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Dhyanshatak Tatha Dhyanstav

Siddhantshastri, Balchandra · 2010/05

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EAV प्रकाशक: वीर-सेवा-मन्दिर २१, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२ प्रथम सस्करण: वीर नि. सं. २५०२ वि.सं. २०३२ । सम् १९७६ ई. NANDIA मूल्य No .COM 30020522 111050522) मुद्रक : रूपवाणी प्रिंटिंग हाऊस, २३, दरियागंज, नई रिसी-११०००२ (कम्पोकिंग : गीता प्रिंटिंग एवंसी) द्वारा मुद्रित एवं वीर सेवा मदिर, २१, परिवा नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित।

i
DHYĀNSATAKA
OR
DHYĀNĀDHYAYANA
(Along with the Sanskrit Commentary of Haribhadra Suri)
AND
DHYANASTAVA"
OF
BHĀS KARA NANDI
Critically Edited with Introduction, Appendices, etc.
BY
Balchandra Siddhanta-Shastri
3
VIR SEWA MANDIR
21, Daryaganj, New Delhi.
First edition : 1976

५२-०२
1
५२
...
६८
ध्यानशतक मूल, संस्कृत टीका व हिन्दी मनुवार
परिशिष्ट (ध्यानसतक)
१ प्रत्याश्यानाध्ययनगत सम्यक्त्वातिचारस्वरूप
२ गावानुकमणिका
३ टीकागत विशिष्ट शब्दानुक्रमणिका
४ मूल ग्रन्थगत विशिष्ट शन्दानुक्रमणिका
५ टीकागत निरुक्त शब्द
६ टीकागत प्रवतरण वाक्य
७ टीका के अनुसार पाठभेद
८ टीकानुसार मतभेद
& टीकागत ग्रन्थ नामोल्लेखादि
१० टीकागत म्यायोक्तियां
ध्यानस्तव मूल व हिन्दी अनुवाद
श्लोकानुक्रमणिका
विशिष्ट शब्दानुक्रमणिका
७२
...
२४
२६
4

प्रस्तावना में उपयुक्त ग्रन्थों का अनुक्रम संख्या सकेत १ अमित. श्रा. २ आचा. सा. ३ प्रात्मानु. प्रा.पु. ५ प्राप्तप. ६ प्राप्तमी. भाव. नि. प्रोपपातिक सूत्र ६ इष्टोप. १० उपासका. ११ प्रोपपा. १२ कार्तिके. २३ क्षत्रचू. १४ गणधरवाद १५ गु.गु. षद. १६ गो.जी. १७ चन्द्र. च. १८ चारित्रप्रा. १४ जीयक. २० जननि. २१ ज्ञा.सा. २२ ज्ञाना. २३ तत्त्वानु २४ त.वा. २५ त.. २६ त. पलो. २७ त सू. २८ त.भा. २१ ति.प. ३० दशवं. ३१ धव. ग्रन्थ प्रकाशन प्रादि अमितगति-श्रावकाचार दि. जैन पुस्तकालय, सूरत प्राचारसार मा. दि. ग्रन्थमाला, बम्बई आत्मानुशासन जैन सस्कृति स सघ, सोलापुर आदिपुराण भारतीय ज्ञानपीठ, काशी प्राप्तपरीक्षा वीर सेवा मन्दिर, दिल्ली प्राप्तमीमासा भा. जैन सि. प्रकाशिनी सस्था, काशी आवश्यक नियुक्ति प्र. १ दे. ला. जन पुस्तकोद्धार फण्ड, सूरत म २,३,४ आगमोदय समिति, मेषसाना इष्टोपदेश वीर सेवा मन्दिर, दिल्ली उपासकाध्ययन भारतीय ज्ञानपीठ, काशी आगमोदय समिति, बम्बई स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा राजचन्द्र जैन शास्त्रमाला क्षत्रचूडामणि टी एस. कुप्सूस्वामी शास्त्री गणघरवाद गुजरात विद्या सभा, अमदावाद गुरुगुणपत्रिंशिका जैन प्रात्मानन्द सभा, भावनगर गोम्मटसार-जीवकाण्ड जैन सि. प्रकाशिनी सस्था, कलकत्ता चन्द्रप्रमचरित्र निर्णय सागर प्रेस, बम्बई चारित्रप्राभूत मा. दि. जैन ग्रन्थमाला, बम्बई, जीपकप्पसुत्त जैन साहित्य शोधक समिति, अमदावाद जन निषन्धावली वीर शासन संघ, कलकत्ता ज्ञानसार मा. दि. जैन ग्रन्थमाला, बम्बई রানাৰ रायचन्द्र जैन शास्त्रमाला तत्वानुशासन वीर सेवा मन्दिर ट्रस्ट, दिल्ली तत्त्वार्थवातिक भारतीय ज्ञानपीठ, काशी तत्त्वावृत्ति सस्वार्थश्लोकवार्तिक रामचन्द्र नाथारंग गांधी (नि. सा.प्रेस) तस्वार्षसूत्र प्रथम गुच्छक, निर्णय सागर प्रेस तस्वार्थाषियमभाष्य दे. ला. जैन पुस्तकोद्धार फण्ड, बम्बई तिनोवपणत्ती जैन सस्कृति सरक्षक संघ, सोलापुर दशकालिक जैन पुस्तकोदार फण्ड, बम्बई घषमा (षट्सण्डागम टीका) शि. ल.जैन साहित्योद्धारक फण्ड, अमरावती ३२ ध्या. स्त. ३३ नि. सा. ३४ न्या. सू. वृत्ति ३५ पचस. ३६ पचा. का. ३७ पा. सू. ३८ पा. दो. ३९ बृ. द्रव्यस. ४० भगबती. ४१ भावस. ४२ ४३ म. स्मारिका . ४४ मूला. ४५ युक्त्यनु. ध्यानस्तव भारतीय ज्ञानपीठ (मा. न. मा.) नियमसार जैन ग्रन्थरत्नाकर कार्यालय, बम्बई न्यायसूत्रवृत्ति पचसग्रह भारतीय ज्ञानपीठ पंचास्तिकाय परमश्रुत प्रभावक मण्डल, बम्बई पाक्षिकसूत्र जैन पुस्तकोद्धार सस्था, सूरत पाहुडदोहा गोपाल अंबादास चवरे, कारजा बृहद्रव्यसंग्रह रायचन्द्र जैन शास्त्रमाला भगवती सूत्र (च. खण्ड) जैन साहित्य प्रकाशन ट्रस्ट, अमदाबाद भावसग्रह (प्राकृत) मा. जैन ग्रन्थमाला, बम्बई (संस्कृत) महावीर स्मारिका जयपुर (१९७२) मूलाचार मा. जैन ग्रन्थमाला, बम्बई युक्त्यनुशासन योगबिन्दु जन ग्रन्थ प्रकाशक सस्था, अमदाबाद योगविशिका आत्मानन्द जैन पु प्र. मण्डल, प्रागरा योगशास्त्र ऋषभचन्द्र जौहरी कि. ला. दिल्ली योगसार रायचन्द्र जैन शास्त्रमाला योगसारप्राभृत भारतीय ज्ञानपीठ योगसूत्र (सभाष्य) विनायक ग. आपटे, पूना (१९३२) (भोज वृत्तिसहित) हरिकृष्णदास, बनारस रत्नकरण्डक मा. जैन ग्रन्थमाला, बम्बई वरांगचरित मा. जैन ग्रन्थमाला, बम्बई वसुनन्दिश्रावकाचार भारतीय ज्ञानपीठ विशेषावश्यकभाष्य ऋषभदेव के. श्वे. संस्था. रतलाम विष्णुपुराण गीता प्रेस, गोरखपुर श्रावकप्रज्ञप्ति ज्ञानप्रसारक मण्डल, मुम्बई षट्खण्डागम शि. ल. जैन साहित्योद्धारक फण्ड षोडशक प्रकरण जैन श्वे. सस्था, रत्नपुर समयसार (समयप्राभूत), भा. जैन सि. प्रकाशिनी सस्था, काशी समाधिशतक (ममाधितन्त्र) वीर सेवा मन्दिर सोसाइटी सर्वार्थसिद्धि भारतीय ज्ञानपीठ सास्यदर्शन लक्ष्मणप्रसाद चिकित्सक, कलकत्ता सिद्धिविनिश्चय टीका भारतीय ज्ञानपीठ स्थानागसूत्र सेठ माणिकलाल चु.व का.चु.अमदावाद स्वयम्भूस्तोत्र वीर सेवा मन्दिर हरिभद्राचार्यस्य समयनिर्णयः जैन साहित्यशोधक समाज, पूना हरिवशपुराण भारतीय ज्ञानपीठ ४६ यो. बि. ४७ यो. वि. ४८ यो. शा. ४६ यो.सा. ५० योगसा.प्रा. ५१ यो. सू. ५२ ५३ रत्नक. ५४ वराग. ५५ वसु. श्रा. ५६ विशेषा. ५७ वि. पु. ५८ श्रा.प्र. ५६ प. खं. ६० षोडश ६१ स.सा. ६२ समाधि. स. सि ६४ सा. द. ६५' सिद्धिवि. ६६ स्थानां. ६७ स्व. स्तो. ६८ 'हरि. स. ६६. ह.पु. 7 -- MN 5 Foreword The Dhyānšataka or Dhyānādhyayana is an important poem of one hundred and five gātbūs composed in Prākrit language Although the author 18 uoknown, yet he contributed a great treatise on Digamber Jain Agaíns, þarticularly the nature of dhyāna or meditation The subject of the work is concerned with the nature of Dhyāna and four types of D'hyánas, i e., årta, raudra, dharma and Şukla are described. Concentration of thought on one particular object is called Dhyāna or meditation. The nature of Dhyāna is considered the self in the released state is characterized by conciousness, and it is the state of the liberated soul Therefore, it is concerned with the Jaina ontology,, metaphysics and epistemology. n Meditation is the art of intensifying inward consciousness In the practice of self-realization, meditation occurs as a channel through which one discovers the pure and liberated soul. First of all, self-observation or spiritual insight is a qualitatively different dimension of experience, it is stated in the terms of states (guna-sthāna) As it is said quite definitely, deliverance is the thought A out wer Mind is now conceived as a concrete self-developing whole-its entire being and essence is the activity of self-development, the archetypal form of which is the activity of thought In the Jaina system every...soul_is possessed of consciousness Therefore, thought itself is conditioned by forms and it is thought that knows external forms and determines their nature The types of meditation are, mentioned as the painful (sorrowful), the cruel, the virtuous (righteous) and the pure. These four kinds of meditation are divided into two classes, evil and good or inauspicious and auspicious serially These occur in the case of layměn with and without small yows, and nonvigilant ascetics, the contemplation of objects of revelation, misfortune or calamity, fruition of karmas and the structure of the universe is virtuous concentration It is not always possible to realise thyself The pure concentration is also defind to be of four types The first two types of pure concentration are attained by the saints well-versed in the Purvas The last two arise in the omniscients.) Edt Harris, Errol B Nature, Mind and Modern Science, London, PP 451 , 7 1 3 3 The Dhyānastava is the Sanskrit composition of one hundred verses, the well-known exposition of meditation. It seems that the author (Bhaskaranand!) of this small hymn was well-acquainted with Dhyānśataka which is quoted in Dhavlā. Both Prākṣit and Sanskrit verses are presented in the series of Digambar Jaina texts in order to explain the nature of meditation and primary means and causes of deliverance, by which we can release our soul from kármas or, bondages. As described by Miss Suzuko Ohira in' the Introduction to Dhyānastava (published by Bhāratīya Jñanpitha), it can be accepted that Bhāskaranandi flourished in the beginning of the 12th century A.D., and it is also an established fact that he was a Digambara Pandit of vakra gaccha, Desi gana of Mula sangba, as a disciple of Jina Chandra. An eminent scholar of Jaina Philosophy, Pandit Balchandra Siddhanta- Shastrı edited this volume (both the important Texts), with Sanskļit commentary, Hindi translation and notes in a neat form (in the Introduction, he has dealt wtih the comparative study of Indian Yoga systems that might be very useful to every student of Philosophy who will read this volume.) There is no doubt that the Shastri's contribution in the field of Jainology is worthy of appreciation. I congratulate bim for this work of extra-ordinary labour and prolonged reflection, > 7th February, 1976 (Dr.) Devendra Kumar, Shastri, M A., Ph.fi, Asst. Professor, Govt. Post-graduate College, Neemuch (M.P.) > 4 he सम्पादकीय Pun प्रस्तुत संस्करण मे ध्यानशतक और ध्यानस्तव ये दो अन्य प्रकाशित हो रहे हैं। दोनों ही ग्रन्थ यद्यपि शब्द-शरीर से कृश हैं, फिर भी विषय-विवेचन की दृष्टि से वे अपने मापमें परिपूर्ण हैं । इन दोनों ग्रन्यो में अपनी-अपनी शैली से ध्यान का सुन्दर व महत्त्वपूर्ण वर्णन किया गया है । ध्यानशतक जहां प्राकृत भाषा मे गाथाबद्ध है वहा ध्यानस्तव सस्कृत श्लोको मे रचा गया है। ध्यानशतक मे केवल १०५ गाथायें हैं। इनमें से लगभग ४६-४७ गाथायें प्राचार्य वीरसेन द्वारा 'षटखण्डागम की टीका धवला मे उद्धृत की गई हैं (देखिये प्रस्तावना पृ. ५६-६२)। धवला का वह भाग (पु. १३) जिस समय सम्पादित होकर प्रकाशित हुआ था उस समय ये गाथायें किस ग्रन्थ की हैं, यह पता नहीं लग पाया था। कुछ समय के पश्चात् सशोधन कार्य के वश जव में आवश्यकसूत्र का परिशीलन कर रहा था तब वे गाथायें वहां मुझे हरिभद्र सूरि के द्वारा अपनी टीका मे पूर्ण रूप से उद्धृत प्रस्तुत ध्यान- शतक मे उपलब्ध हुईं। तव मैंने इस ध्यानशतक का तन्मयता से अध्ययन किया। ग्रन्थ मुझे बहुत उपयोगी च महत्त्वपूर्ण प्रतीत हुआ । इससे उसे प्रकाश मे लाने को मेरी इच्छा बलवती हो उठी । तब मैंने हिन्दी अनुवाद आदि के साथ उसके कार्य को सम्पन्न कर डाला। अब समस्या उसके प्रकाशन की थी। मैंने उसकी चर्चा वीर सेवा मन्दिर के महासचिव श्री महेन्द्रसेन जी जैनी से की । उन्होने उसे वीर सेवा मन्दिर से प्रकाशित करने की योजना बनायी और उसी के आधार से उन्होने उसे वीर सेवा मन्दिर के लिए दे देने की इच्छा व्यक्त की । तदनुसार ग्रन्थ मैंने उन्हे सहर्ष दे दिया। विषय की समानता और ग्रन्थ की उपयोगिता को देखते हुए उसके साथ दूसरे ग्रन्थ ध्यानस्तव को भी जोड देना उचित समझा गया। इस प्रकार से इस सस्करण मे हरिभद्र सूरि विरचित सस्कृत टीका व मेरे हिन्दी अनुवाद के साथ ध्यानशतक तथा केवल मेरे हिन्दी अनुवाद के साथ भास्करनन्दी विरचित ध्यानस्तव ये दो ग्रन्थ प्रकाशित किये जा रहे हैं। मेरी इच्छा थी कि इन दोनो ग्रन्थों का उपलब्ध कुछ हस्तलिखित प्रतियो से मिलान कर लिया जाय । पर वे सुलभ न हो सकी। जैसा कि जिन-रत्नकोश मे निर्देश किया गया है, यद्यपि ध्यानशतक की कुछ प्रतियां अहमदावाद, बम्बई और पाटण मे विद्यमान हैं, पर इसके लिये वहां लिखने पर न तो कोई प्रति ही मिल सकी और न कुछ उत्तर भी प्राप्त हुआ। इससे उसका सम्पादन आवश्यक सूत्र की टीका में उद्धृत व मुद्रित सस्करण तथा विनय सुन्दर चरण ग्रन्थमाला द्वारा प्रकाशित स्वतत्र सस्करण के ही आधार से किया गया है। ध्यानस्तव का सम्पादन जैन-सिद्धान्त-भास्कर, भाग १२, किरण २ मे श्री प. के भुजबली शास्त्री के द्वारा सम्पादित व प्रकाशित मूल मात्र तथा कु. सुजुको प्रोहिरा द्वारा सम्पादित और भारतीय ज्ञानपीठ (मा. दि. जैन ग्रन्थमाला) द्वारा प्रकाशित संस्करण (ई. सन् १९७३) के माधार से किया गया है । इसके लिए मैं उक्त दोनो ग्रन्थों के इन सस्करणों के सम्पादको व प्रकाशको का विशेष प्राभारी हूं। प्रस्तावना के लेखन में वैसे तो बहुत से अन्थो की सहायता लेनी पडी है, पर विशेष रूप से बी प. सुखलाल जी सपवी द्वारा लिखित 'योगदर्शन तथा योगविशिका' की प्रस्तावना (संवत् १९७८) और क.

