Adarsh Library, Jaipur
Gwah Number Teen
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गवाह नम्वर तीन
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गवाह नम्बर तीन
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CRIS
नान
mins
विमल मित्र
राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली
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- जल्दबाजी में लिखी गई मेरी यह कहानी जव पानका म प्रकाशत हुइ थी, मुझे जरा भी पसन्द नहीं आई थी। और फिर मेरी कौन-सी कहानी मेरी मनपसन्द होती ही है । छपने के बाद जब भी कोई अपनी कहानी पढने बैठा- जंची नहीं । सोचा-पोड़ा और मन लगाकर, थोडी और मेहनत से लिखता तो अच्छा रहता। लेकिन बीसवी सदी के उत्तरार्द्ध में मनुष्य के पास समय ही कहां है ! मनुष्य का आज का धर्म हो गया है--आगे बढते चलो-सवको पीछे छोड़ते चलो-धक्का मारकर, चोट पहुंचाकर-किसी भी तरह बढ़ते चले जाओ। रुकने का समय नहीं, पीछे मुड़कर देखने का समय नही, दो क्षण सोचने के लिए भी किसीके पास वक्त नही—क्योकि उन्ही दो क्षणो मे तुम्हारे पीछे के ये लोग तुमसे आगे बढ जाएगे। इसीलिए कभी-कभी मैं अपने लिए सोचता हूं। दूसरो के साथ दौड़ने की इस प्रतियोगिता में क्या मैं भी उतर पड़ा हूं? पर साहित्य तो समय का फल है, जमीन को भी कुछ दिनों के विश्राम 'की जरूरत होती है, उसे अवसर दिया जाता है-तभी फसल अच्छी होती है । मैं इन बातों को जानता हूं, फिर भी आजकल क्यों इतना लिखता हू ? मन को जरा भी आराम नहीं दे पाता ! सम्भवतः यही इस व्यस्त युग का अभिशाप है । मैं भी उस अभिशाप को ही भोग रहा हूं। नहीं तो सरयू को लेकर जो कहानी लिखी है, वह और सोच- समझकर, समय लेकर लिखता तो बात बनती। ताज्जुब है ! सरयू की कहानी इतनी जल्दी मुझे लिखनी पड़ेगी, यह मैंने कभी नहीं सोचा था। हमारे जीवन में प्रतिदिन सम्पादकों और प्रकाशकों के तकाजे, सांसारिक और वास्तविक जीवन के तकाजे, बाहर से, अन्दर से- चारों तरफ से तकाजों का पाप-जीवन को दूभर बना देता है। इन तरूनों के पीछे केवल 'प्रयोजन' रहता है-~-प्यार नहीं । - । किन साहित्य तो प्रयोजन पर निर्भर नहीं करता । साहि फसल है और प्रीति प्रयोजन की परवाह नहीं करती। उसे तो समय हए, गहराई तक पहुंचने के लिए। पर साहित्य सृष्टि के लिए वह 'समय' ई नहीं देना चाहता । न तो सम्पादक राजी होते हैं और न प्रकाशक, और ही खुद लेखक । कोई राजी नहीं होता, इसीलिए सरयू और निशिकान्त को कर लिखी गई कहानी भी शायद गहराई तक नहीं पहुंची है। सरयू की जो बात मैं आज लिख रहा हूं-वह घटना है बहुत पुरानी । सोचा था कभी सही अर्थ में जब समय मिलेगा तब लिखूगा । लेकिन समय ! अवसर ! इन शब्दों को तो मैं भूल ही चुका हूं। केवल जरूरत और ज़रूरत । ज़रूरत की गरज ही जीवन की प्रमुख गरज़ है। खैर, कभी मौका मिला तो इसपर भी कुछ लिखूगा । आज तो सरयू. और निशिकान्त की ही बात बताता हूं, वह भी इसीलिए कि उस दिन सड़क पर अचानक निशिकान्त मिल गया। मैं पहले तो उसे पहचान ही नहीं पाया। कितना बदल चुका था निशि- कान्त। -कुछ पैसे देंगे सर? -पैसे ? इस तरह से मांगने वालों की कलकत्ता में कोई कमी नहीं। -दीजिए न सर ! बड़ी मुसीबत में पड़ा हूं। नौकरी-चाकरी है नहीं। बच्चों के साथ उपवास चल रहा है। थोड़ा ही सही, जितना हो सके दीजिए। मैं हैरान होकर उसे देख रहा था । कुछ शक भी हो रहा था । आखिर पूछ ही बैठा-तुम निशिकान्त हो न ? शायद निशिकान्त ने भी मुझे पहचान लिया था। दूर खिसकने की कोशि करते ही मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। वोला- --तुम निशिकान्त ही हो न निशिकान्त पहले तो मानने को तैयार नहीं हुआ, पर मैंने भी उसे बोलने का मौका नहीं दिया। बोला-झूठ बोलने की कोशिश मत क अभी तक तुम्हारी आदत सुधरी नहीं। बोलो, कहां रहते हो? निशिकान्त अपने को संभाल नहीं पाया। रो पड़ा, सिसक-सिसककर जप रहो निशिकान्त । बस करो।
उसके बाद उसे लेकर मैं सड़क के किनारे एक रेस्तरां में घुसा । सोचा कुछ पिला दूं। कुछ खा लेने पर शायद स्वस्थ लगने लगेगा ! साथ-साथ मुझे वह घटना भी याद आने लगी। खून का वह मुकदमा। उसे बैठाकर मैंने होटल के चेयरे को कुछ लाने के लिए कहा और मैं उसे देखता रहा । सोचता रहा । सचमुच ही यह क्या वही निशिकान्त है । उस दिन अगर वह घटना नहीं घटती तो निशिकान्त से मेरा परिचय भी कमी नहीं होता। मैं उस मुक- दमे में तीसरा गवाह था। मुकदमा कुछ विचित्र और जटिल-सा था। फिर भी मनुष्य के जीवन में चाहे कितनी भी जटिलता क्यों न हो, मनुष्य की बनाई अदालत उस जटिल जीवन की ऐंठनों को खोलने के बजाय उसे और भी जटिल बना देती है । मैं कैसे इस मुकदमे में तीसरा गवाह बना इसका भी एक खास कारण था। कारण यह था कि में इस सारे मामले को पूरी तरह जानता था। आज याद आता है, सरकारी वकील ने मुझसे पूछा था-क्या आप इस आसामी को जानते हैं ? उत्तर में मैंने 'हाँ' कहा था। ---आपने इमे पहले भी कभी देखा था ? ---अपनी राय में आप आसामी को अपराधी मानते हैं या नहीं ? -मैं उसे अपराधी मानता हूं। -क्यों? सरकारी वकील ने जिरह शुरू की। इसके जवाब में मैने क्या कहा था---उसे कहने के लिए मुझे पाठकों को शुरू से पूरा इतिहास बताना पड़ेगा। वही बताता हूं। व्यक्तिगत रूप से मेरी धारणा रही है कि प्रत्येक कलात्मक रचना के पीछे एक सामाजिक नीतिबोध रहता है । इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य को नैतिक शिक्षा देना ही साहित्य का धर्म है, क्योंकि ऐमा होने से तो वह या तो धर्म-पुस्तक बन जाएगा या फिर पाठ्य पुस्तक । साहित्य की जो अधिष्ठात्री देवी है वह धर्म नही मानती, शिक्षा भी नहीं मानती । वह केवल एक ही चीज मानती है । और वह है रस । इस रस का क्या अर्थ है, क्या व्याख्या है, यह किसी भी अन्य में नहीं ७ मिलता | दुनिया में ऐसा कोई विश्वविद्यालय भी नहीं, जहां धरना देने पर इस रस की डिग्री मिल सके । इस रस का स्वाद तो जिन्होंने लिया है केवल वही इसका यथार्थ भी समझ पाते हैं। यह भाषण देकर नहीं समझाया जा सकता । किताबें लिखकर भी इसकी व्याख्या नहीं की जा सकती, और न ही इसे औषध की तरह जवरन घोंटा जा सकता है। यह जो रस है, इसका कोई देशभेद, जातिभेद या युगभेद नहीं । यह तो अनादि, अनन्त, यव्यय, अक्षय, अपार्थिव एक उपलब्धि है । परन्तु अपार्थिव होकर भी इसका मूल पृथ्वी के मनुष्य के हृदय में रहता है । मानव-मन की गहराई तक इसकी जड़ें फैली रहती हैं । रस के सम्बन्ध में इतना कुछ कहने का भी एक कारण है। अगर यह कारण बता दूं तो आप समझ जाएंगे कि मैं क्यों रस के लिए इतना बक रहा हूं। कुछ दिन पहले अर्थात् वहुत वर्षों पहले मैं एक ऐसी नौकरी करता था जिसके कारण मुझे करीव-करीव सारे हिन्दुस्तान में रेल से सफर करना पड़ता था। खुलकर ही बता देता हूं। पुलिस की नौकरी थी मेरी । पुलिस की नौकरी तो करता था पर वाहर वालों के लिए यह जानना मुश्किल था कि मैं पुलिस का कोई आदमी हूं। यह तो सभी जानते हैं कि पुलिस भी तरह-तरह की होती है । जल-पुलिस, रेल-पुलिस, और साधारण लाल पगड़ी वाली पुलिस । लेकिन इन सबके अलावा भी एक और तरह की पुलिस होती है। उसके आदमियों को देखने पर यह समझना मुश्किल है कि वे पुलिस में हैं क्योंकि मापकी-हमारी तरह वे भी ट्रेनों, स्टीमरों और सड़कों पर साधारण पोशाक पहनकर आम आदमी की तरह धूमते हैं और मौका पाकर अपना कार्य सिद्ध कर लेते हैं। मैं भी ऐसी ही पुलिस का आदमी था। इसी तरह एक दिन अचानक एक महिला मेरे पास आकर बोली-देखिए, मेरा एक काम कर देंगे? मैं थोड़ा हैरान-सा हो गया । महिला विल्कुल अनजान थी । उम्र कच्ची थी। देखने में अच्छी थी। मोकामाघाट के प्लेटफार्म पर ट्रेन की प्रतीक्षा में कई लोगों में मैं भी बैठा था। कहीं-कहीं थोड़ा अंधेरा-सा था। कलकत्ता जाने वाली गाड़ी आने ही वाली थी। मुझे जाना भी वहीं था। मैंने महिला की तरफ देखा। पुलिस का आदमी भले ही हो-दया-ममता । ।
तो हर मनुष्य में होती ही है। पूछा-क्या काम है, कहिए ? वह महिला अत्यन्त ही भद्र ढंग से बोली-देखिए, मैं चाय पीने जा रही हूं। तुरन्त वापस आ जाऊंगी। क्या मेरा यह सूटकेस अपने पास रख सकेंगे? सूटकेस रखने में भला क्या आपत्ति हो सकती थी ? इसलिए बोला- छोड़ जाइए, पर ज्यादा देर नहीं कीजिएगा। वह बोली-मैं गई और आई । विल्कुल देर नहीं होगी। मैं चुपचाप सामान के आसपास चहलकदमी करने लगा। ट्रेन की प्रतीक्षा मे अधीर भी हो रहा था। सोच रहा था रिजर्वेशन तो है ही-बस, गाडी आते ही अपनी वर्य पर चैन से सो जाऊंगा। लेकिन काफी समय बीत चुका, वह महिला नहीं आई। मैं सोच ही रहा था कि चाय की दुकान तक जाकर देख आऊं। पता नही चाय या उसके साथ दो बिस्कुट खाने में उसे इतनी देर क्यों लग रही थी। वास्तव मे मैं चिन्ता मे पड गया था कि अगर अन्त तक वह नही लौटी, तब क्या होगा? न जाने क्यो मेरे मन में एक अजीब-सा शक पैदा हो रहा था। इसी बीच एक तमाशा हुआ। पुलिस की एक छोटी टुकडी मेरे पास आई। योडी देर पहले आवकारी- पुलिस के ये लोग यों ही प्लेटफार्म पर घूम-फिर रहे थे । समीके माल पर इनकी कड़ी नजर थी। किसीपर शक होने से उनके वक्सो को खोलकर भी देख रहे थे। मेरे पास भी आकर उन्होंने पूछा-सूटकेस के अन्दर क्या है ? मैंने कहा-मेरे कपडे-लत्ते वगैरह । पुलिस की उस टुकड़ी के जो बडे साहब थे वे जिस माल पर सन्देह होता, उसपर अपनी छड़ी से ठोककर पूछा-ताछी करते। मुझसे भी उन्होने पूछा- और यह ? -मेरा पोर्टफोलियो है। -उसमें है क्या? -आफिस के कागजात वगैरह । --बैग खोलकर दिखलाइए। मैं थोड़ा नाराज हुआ। बोला-आप मुझपर शक कर रहे हैं ! ६ वह बोले-हम एक्साइज डिपार्टमेण्ट के आदमी हैं । और मैं आव ग का इन्स्पेक्टर हूं, इसलिए देखना चाहता हूं कि इसमें कोई गैरकानूनी है या नहीं? मैंने कहा-अवश्य देखिए ! इतना कहकर मैंने अपना पोर्टफोलियो खोल पा। वह समझ गए कि मैं भी सरकारी काम करता हूं इसलिए मुझे और धिक परेशान नहीं किया। मुझे छोड़ वह मेरे पास ही में बैठे एक सज्जन को ले बैठे। वह वेचारे सपरिवार ट्रेन की प्रतीक्षा में बैठे थे। बच्चों के साथ वह परेशान-से दिखाई दे रहे थे-सम्भवतः सोच रहे थे कि ट्रेन पर सही- सलामत सबके साथ चढ़ पाएंगे या नहीं। ढलती उम्र के थे। कोई सयाना लड़का या मददगार भी साथ में नहीं था। उनसे भी वही सवाल पूछा गया । -~-आपके ट्रंक में क्या है ? केवल ट्रंक ही नहीं, विस्तरवन्द, टिफिनवक्स, सूटकेस सब कुछ तितर- वितर कर देखा जाने लगा। शायद यह सज्जन सपरिवार पुण्य कमाने के लिए नेपाल में पशुपतिनाथजी का दर्शन करने निकले थे। पर ये पुलिस वाले भी किसीको छोड़ते नहीं। वह प्रौढ़ सज्जन अत्यन्त घवराकर सारा सामान खोल- खोलकर दिखा रहे थे। सारा कुछ देखकर तसल्ली से जैसे ही इन्स्पेक्टर साहव आगे बढ़े कि अचानक मेरे पास में पड़े महिला के उस सूटकेस पर उनकी जर पड़ गई। पूछा-यह सूटकेस किसका है ? क्या है इसमें ? सभी यानी अपना-अपना सामान देखने लगे। सब अचरज में पड़े थे- आखिर यह प्रश्न पूछा किससे जा रहा है । इन्स्पेक्टर साहब.ने वेंत की छड़ी से सूटकेस पर चोट करते हुए पूछा-इसे तो खोलकर नहीं दिखाया गया। इसे खोलिए। एका बूढ़े सज्जन पास में ही बैठे थे। रुआंसे-से होकर बोले-यह मेर सूटकेस नहीं है। यह उनका-कहकर उंगली उठाकर मुझे दिखा दिया। इन्स्पेक्टर अव मेरी तरफ मुड़े। पूछा-यह सूटकेस आपका है ? मैंने कहा-~-नहीं। बैठे कई लोगों से उन्होंने पूछा कि यह सूटकेस उनमे । किसीका है या नहीं। पर वह सूटकेस उनमें से किसीका या ही नहीं, तो वे यह स्वीकार कैसे करते ? अव मैंने आगे बढ़कर कहा-यह सूटकेस एक महिला का है । वह इसे मेरे पास छोड़कर चाय पीने के लिए गई हैं. अभी लौट आएगी। -कहां चाय पीने गई हैं ? मैंने कहा-वो तो मैं नहीं बता सकता। पर कह गई थीं कि चाय की स्टाल पर जा रही है। मूटकेस चोरी न हो जाए, इसलिए मुझे ध्यान रखने के लिए कह गई। इन्स्पेक्टर साहब ने एक कान्स्टेवल को चाय की स्टाल पर भेजा और मुझसे पूछा- कैसी थी वह ? कितनी उम्र की होगी ? मैंने जैसा देखा या समझा था, वर्णन कर दिया। कास्टेबल उसी आधार पर उसे दूढने निकल पड़ा, लेकिन उल्टे पांव लौटकर उसने बताया कि चाय की स्टाल पर या आसपास किसी महिला को चाय पीते हुए स्टाल वालों ने देखा ही नहीं। और सच में चाय पीने को फुसंत ही उस समय किसको थी । सबको ट्रेन की जल्दी थी। एक कान्स्टेबल को मेरे पास छोडकर इन्स्पेक्टर वाकी यात्रियो के माल फो परखने लगा। मैंने भी चारों तरफ नजर दौड़ाई. पर वह कही भी नहीं दिवाई पड़ी। ट्रेन आने का वक्त हो चुका था। इन्स्पेक्टर साहब ने लौटकर दुवारा मुझसे पूछा-कहां गई आपकी वह महिला ? ---मालूम नहीं । मुझे तो अभी तक दिखाई नहीं दी है। कहकर तो गई थी कि चाय पीकर तुरन्त लोट आएगी। इन्स्पेक्टर को मुझपर शक हो गया। उन्होने थोडी कड़ाई से कहा- यदि सूटकेस वाकई दूसरे का होता तो वह अवश्य लौटता । असल में यह आप ही का सूटकेस है। इसे खोलिए और दिखलाइए कि इसमे क्या है ? मेरा भी क्रोध बढ़ रहा था। बोला-मुझे कोई आपत्ति नहीं, परन्तु" इन्स्पेक्टर बोला-आप अपना नाम-धाम और परिचय भी बतलाइए। मेरे साथ आपको थाने चलना पड़ेगा। इतना कुछ कहकर वह मुझे डराने की कोशिश कर रहे थे। मैं अपना परिचय और न छुपा सका। जेब से आइडेण्टिटी कार्ड फोटो ..
? - सहित निकालकर उन्हें दिखाया। कार्ड देखकर वह चौंक पड़े । बोले-आप सी० बी० आई० के आदमी है । पहले क्यों नहीं बताया ? मैंने कहा---पहले आपने मेरा परिचय पूछा ही कहां था इन्स्पेक्टर साहव बोले-मुझे तो ऐसा लग रहा है कि यह किसी स्मगलर की बदमाशी है । अगर हम इसका ताला तोड़ डालें तो आपको कोई आपत्ति तो नहीं होगी? मैंने कहा-बिल्कुल नहीं । जिसकी चीज़ है जब उसे ही परवाह नहीं तब आप इस सूटकेस को लेकर कुछ भी कर सकते हैं । मैं आपत्ति करूंगा भी क्यों ? और आप मेरी आपत्ति सुनेंगे भी क्यों ? अन्त में सूटकेस का ताला तोड़ा गया। कुछ साड़ियां, ब्लाउज, तौलिये आदि थे । और उन सबके नीचे गांजा भरा हुआ था। सूटकेस को टूटते देखकर बाकी पैसेंजरों ने भी भीड़ लगा दी। सभी गांजा देखकर हैरान हो रहे थे। मैं तो सर्वाधिक हैरान था, क्योंकि खुद पुलिस- विभाग का आदमी होकर भी मैंने उस महिला पर शक नहीं किया—यह मेरी नालायकी थी। इन्स्पेक्टर मेरी तरफ देखकर बोला-आपकी कोई गलती नहीं है। इस लाइन में हमेशा ही ऐसा होता रहता है। खासकर जिस महिला के लिए आप बोल रहे थे, हमें उसकी तलाश वहुत दिनों से है। पकड़ में आती ही नहीं।-अन्त में वह सूटकेस लेकर चल पड़े। ट्रेन आ चुकी थी । दूसरे यात्रियों के साथ मैं भी ट्रेन पर सवार हो गया और दूसरे दिन कलकत्ता पहुंच गया। वह महिला कौन थी, नेपाल से इतना गांजा लेकर क्यों आ रही थी.. उसके पीछे कोई ऐसा-वैसा दल था या नहीं.. मैं कुछ भी नहीं जान पाया। २ ये सारी बातें बहुत पुरानी हैं। आज इतने दिनों के बाद चाय की दुकान पर निशिकान्त के साथ बैठकर उसे ही देख रहा था। उसीके वारे में सोच - - रहा था । पक्का शराबी था निशिकान्त पर आज उसका चेहरा बिल्कुल ही वदला हुआ लगता था। उस दिन निशिकान्त से किए दुव्यवहार के लिए मुझे दुख हो रहा था। पर निशिकान्त की नजर किसी चीज़ पर नही थी। वह मन लगाकर खाता रहा-चॉप, कटलेट, आमलेट, केक । मानो बहुत दिनों से अच्छा कुछ खाया ही न हो। मैंने पूछा-एक कटलेट और लोगे निशिकान्त ? वह निर्विकार भाव से बोला-हा, ले सकता हूं। मैंने वेयरे को बुलाकर कहा-एक गरम चिकेन कटलेट बनाकर ले आओ। बेयरा चला गया। निशिकान्त साते-खाते बोला- असली घी मे तला हुमा कटलेट है। इस दुकान पर मैंने पहले भी कई बार खाया है। उसके बाद मुझसे बोला-आप भी एक कटलेट खाइए न? मैंने कहा- नहीं ! अभी तुरन्त खाकर ही घर से चला था। तुम सामओ। वेयरा कटलेट दे गया। गरम घुआ निकल रहा था। मुझे लगा खाते- खाते भी निशिकान्त की जीभ से लार टपक रही है। मेरी इच्छा हो रही थी-निशिकान्त जी भरकर खाए । बहुत तकलीफें झेली हैं उसने जीवन में । अभी कम-से-कम थोडी तृप्ति से खा ले। निशिकान्त खा रहा था और में सोच रहा था । उन दिनों की बात सोचते ही सारी पुरानी बातें याद आ गई। मोकामाघाट स्टेशन पर गांजे से भरे सूटकेस के पकड़े जाने की बात । कुछ ही दिनों बाद एक और तमाशा हुआ और उस तमाशे के बाद मेरे जीने का ढंग ही बिल्कुल बदल गया। उन्हीं दिनो मैंने एक किताब लिखी थी। उसकी इतनी प्रशंसा हुई कि में विख्यात हो गया, हालांकि कुछ लोगो ने किताब को दुरी समीक्षा भी की थी। जिन्होंने ऐसी समीक्षा की, उन्होंने मेरी किताव के पन्ने तक नही उलटे । किताब के अन्दर मैंने क्या ऊल-जलूल मरा था, इसे देखने की भी चेप्टा नहीं की। केवल सोचा साहित्यिक दुनिया मे यह कहां से टपक पड़ा? मेरी पाली का हिस्सेदार । मैं तो निविकार बन गया था, और फिर करता भी क्या? उनकी समालोचना से मैं विचलित हो जाऊं, उनकी इस भावना को मैं भांप ।
, -- गया था। इसीलिए उनकी सारी कोशिशों के वावजूद मैं निर्विकार ही बना रहा । साथ ही सभी दोस्तों और दुश्मनों-सभीसे अलग रहकर और भी अच्छी तरह लिखने की चेष्टा में डूबा रहा और पुलिस की नौकरी छोड़ दी। केवल नौकरी ही नहीं छोड़ी, कलकत्ता के कोलाहल से दूर एक उपनगर में मैंने एक फ्लंट किराये पर ले लिया। शहर और निन्दा से दूर इस एकान्त जगह में एक बड़ा-सा उपन्यास लिखने में मग्न हो गया । मैंने सोच लिया था कि जीने के लिए दूसरे की नौकरी नहीं करूंगा। और अगर किसीका दासत्व करना ही है तो फिर अपना ही करूंगा। इसमें कष्ट तो उठाना पड़ता है, पर वदले में अपरिसीम आनन्द की उपलब्धि होती है। उसी दिन मैंने प्रतिज्ञा की कि मैं अपने लेखन पर ही जीऊंगा या मरूंगा। नौकरी करके भी लिखा जा सकता है लेकिन सच्ची साहित्यिक रचना के लिए दो नावों पर पैर रखकर चलना मृत्यु की ओर बढ़ना है। जिस मकान में मैं रहता था उसके पास ही गंगा नदी थी । ज्यादा चौड़ी नहीं। दोनों किनारों पर वहुत-से पेड़ थे। दिन-भर काम करने के बाद गंगा के किनारे बहुत दूर तक घूमने निकल पड़ता। सारा दिन लिखने के बाद इस कदर थक जाता कि शाम को घर पर टिकना मुश्किल हो जाता । वह समय मेरे विश्राम का होता, और मेरे विश्राम का अर्थ था-फुटपाथ पर दूर तक पैदल चलना-सीधा बस-रोड के चौराहे तक । यहां थोड़ी भीड़ रहती । कुछ दुकानें भी थीं। सब्जी वर्ग- रह की दुकानें फुटपाथ पर ही थीं। फिर बाल काटने का सैलून, मिठाई और पान-बीड़ी-सिगरेट की दुकान, जहां विविध भारती से हिन्दी-फिल्मों के गाने जोर-जोर से गूंजते । उसीके आसपास लम्बी जुल्फों वाले लड़कों का जमघट रहता। इन सारी चीज़ों को देखता हुमा मैं टहलता । कई बार सड़क चलते राहगीरों का तर्क-वितर्क भी सुनने को मिल जाता । इनका विषय अधिकतर हिन्दी-फिल्म स्टारों का प्राइवेट जीवन ही होता। अच्छा ही लगता था। इसी तरह दिन कट रहे थे। अचानक एक दिन देखा कि गंगा के - -- किनारे एक साधु सारे अंग पर विभूति लगाए बैठा है और उसके चारों तरफ कुछ भीड़ इकट्ठी हो गई है। सामने धूनी रमी थी, धुआं भी उठ रहा पा । फिर देखा चौराहे की दुकान से साधु बाबा के लिए चाय मा रही थी। चलते-चलते मैं भी वहां आकर रुक गया । कुतूहल भी था । यह महात्मा एकाएक कैसे आ गया ? कव आया, कहां खाता है, कहा सोता है--मन में बहुत-से प्रश्न उठ रहे थे। सामने बैठे लोग साधु से तरह-तरह के प्रश्न भी कर रहे थे। कोई कहता-बाबा, कृपा कीजिए। कसी कृपा, कौन-सी कृपा, कृपा क्यों की जाएगी। मैं नहीं समझ सका। और वस्तुतः कृपा करने की कोई अलौकिक क्षमता साधुवाबा के पास है, इसका कम-से-कम मुझे तो कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ा। किसी भक्त से जाकर पूछा--महात्माजी कहां से आए हैं ? -हिमालय से। सुनकर मैं चकित रह गया। संसार मे इतनी जगह के रहते हुए महात्माजी हिमालय से कलकत्ता में इसी जगह क्यों आए? लेकिन जहां भक्ति गाढ़ी हो, युक्ति तुच्छ हो जाती है । भक्ति के स्रोत में युक्ति और तर्क बिल्कुल वह जाते हैं । फिर भी मनुष्य के समाज में जब भी कोई व्यतिक्रम दिखाई पड़ता है तब कुतूहल होता ही है । मैंने फिर पूछा-महात्माजी भोजन क्या करते हैं ? भक्त बोला-महात्माजी कुछ नही खाते। -कुछ नहीं खाए तो मनुष्य जो नहीं सकता। कुछ तो खाते ही होंगे? भक्त बोला-नही सर । कल से मैं चेष्टा कर रहा हूं। चौराहे की दुकान से रसगुल्ले, पैड़े और फल भी मंगवाए । पर गुरुजी ने कुछ भी मुंह मे नही रखा । सब अपने हाथों से हम लोगों को बांट दिया। -लेकिन जो चाय उनको दी गई ? भक्त बोला-गुरुजी चाय भी नहीं पाएंगे। उनके सामने पडी रहेगी । अन्त मे हम ही लोगों में से कोई उसे पीएगा। रोज ऐसा ही होता है। 3- १५ - । -~~~-महात्माजी सोते भी नहीं क्या? मैंने कुतूहलवश पूछ ही लिया। कल रात के दो बजे तक तो मैं स्वयं ही जगा वैठा था। बाबा एक ही मुद्रा में बैठे रहे। बाबा में अलोकिक क्षमता है। मैं देख रहा था-साधुजी पद्मासन की मुद्रा में बैठे थे । सामने भक्तों की भीड़ थी। पर महात्माजी को किसी चीज़ का ध्यान नहीं था। केवल इकट्ठी भीड़ को अपलक देख रहे थे। मैं आखिर कितनी देर रुकता? धीरे-धीरे अपने घर की तरफ चल पड़ा। ऊसके बाद से रोज़ उसी रास्ते से जाने लगा। रोज़ एक ही दृश्य देखने को मिलता । वही एक चेहरा। सामने एक त्रिशूल । पहले यह नहीं था। त्रिशूल के फलक पर सिन्दुर पुता था । सुना कि किसी भक्त ने बाजार से अपने पैसों से मंगवाकर दिया था। मैं भी नियम से रोज़ गंगा के किनारे-किनारे उतनी दूर तक चला जाता । देखता कि दिन-पर-दिन उनके भक्तों की संख्या बढ़ रही थी। पहले दिन तो चार-पांच ही लोग दिखाई पड़े थे । दूसरे दिन से पन्द्रह-बीस इकट्ठे होने लगे। चौराहे पर से कुछ लड़के-बच्चे भी आने लगे । वे साधु बावा को घेरकर गोल चक्कर बनाकर बैठे रहते और उनके चेहरे को चुप- चाप निहारते रहते । महात्माजी ध्यानस्थ उदास नयनों से सबको देखते । थोड़े दिनों के बाद बरसात का मौसम आया। मैंने देखा, साधुवावा के किसी चेले ने त्रिशूल के फलक पर एक छाता बांध दिया था। और उस खुले छाते के नीचे साधुवावा निर्विकार हो पद्मासन लगाए बैठे रहते । फिर एक दिन रातोंरात एक छप्पर छाया गया। चारों तरफ कोई दीवाल नहीं थी, केवल धूप और पानी से भक्तों को बचने-बचाने के लिए किसी पैसे वाले शिष्य ने यह छप्पर बनवा दिया था। फिर हिन्दी-भजन भी साधु बाबा के अखाड़े पर जोर-जोर से बजने लगे। धीरे-धीरे जो लोग चौराहे के बड़े मकान के बरामदे पर या फिर चाय की दुकान की लकड़ी की बेंच पर बैठे फिल्मी गीत सुना करते थे, वे भी इस अखाड़े पर जुटने लगे। फिल्मी गीत छोड़ पैण्ट-शर्ट धारी लोग भी सबके साथ सुर मिलाकर भजन गाने किनारे से जाते हुए एक दिन मैं अपने को रोक नहीं सका। सुगन्धित .
