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ईशावास्योपनिषद्

2005/06/17

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Birla Central Library
PILANI (Jaipur State)
Class No.
Book No :-
$ 296.1
S213IJ
27449
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श्रीगणेशाय नमः। आदौ मङ्गलाचरणम् ॥ वन्दे शैलसुतापतिम्भयहरं मोक्षप्रदं प्राणिना मोहध्वान्तसमूहभजनविधी प्राभास्कर चान्वहम् । यद्बोधोदयमात्रतः प्रेविलयं विघ्नस्य शैलबजा यान्त्येवाखिलसिद्धयः प्रतिदिनं चायन्तहीनं परम् ॥१॥ यन्ध्यायन्ति मुनीश्वराः प्रतिदिनं संयम्य सर्वेन्द्रिया ण्यक्तिीर्थजलाभिषिकशिरसो नित्यक्रियानिवृताः। षट्चक्रादिविचारसारकुशला नन्दन्ति योगीश्वराः तं वन्दे परमात्मरूपमनघं विश्वेश्वरं ज्ञानदम् ॥२॥ दो० करों वन्दना ब्रह्मको, जो अनन्त निजरूप। जेहिजानेजगभ्रम सकल, मिटै अन्ध तमकूप ॥ नाम रूप जामें, नहीं, नहीं जाति भरु भेद। सो में पूरण ब्रह्म हूं, रहित त्रिविधपरिछेद ॥ ब्रह्मभाग जो उपनिषद, ताका करूं विचार । भाषामें तिस अर्थको लखै सकल संसार ॥ सन्त संग से जो लख्यो, सो मैं करूं बखान । परमानन्द सहाय ते, जाने सकल जहान ॥ पुरी अयोध्या के निकट, अकबरपुर है गांव । जन्मभूमि मम जान तू, जालिमसिंहहि नांव ॥ यह संसार प्रसार महापार समुद्र है, इसके पार होने के लिये उपनिषद् अद्भुत अलौकिक अद्वितीय नौका है, जिसमें बैठकर असंख्य सजन मुमुक्षुजन विना प्रयासही ऐसे दुस्तर सागर के पार होगये और होते जाते हैं और भविष्यकालमें २ +च - और +च = और ईशावास्योपनिषद । देवतों का अक्षभिः = नेत्रोंद्वारा हितह याने भद्रम् = कल्याणको यज्ञ दान पश्येम = देखें हम देवहितम् आदिसेदेव- तों का हित स्थिरैः- स्थिर यानी करनेवाला है हढ़ व्यशेमहि = प्राप्त होवें अङ्गैः = अंगोंकरके ( हमारे ताप त्रय की शा- +स्थिराभिः स्थिरयानीढ़ न्ति होवै अ- तनुभिः = शरीरों करके र्थात् आध्या- ॐशान्तिः +युष्माकम् आपकी त्मिक आधि- शान्तिः तुष्टुवांसः = सदा स्तुति भौतिक आ- शान्तिः करतेहुये धिदैविकरूप ; +वयम्- हम आयुः आयुको हैं उनका ना- यत् = जोकि शहोवे +च % और जो दुःखत्रय ॐ हरिः ॐ मूलम् । ईशा वास्यमिदर्थ सर्व यत्किच जगत्याञ्जगत तेन त्यकेन भुञ्जीथा मागृधः कस्यस्विडनम् ॥१॥ पदच्छेदः। ई प्रास्यम् इदम् सर्वम् प्रत किय जगत्याम यत्किञ्च = जो कुछ शावास्योपनिषह। जगत् तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मागृधः कस्यस्चित् धनम् ॥ पदार्थ पदार्थ त्यक्तेन = पृथक् होकरके जगत्याम् = जगत विषे + स्वात्मानम् = अपने जगत् = नामरूपात्मक आत्माको जगत है भुञ्जीथाः = रक्षाकरे + तत् = सो + च = और इदम् = यह कस्यस्वित-किसीके भी विषय ईशा = ईश्वरकरके भोगरू- वास्यम् = पाच्छादित है पधनकी तेन = तिससे यानी मागृधः = आकांक्षा सर्वम् = सब धनम् - जगत् से न करे भावार्थ। ईशावास्यमिदासर्वमिति ॥ “ उपनिषद" में तीन पद हैं, उपनिषाई, “उप"पदमा भर्थसमीपताहे, या ऐक्यता है,और 'नि" प्रवकनिश्वक और “पर” पवका अर्थ नाम या मुकि है वीमिलने सामर्थ होता है कि जो जीक और मामले अमेषको विषमकमेपाली नागरिया है, यह विद्वानों के जन्म मरण रूपी अनर्थको नाशकरके ब्रह्मको प्राप्त करती है, या बुद्धि के समीपस्थितमाकी प्राप्ति करनेवाली जो निश्चयकरके किया

ईशावास्योपनिषद् ।
मूलम् ।
अन्वयः
पदार्थ अन्वयः
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतई समाः
एवन्त्वयि नान्यथेतोऽस्ति नकर्म लिप्यतेनरे॥२॥
पदच्छेदः।
कुर्वन् एव इह कर्माणि जिजीविषेत् शतम्
समाः एवम् त्वयि न अन्यथा इतः अस्ति न
कर्म लिप्यते नरे॥
पदार्थ
इह = इससंसार में अन्यथा = और कोई
कर्माणि = निष्काम क-
मर्मों को
न-नहीं
अवश्यही
अस्ति है
कुर्वन् = करते हुये एवम्- इस प्रकार
शतम् = सौ
नरे = मनुष्य बिषे
जिजीविषेत् = जीनेकी इ कर्म = कर्म
उपाय
एक-
करते हुये
त्वयि%= तुझ
समाः= वर्ष
च्छा करे
न% नहीं
इतः = इसके सि- लिप्यते = लिपायमान
वाय
होगा
नोट-लिप्यते यह वर्तमान काल है परन्तु अर्थ भविष्यत्काल
काही देताहै और इस मन्त्र का उपदेश मध्यमाधिकारी मुमुक्षु के
प्रति है ॥२॥