सुजुको ओहिरा द्वारा इगलिश मे लिखी गई ध्यानस्तव की प्रस्तावना के हिन्दी अनुवाद से सहायता मिली हैं। इसके लिए मैं उक्त दोनों प्रस्तावनामो के लेखक विद्वानों के प्रति अपना हार्दिक आभार व्यक्त - "करता हूँ। श्री डा. देवेन्द्रकुमार जी शास्त्री, सहायक प्राध्यापक शासकीय महाविद्यालय नीमच ने, हमारे आग्रह पर दोनो ग्रन्थो का यथासम्भव परिशीलन कर अगरेजी में प्रस्तावना (Foreword) लिख देने की कृपा की है, इसके लिए मैं उन्हे धन्यवाद दिये विना नही रह सकता। अन्त मे मैं वीर सेवा मन्दिर के उन अधिकारियो को भी नही भूल सकता हूं, जिन्होने प्रस्तुत संस्करण के प्रकाशन का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लिया व उसके प्रकाशन की व्यवस्था भी की है । हम सभी की यह इच्छा रही है कि ग्रन्थ भगवान् महावीर के २५००वें निर्वाण-महोत्सव वर्ष के मध्य मे ही प्रकाशित हो जाय । पर ऐसा नहीं हो सका। कारण इसका यह रहा है कि यद्यपि ग्रन्थ का मुद्रणकार्य मार्च १९५४ मे ही प्रारम्भ हो चुका था, पर कुछ ही समय के बाद स्वास्थ्य ठीक न रहने के कारण जुलाई १९७४ मे मुझे दिल्ली छोडकर घर जाना पडा । वहाँ मैं लगभग डेढ़ वर्ष रहा । इस बीच मुद्रणकार्य प्राय. रुका ही रहा । जब मैं नवम्बर १९७५ मे यहां वापिस आया तब कही उसके मुद्रण कार्य मे प्रगति हुई है । यही कारण है कि ग्रन्थ कुछ विलम्ब से पाठको के हाथो मे पहुच रहा है । वीर सेवा मन्दिर, दिल्ली ६.३-१९७६ बालचन्द्र शास्त्री प्रस्तावना ग्रन्थ नाम - जैसा कि टीकाकार हरिभद्र सूरि ने आवश्यफसूत्र नियुक्ति की टीका मे प्रस्तुत ग्रन्थ को गर्भित करते हुए निर्देश किया है, इसका नाम ध्यानशतक रहा है। परन्तु मूल ग्रन्थ के कर्ता ने मगलपद्य मे जो प्रतिज्ञा की है, तदनुसार उनको उसका नाम ध्यानाध्ययन अभीष्ट रहा दिखता है। उक्त मगलपद्य मे उन्होने शुक्लध्यानरूप अग्नि के द्वारा कर्मरूप ईधन के भस्म कर देनेवाले योगीश्वर को प्रणाम करके ध्यानाध्ययन के कहने की प्रतिज्ञा की है। अध्ययन शब्द से यहा अध्ययन के विषयभूत ग्रन्थविशेष का अभिप्राय रहा है। तदनुसार जिसके पढने से अध्येता को ध्यान का परिचय प्राप्त होता है ऐसे ध्यान के प्रतिपादक शास्त्र का वर्णन करना ही ग्रन्थकार को अभीष्ट रहा है और उन्होने उसी के कहने की प्रारम्भ मे प्रतिज्ञा की है । ग्रन्थगत विपय के विवेचन को देखते हुए भी यह निश्चित है कि उसमे ध्यान का ही व्यव- स्थित रूप मे वर्णन किया गया है, अत उसका 'ध्यानाध्ययन' नाम सार्थक ही है। हरिभद्र सूरि ने उसकी' टीका करते हुए जो 'ध्यानशतक' नाम से उसका उल्लेख किया है उसका कारण ग्रन्थ के अन्तर्गत गाथाओ की सख्या है, जो सौ के आस-पास (१०५) ही है । - ग्रन्थकार प्रस्तुत ग्रन्थ का कर्ता कौन है, यह एक विचारणीय प्रश्न है। जैसा कि 'बृहद् जैन साहित्य का इतिहास' भाग ४ (पृ २५०) मे सकेत किया गया है। प्रस्तुत ग्रन्थ मे १०६ गाथायें पायी जाती है । उनमे जो अन्तिम गाथा (१०६) है उसमे उसे जिनभद्र क्षमाश्रमण द्वारा विरचित सूचित किया गया है । वह गाथा इस प्रकार है- पंचुत्तरेण गाहासएण झाणस्स यं (ज) समक्खायं । जिणभद्दखमासमणेहि कम्मविसोहीकरणं जइणोली यह गाथा कुछ असम्बद्ध-सी दिखती है। भाव उसका यह प्रतीत होता है कि जिनभद्र क्षमाश्रमण ९. ध्यानशतकस्य च महार्थत्वाद्वस्तुत शास्त्रान्तरत्वात् प्रारम्भ एव विघ्नविनायकोपशान्तये मगलार्थमिष्ट- देवतानस्कारमाह-ध्यानशतक टीका १ (उत्थानिका)। up. Descriptive Catalogue of the Government Collection of Manuscripts (Vol. -X011, Pt 3, P 416) Bhandarkar Oriental Recearch Instiute Poona. यह गाथा आवश्यकसूत्र (पूर्व भाग पृ ५८२-६१२) के अन्तर्गत ध्यानशतक मे तथा वि. भ. सु. च. ग्रन्थमाला द्वारा प्रकाशित उसके स्वतन्त्र सस्करण मे भी नही पायी जाती है। यदि यह गाथा मूल ग्रन्थकार के द्वारा रची गई होती तो टीकाकार हरिभद्र सूरि द्वारा जिनभद्र क्षमाश्रमण के नाम का निर्देश अवश्य किया जाता।

२ ध्यानशतक ने यति की कर्मविशुद्धि के करनेवाले ध्यान के प्रकरण या अध्ययन को एक सौ पांच (१०५) गाथानो द्वारा कहा है। यह गाथा स्वय ग्रन्थकार के द्वारा रची गई है या पीछे किसी अन्य के द्वारा जोडी गई है, यह सन्देहापन्न है। सम्भवत इसी के आधार से श्री विनयभक्ति सुन्दरचरण ग्रन्थ माला द्वारा प्रकाशित उसके सस्करण मे उसे जिनभद्र गणि क्षमाश्रमण द्वारा विरचित निनिष्ट किया गया है। किन्तु वह जिनभद्र क्षमाश्रमण द्वारा रचा गया है, इसमे सन्देह है। श्री प. दलसुखभाई माल- वणिया का मन्तव्य है कि ध्यानशतक के रचयिता के रूप मे यद्यपि जिनभद्र गणि से नाम का निर्देश देखा जाता है, पर वह सम्भव नहीं दिखता। इसका कारण यह है कि हरिभद्र सूरि ने अपनी आवश्यक नियुक्ति की टीका में समस्त ध्यानशतक को शास्त्रान्तर स्वीकार करते हुए समाविष्ट किया है तथा वहा उसकी समस्त गाथाओ की व्याख्या भी उन्होने की है। पर वह किसके द्वारा रचा गया है, इसके सम्बन्ध मे उन्होने कुछ भी नही कहा । इसके अतिरिक्त हरिभद्र सूरि की उक्त टीका पर टिप्पणी लिखनेवाले आचार्य मलधारी हेमचन्द्र सूरि ने भी उसके रचयिता के विषय मे कुछ भी सूचना नहीं की। हरिभद्र सूरि ने जो उसे शास्त्रान्तर कहा है इससे वह स्वतत्र ग्रन्थ है, यह तो निश्चित है। पर वह आवश्यक नियुक्ति के रचयिता की कृति नहीं है, यह उससे फलित नहीं होता। उसके प्रारम्भ मे जो योगीश्वर वीर जिन को नमस्कार किया गया है, इस कारण से हरिभद्र सूरि उसे आवश्यक नियुक्तिकार की कृति न मानते हो, यह तो हो नहीं सकता । कारण यह कि आवश्यक नियुक्ति मे किसी नवीन प्रकरण को प्रारम्भ करते कितने ही बार तीर्थंकरो को नमस्कार किया गया है। तदनुसार ध्यान के महत्त्वपूर्ण प्रकरण को प्रारम्भ करते हुए वीर को नमस्कार किया गया है । अत उसे नियुक्तिकार भद्रवाहु की ही कृति समझना चाहिए। हरिभद्र सूरि ने जो उसे शास्त्रान्तर प्रगट किया है वह विषय की महत्ता को देखते हुए ही प्रगट किया है। यदि वह जिनभद्र की कृति होती तो उसकी व्याख्या करते हुए हरिभद्र सूरि उसकी सूचना --- अवश्य करते मेरे विचार में भी वह जिनभद्र क्षमाश्रमण की कृति प्रतीत नही होती। कारण यह कि उनके द्वारा विरचित विशेषावश्यकभाष्य और जीतकल्पसूत्र के देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि वे विवक्षित ग्रन्थ को प्रारम्भ करते हुए प्रवचन को प्रणाम करके ग्रन्थ के कहने की प्रतिज्ञा करते है तथा उसे समाप्त करते हुए उसकी उपयोगिता को प्रगट करते हैं । यथा-- कतपवयणप्पणामो वोच्छं चरण-गुणसगह सयलं । पावसयाणुयोगं गुरूपदेसाणुसारेणं ॥ विशेषा. १. फयपवयणप्पणामो वोच्छं पच्छित्तदाण संखेव । जीयववहारगयं जीयस्स विसोहणं परमं ॥ जीयकप्पसुत्त १३ समाप्ति-सव्वाणुयोगमूलं भास सामाइयस्त होति परिकम्मियमतो जोग्गो सेसाणुयोगस्स !| विशेपा, ४३२६. इय एस जीयकप्पो समासो सुविहियाणुफम्पाए । कहियो देयोऽय पुण पत्ते सुपरिच्छियगुणम्मि ॥ जीयकप्पसुत्त १०३. पर प्रस्तुत ध्यानशतक मे प्रवचन को प्रणाम न करके योगीश्वर वीर को नमस्कार किया गया तथा उसे समाप्त करते हुए यद्यपि उसकी उपयोगिता प्रगट की गई है, किन्तु वह कुछ भिन्न रूप में की गई है। इसके अतिरिक्त विवादापन्न १०६ठी गाथा मे जिस प्रकार जिनभद्र क्षमाश्रमण के नाम का णाकण। - १. गणघरवाद, प्रस्तावना पृ. ४५.