प की सुगबू आ रही थी। मैं उत्सुकतावश रुक गया। देखा, साधु बाबा के सामने सिन्दूर से लिपटी एक मूर्ति की भी प्रतिष्ठा हो गई थी। कर- ताल बज रहा या, भजन चल रहा था। भजन खत्म होने पर में वापस आ ही रहा था कि एक महिला मेरे सामने आई। लाल किनारे की साडी। गोरा रंग । सिन्दूर की एक विन्दी। पत्ते में लपेटी किसी चीज निकालकर बोली-थोड़ा प्रसाद नहीं लीजिएगा? गले की आवाज सुनकर मैं चौंक पड़ा । आवाज बड़ी ही परिचित-सी लगी। इसे कही जरूर सुन नुका हूं। मैंने महिला की तरफ अच्छी तरह से देखा-लगा इन्हे कही देखा भी है। तव सक मैं प्रसाद ले चुका था । प्रसाद के नाम पर कोई कीमती चीज नहीं थी। हलुआ था । योडा-सा मुह में डालकर महात्माजी का सम्मान रखा। मुझे प्रसाद देने के बाद वह महिला दूसरे भक्तों के बीच प्रसाद वांटने लगी। मेरे और ठहरने का कोई कारण नहीं था। मैं चलने लगा। चलते- चलते वार-वार लग रहा था इस महिला को मैंने जरूर कही देखा है। फिर सोचते-सोचते अचानक याद भी आ गया। मनुष्य की स्मरणशक्ति भी बडी अजीब चीज है । एक छोटी-सी खोपड़ी में कितना कुछ है-सोचकर हैरानी होती है । कव की घटी कोई घटना अचानक नीद मे याद आ जाती है और फिर जगने पर सोचता हूं कि ऐसी बेतुकी बात दिमाग में आई कैसे ? एक बार किसी स्टेशन पर कोई चीज खरीदकर पैसे देने के पहले ही गाडी चल पड़ी । वंग से जब तक पैसे निकालू, ट्रेन प्लेटफार्म को बहुत पीछे छोड़ चुकी थी। चीज़ दो-चार पंसो की थी, लेकिन बात मन में चुभ गई। उस गरीब आदमी ने पैसे के अभाव में हो सकता है मुझे गाली दी हो, अभिशाप भी दिया हो। उस स्टेशन से दुवारा गुजरने का मौका मुझे नहीं मिला। वे पैसे में नहीं लौटा राका । यह घटना भी कुछ उमी तरह की है।
घर लौटकर खाना वगैरह खाकर रात को सो गया। जैसे ही विस्तर र लेटा, एकाएक सव कुछ याद आ गया। बरे ! यह तो वही महिला है, जससे मोकामाघाट स्टेशन के प्लेटफार्म पर भेंट हुई थी। नात कितनी पुरानी हो गई थी। फिर भी चेहरा कोई खास नहीं बदला था। गले की वही लावाज। सोचते-सोचते पूरी घटना आंखों के सामने फिर से भूम गई । मेरे ज़िम्मे सूटकेस सम्हलवाकर चाय पीने का बहाना बनाकर गायब हो जाना, इन्स्पेक्टर के साथ मेरी वातचीत और फिर सूटकेस के ताले को तोड़ने के वाद उसके अन्दर से ढेर-सा गांजा। यह तो वही महिला है । वह इसीका तमाशा तो था। लेकिन इतने वर्षों के वाद यह यहां कैसे आई ? और फिर उसकी भेंट मुझीसे होनी थी? रात को काफी देर तक सोचता रहा, फिर भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सका। दूसरे दिन शाम को मैं फिर वहां गया। सोचा था, यहां तो उससे भेंट होगी ही। भीड़ नाज भी काफी थी। भजन हो रहा था। प्रसाद भी वां गया-पहले दिन की ही तरह । मैं चारों तरफ उसी महिला की खोज नजर दौड़ा रहा था। लेकिन वह दिखी नहीं। उत्सव चल ही रहा था कि मैं वापस आ गया। व्यर्थ में वहां से मी क्यों ? भक्ति में मेरी कभी कोई आस्था नहीं रही। आज भी है केवल कुतूहलवश वहां गया था। वहां से हटकर रोज की तरह मैंने सान्ध्य-भ्रमण की ओर ध्यान दिया। ३ नौकरी छोड़ने के बाद से मेरी ख्याति तो उतनी नहीं बढ़ी प हजार गुना बढ़ गया था। नौकरी में एक वात बड़े मजे की है व्यक्ति को खुश रखने से काम चल जाता है, लेकिन लेखक की कुछ और ही है । एक ओर तो वह स्वयं मालिक है और दूसरी १८ सभी पाठकगण उसके मालिक हो जाते हैं । इसलिए बाहर के लोगों से योड़ा मेल-जोल रखने पर भी मैं स्वयं में ही व्यस्त रहता । वाहर या घर में निस्संग था। अकेला था। ऐसे ही एक दिन में अपने काम में उलझा हुआ था कि कानाई, मेरा नोकर आकर वोला-आपसे कोई महिला मिलना चाहती है। मैंने पूछा--मेरे पास महिला क्या करने आई है ? -किमी पत्रिका से आई है ? में थोड़ा नाराज भी हुआ। क्योंकि कानाई को मैंने कह रखा या किं जय-नव जिस-तिसको मेरे सामने न आने दे। खर क्या करता? बोला-ले आओ उस महिला को। थोड़ी ही देर में महिला आई । मैं अचरज से देखता ही रह गया। यह वही थी । वही--जिसे साधुबाबा के अखाडे पर देखा था। मैंने पूछा- कहिए, क्या बात है ? महिला योलो-आप हमारे ही मुहल्ले में रहते हैं । महात्माजी का आश्रम आपने देखा होगा। यहां के हम सभी निवासी मिलकर आश्रम को पक्का बनवाना चाहते हैं ताकि धूप और पानी में भक्तों को तकलीफ न हो । इसीलिए. इस कार्य के लिए आपसे चन्दा मागने आई है । जितनी भी आपकी श्रद्धा हो उतना ही अपनी खुशी से दीजिए। मैं महिला को अपलक देख रहा था । मुझे उसके सामने बैठकर सारी पुरानी बातें याद आ रही थी। वही मूटकेस, उसका गायब हो जाना, पुलिस को चकमा देना, चाय का बहाना" में देख रहा था वह बड़ी अच्छी लग रही थी। दंग मे कपड़े पहने थी। कहीं कोई अपवित्रता का नामोनिशान नहीं था। महिला फिर वोलो-आपपर कोई जुल्म नहीं कर रही हूं। आपकी जो भी इच्छा हो, दे सकते हैं। पूछा-इस वन्दे को मांगने में आपका क्या स्वार्य है ? --भैरा भला क्या स्वार्य हो सकता है ? भगवान की सेवा है-यही वही बात है। घर-गृहस्थी के काम-काज के बाद समय फ्यादा मिल नमें पाता, इसलिए थोड़ा-बहुत समय ही आयम की सेवा में लगाती हूं।
भी पूजावत इत्यादि कुछ । कहा-देखिए, मैं आश्रम वगैरह के बिल्कुल विरुद्ध हूं। -विरुद्ध ? इसका माने आप भगवान को नहीं मानते ? वह मेरी हैरानी से देख रही थी। मैंने कहा-इस सम्बन्ध में मैं आपसे तर्क करना चाहता। महिला बोली-मैं भी आपसे कोई तर्क नहीं करना चाहती--परन्तु दू होकर आप भगवान को नहीं मानते, यह मुझे अच्छा नहीं लगता। छ अजीव-सा लगता है ।—फिर थोड़ा रुककर वोली-खैर, मेरे पास समय म है। आप चन्दा दें या न दें-मैं किसी दूसरे दिन आकर इस सम्बन्ध में बातें करूंगी।-इतना कहकर वह जा ही रही थी कि न जाने फिर क्या सोच- कर रुक गई और बोली-ठीक है, आप भगवान को नहीं मानते । न सही। आमतौर से आजकल सभी पुरुप नास्तिक बनते जा रहे हैं। पर आपकी पत्नी ? क्या वह भी नहीं मानती। उनका पालन नहीं करती? -मेरी कोई पत्नी नहीं है। -पत्नी नहीं है ? पत्नी नहीं का अर्थ ? उसका एक ही अर्थ होता है, पत्नी नहीं है । मैंने कहा । -आप कहना चाहते हैं कि आपने अभी तक शादी ही नहीं की? वस्तुतः किसी व्यक्तिगत प्रसंग पर आलोचना करने में मुझे संकोच है रहा था, और वह भी एक अपरिचित महिला के साथ । प्रसंग बदल के लिए मैंने कहा-मैं इस वक्त काम में व्यस्त हूं। इस विषय पर आप किसी और समय वातचीत करूंगा। आप भी तो इसी मुहल्ले में र हैं न? -हां ! आप किसी भी समय आ सकते हैं। कहकर उसने में पता बता दिया। पता देखने पर मुझे मालूम हुआ कि उसका घर मेरे घर से ज्या नहीं था। भद्र महिला चली गई। अधिक परेशान किए बिना ही। बाद से हर रोज़ उसके प्रति मेरा कुतूहल बढ़ता ही गया, कभी-क भी होता कि सच में यह क्या वही महिला है, या मेरी आंखों को के २० मैंने बहुत वर्षों के बाद उमे देखा था। हो सकता है चेहरा बदल गया हो, और फिर कभी-कभी दो चेहरो में साम्य भी तो रहता है। संर, हमेशा की तरह मैं रोज साधु दादा के आश्रम से होकर टहलने निकलता । रोज ही भीड रहती। दर्शन के लिए कतार से लोग खड़े रहते । रोज ही नियम से भजन होता, प्रमाद बंटता । परन्तु उम महिला को मैंने यहां दुबारा नहीं देखा । कुछ दिनों तक न तो उसके साये मेरी कही कोई मुलाकात हुई. न वह घर पर आई और न ही कभी आश्रम में मिली । मेरे मन में एक चुभन-मी हो रही थी । ऐसा तो होना नहीं चाहिए। वह कही चली तो नहीं गई ? शायद फिर नेपाल चली गई हो, या बीमार हो । तबीयत तो किसीको भी खराव हो सकती है । एक दिन मैं अधीर होकर उसके दिए पते को खोज लगाकर उसके घर पहुंच हो गया। मकान गली के अन्दर) था। बाहर का दरवाजा खुला पड़ा था। थोडा संकोच तो हुआ, पर मैं अन्दर घुस ही गया । विल्कुल साधारण सा बैठक का कमरा था। दो-चारे छोटी कुसिया थी और दूसरी तरफ अन्दर जाने का दरवाजा । कमरे में कोई नही था । सोचा बाहर से ही किसीको आवाज द)। पुकारूं-अन्दर कोई है ? पर मैं संकुचित-सा सड़ा रहा। इस घर में उस महिला के अलावा और किसीको मैं जानता नहीं था। मुझे भी इस घर के सदस्य नही पेह- चानते थे। बहुत देर तक प्रतीक्षा करने पर भी जव मुझे किसीके दर्शन नहीं हुए तब मैं बाहर चला आया । सोचा, क्या जरूरत है उमसे मेंट करने की । उसके साथ मेरा कोई सम्पर्क भी नहीं--फिर मैं उससे मिलने ही क्यों आया ! क्या उसके प्रति मेरी कोई आसक्ति है ? या किसी कहानी का प्लाट ढूढने आया हूं या फिर एक अजीब चरित्र को सोज में कुतूहलवश आया हूं। अन्त में और प्रतीक्षा किए बिना मैं जैसे आया था वैसे ही गली में उतरकर वापस जाने लगा । जल्दी-जल्दी चल रहा था। किसी भी तरह यह गली पार कर बड़े रास्ते तक पहुंचना चाहता था, अपनी लग्ना बचाने के लिए। लेकिन बड़े रास्ते के क्रासिंग पर पहुंचते ही देखा-mfareो विल्कुल सामने पड़ गया। मुझे देखकर वह बोली-अरे ! आप. से? -आपके घर गया था। मैंने जवाव दिया। मेरे घर? -हां! आपने तो किसी भी दिन आने के लिए कहा था। ऑपर्क नहीं ? महिला बोली-तो फिर चलिए ! मैं ज़रा श्याम बाजार की तरफ थी। -श्याम बाजार ? वह क्यों ? -मेरी छोटी बहन की ससुराल है। बहुत दिनों से नहीं गई थी, इसलिए वह छोड़ ही नहीं रही थी। लौटने में भी देर हो गई । आइए !" महिला आगे-आगे चल रही थी और मैं उसके पीछे-पीछे। घर पहुंचकर दरवाजे पर से ही उसने आवाज दी-कमला, अरी ओ कमला! घर के अन्दर भी जाकर एक-दो वार कमला को आवाज दी। वाहर के कमरे में चुपचाप बैठा रहा। कमला कहीं नहीं मिली। वह फिर वापस बैठक में आई, जहां मैं बैठा मैं था। वोली-देख रहे हैं न तमाशा । मैं कमला के भरोसे घर छोड़कर गई थी। बोल गई थी, मेरे लौटने के पहले कहीं मत जाना । पर फिर भी वह चली गई। मैंने पूछा-कमला कौन है ? -मेरी नौकरानी । पर इन लोगों के भरोसे कहीं जाना भी मुश्कि ही है। कोई भरोसे का नहीं। इतना कहकर आगे क्या करना चाहि शायद इसीपर विचार करने लगी। तभी तक एक बूढ़ी औरत आई । उसे देखते ही महिला वोल उट कसी अक्ल है तुम्हारी ? तुमपर भरोसा करके मैं वहन के घर गई तुम वाहर चली गई। कमला वोली-यो मां! मैं भला मकान खाली क्यों छोड़ जा २२ यावूजी याए थे, इसलिए मैंने सोचा, एक वार पर पर चक्कर लगा पाऊं। ? ? -बावूनी ? वाचूनो कब आए कमला बोली-वाबूजी के आने पर ही तो मैं गई थी। यह सुनते ही महिला का चेहरा उतर गया। बोली- कहां हैं बाबूजी ? मुझे तो दिखाई नहीं देते। इतना कहकर अन्दर वाले कमरे की तरफ जानेवाली ही थी कि उसके पहले ही अन्दर की ओर से एक सज्जन गिरते-पड़ते बाहर के कमरे में आ पहुंचे। उसे देखकर वह महिला थोड़ा चौकी, फिर बोली-तुम तुम कब आए? स सग्जन की आतें करोंदों की तरह लाल यों, और उन्ही लाल आंखों से वह मुझे घूर रहा था। इस तरह की सन्देहजनक दृष्टि मुझे अच्छी नहीं लग रही थी। मैं सोच ही रहा था कि अब यहा से चलना चाहिए कि उस मजन ने मुझसे पूछा-आप कौन हैं ? सरयू की जान• पहचान के अन्दमी इसके जवाब में मैं क्या बोलू, समझ में नहीं आया। महिला सज्जन को रोकते हुए बोली-तुम इस कमरे मे पयों आए ? चलो। उस कमरे में चलो। पर वह वित्तुल अड़े रहे। बोले-क्यो? उस कमरे में क्यों जाऊं? मैं यहा विल्कुल ठीक हूं। सरयू बोली नहीं । तुम ठीक नहीं हो। आज तुम फिर पीकर आए हो । चलो, उस कमरे में चली। पर वह सरयू का हाय छुडाते हुए बोला-क्यो ? तुन्हें शर्म आ रही है ? मैं शराब पीता हूं, यह जानकर लोग मुझसे घृणा करते हैं। मैं जो करता हूं, ठीक करता हूं। मैं शराब पीता हूं, इसमें किसीके बाप का क्या ? वातावरण कुत्सित बनता जा रहा था। मैं भी शर्म से गड़ा जा रहा था। सरयू भी लज्जित थी। बोली-क्या बक रहे हो तुम?शराब पीने से क्या दिमाग भी ठिकाने पर नहीं रहा ? सरयू को अनसुनी करके उसने मुझे अपना गवाह बनाया। बोला -देख रहे हैं आप? कंती सती बन रही है सरयू । देख लीजिए अच्छी तरह । मैं जनाव रोज शराब पीता हूं। पर कभी कुछ वोलती नहीं, पर लाज आप साथ में हैं इस कारण शर्म से मरी जा रही है । इतना कहकर नह ठहाका मारकर हंसने लगा। सरयू उनसे बोली- यह क्या हो रहा है ? तुम्हें ज़रा भी लज्जा-शर्म नहीं ? नाज यह पहली बार हमारे घर आए हैं, और उनके सामने तुम मुझे इस कदर वेइज्जत कर रहे हो ? वे क्या सोचेंगे? . वह बोला-तो फिर यह वताओ कि इन्हें पकड़कर कहां से लाई । यह कौन हैं तुम्हारे ? सरयू वोली-होंगे कौन ? कोई भी नहीं। इसी मुहल्ले में रहते हैं । -ओ ! एक मुहल्ले में रहने से जिस किसीको भी घर में बुलाकर खातिर करनी पड़ेगी ? यह तुम्हारी नई पकड़ है ? मैं बहुत देर से सह रहा था। इन दोनों के बीच अब मुझे एक क्षण मी रहना अनुचित लग रहा था । पर एक बात मेरी समझ में नहीं आई . कि आखिर इन दोनों के बीच सम्बन्ध क्या है ? खैर, सम्बन्ध कुछ भी हो, उससे मेरा क्या लेना-देना । मैं उठ खड़ा हुआ। वोला-मैं चलता हूं। यह सुनते ही वह सज्जन लटपटाते हुए दौड़कर आए और मुझे पकड़ लिया। पोले- नहीं ! नहीं ! आप क्यों जाएंगे जी ! आपको सरयू ने बादरपूर्वक घर बुलाया है, याप रहिए ! मैं ही जाता हूं। मैं तो साहब फालतू आदमी ठहरा! यह कहकर वह वाहर के दरवाज़े की तरफ बढ़ा, पर फिर मुड़कर बोला-मेरा कोट यहां छूट गया है। कोट के लिए अन्दर के कमरे में जाने से पहले ही सरयू ने कोट लाकर उसकी तरफ फेंक दिया। कोट सज्जन के मुंह पर जाकर पड़ा। उसने निर्विकार भाव से उस कोट को पहन लिया और मेरी तरफ देख- कर बोला-देखा न ? देखा औरत का तेज ? लेकिन एक दिन मुझे भी आपकी ही तरह खातिर करके, राह भटकाकर अपने घर लाई थी। माप सुनकर और देखकर जाइए-वही औरत आज मुझे घर से निकाल रही है और नापको बुलाकर लाई है। सावधान लाई है। सावधान हो जाइएगा, साहव ! वहुत सावधान ! मैं इसका प्रतिवाद करना चाहता था, पर सरयू ने मुझे रोक दिया। २४ बोली -आप उनकी बातों पर मत जाइए । वह एक जानवर है । आदमी का सम्मान नही कर सकता। उसे यही दण्ट मिलना चाहिए। जाए जहन्नुम में। वह चला गया। सरयू चुपचाप थोड़ी देर तक उसी जगह खड़ी रही। फिर एक लम्बी सांग ली। इसी मौके पर मैंने कहा- मैं अब चल रहा हूं। मेरे आने से विना कारण एक अप्रिय घटना हो गई । अगर मुझे पहले पता होता तो सच, मैं कभी नहीं पाता। सरयू बोली-नही ! भाप वैठिए । अगर इस वक्त चले गए तो मैं समझूगी आप मेरे ऊपर नाराज होकर जा रहे हैं। -नही, में ऐसा नही सोचूगा। वैसे भी में किसी खास काम में तो आया नहीं था। आपने कहा था इसलिए यो ही चला आया । अब चलता हूँ। इतना कहकर उसकी अनुमति की प्रतीक्षा किए दिना ही मैं वहां से विदा हो गया। ४ यह घटना यहीं समाप्त हो सकती थी। जीवन में बहुत-सी ऐसी पटनाएं घटती हैं जिनके बारम्भ का पता तो सबको होता है, पर जिनका अन्त अज्ञात रह जाता है। इतनी बड़ी दुनिया में कब कौन बाता है, और कर कौन खो जाता है, इसका हिमाय कोन र ? लेकिन कुछ घटनाएं ऐमी भी होती हैं जो रेलगाड़ी की तरह बनी बनाई पटरी पर चलकर रेल की तरह ही एक निर्दिष्ट गन्तव्य पर जाकर ही सत्म होती है। सरयू की घटना भी कुछ ऐसी ही थी। मेरा जो कार्य-क्षेत्र है---वक्ष बहुत लोगों की भीड़ रहती है, क्योकि मेरा कारोबार ही मनुष्य चरित्र को लेकर है । अपने काम में मैं जब हूब ता हूं तव मन करता है-डूवा ही रहूं, लिखता ही जाऊं। जब तक चन समाप्त नहीं होता, मन को चैन नहीं मिलता। मैं उस समय ऐसी अवस्या से गुजर रहा था। लेखन को जीविका वनाने में सुविधा तो है, पर इसकी ज़िम्मेदारी भी छ कम नहीं। संख्या के साथ गुण का साम्य कायम रखने की चेष्टा में उखक दिन-रात क्षत-विक्षत होता रहता है। इसी समय एक दिन किसीने मेरा दरवाजा खटखटाया। मेरा नौकर किसी काम से गया हुआ था। इसलिए मैंने ही ऊंची आवाज से पूछा-- कौन? वाहर से किसी महिला की क्षीण नावाज़ सुनाई पड़ी। जल्दी से जाकर स्वयं ही मैंने दरवाजा खोल दिया। देखा, महिला.." सरयू थी। --आप ? मैंने अचरज से पूछा । सरयू झट से मेरे कमरे के अन्दर घुस आई और सिर पर कपड़ा थोड़ा ज्यादा खींचकर, थोड़ा सहज बनने की चेप्टा की । वोली-मुझे 'आप' मत कहिए । इतना सम्मान मुझे न दीजिए। मैं छोटी हूं, केवल उम्र में ही नहीं, हर क्षेत्र में । अगर आप मुझे अच्छी तरह जान लें तो मुझसे बात करने में भी आपको घृणा होगी। सरयू की बात सुनकर मैं हतप्रभ-सा खड़ा रहा । इस तरह से इस महिला ने पहले मुझसे कभी वातें नहीं की थीं। अचानक ऐसी क्या ज़रूरत या पड़ी कि वह इस तरह से मेरे समक्ष आत्मसमर्पण कर रही थी। कमरे के अन्दर घुसकर सरयू बोली-दरवाज़ा बन्द कर रही हूं। बाप बुरा मत मानिएगा । मेरे पीछे पुलिस पड़ी है। -पुलिस? -हां, पुलिस । मैं डरकर आपके मकान में आई हूं। -लेकिन व्यर्य में तुम्हारे पीछे पुलिस पड़ेगी क्यों ? तुमने क्या किया है ? सरयू वोली-उस दिन जिस आदमी को आपने मेरे यहां देखा था, जो नदो में चूर पागलपन कर रहा था, उसीने मुझे पकड़ने के लिए पुलिस से है कहा होगा। मैंने पूछा- लेकिन वह है कौन ? और तुमने क्या किया है कि वह तुम्हे पुलिस में पकडवा देगा? सरयू बोली- मैं सब बताऊंगी। पहले आप मुझे एक गिलास पानी दे सकते हैं ? मेरा गला सूख गया है, आपके घर पर कोई नौकर या नौक- रानी नही? मैंने कहा--उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। पानी में ला देता हूं |--कह- कर अन्दर से एक गिलास ठण्डा पानी लाकर मैंने उसके हाथ में दिया। सरयू बोली-पानी आपको ही लाना पड़ा। मेरा पाप और वढा, लेकिन क्या करती, गला बिल्कुल सूख गया था। कहकर वह एक ही सांस में सारा पानी पी गई । बोली-~-यह जूठा गिलास मैं आपको नहीं दूंगी। अपनी रसोई बता दीजिए-~मैं माजकर रख दूगी। मैंने उसके हाथ से गिलास ले लिया । कहा-तुम्हे यह सब कुछ करने की कोई जरूरत नही । यह यही रहेगा, बाद में भी घुल सकता है । अब बताओ वह आदमी कौन था? सरयू बोली- वह एक फरेबी है । वही मुझे इस रारते पर लाया है । में फिर भी नहीं समझा। पूछा--कसा रास्ता? क्या कहना चाहती हो? सरयू अचानक रो पड़ी। कुछ बोलना चाह रही थी, पर अटक गई। फिर थोडा स्ककर वोली-याप यह सब न सुनें तो अच्छा है। किसीको भी ये बातें मालूम नहीं, और किसीको कहने लायक भी नहीं । विश्वास कोजिए, मैं भी ब्राह्मण की लड़की हूं। अच्छे खानदान की हूं। वही आदमी मुझे इस पथ पर ले आया। फिर वही रहस्य। मैं समझ गया । इतनी आसानी से यह औरत कुछ नहीं कहेगी। और जो स्वयं कहना नहीं चाहती उसकी बात जबर्दस्ती सुननी भी नहीं चाहिए। मैंने कहा-तुम क्या समझती हो कि यहां रहने से पुलिस तुम्हें नहीं । पकड सकेगी? सरयू बोली-देखिए, सुबह तक मुझे किसीने कुछ भी नहीं बताया - पा। रोज की तरह नींद से उठकर खाना वगैरह वनाने बैठी थी। कमला को तो आपने देखा है न? ~~~हो । तुम्हारी वह नौकरानी ? सरयू बोली-हां ! असल में मुझे पता नहीं था कि वह कमला भी इसमें मिली है । निशिकान्त वावू को भी तो आपने देखा है ? -कोन निशिकान्त वायू ? -वही जो नशे में धुत होकर बक रहा था। वही निशिकान्त है। निशिकान्त हालदार। मैंने पूछा-उसके साथ तुम्हारा क्या सम्बन्ध है ? --सम्बन्ध ? सम्बन्ध कुछ भी नहीं। केवल कृतज्ञता है, एक दिन उसने मुझे विपदा से बचाया था । क्या पता था कि वही किसी दिन मुझे । विपत्ति में भी डाल देगा। बातचीत के दौरान ही दरवाजे पर कुछ आहट सुनाई पड़ी। सरयू भयंकर रूप से डर गई । बोली-शायद पुलिस आ गई । मुझे अन्दर के किसी कमरे में छुपा लीजिए । जल्दी कीजिए । कहकर वह स्वयं ही वगल वाले कमरे में चली गई। मैं भी उसके साथ-साथ उस कमरे में चला गया । यह मेरे सोने का कमरा था । महिला तव तक मेरी आलमारी के पीछे छुप गई थी। मुझे देखकर फुसफुसाकर वोली-आप जाइए । देर मत कीजिए। आप पुलिस को मेरे बारे में बता मत दीजिएगा । जाइए। दरवाजा खोलकर मैं कमरे से निकला। मन में थोड़ा डर भी था। जान-बूझकर भी मैंने इसे आश्रय क्यों दिया ! मैं तो जानता था इस महिला का चरित सन्देहजनक है । नेपाल से गांजे की तस्करी करती थी--यह सव जानकर भी उस दिन क्यों तो मैं उसके घर गया और क्यों ही आज इसे अपने घर में शरण दे रहा था ? दरवाजा खोलते ही मैं हैरान रह गया। पुलिस का आदमी नहीं था। मेरा नौकर कानाई खड़ा था । -तू कहां गया था? कानाई बोला-सरसों का तेल खत्म हो गया था। मैं तेल खरीदने गया था। २८ कानाई तेल लेकर रसोई की तरफ गया। और मैं अपने सोने के कमरे की तरफ । लेविन सरयू कहां थी? वायरूम देखा- पलंग के नीचे आल- मारी के पीछे देखा, पर वह कही दिखाई नहीं दी। अन्त में देखा बाथरूम का पिछला दरवाजा, जिधर से जमादार आता था, खुला पड़ा था । उस दरवाजे से भी झाका । पर वह दिपाई नही पड़ी । शायद पुलिस के डर से उसी दरवाजे से कहीं भाग गई थी। मैं निश्चिन्त हुआ। बगर सच मे पुलिस आती तो नाहक मुझे भी परे। शानी उठानी पड़ती। मन में यह भी तय कर लिया कि अगर फिर कभी सरयू मेरे घर पर बाई तो उसे आश्रय नहीं दूगा। ऐसी लड़कियों से दूर ही रहना चाहिए । सोचा था यह प्रसंग यहीं समाप्त हो जाएगा । जीवन की राह पर कितने लोगो से अपनापन हो जाता है, फिर आकस्मिक रूप से जीवन से ये सो भी जाते हैं। मेरे लेखक-जीवन के शुरू से यदि देखा जाए तो सम्पूर्ण जीवन की राह पर केवल मनुष्यो का एक लम्बा जुलूस दिखाई देता है । एक के बाद दूसरा श्रम से आया है और गया है। मनुष्य की जीवन-यात्रा का पथ भी सम्भवत: जुलूसों से ही भरा हुया है। नहीं तो कब की, कौन-मो सरयू के साथ इस कलकत्ता में भेंट क्यों हुई। और यदि भेंट हुई भी तो इस रहस्यमय ढंग से वह गायब भी क्यों हो गई ? मनुप्पो की कतार जितनी अजीय है, उतना ही अजीव शहर है-~यह कलकत्ता । पुण्य करने के लिए भी यहां आना पड़ता है और पाप करने के लिए भी । सत्रहवी सदी के शुरू से लेकर बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक इस नियम का व्यतिकम नहीं हुआ। वही पुराना शहर प्रतिदिन नया होकर मन को चौंका देता है। जिस सड़क से रोज गुजरता हूं, वही किसी आकस्मिक घटना से नया बन जाता है। और इसो मुहूर्त मे में इस कलकत्ता को भी नये रूप मे पाता हूँ। यह २६ - कुछ वैसा ही है जैसे एक ही लड़की का नित्य बदली हुई पोशाक पहनकर नई वन जाना। उस दिन अचानक किसीने मुझे पीछे से पुकारा। मेरा नाम लेकर पुकारा था, पर मैंने उसे पहचाना नहीं । कहा भी-क्षमा कीजिए। आपको पहचान नहीं पा रहा हूं। उसने कहा-पहचानिएगा भी कैसे ? एक बार के सिवाय दुवारा तो नापने कभी मुझे देखा नहीं। मैंने कहा-आपको कहां देखा है, जरा वताइए तो? उसने कहा-आपके अपने मुहल्ले में । अपने मोहल्ले में, मतलव ? -~-माने, आप पहले टालीगंज में रहते थे न ? -हां। -उनी मोहल्ले में सरयू नाम की किसी लड़की को आप जानते थे ? फिर मुझे सब कुछ याद आ गया। बोला-~~-वह तो बहुत पुरानी वात है। ---पुरानी बात है इसलिए तो कह रहा हूं। कितनी तेज़ औरत थी- देखा न ? लेकिन साहब, बहुत नमकहराम है। मैंने उसका इतना भला किया, पर बदले में उसने मुझे सड़क पर विठा दिया ।-मुझे कुतूहल हुआ। टालीगंज छोड़ने के बाद वह प्रसंग में विल्कुल भूल चुका था । और फिर हर व्यक्ति की तरह मेरे जीवन की भी कुछ समस्याएं थीं, उन्होंके धक्कों को संभालने में समय बीत गया था--किस-किसको याद रखता? उस सज्जन ने बड़े आग्रह से मुझे नहा-आइए, एक कप चाय पीजिए। अभी थोड़ी देर पहले तक वह शायद उसी दुकान पर बैठकर चाय पी रहा था, फिर मुझे लेकर दुबारा वहां जा बैठा। इस दुकान पर बैठने की मेरी ज़रा भी इच्छा नहीं हो रही थी, पर मजबूरन बैठना ही पड़ा। टीन की एक जंग लगी हुई कुर्सी मेरी तरफ बढ़ाकर वोला-वैठिए । उसके बाद बोला-इस दुकान में ज्यादा ग्राहक नहीं आते, इसीलिए मैं ३० सही माता हूँ। एकान्त में बैठकर बातचीत करने की इससे अच्छी जगह पूरे नगर में आपको नहीं मिलेगी। उसके बाद दुकानदार से वोला-ओ भाई खेतर, एक कप चाय और देना। मेरी आपत्ति उसने मुनी नहीं । जबर्दस्ती एक कप चाय पकड़ा दी। चोला.-पोजिए साहब ! इसे आप चाय भी कह सकते हैं और इमली का पानी भी । लेकिन क्या करूं? आजकल आमदनी घट गई है, अच्छी दुकान पर चाप पीने की सामथ्र्य नहीं रही। इस उहर को पीने के लिए यही आना पड़ता है। फिर बोला-मेरा नाम शायद आपको मालूम नही । नही । -मेरा नाम निशिकान्त है, निशिकान्त हालदार ।-कहकर जेव से एफ सस्ती-सी सिगरेट का पैकेट निकालकर बोला-सिगरेट चलेगी? --चलती है । पर अभी ज़रूरत नहीं । आप पीजिए। निशिकान्त वोला-न पीना ही अच्छा है। सस्ती सिगरेट जितनी कम पीजिए, उतना ही अच्छा है। मैं नी पहले कभी सस्ती चीज छूता तक नही बा। कभी मैं भी बड़ी कीमती सिगरेट पिया करता था और केवल सिगरेट भी क्यो ? विलायती ह्विस्की के अलावा कुछ पीता ही नहीं था। पर हालत बदल गई, इसीलिए निशिकान्त हालदार को देशी माल पीना पड़ रहा है । दुखड़ा सुनाऊं भी तो किसे ! सुनेगा भी कोन ? में अचानक पूछ बैठा-सरयू अव कहां है ? निशिकान्त वोला-उसकी बात मत उठाइए साहब ! वह एकदम चली गई। -मतलब? --मतलब गई । कही को न रही। -योडा खुलकर ही बताइए न निशिकान्त वावू । बात कुछ पल्ले नही पड़ रही। निशिकान्त वोला-एक सीधी-सी बात आपकी समझ मे नही आ रही। आप ठहरे लेखक, इतना तो आपको समझना ही चाहिए, दाल-रोटी . की तरह सीधी-सपाट वात है वातचीत के बीच ही एक और कांड हुआ । एक बूढ़ा आदमी सड़क पर जा रहा था । निशिकान्त को देखकर सामने माकर खड़ा हो गया। वोला-कमाल करते हैं । आप यहां हैं, और मैं आप- के लिए सारी दुनिया छान रहा हूं। कैसे सज्जन हैं आप ?--मैं अवाक् वैठा रहा । देखा, निशिकान्त का चेहरा फीका पड़ गया था। अंधेरे रास्ते में शेर देखने पर जैसा चेहरा होता है, निशिकान्त उतना ही डरा दीख रहा था। लेकिन निशिकान्त के कुछ कहने के पहले ही बूढ़े सज्जन ने कहा-'कल भेंट करूंगा', कहकर आप हवा हो गए। आज मैं आपको नहीं छोड़गा। जहां से भी हो, मेरे किराए के पैसे दे दीजिये। चलिए मेरे साय ! निशिकान्त बोला-आज जरा मैं व्यस्त हूं मल्लिकजी । देखिए न, इन सज्जन से मुझे कुछ रुपये वापस लेने हैं, यह जैसे ही लौटाएंगे, मैं आपको दे दूंगा । आप फिक्र मत कीजिए। निशिकान्त की बात सुनकर मैं तो जैसे आकाश से गिर पड़ा। यह आदमी कह क्या रहा था। मकानमालिक ने अव मेरी तरफ मुड़कर मुझे अच्छी तरह देखा । शायद जानना चाहता था, मैं कौन था ? निशिकान्त से मेरा कैस रिश्ता था और वास्तव में निशिकान्त से मैंने कुछ उधार लिया था या नहीं घटना की आकस्मिकता से मैं बेवकूफ-सा बन गया था। मेरे मुंह वोली ही नहीं निकली। निशिकान्त मेरी ओर इशारा कर कह रहा था-अगर आपको विश्व नहीं होता तो आप इनसे पूछ लीजिए। यह भी कुछ मुश्किल में पड़े इसलिए रुपया चुफा नहीं पा रहे हैं । खैर, इसमें उनका भी क्या कसूर दिन ही कड़की के हैं । मैं भी ज्यादा दवाव कैसे डालूं-बोलिए? मकान-मालिक मल्लिक साहव वोले-ये बापको रुपया दे सकते है नहीं, यह मेरे देखने की बात नहीं है। मेरे किरायेदार तो. आप हैं महीनों से किराया वाकी पड़ा है और फिर मेरा लेन-देन तो आपके है । आप मुझे उनको क्यों दिखा रहे हैं । वह आपके रुपये नहीं लौटा इस कारण में क्यों तकलीफ पाऊं ? आज माप किसी भी हालत में छु सकते, चलिए! ३२ निशिकान्त फिर वोला-मैंने आपको कहा न कि किराया तोदे हो दूंगा । मैं क्या कही भाग रहा हूं कि आप इस तरह उल्टा-सीधा बक रहे -~-क्या कहा ? मैं पक रहा हूं? आप बक नही रहे हैं तो क्या मैं बक रहा हूं? मुझे क्या पड़ी है ? यह सज्जन ही गवाह हैं, इन्हीसे पूछिए ? आप ही बोलिए साहब, मैंने विनीत भाव से कहा था या नहीं कि किराये के रुपये मैं दे दूंगा । जैसे ही मेरे हाथ में रुपये आएंगे मैं पाई-पाई चुका दूंगा। मल्लिक साहब बोले- ये सब बातें में बहुत बार पहले भी सुन चुका. हूं! इस वार बाकी के पैसे न चुकाने पर में कमरे का ताला तोडकर बक्सा- पेटी सव सड़क पर फेंक दूंगा। निशिकान्त मेरी तरफ ताककर बोला-सुन रहे हैं जनाब, इनकी बातें ? आप गवाह रहे । जरूरत पड़ी तो कचहरी मे जाकर आपको गवाही देनी होगी। मैं इनके नाम फौजदारी का मुकदमा ठोकूगा। --क्या कहा ? मेरे नाम फौजदारी का मुकदमा करोगे?--मल्लिक साहब चिल्लाए । अब चाय की दुकान का छोकरा खेत्तर आकर चोला- दुकान के अन्दर हल्ला मत मचाइए सर ! चिल्लाना है तो बाहर सड़क पर जाकर चिल्लाइए। मैंने देखा-अजीब विपत्ति है । फालतू झमेले में मैं क्यो इस तरह फंस गया ! मुझे इस मामले से क्या लेना-देना ? मैं उठने लगा, पर निशिकान्त ने मुझे रोक लिया। बोला-आप भाम क्यों रहे हैं साहब ? आपको तो मैं गवाह रखूगा। आप कचहरी में जाकर गवाही दीजिएगा कि आपने अपनी आंखों से क्या देखा है। इस मल्लिक के बच्चे ने सबके सामने मेरा अपमान किया है मकान-मालिक मल्लिक भी क्यों दबता ? वह भी चिल्लाया-ठोक किया है, जो तुम्हारा अपमान किया है । हजार वार तेरा अपमान करूमा। जब मकान किराये पर लिया था तब होश नही था? उस समय तो बड़ी- बड़ी बातें कर रहे थे । हजार रुपया वेतन है। खूबसूरत दीदी घी साथ में, अव वही बीबी आपको छोड क्यों गई ?
