Central Archaeological Library_asi_new Delhi
Shree Mad Anuyogdwar Sutra
Front matter
Bd
-
XLSCG
फाडफाडमा मानना
* अहम् ,
श्रीमद् अनुयोगद्वार सूत्र
HI
(उत्तरार्थ)
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हिन्दी-अनुवाद कर्ता-
जैनमुनि उपाध्याय श्रीआत्मारामजी महाराज
(पंजाबी)
TPh2.
Anul Atm
वीर निर्वाण सं० २४५८
विक्रम संवत् १६८८
ईस्वी सन् १६३१
प्रथम संस्करण
मूल्य-4
सदुपयोग
५००
NEETHERE IS FIRESHEELERHILESHEELES
MMUNSHPRARMA
प्रकाशक- श्रीमान् (भक्त) लाला मुरारीलालजी-चरणदासजी जैन; पटियाला स्टेट। DELHI. LEG. No....4.2.42....... २.२...J.C1965... 4...P.A2). Aam RITHVENXNXNX.10 पद्मसिंह जैन अध्यक्ष श्रीमज्जैन शास्त्रोद्धार प्रिंटिंग प्रेस, जौहरी बाजार आगर ceived Arom mys Alekroll la Poola Compresy d. 01/16 Poets 2 प्राक पाक्तया । प्रिय सुज्ञ पुरुषो! मनुष्य पर्याय पाकर जीव ने यदि प्रात्मकल्याण-आत्म संशोधन-आत्मो- नति- परमात्मपदप्रतिष्ठान नहीं किया, जिसे कि उसने आजतक नहीं किया है और भोगोपभोगों में ही सर्वथा-सर्वदा व्यस्त रहा, जैसा कि अनादिकाल से वह प्रायः रहतो चला आया है, तो कहना चाहिये कि एक तरह एक तरह से उस ने कुछ भी नहीं किया और इस मनुष्य पर्याय को, जो क सर्व पर्यायों में श्रेष्ठ है तथा जिस के लिये इन्द्रादि देव भी तरसते रहते हैं, व्यर्थ हो गँवाया। मनुष्य पर्याय को व्यर्थ गँवा देना ठीक वैसा ही है जैसा कि एक मणि के टुकड़े को समुद्र में डाल देना । एक बार हाथ में आए हुए मणिकरण का समुद्र में पटक देने से जैसे उस का पुनः मिलना दुर्लभ है, वैसे हो मनुष्य पर्याय को भी एक बार पाकर उसका सदुपयोग न करना व समुद्र में डाल देने के बराबर है, वहां से उस का पुनः प्राप्त करना दुर्लभ है । आत्मविकास आत्मा तभी कर सकता है, जब उसे आत्मा का स्वरूप, आत्म विकास के साधन आदि ज्ञात हों। श्रात्मा का स्वरूप भौर भात्मविकास के साधनों का ज्ञान प्रात्मा को अध्यात्म साहित्य के अवलोकन, पठन-पाठन, मनन आदि से हो हो सकता है। देश-विदेश के समाचारों का ज्ञान मनुष्य को जैसे समाचार पत्रों से होता है, कृषि का ज्ञान मनुष्य को जैसे कृषि शास्त्र से होता है; काम की बातों का ज्ञान मनुष्य को जैसे कामशास्त्र से होता है, उसी तरह आत्मा का ज्ञान और श्रात्मोन्नति के साधनों का ज्ञान मनुष्य को अध्यात्मशास्त्र से होता है। उपस्थित प्रन्थ-'श्रीमदनुयोगद्वार सूत्र' अध्यात्म ग्रन्थ ही है। अध्यात्म प्रेमियों द्वारा यह रचा गया है । प्रम्थ कठिन नहीं है। हालां कि लोगों को वह कठिन प्रतीत होगा। कठिन प्रतीत होने का तो कारण यह है कि जिस विषय की ओर लोगों को रुचि नहीं होती, वह उन्हें कठिन ही प्रतीत होता है। भोर जिधर प्रीति होती है, वह विषय सरल प्रतीत होता है-उसको कठिनाइयाँ फिर कठिनाइयों नहीं रहतीं । अन्त में इतना लिख कर इम इन पंक्तियों को यहाँ समाप्त करते हैं कि- प्रत्येक व्यक्ति को स्वकीय जीवन सम्यग् दशन और सम्यग् चरित्र से अलंकृत करना चाहिये । इस सूत्र में सभ्यग ज्ञान और दर्शन का भलो भांति स्वरूप वर्णित किया गया है तथा संक्षेप में सम्यग् चारित्र का भी वर्णन किया गया है। अतः सब से पूर्व इस सूत्र का अध्ययन करना चाहिये । चार प्रमाण, नव वाद, तथा अन्य नाना प्रकार के विषयों के अध्ययन करने से सम्यग ज्ञान और सम्यग दर्शन की भली भांति प्राप्ति हो सकती है। और निज मात्मा का विशए प्रकार से बोध हो सकता है। हिन्दी अनुवाद करने का तात्पर्य यही है कि प्रत्येक प्राणी इस सूत्रज्ञान का अनुभव कर सके और फिर स्वकीय अात्मा को सम्यग् दर्शन, सम्यग् ज्ञान और सम्यग चारित्र से सुशोभित कर मोक्षाधिकारी बन सके। भवदीय:- जैनमुनि उपाध्याय आत्माराम ।
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धन्यवाद। mms 'श्री श्वेताम्बर-स्थानकवासी-पाल इण्डिया जैन कान्फन्स' के सिकन्दरावाद वाले अधिवेशन में स्वर्गीय राजाबहादुर लालाजी श्रीमान् सुखदेवसहायजी ने जैन सिद्धान्तों को प्रकाशित करने के लिए 'कान्फन्स' को जिस समय एक प्रेस दिलाया था उस समय 'कान्फन्स' की सूचनानुसार जैनमुनि उपाध्याय श्रीवात्मारामजी महाराज ने श्रीमद्नुयोगद्वार सूत्र का हिन्दी अनुवाद करके 'कान्फन्स' को समर्पण किया था। 'कान्फन्स' ने उस का कुछ हिस्सा पूर्वार्ध' के नाम से प्रकाशित करके 'कान्फन्स प्रकाश' के ग्राहकों को उपहार में वितरण किया और उस का शेष भाग यों ही रख छोड़ा । इस बात को १३-१४ वर्ष होने आये। सूत्र के अप्रकाशित भाग को 'कान्फन्स' से हम ने मँगा लिया। लेकिन वह हमारे पास भी बहुत समय तक यों ही रक्खा रहा। एक अवसर पर इस के प्रका- शक महोदय ने इस को प्रकाशित करने के लिए ५००) रुपयों की उदारता दिखलाई थी। लेकिन इतना बड़ा काम इतने से रुपयों में होना अशक्य था। अतएव उस समय भी हमें ठहरना पड़ा। एक समय आगरा निवासी श्रीयुत बाबू पद्मसिंहजा जैन, अध्यक्ष -'श्री- मज्जैनशास्त्रोद्वार प्रिंटिंग प्रेस' और प्रकाशक-'श्रीजैनपथ-प्रदर्शक' आगरा महाराज श्री के दर्शनों के लिए यहाँ आए । महाराजजी ने यह बात उन के सामने रक्खी । घर का प्रेस होने के कारण आप ने इस कार्य को शीघ्र पूरा प्रकाशित कर सकने का वचन दिया । तदनुसार उक्त प्रन्थ आप को दिया गया और आप ने तत्काल कार्य प्रारम्भ कर दिया। लेकिन थोड़े ही दिनों बाद आप पर भी कई कठिनाइयाँ ऐसी आन पड़ी कि जिन के कारण ग्रन्थ के प्रकाशित होने में फिर भी विलम्ब हो गया। श्रीयुत बाबू पद्मसिंहजी को जिस समय यह प्रन्थ छापने के लिए दिया गया था उस समय इसे लगभग ३०-३२ फार्म का समझा गया था परन्तु छपने पर यह ४० फार्म का बैठा। लेकिन फिर भी उक्त महानुभाव ने अपने वचनानुसार इसे पूर्ण ही छाप कर प्रकाशित किया । एतदर्थ श्राप को धन्यवाद है। ।
दूसरा धन्यवाद श्रीमान् (भक्त) लाला मुरारीलालजी व श्रीमान् लाला चरणदासजो को है। ये दोनों भाई पटियाला निवासी श्रीमान् लाला जगतरामजी के भतीजे हैं। श्रीमान् लाला जगतरामजी के एक छोटे भाई लाला कुन्दनलालजी थे । श्रीमान् भक्त लाला मुरारीलालजी और श्रीमान लाला चरणदासजी उन्हीं के सुपुत्र हैं। श्रोमान भक्त लाला मुरारीलाजी के सुपुत्र श्रीमान् श्यामलालजी हैं। श्रीमान् लाला जगतरामजी एक प्रसिद्ध व्यापारी थे। आप की आजकल विभिन्न स्थानों में पाँच दुकाने चल रही हैं। आप एक माननीय जैन गृहस्थ थे। पाठकों को जान कर आनन्द होगा कि श्रीमदनुयोगद्वार सूत्र का यह शेषांश 'उत्तरार्ध' के नाम से उन्हीं श्रीमान् लाला जगतरामजी की स्मृति में उन के भतीजे श्रीमान् (भक्त) लाला मुरारीलालजी और श्रीमान् लाला चरणदासजी ने प्रकाशित करवा कर परम पुण्य उपार्जन किया है। एतदर्थ हम श्रीमान् लाला (भक्त) मुरारीलालजी और श्रीमान् लाला चरण- दासजी को हार्दिक भावों से धन्यवाद देते हैं और साथ ही प्रत्येक जैन बन्धु से सानुरोध निवेदन करते हैं कि वे उक्त महानुभावों का अनुकरण करके श्रीभगवद्- भाषित शास्त्रों का जनता में प्रचार करके मोक्षादि के अधिकारी बनें। इस सूत्र का पूर्वार्द्ध आज से १०-१२ वर्ष पहिले जिस रंग ढंग से प्रकाशित हुआ था उसी रंग ढंग से उसके उत्तरार्द्ध को भी प्रकाशित किया गया है । और भागे जो सूत्र उपाध्यायजा लिख रहे हैं वे सब मूल पाठ, संस्कृत छाया, शब्दार्थ, भावार्थ, सरल हिन्दी विशषार्थ और टिप्पणी आदि सहित लिख रहे हैं । इस समय श्रादशवै कालिकसूत्र तो हैदराबादनिवासी लालाजी ज्वालाप्रसादजी की उदारता से छप रहा है और 'श्रीउत्तराध्ययन सूत्र' भी लिखा रखा है। आशा है कोई धर्म- साहित्य प्रेमो उस के प्रकाशित कराने का भार लाला ज्वालाप्रसादजो के समान लेकर अपने धर्मप्रेम और साहित्यप्रेम का परिचय देंगे। अन्त में निवेदन है कि इस सूत्र में दृष्टिदोष से प्रूफसंशोधकों की भूल से या असवज्ञता के कारण कोई दोष रह गया हो तो विद्वान् सूचित करने की कृपा करें, जिस से भविष्य में उस सुधार का ध्यान रखा जाय। भवदीय- दीपावली गूजरमल प्यारेलाल जैन, सं० १९८ वि. चौड़ा बाजार-लुधियाना। ।
* श्रोवर्धमान नमः * का (उत्तरार्ध) ब्राय हमारा विनय । maar-BHIMROshe से कितं पमाणे? चउविहे पण्णते, तं जहा-१ दव्वप्पमाणे, २ खेन्तपमाणे, ३ कालप्यनाणे, ४ भावप्पमाणे। से किं तं दव्वप्पमाणे ? दवप्रमाणे दुविहे पण्णते, तं जहा पदेसनिप्फन्ने, विभागनिष्फन्ने य । से किंतं पदेस- निष्फन्ने ? परमाणुपोग्गले दुपएसिए जाव दसपएसिए संखिज्जपएसिए असंखिज्जपएसिए अणंतपए सिए से तं पदेसनिष्फन्ने । से किं तं विभागनिष्फन्ने? पंचविहे पण्णत्ते, तं जहा-माणे १,उम्माणे २, अवमाणे ३, गणिमे ४, पडिमाणे ५ । से कितं माणे ? दुविहे पएणत्ते, तं जहा-१ धन्नप्पमाणे, २ रसप्पमाणे य से कि तं धन्नप्पमाणे। दो असईओ पसइ, दो पसईओ सेतिया, चत्तारि सेइ- आओ कुलो, चत्तारि कुलया पत्थो चत्तारि पत्थया ओढगं, चत्तारि आढगा दोणी, सटिआढगाइं जहन्नकुंभे, असीति आढयाई मज्झिमकुभे, आढयसयं उक्कोसए कुभे, अट्टय. अठयसत्तिए वाहे । एएणं धन्नमाणप्पमाणेणं किं पउयणं ? एएणं धन्नप्पमागाण मुत्तोलिमुखइदुरअलिंदअवयाणं संसियोणं धराणाणं घिरापमाणप्पमाणनिव्वति.लक्खणं भवइ, से तं धन्नमाणप्पमाणे २ । [श्रीमवनुयोगद्वारसूत्रम् ] पदार्थ-(से किं तं प्पमाणे ? चविहे पन्नत्ते, तं जहा) प्रमाण किसे कहते हैं ? 'परि- मीयते परिच्छिद्यते धान्यद्रव्याद्यनेनेति प्रमाणमसतिप्रसृत्यादि' ।। जिसके द्वारा धान्यादि वस्तुओं का प्रमाण किया जाय उसे 'प्रमाण' कहते हैं । अथवा प्रत्येक पदार्थों का जिसके द्वारा प्रमाण किया जाता है उसे 'प्रमाण कहते हैं। यह करणसाधन है और चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है। जैसे कि-( दव्वप्पमाणे ) द्रव्य के विषयमें जो प्रमाण किया जाय उसे 'द्रव्य प्रमाण' कहते हैं। इसी प्रकार (खेत्तप्पमाणे) क्षेत्र प्रमाण ( कालप्पमाणे ) काल प्रमाण ( भावप्पमाणे ) भाव प्रमाण (से किं तं दवप्प- माणे ? दुविहे पन्नत्ते, सं जहा) द्रव्य प्रमाण किसे कहते हैं ? द्रव्यों का जो प्रमाण किया जाय उसे 'द्रव्य प्रमाण' कहते हैं । वह दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है। जैसे कि--(परसनिष्फो विभागनिक य ) प्रदेशनिष्पन्न और विभागनिष्पन्न (से किं तं पएसनिष्पन्न य ) प्रदेशनिष्पन्न किसे कहते हैं ? जो प्रदेशों के द्वारा निष्पन्न हो। जैसे कि-(परमाणु पोग्गले) परमाणु पुद्गल और ( दुपएसिए) द्विप्रदेशिक निष्पन्न स्कन्ध (इसपएसिए जाव) दशप्रदेशिक स्कन्ध(संखेज्जपएसिए) संख्यातप्रदेशिक स्कन्ध (असंखेज्जपए- सिए) असंख्यात प्रदेशिक स्कंध (अणंतपएसिए)अनन्तप्रदेशिक स्कन्ध (से सं पएसानेप्फत्र) सो इसेही 'प्रदेशनिष्फन्न' कहते हैं । ( से किं तं विभागनिप्फन ? पंचविह पएणत्ते, तं जहा ) विभागनिष्पन्न किसे कहते हैं ? जो विशिष्ट प्रकारों तथा नाना प्रकार के असति प्रसूत्यादि द्वारा विभाग किया जाय वह 'विभागनिष्पन्न' होता है । वह पांच प्रकार से प्रतिपादन किया गया है। जैसे कि-(माणे १, उम्माणे २, अत्रमाणे ३, गणिमे पडि- माणे ५) मान प्रमाण १, उन्मान प्रमाण २, अवमान प्रमाण ३, गणित प्रमाण ४ और प्रतिमान प्रमाण ५, (से किं तं माणे ? दुविह पएणत्ते, जहा)मान प्रमाण कितने प्रकारका है ? मान प्रमाण दो प्रकार का है। जैसे कि--(धन्नमाणे ) धान्यमान प्रमाण और रसमाणे य) रसमान प्रमाण अर्थात् जिसके द्वारा धान्योंका प्रमाण किया जाय वह 'धान्यमान प्रमाण' और जिसके द्वारा रसों का प्रमाण किया जाय वह 'रसमान प्रमाण' है (से किं तं धरणमाणे य ?) धान्य प्रमाण किस प्रकार से किया जाता है ? (दो असइयो पसइ) दो असृति की एक प्रमृति होती है । असृति उसे कहते हैं जो एक हथेली भर में धान्य आजावे अथवा एक मुष्टि प्रमाण । यह अमृति सर्व मानोंकी आदि- भूत होती है। दो अमृतियों की एक प्रसूति होती है अर्थात् एक प्राञ्जलि अथवा दोनों हाथों का नावाकार जो संपुट होता है उसे 'प्रसूति' कहते हैं । सो इसी प्रकार (दो पसइओ सेईय ) दो प्रसृतियों की एक 'सेतिका' होती है ( चत्तारि से यात्री कुलो) चार सेतियों का एक 'कुडव' होता है ( चत्तारि कुलयो पत्थो) और चार कुड़वों ४, ।
३ [उत्तरार्धम् ] का एक 'प्रस्थ'-'पाथा' होता है (चतारि पत्था आढगा) चार पाथोंका एक 'आढक' होता है और (चत्तारि श्रादगाई दोणी) चार प्राढक की एक 'द्रोणों होती है (सटि- भाढगाई जहन्नए कुभे ) साठ आढक का एक 'जघन्य कुभ होता है और (असीए आढ- गाई मज्झिमए कुभे) अस्सी आढकों का एक 'मध्यम कुभ होता है (पाढगसयं उको- सए कुभे) और सौ आढकों का एक 'उत्कृष्ट कुभ होता है (अट्टयथाढयसइए वाहे) आठ सौ आढकों का एक 'वाह' होता है ( एए णं धन्नमाणटपमाणेणं किं पञ्यणं ! ) इस धान्यमान प्रमाण के वर्णन करने का क्या प्रयोजन है ? (एएणं धनप्पमाणेणं) इस धान्यमान प्रमाण के द्वारा (मुत्तोलि मुख) मुक्तोली मुख (इंदुर) इंदुर (अलिन्द) आलिंद (अपपार) अपचार ( संसियाणं) इनके आश्रित (धन्नाणं) धान्यों का (धएणमाण. प्पमाण ) धान्य मान प्रमाण की (निव्वत्तिलकवणं भवइ) निवृत्ति लक्षण होती है अर्थात् उक्त प्रकार से धान्यों के परिज्ञान की सिद्धि उत्पन्न होती है। (से तं धन्नमाणप्पमाणे ) वही 'धान्य मान प्रमाण है। भावार्थ-जिसके द्वारा वस्तुओंका प्रमाण किया जाय उसको 'प्रमाण' कहते हैं। वह चार प्रकार का है। जैसे-द्रव्य प्रमाण १, क्षेत्र प्रमाण २, काल प्रमाण ३, भाव प्रमाण ४ । द्रब्य प्रमाण दो प्रकार का है--एक प्रदेशनिष्पन्न, द्वितीय विभागनिष्पन्न । एक प्रदेशी परमाणु पुद्गल से लेकर अनन्त प्रदेशी स्कंध पर्यन्त सर्व प्रदेशनिष्पन्न होता है। विभागनिष्पन्न पांच प्रकार का है। जैसे कि-मान प्रमाण १, उन्मान प्रमाण २, अवमान प्रमाण ३, गणित प्रमाण ४, प्रतिमान प्रमाण ५ । मान प्रमाण दो प्रकार का है। जैसे कि-धान्यमान प्रमाण और रसमान प्रमाण । धान्यमान प्रमाण के उदाहरण निम्न प्रकार हैं:-दो असृतियों की (दो हथेलियों की) एक 'प्रसूति होती है । संपुटाअलि नावाकार दो प्रसूतियों की एक 'सेतिका' होती है। चार सेतियों का एक 'कुड़व', चार कुड़वों का एक 'पाथा' (प्रस्थ ) होता है । और चार पाथों का एक 'श्राढक' और चार श्रादकों की एक 'द्रोणी' होती है। साठ आढकोका एक 'जघन्य कुभ' होता है । अस्सी आढकों का एक 'मध्यम कुम' और सौ श्राढको का एक 'उत्कृष्ट कुभ होता है और पाठसौ आढको की एक 'वाह' होती है। ये सब प्रमाण मगध देश की अपेक्षा से कहा गया है। इस का प्रयोजन केवल इतना ही कि जो धान्यों की कोठी, जिसका मुख ऊपर विस्तीर्ण नहीं होता, मध्य विस्तीर्ण होता है अथवा वंशमय पात्र अथवा दीर्घ कोठी इत्यादि स्थानों में उक्त प्रमाणों से धान्यों का प्रमाण किया जाता है। फिर उस के शान की निष्पत्ति होती है। इसे ही धान्यमान प्रमाण कहते हैं । ।
[श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् । - प्रथा रस मधाचा विषय । से किं तं रसमाणप्पमाणे ? धन्नमाणप्पमाणओ चउ- भागविवडिए अभित्तरलिहाजुत्ते रसमाणप्पमाणे विहिज्जइ तं जहा-चउसटिया ४, बत्तीसिया ८, सोलसिया १६, अट्ठभाइया ३२, चउमाइया ६४, अद्धमाणी १२८, माणी २५६, दो चउसट्रियाउ पत्तीसिया, दो बत्तीसियाओ सोल. सिया, दो सोलसियाओ अटुभाइया, दो अटुभाइयाओ चउभाइया, दो चउमाइयानो अद्ध माणी, दो अद्धमाणीयो माणी। एएवं रसमानापमाणेणं किं पोयणं ? एएणं रसमाणप्पमारणे वारक १, घडक १, करक ३, कलस ४, ककरिय५, दइय ६, कुदिए ७, करोडि ८, संसियाणं रसाणं रसमाणप्पमापनिव्वत्तिलक्खणे भवइ । सेतं रसमाणप्पमाणे, सेतंमाणे। पदार्थ-(से कि : रप्तमाणप्रमाणे ? ) रसमान प्रमाण किसे कहते हैं ? जैसे (धन्नमाणपमाणो) धान्यमान प्रमाण से ( चउभा ववढिर ) चतुर भाग अधिक और ( भित्तरसिहाजुले भवइ ) अभ्यन्तर शिखा युक्त होता है क्यों कि रसमान प्रमाण द्रवीभूत होने से अभ्यन्तर शिखा युक्त ही होता है । इसको बाहर शिखा नहीं होती वह (रसमाणप्पमाणे) रस मान प्रमाण से चतुर्भागाधिक अभ्यन्तर शिखायुक्त होता है जैसे कि--(चउसट्टिया ४) चार पल प्रमाण 'चतुष्वष्ठिका होती है ( बत्तीसिया ८) आठ पल प्रमाण 'द्वात्रिंशिका' होती है ( लोलसिया १६ ) सोलह पल प्रमाण 'षोड. शिका' और ( अट्ठभाइया) द्वात्रिंशत् पल प्रमाण 'अष्ठभागिका' होती है (चउभाइया) चौंसठ पल प्रमाण 'चतुर्भागिका' (अदमाणी ) एक सौ अट्ठाईस पल प्रमाण 'अर्द्धमानी होती है और दो सौ छप्पन पल प्रमाण 'माणी' होती है। (दो चरस- ट्टियानो वत्तीसिया ) दो चतुःषष्टिका से एक 'बत्तीसी' होती है अर्थात् माणी का बत्तीसवां भाग होता है (दो बत्तीसियाओ ) दो बत्तीसियों से (सोलसिया ) माणी का सोलहवां भाग होता है और ( दो सोलसियाओ अभाइया ) दो षोडशिकाओं से माणी [उत्तराधेम्] । . का आठवां भाग होता है ( दो अठभाइयायो चउभाइया ) दो आठ भागिकाओं से एक चतुर्भागिका होती है ( दो चरभाइयाओ) दो चतुर्भागिकाओं से (अढमाणी ) अर्द्धमाणी होती है और (दो अदमाणीयो) दो अर्द्धमाणी से (माणी) दो सौ छप्पन पल प्रमाण की एक माणी होती है ( एएणं रसभाणप्पमाणेणं किं पोयणं ?) इस रस मान प्रमाण के कथन करने का प्रयोजन क्या है ? (एएणं रसमाणममाणेणं वारक १, घडगर, करक ३, कलस ४, ककारिय ५, दइए ६, कुडिय ७ करोडिसंसियाणं रसाणं रसमागप्प- माणनिव्वत्तिलक्खणं भवइ, से तं रसमाणप्रमाणे । से तं माणे ) इस रसमान प्रमाणसे वारक घट, कलश, करक, गर्गरोगागर, दतिक-चम मयभाजन-मशक, कुडिका और कुंडा इत्यादि के आश्रय भूत जो रस हैं उन रसों के रसमान प्रमाण की उक्त प्रमाण से ही सिद्धि होती है । इसी लिये इसे 'रस मान प्रमाण' कहते हैं। भावार्थ-रसमान प्रमाण धान्यमान प्रमाण से चतुर्भागाधिक होता है और उसकी श्राभ्यन्तर ही शिखा होती है। उसके लिये निम्नलिखित प्रमाण कथन किया गया है। जैसे कि चार पल प्रमाण चतुःषष्ठिका होती है, आठ पल प्रमाण द्वात्रिंशिका, षोडश पल प्रमाण पोडशिका, द्वात्रिंशत् पल प्रमाण अष्टभागिका, १२८ पल प्रमाण अर्द्धमाणी और २५६ पल प्रमाण माणी होती है। अतः दो चतुः पष्ठिका की एक द्वात्रिंशिका और दो द्वात्रिंशिका की एक षोडशिका होती है। फिर दो षोडशिकाओं की एक अष्टभागिका, दो अष्टभागिकाओं की एक चतुर्भागिका, दो चतुर्भागिकाओं की एक अर्द्धमाणी और दो अर्द्धमाणियों की एक माणी होती है । यह सब मान मगध देश की अपेक्षा से है । इसका मुख्य प्रयोजन वारक, घट, करक, कलश, गर्गरी, इति, कुडिका और कुडादि में जो रस भरा रहता है उसकी नाप जानना है । इसीलिये इसे 'रसमान प्रमाण' कहते हैं। अथ उन्मान धमाशा विषय । से किंतं उम्माणे? जगणं उम्मिणिजइ, तं जहां-अद्ध करिसो १, करिसो २, अद्धपलं ३, पलं ?, अद्धतुला ५, तुला ६, अद्धभारो ७, भारो ८, दो अद्धकरिसो करिसो, दो करिसो अद्धपलं, चुत्तर पलसइया तुला, दस तुलाईप्रोअद्ध भारो,वीसं तुलाओभारो,एएणंउम्माणप्पमाणेणं किं पोयणं?
६ [श्रीमद्नुयोगद्वारसूत्रम् ] एएणं उम्माणप्पमाणेणं पत्ता १, अगर २, तगर ३, चोयए ४, कुंकुम ५, खंड ६, गुल ७, मच्छंडियाइणं ८, दव्वाणं निव्वत्तिलक्खणं भवइ, से तं उम्माणे । पदार्थ--(से किं सं उम्माणे ? जएण उम्मिणिज्जइ, तं जहा) उन्मान किसे कहते हैं ? जिस करके उन्मान किया जाता है उसे ही उन्मान कहते हैं। उसका प्रमाण निम्न प्रकार है:-( अद्धकरिसो १, करिसो २ ) पल के आठवें भाग को अर्द्ध कर्ष कहते हैं, पल के चौथे भाग का नाम कर्ष है और ( अहपलं पलं ) पल के अर्द्ध भाग का अर्द्ध पल कहते हैं और ( अद्धतुला तुला ) अर्द्ध तुला, तुला ( अदभारो भारो) अद्ध भार और भार , ये सर्व अनुक्रम पूर्वक इस प्रकार हैं। जैसे कि--(दो ग्रह करिसो करिसो) दो अर्द्ध कर्षों का एक कर्ष (दो करिसी अडपलं ) दो कर्षों का अर्द्ध पल और (दो अदपलं पर्व ) दो अर्द्ध पलों का एक पल होता है अतः (पंचुत्तरपलस्सईया तुला) १०५ पल की एक तुला होती है ( दसतुलाइयो श्रद्धभारो) दश तुला का अर्ध भार और ( वीसंतुलानो भारो) बीस तुला का एक भार होता है। (एएणं उम्माणप्पमाणेण किं पउयणं) ? इस उन्मान प्रमाण के कथन करने का क्या प्रयोजन है ? (एएणं उन्माणपमाणे पत्ता अगर तार चं.पए कुशुम खंड गुड मच्छडिवाइर दवाणं) इस उन्मान प्रमाण से पत्र, अगर, तगर, चोक-औषधविशेष-कुकुम, केशर, खांड़, गुड़, मिसरी, श्रादि द्रव्यों की ( उग्माणप्पमाणनि वत्तिलक्खणं भवइ ) उन्मान प्रमाण से सिद्धि होती से तं उम्माणे ) उसे ही उन्मान प्रमाण कहते हैं। । भावार्थ-उन्मान प्रमाण उसका नाम है जिसके द्वारा पदार्थों का उन्मान किया जाता है और पदार्थ उन्मान प्रमाण में स्थापन किये जाते हैं। जैसे कि-- भई कर्ष १, कर्ष २, अद्ध पल ३, पल ४, अर्द्ध तुला ५, तुला ६, अर्द्धभार ७, भार = । दो अर्द्धकर्षों का एक कर्ष होता है, दो कर्षों का अर्द्ध पल होता है, दो अपलों का एक पल होता है, १०५ पलों का एक तुला होता है और दश तुलाओंका अर्द्ध भार होता है । सो इस प्रमाण का मुख्य प्रयोजन यह है कि-जो पत्र, अगर, तगर, चोक, कुकुम, खांड, गुड़, चोक, कुकुम, खांड, गुड़, मिसरी श्रादि द्रव्य हैं उनके प्रमाण की सिद्धि की जाती है। इसी लिये इसे उन्मान प्रमाण कहते हैं।
. [ उत्तरार्धम् ] अथ अवमान और गणित प्रमाण विषय । से किं तं अवमाणे ? जगणं अवमिणिज्जइ, तं जहा हत्थेण वा १, दंडेण वा २, धणुएण वा ३, जुगेण वा ४, नालि- या वा ५, अक्खेण वा ६, मूसलेण वा ७, दंडं धणु जुगना- लियं अक्खमुसलं च चउहत्थं दस नालियं च रज्जु बिया- णमो उम्माणसंन्नाए १ वत्थुमिहत्थमिजं च्छेत्तं दंड धणु च पत्थमिखायं च नालिए वियाण उम्माणसंन्नाए । एएणं अवमाणप्पमाणेणं किं पउयणं ? एएणं अवमाणप्प- माणेणं खायचियकरकवियकडपडभित्तिपरिक्खेव संसि- याणं दव्वाणं अवमाणप्पमाणनिव्वत्तिलक्खणं भवइ, सेतं भवमाणे। से किं तं गणिमे ? जेणं गणिज्जइ, तं जहा-एगो- दस सय सहस्सं दससहस्सं सहसहस्सं दसप्सयसहस्साई कोडी। एएणं कम्मेणं गणिमप्पमाणेणं किं पउयणं ? एएणं गणिमप्पमाणेणं भयगभइभत्तवेयणायव्वयनिस्सि- याणं दव्वाणं गणिमप्पमाणेणं निव्वत्तिलक्खणं भवइ, से तं गणिमे ॥ ४॥ पदार्थ-(से किं तं श्रवमाणे ? जन अवमिणिज्जइ, तं जहा ) अवमान किसे कहते हैं ? जिसके द्वारा अवमान किया जाय उसे अवमान कहते हैं। यह सर्व कथन कर्मसाधन की अपेक्षा से किया जाता है। जैसे कि--(हत्थेण वा) चतुविंशति अंगुल प्रमाण हस्त होता है उस हस्त करके पदार्थों का अवमान किया जाता है (दंडेण वा ) चार हस्त प्रमाग दंड होता है, उस दंड करके अथवा (धणुएण वा) धनुष करके (जुगेण वा ) युग करके ( नालियाए वा ) नालिका करके (अक्खेण वा ) अक्ष करके (मूसखेण वा) मुशल करके, सो यह सर्व (दंडं धणुं जुग नालि। अक्ख मुसलं व चउहत्थ) दंड, धनुष, युग, नालिका, अल, मुशल, इन छहों की एक ही संज्ञा है, और ये सर्व हस्त प्रमाण होते हैं, अथवा धनुष के छह नाम हैं। ये सर्व 8 अंगुलप्रमाण । चार ।
-- [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] होते हैं और ( दसनालिये च र४) दश नालिका से एक रज्जु उत्पन्न होती है । अर्थात रज्जु दश नालिका प्रमोण होती है सो (वियाण अवमाणसंनाए ?) इस प्रकार से जानना चाहिये । यही अवमान की संज्ञा है। ( वथुमिहत्थमिज्ज) हाट, वास्तु, घर, यावन्मान भूमि गृह हैं । वे सर्व भूमि गृह हस्तादि से गिने जाते हैं। इसलिये सूत्र में हस्त शब्द आया है और (च्छेत द) क्षेत्र कृषि कर्मादि विषयक भूमि का मान दंड से किया जाता है । ( णुं च पंथमि ) धनुष से पंथादि का मान किया जाता है, जैसे कि जब मार्ग का प्रमाण किया जाता है तब धनुष आदि के द्वारा ही मान करते हैं और ( खायं च नालियाए ) खाई कूप आदि का प्रमाण नालिका से किया जाता है तथा नालिका प्रमाण दंड से किया जाता (वियाण अवमाणसंन्नाए ) इस प्रकार अवमान प्रमाण में दंडादि का प्रमाण जानना चाहिये । अवमान संज्ञा इन्हींकी जाननी चाहिये । (एएणं अवमाणपमाणेणं किं पयोयणं)? इस अवमान प्रमाण के कहने का क्या प्रयोजन है, ( एएणं अवनाणप्पमाणेणं ) इस अवमान प्रमाण से (खाय) खाई कूपादि (चय ) इट्टादि रचित प्रासाद ( करकविय ) करवत से विदारित काष्ठादि (कड) कट मंचादि ( पड ) वस्त्र (मित्त) भोत (परि- क्खेव) नगरादि को परिधि (संसियाणं दवणं अवमाणप्पमाणनिव्वत्तिलक्खणं भवइ) इत्यादि के आश्रित द्रव्यों के अवमान की जो सिद्धि निष्पन्न होती हैं ( से तं अवमाणे ) वही अवमान प्रमाण है अर्थात् उक्त स्थानों में जो भूमि वा द्रव्य हैं उनका नाप उक्त प्रमाण से किया जाता है, इसीलिये इसे अवमाण प्रमाण कहते हैं और उक्त पदार्थों के ज्ञान को प्राप्त होना, यही इसका लक्षण है । (से किं तं गाणमे ? जेणं गणिज्जइ, तं जहा) गणिम प्रमाण किसे कहते हैं ? गणिम प्रमाणके द्वारा गणना की जाती है। यह कथन भीकर्मसाधन की अपेक्षा से ही है। जैसे कि (एगो दस सय) एक-१,दश-१०,सौ-१००, (दससहस्सं ) दश सहस्र १०००० (सयसहस्सं) एक लाख १००००० (दससयसहस्साई) दश लक्ष १०००००० (कोडी) क्रोड १०००००००, ये सब गणनाएँ दशगुणा करने से होती हैं ( एएणं कम्मेणं गणिभप्पमाणेणं किं पञ्एणं ? ) इस अनुक्रम गणिम प्रमाण से क्या प्रयोजन है? (एएणं गणिमप्पमाणेणं) इस गणिम प्रमाण से ( भयगभइभत्तवेयण) भृतक वृत्ति, भोजन देना और वेतन देना अथवा (आयब्वय) आमदनी और खर्च (निस्तियाणं दवाणं गणिमप्पमाणेणं निव्वत्तिलक्खणं भवा, से तं गणिमें) इनके आश्रित जो भृतकों को वेतनादि जो दिये जाते हैं वे सर्व गणिम प्रमाण के द्वारा ही कार्य सिद्ध होते हैं तथा श्राय व्यय का जो मूल साधन है वह भी गणिम प्रमाण के द्वारा ही सिद्ध है और सांसारिक व्यवहार सर्व गणिम प्रमाण के ही आश्रित हैं। करोड पर्यन्त गणना की गई है किन्तु सर्व संख्या १९४ अक्षर पर्यन्त है Lसचिव । । । भावार्थ--अवमान प्रमाण के द्वारा वस्तुओं का प्रमाण किया जाता है। जैसे कि-हस्त से १, दंड से २, धनुष से ३, युग से ४, नालिका से ५, अक्ष से ६, और मुशल से ७। हस्त का प्रमाण २४ अंगुल का होता है और दंडादि छहों, चार हस्त प्रमाण होते हैं । भूमि, गृह आदि का हस्तादि से अवमान किया जाता है । क्षेत्र कृषि कार्यादि के वास्ते दंडादि से प्रमाण किया जाता है। राजमार्ग को धनुषके द्वारा मान करते हैं। खाई और कूपादि स्थान का नापना नालिका से किया जाता है। अतः इनके कथन का मुख्य प्रयोजन यही है कि खाई, इष्टकादि से प्रासाद का बनाना, काष्टादि का विदारण, कट, पट, भीति, परिधि इत्यादि की सिद्धि अवमान प्रमाण के द्वारा की जाती है तथा उक्त स्थानों में जो द्रब्य आश्रित हैं उनका प्रमाण भी उक्त प्रमाण के ही द्वारा होता है। इसी को अवमान प्रमाण कहते हैं। और गणिम प्रमाण निम्न प्रकार से है। जैसे कि एकर, दश १०, सौ १००, सहस्र १०००, दश सहन १००००, लक्ष १०००००, दश लक्ष १०००.००, कोटि १०००००००, इनको उत्तरोत्तर दशगुणा करनेसे निश्चितार्थ की सिद्धि होती है और इसका मुख्य प्रयो- जन |भृतक आदिकों को वेतन देना और अपनी अाय व्यय की सँभाल करना है। इसी को गणिम प्रमाण कहते हैं। तथा यावन् मात्र द्रव्य हैं उनकी भी संख्या उक्त प्रमाण द्वारा हो की जाती है। अथ प्रतिमान प्रमाणा विषयः । से किं तं पडिमाणे ? जएणं पडिमिणिज्जइ, तं जहा गुंजा १, कांगणी २, णिफावो ३, कम्ममासो ४, मंडलओ ५, सुवन्नो ६, पंच गुजाओ कम्ममासो, चत्तारि कांगणी- प्रो कम्ममासओ, तिरिण निफ्फावो कम्ममासमो, एवं च उक्को कम्ममासो, वारस कम्ममासओ मंडलओ, एवं अडया- लीसाय कांगलीओ मंडलो, सोलस्स कम्ममासगा सुवन्नो, एवं चउसट्टिए कांगणीओ सुवन्नो, एएणं पडिमा- णप्पमाणेणं किं पउयणं? एएणं पडिमाणप्पमाणेणं सुवण १, , गुजा को 'काकरणो' कहते है २, (निफावो) त्रिभागोन दो गुजाओं के प्रमाण रजत २, “ब ३,अणि ४, मोत्तिम, संक्ख ६, सिलप्पवाला- इयाणं ७ दव्वा पडिमाणप्पमाणलिवत्तिलक्षणं भवइ । से तं पडिमाणो से तं विभाग निष्फन्ने से तं दव्वप्पमाणे॥ पदार्थ--(से कि तं पडिमाणे ? जएणं पडिमिणि जइ, तं जहा-) पूतिमान किसे कहते हैं ? जिस करके सुवर्ण आदि पदार्थों का मान किया जाता है उसे 'पूतिमान' कहते हैं जैसे कि-(गुजा) रक्तिका १ (कागणी ) सपाद को 'निष्पाव' कहते हैं ३, (कम्ममासो) तीन निष्पावों का एक कर्ममाषक' होता है ४, ( मंडलओ) द्वादश कर्ममाषकों का एक 'मंडल' होता है ५, (सुवन्नो) षोडश कर्म मापकों का एक 'सुवर्ण' होता है अर्थात् षोडश कर्ममाषकों का एक सोनईया होता है ६ । उक्त अर्थों को सूत्र ही विस्तारपूर्वक कहता है जैसे कि--(पंच जाश्री कम्ममासी) पांच रक्तिकाओं का एक कर्म भाषक होता है अथवा ( चत्तारि कांग- रगोश्रो का समासपी) चार कांकणियों का एक कर्ममाषक होता है, (तिमिण निप्फावो कम्ममासो) तोनों निष्पावों का एक कर्ममाषक होता है ( एवं चउको कम्म- मासो) इसी प्रकार चार कांकणिोंका एक कर्ममाषक होता है। ऊपर जो तीनों प्रकार से कर्ममाषक का विवरण किया गया है उसमें जिस कर्ममाषक को कहने को वक्ता की इच्छा हो उसे ही ग्रहण करके एक इष्ट कार्य की सिद्धि कर लेता है। इसीलिये अर्थ के भेद न होने से उसे चतुष्क कर्ममाषक' कहते हैं। ( वारसकम्ममासो मंडलो) द्वादश कर्ममाषकों का एक 'मंडलक' होता है (एवं अडयालीसाय कांगणियो मंडलो ) इसी प्रकार अड़तालीस कांकणियों का भी एक मंडलक होता है (सोलस कम्ममासगो सुवन्नो) षोडश कर्ममाषक का एक सुवर्ण होता है (एवं चउसलिए कांगणोश्रो सुवन्नो ) इसी प्रकार चौंसठ काकणियों का भी एक सुवर्ण होता है ( एएणं पडिमाणप्पमाणेणं किं पयोधणं ? ) इस प्रतिमान प्रमाण के वर्णन करने का क्या प्रयोजन है ? ( एएणं पडिमाणप्पमाणेणं ) इस प्रतिमान के द्वारा ( सुवराण ) सुवर्ण ( रयय ) रजत ( तव ) ताम्र ( मणि ) मणि चन्द्रकान्तादि ( मोत्तिय ) मोती ( संक्ख) संख (सिलप्पवालाइयाणं) शिला-राजपट्टक गंध, प्रवाल आदि (दव्वाणं पडिमाणप्यमाणनिव्वत्तिलक्खणं भवइ ) द्रव्यों के प्रतिमान प्रमाण की सिद्धि की लक्ष्यता होती है और यही इसकी सिद्धि का लक्षण होता है ( से तं पडिमाणे ) इसे ही प्रतिमान प्रमाण कहते हैं (से तं विभागनिष्फन [ उन्तरार्धम् । ११ ७ । यही विभाग निष्पन्न प्रमाण है और (से तं दव्वल्पमाणे) यही द्रव्य प्रमाण का विवरण है अर्थात् पांच विध से विभागनिष्पन्न द्रव्य प्रमाण का समर्थन किया गया। भावार्थ-प्रतिमान प्रमाण उसे कहते हैं जिसके द्वारा सुवर्णादि पदार्थों का मान किया जाता है। जैसे कि-गुजा १, कांगणी २, निष्पाप ,कर्ममाषक ४, मंडलक ५,सुवर्ण ६ । इनका प्रमाण निम्न प्रकार ले है-पांच गुजा का कर्ममा- षक होता है तथा चार कांगणी का भी कर्ममाषक होता है तथा तीनों प्रमाणों से गृहीत वक्ता की इच्छानुसार चतुर्थ संक्षक कर्म माषक है तथा चार कांकणी प्रमाण जो कर्ममाषक वर्णन किया गया है उन द्वादश कर्ममाषकों का एक मण्डलक होता है अड़तालीस कांकणियों को एक मंडल होता है और षोडश कर्म माषकों का एक सुवर्ण ( सोनइया) होता है अथवा चौसठ कांकणियों का एक सुवर्ण होता है। इस प्रमाण के कथन करने का मुख्य प्रयोजन सुवर्ण १, रजत २, तात्र ३ मणि ४, मोती ५, संख ६ आदि पदार्थों के मान करने का ही है इसे प्रतिमान प्रमाण कहते हैं। इसे ही विभागनिष्पा प्रमाण कहते हैं * ! नोट-किन्तु यह प्रमाण मगध देश के अनुसार कहा गया है । इस लिये चरक, सुश्रुत, वाग्भट, भावप्रकाश आदि के अनुसार समायदेश का मान जो शायर ने ग्रहण किया है उसको भी हम यहां पर करते है । स्था: গী ক ন জ্বী ত্ববিদ। न मानेन विना युक्तिव्याणां ज्ञायते क्वचित् । अतः प्रयोगकार्यार्थ मानमयोच्यते मया ॥ १४ ॥ अर्थ-मान परिमाण के विना औषधों की युक्ति-करव्य विधि कहीं नहीं होती। अतएव औषध बनाने के लिये मान-तोलने श्रादि की विधि इस संहिता में कही जाती है:- त्रसरेणु का परिमाण। त्रसरेणुर्बुधैः प्रोक्तस्त्रिंशता परमाणुभिः । त्रसरेणुस्तु पर्यायनान्ना वंशी निगद्यते ॥ १५ ॥ अर्थ-तीस परमाणुओं का 'सरेणु' होता है और उसी को 'वंशी' भी कहते हैं । अन्यत्र भी कहा गया है कि-'जालान्तर्गतैः सूर्यकरैवंशी विलोक्यते' अर्थात् जाली झरोखों में जो सूर्य की किरणों में रज उड़ती हुई दीखती हैं उसको वंशी कहते हैं । वे नेत्रों करके नहीं जाने जाते। MONIA ।
१२ [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] । परमाणु के लक्षण । जालान्तर्गते भानौ यत्सूक्ष्म दृश्यते रजः । तस्य त्रिंशत्तमो भागः परमाणुः सः उच्यते ॥ १६ ।। अर्थ-जाली झरोखे में सूर्य की किरण उड़ते हुए दीखते हैं उस रज के तीसवे भाग को 'परमाणु' कहते हैं। मरीचि आदि का परिमाण | षडवंशीभिर्मरीची स्यात्ताभिः पभिस्तु राजिका । तिसभी राजकाभिश्च सर्षपः प्रोच्यते बुधैः । यवोऽष्टसर्षपैः प्रोक्तो गुजा स्याच्च चतुष्टयम् ॥ १७ ॥ अर्थ-छह वंशी की एक 'मरीची', जो रेतीली जमीन में धूल के बारीक कण सूर्य की किरणों से चमकते हैं, होती है। छह मरीचियों की एक 'राई', तीन राई की एक सफेद सरसों होती है, अाठ सफेद सरसों का एक 'यव' होता है और चार यव की एक 'गुञ्जा'- रत्ती'-'घोघची' होती है। मासे का परिमाण । पभिस्त रत्तिकाभिस्स्यान्माषको हेमधान्यको । अर्थ -छह रत्ती का एक 'मासा' होता है । उसको म' और 'धान्यक' भी कहते हैं। शाण और कोल का परिमाण । माश्चतुर्भिः शाणः स्यात् हरणः स निगद्यते ॥ १८ ॥ टंकः स एव कथितस्तद्वयं कोल उच्यते । क्षुद्रभो वटकश्चैव द्रंक्षणः स निगद्यते ॥ १६ ॥ अर्थ-चार मासे का 'शाण' होता है उसको 'हरण', 'टेक' भी कहते हैं। जहां जहां मासा आवे वहां वहां छह रत्तीका मासा जानना । दो शाण का एक 'कोल' होता है। उसको 'क्षुद्रभ', 'वटक', और 'द्क्षण' भी कहते हैं। कोल नाम वेर का है, उसके बराबर होने से इस मान की कोल संज्ञा रक्खी है। नोट:-कोई पांच रत्ती का, कोई सात रत्ती का और कोई दस रत्ती का भी 'मासा' कहते हैं।
[ उत्तरार्धम् ] १३ AngRLDHANAAD 'कर- कर्ष का परिमाण । कोलद्वयं च कर्षः स्यात् स मोक्तः पाणिमानिका । अक्षपिचुः पाणितलं किंचित् पारिणश्च तिन्दुकम् ॥२०॥ विडालपदकं चैव तथा षोडशिको मता। करमध्यं हंसपदं सुवर्णकवलग्रहम् । उदुंबरं च पर्यायैः कर्ष एव निगद्यते ॥ २१ ॥ अर्थ-दो कोल का का एक 'कर्ष होता है, उसको 'पाणिमानिका', 'अक्ष- पिचु', 'पाणितल', "किंचित्पाणि', 'तिंदुक', 'विडालपदक', घोडशिका', मध्य', 'हंसपदक', 'सुवर्ण', 'कवल' और 'उदुवर' भी कहते हैं अर्थात् यह १३ नाम उसी कर्ष के हैं। अक्ष नाम बहेड़े का है, उसके बराबर होने से इसे कर्ष को अक्ष कहते हैं । तेंदु के फल समान होने से उसकी तेंदुक संज्ञा है। हथेली भरकी पाणितल संशा है ! तीन अंगुली करके ग्राह्य है, अतएव इसकी विडालपद संज्ञा है। सोलह मासे का होता है, इस कारण इसकी बोडशिका संज्ञा होती है और के समान होने से इस कर्ष की उदुवर संशा प्राचार्यों ने की है। इसी प्रकार जितनी संज्ञा इस परिभाषा में है, सार्थक । अाजकल व्यवहार में उस कर्ष को 'तोला' कहते हैं। सोने, चांदी, हीरा, मोती आदि बहुमूल्य चीजें इससे तोली जाती हैं, इसलिये; अथवा मन, सेर, छटांक आदि तोलने के बांट इसी के आधार से बनाये जाते हैं, इसलिये भी इसको 'तोला' कहते हैं। अई पल और पल का परिमाण । स्यात् कर्षाभ्यामद्ध पलं शुक्तिरष्टमिका तथा। शुक्तिभ्यां च पलं ज्ञेयं मुष्टिरानं चतुर्थिका । प्रकुचः षोडशी विख्य पलमेवात्र कीयते ॥२२॥ अर्थ-दो कर्ष का एक 'अर्द्धपल' होता है, उसी को शुक्ति-सीप और 'अष्टमिका' कहते हैं। दो शक्ति का पल होता है। उसको 'मुष्टि', 'श्राम्र', 'आम्रफल', 'चतुर्थिका', 'प्रकुच', 'षोडशी' और 'बिल्व' भी कहते हैं। प्रमृति से मानिका पर्यन्त को परिमाण । पलाभ्यां प्रसूतिज्ञेया अमृतश्च निगद्यते । प्रमृतिभ्यामञ्जलिः स्यात् कुडवो अर्द्धशरावकः ॥२३॥ वे सब श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] से किं तं शेयं कुडवाभ्यां व मानिका । तज्ज्ञ यमत्र विचक्षणः ॥ २४॥ णिप्फणेय विभ ति होती है। उसी को प्रसृत भी कहते हैं। दो एगपएसोगाढे, । उसी को 'कुडव', 'पाव सेर' 'श्रीशरावक' और से तं पएसनिय की एक 'मानिका' होती है । उसको शराब विहत्थी रयणी र आढक का परिमाण । लोगम लोगे विन भवेत्तस्थः चतुःप्रस्थैस्तथाढकम् । पदार्थ-( से किसी च चतुःषष्टिपलं च तत् ॥ २५ ॥ क्षेत्र प्रमाण दो प्रकार 'प्रस्थ'-लेर होता है। चार सेर का एक 'बाढक' विभागणिकन य) प्रदेश और कंसपात्र' भी कहते हैं । यह चौंसठ पल का गाढे दुपर सोमाः संस्त्रिजपा किस प्रकार से होता है। लेणी पर्यन्त का परिमाण । संख्यात प्रदेशावगाहो, कि प्रदेश निर्विभाग है। : कलशोनल्बरणोन्मनौ। प्रदेश निष्पन्न क्षेत्र प्रमn FM राशियॊणपयायसंज्ञकाः ॥ २६ ।। कुत्थी) विभाग निष्पन्न SEN कुम्भी च चतःषष्टिशरावकाः । विभाग रूप क्षेत्र कहते हैं छोणी वाहो गोणी च सा स्मृता ॥ २७ ॥ इसी प्रकार वितस्ती हस्तान एक 'द्रोण' होता है। उसको 'कलश', 'घट' और अर्थ- । 'सूप-खूप होता है। उसको कुभ' भी कहते हैं। बांस अथवा लोह श्राyिi एवं दो सूर्य की एक 'द्रोणी' होती है । उसको सोना, चांदी, तांबा, जन जाते हैं । इसके द्वारा EDIT का परिमाण । खारी कथिता मूक्ष्मबुद्धिभिः । यदोष । पएणबत्यधिका च सा ॥ २८॥ तन्नाम्नैव एक 'खारी होती है। उसके चार हजार छयानवे अर्थ-जिस प्रया तुला का परिमाण । प्रयोग कहलाता है। जैस और गिलोय है। इसी का च भार एकः प्रकीर्तितः । काढ़ा कहलाता है। इस ज्ञ' या सर्वत्र वैष निश्चयः॥ २६ ॥ आदि में भी जानना चा होता है। हरि उच्यते । खारी भारद्वये नैव स्मृता षड् भाजनाधिका ॥ -चार अंक | 'सूर्प-रूप होता है। ARRIES ।
। उत्तराधम्
BLAapraman
।
अर्थ--दो हजार पल का एक 'भार' होता है और सौ पल की एक 'तुला'
होती है। यह तोल केवल मगध देश में ही नहीं किन्तु सम्पूर्ण देश में मानी
जाती है।
सब मानों का परिमाण ।
माषटकातदिल्वानि कुडवः प्रस्थमाढकम्
राशिर्गोणी खारिकेति यथोत्तरचतुगुणा ॥ ३० ॥
अर्थ--मासे से लेकर खारी पर्यन्त एक से दूसरी तोल चौगुनी जाननी
चाहिये । जैसे ४ मासे का एक शाण, ४ शाण को एक कर्ष, ४ कर्ष का एक
बिल्व, ४ विल्व की एक अञ्जलि, ४ अञ्जलि का एक प्रस्थ.४ प्रस्थ का एक आढक,
४ आढक की एक राशि, ४ राशि की एक गोणी, ४ गोणी की एक खारी और
इसी प्रकार आगे भी एक मान से दूसरी तौल चौगुनी जाननी चाहिये।
गीली, सूखी और दूध आदि पतली वस्तुओं का परिमाण
गुजादिमानमारभ्य यावत्स्यात्कुडवस्थितिः ।
द्रवाशुष्कद्रव्याणा तावन्मानं समं मतम् ॥ ३१ ॥
प्रस्थादि मानमारभ्य द्विगुणं तद्दवादयोः ।
मानं तथा तुलायास्तु द्विगुणं न कचिन्मतम् ॥ ३२ ॥
अर्थ-जल आदि पतले पदार्थ तथा गीली औषधि लेनी हो तो प्रस्थ से
लेकर तुला पर्यन्त इनकी तोल सूखी औषधि की अपेक्षा दुगुनी लेवे तथा तुला
से लेकर द्रोण पर्यन्त इनको दुगुना लेवे, अतएव इनका मान सूखी औषधि के
समान लेवे । इस अभिप्राय को स्नेहपाक में प्रायः मानते हैं। तत्काल की लाई
हुई औषधि को गीली कहते हैं । जो धूप में सुखा ली हो अथवा बहुत दिन
की रक्खी हुई हो उस औषधि को शुष्क कहते हैं।
कुडव पात्र बनाने की रीति ।
मृदस्तुवेणुलोहादेर्भाण्डं यच्चतुरङ गुलम् ।
विस्तीर्ण च तथेच्चं च तन्मानं कुडवं बदेत् ॥ ३३ ॥
नोट-रक्तिकादिषु मानेषु यावन्न कुडवो भवेत् । शुष्कद्रव्याईयोस्तावत्तुल्यं मानं प्रकीर्तिम् ॥१॥
प्रत्यादिमानमारभ्य द्रव्यादिद्विगुणस्त्विदम् । कुडवोऽपि कचिद् दृष्टं यथा दन्ती घृते मतः ॥२॥
शुष्कद्रव्यस्य या मात्रा त्वाईस्य द्विगुणा हि सा । शुष्कस्य गुरुतीक्ष्णत्वात्तस्माद
प्रयोजयेत् ॥३॥
--- अथ क्षेत्र प्रमाणा विषय। से किं तं खेत्तप्पमाणे ? दुविहे पण्णते तं जहा-पएस णिप्फणेय विभागणिप्फणेय । से किं तं पएसनिप्फन्ने ? एगपए सोगाढे, दुपएसोगाढे, संखिज्जप०, असंखिज्जप. से तं पएसनिप्पन्ने। से किं तं विभागनिप्पन्ने ? अंगुल विहत्थी रयणी कुत्थी गाउयं च बोधव्वं जोयण सेढीपरं लोगम लोगे वियतहेव ॥२॥ पदार्थ-(से किं तं खेत्तप्पमाणे? दुविहे पण्णत्ते, तं जहा। क्षेत्र प्रमाण किसे कहते हैं? क्षेत्र प्रमाण दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है. जैसे कि-(पएसनिप्फन्न य विभागणिकन्नय) प्रदेश निष्पन्न और विभाग निष्पन्न (से किं तं पएसनिप्फनय ? एगपएसो- गाढे दुपरसोसाढे संखिजपएसोगाडे असंखेजपएसोगाडे, से तं पए सनिप्फन) प्रदेश निष्पन्न किस प्रकार से होता है ? जैसे कि-एक प्रदेशावगाही पुद्गल, द्विप्रदेशावगाहो, संख्यात प्रदेशावगाहो, असंख्यात प्रदेशावगाही द्रव्य । ये सर्व प्रदेशनिष्पन्न हैं। क्यों कि प्रदेश निर्विभाग है । उस में द्रब्य यावन्नात्र प्रदेशों पर ठहरता है। इस अपेक्षा से प्रदेश निष्पन्न क्षेत्र प्रमाण होता है । (से कि तं विभागनिष्फन्ने ? अंगुल विहत्थी रयणी कुत्थी) विभाग निष्पन्न किसे कहते हैं ? जो क्षेत्र के विभाग से उत्पन्न हो, उसे विभाग रूप क्षेत्र कहते हैं। जैसे कि-अंगुली प्रमाण जो क्षेत्र है, उसे अंगुल कहते हैं इसी प्रकार वितस्ती हस्त कुक्ष (गाउयं च वोधव्यं) और कोश भी जानना चाहिये अर्थ-चार अंगुल लम्बा, चार अंगुल चोड़ा तथा चार अंगुल गहरा, बांस अथवा लोह आदि के पात्र को 'कुडव' कहते हैं । श्रादि शब्द से यहां पर सोना, चांदी, तांबा, जस्त, रांग, कांसा, शीशा, चाम, सींग, दांत भी लिये जाते हैं । इसके द्वारा दूध, जल, तेल, घृत नापा जाता है। औषधों का नामकरण । यदौषधं त प्रथमं यस्य प्रथमं यस्य योगस्य कथ्यते । तन्नाम्नैव स योगो हि कथ्यतेऽसौ विनिश्चयः ॥ ३२ ।। अर्थ--जिस प्रयोग में जो प्रथम औषधि है उसी औषधि के नाम से वह प्रयोग कहलाता है। जैसे क्षुद्रादि, गुडूच्यादि क्वाथ । इनमें प्रथम कटेरी, रास्ना और गिलोय है । इसी कारण क्षुद्रादि काढ़ा, रास्नादि काढ़ा और गुडूच्यादि काढ़ा कहलाता है । इसी प्रकार चंदनादि तैल, कूष्मांड पाक, हिंग्वष्टक चूर्ण श्रादि में भी जानना चाहिये। ।
तथा (जोजण) योजन (सेढी) श्रेणि (पयर) प्रतर (लोग) लोक (अलोगे वि य तहेब)अलौक । अपिशब्द समुच्चय अर्थ में हैं । इसलिये लोकालोक भी इसी प्रकार जानना चाहिए । भावार्थ-क्षेत्र प्रमाण दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है। जैसे कि प्रदेशनिष्पन्न और विभागनिष्पन्न । एक प्रदेश-अवगाही परमाणु से लेकर असंख्यात-प्रदेश अवगाही द्रव्यपर्यन्त प्रदेशनिष्पन्न दोन प्रमाण होता है । यद्यपि द्रव्य स्वगुण में प्रमेय है तथापि क्षेत्र सम्बन्ध को अपेक्षा से उसे क्षेत्र प्रमाण ही कहा जाता है। विभागनिष्पन्न-अंगुल १, वितस्ती २, हस्त ३, कुक्ष ४, धनुष ५, कोश ६, योजन ७, श्रेणि, प्रतर, लोक १०, और अलोक ११, ये सब विभागनिष्पन्न क्षेत्र प्रमाण के उदाहरण हैं। अथ अंगुल विषय से कि तं अंगुले ? तिविहे पएणते, तं जहा-आर्य- गुले उस्सेहंगुले पमाणंगुले । से किं तं आयंगुले ? जेणंजया मणुस्सा भवंति, तेसिणं तयाअप्पणे अंगुलेणं. दुवालसअंगु- लाइं मुहं, नवमुहाई पुरिसेपमाणजुत्तेभवइ,दोरिणए पुरिसे माणजुत्ते भवइ, अद्धभारं तुल्लमाणे पुरिसे उम्माजुत्ते भवइ, माणुम्माणप्पमाणजुत्तालक्खणवंजणगुणेहि उववेया। उत्तमकुलप्पसूया उत्तमपुरिसा मुणेयव्वा ॥ इंति पुण अहियपुरिसा अट्टसयं अंगुत्ताण उच्चिद्धा। छण्णउइ अहम्म पुरिसा, चउत्तरं मज्झिमिल्लाओ॥ हीणा वा अहिया वाजे खलु सरसत्तसारपरिहीणा । ते उत्तमपुरिसाणं अवसा पेसत्तण- । मुवेति ॥एएणं अगुलपमाणेणं छ अंगुलाई पायो, दो पायाउ विहत्थी, दो विहत्थीओ रयणी, दो रयणीओ कुच्छी, , , [श्रीमद्नुयोगद्वारसूत्रम् ] दो कुच्छीओ दंड, धणुजुगेनालियाअक्खमूसले, दो धणु- सहस्साई गाउयं, चत्तारि गाउमाई जोअणं । एएणं अंगुलप्पमाणेणं किं पयोयणं ? एएणं अंगुलेणं जे णं जया मणुस्सा हवंति तेसि णं तया णं आयंगुलेणं अगडत- लागदहनदीवाविपुक्खरिणीदीहियगुंजालियानो सरसरपंति- आयो विलपंतिआयो आरामुज्जाणकाणणवणवणसंडवण- राईओ देउलसभापवाथूभखाइअपरिहाओ पागारअद्यालय- चरियदारगोपुरपासायघरसरणलयणावणसिंघाडगतिगच- उक्कचउमुहमहापहपहासडगरहजाणजुग्गागिल्लिथिल्लिसि- वेयसंदमाणिआयो लोहीलोहकडाहकडिल्लयभंडमत्तोवगर- णमाईणि, अन्जकालियाई च जोयणाई मविज्जति, से समासओ तिविहे पण्णते, तं जहा-सूईअंगुले, पयरंगुले, घणंगुले, अंगुलायया एगपएसिया सेढी सूईअंगुले, सूई सूई गुणिया पयरंगुले. पयरं सूइए गुणियं घणअंगुले, एएसि णं सूईअंगुलं पयरंगुलं, घणअंगुलाणं कयरे कयरे हिंतो अप्पा वा बहु वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा ? सवत्थोवे सूईअंगुले, पयरंगुले असंखेज्जगुणे, घणअंगुले असंखेज्जगुणे, से तं आयंगुले ॥ पदार्थ-(से कि तं अंगुले ? तिविहे परणते, तं जहा-) अंगुल कितने प्रकार से वर्णित है ? तीन प्रकार से वर्णन किया गया है। जैसे कि-(आयंगुले १, उस्सेहंगुले २, पमाणंगुले ३) आत्मांगुल १, उत्सेधांगुल २, और प्रमाणांगुल ३ (से किं तं प्रायंगुले ? ) आत्मांगुल किसे कहते हैं ? (जे णं जया मणुस्सा हवंति) जिस काल में जो , । पुरुष होता है जल उस कुण्ड से निकाल लिया, उसे 'द्रोणिक पुरुष' कहते हैं। तथा द्रोण परिमाण न्यून जल कुण्डिका में पुरुष के प्रवेश होने पर कुण्डिका पूर्ण हो जाती है। (अद्धभारं तुल्जमाणे पुरिसे उमाण जुत्ते भवइ) जिसका शरीर शुभ पुद्गलों से रचित है, पुरुष जानना चाहिये । (हुति पुण अहियपुरिसा) अधिक अंगुल प्रमाण उत्तम पुरुष पुरुष होता है (चउरुत्तरा मजि मिल्लाउ) जो एकसो चार अंगुल प्रमाण ऊंचा हो वह मध्यम हीन वा अधिक और (जे खलु सरसत्तसारपरिहीणा) जो निश्चय ही आदेय स्वर [उत्तरार्धम् ] भरत सगर आदि प्रमाणयुक्त मनुष्य होते हैं, उस काल को अपेक्षा से उनका आत्मां- गुल ग्रहण होता है । क्योंकि-'आत्मनामंगुलमात्मांगुलम्' जो आत्मा का अंगुल है वही आत्मांगुल होता है । तात्पर्य-जिस काल में जो जोव उत्पन्न होते हैं उस काल में उनका आत्मांगुल कहा जाता है। (तेसिंणं तया अप्पणो अंगुलेणं दुवालस्स अंगुलाई मुहं ) उन भरत सगरादि मनुष्यों का अपने अपने अंगुल से द्वादश अंगुल प्रमाण मुख होता है ( नमुहाई पमाणजुत्ते पुरिसे भवइ ) नव-मुख-प्रमाण-युक्त अर्थात् एकसौ आठ अंगुल प्रमाण पुरुष होता है । दोरिणए पुरिसे माणजुत्ते भवइ ) मान युक्त उसे कहते हैं, जैसे-किसी व्यक्ति को एक विस्तार पूर्वक मानोपेत जलकुण्ड में बैठा दिया, फिर उसके अनन्तर द्रोणिक प्रमाण में रोपित किया हुआ यदि अर्द्ध भार के प्रमाण वह पुरुष हो तो वह उसको तुला पुरुष उन्मान प्रमाण युक्त होता है । ( माणु-माणपमाण जुत्ता ) मान उन्मान प्रमाणयुक्त चक्रवत्यादि पुरुष जो (लक्षण) लक्षण-शंख, स्वस्तिकादि ( वंजण ) व्यंजन-तिल माषादि ( गुणेहिं ) गुण-क्षमादि करके ( उववेया ) उपेत-संयुक्त (उत्तमकुलप्पसूया ) और उग्रादि उत्तम कुलों में जो उत्पन्न हुआ है उसे (उत्तमपुरिसा मुण्यव्वा ) उत्तम होते हैं, जैसे (अलसयं अंगुलाणं उच्चिद्वा) एकसौ आठ अंगुल के आत्मांगुल से ऊंचे । छन्नउड़ अहम्मपुरिसा) आत्मांगुल के प्रमाण से जो छयानवे अंगुल ऊंचा हो वह अधम पुरुष होता है । (हीणा वा अहिया वा ) उक्त प्रमाण से अर्थात् १०८ अंगुल इससे भी उसे 'द्रोणिक पुरुष' कहते हैं। अथ उन्मान प्रमाणा विषय । जो और सत्त्व अथवा शारीरिक शक्ति, इन गुणों से रहित होता है, (ते उत्तम पुरिसाणं ) वह, उत्तम पुरुषों के (अवसा पेसत्तणमुवेति ) अपने कर्मों के वश होते हुए दास भाव को प्राप्त होते हैं । अंगुलप्रमाणेणं छ अंगुलाई पायो) इन अंगुलों के प्रमाण । २० [श्रीमद्नुयोगद्वारसूत्रम् ] से छह अंगुल प्रमाण 'पाद' होता है । (दोपायाश्रो विहत्थी) दो पादों की एक 'वितस्तो' होती है (दो विहत्थीओ रयणी) दो वितस्तियों को एक 'रत्नो'-'हाथ' होता है। (दो रयणीअो कुच्छी ) दो रनियों की एक 'कुक्षि' होती है ( दो कुच्छिश्री दंड) दो कुक्षियों का एक दंड होता है। ( पशुजुगेनालियाअक्खमूसले ) धनुष्, युग, नालिका, अक्ष, मुशल, ये सब छयानवे अंगुल प्रमाण होते हैं (दो घणुसहस्साई गाउयं ) दो सहस्र धनुष् का एक 'गव्य-कोस होता है ( चत्तारि गाज्याई जोत्रणं ) चार कोसों का एक योजन' होता है (एएणं अंगुलप्पमाणेणं किं पयोयणं !) इस अंगुल प्रमाण का क्या प्रयोजन है ? (एएणं अंगुलप्पमाणेणं) इस अंगुल प्रमाण से (जे णं जया मणुस्सा हवन्ति) जो जिस काल में मनुष्य होते हैं (तेसिं णं तया अारामुज्जाणं) उनके बाग, आराम, उद्यान सब आत्मांगुल से मान किये जाते हैं ( काणणवण ) सा- मान्य वृक्ष युक्त अथवा अटवी पर्वत युक्त जो वन है उसको 'कानन' कहते हैं। और जिस स्थान में एक जाति के वृक्ष हों उसको 'वन' कहते हैं (वणसंडवणराइनो) एक जाति के वृक्षों से आकीर्ण वनको 'वनखण्ड' और वन पंक्ति को 'वनराजि' कहते हैं (आडतलागदह) कूप, तड़ाग, हृद, ( नदीवावि ) नदी, वापी (पोक्खरिणी ) वृत्त जलाशय को 'पुष्करिणी' कहते हैं तथा कमलों से युक्त ( दीहिय ) दीर्घ जलाशय (गुजालियाओ ) वक्र गुजालिका-जलाशय विशेष (सर) स्वयं संभूत जलाशय (सरपंतीयानो) सर पंक्ति रूप किए हुए, जैसे कि एक सर से पानी द्वितीय तृतीयादि सरों में चला जावे ( सरसरपंतियाउ ) सर सरपंक्तियाँ एक सर से द्वितीय तृतीय आदि में पानी वा पुरुषों का संचार हो सके, कपाटादि के द्वारा वा अन्य प्रकार से (विल- पं.ियाओ) कूपों की पंक्तियां (देवकुल) मन्दिर विशेष (सभा) सभा-पुस्तकशाला अथवा जिस स्थानमें अनेक पुरुषों का समूह एकत्र होवे (पवा) पर्व स्थान तथा जलपान स्थान (थूभ) स्तूप ( चेईय *) मृत्तिका आदि की वेदिका बनाना (खाइय ) खाई उसे कहते हैं जो नीचे से संकीर्ण हो और ऊपर से विस्तीर्ण हो (परिहारो) परिखा (पागार ) नगरकोट (अट्टालय) प्राकार-ऊपर आश्रयस्थान (चरिय) गृहों और प्राकार के अन्तर में जो अष्ट हस्त प्रमाण विस्तीर्ण राजमार्ग हो उसे 'चरिका' कहते हैं (दार) द्वार (गोपुर) द्वारों के जो परस्पर अन्तर स्थान हैं उन्हें 'गोपुर' कहते हैं अथवा राज्य भवन (पासाय) प्रासाद (महल) महल (सिंघाडगतिगचक्कचउमुह) शृङ्गार * यह पाठ टीकाकार ने ग्रहण नहीं किया है। इसलिये यह प्रक्षेप प्रतीत होता है। तथा चैत्य शब्द का यथा स्थान अर्थ करना चाहिये।
[उत्तरार्धम् ] के आकार पर मार्ग अथवा जहाँ पर तीन मार्ग एकत्र हों, चार राजमार्ग एकत्र हों तथा चतुर्मुख देवकुलादि ( महापह) महा राज्यमार्ग (पहेह ) सामान्य मार्ग (सगट शकट गाड़ी (रह) रथ (जाण ) यान (गिल्लि भिल्लि जुग्ग) हस्ती का हौदा, लाट देश प्रसिद्ध पलान और युग भी यान विशेष है ( सीयसंधमाणीयानो) स्पंदमान शिविका (धरसरणलेणश्रावण ) सामान्य लोकों के घर, तृण मय घर पर्वत में घर, हट्ट(प्रासणसयालयणक्वंभ) आसन, शय्या, गुफादि अथवा (भंडमत्तोवगरण) मृतिकादि के भाजन, काश्यादि के भाजन, और नाना प्रकार के उपकरण (लोहीलाह कडाह) लोही उसे कहते हैं जिसमें मडनकादि पकाये जाते हैं तथा लोहे की कढ़ाई (कडच्छुगमाईणी) करच्छी आदि (अजकालियाई जोषणाईमविति) जिस काल में जो मनुष्य पैदा होते हैं उन्हीं की आत्मांगुल से मान की जाती हैं तथा उसी काल के योजन ग्रहण किये जाते हैं। (से समासो तिविहे पएणते, तं जहा-) वह आत्मांगुल संक्षेप से तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है (सअगले) सूच्यंअंगुल ( पयरंगुले) प्रतरांगुल (घणंगुले) और घनांगुल (अंगुलायया) और जो एक अंगुल प्रमाण दीर्घ और (एगपसियासेढी) एक प्रदेश की श्रेणिरूप जिसका विष्कंभ ( सूअंगुले) उसे सूच्यंगुल कहते हैं । ( सूई सूईगुणिया पयरंगुले ) सूच्यंगुल को सूच्यंगुल से गुणा किया जाय तब प्रतरांगुल उत्पन्न होता है ( पयरं सू एगुणियं घणगुले ) प्रतरांगुल को सूच्यंगुल से गुणा करें तब घनांगुल उत्पन्न होता है । ( एसि एवं सूई अंगुले पयरगुले घणंगुलाणं ) इन सूच्यंगुल, प्रतरांगुल और घनांगुलों में ( कयरे २ हिं तो अप्पा वा बहुदा वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा ) परस्पर किन रसे अल्प, बहुत्व, तुल्य और विशेषाधिक है (सवत्थोवे सूई अंगुले) सब से स्तोक सुच्यंगुल होता है ( पयरगुले असंखेनगुणे) प्रतरांगुल असंख्यात गुणा अधिक है । (वणंगुले असंखेज्जगुणे) घनांगुल उससे भी असंख्यात गुणा अधिक है (से तं प्रायंगुले) सो उसी को आत्मांगुल कहते हैं। भावार्थ-अंगुल तीन प्रकार से वर्णन किया गया है। जैसे-आत्मां- गुल १, उत्सेधांगुल २। और प्रमाणांगुल ३। जिस कालमें जो मनुष्य उत्पन्न होते हैं उनका अपने अंगुलों से १२ अंगुलों का मुख होता है, और उन्हींके अंगुलों से १०८ अंगुल प्रमाण उनका पूरा शरीर होता है। ये पुरुष उत्तम, मध्यम और जधन्य भेद से तीन प्रकार के हैं। जो पूर्ण लक्षणों से युक्त प्रमाण जिनका शरीर होता है, वे उत्तम पुरुष हैं। १०४ अंगुल प्रमाण शरीर वाले मध्यम पुरुष हैं । ६६ अंगुल प्रमाण वाले जघन्य पुरुष हैं। अतः इन्हीं अंगुलों के प्रमाण से छह अंगुलों का एक पाद, दो पादों की एक वितस्ती, दो वितस्तियों । हैं और १०८ अंगुल २२ [श्रीमद्नुयोगद्वारसूत्रम् ] की एक रनि-हाथ, दो हस्तों की एक कुक्षि, दो कुतियों का एक धनुष्, दो सहस्र धनुषों का एक कोश और चार कोशों का एक योजन होता है । इसी प्रमाण से पाराम, उद्यान, वन, वनखंड, कूप, तड़ाग,नदी, बावली, सर, देवकुल, सभा, स्तूप, खाई, प्राकार, अट्टालक, चरिका, द्वार, गोपुर,, प्रासाद, शृङ्गारक, विकमार्ग, चतुर्मुख मार्ग, महापथ, राजमार्ग, शकट, रथ, यान, युग, गिल्ली, थिल्ली, शिविका, घर, आपरा, आसन, शयन, स्तम्भ, कडाह, दर्वी इत्यादि पदार्थ जिस समय के मनुष्य होते हैं, उक्त पदार्थ उन्हीं के अंगुलों से मान किये जाते हैं । इसे ही आत्मांगुल कहते हैं । , ७ अंगल तीन प्रकार से वर्णन किया गया है । जैसे-सूच्यंगुल १, प्रत. रांगुल २ और घनांगुल ३ । असत्हेतु से आकाश में एक अंगुल प्रमाण दीर्घ, तीन प्रदेशरूप विस्तीर्ण और एक प्रदेश विष्कम्भरूप को 'सूच्यंगुल' कहते हैं । सूच्यंगुल को तिगुना करने से 'प्रतरांगुल' उत्पन्न होता है । यह अंगुल प्रदेश रूप होता है । प्रतरांगुल को तिगुना करने से 'धनांगुल' होता है। वह २७ प्रदेश रूप है। इनमें सबसे छोटा सूच्यंगुल है । प्रतरांगल उससे असंख्यात गुणा बड़ा है और धनांगुल उससे भी असंख्यात गुणा बड़ा है। इसी को आत्मांगुल कहते हैं। 0 विष्कम्भ एक प्रदेशरूप है, उसे गुणा नहीं करना, अपितु दीर्घाकार में समरूर है और धन शब्द रूढ़ि रूप है । जब प्रतर अंगुल ६ प्रदेश रूप है उसको सूचि अंगुल से गुणा किया जाय तब धनांगुल 0 २७ प्रदेशों का सिद्ध हुआ । जैसे कि- इस असत्य हेतु से २७ प्रदेश निष्पन्न ० ० माना जाता है। वास्तव में अखंख्यात प्रदेश रूप जानना चाहिये। 0 परमाणु १, तसरेण से किं तं उस्सेहिंगुले ? अणेगविहे पण्णत्ते, तं जहा. २, रहरेणु ३, अग्ग च बालस्स४॥ लिक्खा ५, जूआ य ६, जवो ७, अट्ठगुणविवट्ठिया क- मसो । से किं तं परमाण ? दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-सुहमे य [उत्तरार्धम् ] ववहारिए य, तत्थ णं जेसे सुहुमे सेठ्ठप्पे, तत्थ णं जे से ववहारिए से अताणं सुहुमपरमाणु समुदयसमिइंसमा गमेणं ववहारिए परमाणु पोग्गले निफ्पज्जइ, से ग भत्ते ! असिधारं वा खुरधारं वा उग्गाहेज्जा ? हंता उग्गाहेजा, से णं भत्ते ! तत्थ छिज्जेज वा भिज्जेज वा ? नो इणटेसमटे, नो खलु तत्थ सत्थं कम्मइ, सेणं भत्ते!अगणिकायस्समझ मज्झणं वीईवएज्जा ? हंता वीईवएज्जा, से णं तत्थ उज्झज्जा ? नो इणटे समढे, नो खलु तत्थ सत्थं कम्मइ, से णं भत्ते पोक्खल संवयस्स महामेहस्स मज्झ मज्झणं वीइवएजा? हंतावीइवए जा, सेणं तत्थ उदउल्लेसिया? नो इणटेसमटे, नो खलु तत्थ सत्थं कम्मइ, से णं भंते ! गंगाए महानदीए पडिसोयं हव्वमागच्छेज्जा ? हंता हव्वमागच्छेज्जा, सेणं तत्थ विणिघायमावज्जेज्जा ? नो इणट्टे समटे, नो खलु तत्थ सत्थं कम्मइ, से णं भंते ! उदयावत्तं वा उदगबिंदुवा उग्गाहेज्जा ? हंता उग्गाहेजा, सेणं तत्थ परियाव- ज्जेज्जा ? (कुच्छेज्ज वा?), नो इणटे समढे, नो खलु तत्थ सत्थं कम्मइ, सत्येण सुतिक्खेण वि च्छेत्तु भेत्तुंच जं किर न सका।तं परमाणु सिद्धा वयंति आइंप्पमाणाणं ॥अताणं ववहारिय परमाणुपोग्गलाणं समुदयसमिइसमागमेणं सा एगा उस्सह- सरिहया इ वा साहसहिया इ वा उटुरेणु इ वा तसरेणु इ वा रहरेणु इ वो, अट्ट उसएहसरिहयाओ सा एगा सराह- सरिहया, अट्ठ सहसण्हियाओ सा एगा उटुरेणू , अट्ठ उट्ठरे- , 1.सानपावारसूत्रम् J -- णुप्रो सा एगा तसरेणु, अट्ट तसरेणुओ सा एगा रहरेणु, अट्ठ रहरेणूओ देवकुमउत्तरकुरुगाणं मणुयाणं से एगे बालग्गे, अट्ठ देवकुरुउत्तरकुरुगाणं मणुयारणं बालग्गा हरिवासरम्मगवा- साणं मणुस्साणं से एगे बालग्गे, अट्टहरिवासरम्मगवासाणं मणुस्साणं बालग्गा हेमवयएरण्णवयाणं मणस्साणं से एगे बालग्गे, अट्ट हेमवयएरएणवयाण मणुस्साणं बालग्गा पुव्वविदेह अवरविदेहाणं मणुस्साणं से एगे वालग्गे, अट्ठ पुव्वविदेहअवरविदेहाणं मणुस्साणं बालग्गा भरहेरवयाणं मणुस्साणं से एगे बालग्गे, अट्ठ भरहेरवयाणं मणुस्साणं वालग्गा सा एगा लिक्खा, अट्ट लिक्खाओसा एगे जूया, अट्ठ जूयाओ से एगे जव मज्म, अट्ट जवमझा से एगे अंगुले, एएणं अंगुलप्पमाणेणं छअंगुलाई पाउ, वारस अंगुलाई विहत्थी, चउवीसं अंगुलाई रयणी, अडयालीसं अंगुलाई कुच्छी, छन्नउइं अंगुलाई दंडेति वा, धणुं ति वा, जुएति वा, नालि- याइ वा, अक्खेइ वा, मुसले इ वा, एएणं धणप्पमाणेणं दो धणु सहस्साई गाउयं, चत्तारि गाउयाई जोयणं, एएणं उस्सेहंगुलेणं किं पयोयणं ? एएणं उस्सेहंगुलेणं नेरइय- तिरिक्खजोणियमणु स्सदेवाणं सरीरोगाहणाउ मविज्जति। पदार्थ-(से किं तं उस्सेहंगुले ? अणेगविहे पगणत्ते, तं जहा-) उत्सेधांगुल किसे कहते हैं ? उत्सेघांगुल उसका नाम है, जिसके द्वारा नारकादि की अवगाहना का प्रमाण किया जाय, जैसे कि (परमाणु) परमाणु १, (तसरेणु) त्रसरेणु २, (रहरेणु) रथरेणु ३, (अग्ग च वालस्स) और बालाग्र ४, फिर (लिक्खा) लीख ५, (जुयाय) जू ६, [ उत्तरार्धम् ] २५ (जबो) यव ७, (अट्ठ गुणविवड्डिया कमसो) यह अनुक्रम से उत्तरोत्तर आठ गुणे बड़े हैं । (से किं तं परमाणु ? दुविहे पएणते, तं जहा-) परमाणु कितने प्रकार का है ? दो प्रकारका जैसे कि-(सुहमे य ववहारिए य) सूक्ष्म और व्यावहारिक (तत्थं एंजे से सुहुमे से टप्पे) उन दोनों भेदों में से जो सूक्ष्म परमाण हैं वे तो स्थापनीय हैं (तत्थ णं जे से ववहारिए से अणंताणं सुहुमपरमाणु समुदयसमिइसमागमणं ववहारिए परमाणु पोग्गले निप्फजइ) उनमें से जो व्यावहारिक परमाण है, वह अनन्त सूक्ष्म परमाणुनों का समुदाय रूप है और उसी के द्वारा व्यावहारिक परमाण की उत्पत्ति होती है । (से णं भंते ! असि- धारं वा खुरधारं वा उग्गाहेजा ?) हे भगवन् ! क्या यह व्यावहारिक परमाणु, खड्ग की धार अथवा क्षुरा की धार में प्रवेश कर सकता है ? (हंता उगाहेजा ) हां, प्रवेश कर सकता है। (से : भत्ते । तत्य छिज्जेज वा भिजलेज वा ?) हे भगवन् ! क्या उस व्यावहारिक परमाणु का छेदन भेदन हो सकता है ? (नो इणढे समढे नो रूलु तत्थ सत्थं कमइ) यह अर्थ समर्थ नहीं है अर्थात् इस प्रकार नहीं है तथा उस को निश्चय ही शस्त्र अतिक्रम नहीं करता (से णं भंते ! अगणिकायन्स मजा मज्झणं वोइवराज्जा ?) हे भग. वन् ! क्या वह परमाणु अग्निकाय के मध्य और मध्यान्तर में प्रवेश कर सकता है ? (हंता वीइवइजा ) हां, प्रवेश कर सकता है ( से णं भंते ! उज्झज्जा ?) हे भगवन् ! क्या वह परमाणु जल सकता है ? ( नो इणढे सम?, नो खलु तत्थ सत्थं कमइ ) यह अर्थ समर्थ नहीं है। उस परमाणु को अग्नि रूप शस्त्र अतिक्रम करने में समर्थ नहीं हैx (से णं भंते ! पोक्खलसंवटयस्स महामेहस्स मज्झमझेणं वीइवएजा ?) हे भगवन् ! क्या वह परमाण 'पुष्कलसंवत' नामक महामेघ के मध्यान्तर में प्रवेश कर सकता है ? (हंता वीइवएज्जा) हां, प्रवेश कर सकता है । (से णं तत्थ उदंउल्लेसिया ?) हे भगवन् ! क्या वह व्यावहारिक परमारण पानी से गीला हो सकता है ? (नो इणढे समढे, नो खलु तत्य सत्थं कमइ) यह तुम्हारा कथन यथार्थ नहीं है । उसको निश्चय ही पानी रूप शस्त्र अतिक्रम नहीं कर सकता (से णं भंते ! गंगाए महानदीए पडिसोयं हव्वमागच्छेज्जा ?)हे भग- * यह सर्व कथन व्यवहार नय के मत से कहा गया है। निश्चय के मत से इसे स्कंध ही माना जाता है। हता' अव्यय कोमलामंत्रण में अथवा स्वीकार अर्थ में होता है। यहां पर स्वीकार अर्थ ही जानना चाहिये। 'णं वाक्यालंकार अर्थ में होता है ४ क्योंकि अग्नि के परमाणु उसकी अपेक्षा रथूल हैं और वह उनकी अपेक्षा से अत्यन्त सूक्ष्म है, इसलिये अग्निकाय पूर्वोक्त काम करने में असमर्थ है। ! - [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] वन् ! क्या वह परमारण गंगा महानदी के प्रतिश्रोत की ओर होता हुआ शीघ्र ही आ सकता है ? (हंता हव्वमागच्छेज्जा) हां, शीघ्र आ सकता है अर्थात् यदि पूर्व की ओर गंगा बहती हो तो वह परमाण पश्चिम की ओर आ सकता है । (से णं तत्थ विणिघा- यमावज्जेज्जा ?) हे भगवन् ! क्या वह परमाणु वहां जल रूप हो सकता है ? (नो इण्डे समट्टे, नो खलु तत्थ साथं कमइ) यह अर्थ समर्थ नहीं है । उसको निश्चय ही पानी रूप शस्त्र अतिक्रम नहीं कर सकता (से शं भंते ! उदयावत्तं वा उदगबिंदु वा उग्गाहेजा ?) हे भगवन् ! क्या वह परमाण उदकावर्तन में अथवा उदकविन्दु में अवगाहन कर सकता है ? (हता उगाहेजा) हां, अवगाहन कर सकता है। (से णं तःथ कुच्छेज्ज वा परिया- बज्जज्जा वा ?) हे भगवन् ! क्या वह परमाणु उस स्थान पर पर्याय परिवर्तन कर सकता है अर्थात् क्या वह परमाण जलरूप हो सकता है ? (णो इणढे सम, नो खलु तत्थ सत्थं कमइ) यह तुम्हारा कथन यथार्थ नहीं है। उस परमाणु को जलरूपी शस्त्र अतिक्रम नहीं कर सकता (सत्थेण सुतिखेण वि छेत्तु भेनु च जं किर: न सका) सुतीक्ष्ण शस्त्र से कोई भी उस परमाणु को छेदन भेदन करने में समर्थ नहीं है ( त परमाणु सिद्धा यति पाई पमाणाणं ) उस परमाणु को सिद्ध भगवान आदि प्रमाण कहते हैं अर्थात् व्यावहारिक गणना में वह परमाण आदिभूत है और (अताणं ववहारिअपरमाणु पोग्गलाणं समुदय- समिइसमागमेणं सा एगा उस्सएहसारहया इवा) अनन्त व्यावहारिक पुद्गलों के समु- दाय के एकत्र होने से एक 'उत्श्लक्ष्ण' नामक कण उत्पन्न होता है (सएहसण्हिया इ वां) उससे फिर 'श्लक्ष्णश्लक्षिणका' नामक कण होता है (ड्ढरेणू ति बा) उध्वरेणु (तसरेणू ति वा) त्रसरेणु (रहरेणू ति ६.१) रथरेणु होता है ( अट्ठ उत्सएहसरियामो सा एगा सएहसण्हिया) आठ उत्श्लक्षणश्लक्षिणकाओं की एक श्लक्षिणका होती. है ( अट्ठ साहस रहयात्री सा एगाउडरेणु) आठ श्लक्ष्णश्लक्ष्णिकाओं का एक ऊर्ध्वरेणु और (अट्ठ उड्डरेणुगो सा एगा तसरेणु) आठ ऊर्ध्वरेणुओं का एक त्रसरेण (अट्ट तसरेणुगो सा एगा रहरेणु) आठ त्रसरेणओं का एक रथरेण ( अट्ट रहरेणुको देव कुरुउत्तरकुरुगाणं मणुयाणं से एगे बालग्गे) आठ रथरेणुओं का देवकुरु-उत्तरकुरु के मनुष्यों का एक बालाप्र होता है (अट्ठ देवकुरु उत्तरकुरुगाणं मणुयाणं वालग्गा हरिवासरम्मगवासारणं मणुस्साणं से एगे वालग्गे) फिर किर' शब्द किलाथ में है अर्थात् निश्चय ही कोई छेदन भेदन करने में समर्थ नहीं है। + सिद्ध' शब्द का अर्थ यहां पर ज्ञानसिद्ध है। यथा केवली; क्योंकि भवस्थ भगवान् सिद्ध होते हैं । मुक्ति में विराजमान जो सिद्ध भगवान् हैं, वे वचनयोग से रहित हैं। इसलिये सिद्ध शब्द का सम्बन्ध यहां पर भवस्थ केवली जानना चाहिये। 'वा' शब्द उत्तरापेक्ष है और 'उत्' शब्द प्राबल्य अर्थ में होता है। - -- भगवान् से [उत्तरार्धम् ] आठ देवकुरु-उत्तरकुरु मनुष्यों के बालात्रों का एक हरिवर्ष रम्पवर्ष के मनुष्यों का बालाग्र होता है (अट्ट हरिवास रम्गवासाणं मगुस्साणं वाला हे सवय हेरएणत्रयाण मणुस्साणं से एगे बालग्गे) आठ हरिवर्ष रम्यवर्ष मनुष्यों के बालापों का हैमवय और एरण्यवय के मनुष्यों का एक बालाग्र होता है (अट हेमवयहेररणवयाणं मणु- स्साणं वालगा पुरविदेहअवरविहाणं मणु ताणं से एो बालगो) हैमवय और एरण्य वय के मनुष्यों के बालात्रों का पूर्वमहाविदेह और दूसरा अपरमहाविदेह के मनुष्यों का एक बालाग्र होता है (अट्ठ पुवविदेहअवरवि देहाणं मणुस्साणं वालग्गा भरहेर- वयाणं मणुस्साणं से एगे वालग्गे) आठ पूर्वमहाविदेह-अरविदेहों के मनुष्यों के वालानों का भरत ऐरावत के मनुष्यों का एक बालाग्र होता है ( अट्ठ भरहेरवयाणं मणु- स्ताणं बालग्गा सा एगा लिक्खा) आठ भरत ऐरावत के मनुष्यों के बालाों की एक लिक्षा- लीख होती है (अट्ठ लिक्खाओ सा एमा जुमा)आठ लिक्षाओं की एक जू होती है (अट्ट जूप्रायो से एगे जवमके) आठ जूओं को एक यव का मध्य होता है (अजब मझाओ से एगे अंगुले) आठ यव मध्यों का एक उत्सेधांगुल होता है। (एएणं अंगुलप्पनाणेणं छ अंगुलई पाओ) इस अंगुल के छह अंगुलों का एक पाद होता है (वारस अंगुलाई विद्वत्थी) बारह अंगुलों की एक वितस्तो होती है (चवीसं अंगुलाई रयणी) चौबीस अंगुलों का एक हाथ होता है (अडयालीसं अंगुलाई कुच्छी) अड़तालीस अंगुलों की एक कुक्षि और (छन्नई अंगुलाई से एगे दंडे इवा) छथानके अंगुलों का एक दंड होता है (पण इ बा, जुगे इ वा, नालियाइ वा, अक्वे इवा, मुसले इवा) धनुष् ,युग, नालिका, अक्ष और मुसल ये सर्व धनुष् के ही नाम हैं। एएणं धणु पमाणेणां) इल धनुष के प्रमाण से (दो घणुसहरसाई गाउय) २००० धनुषों का एक कोस होता है और (बलारि गाउयाई जोम) चार कोसों का एक योजन होता है। (एएणं उस्तेहं गुलेणं किं पयोयणं ?) इस उत्सेधांगुल के कथन करने का क्या प्रयोजन है ? (एएणं उम्लेहंगुलेणं णेरइयतिरिक्ख जोणियनणुस देवाणं सरीरोगाहणाउ मविनंति) इस उत्सेधां- गुल से नारक, तिर्यक् योनि के जीव, मनुष्य और देवों के शरोरों की अवगाहना नापो जाती है। भावार्थ-उत्सेधांगुल का अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है। जैसे- परमाणु, त्रसरेणु, रथरेणु, इत्यादि । प्रकाश में जो धूलि कण प्रतीत होते हैं, उन्हें 'त्रसरेणु' कहते हैं । रथ के चलने से जोरज उड़ती है, उसे 'रथरेणु' कहते हैं । बालान, लिना,जू, यव, ये सब उत्तरोत्तर आठ गुणा अधिक करने से निष्पन्न होते हैं। परमाणु दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है । एक सूक्ष्म- परमाणु, द्वितीय व्यावहारिक परमाणु। सूक्ष्म परमाणु स्थापनीय है; क्योंकि उसका । ॥ [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] यहां पर अधिकार नहीं है। अनन्त सूक्ष्म परमाणुओं के मिलने से एक व्यावहारिक परमाणु उत्पन्न होता है । उसको खड्गादि भी अतिक्रम नहीं कर सकते । अग्नि जला नहीं सकती। पुष्कलसंवर्त नायक महामेह जो उत्सर्पिणी काल में होता है, उसको जलरूप नहीं कर सकता। गंगा महानदी के स्रोतोगत होता हुश्रा भी वह पानी में लीन नहीं होता। किन्तु सुतीक्ष्ण शस्त्र भी उसको छेदन करने में असमर्थ है। वह परमाणु केवली भगवानों ने व्यावहारिक गणना की आदि में प्रतिपादन किया है। अनन्त व्यावहारिक परमाणु पुद्गलों के मिलने से उत्श्लक्ष्णश्लक्षिणका परमाणु उत्पन्न होता है। फिर श्लक्ष्णश्लक्षिणका, ऊर्ध्वरेणु,त्रसरेणु, देवकुरुउत्तरकुरु मनुष्यों का वालाग्र, हरिवर्ष-रम्यवर्ष मनुष्यों का बालान, हैमवय-हैरण्यवय मनुष्यों का बालाय, पूर्वमहाविदेह-पश्चिममहाविदेह मनुष्यों का बालान, भरत- पेरवत मनुष्यों का बालान, लिक्षा, जू, यव, अंगुल, ये प्रत्येक उत्तरोत्तर पाठगुणा अधिक जानने चाहिये । उक्त ६ अंगुलों का अर्द्ध पाद, १२ अंगुलों का एक पाद, २४ अंगुलो का एक हस्त, ४८ अंगुलों की एक कुक्षि, और ६६ अंगुलों का एक धनुयू होता है । इसी धनुष के प्रमाण से २००० धनुषों का एक कोस और ४ कोसों का एक योजन होता है। इस अंगुल के कथन करने का प्रयोजन, चार गतियों के जीवों की अवगाहना का मान करना है। इसलिये अवगाहना के विषय में अव सूत्रकार कहते हैं- अथ अवगाहना विडया णेरइयाणं भत्ते ! के महालिया सरीरोगाहणा प- एणता ? गोयमा!! दुविहा पण्णता, तं जहा-भवधारणि- जाय उत्तरवेउव्विाय तत्थणं जासा भवधारणिज्जा, सा जहणणेणं अंगुलस्स असंखेजइभाग, उक्कोसेणं पंचधणुस- याइं; तत्थ णं जा सा उत्तरवेउव्विा सा जहरणेणं अंगुल- स्स संखेजइभाग, उकोसेणं धणुसहस्सं॥ पदार्थ-(णे?इयाणं भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णता ? गोयमा ! दुविहा पएणता, तं जहा-भवधारणिज्जा य उत्तरवेउच्चिा य) [श्री गौतम प्रभु जी, भगवान से प्रश्न [उत्तरार्धम् ] करते हैं कि हे भगवन् ! नारकियों के शरीरों को अवगाहना कितनी बड़ी है ? [भगवान् , श्री गौतम प्रभु को संबोधन करके प्रथम अवगाहना के भेद प्रकट करते हुए निम्न प्रकार से उत्तर देते हैं ] भो गौतम ! अवगाहना दो प्रकार की वर्णन की गई है। एक भवधारणीया और दूसरी उत्तरवैक्रिया । भवधारणोया अवगाहना उसे कहते हैं कि जो |जब तक आयु रहे तब तक रहे। उत्तरवैक्रिया उसका नाम है कि जो कुछ समय के लिये कारणवशात् वा स्वेच्छानुसार शरीर छोटा बड़ा किया जाय (तत्य णं जा सा भववारणिज्जा, सा जहरणेणं अंगुलस्स असंवेज्जइभाग, उकोसेणं पंचधणुसयाई) उन दोनों में जो भवधारणोया अवगाहना है, वह न्यून से न्यून के असंख्यात भाग प्रमाण होती है [यह कथन उत्पत्ति समय की अपेक्षा से है ] और उत्कृष्ट से उत्कृष्ट ५०० धनुष प्रमाण होती है। यह कथन सातवों पृथ्वी की अपेक्षा से है ] (तत्य णं जा सा उत्तरवे उब्बिया, सा जहरणेणं अंगुलरस संखेज्जइभाग, उकोसेरणं पणु- सहस्स) उन दोनों में जो उत्तरवैक्रिया है, वह न्यून से न्यून अंगुल के संख्यात भाग प्रमाण होती है [ असंख्यात भाग प्रमाण में वैक्रिया की पूर्ति नहीं होती है। ] और उत्कृष्ट से उत्कृष्ट १००० धनुष प्रमाण होती है। [ यह कथन भी सातवें नरक की अपेक्षा से है।] 4 न्यून अंगुल भावार्थ-जारकियों के शरीर की अवगाहना दो प्रकार से प्रतिपादन की गई है। एक भवधारणीया और द्वितीय उत्तरवैक्रिया । भवधारणीया जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट १०० धनुप् प्रमाण होती है। उत्तरवैक्रिया जघन्य अंगुल के संख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट १००० धनुष्प्रमाण होती है । भवधारणीया उसे कहते हैं जो आयु पर्यन्त रहे और उत्तरवैक्रिया वह है जो कारण वश की जावे। यहां पर तो नारकियों की अवगाहना सामन्य प्रकार से कही गई है। अब आगे विस्तार पूर्वक उसका वर्णन करते हैं- mam amaya रयणप्पहाए पुढवीए णेरइयाणं भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णत्ता? गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता, तं जहा- भवधारणिज्जा य उत्तरवेउव्विा य । तत्थ णं जा सा भव- धारणिजा सा जहणणेण अंगुलस्स असंखेजइभाग, उक्कोसेणं सत्त धणूइं तिरिण रयणीओ [श्रोमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] अंगुलाई; तत्थ णं जा सा उत्तरबेउविमा सा जहरणोणं अंगुलस्स संखेजइभाग, उक्कोलेणं पण्णरस धणू दोन्नि रयणीमो बारस अंगुलाई (१) सकरपहापुढवीए णेरइयाणं भंते । के महाजिया सरीरोगाहणा पण्णता ? दुविहा पण्णत्ता, तं जहा-भवधारणिज्जा य उत्तरवेउठिवाया तत्थ णं जा सा भवधारशिजा साजहणणे अंगुलस्सअसंखेजहभाग, उक्को- सेणं पण्णरसधणूइंदुगिण रयणीभोवारस अंगुलाई; तत्थ णं जा सा उत्तरउनिमा साजहराणेणं अंगुलस्त संखेजइभार्ग, उक्कोसेणं एकतीसं धणूइं इक्करयणी य (२) वालुअप्पहा- पुढवीए गरइया भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पगण- ता? गोयमा ! दुविहा पराणता, तं जहा-भवधारणिज्जा य उ त्तरवेउव्विा यातत्थ हो जा सा भवधारगिजा सो जहणणेणं अंगुलस्स असंखेजइभाग, उक्कोसेणं एकतीसं धणूई इक्करयणी या तत्थ एंजासा उत्तरउब्विा सा जहणणेणं अंगुलस्स संखेजहभागं, उक्कोसेणं बासटि धणूई दो रय णीयो अ (३) एवं सवासिं पुढवीणं पुच्छा भाणियब्वा । पंकप्पहाए पुडवोए भवधारणिज्जा जहणणेणं अंगुलस्स असंखेजइभागं, उक्कोसेणं बाटि धणइदो रयणीओ य; उत्तरवेउब्बिया जहणणं अंगुलस्त संखेजइभाग, उक्कोसे- णं पणवीसंधणूसयं (४) धूमप्पहाए भवधारणिजाजहरणेणं अंगुलस्स असंखेजइभागं, उक्कोसेणं पणवीसं धणूसय; उत्तरवेउविया जहणणेणं अंगुलस्स संखेजइभागं, उक्को- सेणं अड्डाइजाई धणूसयाई (५) तमाए भवधारणिज्जा L जहणणेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभाग, उक्कोसेणं अड्डाइ- उजाइ' धणूसयाइ'; उत्तरवेउब्विया जहणणे अंगुलस्स संखेज्जइभाग, उक्कोसेणं पंच धणुसयाई (६) तमतमाए पुढवीए णेरइयाणं भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णता ? गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता, तं जहा-भवधारणि- ज्जा य उत्तरवेउव्विया य। तत्थ रणं जा सा भवधारणि जा सा जहरणेणं अगुलस्स असंखेज्जइभाग', उक्कोसेणं पंच धणूसयाई; तत्थ णं जा सा उत्तरवेउठिकमा सा जहणणेणं अंगुलस्स खेज्जइभाग', उक्कोसेणं धणुसहस्साई (७) BAHAN क पदार्थ-(रयणप्पहाए पुढबीए गरइयाणं भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णता ? गोयना ! दुविहा पएणत्ता, तं जहा-भवधारणिज्जा य उत्तरवेव्विा य) रत्नप्रभा पृथ्वी के नार- कियों को हे भगवन् ! कितनी बड़ी अवगाहना है ? हे गौतम ! रत्नप्रभा के नारकियों के शरीरों को अवगाहना दो प्रकार की वर्णन की गई है। एक तो भवधारणीया, द्वितीय उत्तरवैक्रिया (तत्थ एं जा सा भवधारणिज्जा सा जहरणेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभाग,उकोसेणं सत्त- धणूई तिरण रयणीको छच्च अंगुलाई) उन दोनों में जो भवधारणीया है, वह जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण होती है; उत्कृष्ट अवगाहना ७ धनुष् , ३ हाथ और ६ अंगुल प्रमाण होती है (तस्थ णं जा सा उत्तरवेब्विया सा जहएणेणं अंगुलस्स संखेज्जइभागं, उक्की- सेणं पएणरस धण्इं दोरिण रयणीग्रो वारस अंगुलाई ) उन दोनों में जो उत्तरवैक्रिया है वह जघन्य अंगुल के संख्यातभाग प्रमाण होती है; उत्कृष्ट १५ धनुष,२ हाथ और १२ अंगुल प्रमाण है।॥१॥ ( सकरप्पहाए पुढवीए गरइआणं भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णता? गोयमा ! दुविहा परणत्ता, तं जहा-भवधारणिज्जा य उत्तरवेउन्विश्रा य ) हे भगवन् ! शर्करा- प्रभा नाम की पृथ्वीके नारकियों की शरीरावगाहना कितनी बड़ी है ? हे गौतम ! वह दो प्रकार से बतलाई गई है । जैसे कि-एक अवधारणोया और दूसरी उत्तरवैक्रिया। (तत्थ णं जा सा भवघारणिज्जा सा जहएणेणं अंगुलस्स संखेजइभाग, उक्कोसेणं पएणरत घणूई दुरिण रयणीश्रो बारस अंगुलाई ) उनमें से जो भवधारणीया अवगाहना है, वह जघन्य अंगुल के असंख्यातवें भागांप्रमाण है और उत्कृष्ट १५ धनुष् , २ हाथ और १२ अंगुल-प्रमाण है । ( तत्थ सं जा सा उत्तरवेचिया सा जहरणेगां श्रृंगुलस्स संखेजइभागं, ! -- १ ३२ [ श्रीमदनुयोगद्वासूत्रम् ] उक्कोसेण एकतीसं धणूई इक्करयणी अ ) उन में से जो उत्तरवैक्रिया नाम की अवगाहना है, वह जघन्य अंगुल के संख्यातवें भाग प्रमाण है और उत्कृष्ट ३१ धनुष और १ हाथ प्रमाण है ।। २॥ (बालुअप्पहापुढवीए णेरझ्याणां भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णता ? गोयमा ! दुविहा पण्णता, तं जहा-भववारणिज्जा य उत्तरवेविप्रा य) बालुकाप्रभा पृथ्वी के नारकियों की हे भगवन् ! कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? भो गौतम ! वह दो प्रकार से प्रतिपादन की गई है। जैसे कि भवधारणीया और उत्तरवैक्रिया ( तत्थ शं जा सा भवधारणिज्जा सा जहरणेगां अंगुलस्स असंखेजइभाग, उक्कोसे एकतीसं धणूई इकरयणी अ) उन में से जो भवधारणीया है, वह न्यून से न्यून अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण होती है, उत्कृष्ट ३१ धनुष्, १ हाथ प्रमाण होती है । (तत्य गांजा सा उत्तरवेउब्विया साजहरणेणं अंगुलस्स संखेजइभागं, कोर्सयां वासट्टि धणूई दो रयणीश्री अ) उन में से जो उत्तरवैक्रिया है, वह जघन्य अंगुल के संख्यातवें भाग प्रमाण है और उत्कृष्ट ६२ धनुष् और २ हाथ प्रमाण है। उत्तरवैक्रिया भवधारणीया से दूनी है ॥३॥ ( एवं सत्रासिं पुढवीण पुच्छा भाणियव्वा ) इसी प्रकार सर्व पृथ्वियों के विषय में प्रश्न कर लेना चाहिये। (पंकप्प- हाए पुढवीए भवधारणिज्जा जहरणेगा अंगुलस्स असंखेजइभाग, उक्कोसे वासट्टिधणूई दोरयणीयो य) पंकप्रभा नाम की पृथ्वी के नारकियों की भवधारणीया शरीरावगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण और उत्कृष्ट ६२ धनुष और २हाथ प्रमाण है (उत्तरवेउब्विया जहरणेगां अंगुलस्स संखेजइभागं, कोसेणं पणवीसं धणसयं ) उत्तरवैक्रिया जघन्य अंगुल के संख्यातवें भाग प्रमाण और उत्कृष्ट १२५ धनुष् प्रमाण है ॥४॥ (धूमप्पहाए भवधारणिज्ना जहरणेगां अंगुलस्त असंखेज्जइभागं, उकासगं पण्व.सं धणूसयं ) धूमप्रभा के नारकियों की भवधारणीया अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण और उत्कृष्ट १२५ धनुष् प्रमाण है । ( उत्तरवेउविश्री जहरणेगां अंगुलस्स संखेजइभागं, उक्कोसेरणं अड्डाइज्जाई धणूसयाई , उत्तरवैक्रिया अवगाहना जघन्य अंगुल के संख्यातवें भाग प्रमाण और उत्कृष्ट २५० धनुष् प्रमाण होती है ॥५॥तमाए भवधारणिज्जा जहएणेगां अंगुलस्स असंखेज्जइभागं, उक्कोसेग अड्डाइज्जाई धणू सयाई ) तमःप्रभा नाम की पृथ्वी के नारकियों की भवधारणीया शरीर की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण और उत्कृष्ट २५० धनुष प्रमाण है । ( उत्तरवेविया जहएणयां अंगुलस्स संखेज्जड़ भागं, उक्कोसेणां पंच धणू सयाई ) उत्तरवैक्रिया शरीर की अवगाहना जघन्य अंगुल के संख्यात भाग प्रमाण, उत्कृष्ट ५०० धनुष प्रमाण है ।। ६॥ (तमतमाए पुढवीए णेरइयाणं भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णता ? गोयमा ! दुविहा परणत्ता, तं जहा-भवधारणिज्जा य उत्त रवेविनाय, तत्थ णं जा सा भवधारणिज्जा सा जहरणेणं अंगुलस्स असंखेजइभागं, ) .. ! उकोसेणं पंचवणुसयाई तत्थ णं जा सा उत्तावेवित्रा सा जहरणेणं अंगुलस्स संखेजइभार्ग, उक्कोसेणं घणुसहस्साई) हे भगवन् ! तमस्तमः पृथ्वो के नारकियों के शरीर की कितनी बड़ी श्रावगाहना प्रतिपादन की गई है ? भो गौतम ! तमस्तमः पृथिवी के नारकियों की अवगाहना दो प्रकार से प्रतिपादन को गई है, एक भवधारणीया, दूसरी उत्तर- वैक्रिया । उन में से जो भवधारणीया है, वह जघन्य अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण है, उत्कृष्ट ५०० धनुष् प्रमाण है । दूसरी उत्तरवैक्रिया, जघन्य अंगुल के संख्यातवें भाग प्रमाण और उत्कृष्ट १००० धनुप् प्रमाण है ॥ ७ ॥ भावार्थ- उक्त सूत्र में सातो नरको के नारकियों की अवगाहना के विषय में विवरण किया गया है । सम्पूर्ण नारकियों की अवगाहना दो प्रकार की है। एक भवधारणीया और दूसरी उत्तरवैकिया। भवधारणीया अवगाहना जघन्य सर्वत्र अंगुल के अलंख्यात भाग प्रमाण है और उत्कृष्ट पूर्व नरकों की अपेक्षा उत्तर नरकों में दुगुनी-दुगुनी है। उत्तरक्रिया, जघन्य सर्व अंगुल के संख्या- तवे भाग प्रमाण है और उत्कृष्ट भवधारणीया ले सर्वत्र दुगुनी-दुगनी है। नार- कियो की अवगाहना का विवरण यहां समाप्त होता है। और देव की अव. गाहना का विवरण अब प्रारम्भ होता है । देव चार प्रकार के हैं-भवनपति १, व्यन्तर २, ज्योतिष्क ३और कल्पवासी ४। इन में सबसे पहले अब भवनपतियों की अवगाहना के विषय में कहते हैं- असुरकुमाराणं भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णता ? गोयमा ! दुविहा पराणता, तं जहा--भवधारणि- ज्जा य उत्तरवेउब्विायतत्थ णं जा सा भवधारणिज्जासा जहणणेणं अंगुलस्त असंखेज्जइभाग, उक्कोसेणणं सत्तरयणोओ; तत्थ णं जा सा उत्तरवेउव्विना सा जहरणेणं अंगुलस्स संखेज्जइभाग, उक्कोसेणं जोयणसयसहस्स। एवं असुरकुमारागमेणं जाव थपियकुमाराणं ताव भाणि- अव्वं walement पदार्थ-(असुरकुमागणं भंते ! के महालिरा रीगंगाह परणार । ? गोयमा ! दुविहा पएणत्ता, तं जहा-भवधारणिज्जा य उत्तरवैउब्विाय) हे भगवन् ! असुरकुमारों को शरीर-अक [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] गाहना कितनी बड़ी प्रतिपादन की गई है ? भोगौतम ! उनकी शरीरावगाहना दो प्रकार से प्रतिपादन की गई है। जैसे कि भवधारणीया और उत्तरवैक्रिया (तत्थ णं जासा भव- धारणिजा सा जहरणेणं अंगुलस्त असंखैजइभाग, उक्कोसेणं सत्त रयणीओ) उन दोनों में जो भवधारणीया है, वह जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट ७ हाथ प्रमाण होती है तथा जो (तत्थ गंजा सा उत्तर वेरब्बिया सा जहरणेणं अंगुलस्स संखेजइभागं, उक्कोसेणं जोयणसयसहस्स) उन दोनों में जो उत्तरवैक्रिया है वह जघन्य अंगुल के संख्यांत भाग प्रमाण और उत्कृष्ट १००००० योजन प्रमाण शरीर को अवगोहना है। (एवं असुरकुमारगमेणं जाव थणियकुमाराणं लाव भारिणयव्यं) इसी प्रकार असुरकुमार से लेकर स्तनितकुमार पर्यन्त स्वरूप जानना चाहिये। भावार्थ-नारकियों की तरह दश भवनपतियों की भी अवगाहना दो प्रकार की है । एक भवधारणीया, दूसरी उत्तरवैक्रिया। भवधारणीया जघन्य अंगुल के असंख्यातवें भाग : माण और उत्कृष्ट ७ हाथ प्रमाण होती है । उत्तर वैक्रिया अवगाहना जघन्य अंगुल के संख्यातवें भाग प्रमाण और उत्कृष्ट १००००० योजन प्रमाण होती है। अथ पंचधाकर-छाकशाहना का विषय । पुढविकाइयाणं भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णता ? गोयमा ! जहणणेग) अंगुलस्स असंखेज्जइभाग, उक्कोसेण वि अंगुलस्स असंखेज्जइभाग; एवं सुहुमाणं ओहियाण, अपज्जत्तयाण', पज्जत्तयाण, बादराण भाणि- यव्वा । एवं जाव बादरवाउकाइयाण पज्जत्तयाण भाणि- थव्वं । वणस्सइकाइयाणं भते! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णता ? गोयमा ! जहणणेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभागं, उक्कोसेणं साइरेगं जोयणसहस्स, सुहुमाणं वणस्सइ- काइया ओहिया अपज्जयाणं पज्जत्तयाणं तिगह , , [ उत्तरार्धम् ] पि जहरणेणं अंगुलस्त असंखेज्जइभार्ग, उक्कोसेण वि अंगुलस्त असंखेज्जइभाग; बादरवणस्सइकाइयाणं जह- एणणं अंगुलस्स असंखेज्जइभाग, उक्कोसेणं साइरेगं जोयणसहस्स; अपज्जत्तयाणं जहणणेणं अंगुलस्स असंखे- उजइभाग, उक्कोसेण वि अंगुलस्त असंखेज्जइभाग; पञ्जत्तयाणं जहणणेणं अंगुलस्त असंखेज्जइभार्ग, उक्को- सेणं साइरेग जोयणसहस्सं ॥ पदार्थ-(पुढविकाइयाणां भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णत्ता ?) पृथ्वीकायिक जीवों को हे भगवन् ! कितनी बड़ी शरीरावगाहना प्रतिपादन की गई है ? (गोयमा !) भो गौतम ! (जहरणेणं अंतुलस असंखेजहभाग)जवन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण (उकोसेण वि अंगुलस असंखेजइभाग) और उत्कृष्ट भी अंगुल के असं- ख्यात भाग प्रमाण होती है । इसको औधिक वा समुच्चय सूत्र कहते हैं । इसी विषय में आगे भी कहते हैं (एवं तुहुनाणं ओहियाणं ) इसी प्रकार सूक्ष्म औधिक सूत्र (अप- ज्ज तयारण) अपर्याप्त सूत्र (पजत्तवाणं) पर्याप्त सूत्र (बादराणं श्रोहियाणं) बादर औधिक सूत्र (पज्जलवाण) पर्याप्त सूत्र (माणिवया) कहने चाहिये (एवं जाव वाररवाउकाइयाणं पजत्तयाणं भाषिया) इसी प्रकार यावत् बाहर वायुकाय पर्याप्त पर्यन्त वर्णन करना चाहिये (वणसइकाइयाणं भंते ! के सहालिया सरीरोगाहणा पएणत्ता ? गोयमा !) हे भगवन् ! वनस्पतिकाय के शरीर की कितनी अवगाहना होती है ? भो गौतम ! (जहरणेणं अंगुलस्त असंखेज्जइभाग, उक्कोसेणं साइरेगं जोयणसहस्स) जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण, उत्कृष्ट कुछ अधिक सहस्र योजन प्रमाण है ( सुहुमवणस्सइ- काइयाणं ओहियाणं अबजतयाणं तिएह पिजहरणेणं असंखेजइभाग, उकोसेण वि असंखेजइ भागं) सूक्ष्म वनस्पतिकाय के विषय में जो औधिक सूत्र है और अपर्याप्त पर्याप्त सूत्र हैं, उन सब की जघन्य उत्कृष्ट अवगाहना अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण प्रति- पादन की गई है । (बादरवणसइकाइयाणं जहरणेणं अंगुलस्स असंखेजइभाग, उकोप्तेणं साइरेगं जीयणसहरसं) बादर वनस्पतिकाय की जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग * जघन्य से उत्कृष्ट फिर भी अधिक जानना चाहिये। क्योंकि 'अनन्त' के अनन्त भेद होते हैं। इसी तरह अन्यत्र भी समझना ।
[श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] प्रमाण अवगाहना होती है और उत्कृष्ट कुछ अधिक सहल योजन प्रमाण (अपज्जत्तयाणं जहएणणं अंगुलस्स असंखेजइभाग, उक्कोलेणं अंगुलत असंखेजइभाग) अपर्याप्त जीवों के शरीरों की जघन्य और उत्कृष्ट दोनों प्रकार की अवगाहना अंगुल के असंख्यातभाग प्रमाण हो होतो है । (पज्जत या जहरणे एवं अंगुलस' असं खेजहभाग, उहोतेणं साइरेगं जोयणसहस्स) पर्याप्त जीवों के शरीरों की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट किंचित् अधिक सहस्र योजन प्रमाण प्रतिपादन की गई है । भावार्थ-प्रथम औधिक पृथ्वीकायिक जीवों की १ औधिक सूक्ष्म पृथ्वी- कायिक २, अपर्याप्त ३, पर्थात ४, भौधिक नारक पृथ्वीकायिक जीवों की ५, अपर्याप्त ६, तथा पर्याप्त ७, इन सप्त स्थानों की जघन्योत्कृष्ट अंगुल के असं- ख्यात भाग प्रमाण अवगाहना प्रतिपाइन की गई है। इसी प्रकार अष्कायिक, तेजस्कायिक और वायुकायिक जीवों की अवगाहना हैं । वनस्पतिकायिक जीवों के सप्त स्थानों में तो जघन्य अवगाहना प्राग्वत् ही है, बादर में उत्कृष्ट जीवों की अवगाहना किंचित् अधिक सहन्न योजन प्रमाण समुद्र में कमल नालिकादि की अपेक्षा से है। इस तरह एकेन्द्रियों के पांच दण्डको की अवगाहना कथन की गई है। अब द्वीन्द्रिय आदि जीवों के विषय में कहते हैं- त्रिविकले द्रय बिदा ७ - एवं बेइंदियाणं पुच्छा, गोयमा ! जहण्गोणं अंगु- लस्स असंखेजइभाग, उक्कोसेशं वारस जोयणाई: अप- जत्तयाणं जहएणणं अंगुलस्स असंखेजइभाग, उक्कोसेण वि अंगुलस्स असंखेजइ भाग: पज्जतयाणं जहण्णणं अंगुलस्स असंखेज इभाग, उक्कोसेणं बारस जोयणाई । तेइंदियाणं पुच्छा, गोयमा । जहण्णणं अंगुलस्स असंखेज्जइभागं, उक्कोसेणं तिरिण गाउयाई;अपजत्तयाणं जहणणेणं अंगुल- स्सअसंखेजइभाग, उक्कोसेण विअंगुलस्स असंखेजइभाग: पजत्तयाणं अंगुलस्स असंखेजइभाग, उक्कोसेणं तिरिण गाउयाई । चरिंदियाणं पुच्छा, गोयमा ! जहरणेणं -- [ उत्तरार्धम् ] अंगुलस्स असंखेज्जइभाग, उक्कोसेणं चत्तारि गाउयाई; अपज्जत्तयाणं जहरणेणं उक्कोसेणं अंगुलस्स असंखेजइ- भागं; पजत्तयाणं जहएणणं अंगुलस्त असंखेजइभाग, उक्कोसेणं चत्तारि गाउयाई ॥ पदार्थ-(एवं वेदियाणं पुच्छा) द्वीन्द्रिय जीवों की हे भगवन् ! कितनी अव. गाहना होती है ? (गोयमा ! जहरणेणं अंगुलस्स असंखेजहभागं, इक सेणं बारस जोयणाई) भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट बारह योजन प्रमाण अवगाहना होती है (अपज्जत्तयाणं जहरणेणं अंगुलरस असंखेजइभाग, उक्कोसेण वि* अंगुलस्स असंखेजइभागं) अपर्याप्त द्वीन्द्रियों की जघन्य तथा उत्कृष्ट दोनों प्रकार की अवगाहनाएँ अंगुल के असंख्यातभाग प्रमाण होती हैं । (पजत्तयाणं जाहरणेणं अंगुल.स्स असंखेन इभान, उकोसेणं बारस जोयणाई) पर्याप्त द्वीन्द्रिय जीवों की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट बारह योजन प्रमाण है। । (लेइंदियाणं पुच्छा) हे भगवन् ! त्रीन्द्रिय जीवों की कितनी अवगाहना होती है ? (गोयला ! जहरण अंगुलस्स असंखेज्जइभार्ग, उकासेण तिरिण गाउचाई) भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यातभाग प्रमाण और उत्कृष्ट तीन कोस प्रमाण होती है [यह भी बाहर के द्वीप समुद्रों में जाननी चाहिये] (अपजक्तयाण जहरणेण अंगुलस्स असंखें जाइभागं, उक्को- सेण वि अंगुलरस असंखेज्जइभा) अपर्याप्त त्रीन्द्रिय जीवों की अवगाहना जघन्य और उत्कृष्ट दोनों ही अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण होतो हैं । ( पञ्जत्तयाण अंगुलस्स असंखेनइभा , उक्को लेग तिशिण गाउयाई ) पर्याप्त जोवों की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट तीन कोस प्रमाण होती है (चरिंदियाण पुच्छा ) चतुरिन्द्रिय जीवों की अवगाहना हे भगवन् ! कितनी होती है ? (गोयमा ! जहणणेण अंगुलस्स असंखेज्जइमागं, उक्कोसेण चत्तारि गाउयाई ) भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट चार कोस प्रमाण होती है (अपज्जत्तयाण जहरणेण अंगुलस्स असंखेज्जइभागं, उनकोसेण वि अंगुलरस असंखेज्जइयाग) और अपर्याप्त जीवों को अवगाहना जघन्य और उत्कृष्ट दोनों ही अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण है (पज्जत्तयाणं जहणणेण अंगुलस्स असंखेज्जइभाग, उक्कोसेण चत्तारि गाउयाई)पर्याप्त यहां पर 'वि-'अपि शब्द परस्परापेक्षार्थ में है। + यह कथन स्वयंभूरमण समुद्र में शंखादि जीवों को अपेक्षा से है * ३८ [ श्रीमदनुयोगद्वासूत्रम् ] जीवों को अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट चार कोस प्रमाण होती है। भावार्थ-दीन्द्रिय जीवों को अवगाहना न्यून ले न्यून अंगुल के अर ख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट १२ योजन प्रमाण कथन की गई है। अपर्याप्त द्वीन्द्रिय जीवों की अवन्य और उत्कृष्ट अवगाहना अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण ही रहती है। श्रीन्द्रिय जीवों की जघन्य अवगाहना तो प्राग्वत् ही किन्तु उत्कृष्ट अवगाहना ३ कोस प्रमाण है। चतुरिन्द्रिय जीवों की जघन्य अवगाहना पूर्ववत् , उत्कृष्ट अवगाहना ४ कोस प्रमाण होती है। यह सर्व कथन असंख्यात द्वीप समुद्रों की अपेक्षा से प्रतिपादन किया गया है। अब पञ्चेन्द्रिय जीवों को अवगाहना के विषय में विवरण करते हैं- प्रथा पञ्चेन्द्रिय विदया। । - पंचेंदियतिरिक्वजोणियाणं भंते ! के महालिया सरी- रोगाहणा पण्णता ? गोधमा ! जहणणेणं अंगुजस्स असंखेज- इ भाग, उकोसे जोयाणसहस्तं; जलयरपंचिंदियतिरिक्ख- जोणियाणं पुच्छा, गोयमा! एवं चेव; संमुच्छिमजलयर- पंचेंदियतिरिक्व जोणियां पुच्छा, गोयमा ! एवं चेव; अपज्जत्तयसमुच्छिमजलयरपंचेंदियतिरिक्खजोणियाण"पु- च्छा, गोयमा ! जहणणं अंगुरूस्स असंखेज्जइभाग, उकोसेण वि अंगुलस्त असंखेज्जइभाग; पजत्तयसमुच्छिम जलयरपंचेंदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा, गोयमा ! जहणणेण अंगुलस्स अस खेज्जाभार्ग, उक्कोसेण जोयण- सहस्स; गम्भवक्कंतियजलयरपंचेंदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा, गोयमा ! जहरणेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभाग, उक्कोसेणं जोयणसहस्स; अपजत्तयाणं पुच्छा, गोयमा । जहणणेणं अंगुलस्स असंखेजइभाग, उक्कोसेण वि अंगुलस्स , [ उत्तरार्धम् । असंखेजइभागं; पज्जत्तयाणं पुच्छा, गोयमा ! जहणणेणं अंगुलस्स असंखज्जइभागं, उक्कोसेमं जोयणसहस्स; च- उप्पयथलयरपंचेदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा, गोयमा ! जहण्णणं अंगुलस्स असंखेजइभाग, उक्कोसेणं छगाउ- याइं; समुच्छिमचउप्पयथलयरपंचेंदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा, गोयमा ! जहरमेणं अंगुलस्स अखेज्जइ- भाग', उक्कोसेणं गाउयपुढतं; अपज्जत्तयाणं पुच्छा गोयमा! जहणणं अंगलस्स अस खेज्जइभाग, उक्कोसेण वि अं- गुलस्स अस खेज्जइभाग'; पज्जत्तयाणं पुच्छा, गोयमा ! जहण्णणं अंगुलस्स असोज्जाभाग, उक्कोलेणं गाउय. पुहुत्तं गब्भवक्कतियचउप्पयथलयरपंचिदियतिरिक्खजोणि याणं पुच्छा, गोयमा ! जहणणेणं अंगुलस्स असोज- इभाग', उक्कोसेणं छगाउयाइं; अपज्जत्तयाणं पुच्छा, गोयमा ! जहणणेणं अंगुलस्स असं खेज्जइभाग, उक्को- सेण वि अंगु लस्स अस खेज्जइ भाग; पज्जत्तयाणं पुच्छा, गोयमा !जहणणेणं अंगु लस्स असरखेज्जइभाग, उक्को- सेणं छगाउयाई; उरपरिसप्पथलयरपंचिदियतिरिक्ख- जोणियाण पुच्छा, गोयमा ! जहणणेण अंगु लस्स असंखेज्जइभाग, उक्कोसेण जोयणसहस्सं समुच्छिम- उरपरिसप्पथलयरपंचिंदियतिरिक्खजोणियाण पुच्छा, गोयमा ! जहणणेण अंग लस्स असंखे जइभाग, उक्को- सेण जोयणपुहत्त; अपज्जत्तयाण अंगु लस्स असंखजइ भागं, उक्कोसेण वि असंह जइभाग पज्जत्तयाणं जहणणेणं अंग लस्स असंरकेजइभाग, उक्कोसेण' , CAR ] ७ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] वि असंखेज्जइभाग, पञ्जत्तयाण जहरणेण अंगु लस्स असंखोज्जइभोग, उक्कोसेण जोयणपुहुत्तं, गब्भवक्क तियउरपरिसप्पथलयरपंचिंदियतिरिक्खजोणियाण पुच्छो, गोयमा ! जहण्णण अंगु लस्स असंखज्जइभाग, उक्कोसेण जोयणसहस्स; अपज्जत्तयाणपुच्छा, गोयना ! जहणणे अं! लस्स असंखजइभाग, उक्कोरोण वि अंगु लस्स असंख जइभाग, पज्जत्तयाण पुच्छा, गोयमा ! जहणणेण अंगु लस्स असंखोजइभाग, उसकोसेण जोयणसहस्स, भुयपरिसप्पथलयरपंचिंदियतिरिक्ख- जोणियाण' पुच्छा, गोयमा ! जहणणण अंगु लस्स अस- खजइभाग, उक्कोसेण गाउयपुहुत्तं समुच्छिम भुयपरिसप्पथलयरपंचिंदियतिरिक्खजोणियाण पुच्छा गोयमा जहण्णण अंग लस्स असंख उजइभाग, उक्को- सेण धणुपुहुत्तं, अपज्जत्तयसंमुच्छिमभुयपरिसप्पथल- यर• पुच्छा, गोयमा! जहणणेण अंगु लस्स असंखजइ- भाग, उक्कोसेण वि अंगुलस्स असंखजइभाग; प.ज- त्तयसंमुच्छिमभुयपरिसप्पथलयर पुच्छा, गोयमा जदाणे अंगुलस्स असंखज्जइभाग', उबकोसेण धणुपहुत्तं, गब्भवक्कंतियभुयपरिसप्पथलयरपचिंदिय- तिरिवखजोणियाण पुच्छा, गोयमा! जहणणेण अंगुलस्स असंखज्जइभाग, उक्कोसेण गाउयपुहुत्तं, अप जत्तयाण पुच्छा, गोयमा ! जहणणेण अंगुलस्स असंख जइभाग', उक्कोसेण वि अंग लस्स असंख जइ भाग', पज्जत्तयाण पुच्छा, गोयमा ! जहणणेण अगु लस्स असंखज्जइभाग, - [ उत्तरार्धम् ] उक्कोसेणं गाउयपुहुत्तं; खहयरपंचिंदिय तिरिक्ख- जोणियाणं पुच्छा, गोयमा ! जहणणेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभाग, उक्कोसेणं धणुपुहुत्तं; संमुच्छिमखह- यराणं जहा भुजपरिसप्पसमुच्छिमाणं तिसुवि गमेसु तहा भाणियब्वं; गम्भवति याणं पुच्छा, गोयमा ! जह. एणेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभार्ग, उक्कोसेणं धणुपुहुत्तं; अपज्जत्तयाणं पुच्छा, गोयमा ! जहणणेणं अंगुलस्त असं- खेज्जइभागं, उक्को सेरण वि अंगुलस्स असंखेज्जइभाग; पज्जत्तयाणं गब्भवक्कोतियखहयर. एच्छा, गोयमा ! जहणणेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभाग, उक्कोसेणं धणु पुहुत्तं । तत्थ णं संगहणिगाहामो भवति । तंजहा-"जोयण सहस्स गाउयपुहुत्तं तत्तो अजोयणपुहुत्तं । दोरहंतु धणुपुहुत्तं समुच्छिमे होइ उच्चित्तं ॥ १ ॥ जोयणसहस्ल छग्गाउयाई तत्तो य जोयणसहस्सं । गाउयपुहुत्त भुयगे, पक्खीसु भवे धणु पहुत्तं ॥ २ ॥ पदार्थ-(पंचिंदियतिरिक्ख जोणियाणं भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णता ?) हे भगवन् ! पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों के शरीरों को अवगाहना कितनी बड़ी प्रतिपादन की गई है ? (गोयमा ! जहणणेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभाग) भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण अवगाहना होती है (उकोसेणं जोयणसहस्तं) उत्कृष्ट सहस्र योजन प्रमाण होती है (जजयरपंचिंदियतिरिक्ख जोणियाणं पुच्छा,) हे भगवन् ! जलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों के शरीर की कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? (गोयमा ! एवं चेव) भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट एक हजार योजन प्रमाण होती है । ( संमुच्छिमजलयरपंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा,) । , ४२ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] हे भगवन् ! संमूच्छिम जलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों के शरीरों की कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? (गोयमा ! एवं चेत्र) हे गौतम! यह भी प्राग्वत् ही है। (अपज्जत्तय समुच्छिप मलयरपंचेंदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा,) हे भगवन् ! अपर्याप्त संमूच्छिम जलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों के शरीरों को कितनी बड़ी अवगाहना होतो है ? (गायमा ! जहएणेणं अंगुलप्स असंखेजइभाग, उकारण वि गुलस्स असंखेजइभाग) हे गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट भी अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण शरीर की अवगाहना होतो है । ( पज्जत्तयसमुच्छिमजलयरपंचिंदियतिरिक्ख जोणियाणं पुच्छा,) हे भगवन् ! पर्याप्त संमूच्छिम जलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों की कितनी बड़ो अवगाहना होता है ? (गोयमा ! जहएणणं अंगुलस्स असंखेजइभागं, स्को- सेणं जीयणसहस्सं) भो गौतम! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृट एक हजार योजन प्रमाण अवगाहना होतो है। (गब्भवतियजलयरपंचेंदिय तिरिक्ख जोणियाणं पुच्छा,) हे भगवन् ! गर्भ से उत्पन्न होने वाले जलचर पञ्चेन्द्रिय तियक् यानियों के शरीरों को कितनो बड़ी अवगाहना होती है ? (गोयमा ! जहरणे अंगुलस्स असंखेज्जइभाग, उझोतेणं जोयणसहस्स)भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भागप्रमाण और उत्कृष्ट एक हजार योजन प्रमाण अवगाहना प्रतिपादन की गई है । (अपज्जत्तयाणं पुच्छा, गोयमा ! जहरणं अंगुलस्स असंखेज भागं, कोसंण वि अंगुलस्स असंखेजइभाग) हे भगवन् ! अपर्याप्त जोवों की कितनी बड़ो अवगाहना होती है ? भो गौतम ! जघन्य और उत्कृष्ट दानों ही, अंगुल के असंख्यात भागप्रमाण होती हैं । (पज्जत्तयाणं पुच्छा, गोयमा ! जहरणे ण अंगुलस्स असंखेजइभागं, कोसेण जोयणसहस्स) पर्याप्त जीवों की अवगाहनाजघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट एक हजार योजन प्रमाण होती है । (चप्पयथलयरपंचिदियतिरिक्खजोणियाण पुच्छा,) हे भगवन् ! चतुष्पद स्थलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों के शरीरों की कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? (गोयमा ! जहएणणं अंगुलस्स असंखेनवभाग, कोसंग छगाउयाइ ) भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण होती है, उत्कृष्ट छह कोस प्रमाण है। यह कथन देवकुरु, उत्तरकुरु के क्षेत्रों में हस्ति आदि युगलियों को अपेक्षा से है।] (समुच्छिमचउप्पय थनयरपंचेंदियतिरिक्ख जोणियाणं पुच्छा,) हे भगवन् ! संमूच्छिम चतुष्पद स्थलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक योनियों को कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? (गोयमा ! जहएणणं अंगुलस्त असंखेजइभाग, उक्कोसेणं गाउयपृहुत्तं ) भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात ? १ [ उत्तरार्धम् ] भाग प्रमाण, उत्कृष्ट पृथक कोस प्रमाण है (अपजत्तयाणं पुच्छा, गोयमा ! जहएणणं अंगु- लस्स असंखेज्जइभाग, उचोसेणं वि अंगुलस्स असंखेजइभागं ) हे भगवन् ! अपर्याप्त चतुष्पद स्थलचर जीवों की अवगाहना कितनी बड़ी होती है ? भो गौतम ! जघन्य और उत्कृष्ट अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण होती है। (पजत्तयाणं पुच्छा, गोयमा ! जहणणे अंगुलस्त असंखेजड़भाग कोसेणं गाउयपुहुत्त) हे भगवन् ! पर्याप्त जीवों को कितनी बड़ी अव- गाहना होती है ? भोगौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट पृथक्त्व कोस प्रमाण होती है (गम्भवक तिय चउप्पयवलयरपंचिंदियतिरिक्खजोणियोणं पुच्छा, गोयमा ! जहरणेणं अंगुलरस असंखेजइभाग, उक्कोसेण छगाउयाई) हे भगवन् ! गर्भज चतुष्पद स्थलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों के शरीरों को कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट छह कोस प्रमाण है (अपजत्तयाण पुच्छा, गोयमा ! जहरणेणं अंगुलस्स असंखेनइभाग, उक्कोसेण वि अंगुल-स असंखेजइभाग) हे भगवन् ! अपर्याप्त जीवां की कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? भो गौतम ! जवन्य और उत्कृष्ट दोनों ही केवल अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण होतो है । (पजत्तयाण पुच्छ', गोयमा ! जहरणेणं अंशुल स.असंखेजहभागं, उक्कोसेणं छगाउपाई) हे भगवन् ! पर्याप्त जीवों को कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट अवगाहना कोस होती है। ( उरपरिसप्पथलयरपं चेदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा, गोयमा ! जहए शां अंतुलस्त असंले नभाग, उहोणं जोषणसहस्स) हे भगवन् ! उर- परिसर्प स्थलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों के शरीरों की कितनो बड़ो अवगाहना होती है ? भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भागप्रमाण और उत्कृष्ट एक हजार योजन प्रमाण [यह कथन बहिर्वर्ती द्वोप समुद्रों की अपेक्षा से है। ] (समुच्छिमडरपरि सप्पथलयरपंचेंदियतिरिक्खजो गया पुच्छा, गोयमा ! जहएणणं अंगुलस्स असंखेजइभार्ग, उक्कोसेगा जोयणपुहत्त) हे भगवन् ! संमूछिम उर:परिसर्प स्थलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक योनियों की कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असं. ख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट पृथक्त्व योजन प्रमाण है । (अपनत्तयाण', जहरणेण अंगुलस्स असंखेजइभाग, उक्कोसेण वि असंखेज्जइ भाग) हे भगवन् ! अपर्याप्त जीवों की कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? भो गौतम ! जघन्य और उत्कृष्ट दोनों ही अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण होती है। (पज्जत्तयाणं, जहएणणं अंगुलस्स असंखेजइभागं, उक्कोसेणं जोयणपुहुत्त) हे भगवन् ! पर्याप्त उरःपरिसर्प स्थलचर पञ्चेन्द्रिय संमूच्छिम तिर्यक् * "संखेज्जइभाग" इत्यपि कचित् । प्रमाण .