प्रस्तावना mr - - सव्व गणधरवस वायगवस निर्देश किया गया है उस प्रकार उपर्युक्त विशेषावश्यकभाष्य और जीतकल्पसूत्र मे अपने नामका निर्देश नहीं किया गया जिस प्रकार उसे जिनभद्र की कृति मानने मे नमस्कारविषयक पद्धति बाधक प्रतीत होती है उसी प्रकार उसे नियुक्तिकार आ भद्रवाहु की कृति मानने में भी वही बाधा दिखती है। यह ठीक है कि नियुक्तिकार किसी नवीन प्रकरण को प्रारम्भ करते हुए उसके प्रारम्भ मे मगलस्वरूप नमस्कार करते हैं, पर वे सामान्य से तीर्थंकरो को नमस्कार करते देखे जाते है । यथा- तित्थकरे भगवते अणुत्तरपरक्कमे अमितणाणी । तिण्णे सुगतिगतिगते सिद्धिपधपदेसए वदे ।। आव नि. ८० (१०२२), पृ. १६५. कही वे प्रकरण से सम्बद्ध गणघर आदि को भी नमस्कार करते हुए देखे जाते हैं । जैसे- एक्कारस वि गणधरे पवायए पवयणस्स वदामि । पवयण च ॥ आव. नि. ८२ (१०५९), पृ. २०२. उन्होने ध्यानशतक के समान कही योगीश्वर वीर जैसे किसी को नमस्कार किया हो, ऐसा देखने में नहीं आया । अतएव हरिभद्र सूरि ने महान् अर्थ का प्रतिपादक होने से उसे जो शास्त्रान्तर कहा है उससे वह एक स्वतत्र ग्रन्थ ही प्रतीत होता है। यदि वह नियुक्तिकार की कृति होता तो कदाचित् वे उनका उल्लेख भी कर सकते थे। पर उन्होने उसके कर्ता का उल्लेख नियुक्तिकार' के रूप मे न करके सामान्य ग्रन्थकार के रूप मे ही किया है । यथा-- १ गाथा ११ की उत्थानिका मे वे साधु के आर्तध्यानविषयक शका का समाधान करते हुए कहते है-पाह च ग्रन्थकारः। २ गा २८-२९ मे निर्दिष्ट धर्मध्यानविषयक भावना आदि १२ द्वारो के प्रसग मे वे कहते हैं कि यह इन दो गाथाओ का सक्षिप्त अर्थ है, विस्तृत अर्थ का कथन प्रत्येक द्वार मे ग्रन्थकार स्वय करेंगे । यथा-इति गाथाद्वयसमासार्थः, व्यासायं तु प्रतिद्वार ग्रन्थकारः स्वयमेव वक्ष्यति । सम्भव है कि टीकाकार हरिभद्र सूरि को प्रस्तुत ग्रन्थ के कर्ता का ज्ञान न रहा हो अथवा उन्होने उनके नाम का निर्देश करना आवश्यक न समझा हो । यह अवश्य है कि प्रस्तुत ग्रन्थ की रचना नियुक्ति- कार आ भद्रवाहु और जिनभद्र क्षमाश्रमण के समय के आस-पास ही हुई है। जैसा कि आगे स्पष्ट किया जानेवाला है, इसका कारण यह है कि उसके ऊपर प्रा. उमास्वाति विरचित तत्त्वार्थसूत्र के अन्तर्गत ध्यान के प्रकरण का काफी प्रभाव रहा है। तत्त्वार्थसूत्र का रचनाकाल प्राय तीसरी शताब्दि है। इसी प्रकार वह स्थानाग के अन्तर्गत ध्यान के प्रकरण से भी अत्यधिक प्रभावित है । वर्तमान पाचारादि आगमो का सकलन वलभी वाचना के समय प्रा. देवद्धि गणि के...तत्त्वावधान मे वीर निर्वाण के पश्चात् ९८९ वर्षों के आस-पास किया गया है। तदनुसार वह (स्थानाग) पाचवी शताब्दि की रचना व्हरती है। इससे ज्ञात होता है कि प्रस्तुत ध्यानशतक की रचना पाचवी शताब्दि के बाद हुई है। साथ ही उसके ऊपर चूकि हरिभद्र सूरि के द्वारा टीका रची गई है, इससे उसकी रचना हरिभद्र सूरि (प्राय विक्रम की की ८वी शताब्दि) के पूर्व हो चुकी है, यह भी सुनिश्चित है। इसके अतिरिक्त जैसा कि हरिभद्र सूरि ने १. जिनभद्र क्षमाश्रमण द्वारा विरचित विशेषणवती, वृहत्क्षेत्रसमास और वृहत्सग्रहणी आदि अन्य कुछ कृतिया भी हैं, पर उनके सामने न होने से कहा नहीं जा सकता कि वहा भी उनकी यही पद्धति रही है या अन्य प्रकार की। ३ यथा-इद गाथापचक जगाद नियुक्तिकार-पाव नि हरि टी. ७१ (उत्थानिका) ४ ध्यानशतक अपनी टीका मे सकेत किया है, उनकी टीका से पूर्व भी कोई अन्य टीका रची जा चुकी है। इस परि- स्थिति मे इतना ही कहा जा सकता है कि वह छठी और आठवी शताब्दि के मध्य मे किसी के द्वारा रचा गया है । पर किसके द्वारा रचा गया है, यह निश्चित नही कहा जा सकता। । है)१३-४) ग्रन्थ का विषय ग्रन्थ को प्रारम्भ करते हुए मगल के पश्चात् सर्वप्रथम स्थिर अध्यवसान को ध्यान का स्वरूप वतलाया है । (स्थिर अध्यवसान से एकाग्रता का आलम्बन लेनेवाले मन का अभिप्राय रहा है, जिसे दूसरे शब्दो मे एकाग्रचिन्तानिरोध कहा जा सकता है। इसके विपरीत जो अध्यवसान की अस्थिरता है उसे चल चित्त कहकर भावना, अनुप्रेक्षा और चिन्ता इन तीन मे विभक्त किया गया है । उनमे ध्यान के अभ्यास की क्रिया का नाम भावना है । ध्यान से च्युत होने पर जो चित्त की चेष्टा होती है उसे अनुप्रेक्षा कहा जाता है। भावना और अनुप्रेक्षा इन दोनो से भिन्न जो मन की प्रवृत्ति होती है वह चिन्ता कहलाती है. (गा. २)। एक वस्तु मे चित्त के अवस्थान रूप उस ध्यान का काल अन्तर्मुहूर्त मात्र है । इस प्रकार का ध्यान केवली से भिन्न छद्मस्थ (अल्पज्ञ) जीवो के ही होता है, केवलियो का ध्यान योगो के निरोधस्वरूप है (३) । अन्तर्मुहूर्त,के पश्चात् ध्यान के विनष्ट हो जाने पर या तो पूर्वोक्त स्वरूपवाली चिन्ता होती है, या फिर भावना और अनुप्रेक्षा रूप ध्यानान्तर होता है। यह ध्यानान्तर तभी सम्भव है जव कि उसके पश्चात पुन स्थिर अध्यवसान रूप वह ध्यान होनेवाला हो, अन्यथा उस प्रकार का ध्यानान्तर न होकर चिन्ता ही हो सकती है ३-४) । प्रार्तध्यान- ध्यान सामान्य से चार प्रकार का है-पात, रौद्र, धर्म या धर्म्य और शुक्ल । इनमे आर्त और रौद्र ये दो ध्यान ससार के कारण हैं तथा धर्म और शुक्ल ये दो ध्यान मुक्ति के कारण हैं । विशेष रूप से आर्तध्यान को तियंच गति का, रौद्रध्यान को नरक गति का, धर्मध्यान को देव गति का और शुक्ल- ध्यान को मुक्ति का कारण माना गया है (५)। अनिष्ट विषयो का सयोग होने पर उनके वियोग की जो चिन्ता होती है तथा उनका वियोग हो जाने पर भी जो भविष्य मे उनके पुन. सयोग न होने की चिन्ता होती है, उसे प्रथम आर्तध्यान माना गया है। रोगजनित पीडा के होने पर उसके वियोग की चिन्ता के साथ भविष्य मे उसके पुन. सयोग न होने की भी जो चिन्ता होती है, उसे दूसरा प्रार्तघ्यान कहा गया है। अभीष्ट विषयो का सयोग होने पर उनका भविष्य मे कभी वियोग न होने विषयक तथा वर्तमान मे यदि उनका सयोग नही है तो उनकी प्राप्ति किस प्रकार से हो, इसके लिए भी जो चिन्ता होती है उसे तीसरा पार्तध्यान माना जाता । यदि संयम का परिपालन अथवा तपश्चरण आदि कुछ अनुष्ठान किया गया है तो उसके फलस्वरूप इन्द्र व चक्रवर्ती प्रादि की विभूतिविपयक प्रार्थना करना, इसे चौथे आर्तव्यान का लक्षण कहा गया है। आगामी काल में भोगाकाक्षा रूप इस प्रकार का निदान अज्ञानी जन के ही हुआ करता है। कारण यह कि जिस अमूल्य सयम अथवा तपश्चरण के प्राश्रय से मुक्ति प्राप्त हो सकती है उसे इस प्रकार से भोगो की प्राप्ति मे गमा देना, इसे अज्ञानता के सिवाय और क्या कहा जा सकता है ? उपर्युक्त चार प्रकार की इस म. (क) अनेन किलानागतकालपरिग्रह इति वृद्धा व्याचक्षते । हरि. टी. गा. ८. (स) अन्ये पुनरिद गाथाद्वय चतुर्भेदमप्यातंत्र्यानमधिकृत्य साधोः प्रतिपेघरूपतया व्याचक्षते । टी. १२. (ग) अन्ये तु ध्याचक्षते तिर्यग्गतावेद प्रभूतमत्त्वसम्भवात् स्थितिवहुत्याच्च ससारोपचारः । टीका १३, (प) आदिशब्द.xxxप्राति-स्थित्यिनुभाव-प्रदेशवन्धभंदग्राहक इत्यन्ये । टीका ५०. - प्रस्तावना ५ 62M - सक्लेश रूप परिणति को यहा आर्तध्यान कहा गया है (६-९)। राग-द्वेप से रहित साधु वस्तुस्वरूप का विचार करता है, इसलिए रोगादि जनित वेदना के होने पर वह उसे अपने पूर्वोपाजित.कर्म के उदय से उत्पन्न हुई जानकर शुभ परिणाम के साथ सहन करता है। ऐसा विवेकी साधु उत्तम आलम्बन लेकर- निर्मल परिणाम के साथ-उसका पाप से सर्वथा रहित (पूर्णतया निर्दोष) अथवा अल्प पाप से युक्त होता हुमा प्रतीकार करता है, फिर भी निर्दोष उपाय के द्वारा चिकित्सादि रूप प्रतीकार करने के कारण उसके आर्तध्यान नही होता, किन्तु धर्मध्यान ही होता है। इसी प्रकार वह सासारिक दुःखो के प्रतीकारस्वरूप जो तप-सयम का अनुष्ठान करता है वह इन्द्रादि पदो की प्राप्ति की अभिलाषा रूप निदान से रहित होता है, इसीलिए इसे भी आर्त व्यान नही माना गया, किन्तु निदान रहित धर्मध्यान ही माना गया हैं। ससार के कारणभूत जो राग, द्वेष और मोह है वे आर्तध्यान मे रहते है। इसीलिए उसे ससार रूप वृक्ष का मूल कहा गया है (१०-१३) । आर्तध्यानी के कापोत, नील और कृष्ण ये तीन अशुभ.लेश्यायें होती है। पार्तध्यानी की पहिचान ॥ इष्टवियोग एव अनिष्टसयोगादि के निमित्त से होनेवाले आक्रन्दन, शोचन, परिवेदन एव ताडन आदि हेतुओ से हुआ करती है । वह अपने द्वारा किये गये भले-बुरे कर्मों की प्रशसा करता है तया धन-सम्पत्ति के उपार्जन मे उद्यत रहता हुआ विषयासक्त होकर धर्म की उपेक्षा करता है (१४-१७) । वह प्रार्तध्यान व्रतो से रहित मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि एव अविरत- सम्यग्दृष्टि तथा सयतासगत व प्रमादयुक्त सयत जीवो के होता है (१८) । २ रौद्रध्यान- हिंसानुवन्धी, मृषानुवन्धी, स्तेयानुवन्धी और विषयसरक्षणानुन्धी के भेद से रौद्रध्यान चार प्रकार का है । क्रिोध के वशीभूत होकर एकेन्द्रियादि जीवो के ताड़ने, नासिका आदि के छेदने, रस्सी आदि से बाधने एव प्राणविधात करने आदि का जो निरन्तर चिन्तन होता है, यह हिंसानुबन्धी नामक प्रथम रोद्रध्यान का लक्षण है । परनिन्दाजनक, असभ्य एव प्राणिप्राणवियोजक आदि अनेक प्रकार के असत्य वचन बोलने का निरन्तर चिन्तन करना; इसे मृषानुवन्धी नामक दूसरा रोद्रध्यान माना गया है । जिसका अन्त करण पाप से कलुषित रहता है तथा जो मायापूर्ण व्यवहार से दूसरो के ठगने मे उद्यत रहता है उसके यह रोद्रध्यान होता है। जिसका चित्त क्रोध व लोभ के वशीभूत होकर दूसरो की धन-सम्पत्ति आदि के अपहरण मे सलग्न रहता है उसके स्तेयानुबन्धी नाम का तीसरा. रौद्रध्यान समझना चाहिए । विषयसरक्षणानुवन्धी नामक चौथे रौद्रध्यान के वशीभूत हुआ जीव विषयोपभोग के लिए उसके साधनभूत घन के सरक्षण मे निरन्तर विचारमग्न रहा करता है। नरक गति का कारभूत यह चार प्रकार का रौद्र- ध्यान मिथ्यादृष्टि से लेकर सयतासयत गुणस्थान तक सम्भव है।) यहा प्रार्तध्यानी के समान रौद्रध्यानी के भी यथासम्भव लेश्याओ और उसके लिंगो आदि का निर्देश किया गया है (१६-२७) । ३ धर्मध्यान- धर्मध्यान की प्ररूपणा को प्रारम्भ करते हुए सर्वप्रथम यहा यह सूचना की गई है कि मुनि को १ ध्यान की भावनाओ, २ देश, ३ काल, ४ आसनविशेष, ५ आलम्बन, ६ क्रम, ७ ध्यातव्य, ८ ध्याता, ६ अनुप्रेक्षा, १० लेश्या, ११ लिंग और १२ फल; इनको जानकर धर्मध्यान का चिन्तन करना चाहिए । तत्पश्चात् धर्मध्यान का अभ्यास कर लेने पर शुक्लध्यान का ध्यान करना चाहिए (२८-२९)। इस प्रकार की सूचना करके आगे इन्ही १२ प्रकरणो के आश्रय से क्रमश प्रकृत धर्मध्यान का विवेचन किया गया है। १ भावना-ध्यान के पूर्व जिसने भावनानो के द्वारा अथवा उनके विषय मे अभ्यास कर लिया वह ध्यानविषयक योग्यता को प्राप्त कर लेता है। वे भावनायें ये हैं-ज्ञान, दर्शन, चारित्र और - है। meronew M - or ध्यानशतक वैराग्य । इनमे ज्ञान के प्रासेवन रूप अभ्यास का नाम ज्ञानभावना है । इसके आश्रय से ध्याता का मन अशुभ व्यापार को छोड़ शुभ मे स्थिर होता है। साथ ही उसके द्वारा तत्त्व-प्रतत्त्व का रहस्य जान लेने से ध्याता स्थिरबुद्धि होकर ध्यान मे लीन हो जाता है। तत्त्वार्थश्रद्धान का नाम दर्शन है। शका-काक्षा आदि पाच दोषो से रहित एव प्रशम व स्थर्य आदि गुणो से युक्त होकर उस दर्शन के आराधन को दर्शनभावना कहते है। दर्शन से विशुद्ध हो जाने पर धर्मध्यान का ध्याता ध्यान के विषय मे कभी दिग्भ्रान्त नहीं होता। समस्त सावद्ययोग की निवृत्ति रूप क्रिया का नाम चारित्र और उसके अभ्यास का नाम चारित्र- भावना है । इस चारित्रभावना से नवीन कर्मों के ग्रहण के प्रभाव रूप सवर, पूर्वसचित कर्म की निर्जरा, सातावेदनीय आदि पुण्य प्रकृतियो का ग्रहण और ध्यान, ये विना किसी प्रकार के प्रयत्न के-अनायास- ही प्राप्त होते हैं। ससार के स्वभाव को जानकर विषयासक्ति से रहित होना, यही वैराग्यभावना है। इस वैराग्य- भावना से जिसका मन सुवासित हो जाता है वह इह-परलोकादि भयो से रहित होकर आशा से-इहलोक और परलोक विषयक सुखाभिलाषा से भी रहित हो जाने के कारण ध्यान मे अतिशय स्थिर हो जाता है (३०-३४)। २ देश-यह एक साधारण नियम है कि मुनि का स्थान सदा ही युवतिजन, पशु, नपुसक और कुशील (जुवारी आदि) जनो से रहित होना चाहिए । ऐसी स्थिति मे ध्यान के समय तो उसका वह स्थान विशेषरूप से निर्जन (एकान्त) कहा गया है । (किन्तु इतना विशेष है कि जो सहनन व धैर्य से बलिष्ठ हैं, ज्ञानादि भावनाओ के व्यापार मे अभ्यस्त हैं, तथा जिनका मन अतिशय स्थिरता को प्राप्त कर चुका है, उनके लिए उक्त प्रकार से स्थानविशेष का कोई नियम नही है-वे जनो से सकीर्ण गाव मे और निर्जन वन मे भी निर्वाध रूप से ध्यान कर सकते हैं। ध्याता के लिए वही स्थान उपयुक्त माना गया है जहा पन, वचन एव काय योगो को समाधान प्राप्त होता है तथा जो प्राणिहिंसादि से विरहित होता है (३५-३७)। ३ काल-स्थान के विषय मे जो कुछ कहा गया है वही काल के विषय मे भी समझना चाहिए। अर्थात् ध्यान के लिए काल भी वही उपयोगी होता है जिसमे योगो को उत्तम समाधान प्राप्त होता है। इसके सिवाय काल के विषय में ध्याता के लिए दिन व रात्रि आदि का कोई विशेष नियम नही निर्दिष्ट किया गया (३८)। ४ श्रासनविशेष-अभ्यास मे आयी हुई जो भी आसन आदि रूप शरीर की अवस्था ध्यान में वाधक -नही होती है उसमे स्थित रहते हुए कायोत्सर्ग, पद्मासन अथवा वीरासन आदि से ध्यान करना योग्य है। कारण यह कि देश, काल और आसन आदि रूप सभी अवस्थामो मे वर्तमान होते हुए मुनि जनो ने पाप को शान्त करके उत्कृष्ट केवलज्ञान आदि को प्राप्त किया है। यही कारण है जो आगम मे के योग्य देश, काल और आसनविशेष का कोई नियम नही निर्दिष्ट किया गया। किन्तु वहा इतना मात्र कहा गया है कि जिस प्रकार से भी ध्यान के समय योगो को समाधान प्राप्त होता है उसी प्रकार का प्रयत्न करना चाहिए (३६-४१) । ५ पालम्वन-वाचना, प्रच्छना (प्रश्न), परावर्तना और अनुचिन्ता तथा सामायिक आदि सधर्मावश्यक ये ध्यान के पालम्वन कहे गये हैं। जिस प्रकार किसी वलवती रस्सी आदि का सहारा लेकर मनुष्य विषम (दुर्गम) स्थान पर पहुंच जाता है उसी प्रकार ध्याता भी सूत्र आदि-पूर्वोक्त वाचना प्रादि का प्राश्रय लेकर उत्तम ध्यान पर पारूढ होता है (४२.४३) । ६ कम-क्रम का विचार करते हुए यहा लाघव पर दृष्टि रसकर धर्मध्यान के साथ शुक्लध्यान के भी क्रम का निरूपण कर दिया गया है। उसके प्रसंग में यह कहा गया है कि केवलियो के मुक्ति की ध्यान - 4 प्रस्तावना - प्राप्ति मे जब अन्तर्मुहूर्त मात्र शेप रहता है तब वे जो क्रम से मनयोग प्रादि का निग्रह करते हैं, यही शुक्लध्यान की प्रतिपत्ति का क्रम है। शेष धर्मध्यानियो के ध्यान की प्रतिपत्ति का क्रम ममाधि के अनु- सार-जैसे भी स्वस्थता प्राप्त होती है तदनुसार-जानना चाहिए (४४) । ७ ध्यातव्य - ध्यातव्य का अर्य ध्यान के योग्य विषय (ध्येय) है। वह आज्ञा, अपाय, विपाक और संस्थान के भेद मे चार प्रकार का है। इनके चिन्तन से क्रमश धर्मध्यान के आज्ञाविचय, अपाय- विचय, विपाकविचय और सस्थानविचय ये चार भेद हो जाते है। नय, भग, प्रमाण और गम (चतुर्वि- शतिदण्डक आदि) से गम्भीर ऐसे कुछ सूक्ष्म पदार्थ है जिनका परिज्ञान मन्दबुद्धि जनो को नहीं हो पाता । ऐमी स्थिति मे यदि उसे बुद्धि की मन्दता से, ययार्थ वस्तुस्वरूप के प्रतिपादक प्राचार्यों के अभाव से, जानने योग्य धर्मास्तिकाय आदि की गम्भीरता (दुरवबोधता) से, ज्ञानावरण के उदय से तथा हेतु और उदाहरण के असम्भव होने से यदि जिज्ञासित पदार्थ का ठीक से वोध नही होता हैं तो बुद्धिमान् धर्मध्यानी को यह विचार करना चाहिए कि मर्वन का मत-वचन (जिनाज्ञा) -असत्य नहीं हो सकता। कारण यह कि प्रत्युपकार की अपेक्षा न रखनेवाले जिन भगवान् सर्वज्ञ होकर राग, द्वेष और मोह को जीत चुके है-उनसे सर्वथा रहित हो चुके है, अतएव वे वस्तुस्वरूप का अन्यथा (विपरीत) कथन नही कर सकते । इस प्रकार से वह प्राणिमात्र के लिए हितकर जिनवचन (जिनाज्ञा) के विषय में विचार करता है (४५-४६)। जो प्राणी राग, द्वेप, कपाय और प्रास्रव आदि क्रियायो मे प्रवर्तनमान है वे इस लोक और परलोक दोनो ही लोको में अनेक प्रकार के अपायो (दु खो) को प्राप्त होनेवाले है । धर्मध्यानी वर्जनीय प्रकार्य का परित्याग करता हुआ उक्त अपायो के विषय में विचार किया करता है (५०) । विपाक का अर्थ कर्म का उदय है। मन, वचन व काय योगो से तथा मिथ्यादर्शदादि रूप जीव- गुणो के प्रभाव से उत्पन्न होनेवाला कर्म का विपाक प्रकृति, स्थिति, प्रदेश और अनुभाव के भेद से भेद को प्राप्त है। इनमे प्रत्येक शुभ और अशुभ (पुण्य-पाप) इन दो मे विभक्त है। इत्यादि प्रकार से धर्मध्यानी कर्म के विपाक के विषय मे विचार किया करता है (५१) । ध्यातव्य के चतुर्थ भेद (सस्थान) का निरूपण करते हुए यहा यह कहा गया है कि धर्मध्यानी द्रव्यो के लक्षण, सस्थान, प्रासन (आधार), भेद, प्रमाण और उत्पादादि पर्यायो का विचार करता हुआ धर्मादि पाच अस्तिकाय स्वरूप लोक की स्थिति का भी विचार करता है । इसके अतिरिक्त जीव जो उपयोग स्वरूप, अनादिनिधन, शरीर से भिन्न, अमूर्तिक और अपने कर्म का कर्ता व भोक्ता है उसका विचार करता है तथा अपने ही कर्म के वश जो उसका ससार मे परिभ्रमण हो रहा है उससे उसका किस प्रकार से उद्धार हो सकता है, इत्यादि का भी गम्भीर विचार करता है । यहा संसार को समुद्र की उपमा देकर दोनो की समानता का अच्छा चित्रण किया गया है (५२-६२) । ८ ध्याता-ध्याता के प्रसग मे कहा गया है कि प्रकृत धर्मध्यान के ध्याता सब प्रमादो से रहित अप्रमत्त गुणस्थानवर्ती-मुनि और क्षीणमोह (क्षपक निर्ग्रन्थ) एवं उपशान्तमोह (उपशमक निर्ग्रन्थ) होते हैं (६३)। इस धर्मध्यान के ही प्रसग मे लाघव की अपेक्षा रखकर शुक्लध्यान के भी ध्याता का विचार करते हुए यह कहा गया है कि जो ये धर्मध्यान के ध्धाता है वे ही अतिशय प्रशस्त सहनन से युक्त होते हुए पृथक्त्ववितर्क सविचार और एकत्ववितर्क अविचार इन दो शुक्लध्यानो के भी ध्याता होते है। विशेष इतना है कि वे चौदह पूर्वो के पारगामी होते है। शेष दो शुक्लध्यानो के-सूक्ष्मक्रियानिवर्ति और व्युच्छिन्नक्रियाप्रतिपाति के-ध्याता क्रम से सयोगकेवली और अयोगकेवली होते है (६४) । ९ अनुप्रेक्षा-इसके प्रसग मे यह कहा गया है कि अन्तर्मुहूर्त प्रमाण ध्यानकाल के समाप्त हो जाने पर जव धर्मध्यान विनष्ट हो जाता है तब पूर्व मे उस धर्मध्यान से जिसका चित्त सुसस्कृत हो चुका ध्यानशतक - Whende है वह मुनि ध्यान के उपरत हो जाने पर भी सदा अनित्यादि भावनाप्रो के चिन्तन मे तत्पर होता है (६५)। १० लेश्या-धर्मध्यानी के क्रम से उत्तरोत्तर विशुद्धि को प्राप्त होनेवाली पीत, पद्म और शुक्ल ये तीन प्रशस्त लेश्यायें हुआ करती हैं जो तीव्र, मन्द व मध्यम भेदो से युक्त होती है (६६) । ११ लिंग-धर्मध्यानी का परिचय किन हेतुओ के द्वारा होता है, इसे स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि आगम, उपदेश, आज्ञा और निसर्ग से जो जिनोपदिष्ट पदार्थों का श्रद्धान होता है उससे तथा जिनदेव, साधु और उनके गुणो के कीर्तन आदि से उक्त धर्मध्यानी का बोध हो जाता है (६७.६८) । १२ फल-धर्मध्यान के फल का निर्देश यहा न करके लाघव की दृष्टि से उसका निर्देश मागे शुक्लध्यान के प्रकरण (गा. ६३) मे किया गया है । इस प्रकार उपर्युक्त भावना आदि बारह अधिकारी के आश्रय से यहा (६८) धर्मध्यान की प्ररूपणा ससाप्त हो जाती है । ४ शुक्लध्यान- जिन पूर्वोक्त भावना आदि वारह अधिकारो के द्वारा धर्मध्यान की प्ररूपणा की गई है उन बारह अधिकारो की अपेक्षा प्रस्तुत शुक्लध्यान की प्ररूपणा मे भी रही है। उनमे से भावना, देश, काल और आसनविशेष इन चार अधिकारो मे उसकी धर्मध्यान से कुछ विशेषता नही रही है । इसलिए उनकी प्ररूपणा न करके यहा शेष आवश्यक अधिप्रारो के ही प्राश्रय से शुक्लध्यान का निरूपण किया गया है। यधा- ५ पालम्बन-क्षमा, मार्दव, आर्जुव और मुक्ति ये यहा शुक्लध्यान के आलम्बन निर्दिष्ट किये गये हैं (६९)। ६ क्रम-पृथक्त्ववितर्क सविचार, एकत्ववितर्क अविचार, सूक्ष्मक्रियानिति और व्युच्छिन्न- क्रियाप्रतिपाति के भेद से शुक्लध्यान चार प्रवार का है। इनमे प्रथम दो शुक्लध्यानो के क्रम का निरूपण धर्मध्यान के प्रकरण (४४) मे किया जा चूका है । इसलिए उन्हे छोडकर अन्तिम दो शुक्लध्यानो के क्रम का विचार करते हुए यहा यह कहा गया है कि मन का विषय जो तीनो लोक है उसका छद्मस्थ ध्याता क्रम से सक्षेप (सकोच) करता हुआ उस मन को परमाणु मे स्थापित करता है और अतिशय स्थिरता- पूर्वक ध्यान करता है । तत्पश्चात् केवली जिन उसे परमाणु से भी हटाकर उस मन से सर्वथा रहित होते हुए अन्तिम दो शुक्लध्यानो के ध्याता हो जाते हैं। वह किस प्रकार से उस मन के विषय का सक्षेप कर उसे परमाणु मे स्थापित करता है तथा उससे भी फिर उसे किस प्रकार से हटाता है, इसे आगे स्पष्ट करते हुए यह कहा गया है कि जिस प्रकार समस्त शरीर में व्याप्त विष को मंत्र के द्वारा डक मे रोक दिया जाता है और तत्पश्चात् उसे अतिशय प्रधान मत्र के योग से उस डफस्थान से भी हटा दिया जाता है उसी प्रकार तीनो लोकरूप शरीर मे व्याप्त मनरूप विष को ध्यानरुप मत्र के वल से युक्त ध्याता डक- स्थान के समान परमाणु मे रोक देता है और तत्पश्चात् जिनरूप वैद्य (मात्रिक) उसे उस परमाणु से भी हटा देता है। आगे इसी बात को अग्नि और जल के दृष्टान्तो द्वारा भी पुष्ट किया गया है। इस प्रकार मन का निरोध हो जाने पर फिर क्रम मे वचनयोग और काययोग का भी निरोध करके वह शेल के समान स्थिर होता हुआ शैलेशी केवली हो जाता है (७०-७६) । ७ ध्यातव्य-शुक्लध्यान के ध्येय का विचार करते हुए यहा यह कहा गया है कि पृथक्त्ववितर्क मविचार नामक प्रथम शुक्लध्यान मे ध्याता पूर्वगत श्रुत के अनुसार अनेक नयो के प्राश्रय से आत्मादि किसी एक वस्तुगत उत्पाद, स्थिति और भग (व्यय) रुप पर्यायो का विचार करता है । इस ध्यान में चूकि अयं से अर्थान्तर, व्यजन (शब्द) से व्यजनान्तर और विवक्षित योग से योगान्तर में सक्रमण होता है। इसलिए उसे सविचार कहा गया है । वह वीतराग के हुआ करता है (७७.७%) । एकत्यवितर्क अविचार नामक द्वितीय शुक्लध्यान में ध्याता उपयुक्त उत्पादादि पर्यायों में से किसी एक ही पर्याय का विचार करता है। हम ध्यान में चित्त वायु के संचार से रहित दीपक के समान स्थिर ।