चाय की दुकान का वह छोकरा खेत्तर फिर आकर बोला-आप लोग चुप भी रहिए । झगड़ा या मारपीट दुकान के बाहर करें तो अच्छा है। मेरी दुकान के अन्दर यह सब कुछ नहीं चलेगा। निशिकान्त को जब और कुछ नहीं सूझा तव उसने खेत्तर को ही गवाह बनाकर कहा-~बोलो तो उत्तर, तुम एक विवेकशील आदमी व्हरे, तुम्हीं वताओ, जरूरत पड़ने पर लोग उधार नहीं लेते ? तुम्हारे ही पास कितने कप चाय के पैसे बाकी हैं, लेकिन तुमने क्या कभी मेरा अपमान किया है ? और अपमान करोगे भी क्यों ? तुम अच्छे खानदान के लड़के हो, इसलिए तुम्हारा व्यवहार भी अच्छा है । जो छोटे होते हैं, उन्हींका व्यवहार हीन होता है। उसके बाद मेरी ओर इशारा कर निशिकान्त बोला-इन्हें देखो ? यह भी सज्जन हैं। वाकई में अच्छे हैं । लेखक आदमी हैं, पर इस समय इनका समय खराब चल रहा है। इनसे मुझे छह सौ रुपये लेने हैं । सामने दशहरा है। पत्रिका के विशेषांक में उपन्यास लिखकर जैसे ही इनको रुपये मिलेंगे, यह मुझे वापस कर देंगे, और तव उन पैसों से मैं तुम्हारे चाय के पैसे, मल्लिक साहब के बाकी के किराये के रुपये सभी एकसाथ चुका दूंगा। यह सुनकर मल्लिक साहव एक बार फिर तुनक उठे । वोले-रहने भी दो। कव कौन किसका उधार चुकाएगा, उसके लिए मैं क्यों सिरदर्द मोल लूं। मेरे पैसे तुम कब चुकानोगे, पहले यही बताओ। इसके जवाब में निशिकान्त क्या बोला, मैं सुन नहीं पाया, क्योंकि उसी क्षण सबकी नजर बचाकर मैं सड़क पर सरक आने में सफल हो गया था । चलते-चलते मैं निशिकान्त के बारे में ही सोच रहा था । कितना धूर्त था यह निशिकान्त । एक लड़की का जीवन तो बर्बाद कर ही चुका था और अब अपने सर्वनाश पर तुला था । और कहता था कि मुझपर उसके सो रुपये उधार थे। ताज्जुब है। जो अभाव में इतना पिसा हुआ था, उसे शराब पीने की जरूरत ही क्या थी ? महान-मालिक ने उसे सबके सामने वेइज्जत कर उचित ही काम किया था। इस तरह के मादमी के साथ ऐसा ही होना चाहिए। यह सब सोचते-मोत्ते में बहुत दूर तक चला आया था कि अचानक पीछे से वही छह पुकार-सुनिए-मुनिए''ओ साहब। पीछे मुड़कर देखा-निशिकान्त दौड़ता-हाफ्ता मेरी तरफ मागता आ रहा था। मैंने पूछा-क्या बात है ? हांफते हुए निशिकान्त बोला-आप बचानक भाग क्यों बाए गए क्या? मैंने कहा-आप लोगो के मामले में में फंसना नहीं चाहता था। यापने झूठ क्यों कहा कि मैंने आपसे छह सौ रुपये उधार ले रखे हैं। सच बताइए -मैंने कभी आपसे छह सौ रुपये मांगे हैं ? नापको मालूम होना चाहिए कि में न तो किसीको उधार देता हूं और न उधार लेता हूं। निशिकान्त बोला-बेरी गुड प्रिन्सपल, वेरी गुड । आपकी तरह मेरा भी यही सिद्धान्त है। मैंने प्रतिज्ञा की है कि जिन्दगी में किसीको न उधार दूगा और न ही उधार लूगा। उधार का लेन-देन मेरी नजर में हराम मैंने कहा-लेकिन आप तो मल्लिकजी के मकान में किराये पर रहते हैं, फिर नियम से किराया क्यों नहीं देने ? इस तरह से अपमानित तो नहीं होना पड़ता। -उस मल्लिक को यात कर रहे हैं ? आपको मालूम है, मल्लिक कितना हरामी आदमी है ? और आप किराये की बात करते हैं, वह भी कोई मकान है ? वह मकान नही है । -मकान नहीं है, मतलब? --अरे ! सीधी-सी बात है, अगर मकान होता तो मैं खुद महीने की पहली तारीख को ही किराया दे देता । असल में वह कौए के घोंसले से भी गया-बीता है । पानी का नल नही, कमरे को दीवारें नहीं, सर पर छत नहीं, और ऊपर से किराया वीस रुपये। आप जान रखिए वह आदमी बिल्कुल खानदानी हरामी है। मैं मजबूरी में या, इसीलिए तो सरयू को लेकर उस कौए के घोंसले में जाना पड़ा। --क्यों, मजबूरी किस बात की थी? आपका टालीगंज का वह मकान तो अच्छा ही था । पक्का मकान, अलग बैठक । उस मकान में तो में गया . भी था । वसा मकान क्या आज के दिन में छोड़ना चाहिए ? निशिकान्त ने जेब से एक सिगरेट निकाली.। सुलगाकर बोला-क्यों छोड़ा ? .. क्यों छोड़ना पड़ा, . साहब, यह अगर आपको सुनाऊं तो आप जैसे यादमी तो रो पड़ेंगे । तव आप ही कहेंगे 'वस करो निशिकान्त, बस करो ! मैं आगे बोर नहीं सुन सकता । आप अपने कानों में उंगली डाल मैंने कहा-कुछ भी हो । तुम बताओ-मैं सुनूंगा। निशिकान्त बोला--ज़िद करते हैं तो सुनिए । पर बाद में मुझे दोप मत दीजिएगा। फिर सुनकर आप ही बताइएगा कि मैं ठीक हूं या सरयू । -बोलो! निशिकान्त ने बताया-वह घर मैंने केवल सरयू के कारण छोड़ा। -क्यों ? सरयू का क्या अपराध था ? -सर ! माप हैं एक लेखक । सीधी-सी बात भी अगर समझ नहीं सकते तो आप कैसे लेखक हैं ? आप क्या जासूसी उपन्यास लिखते हैं ? मैंने कहा-क्यों भई, जासूसी उपन्यास लिखने वाले क्या लेखक नहीं होते? निशिकान्त बोला-खाक लेखक होते हैं, केवल खून-खराबे की बातें ही तो लिखते हैं। देखिए न, कभी मेरे दिमाग पर भी खून सवार हो जाता है। यह बात आप जैसे लेखक ही समझ सकते हैं। कभी-कभी तो मल्लिक साहब का खून कर देने की इच्छा होती है। में अच्छी तरह समझ रहा था कि असली वात को निशिकान्त टाल रहा है। मैंने फिर पूछा-टालीगंज का मकान तुमने क्यों छोड़ा, बताया नहीं ? निशिकान्त वोला-दुख की बात क्या बताऊं, उसी सरयू के कारण छोड़ा। -लेकिन सरयू की गलती क्या थी, यह बताओ। निशिकान्त वोला-औरत का इतना रूप , क्या अच्छा है, बाप ही बताइए? बहुत सुन्दर औरत कभी सुखी नहीं होती । वहां भी सरयू पर मकान-मालिक की नज़र पड़ी। अपनी पत्नी पर दूसरे की नज़र कौन मर्द ३६ सह सकता है ?--फिर थोड़ा रुककर बोला-एक तो आग की तरह झुलसता रूप, उसपर बांझ । वांश औरत यदि सुन्दर हो तो लोग और भी पीछे पड़ जाते हैं, जैसे अभी एक पड़ा है। --अब कौन पड़ा है उसके पीछे ? निशिकान्त बोला-वही मल्लिक साहब । --क्या कहते हो? मल्लिक तो वुड्ढा आदमी है । -बुड्ढे तो और घाघ होते हैं । मैं समझ नही सका। पूछा-तुम कहना क्या चाहते हो? -आप सो कमाल करते हैं, हंसी आती है आपपर । बुड्ढो मे अधिक वासना होती है, इसलिए, खूबसूरत औरतो को देखने पर उनका मन भी जल्दी फिसलता है । इसीलिए तो कह रहा हूं कि मल्लिक बडा हरामी आदमी है । मेरी पत्नी को देखते ही तुरन्त मकान किराये पर दे दिया । बीस रुपया किराया तय हुआ था-पर कभी भी तकाजा नहीं करता था। पर जैसे ही मैं घर से बाहर निकल जाता था, वह मेरी पत्नी के साथ मसखरी करने लगता । लेकिन अब तो यह सब चल नही रहा है। सरयू तो चली गई। इसलिए किराये का तकाजा कर रहा है। बुड्डा कम बदमाश नहीं है। यह सब सुनकर मेरे दिमाग में अजीव-सी प्रतिक्रिया हो रही थी। तो फिर क्या अब तक मैंने जो कुछ ममझा था वह गलत था? अगर ऐसी बात थी तो उस दिन मोकामाघाट स्टेशन पर कौन मेरे जिम्मे गांजे से भरा सूटकेस छोड़कर भागी थी ? टालीगंज में आदि गंगा के किनारे साघु धाया के अखाड़े पर कोन प्रसाद वितरण कर रही थी और फिर आश्रम के नाम से चन्दा वसूलने कोन आई थी? पुलिस के डर से मेरे घर पर शरण किसने ली थी और कोन वायरूम के पीछे के दरवाजे से भाग निकली थी ?--यह सब किमकी हरकत थी ? निशिकान्त मेरे साथ-साथ चल रहा था। मैंने पिछली किसी की चर्चा नहीं की, सिर्फ ना पूछा--मर कहां चली गई? निशिकान्त बोला--आपको कहा न-जहन्नुम में गई । एक तो सुन्दर, उसपर से बांन । जहन्नुम मे जाएगी यह तो मैं पहले से ही जानता .
A या। लेकिन मुश्किल क्या है जानते हैं ? मैं बहुत दयालु प्रकृति का हूं। किसीका दुस मुझसे सहा नहीं जाता। शरणार्थी वनकर बदन पर एक कपड़ा लपेटे जब वह पाकिस्तान से आई थी, तब उसके खाने-रहने का कोई ठिकाना नहीं था । उस दिन अगर मैं सरयू को नहीं बचाता तो वह गुण्डों के पल्ले पड़ ही जाती। मैंने सोचा लड़की है-उसे सहारा चाहिए, इसलिए आगे- पीछे कुछ न सोचकर उससे शादी कर ली। अव सोचता हूं दुनिया में किसी- का भला नहीं करना चाहिए । जिसका भला कीजिएगा, वही आपका सर्वनाश करेगा। विद्यासागर क्या बेवकूफ थे, जो उन्होंने कहा था कि जिसकी तुम भलाई करोगे-वह तुम्हारा बुरा जरूर चाहेगा । सरयू ने भी मेरे साथ वही किया। नहीं तो क्या मल्लिक जैसे घटिया आदमी के सामने मुझे अपमानित होना पड़ता? मैंने पूछा- अब तुम्हारी पत्नी कहां है ? निशिकान्त वोला--अब वह किसी धनी व्यक्ति के पास है."उसकी रखेल बन गई है। -~-वह धनी व्यक्ति है कौन ? निशिकान्त वोला-आप उसे नहीं जानते। कलकत्ता में पैसे वालों की कोई कमी है ? वस एक बार महक मिलने की देर है, चारों तरफ से अपना जाल फैला देते हैं। तुम उसका पता नहीं जानते ? -जानता हूं। उसका पता भी जानता हूं। उसके बाप का नाम भी जानता हूं। लेकिन वहां जा नहीं सकता। सरयू मुझे देखते ही भगा देगी। --भगा क्यों देगी? -क्यों नहीं भगाएगी ? मैं ठहरा एक गरीब आदमी । मरने पर आग देने वाला या मुकादमे में जमानत देने वाला मेरा अपना कोई नहीं। मैं ते सरयू को एक अच्छी साड़ी भी नहीं दे सकता । और फिर आप औरत क मन तो जानते ही हैं । केवल साड़ी और गहनों से हो खुश रह सकती है जब मेरे पास पंसे थे, मैंने भी उसे बहुत कुछ दिया, लेकिन अब मैं खर हो गया हूं। फिर मधुमक्खी आएगी कहाँ ? थोड़ा रुककर फिर बोला- भाप मेरा एक उपकार कीजिए सर !
-योलो क्या उपकार कर सकता हूं? -अगर आप मेरा इतना-सा उपकार कर सकें तो मैं जीवन-भर आपका गुलाम रहूगा। असल में जानते हैं, सरयू को में जितना खराव बता रहा हूं वह वैसी है नहीं । वह बहुत अच्छी है, दयालु है। साडी-गहनों के प्रति उसका लालच तो है और वह किस लड़की को नहीं रहता, पर उसके जैसा मन आपको कही नहीं मिलेगा। दुख में, कष्ट में, परेशान होकर कभी-कभार मुझसे गाली-गलौज अवश्य करती है, पर मैं भी तो कोई धुली सुलसी का पत्ता नही । मुझमें भी तो हर तरह के दोष हैं । --तुममे भी दोष हैं ? -~-दोष एक है साहब, जो गिनाऊं? हजारो दुरी आदतें हैं मुझमे .. मैं शरावी हूं। मैंने कहा- शराब पीना तो कोई बडा दोप नहीं। शराव तो बहुत लोग पीते हैं । मैंने बहुत बड़े-बड़े लोगो को पीते हुए देसा भी है। निशिकान्त बोला-नही सर । मेरा पीना कुछ और किस्म का है। एक गन्दा मामला है। -वह कमे? -देखिए, शराव तो मभी पीते हैं। पीने की चीत्र ही है। नहीं तो सरकार ने शराब की दुकानें क्यो खोली हैं। लेकिन मेरे पीने का ढंग कुछ और है । जिस दिन हाथ में पैसा आता है, उन दिन क्या तो बादशाह आल- मगीर और क्या मैं ? और जब तक वे पैसे खत्म नहीं हो जाते, मुझे चन नहीं पड़ता। फिर जब उटपटाते हुए घर लौटता हूं. मेरी जेब सपाट मैदान यनी रहती है। -उसके बाद? -उसके बाद क्या होगा ? पर आकर के करता हूं। उसे सरयू साफ फारती है । यिस्तर, चादर, तकिया सब धोती है । बोलिए साहय, ऐसी हालत में किसका मिजाज ठीक रह सकता है । मेरी तो वही दशा है, खाना नहीं दे सकता, पर मालिक तो हूं ही, जुल्म तो कर हो सकता हूं। मेरा घूमना तव तक खत्म हो चुका था। घर के पास पहुंच नुका था। निशिकान्त से मैंने कहा-~अव में चलता हूं। मेरा घर मा गया है।
? -- निशिकान्त वोला-अच्छा? नापका घर कौन-सा है उंगली से संकेत कर मैंने अपना मकान उसे दिखा दिया और कहा- इसी मकान के दुमंजिल पर रहता हूं, बाई तरफ दरवाजा है । निशिकान्त बोला-बड़ा बच्छा मकान है। सरयू को भी कलकत्ता में एक बच्छा मकान बनाने का बड़ा शौक था। सोचती थी अच्छा खाएगी, मच्छा पहनेगी, अच्छी लड़की की तरह जीवन बिताएगी, पर यह सब कुछ भी नहीं हुआ, मुझ जैसे एक शराबी के हाथों पड़ गई। बय तक मैंने अपना कुतूहल दवा रखा था, पर मुझसे मोर न रहा गया । पूछा-तुमसे एक बात पूछना चाहता हूं, निशिकान्त ! -बोलिए न सर, वोलिए! -अगर तुम्हारे पास बहुत-से रुपये हों तो क्या तुम्हारी पत्नी तुम्हारे पास फिर लोट पाएगी? -~-क्यों सर ? बाप मुझे पैसे देंगे क्या? - मैं तुम्हें पैसे दूं या न दूं, जो पूछ रहा हूं पहले उसका जवाब दो। निशिकान्त कुछ सोचने लगा। उसके बाद बोला -आप कितना रुपया दे सकते हैं ? सौ-दो तो, पांच सौ देने से तो काम नहीं बनने का । सरयू की मांग बहुत दड़ी है । इसके अलावा मैं शरावी आदमी भी हूं। आप जो ಣ भी देंगे उने में शराव में उड़ा दूंगा। हाथ में कुछ भी नहीं बचेगा । किसी ज्योतिथी ने मुझे बताया भी था कि लाख-लाख रुपये आने पर भी मेरे हाथ में कुछ नहीं टिकेगा। इससे अच्छा तो यह होगा कि रुपये आप सरयू के हाथों में दे दीजिए । वह अच्छी तरह सम्भालकर गृहस्थी चलाएगी। मैंने कहा--- लेकिन अभी तो वह सामने है नहीं और न ही मेरे पास सना रुपया है कि तुम दोनों की गृहस्पी का खर्चा चला सकूँ। ----तो फिर एक काम कीजिए सर ! निशिकान्त ने बीच ही में मुझे रोककर कहा. -स्या काम? निशिकान्त बोला-बाद में आप सरयू को हायों में जो दीजिएगा सो तो दीजिएगा ही, लेकिन अभी बगर कुछ रुपये मुझे दें तो मैं जी जाऊंगा। सड़क पर भटकना नहीं पड़ेगा।
- मैं यह सुनकर चुप रहा । निशिकान्त यह देखकर बोला-आप यह मत मोचिए कि आपका पैसा लेकर मैं कही भाग जाऊंगा। जैसे भी होगा, रुपया जरूर वापस कर दूंगा। दुनिया में कितने विचित्र लोग रहते हैं, कभी-कभी मैं यही सोचता रहता हूं। यह निशिकान्त सोत्र क्या रहा है ? क्या मैं इतना ही वेवकूफ हूं कि एक चरित्रहीन शराबी आदमी को पैसे देकर उसकी सहायता करूंगा? लेकिन निशिकान्त को मैं और अच्छी तरह जानना चाह रहा था। ऐसे चरित्र और इस तरह के जीवन को लेकर ही तो दुनिया बनी है। रास्ते पर, ट्रेन मे, बस, ट्राम, हवाई जहाज, नदी के घाट सभी जगह ऐसे ही लोग बिखरे पड़े हैं। जनसंख्या के निन्यानवे प्रतिशत लोग तो ऐसे ही लोग हैं। इन्हें वोट देने का अधिकार है, इनके वोट से किसी देश या राष्ट्र का भाग्य निर्धारित होता है, इसलिए ये मदहेलना की वस्तु नहीं । इनसे घृणा करें या इनकी अवहेलना, पर इन्हें ही लेकर हमारा समाज, हमारा राष्ट्र बना है । अगर किसी भी दिन ये ही सब मिलकर एक दल बना लें तो इन्हीमें में कुछ लोग देश के नेता बन बैठेगे और हमपर शासन चलाएगे। तव ? मैंने पूछा-कितने रुपयों से तुम्हारा काम चल जाएगा? निशिकान्त बोला-वीस रुपये के हिसाब से मकान के किराये के लिए एक सौ बीस रपये, छह महीनो का बाकी जो पहा है उसके बाद होटल मे खाता हूं, पचास रुपये वहा देने हैं, फिर खेतर के यहा चाय पीता हूं. बीस रुपये उसे देने हैं । इस प्रकार कुल दो सौ देने से सभी काम निकल सकता है। मैंने कहा-अच्छा, किसी दिन सुबह यहा आ जाना। निशिकान्त अघोर होकर बोला- कब आऊं कहिए ? कितने बजे ? ---दो-चार दिन बाद आना । कहकर मैं पर चला गया । ६ उसके बाद चौवीस घण्टे भी नहीं बीते थे कि मुबह-सुवह किसीने दर- वाजा खटखटाया। दरवाजा कानाई ने खोला। एक वुड्डा बादमी था। कानाई ने पूछा-आप कौन हैं ? किससे मिलना चाहते हैं ? मैं सारी बातें सुन रहा था, पर समझ नहीं पा रहा था कि आखिर निशिकान्त का मकान-मालिक मेरे पास क्यों चला आया ? वूड़े सज्जन ने कानाई से कहा--बाबू को जाकर वोलो मल्लिक साहब आए हैं। एक बार भेंट करके वापस चले जाएंगे। फिर मेरे कमरे में आकर वोले- मुझे देखकर आपको हैरानी तो हो रही होगी, पर मैं आए विना रह नहीं सका। उस दिन निशिकान्त के सामने में खुलकर आपको कुछ बता नहीं सका था। मैंने कहा-आप वैठिए। मल्लिक साहव बोले-हां, बैठना ही पड़ेगा, क्योंकि मुझे बहुत-कुछ. बताना है। ~बोलिए ! मैं भी सुनना चाहता हूं। मल्लिक साहव बोले-उस नालायक से भापका परिचय कैसे हुआ एक नम्बर का नीच आदमी है। नगर ठीक से उसे जानते तो आप बात भी नहीं करते । उसकी छाया में भी पाप है। ~वह किस तरह? -वही तो बताने आया हूं। पर आपने यह तो पूछा ही नहीं कि आपका पता मुझे मालूम कैसे हुआ । ~हां, मैं अभी यही सोच रहा था, क्योंकि उस दिन से पहले तो मापने मुझे कभी देखा भी नहीं था और पहचानते भी नहीं थे। मल्लिक साहव बोले-उसी नालायक निशिकान्त ने बताया है। आपने उसे दो सौ रुपये देने का वादा किया है न ? -~-यह मुझमे रुपये मांग रहा था, इसलिए मैंने यहां आने के लिए कहा था। ~~~-आप सचमुच ही उसे रुपये देंगे? मैंने कहा-उसे सचमुच जरूरत है। और फिर किसी भी दिन आप ? - । उसे घर से निकाल बाहर करेंगे, फिर वह जाएगा कहां। कोई और जगह भी तो नहीं है उसकी। ---यह बात है। इसीलिए कल इतना टर-टरं कर रहा था। मुझे गाली दे रहा था । कह रहा था, वह आपका बहुत पुराना दोस्त है, बचपन का साथी । आप दोनों एक ही क्लास में, एक ही स्कूल में पढते थे। उसीसे तो मुझे यापका पता मालूम हुआ मैंने कहा--अगर मैं उसे रुपये दे देता हूं तो इसमें तो आपका फायदा ही है। आपको मकान का किराया मिल जाएगा। --याप क्या पागल हो गए हैं ? मल्लिक साह्व व्यंग्य की हमी हंस रहे थे । फिर बोले-आप तो बहुत बड़े लेखक हैं । मैं तो सर, फ्यादा पढा- लिग यादमी नहीं हूं और सच पूछिए तो किताब-उताब पढने का वक्त भी नहीं मिलता । मैं तो मेहनत की रोटी खाता हूं। पर ताज्जुब है, आप लेखक होकर भी निशिकान्त को नहीं पहचान सके ? आप क्या सोच रहे हैं कि आपके दिए रपयों से वह किराया चुकाएगा? --लेकिन किराया देने के लिए ही तो वह रुपये मांग रहा है। मुझे तो उसने ऐसा ही कहा है कि वह मकान का किराया, होटल में खाने और चाय के पैसे सव चुका देगा। मल्लिक साहब बोले-फिर तो हो चुका । वह आदमी अगर इतना भला होता तो फिर कलियुग हो क्यों रहता । मैं पिछले छह महीनो से उसे देख रहा हूँ। अपनी पत्नी के जरिये उसने बहुत पैसा कमाया है। मैं बुड्ढा आदमी हूं। उसने तो अपनी पत्नी को मेरे पीछे भी पड़ने के लिए उक- साया था। पृणा की बात क्या बताऊं, इन बातो को कहने में भी मुझे शर्म आती है। मैंने पूछा-उसकी पत्नी कहां गई हुई है ? मल्लिक साहब बोले-उसने अब किसी और बड़े कप्तान को परता -वह कैसे? -अरे साहब ? कलकत्ता में मालदारों की कमी है क्या ? निशिट ने क्या-क्या तमाशा नहीं किया। अगर आप सब कुछ मुनेंगे तो पोलो ४३ यहां के बहुत-से मकानों में वह किराये पर रह चुका है, और हर जगह मकान-मालिक को चकमा देकर भाग गया है । उसकी पत्नी ही उसका मूल- चन है । उसीको खटवाकर उसकी जिन्दगी की गुज़र हो रही है । इतनी वातें पहले मुझे भी नहीं मालूम थी। उसने मुझसे आकर कहा कि वह पाकिस्तान ने शरणार्थी बनकर कलकत्ता आया है। सिर छुपाने के लिए कोई जगह चाहिए । उसकी पत्नी की दशा देखकर मुझे दया ना गई, इसीलिए सस्ते में रहने दिया। मैंने कहा - लेकिन आपको भी तो किराये के रुपये मिलने ही चाहिए। रुपये न मिलने पर आप भी उसे छोड़ेंगे क्यों ? किसी भी दिन उसके नाम मुकदमा दायर कर देंगे-फिर क्या होगा ? मल्लिक साहब बोले-नहीं साहब, मुकदमे वगैरह की तरफ में नहीं जाता । वकील, मुंशी, पेशकारों के चक्कर में मेरा घर-बार जो कुछ है, वह भी नव वदि हो जाएगा । यह सब मैं नहीं चाहता। मैं तो बस इतना ही चाहता हूं कि वह मेरा घर छोड़ दे। बदमाश गाय ते तो साली गौशाला ही अच्छी है । मुझे ऐसा किरायेदार नहीं चाहिए । मैंने पूछा- लेकिन उसको पली बाजकल है कहां, यह तो आपने बताया ही नहीं । क्या निशिकान्त को छोड़ गई है ? -छोड़ क्यों जाएगी ? निशिकान्त ने ही उस मुवक्किल के यहां अपनी पली को रखा है । सोचा था खूब पैसा कमाएगा, पर मामला बैठा नहीं। उसकी पत्नी का नाम सरयू है। अब वह भी चालाक बन गई है। ऐसे शराबी पति को नाखिर कब तक बर्दाश्त करेगी। अब वह निशिकान्त के एक पैसा भी नहीं देती। -~-पैसा क्यों नहीं देती ? मल्लिक साहब बोले-जित कारण से मैं आपको उसे पैसे देने के लि मना कर रहा हूं, वही कारण है। पैसा देने पर वह निशिकान्त के पा तो रहेगा नहीं, सब शराब पीने में चला जाएगा। पहले वह वहुत पैर देती यो । जी-जान से उसकी सेवा करती थी। खुद भूखी रहकर निशिकार को शराब के लिए पैसा देती थी। लेकिन मनुष्य के बदाश्त की भी के सीमा होती है। इसीलिए वह अब उसपर बिल्कुल ध्यान नहीं देती। जान है कि निशिकान्त सुधरने वाला नहीं है । वह शराब नही छोड़ सकता, भले ही उसकी जान चली जाए। मैंने पूछा-उसकी पत्नी क्या अब बड़े आराम के साथ दिन गुज़ार रही है ? आपको कुछ मालूम है ? मल्लिक साहब वोले-आराम से क्यों नहीं रहेगी? उसका अपना मकान है, गाड़ी है, नौकर-चाकर सभी कुछ है । अपने हाथ से तो उसे एक तिनका भी नहीं उठाना पड़ता-इतनी सुसी है। ---निशिकान्त वहां नहीं जाता? -जाएगा क्यों नहीं, धरना देकर पड़ा रहता है, पर अन्त में धक्के खाकर उसे वापस आना पडता है । और फिर धक्का लोग देंगे भी क्यों नहीं । वैसे आदमी को रोज-रोज कहां से कोई रुपया दे सकता है। शरावी की माग का कोई अन्त भी होता है ? जैसे ही स्पया हाथ में पड़ता है, सब शराब पर खर्च कर डालता है । असल में वह है ही मनहूस । इतना कहकर मल्लिक साहब जाने लगे। मुझे भी चैन मिला । सोचा सहानुभूतिवश अगर, निशिकान्त को कुछ रुपये दे देता तो वह वेकार ही जाता। मल्लिक साहब को जाते-जाते मैंने टोका-आपको तो काफी घाटा लगा। मकान का किराया आपको मिलेगा नहीं? मल्लिक साहय बोले-वह तो सर, मुझे ऐसे भी नहीं मिलने वाला था। मगर बाप उसे रपये उधार भी देते फिर भी मुझे कोई फायदा नहीं होता। नाहक आप ही के पैसे बर्बाद जाते । फिर थोडा रुककर बोले- उसकी पत्नी को जाकर भी मैं यही बात यता आया हूं। -इसका मतलब उसकी पत्नी से आपकी भेंट होती है ? मल्लिक साहब हम पड़े। बोले-आपको खुलकर ही बताता हूं, वास्तव मे मुझे कोई नुक्सान नहीं उठाना पड़ रहा है । आप निशिकान्त को कुछ बताइएगा नही । उसकी पत्नी हर महीने का किराया मुझे दे देती है । यह सुनकर वडा हैरान हुआ। मगर किराये के पैसे उन्हें मिल ही जाते हैं तो फिर उस दिन चाय को दुकान पर उन्होंने निशिकान्त का अपमान क्यों किया? अजीव रहस्य है ? सारा मामला हो रहस्यमय है, यहां के बहुत-से मकानों में वह किराये पर रह चुका है, और हर जगह मकान-मालिक को चकमा देकर भाग गया है । उसकी पत्नी ही उसका मूल- धन है । उसीको खटवाकर उसकी ज़िन्दगी की गुज़र हो रही है। इतनी बातें पहले मुझे भी नहीं मालूम थीं। उसने मुझसे आकर कहा कि वह पाकिस्तान से शरणार्थी बनकर कलकत्ता आया है। सिर छुपाने के लिए कोई जगह चाहिए। उसकी पत्नी की दशा देखकर मुझे दया आ गई, इसीलिए सस्ते में रहने दिया। मैंने कहा-लेकिन आपको भी तो किराये को रुपये मिलने ही चाहिए। रुपये न मिलने पर आप भी उसे छोड़ेंगे क्यों ? किसी भी दिन उसके नाम मुकदमा दायर कर देंगे-फिर क्या होगा ? मल्लिक साहव बोले-नहीं साहब, मुकदमे वगैरह की तरफ मैं नहीं जाता । वकील, मुंशी, पेशकारों के चक्कर में मेरा घर-बार जो कुछ है, वह भी सब वर्वाद हो जाएगा । यह सब मैं नहीं चाहता । मैं तो बस इतना ही चाहता हूं कि वह मेरा घर छोड़ दे। बदमाश गाय से तो खाली गौशाला ही अच्छी है । मुझे ऐसा किरायेदार नहीं चाहिए । मैंने पूछा-लेकिन उसकी पत्नी आजकल है कहां, यह तो आपने बताया ही नहीं । क्या निशिकान्त को छोड़ गई है ? -छोड़ क्यों जाएगी ? निशिकान्त ने ही उस मुवक्किल के यहां अपनी पत्नी को रखा है । सोचा था खूब पैसा कमाएगा, पर मामला बैठा नहीं। उसकी पत्नी का नाम सरयू है। अब वह भी चालाक बन गई है । ऐसे शराबी पति को आखिर कब तक बर्दाश्त करेगी। अब वह निशिकान्त को एक पैसा भी नहीं देती। -~-पंसा क्यों नहीं देती ? मल्लिक साहब बोले-जिस कारण से मैं आपको उसे पैसे देने के लिए मना कर रहा हूं, वही कारण है। पैसा देने पर वह निशिकान्त के पास तो रहेगा नहीं, सब शराब पीने में चला जाएगा। पहले वह बहुत पैसा देती थी । जी-जान से उसकी सेवा करती थी। खुद भूखी रहकर निशिकान्त को शराव के लिए पैसा देती थी। लेकिन मनुष्य के वर्दाश्त की भी कोई सीमा होती है। इसीलिए वह अब उसपर बिल्कुल ध्यान नहीं देती । जान गई 1 -- ४४ है कि निशिकान्त सुधरने वाला नहीं है । वह शराव नहीं छोड़ सकता, भले ही उसकी जान चली जाए। मैंने पूछा-उसकी पत्नी क्या अब बड़े आराम के साय दिन गुज़ार रही है ? आपको कुछ मालूम है ? मल्लिक साहब बोले-आराम से क्यों नहीं रहेगी? उसका अपना मकान है, गाडी है, नौकर-चाकर सभी कुछ है । अपने हाथ से तो उसे एक तिनका भी नही उठाना पडता-इतनी सुखी है। -निशिकान्त वहां नहीं जाता ? -जाएगा क्यो नहीं, घरना देकर पड़ा रहता है, पर अन्त में धक्के खाकर उसे वापस आना पड़ता है । और फिर धक्का लोग देंगे भी क्यों नहीं। वैसे आदमी को रोज-रोज कहा से कोई रपया दे सकता है। शराबी की माग का कोई अन्त भी होता है ? जैसे ही रुपया हाथ मे पडता है, सब शराब पर खर्च कर डालता है । असल में वह है ही मनहूस । इतना कहकर मल्लिक साहब जाने लगे । मुझे भी घंन मिला । सोचा महानुभूतिवश अगर 'निशिकान्त को कुछ रुपये दे देता तो वह वेकार ही जाता। मल्लिक साहब को जाते-जाते मैंने टोका-आपको तो काफी घाटा लगा। मकान का किराया आपको मिलेगा नहीं? मल्लिक साहब बोले-वह तो सर, मुझे ऐसे भी नहीं मिलने वाला था। अगर आप उसे रुपये उधार भी देते फिर भी मुझे कोई फायदा नहीं होता। नाहक आप ही के पंसे बर्बाद जाते । फिर धोडा रककर बोले-उसकी पत्नी को जाकर भी मैं यही बात यता याया हूं। -इसका मतलब उसकी पत्नी से आपकी भेंट होती है ? मल्लिक साहब हंस पड़े । बोले-आपको खुलकर ही बताता हूं, वास्तव में मुझे कोई नुक्सान नहीं उठाना पड़ रहा है । माप निशिकान्त को कुछ बताइएगा नहीं । उसकी पत्नी हर महीने का किराया मुझे दे देती है। यह सुनकर मैं बहा हैरान हुआ । अगर फिराये के पैसे उन्हें मिल ही जाते हैं तो फिर उस दिन चाय की दुकान पर उन्होंने निशिकान्त का अपमान क्यों किया? अजीब रहस्य है ? सारा मामला हो रहस्यमय है, ४५ यह तो मैं उसी दिन समझ गया था जिस दिन सरयू को मोकामाघाट के स्टेशन पर देखा था। टालीगंज का फ्लेट छोड़कर अव मैं माणिकतला में आ गया था। यहां आकर भी संयोग से निशिकान्त के साथ भेंट हो गई। मैं इन घटनाओं के पीछे नहीं भाग रहा था, घटनाएं ही मेरे पीछे दौड़ रही थीं। मैंने सोचा कि अगर इस घटना को लेकर कोई कहानी या उपन्यास लिखू तो कैसा रहेगा? मैंने इसी तरह तो अपने हर उपन्यास का प्लाट खोजा है और फिर उसमें कल्पना का मसाला डालकर उसे रोचक बनाया है । और फिर अन्त में अपनी ओर से उसमें एक महान वक्तव्य भी जोड़ दिया है। सच तो यह है कि अगर मल्लिक साहब से मेरी भेंट नहीं होती तो यह सारी बात इतनी जटिल मोर रहस्यमय नहीं हो पाती । मल्लिक साहब ने ही घटना की गति को दूसरी तरफ मोड़ दिया। मैं थोड़ा आग्रह दिखाकर बोला-मल्लिक साहब, आप इतनी जल्दी क्यों उठ गए? मल्लिफ बाबू बोले-नहीं साहब, मुझे मेहनत की रोटी खानी पड़ती है । वैठने की फुर्सत कहां । पर फिर भी मल्लिक साहब वैठ ही गए । ताज्जुब तो मुझे इस बात का हो रहा था कि जिस आदमी को रोटी के लिए चौबीसों घण्टे मेहनत करनी पड़ती है उसे एक बार के सिवा दुवारा बैठने के लिए मुझे नहीं कहना पड़ा। मैंने पूछा-चाय पीजिएगा? -पी सकता हूं। कोई दिक्कत तो नहीं होगी ? -दिक्कत की क्या बात है ? मैंने कानाई को चाय और विस्कुट लाने के लिए पाह दिया। मल्लिक महाशय विनय के अवतार बने बैठे थे। बोले-विस्कुट की क्या जरूरत थी? केवल चाय ही ठीक थी। लेकिन अन्त तक मल्लिक वाबू ने चाय भी पी और विस्कुट खाए । विस्कुट को चाय में डुबाकर बड़ी तसल्ली से खा रहे थे। चाय पीकर बोले-सारी बातें तो आप लोगों को कहनी भी मुश्किल है, क्योंकि, सर, पता नहीं इन्हीं बातों को लेकर आप फोई माहानी ही लिख डालें । फिर लोग समझ जाएंगे कि मैंने ही सारी बातें आपको बताई हैं। -~-आपको डरने की कोई बात नही। यार में लिलूंगा भी तो, नाम-धाम सब कुछ बदल दूगा। कहानी पढकर भाप स्वयं ही नहीं समझ पाएंगे कि यह मापकी ही कही हुई कहानी है । यव बताइए कि निशिकान्त की पत्नी सरपू के साथ बापकी मुलाकात होती है ? मल्लिक साहब बोले- मुलाकात तो होती ही है, नहीं तो मकान का किराया मुझे कैसे मिलता? और केवल मकान का किराया ही नहीं, निशिकान्त के महीने गर का होटल में खाने का सर्च, चाय के पमे सब मेरे हापों में उसकी पत्नी रख देती है और माय में यह भी कह देती है कि किसी- को मालूम नहीं होना चाहिए कि पैमे चुका दिए गए हैं। मैंने भी होटल वाले और चाय वाले को कह दिया है कि निशिकान्त वादू को ये बातें ये नहीं बताएं, उलटे बीच-बीच में पैसे के लिए तकाजा भी करते रहें। एक बात और भी है साहब । उसकी पत्नी ने मुझे बार-बार कह दिया है कि किसी भी तरह यह गाराव न पोने पाए। इसलिए यह उमे कभी नकद रुपया नहीं देती! मैंने पूछा-तो फिर निशिकान्त याजकल शराब नही पोता ? -पीता क्यों नहीं ? पीता तो है ही। पंसे उसको कभी-कभार मिल हो जाते है। जैसे कि किराया देने के नाम पर आपरो हो रुपये उधार मांग रहा था। ऐसे ही पंसों से वह शराब पीता है, आपको कुछ मालूम भी लेकिन मैं उसे उधार दे दूगा, यह आपको कैसे मालूम हुआ? -उसीने तो बताया है । मैंने जैसे ही किराये के लिए तकाचा किया, उसने घट से कह दिया