- [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] योनियों को कितनी बड़ो अवगाहना होती है ? भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट पृथक्त्व योजन प्रमाण कथन की गई है । (गम्भव कतियउरपरिसप्पथलयरपंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा.) हे भगवन् ! गर्भ से उत्पन्न होने वाले उरःपरिसर्प स्थलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों की कितनी बड़ी अव- गाहना होती है ? (गोयमा ! जहएणेणं अंगुल स्स असंखेजइभागं, उकोसेणं जोयणसहस्स) भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट अवगाहना एक हजार योजन प्रमाण होती है । (अपजत्तयाणं पुच्छा, गोयमा ! जहरणेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभागं, उकोसेण वि असंखेज्जइभाग) हे भगवन् ! अपर्याप्त जीवों की कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? भो गौतम ! जघन्य और उत्कृष्ट दोनों ही अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण अवगाहना होती है । ( पज्जत्तयाणं पुच्छा, गोयमा ! जहरणेणं अंगुलस्स असंखेजइ भागं, उकोसेणं जोषणसहस्सं) हे भगवन् ! पर्याप्त जीवों की कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग-प्रमाण और उत्कृष्ट १००० योजन प्रमाण है। (भुयपरिसप्प पलयरपंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा, गोयमा ! जह- गणेणं अंगुलस्स असंखेन्नइभागं, उकोसेणं धणु पुहुतं ) हे भगवन् ! भुजपरिसर्प स्थलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों को कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट पृथक्व धनुष् प्रमाण है । (समुच्छि र भुयपरिस पथलयरपंचेंदियतिरिक्ख जोणियाणं पुच्छा,) हे भगवन् ! संमूच्छिम भुजपरि सर्प स्थलचर की कितनी बड़ो अवगाहना होती है ? (यमा ! जहएणणं अंगुल स असंवे- जइभाग, उकोसेणं धणु हुत्त) भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट पृथक्व धनुष् प्रमाण है । (अपजत यसमुच्छिमभुयपरिसपथलयर० पुच्छा, गोयमा ! जहरणेणं अंगुलस्स असंखेजइभाग, उकोलेण वि अंतुलस्त असंखेजइभागं) हे भगवन् ! अपर्याप्त सम्मूच्छिम भुजपरिसर्प स्थलचर जीवों की कितनी बड़ो अवगाहना होती है ? हे गौतम ! जघन्य और उत्कृष्ट दोनों ही अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण अव- गाहना है । ( पजत्तयसमुच्छिमभुयपरिसप्पथलयर० पुच्छा, गोयमा ! जहणणेणं अंगुलस्स असंखेजइभाग, उकोसेणं धणुपुहृत्त) हे भगवन् ! पर्याप्त समूच्छिम भुजपरिसर्प स्थल- चर पञ्चेन्द्रिय जीवों की कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? हे गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट अवगाहना पृथक्त्व धनुष् प्रमाण होतो है । ( गम् नवक्कंतियभुयपरिसप्पथलयरपंचेंदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा,) हे भगवन् ! गर्भ से उत्पन्न होने वाले भुजपरिसर्प स्थलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक योनियों की कितनो वड़ी अवगाहना होती है ? (गोयमा ! जहरणेणं अंगुलस असंखेजइभाग, उक्कोसेणं गाउय +"गाउप” इत्यप्यन्यत्र क्वचित् । !
[ उत्तरार्धम् ] पुहुत्त) हे गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट पृथक्त्व कोस प्रमाण है । (अपज्जत्तयाणं पुच्छा, गोयमा ! जहणणेणं अंगुलस्स असंखेजइभाग, कोसेण वि अंगुलस्स असंखेजइभाग) हे भगवन् ! अपर्याप्त जीवों की कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? हे गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट भी अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण ही अवगाहना होती है । (पजत्तयाणं पुच्छा, गोयमा ! जहरणेणं अंगुलस्स असंखेजइभाग, उकोसेणं गाउयपुहुक्त) पर्याप्त जीवों की अवगाहना कितनी बड़ी होती है ? हे गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट अवगाहना पृथक्त्व कोस प्रमाण होती है। (खहयरपंचेंदियतिरिक्खजोणियाणं पुच्छा, गोयमा ! जहणणं अंगुलरस असंखेज्जभाग, कोसेणं धणुपुहुत्तं ) हे भगवन् ! खेच. पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों की कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट अवगाहना पृथक्त्व धनुष् प्रमाण होती है। (समुच्छिमसहयराण जहा भुजपरिसप्पसंमुच्छिमाणं तिसुवि गमेसु तहा भाणियवं, ) भुजपरिसप्प समूच्छिम जीवों की अवगाहना तीन गमों में जैसी कही गई है, वैसी हो यहां पर खेचर संमूच्छिम जीवों की कहना चाहिये । ( गम्भबकतियाणं पुच्छा, गोयमा ! जहरणेणं अंगुलस्स असंखेजहभागं, उकोसेणं धणुपुहुत्त) गर्भ से उत्पन्न होने वाले खेचरों के शरीरों की कितनो बड़ो अवगाहना होती है ? भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट अवगाहना पृथक्त्व धनुष् प्रमाण होती है । (अपज्जत्तयाणं पुच्छा, गोधमा ! जहर शेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभागं, उक्कोण वि अंगु- लन्स असंखेज्जइभ गं) हे भगवन् ! अपर्याप्त जीवों के शरीरों की कितनी बड़ी वावगा- हना होती है ? भो गौतम ! जघन्य और उत्कृष्ट दोनों ही अवगाहनाएँ अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण ही होती हैं। (पज्जत्तयगभवक तियखहयराणं पुच्छा, गोयना ! जह- एणणं अंगुलस्स असंखेजइ भाग, उ छोलेणं धणु पुहत्तं) हे भगवन् ! पर्याप्त गर्भज खेचरों के शरीरों की कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असं. ख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट पृथक्त्व धनुष् प्रमाण अवगाहना कथन को गई है। (तत्थ णं संगहणिगाहारो भवति, तं जहा-) यहां पर इस विषय को दोगाथाएं भी संगृ. होत हैं । जैसे कि (जोयणसहस्स) [संमच्छिम जलचर पचेन्द्रिय योनियों के जीवों की उत्कृष्ट अवगाहना] एक सहस्र योजन प्रमाण होती है और (गाउयपुहुत्त) [संमूच्छिम चतुष्पद की] पृथक्त्व कोस (तत्तो य जोयणपुहुत्तं । ) तत्पश्चात् [संमूच्छिम उर परिसर्प की उत्कृष्ट अवगाहना] पृथक्त्व योजन प्रमाण होती है ( दोण्हं धणु पुहुत्तं ) [संमूच्छिम भुजपरिसर्प तथा खेचर संमूछिम] इन दोनों की भी पृथक्त्व धनुष् की अवगाहना !
प्रमाण [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] होती है (समुच्छिमे होइ उच्चित्तं ।।।) इस प्रकार संमूच्छिम तिर्यचों की अवगाहना वर्णन की गई है। १ । (होयणसहस्स छाउ शाइ) [गर्भज जलचर पञ्चेन्द्रिय तियक् योनि के जीवों की और चतुष्पत्रों की क्रमशः अवगाहना एक सहस्र योजन प्रमाण और छह कोस प्रमाण होतो है (तत्तो य जोयणसहस्सां) तत्पश्चात् [गर्भज उरःपरिसर्प की भी अवगाहना] १००० योजन प्रमाण है । (गाउयपुसृत भुयग) भुजपरिसर्प की अवगा- हना पृथक्त्व कोस होतो है (कबीसु भवे धरणु पुहुत्तं ।२।) गर्भज पक्षियों की पृथ. क्व धनुष प्रमाण अवगाहना है ॥२॥ भावार्थ-पञ्चेन्द्रिय तिर्यक योनियों की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट १००० योजन प्रमाण होती है; जलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों की जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट अवगाहना १००० योजन प्रमाण प्रतिपादन की गई है। संमूच्छिम जलचर पञ्चेन्द्रिय जीवों की अवगाहना भी प्राग्वत् ही है; अप- र्याप्त संमूछिम जलचर पञ्चेन्द्रिय जीवों की जघन्य और उत्कृष्ट अवगाहना अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण होती है, और पर्याप्त संमूछिम जलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक योनि के जीवों की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट १००० योजन प्रमाण है; गर्भज पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों की जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट १००० योजन प्रमाण अवगाहना है; अपर्याप्त जीवों की अवगाहना जघन्य और उत्कृष्ट दोनों ही अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण होती है। पर्याप्त जलवर जीवों की जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट १००० योजन प्रमाण अव. गाहना होती है; चतुष्प स्थल पर पवेन्द्रिय तिर्यक् योनि के जीवों की जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट ६ कोस प्रमाण अवगाहना होती है; संमूछिम चतुष्पद स्थलचर पञ्चेनि य जीवों की जधन्य अव- गाहना अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट अवगाहना पृथकत्व कोल प्रमाण होती है; अपर्याप्त जीवों की अवगाहना जघन्य और उत्कृष्ट केवल अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण होती है; पर्याप्त जीवों की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट पृथक्त्व कोस प्रमाण होती है; गर्भज चतुष्पद स्थलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक योनियों की जघन्य अवगाहना अंगुल के असंख्यात भाग और उत्कृष्ट ६ कोस प्रमाण होती है; अपर्याप्त जीवों की अवगाहना जघन्य और उत्कृष्ट दोनों ही अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण [उत्तरार्धम् ] होती है; पर्याप्त जीवों की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट ६ कोस प्रमाण है; उर:परिसर्प स्थलचर पञ्चेद्रिय तिर्यक् योनियों की जघन्य अवगाहना अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट १००० योजन प्रमाण होती है; संमूञ्छिम उरःपरिसर्प स्थलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट पृथक्त्व योजन प्रमाण होती है; अपर्याप्त जीवों की अवगाहना जघन्य और उत्कृष्ट दोनों ही केवल अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण है; पर्याप्त जीवों की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट योजन पृथक्त्व होती है; गर्भज उरःपरिसर्प स्थलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट १००० योजन प्रमाण होती है; अपर्याप्त जीवों की अवगाहना जघन्य और उत्कृष्ट दोनों ही अगुल के असंख्यात भाग प्रमाण होती है। पर्याप्त जीवों की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट १००० योजन प्रमाण होती है; भुजपरिसर्प स्थल चर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक योनियों की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट पृथक्त्व कोस प्रमाण होती है; संमूच्छिम भुजपरिसर्प स्थलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट पृथकत्व धनुप प्रमाण होती है; अपर्याप्त संमूछिम भुजपरिसर्प स्थलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों की जघन्य और उत्कृष्ट दोनों ही अंवगाहनाएँ अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण होती हैं; पर्याप्त संमूच्छिम भुजपरिसपों की अवगाहना जघन्य अंगल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट पृथक्त्व धनुन् प्रमाण होती है; गर्भज भुज परिसर्प स्थलचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों की जघन्य अवगाहना अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट पृथक्त्व कोस प्रमाण होती है; अपर्याप्त जीवों की अवगाहना जघन्य और उत्कृष्ट दोनों ही अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण होती है। पर्याप्त जीवों की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भोग प्रमाण और उत्कृष्ट पृथक्त्व कोल प्रमाण होती है; खेचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यक् योनियों की जघन्य अवगाहना अगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट पृथक्त्व धनुष की होती है; संमूच्छिम खेचर पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चों की अवगाहनाएँ भुजपरिसर्प संमूछिम तिर्यश्चों की बराबर है; गर्भज खेचरों की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट पृथक्त्व धनुष की होती H पुच्छा, गोयमा ! जहणणेणं अंगुलस्स असंखेजइभार्ग, [ श्रीमदनु योगद्वारसूत्रम] है; अपर्याप्त जीवों की अवगाहना जघन्य और उत्कृष्ट दोनों ही अंगुल के असं- ख्यात माग प्रमाण होती है; पर्याप्त गर्भज खेचरों की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट पृथकत्व धनुष की होती है; संमूछिम जलचरों की अवगाहनो उत्कृष्ट १००० योजन की होती है और संमूच्छिम चतुष्पद की पृथक्त्व कोस की होती है; संमूच्छिम उरःपरिसर्प को पृथक्त्व योजन की अवगाहना होती है; संमूच्छिम भुजपरिसर्प और संमूञ्छिम खेचर, इन दोनों की भी पृथक्त्व धनु की ही अवगाहना होती है; जलचर पञ्चन्द्रिय तिर्यक् योनिक गर्भज जीव की उत्कृष्ट अवगाहना १००० योजन प्रमाण होती है। चतुष्पद की उत्कृष्ट अवगाहना ६ कोस प्रमाण होती है; गर्भज उत्परिसर्प की अवगाहना भी १००० योजन की है, गर्भज भुजपरिसर्प की अवगाहना उत्कृष्ट पृथक्व कोस प्रमाण है और गर्भज पक्षियों को उत्कृष्ट अवगाहना पृथक्त्व धनुष की होती है। यह सर्व पञ्चन्द्रिय तिर्यक् योनियों की जघन्य और उत्कृष्ट अवगाहना कही गई है । अब इसके आगे मनुष्यों के विषय में विवरण किया अथ मनुष्य-अक्माहना विक्य । मणुस्साणं भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णता ? गोयमा ! जहण्णणं अंगुलस्स असंखेजइभागं, उक्कोसेणं तिरिण तिरिण गाउयाइं; समुच्छिममणुस्लाणं जाता है- उक्कोसेण वि अंगुलस्स असंखेजइभाग;अपज्जत्तय गब्भव- कंतियमणुस्साणं भंते ! पुच्छा, गोयमा ! जहरणेणं अंगुलस्स असंखेजइभाग, उक्कोसेण वि अंगुलस्स असंखेज्जइभाग; पज्जत्तयगब्भवक्कंतियमणुस्साणं भंते ! पच्छा, गोयमा । जहण्णेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभागं, उक्कोसेणं तिषिण गाउयाई से न्यून अंगुल [ उत्तरार्धम् ] ४९ पदार्थ-(मणुत्साणं भंते ! के महालिया सरोरोगाहणा पण्णत्ता ?) हे भगवन् मनुष्यों के शरीर की अवगाहना कितनी बड़ी होती है ? (गोयमा ! जहरणेए! अंतस असं इभान, उक्कोले गं तिरिय गाउयाई ) भो गौतम ! न्यून के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट अवगाहना तोन कोस को होतो है। [जैसे कि देवकुरु उत्तरकुर्बादि मनुष्यों की अवगाहना कथन की गई है। (संनुच्छामणुस्साए पुच्छा,)संमूच्छिम मनुष्यों के शरीरों को कितनी बड़ी अवगाहना होती है? (गोयमा! जहरणेणं अंशुलत असंखेजइभामं, उनकोसे की अंगुल रस असं ले जइभाi) भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट अवगाहना भी अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण होती है। [ ( गम्भवतियमणु :साण भंते ! पुच्छा,) हे भगवन् ! गर्भज मनुष्यों के शरीर की कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? ( गोयमा ! जहर गेण अंगुलस असं बेइ मागं, उनकोशः तिरि गाउयाई) भो गौतम ! जयन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट तीन कोस की होती है। * (ग्राउजत्तय भिवक्कतिय रणुस्साणं भंते ! पुच्छा, ) हे भगवन् ! अपर्याप्त और गर्भज मनुष्यों को कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? (गोयमा ! जहणणे अंगुलस्स असंखेज्जइभाग, उक्कोसेण वि अंगुलस्त असंखेज्जइ भागं ) भो गौतम ! जघन्य और उत्कृष्ट केवल अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण ही अवगाहना होती है । (पज्जत्तयगब्भवक्कंतियमणुस्साणं भंते ! पुच्छा,) हे भगवन् ! पर्याप्त और गर्भज मनुष्यों की कितनी बड़ी अवगाहना होती है ? ( गोयमा ! जहरणेणां अंगुलस्स असं वेज्जइभाग, उक्कोसेणं तिरिण गाउयाई) भो गौतम ! जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट अवगाहना तोन कोस की होती है । भावार्थ-संमूर्छिम मनुष्य और अपर्याप्त मनुष्य इन दोनों की न्यून से न्यून और उत्कृष्ट से उत्कृष्ट अवगाहना अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण होती है। गर्भज मनुष्यों की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट तीन कोस प्रमाण होती है । इसके मध्यम भेद अनेक जानने चाहिये । यह उत्कृष्ट अवगाहना अकर्मभूमिज मनुष्यों की अपेक्षा से वर्णन की गई है। अब इसके आगे देवों की अवगाहना के विषय में कहते हैं- । - *[] एततकोष्ठान्तर्गतः पाठः कुत्रचिन्नास्त्यपि .
५० [श्रामदनुयागद्वारसूत्रम् । अथ देव-प्रवगाहना का विषय । वाणमंतराभवधारणिज्जा य उत्तरवेउब्विया य, जहा असुरकुमाराणं तहा माणियया, जहा वाणमंतराणं, तहा जोइसियाण विभाणियव्वा; सोहम्मे कप्पे देवाणं भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णता ?. गोयमा ! दुविहा पगणता, तं जहा-भवधारणिज्जा य उत्तरवेउब्बिया य; तत्थ णं जा सा भवधारणिज्जा सा जहणणं अंगुलस्स असंखेज्जइभाग, उक्कोसेणं सत्त रयणीओ तत्थ रणं जा सा उत्तरवेउब्विया सा जहणणेणं अंगुलस्स संखेज्जइभागं उक्कोसेणं जोयणसयसहस्स; एवं ईसाणे कप्पे वि भाणियब्वं, जहा सोहम्मकप्पाणं देवाण पुच्छा, तहा सेसकप्पाणं देवाणं पुच्छा भाणियव्वा, जाव अच्चुअकथ्यो; सणंकुमारे भवधारिणजा जहएगाणं अंगुलस्स असंखजइ. भागं, उक्कोसेणं रयणीभो; उत्तरवेउव्विया जहा सोहम्मे भवधारणिज्जा जहा सणंकुमारे तहा माहिदे वि भाणियव्या. बंभलोयलंतगेसु भवधारणिज्जा जहणणणं अंगुलस्स असंखेजइभाग, उक्कोसेणं पंच रयणीओ, उत्तरवेउब्विया जहा सोहम्मे; महासुक्कसहस्सारसु भवधार- णिज्जा जहणणं अंगुलस्स असंखेजइभार्ग, उक्कोसेणं चत्तारि रयणीओ; उत्तरवेउब्विया जहा सोहम्मे; आणत- पारणतारणअच्चुएसु चउसु वि कप्पेसु भवधारणिज्जा जहणणं अंगुलस्स असंखेज्जइभाग, उक्कोसेणं तिगिण स्यणीओ; उत्तरवेउव्विया जहा सोहम्मे; गेवेज्जगदेवाणं [ उत्तरार्धम् ] ! भंते ! के महालिया सरीरोगाहणा पण्णत्ता ? गोयमा ! गेवेज्जगदेवाणं एगे भवधारणिज्जे सरीरे पण्णत्ते से जहणणेणं अंगुलस्स असंखेज्जइभार्ग, उक्कोसेणं दुरिण रयणीओ; अणुत्तरोववाइयाणं देवाण मंते ! के महालिया सरीरो- गाहणा पण्णता ? गोयमा ! अणुत्तरोववाइयाणं देवाणं एगे भवधारणिज्जे से जहरणोणं अंगलस्स असंखेज्जइ. भागं, उक्कोसेणं एगा रयणीउ । पदार्थ-(वाणमंतराणं भववारणिजना य उत्तरवेउब्बिया य जहा असुरकुमाराणं तहा भाणियवा) वानव्यन्तरों के भवधारणीय और उत्तरवैक्रिय शरीरों को अवगाहना जैसे प्रथम असुरकुमारों की वर्णन की गई है, उसी प्रकार जाननी चाहिये । ( जहा वाणमंतराण' तहा जोयसियाण वि भाणियवा) जैसे वा. व्यन्तरों की अवगाहना का विवरण है, उसी प्रकार ज्योतिपो देवों का भी विवरण जानना चाहिये । ( सोह मे कप्पे देवाणं ते ! के हालिया सरीरोगाहरणा परणता ?) हे भगवन् ! सौधर्म कल्प के देवों की कितनी बड़ी शरीरावगाहना प्रतिपादन की गई है ? (गोयमा ! दुविहा परणत्ता, सं जहा-भवधार. णिता य उत्तरवेरब्बिया य ) भो गौतम ! उक्त देवों की अवगाहना दो प्रकार से वर्णन की गई है । जैसे कि एक भवधारणीय और दूसरी उत्तरवैक्रिय । ( तत्व हो जा सा भव पारणिज्जा साहस अंगुलस्स असंखेजइभाग) उन दोनों में जो भवधारणीय है वह जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण होती है। (उक्कोसेणं सत्त रयणीओ ) उत्कृष्ट अवगाहना सात हाथ की है । (तत्य णं जा सा उत्तर. वेउवया सा जहरणेगां अंगुलास संखेन्नइभाग ) उन दोनों में जो उत्तरवैक्रिय है, वह जघन्य अंगुल के संख्यात भाग प्रमाण है और ( उक्कोसे जोयणसयसहरस) उत्कृष्ट एक लक्ष योजन प्रमाण होती है । ( एवं ईसाणकप्पे वि भाणियव्वं ) जैसे सुधर्म कल्प का विवरण है, उसी प्रकार ईशान कल्प का भी स्वरूप जानना चाहिये । (जमा संह मकापाण देवाणा पुच्छा, तहा सेतकप्पदेवाणं पुच्छा भाणियबा, जाव अच्चुअकप्पो) जैसे सुधर्म कल्प देवों की पृच्छा का स्वरूप है, उसी प्रकार अच्युत पर्यन्त शेष कल्पों 'वि-अपि शब्द यहां पर परस्परापेक्षार्थ में है * भेदपूर्वक कथन करने से प्रत्येक पदार्थ का विवरण बड़ी सरलता से समझ में आ जाता इसी लिये यहां सब जगह प्रायः भेदपूर्वक कथन किया गया है। Tnce [ श्रीमद योगद्वारसूत्रम् । का भी स्वरूप जानना चाहिये। (सांकुमारे भवधारणिना जहरणेण अंगुलस्स असंखेज्जइभाग) सनत्कुमार देवों की भवधारणीय शरीर की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भागप्रमाण, (क्कोलेण' छ रयणीओ) उत्कृष्ट षट् हाथ की होती है ( उत्तरवे- अधिया जहा सोहम्मे) उत्तरवैक्रिय अवगाहना सुधर्म देवलोक की भांति है (जहा सण कुमारे तहा माहिदे वि) जैसे सनत्कुमारीय देवों को अवगाहना है उसी प्रकार माहेन्द्रोय देवों की भी अवगाहना जाननी चाहिये। (वंभलोयलंतगेतु भववारणिज्जा जहरणेणं अंगुलस्स असंखे- जइभाग) ब्रह्मलोक और लान्तक देवलोक के वासो देवों की भवधारणोय अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यातभाग प्रमाण है और (उकोसेणं पंच रयणी) और उत्कृष्ट पांच हाथ की होतो है । (उत्तरवेउब्बिया जहा सोहम्मे) उत्तरवैक्रिय जैसे सुधर्म देवलोक को है, वैसे ही जाननी चाहिये । ( महासुक्कस हरसारेसु भवधारणिज्जा जहरणेणं अंगुलस्स असंखेजइभाग ) महाशुक्र और सहस्रारवासी देवों को भवधारणीय अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यातभाग प्रमाण है और (उकोसेणं चत्तारि रयणीयो) उत्कृष्ट अवगाहना चार हाथ की है, (उत्तरवेचिया जहा सोहम्मे ) उत्तरवैक्रिय सुधर्म देवलोकवत् है ( प्राणतपाणतारणअच्चुएसु चउसु वि कप्पेसु भवधारणिजा जहरणेणं अंगुलस्स असंखेज्जइ भागं ) आनत, प्राणत, श्रारण और अच्युत, इन चारों कल्पों में भवधार रणीय शरोरों की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यातभाग प्रमाण है और ( उक्कोसेणं तिषिण रयणीओ) उत्कृष्ट अवगाहना तीन हाथ की होती है; (उत्तरवेदपया जहा सोहन्म) उत्तरवैक्रिय सुधर्म देवलोकत् है । (जगवाणं भंते ! के महालिया सरीगेगाहणा पण्णता ?) हे भगवन् ! गैरेयक देवों के शरीरों की कितनी बड़ी अवगाहना होतो है ? (गोरमा ! गेवनादेवाणं एगे भाधारणिज्ने सरीरे परमाते,से जहएगणेशं अंगुलस्स असंखेजइभागं, उकोतेणं दुन्नि रयणीओ) भो गौतम ! अत्रेयकदेवों के एक भवधारण यशरीर ही प्रतिपादन किया गया है। सो उस शरीर की जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट दो हाथ की अवगाहना होती है । ( अणुत्तरोववाइयाणं देवाणं भंते ! के महालिया सरीरो- गाहणा पएणत्ता ?) हे भगवन् ! अनुत्तरोपपादिक देवों के शरीर की कितनी बड़ी अव- गाहना होती है ? (गोयमा ! अणुत्तरोबवाइयाणं देवाणं एगे भवधारणिज्जे, से जहरणेणं अंगुलस्स असंखेजइभाग, उक्कोसेरणं एगा रयणीउ ) भो गौतम ! अनुत्तरविमानवासी देवों के एक भवधारणीय ही शरीर कहा गया है। सो उस की अवगाहना जघन्य अंगुल के असंख्यात भाग प्रमाण और उत्कृष्ट एक हाथ की होती है। भावार्थ--वाणव्यन्तर देवों के शरीरों की अवगाहना असुरकुमारों के समान है । और उसी प्रकार ज्योतिषी देवों की भी है। किन्तु बारह कल्पवासी [ उत्तरार्धम् ] देवों के भवधारणीय शरीर की जघन्य अवगाहना अंगुल के असंख्योत माग प्रमाण होती है। उत्तरवैक्रिय शरीर की जघन्य अवगाहना अंगुल के संख्यात भाग प्रमाण है और उत्तरवैक्रिय शरीर की उत्कृष्ट अवगाहना एक लत योजन प्रमाण होती है। भवधारणीय शरीरों की उत्कृष्ट अवगाहना निम्न प्रकार से है- सुधर्म और ईशान देवलोक वासी देवों की अवगाहना सात हाथ प्रमाण; सनत्कुमार और माहेन्द्र देवलोक वासी देवों कीषट् हाथाप्रमाण; ब्रह्म और लान्तव के देवों की पाँच हाथ प्रमाण; महाशुक्र और सहस्त्रार के देवों की चार हाथ प्रमाण; आणत, प्राणत, श्रारण और अच्युत देवों की तीन हाथ प्रमाण; वेधक देवों की दो हाथ प्रमाण; और अहतर विमान वासी देवों की एक हाय प्रमाण अवगाहना होती है। ये सर्व अवगाहनाएँ उत्सेधांगुल से नापी जाती हैं। इसलिये उत्सेधांगुल का वर्णन यहां पर फिर करते हैं- अथ पुनः उत्सेवांगुल का विषय से समासोतिविहे पण्णत्ते, तं, जहा-सूईअंगुले पय मुले घणंगुले, एगंगुलायया एगपएसिया सेढो सूईअंगुले,सूई सूईए गुणिया पयरंगुले, पयरं सूईए गुणियं धणंगुले, एएसि णं सईअंगुलपयरंगुलघणंगुलाणं कयरे कयरेहितो अप्पे वा बहुए वातुल्ले वा विसेसाहिए वा ? गोयमा ! सव्वत्थोवे सूई- अंगुले, पयरंगुले असंवेजगुणे, घणंगुले असंखेज्जगुणे, से तं उस्सेहंगुले। पदार्थ-(से समासो तिबिरे पएणते, तं जहा-) वह अंगुल संक्षेप से तीन प्रकार का प्रतिपादन किया गया है । जैसे कि (सूअंगुले ) सूच्यंगुल (पथरंगुले) प्रत- रांगुल और ( घणगुले ) घनांगुल ( एगंगुलायया ) एक अंगुल प्रमाण (एगपएसिया सेढी सूईअंगुले) एक प्रदेशिक आकाश की श्रेणि को सूच्यंगुल कहते हैं (सूई सूईए गुणिया पयरंगुले) सूच्यंगुल को सूच्यंगुल के साथ गुणा करने से प्रतरां- गुल बनता है। (पयर सूईए गुणियं घणंगुले ) प्रतरांगुल को सूच्यंगुल के साथ [ श्रोर्मदनुयोगद्वारसूत्रम् ] गुणा करने से घनांगुल होता है (एएसि णं सूईअंगुलयरंगुलघणंगुलाणं "कयरेक्तयरेहितो अप्पे वा बहुए वा तुल्ले वा विसेसाहिएवा) हे भगवन् ! इन सूच्यंगुल ? प्रतरांगुल, और घनांगुलों का परस्पर अल्प-बहुत्व, तुल्य-विशेषाधिकरब किस प्रकार से है, ( सव्वत्थोवे सू.अंगुले पयरंगुले असंखेज गुणे, घणंले असंखेजगुणे ) भो. गौतमः ! सब से छोटा सूच्यंगुल होता है, प्रतरांगुल उससे असंख्यात गुणाधिक है । और घनांगुल प्रतरांगुल से भी असंख्यात गुणाधिक होता है । (से तं उस्सेहंगुले) सो वहीं उत्सेधांगुल होता है। -- भावार्थ--उत्सेधांगुल भी तीन प्रकार से वर्णन किया गया है। जैसे कि सूच्यं गुल १, प्रतरांगुल २, और घनांगुल ३ । एक अंगुल प्रमाण दीर्घ और एक प्रदेशिक रूप श्रेणि को सूव्यं गुल कहते हैं। फिर सूच्यंगुलके साथ सूची को गुणा करने से प्रतरांगुल होता है । फिर प्रतरांगुल को सूची से गुणा करने से घनांगुल होता है । सब से स्तोक सूच्यं गुल है। प्रतरांगुल उससे असंख्यात गुणा है, घनां- गुल उससे भी असंख्यात गुणा बड़ा है । यह सब अाकाश प्रदेशों की अपेक्षा से कथन किया गया हैं। इसलिये' सूच्यंगुल से प्रतरांगुल के प्रदेश असंख्यात गुणाधिक और प्रतरांगुल से धनांगुल के प्रदेश असंख्यात गुणाधिक होते हैं । यह परस्परापेक्षा अधिक जानना। इन का पूर्ण विवरण पूर्व में लिखा गया है। इसी को उत्सेधांगुल कहो हैं । अब प्रमाणांगुल का विवरण किया जाता है- अथ प्रमाणगुज का विषय । से किं तं पमाणगुले ? पमाणंगुले एगमेगस्स रण्णो चाउरंतवकवहिस्स असोवरिणए कागणीरयणे छत्तले दुवालसंसिए अट्टकण्णिए अहिगरणसंठाणसंठिए पण्णत्ता, तस्स णं एगामेगा कोडी उस्सेहंगुलविक्रखंभा तं समणस्स भगवओ महावीरस्स अद्धगुलं, तं सहस्सगुणियं पमाणंगुल भवइ. एएणं अंगुलप्पमाणेणं छ अंगुलाइंपादो, दो पायाश्री विहत्थी, दो विहत्थीओ रयणी, दो रयणीयो १-“दुवालसंगुलाई विहत्थी" इत्यप्यत्र पाठान्तरम् । २-"वितस्तिवसतिभरतकातरमातुलिङ्ग हः” प्रा. व्या०,०८, पा१, सूत्र २१४ । इत्येननतस्य हः ।
। उत्तराधम् । कुच्छी, दो कुच्छीओ धणू, दो घणुसहस्साई गाउयं, चत्तारि गाउयाई जोयणं । एएणं पमाणंगलेणं किं पोयणं ? भवणपत्थडाणं निरयाणं निरथावलीणं निरयपत्थडाण कप्पाणं विमाणाणं विमाणावलीण विमाणपत्थडाणं टंकाणं कूडाणं सेलाणं सिहरीणं पनाराणं विजयाणं वक्खा- राणं वासाणं वासहराणं वेलाणं वेइयाणं दाराणं तोरणाणं दीवाग समुदाणं आयामविक्खंभोञ्चत्तोव्वेहपरिक्खेवा मविज्जति से समासोतिविहे पण्णत्ते, तं जहा-सेढोअंगुले पय- रंगले घणंगले | असंखेजाओ जोयणकोडाकोडीओ सेढो, सेढी सेढीए गुणिया पयरं, पयरं सेढीए गुणियं लोगो, संखेजएणं लोगो गणिओ संखेजा लोगो असंखेजएणं लोगो गणिो असंखेजा लोगा, अणंतेणं लोगो गणिो अणंता लोगा। एएसि णं सेढीअंगुलपयरंगुलघणंगुलाण कयरे कयरे हितो अप्पे वा बहुए वा तुल्ले वा विसेसाहिए वा ? सव्वत्थोवे सेढीअंगुले, पयरंगुले असंखेजगणे, घणंगुले असंखेज गुणे, से तं. पमाणंगुले । से तं विभागनिप्फण्णे | से तं खेत्तप्पमाणे॥ पदार्थ-(से किं तं पमाणंगुले ?) प्रमाणांगुल किसे कहते हैं ? (पभाणांगुले एगमेगस्स रगणो) एक २ राजा का (चउरत चक्कटिस्स) जिस । तीन दिशा समुद्र तक और चतुर्थी दिशा हेमवंत पर्वत पर्यन्त, इस प्रकार चारों दिशाओं का अन्त किया है अथवा चक्रधारी हो, ऐसे एक एक चक्रवर्ती राजा का (अट्ठसोवरिणए कागणीरयणे) अष्ट सौवर्णिक ७ १-कचिदेतन्नास्ति। वासहरपव्वयाणं" इत्यप्यधिकः पाठो दृश्यते क्वचित । Ausum [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] प्रमाण 'काकिणी' रत्न होता है, जो कि (छत्तले दुवाजसंसिर) षट् तल और बारह अंश तथा (अट्ठकरिणर) आठ कौन वाला होता है और इसका ( अहिगरणसंठाणसंठिए पर गत्ते ) अहिरण के आकार जैसा संस्थान प्रतिपादन किया गया है। (म्स णं) उस काकणी रत्न को (एमेगा कोही) एक एक कोटि ( उस्ते गुलविक्वंभा) उत्सेधांगुल प्रमाण वष्कम वाली अर्थात् चौड़ी है । (त) वह (समणस्स भगवनो महावीरस्त अडगुलं) श्रमण भगवान् श्रीमहावीर का अ गुल है । (तं सहस्तरेणं पमाणं गुलं भवइ) इसको सहस्र गुण करने से प्रमाणांगुल होता है अर्थात् उत्सेधांगुल से प्रमाणांगुल सहस्र गुणा अधिक होता है । (एएणं अंगुलप्रमाणेण) इस अंगुल के प्रमाण से (छ अंशुला गो षट् अंगुल का एक पाद, (दा पायानो विहत्थी) दो पादों की एक वितरित, (दो विहत्थीयो रय गी) दो वितस्तियों की एक रत्नि-हाथ, (हो रयणीनो कुच्छी) दो रत्नियों की एक कुक्षि, (को कुच्छी पो धरा) दो कुक्षियों का एक धनुप, ( दो घणु सहस्साई गाउअं) दो हज धनुषों का एक गव्यूत-कोस, (चत्तारि गाड्याई जोयणं) चारगव्यूतों का एक योजन होता है । ( एएणं पाणं लेणं किं पयउणं ?) इस प्रमाणांतुल का क्या प्रयोजन है ? (एएणं पनाणं लेणं पुढवीणं) इस प्रमागांगुल से रत्नप्रभादि पृथ्वियों की, (कंडाण) रत्नकाण्ड आदि काण्डों की, (मायालाणं) पाताल कलशों की, (भवणणं) भवनों को, (भवण- पत्यडाणं) भवनपतियों के प्रस्तरों को, (निरयाणं) नरकों को, (निरयाव जीणं)नरक की पक्तियों को, (निमयपत्थडाणं) नरक के प्रस्तरों की, (कनाणं) कल्पों की, (विशणाणं) विमानों को, (वेनाणावलीणं) विमानों की पंक्तियों की, (विनाणपत्थडाण) विमानों के प्रस्तरों की, (टकाणं) छिन्नटंकों की, (कडाणं) कूटों को, (सेलाणं) पर्वतों की, (सिहरीणं) शिखरी पर्वतों की, (पवाराणं) नमू पर्वतों को, (वेजयाणं) विजयों की, (वाराण) वक्षार पर्वतों की, (वासाणं) क्षेत्रों की, (वासहराणं) वर्षधर पर्वतों.की, (वेजाणं) समुद्र को वेलाओं की, (वेइयाणं) वेदिकाओं को, (दाराणं) द्वारों को, (तोरणाणं) तोरणों की, (दीवाणं)द्वीपों की, (समुदाणं) समुद्रों को, (प्रायानविक्वंभोचत्तोबेहपरिक्खेवा ) लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई, गह- राई और परिधि (मविज्जति) नापी जाती है। - (से समासो तिविहे पएणत्ते, तं जहा-) वह प्रमाणांगुल संक्षेप से 'तोन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है । जैसे कि (सेढीअंतुले, पथरंगुले, धणं गुले) श्रेणि-अंगुल १, प्रत- रांगुल २, और घनांगुल ३ असंखे जाओ जोयण कोडाकोडीनो सेढी) प्रमाणांगुल के प्रमाण *श्रीमहावीरस्वामी स्वहाथों से साढ़े तीन हाथ प्रमाण और उत्सेयांगुल से सात हाथ प्रमाण भवनपति देवों के त्रयोदश अन्तर स्थान को 'स्तट' कहते हैं।
। [ उत्तरार्धम् ] से असंख्यात योजन कोटाकोटि प्रमाण एक 'श्रेणि' होती है, (सेढी सेढीए गुणिया पयरं) श्रेणि को श्रेणि के साथ गुणा करने से 'प्रतरांगुल' होता है, और (पयर मेढीर गुणीय लोगो) प्रतरांगुल को श्रेणि के साथ गुणा करने से एक 'लोक' होता है । वह लोक चौदह रज्जु प्रमाण होता है । स्वयंभूरमण समुद्र के पूर्व से पश्चिम तक के विस्तार को एक रज्जु कहते हैं। सोइसी संखेज रण लोगो गुणिना संखेना लो गा) संख्यात लोक से गुणाकार करने पर संख्यात लोक होता है, (अलं वेज रणं लागी गुणि यो अतं वे जा लोगा) असंशात लोक से गुगा करने पर असंख्यात लोक होता है (अण तेग लोगो गुणिग्रो अणता लोगा) एक लोक का अनंत लोकों के साथ गुणा करने से अनंत लोक होता है अर्थात् लोक अनंत है । (एएसि णं सेढि अंगुलगुलवणं तार कयरे कपरेहितो अप्पे वा बहुए वा तुल्ले वा बिसेसाहिए वा) इन श्रेगि-अंगुल, प्रतरांगुन और घनांगुलों का परस्पर किस २ के साथ अल्प, बहुल, तुल्य और विशेषाधिक भाव है अर्थात् परस्पर न्यूनाधिक कौन से अंगल हैं ? (सत्र थोवे सेडिअंगुले) सत्र से स्तोक छोटा श्रेणि-अंगुन होता है, (पयले अतंखे न तुरणे) श्रेणि-अंगुल से प्रारांगुल असंख्यात गुणाधिक होता है और (घणं गुले अये न पुणे) प्रतरांगुल से वांगुल भी असंख्यात गुणाधिक होता है, (से तं पाण'गुले से तं विभा.. निप्फरणे) सो यही प्रमाणांगुल है और यहो विभाग निष्पन्न नामक भेद है, ( से तं खेत्तरमाणे ) सो यही क्षेत्र प्रमाण है अर्थात् उक्त अंगुलियों के द्वारा ही सर्व प्रकार से क्षेत्रों का प्रमाण किया जाता है। भावार्थ-प्रमाणांगुल उत्सेधांगुल से १००० गुणाधिक है। इस प्रकार सूत्र कहा गया है। श्रीमान् भगवान् वर्द्धमान स्वामी की एक अंगुल के प्रमाण में उत्सेधांगुल दो होते हैं । अनादि पदार्थों का प्रमाण इसी अंगुल के द्वारा किया जाता है और इस अंगुल के भी पूर्ववत् पाद, हाथ, धनुस् , कोश, योजन आदि जान लेने चाहिये । फिर उरलेघांगुल धणांगुलों का अल्प-बहुत्व भी प्राग्वत् ही कथन किया गया है । वृत्ति में इस अंगुल का निम्न प्रकार से स्वरूप प्रतिपादन किया गया है, इस के अनन्तर प्रमाणांगुल का विवरण किया जाता है । उत्सेधांगुल से १००० गुणाधिक प्रमाणांगुल होत है। परम प्रकर्ष रूप प्रमाण को जो अंगुल प्राप्त हो, उसे 'प्रमाणांगुल' कहते हैं । अथवा समस्त लोकव्यवहारादि और राज्यस्थिति आदि का जिस से प्रमाण किया जाय तथा जिससे बृहत्तर अन्य कोई अंगुल न हो, उसे 'प्रमाणांगुल' कहते हैं,अथवा लौकिक सर्व व्यवहार के दर्शक प्रमाण भूत तथा इस अवसर्पिणी काल में प्रथम श्री- युगादि देव श्रीऋषभनाथ भगवान् के अंगुल और उनके सुपुत्र श्रीभरत चत्र १ में । । [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] वर्ती के अंगुल को भी 'प्रमाणांगुल' कहते हैं । 'काकणी' रत्न के छह तल, बारह अंश और पाठ कौने होते हैं। 'अहिरण' रत्न के सदृश उस कााकार होता है। और वह प्रत्येक चतुरन्त चक्रवर्ती राजा के पास होता है अन्य अन्य काल में उत्पन्न हुए चक्रवर्ती के काकणी रन को तुल्य कहने के लिये 'एक' शब्द का ग्रहण किया गया है। तथा निरुपचरित 'राज' शब्द का विषय जानने के लिये राज' शब्द का ग्रहण किया गया है। तीन दिशाओं में समुद्र तक तथा चौथी दिशा में हैमवंत पर्वत पर्यन्त सामान्य रूप से अपने चक्र के द्वारा पृथ्वी को साधन करने वाले को 'चतुरन्त चक्रवर्ती' कहते हैं। काकणी रत्न को प्रमाण इस प्रकार है। चार मधुर तृण फल का एक श्वेत 'सर्षप' होता है । सोलह श्वेत सर्षप का एक 'धान्य माष फल' होता है। चार धान्य माष फलकी एक 'गुजा होती है। पांच गुंजा का एक कर्ममाष' होता है। सौलह कर्ममाषक का एक 'सुवर्ण' और आठ सुवर्ण को एक 'काकरणी रत्न' होता है। ये मधुर तृण फलादि भरत चक्रवर्ती के समय के ग्रहण किये गये हैं। अन्यथा काल के भेइ ले इनका न्यूनाधिक होना संभव है। इसी कारण से समस्त चक्रवर्तियों के काकणी रत्न तुल्य नहीं होते। काकती रत्न चारों दिशाओं तथा अर्द्ध अधो दिशाओं में होता हैं । इसलिये इसके षः तल और बारह श होते हैं । ऊर्द्ध वा अधो दिशाओं में चार २ कोणम्भव होते हैं । अतः इसके आठ कोण हैं। इसी कारण से इसे 'अधकर्णिका' भी कहा जाता है। इसका संस्थान अहिरण के श्राकार जैसा प्रतिपादन किया गया है । काकणी रत्न की एक कोटि उत्लेघांगुल प्रमाण चौड़ी । इसी प्रकार शेष चार अंश भी एक उत्सेधांगुल प्रमाण होते हैं । इसका चतु- रंश, आयाम तथा विष्कम प्रत्येक उत्सेधांगुल प्रमाण होता है। किसी २ ग्रन्थ में इस प्रकार भी कहा गया है कि चतुरंगुल प्रमाण सुवर्ण, काकरणी रत्न जानना चाहिये । यह किसी २ का मत है। निश्चित मत सर्वज्ञ जाने । प्रत्येक उत्सेधां- गुल भगवान् वर्द्धमानखामीजी के श्रद्ध गुल के बराबर होता है। यथा - । श्रीवर्द्धमानखामी सात हस्त प्रमाण ऊंचे थे। एक २ हाथ चौबीस अंगुल प्रमाण होता है । इस हिसाबसे भगवान् एकसौ अरसठ उत्सेधांगुल प्रमाण हुए। और मतान्तर अपेक्षा अपने हाथों द्वारा नापने से साढ़े तीन हाथ अर्थात् चौरासी उत्सेधांगुल प्रमाण हुए। इस तरह से एक उरलेधांगुल, भगवान् वर्द्धमान स्वामी TituRIT n । [ उत्तरार्धम् ] ५९ जी के अ‘गुल के बराबर होता है । और दो उत्सेधांगुल, भगवान के आत्मांगुल की अपेक्षा एकसौ पाठ बंगुल अर्थात् साढ़े चार हाथ के हैं। उन के मत में एक आत्मांगुल उत्सेधांगुल के नव भागों में से पांच भाग के बराबर हुआ। और जिनके मत में प्रात्मागुल की अपेक्षा से भगवान् एक सौ बीस अंगुल अर्थात् पांच हाथ प्रमाण हैं, उनके मत में एक आत्मांगल उत्सेधांगुल के पाँच भागों में से दो भाग अधिक हुआ। इस प्रकार प्रथम मत की अपेक्षा से एक उत्से- धांगुल, भगवान् वर्द्धमान सामीजी के अर्धात्मांणुल के तुल्य होता है। एक उत्सेधांगुल को सहन गुणा करने से एक प्रमाणांगुल होता है। यथा-भरत चक्रवर्ती, प्रमाणांगुल से एक सौ बीस अंगुल प्रमाण ऊंचे थे। क्योंकि इनके अात्मांगुल तथा प्रमाणांगल दोनों अन्यूनाधिक होते हैं । उत्सेधांगुल की अपेक्षा से भरत चक्रवर्ती पांच सौ धनुष् प्रमाण थे। एक ध नौ सौ त्रेलठ उत्सेधांगुल का होता है । इस गणना से पांच सौ धनुष के अड़तालीस सहस्र उत्लेघांगुल होते हैं। यहां पर शंका हो सकती है कि जब प्रमाणांगुल चार सौ उत्सेधांगुल के बराबर हुआ, तब "पूर्वोक्त उत्लेधांगुल से एक सहस्र गुणाधिक प्रमाणांगुल होता है" यह कथन किस प्रकार से ठीक हो सकता है ? इसका उत्तर यह है कि एक प्रमाणांगुल ढाई अंगुल प्रमाण मोटा है । सो जब वह मोटाई में यथा- वस्थित होता है, तब चार सौ गुणा ही होता है। क्योंकि उत्सेधांगुल मोटाई को चार सौ रूप दीर्थाणे के साथ गुणा करने पर एक अंगुल विष्कभ तथा एक हजार अंगुल विष्कम तथा एक हजार अंगुल दीर्घ प्रमाण की सूचि सिद्ध हुई । पुनः ढाई अंगुल विष्कम्भ प्रमाणांगुल की तीन श्रेणियां कल्पित करने पर पहली एक अंगुल विष्कम्भ बार सौ अंगुल की श्रेणि हुई। दूसरी भी इतनी ही । और तीसरी श्रोणि अगुल विष्कम्भ है। इसलिये दो सा अंगुल प्रमाण दीर्घ हुई । सो तीनों मिल कर एक हजार अंगुल हुई । इसमें से एक उत्सेधां- गुल विष्कम्भ तथा सहस्र सत्सेधांगुल दीर्घ की सूची सिद्ध हुई। अतः इस गणना की अपेक्षा से उत्सेधांगुल से एक हजार गुणा प्रमाणांगल होगया है। परन्तु वास्तव में चारसौ गुणा ही बड़ा है । इग्ली का नाम 'विभागनिष्पन्नक्षेत्र प्रमाण' है। अब आगे काल प्रमाण' का विवरण करते हैं- प्रशद काल का विक्या । से किंतं कालप्पमाणे?, २ दुविहे पण्णते, तं जहा-पएस- * 'से' शब्द मागधी भाषा में 'अथ' शब्द के अर्थ में आता है, किं' शब्द प्रश्न के अर्थ में आता है और 'त' शब्द पूर्व सरवन्धार्थ में पाता है। है [ श्रीमदनुयोगद्वार सूत्रम् ] निष्फरणे य विभागनिप्फरणे य, सेकिंतं पएसनिप्फरणे?,२ एगसमयटिइए दुसमयट्टिईए तिसमयट्टिईए चं उसमयट्टिएई जाव दससमयट्टिईए असंखेजसमयट्टिईए, से तं पए सनिप्फरणे । से किं तं विभागनिष्फरणे ?, समयावलिअ- मुहत्ता, दिवसनहोरत्तपक्षमासा थ। संवच्छरजुगपलिया, सागरोसप्पिपरियहा ॥१॥ पदार्थ-(से किं तं कालप्पमाणे १, २ दुविहे पएणत्ते, तं जहा-) काल प्रमाण किसे कहते हैं ? वह दो प्रकार से वर्णन किया गया है। जैसे कि-(पएसनिष्करणे य विभाग- निष्कर ऐ य) प्रदेशनिष्पन्न और विभाग निष्पन्न (से किं तं पएसनिप्फणे ?) प्रदेशनिष्पन्न काल प्रमाण किसे कहते हैं ? (एगसम हि ईए) एक समय की स्थिति वाला द्रव्य वा परमाणु काल प्रमाण से एक समय की स्थिति वाला कहा जाता है । (दुसमयट्टिईए) दो समय को स्थिति वाला (तिसमयट्टिईए, तीन समय की स्थिति वाला (चउसमयट्टिईए) चार समय की स्थिति वाला (नाव दससमयट्टिईए) दश समय को स्थिति वाले (असंखिज समयढिईए) असंख्यात समय की स्थिति वाले तक जानना (से तं पएसनिप्फरणे) सो वहो प्रदेश निष्पन्न काल प्रमाण होता है । (ले किं तं विभागनिप्फणे ?) विभागनिष्पन्न काल प्रमाण किसे कहते हैं ? समयावलिअमुहुत्ता, दिवसअहोरत्तपक्षमासा य । संवच्छरजुगपलिया, सागरोसप्पिपरियट्टा ॥१॥ समय, * श्रावलिका, मुहूर्त, दिवस, अहोरात्र, पक्ष, मास, संवत्सर, युग, पल्य, सागर, उत्सर्पिणी और परिवर्तन, ये सभी विभागनिष्पन्न काल प्रमाण है। भावार्थ-काल प्रमाण भी दो प्रकार का है। एक प्रदेशनिष्पन्न और विभागनिष्पन्न । एक समय स्थिति वाले परमाणु या स्कन्ध, दो समय स्थिति वाले १-क्वचिदेतद्वाक्यं नोपलभ्यते । * असंख्यात समयों की एक प्रावलिका, १६७७७२१६ आवलिकाओं का एक मुहूर्त, १५ मुहूतों का एक दिवस, ३० मुहतों का एक अहोरात्र या रात्रि दिवस, १५ अहोरात्र का एक पक्ष, २ पक्षों का एक मास, १२ मासों का एक संवत्सर, ५ संव.सरों का एक युग, अनेक युगों का एक पल्य, १० कोटाकोटि पल्यों का एक सागर, १० कोटाकोटि सागरों की एक उत्सपिर्णी और अनन्त उत्सर्पिणी कालों का एक (पुद्गल) परावर्तन होता है।
[ उत्तरार्धम् ] ६१ परमाणु या स्कन्ध, इसी तरह तीन चार आदि असंख्यात समय पर्यन्त वाले परमाणु-स्कन्धों को प्रदेशनिष्पन्न काल प्रमाण' कहते हैं, और समय, श्रावलिका, मुहूर्त, दिवस, अहोरात्र, पक्ष, मास, सम्वत्सर, युग, पल्य, सागर, अवसर्पिणी उत्सर्पिणी, परावर्तन इत्यादि को 'विमागनिष्पन्न काल प्रमाण' कहते हैं। अब समय का खरूप वर्णन करते हैं- RAMINS अथ समय का विषय । से किं तं समए ? समयस्स णं परूवणं करिस्सामि, से जहानामए तुण्णागदारए सिया तरुणे बलवं जुगवं जुवाणे अप्पात के थिरग्गहत्थे दढपाणिपायपासपिटुंतरोरुपरिणते तलजमलजुयलपरिघणिभवाहू घेणणिचियवट्ट पाणि खंधे घम्मट्टगदुहणमुट्टियसमाहतनिचितगत्तकाए उरस्सबल सम- राणागए लंघणपवणजइणवायामसमत्थे छेए दक्खे पत्तट्रे कुसले महावी निउणे निउणसिप्पोबगए एग महती पडि- साडियं वा)पदृसाडियं वा गहाय सयराहं हत्थमेत्तंओसारेज्जा, तत्थ चोपए पण्णवयं एवं वयासी-जेणं कालेणं तेणं तुण्णा- गदारएणं तीसे पैडसाडियाए वा पट्टसाडियाए वा सयराह हत्थमेत्ते ओसारिए, से समए भवइ?, नो इणटेसमटे, कम्हा?, जम्हा संखेजाणं तंतूणं समुदयसमितिसमागमेणं एगा पट्टसाडिया निष्फजइ, उवरिल्लंमि तंतुमि अच्छिण्णे हि- टिल्ले तंतू न छिज्जइ, अण्णमि काले उवरिल्ले तंतू छिज्जइ, १-नाम' इति संभावनायाम् । २-अप्प'-अल्प शब्दोऽभाववचनः। ३-कचिदेतद्वाक्यं नोपलभ्यते । कचित् 'चम्मे०' ४-कचित् 'धम्म' स्य स्थाने 'चम्म इति ।
, [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] अण्ण मि काले हिटिल्ले तंतू छिज्जइ, तम्हा से समए न भवइ, एवं वयंतं पण्णवयं चोभए एवं वयासी- जेणं कालेणं तेणं तुण्णागदारएणं तीसे पडसाडियाए वा पट्ट- साडियोए वो उवरिल्ले तंतू छिराणे से समए भवइ ? न भवइ, कम्हा ? जम्हा संखेजाणं पम्हाणं समुदयसमितिसमागमेणं एगे तंतू निष्फजइ, उबरिल्ले पम्हे अच्छिण्णे हेटिल्ले पम्हे न छिज्जइ, अण्णनि काले उबरिल्ले पम्हे छिज्जइ, अण्णांमि काले हेटिल्ले पम्हे छिज्जइ, तम्हा से समए न भवइ । एवं वयंत पएणक्यं चोभए एवं वयासी-जेणं कालेणं तेणं तुण्णा- गदारएणं तस्स तंतुस्स उवरिल्ले पम्हे छिएणे से समए भवइ ? न भवइ, कम्हा ? जम्हा अणंताणं संघायाणं समु- दयसमितिसमागमेणं ऐगे पम्हे निफजइ, उवरिल्ले संघाए अविसंघाइए हेटिल्ले संघाएं न विसंघाइज्जइ, अण्णमि काले उवरिल्ले संघाए विसंधाइज्जइ. अण्णामि काले हिडिल्ले संघाए विसंघाइज्जइ, तम्हा से समए न भवइ । एत्तो वि अणं सुहुमतराए समए पएणत्ते समणाउसो! अमंखिज्जाणं समोणं समुदयसमितिसमागमेणं सा एगा आवनित्ति वुच्चइ, संखेज्जाओ आवलियानो ऊसासो, संखिज्जाओमावलियाओ नीसासो-हस्स प्रणवगल्लस्त, निस्वकिट्ठस्त जंतुणो । एगे ऊसासनीसासे, एस पाणुत्ति वुच्चई ॥११॥ सत्त पाणूणि से थोवे,सत्तथोवाणि से लवे । लवाणं सत्तहत्तरीए, एस मुहुत्ते विआहिए ॥२॥ तिण्णि सहस्सा सत्त य, सयाई तेहुत्तरिं च ऊसासा । एस मुहुत्तो भणियो, सम्वेहिं अणंतनाणीहिं ॥३॥ एएणमुहत्तपमाणेण तीसं a ।
६३ [ उत्तरार्धम् ] मुहुत्ता अहोरत्तं, पण्णरस अहोरत्ता पक्खो, दो पक्खा मासो, दोमासा ऊऊ, तिगिण उऊ अयणं, दो अयणाई संवच्छरे, पंच संबच्छराइ जुगे, वीसं जुगाई वाससयं, दस वाससयाई वाससहस्सं, सयं वाससहस्सारण वाससयसहस्सं, चोरा- सीई वाससयसहस्साइं से एगे पुवंगे, चउरासीई पुव्वंग- सयहस्साई से एगे पुवे, चउरासीइ पुध्वसयसहस्साई से एगे तुडिअंगे. चउरासीइं तुडिअंगे सयसहस्साइ से एगे तुडिए, चउरासीइ तुडिभसयसहसाइ से एगे अडडंगे, चउरासोई अडडंगस्यसहसाइं से एगे अरडे, एवं अव- वंगे अक्वे हुहुअंगे हुहुए उप्पलंगे उप्पले पउमंगे पउमे नलिणंगे नलिणे अच्छनिऊरंगे अच्छनिउरे अउमंगे अउए पउअंगे पउए उअंगे उए चूलिअंगे चूलिया सीस- पहेलियंगे चउरासीई सीसपहेलियंगसयसहरसाइं सा ऐगा सीसपहेलिमा । एयावया चेव गणिए, एयावया चेव गणिअस्स विसए एत्तोवरं प्रोवमिए पवत्तई ॥ पदार्थ-( से कि त समए ? ) समय किसे कहते हैं ? (सस्यस्स णं परूषणं करिस्सामि) समय की ही प्ररूपणा करूंगा, (से जहानाम ए तुरणागदारए सिया) जैसे एक दर्जी हो, (तरुणे बज) वह तरुण और बलावान हो,(जुग्वं जुवाणे) चतुर्थकाल का जन्महो और जवान हो, अप्पातके) रोग रहित हो (थिरग हत्थे) हाथ जिसके स्थिर हो, (दढ़ पाणपाय पिट्टत्तरोरुपरिणते) पार्श्व, पृष्ठयन्तर और उरु भाग भी जिसके दृढ़ और सुपरिणमित हों अर्थात् सुडौल हो (लजमलजुयलबाइ) ताल वृक्षोंके सदृश लम्बे और अर्गलोंके समान जिसके बाहुयुगल मोटे हों (घणणिचियवसपाणिवखं ) कठिन संगठित और वर्तुलावार जिसके स्कन्ध हो (चर मेहगदु हए मुष्टि असमाह त निचितगत्तकाए) चर्गेष्टक, द्रुघण मुष्टिका आदि व्यायामों के प्रतिदिन अभ्यास से जिसके शरीर के अवयव पुष्ट होगये हों (उरस्सपल तमगणागए) हृदय का बल भी जिसको प्राप्त हो गया है अर्थात् जिस अब मैं को Enaperrerammar HTETTEवायाRRAR) कहना.
[ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] फलांगना, तैरना, दौड़ना आदि व्यायामों के करने में भी जो समर्थ हो (च्छेए) जो प्रयोगादि का भी ज्ञाता हो, (दक्वे) जो शोघ्र कार्य करने वाला हो, (पत ) जो उपाय को करने वाला हो, और (कुसले) जो विचार शोल हो (मेवी) जो एक वार हो सुन कर या देख कर स्मृति रखने वाला तथा कार्य प्रारम्भ करने वाला हो, (निउणे) उपायों का ज्ञाता हो, (निउणसिप्पीचाए) जो शिल्पोपगत और सक्ष्म विज्ञान युक्त हो, एक (एगं महती पाडेसाडियं पट्ट साडियं वा गहाय) एक बड़ी या छोटो पट साटिका ग्रहण करके उसमें से (सपराहं हाथमे ते प्रोसारेज्जा) एक हो बार में बहुत शीघ्र हाथ भर फाड़ दे, तत्थ चोयए परणवयं एवं वयासी-) उस समय ऐसी स्थिति में प्रेरक शिष्य ने प्रज्ञापक-गुरु से यों कहा-(जेणं कालेणं तेणं तुरणादारएणं तीसे पडसाडि पार वा पट्टसाडियाएवा सयराहं हत्यत्ते प्रोस:रिए से सन ए भवइ ?) जितने काल में उस दर्जी के बालक ने उस कपड़े में से एक ही बार में बहुत ही शोघ्र एक ह.थ भर कपड़ा फाड़ दिया तो क्या वहो समय है ? (नो इणढे सन?) यह अर्थ समर्थ नहीं है, (क-हा?, क्यों ? (ज हा संवे जाणं तंत्रणं समु र समितिसना मे शं) यों कि संख्यात तन्तुओं के समुदाय से एा पडि साडिया नि-फ जड) एक पट्ट साटिका उत्पन्न होता है, और (उवरिल्लमि तंतुमि अच्छिरणे हिटिल्ले त न छिज्जइ) ऊपरके तन्तुओं के बिना छिदे नीचे के तन्तु नहीं छिदते, (अण्णमि काले उरिल्ले तंतू छिज्जइ अण्णमिकाले हिडिल्ले तंतू छिज्जइ) ऊपर के तन्तु अन्य काल में छेदन होते हैं और नीचे के तन्तु अन्य काल में छेदन होते हैं (तम्हा से समए न भवइ) इसलिये वह 'समय' नहीं है । (एवं वयंतं परणवयं चो- पए एवभं वयासी- गुरुके इस प्रकार कहने पर शिष्यने यों कहा-(जेणं कालेणं तेणं तुराणा- गदारएणं तीसे पडसाडियार वा पट्टसाडियाए वा उवरिल्ले तंतू च्छिएणे से समए भवइ ?) जितने काल में उस दर्जी के बालक ने उस कपड़े के ऊपर के तन्तु को छेदन किया, क्या वह 'समय' है ? (न भवइ) नहीं होता, (कन्हा ?, क्यों? (जम्हा संखेजाणं पम्हाणं समुदयसमिति- समागमेणं एगे तंतू निप्फजइ) इसलिये कि संख्यात पक्ष्मणों के समुदाय से एक तन्तु बनता है और उवरिल्ले पन्हे अच्छिएणे हेटिल्ले पम्हे छिज्जइ) ऊपर के पक्ष्म छिदे विना नीचे के पक्ष्म नहीं छिदत्ते (अरांणमि काले वरिल्ले पन्हे च्छि जइ अएणमिकाले हेटिल्ले पम्हे च्छिज्जइ) ऊपर के पक्ष्म अन्य काल में छिदते हैं और नीचे के पक्ष्म अन्य काल में छिदते हैं (तम्हा से समए न भवति ) इसलिये वह 'समय' नहीं है (एवं वयंत पएणवयं चोपए एवं वयासी-) इस प्रकार गुरु के कहने पर शिष्य ने कहा-(जे कालेणं तेयां तुएणागदारएणं) जिस काल उस दरजी के बालक ने (तस्स तं तुस्स उवरिल्ले पम्हें च्छिएणे से समए भवइ ?) उस तन्तु के ऊपर को 'पक्ष्म' को छेदन किया है, क्या वह में , [ उत्तरार्धम् ] ६५ 'समय' है ? (न भवइ) नहीं, (क हा?) क्यों ? (जम्हा अणंताएं संचायाणं समुदयसमितिसमागमेणं एगे पम्हे निष्फजइ) इसलिये कि अनन्त संघातों के समुदाय समिति समागम से एक 'पक्ष्म' उत्पन्न होता है. (वरिल्ले संवाए अविसं घाइए डिल्ले संघाए न वि संघाइज्जइ) ऊपर के संघात के विसंघटित हुए विना नीच का संघात विसंघटित नहीं होता । (अरणनि काले उमरिल्ले संधाए विसंघ इज्जइ) ऊपर का अन्य काल में संघात विसंघटित होता है, और (अएणमि काले हिट्ठिले विसंघाए विसंघाइजइ) नीचे का संघात अन्य काल में विसंघटित होता है । (तम्हा से समए न भवइ) इसलिये वह 'समय' नहीं है, किन्तु (एत्तो वि अ णं सुहुमतराए समए परगत्ते, समणाउसो !) हे श्रमणायुष्मन् ! इस ऊपर के पक्ष्म के छेदन काल से भो सूक्ष्मतर 'समय' प्रतिपादन किया गया है।ॐ (असखिजाणं समयाणं समुदय- समितिसमागमेणं) अपि तु फिर असंख्यात समयों के समुदाय समिति और समागम से (सा ए ।। श्रावलि अत्ति वुचइ,) वह एक आवलिक का कही जाती है, फिर ( संखेजारी आवलियानो ऊपास.) संख्यात श्रावलिकाओं का एक उश्वास और (संखेजानो आवलिया- श्रो नीसासो) संख्यात प्रालिकाओं का एक निश्वास होता है, अर्थात् संख्यात अाव- लिकाओं के मिलने से एक उच्छास निश्वास होता है, नाभि से ऊर्द्धगमन को उच्छ वास और अधोगमन को निश्वास कहते हैं, फिर (हवास अणबगलजस्स) दृष्ट (हर्ष) वंत और जरा से रहित और (निरुत्रकिटस्स जंतु णो ।) व्याधि से भी रहित ऐसे पुरुष के (एगे ऊसासनीसासे एस पाणुत्ति बुच्चई ॥१॥) एक उश्वास निश्वास के काल को प्राण कहा जाता है अर्थात् जो हर्षवन्त शोक रहित पुरुष है उसके एक श्वासोच्छास को प्राण कहते हैं, और (सत्तपाणि से थोवे) और उन सप्त प्राणों का एक स्तोक, (सत्त थोवाणि से लवे) और ७ स्तोकों का एक लव होता है। (लवाणं सत्तहत्तरिए) और ७७ लवों का एप्त मुहुत्ते वियाहिए) यह मुहूर्त कहा गया है ॥ २॥ अब मुहूर्त काल के उच्छासों का विवरण करते हैं । (तिरिण सहस्सा सत्त य सयाई) तीन सहस्र सात सौ ( तेहुत्तारै च ऊसासा)। और ७३ उच्छासों का (एस मुहुत्तो *लेकिन इस कथन से अनन्त पक्ष्मणों के छेदन में अनन्त समय न जानना चाहिये किन्तु इसमें असंख्यात समय ही होते हैं । क्योंकि अागम में कहा गया है कि-"असंखेज्जासु णं भंते ! उस्सप्पिणिअवसप्पिणीसु केवईया समया पण्णत्ता ? गोयमा ! असंखेजा; अणंतासु णं भंते ! उस्सपिणिअवसप्पिणीसु केवईया समया पण्णता ? गोयमा ! श्रणंता" अनन्त उत्सपिणियों के अनन्त समय होते हैं और असंख्यात उत्सपिणियों के असं. ख्यात सयय होते हैं। - !
.. ६६ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] भणियो) ऐसा एक मुहूर्त (सब्बेहि अणेतनाणीहि ॥३॥) सर्व अनन्त ज्ञानियों ने कहा है ॥३॥ अर्थात् सर्वज्ञ देवों ने एक मुहूर्त के ३७७३ श्वासोच्छ्रास कथन किये हैं । इसलिए (एएणं मुहुत्तरमाणेणं) इस मुहूर्त प्रमाण से (तीसं मुहु ता अहोर तं) तोस मुहूत्तों का एक अहोरात्र होता है, और (पन्नरस अहोरत्ता पक्खो) पंच दश १५ दिन रात्रियों का १ पक्ष, (दो पकजा मासो) दो पक्षों का एक मास होता है, फिर (दो मासा उऊ) दो मासों की एक ऋतु,(तिरिण ॐऊ अयणं) और तीन ऋतुओं का एक अयण होता है, और (दो अयणाई संवच्छरे) दो अयणों का एक संवत्सर होता है, (पंच संवच्छशाई जुगे) पांच संवत्सरों का एक युग, और (वीसं जुगाइ बासस) बीस युगों का एक सौ वर्ष होता है, (दस वाससथाई बाससहस्सं,) दस सौ वर्षों का एक सहस्र वर्ष, (सयं वाससहस्साणं वाससयसहस्स) सौ सहस्र वर्षों का एक लक्ष वर्ष होता है, और चपरासीई वाससयसहस्साई से एगे पुगे) चौरासी लक्ष वर्षों का एक पूर्वाग होता है, (चउरासइ पुबंगसयसहस्साई से एगे पुव्वे, चौरासी लक्ष पूर्वागों का एक पूर्व, और (चउरासोइ बस यसहस्साई से एो डिग्री, चौरासो लाख पूर्वो का एक त्रुटितांग होता है, (बउरासीई तुडियंगसयसहस्साई से एो । डिए) चौरासी लक्ष त्रुटितांगों का एक त्रुटित होता है, और (चउरासीई तुडियसयसहस्साई से ए गे अडडंगे,)८४ लक्ष त्रुटितों का एक अडडांग होता है, (चउरासीइ अडडंग ततसहस्साई से एगे अडडे,) चौरासी लक्ष अडडांगों का एक अडड होता है, एवं अवंगे अबवे) इसी प्रकार आगे भी ८४ लाख गुणा करते जाना सो अववंग, अवव, (हुहुअंगे हुहुए) हुहुअंग और हुहुय (जमलंगे उप्पले) उप्पलांग और उपाल, (पउमंगे परमे) पद्मांग और पद्म, (नलिणंगे न. लिणे नलिगांग और नलिण, (अच्छनिऊरंगे अच्छनिऊरं) अच्छनिऊरांग और अच्छनि- ऊर (अउयंगे अज्य) अयुतांग और अयुत, (पउनंगे पउए) प्रयुतांग और प्रयुत, (णउअंगे एउए) नयुतांग और नयुत, (चूलिअंगे चूलिया) चलितांग और चलिका (सीसपहेलिदंगे) शीर्ष- प्रहेलिकांग, ( चउरासीइ सीसपहेलियंगसतसहस्साई ८४ लक्ष शीर्षप्रहेलिकांगों की (सा एगा सोसपहेलिया) एक शोर्ष प्रहेलिका होती है, (एतावता चेव गणिते) एतावन्मात्र हो गणना है, और ( एता पता चेत्र गणिग्रस्त विसये) एतावन्मात्र ही गणित का विषय है अर्थात् फलितार्थ है, अपि तु इसका पूर्ण विवरण किया जा चुका है, इसीलिये वि- शेष वर्णन नहीं किया है, किन्तु (*अतो तेणं परं उवमिए पत्तांत, ) इसके उपरान्त उपमा प्रवती है अर्थात इस गणना के उपरान्त पल्योपम व सागरोपम का ही विवरण किया जाता है, क्योंकि गणना संख्या में केवल एकसौ ९४ १ अक्षर होते हैं, अधिक नहीं होते, इसीलिये सूत्र ने प्रतिपादन किया है कि एतावन्मात्र ही गणित वा गणित का विषय है। - जोनापान्तरम्।
६७ ७ ७ किस कारण ? संख्यात पक्ष्मणों के [ उत्तरार्धम् ] भावार्थ-समय किसे कहते हैं ? समय का स्वरूप निम्न प्रकार से है, जैसे कि-कोई देवदत्त नामक दरजी का बालक तरुण, बलवान, चतुर्थ समय का उत्पन्न हुश्रा हुआ, युवा निरोगशरीर स्थिर हस्तान दृढ़ है जिसके, पाणि और पाद, पुनः पार्श्व, पृष्ठयन्तर उरु आदि भी सुपरिणमित है तथा युगलताडं वृक्षों के समान सभ है और जिसकी बाहु दीर्घ है, कठिन मांसोपचित वतूलाकार जिसके स्कन्ध हैं, और व्यायाम से भी जिसका शरीर पुष्ट है, तथा वक्षःस्थल में भी बल प्राप्त हो रहा है ऐला सदैव शीघ्र कार्य करने वाला, दक्ष, प्रज्ञावान, कुशल और मेधावी है, पुनः निपुण और शिल्पोपगत है उसने एक महान् उत्तीर्ण वा लघु पदृशाटिका हाथ में लेकर एक हस्त प्रमाण फाड़ दिया। जिस कोल में उस युवा पुरुष ने उस वस्त्र को फाड़ा क्या वही समय काल होता है ? नहीं, क्यों ? संख्यात तंतुओं के समुदाय से पदृशाटिका की उत्पत्ति होती है, इसलिये ऊपरके तंतु के छेदन किये बिना नीचे का तंतु छेदन नहीं होता, सो ऊपर के तंतु-छेदन का समय और है, तथा नीचे के तंतुओं का छेदन समय और है इसलिये वह समय काल नहीं है । जिस काल में उस युवा पुरुष ने उस पहशाटिका के ऊपर के तंतु को छेदन किया है, तो क्या वह तंतु उत्पन्न होता है सो ऊपर के पक्ष्मणों के बिना छेदन हुए नीचे का पक्ष्म छेदन नहीं होता है और उनके छेदन काल का समय पृथक् २ है इसलिये वह भी समय काल नहीं होता है। क्या ऊपरके पक्ष्म के छेदनकाल को समय कहते हैं ? नहीं । क्यों ? अनन्त परमाणुओं के मिलने से एक पक्ष्म की उत्पत्ति होती है, इसलिये उनका भी छेदन काल पृथक् २ है । इसलिये प्रतिपादन किया गया है कि समय काल बहुत ही सूक्ष्म है । तथा असंख्यात समयों के मिलने से एक भाव- लिका होती है, संख्यात श्रावलिकाओं का एक उच्छास और निःश्वास होता है, सो प्रसन्न मन, निरोग शरीर, जरा और व्याधि से रहित पुरुष के सोच्छ्वास को एक प्राण कहते हैं, और सात प्राणों का एक स्तोक, सात स्तोको का एक लव होता है, ७७ लवों का एक मुहूर्तकाल वर्णन किया गया है, तीन सहस्र सात सौ तिहत्तर श्वासोच्छ्रास का एक मुहूर्त होता है, फिर तीस मुहूतों वन विशेष! * 'असंखेज्जासु एवं भंते ! उस्स.प्पणिणीसु केवइया समया परणता ?, गोयमा ! असंखेजा, अरांतासु णं भंते ! उस्सप्पिणिसु केवइया समया पएणता ?, गोयमा ! अांता' इति वचनात् । एक श्वा- [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] का एक दिन रात, १५ दिन रात्रों का एक पक्ष होता है, दो पक्षों का एक मास होता है, दो मासों की एक ऋतु और तीन ऋतुओं की एक अयण, दो अयणों का एक संवत्सर होता है, इसीतरह पाँच संवत्सरों का एक युग बीस युगों का १०० वर्ष होता है, दश सौ वर्षों का एक सहल वर्ष, सौ सहस्र वर्षों को एक लाख वर्ष, चौरासी लाख वर्षों का एक पूर्वाग होता है, इसी प्रकार प्रत्येक को चौरासी लाख से गुणा कर लेना चाहिये । पूर्व त्रुटितांग, त्रुटित, अडड २, अवय २, हु- हुए २; उप्पले २, पो २, नलिण २ अच्छिन २, प्रयुत २, अयुत २, चुलित शीर्षप्रहेलिका २। एक पूर्ववर्ती अंग से उत्तर स्थिति पद चौरासी लाख गुणा अधिक जानना चाहिये, सो एतावन्मात्र गणित का विषय है। अपि तु इसके उपरांत उपमा से कार्य साधन करना चाहिये इसलिये अब उपमा का विषय कहते हैं- NISHAHDOL अथ उपमा का विषय। से किं तं प्रोवमिए ?, २दुविहे पण्णत्ते तंजहा-पलि- ओवमे य सागरोवमे य, से किं तं पलिओवमे ?, तिविहे पण्णत्ते, तंजहा- उद्धारपलियोवमे अहापलिओवमे खित्त- पलिप्रोवमे अ, से किं तं उद्धारपलिवमे?, २ दुविहे पण्णत्ते, तंजहा-- सुहुमे अ ववहारिए अ,तत्थ णं जे से सुहुमे से ठप्पे, तत्थ णं जे से ववहारिए से जहानामए पल्ले सिया जोयणं आयामविक्खंभेणं जोयणं उट्ठ उच्चत्तेणं तं तिगुगणं सविसेसं परिक्खेवेणं, से णं पल्ले एगाहिअ वेाहिअतेश्रा- हिम जाव उक्कोसेणं सत्तरत्त [प] रूढाणं संस? संनिचि- ते भरिए वालग्गकोडीणं ते णं वालग्गा नो अग्गी डहेजा नो वाऊ हरेजा नो कुहेजा नोपलिविइंसिज्जा नो पुइत्ताए हव्व- मागच्छेज्जा,तोणं समए २ऐगमेगं वालग्गं अवहाय जावइ- [ उत्तरार्धम् ] ऐणं कालेणं से पल्ले खीणे नीरए निल्लेवे निटिए भवइ, से तं ववहारिए उद्धारपलिअोवमे । ऐऐसिं पल्लाणं कोडाकोडी हवेज्ज दसगुणिया । सं ववहारियस्स उद्धारसागरोवमस्स एगस्स भवे परिमाणं ॥१॥ एएहिं वावहारियउद्धारपलिओवमसागरोवमेहि किं पत्रो- अणं ?, एएहि वावहारिअउद्दारपलिओवमसागरोवमेहि णत्थि किंचिप्पोअणं, केवलं, तु एणवणा किजइ, से तं वावहारिए उद्धारपलिओवमे । पदार्थ-(से किं तं प्रोवमिए ?, २ दुविहे पण्णत्ते, तंजहा-) औपमिक किसे कहते हैं ? जो संख्या से अतिरिक्त है उसको उपमा के द्वारा विवर्ण किया जाय उसे औपमिक कहते हैं, तथा च औपमिक विवर्ण दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, जैसे कि- (पलिनोवमे य सारोवमे य) पल्योपम और सागरोपम, (से कि पशि ग्रोवमे १, २ तिविहे पणत्ते, तंजहा-) पल्योपम किसे कहते हैं ? जो धान्य के पल्य (कूप) के समान पल्य है उसकी उपमा देकर पदार्थों का विवर्ण करना ही पल्योपम कहलाता है, किन्तु पल्योपम भी तीनों प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, जैसे कि हारपहियो- वमे ) उद्धारपल्योपम, ( अद्यापलिश्रोत्रमे ) अद्धा (काल) पल्योपम और (खित्तपलि- ओवमे ) क्षेत्रपल्योपम, (से किं तं उद्धारपलिअोवमे ) उद्धार पल्योपम किसे कहते हैं ? (उद्धारपलि प्रोत्रमे दुविहे पन्नत्ते, तंजहा-) उद्धार पल्योपम दो प्रकार से विवर्ण किया गया जैसे कि-(सुहुमे य ववहारिए य)सूक्ष्मउद्धारपल्योपम और व्यावहारिकउद्धारपल्योपम, अपि तु, फिर (तत्थ णं जे से सुहुमे से ठप्पे,) उन दोनों में जो सूक्ष्म है उसके स्वरूप को तो अभी छोड़ दीजिये, परंतु (तत्य णं जे से वावहारिए से जहानामए पल्ले सिया) उन दोनों में जो वह व्यावहारिक है वह जैसे नाम संभावना में धान्य के पल्य के समान पल्य होता है वह पल्य (जोयणं आयामविक्वंभेण") उत्सेधांगुल के परिमाण से योजन मात्र दीर्घ और विस्तार संयुक्त हो, और (जोयणं उस चित्तणं) योजन मात्र ऊंचा हो, १ एतद न्यत्र नास्ति । २ परणावि० पाठान्तरम् । किसी २ प्रति में (जोयणं उव्वेहण) योजन प्रमाण गहरा है, ऐसा पाठ * [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] और (तं तिगुणं सविसेस परिक्खेत्रेणं ) उस पल्य की कुछ विशेष त्रिगुणी परिधि हो, (से णं पल्ले एगाहियवेत्राहिए तेश्राहिए जाव उहोसेणं सत्तरत्त [५] रूढाणं) फिर उस पल्य में एक दिन से लेकर सात दिन पर्यन्त उत्पन्न हुए हुए बालकों के (वालग्गकोडीणं) वालायों की अनियों से (संसः सनिचिते) संसृष्टता पूर्वक और पूर्णतया अथवा घनिष्टतया (भरिए) भरा हुआ हो, फिर उन वालातों को (नो अग्गी डहेजा ) अग्नि दाह न कर सके, (नो वाऊ हरेज्जा) न हो वायु हरण करे, (नो कुहेज्जा) न ही सड़े अर्थात् परिभ्रंश भी न हो, (नो विद्वसेज्जा) न ही विध्वंस हो, (नो पृत्ताए हवागच्छेज्जा) न ही दुर्गंध उत्पन्न हो, फिर (तो णं समए २ एगमेगं वालग्गं अबहाय) उन वालात्रों को समय २ में अपहरण करके (जावइएवं कालेणं से पल्ले खीणे नीर शील्लेवे निट्ठिए भवा, से तंबवहारिएउद्धार पलिग्रोवमे । ) जितने काल मात्र में वह पल्य क्षीण, *निरज, निलेप और निष्टित होता है उसीको व्यावहारिक उद्धारपल्योपन कहते हैं। पल्य के स्वरूप के अनन्तर अव सागरोपम का विवर्ण करते हैं- ARRA (एए सि पल्लाणं कोडाकोडी हवेज दसगुणिया । तं ववहारियस्स उद्वारसागरोवमरस एस्स भवे परिमाणं ॥१॥) इन उक्त पायोपमों को दश कोटा कोटि गुणा करें तो एक व्यवहारिक उद्धार सागरोपन का परिमाण होता है अर्थात् दश कोटा कोटि पल्योपमों का एक सागरोपम होता है, (एए हैं बावहारियउद्वारपलिनोवमसागरोवमेहिं किं पारणं ?) इ.1 व्यावहारिक उद्धारपल्योपम और सागरोपम के कथन करने का क्या प्रयोजन है ? (नस्थि किंचिप्पोयणं, केवलं तु पएणवणा किजइ) कुछ भी प्रयोजन नहीं है, केवल प्ररूपण मात्र ही इनका विवर्ण किया जाता है। जब किंचित् मात्र भी प्रयोजन नहीं है तो फिर इसका विवणं व्यर्थ है ? वर्तमान प्रारम्भ मास में इसको किंचित्मात्र भी प्रयोजनता असिद्ध है किन्तु सूक्ष्म उद्धारपल्योपम समास के समय में यह सुखाववोध के लिए उपादेय है अर्थात् अत्यन्त उपयोगी है, (से तं ववहारिए उद्धारपलिनोवमे) अतएव वही व्यावहारिक उद्धारपल्योपम है। भावार्थ-औपमिक समास उसे कहते हैं जहाँ पर गणित का विषय तो न हो सके, परन्तु उपमा के द्वारा उसका विवर्ण किया जाय, वह उपमा प्रकार से वर्णन की गई है, जैसे कि-पल्योपम और सागरोपम, पल्लोपम के भी तीन भेद हैं, जैसे कि-उद्धारपल्योपम, अद्धापल्योपम और क्षेत्र- * यह तीनों शब्द एकार्थी हैं, तथापि परस्पर विशुद्धतर जानने चाहिए।
[ उत्तरार्धम् ] पल्योपम,अपितु फिर उद्धारपल्योपम भी दो प्रकारसे वर्णन किया गया है, जैसे कि- सूक्ष्म और व्यावहारिक, सूक्ष्म का विवर्ण फिर किया जायगा, अतः व्यावहारिक का स्वरूप निम्न लिखितानुसार पढ़ना चाहिये, जैसे एक उत्सेधाँगुल के प्रमाण से योजनमात्र दीर्घ, विस्तीर्ण और ऊर्ध्व पल्य (कूप) के समान हो, उसकी कुछ विशेष त्रिगुणी परिधि भी हो, उसको एक दिन से लेकर सात दिन तक के उत्पन्न हुए हुए बालकों के केसों से ऐसो भरा जाय कि उनको अग्नि दाह न कर सके, वायु भी अपहरण न करे, और न वे विध्वंस हो, तथा न उनमें दुर्गन्धि उत्पन्न होवे, फिर उन बालानों को समय २ में अपहरण किया जाय, जितने काल में वह पल्य क्षीण, निरज, निलेप निष्टित हो जाय उसी को व्यावहारिक उद्धारपल्योपम कहते हैं, और इन्हीं पल्यों को दश कोटाकोटि गुणा करने से व्यावहारिक उद्वारसागरोपम होता है। यदि यह शंका हो कि-इसके कथन करने का क्या प्रयोजन है तो उत्तर यह है कि इस समय तो कुछ भी प्रयोजन नहीं है किन्तु सूक्ष्म पल्य के बोध के लिये अत्यन्त उपयोगी है, इसीलिये इसको व्यावहारिक उद्धारपल्योग्म कहते हैं। अब इसके अनन्तर सूक्ष्म उद्धारपल्यो. पम के विषय में कहा जाता है - - अव सूक्ष्म उद्धारपल्योफ्म का विषय । से किं तं सुहुमे उद्धारपलिभोवमे ?, २ से जहा- नामए पल्लसिया जोयणं आयामविवखंभेणं जोयणं उठवहेणं त तिगुणं सविसेस परिक्खेवेणं, से णं पल्ले एगाहिअवेत्राहिएतेाहित्र उक्कोसेणं सत्तरत्तपरूढाणं संसट्टे संनिचिते भरिते बालग्गकोडीणं, तत्थ णं एगमेगे वालग्गे असंखिज्जाई खंडाई कज्जइ, तेणं वालग्गा दिट्टी- ओगाहणाओ असंखेज्जइभागमेत्ता सुहमस्स पणग- जीवस्स सरीरोगाहणाउ असंखेज्जगुणा, तेणं वालग्गा णो [ श्रीमद योगद्वारसूत्रम् ] अग्गी डहेज्जा णो बाऊ हरेज्जा णो कुहजाणो विइंसेज्जा नो पूइत्ताए हव्वमागच्छेज्जा, तो णं समए २ एगमेगं वालग्गं अवहाय जावइएणं कालेणं से पल्ले खीणे नीरए निल्लेवे णिट्ठिए भवइ, से तं सुहुमे उद्धारपलिनोवमे एएसिं पल्जार्ण कोडाकोडी हवेज्ज दस गुणिया । तं सुहुमस्त उद्धारसागरोवमस्स एगस्स भवे परिमाणं ॥१॥ एएहिं सुहुमउद्धारपलिओवमसागरोवमेहिं किं पनो- अणं ? एएहिं सुहुमउद्धारपलिओवमसागरोवमेहि दीव- समुद् राणं उद्धारं घेव्यइ । केवइयाण भंते ! दीवसमुद्दा उद्धारण पण्णत्ते ? गोयमा! जावइयाण अड्डाइज्जाण उद्धार सुहुमसागरोधमाणं उद्धारसमया एवइयाणं दीव. समुद्दा उद्धारेण पएणत्ता, से तं सुहुमे उद्धारपलिओवमे, से तं उद्धारपलिओवमे। पदार्थ-(से किं तं सुहुमे उद्धारपलिनोवमे ?, २ से जहानामए) सुक्ष्मउद्धारपल्यो- पम किसे कहते हैं ? जैसे कि-(पल्ले सिया जोयणं आयामविक्खंभेणं ) धान्य के पल्य के समान पल्य हो और वह योजन प्रमाण दीर्घ और विस्तार युक्त हो और (जोयण उन्हेणं) योजन प्रमाण भूमिके नीचे स्थित हो, (तं तिगुणं सविसेसं परिक्खेवेणं) फिर उसकी परिधि कुछ विशेष त्रिगुणी भी कथन की गई हो ( से णं पल्ले एगाहिश्र) फिर उस पल्य में एक दिन के, ( वेत्राहिअ) दो दिन के, (तेआहिश्र) तीन दिन के, उकोसेणं सत्तरत्तपरूढाणं ) उत्कृष्ट से सात दिन तक के वृद्धि किये हुए केशों से, १ 'पलि' इति पाठान्तरम् । २ 'रो' इति पाठान्तरम् । ३ 'उद्धारसागरोवमा' इति पाठः।
७ ७ , [ उत्तरार्धम् ] ( संसट्टे ) आकर्ण पर्यन्त ( संनिचिते ) घनिष्ठता से भरिते बालाकोडीणं ) बालानों को कोटि (अनियों) से भरा हुआ हो, फिर ( र मेरे बालग्गे असं वेज्जाई खंडाई कज्जइ) एक २ बालान के असंख्यात प्रमाण खंड किये जायँ । अब द्रव्य से उन खंडों का प्रमाण कहते हैं-(ते णं बाला ट्ठिीणं श्रोहणाउ असंखेजमइभा मेत्ता) वे बालाय दृष्टि की अवगाहना से असंख्यात भाग मात्र हों अर्थात् यावन्मात्र दृष्टिगत पदार्थ हों, उन से भो असंख्यात भाग प्रमाण वह खंड न्यून हो, इसलिये दृष्टि से वह खंड असंख्यात भाग प्रमाण होता है । अव क्षेत्र से प्रमाण कहते हैं-(सुहुमत्स पणगजी- वस्स सरीरोगाहणाउ असं खेज्ज गुणा,) सूक्ष्म पनक-जीव के शरीर की अव- गाहना से असंख्यात गुणाधिक है। अ-: यावन्मात्र सुक्ष्म पनक जीव की शरार अवगाहना होती है, उस से असंख्यात गुणा है यानी *बादर पृथ्वोकायिक पर्याप्त जीवों के तुल्य है, इस प्रकार वृद्धवाद भी कहा जाता है। फिर ( तेणं वालग्ना णो अगी डहना) उन वालानों को अग्नि भी दाह न कर सके, (ो बाऊ ह उमा) न ही वायु हरण कर सके, ( ना कुज्जा ) न ही वे सड़े, ( णो विहरिता) विध्वंस भी न हों, ( णो पुइत्ताए हव्यम ग छेजा ) नही दुर्गधता को वे प्राप्त हां, (तो णं समए २ एगमेगं वालगं अवहाय ) फिर एक २ वालाग्र को समय २ में अपहरण करके ( जाव इएणं कालेणं ) यावन्मात्र काल में (से पल्ले खीणे नीरए निल्लेवे निट्ठिए भवइ, ) वह पल्य क्षीण, निरज, निर्लेप और निष्टित होता है, (से तं सुहुमे रद्वारपालोरमे।) इसी को सुक्ष्म-उद्धारपल्योपम कहते हैं। ( एएसिं पल्लाणं कोडाकोडी हवेज्ज दस गुणिया । (तं सुहुमत्स उद्दारसागरोवमत्स एस भवे परिमाणं ॥१॥) इन पल्यों को दश कोटाकोटि गुणा करने से एक सूक्ष्म- उद्धारसागर का परिमाण होता है, अर्थात् दश १० कोटाकोटि पल्यों का एक सूक्ष्मउद्धारसागर होता है । ( एएहिं सुहुनहारपलिग्रोवमसागरोग्मेहि किं पत्रीयणं ! ) इन सूक्ष्म उद्धारसागरोपम और पल्योपम के वर्णन करने का क्या प्रयोजन है ? ( एएहिं सुहुनरद्धारपलिग्रोवनसागरोत्रमेहं दीवस मुद्दाणं उद्दारं घेप्पइ ) इन सूक्ष्मउद्धारपल्योपम और सागरोपमों से होप समुद्रों का उद्धार किया जाता है, +प्राकृत भाषा में जैसे कोई घटादि जल से इतना पूर्ण हो कि उसमें एक भी विन्दु और प्रविष्ट न हो सके तो उसको पूर्णता को प्राकण-पूर्णता कहा जाता है। * 'दिट्ठी' इयपि पाठः। * बादरपृथिवीकायिकपर्याप्तशरीरतुल्यानीति' सुद्धवादः । Maniseme - ७४ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] अर्थात् द्वीप समुद्रों का प्रमाण इसी गणना के अनुसार ग्रहण किया गया है। (केवइ- याणं भंते ! दीवसमुद्दा द्वारेणं परणता ?) इस प्रकार श्री भगवान के वचनों को सुन कर श्री गौतम स्वामी ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! क्रियत्प्रमाण द्वीप समुद्र उद्धार प्रमाण से प्रतिपादन किये गये हैं ? (गोबमा ! जावइयार अड्ढाइमाणां रहारसुहुनसागरोवमार उद्धारसमया एवइया शं दीवसमुदा उडारे पमत्ता, से बुहुमे उबारपलियमे, से तं उद्धारपल्लि- ओवमे ।) भगवान ने उत्तर दिया कि भो गौतम ! यावत्प्रमाण ढाइ उद्धार सूक्ष्म सागरोपम के उद्धार समय हैं, तावत्प्रमाण उद्धार द्वीप समुद्र हैं, यही पूर्वोक्त सूक्ष्मो- द्धारपल्योपम है और इसी को पल्योपम कहते हैं। भावार्थ- सूक्ष्मउद्धारपल्य उसे कहते हैं जो प्राग्वत् के समान एक पल्य स्थापन किया गया है, अपि तु जो वालात्रों की कांडियों से भरा हुआ हो, फिर उन कोटियों में से एक २ कोटिके असंख्योत खंड कल्पित करलिये जायें जो कि दृष्टि की अवगाहनता से असंख्यात भाग प्रमाण हो, और लूदा पनक जीव की प्रवगाहना से असंख्यात गुणा हो, इस प्रकार उस पल्य को बालात्रों से भर दिया जाय, पुनः जिसे अग्नि दाह न कर सके तथा वायु अपहरण न कर सके, न ही उसको दुर्गंध पराभव कर सके और वह धनता युक्त भी. हो, फिर उन बालानों का समय २ में एक २ खंड करके वह पल्य खाली कर दिया जाय, इस प्रकार जितने काल में वह पल्य खाली हो जाय उसको सूक्ष्म उद्धार पल्योपम कहते हैं। अब दश कोटा कोटि प्रमाण पत्य खाली हो जाय तब एक सूक्ष्मउद्धार सांगर होता है। इसके प्रतिपाद करने का मुख्य प्रयोजन इतना ही है कि इसके द्वारा द्वीपसमुद्रादि का प्रमाण किया जाता है । इस प्रकार गुरु के वचनों को सुन कर शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! उक्त प्रमाण से कितने द्वीप समुद्र हैं ? गुरु ने उत्तर दिया कि भो ! शिष्य ! उक्त प्रमाण से अर्द्ध तृतीय अढ़ाई २॥ सागरों के समान द्वीप समुद्र है, अथवा २५. पच्चीस कोटा कोटि उद्धार पल्यों के तुल्य द्वीप समुद्र हैं, सो इसे ही उद्धारपल्य कहते हैं। अब इसके अनन्तर अद्धापल्य का वर्णन किया जाता अथ श्रद्धा पल्य का विषय । से किं तं श्रद्धापलिनोवमे ?, २ दुविहे पण्णत्ते, तंजहा- सुहुमे य ववहारिए अ तत्थ णं जे से सुहुमे से ठप्पे, तत्थ * निमोद के जीव। amune [ उत्तरार्धम् ] गंजे से वावहारिए से जहानामए पल्ले सिया जोयणायाम- विक्खंभेग जो० उ० तं तिगुण सविसेसं परिवखेवेणं, से रणं पल्ले एगाहियवाहियतेाहिए जाव भरिए वालग्गकोडीणं, ते णं वालग्गा रणो अग्गी डहेजा जाव नो पलिविद्धंसिज्जा नो पूइताए हब्बमागच्छेज्जा, ततो वाससए २ एगमेग वालग्गं अवहाय जावइएवं कालेज से पल्ले खीणे नीरए निल्लेवे निटिए भवइ, से सं ववहारिए अद्धापलिनोवमे । एएसिं पल्ला कोडाकोडी हविज दसगुणिता। तं ववहारिअस्ल, श्रद्धासा एगस्स भवे परिमाणं ॥१॥ एएहिं बवहारिएहिं अद्धापलिओवमसागरोवमेहि किं पोयणं ?, एएहिं सबहारिमनद्वापलिओवमसागरो- वमेहिनस्थि किंचियोयएं, केवलं पाणवणा किजइ, से त ववहारिए श्रद्धापलिमोबने। लेकि सुहमे अद्यापलि- भोवमे ?, २ ले जहानामए पल्ले सिमा जोअणं आयाम- विक्खम्भेणं जोयाँ उडे उम्बत्तेगा तं तिगुणं सविसेसं परि- क्खेवेणं, से पल्ले गाहियवेत्राहियतेबाहिय जाव भरिए बालग्गकोडी, तस्थ गां एगमेगे वालग्गे असंखेजाइं खंडाई कजइ. ते णं वालग्गा दिट्टीमोगाहणाश्रो असंखेज्जइभाग- भेत्ता सुहमस्स पणगजीवस्त सरीरोगाहणाओ असंखिज्ज गुणा, ते णं वालाग्गा रणो अग्गी डहेजा जाव णो पलिविद्व- सिज्जा नो पूइत्ताए हव्वमागच्छेज्जा, ततो णं वाससए २ एगमेगं वालग्गं अवहाय जावइएणं कालेणं से पल्ले खीणो नीरए निल्लेवे णिट्टिए भवइ, से तं सुहुमे अद्धापलिओवमे। । .
७६ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] एएसिं पल्लाणं कोडाकोडि भवेज दस गुणिया। तं सुहुमस्स अद्धासागरोवमस्स एगस्स-भवे परिमाणं॥१॥ एएहिं सुहुमेहिं अद्धापलिअोवमसागरोवमेहि किं पोयणं ? एए हि सुडुमहिं श्रद्धापलिभोवमसागरोवमेहि नेरइयतिरिक्खजोणियमणुस्तदेवाणं आउअं मविज्जति। पदार्थ-(से किं तं श्रद्धापलिनोवमे ? २ दुविहे पत्नत्ते, तंजहा-) अद्धापल्योपम किसको कहते हैं ? श्रद्धापल्योपम दो प्रकार से वर्णन किया गया है, जैसे कि-(सुहुमे य ववहा- रिए य,) सूक्ष्म और व्यावहारिक, (तत्थ णं जे से सुहुभे से ठप्पे,) उन दोनों में से जो सूक्ष्म है उसे छोड़ दीजिये, (तत्थ णं जे से ववहारिए, उन दोनों में जो वह व्यावहारिक है, वह निम्न प्रकार से है-(से जहानामए) जैसे कि-(पल्ले सिया जोयणं पायामविक्खंभेणं) धान्यों के समान एक पल्य हो, जो कि योजन प्रमाण दीर्घ और विस्तार युक्त हो, और (जोयणं उड्डउच्चत्तेणं) योजन प्रमाण ऊर्ध्वता से भी युक्त हो (तं तिगुणं सविसं परि- क्लेवेणं.) उसकी त्रिगुणो कुछ विशेष परिधि भी हो, अर्थात् त्रिगुणी साधिक परिधि युक्त हो, से णं पल्ले एगाहिय अहियते प्रा.हए व भरिए बालग्गकोडीण) फिर उस पल्य को एक दिन दो दिन तीन दिन यावत् सात दिन तक के बालासों से भर दिया गया हो और ( ते णं वालग्गा णो अग्गी इ हेजा जाव नो प.लेविड सिजा नो पूत्ताए हव्वमागच्छेजा,) जब की बालानों की कोटियों से भर दिया गया तब उन बालानों को अग्नि भी दाह न कर सकती हो यावत् वे बालाग्र विध्वंस भी न हों क्योंकि कठिन यानी घनता से भरे गए हैं, और न ही उनमें दुर्गन्ध उत्पन्न हो, (ततो णं वाससए २ एगमेगं वालाग्गं अवहाय,) फिर उस पल्य में से सौ २ वर्ष के पश्चात् एक एक बालाग्र निकाल लिया जाय तो (जावइ- एण कालेण से पहले खीणे नीरए निल्लेवे निहिए भवइ,) जितने काल में वह पल्य क्षीण, निरज, निर्लेप, और निष्टितार्थ होता है (से तं वववहारिए अद्यापलिनोवमे ।) उसी काल मात्र को व्यावहारिक अद्धापल्योपम कहते हैं। से (एएसि पल्लाणं कोडाकोडी भविज दस गुणिया । : ववहारिस अदासागरीवमस्स एगस्स भवे परिमाणं ॥१॥) इन पल्योपमों को दश कोटा कोटि गुण किया जाय तब एक व्यावहारिक श्रद्धासागरोपम होता है । (एपहिं ववहारिएहिं श्रद्धापलिश्रोवमसागरोवमेहिं किं पोयणं ?)
। [ उत्तराधम् ] इन व्यावहारिक अद्धा पल्योपम और सागरोपम के कथन करने का क्या प्रयोजन है ? (ए एहिं ववहारियनद्वापलिनोवमत्तागरोवमेहिं नस्थि किंचिप्पीयण, केवलं परणवणा- किजइ.) इन व्यावहारिक अद्धापल्योपम और सागरोपम के कथन करने का किंचिन्मात्र भी प्रयोजन नहीं है, केवल सुखावबोध के वास्ते प्ररूपणा मात्र हो कथन किया गया है, (से तं ववहारिए अद्धापलिनोवमे ।) वही पूर्वोक्त व्यावहारिक अद्धा पल्योपम है । (से किं तं सुहुमे अद्यापलिनोवमे ? २ से जहानामए) सूक्ष्म अद्धापल्योपम किसे कहते हैं ? जैसे कि-(पल्ले सिया) प्राग कथित पल्य हो, और वह (जोयण पायाम- विक्खंभेण जोयण उट्ट उच्चत्तेण,) योजन प्रमाण दीर्घ और विस्तारपूर्वक हो, अपितु योजन प्रमाण ऊर्ध्व भो हो तं तिगुणं सविसेस परिक्खेवेणं) और उसको परिधि तीन गुणीसे कुछ विशेष भो हो, (से णं पल्ले एगाहिएवेत्राहियतेप्राहिय जाव भरिए वालाग्ग कोडीणं, फिर वह पल्य एक दिन, दो दिन, तीन दिन, यावत् सात दिनतक के उत्पन्न हुए २ वालाबोंसे भर दिया गया हो अथवा बालापों की कोटियों से घन रूप भी होगया हो, (तत्थण) फिर (एगमेगे वालग्गे असंखेजाई खंडाई कजइ, एक २ बालान के असंख्यात खंड किये जायें, फिर (ते णं वालाग्गा दिहीमोगाहणारे असंखेजइभागमेत्ता) वे बालाग्र दृष्टि को अवगाहना से असंख्यात भाग मात्र हो, किन्तु (सुहुमस्स पण गजीवस सरीरोगाहणाश्रो असंखेज गुणा,) सूक्ष्म पनक जोव के शरीर की अवगाहना से असंख्येय गुणाधिक कल्पित कर लिये जाये, (तेण बालग्गा नो अग्गी डोजा) फिर उन बालानों को अग्नि भी दाह न कर सके, (जाव नो पलिविद्ध सिन्जा) यावत् वे विध्वंस भो न हों (नो पूत्ताए हव्वमा. गच्छेज्जा,) और न ही वे दुर्गन्धता को प्राप्त हों, (ततोण वाससए २ एमेगं बालग अवहाय) फिर उन में से सौ सौ वर्ष के पश्चात् एक एक बालान अपहरण किया जाय तो जावइएण कालेण से पल्ले खीणे नीरए निल्लेवे निट्टिए भवइ, से तं सुहुमे अदापलिश्रीवमो।) फिर वह पल्य जितने काल में क्षीण, निरज, निर्लेप और निष्ठितार्थ हो जाय, उसको सूक्ष्म अद्धा पल्योपम कहते हैं, फिर- (एएसिं पल्लाण कोडाकोडि भवेज दस गुणिया । ) (तं सुहुमस्स श्रद्धासागरोवमस्स एगस्स भवे परिमाण ॥१॥) इन श्रद्धापल्योपमों को दशकोटाकोटि गुणा करने से एक सूक्ष्म श्रद्धासागरोपम का परिमाण होता है। (एएहिं सुहुमेहिं अदापलिश्रोत्रमसागरोवमेहिं किं पोयण ?) इन सूक्ष्म श्रद्धापल्योपम और सागरोपमों के कथन करने का क्या प्रयोजन है ? ( एएहिं सुहुमेहि *'नवरमुद्धारकालस्येह वर्षशतमानत्वाद्यावहारिकपल्योपमे] सङ्खयेया वर्षकोत्योऽवसेयाः, सूचमपल्योपमे त्वसङ्ख्येया' इति । ?
नारकियों सांगरोत्रम को और शेष पृश्निन पर्याप्त [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] तेरिक्ख जोणियमणुस वाण प्राज्यं मविज्जति, ) इन सूरम अद्धा- गों से नारकीय, तिथंग योनिक, मनुष्य और देवताओं की आयु अर्थात् उक्त प्रमाणों से चारों गतियों के जीवों की आयु की लिये इसे अध्वन काल कहते हैं। स्थूल अद्धापल्यं का वर्णन पहिले किया जा चुका है, का भी स्वरूप जानना चाहिये, किन्तु विशेषता केवल इतनी प्र के असंख्यात २ खंड कल्पित कर लेने चाहिये जो कि असंख्यात भाग प्रमाण हो और सूक्ष्म पनकजीव की अव- गुणाधिक हो, कि.र उनबालानों में से एक एक को काला जाय, जितने काल में वह पल्य खाली होजाय उसी हैं । जब दश कोटा कोटि प्रमाण पल्य खाली होजाय तब ॥ है, इसके विवरण करने का मुख्य प्रयोजन केवल इतना य र, तिर्यक् योनिक २, मनुष्य ३ और देवों की ४ आयु अतः सर्व जीवों की आयु का मान इसी के द्वारा किया श्रायु के विषय में विवरण करते हैं- कारकिया की रिहति । अगले सूत्र का ठिईप प्रतिपादन हे गौतम ! है, (पंक नारकिग BARAHA सागरोत्रमा ओर उत्कृष्ट उकोसेण मन दश सागरो पुढविनेरइयाग स्थिति कित उकोसे वापी २२सागरोपन तमस्तमाप्रमा (गोयमा ! जर जघन्य स्थिति ते ! केवइयं कालं ठिई पण्णता? गोयना! वाससहस्साई उक्कोसेणं तेत्तीसं सागरो- भापुढविणेरइयाणं भंते ! केवइयं कालं यमा ! जहन्नेणं दस वाससहस्साइ नागरोवमं, अपजत्तगरयणप्पभापुढविणेर- वइयं कालं ठिई पण्णता? गोयमा ! जह हुत्तं उक्कोसेणवि अंतोमुहत्तं, पज्जतग- रइयाणं भंते ! केवइयं कालं ठिई प. ? णं दस वाससहस्साइं अंतोमुहुत्तूणाई सागरोवमं अंतोमुहुत्तोणं, सक्करप्पभा- स [ उत्तरार्धम् ] ७६ पुढविनेरइयारा भंते ! केवइयं काले ठिती प० ? गो! जह- नेणं एगं सागरोवमं उक्कोलेणं तिगिण सागरोवमाइं, एवं सेसपुढवीसु पुच्छा भाणिया, वालुअप्पभापुढवि- नेरइयाणं जहन्नेणं तिगिण सागरोवमाई उकोसेणं सत्त सा- गरोवमाइं, पंकप्पभापुढविनेरइयाणं जहएणेणं सत्त साग- रोवमाई उक्कोलेणं दस सागरोवमाइं, धूमप्पभापुढविनेरइ- याणं जहन्नेणं दस सागरोवमाई उक्नोसेणं सत्तरस सागरो- वमाई, तमप्पभापढ विनेरइयाणं जहणणं सत्तरस साग- रोवलाई उक्कोसेणं वावीसं सागरोबमाई, तमतमापुढवि- नेरइयाणं भंते ! केवइवे कालं ठिई पण्णता ? गोयमो ! जहणणं बावीसं सागरोवमा उक्कोसणं तेत्तीस सागरो- वमाई। पदार्थ-(णेरइयाण ते ! केवइयं कालं ठिई परणता ?) हे भगवन् ! नारकियों की कितने काल की स्थिति प्रतिपादन को गई है ? (मोरमा ! जहरणे दस वाससहरसाई उको- सेण तेत्तीसं सागरोबमाई,) भो गौतम ! जघन्य से दश सहस्र वर्ष, और उत्कृष्ट तेतीस सागरोपम अर्थात् नारकियों की न्यून से न्यून स्थिति दश हजार वर्ष को और उत्कृष्ट ३३ सागरोपम को होती है, इसी को औधिक सूत्र कहते हैं । (रयणप्पभापुड़- विणेरइयाण भंतें ! केवइयं कालं ठिई ५०? ) हे भगवन् ! रत्नप्रभापृथ्वी के नारकियों की स्थिति कितने काल की प्रतिपादन को गई है ? ( गोयमा ! जहरणेण दस वाससहरसाई) हे गौतम ! जघन्य स्थिति दश सहस्र वर्ष की और (उकोसेण एगं सागरोवम,) उत्कृष्ट एक सागरोपम की होती है, (अपजत्तयरयणप्पभापुढविनेरइयाण भंते ! केवइयं कालं ठिई प०१) हे भगवन् ! अपर्याप्त रत्नप्रभापृथ्वी के नारकियों की स्थिति कितने काल की वर्णन की गई है ? (गोयमा ! जहन्नेणवि अंतोमुहुत्तं इकोसेणवि अंतोमुहुत्तं,) हे गौतम! इनको जघन्य स्थिति भी अन्तर्मुहूर्त प्रमाण और उत्कृष्ट से भी अन्तर्मुहूर्त की होती है, (पज्जत्तग- रयणप्पभापुढविनेरइयाणं भंते ! केवइयं कालं लिई पं०) हे भगवन् ! पर्याप्त रत्नप्रभा पृथ्वी के नारकियों की स्थिति कितने काल की वर्णन की गई है ? (गीयमा ! जहरणेणं दस वाससहस्साई अंतोमुहत्तणाई उक्कोसेण एग सागरोवमं अंतो मुहुत्तोण',) हे गौतम! जघन्य !
७ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] अन्तर्मुहूर्त न्यून दश सहस्र वर्ष की और उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त न्यून एक सागरोपमको होती है, (सक्करप्पभापुडविनेरइयाण भंते ! केवइयं कालं ठिई पं.?) हे भगवन् शर्करप्रभापृथ्वी के नारकियों की स्थिति कितने काल को प्रतिपादन की गई है ? (कोयमा ! जहएगण एर्ग सागरोवम उकोसेण तिरिण सागरोवमाई,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति एक सागरोपम को और उत्कृष्ठ तीन सागरोपम को होतो है, (एवं सेसपुढची पुच्छा भाणयिधा,) इसी प्रकार शेष पृथिवयों के विषय में पृच्छा करनी चाहिये । जैसे कि-अपर्याप्त काल और पर्याप्त, सो अपर्याप्त काल सभी नारकियों का अंतर्मुहूर्त प्रमाण होता है और पर्याप्त काल अपर्याप्त काल के अंतर्मुहूर्त को छोड़ कर शेष यथा स्थिति काल होता है, जो अगले सूत्र में विवरण किया गया है, जैसे कि-(वालुअप्पभापुरविनेरइयाण भंते ! केवइयं कालं ठिई पं०?) हे भगवन् ! बालुप्रभा पृथ्वी हे नारकियों के कितने काल की स्थिति प्रतिपादन कीगई है ? (गोय! जहरणेण तिएिण सागरोत्रमाइउकोसेण स सागरोत्रमा, गौतम ! जघन्य स्थिति तीन सागरोपम को और उत्कृष्ठ सात सागरोपम को होती है, (पंकनमा गुढविनेरइ प्राण भंते ! केवइयं कालं टिई पं० ?) हे भगवन् ! पंकप्रभापृथ्वी के नारकियों की कितने काल की स्थिति प्रतिपादन की गई है ? (गोयमा ! जहरणेण सत्त सागरोबमाइउकोसेण दस सागरोत्र माइ',) हे गौत्तम ! जघन्य स्थिति सात सागरोपम की ओर उत्कृष्ट दश सागरोपम की होती है, (धूमप्पभापुढवि. जहरणेण दस सागरोवमाई उकोसेण सत्तरस सागरोब माइ',) तथा धूमप्रभापृथ्वी के नारकियों की जघन्य स्थिति- दश सागरोपम प्रमाण की और उत्कृष्ट सत्रह सागरोपम की होती है (तमप्पभा- पुढविनेरइयाण भंते ! केव इयं कालं ठिई पं०) हे भगवन् ! तमःप्रभापृथ्वी के नारकियों की स्थिति कितने काल की प्रति पादन की गई है ? (गोयमा ! जहरणे सत्तरस सागरोवमाई उक्कोसे वावीसं सागरोबमाई) हे गौतम ! जघन्य स्थिति १७ सागरोपम की और उत्कृष्ट २२ सागरोपम की होती है, (तमतमापुढविनेरइयाण भंते ! केवइयं कालं ठिई पं०?) हे भगवन् ! तमस्तमाप्रभापृथ्वी के नारकियों की कितने काल की स्थिति प्रति पादन की गई है ? (गोयमा ! जहरणेण बावीसं सागरोवमाइ उकोसेण तेत्तीस सागरोबमाई',) हे गौतम ! जघन्य स्थिति २२ सागरोपम की और उत्कृष्ट तेतीस सागरोपम की कही गई है। + एतद्वाक्यं कचिनोपलभ्यते * सागरमेगं तिय सत्त दस य सत्तरस तह य बावीसा। तेत्तीसं जाव ठिई सत्तसुवि कमेण पुढवीसु ॥१॥ सागरोपममेकं त्रीणि सप्तदश च सप्तदश तथैव द्वाविंशतिः Pasna [ उत्तरार्धम् ] ८१ भावार्थ -नारकियों की जघन्य स्थिति दश सहस्र वर्ष की और उत्कृष्ट ३३ सागरोपम की होती है, इसी को औधिक सूत्र कहते हैं । और सातो नरकों के अपर्याप्त नारकियों की स्थित सिर्फ अंतर्मुहूर्त प्रमाण ही वर्णन की गई है, तथापि पर्याप्त नारकियों की स्थिति अन्तर्जुहूर्त न्यून होती है। इन सातो नरकों की जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति निम्न लिखितानुसार जाननी चाहिये- नरक जघन्य स्थिति उत्कृष्ट स्थिति दश सहस्र वर्ष १ सागरोपम द्वितीय एक सागरोपम ३ तीन सागरोपम तृतीय तीन सागरोपम ७ सात सागरोपम चतुर्थ सात सागरोपम १० दश सागरोत्रम पंचम दश सागरोपम १७ सत्तरह लागरोपम षष्ठ सत्तरह लागरोपम २२ द्वाविंशति लागरोपम सप्तम द्वाविंशति सागरोपम ३३ त्रयस्त्रिंशत् सागरोंपम इस तरह जघन्य और उत्कृष्ट सातो नरकों की स्थिति वर्णन की गई है, किन्तु जघन्य से अधिक और उत्कृष्ट स्थिति से न्यून सर्व मध्यम स्थिति जाननी चाहिये । अब इसके पश्चात् दंडकानुसार भवनपत्यादि देवों की स्थिति वर्णन करते हैं:- aad . अथ भवनपत्यादि देवों की स्थिति। असुरकुमाराणं भंते ! केवइयं कालं ठिई पं० ? गोयमो । जहण्णणं दस वाससहस्साई उक्कोमेणं सातिरेगं सागरो- वर्म, असुरकुमारदेवीणं भंते ! केवइयं काल ठिई पण्णते ? गोयमा ! जहणणेणं दस वालसहस्साई उक्कोसणं अद्ध- पंचमाई पलिअोवमाई', नागकुमारीणं भंते ! केवइयं कालं ठिई पं०? गोयमा ! जहणणं दस वाससहस्साई उक्को- + 'जा पढमाए जेट्ठा सा बीयाए कणिट्टा भणिया । या प्रथमाया ज्येष्ठा सा द्वितियायां निष्ठा भणिता' ॥
८२ [ श्रीमद्नुयोगद्वारसूत्रम् । सेणं देसूणाई दुरिण पलिश्रोवमाइ, नागकुमारीणं भंते ! केवइयं कालं ठिई पं ? गोयमा ! जहण्णणं दस वाससह स्साई उक्कोसेणं देसूणं पलिओवमं, एवं जहा नागकुमा- राणं देवाणं देवीण य तहा जाव थणियकुमारणं देवाणं देवीण य भाणियवं। पदार्थ-असुरकुमाराएं भंते ! केवइयं कालंठई पन?) हे भगवन् ! असुरकुमारों की कितने काल की स्थिति प्रतिपादन की गई है ? (नावमा : महारः दल वाससहस्साई उकोसे सातिरेगं सागरोत्रमं,) हे गौतम ! जयन्य स्थिति दश लहस वर्ष प्रमाग और उत्कृष्ट एक सागरोपम से कुछ अधिक की वणन की गई है। (अनुशारदीग भने ! केवइय कालं ठिई पन्नते?) हे भगवन् ! असुरकुमारों के देवियों की कितनं काल की स्थिति प्रति- पादन की गई है ? ( गोयमा ! ऽ हरगोर बल वाससहरसाइ रहीमेमां वहांचाई पन्तोद- माई,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति दश सहस्र वर्ष और उत्कृष्ट साढ़े चार ४॥ पल्पोपम की प्रतिपादन की गई है, (नागकुमार भंते ! कंबइयं काली पनते. हे भगवन् ! नाग. कुमार देवों की स्थिति कितने काल को प्रति पाइन को गई है ? (नयमा ! जहरणे दस वाससहस्साई उक्कोसेणं देतृणाई दुरिण पलियम,) हे गौतम ! जयन्य स्थिति दश सहस्र वर्ष की और उत्कृष्ट देश न्यून दो पल्योपम की है, (नागकुमारी भते! केवइयं कालं ठिई पनत्ते?) हे भगवन् ! नागकुमारियों की कितने काल की स्थिति प्रतिपादन की गई है ? (गोयमा ! जहएणेगां दस बाससहस्साई उकोते देसूण पजियार, हे गौतम ! जघन्य दश सहस्र वर्ष की और उत्कृष्ट देश न्यून एक पल्योपम की होती है । (वं जहा नाग- कुमाराणं देवाणं देवीण य .हा जाव थनियकुमार मां देवाय देवीण व भाणियञ्च ।) जिस प्रकार नाग कुमार देव और देवियों को स्थिति वर्णन की गई है उसी प्रकार स्तनित्- कुमार देव और देवियों की स्थिति भी जानना चाहिये, अर्थात् जैसे नाग कुमारों को स्थिति वर्णन की गई है उसी प्रकार नव निकायों की भी स्थिति जाननी चाहिये भावार्थ-असुरकुमार देवों की जघन्य स्थिति याने न्यून से न्यून दश सहस्र वर्ष की होती है, और उत्कृष्ट एक सागरोपम से कुछ अधिक प्रतिपादन की गई है, किन्तु उनके देवियों की जघन्य तो पूर्ववत् ही है परन्तु उत्कृष्ट साढ़े. चार ४॥ पल्योपम की होती है। और नागकुमारों की जघन्य स्थिति दश सहस्र वर्ष की और उत्कृष्ट देश न्यून दो पल्यापम की होती है । ।
, [ उत्तरार्धम् ] अथ पांच स्थावरों की स्थिति। पुढवीकाइयाणं भंते ! केवइयं काल ठिई पन्नत्ते ? गोयमा ! जहणणेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं बावीसं वास- सहस्साई, सुहुम पुढवीकाइयाणं भंते ! केवइयं कालं ठिई पन्नत्ते ? गोयमा ! जहणणोणवि अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणवि अंतोमुहत्तं, बादरपुढविकाइयाणं पुच्छा, गोयमा ! जह एणोणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं बावीसं वासलहस्साई, अप- जत्तगबाहरपुढविकाईयाणं पुच्छा, गोयमा ! जहएणोण- वि अंतोमुहत्तं उक्कोसेणवि अंतोमुहुत्तं, पजत्तगबादर- पुढविकाइयाणं पुच्छा, गोयमा ! जहणोणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं बावीसं वाससह साई अंतोमुहुत्तूणाई, एवं सेसकाइयाणंपि पुच्छावयणं भाणियव्वं, आउकाइ- याणं जहरणेणं अंतोमुहुत्त उक्कोसेणं सत्त वाससह- स्साई, सुहुमाउकाइयाणं ओहियाणं अपज्जत्तगाणं पज्जत्तगाणं तिण्हवि जहएणणवि अंतोमुहुत्तं उक्को- सेणवि अंगोमुहुत्तं, बादराउकाइयाणं जहा ओहि- याणं, अपज्जत्तगवादरभाउकाइयाणं पुच्छा, गोयमा ! जहणणोणवि अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणवि अंतोमुहुत्तं, पज्जत्तगबादराउकाइयाणं पुच्छा, गोयमा ! जहएणणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं सत्त वाससहस्साई अंतोमुहुत्त- णाई, तेउकाइया पुच्छा, गोयमा । जहणणोणं अंतो- मुहुत्तं उक्कोसेणं तिणि राइंदि इ, सुहुमतेउकाइ- , १--सु० 'प्रोहियाणं अपजत्तयाणं पजत्तयाण य ति ऐग च्छा, इत्यपि पाठः ।
[ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] याणं ओहियाणं अपज्जत्तगाणं पज्जत्तगाणं तिगृहवि जहण्णोणवि अंतोमुहुत्त उक्कोसेणवि अंतोमुहत्तं, बादरतेउकाइयाण पुच्छा, गोयमा ! जहण्णोणं अंतो- मुहुत्त उक्कोसेण तिषिण राइंदियाइ', अपज्जत्तगवादर- तेउकाइयाण पुच्छा, गोयमा ! जहणणोणवि अन्तो- मुहुत्तं उक्कोसेणवि अंतोमुहुत्तं, पज्जत्तगवादरतेउ- काइयाण पुच्छा, गोयमा ! जहणणेण अन्तोमुहुत्तं उक्को- सेण तिण्णि राइंदियाई अंतो मुहुत्तूणाई, वाउकाइयाणं पुच्छा, गोयमा ! जहणोण अन्तोमुहुत्त उक्कोसेगां तिरिण वाससहस्साई, सुहुमवाउकाइयाण ओहियाणं अपज्जत्तगाणं पज्जत्तगाण य तिण्हवि जहणणेण वि अंतो- मुहुत्त उक्कोसेणवि अंतोमुहुत्त, बादरवाउ काइयाणं पुच्छा, गोयमा ! हरणोणं अन्तोमुहुरा उक्कोसेणं तिरिण वाससह- स्साई, अपजत्तगवादरवाउकाइयाणं पुच्छा, गोयमा ! जह- रणणं अन्तोमुहुत्तं उक्कोसेणवि अंतो मुहुत्तं, पज्जतगबादर- वाउकाइयाणं पुच्छा, गोयमा ! जहणणेण अन्तोमुहुत्तं उक्कोसेणं तिषिण वाससहस्लाई अन्तो मुहुत्तूणाई । वण- स्सइकाइयाण पुच्छा, गोयमा ! जहणणेण अन्तो- मुहुत्तं उक्कोसेण दस वाससहस्साई, सुहुमवणस्सइ- काइयाण ओहियाण अपज्जत्तंगाण पज्जत्तगाण य तिणहरि जहण्ण्णवि अन्तोमुहुत्त उक्कोसेणवि अन्तो- मुहुत्तं, बादरवणस्सइकाइयाण पुच्छा, गोयमा ! जह- एणण' अंतोमुहुत्त उक्कोसेण दस वाससहस्साई, माटरगाम्मटकादयागा गोयमा !
जहणणेण ७ [ उत्तरार्धम् ] जहणगोणवि अन्तोमुहुत्त उक्कोसेणवि अन्तोमुहुत्त, पज्जत्तगवादरवणस्सइकाइयाण पुच्छा, गोयमा! अन्तोमुहुत्त, उक्कोसेण दस वाससहर स्साई अन्तोमुहुत्तूणाई। पदार्थ-(पुटवीकाइयाणं भंते ! केवइयं कालं टिई पन्नत्त ?) हे भगवन् ! पृथिवी काय के जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जहएणेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोरणं बावीसं वाससहस्साई.) भो गौतम ! जघन्य स्थिति अन्तमुहूर्त की और उत्कृष्ट बाईस हजार वर्षकी होती है, (सुहम पुढवीकाइयाण ते ! केवइयं कालं ट्ठिई पनत्ते,)हे भगवन् ! सूक्ष्म- पृथिवीकाय के जीवों को स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जहएणण वि अंतो मुहुत्त उक्कोसेणवि अन्तोमुहुत्तौं,) भोगौतम!जघन्य स्थिति भी अन्तर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट भी अन्तर्मुहूर्त की प्रतिपादन को गई है, (बादरपुढवीकाइयाणं पुच्छा,) बादर (स्थूल) पृथ्वीकाय के जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जहएणणं अंतोमुहुत्तं उकोसेणं बावीसं वाससहरसाइ,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट बाईस हजार वर्ष को होती है, (अपजत्तम्बादरपुढवीकाइयाणं पुच्छा,) हे भगवन् ! अपर्याप्त बादर पृथिवीकाय के जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोरमा ! ह. एणणवि अंतीमुहुर्त उक्कोसेणवि अंतोमुहत्त,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति भी अन्तर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट भी अन्नाहूर्त की होती है. (५जत्तावादर पुढपीकाइयाणं पुच्छा,) पर्याप्त बादर पृथिवोकाय के जीवों की स्थिति कितने काल की होती है? (गोयमा ! जह- एणणं अंतोमुहुत्तं डकोसेणं वावीसं वाससहरसाइ अंतीमुहुत्तूणाई,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट, अन्तर्मुहूर्त न्यून बाईस हजार वर्ष को होती है, क्योंकि अपर्याप्त काल को पृथक् कर दिया है, (एवं सेसकाइयाणं पि पुच्छावयणं भाणियब्वं,) इसी प्रकार शेष कार्यों के विषय में भी प्रश्नोत्तर जानने चाहिये । (आउकाइयाणं जह- एणणं अंतो मुहुत्तं उक्कोसेणं सत्त वाससहस्साई,) अप्कायिकों की जघन्य स्थिति अन्त हूर्त की और उत्कृष्ट सात हजार वर्ष की होती है, (सुहुमाउकाइयाणं श्रोहियाणं अपज्जत्त- गाणं पजत्तगाणं तिरह वि जहरणेण वि अंतोमुहत्तं उकोसेण वि अंतोमुहुत्तं,) तथा सूक्ष्म अप्कायिकों के औधिक, अपर्याप्त, और पर्याप्त इन तीनों की जघन्य स्थिति भोअन्तर्मु- + 'अपि' शब्द समुच्चय वाचक है । अब सामान्य प्रकार से ही पृच्छा की जाती है, जैसे कि-(आउकाइयाणं पुच्छा,) हे भगवन् ! जलकांयिकों की स्थिति कितने काल की प्रतिपादन की गई है ? इत्यादि- BHARI सूत्र ७ काय के जीवों की स्थिति कितने काल की प्रतिपादन की है ? (गोयमा जहएणणं अंतो- तीन रात्रि दिन की होती है, (अपजत्तावादरतेडकाझ्या पुच्छा,) हे भगवन् ! अपर्याप्त की ही प्रतिपादन की गई है, (पज्जतावादरतेउकाइयाणं पुच्छा,) पय्याप्त बादर अग्नि- ८६ [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] हूर्त की और उत्कृष्ट भी अन्तर्मुहूर्त की होती है, (बादराउकाइयाणं जहा ओहियाणं ) बादर औधिक अपकायिक जीवों की स्थिति जैसे प्रथम में वर्णन की गई है उसी प्रकार जानना चाहिए, किन्तु (अपज्जत्तगबादराकाइयाणं जहरणेणवि अंतोमुक्षुत्तं उकोसेरण वितोमुहुत्तं,) अपर्याप्त बादरअपकाय के जीवों की स्थिति, जघन्य और उत्कृष्ट दोनों ही अन्तर्मुहूर्त प्रमाण होती है, ( पजत्तः वादराउकाइयाणं पुच्छा,) हे भगवन् ! पर्याप्त बादरजलकाय के जीवों की स्थिति कितने काल की प्रतिपादन की गई है ? (गोयमा ! जहएणे अंओमुहुतं उक्कोलेणं रच वाससहस्साई अन्तोमुहूत्त णाई,) भो गौतम ! जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट अन अन्तर्मुहूर्त न्यून सात हजार वर्ष की होती है, अब अग्निकाय के विषय में कहते हैं- (तेउका इमाण पुच्छा,) हे भगवन् ! अग्निकायिक जीवों की स्थिति कितने काल की प्रतिपादन को है ? (कोयमा ! जहरणेणं अंतोनुहुत उक्कोसेणं तिरिश राईदिआई,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त की और उष्कृष्ट तीन रात्रि दिनको होती है,तथा-(सुहुनतेकाइयाणं मोहि ग्राणं अपज्जतगाणं पजत्तगाणं तिएहवि जहरणेण विशंतोमुत्र उक्कोसेण वि अंतोमुहुत्,) किन्तु सूक्ष्म अग्निकाय के औधिक अपर्याप्त, और पर्याप्त अर्थात् उक्त तीनों की जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त्तकी और उत्कृष्ट भी अन्तमुहूर्त की होती है, ( बादरतेउकाइयाणं ) हे भगवन् ! बादर अग्नि मुहुरा उक्कोलेणं निरिणराईदिवाई.) हे गौतम ! जघन्य स्थिति तमुहूर्त की और उत्कृष्ट अग्निकाय के जीवों स्थिति कितने काल को प्रतिपादन की है ? (ोयमा ! जहरणेणवि अंतोमुहुतं उद्योग वि अंतीमुहूर,) भो गौतम ! जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति अंतर्मुहूर्त पुच्छा, ! काय , के जीवों की स्थिति कितने काल की होतो है ? (गोधा ! जहरणेणं अंतोमुहुर्त उच्को- निरिण राईदियाई अंतोमुहुर् णाई.) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट अन्तमुहूर्त न्यून तीन रात्रि दिन की होती है (वाउकाइयाणं पुच्छा,) वायु- काय के जीवों की स्थिति कितने काल को होती है ? (सोयना ! जहरणेणं अन्तो मुद्दत्तं उक्को- से तिरिण वाससहस्साई.)हे गौतम ! जघन्य से अन्तर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट तीन हजार वर्ष की होती है, (सृहुमवाञ्काइयाणं अोहियाणं अज्जतगाणं पज्जलगाण्य तिरहवि जहरणेणवि अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणवि अंतोमुहुत्तं,) सूक्ष्म वायुकायिक जीवों के औधिक अपर्याप्त, और पर्याप्त, इन तीनों की ही जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति केवल अन्तर्मुहूर्त की ही प्रतिपादन की या पच्छा.) बादर वायकारिणी [ उत्तरार्धम् ] होतो है ? ( गोयमा ! जहएणेण अंगोमुहुर उचोतेण तिरिण वासहस्साई,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट तीन हजार वर्ष की होती है, अ.पजत्तगवादरवाउकाइयाण पुच्छा,) हे भगवन् ! अपर्याप्त बादर वायुकाय के जीवों की स्थिति कितने काल की प्रतिपादन की गई है ? (गायमा ! जहएणेण वि अंतो- मुहुरा कोसेरणवि अंतीमुहुतं,) हे गौतम ! जघन्य और उत्कृष्ट केवल अन्तर्मुहूर्त की ही स्थिति होती है, (पजत्तमबादरवाउकाइयाणं पुच्छा,) हे भगवन् ! पर्याप्त बादरवायु काय के जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयना ! जहरणेण अंतोमुहुत्तं उकोसेणं तिरिण बाससहस्साई अंतीमु त णाई,) भो गौतम ! जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूत्त की और उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त न्यून तोन हजार वष की होती है, (वणस्सइकाइयाणं पुच्छा,) हे भगवन् ! वनस्पतिकाय के जीवों की स्थिति कितनं काल को होतो है? (गोयमा ! जहरणेणं श्रीमुहुर उकोहणं दस वाससहस्साई,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूत की और उत्कृष्ट दस हजार वष को होतो है, और (सुहुभव । सइकाइया: हियाणं अपजतगाणं पाणय लिए वि जहरणेकवि अन्तानुहुतं उकोणवि अंतोमुहुतं,) सूक्ष्मवनस्पति- काय के औधिक, अपर्याप्त, और पर्याप्त इन तीनों की जघन्य और उत्कृष्ट, स्थिति केवल अतमुहूत्त की हो प्रतिपादन को गई है, तथा-(वादरवर,स्सइकाइयाण जहएणणं अंतीमुहुरो कारण दस वाससह.स.) बादर बनस्पति काय के जीवों की जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त को और उत्कृष्ट दस हजार वर्ष की होती है, (अपज्जत वादरवणसइकाइयाणं पुच्छा,) हे भगवन् ! अपर्याप्त बादर बनस्पति काय के जीवोंको स्थिति कितने काल की होती है ? गोयना ! जहएणणावे अन्तामुहुर उकोसेणवि अान्दोमुहुरा,) भो गोतम! जघन्य से भी अन्तर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट से भी केवल अन्तर्मुहूर्त की ही होती है, (पजत्तगवादर- वणस्सइकाइयाणं पुच्छा.) हे भगवन् ! पर्याप्त बादर बनस्पतिकाय के जीवों की स्थिति कितने काल की प्रतिपादन की है ? (गोयना ! जहएणेणं अतोमुहुरा उकोसेण दम बास सहस्साई अतोमुहुत्त णा',) भो गौतम ! जघन्य से अन्तर्मुहूर्त को और उत्कृष्ट से अन्त मुहूर्त न्यून दस हजार वर्ष तक को स्थिति प्रति पादन को गई है क्योंकि अपर्याप्त काल को पृथक् कर दिया गया है। भावार्थ-पांच स्थावर सूक्ष्म, सभी अपर्याप्त, और औधिक इन सभी की जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति सिर्फ अंतर्मुहर्त की है, लेकिन जो बादर पर्याप्त है उनके अपर्याप्त काल की स्थिति पृथक करके शेष श्रायु निम्न लिखितानुसार जानना चाहिये- ।
[श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] अध विकलेन्द्रियों की स्थिति बेइंदियाणं भंते ! केवइयं काले दिई पन्नते ? गोयमा ! जहरणेणं अंतोमुहत्तं उक्कोसेणं वारस संवच्छराणि, अप- जागबेइंदियाणं पुच्छा, गोयमा ? जहणणेण वि अंतो- मुहुतं उक्कोसेण वि अंतोमुहुत्तं, पजत्तगवेइंदियाणं पुच्छा, जहएणणं अंतोमुहुरा उक्को सेणं बारस संवच्छराणि अंतो- मुटुंतूणाई। तेइ दियाणं पुच्छा, गोयमा! जहणणं अंतो- मुहुत्तं उक्कोसेणं एगुणपण्णासं राईदियाणं, अपज्जत्तग- तेइ दियाणं पुछा, गोयमा ! जहएणेण वि अंतोमुहुत्त उक्कोलेण वि अंतोमुहुत्त, पज्जत्तगतेइंदियाणं पुच्छा, गोयमा ! जहण्णणं अंतोमुहुत्त उक्कोसेणं एगुणपण्णा- सं राईदियाइ अंतोमुहुत्तू णाई। चउरिंदियाणं भंते ! केव- इयं कालं टिई पण्णत्ते ? गोयमा ! जहएणणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं छम्मासा, अपज्जत्तगचउरिंदियाणं पुच्छा, गो- यमा ! जहण्णण वि अंतोमुहुत्तं उक्कोसेण वि अंतो मुहत्त, पज्जत्तगचउरिंदियाणं पुन्छा, गोयमा ! जह एणणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं छम्मासा अंतोमुहुत्तू- गाई। पदार्थ-(इंदियाणं भंते ! केवइयं कालं टिई पन्नचे ?) हे भगवन् ! द्वीन्द्रिय जीवों की स्थिति कितने कालकी प्रति पादन की गई है ? (गोयमा ! जहण गेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं बारस संवच्छराणि,) भो गौतम ! जघन्य से अंतमुहूर्त की और उत्कृष्ट स्थिति बारह वर्ष की होती है, (अपजत्त बेईदियाणं पुच्छा,) हे भगवन् ! अपर्याप्त द्वोन्द्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की की होती है ? (गोयमा ! जहरणेण वि अंतोमुहुत्तं उक्को पेण वि अन्तो मुहुत्तं,) भो गौतम ! जघन्य से भी अन्तमुहूर्त की और उत्कृष्ट भी केवल अन्तर्मुहूर्त ! [ उत्तरार्धम् ] की होतो है, ( पजत्तम वेइंदेवाणं पुच्छा,) हे भगवन् ! पर्याप्त द्वीन्द्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जहरणेण अंतोमुहुत्तं उकोसेण वारस संवच्छर णि अन्तो मुहुनगाई, ) भो गौतम ! जयन्य स्थिति अंतमुहूर्त की और उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त न्यून बारह संवत्सर की होती है । (तेईदियाणं पुच्छा,) हे भगवन् ! त्रीन्द्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की प्रति पादन की गई है ? (जोय गा ! जहरणेणं अन्तो मुहुत्तं उक्कोसेण एगुणपण्णासं राईदिया णं, हे गौतय ! जवन्य स्थि ते अंतर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट ४९ दिवस रात्रि की होती है, ( अपजतातेई.देयाणपुच्छा, ) अपर्याप्त त्रीन्द्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? ( गोषमा ! जहरणेवि अन्तोमुहुतं उकोलेण वि अन्तोमुहुत्तं, ) हे गौतम ! जघन्य से भी अन्तर्महूर्त को और उत्कृष्ट से भी केवल अन्तर्मुहूर्त की ही होती है, (पजताईदिया ह पुच्छा,) पर्याप्त त्रीन्द्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (ोरमा ! जहरो अन्नोनुहुत्तं उको नेण एशुरण- पण्णासं राईदियाई अान्दोमुहत्तुगाई.) भो गौतम! जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त न्यून ४९ दिन रात्रि की होती है । (दिवाण अंते ! केवइयं कालं ठिई पन्नते ?) हे भगवन् ! चतुरिन्द्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की प्रति पादन को गई है ? (गोयमा ! जहरण अन्तो हुतं उको ते गौंछ मासा,) हे गौतम ! जघन्य से अंतर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट षट मास की होतो है, (अपज्जत्तगचरिंदियाण पुच्छा,) हे भगवन् ! अपर्याप्त चतुरिंद्रिय जीवों की स्थिति कितने काल को होती है? (गोयना ! जहरणेणवि अन्तोमुहुत्तं उक्को. सेणवि अन्तीमुहु',) हे गौतम ! जघन्य से मी अन्तर्मुहूत की और उत्कृष्ट से भी केवल अन्तर्मुहूर्त को होती है, ( पज्जत्ता बनिदियाण पुच्छा,) हे भगवन् ! पर्याप्त चतुरिंद्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? ( गोयमा ! जहणणे अन्तोमुहुत्तं उकोसेण (यह मेटर = पेज के ऊपर का है, पाठक ध्यान पूर्वक पढ़ें) पांच स्थावर जघन्य सिथिति उत्कृष्ट स्थिति पृथ्वी काय अंतर्मुहूर्त प्रमाण २२००० बावीसहज़ार वर्ष ७ सात हजार वर्ष तेजस्काय ३ तीन दिन रात्रि वायुकाय हज़ार वर्ष वनस्पतिकाय यह सभी बादर पांच स्थावरों की स्थिति है, किन्तु सूक्ष्म पर्याप्त, अपर्याप्त, और औधिक इन तीनों की जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति सिर्फ अंतर्मुहूर्त ही की होती है। अब इसके आगे विकलेन्द्रियों की स्थिति का वर्णन किया . अप काय ३ तीन १० हज़ार वर्ष जाता है- MAMANA [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] छम्मासा अन्तोमुहुन्तूणाई, ) हे गौतम ! जघन्य से अन्तर्मुहूत की और उत्कृष्ट अन्त- मुहूर्त न्यून पट् मास की होती है, किन्तु न्यून से अधिक और उत्कृष्ट से न्यून सभी मध्यम स्थिति जानना चाहिये। भावार्थ-तीनों विकलेन्द्रय अपर्याप्त जीवों की जघन्य स्थिति केवल अंतर्मुहूर्त प्रमाण ही होती है, तथा पर्याप्त जीवों को जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति निम्न लिखितानुसार देखिये- विकलेन्द्रिय जीव जघन्य स्थिति स्थिति द्वीन्द्रिय अंतर्मुहूर्त प्रमाण द्वादश वर्ष प्रमाण श्रीन्द्रिय ४१ दिन रात्रि चतुरिन्द्रिय उपरोक्त सभी पर्याप्त जीवों की स्थिति वर्णन की गई है । अब तिर्यक् पंचेन्द्रिय जीवों की स्थिति प्रतिपादन करते हैं- पंचन्द्रिय तियञ्चों की स्थिति उत्कृष्ट पद मास - ra 2 २ 7 पंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं भंते ! केवइयं कालं ठिई पन्नते ? गोयमा ! जहणणेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं तिरिण पलिश्रोवमाइं, जलयरपंचिंदियतिरिक्वजोणियाणं भंते ! केवइयं कालं ठिई पं. ? गोयमा ! जहणणेणं अंतोमुहुत्त उक्कोसेणं पुत्वकोडी, समुच्छिमजलयरपंचिंदिय पुच्छा, रोयमा ! जहरणेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं पुवकोडी, अमजत्तयसमुच्छिमजलयरपंचिंदिय जहणणेणवि अंतोमुहुत्तं उस्कोसेणवि अन्तोमुहुत्त, पजत्तयसमुच्छिमजलयरपंचिंदिय पुच्छा, गोयमा ! जह- रणेण अंतामुहुत्तं उक्कोसेणं पुव्वकोडी अंतोमुहुत्तू- णाई, गब्भवक्कंतियजलयरपंचिंदिय पुच्छा, गोयमा ! जहन्नेणं अतोमु हुत्त उक्कोसणं पुवकोडी, अपज्जत्तय- पुच्छा, गोयमा ! !
[ उत्तरार्धम् ] गब्भवक्कंतियजलयरपंचिंदिय पुछा, गोयषा ! जहरणेण वि अन्तोमुहुत्तं उक्कोसेणवि अन्तोमुहुत्तं , पज्जत्तग- गब्भवक्कंतियजलयर पंचि दिय पुच्छा, गोथमा ! जहणणेरणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेण पुवकोडी अन्तोमुहुत्तूणाई, चउप्पयथलयरपंचि दिय पच्छा, गोयमा ! जहहणेण अंतोमुहुत्त उक्कोसेण तिषिण पलिप्रोबमाई, समुच्छिम- चउप्पयथलयरपचि दिय जाव गोयमा ! जहणणेण अतो- मुहुत्त उक्कोसेण चउरासीइ वाससहस्साई', अज- त्तयसमच्छिमचउप्पयथलयरपचिदिय जाव गोयमा ! जहहणेणवि अन्तोमुहुत उक्कोसेणवि अन्तोमुहुतं, पज्जत्तयसमुच्छिमचउप्पयथलयर पचि दिय जाव गोयमा! जहएणेण अंतोमुहुत्तं उक्कोसेण चउरासीई वाससह- स्साई अंतोमु हुत्तूणाई, गावस्कंतियचउप्पयथलयर- पंचि दिय जाव गोयमा ! जहरणेण अंतोमहु उक्को- सेण तिरिण पलिमोवमाई, अपजत्तगगभवतिय चउ. प्पयथलयरपचि दिय जाव गोयना ! जहाणेरणवि अन्तो मुहुत्तं उक्कोसेणवि अंतोमुहुर्स, पजत्तगगब्भवक्क- तियचउप्पयथलयरपंचिदिय जाव गायना: जहाणेण अतोमुहुत्तं उक्कोसेणं तिरिण पलिओवमाई अंतोमुहुत्त - णाई, उरपरिसप्पथलयर पचि दिय पुच्छा, गोयमा ! जह- एणणं अन्तोमुहुर्त उक्कोसेणं पुषकोडी, समुच्छिम- उरपरिसप्पथलयरपंचिंदिय प च्छा, गोयमा! जहएणणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं तेवन्नं वाससहस्साई, अपज्ज त्तयसमुच्छिमउरपरिसप्पथलयस्पाचि दिय जाव गोयमा ९२ [श्रीमद्नुयोगद्वारत्रम् ] जहरणेणवि अन्तोमुहत्तं उक्कोसेणवि अतो हुत्तं, पज्जत्त यसमुच्छिमउरपरिसप्पथलयरपचिंदिय जाव गो- यमा ! जहणणेणं अतोमुहुत्त उक्कोसेण तेवन्नं वास- सहस्लाइ' अन्तोमुहुजूणाई, गम्भवक्कंतियउरपरिसप्पथल- यरप चिंदिय जाय गोयमा ! जहरणे अन्तोमु हत्त उक्को- सेणं पुनकोडी, अपजत्तगगम्भवक्कंतियउरपरितप्पथल्लयर- पांचिंदिय जाव गोयमा ! जहण्ण णवि अन्तोमुहुत्तं उक्को- सेणवि अन्तोमुहुत्तं, पज्जत्तगगब्भवक्कंतियउरपरिसप्प- थलयरप चिंदिय जाब गोयमा ! जहण्णण अतोमुहुत्तं उक्कोसेणं पुब्बकोडी अंतोमुहुत्तूणाई, भुयपरिसप्प थलयरपचिंदिय जाव गोयमा! जहरण ण अंतोमुडतं उक्कोसेण पुवकोडी, सैमुच्छिमभुयपरिसप्पथलयर- पचिंदिय जाव गोयमा ! जहण्णण अन्तोमुहुत उक्कोसण बायालीस वाससहस्साई, अपज्जत्तगसमुच्छिमभुय- परिसप्पयलयरपचिंदिय जाव जाव गोयमा ! जहरण खवि अ'तोमुहुर्त उक्कोसेणवि अतोमुहुत्तं , पत्तगसंमु- च्छिमभुयपरिसप्पथलयरपंचिंदिय गोयमा ! जहएणण' अतोमुहुत्तं उक्कोसेण बायालोसं वास सह- स्साई अंतो मुहुत्तूणाई, गब्भवक्कंतियभुयपरिसप्प- थलयरपचिंदिय जाव गोयमा ! जहण्णण अंतोमुहुत्त उक्कोसेण पब्बकोडी, अपज्जत्तगगब्भवक्कंतियभुय- परिसप्पथलयरपंचि दिय जाव पुच्छा गोयमा ! जह- एणणवि अतोमुहुत्तं उक्कोसेणवि अंतोमुहुत्तं, पज्जत्तग- गब्भवक्कंतियभुयपरिसप्पथलयरपचि दिय जाव गोयमा! , जाव [ उत्तराधम् ] जहणण ण अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं पुत्वकोडी अंतो- मुहुत्तूणाई। पदार्थ-पंचिंदियतिरिक्खजोणिया भंते ! केवइयं कालं ठिई पं. ?) हे भगवन् ! पंचेंद्रिय तिर्यक् योनि के जीवों की स्थिति कितने काल की प्रतिपादन की गई है ? (गोयमा ! जहरणेणं अंतोनुहुक्तं उक्कोसेणं तिरिणपलिनोवमाई,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अंतमु हूर्त की और उत्कृष्ट तोन पल्योपम की होती है , (जन्लयरपंचिं दयतिरिक्ख जोणियाणं भंते ! केवइयं कालं ठिई परण ?) हे भगवन् ! पंचेंद्रिय जलचर तिर्यक् योनि के जीवों की स्थिति कितने काल की होतो है ? (गोय ! ! जहणणं अंनोमुहुर एक्कोसेग पुवकोडी,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट पूर्व क्रोडवर्ष की होती है, (समुच्छिम जलयरपंचिंदिय तेरिक्ख जोणियाणं पुन्छा,) हे भगवन् ! + समूच्छिम जलचर पंचद्रिय तिर्यक् योनिकों को स्थिति कितने काल की होती है ? (गायका ! जहरणेणं अतोमुहुत्तं उक्कोतेणं पुचकोडी,) हे गौतम ! जयन्य स्थिति अंतर्मुहूत की और उत्कृष्ट पूर्व क्रोडवर्ष की हाती है, (अपजत्यसंमुच्छिन्नल यस्पाँचदिय पुच्छा,) हे भगवन् ! अपर्याप्त समूच्छिम जलचर पंचेंद्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? ( गोयमा ! जहरणेणवि अंतोमुहुँत्तं उकोसेणवि अंतोमुटुतं, ) हे गौतम ! जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति केवल अंतर्मुहूर्त की ही होती है, (पजलयसमुच्छिमजलयरपंचिंदिय पुन्या,) हे भगवन् ! र्याप्त समूच्छिम जलचर पंचेंद्रिय जोवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (सोयमा ! जहरणेणं अंतीमुहुरा उरोले पुचकोडी अलीमुहुरा णाई, हे गौतम ! जघन्य स्थिति अंतहहूर्त की और उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त न्यून पूर्व क्रोडवर्ष की होती है, क्योंकि अपर्याप्त काल पृथक् कर दिया गया है। (गम्भववरियज जयरपंचिं.देय पुच्छा,) भगवन् ! गम से उत्पन्न होने वाले जलचर पंचेंद्रिय योनिकों की स्थिति कितने काल की होती है ? गोयमा! जहणणे अंतोमुहुउकोसेणं पुषकोडी,) हे गौतम! जघन्य से अंत- मुहूर्त की और उत्कृष्ट पूर्व क्रोडवर्ष की होती है, (अपज्जत्यगम्भवक तिय जलचापांचेंदिय पुच्छा,) हे भगवन् ! अपर्याप्त गर्भ से पैदा होने वाले पंचद्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? ( गोयमा ! जहएणेणवि अतोमुहु उछोसेणवि अंतोमुत्रां, ) हे गौतम ! जघन्य भी अंतर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट से भी केवल अंतर्मुहूर्त की होती है । पजत्तगगम्भवतियजलयरपंचिंदिय पुच्छा,) हे भगवन् ! पर्याप्त गर्भ से उत्पन्न होने वाले जलचर पंचेंद्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होतो है ? (गोयना ! जहरणेणं अतो- मुहुर्र उक्कोसेणं पुवकोडी अतोमु हुत्त णाई,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त * पानी के अन्दर चलने वाले। वात पित्तादि या विना गर्भ से उत्पन्न होने वाले । ? ।
! ९४ [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] की उत्कृष्ट और अन्तर्मुहूर्त न्यून पूर्व क्रोडवर्ष की होती है। अब चतुष्पदके विषय में वर्णन करते हैं- चउप्पयथलयरपंचिंदिय पुच्छा, हे भगवन् ! चार पैर वाले स्थलचर पंचेंद्रिय जीवों को स्थिति कितने काल को होती है? (गोयमा ! जहरणेणं अतोमुहुरा उच्कोसेणं तिरिण पलिग्रोधमाई) हे गौतम! *जघन्य से अंतर्मुहूर्त को कौर उत्कृष्ट तीन पल्योपम को होती है। (संगुच्छिमचउपयथलयरपंचिंदियजावर) हे भगवन् ! समूछिम चतुष्पद वाले स्थलचर पंचेंद्रिय जीवों को स्थिति कितने काल की होती है ? ( गायमा ! जहरणेणं अतो गुहु उनोसेणं चउरासीई वाससहस्साई,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त को और उत्कृष्ट ८४ चौरासो हजार व की होती है, (अपज्जत गसमुच्छिमचउप्प यथलयरपंचिंदिय जाव) हे भगवन् ! अपर्याप्त समू. च्छिम चतुष्पद वाले स्थलचर पंचेंद्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जहरणेण वि अंतोमुहुरां, उक्कोसेणंवि अतोमुहुर,) हे गौतम ! जघन्य से भी अंतमुहूर्त की और उत्कृष्ट से भी केवल अंतर्मुहूर्त की होती है, (पज्जतगमुच्छिम चउप्पय- थलयरपंचिंदिय जाव) हे भगवन् ! पर्याप्त समूच्छिम चतुष्पद वाले स्थलच. पंचेंद्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जहरणेणं अतोमुहुरा उक्कोलेणं चउर- सीई वास सहस्साई अतोमुहत् णाई,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अंतर्मुहूत की और उत्कृष्ट अंतमुहूर्त न्यून ८४ चौरासो हजार वर्ष को होती है । अब गर्भ विषय में कहते हैं- ANORama (गन्नवालियचउप्पथलयरपंचेंदिय जाव) हे भगवन् ! गर्भ से उत्पन्न होने वाले चतुष्पद स्थलचर पंचेंद्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होतो है ? (गोयमा ! जहरणेणं अतोमुटुत्ते उक्कोसेण तिरिण पलि ग्रोव भाई,) हं गौतम ! जवन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट तीन पल्योपम की होती है। (अपजत- गगब्भवक्कंतियचउम्पयथलयरपंचिंदिय जाब,) हे भगवन् ! अपर्याप्त गर्भ से उत्पन्न होने वाले चतुष्पद स्थलपर पंचेंद्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होती है? (गोयमा ! जहरणेणवि अतोमुहुरं उक्कोसेणवि अतोमुहुतं, ) हे गौतम ! जघन्य से भी अंतर्मुहूत की और उत्कृष्ट से भी केवल अंतमुहूत की होती है, (पज्ज गगब्भवक्क- तियथलयरपंचिंदिय जाव.) हे भगवन् ! पर्याप्त गर्भ से उत्पन्न होने वाले चतुष्पद स्थल. * यह देवकुरु उत्तरकुर्वादि अकर्मभूमि के क्षेत्रों की अपेक्षा से है। - 'जाव' शब्द 'यावत्' शब्द का वाची है जो कि सभी प्रश्नों का बोधक है।
उत्कृष्ट अंतर्मुहूत्त [ उत्तरार्धम् ] ९५ चर पंचेंद्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जहहणण अतो- मुहुरा उक्कोसेण तिरिण पलिनोवमाई तोहुत्तूणाई,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अंत- मुहूर्त की और न्यून तीन पल्योपम को होती है, (उर परिसप्पथलयर- पंचिंदिय पुच्छा,) हे भगवन्! * उरपरिसर्प स्थलचर पंचेंद्रिय जीवों की स्थिति मितने काल को होती ? (गोयमा ! जहरणे ण अतोमुहुरा उक् कोसेण पुव्वकोडी,) हे गौतम ! जघन्य से अंतर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट पूर्व क्रोडवर्ष की होतो है । (संमुच्छनउरपरिसप्पथलयर पंचिंदिय पुच्छा,) हे भगवन् ! समूच्छिम उरपरिसर्प स्थल० पंचेंद्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जहरणेण अतोमुहुरा उक्कोसेण तेवन्नवाससहस्साई,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट ५३ हजार वर्ष की होती है ? (अपजत्तयसमुच्छिमउरपरिसप्पथलयरपंचिंदिय जाव,) हे भगवन् ! अपर्याप्त समूछिम उरपरिसर्प स्थलचर पंचेंद्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जहरण णवि अतोमुहुरा उक्कोसेणवि अतोमु) हे गौतम ! जघन्य से भी अतमुहूर्त की और उत्कृष्ट से भी अंतमुहूर्त की ही होती है, (पचयसमुच्छिमउरपरिसप्पथलयर- पंचिंदिय जाब) हे भगवन् ! पर्याप्त समच्छिम उरपरिसर्प स्थलचर पंचेंद्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की प्रतिपादन की गई है ? (गोयमा ! जहरण ण अतोमुहुर्त उक्को- सेण तेवन्नं वाससहस्साई अतोमुहुन्णाइ,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति तमुहूर्त की और उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त न्यून ५३ हजार वर्ष की होती है, गम्भवक्कतियउरपरिसप्प- थलयरपंचिंदिय जाव) हे भगवन् ! गर्भ से उत्पन्न होने वाले उरपरिसर्प स्थलचर पंचेंद्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जहरण ण अतोमुहुरा उक्कोसेण पुनकोडी, ) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अंतर्मुहूं को और उत्कृष्ट क्रोड पूर्व वर्ष की होती है, (अपज चयगम्भवक्कंतियउरपरिसप्पथलयरपंचिंदिय जाब) हे भगवन् ! अपर्याप्त गर्भ से उत्पन्न होने वाले उरपरिसप स्थलचर पंचेंद्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जहरणेणवि अंतोमुहुत्तं उक्कोलेणवि अंतोमुहुत्तं, हे गौतम! जघन्य स्थिति भो अन्तर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट भी सिर्फ अन्तर्मुहूर्त को होती है,(पज्जत्तयगम्भवक्वंतिय- उरपरिसप्पथलयरपंचिंदिय जाव) हे भगवन् ! अपर्याप्त गर्भ से उत्पन्न होने वाले उरपरि सर्प स्थलचर पंचेन्द्रिय जीवोंकी स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जहएणे णं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं 'पुचकोडी अंतोमुहुत्तूपणाई) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त की और उस्कृष्ट अंतर्मुहूर्त न्यून क्रोड पूर्व वर्ष की होती है, (भुयपरिसप्यथलयरपंचेंदिय जाव पुच्छा) हे भगवन् ! मुज परिसर्प स्थलचर पंचेन्द्रिय जीवों की स्थिति कितने काल * पेट से चलने वाले।
[ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् की प्रतिपादन की है ( गोयमा ! जहएणेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं पुचकोडी,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त को और उत्कृष्ट क्रोड पूर्व वर्ष की होती है, (समुच्छिमभुयप- रिसप्पथलयरपंचिंदिय जाव ) हे भगवन् ! सम्मच्छिम भुजपरिस' स्थलचर पंचे- न्द्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होतो है ? (ोयना ! जहरणेणं अंतो मुहुः उक्को- सेणं वायालीसं वास उहस्लाई,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट ४२ हजार वर्ष की होती है, (अपज तयसंमुच्छि प्रभुषपरिसप्पथ जयरपंचिदिय जात्र,) हे भगवन् ! अपर्याप्त संमूछिम भुजपरिसर्प स्थलचर पंचेन्द्रिय जीवों की स्थिति कितने काल को होती है ? (यमा ! जहरणेण वि अंतोमुहुत्तं उक्कोलेण वि अंगोमुहुत्तं) हे गौतम ! जघन्य स्थिति भी अंतर्मुहूर्त को और उत्कृष्ट भी अंतर्मुहूर्त को होती है, ( पज्जत्तासमुच्छि प्रभुयपरिसप्पय जय पंचिंदिय जाप ) हे भगवन् ! पर्याप्त समूच्छिम भुजपरि सर्प स्थलचर पचेन्द्रिय जीवों की स्थिति कितने काल को होती है ? (गोपमा ! जहरणेणं अंतोमुहुत्तं उको सेशं वाचालीसं बाससह साई अंतोमुहुत्तू एण ई) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त को और उत्कृष्ट अतर्मुहून न्यून ४२ हजार वर्ष की होतो है, (गम्भवक्कतिय भुअ परिसप्पथ तयरमांचे दे। जात्र) हे भगवन् ! गर्भ से उत्पन्न होने वाले भुजपरिसर्प स्थलचर पंचेन्द्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होतो है ? (गोयमा ! जहरणेग्गं अंतोमुहुर्त उकोलेणं पुषकोडी) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट पूर्व क्रोड वर्ष को होती है, (अपजत्तयगब्भवक्कं तेयभुयपरिसप्पथलयरपंचिंदिय जाव) हे भगवन् ! अपर्याप्त गर्भ से उत्पन्न होने वाले भुजपरिसप स्थलचर पंचेन्द्रिय जोवों की स्थिति कितने काल को होती है ? (गोया ! जहरणे गवि अंतोमुहुत्तं उक्कोसेण वि अंतोमुहुरा,) हे गौतम ! जघन्य से भी अन्तमुहूर्त की और उत्कृष्ट से भी केवल अंतर्मुहूत की होतो है, (पजत्तयगल भवक्कंतियभुयपरिसप्पथलयरपंचेंदिय जात्र) हे भगवन पर्याप्त गर्भ से उत्पन्न होने वाले भुजपरिसर्प स्थलचर पंचेन्द्रिय जीवों की स्थिति कितने काल को होती है ? (गोया ! जहणणेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं पुब्धकोडी अंत्तो मुहुन्न रण) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त की, उत्कृष्ट अंतर्मुहूँत्त न्यून क्रोड पूर्व वर्ष की होती है, किन्तु सत्तर लाख क्रोड वर्ष तथा छप्पन हजार क्रोड वर्षों के एकत्र करने से एक पूर्व होता है, इस गणना से पूर्व क्रोड वर्ष की उत्कृष्ट स्थिति होती है। भावार्थ-पंचेन्द्रिय तिर्यक् योनि के जीवों की जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट तीन पल्योपम की होती है, इसी को औधिक सूत्र कहते हैं। किन्तु सभी प्रकार के अपर्याप्त पंचेन्द्रिय जीवों की जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति केवल अंतर्मुहूर्त की ही होती है । अब जलचर जीवों की स्थिति निम्नलिखितानु- सार जानना चाहिये- MADHAN SHINDIMES जघन्य [ उत्तरार्धम् ] ९७ समूच्छिम जलचर जघन्य स्थिति उत्कृष्ट स्थिति समूछिम जलचर पंचेन्द्रिय अंतर्मुहूर्त *पूर्व क्रोड वर्ष गर्भज जलचर पंचेन्द्रिय स्थलचर जीवों की जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति निम्न प्रकार से है- चतुष्पद वाले स्थलचरों की चार पैर वाले पशुओं की अंतर्मुहूर्त तीन पल्योपम समूच्छिम चतुष्पद बालों की अंतर्मुहूर्त ८४ सहस्रवर्षोंकी गर्भज चतुष्पद वालों की अंतर्मुहूर्त तीन पल्योपम उरपरिसपा की समुच्चय अंतर्मुहत पूर्व क्रोड वर्ष समूच्छिम उरपरिसों की अंतनु हर ५३ सहस्रवर्ष गर्भज उरपरिसर्प पूर्व क्रोड वर्ष भुजपरिसर्प अंतर्मुहूर्त पूर्व क्रोड वर्ष समूचिम भुजारिस अंतर्मुहत ४२ सहस्र वर्ष अंतर्मुहूर्त पूर्व क्रोड वर्ष . . अतर्नुह गर्भज ये सभी जघन्य और उत्कृष्ट स्थितिएँ है, किन्तु विशेष इतना ही है कि सभी तरह के अपर्याप्तों की स्थिति अंतर्मुहर्त ही की होती है, तथा जघन्य काल से अधिक और उत्कृष्ट काल से न्यून ये सभी मध्यम स्थिति कहलाती है। अब इसके अनंतर खेचरों की स्थिति का वर्णन करते हैं। खेचरों की स्थिति खहयरपंचिंदिय जाव, गोयमा ! जहरणेणं अंतो- मुहुत्तं उक्कोसेगा पलिअोवमस्स असंखेजइभागो, संमु- च्छिमखहयरपंचिंदिय जाव गोयमा ! जहणणेणं अंतो- मुहुत्त उक्कोसेणं बावत्तरि वाससहस्साई, अपज्जत्तग- संमुच्छिमखहयरपंचिंदिय पुच्छा, गोयमा ! जहरणेण- वि अंतोमुहृतं उक्कोसेणवि अंतोमुहुत्त, पजत्तयसंमु- *- उत्कृष्ट स्थिति में अंतर्मुहूर्त प्रमाण अपर्याप्त काल न्यून कर देना चाहिये ।
च्छिमखहयरपंचिंदिय जाव गोयमा ! जहणणेणं अंतो- मुहत्तं उक्कोसेणं बावत्तरि वाससहस्साई अंतोमुहुत्तूणाई, गम्भवक्कंतियखयरपंचिंदिय जाव गोयमा ! जहएणणं अंतोमुहत्तं उक्कोसेणं पलिमोवमस्स असंखेज्जहभागो, अपज्जत्तयगब्भवतियखयरपंचिंदिर जाव गोयमा ! जहणणेणवि अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणवि अंतोमुहुत्तं, पज्जत्तग- गब्भवक्कंतियखहयरपंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं भंते ! केवइयं कालं ठिई पण्णता ? गोयमा । जहणणेणं अंतो- मुहुत्तं उक्कोसेणं पलिअोवमस्स असंखेज्जइभागो अंतो- मुहुत्तूणो। एत्थ एएसि णं संगहणिगाहामो भवन्ति, तंजहा- संमुच्छिमपुवकोडी चउरासीइं भवे सहस्साई। तेवण्णा बायाला बावत्तरिमेव पक्खीणं ॥ १ ॥ गम्भंमि पुव्वकोडी तिगिण य पलिश्रोबमाई परमाऊ । उरगभुपुत्रकोडी पलिओवमा संखभागो अ॥२॥ पदार्थ-(वयरपीचंदिय जात्र) हे भगवन् ! आकाश में उड़ने वाले पंचेन्द्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जहएणणं अंतीमुहुत्तं उकोसेणं पलिप्रो- वमस्स असखे जइ भागो, हे गौतम ! जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट पल्योपम के असंख्यात भाग प्रमाण होतो है, (समुच्छि मखहयरपंचेदिय जाब) हे भगवन् ! समू- च्छिम खेचर पंचेन्द्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जहरणेणं अंसोमुहुत्तं उकोसेणं वावतर वाससहस्साई,) हे गौतम ! जयन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट ७२ हजार वर्ष की होती है. (अपज्जतासमुच्छिमखहयरपंचिंदिय पुच्छा,) हे भगवन् ! अपर्याप्त समूच्छिम खेचर पंचेन्द्रिय जीवों को स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयना ! जहरणेणवि अंतोमुहुत्तं उक्कोंमेणवि अंतोमुहुत्तं,) हे गौतम ! जघन्य से भी अन्तर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट से भी केवल अतमुहूर्त ही की होती है, (पञ्जत्तगa समुच्छिमसहयरपंचिंदिय जाब) हे भगवन् ! पर्याप्त समूच्छिम खेचर पंचेन्द्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जहणणेणं अंतोमुहुत्तं उनोसेणं बावत्तरि वाससहस्साई अन्तोमुत्तूणाई,) हे भगवन् ! जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त न्यून ७२ हजार वर्ष की होती है, (*गम्भवक्कांतियखहयरपंचिदिय जाब) है भगवन् ! गर्भ से उत्पन्न होने वाले खेचर पंचेन्द्रिय जीवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जहरणेणं अंतोमुहुत उकासेणं पलिओनसम्स असंखे नइभागो) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट पल्योपम के असंख्यात भाग प्रमाण होतो है, (अपजत्तगगम्भवतियखहयरपंचिंदिय जाव) हे भगवन् ! अपर्याप्त गर्भ से उत्पन्न होने वाले खेचर पंचेन्द्रिय जीवों की स्थिति कितने काल को होती है ? (गोयमा ! जहरणेणवि अंतोमुहुरो उकोसेरणवि अंतोमुहुत्तं,) हे गौतम ! जघन्य से भी अन्तमुहूर्त की और उत्कृष्ट भी केवल अन्तर्मुहर्त की हो होती है. (पज्जत्तगगम्भवक्कंतिय- खहयरपंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं भंते ! केवइयं कानां ठिई परात्ता ?) हे भगवन् ! पर्याप्त गर्भ से उत्पन्न होने वाले खेचर पंचेन्द्रिय जीवोंकी स्थिति कितने काल की प्रतिपादन की गई ? ( गोयमा ! जहरणेणं अंतोमुहुरो उकोलेणं पलिओवनास असंखेन इभानो अंतीमुहुतणी,) हे गौतम ! जघन्य से अंतमुहूर्त की और उत्कृष्ः अंत मुहूर्त न्यून एक पल्योपम के असँख्यात भाग प्रमाण होती है। (ए२५ र एसि र संहिणि19ो भवन्ति, जा-) इस समास के अंतर्गत इन सर्व अधिकारों की संग्रहणी गाथाएं भी होती हैं, अर्थात् सव अधिकारी को संक्षेप से वर्णन करने वाली गाथाओं को सँग्रणी गाथा कहते हैं। संच्छिमायकोडी साई भव सह साई । तेवरा वायाला बावत्तभित्र परी॥१॥ जल वर समूछिम जीवों की उत्कृष्ट स्थिति पूर्व क्रोड वर्ष की, स्थलचर चतु पद समूच्छिमों की ८४ हजार वर्ष की, तथा समूच्छिम उरपरिसप अर्थात् रंग कर चलने वालों को ५३ हजार वर्ष की और समूच्छिम भुजपरिसपों की ३२ हजार वर्ष की, इसी तरह समूच्छिम पक्षियों की ७२ हजार वर्ष की स्थिति होती है। इस संग्रहणी गाथा में समूच्छिमों की स्थिति वर्णन को गई है, अब दूसरी गाथा में गर्भ से उत्पन्न होने वाल जोवों की स्थिति वर्णन करते हैं। गनमि पुब्बकोटी निरिणय पलिनीकमाई परमाऊ । उरगभुगपुवकोडी पलिग्रोवमासंखभागोन ॥२॥ गर्भ से उत्पन्न होने वाले जलचर पंचेन्द्रिय जीवों की उत्कृष्ट स्थिति पूर्व क्रोड वर्ष की स्थलचर चतुष्पद वालले गर्भज तिर्यचों को उत्कृष्ट तीन पल्योपम की, * ये सभी छप्पन अन्तर्वीपों की अपेक्षा से है।
LA५उपाएन। हूत की ही प्रति पादन को गई उरपरि सर्प और भुजपरिसपों को उत्कृष्ट क्रोड २ पूर्व वर्ष की और पक्षियों को एक पल्योपम के असंख्यात भाग प्रमाण होती है ॥२॥ इन को संग्रहणी गाथा कहते हैं, अथात् संग्रह करके सर्व आयु वर्णन की गई है। भावार्थ:-अाकाश में उड़ने वाले पक्षियों की जघन्य अायु अंतर्मुहर्त की होती है लेकिन अंतर्वीपों की अपेक्षा से उत्कृष्ट अायु एक पल्योपम के असंख्या- तभाग प्रमाण होती है, तथा सर्व प्रकार के अपर्याप्कों की आयु केवल अंतर्मु: निम्न प्रकार से जानना चाहिये- संमूछिम पक्षियों की जघन्यस्थिति उत्कृष्ट स्थिति अन्तर्मुहूत बहत्तर हज़ार वर्ष गर्भज पक्षियों की अन्तर्मुहूर्त पल्यपमो का असंख्यात. इनकी उत्कृष्ट आयु ग्रहण करते वख्त अपर्याप्त काल को पृथक् कर देना. चाहिये । तथा उक्त संग्रहणी गाथाओं का सार संक्षेप से यह है कि समूच्छिम जलचरों की उत्कृष्ट प्रायु पूर्व क्रोड वर्ष, स्थलचर चार पैर वाले पशुओं की चौरासी हज़ार वर्ष, उरसरिसों की तिरपन हज़ार वर्ष को, भुजपरि- सर्प की बयालीस हज़ार वर्ष और पक्षियों की बहत्तर हजार वर्षकी होती है । १॥ तथा गर्भ से उत्पन्न होने वाले जलचरों की पूर्व क्रोड वर्ष, स्थलचरों की तीन पल्योपम, उरपरिसर और मुजपरिसरों की पूर्व क्रोड वर्ष और पक्षियों की पल्योपम का असंख्यातयाँ भाग प्रमाण उत्कृष्ट आयु होती है ॥२॥ इन्हीं को संग्रणी गाथाए कहते हैं । अपितु जघन्य से अधिक, उत्कृष्ट से न्यून अायु को मध्यम आयु जानना चाहिये। इसके अनंतर मनुष्य और व्यंतरों की स्थिति प्रति- पादन करते हैं- , मनुष्य और व्यंतरों की स्थिति। मणुस्साणं भंते ! केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता ? गो. यमा । जहणणेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं तिषिण पलिओ- वमाई, संमुच्छिममणुस्साणं जाव गोयमा ! जहणणेणवि अंतोमुहुँत्तं उक्कोसेणवि अंतोमुहुत्तं, गम्भवक्कंतिय- ! [उत्तरार्धम् । मणुस्साणं जाव गोयमा ! जहएणणं अंतोमुहुरो उक्को- सेणं तिगिण तिगिण पलिओवमाई, अपजत्तगगब्भक्कंतिय- मणुस्साणं ! भंते केवइयं कालं ठिई पगणता ? गोयमा ! जहणणेणवि अंतोमुहुत्तं उकोसेणवि अतोमुहुत्तं, पज- त्तगगब्भवक्कंतियमणुस्साणं भंते ! केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता ? गोयमा ! जहणणेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं तिशिण पलिओवमाइं अंतोमुहुत्तूणाई । वाणमंतराणं देवाणं केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता ? गोयमा ! जहण्णणं दस वाससहस्साई उक्कोसेणं पलि- ओवन, वाणमंतरीणं देवीणं भंते ! केवइयं कालं ठिई पण्णता ? गोयमा ! जहणणेणं दस वाससहस्साई उक्को- सेणं अद्धपलिअोवमं । पदार्थ-(मुणु-साणं भंते ! केवइयं कालं ठिई परणत्ता ? ) हे भगवन् ! मनुष्यों की स्थिति कितने कालको प्रति पादनको गई है ? (गोयमा ! जहएगणं अतोमुहुरा उकोसेणं तिरिण पलिनोवमाई,) हे गौतम ! जयन्य स्थिति अंतमुहूर्त की और उत्कृष्ट तीन *पल्योपम की होती है, इसी को औधिक सूत्र कहते हैं । (संनुन्छिन मणुस्साणं जाव) हे भगवन् ! समूच्छिम मनुष्यों की स्थिति कितने काल की प्रति पादन की गई है ? (गोयमा ! जह- एणेणवि अतोघुहुरा उक्कोसेणवि अतोमुहुत्तं,) हे गौतम ! जघन्य से भी अन्तर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट से भी केवल अन्तर्मुहूर्त ही की होती है, (गम्भवक्कंतियमणुस्साणं जाव) हे भगवन् ! गर्भ से उत्पन्न होने वाले मनुष्यों की स्थिति कितने काल की वर्णन की गई है ? (गोयमा ! जहरणेणं अन्तोमुहुनं उकोसेणं .तरिण पलिअोवमाई,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट तीन पल्योपम की होतो, है (अपज रागगब्भवक्कंतिय मणुस्साणं भंते ! केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता ?) हे भगवन् ! अपर्याप्त गर्भ से उत्नेन्न होने वाले मनुष्यों की स्थिति कितने कालकी प्रनि पादन की गई है ? (गोयमा ! जहएणेणवि- अंतीमुहुर्श उक्कोसेणवि अतोमुकुर,) हे गौतम!जघन्य स्थिति भो अन्तर्मुहूर्त की औरउत्कृष्ट भो केवल अंतर्मुहूर्त ही की होती है, (ज्जत्तगगब्भवक्कंतियमणुस्साणं भंते ! केवइयं कालं ठिई * यह स्थिति अकर्मक भूमि के मनुष्यों की अपेक्षा से है।
१०२ [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] पर पता ?) ह भगवन् पर्याप्त गर्भ से उत्पन्न होने वाले मनुष्यों को स्थिति कितने काल की प्रतिपादन की गई है ? (गोयमा ! जहरणे गं अंतोमुहुने उकोसेणं तिरिण पलिनो वपाई अतो मुहुतू गाई,) हे गौतम ! जवन्य स्थिति अंतर्मुहूत की और उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त न्यून तोन पल्योपम की होती है । अब व्यंतर देवों की स्थिति कहते हैं- (वाण नंत राणं देवाणं केवइयं कालं ठिई परणता ?) हे भगवन् ! वान व्यंतर देवों की स्थिति कितने काल को प्रतिपादन की गई है ? (गोयता ! जहरणेणं दस वाससहस्ताई उक्कोसेणं पलियोधन) हे गौतम ! जघन्य स्थिति दश हजार वर्ष की और उत्कृष्ट एक पल्योपम की होती है, (वाणरोतणं देवीणं भंते ! केवइयं कालं ठिई पएणत्ता ?) हे भगवन् ! व्यंतरिकों के देवियों को स्थिति कितने कालकी प्रतिपादन की गई है ? (गोपमा ! जहरणेणं दस वाससहस्साई उकोसेगां अपिलिनोवम,) हे गौतम ! *जघन्य स्थिति दश सहस्र वर्ष की और उत्कृष्ट अर्द्ध पल्योपम को होती है। भावार्थ-मनुष्यों की जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट तीन पल्योपम की होती है। इसी को औधिक सूत्र कहते हैं, तथा सभी प्रकार के अपर्याप्तों की स्थिति केवल अतहत ही की होती है, शेष निम्न लिखितानु- सार जान लीजिये- जघन्य स्थिति उत्कृष्ट स्थिति समूच्छिम मनुष्यों की अंतर्जुहूर्त अतर्नुहूर्त गर्भज मनुष्यों की अतईहूर्त तीन पल्योपस इसके अतिरिक्त मध्यम स्थिति जाननी चाहिये तथा व्यंतरों की जघन्य- स्थिति दश हजार वर्ष की और उत्कृष्ट एक पल्योपम की होती है, और व्यंतरा- दिक देवियों की जघन्य स्थिति तो पूर्ववत् ही है, परन्तु उत्कृष्ट अर्द्ध पल्योपम की होती है, किन्तु जघन्य से अधिक और उत्कृष्ट से न्यून सर्व मध्यम स्थिति जाननी चाहिये । अब ज्योतिषी देवों की स्थिति प्रतिपादन की जाती है- ज्योतिक देवों की स्थिति। जोइसिआणं भंते ! देवाणं केवइयं कालं ठिई पराणता? *सूत्र के साथवार्थ व्यन्तरों के अपर्याप्तादि अवस्था का काल ग्रहण नहीं किया गया, क्योंकि इस में ये काज ही नह करते, इस लिये उनके प्रश्नोत्तर नहीं किये गये। तो भी अपर्याप्त काल शंतमुहरी प्रभाग ही जानना चाहिये । GODAWARA मध्य daan । [उत्तरार्धम् ] गोयमा ! जहरणेणं सातिरेगं अट्ठभागपलिश्रोवमं उक्को- सेणं पलिओवमं वाससयसह-समन्भहियं, जोइसिय देवीणं भंते ! केवइयं कालं ठिई पण्णता ? गोयमा ! जह- गोणं अट्ठभागपलिनोवम उक्कोसेणं अद्धपलिनोवम परणासाए वारूसहसहि अमहिय, चंद विमाणाणं भंते! देवाणं केवइयं कालं ठिई पण्णता ? गोयमा ! जहरणेग चउभौगपलिनोवम उकोसेशं पलिभोवन वाससयहस्समब्भ- हियं चंदविमाणाणं भंते ! देवीणं केवइयं काल ठिई पगणता ? गोयमा ! जहाणेरणं चउभागपलिश्रोवम उक्कोसे श्रद्धालभोक्म परणासाए वोसलहस्सेहिं अभ- हियं, सूरविमाणाणं भंते ! देवाणं केवइयं काल टिई एण्णत्ता ? गोयमा जगणं चउभागपलिनोवम उक्कोसणं पलिश्रोवमं वाससहस्समभहिय, सूरविमाणाणं भंते ! देवीणं केवइयं कालं ठिई पराणता ? गोयमा ! जहराणोणं चउभागपलिओवम उक्कोमेणं अद्धपलिमोवम पंचहि वास- सएहिं अब्भहिय, गहबिमाणाणं भंते ! देवाण केवइयं कालं ठिई पत्ता ? गोयमा ! जहणोण चउभागपलिनोवम' उक्कोसणं पलिओवमं, गहविमारणा भंते देवीणं केवइयं कालं ठिई पण्णता? गोयमा जहरणेणं चउभाग पलिओबम उक्कोसेणं अद्धपलिओवभ, णक्खत्तविमाणाग भंते ! देवाणं केवइयं कालं ठिई पण्णते ? गोयमा ! जहणणेगां चउभागपलिओवम उक्कोसणं अद्धपलिनोवम, णक्ख- तविमाणाणं भते। देवीणं केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता ! गो. यमा! जहणणेण चउभागपलिओवमं उक्कोसेणं साइरेगं , ।
१०४ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] चउभागपलिअोवमं, ताराविमाणाणं भंते ! देवाणं केव- इयं कालं ठिई पराणत्ता ? गोथमा । जहण्णण साइरेगं अटुभागपलिओवर्म उक्कोसेण चउभागपलिप्रोवर्म ताराविमाणाणं भंते ! देवीणं केवइयं काल ठिई पण्णता ? गोयमा ! जहणणेण अट्रभाग पलिमोवर्म उक्कोसेणं साइ- रेगं अट्ठभागपलिअोवमं । पदार्थ-(जोइसियाणं भंते ! देवाणं केवइयं कालं ठिई पएणत्ता ?) हे भगवन् ! ज्योतिषी देवोंकी स्थिति कितने काल की प्रतिपादन कीगई है? (गोयमा! जहरणेणं सातिरंगं अट्ठभागपलि- श्रोवस) हेगौतम ! जघन्य स्थिति पल्योपम के आठवें भाग से कुछ अधिक और (उकोसेणं पलिग्रोवमं वाससयसहरसमभहियं,) उत्कृष्ट से एक पल्योपम और एक लाख वर्ष अधिक होती है (जोइसिय देवोणं भते! केवइयं कालं ठिई पएणत्ते ?) हे भवगन् ! ज्योतिषी देवियों को स्थिति कितने काल की प्रदिपादन की गई है ? (गोयना ! जहरणेणं अट्ठभागपलिओवम उकोसेणं श्रद्धापलिग्रोवनं परणासाए वाससहस्समभलियं,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति.पल्यो- पम का आठवां भाग और उत्कृष्ट पचास हजार वर्ष अधिक अर्द्ध पल्योपम की होती है, इसी को औधिक सूत्र कहते हैं, (चंदविमाणाणं भंते ! देवाणं कंवइयं कालं ठिई पएणचे ?) हे भगवन् चन्द्र विमानों के देवो की स्थिति कितने काल की प्रतिपादन को गई है ? गोयमा ! जहएणणं चउभागपलिग्रोवमं उक्नोसेण' पलिनोरम वाससयसहरस- मभहियं) हे गौतम ! जघन्य स्थिति पल्योपम का चतुर्थभाग और उत्कृष्ट एक लाख वर्ष अधिक एक पल्योपम की होती है, (चंदविमाणाणं भंते ! देवीणं केवइयं कालं ठिई पएणते ?) हे भगवन् ! चंद्र विमानों के देवियों की स्थिति कितने काल की प्रतिपादन की गई है ? गोयमा ! जहएणणं चउभागपलिअोवमं उकोसेणं अद्धपलिअोवमं परणासाए वास- सहस्सेहिं अब्भहियं,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति पल्योपम का चतुर्थभाग और उत्कृष्ट अर्द्ध पस्योपम तथा पचास हजार वर्ष अधिक होती है, (सूरविमाणाणं भंते ! देवाणं केवइयं कालं ठिई परणत्ता ?) हे भगवन् ! सूर्य विमानों के देवों की स्थिति कितने काल की प्रतिपादन की गई है ? (लोयमा! जहएणेणं चउभागपलिअोवमं उक्कोसेणं पलिश्रीवमं वाससहस्स- मभहिये,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति पल्योपम का चतुर्थीश और उत्कृष्ट एक हजार वर्ष अधिक एक पल्योपम की होती है, (सूरविमाणाणं भंते ! देवीणं केवइयं कालं ठिई पएणते ?) हे भगवन् ! सूर्य्य विमनों के देवियों की स्थिति कितने काल की प्रतिपादन को गई हैं ? (गोयमा! जहएणणं चउभागपलिनोवमं ) हे गौतम ! जघन्य स्थिति पल्योपम का !
! [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] चतुर्थ भाग और (उकोसेरणं श्रद्धपति श्रोत्र पंचहिं बाल लग भनिन, उत्कृष्ट पांच सौ वर्ष अधिक अद्व पल्योपम की होतो है, (गविना गावं भो ! कठिन परणता ?, हे भगवन् ग्रह विमानों के देवों को स्थिति कितने काल मति पाइन को गई है ? गोयमा ! जहरणे चवभागपतिनाव कोण जिन) हे गौतम जपन्या स्थिति पल्योपम का चतुर्थीश और उत्कृष्ट एक पल्यापम की होती है, सिविताना भंते ! देवीणं केवइयं कालं लिई पलासा ?) हे भगवन् ! अन विमानों के देत्रियों को स्थिति कितने काल को प्रतिपादन को गई है ? (सोचना ! जहर का सामाजिक उसक अद्धपनिनोत्रम,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति पल्यापम का चतुर्थांश और साष्टा भाई पल्योपम की होती है, (२.कसत्तविभागार भो ! देवाः . ) हे भगवन् न विमान के देवों की स्थिति कितने काल प्रति पादन की गई है ? (ोरम जमा नाम पलि ग्रोवम उगोलग अपलब,) गौतम ! जघन्य स्थिति पल्लोपा का चौथा भाग और उत्कृष्ट अर्द्ध एल्योपम को होती है. इस प्रकार का सामान ) हे भगवन् ! नक्षत्र विमानों के देवियों की स्थिति कितने काल को हाली पन्ना जहरणे चउभापजिमोर उसे ग साइरेसी च उभा पालोज) हातम ! जयन्त्र स्थिति पल्योपान का चौथा भाग और उत्कृष्ट पलकोपम के चौथे भाग से कुछ अधिक होती है. (नारात्रि मारणारा भी श्वार हे भगवन् ! तारा विमानों के देवोंकी र निजितने काल को होती है ? (याला ! जहरणे साइ अभाग पति यात्रा काम- पलियोबभ,) हे गौतम् ! जघन्य स्थिति पल्यापम के पाठवें भाग से कुछ अधिक और उत्कृष्ट पल्योपम का चतुर्थीश होती है, (लाशाविनाएकवीमा मह भगवन् तारा विमानों के देवियों की स्थिति कितने काल की होती है ? (हेवा कहना मान- पलिग्रोवम उकोले साइ अभाग लिनोत्रमं,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति परोपन का आठवां हिस्सा और * उत्कृष्ट पल्योपम के आठवें भाग से कुछ अधिक होती है। भावार्थ-ज्योतिषी देवों की जघन्य स्थिति पल्लोपन का नाउवा भाग से अधिक और उत्कृष्ट एक लाख वर्ष अधिक एक पल्यापम की होती है, इसी को श्रौधिक सूत्र कहते हैं । तथा-ज्योतिषी देवोंके पांच भेद है चन्द्र, सूर्य, ह, नक्षत्र और तारा इनकी निम्न लिखितानुसोर जघन्य और उत्कृष्ट मासु जाँदनी जाहिये। ज्योतिषी १ चंद्र विमानों के देवों की पल्योपम का च० एक लाख वर्ष अधिक एक पल्योधमकी HAMATA । KANTIES जघन्य स्थिति * जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति के अतिरिक्त मध्यम स्थिति जानना चाहिये।
१ ५० हजार 3 १०६ [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] २ चंद्र के देवियों की ३सूर्य विमानों के देवोंकी १००० हज़ार वर्ष अधिक ४ सूर्य विमानों के देवियों की ५०० वर्ष अधिक ५ग्रह विमानों के देवोंकी एकपल्य ६ ग्रह विमानोंके देवियों की अर्द्ध पल्य की ७ नक्षत्र विमानों के देवोंकी नक्षत्र विमानों के देवियों की पल्य के च०से कुछ अधिक ६ तारा विमानों के देवोंकी पल्यके श्रा० से कुछ अधिक चतुर्थांश १० तारा० देवियों की पल्य का प्रा० भा० पाठ भागसे कुछ अधिक यह सभी जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति । किन्तु जो उत्कृष्ट से न्यून और जघन्य से अधिक हो उसे मध्यम स्थिति जानना चाहिये। अब ज्योतिषी देवों के अनन्तर चौवीसवें दण्डक की स्थिति वर्णन करते हैं अर्थात् वैमानिकादि देवों की स्थिति का स्वरूप प्रतिपादन करते हैं - वैमानिकादि देको की स्थिति } वेमाणियाणं भंते ! देवाणं केवइयं कालं ठिई पण्णता ? गोयमा ! जहणणेणं पलिओवम उकोसेणं तेत्तीसं सागरो- वामई, वेमाणियाणं भंते ! देवीणं केवयं कालं ठिई पण्णत्ता ? गोयया ! जहणणेणं पलिनोवम,उकोलणं पणपणणं पलिओवमाई, सोहम्मेणं भंते ! कप्पे देवाणं केवइयं काल ठिई पण्णता ? गोयमा ! जहणणेणं पलिओवम उक्कोसेणं दो सागरोवमई , सोहम्मेणं भंते । कप्पे परिग्गहिया देवीणं जाव गोयमा! जहणणेणं पलिओवम उक्कोसेणं सत्त पलि- ओवमाई,सोहम्मेणं कप्पे अपरिग्गहियादवीणभंते ! केवइयं काल ठिई पण्णता ? गोयमा ! जहरणेणं पलिओवर्म उकोसेणं पण्णासं पलिओवम, ईसाणेणं भंते ! कप्पे देवाणं पच्छा. गोयमा जहरायोगां माहोग १०७ , [ उत्तराधम् ] उकोसेणं साइरेगाइं दो सागरोबमाई, ईसाणेशां भंते ! कप्पे परिग्गहियादेवी जाव गोयमा ! जहणोणं साइरेगं प. लिओवम उक्कोसेणं नव पनियोकमाई, अपरिग्गहिया- देवीणं भंते ! केवइयं काले ठिई पं. ? गोयमा ! जह- रणेणं साइरेग पलिशोवर्म उक्कोसेसं पणपरणं पलिअोवमाई, सणकुमारणं भंते ! कप्पे देवाणं पुच्छा, गोयमा! जहगाणं दो सागरोबमाई उक्कोसेणं सत्त साग- रोवमाई, माहिदेणं मंते ! शप्पे देवाण पुच्छा, गोयमा ! जहणणेणं साइरेगाई दो सागरोवमा उक्कोसेणं साइरेगाई सत्त सागरोवमाई, बंगलोएणं भंते ! कप्पे देवाणं पुच्छा, गोयमा ! जहएणणं सत्त सागरोवमाई उक्कोसेणं दस सा- गरोवमाई.एवं कप्पे केवइयं कालदिई पहाता ? गोयमा! एवं भाणियव्वलंतए जहयोग दस सागरोवमाई उक्को- सेणंचउदस सागरोषमा, महासुबके जहरणं चउद्दस सागरोवलाइ उक्कोसग सत्तरस सागरोवाइ, सहस्सारे जहणणेणं सत्तरस सागरोवनाई उकोले अट्ठारस सागरो- वमाइ, पारणए जहरणेण अटारससागरोवमाई उक्को- सेणं एगूणवीसं सागरोवमाइ, पाणए जहागण एगूण- वीसं सागरोवमाई उक्कोसेण वीसं सागरोवमाइ', आरणे जहण्णण वोसं सागरोव माइ' उक्कोसेणं एकवीसं साग- रोवमाइ', अच्चुए जहणणेण एक्कवीसं सागरोवमाई, उक्कोसेणं बावीसं सागरोवमाई, हेट्ठिमहेट्ठिमगेविज्ज- विमाणेसु ण भंते ! देवाणं केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता ? गोयमा ! जहणणेण बावीसं सागरोवमाइ उक्कोसेणं ।
! [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] तील सागरोवनाई, हेडिममज्झिमगेवेज्जविमाणेसु णं भंते ! देवा केवइयं कालं ठिई पं० ? गोयमा ! जहएणोण तेवीस सामरोजमा उनकोसणं चउवीसं सागरोवमाइ, हेट्ठिमउव- रिमोविज बिमाणेसुण भंते ! देवाणं पुच्छा, गोयमा ! जह- एयरा बड़वीसं सागरोवमाइ उक्कोरूण पणवीसं साग- रोचभाई, ४ मज्झिमहेट्रिगेवेजविमाणेसुण भंते ! देवाण पुच्छा, गोयमा ! जहरणे पणवीसं सागरोवमाई उक्को- सेण' छब्बीसं सागरोवमाई, मज्झिममज्झिमगेबिज्ज- विमासु हा अंते ! देवाण पुच्छा, गोयमा ! जहणणेण छनीस साबरोबमाई उस्कोसण सत्तावीसं सागरोवमाई, मज्झिन उरिमोयेजविमाणेसु णं भंते ! देवाणं पुच्छा, गोषमा ! जसमा सत्तावीसं सागरोबमाई, उक्कोसणं अदालील सागरोत्रमाई, उरिमहेटि मगेविजबिमाणेसु णं मं देवानां पुच्छा, गोयमा ! जहाणेण अट्ठावीसं साग- रोवलाई उकारण एणतोसं सागरोवमाई, उवरिम- मविकमविज्ञविनाणेसुण भंते ! वाणं पुच्छा, गोयमा ! जहरण पणतीसं सागरोक्माई, उक्कोसेणं तीसं सागरोवनाई, उबरिमउवरिमगेविजविमारणेसु ण भंते ! देवाणं । च्छा, गोयमा ! जहण्णण तीसं सागरोवमाई उक्कोण एक्कतीसं सागरोबमाई, विजयवेजयंतजयंत अपराजितविमाणेसु ण भंते ! देवाण केवइयं कालं ठिई पएणता? गोयमा ! जहणगाण एक्कतोस सागरोवमाई, उक्कोसेण तेत्तीसं सागरोवमाइं, सब्वट्ठसिद्ध ण भंते ! . * च 'पाठान्तरमनज्झिमहेट्रिमगेवेजविमाणेस के० प्र० ।
- [उत्तरार्धम् ] महाविमाणे ठेवाणं केवइयं कालं ठिई पण्णता ? गोयमा ! अजहण्णमणुक्कोसेणं तेत्तीसं सागरोवमाइं, से तं सुहुमे अद्धापलिश्रोवमे से तं अद्धापलिअोवमे। सू०१४२ पदार्थ-वेमाणिया णं भंते ! देवाणं केवइयं कालं ठिई पण्णत्ते ?) हे भगवन् ! वैमा- निक देवों की स्थिति कितने काल को प्रतिपादन की गई है ? (गोयमा ! जहणणं पलि- ओवभं कोसेणं तेत्तीसं सागरोवमा:) हे गौतम ! जघन्य स्थिति एक पल्योपम की और उत्कृष्ट ३३ सागरोपम की होती है, (वेमाणिया णं भंते ! देवी केवइयं कालं ठिई परणत्ता ?) हे भगवन् ! वैमानिक देवियों की स्थिति कितने कालकी प्रतिपादन की गई है ? (गोयमा ! जएहणणं पलिअोवमं उक्कोसेणं पणपएण पनि ग्रोवमाई, हे गौतम जघन्य स्थिति एक पल्यो- पम की और उत्कृष्ट ५५ पल्योपम की होती है । * अब अनुक्रम से कल्प और कल्पातीत देवों की स्थिति का वर्णन किया जाता है। जैसे कि (सोहम्मे णं भंते ! कप्पे देवाणं के०?) हे भगवन् ! सौधर्म देव लोकके देवों की स्थिति कितने काल की प्रतिपादन को गई है ? (गोयमा ! जहोणं पलिओचम हे गौतम ! जघन्य स्थिति एक पल्योपमको और (उक्कोसेणं दो सागगेवमाई.) उत्कृष्ट दो सागरोपम की होती है, (सोहम्मेणं भंते ! कसे परिगहियादेवीणं जाब) हे भगवन् ! से धर्म देव लोकके परिगृहीत देवियों की स्थिति कितने काल को प्रतिपादन को गई है ? (गोमा ! जहरणे पलिओवर्म उकोसणं सत्त पलि अोवमाई,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति एक मल्लोपम की और उत्कृष्ट सात पल्योपम की होती है, (सोहम्मे गं कप्पे अारमाहिर देवी मते ! केवइथं ?) हे भगवन् ! सौ. धर्म कल्प के अपरिगृहोत देवियों की स्थिति कितने काल की प्रति पादन को गई है ? (गोयमा ! जहरणेणं पलि प्रोवमं उक्कोलेणं परणासं पलिश्रोत्रमं.) हे गौतम ! जघन्य स्थिति एक पल्योपम को और उत्कृष्ट ५० पल्योपम की होती है (ईसाणेणं भंते ! कप्पे देवाणं पुच्छा,) हे भगवन् ईशान कल्प के देवों की स्थिति कितने काल की प्रति पादन की गई है ? (गोयमा ! जहरणेणं साइरेगं पलिनोवम) हेगौतम ! जघन्य स्थिति एक एक पल्योपमसे कुछ अधिक और (उकोसेणं साइरेगाई दो सागरोत्रमाई,) उत्कृष्ट दो सागरोपम से कुछ अधिक होती है, (साणेण भंते ! कप्पे परिग्गहियादेवीण जाव ) हे भगवन् ! ईशान कल्पके परि- गृहीत देवियोंकी स्थिति कितने कालकी होती है ? (गोयमा ! हरणेण साइरेगं पलि- श्रोवम) हेगौतम ! जन्घयसे एक पल्योपमसे कुछ अधिक और (उकोसेण नव पलिग्रोवर्म,) उत्कृष्ट नव पल्योपमकी होती है, (अपरिग्गहिया देवीण' भंते ! के० ?) हे भगवन् ! ईशान ! * नोनों भोगोलि [ उत्तरार्धम् ] कल्प के अपरिगृहोत देवियों को स्थि ते कितने काल को प्रतिपादन की गई है ? ( गोयमा ! जहएणे साइरेग पलिमोचनं ) हे गौतम् जघन्य स्थिति पल्मोपम से कुछ अधिक और ( उसको वेण पाणवर पनि मोजमाई,) उत्कृष्ट ५५ पल्यापम की होती है, (सण कुमारेण भंते ! कच्चे देवाण पुच्छा,) हे भगवन् सनत्कुमार कल्प के देवों की स्थिति कितने काल की होतो है ? ( गोयमा ! जहरणेण दो सागरोबमाई ) हे गौतम ! जघन्य स्थिति दो सागरोपमकी और (इकोण सत्त सागशेवभाई) उत्कृष्ट सात सागरोपकी होती है, (माहिदेणभंते ! कप्पे देवाण पुच्छा,) हे भगवन् माहेन्द्र कल्प के देवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जहरणेण साइरेगाई दो सागरोवमाई) हे गौतम ! जघन्य स्थिति दो सागरोपमसे कुछ अधिक और उद्योलेण साइरेगाई सत्त सागरोबमाई,) उत्कृष्ट सात सागरोपम से कुछ अधिक होती है, (वंभलोरण भंते ! कप्पे देवाण पुच्छा,) हे भगवन् ! ब्रह्म कल्प के देवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जह- एणेण सत्त मारोवाई) हे गौतम ! जघन्य स्थिति सात सागरोपम को और (उकोसेण दस सागरोवभाई,) उत्कृष्ट दस सागरोपम को होती है, (एवं कप्पे कप्पे केवइयं कालं ठिई परणता ? गोयमा ! एवं भागियध्वं.) इसी प्रकार प्रत्येक कल्प की कितने काल को स्थिति प्रति पादन की गई है ? हे गौतम् ! इस * प्रकार कहना-जानना चाहिये- जहरणे दल सागरोसाईडकोले चउद्दस सा रोगमाई, ) लान्तक विमान के देवोंकी जघन्य स्थिति दश साग गेपम की और उत्कृष्ट से चतुदरा सागरोपम की होती है, तथा (महा तुक्के जहरणेश चञ्चन सा रोचमाई उकोरेण सत्तरस सागरोबमाई,) महा शुक्र देवलोक के देवा को स्थिति जवन्य से १४ स गरोपम को और उत्कृष्ट १७ सागरोपम की होती है, (सहस्सारे जहएणे ग सत्तास सामोमाई उकोण अट्ठारस सागरोवमाई) सहस्रार देव लोक के देवों को जघन्य स्थिति १७ सागरोपम को और उत्कृष्ट से १८ सागरोपम की होती है, तथा (प्राणए जहरणेण अट्ठारस सागरोवमाई उक्को. सेण एगृणवीसं सागरोत्र गाई,) आनत देव लोक के देवों को जघन्य स्थिति १८ सागरो- पम की और उत्कृष्ट १६ सागरोपम की होती है, पाणए जहरणेण एगण वीसं सागरो वमाई उकोलेण वीसं साबमाई,) प्राणत देव लोक की जघन्य स्थिति १९ सागरोपम की और उत्कृष्ट बीस सागरोपम की होती है, (प्रारणे जहरणेण वीसं सागरावमाई उकोसेणं एकवीसं सागोयनाई) श्रारण्य देव लोक की जघन्य स्थिति बीस सागरोपम को और उत्कृष्ट २१ सागरोपम की होती है, (अच्छुए जहरणेण एकवीसं सागरोवमाई उकोलणं वावीप सारोगमा) अच्युत कल्प के देवों को जघन्य स्थिति २१ सागरो- इत्यादि प्रश्नोत्तर पूर्ववत् ही जानना चाहिये, क्योंकि अब सामान्य रूपसे ही वर्णन किया जाता है। ( लंतर १११ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् । पम की और उत्कृष्ट २२ सागरोपम की होती है, ये सभी बारह देव लोक के देवों की स्थिति जानना चाहिये । *अब नव अवेयक देवों में से पहिले नीचे के त्रिक की स्थिति वर्णन करते हैं। ! (हटिमटिंमगेविज विमाणेसुण भंते ! देवाण केवइयं कालंठिई पएणते ?) हे भगवन् ! नीचे के त्रिक के नीचे के वेयक विमानों के देवों को स्थिति कितने काल की प्रति पादन की गई है ? ( गोगमा ! जहरणे बाबीसं सागबनाई उसोतेणं तेवीसं सागरी वमाई,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति २२ सागरोपम को और उत्कृष्ट से २३ सागरोपम की होती है, ( हेटिममजिनमगेविनविनाणेसु र भंते ! देवाणं केवइयं कालं ठिई पएणता ? ) हे भगवन् ! नीचे के मध्यम वेयक विमानों के देवों की स्थिति कितने काल की प्रति- पादन की गई है ? ( गोषमा ! जहरणे ते नीरस सामशेवभाइ उनको पेणं चवीस सागरो. वमाई) हे गौतम ! जघन्य स्थिति २३ सागरोपम की और उत्कृष्ट से २४ सागरोपम की होतो है, (हटिमबरिमगवि नविमाणेसुरण भत ! देवाण पुच्छा,) नीचे के ऊपर वाले वे- यक विमानों के देवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोधमा ! जहरणेण चउ- बीसं सागरोबमाई उक्कोलेण पणवासं सामरोबमाई,) हं गौतम ! जघन्य स्थिति २४ सागरोपम की ओर उत्कृष्ट २५ सागरोपम की होतो है, (मजिमहंटिगगविजविमाणे सुणं भंते ! देवाण पुच्छा,) हे भगवन् ! मध्यम के नीचे वाले विमानों के देवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (नायगा ! जहरणे पणवीस साबरोबमाई उक्होलणं छब्बोस सागरोवनाई,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति २५ सागरोपम को और उत्कृष्ट २६ सागरो- पम को होती है, (मजिक्रमझिमगवेज्ननिमाणेलु णं भंते ! देवाणं पुच्छा.) हे भगवन् ! मध्यम के मध्यम ग्रैवेयक विमनों के देवोंकी स्थिति कितने काल होती है ? (गोयमा ! जहएणणं छब्बीस सागरोवमाई उकासेणं सत्तावीसं सागशेवमाई.) हे गौतम ! जघन्य स्थिति २६ सागरोपम की और उत्कृष्ट २७ सागरोपम की होती है, (पजिसमवरिंभगवेजविमाणेसु णं भंते ! देवाणं पुच्छा, हे भगवन् मध्यम के ऊपर वाले अवेयक विमानों के देवों की स्थिति कितने काल की हाती है ? (गोयमा ! जहरणेणं सत्तावीसं सामरोवमाई उक्कोसेणं अट्ठावीसं सागरोवमाई,) हे गौतम ! जघन्य स्थिति २७ सागरोपम की और उत्कृष्ट से २८ सागरो- पम को होतो है, (वरिमटिमविज्ञविमाणेसु णं भंते ! देवाणं पुच्छा,) हे भगवन् ! ऊपर ! *----अवेयक विमानोंके तीनत्रिक हैं, जिनमें प्रथम के निक में १११ गिमान, द्वितीय में १०७ और तृतीय त्रिको १०० हैं, इस लिये प्रथम त्रिक का नाम नीचे का त्रिक दूसरे का मध्यम त्रिक और तीसरे का ऊपरला त्रिक है ११२ [ उत्तरार्धम् ] वाले नीचे के ग्रैवेयक विमानों के देवों की स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा । जहरणेणं अट्ठावीसं सागरोवमाइ उनको सेणं एगणतीसं सागरोबमाइ,) हे गौतम! जघन्य स्थिति २८ सागरोपम को और उत्कृष्ट से २६ सागरोपम की होती है, (वरिनमज्झिम- गेवेजविमाणेतु णं भंते ! देवाणं पुच्छा,) हे भगवन् ! ऊपर वाले मध्यम के अवेयक विमानों के देवों को स्थिति कितने काल की होती है ? (गोयमा ! जहरणेणं एगृणतीस सागरोवमाई उक्कोसेणं तीसं सागरोबमाई',) हे गौतम ! जघन्य स्थिति २६ सागरोपम की और उत्कृष्ट ३० सागरोपम की होती है, ( उपरिमयरिम गवेज्जविमाण एवं भंते ! देवार्ण पुच्छा,) हे भगवन् ऊपर वाले ग्रैवेयक विमानों के देवोंको स्थिति कितने कालको होती है ? (नोयमा ! जहणणेणं तीसं सागशेवनाई उक्लोसणं एक्कतीसं सागरोबमाइ.) हे गौतम ! जघन्य स्थिति तीस सागरोपम की और उत्कृष्ट ३१ सागरोपम की होती है । अब अनुत्तर विमानों के विषय में कहते हैं- (विजयवे नयन्तजयन्त अपराजितविमाणेसु णं भंते ! देवाणं केवइ कालं ठिई पण्णत्ता ? ) हे भगवन् ! विजय, वेजयन्त, जयंत और अराजित विमानों के देवों की स्थिति कितने काल को प्रतिपादन की गई है ? (गोयमा ! जहरणेणं एक्कतीसं सागरोत्रमाई उकोसेण तेत्तीसं सागगेचमाइ, ) हे गौतम ! इनकी जघन्य स्थिति ३१ सांगरोपम की और उत्कृष्ट ३३ सागरोपम की होती है। साढसिद्धरणं भंते ! महाविमाणे देवाणं केवइयं कालं ठिई परणता ?) हेभगवन् ! सर्वार्थ सिद्ध महाविमान के देवोंकी स्थिति कितने काल की प्रतिपादन की गई है ? (गोयमा ! अजहरणमणु उक्कोसेणं तेत्तीसं सा.रोवमाइ।)हे गौतम ! जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति केवल तेतीस सागरोपम की होती है क्योंकि उक्त विमानों में मध्यम स्थिति नहीं होती । (सेतं सुहुमे अडापलिनोवमे, सेत्तं श्रद्धापलिनोत्रमे) इस लिये इसी को ही सूक्ष्म अद्धा पल्योपम और इसी को श्रद्धापल्योपम कहते है। ( ० १४२) भावार्थ-वैमानिक देवों की जघन्य स्थिति एक पल्योपम की और उत्कृष्ट ३३ सागरोपम तक होती है, तथा उनके देवियों की जघन्य तो एक पल्य की और उत्कृष्ट ५५ सागरोपम की होती है। किन्तु दूसरे कल्प से ऊपर देवियें उत्पन्न नहीं होती, इस लिये दूसरे कल्प तक देवियों की स्थिति वर्णन की गई है, इनके दो भेद है, परिगृहीत और अपरिगृहीत । जो परिगृहीत प्रथम देवलोक में हैं उनकी जघन्य स्थिति एक पल्य की और उत्कृष्ट सात पल्य की, तथा अप- रगृहीतों की जघन्य स्थिति एक पल्य की और उत्कृष्ट ५० पल्य की होती है।
[ उत्तरार्धम् ] द्वितीय देवलोक के परिगृहीत देवियों की जघन्य स्थिति एक पल्य से कुछ अधिक और उत्कृष्ट से पल्य की, अपरिगृहीतो की जघन्य स्थिति तो प्राग्वत् ही है लेकिन उत्कृष्ट ५५ पल्य की होती है। इन वैमानिक देवों के २६ लोक हैं, जिनमें बारह देव लोक तो कल्प संज्ञक हैं। इन सभी की स्थिति सरल जानने के वास्ते नीचे कोष्टक भी दिया गया है-- उत्कृष्ट स्थिति वैमानिकादि १ सौधर्म देव लोक २ ईशान जघन्य स्थिति २सागर १ पल्य से कुछ अधिक २सागरसेकुछअधिक २सागर ७सागर २ सागर से कुछ अधिक सागरसे कुछअधिक ७सागर १०सागर ३ सनत्कुमार ४ माहेन्द्र देव लोक ६लान्तक " ७ महोशुक्र के देवों की १४ " " " श्रानत" १० प्राणत १६ ११ श्रारण्य १२ अच्युत" २२ २३ २४ १४ सुभद्र १५ सुजात " २५ २५ २६ १६ सौमनस् , १७ प्रियदर्शन १८ सुदर्शन । १६ अमोह २७ २९ " २० सुप्रति २६ ३० ३१ २१ यशोधर २२ विजय २३ वेजयंत ३१ ३३ ३३ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] २५ अपराजित देवों की ३१ २६ सर्वार्थ सिद्ध देवों की ३३ परन्तु सर्वार्थ सिद्ध विमान के देवों की जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति केवल ३३ सागर की होती है। अतः इसीको सूक्ष्म अद्धा पल्योपम अथवा श्रद्धा पल्योपम जानना चाहिये । ( सू० १४२ ) अब इसके पश्चात् क्षेत्र पल्योपम के प्रमाण की व्याख्या की जाती है- , , क्षेत्रवल्योपम का प्रमाण । से किं तं खेत्तपलिओवमे ? २ दुविहे पण्णते, तंजहा- सुहुमे य ववहारिए य, तत्थ णं जे से सुहुमे से ठप्पे, तत्थ णं जे से ववहारिए से जहानामए पल्ले सिया जोयणं आयाम- विक्खम्भेणं जोयणं उव्वेहेणं तं तिगुणं सविसेस परिक्वे- वेणं, से गं पल्ले एगाहियबेआहियतेमाहिय जाव भरिए वालग्गकोडीणं, ते णं वालग्गा णो अग्गी डहेजा जाव णो पूइत्ताए हव्वमागच्छेज्जा, जेणं तस्स पल्लस्स आगासपएसो तेहिं वालग्गेहिं अप्फुन्ना, तो समए २ एगमेगं आगास. पएसं अवहाय जावइएणं कालेणं से पल्ले खीणे जाव निट्टि- एभवइ से तं ववहारिए खेत्तपलियोवमे । एएसिं पल्लाणं कोडाकोडी भवेज दस गुणिआ । तंववहारिअस्स खेत्तसागरोवमस्स एगस्स भवे परीमाणं ।। एएहि ववहारिएहि खेत्तपलिओमवसागरोवमेहि किं पोअणं ? एएहि ववहारिएहिं खेत्तपलिअोवमसागरोव- मेहि नस्थि किंचिप्पोअणं, केवल पण्णवणा ॐ किज्जइ, से तं ववहारिए खेत्तपलिओवमे। DEPARINEE AMAttismetrena MAAMANANDHRA १३ ११५ [ उत्तरार्धम् । से किं तं सुहुमे खेत्तपलिअोवमे? २ से जहाणामए पल्ले सिया जोयणं आयामविश्वंभेणं जाव परिक्खेवेणं से णं पल्ले एगाहिमवेत्राहियतेबाहिश जाव भरिए वालग्ग- कोडीणं, तत्थणं एगमेगे वालग्गे संखिज्जाई खंडाई कज्जइ तेणं वालग्गा दिट्ठीश्रोगाहणाओ असंखेज्जइभागमेत्ता सुहुम स्स पणगजीवस्स सरीरोगाहणाओ असंखेज्जगुणा, ते णं वालग्गा णो अग्गी डहेज्जा जाव णो पूइत्ताए हब्वमागच्छि- ज्जा, जे णं तस्स पल्लस्स आगासपएसा तेहिं वालग्गेहि अप्फुन्ना वा अणाफुन्ना वा तो समए २ एगमेगं आगा- सपएसं अवहाय जावइएणं कालेणं से पल्ले खीणे जाव णिट्ठिए भवइ, से तं सुहुने खेत्तपलिअोवमे। तत्थ णं चोअ- ए पण्णवर्ग एवं वयासी-अस्थि णं तस्स पल्लस्त आगासप- एसा जेणं तेहिं वालग्गेहि अणाफुण्णा ? हंता आत्थ, जहा को दिटुंतो ? से जहानामए कोट्टए सिमा कोहंडाणं भरिए तत्थ णं माउलिंगा पक्खित्ता तेऽविमाया, तत्थ ण बिल्ला पक्खित्ता तेऽवि माया, तत्थ णं आमलगा पक्खित्ता तेऽवि माया, तत्थ णं बअरा परिवत्ता तेऽवि माया, तत्थ णं चणगा पक्खित्ता तेऽवि माया, तत्थ णं मुग्गा पक्खित्ता तेऽविमाया, तत्थ सरिसवा पक्खित्ता तेऽविमाया तत्थरणं गंगाबालूमा पक्खित्तासावि माया, ® एवामेव एएणं दिदै- तेणं अत्थि णं तस्स पल्लस्स आगासपएसा जेणं तेहिं बाल- ग्गेहि अणाफुण्णा। . *"एवमेव प्रा शि गे ३ ID म [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] एएसिं पल्लाणं कोडाकोडी भज्ज दस गुणिमा तं सुहुमस्स खेत्तसागरोवमस्स एगस्स भवे परीमाणं ॥१॥ एएहि सुहमेहिं खेत्तपलिओवमसागरोवमेहि कि पोअणं ? एएहि सुहुमपलिओवमसागरो- वमेहि दिट्टिवाए दव्वा मविज्जति । (सू० १४३) पदार्थ-(से किं तं खेत्तपलिनोवमे ?) हे भगवन् ! क्षेत्रपल्योपम किसको कहते हैं ? (खेत्तपलिश्रोवमे दुविहे पएणत्ते तंजहा-) भो शिष्य ! क्षेत्रपल्योपम के दो भेद हैं, जैसे कि (सुहुमेय ववहारिए अ.) सूक्ष्म और व्यावहारिक, (तत्थ ण जे से सुहुमे से ठप्पे,) उन दोनों में जो सूक्ष्म है उसको छोड़िये, किन्तु (तत्थण जे से ववहारिए) उन दोनों में जो व्यवहा- रिक है (से जहानामए पल्ले सिया) वह ऐसा जानना यथा-धान्य के पल्य के समान पल्य हो और (जोश्रण पायामविक्वंभेणं) योजन मात्र दीर्घ तथा विस्तार युक्त भी हो, पुनः (जोयणं उब्वेहेणं ) एक योजन गहरा हो, तथा (तं तिगुणं सविसेसं परिक्लेवेणं ) उसकी परिधि तीन गुणी से कुछ अधिक हो, फिर (से णं पल्ले एगाहियवाहिअतेश्राहिअ जाव) उस पल्य में एक दिन, दो दिन, तीन दिनसे लगाकर सात दिन तक के वृद्धि किये हुए (भरिए वाला कोडोणं,) बालारों की कोटियों से घनता युक्त भर दिया जाय, फिर (तेणं वालग्गा णो अग्गी डहेजा,) उन बालानों को अग्निभी दाह न कर सके (नाव नो पूइत्ताए हव्वमा गच्छेजा,) यहां तक कि उनमें दुर्गध भी पैदा न हो, (जेणं तस्स पल्लस्स) जिससे कि उस पल्य के (अागासपएसा तेहिं बालग्गेहि अप्फुन्ना,) आकाश प्रदेश उन बालानों से स्प- शित हुए हों, (तो णं समए २ एगमेगं आगासपएस अवहाय) फिर उसमें से समय २ में एक २ आकाश प्रदेश अपहरण-निकाला जाय, तो (जावइएणं कालेणं) जितने काल में ( से पल्ले खीणे जाव निट्टिए भवइ,) वह पल्य क्षीण यावत् विशुद्ध होता है, (से तं ववहारिए खेत्त पलिश्रोत्रमे ।) वही व्यावहारिक क्षेत्रपल्योपम है, किन्तु एएसि पल्लाण कोडा कोडी भवेज दस गुणिया । तं ववहारियस्स खेत्तसागरोवमास एगस्स भवे परीमाणं ॥१॥ - U -- इन पल्मों को दश कोटा कोटि गुणा करने से एक व्यवहारिक क्षेत्र सागरो- पम का परिमाण होता है ॥१॥ अर्थात् उक्त पल्य को दश कोटा कोटि गुणा करने से एक व्यवहारिक क्षेत्र सागरोपम होता है । (एएहिं ववहारिएहिं खेत्तपलिश्रोवमसागरोवमेहि किं पोयणं १) इन व्यावहारिक क्षेत्रपाल्योपम और सागरोपम से क्या प्रयोजन है ?