ईशावास्योपनिषद् । भावार्थ । कुर्वन्नेवेहेति ॥ जो पुरुष धन का अभिलाषी है, और ईश्वर के जानने में भी असमर्थ है, उसका त्याग में अधिकार नहीं, उसके प्रतिश्रुतिकर्महीं करनेका उपदेशकरती है । इहेति ॥ इसमृतलोक में अधिकारी पुरुष नित्यकर्म जो अग्निहोत्र और सन्ध्यादिकहैं,उन को करता हुवा और फलकी अभिलाषा से रहितहोता हुवा सौ वर्ष तक जीनेकी इच्छाकरै, हेशिष्य! इस प्रकार जब तू कर्मकरेगा तब तू कर्म के बंधन में नहीं पड़ेगा, अर्थात् कियेहुये कर्म तुझको जन्ममरणरूपी संसार में नहीं बांधेंगे, किंतु अन्तःकरणके शुद्धि के हेतु होवेंगे और अन्तःकरण के शुद्धि होनेपर ज्ञानकी प्राप्ति होगी और ज्ञानद्वारा मुक्ति को तू प्रात होगा इसलिये स्ववर्णा- श्रम के कर्मों का अनुष्ठान करना उचित है, गृहस्थ पुरुषको उनका त्याग उचित नहीं है ॥२॥ असुर्य्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाहताः तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनोजनाः॥३॥ पदच्छेदः। असुर्य्याः नाम ते लोकाः अन्धेन तमसा भारताः तान् ते प्रेत्य अभिगच्छन्ति ये के च आत्महनः जनाः॥ पदार्थ अन्वयः पदार्थ +ये जो आटताः= आटत हैं लोकाः = लोक तेवे अन्धेन = अदर्शनात्मक असुर्याः असुरोंके समान (अति) नाम-प्रसिद्ध हैं तमसा = अज्ञान से अन्वयः च= और जो ईशावास्योपनिषद् । ये= जनाः- जन हैं के = कोई तेवे । अात्मह- तान् = उन लोकों त्यारेयानी को अपनेया- आत्महनः- त्माकोनहीं प्रेत्य - मरकरके उद्दार क- अभिग प्राप्त होते हैं। रनेवाले च्छन्ति । भावार्थ । असुर्या नामतेलोकेति ॥ यह तीसरामंत्र अज्ञानी कर्मियों की निंदाकरता है । असुर्याइति ॥ सुष्टुरमंतेइतिसुरा ॥ भलीप्रकारसे जो आत्मामें रमणकरेंवक्रीड़ाकरें,उनकानाम सुर है, वही आत्मा- राम कहेजाते हैं, उनसे जो भिन्न विषयों में रमण करनेवाले हैं, वे असुरकहेजाते हैं, उनके कर्मोंसे उत्पन्न हुये जोलोकहैं, और जिनमें वे जाकर भोगते हैं, वे असुरलोक कहे जाते हैं, लोकका अर्थ यहां योनि है, अर्थात् कामुक कर्मों के करनेवाले कूकरसकरादि योनियों में जाते हैं, और वेदविहित कर्मों के करनेवाले देवतादि योनियों में जाकर शरीर को धारण करते हैं, और उन योनियों में कर्मों के फलको भोगते हैं, ये सब असुर कहेजाते हैं, क्योंकि आत्मा का अज्ञानरूपी जो तम है, उस करके उनके चित्त आच्छादित होते हैं, वे आत्मा के ज्ञानसे शून्य होने के कारण संसारचक्र में भ्रमते ही रहते हैं, अर्थात् एक शरीर को त्यागकर दूसरे शरीर में दूसरे से फिर तीसरे में जातेहैं, इसप्रकार घटीयंत्रकी तरह उनका चक्र चलताही रहता है, वास्तव में वे आत्महत्यारे हैं, वे आत्माका हनन करते हैं ॥३॥ अपने अज्ञान करके अजर अ- मर भास्माको जरामरमादि धर्मोवाला मानते हैं, और इसी से 8 ईशावास्योपनिषद् । वार २ जन्म मरणको प्राप्तहोतेहैं यही आत्मा हनन है (प्र०)देवयो- नियों से इतर योनि को असुर कहना चाहिये क्योंकि वह निषिद्ध कर्मोंके करने से मिलती है, देवयोनि तो बड़े भारी पुण्य कर्मों से मिलती है, उसको असुरयोनि कहना उचित नहीं है, (उ०) शुभ कर्मों के करने से देवयोनि की प्राप्ति होती है इसमें कोई संदेह नहीं, परंतु वह देवयोनि केवल विषय भोगों के लियेही होतीहै, आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये नहीं होती है, इसीवास्ते दे- वता भी सब महान् भोगी होतेहैं आत्मज्ञान से शून्य होते हैं, अनेक कुकर्मों को करते हैं और अपने शरीर से गिरकर फिर छोटी योनियों में जाते हैं, इसीसे देवयोनिको भी असुर योनि कहाहै ॥३॥ नोट-इस मंत्रका उपदेश सकामकर्मियों के निंदाके प्रति है । मूलम् । अनेजदेकम्मनसो जवीयो नैतद्देवा आप्नुवन्पूर्व- मर्शत तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मा- तरिश्वा दधाति ॥४॥ पदच्छेदः। अनेजत् एकम् मनसः जवीयः न एतत् देवाः आप्नुवन् पूर्वम् अर्शत् तत् धावतः अन्यान् अ- त्येति तिष्ठत् तस्मिन् अपः मातरिश्वा दधाति ॥ पदार्थ अन्वयः पदार्थ एतत् =यह आत्मा तिष्ठत् = विकाररहितहै अनेजत् = अचलहै एकम् = अद्वैतहै अन्वयः ण वायु अग्नि पा- और सब प्रा- ईशावास्योपनिषद् । मनसः= मनसे +च और जवीयः = आगे जानेवा- लाहै तस्मिन् = उसी चेतन पूर्वम् = पहलेसेही आत्मा बिषे अर्शत् = गयाहुवाहै मात सूत्रात्मा प्रा- + यत् = जिसको रिश्वा चक्षुरादि इ- देवाः = न्द्रिय अभि- मानीदेवताभी दित्य आदि न नहीं प्राप्नुवन् - अपः-णियों के ज्व- प्राप्तहोते हैं तत् = वही आत्मा लन दहन धावतः = शीघ्रचलतेहुये आदि सब कर्मों को अन्यान् = नीमन श्रा- धारण करता है यानीसबको (उल्लंघन करता दधाति =अपने अपने अत्यति है यानी पीछे कर्मों विषे प्रे- छोड़ देता है रणा करता है भावार्थ। अनेजदेकमिति" (प्र०) जिस आत्मा के स्वरूप के अज्ञान से अज्ञानीलोक जन्म मरणरूपी संसारको प्राप्त होते हैं और ज्ञानीलोक जिस आत्मा के स्वरूप के ज्ञानसे मुक्त होजाते हैं तिस आत्माका स्वरूप कैसा है (उ०)॥अनेजत्॥ वह भात्मा चलनादि औरोंको या- दिकों को ईशावास्योपनिषद् । क्रियोंसे रहित है, सारे जगत् में एकही है, नाना नहीं है, शरीरों के भेदसे भी भेदरहित है,मनसे भी वेगवालाहै, (प्र०)आपने आत्मा को "अनेजत्"यानीक्रियासेरहित पूर्व कहा,अब आप उसकोमनसे भीअतिवेगवाला अर्थात क्रियावाला कहते हैं, एकमेंही दो विरोधी धर्म कैसे रहसक्ने हैं (उ०) विरोध नहीं आताहै क्योंकिंजो आत्मा निरुपाधिक है अर्थात् अन्तःकरणादि उपाधियों से रहित है, वह व्यापकहै, और वह क्रिया से रहित ध्रुव है, और अन्तःकरणादि, उपाधियों में प्रतिबिंबितजो विशेष चेतनहै, वह जीवात्माहै,उसमें अन्तःकरणके साथ संबंध होने से क्रिया प्रतीत होती है और इसलिये उपाधि के संबन्ध से क्रियावाला कहाजाता है, मन स- कल्प करके देशांतर लोकांतरको क्षणमात्र में प्राप्त होताहै, और आत्मा व्यापक होनेसे वहां पर प्रथमहींप्राप्त है, इसीकारण मंत्र ने उसको मनसे भी अधिक वेगवाला कहा है, (प्र०) मनकरके रूपादिकों का प्रत्यक्ष नहीं होताहै पर चक्षुरादिकों करके उनका प्रत्यक्ष होताहै तैसे ही आत्माका प्रत्यक्ष भी चक्षुरादिको करके क्या न होना चाहिये (उ०)॥देवा॥चक्षुरादि इन्द्रिय करके आत्मा प्राप्त नहीं होसका है, जैसे मनमें स्थित मनका जो परिमाण है, तिसका मन करके ग्रहण नहीं होता है, तैसे ही मनमें अनुगत आत्माका भी मन करके ग्रहण नहीं होताहै,और जैसे चक्षुइन्द्रिय के गोलक में स्थित जो अंजन है तिसका प्रत्यक्ष चक्षु इन्द्रिय करके नहीं होताहै, तैसे चक्षुमें अनुगत आत्माका भी चक्षुकरके प्रत्यक्ष नहीं होताहै, (प्र०) जिस आत्माका प्रत्यक्ष मन और चक्षुकरके नहीं होता है, वह असत् होगा (उ.) वह असत्य नहीं, किंतु सद्रूपही है, क्योंकि वह आत्मा व्यापक होने के कारण मन आदिकों से प्रथमहीं प्राप्त है, और जहां मन इन्द्रियादिक दौड़कर प्रात होते हैं, वहां वह उनसे प्रथमहीं प्राप्त रहताहै, और चेतन आत्मामें मातरिश्वा जो समष्टी प्राणोंका अभिमानी हिर- एयगर्भहै, वह चेतनद्वारा ब्रह्मा होकर जगत् और कल्पादिकों को . , १२ ईशावास्योपनिषद् । कर्ता है और उनको और संपूर्ण जीवों को विभागकरके स्थापन करताहै, तात्पर्य यहहै कि संपूर्ण कार्य करण संघात का व्यापार विना अधिष्ठान चेतन के नहीं होसकाहै ॥४॥ नोट-प्राप्नुवनभूतकाल है परन्तु अर्थ वर्तमानकाल का देताहै। मूलम्। तदेजति तन्नजति तद्दूरे तद्वदन्तिके तदन्तर- स्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥५॥ पदच्छेदः। तत् एजति तत् न एजति तत् दूरे तहत् अन्तिके तत् अन्तः अस्य सर्वस्य तत् उ सर्वस्य अस्य बाह्यतः॥ अन्वयः पदार्थ तत् = सोई अात्मा समीप है एजति= चलता है उ- पाधी करके तत् = सोई आत्मा अस्य-इस उपाधी विना सर्वस्य = संपूर्ण जगत् के न% नहीं अन्तः= अभ्यन्तर बिषे एजति = चलता है स्थित है तत् = सोई आत्मा दूरे = अविद्वानों से तत्- अस्य- इस तहत् -वैसेही सर्वस्य = सब जगत् के अन्तिके - विद्वानों के बाह्यतः= बाहर है पदार्थ अन्वयः +च % और तत्-3 सोई आत्मा उ=और सोई आत्मा है ईशावास्योपनिषद्। भावार्थ। "तदेजतीति” मंत्रों को आलस्य नहीं है यानी एकही वस्तु की बार २ बाधार्थ कहा करते हैं इसी हेतुसे कहेहुये अर्थ को फिर मंत्र कहते हैं ॥ ईश्वररूप आत्मा वायुआदि उपाधि करके चलता प्रतीत होताहै, और ईश्वररूप आत्मा स्वभावकरके च- लता नहीं है, क्योंकि वह अपने स्वभाव से क्रिया रहित है, वही ईश्वररूप प्रात्मतत्त्व अज्ञानियों को दूर प्रतीत होता है, यानी अज्ञान के कारण करोड़ों बरसोंतक भी उनको प्राप्त नहीं होता है, और वही ईश्वररूप आत्मा ज्ञानवानों को अतिसमीप है, क्योंकि वह उनका अपना आप आत्मा है, वही ईश्वरात्मा संपूर्ण चरा- चर जगत् के अन्तर बाहर आकाश की तरह व्यापक है ॥५॥ मूलम् । अन्वयः यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति सर्व- भूतेषु चात्मानं ततो न विचिकित्सति ॥६॥ पदच्छेदः। यः तु सर्वाणि भूतानि अात्मनि एव अनुपश्यति सर्वभूतेषु च आत्मानम् ततः न विचिकित्सति ॥ पदार्थ अन्वयः पदार्थ तु- और अनुप यः = जो ज्ञानी पुरुषश्यति देखता है सर्वाणि = सब भूतानि = भूतोंको आत्मनि = आत्मामें(यानी सर्वभूतेषु = सम्पूर्ण भूतों में अपने में) आत्मानम्-श्रात्माको एव%निश्चयकरके (यानीअपनेको) च - और +अनूप} = देखता है १४ ईशावास्योपनिषद् । न = नहीं श्यति सन्देह को प्राप्त होताहै यानीसं- + सः-वह विचिकि ततः = इसप्रकार के सति शय विपर्यय से रहितहुआ जी- दर्शन से वन्मुक्त होता है भावार्थ। “यस्तुसर्वाणीति"-अब आत्मज्ञानके फलको कहते हैं॥