कि आपने उसे पैसे उधार देने का वादा किया मुझे बहा अजीब लग रहा था। जो पत्नी निशिकान्त को छोड़ गई है, फिर उमकी भलाई के लिए वह इतना सोचतो वों है ? निशिकान्त को कही तकलीफ न उठानी पड़े, इसलिए मल्लिक साइव के हाथ में रुपये देती रहती है, निशिकान्त भूपा रहेगा यह सोचकर होटल में पाने के पैसे भर देती है, और चाय का उधार चुकाती है । उसे आपत्ति है तो केवल शराब की लत पर । बड़ा ही विचित्र चरित्र है, और उससे भी अजीव है यह दाम्पत्य-जीवन। जिस घर से निकल गई है, उसी घर के लिए फिर किस वात का लगाव है ? वह नये वाबू के साथ भी खुश रह सकती है। अपना घर, अपनी साड़ी, आराम का भोजन-इतने सारे सुख के बीच वह खुद विभोर रह सकती है। जो पति भरपेट खाना नहीं जुटा सकता, उसके प्रति यह कैसा लगाव ? मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। मल्लिक साहब चुपचाप बैठे थे। मैंने उनसे कहा-सारी बातें वता- कर आपने मेरा भला ही किया है । मैं निशिकान्त को रुपये नहीं दूंगा। -विलकुल नहीं। सरयू ने मुझसे आपको यही कहलवाया है। मैं चकित रह गया । बोला-क्या सरयू को पता है कि मैंने निशिकान्त को पैसे देने का वादा किया है ? मल्लिक साहब बोले-जानती तो है। बोले-जानती तो है। मैं खुद जाकर सब कुछ बता माया हूं। चाय की दुकान पर जो तमाशा हुआ था, मैंने उसे जाकर बताया। यह तो आपको अच्छी तरह पहचानती भी है। मैंने कहा-हां । जव मैं टालीगंज में रहता था, तब दो-एक बार उससे मेरी भेंट हुई थी। मल्लिक साहब बोले-बड़ी अच्छी लड़की है साहब । बहुत ही नरम दिल की है। ऐसे शरावी के हाथों न पड़ती तो बेचारी इतना कष्ट भी न पाती। खैर, जो कुछ हुआ, सो तो हुआ ही। वेचारी अभी थोड़ी चैन से है। पेट-भर खाना तो मिल जाता है। ---सरयू क्या किसीके यहां रखैल है ? मल्लिक साहब बोले-छि:-छिः । ऐसी बात जबान पर मत लाइए बाबू ! निशिकान्त आवारा, शराबी, बदचलन हो सकता है, पर सरयू कोई ऐसी- वैसी नहीं है। मैंने पूछा--फिर? मल्लिक साहव बोले-असल वात मैं बताता हूं। एक दिन अखबा में एक विज्ञापन निकला था कि एक बूढ़े विधुर को अपने नाबालिग बच्च की देख-रेख के लिए किसी ऐसी महिला की जरूरत है जो उसके बच्चों अपने बच्चों की तरह पालन-पोषण करे। सरयू ने भी एक दरखास्त ६ ४८ और संयोग देखिए, हजार दरखास्ते याई पर उस सज्जन ने सरयू को ही जुना । नर्स या गवर्नेस की हैसियत से घर पर ही रहने की उसकी व्यवस्था भी कर दी। -उसके बाद? मल्लिक साहब बोले-उसके बाद निशिकान्त को छोड़कर सरयू एक दिन अपने काम पर चली गई, और तब से ही दोनों मे खटपट चल रही है। पहले-पहल तो निशिकान्त रोज हो पत्नी के पास जाकर धरना दिया करता था, रुपया माग-मांगकर उसे तंग करता था। सरयू भी पहले रुपया दे दिया करती थी, लेकिन हाय में पैसे पड़ते ही आदत मे मजदूर निशिकान्त सीधा भरावखाने चल देता। तब से मरयू ने उसके हाथों में पैसा देना बिल्कुल बन्द कर दिया है। जो कुछ देती है, मेरे हाथ में देती है । अक्सर मुझे बुला भेजती है, और निशिकान्त का हालचाल पूछती है । -आप अक्सर वहां जाते रहते हैं ? मल्लिक साहब बोले-क्यो नहीं जाऊंगा, बोलिए ? दरवान भेजकर बुलवाती है । निशिकान्त जब घर पर नहीं रहता तव बुलवाती है । कल ही तो उसने बुलवाया था। -कल? -हां, कल ही की तो बात है। मैं गया । जाते ही पूछा कि निशिकान्त कैसा है ? मैंने चाय की दुकान पर हुई सारी बातें बताई। फिर आपकी वात भी बताई । तव सरयू ने कहा कि वह आपको जानती है। मैंने कहा-मामूली जान-पहचान है । कोई खास बात नहीं। दो-तीन बार तो कुल उसे देखा ही है । -सरयू भी यही कह रही थी। आपकी तारीफ भी कर रही थी। -मेरी तारीफ ? मैंने प्रशंसा के लायक तो अब तक कोई काम किया नहीं। मल्लिक साहब बोले-यह वात नहीं। सच पूछिए तो आजकल कौन किसकी तारीफ करता है? किसीको भलाई किसीसे नहीं देखी जाती। आपने कभी सरयू का वहा उपकार किया था। और जब मैंने उसे बताया कि निशिकान्त को आप उधार देने वाले हैं तब वह कातर स्वर में बोली- ४६ -- ल्लिकजी, आप पौ फटते ही उनके घर जाइए और उन्हें कहिए कि वह नेशिकान्त को किसी भी हाल में रुपया नहीं दें। इसीलिए तो सारा काम- काज ठप्प करके सुबह-सुबह ही आपके पास दौड़ा आया हूं। अव मल्लिक साहब चलने के लिए वाकई उठ खड़े हुए। ठीक उसी क्षण किसीने दरवाजा खटखटाया। कानाई ने दरवाजा खोलकर पता नहीं क्या वातचीत की, फिर मेरे पास आकर बोला-आपसे कोई आदमी मिलना चाहता है । नाम पूछकर आओ। कानाई आकर बोला---निशिकान्त बाबू आपसे मिलने आए हैं। निशिकान्त का नाम सुनते ही डर से मल्लिक साहव का चेहरा फीका पड़ गया । वोले-मेरी खरियत नहीं। अब क्या होगा ? फिर उन्हें कोई तरकीव सूझी होगी। धीरे से मुझसे कहा-आपके अन्दर वाले कमरे में छुप जाता हूं। नहीं तो मुझे देखकर हंगामा खड़ा कर देगा । कहकर झट से वह अन्दर वाले कमरे की तरफ चले गए। कानाई दरवाजा खोल चुका था। निशिकान्त आया। विनयी और निरीह बनकर आया। दोनों हाथ जोड़कर मुझे प्रणाम भी किया। फिर मेरे कहने की अपेक्षा किए बिना ही धम् से कुर्सी पर बैठ गया, थोड़ी देर पहले तक जिसपर मल्लिक साहब वैठे थे। पूछा-कसे हैं आप? -अच्छा हूं। निशिकान्त तुरन्त बोल पड़ा~-अच्छे हैं, जानकर जी में जी आया साहव । ऐसा युग आया है कि अच्छा रहना ही एक वेनियम-सा हो गया है। कहिए तो सर, क्या जमाना आया है ? एक भी आदमी चैन से नहीं है । जिसने भी पूछता हूं--कैसे हैं आप ? एक ही जवाब सुनने को मिलता है-कट रही है, किसी तरह से जवाब में मैं क्या कहता ? चुप ही रहा । निशिकान्त बोलता गया-अच्छा आदमी रह भी कैसे सकता है कहिए? साढ़े चार रुपये किलो चावल कितने लोग खरीद सकते हैं ? पहरे दो पैसे में एक कप चाय पीता था, आपने भी ज़रूर पी होगी। अब पच्ची पंसों से कम में नहीं मिलती। चाय वाले कहते हैं--चीनी का भाव पांच रुप । किलो हैं। फिर आप ही बताइए कौन-सी चीज़ बिना माए आप रह सकते हैं ? चावल, दाल, तेल, नमक, साग-सब्जी मभी तो दुर्लभ हो गए हैं। नमक को ही बात बताता हूं । एक दिन होटल में खाते समय मैंने नमक मांगा। होटल वाले ने कहा-नमक नहीं है । मुझे भी गुस्सा आ गया। बोला-नमक नहीं है मतलब? होटल वाले ने कहा-नमक एक रुपया किलो है। थाली में एक्सट्रा नमक के लिए एक्सट्रा पंसा लगेगा । नमक एक रुपया किलो है। --मादा दाम देना पड़ेगा? मजाक है क्या-मैं भी चिल्लाने लगा। वे फिर मारने को दोडे । देखिए न साहब, मेरे मुह में एक घूसा मारा और ऊपर से कहा- उधार का खाता है, ऊपर से यह शान । उस धूंसे को मैं संभाल न सका । एकदम गिर पड़ा। निशिकान्त अपनी बातें विश्वास के माथ सुना रहा था पर मुझे उसकी यातो पर जरा भी विश्वास नही हो रहा था। निशिकान्त योडी देर तक मुझे देखता रहा, फिर बोला-मेरी बातों पर आपको विश्वास नहीं हो रहा है न ? मैंने पूछा-यह घटना कब हुई ? -कल साहब, कल । कल शाम को तो आपमे भेंट हुई ही थी। फिर रात के करीव माठ बजे जोरों को भूख लग गई। शाम से एक कप चाय और दो-तीन सिगरेटों के अलावा और कुछ भी नहीं जुटा था, इसलिए सोचा होटल में जाकर भर-पेट चावल सा लू । उसी समय यह घटना घटी। देखिए न, मेरा चेहरा देखिए-कहकर अपना मुंह मेरी ओर बढ़ा दिया । बोला- देखिए कैसा काला दाग पड़ गया है। मैं बहुत देर तक उसका चेहरा देखता रहा, पर दो दिनो से जिमने दाढ़ी नही धनवाई है-उसके चेहरे मे एक कोई काला-सा दाग में कैसे देख पाता? -देख रहे हैं न? -निशिकान्त वकता ही गया । इस जमाने के लोग ही बदल गए हैं । बाज को दुनिया इसे ही कहते है। इस दुनिया में कोई किसीका नहीं, कोई किसीका नहीं। जिमको अपनी पत्नी ही नहीं देखती, उमका जीवन ही क्या, और दुनिया ही क्या ? समझे कुछ भाप ? आपको
कह देता हूं-अगर जरूरत पड़े तो आप अपने उपन्यास में भी लिख
कते हैं।
मैंने पूछा-क्या?
-यही कि एक दिन सब कुछ ध्वस्त हो जाएगा। मैं, आप, सरयू,
पल्लिक साहब कोई भी नहीं बचेगा। मेरी वात आप नोट कर लीजिए।
जैसा जमाना आ रहा है-धनी हो या गरीब, वड़ा हो या छोटा-कोई भी
नहीं बचेगा । आपको शायद मेरी बातों पर विश्वास नहीं हो रहा है लेकिन
इस गरीव की वात वासी हो सकती है, पर फलेगी जरूर ।
मैं इतनी देर तक केवल यही सोच रहा था कि रुपया मांगने के पहले
निशिकान्त कितनी बड़ी भूमिका बांध रहा है। रुपया मांगने ही के लिए,
वह आया है, यह तो पक्का था।
अचानक निशिकान्त बोला-आपने चाय पी ली है क्या ?
उसके वाद टेवल पर मल्लिक साहब की पी हुई चाय के खाली प्याले
को देखकर बोला-आप चाय आलरेडी पी चुके हैं।
-~-हां।
निशिकान्त फिर भी सहमा नहीं । बोला-सुबह क्या आप एक ही कप
चाय लेते हैं ?
-
--फिर तो मुझे थोड़ा पहले आना चाहिए था। लेकिन बहुत-से लोग
सुबह के वक्त दो बार चाय पीते हैं।
मैंने कहा-तुम चाय पीयोगे?
नहीं साहब । चीनी का दाम इतना बढ़ गया है। चाय कम कर
देनी ही ठीक है पर कुछ कहना चाह रहा था, पर संकोच में पड़ गया
था।
मैंने कहा-कहो क्या कहना चाहते हो । संकोच करने की कोई वात
नहीं है।
निशिकान्त वोला-आपके सामने संकोच भी कैसा? आपको तो मेरी
सारी खवर मालूम ही है। क्या छुपाऊं आपसे ? जिसकी औरत भाग जाए
उसे कैसी शर्म ? मैं वेहया हूं सर, पक्का बेहया, शर्म-संकोच से ऊपर उर
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। गया हूं। मैंने कहा-इतने नखरे की जरूरत नहीं, क्या कहने के लिए आए हो, वही बताओ। निशिकान्त बोला- जब आप पूछ ही रहे हैं तो कहता हूँ । मुबह में दो कप चाय लेता हूं। एक बार नाद से उठकर और एक बार अभी- -तो यह बात साफ-साफ क्यो नहीं बता रहे थे कि तुम्हें एक कप पाय चाहिए। ---नही कहता, सर !पर आदत जो हो गई है। नशा हो गया है और नशाखोर को शर्म शोभती नहीं । आप ठीक ही कह रहे हैं । मैने कानाई को बुलाकर चाय बनाने के लिए कहा । निशिकान्त पोला-चाय आने के पहले मैं आपके निवेदन में एक बात रखूगा। -बोलो। -- . निशिकान्त ने सीधा कह डाला-मेरा रुपया क्या रेडी रखा है आपने ? निशिकान्त हमेशा इसी कायदे से वातें करता था, क्योंकि केवल बात और काम दो ही चीजें उसे आती थी। 'मैंने कहा- रुपया तो मैं तुम्हें दूगा नहीं, निशिकान्त ! यह मैं तुम्हें साफ-साफ बता देना चाहता हूं। --नही दीजिएगा? निशिकान्त के सिर पर मानो बिजली गिर पड़ी। उसे विश्वास ही नहीं हुआ । बोला-रुपया नहीं दीजिएगा? निशिकान्त बोला-लेनिन क्यों ? कल तो आपने कहा था कि माप रुपया देंगे? -तुम झूठ कह रहे हो निशिकान्त ! मैंने तुम्हें कभी नहीं कहा था कि मैं तुम्हें रुपये दूगा - लेकिन आपके कहने के अनुसार में होटलवाले को और चायवाते को कहकर आया हूं कि मैं उनके पैसे का दूगा। -तुमने ऐसा कहा क्यों ? उसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं हूं। ?
-- निशिकान्त बोला-आप ज़िम्मेदार नहीं हैं तो क्या मैं जिम्मेदार हूं? -ज़रूर । तुम्ही जिम्मेदार हो। निशिकान्त बोला- वाह साहब ! उल्टा दवाव डाल रहे हैं मुझपर । नि सवको कह रखा है। अब अगर अपनी ही कही वात पर अमल नहीं कर सका तो लोग क्या मुझे गाली नहीं देंगे? --तुम्हारा मामला है, तुम स्वयं निपटाओ । मुझे क्या पड़ी है ? निशिकान्त की दोनों आंखें भर आई। उसके बाद बड़ी उदासी से पूछा--आप रुपया नहीं दे सकते ? मैंने दृढ़ स्वर में कहा नहीं। निशिकान्त चौंक पड़ा। वोला-सच में नहीं देंगे? -नहीं ! किसी भी हालत में नहीं दूंगा। निशिकान्त थोड़ी देर तक मेरा मुंह देखता रहा । फिर बोला-अगर माप मुझे रुपये नहीं देंगे तो मैं बहुत मुश्किल में पड़ जाऊंगा। -क्यों ? मुश्किल किस बात की है ? -कैसे मुश्किल नहीं है ? मैंने मल्लिक साहब को कह रखा है कि आप मुझे दो सौ रुपये दे रहे हैं, उसीमें से उनके छह महीने का किराया एक सो वीस रुपये उन्हें दूंगा । फिर बाकी पैसों से होटल वाले तथा चाय वाले का उधार चुकाता । अब अगर रुपये नहीं मिलते हैं तो मुश्किल में नहीं पड़गा? -लेकिन उन लोगों से झूठ कहने की जरूरत क्या थी ? मैं तुम्हें रुपये दूंगा ही, ऐसी तो कोई बात नहीं हुई थी। -बापने वादा नहीं किया था ? अपनी छाती पर हाथ रखकर वोलिए तो सही कि आपने ऐसा नहीं कहा था ! मैंने कहा- मेरी कही बात ही काफी है। निशिकान्त का चेहरा सूख गया। निराश होकर मेरी तरफ देखने लगा। मैंने देखा उसकी आंखों से आंसू की धार वह रही थी। निशिकान्त बोला-मैं बहुत उम्मीद लेकर आपके पास आया था साहब । अब मैं क्या करूं ? किस मुंह से घर लौटूं, क्या खाऊं ? किस- किससे छुपता फिरूं? मैंने कहा-तुम और किसी जगह कोशिश करो। कलकत्ता में में । ५४ अलावा भी बहुत से लोग हैं। निशिकान्त तब भी पड़ा रहा। मैंने कहा-तुम अब जा सकते हो निशिकान्त । मैं काम पर बठूगा । पहकर मैंने कागज-कलम सामने सोचे । निशिकान्त बोला-एक काम कीजिए सर, दो सौ अगर नहीं दे सकते तो डेढ़ सो ही दीजिए। -मैं तुम्हें कुछ भी नहीं दे सकता। निशिकान हैरान रह गया । वोला-मैं तो कम ही मांग रहा हूं सिर्फ डेढ़ सौ रुपये। वे भी नहीं दे सकते ? मैंने फिर कहा-मैं तुम्हे एक रुपया भी नहीं दूंगा। निशिकान्त बोला-ठीक है । आप सिर्फ मल्लिक साहय के मकान के किराये के पैसे दे दीजिए। कम से कम उस युड्ढे के मुह पर फेंक सकू ताकि उसके मुंह पर जूतियां पड़ें। बुड्ढा नम्बरी बदमाश है । कई महीनों से मुझे परेशान कर रखा है। - मैंने तुम्हें कहा न कि मैं एक रुपया भी तुम्हें नहीं दे सकता। क्यो मुझे परेशान कर रहे हो। - आप मुझे सिर्फ सौ रुपये ही दे दीजिए। आप कम से कम मेरी एक बात को तो रखिए। मुझे बहुत गुस्सा जा रहा था। कहा-मुझे परेगान मत करो। मैं तुम्हें कुछ भी नहीं दूगा । तुम अपनी औरत को भाड़े पर लगाकर पंसा कमाने का धन्धा करना चाहते थे ? तुम्हें जेल भेजना चाहिए, समझे ? ---क्या कहा आपने ? निशिकान्त ने पूछा । मैंने कहा--तुम अपनी पत्नी को कमाने का माध्यम बना रहे थे । मुझे सब कुछ मालूम है । तुम्हें इसका दण्ड मिलना चाहिए। निशिकान्त बोला-आप एक विवेचक बुद्धिमान् आदमी होकर ऐसी बातें कर रहे हैं । यताइए आपको यह सब किसने कहा है ? योलिए? मल्लिक यहां आया था? जानकर क्या करोगे? -जिसने भी नापको यह राव बताया है मुझे उसका नाम बताइए।
? कहा है ? उसकी गर्दन पकड़कर उसकी नाक अगर आपके पैरों पर नहीं रगड़वाई तो देख लीजिएगा! बाप सिर्फ नाम बताइए। ज़रूर उस हरामजादे मल्लिक का ही काम है । अभी सामने आए तो उसके बाप को भी देख लूंगा। मैंने कहा-तुम्हारी पत्नी सरयू ने ये बातें बताई हैं। -सरयू सरयू ने -हां । सरयू के पास जाने की तो तुममें हिम्मत है नहीं। अगर हिम्मत रहती तो अभी चले जाते। निशिकान्त बोला-आप समझते हैं, हिम्मत नहीं है ? मैं अभी उसके पास जा रहा हूं, अभी । जाकर ज़रूर पूछूगा। जिसके लिए मैंने चोरी की है, वही मुझे चोर बता रही है ? भापको मालूम है, अगर उस दिन मैं नहीं रहता तो सरयू भूखी मर जाती। दर-दर भीख मांगती। याज मुझे ही वदनाम कर रही है । मैं भी देख लूंगा । अभी जाता हूं। नाते हुए भी वह रुक गया। वोला-वात जब उठी ही है तो आपको मताता हूं। इसी निशिकान्त ने सरयू के लिए क्या नहीं किया है। जब पाकिस्तान से आई थी-मुझे सड़क पर मिली थी। -क्या बोल रहे हो तुम ? -~-ठीक कह रहा हूं साहब । झुण्ड का झुण्ड हम शरणार्थियों का दल भारत आ रहा था। कितने ही लोग रास्ते में मर गए। कितने लोगों को मार दिया गया। उसी समय खान और पठान लोग उसे पकड़कर ले मा रहे थे। -पठान लोग? -हां, पाकिस्तान के पठान । --न्यों ? क्यों पकड़कर ले जा रहे थे ? निशिकान्त बोला-अरे साहब, इतनी खूबसूरत औरत को देखकर लालच नहीं होगा। वे भी तो आदमी हैं। यह देखते ही मैं दौड़ा गया। मुझे तो वे लोग मार ही डालते ! पर मैंने जान की परवाह नहीं की। किसी लड़की का सर्वनाश मैं अपनी आंखों से नहीं देख सकता। मैं भी तो आदमी हूं मेरे भी तो मां, वहन और भतीजियां थीं। उन्हें भी तो लोगों ने इसी तरह मारा था। मैं उनपर झपट पड़ा, खाली हाथों । उनके हाथों में हथियार थे।
-- मैंने विनती की–कमाण्डर साहब, उसे छोड़ दीजिए। उसके बदले जो चाहिए में दूगा। मेरे पास कुछ सोना और कुछ नकद रपये थे। मैंने उमे उन लोगों को दे दिया और उनके बाद उनके पर पकड़कर कहा-यह मेरी पत्नी है हुजूर! सब कुछ ले लीजिए मगर मेरी पत्नी को छोड़ दीजिए। निशिकान्त की बात मुझे जासूसी कहानी की तरह लग रही थी। मैं मोहित होकर मुन रहा था। पूछा भी-ये सारी बातें सच हैं ? निशिकान्त ने अचानक मेरे पैर छू लिए। बोला-आपके चरण छूकर कहता हू-सब सच-सच बता रहा है। सरयू के लिए मैंने जो कुछ किया वह उसके बाप-भाई भी नहीं कर सकते थे। मैंने पूछा-उसके वाद ? ---उसके बाद क्या ? कुछ लोग और आ जुटे। सभीने कहा--सरयू इसकी पत्नी है। हम इन्हें जानते हैं, छोड दीजिए हुजूर! सभीको सर्च किया गया । कुछ न कुछ धन सबके पास मे मिला । रुपये-पमे, सोना-चांदी के लोभ मे या दया से, पता नही क्यों उन लोगों ने सरयू को छोड़ दिया। मैं सरयू को लेकर वालकत्ता आ गया। सोचा था, साहब, कलकता आना यानी कि स्वर्ग पहुच जाना । पर कलकता इतना बड़ा नरक है, यह मैं नहीं जानता था। -~-क्यों ? इसे नरक क्यो कह रहे हो ? -~-नरक नहीं कहूंगा? नरक ही तो है। इसीलिए तो किसी खूबसूरत औरत को देखते ही लोगों की आंखें चमक उठती हैं। हम लोगों को भी पहले एक कंम्प में जगह मिली। यहां शरणार्थियों को मुफ्त मे खाना मिलता था। मैंने उस कैम्प में लिखवाया कि मैं सरयू का पति हू । सरयू मेरी पत्नी है। मैंने हैरान होकर पूछा-क्या कह रहे हो ? इसके पहले तुम एक-दूमरे को जानते तक नहीं थे? निशिकान्त बोला–परिचय तो दूर की बात है, इससे पहले सरयू को मैंने कभी देखा तक नही था। वह भी मुझे नहीं जानती थी। वह फरीदपुर या ऐसे ही कही को रहने वाली थी, और मेरा घर वारिसाल । जान-पहचान का सवाल ही नहीं उठता। लेकिन जब यहा याना पड़ा तो खाते में दोनों का . एक ही परिचय भी देना पड़ा। नहीं तो सभी सन्देह करते । इसीलिए पति- पली के रूप में नाम लिखा दिया। सरयू ने मुझसे कहा कि खाते में तुमने मुझे अपनी पत्नी बताया है, लेकिन बाद में अगर किसीको पता चला तो! -~~-वह कैसे संभव है ! अगर हम दोनों में से किसीने कुछ नहीं कहा तो दूसरों को कैसे पता चलेगा? मैंने उसे समझाया था। सरयू वोली-लेकिन मैं अपने विवेक को क्या समझाऊंगी? ~~यह सुनकर मैं हैरान रह गया। उस समय तक मुझे क्या पता था कि यह लड़की इतनी जलील है। चेहरा-मोहरा देखकर तो भले घर की लग रही थी, देश-विभाजन के कारण वेसहारा हो गई थी। मैंने कहा-कैसा विवेक ? कहना क्या चाहती हो ? सरयू वोली~हां विवेक । घर-परिवार, रुपये-पैसे, आत्मीय-परिजन मैंने सबको खो दिया है । लेकिन विवेक तो मैं यों नहीं खो सकती। ----तो फिर तुम्हीं कहो कि तुम्हें अपना विवेक न खोना पड़े, इसके लिए में क्या कर सकता है? सरयू बोली-विवेक मेरी ही कोई निजी सम्पत्ति तो नहीं । तुम्हारा भी तो विवेक है, नहीं तो एक अनजान अज्ञात कुल की लड़की के लिए तुमने अपना सारा कुछ क्यों दे डाला ? खैर साहब । मैं उस समय तुरन्त कालिज से पास करके निकला था। शराव वगैरह पीता नहीं था, इसलिए आदर्श के जोश में कहा-अपनी मां- वहन के लिए भी तो यही करता। तुम्हारे ही लिए कोई खास काम तो किया नहीं है। सरयू वोली थी-लेकिन तुम मेरे साय एक घर में सो रहे हो, यह कोई अच्छी बात है ? मैंने उससे कहा-तुम अगर खराव समझती हो, तो खराब है। तुम अपने विस्तर में सोती हो और मैं अपनी जगह । हां, तुम इतना कह सकती हो कि कमरा एक ही है । कमरे में कोई पार्टीशन नहीं, दीवार नहीं। रक्त मांस का शरीर। कहीं किसी दिन तुमपर कोई अन्याय न कर डालूं ? तुम यही कहना चाहती हो न? 44 सरयू बोली-केवल अपनी ही बात क्यो बता रहे हो। मैं भी तो रक्त- माम की बनी है। किसी दिन मेरे पर भी डगमगा सकते हैं। -~-फिर क्या करना चाहती हो? --मैं क्या बताऊ । जैसा तुम कहोगे मैं वैसा ही करूंगी। मैंने भी उसकी बात दुहराई । कहा-मैं भी तुम्हें वचन देता हूं। जो तुम कहोगी, मैं वही करूंगा। इसके जवाब मे मरयू कुछ नही बोली थी। उसी समय मैंने उससे कहा था-मुझसे शादी करने में तुम्हें कोई आपत्ति है ? सरयू चुप रही। सर नीचा करके अपने नायून काटने लगी। मैं समझा गया कि मुझमे शादी करने में सरयू को आपत्ति नहीं है । दूसरे ही दिन हम मां काली के मन्दिर मे गए। मैंने दोनों हाथ जोडकर मां से कहा-मा, तुम्हें साक्षी रखकर मैं यह विवाह कर रहा हू । मैं गरीब आदमी हूं। घर-बार कुछ नहीं है । एक पंगा भी नही और इस दुनिया में सरयू का भी यही कोई नहीं है । इसे विपति में सहारा देने के लिए ही मैं यह शादी कर रहा हूं। तुम कृपा-दृष्टि रखना, मा! ...उसी दिन मां काली के मन्दिर में मां के मामने हम दोनों की शादी हो गई । मैंने अपने हाथों से सरयू को माग में सिन्दूर डाल दिया। और इस तरह मवकी नजर बचाकर हम दोनो की शादी हो गई। इतना बहार निशिकान्त योड़ी देर रुका। शायद पर नुका था, फिर मैंने ही पूछा-उसके बाद? निशिकान्त बोला-इतनी बातें मैं आपको बताना नहीं चाहता था, सर ! लेकिन जैसे ही आपने कहा कि सरयू ने मेरे बारे में यह कहा है कि मैं पारावी हूं, जानवर हूं, उसीके जवाब मे मुझे यह सब बहना पड़ा। यह झूठ नहीं है कि मैं शराय पीता हूं। पर वह तो पीने को ही चीज है । सर- कारी दुकान से शराव सरोदता हूं और पीता हूं। और ताज्जुब की बात जानते हैं अगर शराब पीकर नशा चढ़ जाता है और कुछ बकने लगता हूं वो उसी सरकार की पुलिस हमें पकड़कर ले जाती है । ताज्जुब है सर! बड़ा ही विचित्र है सर! उससे भी विचित्र है कानून। आप भी तो कुछ .
कहिए न? मैंने कहा-लेकिन तुम अपनी पत्नी के जरिये लोगों को धोखा देकर पैसा कमाते हो, इसे मैं क्या कहूं ? -यह वात भी क्या सरयू ने आयसे कही है ? देख रहे हैं कि कितनी जलील औरत है। एक बार किसी सेठ से मेरा परिचय हुआ। एक दिन मेरे घर पर भी वह आया। सेठ बड़ा ही धनी था। उसकी · कई गाड़ियां भी थीं. "खर सर ! मैंने आपको अपना सारा दुखड़ा कह सुनाया, जो किसी और को मालूम नहीं। सेठ के साथ अपने परिचय को मैंने तो स्वर्ग पाने के वराबर समझा। मैंने तो सर, आटे-दाल के भाव में ही जीवन गवां डाला। इतना कहकर निशिकान्त धम से आराम से फिर कुर्सी पर बैठ गया और बोला--सर, कृपा करके अपने कानाई को कहिए कि एक कप चाय और दे जाएगा। और इतना कहकर जेब से उसने सिगरेट का पैकेट निकाला। ७ निशिकान्त की जवान से जो कहानी मैंने सुनी वह एक विचित्र कनानी है। उसी घटना के बाद से निशिकान्त के जीवन में उथल-पुथल शुरू हो गई। तब तक रानाघाट के शरणार्थी-शिविर को छोड़कर वे लोग कलकत्ता आ गए थे । यादवपुर की किसी जबर्दस्ती दखल की गई कालोनी में एक छावनी भी बना ली थी। सरकार से सभीको 'डोल' मिलता था। उसी रुपये से किसीने सियालघाट में, किसीने कालीघाट में, तो किसीने गढ़िया- हाट में दुकानें खोली। कुछ ऐसी दुकानें कलकत्ता के फुटपाथ पर चल रही थीं। केवल निशिकान्त हो तब तक कुछ भी नहीं कर सका था। निशिकान्त भी कुछ धन्धे की फिक में था। किसीने उसे हावड़ा के हाट से सस्ते में कपड़ा खरीदकर घर-घर फेरी लगाकर वैचने की सलाह दी। किसीने उससे वारुईपुर के हाट से साग-सब्जी लाकर कलकत्ता के बाजार में बेचने को कहा । एक दिन इसी तरह धन्धे के चक्कर में दिन-भर ६० पककर घर आकर उसने देखा कि एक आदमी उमकी प्रतीक्षा में पंठा हुआ सरयू के साथ बात कर रहा है । निशिकान्त को बात पसन्द नहीं आई। उसकी अनुपस्थिति का मौका ढूढ कर उसकी ही पत्नी से न जाने क्या सलाह-मशविरा कर रहा था। यह कोई अच्छी बात नहीं थी। निशिकान्त ने थोड़ा नाराज हो कर कहा-कौन हैं आप? वह आदमी बोला—जी । मेरा घर भी वारिसाल के गला गांव में पड़ता है । मैं भी आपकी तरह ही एक शरणार्थी हूं। सरकार मुझे दण्डवा- रण्य के 'माना कैम्प' में भेजना चाहती थी, पर मैं गया नही । उस लकापुरी मे जाएगा भी कौन ? मैंने यहीं पर एक कारोबार शुरू किया है। -किस चीज़ का कारोबार है आपका? यही कहने के लिए ही तो आपके पास आया हूँ। मेरे पीछे बहुत बड़ा और पैसेवाला एक सेठ है । मूलधन के लिए सोचना नहीं पड़ेगा। -वह सब तो ठीक है । पर कारोबार किस चीज का है ''यह तो बताइए। - आप इतने अधीर क्यो हो रहे हैं ? मैं यही कहने के लिए तो आपके घर आया हूं। इस मोहल्ले में इतने लोग हैं पर मैं आपके पास इसीलिए आया क्योकि आप और हम एक ही गांव के हैं। अगर आप मेरी बात पर राजी हो जाते हैं तो एक साल के अन्दर आप दो मकान बनवा सकते हैं। -वह कसे? --आपकी पत्नी को अब तक मैं यही समझा रहा था । सबने धीरे-धीरे अपने मकान खड़े कर लिए हैं। लोग हजारो रुपये दोनों हाथों से लूट रहे हैं। फिर केवल हम ही क्यों भूखों मरें? उसके बाद उसने जो बात बताई उसका सीधा-सा अर्थ था--तस्करी। कलकत्ता में कुछ जगहें ऐसी हैं, जहा घोडा एकान्त है और कुछ जमीन भी खाली पड़ी हुई है, खास कर गंगा के किनारे । दूसरी तरफ चूंचडा, चन्दननगर से लेकर वरानगर तक और फिर कलकत्ता के मैदान के बगल मे गंगा के किनारे-किनारे होकर विदिरपुर तक । वहा से फिर आदिगंगा मे लेकर कालीघाटन्चेतला होकर टालीगज, कुदघाटा, कुलपी और पश्चिम पुटियारी तक । इस तरफ महात्माओं की कई
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मोर आसान रास्ता था। उसे तो किसीने अब तक बताया ही नहीं था। उस आगन्तुक ने निशिकान्त के मन को पढ़ लिया। बोला-आप ठहरे हमारे ही गांव के आदमी, इसलिए आप ही को कह रहा हूं, नहीं तो आदमियों की पया कमी है। निशिकान्त वोला-देखिए न ! पत्नी को लेकर मुश्किल में पड़ गया हूं। अकेला होता तो कोई चिन्ता ही नहीं थी। जहां खुशी आ-जा सकता -परिवार में और कौन-कौन है ? कोई सन्तान ? -बच्चों का झंझट मुझे नहीं है । वे रहते तो मैं शायद कही का न रहता । खैर, है ही नहीं, तो बात ही खत्म । मुझे तो पैसे की कमी पयादा सता रही है। -पंसो का अभाव आपको नहीं रहेगा। वह सब पाप मुगपर छोड दीजिए। फिलहाल आर ये दो सौ रुपये रखिये। किमी और दिन याकर बतला जाऊंगा कि क्या-क्या करना पड़ेगा । नकद दो सौ रपये पाकर निशि- कान्त की आंखें चमक उठीं। -~-आप बिल्कुल कुछ मत सोचिए । इन पैसो की रसीद भी मुझे नही पाहिए । रसीद लेकर रुपये का कारोबार हम लोग नहीं करते । आप हमारे गाव के हैं, विश्वास-अविश्वास का प्रश्न आपके लिए उठना ही नही । अय मैं चलता हूं, रात हो गई है। फिर जाते-जाते मुडकर बोला-किसीको कुछ बताइएगा नही । दुनिया में सब तरह के लोग हैं। सभी आपको और हमारी तरह सज्जन नहीं होते । सब साले ठग और येईमान हैं । कव कौन काम में अडचन डाल दे, क्या पता ? निशिकान्त दरवाजे तक उन्हें छोडने आया था। दोला-नही, नही, मैं किसीको भी नहीं बताऊंगा। वह आदमी चला गया। निशिकान्त सोचने लगा, यह भगवान की ही महिमा है, नही तो, न जान, न पहचान, फिर यह आदमी उसीके घर आकर नकद पैसा क्यो रे गया? लेकिन काम दरअसल मे क्या था, यह निशिवान्त की समझ मेंदर भी नहीं आया। ऐसा कौन-सा काम है जिसके जरिये एक-दो साल ही में कलकत्ता में एक-दो मकान बनाए जा सकते हैं। यह निशिकान्त की समझ के बाहर की चीज़ थी। खैर, ज्यादा दिन प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। दो दिनों के बाद ही वह सज्जन फिर आए और पुछा--निशिकान्तजी कहां हैं ? सरयू घर पर ही थी। बोली-आइए। फिर उसे अपनी झोंपड़ी में आदरपूर्वक बैठाया, चाय के लिए भी पूछा। वह भी बड़े विनयी निकले । वोले-हां वेटी। तुम जव कह रही हो तव चाय के लिए ना कैसे कर सकता हूं। चाय पीने के बाद पूछा-मैं उस दिन जो कुछ कह गया था, उसके बारे में निशिकान्त बाबू ने किसीसे कुछ कहा तो नहीं? सरयू वोली-यह सब कह भी किससे सकते हैं ? -~-निशिकान्त वावू गए कहां हैं ? ---मुझे कहकर नहीं गए हैं। -कद लौटेंगे? -कोई ठीक नहीं। हो सकता है अभी आ जाएं, नहीं तो देर भी लग सकती है। आपको जो कुछ कहना हो मुझे कह दीजिए, मैं उन्हें बता दूंगी -तो फिर वेटी, तुम्हींकों बताता हूं। मेरा नाम सुदर्शन है। सुदर्शन पोद्दार । वारिसाल से तुम्हीं लोगों की तरह निराश्रित होकर आया था! पर जिस दिन से यह कारोबार शुरू किया, तब से कोई दुख नहीं रहा । मज़े में रहता हूं। तुम लोगों का हाल देखकर मिलने की इच्छा हुई, सो उस दिन चला आया। सरयू वोली-आपका कारोवार किस चीज़ का है, जो इतना मुनाफा सुदर्शन बोला-कारोवार वैसे थोड़ा वेढंगा ही है। पर जितना बेढंगा कारोवार होगा, मुनाफा भी उतना ही अधिक होगा। कारोबार की तो यही रीत है। तुम तो वेटी, सव कुछ समझती ही होगी। पर मैं सोच रहा हूं, न जाने तुम इसे किस रूप में लोगी? सरयू बोली- आप पहले वताइए तो सही, उसके बाद ही मैं कुछ सोच- कर कह सकती हूं.