[ उत्तरार्धम् ] एएहिं ववहारिएहिं खेत्तपलिग्रोवमसागरोवमेहिं नत्थि किंचिप्पोमणं,) इन व्यवहारिक क्षेत्र पल्योपम और सागरोपम से किंचिन्मात्र भी प्रयोजन नहीं है, (केवलं पण्णवणा केजइ,) सिर्फ प्ररूपणा ही की गई है अर्थात संक्षिप्त स्वरूप हो प्रतिपादन किया गया है, . (से तं ववहारिए खेत्तपलिअोवमे ।) इसीको व्यवहारिक क्षेत्रपल्योपम कहते हैं। (से किं तं सुहमे खेत्तपलिश्रोवमे ?) सूक्ष्म क्षेत्रपल्योपम किसको कहते हैं ? (खेत्तप०) सूक्ष्म क्षेत्र पल्योपम का स्वरूप निम्न प्रकार से है (से जहानामए पल्ले सिया) जैसे कि धान्य के पल्य के समान पल्य हो, जो कि (जोयणं पायामविक्वंभेणं) एक योजन दीर्य और विस्तार युक्त होता हुआ (जाव परिक्खेवेणं,) यावत परिधि से भी युक्त हो, (से पल्ले एगा- हिय) फिर वह पल्य एक दिन, (वेयाहियतेयाहिय जाव) दो दिन, तीन दिन यावत् याने सात दिन तकके वृद्धि किये हुए (भरिए वालग्गाकोडीणा,) बालानों की कोटियों से भर गया हो, फिर (तत्य एवं एगमेगे वालग्गे असंखिजाई खंडाई किज्जइ) एकैक बालाग्र के असंख्यात २ खंड किये जायें जो कि-(तेणं वालग्गा दिट्ठीयोगाहणाश्रो असंखेज्जइभागमेत्ता) वे बालाप दृष्टि को अवगाहना से असंख्यात भाग प्रमाण हो अर्थात् दृष्टि मात्र जो सूक्ष्म पुद्गल हैं उनसे भी न्यूनतर हों, किन्तु (सुहमरस पणगजीवस्स सरीरोगाहणारे असंखेज्न- गुणा,) *सूक्ष्म पनकजीव के शरीर की अवगाहना से असंख्यात गुणा अधिक हों, फिर (तेणं वालग्गा नो अग्गी डहजा.) उन वालागों को अग्नि भी दाह न करे, (जाव णो पूइत्ताएहन्द- मागच्छेजा,) यावत् याने वायु भो न हरण करे न वे सड़ें और न उनमें दुर्गधता प्राप्त हो, किन्तु (जेए तस्स पल्लस्स पागासपएसा ) जिससे कि उस पल्य के आकाश प्रदेश (तेहिं वालग्गेहि अप्फुन्ना वा अणाफुन्ना बा) उनबालानों से स्पर्शित हुए हों या न हुए हों, (तप्रोणं समए २ एगमेगं ागासपएस अवहाय पश्चात् समय २ में एक २ आकाश प्रदेश को अपहरण किया जाय तो (जानइएण कालेण से पल्ले खीणे जाव निटिए भाइ, से । खेत्तपलिओगमे ।) जितने काल में वह पल्य आकाश प्रदेशों से क्षीण यावत् शब्द से नीरज निर्लेप और विशुद्ध होता है उसी को सूक्ष्म क्षेत्रपल्योपम कहते हैं, अर्थात् जो आकाश प्रदेश उन वालागों से स्पर्शित हुए हों या अस्पर्शित हुए हों वे सभी सूक्ष्म क्षेत्र पल्योपम में प्रहण किये जाते हैं। जब आकाश प्रदेश ही ग्रहण किये जाते हैं तब खंडों के वर्णन करने का क्या प्रयोजन है ? दृष्टिवाद के द्रव्य, कोई तो स्पर्शित और कोई अस्पर्शित प्रदेशों से मान किये जाते हैं यही मुख्य प्रयोजन है। सुहमे - * यावन्मात्र सूक्ष्म पनक जीव आकाश प्रदेशों को अवगाहना करता है उससे असंख्यात गुणाधिक आकाश प्रदेश को वह खंड अवगाहना करता है।
fi मे व JiaNP . ११८ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् (तत्य ण चोए परगना एवं वयासी-) उक्तसमास को सुन कर शिष्य ने ऐसा कहा कि हे भगवन् ! (अस्थि गो तस्स पल्लस अागासपएसा जेण तेहिं गालग्गेहि अणाकुण्णा ?) क्या उस पल्य के श्राकाश प्रदेश हैं जो कि उन वालातों से अस्पर्शित हैं ? (हंता अस्थि,) हों हैं इसमें किंचित् भी संदेह न करना चाहिये, (जहा को दिद्वन्तो ?) इसका कोई दृष्टान्त भी है ? क्योकि वह कूआ धन रूप वालासों से भरा गया है (से जहानामए) जैसेकि (कोट्टए सिया कोहंडाण भरिए) एक कोई कोष्ठक-कोठा हो जो कि कुष्मांडों के फलों से भरा हुआ हो (तत्थ ग माउलिंगा पक्खित्ता) फिर उसमें मातुलिंग-बोज पूरक डाले अर्थात् उसे स्थूल दृष्टि से निश्चय हुआ कि-कुष्मांडों के भरने से यह कोष्ठक ठोक तो भर गया है किन्तु उसमें छिद्र देखने से मालूम हुआ कि फल और भी प्रवेश हो सकते हैं, तो उसने मातुलिंग याने बीज पूरक नामक फल डाले, (तेऽत्रि माया,) वे भी उसमें प्रविष्ट होगये, इसी प्रकार (तत्थ ण वल्ला पक्खित्ता, ते ऽवि माया,) फिर उसमें बिल्व डाले वे भी समा गये ( तत्थ ण ामलगा पक्खित्ता ते ऽवि माया,) फिर आंवले डाले वे भी समा गये (तत्थ ण वयरा पक्खित्ता तेऽवि माया) फिर वदरी फल डाले वे भी प्रविष्ट होगये, पश्चात् (तत्थ ग चणा पक्खित्ता ते ऽवि माया,) चने-छोले डाले वे भो समा गये ( सस्थ णं मुग्गा पक्खित्ता तेऽवि मारा,) तदनन्तर मूग प्रक्षेप किये वे भा प्रविष्ट हो गये, ( उत्थ णं सरिसवा पक्वित्ता तेऽ वे माया,) फिर सर्षप सरसों डाले वे भी समा गये, ( तःथ गां गंगावालुवा पकिसत्ता साऽवि माया,) फिर उसमें गंगा नदी को बालुका डाली वह भी समा गई (एबामेव एएणं दिटुंतेणं) इसी प्रकार इस दृष्टान्त से (अस्थि णं तस्म पल्लस्स भागासपएसा ) उस पल्य उस पल्य के आकाश प्रदेश आकाश प्रदेश हैं (जेणं तेहि वालग्गेहि अणफुण्णा,) जिससे कि वे वालाग्र अस्पर्शित हैं क्योंकि वे अतीव इसलिये असंख्यात आकाश प्रदेश भी अस्पृष्ट हैं, जैसे अतोव धन रूप स्तम्भ में कीलक समा जाता है उसी प्रकार उस पल्य में भी अस्पृष्ट आकाश प्रदेश विद्यमान हैं , ॥ (एएसि पल्लाणं कोडाकोडी भवेज दसगुणिया ।) तं सुहमस्स खेत्तसागरोत्रमस्स एगस भवे परीमाणं ।। इन पल्यों को दश कोटा कोटि गुणा करने से एक सूक्ष्म क्षेत्रसोगरोपम का परिमाण होता है ॥ १ ॥ ( एएहिं सुहुमेहिं खेत्तपलिग्रोवमसागरोवमेहिं किं पनोयणं ? ) हे भगवन् ! इन सूक्ष्म क्षेत्र पल्योपम और सूक्ष्म क्षेत्रसागरोपम के प्रतिपादन करने का क्या प्रयोजन है ? (एएहिं सुहुमेहिं पलिपोषमसागरोवमेहिं दिठिवाए दव्या मविज्जति ।) इन सूक्ष्म क्षेत्रपल्योपम और सागरोपम से दृष्टि वाद में जो द्रव्य वर्णन किये गये हैं उनकी गणना इससे को जाती है अर्थात् इनसे दृष्टि वाद के द्रव्य गिने जाते हैं।
SONAaen [उत्तरार्धम् ] भावार्थ- -क्षेत्र पल्योपम के दो भेद है, एक सूक्ष्म और दूसरा व्यावहारिक इनमें सूक्ष्म का स्वरूप तो इस समय प्रतिपादन नहीं किया जाता है क्योंकि उसका वर्णन फिर करेंगे, लेकिन व्यावहारिक का स्वरूप निम्न प्रकार से है, जैसे कि एक पल्य हो जो कि एक योजन मात्र गहरा दीर्घ और विस्तीर्ण युक्त हो और जिसकी, अधिक त्रिगुणी परिधिभी हो,फिर उसमें एक दिन,दो दिन, तीन दिन यावत् सात दिन तक वृद्धि किये हुए वालानों की कोटियो से ऐसांभर दिया जाय कि जिस को अग्नि भी दाह न कर सके, वायु भी न उड़ा ले जाय, नष्ट भी न हो यहां तक उसमें दुर्गंध भी उत्पन्न न हो, फिर उस पल्य को, जो आकाश प्रदेश स्पर्शित किये हुये हैं उनको समय २ में निकाला जाय तो जितने काल में वह पल्य खाली और निर्लेप हो जाय उसी को व्यावहारिक क्षेत्र पल्योपम कहते हैं, तथा दश कोटा कोटि पल्यो का एक व्यावहारिक सागरोपम होता है, किन्तु यहाँ पर इसके वर्णन करनेका कुछ भी प्रयोजन नहीं है,सिर्फ प्ररूपणा ही की गई है। तो भी सूक्ष्म क्षेत्रपल्योपम को जाननेके लिये प्रत्युपयागी है सूक्ष्म क्षेत्रपल्योपम का स्वरूप पूर्व वही है लेकिन एक २ बालानके असंख्यात २ खंड कल्पित कर लेने चाहिये जोकि दृष्टि की अवगाहना से असंख्यातवे भाग में हो, और सूक्ष्म पनक जीव के शरीर को अवगहना से असंख्यात गुणा हो, तथा जिनको अग्नि भी दाह न कर सके यावत् दुर्गंध भी उत्पन्न न हो, फिर उस पल्य मे से उन वालानों को जो आकाश प्रदेश स्पर्शित और अस्पर्शित हो, सभी को समय २ में अपहरण किया जाय तो जितने कालमें वह पल्य क्षीण, नीरज और निलेप हो जाय उसी को सूक्ष्म क्षेत्र पल्योपम कहते हैं । ऐसा वर्णन सुनकर पृच्छक ने प्रश्न किया कि-हे भगवन् ! क्या उस पल्य में ऐसे प्रदेश भी हैं जो बालानों से अस्पृष्ट हैं ? गुरु ने उत्तर दिया कि-हां-ऐसे आकाश प्रदेश भी उस पल्य में हैं जिन को वालानों ने स्पर्श नहीं किया। जैसे कि-एक कोष्टक-कोठा को किसी ने कुष्मांडो से भर दिया, जब उसमें देखा कि अब एक भी कुष्मांड प्रवेश नहीं हो सकता परन्तु छिद्र हैं तो उसने मातुलिंग प्रक्षिप्त किये इसी प्रकार विल्व, आंवले, बदरी बेर फल, चने, मूंग, सर्षप और गंगा की रेत इत्यादि प्रक्षेप करने पर सभी प्रविष्ट हो गये, इसी प्रकार उस पल्य में भी ऐसे श्राकाश प्रदेश विद्यमान हैं जो उन चालानों से स्पर्श मान भी नहीं हुए, क्योंकि उनकी अपेक्षा आकाश प्रदेश अतीव सूक्ष्म होते हैं, जैसे किसी स्तम्भ में कालिका प्रवेश हो जाती है, इसी प्रकार श्रा- काश प्रदेश भी अवकाश देते हैं । तथा दश कोटा कोटि सूक्ष्म क्षेत्र पल्यों को एक सूक्ष्म सोगरोपम होता है। इन दोनों से केवल दृष्टिबाद के द्रव्य मान - ।
[श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] , , कइविहा णं भंते ! दव्वा पण्णता ? गोयमा ! दव्वा दुविहा पण्णत्ता, तंजहा-जीवदव्वा य अजीवदव्वा य । अ जीवदव्वा णं भंते ! कइविहा पण्णता ? गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता, तंजहा-रूवीअजीवदव्वा य अरूवीअजीवदव्वा य अरूवीजीवदव्वा णं भंते ! कइविहा पण्णता ? गोय- मा ! दसविहा पण्णत्ता, तंजहा-धम्मत्थिकाए धम्मस्थि- कायस्स देसा धम्मत्थिकायस्स पएसा अधम्मत्थिकाए अधम्मस्थिकायस्स देसा अधम्मस्थिकायस्स पएसा आगा- सत्थिकाए आगासत्थिकायस्स देसा आगासत्थिकायस्स पएसा, अद्धा समए । रूवीअजीवदव्वाणं भंते ! कइविहा पण्णता ? गोयमा! चउव्विहा पण्णत्ता, तंजहा-खंधाखंध- देसा खंधप्पएसा परमाणुपोग्गला, तेणं भंते ! किं सं- खिज्जा असंखिज्जा अर्णता ? गोयमा! नो संखेजा नो असंखेजा अणंता, से केणटेणं भंते ! एवं बुच्चइ-नो संखिज्जा नो असंखेज्जा अर्णता? गोयमा ! अणंता पर- माणुपोग्गला अणंतो दुपएसिया बंधा जाव [दस पएसि- आ खंधा संखेज्जपएसिया] अणंता अणंतपएसिया खंधा से • तेणऽटेणं गोयमा ! एवं वुच्चइ-नो संखिज्जा नो प्रसं- खिज्जा अणंता । जीव दवाणं भंते ! कि संखेज्जा असं खिज्जा अणंता ? गोयमा ! नो संखिज्जा नो असंखिज्जा अणंता, से केणटेणं भंते ! एवं वुच्चइ-नो संखिज्जा नो 'एएण' पानान्ताम।
[ उत्तरार्धम् ] असंखिज्जा अणता? गोयमा। असंखेज्जा नेरइया असं- खेज्जा असुरकुमारो जाव असंखेज्जा थणियकुमारा असंखेज्जा पुढवोकाइया जाव असंखेज्जा बाउकाइया अणंता वणस्सइकाइया असंखेजा बेइंदिया असंखज्जा तेई. दिया असंखज्जा चउरि दिया असंखेज्जा पंचिदिय- तिरिक्खजोणिया असंखेज्जा मणुस्सा असंखेज्जा वाण- मंतरा असंखिज्जा जोइसिया असं वेज्जा वेमाणिया अणंता सिद्धा, से तेणऽद्वेग) गोयमा ! एवं बुच्चइ-नो संखिज्जा नो असंखिज्जा अणंता । (सू० १४४) पदार्थ-(कइविहाणं भंते ! दव्या पएणता ?) हे भगवन् ! द्रव्य कितने प्रकार के प्रतिपादन किये गये हैं ? ( गोयमा ! दुविहां पर पता, जहा.) हे गौतम ! दो प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं, जैसे कि- जीवदना य अनीवदा य,) जीव द्रव्य और अजीव द्रव्य । (अनविदाग भंते ! कइविहा पएणता ?) हे भगवन् ! अजोव द्रव्य कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? ( गोयमा ! दुविहा परणचा, तंजहा- ) हे गौतम ! दो प्रकार से वर्णन किया गया है, जैसे कि- रूबीअजीवब्वाय अरूबीनजीवब्बा य ।) रूपी अजीव द्रव्य और अरूपी अजीव द्रव्य । (अरुवीयजीवदत्राणं भंते ! कइविहा परता?) हे भग. वन् ! अरूवी अजीव द्रव्य कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? (गोयमा ! दस विहा पराणत्ता, तंजहा.) हे गौतम ! दस प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, जैसे कि- (धम्मत्यिकाए) : संग्रह नय के अभिप्राय से धमास्तिकाय एक द्रव्य है, किन्तु व्यवहार नय से (वम्महि व सायम्स देसा) धर्मास्ति काय के देश और (व-मस्थि कायरस पएसा) ध. मास्तिकाय के प्रदेश भी है, लेकिन ऋजुसूत्र नय के अभिप्राय से ये सभी पृथक् २ हैं । ॥ . weawneMargamM १ * 'एएमटेगा । एकोऽपि धर्मास्तिकायो नयमतभेदातत्रिया भिद्यते, तच्चसंग्रह नयाभिमायादेक एव धर्मा- स्ति कायः-पूर्वोक्त पदार्थः, व्यवहारनयाभिप्रायात्तु बुद्धि परिकल्पितो द्विभागत्रिभागादिकस्तस्यैव देशाः, यथा सम्पूणों धनास्तिकायो जीवादिगत्युपटम्भकं द्रव्यमिप्यते, एवं तशा अपितदुपष्टम्भकानि पृथगेव द्रव्याणीति भावः, ऋजुमूत्राभिप्रायतस्तु स्वकीयस्वकीयसामर्थेन जीवादिगत्युपष्टम्भे व्यामि- यमाणास्तस्य प्रदेशा बुद्धिगरिकल्पिता निर्विभागा भागाः पृथगेव द्रव्याणि ।'
तंजहा.) है [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] इसी तरह (अधम्मस्थिकाए) श्रधर्मास्तिकाय में (अधम्मस्थिकायस्स देसा) अधर्मास्ति- काय के देश और (अधम्पत्थिकायस्स पएसा) अधर्मास्तिकाय के निविभाग प्रदेश, फिर ( भागासस्थिकाए) आकाशास्तिकाय में (अागासा थकायस्स देसा) आकोशास्तिकाय के देश और (प्रागासत्यिकायस्स पए सा,) आकाशास्ति काय के प्रदेश, तथा-(प्रडा समए ।) दसवां काल द्रव्य, यह निश्चय नय मत के अभिप्राय से एक ही है, क्योंकि वर्तमान समय की अपेक्षा यह नय भूत और भविष्यत् काल के समय को अंगीकार नहीं क्योंकि भूत काल के समय विनष्ट हैं और भविष्यत् काल के अनुत्पन्न हैं इसलिये वर्तमान के ही समय सद्रूप हैं । अतः इसकी अपेक्षा काल द्रव्य एक है, इस तरह अरूपी जीव द्रव्य के कुल दस भेद हुए, अब रूपी अजीव द्रव्य का वर्णन करते हैं-(रुवीयजीवदव्याणं भंते ! कइविहा पएणता ?) हे भगवन् ! रूपी अजीव द्रव्य कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? (गोयमा ! चविहा परणत्ता, गौतम ! चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, जैसे कि-(खंवा खंधदेसा) अनन्त परमाणु रूप स्कन्ध और उसके विभाग रूप देश, तथा--(पएसा परमाणपोग्गला,) देश का विभाग रूप प्रदेश और केवल निरंश भाग रूप परमाणु पुद्गल होते हैं, ( तेणं भंते ! कि संखिजा ) हे भगवन् ! क्या वे रूपी अजीव द्रव्य संख्यात हैं या ( असंखेना) असंख्यात हैं या या । अगता ?) अनंत हैं ? ( गोयमा ! नी संखेजा नो असंखेज्जा अणंता,) हे गौतम न वे संख्यात हैं न वे असंख्यात हैं किन्तु अनंत हैं, (से केण्डेणं भंते ! एवं बुञ्चइ-) हे भगवन् ! ऐसा कहने का क्या अर्थ है कि-(नो संखिज्जा) न तो वे सख्यात हैं, (नो असंखिजा ) न असंख्यात हैं, किन्तु ( अणता ?) अनंत हैं ? ( गोयमा ! अणता परमाणुपोग्गला ) हे गौतम ! परमाणु पुद्गल अनंत हैं तथा (अग्गंता दुपसिया बंधा) द्विप्रादेशिक स्कंध अनंत हैं (514 ६स पारि सा खंधा, यावत् [देश प्रा- देशिक स्कंध भी अनंत हैं) और (संखिज पएसिया) संख्यात प्रादेशिक स्कंध मी अनंत हैं (असंखेज पएसिया)] असंख्यात प्रादेशिक स्कंध भी अनंत हैं और (अणंता अशांतपएति- या खंधा,) अनंत प्रादेशिक स्कंध भी अनंत हैं, (से तेण?ण गोयमा ! एवं वुच्चइ-) इसलिये हे गौतम ! वह ऐसा कहा जाता है कि-(नो संखिजा मी असंखिजा) न वे संख्यात हैं न वे असंख्यात हैं, किन्तु (अणंता ।) अनंत हैं। (जीवदव्याणं भंते : किं संस्त्रेजा असंखेना श्रणता ?) हे भगवन् क्या जीव द्रव्य संख्यात हैं अथवा असंख्यात हैं वा अनंत हैं ? (गीयमा ! नो संखेजा नो असाखळा अणंता,) हे गौतम ! वेग तो संख्यात हैं और न ! + 'वर्तमानकालसमयस्यैव एकस्य सस्वादतीतानागतयोस्तु निश्चयनयमतेन विनष्ट. स्वानु परवान्याससस्वादु ।'
तथा ७ हैं ७ WARMINS [ उत्तरार्धम् ] असंख्यात हैं केवल अनंत हैं, (से केणटेणं भंते ! एवं बुच्चइ-) हे भगवन् वे किस अर्थ से ऐसे कहे जाते हैं कि-(नो संखिजा नो असंखेजा अणंता ?) संख्यात नहीं हैं असंख्यात भी नहीं हैं सिर्फ अनंत ही हैं । (गोयमा ! असं खेजा नेरइया) भोगौतम ! नारकीय असंख्यात असंखेज्जा असुरकुमारा) असुरकुमार देव असंख्यात हैं (जाव असंखिज्जा भणिय- कुमारा,) यावत् असंख्यात स्तनित्कुमार देव हैं, और (असंखिज्जा पुडवीकाइया) असं- ख्यात पृथ्वोकाय के जोब हैं (जाव असंत्रे ज्जा वाउकाइया) यावत् असंख्यात २ वायुकायादि के जीव हैं, किन्तु ( अणंता वणसइकाइया,) वनस्पति काय के अनंत जोव हैं, अखे जा वेइंदिया ) असंख्यात द्वीन्द्रिय ( अमखेजा तेइंदिया) असंख्यात त्रोन्द्रिय, ( असं वे हा चार दिया ) असंख्यात चतुरिन्द्रिय, (असंवेज्जा पंचिंदियतिरिक्खजोणिया) असंख्यात पंचेन्द्रिय तिर्यक् योनिवाले, ' असंखेजा मणुस्सा) * असंख्यात मनुष्य, (अमंखेजा वाणमंतरा) वान व्यंतर असंख्यात, (अमखेजा जोइसिया) ज्योतिषी देव असं- ख्यात हैं, (असंग्वेजा बेमाणिया) वैमानिक असंख्यात हैं और (अणंता सिद्धा,) सिद्ध अनंत हैं. (से तेरगटे गोयमा ! एवं बुञ्च:-) इसलिये हे गौतम ! ऐसा कहा जाता है कि- (नो संखे जा ) न संख्यात हैं नो असंग्वेजा ) न असंख्यात हैं ( अणता । ) केवल अनंत । (सूत्र २४४) भावार्थ-व्य के दो भेद है, जीव द्रव्य और अजीव द्रव्य, जीव द्रव्य संख्यात असंख्यात नहीं है केवल अनंत है. क्योंकि असंख्यात नार- कीय हैं, असंख्यात इस प्रकार के भवन पति देव है, असंख्यात पृथिवीकाय के जीव है इसी प्रकार असंख्यात अपकाय, असंख्यात अग्निकाय, असंख्यात वायु- कायादि के जीव हैं, और वनस्पतिकायिक अनंत हैं । असंख्यात २ द्वीन्द्रिय श्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रियादि हैं, और असंख्यात तिर्यञ्च पंचेन्द्रिय जीव हैं, मनुष्य असंख्यात है, असंख्यात व्यन्तर देव हैं, असंख्यात ज्योतिषी देव हैं, असंख्यात वैमानिक देव है, लेकिन सिद्ध अनंत हैं, इसीलिये जीव द्रव्य संख्यात असंख्यात नहीं है, किन्तु अनंत द्रव्य है । तथा-अजीव द्रव्य भी दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि-अरूवी अजीव द्रव्य, रूपी अजीव द्रव्य । अरूपी अजीच के दस भेद हैं, जैसे कि-धर्मास्तिकाय १ धर्मास्तिकाय देश २ धर्मास्तिकाय प्रदेश ३,अधर्मास्तिकाय अधर्मास्तिकाय देश , अधर्मास्तिकाय प्रदेश ६, आकाशास्ति- काय ७ आकाशास्तिकाय देश = आकाशास्तिकाय प्रदेश और समय १० । किन्तु धर्मास्तिकाय शब्द संग्रह नय से कहा गया है तथा देश प्रदेश शब्द व्यवहार नय । * समूच्छिम और गर्भन । कत्र करने से मनुष्य संख्या असंख्यात होती है ।
HABARONM [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] से प्रतिपादन किये गये हैं। तथा-रूपी अजीव द्रव्य चार प्रकार का है, जैसे कि- स्कन्ध र स्कंध देश २ स्कंध प्रदेश ३ परमाणु पुद्गल ४, इनमें रूपी अजीव द्रव्य भी संख्यात असंख्यात नहीं है, केवल अनंत द्रव्य है, क्योंकि पुद्गल अनंत परमणु हैं। द्वीप्रदेशी से लेकर अनंत प्रादेशिक द्रव्य भी अनंत हैं, इसीलिये रूपी अजीव द्रव्य भी अनन्त हैं । यह सभी विचार औदारिकादि शरीर धारी में सिद्ध होते हैं, अतः अब शरीरों का विषय प्रतिपादन किया जाता है- पांच प्रकार के शरीर । कइविहा णं भंते ! सरीरा पण्णता ? गोयमा! पंच सरोरा पण्णत्ता, तंजहा ओरालिए वेउव्विए आहारए तेभए कम्मए, णेरइआणं भंते ! कइ सरीरा पण्णता ? गोयमा ! तो सरीरा पण्णता, तंजहा-बेउव्विए तेअए कम्मए, असुरकुमारणं भंते ! कइ सरीरा पण्णता ? गो. यमा ! तो सरीरा परागात्ता, तंजहा-बेउत्रिए तेत्रए कम्मए, एवं तिगिण २, एए चेव सरीरा जाव थणियकुमा- राणं भाणिवा । पुढवीकाइयाणं भंते ! कइ सरीरा पएणत्ता ? गोयमा ! तो सरीरा पगणता, तंजहा-ओरा- लिए तेअए कम्मए, एवं आउत उवणस्सइकाइयाणवि एए चेव तिगिण सरीरा भाणियव्या. वाउकाइयाणं भंत! कह सरीरा पण्णत्ता ? गोयमा ! चत्तारि सरीरा पण्णत्ता, तंजहा-ओरालिए वेउविए त अए कम्मए । बेइंदिअते. इंदियचउरिदियाणं जहा पुढवीकाइयाणं, पंचिंदयतिरिक्ख- जोणियाणं जहा वाउकाइयाणं | मणुस्साणं भंत +! कई सरी। पण्णता ? गोयमा ! पंच सरीरा पण्णत्ता, तंजहा. * जान गो० प्र०॥ +जाव गो० मा ।
१२५ [उत्तरार्धम् ] ओरालिए वेउब्विए आहारएत अए कम्मए । वाणमंतराणं जोतिसिआणं वेमाणियाणं जहा नेरइनाणं । पदार्थ-(कइविहा | भंते ! सरीग पण्णता ?) हे भगवन् ! शरीर कितने प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं ? (गोयमा ! पंच सरीरा पण्णत्ता, तनहा-) हे गौतम !पांच प्रकार के शरीर प्रतिपादन किये गये हैं, जैसे कि-(ोगलिए) देव तथा नारकीय जीवों को छोड़कर इसी शरीर को तीर्थकर तथा गणाधरों के धारण करने से अथवा शेष शरीरों को अपेक्षा इसकी एक सहन योजन से कुछ अधिक प्रमाण अवगाहना होने से इसको औदारिक शरीर कहते हैं, तथा- बिए) वैक्रिय शरीर उसे कहते हैं-जो नाना प्रकार की विशिष्ट क्रिया वा विक्रिया के द्वारा नाना प्रकार के रूप धारण करें। ( श्राहारए) किसी बात की शंका होने पर केवली भगवान् के पास निर्णय के लिये भेजने के वास्त चर्तुदश पूर्वविद् मुनि जिस शरीर को रचते हैं और लौटने पर उसके द्वारा अर्थों को धारण करते हैं उसे आहारक शरीर कहते हैं, (तेए) रसादि आहार को पाचन करने वाला पुनः तेजोलेश्या की उत्पत्ति का कारण भूत, ऊष्ण रूप पुद्गलों का विकार तैजस शरीर होता है, पुनः (कम्मए) जो आठ प्रकार कर्मों के समूह से जनित औदारिकादि शरीरों का कारण भत तथा भवान्तर में नाना प्रकार के फलों का दाता उसे कामण शरीर कहते हैं। इस तरह अनुक्रम से पांचों शरीर का ६णन किया गया है, कि तु विशेष इतना ही कि औदारिक शरीर हस्व से ह्रस्वतर तथा दो से दीर्घ तर भी होता है, क्योंकि निगोदके जोवों का शरीर : स्वतर और समुद्र के कमल नाल का शरीर दीर्घतर होता है, इसी कारण प्रथम उसका ग्रहण किया गया है। अब चौवीस दण्डकों के शरीरों का विषय कहते हैं-(ोर इअ. भंते ! कइ मरीरा परणत्ता ?) हे भगवन् ! नारकियों के कितने शरीर प्रतिपादन किये गये हैं (गोयमा ! तो सरीरा पण्णता, तंजहा.) हे गौतम! तीन शरीर प्रतिपादन किये गये है जैसे कि वेचिए) वैक्रिय (तेअर) तैजस और (कम्पए,) कार्मण, (असुरकुमाराणं भंते ! कइसरीरा पएणत्ता ?) हे भगवन् ! असुरकुमार देवों के कितने शरीर कथन किये गये हैं ? (गोयमा ! तनो सरीरा परणत्ता, तंजहा.) हे गौतम! तीन शरीर प्रतिपादन किये गये हैं, जैसे कि-(वेब्धिए तेअए कम्मए,) वैक्रिय तैजस और कार्मण, (एवं तिरिण २ एए चैव सरीरा) इसो प्रकार ये तीन २ शरीरजो पूर्व कहे गये हैं वे (जाव थणियकुमाराणं भाणियव्वा ।) यावत् स्तनित्कुमारों के भी जानना चाहिये, अथात् स्तनित्कुमार तक ये तीन शरीरं होते हैं । (पुढविकाइयाणं भंते ! कइ सरीरा एण्णता ?) हे भगवन् ! पृथिवी ! ७ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] कायके कितने शरीर प्रतिपादन किये गये हैं ? (गोयपा ! तो सरीरा पराणता, तंजहा- हे गौतम! तीन शरीर प्रतिपादन किये गये हैं,जैसेकि-(ओरालिए) औदारिक (तेथए) तेजस और (कम्मए) कार्मण्य, (एवं पाउतेउवणस्सइकाइयाण वि) इसी प्रकार अपकाय तेजस काय और वनस्पति काय के भी (एए चेव तिषिण सरीरा भाणियचा,) ये तीनों शरीर कहना चाहिये, (वाउकाइयाणं भंते ! कइ सरीरा पाणता ?) हे भगवन् ! वायुकायिक जीवोंके कितने शरीर प्रतिपादन किये गये हैं, (गोयमा ! च तारि सरीरा पएणत्ता, तंजहा.) हे गौतम ! चार प्रकार के शरीर प्रपिादन किये गये हैं, जैसे कि-(ओरालि एवेरब्बिए तेश्रए कम्मण। औदारिक वैक्रिय तेजस और कार्मण्य, तथा (वेइंदियतेइंदियचरिंदियाणं जहा पुटवीकाइयाणं,) पृथ्वी काय के जितने शोर होते हैं उतने ही द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय और च- तुरिन्द्रिय जीवों के जानना (पंचिंदियतिरिक्ख जोणियाणं जहा बाउकाइयाणं ।) पंचेन्द्रिय तिर्यक् योनियों के शरीर वायु काय के समान हैं अर्थात् इनके भो चार शरीर होते हैं। ( मणु साणं भंते ! कई सी परणता ? ) हे भगवन् ! मनुष्यों के कितने शरोर प्रति. पादन किये गये हैं ? (गोयमा ! पंच सरीरा परणत्ता, तं नहा-) हे गौतम! पांच ही शरीर प्रतिपादन किये गये हैं, जैसे कि (ोरालिए वेचिए अाहारए तेत्रए कर मए ।) औदारिक, वैक्रिय, आहारक, तैजस और कार्मण्य. किन्तु (वाणमंतगणं जोतिसियाग्गं वेमाणियाण) व्य तर ज्योतिषी और वैमानिक देवों के शरीर (जहा नेरइयाणं ।) जैसे नारिकियों के वर्णन किये गये हैं उसो प्रकार इनके भी जानना चाहिये, अर्थात् इन तीनों के तीन २ शरीर होते हैं। dasana भावार्थ---शरीर पांव प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं, जैसे कि-ौदा. रिक शरीर र वैक्रिय शरीर २ श्राहारक शरीर ३ तेजस शरीर ४ और कार्मगय शरीर ५, औदारिक शरीर उसे कहते हैं जो सर्व से प्रधान और स्थूल तथा जिस की अवगाहना एक योजन से कुछ अधिक हो १, वैक्रिय' शरीर उसे कहते हैं जो नाना प्रकार की क्रिया के द्वारा नाना प्रकार के रूप धारण करे २। इसकी उत्तर वैक्रिय अवस्था एक लाख योजन की और भवधारणीय शरीर की ५०० धनुष तक होती है । चतुर्दश पूर्वधारी अपनी शंका के दूर करने के वास्ते एक नया शरीर रच कर श्री केवली भगवान् के पास भेजते हैं, उसको आहारक शरीर कहते हैं ३, तथा-रसादि श्राहार को पाचन करने वाला तैजस शरीर कहलाता है ४, और अष्ट कर्मों से जनित भवान्तर में विपाक रस का देने वाले कार्मण्य शरीर होता है, अर्थात् कर्मों का कोष रूप है, विशेष इतना ही है कि-इन पांचों में औदारिक शरीर ह्रस्व से ह्रस्वतर और दीर्घ से दीर्घतर होता है, क्योंकि - , उत्तरार्धम् । निगोद के जीवों का शरीर ह्रस्वतर और समुद्र के नाल के जीवों का शरीर दीर्घतर होता है । ये पांच प्रकार के शरीर चतुर्विशति दंडकों में भी पाये जाते हैं- जैसे कि चारों नरकों के नारिकियों के और दश प्रकार के भवन पतिदेवों के केवल वैक्रिय तेजस और कार्मण्य, ये तीन शरीर होते हैं, तथा पृथ्वीकाय, अपकाय, तेजसकाय, वनस्पतिकाय और विकलेन्द्रिय इनके औदारिक तेजस और कार्मण्य ये तीन शरीर होते हैं, अपितु वायु काय और पंचें० तिर्यों के औदारिक, वैक्रिय, तैजस और कार्मण्य ये चार शरीर होते हैं, तथा-मनुष्यों के औदारिक, वैक्रिय आहारक तेजस् और कार्मण्य ये पांच शरीर होते हैं, और व्यन्तर ज्योतिषी वैमानिक देवों के वैक्रिय, तेजस और कार्मण्य ये तीन शरीर होते हैं । अब प्रत्येक २ शरीर के बद्ध और मुक्त भेद सविस्तर निम्न लिखित जानना चाहिये- बद्ध और मुक्त के भेद । ॐ केवइयाणं भते ! ओरालियसरीरा पण्णता ? गो. यमा ! दुविहा पराणत्ता, तंजहा-बल्लिया य मुक्कल्लगाय, तत्थ णं जे ते बद्धलगा तेणं असंखेज्जा अखिजाहि उस्सप्पिणीओसप्पिणीहि अवहीरंति कालो, खेत्तो असंख ज्जा लोगा, तत्थ णं जे ते मुकल्लगा तेणं अता श्रणताहि उसप्पिणीओसप्पिणहि अवहीरंति कालो, खत्तओ अणंता लोगा, दव्वओ, अभवसिद्धिएहि अणंत- गुणा सिद्धाणं अणंतभागो। केवइयाणं भंत ! वेउत्रियः सरीरा पण्णत्ता ? गोयमा ! दुविहा पण्णता, तजहा-बद्ध- ल्लगाय मुक्केल्लगा य, तत्थ णं जे ते बद्धल्लगा तेणं असं- खिज्जा असंखिज्जाहि उस्सप्पिणीोसप्पिणीहि अवही- रंति कालो खत्तमओ असंखज्जाओ सेढीओ पयरस्स असंखज्जइभागो, तत्थ णं जे ते मुक्कलया तण' अणंता ! 'कह रिहा ।
१२८ .! पुहतं, [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] अणंताहिं उस्सप्पिणीओसपिणीहि अवहोरंति कालो सेसं जहा ओरालियस्स मुकल्लयातहा एएवि भाणियब्वा । केवइयाणं भंत ! पाहारगसरीरा पण्णता ? गोयमा ! दुविहा पएणत्ता, तजहा-बद्ध ल्लगा यमुकल्लगाय, तत्थ णं जे ते बद्धल्लया तणं सिप अस्थि सिमनस्थि, जइ अ. स्थि जहणणेणं ऐगो वा दो वा तिषिण वा उक्कोसेणं सहस्स मुकल्लया जहा ओरालियस्त मुक्कल्लया तहा भाणियव्वा । केवइयाणं 'भत ! त अगसरीरा पण्णता ? गोयमा : दुविहा पण्णत्ता, त'जहा-बद्ध ल्ल याय मुकल्ल. या, तत्थ णं जे ते बद्ध ल्लया तणं अणंता अणंताहि उस्स. प्पिणीओसप्पिणीहि अवहीरति कालो खत्तश्रो अणंता लोगा दव्य ओ सिद्धोहि अणंतगुणा सव्वजीवाणं अणंत- भागूणा, तत्थ णं जे ते मुक्केल्लया तणं अणंता अणंताहि उस्सप्पिणीयोसप्पिणीहि अवहीरति कालो खत्तमओ भणतालोगा व्वलो सव्वजीवेहि अणतगुणा सव्व- जीववग्गस्स अणंतभागो । केवइयाणं भंत ! कम्म- गसरीरा पण्णता ? गोयमा ! दुविहा पएणत्ता, तंजहा- बद्धल्लया य मुक्केल्लयो य, जहा ते अगसरीरा तहा कम्मगसरीरावि भाणियब्वा ५। पदार्थ- केवइयाणं भंते ! ओरालिनसरीरा पएणत्ता ! ) हे भगवन् ! औदारिक शरीर कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? (गोयमा ! दुविहा परणता, तंजहा.) हे गोतम ! दोकार से प्रतिपादन किया गया है, जैसे कि-( बदल्लगा य मुक्के ल्लगा य) बद्ध और मुक्त, बद्ध उसे कहते हैं जो तथा विध कर्मों के द्वारा औदारिक शरीर ग्रहण किया गया हो, और मुक्त उसे कहते हैं जिस समय जीव औदारिक शरीर को छोड़ वाला होता व मोनाaar [ उत्तरार्धम् ] में छोड़ा था उसे मुक्त औदारिक शरीर कहते हैं । अब इनकी संख्या का प्रमाण कहते हैं, जैसे कि-(तत्थ णं जे ते बदल्लया) इन दोनों में जो बद्ध औदारिक शरीर हैं (तेणं असंखिजा) वे असंख्येय हैं, क्योंकि इसका प्रमाण यह है कि-(असंखिज्जाहि) यदि प्रति समय एक २ शरीर अपहरण किया जाय तो वे असंख्यया (सप्पिणी नोप्पिणीहि। उत्सर्पिणो और अवसर्पिणो ( अई. बीते कालो ) काल से अपहरण किये जाते हैं, अर्थात् बद्ध औदारिक शरीर जितने असंख्येय उत्सर्पिणी और अवसर्पिणियों के समय हैं उतने हैं, क्योंकि नारिकीय और देवों को छोड़ कर शेष जीव औदा- रिक शरीर से बद्ध है, परन्तु सिद्ध अशरीरी हैं। (खे तो असंखज्जा लोगा, क्षेत्र से असंख्यात लोग प्रमाण, अर्थात् असत्कल्पना के द्वारा यदि एक २ औदारिक शरीर एक २ आकाश प्रदेश पर स्थापन किया जाय तो असंख्यात लोकाकाश के समान, अलोक में से आकाश प्रदेश ग्रहण किये जायँ तो उतने ही औदारिक शरीर हैं, अत एव क्षेत्र से भी सिद्ध हुआ कि असंख्यात लोकाकाश के तुल्य बद्ध औदा- रिक शरीर है। जब औदारिक शरीरों में रहने वाले जोव अनन्त हैं तब औदारिक शरीर अनन्त क्यों नहीं है ? साधारण काय की अपेक्षा प्रत्येक शरीर वालों को छोड़ कर जो साधारण शरोरी हैं, उनके एक एक शरीर में अनन्तानन्त जोव निवास करते हैं, अर्थात् अनन्त जीवों के समुदाय से एक हो औदारिक शरीर होता है, और जो प्रत्येक शरीरी हैं वे असंख्यात ही होते हैं, इसलिये बद्ध चौहारिक शरोर असंख्यात हैं। अब मुक्त औदारिक शरीर का वर्णन करते हैं-(तत्थ णं जे ते मुक्केल्लगा) उन दोनों में जो मुक्त औदारिक शरीर हैं (ते णं अणंता) वे अनन्त हैं, क्योंकि इनका प्रमाण यह है कि-( आणं ताहि उ सप्पिणीयासपिणाहिं अवहोति कालो ) अनन्त उत्स- पिणी और अवसर्पिणियों के काल से अपहरण किये जाते हैं अर्थात् अनन्त उत्सर्पिणी और अवसर्षिणिओं के काल क राशियों के समय के तुल्य मुक्त औदारिक शरीर + इनका प्रमाण द्रव्य क्षेत्र और काल से किया जायगा इसीलिये यह संख्येय पद द है, तथा भाव द्रव्यान्तर्गत होने से पृथक वर्णन नहीं किया गया । अनेन सूत्रेण उत्सर्पिणी नवसपिणी शब्द सिद्ध भवति, तथा च, क-~-हु-त- --स-) क ) पायलुक मा । व्या । । ८ पा० । २ लूर । ७७ धनादोशेषा- दशयो त्यम् । ६ । अवापोते | अ. । । पा० । १ । ० । १७२ ।
न्यून हैं। प्रज्ञापना मूत्र [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् | होते हैं और (खेत्ती अणंता लोगा,) क्षेत्र से अनन्त लोक के समान, अर्थात् क्षेत्र की अपेक्षा लोक प्रमाण प्रदेशों के खण्ड की राशि के तुल्य मुक्त औदारिक शरीर हैं इसी लिये 'अनन्ता लोमा' सूत्र रक्खा गया है। अब द्रव्य से प्रमाण कहते हैं- (दव्वश्रो) द्रव्य से ( अभवसिडिएहिं) अभव्य सिद्धिक जोवों से (अणंतगुणा,) अनन्त गुणे और (सिद्धाणं अणंतभागो।) सिद्धों के अजन्तवें भाग में हैं, अर्थात् सिद्ध जीवों की अपेक्षा औदारिक शरीर के तृतीय पद के महादण्डक में अभव्य जीवों से सम्यक्त्व पतित अनन्त गुणे माने हैं तो फिर इस अंक को छोड़ कर मुक्त औदा- रिक शरोरों के लिये अभव्य से अधिक सिद्धों से न्यून ऐसा प्रमाण क्यों दिया ? महादण्डक में ७४ व अंक अभव्य जीवों का, पचहत्तरवां सम्यक्त्व से पतितों का और ७६ वां सिद्धों का है, अतः मुक्त औदारिक शरीर कभो तो सम्यक्त्व पतितों से अधिक हो जाते हैं और कभो न्यून होते हैं, किन्तु सिद्धों के अनन्त भाग में ही रहते हैं, इसलिये सिद्धों का अंक ग्रहण किया गया है। हे भगवन् ! मुक्त ओदारक शरीर का अनन्त काल पर्यन्त स्थिर रहना किस प्रकार से मानते हो ? क्या मुक्त शरीर सम्पूर्ण अनन्त काल पर्यन्त रह सकता वा उसके खंड २ किये हुए परमाणु ग्रहण किये जाते हैं ? आदि पक्ष स्वीकृत नहीं हो सकता, क्योंकि शरीर धारो तो अनन्त काल नहीं रहता, यदि द्वितीय पक्ष ग्रहण किया जाय तो अतोत काल में ऐसा कोई परमाणु पुद्गल नहीं रहा जो जीव को अनन्त २ वार औदारिक भाव में परिणमित न हुआ हो ? ये दोनों ही प्रश्न अग्राह्य हैं, क्योंकि मुक्त औदारिक शरीर उसे कहते हैं जो औदारिक शरीर के अनन्त खंड होने पर भी वे अन्यभाव में परिणमित न हों वहां तक उसको शरीर कहते हैं, जैसे उपचारक नय से "एक देश दाहेपि ग्रामो दग्धः पटो दग्धः" इत्यादि, एक देश मात्र गांव के जलने पर गांव जल गया या पट जल गया ऐसा कहा जाता है, उसी प्रकार जितने खंड औदारिक शरीर के अन्य भावमें परिणमित नहीं हुए वे औदारिक शरीर के पुद्गल कहे जाते हैं, और एक २ औदारिक शरीर के अनन्त २ खंड होने पर अनन्त भेद होते हैं, अतः अनन्त मुक्त औदारिक शरीर हैं, जो कि अभव्यों से अनन्त गुणे और सिद्धों से अनन्त भाग न्यून हैं। इस से सिद्ध हुआ कि जिन पुद्गलों ने औदारिक भाव को छोड़ दिया वे पुद्गल अन्यभाव में परिणमित हो गये तब औदारिक शरीर का व्यवच्छेद होना यह हैं [ उत्तरार्धम् ] बर्णन औधिक भाव से कहा गया है, किन्तु विभाग से वणन श्रागे कहा जायगा। वैक्रिय शरीर का विस्तार से वर्णन करते हैं ( केवइयाणं भंते ! बेउब्वियसरीश पुराणता ? ) हे भगवन् ! वैक्रिय शरीर कितने प्रकार से प्रतिवादन किया गया हैं ? क्योंकि नारकीय और दवता सदैव ही बद्ध वैक्रिय शरीर युक्त होते हैं, और मनुष्य तिर्यक् उ तर वैक्रिय करते समय वैक्रिय शरीर युक्त होते हैं, इसलिये चारों गतियों के जीवों के वैक्रिय शरीर कितने होते हैं ? गंध्यमा ! दुविहा परणत्ता, तंजहा- ) हे गौतम ! दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, जैसे कि-( बदल्लया य ) बद्ध वैक्रिय शरीर और ( मुक्केल्लया य ) मुक्त वैविय शरीर (aणं जे ते बदल्लया) उन दोनों में जो बद्ध वैक्रिय शरीर हैं (तेर अखिज्जा) वे असं. ख्येय हैं, अब काल से प्रमाण कहते हैं, जैसे-(प्रसंखेजाहिं ) असंख्येय ( उम्सप्पिणी प्रोसप्पिणीहिं ) उत्सपीणी और अवपिणीयों से ( अवहीरंति ) अपहरण किये जाते ( कालो ) काल से अर्थात् असंख्येय काल चक्रों के समय की राशि के तुल्य बद्ध वैक्रिय शरीर हैं, और (खेतो) क्षेत्र से (अप्तंखिजाओ संदीग्रो) प्रमाणांगुल के अधिकार में उन असंख्येय प्रदेशों को श्रेणी से जो धन प्रतर वर्णन किया गया है, (पयरस्स अखेजभागो.) उस प्रतर के असंख्येय भाग में जितने आकाशास्तिकाय के श्रेणियों के प्रदेश हैं, उतने बद्ध वैक्रिय शरीर हैं। फिर (तस्प ए जे ते भुक्कल्लया) उन दोनों में जो मुक्त वै क्रेय शरोर हैं (नेश अशंता अएताहि) वे अनन्त हैं और अनन्न (उम्सपिणी) उत्सपिरिणओं और (अं.स. वणी है) अबसपिणियों के (अवहीति काली) काल से अ- पहरण कियेजाते हैं (नेस) शेष (महा) जैसे (ोरालियास) औदारिक शरीर की ( मुक- ल्लया) मुक्तता वर्णन की गई है (तहा, उसी प्रकार ( एएऽवि भाणिया २ ) इनकी भी कहनाचाहिये, अर्थात् अनन्त हैं, (केवइयाणं भंते ! अाहारगसरीरा पगणता ?) हे भगवन् ! आहारक शरोर कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया हैं ? (गोयमा ! दुविहा परणता,) हे गौतम ! दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है. (तंजहा.) जैसे कि -(बद्ध ल्लया यते बद्ध आहारक शरीर और (मुकल्लया य,) मुक्त आहारक शरीर, (तत्थ णं जे ते) बदल्लया) इन दोनों में जो बद्ध आहारक शरीर है (ते णं सिय अस्थि ) वे कदाचित् होते हैं (सिय नस्थि-) कदाचित् नहीं होते, सूत्रमें बहु वचन की क्रिया के स्थानमें एक वचन की क्रिया दी गई है। इसमें कदाचित् शब्द इस लिये दिया गया है कि इसका अंतर काल भी होता है, अब उनके प्रमाण की संख्या कहते हैं-(जइ अस्थि जह-गणेणं) यदि हों तो जघन्य से (एगो वा दो वा तिरिण बा) एक अथवा दो या तीन और (उकोसेणं) उत्कृष्ट से (सहस्स पुहत्तं) पृथक सहस्र हों, याने दो हजार से नव हजार पर्यन्त होते हैं, इसीका नाम पृथक् संज्ञा है,(रूक्केल्लया) मुक्त आहारक शरीर (जहा) जैसे (ोरालि.
! [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] यस्स) औदारिक शरीर का वर्णन किया गया है ( तहा भाणियव्या ३ । ) उसी प्रकार जानना चाहिये ३ । (केवइयाणं भंते ! तेषगरीरा परणत्ता ?) हे भगवन् तैजस शरीर कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया, है, (गोयमा ! दुविहा परणत्ता,) हे गौतम ! प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तंजहा-) जैसे कि-(वडल्जया य मुक्केल्नया य) बद्ध तैजस शरीर और मुक्त तैजस शरीर, (तत्य णं जे ते बद्दलया) उनमें जो बद्ध शरार हैं ( तेणं अणंता ) वे अनन्त हैं, अब अनन्त का प्रमाण कहते हैं-(अणताहिं ) अनन्त (उस्सप्पिणीोसप्पिणीहिं) उत्सप्पिणी और अबसपिणीयों के (अवहीरंति कालो) काल से अपहरण किये जाते हैं, और (वेत्तो) क्षेत्र से (अणंता लोगा) अनंत लोका काश के प्रदेशों की राशि के तुल्य हैं, और (दव्यानो सिद्धोहिं अगतगुणा) द्रव्य से सिद्धों से अनन्त गुणे हैं, (सव्यजीवाणं) सब जीवों की अपेक्षा (अणंत भागृणा) अनन्त भाग न्यून हैं, क्योंकि-सवं जीवों के अनंत भाग प्रमाण सिद्ध हैं,इनके के तैजस शरीर नहीं होता इस लिये सभी जीव वर्ग से तैजस शरीर अनंत भाग न्यून हैं, तथापि यह प्रश्न यहां पर उत्पन्न नहीं हो सकता क्योंकि "औदारिक असंख्यात" हैं फिर तैजस शरीर अनन्त क्यों हुए ?, क्योंकि एक औदारिक शरीर में अनन्त जीव निवास करते हैं, और प्रत्येक २ जीव के साथ पृथक २ तैजस शरीर होते हैं, इसलिये यहाँ पर कोई भी शंका उत्पन्न नहीं हो सकती । संसारी जीव सिद्धों से अनन्त गुरणे हैं इसलिये तैजस शरीर भी सिद्धों से अनंत गुणे हैं, क्योंकि उनके तैजस शरीर नहीं होता इस लिये तैजस शरीर सभी जीव वर्ग से अनन्त भाग न्यून हैं, तथा-(तत्य रणं जे ते मुक्त - लाया) उन दोनों में जो मुक्त तैजस शरीर हैं ( ते अणता) वे अन्नत हैं, अनंत का प्रमाण यह है कि (अणं साहि) अनंत (उत्सपियोसप्पिणी हिं) उत्सपिणी और अवस- प्पिणो ( अवहीति कालो) काल से अपहरण किये जाते हैं (खेतो) क्षेत्र से (अणंता लोगा) अनंत लोकाकाश के प्रदेशों की राशि के तुल्य, और (दव्यत्रो) द्रव्य से (सबजीवहिं अणंतगुणा) सभी जीवों से अनन्त गुणे हैं, क्योंकि एक २ जीव के अनंत २ मुक्त तैजस शरीर होते हैं, लेकिन (सबजीबवास्स अणंतभागो) सभी जीवों के वर्ग का अनंतवाँ भाग हैं, क्योंकि-वर्ग उसे कहते हैं, जैसे कि चार ४ को चार सेगुणा किया जाय तो १६ हुए, इसलिये सोलह का वर्ग कहा जाता है । इसी तरह दस सहस्र को १० सहस्र गुणा किया जाय तो दस क्रोड होते हैं, इसी का नाम वर्ग है। इसी प्रकार सद्भाव से जीव राशि अनंत है, इस राशि को तद् गुणा किया जाय तो उसे वर्ग कहते हैं इसलिये सभी जीवों के साथ - सिद्ध भी ग्रहण किये गये । परन्तुसिद्धों के और तैजस शरीर नहीं होते, इस लिये सभी जीव वर्गसे मुक्त तैजस शरीर अन्तत भाग न्यून हैं, क्योंकि सिद्ध भगवान् सर्व जीवों के अनंतव भाग में हैं,इस लिये [ उत्तरार्धम् ] तेजस शरीर भी सभी जीवों के अनंतवें भाग में है। तुल्य का वर्णन इस लिये नहीं किया गया कि असंख्यात काल के पश्चात् तैजस शरीर के पुद्गल अपने २ परिणाम को छोड़ कर अन्य भाव में परिणमित होते हैं, इसलिये अनन्तों के अनंत भेद होते ४। ( केवइयाणं भंते ! कम्मगसरीरा पएणत्ता १ ) हे भगवन् ! कार्मण्य शरीर कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? (गोयमा ! दुविधा पएर त्ता, ) हे गौतम ! दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया हैं, (जहा.) जैसे कि-(बह लया य) बद्ध कार्मण्य शरीर और (मुकल्लया य) मुक्त कार्मण्य शरीर, (जहा) जैसे (तेया सरीरा, तैजस शरीर होते हैं ( तहा कम्मगसरीगवि भाणियव्या ! ) उसी प्रकार कामण्य शरीर के भी भेद कहने चाहिये, अर्थात् तेजस शरीर के तुल्य ही कार्मण्य शरीर होता है ।। भावार्थ-शरीर के पाँच भेद हैं, जैसे कि---औदारिक १ वैत्रिय २ श्राहा. रक ३ तैजस ४ और कार्मण्य ५ इन पाँच शरीरों में से नारकीय. दस भवनपति व्यन्तर, ज्योतिषो, और वैमानिक देवों के वैक्रिया तैजस और कार्मराय ये तीन शरीर होते हैं, तथा चार स्थावर और विकलेन्द्रिय के तीन, पंचेन्द्रिय तिर्यके और वायु काय के चार, तथा मनुष्यों के पांच शरीर होते हैं । औदारिक शरीर के दो भेद हैं, जैसे कि बद्ध और मुक्त ! औदारिक शरीर यदि असत्यल्पना के द्वारा प्रति समय एक २ अपहरण किया जाय तो असंख्येय उत्साक्षिणी और शवस- पिणी काल से अपहरण किये जाते हैं, यह काल प्रमाण बतायाया है, लेकिन क्षेत्र से असंख्यात लोकों के प्रदेशों के तुल्य है. तथा जो मुक्त औदारिक शरीर हैं, वे अनंत हैं, काल से जितने अनन्त काल चक्रों के समय है उतने मुक्त नौदारिक शरीर है, तथा क्षेत्र से अनन्त लोक के जितने देश हैं उतने उक्त शरीर हैं जो कि अभव्यों से अनन्त गुणे और सिद्धों के अनंतवें भाग में हैं १ । वैकि र शरीर के भी दो भेद हैं, बद्ध और मुक्त, बद्ध तो असंख्येय हैं जो कि प्रतर के असं- ख्यातवें भाग के प्रदेशों के तुल्य हैं, और काल से असंख्येय काल चक्रों के समयों के समान है । तथा-मुक्त वैक्रिय शरीर मक्त औदारिक शरीर के सदृश है २ । तथा-बद्ध श्राहारक शरीर कदाचितू होते हैं कदाचित् नहीं होते, यदि हो तो जघन्य से एक या दो या तीन और उत्क्रष्ट से पृथक सहस्र तक होते हैं। और मुक्त श्राहारक शरीर मुक्त औदारिक शरीरवत् जानना चाहिये ३ तेजस * बद्ध आहारक शरीर चतुर्दश पूर्वविद को ही होता है, इसका अन्तर काल जघन्य से एक समय का औ र उत्कृष्ट से छः माप्त तक होता है।
उनमें बद्ध [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] शरीर के भी दो भेद हैं-बद्ध और मुक्त, और दोनों ही अनन्त हैं, मुक्त श्रत एवं काल से वद्ध अनन्त उत्सामिणी और अवसापिणियों के समयों के तुल्य, और क्षेत्र से अनंत लोकके प्रदेशों के समान पुनः द्रव्य से सिद्धों से अनन्त गुणे और सभी जीवों को अपेक्षा अनंतवें भाग न्यून हैं तथा क्षेत्र और काल से मुक्त तैनस शरीर अन त हैं किन्तु द्रव्य से सभी जीवों से अन्त गुणे और जीव वर्ग के अनन्तवें भाग में है। इसी तरह जिस प्रकार तैजस शरीर का वर्णन किया गया है उसी प्रकार कागय शरीर का भी जानना, क्योंकि ये दोनों शरीर युग- पत् साथ रहने वाले हैं। इस प्रकार औधिकसे पांव शरीरों का वर्णन किया गया है, अब विशेषतया वर्णन करते हैं- , पांच शरीरा का विशेष वर्णान । नेरइआणं भंते ! केवइया ओरालिअसरीरा पण्णता ? गोयमा ! दुविहा परणता, तंजहा-बद्धल्लया य मुक्के- ल्लया य, तत्थ णं जे बद्ध ल्लया तेणं नत्थि, तत्थ णं जे ते मुकल्लया ते जहा ओहिआ ओरालि असरीरा तहा भाणियवा, नेरइयाग भंते ! केवइया बेउब्धियसरीरा पएणता ? गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता, तंजहा-बदल्लया य मुक्केल्लया य, तत्थ णं जे ते बदल्लगा तेणं असंखि- जजा असंखिजाहिं उस्सप्पिणीओसपिणीहि अवहीरंति कालो खेत्तो असंखेजाओ सेढीओ पयरस्स असंखिज्जइ भागो, तासि णं सेढोणं विक्खं भसूई अंगुलपढमवग्ग- मूलं बिइअवगमूलपटुप्पएणं अहवणं अंगुलबिइअवग्ग- मूलघणप्पमाणमेत्ताओ सेढीओ, तत्थ णं जे ते मुक्केल्लया ते णं जहा ओहिया ओरालिअसरीरा तहा भाणियव्वा, नेरइआणं भंते ! केवइया आहारगसरीरा पण्णता ? गो- यमा दुविहा पण्णत्ता, तंजहा-बद्धल्लया य मुक्केल्लयो २३५ , पदार्थ-निरइया मते ! ववश्या ओगलियातीय परमत्ता ?) हे भगवन् । नार- [ उत्तरार्धम् ] य, तत्थ णं जे ते बल्लया ते णं नत्थि, तत्थ णं जेते मुक्केल्लयो ते जहा प्रोहिया ओरालिया तहा भाणियव्वा, तेअगकम्मसरीरा जहा एएसि चेव वेउब्वियसरीरा तहा भाणियव्वा । असुरकुमाराणं भंते । केवइया ओरालिअसरीरा प- एणत्ता ? गोयमा ! जहा नेरइयाणं ओरालिअसरीरा तहा भाणियव्वा, असुरकुमाराणं भंते ! केवइया वेउव्विय- सरीरा पण्णता ? गोयमा ! दुविहां पराणत्तां, तंजहा -बद्धे- ल्लया य मुक्केल्लया य, तत्थ जोते बल्लिया तणं असंखिजा असंखेजाहिं उस्सपिणीओसप्पिणीहि अबही- रति कालो, खेत्तो असंखेजाओ सेढीओ पयरस्स असंखिज्जइभानो, ताप्तिणं सेढीगां विक्खंभसूईअंगुल- पढमवग्गमूलस्स असंखिजइभागो, मुकेवल्लया जहा ओहिया ओरालियसरीरा असुरकुमाराणं भंत ! केवइया आहारगसरीरा पण्णता ? गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता, त. जहा-बद्ध ल्लया य, मुकल्लया य-जहा एएसिं चेत्र ओरा- लियमरीरा तहा भाणियव्वा, त यगकम्मसरीरा जहा एएसि चेव वेउब्वियसरीरा तहा भाणियन्वा, जहा असुरकुमाराणं तहा जाव थणियकुमाराणं ताव भाणियव्वा । कियों के औदारिक शरीर कितने प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं ? (गोयमा ! दुविहा पएणता, जहा-) हे गौतम ! दो प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं, जैसे कि (बद्धल्या य मुकल्लया य,) बद्ध औदारिक शरीर और मुक्त औदारिक शरीर (तस्थ णं जे ते बदल्लया) इन दोनों में जो बद्ध औदारिक शरीर हैं (लेणं नस्थि,) वह वर्तमान समय में वैक्रिय के सद्भाव होने से नहीं हैं, (तत्थ रणं जे ते मुक हलया ) तथा उन दोनों में जो मुक्त [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] औदारिक शरीर हैं (ते जहा ओहिया ओरालियसरीग) वे जैसे औधिक औदारिक शरीर होते हैं ( तहा भाणियव्व , ) उसी प्रकार कहने चाहिये, अर्थात् मुक्त औदारिक शरीर पिछले भावों की अपेक्षा जानने चाहिये। ( नेइयाणं भंते ! कंवइया वेचियस शेरा पर गत्ता ?) हे भगवन् ! नारकियों के वैक्रिय शरीर कितने प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं ? ( गोयमा ! दुविहा परणता, तंजहा-) हे गौतम ! दो प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं, जैसे कि-(बदल्न या य मुल्न या य, ) बद्ध वैक्रिय शरीर और मुक्त वैक्रिय शरीर, (त: जे ते बद्दल या ) फिर उन दोनों में जो बद्ध वैक्रिय शरीर हैं. (नेएं असं खिजा) वे असंख्येय हैं क्योंकि-(प्रसंखिजा है उसादपणी) असंख्येय उत्सस्पिणियों और (प्रोसवित-गीहि अाहोरंति काल गो) अवस्पिणियों के काल से अपहरण किये जा सकते हैं, लेकिन (खेत्त ग्रो) क्षेत्र से (असंखेज्जाओ) असंख्येय (सेढी यो) श्रेणियें, जो (पयरम्स) प्रतर के ( असंखेज इ भागो, ) असंख्येय भाग में हों तो जितने उनके आकाश प्रदेश हैं उतने ही बद्ध वैक्रिय शरीर हैं, इसका प्रमाण यह है ( तासिणं सेठीणं विक्वाभत्र उन श्रेणियों की विष्कुभ सूची ( अंगुलपढपवनामूल) अंगुल प्रमाण तर में श्रेणियां की जो राशि हैं उसमें असंख्येय वर्ग मूल हैं, किन्तु यहांपर प्रथम वर्ग को (विश्यबरामूलं गड्डप्परणं ) द्वितीय वर्ग मूल के साथ गुणा करने से जितनी श्रोणिये उपलब्ध हो उतनी ही श्रेणियों को विष्कम्भ सूचि होती है, अर्थात् इतनो ही श्रेणियें ग्रहण करना चाहिये । अब असत्कल्पना के द्वारा यह सिद्ध करते हैं कि अंगुल प्रमाण प्रतर में २५६ श्रेणियें हैं, इसका प्रथय वर्ग मूल १६, और द्वितीय वर्ग मूल ४ हुआ, यदि प्रथम वर्ग मूल को दूसरे से गुणा किया जाय तो ६४ हुए, क्योंकि-१६४४ ६४ याने जितनी श्रोणिये हैं उतनी ही विस्तार सूचि जानना चाहिये । यह सिर्फ असत्क ल्पना के द्वारासिद्ध किया गया है, लेकिन निश्चय से तो उसमें असंख्येय श्रेणियें हैं, *अहव ण) अथवा (अंगुलबिइयवगभूलघणप्रमाणमित्तानी सेढीओ) अंगुल प्रमाण प्रतर क्षेत्र वर्ती श्रेणी राशि का द्वितीय वर्ग मूल,-जो चतुष्पद रूप पहिले दिखलाया गया -६४ जिसका घन है, उतनी ही असंख्य श्रेणिये यहाँ ग्रहण की जाती हैं, अर्थात् द्वितोय वर्ग मूल को गुणा करने से चौसठ होते हैं, क्योंकि द्वितीय वर्ग मूल षोडश का है । इस लिए धनमात्र में जितनी श्रणियां हैं तथा उनमें जितने असंख्येय प्रदेश हैं उतने ही बद्ध वैक्रिय शरीर नारकियों के हैं, (तस्थ णं जे ते मुक्कल्लया) उन दोनों में जो मुक्त वैक्रिय शरीर हैं, ( तेणं जहा प्रोहिया ) वे जैसे औधिक (ओरालियसरीरा तहा *'ण' इति वाक्याल्वारे 'णं' नं वाक्य के अलकर अयं में हैं। + घनरूप श्रोणियों में असंख्येय श्रेणियें होती हैं। इस कारण नारकियो के भी उसने ही बद शरीर होते । Swedise [उत्तरार्धम् ] १३७ भाणियवा,) औदारिक शरीर होते हैं उसी प्रकार वर्णन कहना चाहिये, (नेर इयाणं भंते ! केवइया पाहारगसरीरा पएणत्ता ?) हे भगवन् ! नारकियों के आहारक शरीर कितने प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं ? (गोयमा! दुविहा पगए,त्ता, तंजहा-) हे गौतम! दो प्रकार से प्रति- पादन किये गये हैं, जैसे कि-(बदल या य मुक्केल्लया य,) बद्ध आहारक शरीर और मुक्त आहारक शरीर, तत्थ एणं जे ते बदल्लया) उन दोनों में जो बद्ध शरीर हैं ( तेणं नत्थि,) वे *वर्तमान में नहीं हैं, (सत्य णं जे ते मुकल्लया) तथा-उन दोनों में जो मुक्त आहारक शरीर हैं ( ते जहा मोहिया ओरालिया ) वे जैसे औधिक औदारिक शरीर होते हैं, (तहा भाणियव्या,) उसी प्रकार कहना-जानना चाहिये । ( तेयगकम्मगसीरा ) तैजस और कार्मण्य शरीर ( जहा एएसिं चेत्र ) जैसे इनके ( वेउब्बियसरीरा ) वैक्रिय शरीर होते हैं (तहा भाणियबा ।) उसी प्रकार जानना चाहिये, ( असुरकुमाएं भंते ! केवइया ओगलियस,रा पण्णत्ता ? ) हे भगवन् ! असुर- कुमार देवों के कितने औदारिक शरीर प्रतिपादन किये गये हैं ? ( गोयना ! जह मेरइयाणं ) हे गौतम ! जैसे नारकियों के । ओरालियसरी ।) औदारिक शरीर होते हैं (तहा भाणियया, ) उसी प्रकार असुर कुमारों के शरीरों का वर्णन कहना चाहिये, (असुरकुपाराणं भंते ! केवइया वेउब्धियसरीरा पएणता ?) हे भगवन् ! असुरकुमार देवों के वैक्रिय शरीर कितने प्रकारसे प्रतिपादन किये गये हैं? (गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता, तंजहा-) हे गौतम ! दो प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं, जैसे कि-( बदल्लया य मुक्केल्लया य,) बद्ध वैक्रिय शरीर और मुक्त वैक्रिय शरीर, ( तःथ णं जे ते बदल्लया ) उन दोनों में जो बद्ध वैक्रिय शरीर हैं (ते णं असंखेजा) वे असंख्येय हैं, लेकिन नारकियों से स्तोक हैं। इस लिये इनका प्रमाण निम्न प्रकार से है-(असंखेज्जाहिं ) असंख्येय (उस्सप्पिणीश्रोस- प्पिणीहिं) उत्सप्पिणी और अबसप्पिणियों के (अवहीरं ति कालो) कालसे अपहरण किये जा सकते हैं, अपितु ( खेत्तो ) क्षेत्र से (असंखेज्जाओ) असंख्येय (सेढीयो) श्रेणियों के (पयरस्स) प्रतर का ( असंखे जइभागो,) असंख्यातवां भाग, फिर ( तासिणं सेढीणं ) उन श्रेणियों की (विक्खम्भसुई ) विष्कम्भ सूचि अर्थात् विस्तार श्रेणि ( अंगुलपढमवग्ग. मुलस्स ) अंगुल प्रमाण वर्ग मूल का ( असंखेजइभागो,) असंख्यातवां भाग है, और * क्योंकि यह शरीर चतुर्दश पूर्व धारी को ही होता है पहिले वैक्रिय शरीरों का वर्णन किया गया है उसी प्रकार तैजस और कार्मण्य शरीरों का भी वर्णन जानना चाहिये, जैसे कि यह असंख्येय और मुक्त अनन्त हैं। * इनमें से प्रतर के अङ्गुल प्रमाण क्षेत्र में प्रथम वर्ग मूल के असंख्येय भाग में जितनी प्रकाश प्रदेशकी श्रेणियां हैं उसी प्रमाण की विस्तार सूचि यहां पर ग्रहण करनी चाहिये और वह नारकोक्त सूचि के असंख्यातवें भाग में सिद्ध होती है, इस लिये असुरकुमार नारकियों के असं. ख्येय भाग में सिद्ध होते हैं। ) , १३८ [श्रीमद योगद्वारसूत्रम् ] (मुक्केल्लया) मुक्त वैक्रिय शरीर ( जहा प्रोहिया ओरालियसरीरा ) जैसे औधिक औदारिक शरीर होते हैं उसी प्रकार यहां भी जानना चाहिये । (असुरकुमाराणं भंते ! केवइया पाहारगसीरा परणता ?) हे भगवन् ! असुरकुमारों के आहारक शरीर कितने प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं ? (गोयमा ! दुविहा परणत्ता, तंजहा-) हे गौतम ! दो प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं, जैसे कि-(बल्लया य मुक्केल्लया य,) बद्ध आहारक शरीर और मुक्त आहारक शरीर, (जहा एएसिं चेत्र) जैसे इनके (ोरालियसरीरा तहा भाणिव्या,) औदारिक शरीर होते हैं, उसी प्रकार आहारक शरीरों का भी वर्णन जानना चाहिये, तथा-(तेयगकम्मगसरीरा) तैजस और कार्मण शरीर (जहा एएसिं चेव वेउब्वियसरीरा) जैसे इनके वैक्रिय शरीर होते हैं ( तहा भाणियव्वा,) उसी प्रकार तै जल और कार्मण शरीरों का वर्णन जानना चाहिये। (जहा असुरकुमाराणं) जैसा असुर- कुमारों का वर्णन है, (तहा जाब ) उसी प्रकार यावत् (परिणयकुमारणं ताव भाणियव्वा,) स्तनिकुमारों तक की व्याख्या कहनी चाहिये, अर्थात् असुरकुमार वत् नव निकायके देवों का वर्णन है। भावार्थ-जारकियों के औदारिक शरीर दो प्रकार से प्रतिपादन किये गये जसे कि-बद्ध और मुक्त, बद्ध तो होते ही नहीं, किन्तु मुक्त जैसे औधिक औदा- रिक शरीर होते हैं उसी प्रकार जानने चाहिये, इसी प्रकार वैक्रिय शरीर भी होते हैं, लेकिन बद्ध वैक्रिय शरीर काल से असंख्येय काल चक्रों के समय प्रमाण हैं, और क्षेत्र से जो असंख्येय योजनों की श्रेणिये हैं उन श्रोणियों के प्रतर से असं- ख्येय भाग प्रमाण, फिर उस अंगुल प्रमाण प्रतर के श्रेणियों की विष्कंभ सूचि करने से प्रथम वर्ग भूल को द्वितीय वर्ग मूल के साथ गुणा किया जाय तो जितने उसमें आकाश प्रदेश हैं उतने ही बद्ध वैक्रिय शरीर होते हैं । अथवा एक अंगु मात्र प्रतर के प्रथम वर्ग को घन रूप करें तो जितनी उसमें श्रेणियाँ है उतने ही उसमें आकाश प्रदेश हैं तो इतने ही नारकियों के बद्ध वैक्रिय शरीर होते हैं, जैसे कि-असत्कल्पना के द्वारा प्रथम वर्ग मूल के १६ अंक हैं इनको चार गुणा करने से धन रूप ६४ होजाते हैं, इसी को धन प्रमाण कहते हैं। मुक्त वैक्रिय शरीर भौधिक औदारिक शरीर वत् होते हैं। तथा नारकियोंके बद्ध आहारक शरीर तो होते ही नहीं, किन्तु मुक्त आहारक शरीर मक्त औधिक औदारिक + प्रज्ञापना सूत्र के महादण्डक में कहा है कि-"भवनपत्यादि सिर्फ रत्नप्रभानारकी से असरूयातों भाग में हैं, तो फिर असुरकुमारों की तो बात ही क्या ।"
- होते हैं, [ उत्तरार्धम् ] शरीर वत् जानना चाहिये । तैजस और कार्मण शरीर बद्ध चैक्रिय शरीर वत् होते हैं। असुरकुमार देवों के श्रीक्षारिक शरीर नारकियों के ही समान जानने चाहिये, लेकिन जो बद्ध वैक्रिय शरीर हैं वे कालले असंख्येय काल चक्रोंके समय प्रमाण प्रतिपादन किये गये हैं, तथा क्षेत्र से असंख्येय योजनों की श्रोणियों के प्रतरका असंख्यातवाँ भाग है, किन्तु उन श्रेणियों की विष्कम्भ सूचि सिर्फ अंगुल प्रमाण ही प्रतिपादन की गई है, इस लिये उसके प्रथम वर्ग के असंख्येय भाग में जितनी आकाश की श्रेणियां हो उतने हो असुर कुमारों के बद्ध वैक्रिय शरीर तया-जुक्त वैक्रिय शरीर मुक्त श्रोधिक औदारिक शरीर वत् जानना। और श्राहारक शरीर औदारिक वत् होते हैं । तेजस और कार्मण शरीर क्रिय शरीरवत् हैं। जिस प्रकार असुरकुमारों के शरीरों का वर्णन किया गया है उसी प्रकार स्तनित्कुमारादि देवोंका भी जानना चाहिये। अब पांच स्थावरोंके बद्ध और भुक्त शरीरों का वर्णन किया जाता है- राकरों के बद्ध बद्ध और मुक्त शारीर पुढविकाइयाणं भंते ! केवड्या पोरालियमरीन पएणत्ता ? गोयमा ! दुविहा परणता, तजहा-बद्धलाया य मुकल्लया य, एवं जहा ओहिया ओरालियसरीरा तहा भाणियबा, पुढविकाइयाणं भंत ! केवइया वेउब्विय- सरीरा पण्णता ? गोयमा ! दुविहा पण्णता, तजहा-बद्ध- ल्लया य, मुकल्लया य, तत्थ रणं जे ते बद्धल्लया तणं पत्थि, मुक्केल्लया जहा ओहिआणं ओरालियसरीरा तहा भाणियव्वा, आहारगसरीरावि एवं चेव भाणियव्वा, तेश्रग- कम्मसरीरा जहा एएसिं चेव शोरालिअसरीरा तहा भाणि- यव्वा, जहा पुढविकाइयाणं एवं आउकाइयाणं त उकाइ- याण य सव्वसरीरा भाणियव्वा। वाउकाइयाणं भंते! केवइया - १४० ७ [श्रीमदनुयोगद्वार सूत्रम् ] ओरालियसरीरा पण्णता ? गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता, तंजहा-बद्ध ल्लया य मुक्केल्लया य, जहा पुढविकाइयाण ओरालियसरीरा तहा भाणियब्बा, वाउकाइयाणं भंते ! केवइया वेउव्वियसरीरा पण्णता ? गोयमा ! दुविहा पएणत्ता, जहा-बद्दल्लया य मुक्केल्लया य, तत्थ णे जे ते बहेल्लया तणं असंखिज्जा समए २ अवहीरमाणा २ खेत्तपलिओवमस्स असंखिजइभागमत्तेणं कालेणं अव- होरंति नो चेव णं अवहिया सिया, मुक्केल्लया वेउव्विय. सरीरा आहारगसरीरा य जहा पुढविकाइयाणे तहा भाणिगव्वा, तेअगकम्मगसरीरा जहा पदविकाइयाणं तहा भाणियव्वा । वणस्सइकाइयाणं ओरालियवेउब्विय- आहारगसरीरा जहा पुढविकाइयाणं तहा भाणियव्वा, वणस्सइकाइयाणं भंते ! केवइया छतेअगसरीरा पण्णत्ता ? गोयमा ! दुविहा पगणता, तंजहा-पहेल्लथा य मुक्कल्लया य, जहा ओहिया तेअगकम्मसरीरा तहा वणस्सइकाइयाण वितेप्रगकम्मगसरीरा भाणि यव्यो । पदार्थ-(पुढ बकाइयाणं भंते ! केवइया ओरालियसरीरा पर णत्ता ? ) हे भगवन् ! पृथिवीकायके औदारिक शर र कितने प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं १ (कोयमा ! दुविहा परणत्ता, तंजहा-) हे गौतम ! दो प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं, जैसे कि- (बहल्लया य) बद्ध शरीर और (मुक्केल्लया य,) मुक्त शरीर, एवं जहा प्रोहिया पोरालिय- सरीरा) इसी प्रकार जैसे औधिक औदारिक शरीरों का वर्णन किया गया है (तहा भाणि- पवा,) उसी प्रकार कहना चाहिये । (पुदविकाइयाणं भंते ! केवइया वे० प. ?) हे भगवन्! पृथिवी कायिक जीवों के वैक्रिय शरीर कितने प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं ? (गोयमा ! दुविहा पएणत्ता, तंजहा-) हे गौतम ! दो प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं, जैसे कि- बहल्लया य ) बद्ध वैक्रिय शरीर और (मुक्कल्लया य, मुक्त वैक्रिय शरीर, (तस्य णं जे से बदल्लया) उन दोनों में जो बद्ध शरीर हैं, (ते णं नत्थि,) वे तो नहीं होते, तेश्रगकम्मसरीरा' पा० । !
[उत्तरार्धम् ] और ( मुक्कल्लया ) मुफ्त वैक्रिय शरीर, (जहा श्रोहियाणं पोरालियसरीरा ) जैसे श्रौधिक औदारिक शरीर होते हैं, (तहा) उसी प्रकार (भाणियध्या ) कहना चाहिये, (आहारगसरी- रावि) आहारक शरीर भी (एवं चेत्र) इसी प्रकार (भाणियव्वा ।) कहना चाहियो (तेश्रग- कम्मसरीरा) तैजस और कार्मण शरोर ( जहा एएसिं चेत्र ) जैसे इनके (ओरालियसरीरा) भौदारिक शरीर होते हैं ( तहा भाणियबा,) उसी प्रकार कहना चाहिये। जहा पुढवि- काइयाणं) जैसे पृथियोकाय के शरीर होते हैं, (एव) इसी प्रकार (श्राउकाइयाणं सेउकाइ- याण य) अप्काय और अग्निकाय के ( सव्यसरीरा भाणियबा ।) सभी शरीर कहने चाहिये । (वाउकाइयाणं भंते !) हे भगवन्! वायु कायके (केवइया) कितने (श्रोरालि.य. सगरा पएणत्ता ?) प्रकार से औदारिक शरीर प्रतिपादन किये गये हैं ? (गोयमा !) हे गौतम ! (दुविहा पएणता,) दो प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं, (तंज है .) जैसे कि- (बह हेलया य मुक्केल्लया य,) बद्ध और मुक्त, (जहा पुढाकारयाणं) जैसे पृथिवीकायिकों के (ोरालिप्रसरीरा) औदारिक शरीर होते हैं (हा भारियव्वा,) उसी प्रकार कहना चाहिये, (वाउकाइयाणं झते !) हेभगवन् ! + वायुकायिकों के (केवइया) कितने (वेरब्धिय- सरीरा पण्णता ? ) वैक्रिय शरीर प्रतिपादन किये गये हैं ? ( गोयमा ! ) हे गौतम ! +अन्य प्रकार से भी वायु कायके बद वैक्रिय शगीर प्रतिपादन किये गये हैं, जैसे कि- चतुर्विधा वायवः--सूक्ष्मा अपर्याप्ता:पर्याप्ताश्च चादरा अपया पर्याप्ताश्च, तत्रायरा. शित्रये प्रत्येकं ते असंख्येयलोराकाशप्रदेशप्रमाणवैक्रियलब्धि शून्याश्च, बारपर्याप्लास्तु सर्वेऽपि प्रतरासंख्येयभागवर्तिन एवन शेषाः येषामपि च वैनिलम्धिस्तेष्वपि मध्येऽरख्यातभार वर्तिन एवं बहवै क्रियशरीराः पृच्छासमये प्राप्यन्ते नापरे, अतो योजमा शान्येवैषां बद्दवैक्रियशरीराणि भवन्ति नाधिकानीति, अत्र कंचिन्मन्यन्ते । ये केचन वान्ति वायवतो सर्वेऽपि वैकियशरीरे वर्तन्ते, तदन्तरेण तेषां चेष्टाया एवाभावात, सच न घटते, यतः सर्वस्मन्नपि लोके यत्र इचित् शुपिरं तत्र सर्वत्र चला वायवो नियमान सन्त्येव, यदि च ते सर्वेऽपि वैक्रियशरीरिणः स्युस्तदा बद्धवैक्रियशरीराणि प्रभूतानि प्राप्नुवन्ति, न तु यथोत्त- मानान्येवेति, सत्मा वैक्रियशरीरिणोऽपि वान्ति वायत्रः, उक्त'च- "अस्थि णं भंते ! इसिं पुरे वाया पच्छावाया मन्दवाया महावाया वार्यसि ? हंता अत्थि, कया णं भंते ! जाव वायन्ति ? गोयमा ! जया णं वाउयाए आहारियं रोया, जयाणं जाव वाड्याए उत्तरकिरियं रीयई, जयाणं वाउकुमारा वाउकुमारीश्रो वा अप्पणो वा परस्स वा तदुभयस्स वा अट्टाए वाउयाय उदीरंति, तया णं ईसिं जाव वायति ।" 'पाहारियं रीयई' त्ति रीत रीतिः स्वभाव इत्यर्थः, तत्यानतिक्रमेण यथा रीतं रीयते- गच्छति, यदा स्वाभाविकौदारिकशरीरगत्या गच्छतीत्यर्थः, 'उत्तरकिरियं ति-उत्तरा-उत्तर ROHI mmy १ ३ १४२ [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] (दुविहा परणत्ता,) दो प्रकारसे प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा-) जैसे क-(वल्लया य) बद्ध और (मुकल्लया य,) और मुक्त, (तत्थ णं जे ते ) उन दोनों में जो वे बदल्लया) बद्ध शरीर हैं (ते णं असंखिज्जा) वे असंख्येय हैं, (सरए २ समय २ में (अबहीरमाणा २) अपहण करते हुए (खेत्तपलिश्रोवमस्स) क्षेत्र पल्योपम के (असंखिजइभागमेत्तेणं कालेणं) * असंख्येय भाग मात्र काल से (अवहीरंति) अपहरण होते हैं, लेकिन नो चेव रणं अव- हिमा सिया ,) शायद ही किसी ने अपहरण किये हों, और (मुकल्लया वेउब्वियसरीरा पाहारगसरीरा य) मुक्त वैक्रिय शरीर और आहारक शरीर ( जहा पुढविकाइयाणं ) जैसे पृथिवीकायिकों के होते हैं (तहा भाणियब्वा,) उसी प्रकार जानना चाहिये, तथा (तेयगकम्मगसरीग ) तैजस और कार्मण शरीर ( जहा पुढविकाझ्याणं ) जैसे पृथिवी- कायिकों के होते हैं (तहा भाणियव्वा, ) उसी प्रकार इनके भी जानना चाये। तथा (वणस्सइकाइयाणं) वनस्पतिकायिकों के ( श्रोर लियवेब्बियाहारगसरीरा) औदारिक वैक्रिय और आहारक शरीर ये तीनों (जहा पुढविकाइयाणं) जैसे पृथिवीकायिक जीवों के होते हैं तहा भाणियव्या) उसी प्रकार कहना चाहिये, फिर (वणम्सइकाइयाणं भंते !) हे भगवन् ! वनस्पतिशायिक जीवों के (केवइया तेयगतरोरा पएणता ?) कितने तैजस शरीर प्रतिपादन किये गये हैं ? (गोधमा ! दुविहा परणत्ता, तंजहा.) हे गौतम ! दो प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं, जैसे कि-(बई ल्ल्या य) बद्ध तैजस शरीर और (मुक्- ल्लया य.) मुक्त तैजस शरीर, किन्तु ( जहा ओहिया) जैसे श्रोधिक ( तेयमकामासा) तैजस और कार्मा शरीर होते हैं (तहा वणसइकाइयाणवि ) उसी प्रकार बनस्पति कायिक जीवों के ( तेयगकम्मगसरीश भाणियच्या,) तैजस और कामण शरीर कहना चाहिये। भावार्थ-पृथिवीकाय अप्काय और तैजसकायादि के जो औदारिक शरीर हैं वे औधिक औदारिक शरीरों के समान जानना चाहिये । तथा इनके बद्धवैक्रिय और आहारक शरीर तो होते ही नहीं, मुक्त प्राग्वत् ही हैं, तथा तैजस और वैक्रियशरीराश्च या गतिलक्षणा क्रिया यत्र गमने तदुत्तरक्रिया तबधा भवतीत्येवं यदा रीयते तदेवमत्र वातानां वाने प्रकारत्रयं प्रतिपादयता स्वाभाविकमपि गमनमुक्तम् । अतो वैक्रियशरीरिण एव ते बान्तीति न नियम इति । पल्योपम के असंख्येय भाग में जितने आकाशास्तिकायके प्रदेश होते हैं, उतने समयों से अपहरण होते हैं, अर्थात् क्षेत्रपल्योपम के असंख्येय भागके प्रदेशों की राशि के तुल्य बढ़ शरीर हैं।
७ SNIN [उत्तरार्धम] १४३ कार्मण शरीर भी पूर्ववत् जानना । अतः वायुकायके औदारिक शरीर तो पृथ्वी- कायके तुल्य ही हैं, लेकिन वैक्रिय शरीर क्षेत्र पल्योपम के असंख्येय भाग में होते हैं, मुक्त पूर्ववत् ही है । श्राहारक शरीरोंका, जैसे पृथ्वीकायके वैक्रिय शरीरों का स्वरूप है उसी प्रकार जानना चाहिये । तैजस और काभण शरीरों का वर्णन पृथ्वीकाय के शरीरों के सदृश जानना चाहिये । तथा वनस्पतिकाय के औदारिक, वैक्रिय, और आहारक शरीर पृथ्वीकायके जीवों के शरीरों के तुल्य हैं, और तैजस कर्मण शरीरों का स्वरूप औधिक के अनुसार जानना चाहिये, इस प्रकार पांच स्थावरों के शरीरों की व्याख्या सम्पूर्ण हुई । अब विकलेन्द्रिय जीवों के शरीरों का वर्णन किया जाता है विकलन्द्रियादि के शरीर । बेइंदियाणं भंते ! केवइया ओरालियसरीरा पण्णत्ता ? गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता, तंजहा बल्लिया य मुक्कल्लया य, तत्थ ण जे ते बद्दल्जया ते णं असंखिज्जा असंखिजाहि उस्सप्पिणीओसप्पिणीहि अवहीरंति कालओ, खेत्तो असं- खेजाओ सेढीओ पयरस्स असंखिज्जइभागो, तासिणं सेढीणं विक्खंभसूई असंखेज्जाओ जोमणकोडाकोडीओ असं- खिजाई सेढीवग्गमूलाई वेइंदियाण ओरालियवद्धेल्लएहि पयरं अवहीरइ असंखेज्जाहिं उस्सप्पिणीओसप्पिणीहि कालओ खेत्तओ अंगुलपयरस्स आवलियाए असंखजइ- भागपडिभागेणं, मुक्केल्लया जहा ओहिया ओरलिन- सरीरा तहा भाणियव्वा, वेउव्यिाहारगसरीरा बद्ध ल्लया नस्थि, मुक्केल्लया जहा ओहिया ओरालियसरीरा तहा भाणि अव्वा, तेयगकम्मसरीरा जहा एएसिं चेव ओरालिअसरीरा तहा भाणियब्वा, जहा बेइंदियाणं तहा तेइंदियचउरिंदियाणवि भाणियव्वा । पंचेंदियतिरिक्ख- [श्रीमदनुयोगद्वारसुत्रम् ] जोणियाणवि ओरालियसरीरा एवं चेव भाणियव्वा, पंचें- दियतिरिक्खजोणियाणं भंते ! केवइया वेउब्वियसरीरा पण्णत्ता ? गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता, तंजहा-बधेल्लया य मुक्केल्लया य, तत्थणं जे ते बद्ध ल्लया तेणं असंखिजा असंखिजाहिं उस्सप्पिणीयोसप्पिणीहि अवहीरति कालो खेत्तओ असंखिज्जाओ सेढीओ पयरस्स असंखिज्जइ. भागो, तासिणं सेढीणं विक्खिंभसूई अंगुलपढमवग्गमूलस्त असंखिज्जइभौगो, मुक्केल्लया जहा ओहिया ओरालिया तहा भाणियव्वा, आहारगसरीरा जहा बेइंदियाणं ते- अगकम्मगसरीरा जहा ओरालिया। पदार्थ (ईदियाणं भंते ! केवइया ओरालियसरीरा परणता ?) हे भगवन् ! द्वी- न्द्रिय जीवों के औदारिक शरीर कितने प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं ? (गोयमा ! दुविहा परणत्ता,) हे गौतम ! दो #प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं, (तंजहा.) जैसे कि- (बद्ध ल्लया य मुकल्लया य,) बद्ध और मुक्त, (तत्थ णं जे ते बदल्लया) उनमें जो वे बद्ध औदारिक शरीर हैं (ते णं असंखिजा) वे असंख्येय हैं, कालसे इसका प्रमाण यह है कि (असंखिजाहिं) असंख्येय (उत्पपिपणीश्रोसप्पिणीहिं) उत्सपिरमी और अबसपिणियों के (अवहीरति काल ग्रो,) कालसे-अपहरण होते-निकाले जाते हैं, तथा क्षेत्र से प्रमाण यह है कि-(खेतो) क्षेत्र से (असंखेजा ग्रो सेढीओ) असंख्येय श्रेणियों के तुल्य हैं, जो कि (पयरस्स असंखेजइ भागो,) प्रतर के असंख्यातवें भाग में हों। ( तासिणं सेढीणं) amavna ! * उन श्रेणियोंके जितने आकाश प्रदेश हैं उतनेही द्वीन्द्रिय जीवोंके बद औदारिक शरीर होते हैं। + श्रेणियों की जो राशि हैं उसमें सत्कल्पनया असंख्येय वर्ग मूल हैं, लेकिन असत्क- स्पना से यदि ६५५३६ प्रदेश मान लिये जाये तो इसका प्रथम वर्ग मूल २५६ होता है, क्यों कि २५६ ४ २५६ = ६५५३६ होते हैं। इसी प्रकार द्वितीय वर्ग मूल १६, तृतीय ४ ओर चतुर्थ २ ये चारों ही स कल्पना से असंख्येय प्रदेश रूप हैं। तथा इन सब का योग करने से +१६४+२२७८ हुए, अर्थाद इतने प्रदेशों की एक विष्कम्भ सूचि होती है [ उत्तरार्धम्] १४५ उन श्रेणियों को ( विभई ) विष्कम्भसूचि (असंखे जानो) असंख्येय (जोअणकोढा- कोडीश्रो) क्रोडाकोड योजन के प्रमाण है, जो कि (असंखेज्जाई) असंख्येय (सेदीवग्ग- मूलाई,) श्रेणियों के वर्गमूल के समान है। ( इंदियाणं ) द्वीन्द्रिय जीवों के (ोरालियबदल्लएहिं) बद्ध औदारिक शरीरों से (पयरं अवहीरइ) प्रतर अपहरण किया जाता है (असंखिजाहि) असंख्येय (उस्सप्पि- णीयोसप्पिणीहिं कालो) उत्सपिणी और अवप्पिणियों के काल से, (खेत्तनो क्षेत्र से (अंगुलपयरस्स) प्रमाणांगुल प्रतर का (श्रावलियाए) आवलिका के (असंखिनइभागपटिभागे- णं,) असंख्यातवें भाग के अंश से ( मुक्केल्लया ) मुक्त औदारिक शरीर (जहा) जैसे (ोहिया ओरालियसरीरा) औधिक औदारिक शरीर होते हैं (तहा) उसी प्रकार (भाणि- यया) कहना चाहिये । तथा-( वेउब्धि पाहारगसगरा बहल्लया ) बद्ध वैक्रिय और आहारक शरीर (नत्थि) नहीं होते । (मुकल्लया) मुक (जहा) जिस प्रकार (ोहिंश्रा ओरालिश्रसरीरा) औधिक औदारिक शरोर होते हैं ( तहा भाणिश्रव्या, ) उसी प्रकार कहना चाहिये, और ( ते अगकामगसरीग ) तैजस तथा कार्मण शरीर ( जहा ) जिस प्रकार (एएसिं चेव) निश्चय ही इनके (ोरालिअसीरा, औदारिक शरीर होते हैं (तहा) उसी प्रकार (भाणियबा ।) कहना चाहिये। एतावता *-इदानी प्रस्तुतशरीरमानमेव प्रकारान्तरेणाह-इंदिया ओरालियसरीरेहिं बदल्लहि, मित्यादि, द्वीन्द्रियाणां यानि वद्वान्यौदारिकशरीराणि तैः प्रतरः सवो ऽप्यपहियते, कियता काले- नेत्याह असंख्येयोत्सपिण्यवसर्पिणीभिः, केन पुनः ? क्षत्रप्रविभागेन कालपविभागेन च, कालेनाथमपहियत इत्याह-अंगुलप्रतरलक्षणस्य क्षेत्रस्य आवलि कालखणस्य च कालस्य योऽसंख्येय- भागरूपः प्रविभागः-अंशस्तेन । इदमुक्त भवति-यद्य कैकेन द्रोन्द्रियशरीरेण प्रतरस्यैकैकोऽङ्गुला- संख्येयभाग एकैकेनावलिकाऽसंख्येयभागेन क्रमशोपहियते तदाऽसंख्येयोत्सर्पिण्यवसर्पिणीभिः सर्वोऽपि प्रतरो निष्ठां याति, एवं प्रतरस्यैकैकस्मिन्नङ्गुलासंख्येयभागे एकैकेनावलिकाऽसंख्येयभागेन प्रत्येक क्रमेण स्थाप्यमानानि द्वीन्द्रियशरीराण्यसंख्येयोत्सर्पिण्यवसर्पिणीभिः सर्वं प्रतरं पुरयन्तीत्यपि द्रष्टव्यम्, वस्तुत एकार्थत्वादिति ।-इसका भावार्थ पदार्थ में भागया है। + अर्थात असंख्येय काल चक्रों से उस प्रतर के आकाश-प्रदेश अपहरण किये जाते हैं। * क्षेत्र से प्रमाणांगुल के असंख्येय भाग के और काल से आवलिका के असंख्येय भागके अंश से अपहरण करें तो असंख्येय कालचक्रों से वे प्रतर निर्लेप होते हैं अर्थात उतने द्वीन्द्रिय जीव हैं । अथवा उक्त प्रमाण से यदि उसी प्रतर में द्वीन्द्रिय जीवों को स्थापन करें तो भी पूर्वोक्त कल्पित समय लगता है।
१४० [श्रीमद योगद्वारसूत्रम् ] दियाणं) जिस प्रकार द्वीन्द्रियों के बद्ध औदारिक शरीर होते हैं (तेइंदिचयरिंदियाण वि) त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रय के भी (भाणियन्वा) मेरका ) , रिक्खजोणियाण वि) पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च योनिकों के भी (ोरोलिन- शरीर ( एवं चेव ) निश्चय ही इसी प्रकार ( भाणियचा) कहना अतिरिक्खजोणियाणं भंते !) हे भगवम् ! तिर्यञ्च पञ्चेन्द्रिय जीवों सरीरा पण्णता ? ) कितने प्रकार से वै क्रय शरीर प्रतिपादन किये दुविहा पएणता, ) हे गौतम ! दो प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं, -(बदल्या य ) बद्ध और मुक्कल्लया य) मुक्त । (तत्थ णं जे ते) ल्लया ) बद्ध हैं ( ते णं ) वे (असंखिज्जा) असंख्येय है, क्यों कि- संख्येय ( उत्सप्पिणीअोसप्पणीहिं ) उत्सर्पिणी और अवसर्पिणियों के ) काल से अपहरण होते हैं, तथा-खेत्ती) क्षेत्र से (असंखिज्जायो) श्रेणियां हैं, जो कि (पयरस्स असंखिजइभागो,) प्रतर के असंख्यातवें [ सेढीणं । उन श्रेणियों की (विक्खंभसूई) विष्कम्भसूचि (अंगुलपढमव- ल के (असंखिजइभागो,)*असंख्यातवें भाग की होती है, (मुक्कल्लया) प्रकार (ओहिया ओगलिश्रा) औधिक औदारिक शरीर होते हैं (तहा प्रकार कहना चाहिये (आहारयसरीराआहारक शरीर (जहा के समान जानना, (तेश्रगकम्मगसरोरा) तैजस और कार्मण शरीर प्रौदारिक जैसे होते हैं । पेनासंख्येयतामात्राव्यभिचारतस्त्रीन्द्रियादीनामतिदेशो मन्तव्यो न पुनः सर्वथा पाम्-"सामान्यातिदेशो विशेषानतिदेश" इति न्यायात् । अतः उक्तम्- ते ! एइंदियवेइंदियतेइंदियचउरिदियपंचिंदिगणं कयरे कयरेहितो अप्पा वा साहिया वा ? गोयमा ! सबथोवा पंचिंदिया चारिदिया विसेसाहिया तेई. या विसेसाहिया एगिदिया अणतगुणा' एकेन्द्रियद्वीन्द्रियत्रीन्द्रियचतुरिन्द्रियपञ्चेन्द्रियाणां कतरे कतरेभ्यः अल्पावा पाधिका वा ? गौतम ! सर्वस्तोका पञ्चेन्द्रियाः चतुरिन्द्रिया विशेषाधिकाः न्द्रिया विशेषाधिका एकेन्द्रिया अनन्तगुणाः । णीनां विष्कम्भसूचिरङ्गुलप्रथमवर्गमूलस्यासंख्ययभागः' इति वचनात् । की विष्कम्भसूचि प्रमाणाङ्गुल के असंख्यातवें भाग में होती है ।
.. [ उत्तरार्धम् ] १४७ भावार्थ-विकलेन्द्रियों के औदारिक शरीर दो तरह के होते हैं. जैसे कि बद्ध और मुक्त । इनके बद्ध शरीर असंख्येय काल चक्रों की समय की राशि के तुल्य तथा क्षेत्र से प्रतर के असंख्यातवें भाग में श्राकाश प्रदेश की जितनी असंख्येय श्रेणियां हैं, उनकी विष्कम्भसूचि के तुल्य है, जो कि असंख्येय योजन कोटाकोटि प्रमाण हो। सत्करपनया असंख्येय भाकाश प्रदेशों की एक श्रोणि होती है, लेकिन असत्कल्पना से यदि ६५५३६ प्रदेश कल्पित कर लिये जाय तो इसका प्रथम वर्गमूल २५६, द्वितीय १६, तृतीय ४, और चतुर्थ २ है । इनका योग करनेसे २७३ होते हैं। सत्कल्पना से असंख्येय श्राकाश प्रदेश ढोते हैं। इस लिये इतने आकाश प्रदेशो की एक विष्कम्भसूचि जानना चाहिये। अथवा बद्ध औदारिक शरीरों से यदि प्रतर के प्रदेश अपहरण किये जायं तो असंख्येय उत्सर्पिणी और अवसर्पिणियों के काल से अपहरण होते हैं, परन्तु क्षेत्र से प्रमाणांगुल प्रतर का प्रावलिका के असंख्येय भाग के अंश से यदि उस के प्रदेश अपहरण करें तो असंख्येय काल चक्र लग जाते हैं। इसी तरह यदि उक्त प्रमाण से प्रतर में स्थापन करें तब वह पूर्ण होती है, अतः इतने ही बद्ध शरीर होते हैं । मुक्त शरीर पूर्ववत् जानना । वैक्रिय और आहारक शरीर तो इनके होते ही नहीं, लेकिन मुक्त पूर्ववत् जानना चाहिये । तैजस और कार्मण शरीरों का वर्णन, जैसे औदारिक शरीरों का वर्णन किया गया है, उसी प्रकार जानना चाहिये। पञ्चन्द्रिय जीवों श्च औदारिक शरीर तो प्राग्वत् हैं, लेकिन बद्ध वैक्रिय शरीर असंख्येय काल चक्रों से अपहरण किये जाते हैं । क्षेत्र से प्रतर के असं. ख्येय भाग में जितनी अाकाश की असंख्येय श्रेणियां हैं, उनकी विष्कम्भसूचि करने से प्रथम वर्गमूल के असंख्येय भाग मात्र में होते हैं, अर्थात् प्रथम वर्ग के असंख्यात में भाग में होते हैं । मुक्त पूर्ववत् हैं । पुनः आहारक शरीर जैसे द्वीन्द्रियों के वर्णन किये गये हैं, उसी प्रकार जानना चाहिये । तैजस और कार्मण शरीरों की व्याख्या जैसे पूर्व औदारिक शरीरों की प्रतिपादन की गई है, उसी प्रकार जानना चाहिये। अब इसके अनन्तर मनुष्य, व्यन्तर, ज्योतिषी और वैमानिक देवों के शरीरों के विषय में कहते हैं- -- १४८ [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] मनुष्यादि शेष दण्डकों के शरीर । मणुस्साणं भंते ! केवइया ओरालियसरीरा पण्णता? गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता, तंजहा-बदल्लया य मुक्कल्ज- या य, तत्थ णं जे ते बदल्लया तेणं सि संखिज्जा सिय असंखिज्जा जहएणपए संखेजा, संखिज्जाओ कोडाकोडीमो एगुणतीसं ठाणाई तिजमलपयस्स उवरिं चउजमलपयस्स हेटा, अहव णं छटो वग्गो पंचमवग्गपडुपरणो, महव णं छण्णउइछेअणगदायिरासी, उक्कोसपए असंखिज्जा, असंखेज्जाहिं उस्सप्पिणीयोसप्पिणोहिं अवहीरति काल- ओ, खेतमओ उक्कोसेणं रूवपक्खित्तेहिं मणुस्सेहिं सेढी अवहीरइ [xतासिणं सेढोए कालखेत्तहिं अवहारो मग्गि- जइ] कालो असंखेज्जाहिं उस्सप्पिणीओसप्पिणीहि, खेत्तओ अंगुलपढमवगमूलं तइयवग्ग मूलपडुप्पण्णं मुक्कल्लयां जहा ओहिया मोरालिया तहा भाणियव्वा, मणुस्साणं भंते ! केवइया वेउब्वियसरीरा पण्णता ? गो- यमा ! दुविहा पण्णत्ता तंजहा-बद्धल्लया य, मुक्के- ल्लया य, तत्थ णं जे ते बद्धल्लया ते णं संखिज्जो समए२ भवहीरमाणा २ संखेजणं कालेणं अवहीरंति, नो चेव णं अवहिआ सिमा, मुक्केल्लया जहा ओहिआ ओरालियाणं मुकल्लया तहा भाणियव्वा, मणुस्साणं भंते ! केवइयो आहारगसरीरा पण्णता? गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता,तंजहा- बद्धल्लया य मुक्केल्लया य, तत्थ णं जे ते बद्ध ल्लया तेणं -- * इत्यत्र 'उकोसपए' इत्यन्यत्र । ४ एतद्वाक्यं क्वचिन्नोपलभ्यते, तथापि पाठान्तरत्वादन योजितः ।
[ उत्तरार्धम् ] सिभ अस्थि सिम नत्थि, जइ अस्थि जहरणेणं एकको वा दो वा तिरिण वा उक्कोसेणं सहस्सपुहत्तं, मुक्कल्लया जहा ओहिया, तेयगकम्मगसरीरा जहा एएसिं चेव पोरालिया तहा भाणियव्वा । वाणमंतराणं मोरालियसरीरा जहा नेरइयाणं, वाण- मंतराणं भंते ! केवइया वेउव्वियसरीरा पण्णत्ता ? गो. यमा ! दुविहा पण्णत्ता, संजहा-बद्ध ल्लया य मुक्केल्लया य, तत्थ णं जे ते बहेल्लया ते णं असंखिज्जा, असंखि. ज्जाहिं उस्सप्पिणीओसप्पिणीहि अवहीरति कालमो, खेत्तमो असंखिज्जाओ सेढीयो पयरस्स असंखिज्जइभागो तासि णं सेढीणं विक्खम्भसूई संखेज्जजोयणसयवग्ग- पलिभागो पयरस्स. मुक्कल्लया जहा ओहिया ओरालि- मा तहा भाणियव्वा, आहारगसरीरा दुविहा वि जहा असुरकुमाराणं तहा भाणियठवा, वाणमंतराणं भंते ! के वइया तेयगकम्मगसरीरा पण्णता? गोयमा! जहा एएसि चेव वेउव्वियसरीरा तहा तेयगकम्मगसरोरा भाणियव्वा, [जोइसियोणं भंते ! केवइया ओरालियसरीरा पण्णता ? गोयमा! दुविहां पण्णत्ता, तंजहा-जहा नेरयाणं तहा भाणि- यवा] जोइसिआणं भंते ! केवइया वेउव्वियसरीरा पएणत्ता? गोयमा! दुविहा पण्णता, तंजहा-बद्धेल्लया य मुक्केल्लया य, तत्थ णं जे ते बद्देल्जया [ते ण असंखेज्जा असंखेजाहि उस्सप्पिणीअोसप्पिणीहि अवहीरति कालो, खेत्तो असंखेज्जायो सेढीयो पयरस्स असंखेज्जइभागो] तासिक इत्यधिकम् ।
१५० [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] सेढीणं विश्वम्भसुई बेछप्पणणंगुलसयवग्गपलिभागो पय- रस्स, मुक्कल्लया जहा भोहिया ओरालिया तहा भाणि- यव्वा, माहारगसरीरा जहा नेरइयाणं तहा भाणियव्वा, तयगकम्मगसरीरा जहा एएसिं चेव वेउब्वियसरीरा तहा भाणियव्वा, वेमाणियाणं भंत ! कवइया ओरालिय- सरीरा पण्णत्ता ? गोयमा ! जहा नेरइयाणं तहा भाणि- यव्वा, वेमाणिपाणं भंत ! केवइया वेउव्वियसरीरा पएणत्ता ? गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता, तंजहा-बदल्लया य मुक्कल्लया य, तत्थ णं जे ते बद्ध ल्लयो तेणं असंखि- ज्जा असंखेज्जाहि उस्सप्पिणीयोसप्पिणीहि अवहीरंति कालो खेतो असंखेज्जाओ सेढीओ पयरस्स असंखे- ज्जइभागो तासिणं सेढीणं विक्खम्भसूई अंगुलबीयवग्ग- मूलं तइयवग्गमूलपडुप्पएणं अहव णं अंगुलत इयवग्गमूलं घणप्पमाणमेत्तोमो सेढीओ, मुक्कल्लया जहा ओहिया ओरालि पाणं तहा भाणियब्वा, आहारगसरोरा जहा नेरइयाणं, ते अगकम्मगसरीरा जहा एएसि चेव वेउव्वि- यसरीरा तहा भाणियव्वा, से तं सुहुमे खेत्तपलिओवमे, से तं खत्तपलियोवमे, से तं विभागनिप्फरणे, से तं काल- प्पमाणे । (सू०१४५) पदार्थ-(मणुस्साणं भंते ! केवइया ओरालि पसरीरा पएणत्ता ?) हे भगवन् ! * मनुष्यों के औदारिक शरीर कितने प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं ? (गोयमा ! . , । ! * मनुष्यों के दो भेद हैं, संमच्छिम और गर्भन । स्त्री आदि के गर्भ से उत्पन्न होने वाले को 'गर्भ' और वातपिचादि से उ.पन्न होने वाले को 'संमूछिम' कहते हैं । गर्भज संख्येय और मलिक [उत्तरार्धम् १५१ दुविहा पण्णता,) हे गौतम ! दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तंजहा-) जैसे कि- (बदल्लया य) बद्ध और ( मुक्कल्लया य.) मुक्त, (तत्थ णं जे ते बदल्लया) फिर उन में जो वे बद्ध शरीर हैं, (तेणं सिय संखेजा) वे कदाचित् ख्येय हों और (सिय असंखेजा,) कदाचित् असंख्येय भी हों, इसका प्रमाण यह है कि (जहन्नपए संखेना,) जघन्य पद से वे संख्येय हैं, क्योंकि--(संखेजाओ ) संख्येय (कोडाकोडीअो) कोटाकोटि प्रमाण है, अथवा (एगुणतीसं ठाणाई)२६ अंक स्थान प्रमाण जघन्य पद वाले मनुष्य होते हैं (तिजमलपयस्स उवरि) तीन + यमल पद के ऊपर और ( चउजमलपयस्स हेटा,) चार यमल पद के नोचे, (अहव णं) अथवा (छएउइछेवणादायिरासी)९६ छेदनकदायी राशि, (उकोसपए) उत्कृष्ट पा से ( असंखेना,) असंख्येय हैं, (असंखेज्जाहिं) असंख्येय (उस्स- प्पिणीयोसप्पिणीहि) उत्सर्पिणी और अवसपिणियों के ( अबहीरति कालो ) काल से अपहरण किये जाते हैं, (खेत्तो) क्षेत्र से (उकोसेणं रूवपक्खित्तेहिं मणुस्सेहि) उत्कृष्ट एक मनुष्य के रूप प्रक्षेप करने से ( सेढी अत्रहीरइ ) श्रीणि अपहरण हो जाती है [तासिणं सेढीए) उन श्रोणियों का (कालखेत्ते, काल और क्षेत्र से (अबहारो मगिाजड,) अपहरण किया जाया जाता है, जैसे कि- कालो) काल से (असंखिज्जाहि) असंख्येय (उस्स- प्पिणीअोसप्पिणीहिं) उत्सर्पिणी और अवसर्पिणियों से, (खेत्तनो) क्षेत्र से (अंगुलपदम- वगमूल) अंगुल प्रमाण क्षेत्र के प्रथम वर्ग मूल को तइयबग्गमूल गडप्पएणं,) तीसरे वर्ग मूल के साथ ४ गुणा करने से, तथा (मुकल्जया) मुक्त औदारिक शरीर (जहा) जैसे (ोहिया ओरालिया) औदारिक शरीर होते हैं ( तहा भाणियब्वा, ) उसी प्रकार कहना चाहिये । ( मणुस्साणं भंते ! ) हे भगवन् ! मनुष्यों के ( केवइया उब्वियसरीरा पएणत्ता ?) कितनी तरह के वैक्रिय शरीर प्रतपादन किये गये है ? (गोयमा ! दुविहा पएणत्ता,) हे गौतम ! दो प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं, (तंजहा )जैसे कि-(बद्ध- ल्लया य) बद्ध और ( मुक्कल्लया य,) मुक्त, ( तत्थ णं जे ते ) उन में वे (बदल्लया) बद्ध वैक्रिय शरीर हैं (ते एवं संखिजा) वे संख्येय हैं और उनका (समए २ अबहीरमाणा २) समय २ में अपहरण करने से (संखेजणं कालेणं) संख्येय कालसे (अवहीरंति) अपहरण +जिप्त समय संमूच्छिमों का अन्तर काल होता है उसी समय मनुष्य संख्येयक पद वाले होते हैं, अन्य काल में नहीं होते। + क्रोड की संख्या को क्रोड से गुणा करने पर कोटाकोटि होते हैं । + आठ २ अंकों का एक यमल पद होता है। पहिले और तीसरे वर्ग के साथ गुणा करने पर जो संख्या प्राप्त हो उतनी ही बह - १५२ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] होते हैं, परन्तु (नो चेव णं अवहिया सिया) किसी ने *अपहरण नहीं किये, (मुकल्लया) मुक्त वैक्रिय शरीर ( जहा मोहिया ) जैसे औधिक अोरालियाणं) औदारिकों के (मुक्के- लया ) मुक्त शरीर होते हैं ( तहा भाणियबा, ) उसी प्रकार कहना चाहिये। (मणुस्साणं भंते ! ) हे भगवन् ! मनुष्यों के (केवइया) कितने प्रकार से (आहारगसरीरा पएणत्ता ?) आहारक शरीर प्रतिपादन किये गये हैं ? ( गोरमा ! दुविहा परमत्ता,) हे गौतम ! दो प्रकारसे प्रतिपादन केये गये हैं (तंजहा) जैसे कि-(बदल्लया य) बद्ध और (मुक्क ल्लया य, ) मुक्त ( तत्थ णं जे ते बदल्लया) उनमें जो वेबद्ध आहारक शरीर हैं (ते णं सिअ अत्थि) वे कदाचित् होते हैं (सि नथि,) कदाचित् नहीं भी होते हैं, (जइ अत्थि) यदि हों तो (जहा नेणं) जघन्य से (एको वा) एक अथवा (दो वा तिरिया वा) दो या तीन या ( उकोसेणं ) उत्कृष्ट से ( सहस्सपुहरी,) सहस्रपृथत्व हो, (मुक्क ल्लया) मुक्त(जहा श्रोहिया,) औधिकों के समान होते हैं, (ते अगकम्मगसरीरा) तैजस और कार्मण शरीर जहा ) जैसे ( एएसिं चेत्र ) इनके (ओरालिया) औदारिक शरीर होते हैं, (तहा भाणिवा, ' उसी प्रकार कहना चाहिये। (वाणमंतराणों ओरालिअसरीरा) वानभ्यन्तरों के औदारिक शरीर (जहा नेरइयाणं,) नारकियों के समान होते हैं। (वाणमन्तराणां भंते ! ) हे भगवन् ! वानव्यन्तरों के (केवइया वेउब्वियसरीरा परणता ?) वैक्रिय शरीर कितने प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं (गोयमा !) हे गौतम ! (दुविहा परगासा,) दो प्रकारसे प्रतिपादन किये गये हैं (तंजहा.) जैसे कि-(बदल्लया य) बद्ध और ( मुकल्लया य) मुक्त, (तत्य णां जे ते) उन में जो वे (बहल्लया) बद्ध शरीर हैं (तेग असंखेजा,) वे असंख्येय हैं, क्योंकि (असंखिजाहि) असं ख्येय ( उस्सप्पिणीअोसप्पिणीहिं ) उत्सर्पिणी और अवसर्पिणियों के अवहीरति कालो,) काल से अपहरण होते हैं, (खेतो) क्षेत्र से (असंखिजाओ सेढीओ) असंख्येय श्रेणियां जो कि (पयरस्स असंखिज्जइभागो) प्रतर के असंख्यातवें भाग में हों, तासिणं सेढीण) उन श्रोणियों की (विक्खम्भलुई) विष्कम्भसुचि (संखेजजोयणसयवग्गपलिभागो पपरस्स,) प्रतर के संख्येय योजन शत वर्गो की + अंश रूप हो । (मुकल्लया) मुक्त वैक्रिय शरीर ( जहा मोहिया ओरालिना ) जैसे औधिक औदारिक शरीर होते हैं (तहा भाणियब्वा, ) उसी प्रकार कहना चाहिये। तथा ( आहागसरीरा दुविहा वि) दोनों *सिर्फ उपमालकार दिया गया है। * क्योंकि इनका अन्तर काल होता है पलिभागो प्रतिभागः-अंशः। Maananda PARinadine गुलसयवगपलिभागो पयरस्स) *प्रतर के अंश के २५६ अंगुल वर्ग प्रमाण, (मुक्कल्लया) [उत्तरार्धम्] १५३ प्रकार के आहारक शरीर ( जहा असुरकुमाराणं ) जैसे असुर कुमारों के होते हैं (तहा भाणियध्वा ।) उसी प्रकार कहना चाहिये । (बाणमंतराणं भंते ! ) हे भगवन् ! धानव्यन्तर देवों के (केवइया तेअगकम्मसरीरा पण्णता ?) कितने प्रकार से तैजस और कार्मरण शरीर प्रतिपादन किये गये हैं ? (गोयमा !) हे गौतम ! (जहा एएसिं चेव वेब्विय सरीरा) जैसे इनके वैक्रिय शरीर होते हैं ( तहा) उसी प्रकार (तेश्रगकम्मसरीरा) तैजस और कामण शरीर (भाणिग्रता , कहना चाहिये । [(जोइसियाणं भंते !) हे भगवन् ! ज्योतिषियों के (केवइया पोरालिअसरीरा ष- एणता १) औदारिक शरीर कितने प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं ? (गोयमा ! दुविहा पएणता,) हे गौतम ! दो प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं (तंजहा.) जैसे कि-(जहा नेरइयाणं) जिस प्रकार नारकियों के होते हैं (तहा भाणियबा । ) उसो प्रकार कहना चाहिये। (जोइसियाणं भंते !) हे भगवन ! ज्योतिषियों के केवइया वेऽब्वियसरीरा पएणता ?) कितने प्रकार से वैक्रिय शरीर प्रतिपादन किये गये हैं ? ( गोयमा ! दुविहा पएणता,) हे गौतम ! दो प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं, (तं महा.) जैसे कि- ( बद्धल्जया य ) बद्ध और (मुकल्जया य, ) मुक्त । (तत्थ णं जे ते बद्दल्या य ) उनमें जो वे बद्ध शरीर हैं (जाव) यावत् (तासि णं सेढीणं) उन श्रेणियों की (विक्खंभसूई) विष्कम्भसूचि (वेछप्परणं- मुक्त (जहा ओहिया ओरालिमा) जैसे औधिक औदारिक शरीर होते हैं, (तहा भाणिपब्बा उसो प्रकार कहना चाहिये । (आहरयसरीरा) आहारक शरीर ( जहा नेरइयाणं) जैसे नारकियों के होते हैं ( तहा भाणिअव्वा,) उसी प्रकार कहना चाहिये (तेमा कम्मसरीरा) तैजस और कार्मण शरीर ( जहा एएसिं चेत्र) जैसे इनके (उ.वयसरीरा) वैक्रिय शरीर होते हैं (तहा भाणिप्रया ।) उसी प्रकार कहना चाहिये। (वेमाणियाणं भंते !) हे भगवन् ! वैमानिक देवों के ( केवइया ओरालि असरीरा पएणता ?) कितने प्रकार से औदारिक शरीर प्रतिपादन किये गये हैं ? (गोयमा !) हे गौतम ! (जहा नेरइयाणं) जिस प्रकार नारकियों के होते हैं (तहा भाणिवा, ) उसी प्रकार कहना चाहिये, ( तेप्राकम्मसरीग) तैजस और कार्मण शरीर (जहा एएसि यथोक्तरीत्या प्रतर के एक २ अंशको ज्योतिषी देव अपहरण करें तो वह सम्पूर्ण अपहरण हो सकता अथवा एक २ ज्योतिषी देव उक्त प्रमाण से स्थापन किया जाय तो प्रतर पूरा हो सकती है । और व्यन्तरों से ज्योतिषी देव संख्यातगुणे अधिक होते हैं। है , १५४ [श्रीमदनुयोगद्वार सूत्रम् ] चेत्र) जैसे इनके (वैउब्बियसरीर।) वैक्रिय शरीर होते हैं, (नहा भाणि अव्वा ।) उसी प्रकार कहना चाहिये। ( वेमाणियाणं भंते ! ) हे भगवन् ! वैमानिक देवों के ( केवइया ओरालिनसरीरा पण्णता ?) कितने प्रकार से औदारिक शरीर प्रतिपादन किये गये हैं ? (गोयमा !) हे गौतम ! ( जहा नेरइयाणं ) जिस प्रकार नारकियों के होते हैं (तहा भाण्यिव्वा ।) उसो प्रकार कहना चाहिये । ( वेभणियाणं भंते ! ) हे भगवन् ! वैमानिक देवों के (केवइया वेउब्वियसरीरा पण्णता?) कितने प्रकार से वैक्रिय शरीर प्रतिरादन किये गये हैं? (गोयमा !) हे गौतम ! (दुविहा पगात्ता.) दो प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं, (तंजहा.) जैसे कि-(बदल्लया यं) बद्ध और (मुकल्लया य, मुक्त । (तस्थ णं जे ते बदल्जया) उन में जो वे बद्ध शरीर हैं (ते णं असंखिजा,) वे असंख्येय हैं, क्योंकि-(असखि जाहि) असं- ख्येय (सिदिपणीओसप्पिणी) उत्सर्पिणियों और अवसपिरिणयों के (अवहीरंति कालो,) से अपहरण होते हैं । (खेल ग्री) क्षेत्र से (असंखिजानो सेटीनो) असंख्येय श्रेणियां, जो कि (पयररस असंखेज इभागो,) प्रतर के असंख्यात भाग में हो, (नास सेढीणं) उन श्रेणियों की (विस्वं भसूई) विष्कम्भसूच (अंगुलबायबगल) प्रमाणांगुल के द्वितीय वर्ग मूल को ( तइयवग्गमूलपड्डुपरणं ) * तृतीय वर्ग मूल के साथ गुणा करने से होती है ( अहव णं) अथवा ( अंगुलतइयवनामूलं ) प्रमाणांगुल के तृतीय वर्ग मूल के (घणप्पमाण- मेत्ताओं) सिर्फ पवन प्रमाण (सेडीओ,) श्रोणियां हों, (मुकल्लया य) मुक्त वैक्रिय शरीर (जहा श्रोहिया पोरालियाणं ) जैसे औधिक औदारिक शरीर होते हैं (तहा भाणियव्वा ।) उसी प्रकार कहना चाहिये । (हास्यसरीरा) आहारक शरीर ( जहा नेरइयाणं नारकियों के समान होते हैं, (लेगकम्मसरीरा) तैजस और कामण शरीर (जहा एएसिं चेत्र) जैसे इनके (वेउब्वियसरीरा) वैक्रिय शरीर होते हैं (तहा भाणियत्रा ।) उसी प्रकार कहना चाहिये । ( से तं सुहुमे खेत्तपलिनोवमे, ) यही सूक्ष्म क्षेत्र पल्योपम है, (से तं खेत्तपलिनोत्रमे,) और यही क्षेत्र पल्योपम है तथा (से तं पलिनोवमे,)यही पल्योपम है और (सेतं. विभागणिकरणे ) यही विभागनिष्पन्न और (से तं कालबमाणे) यही काल प्रमाण है (सू० १४५) * प्रमाणाङ्गुल प्रतर क्षेत्र की अपेक्षा सत्कल्पना से असंख्य श्रोणियां होती हैं, लेकिन प्रसत्कल्लपना के द्वारा यदि २५६ श्रेणिया मान ली जायें तो इसका प्रथम वर्गमूल १६, द्वितीय ४, और तृतीय २ है । अत: द्वितीय वर्ग मूल ४ को तृतीय वर्ग मूल ४ को तृतीय वर्ग मूल २ के साथ गुणा करने पर ४ ४ २ = = होते हैं । यही प्रमाण विकम्भ सूचि का जानना चाहिये । अर्थात तीसरे वर्ग मूल को घन रूप करने से २४२४२ = ही होते हैं । इसलिये यही विस्कम्भसूचि यहां पर ग्रहण करना चाहिये ।
[ उतरार्धम्] भावार्थ-मनुष्यों के दो भेद हैं, संमूर्छिन और गर्भ ज । वात पित्तादि से उत्पन्न होने वाले को संभूछिम और स्त्री के गर्भ से उत्पन्न होने वाले को गर्भज कहते हैं । उनमें से संमूछिम तो कदाविद् नहीं भी होते। क्योंकि इनको जघन्य स्थिति एक समय की और उत्कृष्ट अन्तर काल-चौबीस मुहर्त की होता है। कदाचित् वे उत्पन्न हो जाय तो जघन्य और उत्कृष्ट अन्त हतं स्थिति के पश्चात् सौ का नाश होना संभव है। यदि होवें भी तो जघन्य से एक या दो अथवा तीन, और उत्कृष्ट से असंख्यात तक हो सकते हैं। परन्तु गर्भज तो सदा संख्येय ही होते हैं। असंख्येय नहीं होते। जब समूच्छिम नहीं होते तव जघ- न्य पदसे गर्भज ही ग्रहण किये जाते हैं, नहीं तो जघन्य पदचर्तित्व ही न होता। तथा चे स्वभाव से संख्येय ही होते हैं। इसी कारण उनके बद्ध शरीर भी सं- ख्येय हैं । पुनः इस का विशेष वर्णन करते हैं। बाट २ अंक के रूपकों को एक २ यमल पद होता है। इसीको सोमयिकी संज्ञा जाननी चाहिये। इन्हीं तीन यमल पदों के समाहार को त्रियमल पद कहते हैं । अर्थात् Ex३ - २४ चौधील अंकों के स्थान रूपको अथवा सौलह अंक की अपेक्षा ऊपर के आठ शंका को त्रियमल पद कहते हैं। इनका भावार्थ एक ही । इस लिये यमल पद के ऊपर उक्त गर्भ मनुष्य होते हैं। तात्पर्य यह है कि चोयीस अंकों के बाद जयबाद वाले गर्भज मनुष्यों की संख्या होती है। क्या चार से आदि लेकर पांच वमल पर भी होते हैं ? नहीं होते। क्योंकि चार बमल पदों के समाहार समूह को चतुर्थ यमल पद कहते हैं । इसलिये बत्तोल अंक रूप अथवा चतुर्थ यसल अर्थात् चौवीस अंक स्थानको के ऊपर वाले जो अंक रूप हैं उसी को चतुर्थ यमल पद कहना चाहिये। इनको भावार्थ एक हो है । तात्पर्य यह है कि उस चतुर्थ यमल पद के नीचे उनतील अंक स्थान के, जो आगे कहे जायेंगे, उनमें गर्भज मनुष्यों की संख्या होती है। अथवा दो वर्गजिनका स्वरूप अब कहा जायगा, उन (यमल पदों) की सामयिकी संज्ञा होती है। इसी तरह तीन यमल पदों के समाहार को त्रियमल पद अर्थात् षट् बर्ग कहते हैं । इसलिये उसके ऊपर तथा चतुर्थ यमल पद अर्थात् पाठवें वर्ग के नीचे यह मनुष्य संज्ञा होती है याने छठे वर्ग के ऊपर * "संख्या कोटीकोव्यः क्रोडाकोड की संख्या को संख्येय' कहते हैं ।
[ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] और सातवें वर्ग के नीचे इन गर्भज मनुष्यों की संख्या प्राप्त होती है। यहां भी रूप के उनतीस अंक जानने चाहिये। तथा अब छठ वर्ग को पंचम वर्ग से गुणित करें तो प्रस्तुत मनुष्य संख्या लब्ध होती है। छठा वर्ग और पांचवां वर्ग किसको कहते हैं ? किसी विवक्षित राशि को उसी राशि के द्वारा गुणा करने से जो गुणन- फल ओवे, उसको उस राशि का वर्ग' कहते हैं जैसे कि-एक का वर्ग एक ही होता है, क्योंकि एक को एक से गुणा करने पर १४१ = १ एक ही होता है। किन्तु वृद्धिका रहितपना होने से इस को वर्ग नहीं कह सकते। इस कारण एक को छोड़ कर दो से गिनती प्रारंभ की जाती है। जैसे कि-दो को दो से गुणा करने पर २४२ = ४ चार होते हैं। यही प्रथम वर्ग है। इसी प्रकार ४ का वर्ग ४४४ १६, यह द्वितीय वर्ग है। तथा १६ का वर्ग १६४१६ = २५६, यह तृतीय वर्ग है । तथा-२५६ को इसी राशि से गुणा करने पर चतुर्थ वर्ग को रूप २५६४ २५६६५५३६ निकलता है। जिस का यंत्र यह है- २ ६ २ ६ ज १ ३ ३ ५ १ ३ -- १ M ६ ५ auntya फिर इसी राशि को इसी के साथ गुणा किया जाय । जैसे कि- ६५५३६४ ६५५.३६ = ४२६४६६७२६६, चार अरब, उनतीस करोड़, उनं. शास लाख, सरसठ हजार, दो सौ छयानवे । यथा- [उत्तरार्धम् ] "चत्तारिय कोडिसया, अउणत्तीसं च हुँत्ति कोडीओ। अउणावन लक्खा, सत्तादि चेव य सहस्सा ॥१॥ दो य सया छनउया, पंचमवग्गो इमो विणिहिट्ठो।" अर्थात् चार सौ उनतीस क्रोड, उनचा सलाख सणसठ हज़ार दो सौ छयानथे, वह पंचम वर्ग है इसका *यंत्र निम्न लिखित है:- RADINGINS ६ ३ ६ ६ ३ ३ ३ ३ ८ १ १ १ १ ३ २ ५ ३ १ ३ ६ ३ ३ ३ ४ or 8 8 * यह गणना और यन्त्रावलि इसलिये दिखलाई गई है कि पाठकों को मनुष्य संख्या भक्षी प्रकारातहो जाय।
[श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] इस यंत्र की शुद्धि के लिये नीचे का कोष्टक देखना चाहिये। इसी राशि को इसी राशिके साथ अर्थात् ४२६४६६७२६६४४५६४६६७२६६ गुणा करने से छठा वर्ग निकलता है। जैसे कि-१८४४६७४४०७३७०.५५१६१६ । इसकी गिनती निम्नलिखित तीन गाथाओं द्वारा की जाती है। जैसे कि- । - "लग्खं कोडाकोडी, चउरालीयं भवे सहस्लाई। चत्तारिश सत्तट्ठा, हुति सया कोडीकोडीणं ॥ १ ॥ चउयालं लक्खाई, कोडीणं सत्त चेव य सहस्सा। तिनि य सया य सत्तरि, कोडीणं हुंति नायब्वा ॥२॥ पंचाणका लक्खा, एगावन्नं भवे सहस्लाइ । छस्सोललोत्तरसया, एसो छट्ठो हवइ वग्गो॥३॥" भावार्थ-एक लाख चौरासी हजार चार छः सौ सरसठ क्रोडाकोडा, चौवालीस लाख सात हजार तीन सौ सत्तर कोड, पंचानवे लाख इक्यावन हज़ार छ: सौ सोलह, यह छठा वर्ग होता है।
[ उत्तरार्धम् ] १५९ २ ९ & ६ २ 8 ६ ६ ४४ १ ३ १ ६ 2. १ ४ १ १ ६ ९ १. १ ४ १ २ म ६ ६ . --- ६ १ श ४ १ ८ ३ ५ ६. ६ ९ २ . ८ UP के १- ६ ८ ३ १ ८ ६ इस यंत्र की शुद्धि के लिये निम्न लिखित यंत्र है- ४. इस छठे वर्ग को पूर्वोक्त पंचम वर्ग के साथ गुणा करने पर जो संख्या प्राप्त होती है, उसमें जघन्य पद वाले गर्भज मनुष्य होते हैं। जैसे- ४२६४६६७२६६४१८४४६७४४८७३७०६५५१६१६% ७६२२८१६२५१४२६ ४३३७५६३५४३६५०३३६ । यह संख्या नीचे के यंत्र से जानना चाहिये- وعو 4 وا نعم و المهم 2 ا 2. 8 اله e و" اه أ ما میں * % و1 **دامه ا\%\%) 3 و 8 [ stagirarxxxx ] ارا مه 8 t 7 3 و به 8 الامر و انه وااااا رو ة 8 اسع شده ة إ مهم 3 د * و مه مه १६२ [उत्तरार्धम् ] इस यंत्र की शुद्धि के लिये नीचे का यंत्र देखिये- madaran KHAND । ऊपर दी हुई संख्या को क्रोडाकोड अथवा और किसी उपाय से नहीं गिन सकते। इस लिये अन्तिम अंक से प्रारम्भ कर शुरू के अंक तक बतलाने के लिये ये दो गाथायें दी जाती हैं- "छत्तिन्नि तिनि सुन्न, पंचेव य नव य तिन्नि चत्तारि। पंचव तिरिण नव पंच सत्त तिन्नेव तिन्नेव ॥ १ ॥ चड छ हो चड एक्को, पण दो बकेकगो य अट्ठव । दो दो नव सत्तेव य, अंकट्ठाणा पराहुत्ता ॥२॥" भावार्थ सरल है। इसलिये यह सिद्ध हुआ कि इन उनतीस अंक वाले रूप में जघन्य पद वाले गर्भज अव अन्य प्रकार से इसका वर्णन किया जाता है- सब से प्रथम राशि को अर्द्ध करना चाहिये । पश्चात् उस अर्द्ध काभी श्रद्ध करना चाहिये । फिर इसका भी अर्द्ध करना चाहिये । इल अनुक्रम से करते करते यहां तक करना कि जिससे उसके छयानवे हिस्से हो जायें, और अन्त में परिपूर्ण एक रूप रहे, खंडित रूप न हो । उस राशि से गर्भज मनुष्यों की संख्या जाननी चाहिये । वह राशि यही है, अर्थात् जिसके पूर्व उनतील अंक स्थानक निष्पन्न हुए हो, अन्य कोई राशि नहीं है । इस राशि को छेदन करते हुए-श्राधी मनुष्य होते हैं।
Mean यह ७ , १६२ [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] आधी करते हुए छयानवे छेदन हो जाते हैं और अन्त में परिपूर्ण शेष एक रह जाता है । इसी को छयानवे छेदनक राशि कहते हैं । 'छेदनक' किस प्रकार से होता है ? जैसे कि-प्रथम वर्ग के ४ रूप पहिले दिखा चुके हैं। उसी प्रकार छेदन करने के लिये पहिले इसका आधा किया, तब २ हुओ। तदनन्तर इसी का अर्द्ध १ हुा । तात्पर्य यह है कि-प्रथम वर्ग चार रूप के दो छेदनक होते हैं, अर्थात् वही वर्ग दो वार आधे से आधा किया जा सकता है, इस से अधिक वार नहीं । इस लिये इसके दो ही छेदनक हैं। इसी प्रकार द्वितीय वर्ग षोडश रूप में चार छेदनक हैं । यथा ८ आठ, यह पहिला छेदनक है। फिर १ = ४ चार, यह दूसरा छेदनक है तथा ? = २ दो, यह तीसरा; और = १ एक, चौथा छेदनक है। इसी प्रकार तृतीय वर्ग २५६रूप के आठ छेदनक होते हैं। यथा-21 = १०८ पहिला,''= ६४ दूसरा, * = ३२ तीसरा, = १६ चौथा, 18 पांचवां, %D४ छठा, ४ छठा, २ सातवां और १ यह पाठवां छेदनक है। इसी प्रकार पांचवे वर्ग को छठे वर्ग से गुणित करने पर ७६२२८१६२५१ ४२६४३३७१६३५४३६५०३३६, यह राशि होती है। तथा पांचवें और छठे वर्ग के छेदन योग करने से इस राशि के छेदनक निकलेंगे। अर्थात् पंचम वर्ग ३२ और छठा ६४, इनका योग करने से ३२+ ६४ = ६६ छेदनक होते हैं । इसलिये स्वयमेव भाजित करके सावधानी से देखना चाहिये । यही जघन्य पद का स्व. रूप है । इसके अनन्तर उत्कृष्ट पद का वर्णन किया जाता है- उत्कृष्ट से मनुष्यों के बद्धौदारिक शरीर अनेक हैं। इसका प्रमाण यह है किकाल से वे असंख्येय उत्सर्पिणियों और अवसर्पिणियों के समयों की राशि के तुल्य है । क्षेत्र से यदि एक मनुष्य का रूप प्रक्षिप्त कर दिया जाय और फिर उसके शरीर से एक २ श्राकाश श्रेणि अपहरण की जाय तो संख्येय उत्सर्पिणो अवसर्पिणी जितना काल लगता है। अथवा प्रमाणांगुल श्रोणि की जो प्रदेश राशि है उसके प्रथम वर्ग मूल को तृतीय वर्ग मूल की प्रदेश राशि के साथ गुणित करने पर जो फल पावे उस क्षेत्रप्रमाण में से एक २ मनुष्य शरीर अपहरण किया जाय । तात्पर्य यह कि यदि एक मनुष्य का शरीर हो तो यथोक्त प्रमाण क्षेत्र की नौणि में से प्रति समय एक २ को अनुक्रम से निकाला जाय तो वह असंख्येय उत्सर्पिणियों और श्रव. सर्पिणियों से अपहरण होती है, लेकिन ऐसा नहीं, क्योंकि सर्वोत्कृष्ट गर्भज तथा me ।
[उत्तरार्धम्] संमूर्छिम मनुष्य योजित करने से इतने ही होते हैं, अधिक नहीं । इस प्रकार मनुष्य के बद्धौदारिक शरीर होते हैं। मुक्तौदारिक शरीर तो औधिकों के सदृश जानना चाहिये । बद्ध वैक्रिय शरीर संख्येय हैं, क्योंकि ये सिर्फ वैक्रिपलब्धि वाले गर्भज मनुष्यों के ही होते हैं, तो भी पृच्छा के समय कितने ही संभव हैं। तथा प्रति समय एक अपहरण करने से संख्येय काल व्यतीत हो जाते हैं। यह प्ररूपणा केवल कल्पना मात्र ही है। तथा मुक्त वैकिय शरीर औधिक के समान जानना चाहिये। बद्ध तथा मुक्त आहारक शरीर जैसे इनके औधिक होते हैं उसी प्रकार जानना चाहिये। तेजस और कार्मण शरीर इनके औदारिकों के सदृश होते हैं। इस प्रकार मनुष्यों के पांच शरीर होते हैं । इसके पश्चात् व्यन्तरों के शरीरों का वर्णन किया जाता है। व्यन्तरों के सत्र शरीर नारकियों के समान जानना चाहिये । लेकिन विशेष इतना ही है कि * ब्यन्तर नारकियों से असंख्येय गुणे हैं। ब्यन्तर कितने अंश से सब प्रतर को अपहरण कर सकते हैं ? संख्येय योजन शत वर्गों का जो अंश है उससे अपहरण हो सकते हैं। ज्योतिषियों का सभी वर्णन सुगम ही है, लेकिन विशेष इतना ही है कि इनको विष्कम्भसूचि अन्तरों की विष्कम्भसूचि से संख्येय गुणी अधिक होती है। । * इनके असंख्येय श्रेणियों की विष्कम्भसूचि का प्रमाण प्रज्ञापना सूत्र के महा- दण्डक पदानुसार स्वयमेव जानना चाहिये। क्योंकि वे पूर्वोक्त तियंञ्च पञ्चेंद्रियों की विष्कम्भ सूचि की अपेक्षा असंख्येष गुणे हीन होते हैं । अर्थात प्रज्ञापना सूत्र महादण्डक पा में इनकी अपेक्षा व्यन्तरों का असंख्य गुण हीन पाठ प्रतिपादन किया गया है । + यदि एक २ व्यन्तर संख्येय योजन शत वर्ग रूप प्रतर के भाग को अपहरण करें तो सब प्रतर अपहरण हो सकते हैं। अश्वा यदि एक व्यन्तर उतने भाग मात्र में स्थापन किया जाय तो सभी प्रार पूर्ण हो जाते हैं । * प्रज्ञापना महादण्डक में व्यन्तरों से संख्येय गुणे अधिक श्रोधिक ज्योतिषी प्रतिपादन किये गये हैं। और यहां पर भी प्रतरापहार क्षेत्र उनके क्षेत्र से संख्येय गुणे हीन होते हैं ।
१६४ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] यदि एक २ ज्योतिषी २५६ प्रमाणांगुल के वर्ग रूप प्रतर के प्रतिभाग को अपहरण करें तो समस्त प्रतर अपहरण हो सकता है। अथवा इतने ही अंश में यदि एक २ ज्योतिषी स्थापन किया जाय तो समग्र प्रतर पूर्ण हो सकता है। इस लिये व्यन्तरों से ज्योतिषी संख्येय गुणे अधिक हैं। वैमानिकों के विषय में भी इसी प्रकार जानना चाहिये। विशेष इतना ही है कि-उन श्रेणियों की विष्कम्भसूचि प्रमाणांगुल के द्वितीय वर्गमूल को तृतीय वर्गमूल से गुणा करना चाहिये । इसका भावार्थ यह है कि प्रमाणांगुल प्रतर क्षेत्र में सद्प असंख्येय श्रेणियाँ होती हैं तो भी कल्पना से ६५६ मान ली जायँ तो इसका प्रथम वर्गमूल १६, द्वितीय ४, तृतीय २ होता है। पश्चात् द्वितीय वर्गमूल ४ को तृतीय वर्गमूल २ के साथ गुणा करने पर-४४२ = निष्पन्न होते हैं। इसी प्रकार यहां पर सद्प से असंख्येय श्रोणियां तथा कल्पना से अंणि रूप विस्तार सूचि ग्रहण करना चाहिये। अथवा तृतीय वर्गमूल द्विक रूप का जो धन २४२४२== होता है, उन्हीं श्रोणियों की विष्कम्भसूचि होती है। दोनों का भावार्थ एक ही है। इससे यह सिद्ध हुआ कि भवनपत्योदिकों की सूचि से यह असंख्येय गुणी हीन शेष भावार्थ क्षेत्र पस्योपम तक सरल ही है। इस प्रकार दोनों भेद तथा उपलक्षण से अन्य उच्छवासादिक कालविभाग भी वर्णन किये गये हैं। यहां पर काल प्रमाण का स्वरूप पूरा हुआ । (सू० १४:) इसके अनन्तर भाव प्रमाण का स्वरूप प्रतिपादन किया जाता है- । माक प्रमाण से किंतं भावप्पमाणे ? तिविहे पण्णते तं जहा- गुणप्पमाणे नयप्पमाणे संखप्पमाणे (सू० १४६) * विशेष इतना ही है कि प्रज्ञापना सूत्र में भवनपति, व्यन्तर और नारकी, ये ज्योति- पियों की अपेक्षा प्रत्येक २ सब से असंख्येय गुणे हीन वर्णन किये गये हैं।
तं [ उत्तरार्धम् ] से किं तं गुणप्पमाणे ? दुविहे पण्णत्ते, तं जहा- जीवगुणप्पमाणे अजोवगुणप्पमाणे य । से किं तं अजीवगुणप्पमाणे ? पंचविहे पण्णत्ते, तं जहा-वण्णगुणप्पमाणे गंधगुणप्पमाणे रसगुणप्पमाणे फांसगुणप्पमाणे संठाणगुणप्पमाणे । से किं तं वण्णगुणप्पमाणे ? पंचविहे पण्णत्ते, जहा-कालवण्णगुणप्पमाणे जाव सुकिल्लवण्णगुणप्पमाणे, से तं वरणगुणप्पमाणे । से किं तं गंधगुणप्पमाणे ? दुविहे पण्णत्ते, तं जहा- सुरभिगंधगुणप्पमाणे दुरभिगधगुणप्पमाणे, से तं गंध- गुणप्पमाणे । से किं तं रसगुणप्पमाणे ? पंचविहे पण्णत्ते, तं जहा तित्तरसगुणप्पमाणे जाव महुररसगुणप्पमाणे, से तं MAHARAS रसगुणप्पमाणे। से किं तं फासगुणप्पमाणे ? अट्टविहे पण्णत्ते, तं जहा-कक्खडफासगुणप्पमाणे जाव लुक्खफासगुणप्पमाणे, से तं फासगुणप्पमाणे। सेकिंतं संठाणगुणप्पमाणे ? पंचविहे पण्णत्ते, तं जहा- परिमंडलसंठाणगुणप्पमाणे वटुसंठाणगुणप्पमाणे तंस- संठाणगुणप्पमाणे चउरंससंठाणगुण पमाणे आययसंठाण गुणप्पमाणे, से तं संठाणगुणप्पमाणे, से तं अजीव- गणप्पमाणे ।
[ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] पदार्थ-विद्यमान पदार्थों के और वर्णादिकों के ज्ञानादि परिणाम का बोध होना उसे *भाव कहते हैं, और जिसके द्वारा पदार्थो का स्वरूप जाना जाय अथवा उनका निर्णय किया जाय वही प्रमाण है, और वह (तिविहे पएणत, तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा- ) जैसे कि-(गुणप्पमाणे ) जिन गुणां से द्रव्यादिकों का ज्ञान हो उसे गुण प्रमाण कहते हैं, ( नयप्पमाणे ) जिन अनन्त धर्मात्मक वस्तुओं का एक ही अंश द्वारा निर्णय किया जाय उसे नय प्रमाण कहते हैं, और (संरूपमाणे) जिसके द्वारा संख्या की जाय उसे + संख्या प्रमाण कहते हैं (से किं तं गुणप्पमाणे ?) गुण प्रमाण किसे कहते हैं ? (गुणप्पमाणे) जिन गुणों से द्रव्यादिकों का ज्ञान हो उसे गुण प्रमाण कहते हैं। और वह (दुविहे परण तं,) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा.) जैसे कि-(जीवगुणप्पमाणे) जाव गुण प्रमाण ( अनीवगुणप्पमाणे ।) और अजीव गुण प्रमाण । (से किं तं अजीवगुणप्पमाणे ?) x अजीव गुण प्रमाण किसे कहते हैं और वह कितनी कार से प्रतिपादन किया गया है ? (अजीवगुणप्पमाणे) जिन गुणों के द्वारा अजीव पदार्थों की सिद्धि हो उसे अजीव गुण प्रमाण कहते हैं। और वह (पंचविहे पएणते) पांच प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा.) जैसे कि-(वरणगुणप्पमाणे) वर्ण गुण प्रमाण (गंधगुणप्पमाणे) गन्ध गुण प्रमाण (रसगुणप्पमाणे ) रस गुण प्रमाण (फासगुणप्पमाण) स्पर्श गुण प्रमाण और (संठागागुणप्पमाणे) संस्थान गुण प्रमाण । ( से किं तं वरणगुणप्पमाणे ? ) वर्ण गुण प्रमाण किसे कहते हैं और वह कितनो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? (वएणगुण प्पमाणे ) जिन वर्गों के द्वारा द्रव्यों का ज्ञान हो उसे वर्ण गुण प्रमाण कहते हैं, और वह पंचविहे परणत) पांच प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, ( तं जहा-) जैसे कि-( कालवएणगुणाप्पमाणे,) भवमं भावो-वस्तुनः परिणामो ज्ञानादिः वांदिश्च । + प्रमीयते अनेन इति प्रमाणम् । * नीतयो न:-~अनन्तधर्मात्मकस्य वस्तुन एकांशपरिच्छित्तयः त एव प्रमाणं नय. प्रमाणम्। +संख्यामं संख्या सैत्र प्रमाणं संख्याप्रमाणम् । + अजीव गुण प्रमाण के विषय मे अल्पवक्तव्य होने से प्रथम इसी का स्वरूमें प्रति. पादन किया जाता है।
ANORMAHAR HEARRORN [उत्तराधम] कृष्णादि वर्गों के द्वारा जिन पदार्थो का ज्ञान हो उसे कृष्णवर्ण कहते हैं, इसी प्रकार (जात्र सुकिल्लगुणप्पमाणे । ) शुक्ल वर्ण गुण प्रमाण तक जानना चाहिये (से तं वरणगुणप्पमाणे ।) इस लिये वही वर्ण गुण प्रमाण है। (से किं तं गंधगुणप्पमाणे?) गंध गुण प्रमाण किसे कहते हैं और वह कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? (गंधगुणापमाणे) जिन पदार्थो का गन्ध द्वारा ज्ञान हो उसे गंध गुण प्रमाण कहते हैं और वह (दुविहे पररणत,) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा-) जैसे कि सुरभिगंवगुणप्पमाणे,) सुरभिगन्ध-सुगन्ध गुण प्रमाण और (दुरभिगंवगुणप्पमाणे, दुरभिगन्ध-दुर्गन्ध गुण प्रमाण, (से तं गंधगुणप्प- माणे ।) यही गन्ध गुण प्रमाण है । ( से किं तं रसगुणम्पमाणे ?) रस गुण प्रमाण किसे कहते हैं और वह कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? ( रस गुणधरमोगे ) जिन पदार्थो का बोध रसों के द्वारा हो उसे रस गुण प्रमाण कहते हैं, और वह (पंचवि परण तं,) पांच प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, ( तं जहा- ) जैसे कि तितरम गुणप्पमाणे ) जिन पदार्थों का तिक्त-तीक्ष्ण रसों के द्वारा ज्ञान हो उसे तिक रस गुण प्रमाण कहते हैं। इसी प्रकार .(जाव महुररसगुणयमाणे,) मधुर रस गुण प्रमाण तक जानना । (से किं तं फासगुणप्पमाणे ?) स्पर्श गुण प्रमाण किसे कहते हैं और वह कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? (फासगुणप्रमाणे : जिन पदार्थों का स्पशों के द्वारा बोध हो उसे स्पर्श गुण प्रमाण कहते हैं, और वह ( अढविहे परणाते. ) आठ प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा-) जैसे कि--(कक्खडफास गुणम्पमाणे) जिन पदार्थों का कर्कश-कठिन स्पर्शों द्वारा ज्ञान हो उसे कर्कश स्पर्श गुण प्रमाण कहते हैं। इसी प्रकार ( जाव ॐ लुवकास गुणप्रमाणे,) रूक्ष पश गुण प्रमाण तक जानना चाहिये, (से .. फास गुणप्पमाणे ।) यही स्पर्श गुण प्रमाण है। (से कि त संठाणगुणाप्पमाणे? ) संस्थान गुण प्रमाण किसे कहते हैं और वह कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? (संठायगुणप्पमाणे ) जिन पदार्थों का बोध संस्थानों से हो उसे संस्थान गुण प्रमाण कहते हैं और वह (पंचविहे परणाचे,) पांच प्रकार से प्रतिपादन किया गया है (तं जहा) जैसे कि--(परिभण्डलसंठाणगुणा- पमाणे) जो बलयादि के समान हो उसे परिमंडल संस्थान जानना चाहिये, * यावत शब्द-मृदु, गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्यादिकों का सूचक है । +चूड़ी।
( [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] (वसं ठाणगुणप्रमाणे) जो लोहे के गोलक सदृश हो उसे वृत्त संस्थान गुण प्रमाण कहते (तंससंगण गुणप्पमाणे ) जो सिंघाड़े के फल के समान त्रिकोण हो उसे त्र्यंश संस्थान गुण प्रमाण कहते हैं, (चरंससंठाणगुणप्पनाणे) चतुरस्र संस्थान गुण प्रमाण जो चारों ओर से समकोण हो और (प्राययसंठारागुणाप्पमाणे,) दीर्घ स्थान गुणप्रमाण, (से तं संठाणगुणप्पमाणे,) यही संस्थान गुण प्रमाण है, और (से तं अजीवगुणम्पमाणे ।) यही अजोव गुण प्रमाण है। भावार्थ-भाव प्रमाण उसे कहते हैं जिसके द्वारा पदार्थों का भली भौति शान हो । उसके तीन भेद हैं, जैसे कि-गुण प्रमाण १, नय प्रमाण २ और संख्या प्रमाण ३॥ जिन गुणों से द्रव्यों का बोध हो उसे गुण प्रमाण कहते हैं, अनन्त धर्मात्मक वस्तुओं का एक ही अंश के द्वारा वर्णन करना उसे नय प्रमाण कहते हैं और तीसरा संख्या प्रमाण है (सू० १४६) गुण प्रमाण के दो भेद हैं, जैसे कि-जीव गुण प्रमाण और अजीव गुण प्रमाण अजीव गुण प्रमाण पांच प्रकार का है, जैसे कि-१ वर्ण गुण प्रमाण, २ गंध गुण प्रमाण, ३ रस गुण प्रमाण, ४ स्पर्श गुण प्रमाण और ५ संस्थान गुण । प्रमाण वर्ण गुण प्रमाण पांच प्रकार से प्रतिपादन किया गया है। जैसे कि- कृष्णवर्ण गुण प्रमाण से लेकर शुक्लवर्ण गुण प्रमाण तक। गंध गुण प्रमाण के दो भेद है, सुरभिगंध गुण प्रमाण और दुरभिगंध गुण प्रमाण। रस गुण प्रमाण पांच प्रकार का है, जैसे कि-तिक्तरस गुण प्रमाण, २ कटुकरस गुण प्रमाण, ३ कषायरस गुण प्रमाण,४ प्राचारलरस गुण प्रमाण और मधुररस गुण प्रमाण ५। स्पर्श गुण प्रमाण के पाठ भेद हैं। जैसे कि-कर्कशस्पर्श गुण प्रमाण, इसी प्रकार मृदु, गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध, कत, ये स्पर्श गुण प्रमाण होते हैं संस्थान गुण प्रमाण के पाँच भेद हैं जैसे कि-१ परिमण्डल संस्थान गुण प्रमाण, २ वृत्त संस्थान गुण प्रमाण, ३ व्यंस संस्थान गुण प्रमाण, ४ चतुरस्त्र संस्थान गुण प्रमाण और ५ दीर्घ संस्थान गुण प्रमाण ।
[ उत्तरार्धम् ] इस प्रकार ये सभी बाजीव गुण प्रमाण के भेद हैं । इसके अनन्तर जीव गुण प्रमाण का स्वरूप निम्न प्रकार जानना चाहिये- जीव गुण प्रमाण । से किं तं जीवगुणप्पमाणे ? तिविहे पण्णते, तं जहा णाणगुणप्पमाणे इंसणगुणप्पमाणे चरित्तगुणप्पमाणे । से किं तं णाणगुणप्पमाणे ? चउठिवहे पण्णते, तं जहा-पञ्चक्खे अणुमाणे ओवम्मे आगमे । से किं तं पच्चकवे ? दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-इंदिय पच्चक्खे अणोइंदियपञ्चक्ले श्र। से किं तं इंदियपञ्चक्खे ? पंचविहे पण्णत्ते, तं जहा सोइंदियपञ्चकवे चक्खुरिंदयपञ्चक्खे घाणिदियपञ्चक्खे जिभिदिवपञ्चक्खे फासिंदियपच्चक्खे, से तं इंदिय- पच्चक्खे से कि त णोइंदियपच्चरखे ? तिविहे पगणचे, तं जहा-ओहिणाणपच्चवखे मणपजवणाणपच्चक्खे केवलणाण पच्चक्खे, से तं णोइंदियपच्चक्खे, से त पच्चक्खे । पदार्थ- (से किं तं जीवगुणप्पमाणे ?) जीव गुण प्रमाण किसे कहते हैं, और वह कितने प्रकार का है ? (जीवगुण माणे) ज्ञानादि गुणों के द्वारा जसको सिद्धि हो उसे जीव गुण प्रमाण कहते हैं और वह (निविहे पएणत्ते,) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा.) जैसे कि-(गाणगुणप्पमाणे) ज्ञान गुण प्रमाण (दसणगुणप्प- माणे) दर्शन गुण प्रमाण और (चरित्तगुणप्पमाणे ।) चारित्र गुण प्रमाण । (से किं तं णाणगुणप्पमाणे ?) ज्ञान गुण प्रमाण किसे कहते हैं और वह कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? (णाणगुणप्पमाणे ) जिसके द्वारा जीव की सिद्धि हो उसे ज्ञान गुण प्रमाण कहते हैं, और वह (चउब्विहे पाणते.) चार प्रकार मे.ufe.