प्रस्तावना ६ . . हो जाता है। इस ध्यान मे चूकि अर्थ से अर्थान्तर आदि का सक्रमण नहीं होता, इसलिए उसे अविचार कहा गया है । प्रथम शुक्लध्यान के समान इसमे भी श्रुत का आलम्वन रहता है (७६-८०) । जो योगो का कुछ निरोध कर चुका है तथा जिसके उच्छ्वास-निःश्वास रूप सूक्ष्म काय की क्रिया ही शेष रही है ऐसे केवली के जब मुक्ति की प्राप्ति मे अन्तर्मुहूर्त मात्र ही शेष रहता है तब उनके सूक्ष्म- क्रियानिवति नाम का तीसरा शुक्लध्यान होता है (८१)। शैल के समान अचल होकर शैलेशी अवस्था को प्राप्त हुए उन्ही केवली के व्युच्छिन्नक्रिया- प्रतिपाति नाम का चौथा परम शुक्लध्यान होता है (८२) । ये चारो शुक्लध्यान योग की अपेक्षा किनके होते हैं, इसे स्पष्ट करते हुए आगे कहा गया है कि प्रथम शुक्लध्यान एक योग अथवा सव योगो मे होता है, दूसरा शुक्लध्यान तीनो योगो मे से किसी एक योग में होता है, तीसरा शुक्लध्यान काययोग मे होता है; तथा चौथा शुक्लध्यान योगो से रहित हो जाने पर अयोगी जिन के होता है (८३) । यहा यह आशका हो सकती थी कि केवली के जब मन का अभाव हो चुका है तब उनके तीसरा और चौथा शुक्लध्यान कैसे सम्भव है, क्योकि मनविशेष का नाम ही तो ध्यान है ? इस आशका के समाधानस्वरूप प्रागे यह कहा गया है कि जिस प्रकार छद्मस्थ के अतिशय निश्चल मन को ध्यान कहा जाता है उसी प्रकार केवली के अतिशय निश्चल काय को ध्यान कहा जाता है, कारण यह कि योग की अपेक्षा उन दोनो मे कोई भेद नही है। इस पर पुन यह आशका हो सकती थी कि अयोग केवली के तो वह (काययोग) भी नही रहा, फिर उनके व्युच्छिन्नक्रियाप्रतिपाति नाम का चौथा शुक्लध्यान कैसे माना जा सकता है ? इसके परिहार स्वरूप आगे यह कहा गया है कि पूर्वप्रयोग, कर्मनिर्जरा का सद्भाव, शब्दार्थ- बहुतता और जिनचन्द्रागम; इन हेतुप्रो के द्वारा सयोग और प्रयोग केवलियो के चित्त का अभाव हो जाने पर भी जीवोपयोग का सद्भाव बना रहने से क्रमश सूक्ष्मक्रियानिवति और व्युच्छिन्नक्रियाप्रतिपाति ये दो शुक्लध्यान कहे जाते हैं (८४-८६) । ८ ध्याता-शुक्लध्यान के ध्याताओ का कथन धर्मध्यान के प्रकरण (६३-६४) मे किया जा चुका है। ९ अनुप्रेक्षा-शुक्लध्यानी ध्यान के समाप्त हो जाने पर भी प्रास्रवद्वारापाय, ससाराशुभानुभाव, अनन्तभवसन्तान और वस्तुविपरिणाम इन चार अनुप्रेक्षामो का चिन्तन करता है (८७-८८) । १० लेश्या--प्रथम दो शुक्लध्यान शुक्ललेश्या मे और तीसरा परम शुक्ललेश्या मे होता है । चौथा शुक्लध्यान लेश्या से रहित है (८९)। ११ लिंग-- अवधा, असम्मोह, विवेक और व्युत्सर्ग ये चार शुक्लध्यान के लिंग कहे गये हैं। परीषह और उपसर्ग के द्वारा न ध्यान से विचलित होना और न भयभीत होना, यह अवालिंग है। सूक्ष्म पदार्थों और देवनिर्मित माया मे मूढता को प्राप्त न होना, यह असम्मोह का लक्षण है । आत्मा को शरीर से भिन्न समझना तथा सव सयोगो को देखना, इसका नाम विवेक है। नि.सग होकर शरीर और उपधिका परित्याग करना, इसे व्युत्सर्ग कहा जाता है (६०-६२) । १२ फल-शुक्लध्यान के फल का विचार करते हुए यहा कहा गया है कि शुभास्रव, सवर, निर्जरा और देवसुख ये जो शुभानुवन्धी धर्मध्यान के फल है विशेषरूप से वे ही शुभ प्रास्रव आदि और अनुपम देवसुख ये प्रथम दो शुक्लध्यानो के फल हैं। अन्तिम दो शुक्लध्यानो का फल निर्वाण की प्राप्ति है (९३-९४)। इस प्रकार शुक्लध्यान की प्ररूपणा को समाप्त करते हुए धर्म और शुक्ल ध्यान निर्वाण के कारण क्यो और किस प्रकार से है, इसे विविध दृष्टान्तो द्वारा सिद्ध किया गया है (९५-१०२) । अन्त मे ध्यान के द्वारा इस लोक सम्बन्धी भी शारीरिक और मानसिक दुख दूर होते हैं, यह १० ध्यानयतक वतलाते हुए सब गुणो के आधारभूत और दृष्ट-अदृष्ट सुख के साधक ऐसे प्रशस्त ध्यान के श्रद्धान, ज्ञान और चिन्तन की प्रेरणा की गई है (१०३-५) । ध्यान का महत्त्व सव ही प्राणी सुख के अभिलाषी है और दुख को कोई भी नहीं चाहता। पर वह सुख क्या और कहा है तथा उसकी प्राप्ति का उपाय क्या है, इसका विवेक अधिकाश को नही रहता है। इसी से वे जो वस्तुतः सुख-दुःख के कारण नहीं हैं उन बाह्य पदार्थों मे सुख-दुख की कल्पना करके राग, द्वेष व मोह के वशीभूत होते हुए कर्म से सम्बद्ध होते हैं । इस प्रकार कर्मवन्धन मे बद्ध होकर वे सुख के स्थान मे दुःख का ही अनुभव किया करते है । अज्ञानी प्राणी जिसे सुख मानता है वह यथार्थ मे सुख नहीं, किन्तु सुख का आभास मात्र है। ऐसे इन्द्रियजनित क्षणिक सुख के विषय मे यह ठीक ही कहा गया है-वह काल्पनिक सुख प्रथम तो सातावेदनीय आदि पुण्य कर्म के उदय से प्राप्त होता है, अत पराधीन है। दूसरे, पुण्य कर्म के सयोग से यदि वह प्राप्त भी हुआ तो वह जब तक पुण्य का उदय है तभी तक सम्भव है, बाद में नियम से नष्ट होने वाला है। तीसरे, उसकी उत्पत्ति दुःखो से व्यवहित है। उस सुख के अनन्तर पुनः अनिवार्य दु.ख प्राप्त होने वाला है। कारण यह कि पुण्य कर्म के क्षीण हो जाने पर दुख के कारणभूत पाप का उदय अवश्यभावी है। इसके अतिरिक्त वह आसक्ति और तृष्णा का वढाने वाला होने से पापासव का भी कारण है । अतएव ऐसे दु खमिश्रित सुख को अश्रद्धेय कहा गया है। तब यथार्थ सुख कौन हो सकता है, यह प्रश्न उपस्थित होता है। इसके समाधान स्वरूप यह कहा गया है कि जिसमें असुख (दुख) का लेश भी नही है उसे ही यथार्थ सुख समझना चाहिए। ऐसा सुख जीव को कर्मवन्धन से रहित हो जाने पर मुक्ति मे ही प्राप्त हो सकता है', जन्म-मरणरूप ससार में वह सम्भव नही है । उस मुक्ति के कारण सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र हैं, जिन्हे समस्त मे मोक्ष का मार्ग माना गया है। निश्चय और व्यवहार के भेद से दो प्रकार के उस मोक्षमार्ग की प्राप्ति का कारण ध्यान है, अतएव मुक्ति प्राप्ति के लिए उस ध्यान के अभ्यास की जहा तहा प्रेरणा की गई है। प्रस्तुत ध्यानशतक मे भी कहा गया है कि ध्यान तप का प्रमुख का कारण है, वह तप सवर व १ दुखाद् विभेषि नितरामभिवाञ्छसि सुखमतोऽहमप्यात्मन् । दुःखापहारि सुखकरमनुशास्मि तवानुमतमेव ।। आत्मानु. २. २. कर्मपरवगे सान्ते दुखैरन्तरितोदये । पापवीजे सुखेऽनास्थाश्रद्धानाकाक्षणा स्मृता ।। रत्नक. १२. ३. दु खस्यानन्तर सौख्यं ततो दुख हि देहिनाम् ॥ क्षत्रचू. ४-३६. ४. तृष्णाचिष. परिदहन्ति न शान्तिरासामिष्टेद्रियार्थविभवे परिवृद्धिरेव । स्थित्यव कायपरितापहर निमित्तमित्यात्मवान् विषयसोख्यपराङ्मुखोऽभूत् ।। स्वयम्भू. १७-२. यत्तु सासारिक सौख्यं रागात्मकमशाश्वतम् । स्व-परद्रव्यसम्भूतं तृष्णा-सन्तापकारणम् ॥ मोह-द्रोह-मद-क्रोध-माया-लोभनिवन्धनम् । दुःखकारणबन्धस्य हेतुत्वाद् दु खमेव तत् ॥ तत्त्वानु. २४३-४४. ५. स धर्मो यत्र नाधर्मस्तत् सुख या नासुखम् । तज्ज्ञान यन नाज्ञान सा गतिर्यत्र नाऽऽगति. ॥ गतिर्यत्र नाऽऽगति. ॥ आत्मानु. ४३ ६. मात्मायत्त निरावाघमतीन्द्रियमनश्वरम् । पातिकर्मक्षयोद्भूत यत् तन्मोक्षसुख विदु ॥ तत्त्वानु. २४२. ७. दुविह पि मोक्खहेर झाणे पाउणदि ज मुणी णियमा। तम्हा पयत्तचित्ता जूयं माण नमन्मसह ।। द्रव्यमं. ४७. रूप .

प्रस्तावना १ निर्जरा का कारण है, तथा वे सवर व निर्जरा मुक्ति के कारण हैं । इस प्रकार परम्परा से मुक्ति का कारण वह ध्यान ही है (६६)। जिस प्रकार अग्नि चिरसचित इन्धन को भस्मसात् कर देती है उसी प्रकार ध्यान चिरसचित कर्मरूप इन्धन को भस्मसात् कर देता है । अथवा जिस प्रकार वायु के प्राघात से मेघो का समूह विलय को प्राप्त हो जाता है उसी प्रकार ध्यानरूप वायु के आघात से कर्मरूप मेघसमूह क्षण- भर मे विलीन हो जाता है। इतना ही नहीं, ध्याता उस ध्यान के प्रभाव से इस लोक मे मानसिक और शारीरिक दुखो से भी सन्तप्त नही होता (१०१-४) । इस प्रकार ध्यान मे अपूर्व सामर्थ्य है। ध्यान पर प्रारूढ हुमा ध्याता चूकि इष्ट-अनिष्ट विषयो मे राग-द्वेष और मोह से रहित हो जाता है, इसलिए उसके जहा नवीन कर्मों के आगमन (आस्रव) का निरोध होता है वहां उस ध्यान से उद्दीप्त तप के प्रभाव से पूर्वसचित कर्मो की निर्जरा भी होती है। इस प्रकार वह ध्यान परम्परा से निर्वाण का कारण है। ध्यान के स्वामी ध्यानशतक मे तत्त्वार्थसूत्र के समान ध्यान के प्रार्त, रौद्र, धर्म और शुक्ल ये चार भेद निर्दिष्ट किये गये हैं । इनमे से प्रत्येक के भी चार चार भेद कहे गये हैं । आर्तध्यान- उनमे चारो प्रकार का प्रार्तध्यान छठे गुणस्थान तक सम्भव है, यह अभिप्राय तत्त्वार्थसूत्र' और ध्यानशतक (१८) दोनो मे ही प्रगट किया गया है। प्रा. पूज्यपाद विरचित तत्त्वार्थसूत्र की सर्वार्थसिद्धि नामक टीका मे प्रकृत सूत्र को स्पष्ट करते हुए यह विशेषता, प्रगट की गई है कि अविरतो-असंयतसम्यग्दृष्टि तक-और देशविरतो के वह चारो प्रकार का आर्तध्यान होता है, क्योकि वे सब असमम परिणाम से सहित होते हैं। परन्तु प्रमत्तसयतो के प्रमाद के उदय की तीव्रता से कदाचित् निदान को छोडकर शेष तीन आर्तध्यान होते हैं। तत्त्वार्थवातिक मे इस प्रसग मे इतना मात्र कहा गया है कि निदान को छोड़कर शेष तीन पात- घ्यान प्रमाद के उदय की तीव्रता से प्रमत्तसयतो के कदाचित् हुआ करते हैं। सूत्र की स्थिति को देखते हुए यह स्वय प्रगट है कि प्रथम तीन पार्तध्यान प्रमत्तसयतो तक कदाचित् होते है, परन्तु निदान प्रमत्त- संयतो के नहीं होता। मूलाचार, स्थानाग, समवायाग और प्रौपपातिकसूत्र में किसी भी ध्यान के स्वामियो का उल्लेख नही किया गया है। हरिवशपुराण मे सामान्य से इतना मात्र निर्देश किया गया है कि वह प्रार्तध्यान छह गुणस्थान भूमिवाला है-छह गुणस्थानो मे सम्भव है। ज्ञानार्णव मे उसका हरिवशपुराण के समान सामान्य से 'पड्गुणस्थानभूमिक' ऐसा निर्देश करके १ मा मुज्झह मा रज्जह मा दूसह इट्टणि?अछेसु । थिरमिच्छहि जइ चित्त विचित्तमाणप्पसिद्धीए ॥ द्र स ४८. २ तदविरत-देशविरत-प्रमत्तसयतानाम् । त. सू (दि ) ६-३४, श्वे. ६-३५ ३ तत्राविरत-देशविरताना चतुर्विधमातं भवति, असयमपरिणामोपेतत्वात् । प्रमत्तसंयताना तु निदान- वय॑मन्यदात्रिय प्रमादोदयोद्रेकात् कदाचित् स्यात् । स सि ६-३४ ४. कदाचित् प्राच्यगार्तध्यानत्रयं प्रमत्तानाम् । निदान वर्जयित्वा अन्यदात्रिय प्रमादोदयोद्रेकात् कदा- चित् प्रमत्तसयताना भवति । त वा ६, ३४, १. ५. अधिष्ठान प्रमादोऽस्य तिर्यग्गतिफलस्य हि । परोक्ष मिश्रको भाव षड्गुणस्थानभूमिकम् ।। ५६-१८.