सुदर्शन ने फिर विस्तृत रूप से सब कुछ कहा । कारोबार तस्करी का है । सरयू को बीच-बीच में नेपाल जाना पड़ेगा । नेपाल में गांजा और परस सस्ता है । इसे वहा से सूटकेस में भरकर भारत लाना पड़ेगा। अगर चेक- पोस्ट पर धर-पकड हो तो मुंह बन्द करने के लिए पुलिस के हाथों में पांच सौ या हजार, कुछ देना होगा । इसमे बहुत फायदा है। इन सब कामों में पुलिस का अधिक सन्देह पुनपों पर होता है, इसलिए यह काम सरयू को ही करना पड़ेगा। निशिकान्त को वात पसन्द नहीं आई। पर मुदर्शन की एक ही रट थी कि पुलिस की निगाह औरतों पर कम पड़ती है । –पर इतना गांजा भारत में किस काम आएगा? सुदर्शन बोला-वेचूगा। कलकत्ता के आस-पाम जितने भी ये नये आश्रम माप देख रहे हैं, सव गाजे और चरस की विक्री के अड्डे हैं । इसके लिए हमें सरकार से लाइमेन्स नहीं लेना पड़ता और टैक्स भी नहीं भरना पड़ता । पक्के मुनाफे का कारोबार है, आप चिन्ता मत कीजिए। सरयू जैसे ही हावड़ा स्टेगन पर पहुंचेगी, हमारा आदमी वहां रहेगा। वह माल सहित आपके घर पहुंचा देगा। निगिकान्त सुनकर योड़ा घबरा गया। बोला-इसमे तो विपत्ति की. आशंका रहती है। इस तरह से किसी दिन सरयू जेल भी जा सकती है। सुदर्शन ठहाका मारकर हंस पड़ा। बोला-आपने तो साहब हंसा दिया । आज तक कभी कोई तस्कर पकड़ाया है कि जेल जाएगा? अगर इस तरह से सब जेल हो जाने लगे तो फिर पुलिस को पैसा कहां से मिलेगा? पुलिस भी तो आदमी ही है ! उनके भी पत्नियां हैं, बाल-बच्चे हैं । दाल- भाजी-तरकारी, कपड़े-लत्तो को उन्हें भी जरूरत पड़ती है। सूखी तनख्वाह से उनका गुजारा कैसे हो सकता है, कहिए ? निशिकान्त को सुदर्शन की बात उचित लगी। इस कालोनी मे ही जब वे लोग आए थे, तब लोगो ने कितना डराया था, पर आज तक कौन-किसको हटा सका है। रिस्क नहीं लूगा फायदा भी कैसे होगा? सोचकर निशिकान्त ने पूछा-हर वार सरयू को कितना मिलेगा? सुदर्शन बोला-पांच सौ रुपये। ट्रेन रोटी चावल, frre :
लस की घूस-यह सब हम लोगों का खर्च है। पांच सौ रुपये ? निशिकान्त थोड़ा निश्चिन्त हुआ। फिर पूछा- हीने में कितनी बार सरयू को नेपाल जाना पड़ेगा? सुदर्शन वोला-तीन बार जा सकेगी तो तीन वार । दस बार जा किती है तो दस दार । जितनी वार माल लाएगी, उतनी ही बार उसे पांच सौ रुपये मिलेंगे। निशिकान्त ने फिर पूछा-नेपाल में सरयू गांजा कहां खरीदने जाएगी ? ज़िन्दगी में वह कभी नेपाल गई भी नहीं है। वहां किसीको जानती भी नहीं। सुदर्शन बोला-आप इन सब बातों को ज़रा भी चिन्ता मत कीजिए। वहां भी हमारे आदमी हैं। वे ही सारी व्यवस्था करेंगे। आपकी पत्नी का काम वहां से केवल माल लाना है । वाकी झमेले से हम निवटेंगे। इसके बाद हां भरने में कोई हर्ज नहीं दिखा । सरयू दूसरे ही दिन काम पर लग गई। सुदर्शन कुछ रुपये एडवांस भी दे गया था। उसीसे सरयू के लिए नई साड़ी, ब्लाउज, पेटीकोट आदि खरीदे गए। और फिर एक दिन भगवान को स्मरण कर सरयू नेपाल रवाना हो गई। पांच दिन वाद वह सही-सलामत.लोट भी आई। रास्ते में कोई दुर्घटना नहीं हुई। किसी- को पता भी नहीं चला कि सूटकेस में सरयू क्या भरकर ले आई । उसी दिन सुदर्शन नकद पांच सौ रुपये घर आकर दे गया। इसी तरह कई बार सरयू के नेपाल आने-जाने के बाद निशिकान्त ने टालीगंज में ढाई सौ रुपये का फ्लैट ले लिया। इसी समय से हाथ में ढेर सारा पैसा भी आने लगा। निशिकान्त भी आराम की ज़िन्दगी विताने लगा। सरयू ही खटती थी। निशिकान्त पैर-पर-पर धरे मौज के दिन गुज़ारने लगा। टालीगंज में आदि गंगा के किनारे का वह आश्रम भी उन्हीं दिनों वना था । एक नये महात्मा का जुगाड़ किया गया था। धीरे-धीरे भक्तगण भी जुटने लगे । सरयू पास-पड़ोस की महिलाओं को वहां एकत्र कर लाती, इस तरह भजन-कीर्तन होता, प्रसाद आदि वांटा जाता । इस तरह से एक दिन आश्रम पूरी तरह. जम गया। बीच-बीच में सरय श्याम बाजार में वहन के घर जाने का नाम लेकर ।
नेपाल जाती और सूब पैसा कमाती । पर जिग तरह पंसों को उपयोगिता है, उसी तरह उसका एक दूसरा पहलू भी है- यह है अनपं । वही अनर्य अब सरयू के जीवन में भी घटा। निशिकान्त ने शराब पीना शुरू कर दिया । शराब पीने से यह तन्दुरुस्ती महसूस करने लगा। जो निशिकान्त कभी एक पैसे के लिए तरसता था वह रातोरात धनी वन गया। लेकिन एक दिन अचानक ही पुलिग ने पर पर छापा मारा। किसीने या तो पुलिस को खबर की होगी कि यहां लुके-छिपे गाजे की तस्करी की जाती है या फिर पूरा लेने वाले पुलिस का तबादला हो गया था । खैर, सरयू और निशिकान्त पिछले दरवाजे से भाग निकलने मे मफल हो गए। पुलिस ने मकान-मालिक को पकड़ा। वेवारा मकान-मालिक जितना जानता था, बता दिया। उसी रात निशिकान्त ने टालीगज का मकान छोड़कर मल्लिक साहब के यहा सहारा लिया। निशिकान्त ने बताया-उसके बाद से सर, फिर वही हालत । जो थोड़ा-बहुत मचित पंसा था, उसीमे गरयू किसी तरह गुजारा करने लगी। सैकिन आखिर वह कब तक चलता ? फिर सोने के कुछ गहने थे, उन्हें भी येचना पडा। लेकिन यह मुदर्शन दाबू कहा गए ? मैंने पूछा। निशिकान्त बीला--बडा विचित आदमी था वह । उसीने इस कारो. चार मे हम लोगो को फंमाया और खुद लापता हो गया । उसका आज तक पता नहीं चला। -सुदर्शन पोद्दार तो एक दलाल होगा । तुमने उसका जो महाजन पा, उसका पता क्यों नही लगाया? -लगाया तो था सर! पर न तो उम महाजन का नाम मुझे मालूम पा, और न ही कभी उमे देखा था, उमे केमे पाहता। आते-आते उस दिन देसा कि माणितला में गंगा के किनारे फिर एक महात्मा का या आश्रम बना है । सोचा सरयू को छोड़कर सुदर्शन ने किसी और को कड़ा होगा। लेकिन मैंने भी प्रतिज्ञा कर ली कि ऐसे कारोबार में फिर नहीं सूंगा । रुपया ज़रूर मिलता है, पर चैन नहीं । सरयू जब नेपाल जाती, मुझे रात को नींद नहीं आती। भूख नहीं लगती। हमेशा डर बना रहता के कहीं पुलिस ने सरयू को पकड़ न लिया हो। और जितना डर लगता उतनी ही शराब पीता। उसी समय से तो मैंने शराब पीनी शुरू की। नहीं तो साहब, पहले मैंने क्या कभी शराव चखी भी थी? इतना कहकर निशिकान्त उठ खड़ा हुआ। बोला-अव तो आपने मेरे दुख की कहानी सुन ली है। अब तो रुपया दीजिए। मैंने कहा-~-लेकिन तुम्हारी पत्नी सरयू तुम्हें अब छोड़ क्यों गई ? तुम्हारे दुख के दिनों में तुमसे वह दूर क्यों है ? ज़रूर तुम उसके जरिये फिर रुपया कमाना चाहते हो, और उन रुपयों से शराब पीने की उम्मीद करते हो। निशिकान्त को गुस्सा आ गया-~-आपको यह सब सरयू ने कहा है न? ऐसी हरामजादी औरत है। उसके लिए मैंने क्या नहीं किया ! अपनी ज़िन्दगी खतरे में डालकर उसे बचाया, शादी करके उसे इज्जत दी और आज वह यह कहती फिर रही है, इतनी नमकहराम है। उसके बाद वोला -~~-ठीक है। आप रुपये दें, चाहे नहीं, यह और वात है । लेकिन अपर ऊपर कोई भगवान है, तो इसका विचार वही करेगा कि सरयू ठीक है या मैं । लेकिन सर, मैं आपको इतना बता दूं कि संसार में रुपया एक बड़ी तुच्छ चीज़ है ! रुपये से बहुत बड़ा है ईमान ! अगर मैं ईमानदार आदमी हूं तो मेरा प्राप्य मुझे अवश्य मिलेगा। इतना याद रखिएगा । इतना कहकर निशिकान्त दरवाजे तक चला गया था। अचानक दीवार पर टंगे मल्लिक साहव के छाते को देखकर चौंक गया। जल्दी में छुपते समय मल्लिक साहब उसे उठाना भूल गए थे। निशिकान्त मल्लिक साहब का छाता पहचान गया। पूछा--यह क्या ? यह तो मल्लिकजी का छाता लग रहा है । यह यहां कैसे आया ? मल्लिकजी क्या आपके यहां आए थे? मैं कुछ कहूं इसके पहले ही निशिकान्त फिर बोल पड़ा-मल्लिक साहब कही छुपे हुए हैं क्या ? मैंने कहा-तुम घर जा रहे थे, जाओ। किसीका छाता है या नहीं, इसमे तुम अपना सर क्यो खपाते हो ? मुझे लिखना है। मेरा समय बर्बाद मत करो। निशिवान्त पोला-अरे साहब, छोडिए भी यह लिखने-बिखने की बात । क्या लिखेंगे? पूजा या दीपावली विशेपाक के लिए ही तो लिसंगे। बह भी कोई रचना है ? सब जजाल है। रुपये कमाने का धन्धा है। लेकिन मल्लिक का छाता यहा आया कैसे ? यह बताइए? मैंने ऊंची आवाज में कहा-अगर बरियत चाहते हो तो निकल जामो, यहा से। मुझे गुस्से में आते देख निशिकान्त घबरा गया। उसने कभी सोचा भी नही था कि मैं इस कदर गुस्सा कर सकता हूं। लेकिन एक क्षण में ही उसने अपने को सम्भाल लिया। बोला-आज आप मेरे साथ इस तरह से बातें कर रहे हैं, जरूर आपके यहा मल्लिक साहब गाए होंगे और मेरे विरुद्ध आपके कान भरे होंगे। नहीं तो पहले तो आपने मेरे माय कमी इम तरह से बात नहीं की थी। मैंने कहा-तुम्हारे साय अभी और बातें करने के लिए मेरे पास वक्त नहीं है निशिकान्त । मैं अच्छी तरह से तुमसे कह रहा हूं कि तुम इस समय मेरे घर से चले जाओ। पर निशिकान्त अडा रहा । बोला-पहले आपको बताना पडेगा कि मल्लिकजी का छाता आपके यहा आया कमे? यह मेरा परिचित छाता है, मर ! जब तक आप मेरी बात का जवाब नहीं देंगे, मैं हिलूगा नहीं। मैं कुर्मी मे उठ खड़ा हुआ । बोला-तुम्हारी इतनी हिम्मत ? मेरे घर पर मुझे हो धमकी दे रहे हो? इसी बीच कमरे के अन्दर से मल्लिक साहब निकल आए। मल्लिक साहब को देखते ही निशिकान्त वोला--जो सोचा था, यही निकला। इसी जुगलखोर मल्लिक ने आपसे मेरी चुगली खाई है । वही तो मैं सोच रहा था कि इतने बड़े लेखक होकर आप इतनी ही बात के खिलाफ कैसे हो गए ? यह सब इसो बदमाश को करतूत है। ६६ - । मल्लिक साहब भी चुप रहने वाले आदमी नहीं थे । वोले- क्यों नहीं कुछ कहूंगा। एक भले मानस साहित्यिक को तुम चकमा दोगे और मैं टुकुर-टुकुर देखता रहूंगा? यह तुम्हें रुपया नहीं देंगे। किराये के नाम पर रुपया लेकर तुम शराब पीयो और मैं उपचाप रहूं? उसके वाद मेरी तरफ देखकर बोले-निशिकान्त को पैसा न देकर आपने अच्छा ही किया है। मैं अन्दर बैठा सब सुन रहा था। यह एक नम्बर का शरावी है। इसे आप कभी पैसा नहीं दीजिएगा । इसकी अपनी ही जुवान से तो आपने सुना कि इसने पली के माध्यम से किस तरह पैसा कमाया है। अब जब इसकी पत्नी इसे पैसा नहीं देती तब इसने लोगों को ठगने का धन्धा शुरू कर दिया है। पत्नी के पैसों के वल पर जब नवावी करता था तब याद नहीं था कि कभी दुख के दिन भी आ सकते हैं ? उस समय सारा पैसा न उड़ाकर अगर कुछ संचय करता तो क्या आज दूसरे के यहां इसकी पत्नी को नौकरानी का काम करना पड़ता ? आप ही बताइए, ? आप ही बताइए, सर! वह भी तो मनुष्य है, उसका भी हृदय है । कोई मशीन तो है नहीं कि जिस तरह चाभी भर दी जाए, उसी तरह चलती रहेगी। उसकी भी इच्छाएं हैं, उसके भी शौक हैं । औरत होकर जन्मी है। फिर मां बनने की इच्छा नहीं होती ? पर इस आदमी ने उसकी किसी भी इच्छा की पूत्ति की है ! अपनी छाती पर हाथ रखकर तो कहे कि इसने उसके साथ न्याय किया है। उसके गहने तक वेचकर इसने शराब पी है। इसकी सारी कीत्ति तो मैंने आपके सामने वखान ही नहीं की है। आप सुनेंगे तो हैरान रह जाएंगे। शायद एक अच्छा- सा उपन्यास भी लिख डालें। मैंने कहा-देखिए मल्लिकजी, यह सव सुनने की मुझे आवश्यकता नहीं । उपन्यास के प्लाट की कोई कमी भी नहीं है। अच्छा होगा कि आप अभी तशरीफ ले जाइए। आप निश्चिन्त रहें । मैं निशिकान्त को रुपपे नहीं दूंगा । और फिर निशिकान्त को मैंने कहा -तुम्हें भी मुझे यह कहना है कि आइन्दा से तुम कभी मेरे घर पर मत आना। निशिकान्त सम्भवतः इसके भी जवाब में कुछ कहना चाहता था, पर मैंने उसे बोलने का मौका ही नहीं दिया। दोनों को कमरे से बाहर करके कानाई को दरवाजा वन्द करने के लिए मैंने कह दिया। । ।
में निविदादी निस्मंग आदमी। ऐसे फालतू लोगों से मेरा क्या मतलब ? कौन अपनी पत्नी को मुटवाकर उपार्जन करता है। कौन उस पैसे से शराब पीता है, किने मकान का किराया नहीं मिलता-इन सबके लिए मैं क्यों सोचू ? मेर पारा इतना वक्त ही वहां ? & इसके बाद कभी किसी मौके पर निशिकान्त वगैरह से मेरी मुलाकात नहीं हुई। न तो मैं ही उनके पास गया और न ही वे लोग कभी मेरे यहां आए। इसके अलावा कलकता शहर में इस तरह के कितने निशिकान्त और कितनी सरय और कितने ही मल्लिक साहब मिलेंगे, अगर इन सबके बारे में सोचा जाए तो जीवन दूभर हो उठेगा । अपने रोज के कामों को भूलना पड़ेगा। खर, इस घटना के कई महीनो याद एक सज्जन मेरे पास एक पुस्तक लेकर आए । मेरे किसी एक उपन्याम पर वह एक फिल्म बनाना चाहते थे। फिल्मो को यात उठते ही मैं थोड़ा सतर्क हो जाता हूं, क्योंकि फिल्मो में साधारणतया साहित्य को विकृत करके उपेक्षित किया जाता है। किसी दुखद उपन्यास के अन्त को भी तोड़-मरोड़कर उमपर बनी फिल्म को सुखद अन्त वाला बना दिया जाता है। उनका कहना है कि जनता ट्रेजेडी फिल्मों को पसन्द नहीं करती। जनता तो बस दो और दो मिलाकर चार का योग- फल चाहती है। जनता के सम्बन्ध मे विचित्र धारणा होती है उनकी । लेकिन वास्तव में क्या जीवन दो और दो का योगफल ही है ? अगर ऐसा ही होता तो फिर किसी उपन्यास को लेकर हम लोगों को चिन्ता ही नहीं रहती। साहित्य-सेवा में जीवन के इतने दिन विताकर आज फिल्मों के लोगों से जव हितोपदेश सुनता हूं तव अपने को धिक्कारने का मन करता है। सिनेमा के दर्शकों को वात में नहीं करना चाहता । उन्हें पायद मार नहीं ७१ कि हम अनपढ़ लोगों के लिए कलम नहीं पकड़ते, और न ही पढ़े-लिखे लोगों के लिए । हम तो बस थोड़े-बहुत रपिक लोगों के लिए लिखते हैं। अगर वे मेरी किताव खरीदते हैं तो बहुत अच्छा । न भी खरीदें तो कोई बुरा नहीं, क्योंकि आज का समय विचारकाल तो है नहीं। लिखने के समय . केवल दो ही लोगों का ख्याल रहता है-एक तो स्वयं का और दूसरा चिरकाल के उस अदृश्य रसिक पाठक का। फिल्म वालों को तो किसी बात का सिरदर्द नहीं । उनका उद्देश्य वस भाज के दर्शकों को खुश करना होता है-~-अर्थात् नकद-नारायण की पूजा । इसके अलावा भी साहित्य और सिनेमा के बीच एक बड़ा विरोध है, एक सूक्ष्म विरोध । वह यह कि साहित्य की गति जितनी धीमी होगी वह उतनी ही स्वादिष्ट होगी, पर सिनेमा को द्रुतगति का होना पड़ता है। इन बातों को लेकर गम्भीर आलोचना हो सकती है, लेकिन जो फिल्म बनाने आए हैं, उनसे यह सब कहना व्यर्थ है । उन्हें केवल अर्थ चाहिए और हमें अर्थ के साथ थोड़ा परमार्थ भी। लेकिन इन दोनों का समन्वय क्या किसी भी युग में सम्भव है? खैर ! जो व्यक्ति सिनेमा के उद्देश्य से मेरे पास आए थे, वे काफी पंसे वाले थे। पैसे की छाप उनके व्यक्तित्व में, उनकी पोशाक में और उनकी गाड़ी पर स्पष्ट थी। उन्होंने कहा-हमें आपकी कहानी पसन्द आई है । मैं चाहता हूं कि इसपर कोई फिल्म बने, ताकि सब इसे देख सकें। उसके बाद भी और बहुत-सी बातें हुई । आलोचना हुई। मोल-भाव हुआ। फिर जब सारी बातें पक्की हो गई तब उन्होंने कहा-~-मैं आपको अपने पानिहाटी के बगीचे में निमन्त्रण देता हूं। वहीं पर निर्देशक के साथ चिननाट्य के सम्बन्ध में बातचीत होगी । आप कब आ सकेंगे, कहिए। मुझे कोई आपत्ति नहीं थी। कहानी जब मेरी लिखी हुई है, तव मेरे साथ मालोचना करना भी स्वाभाविक था । मैंने उन्हें एक तारीख दे दी। उस तारीख को निश्चित समय पर वे लोग हमें अपने पानिहाटी के बगीचे वाली कोठी पर ले गए। बगीचा बहुत बड़ा था। तालाब भी था। वगीचे के विल्कुल पास ही उनका प्लाईवुड का कारखाना था। ૭૨ पाने-पीने का आयोजन भी जबर्दस्त था। मैंने यह ख्याल किया है कि फिल्म शुरू करने के पहले कहानी के सम्बन्ध मे जो बातचीत होती है, वह करीय एक-मो ही होती है। कहानी को ऐमा मोट दिया जाए ताकि निर्माता की तिजोरी भरी जा सके। मारी आलोचना का हम उसी तरफ होता है। फिल्म रिस तरह अच्छी बन सकती है, इसपर उतना ध्यान नहीं दिया जाता पंग के सामने कला हमेशा उपेक्षित ही रह जाती है । आलोचना के बाद भोजन ममाप्त होते-होते ढाई बज गए । पया- प्रसंग में मैंने कहा--मेरी यह कहानी तो नायिका-प्रधान है। नायिका के चरित्र की भूमिका कोन निभा रही है ? निर्माता ने कहा- एक नई कलाकार है। इससे पहले उसने किसी फिल्म में काम नहीं किया है। मैंने कहा--कोई नई कलाकार इतने जटिल चरित्न की भूमिका निमा सकेगी? निर्देशक ने कहा-यह आप मुझपर छोड़ दीजिए। मैं उमसे करा हर फिल्म का निर्देशक यही बात कहता है। निर्देशक को काम चाहिए। फिल्म भले जाए भाड़ मे। उसे तो बम अच्छी रकम मिलनी चाहिए । फिर क्या ? खुशी ही सुशी। निर्माता ने कहा- वह अभिनेत्री यही है । आप देखना चाहते हैं ? --यही पर है ? मैंने पूछा। -हा, पास यासी कोठी मे । ठीक इसके बगल में ही मेरा एक और भी मकान है । गाज का साना उसीने तो बनाया है। उसे बुला भंजू? -बुलवाइए। नायिका को बुलाने के लिए मादमी मेजा गया । और फिर थोड़ी देर दाद जो मेरे सामने आपर सड़ी हुई उसे देखकर मैं हतप्रभ रह गया। हैरान वह स्वयं भी हुई। दोनों एक-दूसरे को निर्वाक थोड़ी देर तक देखते रहे । सरयू को मैं यहां ऐसी अवस्था में देखूगा-यह मैं पल्पना भी नहीं कर सकता था।
कि हम अनपढ़ लोगों के लिए कलम नहीं पकड़ते, और न ही पढ़े-लिखे लोगों के लिए । हम तो बस थोड़े-बहुत रसिक लोगों के लिए लिखते हैं। अगर वे मेरी किताब खरीदते हैं तो बहुत अच्छा । न भी खरीदें तो कोई दुरा नहीं, क्योंकि आज का समय विचारकाल तो है नहीं। लिखने के समय . केवल दो ही लोगों का ख्याल रहता है-~~-एक तो स्वयं का और दूसरा चिरकाल के उस अदृश्य रसिक पाठक का। फिल्म वालों को तो किसी बात का सिरदर्द नहीं। उनका उद्देश्य वस आज के दर्शकों को खुश करना होता है-अर्थात् नकद-नारायण की पूजा । इसके अलावा भी साहित्य और सिनेमा के बीच एक बड़ा विरोध है, एक सूक्ष्म विरोध । वह यह कि साहित्य की गति जितनी धीमी होगी वह उतनी ही स्वादिष्ट होगी, पर सिनेमा को द्रुतगति का होना पड़ता है। इन बातों को लेकर गम्भीर आलोचना हो सकती है, लेकिन जो फिल्म बनाने आए हैं, उनसे यह सव कहना व्यर्थ है। उन्हें केवल अर्थ चाहिए और हमें अर्थ के साथ थोड़ा परमार्थ भी। लेकिन इन दोनों का समन्वय क्या किसी भी युग में सम्भव है ? खैर ! जो व्यक्ति सिनेमा के उद्देश्य से मेरे पास आए थे, वे काफी पैसे वाले थे। पैसे की छाप उनके व्यक्तित्व में, उनकी पोशाक में और उनकी गाड़ी पर स्पष्ट थी। उन्होंने कहा-हमें आपकी कहानी पसन्द आई है । मैं चाहता हूं कि इसपर कोई फिल्म वने, ताकि सब इसे देख सकें उसके बाद भी और वहुत-सी बातें हुई 1 आलोचना हुई। मोल-भाव हुआ। फिर जब सारी बातें पक्की हो गईं तब उन्होंने कहा-मैं आपको अपने पानिहाटी के बगीचे में निमन्त्रण देता हूं। वहीं पर निर्देशक के साथ चिननाट्य के सम्बन्ध में बातचीत होगी। आप कब आ सकेंगे, कहिए । मुझे कोई आपत्ति नहीं थी। कहानी जब मेरी लिखी हुई है, तव मेरे साथ मालोचना करना भी स्वाभाविक था। मैंने उन्हें एक तारीख दे दी। उस तारीख को निश्चित समय पर वे लोग हमें अपने पानिहाटी के वगीचे वाली कोठी पर ले गए । बगीचा बहुत बड़ा था । तालाव भी था । बगीचे के विल्कुल पास ही उनका प्लाईवुड का कारखाना था। ७२ पाने-पीने का आयोजन भी जबर्दस्त था। मैंने यह स्याल किया है कि फिल्म गुरू करने के पहले कहानी के मम्बन्ध मे जो बातचीत होती है, वह करीब एक-मी ही होती है। कहानी को ऐमा गोड दिया जाए ताकि निर्माता की तिजोरी भरी गसके । मारी आलोचना का हम उमी तरफ होता है। फिल्म रिम तरह अच्छी बन मकती है, इमपर उतना ध्यान नहीं दिया जाता। पंगे के सामने कला हमेशा उपेक्षित ही रह जाती है। आलोचना के बाद भोजन ममाप्त होते-होते ढाई बज गए । कया- प्रसंग मे मैंने कहा-मेरी यह कहानी तो नायिका-प्रधान है। नायिका के चरित्र की भूमिका कौन निभा रही है ? निर्माता ने कहा- एक नई कलाकार है । इससे पहले उसने किमी फिल्म में काम नहीं किया है। मैंने कहा-कोई नई कलाकार इतने जटिल चरित्र की भूमिका निमा सकेगी? निर्देशक ने कहा- यह आप मुद्दापर छोड़ दीजिए। मैं उससे करा लूगा। हर फिल्म का निर्देशक यही यात कहता है। निर्देशक को काम चाहिए । फिल्म भले जाए गाड मे। उसे तो बस अच्छी रकम मिरानी चाहिए । फिर क्या ? सुशी ही सुशी। निर्माता ने कहा -वह अभिनेत्री यही है । आप देखना चाहते हैं ? -यहीं पर है ? मैंने पूछा। -हां, पास वाली वोठी मे । ठीक इसके बगल मे ही मेरा एक और भी मकान है । याज का साना उसीने तो बनाया है। उसे बुला भेजू ? -बुलवाइए। नायिका को बुलाने के लिए आदमी भेजा गया । और फिर थोडी देर बाद जो मेरे सामने आकर सड़ी हुई उसे देखकर मैं हतप्रभ रह गया। हैरान वह स्वयं भी हुई। दोनों एक-दूसरे को निर्वाक् थोड़ी देर तक देखते रहे । सरयू को मैं यहां ऐमी अवस्या में देगा मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था।
.. - निर्माता ने पूछा-बोलिए--कैसी है ? उनकी आवाज से मेरे होश लौट आए। बोला-अच्छी है। -~-इस कलाकार से काम चलेगा? आपकी क्या राय है ? -चलेगा। इसके बाद और कोई बातचीत नहीं हुई। सरयू से मैं कई प्रश्न करना चाहता था, और मुझे लगा कि वह भी मुझे कुछ कहना चाहती थी। पर मौका नहीं मिल रहा था। निर्माता ने कहा- अब तुम जा सकती हो, सरयू सरयू जिस तरह आई थी, उसी तरह नि:शब्द वापस चली गई। योड़ी देर तक मैं विमूढ़ बैठा रहा । सोचता रहा, यह क्या हुआ ? सरयू यहां कैसे पहुंची ? सरयू का जीवन किस विचित्र दिशा की ओर मोह ले रहा है ? पाकिस्तान से लौटते समय रास्ते की वह विपत्ति, निशि- कान्त के साथ उसकी भेंट, फिर विवाह, नेपाल से गांजे की तस्करी, टाली- गंज की गंगा के किनारे उस साधु के अखाड़े पर प्रसाद-वितरण से लेकर कहां एक विधुर धनी के बच्चों की देखभाल करने वाली आया की नौकरी । और फिर यह आखिर उसका जीवन किधर मुड़ रहा है ? खैर, सरयू मेरी कौन होती है कि मैं उसके लिए इतना सोचूं ? वाकी लोगों के वहां बगीचे में और देर तक रहने का प्रोग्राम था, लेकिन मेरी विदाई उन्होंने पहले ही कर दी । मैंने यही अन्दाज लगाया कि मुझे भेजने के बाद इन लोगों में व्हिस्की का प्रोग्राम चलेगा। निर्माता ने मेरी वापसी के लिए प्रवन्ध कर दिया था। सवसे विदा लेकर मैं अकेला ही फाटक की तरफ बढ़ा । पर पास ही अन्धेरे में किसी पेड़ के नीचे से किसीने पुकारा-सुनिए ! मैं समझ गया। वह सरयू थी 1. मैंने चारों तरफ नजर दौड़ाई, पर कहीं कोई नज़र नहीं आया। सरयू सम्भवतः एकान्त में ही मुझसे कुछ कहना चाहती थी। केवल मौके की प्रतीक्षा में थी। फिर खुद मेरे नज़दीक आकर बोली-यह आपने क्या किया ? में हैरान हो रहा था। । ७४ सरयू की बात समझ में नहीं आ रही थी। पूण-महान मगा बिगाड़ा है? सरयू बोली- आपके जिम उपन्यास पर ये लोग फिल्ग मना रहे है, उगे मैंने पढ़ा है। लेकिन नायिका से आपने अन्त में पेश्यावृति करपाई है। क्या वास्तव में ऐसी है? इसका जवाब मेरे पास या, पर जुबान पर नहीं ला सका। में कुछ बोलू, उससे पहले ही सरयू बोली-इन लोगों को भी नहीं मालूम कि आपने मुझे ही लेकर यह कहानी लिखी है । लेकिन किसीको गालग हो मा नही, मैं तो जानती ही हूं। और अपने को मैं आपसे अधिक पहपाती हूं। आपकी कहानी की नायिका की तरह मैं इतनी बेवकूफा नहीं । पले-पर का अन्दाज़ मुझे भी है । मेरे बारे मे आपको किसने इतनी यातें यसाई ? पर! जिसने भी बताई हो उसने आपको असली बात नहीं बताई। मैंने कहा-कहानी कहानी होती है । तुम क्यो परेशान होती हो? सरयू बोली-आप मुझपर झूठा कलंक थोपेंगे और मैं परेशान न होऊ ? करते हैं आप? -लेकिन सरयू, अपनी कहानी में मैंने वही भी तुम्हारा नाम तो दिया नहीं है। सरयू बोली-अगर आप नाम दे भी देते तो भी मैं आपका क्या बिगाड़ लेती ? मैं आपके नाम मानहानि का मुकदमा दायर तो कर नहीं सकती। जय आपने मेरी मारी बात लिखी ही है तो मेरा नाम देने के लिए आपको मना ही किमने किया था? मैंने कहा-यही कहने के लिए तुम इतनी देर तक एपकर मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। अगर अभी तुम्हें कोई यहां देख ले तो? --इस समय यहां कौन देगा? किसके पान इतनी फुसंत है । अब तक तो व्हिसी में सब घुन हो गए होंगे । नशा चढ़ चुका होगा? मैंने कहा-निशिकान्त शराब पीता था, इमलिए तुमने उमेर अब भाग्य की विडम्बना देखो कि ऐसे शराबियों के हायों में तुम्हें मरयू बोली-निनिकान मराब पीता था, इसलिए मैंने - आपको किमने कहा ? देखिए आप अपने को बहुन । बसी असल में आपने अब तक मनुष्य-चरित्न को समझा ही नहीं है। आप न तो निशिकान्त को समझ सके और न ही मुझे। फिर भी आप हम दोनों को ले- कर कहानी लिख गए। और अब उस कहानी पर फिल्म भी बन रही है। लेकिन मैं आपसे पूछती हूं आपने यह कहानी लिखी क्यों? आपने क्यों इस तरह निशिकान्त का अपमान किया ? मैंने कहा-निशिकान्त जैसा है, मैंने उसे वैसा ही बांका है। सरयू बोली-नहीं। निशिकान्त वैसा दुश्चरित्र और लम्पट नहीं है । मनुष्य के बाहर का रूप देखकर उसके चरित्र के बारे में निर्णय कर लेना अनुचित है। मैंने कहा-तुम मल्लिक साहब को जानती हो ? मणिकतला में तुम्हारे फ्लैट के मकान मालिक ? -वह लम्पट ? मैंने कहा-तुम उसे लम्पट कह रही हो? उससे तो तुम अक्सर भेंट करती रहती हो । उसीके हाय तुम निशिकान्त के फ्लैट का किराया, चाय के पैसे, होटल में खाने के पैसे सर्व भेजती रहती हो। ---यह सब झूठ है। तुम कहना क्या चाहती हो ? मल्लिक साहव ने मुझसे सब झूठ कहा हैं ? मैने निशिकान्त को दो सौ रुपए देने के लिए अपने घर पर बुलाया था, पर तुम्हींने मल्लिक के मारफत मुझे निशिकान्त को पैसे देने के लिए मना करवाया था। इसके अलावा निशिकान्त ने स्वयं भी मुझे बताया कि तुम बर्बाद हो चुकी हो। सरयू बोली-वर्वाद तो मैं बहुत पहले ही हो चुकी थी। वह तो आप उसी दिन जान गए थे जिस