। .. । [ श्रीमदंनुयोगद्वारसूत्रम् ] पादन किया गया है, (तं जहा.) जैसे कि-(पच्चक्ले) *प्रत्यक्ष (अणुमाणे) अनुमान (प्रोवम्मे) औपम्य-उपमान और (आगमे ।) आगम । * अशेर्देवने । ३० । पा० ३ । सू० ६५ । 'अशुङ व्याप्तौ' धातु से स प्रत्यय करने पर 'अ' शब्द सिद्ध होता है । उज्ज्वलदत्तटोकायाम्-'अशोङ् याप्तौं' अतो देवनः वाच्ये सः। अश्चभ्रस्जेत्यादिना षत्वादि कार्यम् । 'अक्षोरथावयवे निमित्तके च' 'अक्षाणि पण्डितजना विदुरि- न्द्रियाणि 'अक्षः कर्षे तुषे चक्रे शकटव्यवहारयोः । आत्मज्ञ पाशके चाक्षं तुत्थे ऽसौ वर्चलेन्द्रिये ॥१॥ क्षान्तेर' इति सः । तथा अश भोजने धातु से भिस् प्रत्यय करने पर भी अक्ष शब्द सिद्ध होता है । पश्चात् 'इको यणचि ।' पाणिनीय सूत्र से प्रति उपमर्ग के इक मात्रको यण हुआ। तब प्रत्यक्ष शब्द बन जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि जो ज्ञानरूपतया पदार्थों में व्याप्त होता हैं उसे अक्षु. कहते है । वह कौन हैं ? जीत्र । और 'अश भोजने' धातु से जो अक्ष शब्द निष्पन्न होता है, उसका भावार्थ यह कि जो सब अथों को भोगता है या पालता है, वह अक्ष है । उसका भी मतलब जीव ही होता है। 'गतादिषु प्रादयः ।' शाकटायन: ।२।१।२१। इस सूत्र से यहां पर द्वितीयांत पुरुष समास हुआ है । प्रत्ययोरेव्ययीभावात् । २।१।१५०। इस सूत्र से जो अव्ययीभाव समास किया जाता है, वह इस स्थान पर उपादेय नहीं होता। क्योंकि अव्ययीभाव समास नपुंसकलिङ्गीय है; और प्रत्यक्षा शब्द निलिङ्गीय है । यथा-प्रत्यक्षा बुद्धिः, प्रत्यक्षो बोधः, प्रत्यचां ज्ञानम । इस लिये सारांश यह हुआ कि जो ज्ञान जीवके साथ साचात्कारी वरने वाला होता है, उसे प्रत्यक्ष ज्ञान कहते हैं। तथाह न्यायदीपिकायां-"कश्चिदाह अक्षं नाम चक्षुरादिकमिन्द्रियं तत्प्रतीत्य यदुत्पद्यते तदेव प्रत्यक्षमुचितं नान्यत्" इति तदप्यासत् । आत्ममात्रसापेक्षाणामवधिमनःपर्ययकेवलानामिन्द्रिय- निरपेक्षाणामपि प्रत्यक्षलविरोधात् । स्पष्टत्वमेव हि प्रत्यचास्वप्रयोजक नेन्द्रियजन्प्रत्वम् । अत एव हि मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानां ज्ञानत्वेन प्रतिपन्नानां मध्ये "श्राद्य परोक्षम्" "प्रयक्षमन्यत' इत्यांचयोमतिश्च तयोः परोक्षत्वकधानमन्येषां (ववधिमनःपर्ययकेवलानां प्रत्क्षत्ववाचो युक्तिः । कथं पुनरेतेषां प्रत्यक्ष शब्दवाच्यत्व मति चेत् रूढित इहि बमः । अक्षणोति-व्याप्तोति अथवा जाना- तीत्यक्ष प्रामा, तन्मात्रापेक्षात्पत्तिकं प्रत्यक्ष मिति किमनुपपन्नम् ? इन्द्रियजन्यमप्रत्यक्ष तर्हि प्राप्तमिति चेत् हन्त विस्मरणशीलत्वं वत्सस्य । अवोचामः खल्वौपचारिक प्रत्यक्षत्वमक्षजज्ञानस्य । ततस्तस्यामत्यक्षवं काम प्राप्नोतु, का नो हानिः । एतेनाक्षेभ्यः पराहतं परोक्षमित्यपि प्रतिविहि- तम् । अवैशयस्यैव प्रोक्षलक्षात्वात् ।" परीक्षामुखसूत्राणि प्रभरिपु न्यायग्रन्थेष्वपि प्राग्वदुल्लेखः । यथा-"आद्य परोक्षे", 'प्रत्यक्षामन्यत्” इति । व्यवहारमयात इन्द्रियजन्यज्ञान प्रत्यक्षमिति नन्दीसूत्रादपि दृष्टव्यः । यथा- दिअपचक्खे होइंडिय० इत्यादि ।
) उत्तरार्धम] (से किं तं पचक्खे ?) प्रत्यक्ष प्रमाण किसे कहते हैं और वह कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है । ( पच्चरखे ) जिन पदार्थों का बोध प्रत्यक्ष प्रमाण से जाना जाय उसे प्रत्यक्ष प्रमाण कहते हैं, और वह (दुविहे परण त्ते, ) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा.) जैसेकि (इंदिअाचावे अ) इन्द्रिय प्रत्यक्ष और (गोइंदिअपचक्ले) नोइन्द्रियप्रत्यक्ष। (से किं तं इंदिअपवखे ? ) इन्द्रिय प्रत्यक्ष किसे कहते हैं और वह कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? ( इंदिअपचक्खे ) जिन पदार्थों का ज्ञान प्रत्यक्ष इन्द्रियों द्वारा उत्पन्न हो उसे इन्द्रिय प्रत्यक्ष कहते हैं और वह (पंचविहे परणते, पांच प्रकार से प्रतिपादन किया गया है। (तं जहा-) जैसे कि-(सोइंदिअपचक्के) श्रोत्रे- न्द्रिय प्रत्यक्ष ( चक्खुरिदिपञ्चकवे ) चारिन्द्रिय प्रत्यक्ष ( घाणिदिअपञ्चक्खे ) प्राणेन्द्रिय प्रत्यक्ष (जिभिदिअपचक्खे ) जिह्वेन्द्रिय प्रत्यक्ष (फासिंदिअपञ्चक्र,) स्पर्शन्द्रिय प्रत्यक्ष (से तं इंदिअपचक्खे ।) यहीं इन्द्रिय प्रत्यक्ष है । (से किं तं णोइंदिनपञ्चक्खे ? ) नो इन्द्रिय प्रत्यक्ष किसे कहते हैं और वह कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? (गोइंदिअपचक्ले) जो ज्ञान इन्द्रियजन्य न हो उसे नो इन्द्रिय प्रत्यक्ष कहते हैं, और वह (तिविहे परमत्ते, ) तीन प्रकार प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा.) जैसे कि-(ओहिणाणायचक्ले ).अवधिज्ञान प्रत्यक्ष (मणपज्जवणाणपञ्चक्खे) मनःपर्यवज्ञान प्रत्यक्ष और (केवलणाणपञ्चकवे) केवलज्ञान प्रत्यक्ष, (से तं णोइंदिअपञ्चक्खे,) यही नोइन्द्रिय प्रत्यक्ष है, (से तं पञ्चक्खे ।) यही प्रत्यक्ष है। भावार्थ-जीव गुण प्रमाण तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, जैसे कि-ज्ञान गुण प्रमाण, दर्शन गुण प्रमाण,और चरित्र गुण प्रमाण । ज्ञानगुण प्रमाण के चार भेद हैं, जैसे कि-प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, और आगम । । - +इदं चेन्द्रलक्षणजीवालरं व्यतिरिक्तनिमित्तमाश्रित्योत्पद्यते इति धूमादग्निज्ञानमिव, वस्तुतोऽर्थसाक्षात्कारिवाभावात् परोक्षमेव, केवलं लोकेऽस्य प्रत्यक्षतया रूढत्वात् संव्यवहारतो ऽत्रापि तथोच्यत इति । भावार्थ-यद्यपि इन्द्रियप्रत्यक्षज्ञान एवंभूत नयानुसार परोक्ष माना गया है, तथापि व्यवहार नय से यह प्रत्यक्ष भी है। + जो ज्ञान श्रोत्रेन्द्रिय द्वारा प्रत्यक्ष हो उस श्रोत्रेन्द्रिय प्रत्यक्ष कहते हैं । इसी प्रकार चक्षुरिन्द्रिय प्रत्यक्ष, घ्राणेन्द्रिय प्रत्यक्ष, जिह्वेन्द्रिय प्रत्यक्ष और स्पर्शेन्द्रिय प्रत्यक्ष जानना चाहिये । x'नो शब्द निषेध वाचक भी है, और ईषत् वाचक भी है। यहां पर उसे निषेध वाचक जानना चाहिये। । - १७२ [श्रीमद्नुयोगबारसूत्रम् ] प्रत्यक्ष प्रमाण दो प्रकार का है, जैसे कि--इन्द्रिय प्रत्यक्ष और नो इन्द्रिय प्रत्यक्ष । जो ज्ञान इन्द्रियों के द्वारा उत्पन्न हो उसे इन्द्रिय प्रत्यक्ष कहते हैं । उस के पाँच भेद हैं, जैसे कि-शब्द, रूप, गंध, रस और स्पर्श; इनका ज्ञान होना उसे इन्द्रिय प्रत्यक्ष कहते हैं। जो इन्द्रिय प्रत्यक्ष नहीं होता अर्थात सातादात्मा ही जिस अर्थको देखती है उसे नोइन्द्रिय प्रत्यक्ष कहते हैं। इसके तीन भेद हैं, अवधिज्ञान, मन:- पर्यवज्ञान और केवलज्ञान । इनमें केवल जीव के उपयोग रूप शक्ति की ही प्रबलता होती है, न कि उनके सहकारी भाव की। इस लिये यही प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसके बाद अनुमान प्रमाण का वर्णन किया जाता है- अनुमान प्रमाण से किं २ अणुमाणे ? तिविहे पण्णत्ते, संजहा. पुववं सेसर्व दिटुसाहम्मवं। से किं पुत्ववं? माया पुत्त जहा नटुं, जुवाणं पुणरागर्य । काई पच्चभिजाणे ज्जा, पुवलिंगेण केणई ॥१॥ तं जहा-खत्तेण वा वगणेण वा लंछणेण वा मसेण वा से तं पुव्व। से किं तं सेसवं पंचविहे पण्णते,तं जहा-कज्जेणं कारणेणं गुणेणं अवयवेणं आसएणं । से किं तं कज्जेणं ? संखं सहणं भेरि ताडिएणं वस- भं ढकिएणं मोरं किंकाइएणं हय हेसिएणं गणं गुल- मुलाइपणं रह घणघणाइएणं, से तं कज्जेणं । से किंतं कारणेणं तंतवो पडस्स कारणं ण पडो तिलएण वा, ? * 'गये पावान्तरम् ।
। [उत्सरार्धम् ] तंतुकारणं एवं वीरणोx कहस्स कारणं ण कडो वीरणा- कारणं, मिप्पिंडो घडस्स कारणं ण घडो मिप्पिडकारणं, से तं कारणेणं | से कि तं गुणेणं ? सुवरण निकसेगां पुप्फ गंधेणां लवणं रसेणं मइर सायएणं वत्थं फासणं, से तं गुणे । से कि त अवयवे ? महिसं सिंगे कुक्कुडं सि- हाएक हस्थि विसाणे वराहं दाढाए मोरं पिच्छणं आस खुरे वग्घं नहेणं चमरि वालग्गेणं धागारं लंगुलेणं दुपयं मणुस्सादि चउपयं गवमादि बहुपर्य गोमियादि सोहं केसरे बसहं कुक्कुहणं महिलं वलयबाहाए । गाहा- परिअरबंधेण भडं, जागोजा महिलियं निवसणे । सित्थेण दोणपागं, कविं च एकाए गाहाए ॥१॥ सेत अवयवेर्ण। से कितं आलएणं ? अग्गिंधूमेणं सलिलं बलागेणं बुट्टि अब्भविकारेणं कुलपुत्तं सीलसमायारेणं । [इंगिताकरितै यः, क्रियाभिर्भाषितेन च । नेत्रवक्त्रविकारैश्च, गृह्यतेऽन्तर्गत मनः॥१. से तासएणं, से तसेसवं । से कि तं दिटुसाहम्मवं ? दुविहं पगणतं, तं जहा- सामन्नदिटुं च विसेसदिटुं च । RAISINS x एतदन्यत्र नोपलभ्यते।
१७४ [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] से कि तं सामन्नदिटुं ? जहा एगो पुरिसो तंहा बहवे पुरिसा जहा बहवे पुरिसा तहा एगो पुरिसो, जहा एगो करिसावणो तहा बहवे करिसावणा जहा बहवे करिसावणा तहा एगो करिसावणो, से त सामनदिटुं। से कि त विसेसदिटुं ? से जहाणामए केई पुरुसे कंचि पुरिसं बहूणं पुरिसाणं मज्झे पुवदिटुं पच्चभिजा- गोज्जा-अयं से पुरिसे, बहूणं करिसावणाणं माझे पुवदिटुं करिसावणं पच्चभिजाणिजा, अयं से करिसावणे । पदार्थ-(से किं तं अणुमाणे ? ) अनुमान प्रमाण किसे कहते हैं ? और वह कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ? (अणुमाणे ४) साधन से होने वाले साध्य के ज्ञान को अनुमान कहते हैं, और वह ( तिविहे पएणत्ते,) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है (तं जहा.) जैसे कि-(पुत्र) पूर्ववत् (सेस) शेषवत् और (दिवसाहम्मवं ।) दृष्ट साधय॑वत् । (पे किं तं पुत्रवं ?) पूर्ववत् किसे कहते हैं ? (पुठ) पहिले देखे हुए लक्षणों से जो निश्चय किया जाय उसे पूर्ववत् कहते हैं, जैसे कि-(माया पुत्तं जहा नटुं, जुवाणं पुण गयं । ) जैसे कि-माता देशान्तर को गये हुए और वहां से युवा होकर वापिस आये हुए पुत्र का (काई पञ्चभि नाणेज्जा, पुवलिंगेण केणई ॥१॥) किसी पूर्वाङ्कित चिन्ह के द्वारा निश्चय करती है कि वह मेरा ही पुत्र है ॥ १॥ जैसे कि- (खतेण वा) अपने देह से उत्पन्न हुये क्षत से अथवा (वरणेण वा) श्वानादि के किये हुये व्रण से या लिंकणेण वा) स्वस्तिकादिकों के लाञ्छनों-चिन्हों से या (मसेण) मसे से या (तिलएण वा) तिल से, (ते तं पुववं ।) यह पूर्ववत् अनुमान है। * साधनाताध्यविज्ञानमनुमानम् । तथा च, अनु-लिङ्गग्रहणसम्बन्धस्मरणस्य पश्चात् मीयते-परिच्छिदाते वस्त्वनेनेति अनुमानम् । + विशिष्टं पूर्वोपलब्ध चिह्नमिह पूर्वमुच्यते, तदेव निमित्तरूपतया यस्यानुमानस्यास्ति तत्पूर्ववत् । * तिल मसादि के देखने से माता अपने मन में निश्चय करती है कि यह मेरा ही पुत्र है, क्यों कि इसके अमुक लक्षण अमुक समय में उत्पन्न हुए थे अथवा जन्म काल से ही थे।
[ उत्तरार्धम् ] (से किं तं सेसर्व + ?) शेषवदनुमान कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया (सेसवं ) शेषवदनुमान (पंचविहं परणत,) पांच प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा-) जैसे कि-(कज्ज गां) कार्य से (कारणेणं) कारण से (गुणेणं) गुण से (अवयवेषां) अवयव से और (आसएणं ।) आश्रय से । (से किं तं कजणं ? ) कार्यानुमान किसे कहते हैं ? ( कजणां) कार्य के द्वारा जिसका अनुमान किया जाता है उसे कार्यानुमान कहते हैं, जैसे कि--(संख सद्देणां) तथा चाह न्यायवादी पुरुषचन्द्रः-- . 'अन्यथाऽनुपपन्नत्व-मानं हेतो. स्वलन रणम् । सत्वासचे हि तहमा , दृष्टान्तद्वयलक्षणे ॥१॥ तहाविति-अन्यथानुपपनस्वधा, कथम्भूते सत्चासत्त्वे इत्याह-साधम्यवैधार्यरूपे दृष्टान्तद्वये लक्ष्यते-निश्चीयते । अथ यदि दृष्टान्तद्वयलक्षणेन च मिसत्तायां सर्वेऽपि धर्माः सर्वदा भवन्त्येव, पटादेः शुक्लत्वादिधर्मव्यभिचारात् । ततो दृष्टान्तयोः सत्तासत्वयमौ यद्यपि कचिदेतो न दृश्यते तथापि धमिस्वरूपमन्यथानुपपन्नत्वं भविष्यतीति न कश्चिद्विरोधः, इति भावः। यत्राणि धूमादौ दृष्टान्तयोः: सत्त्वासत्वे तोश्यते, तत्रापि साध्यान्यथानुपपन्नवस्यैत्र- प्राधान्यानस्यैवैकस्य हेतुलक्ष णताऽवसेया । तथा चाह--- धूमादेर्यद्यपि स्याता, सत्त्वासत्त्वे च लक्षणे । अन्यथानुप्रपन्नत-प्राधान्याल्लक्षणेकता ॥९॥ किं च यदि दृष्टान्ते सत्चासत्वदर्शनाह तुर्गमक इप्यते तदा लोहलेख्यं वनं पार्थिवत्वात काष्ठादिवदित्यादेरपि गमकत्वं स्याद् । अभ्यधायि च- दृष्टान्ते सदसत्वाभ्यां, हेतुः सम्यग् यदीप्यते । लोहलेख्य भवेद्वन, पार्थिववाद् द्रुमादिवत् ॥१॥ यदि पक्षधर्मवसपक्षसत्रविपक्षासवलक्षणं हेतोस्त्रैरुप्यमभ्युपगम्यापि यथोक्तदोषभयाव साध्येन सहान्यथानुपपन्नत्वमन्वेषणीयं तर्हि तदेवैकं लक्षणतया वक्तुमुचितम् , किं रूपयेणेति । श्राहच- 100 अन्यथानुपपन्नवं, यत्र तत्र त्रयेण किम् ? नान्यथानुपपत्रां, यत्र तत्र त्रयेण किम् ॥१॥" * अनुमान का अंध्याहार सर्वत्र जान लेना चाहिये।
[ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] शिङ्ख का शब्द से (भेरि ताडिए) भेरि का बजाने से (वसभं दक्किएण) वृषभ-बैल-सांड का डकारने से (पोरं किंकाइएण) मयूर-मोर को किंकारव-शब्द से (हवं हेसिएणं) घोड़े का हिनहिनाने से (हत्यि गुलगुलाइएणं) हाथीका गुलगुलाहट शब्द से (र घणघणाइएणं,) रथ का घनघनाहट शब्द से अनुमान होता है,(से तं ऋजणं ।) यही कार्यानुमान है। (से कि त कारणेणं ?) कारणानुमान किसे कहते हैं ? (शारणेणं) जिन हेतुन्नों के द्वारा कार्य का ज्ञान हो उसे कारणानुमान कहते हैं । जैसे (तंतवो पडस कारणं ) तन्तु वस्त्र के कारण रूप हैं, लेकिन (न पडो तंतुकारणं ) पट तन्तुओं का कारण नहीं है + (एवं) इसी प्रकार (वीरणा कडस्स कारणं) वोरण-तृण कट-मंचा का कारण है, लेकिन ( न कडो वारणकारणं ) कट वीरण का कारण नहीं है, (मिपिडो घडरस कारणं ) मिट्टीका पिण्ड घड़े का कारण है परन्तु (ण घणे मिपिड. कारणं) घट मिट्टी के पिंड का कारण नहीं है, (से तं कारेणं ।) यही कारणानुमान है। से किं तं गुणेणं ? ) गुण से अनुमान किस प्रकार होता है ? (गुगोण) जिन के द्वारा निश्चय किया जाय उसे गुणानुमान कहते हैं। जैसे कि- ( सुवरणं निकसेणं ) सोने का कसौटो से, (पुफ गंधणं ) पुष्प का गन्ध से (लवणं रसेणं) निमक का रस से (मइरं श्रासाइएणं ) मदिरा का स्वाद लेने से, (वत्थं फासेणं) वस्त्र का स्पर्श करने से, (से तं गुणेणं ।) यही गुणानुमान है। पदार्थों का गुण + शस्त्र का शब्द होना कार्य है । इस कार्य के होने पर यह अनुमान होना कि यहां पर शंख है। इसी प्रकार सर्वत्र जानना चाहिये। + उक्त उदाहरणों से निश्चय होता है कि जब कार्य हो जाय तब उसका ज्ञान होना कि यहां पर अमुक पदार्थ है, इसी को कार्यानुमान कहते हैं। विकाश का, * चन्द्रमा के उदय से समुद्र की रद्धि का अनुमान किया जाता है, क्यों कि वह द्धि का कारण भूत है और जलद्धिरूप उसका कार्य है। इसी प्रकार सूर्य के उदय से कमलों के अतीव वर्षा से नाज की पत्ति और कृषकों के मन-आल्हाद का अनुमान होता है। इत्यादि हेतुओं से सिद्ध होता है कि कारण से कार्य का अनुमान अच्छी तरह हो जाता है । +क्यों कि तन्तुओं के समुदाय से पट की रत्ति है, लेकिन पट से तन्तुओं की उत्पत्ति महीं होती, इस लिये तंतु ही कारणभूत हैं। सौने को कसौटी पर घिसने से उसके रूप गुण द्वारा सोने का यथार्थ ज्ञान होता है।
ama [उत्तरार्धम् ] (से किं तं अवयवेणं !) अवयवानुमान किसे कहते हैं ? (अवयवेणं) जिस अव- यव से अवयवी का ज्ञान हो उसे अवयवानुमान कहते हैं, जैसे कि ( माहिसं सिंगेणं ) महिष का शृंग-सींग से (कुक्कु सिहाएणं) मुर्गे का शिखा से (हत्थि +विताणेणं) हाथी का दान्तों से (वराहं दाढाए ) बराह का दाढ से ( मोरं पिच्छणं) मयूर का पिच्छी से (आसं खुरेणं) अश्व का खुर से (बन्धं नहेणं) व्याघ्र का नखों से (चमरिं वा- लग्गेणं) चमरी गाय का बालात्रों से ( वाणरं लागृले) कपि-बन्दर का पूंछ से (दुपय मणुस्सादि) मनुष्यादि का द्विपद से (चउप्पयं गयमादि ) गो आदि का चार पैरों से (बहुपयं गोमिश्रादि कर्णशृगाली--कानखजूरादि का बहुत पैरों से (सीहं केसरेण ) सिंह का केशर से (वसहं कुक्कुरे) वृषभ का ककुभ स्कन्ध से ( महिलं वलयवाहाए ) महिला स्त्री का भुजाओंकी चूड़ियों से । ( परियरबंधेण भई, जाणिज्ज महिलिश्नं निवस- णेगां । ) * परिकरबन्धन--शस्त्र के धारण करने से सुभट तथा वेष पहनने से स्त्री का (सि थेण दोणपागं कविं च एकाए गाहाए ॥ ॥) चावलों का सिक्त--एक दाने से और कवि का एक गाथा से ॥१॥ (से तं अवयवेणं । ) वही अवयव से में अनुमान है। (से किं तं प्रासएगा ?) आश्रयानुमान किसे कहते हैं ? (ग्रासएए) आश्रय से जो पदार्थ का अनुमान होता है उसे आश्रयानमान कहते हैं। जैसे कि-(अग्नि धूमेणं) अग्नि का धूएँ से, (सजिलं बलागेणं) जल का बलाकों से (बुद्धिं अन्नविकारेणं) वृष्टि का बादलों के विकार से (कुलपुत्तं सीलसमायारण) कुलवान पुत्र का शीलादि सदाचार से, इङ्गिताकारितै यैः, क्रियाभिर्भाषितेन च । नेत्रवविकारैश्च, गृह्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥१॥) शरीर की चेष्टाओं से, भाषण करने से, और नेत्र तथा मुख के विकार से अन्तर्गत मन जाना जाता है ॥१॥ (से तं आसएगां ।) यही आश्रयानुमान है, और (से तं सेसर्व ।) यही शेषवत् अनुमान है। । * ये उदाहरण अवयवी के अनुपस्थिति में ही सिद्ध होते हैं। प्रत्यक्षा में सिद्ध नहीं हो सकते । अागम में भी कहा "अयं च प्रयोगो रत्तिवरण्डकाद्यन्तरिवादप्रत्यक्षा एवावयविनि दृष्टव्यः । तत्सत्यक्षतायामध्यचात एव तसिहरनुमानवैयर्थ्यप्रसङ्गादिति । 'विषाण' शब्द के संस्कृत में तीन अर्थ होते हैं-१ सींग, २ कोल, और ३हाथी के दांत । यथा-"विषाणं तु ऋङ्ग कोलेभदन्तयोः"-अभिधाननाममाला। * विशिष्टनेपथ्यरचनालदाणेन । + अर्थात अवयव के देखने से अवयवी का ज्ञान होना । अवयवानुमान है। * आश्रयतीति आश्रयः । हेतु का पर्याय ही आश्रय हैं । ।
एगो पुरिसो) जसे एक पुरुष है, (तहा बहवे पुरिसा) उसो प्रकार बहुत [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] (से किं तं दिसाहम्मवं ?) दृष्टसाधयंवदनुमान किसे कहते हैं ? (दिह्र साहल्म) पूर्व में जाने हुए पदार्थ के द्वारा वर्तमान काल के तत्सदृश पदार्थो का ज्ञान होना, दृष्टसाधर्म्यवदनुमान है, और वह (दुविहं परणत,) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा-) जैसे कि-- (सामनदिटुं ४ च) सामान्यष्ट और (विलेप्सदिट्ट च ।) विशेषहष्ट। (से किं तं सामन्नदिडं ?) सामान्य दृष्टानुमान किसे कहते हैं ? जैसे कि--(जहा से.) मनुष्य , (जहा वहवे पुरिसा) जैसे बहुत से पुरुष हैं, (तहा एगो पुरिसो) उसी प्रकार एक मनुष्य होगा, ( जहा एगो करिसावणो ) जैसे एक कार्षापण-सोने की मोहर है । (तहा वहवे करिसावणा) उसी प्रकार बहुतसी मोहरें होंगी, और (जहा वहवे करिसावणा) जैसे बहुतसी मोहर होंगी (तहा एगो करिसावणो, उसी प्रकार एक मोहर होगी (से तं सामनदिहुँ ।) सामान्यदृष्टानुमान है। (से किं तं विसेसदिष्टं) विशेष दृष्टानुमान किसे कहते हैं ? (से जहानामए) जैसे देवदत्तादि नामक (केई पुरुसे) कोई पुरुष हो ( कंचि पुरिसं ) किसी पुरुष को (बह्वर्ण पुरिसाणां मझ) बहुत से मनुष्यों के मध्य में (पुन्वदिलु) पहिले देखा था (पञ्चभिजाणेजा) जान लिया कि-(अयं से पुरिसे) यह वही आदमी है, तथा-(वणं करिसावणाणं मझे) बहुत सी सोने की मोहरों के बीच में (पुवदिढ करिसावर) पहिले देखी हुई को (पञ्च- भिजाणिजा) पहिचान लिया कि (अयं से करिसावणे ।) यह वही सोने की मोहर है। भावार्थ-साधन से जो साध्य का ज्ञान हो, उसे अनुमान प्रमाण कहते हैं। इसके तीन भेद हैं, जैसे कि-पूर्ववत् १, शेषवत् २, और दृष्टसाधर्म्यवत् ३ । पूर्ववत् उसे कहते हैं जैसे किसी माता का पुत्र बाल्यास्था में परदेश- चला गया परन्तु वह जब युवा होकर अपने नगर में वापिस आया तब उस की माता पहिले देखे हुए लक्षणों से अनुमान करती है यह मेरा ही पुत्र है, ४ दृष्टने पूर्वोपलब्धनार्थेन सह साधर्म्य दृष्टसाधयं, तद्गमकत्वेन विदा त यत्र सद् दृष्टसाधम्र्यवत् । () जैसे कि अन्य द्वीप से आये हुए एक पुरुष को प्राकृति को देख कर यह अनुमान करना कि उस द्वीप में और जो बहुत से मनुष्य होंगे वे ऐसे ही होंगे। * जैसे कि देवदत्तादि नामक किसी व्यक्ति ने किसी पुरुष को बहुत से मनुष्यों के बीच में पहिले देखा था, उसको फिर देख कर अनुमान करता है कि यह वही पुरुष है जिसको मैंने पूर्व में देखा था, इसी को विशेषदृष्टानुमान कहते हैं।
[ उत्तरार्धम् ] १७६ अर्थात् जब उसके लक्षणों से ठीक निश्चय हुआ तब उसको साध्य का ज्ञान साधनों द्वारा यथार्थ हो गया। इसी को पूर्ववत् अनुमान कहते हैं । हेतु के तीन भेद हैं, जैसे कि पक्षधर्मत्व, सपक्षसत्य विपक्षचालत्व । लेकिन यहां पर एक ही प्रकार से माना गया है। इसका कारण यह है कि मुख्यतया हेतु एक ही प्रकार का होता है। शिष्यों के बोध के वास्ते प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, निगमन और उपनय भी वर्णन किये जाते हैं, तथा हि-* 'बालव्युत्पत्यर्थ तत्रोपयोगे शास्त्र एवासौ न वादेऽनुपयोगात्।" बालकों को समझाने के लिये उदाहरण, उपनय और निगमन आदि का भी प्रयोग करना चाहिये । वाद-विवाद में इनकी आवश्यकता नहीं है । 'दृष्टान्तो द्वधा, अन्वयतिरेकभेदात् ।' दृष्टान्त के दो भेद हैं, अन्वय और व्यतिरेक । 'साध्यव्याप्तं साधनं यत्र प्रदश्यते सोऽन्वयदृष्टान्तः। जिस स्थान में साध्य के साथ साधन की व्याप्ति प्रदर्शित की जाय उसे अन्वयदृष्टान्त कहते * उक्तम्चन्यायदीपिकायाम् "वीतरागकथायां तु प्रतिपाद्याशयानुरोधेन प्रतिज्ञाहेतृ द्वाववयवौ, प्रतिज्ञाहेतृदाहरणानि त्रयः, प्रतिज्ञाहेतृदाहदणोपनयाश्चत्वारः, प्रतिज्ञाहेतृदाहरणोपनयनिगमनानि वा पवेति यथायोग्यं परिपाटी।" तदुक्तं कुमारनन्दिभट्टारकैः,-'प्रयोग परिपाटी तु प्रतिपाद्यानुरोधतः ।' इति, नदेव प्रतिज्ञादिरूपातपरोपदेशादुरसन्नं परार्थानुमानम् । तदुक्तम्-- 'परोपदेश सापेचां साधनात साध्यवेदनम् । श्रोतुर्यजायते सा हि परार्थानुमतिर्मता ॥ १॥' इति । तथा च स्वार्थ परार्थं चेति द्विविधमनुमानम् । साध्याविनाभावनिश्चयैकलक्षणाहतो. रुत्सद्यते। न्यायदीपिका में कहा है कि वीतरागकथा के अन्तर्गत शिष्य के श्राशयानुसार यथायोग्य प्रतज्ञिा और हेतु, इन दो अवयवों का प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, इन तीन अवयवों का प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण उपनय, इन चार अवयवों का; अथवा प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन, इन पांचों अवयवों का प्रयोजन होता है।' कुमारनन्दिभटारक ने कहा है-"अवयव करने की शैली तो श्राशयानुसार होती है।" तथा-रार्थानुमान प्रतिज्ञादि रूप दूसरे के उपदेश से उत्पन्न होते हैं । कहा भी है-"परोप देश सुन कर जिस श्रोता को साधन से साध्य का ज्ञान होता है, उसीको परार्थानुमान कहते हैं” उसो तरह यह भी कहा है कि स्वार्थं और पदार्थ दोनों ही प्रकार का अनुमान हेतु से उत्पन्न होता है, जिसका कि साध्य के बिना न होना निश्चित - १८० [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] हैं। 'साध्याभावे साधनाभावो यत्र कथ्यते स व्यतिरेकदृष्टान्तः। जिस स्थान में साध्य के अभाव को दिखा कर साधन का प्रभाव दिखाया जावे, उसे ब्यतिरकदृष्टान्त जानना चाहिये। शेषवत् अनुमान प्रमाण पांच प्रकार का है, जैसे कि-कार्य से १, कारण से २, गुण से ३, अवयव ले ४, और आश्रय से ५। कार्य होते हुए जो कारण का ज्ञान होता है, उसे कार्यानुमान कहते हैं, जैसे कि- शंख, भेरी, वृषभ, मयूर, अश्व, हस्ति, इत्यादि । जब इनके शब्द होते हैं, तो शीघ्र ही अनुभव हो जाता है कि अमुक स्थान पर अमुक का शब्द हो रहा है, इत्यादि। जिन कारणों से कार्यका ज्ञान होता है उसे कारणानुमान कहते हैं। जैसे कि तन्तु पट के कारण हैं, पट तन्तुओं का कारण नहीं है । इसी प्रकार वीरण मंचा का कारण है, लेकिन मंचा वीरणों का कारण नहीं है। मिट्टी का पिण्ड घट का कारण है लेकिन घट मिट्टी का कारण नहीं है। गुण को शान से जो गुणी का ज्ञान होता है, उसे गुणानुमान कहते हैं, जैसे कि-सुवर्ण की परीक्षा कसौटी से, पुष्पों की गन्ध से, सैन्धवादि निमक की रस से, मदिग की प्रास्वादन से, वस्त्र की स्पर्श-छूने से होती। जिन अवयवों से अवयवी को ज्ञान हो, वह अवयवानुमान है । जैसे कि- शृङ्गों से महिष का, शिखा से मुर्गे का, दान्तों से हाथी का, दाढों से सूअर का, खुरों से अश्व का, नखों से व्याघ्र का, वालाग्रों से गाय का, पूछ का, द्विपद से मनुष्यादि का, चार पैर से गौ आदि का, बहुत से पैरों से कानख- । वानर 61 अत्राह-जनु यदा कश्चिनिपुणः पटभावेन संयुक्तानपि तन्तॄन् क्रमेण वियोजयति तदा पटोऽपि तन्तूनां कारणं भवत्येव, नैव, सत्वेनोपयोगाभावात्, यदेव हि लब्धसत्ताकं सत् स्वस्थिति- भावेन कार्यमुपकुरुते तदेव तस्य कारणलेनोपश्यिते, यथा मृत्पिण्डो घटस्य, ये तु तन्तुवियोगत- ऽभावी भवता पटेन तन्तवः समुत्पद्यन्ते तेषां कथं पटः कारणं निर्दिश्यते, न हि ज्वराभावेन भवत पारोगिता सुखस्य ज्वरः कारणमिति शक्यते वक्तुम, यद्य वं पटेऽप्युत्सद्यमाने तन्तवोऽभावी भव न्तीति तेऽपि तत्कारणं न स्युरिति चेत्, नैवं, तन्तुपरिणाम रूप एव हि पटः, यदि च तन्तवः सर्वथाऽभावी भवेयुस्तदा मृद्धावे घटस्यैव सर्वथैवोपलब्धिन स्यात, तस्मासटकालेऽपि तन्तवः सन्तीति सत्त्वेनोपयोगात्ते पटस्य कारणमुच्यन्ते पटवियोजनकाले स्वेकैकतन्त्ववस्थायां पटो नोपलभ्यते, अत- स्तत्र सत्वेनोपयोगाभावान्नासौ तेषां कारण।
बहुत से [ उत्तरार्धम् ] जूरादि को, केसर से सिंह का, स्कन्ध से वृषभ का, भुजाओं की चूड़ियों से स्त्री का, राज्य चिन्ह से सुभट का, का, एक सिक्त-दाने से चावल और एक गाथा से कवि की ज्ञान होता है। साधन से साध्य का अर्थात् आश्रय से आश्रियी का ज्ञान हो उसे आन- यानुमान कहते हैं । जैसे कि-धूएं से अग्नि का, बादलों से जल का, आसमान के विकारों से वृष्टि का, शीलोदि सदाचरण से कुलवान पुत्र का, भाषण करने से या अंग की, चेष्टाओं से और नेत्र तथा मुख के विकार से मन का ज्ञान होता है। दृष्टसाधर्म्यवत् के दो भेद हैं, जैसे कि-सामान्यदृष्ट और विशेषदृष्ट । जैसे कि-आगन्तुक के देखने से किसी पुरुष किसी पुरुष को अनुमान से निश्चय हुआ कि अन्य भी बहुत से मनुष्य इस आकृति वाले होंगे, तथा- मनुष्यों का ज्ञान हुआ तब एक का भी अनुमान किया जा सकता है। इसी प्रकार कार्षापण का भी भावार्थ जानना चाहिये। विशेषद्दष्ट उसे कहते हैं, जैसे कि-किसी पुरुष ने किसी व्यक्ति को पहिले किसी स्थान पर देखा था, फिर किसी समाज के बीच दिखलाई दिया, तब अनुमान किया कि मैं ने इस को कहीं पर देखा है। इस प्रकार स्मृति करते हुए अच्छी तरह निश्चय होगया कि मैं ने इसको अनुक स्थान पर देखा था। इसलिये इसी को विशेषदृष्ट अनुमान कहते हैं। इसी प्रकार कार्षापण का भी उदाहरण जानना चाहिये। तस्स समासो तिविहं गहणं भवइ, तं जहा-अतीय- कालगहणं पडुप्पण्णकालगहणं अण्णागयकालगहणं । से कि तं अतीयकालगहणं ? उत्तणाणि वणाणि निप्फण्णसव्वसस्संवा मेइणि पुण्णाणि य कुडसरणईदी- हिआतडागाई पासित्ता तेणं साहिजइ, जहा सुवुट्ठी भासी, से तं अतीयकालगहणं । से किं तं पडुप्पण्णकालगहणं ? साहुं गोयरग्गगर्य विच्छड्डियपउरभत्तपाणं पासित्ता तेणं साहिज्जइ, जहा- वह १८२ . , [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] सुभिक्खे बट्टइ, से तं पडुप्पण्णकालगहणं । से कितअणागयकालगहणं ? अब्भस्स निम्मलत्तं,कसिणाय गिरी सविजुआ मेहा। थणियं वा उब्भागो, संझा रत्ता पणिटा य ॥१॥ वारुणं वामहिंदं वा अण्णयर वा पसत्थं उप्पायं पा- सित्ता तेणे साहिजइ, जहा-सुवुट्टी भविस्सइ, से तं अणागयकालगहणं। एपसिं चेव विवज्जासे तिविहं गहणं भवइ, तं जहा- अतीयकालगहणं पडुप्पण्णकोलगहणं अणागयकालगहण। से कि अतीयकालगहणं ? नित्तिणाई वणाईअणि- प्फरणसस्सं वा मेइणी सुकाणि अ कुडसरणईदीहि तडागाई पासित्ता तेणं साहिज्जइ, जहा-कुवुट्टी पासी, से तं अतोयकालगहणं। से किं तं पडुप्पण्णकालगहणं ? साहुं गोयरम्गगयं भिक्खं अलभमाणं पासित्ता तेणं साहिजइ, जहा-दुभिक्खे वदृह, से तं पडुप्पण्णकालगहणं। से कितं अणागयकालगहणं । धूमायति दिसाओं, संविअमेइणी अपडिवा। वाया नेरइआ खलु, कुवुट्टीमेवं नित्रेयंति ॥ १ ॥ अग्गेयं वा वायव्वं वा अन्नयरं वा अप्पसत्थं उप्पा- पं पासित्ता तेणं साहिजइ, जहा-कुवुट्ठी भविस्सइ, से तं अणागयकालगहणं, से तं विसेसदिटुं, से तं दिट्टसाहम्मवं, से तं अणुमाणे।
[उत्तरार्धम्] १८ पदार्थ-(तस्स* समासओ) उसका संक्षेप से (तिविहं गहणं भवइ,) तीन प्रकार से ग्रहण होता है, अर्थात् विशेषदृष्टसाधर्म्यवद् अनुमान द्वारा तीनों काल के पदार्थो का निर्णय किया गया जाता है, (तं जहा-) जैसे कि--(अतीयकालगहणं) अतीत काल ग्रहण ( पडुप्पएणकालगहरण) प्रत्युत्पन्न-वर्तमान काल ग्रहण और (श्रणागयकाल गहणं ।) अनागत काल.ग्रहण। (से कि तं अतीयकालगहणं ?) अतीत काल ग्रहण अनुमान किसे कहते है ? ( अतीयकालगहणं ) अतीत काल के पदार्थों का निर्णय करना उसे अतीत काल ग्रहण अनुमान जानना चाहिये । जैसे कि-(उत्तणाणि वणारिण) बनों में घास उत्पन्न हुए हैं, (निप्फरणसम्बसम्सं वा) या सव नाज उत्पन्न हुये हैं (मेइणि पुण्णाणि अ) पृथिवी परिपूर्ण है (कुड) कुण्ड, (सर) सरोवर, (ण) नदी, (दीहियातडागाउँ) बड़े बड़े तालाबादि को (पासित्ता ) देख कर ( ते साहिजइ ) उससे अनुणन किया जाता है, (तं जहा.) जैसे कि--(सुवुट्टी श्रासी) अच्छी वर्षा हुई. ( से तं अतीयकालगहणं । ) यही अतीत काल प्रहण विशेषसदृष्टसाधर्म्यवद् अनुमान है। (से किं तं पडुप्पएणकाला हणं ?) प्रत्युत्पन्न काल ग्रहण किसे कहते हैं ? (पडुप्प- एणकालगहरणं) वर्तमान काल में ग्रहण किये हुये पदार्थों का अनुमान के द्वारा निर्णय करना उसे प्रत्युत्पन्न काल ग्रहण कहते हैं, जैसे कि--(साहुं गोयरग्गगय) गोचरो गये हुए साधु को (विच्छटिअपउरभत्तपाणं) गृहस्थोंसे विशेष आहार पानी पाते हुये (पासित्ता) देख कर ( ते साहिज्जइ उस से अनुमान किया जाता है (जहा-) जैसे कि- (सुभिक्खे * सुभिक्ष वर्त रहा है, सुभिक्ष है । ( से तं पडुप्पएणकालगहण ।) यही प्रत्युत्सन्न काल ग्रहण विशेषदृष्टसाधर्म्यवद् अनुमान है। (से किं तं प्रणागयकालगहणां ?) अनागत काल ग्रहण किस कहते हैं ? (अण्णा गयकालगहएं) भविष्यकाल में ग्रहण किये जाने वाले पदार्थों का अनुमान के द्वारा * विशेषदृष्टसाधयंवरः । तस्येति सामान्येनानुवर्तमानमनुमानमात्रं सम्बध्यते । अर्थात वन में घास उगा हुआ पृथ्वी में सभी नाज पैदा हुए हैं; कुण्ड, सरोवर, नदी आदि सब जल से परिपूर्ण हुए हैं। इनके देखने से अनुमान होता है कि यहां पर भी अच्छी दृष्टि हुई है। यह 'पक्ष' है, 'तृण धान्य जलाशयादि' ये उस के कार्य हैं । इस लिये यह हेतु' और 'अन्य देशवत्' यह अन्वयदृष्टान्त है। इसी प्रकार ये तीन २ सर्वत्र सभी के जानना चाहिये। जैसे कि-पच हेतु और दृष्टान्त । * यहां पर 'सुभिक्ष', पक्ष बचन; 'प्रचुर आहार पानी' हेतु; और 'पूर्वदृष्टदेशवत'; हृष्टान्त है। .
[ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् । निर्णय करना, उसे अनागत काल ग्रहण कहते हैं, जैसे कि-(अम्भस्स निम्लतं, कसणा य गिरी सबिज्जुमा मेहा || निर्मल श्राकाश में काले रंग के पहाड़ जैसे बिजली सहित मेघों की- थणियं वा उठभायो, संझा रत्ता पणिट्ठा य ॥१॥) गर्जना तथा अनुकूल हवा और सन्ध्या का जालपन ॥१॥ तथा-(वारुणं वा) वरुण के नक्षत्र या (महिदं वा) महेन्द्र के नक्षत्र अथवा ( अन्नयरं वा पसत्यमुपायं) अन्य कोई प्रशस्त उत्पांत-उल्का पात या दिग्दाहादि को ( पासित्ता ) देख कर (लेणं साहिज्जइ,) उस से अनुमान किया जाता है (जहा , जैसे कि- सुबुढी भविस्सइ,) + अच्छी वृष्टि होगी, ( से तं अणागय. कालगहणं । ) इसे x अनागत काल ग्रहण विशेषदृष्टसाधर्म्यवद् अनुमान जानना चाहिये। (एएसिं चेव विवज से ) इनका विपरीत भी (तिविहं गहणां भवइ,) ग्रहण तीन प्रकार से होला है, 'तं जहा-) जैसे कि-- अतीयकालगहणं) अतीत काल ग्रहण पदुप्प- मकालगहण) वर्तमान काल ग्रहण और ( अण्णायकालगहरणं । ) अनागत-भविष्यत्काल ग्रहण। से किं तं अतीयकालगहणं ? ) अतोत काल ग्रहण किसे कहते हैं ? (अतीयकाल गहण) अतीत काल के पदार्थों को वर्तमान में अनुमान के द्वारा निर्णय करना उसे अतीत काल ग्रहण कहते हैं, जैसे कि-(नित्तिणाई वणाई) बिना घासके जंगल (अणिप्क रणसम्स वा मेइणी) अथवा पृथिवी में धान्य वगैरह न पैदा हुए हों, (सुकाणि अ कुड- सरणईदीहिअतडागाई) और सूखे हुए कुण्ड सरोवर नदो दीर्घाकार जलाशय तालाव आदि को (पासित्ता) देख कर (तेणं साहिजइ) उससे अनुमान किया जाता है, (जहा.) जैसे कि-(कुबुट्ठीआसी) * कुवृष्टि-खराब बर्षा हुई है, (से तं अतीयकालगहणणं ।) यही अतीत काल ग्रहण है। रेवती ६, + पूर्वाषाढ़ा १, उत्तराभाद्रपद २, आश्लेषा ३, आर्द्रा ४, मूल ५, और शतभिष ७॥ अनुराधा १, अभिजित २, ज्येष्ठा ३, उत्तराषाढा ४, धनिष्ठा ५,रोहिण ६, श्रवणी + यहां 'सुवृष्टि होगी', यह पक्ष वचन; अाकाश का निर्मलपना इत्यादि, हेतु, और "जैते भागे हुई थी", यह दृष्टान्त है । 'चेव निपात है और यहां पर वाक्यालंकार में आया हुआ हैं । x पूर्वोक्त तृणादि कुटष्टि के कारणों की अपेक्षा विपरीत प्रतिपादन करनेसे कुटष्टि श्रादि का बोध होता है। और इसके भी पल, हेतु, उदाहरण प्रादि यथासंभव पूर्व से विपरीत कल्पित कर ना चाहिये।
" [ उत्तरार्धम् ] (से किं तं पडुप्पएणकालगहरण ? वर्तमान काल ग्रहण किसे कहते हैं ? (पडुप्प- नकालाहां ग्रहण किये हुए पदार्थों को अनुमान के द्वारा वत्तं नान काल में निर्णय करना उसे प्रत्युत्पन्न-वर्तमान काल ग्रहण कहते हैं, जैसे कि--(साहुं गोबरगा) गोचरो गये हुए साधु को (भिक्खं अलभन ए) भज्ञा नहीं मिलते हुए (पालिता) देख कर (तेण साहिजइ) उस से अनुमान किया जाता है, (जहा-) जैसे कि-(दुभिक्खे बट्टइ,) दुर्भिक्ष वर्त रहा है, (से तं पडुप्पएणकालगह 1) अतः यहां प्रत्युत्पन्न काल ग्रहण है। (से किं तं अणागएकालगहण ?) अनागत काल ग्रहण किसे कहते हैं ? (अणागय कालगहणं, अनागत काल ग्रहण उसे कहते हैं, जैसे कि-(यूमायति दिसाओ, संविअभेदणी अपडिवहा । वाग नेरइया खलु, कुखुट्टीमेवं निवेति ॥ १५॥) धूम युक्त दिशाओं के देखने से, पृथिवो का हिग्धपना न होने से, नैऋत कोण को हवा होने से, निश्वय हो कुवृष्टि के लक्षण प्रतीत होते हैं ॥१॥ अग्गय क) अथवा आग्नेय भण्डल के नक्षत्र हों (बापचं वा) या वायव्य मण्डन के नक्षी हों (अए एयरं वा अप्प उत्व उन्नाथ) या अन्य काई खराब उत्पाद हो, उस को (पासित्ता) देख कर (तेणं साहिज्जइ,) उस से अनुमान किया जाता है, (जहा.) जैसे कि- कुवुट्ठी भविस्सइ) :खराब वर्षा होमी, (से तं अणागयकालगहण ।) यही अना- गत काल ग्रहण जानना चाहिये । ( स तं वितसदिडं,) यही विशेषदृष्ट है, (सेत विसाह मवं,) यही दृष्टसावम्यवत् और (से तं अणु गाणे ।) यही अनुमान प्रमाण है। भावार्थ-उक्त सामान्य रूप अनुमान द्वारा तीनों काल के पदार्थों का बोध होता है, जैसे कि वन में तृण विशेष उत्पन्न हुए हैं, अथवा पृथ्वी में धान्यों की निष्पत्ति अतीव हु ईहै, या सभी जलाशय जलसे परिपूर्ण हैं, इत्यादिकों के देखने से अनुमान होता है कि यहां पर सुवृष्टि हुई है, यह भूत काल के पदार्थों का ज्ञान है। इसी को अतीत काल ग्रहण अनुमान कहते हैं । वर्तमान काल के पदार्थों के लिये यह उदाहरण है, जैसे कि-गोचरी गये * विशाखा १, भरणी २, पुष्य ३, पूर्वाफाल्गुनी ४, पूर्वाभाद्रपद् ४, मघा ६, और कृत्तिका ७॥ +चित्रा १, हस्त २, अश्विनी ३, स्वाति ४, मार्गशीर्ष ५, पुनर्वसु ६, और उत्तरा फाल्गुनी ॥ यहां पर भी पक्ष, हेतु और दृष्टान्त यथासम्भव पूर्ववत् घटा लेना चाहिये ।
[श्रीमद योगद्वारसूत्रम् ] हुए साधु को गृहस्थों से विशेष-प्रचुर आहार पानी देते हुए देख कर अनु- मान किया कि यहां पर सुभिक्ष-सुकाल है। अनागत काल के लिये, जैसे कि--निर्मल आकाश में काले पहाड़ जैसे बिजली सहित मेघों की गर्जना तथा अनुकूल वायु, रक्त सन्ध्या, वरुण या महेन्द्र मण्डल के नक्षत्र हो अथवा शुभ उत्पतों को देख कर अनुमान होता है कि सुवृष्टि अवश्य होगी । इसी प्रकार ये तीनों उदाहरण विपरीत भी होते हैं, जैसे कि-वन निस्तुण हैं, पृथ्वी में धान्य भी उत्पन्न नहीं हुए, जलाशय भी शुष्क हो गये । इससे अनु- मान होता है कि यहां पर कुवृष्टि हुई है । यह अतीत काल का उदाहरण है। वर्तमान काल का निम्न प्रकार से जानना चाहिये--नगर में गोचरी लेने के लिये गये हुए किसी साधु को भिक्षा प्राप्त नहीं होते हुए देख कर अनुमान किया कि यहां पर दुर्भिक्ष है। भविष्यकाल के लिये, जैसे कि-जभी दिशाओं में धूआहो रहा है,पृथिवी भी शुष्क है, वायु वर्षा के अनुकूल नहीं है, आग्नेय और वायव्य मंडल के नक्षत्र हैं, आकाश में भी अशुभ उत्पात हो रहे हैं । इस से अनुमान हुआ कि यहां पर कुवृष्टि होगी। इसी प्रकार अन्य उदाहरण भी जानने चाहिये। उपरोक्त सभी उदाहरण अनुमान प्रमाण के तीनों काल के हैं। इन में पक्ष दृष्टान्त, ये तीनों यथासम्भव घटाना चाहिये। हेतु और उपमान प्रमाण से कि तं ओवम्मे ? दुविहे पण्णत्ते, तं जहा- साह- म्मोवणीए अवेहम्मोवणीए । से कितं साहम्मोवणीए ? तिवहे पण्णत्ते, सं जहा- किंचिसाहम्मोवणोए पायसोहम्मोवणीए सव्यसाहम्मो- वणीए । से कितं किंचिसाहम्मोवणीए ? जहा मंदरो तहा सरिसवो जहा सरिसवो तहा मंदरो, जहा समु. तहा गो- . [ उत्तरार्धम् ] पर जहा गोप्पयं तहा समुहो, जहा आइच्ची तहा खजोतो जहा खजोतो तहा आइच्यो जहा चंदो तहा कुमुदो जहा कुमुदो तहा चंदो, से तं किंचिसाहम्मोवणीए । से कि त पायसाहम्मोवणीए ? जहा गो तहा गवो जहा गवो तहा गो से तं पायसाहम्मोवणीए । से कि तं सञ्चसाहम्मोवणीए ? सवसाहम्मे ओव- म्मे नत्थ तहावि तेणेव तस्त ओवम्म कोरइ, जहा अरिहंतेहि अरिहंतसरितं कयं, चक्काहिणा चकवहिसार- स कयं, बलदेवेण वन विसरिसं कयं, वासुदेवेण वासुदेव सरिसं कयं साहुणा साहुसरिसं कयं, से तं सबलाहम्ने, से तं साहम्मोवणीए। से किं तं वेहम्मोवणोए ? तिविहे पर गत्ते, तं जहा- किंचिवेहम्मे पायवेहम्मे सव्ववेहम्मे । से किं तं किंचिवहम्मे ? जहा सामरो न तहा बाहु लेरो जहा बाहुलेरो न तहा सामलेरो, से तं किंविवेहम्मे । से कि पायवेहम्मे ? जहा वायसो न तहा पायसो जहा पायसो न तहा वायसो, से तं पायवेहम्मे । से कि तं सव्ववेहम्मे ? सबवेहम्मे ओवम्मे नस्थि, तहावि तेणेव तस्स ओवम्म कीरइ, जहा णीएण णीस रिसंकयं, दासेण दाससरिसं कयं, काकेण काकासरिसं कयं, साणेण साणसरिसं कयं, पाणेण पाणसरिसं कयं, से व सव्ववेहम्में, से तं वेहम्मोवणोए, से तं ओवम्मे ।
१८८ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] पदार्थ:-( किं वं *ग्रोवस्मे ? ) उपमान प्रमाण किसे कहते हैं ? (ोत्र मे) जिन सदृश वस्तुओं का परिमाण परस्पर तुल्य कर के दिख जाया जाय उसे उपमा कहते हैं और जिस में उपमा का भाव हा उसे औरम्य-उपमान जानना चाहिये, और वह (दुविहे परणते,) दो प्रकार से प्रति गाइन किया गया , ( जहा-) जैसे कि- (साहम्मात्रणोए अ) साधोपनीत और (वे हम्मात्र गाए अ) वैधोपनीत । (से किं तं साहम्मोवणीए ?) साधोपनीत किसे कहते हैं ? (साहम्मोर गोए । जिन पदार्थों को साधम्यता-सजातीयता उपमा के द्वारा सिद्ध की जाय उसे साध. म्योपनीत कहते हैं, और वह (तित्रिह पर णते,) तान प्रकार से प्रतिपादन किया गया है (तं जहा-) जैसे कि-(किंचिताहम्मावणीए) किंचित्सायोपनोत (पाथसाहम्मोरणीए) प्रायःसाधोपनोत और (सबसाहम्मावणीए ।) सर्वसाधम्यो पनीत । (से किं तं किं चसाहम्मोत्रणीए ?) किंचित्सायन्या पनीत किसे कहते हैं ? (किं.च साहम्मोजणीए) किंचितसाधोपनोत उसे कहते है जिसमें किंचिन्मात्र साधर्म्यता पाई जाय, जैसे कि-(जहा मंदरो) जिस प्रकार मन्दर है (तहा सरिसवा) उसी प्रकार सरसों है, और (जहा सरिसवो तहा मंदरी) जैसे सरसों है उसो प्रकार मन्दर है, (जहा समुद्दो) जिस प्रकार समुद्र है ( तहा गोप्पयं) उसो प्रकार * गोष्पद-आखात है, जहा गोपयं ) जिस प्रकार गोष्पद है ( तहा समुद्दो) उसी प्रकार समुद्र है; तथा- (जहा आइचो तहा खजाता) जिस प्रकार आदित्य-सूर्य है, (तहा खजाता) उसी प्रकार खद्योत--पटबीजना है ( जहा खजातो तहा आइची ) जैसे खद्योत है वैसे ही सूर्य है, अथवा ( जहा चंदो तहा कुमुदा) जिस प्रकार चन्द्रमा है उसी प्रकार कमल हैं, और ( जहा कुमुदो तहा चंदो, ) जैसे कमल है वैसे हो चन्द्रमा है, (से त किंचितादम्मावणाए ।) यही किंचित्साधयो पनीत है। ( से किं तं पायसाहम्प्रोवर्ण ए ? ) प्रायःपाधस्या पनीत किसे कहते हैं ? (पायसा- हम्मोवणीए) जो सब प्रकार से साम्यता रक्खे लेकिन किसी में भेद हा जाय, वही * उपमीयते---सदृशतया वस्तु गृह्यते अनेनेत्युपमा सैवौपम्यम् । +पहाड़ या मेरु पर्वत। क्योंकि दोनों ही मूर्तिमान हैं। यद्यपि उनके परस्पर बहुत भेद हैं तथापि मूतिमत्त्र में साम्यता है। अर्थात दोनों ही जलाशय रूप हैं । +क्योंकि दोनों ही आकाशगामी और प्रकाशक हैं। *अर्थात् चन्द्र और कुमुद दोनों ही शुक्ल हैं । Manon [ उत्तरार्धम् ] १८६ प्रायःसा सम्यो पनीत है । ( जहा *गो तहा गवनी ) जैसे गौ है उसी प्रकार गवय- नील गाय है, और (जहा गवो तहा गो, जिस प्रकार नील गाय है उसी प्रकार गौ (से तं पायसाहम्नोवणीए ।) वही प्रायःसाधम्यो पनीत है। (से किं तं सबसाहम्मोवणीए ?) सर्वसाधोपनात किसे कहते है ? (सब्बसा. हन्मोवणीए) जिस में सभी प्रकार की समानता पाई जाय, उस को सर्वसाधोपनीत कहते हैं परन्तु ( सम्बसाइन्मे ) सर्वसाधम्यपने में (ोत्रम्मे नत्थि ) उपमा नहीं होती, (तहाधि) तो भो ( तेणेव तस्स ) उसीसे उसकी (ोमा कोइ,) उपमा की जाती है, (जहः-) जसे कि-(x अरिहंतेहि अरिहंतमरिसं कयं,) + अरिहंत ने अरिहन्त के समान किया, (चकवधिमा चकवट्टिसरिसं कयं,) चक्रवर्ती ने चक्रवर्ती के समान किया, (बलदेवेण बलदेवसरिसं कयं,) बलदेव ने बलदेव के सहश किया, (वासु वेण वासुदेवसरिसं कसं,) वासुदेव ने वासुदेव के समान किया, ( साहुणा ) साधु ने (साहुसरिसं कर्ष, साधु के समान किया, (तं सबसाहम्मे, ) यही सर्वसाधोपनीत है, और (से तं साहम्मोव- रणीर) यही साधन्यो पनीत है। (से किं तं वेहम्मोवणीए ?) वैधम्यो पारीत किसे कहते हैं ? (वेहम्मोवणीए ) जो सामान्य धर्मसे विपरीत हो और वह (तिनिहे पएणत्ते,) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा- ) जैसे कि--(किंचिवेहम्मे) किंचिद्वधर्म्य (पायवेहम्मे) प्रायः वैधये और (सबवेहम्मे ।) सर्ववैधयें । (से किं तं किंांचवेहम्मे ! ) किंचि द्वैधर्य किसे कहते हैं ? (कि.वेहम्मे) जिसमें किंचिन्मात्र वैधयंता हो, जैसे कि जहा सामलेरो) जिस प्रकार श्याम गौ का बछड़ा ANNADHI * सकम्बलो गौः अर्थात् गौ सास्लादियुक्त होती है। स्त्त कष्ठस्तु गवयः अर्थात् नील गाय के वत्तलाकार कण्ठ हो है। खुर, ककुद, सींग आदि सब में तो साम्यता है, सिर्फ नील गाय का वत्त लाकार का है और गौ सास्नादियुक्त होती है । इसी लिये प्रायःसाधम्योपनीत है। +"भितो हि हिहिं ।" मा व्या०1८।३। ७ । तथा "भिस् यस्सुपि ।” प्रा० व्या० 15। ३ । १५ । इन सूत्रों से उक्त पद महंत' शन का तृतीया का बहुवचन सिद्ध होता है x'तीर्थ का स्थापन करना इत्यादि कार्य अरिहन्त ने अरिहन्त के समान ही किया। क्योंकि लौकिक में यह भली प्रकार से प्रगट है कि किसी के किये हुये अद्भुत कार्य को देखकर ऐसा कहा जाता है कि इस कार्य को आप ही कर सकते थे अथवा आपके तुल्य जो होगा वही इस कार्यको कर सकता था, अन्य नहीं ।
M [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] है (न तहा वाहुलेरो,) उसी प्रकार श्वेत गौ का बछड़ा नहीं है. और (जहा बाहुलेरो) जैसे श्वेत गौ का बछड़ा होता है, (न तहा सामलेरो,) उसी प्रकार श्याम गौ का बछड़ा नहीं होता * (से तं किंचिवेहम्मे !) यही किंचिट्ठधर्म्य है। (से किं तं पायवेहम्मे १) प्रायः वैधयं किसे कहते हैं ? (पाथवेहम्मे) जिसमें करीब २ वैधयंता हो, यथा-(जहा वायतो) जिस प्रकार कौआ होता है (न तहा पायसो,) उसी प्रकार दूध नहीं होता, और (जहा पायसो) जिस प्रकार होता है (तहा बायसो) तद्वत् कौश्रा नहीं होता। (से 6 पायवेहम्मे !) यही प्राय:वैधर्म्य है। (मे किं तं सब्ववेहम्मे !) सर्ववैधयं किसे कहते हैं ? (सब्ववेहम्मे) जिसमें किसी प्रकार की भी सजातीयता न हो, यद्यपि (मञ्चवेहरमे) सर्ववैधयंपने में (प्रोवम्मे नत्थि) उपमा नहीं होतो, (तहावि) तथापि (तेणेव तस्स) उस को उसी के साथ (अोवम्भं कीरइ,) उपमा की जाती है, ( जहा-) जेसे-(णीएण गीअसरिसं कयं, ) नीव ने नीच के समान किया, (दारुण दाससरिसं कयं,) दास-सेवक ने दासके समान किया, और (काकण काक- सरिसं कयं,) कौए न कोए जैसा किया, (साणेण साणसरिसं कयं,) श्वान-कुत्त ने श्वान . * अत्र च शेषयमस्तुल्यत्वाद्भिननिमित्तजन्मादिमावस्तु वैलक्षण्यात किंचिद्वधम् भाव- नीयम् । अर्थात् यहां पर गोपन में तो कुछ भेद नहीं है लेकिन माता के पृथक् भाव होने से वर्ण भेद अवश्य है । इसी कारण उसकी किंचिधयंता सिद्ध की गई है। + अत्र वायसपायसयोः सचेतनत्वाचेतनत्वादिभिर्बहुभिर्धावसंवादात अभिवानगतवर्ण- द्वयेन सत्यादिमात्रतश्च साम्यात्प्रायोवैवयंता भावनीया । अर्थात् 'वायत' कौए का और पायस' दूध का नाम है, इस लिये दोनों में साम्यता नहीं हो सकती । कारण कि 'वायस' चैतन्य है और 'पायस' जड पदार्थ है। सिर्फ इनके नामों में दो दो वर्षों की साम्यता है । अतः यहां पर प्रायःवै. धम्ता जाननी चाहिये। सर्ववैवयं तु न कस्यचित्केनापि सम्भवति, सत्त्वप्रमेयत्वादिभिः सर्वभावानां समानत्वात, तैरप्यसमानत्वे ऽसत्त्वप्रसङ्गात् । तथापि तृतीयभेदोपन्यासवैयर्थ्यमाशङक्याह । अर्थात सर्ववैधर्म्य तो वास्तव में किसी का किसी के साथ नहीं हो सकता। क्योंकि कम से कम सत्त और प्रमेया आदि गुणों से तो संपूर्ण पदार्थ परस्पर में समान ही हैं । यदि इनसे भी असमानता हो तो पमार्थ के अप्तत्व-प्रभाव का ही प्रसङ्ग हो जाय । तो भी तीसरे भेद सर्ववैधयं की व्यर्थता को दूर करने के लिये कहते हैं । इस ने गुरु गतादि जैसे अत्यन्त खराक काम किये हैं, जिसको नीच से नीच भी नहीं कर सकता।' इसी प्रकार दासादि के उदाहरण भी जानने चाहिये। ।
। [ श्रीमद योगद्वारसूत्रम् ] जसा किया, (पाणेण पाणसरिसं कथं,) नीच ने नीच के सदृश किया, (से तं सबवेहम्मे) यही सर्ववैधयं है। और (से तं वेहम्मोवणीए । ) यही वैधयापनीत है। (से सं प्रोवम्मे ।) इसी को उपमान प्रमाण जानना चाहिये । भावार्थ--उपमान के दो भेद हैं, जैसे कि-साधोपनीत और वैधोपनीत। साधोपनीत तीन प्रकार का है, जैसे किंचित्साधोपनीत, प्रायः साधम्योपनीत और सर्वसाधोपनीत । किंचितसाधोपनीत उसे कहते हैं जिसमें किंचित् साधर्म्यता हो, जैसे जिस प्रकार मेरु पर्वत है, उसी प्रकार सर्वर का बीज है, क्यों कि दोनों ही मूर्ति मान हैं । और जैसे समुद्र है, उसी प्रकार गोष्पढ़ है, क्यों कि दोनों ही जलाशय हैं, तथा जैसे आदित्य है उसी प्रकार खद्योत भी है, क्यों कि दोनों ही प्रकाशक और आकाश गामी हैं. और जैसे चन्द्र है वैसे ही कुमुद है, क्यों कि दोनों ही श्वेत हैं। यही किंचित् लोधोपनीत है। प्रायः साधोपनीत उसे कहते हैं जो करीब २ साधर्म्यता रक्खे, जैसे गौ है वैसे ही गवय नील गाय है केवल सास्नादिवर्जित ही गवय होता है, शेष अङ्गोपाङ्ग गौ के ही सहश होते हैं। देशकालादि भिन्न होने से सर्वसाधर्म्य की उपमा कभी हो ही नहीं सक्ती तथापि इसके निम्नलिखित उदाहरण हैं, जैसे कि-अर्हत् ने. अर्हत् के तुल्य तीर्थ प्रवर्तनादि कृत्य किया अथवा चक्रवर्ती ने चक्रवर्ती के.समान कार्य किया। इसी प्रकार अन्य उदाहरण जानने चाहिये । इसी को सर्वसाधोपनीत उप- मान कहते हैं। वैधोपनीत तीन प्रकार का है। जैसे कि-किञ्चिद्वधर्म्य, प्राय:वैधर्म्य और सर्ववैधय 'किक्षिद्वधर्म्य उसे कहते हैं जिसमें किञ्चिन्मान वैधर्म्यता हो, जैसे- जैसा सांवली गौ का बछड़ा है वैसा सफेद गौ का नहीं है, क्यों कि वर्ण भेद है। इसी प्रकार- प्रायः वैधर्म्य-जैसे कौश्रा है उसी प्रकार दूध नहीं है। खर्व वैधयं जैसे-नीच ने नीच के समान ही कृत्य किया है। इसी एकार
[उत्तराईम
दास, कौश्रा, श्वान, चाण्डाल आदि उदाहरण जानने चाहिये। इसी को लव
वैवर्य कहते हैं।
है
।
| आगम-प्रमाण निम्न अनु.
यही वैधन्यौपनीत तथा उपमान प्रमाण
सार जानना चाहिये-
प्रामम् प्रमाण
?
से कि तं श्रा-मे ? दुविहे पण्णते, तंजा- लोउए
अलोउत्तरिए असे कितं लाइए ? जगणं इमं अगणाणि-
एहि मिच्छादिट्रीएहि सच्छंदबुद्धिमइविगप्पियं ते जहा-
भारह रामायणं जाव चत्तारि वेया संगोवंगा, से तं लोहए
आगमे।
से कितं लोउत्तरए ? जगणं इमं अरिह तेहिं भगवंतेडि
उप्पाणणाणदसणधरेहि तीयपच्चुपएणमणागयजाणएहि
तिलुक्कवहिषमहिअपूइएहि सव्वाणहि सब्बदरसाहि
पणीअं दुवालसंग गणिपिडगं, तं जहा- आयारो जाव
दिहिवाओ । अहवा आगमे तिविहे पण्णते. तं जहा-
सुत्तागमे अत्थागमे तदुभयागमे । अहवा-आगमें तिविहे
पसरणत्ते, तं जहा–अत्तागमे अणंतरागमे परंपराग
तित्थगराणं अत्थस्स अत्तागमे गणहराणं सुत्तस्स अत्तगमे
अस्वस्त अतिरागमे गणहरसीसा सुत्तस्स गणंतरागमे
अस्थस्स परंपरागमे । तेणं पर सुत्तस्मावि मत्थस्सविणो
अत्तागमे यो अणंतरागमे परंपरागमे, से तं लोगुत्तरिए से
माने से ग्राणप्पमा।
KANTS Maow [श्रीमदनुबोगद्वारचन] १९३ पदार्थ-(से किं तं गमे ?) = भागम प्रमाण किसे कहते हैं ? (आगमे) जो गुरु परम्परा से आया हो अथवा जिलसे सत्र प्रकार के जीवादि पदार्थ जाने जायं, उसे आगम कहते हैं, और वह (दुविहे पणत्ते, ) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा- जैसे कि--(लोइए अ) लौकिक और (लोउत्तरिए अ) लोकोत्तरिक । (से किं तं लोइए ?) लौकिक बागम किसे कहते हैं, ( लोइए) जिसको लोगों ने रचा हो, जैसे कि-(जएणं इस) जिन को इन (अशाणिएहि मिच्छादिट्ठीपहिं) अज्ञानी मिथ्याष्टियों ने (+ सच्छदबुद्धिमतविध्यियं,) स्वच्छन्द बुद्धि और मति से रचा हो (तं जहा- ) जैसे कि--(भारह) महाभारत (रामायण) रामायण (जाव चत्तारि वेया संगो- वंगा x ) और साङ्गोपाङ्ग चारों वेद (से तं लोइए भागने ।) यही लौकिक आगम है। (से किं तं तं उत्तरिंग ? , लोकोत्तारिक अागम किसे कहते हैं ? (लोउत्तरिए) जो लोकोत्तर पुरुषों ने रचे हों, जैसे कि-(जहां इम) जिन को इन (अरिहंतेहिं भगवतेहिं उप्परगणागदसणवरहि) संपूर्ण ज्ञान, दर्शन को धारन करने वाले श्री अरिहंत भगवान् जो कि (तीय प्रचारमा पठान्य नागर है ) भूत, भविष्यत् और वर्तमान के जानने वाले, तथा ( तिलुका हिनमहिअह) त्रिलोकवासी जीवां से सहर्ष पूजित ऐसे (सत्रएणू हें सब्बदरसीहिं ) सवथा सर्वदर्शियों ने (पणी दुवालसंग गणिपिडगं,) जो कि द्वादशांग रूप गणिपिटक रचना को, (तं जहा-) जैसे कि-(प्रापा जाव दिहिवाश्री) आचारांग से लगाकर दृष्टिवाद तक। ये ही लोकोत्तरिक-प्रधान आगम हैं। aman २,०या- = गुरु (आचार्य) पारम्पयागच्छतीत्यागमः, श्रा-समन्ताद्गश्यन्ते-झायन्ते जीवादयः पदार्था अनेनेति वा आगमः। * लोकैः प्रणीतं लौकिकम् । + स्वच्छन्दबुद्धिमतिविकल्पित स्वबुद्धिविकल्पनाशिल्पिनिर्मितम् । x तत्राङ्गानि-शिक्षा १, कल्प २, व्याकरण ३, च्छन्दो ५, निरुक्त ५, ज्योतियकायन : उपाङ्गानि तव्याख्यारूपाणि, तैः सह वसन्ले इति साङ्गोपाङ्गः अर्थात शिक्षा १, कलर २, करण ३, च्छन्द ४, निरुत ५, और ज्योतिकायन ६, ये अङ्ग हैं, इनकी व्याख्या रूप ग्रन्थ उपाङ्ग हैं, इन सहित वेद, 'साझंपाङ्ग वेद' कहलाते हैं। * 'बहिय' त्ति-विगलदहलानन्दाश्रुष्टिभिः सह निरीक्षिता यथावस्थितानन्यसाधारण- गुणोत्कीर्तनलक्षणेन भावस्सवेन । गणिपिटक-गुणगणोऽस्यात्तीति गणी-प्राचार्य स्तस्य पिटकं-सर्वस्वं गणिपिटकम् । अर्थात् जिसमें सभी प्रकार के गुणों के समुदाय हो, उसे 'गणिपिटक' कहते हैं। मशाना समवायाङ ३. व्याख्याप्रज्ञप्ति-भगवती सूत्र ४, wdau4:3245 १९४ (अहवा) अथवा (आमे) नागान (लिकि पाडले) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, ( कहा-) जैले नि सामे) सूत्रीपद (अस्थायी) अर्थागम और (तदुभयागने ) तदुभव भाग मशीन और अर्थ दोनों सहित। अहवा) या ami) आगम लिवित प्रदान्त, तीन प्रकारले प्रतिपादन किया गया है, (जहा-) जैले रिसा) प्रास्तापात भारताने अनन्तरागम और (परंपरागने,) परम्परागत ! (Eित्यस्त) तीर्थकरों के माथे को ज्ञान (अत्तागम) +आत्मागम जानना चाहिये, तथा जनगारा बुत) गणधरों के सुत्र का ज्ञान (अत्तागम) अात्मागम जानना चाहिये, और अयस्त ४ तशयम) अर्थ का अनन्त- रागम होता है. तथा सोसाय) गणकों के शिष्यों के (गुलमा अागमे) सूत्र के ज्ञान को अनन्तरागल कहते हैं, और ( प्रत्यक्ष परंपरा,) अर्थ का परम्परागम होता है, (तेण पर) तत्पश्चात् सुलस्वयि साक) सूत्र और अर्थ शोनों ही का (णो- अत्तागम) बारमाधम ओ नहीं है और जो मन) अनन्तरागम भी नहीं है सिर्फ (परंपरागते, परम्परागम जानना चाहिये, संजोगुरदिए) यही लोकोत्तरिक है और (से तं आगम, यही आगम है, कथा ( तो रणागपुरणप्पमाणे ।) इली को ज्ञानगुणप्रमाण जानना चाहिये। MAHamaramAILASS -RIN লালাখখা, উদাখ লয় , মা , লেখাঃ দুয়া , লং ২, और विषाकलून १० । इत्यादि का महल करना चाहिये, शेष दो के नाम मूल पाठ में आ ही गये । इन्हीं के समुदाय को गतिपिटक कहते है * अर्थात सिफभूल पावरूपा मूळ सूत्र का सिर्फ अर्थ । +योंकि वे केवलज्ञान से स्वयजेब पलायों की जानते | इसलिये उनके अर्थ को Paramar * गणधर महाराज सूत्रों की स्वयमेव रचना कहते हैं, इसलिये उनके रचे हुए सूत्रों को सूत्रागम कहते हैं। भागम में भी कहा है- अर्थ मास मरहा, सुतं गंथति गणहरा निउण" अर्थात् अर्हद्भगवान् अर्थ कहते हैं, निपुर भणधर महाराज सूत्र को शूथते हैं। * क्योंकि गणधर महाराज कोई भी अन्तर बिना तथंकरों से अर्थ सीखते हैं, इस लिये अर्थ से ज्ञान को अनन्तराम जानना चाहिये। अर्थात शिष्य, गणधरों के पास विना अन्तर अध्ययन करते हैं। क्योंकि तीर्थंकरों से अर्थ का ज्ञान गणधरों को प्राप्त हुना, और गणधरों से उनके 5 ; ভায়াচ্ছ? রুহ --- হতে হয় , মনে হয়, আর তা ঈ সুখী জী ভন্তু অফ কে ? তিনি কােনােই । ২নং At's a ৮. . !e A%, ৫৭, ৫.t is ঋ৭৭ গ + ৫ ++, #*ff 'গ! * fed * * taries * * F4 : * staq | "The4. ক+: . * রে শুe na হল ভী! যে কত বড় নয়হয় ? হাঅষ্টাবক কাজ জল জিনস আর বি বি জাটে আর হনু মুজিহাজ হত না হয় এই এল গালে, লাফ ৯ জীহ ঃ সুজিত হয়জি আট হয় মই কম হয় ময়লা ই । উয় কি-~~্যাক্স এর দিকে না :-~- এটুআয়ক জিজে আজ নয় না , এক চা-কলিক্ষা ই দ্বীন আল আজ ন ল ক + হক ও অঞ্জ স্ট্রিং এর মি নি , ঘরে ঃ- এ হারে শুত্ব দালালী জঞ্জী । ভুল হয় বহু মাখলে ভয় লীন এমন গুণ হং ছাই ই प्रमाणभूत है। টান দিয়ে। ক অar asswয়া লিলক লাখাে গঙ্গা ছবি সম্বলি: তানায়, সে দিন আর আকাশ সংসুস্থ গহিন্দি, গত শুকনু-~~-নাদিন নি । হাসন করে সারি জি যদি নিসা-সংশভাই কিছু জেনেই : বলয়ে নিয়মিত। অম: অজয়লাখবি, স্কান দলের কােন সুখতে হচ্ছে এবি আতিয়ঃ ঃ বালু , মহিঃ) হয় ময়মন। একজন মা খুলল দালান । :--বাক্ষন শুলজ।অসমত জাহঃ জুম দিল। হাফws “হলি- মালাহিয় না।” { ? ? ? মা গহনাজ, ‘শালালি मोक्षस्य सकलकतावस्यमार्ग उपयो ও হৃ বল জুহালাল ন্যায্য - বিননাশ সাংস্র ল ট সংঘলিয়া, সাই কাল এখাজ কি? গান বাজা- : । স্বার্থ সমায মায়াস্থি দিন: লিখিয়: ফু: নংস শুয়ি রুম্মন। গানঃ মামণিলাল জুলি মাদ্ভিনীত্ব হয়:। আসংখালঘাট এ কাম্যালিঃ বদদিসবিল অঞ্চলগুলো গ ক মজা। -অলিকায় অন্তত দুইমাম ভিড় নিনি: গানঃ অষ্ট, দি লিজ হাই হিল সন। प्रामुख्येन प्रत्तिः, গ্য = লালুয়াঘাথ শৰাম । नैवविधः सिद्धपरमेष्ठी तस्यानु- ইনু। লনীৰল লিমাঘী ! মি লালন ফ্লাহর লান মামুন। নয়াবিন্দ। মিলালামালামাধানামঘৰংলা প্রথমদিনঅলি জিহান লিমা: মণি। লে [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] अथवा आगम तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, जैसे कि-सूत्रा- गम १, अर्थागम २, और तदुभयागम ३। अथवा प्रात्मागम ?, अनन्तरागम २, और परम्पराग ३॥ तीर्थंकरों से प्ररूपित नार्थ को यात्माम जानना चाहिये। तथा गणधरी के रचे हुये खूब को आत्मागम और अर्थ को अनतराम कहते हैं, और गण- धरों के शिष्यों के सूत्र अनन्तरागम और अर्थ परम्परागम होता है तत्पश्चात् सूत्र और अर्थ दोनों ही परम्परागम होते हैं। क्योंकि-आत्मागम उसे कहते हैं जो स्वयमेव बोध हुधा हो, तथा जो बिना अन्तर गुरु से अध्ययन किया हो उस्ले अनन्तरागम जानना चाहिये । पर- स्परागम उसे कहते हैं जो अनुक्रमपूर्वक वृद्ध लोग ज्ञान सीखते आये हों और भागेको भी परिपाट्यनुकूल सीखते जायं इस वर्णन से अपौरुषेय वाक्यों का भली भांति निषेध हो जाता है। क्योंकि वों के तानादि अष्ट स्थान होते हैं और सूत्र भी वर्णमय होते हैं। तथा-अशरीरी जीवों के वचनयोग नहीं होता, इस लिये अपौरुषेय वाक्य युक्तिसंगत नहीं होत । इसी को ज्ञान गुण प्रमाण कहते हैं। इसके बाद दर्शन शुण प्रमाण का स्वरूप जानना चाहिये- दशन हुशा प्रमाण से किं तं देसागुणपमाणे? चउबिहे पण्णत्ते, तं जहा-चक्खुदंससागुरणप्पमा अचखुदसणगुणप्प- माणे ओहिदसणगुणप्पमाणे केवलदसणापमाणे । चक्खुदंसणं चक्खुदसणिस्ल घडपडकडरहोइएसु दोसु अचखुदंसणं अचखुदंसणिस आयभावे आहिदसणं ओहिदंसणिस्स सव्वरूविदब्वेसु न पुण सव्वपज्जवेसु के बलदंसणं केवलदंसणिस्स सव्वदव्वेसु अ सत्वपजवेसु अ, से तं दसणगुणप्पमाणे पदार्थ--(से किं तं ईसणगुणप्पमाणे १) दर्शनगुणप्रभाण किसे कहते हैं ? (दसणगुणप्पमाणे ) *दर्शनावरणकर्म के क्षयोपशम से जो उत्पन्न हो, अथवा जो made whemamaina mamaee " तामनगहण भावारणं नेत्र क मागा। अविससि ऊगा [उत्तरार्धम् ] आत्मा का निज गुण हो उसे दर्शनगुणप्रमाण कहते हैं। और वह (चउब्बिहे पएणत्ते,) चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा.) जैसे कि-(चक्खुदसणगुणप्पमाणे) चक्षुर्दर्शनगुणप्रमाण ( अचक्खुदसणगुणप्पमागो) अचक्षुर्दर्शनगुणप्रमाण (ोहिसण- गुणप्पमाणे ) अवधिदर्शनगुणप्रमाण और (केवलदंसणगुणप्पमाणे ।) केवलदर्शनगुण- प्रमाण । इनका भिन्न २ स्वरूप निम्नानुसार जानना चाहिये- ( चक्खुदंसणं चक्खुदंसणिस्स ) चक्षदर्शनी का चक्षुर्दर्शन (घडपडकडरहाइएसु) घट, पट, कट-मंचा, रथादिक ( दब्बेसु) द्रव्यों में होता है (अचक्खुदंतणं अचक्खुदंस- णिःस) अचक्षुर्दर्शनी का x अचक्षुर्दर्शन (प्रायभावे) श्रापभाव में होता है, (प्रोहिदप्तणं श्रोहिदंसणिस्स) *अवधिदर्शनवाले का अवधिदर्शन (सव्वरूविदव्येसु) सभी रूपी द्रव्यों में होता है, (न पुण सव्वपज्जवेसु) सभी पर्यायों में नहीं होता। (किंवलदसणं केवल दसणिस्स) केवलदर्शनी का केवलदर्शन ( सव्वदव्वेसु अ) सब द्रव्य और (सब्बपजवेसु अ)सभी पर्यायों में होता है, से तं दंसणगुणप्पमाणे ।) यही दर्शनगुणप्रमाण है। भावार्थ--दर्शनगुणप्रमाण चार प्रकार का है, जैसे कि-चक्षुर्दर्शनगुण प्रमाण, अचक्षु दर्शनगुणप्रमाण, अवधिदर्शनगुणप्रमाण और केवलदर्शनगुण तदेवात्मनो गुणः स एव प्रमाणं दर्शनगुणप्रमाणम् । चक्षुर्दर्शन उसे कहते हैं जो भावचक्षुरिन्द्रिय के क्षयोपशम से और द्रव्येन्द्रिय के अनुपात से सन्न हो । क्योंकि चक्षुर्दर्शनी जीव सामान्यतया घटादि द्रव्यों को भली प्रकार से देखता व जानता है। ४ चक्षुरिन्द्रिय को छोड़ कर शेष चार इन्द्रिय और मन इनसे अचक्षुदर्शन होता है, तथा भाव-अचक्षुरिन्द्रिय के क्षयोपशम से और द्रव्येन्द्रियों के अनुपात से प्रगट होता है। + क्योंकि चक्षु अप्राप्यकारी हैं तथा श्रोत्रादि प्राप्यकारी हैं । श्रागम में भी कहा है-- 'पुढे सुणेइ सदं रूवं पुग्ण पासई अपुढे तु ।' ® जिन कमों के क्षय से अवधिदर्शन प्राप्त हो, उसे अवधिदर्शन कहते हैं। अवधिदर्शन को इसलिये सामान्य माना गया है कि दर्शन सामान्यावबोध रूप होता है और ज्ञान विशेष रूप होता है। । केवलदर्शनावरण कर्मके क्षय होने से केवलदर्शन ऊपन्न होता है, जो कि सकल पदार्थों को देखता है क्यों कि वे सर्वदर्शी हैं, इस लिये रूपी अरूपी सभी द्रव्यों में केवलदर्शन होता है तथा मनःपर्यायज्ञान सदैव ही विशेष ग्रहण करने वाला होता है, सामान्य को नहीं। इसलिये मनःपर्यायदर्शन नहीं होता। प्रमाण । akam MAHARASINARuampassityant । . ।
१९८ [ श्रीसदनुयोगद्वारसूत्रम् ] चक्ष दर्शनावरणीय कर्म के क्षयोपशम से चक्षु ईर्शन घट पद्धादि पदार्थों में होता है। अचक्षु दर्शनावरणीय कर्म के क्षयोपशम से अचक्षु दर्शन उत्पन्न होता है और वह आत्मभाव में ही रहता है। अवधिदर्शनावरणीय कर्म के क्षयोपशम से अवधिदर्शन सभी रूपी द्रव्यों में होता है लेकिन सभी पर्यायों में नहीं होता, क्योंकि वह केवल रूपी द्रव्यों को ही देखता है, जैसे कि रूप रस गन्ध और स्पर्श। केवलदर्शनावरणीय कर्म के क्षय से केवलदर्शन सभी रूपी और अरूपी द्रव्य और पर्यायों में होता है, क्योंकि केवलदर्शन क्षयोपशम भाव में नहीं होता, सिर्फ क्षायिक भाव में होता है । इस लिये वह मूर्त अमूर्त दोनों प्रकार के द्रव्य और पर्यायों में होता है। इसके बाद चारित्रगुणप्रमाण का स्वरूप वर्णन किया जाता है-- से किं तं चरित्तगुणप्पमाणे ? पंचविहे पण्णत्ते, तं जहा--सामाइअच रित्तगुणप्पमाणे छेनोवट्ठावणच रित्तगु. णप्पमाणे परिहारविसुद्धिमचरित्तगुणप्पमाणे सुहुमसंप- रायचरित्तगुणप्पमाणे प्रहक्खायचरितगुणप्पमाणे। सामाइयचरित्तगुणप्पमाणे दुविहे पण्णत्ते, त जहा- इत्तरिए अ आवहिए 9 : छेओवट्ठावणचरित्तगुणप्पमाणे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-साइयारे य निरइयारे य । परि- हारविसुद्धियवरित्तगुणप्पमाणे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा- णिव्विसमाणए अणिविटकाइए अ।सुहुमसंपरायचरित्त गुणप्पमाणे दुविहे पण्णते, तं जहा-पडिवाई अ अपडिवाई अ । अहक्खायचरित्तगुणप्पमाणे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा- छउमथिए अ केवलिए य । सेतं चरित्तगुणप्पमाणे, से तं जीवगुणप्पमाणे, से तं गुणप्पमाणे । (सू ०४७) पदार्थ-(से किं तं चरित्तगुणप्पमाणे १ ) चारित्रगुणप्रमाण किसे कहते हैं ?