जो विद्वान् ब्रह्मा से चीटी पर्यन्त संपूर्ण भूतों को अर्थात् संपूर्ण प्रा- णियों को अपना आत्मा जानता है, और संपूर्ण भूतों में अपनेही आत्माको देखता है, अर्थात् मैंही संपूर्ण भूतों में स्थित हूं, वह किसी प्राणी की निंदा नहीं करता है, निंदा वह करताहै जो अपने से भिन्न दूसरे को देखता है, सो विद्वान् अपने से भिन्न किसी को भी नहीं देखताहै किंतु सबको अपना आत्मारूप करकेही देखता है और जब अपने आत्मा की निंदा अज्ञानी पुरुष भी नहीं करता है तब ज्ञानवान् कैसे करैगा ॥ ६ ॥ मूलम् । यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः तत्र को मोहः कःशोक एकत्वमनुपश्यतः॥७॥ पदच्छेदः। यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मा एव अभूत् विजा- नतः तत्र कः मोहः कः शोकः एकत्वम् अनुपश्यतः॥

ईशावास्योपनिषद् । १५ अन्वयः पदार्थ | अन्वयः पदार्थ यस्मिन् = जिसकाल में एकत्वम् = एकत्व को विजानतः = ज्ञानवान् को यानी अभेद सर्वाणि = संपूर्ण अनुपश्यतः = देखनेवाले भूतानि = भूत पुरुष को आत्मा-आत्मा कः-कहां एक ही मोहः = मोह है +च % और सिद्ध होता कः= कहां अभूत् % यानी प्रतीत शोकहै कि- होताहै न्तुमोह शो- क रहित तत्र -तिस काल में होता है भावार्थ । “यस्मिन्सर्वाणीति"-जिस पूर्वोक अभेद ज्ञानी विद्वान् को प्राणीमात्र अपना आत्माही प्रतीति होनेलगता है,याने जब उसको ऐसा अनुभवहोताहै कि संपूर्ण प्राणियों का आत्मा में ही हूं, तिस विद्वान् को न मोह है, न शोक है, क्योंकि उसकी मूला- विद्या आत्मविद्या करके नाशको प्राप्त होजाती है, और अ- विद्या के नाश होनेसे अविद्या के कार्य जो शोक मोहादिक हैं, वे भी सब उसके साथहीनाशको प्राप्त होजाते हैं, क्योंकि कारण के नाशसे कार्य का भी नाशही होजाताहै ॥७॥ नोट-अभूत् भूतकाल है परंतु अर्थ वर्तमान का देताहै। शोकः% १६ ईशावास्योपनिषद् । मूलम् । स पयंगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरछशुद्ध- मपापविद्धम् कविर्मनीषी परिभूःस्वयम्भूर्याथात- थ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥८॥ पदच्छेदः। सः पर्यगात् शुक्रम् अकायम् अव्रणम् अस्ना- विरम् शुद्धम् अपापविद्दम् कविः मनीषी परिभूः स्वयम्भूः याथातथ्यतः अर्थान् व्यदधात् शाश्व- तीभ्यः समाभ्यः॥ पदार्थ अन्वयः पदार्थ सः = वह पूर्वोक्त कविः = त्रिकाल- प्रात्मा दर्शी है पर्यगात् = व्यापक है मनीषी = सर्वज्ञहै प्रकाशकहै परिभूः = सबके ऊ- अकायम् =लिंगशरीर परहै रहित है अव्रणम् 3D छिद्ररहित अन्वयः शुक्रम् 3 है स्वयम्भः = स्वयं वि- द्यमान है, च% और अस्नाविरम् = नाड़ी रहि- तहै शाश्वतीभ्यः- अनंतका- लस्थायी है अपापविद्धम् = पापरहितहै +सःएव = वही शुद्धम् = निर्मल है र्मों को ईशावास्योपनिषद् । ब्रह्माया- अग्निहो- दि प्रजा अर्थान् = त्रादि क- समाभ्यः- पतियों के लिये व्यदधात् =विधानक- याथातथ्यतः- यथा उ.. रता भया चित भावार्थ । सपयंगाच्छुक्रमिति ॥३०॥ पूर्व जो कहाहै कि यह सम्पूर्ण जगत् ईश्वरकाही स्वरूप है । इसप्रकार जो जानता है उसके आवरण और विक्षेप दूर होजातेहैं, सो वार्ता नहीं बनती है, क्यों- कि ॥ ईश्वरः शरीरवान् आत्मत्वात् जीववत्॥ ईश्वर भी शरीर वाला है आत्मत्व के कारण जीवकी तरह है। जैसे जीव में प्रा- त्मत्व है और शरीरवाला है तैसे ईश्वर में भी आत्मत्वहै, इस लिये वह भी शरीरवाला है ॥उ०॥ जिस आत्मत्व हेतु से तुम ईश्वरको शरीरवाला सिद्ध करते हो सोई तुम्हारा हेतु सत् प्रतिपक्ष है, जिस हेतुके साध्य के अभावका साधक दूसरा हेतु विद्यमान हो वह हेतु सत्प्रतिपक्ष कहाजाता है, सो तुम्हारे साध्यके अभावका साधक दूसरा हेतु विद्यमान है, इसलिये यह तुम्हारा हेतु सत्प्रतिपक्ष याने व्यभिचारी है ॥ ईश्वरः शरीराs भाववान् व्यापकत्वात् आकाशवत्॥ जैसे आकाश व्यापक है, और उसमें शरीरका अभाव है, तैसेही ईश्वर भी व्यापक है, और उसमें शरीरका अभाव है, यह व्यापकत्व हेतुही शरीर के अभावका साधक है, इसलिये तुम्हारा हेतु व्यभिचारी है, और व्यभिचारी होने से अपने साध्यके सिद्ध करने में असमर्थ है, और मंत्र भी ईश्वरके शरीर के अभाव को कहकरके ईश्वरके स्वरूप को दिखाताहै ॥ सपर्यागात्॥ पूर्वोक्न रीति से ईश्वरात्मा ईशावास्योपनिषद् । सर्व ओर से प्राप्त है, याने आकाशवत् व्यापक है, अब आगे तिसी ईश्वरात्मा के विशेषणों को मंत्र कहता है ॥ शुक्रम् ।। वह शुद्ध है, अर्थात् प्रकाशमान है ॥ अकायम् ॥ वह लिंग शरीरसे रहित है । अत्रणम् ॥ वह छिद्रसे रहितहै।अस्नाविरं॥ वह नाड़ी रहितहै ॥अत्रणम् ॥और अस्नाविरं॥इन दो विशेषणों करके मन्त्रने ईश्वरके स्थूल व लिंग शरीरका निषेध किया है, याने ईश्वर का न तो लिंग शरीर है, और न स्थूल शरीर है। अपापविद्धं ॥ वह धर्माऽधर्मादि पापों से भी रहित है, याने अ- विद्या मल से रहित है, ऐसा कहने से कारण शरीर का मन्त्रने निषेध कियाहै। कविः॥यह सबका द्रष्टा है ॥ मनीषी ॥ मना- दिकका प्रेरकहै याने जाननेवालाहै अर्थात् सर्वज्ञ है। परिभूः॥ नानारूपों करके सर्वओर से प्रकाशमान होरहा है, या सब के ऊपर है, याने मालिक है।स्वयंभूः॥ यह स्वतः सिद्धहै, अर्थात् उसका कारण कोई नहीं है और आप सबका कारण है ॥ शाश्वतीभ्यः॥ निरन्तर है ॥ समाभ्यः॥ संवत्सर नाम प्रजा- पतियों के लिये ॥ याथातथ्यतः ॥ यथा उचित साध्य साधन- रूप करके अर्थात् चेतन अचेतनरूप करके ॥व्यदधात् ॥ नाना प्रकार के पदार्थों की कल्पना को करता भया ॥ इस मन्त्रमें यथार्थरूपसे ईश्वरके स्वरूप का निरूपण किया है ॥८॥ मूलम् । अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते॥ ततो भूय इव ते तमो यऽउ सम्भूत्यार्थरताः॥ ६ ॥ पदच्छेदः । अन्धम् तमः प्रविशन्ति ये असम्भूतिम् उपासते ततः भूयः इव ते तमः ये उ सम्भूत्याम् रताः।

ईशावास्योपनिषद् । १६ अन्वयः पदार्थ | अन्वयः पदार्थ ये जो कोई ये= जो कोई कार्यब्रह्म हि- सम्भ प्रकृति को तिम्। त्याम् हरण्यगर्भबिषे उपासते= उपासनाक- रताः = रत हैं असम्भू +ते = वे ततः= उससे भी अन्धम् = अदर्शनात्मक भूयःइव = अधिकतर तमः= अज्ञान विषे (अन्धकार प्रवेश करते तमः- प्रविशन्ति = हैं याने गि- रते हैं +प्रविशन्ति = याने अ- ज्ञान विषे प्रवेश कर उ% और हैं भावार्थ । ज्ञान के प्रकरण को समाप्त करके अब इस बातको दिखलाते हैं कि जो पुरुष पूर्वोक्त आत्मतत्व को नहीं जानता है, और संन्यास में भी जिसका अधिकार नहीं है, किंतु संसारसे अत्यन्त प्रीति दिखलानेवाला है, उसके प्रति जो कामुक कर्म करना और भिन्न भाव से देवता की उपासना करना कहाहै उन दोनों की मंत्र निंदा करता है ॥ अंधमिति ॥जो धनके अभिलाषी अज्ञा- नी अविद्याकी अर्थात् ज्योतिष्टोमादिरूप कर्म की उपासना को करते हैं वे अहंममाभिमानरूपी संसारको प्राप्त होते हैं। प्र०॥ यदि कर्मों की उपासना करने से संसार की प्राप्ति होती है तब फिर कर्मों का त्याग करके देवताओं की उपासना करनी चाहिये अथवा ॥ अहंब्रह्मास्मि ॥ ऐसी उपासना करनी चाहिये।उ०॥

ईशावास्योपनिषद् । जो कर्मों के त्यागी अज्ञानी कर्मोको त्याग करके देवताओं की उपासनामें प्रीतिवाले हैं, और जो आत्मा के साक्षात्कार विना मुखसे "अहंब्रह्मास्मि" ऐसा कहते हैं, वे दोनों पूर्वोक्त अहंममा- भिमानरूप संसारसे भी अधिकतर अहंममाभिमानरूप तमको प्राप्त होते हैं॥६॥ मूलम् । ये =जो कोई अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तहिचचक्षिरे ॥१०॥ पदच्छेदः। अन्यत् एव बाहुः सम्भवात् अन्यत् आहुः असम्भवात् इति शुश्रुम धीराणाम् ये नः तत् वि- चचक्षिरे॥ अन्वयः पदार्थ अन्वयः पदार्थ सम्भवात् = सम्भूति करके अन्यत् औरही नः% हमारेलिये एव (उस सम्भ- +फलम् = फल तिऔर अ- कहते हैं तत्% फलको असम्भ_ असम्भूति विचच करके वात् = कहतेभये क्षिरे +तेषाम् = तिन +फलम् = फल धीराणाम् = धीरपुरुषों के +वचनम् = वचनको सम्भूति के आहुः- च = और अन्यत्-औरही आहुः= कहते हैं ईशावास्योपनिषद् । इति= इसप्रकार श्रवण किया शुश्रुम = हमलोगोंने है भावार्थ। अन्यदेवाहुरिति ॥ प्र० ॥ कर्म और उपासना ये दोनों पुरुषों को करनी उचित हैं सो दोनों की आप निंदा करते हैं, तब फिर दोनों का कुछ भी फल नहीं होगा। उ०॥दोनोंका फल भिन्न भिन्न है॥ अन्यदेव ॥ देवताकी उपासनाका फल देवलोक की प्राप्ति है, और कामुक कर्मोके करने का फल पितृलोक की प्राप्ति है, और निष्काम कर्मोंके करने का फल चित्तकी शुद्धिद्वारा आत्मज्ञानकी प्राप्ति है ।। तीनों फल एक दूसरे से श्रेष्ठ हैं, याने पितृलोकसे श्रेष्ठ देवलोक है, और देवलोकसे श्रेष्ठ आत्मज्ञान है, क्योंकि इसके द्वारा मुक्ति होती है ॥ १०॥ , मूलम्। सम्भूतिश्च विनाशञ्च यस्तद्देदोभयर्थ सह विना- शेन मृत्युन्तीा सम्भूत्यामृतमश्नुते ॥११॥ पदच्छेदः। संभतिम् च विनाशम् च यः तत् वेद उभयम् सह विनाशेन मृत्युम् तीर्खा सम्भूत्या अमृतम् अश्नुते॥ पदार्थ अन्वयः पदार्थ यः = जो कोई विनाशम् = असम्भूतिको उभयम् = दोनों सह = एकही सम्भूतिम् = सम्भूति वेद = जानता है अन्वयः च% और तत् = उस ईशावास्योपनिषद् । सः-वह ती : तर करके विनाशेन = असंभूति- असंभूत्या = सम्भूतिद्वारा हारा अमृतम् = अमरभावको मृत्युम् = मृत्यु को अश्नुते = प्राप्तहोताहै भावार्थ। संभूतिचेति ॥ पूर्वोक्त दोनों उपासना के अव फल को मन्त्र दिखाताहै ॥ सम्भूति च ॥