ध्यानशतक भी आगे यह स्पष्ट कर दिया गया है कि सयतासयतो मे तो वह चारो प्रकार का आर्तध्यान होता है, परन्तु प्रमत्तसयतो के वह निदान से रहित शेप तीन प्रकार का होता है। -- रौद्रध्यान- रौद्रध्यान के स्वामियो का निर्देश करते हुए उसका अस्तित्व तत्त्वार्थसूत्र (8-३५), सर्वार्थसिद्धि (६-६५), तत्त्वार्थवार्तिक (६-३५), ध्यानशतक (२३), हरिवंशपुराण (५६-२६) और ज्ञानार्णव (३६, पृ २६९) आदि प्राय सभी ग्रन्थो मे प्रथम पाच गुणस्थानो में निर्दिष्ट किया गया है। धर्मध्यान- घHध्यान के स्वामियो के विषय मे परस्पर काफी मतभेद रहा है। यथा तत्त्वार्थाधिगमभाष्य सम्मत सूत्रपाठ के अनुसार तत्त्वार्थसूत्र मे अप्रमत्तसंयत, उपशान्तकषाय और क्षीणकषाय के उसका सद्भाव प्रगट किया गया है। यहा सूत्र मे उपयुक्त 'अप्रमत्तसयतस्य' इस एकवचनान्त पद से ऐसा प्रतीत होता है कि उससे केवल सातवें गुणस्थान को ही ग्रहण किया गया है। आगे उल्लिखित उपशान्त- कषाय और क्षीणकषाय शब्दो से ग्यारहवा और बारहवा ये दो गुणस्थान विवक्षित रहे दिखते हैं। ऐसी अवस्था मे मध्य के अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानो मे कौनसा ध्यान होता है, यह विचारणीय है । कारण यह कि इसे न तो मूल सूत्र मे स्पष्ट किया गया है और न उसके भाष्य मे भी। ध्यानशतक (६३) मे भी लगभग यही कहा गया है। परन्तु वहा 'सव्वप्पमायरहिया मुणनो' ऐसा जो बहुवचनात्मक निर्देश किया गया है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि ग्रन्थकार को समस्त प्रमादों से रहित-अप्रमत्तसयत से लेकर सूक्ष्मसाम्पराय पर्यन्त-सभी मुनि धर्मध्यान के स्वामी अभिप्रेत रहे हैं । आगे उपशान्तमोह और क्षीणमोह का पृथग्रूप में जो निर्देश किया गया है उससे सयोग और प्रयोग केवलियो की व्यावृत्ति हो जाती है। टीकाकार हरिभद्र सूरि ने क्षीणमोह से क्षपक निम्रन्थो और उप- शान्तमोह से उपशमक निर्ग्रन्थो को ग्रहण किया है। इस प्रकार से भी पूर्वोक्त अपूर्वकरणादि उक्त तीन गुणस्थानो का ग्रहण हो जाता है। सर्वार्थसिद्धिसम्मत सूत्रपाठ के अनुसार तत्त्वार्थसूत्र मे धर्म्यघ्यान के स्वामिविषयक कुछ उल्लेख नही किया गया, उसमे मात्र धर्म्यध्यान के भेदो का सूचक स्वरूप मात्र कहा गया है। वहा पात, रोद्र और शुक्ल इन तीन ध्यानो के स्वामियो का निर्देश करने पर भी धर्म्यध्यान के स्वामियो का निर्देश क्यो नही किया गया, यह विचारणीय है। हा, यह अवश्य है कि उस सूत्र के अभिप्राय को स्पष्ट करते हुए सर्वार्थसिद्धि मे यह निर्देश किया गया है कि उक्त धर्म्यध्यान अविरत, देशविरत, प्रमत्तसयत और अप्रमत्त- सयत इन चार के होता है । वृहद्व्यसग्रह टीका मे उसका अस्तित्व इन्ही चार गुणस्थानो में स्वीकार किया गया है। इसी प्रकार अमितगतिश्रावकाचार (१५-१७) मे भी उसका सद्भाव इन्ही चार गुण- स्थानो मे बतलाया गया है। १. अपथ्यमपि पर्यन्ते रम्यमप्यग्निमक्षणे । विद्धघसद्धयानमेतद्धि पड्गुणस्थानभूमिकम् ।। सयतासयतेप्वेतच्चतुर्भेद प्रजायते । प्रमत्तसयताना तु निदानरहित त्रिधा ॥ ३८-३६, पृ. २६०, २ प्राज्ञापाय-विपाक-मस्थानविचयाय धर्ममप्रमत्तगयतरय । उपशान्त क्षीणकपाययोश्च । त सू. ६, ३७.३८. ३. प्राज्ञापाय विपाक-सस्थानविचयाय पर्म्यम् । त. सू. ६-३६. ४ तनविरत देशविरत-प्रमत्ताप्रमत्तसयताना भवति । स सि. ६-३६. ५. प्रत परम् प्रात-रौद्रारित्यागलक्षणमाज्ञापाय-विराक-सस्थानविषयसज्ञ चतुर्भेदभिन्न तारतम्यवृद्धि- प्रमेणासयतसम्यग्दृष्टि देशाविरत-प्रमत्तमयताप्रमत्ताभिधानचगंतुणस्थानवतिनीयसम्भवम् । बृह्व. टी. ४८, पृ. १७५, A .

. प्रस्तावना - . तत्त्वार्थवातिक मे धर्म्यध्यान के स्वामियो का पृथक से स्पष्ट निर्देश तो उस प्रसंग मे नही किया गया, जैसा कि सर्वार्थसिद्धि में किया गया है। परन्तु वहा शका के रूप मे यह कहा गया है कि उक्त धर्म्य- ध्यान अप्रमत्तसयत के होता है। उसका समाधान करते हुए यह कहा गया है कि ऐसा सम्भव नही है, क्योकि वैसा स्वीकार करने पर अप्रमत्त के पूर्ववर्ती प्रसयतसम्यग्दृष्टि प्रादि तीन गुणस्थानो मे उसके अभाव का प्रसग दुनिवार होगा। पर सम्यक्त्व के प्रभाव से इन तीन गुणस्थानो मे भी वह होता है । इसके बाद वहा यह दूसरी शका उठायी गई है कि उक्त धर्म्यध्यान पूर्व गुणस्थानवतियो के ही नहीं, बल्कि उपशान्तकपाय और क्षीणकषाय के भी होता है । इस शका के समाधान में कहा गया है कि यह भी ठीक नहीं है, क्योकि वैसा स्वीकार करने पर इन दो गुणस्थानो मे जो शुक्लध्यान का अस्तित्व स्वीकार किया गया है उसके वहा अभाव का प्रसग प्राप्त होगा। इस पर यदि यह कहा जाय कि उनके धर्म्य और शुक्ल ये दोनो ही ध्यान हो सकते है, तो यह भी सगत नही है। क्योकि पूर्व (धर्म्य) ध्यान उनके नहीं माना गया है । आर्ष मे उसे उपशमक और क्षपक दोनो श्रेणियो मे नही माना जाता, किन्तु उनके पूर्ववर्ती गुण- स्थानो मे माना जाता है । यहा अगले सूत्र (६-३७) की उत्थानिका मे यह सूचना अवश्य की गई है कि वह अविरत, देशविरत, प्रमत्तसयत और अप्रमत्तसयतो के होता है । घवला मे जो प्रकृत धर्म्यध्यान के स्वामिविषयक उल्लेख किया गया है वह बहुत स्पष्ट है। वहा यह शका उठायी गई है कि घHध्यान सकषाय जीवो मे ही होता है, यह कैसे जाना जाता है ? इस शका के समाधान मे यह कहा गया है कि धर्म्यध्यान की प्रवृत्ति असयतसम्यग्दृष्टि, सयतासयत, प्रमत्तसयत, अप्रमत्तसयत, अपूर्वसयत, अनिवृत्तिसयत और सूक्ष्मसाम्परायिक क्षपको व उपशमको मे होती है। इस जिन देव के उपदेश से वह जाना जाता है। हरिवंशपुराण मे उक्त धर्म्यध्यान के स्वामियो के प्रमग मे इतना मात्र कहा गया है कि प्रमाद के अभाव मे उत्पन्न होने वाला वह अप्रमत्तगुणस्थानभूमिक है-अप्रमत्तगुणस्थान तक होता है। यहा यह स्पष्ट नही किया गया है कि वह प्रथम से सातवें गुणस्थान तक होता है, अथवा चौथे से सातवें गुण- स्थान तक होता है, अथवा एक मात्र सातवें गुणस्थान मे ही होता है । यहा पूर्व मे प्रार्तध्यान के प्रसग मे भी 'षड्गुणस्थानभूमिक' (५६-१८) ऐसा निर्देश करके उसका अस्तित्व प्रथम से छठे गुणस्थान तक प्रगट किया गया है। आदिपुराण मे उक्त धर्माध्यान की स्थिति को भागमपरम्परा के अनुसार सम्यग्दृष्टियो, रायता- सयतो और प्रमत्तसयतो मे स्वीकार करते हुए उसका परम प्रकर्ष अप्रमत्तो मे माना गया है। तत्त्वानुशासन मे धर्म्यध्यान के स्वामियो के प्रसग मे प्रथमत यह निर्देश किया गया है कि तत्त्वार्थ मे उसके स्वामी अप्रमत्त, प्रमत्त, देशसयत और सम्यग्दृष्टि ये चार माने गये है। तदनन्तर बहा उक्त घHध्यान को मुख्य और उपचार के भेद से दो प्रकार का बतलाते हुए यह कहा गया है कि मुख्य धय॑ध्यान अप्रमत्तो मे और औपचारिक इतरो मे~सम्यग्दृष्टि, देशसयत और प्रमत्तसयतो मे-होता है। - - १.त वा ६,३६, १४-१६ २. असजदसम्मादिट्टि सजदासजद पमत्तसजद-अप्पमत्तसजद-अपुव्वसजद-अणियट्टिसजद - सुहुमसापराइय खवगोवसामएस धम्मज्माणस्स पवुत्ती होदि त्ति जिणोवएसादो । धव पु १३, पृ. ७४ ३. अप्रमत्तगुणस्थानभूमिक ह्यप्रमादजम् । पीत-पालसल्लेश्यावलाघानमिहाखिलम् ।। ह पु. ५६-५१. ४.श्रा पु. २१, १५५-५६. ५. 'तत्त्वार्थ' से क्या अभिप्रेत रहा है, यह वहा स्पष्ट नही है। स्व श्री प. जुगल किशोर जी मुख्तार ने उसके भाष्य मे 'तत्त्वार्थ' शब्द से 'तत्त्वार्थवार्तिक' को ग्रहण किया है । पृ ४६ ६. अप्रमत्त प्रमत्तश्च सदृष्टिदेशसंयत । घHध्यानस्य चत्वारस्तत्त्वार्थे स्वामिन' स्मृता ॥ ४६. मुख्योपचारभेदेन धर्म्यध्यानमिह द्विधा । अप्रमत्तेषु तन्मुख्यमितरेष्वौपचारिकम् ॥ ४७. - , ।

१४ ध्यानशतक आगे वहा यह भी कहा गया है कि जो मन से स्थिर है वह विकल श्रुत से भी उसका ध्याता होता है तथा प्रवुद्धधी--प्रकृष्ट ज्ञानी-दोनो श्रेणियो के नीचे उसका ध्याता माना गया है। यह आदिपुराण (२१-१०२) का अनुसरण है। 'दोनो श्रेणियो के नीचे' इससे क्या अभिप्रेत है, यह स्पष्ट नहीं है । दोनो श्रेणियो से पूर्ववर्तियो के उक्त धर्म्यध्यान के अस्तित्व की सूचना वहा आगे फिर से भी की गई है। अमितगतिश्रावकाचार मे उक्त घHध्यान का सद्भाव सर्वार्थसिद्धि के समान असयतसम्यग्दृष्टि आदि चार गुणस्थानो मे ही निर्दिष्ट किया गया है। ज्ञानार्णव मे उसके स्वामियो के प्रसग मे यह कहा गया है कि उसके स्वामी मुख्य और उपचार के भेद से यथायोग्य अप्रमत्त और प्रमत्त ये दो मुनि माने गये है। आगे वहा प्रादिपुराण और तत्त्वानुशासन के समान यह अभिप्राय प्रगट किया गया है कि सूत्र (आगम) मे उसका स्वामी विकल श्रुत से भी युक्त कहा गया है, अध श्रेणि मे प्रवृत्त हुआ जीव धर्म्यध्यान का स्वामी सुना गया है। आगे यहा यह भी निर्देश किया गया है कि कुछ आचार्य यथायोग्य हेतु से सम्यग्दृष्टि से लेकर अप्रमत्त गुणस्थान तक उक्त धर्म्यध्यान के चार स्वामियो को स्वीकार करते हैं। ध्यानस्तव मे लगभग आदिपुराण और तत्त्वानुशासन के समान धर्म्यध्यान के स्वामियो का निर्देश करते हुए कहा गया है कि उपशमक और क्षपक श्रेणियो से पहिले अप्रमत्त गुणस्थान मे मुख्य धबध्यान होता है तथा असयतमम्यग्दृष्टि, सयतासंयत और प्रमत्तसयत इन तीन मे वह गौण होता है। आगे यहा यह भी कहा गया है कि अतिशय विशुद्धि को प्राप्त वह धर्म्यध्यान ही शुक्लध्यान होता हुना दोनो श्रेणियो मे होता है (१५-१६) । तत्त्वानुशासन मे जहा 'इतरेषु' पद के द्वारा असयतसम्यग्दृष्टि आदि तीन का सकेत किया गया है वहा प्रकृत ध्यानस्तव मे कुछ स्पष्टता के साथ 'प्रमत्तादित्रये' पद के द्वारा उन तीन- प्रमत्तसयत, सयतासयत और असयतसम्यग्दृष्टि-की सूचना की गई है। इस प्रकार धर्म्यध्यान के स्वामियो के विषय मे पर्याप्त मतभेद रहा है। अधिकांश ग्रन्थकारो ने उसे स्पष्ट न करके उसके प्रसग मे प्राय उन्ही शब्दो का उपयोग किया है, जो पूर्व परम्परा मे प्रचलित रहे हैं। शुक्लध्यान- शुक्लध्यान के स्वामियो के प्रसग मे तत्त्वार्थसूत्र मे यह निर्देश किया गया है कि प्रथम दो शुक्ल- १. उक्त दोनो ग्रन्थो का वह श्लोक इस प्रकार है- श्रुतेन विकलेनापि स्याद् ध्याता मुनिसत्तम । प्रबुद्धधीरच श्रेण्योर्मध्यानस्य सुश्रुत ॥ प्रा. पु. २१-१०२. श्रुतेन विकलेनापि ध्याता स्यान्मनसा स्थिरः । प्रबुद्धधीरव श्रेण्योर्घHध्यानस्य सुश्रुत ॥ तत्त्वानु ५०. २ अदानी निषेधन्ति शुक्लध्यान जिनोत्तमा । धर्म्यध्यान पुन प्राहु श्रेणिभ्या प्राग्विवर्तिनाम् ॥ तत्त्वानु ८३. ३ अनपेतस्य धर्मस्य धर्मतो दशभेदत । चतुर्थ पचम पप्ठ मप्तमश्च प्रवर्तकः ॥ १५-१७ ४ मुग्योपचारभेदेन द्वौ मुनी स्वामिनो मतो । अप्रमत्त-प्रमत्तारयो धर्मस्यंती यथायथम् ॥ ज्ञाना २५. पृ. २८१ ५ श्रुतेन विकलेनापि स्वामी सूत्रे प्रकीर्तित । अघ श्रेण्या प्रवृत्तात्मा धर्म्यवानरय मुश्रुत ॥ ज्ञाना. २७, पृ २८१. ६ कि कश्चिन धर्मस्य चत्वार स्वामिन स्मृता । सदृष्ट्याचप्रमत्तान्ता यथायोग्येन हेतुना ॥ २८, २८२ प्रस्तावना १५ ध्यान श्रुतकेवली के और अन्तिम दो शुक्लध्यान केवली के होते है। सूत्र मे उपयुक्त 'च' शब्द के प्राश्रय से सर्वार्थ सिद्धि और तत्त्वार्थवातिक मे यह अभिप्राय व्यक्त किया गया है कि श्रुतकेवली के पूर्व के दो शुक्लष्यानो के साथ धर्म्यध्यान भी होता है। विशेप इतना है कि श्रेणि चढने के पहिले धर्म्यव्यान और दोनो श्रेणियो मे वे दो शुक्लध्यान होते है। तत्त्वार्थाधिगमभाष्यमम्मत सूत्रपाठ के अनुसार उपशान्तकपाय और क्षीणकषाय के घHध्यान के साथ आदि के दो शुक्लध्यान भी होते है। यहा भाष्य मे यह विशेष सूचना की गई है कि आदि के वे दो शुक्लध्यान पूर्ववेदी के-श्रुतकेवली के-होते है। सर्वार्थसिद्धिसम्मत सूत्रपाठ के अनुसार जहा 'पूर्ववित्' शब्द को मूल सूत्र मे ही ग्रहण किया गया है वहा भाष्यसम्मत सूत्रपाठ के अनुसार उसे मूल सूत्र मे नही ग्रहण किया गया है, पर उसकी सूचना भाष्यकार ने कर दी है । अन्तिम दो शुक्लध्यान यहा भी केवली के अभीष्ट है। ध्यानशतक में भी यही अभिप्राय प्रगट किया गया है कि पूर्व दो शुक्लध्यानो के ध्याता उप- शान्तमोह और क्षीणमोह तथा अन्तिम दो शुक्लध्यानो के ध्याता सयोग केवली और प्रयोग केवली होते हैं (६४)। धवला के अनुसार पृथक्त्ववितर्कवीचार नामक प्रथम शुक्लध्यान का ध्याता चौदह, दस अथवा नौ पूर्वो का धारक तीन प्रकार के प्रशस्त सहननवाला उपशान्तकपाय वीतराग छद्मस्थ होता है तथा द्वितीय एकत्ववितर्क-प्रवीचार शुक्लध्यान का ध्याता चौदह, दस अथवा नौ पूर्वो का धारक वज्रर्षभ- वज्रनाराचसंहन व अन्यतर सस्थान वाला क्षायिकसम्यग्दृष्टि क्षीणकषाय होता है। विशेष रूप से यहां उपशान्तकषाय गुणस्थान मे एकत्ववितर्क-प्रवीचार और क्षीणकषायकाल मे पृथक्त्ववितर्क-वीचार शुक्लध्यान की भी सम्भावना प्रगट की गई है। सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती नामक तीसरा शुक्लध्यान सूक्ष्म काययोग मे वर्तमान केवली के और चौथा समुच्छिन्न क्रियाप्रतिपाती शुक्लध्यान योगनिरोध हो जाने पर शैलेश्य अवस्था मे"--प्रयोग केवली के-कहा गया है । हरिवशपुराण मे शुक्ल और परमशुवल के भेद से शुक्लध्यान दो प्रकार का कहा गया है। इसमे प्रत्येक दो-दो प्रकार का है-पृथक्त्ववितर्क सवीचार व एकत्ववितर्क अवीचार तथा सूक्ष्मकिशाप्रतिपाती व समुच्छिन्नक्रियानिवर्तक । इनमे प्रथम शुक्लध्यान दोनो श्रेणियो के गुणस्थानो-उपशमश्रेणि के अपूर्व- करण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मसाम्पराय व उप-शान्तमोह तथा क्षपकवेणि के अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, १ शुक्ले चाये पूर्वविदः । परे केवलिन । त. सू ६, ३७-३८. २. च-शब्देन धर्म्यमपि समुच्चीयते । तत्र व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिरिति श्रेण्यारोहणात् प्राग्धर्म्यम्, श्रेण्यो शुक्ले इति व्याख्यायते । स. सि. ६-३७; त. वा. ६, ३७, २३. ३ शुक्ले चाये । त. सू. ६-३६ ४. पाये शुक्ले ध्याने पृथक्त्ववितर्ककत्ववितर्के पूर्वविदो भवत । त भाष्य ६-३६. ५ परे केवलिन. । त. सू ६-४०. ६ घव. पु. १३, पृ. ७८. ७ धव.पु १३, पृ. ७६. ८. उवसंतकसायभिम एयत्तविदक्कावीचारे सते 'उवसतो दु पुषत्त' इच्चेटेण विरोही हादितिमाकमिन्द, तत्थ पुधत्तमेवे ति णियमाभावादो । ण च खीणकसायदाए सव्वत्य एतविदका बारजमाणमंत्र, जोगपरावत्तीए एगसमयपरूवणण्णहाणुववत्तिवलेण तदद्धादीए पृक्तदिनाचारस्त्र वि संभव- सिद्धीदो। धव पु. १३, पृ. ८१. ६. धव. पु. १३, पृ.८३-८६. १०. धव. पु १३, पृ. ८७.