[ उत्तरार्धम् ] १९६ (चरित्तगुणप्पमाण) जोअनिन्दतपने निरवद्यानुष्ठान रूप आचरण है उसे चारित्र कहते हैं, और वह (पंचविहे पण्णते,) पांच प्रकार से प्रतिपादन किया गया है (तं जहा-) जैसे कि- सामाइनचरित्तगुण दपमाणे) सामायिक चारित्रगुणप्रमाण १, (छेत्रोवट्ठावणचरि- त्तगुणप्पमाणे) छेदोपस्थापनीय चारित्रगुणप्रमाण २, ( परिहार विसुद्धिचरिशगुणप्पमाणे) परिहारविशुद्धिक चारित्रगुणप्रमाण ३, ( सुहमसंपरायचरित्रगुणप्पमाणे ) सूक्ष्मसम्पराय- चारित्रगुणप्रमाण ४, (अहक्खायचरित्रगुणप्पमाणे) अथाख्यात चारित्रगुणप्रमाण ५ । ( सामाइअचरिचगुणप्पमाणे) सामायिक चारित्रगुणप्रमाण (दुविहे परमत्ते,) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है (तं जहा.) जैसे कि--(इचरिए अ) इत्वरिक-स्व- ल्पकालिक और (आवहिए ।) यावत्कथिक--आयुःपर्यन्त । (छेत्रोवट्ठावणचरितगुण प्पमाणे) छेदोपस्थापनीय चारित्रगुण प्रमाण ( दुविहे पण्णत्ते,) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा-) जैसे कि-(साइयारे य ) अतिचारों के निमित्त से जो छेदो- पस्थापन प्रायश्चित्त प्राप्त हो उसे सातिचार कहते हैं, और (निरइयारे य ।) जो बिना * अतिचारों के कारण प्राप्त हो उसे निरतिचार कहते हैं । (परिहार विसुद्धिअचरितगुए । * चरन्त्यनिन्दितमनेनेति चारित्रं, तदेव चरित्र, चारित्रमेव गुणः चारित्रगुणः, स एव प्रमाणं चारित्रगुणप्रमाणं-सावायोगविरतिरूपम् । * पञ्चविधमप्येतदविशेषतः सामायिकमेव छेदादिविशेषैः विशेष्यमाणं पञ्चधा भिद्यते, तत्राद्य विशेषाभावात सामान्यसंज्ञायामेवावतिष्ठते सामायिकमिति । * 'अथ' शब्दोऽत्र अभिविधौ । अथवा यथाख्यातमित्यपि नामान्तरम् । भरत और ऐश्वत क्षेत्र के प्रथम और चरम तीर्थंकर के साधु जहां तक छेदोपस्थाप- नीय चारित्र अंगीकार नहीं करते वहां तक उनका सामायिक चारित्र ही होता है। इस लिये सामायिक चारित्र इत्वरिंक-स्वल्पकालिक कहलाता है। तथा-भरत और ऐरवत क्षेत्र के शेषा बावीस तीर्थंकरों के तथा महाविदेह क्षेत्र के साधुओं को सदैव सामायिक चारित्र होता है, इस लिये यावत्कथि अर्थातक आयुः पर्यन्त भी कहलाता xभरत और ऐरवत क्षेत्र के प्रथम और चरम तीर्थंकर के साधुओं को प्रथम दीक्षा के समय सामायिक चारित्र के दिन या ४ महीने या ६ महीने के बाद पांच महाव्रत आरोपण रूप निरतिचार छेदोपस्थापनीय चारित्र होता है । तथा पार्श्वनाथ भगवान् के शासन कालके साधु यदि भगवान् महावीर स्वामी के शासन में पार्वे तव उनको भी निरतिचार छेदोपस्थापनीय चारित्र होतानाजी माSATTA ।
[ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम्] प्पमाणे) परिहारविशुद्धिक चारित्रगुणप्रमाण (दुविहे परमात्ते, ) दो प्रकार से प्रति- पादन किया गया है ( तं जहा- ) जैसे कि--(णिविसमाणए य) निविश्यमानक और (णिबिट्टकाइए 1) निर्विष्टकायिक । (सुहुमसंपरायचरित्तगुणप्पमाणे) सूक्ष्मसम्पराय चारित्र गुण प्रमाण (दुविहे पण्णत्ते,) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा) । MARRIO है , । * परिहार विशुद्धिक तप उसे कहते हैं जो परिहार नाम का तप विशेष हो अथवा अणे- पणादि दोषों से जिसकी शुडि हो । उसके दो भेद हैं-निविश्यमानक अर्थात् आसेव्यमान और निर्विष्टकायिक अर्थात् जिन्होंने उक्त तप को विशेषतया काया के द्वारा आसेवन किया हो । तथा- कई एक का यह भी अभिप्राय है कि-जिन्हों ने पूर्व इस तप को अङ्गीकार किया हो उनके पास अथवा तीर्थंकरों के पास नव साधुओं का समुदाय उक्त तप को ग्रहण करता है जिनमें एक साधु कलास्थित सभी सामाचारी करता तथा चार साधु तप को ग्रहण करते हैं, जिनको परिहारिक कहते हैं, और शेष चार परस्पर वैयानृत्य करने वाले होते हैं, जिनको अनुपरिहारिक कहते हैं । परिहारिक साधु गर्मी की ऋतु में जघन्य से चतुर्थ-१ उपवास; मध्य से पट्-दो उपवास और उत्कृष्ट से अष्ट अर्थात तीन उपवास तथा शिशिर ऋतु में जघन्त से षट् , मध्यम से अष्ट और उत्कृष्ट से दश । इसी प्रकार वर्षाकाल में जघन्य से अष्ट, मध्यम से दश और स्कृष्ट ते द्वादश करते हैं ! शेष कल्पस्थित पांचों ही साधु अनुपरिहारिक नित्यभक्त होने से उपवास नहीं करते हैं सिर्फ आयंविल करते हैं और कुछ नहीं । यथा--"शेषास्तु कल्पस्थितानुपरिहारिकाः पञ्चापि प्रायो नित्यभक्ता नोपवासं कुर्वन्ति, भक्त च पञ्चानामप्याचाम्लत्वमेव ।" इसके पश्चात् परिहारिक साधु घट मास पर्यन्त उक्त तप करके अनुपरिहारिक होते और अनुपरिहारिक परिहारिक होते हैं । जब तप करते हुए इनको छह महीने हो जाये तब आठ जनों में से एक कल्पस्थित रहता है और शेष सात अनुचरता आश्रय ग्रहण करते हैं और छह महीने तक तप करते हैं । इस प्रकार अठारह महीने में सम्पूर्ण तप पूरा होता है। होने पर साधु फिर से उसीको या जिनकल्प को अङ्गीकार करे या गच्छ में आजाय, ये तीनरास्ते हैं। यह चारित्र सिर्फ छेदोपस्थापनचारित्र वाले को होता है, दूसरों को नहीं । इस लियेजो इस तप को करके अनुपरिहारिकता या कल्पस्थितपना अङ्गीकार करता है उसी को परिहारविशुद्धिक निर्विष्टकायिक कहते हैं। संसार के अन्दर पर्यटन, करना इसी का नाम सम्पराय-क्रोधादिकपाय है । अंश मात्र लोभ रह जाय उसी को सूक्ष्मसम्पराय कहते हैं। 'सम्परैति-पर्यटति संसारमनेनति सम्परायः-- क्रोधादिकपाय: लोभांशमात्रावशेषतया सूक्ष्मः संपरायो यत्र तत्सूक्ष्मसंपरायम् । अथवा-सूचमः- • #ो अस्य सत सक्षम संपरायं संज्वलन लोभात्मकं दशमगणस्थानवर्तिकमिति भावः।' ।
। [उत्तरार्धम् ] जैसे कि--(पडिवाई अ) प्रतिपाति और (अपडिवाई अ।) * अप्रतिपाति (+ अहक्खाय- चरित्चगुणप्पमाणे) यथाख्यात चारित्र गुण प्रमाण (दुविहे पण्णत्ते,) दो प्रकार से प्रति पादन किया गया है, ( तं जहा-) जैसे कि--( छउमथिए अ) x छाद्मस्थिक और (केवलिए अ) केवलिक । (से तं चरित्तगुणप्पमाणे) वही चारित्र गुण प्रमाण है और (से तं जीवगुणप्पमाणे,) यही जोव गुण प्रमाण है, और (से तं गुणप्पमाणे । ) यही गुण- प्रमाण है । (सू० १४७) भावार्थ--जो सम्यक्प्रकार से-अनिन्दितपने ले आचरण किया जाय वही सच्चारित्र कहलाता है, और उस का जो प्रमाण हो उसे चारित्र गुण प्रमाण कहते हैं। इसके पांच भेद हैं, जैसे कि-सामायिक चारित्र गुण प्रमाण १, छेदोप- स्थापनीय चारित्र गुण प्रमाण २, परिहार विशुद्ध चारित्र गुण प्रमाण ३, सूक्ष्म- सम्पराय चारित्र गुण प्रमाण ४, और यथाख्यात चारित्र गुण प्रमाण ५। जीव को सम्यक्प्रकार से ज्ञानादि का जो लाभ होता है उसे सामायिक चारित्र कहते हैं, और वह 'कमि भले ! सामाइथं' इत्यादि सूत्र से धारण किया जाता है । मुख्यतया इसके दो भेद हैं, जैसे कि इत्वरिक-स्वल्प- कालिक और यावत्कथिक-जीवन पर्यन्त । छेदोपस्थापनीय चारित्र उसे कहते हैं जो पूर्व पर्यायों को छेद कर प्राय- श्चित्त के द्वारा पञ्च महाव्रत में प्रारोपण करे । यह दो प्रकार का है, साति चार और निरतिचार । प्रथम और चरम जिनेश्वर भगवान् के समय के साधुओं को सामायिक चारित्र के पश्चात् ७ दिन अथवा ४ या ६ मास के अनन्तर + श्रोणि से गिरते हुए को प्रतिपाती-संक्लिश्यमानक कहते हैं। भोणि चढ़ते हुए को अप्रतिपती-विशुद्धयमान कहते हैं। +प्राकृत में इसको जो 'अहक्खाय चारित्र' कहते हैं, उसकी शब्दव्युत्पत्ति इस प्रकार जानना चाहिये-'अह' 'आ' 'अक्खाय' यहां पर अथ शब्द याथातथ्य अर्थ में, तथा 'बा' उप- सर्ग अभिविधि अर्थ में होता है, 'अक्खाय' क्रिया पद है, जिसकी सन्धि होने से 'अहाक्खाय पद होता है, फिर 'हस्वः संयोगे' इस सूत्र से आकार स्व होने से "अहक्खायं” पद बन जाता 'श्रादेयों जः' इत्यनेन पदादेर्यस्य जो भवति । बहुलाधिकारात्सोपसर्गस्थानादेरपि; यथा 'संजोयो' आर्षे लोपोऽपि, यथाख्यातम-अहक्खायं । x ग्यारहवें गुणस्थान तक यथाख्यात चारित्र प्रतिपाती और बारहवें में अप्रतिपाती होता है। उपशान्तमोहनीय, क्षीणमोहनीय और छद्मस्थ केवली भगवान् के यह चारित्र होता है। .. ॥
। यथाख्यातनामक चारित्र वह [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] छेदोपस्थापनीय चारित्र अवश्य होता है, और वह निरतिचार रूप होता है। यदि मूल गुण का घात न हो तो सातिचार रूप होता है। महाविदेह क्षेत्र में इसका अभाव ही है। संयम के दोषों को दूर करने वाला परिहार विशुद्धिक चारित्र जानना चाहिये । जिसमें संक्लिष्ट भावों का परित्याग और असंक्लिष्ट भावों का ग्रहण किया जाता है, जिसे कि नव साधु यथोक्त विधि से अष्टादश मास उक्त तप करते हैं उसको भी परिहार विशुद्धिक चारित्र कहते हैं । उक्त तप को जो साधु तप रहा हो, उसे 'निर्विश्यमान' और जो तप चुका हो, उसे 'निर्विष्टका- यिक' कहते हैं। सूक्ष्मसम्पराय चारित्र वह है जो कि प्रतिपाती और अप्रतिपाती भेदों युक्त शुद्ध क्रियानुष्ठान रूप होती है। यह चारित्र छद्मस्थ तथा केवली भगवान् दोनों ही को होता है । यही चारित्र गुण प्रमाण है। यही जीव गुण प्रमाण है और यही गुण प्रमाण है अर्थात् इनका वर्णन यहां समाप्त होता है। और इसके बाद नय प्रमाण का स्वरूप प्रतिपादन किया जाता है। हो। । [से किं तं नयप्पमाणे ? सत्तविहे पण्णत्ते, तं जहा-णेगमे १, संगहे २, ववहारे ३, उज्जुसुए ४, सद्द ५, समभिरूढे ६, एवंभूए ७11 से कि त नयप्पमाणे ? तिविहे पण्णत्ते, तं जहां- पत्थगदिटुंतेणं वसहिदिटुंतेणं पएसदिट्ठतेणं । से किं तं पत्थगदिद्रुतेणं ? से जहानामए केई पुरिसे परसु गहाय अडवीसमहुत्तो गच्छेज्जा, तं पासित्ता *इसको विशेष व्याख्या 'व्याख्याप्रज्ञप्ति' 'भगवती' सूत्रसे जानना चाहिये । इस [ कोष्ठक ] में दिये हुये पाठको अधिक पाठ जानना चाहिये ।
, [ उत्तरार्धम] कई वएजा-कहिं भवं गच्छसि ? अविसुद्धो णेगमो भणइ-पत्थगस्स गच्छामि, तं च केई छिंदमाणं पासित्ता वएज्जा-किं भवं छिसि ? विसुद्धो गमो भणइ-पत्थयं छिदामि, तं च केई तच्छमागणं पासित्ता वएंजा-किं भवं तच्छसि ? विसुद्धतराओ णेगमो भणइ-पत्थयं तच्छामि, तं च कई उक्कीरमाणं पासित्ता वएज्जा-किं भवं उक्कीरसि. विसुद्धतराओ णेगमो भणइ-पत्थयं उक्कीरामि, तं च केई (वि) लिहमाणं पासित्ता वएजा-किं भवं (वि)लिहसि ? विसुद्धतराओणेगमोभणइ-पत्थयं (वि)लिहामि, एवं विसद्ध तरस्सणेगमस्स नामोउडिओ पत्थो,एवमेव ववहारस्सवि, संगहस्स मिउमेजसमारूढो पत्थओ, ऊजुसुयस्स पत्थो ऽवि पत्थो मेज्जपि पत्थो, तिरहं सदनयाणं पत्थयस्स अस्थाहिगारजाणो जस्सा वा वसेणं पत्थओ निष्फज्जइ, से तं पत्थयदिळंतेणं । (से किं तं नयप्पमाणे १) नयप्रमाण किसे कहते हैं ? (नयप्पमाणे) जिन अनन्त धर्मात्मक वस्तुओं को एक ही अंश के द्वारा निर्णय किया जाय उसे नयप्रमाण कहते हैं,और वह (सत्तविहे परणचे,) सात प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा-) जैसे कि-(णेगमे ) नैगम १, (संगहे ) संग्रह २, ( ववहारे ) व्यवहार ३, (उज्जुसुए) ऋजुसूत्र ४, ( सद्दे ) शब्द ५, ( समभिरूढ़े ) समभिरूढ ६, और ( एवंभूए) एवम्भूत । ( से किं तं नयप्पमाणे १) नयप्रमाण किसे कहते हैं ? (नयप्पमाणे) जिन अनन्त धर्मात्मक वस्तुओं को एक ही अंशके द्वारा निर्णय किया जाय उसे नयप्रमाण जानना चाहिये, और वह (तिविहे पएणत्ते,) + तीन प्रकारसे प्रतिपादन किया गया है (तं जहा.) +'यद्यपि नैगमसंग्रहादिभेदती बहवो नयास्तथापि प्रस्थकादिदृष्टान्तत्रयेण सर्वेषामिह निरू- पयितुमिष्टत्वात्त्रैविध्यमुच्यते ।' अर्थात् यद्यपि नैगमसंग्रहादि के भेद से नयों के भेद हैं तथापि प्रस्थकादि दृष्टान्तों के द्वारा यहां पर उन सब के ही निरपण करने की इच्छा से तीन प्रकार से ही प्रतिपादन किया गया है। ।
, २०४ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] जैसे कि--(पत्थगदिट्टतेणं ) प्रस्थक के दृष्टान्त से (वसहिदिटुंतेणं) वसति के दृष्टान्त से (पएसदिटुंतेणं ।) प्रदेश के दृष्टान्त से । (से किं तं पत्थगदिट्टतेणं ?) प्रस्थक के दृष्टान्त से नयों का स्वरूप किस प्रकार जाना जाता है ? (पत्थगदिटुंतेणं) जिन पदार्थो को प्रस्थक के दृष्टान्त द्वारा सिद्ध किया जाय उस को प्रस्थक दृष्टान्त जानना चाहिये, (से जहानामए)xयथा देवदत्तादि नामक (केइ पुरिसे ) कोई पुरुष (परसु गहाय) कुल्हाड़े को लेकर (अडवीसमहुत्तो) अटवी के सन्मुख-अर्थात् वन में (गच्छेज्जा) जाय (तं पासित्ता) उसको देख कर (केई वएजा) कोई कहे ( कहिं *भवं गच्छसि ?) आप कहां जाते हैं ? ( अविसुद्दो णेगमो भणइ) अविशुद्ध नैगम नय कहता है कि (पत्थगस्स गच्छामि, प्रस्थक के लिये जाता हूँ, फिर (तं च केई छिंदमाणं) कोई उसको छेदन करते-छीलते हुए (पासित्ता) देख कर (वएजा-) कहे कि- ( किं भवं छिदसि ?) आप क्या श्रीलते हैं ? ( विसुद्धो णेगमो भगइ ) विशुद्ध नैगम नय कहता कि-(पत्थर्य छिदामि,) प्रस्थक को छीलता हूं। तदनन्तर (तं च केई) कोई उस को (तच्छमाणं) तक्ष्ण-समान करते हुए (पाप्तित्ता) देख कर (वर ज्जा-) कहे कि-(किं भवं तच्छसि ?) आप क्या समान बनारहे हैं ? (विसुद्धतराोणेगमो भणइ.) विशुद्धतर नैगम x जैसे कि कोई पुरुष मगध देश प्रसिद्ध 'प्रस्थक'---धान्यमानविशेष के लिये काष्ठमय भाजन बनाने के हेतु कुल्हाड़े को हाथमें लेकर लकड़ी काटने के लिये जंगल में गया । 'पृस्थक' शब्द का अर्थ अमरकोषकारने 'परिमाणविशेष' ही किया है। यथा-"अस्त्रि- यामाहवद्रोणौ खारीवाहो निकुञ्जयः । कुडवः प्रस्थ इत्याद्याः, परिमाणार्थकः पृथक् ॥१॥" * यद्यपि भवान्' शब्द अन्य पुरुष के साथ ही प्रयुक्त होता है, तथापि यहाँ पर मध्यम पुरुष के साथ व्यवहृत किया गया है, क्योंकि पार्ष होने से ऐसा ही प्रमाण भूत है । अथवा- "व्यत्ययश्च ।” प्राकृतादिभाषालक्षणानां व्यत्ययश्च भवति । प्रा० । व्या० अ० पा० ३।सू० ४४७ । इससे भी 'गच्छसि क्रिया के साथ 'भवान्' शब्द का प्रयोग ठीक ही है । तथा-'भादीप्तौ धातु से औणादिक ‘डवतु' प्रत्यय का आगमन होने से 'भवतु' का भवान् रूप सिद्ध होता है और 'शत' प्रत्ययान्त होने से भी भा' का 'भवान्' और 'भू' का भवन प्रयोग सिद्ध होता हैं। + यद्यपि वह काष्ठ के लिये जा रहा है तथापि-'नके गमा:-वस्तुपरिच्छेदा यस्य' जिसके वस्तु परिच्छेद बहुत हैं वह नैगम नय है । नय अनेक प्रकार से वस्तु परिच्छेद मानते हैं । इस लिये कारण को कार्य का भाव मान कर उक्त प्रकार से उत्तर दिया है। "विशुद्धतर' शब्द इस लिये दिया है कि इसका प्रत्युत्तर पहिले से विशेष शुद्ध है। इसी प्रकार आगे भी जानना चाहिये। ।
से [ उत्तरार्धम् ] २०५ नय कहता है कि-(पस्थयं तच्छामि,) प्रस्थक को ठीक करता हूँ पश्चात् ( तं च केई ) कोई उसको (उकीरमाणं) उकिरन-बीजने से ठीक करते हुए (पासिचा) देखकर (व एज्जा-) कहे कि-(किं भवं उकीरसि ?) आप क्या उत्कीरन करते हैं ? (विसुद्धतराम्रो णेगमो भणइ.) विशुद्धतर नैगम नय कहता है कि (पत्थयं उक्कीगमि,) प्रस्थक को उत्कीरन करता हूं, (तं च केइ) फिर कोई उसको (लिहमाणं पासित्ता) लेखन-घड़ते हुए देख कर (वएज्जा-) कहे कि-(किं भवं लिहसि ?) ओप क्या लेखन करते हैं ? (विसुद्धतरानो गमो भणइ) निशुद्धतर नैगम नय कहता है कि ( पत्थयं लिहामि, ) प्रस्थक को लेखन करता हूं, (एवं विसुद्धतरस्स रोगमस्स) इसी प्रकार विशुद्धतर नैगम नय के मत से (नामाउ डिनो पत्थो,) + नामाङ्कित प्रस्थक होता है। (एवमेव ववहारस्सवि) इसी प्रकार व्यवहार नय से भी जानना चाहिये । (संगहस्स) संग्रह नय के मत से (मिउमेजसामरूटो) धान्य भरा हो तभी वह पात्र (पत्थश्रो) प्रस्थक होता है (उज्जुसुयस्स)’ ऋजुसूत्र से (पत्थो ऽवि पत्थो) प्रस्थक भी प्रस्थक होता है, और ( मेजपि पत्थो, ) मेय-वस्तु भी प्रस्थक रूप ही है, तथा (तिरह सहनया) तीनों शब्द नयों के मतसे (पत्थयस्त + अर्थात प्रथम के नैगम नय से दूसरा कथन इसी प्रकार विशुद्धतर होता हुआ नामाङ्कित प्रस्थक निष्पन्न हो जाता है। क्योंकि जब प्रस्थक का नाम स्थापन कर लिया गया तभी विशुद्धतर नैगम नय से परिपूर्ण रूप प्रस्थक होता है । * संग्रह नय सामान्यतया सभी पदार्थों को ग्रहण करता लिये जो प्रमाण पूर्वक धान्य से भग हुआ हो और कर्य रूप में परिणित हो, तभी वह पात्र प्रस्थक कहा जाता है, नहीं तो घट पटादि पदार्थ भी प्रस्थक संज्ञक हो जायंगे । + क्योंकि यह नय सिर्फ वर्तमान काल को ही मानता भूत, भविष्यत् को नहीं, इस लिये व्यवहार पक्ष में नाम रूप प्रस्थक को भी प्रस्थक और उसमें भरे हुए धान्य को भी प्रस्थक कहा जाता है। कहा भी है- 'तस्य निष्पन्नस्वरूपोऽर्थक्रियाहेतुः प्रस्थकोऽपि प्रस्थकः, तत्परिच्छन्न धान्यादिकमपि वस्तु प्रस्थक, उभयत्र प्रस्थकोयमिति व्यवहारदर्शनात, तथा प्रतीतेः, अपरं चासौ पूर्वस्माद्विशुद्धत्वाद्व- समाने एव मानमेये प्रस्थकत्वेन प्रतिपद्यते, नातीतानागतकाले, तयोविनिष्टानुत्पन्नवेनासत्वादिति ।' *शब्द, और एवम्भूत ३, इन तीनों को 'शब्द नय' इस लिये कहते हैं कि ये शब्द को प्रधान मानते हैं । तथा प्रथम के चार नय 'अर्थ नय' कहलाते हैं, क्यों कि इनकी अर्थ में ही मान्यता है। कहा भी है- 'शब्दपधानाः नयाः शब्दनयाः-शब्दसमभिरुदैवंभृताः, शब्देऽन्यथस्थितेऽर्थमन्यथा नेच्छ- न्त्यमी, किन्तु यथैव शब्दो व्यवस्थितस्तथैव शब्देनार्थं गमयन्तीत्यतः शब्दनया उच्यन्ते, पाद्यास्तु यथाकथञ्चिच्छब्दाः प्रवर्तन्तामर्था एव प्रधानमित्यभ्युपगमपरत्वादर्थनयाः प्रकीत्यन्ते ।' है mattee .. ममभिरुढ २, amme } [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] अस्थाहिगारजाणो) प्रस्थक के अधिकार का जो ज्ञात होता है ( जस्स वा वसे) अथवा जिसके लक्ष्य से ( पत्थरो निप्फजइ,) प्रस्थक निष्पन्न होता है, (से तं पत्थय- दिलुतेषां । । यही प्रस्थक का दृष्टान्त हैं। भावार्थ-जिन अनन्त धर्मात्मक वस्तुओं के स्वरूप को एक ही अंशद्वारा निरूपण किया जाय उसे नय प्रमाण कहते हैं। उनके सात भेद हैं, जैसे कि- नैगम १, संग्रह २, व्यवहार ३, ऋजुसूत्र ४, शब्द ५, समभिरूढ ६, और एवं- भूत ७॥ अथवा नय तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है-प्रस्थक के दृष्टान्त से १, वसति के दृष्टान्त से २, और प्रदेशों के दृष्टान्त से ३ : प्रस्थक का दृष्टांत निम्न प्रकार जानना चाहिये । जैसे कि-कोई पुरुष परशु हाथ में लेकर बन में जा रहा था, उसको देख कर किसी ने पूछा कि-अोप कहां पर जाते हैं ? तब उसने कहा कि-'प्रस्थक के लिये जाता हूँ' । उसका ऐसा कहना अविशुद्ध नैगम नयाभिप्राय से है, क्यों कि अभी तो उसके विचार ही उत्पन्न हुए हैं। तदनन्तर किसी ने उसको काष्ट छीलते हुए देख कर पूछा कि-श्राप क्या छीलते हैं ? तब उसने उत्तर दिया कि प्रस्थक को छीलता हूँ। यह विशुद्ध नैगम नय का वचन है क्योंकि पहिले के बनिस्वत यह कथन शुद्ध है। इसी प्रकार काष्ट को तक्ष्ण करते हुए, उत्की. क्यं कि भावप्रधान नयों में उपयोग ही मुख्य लक्षण है, और उपयोग बिना प्रस्थक की उत्पत्ति नहीं होती। अतः उपयोग को ही 'प्रस्थक' कहा जाता है। कहा भी है- 'प्रस्थकार्थाधिकारजः' प्रस्थकस्वरूपपरिज्ञानोपयुक्तः प्रस्थकः, भावप्रधाना ह्यते नया इत्यतो भावप्रस्थकमेवेच्छन्ति, भावश्च प्रस्थाकोपयोगोऽतः स प्रस्थकः, तदुपयोगवानपि च ततो ऽव्यतिरेकात प्रस्थकः, यो हि तत्रोपयुक्तः सोडमीषां मते स एव भवति, उपयोगलक्षणो जीवः, उप गश्चेत् प्रस्थकादिविषयतया परिणतः किमन्यजीवस्य रूपान्तरमस्ति ? यत्र व्यपदेशान्तरं स्या- दिति भावः ।' अर्थात जीव ही प्रस्थक है, क्योंकि उपयोग से ही प्रस्थक की निष्पत्ति है, कारण कि उपयोग और प्रस्थक एक रूप होते हैं इस लिये श्रात्मा ही प्रस्थक है अन्य नहीं। लेकिन यह न जानना चाहिये कि जड़रूप में उपयोग वर्तने से प्रात्मा भी जड़वत हो जाय; वह तो चैतन्य कर्ता रूप ही है, और अचेतन चेतन का आधार ही नहीं। इस लिये प्रस्थक में जिसका उपयोग हो वही प्रस्थक है, अन्य नहीं ।
- . [ उत्तरार्धम् ] २०७ रन करत हुए, लेखन करते हुए को देख कर जब किसीने पूछा, तब उसने विशु- द्धतरनैगम नय के मतसे उत्तर दिया कि-'प्रस्थक को तक्ष्ण करता हूँ, उत्कीरन करता हूँ, लेखन करता हूँ' इत्यादि । क्योंकि विशुद्धतर नैगम नय के मत से जब प्रस्थक नामांकित हो गया तभी पूर्ण प्रस्थक माना जाता है। संग्रह नय के मत से सब वस्तु सामान्य रूप है, इस लिये जब वह धान्य से परिपूर्ण भरा हो तभी उसको प्रस्थक कहा जाता है। यदि ऐसा न हो तो घटपटादि वस्तु भी प्रस्थक संज्ञक हो जायगी। इस वास्ते जब वह धान्यों से परिपूर्ण भरा हो और अपना कार्य करता हो तभी वह प्रस्थक कहा जाता है। इसी प्रकार व्यवहार नय को भी मत है। ऋजुसूत्र नय के मत से प्रस्थक और प्रस्थक से प्रमाण को हुई वस्तु. दोनों ही प्रस्थक रूप मानी जाती हैं, क्योंकि दोनों को ही प्रस्थक कहने की रूढ़ि है, और दोनों में प्रस्थक का ज्ञान होता है। यह नय वर्तमान काल को ही मान- ता है; भूत, भविष्य को नहीं। शब्द, समभिरूढ़ और एवम्भूत, इन तीनों को शब्द नय कहते हैं, क्योंकि ये शब्द के अनुकूल अर्थ मानते हैं। आद्य के चार नय अर्थ को प्राधान्य मानते हैं। इस लिये शब्द नयों के मत से जो प्रस्थक के अर्थ का ज्ञाता हो, वही प्रस्थक है, क्योंकि--जिसके उपयोग से प्रस्थक की निष्पत्ति है बास्तव में वही प्रस्थक है, अन्य नहीं और बिना उपयोग के प्रस्थक उत्पन्न हो ही नहीं सकता। इस लिये ये तीनों भावनय हैं। सभी वस्तु अपने सद्भाव में सदैव कौल विद्यमान हैं । इस वास्त जिस वस्तु में जिस जीव का उपयोग होता है, शब्द नय के मत से उपयोग युक्त जीव को ही वस्तु कहा जाता है, क्योंकि-"उधोगो जीवलक्खणं" उपयोग लक्षण प्रात्मा का ही होता है। इस लिये जिस के द्वारा प्रस्थक की उत्पत्ति होती है, उस जीव को ही इन नयों के मत से प्रस्थक कहा जाता इस प्रकार प्रस्थक के हष्टन्त द्वारा सातो नयों का ख रूप दिखलाया गया अब द्वितीय वसति के दृष्टान्त से नयों का स्वरूप प्रतिपादन किया जाता है से किं तं वसहिदिटुंतेणं ? से जहानामए केई पुरिसे pawr है । । "वितस्ति-वसति-भरत-कातर-मातुलिंगेहः।" प्रा० ।।१।२१४ । एषु तस्य हो भवति ।
२०८ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] कंचि पुरिसं वएज्जा-कहिं भवं वससि ? तं अविसुद्धो णे- गमो भणइ-लोगे वसामि, लोगे तिविहे पण्णचे तं जहा- उड्डलोए अहोलोए तिरिअलोए, तेसु सव्वेसु भवं वससि ? विसुद्धो गमो भणइ-तिरिअलोए वसामि, तिरिअलोए जंबुदीवाइमा सयंभूरमणपज्जवसाणा असंखिजा दीवस. मुद्दा पराणचा, तेसु सव्वेसु भवं वससि ? विसुद्धतराओ णेगमो भणइ-जंबूद्दीवे वसामि, जंबुद्धदीवे दस खेत्ता पण्णता, तं जहा-भरहे एरवए हेमवए एरण्णवए हरिव- स्से रम्मगवस्से देवकुरू उत्तरकुरू पुचविदेहे अवरविदेहें, तेसुसब्वेसुभवं वससि ? विसुद्धतराओ णेगमो भणइ-भरहे वासे वसामि, भरहे वासे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-दाहि- गड्ढभरहे उत्तरड्डभरहे अ, तेसु सम्वेसु (दोसु) भवं वससि ? विसुद्धतराओ णेगमो भणइ-दाहिणड्डभरहे वसामि, दा- हिणड्डभरहे अणेगाई गामागरणगरखेडकब्बडमडंबदोण- मुहपट्टणासमसंवाहसण्णिवेसाई, तेसु सव्वेसु भवं वस- सि ? विसुद्धतराप्रो गमो भणइ-पाडलिपुत्ते वसामि, पाडलिपुत्ते अणेगाई गिहाई, तेसु सम्वेसु भवं वससि ? विसुद्धतरायो गमो भणइ-देवदत्तस्स घरे वसामि, देवदत्तस्स घरे अणेगा कोटगा, तेसु सव्वेसु भवं वससि ? विसुद्धतरोनो णेगमो भणइ-गब्भघरे वसामि, एवं विसु- हुस्स णेगमस्स वसमाणो वसइ, एवमेव ववहारस्सवि. संगहस्स संथारसमारूढो वसइ, उज्जुसुयस्स जेसु, आगा- सपएसेसु ओगाढो तेसु वसइ, तिरहं सदनयाणं भायभावे वसइ । से तं वसहिदिटुंतेणं ।
१ [ उत्तरार्धमा पदार्थ-(से किं तं वसहिदिट्ठतेणं ?) वसति के दृष्टान्त से नयों का स्वरूप कैसे जाना जाता है ? (वसहिदिटुंतेणं ) वसति के दृष्टान्त से नयों का स्वरूप निम्न प्रकार जानना चाहिये--(से जहा नामए केई पुरिसे ) जैसे कोई नामधारी पुरुष (कंचि पुरिसं) किसी पुरुष को (वएज्जा.) कहे कि-(कहिं भवं वससि ?) आप कहां पर रहते हो ? (तं) उसको ( अविसुद्धो णेगमो भण्इ-) अविशुद्ध नैगम कहता है-(लोगे वसामि,) *लोक में रहता हूँ, ( लोगे तिविहे पण्णत्ते, ) लोक तोन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा-) जैसे कि-(उडलोए अहोलोए तिरिय होए, र,) ऊर्ध्व लोक, अधो लोक, तिर्यक् लोक । (तेसु सव्वेसु भवं वससि ?) तो क्या आप उन सभी में बसते हो ? (विसुद्धो) विशुद्ध (णेगमो भणइ) नैगम कहता है-(तिरिअलोए वसामि,) तिर्यक् लोक में रहता हूँ, (तिरित्रलोए) तिर्यक् लोक में (जंबदीवाइमा सयंभूरपणपज्जवसाणा ) जम्बूद्वीप से लगा कर स्वयम्भूर- मण पर्यन्त ( असंखिजा दीव उमुद्दा ) असंख्ये व द्वीप समुद्र (पएणत्त',) प्रतिपादन किये गये हैं, (तेसु सब्बेगु) क्या उन सभी में (भव वससि ?) आप रहते हो ? (विसुद्धतरानो णे मो, विशुद्धतर नाम भण्इ-) कहता है-(जंबूदावे कसामि,) जम्बूद्वीप में रहता हूँ। (जंबूद्दीवे दस खेत्ता) जम्बूद्वीप में दस क्षेत्र पण्णता,) प्रतिपादन किये गये हैं, (भरहे) भारतवर्ष (एरवए) ऐरवत (हेमवए) हैमवत (एर एणवए ) ऐरण्यवत (हरिवस्से ) हरिवर्ष (रम्भगवस्से रम्यकवर्ष (देवकुरू) देवकुरु ( उत्तर कुरू) उत्तरकुरु (पुवनिदेहे) पूर्व महाविदेह और (अवरविदेहे,) पश्चिम महाविदेह, (तेलु सवेत्तु भवं वससि ? ) क्या आप उन सबमें रहते हो ? ( विसुद्धतगो गेमो भाइ-) विशुद्धतर नैगम नय कहता है--(भरहे वासे वसामि) भारतवर्ष में रहता हूँ। (भरहे वाले दुविहे पएणते) भारतवर्ष के दो भेद कहे गये हैं। (तं जहा-) वे इस तरह हैं- (दाहिशड्डभरहे उत्तरड्डभरहे अ) दक्षिणार्द्ध भरत और उत्तरार्ध भरत । ( तेतु सब्बेसु ) क्या उन सभी में भवं वस.से ? ) ओप रहते हो ? ( विसुद्वतरायो णेगमो) विशुद्धतर नैगम (भणइ-' कहता है- दाहिणड्डभरहे) दक्षिणार्द्ध भारत में (वसामि, ) रहता हूँ, ( दाहिणड्डभरहे ) दक्षिणार्द्ध भारत में (अणेगाई) अनेक (गाम-) ग्राम (आगर) खान (णार) ऐसा शहर जिसमें किसी भी प्रकार कर न लिया जाता हो (खेड) खेट-जिसके चारों ओर धूलका परकोटा हो (कव्वड) नगर (मडव) मंडप जिसके आस पास कोई न रहता हो अथवा कोई शहर या ग्राम न हो (दोणमुह) द्रोण- * लोक तो चतुर्दशरत्रात्मक है, इस लिये अनर्थान्तर है । क्योंकि विशुद्ध नैगम नय अतिव्यप्ति होने से उसे असङ्गगत मानता है। श्रागम में भी कहा है-"तन्निवासक्षेत्रस्यापि चतुर्दशर- वात्मकलोकादनन्तरत्वाद्, इत्थमपि च व्यवहारदर्शनाद्, विशुद्धनगमस्त्वतिव्याप्तिपरत्वादिदमस. प्रतं मन्यते।"
किम् ? गहवाई।" अर्थात 'र' शब्द को 'घर' आदेश हो जाता है, यदि उसके परे पति शब्द न [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् । मुख-जिसका जल और स्थल दोनों तरफ से रास्ता हो (पटर) पत्तन-शहर (आसम) आश्रम-मठ (संवाह) संवाह और (सन्निवेसाई) सन्निवेश-रहने के स्थान आदि, (तेसु सव्वेसु) क्या उन सभी में (भवं वससि ?) आप रहते हो ? (विसुद्धतरात्री णेगमो) विशुद्ध तर नैगम (भणइ.) कहता है-( देवदत्तस्स घरे ) देवदत्त के घर में (वसामि.) बसता हूँ, ( देवदत्तस्स घरे* ) देवदत्त के घर में (अणेगा कोटगा) अनेक कोठे हैं, (तेतु सब्बेसु) क्या उन सभी में ( भवं वससि ? ) श्राप रहते हो ? ( गमधरे ) गर्भ घर में (वसामि,) रहता हूँ. (एवं) इस प्रकार (विसुडस्य णेगमस्स) विशुद्ध नैगम नय के मत से (असमाणो वसइ, ) वसते हुए को बसता हुआ माना जाता है। (एवमेव गगहारस्सवि) इसी प्रकार में व्यवहार नय का भी मन्तव्य है । (संगहस्स) :: संग्रह नय के मत से (संथार समारूढो) शय्या पर आरूढ हुआ हो तभी वह (व सइ,) बसता हुआ कहा जाता है । (ज्जुसुयस्स ) ऋजुसूत्र नय के मत से (जेसु आगासप एतु ) जिन आकाश के प्रदेशों में (ोगाढो) अवकाश किया हो (तेतु बलइ.) उनमें ही बसता हुआ माना जाता है, + (तिएहं सद्दनयाणं) तीनों शब्द नयों के अभिप्राय से पदार्थ (प्रायभावे वसइ ।) आत्म * "गृहस्य घरोऽपतौ। पा०1८।२ । १४४ : गृहस्य 'घर' इत्यदेशो भवति, पतिशब्दश्चेत् परो न भवति । घर सामि । अपतावित्ति हो तो । यहाँ पर 'गृह' शब्द के अनन्तर 'पति' शब्द नहीं है । इस लिये उक्त 'गृह' को 'घर' है , आदेश हो गया । + क्योंकि जहाँ पर जिसका निवास स्थान हैं वह उसी स्थान में वसता हुआ माना जाता तथा जहां पर रहे वही निवास स्थान उसका होता हैं । जैसे कि पाटलिपुत्र का रहने वाला यदि कारणवशात कहीं पर चला जाय तव वहाँ पर ईसा कहा जाता है कि-अभुक पुरुष पाटलि- पुत्र का रहने वाला यहाँ पर आया हुआ है । तथा-पाटलिपुत्र में ऐसा कहते हैं-"अब वह यहाँ पर नहीं है अन्यत्र चला गया है।" भावार्थ यह है कि विशुद्धतर नैगम नय और व्यवहार नय के मत से वसते हुए को बसता हुआ' मानते हैं । है, यह नय सामान्यवादी है, इस लिये जब चलनादि क्रियाओं से रहित होकर कोई व्यक्ति स्वशय्यामें शयन करे तभी उसको बसता हुआ कहा जाता है । यदि घर में ही बसता हुआ माना जाय तो अतिप्रसङ्ग होगा, पयोंकि फिर यह भी मानना होगा कि इसी तरह लोकमें भी रहता है। * अर्थात् संस्तारक में जितने आकाश प्रदेश उसने अवगाहन किये हों, इस नय से इतने ही प्रमाण में वह बसता हुआ कहा जाता है।
- Sam [ उत्तरार्धम् ] २११ भाव में रहता हुआ माना जाता है + । (से तं व सहिदिटुंतेणं ।) यही वसति का दृष्टान्त है। भावार्थ-सानों नयों का पूर्ण बोध होने के लिये द्वितीय दृष्टान्त बसति का दिया गया है। उसे निम्न लिखित प्रश्नोत्तों से इस प्रकार जानना चाहिये-- देवचन्द्र-हे प्रिय ! आप कहां पर बसते हैं ? प्रमोदचन्द्र-(अविशुद्ध नैगम नय के श्राश्रित होता हुआ कहने लगा कि) मैं लोक में बसता हूँ। देवचन्द्र-लोक तो तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, जैसे कि ऊर्ध्वलोक, अधोलोक, और तिर्यक् लोक, तो क्या आप तीनों लोकों में बसते हैं ? प्रमोदचन्द्र-प्रियवर ! मैं केवल तिर्यक् लोक में ही बसता हूँ। (यह वि- शुद्ध नैगम नय का वचन है।) देवचन्द-तिर्यक् लोक में जम्बूद्वीप से लेकर स्वयम्भूरमण समुद्र पर्यन्त असंख्येय द्वीप समुद्र हैं, तो क्या आप उन सभी में रहते हैं ? प्रमोदचन्द्र- मेरे परम प्रिय ! मैं जम्बूद्वीप में ही बसता हूँ। (यह विशुद्धतर०) देवचन्:-मित्रवर ! जम्बूद्वीप में दश क्षेत्र वर्णन किये गये हैं । जैसे कि- भारत वर्ष १, ऐरवत २, हैमवत ३, ऐरण्यक्त ४, हरिवर्ष ५, रम्यक ६, देवकुरु ७, उत्तरकुरु ८, पूर्व महाविदेह है, और पश्चिम महाविदेह १० । तो क्या आप उन सभी में रहते हैं ? प्रमोदचन्द्र-सुहृद ! मैं भारतवर्ष में बसता हूँ। (यह विशुद्धतर०) देवचन्द्र-प्रिय ! भारतवर्ष के दो खण्ड हैं, जैसे कि-दक्षिणार्द्ध भारतवर्ष और उत्तरार्द्ध भारतवर्ष । तो क्या श्राप उन सभी (दोनों) में रहते हैं ? प्रमोदचन्द्र-मान्यवर ! मैं दक्षिणार्द्ध भारतवर्ष मेंब सता हूँ। (यह विशुद्धतर०) देवचन्द्र-मित्रवर्य! दक्षिणाद्धं भारतवर्ष में अनेक ग्राम, श्राकर, नगर, +जितने भी पदार्थ हैं वे सभी अपने २ ही स्वरूप में रहते हैं, अन्य स्वरूप में कोई भी निवास नहीं करता । यदि निवास करते माने जाय तो सभी स्वरूप में रहते हैं या देश रूप में ? फिर श्राधाराधेय के भी प्रश्नोत्तर हैं, इत्यादि भावार्थ से जानना चाहिये । अतः सभी पदार्थ अपने ही स्वरूप में हैं, यही इन शब्द, समभिरूद और एवम्भूत नयों का मत है।
। [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] खेड़ , शहर, मण्डप, द्रोणमुख, पत्तन, अाश्रम, संवाह, सन्निवेश आदि स्थान हैं, तो क्या आप उन सभी में निवास करते हैं ? प्रमोदचन्द्र--हे सखे ! मैं *पाटलिपुत्र में बसता हूँ (यह विशुद्ध तर०) देवचन्द्र---प्रियवर ! पाटलिपुत्र में अनेक घर हैं, तो क्या आप उन सभी में बसते हैं ? प्रमोदचन्द्रग्रहे वयस्य ! मैं देवदत्त के घर में बसता हूँ। (यह विशुद्धतर०) देवचन्द्र--हे प्रीतिवर्द्धक ! देवदत्त के घर में अनेक-कोठे-कमरे हैं, तो क्या आप उन सभी में बलते हैं? प्रमोदचन्द्र-मैं देवदत्त के गर्भ घर में बसता हूँ। (यह विशुद्धतर०) इस प्रकार पूर्वपूर्वापेक्षया विशुद्धतर नैगम नय के मत से बसते हुए को बसता हुआ माना जाता है। यदि वह अन्यत्र स्थान को चला गया हो तब भी जहां निवास करेगा वहीं उस को बसता हुआ माना जायगा। इसी प्रकार व्यवहार नय का मन्तव्य है। किन्तु विशेष इतना है कि जहां तक वह अन्यत्र अपना स्थान निश्चय न कर लेवे वहां तक उसके लिये यह शब्द उच्चारण किया जाता है कि-"अमुक पुरुष इस समय पाटलिपुत्र में नहीं है।" और जहां पर जाता है वहां पर ऐसा कहते हैं कि-"पाटलिपुत्र के बसने वाला अनुक पुरुष यहाँ पर आया हुआ है, लेकिन बसते हुए को बसता हुश्रा मानना, यह दोनों नयों का मन्तव्य संग्रह नय से जब कोई वशय्या में शयन करे तभी बसता हुश्रा माना जाता है, क्योंकि चलनादि क्रिया से रहित होकर शयन करने के समय को ही संग्रह नय बसता हुआ मानता है । यह सामान्यवादी है, इस लिये इसके मत से सभी शय्याएं एक समान है, चाहे वे फिर कहीं पर ही क्यों न हो। है - नाकर लाहाा त्यत्तिस्थानम् | नगरं कररहिम् । खेट-थूलीमयमाकारोपेतम् । कट- नगरम् । मडम्ब----पर्वतो दूरवर्तिसन्निवेशान्तरम् अथवा यस्य पार्श्वत श्रासन्नमपरं ग्रामनगरादिक नास्ति, तत्सर्वतश्छिन्नजनाश्रयविशेषरूपं मडम्बमुच्यते । द्रोणमुखं-जलपथस्थलपथोपेतम् । पत्तनम् नानादेशागतपण्यस्थानम् । तच्च द्विधा, जलपत्तनं स्थलपत्तनं च । रत्नभूमिरित्यन्ये । श्राश्रमः- तापसादि स्थानं, अतिवहुप्रकारलोकसङ्कीर्णस्थानविशेषः । सन्निवेशाः- घोपादिर थवा ग्रामदीनां द्वन्द्व ते च ते सनिवेशाश्चेत्येव योज्यते । * वर्तमान में इसको 'पटना' कहते हैं जो कि विहार और उड़ीसा की राजधानी है। ।
[ उत्तरार्धम् ] २९३ ऋजुसूत्र नय के मत से शय्या में जितने अाकाश-प्रदेश अवगाहन किये गये हैं, वह उन्हीं पर बसना हुआ माना जाता है, कारण कि यह नय वर्तमान काल को ही स्वीकार करता है, शेष को नहीं । इस लिये जितने आकाश-प्रदेश किसी ने अवगाहन किये हैं, उन्हीं पर वह बसता है, ऐसा ऋजुसूत्र नय का मन्तव्य है। शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत इन तीनों नयों का ऐसा मन्तव्य है कि जो २ पदार्थ हैं वे सब अपने २ स्वरूप में ही बसते हैं। यदि अन्य पदार्थ अन्य परार्थ में बसता हुआ माना जाय तो यह शंका उत्पन्न होती है कि अन्य पदार्थ यदि अन्य पदार्थ में बसता है तो क्या सर्व स्वरूप से बसता है या देश स्वरूप से ? यदि ऐसा माना जोय कि सर्व स्वरूप से बसता है तो आधार से श्राधेय पृथक् है, तब अपने स्वरूप का ही आप अज्ञात होगा। क्योकि जैसे संस्तारकादि श्राधार है, उसका स्वरूप उसी में विराजमान । इसी प्रकार देवदत्तादि सभी पदार्थ खरूप में रहते हुए आधार से पृथक प्रतीत नहीं होते, इसलिये यहपक्ष तो ठीक नहीं हुआ। अब यदि देश स्वरूप से प्राधेय अाधार में ठहरता है, ऐसा माना जाय तो उसका स्वरूप भी देश मात्र ही रह जायगा। तथा देशमात्र में भी पदार्थ सब स्वरूप से रहता है या देश स्वरूप से ? यहां यदि प्रथम पक्ष ग्रहण किया जाय तब देशमात्र का नोदेशमात्र हो जायगा । यदि द्वितीय पक्ष प्रहण किया जाय तो देश में देशमात्र की ही वर्तना सिद्ध होगी। इस प्रकार अनवस्था दोष आजायगा । इस लिये यह सिद्ध हुआ कि सभी पदार्थ स्वरूप-यात्म भाव में ही निवास करते हैं। क्योंकि यदि परस्वरूप में निवास करते हुए माने जायें, तब स्व स्वरूप का भी प्रभाव हो जायगा। इस प्रकार बसति के दृष्टान्त से सातो नयों का स्वरूप वर्णन किया गया है। अब प्रदेशों के दृष्टान्त द्वारा सातो नयों का विशेष विचार किया जाता है- प्रदेश दृष्टान्त। से किं तं पएसदिटुंतेणं ? णेगमो भणइ-छगह पएसो, तं जहा-धम्मपएसो अधम्मपएसो आगासपएसो जीवपएसो खंधपएसो देसपएसो। एवं वयं णेगमं संगहो भणह-जं भणसि छरह -- , , , [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] पएसो, तं न भवइ, कम्हा ? जम्हा जो देसपएसो सो तस्सेव दबस्स, जहा को दिटुंतो ? दासेण मे खरो कीओ दासोऽवि मे खरोऽवि मे तं; मा भणांहि छगह पएसो, भणाहि पंचगह पएसो, धम्मपएसो आगासपएसो अधम्म पएसो जीवपएसो खंधपएसो। एवं वयंतं संगहं ववहारो भणइ-जं भणसि पंचगह पएसो तं न भवइ, कम्हा ? जइ जहा पंचण्हं गोटियाणं पु- रिसाणं केइ दव्वजाए सामगणे भवइ, सं जहा-हिरणणे वा सुवरणे वा धने।वा धरणे वा, ते जुत्तं वत्तुं तहा पंचण्हं पएसो, त मा भणिहि--पंचण्हं पएसो, भणाहि-पंचविहो पएसो, तं जहा-धम्मपए सो अधम्मपएसो आगासपएसो जीवपएसो खंधपए सो। एवं वयंतं ववहारं उज्जु सुनो भणइ-जं भणसि पंच- विहो पएसो तं न भवइ, कम्हा ? जइ ते पंचविहो पएसो एवं ते एक को पएसो पंचविहो एवं ते पणवीसतिविहो पएसो भवइ, तं मा भणाहि पंचविहो पएसो, भणाहि भइयव्वो पएसो-सिम धम्मपएसो लिन अधम्मपएसो सिम आगासपएसो सिअ जीवपएसो सिम खंधपएसो, एवं वयंत उज्जु सुयं संपइ सदनोभणइ-जं भणसि भइयव्वो पएसो, तं न भवइ, कम्हा ? जइ भइयव्वो पएसो, एवं ते धम्मपएसोऽवि सिय धम्मपएसो सिय अधम्मपएसो सिय आगासपएसो सिय जीवपएसोसिय संधपएसो, अधम्मपएसोऽवि सिय धम्मपएसो जाव सिय . RE २१५ - , [ उत्तरार्धम् ] संधपएसो, जीवपएसोऽवि सिय धम्मपएसो जांव सिय खंधपएस, खंधपएसोऽवि सिथ धम्मपएसो जाव सिय खधपएसो, एवं ते अण्वत्था भविस्सह, २ मा भणाहि भइयव्वो पएसो, भणाहि धम्मे पएसे से पएसे धम्मे, अहम्मे पएसे से पएसे अहम्मे, आगासे पएसे से पएसे मागासे, जीजे पए से रहे पएस नोजीवे, खंधे पए से से पएसे नोखंधे। एवं वयं सदनयं समभिरूढो भण्इ-जं भणसि धम्मे परसे से पएस धम्मे, जीवे पएसे से पएसे नोजीवे, खंधे परसे से पएसे नोखंधे, सं न भवइ, कम्हा? इत्थं खलु दो समासा भवति, तं जहा-तप्पुरिसे अ कम्मधा- रए अ, तंण राजइ कयरेणं समासेणं भणसि ? कि तिप्पु- रिसणं किं कम्मधारएणं ? जइ तप्पुरिसेणं भणसि तो मा ऐवं भणाहि, अह कम्मधारएणं भणसि तो विसेसओ भणा- हि, धम्मे असे पएसे असे पएसे धम्ने, अहम्मे असे पएसे असे पएसे अहम्म, आगासे असे पएसे असे पएसे आगासे, जीवे असे पएसे असे पएसे नोजीवे, खंधे अ से पएसे असे पएसे नोखंधे । एवं वयंतं समभिरूढं संपइ एवंभूओ भणइ-जं जं भणसित तं सव्वं कसिणं पडिपुण्णं निरवसेस एगगह- णगहियं देसेऽवि मे अवत्थू पएसेऽवि मे अवत्थू । सेत पएसदिटुंतेणं । से तं नयप्पमाणे। (से किं तं पएसदिटुंतेणं ? ) * प्रदेश दृष्टान्त किसे कहते हैं ? (पएसदि8 x * 'प्रकृष्टो देशः प्रदेशो-निविभागो भाग इत्यर्थः' अर्थात् जो अति ही हो और जिसका विभाग न हो सके उसे प्रदेश कहते हैं। ४ एतदन्यप्रतिषु नास्ति । सूचम २१६ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] प्रदेशों के दृष्टान्त से सप्तनयों का स्वरूप निम्न प्रकार जानना चाहिये । (ऐनमा भणइ.) नैगम नय कहता है-(छएहं पएलो) छह प्रकार के प्रदेश हैं, (तं जहा.) जैसे कि- (धम्मपएसो) धर्मास्तिकाय x का प्रदेश (अधम्मपएसो) अधर्मास्तिकाय का प्रदेश (पागास पएसो) आकाशास्तिकाय का प्रदेश (जीवपएसो) जीव का प्रदेश (खंचपएसो) स्कन्ध का प्रदेश और (देसपएसी) देश का प्रदेश ! इस प्रकार नैगम नय से षट् प्रदेश हुए । ( एवं वर्षत ) इस प्रकार भाषण करते हुए ( णेगम ) नैगम को (संगहो भणइ-) संग्रह नय कहता है ( जं भणसि ) जो तू कहता है कि ( छण्हं परसो) छओं के प्रदेश (तं न भवइ) वह नहीं होता है, (कम्हा ?) क्यों ? (जम्हा) इस लिये कि (जो देस पएसो) जो देश का प्रदेश है (सो तस्लेव दव्यास) वह उसी के *द्रव्य का है, (जहा को दिटुंतो ?) जैसे कोई दृष्टान्त है ? (दासेण मे खरो कीओ) मेरे नौकर ने गधा खरोदा है, दासोऽवि मे) दास भी मेरा ही है और (खाऽवि मे) गधा भी मेग ही है । (तं मा भरणाहि) इस लिये ऐसा मत कहो कि (छह पएसो) छओं का प्रदेश है, लेकिन (भणाहि पंचा पएसो,) कहो कि पांचोंके प्रदेश हैं, (जहा-) जैसे कि (धम्मपएसो अधम्मपएसो नागा- सपासो जीवपएसो खंधाएसो,) धर्मास्तिकाय का प्रदेश, अधर्मास्तिकाय का प्रदेश, आका शास्तिकाय का प्रदेश, जोवास्तिकाय का प्रदेश और स्कन्ध का प्रदेश। (एवं वयंत संगह) इस प्रकार कहते हुए संग्रह नय को ( बवहारो भणइ-) व्य- वहार नय कहता है कि (जं भणसि पंचण्हं पएसो,) जो तू कहता है कि पांचों के प्रदेश हैं, (तं न भवइ, ) वह सिद्ध नहीं होता है ( कम्हा ?) कैसे ? (जइ जहा ) ४ धर्म शब्द से यहाँ पर धर्मास्तिकाय जानना चाहिये। जैसे कि द्रव्य का देश और उसी का प्रदेश, तो वह प्रदेश उस द्रव्य का ही है, अन्य का नहीं। + देश प्रदेश सम्बन्धी होने से प्रदेश का ही है, अन्य का नहीं । * यहाँ पर इतना विशेष जानना चाहिये कि यह वर्णन अविशुद्ध संग्रह नय का है, क्यों कि विशुद्ध संग्रह नय अनेक द्रव्य और प्रदेशों के विकल्पों को नहीं मानता और सभी पदार्थों को सामान्य रूप से ही स्वीकार करता है संग्रह नय ने उत्तर दिया कि यह दृष्टान्त है, जैसे कि लौकिक में यह व्यवहार देखा जता है और कहा जाता है।
[ उत्तरार्धम् ] दि जैसे ( पंचएहं गोढिाणं पुरिसाणं) पांच गोष्ठिक पुरुषों की (केइ दव्वजाए) किंचित् द्रव्य जाति (सामरणे भवइ,) सामान्य होती है, (तं जहा.) जैसे कि-(हिरपणे वा सुवरणे वा धणे वा धरणे वा) हिरण्य या सोना या धन या धान्य इत्यादि, (ते जुत्तं वत्तु तहा) तो तुम्हारा वैसा कहना युक्त थी कि (पंचरह पासो,)* पांचों के प्रदेश हैं, (२ मा भणाहि.) इस लिये ऐसा मत कहो कि ( पंचरह पएसो,) पांचों के प्रदेश हैं, लेकिन (भणाहि- पंचविहो पएसो,) कहो कि-प्रदेश ४ पाँच प्रकार का है, ( जहा-) जैसे कि-(धरमपएसो अधम्मपएसो आगासपएसो जीवपएसो संधपरसो) धर्मास्तिकाय का प्रदेश, अधर्मास्तिकाय का प्रदेश, आकाशास्तिकाय का प्रदेश, जोवास्तिकाय का प्रदेश और स्कन्ध का प्रदेश । (एवं वयंत बहार) इस प्रकार कहते हुए व्यवहार नयको (उजुतुनो भणइ-)ऋजु सूत्र * कहता है कि-(श भणसि-पंचबिहे पर सो, जो तू कहता है कि पाँच प्रकार के प्रदेश हैं, (तं न भवइ ) वह नहीं होता है, (कहा ?) क्यों ? (अ.इ ते) यदि तेरे मत में (पंचविहो पएसो) पांच प्रकार के प्रदेश हैं, तो (वं ते एका को परसी) इस प्रकार तेरे मतसे एक २ प्रदेश (पंचविही ) पाँच प्रकार का होता है, (एवं ते पणवीसतिविहो) इस तरह तेरे मत से पच्चीस प्रकार का ( पएसो भवइ. ) प्रदेश होता है, (२ मा भणाहि-) इसलिये ऐसा मत कहो कि-(पंचविहो पएसो,) पांच प्रकार का प्रदेश है, लेकिन (भणाहि-) कहो कि (भइयव्वो पएसो) प्रदेश भजनीय हैं । (सिय धम्मपएसो) धर्मास्तिकाय का प्रदेश हो (सिल अधम्मपएसो, अधर्मास्तिकाय का प्रदेश हो (सिय मागासपएसो) आकाशास्तिकाय का प्रदेश हो, (सिय जीवपएसो) जीवास्तिकाय का प्रदेश हो (सिय खंधपएसो) या स्कन्ध का प्रदेश हो। जैसे कि पांच गोष्टिक पुरुषों का किञ्चित् द्रव्य सोना-धान्य आदि सामान्य-साधारण होता है, उसी प्रकार यदि पांचों द्रव्यों के प्रदेश सामान्य-इकट्ठे हों तब संग्रह नय का कहरा ठीक है कि 'पाँचों के प्रदेश हैं लेकिन ऐसा नहीं है, क्योंकि पांचों के प्रदेश मिन्न २ हैं x द्रव्य पाँच प्रकार के हैं और प्रदेश तदाश्रयभूत हैं इसलिये प्रदेश भी पांच प्रकार का कहना चाहिये। * यह नय वर्तमान काल को ही मानता है, भूत और भविष्यत् काल को नहीं । इसलिये सभी पदार्थ अपने २ गुण स्वरूप हैं और पर गुण में नास्ति रूप हैं । स्वगुण वाले पदार्थ अपने ही गुण के बोधक हैं, पर गुण के नहीं । + भाज्य, विभजनीय, ये एकार्थी हैं। । ।
२ भ प 3 [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] एवं वयंत उज्जुसुयं) इस प्रकार कहते हुये ऋजुसूत्र को (संपद सद्दनो भणइ-) सम्प्रति शब्द नय कहता है, (जं भणसि) जो तू कहता है कि-(भइ यन्बो पएसो,) प्रदेश भजनीय है, ( तं न भवइ, ) वह नहीं होता (कम्हा ?) क्यों ? (जइ) यदि (भइयव्वो परसो) प्रदेश विभजनीय हैं (एवं ते इस प्रकार तेरा मत है तो (धम्मपएसोऽवि) धर्मास्ति- काय का प्रदेश भी (सिय धम्मपएलो) शायद धर्मास्तिकाय का प्रदेश हो (सिय अधम्म पएसो) या अधर्मास्तिकाय का प्रदेश हो (सिय भागासपएसो ) या आकाशास्तिकाय का प्रदेश हो (लिय जीवपरसो) अथवा जीवास्तिकाय का प्रदेश हो (सिय बंधपरसो, कदाचित स्कन्ध का प्रदेश हो, तथा-(अधम्मपएसोऽवि) अधर्मास्तिकाय का प्रदेश भी (सिय धम्म पएसो) कदाचित् धर्मास्तिकाय का प्रदेश हो (जाव सिअ खंधपरसो,) यावत् स्कन्ध का प्रदेश हो, इसी प्रकार ( ज.वपरसोऽवि ) जीवास्तिकाय का प्रदेश भी (सिय धम्मपर सो) शायद धर्मास्तिकाय का प्रदेश हो (जाव) यावत् (सिय खंधपएसो) स्कन्ध का प्रदेश हो, (खंधपएसोऽवि) स्कन्ध का प्रदेश भी (सि धम्मपरसो) शायद धर्मास्तिकाय का प्रदेश हो (जाव) यावत् (सिन खंधपएसो) शायद स्वन्धका प्रदेश हो (एवं ते) इस प्रकार तेरे मतसे (अणवस्था भविस्सइ,) अनवस्था हो जायगी, (तं मा भणाहि-) इस लिये ऐसा मत कहो कि ( भइयव्यो पएसो,) प्रदेश भजनीय हैं, किन्तु (भणाहि.) कहो कि (ध मे पएसे) धर्म रूप जो प्रदेश है ( से पएसे धम्मे, ) वही प्रदेश धर्म है अर्थात् *धर्मात्मक रूप है, इसी प्रकार (अहम्मे पए से ) जो अधर्मास्तिकाय का प्रदेश है ( से पए से अहम्मे ) वही प्रदेश अधर्मात्मक है, और (आगासे परसे) जो आकाशास्तिकाय का प्रदेश है (से परसे आगासे) वही प्रदेश x आकाशात्मक है, और (जीवे परसे) जीवास्तिकाय का जो प्रदेश है (से पएसे नोजीवे, ) वह प्रदेश : नोजीव है, इसी प्रकार (खंधे परसे) जो स्कन्ध का + अर्थात् इस प्रकार से अनवस्था दोष होगा । जैसे कि-एक देवदत्त राजा का नौकर है शायद वह अमात्य-मंत्रीका भी हो, इसी प्रकार आकाशास्तिकायादि के प्रदेश भी जानना चाहिये। The * सकल धर्मास्तिकाय के देश से एक प्रदेश अभिन्न रूप है इस लिये प्रदेश को धर्मात्मक माना गया है। ४ धर्म १ अधर्म २ और आकाश ३ ये तीनों एक २ द्रव्यात्मक हैं, इस लिये इनका एक २ प्रदेश भी तद्रूप जीव द्रव्य अनन्त हैं और एक प्रदेश सभी जीव द्रव्यों के एक देश में संगठित है तथा सकल जीवास्तिकाय के एक देश में उसकी दृत्ति है। यहाँ पर 'नो' शब्द देशत्रांची है । जो एक जीव द्रव्यात्मक प्रदेश हैं वह किस प्रकार अनन्त जीव द्रव्यात्मक हो सकता है ? अर्थात सकल जीवास्तिकाय में किस प्रकार वर्त सकता है ?
[उत्तरार्धम्] २१६ प्रदेश है (से पएसे नोखंधे, ) वही प्रदेश नो स्कन्धात्मक है। (एवं वयंत सदनयं) इस प्रकार भाषण करते हुए शब्द नय को ( समभिरुढो भणइ, ) समभिरूढ नय कहता है कि-( भणसि.) जो तू कहता है कि (धम्मे पएसे ) धर्मास्तिकाय का जो प्रदेश है (से पएसे धम्मे) वही प्रदेश धर्मात्मक है, (जाव) यावत् ( जीवे पर ते ) जीव का जो प्रदेश है (से परसे नोजोवे,) वही प्रदेश नोजीवा- स्मक है, तथा ( खंधे पएसे ) स्कन्ध का जो प्रदेश है (से पएसे नोखंधे,) वही प्रदेश नोस्कन्धात्मक है। ( तं न भवइ,) ऐसा नहीं होता है, अर्थात् तेरा यह कहना युक्ति पूर्वक नहीं है, (कम्हा?) कैसे ? (इत्थं खलु) इस प्रकार से निश्चय ही (दो समासा भवंति) दोसमास होते हैं, अर्थात् यह वाक्य दो समास का है। (तं जहा.) जैसे कि-(तप्पुरिसे अ कम्मधारए अ) तत्पुरुष और कर्मधारय, इस लिये ( ण णज्जइ) नहीं मालूम होता है कि (कयरेणं समासेणं भणसि १) तू कौन से समास से कहता है ? (किं तप्पुरिसेणं किं कम्मधारएणं ?) तत्पुरुष से या कर्मधारय से ? ( जइ तप्पुरिसेणं भणसि ) यदि तित्पुरुष से कहता है (तो मा एवं भणाहि,) तब ऐसा मत कह, (ह कग्मधारएणं भणप्सि) अथवा कर्मधारय *से कहता है (तो विसेसनो भणाहि,) तब विशेषतया कहना चाहिये + कन्य दव्य प्रान्त होते हुए भी एक देशवर्ती हैं, इस लिये वही प्रदेश नोस्कन्धात्मक कहा जाता है। नोजीव और स्कन्ध इसी लिये कथन किये गये हैं । जीव द्रव्य और पुद्गल द्रव्य पृथक् २ अनन्त हैं। । । +'त पुरुष समास माननेसे 'धर्म प्रदेश में भेदापत्ति होती है, यथा 'कुण्डे बदराणि ।' प्रदेश और प्रदेशीका अभेद होता है। कारण कि अभेद में भी सप्तमी होना चाहिये, जैसे कि 'घटे रूपम्' इत्यादि, यदि ऐसो कहें तब दोनों पद सप्त यन्त होने से संशय रूप दोषापचि होती है, जैसे कि- 'धम्मे पएसे ।' इस लिये तत्पुरुष के मानने से दोषापति अवश्य है । प्रथम तो प्रदेश प्रदेशी के भिन्न होने की और दूसरी संशयात्मक होने की * यदि 'धम्मे पएसे' में धर्म शब्द सप्तम्यन्त माना जाय तब-हलताः सप्तम्यः । २।२ । १० सूत्र की प्राप्ति होती है, जैसे-'वने हारिद्रका ।' यदि धर्म शब्द प्रथमान्त माना जाय तब 'विशेषणं व्यभिचार्येकार्थं कर्मधारयश्च । २ १ १।५८ ।' सूत्र से कर्मधारय समास होता है, जैसे 'धर्मश्च स प्रदेशश्च स इति । इस लिये इस उपचार से भी दोनों समासों की और অনুকূল विवक्षा से भी दोनों समासों की प्राप्ति होती है । जैसे-'अकामे ऽमूड मस्तका० । २ । २ । १२ ।' इस सूत्र से 'कएठे कालः' इत्यादि प्रयोग सिद्ध होते हैं। ।
[ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] जैसे कि-(धम्मे अ से परसे अ' ) धर्म और उल्लका जो प्रदेश है (से पएसे धन्मे) वही प्रदेश धर्मास्तिकाय है, इसी प्रकार ( अम्मे असे पएसे अ) अधर्म और उसका जो प्रदेश है (से पएसे अहम्मे) वही प्रदेश अधर्मात्मक है, (आगासे असे पएसे अ) आकाश और उसका जो प्रदेश है (से पएसे आपसे ) वही प्रदेश श्राकाश है, (जीवे अ से पएसे अ) जीव और उसका जो प्रदेश है (से परसे नोजीव) वही प्रदेश नोजीवात्मक है, (खंधे असे परसे अ) स्कन्ध और उसका जो प्रदेश है ( से पएसे नोखंधे ) वही प्रदेश स्क- न्धात्मक है, (एवं वयंत) इस प्रकार करते हुए (समभिरूढं, समभिरूढनय को (संपइ एवंभूओ) सम्प्रति एवम्भूत नय (भणइ.) कहता है-(जं जं भणसि ) जो २ ते ने धर्मास्तिकायादि पदार्थो का स्वरूप कहा है (तं तं सव्व) वे सब (कसिणं) देश प्रदेश के कल्पना रहित तथा- (पडिपुरणं ) प्रतिपूर्ण-आत्मस्वरूप से अविकल और (निरवसेस) अवयव रहित (एगगहणगहियं) एक नाम से ग्रहण की गई है, * (देसे ऽवि मे अवस्थू) मेरे मित में देश भी अवस्तु है, और (पएते ऽवि मे अवत्यू) प्रदेश भी मेरे मत में अवस्तु है । (से : परस दिलुतेणं । ) यही प्रदेशों का दृष्टान्त है । (से तं नथप्पमाणे) और यही नियों के प्रमाण हैं। (सू० १४८) भावार्थ-प्रदेशों के दृष्टान्त ले नयों का जो वरूप अवगत हो, उसे प्रदेश दृष्टान्त कहते हैं । जैले कि-- समानाधिकरण कर्मधारय मानने से सब शंकाए दूर हो जाती है क्योंकि धर्मास्ति- काय से वह प्रदेश पृथक् तो है लेकिन देश से पृथक् नहीं है । * वस्तु एक नाम युक्त ही होती है, अनेक नाम युक्त नहीं होती, क्योंकि पृथक् २ नाम होने से मत भेद अवश्य ही होगा। इस लिये वस्तु को देश प्रदेश न कहना चाहिये । 'अशव मेरे मत में परिपूर्णात्मक रूप हो वस्तु है । प्रदेश और प्रदेशी का भेद नहीं है यदि प्रदेश मान लिया जाय तो दो पदार्थ हो जायेंगे, लेकिन दो होते नहीं हैं । अथवा प्रदेशी मान लिया जाय तो धर्म और प्रदेश शब्द पर्याय रूप हो जायेंगे, और फिर दोनों का एक ही साथ उच्चारण करना पड़ेगा, जो कि युक्ति से प्रसिद्ध लिये सम्पूर्ण वस्तु को ही वस्तु मानना 1 चाहिये। यहां पर संक्षेप मात्र वर्णन किया गया है, विशेष वर्णन आगे 'नय द्वार' से जानना चाहिये । यद्यपि नयप्रमाणं गुणप्रमाण के ही अन्तर्गत है, तथापि स्थान २ में अत्युपयोगी और अतिगहन विषय होने से इसका पृथक् वर्णन किया गया है ।
[ उत्तरार्धम् ] नैगम नय कहता है कि प्रदेश छह हैं-धर्म प्रदेश १, अधर्मप्रदेश २, प्रोकोश प्रदेश ३, जीवप्रदेश १, स्कन्ध प्रदेश ५ और देश प्रदेश ६। इस प्रकार नैगम नय के वचन को सुन कर- संग्रह नय ने कहा कि जो तूने षट् प्रदेश माने हैं वे ठीक नहीं हैं, क्योंकि जो तूने देश का भी प्रदेश मान लिया है वह युक्ति संगत इस लिये नहीं है कि जब द्रव्य का देश और फिर प्रदेश है तो वास्तव में वह द्रव्य ही का है, जैसे कि किसी ने कहा कि- मेरे दास ने गधा खरीद लिया यहां पर दाल भी उसी का है और गधा भी उसी का है । इस लिये षट् प्रदे न कहना चाहिये.किन्तु पांच ही प्रदेश कहना चाहिये । जैसे कि-धर्म प्रदेश १, अधर्म प्रदेश २, आकाश प्रदेश ३, जीव प्रदेश ४ और स्कन्ध प्रदेश ५ । इस प्रकार अविशुद्ध संग्रह नय के वचन को सुन कर व्यवहार नय ने कहा कि जो तू ने पांच प्रदेश प्रतिपादन किये हैं वे भी ठीक नहीं है, जैसे कि - पांच गोष्टिक पुरुषों का कई जाति का द्रव्य जैसे हिर- एय, सुवर्ण, धन अथवा धान्य साधारण साझी हों, यदि उसी प्रकार पाँच प्रदेश साधारण हो, तब तो तेरा कहना युक्ति संगत है, लेकिन चे तो पृथक् २ हैं, इस लिये तेरा कहना युक्ति संगत नहीं है, किन्तु पाँच प्रकार से देश कहने चाहिये, जैसे कि-धर्म प्रदेश यावत् स्कन्ध प्रदेश । इस प्रकार व्यवहार नय के वचन को सुन कर ऋजु सूत्र नय ने कहा कि-तेरा वाक्य भी ठीक नहीं है, क्योंकि एक २ द्रव्य के पांच २ प्रदेश मानने से २५ हो जाते हैं, इस लिये यह कथन सिद्धान्त बाधित है। इस लिये ऐसा न कहना चाहिये, किन्तु मध्य में 'स्यात्' शब्द का प्रयोग करना चाहिये। जैसे कि -स्यात् धर्म प्रदेश यावत् स्यात् स्कन्ध प्रदेश। क्योंकि वर्तमान में जिसकी अस्ति है उसी की अस्ति है, जिसकी नास्ति है उसी की नास्ति है। जो पदार्थ है, वह अपने गुण में सदैव काल विद्यमान है, क्योंकि पांचों द्रब्य साधारण नहीं हैं, इस लिये स्यात् शब्द का प्रयोग करना चाहिये। इस प्रकार ऋजुसूत्र नय के वचन को सुन कर- शब्द नय ने कहा कि-यदि स्यात् शब्द का ही सर्वत्र प्रयोग किया जायगा तो अनवस्था दोष कीप्राप्ति होजायगी। जैसे कि-स्यात् धर्म प्रदेश, स्यात् अधर्म प्रदेश इत्यादि । जैसे देवदत्त राजा का भी भृत्य है और वही अमात्य का भी है। bena ७ * विशुद्ध संग्रह नय भेद को विकल्प नहीं मानता।
ARTS [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] इसी प्रकार आकाशादि प्रदेश भी जानना चाहिये । इस लिये ऐसान कहना चा- हिये, किन्तु ऐसा कहना चाहिये कि जो धर्म प्रदेश है वह प्रदेश ही धात्मक है इसी प्रकार जो स्कन्ध है वह प्रदेश नोस्कन्धात्मक है । इत्यादि इस प्रकार शब्द नय के वचनों को सुन कर- समभिरूढ़ नय ने कहा कि-यह भी वाक्य युक्ति युक्त नहीं है, क्योंकि इस स्थान पर दो समासों की प्राप्ति है, जैसे कि-तत्पुरुष और कर्मधारय । क्योंकि-'धम्मे पएसे-से पएसे धम्मे-इन वाक्यों में दो समासोंका बोध होता है। यदि धर्म शब्द को सप्तम्यन्त माना जाय तब तत्पुरुष समास होता है । जैसे कि-'बने हस्ती' इत्यादि। यदि प्रथमान्त माना जाय तब कर्मधारय समास होता है। जैसे कि-'नीलेसु उत्पलेसु नीलोत्पलम्' अलुक् समास की अपेक्षा से भी दो समास सिद्ध होते हैं। जैसे कि-'कराठे कालः।' इत्यादि । इल लिये नहीं जाना जाता, कि तू कौन से समास के आश्रय होकर प्रतिपादन करता है ? क्योंकि-यदि तत्पुरुष मान लियो जाय तब दोषापत्ति पाती है, जैसे कि 'धम्मे पएसे धर्म शब्द को सप्तम्यन्त तत्पुरुष के मानने से भेदापत्ति सिद्ध होती है, यथा 'कुण्डे बदराणि ।' इत्यादि । यदि अभेद में सप्तमी मानी जाय यथा--'घटे रूपम् तब दोनों पद सप्तम्यन्त मालूम होने से संशयात्मक दोष उत्पन्न होता है, इस लिये तत्पुरुष समास तो किसी प्रकार सिद्ध ही नहीं हो सकता। यदि कर्मधारय है तो विशेष से कहना चाहिये । जैसे कि- धर्मश्च स प्रदेशश्च स इति । 'समानाधिकरणः कर्मधारयः' इति वचनात् । इस लिये पेसा कहना चाहिये कि मेरे मत में प्रदेश धर्मास्तिकाय है, क्योंकि वह उस से तो पृथक् है, लेकिन उसके देश से पृथक् नहीं है। इसी प्रकार नोस्कन्ध पर्यन्त जानना चाहिये । इस प्रकार समभिरूढ नय के वचन को सुन कर- एवंभूत नय ने कहा कि-जो जो तू ने सब संपूर्ण प्रतिपूर्ण निरविशेष एक प्रहण वस्तु वर्णन की हैं वे सभी एक ही नामसे मेरे मत में ग्राह्य हैं, क्योंकि-मेरे मत में देश और प्रदेश दोनों ही अवस्तु हैं, भेद है नहीं । यदि द्वितीय पक्ष प्राय है तब धर्म शब्द और प्रदेश शब्द पर्यायवाची सिद्ध हुए । दोनों शब्दों का युगपत् उच्चारण करना युक्ति से बोधित है । क्योंकि दोनों एक ही अर्थ के बोधक हैं, और एक उच्चारण करने से द्वितीय शब्द निरर्थक हो जावेगा। इस लिये एक अखंडरूप वस्तु ही प्राह्य हो सकती है।
[ उत्तरार्धम् ] २२३ इस प्रकार यह सातो नयों का संक्षेय स्वरूप है। ये सातो नय अपना २ मत निरपेक्षता से वर्णन करते हुए दुर्नय हो जातेहैं 'सौगतादि समयवत्' और परस्पर सापेक्ष होते हुए सन्नय हो जाते हैं। उन सतों नयों का जो पर- स्पर सापेक्ष कथन है, वही सम्पूर्ण जैन मत है। क्योंकि जन मत अनेक नयात्मक है, एक नयात्मक नहीं। जैसे कि-स्तुतिकार ने भी कहा है कि-- "उद्धाविव सर्वसिन्धवः, समुदीर्णास्त्वभिनाथदृष्टयः। न च तासु भवान् प्रहश्यते, प्रविभक्तासु सरिस्विवोदधिः ॥१॥ 'हे नाथ ! जैसे सब नदियां समुद्र में एकत्र होजाती है, इसी प्रकार श्राप के मत में सब नय एक साथ हो जाते हैं । किन्तु आपका मत किसी भी नय में समावेश नहीं हो सकता । जैसे कि लनुह किसी एक नदी में नहीं समाता इलो एकार सभी वादियों का सिद्धान्त तो जैन मत है, लेकिन सम्पूर्ण जैन मत किली वादी के मत में नहीं है।' जिस प्रकार तीनों दृष्टान्तों के द्वारा लप्त नयों का स्वरूप दिखलाया गया है, उसी प्रकार सब पदार्थों में इन को घटा लेना चाहिये। इस प्रकार प्रदेशका दृष्टान्त यहां पूर्ण हुआ और नय प्रमाणकावर्णन भी यहां पूर्ण हुआ। अब इसके अनन्तर संख्या प्रमाण जानना चाहिये- संख्या प्रमाणा से किं तं संखप्पमाणे ? अट्टविहे पण्णत्ते, तं जहा- नामसंखा ठवणसंखा व्वसंखा ओवम्मसंखा परिमाण- संखा जोणणासंखा गणणासंखा भावसंखा। से तिं नामसंखा ? जस्स णं जीवस्स वा जाव, से तं नामसंखा। से किं तं ठवणसंखा ? जगणं कटकम्मे वा पोत्थकम्मे वा जाव,से तं ठवणसंखा। नामठवणाणं को पइविसेसो ? नाम [पापणं] आवकहियं ठवणा इत्तरिया वा होज्जा आवक- हिया वा होजा।
[श्रीमद्नुयोगद्वारसूत्रम् ] सकिं तं दव्वसंखा ? दुविहा पण्णत्ता, तं जहा- आगमत्रो य नोनागमो य जाव, से कितं जाणयसरोर भविश्नसरीरवइरित्ता दव्यसंखा? तिविहा पण्णता, तं जहा- एंगभविए बद्धाउए अभिमुहणामगोत्ते अ। एगभविए णं भंते ! एगभविएत्ति कालो केवच्चिरं होइ ? जहरणेणं अंतोमुहुत्ते, उकासेगा पुत्वकोडो। बद्धाउए णं भंते ! बद्धाउ- एत्ति कालओ केवच्चिरं होइ ? ज० अं०, उ० पुवकोडीतिभा- ग।अभिमुहनामगोए णं भंते ! अभिमुहनामगोएत्ति काल- भो केवञ्चिरं होइ ? जहणणं एक्कं समयं, उक्कोसणं अंतोमुहुत्तं । इयाणी को णो के संखं इच्छइ, तत्थ नेगमसंगहववहारा तिविहं संखं इच्छंति, तंजहा-एगभवियं बद्धाउअं अभिमुहनामगोत्तं च। उज्जुसुओ दुविहं संखं इच्छइ, तंजहा-बद्धाउअं च अभिमुहनामगोत्तं च ।तिरिण सदण्या अभिमुहनामगोत्तं संखं इच्छंति, सेतं जाणयसरीर- भवियसरीरवइरित्ता वसंखा, से तं नोआगमओ दव्व- संखा, से तं व्वसंखा। पदार्थ-(से किं तं संखप्पमाणे १) सङ्घयाप्रमाण किसे कहते हैं ? (संखप्पयाणे) जिसके द्वारा गणवा को जाय उसे संख्याप्रमाण * कहते हैं, और वह (अद्धविहे पएणते,) *प्राकृत भाषा के "शपोः सः सूत्रसे 'शङ्ख' के 'श' को 'स' आदेश होजाता है। अतः यहाँ पर संवा शब्द से 'बड्या' और 'राज' दोनों ही का ग्रहण किया जाता है। जैसे कि 'गो' शब्द के पशु, भूमि इत्यादि का । यथा-पोशब्दः पशुभूभ्यास, वाग्दिगर्थप्रयोगवान् । मन्द- प्रयोगे दृष्ट्याब्रुवजूस्वर्गाविधायकः ॥१॥” इसी प्रकार यहाँ पर भी 'संखा' प्राकृत में होने से 'सङ्ख्या' और 'शङ्ख की प्रतीति होने से दोनों ही का ग्रहण किया गया है । इसलिये सुक्ष जन , . [उत्तरार्धम्] २२५ आठ प्रकार की कही गई है। (तं जहा- ) जैसे कि-(नामसखा ) नाम संख्या १, (उवणसंखा) स्थापना संख्या २, (दव्वसंखा ) द्रव्य संख्या ३, (श्रोवम्मसंखा ) औपम्य- उपमान संख्या ४. (परिमाण संखा ) परिमाण संख्या ५, (जाणणासंखा) ज्ञान संख्या ६, (गणणासंखा) गणना संख्या ७, और (भावसंखा) भाव संख्या = । (से किं तं नामसंखा ?) नाम* संख्या किसे कहते है ? (नामसंखा) नाम संख्या उसे कहते हैं कि, ( जस्स णं जीवस्स वा जाव) जिस किसीका अथवा जीव का (से तं नामसंखा ।) यही नाम संख्या है। ( से किं तं ठवणसंखा ? ) स्थापना संख्या किसे कहते हैं ? (ठवणसंखा) स्थापना संख्या उसे कहते हैं कि (जगण कटकरमे वा) जो काष्ठ का कर्म हो अथवा (पोत्थकम्मे वा) पुस्तक का कम हो (जाव) यावत् (सेत व्वणसंखा।) यही स्थापना संख्या है। ( नामठवणागं ) नाम और स्थापना में ( को पइविसंसो ? ) कौन प्रतिविशेष है ? ( नाम [पारणं]) प्रायः नाम हो है, क्योंकि यह (श्रावकहियं ) आयुपर्यन्त होता है, और (ठवणा) स्थापना (इत्तरिया वा होजा) स्वल्प काल भी होता है और आवकहिया वा होना। प्रायुपर्यन्त भी होता है। ( से किं तं दव्वसंखा ? ) द्रव्य संख्या किसे कहते हैं ? (दव्वसंखा ) द्रव्य संख्या (दुविहा पण्णत्ता,) दो प्रकार से प्रतिपादन की गई है (तं जहा-) जैसे कि-(भागमो य) आगम से और (मोआगमा य,) नो आगम से (जाव) यावत् । (से किं तं जाणयसरीरभवियसरीरवइरित्ता वसंखा ?) ज्ञशरीर, भव्य शरीर और व्यतिरिक्त द्रव्य संख्या किसे कहते हैं ? (जाणयसरीरभवियसरीरवहरित्ता दव्वसंखा) ज्ञश- रीर, भव्य शरीर और व्यतिरिक्त द्रव्य संख्या (तिविहा पण्णता,) तीन प्रकार से प्रति- पादन की गई है, (तं जहा-) जैसे कि--(एगभविए) जिस जीव को मत्यु के पश्चात् विना अन्तर शंख में उत्पन्न होना है उसे एकभविक शंख कहते हैं, (बढाए) जिसने शंख भव की आयु उपार्जन करली है उसे बद्धायुष्क कहते हैं, (अभिमुहनामगोत्ते श्र।) और अभिमुख हो गया है नाम और गोत्र जिसका उसे अभिमुखनामगोत्र कहते हैं। (एगभविए णं भंते !) हे भगवन् ! अब एक भवका वर्णन कीजिए (एगभविएत्ति) एक भव ( कालो केवच्चिर होइ ?) काल से कितने समय का होता है ? (जहरणेणं अंतोमुहुत्तं) जघन्य से अन्तर्मुहूर्त और ( उक्कोसेणं पुव्वकोडी,) उत्कृष्ट से पूर्व क्रोढ वर्ष प्रमाण। (बढाउए णं भंते !) हे भगवन् ! अब बद्धायुष्क जीव का वर्णन कीजिए (बडा- !
२९६ १२४ में एं। भं अं [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] उपत्ति) बद्धायुष्क भाव में (कालनो केवचिरं होइ ? ) काल से कितने समय तक रह सकता है ? (जहन्नेणं अंतोमुत्त) जघन्य से अन्तर्मुहूर्त (उच्कोसेणं) उत्कृष्ट से (पुवकोडी- तिभागं,) पूर्व क्रोड वर्ष के तीसरे भाग* प्रमाण । (अभिमुहनामगीए र भंते !) हे भगवन् ! अभिमुखनामगोत्र बाला (अभिमुहनामगो- एत्ति) अभिमुखनामगोत्र के भाव में ( कालमो केवचिर होइ ?) कितने काल तक रह सकता है ? (जहन्नेणं एक समय) जघन्य से एक समय (उकोसेणं अंतोमुहुरा ।) उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त प्रमाण। (इयाणी) इस समय (को णनी) कौन २ नय (कं संखं किस २ शंख को (इच्छइ) चाहता है-(तत्थ णेगमसंगहबवहाग ) उन सातों नयों में से नैगम, संग्रह और व्यव- हार (तिविहं संख) तीन प्रकार के शंख को (इच्छति,) चाहते हैं ।, (तं जहा.) जैसे कि- (एगभविनं) एक भविक ( बदाउन्नं ) बद्धायुष्क (अभिमुहनामगोत्तं च,) और अभिमुख- नामगोत्र को। ( उज्ज सुनो दुविहं) ऋजुसूत्र दो प्रकार के ( संखं इच्छइ ) शंख को चाहता है, (तं जहा.) जैके कि-(वदा च) बद्धायुष्क और (अभिमुहनामगोत्तं च) अभिमुख नाम- गोत्र को। (तिरिण सद्द नया ) तीनों शब्द नय’ सिर्फ (अभिमुहनामगोत्तं सखं) अभिमुख नामगोत्र शंख को (इच्छति) चाहते हैं । (से तं जाणयसरीरभवियसरीरवइरित्ता दव्वसंखा ।) यही ज्ञशरीर, भब्यशरीर और व्यतिरिक्त द्रव्य संख्या है । (से तं नोनागमोदव्वसंखा ।) यही नोआगम द्रब्य संख्या है । ( से तं दव्वसंखा। ) और इसी को द्रव्य संख्या कहते हैं ए ग गम स १ -- * अर्थात् अन्तमुहूर्त प्रमाण प्रायु के शेष रहने पर परभव की आयु का बन्धन होता है और वह उत्कृष्ट से पूर्वक्रोड के तीसरे भाग में होता है । इस लिये जब से किसी जीव ने शङ्ख भव को आयु का बन्धन किया है, तब से उसे बदायुष्क कहते हैं । + जैसे कि व्यवहार में राज्य के योग्य कुमार को राजा अथवा घृत के योग्य घड़े को घी का घड़ा कहते हैं उसी प्रकार ये तीनों नय स्थूलदृष्टि से तीनों प्रकार के शंख मानते हैं । * क्योंकि यह नय पूर्व नयों की अपेक्षा विशेष शुद्ध है। इसका मत यह है कि यदि एक भविक जीव शंख माना जाय तो अतिप्रसङ्ग दोष को प्राप्ति होगी, क्योंकि वह भाव शंख से बहुत अन्तर पर है। +ये नय अतीव शुद्ध है। इस लिये इनके मत में प्रथम दोनों प्रकार के शंख भाव शंख के अन्तर पर होने से कार्य रूप हैं । यद्यपि नयों में भाव की ही प्रधानता है, तथापि अतिप्रसङ्ग की नित्ति करते हुए और भाव शंख के समीत सोने की - [ उत्सरार्धम् ] भावार्थ-जिनके द्वारा संख्या-गणना की जाय उसे संख्या प्रमाण कहते हैं और वह आठ प्रकार से वर्णन किया गया है। जैसे कि-नाम संख्या १, स्थापना संख्या २, द्रव्य संख्या ३, उपमान संख्या ४, परिमाण संख्या ५, शान संख्या ६, गणना संख्या ७, और भाव संख्या = नाम संख्या और स्थापना संख्या का खरूप पूर्व कथित आवश्यक स्वरूप की तरह जानना चाहिये। द्रव्य संख्या भी आगम से और नो आगम से वर्णन की गई है । तथा शशरीर, भव्यशरीर और व्यतिरिक्त द्रव्य संख्या तीन प्रकार से वर्णित है। जैसे कि-जिसे एकभव के अनन्तर मृत्यु प्राप्त कर शंख में उत्पन्न होना है उसे एकभ- विक शंख कहते हैं । इसमें द्विभविक त्रिभविकादि भवों की गणना नहीं है, क्यों कि वह भोव शंख के बहुत ही अन्तर पर है ? तथा जिसने शंख आयु का बन्धन कर लिया है उसे बद्धायुष्क शंख कहते हैं और जो भाव शंख के सन्मुख है उसे अभिमुखनामगोत्रकर्मपूर्वक शंख कहते हैं। एकभविक शंख की जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट क्रोड पूर्व वर्ष की होती है। बद्धायुष्क की जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट कोड पूर्व के तीसरे भाग की होती है । तथा असंख्येय वर्षा की स्थिति वाले जीव मृत्यु प्राप्तकर देवयोनि में ही प्राप्त होते हैं, शंखमें नहीं । इसी लिये उत्कृष्ट पद में पूर्व क्रोड उपादोन कारण है। अभिमुखनामगोत्र पूर्वक जीव जघन्य से एक समय और उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त प्रमाण रह कर भाव शंख को प्राप्त हो जाता है। नैगम, संग्रह और व्यववहार नय स्थूल दृष्टि से तीनों शंखों को मानते हैं । ऋजुसूत्र नय के मत में दो शंख और शेष तीन शब्द नयों के मन में केवल तृतीय शंख ही ग्राह्य है, क्योंकि वही भाव शंख प्राप्त होने योग्य है। इस प्रमाण से केवली तीन काल के शाता सिद्ध किये गये हैं। क्योंकि कतिपय मत सर्वशको तीन काल के ज्ञाता नहीं मानते । संख्या प्रमाण के अनन्तर अब उपमान प्रमाण को वर्णन किया गया जाता है- श्रौपम्य संख्या प्रमाणा। से किंत ओवम्मसंखा? चउठिवहा पराणता, ते जहा-अस्थि संतयं संतएणं उवमिजइ, अस्थि संतयं असं- १२२८ ए भ ब ग [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] तएणं उवमिजइ, अस्थि असंतयं संतएणं उवमिजइ, अस्थि असंतयं असंतएणं उवमिज्जइ तत्थ संतयं संतएणं उव- मिजइ जहा-संता अरिहंता संतएहिं पुरवरेहिं संतएहि कवाडेहिं संतएहिं बच्छेहिं उवमिज्जइ, तं जहा- पुरवरकवाडवच्छा, फलिहभुआ दु'दुहित्थणियघोसा। सिरिवच्छंकि प्रवच्छा, सव्वे विजिणा चउव्वीसं ॥१॥ संतयं असंतएण उवमिज्जइ जहा-संताई नेरइयतिार- क्खजोणियमणस्सदेवाणं भाउयाई असंतएहि पलिओ- वमसागरोवमेहि उवमिजति २ । असंतयं संतएणं उवमिजइ त जहा- परिजूरियपेरंत, चलंतबिट पडतनिच्छीरें । पत्तं व वसणपत्तं, कालप्पत्तं भणइ गाहं ॥१॥ जह तुब्भे तह अम्हे, तुम्हेऽवि अ होहिहा जहा अम्हे। अप्पाहेइ पडतं, पंडुयपत्तं किसलयाणं ॥२॥ णवि अस्थि णवि अहोही, उल्लावो किसलपंडुपत्ताण । उवमा खलु एस कया, भवियजणविबोहणटाए ॥३॥ असंतयं असंतएहिं उवमिजइ, जहा- खरविसाणे तहा ससविसाणे+से तं ओवम्मसंखा । ने ब ran ३ २ । पदार्थ-(से किं तं ओवम्मसंखा ? ) औपम्य-उपमान संख्यो किसे कहते हैं ? श्रोवम्मसंखा ) किसी वस्तु का उपमा के द्वाग प्रमाण जानना उसे औपम्य संख्या कहते हैं, और वह ( चउविहा परणत्ता,) चार प्रकार से प्रतिपादन की गई है, ( जहा-) जैसे कि-(अस्थि संत4) विद्यमान पदार्थ को ( संतएणं विद्यमान पदार्थ से (उवमिज्जइ) उपमा दी जाती है १ । (अस्थि संतयं) विद्यमान पदार्थ को (असंतएणं) अ- * क्वचित् 'वंदा जिणे चउव्वीसं'। +कचित्र 'जहा खरविसाणं तहा ससविसाणं' ।
[ उत्तरार्धम् ] विद्यमान पदार्थ से ( उवमिज्जइ ) उपमा दी जाती है २, (अस्थि असतयं ) अविद्यमान पदार्थ को (अक्षांतए) अविद्यमान पदार्थ से ( उवमिजा,) उपमा दी जाती है ३,(अस्थि नसंतयं )अविद्यमान पदार्थ को (असंतएणं) अविद्यमान पदार्थ से (ज्वमिजइ) उपमा दी जाती है ४ (तत्थ संतयं) अब इनमें से विद्यमान पदार्थ को (संतएणं) विद्यमान पदार्थ से ( उवमिजइ) उपमा दी जाती है (जहा) जैसे कि-(संता अरिहंता) विद्यमान अहंन्तको (संतएहिं पुरवरहिं) विद्यमान प्रधान नगरों के (संतएहिं कबाडेहिं) विद्यमान कपाटों-दर- वाजों के (संतएहिं वच्छ हिं) विद्यमान वक्षःस्थल से (स्वमिज्जइ,) उपमा दी जाती है, (सं जहा-) जैसे कि (पुरवरकवाडवच्छा, फलिहभुश्रा दुंदुहित्थणिअघोसा।) (सिरिवच्छ कि भवच्छा, सव्वे ऽवि जिणा चव्वीसं ॥ १ ॥) प्रधान नगरके कपाटों के समान जिनके वक्षः स्थल, अर्गला के समान भुजाएं, देवदुन्दुभि या स्तनित-विद्युत् के समान शब्द और जिनका वक्षः स्थल स्वस्तिक से अङ्कित है, इसी प्रकार चौवोस तीर्थङ्कर हैं १। (संतयं ) विद्यमान पदार्थ को ( असंतएणं ) अविद्यमान पदार्थ से ( उवमिज्जइ,) उपमा दी जाती है, ( जहा-) जैसे कि- (संताई नेरइअतिरिक्खजोणिश्रमणुस्सदेवाणं आउयाई) नारक, तिर्यंच, मनुष्य और देवताओं की विद्यमान आयु 'असंतएहिं पलिग्रोवमसागरोवमेहि) अविद्यमान जो पल्योपम और सागरोपम हैं उन से ( उद्यमिज ति, ) उपमाएं दी जाती हैं। (असंतयं संतएणं) अविद्यमान को विद्यमान से (उबमिजइ) उपमा दी जाती है, (तं जहा.) जैसे कि- (परिजूरिश्रपेरंतं, चलंतविटं पडतनिच्छीरं ।) (पत्तं च वसणपत्तं, कालप्पत्तं भणइ गाहं ॥१॥) वसम्त समय में जो अतिजीर्ण कल्प है वह दध रहित परिपक्व होनेके कारण बीट से नीचे गिर जाता है । पुनः पत्रवियोग रूपी ब्यसन से नष्ट हो जाता है, ऐसे गाथा कहती है ॥१॥ (जह तुब्भे तह अम्हे, तुम्हेऽवि अ होहिहा जहा अम्हे ।) (अप्पाहेइ पहंतं, पंडुअप किसलयाणं ॥२॥) कोई जीर्ण पत्र वृक्ष से गिरता हुआ अभिनव कान्ति रूप किशलय को कहता है कि-जैसे तुम हो वैसे ही हम पहले थे और तुम भी अब हमारे जैसे हो जायोगे। किशलयों को कहता हुआ जोर्ण-पत्र नीचे गिर जाता है ॥२॥ । womgantete करो। एं भ JA ग व २३० [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] अर्थात जैसे तुम सब जीवोंको आनन्द पहुँचाने वाले हो और अपनी श्री से अलंकृत हो उसी प्रकार हम भी पूर्व में ऐसे ही थे, और तुम भी अब हमारे जैसे हो जाओगे। क्योंकि तुम्हारा यही भाव होगा, जो इस समय हमारा हो रहा है । इस लिये अपनी : ऋद्धि को देख कर अहंकार न करो और दूसरों की निन्दा मत ( णवि अस्थि णवि श्र होही, उल्लाको निसलपंडुपत्ताणं । ) उवमा खलु एस कया; भविअनणविबोहणट्ठाए ॥ ३ ॥) किशलय और जीर्ण पत्रोंका पास्पर कभी वार्तालाप न हुश्रा, न होता है और न होगा, सिर्फ भव्यजीवों के बोध के लिये निश्चय ही यह उपमा की है ॥३॥ प्रथम पक्षमें किशलयों की जो अवस्था विद्यमान है उसी प्रकार अवस्था जीर्ण पत्रों की भूत काल में थी, वर्तमान में नहीं। तथा द्वितीय जो जीर्णावस्था पत्रों की वर्तमान में है वही दशा भविष्यत काल में किशलयों को होगी। इस प्रकार निर्वेद के वास्त उपमा और उपमेय का स्वरूप जानना चाहिये। चतुर्थ भंग में--(असंतयं) अविद्यमान पदार्थ की (असंतएण) अविद्यमान पदार्थ से (उवमिजइ) उपमा दी जाती है। (जहा-) जैसे कि-खरविताणे) गधे के श्रृंग अवि- धमान हैं ( तहा सप्तविसाणे । ) उसी प्रकार खरगोश के शृंग भी अभाव रूप हैं और जैसे शश के श्रृंग अभाव रूप है उसी प्रकार खरके शृग हैं । (से तं औवम्नसंखा ।) वही पूर्वोक्त उपमान संख्या का स्वरूर है, अर्थात् इसे ही उपमा संख्या कहते हैं। भावार्थ उपमान प्रमाण भो चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, जैसे कि-विद्यमान पदार्थों को विद्यमान पदार्थों से उपमेय करना १, विद्यमान को अविद्यमान से उपमेय करना २, अविद्यमान को विद्यमान से उपमेय करना ३, और अविद्यमान को विद्यमान से उपमेय करना । विद्यमान पदार्थ की विद्यमान पदार्थ से उपमा दी जाती है। जैसे-विद्य- मान अईन भगवन्तों के वक्षः स्थल की विद्यमान नगर के कपाटादि से उपमेय करना १, विद्यमान पदार्थ की अविद्यमान पदार्थ से उपमा दी जाती है । जैसे चारों गतियों के जीवों की आयु को पल्योपम और सागरोपमों से मान करना २, अविद्यमान दृष्टान्तों से विद्यमान पदार्थ को भव्यजनों के बोध के वास्ते बोधित करना । जैसे कि-वृक्ष के बीट से गिरते हुये जीर्ण पत्र ने किशलयों को कहा कि हे पल्लवो! सुनो-जैसे तुम हो इसी प्रकार हम भी थे, और जैसे इस समय हम हैं तुम भी कालान्तर में इसी प्रकार हो जाओगे । इस लिये अपनी श्री का अहंकार मत करो। तुम को जीर्ण पत्र पुनः २ कह रहा है । यद्यपि पत्रों का है AAM ३ १ , [ उत्तरार्धम् ] को परस्पर वार्तालाप करना असंगत है तथापि भव्यजनों के बोध के लिये इस प्रकार कहा जाता है। यह अविद्यमान पदार्थ से विद्यमान पदार्थ को उपभा देना तीसरा भंग है ३, चतुर्थ भंग वह है कि जो अविद्यमान को विद्यमान से उपमान दिया जाय, जैसे गधेके ग हैं उसी प्रकार शशके विषाण हैं। क्यों कि दोनों अभाव रूप हैं । यही उपमा संख्या है--- अब इसके अनन्तर परिमाण संख्या का वर्णन किया जाता है। परिमाण संख्या। से किं तं परिमाणसंखा ? दुविहा पण्णत्ता, तं जहा कालियसुयपरिमाणसंखा दिटुवायसुयपरिमाणसंखा य । से किं तं कालियसुयपरिमाणसंखा ? अणेगविहा पण्णता, तं जहा-पज्जवसंखा अक्खरसंखा संघायसंखा पयसंखा पायसंखा गाहासंखा संखायसंखा सिलोगसखा वेढसंखा निज त्तिसंखा, अणोगदारसंखा, उसगसंखा अझ यणसंखा सुअखंधसंखा अंगसंखा, से तं कालियसुयपरि. माणसंखा। से किं तं दिठिवायसुयपरिमाणसंखा ? अगोगविहा पण्णत्ता, तं जहा-पज्जवसंखा जाव अणोगदारसंखा पा- हुडसंखा पाहुडियासंखा पाहुडपाहुडिआसंखा वत्थुसंखा, से तं दिट्टिवायसुयपरिमाणसंखा। से तं परिमाणसंखा। पदार्थ--(से किं तं परिमाणसंखा ?) परिमाण संख्या किसे कहते हैं और वह कितने प्रकार से वर्णन की गई है ? (परिमाणसंखा) जिसके द्वारा पर्याय आदिको की संख्या की जाय उसे परिमाण संख्या कहते हैं, वह दुविहा) दो प्रकार से (पएणता, प्रतिपादन की गई है, (तं जहा.) जैसे कि (कालियसुयपरिमाणसंखा) कालिक श्र तपरि- माण संख्या, (दिट्टिवायसुअपरिमाणसंखा य ।) और रष्टिवादश् तपरिमाण संख्या। (से किं तं कालिसुयपरिमाणसंखा ?) कालिका तपपिमाण संख्या किसे कहते हैं। कालियसुयपरिमाणसंखा) जिन २ सूत्रों को प्रथम या दूसरे प्रहर में वाचना दो जाय * एतदन्यत्र नोपलभ्यते। * संख्यायते अनयेति संख्या-परिमाणं पर्यवावि तद् का संख्या परिमाणसंख्या । , . [ श्रीमद्नुयोगद्वारसूत्रम् ] और उनका जो परिमाण हो उसे कालिक अ तपरिमाण * संख्या कहते हैं, और वह (अणेगविहा पण्णत्ता,) अनेक प्रकार से प्रतिपादन की गई है, (तं जहा-) जैसे कि- (पज्जवसंखा) पर्यव-पर्याय संख्या, ( अक्खरसंखr) अक्षर संख्या, (संघायसंखा) संघात संख्या, ( पयसंखा) पद सख्या, (पायसंखा) पाद संख्या, (गाहासंखा) गाथा संख्या, ( संखायसंखा) संख्यात संख्या, (सिलोगसंखा) श्लोक संख्या, ( वेढसंखा) वेष्टक संख्या, (निज त्तिसंखा) नियुक्तिसंख्या , ( अणुयोगदारसंखा) अनुयोगद्वार संख्या, (उदेसगसंखा ) उद्देश संख्या, ( अज्झयणसंखा) अध्ययन संख्या, (सुयखंधसंखा) श्रुतस्कन्ध संख्या, अंगसंखा) अंगसंख्या, (से तं कालिश्रसुअपरिमाणसंसा।) यही कालिक श्रु तपरिमाण संख्या है। (से किं तं दिट्टिवायसुअपरिमाणसंखा ?) दृष्टिवादश्रुतपरिमाण संख्या किसे कहते हैं ? (दिट्टिवायसुअपरिमाणसंखा) दृष्टिवादश्रु तपरिमाण संख्या ( अणेगविहा पण्णत्ता,) अनेक प्रकार से प्रतिपादन की गई है, (तं जहा- ) जैसे कि--(पज्जवसंखा) पर्यव-पर्याय संख्या (जाव अणुश्रोगदारसंखा) यावत् अनुयोगद्वार संख्या, ( पाहुडसंखा) प्राभृति संख्या, ( पाहुडियासंखा ) प्राभृतिका संख्या, (पाहुडपाहुडियासंखा) प्राभृत प्राभृतिका संख्या, (वत्युसंखा ) वस्तु संख्या ( से तं दिटिवायसुअपरिमाणसंखा।) यही दृष्टिवादश्रुतपरिमाण संख्या है और (से तं परिमाणसंस्खा ।) यही परिमाण संख्या है। * कालिकश्च तपरिमाणसंख्यायां पर्यवसंख्या इत्यादि, पर्यवादिरूपेण-परिमाणविशेषेण कालिकश्रुतं संख्यायत इतिभावः । इनका नाम अन्वर्थ है । जैसे-१-जिसमें पर्यायौंको संख्या हो। -जिसमें अक्षरों की गणना हो। ३-द्वयादि संयोगादि व्यंजनों की गणना हो। ४-जिसमें वाक्यों के पदों की संख्या हो । अथवा-सुप्तिङन्तं पदम् । १।४ । १४ । पा० ।' जिस के अन्त में सुप् और तिङ हो उसे पद जानना चाहिये । ५-श्लोकादि के चतुर्थांश को पाद कहते हैं। इनकी जिसमें संख्या हो उसे पाद संख्या कहते हैं । ६-जिसमें गाथाओं की संख्या हो । ७-जिसमें गणना की संख्या हो। जिसमें श्लोकों की संख्या हो।-जिसमें वेष्टक- छन्द विशेषकी संख्या हो । १०-जिस नियुक्ति की संख्या हो । ११-जिसमें अनुयोग द्वार की संख्या हो। १२-जिसमें दशकों की संख्या हो । १३-जिसमें अध्ययनों की संख्या हो। १४ जिसमें श्रुत स्कन्धों की गणना हो। १५-जिसमें अङ्गादिकों की संख्या हो । इनका विशेष वर्णन नन्दी और अनुयोगद्वार से जानना चाहिये । १६-जिसमें प्रभृतों की संख्या हो। १७- जिसमें प्राभृति की संख्या हो । १८-जिसमें माभूतमाभृतिका की संख्या हो । १६-जिसमें जीवादि वस्तुओं की संख्या हो । ये सब पूर्वान्तर्गत श्रु ताधिकारविशेष हैं। यथा--"प्राभृतादयः [उत्तरार्धम] २३३ भावार्थ-जिसकी गणना की जाय उसे सङ्ख्या कहते हैं, और जिसमें पर्यवादि का परिमाण हो उसे परिमाण संख्या कहते हैं । इसके दो भेद हैं, जैसे कि-कालिकश्रु त परिमाण संख्या १, और दृष्टिवादश्रु त परिमाण संख्या २ । जिन २ सूत्रों की प्रथम या दुसरे प्रहर में वाचना दी जाय और उनका जिसमें परिमाण हो उसे कालिकश्रु त परिमाण संख्या कहते हैं । इसके अनेक भेद हैं, जैसे कि-पर्याय संख्या १, अक्षर संख्या २, संघात संख्या ३, पद संख्या ४, पाद संख्या ५, गाथा संख्या ६, संख्या संख्या ७, श्लोक संख्या ८, वेष्टक संख्या ६, नियुक्ति संख्या १०, अनुयोगद्वार संख्या ११, उद्देशक संख्या १२, अध्ययन संख्या १३, श्रु तस्कन्ध संख्या १४, और अंग संख्या १५ ।। तथा दृष्टिवादश्रत परिमाण संख्या भी इली प्रकार जानना चाहिये। लेकिन प्राभत संख्या, प्राभृतिका संख्या, प्राभृत आभृतिका संख्या और वस्तु संख्या, इतना विशेष जानना चाहिये । इसी को परिमाण संख्या कहते हैं। इसके बाद अब ज्ञान संख्या का स्वरूप वर्णन किया जाता है- ज्ञान संख्या से किं तं जाणणासंखा? जो जं जाणइ. सहसद्धिदओ गणिअं गणिो निमित्तं नेमित्तिो कालं कालणाणी वेजयं वेजो, से तं जाणणासंखा । पदार्थ-(से किं तं जाण णासँखा ?) ज्ञान* संख्या किसे कहते हैं ? (जाणणासंखा) ज्ञान संख्या उसे कहते हैं कि-(जो जं जाणइ,) जो जिसको जानना हो, ( जहा-) जैसे क-(सई सद्दिो) जो शब्द को जानता हो उसे शाब्दिक (गणिनं गणिो) जो गणित को जानता हो उसे गणितज्ञ, (निमित्तं ने मत्तिो) जो निमित्त को जानता हो उसे नैमित्तिक, ( कालं कालणाणी ) जो काल को जानता हो उसे कालज्ञानी-कालज्ञ (वैजयं वेजो,) जो वैद्यक जानता हो उसे वैद्य कहते हैं, ( से तं जाणणासंखा । ) यही ज्ञान संख्या है। तं जहा- * "ज्ञो यः।" प्रा० । सू०।८।२।८३ । ज्ञः सम्बन्धिनो अस्य लुग् वा भवति । जाणं-णाणं-ज्ञानम् । इत्यादि । + यहां पर अभेदोपचार नयके मतसे वर्णन किया जारहा है । इसी प्रकार सर्वत्र जानना चाहिये।
और ( (पर संस (३ संर २३४ [श्रामद्नुयोगद्वारसूत्रम् ] भावार्थ-जिसके द्वारा पदार्थों का स्वरूप जाना जाता है उसे मान कह- ते हैं और जिसमें उसकी संख्या का परिमाण हो उसे ज्ञान संख्या कहते हैं। जैसे कि जो शब्द को जानता है वही शाब्दिक है, जो गणित को जानता है वही गणितच है, जो निमित्त को जानता है वही नैमित्तिक है, जो काल [भूत, भविष्यत् और वत्त मान श्रादि] को जो जानता है वही कालज्ञानी है, जो वैद्यक जानता है वही वैद्य है। इसी को ज्ञान संख्या कहते हैं। इसके अनन्तर अब गणना संख्या का स्वरूप जानना चाहिये- गगाना संख्या Narasima ? से कि तं गणणार्शखा ? एक्को गणणं न उवेइ, दुप्प- भिइ संखा, तं जहा-संखेज्जए १, असंखेजए २, अतए ३, से कि तं संखेज्जए ? तिविहे पण्णत्ते, तं जहा-जह- एणए उक्कोसए अजहरणमणुक्कोसए । से किसं असंखेज्जए ? तिबिहे पण्णत्ते, तं जहा- परित्तासंस्खेजए जुत्तासंखेज्जए असंखेज्जासंखेज्जए। से किंह परित्तासंखेजए ? तिविहे पाणते, तं जहा- जहण्णए उक्कोसए अजहरणमणुक्कोसए । से कि तं जुत्तासंखेज्जए ? तिविहे पण्णत्ते, तं जहा- जहएणए उक्कोसए अजहएणमणुक्कोसए । से कितं असंखज्जासंखेज्जए? तिविहे पगणते, जहा-जहण्णए उक्कोसऐ अजहण्णमणुक्कोसए । से किं तं अणंतए ? तिविहे पणाचे, तं जहा-परि- ताणतए जुत्ताणतए अणंताणतए । से कि तं परित्ताणतए ? तिविहे पण्णत्ते, तं जहा- जहण्णए उक्कोसए अजहण्णमणकोसए। ANIN २३५ [ उत्तरार्धम् । से किं तं जुत्ताणतए ? तिविहे पण्णत्ते. तं जहा-ज- हएणए उक्कोसए अजहरणमणुक्कोसए । से कि तं अणतातए ? दुविहे पण्णते, तं जहा- जहण्णए अजहण्णमण्क्कोसए । जहरणयं संखेज्जयं केवइयं होइ? दोरूवयं, तेणं पर अजहरणमणकोसयाई ठाणाई जाव उक्कोसयं संखेज्जयं न पावइ। उक्कोसयं संखेज्जयं केवइयं होइ ? उक्कोसयस्स संखेज्जयस्स परूवणं करिस्लामि-से जहानामए पल्ले सिया एग जोयणसयसहस्सं मायामविक्रवंभेणं तिगण जोयणसय. सहस्साई सोलस सहस्साई दोगिण म सत्तावीसे जोयण- सये तिगिण अ कोसे अढावीमं च धणुसयं तेरस य अंगुलाई अद्ध अंगुलं च किंचि विसेलाहि परिक्खेवेणं पण्णत्ते, से णं पल्ले सिद्धस्थयाणं भरिए, तो ग तेहिं सिद्धत्थएहि दीवसमुददा उद्धारो घेप्पड़, एगो दोवे एगो समुद्दे एवं पक्खिप्पमाणेणं जावइया दीवसमुददा तेहि सिद्ध- थएहि अप्फुण्णा एस णं एवइए खेत्ते पल्ले आइट्टा पढमा सलागा, एवइयाणं सलागाणं असंलप्पा लोगा भरिया त- होवि उक्कोसयं संखेज्जयं न पावइ । जहा को दिटुंतो ? से जहानामए मंचे सिया आमलगाणं भरिए, तत्थ एगे आमलए पक्खित्ते सेऽवि माते अण्णेऽवि पक्खित्ते सेऽवि माते भएणेवि पक्खित्ते सेऽविमाते एवं पक्खिप्पमाणेहि २७ चिदेतत् 'पक्खिप्पमाणेणं ।
[ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् । होही सेऽवि आमलए जंसि पक्खित्ते से मंचए भरिज्जिहिइ जे तत्थ श्रामलए न माहिइ । एवामेव उक्कोसए संखेज्जए रूवे पक्खित्ते जहएणयं परित्तासंखेज्जय भवइ । पदार्थ-(से किं तं गणणासंखा ?) गणना संख्या किसे कहते हैं ? (णणासंखा) जिनकी संख्या गणना के द्वारा की जाय उसे गणना संख्या * कहते हैं, (एको गणणं न उवेइ,) 'एक' गणन संख्याको प्राप्त नहीं होता, इस लिये (दुप्पभिइ सखा,) दो प्रभृति -दो से संख्या शुरू होती है, (तं जहा) जैसे कि-- संखेजए ) संख्येयक ( असंखेज्जए ) असंख्येयक और (अणतए । अनन्तक ! किं तं खेजए ?) संख्येयक किसे कहते हैं ? (संखेझर) जिसकी संख्या की जाय, और वह (तिविहे पणत्ते,) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा-) जैसे कि-(जहरणए) जघन्य (उकोसए) उत्कृष्ट और (अजहरणमणुकांसए ) मध्यम । (से किं तं असंखेजए ?) असंख्येयक किसे कहते हैं ? (असंखेजए, जो संख्येयक न हो, और वह (तिविहे परणत्ते, ) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है तं जहर-) जैसे कि--(परित्तासंखेज्जए) परीतासंख्येयक (जुत्तासंखेज्जए) युक्तासंख्येयक और (असंवे. जासंखेन्नए ।) असंख्येयासंख्येयक । से किं तं परि तासंखेजए ?) परोतासंख्येयक किसे कहते हैं ? (परित्तासंवेज्जए) जो उत्कृष्ट संख्येयक न हो, और वह ( तिनिह पएणत्ते, ) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा-) जैसे कि- (जहएणए) जघन्य (उक्कोसए) उत्कृष्ट और (अजह. एणमणुकोसए ।) मध्यम। ( से किं तं जुत्तासंखेज्जए ? ) युक्तासंख्येयक किसे कहते हैं ? (जुत्तासंखेजए) जो नैक- * एतावन्त एते इति संख्यानं गणनसंख्या । यत एकस्मिन् घटादौ दृष्टे घटादि वस्त्विदं तिष्ठतीत्येवमेव प्रायः प्रतीतिरुत्पद्यते, संख्याविषयत्वेन, अथवा आदानसमर्पणादिव्यवहारकाले एक वस्तु प्रायो न कश्चिद्गणयत्यतोऽसंव्य. वहार्यत्वादल्पत्वाद्वा नैको गणनसंख्यामवतरति । अर्थात्- जैसे कि कोई एक घटादि वस्तु देख कर घटादि वस्तु का तो ज्ञान हो जाता है, लेकिन संख्या नहीं मालूम होती । तथा-लौकिक व्यवहार में भी परम स्तोक होने से देने लेने में इसकी गणना नहीं की जाती। ।
mins [ उत्तरार्धम् ] उत्कृष्ट परोत न हो, और वह (तिविहे पएणते,) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा-) जैसे कि जहएणए ) जघन्य (कोसए) उत्कृष्ट और (अजहरणमणुको. सए ।) मध्यम। (से कि तं असंखेज्जासखेजए ?) अख्येयासंख्येयक किसे कहते हैं ? (असंखेज्जा. सांखेज्जए) जो उत्कृष्ट युक्त न हो, और वह (तिविहे परणते,) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा-) जैसे कि--(जहएणए) जघन्य (कोसए) उत्कृष्ट और (अजह- एण्मणुकोसए।) मध्यम । (से किं तं अतए ?) अनन्तक किसे कहते हैं ? (अणंतए) जो उत्कृष्ट असं- ख्येयासंख्येयक न हो, और वह (निविहे पण्णते, ) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा.) जैसे कि-(परित्ताणतए) परीतानन्तक, (जुत्ताणतए) युक्तानन्तक और (अणंताणतए ।) अनन्तानन्तक । (ले कि तं परित्ताणतए ? ) परीतानन्तक किसे कहते हैं ? ( परित्ताणतए) जो उत्कृष्ट अनन्तानन्तक न हो, और वह (तिविहे पएणते,) तीन प्रकारसे प्रतिपादन किया गया है, (तं .हा-) जैसे कि- जहएणए) जघन्य (उकोसए) उत्कृष्ट और (अजहएणमणुको- सए ।) मध्यम । (से कि तं जुत्ताणतए ? ) युक्तानन्तक|किसे कहते हैं ? ( जुत्ताणतए ) जो परीत उत्कृष्ट न हो और वह (तिविहे पएणते,) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा.) जैसे कि--(जहरणए) जघन्य (उकोसए) उत्कृष्ट और (अजहएणमणुकोसए ।) समुद्र में (से किं तं अणताणलए ?) अनन्तानन्त किसे कहते हैं ? (दुविहे पएणत्ते,) वह में डालें तो जितने में वे व्याप्त हुए हों उनका एक शलाका होता है। दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है (तं जहा.) जैसे कि-(जहण्णए अजहएणमणुको- सए) जघन्य और मध्यम । जहरणयं संखेनयं) जघन्य संख्येयक (केवइयं होइ ?) कितने प्रमाण में होता है ? (दोस्वयं) दो रूप प्रमाण, (तेणं परं) उसके पश्चात् (अजहरणमणुकोसयाई ठाणाई) मध्यम स्थान हैं, (जाव ) यावत् ( उकोसयं संखेजयं ) उत्कृष्ट संख्येयक (न पावइ । प्राप्त नहीं होता। (उकोमयं संखेजयं) उत्कृष्ट संख्येयक (केवइयं होइ ?) कितने प्रमाण में होता है ? (उक्कोसयस्स संखेज्जयस्स) उत्कृष्ट संख्येयक का (परूवणं)। प्ररूपण (करिस्सामि.) करूंगा- (से जहानामए) तद्यथा नामक-जैसे कि--(पल्ले सिपा) पल्य हो, जो कि (एगं जोयण- २३८ ( [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] सयसहस्स) एक लाख योजन (आयामविक्वंभेण, लम्बा चौड़ा हो, और (तिरिण जोयण- सयसहस्साई) तीन लाख (सोलहसहस्साई दोरिण अ सचावीसे जोयणसए) सोलह हजार दो सौ सत्ताईस योजन (तिरिण अ कोसे) और तीन कोश (अट्ठाव सं च धणुसयं) एक सौ अट्ठाईस धनुष (तेरस य अंगुलाई अह अंगुल च) साढ़े तेरह अनुलसे (किचि विसेसाहि) कुछ अधिक (परिक्खेवेणं पण्णत्ते,) परिधि प्रतिपादन की गई है, पश्चात् (से णं पल्ले) उस पल्य को (सिद्धत्थयाणं भरिए,) सर्षपों से भर दिया जाय, (तमो णं तेहिं सिद्धत्थए हिं, फिर उन सर्षपों से (दीवस मुद्दाणं ) द्वीप और समुद्रों का (उद्वारो घेप्पइ) उद्धार प्रमाण निकाला जाता है, जैसे कि- एगो दीवे एगो समुद्दो) एक २ द्वीप में और एक २ समुद्र ( एवं पक्लिप्पनाणेहिं ) इस प्रकार प्रक्षेप करते-फेंकते हुए ( जावया दोवसमुदा) जितने द्वीप समुद्र हैं, (तेहिं सिद्धत्यएहिं) उन सरसोंसे (अप्फुरणा) भर जायं (एस णं एवइए खेत्ते पल्ले) इतने क्षेत्र पल्य का (आइट्ठा पडमा सलागा,) प्रथम शलाका होता है, (एवढ्या णं सलागाणं) इतने शलाकों के (असालप्पा लोगा) अकथनीय लोक (भरिया,) भरे हुए हैं, (तहावि) तो भी वे (उकोसयं संखेज्जयं) उत्कृष्ट* संख्येयक को (न पावइ,) प्राप्त नहीं होते (जहा को दिलुतो ?) जैसे कोई दृष्टान्त भी है ? (से जहानामए) तद्यथा नामक-जैसे कि (मंचे सिपा) मञ्च-वार पा हो या स्थान विशेष हो,जो कि-(प्रामल गाणं भरिए) प्रांव- लों से भरी हुई हो (तत्य) तदनन्तर ( एगे अामल ए ) एक आँवला ( पक्खित्ते ) डाला (से ऽत्र माते) वह भी समा गया (अगणेऽपि पक्वित्त) अन्य अन्य भी डाला (सेऽविते) वह भी समा गया, ( अन्ने ऽवि पक्लित्ते) दूसरा और भी डाला (से ऽवि माते) वह भी Whema * यहां पर मूल सूत्रकार ने ३१६२२७ योजन, ३ कोश, १२८ धनुष और १३॥ अङ्गुल की जो परिधि प्रतिपादन की है, उसे जम्बूदीप दी जानना चाहिये । उत्तिकार का भी यही अभिप्राय है । यथा-- "परिही तिलक्स सोलस, सहस्स दो य सय सत्तावीस ऽहिया । कोसतिय अट्ठवीसं, धणुसय तेरंगुलहहियं ॥ १ ॥" परिधिस्त्रयो लक्षाः षोडश सहला द्वे शते सप्तविंशत्यधिके । क्रोशत्रिकमष्टाविंशं धनुःशतं त्रयोदशाङ्गुलानि अर्धाधिकानि ॥२॥ * क्योंकि वह पल्य चोटि तक भरा हुआ नहीं है इस लिये उसे उत्कृष्ट संख्येयक नहों - * शिखा के बिना भी लौकिक रूदि है कि यह मंच चोटी तक भर गया है कल्पना की जाय कि कोई देव उस पल्य में से उन सरसों को एक २ द्वीप और एक २ . [ उत्तरार्धम् ] २३९ समा गया, ( एवं पक्खिप्पमाणेहिं २ ) इस प्रकार प्रक्षेप करते २(होही सेऽवि अमलय) यही आँवला होगा (जंसि पक्खित्ते) जिसके डालने से (से मंचए) वह मञ्च (भरिजिहिड) भर जायगा ( जे नत्य ) जिसके बाद (आमलए) आँवला (न माहिए,) न समा सकेगा। (एवामेव) इसी प्रकार (उकोसए संखेज्जए) उत्कृष्ट संख्येयक हो (रुवे पक्विचे) रूप प्रक्षेप करने से (जहएणय) जघन्य (परित्तासंखेज्जय) परीतासंख्येयक (भवा ।) होता है । भावार्थ--जिसके द्वारा गणना की जाय उसे गणना संख्या कहते हैं । एक का अंक तो संख्या की गिनती में नहीं पाता, इस लिये दो से गिनती शुरू होती है। इसके तीन भेद है-संख्येयक १, असंख्येयक २, और अनन्तक ३ । १, संख्येयक-जघन्य २, मध्यम २, और उत्कृष्ट ३। २, असंख्येयक-जघन्य परीत असंख्येयक १, मध्यम परीत असंख्येयक२, और उत्कृष्ट परीत असंख्येयक ३; जघन्य युक्त अख्येयक ४, मध्यम युक्त असं. ख्येयक ५, और उत्कृष्ट युक्त असंख्येयक ६ जघन्य असंख्येयक असंख्येयक ७, मध्यम असंख्येयक असंख्येयक, और उत्कृष्ट असंख्येयक संख्येयक।। ३, अनन्त - जघन्य परीतानन्त १, मध्यम परीतानन्त २, और उत्कृष्ट परीतानन्त ३; जघन्य युक्तानन्त ४, मध्यम युक्तानन्त ५, और उत्कृष्ट युक्तानन्त ६; जघन्य अनन्तानन्त ७, और मध्यम अनन्तानन्त :, इस प्रकार संक्षेप से अंक वर्णन किये गये हैं। अब इन्हीं का विस्तार पूर्वक विवेचन करते हैं। जैसे- असत्कल्पना के द्वारा चार पल्य जम्बूद्वीप प्रमाण कल्पित कर लिये जायें और उनकी परिधि ३ लाख १६ हजार, २२७ योजन, कोश, १२८ धनुष, १३॥ अंगुल से कुछ विशेष होती है। इनके नाम अनुक्रम से शलाका १, प्रतिशलाका २, महाशलाका ३ और अनवस्थित हैं। एक सहस्न योजन प्रमाण गहरे और जम्बूद्वीप की वेदिका के समान ऊंचे हैं। उनमें से अनवस्थित पल्य को सर्षपों से भर दिया जाय फिर उसको अलक- रूपना के द्वारा कोई देवता उठाकर एक २ सर्षप एक २ बीप और एक २ समुद्र में प्रक्षेप करता जाय । जिस समय उन सब सर्षपों का अवसान आजाए तब एक सर्षप प्रथम शलाका पल्य में प्रक्षेप कर दिया जाय । तथा--जहां तक वे सब सर्षप प्रक्षेप किये थे इतने ही क्षेत्र का एक और अनवस्थित पल्य कल्पित कर लिया जाय । फिर वे सर्षप पूर्ववत् अन्य द्वीप समुद्रों में प्रक्षेप कर दिये जायें। जब एक सर्षप शेष रह जाय तब उसी शलाका पल्य में प्रक्षेप किया जाय । इसी प्रकार पूर्णतया शलाका पल्य को अनवस्थित पल्य के द्वारा भर दिया जाय तब- कुल बीस २४० [ श्रीमदजुयोगद्वारसूत्रम् ] नन्तर अनवस्थित पल्य को रख कर शलाका पल्य को उठा कर शेष द्वीप समुद्रों में सर्षप प्रक्षप करें। जब एक सर्षप शेष रह जाय तय प्रतिशलाका पल्य में उसे प्रक्षेप करें। पश्चात् अनवस्थित पल्य के द्वारा प्रथम शलाका पल्य को भरना चाहिये। जब अनवस्थित और शलोका पल्प दोनों ही भर जांय तय फिर शला- का पल्य में ले दूसरे द्वीप समुद्रों में सर्षप प्रदप किया जाय ! जब एक सर्पप रह जाय तब उसे प्रतिशलाका पल्य में प्रक्षप कर दिया जाय ! इस प्रकार अन- वस्थित पल्य से शलाका पल्य भर दिया जाय और शलाका से प्रतिशलाका । पश्चात् प्रतिशलाका के सर्षप के बीज उठाकर अन्य द्वीप समुद्रों में प्रक्षेप किया जाय। जब शेष एक सर्षप रह जाय तब उसे महाशलाका नामक पत्य में रख देना चाहिये । पश्चात् शलाका पल्य में से उठा कर दूसरे द्वीप समुद्रों में बीज प्रक्षेप करने चाहिये। फिर उसका एक शेष सर्षप प्रतिशलाका में रखना चाहिये, अर्थात् इतने परिमाण का आनवस्थित पल्य कल्पित कर लेना चाहिये, और उसके द्वारा पूर्ववत् प्रथम शलाका पल्य भरना चाहिये। इसी प्रकार शलाका से प्रतिशलाका को और प्रतिशलाका से महा- शलाका भरना चाहिये । जब चारों पल्य भर जायं तव उनके सर्पयों की एक राशि कर लेना चाहिये । क्योंकि जब तृतीय पल्य के द्वारा भरा जाय तब द्वितीय पल्य को उसे पहले के द्वारा भरना चाहिये, और प्रथम पल्य को अनव. स्थित पल्य से भरना चाहिये जब तीनों भर जायं तब अनवास्थित को भर कर पुनः चारों को एक राशि कर लेनी चाहिये, उस राशि के एक रूप अधिक को उत्कृष्ट संख्येयक कहते हैं । क्योंकि दो जघन्य संख्येयक हैं। जयन्य से अधिक उत्कृष्ट से न्यून मध्यम संख्येयक जानना चाहिये। सूत्र में जहाँ २ पर संख्येयक का वर्णन आता है वहां २ पर मध्यम संख्येयक ही जानना चाहिये । तथा जब उत्कृष्ट संख्येयक में एक रूप अधिक प्रक्षेप किया जाय तब उस राशिको जघन्य परीत असंख्येयक कहते हैं अब शेष असंख्येयक का निरूपण कियाजाता है- matalab * जब तृतीय पल्य द्वितीय पल्य के द्वारा पूर्णतया भर दिया जाय तो अनवस्थित पल्य के साथ २ प्रथम शलाका पल्य भी भर देना चाहिये । जब शलाका पल्य भी पूर्णतया भर जाय । तहफिर अनवस्थित के साथ ही प्रतिशलाका पल्य भरना चाहिये । जब वह भी पूर्ण भर जाय तब अनवस्थित को भी भर कर चारों की एक राशि कर लेनी चाहिये, उस राशि में से एक सर्वप न्यून करने से उत्कृष्ट संख्यक होता है।