वास्तव में यह पद असम्भूति है, इसमें अकार का लोप होगयाहै, असम्भूति नाम अव्याकृत प्रकृति का है, वही संपूर्ण जगत् का मूल कारण है, और विनाश नाम नाशको प्राप्त होनेवाले हिरण्यगर्भका है, वह प्रकृति का कार्य है, जो पुरुष पूर्वोक्त प्रकृतिकी और हिरण्यगर्भकी उपासना एक साथ ही करना उचित समझता है और करता है तो वह उपासक हिरण्यगर्भ की उपासनासे अनैश्वर्यरूप दोषों से तरता है, और प्रकृति की उपासना से प्रकृति में लयरूप अमरभाव को प्राप्तहोता है ॥११॥ नोट-असंभूति प्रकृति को कहते हैं उसका उपासक प्रकृतिविषे लय होता है, इसलिये वह जन्म मरण भावसे अमर समझा गया है =सम्भूति हिरण्यगर्भ को कहते हैं उसका उपासक अणिमा प्रादि सिद्धियोंको प्राप्त होताहै, इसलिये वह भी जन्म मरणभाव से रहित समझागयाहै ॥ ११ ॥ मूलम् । अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ततो भूय इव ते तमो यऽउ विद्यायाथ्रताः॥१२॥ पदच्छेदः। अन्धम् तमः प्रविशन्ति ये अविद्याम् उपासते उ = और अविद्याम् = ईशावास्योपनिषद् । ततः भूयः इव ते तमः ये उ विद्यायाम् रताः। अन्वयः पदार्थ | अन्वयः पदार्थ ये = जो कोई अवि- प्रविशन्ति = प्रवेश करतेहैं वेकी पुरुष अविद्या के ये = जो कोई आश्रय अ- (सकामकर्म - अग्नि होत्रा- त्यागकरके दि सकाम विद्यायाम् = केवल देव- कर्मों को तों के भेद स्वर्गादि भाव उपा- फल के नि- सना विषे उपासते - = नित्त उपा रताः= तत्परहें सना करते ते = वे ततः% उस अंधतम + ते= वे से भी अन्धम् - अदर्शना भयः 3अत्यंत त्मक तमः = अज्ञानात तमः = अन्धकारको शरीर में प्रविशन्ति = प्राप्तहोते हैं भावार्थ। अन्धंतम प्रविशंतीति । इस बारहवें मन्त्रमें व्याकृत अव्या- कृत उपासना की निंदा करते हैं ॥अंधमिति ॥ अव्याकृत नामक जो जगत्का कारणीभूत प्रकृति है उसकी अज्ञ पुरुष उपासना करते हैं, और कहते हैं कि वह प्रकृति हमहीं हैं, वे अंधतम को हैं इव) ईशावास्योपनिषद् । अर्थात् अहममाभिमानरूप अज्ञानको ही प्राप्त होते हैं, और जो पुरुष संभूति की अर्थात् कार्यरूप हिरण्यगर्भ की उपासना करते हैं, वे पूर्वोक तमसे भी अधिक अहंममाभिमानरूप संसार को प्राप्त होते हैं। इस मंत्र में जो असंभूति पद है, वह कारणरूप प्रकृति का वाचक है, और संभूति पद जो है वह कार्यरूप हिरण्यगर्भ का वाचक है ॥ १२॥ मूलम्। अन्यदेवाहुर्विद्याया अन्यदाहुरविद्याया इतिशु श्रुम धीराणां ये नस्तहिचचक्षिरे ॥१३॥ पदच्छेदः। अन्यत् एव आहुः विद्यायाः अन्यत् आहुः अवि- द्यायाः इति शुश्रुम धीराणाम् ये नः तत् विचचक्षिरे॥ अन्वयः पदार्थ | अन्वयः पदार्थ विद्यायाः = विद्याका धीराणाम् = बुद्धिमान् पु- अन्यत्एव% औरही रुषों के + फलम् = फल + वचनम् = वचनको आहुः = कहते हैं शुश्रुम = हमने सुनाहै अविद्यायाः- अविद्याका ये जिन्होंने अन्यतएव =औरही नः = हमारे लिये + फलम् - फल उसकोयाने आहुः = कहते हैं तत् = कर्म और इति = ऐसा विचचक्षिरे-उपदेश कियाहै ज्ञान को तेषाम् = उन ५ ईशावास्योपनिषद् । भावार्थ। अन्यदेवाहुरिति । अब इस मन्त्रमें संभूति असंभूति की उपासना से जो फल होता है उस फल के भेदको कहते हैं। संभवात् ॥ हिरण्यगर्भरूपी कार्य की उपासना से अणिमादि ऐश्वर्यकी प्राप्तिरूपी फल उपासक को मिलता है, और अस- म्भवात् ॥ व्याकृत की उपासना से प्रकृति में लयरूपी फल मि- लता है, वेदके वेत्ता धीर पुरुष इसप्रकार दोनोंके फलोंको भिन्नर कथन करते हैं, ऐसा हमने वेदके वेत्ता जो आचार्य और वि- द्वान् हैं उनसे सुना है, मूलमें जो “ सम्भव " पद है वह कार्य- रूपी हिरण्यगर्भका वाचक है, और जो “असम्भव" पद है वह कारणरूपी प्रकृति का वाचक है ॥ १३॥ , मूलम् । विद्याञ्चाविद्याञ्च यस्तवेदोभयर्थ सह अविद्यया मृत्युन्तीा विद्ययामृतमश्नुते ॥ १४ ॥ पदच्छेदः। विद्याम् च अविद्याम् च यः तत् वेद उभयम् सह अविद्यया मृत्युम् तीवी विद्यया अमृतम् अश्नुते॥ पदार्थ अन्वयः पदार्थ अन्वयः च = और च - और यः = जो कोई 'अविद्या यानी अविद्याम् अग्निहोत्रादि विद्यायानी दे निष्कामकर्म वताओंकी- तत् = उन भेद उपासना उभयम् = दोनोंको विद्याम् २६ ईशावास्योपनिषद् । (एकही पुरुष करके तीर्वा = तरकरके सह अनुष्ठानकरने योग्य विद्याद्वारा वेद = जानता है यानीअहं- +सः = वह पुरुष विद्यया - २ ग्रह उपा- अविद्याद्वारा सनाहारा अविद्यया यानी कम्मों द्वारा अमृतम् = अमरभावको मृत्युम् = मृत्यु को अश्नुते = प्राप्त होताहै भावार्थ । विद्यांचाविद्यांचेति ॥ पूर्वले मन्त्र में कर्म और देवताकी उपा- सना का पृथक् २ फल कहा है, अब इस मन्त्र में दोनों के समुच्चय के फल को कहते हैं ॥ विद्यांचाविद्यांचेति ॥ जो पुरुष देवताकी उपासना और कर्मोंको एक साथही करताहै वह कर्मों करके मृत्युको उत्क्रमण करता है, और देवताकी उपासना करके अमरभाव उपास्यरूप देवताको प्राप्त होताहै ॥१४॥ मूलम्। हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् तत् त्वम्पूषन्नपाणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥१५॥ पदच्छेदः। हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्य अपिहितम् मुखम् तत् त्वम् पूषन् अपाटणु सत्यधर्माय दृष्टये॥