दिन मोकामा घाट स्टेशन पर गांजे से भरा सूट- केस आपको थमाकर मैं गायब हो गई थी। फिर उसके बाद पुलिस से भाग- कर मैंने आपके यहां शरण ली, फिर वहां पिछवाड़े से भाग निकली। उस दिन भी तो आप समझ हो चुके थे कि मैं कितनी बर्बाद हो चुकी हूं-आपरे यह सारी बातें तो अपनी कहानी में लिखी ही हैं । निशिकान्त ने आपसे कुद गलत नहीं कहा। मैंने कहा-फिर तुम्हारी कहानी लिखकर मैंने कौन-सी गलती की है -- ७६ और कौन-मी वात झूठ कही है ? मरयू बोली-निशिकान्त के साथ आपने अन्याय किया है । तमे आपने एक चरित्रहीन लम्पट के रूप में आरा है। आपको उसे कहानी का खल- नायक नहीं बनाना चाहिए था। फिर थोड़ा रुसकर बोली-अभाव में, गरीबी में, दुप में, परेशानी में आदमी जो कुछ करता है उसमे उसका मूल्यां- कन नहीं किया जाता । यह उसके प्रति अन्याय है । क्या आप जानते हैं कि निशिकान्त एक महान् नि स्वार्थ सच्चा आदमी है। मैंने कहा-क्या पक रही हो। एक शरावी को अच्छा कहते हुए तुम्हे असरता नहीं? सरयू बोली-मेरी जवान पर कोई बात नहीं अखरती। मैं आज कितनी भी गिरी हुई क्यों न हू, लेकिन अच्छे को अच्छा कहने का साहस मुझमें अब भी है और जरूरत पड़े तो दुनिया के मामने मैं ऊंची आवाज में चिल्लाकर कह सकती हूं। मैंने कहा-आज इतनी बडी-बडी बातें सुना रही हो। पर वह बात बहुत पुरानी तो है नही, जव मेरे सामने टालीगंज के मकान से गाली-गलौज कर तुमने उसे निकाल दिया था। सरयू बोली- इसी बल पर बाप अपने को लेखक मानते हैं ? मनुष्य. चरित्र का इतना ही ज्ञान है ? इमी ज्ञान के आधार पर किताबें लिखकर लोगो से वाहवाही लूटते हैं ? मुह की यात ही अगर सच्ची होती तो लोग तो.. भगवान को भी गाली देते हैं। क्या भगवान के प्रति किसी के मन की वात गाली होती है? अचानक कुछ बातचीत की आवाज सुनाई पड़ी। निर्माता, निर्देशक और एक-दो और यादमी फाटक की तरफ आ रहे थे। सरयू उन लोगों को देखते ही अन्धेरे में पेड के पीछे अदृश्य हो गई। निर्माता ने मुझे देखा तो हैरान होकर पूछा-आप अभी तक यही पर आपके लिए तो मैंने गाडी का प्रबंध किया था ? मैंने कहा-गाडी यहा है उमौका पता कर रहा था । निर्माता ने कहा-आपको अभी तक गाड़ी ही नहीं मिली। ताज्जुव है । अच्छा अभी देयता हूं। इतना कहकर वह आगे बढ़ गए। फाटक से -- थोड़ी दूर पर गाड़ी खड़ी थी। ड्राइवर बैठा-बैठा सो रहा था। -यह रही आपकी गाड़ी-निर्माता ने कहा। ड्राइवर को नींद से जगाया गया। उस बेचारे को बेकार में डांट पड़ गई । मेरी तकलीफ के लिए निर्माता ने मुझसे माफी भी मांगी। मुझे लगा- अलकोहल का डोज़ पेट में कुछ ज्यादा ही पड़ा था। इसी कारण गद्गद भाव से बातें कर रहे थे। मैं गाड़ी में बैठकर सीधा घर आ गया। खैर । फिल्म अन्त तक नहीं ही बनी। अक्सर फिल्मों के साथ जो होता रहता है-इसके साथ भी वही हुआ । ख्वामख्वाह बहुत-से रुपये शराब और औरत के पीछे वर्वाद हो गए। पर मुझे इससे जो कुछ हुआ, वह बड़ी विचित्र घटना थी। वही कहूंगा। फिल्म-विल्म की बात तो मैं भूल चुका था । जीवन रोज़ की तरह चल रहा था। अचानक एक दिन अखबार में एक खबर पढ़कर चौंक गया। समाचार यो था कि प्रभुदयाल सिंह नाम के एक व्यापारी का उसके पानि- हाटी के बगीचे वाली कोठी में खून हो गया था । खून के अपराध में निशिकान्त हालदार नाम के एक आदमी को पकड़ा गया था । खून के कारण का कुछ पता नहीं चला। खोज जारी है। मुझे याद आया, प्रभुदयाल सिंह तो मेरी उस कहानी के फिल्म निर्माता थे। निशिकान्त ने आखिर उसकी हत्या कर दी। मैं समझ गया कि इस खून का मूल कारण सरयू ही है । सरयू के कारण ही प्रभुदयाल पर निशिकान्त को आक्रोश रहा होगा। प्रभुदयाल का खून करके निशिकान्त ने वदला लिया होगा। कोई कुछ समझे या नहीं, मेरे समक्ष वात स्पष्ट थी। . १० पुलिस से मैंने पूछा-~-मुझे गवाह किसने बनाया ? किसने मेरा ना बताया ? पुलिस ने बताया-मुजरिम के वकील ने । मैं सोच में पड़ गया । ढूंढ-ढूंढकर उस वकील के घर पहुंचा । बोला मुझे क्यों इस मामले में फंसा रहे हैं ? वकील ने कहा-में आपको क्यों फंमाऊंगा? आपको तो श्रीमती सरयू हालदार ने फंसाया है । आप उसके मुकदमे के तीसरे गवाह है। मैंने कहा-मैं तो इस मामले के बारे में कुछ भी नहीं जानता । वकील ने कहा-आप निशिकान्त को जानते हैं, सरयू को भी जानते हैं। उन्हीके बारे में यताइएगा। -लेकिन श्रीमती सरयू देवी किस पक्ष की गवाह हैं ? -फरियादी पक्ष की। उसके सामने ही तो प्रभुदयाल सिंह की हत्या हुई थी। यद्यपि मैं जानता था कि प्रमुदयाल सिंह कौन था, तयापि संदेह दर पारने के लिए पूछा-प्लाईवुड का कारखाना उन्हींका या ? प्लाईवुड के वक्रो अराम के चाय के बगीचों में भेजकर बहुत पैसा कमाता था—यह प्रभुदयाल सिंह। जब पता लगा कि वह अद्वितीय व्यक्ति प्रभुदयाल सिंह ही है तब मेरा संदेह बिल्कुल ही जाता रहा । पूरी घटना को माद्योपान्त मन मे सजाकर जिस निष्कर्ष पर पहुंचा, वही सच निकला। निशिकान्त के लिए मुझे दुख हो रहा था। सरयू के लिए भी। पैसे के अभाव के कारण ही संसार और समाज में अपराध का जन्म होता है । अगर निशिकान्त को किसी बात का अभाव नहीं रहता, पाकिस्तान से भागना नहीं पड़ता, अगर पत्नी के साथ उसे जगह-जगह भटकना नहीं पडता, स्वस्प जीवन मिलता, कोई स्वस्थ जीविका मिलती तो वह आज इस परिस्थिति में नहीं रहता । उसकी यह दशा नहीं होती। लेकिन उस समय तक मुझे नहीं मालूम था कि कचही में इससे भी बड़ा विस्मय मेरी प्रतीक्षा में है। मैंने सोचा, सरयू से एक बार भेंट करनी चाहिए । एक बार दिमाग में माया, मल्लिक साहब के घर का ही पता करूं और उनमे पूछताछ कर पूरी घटना अच्छी तरह से जान लू, समालू। निशिकान्त क्या उन्हीके पलंट में अन्त तक रहता था? सरयू और निशिकान्त के लिए मल्लिक साहब ने जो कुछ पहा था, वह सब क्या झूठ था? मुझे पूरी जानकारी की जरूरत धी।
पानिहाटी के बगीचे में सरयू के साथ मेरी जो बातचीत हुई थी उससे तो यही लग रहा था कि मल्लिक खुद एक लम्पट आदमी है । तो फिर क्या निशिकान्त मूलतः निर्दोप था ? ज्यादा सोचने-विचारने का वक्त भी नहीं था। सोचा, जितना जानता हूं उतना ही कहूंगा। अगर निशिकान्त को फांसी लग भी जाए तो मेरी कोई हानि नहीं और यदि वह निर्दोष सावित कर दिया जाता है तब भी मुझे कोई फायदा नहीं। उसकी अच्छाई-बुराई के साथ दुनिया के और किसी की बुराई या भलाई जुड़ी नहीं है । मैं निरपेक्ष आदमी । घटनाचक्र के फेर में इन लोगों से उसी तरह जड़ित हो गया जैसे हजारों और लोगों से कई वार जुड़ना पड़ा है । इसलिए मैं क्यों किसी पक्ष को उपालम्भ दूंगा। अत: जिस दिन कचहरी से बुलावा आया, मैं सीधा पहुंच गया। मैं समय पर कचहरी पहुंच गया। कोर्ट-रूम खचाखच भरा था । लोग तरह-तरह की टीका-टिप्पणी कर रहे थे। कोई मासामी का पक्ष लेकर बोल रहा था तो कोई विपक्ष में । पक्ष-विपक्ष की बात अगर छोड़ दी जाए तो संसार के अधिकतर लोग स्वभाव से कुतूहली होते हैं और उसपर यदि किसी घटना में कलंक की गन्ध आ जाए तो वातचीत में भी रस आ जाता है। सभी उस लड़की को देखने के लिए आतुर थे जिसके कारण यह खून का मुकदमा चल रहा था । अर्थात् सरयू ही यहां की केन्द्रविन्दु बनी हुई थी। एक-एक करके और सभी की गवाही हो गई। लेकिन उस दिन मुकदमा खत्म नहीं हुआ। कोर्ट का कानून अपने नियमों से चलता है। जिस दिन भी में जाता किसी न किसी कारण से मुकदमा उस दिन के लिए स्थगित कर दिया जाता। इस तरह कितने ही दिन बीत गए। अन्त में एक दिन मेरा दुलावा आया। मैं गवाह नम्बर तीन था। सरकारी वकील ने जिरह से मुझे झकझोर दिया। अन्त तक मैं इतना ही कह पाया, मैं आसामी को जानता हूं। उसके साथ कई बार मेरी मुलाकात भी हुई है। हर वार जो पटना घटी वह भो में बता गया। उसके बाद ही वकील ने मुन्नसे सवाल किया-आपकी राय में मा मुजरिम अपराधी है? मैंने कहा-घटना के समय में वहां उपस्थित नही था, इसलिए मैं कमे कह सकता हूं कि वह अपराधी है या नहीं ? लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि मुजरिम के लिए यह अपराध कोई असम्भव नहीं था। मुझे मुक्ति मिल गई। लेक्नि मुकदमे का फैसला जानने की मन में उत्कण्ठा थी। मुकदमे का नतीजा सरयू की गवाही पर निर्भर था। दुर्घटना के समय सरयू घटनास्थल पर उपस्थित थी और उससे भी बड़ी बात थी कि यह आसामी की पत्नी थी। इम कारण सभी के मन में कुतुहल था, उत्सुकता यो। सरयू कठघरे में खड़ी हुई । मैंने उसकी तरफ देखा । बहुत दिनों के बाद देश रहा था। लेकिन लगा इतनी बड़ी दुर्घटना के बाद भी उसके चेहरे में कोई परिवर्तन नहीं आया है। लेकिन उसने जो कुछ कहा, उसे सुनकर सबके साय में भी चकित रह गया । गवाही देते समय यह एक बार भी घबराई नहीं, रोई नहीं । स्थिर चित्त से बोली-धर्मावतार ! आसामी बेकसूर है । -यह कैसे कह सकती हो। आसामी क्यो निर्दोष है, सरयू एक लहजे में नहीं समझा सको। लेकिन सरयू को बात में जितनी सुन रहा था-उतनी ही हैरानी हो रही पी। सरकारी वकील ने कहा-पुलिस के सामने आपने तो दूसरी ही बात बताई थी। सरयू बोली-सच बताते के लिए पुलिस ने ही मुझे रोका या.. मैं जो बाहना नहीं चाहती थी उमे हो मेरी बात मानकर उन्होंने लिप लिया। --लेकिन क्या आपने पति को छोड़कर उपयों के लिए प्रभुदयाल सिंह के यहां नौकरी नहीं की? सरयू बोली-हा, नौकरी की। अखबार में विज्ञापन देकर मैंने दर- स्पास्त दो और मेरे रूप के कारण उन्होंने मुझे नौकरी भी दी। १ -इसके पीछे आपके पति का प्रोत्साहन नहीं था ? -पति? कौन मेरे पति ? -आसामी निशिकान्त मापके पति नहीं ? -नहीं। -फिर भाप मांग में सिन्दूर क्यों भरती हैं ? -~क्योंकि मेरे पति जीवित हैं। ~~-वह कहां है ? उनका पता क्या है ? सरयू वोली-~~वह अलीपुर जेल में हैं। खून के अपराध में वह आ- जीवन कारावास की सज़ा भोग रहे हैं। --क्यों, उन्होंने किसका खून किया था ! जवाव में सरयू जो कुछ बोली वह बड़ा ही मर्मान्तक था । १२ सरयू की कहानी सुनकर में चौंक उठा। मैंने बहुत-से आदमियों का जीवन देखा है। लेखन की हैसियत से बहुत-से नर-नारियों के सम्पर्क में माना पड़ा है, उनकी जिन्दगी की कहानी भी सुनी है। सड़क पर, पार्क में, मनुष्यों की भीड़ में, एक आम आदमी की तरह लोगों के संस्पर्थ में आया हूं। मुझे गरूर था कि किसीको देखकर या उससे वातचीत करके मैं उसे पहचानने की क्षमता रखता हूं। लेकिन उस दिन सरयू की कहानी सुनकर मेरा सारा अहंकार धूल में मिल गया। सरयू सिर्फ एक लड़की ही नहीं, मुझे लगा कि इतनी बुद्धिमती लड़की मैंने जीवन में पहले कभी नहीं देखी। जब सरयू एक छोटी-सी बालिका थी और गांव में रहती थी, तब कोई उसे एक बार देखने आया । उस समय सरयू विवाह के लायक हो चुकी थी। सरयू के पिता ने सरयू से कहा---बेटी, आज तू कहीं मत जाना। आज लोग तुम्हें देखने ५२ आएंगे। सरयू अवाक् हो गई थी। पूछा पा–लोग मुझे पपों देगने आएंगे ? मैंने क्या किया है। छोटी उम्र में ही सरयू की मां गुजर चुकी थी, इसलिए पिना ही सरवू के लिए मा और बाप दोनों थे । सरयू के पिता हरिहर एक तान्त्रिक थे। गृहस्य आदमी जिस तरह से तान्तिा होते हैं, वो हो। गारा गंसार-धर्म भी निभाते और रात में श्मशान जाकर जप-तप भी करते । वहा वह क्या करते यह तो फिसीको पता नहीं था, लेकिन आधी रात गए जब यह पर लौटते, तब उनके कगल पर सिन्दूर का एक बहा-मा टीका लगा रहता, गले में लाल जवा के फूलों की माला रहती और आय परीदों की तरह सरयू पिता को देखकर डर जाती। दिन में जो व्यक्ति म्वाभाविक रहता रात को वही चेहरा सरयू के भय का कारण बन जाता। उनरी मांस में एक कड़ी-सी गन्ध निकलती। उस गन्य से मरयू को मिरली बाती। सरयू पूछती-आपके मुह मे यह कमी टुगंध निकल रही है, पिता जी? आपने क्या माया है ? सरयू के पिता कुछ नहीं बोलते । उनके मुंह से केवल 'मा, मा' मा पर निमलता यऔर वह अपने कमरे में घुसकर अन्दर में घटननी बन्द कर लेते। सरयू के साथ उमके पिता हरिहर या एक यद्भुत सम्बन्ध पारिता को वह यदा एवं भय दोनो नजरों से देखती थी । इमो भय और या के दो अलग-अलग नावों में मुलकर सरयू का मन टुट गया पा। मग्यू छुटपन गे किमी पाई मां के हायों पाली गई थी। अब पोड़ी यही हुई तब उसे पता चला कि घाई मां उगकी मां नहीं, बल्कि एक नौक- रानी है, जिम पिताजी मे हर माम तनख्वाह भी मिलती है। मरयू ने अपने पिता ने एक दिन पूछा भी मेरी बमली मा रहा है ? बेटी के प्रश्न से हरिहर चौक रसा। बोला-क्यों? तुम्हारी धाई मां ही तुम्हारी बगली मा है। सरयू नाराज हुई थी। दुमी होवर वोली-यह मूठ है। थार मरामर ।
नूठ वोल रहे हैं। हरिहर ने कहा-नहीं वेटी। मैं झूठ बोल रहा हूं, यह तुझसे किसने कहा । देखती नहीं, मैं हमेशा 'मां, मां' पुकारता रहता हूं। मां का बेटा कभी झूठ नहीं कहता, वेटी ! सरयू फिर भी ज़िद पर अड़ी रही। बोली-नहीं, मैना ने कहा है कि मेरी मां मर गई है । वाई मां हमारी नौकरानी है। इसके बाद सरयू से कुछ भी न छुपा रह सका। केवल यही बात नहीं पिता की और बातें भी मालूम हो गई । मैना से उसे यह भी पता लगा कि उसकी मां को उसके पिता ने ही मार डाला है। सरयू को पहले तो विश्वास नहीं हुआ। मैना से. वह पूछती-तुझे यह सब कैसे पता चला? मैना चोली-मेरे पिताजी सब कुछ जानते हैं । एक दिन रात को सोते समय मां को वह सारी घटना बता रहे थे। मैंने सुन लिया। छुटपन में ही पिता के सम्बन्ध में ऐसी जानकारी प्राप्त करके सरयू ज्ञानी बन गई। उसने यह सबक सीखा कि दुनिया में सभी स्वार्थी हैं । रात को श्मशान में पूजा करके लौटने पर पिताजी के मुंह से जो दुर्गन्ध निकलती थी, वह शराब की गन्ध थी। सरयू मैना से पूछती-शराव का मतलब क्या है रे? मैना वोलती-मुझे पता नहीं शराब क्या चीज़ है ? वह तो जहर है, जहर ! शराब पीने से आदमी पागल हो जाता है । -धत्त् ! शराव अगर ज़हर ही होता तो पिताजी कव के मर जाते । पर वह तो मरते ही नहीं। मंना समझाती-तू बहुत वेवकूफ है, सरयू ! शराब पीने से आदमी का दिमाग ठीक तरह काम नहीं करता। इसीलिए तो तेरे वापू का भी दिमाग ठीक नहीं है । अगर ठीक ही रहता तो क्या तेरी मां मरती ? तेरे वापू ने ही तो तेरी मां को धूंसा मार-मारकर मार डाला। उस दिन घर लौटकर सरयू ने खाना नहीं खाया। वस बिस्तर पर पड़ी रही। धाई मां उसे बुलाने आई-उठ वेटी, खाना खा ले। तेरे लिए मैं भी ५४ भूखी बैठी हूं। सरयू बोली-मैं कुछ भी नहीं साऊंगी, किसी भी हालत में नहीं खाऊंगी। फिर भी धाई मां दुलार मे उसे पुकारने लगी। यब सरयू तुनक उठी। बोली- मुझे क्या मता रही हो? तुम मेरी फोन होती हो? तुम तो मेरी मां नहीं हो? धाई मां घबराकर बोली-क्या कह रह रही है बेटी ? मैं तेरी मां नहीं तो और कौन हूँ? -तुम तो नौकरानी हो, पिताजी से तनख्वाह लेती हो। तुम समझती हो, मुझे कुछ नहीं मालूम ? मेरी मां तो मर गई है। मेरे पिताजी ने शराब पी कर मां को पूसा मार-मारकर मार डाला है। इतना कहकर सरयू मिसका-सिसककर रोने लगी। सारे दिन नहीं उदो, साना भी नहीं पाया। हर दिन की तरह उस रात भी हरिहर बाधी रात पर लोटा, गले में लाल फूलों की माला, लाल-लाल आंखें । 'मा, मा' कहता हुआ घर आया और बेटी की करतूत सुनी। सब कुछ सुनकर हरिहर ने कहा-सरयू अभी क्या कर रही है ? ----बिना खाए-पिए सो रही है। -~-उसे सोने दो, तुम भी जाकर सो जाओ । कहकर वह रुका नहीं। अपने कमरे में जाकर बन्दर से चिटकनी बन्द कर ली। इस पटना के बाद से सरयू बदली हुई लगने लगी। उस दिन से वह समझने लगी कि यह पृथ्वी केवल जीने के लिए ही नहीं, मरने के लिए भी है। साथ-साय यह भी जान गई कि यहां मरना बहुत आसान है । यहाँ मरने के लिए इतने साधन है कि अगर कोई मरना चाहे तो उसे कोई बाधा भी नहीं पहुंचाएगा । और मरने के बाद केवल शान्ति ही शान्ति। लेकिन जीना?
इस दुनिया में जीना ही सबसे कठिन है। जीने के लिए लड़ना पड़ता. है, परिस्थितियों के साथ विरोध होता है। अगर कोई दस-पांच जनों के वीच सर ऊंचा रखकर जीना चाहता है, तो उसकी लड़ाई कभी खत्म नहीं होने की । उसे आमरण जूझना पड़ेगा। और अगर कोई सर उठाकर जी नहीं सकता, तो फिर उसका जीना ही क्या ? कुछ लोग महत्त्वाकांक्षा लेकर ही पैदा होते हैं । अन्य लोगों की अपेक्षा इनकी इच्छा और आशाएं भी आकार एवं मायतन में ज्यादा होती हैं । और फिर ऐसे ही लोग देश के और समाज के कर्ता-धर्ताओं के सिरदर्द बन जाते, हैं । ये अगर न रहें तो सरकार चैन की सांस लेगी और मनुष्य के समाज को भी नेतिवाचक शान्ति मिलेगी। जिनको परिस्थितियां अनुकूल मिलती हैं वे किसी न किसी रूप में अपना सर ऊंचा उठा ही लेते हैं। किसीको मां-बाप का असीम प्यार मिलता है, तो किसीको अगाध सम्पत्ति । इनकी वात भी अलग है। लेकिन सरयू? सरयू को छुटपन से क्या मिला, यह कहना मेरे जैसे लेखक के लिए मुश्किल है । क्या नहीं मिला इसकी सूची ज़रूर बना सकता हूं। सरयू ने आंखें खोलते ही देखा, मैना के पास जो कुछ है उसके पास नहीं है। मैना के पिता नौकरी करते थे, उसके पिता नहीं। मैना के बाबूजी उसे प्यार करते थे, सरयू के पिता उसे प्यार नहीं देते । मैना की मां थी, उसकी नहीं । उसको तो बस एक धाई मां थी, जो तनख्वाह पर नौकरी करती यी, रिश्ते में कोई नहीं थी। इस तरह हिसाव लगाकर सरयू ने देखा कि संसार में जो सब कुछ रहने से आदमी सुखी रह सकता है, उनमें से उसके भी नहीं था। राजशाही में उसके घर के पास ही एक ताल था । एक दिन बिना किसीको कुछ कहे वह वहां चली गई । अगाध जल से ताल छलछला रहा था, इतना पानी मानो मनुष्य के सारे दुखों को मिटा सकता है । उसे लग रहा था कि एक डुबकी लगाने से उसके पास जो कुछ अब तक नहीं था वह सब मिल जाएगा। अचानक उसे ऐसा अनुभव हुमा जैसे चारों तरफ एक हल्ला-सा हो रहा . पास कुछ - ८६ है । उसने यासे उठाकर देखा-पिताजी सामने पड़े थे। 'मां, मां को रट मुह में थी। बास-पास के लोगों में से किसीने कहाइस सड़की को देखने के लिए घर में कोई नहीं है क्या ? सरयू को लगा-यह कोई बडे डाक्टर हैं। सरयू के पिता ने कहा-क्यो ? घर में इसकी मां है। -~-मां है? मैंने तो सुना कि इसकी मां नहीं है। ~~पया कह रहे हैं डाक्टर माहब । मा तो मभीको है। किसकी भी नहीं है, गहिए । मेरी मा है, आपकी है, उमी तरह मेरी सरयू की भी मां है। सारे विश्व ब्रह्माण्ड को मां ही तो देख रही है, चला रही है नहीं तो दुनिया का क्या हाल होता? हरिहर को जो लोग जानते थे वे बोलने लगे-यह तो पिशाव है । नर- पिशाच । अगर श्मशान में विचरण करने का इतना ही गौर है तो फिर शादी करने की क्या जरूरत थी ? और अगर शादी की भी, तो लड़की के बाप फो पया जरूरत थी? लड़की को जन्म देने पर उसकी सुख-सुविधा तथा शादी की व्यवस्था तो करनी ही पड़ेगी। उसके बदले 'मो मा' को रट लगाने से लड़की क्या कभी माफ करेगी? हरिहर लड़की को समझाने-~-जीवन की मुक्ति रुपयों मे नही बेटी, भक्ति मे है । भगवान के प्रति भक्ति, निष्काम भक्ति । निष्काम भविन पो समाने लायक उन सरयू की तो थी नही । वह तो उम समय माड़ी, गहने और मुन्द- रता चाहती थी, और पायद एक पति भी । गाव की और लड़कियां जो कुछ चाहती पौं सरयू भी वही चाहती । इगलिए पिता की बात सुनकर भी वह कोई जवाब नहीं देती। सोचती रुपये नहीं हैं, इसीलिए पिताजी उसे भक्ति की बातें सुनाते हैं । जो आदमी उसकी मां की हत्या कर सकता है, उसके मुह से भक्ति की बात सुनकर सरयू को पिता पर वृणा हो जाती। वकील ने पूछा-जब तुम्हारे पिता ने तुम्हारी मां की हत्या की, तो इसके लिए उनपर कोई मुकदमा नहीं चला ? सरयू बोलो असल में पिताजी ने मो का सून नहीं किया था। मैंने भी पहले ऐसा ही सुना था। मेरी उम्र कम थी, इसलिए मेरी महेली मना जो कुछ भी मुझे कहती, उसे मैं सच समझती। उसी मुझे ऐग 11 1 EN मेरा जीवन वर्वाद कर डाला। असल में मेरी मां किसी भयानक बीमारी में चल बसी थी । पिताजी की गलती सिर्फ इतनी ही थी कि किसी बड़े डाक्टर को दिखाने के बदले वह श्मशान में जाकर मां काली से प्रार्थना करते रहे । जब मुझे यह मालूम हुआ, वहुत देर हो चुकी थी। पिताजी तब तक जीवित नहीं रहे । मगर रहते तो उनके पैर छूकर मैं उनसे अपने सभी अपराधों के लिए माफी मांगती। । - १४ इस तरह मुकदमे की कई तारीखें बदलीं । सरयू गवाह के रूप में अपना वयान देती। पुलिस की कड़ी निगरानी में निशिकान्त भी अदालत में बैठा रहता। वह सब कुछ चुपचाप सुनता रहता । किसी भी दिन उसके चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं दिखाई दी। वह निर्विकार, निरासक्त हो केवल सरयू की तरफ देखता रहता । कोर्ट-रूम भीड़ से भरा रहता । जो खुद हत्या नहीं कर सकते, पर खून की वासना जिनमें रहती है वे अपनी भूख कोर्ट-रूम में वैठकर मिटाते हैं। लेकिन मेरी दिलचस्पी और कारणों से थी। सरयू के इस मुकदमे से जैसे मेरी दिव्यदृष्टि खुल गई। सच में, हम कितनी आसानी से किसीके भी सम्बन्ध में एक मनगढन्त-सी राय बना लेते हैं और केवल किसीका बाहरी रूप ही देखकर किसीकी मीमांसा करने बैठ जाते हैं खर, अन्त में राजशाही में ही सरयू को देखने के लिए वर-पक्ष के लोग आए। पूछा-खाना-वाना बना सकती हो ? सरयू ने सर हिलाकर 'हाँ' कहा । फिर प्रश्न हुआ-एक वार कमरे के इस कोने से उस कोने तक जरा चलकर दिखामो वेटी, देखें तुम कैसा चलती हो । सरयू ने वैसा ही किया । -तुम्हारे पैर में यह दाग कैसा है ? पर में कटे का एक निशान था। बचपन में वह ताल में नहाने गई थी, और वहीं किसी तरह चोट आ गई थी। वात कोई गम्भीर नहीं थी। कितने ।
ही लोग गिरते-पहने हैं, पर में चोट मो भाती है, शरीर के किनी में कोई विरस्यापो दाग भी रह हो जाता है, लेकिन इनके निरनिराकानी नहीं रखती। लेक्नि सरयू का भाग्य ऐसा ही था कि उसी एक मामूली वजह से बार-बार शादी के रिस्ते टूटते गए। लेकिन क्या मच में ही इसके लिए विसीका विवाह हा जाता ? रार- माही के एक छोटे से गांव की लड़की होने के कारण सा उनको शादी हो नहीं होती? फिर अन्त में जब मना की शादी भी हो गई तव सरयू को लगा कि अब उसकी शादी को कोई नाता नहीं। पाई मां टांडम बंधाडी-- मत रो बेटी । दुख मत कर । भगवान को याद कर। देश रहो हो न, मालिक तुम्हारी शादी के लिए कितनी चेष्टा कर रहे हैं । अन्त गुस्सा जाती । चिल्लाकर बोलती-तुम मेरे सामने से निकल बायो। तुम्हारा मुंह मो नहीं देखना चाहती । तुम्हारे लिए ही तो पिताजी ने मेरी मां को मार डाला है । उस दिन ताल में डूब मरती तो अन्छा होता। तुन लोगों ने क्यों मुझे बचाया । तुम ही इस घर को बांदो की जड हो। इस घर से चली जाओ, नहीं तो मैं नहीं बचूगी। इसके जवाब में पाई मो दुध भी नहीं कहती। बस, उदास होकर कमरे से बाहर चली जाती। खर । सरयू अन्ततोगत्वा ससुगल गई हो। समुराल पहुंचकर वह अपने बचपन की वात सोचा करती। ओ भर आती। बचपन से ही सगु. राल के लिए उसके दिमाग में एक धारणा थी-बड़ी सुन्दर-सी । पहो उसे अपार मुख मिलेगा। यह वहां की गृहलक्ष्मी होगी। सारा-मगर उसे पेटी की तरह प्यार करेंगे । कोई उसे 'भाभी' यहकर पुकारेगा तो कोई पर। "उसके नाम से केवल एक आदमी बुलाएगा। लेकिन से ही उसकी धारणा को धसा लगने लगा। आदमी बड़ा अच्छा पा-सीधा और सरल। पर की उमा भी । रख पाता । सरयू देखती-सबके खाने की थाली में दाल-भात, सब्जा, उली रहती, पर उसके पति के लिए कुछ नहीं। तात जब कहती-बहू, कान्त नाया है उसकी बाली लगा दो तो सरयू पूछती-उन्हें मछली ही दोगी मां? आप शायद देना भूल गई। सास बोलती-अव और मछली तो है नहीं, सब खत्म हो चुकी। कान्त ऐसे भी पसन्द नहीं करता। सरयू बोलती-कढ़ाई में तो है, दीजिए न ? -कैसी बात कह रही हो बहू ? तुम्हारे कूड़े ससुर के लिए इतना रख छोड़ा है, तुम्हारी नजर उस तरफ भी है। कैसे घर की हो । वाप ने इतनी भी शिक्षा नहीं दी ? मैं श्रीकान्त की मां हूं, मुझसे अधिक तुम्हारी उसकी... इसके बाद सरयू कुछ नहीं बोलती। थाली दालान में रख आती। श्रीकान्त भी एक निरीह बादमी की तरह दिन-भर खेत पर काम करता। वह भी संयुक्त परिवार का एक सदस्य था, पर सबसे अधिक काम उसे ही करना पड़ता । पर खाने के मामले में उसके प्रति पूरे घर की अवहेलना होती। इसके लिए भी श्रीकान्त के मन में कोई शिकायत नहीं होती। बस, खाने-पहनने को मिल जाए, चाहे वह जंता भी हो । सूखा खाना, या मैली-फटी धोती, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। घर में किसे अधिक प्यार मिल रहा है या किसकी खातिर हो रही है, यह देखने के लिए उसके पास फुर्सत भी नहीं यी और न ही देखने की आंखें । और इस सम्बन्ध में उसे कुछ कहा भी जाता तो वह गुस्सा जाता। कहता-सरयू, इन सब बातों को लेकर सोचा मत करो। मुझे तो कोई कष्ट हो नहीं रहा है। सरयू बोलती-तुम्हें न सही, मुझे तो कष्ट पहुंचता है। -तुम क्यों व्यर्थ में दुख पाती हो ? -मैं मगर तुम्हारे लिए न सोचूं तो क्या करूं, यही बताओ। श्रीकान्त बनायास कह देता-क्यों ? रसोई में जाकर खाना बनाओ, भाभी और मां के साय-साय काम में लगी रहो। उन्हें सहायता दो। इतनी बड़ी गृहस्थी में काम-काज को क्या कमी । धान उवालो, कपड़े धोओ, गोवर लीपो। सब लोग काम के पीछे परेशान रहते हैं-तुम उनकी मदद करो। सरयू बोलती-तुम क्या समझते हो, मैं यह सब कुछ नहीं करती? -- ६० ? ? गोबर लीपना, पान उबालना, कपड़े धोना छोड़कर क्या मैं साज-शृंगार कर मेम बनी फिरती हू ? उपन्याम पढ़ती रहती हूं? श्रीकान्त झट समझौता कर लेता। कहता--तुम मुझपर नाराज मत हो, मैं तुम्हें ऐसा नही कहना चाहता था। -अभी-अभी तो ऐसा ही कह रहे थे ? श्रीकान्त