[ उत्तरार्धम् ] असंख्येयासंख्ययक तेण परं अजहण्णमणुकोसयाई ठाणाई जाव उक्को- सयं परित्तासंखज्जयं न पावइ । उकोसयं परित्तासंखेज्जयं केवइयं होइ ? जहरणयं परित्तासंखेज्जयं जहएणयं परित्तासंखेज्जमेत्ताणं रासीणं अण्णमण्णब्भालो रूवूणो उक्कोस परित्तासंखज्जय होइ, अहवा जहएणयं जुत्तासंखेज्जयं रूवूणं उक्कोसयं परित्ता- संखज्जयं होइ। जहएणयं जुत्तासंखेज्जयं केवइयं होइ ? जहण्णय- परित्तासंखेज्जयमेत्ताणं रासीणं अण्णमण्णब्भासो पडिपु- एणो जहएणयं जुत्तासंखेज्जयं होइ, अहवा उक्कोसए परि- त्तासंखेज्जए रूवं पक्खित्ते जहण्णयं जुत्तासंखेज्जयं होइ, भावलियावि तत्तिा चेव, तेण परं अजहएणमणुक्कोस- याई ठाणाई जाव उक्कोसयं जुत्तासंखेज्जयं न पावइ । उक्कोसयं जुत्तासंखेज्जयं केवइयं होइ ? जहण्णएणं जुत्तासंखेज्जएणं आवलिया गुणिया अण्णमण्णब्भासो रूवूणो उक्कोसयं जुत्तासंखेज्जयं होइ, अहवा जहएणयं असंखेज्जासंखेज्जयं रूवूणं उक्कोसयं जुत्तासंखेज्जयं होइ । जहएणयं असंखेज्जासंखेजयं केवइयं होइ ? जहण्ण- एणंजुत्तासंखेज्जएणं मावलिया गुणिया अण्णमण्णब्भासो पडिपुण्णो जहरणय असंखेज्जासंखेज्जयं होइ, अहवा उक्कोसए जुत्तासंखेज्जए रूवं पक्खित्तं जहएणयं असंखे- ज्जासंखेज्जयं होइ, तेण परं अजहण्णमणुक्कोसयाई २४० उसे আf का वरि देन प्रचे [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] ठाणाई जाव उक्कोसयं असंखेज्जासंखेजयं ण पावइ । उकोसयं असंखोज्जासंखोजयं केवइयं होइ ? जहएणयं असंखेज्जासंखेज्जयमेत्ताणं रासीणं अण्णमण्णब्भासो रूवू- णो उक्कोसय असंखेज्जासंखेज्जयं होइ, अहवा जहण्णय परित्ताणतयं रूवूणं उक्कोसयं असंखेज्जासंखेज्जय होइ । पदार्थ-(तेण परं) उसके बाद (अजहरणमणुकोसयाई ठाणाई) मध्यम स्थान हैं, (भाव) यावत् (उकोसयं परित्तासंखेज्ज) उत्कृष्ट परीतासंख्येयक (न पावइ) नहीं प्राप्त होता (उकोसयं परित्तासंखेज्जयं केवइयं होइ ?) उत्कृष्ट परीतासंख्येयक कितने प्रमाण में होता है ? (जहएणयं परित्तासंखेज्जयं) जघन्य परीतासंख्येयक को (जहएणयं परित्तासंखेजमे ताणं रासःणं) सिर्फ जघन्य परोतासंख्येयक की राशि से (अण्णमएणब्भासो) परस्पर गुणित कर (रूबूणो) एक रूप न्यून (उक्कोसं परित्त संखेज्जयं होइ,) उत्कृष्ट परीतासंख्ये- यक होता है, (अहवा) अथवा (रूवूर्ण) एक न्यून (जहएणयं जुत्तासंखेजयं) जघन्य युक्ता- संख्येयक (जक्कोसयं परित्तासंखेज्जयं) उत्कृष्ट * परीतासंख्येयक (होइ !) होता है। (जहएणय जुत्तासंखेज्जय) जघन्य युक्तासंख्येयक (केवइयं होइ ?) कितने प्रमाण में होता है ? ( जहएणयपरित्तासंखेज्जयमेत्ताणं रासीणं ) जघन्य परीतासंख्येयक मात्र राशि का (अण्णमएणब्भासो ) उसी को उसी के साथ गुणा करने से (पडिपुराणो) प्रतिपूण (जहएणय जुत्तासंखेज्जयं) जघन्य युक्तासंख्येयक (होइ,) होता है, (अहवा) अथवा (उकोसए परिचासंखेजए) परीतासंख्येयक में (रुवं पक्खित्त) रूप प्रक्षेप करने-जोड़ने से (जहएणयं भुत्तासंखेजयं) जघन्य युक्तासंख्येयक (होइ) होता है, ( प्रावलिश्रावि तत्तिा चेव,) श्रावलिका का प्रमाण भी उतना ही होता है, + (तेण परं) तत्पश्चात् ( अजहरणमणुको- * अर्थात जितने जघन्य परीतासंख्येयक के रूप हो उनको परस्पर गुणा कर उनमें एक न्यून करने से उत्कृष्ट परीतासंख्येयक होता है। जैसेकि-असत्कल्पनया जघन्य परीत राशिके पांच २ रूप पांच २ वार स्थापन कर लिये जायँ ५४५४५४५४५ = ३१२५ पश्चात प्रथम पांच को द्वितीय पांच से गुणा करने पर--५ x ५ = २५ होते हैं । इसी संख्या को तीसरे पांच से गुणा करने पर-२५ x ५ = १२५ होते हैं । इसी प्रकार शेष अंकों को गुणा करने से १२५४५४५ = ३१२५ होते हैं । इन में से यदि एक न्यून कर दिय जाया तो उत्कृष्ट परीत असंख्येयक होता है, जैसे कि--३ १२५--१ - ३१२४ । * जघन्य युक्ता संख्येयक के जितने सरसों लब्ध हो उतने ही भावलिका के समय होते हैं। श रा छि शि पु ।
न्यून ( उक्कोसयं असंखेज्जासंसेज्जय) उत्कृष्ट असंख्येयासंख्येयक (होइ, होता है, (अहवा) [उत्तरार्धम] २४३ सयाई ठाणाई) मध्यम स्थान हैं (जाव) यावत् (उकोसयं) उत्कृष्ट ( जुत्तासंखिज) युक्ता- संख्येयक को (न पावइ ।) नहीं प्राप्त होता। (उक्कोसयं जुत्तासंखेज्जयं) उत्कृष्ट युक्तासंख्येयक (केवइ होइ ?) कितनो होता है ? (जहएणएणं जुत्तासंखेज्जएणं ) जघन्य युक्तासंख्येयक से (आवलिया) आवलिका को (गुणिना अएणमएणब्भासी ) परस्पर गुणा करने से ( रूबूणो ) एक न्यून (उकोसयं जुत्तासंखेजयं) उत्कृष्ट युक्तासंख्येयक (होइ,) होता है । (अहवा जहएणय) अथवा जघन्य ( असंखेज्जासंखेज्जयं) असंख्येयासंख्येयक का (रुवर्ण) एक न्यून (कोसय, उत्कृष्ट (जुत्तासंखेज्जय) युक्तासंख्येयक (होइ ।) होता है। (जहएणयं असंखेज्जासँखेज्जयं जघन्य असंख्येयासंख्येयक (केवइयं होइ ?) कि- तना होता है ? (जहरणएणं जुवासंखेज्जएणं) जघन्य युक्तासंख्येयक के साथ (प्रावलिश्रा) आवलिका की राशि को (गुणिनाअण्णमण्णब्भासो) परस्पर गुणा करने से (पडिपुराणो) परिपूर्ण ( जहएणयं असंखेज्जासंखेज्जयं ) जघन्य असंख्येयासंख्येयक ( होइ, ) होता है, (अहवा) अथवा ( उक्कोसए जुत्तासंखेज्जए) उत्कृष्ट युत्तासंख्येयक में (रूवं पक्खित्त) रूप प्रक्षेप करने-जोड़ने से (जहएणयं असंखेज्जासंखेज्जय) जघन्य असंख्येयासंख्येयक (होइ,) होता है, ( तेण परं ) तत्पश्चात् ( अजहएणमणुकोसयाई ठाणाई) मध्यम स्थान हैं यावत ( उक्कोसयं असंखेज्जासंखेज्जयं) उत्कृष्ट असंख्येयासंख्येयक को (ण पावइ ।) नहीं प्राप्त होता। (उकोसयं असंखेज्जासंखेज्जयं) उत्कृष्ट असंख्येयासंख्येयक (केवइ होइ ?) कित- ना होता है ? ( जहएणयं असंखेज्जासंखेज्जयमेत्ताणं रासीणं ) जघन्य असंख्येयासंख्येयक मात्र राशि को (अण्णमएणभासो) उसी के साथ परस्पर गुणा करने से (रूवूणो) एक -- अथवा (रूवूणं) एक न्यून (जएणयं परित्ताणतयं) जघन्य परीतानन्तक (उक्कोसयं असंखेना- संखेजयं) उत्कृष्ट * असंख्येयासंख्येयक (होइ ।) होता है। अन्ये त्वाचार्या उत्कृष्टमसंख्येयासंख्येयकमन्यथा प्ररूपयन्ति, तथाहि-जघन्यासंख्येया- संख्येयकराशेवंगः क्रियते, तस्यापि वर्गराशेः पुनर्वगों विधीयते, तस्यापि वर्गवर्गराशेः पुनरपि वर्गों निष्पद्यते, एवं च वारत्रयं वर्गे कृतेऽन्ये ऽपि प्रत्येकमसंख्येयस्वरूपा दश राशयस्तत्र प्रक्षिप्यन्ते, ताथा "लोगागासपएसा, धम्माधम्मेगजीवदेसा य । दवटिमा निमोआ, पत्तेया चेव बोद्धव्वा ॥१॥ ठिइबंधझवसाणा, अणुभागा जोगच्छ अपलिभागा ।
२४ में उ [ श्रीमद्नुयोगद्वारसूत्रम् ] -उस के पश्चात् वहां तक अजघन्योत्कृष्टस्थान ही है जहां तक कि परीत असंख्यात नहीं होता। तथा उत्कृष्ट परीत असंख्येयक वह होता है जो जघन्य परीत असंख्येयक को जघन्य परीत असंख्येयक की राशि के साथ परस्पर गुण किया जोय फिर उस में से एक रूप न्यून कर दिया जाय । जैसे कि-५४,५४,५४,५४,५= इस राशि में से प्रथम पांचवें अंक को पाँच के साथ गुणा किया तब २५ हुए, फिर २५ को अगले पांच से गुणा किया तब १२५ हुए, फिर १२५ को ५ से गुणा किया तो ६२५ हुए, फिर ६२५ को ५ से गुणा किया तब ३१२५ हुए, अथवा जघन्य युक्त संख्येयक में से यदि एक रूप न्यून कर दिया जाय तब भो उत्कृष्ट परीत असंख्येयक होता है। तथा-जघन्य युक्त असंख्येयक उसे कहते हैं जो जघन्य युक्त परीत अ- संख्येयक राशि को उसी के साथ अर्थात् परस्पर गुणा किया जाय, अथवा उत्कृष्ट परीत असंख्येयक में यदि एक रूप प्रक्षेप किया जाय तब भी जघन्य प गर Mummera दोण्ह य समाण समया, असंखपक्खेवया दसउ ॥ २॥" इदमुक्त भवति-लोकाकाशस्य यावन्तः प्रदेशास्तथा धर्मास्तिकायस्य अधर्मास्तिकायस्यै- कस्य च जीवस्य यावन्तः प्रदेशाः 'दव्वट्टिा निमोन'रि----सूक्ष्माणी बादराणां चानन्तकायिकवन. स्पतिजीवाना शरीराणीत्यर्थः 'पोया चेव' त्ति, अनन्तकायिकान् वर्जगित्वा शेपाः पृथिव्यप्तेजोवायु वनस्पतित्रसाः प्रत्येकशरीरिणः सर्वेऽपि जीवा इत्यर्थः, ते चासंख्यया भवन्ति, 'ठिइबंधज्झव- साण' शि, स्थितिवन्धस्य कारणभूतानि अध्यवसायस्थानानि तान्यप्यसंख्येयान्येव, तथाहि- ज्ञानावरणस्य जघन्यो ऽन्तमु हर्सप्रमाणः स्थितिबन्धः, स्पृष्टस्तु त्रिंशत्तागरोपमकोटी कोटीप्रमाणः मध्यमपदे त्वेकद्वित्रिचतुरादिसमयाधिकान्तमुहर्तादिको संख्येयभेदः, एषां च स्थितिवन्धानां निर्वत- कानि अध्यवसायस्थानानि प्रत्येकं भिन्नान्येव, एवं च सत्येकस्मिन्नपि ज्ञानावरणे ऽसंख्येयानि स्थितिबन्धाध्यवसायेस्थानानि लभ्यन्ते, एवं दर्शनावरणादिप्वपि वाच्यमिति । 'अणुभाग' त्ति, अभागा:---ज्ञानावरग्णादिकर्मणां जघन्यमध्यमादिभेदभिन्ना रसविशेषाः, एतेषां चानुभागविशेषाणां निवर्तकान्यसंख्येयलोकाकाशप्रदेशप्रमाणान्यध्यवसायस्थानानि भवन्ति, अतोऽनुभागविशेषा अप्येता- वन्त एव द्रष्टव्याःकारणभेदाश्रितत्वात कार्यभेदाना, 'जोगच्छ यपलिभाग' शि, गेगो-मनोवाका- यविषयं वीर्यं तस्य केवलिप्रज्ञाच्छ देन प्रतिविशिष्टा निर्विभागा भागा योगच्छदप्रतिभागाः, ते च निगोदादीनां संक्षिपञ्चेन्द्रियपर्यन्तानां जीवानामश्रिता जघन्यादिभेदभिन्ना असंख्येया मन्तव्याः । 'दुण्ह य समाण समय' चि, द्वयोश्च समयोः--उत्सर्पिण्यवसर्पिणीकालस्वरूपयोः समया असंख्ये- यस्वरूपाः, एवमेते प्रत्येकमसंख्येयस्वरूपाः दश प्रक्षेपाः पूर्वोक्त वारत्रयवगिते राशौ प्रक्षिप्यन्ते, इत्थं च यो राशिपिण्डितः सम्पद्यते स ।
[ उत्तरार्धम् ] २४५ युक्त असंख्येयक होता है, और एक श्रावलिका के समय भी इतने ही प्रमाण में होते हैं। फिर यावत्पर्यन्त उत्कृष्ट स्थानक प्राप्त नहीं हुआ तावत्पर्यन्त मध्यम स्थानक ही होते हैं, और यदि जघन्य युक्त असंख्येयक के साथ एक श्रावलिका के समयों की राशि को परस्पर गुणा किया जाय तब फिर उसमें से एक रूप न्यून करने से जघन्य युक्त असंख्येयक होता है। अथवाजघन्य असंख्येयक संख्येयक में से एक रूप न्यून करदे तब उत्कृ- ष्ट युक्त असंख्येयक होता है, जघन्य युक्त असंख्येयक के साथ श्रावलिका के समयों को परस्पर गुणा किया जाय तब जो प्रतिपूर्ण राशि हो उसे ही जघन्य असंख्येयासंख्येयक कहते हैं, अथवा उत्कृष्ट युक्त असंख्येयक में यदि एक रूप प्रक्षेप करें तब भी जघन्य असंख्येयासंख्येयक ही होता है। तथा-जहां तक उत्कृष्ट असंख्येयासंख्यय न हो वहां तक मध्यम असंख्येयासंख्येयक होता है। यदि जघन्य असंख्येयासंख्येयक की राशि को परस्पर गुणा करके फिर उसमें से एक रूप न्यून कर दिया जाय तब उत्कृष्ट असंख्यासंख्येयक होता है, अथवा जघन्य परीत अनन्त में से यदि एक रूप न्यून कर दिया तब भी उत्कृष्ट असं. ख्येया संख्येयक होता है। तथा-किसी २ श्राचार्य का ऐसा मत है कि--जो असंख्येयक २ राशि है उसी का वर्ग करना , फिर उस वर्ग की जितनी राशि श्रावे उसका भी फिर वर्ग करना, पुनः उस वर्ग की जो राशि आवे उसका भी वर्ग करना । इस तरह तीन वर्ग करके फिर उस वर्ग की राशि में दश असंख्येयक राशि प्रक्षेप करने चाहिये। जैसे कि- "लोगागासपएसा, धम्माधम्मेगजीवदेसा य । दव्ववित्रा निश्रोत्रा, पोत्रा चेव बोद्धव्वा ॥१॥ ठिइबंधज्भवसाणा, अणुभागा जोगच्छेअपलिभांगा। दोण्ह य समाण समया असंखपक्खेवया दस उ॥२॥" लोकाकाश के प्रदेश १, धर्म के प्रदेश २, अधर्म के प्रदेश ३, एक जीव के प्रदेश ४, द्रध्यार्थिक निगोद-सूक्ष्म साधारण वनस्पति के शरीर ५, अन- न्तकाय को छोड़कर शेष प्रत्येक कायिक पांचों जातियों के जीव ६, शानावरणीय श्रादि कर्मों के बन्धन के असंख्येयक अध्यवसायों के स्थानक ७, श्रध्यव. सायों का विशेष उत्पन्न करने वाला असंख्यात लोकाकाश की राशि प्रमाण अनुभाग ८, योग प्रतिभाग ६, और दोनों कालों के समय १०, जब ये दश प्रक्षेप ७ । 400 [श्रीमद्नुयोगद्वारसूत्रम् ] कर दिये जायं तव फिर उस राशि का तीन वार वर्ग करना चाहिये। फिर उन में से एक रूप न्यून करने से उत्कृष्ट असंख्येयासंख्येयक होता है। योग प्रतिभाग उसे कहते हैं जो मन वचन काया के योग हैं। उनका केवली द्वारा कल्पित प्रतिभाग रूप जो एक अंश है उसी को योग प्रतिभाग कहते हैं। स्थिति बन्धन करने वाले अध्यवसाय प्रत्येक २ असंख्येयक होते हैं, इस लिये वे ग्रहण किये गये हैं। इस प्रकार असंख्यातों का वर्णन किया गया। अब अनन्त का स्वरूप प्रतिपादन किया जाता है- । kalpana अनन्त के भेद। जहण्णयं परित्ताणतयं केवइयं होइ? जहणणयं असं- खेजासंखेजयमेत्ताणं रासीणं अण्णमण्णब्भासो पडिपुण्णो जहएणयं परित्ताणतयं होइ, अहवा उक्कोसए असंखेजा. संखेजए रूवं पक्खित्तं जहएणयं परित्ताणतयं होई तेण परं अजहएणमणुक्कोसयाई ठाणाई जाव उक्कोसए परि- त्ताणतयं रह पावइ। उक्कोसयं परिसाणंतयं केवइयं होइ? जहण्णयपरि सागांत्तयमेत्ताणं रासीणं अण्णमण्णब्भासो रूवूणो उक्को- सयं परित्तोणतय होइ. अहवा जहएणय जुत्ताणतय रूवृणं उत्कोसय परित्ताणतय होइ । जहण्णय' जुत्ताणतय केवइयं होइ? जहण्णयपरि- ताणतयमेत्ताणं रासीणं अण्णमण्णब्भासो पडिपुण्णो जहण्णय जुत्ताणतय होइ, अहवा उक्कोसए परिवाणं- तए रूवं पक्खितं जहण्णय जुत्ताणतयं होइ, अभव- सिद्धियावि तत्तिा होइ, तेण परं अजहण्णमणुक्कोसयाई ठाणाई जाव उक्कोसय जुत्ताणतयण पावइ ।
७ [ उत्तरार्धम् ] उक्कोसय जुत्ताणतय केवइय' होइ ? जहण्णएणं जुत्ताणतएणं अभवसिद्धियो गुणिया अण्णमण्णब्भासो रूवूणो उक्कोसय जुत्ताएं तय होइ, अहवा जहरणय अणंताणतयं रूवूण उक्कोसय जुत्ताणं तय होइ,। जहएणय अणंताणतय केवइय होइ ? जहण्णएणं जुत्ताणतएणं अभवसिद्धिया गुणिमा अण्णमण्णब्भासो पडिपुण्णो जहरण्यं अणंताणतय होइ, अहवा उक्कोसए जुत्ताणंतए रूवं पविखतं जहण्णय अणंताणतयं होइ, तेण परं अजहण्णमणुक्कोसयोइं ठाणाइं, से तं गणणा संखा। पदार्थ--( जहएणयं परित्ताणं तय केट इयं होइ ? ) जघन्य परीत अनन्तक कितने प्रमाण में होता है ? (जहएणय) जघन्य (अमर उजार र उजर) असंख्येयासंख्येयक (मेराएं रासीणं) मात्र राशि को (भएणमरण भासो) परस्पर गुणा व.रने से (पडिपुरण) प्रति- पूण (जहएणयं) जघन्य (परित्तार तयं) परीत अनन्तक (झोड,) होता है, (हवा) अथवा (कोसए) उत्कृष्ट (असे जार रजए एवं पवित) असंख्य यासंख्येयक में यदि एक रूप प्रक्षप कर दिया जाय तो भी (जहएए यं) जघन्य (परिमाणंतः) परीत अनन्तक (होइ) होता है, ( तेण परं ) उस के पश्चात् ( अजहरण मणुकीसयाई ठाणाई ) अजघन्योत्कृष्ट ही स्थान है (जाव) यावत् (उकोसयं) उत्कृष्ट ( परिवार तथं ) परीत अनन्तक (ण पावइ ) नहीं प्राप्त होते। ( उक्कोसयं) उत्कृष्ट (परित्ताणतय) परीत अनन्तक (केवाय) कितने प्रमाण में (होइ ?) होता है ? (जहएण्य) जघन्य (परित्ताण्तर मेत्ताणं रासीण) परीत अनन्तक मात्र राशि को ( अण्णमएणभासो ) परस्पर गुणा करके उसका ( रुवूणो) एक रूप न्यून ( उक्कोसयं ) उत्कृष्ट ( परित्ताणतय) परीत अनन्तक (होइ,) होता है, (ग्रहवा) अथवा (जहएणय) जघन्य (जुत्ताणतय) युक्त अनन्तक का (रूबूणं) एक रूप न्यून (उकोसय) उत्कृष्ट (परित्ताणतय) परीत अनन्तक (होइ ।) होता है। (जहएणय) जघन्य (जुत्ताणतय') युक्त अनन्तक (केवइय' होइ ?, कितने प्रमाण में होता है ? (जहएणय') जघन्य ( परित्ताणतय मेत्ताणं रासीणं) अजन परीततक मात्र २४८ [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] राशि को (अण्णमएणभासो) परस्पर अभ्यास करने से (पडिपुराणो) प्रतिपूर्ण (जह एण्य) जघन्य (जुताणतय) युक्त अनन्तक (होइ,) होता है, (अहवा) अथवा (फोसर) उस्कृष्ट (परित्ताणतए) परीत अनन्तक में ( एवं पक्खित्त) एक रूप प्रक्षेप करने से (जहए एय) जघन्य ( जुधाणतय) युक्त अनन्तक (होइ) होता है, तथा (अभवसिहियावि तशिया होड,) अभव्यसिद्धिक जीव भी उतने ही होते हैं, (तेणं परं ) उसके पश्चात् (अजहएणमणुषो- सयाई ठाणा) अजघन्योत्कृष्ट स्थान हैं ( जाव ) यावत् पर्यन्त (कोसय जुत्ताणतय') उत्कृष्ट युक्त अनन्तक को (न पावइ ।) नहीं प्राप्त होता। (कोसयौं जुत्ताणतय) उत्कृष्ट युक्तानन्तक (केवइयं होइ ?) कितने प्रमाण में होता ? ( जहएणएणं जुत्तौणंतरणं ) जघन्य युक्त अनन्तक के साथ ( अभवसिद्धिया गुण्या अण्णमण्णभासो) अभव्य सिद्धिक जीवों की राशि को परस्पर गुणा करनेसे (स्वृणो) एक रूप न्यून (उकोस) उत्कृष्ट (जुत्ताणतयं ) युक्त अनन्तक (होइ,) होता है, (अहवा) अथवा (रूवूण) एक रूप न्यून (जहएणयं) जघन्य (अणंताणतय ) अनन्तानन्तक (उकोसयं) उत्कृष्ट (जुत्ताणतय) युक्त अनन्तक (होइ) होता है। (जहएण्यं ) जघन्य (अणंताणतयं) अनन्तानन्तक (केवइय) कितने प्रमाण में (होइ ?) होता ? (जहरणरणं जुत्ताणतरणं ) जघन्य युक्तानन्तक के साथ (भभवसिहिया गुणिया अण्णमएणभासो) अभव्य सिद्धिक जीवों के प्रमाण को परस्पर गुणा करने से (पडिपुरणो) प्रतिपूर्ण (जहएणयं श्रण ताणत्य) जघन्य अनन्तानन्तक (होइ,) होता है, (अहवा) अथवा (कोसए) उत्कृष्ट (जुत्ताणंतए) युक्त अनन्तक में (ज्वं पक्खित) एक रूप प्रक्षेप करने से (जहएणय) जघन्य (अयंतातय) अनन्तानन्तक (होइ,) होता है, (तेण परं) तत्पश्चात (अजहएणमणुकोसयाई ठाणाई) अजघन्योत्कृष्ट-मध्यम स्थान होते हैं, अर्थात् मध्यम अनन्तानन्तक होते हैं ! (से तं गणणासंखा) यही गणना संख्या है। यद्यपि किसी र आचार्य के मत में अनन्तों के नव ही भेद वर्णन किये गये हैं लेकिन वे सुत्रविहित नहीं है, और सूत्र में जहां कहीं अनन्तों का वर्णन किया गया है वहां पर मध्यम अनन्तों का ही स्वरूप जानना चाहिये। भावार्थ-जघन्य असंख्येयासंख्येयक मात्र राशि को परस्पर गुणा करने से जो प्रतिपूर्ण अंक हो वे जघन्य परीत अनन्तक होते हैं, अथवा उत्कृष्ट असंख्येयासंख्येयक राशि में एक रूप और प्रक्षेप कर दिया जाय तो भी परीत अनन्तक होता है। तथा-जहां तक उत्कृष्ट परीत अनातक नहीं होता यहां तक मध्यम परीत अनन्तक ही रहता है। । उत्कृष्ट परीत अनन्तक को जघन्य परीत अनन्तक राशि के साथ परस्पर [ उत्तरार्धम् ] गुणा करके एक रूप न्यून कर दिया जाय तब उत्कृष्ट परीत अनन्तक होता है, अथवा जघन्य युक्तानन्तक में से यदि एक रूप न्यून कर दें तब भी उत्कृष्ट परीत अनन्तक हो जाता है। तथा जघन्य परीत अनन्तक राशि को उसी के साथ गुणा करें तो प्रतिपूर्ण युक्तानन्तक होता है, अथवा उत्कृष्ट परीत अनन्तक में एक और प्रक्षेप कर दे तो भी जघन्य युक्तानन्तक ही होता है। तथा उतनी ही अभव्य जीवों की राशि जानना चाहिये। तत्पश्चात् जहां तक उत्कृष्ट युक्त अनन्तक नहीं होता वहां तक मध्यम युक्त अनन्तक ही रहता यदि जघन्य युक्त अनन्तों की राशि को अभव्यों की राशि के साथ पर- स्पर गुणा करके उसमें से एक रूप न्यून कर दें तब उत्कृष्ट युक्त अनन्तक होता है, अथवा जघन्य अनन्त अनन्त की राशि में से यदि एक रूप न्यून कर दिया जाय तो भी उत्कृष्ट युक्त अनन्तक होता है। जघन्य युक्त अनन्तक की राशि के साथ अभव्य जीवों की राशि को पर- स्पर गुणा करने से प्रतिपूर्ण जघन्य अनन्तानन्त होता है, अथवा यदि उत्कृष्ट युक्त अनंत की राशि में एक रूप और प्रक्षेप कर दिया जाय तो भी जघन्य अ- नंतानंत होता है, तत्पश्चात् अजधन्योकृष्ट-मध्यम अनन्तानन्त ही होता है, उत्कृष्ट अनंतानंत नहीं होता। इस प्रकार मूल सूत्र से सिद्ध है। लेकिन किसी २ प्राचार्य का मत है कि-जघन्स अनन्तों का तीन वार वर्ग करके फिर उसमें षट् अंक अनंतों के प्रक्षप करने चाहिये। जैसे कि- सिद्धा निगोयजीव, वणस्सई कालपुग्गला चेव । सवमलोगागासं, छप्पेतेऽणंतपक्खेवा ॥ १ ॥ सिद्ध १, निगोद के जीव २, वनस्पति ३, तीनों कालो के समय ४, सर्व पुद्गल ५, और अलोकाकाश ६, ये षट् प्रक्षेप करना चाहिये। फिर सब राशि का तीन वार वर्ग करना चाहिये, तो भी उत्कष्ट अनन्तानन्तक नहीं होता यदि उसमें केवल ज्ञान और केवल दर्शन के पर्याय प्रक्षेप कर दिये जाय तब उत्कृष्ट अनन्तानन्तक हो जाता है। इस प्रकार सब पदार्थों को केवल ज्ञान और केवल दर्शन के अन्तर्गत कर दिया है, कोई भी पदार्थ इससे बाहिर नहीं है। लेकिन सूत्र में उत्कृष्ट अनन्तानन्त प्रतिपादन नहीं किया गया है, वहां पर तो मध्यम अनन्तानन्तक पर्यन्त ही गणन संख्या को पूर्ति कर दी है, यही IND- - २४ ग जघ (पा जघ प्रए [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] गणन संख्या का स्वरूप है। अब इसके आगे भाव सख्या--शंख जाननाचाहिये। भावसंख्या [ख] विषय । से किं तं भावसंखा ? जे इमे जोवा सँखगइनाम- गोत्तई कम्माइं वेदेति ( न्ति ) से तं भावसंखा, से तं संखप्पमाणे से तं भावपमाणे, से तं पमाणे | पमाणेत्ति पयं समत्तं । (सूत्र ११० (से किं तं भावसंवा ?) भाव शंख किसे कहते हैं ? (जे इमे जीवा) जो इस लोकके जीव ( संखगइनामगोत्ताई ) शंख गति नाम गोत्र ( कमाई ) कर्मोदिकों को (वें तिति ) वेदते हैं ( से तं भावसंखा ) उसो को भाव शंख कहते हैं । ( से तं संस्खापमाग ) यही संख्या प्रमाण है, तथा-(से तं भावपनाणे,) यही भाव प्रमाणका वर्णन है (ले तं पनणे :) और यहो प्रमाण है । ( पनाणेशि पयं सम्मतं ।) यहाँ पर हो प्रमाण पद की समाप्ति होगई है। [सू० १५० भावार्थ-जो जीव नीच गोत्र और तिर्यग योनि के भाव में शंख नामक जीव की गति को भोगता हो और उसी के अनुकूल जिसे नामादिक कर्मों को प्रकृतियों का उदय प्राप्त हुआ हो, उसी को भाव शंख कहते हैं। यही संख्या प्रमाण का वर्णन है। इस तरह इस स्थान पर भाव संख्या का वर्णन पूर्ण होते हुये प्रमाण द्वार समाप्त हो जाता है। इसके अनन्तर वक्तब्यता का स्वरूप जानना चाहिये- वक्तव्यता विक्या। एव (उ ( ह गु । - (अ प्रद पर से कि तं वत्तव्वयां ? तिविहा पगणत्ता, तं जहा-स- समयवत्तव्वया परसमयक्त्तव्वया ससमयपरसमयव- त्तव्वया। * यद्यपि 'संख्या' शब्द गणना का भी वाचक है, किन्तु पूर्वमें भला प्रकार से सिद्ध कर चुके हैं कि-प्राकृत भाषा में संख्या शब्द शंख का भी वाचक है, इस लिये यहां पर 'भाव संख्या' शब्द दोन्द्रिय जीव का हो वाचक जानना चाहिये।
, [ उत्तरार्धम् ] से किं तं ससमयवत्तव्वया ? जत्थ णं ससमए आघ. विज पण्णविजइ परूविजइ दलिजइ निदसिज्जइ उवढं- सिज्जइ, से तं ससमयवत्तव्वया। से किं तं परसत्यवत्तव्वया ? जत्थ णं परसमए आघविज्जइ जाव उवटसिज्जइ, से तं परसमयवत्तव्वया। से किं तं ससमयपरसमयवत्तव्वया ? जत्थ ण सस- मए परसमए आपविजइ जाव उवदंसिज्जइ, से तं ससमय परसमयवत्तव्वया इयाणिं को णो कं वत्तव्वयं इच्छइ ? तत्थ नेगमसंगहयवहारा तिविहं वत्तव्वयं इच्छति, तं जहा-सलमयवत्तव्वयं परसमयवत्तव्ययं ससमयपरसमय- वत्तव्वयं । उज्जुसुमो दुविहं वत्तव्वयं इच्छइ, तं जहा-स- समयवत्तव्वयं परसमयवत्तव्वयं । तत्थ णं जा सा ससमय. वत्त व्वया सा ससमय पविट्ठा, जा सा परसमयवत्तव्वया सा परसमयं पविटा । तम्हा दुविहा वत्तव्यया, नस्थि तिविहा वत्तव्यया। तिषिण साणया एगं ससमयवत्तव्वयं इच्छंति, नत्थि परसमयवत्तव्वया कहा ? जम्हा परसमए अणटे अहेऊ असब्भावे अकिरिए उम्मग्गे अणुविएसे मिच्छा- दसणमितिकटु तम्हा सव्वा ससमयवत्तब्धया, नत्थि पर- समयवत्तव्वया, नथि ससमयपरसमयवत्तव्वया, से तं वत्तव्यया । (सू.१५१) पदार्थ-(से किं तं वतब्बया ? ) वक्तव्यता किसे कहते हैं ? और वह कितने प्रकार से प्रतिपादन की गई है ( वत्तव्वया ) अध्ययनादि विषयों के अर्थों का यथा-~ सम्भव विवेचन करना उसे वक्तव्यता कहते हैं,अथवा गाथादिकों को अनुकूलता पूर्वक अर्थ का जो विवेचन है उसे वक्तव्यता कहते हैं और वह (तिविहा पएणत्ता,) तीन प्र- । कार से प्रतिपादन की गई है. (तं जहा- जैसे कि-(ससमयवतव्या वय वक्तव्यता २४ ग ( २५२ [श्रीमद्नुयोगद्वारसूत्रम् ] अर्थात् जिसमें स्वसिद्धान्त का विवेचन हो ( परस प्रयवत्तव्य या ) परसमयवक्तव्यता अर्थात् जिसमें अन्य मतका विवेचन हो और (ससमयपरसम यवराव्यया) स्वसमय परसमय की वक्तव्यता अर्थात् जिसमें स्वसिद्धान्त और परसिद्धान्त दोनों का विवेचन हो । ( से किं तं ससमयवत्तव्यया ? ) स्वसमय वक्तव्यता किसे कहते है ? (ससमयवत- व्वया) स्वसमय वक्तव्यता उसे कहते हैं (जत्य *) जहां पर (ससमए) स्वसिद्धान्त का (आघविजइ ) व्याख्यान किया जाता है, (परणविजइ) प्रतिपादन किया जाता है, परूविजइ) स्वरूप को प्ररूपणा को जाती है, (सिजइ) सामान्य प्रकार से धर्मास्ति काय आदि का निदर्शन किया जाता है, (निदंसिलइ) दृष्टान्त के द्वारा सिद्धि की जाता हैं (वदंसिज्जइ) उपनय के द्वारा उसका स्वरूप निरूपण किया जाता है.(से तं ससमयवत्त. अया।) यहो पूर्वोक्त स्वसमय वक्तव्यता है । (से कि तं परसनयवत्तवया ?) परसमय-परमत वक्तव्यता किसे कहते हैं ? ( ससमयवत्तव्बया ) परसमय की वक्तव्यता उसे कहते हैं (जस्थ णं) जिस में (पासमए) परमत का स्वरूप ( आधविजई) प्रतिपादन किया जाय (जाव) यावत् (वदंलिज्जइ,) निगमन के द्वारा उसका स्वरूप दिखलाया जाय से तं परसमयवत्तबया ।) यही पर- समयवक्तव्यता है। (से किं तं ससमयपरवत्तव्वया ? ) स्वसमय परसमय वक्तव्यता किसे कहते हैं। ( ससमयपरसमयबत्तव्वया ) स्वसमयपरसमयवक्तव्यता उसे कहते जैसे कि-(नत्य णं) जहाँ पर (सप्तमर) स्व समय और (परसमए) परसमय (प्रायविजइ) प्रतिपादन किया जाता है (जाव) यावत् (उबदसिजइ,) निगमन के द्वाग दिखलाया जाता है, (से तं, वही ससमयपरसमयवत्तव्वया । ) स्वसमयपर समयवक्तव्यता है। ( इयाणी ) इस समय को णो कं वत्तव्ययं इच्छइ १) कौन २ नय किस किस वक्तव्यता को मानता है ? तत्थ नेगमसंगहववहारा) उन सातों नयों में से नैगम नय १, संग्रह नय २, और व्यवहार नय ३ (तिविहं वत्तवय) तोनों प्रकार की वक्तव्यता को (इच्छति,) मा. नते हैं, (तं जहा.) जैसे कि--(ससमयवत्तव्वयं) स्वसमय को वक्तव्यता (परसमयवत्तव्वयं) परसमय को वक्तव्यता औ (ससमयपरसमयवत्तव्वयं) स्वसमय परसमय की वक्तव्यता, तथा (इज्जुसुओ) ऋजुसूत्र नय (दुविहं) दो प्रकार की (वत्तव्वयं) वक्तव्यता को (इच्छा,) मातता है, (तं जहा.) जैसे कि- ससमयकव्वयं) स्वसमय की वक्तव्यता और (परसमय वत्तव्वयं) परसमय को वक्तव्यता, (नत णं जा सा) उन वक्तव्यताओं में से जो वह ? * 'ण' मिति वाक्यालङ्कारे,-'ण' वाक्य से अलङ्कार अयं में होता है।
है , [ उत्तरार्धम् ] २५३ (ससमयवत्तब्बया) स्वसमयवक्तव्यता है ( सा ससमय पविट्ठा,) वह स्वसमय प्रविष्ट हो जाती है, अर्थात् प्रथम वक्तव्यता के अन्तर्भूत है, और ( जा सा परसमयबाध्वया ) जो परसमय की वक्तव्यता है (सा परसमय पविट्ठा,) वह परसमय में प्रविष्ट होती है, अर्थात द्वितीय वक्तव्यता के अन्तर्भूत होती है, (तम्हा दुविहा वतव्वया,) इस लिये यह दो प्रकार की वक्तव्यता को ग्रहण करता नत्य तिनिहा क्त्तव्वया) तीनों प्रकार की वक्त- व्यताओं को नहीं। तिरिण) तीनों ( सद्दणय ) शब्द नय ( एगं ससमयं वत्तव्यय) एक स्वसमय वक्तव्यता को ही (इच्छति) मानते हैं, क्योंकि तीनों नय के मत में] (नत्थि परसमयवावया,) परसमय को वक्तव्यता नहीं होती, (कम्हा ?) क्यों ? (जम्हा) इस लिये कि--(परसमय) परसमय का जो कथन है वह ( अण? ) अनथे रूप है, अर्थात् कतिपय वादी आत्मादि पदार्थों की ही नास्ति कहतें है, और ( अहेऊ) अहेतु रूप तथा (असब्भावे) असद्भाव रूप भी है, और (अकिरिए) अक्रिया रूप है और (उम्मग्गे) परसमय उन्मार्ग भी है, (अणुवएते ) अनुपदेश रूप भी है, (मिच्छादंतिणमिति कट्टु,) परसमय मिथ्यारूप है, इस करके; (तम्हा) और इसी लिये (ससमयवतव्वया) स्वसमय की ही वक्तव्यता है, (णत्यि परसमयवतव्वया) परसमय की वक्तव्यता नहीं होती, (से तं वरावया) यही वक्तव्यता है। भावार्थ-अध्ययनादि के विषय-प्रतिनियत अर्थ को वक्तव्यता कहते हैं, इसके तीन भेद हैं, जैसे कि-स्वसमयवक्तव्य ता, परसमयवक्तव्यता और उभय- समयवक्तव्यता। स्वसमय की वक्तव्यता उसे कहते हैं जैसे-पंचास्तिकाय का वर्णन करना और परसमय की वक्तव्यता उसका नाम है जो स्वमत के अतिरिक्त अन्य मतों की व्याख्या करनी और उभय मत की वक्तव्यता वह है, जैसे कि-"श्रागारमाव- संता वा, अरराणा वावि पन्वया । इमं दरसणंमारना सब्बदुक्खा विमुच्चा ॥१॥" इस गाथा का तात्पर्य यह है कि घर में वा अटवी में बसता हुआ अथवा दी- तित होकर हमारे मत को ग्रहण करने वाला दुखों से विमुक्त हो जाता है । इस गाथा का जो अर्थ है वह उसी के मतानुसार हो जाता है । इस लिये यह उभय- समयों की वक्तव्यता है, फिर नैगम १, संग्रह, २ और व्यवहार ३, इन तीनों नयों के मत में तीनों ही वक्तव्यता होती हैं । ऋजुसूत्र नयके मतमें दो वक्तव्यता और तीनों शब्द नयों के मत में केवल स्वसमय की ही वक्तव्यता है। क्योंकि सातों नयों में पूर्व नयों से उत्तर नय विशुद्ध हैं। अब इसके अनन्तर अर्थाधिकार के विषय में कहते हैं- 009 [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] प्राधिकार विषय से किं तं अत्थाहिगारे ? जो जस्स अझयणस्स अस्थाहिगारो, तं जहा- सावज्जजोगविरई, उकित्तण गुणवो य पडिवत्ती । खलियस्त निंदणा वणतिगिच्छ गुणधारणा चेव॥१॥ से तं प्रत्थाहिगारे। (सू० १५२) पदार्थ-(से किं तं प्रत्याहिगारे ? ) अर्थाधिकार किसे कहते हैं ? (अत्याहिगारे) अर्थाधिकार उसे कहते हैं कि-(जो जस्स अज्झ रणस्स) जो जिस अध्ययन को (अन्या हे गारो,) अर्थाधिकार हो, (तं जहा-) जैसे कि-(सावजजोगविरई। सावध योग की निर्वृत्ति रूप प्रथमाध्याय है ( उक्तित्तण) चतुर्विंशित स्तवरूप द्वितीयाध्याय है (गुणवत्रो र पडिवती) गुणघान की प्रतिपत्ति रूप तृतीय वन्दनाध्याय है, (खलियस्स निंदणा) पापोंको आलोचना रूप प्रतिक्रमण चतुर्थ अध्याय है, और (वणतिगिच्छ ) व्रणचिकित्सा रूप-कायोत्सर्स नाम का पांचवां अध्याय है, (गुणधारणा चेव ॥१॥) गुणधारणा रूप प्रत्याख्यान नामक छठा अध्याय है॥ १॥ ( से तं प्राथाहिगारे ।) वही * अर्थी धिकार है । (स० १५२) भावार्थ-अर्थाधिकार उसे कहते हैं जो जिस अध्ययन के अर्थ का अधि कार हो, जैसे कि-श्रावश्यक स्त्र के ६ अध्याय हैं, वे उसी के अर्थाधिकार रूप होते हैं। इसी प्रकार अन्य सूत्रों के विषय में भावार्थ जानना चाहिये। अर्थाधिकार और वक्तव्यता में सिर्फ इतना ही भेद है कि-अर्थाधिकार अध्ययन के आदि पद से प्रारम्भ होकर सब पदों में अनुवर्तता है, जैसे कि- पुद्गलास्तिकाय का प्रत्येक परमाणु मूर्तमान है, और वक्तव्यता यह है, कि जैसे उसी के देशादि का निरूपण करना । (सू० १५२) इसके बाद समवतार का स्वरूप जानना चाहिये-- * विशेष अधिकार प्रथम भाग स० ५८ से जानना चाहिये। समक्तार विषय से कितं समोआरे ? छविहे पण्णत्ते, तं जहा-णाम- समोआरे ठवणासमोआरे दव्वसमोआरे खेत्तसमोआरे - [उत्तरार्धम] कालसमोआरे भावसमोआरे । नामठवणाो पुव्वं ® भणियाओ जाव से तं भवियसरीरदव्वसमोआरे । से किं तं जाणयसरीरभवियसरीरवरित्ते व्वसमो- शारे ? तिविहे पण्णते, तं जहा-आयसमोआरे परसमो- आरे तदुभयसमोयारे, सव्वदब्यावि ण आयसमोआरेणं आयभावे समोअरंति, परसमोआरेणं जहा कुडे बदराणि- तदुभयसमोआरेणं उ.हा घरे खंभो ओयभावे अ, जहा घडे गीवा आयभावे । अहवा जाणयसरीरभवियसरीरवइरित्ते दव्वसमोआरे दुविहे पण्णत्ते, ते जहा-आयसमोआरे अ तदुभयतमो- आरेभ । चउसटिआ आयसमोयारेणं ओयभावे समोयरइ, तदुभयसमोयारेणं बत्तासिाए समोयरइ प्रायभावे अ, बत्तीसिया आयसमोआरेणं आयभावे समोयरइ तदुभयस. मोयारेणं सोलसियाए समोयरइ आयभावे अ, सोलसिया आयसमोयारेणं आयभावे समोयरइ, तदुभयसमोयारेणं अटभ इयाए समोयरइ आयभाडे अ, अट्टभाइया आय- समोआरेणं आयभावे समोयरइ, तदुभयसमोआरेण चउभा इयाए समोअरइ आयभावे अ, चउभाइमा आयसमोआ. रेणं आयभावे समोअरइ, तदुभयसमोसारेणं अद्धमाणीए समोअरइ आयभावे अ, अद्धमाणी आयसमोआरेणं आय- भावे समोअरइ,तदुभयसमोधारेण माणीए समोअरइ आय- भावे असे तं जाणयसरीरभवियसरीरवइ रित्ते दव्वसमो- आरे। सेतं नोआगमओ दव्वसमोधारे, से संदव्यमसोबारे * कचिद 'परिणाम, पाठः । , [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् । पदार्थ-(से किं तं समोसारे ?) समवतार किसे कहते हैं ? (समोआर) वस्तुओं का स्वपर उभय भाव में चिन्तन करना, अर्थात यह वस्तु आत्मभाव, परभाव अथवा उभय भाव में अन्तर्भूत कैसे होती है, उसीको समवतार व हते हैं, और वह छब्बिर पएणत्ते,) षट् प्रकार प्रतिपादन किया गया है, (तं जहः-) जैसे कि--( (नामसमोयारे) नाम समवतार (ठवणासमोआरे ) स्थापना समवतार (दव्यसमोसारे द्रव्य समवतार (खेत्तसमोपारे) क्षेत्र समवतार (लसमोआरे) कोल समवतार और (भावसनीयार) भाव समवतार। (नामठवणाओ) नाम और स्थापना (पुग्धं भणियाओ) पूर्व वर्णन की गई है (जाब) यावत् (से तं भवियसरीरदव्वसमोपारे ।) यही भव्य द्रव्य शरीर समवतार हैं । (से किं तं जाणयसरीरभवियसरीरवरित्ते दबसमोसारे ?) ज्ञशरोर और भव्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्य समवतार किसे कहते हैं ? ( जाणयसरीरभवियसरीरवइरिचे दब्वसमोपारे) ज्ञशरोर-भव्य शरीर-व्यतिरिक्त द्रव्य समवतार (तिविहे पण गात्से,) तीन प्रकार से प्रति. पादन किया गया है, (तं जहा.) जैसे कि-(आयसमोपारे) आत्मसमवतार (परसमोसार) परसमवतार और (तदुभयसमोनारे,) तदुभयसमवतार । (सबब्वाचि गान) सभी द्रव्य (आयसमोआरेग) आत्मसमवतार के विचार से (अायभावे समोअरंति) आत्मभाव अपने ही भाव में समवतीर्ण होते हैं ( परसमोआरेणं) परममवतार के विचार से परभाव में भी रहते हैं, (जहा कुडे बदराणि, ) जैसे कुण्ड में बदरी फल, (तदुमयसमो प्रारण) तदुभय-दोनों समवतार के विचार से ( जहा घरे खंभो प्रायभावे अ) जसे कि-घर में स्तम्भ-खंभा, अतः यह परभाव तथा आत्मभाव दोनों ही में है, और ( जहा) जैसे ( घडे गीवा ) घट में ग्रीवा, जो कि कपालादि के समुदाय में और ( श्रायभावे य) आत्मभाव में भी है। , (अहवा) अथवा (जाणयसरीर) ज्ञशरीर (भवियसरीर) भव्य शरीर (वइरिगे) व्य- तिरिक्त ( दव्वसमोआरे ) द्रव्य समवतार (दुविहे पर पत्ते,) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा.) जैसे कि-(आयसमोआरे अ.) आत्मसमवतार और (तदुभयसमोसारे अ,) तदुभयसम्वतार, ( चरसहिया) चतुःषष्टिकाचार पल प्रमाण ( आयसनोबारेणं) आत्मसमवतार से (प्रायभावे ) अस्मिकभाव में (समोयरइ,) समवतीर्ण होती है, और (तदुभयसमोआरेणं ) तदुभयसमवतार से ( बत्तीसाए ) द्वात्रिंशिका अष्ट पल प्रमाण में ( समोयरइ ) समवतीर्ण होती है ( अायभावे अ,) आत्मभाव में तथा * समवतरणं-वस्तूनां स्वपरोमयेष्वन्तर्भावचिन्तनं समवतारः । + 'अपि' शब्द समुच्चय वाचक तथा 'ण' वाक्य के अलङ्काकारार्थ जानना चाहिये ।
[अन्तरार्धम् ] (बत्तीसिया) द्वात्रिंशिका (अायतमोयारणं) आत्मसमवतार से (प्रायभावे) आत्मभाव में ( समोयरइ,) समवतीर्ण होती है, और (तदुभयसमोयारेणं) तदुभयसमवतार से (सोल- सिपाए ) षोडशिका-१६ पल प्रमाण ( समोयरइ अायभावे अ.) आत्मभाव में समवतीर्ण होती है, फिर (सोलसिया) षोडशिका ( प्रायसमोयारेणं ) आत्मसमवतार से (प्रायभावे) आत्मभाव में (समीयरइ,) समवतीर्ण होती है, और (तदुभयसमोयारेण) तदु. भय समवतार से ( अट्ठभाइयाए) अष्टभागिका (समोधर भायभावे श्र,) आत्ममाव में समवतीर्ण होतो है, फिर (अट्ठभाइया) अष्टभागिका (आयसमो पारेणं) आत्मसमव- तार से ( प्रायभावे ) प्रात्मभाव में (सभोयरइ) समवतीण होता है, लेकिन (तदुभयसमो- पारेणं) तदुभयसमवतार से ( चरभाइयाए) चतुर्भागिका-६४ पल प्रमाण (समोयरइ श्रायभावे अ, ) और आत्मभाव में समवतीर्ण होती है, ( उभाइ या ) चतुर्भागिका (श्रायसमोनारेणं) आत्मसमवतार से (आयभात्र) आरमभाव में (समोयर इ,) समवतोर्ण होती है, और (तदुभयसनीयारेणं) तदुभयसमवतार से (अदमाणीए) अद्ध माणिका- १२८ पल प्रमाण में ( समोयरइ अायावे य, ) और आत्मभाव में समवतीर्ण होती है, ( अडमाणो ) अर्द्ध माणिका (अग्य समोयारेणं) आत्मसमवतार से (आयभावे समोयरइ ) आत्मभाव में समवतोण होती है, (तदुभयसमीयारेण) तदुभयसमवतार से ( माणीए ) माणिका १५६ पल प्रमाण में ( समापरइ प्रायभावे अ,) और आत्मभाव में समवतीर्ण होती है, ( से तं जाणयसरीरभवियसरीरवइरिने व्वसमापारे ।) यही पूर्वोक्त ज्ञशरोर, भव्यशरीर, व्यतिरिक्त द्रव्यसमवतार है, और ( से तं रणोप्रागमो दबसमोयारे । ) यहो नोआगम से द्रव्य समवतार है। तथा (से तं दबसमोयारे !) यही द्रव्यसमवतार है। भावार्थ-किला भी वस्तु का खरूप आत्मभाव, पर भाव में समवतरण हो उसे समवतार कहते है । इसक ६ समवतार, स्थापनासमतार २, द्रव्यसमक्तार ३, समवतार ४, कालस. मवतार ५, और भावसमवतार ६ ! नाम और स्थापना का वर्णन पूर्ववत् जानना चाहिय । शरीर, भव्यशरार और व्यतिारक द्रव्यसमवतार भो तोन प्रकार से वणन किया गया है, जैसे कि सब द्रव्य अपने गुण को अपेक्षा प्रात्मभाव में समवतार्ण होते है, किन्तु व्यवहारनय की अपेक्षा परस्वरूप में भी समवतीर्ण होते हैं, जैसे कि-कुंड में बदरी फल, अथवा घर में स्तम्भ । इस प्रकार उभय स्वरूप में भी समवतीर्ण होते हैं। परन्तु आरमभाव में ऐसे समवतरण होते हैं, अथवा तदुभय जैसा कि नाम । *निश्चय से सभी द्रव्य अपने ही स्वरूप में होते हैं पृथक् कोई नहीं होता, लेकिन व्यव- हार से पृथक् भी होते हैं।
- पएण [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् । जैसे घट में ग्रीवा । यदि ऐसी शंका की जाय कि परलमवतरण तो होती ही नहीं, तो उलका सूत्रकार उत्तर देते हैं कि वास्तव में समवतार दो हो होते हैं,जैले कि-आत्मसमवतार और तदुभयसमवतार । तृतीय पररूप समवतार केवल नाम मात्र ही वर्णन किया गया है। इसी प्रकार द्रव्य की अपेक्षा जैसे चतुःषष्टिका चार पल प्रमाण आत्मा समवतार में भी रहती है और तदुभय समवतार की अपेक्षा द्वा शिका पाठ पल प्रमाण में भी होती है, इसी प्रकार मानी पर्यन्त जानना चाहिये । यही क्ष- शरीर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्यसमवतार नो श्रागम से द्रव्यसमवतार है। यही द्रव्यसमवतार इसके बाद क्षेत्रसमवतार का वर्णन किया जाता है (खेत्तम यावर व्यति ज्ञशा परस (आ. ही क्षेत्रसमवतार। से किं तं खेतसमोआरे ? दुविहे पण्णत्ते, सं जहा- आयसमोआरे अ तदुभयसमोआरे अ, भरहे वासे आय. समोआरेणं आयभावे समोअरइ, तदुभयसमोआरेणं जंबूद दीवे समोयरइ आयभावे अ, जंबूद्दीवे आयसमो. आरेणं आयभावे समोअरइ, तदुभयसमोआरेणं तिरियलोए समाअरइ आयभावे अ,तिरियलोए आयसमोारणं आय- भावे समोअरइ, तदुभयसमोआरेणं लोए समोअरइ, अ, से तं खेत्तसमोआरे त में जै श्रायभावे ति पदार्थ-(से कि तं खेत्तसमीपारे ?) क्षेत्रसमवतार किसे कहते हैं ? (खेत्तसमा पारे) क्षत्र समवतार (दुविहे पण्णत्ते,) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है. (तं जहा.) जैसे कि--(अायसनोआरे अ) आत्मसमवतार और (तदुभयसमोसारे अ) तदुभयसम- वतार (भरहे वास) भारतत्र (आयसमोआरेणं) आत्मसमवतार से प्रायभाव) आत्मभाव में ( समोयरइ, ) समवतीर्ण होता है, और ( तदुभयसमोआरेणं ) तदुभयसमवतार से * इत्तः 'लोए आयसमोबारेणं प्रायभावे समोयरइ, तदुभयसमोआरेणं अलोए समीयरह भायभावे ' इत्यधिकं कचित् ।
[उत्तरार्धम] (जंबुद्दीवे) जम्बूद्वीप में (समायरइ आयभावे अ) और आत्मभाव में समवतीर्ण होता है, (जंबुद्दीवे) जम्बूद्वीप ( अन्यतमोप्रारेणं ) आत्मसमवतार से (प्रायभावे) आत्मभाव में (समोयरइ,) समवतीर्ण होता है, और (तदुभयसभोपारेण) तदुभयसमवतार से तिरिय- लोए) तिर्यक् लोक ( समोयरइ प्रायभावे अ,) और प्रात्मभाव में समवतीर्ण होता है, (तिरिअलोए) तिर्यक् लोक में (आयसमोपारेण) आत्मसमवतार से (प्रायभावे) आत्मभाव में (सनीयरइ) समवतीर्ण होता है, और (तदुभयसमो पारेणं तदुभयसमवतार से (लीए) लोक में (सनीअरइ आयभावे अ,) और अात्मभाव में भो समवतार्ण होता है, (से तं खेत्त- समोसारे ।) यहो क्षेत्रसमवतार है। भावार्थ- क्षेत्रसमवतार उसे कहते हैं जो लघु क्षेत्र का प्रमाण बृहत्क्षेत्र समवतीर्ण किया जाय । इसके दो भेद है-आत्मसमवतार और तदुभयसम- वतार । श्रात्मलमवतार उसे कहते जो अपने ही स्वरूप में हो, जैले कि भारतवर्ष आत्मसमवतार से श्रात्मभाव में अर्थात् अपने ही क्षेत्र में समवतीर्ण ENIONLINATANA होता है। तथा तदुभयसमवतार उसे कहते हैं जो आत्म स्वरूप और पर स्वरूप दोनों में हो, जैसे कि-भारतवर्ष, तदुभयसमवतार से जम्बूद्वीप में समवतीर्ण होता है और श्रात्मभाव में भी इसी प्रकार अलोक पर्यन्त जानना चाहिये । यही क्षेत्र समवतार है। इसके बाद अब कालसमवतार का वर्णन किया जाता है. से कितं कालसमोआरे ? दुविहे पण्णते. तं जहा- आयसमोआरे अ तदुभयसमोआरे अ, समए आयसमो- आरेणं आयभावे समोअरइ, तदुभयसमोआरेणं प्रवि. लि पाए समोयरइ आयभावे अ, एवमाणापाणू थोवे लवे मुहत्त अहोरत्ते पक्वे मासे ऊऊ अयणे संवच्छरे जुगे वाससए वाससहस्से वाससयसहस्सं पुव्वंगे पुवं तुडि- अंगे तुडिए अडंगे अडडे अववंगे अश्वे हुहुअंगे हुहुए उप्पलंगे उप्पले पउमंगे पउमे णलिणंगे णलिणे अच्छनि- २६० उभर पराए नाम (खेत्त सम याव 1. पान [ श्रीमदनुयोगटारसूत्रम] उरंगे अच्छनिउरे अउअंगे अउए नउअंगे नउए पउअंगे पउए चूलिअंगे चूलिया सीसपहनिअंगे सीसपहेलिया पलिमोवमे सागरोवमे आयसमोआरेणं आयभावे समो. यरइ, तदुभयसमोआरेण ओसपिणी उस्सप्पिणीसु समा- यरइ आयभावे अ, ओस प्पिणीउस्सप्पिणीको आयसमो. आरेणं आयभावे समोयरइ, तदुभयसमोआरेणं पोग्गल- परिमटे समोयरइ आयभावे अ, पोग्गलपरिश्र आयसमो- आरेणं आयभावे समोयरइ, तदुभय समोआरेणं तोतद्धा- अणागतद्धासु समोयरइ प्रायभावे अ, तोतद्धामणागत- द्धाउ यसमोआरेगां पायभावे समोयरइ, तदुभयसमो आरेणं सव्वद्धाए समोयरइ आयभावे अ। सेरा काज- समोसारे। पदार्थ--से किं तं कालसमोआरे ? ) कालसमवतार किसे कहते हैं ? (कालसमो- आहे) अतिसूक्ष्म समय का वृहत समय में अवतरण करना-इसी का नाम काल समवतार है । और वह ( दुविहे पण्णत्ते, दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है (तं जहा.) जैसे कि-(प्राथसमोसारे अ) आत्मसमवतार और (दुभयसमोआरे अ) तदु भय. समवतार, (समए आयसमोआरेणं समय आत्मसमवतार से (अायभावे) आत्मभाव में (समोयरइ,) समवतीर्ण होता है, और (तदुभएसमोकारेरण) तदुभयसमवतार से (आलि. आए) श्रावलिका में ( समोयरइ अायभावे अ) और आत्मभाव में समवतीर्ण होता है, ( एवमाणा पाण थोवे लवे मुहुत्ते अहोरत्ते पक्खे मासे) इसी प्रकार आन, प्राण, स्तोक, लव, मुहूर्त, अहोरात्र, पक्ष, मास (ऊज) ऋतु (अयणे) अयन (संवच्छरे) सम्वत्सर (जुगे) युग (वाससए) सौ वर्ष (वाससहरस) हजार वर्ष (वाससयसहम्से) लाख वर्ष (पुवंगे) पूर्वाङ्ग (पुठवे) पूर्व (तुडिअंगे) त्रुटितोङ्ग (डिए) त्रुटित (अडगे) अडडाङ्ग (अडडे) अडड (भववंगे) अववाङ्ग (अववे) अवव (हरभंगे) हुहुअङ्ग (हुहुए) हुहु (उप्पलंगे) उत्पलाङ्ग (उप्पले) उत्पल (पउमंगे) पद्माङ्ग (पल्मे) पद्म (लिणंगे) नलिनांग (गलिणे) नलिन अच्छ- निउरगे) अक्षनिकुराङ्ग (अच्छनिः२) अक्षनिकुर (अरअंग) अयुताङ्ग (अप) अयुत नअंगे) +इन सब का विशेष वर्णन इसी भाग के पृ०६२-६४ से जानना चाहिये । (अ में ता -- , से [ उत्तरार्धम् ] २६१ नयुताङ्ग (नउए) नयुत (पउअंगे) प्रयुताङ्ग (पडए) प्रयुत (चुलिअंगे) चूलिकाङ्ग (चूलिया) चूलिका ( सीसपहें लअंगे ) शीप्रिहेलिकाङ्ग (सीसपहलिना ) शीर्षप्रहेलिया (पलिअोवमे सागरोवमे) पल्योपम सागरोपम (आयसमोसारेणं) आत्मसमवतार से (प्रायभावे) आत्म- भाव में (समोयरइ,) समवतीर्ण होता है, और ( तदु भयसमोसारेणं ) तदुभयसमरतार (ोसप्पिणी स्लरिएणीस) अवसर्मिणो उत्सर्पिणी में (समोयरइ मायभावे अ) और आत्म भाव में समवतीर्ण होता है (ोसटिपणी उस्स टिपणोश्रो ) अवसर्पिणी उत्सर्पिणी (प्राय समोग्रारेणं) अत्मसमवतार से (आयभावे) आत्मभाव में (समोयग्इ,) समवतीर्ण होता है और (तदुभयप्तमोप्रारेणं) तदुभयसमवतार से (पोग्गलपरिअ) पुद्गलपरावर्त में (समोयरइ श्रायभावे अ) और आत्मभाव में समवतीर्ण होता है, (पोगनपरिअ) पुद्गलपरावर्त (आयसमो पारेण) आत्मसमवतार से (प्रायभावे) आत्मभाव में (समोयाइ,) समवतीर्ण होता है और ( तदुभयसमो पारेणं) तदुभयसमवतार से (नीतहाअगागतहार) अतीत और भविष्यत काल में ( समोथरइ प्रायभावे अ,) और आत्मभाव में समवतीर्ण होता है, (तीतद्वाश्रणागतद्वाउ अायतमोबारेणं ) अतीत और भविष्यकाल आत्मससवतार से (आयभावे) आत्मभाव में (सामोयरइ) समवतीर्ण होता है और (तदुयभसमोआरेणं) तदु- भयसमवतार से (सबढाए) सभी काल में (समोयरइ अायभावे अ।) और आत्मभाव में समवतीर्ण होता है । (से से कालसमोसारे ।) यही कालसमवतार है भावार्थ-न्यून से न्यून समय का सभी काल में समवतरण करना उसे काल समवतार कहते हैं । इसके दो भेद है-प्रात्मसमवतार और तदुभयसमव- तार । आत्मसमवतार उसे कहते हैं जो अपने ही भाव में हो, जैसे कि -- 'श्रोन' आत्मसमवतार से अपने ही रूपमें समवतीर्ण होता है । तथा तदुभयसमवतार से कहते हैं जो परस्वरूप और प्रात्मभाव, दोनों में हो, जैसे--'आन' तदुभय- समवतार से आत्मभाव में भी है और परस्वरूप से 'प्राण' में भा समवतीर्ण होता है। इसी प्रकार सब काल का स्वरूप जानना चाहिये । इसी को काल. समवतार कहते हैं। अब भावसमवतार का वर्णन किया जाता है- । Suman से तिं भावसमोसारे? दुविहे पण्णत्ते, तं जहा- आयसमोआरे अ तदुभयसमोआरे अ। कोहे आयसमो- आरेणं आयभावे समोअरइ, तदुभयसमोआरेणं माणो उ (तदुभयप्तमोआरेणं) तदुभयसमवतार से (अब्धि भावे) क्षायोपशमिकादि छह प्रकार के २६२ [श्रीमदनुयोगबारसूत्रम् ] समोयरइ प्रायभावे अ, एवं माणे माया लोभे रागे मो- हणिज्जे अट्टकम्मपयडीओ आयसमोआरेणं आयभावे समोयरइ, तदुभयसमोआरेणं छविहे भावे समोयरइ प्रा- यभावे अ, एवं छविहे भावे, जीवे जोवस्थिकाए आय- समोसारेणं प्रायभावे समोयरइ, तदुभयस मोआरेणं सव्वदव्वेसुसमोअरइ मायभावे । एत्थ मंगणीगाहा-- कोहे माणे माया, लोभे रागे य मोहणिज्जे अ पगडीभावे जोवे, जीवस्थिकाय दव्वा य ||१|| से तं भावसमोपारे । से तं समोआरे । सेतं उव. कमे | उकाम इति पठम दारं (सू. १५३) पदार्थ ( से किं तं भावसमीनारे ? ) भावसमवतार किसे कहते हैं ? (भावसमी- पारे) भावसमवतार (दुविहे पएणते,) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा.) जैसे कि-(आयसमोआरे अ) आत्मसमवतार और (तदुभयसमोसारे अ,) तदुभयसमव- तार (कोहे ) क्रोध (आयसमोसारेणं ) आत्मसमवतार से ( प्रायभावे) आत्मभाव में (समोयरइ) समवतीर्ण होता है, और (तदुभयसमाबारेणं) तदुभयसमवत्तार से (मागी) मान में ( समोयरइ आयाभावे अ,) और आत्मभाव में समवतोर्ण होता है (एव) इसी प्रकार (माणे माया लोभे रागे ) मान, माया लोभ, गग को जानना चाहिये, तथा--- (गोहणिज्ने अटक मपयड ओ ) मोहनीय कर्म की आठ कर्म प्रकृतियें (प्रायस मोगारेणं) आत्मसमवतार से (प्रायभावे) आत्मभाव में (समोयरइ.) समवतीर्ण होती हैं. और na भाव में (समोयरइ प्रायभावे अ,) और आत्मभाव में समवतोर्ण होती है (एवं छविहे भावे,) इसी तरह छह प्रकार के भाव जानने चाहिये, (जीवे) जीव (जीवस्थिकाए) जीवा- स्तिकाय ' आयसमोआरेणं) आरमसमवतार से (प्रायभावे ) आत्मभाव में (समोयरड,) समवतीर्ण होती है, और (तदुभयसनोबारेणं) तदुभयसमवतार से (सबदधे समाना श्रायभावे अ) सब द्रव्य और आत्मभाव में समवतीर्ण होतो हैं, (एत्य संगहणीगाहा-) यहां पर एक संग्रह गोथा भी है- + जिन अधिकारों का संग्रह कर के गाथा रूप में संक्षेप से वर्णन किया जाता है उसे । | उत्तरार्धम् ] ( कोहे माणे माया, लोभे रागे व मोहणिज्ज अपगडीभावे जीवे, जीवस्थिकाय दवा य ॥१॥) क्रोध, मान, माया, लोभ, राग और मोहनोय कर्म, प्रकृतियें, भाव, जोव, जीवास्तिकाय और द्रव्य, ये सभी श्रात्मसमवतार से अपने ही स्वरूप में रहते हैं और तदुभयसमवतार से परस्वरूप में भी होते हैं । (से तं भावसमोपारे । ) यही भावसमवतार है । (से तं समोारे) यही समवतार है । ( से तं उवक्रमे ।) यही उपक्रम । (उबकम इति पदम दारं ।) उपक्रम नामक प्रथम द्वार समाप्त हुआ। (सू. १५२) भावार्थ-भावसमवतार के दो भेद है, आत्मसमवतार और तदुभयसमव. तार आत्मसमवतार उसे कहते हैं जो अपने ही स्वरूप में हो, जैसे कि-'क्रोध' आत्मसमवतार के अपने ही स्वरूप में समवतीर्ण होता है। तथा तदुभयसमवतार उसे कहते हैं जो स्वरूप और पररूप दोनों में । जैसे कि--'क्रोध' तदुभयसमवतार ले आत्मभाव में भी है और पर स्वरूप से मानमें समवतीर्ण होता है । इसी प्रकार जीवास्तिकाय आदि सभी द्रव्यों को जानना चाहिये। "अत्र च प्रस्तुत आवश्यके विचार्यमाणे सामायिकाअध्ययनमपि क्षायापश- मिकभावरूपत्वात् पूर्वोक्तेष्वानुपूर्यादिभेदेषु क्व समवतरतीति निरूपणीयमेव, शास्त्र कारप्रवृत्तेरन्यत्र तथैव दर्शनात, तच्च सुखावलेयत्वादिकारणात् सूत्रे न निखापतम् साधयोगत्वात्स्थानशून्यत्वार्थ किंचिद्वयमेव निरूपयामः । तत्र सामा यिक चतुर्विंशतिस्तव इत्याद्यत् तिनविषय वात् सामायिकाद्यध्ययनमुत्कीर्तना- नुपूयीं समवतरति, तथा गणनापूयां च, तथाहि-पूानुपा गण्यमान मिदं प्रथम; पश्चानुपूया तु षष्ठम्, अनानुपूब्बी तु द्वयादिस्थानवृत्तित्वादीन यतमिति प्रागेवोक्तम् । नाम्नि च औदयिकादिभावभेदात्षण्णामपि प्रागुक्तमु, तत्र सामायिकाध्ययनं श्रुताशनरूपत्वेन बायोपशामिकभाबबृत्तित्वात्सायापश- मिकभावनाम्नि समवतरति । आह च भाष्यकार:-- "छव्विहनामे भावे, खोवसमिए सुय समोयरइ। जं सुयनाणावरण खोवसमियं तयं सव्वं ॥१॥ प्रमाणे च द्रव्यादिभेदैः प्राग्निीते जीवभावरूपत्वाद्भावप्रमाणे इदं समव- तरतीति । उक्तञ्च- 'दन्वाइचउन्भेयं, पमीयए जेण तं पमाणंति । इणमज्झयणं भावोत्ति भाव माणे समोयरइ ।। .
[ श्रीमदतुयोगद्वारसुत्रम् ] भावप्रमाणं च गणनयसंख्याभेदतस्त्रिया प्रोक्तं । तत्रास्य गुरण सन या प्रमा- ण्योरेवावतारो, नयप्रमाणे तु यद्यपि- "आसज्ज 3 सोयारं, नए नयविसार ओ बया" इत्यादिवचनात् क्वचिन्नय समवतार उक्तः, तथापि साम्प्रतं तथाविधनव- विचाराभावाद्वस्तुवृत्त्याऽ अवतार एक, यत इदमप्यक्तम् । "मूढनइयं सुयं कालियं तु न नया समोयरति इह" इत्यादि । महामातेना- ऽप्युक्तम् 'मूढनइयं तु न संपई नयप्यमाणावारी से ति, गणप्रमाणमपि जीवाजीवगुणभेदता द्विधा प्रोक्तं तत्रास्य जीवोपयोगरूपत्वा नावाप्रमाणे समवरः, तस्मिन्नपि ज्ञानदर्शनचारित्रभेदतस्त्रयात्मके अस्य ज्ञान रूपतया ज्ञानरूप्रमाणेऽवतारः । तत्रापि प्रत्यक्षानुमानोपमानागमभेदाच्चतुर्विध प्रकृता- ध्ययनस्याप्तोपदशरूपतया आगमेऽन्तर्भावः, तस्मिन्नपि लांकिकोकोत्तरेभदभिन्न परमगुरुप्रणीतत्वेन लोकोत्तरित तत्रावि आत्मागमानन्तरागम परंपरागमभेद स्त्रि- विधेऽप्यस्य समवतारः, संख्याप्रमाणेऽपि नामादिभेदमिन्ने प्रागुक्ते पारमाण- संख्यायामस्यावतारः, वक्तव्यतायामपि स्वसमयवक्तव्यतायामिदमवतरति, यत्रापि परभयसमयवर्णनं क्रियते तत्रापि निश्चयतया स्वसमयवक्तव्यतव ।' अर्थात् यद्यपि उपक्रम द्वारमै शास्त्रकार की प्रवृत्ति सामायिकादि षट् अ. भ्यायोंके समवतार के विष 4 में है तथापि सुगमता के कारण सूत्रकार ने उनका वर्णन नहीं किया, अतः वृत्तिकार स्थान शून्य रहने से स्वयं इसका किंचिन्मात्र वणन करते हैं- सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव इत्यादि उत्कीर्तन के विषय होने से उत्की. तनानुपूर्वीय में समवतीर्ण होते हैं । इसी प्रकार गणनानुपूर्वी जानना चाहिये । क्योंकि गणन विषय होने से पूर्व्यानुपूर्वी या पश्चानुपूवा होती है । तथा-प्रौद- यिकादि भावों की अपेक्षा सामायिकाध्ययन श्रतचान रूप होने से क्षायोपश- मिकादि षट् प्रकार के भाव में समवतीर्ण हाता है । पूर्वोक्त द्रव्यादि भेदतया प्रमाण द्वार की अपेक्षा जीव भाव रूप होने से सामायिकाध्ययन भाव प्रमाण +आगम में भी कहा है "दव्वाइचउम्भेणे, पमीयए जेण तं पमाणति । इणमझयणं भावोत्ति (प) माणे समोय ॥ १॥" द्रव्यादिचतुर्भेद, प्रमीयते येन तत्प्रमाणमिति । WATEST Hra ति भावमा FIRETRom
Came
।
[ उत्तराधम् ]
२६
में समवतीर्ण होता है क्योंकि जीव भावप्रमाण में ग्रहण किया गया है। तथा--
भावप्रमाण के गुण, नय और संख्या यो तीन भेद होनेले गुण और संख्या प्रमाण
में समवतीर्ण होता है । यद्यपि नयविचार की अपेक्षा परमार्थ ले क्वचित् समत्र.
तार होता है, लेकिन उसी प्रकार नवविवार के प्रभाव से अनवतार ही
होता है। तथा गुण प्रमाण के दो भेद होने से इसका जीव गुण प्रमाण में सम-
वतीर्ण होता है, तथा इसके ज्ञान, दर्शन और चारित्र, यो तीन भेद होने से ज्ञान
प्रमाण में समवतीर्ण होता है। फिर प्रत्यक्षादि शानगुण के चार भेद होने से यह
अध्याय आत्मोपदेश रूप भागमा प्रमाण में समवतीर्ण होता है। पश्चात् आगम
के दो भेद होने से इसका लोकोत्तरिक ओगम में समवतार होता है। तथा लो-
कोत्तरिक आगम के तीन भेद अात्मागम, अनन्तरागम और परम्परागम होने से
इसका तीनों ही में समवर्तीर्ण होता है, और संख्या प्रमाण के आउ भेद होने से
इसका परिमाण संख्या में समवतीर्ण होता है, तथा तीन वकन्यताओं में से
स्व समय की वक्तव्यता में इसका समवतीर्ण होता है । यद्यपि उभय समय की
वक्तव्यताओं में से स्वलमय की वक्तव्यता में भी समवतीर्ण होता है लेकिन
निश्चय से स्वसमय को वक्तव्यतो ही जानना चाहिये । क्योंकि सम्यग्दृष्टि
परलमा और उभय समय की वकव्यताको व्याख्यान के समय स्वसमय को
कर लेते हैं। कारण कि वे एकान्तबादी नहीं होते, अनेकान्ती होते हैं । इसलिये
परमार्थ से सभी अध्ययन स्वलमय की वक्तव्यता में समवतीर्ण होते हैं ।
इसी प्रकार चतुर्विशति त्तवादिकों का जाननी । इल तरह समवतार का वर्णन
करते हुए उपक्रम नामक प्रथम द्वारसमाप्त हुआ।
: आगम में भी कहा है--
'ग्रासज्ज इ सीयारं, नए नयविसारो बूया।'
[आसाद्य तु श्रोतारं नया नयविशारदो व यान]
महामतिनाप्युक्तम्-
• "भृढनइयं सुयं कालियं तु न नया समोयरति इह ।
मूदनयं तु न संपई नबप्पमाणावनारी से।"
[मूठनयिकं श्रुतं कालिकं तु न नया समवतरन्तीह ।
मूढनयं तु न संप्रति नयप्रमाणावतारस्तस्य ।।
* श्रागम में भी कहा है-
"परसमयी उभयं वा, सम्मधि हिस्स ससमो जेणं ।
तो सबभयगाई, ससमयवत्तवनिमयाई ॥१॥
परसमयं उभयं वा सम्पन्हाटः स्वसमयो येन ।
ततः सागराध्यापनाले जलमयरत्तव्यनियतानि ॥२॥
२६६ [ ओमनुयोगद्वारसूत्रन] इसके बाद निक्षपद्वार नामक तृतीय अयोगहार का स्वरूप जानना चाहिये- ARRESTIONER भा एयोरेवा विचारा ऽप्युक्त जीवाज समत्र जानरू ध्ययन परम विधेs संख्य परभ MAP निक्षेप द्वार से किरा निक्वेवे ? तिविहे पणते, ते जहा-ओह- निष्फरणे नामनिप्फरणे सुत्तालावगणिकरणे । से कि त ओहनि फरणे ? चउबिहे पण्णत्ते. ते जहा-अझयणे अझोणे आए खवणा। से कितअज्झयणे? च उठिवहे पण्णत्ते त जहा- णामज्झयणे, ठवण कयणे दवझयणे भावज्झयणे, णा. मटवणाश्रो पुवं वरिणाओ। से किं तदव्यज्झयणे ? दुबिहे पण्णन्ते, त' जहा- आगमो अणोप्रागमो अ। से कि त आगमो दवझवणे ? जस्स णं अ- ज्झयणेति पदं सिक्खत ठित जित मित परिजित जाव एवं जावइया अणुवउत्ता आगमओ तावइयाई दवझ- यणाई, एवमेव ववहारस्सवि संगहस्स णं एगो वा अण. गो वा जाव, से तं आगमओ दव्यज्झयणे । से कितणोआगमओ व्यझियणे ? तिविहे प- एणते, तं जहा-जाणगसरीरदव्यज्झयणे भवियसरीरदव्व- ज्झयणे जाणगसरोंरभवियसरोरवइरित्ते वज्झयणे । से कि तं जाणगसरीर इव्वज्झयणे ? अझयणपय- स्थाहिगारजाणयस्स जं सरीरं ववगयच्यचावियवत्तदेह ध्याय वर्णन वार तना क्यों यिक उत्तरार्ध जीवविष्पजडं जाव अहो हां इमेणं सीरसमुस्तएणं जिण- दिटेणं भावे अझयणेत्तिपयं आधविसं जाव उवसितं, जहा को दिळंतो ? अयं घपसे आसो अयं महुकुंभे पासो, से वं जाण गसरीरदब्वभपणे । से कितं भवियसरीरदव्वझयणे? जे जीवे जोणि- जम्मणनिकलते इमेणं चेव आदत्तपणं सरीरसमुस्सएणं जिणदिट्टेणं भावेणं अजयणे त्तपयं सेअकाले सिक्खि- स्सइ न ताव सिक्खइ, जहा को दिळंतो ? अयं महु- कुभे भविस्लइ, अयं घयभे भविस्साह से भविय- सरीर दवज्करणे । से कितं जाणगसरीरभवियसरीरबहरिते दवझर- यो पत्त पोत्ययलिहिर्य, सेतं जाणगसरीरभवियसरीर- वइरिते दवझयणे, सेत' णोप्रागनमो दवझयणे, से तवज्झयणे। से कि त भावज्झयणे ? दुविहे पण्णत्ते, त जहा- आगमओ अणोआगमो अ। से किंत आगमओ भावज्झयणे ? जाए उवउत्ते, से तं आगमो भावज्भायणे। से कितनोआगमओ भावःभयणे? अ.झप्पस्साणयणं, कम्नाणं अवचओ उवचिआणं। अणुवचओ अ नवाणं, तम्हा अभयणमिच्छति । से तोगमओ भावज्झयणे । सेत भावज्झ- यणे। सेत अझयणे।
२६४ विन SE जी श्रीसदनुयोगद्वारसत्रमा पदार्थ--- से किं तं निकले ? ) निक्षेप किसे कहते हैं ? (क) जिन पदार्थ का स्वरूप निक्षेप द्वारा वर्णन किया जाय उसे लिप कहते हैं. को अविर परणते,) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तहा) जैसे कि - निर) ओघनिष्पन्न (नामनिष्फएरणे) नामनिष्पन्न और (कुता कामानिकारक । सबाला र (से किं तं श्रीहणिकरण ? ) ओघनिष्पन्न किसे कहते है ? यो हो दाग) जो सामान्यतया अध्ययनादि श्रुत के नाम से निष्पन्न हुए ही उसे ओनिष्पन्न निक्षप कहते हैं, और वह ( चउबिहे पणते, ) चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (न जहा-) जैसे कि-(अज्झयणे ) अध्ययन (*अझी ग) अनीय अगआय . लाभ: (खत्रण) क्षपणा। (से कि तं अज्झयणे ? ) अध्ययन किसको कहते है ? (अभया) अध्ययन चविहे पएणत्ते,) चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा) जैसे कि (णामज्झयणे) नामाध्ययन (ठवणझयणे) स्थापनाऽध्ययन ( इयो) ध्याध्ययन (भावझयणे ।) भावाध्ययन ।। णामट्ठवणाओ ) नाम और स्थापना (पुर्व वरियानो, ) पूर्व वर्णन की गई हैं। (से किं तं दवझयणे ? ) द्रव्याध्ययन किसको कहते हैं. ? (मवर) द्रव्या ध्ययन (दुविहे पएणत्ते,) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, जहा- जैसे कि- (आगमत्रो अ) आगम से और (सोनागमओ अ) नोआगम से! (से किं तं प्रागमो दवझयणे ?) आगम से द्रव्याध्ययन किसे कहते हैं ? ( भागमश्रो दव्वज्झयणे ) आगम से द्रव्याध्ययन उसे कहते हैं कि- ( जान गई ) जिसने (अज्झयणत्ति पर्य) अध्ययन रूप पद को ( सिविखर) आदि से अन्त तक सोख लिया हो (ठितं) हृदय में अवश्मरण रूप स्थिर कर लिया हो (जितं ) प्रवृत्त करते हुए MAIN वि सः पा त *"अक्षीणशब्दस्य क्ष: खः क्वचित् छझो” प्रा० ऋ० ८ पासुः ३ । इत्यनेन क्षस्य खो भवति कचित् छझावपि । +ये चारों नाम सामायिकादि चतुर्विशतिस्तवविशेषों के हैं । विशेष वर्णन आगे दिया गया है। । * श्रादित आरभ्य पठनक्रियया यावदन्तं नीतं तच्छिक्षितमुच्यते । स्थितं---अविस्मरण- श्चेतप्ति स्थितं स्थितस्त्रात स्थितमप्रच्युतमित्यर्थः । जितं-परावर्तनं कुर्वता परेण वा करिष्टस्य यच्छा प्रगगच्छति तजितम् । विज्ञातश्लोकपदवर्णादिसंख्या मितम् परिजितम-परि समन्तात्सर्वप्रका- जितं परिजितं परावर्तनं कुर्वतो यन्त्रमेणोत्नमेण वा समागच्छति । अनुपयुक्त होनेसे द्रव्याध्ययन एक ही होता है।
उत्तरार्धम् ] कोई पूछ तो शीघ्र उत्तर देता हो । मतं ) श्लोक और पदादि वर्गों की संख्या भी जान ली हो ( परिजिल जाब ) यावत् अननुक्रम से पठ भी लिया हो, ( एवं ) इसी प्रकार (जाप या ) जिसने { ऋणु उमा भागमको ) आगम से अनुपयोग युक्त पुरुष हैं तावश्याई दबायणाई 1) उतने ही द्रव्याध्ययन होते हैं। ( एवमेव बवहारस्सवि, ) इसी प्रकार व्यवहार नय का भी मत है, (संगहस्स हा संग्रह नय के मत से (एगो वा अरोगो वा जाव)एक या अनेक यावत् (से सं वागमत्रो दबझायणे ।) यही आगमसे व्याध्ययन (ले किं तं नोभागमो इव्वजयणे ?) नोआगम से द्रव्याध्ययन किसे कहते हैं ? (नो नागमो दवझयणे) नोभागम से जो अध्ययन क्रियायुक्त पठन-पाठन किया जाता है उसे नोआगम से द्रव्याध्ययन कहते हैं, और वह (तिविहे पणते,) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा-) जैसे कि-( जाणगसरीरवज्रणे) ज्ञशरीर द्रव्याध्ययन ( भवियसरीरदबझयणे ) भव्यशरीर द्रव्याध्ययन और ( जाणगसरीर. भवियसरीरबारित दव्य ज्यणे) ज्ञशरीर-भव्यशरोर-व्यतिरिक्त द्रव्याध्ययन । ( से किं तं जाणगसरीरदव्यभायणे ?) ज्ञशरीर द्रव्याध्ययन किसे कहते ? (जाणासरीरदव्यज्झयणे) ज्ञशरीर द्रव्याध्ययन उसे कहते हैं जो (अज्झयणपयत्याहि..ार) अध्ययन के पदार्थाधिकार के ( जाण्यस्स ) ज्ञाता का (जे सरीरं ) जो शरीर हो. (वाय) चेतना से रहित हो (जुन श्वासोच्छ वासादि दश प्रकार के प्राणोंसे रहित हो (चत्रिय) प्राणों से विमुक्त हो चत्तदेह) देह छाड़ दिया हो (नीवत्रिप्पजह) आत्मा को अनेक बार छोड़ा हुआ हो, (जाव) यावत् (अहो णं, आश्चर्य है कि (इमेणं) इस (सरीर- समुस्तएणं) शरीर के समूह से (जिण दढेरणं भावेणं) जिनेश्वर भगवान के उपदेश किये हुये को अपने भाव से ( अाजकपणेत्तिपदं ) अध्ययन रूप एक पद का (आपवित) ग्रहण किया हो (नाव) यावर (वदंसितं) सबनय और युक्तियों से उपदेश किया हो (नहा को दिलुतो ?) जैसे कोई दृष्टान्त भी है ? (अयं) यह (ध्यकुभे) धो का घड़ा (आसी) था - * व्यपगतं चैतन्यपर्यायादचैतन्य लक्षणं पर्यायान्तरं प्राप्तम् । च्युतं-उच्चासनिःश्वासजी- वितादिदशविधप्राणेभ्यः परिभ्रष्टम् । च्यावितं-बलीयसा आयुःक्ष येण तेभ्यः परिभ्र शितम् । त्यत्तदेह-दिह उपचये इयत्तो देह आहारपरिणलिजनित उपचयो येन तत् त्यत्तदेहम् । जीववि- प्पजी-जीवेन-अमना विविधम्-अनेकधा प्रकरण मुक्त-जीवविषमुक्तम् । पुद्गल्संख्यतत्वात्स- मुच्छ्यस्तेन । आघवियं-प्राकृतशैल्या छान्दसत्वाच्च द्वयोः सकाशादागृहीतम् । उवदंसितं-उपदर्शितं २६४ गये वित : डर जी १ सम जा पर वि [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] (अयं) यह (महुकु भै) मधु का घड़ा (ग्रार्स) या (से ले जाणासरीदन्यः सपणे । ) यही ज्ञशरीर द्रव्याध्ययन है। ( से किं तं भवियसरीर दव्यायणे ?) भव्यशरीर याध्ययन किसे कहते हैं ? (भवियसरीरदव्वज्झयणे ) !भव्यशरीर द्रव्याध्ययन उसे कहते हैं जैसे (जे जावे ) जो जीव (जोणिजम्मणनिक्खंते) योनि से जन्न को प्राप्त हुआ अर्थात् योनि से बाहर निकला, (इमेणं चेत्र) और इस (आदत्तरण) ग्रहण किये हुए (सरल र सागा) शरीर समुदाय से (जिणदिष्टेणं भावेणं) जिनेश्वर के उपदेश किये हुए को (पायेग) अपने मात्र से (अज्झयणेत्तिपयं, अध्ययन रूप पद को ( सेयकाले सिके जल ) वह भविष्य काल में सोखेगा लेकिन (न ताव सिक्वइ) अब नहीं सोखता है. (हा को दिनो :) जैसे काई दृष्टान्त भी है ? (अयं) यह ( महुकुंभे) मधु का कुभ (नविइ) हागा (श्रम) यह (वयकुभे) घृत का कुंभ (भविस्सइ.) होगा (ते तं वयसरीरदय करणे :) यही भव्यः शरीर द्रव्याध्ययन है। (से किं तं जाणासरीरभवियसरीरवइरित्ते दबज्झयणे) ज्ञशरीर-भव्यशरीर-व्यति रिक्त द्रव्याध्ययन किसे कहते हैं ? ( जाण सरीर नवियसरोरगरिने दवाझवणे ) ज्ञ- शरीर भव्यशरोर-व्यतिरिक्त द्रव्याध्ययन उसे कहते हैं जो ( पनय) पो और (पोत्यय ) पत्रसंचय रूप पुस्तक (लिहि) लिखे हुए हों. (से तं) वहो (जागासरीर) भवियसरीरवइरित्ते दव्वज्झयणे) ज्ञशरीर-भव्यशरीर-ध्यतिक्ति द्रव्याध्ययन है। (से तं णोागमो दव्यज्झयणे ।) यही पूर्वोक्त नोआगम से द्रव्याध्ययन है । (ने तं दबकपणे ।) यही द्रव्याध्ययन है। (से किं तं भावज्झयणे ? ) भावाध्ययन किसे कहते हैं ? ( भाव कयणे ) जिसके द्वारा कर्मों का उपचय निवृत्त हो उसे भागाध्ययन कहते है, और वह (दुविर परते.) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया हैं, (तं जहा.) जैसे कि-'अागमयो अ) आगम से और (नोभागमो अ) नोआगम से। (से किं तं प्रागमनो अ भावज्झयणे ? ) आगम से भावाध्ययन किसे कहते हैं ? ( भावझणे ) आगम भावाध्ययन उसे कहते हैं-(जाणर उवर) जो अध्ययन के अर्थ के उपयोग से युक्त है। (से तं आगमनो भावज्झयणे ।) यही आगम से भावाध्ययन होता है। (से किं तं नोआगमओ भावज्झयणे १ नोआगम से भावाध्ययन किसे कहते हैं ? ( नोआगमनो भावज्झयणे ) जिसके द्वारा कर्मों का उपचय न हो, उसे नोआगम से भावाध्ययन कहते हैं, जैसे कि- ৯ লী আল মা আনৰ কাঠি पर त तम्हा अज्झ- [उत्तरार्धम् । 'अझस्पस्साणयां कम्ना श्रवचनो उचिआणं । अणुपचनो अ यणामिच्छति ॥१॥) अध्यात्म में आने के लिये उपार्जित किये हुये कर्मों का क्षय हो तथा नये कर्मों की उत्पत्ति न होना, इसी लिये आचार्य लोग 'अध्ययन को चाहते हैं।२।। (ते तं गोमागमो भावज्झयणे ।) यहो नोभागम से भावाध्ययन है, (से तं भावा- यगा) तथा यही भावाध्ययन है, ( से तं अज्झयणे ।) और इसी को अध्ययन कहते हैं। भावार्थ-निक्षप तीन हैं, जैसे कि-बोधनिष्पन्न १, नामनिष्पन्न २, और सूत्रालापकनिष्पन्न ३ बोधनिष्पन्न चार प्रकार का है, जैले कि-अध्ययन १, अक्षीण २, आय ३, और क्षपणा ४॥ ama bhair अध्ययन के चार भेद हैं, जैसे कि नाम १, स्थापना २, द्रव्य ३ और भाव ४ । नाम भार स्थापना का स्वरूप पूर्ववत् जानना चाहिये। द्रव्य अध्ययन के दो भेद है, जैसे कि आगम से १, और नोमागम से २। जो अध्ययन को उपयोग पूर्वक नहीं पढ़ता है उसे आगम से द्रव्य अध्ययन कहते हैं। और नोआगम से द्रव्याध्ययन तीन प्रकार से वर्णन किया गया है, जैसे कि-शरीर द्रव्याध्ययन १, भव्यशरीर द्रव्य अध्ययन २, शशरीर-भव्य शरीरव्यतिरिक्त द्रव्याध्ययन ३ । प्रथम दोनों का स्वरूप नो मागम ही है लेकिन तृतीय व्यतिरिक्त द्रव्याध्ययन वह है जो पत्र और पुस्तक रूपमें लिखा हुआ हो, इस लिये इसे नोअगम से द्रव्याध्ययन कहते हैं। तथा भावाध्ययन भी दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, जैसे कि---आगम से और नोप्रागन स, अगम से भावाध्ययन वह है जो उपयोग पूर्वक होता है और नामागम से भावा- ध्ययन वह है जिसके द्वारा नूतन कर्मों का उपचय न हो और प्राचीन कर्मों का क्षय हा यही नोपागम से भावाध्ययन का स्वरूर है तथा यही भावाध्ययन है और यहा अध्ययन हे। इसके बाद अक्षीण निक्षेप का वर्णन किया जाता है- amitute अक्षीण द्वार। से कितं अज्झोणे? चउठिवहे पण्णत्ते,तं जहा-नाम- ज्झीणे ठवणज्झोणे दब्यज्झोणे भावस्फोगो । नामठव- "अज्झप्पस्लाणयण'-सूत्र के निपात द्वारा प स 'आ ण' के लोप करने से 'अ- झयण' शब्द की प्राकृत भाषा में व्युत्पत्ति होती है, लेकिन संस्कृत में 'अध्ययन' कहते हैं ।
500 । श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् । रणामो वरिणाओ। से किं तं दव्व झोणे ? दुबिहे पण्णत्ते, सं जहा-- आगमो अनोआगमोथ। से किं तं आगमो नमोरो जस्स शंअध्झी त्ति पयं सिक्खियं जियं नियं परिजियं जान, से तं आगमओ व्वाकोणे। से किं तं नोनागमो दवणे? तिविहे पर पत्ते, तं जहा-जाणयसरीरदामोरो भरियलरोरवाण जाणयसरीरभविषलरीरबारिते दबकोणे। से कि तं जाणपसोरदवकोणे ? अझीणपयत्था- हिगारजायस्स जं सरीरयं ववगयचुपचाविय चत्तदेहं जहा दवज्झरणे तहा भोणियव्वं जाव, से तं जागयतरोर- दयझोणे। से कितं भवियसरीरदवासी ? जे जीव जोगि. जम्मणनिक खते जहा दवझवणे जान, सेत भत्रिय- सरीरदव्यज्झीणे । से किं तं जाहायसरीरभवियसरीरवइरित्ते दव्य- जझीणे ? सव्वागास सेढी, से तं जाणयसरीरभविपसरीर- वइरिते दव्वज्झोगो । से तं नोओगमो दव्वामीणो, से तं व्वझीणे। से किं तं भावभीगो ? दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-मा- गमो अनोागमो य। से कितं आगमओ भावझोणे ? जाणए उवउत्ते, से तं आगमओ भावजझीयो ।
[ उत्तराधेम् से कितनोग्रागमओ भावज्झोणे? जह दीवा दीवसयं, पइप्पए दिप्पए असो दीवो। दीवसमा आयरिया, दिप्पति परं च दीवंति ॥१॥ से सं नोआगमओ भाव झोणे | से तं भावभोणे, से तं अजझोणे। पदार्थ--(से किं तं अज्झोणे १ ) अक्षीण किसे कहते हैं ? और वह कितने प्रकार का है ? (अज्झोणे) अक्षीण उसे कहते हैं सामान्यभुत विशेष सामायिक चतु- विशतिस्तवादि का नाम हो, और वह चउबिहे परागी, ) चार प्रकार से प्रति गहन किया गया है, (तं जहा-) जैसे कि-(णामीण) नाम अक्षोण, (:वणझीयो) स्थापना अक्षीण, (दबझीणो) द्रव्य अक्षोण और (भावमीण ।) भाव अक्षोण ! (नामठवणारे) नाम स्थापना (पुछ बरिणामी,) पूर्व में वर्णन को गई है। (से किं तं दव्वज्झोणे ?) द्रव्य अक्षोण किसे कहते हैं ? (दव्यझोरो) जो द्रव्य से क्षीण न हो, वह (दुविहे पर गत्ते.) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा.) जैसे कि--(भागमनो अ) आगम से, और (नोयागमत्रो अ) नो आगम से। ( के किं तं आगमत्रो दबज्झीणे ?) आगम से द्रव्य अक्षीण किसे कहते हैं ? (भागमो दव्वज्झीणे) आगम से द्रव्य अक्षाण उसे कहते हैं कि- जस्सरण) जिसन (अज्झीयोतिपयं) अक्षोण रूप एक पद को ([साक्खयं) प्रारम्भ से अन्त तक सोख लिया हा, (जिय, आवृत्ति करत हुए काई पूछ तो शोब उत्तर देता हो उसे जित कहते हैं, (मिय) पदादि श्लाकों के वर्णों को संख्या जानता हा । (पारजितं जाव) आवृत्ति करत हुए कोई उलट पुलट पूछे तो सब प्रकार उत्तर देता हा, यावत (से तं श्रागमओ दव्व- ज्झोणे ।) यही आगम से द्रव्य अक्षीण है। (से कि तं नोभानमओ दव्वझीणे ? ) ना नागम से द्रव्याक्षीण किसे कहते हैं ? (नोभागमो दवझीण) नोआगम से द्रव्याक्षीण (तिावह पएण.) तान प्रकार से प्रति- पादन किया गया है, (तं जहा-) जैसे कि--(जाणयसरीरदबझीण) ज्ञशरीर द्रव्याक्षीण (भवियसरीरदव्यज्झीणे ) भव्यशरीर द्रव्याक्षीण और ( जाणयसरीरभवियसरीरवरित दब्वज्झीणे ।) ज्ञशरीर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्य अक्षोण । (से किं तं जाणयसरीरदव्वमाणे ) ज्ञशरीर द्रव्याक्षीण किसे कहते हैं ? (जाण- यसरीरदब्वन्झीणे) शरीर द्रव्याक्षीण उसे कहते हैं जो (अज्झीणपयत्थाहिगारजाणयस्स) अक्षीण शब्द पदार्थाधिकार के ज्ञाता का ( मी को णामी आगः गोत्ति । [ श्रीमदतुयोगद्वारसूत्रम् चत्तदेह) व्यपगत, जीव से च्युत, त्यागा, त्यक्तदेह हो, (जहा दवझोणे ) जैसा द्रव्य अध्ययन में वर्णन किया गया है ( तहा भाणिग्रव्यं ) उसी प्रकार कथन करना चाहिये, (जाव) यावत् (से तं जाणयसरीरदव्यज्झीणे ।) यही ज्ञशरीर द्रब्याक्षीण है ( से किं तं भवितरीरदब्वज्झोणे ?) भव्यशरीर द्रव्याक्षीण किसे कहते हैं ? ( भविग्रसरीरदव्यज्झीणे ) भव्यशरीर द्रव्याज्ञोण उसे कहते हैं कि-(जे जये) जो जीव जोणिजम्मपनिक्वते ) योनि से निकल कर जन्म को प्राप्त हुआ. (जहा बब्बन्झायणे, जैसे द्रव्य अध्ययन अर्थात् शेष स्वरूप द्रब्य अध्ययनवत् जानना चाहिये । (जाब) यावत् (से तं भविश्नसरीरदबझोणं !) यही भव्यशरोर द्रव्याक्षोण है। (से किं तं जाए।यसरीरभविश्नसरीरवरित ? ) ज्ञशरीर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्याक्षीण किसे कहते हैं ? ( जाणय० ) ज्ञशरोर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्य अक्षीण उसे कहते हैं, कि -- सागाससेढी) लोकालोका काश के सब श्रोणियों से प्रदेशों का अपहरण किया जाय तो भी क्षाण नहीं हो सकते, ( से तं नाराय) यही ज्ञशरीर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्या ताणता है । ( से तं नोअागमनी इनझोणे ।) यही नो आगम से द्रव्याक्षोण है । (से तं दव्यज्झोणे ।) यही द्रब्याक्षीण है। से किं तं भावउझीणे ? ) भाव अक्षीण किसे कहते हैं ? (भावझीणे) जो भाव से क्षोण न हो उसे भाव अक्षोण कहते हैं, और वह (दुविहे पणते,) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा.) जैसे कि-- आगमओ य) आगम से और (नोग्राग- मयो य ।) नो आगम से। हिग EN-20 सरी से कितं आगमनो भावज्झीणे ? ) आगम से भाव अनीण किसे कहते हैं (आगमो भावझीणे) आगमसे भावाक्षोण उसे कहते हैं कि-(जाणए उवउत्ते) जो अक्षी- ण के अर्थ को * उपयोग पूर्वक जानता हो, ( से तं श्रागमयो ) यही आगम से (भावज्झ णे ।) भाव अक्षोण है। (ते किं तं नोआगमनो भावज्झीणे ?) नोआगम से भाव अक्षीण किसे कहते हैं ? जमें AMODurat * अत्र उद्धा व्याचक्षते -- यस्माच्चतुर्दशपूर्वविदः आगमोपयुक्तस्यान्तमुहर्तमात्रीपयोगकाले ये ऽयोपलम्भोपयोगपर्यायास्ते प्रतिसमयमेकैकापहारेणानन्ताभिर प्युत्सपिण्यवसर्पिणीभि पढियन्ते, अतो भावाक्षीणतेहावसया । चदुर्दश पूर्व जानने वाले के उपयोग मात्र एक अन्तमुहर्त काल में जितने पर्याय होते हैं वे अनन्त काल चक्रों से भी अपहरण नहीं हो सकते, क्योंकि वे अनन्त हैं। यही भानाक्षीणता यहां पर जानना चाहिये। - [उत्तरार्धम] (नोग्रागमो भावज्झीणे ? नो आगम से भावाक्षीण उसे कहते हैं कि जो श्रुत ज्ञान का दान करने से श्रुत का क्षय न हो वही नो पागम से भाव अक्षोणता है। (जह दीवा दोवसर पाइपए दिपए असा दीबी। दीवलमा प्रायरिया दिपति परंच दीवति ॥१॥) जैसे कि दीपक स्वयं प्रकाशमान रहते हुए सैकड़ों दूसरे दीपकों को प्रकाशमान करता है, उसी प्रकार आचार्य महाराज स्वयं दीपक के समान देदीप्य- मान हैं और दूसरों को अर्थात् शिष्य वर्ग को देदीप्यमान करते हैं। (से तं नोआगमनो भावज्झीणे ।) यहो नोबागम से भावाक्षीण है । (से तं भाव- ज्झीणे) यही* भावाक्षीण है। (से तं अज्मोणे!) यही अक्षोण है। भावार्थ-भावामीणता के चार भेद हैं,-नामाक्षीण, स्थापनाक्षीण, द. व्याक्षण और भावाक्षीण ! नाम और स्थापना पूर्ववत् जानना चाहिये । द्रव्या- क्षीण दो प्रकार से प्रतिपादन की गई, जैसे कि-आगम से और नोआगम में। जो अक्षीण शब्द को उपयोग पूर्वक जानता हो उसे पागम अक्षीण कहते तथा-नोआगम से अक्षीण पूर्ववत् तीन प्रकार से जानना चाहिये, सिर्फ व्यति- रिक्त तृतीय भेद में सब आकाश की भोपियें ग्रहण करना चाहिये क्योंकि वे अनन्त होने से किसी प्रकार भी क्षीण नहीं हो सकती तथा-भावाक्षीणता के दो भेद हैं जैसे कि-श्रागम से और नोनागम से। आगमले भाव अक्षण उसे कहते हैं जो अक्षण शब्द के अर्थ को उपयोग पूर्वक जानता हो, और आगम से भाव अक्षीण उसे कहते हैं जो किली प्रकार भी व्यय करने से क्षीण न हो, जैसे-एक दीपक ले सैकड़ों दूलरे दीपक प्रदीप्त किये जाते हैं परन्तु असली दीपक किसी प्रकार भी नष्ट नहीं होता, इसी प्रकार आचार्य महाराज श्रुत का दान-पठन-पाठन करते हुए आप भी दीप्त रहते हैं, और दूसरों को अर्थात् शिष्य वर्ग को भी प्रकाशमान करते हैं। श्रत का क्षीण न होना यही भावाक्षीण है। अतः यही नोागम से भाव अक्षीण तो है। भावाक्षीण तथा अक्षीण का वर्णन यहां समाप्त होता है। इसके अनन्तर पाय-लाम का स्वरूप जानना चाहिये- प्राय से किंतं आए ? चउविहे पण्णत्ते, तं जहो-नामाए SSURNA अत्र च नोआगमतो भावामीणता श्रु तदायकाचार्योपयोगस्यागमत्वाहाकाययोगयोश्चा- नागमत्वानोशब्दस्य मिश्रवचनवादावनीयेति टढा व्याचक्षते ।
७२. २७६ प्रा गो ARCHI तं ज METAK che un hom [ श्रीमदनुयोगद्वारसुत्रम् ] ठवणाए दवाए भावाए । नामठवणामो पुवं भणि. प्राओ। से किं तं दवाए ? दुवहे पण्णत्ते, तं जहा-आगम- ओ अनोपांगमयो । से कि त आगमओ दव्वाए ? जस्स णं आयत्ति पदं सिक्खित ठित जित मित परिजित जाव कम्हा ? अणुवओगो दव्वमितिकटु, नेगमस्स णं जावइया अणु- वउत्ता आगमओ तावइया ते दवाया जाव, सेतं आगमओ व्वाए। से कितनोआगमओ दव्वाए ? तिविहे पण्णत्ते, त जहां-जाणगसरीरदव्वाए भवियसरीरदव्वाए जाणग- सरीरभवियसरीरवइरित्ते दवाए। सेकिंत जाणगसरीरदव्वाए ? आयपयत्थाहिगार- जाणयस्स जं सरीरयं ववगयचुयचावियचत्तदेह जहा द. व्वज्झयो जाव, से तं जाणगसरीरदव्वाए। से कित भविषसरीरदव्याए ? जे जीवे जोणिज- म्मणणिक्खंते जहा व्वज्झयणे जाव, से तं भवियसरीर- दव्वाए। से कि त जाणयसरीरभवियसरीरवइरित्ते दव्वाए ? तिविहे पण्णत्ते, त जहा-लोइए कुप्पावयणीए लोगुत्तरिए। से कि तं लोइए ? तिविहे पण्णत्ते, तं नहा-चि- ते अचित्ते मीसए अ। से कि त सचित्ते? तिविहे पण्णत्ते, तं जहा-दुप- याणं चउप्पयाणं अपयाणं दुपयाणं दासाणं दासीणं चउ- ज म ज व मत्रो दबाए, से तं व्वाए [उत्तरार्धम् ] प्पयाणं आसाणं हत्थीणं अपयाणं अंबाणं अंबाडगाणं आए, से त सचित्ते। से कि त अचित्ते ? सुवरणरयय पणिमोत्तियसंखसि- लप्पवालरत्तरयणाणं संतसावएजस्स आए, से तं अचित्ते। से कितमीसए ? दासाणं दासीणं आसाणं हत्थी- णं समाभरिआउजालंकियाणं आए, से तं मीसए. से तं लोइए। से कि त कुप्पावयणिए ? तिविहे पण्णत्ते, सं जहा. सचित्ते अचित्ते मीसए अतिरिणवि जहा लोहए जाव, से तमीसए, सेत कुप्पावयणिए । से कि त लोगुत्तरिए ? तिविहे पण्णते, तं जहा- सचित्ते अचित्ते मीसए अ। से कि त सचित्ते? सीसाणं सिस्सणियाणं, से त सचित्ते। से कि त अचित्ते ? पडिग्गहाणं वत्थागणं कंबलाणं पायपुंछणाणं आए, से त अचित्ते। से कि त मीसए ? सिस्साण सिसणियाणं सभंडो- वगरणाणं आए, से तमीसए, से त लोगुत्तरिए, सेत जाणगसरीरभवियसरीरवइरित्त दवाए, सेतं नोआग- CHORIRABARIA से कि तभावाए ? दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-आग. मत्रो अनोप्रागमो अ। से कि त आगमओ भावाए ? जाणाए उवउत्ते, से तं आगमओ भावाए।
, [ श्रीमदनुयागद्वारसूत्रम् ] से कि त नोआगममो भावाए ? दुविहे पण्णते, त जहा-पसत्थे अ अपसत्थे । से किं तं पसत्थे तिविहे पण्णते. तजहा-णाणाए दसणाए चरित्ताए सेत पसत्थे। से कि त अपसत्थे चउविहे पराणो. तजहा- कोहाए माणाए मायाए लोभाएं, से त अपस थे, सेत' णोआगमओ भावाए, से तभावाए, से ताए । पदार्थ-(से किं तं पाए ? ) आय किसे कहते हैं ? ( पाए ) जो अप्राप्त की प्राप्ति हो उसे आय-लाभ कहते हैं, और वह (चरविहे परागते,) चार प्रकार से प्रति. पादन किया गया है, (त जहा-) जैसे कि-(नामए) नाम आय (टवणा) स्थापना प्राय (दव्व ए) द्रव्य आय और (भावाए)भाव प्राय । (नामव्वणायो) नाम और स्थापना (पुत्रं भाणेनाओ।) पूर्व में वणन की गई है। (से कि तं दवाए ?) द्रव्य आय किसे कहते हैं ? (दवाए) जिसे द्रव्य की प्राप्ति हो उसे द्रव्य आय कहते हैं, और वह (दुविहे पण्णत्ते, दो प्रकार से प्रतिपादन की गई है, (तं जहा.) जैसे कि-(आगम नो अ) आगमसे और (नोग्राग मनो अ) नो आगम से । ( से किं तं श्रागमो दव्याए ? ) आगम से द्रव्य आय किसे कहते हैं ? (आगम. श्रो०) आगम से द्रव्य आय उसे कहते हैं कि (जस्तणं) जिसने (प्रायत्तिपर) 'पाय' रूप एक पदको (सिक्खिन) सीख लिया हो (ठित) हृदय में स्थित कर लिया हो (जितं) अनुक्रम से पढ़ भी लिया हो (मितं) श्लोकादि अक्षरों के प्रमाण को जान लिया हो (परिजित) अननुक्रम से भी पढ़ लिया हो (जाव) यावत, कम्हा ?) क्यों ? अणुपयोगो दव्वमितिक,) द्रव्य अनुपयुक्त होने से, (जेगमस्स रणं, नैगमनय के मत से (जावइया जितने (अणुवउत्ता भागमो) आगम से अनुपयुक्त हैं (तावइया) उतने ही (ते दव्याया) वे द्रव्याय हैं (जाव) * यावत् (से तं आगमयो दवाए ।) यही आगम से द्रव्य आय है। (से किं तं नोआगमयो दव्याए ?) नोआगम से द्रव्याय किसे कहते हैं ? (नोग्राग- मो दवाए) नोआगम से द्रव्याय (तिविहे पण्णत्ते,) तीन प्रकार से प्रतिपादन की गई है, (तं जहा-) जैसे कि-(जाणगसगेरदव्वाए) ज्ञशरीर द्रव्य आय (भवियसरीरदवाए) भ- * 'जाव' यावत् शब्द पूर्वमें वर्णन किये हुये अधिकार का सूचक है । इसी प्रकार सर्वत्र ।
उत्तरार्धम् । ब्यशरीर द्रव्य आय (जाणयसरीरवइरिने दवाए ।) और ज्ञशरीर भव्यशरीर ब्यतिरिक्त द्रव्य वाया (से किं तं जाणगसरीरदबाए ?, ज्ञशरीर द्रव्याय किसे कहते हैं ? (जाणंग०) ज्ञ- शरीर द्रव्य आय उसे कहते हैं कि-(प्रायपयत्याहिगारजाणवल) आयपदार्थाधिकार के जानने वाले का (जं सरीरय) जो शरीर है, जो कि (ववगय) चैतन्यसे रहित हो अथवा (चुअ) च्युत हुआ हो (चाविय) दश प्रकार के प्राणों से रहित हुआ हो या (चत्तदेह) देह छोड़ दिया हो (जहा) जैसे (दबझयणे,) द्रव्य अध्ययन, (से : जाणगसरीर दबाए ।) यही ज्ञशरीर द्रव्य आय है। (से कि त भनियसरीरदब्वाए ? ) भव्यशरीर द्रव्य आय किसे कहते हैं (भविय- सरीरदबाए) भव्यशरीर द्रव्य प्राय उसे कहते हैं कि-(जे जीये) जो जीव (जोणिजम्म- णनिक्खते) योनि से निकल कर जन्म को प्राप्त हुआ हो ( जहा दव्यज्झयणे,) द्रव्य अध्ययन के समान, (स तं भवियसरीरदयाए ।) यही भव्यशरीर द्रव्य प्राय है। (से कि तं जाएग० बरित्ते दवार ? ज्ञशरोर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्य आय किसे कहते हैं ? ( जाणग० बइरित्ते दबाए ) ज्ञशरीर भब्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्य आय (तिविहे पण्णत्ते,) तीन प्रकार से प्रतिपादन की गई है, (तं जहा-) जैसे कि- (लोइए, लौकिक (कुप्पात्रयसिए) कुप्रावचनिक और (लोगुनरिए ।) लोकोरिक। (से किं तं लोइए ?) लौकिक किसे कहते हैं ? (लोइए) जो सांसारिक लाभ हो उसे लौकिक कहते हैं, और वह (तिविहे पण्णात्ते,) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा- ) जैसे कि---( सचित्ते ) सचित्त (अचित्ते ) अचित्त ( मीसए अ) और मिन। (से कि तं सचित्ते ?) सचित्त किसे कहते हैं ? (सचिते) जो सचित्त पदार्थ का लाभ हो उसे सचित्त कहते हैं, और वह (तिविहे पएणत्ते,) तीन प्रकार से प्रति- पादन किया गया है, (तं जहा) जैसे कि-(दुपयाणं ) दो पांव वालों का (चउप्पयाण) चार पैर वालों का (अपयाणं) और बिना पैर वालों का । (दुपयाणं) दो पैर वालों का जैसे-(दासाणं) दास-सेवकों और (दासीणं) दासियों-सेवकनियों का (चउप्पयाणं, चतु- पदों का, जैसे-(प्रासाणं) अश्व-घोड़ों और (हत्यीणं) हस्तियों का (अपयाणं) बिना पैर जैसे-(अंबाणं) आमू और (अंबाडगाणं) अम्बाडियों का (आए,) लाभ, (से तं सचित्ते ।) इसी को सचित्त आय कहते हैं ! (से किं तं अचिने ?) अचित्त आय किसे कहते हैं ? (अचित्ते) जिस अचित्त वालों का, नशेष अधिकार द्रव्य अध्ययन के अनुसार जानना चाहिये।
BAR नहा- दंसरा कोहा गोड प्राप्ति पादन। (दव्व ए भणश्रा २८० [ श्रीमद्नुयोगद्वारसूत्रम् ] का लाभ हो उसे अचित्त कहते हैं, जैसे कि-(सुवरणा) सोना (स्यय) चान्दी (मणि) मणि (मोतिन) मौक्तिक-माता (संख) शंख (सन) शिला बहुमूल्य पत्थर अथवा राज्याभिषेक योग्य पदार्थ (पत्राल) प्रवाल --मूगा, ( रत्तस्यग्णा) पद्मराग रत्न-- * संतमावएजस्स ) विद्यमान द्रव्य का (पाए ) लाभ होना ( से न चिन्ने : ) यही अचित्त लाभ है। (से किं तं मीसए ?) मिश्र लाभ किसे कहते हैं ? (मसिए) मित्र लाभ उसे कहते हैं जैसे-(दासाणं दासीणं) दास और दासियों का (आसाणं हत्यीण) अश्व और हस्तियों का (समाभरिग्राउज्जालंकियाणं) सोने तथा साङ्कलादि झल्लरी प्रमुख प्राभूपों से विभू- षित का (आए,) लाभ होना, (से तं मोसए,) इसा को मिश्रलाभ कहते हैं, (से तं लाइए ।) यहो लौकिक लाभ है। ( से किं तं कुप्पावयणिए ? ) कुप्रावचनिक लाभ किसे कहते हैं ? (कुप्पावणिए) जिससे कुप्रावचनिक लाभ हो, और वह (तिविह पएणरो, ) तोन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा.) जैसे कि--(सचित्त) सचित्त (अचित्त) अचित्त (मीसए अ ।) और मिश्र । ( तिरिणवि ) उक्त तीनों हो ( जहा लोइए,) लौकिक जैसे होते हैं, (जाब) यावत् (से तं मीसए ।) यही मिन है। (से तं कु पावरणिए ।) और इसे हो कुप्रावनिक कहते हैं। (से किं तं लोगुत्तरिए ?) लोकोत्तरिक लाभ किसे कहते हैं ? (लोगुत्तरिए) लोको- त्तरिक लाभ (तिविहे पएणते,) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा-) जैसे कि-(सचित श्रचिरी मीसए अI) सचित्त चित्त और मिश्र । (से कि तं सचित्ते ?) सचित्त किसे कहते हैं ? (सचित्ते) सचित्त, जसे-(सोसाणं सिस्सणि प्राणं) शिष्य और शिष्यानिओं सात्रियों का, ( से तं साचते ।) इसा को सचित्त कहते हैं। से किं तं अचित्ते ? ) अचित्त किसे कहते हैं ? (पडिगगहाणं वत्थाणं) वस्त्र पात्र (कंबलाणं) कम्बलों का (पायपुछणाणं) पादप्रोञ्छनादिकों का (पाए, लाभ होना, (से तं अचिचे ।) यही अचित्त है। (से किं तं मीसए ?) मिन किसे कहते हैं ? (मासए) मिश्र जैसे-(सिस्साणं सिस्ता- णिनाणं) शिष्य और शिष्यनियों का (सभंडोवारणा पाए,) भाण्डोपकरण सहित लाभ होना, ( से तं मीलए,) इसी को मिन कहते हैं, ( से तं लोगुत्तरिए,) यहो लोको- रक्तरत्नानि पद्मरागरत्नानि । * 'संत'-सद्-विद्यमान, 'सावए जस्स-स्वापतेय-द्रव्यं । हो उसे ओ.) रूप। अनुब (पर्गि दव्वनि ( अपसत्थे ।) यहो अप्रशस्त है। और (सतो याआगमी भावाए,) यहा नामागम सभाव [ उचराधेम्] सरिक है, (से तं जाणयसरीरभवि प्रसरीग्वइरिने दवाए,) यही ज्ञशरीर भव्यशरोर व्यतिरिक्त द्रव्य आय है। (से तं नोआगमो दवाए,) यहो नोआगम से व्याय है और (से तं दबाए ।) यहो द्रव्य आय (से किं तं भावाए १) भाव प्राय किसे कहते हैं ? (भावाए) जो भाव से लाभ हो, और वह (दुविहे पएणचे,) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा-) जैसे कि-(प्रागमओ श्र।) आगम से और (नानागमो अ) नोआगम से। (से किं तं आगमनो भावाए ?) आगम से भाव लाभ किसे कहते हैं ? (आगमनो भावाए) आगम भाव लाभ उसे कहते हैं कि-(जाणए उवउत्ते,) जा उपयोग पूर्व जानता हो, (से तं आगमनओ भावाए । ) यही आगम से भाव लाभ है। (से किं तं नोयागमनी भावाए ? ) नोआगम से भाव लाभ किसे कहते हैं ? (नोभागमो भावाए) नोआगम से भाव भाय ( दुविह परणारा,) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है (तं जहा-) जैसे कि-(पस थे अ) प्रशस्त और (अपसत्थे य ।) अप्रशस्त । (से किं तं पसत्थे ?, प्रशस्त किसे कहते हैं ? (पस थे) प्रशस्त (तविह पए गये,) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (तं जहा-) जैसे कि गाणाए ) ज्ञान आय (दसणाए ) दर्शन आय और ( चारत्ताए,) चारित्र आय, (से तं पसत्थे।) यहो प्रशस्ताय है। (से किं तं अपसत्थे ?) अप्रशस्त किसे कहते हैं ? (अपसत्थे) अप्रशस्त (चाविह पएणत,) चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, ( जहा) जैस कि-( काहार) क्रोध आय (माणाए) मान आय (भाय ए) माया आय (लाहाए,) लाभ आय, (ते तं आय है, (से से भावाए ।) यहा भाव आय हे (से तं पाए।) और यहां आय है। भावार्थ-लाभ चार प्रकार का है, जैस कि-नाम लाभ, स्थापना लाभ, द्रव्य लाभ और भाव लाम । नाम और स्थापना का वर्णन पूर्ववत् जानना चा- हिये। द्रव्य लाभ दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, जैसे कि-आगम से और नोमागम से । शेष वर्णन प्राग्वत् जानना चाहिये, सिर्फ व्यतिरिक्त तृतीय भेद के तीन भेद है, लोकिक, लोकोत्तरिक और कुमावनिक । लोकिक प्राय, जैसे-सचित्त द्विपादि, अचित्त सुवर्णादि, मिश्र दास दासी अश्व भल्लरीप्रमुख अलंकृत किये हुए का लाभ होना । इसी प्रकार कुमावनिक लाभ जानना चा- हिये। लोकोत्तरिक आय, जैसे-सचित शिष्यादि, अचित वस्त्रादि, मिश्र भाण्डोप. करण सहित शिष्यादि। भाव भाय के दो भेद है, जैसे कि आगम से और नोमागम से। श्रागम Sanase [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] से उपयोग पूर्वक तथा नोआगम से प्रशस्त अप्रशस्त रूप होता है। जैसे कि- ज्ञान दर्शन और चारित्र का लाभ प्रशस्त लाभ और क्रोध मान माया लोभ का लाभ अप्रशस्त लाभ होता है । इस तरह से यहाँ पर नोनागम से भाव प्राय, भावाय, और आय का वर्णन समाप्त हुआ- इसके बाद अव क्षपणा का स्वरूप कहते हैं- canoarn Roman PDamasuny NA ह SAHIBE वए गया उसे ( तं से कि तं भवणा ? चउव्विहा पण्णत्ता, तं जहा- नामभवणा ठवणझवरणा दव्वझवणा भावझवणा। नामठवणाओ पुव्वं भणियामो से किं तं दव्वझवणा ? दुविहा पण्णता, तं जहा- आगमओ अनोभागमो अ। से किं तं आगमओ दवझवणा ? जस्स णं झवणे- तिपयं सिक्खियं ठियं जियं मियं परिजिअं जाव, से तं आगमनो दव्वझवणा । से किं तं नोआगमओ दव्वझवणा ? तिविहा पगण- त्ता, तं जहा-जाणयसरीरदव्वझवणा भवियसरीरदव्व. ज्भवणा जाणयसरीरभवियसरीरवइरित्ता दवझवणा । से किंत जाणयसरीरदव्वझवणां ? झवणापयत्था- हिगारजाणयस्स जं सरीरयं ववगयचुअचाविअचत्तदेह सेसं जहा दव्वाझयणे जाव, से तं जाणयसरीरदव्व- ज्झवणा। से कि तं भविअसरीरदव्वझवणा? जे जीवे जोणि- जम्मणणिक्खंते, सेसं जहा इव्वझयणे जाव, से तं भवि- जो०) अनु सी Maa २८३ , तं [ उत्तरार्धम् ] से किंतं जाणयसरीरभवियसरीरवहरित्ता दव्व- ज्भवणा ? जहाँ जाणयसरीरभवियसरीरवइरित्ते दवाए तहा भाणिअव्वा जाव, से तं मीसिआ, से तं लोगुत्तरिया, से तं जाणयसरीरभवियसरीरवइरित्तो दव्वज्झवणा, से तं नोमागमो दव्वझवणा, से तं दव्वझवणा । से किं तं भावझवणा ? दुविहा पण्णत्ता, जहा. आगमओ अणोआगमओ अ। से कितं आगमओ अ भावझवणा ? दुविहा प. एणत्ता, ते जहा-जाणए उवउत्ते, से तं आगमओ भाव- झवणा। से कि नोआगमो भावझवणा ? पसत्था य अपसत्था या से किं तपसत्था ? तिविहा पण्णत्ता, त जहा- नाणज्भवणा दंसणझवणा चरित्तम्भवणा, से त पसस्था। से कि त अपसत्था ? चउव्विहा पण्णत्ता, त जहा कोहझवणा माणज्झवणा मायज्भवणा लोहझवणा, से त अपसत्था । से तं नोआगमओ भावझवणा, त भावझवणा, से त झवणा, से तोहनिफरणे । पदार्थ-(से किं तं झवणा ?) क्षपणा किसे कहते हैं ? और वह कितने प्रकार से प्रतिपादन की गई है । ( झत्रणा ) क्षपणा उसे कहते हैं जिससे कर्म की निर्जरा हो, और वह (चउव्विहा पएणत्ता,) चार प्रकार से प्रतिपादन की गई है, (तं जहा-) जैसे कि- (नामज्भवणा) नामक्षपणा (ठवणज्झवणा) स्थापना क्षपणा (दव्वझवणा) द्रव्य क्षपणा और (भावज्भवणा ।) भाव क्षपणा । ( नामठवणाओ पुवं भणियानो । ) नाम और स्थापना का स्वरूप पूर्व में वर्णन किया जा चुका है। से . दव्यभत्रणा (झवणापयत्याहिगार- [ श्रीमद्नुयोगद्वारसूत्रम् ] (से किं सं दवझवणा ?) द्रव्य क्षपणा किसे कहते हैं ? (दवझवणा) द्रव्यक्षप. णा (दुविहा पएणत्ता,) दो प्रकार से प्रतिपादन की गई है, (तं जहा-) जैसे कि-(आगम ओ य) आगम से और (नोनागमो य ।) नोआगम से ! (से किं तं श्रागमो दव्यज्भवणा १ ) आगम से द्रव्य क्षपणा किसे कहते हैं ? (श्रागमश्रो दव्वझवणा ) आगम से द्रव्य क्षपणा उसे कहते हैं कि ( जम्स ग ) जिसने (झवणेत्तिपर) क्षपणा रूप पद को (सिक्खि) सीख लिया हो या ठिय) हृदय में स्थित कर लिया हो वा (जियं) अनुक्रम से पढ़ भी लिया हो अथवा (मयं) अक्षों को परि- माण भी जानता हो या (परिजि) अननुक्रम से पढ़ लिया हो (जाव) यावत् (से तं आगमी दव्यज्भवणा) यही आगम से द्रव्य चपणा है। (से कितनोग्रागमत्रो १) नोभागम से द्रव्य क्षपणा किसे कहते हैं ? ( नोनागमो दव्वज्भवणा ) नोआगम से द्रव्य क्षपणा (तिविहा पणणत्ता,) तीन प्रकार से प्रतिपादन की गई है, (तं जहा-) जैसे कि-( जाणयसरीरदव्यज्भवणा) ज्ञशरीर द्रव्य क्षपणा, (भवियतरीरदव्वज्झत्रणा) भव्यशरीर द्रव्य क्षपणा, (जाण य तरीरभवियसरीरवइरित्ता दव्वज्झवणा) ज्ञशरीर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्य क्षपणा । (से किं तं जाणयसरीरदव्यज्झत्रणा ?) ज्ञशरीर द्रव्य क्षपणा किसे कहते हैं ? जाणयस्स) क्षपणा पदार्थाधिकार जानने वाले का (जं सरीरय) शरीर, जो कि- (ववगय) चेतना से रहित हुआ हो या चुः) श्वासोच्छ्वासादि से रहित हुआ हो अथवा (चाविय) जवरदस्ती दश प्राणों से अलग हुआ हो या चत्तदेह) त्यक्तशरीर हो (सेस) शेष (जहा दव्वज्झवणे,) द्रव्य अध्ययन जैसे, अर्थात् शेष स्वरूप द्रव्य अध्ययना- नुसारं जानना चाहिये, (नाव) यावत् ( से तं जाण यसरीरदवझवणा।) यही ज्ञशरीर नु गि द्रव्य क्षपणा है। दि (मे किं तं भवियसरीरदव्वज्झत्रणा ?! भव्यशरीर द्रव्य क्षपणा किसे कहते हैं ? (भवियसरीग्दवज्झवणा) भव्य शरीर द्रव्य क्षपणा उसे कहते हैं कि-(जे जीवे) जो जोव (जोणिजम्मा ) योनि से निकल कर जन्म को प्राप्त हुआ (सेसं जहा दव्वझवणे.) शेष वर्णन द्रव्य अध्ययनरत जानना (जाव) यावत (से तं भविग्रसरीरदव्वझवणा।) यही भव्य शरीर द्रव्य क्षपणा है। उ MAINA .. न ॥ (से किं तं जाणयसरीरभविप्रप्तरीग्व रित्ता दवझवणा १) शगेर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्य क्षपणा किसे कहते हैं ? (जाणयसरीरभविश्नसरीरवइरिचा दव्यज्भवणा [उत्तरार्धम्] शरीर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्य क्षपणा (जहा जाणयसरीरभ वेनसरीरवइरित्ते दवाए) जैसे ज्ञशरीर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्य आय होती है तहा भाणिग्रव्या) उसी प्रकार कहना चाहिये, (जाव) यावत् (से तं मीसिमा,) यहो मिश्र क्षपणा है। (से तं लोगुचरित्रा) यही लोकोत्तरिक है, ( से तं जाणयसरीरभत्रिसरीरवारिता दवझवणा,) यही ज्ञशरीर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्य क्षपणा है, ( से तं नोभागमश्री दव्वझवणा,) यही नोआगम से द्रव्य क्षपणा है, और (से तं दव्वझवणा ) यहो द्रव्य क्षपणा है। (से किं तं भावज्झवणा ?) भाव क्षपणा किसे कहने हैं ? ( भावज्झत्रणा ) भाव क्षपणा (दुविहा पएणत्ता,) दो प्रकार से प्रतिपादन को गई है, (तं जहा.) जैसे कि (आगमनो अ) श्रोगम से और (गोपागमो य ।) नोआगम से । (म किं तं प्रागमयी भावज्झवणा ? ) आगम से भाव क्षपणा किसे कहते हैं ? आगमो भावज्झत्रणा) आगम से भाव क्षपणा उसे कहते हैं कि ( जाणए उव,) जो क्षपणा शब्द के अर्थ को उपयोग पूर्वक जानता हो, ( से से आगमश्रो भावज्झवणा ।) यही आगम से भाव क्षपणा है। (से किं तं णोनागमओ भावझवणा ? ) नोआगम से भाव क्षपणा किसे कहते हैं ? ( णीभागमो भावझवणा) नोआगम से भाव क्षपणा (दुविहा परणात्ता,) दो प्रकार से प्रतिपादन की गई है, (तं जहा.) जैसे कि-(पसत्या य) प्रशस्त और (अपसत्या य,) ? अप्रशस्त (से किं तं पसस्था ?) प्रशस्त किसे कहते हैं ? (पसत्था) प्रशस्त क्षपणा (तिविहा पएणचा,) तीन प्रकार से प्रतिगइन की गई है, (तं जहा.) जैसे कि-(नाणज्झवणा) ज्ञान क्षपणा दिसणज्झत्रणा) दर्शन क्षपणा (चरित्तझवणा,) चारित्र क्षरणा, (से तं पस- स्था ।) यहो प्रशस्त क्षपणा है। (से किं तं अपसत्था १) अप्रशस्त किसे कहत हैं ? (अपसत्था) अप्रशस्त (बउबिहा पएणचा,) चार प्रकार से प्रतिपादन की गई है, (तं जहा-) जैसे कि-(कोहझवणा', क्रोध क्षपणा (माणज्झत्रणा) मान क्षपणा (मायज्झत्रणा ) माया क्षरणा (लोहकवणा.) लभ तपणा (से तं अपसत्या, ) यही अप्रशस्त क्षपणा है। ( से तं नोनागमो भावज्झत्रणा) और यही नोआगम से भाव क्षपणा है, (से तं भावझवणा) यही भाव क्षपणा है, (मे तं ओहनिष्फरणे ।) और यही ओघनिष्पन्न है। भावार्थ -क्षपणा उसे कहते हैं जिससे कर्म की निर्जरा हो। इसके चार भेद है, नामक्षरणा, स्थापनाक्षपणा, द्रव्यक्षपणा और भावक्षपणा । नाम और स्थापना पूर्ववत् जानना चाहिये । तथा--अशरीर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्य २८६ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] आय के समान जानना चाहिये। भाव क्षपणा के दो भेद है, आगम से और नो अागम से। आगम से भाव नपणा उसे कहते हैं जो क्षपणा शब्द के अर्थ को उपयोग पूर्वक जानता हो । तथा-नोआगम से भाव क्षपणा दो प्रकार की है, प्रशस्त और श्नप्रशस्त । प्रशस्त क्षपणा उसे कहते हैं जो ज्ञान दर्शन चारित्र रूप हो, और अप्रशस्त उसे कहते हैं जो क्रोध मान माया लोभ कप हो। इसी को नो. आगम से भाव क्षपणा, तथा यही भाव क्षपणा, और यही क्षपणा है। इस तरह पूर्वोक्त सभी अधिकार श्रोधनिष्पन्न निक्षेप के हैं। इसके बाद नामनिष्पन्न निक्षेप का स्वरूप प्रतिपादन किया जाता है- नामनिवन्त निक्षेप। से कि त नामनिप्फरणे ? सामाइए, से समासओ चउठिवहे पण्णत्ते, तजहा-णामसामाइए ठवणासामाइए दव्वसामाइए भावसामाइए । णामठवणाओ पुव्वं भणि. आओ । दव्वसामाइएवि तहेव जाव, सेत भवियसरीर- दव्वसामाइए। से किं तं जाणयसरीरभवियसरीरवहरिते दव्वसामा- इए ? व्वपत्तयपोत्थयलिहियं । सेत जाणयसरीरभविय- सरीरवइरित्ते दव्वसामाइए । सेत नोशागमओ दव्वसा- माइए । से त दव्वसामाइए । से कि त भावसामाइए ? दुविहे पण्णत्ते, तजहा आगमत्रो य नोआगमो य । से कि तं आगमओ भावसामाइए ? जाणए उवउत्ते, से तं आगमओ भावसामाइए। से कि तं नोआगमओ भावसामाइए ? जस्स सामाणिओ अप्पा, संजमे णियमे तवे । तस्त्र सामाइयं होइ, इइ केवलिभासियं ॥१॥ । 4.५. क 64 - ...