ध्यानशतक सूक्ष्मसाम्पराय व क्षीणमोह इन गुणस्थानो-मे होता है। द्वितीय शुक्लध्यान के स्वामी का कुछ स्पष्ट उल्लेख किया गया नहीं दिखा। सम्भवत उसे सामान्य से पूर्ववेदी-क्षीणमोह के-अथवा योगनिरोध के पूर्व केवली के कहा गया है। केवली जब तीनो वादर योगो को छोडकर सूक्ष्मकाययोग का पालम्बन करते है तब वे शुक्लसामान्य से तृतीय और विशेषरूप से-परमशुक्ल की अपेक्षा-प्रथम सूक्ष्मक्रिया- पतिपाती शुक्लध्यान पर आरूढ होने के योग्य होते है। यह शुक्लध्यान समुद्घात क्रिया के पूर्ण होने तक होता है । तत्पश्चात् द्वितीय परमशुक्ल-समुच्छिन्नक्रियानिवर्ती शुक्लध्यान-यात्मप्रदेशपरिस्पन्दन, योग और प्राणादि कर्मों के विनष्ट हो जाने पर प्रयोग केवली के होता है। आदिपुराण मे भी हरिवशपुराण के समान शुक्लध्यान के शुक्ल प्रौप परमशुक्ल ये दो भेद निर्दिष्ट किये गये है। इनमे छद्मस्थो के-उपशान्तमोह और क्षीणमोह के शुक्ल और केवलियो के परमशुक्ल होता है। तत्त्वानुशासन मे शुक्लध्यान का स्वरूप मात्र निर्दिष्ट किया गया है, उसके भेदो व स्वामियो आदि की कुछ चर्चा नहीं की गई है (२२१-२२) । ज्ञानार्णव मे आदिपुराण के समान प्रथम दो शुक्लध्यान छद्मस्थ योगियो के और अन्तिम दो दोषो से निर्मुक्त केवलज्ञानियो के निर्दिष्ट किये गये है। ध्यानस्तव मे अतिशय विशुद्धि को प्राप्त धर्म्यध्यान को ही शुक्लध्यान कहा गया है जो दोनो श्रेणियो मे-उपशमणि के अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसाम्पराय तथा क्षपकवेणि के भी इन्ही तीन गुणस्थानो मे होता है (१६) । आगे शुक्लध्यान के चार भेदो का निर्देश करते हुए उनमे पृथक्त्ववितर्क सविचार और एकत्ववितर्क अविचार इन दो शुक्लध्यानो का अस्तित्व क्रम से तीन योगो वाले और एक योगवाले पूर्ववेदी (श्रुतकेवली) के प्रगट किया गया है। तीसरा सूक्ष्म क्रियाप्रतिपाती शुक्लध्यान सूक्ष्म शरीर की क्रिया से युक्त सयोग केवली के और चौथा समुच्छिन्नक्रियानिवर्तक शुक्ल- ध्यान समस्त प्रात्मप्रदेशो की स्थिरता से युक्त प्रयोग केवली के होता है (१७-२१) । उपंसहार- तत्त्वार्थसूत्र आदि अधिकाश ग्रन्यो मे सामान्य से यह निर्देश किया गया है कि चारो प्रकार का आर्तध्यान छठे गुणस्थान तक हो सकता है। परन्तु सर्वार्थसिद्धि आदि कुछ ग्रन्थो मे इतना विशेष कहा गया है कि निदान छठे गुणस्थान मे नही होता। १. शुक्ल तत् प्रथम शुक्लतर-लेश्यावलाश्रयम् । श्रेणीद्वयगुणस्थान क्षयोशमभावकम् । ह पु ५४-६३ २. ह. पु. ५, ६४-६८. ३. अन्तर्मुहूर्तशेषायु. स यदा भवतीश्वरः । तत्तुल्यस्थितिवेद्यादित्रितयश्च तदा पुन. ।। समस्त वाड्मनोयोग काययोग च वादरम् । प्रहाप्यालम्ब्य सूक्ष्म तु काययोग स्वभावत.॥ तृतीय शुक्ल सामान्यात् प्रथम तु विशेषत । सूक्ष्मक्रियाप्रतीपाति ध्यानमस्कन्तुमर्हति ।। ह पु. ५६, ६९-७१. ४. है. पु. ५६, ७२-७७. ५. शुक्ल परमशुक्लं चेत्याम्नाये तद् द्विघोदितम् । उपस्थस्वामिक पूर्व पर केवलिना मतम् ।। श्रा पु २१-१६७. ६. छमस्ययोगिनामाघे तु तु शुक्ले प्रकीर्तिते । है त्वन्त्ये क्षीणदोपाणा केवलज्ञानचक्षुपाम् ॥ ज्ञाना. ७, पृ. ४३१.

--- प्रस्तावना १७ रौद्रध्यान की सम्भावना सर्वत्र पाचवें गुणस्थान तक बतलायी गई है। धर्म्यध्यान-तत्त्वार्थसूत्र मे भाष्यसम्मत सूत्रपाठ के अनुसार इसका सद्भाव अप्रमत्त, उपशान्त- कपाय और क्षीणकपाय के बतलाया गया है। ध्यानशतक मे भी लगभग यही अभिप्राय प्रगट किया गया है। टीकाकार हरिभद्र सूरि के स्पष्टीकरण से ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हे उसका सद्भाव उपशम श्रेणि तथा क्षपकणि के अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानो मे भी अभीप्ट है । सर्वार्थसिद्धि, तत्त्वार्थवातिक और अमितगतिश्रावकाचार मे उसका सद्भाव अविरत, देशविरत, प्रमत्तसयत और अप्रमत्तसयत इन चार गुणस्थानो मे स्वीकार किया गया है। धवलाकार उसे असयतसम्यग्दृष्टि से लेकर सूक्ष्मसाम्पराय तक सात गुणस्थानो मे स्वीकार करते हैं। हरिवशपुराण में उसके स्वामी के सम्बन्ध मे 'अप्रमत्तभूमिक' इतना मात्र सकेत किया गया है । उससे यही अभिप्राय निकाला जा सकता है कि सम्भवत हरिवशपुराणकार को उसका अस्तित्व सर्वार्थ- सिद्धि मादि के समान असयतसम्यग्दृष्टि से लेकर अप्रमत्तसयत तक चार गुणस्थानो मे अभिप्रेत है। आदिपुराण मे उसे आगमपरम्परा के अनुसार सम्यग्दृष्टियो, सयतासयतो और प्रमत्तसयतो मे स्वीकार कर उसका परम प्रकर्ष अप्रमत्तो मे माना गया है। यही अभिप्राय तत्त्वानुशासनकार का भी रहा है। ज्ञानार्णव मे अप्रमत्त और प्रमत्त ये दो मुनि उसके स्वामी माने गये है। मतान्तर से वहा उसका अस्तित्व सम्यग्दृष्टि आदि चार गुणस्थानो मे प्रगट किया गया है । घ्यानस्तव मे असयतसम्यग्दृष्टि प्रादि चार गुणस्थानो मे उसके अस्तित्व को सूचित करते हुए सम्भवत यह अभिप्राय प्रगट किया गया है कि प्रकृत धर्म्यध्यान ही अतिशय विशुद्धि को प्राप्त होकर शुक्लध्यानरूपता को प्राप्त होता हुआ दोनो श्रेणियो मे भी रहता है। इस प्रकार से ध्यानस्तवकार सम्भवत. प्रकृत धर्म्यध्यान को असयतसम्यग्दृष्टि से लेकर उपशान्तकषाय व क्षीणकपाय तक स्वीकार करते हैं, अथवा शुक्लध्यान को वे दोनो श्रेणियो के अपूर्वकरणादि गुणस्थानो मे स्वीकार करते है। प्रसग प्राप्त श्लोक १६ का जो पदविन्यास है उससे ग्रन्थकार का अभिप्राय सहसा विदित नही होता है । शुक्लध्यान-सर्वार्थसिद्धिसम्मत सूत्रपाठ के अनुसार तत्त्वार्थसूत्र मे पूर्व के दो शुक्लध्यान श्रुत- केवली के और अन्तिम दो शुक्लध्यान केवली के स्वीकार किये गये हैं। सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थवार्तिक के स्पष्टीकरण के अनुसार उपशमक और क्षपक इन दोनो श्रेणियो मे-अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्म- साम्पराय और उपशान्तमोह इन चार उपशामको के तथा अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मसाम्यराय और क्षीणमोह इन चार क्षपको के-क्रम से वे पूर्व के दो शुक्लध्यान होते है । तत्त्वार्थ भाष्यसम्मत सूत्रपाठ के अनुसार तत्त्वार्थसूत्र में पूर्व के दो शुक्लध्यान धर्मध्यान के साथ उप- शान्तकषाय और क्षीणकषाय के तथा अन्तिम दो शुक्लध्यान केवली के निर्दिष्ट किये गये हैं। यही अभिप्राय ध्यानशतककार का भी रहा दिखता है । धवलाकार के अभिप्रायानुसार प्रथम शुक्लध्यान उपशान्तकषाय के, द्वितीय क्षीणकषाय के, तृतीय सूक्ष्म काययोग मे वर्तमान सयोग केवली के और चतुर्थ शैलेश्य अवस्था मे प्रयोग केवली के होता है । प्रादि- पुराणकार और ज्ञानार्णव के कर्ता का भी यही अभिमत रहा है। हरिवशपुराणकार के अभिमतानुसार प्रथम शुक्लध्यान दोनो श्रेणियो के गुणस्थानो मे, द्वितीय सम्भवत' वादर योगो के निरोध होने तक सयोग केवली के, तृतीय सूक्ष्म काययोग मे वर्तमान सयोग केवली के और चतुर्थ अयोगी जिनके होता है । बृहद्व्यसग्रह टीका के अनुसार प्रथम शुक्लध्यान उपशमणि के अपूर्वकरण उपशमक, अनि- वृत्ति उपशमक, सूक्ष्मसाम्पराय उपशमक और उपशान्तकषाय पर्यन्त चार गुणस्थानो मे तथा क्षपक- + - १८ ध्यानशतक श्रेणिके अपूर्वकरण क्षपक, अनिवृत्तिकरण क्षपक और सूक्ष्मसाम्पराय क्षपक इन तीन गुणस्थानो मे होता है । दूसरा शुक्लध्यान क्षीणकपाय गुणस्थान मे, तीसरा उपचार से सयोगिकेवली जिनके और चौथा शुक्ल: ध्यान उपचार से अयोगिकेवली जिनके होता है (गा ४८, पृ. १७६-७७) । ध्यानस्तवकार के मतानुसार अतिशय विशुद्ध धर्म्यध्यान रूप शुक्लध्यान दोनो श्रेणियो मे रहता है। प्रथम शुक्लध्यान तीन योगोवाले पूर्ववेदी के, द्वितीय एक योगवाले पूर्व वेदी के, तृतीय सूक्ष्म काय- योग की क्रिया से युक्त सयोग केवली के और चतुर्थ अयोगी जिनके होता है। ध्यान के भेद-प्रभेद मूलाचार आदि अनेक प्राचीन ग्रन्थो मे ध्यान के सामान्य से ये चार भेद उपलब्ध होते है- मात, रोद्र, धर्म और शुक्ल । इनमें प्रथम दो को ससार के कारण होने से अप्रशस्त और अन्तिम दो को परम्परया अथवा साक्षात् मुक्ति के कारण होने से प्रशस्त कहा गया है। अनेक ग्रन्थो मे उक्त चार ध्यानो को क्रम से तिर्यग्गति, नरकगति, देवगति और मुक्ति का कारण कहा गया है। ध्यान के पूर्वोक्त आर्त आदि चार भेदो मे से प्रत्येक के भी पृथक्-पृथक् वहा चार भेदो का निर्देश किया गया है। पटखण्डागम की आ वीरसेन विरचित धवला टीका मे यह एक विशेषता देखी जाती है कि वहा ध्यान के धर्म और शुक्ल इन दो भेदो का ही निर्देश किया गया है, आर्त और रौद्र इन दो भेदो को वहा सम्मिलित नहीं किया गया। सम्भव है वहा तप का प्रकरण होने से प्रात व रौद्र इन दो अप्रशस्त ध्यानो की परिगणना न की गई हो। किन्तु तप का प्रकरण होने पर भी मूलाचार (५-१९७), तत्त्वार्थसूत्र (९-२८) और औपपातिकसूत्र (२०, पृ ४३) मे उपर्युक्त आर्त और रौद्र को सम्मिलित कर ध्यान के पूर्वोक्त चार भेदो का ही उल्लेख किया गया है। हा, प्रा हेमचन्द्र विरचित योगशास्त्र में अवश्य धवला के ही समान ध्यान के दो भेद निर्दिष्ट किये गये है-धर्म और शुक्ल' । स्वय वीरसेनाचार्य के शिष्य आ जिनसेन ने भी सामान्य से ध्यानके प्रशस्त और अप्रशस्त इन दो भेदो का निर्देश करके उनमे अप्रशस्त को आर्त और रौद्र के भेद से दो प्रकार तथा प्रशस्त को धर्म और शुक्ल के भेद से दो प्रकार बतलाया है । इस प्रकार वहा ध्यान के उपर्युक्त चार भेदो का ही निर्देश किया गया है। इधर कुछ अर्वाचीन ध्यानसाहित्य मे ध्यान के पूर्वोक्त चार भेदो के अतिरिक्त पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और रूपातीत ये अन्य चार भेद भी उपलब्ध होते है। इनका स्रोत कहा है तथा वे उत्तरोत्तर किस प्रकार से विकास को प्राप्त हुए है, यह विचारणीय है । इन भेदो का निर्देश मूलाचार, भगवती आराधना, तत्त्वार्थसूत्र व उसको टीकाओ मे तथा स्थानाग, समवायाग, भगवतीसूत्र, ध्यानशतक, हरिवशपुराण और आदिपुराण आदि ग्रन्थो मे नही किया गया है । इन मेदो का उल्लेख हमे आ. देवसेन (वि १०वी शती) विरचित भावसग्रह मे उपलब्ध होता है। जैसा कि आगे आप देखेंगे, इनके नामो का उल्लेख योगीन्दु (सम्भवत ई ६ठी शताब्दि) विरचित १. मूला. ५-१६७; त. सू. ६-२८, ध्या. श. ५; आ. पु. २१, २७-२६, ह. पु. ५६-२० तत्त्वानु. ३४ व २२०. २. ध्या. श टी ५ मे उद्धृत-प्रट्टेण तिरिक्सगई इत्यादि; ह. पु. ५६-१८, २८, ५२ और ६४; जा सा. १३, अमित. पा. १५, ११-१५. ३. झाण दुविह-धम्मज्माण सुक्कग्माणमिदि । धव. पु. १३, पृ. ७०. ४. यो. शा. ४-११५. ५. प्रा. पु. २१, २७२६. ६. भावस.~-पिण्डस्य ६१६-२२, पदस्य ६२६-२७, रूपस्थ ६२३-२५, रूपातीत ६२८-३०. (स्व. श्री प. मिलापचन्द जी कटारिया ने इस भावनग्रह को दर्शनसार के कर्ता देवसेन से भिन्न १४वी शताब्दि के लगभग होनेवाले किन्हीं अन्य देवसेन का सिद्ध किया है-(जैन निनन्यरत्नावली पृ. ३६-६४)।