बोलता-मेरे पास इस समय ज्यादा समय नहीं है । खेत में जन-मजदूर खट रहे हैं, आज दम बीघा जमीन पर हल चलाया जाएगा, मजदूरों के नाश्ते का इन्तजाम करना है। काम ठीक से चले इसकी निग. रानी करनी है। रात को लोटकर तुम्हारी यात सुनूगा। सरयू बोलतो-रात को भी तुम्हारे पास वक्त कहा होता है ? पपा तुम्हें मैं नहीं पहचानती ? आते ही चन की नीद सो जाओगे। -वाह । मैं केवल सोता हूं ? तुम्हें प्यार नहीं करता? कहकर सरयू की तरफ बढ़ता । सरयू दूर हट जाती। योलती-रहने भी दो, वमा दिखावटी प्यार मुझे पसन्द नहीं। जाओ, तुम्हारे काम पर आने में देर हो रही है । हर्जा होगा। श्रीकान्त को और कोई उपाय नही सूझता । कहता--तुम तो काम पर निकलते समय नाराज हो रही हो । अब मैं क्या करूं? -करोगे क्या ? तुम्हारे लिए जब तुम्हारा काम ही बड़ा है तव काम ही करो। मैंने तुम्हें रोक नहीं रखा है। -तो फिर तुम मुस्कराओ। तुम्हारा हंसता हुआ चेहरा देखकर जाऊंगा । जरा, हसकर बातें करो। -हंसी ? जब मैं मरने लगूगी तव हंसूगी। उससे पहले नहीं। --कैसी फालतू बातें कर रही हो ? मैं घर से निकल रहा हूं और तुम भमंगल की बात कर रही हो? -अमंगल कसा ? तुम्हें तो कुछ भी फर्क नहीं पड़ेगा। तुम अपने प्यार के जन-मजदूरों को खिलाओ ताकि वे तुम्हारे काम में फांकी न दें। यस तुम्हें तो स्वर्ग मिल जाएगा। मैं मरूं या जोऊ, तुम्हें इसको चिन्ता हो । क्या? श्रीकान्त को गुस्सा आ जाता । यहता-तुम मुझ कोधित करना चाहती हो । मैं सोचता हूं कि माया गरम न करूं पर तुम इसी पर तुली हो । वता सकती हो कि मेरे क्या करने से तुम सुखी रह सकती हो, हंस सकती हो ? तुम क्या चाहती हो-मैं खेत पर न जाऊं, कामकाज सब छोड़-छाड़ तुम्हारा मांचल पकड़कर घर बैठा रहूं? और अगर ऐसा नहीं चाहती हो तो मैं दीवार से अपना सर फोड़ लेता हूं, कहो क्या चाहती हो तुम? यह सुनकर सरयू गम्भीर हो जाती। कहती-तुम किस दुख से अपना सर फोड़ोगे । सर तो मुझे फोड़ना चाहिए। शायद मेरा कच्चा ताज़ा खून देखकर तुम्हें होश आ जाए । कहकर वह साड़ी के पल्ले से आंखें ढककर कमरे से बाहर चली जाती। श्रीकान्त पीछे-पीछे दौड़ा जाता। पुकारता-सरयू, सुनो भी, सुनती जाओ। श्रीकान्त कहता -तुम्हारी बहू सरयू श्रीकान्त को जवाब नहीं देती, बदले में श्रीकान्त की मां आती पूछती-येटा, तूने बहू को कुछ कहा है क्या ? -क्यों? -वह रो रही है । तूने उसे जरूर कुछ कहा होगा। क्यों रो रही है, यह मैं कैसे बता सकता हूं, तुम्ही बेहतर जानती होगी। -बिना कारण तो कोई रोता नहीं, कहो क्या बात है ? कुछ कहा है उससे ? श्रीकान्त कहता-मुझे कहने की क्या जरूरत है। लेकिन मेरी थाली में ढंग का खाना नहीं रहता, मछली नहीं रहती, दशहरे में सबके नये कपड़े बनते हैं, पर मेरी वारी आती है तो पैसे घट जाते हैं, मैंने इसके लिए तुम. लोगों को कभी कुछ नहीं कहा। मैं दिन-भर खटता रहता हूं और बड़े भैया हवा खाते फिरते हैं। याना, नाटक में व्यस्त रहते हैं, इसके लिए मैंने. पिताजी, भैया-भाभी या तुम्हें कभी कुछ कहा है ? श्रीकान्त की मां अपने गाल पर हाथ रख अवाक् होकर सुनती। बोलती-तुझसे यह सब बहू ने कहा है ? इतनी छोटी बुद्धि की है ! श्रीकान्त तुरन्त समझ जाता कि पत्नी के विरुद्ध यह सब कहना अन्याय है.। अपने को झट सम्भालकर कहतावहू की बात छोड़ो मां, उसने क्या - १२ कहा और नहीं कहा। लेकिन मेरी बातों के जवाब में अगर मा पहना है तो कह सकती हो नहीं तो फालतू बातें कहने-गुनने के लिए मेरे पास पा नहीं है। याज दप्त बीघा जमीन में हल चलाया जाएगा। देरराम करती है, घर में खाने वाले लोगो की कमी नहीं, लेकिन माग गारा मुझे ही माला पडता है, क्यों? याहने-कहते श्रीकात कुछ अनमना-सा हो जाता। शापर काम की बात सोचने लगता । पाहता-मैं चल पा हूँ, मा, लोटा नाग हो जाएगी। और इतना कहकर जल्दी-जल्दी गत पी तरफ पारग यहा देता । घर के मालिक प्राणान्त यूट हो मुके थे। उन्होंने अपंग होनी सम्पत्ति हाट्ठी की थी । जवानी में बैल की तरह पटते थे, पात भी नगी मावा में थे। पका हुआ पूरा कटहल अकेले ही पा जाते । जी-जान गे परि. श्रम कर, उन्होंने रोती-बाडी, जमीन-जायदाद यनाकर अपने को गाय प्रतिष्टित कर लिया था। चार गज की एक छोटी धोनी मेंहीयाना चला लेते । श्रीकान्त पिता पर हो गया था। प्राणकान्त भी दिन-भर मेत में काम मारफे यक-मदि पीने मर गीधे कुएं पर नहाने चले जाते। बड़ा सदा मागाल वारसी मरमही फरता, सिर्फ मुहल्ले के यग्विनी कुछ भी नल की दुकान पर घटकार नाटक का रिहर्मल करता। जब भूग लगती, गाना गाने में शि परपरा धमरता। प्राणान्त को नहाते-नहाते गमि की पार यानी और वर मारने- शगि! ओ शशि! पत्नी वाकर पूटनी- क्यों, क्या चाहिए? शनि पर परमा। प्राणान्त कहतापिर वह रहता कहां है? मेरे रिमी नाम में काम नहीं करता । तुम उग टगह भी नहीं मानी कि मेरे माप गरा परें। एक लोटा पानी भी अगर मंट पर पदंचा को मगर मग तो बुन जागी । इतनी बार सरनी है रिपती पटी माती" पली दारती-मली है दीदार मंग क्यों नही मत, सनी माय मामी मंत्र दी। सामान बहती दाट शो! कोर आएगा घर से पानी लेने ? और तुम्हारा लड़का केवल अश्विनी कुंडू की दुकान पर अड्डा मारेगा? पत्नी चोलती-अभी बच्चा ही तो है। इसलिए गपशप में फंस जाता है । बड़ा होगा तो गृहस्थी निभा ही लेगा । वह आएगी, ज़िम्मेदारी वड़ेगी। सब ठीक हो जाएगा। प्राणकान्त वात को आगे और नहीं बढ़ाते । केवल कहते-~-तुम प्यार से शशि को विगाड़ रही हो। इसका नतीजा उसके लिए अच्छा नहीं होगा। कहकर वह दालान में ही बैठकर किसी तरह खाना खाकर फिर खेत चले जाते । शशि घर पहुंचकर दरवाज़े पर से ही चिल्लाता-मां, खाना लाओ। थाली देकर मां पूछती-हाथ-मुंह भी तूने धोया है या वैसे ही खाने बैठ गया। पर शशि को बात करने की भी फुर्सत नहीं रहती । जल्दी-जल्दी ग्रास भरता रहता । अश्विनी कुंडू शशि का हमउम्र था, दोस्त था । उसका वाप भारद्वाज कुंड किसी तरह तेल की दुकान वेटे को सौंप गया था। सव तरह का तेल-सरसों, नारियल तथा मिट्टी का तेल वहां विकता था। भारद्वाज कुंडू को लोग भारद्वाज तेली कहकर पुकारते । कुंडू जी कहते-पत्नी हो या पुत्र, रुपया ही सब कुछ है, छाती का बल है । रुपया रहेगा तो दुख भी नहीं रहेगा। प्राणकान्त भारद्वाज कुंडू को कहते-तुम तो पत्नी और पुत्र के बारे में भी कहते हो कि वे तुम्हारे कोई नहीं है, जब तुम नहीं रहोगे तव ? मैं या तुम, अक्षय आयु लेकर तो जन्मे नहीं हैं । मरने पर तो बेटा ही कारोवार संभालेगा । और वे ही लड़के यदि आदमी न बन सके तव ? भारद्वाज कुंडू कहता- तुम्हारा भी क्या कहना ? मेरे मरने के बाद मेरे लड़के ने दुकान चलाई या उसे उठा दिया यह देखने के लिए कौन आएगा ? इस युग में अगर वेटे बाप का दुःखं समझते तो चिन्ता ही किस बात की थी। भारद्वाज कुंडू पहले ही मर गया। प्राणकान्त की तरह अगर उसे जीना पड़ता तो अपनी दुकान देखकर कुंडू दुख ही पाता। उसकी दुकान पर दिन- भर ताश का अड्डा जमता । शशिकान्त भी वहीं रहता ! भारद्वाज कुंडू ने ६४ बड़े शौक से इस दुकान को बनाया था। वह यपने हाथों से तेल तोलता । जहां वह बैठता, उसके पीछे के कमरे में आखों पर पट्टी बांधकर कोल्हू का बैल गोल चक्कर मे घूमता रहता और सरसों के बीच से शुद्ध सरमों का तेल निकलता रहता । उसो बाप की गद्दी पर बैठकर अश्विनी कुडू तल बेचने की बजाय यार-दोस्तो के माथ ताश खेलने में श्यादा रुचि लेता । शाम को इसी दुकान पर नाटक का रिहर्सल होता। कभी नल-दमयन्ती, तो कभी दुष्यन्त-कोति, दान-यज्ञ और कमी पापाणी। रिहर्मल में कमी-कभी रात बीत जाती। दिन में जब इंट और लालपान की होड लगती तब अश्विनी कुंडू की विधवा मा दुकान पर अश्विनी को पाने का तकाजा करने आती। कई बार बुलाने के बाद मजबूरन अश्विनी को खाना खाने के लिए उठना पड़ता । पत्ते ज्यो-के-त्यों रखे रहते। नहाने और खाने के बाद फिर वही से खेल शुरू हो जाता। और फिर सूर्यास्त के साथ-साथ हारमोनियम और तबला बजने लगता। शशिकान्त अच्छा गाना गा सकता था और बाजा भी बजा लेता । अभिनय भी अच्छा कर लेता। प्रधान भूमिका से ही दी पाती । 'दुप्मन्त-कीति' में वह हस्तिनापुरपति राजा दुष्यन्त को नूमिका निभाता । जब तक नाटक का रिहसंल चलता, वह पदो की मावृत्ति करता मां पूछती-खाना खाते समय भी नू या बहरहाता है ? शशिकान्त मन ही मन बड़बड़ाता रहता : तपोवनवासी पवित्र ऋपियों के यज्ञ में हाल रहे हैं विघ्न, ये दुष्ट राक्षस ध्वंस कर उन राक्षसो का लोटा दूंगा में शालि तपोवन की। तपस्वी ऋषियो का प्रत है पुण्यमय और धार्मिक । उन्हें विरदा से मुक्त करा कर हो जाऊंगा धन्य उनके आशीर्वाद से!
- मां फिर पूछती-तू क्या पक रहा है ? शशिकान्त कहता-पत्नी को प्रहार करता है ? क्या कह रही हो मां ?-प्रसेन दुश्चरित्र बन गया है ? यहां कोई है ? प्रसेन को अभी मेरे समक्ष उपस्थित करो! मां कहती है और कुछ दूं वेटा ? शशिकान्त वोलता-मेरी मां, तुम मेरी गर्भधारिणी मां हो, फिर भी शैशव से तुमने जननी की तरह प्रतिपालन किया है, इसलिए तुम्हारे गर्भ- जात प्रसेन को मैं अपने सहोदरतुल्य समझकर अपना भुज-वीर्य-रक्षित सुशा- सित राज्यभार नि:संकोच उसे अर्पण कर रहा हूं। लेकिन अगर प्रसेन दुश्चरित्र है, कुसंसर्ग में जाता है तो- मां समझ जाती कि वेटा नाटक का रिहर्सल कर रहा है। इसलिए लड़के को अनमना देखकर थोड़ा और खाना थाली में रख देती। लड़का पूरा खाना खा नहीं पाता, फिर भी शशिकान्त पर मां का प्यार कुछ अधिक ही था। शशिकान्त क्या खाएगो, पहनेगा, इसपर कभी उसने ध्यान नहीं दिया। फिर धीरे-धीरे बच्चे बड़े हो गए। उनकी बहुएं आ गई। प्राणकान्त भी बूढ़े हो गए । एक दिन उन्होंने श्रीकान्त को अपने पास बुलाया। वोले-~~-मैं आज खेत पर नहीं जा सकूगा । आज से तुम जाओ। मेरा काम-काज भी आज से तुम ही देखा करो क्यों देख सकोगे ? श्रीकान्त वैसे भी धीर-गम्भीर स्वभाव का व्यक्ति था। दायित्व कन्धे पर लेने के बाद वह और भी शान्त और गम्भीर बन गया। उस दिन से सारा भार अनायास श्रीकान्त के कंधों पर आ गया। किसीको किसी भी चीज़ की ज़रूरत होती, वह श्रीकान्त को ही याद करता। खेत और जमीन के अलावा मुंशी और पेशकार का भी काम होता है। ज़मीन का लगान देने के लिए सरकारी सरिश्तेदार और तहसीलदार के पास कचहरी में जाना पड़ता है । यह सब आखिर करता भी कौन ? शशिकान्त कर सकता था, पर उसके पास कुर्सत ही नहीं थी। बस अश्विनी कुंडू की दुकान पर ताश खेलता रहता । प्राणकान्त की पत्नी बोलती-शशिकान्त सीधा आदमी है, यह सब काम श्रीकान्त को ही करने के लिए कहो । शशिकान्त सव विगाड़ 1 कर रयदंगा। प्राणकान्त बोलते-दिन-भर ताग रोलने से कही गृहस्यी चलेगी? उसे ही तो एक दिन सब कुछ संभालना पड़ेगा। यह सुनकर पली पोधित हो जाती । कहती- शशि पर तुम्हारा इवना याक्रोश क्यों है ? श्रीकान्त भी तो बैठा रहता है। वह क्या काम नही कर सकता ? उसे काम पर भेजा करो। -श्रीकान्त बैठा रहता है ? तुम देव नही सकती? आज उसे रेल फी हाट पर भेजा है ? वहा में धान का भाव पता करके आएगा । इस बार महाजन के यहां कुछ धान वैचूगा। यातचीत के दौरान श्रीकान्त आ जाता। पिता की बात वह सुनकर बोलता-या काम है कहिए न पिताजी, मैं उस तरफ ही जा रहा हूँ, कर दूगा । श्रीकान्त भी वास्तव में येशर्म था। बुद्धि-विवेचना की उसमें कमी यी। पर में और वाहर उमे ही पटना पड़ता है, उसका बड़ा भाई ताम सैलता रहता है, नाटक करता रहता है, और वाकी समय अंगडाई लेता रहता है, यह देखकर भी श्रीकान्त अनदेखी कर देता। जब सरयू इस घर की बहू बनकर आई तब उसकी नजर में सब कुछ बहुत जल्दी ही स्पष्ट हो गया। उसने देखा कि उसके ससुर एक तो पूरे और उसपर वातरोग से पीडित-ठीक से चल-फिर भी नही सरते थे। उनकी देखभाल करने के लिए भी कोई नहीं था। जो कुछ देखना था, वह श्रीकान्त नी करता था। पंत से लौटते ही यह बाप को देखने पहुंच जाता। . पिता थेटे से पूछते-परसों कटवाने को कोई व्यवस्था की है बेटा? -हां पिताजी, आज ही से कटाई शुरू हो गई है। -~-मजदूरी कितनी तय की? -डेड रूपये रोज -डेढ़ रुपये ? मैं तो बरावर एक रुपया देता था -आजकल मजदूरी बउ गई है। एक जोड़ी कपड़े की कीमत वीस रुपये हो गई है । मजदूर हायगर पकड़कर रोने लगे, इमलिए 'ना' नहीं कर सका।
है दानव ! ता रहा हूं, दुवारा लौटूंगा नहीं। रात को ही लौटूंगा। -~-मां कहती-नहीं आओगे, मेरी वला से ! मुझे क्या धमकी दे रहे हो ? शशिकान्त को अचानक नाटक का अपना पार्ट याद आ जाता और वहीं खड़ा-खड़ा वह बड़बड़ाने लगता- कोई भय नहीं है मां, स्वर्ग है यह मन्दाकिनी। वह रही यहां नहीं कर सकता कोई जीव हत्या। पर ओ दुष्ट देवता पर आक्रमण बार-बार? वढ़ गया है तेरा साहस तो देख ! देवताओं ने नीति अपना ली है अब जैसे को तैसे की। देखना अव यह है, राज्य टिकेगा और कितने दिनों तक ? अपने पराजय के कलंक को रख दो सम्राट के पैरों के नीचे; रह नहीं सकता स्थापित शासन अत्याचार ? का ! - ससुर प्राणकान्त असहाय-अपाहिज की तरह पड़े-पड़े सब सुनते । वीच-बीच में वे पूछते-किससे बातें कर रही हो ? इसी तरह संसार का चक्र चल रहा था । सरयू सोचती-अगर उसका कोई मायका रहता तो कुछ दिन वहां रहकर आती। कुछ दिनों के लिए तो कम-से-कम चैन की सांस ले सकती । पर पिता की मृत्यु की खवर उसे चिट्ठी से ही मिली थी। खवर पाकर वह रोई नहीं। वाप के लिए हर लड़की के मन में एक समवेदना होती है, लेकिन पिता की मृत्यु ने सरयू के मन में कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं की। श्रीकान्त कभी-कभी कहता-क्या करोगी कहो ? मां-बाप तो चिर- १००
फाल तक किसीके भी नहीं रहते । दुख करने से क्या लाभ ? सरयू बोली-
मुझे दुख तो हो नही रहा है।
श्रीकान्त अवाक रह जाता-दुए नहीं हो रहा है ?
सरयू महती-नहीं। पिताजी के लिए मेरे मन में जरा भी दुस
नहीं। जिस दिन मेरी मां मर गई, उसी दिन से मैंने समझ लिया कि बाप
के घर से मेरा कोई नाता नहीं। कोई उपाय नहीं था, इसलिए मैं यहाँ
रहती थी। मेरे दुख का कारण कुछ और है ।
-बोलो क्या कारण है ?
-तुम नही समझोगे-
श्रीकान्त कहता-में नहीं समझूगा, इसके क्या मानी? तुम्हारी
इतनी बातों को समझ सकता हूं और एक बात नहीं समझूगा ?
-तुम नहीं समझ सकते । अगर समझते तो मुझे दुख हो किस बात
'का था?
-~अच्छा तो तुम बोलकर ही देखो । मैं समझता हूं या नहीं ? तुम्हें
कौन-सा कष्ट है ? मैं तुम्हारा पति हूं? मुझे कहने मे तो कोई हानि
नहीं?
सरयू कहती-तुम सो जानो। नहीं सोने पर तुम्हारी तबियत विगढ़
जाती है।--कहकर वह फरवट बदलकर सो जाती।
धोकान्त कहता-मैं अभी नही सोऊगा । पहले तुम बताओ। मुझे
तो अभी नीद आई नहीं है।
सरयू बोलती-लेकिन मुझे नीद आ रही है। मैं तो कभी सोऊंगी।
--पोड़ी देर के बाद मो लेना-क्या हर्ज है ?
-मेरी लाभ-हानि के लिए तुम्हें सोचने की जरूरत नहीं।
-गुस्सा क्यो कर रही हो सरयू ? यह गुस्मा ही तुम्हारे लिए काल
बन जाएगा, जानती हो? इतना गुस्सा यच्छा नही । वोलो न सरयू, तुम्हें
क्या कष्ट है ?
सरयू कहती हटो। मुझे छुओ मत ।
श्रीकान्त कहता-मैं अच्छी बात कह रहा हूं, और तुम नाराज हो
रही हो।
सरयू झल्लाकर वोलती-अच्छी बात तुम्हें करने की ज़रूरत नहीं। तुमसे अच्छी वातें सुनते-सुनते अव तक मेरे कान सड़ गए हैं । दया करके मुझे और अच्छी बातें मत सुनाओ। मैं तुम्हारे पैर पकड़ती हूं। मुझे थोड़ी रिहाई दो। वात किस तरह विगड़ जाती--सरल-प्राण श्रीकान्त समझ नहीं पाता। बोलता-मैं तुम्हारी वात नहीं समझ पा रहा हूं, सरयू ! फिर थोड़ा आसान बना के ही वोलो। मैं भी समझने की थोड़ी कोशिश करूंगा। -मैंने तुमसे कहा न कि मेरे बारे में तुम्हें सोचने की ज़रूरत नहीं। --मैं नहीं सोचूंगा तो तुम्हारे लिए कोन सोचेगा ? मेरे सिवा तुम्हारा यहां अपना है कौन ? सरयू कहती-दुनिया में जिसका अपना कोई नहीं होता, क्या उसके दिन नहीं कटते ? वे सब क्या मर जाते हैं ? -फिर मरने की बात कर रही हो। ऐसी कौन-सी बात हो गई हैं कि मरने की बातें कर रही हो ?, मेरा कहा कुछ बुरा लगा है ? सरयू बोलती-रात को और मुझे तंग मत करो। दिन-भर. तुम्हारे घर के लोग सताते हैं, रात को तुम सोने नहीं देते, मैंने कौन-सा पाप किया है कि दिन में, रात में, मुझे कोई चैन से नहीं रहने देता । कहो मेरा क्या अपराध है ? श्रीकान्त समझने की कोशिश करता-माथा गरम मत करो सरयू । व्यर्थ में कष्ट पाओगी। मुझे देखो । मुझे देखकर समझो । डेढ़ सौ बीघा जमीन, उसकी देखभाल, खेती, आढ़त का हिसाव, खाद के लिए वी०डी० ओ० आफिस के बावुओं के पास धरना, लेवी के हंगामे, सव मुझे अकेले ही करना पड़ता है, मुझे कोई मदद नहीं देता। भैया को तो देख ही रही हो । केवल नाटक लेकर ही व्यस्त हैं । सरयू कहती-उनका भी क्या कसूर ? तुम्हारे जैसा वेवकूफ भा रहता तो मैं भी उससे बेगार खटवाती। .-वेगार खटना क्यों कह रही हो ! जिसका जैसा स्वभाव है, व वैसा ही करता है । और अगर मैं आज से कुछ न देखू तो कौन देखेगा य सब ? और है ही कौन ? पिताजी तो अशक्त हो गए हैं। - १०२.
सरयू नाराज होकर कहती-तुम बटोन ! मैंने तुम्हें मना ही कंव किया है ? तुम सेतीयाड़ी देखो, जन-मजदूर को मटवानो, आहनियों का हिमाय मिलाओ, वी० डी० ओ० आफिर दौड़ो, लेवी का हंगामा हल करो। यही सब यदि करना था तो शादी क्यों की ? अपने साप मुझे क्यों जोड़ा ? शादी के पहले इतना तो बता देते कि इस पर की बहू बनने पर उठते-बैठते सुबह-शाम केवल लात और गाली गानी पड़ेगी । बाप की गाली सुनाई जाएगी। तुम कह सकने थे कि बडी पेठानी सौरी से निकलती ही नहीं, जिन्दगी भर उसकी सेवा करनी पड़ेगी । यह सब मुझे क्यो नही कहा गया ? मेरी बात का जवाब दो। श्रीकान्त पत्नी का अभियोग सुनकर हतप्रभ रह जाता। सरयू फिर पोलती-~~गूगे क्यों बन गए ? मेरी बातो का जवाब देते नही बन रहा या सुनाई नहीं पड़ रहा ? सच्चो वात गुनाई भी तो नहीं पड़ती! श्रीकान्त बोलता-तुमने अब तक तो कुछ भी नहीं बताया पा। क्या बताऊ, बोलो? जवान से ही मब कुछ कहना पडेगा? तुम देखते नहीं। सब चीजो पर तुम्हारा इतना ख्याल रहता है, केवल मेरे ही बारे में तुम्हे कुछ दिखाई नहीं देता, सुनाई नहीं पड़ता? श्रीकान्त कहता-तुम मच-मच बतानी सरयू, तुमको किमने क्या कहा है ? यब तक मुझे तो कुछ भी नहीं मालूम था । अव वनाओ पया-वया हुआ है ? मैं सबसे इसका जवाब मागूंगा। भैया, मा, पिताजी, किसने तुम्हें क्या कहा है ? -तुम्हारे साने-पहनने के लिए कभी दुछ करती हूं वो बार गाली पानी पड़ती है, क्योकि मैं घर तोडना चाहती हूं। पत्नी होकर पति की मुख सुविधा का रूपास रखना, तुम्हारे इस घर में गुनाह है क्या ? मैं अगर इतनी ही सराव हूं, तो मुझे यहां मारने के लिए रखने की जरूरत ही क्या थी ? मुझे निकाल दो, मैं कही भी चली जाऊंगी। लहरियों की मां का एक घर होता है, भगवान ने मेरे लिए यह भी नहीं छोड़ा। न बार के घर में जगह थी और न पति के घर में जगह मिली। तुममे भीर नहीं मांगती, पर जरूरत पड़ी तो औरों से भोग मांग लगी।
कहते-कहते सरयू विलख-बिलखकर रोने लगती । आंसू बन्द ही नहीं होते। श्रीकान्त का दिमाग काम नहीं करता । वह बिस्तर से उठ जाता, दरवाजे की तरफ भागता । यह देख सरयू डर जाती। पूछती-कहां जा रहे हो? श्रीकान्त कहता-अभी चलकर इसका फैसला करूंगा, तभी मुझे चैन मिलेगा। सरयू श्रीकान्त का हाथ थाम लेती । वोलती-इतनी रात को तुम क्या फैसला करोगे ? सुवह होने दो, फिर देखा जाएगा। श्रीकान्त कहता-नहीं, तुम मेरा हाथ छोड़ दो। सरयू उसे और भी कसकर पकड़ लेती। वोलती-मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगी। श्रीकान्त का पारा चढ़ा ही रहता। वोलता क्यों नहीं छोड़ोगी ? मैं खटता-खटता मर रहा हूं और बाकी लोग मोज कर रहे हैं। मुझे इसका नाज जवाव चाहिए। सरयू कहती-तुम चुप करो। शान्त हो जाओ। लोग मुझे ही बदनाम करेंगे। -तुम्हें क्यों बदनाम करेंगे? -सब यही कहेंगे कि मैंने ही तुम्हें सिखाया है । दुहाई तुम्हारी, किसीको कुछ बोलने की ज़रूरत नहीं। और इस तरह बड़ी मुश्किल से सरयू श्रीकान्त को शान्त कर पाती। अत्यन्त शान्त स्वभाव का श्रीकान्त भी थोड़ी देर के लिए गुस्से में पागल हो उठता, पर धीरे-धीरे कीचड़ की तरह नरम पड़ जाता । पहले की तरह खेती-बाड़ी में जुट जाता । घर में उसकी एक व्याहता पत्नी थी, यह भी भूल जाता। - सरयू की कहानी कोई एक दिन में खत्म नहीं हुई । सरयू की बार १.४ मुनते-सुनते मेरी भी दिव्यदृष्टि मुल गई। कभी किमी एक साधारण-मी सड़की को रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर देखा, और घटनाचक्र से इसी शहर कलकत्ता में दुवारा एक अजीब माहौल में उममे भेंट हो गई। उसके बाद उसे रोकर मैंने एक कहानी भी लिय डाली थी। उम समय लगता पा कि उसे देखकर ही उसे पूरी तरह ममा गया था, लेकिन मर कुछ उलट- पलट गया। अब लगता था कि अब तक का मेरा देखना-गुनना-जानना, सब इस खून के मुकदमे में वेकार मिद्ध हो गया। मरयू ने मुझे बेवकूफ माबित कर दिया। उसके आगे मैं हार गया । हमेशा की तरह इस दिन भी कोटरूम मे भीड थी। जिन्हें बैठने को जगह नहीं मिली, वे पीछे की तरफ खड़े थे। वकील के प्रश्नों का जवाव सरयू घट-घट देती जा रही थी। उसकी मुद्रा वही थी । सर पर कपड़ा । सर झुकाए । अपनी कहानी में मानो वह अपने सारे जीवन की परिक्रमा कर रही हो । मनुष्य किसी एक पर मे पैदा होता है, मां-बाप को स्नेह-छाया मे वडा होता है, उसके बाद मसार-आश्रम में प्रवेश करता है, और संसार के सुग्न-दुख में फमकर एकाएक जीवन के किनारे आ पहुंचता है । और फिर अचानक ही इलहोक का हिमाद पुका- कर परलोक के इष्ट-अनिष्ट की चिन्ता में लग जाता है, यही मनुष्य-जीवन का साधारण-सा नियम है । लेकिन सरयू का जीवन कुछ और ही था। उसकी जीवनधारा की गति बड़ी विचित्र थी। उस दिन सुबह से ही उसकी एक आंग फड़क रही थी । वचपन में ही सरयू ने यह संस्कार पाल रखा था कि एक थाख फड़कने से कोई अमंगल होता है। श्रीकान्त की नीद सुबह जल्दी खुलती थी. उमे सेत पर जाना होता पा। जब से स्वदेशी युग आपा, कृषि-कायं मे समेने भी बढ़ गए थे। प्राणकान्त हालदार के जमाने में ऐसा नहीं था। धान-गेहूं की फसल उगाओ --और साल-भर का अनाज अपने गोदाम मे भरकर छुट्टी मनाओ। फिर भारद्वाज तेली की दुकान पर जाकर ताश खेलो, तम्बाकू पियो और साल से मछली पकड़ो। और घर पर पली हर साल बच्चे पैदा करती रहती। पर अव युग पलट गया था। कय तो एकाएक हिन्दुस्तान-पाकिस्तान बन गए , और कब मनुष्य-मध्या पिलपिला कर बढ़ने लगी।द देशी 1 - १०५ - युग आया-~गांव के लोगों को कुछ पता ही नहीं चला। भारद्वाज तेली जब मरा, प्राणकान्त हालदार उसके श्राद्ध में नहीं गए, क्योंकि उन्हें अपनी मृत्यु की बात सता रही थी। पत्नी से बोले-अब मेरा भी जाने का समय आ गया है। अश्विनी कुण्डू श्राद्ध का निमन्त्रण देने आया था। बोला-पिताजी से आपकी दोस्ती थी, आप ज़रूर आइएगा। ज़रूर आऊंगा, तुम चिन्ता मत करो। लेकिन प्राणकान्त दोस्त के श्राद्ध में नहीं जा सके। पत्नी ने पूछा भी क्यों जी, गए नहीं ? -कहां ? --क्यों ? कुण्डू जी के श्राद्ध पर? प्राणकान्त बोले-मेरे श्राद्ध का भोज कौन खाएगा, 'उसका तो कोई ठीक नहीं और मैं जाऊं उसका भोज खाने । तुम लोगों की इच्छा हो तो जाओ। उसी समय से प्राणकान्त ने घर से निकलना छोड़ दिया। चुपचाप घर की चारदीवारी में पड़े रहते और पड़े-पड़े घर के तमाम झंझटों को सुनते रहते। कभी-कभी उनकी इच्छा होती कि वे शशिकान्त का गला ही घोंट' दें। लेकिन सामर्थ्य नहीं थी। केवल गिड़गिड़ाते-क्या हो रहा है वहां ? शशि क्या बक रहा है ? वुड्ढे को कौन जवाब देता? प्राणकान्त हालदार शशि को गाली बकते-हरामजादे, बेवकूफ । दिन- भर तेली की दुकान पर ताश खेलकर आकर हुकुम चलाता है। पली को भी बुलाते-एक बार इधर आओ न, घर में क्यों इतना शोरगुल हो रहा । पत्नी पास नहीं जाती। बाहर से ही बोलती-बुड्ढे पर सनक सवार लेकिन शशिकान्त को कोई चिन्ता नहीं थी। निर्विकार निरंकुश पुरुष' था वह । याता और नाटक के बीच रहकर अन्त में उसने शराब भी पीना शुरू कर दिया था। कई बार रात को नशे में धुत बेहोशी की हालत
--
पर पहुंचता।
शशिकान्त को मां सब कुछ जानती, कभी-कभार बेटे को पूछती पी.
तू पीता क्यों है, यह गन्दी आदत शिससे सोखो ?
बेटा इसके उत्तर मे नाटक का पाटं दुहराता-
प्रासाद मेरा है कारागार
विक्षिप्तों वा!
गान समझकर उन्मादी की तरह वरता हूं
समय बढ़ता है आगे
अपनी रफ्तार से।
प्यासी हो उठी है तलवार खूयार
मांगती है खून के बदले खून
उसकी मां सब कुछ जानकर भी पुप रहती। बेटे को प्रश्रय देती।
कहती-इतना चिल्लाकर बातें मत कर शागि । वाबूजी जगे पई है, मुन
लेंगे।
शशि कहता-चिल्लाऊंगा नही तो सभा के सारे लोग मुन की
पाएंगे।
रात को सस्य श्रीकान्त से कहती-तुम रोती-बारी लेकर ही व्यस्त
रहते हो, मुझे इस घर में रहना अच्छा नही लगता।
श्रीकान्त पूछता-क्यो?
- तुम नहीं समझोगे !
-अरे, कहकर भी तो देणे न !
सरयू कहती-किसी-विमी दिन मैं परंशान-सी हो जाती हूं, पाहा जाऊं,
क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आता। ऐसा ही भाग्य है मेरा कि बाप मा
पर भी नहीं । यहां तो मैं जल-भुन गई हूं।
तुम किस बात में झुलस रही हो। अगर समझाकर बहोगी
नहीं तो मैं बाषिर समझूगा कसे ?
सरयू गुस्सा कर बहती-पुप भी हो जाओ। तुम्हारे मे आदमी के
हापों मे पड़कर ही मेरी इतनी दुदंशा हुई । तुमने मुझने गामे यो यो?