२८७ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] जो समो सव्वभूएसु, तसेसु थावरेसु य। तस्स सामाइयं होइ, इइ केवलिभासिय ॥२॥ जह मम ण पियं दुक्खं, जाणिय एमेव सव्वजीवाणं । ण हणइ न हणावेइ अ, सममणति तेण सो समणो णस्थिय से कोई वेसो, पिओ य सव्वेसु चेव जीवेसु। एएण होइ समणो, एसो अन्नोऽवि पन्जाओ ॥४॥ उरगगिरिजलणसागरनहत जतस्गरणसमोअजो होइ। भमरमियधरणिजलरुहरविपवणसमो असो समणो ५ तो समणोजइ सुमणो,भावेण य जइ ण होइ पावमणो सयणे अ जणे य समो, समोअ माणावमाणेसु ॥६॥ से तनोत्रागमओ भावसामाइए, से तं भावसा- माइए. से ते सामाइए, से तं नामनिष्फएगा। पदार्थ (से किं तं नामनिप्फरणे ?) नामनिष्पन्न निक्षेप किसे कहते हैं ? (नामनि- प्फरणे) पूर्व कथित जो अक्षीणाद्यध्ययन के नाम से विशेषतया निष्पन्न हुए हों उस को नामनिष्पन्न निक्षेप कहते हैं, जैसे कि ( सामाइए, ) सामायिक, (से) वह (समासो) संक्षेप से ( चडब्बिहे पण्णत्ते,) चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (त जहा.) जैसे कि-(सामाइए) नाम सामायिक (ठवणासामाइए) स्थापना सामायिक (दव्वसामाइए) द्रव्य सामायिक और (भावसामाइए ।) भावसामायिक । (णामठवणाओ) नाम और स्थापना (पुव्वं भणिआयो ।) पूर्व वर्णन की गई है। (दव्वसामाइएवि) द्रव्य सामायिक भी (तहेव ।) उसी प्रकार जानना चाहिये । (जाव) यावत् (से त भविश्न- सरीरदव्वसामाइए ।) यही भव्य शरीर द्रव्य सामायिक है। (से किं ते जाणगसरीर भविय० ?) ज्ञशरीर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्य सामा- यिक किसे कहते हैं ? (जाणय०) ज्ञशरीर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्य सामायिक उसे कहते हैं (पत्तयपोत्थयलिहियं,) जो पत्र अथवा पुस्तक रूप लिखा हुआ हो, (से तं जा- यसरीर०) यहो ज्ञशरीर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्य सामायिक है, (से तं गोश्रागमश्री दव्व०) यही नोआगम से द्रव्य सामायिक है, (से तं दवसामाइए ।) और यही द्रव्य [ उत्तरार्धम् ] (से किं तं भावसामाइए ?) भाव सामायिक किसे कहते हैं ? (भावसामाइए) जो भात्मिक सामायिक हो उसे भाव सामायिक कहते हैं, (दुविहे परमात्ते,) दो प्रकार से प्रतिपान की गई है, तं जहा.) जैसे कि-(प्रागमत्रो अ) आगम से और नोभागमओ य।) नोमागम से। (से किं तं श्रागमश्रो भावसामाइए ?) भागम से भाव सामायिक किसे कहते हैं ? (श्रागमत्रो भावसामाइए) भागम से भाव सामायिक उसे कहते हैं जो सामायिक का शब्दार्थ ( जाणए उवउत्ते, . उपयोग पूर्वक जानता हो, ( से तं पागमो भात्र सामाइए । ) यही आगम से भाव सामायिक है। ( से किं तनोआगमो भावसामाइए ?) नोआगम से भाव सामायिक किसे कहते हैं ? (नोआगमन्नो भावसामाइए) नोआगम से भाव सामायिक निम्न प्रकार जान- ना चाहिये । (जस्स) जिसको (* सामाणिो अप्पा) आत्मा सब प्रकार के व्यापार से निवृत्त होकर (संजमे) मूल गुण रूप संयम में (पियम) उत्तर गुण रूप नियम में और (तवे) अनशनादिक तप में हो, (तस्स) उसकी (सामाइय) सामायिक (होइ) होती है, (इइ) इस प्रकार (केवलिभासियं ॥१॥, केवलि भगवान ने कहा है । (जो समो सवभूएसु) जिसका सब जोवों में सम-मैत्री भाव है, (तसेसु थावरेसु य।) त्रस और स्थावरों में । (तस्स) उसकी (सामाइयं) सामायिक (भाइ) होती है (इइ केवलिभासियं ॥२॥) इस प्रकार केवलि भगवान् ने कहा है। (जह) जैसे (मम) सुझको (ण पिनं दुक्खं) दुःख प्रिय नहीं है (जाणिय एमेव) इस प्रकार जान कर (सव्व जीवाण।) सब जीवों का, (न हणइ) न मारता है (न हाणवेइ य) न मरबाता है (सम मणइ) समान मात्रता है (तेण) इस कारण से (सो समणो ॥३॥) वह श्रमण साधु है। । * सामानिकः-सन्निहित श्रात्मा सर्वकालं व्यापारात् । + जीवेषु च समत्वं संयमसानिध्यप्रतिपादनात पृर्वश्लोकेऽपि लभ्यते, किन्तु जीवदयामूल- वामस्य तत्प्राधान्यख्यापनाय पृथगुपादानमिति । चशब्दात घ्नताश्चन्यान समनुजानीत-च शब्द से हिंसा करते हुए को अच्छा न समझे। तदेवं सर्वजीवेषु समत्वेन सममणतीति 'समण' इत्येकः पर्यायो दर्शित, एवं समो मनो- अस्येति समना इत्यन्यो ऽपि पर्यायो भवत्येवेति दर्शयन्नाह । अर्थात समभावपन से जो सब जीवों को समान मानता है, वही 'श्रमण है, यह भी एक व्युत्पत्ति उक्त शब्द की होती है, इसी प्रकार जिसका मन समान है, वही 'श्रमण' है, यह भी इस Mmmmm marumANaMALANI [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] २८ (णस्थि य से कोइ वेसो) किसो के साथ उसका द्वेष नहीं है (पिनो य सव्वेतु चेव जीवेसु) और सब जीवों के साथ प्रेम है। एएए) इस कारण (होइ समणो) श्रमण होता है (एसो) यह (अपणोऽवि पजाम्रो ॥ ४ ॥) भी दूसरा पर्याय है ॥ ४ ॥ अब अन्य प्रकार से साधु की उपमा घटाते हैं। *(इरग) सर्पके समान गिरि) पर्वत के समान (जणय) अग्नि के समान (सागर) समुद्र के समान (नहतल ) आकाश के तुल्य ( तकारासमो अ जो होइ । ) वृक्षों के समूह के समान जो हो । और (भमर) भ्रमर समान (भिय) मृग समान (धरणि) पृथि. यो समान (जलरुह) कमल समान (रवि) सूर्य समान (पवणसमो अ) और पवन के समान हो (सो) वही (समणी ॥ ५॥) श्रमण है ।। ५॥ इस लिये 'श्रमण वही हो सकता है जिसका शोभन मत है। इसी का आगे वर्णन किया जाता है- (तो समणो) इस लिये वही श्रमण (जइ सुमणो) यदि शुभ मन हो (भावेणा य) और भाव से (जइ) अगर (न होइ पात्रमणो।) पाप मन वाला न हो, (सयणे य जणे य समो) खजन और सामान्य मनुष्यों में समान (समो अ माणावमाणेसु॥६॥) मान और * अहि के समान जैसे सर्प स्वयं घर नहीं बनाता लेकिन दूसरों के किये हुए बिल में है, इसी प्रकार साधु भी एक जगह नहीं ठहरते क्यों कि उनके घर तो है ही नहीं, इसी लिये उन्हें उरग - सर्प की उपमा दी गई है। समशब्दः सर्वत्र योज्यते।-सम शब्द का सब जगह सम्बन्ध जानना चाहिये। पर्वत के समान-परीपहों को सहन करने में पर्वत के समान अकम्प । अग्नि के समान--जैसे अग्नि तृण काष्ठ आदि से तृप्त नहीं होती, इसी प्रकार साधु भी सूत्रार्थ से तृप्त नहीं होते। सागर के समान-जैसे समुद्र अपनी मर्यादा को नहीं छोड़ता, इसी प्रकार साधुभी ज्ञानादि रत्नयुक्त होने से अपनी मर्यादा उल्लंघन नहीं करते अर्थात गम्भीर रहते हैं। आकाश के समान-जैसे कि श्राकाश का तलिया सब जगह से आलम्बन रहित है, इसी प्रकार साधु होते हैं अर्थात वे कोई आश्रय नहीं लेते। वृक्षों के समूह समान-जैसे वृक्षों के सुख दुःख का विकार नहीं दीखता, इसी प्रकार साधु भी सुख दुःख में विकारवान् नहीं होते। अमर--अनियत यत्ति होने से । मृग-संसार के भय से उद्विग्न | पृथिवी-सव खेद सहन करने से । कमल-जल में रहता हुआ भिन्न है, इसी प्रकार साधु विषय रूपी कीचड़ में लिप्त महीं होते । सूर्य-धर्मास्तिकायादिलोकमधिकृत्याविशेषेण प्रकाशकत्वात्र । पवन-अप्रतिबद्धविहारी रहता । होने से।
। । २६० [ उत्तरार्धम् ] अपमान में समान हो, ( से तं नोागमो भावसा माइए,) यही * नोपागम से भाव- सामायिक है, (से त' भावसामाइए 1) यही भाव सामायिक है (से त सामाइए ।) यही सामायिक है । (से त नामनिप्फन्ने ।) यही नामनिष्पन्न निक्षेप है। भावार्थ-जिस वस्तु को नाम रूप निष्पन्न हुआ हो उसे नामनिष्पन्न निक्षेप कहते हैं, जैसे कि सामायिक । इसके चार भेद हैं- नाम स्थापना द्रव्य और भाव । नाम स्थापना और दव्य सामायिक पूर्ववत् जानना चाहिये । शरीर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्य सामायिक उसे कहते हैं जो पत्र अथवा पुस्तक रूप लिखी हुई हो। इसी को नोआगम से द्रव्य सामायिक अथवा द्रव्य सामायिक कहते हैं। भाव सामायिक के दो भेद हैं,-भागम से और नोागम से । जो सामा. यिक शब्द के अर्थ को उपयोग पूर्वक जानता है उसे पागम से भाव सामायिक कहते हैं। नो आगम से भाव सामायिक निम्न प्रकार जानना चाहिये । जैसे- जिसकी श्रात्मा सब प्रकार के व्यापार से निवृत्त होकर मूलगुण रूप संयम, उत्तर गुण रूप नियम तथा अनशनादिक तप में लीन है, उसी की सामा- यिक होती है, ऐसा केवली भगवान् ने प्रतिपादन किया है ॥१॥ जो त्रस और स्थावर आदि सब प्राणियों को अपने समान मानता है उसी की सामायिक होती है, ऐसा केवली भगवान् कथन किया है ॥२॥ से कि मुझे किसी जीव की हिंसा करने को, करवाने को अथवा करते हए को अनुमोदन करने का दुःख प्रिय नहीं है, इस प्रकार सर्व जीवों को जान कर समान मानता है, इस कारण वह श्रमण है ॥३॥ किसी जीव के साथ द्वष नहीं है बल्कि सभी के साथ प्रीति है, इससे भी वह श्रमण है । यहां दूसरा पर्याय रूप है ॥ ४ ॥ तथा जो सर्प, पहाड़, अग्नि, सागर, आकाश का तलिया, वृक्षों के समूह, * "इह च ज्ञानक्रियारूपं सामायिकाध्ययनं नोभागमतो भावसामायिक भवत्येव, ज्ञानक्रिया- समुदाये श्रागमस्यैकदेशत्तित्वात, नोशब्दस्य च देशवचनत्वाद्, एवं च सति सामायिकवतः साधो. रपीह नोभागमतो भावसामायिकत्वेनोपन्यासो न विरुध्यते, सामायिकतद्वतोरभेदोपचारादिति भावः' अर्थात् यहां पर ज्ञान क्रिया रूप सामायिक अध्ययनको नोआगमसे भावसामायिक जानना चाहिये । क्योंकि ज्ञान और क्रियाएँ गम की एक देश होने से भावसामायिक होती हैं। तथा- नोशब्द देशवाचक है । इसी प्रकार सामायिक करने वाला और साधु दोनों ही को नोआगम से ने । R - । [ उत्तरार्धम्] २६१ भंवर, मृग, पृथिवी, कमल, सूर्य, और पवन इत्यादि उपमाओं के समान होता है वही श्रमण है ॥ ५ ॥ इस कारण वही श्रमण है जिसका शुभ मन है और जो भाव से भी पाप नहीं करता, तथा जिसका स्वजन और सामान्य मनुष्य, तथा मान और अप- मोन में समभाव हो॥६॥ इसी को नोागम से भाव सामायिक कहते हैं। और यही सामायिक है। यही नामनिष्पन्न निक्षेप है। इसके बाद सूत्राल.पकनिष्पन्न निक्षेप इस प्रकार जानना चहिये- सूनालायक निष्पन्न निक्षेप। से कि तं सुत्तालाबगनि फरणे ? इआणि सुत्तालाव- यनिप्फरणं निक्खेवं इच्छावेइ से अ पत्तलक्खणेऽविण णिक्खप्पइ, कम्हा ? लाघवत्थं, अस्थि इओ तइए अणु- ओगदारे अणागमेत्ति,तत्थ णिक्खित्ते इह णिक्खित्ते भवइ, इहं वा णिक्खित्ते तत्थ णिक्खित्ते भवइ, तम्हा इह ण णिक्खिप्पइ तहि चेव निक्खिप्पड़, से तं निक्खेवे । (सू०१५४) पदार्थ-(से किं तं सुतालावगनिष्फरणे ? ) सूत्रालापकनिष्पन्न निक्षेप किसको कहते हैं ? (सुत्तालावगनिष्करणे) 'करेमि भंते सामाइयं' इत्यादि सूत्रालापकों के नाम स्थापनादि भेद भिन्न से जो न्यास है उसे सूत्रालापकनिष्पन्न निक्षेप कहते हैं। (इआणिं) इस समय (सुत्तालावगनिष्फरणं निक्खेव) सूत्रालापकनिष्पन्न निक्षेपकी (इच्छावेइ) इच्छा उत्पन्न होती है, (से अ पत्तलक्खणे ऽवि ) उसका लक्षण प्राप्त होने पर भी (ण णिक्खप्पइ,) निक्षेप * नहीं किया जाता है, (कम्हा ?) क्यों ? (लाघवत्थं) लाघवार्थ होने से ( अस्थि इत्रो तइए ) इसके आगे तृतीय ( अणुअोगदारे) अनुयोगद्वार (अणुगमेत्ति,) अनुगम है (तत्थ णिक्खित्ते) वहां निक्षेप करने से (इहं णिक्खित्ते भवइ,) यहाँ निक्षेप होता है, (इहं वा णिक्खित्ते ) अथवा यहां पर निक्षेप करने से (तत्य सिक्खित्ते भवर,) वहाँ निक्षप होता है, (तम्हा) इस कारण (इहं ण णिक्खिप्पइ ) यहां पर निक्षेप नहीं * सूत्रालापक निक्षेप के द्वारा वणन नहीं किया जाता।
२६२ [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम्] किया जाता (तहिं चेव निक्खिपद) वहां पर ही किया जायगा, (से तं निक्लेवे) यही निक्षेप है। (सू०१५३) भावार्थ-करेमि भंते ! सामाइयं' इत्यादि सूत्रालापकों का नाम स्थाप- नादि भेदभिन्न जो न्यास है उसे सूत्रालापकनिष्पन्न निक्षेप कहते हैं । इस समय यहां पर इस निक्षेप के कहने की इच्छा होती है, लेकिन लक्षण प्राप्त होजाने पर भी नहीं कहा जाता, क्योंकि लाधवार्थ होने ले । इस लिये तृतीय अनुयोग नामक अनुयोगद्वार में वर्णन किया जायगा। वहां पर निक्षेप करने से यहां पर निक्षेप होता है, अथवा यहां पर निक्षेप करने से वहां पर होता है। इस लिये यहां पर नहीं करते हुए वहां पर ही इसको निक्षेप किया जायगा। यहां पर निक्षेप नामक द्वितीय अनुयोगद्वार समाप्त होता है। इसके बाद अब तृतीय अनुयोगद्वार इस प्रकार जानना चाहिये- म अनुगम। से कितअणगमे ? दुविहे पण्णते, त जहा-सुत्ता- णुगमे अनिज्जुत्ति अणुगमे । से कि त निज्जुत्तिअणुगमे ? तिविहे पण्णत्ते, त जहा-निक्लेवनिज्जुत्तिअणुगमे उबग्घायनिज्जुत्तिअणुगमे सुत्तप्फासिमनिज्जुत्तिअणुगमे। से किंत निक्खेवनित्तिअणुगमे ? अणुगए, त निक्लेवनिज्जुत्तिअणुगमे । से किं त उवग्यायनिज्जुत्तिअणुगमे ? इमाहिं दोहिं मूलगाहाहि अणुगंतब्बो, त जहा- उद्देस १ निदेसे अरनिग्गमे३ खेत्त४ काल५ पुरिसे य६ । से +सूत्र का उच्चारण किये बिना सूत्रालापक नहीं हो सकता, इस लिये यहां पर सूत्र का उधारण न होने से वर्णन नहीं किया गया। सिर्फ निक्षेप का सामान्य भेद होने से नाम मात्र yer [ उत्तरार्धम् ] कारण७ पञ्चय८ लक्षणह, नए। समोसारणाणु. मए११ ॥१॥ कि १२ कइविहं १३ कस्स१४ कहि १५,केसु१६ कह१७ किच्चिरं हवइ कालं१८ । कइ१६ संतर२० मविरहियं २१. भवा२२ गरिस२३ फासण२४ निरुत्ती२५ ॥ २ ॥ से त उवग्यायनिज्जुत्ति- अणुगमे। पदार्थ-(से किं ते अणुगमे ?) अनुगम किसे कहते हैं ? (अणुगमे) जो सूत्र के अनुकूल व्याख्या हो, अथवा जिसके द्वारा स्त्र को व्याख्या की जाती हो या गुरु वाचनादि देते हों उसे अनुगम कहते हैं, और वह (दुविहे परणत्ते,) दो प्रकार से प्रति- पादन किया गया है, (तं जहा.) जैसे कि- (सुत्ताणुगमे अ) सूत्रानुगम, जो सूत्र का व्याख्यान रूप हो और (निज्जुत्तिअणुगमे अ!) नियुक्त्यनुगम । (से किं तं निज्जुत्तिअणुग्मे ?) नियुक्त्यनुगम किसे कहते हैं ? (निज्जुचिअणुगम) जिम नियुक्ति की व्याख्या को जाय उसे * नियुक्त्यनुगम कहते हैं, और वह (तिविहे परणत्ते,) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, (जहा.) जैसे कि-(निक्वेवनि- ज्जुत्तिणु गमे) निक्षेप नियुक्त्यनुगम (उपग्यायनिज्जुत्तिणु गमे) उपोद्धात नियुक्त पनुगम, और । सुत्तप्कासिनिजुचिअणुगमे ।। सूत्रस्पशिक नियुक्त्यनुगम । से किं तं निखेवनिज्जुतिअणुगमे १, निक्षपनियुक्तपनुगम किसे कहते हैं ? (निक्खेवनिज्जुत्तिणुगमे) निक्षेपादि द्वारा जिस नियुक्ति को व्याख्या की जाय उसे नियुक्त्यनुगमश्च-नितरां युक्ताः-सूत्रेण सह लोलीभावेन सम्बडा नियुक्ता अर्थास्तेषां युक्ति:-स्फुटरूपतापादनम् । एकस्य युक्तशब्दस्य लोपानियुक्ति:-नामस्थापनादिप्रकारैः सूत्रविभन- नेत्यर्थः, तद्पोऽनुगमस्तस्य वा अनुगमो-व्याख्यानं नियुक्त्यनुगमः । अर्थात् नामस्थापनादि से अत्यन्त ही सूत्र के साथ अर्थ का जो सम्बन्ध है उसकी व्याख्या करना या नामस्थापनादि द्वारा विस्तारपूर्वक विभागतया जो सूत्र के व्याख्यान की पद्धति हो, उसी को नियुक्त्यनुगम कहते हैं। अर्थात् जो नियुक्ति सूत्र को स्पर्श करती हो उसे सूत्रस्पर्शिकनियुक्त्यनुगम कहते हैं । सूत्र स्पृशन्तीति सूत्रस्पर्शिका सा चासो नियुक्तिश्च सूत्रस्पर्शिकनियुक्तिः । - । २६४ [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] निक्षपनियुक्त्यनुगम * कहते हैं । ( अणु गए) पूर्ववत् जानना चाहिये । (से तं निक्षेत्र निज्जुत्तिश्रणुगमे ।) यहो निक्षेप नियुक्त्यनुगम है। (से कि तं उवग्यायनिज्जुत्तिअणु गमे ? ) उपोद्धात नियुक्त्यनुगम किसे कहते हैं ? ( उबग्चायनिज्जुत्तिअणुगमे ) व्याख्या किये हुए सूत्र की व्याख्या विधि को समीप करना उसे उपोद्धात कहते हैं उसी की नियुक्ति का व्याख्यान करना उसे उपोद्धात नियु क्ति कहते हैं। इसका स्वरूप (इमाहिं) इन (दोहिं मुलगाहाहिं ) दो मूलगाधाओं से (अणुगंतव्यो,) जानना चाहिये, (तं जहा.) जैसे कि- (उह से निह से अ२, निग्गमे३ खेत्त४ काल'५ पुरिसे य६ । कारण पञ्चयो८ लक्खण ६, नए१० समोआरणाणुमए११ ॥१॥ किं१२ कइविहं १३ कस्स१४ कहिं१५, केसु१६ कह१७ किञ्चिरं हवा कालं१८ ! कइ१६संतर२० मविरहिय२१, भवा२२ गरिस२३ फासण२४ निरुत्ती२५ ॥२॥) उद्दश १, निर्देश २, निर्गम ३, क्षेत्र ४, काल ५, पुरुष ६, कारण ७, प्रत्ययम, लक्षण ६, नय १०, समवतार में अनुमत होना ११, ॥ १ ॥ किसको १२, कितने प्रकार को १६, किसकी १३, कहाँ पर १५, किस में १७, किस प्रकार १७, कितने समय तक काल होता है १८, कितनी १६, अन्तर सहितपना २०, अविरहपन २१, भव २२, आकर्ष २३, स्पर्शना २४, और निरुक्ति २५, ॥२॥ (से तं उवग्यायनिज्जुचिअणुगमे ।)यहाँ उपोद्धातनियुलियनुगम है । भावार्थ-जो व्यवस्था सूत्र के अनुकूल होतो है, उसे अनुगम कहते हैं। उसके दो भेद हैं, जैसे कि-सूत्रानुगम और नियुक्त्यनुगम । जिस सूत्र के साथ अर्थ को अत्यन्त निकलाना हो पश्चात् उसकी व्याख्या की जाय उसे नियु: त्यनुगम कहते हैं । वह तीन प्रकार का है, जैसे कि-निक्षेप निर्युत्तयनुगम १, उपोद्घात नियुक्त्यनुगम २ और सूत्रस्पर्शिकनियुत्तयनुगम ३ । निक्षेपनियुत्तनुगम पूर्व में प्रतिपादन किया गया है, और उपोद्घात नित्यनुगम उसे कहते हैं जो सूत्र से पूर्व अध्याय फिर उद्देश फिर सूत्र की व्याख्या की जाय जिससे कि , * अत्र व प्रागावश्यकतामायिकादिपदानां नामस्थापनादिनिक्षेपद्वारेण यद्वयाख्यानं कृतं तेन निक्षेपनियुक्त्यनुगमोऽनुगतः-प्रोक्तो द्रष्टव्यः । अर्थात् पूर्व आवश्यक और सामायिकपदों की नामस्थापनादि निक्षेप द्वारा जो व्याख्या की गई है उसे ही निक्षेप नियुक्त्यनुगम जानना चाहिये। + उपोडननं-व्याख्येयस्य सूत्रस्य व्याख्याबिधिसमीपीकरणमुगोदातस्तस्य तद्विषया वा नियक्तिस्तहपस्तस्य वा अनम: पोटानि.
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[उत्तरार्धम]
२६५
सूत्र का बोध सरल हो । उपोद्घात नियुक्त्यनुगम का स्वरूप यह है कि उसके
२५ लक्षण हैं, जो प्रश्नोत्तर के रूप में नीचे दिये जाते हैं-
(१) उद्देश किसे कहते हैं ? जिसका उद्देश किया जाय अथवा जो सा.
मान्य नाम रूप हो उसे उद्दश कहते हैं। जैसे कि-अध्ययन ।
(२) निर्देश किस को कहते हैं ? जिसका निर्देश किया जाय अथवा जो
विशेष अभिधान पूर्वक हो, जैसे कि सामायिक ।
(३) निर्गम किसे कहते हैं ? जो वस्तु जहां से निकली हो उसे निर्गम
कहते हैं, जैसे कि-श्रावश्यक से सामायिक निकली है।
(४) किस क्षेत्र से सामायिक की उत्पत्ति हुई है ? व्यवहार नय से समय
क्षेत्र से।
(५) * किस काल में सामायिक की उत्पत्ति हुई है ?
(६) किस पुरुष से सामायिक शब्द निकला है ? सर्वज्ञ पुरुषों ने सामा-
यिक का प्रतिपादन किया है, अथवा व्यवहार नय से भारत वर्ष की अपेक्षा
श्रीऋषभदेव भगवान् ने सामायिक चारित्र प्रतिपादन किया है, लेकिन
एवम्भूत
नय से सामायिक चारित्र अनादि है।
(७) किस कारण से गौतमादि गणधरों ने सामायिक को श्रवण किया
है ? संयति भाव की सिद्धि के लिये।
(E) किस प्रत्यय से भगवान् ने इसका उपदेश दिया है ? और किस
प्रत्यय से गणधरों ने इसका श्रवण किया है ? : केवल शानसे भगवान् ने सामा-
* सूत्रालापकनिष्पन्न निक्षेप का वर्णन आगे किया जायगा । आवश्यक सूत्र में कहा
है-"वइसापसुहएकारसीए पुवाहदेसकालम्मि । महसेणवणु जाणे अणंतर परंपर सेस" वैशाख-
शुक्लैकादश्यां पूर्वाण्हदेशकाले । महासेनवनोद्याने अनन्तरं परम्परं शेषम् ।
अर्थात् अनन्तर, परम्पर और शेष, तीनों प्रकार की, वैशाख शुक्ल ग्यारस के दिन महासेन
नामक बन के उद्यान-बगीचे में मध्यान्ह के समय की।
+ "गोयमाई सामाइयं तु किं कारण निसामिति ।"-गौतमादयः सामायिकं तु किं कारणं
निशाम्यन्ति।
"केवलनाणित्ति अहं अरिहा सामाइयं परिकहेइ । तेसिपि पचो खलु सव्वन्नु तो
निसामिति ॥१॥" केवलज्ञानीत्यहमहन् सामायिक परिकथयति । तेषामपि प्रत्यया खलु सर्वक्षस्ततो
निशाम्यन्ति ॥१॥
S [ श्रोमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] यिक चारित्र प्रतिपादन किया है और उसी प्रत्यय से भव्य जीवों ने श्रवण किया है। (8) सामायिक का लक्षण क्या है ? * श्रद्धा, विज्ञान, विरति और मिश्र लक्षण होते हैं। (१०) नयों के मत से सामायिक कैसे होती है ? व्यवहार नय से पाठ रूप सामायिक होती है, तीन शब्द नयों से जीवादि वस्तु का ज्ञान होना पाठ रूप सामायिक होती है। (११) नयों में सामायिक का लमवतार कैसे होता है ? + अनुपयुक्त सामायिक का समवतार नैगम नय और व्यवहार नय से अनेक द्रव्य रूप है, नयसे अनुपयुक्त जितने सामायिक के द्रव्य हो उनका एक ही द्रव्य मानते हैं । तीनों शब्द नयों से अनुपयुक्त रूप सामायिक कोई वस्तु नहीं है, लेकिन उपयोग रूप सामायिक तीनों नयों से वस्तु रूप है। (१२) सामायिक क्या वस्तु है ? + जीव का गुण है । (१३) सामायिक कितने प्रकार से प्रतिपादन की गई है ? तीन प्रकार से जैसेकि- संग्रह और ऋजुसूत्र । । * सम्यक्त्व सामायिक का तत्त्वों पर श्रद्धा रखना, श्रुत सामायिक का जीवानिकों का परिज्ञान होना, चारित्र सामायिक का सावध विरति रूप और देशविरति सामायिक का विस्त्य- विरति रूप है । तत्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् | जोबा जीवाभव०-तत्रार्थसूत्र अ० १, ०२-३ । श्रागम में भी कहा है--'सईसण जाणणा खलु विरई मीसं च लक्वणं कहए -श्रद्धानं विरतिमिदं च लक्षणं कथयति । + "तबसंजमो अणुमओ, निग्मथं पक्यणं च क्वहारो । सदुज्नुसुयाणं पुगा निवारणं मो चेव ॥ १॥-तपः संयमोऽनुमतो नैय॒त्थ्यं प्रवचनं च व्यवहारः । शब्द सूत्राणं पुनर्निर्माण यमश्चैत्र । अर्थात् व्यवहार नय से तपः, संयम, निर्ग्रन्थ और प्रवचन रूप सामायिक होती है, खेकिन शब्द और ऋजुसूत्र नय के मत से संयम और मोक्ष रूप सामायिक होती है । + 'जीवो गुणपडिबन्नो यस्स दव्वट्टियस्स सामाइय-जीवो गुणप्रतिपन्नो नयस्य द्रव्या- किस्य सामायिकम् । “सामाइयं च तिविहं सम्मत्तसुयं तहा चरित्तं च"-सामायिकं च विविध म्यक्त्वं श्रुतं तथा चरित्र च । 'जस्स सामाणिो अप्पा'-यस्य सामानिकः (सन्निहित) आत्मा । सेहिसाकालगभवियसरिणउस्सासदिहिमाहारे"-क्षेत्रदिकालगतिमव्यसंझ्युच्छवामप्टमाद्वारः।
[ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् २९७ जैसे कि-सम्यवसामायिक, श्रुतसामायिक और चारित्रसामायिक । (१४) किस जीव को सामायिक होती है ? जिसकी आत्मा सब प्रकार के व्यापार से निवृत्त हुई हो अर्थात् समभाव युक्त हो। (१५) सामायिक कहां कहां होती है ? क्षेत्र, दिशा, काल, गति, भव्य, संची, सम्यग्दृष्टि, श्वासोच्छवास और पाहारक आदि अनेक हैं। (१६) किस किस में सामायिक होती है ? सब द्रव्यों में होती है, लेकिन भुत सामायिक सब द्रव्य और चारित्र सामायिक सब पर्यायों में नहीं होती, देशविरति में दोनों का ही निषेध किया गया है। (१७) किसको सामायिक हो सकती है ? मोनुष भव क्षेत्र, शाति, कुल, रूप, आरोग्य, आयु और बुद्धि, ये सामायिक के कारण हैं * | (१०) किनने काल तक सामायिक रह सकती है ? ६६ सागर पर्यन्त । लेकिन चारित्र सामायिक देश ऊन पूर्व क्रोड़ वर्ष तक होती है । (१६) सामायिकधारी वर्तमान काल में एक साथ कितने होते हैं ? सम्य- व देश बेर त सामायिक वाले पल्य के असंख्यातवें भाग होते हैं (२०) सामायिक का अन्तर काल कितना होता है ? एक जीव की अपे. क्षा अघन्य से अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट से अर्द्ध पुद्गल परावर्त देशोन अन्तर काल होता है। (२१) बिना अन्तर कितने काल तक सामायिक ग्रहण करने वाले होते हैं१ सम्यचव और श्रुत सामायिक वाले प्रावलिका के असंख्यातवे भाग में होती है। भाउ समय तक चारित्र सामायिक वाले होते हैं, और जघन्य से दो समय तक ही होते हैं। (२२) कितने भाव पर्यन्त सामायिक रह सकती है ? पल्य के असंख्या- तभाग मात्र में सम्यत्तव देशविरति होती है। पाठ भाव पर्यन्त चोरित्र सामा- यिक होती है, और अनन्त काल तक श्रुत सामायिक होती है। । "सव्वगयं सम्मत्तं, सुय चरित्ते न पजवा सब्बे । देसविरई पडुच्चा दुराहवि पडि सेहणं कुजा ॥१॥"-सर्वगतं सम्यक्त्वं श्रुते चारित्र न पर्यवः सर्वे । देशविरतिं प्रतीत्य द्वयोरपि प्रतिषेधनं कुर्याद ॥१॥ *"माणुस्स खेत्त जाई, कुल रुवारग पाठयं बुद्धि।"-मानुष्यं क्षेत्र · जातिः, कुलं म्पमारोग्यमायुबुद्धिः।
गरि (2) होते सामा सामा (१ मायिक ह और द्रव्य ( १ २१८ [उत्तरार्धम् ] (२३) सामायिक के आकर्ष एक भव में या अनेक भवों में कितने होते १ अर्थात् एक भव में वा अनेक भवों में सामायिक कितनी बार धारण की जाती हैं ? तीनों सामायिक का सहस्रपृथत्तत्र और देशविरति वालों का शत पृथत्व एक भव के आकर्ष होते हैं । जघन्य दो वार, उत्कृष्ट पृथक्त्व सहस्रवार आकर्ष अनेक भवों की अपेक्षा से होते हैं। (२४) सामायिक वाला कितने क्षेत्र तक स्पर्श करता है ? सम्यक्त्व और चारित्र के साथ जीव उत्कृष्ट से सर्व लोक का स्पर्श करता है, जघन्य से लोक के सप्त, दश या पांच श्रुत और देशविरति सामायिक का असंख्येयक भाग को स्पर्श करता है। (२५) सामायिक की निरुक्ति क्या है ? जो निश्चित उक्ति-कथन होती वही निरुक्ति होती है। इस लिये सम्यग दृष्टि,मोह से रहित, शुद्ध स्वभाव वाले, दर्शनबोधी, पाप से रहित इत्यादि सामायिक की निरुक्ति है, अर्थात् सा- मायिक का जो पूर्ण वर्णन है,वही सामायिक की निरुक्ति होती है । इस प्रकार संक्षप से उपोद्घात निरुक्ति का वर्णन किया गया है। विस्तार पूर्वक आवश्यक निरुक्ति टीका से जानना चाहिये । इस प्रकार दो गाथाओं का संक्षेप अर्थ है। विस्तृत अर्थ अन्य ग्रन्थों से जानना चाहिये। उपोद्घात नियुक्ति का सारांश इतना ही है कि-अध्ययन का सर्व सारांश प्रथम ही अवगत करना चाहिये । वह सूत्रस्पर्शिक नियुक्ति पूर्वक होता है, इस लिये अब सूत्रस्पर्शिक नियुक्ति का स्वरूप जानना चाहिये । उस में यद्यपि पूर्व सूत्रानुगम प्रतिपादन कर पश्चात् सूत्रस्पर्शिक नियुक्ति वर्णन की गई है, तथापि यहां पर नियुक्ति के संघात होने से ही दिखलाई जाती है, इस लिये कोई दोषापत्ति नहीं है। सूचस्पनिक नियुक्ति । 4 से कि त सुत्तप्फासियनिज्जुत्तिमणुगमे ? सुत्तं उच्चारअव्वं अक्खलिअं अमिलि अवच्चामेलिनं पङि- पुण्णं पडिपुण्णघोसं कंटोदुविप्पमुक्कं गुरुवायणोवगयं, तो तत्थ णजिहिति ससमयपयं वा परसमयपयं वा बंधपयं वा जवषयं वा सामाइयषयं वा खोसामाइयपय वा, तो (१ । सेकि- বিমান নিয়ৰি সে २६६ (अहिगया) पूरे जाने हुए (भवंति होते हैं और (केइ) कचिद् (अत्याहिगारा) अर्थाधि- [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] हिगारा अहिगया भवति, केइ अत्थाहिगारा अहिगया भवंति, ततो तेसि अणहिगयाणं अहिगमट्टयाए पदं प- देणं वन्नइस्सामि। संहिया य पदं चेव, पयत्थो पयविग्गहो। चालणा य पसिद्धी य, छव्विहं विद्धिलक्खणं ॥शा से त सुत्तप्फासियनिज्जुत्तिअणुगमे, से त निज्जुः त्तिअणुगमे, से त अणुगमे [सू० १५५] पदार्थ-(से किं तं सुतप्फालियनिज्जुत्तिअणुगमे ?) सूत्रस्पर्शिकनियुक्त्यनु- गम किसे कहते हैं ? सुतप्काप्तिअनिज्जुत्ति अणुगमे । जो नियुक्ति व्याख्यान रूप सूत्र को स्पर्श करती हो उसे सूत्रस्पर्शिकनियुक्त्यनुगम कहते हैं, जैसे कि-(सुख- उच्चारयव्वं ) सूत्र का उच्चारण करना चाहिये (अक्खलिय) अस्खलित (अमिलिय) परस्पर मिले हुए वर्ण न हों ( अबच्चामेलिनं ) समाप्त सम्बन्धी सूत्रों के पाठ सहित हों (पडिपुरणं) प्रतिपूर्ण हो (पडिपुराणघोस) प्रतिपूर्ण घोष हो (कंठोट्ठविप्पमुस्क) कंठ अलग हो (गुरुवायगोवगयं ) गुरु को वाचना से उपगत-- प्राप्त हुआ हो ( तो तत्थ ) तत्पश्चात् ( णजिहि ति ) जाना जायगा कि यह (ससमय पर्य वा) जीवादि पदार्थों का प्रतिपादक रूप स्वसमय का पद है, अथवा (परसमयपयं वा) ईश्वरादि को प्रतिपादन किया हुआ परसमय पद है, या (वंध मयं वा) पर समय का पद मिथ्यात्व रूप होने से बंध पद है, या (मोक्खपयं वा) मोक्षपर अर्थात् सद्धोध का कारण कर्म क्षय के करने वाला मोक्ष पद है, या (सामाइयपयं वा) सामा यिक का प्रतिपादन करने वाला सामायिक पद है अथवा गोसामाइयपयं वा ) सामा- यिक से व्यतिरिक्त नारक तिर्यगादि का बोधक नोसामायिक पद है अथवा (तो तम्मि) तत्पश्चात् सूत्र के (उच्चारिए समाणे) उसके समान उच्चारण होने से (केसि च णं भगवंताणं) कितनेक भगवन्तों के साधुओं के (केइ अत्याहिगारा) कितनेक अधिकार कार (अणहिगया) नहीं जाने हुए (अवंति) होते हैं, (तो तेसिं अणहिगयाणं ) तत्पश्चात अन्ये तु व्यचक्षते-प्रकृतिस्थित्यनुभावप्रदेशलक्षणभेदभिन्नस्य बन्धस्य प्रतिपादकं पदं बन्धपदम्।
३०० स ।द्र हीं [ उत्तराधम्] उन नहीं जाने हुए को (अहिगमणट्टाए) जानने के लिये ( पदं पदेणं ) पद पद से वन्नइस्सामि) वर्णन-व्याख्या करूँगा अर्थात् पद २ की व्याख्या करूंगा। * संहिया य) जैसे सहिता-अस्खलितपदों का उच्चारण करना यथा “करोमि भयान्त सामायिकम्(पदं चेव) और पद से जैसे 'करोमि द्वितीय पद है । सामायिकम् तृतीय पद है, तृतीय भेद में (फ्यथो) पदार्थ पदों का भिन्न २ अर्थ करना, (पविग्गही) पद विग्रह अर्थात् पदों का समास करना--जो समासान्त पद हों उन्हें समासान्त ही कहना चाहिये (चालणा य) और चालना-सूत्र के अर्थ जानने की इच्छा से युक्ति का प्रकाश करना उसे चालना कहते हैं, ( पसिद्धी य ) और प्रसिद्धि-प्रथम सूत्र अर्थ में शंका दिखलाकर फिर पंचावयव उस शंका का समाधान करना उसे प्रसिद्धि प्रत्य- बस्थान कहते हैं, इस लिये (छव्विहं लक्षणं विडि) षट् प्रकार के लक्षण जानना, इस प्रकार सूत्र की व्याख्या करने से सूत्रानुगम की पूर्ति हो जाती है, (मे तं मुत्तप्फासिय- निज्जुतिअणुगमे ।) यही पूर्वोक्त सूत्रस्पर्शिकनियुक्त्यनुगम है, और ( से तं निज्जुक्तिअणु गमे) यही नियुक्त्यनुगम, है, ( से तं ऋणुगमे । ) तथा यही अनुगम की व्याख्या है। भावार्थ-सूत्रस्पर्शिकनियुक्ति अनुगम उसे कहते हैं जो सूत्र अस्था- लित अमिलित अन्य सूत्रों के पाठों से अनलंकृत, प्रतिपूर्ण, प्रतिपूर्ण धोष, कंठ और पोष्ठों से विप्रमुक्त और गुरु के मुख से ग्रहण किया हुआ-उच्चारण किया गया हो । क्यों कि- अप्पगंथमहत्थे, बत्तीसादोषविरहियं जंच। लक्खणजुत्त सुत्त, अहि य गुणेहि उववेयं ॥१॥ अर्थात् जो अल्प ग्रन्थ और महार्थ युक्त (समाहार द्वन्द्व करने से इस शब्द की सिद्धि होती है, जैसे कि-उत्पादध्ययध्रौव्ययुक्त सत् इत्यादि सूत्र में ) हो, ३२ दोषों से रहित हो, आठ गुण सहित और लक्षण युक्त हो, वह सूत्र है, जैसे कि- अलियमुवधायजणयं, निरस्थयमवत्थयं छलं दुहिलं । निस्सारमहियंमूणं, पुणरुत्तं वायमजुत्तं ॥१॥ जैसे aasanta विति * हितते वा । शा० । अ० २ । पा० २ । सू० ७१ । समः हित्तततयोरुचरपदयोलुंगवा ----निशिश नित्यं लक व्यवस्थितविभाषा- , . [श्रीमदनुयोगद्वारसुत्रम् ] कमभिन्नवयणभिन्न विभत्तिभिन्नच लिंगभिन्न च । श्रणभिहियमपयमेव य, सहावहीणं ववहियं च ॥२॥ कालजतिच्छविदोसो, समयविरुद्धं च वयणमित्त च। अस्थावत्ती दोलो, नेओ असमासदोलो य॥३॥ उवमास्वगदोसो, निह सपयत्थसंधिदोसो य । एए असुत्तदोला, बत्तीसा हुत्ति नायव्वा ॥ ४ ॥ १ अनृतदोष-असत्य दो प्रकार से होता है, प्रथम अविद्यमान पदार्थों का प्रादुर्भाव, जैसे-जगत् का कत्ती ईश्वर है, द्वितीय विद्यमान पदार्थों का अभाव सिद्ध करना, जैसे --श्रात्मा पदार्थ नहीं है। २ उपघातजनक-जीवों का नाश करना, जैसे-वेद में वर्णन की हुई हिंसा धर्म रूप है, अर्थात् वेदवाक्यवत् । ३ निरर्थकवचन-जिन अक्षरों का अनुक्रम पूर्वक उच्चारण तो मालूम होता है, लेकिन अर्थ सिद्ध कुछ भी नहीं होता, जैसे अभी इई उऊ ऋऋ लूलू इत्यादि । अथवा डिथ विस्थादि असंबद्ध-सम्बन्धरहित निरर्थक वचन दोष होता है, जैसे कि-दश दाडिम, छह अपूप, कुण्ड में षकरा । ४ अनवस्थादोष जिन कथन में अनवस्था दोष की प्राप्ति हो तथा किसी प्रकार की भी जिस में युक्ति काम न करे, जैसे कि -भाइयव्यो पएसो। ५ छलदोष-जिस में अनिच्छा अर्थ की सिद्धि हो जाय, तथा किये हुए अर्थ को प्राधात पहुँचे, विवक्षितार्थ का उपघात हो जाय, उस स्थल को छल दोष कहते हैं, जैसे कि-प्राणियों का कल्याण न होने की इच्छा से पापच्यापार- पोषक रूप उपदेश करना जैसे नवकम्बलो देवदत्तः । ६ द्रुहिलक-जिस स्थान पर अतीव वर्णों का संग्रह हो, और वे पापों के पोषक हो, जैसे कि- एतावानेव लोकोऽयं, यावानिन्द्रियगोचरः। भद्र! वृकपदं पश्य, यद्वदन्त्यबहुश्रुताः॥१॥ पिव खाद च चारुलोचने, यदतीतं वरगात्रि ! तन्न ते । न हि भीरु ! गतं निवर्तते, समुदयमात्रमिदं कलेवरम् ॥२॥ अर्थात् जितना आंखों से दिखाई देता है उतना ही लोक है, इसलिये ---नो शल्पज्ञानी कहते हैं।
[ उत्तरार्धम् ] लोचन वाली खाओ पीश्रो क्योंकि यह श्रेष्ड शरीर नहीं है।हे डरपोक ! गया हुआ शरीर फिर न पायगा यह २६ अर्थापति रुप है। की प्राप्ति हो जाए वह मर्थात् घर का मुगा क्योंकि शेषधातोऽदुर होता है। अन्य स्थान चन - युक्ति रहित होने से निस्तारवचन दोष होता है। तथा मथ्या वचन। २७प्रसमास स्थान पर उस समार होता है। २८ उपमा उपमा-सर्षपो मेर मेरुः समुद्रोपमः । २६ रूपक करना, जैसे कि का निरूपण करन वचन--जिसमें पदादिकों की मात्राऐं अधिक हो। जैसे कि- स्तकत्वप्रयत्नानन्तरीयकत्वाभ्यां घटपटवत् । इस स्थान पर । दो हेतु और दृष्टान्त दिये गये हैं। इस लिये अधिक दोष में एक ही हेतु और एक ही दृष्टान्त होना चाहिये। से अधिक हैं। r-जिसमें पदों के अक्षरों की मात्राएँ न्यून हो उसे हीनवचन स्तु में हेतु या दृष्टान्त की न्यूनता हो उसे भी हीनवचन अनित्यः शब्दः घटवत् तथा अनिन्यः शब्दः कृतकत्वात् । दोष--पुनरुक्त दोष के दो भेद हैं। एक शा से, और द्वितीय यह है कि जो शब्द एकबार उच्चारण किया गया होफिर उसीको कि-घटो घटः। अर्थ से वह है. जैसे कि-घटः कुटः कुभः । पुनरुक्त दोष में गर्भित है । जैसे कि-पीनो देवदत्तो दिवा न * रात्रौ भुक्त इति । इस स्थान पर प्रापन्नार्थ के लिये साक्षात् रना भी पुनरुक्त दोष है। पीन देवदत्त दिन में नहीं वे में खायगा। तदोष-जिस स्थान पर पूर्व वचन से उत्तर वचन व्याख्यान अव्याहत दोष कहते हैं, जैसे कि--कर्म चास्ति फलं चास्ति रिणामित्यादि । कर्म और फल दोनों है, लेकिन कर्मों का कर्ता । एकवायनकर पचति शब्दं ना लेकिन वहां पर ३१ पदा दोष होता है। साच वैशेषिक वस्तूनामनन्तर भाव सिद्ध हो है। अतः उन ष-जो वचन युक्ति से रहित हो, अथवा युक्ति को सहन के आयुक्तदोष कहते हैं, जैसे कि--तेषां कटतटभ्रष्टैगजीनां सि नदी घोरा हस्त्यश्वरथवाहिनी। दोष-जो अनुक्रमता पूर्वक न हो वह क्रमभिन्न दोष होता शनरसनघ्रोणचतुःश्रोत्राणामाः स्पर्शरसगन्ध रूप शब्दा अति व यातालट पलट बोले। এবি- - [श्रोमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] १४ वचन भिन्न-जहां पर वचन विपरीत हैं वहाँ वचनभिन्न दोष होता है, जैसे वृक्षा ऋतौ पुष्पितः । १५ विभक्तिभिन्न-विभक्ति का ठीक न होना, जैसे कि-'वृक्ष पश्य' या वृक्षः पश्य, ऐसा कहना विभक्तिभिन्न दोष होता है। १६ लिंगभिन्न-लिंग के विपरीत होना, जैसे कि-'अयं स्त्री १७ अनभिहित दोष - स्वसिद्धान्त ने जो पदार्थ नहीं ग्रहण किये उन का उपदेश करना, जैसे कि-लप्तमः पदार्थों वैशेषकस्य, प्रकृतिपुरुषाभ्यधिक सांख्यस्य, दुःखसमुदायमार्गनिरोधलक्षणचतुरार्यसत्यातिरिक्त बुद्धस्य । १- अपददोष-अन्य छंद स्थान पर अन्य छंद उच्चारण करना वह अप. ददोष होता है, जैसे कि-प्रार्णपदे अभिधातव्ये वैतालीयं परममि ध्यात् है अर्थात् आर्या छन्द की एवज में वैतालीय पद कहना। १६ स्वभावहीनदोष-जिल पदार्थ का जो स्वभाव है उससे विरुद्ध प्रति पादन करना, जैसे कि-शं तो वह्निः, मूर्तिमदाकाशम् अर्थात् अग्नि शीत है, आकाश मूर्तिमान है, ये दोनों ही स्वभाव से हीन हैं । २० व्यवहितदोष--जिसका प्रारम्भ किया हुआ है उसे छोड़ कर जिस का प्रारम्भ नहीं किया उसकी व्याख्या करके फिर प्रथम प्रारम्भ किए हुए को व्याख्या करना व्यवहितदोष हो जाता है। २१ कालदोष भूतकाल के वचन को वर्तमान काल से उच्चारण करना। जैसे कि रामो वनं प्रविवेशेति वक्तव्ये, राभो वनं प्रविशति इत्यादि, अर्थात् रामचन्द्रजी ने बन में प्रवेश किया, पेसा कहने के बदले रामचन्द्र जी बन में प्रवेश करते हैं। २२ यतिदोष-बिना स्थान विरति करना। २३ छविदोष-अलंकारों से शून्य ऐसे पदों का उच्चारण करना अर्थात् नो पद उच्चारण किये जायँ वे अलंकार पूर्वक होने चाहिये। २४ समयविरुद्ध दोष-स्व सिद्धान्त से विरुद्ध प्रतिपादन करना, जैसे कि-सांख्यस्यासत्कारणे कार्ये वैशेषिकस्य वा सदिति । २५ वचनमात्र दोष-निर्हेतुक वचन उच्चारण करना, जैसे कि कश्चद्यथेच्छया कश्चित्प्रदेश लोकमध्यतया जनेभ्यः प्ररूपयति, अथात् कोई पुरुष mesh ranा पर्वक किसी स्थान पर भूमि का मध्य भाग लिद्ध करे।
[ उत्तराधम् ] २६ अर्थापत्ति दोष-जिस स्थान पर अर्थापत्ति करने से अनिष्ट फल की प्राप्ति हो जाए वह अर्थापत्ति दोष होता है। जैसे कि गृहकुक्कटो न हन्तव्यः अर्थात् घर का मुगा न मारना चाहिये, इस कथन से अर्थापत्ति होती है। क्योंकि-शेषघातोऽदुष्ट इत्यापतति' शेष को मारना चाहिये, ऐसा सिद्ध होता है। अन्य स्थान पर कुक्कुट का वध निर्दोष सिद्ध होता है। २७ असमास दोष-जिस स्थान पर जिस समास को प्राप्ति हो उस स्थान पर उस समास को छोड़कर अन्य समास कर देवे तो असमासदोष होता है। २८ उपमा दोष-हीन उपमा । जैसे कि मेरुः सर्षपोपमाः। अथवा अधिक -सर्षपो मेरुसनिमः । अथवा अन्य विपरीत उपमा करना, जैसे कि- मेरुः समुद्रोपमः। यह उपमादोष होता है। २६ रूपक दोष--स्वरूप को छोड़कर उसके अवयवों का प्रतिपादन करना, जैसे कि--पर्वत के निरूपणं को छोड़ कर शिखर आदि उसके अवयवों का निरूपण करना, या अन्य कोई समुद्र के अवयवों का निरूपण करना। ३० निर्देश दोष-जिस वचन का उच्चारण कर दिया है फिर उसका एक वाक्य न करना । जैसे कि--देवदतः स्थाल्यामोदनं पचति, इत्यभिधातव्ये पचति शब्दं नाभिधत्ते । देवदत्त स्थाली में चांवल पकाता है, ऐसा कहना लेकिन वहां पर पचति नहीं कहना। ३१ पदार्थ दोष--जिस वस्तु के पर्याय को एक पदार्थान्तरमानना पदार्थ- दोष होता है। जैसे कि - "सतो भावः” सत्तेति कृत्वा वस्तुपर्याय एव सत्ता, साच वैशेषिकैः षट्स पदार्थेषु मध्ये पदार्थान्तरत्वेन कल्प्यन्ते, तच्चायुक्तम् । वस्तूनामनन्तपर्यायत्वेन पदार्थानन्त्यप्रसङ्गादिनि । इस कथन से वस्तु का सत्ता भाव सिद्ध होता है, और वैशेषिक दर्शन ने षट् पदार्थ के अंतर्गत सत्ता मानी । अतः उनका यह एकान्त कहना अयुक्त ३२ सन्धिदोष-जहां पर सन्धि होना चाहिये, वहां पर सन्धि नहीं करना, अथवा करना तो गलत करना, यह सन्धिदोष है। भरतो वन्दितु गच्छति-भरत बन्दन करने जाता है । ऐसा कहते हुए भरतः वन्दितु कहना। इन बत्तीस दोषों से जो रहित है उसे ही लक्षण युक्त सूत्र कहते हैं, तथा मान काही लन गक्त सत्र होता है, जैसे कि HAIRS [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] "निहोसं १ सारवंतं च २, हेतुजुत्तम ३ लंकियं ।। उवणीयं ५ सोवयारं च ६, मियं ७ महुरमेवय ॥१॥" अर्थात् सब दोषों से रहित १, सारवान् अर्थात् गोशब्द समान बहुत अर्थ युक्त २, अन्वय और व्यतिरेक हेतुओं से युक्त ३, उपमादि अलंकारों से विभूषित ४, उपनय से युक्त अर्थात् दृष्टान्त को दान्तिकतया सिद्ध करना, उसे ही उपनीत कहते हैं ५, संस्कृतादि भाषाओं से युक्त और प्रामीण भाषाओं से वर्जित, इसको सोपचार कहते हैं ६, अक्षरादि के प्रमाण से निया ७ और जो सुनने में मनोहर हो, उसे मधुर वर्ण युक जानना चाहिये ८, जिस में पूर्वोक्त गुण होते हैं, उसे ही सूत्र कहते हैं। तथा किसी २ श्राचार्य के मत से षट गुण होते हैं, जैसे कि- "अप्प स्वर १ मसंदिद्ध २, सारवं ३ विस्लोमुहं ४। अत्थोम ५ मणवज्जं च ६, सुत्त सबरणमासियं ॥२॥" अल्पाक्षर अर्थात् मिताक्षर हो, जैसे सामायिकसूत्र १,संदेहरहित हो क्यों कि सैन्धव शब्दवत् संदेहयुक्त न हो, सैन्धव शब्द लवण, वस्त्र, अश्वादि अनेक अर्थों में व्यवहत है २, सारवत्-गौ शब्द के समान बद्दुत अर्थ वाला हो ३, प्रत्येक सूत्रा चरणानुयोगादि चार अनुयोग द्वारा सिद्ध है तथा एक शब्द के अनन्त अर्थ होने से उसे विश्वमुख कहते हैं, यथा 'धम्मो मंगलमुक्किट्ठ इत्यादि, श्लोके वस्वारोऽप्यनुयोगा व्याख्यायन्ते" जैसे-धम्मो0 इस श्लोक से चारों ही मनुयोगों की व्याख्या होती है ४, चकार वकारादि निपातों से रहित ५ और अनवद्य वाक्य अर्थात् पापोपदेश से रहित हो ६, यह षट गुण पूर्वोक्त आठ गुणों में समवतार हो जाते हैं। संग्रह नयसे आठ गुण षट् गुणों में समवतार हो जाते हैं । इस प्रकार शुद्ध सूत्र का शुद्ध उच्चारण करने से मालूम होता है कि यह पद खसिद्धान्त जीवादि पदार्थ का बोधक है, और ईश्वरादि कृत परसमय का पद पर सिद्धान्त का बोधक है। खसमय का बोधक पद मोक्ष पद होता है और परसमय का बोधक पद बन्ध पद कहा जाता है। कर्मबन्धन का कारण अथवा कुवासनादि हेतुमों से बन्ध पद, कर्म और सबोध का कारण होने से किये हुए का क्षय रूप कारण सो मोक्ष पद होता है । इसी प्रकार सामायिक का प्रतिपादक सामायिक पद होता है। सामायिक से व्यतिरिक्त अर्थो का बोधक नोसामायिक पद होता है । इस प्रकार सूत्र उच्चारण करने से बान की प्राप्ति सिद्ध की गई है । फिर जब सूत्रोच्चारण किया गया तब । - होत - मेर [ उत्तरार्धम् ] कतिपय मुनियों को अर्थ अधिगत हो जाता है और कतिपय मुनियों को अर्थ अधिगत नहीं भी होता । जिन मुनियों को अर्थ अवगत नहीं हुआ, उनको अव. गत कराने के लिये पद २ की संहिता करनी चाहिये । इसलिये अब व्याख्यान करने की विधि कहते हैं। प्रथम व्याख्या की संहिता करनी चाहिये, जैसे कि-. अस्खलित पदों का उच्चारण करना, "करेमि भंते सामाइयं" फिर सन के पदच्छेद करने चाहिये, जैसे कि-'करेमि" एक पद है, "भंते !" द्वितीय पद हैं, "सामाइयं तृतीय पद है। भाष्यकार ने भी कहा है- "होइ कयत्थो वोत्तुं, संपयच्छेयं सुयं सुधाणुगमो । सुत्तालावगनासो, नामाइन्नास विरिणोगं ॥ १: सुस्तफासियनिज्जुतिविणियोगो सेसो पयस्थाइ । पायं सोशिय नेगमनयाइमय गोयरो होइ॥२॥" "सुत्तं सुत्ताणुन मो, सुत्तालावयको य निक्खेत्रो। सुन्तफासियांगजुत्ती नया य समगं तु वच्चंति ॥ १॥" i: "भवति कृतार्थ उक्त्वा, सपदच्छेदं सूत्रं सूत्रानुगमः । सूत्रालारकन्यालो, नामादिन्याल विरि योगम् ॥ १ ॥ सूत्रस्पर्शिकंनियुक्ति विनियोगः शेषकः पदार्थादिः । प्रायः स एव नैगमनयादिमतगोचरो भवति ॥ २॥" 'सूत्र सूत्रानुगमः, सूत्राालापककृतश्च निक्षेपः। सूत्रस्पर्शिकनियुक्तिर्नयाश्च समकं तु बजन्ति ॥ १॥" फिर पद का अर्थ करना चाहिये, जैसे कि-"करेमि" क्रियापद ग्रहण करने अर्थ में श्राता है, यथा-करता हूँ। "भते" हे भगवन् ! यह पद गुरु के श्राम- त्रण अर्थ में है । "सागाइयं सम्यग् ज्ञान दर्शन चारिश का जिस से लाभ हो उस सामायिक को। इस प्रकार सर्व सूत्रों का पदार्थ करना चाहिये । पश्चात् जो समासान्त पद हों उनको पदविग्रह से समासान्त करके दिखलाना चाहिये, जैसे कि-भयस्य अंतो भयान्तः, जिनानाम् इन्द्रः जिनेन्द्रः, देवानां राजो देव- राजः, जिनानाम् ईश्वरः जिनेश्वरः। अनेक पदों का एक पद कर देना उसे समास कहते हैं, पश्चात् प्रश्नोत्तर करके सूत्र की पुष्टि करना चाहिये । तदनन्तर प्रतिज्ञा हेतु उदाहरण उपनय निगमन के द्वारा सूत्र की युक्ति करनी चाहिये । तथा प्रत्येवस्थान के द्वारा प्रथम अन्य युक्ति देकर फिर सूत्रोक्त युक्ति को ही सिद्ध करना चाहिये । इस प्रकार संहिता, पदच्छेद, पदार्थ, पदविग्रह, । 3 नयों का रूप है । इस प्रकार सूत्र को व्याख्या करने से सब [ओमदनुयोगद्वारसूत्रम्] ३०७ चालना और प्रसिद्धि के साथ सूत्र की व्याख्या करना चाहिये । इस में सूत्रो- च्चारण और पदच्छेद करने से सूत्रानुगम का विषय सिद्ध होता है । फिर सूत्रो. च्चार और पदच्छेद करे फिर लर्व पदों के निक्षेप करने से सूबालापक निक्षेप की सिद्धि होती है। शेष पदविग्रह, चालना और प्रसिद्धि यह सर्व सूत्रस्पर्शिकनियुक्ति का विषय है । और आगे जो नय को विषय कहा जायेगा, वह भी चालना और प्रसिडि रूप ही है लेकिन सचमुच से तो सूत्रस्पर्शिक नियुक्ति के अन्तर्मत सात में ही समाप्त हो जाते हैं। इस प्रकार सूास्पर्शिक नियुक्ति का विषय पूर्ण किया गया है । तात्पर्य यह है कि षट् विधि से. सूत्राध्यपन करना चाहिये तब ही अर्थ साफल्य को प्राप्त होता है और पाठक के मन में किसी प्रकार का भी संदेह नहीं रहता। इस प्रकार तृतीय अनुयोग द्वार की व्याख्या की गई है। अब इसके अनन्तर नय रूप चतुर्थ अनुयोग द्वार के विषय में कहते हैं और इसमें विस्तार पूर्वक नयों का विवेचन किया जावेगा क्योंकि स्योद्वादमत अनेक नयात्मक है। अथ चतुर्थ अनुयोगहार। से किं तं णए ? सत्त मूलणया पण्णत्ता, तं जहा- रणेगमे १, संगहे २, ववहारे ३, उज्जुसुए ४. सद्दे ५, समभिरूढ़े ६, एवंभूए ७, तत्थ- णेगेहि माणेहि मिणइत्ति णेगमस्स य निरुत्ती। सेसाणपि नयागां, लक्खणमिणमो सुणह वोच्छं ॥१ संगहियपिडिअत्थं, संगहवयणं समासो विति । बच्चइ विणिच्छिमस्थ, ववहारो सव्वदव्वेसु॥२॥ पच्चुप्पन्नग्गाही, उज्जुसुओ णयविही मुणेअव्वा । इच्छइ विसेसियतरं, पच्चुप्पण्णं णो सददो ॥ ३ ॥ वत्थूओ संकमणं, होइ अवस्थूनए समभिरूढ़े वंजणअत्थतदुभयं, एवंभूगो विसेसेइ ॥४॥ Mpmusarmend की वयं श हो । [उत्तरार्धम् ] णायमि गिरिहअव्वं अगिरिहअव्वंमि अत्थंमि । जइअव्वमेव इइ जो, उवएसो सो नो नाम ॥५॥ सव्वेसिपि नयाणं बहुविहवत्तव्वयं निसामित्ता। तं सवनयविसुद्धं, जं चरणगुणट्टिो साहू ॥ ६ ॥ से तं नए। अणुबोगद्दारा सम्मत्ता (सू ० ११६) सोलससयाणि चउरुत्तराणि होति उइमम्मि गाहाणं । दुसहस्समणुठ्ठ भछंदवित्तप्पमाणो भणिो॥१॥ णयरमहादारा इव उवकमदाराणुओगवरदारा । भक्खरबिंदुगमत्ता लिहिया दुक्खक्खयट्टाए ॥२॥ गाहा १६०४, अनुष्टुप् ग्रन्थानं २०७५, अणुओगदारं सुत्तं समत्तं ॥ पदार्थ-(से कि त णए ?) नय किसे कहते हैं और वह कितने प्रकार से वर्णन किया गया है ? (णए)जो एक अंश लेकर वस्तु के स्वरूप का वर्णन करे उसे नय कहते हैं, और वह ( सत्त मूलणया पएणत्ता,) सात प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, अर्थात् मूल नय सात होते हैं (तं जहा) जैसे कि - (नेः मे १) नगम नय १ (आहे २) संग्रह नय २ ( ववहारे ३) व्यवहार नय ३ (उजुसुए ४) ऋजुसृत्र नय ( सद्दे ) शब्द नय ५ ( समभिरूढ़े ) समभिरूढ़ नय ६ और (एवंभूए) एवंभूत नय । अब नैगम नय का स्वरूप वर्णन किया जाता है, (णेगेहि माणेहि) जो अनेक मानों से (मिणइत्ति) वस्तु के स्वरूप को जानता है वा अनेक भावों से वस्तु का निर्णय करता है इस प्रकार से ( नेगमस्स य ) नैगमनय की (निरुत्ति) निरुक्ति व्युत्पत्ति है। मे *णीम् पापणे धातु से नय शब्द की उत्पत्ति है इसलिये जो वस्तु के स्वरूप को प्राप्त करे उसे ही नय कहते हैं। नि उपसर्ग पूर्वक गम्लु गतौ धातु से नैगम शब्द की सत्ति का पूर्व में पूर्ण विवेचन किया जा चुका है । जैसे कि-लोगे वसामि, इत्यादि, इसी को नैगम नय कहते हैं अथवा नैगम मय को यह भी निरुक्ति है कि न एकः नैकः । निपातनाव सिद्धम् ॥ विस्तारपूर्वक वर्णन आवश्यकनियुक्तिटीका से जानना चाहिये ।
- [ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ३०६ तथा (सेसाणं पि) शेष संग्रहादि (नयाणं) नयों का ( लक्षणं) लक्षण (इणमो) इस प्रकार (सुणह ) श्रवण कर (वोच्छं ॥१॥). मैं तुम को सुनाऊंगा ॥१॥ * नयों के मूल दो भेद हैं, जैसे कि द्रव्य नय और पर्याय नय । द्रव्य नय द्रव्य को और पर्याय नय पर्याय को स्वीकार करते हैं। प्रथम के तोन नय द्रव्य नय कहलाते हैं और शेष पर्याय नय माने जाते हैं। संग्रह नय सामान्य प्रकार से स्वरूप को मानता है। लौकिक में भी घट, कभ, पट, इन से भित्र २ काम लिये जाते हैं तथा कप चलता है, ग्राम आ गया, पर्वत जलता है इत्यादि क्रियाओं के देखने से सामान्य स्वरूप का अभाव हो विशेष स्वरूप की प्रतीति होती है । इसलिये व्यवहार नय विशेष स्वरूपतया सब द्रव्यों में विद्यमान रहता है। ऋजुसूत्र नय के मत में भूतकाल विनाश हो चुका है और भविष्यत् अविद्यमान है, इसलिये यह वर्तमानकालग्राही है । ऋजु नाम है अकुटिलता-सरलता का और सूत्र नाम है गुमने का । अतएव जो ऋजुभाव से गून्थे वही ऋजुसूत्र नय है। भिन्नलिभिन्नवचनैश्च शब्दैरेकमपि वस्त्वभिधीयत इति प्रतिजानीते ऋजुसूत्रनयः । और इस नय के मत में लिंगभेद भी नहीं है। शप आक्रोशे धातु से शब्द बनता है जिसका अर्थ है बोलना । जो शब्द को मुख्य देखता है वही शब्द नय है । शब्दयते अभिधीयते वस्त्वनेनेति शब्दः-इस नय के मत में अर्थ गौणरूप होता है। क्योंकि 'पुरंदर' शब्द का अर्थ अन्य है, और 'इन्द्र' शब्द का अर्थ अन्य है । एक में अर्थ वाले शब्द में अन्य अर्थ वाला शब्द यदि प्रविष्ट कर दिया जाय तो वह अवतु हो जाती है. है कि -- जैसे नाममात्र घट शब्द का धारण करने से घट का ज्ञान हो है और उसी प्रकार उस का अर्थ भी प्राप्त हो जाता है, लेकिन घट चेष्टायां धातु से जो घट शब्द की उत्पत्ति हुई है, वह जव ही सफल होगी जब घट स्त्री के शिर पर चेष्टा रूप दृष्टि- गोचर होगा । इसलिये इस नय के मत में जल से परिपूर्ण घट और स्त्री के मस्तक पर रक्खा हुआ ही घट 'घट' माना जाता है। शाशपिभ्यां ददनौ उणादि । पा० ४ सू०६७ । तमेव गणी भृतार्थमुख्यतया यो मन्यते स नयो ऽप्युपचाराच्छन्दा । शौ तनूकरणे । शपू श्राकोशे ॥ श्राभ्यां ददनौ। शादः कर्दमशप्ययोः नडशाडातडु वल च ! पा० ४१२.८८ शाब्दलः । पकावस्य वकारः । शब्दो निनादः । शब्द वैरेति । पा० ४।१।१७ । क्या । शब्दायते शब्दं करोतीति शाब्दिको वैयाकरणः॥ "सुयनाणे श्र विउत्तं, केवले तयणंतरं । अप्पणीय परेसिं च, जम्हा तं परिभावगं ॥१॥" "श्रुतक्षाने च नियुक्त, केवलेशे तदनन्तरम् । आत्मनश्च परेषां च, यस्मात्तत् परिभा- तात्पर्य यह । बकम्॥१॥"
की उत्तराधम्। * संगहिय) सम्यग् प्रकार से जिसने ग्रहण किया है, (पिडिअाथं ) पिंडितार्थ अर्थात् जिस नय से.सामान्य प्रकार से एक जाति रूप अर्थ ग्रहण किया है (संगहरयणं) संगृहीत-पिंडितार्थ वचन (समासो) संक्षेप से (वित्ति) श्रीतीर्थ करदेव संग्रह का वचन कहते हैं। (विणिच्छियस्थ) दूर हो गया है सामान्य रूप जिस का अर्थात् सामान्य का श्रभाव जिस में (वञ्चइ ) वर्तता है, पृथक् २ स्वरूप के विषय उपयोग जिसका अर्थात् पृथक २ वस्तु का खरूप माना जाता है जिस में उसी को व्यवहार नय कहते हैं और विशेष स्वरूप से ( ववहारो) व्यवहार से विशेष स्वरूप देखा जाता है (सव्वदम्वेसु ॥२॥) सर्व द्रव्यों में ॥ २ ॥ पच्चुप्पएणगाही ) वर्तमान काल को ही ग्रहण करने वाला ( उज्जुमुश्रो) ऋजुसूत्र नय है, (णयविही) ऋजुसूत्र की नय विधि (मुणेय यो) जानना चाहिये । यह ऋजुसूत्र नय (विसेसियतरं) विशेषतर है और (पञ्च परणे ) वर्तमान काल को ( इच्छइ.) मानता है। ( यो सहो ॥ ३॥) वह शब्द नय है ॥३॥ * यह आपवादिक सूत्र है, "प्रासज्ज उ सोयारं नए नयविसार यो व्या ।" "यासाश तु श्रोतारं नयान् नयविशारदो ब्रूयात् ।" न - श्रामेऽपि प्रोक्ताम्-"पहनं नाणं तो दया प्रथमं ज्ञानं तो दया।" आगम में भी कहा है.--प्रथम ज्ञान पश्चात दया । "ज अन्नाणी कम्म खई" जैसे कि अज्ञानी कितने ही काल के कर्म को क्षय करता है। "अपावाको विणियत्ती पवत्तणा तह य कुसलपक्खम्मि । विणयस्स य पडिवत्ती, तिन्निवि नाणे समाप्पंति ॥ १ ॥" "पापाद्विनिवृत्तिः प्रवर्तना तथा च कुशलपक्षे ।। विनयस्य च प्रतिपत्तिः, त्रीण्यपि ज्ञानात् समाप्यन्ते ॥१॥" - बीयो "गीयत्थो य विहारी, गीयत्थमीसिनो भणियो। इत्तो तइयविहारो, नाणुनायो जिनवरेहिं ११॥" "गीतार्थश्च विहारी, द्वितीयो गीतार्थमिश्रितो भणितः । एताम्यां तृतीयो विहारो, नानुज्ञातो जिनवरौं ॥१॥ साधु दोनों मिल कर मोक्ष का साधन होते हैं, एक र मोक्ष के साधन नहीं होते, भाव साधुः वही है, जो दोनों के स्वरूप में स्थित है ।
(वयूयो संक्रमणं हाइ) वस्त [ श्रोमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] जिस नय के मत में शब्दानुकूल अर्थ होते हैं और जितने शब्द हो उतने ही अर्थ होते हैं, यदि इन्द्र शब्द को पुरन्दर कहा जाय तब जिस नय के मत में (अवत्थू) श्रवस्तु हो जाता है, ( नए समभिल्ढे) उसे स निरूढ नय कहते हैं। F (वंजण ) शब्द (अत्य) शब्द की अभिधेय वस्तु ( तदुभए , व्यंजन और अर्थ दोनों ही ( एवंभूओ ) चेष्टारूप को जो प्राप्त हो गया हो उसे एवम्भूत नय कहते हैं। (विसेसेइ ॥४॥) यही इस नय का विशेष है ॥ ४ ॥ १ अब ज्ञान क्रिया दोनों ही युगपत् मोक्ष का कारण हैं, इस विषय में कहते हैं- MORE ( णायंमि ) लभ्यक जोनकर ही ( गिहिअव्वे ग्रहण करने वाले अर्थ में (चैत्र) और (अगिरिहश्रध्वंमि) अग्रहणीय ( *एवं यत्'मि ) अर्थ में भी होता है सो इस लोक सम्बन्धी अर्थके विषय वा परलोक सम्बन्धी अर्थ के विषय (जइयव्वमेव) यत्न करना चाहिये ( इइ जो) इस प्रकार जो सद्व्यबहार के ज्ञान का कारण (वएसो) उपदेश है, (सो नो नाम ॥५॥) वह प्रस्ताव से ज्ञान नय कहा जाता है। अब इसी विषय में कहते हैं- (सव्वेसिपि) सो सभी (नयाणं) नयों के (बहुविहा वक्तव्वयं) नाना प्रकार की वक्तं. व्यताओं को (निसामित्ता) सुनकर ( सव्वनयविसुद्ध) सत्र नयों में विशुद्ध (त) वही है, (ज) जो (साहू) साधु (चरण) चारित्र और (गुणटिश्रो.) ज्ञान के विषय स्थित है * एव शब्द अवधारण अर्थ में ग्रहण किया है। । "नाम शब्द शिष्य के आमन्त्रण अर्थ में ग्रहण किया गया में ग्रहण किया गया है। सारांश केवल इतना ही है कि ज्ञानद्वारा उपादेय, हेय, ज्ञेय पराथों का बोध होता है, फिर तादृश यत्न किया जाता है, ऐसा जो उपदेश है उसी को ज्ञान नय कहते हैं । और क्रियावादी इस गाथा का अर्थ केवल क्रिया में ही करता है,जैसे कि--उपादेय पदार्थों को जानकर जो यत्न करता है वह गौण । इस प्रकार जो उपदेश करे वह क्रिया नय हो जाता है। तब कोई एक ही मोक्ष का कारण नहीं होता, लेकिन दोनों एकत्रित होकर मोक्ष का कारण हो जाते हैं । अपि शब्द समुच्चय अर्थ में है। - | उत्तराधम् । (से तं णए) यही नय का वणन है। और यहीं (अणु प्रोगादरा सम्मता !) अनु. योगद्वार का वर्णन भी पूर्ण हो गया । भावार्थ-जो एक अंश लेकर वस्तु का स्वकर प्रतिपादन करे उसे नय कहते हैं । इस के सात भेद हैं, जैसे कि-नैगमनय १, संग्रहनय २, व्यवहारनय ३, ऋजुसूत्रनय ४, शब्दनय ५, समभिरूढनय ६, और एवम्भूतनय ७१ अश अनु. क्रम पूर्वक सातो नयों का वर्णन किया जाता है- MORIANISATIR जिस का नहीं है एक मान अर्थात् महाससा, उसे नैगम नय कहते हैं। तथा निगम शब्द से वसति का अर्थ प्राण करने से, जो पूर्व में "लोके वलामि" इत्यादि दृष्टान्त से नैगमनय का स्वरूप प्रतिपादन किया गया है, उसे भी नैग- मनय करते हैं, अथवा निगम नाम है,अर्थ के ज्ञान का अनेक प्रकार से जो अर्थ के ज्ञान को माने वा बहुत से गमा होने से भी इसे नैगमनय कहते हैं, और इस नय के मत में से सामान्य और विशेष रूप वस्तु दोनों ही भिन्न २ हैं, क्यों कि सभी वस्तुओं में विद्यमान भाव एक है,इसलिये इसे द्रव्यनय कहते हैं। इसीलिये सात नयों में से प्रथम के चार नय द्रव्यनय कहलाते हैं, क्यो कि ये द्रव्य को ही प्रधानता से मानते हैं। और शेष तीन नय पर्यायाश्रित होने से पर्याय नय कहलाते हैं । तथा यह नय भूत, भविष्यत् ओर वर्तमान तीनों काल के पदार्थों को प्रहण करता है। इस भय के मत में तीनों काल की अस्ति है। जैसे कि भूत काल, भविष्यत् काल और वर्तमान काल । । MROHAR जिस ने भली प्रकार एक जाति रूप अर्थ को ग्रहण किया है, उसी को संग्रह नय कहते हैं। कारण कि यह नय वस्तु का सामान्य ही मानता विशेष नहीं। इस का वचन संग्रह किये हुरे' का सामान्य अर्थ में ही होता है। इस लिये संग्रह कर पश्चात् सामान्य रूप से सब वस्तुओं को जो सिद्ध करता है उसे संग्रह नय कहते हैं । रूप वस्तु से भिन्न है किम्वा अभिन्न है? यदि प्रथम पक्ष ग्रहण किया जाय तो सद्रूप सामा य रूप से भिन्न असद्रूप लिख होगा।
[ श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् । अतः अलद्रूप खपुष्पयत् होता है । यदि द्वितीय पक्ष अभेद रूप स्वीकृत किया जाय तब सामान्य स्वरूप ही सिद्ध हो गया, क्यों कि-विशेष सामान्य स्वरूप से पृथक् नहीं है । इस लिये एक ही सिद्ध हुअा। इस प्रकार संग्रह नय के मत में केवल एक सामान्य स्वरूपही माना जाता है। सामान्य स्वरूप का अभाव सिद्ध करने वाला व्यवहार नय है, अर्थात् सर्वदा जिस का द्रव्यों में विशेष भाव हो । जैसे कि घटादि पदार्थ जलादि से भरे हुये अपनी २ क्रिया करते दिखाई देते हैं, लेकिन उससे अतिरिक्त लामा न्य नहीं होता। इसलिये सामान्य स्वरूप को लोक व्यवहार भी अंगीकार नहीं करता । सामान्य रूप से लौकिक व्यवहार की प्रवृत्ति भी नहीं हो लकतो। इस सर्व प्रकार ल सामान्य स्वरूप द्धि नहीं होता है मत लौकिक व्यवहार में प्रधान नय हाने ले भाव हो सिद्ध है और इसे व्यवहार नब कहते है। विशेष से सामान्य स्वरूप पृथक् भो नहीं है अथवा विशेषतया जिसका निश्चय या जाता है उसे विनिश्का कहते हैं। "सुथनाणे अनिउत्त, केवले तयणंतरं । अपणो य परोसिं च,जम्हां तं परिमावगं ॥१॥" श्रुतक्षाने च नियुक्त, केवले तदनन्तरम् । आत्मनश्च परेषां च, यस्मात्तत्परिभावकम् ॥१॥ एक ही वस्तु भिन्न २ लिंग और भिन्न २ वचन से कही जाती है, मानों इस नय का मत ही निराला है। कोई लिंग वचन का भेद ही नहीं होता। इस में यह शंका भी उत्पन्न होती है कि- सामान्य स्वरूप विशेष स्वरूप से मिन्न है या अभिन्न ? यदि भिन्न माना जाय तब विशेष स्वरूप ले सामान्य स्वरूप पृथक् दृष्टि गोचर होना चाहिये, लेकिन होता नहीं। इस लिये प्रथम पक्ष ग्राह्य हो जाता है ! यदि द्वितीय अभिन्न पक्ष स्वीकार किया जाय तव विशेष स्वरूप की सिद्धि हो गई, क्योंकि विशेष स्वरूप से सामान्य स्वरूप पृथक् नहीं है, इस लिये एक ही रूप हुए । अतः व्यवहार नय का यह मन्तव्य सिद्ध हो गया कि जो वस्तु व्यव- हार से प्राा है उसी भाव को विद्यमान माना जाता है। जो भाव विद्यमान अयो ग्य तो है लेकिन ब्यवहार में उस का ग्रहण नहीं होता, वह उपकारक न होने से भाव व्यवहार में अमाननीय होने से अयोग्य है । जैसे परमाणुओं के समूहों से घट की उत्पत्ति है। घट का विचार कल्पनीय है, परन्तु परमाणुओं का विचार । ।
योगद्वार का । कहते हैं। इ प्रत्यु- यादि दृष्या सिद्ध हुआ होती है क्योंकि एक स्वभावरूप वस्तुका अनेक स्वमाव वाला [ उत्तरार्धम्] (से: अकल्पनीय है। क्यों कि उस में प्रमाण नहीं है और व्यवहार मुख्य होता है, जैसे घटादि पदार्थों में ५ वर्ण, २ गंध, ५ रस, = स्पर्श होते हैं । तथापि जिस वर्ष की अतीव मुख्यता होगी वही वर्ण व्यवहार में उपयोगी होता है । जैसे-नील घट, इत्यादि । यदि सामान्य स्वरूप ही माना जाय जैसे कि घट व्यवहार से अकल्नीय होगा तो प्रकृति असत् हो जायगी। इस लिये व्यवहार से जो सिद्ध ऋजसूत्रनय हो जाता है वही लोक व्यवहार होने से सब द्रव्यों में विद्यमान है। कम पूर्वक ऋजुसूत्र नय के मत में वर्तमान काल ही ग्रहणीय है। जो तत्काल उत्पन्न हुआ हो उसे प्रत्युत्पन्न अर्थात् वर्तमान कहते हैं । भूत और भविष्यत् , ये दोनों जिस काल वर्तमान ही सूचन करते हैं । और जो इस को ग्रहण करता है उसे था निगम स्पन्नग्राही कहते हैं । भूत और भविष्यत् वर्तमान काल में अस्सस्प हैं, क्योंकि भूत काल हो चुका है और भविष्यत् उत्पन्न ही नहीं हुआ। इस लिये ये दोनों असत् हैं । इस नय को कंवल भु तज्ञान ही उपादेय है । अथवा ऋतु नय करते याने सरलता अर्थात् जिल का सरल श्रु त हो उसे ऋजुश्च त कहते हैं। इस स ज्ञान काम है के मत वही ऋजुसूत्र नय है इल में विशेष इतना जानना चाहिये कि इस नय के मत में लिंग वचनादि अनेक भेद भिन्न रूप एक ही वस्तु मानी जाती है। इस से व्यतिरिक्त वस्तु अवस्तुरूप है । अतः भूत काल उत्पन्न वस्तु वर्तमान में अब- स्तु है, वर्तमान काल में उस का विनाश है तथा भविष्यत्काल की वस्तु वर्तः निता से मान में अनुत्पन्न है, इस लिये वह भी अवस्तु हो है और परसम्बन्धी वस्तु लाते हैं। खकार्य में लाधक नहीं होने से अवस्तु । अतः इस लिये वह भी आकाश- पुष्पवत् है । तथा जो वर्तमान काल मै वस्तु है वही सद्रूप है। यद्य प लिंग भेद तो है, परन्तु वह अपने गुण को नहीं छोड़ती। इस नय के मत में नाम स्थापनादि द्रव्य इन्द्रादि वस्तु नहीं है क्योंकि भूतकाल का विनाश है और भविष्यत् काल अनुत्पन्न है, केवल वर्तमान काल में क्षण रूप है क्यों कि जो वस्तु शक्ति रूप नहीं होती वह अर्थ क्रिया भी नहीं कर सकती अतः जो अर्थ क्रिया करने में अशक्त है वह अवस्तु रूप है । जो वत्तमान में क्रिया करे वही वस्तु होती है । यदि अंश रहित वस्तु मानी जाय तब युति से असंगत सिद्ध देश प्रदेश के माने असिद्ध है । यदि ऐसे माना जाय कि वस्तु हा अनेक स्वभाव रूप है सो वह अयुक्त है, परस्पर विरोध होने के कारण से। जैसे कि पी वस्तुओं नयों में से .
। । । १ । [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] ३१५ एक स्वभाव अनेक स्वभाव को त्याग कर स्वयं स्थित है और अपने स्वभाव में सर्व पदार्थ विद्यमान हैं। जैसे कि परमाणु नित्य होने पर भी समूह रूप होकर घटादि कार्य बन जाते हैं परन्तु घटादि के होने पर भी परमाणु स्वभाव में स्थित रहते हैं। इसलिये वतमानकालग्रोही ऋजुसूत्र नय शव अाक्रोशे धातु से 'शब्द' शब्द की उत्पत्ति होती है जिसका अर्थ है कि जो उच्चारण किया जाय उसे शब्द कहते हैं। इस नय में शब्द प्रधान और अर्थ गौड़ रूप माना जाता है । इस लिये यह नय ऋजुसूत्र नय से विशेषतर वर्तमानप्राही है। जैसे कि- ऋजुसूत्र के मत में लिंगभेद होने पर भी अभेद रूप शब्द माने जाते थे किन्तु इस नय के मन्तव्य में लिंगभेद के साथ ही अर्थ: भेद भी माना जाता है। जैसे कि--तट:--तटी-तटम्, गुरुः--गुरू--गुरुवा, पुरुषः--पुरुषौ--पुरुषाः इत्यादि । फिर इस भय में नाम स्थापना द्रव्यादि को भी वस्तु नहीं माना जाता क्योंकि वे कार्य करने में असमर्थ हैं । इस लिये भावप्रधान हैं। भाव से ही कार्यसिद्धि होती है। नाम, स्थापना, द्रव्य और अप्रमाण हैं । उनसे कार्य की लिद्धि नहीं है सो प्रसंगवशातू इन दोनों नयों के मत से चार निक्षेपों का किंचित् स्वरूप यहां लिखा जाता है । सव वस्तुएं नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव से युक्त हैं। ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जिस के चार निक्षेप न हो सके। नाम नय का मन्तव्य है कि--जो वस्तु है वह सर्व नाम रूप है। बिना नाम कोई भी वस्तु नहीं है और बिना बस्तु ग्रहण भी नहीं हो सकती इस लिये सर्व वस्तुएं नाम रूप जैसे कि--मृत्तिका ले घट की उत्पत्ति है फिर वह घट मृत्तिका के ही नाम से बोला जाता है और नाम विना संशय हो जाता है इस लिये नाम रूप वस्तु का ना ही ठीक है। स्थापना नय का मन्तव्य है कि सर्व वस्तु स्थापना रूप है । बिना श्राकार कोई भी वस्तु नहीं है। स्थापना में नाम रूप वस्तु नहीं' होती। जो वस्तु है श्राकार रूप है और आकार के बिना नाम होना ही असंभव है। इस लिये सर्व वस्त स्थापना रूप है। द्रव्य नय का मन्तव्य है कि सर्व वस्तु द्रव्य रूप है। क्यों कि जैसे आकार बिना नाम नहीं हो सकता उसी प्रकार द्रव्य बिना स्थापना नहीं हो सकती। इस लिये स्थापना रूप वस्तु नहीं है किन्तु द्रव्य रूप वस्तु है। भाव नय का मन्तव्य है कि द्रव्य रूप वस्तु नहीं है, अपि रूप वस्तु है क्यो कि सर्व प्रकार से विचार करने से अंतिम भाव की ही सिद्धि होती है किन्तु भूत भविष्यत् के भाव अप्रगट हैं इस लिये वर्तमान काल के हो भाव को ग्रहण करना चाहिये जो कि प्रगट हैं। । - - योग । कहा कम त्या । उत्तराधम्। स प्रकार ऋजुसूत्र और शब्द इन दोनों नयों का मन्तव्य है। इन नयों भाव निक्षेप ही माननीय है, अन्य नहीं । अन्य निक्षेप द्रव्य नयों को हैं, पर्यायार्थिक नय तो भाव पर नारूढ है। परन्तु शब्द नय'ऋजुसूत्र तर वर्तमान काल में आरूढ है। जैसे कि-श लिंग बचन से रना शब्द नय को उपादेय है तथा इन्द्रः शक्रः पुरंदर तथा घटः कुटः 'दि । सो शब्द नय के मतमें शब्द प्रधान और अर्थ गौण रूप होता है। मभिरूड नय के मत में वस्तु स्वगुण में प्रवेश करतो है । यदि एक शब्द शब्द एकत्व किया जाय तब वह अवस्तु रूर हो जाता है। जैसे कि- राक कहना। यद्यपि ये दोनों पर्याय नाम हैं किन्तु अर्थभेद अवश्य है। दतीति इन्द्रः, शक्नोतीति शक्रः, पुरं दारयतीति पुरंदरः इत्यादि। सो के मत में शब्द भिन्न होने से अर्थ मिन्न अवश्य होता है नहीं तो शब्द से श्रति प्रसंग दोष को प्राप्ति होगी। इस नय के मत से इन्द्र से उतना ही भिन्न है जितना कि घट से पट और अश्व से हस्ति, इस न २ शब्द के भिन्न २ अर्थ इस नय को स्वीकार हैं। तात्पर्य यह हुआ वस्तु के अनेक नाम इस को सम्मत नहीं हैं क्यों कि समभिरूढ़ नय का । है कि नाम के भेद होने से वस्तु का भेद होता है । इस प्रकार सम- त्य का विवरण होने पर एवंभूत नय के विषय में कहते हैं- एवंभूत के मत में व्यजन और अर्थ के युगपत् होने से वस्तु के स्वरूप कार किया जाता है। जैसे कि-व्यसन नाम शब्दको सो शब्दसे जो । अभिधेय अर्थ है उसको प्रगट किया जाय, उसे ही एवंभूतनय कहते ना घट चेष्टायां धातु से घट शब्द की उत्पत्ति है। सो जब घट पूर्ण जल हुआ स्त्री के मस्तक पर होता है तभी उसको घट कहा जाता है, अन्यत्र इस लिये वस्तु का जिस समय पूर्ण गुण उस वस्तुमें प्राप्त हो उसी समय 'नय के मत से उसकी वस्तु माना जाता यहां यदि ऐसे कहा जाय कि-मृत और भविष्यत् काल की चेष्टा को र करके समुच्च य रूप में उसे घट क्यों नहीं माना जाता ? इसका उत्तर कि-भूतकाल की चेष्टा विनाशरूप है और भविष्यत् काल की चेष्टा है। इस लिये ये दोनों चेष्टाएं शश-शृंगवत् होने से अमाननीय हैं। -यदि इस अपेक्षा से ही घट मानना है तब मृपिड को भी घट संसा हो जायगी तथा प्रसंगवशात् अन्य पदार्थ भी घट संचक होंगे। इस लिये व भी है ला है ।
. । ही [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् ] ३१७ सिद्ध हुआ कि सम्पूर्ण भात्र ही एवंभूत नय को उपादेय है क्योंकि एवं नाम है चेष्टादि का और भूत नाम है प्राप्त होने का । तब दोनों के मिलने से एवंभूत शब्द की सिद्धि हो गई है। इस प्रकार एवंभूत नय का मन्तव्य दिखलाया गया। सो सात ही नय साधारण रूप में एकान्त एक्षी होने से दुर्नय कहे जाते है। और अनेकान्त रूप होने से सुनय होते हैं। फिर सुनयों के मिलने से स्यावाद (जैन) मत बन जाता है अर्थात् सुनयों के समूह का नाम स्याद्वाद (जैन) मत है सो प्रसंगवशात् दुर्नग, नय, और प्रमाण का किंचित् विवरण दिखलाते हैं- "सदेव सत्स्यात्सदिति विधार्थी, मीयेत दुर्णीतिनयप्रमाणः । यथार्थदर्शी तु नयप्रमाणपथेन दुर्णीतिपथं त्वमास्त्व १॥" अर्थात्-पदार्थों का निर्णय तीन प्रकार से होता है-दुर्नय, नय और प्रमोण से । सत् यह नपुन्सक लिंगीय शब्द दुर्नय का बाधक है और सत् शब्द सुनय का बोधक है । स्यात् सत् यह शब्द प्रमाण का वाचक है। एकान्त वस्तु का मानना दुर्नय है और अस्ति शब्द के साथ वस्तु स्वरूप का कथन करना सुनय का लक्षण है । स्यात् सत् शब्द से वस्तु का स्वरूप कथन करना प्रमाण का लक्षण है । जैसे कि-स्यात् अस्ति घटः, इत्यादि। क्योंकि इस प्रकार से किसी भी वस्त के साथ विरोध भाव नहीं होता। इसी प्रकार सत्व स्वरूप असत्य स्वरूप; नित्य स्वरूर, अनित्य स्वरूप पक्त, अव्यक्त व्यकाव्यक स्वरूर; सामान्य स्वरूप, विशेष स्वरूप इत्यादि अनेक धर्म दुर्नय, नय और प्रमाण से वर्णन किये जाते हैं। स्तुतिकार कहते हैं कि हे जिनेन्द्र ! दुर्नयों के निग- करण में आप ह' समथ हैं; अन्य कोई भी वाही दुर्नयों का मार्ग निराकरण नहीं कर सकते और हे प्रभो! नय और प्रमाण से आपने ही दुर्नयों के मार्ग को लमार्ग बना दिया है। इस लिये हे नाथ ! आप यथार्थदर्शी है, अन्य कोई भी वादी आप के समान ज्ञानयुक्त नहीं है। और जो नय को प्रमाण तुल्य वर्णन किया है वह अनुयोगद्वार की व्याख्या की सिद्धि के लिये ही है। क्योंकि अनुयोगद्वार के चार मुख्य द्वार हैं । जैसे कि - उपक्रम १, निक्षेप २, अनुगम ३ और नय ४। अब दुर्नयों के बोध के वास्ते प्रथम नय का विवरण किया जाता है- जो अनन्त धर्मात्मक वस्तु को एक अंश से वर्णन करे उसे ही नय कहते हैं । इस प्रकार अनन्त नय सिद्ध होते हैं । इस में वृद्धवाक्य की प्रमाणता 1 -- ।
योग कह क्रम तथा । त्या। । । [ उत्तरार्धम् है। जैसे कि-"जावइया वयणपहो तावइया चेव हुंति नयवाया' यावम्मान वचन के मार्ग हैं तावन्मात्र ही नय वाक्य हैं तथापि मूल सूत्र में मूल सात ही नय वर्णन किये गये हैं। जैसे कि-नैगम १, संग्रह २, व्यवहार ३, ऋजुसूत्र ४, शब्द ६, समभिरूढ ६ और एवंभूत ७ ! इन के मुख्य दो द्वार हैं । जैसे कि-- अर्थ द्वार और शब्द द्वार । प्रथम चार अर्थ नय है, तीन पिछले शब्द नय है। और दुर्नय उसे कहते हैं जो एकान्त वाद को मानते हो और अनेकान्त वाद का निषेध करें। जैसे कि-नैगमनय खे नैयायिक और वैशेषिक दर्शन उत्पन्न हुये हैं संग्रह नय से अद्धैतवाद, सांख्य और मांसक दर्शन मी उत्पन्न हुए हैं, व्यवहार नय से चार्वाकमत प्रचलित हुआ है, ऋजुसूत्र के आश्रित बौद्ध दर्शन हैं । शब्दादि तीन नयों के आश्रित वैयाकरणादि हैं । नय और सुनय का विवरण ग्रंथों में इस प्रकार से भी किया गया है। जैसे कि--नैगम, संग्रह और व्यवहार, इनके अनेक भेद किये गये हैं । यथा धर्म धर्मी से प्रधान भाव से भाषण करना । उसे नैगम नय कहते हैं। जैसे कि आत्मा में चेतन गुण है सो आत्मा मुख्य है, चेतन उसका गुण है ! जब दोनों धर्मों का प्रधान भाव सिद्ध हुआ तब उसको द्रव्य और पर्याय स्वतः सिद्ध हो जाता है। इस प्रकार नैगम नय का सिद्धान्त है जब दोनों को एकान्त भाव से कथन किये जाये तब नैगमाभास हो जाता है जैसे कि--प्रात्मा और चेतन भिन्न २ पदार्थ हैं। इसी को नैगम दुर्नय कहते हैं। जो सामान्य मात्र से पदार्थों का वर्णन करे उसे संग्रह नय कहते हैं जिर मुख्य दो भेद है जैसे कि - पर संग्रह और अपरसंग्रह । सामान्य प्रकार से सर्व वस्तु को एक रूप मानना, परसंग्रह होता है फिर उसी को एकान्त रूप मानना उसे परसंग्रहाभास कहते हैं तथो द्रव्यत्व,गुणत्व, कर्मत्व आदि को अवान्तर सामान्य प्रकार से मानना-उसका विशेष कुछ भी कथन करना उसे अपरसंग्रह कहते हैं । जब धर्म, अधर्म, आकाश, काल और पुद्गल द्रव्य को एकान्त से एक रूप माना जाय तब वह अपरसंग्रहाभास हो जाता है। संग्रह नय के कथन को निर्मूल करता हुआ द्रव्य और पर्याय को ठीक २ मानने वाला व्यवहार नय होता है जो द्रव्य और पर्याय का एकान्त रूप से भेद मानता हो उसे व्यवहार नयाभास कहते हैं । इस नय के आश्रित चार्वाक दर्शन है। इस प्रकार व्यवहार नय और व्यवहार दुर्नय का विवरण किया गया है। य भी । वान के বু ह -- [श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् । ३१४ द्रव्य नय के पश्चात् चार पर्याय नयों का यह मन्तव्य है कि ऋजु- सूत्र नय वर्तमान काल को सुख को सुख दुःख को दुःख स्वीकार करता है और अन्य द्रव्य के उत्थापन करने से ऋजुसूत्राभास हो जाता है । इस नय के मानने वाला बौद्ध दर्शन है जो कि एकान्त वर्तमान काल की पर्या- य में प्रारूढ है कालादि के भेद होने से शब्द के अर्थ का भेद होता है उसे ही शब्द नय कहते हैं किन्तु उस अर्थभेद को एकान्त भिन्न रूप मानने से शब्द नयाभास हो जाता है। पर्याय के अनुकूल अर्थ का मानना समभिरूढ नय का मन्तव्य है । जैसे कि--इन्दनात् इन्द्रः, शकनात् शक्रः, पुरणात् पुरंदरः इत्यादि। यदि इन्हीं शब्दों को एकान्त रूप से भिन्न २ पदाथ माने जाये तब समभिरूढ नयाभास हो जाता है। शब्द के अनुकूल क्रिया का होना एवंभूत नयाभीष्ट है जैसे कि-इदका स्वरूप अनुभव करने से इन्द्र कहा जाता है, शकनयुक्त होने से शक है, (दत्यों के) पुर (नमर) विदारण से पुरंदर है इत्यादि । यदि क्रिया रहित वस्तु को उस शब्द से न उच्चारण करना चाहिये ऐला एकान्त निषेध करे तब एवंभूत नयाभास होता है । जैसे कि--विशिष्ट चेष्टा शून्य घट रूप वस्तु को घट न कहना। इन सात नयों में प्रथम चार अर्थ नय कहे जाते हैं पिछले तीन नय शब्द रूप से माने जाते हैं और सातों नयों का उत्तरोत्तर विषय अल्प है जैसे कि- नैगम नय से संग्रह नय का विषय अल्प है और संग्रह नय से व्यवहार नय का विषय स्तोक है। इसी प्रकार समभिरूढ नय से एबंभूत नय का विषय स्वल्प है इसका कारण पीछे कहा जा चुका है इसी लिये उसी अपेक्षा से जानना चाहिये और इन्हीं नय वाक्यों से सप्तभंगी को सिद्धि होती है अतः सप्तभंगी का स्वरूप अन्य जैन न्याय ग्रन्थों से जानना चाहिये । तृतीय द्वार प्रमाण का है । सो प्रमाण के मुख्य दो भेद हैं-प्रत्यक्ष और परोक्ष फिर सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष और निश्चयिक प्रत्यक्ष, इस प्रकार प्रत्यक्ष के दो भेद कहे गये है फिर इन्द्रिय प्रत्यक्ष और नोइन्द्रिय प्रत्यक्ष, इस प्रकार सांब्यवहारिक के दो भेद हाते हैं किन्तु इनके भी अ.ग्रह, ईहा, अवाय और धारणा, इस प्रकार चार भेद बन जाते हैं। प्रत्यक्ष प्रमाण क्षयोपशमिक और क्षायिक भाव से होता है। अवधिज्ञान और मनः- पर्यायवान खायोपशमिक भाव से उत्पन्न हैं। केवल चान क्षायिक भाव Lउत्तराधम्। । । । जैसे कि-" न के मार्ग हैं। वर्णन किये ग ६, समभिरू द्वार और श दुर्नय उसे निषेध करें। हैं संग्रह नय होर नय से शब्दादि तीन से ही होता है । परोक्ष ज्ञान के पांच भेद हैं । जैसे कि-स्मृति :, पत्यभिचान २, उह ३, अनुमान ४ ओर आगम '', पूर्व संस्कारोत्पन्न स्मृति शान है। स्मृति और अनुभव से उत्पन्न प्रत्यभिशान होता है। जैसे कि यह वही देवदत्त जिलको मैंने पूर्व में अमुक स्थान पर देखा था । त्रिकाल के साध्य और साधन ज्ञान से ऊह शान होता है तथा इस का द्वितीय नाम तर्क ज्ञान भी है । अनुमान के दो भेद हैं स्वार्थानुमान और परार्थानुपान। स्वार्थानुमान अन्धधानु पनि लक्षण हेतु ग्रह संबन्ध स्मरणहेतुक साध्य ज्ञान होता है, परार्थानुमान पक्ष हेतु दृष्टान्न उप- नय और निगमन रूप पांच अवयवो होता है। श्री अहत् देव के वचन से उत्पन्न हुए शान को आगमानुमान कहते हैं तथा उपवार स सर्वज्ञ के वचन को हो आगमानुमान कहते हैं। इस प्रकार नय प्रमाण पूर्वक प्रमाण वचन होता है,अन्य- था वह दुग्ध है। इस बार एकान्तवाद मिथ मारूप है, अनेकान्लवाद सम्यग दर्शन है । श्रीजिनेन्द्र देव के स्थाद्वादरूप दर्शन में सर्व नय भुक्ताहारवत् सुन्दरता को प्राप्त है और इनका पासर स्याद्वादशन में विराध मिट जाता है जैसे कि मध्यस्थ के सन्न वाही प्रतिवादी शान्त हो जाते हैं । इसो प्रकार श्रीजिनेन्द्र देव के ' स्यात्" इस पवित्र वचन से सर्व नय विवाद रहित होकर मैत्री भाव से परस्पर निवास करते हैं ! नय और - कि--नैगम, धर्मी से प्रधा मो में चेतन: का प्रधान ता है। इस प्रा कथन किये ज़ न २ पदार्थ हैं जो सामान मुख्य दो भेद वस्तु को एर मानना उसे । यहां यदि यह शंका की जाय कि जब सर्व दर्शन स्यावाद दर्शन में विद्यमान हैं तब स्थाद्वाद दर्शन अन्ध दर्शनों में क्यों नहीं माना जाता ? तो इसका उत्तर यह है कि समुद्र तो सर्वनदीमय है किन्तु पृथक् २ नदियों में समुद्र प्राप्त नहीं होता। इसी प्रकार स्याद्वाद दर्शनके विषय में भी जानना चाहिये क्यों कि एक वस्तु का स्याद्वाद मत के अनुसार मानने से जीव सम्यग दृष्टि होता है और एकान्त एक र नय के मानने से जीव मिथ्याइष्टि हो जाता है। इन नयों के कथन करने का मुख्य प्रयोजन इतना ही है कि सामायिकाध्ययन जब उपक्रम नि. क्षेप अनुगमादिके द्वारा वर्णन किये गये हो तो फिर उनको नयों द्वारा वर्णनकरना चाहिये-एक सूत्रमात्र को तथा सर्व अध्ययन को भी नयों द्वारा वर्णन करना चाहिये । एक सूत्र, जैसे "रागे आया" इत्यादि सूत्र की भी नयों द्वारा व्याख्या करनी चाहिये और सर्व अध्ययन की भी नयों द्वारा व्याख्या करनी चाहिये । यद्यपि नयोंके अनेक भेद हैं । जैसे कि यावन्मात्र वचन मार्ग हैं नावन्मात्र नय हैं तथा सात गादि मूल नय हैं वा द्रव्यार्थिक पर्यायाधिक वाचान नय, क्रिया न्तर सामान्य अपरसंग्रह न्त सेप । । । । श्रीमदनुयोगद्वारसूत्रम् । नय; निश्चय नय, व्यवहार नय; शब्द नय, अर्थ नय त्यादि नयोंके अनेक भेद है। तथापि सर्व अध्ययन का विचार ज्ञान नय और क्रिया से करना चाहिये क्योंकि ये मोक्ष के कारण हैं। इसी लिये हम यहां अब ज्ञान और किया के विषय में कुछ कहते हैं। क्योंकि इस समय इन दोनों की ही उपयोगिता है, अन्य नयों का प्रस्ताव नहीं है। पदार्थों के स्वरूप को जो उपादेय” हो उसे ग्रहण चाहिये, जो "हेय" रूप हो उन्हें साग करना चाहिये और जो "य" रूप (जानने योग्य) हो उन्हें मध्यस्थ भाव से देखना चाहिये । इन लोक सम्र- न्धी नुवादि सामग्री ग्रहण योग्य है, विषादि पदार्थ त्यागने योग्य है और तृणादि पदार्थ उपेक्षणीय है । यदि परलोक सम्बन्धी विचार किया जाय तब मम्यग दर्श- नादि ग्रहण करने योग्य हैं, मिथ्यात्वादि क्रिग त्यागने योग्य हैं और स्वर्गीय सुग्व उपेक्षणीय हैं। इस प्रकार तीनों प्रकारके अर्थों में यत्न करना चाहिये। कोकि ज्ञान नय का मन्तव्य है कि-हे श्रार्यो! शान बिना किसी भी कार्य की सिद्धि नहीं होती । ज्ञानी पुरुष ही मोक्ष के फल को अनुभव कर सकते हैं । अन्ध पुरुष अन्ध के पश्चात् गमन करने से वांछित अर्थ को प्राप्त नहीं कर सकता । जैसे बीज बिना अंकुरोत्पत्ति नहीं है इसी प्रकार ज्ञान बिना पुरुषार्थ की सिद्धि नहीं है फिर शान से सववत, देशवत, क्षायिक सम्यक्त धादि अमूल्य पदार्थों की प्राप्ति हो मकती है अत एव सर्व का मूल कारण झान ही है । क्रिया नय का मन्तव्य है कि सर्व का मुख्य कारण क्रिया हो है जैसे कि तीनों प्रकार के अर्थों का जान कर उन में फिर यत्न करना । इसी कथन मे क्रिया को मिद्धि की गई है। ज्ञान तो क्रिया को उपकरण है इस लिये क्रिया मुख्य और ज्ञान गौण रूप है । इस प्रकार क्रिया नय का उपदेश है कि क्रिया ही मुख्य है जैसे कि क्रिया से रहित ज्ञान स्वर के समान चन्दन के भारवत् है नथा ज्ञान से जीव सुख नहीं पाते तथा ज्ञान से पुत्रोत्पत्ति नहीं हो सकती, नोर्थंकर देव भी अन्तिम समय पर्यन्त क्रिया के हो श्राश्रित रहते हैं। बीज को भी बाहिर की सामग्री की अत्यन्त आवश्यकता है तबही अंकुरोपनि होती है। इसलिये सब का मुख्य कारण क्रिया हो है । इस प्र. कार क्रिया नय का मन्तव्य है किन्तु एकान्न पक्ष में मोक्ष प्राप्ति का अभाव है । इसलिये अब मान्य पक्ष के विषय में कहते हैं कि सर्व नयों के नाना प्रकार के वक्तव्य को सुनकर सम्या सामायिक और श्रत सामायिक को ज्ञान प्रधान नय मानते हैं, अन्य दोनों के मत में गौण रूप हैं. इस प्रकार नयों के परस्पर विरोध जनक भाव को सुनकर जो और क्रिया में स्थित है वही मोक्ष का साधक होता है। कारण कि एकान्त पत मिथ्या रूप है । इस लिये ज्ञान और क्रिया युगपत् मोक्ष के साधक हैं क्योंकि केवल ज्ञान से और केवल क्रिया से कार्यसिद्धि नहीं होती । जैसे कि अन्नादि के ज्ञान से भी बिना क्रिश किये उदरपोषणादि नहीं हो सकते। इस वास्ते श्रीतीर्थ कर केवलशान और यथा- ख्यात चरित्रयुक्त होते हैं। फिर केवल क्रिया से भी कार्य सिद्धि नहीं होती तथा । साधु ज्ञान - Lउत्तराधम् कि- NAGAR मार्ग हैं। न किये। समभिर স্বীয় হ नय उसे 'ध करें। संग्रह नय (नय से दादि तीन नय और --गम माँ से प्रध में चेतन जब क्रिया हो जाती है नव उस का बान प्रथम ही होता है इसलिये क्रिया का ज्ञानपूर्वक होना सिद्ध हुश्री । इस लिये सिद्ध इा कि-ज्ञान और क्रिया दोनों के समकालीन होने पर ही मोक्ष के फन की प्राप्ति होती है। जैसे कि-क्रिया से रहित ज्ञान निष्फल हो जाता है, क्रिया ज्ञान से रहित होने से शून्य हो जाती वोचित सिद्धि नहीं हो सकती जैसे कि-पंगुला और अंध भागते हुए सुमार्ग को नहीं प्राप्त होते तथा वृक्ष के फल को नहीं ले सकते तथा जैसे एक चक्र से शकट नगर को प्राप्त नहीं हो सकता हनी प्रकार अकेने ज्ञान और अकेले किरा से सिद्धि नहीं, अपितु दोनों से सिद्धि होती है । यहां यदि ऐसी शका की जाय कि जयनों में पृथक २ भाव में मुक्तिसाधन को शक्ति नहीं है नो युगपत् में वह शक्ति कहां से उत्पन्न होगी ? इन का उत्तर यह है कि ज्ञान और क्रि पृथक २ भार में दे। उपकारी होते हैं, युगात् मिलने से सर्व उपकारी बन जाते हैं। जैले एक सर्षा नै न की प्राशा पूरी नहीं कर सकता और यदि सर्षगों का समूह हो जाय तो तैन की प्रासा पूर्ण हो जाती है । इली प्रकार ज्ञान और क्रिया दोनों से मोक्ष की प्राप्ति हो जानी है, एक २ से नहीं । इस प्रकार मानने और ग्रहण करने से भारसाधु होता है। इस तरह नय द्वार की समादिन होते हुए चतुर्थ अनुयोगहार की भी समाप्ति होती है। चतुर्थ अनुरोगद्वार के पूर्ण होने से श्रीमानुयोगद्वार सूत्र को भी पूर्ति होती है क्यों कि अनुयोगद्वार सूत्र के चार मुख्य द्वार है सो चारों की पूर्ति होने से अनुयोगद्वार सूत्र की पूर्ति हो गई। कतिपय प्रतियों में अनुयोगद्वार सूत्र की पूर्ति के पश्चात् निम्न लिखित दो गाथाएं भी लिखी हुई मिलती हैं- "सोलसयाणि, चउरुत्तराणि होति उ इममि गौडाणं । दुसहस्लमणुदमछंदवित्तपमाणो भणियो॥ १॥ गण्यरमहादरा इव उवक्कमदाणु प्रोगवरदारा । अवरबिटुगमता लिहिश्रा टुक्ख खपट्टाए ॥ २॥" इन गाथाओं का सारांश इतना ही है कि श्रीमनु योगद्वार सू। की. १३०४ गाथाएं हैं और २०८५. अनुष्ट छन्द हैं ॥१॥ जैसे महानगर के मुख्य मुख्य चार द्वार होते हैं उसी प्रकार श्रोन इतु गेगदार सूत्र के उपादि नाम । और इस सूत्र का अन, बिंदु और मात्रायें जो लिखी गई है वे सदुखों में नय करने के वास्ते ही हैं। यद्यपि ये गाथा ये मूल स्त्र में नहीं हैं। वृत्तिकारों ने इन को वृत्ति मी नहीं लिखी है तथापि इन का सारांश अच्छा होने से तथा कतिपय प्रतियों में थे गाथायें लिखी हुई है। इस लिये मैं ने भी यहां पर लिख दी है। यदि प्रमाद वश प्रज्ञान भाव से सूत्र से किंचित् मात्र भी मेरे से विरुद्ध लिखा गया हो तो में 'मि व्छा मि दुक कर्ड" ग्रहण करता हूं। इति श्रीमदनुयोगद्वारमत्रस्य हितोपाभावाची समाप्त। प्रधान न किये ज १ पदार्थ है जो सामा र दो भेद स्तु को ए नना उसे र सामान् परसंग्रह नर "श्रीजनागमप्रकाशक मण्डल" गौहरी बाजार आगरा। संसार में आज कल प्रायः सभी सम्प्रदायों का साहित्य बड़ी उत्तमता, सुन्द- रता और विशालता के साथ प्रकाशित होकर जनता में अपना-अपना प्रचार कर रहा है। धर्म-प्रचार के सब साधनों में से आजकल सिर्फ उच्च कोटि का साहित्य प्रकाशित करना ही सर्व श्रेष्ठ साधन गिना जाता है। ज्ञातव्य-ज्ञातव्य बातों से भरा हुआ, सर्वाङ्गपूर्ण, एक से एक नयनाभिराम और बहुज्ञों द्वारा सम्पादित करा कर आजकल जैसा विशाल साहित्य अन्य समाज की सुदृढ़ संस्थाएं कर रही हैं, उसे देख कर हमें चकित रह जाना पड़ता है। जैन समाज में ऐसी संस्थाओं का सर्वथा अभाव देखकर हमें बड़ा खेद खिन्न और लज्जित होना पड़ता है और धर्मप्रचार के कामों में अन्य समाजों के सामने हमें अपनी कमी अनुभव में आती है। इसी बात को महसूस करके उक्त नाम की संस्था की नींव डाली है । तदनुसार उस को देख रेख से निम्न लिखित छोटे, पर अच्छे, पुराने ढंग के, पर नये रूपसे तीन ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं- ने 8 १-"उवएस-रयण-माला" २-"जीव-विचार, ३-"समस्या पूर्ति-सुमनमाला" - उक्त तीनों ग्रन्थ सुन्दर कागज पर काफा संशोधन पूर्वक नये टाईपों में छापे गए हैं। पहिला संस्करण प्रायः समाप्त होने को आया । प्रत्येक जैन साहित्य को प्रकाशित कराने वाले । अनुगगी बन्धुओं से निवेदन है कि आप जो भी ग्रन्थ प्रकाशित करावें वह इस मण्डल की देख रेख के नीचे प्रकाशित करावें । अब तक इस मण्डल की देख रेख में दो तीन यह माधारण ग्रन्थ ही प्रकाशित हो सके थे। परन्तु अब इस मण्डल ने जैन सूत्रों को प्रकाशित कराने का काम अपने हाथ में लेकर सब से प्रथम उपाध्यायजी श्री आत्माराम जी महाराज का अनुवाद किया हुआ "श्रीदशवैकालिकसूत्र" को प्रकाशित कराने का काम अपने हाथ में लिया है, जो आधे से अधिक छप चुका है । यह सूत्र किस रंग ढंग से प्रकाशित हो रहा है, उस का थोड़ा सा ज्ञान तो पाठकों को नीचे के विज्ञापन से हो जायगा और पूरा परिचय जब पाठकों के हाथ में पहुँचेगा तब मिलेगा। निवेदकः पद्मसिंह जैन: व्यवस्थापक-"श्रीजैनागमप्रकाशक मण्डल" जौहरी बाजार, आगरा।