२७
पूषन् = हे पोषणकर्ता
है
मुखम् -
+ यत् = जो
अपाटणु = खोलदे
ईशावास्योपनिषद् ।
अन्वयः
पदार्थ । अन्वयः
पदार्थ
पात्रेण = पात्रकरके
सूर्य अपिहितम् = आच्छादित
सत्यस्य-सत्य परमा-
त्माके
त्वम् = तू
तत्- उस
सत्यधर्माय = मुझ सत्य-
द्वारको
धर्मा के
दृष्टये = दर्शनके अर्थ
हिरण्मयेन तेजोमय
भावार्थ।
हिरण्मयेनेति ॥ पूर्वले मन्त्र में "अघिद्यया मृत्यु तीर्खा विद्य-
याऽमृतमश्नुते" उस समुच्चय उपासना करके सूर्यमण्डल में
स्थित जो पुरुष है उसी की प्राप्ति उस उपासक को होती है।
जिसकालमें उपासक पुरुष अपने शरीरको त्याग करके इसलोक
से सूर्यमण्डल को जाता है तब वहां सूर्यमण्डलस्थ पुरुष से
प्रार्थना करता है। हिरण्मयेनेति ॥ हे पूषन् ! हे जगत् के पालन
करनेहारे ! आप कृपा करके सत्य परमात्मा के द्वारको जो आप
के तेजोमय पात्रसे आच्छादित है मुझ सत्य धर्मावलम्बी के दर्श-
नार्थ खोल दीजिये, मैं आपका सेवक हूं, दूसरा अर्थ यह है हे
जगत् के पालन करनेवाले ! मेरे प्राप्ति का द्वार आपका मुख है,
वह स्वर्ण की तरह प्रकाशमान पात्र करके आच्छादित है, सो
तिस तेजको आप हटा लेवो तो मैं आपका दर्शन करूं मैंने सत्य
धर्म को ग्रहण करके विधिपूर्वक आपकी उपासना की है, उसका
फल अब मुझ सत्यधर्मावलम्बी को प्रात होना चाहिये, इस
प्रकार उपासक सूर्यमण्डलमें जाकर सूर्यमण्डलस्थ पुरुष के
आगे प्रार्थना करता है।॥ १५॥

२८ ईशावास्योपनिषद् । मूलम् । पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह ॥ तेजो यत्ते रूपङ्कल्याणतमन्तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥१६॥ पदच्छेदः। पूषन् एकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह तेजः यत् ते रूपम् कल्याणतमम् तत् ते पश्यामि यः असौ असौ पुरुषः सः अहम् अस्मि ॥ अन्वयः पदार्थ | अन्वयः पदार्थ पूषन् = हे पोषणकर्ता समूह = एकत्रकर एकर्षे हे एकचलनेवाला = ताकि यम= हे सर्व के संय- ते= तुम्हारा हे सर्वरसके कल्याण कल्याण तमम् तम सूर्य रूपम् = रूप है प्राजापत्य हे प्रजापति ते तुम्हारे +स्वान् = अपने +प्रसादेन = प्रसाद से रश्मीन -किरणों को पश्यामि = देखू मैं व्यूह = अलगकर यःअसौ= जो यह + च% और त्वयि = तेरे बिषे तेजः= तेजको परिपूर्णः = परिपूर्ण +तु यत्-जो मन कर्ता सूर्य = स्वीकार कर्ता %3D तत् %3Dतिसको के पुत्र + + २४ ईशावास्योपनिषद् । पुरुषः = पुरुष है अहम् = मैं = सोई अस्मि =हूं it has सः असौ = यह भावार्थ । पूषन्नेति ॥ इस मन्त्र में भी बहुतप्रकार के विशेषणों करके उपासक सूर्यमण्डलस्थ पुरुष को संबोधन करताहुआ प्रार्थना रताहै ॥ पूषन्नेति ॥ हे संपूर्ण जीवों के पोषण करनेवाले ! हे एकाकी गमन करनेवाले ! हे संपूर्णजीवों के नियामक ! हे संपूर्ण लोकों को उनके कर्मों में प्रवृत्त करनेवाले ! हे प्रजापति के पुत्र ! आप अपने तेजोमय किरणों को समेट लो ताकि मैं आपके अतिशय कल्याणरूप को देखू, मेरी और कोई याचना नहीं है, आप विषे जो पूर्ण पुरुष स्थित है, वह मेराही स्वरूप है, यानी में हीहूं ॥ १६॥ नोट-सूर्य भगवान् का उपासक सूर्य भगवान की प्रार्थना मरते समय ऊपर कहेहुये प्रकार करता है । वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त, शरीरम् ॥ ॐ क्रतो स्मर कृतथं स्मर क्रतो स्मर कृतथं स्मर॥१७॥ पदच्छेदः। वायुः अनिलम् अमृतम् अथ इदम् भस्मान्तम् शरीरम् अम् क्रतो स्मर कृतम् स्मर क्रतो स्मर कृतम् स्मर॥ अन्वयः पदार्थ अन्वयः पदार्थ अथ = इसकालमेंयानी वायुः=प्राणवायु देहावसानसमय मूलम् । +मम- मेरा -प्राप्त हो + च = और क्रतो= हे मन ३० ईशावास्योपनिषद् । अनिलम् = सत्रआत्मास- +च और मष्टि प्राणका क्रतो हे मन + च% और ओम् = ॐकारको +मम: मेरा स्मर-स्मरण कर अमृतम् =लिंगशरीर +च = और +स्वकार_ अपनेकारण कृतम् = कियेहुये शुभ गम् तत्त्वको +प्राप्येत कम्ाँको स्मर-स्मरण कर इदम् = यह शरीरम् = स्थूलशरीर कृतम् = कियेहुये शुभ भस्मा अन्तभस्म कर्मों को न्तम् भावको स्मर-स्मरण कर + भूयात् = प्राप्त हो स्मर-स्मरण कर भावार्थ। मरणकाल में उपासक पुरुष सूत्रात्मा प्राण को इसप्रकार अनुसंधान यानी चिंतन करना चाहिये॥वायुरिति॥मेरे जो प्राण हैं सो अमरभावरूप वायु देवता में लीन हों मेरा जो यह स्थूल शरीर है सो अग्नि में हवन किया हुआ भावको प्राप्त हो हे मन ! ॐकारके वाच्य ईश्वर को स्मरण कर, संपूर्ण शुभकर्मों को स्मरण कर, हे मन सँभल सावधानहो, परमात्मा में चित्त लगा, इसीकाल के वास्ते तू कर्म उपासना और ज्ञान में प्रवेश हुमाथा ॥१७॥ नोट-सूत्रात्मा प्राणका उपासक मरते समय ऊपर कहेहुये प्रकार ॐकार को स्मरण करताहै।