श्रीकान्त बोलता- देयो तुम फिर वही यात बह रही हो। यह तो मैं
। । बहुत बार सुन चुका हूं। लेकिन मैं कर भी क्या सकता हूं, वोलो ! बोलो ! मेरे क्या करने से तुम खुश रह सकती हो, सुखी हो सकती हो? -तुम्हें कुछ करने की ज़रूरत नहीं। कहकर सरयू या तो कमरे से निकल जाती या फिर उसी समय सास की आवाज़ आती-~श्रीकान्त वेटे, तुमसे कोई मिलने आया है। ज़रूर जमीन-सम्बन्धी कोई बात होगी। श्रीकान्त उसी हालत में वाहर चला जाता। पर उस दिन श्रीकान्त को क्या पता था कि यह जाना उसका आखिरी जाना होगा और सरयू ही क्या जानती थी कि यह आदमी फिर लौटकर नहीं जाएगा। घटना उसी दिन दोपहर को घटी । और दिन की ही भांति शशिकान्त खाने आया था। खाने में उसे वरावर ही जल्दी रहती थी, क्योंकि कुण्डू की दुकान पर ताश को वंटी पत्तियों को वह छोडकर आता था। आज वह माया ही था कि उसकी बड़ी लड़की ने आकर कहा-~चार पैसे दीजिए बाबूजी। -पसे ? पैसे क्या करेगी ? जा मेरे पास नहीं हैं। दादी मां ने प्यार से लड़की का नाम लक्ष्मी रखा था। पर नाम लक्ष्मी होने से क्या होता, वह इतनी जिद्दी थी कि अगर कोई चीज़ चाहिए तो जब तक उसे हासिल नहीं कर लेती, जीना मुश्किल केर देती थी। लक्ष्मी जिद्द पर अड़ी रही--मुझे पैसे चाहिए । आइसक्रीम खाऊंगी। शशिकान्त खाना खा रहा था । उसे भी गुस्सा आ गया। बोला-कह रहा हूं न कि पैसे नहीं हैं मेरे पास । फिर भी घनघना रही है। --पैसे मुझे देने ही पड़ेंगे । सबके पिताजी तो पैसे देते हैं । सास खाना परोस रही थी। वाली-खाने के समय शोर नहीं मचाते, लक्ष्मी। जा, खेल जाकर ! अचानक लक्ष्मी बोल उठी-खाने के समय न कहूं तो किस समय कहूं ? ताश खेलने के लिए तो पिताजी के पास पैसों की कमी नहीं होती ? तव पैसा कहां से आता है ? शशिकान्त और नुप नहीं रह सका, जूठे हाथ से ही लक्ष्मी को चटा- चट कई थप्पड़ जड़ दिए।
थप्पड़ साकर लक्ष्मी जमीन पर गिर पड़ी और जोर-जोर से चिल्लाने लगी। शशिकान्त भी गुम्मे में चिल्ला रहा था-इतनी हिम्मत इस छोकरी की ? मुझे कहती है, में जुआ सेलता हूँ ? गेलता हूं तो क्या तेरे बाप के पैसे से सेलता हूँ ? हरामजादी कही की! प्राणकान्त अपने कमरे से चिल्लाने लगे- लक्ष्मी क्यो रो रही है ? क्या हो गया ? उस समय किमको फुसंत थी कि बूढे आदमी को जवाब देता । सरयू वो जेठ के सामने जाने की हिम्मत नहीं थी, फिर भी लक्ष्मी के गिर पडने पर सरयू उसे गोद में उठाकर उसे चुप कराना चाह रही थी। लेकिन शशिकान्त इमे सहन नहीं कर सका । बोला-बहू, तुम इस जलील लडको को छोड दो। यह बाप को गाली बकती है, मैं आज उसका खून कर सलूगा । साम ने सरयू से कहा-लक्ष्मी को तुम अपने कमरे में ले जाओ बहू । शशिकान्त रास्ता रोककर सहा हो गया। इसी बीच बूढे ससुर प्राण- कान्त किसी तरह लगडाते हुए पटनास्पल पर आ पहुंचे। बोले-इतना हल्ला क्यों मचा रखा है ? क्या समझ रणा है अपने को ? दशशिकान्त का दिमाग गरम पा ही । वोला-मेरा मिजाज चढ़ा हुआ है तो आपको क्या? आप अपने कमरे में जैसे पड़ थे, पड़े रहिए । यहाँ गिडगिड़ाने की जरूरत नहीं। - क्या ? तूने इतनी बड़ी बात मुझसे कही ? मैं तेरा बाप होता हूं। शशिकान्त वोला-बाप है तो क्या ? मुझे परीद लिया है क्या ! मैं अपनी लहकी को जो चाहे कहूं, इसमे आपको क्या ! प्राणकान्त बोते-चुप रहो। किसके साथ किस तरह बात परनी चाहिए, तुम्हें इतनी भी अक्ल नहीं। -सूब जानता हूं। मुझे शिक्षा देने की जरूरत नहीं। --पया महा! शगि बोला-जो मैंने कहा वह बापने ठीक ही मुना। सास अब तक सब कुछ चुपचाप सुन रही थी। अब बोली-राशि, तू पुप कर जा । बूढ़े आदमी के साथ तकरार करने की जरूरत नहीं। शशि बोला-बुड्ढे से क्या मैं बात करने गया या । वडा र । ! - तो गरजू होकर लड़ने आया है ! प्राणकान्त खड़े-खड़े हांफ रहे थे। लडके की बात सुनकर स्तम्भित हो गए। बोले-शशि, तू इतना गिर गया है मुझे अन्दाज़ भी नहीं था। मेरा खाकर मुझपर ही गरजता है। तू अभी मेरे घर से निकल जा। ~खबरदार ! जो मेरे शरीर पर हाथ लगाया । शशिकान्त चिल्लाया। फिर सारा मकान मानो एक क्षण में एक बारूद का गोला बन गया। शान्त और गम्भीर स्वभाव के प्राणकान्त, जिन्होंने कभी ऊंची बोली में किसीसे वात भी नहीं की थी~आज किस दुर्मति से अपने ही आत्मज के सामने खड़े थे। उनकी नंगी छाती की हड्डियां लोहार की धौंकनी की तरह कांप रही थीं। बोले-शशि, 'तू मेरे 'घर से निकल जा-अभी तुरन्त ! मैं तुझे इस घर में नहीं रहने दूंगा। शशि बोला--मैं अलवत्ता यहीं रहूंगा । अपनी खुशी से रहूंगा। मुझे इस घर से निकालने वाले भाप कौन होते हैं ? ---तो यह बात है ? बूढ़े होने पर भी प्राणकान्त उस दिन गुस्से में अधीर हो गए । क्रोध में । आकर बेटे की तरफ दौड़े-~पर शशि ने उससे पहले ही उन्हें एक धक्का दिया। प्राणकान्त का बूढ़ा शरीर ज़मीन पर जा गिरा---ठीक उसी मुहूर्त में श्रीकान्त घर लौटा । खेत से थका-हारा लौटा था। प्यास बुझाने के लिए एक लोटा पानी मांगने ही जा रहा था कि आंगन में नज़र पड़ी। फिर तो उसके दिमाग पर भी खून चढ़ गया । दौडकर वाप को उठाया, फिर शशिकान्त की तरफ देखकर वोला-भैया, यह तुमने क्या किया ! पिताजी को मारा! ---ठीक किया है। अपनी खुशी से पीटा है । कहकर न जाने क्यों शशिकान्त ने कोने में पड़ी एक बी को उठा लिया। श्रीकान्त बोला-नशे में आकर क्या करने जा रहे हो भैया ! होश खो बैठे हो क्या? -क्या कहा तूने ! स्वभाव से चाहे श्रीकान्त कितना ही नरम क्यों न हो, पर वह था ११०
शक्तिशाली पुरुष । उसने झट शशिकाल के हाप से पाणीगतीमोरा
भरी दुपहरी में दोनों भाइयों के बीच हाथापाई होने मपी। मी मा.
झपटी में वह बर्थी एकाएका गाशिफान के गले में सिंध गई।
शशिकान्त के मुह से 'बाप रे' का एक मारांनाद निकला।
उसके बाद धूप से नहाते हुए उग आंगन में जो एकापामा कर
बहुत ही अप्रत्याशित और भयावह था। शिान्त ये भसारा भागों
ने देखा, शशिकान्त के गले से सा की यार निकालकर आगर की पट्टी
काली कर रही है।
आधे घण्टे के अन्दर ही टापटर आया, और लिग भी पाई ।
डाक्टर ने शशिकान्त को देते ही मुह फेर लिया-पद माधा पण्टा पहले
ही मर का था।
वीर ने पूछा।
उनके वाद
-टमरे वाद रावगाही या बदालत में मरे पति मून के राय में
को गए। हम लोगों की गुहायो मटियामेट हो गई। गारी गगनी.
नाही अगदमे में मार हो गई। परियार के योग निगमण, पिन
होकर एक-दृमरे में बम हो म । मान-ममुर की मृत्यु मा रान
ही हो गई थी। हमदर रह गा- और मंगवर।
आपरावर!
हां, आमामी दिगियानहाटारमंग देवर है।
-यह बार याद ही है!
नितिन मंग माता देवर है। मोदिन मटर मामार
सिं दार कार्ड में आता में देशदाता
बनी है। निदानका दिदा मार्ग
नमावि नग्गिा देवा । पूरकार दान
त्र, पन्नं वादा का ग्राम में मां काम
। । मेरी शादी के समय वह कोलियरी में नौकरी करता था, बाहर ही रहता था। नाज हालात ने उसे शरावी बना दिया है, लेकिन किसीने उसे जानने की कोशिश भी नहीं की, समझने की कोशिश नहीं की। गरीवी ही हमारे जीवन के अध:पतन का कारण है। उसी गरीबी को दूर करने के लिए मैं नेपाल से गांजा लाती थी। हमने तस्करी करके पैसा कमाया, ताकि उन पैसों से हम लोग फिर सर उठा सकें। पति को जेल से मुक्ति दिलाने के बाद उसे सुख पहुंचा सकें। लेकिन उस काम में भी बाधा आई। पुलिस के आतंक से माणिकतला में मल्लिक वाबू के वीस रुपये के कमरे में जाकर सर छुपाना पड़ा । सभी यही समझते कि हम पति-पत्नी हैं । हमने अपना रिश्ता दूसरों को नहीं बताया, क्योंकि दुनिया के लोग उसमें आपत्ति उठाते । देवर और भाभी एक मकान में एक ही कमरे में सोते हैं, पर रिश्ते में ज़रा भी मालिन्य नहीं, यह कोई नहीं विश्वास करता। पर दुर्भाग्य है, मल्लिक वावू जैसे बुजुर्ग आदमी ने भी हमारी गरीबी का फायदा उठाना चाहा । मल्लिक बाबू से बचने के लिए ही अखवार में विज्ञापन देखकर मैंने दरख्वास्त दी और नौकरी कर ली। -~~-आपके देवर ने इसपर आपत्ति नहीं की ?-वकील ने पूछा। मापत्ति की थी। पर आपत्ति से क्या पेट भर सकता है ? मेरी दशा मेरे देवर से देखी नहीं गई-नौकरी के लिए वह पागलों की तरह घूमता रहा । सोचा था भाभी को लेकर अच्छी तरह सम्मान के साथ जीएगा। पर कौन देता है अनजान गरीव को नौकरी ? दुश्चिन्ता और विपत्तियों के बीच उसका मन विल्कुल टूट गया । -मुजरिम अगर आपके देवर हैं तो आप लोग पति-पत्नी का परिचर क्यों देते रहे ? वोली-~-ऐसा नहीं करते तो कोई किराये पर मकान देता ? आ निशिकान्त को छोड़ दीजिए, धर्मावतार ! इस दुनिया में मैंने जो कुछ है, पाप ही किया है। पर मेरे पाप का दण्ड मेरे निरपराध देवर को दीजिए । सज़ा मुझे दीजिए ! यह कहते समय सरयू एक ढही हुई दीवार लग रही थी। अब तक संयम मानो वांध नहीं मान रहा था। मुझे लग रहा था जैसे वह वेहोश - सरय कुछ किर । ११२ 7 जाएगी। सेमिन अमोम सपम से वह भनेको हो। इसी तरह रोज कमारो पर होने का HIM पारे दादी कोठी मे यापम पली माती। मैं मरय से यात करना पाहता पा। एक दिन कहा गग्य, गुनो। चारो तरफ भीड पी, साग रारपू गो की RAT थे। मेरी आवाज सुनकर उमा पी0 YEAR INRITAmi, Her) नहीं। गाडी में बैठकर परली गई। भारानी || गाडी मेरे सामने मे धुमा उनी ती गई। भीड-भरी उस राहा पर मैं EिRTILIT iii in क्या हुआ? मेरे जीवन को मारी रपनाए, जीगर funा, Ammun.m मामूली लड़की ने एक क्षण में गला गान M. Om AAMIT में में रिक्त हो गया। अमहाय, गरानिगा I min लडकी के था। १८ लैरिन टम ममय तक भी मी मी मामाtainment मी विम्मय बाकी है। दूसरे दिन मागम में प्राग की rint m; निम्न बन, पंगकार, मुगी, मुसार, Marthi जनता भी यौ। मया। माम-7 ar,ar Arment नहीं, अधिकार गागंज tirsinhere - में इस हारकार- ददिम fur दिवटी के कारदार martime शिष्टों के पालनहारे विचारक हैं। निशिकान्त हालदार भी रोज़ की भांति पुलिस के पहरे में था। बहुत दिनों का भूखा और जर्जरित । इतने लोगों की क्रूर दृष्टि की चोट से वह और भी कंकाल बन गया था। पर सरयू के चेहरे पर वैसी ही चमक थी। कौन मानेगा कि यह लड़की किसी दिन किसीकी सहधर्मिणी वनकर किसी गृहस्थी घर की वधू बनकर आई थी और फिर यही लड़की नेपाल की अपरिचित अंधी गलियों में गांजे का मोल-भाव करती होगी। विश्वास नहीं होता था। बड़ी विचित्र है यह दुनिया, और इस विचिन दुनिया के लोग भी बड़े विचित्र हैं। उनके चरित्र भी बहुत विचित्र हैं। इस मुकदमे के गवाह नम्बर तीन को आप जानती हैं ? - वकील ने पूछा। -~-सरयू की दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी, आंखें मिलीं, पर क्षण-भर के लिए ही । सरयू ने सर पर कपड़ा खींच लिया। मेरे प्रश्न का जवाब दीजिए, तीसरा गवाह आपके सामने है--उन्हें गौर से देखिए, उन्हें पहचानती हैं । -पहचानती हूं। -पुलिस की नजर बचाकर आपने इनके घर शरण भी ली थी? -~हां, मैं पुलिस के डर से भाग आई थी। -पुलिस से यदि आप इतना डरती थीं तो फिर इतना अन्याय आपने कैसे किया ? डर नहीं लगा? सरयू बोली-जिन विपत्तियों के बीच मैंने जीवन विताया है-आज किसी भी हालत में डर नहीं लगता । मेरे कारण ही मेरे पति जेल गए । मैं ही हर रोज़ उन्हें परिवार के विरुद्ध उत्तेजित करती थी। आज वह आजी. वन कैद की सजा काट रहे हैं। आप मुझे अपने पति के पास भेज दीजिए, मुझे सजा दीजिए ताकि वांकी जीवन कैद में उनका साथ दे सकूँ। -जो पूछा जा रहा है आप उसका जवाब दीजिए। प्रभुदयाल सिंह के यहां जब आपने नौकरी की, आपको मालूम था कि वह अच्छे आदमी नहीं हैं ? ११४ - -जानती थी। प्रभुदयाल-जैसे दुश्परिन आदमी के यहां नौकरी की लज्जा और अपमान ने मेरे देवर के मन में अधिक चोट पहुंचाई। उसने मेरी कमाई के परो छुए तक नहीं । जो आदमी गांजे की तस्करी के रुपयों में नगा करता था, उसीने मेरे माज के इन पंसों को छुआ नहीं। उसे जितनी ग्लानि होती, उतना ही अन्तर्दाह होता। वह शगव पीता । सायद सब कुछ सब किसीको भूलना चाहता था। लेकिन विवेक उसे छोड़कर नहीं गया, इसलिए उसने भीख मांगी, लोगो को घोगे में रखकर रुपये उधार लिए । एक दिन निशिकान्त मेरे पास भी आया, योला-भाभी यह नौरी तुम छोड दो । कप्ट के दिन वाटकर गुजर कर लेंगे। यह सब याते उसने पहले भी बहुत बार कही थीं, लेकिन मैं मुनना नहीं चाहती थी। मुझे तो एक ही चिन्ता थी। किसी तरह पैमे जोहगी, पति को जेल मे रिहा करया- ऊगी और एक मकान बनवाऊगी। मुझे उसी दिन की मिर्फ प्रतीक्षा थी। उग दिन निशिकान्त को देखकर मेरे मालिक प्रभुदयाल सिंह नाराउ हुए। उसे अपमानित भी किया। निशिकान्त का अपमान में नहीं मह मगे। मैंने प्रभुदयाल को मना किया। निशिकान्त भी गुम्ने मे थाकर प्रमुदपाल वो युग-भला कहने लगा । दोनों में हायागई शुरू हो गई। प्रभुदपार निशिकान्त को मार रहा था । पास में एक लाठी पड़ी यो, मैंने उमे उठापा और प्रभुदयाल को तय तक मारती रही, जय तक वह बेहोश होकर गिर नहीं पड़ा। निशिकान्त चोंककर बोला-भाभी, तुमने यह क्या किया? यह यादमी तो मर चुका। -~-मरने दो। तुम यहा से भाग जाओ। -निशिकान्त नही भागा। सड़ा रहा, मून के दाग कुछ लग गए थे, कुछ उसने लगा लिए। नौकर-दरवान दौड़े बाए। उसने कहा--प्रभुदयाल को मैंने मारा है। लेकिन पून असल में मैंने ही किया था। उस दिन भी मुझे लगा कि हम जीवन को जितना कम जानते हैं, रिमो. को कितना कम पहचान पाते हैं । एक दिन कोर्ट का फैमला को शिष्टों के पालनहारे विचारक हैं। निशिकान्त हालदार भी रोज की भांति पुलिस के पहरे में था। बहुत दिनों का भूखा और जर्जरित । इतने लोगों की क्रूर दृष्टि की चोट से वह और भी कंकाल बन गया था। पर सरयू के चेहरे पर वैसी ही चमक थी। कौन मानेगा कि यह लड़की किसी दिन किसीकी समिणी वनकर किसी गृहस्थी घर की वधू बनकर माई थी और फिर यही लड़की नेपाल की अपरिचित अंधी गलियों में गांजे का मोल-भाव करती होगी। विश्वास नहीं होता था। बड़ी विचित्र है यह दुनिया, और इस विचित्र दुनिया के लोग भी बड़े विचित्र हैं। उनके चरित्र भी बहुत वकील ने - विचित्र हैं। इस मुकदमे के गवाह नम्बर तीन को आप जानती हैं ? पूछा। -सरयू की दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी, आंखें मिलीं, पर क्षण-भर के लिए ही । सरयू ने सर पर कपड़ा खींच लिया। मेरे प्रश्न का जवाब दीजिए, तीसरा गवाह आपके सामने है उन्हें गौर से देखिए, उन्हें पहचानती हैं । -पहचानती हूं। -पुलिस की नजर बचाकर आपने इनके घर शरण भी ली थी? -हां, मैं पुलिस के डर से भाग आई थी। -पुलिस से यदि आप इतना डरती थीं तो फिर इतना अन्याय आप कैसे किया ? डर नहीं लगा? सरयू वोली--जिन विपत्तियों के बीच मैंने जीवन विताया है-अ किसी भी हालत में डर नहीं लगता। मेरे कारण ही मेरे पति जेल गए । ही हर रोज़ उन्हें परिवार के विरुद्ध उत्तेजित करती थी। आज वह आम वन कैद् की सजा काट रहे हैं। आप मुझे अपने पति के पास भेज दीपि मुझे सजा दीजिए ताकि वांकी जीवन कैद में उनका साथ दे सकू। -जो पूछा जा रहा है आप उसका जवाब दीजिए। प्रभुदयाल के यहां जब आपने नौकरी की, आपको मालूम था कि वह अच्छे अ नहीं हैं ? ११४ . -जानती थी। प्रभुदयाल-जमे दुश्चरित्र आदमी के यहां नौकरी की उज्जा और अपमान ने मेरे देवर के मन में अधिक चोट पहुंचाई। उसने मेरी कमाई के पैसे छुए तक नहीं । जो आदमी गाजे को तस्करी के रुपयों से नशा करता था, उसीने मेरे आज के इन पैसों को एआ नहीं। उसे जिननी पलानि होती, उतना ही अन्तर्दाह होता। वह शराब पीता । शायद सब कुछ सब किसीको भूलना चाहता था। लेकिन विक उगे छोड़कर नहीं गया, इसलिए उसने भीख मांगी, लोगों को पोमे मे रखकर रपये उधार लिए। एक दिन निशिकान्त मेरे पास भी आया, योला-भाभी यह नौकरी तुम छोड दो । कष्ट के दिन बाटकर गुज़र पर लेगे । यह सब बातें उगने पहले भी बहुत बार कही थीं, लेकिन मैं मुनना नहीं चाहती थी। मुझे तो एक ही चिन्ता थी। किसी तरह पैमे जोगी, पति यो जेल गे रिहा करया- ऊंगी और एक मकान बनवाऊगी । मुझे उसी दिन की मिर्फ प्रतीक्षा थी। उग दिन निशिकान्त को देखकर मेरे मानिक प्रभुदयाल सिंह नागर हए। उसे अपमानित भी किया। निशिकान्त का अपमान में नहीं मह ममी। मैंने प्रभुदयाल को मना किया। निशिकाल भी मुम्गे में मार प्रभुदयाल गो बुग-मरा कहने लगा। दोनों में हायागई गुट हो गई। प्रभुदयाल लिशिकान्त को मार रहा था। पाम में एक साठी पड़ी थी, मैंने उमे उठाया और प्रभुदयाल को तब तक मारती रही, जब तक वह यहींग होकर गिर नहीं पड़ा। निशिकान्त चौंककर बोला-मामी, तुमने यह क्या किया? यह यादमी को मर चुका। -मरने दो। तुम यहा मै माग जाओ। -निशिकाल नहीं भाया । मड़ा रहा, मून के दाग कुछ मग मा ये, उमने लगा लिए। नौकरन्दरवान दौड बाए । सने कहा -प्रभुदयाल को मैंने माग है। लेकिन खून मसर में मैंने ही दिया था। उस दिन भी मुझे लगा किन बीवन कोरिनना कम जानते हैं, रिगी. रिना कम पहचान पाते हैं । एक दिन कांटे गईमा भी मन में मिला । सरयू को आजीवन कारावास की सजा मिली। सरयू के पति जिस दण्ड को भोग रहे थे और जिस दण्ड की परिसमाप्ति के बाद एक सुन्दर घर और प्रतिष्ठित जीवन का स्वप्न सरयू ने देखा था, आज वही दण्ड सरयू को दिया गया था । जीवन की उम्मीदें पीछे छोड़कर हथकड़ी से बंधी सरयू इस दण्ड को भोगने के लिए कैदखाने के अन्दर चली गई। एक दिन मन में बड़ी इच्छा हुई कि निशिकान्त से भेंट करूं । उस बादमी को अब तक जैसा सोचता था.-बिल्कुल दूसरा ही निकला। लेकिन उसे देखकर कभी भी मुझे शक नहीं हुआ। मनुष्य-चरित्र पहचानना क्या इतना ही कठिन है ? जो आदमी, इतना ईमानदार, सच्चा और महान हो सकता है, वही आदमी फिर शरावी और झूठा भी हो सकता है ! मुझे अपने पर धिक्कार हो रहा था। इसी बुद्धि को लेकर अपने को लेखक समझता हूं, अहंकार करता हूं। मैं अपनी ही आंखों में छोटा हो -- गया। मुझे लगा, मैंने इतनी किताबें लिखी हैं, कितावों की बिक्री और उनकी प्रशंसा सुनकर मन ही मन खुशी भी हुई है, पर आज एक मामूली-सी लड़की के सामने मेरा सब कुछ धूल में मिल गया। ताज्जुव है गवाह नम्बर तीन के रूप में मैंने ही कहा था--निशिकान्त अपराधी है । लोक-चरित्र के सम्बन्ध में मेरा ज्ञान कितना कम था। फैसले के कई दिनों बाद तक मन ही मन बड़ा पश्चात्ताप हो रहा था। अपनी गलती के लिए आत्म-ग्लानि होती थी। ऐसी गलती तो पहले कभी नहीं की थी। सोच रहा था, मल्लिक बाबू या निशिकान्त मुझसे मिलने नाएंगे, लेकिन नहीं । वह अवसर भी मुझे नहीं मिला । मल्लिक बाब के घर का पता भी मालूम नहीं था, नहीं तो स्वयं ही भेंट करने की कोशिश - मैं सोच ही रहा था कि अगर निशिकान्त के साथ भेंट होती तो बड़ा अच्छा होता । उसी समय यह कांड हुआ। मैंने सोचा इतने दिनों के बाद जव मुलाकात हुई है तब उससे माफी भी मांग लूं। कहूं-निशिकान्त, तुम मुझे माफ कर दो। मैंने हमेशा तुम्हें - मलन रामना । उन दिन कचहरी में निकलने के बाद भी मैंने तुमने माती मागनी चाही थी। मैंने तुम्हें बहुत टूढा भी पर न जाने तुम वहां चले गए। मैंने देया निमितान्त गानो रहा है पर जमकी शापों में टाटा मागू यह रहे है। कहा -यह क्या ? तुम रो रहे हो निमितान्न ? उछि, रोते ययों हो ? याना वा लो। एक कटलेट और पाओगे? दो गॉर और ले लो। पर निशिकान्त ने कोई जवाब नहीं दिया। मैंन फिर कहा--गच में तुग मंकोर मत को निमियाना याओगे कहो। अगर तुन्हें रूपयो की जरूरत हो तो वह भी कहो। इतना पहार मैंने अपनी जेब में जो कुछ था उसे दे दिया। करीब तीस गये थे। मैंने कहा-मेरे पास इस समय तो यही है। इसे रख लो और पल मेरे पर आकर और ले जाना । समझे? निशिकान्त रुपये नहीं ले रहा था। मैंने रपयों को जबर्दस्ती उसकी पाकिट में डाल दिया और बोला- अब और क्या लोगे, वोलो। मुह नीचा करके निशिकात बोला-नही। और कुछ मैं नही रग सकूगा। मैंने पूछा-मिठाई खाओगे? -नही ।---निशिकान्त ने सिर हिलाया। -दो टोस्ट और लो। -नहीं। मैंने सोचा दुवान के अन्दर जाकर दे कि वहां और बपा-पमा पाने की चौवें है। मैं उठकर अन्दर गया और और ये दो रुपये का सामान मागा। सोचा-बेचारा निशिकान्त कई दिनो ने माया नहीं होगा । मेरे हाप पारे जाने पर मंत्रोच से युछ बोल नहीं पा रहा है। निभिसा पर मैंने जो अन्याय किया था, उसे खिलाफर व रपये देकर उसी मुछ पूर्ति करना चाहता था। पाने को चीजें लेकर जब म केविन वे अन्दर गया तो दंगा वहां कोई नहीं था। निशिकान्त मौका पाकर गायब हो गया था। टेरस पर मेरे दिए तीस रपये पड़े थे। उसे न देखकर मुझे गा हुआ कि वह यहीं भाग तो नहीं गया। ।
मिला। सरयू को आजीवन कारावास की सजा मिली। सरयू के पति जिस दण्ड को भोग रहे थे और जिस दण्ड की परिसमाप्ति के बाद एक सुन्दर घर और प्रतिष्ठित जीवन का स्वप्न सरयू ने देखा था, आज वही दण्ड सरयू को दिया गया था । जीवन की उम्मीदें पीछे छोटकर हथकड़ी से बंधी सरयू इस दण्ड को भोगने के लिए कैदखाने के अन्दर चली गई। एक दिन मन में बड़ी इच्छा हुई कि निशिकान्त से भेंट करूं । उस आदमी को अब तक जैसा सोचता था-~-बिल्कुल दूसरा ही निकला। लेकिन उसे देखकर कभी भी मुझे शक नहीं हुआ। मनुष्य-चरित्र पहचानना क्या इतना ही कठिन है ? जो आदमी, इतना ईमानदार, सच्चा और महान हो सकता है, वही आदमी फिर शरावी और झूठा भी हो सकता है ! मुझे अपने पर धिक्कार हो रहा था । इसी बुद्धि को लेकर अपने को लेखक समझता हूं, अहंकार करता हूं। मैं अपनी ही आंखों में छोटा हो गया। मुझे लगा, मैंने इतनी किताबें लिखी हैं, कितावों की विक्री और उनकी प्रशंसा सुनकर मन ही मन खुशी भी हुई है, पर आज एक मामूली-र्स लड़की के सामने मेरा सव कुछ धूल में मिल गया। ताज्जुव है गवाह नम्ब तीन के रूप में मैंने ही कहा था-~-निशिकान्त अपराधी है । लोक-चरित्र सम्बन्ध में मेरा ज्ञान कितना कम था। फैसले के कई दिनों बाद तक मन ही मन बड़ा पश्चात्ताप हो रहा था अपनी गलती के लिए आत्म-ग्लानि होती थी। ऐसी गलती तो पहले का नहीं की थी। सोच रहा था, मल्लिक बाबू या निशिकान्त मुझसे मिल आएंगे, लेकिन नहीं। वह अवसर भी मुझे नहीं मिला । मल्लिक बाबू घर का पता भी मालूम नहीं था, नहीं तो स्वयं ही भेंट करने की कोटि मैं सोच ही रहा था कि अगर निशिकान्त के साथ भेंट होती तो अच्छा होता । उसी समय यह कांड हुआ। मैंने सोचा इतने दिनों के बाद जब मुलाकात हुई है तब उससे : भी मांग लूं। कहूं-निशिकान्त, तुम मुझे माफ कर दो। मैंने हमेशा ११६ गलत समझा। उस दिन कचहरी मे निकलने के बाद भी मैंने तुमने मारी मागनी चाही थी। मैंने तुम्हें बहुत टूटा भी पर न जाने तुम कहां चले गए। मैंने देखा निशिकान्त ना तो रहा है पर मनी सामों में टप-टप मामू यह रहे हैं। मैंने कहा [~यह क्या । तुम रो रहे हो निगिरान्न? रि-छि:, रोने करों हो ? खाना या लो । एका कटलेट और पाओगे? दो चार और ले लो। पर निशिकान्त ने कोई जवाब नहीं दिया। मैन फिर वहाराच मे तुम मंकोच मत करो निम्किान । या मानोगे कहो। अगर तुम्हें रुपयो की जरूरत हो तो वह भी कहो। इतना पहार मैंने अपनी जेय में जो कुछ था उमे दे दिया। करीब तीस गाये थे। मैंने कहा-मेरे पास इस समय तो यही है। इसे रख लो और दाल मेरे घर आकर मोर ले जाना । समझे? निशिकान्त रुपये नहीं ले रहा था। मैंने स्पयों को जबर्दस्ती उसी पाकिट में डाल दिया और बोला- अब और क्या लोगे, वोलो। मुह नीचा करके निशिकान्त बोला-नही। और कुछ में नहीं सा मकूगा। मैंने पूछा-मिठाई साओगे ? नहीं।---निशिकान्त ने सिर हिलाया। -दो टोस्ट और लो। -नहीं। मैंने सोचा दुवान के अन्दर जाकर देखू कि वहां और क्या-पायाने को चीजे हैं। मैं उठकर अन्दर गया और और ये दो रपये का सामान माना । सोचा-बेचारा निशिकान्त कई दिनों में माया नहीं होगा । मेरे हाय पाई जाने पर मोच से बुछ बोल नहीं पा रहा है। निशिकान्त पर मैंने जो अन्याय किया था, उसे सिलाकर एवं रपये देकर उसकी कुछ पूर्ति करना चाहता था। थाने को चीजें लेकर जब में कैबिन के अन्दर गया तो देखा वहां कोई नहीं था। निशिकान्त मौका पाकर गायब हो गया था । टेवल पर मेरे दिए तोम रपये पड़े थे। उने न देशवर मुझे शक हुआ कि वह कहीं भाग तो नहीं गया। . ११७ कैविन से निकलकर मैंने चारों तरफ नजर दौड़ायो पर .... ही नहीं दिखाई पड़ा। मैं वहां बहुत देर तक खड़ा रहा। मैं समझ गया 5 मुझसे नजर बचाने के लिए ही निशिकान्त गायव हो गया है और झसे फिर कभी भेंट नहीं करेगा। वही उससे मेरी आखिरी मुलाकात पी। उसके बाद एक दिन मेरे घर पर एक अजीव तमाशा हुआ। वहीं बताता हूं। एक दिन किसीने अचानक दरवाजा खटखटाया। मैंने पूछा-कोन ? -मैं हूं, सर! मुझे लगा यह आवाज निशिकान्त की है। जल्दी से दरवाजा खोला। मल्लिक जी खड़े थे। एक हाथ में छाता । मुझे देखते ही सिसक-सिसक- कर रोने लगे। -~~अन्दर आइए मल्लिकजी । क्या हुआ है ? रो क्यों रहे हैं ? -~-बहुत मुश्किल में पड़ गया हूं। -अब क्या मुश्किल आ पड़ी मल्लिक साहब ? हांफते हुए मल्लिक बोले-~आपके उस निशिकान्त को कमरा किराये पर देकर बड़ी भूल की थी, सर। वह मर कर भी मुझे सता गया । -माने ? क्या हुआ है ? मल्लिक साहव वोले-~आपके निशिकान्त ने फांसी लगा ली है। -क्या कह रहे हैं ? कव, कहां, किस समय ? हुआ -कल । याज सुवह जब मैं गया, वह लटक रहा था। क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आया । इसीलिए भागता हुआ आपके पास आया हूं। -पुलिस में खबर कर दी है ? -नहीं, सर ! पुलिस को खबर नहीं की। अन्त में कहीं मुझे ही हथ- कड़ी न पहना दे-~-इसीलिए तो आपके पास आया हूं । फिर मेरी तरप असहाय दृष्टि से देखकर वोले-आप भी मेरे साथ चलिए न, सर ! बूढ़ आदमी हूं। थोड़ी हिम्मत रहेगी। किसी तरह जूता पहन मल्लिक साहव के साथ,थाने पर गया। पुलि को साथ लेकर मल्लिक बाबू के घर की तरफ चला। इससे पहले मैं कभी इनके घर नहीं आया था। सच में ही, वह के - यह सब कैसे ? ११८ - मकान नहीं था । एक दूह या। मिट्टी को दीवार, टोन का पर। वस्ती के और लोग भी तमाशा देखने जुट गए। पुलिस का दारोगा दरवाजा तोड़- कर अन्दर घुसा। मैं भी पीछे-पीछे गया । टीन के छप्पर के एक वाम से रस्सी वधी धी-उमी रस्सी के फन्दो से निशिकान्त का शरीर लटक रहा था। चेहरे पर विनि नही आई थी, केवल ताजे यून को एक बद उमर मोठी पर अटकी हुई थी। पुलिस ने रस्सी काट दी। निशिकान्त का शरीर घम से जमीन पर गिर पड़ा। पुलिस चारो तरफ की चीजो को ध्यान मे देख रही थी। कुछ भाराव और सोडा की बोतलें थी। दो-चार वर्तन, और एक तम्तपोश । उस तस्तपोश पर दरो मे लिपटा चद्दर-तकिया पड़ा था। रात को सम्भवत. ह सोया नही होगा-केवल शराय पी होगी। एक जगह से वागज का एक छोटा-सा टुकडा मिला । दारोगा यावू पढने लगे। मैं भी उनके पास जाकर खड़ा हो गया : 'मेरी मृत्यु के लिए कोई उत्तरदायी नहीं है । भाभी को अपमान से चाने के लिए प्रभुदयालसिंह का सून मैंने ही किया था, फिर भी मैं भाभी तो यचा न सका। मेरे अपराध का वोश भाभी अपने सर लेकर मुझे बचाना चाहती थी। जो दण्ड भाभी ने अपने ऊपर ले लिया-वह मेरा प्राप्य है, इसलिए अपने पाप का प्रायश्चित्त में स्वयं कर रहा हूं। भाभी, मुझे माफ करना! --निशिकान्त हालदार जमीन पर निशिकान्त का प्राणहीन गरीर पडा था। एक माधी उसके होठों पर बैठी थी । जेय से रुमाल निकालकर मैंने उगे उड़ा दिया, लेकिन वह बार-बार मौका पाकर होंठों पर लगे उस मुसे खून पर बैठने लगी। मैंने मुंह से आवाज की-जा.''जा'हू' ..... और सोचता रहा। इसके बाद ? इसके बाद क्या ? सोचा देश के ऊपर महादेश है, काल के ऊपर महाकाल है, पर जीवन ? क्या जोवन के ऊपर भी कोई जीवन है, जिसका नाम महाजीवन है ? अगर यह महाजीवन रही है तो वहां भी कोई विचारालय होगा, कोई ६. "
विचारपति होंगे और अगर हैं तो उनके विचार का दण्ड किसके सर पर
आएगा? सरयू पर? निशिकान्त पर? या फिर आदमी के बने उस
समाज पर, जिसमें निशिकान्त और सरयू को रहना पड़ा ?
कौन जानता है ?