प्रस्तावना १६ - योगसार (गा. ६८) मे भी किया गया है। इससे पूर्व के अन्य किसी ग्रन्थ में वह हमे देखने में नहीं पाया। पपसिंह मुनि विरचित जानसार (दि. १०८६) मे अरहन्त फी प्रधानता से पिण्डरथ, पदस्थ और रूपस्थ इन तीन की प्रलपणा धर्मध्यान के प्रसग में की गई है। पहा रूपातीत फा निर्देश नही किया गया है। इनका पुछ संकेत तत्त्वानुशासन में भी प्राप्त होता है। यहा ध्येय के नामादि चार भेदो के प्ररांग मे द्रव्य ध्येय के स्वरूप को प्रगट करते हुए कहा गया है कि ध्यान मे चूंनि ध्याता के शरीर मे स्थित ही ध्येय अर्थ का चिन्तन किया जाता है, इसीलिए गितने ही प्राचार्य उगे पिण्डस्थ ध्येय कहते है। इसके यहा नाम ध्येय के प्रसग मे जो अनेक मत्रो के जपने का विधान किया गया है उससे पदस्थध्यान फा संकेत मिलता है। इसी प्रकार स्थापना ध्येय में जिगेन्द्रप्रतिमानो का तथा द्रव्य भाव ध्येय के प्रसग गे शागस्वरूप प्रात्मा और पाच परमेष्ठियो के ध्यान का भी जो विधान किया गया है उसमे रूपस्थ और रूपातीत ध्यान भी सूचित होते है। यहा पात और रौद्र को दुनि कहकर स्याज्य तथा धर्ना और शुक्र को समीचीन ध्यान बतसागर उपाय कहा गया है (३४) । यहा धर्म्यव्यान के प्राशा व अपायपिचय प्रादि तथा शुक्लध्यान के गृथक्त्ववितर्ग राविचार प्रादि भेदो गा कुछ भी निर्देश नहीं किया गया है। मुनि नेमिचन्द्र सिद्धान्तिदेव (वि. ११वी शती) विरचित व्यसंग्रह (गूरा) भे ध्यान के पात आदि किन्ही भेयो का निर्देश नहीं दिया गया है, पर वहा परमेष्ठिवाचक अनेक पदो के जपने (४६) और पाचो परमेष्ठियो के स्वरूप के विचार करने (५० ५४) की जो प्रेरणा की गई है उससे पूर्वोक्त पदस्थ, पिण्उस्थ, रूपस्थ और रूपातीत ध्यानों का कुछ सकेत मिलता है। टीकागार ब्रह्मदेव ने (वि ११-१२वीं शती) गा. ४८ की टीका मे "पदस्थं मत्रवाक्यस्थ पिण्डरथ स्वात्मचिन्तनम् । रूपस्थ सर्वचिद्रूपं रूपातीतं निरञ्जनम् ॥" इस योगा को उद्धृत करते हुए मात श्रादि के साथ इस प्रकार के विचित्र ध्यान की सूचना की है। प्रा. अमितगति द्वि. (वि. ११वी शती) विरचित श्रावणाचार फे १५वें परिच्छेद मे ध्यान का वर्णन किया गया है। यहा प्रथमत' ध्यान के पात प्रादि चार भेदो का विवेचन करते हुए ध्यान के इच्छुया जीव के लिए ध्याता, ध्येय, ध्यान की विधि और ध्यानफरा इन चार के जान रोने की प्रेरणा की गई है (१५-२३) । तत्पश्चात् उसी क्रम से उनका निरूपण करते हुए वहा ध्येय के प्रसग गे पदस्थ (१५, ३०.४६), पिण्डरथ (१५, ५०-५३), रूपस्थ (१५-५४) और अरूण (रूपातीत) (१५, ५५-५६) इन पार का भी वर्णन किया गया है । यहा पदस्थध्यान मा निर्देश पिण्डरय के पूर्व में किया गया है। प्रा. शुभचन्द्र (पि. ११वी शती) विरचित शानार्णव मे उक्त प्रात आदि पार भेदो के उल्लेख के साथ पिण्डरथ (१ ३३, पृ. ३८१.८६), पाथ (१-११६, पृ ३८७-४०८), रूपस्थ (१-४६, पृ. ४०६ से ४१६) और रूपातीत (१-३१, पृ ४१७-२३) इन चार का वर्णन विरतारपूर्वक किया गया है । प्रा. वसुनन्दी (दि. १२वी शती) विरचित श्रावकाचार मे इनका निरूपण पदस्थ, पिण्डस्थ, रूपस्थ और रूपातीत के कग से किया गया है (गा. ४५६-६३, ४६४-७३, ४७४-७५, ४७६)। योगिचन्द्र या योगीन्दु प्रणीत योगराार मे इन चारो ध्यानो गे नाम मात्र का निर्देश दिया गया १. शा सा. १८ (पिण्डस्थ १६.२०, पदस्थ २१-२७, रूपस्थ का उल्रोग्य स्पष्ट नही है, सम्भवतः उसका स्वरूप गा. २८ मे निर्दिष्ट है)। २. ध्यातुः पिण्डे स्थितश्चैव ध्येयोऽर्थों ध्यायते यत । ध्येय पिण्डस्थमित्याहुरतएव प गौचन ॥ तत्वानु. १३४. ३. तत्त्वानु. १०१.८० ४ तत्त्वानु. १०६ व ११८-३०. - २० ध्यानशतक है। श्री डॉ उपाव्ये ने योगीन्दु के समय पर विचार करते हुए उनके ईसा की छठी शताब्दि मे होने की कल्पना की है। तदनुसार यदि वे छठी शताब्दि के आस-पास हुए है तो यह कहा जा सकता है कि उक्त पिण्डस्थ प्रादि ध्यानो का निर्देश सर्वप्रथम उन्ही के द्वारा किया गया है । हेमचन्द्र मूरि (वि १२ १३वी शती) विरचित योगशास्त्र (४-११५) मे ध्यान के अन्तर्गत पात और रौद्र इन दो अप्रशस्त ध्यानो का कही कोई निर्देश नहीं किया गया। वहा पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और स्पातीत इन चार भेदो की प्ररूपणा क्रम से सातवें, आठवें, नौवें और दमवें (१.४ श्लोक) इन चार प्रकाशो में की गई है । तदनन्तर इसी दमवे प्रकाश में प्राज्ञाविचयादि चार भेदो मे विभक्त धर्मध्यान का निरूपण करते आगे ११वें प्रकाश मे शुक्लध्यान का विवेचन किया गया है । भास्करनन्दी (वि १२वी शती) विरचित ध्यानस्तव मे ध्यानशतक (५) के समान प्रथमतः अातं आदि चार भेदो का निर्देश करते हुए उनमे आदि के दो को ससार का कारण और अन्तिम दो को मुक्ति का कारण कहा गया है (८)। आगे उनमे से प्रत्येक के चार चार भेदो का निरूपण करते हुए (६-२१) पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और रूपातीत के भेद से उक्त समस्त ध्यान को चार प्रकार का कहा गया है । तदनन्तर इन चारो के पृथक्-पृथक् स्वरूप को भी प्रकट किया गया है (२४-३६) । ज्ञानार्णव में इन पिण्डस्थादि चार भेदो की प्ररूपणा सस्थानविचय धर्मव्यान के प्रसग मे की गई है। इसमे ऐसा प्रतीत होता है कि जानार्णव के कर्ता को ये भेद सस्थानविचय धर्मध्यान के अन्तर्गत अभीष्ट रहे हैं। पर उन्होने इसका कुछ स्पष्ट निर्देश न करते हुए इतना मात्र कहा है कि पिण्डस्थादि के मेद से ध्यान चार प्रकार का कहा गया है। पर ध्यानस्तवकार के द्वारा जो ये पिण्डस्पादि चार भेद सामान्य से समस्त ध्यान के निर्दिष्ट किये गये हैं, यह कुछ असगत-सा प्रतीत होता है। कारण इसका यह है कि समस्त ध्यान के अन्तर्गत वे आर्त और रौद्र ध्यान भी आते हैं जो ससार के कारण है, जव कि उक्त पिण्डस्थादि ध्यान स्वर्ग-मोक्ष के कारण है। सम्भव है ध्यानस्तव के इस प्रसंग से सम्बद्ध श्लोक २४ मे 'सर्व' के स्थान में 'धम्य' पाठ रहा हो। ध्यानशतक मे चतुर्थ (सस्थानविचय) धर्म्यध्यान का विषय बहुत व्यापक रूप में उपलब्ध होता है। वहा इस ध्यान मे द्रव्यो के लक्षण, सस्थान (प्राकृति), प्रासन (आधार), भेद और प्रमाण के साथ उनकी उत्पाद, स्थिति व व्ययरूप गर्यायो को भी चिन्तनीय कहा गया है (५२) । साथ ही वहा पचास्तिकाय- स्वरूप लोक के विभागो और उपयोगस्वरुप जीव के ससार व उससे मुक्त होने के उपाय के भी विचार करने की प्रेरणा की गई है (५३.६०) । इस प्रगर उक्त मस्थानविचय की व्यापकता को देखते हुए यदि ज्ञानार्णवकार को पूर्वोक्त पिण्डस्थ अादि भेद उसके अन्तर्गत अभीष्ट रहे हैं तो यह सगत ही माना जायगा। हा, यह अवश्य है फि लोकर दि के अनुमार ध्यान शब्द से जहा ममीचीन ध्यान की ही विवक्षा रही है वहा यदि पिण्डम्य प्रादि को सामान्य ध्यान के अन्तर्गत माना जाता है तो उसे असगत भी नहीं कहा जा सकता। परन्तु ध्यानम्तव के कर्ता की वैसी विवक्षा नही रही है, क्योकि उन्होने सामान्य से ध्यान के जिन चार भेदो का निर्देश लिया है, यात व रोद्र भी उनके अन्तर्गत है (5)। १. जो पिडत्यु पयत्थु वुह व्यत्यु वि जिणउत्तु । रूवातीतु मुहि लहु जिमि पर होहि पवित्त । यो. मा ६८. २. परमात्मप्रकाश को प्रस्तावना इगलिया पृ ६७ व हिन्दी प्रस्तावना पृ. ११५. ३. पिण्टम्य न पदम्य च पम्ध वनितम् । चतुर्दा ध्यानमाम्नात भव्य-गानीव-नाम्करै ।। १, ३५१ प्रस्तावना २१ पिण्डस्थ आदि के स्वरूप का विचार विविध ग्रन्थों मे प्ररूपित उक्त पिण्डस्थ आदि के स्वरूप मे जो कुछ विशेषता देखी जाती है उसका यहा कुछ दिग्दर्शन कराया जाता है । पिण्डस्थ- भावसग्रह (६२२) मे जहा अपने शरीर मे स्थित निर्मल गुणवाले प्रात्मप्रदेशो के समूह के चिन्तन को पिण्डस्थध्यान कहा गया है वहा ज्ञानसार (१६-२०) मे अपने नाभि-कमल के मध्य मे स्थित अरहन्त के स्वरूप के चिन्तन को पिण्डस्थध्यान कहते हुए भालतल, हृदय और कण्ठदेश मे उसके ध्यान करने की प्रेरणा की गई हैं। अमितगति-श्रावकाचार मे पिण्डस्थध्यान का स्थान पदस्थ के बाद दूसरा है । यहा कर्मकालुष्य से रहित होकर अनन्त ज्ञान-दर्शनादि से विभूषित, नौ केवललब्धियो से सम्पन्न एव पाच कल्याणको को प्राप्त जिनेन्द्र के ध्यान को पिण्डस्थध्यान कहा गया है (१५, ५०-५३)। ज्ञानार्णव मे उसे अधिक विकसित करते हुए उसमे पार्थिवी, प्राग्नेयी, श्वसना (मास्ती), वारुणी और तत्त्वरूपवती इन पाच धारणाओ का निर्देश करके उनका उपर्युक्त क्रम के अनुसार व्यवस्थित रूप मे विचार किया गय है'। इन धारणाओ के स्वरूप को सक्षेप मे इस प्रकार समझा जा सकता है -प्रथम पाथिवी धारणा मे योगी मध्यलोक के वरावर गम्भीर क्षीरसमुद्र, उसके मध्य मे हजार पत्तोवाले जम्बू- द्वीप प्रमाण कमल, उसमे मेरु पर्वतस्वरूप कणिका, उसके ऊपर उन्नत सिंहासन और उसके ऊपर विराज- मान राग-द्वेष से विरहित आत्मा का स्मरण करता है। दूसरी आग्नेयी धारणा में नाभिमण्डल मे सोलह पत्तोंवाले कमल, उसके प्रत्येक पत्र पर प्रका- रादि के क्रम से स्थित सोलह स्वरो और उसकी कणिका पर महामत्र (है) की कल्पना की जाती फिर उस महामत्र की रेफ मे निकलती हुई अग्निकणो से सयुक्त ज्वालावाली धूमशिखा की कल्पना करता हुआ योगी निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होनेवाले उस ज्वालासमूह से हृदयस्थ अधोमुख पाठ पत्तोवाले कमल के साथ उस कमल को भस्म होता हुआ स्मरण करता है। तत्पश्चात् शरीर के वाहिर त्रिकोण अग्निमण्डल की कल्पना करके ज्वालासमूह से सुवर्ण जैसी कान्तिवाले वह्निपुर के साथ शरीर और उस कमल को भस्मसात् होता हुआ स्मरण करता है, फिर वह दाह्य के शेष न रहने से धीरे-धीरे उसी अग्नि को स्वय शान्त होता हुआ देखता है। तीसरी श्वसना धारणा मे योगी महासमुद्र को क्षुब्ध करके देवालय को शब्दायमान करनेवाली उस प्रबल पवन का स्मरण करता है जो पृथ्वीतल मे प्रविष्ट होती हुई भस्मसात् हुए उस शरीर आदि की भस्म को उडाकर स्वय शान्त हो जाती है । चौथी वारुणी धारणा मे योगी इन्द्रधनुष और विजली के साथ गरजते हुए मेघो के समूह से व्याप्त ऐसे आकाश का स्मरण करता है जो निरन्तर वडी-बड़ी बूदो से वर्षा करके जलप्रवाह के द्वारा अर्धचन्द्राकार वरुणपुर को तैराता हुआ पूर्वोक्त शरीर से उत्पन्न उस भस्म को धो डालता है । अन्तिम तत्त्वरूपवती धारणा मे योगी सप्तधातुमय शरीर से रहित सर्वज्ञ सदृश अपने शरीर के मध्यगत पुरुषाकार उस आत्मा का स्मरण करता है जो समस्त कर्मकलक से रहित होकर दिव्य अतिशयो से युक्त होती हुई सिंहासन पर विराजमान है। उक्त पाच धारणाप्रो मे से ये तीन धारणायें क्रम से तत्त्वानुशासन मे भी उपलब्ध होती हैं- मारुती, तेजसी और पाप्या । ये क्रम से श्वसना, आग्नेयी और वारुणी के पर्याय नाम है । तत्त्वानुशासन १. पार्थिवी ४-८, पृ ३८१-८२, आग्नेयी १०-१६, पृ ३८२-८३, श्वसना २०-२३, पृ ३८४-८५, तत्त्वरूपवती २६-३१, पृ. ३६५.