ईशावास्योपनिषद् । अन्वयः मूलम् अग्ने नय सुपथा ण्ये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान युयोध्यस्मज्जुहुप्लमेनो भूयि ष्ठान्ते नम उक्ति विधेम ॥१८॥ पदच्छेदः। अग्ने नय सुपथा ण्ये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् युयोधि अस्मत् जुहुएणम् एनः भूयि- ष्ठाम् ते नमउक्तिम् विधेम ॥ पदार्थ । अन्वयः पदार्थ देव = हे प्रकाशात्मक अस्मत् = हमारे देव, जुहु कुटिल वच- अग्ने = हे अग्ने ! एणम् नात्मक विश्वानि = सर्व एनः पापको वयुनानि = कम्तेको युयोधि -नाशकर विद्वान् = जाननेवाला तू ते= तेरे अर्थ अस्मान् = हम कर्म क- भूयि = बहुत से ष्ठाम् एये = कर्मफलके अर्थ नमउ (नमस्कार के सुपथा = शुभमार्ग से तिम् वचन नय विधेम = हम कहते हैं +च और भावार्थ। अग्नेनयेति ॥ अग्नि देवता का उपासक मरण काल में सुन्दर मार्गसे चलनेके लिये इसप्रकार प्रार्थना करता है । अग्ने- ले चल ३२ ईशावास्योपनिषद् । रिति ॥ हे अग्ने ! कर्म उपासना के समुच्चयका अनुष्ठान करने वाले हमको शोभन मार्ग से अर्थात् उत्तरायणमार्ग से उपास्य देवके पास कर्म और उपासनाके फल के भोगने के लिये प्राप्त करो, हे देव ! आप हमारे संपूर्ण उपासना और कर्मों के जानने वाले हो, आप हमारे कुटिल वचनरूपी पाप को नाश करो, आप के प्रति वारंवार मैं नमस्कार करता हूं ॥ १८ ॥ इति ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।। नोट-अग्नि देवताका उपासक मरण काल में अपने मनमें अग्नि देवताकी प्रार्थना करता है ॥ १८ ॥ इति वाजसनेयसंहितायामीशावास्योपनिषद् समाप्तिमगात् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

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विक्रयार्थ पुस्तकों का सूचीपत्र ॥ केनोपनिषद् भाषाटीका सहित, कीमत ॥ सामवेदीय तलबकार शाखीय भाषाटीका सरल मध्यदेशी हिन्दी भाषा में है- जिसको रायबहादुर बाबू ज़ालिमसिंह जी ने पंडित गङ्गादत्त, रामदत्त जोशी की सहायता से अनुवाद किया इस में भी पदों के अन्वयपूर्वक भावार्थ स्पष्ट किया है और ऐसी टीका किया है कि अल्पज्ञ मनुष्यों के भी समझ में आजावे ।। माण्डूक्योपनिषद् भाषाटीका सहित, कीमत ।) रायबहादुर बाबू जालिमसिंह जी की भाषाटीका सहित-जिसमें ॐकार स्वरूप का प्रतिपादन व ब्रह्म और आत्मा की अभेदता का निरूपण चार प्रकरणों में अच्छी तरह से किया है । कठवल्लीउपनिषद् भाषाटीका सहित, कीमत || रायबहादुर बाबू जालिमसिंह जी की भाषाटीका सहित-इस में भी ऊपर लिखेहुये के अनुसार भावार्थ स्पष्ट कियागया है और समझने की सुगमता के लिये गुरुशिष्यसंवादपूर्वक पूर्णज्ञान लखाया है ॥ मुण्डकोपनिषद् भापाटीका सहित, कीमत 1) रायबहादुर बाबू जालिमसिंह जी की भाषाटीका सहित-जिसमें वादी प्रतिवादी के प्रश्नोत्तर से ब्रह्मका निर्णय व जगदुत्पत्ति व प्रत्येक अन्नादि का सम्भव व अग्निहोत्रादि क्रियाओं का विधान मन्त्रों द्वारा वर्णित है ॥ तैत्तिरीयोपनिषद् भाषाटीका सहित, कीमत ||) रायबहादुर बाबू जालिमसिंह जी की भाषाटीका सहित--जिसमें तैत्तिरीय शाखा के प्रकट होने का उदाहरण और स्वर मात्रा व वर्गों के उच्चारण की शिक्षा का नियम व वर्णोके सम्बन्धरूप संहिताकी उपासना व बुद्धि व लक्ष्मी की कामनावाले पुरुषों के अर्थ साधन जप और हवनादि की क्रियायें वर्णित हैं ॥ ऐतरेयोपनिषद् भाषाटीका सहित, कीमत ।) रायबहादुर बांबू जालिमसिंह जी की भाषाटीका सहित-जिसमें आत्मा व ब्रह्मका निरूपण और प्राण व प्रणवकी उपासना की व्याख्या व संन्या- सादि आश्रमों के लक्षण व धर्म अच्छेप्रकार वर्णित हैं । मिलने का पता:- मैनेजर नवलकिशोर प्रेस, हज़रतगंज, लखनऊ. . .

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ईशावास्योपनिषद्

Author
Unknown
Title
Iishaavaasyopanishhad-
File name
ईशावास्योपनिषद्
Text
OCR done
Published
2005/06/17
Publisher
Unknown
Language
Sanskrit
Pages
38
Library
Central Library, Bits- Pilani
Classification
LANGUAGE LINGUISTICS LITERATURE
DLI number
477499
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