२२ ध्यानशतक मे धर्म्य और शुक्ल के दुशक्य ध्येय के अभ्यास के प्रसग मे कहा गया है कि पिण्डसिद्धि और शुद्धि के लिए प्रथमत क्रम से मारुती, तेजसी और पाप्या धारणामो का पाराधन करना चाहिए (१८३) । आगे इन धारणापो को क्रम से कुछ स्पष्ट करते हुए वहा यह कहा गया है कि ध्याता 'मह' के प्रकार को वायु से पूर्ण व कुम्भित करके रेफ से प्रगट हुई अग्नि के द्वारा अपने शरीर के साथ कर्म को भस्मसात् करके उस भस्म को स्वय विरेचित करता हुआ प्रात्मा मे अमृत के बहानेवाले 'ह' मत्र का आकाश मे चिन्तन करे और यह विचार करे कि उससे अन्य अमृतमय शरीर निर्मित हो रहा है। तत्पश्चात् पाच स्थानो मे निक्षिप्त पाच पिण्डाक्षरो से युक्त पचनमस्कार पदो से सकलीकरण क्रिया को करे और तब अपने को अरहन्त और कर्ममल से रहित सिद्ध जैसा ध्यान करे (१८४-८७) । सम्भव है ज्ञानार्णव के कर्ता ने तत्त्वानुशासन से उक्त तीन धारणाग्रो को लेकर और उनमे पार्थिवी व तत्त्वरुपवती इन दो धारणामो को और सम्मिलित करके उन्हे यथाक्रम से व्यवस्थित रुप मे विकसित किया हो। वसुनन्दि-श्रावकाचार मे प्रकृत पिण्डस्थध्यान के प्रसग मे यह कहा गया है कि धवल किरणो से प्रकाशमान व पाठ महाप्रातिहार्यों से वेष्टित जो आत्मा का ध्यान किया जाता है उसे पिण्डस्थध्यान जानना चाहिए । भागे विकल्प रूप मे वहा यह भी कहा गया है कि अथवा नाभि मे मेरु की कल्पना करके उसके अधोभाग मे अधोलोक, दूसरे तिर्यग्भाग मे मध्यलोक, अर्वभाग भे कल्पविमान, ग्रीवास्थान में अवेयको, ठोडीप्रदेश मे अनुदिशो, मुखप्रदेश मे विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित और सर्वार्थ इन अनुत्तरविमानो; ललाटदेश मे सिद्धशिला और उसके ऊपर शिर की शिखा पर सिद्धक्षेत्र, इस प्रकार से जो अपने शरीर का ध्यान किया जाता है उसे भी पिण्डस्थध्यान समझना चाहिए (४५६-६३) । गुरुगुणपत्रिंशिका की स्वोपज्ञ वृत्ति मे कहा गया है कि नाभि-कमलादि रूप स्थानो मे जो इष्ट देवता आदि का ध्यान किया जाता है उसे पिण्डस्थध्यान कहते है (२, पृ. १०) । पदस्थ- भावसग्रह में पदस्थध्यान में पदस्थध्यान के स्वरूप को व्यक्त करते हुए यह कहा गया है कि देशविरत गुणस्थान मे जो देवपूजा के विधान का कथन किया गया है उसे पदस्थध्यान कहते है। अथवा पाच गुरुप्रो से सम्बद्ध जो एक पद या अक्षर का जाप किया जाता है वह भी पदस्थध्यान कहलाता है (६२६-२७) । ज्ञानसार मे पदस्थध्यान के प्रसग मे यह कहा गया है कि सातवें वर्ग के दूसरे वर्ण (र) से युक्त अाठवें वर्ग के चतुर्थ वर्ण (ह) के ऊपर शून्य रखकर र् से सयुक्त करने पर उसे तत्त्व (ह) समझो । एक, पाच, सात और पैतीस धवल वर्णों का जो ध्यान किया जाता है उसे पदस्थध्यान कहा गया है । आगे पुन पैतीस अक्षरो के महामत्र के साथ प्रणव (ॐ) आदि के जपने का निर्देश करते हुए पाच स्थानो मे पाच कमलो पर कम से पाच वर्गों को तथा सात स्थानों में सात अक्षरो को स्थापित कर उनके साथ जो सिर पर सिद्धस्वरूप का ध्यान किया जाता है, इसे पदस्थध्यान कहा गया है, इत्यादि (२१-२७) । अगितगति-थावकाचार में इस पदस्थध्यान के प्रसग मे पच नमस्कार पदो के ध्यान का विधान करते हुए अनेक प्रकार के मत्राक्षरो व मत्रपदो के जपने का उपदेश दिया गया है (१५, ३१-४६) । शानाणव (१, पृ ६८७) और योगशास्त्र (८.१) में पदस्थध्यान के स्वरूप को दिसलाते हुए समान रूप में यह कहा गया है कि पवित्र पदो का मालम्वन लेकर जो अनुष्ठान या चिन्तन किया जाता है उसे पदस्थध्यान कहते हैं। प्रागे इन दोनो ग्रन्यो मे अक्षर और मत्र पदों का विस्तार से व्याख्यान किया गया है। वसुनन्दि-श्रावकाचार में एक अक्षरादिरूप जो परमेष्ठी के बा चक निर्मल पद है उनके उच्चारण- पूर्वफ ध्यान करने को पदस्थध्यान कहा गया है (४६४) । १. माना. १-११६, पृ. ३८७.४०६, यो. शा. ८, २०८१. - . ।

प्रस्तावना ३ ;- गुरुगुणनिशिका की स्वोपज्ञ वृत्ति (वि. १५वी शती) मे स्वाध्याय, मत्र तथा गुरु व देवता की स्तुति मे जो चित्त को एकाग्रता होती है उसे पदस्थध्यान कहा गया है (२, पृ १०)। वामदेव (वि. १५वी शती) विरचित भावसग्रह मे प्राकृत भावसग्रह के समान पाच गुरुनो से सम्बद्ध पदो के ध्यान को पदस्थध्यान माना गया है (६६२) । इस प्रकार पदस्थध्यान के स्वरूप के विषय मे प्राय सभी ग्रन्थकार हीनाधिक रूप मे सहमत हैं । रूपस्थ- ज्ञानसार मे रूपस्थध्यान का निर्देश करते हुए यह कहा गया है कि ध्याता घातिया कर्मों से रहित होकर अतिशयो व प्रातिहार्यों से सयुक्त हुए समवसरणस्थ अरहन्त का जो ध्यान करता है वह रूपस्थ- ध्यान कहलाता है (२८) । ज्ञानार्णव मे उसके लक्षण को स्पष्ट करते हुए यह कहा गया है कि सात धातुओ से रहित व समस्त अतिशयो से सहित होकर समवसरण मे विराजमान प्राद्य (ऋषभ) जिनेन्द्र का जो ध्यान किया जाता है उसका नाम रूपस्थध्यान है (१-८, पृ ४०६) । आगे वहा पुन यह कहा गया है कि इस ध्यान मे ध्याता को महेश्वर (२७), आदिदेव, अच्युत (२८), सन्मति, सुगत, महावीर (२९) और वर्धमान (३०) आदि अनेक सार्थक पवित्र नामो से उपलक्षित सर्वज्ञ वीर देव का स्मरण करना चाहिए (पृ. ४११-१२)। भावसग्रह मे उस रूपस्थध्यान के दो भेद निर्दिष्ट किये गये हैं.-स्वगत रूपस्थध्यान और परगत रुपस्थध्यान । जिसमे पाच परमेष्ठियो का चिन्तन किया जाता है वह परगत रूपस्थध्यान कहलाता है तथा जिसमे अपने शरीर के वाहिर स्थित तेजपुज स्वरूप अपनी आत्मा का चिन्तन किया जाता है वह स्वगत रूपस्थध्यान कहलाता है (६२४-२५) । द्रव्यसग्रह की टीका मे चिद्रूप के चिन्तन को रूपस्थध्यान का लक्षण कहा गया है। अमितगति-श्रावकाचार मे प्रतिमा मे आरोपित परमेष्ठी के स्वरूप के चिन्तन को रूपस्थध्यान कहा गया है (१५-५४) । योगशास्त्र मे रूपस्थध्यान के स्वरूप का निर्देश करते हुए यह कहा गया है कि छत्रत्रय आदि रूप प्रातिहार्यों से सम्पन्न व समस्त अतिशयो से युक्त होकर समवसरण मे स्थित अरहन्त केवली के रूप का जो ध्यान किया जाता है उसे रूपस्थध्यान कहते हैं (६, १-७) । अथवा राग, द्वेष एव मोहादि विकारो से रहित जिनेन्द्रप्रतिमा के रूप का भी जो ध्यान किया जाता है उसे रूपस्थध्यान जानना चाहिए (६, ८-१०)। वसुनन्दि-श्रावकाचार मे रूपस्थध्यान के प्रसग मे यह कहा गया है कि पाठ प्रातिहार्यों से सहित व अनन्त ज्ञानादि से विभूषित होकर समवसरण मे स्थित अरहन्त प्रभु का जो ध्यान किया जाता है उसका नाम रूपस्थध्यान है । अथवा उपर्युक्त गुणो से मण्डित होकर परिवार (समवसरण) से रहित हुए जिनका समस्त शरीर क्षीरसमुद्र की जलधारा से धवल वर्ण को प्राप्त है ऐसे सर्वज्ञ जिनका जो विचार किया जाता है उसे रूपस्थध्यान जानना चाहिये (४७२-७५) । ध्यानस्तव मे रूपस्थध्यान के प्रसग मे यह कहा गया है कि ध्याता एकाग्रचित्त होकर जो जिनदेव के नामपदरूप मत्र का जाप करता है वह रूपस्थध्यान कहलाता है। अथवा ध्याता प्रातिहार्यों आदि से विभूषित निर्मल अरहन्त प्रभु का जो भिन्नरूप मे ध्यान करता है उसे रूपस्थध्यान जानना चाहिए (३०-३१)। रूपातीत- भावसग्रह मे रूपातीतध्यान के प्रसग मे यह कहा गया है कि जिस ध्यान मे ध्याता न शरीर मे १. रूपस्थ सर्वचिद्रूपxxx॥ बृ. द्रव्यस. टीका ४८ मे उद्धृत । - * .

२४ ध्यानशतक स्थित किसी का चिन्तन करता है, न शरीर के बाहिर स्थित किसी का चिन्तन करता है, न स्वगत रूप का चिन्तन करता है, और न परगत रूप का चिन्तन करता है। ऐसे मालम्बन से रहित ध्यान को गतरूप (रूपातीत) ध्यान माना गया है । आगे वहा यह भी सूचित किया गया है कि धारणा-न्येय से रहित इस ध्यान मे चित्त का कोई व्यापार नहीं होता। उसमे इन्द्रियविषयो के विकार और राग-द्वेष भी क्षय को प्राप्त हो जाते हैं (६२८-३०)। यह विशेष स्मरणीय है कि यहा प्रकृत पिण्डस्थ आदि चार ध्यानो का निरुपण अप्रमत्त गुणस्थान के प्रसग मे ध्याता, ध्यान, ध्येय और फल इन चार अधिकारी के निर्देश- पूर्वक ध्यान के प्रकरण मे किया गया है (६१४-४१) । अमितगति-श्रावकाचार मे रूपातीत ध्यान के लक्षण का निर्देश करते हुए यह कहा गया है कि स्फटिक मणि मे प्रतिविम्वित जिनरूप के समान जो नीरूप-मूर्तिक शरीर से रहित-सिद्धस्वरूप आत्मा का ध्यान किया जाता है उसका नाम अरूप (रूपातीत) ध्यान है (१५, ५५-५६) । द्रव्यसग्रह की टीका मे रूपातीत ध्यान का लक्षण निरजन कहा गया है। उसका अभिप्राय यही समझना चाहिए कि कर्म-कालिमा से रहित जो सिद्धस्वरूप प्रात्मा का ध्यान किया जाता है वह रूपा- तीत ध्यान कहलाता है। ज्ञानार्णव (१६, पृ. ४१६) और योगशास्त्र (१०-१) में चिदानन्दस्वरूप प्रमूर्तिक व शाश्वतिक उत्कृष्ट प्रात्मा के स्मरण को रूपातीत घ्यान कहा गया है। वसुनन्दि-श्रावकाचार मे वर्ण, रस, गन्ध और स्पर्श से रहित ऐसे ज्ञान-दर्शनस्वरूप परमात्मा के ध्यान को रूपरहित (रूपातीत) ध्यान कहा गया है (४७६) । ध्यानस्तव मे प्रकृत रूपातीतध्यान के लक्षण मे यह कहा गया है कि जो योगी आत्मा मे स्थित, शरीर से भिन्न होकर उस शरीर के प्रमाण, ज्ञान-दर्शनस्वरूप, कथचित् कर्ता, भोक्ता, अमूर्त, नित्य, एक, शुद्ध व क्रिया से सहित और रोष-तोष से रहित, उदासीन स्वभाव वाले, स्वसवेद्य सिद्ध परमात्मा का ध्यान करता है उसके रूपातीत ध्यान होता है (३२-३६)। उपसंहार- ज्ञानसार मे धर्मध्यान के प्रसग मे पिण्डस्थ, पदस्थ और रूपस्थ के भेद से तीन प्रकार के प्ररहन्त के ध्यान की प्रेरणा करते हुए अपने नाभि-कमल आदि मे स्थित उक्त अरहन्त के ध्यान को पिण्डस्थ- ध्यान कहा गया है (१६.२०) । भावसग्रह (६२००२२), तत्त्वानुशासन' (१३४), अमितगति-श्रावकाचार (१५, ५०-५३), द्रव्य- सग्रह टीका (४८), वसुनन्दि-श्रावकाचार (४५६), ध्यानस्तव (२५-२८) और भावसंग्रह (वाम.-६६१) के अनुसार निज देहस्थ अरहन्त के ध्यान का नाम पिण्डस्थध्यान है। विशेषता यह रही है कि तत्त्वानु- शासन मे जहा ध्याता के पिण्ड (शरीर) मे स्थित ध्येय के रूप मे अरहन्त की सूचना की गई है वहा द्रव्यसग्रह की टीका मे उद्धृत श्लोक के अनुसार देह का निर्देश न करके केवल स्वात्मचिन्तन को ही पिण्डस्थध्यान कहा गया है। वसुनन्दि-श्रावकाचार (४६०-६३) मे विकल्परूप से नाभि में मेरु की कल्पना करके उसके अघस्तन व उपरिम अंगो मे यथायोग्य प्रघोलोक व तिर्यग्लोक आदि लोक के विभागो की कल्पना करते हुए निज देह के ध्यान को भी पिण्डस्थ वतमाया गया है। ज्ञानार्णव और योगशास्त्र में इस पिण्डस्थध्यान के प्रसंग में पापिवी, माग्नेयी, मारुती, यारुणी पौर तत्त्वरूपवती (तत्त्वभू) इन पाच धारणामो का निरूपण किया गया है। पूर्वोक्त ज्ञानसार प्रादि अन्यों में जो अरहन्त के ध्यान को पिण्डस्यध्यान कहा गया है वह प्रकृत ज्ञानार्णव (२८-३०, पृ. ३८५) १. xxx रूपातीत निरन्जनम् ॥ द्रव्यस टी. ४८. में उद्धृत । २ यहा पिण्डस्य प्रादि ध्यानभेदो का निर्देशन करके मतान्तर के अनुसार पिण्डस्यध्येय को सूचना मी गई है।

प्रस्तावना २५ और योगशास्त्रगत (७, २३-२५) उक्त पाच धारणाओ मे अन्तिम तत्त्वरूपवती धारणा के अन्तर्गत है । पदस्थध्यान के विषय मे पूर्वोक्त सभी ग्रन्थो मे कही कोई विशेष मतभेद दृष्टिगोचर नहीं होता। उन सभी ग्रन्थो मे प्राय इस ध्यान मे सक्षेप अथवा विस्तार से विविध प्रकार के मत्रो को चिन्तनीय कहा गया है। विशेष इतना है कि अनेक ग्रन्थो मे जहा पिण्डस्थ को प्रथम और पदस्थ को दूसरा ध्यान कहा गया है वहा द्रव्यसग्रह की टीका और अमितगति श्रावकाचार में प्रथमत पदस्थध्यान का और तत्पश्चात् पिण्डस्थध्यान का उल्लेख किया गया है। रूपस्थध्यान के विषय मे उपर्युक्त ग्रन्थो के कर्ता एकमत नही है—ज्ञानसार' (२८), ज्ञानार्णव' (१-४६, पृ४०६-१६) योगशास्त्र (६, १-७) और वसुनन्दि-श्रावकाचार (४७२-७५) मे पाठ प्राति- हार्यों व समस्त अतिशयो से सहित अरहन्त के स्वरूप के चिन्तन को रूपस्थध्यान कहा गया है। भावसग्रह मे इस ध्यान को स्वगत और परगत के भेद से दो प्रकार बतलाकर अपने शरीर के बाहिर अपनी आत्मा के चिन्तन को स्वगत और पाच परमेष्ठियो के ध्यान को परगत रूपस्थध्यान कहा गया है (६२३-२५)। अमितगति-श्रावकाचार (१५-५४) मे प्रतिमा मे आरोपित परमेष्ठी के स्वरूप के चिन्तन को और ध्यानस्तव (३०) मे जिनेन्द्र के नामाक्षर व धवल प्रतिविम्ब के चिन्तन को रूपस्थध्यान का लक्षण बतलाया है। इसी ध्यानस्तव (३१) मे आगे विकल्लरूप मे पूर्वोक्त ज्ञानसार आदि के समान प्रातिहार्यों आदि से विभूषित अरहन्त के ध्यान को भी रूपस्थध्यान कहा गया है। रूपातीतध्यान-ज्ञानसार मे पिण्डस्थ, पदस्थ और रूपस्थ के भेद से तीन प्रकार के अरहन्त के ध्यान का ही निर्देश किया गया है। वहा इस रूपातीत ध्यान का कही कोई निर्देश नही किया गया (१६-२८)। शेष सभी ग्रन्थो मे प्राय रूप-रसादि से रहित अमूर्तिक सिद्ध परमात्मा के चिन्तन को रूपातीतध्यान का कक्षण कहा गया है । ध्यान, समाधि और योग की समानार्थकता इन तीनो शब्दो के अर्थ मे सामान्य से कुछ भेद नही हैं, क्योकि वे तीनो ही शब्द प्राय एकान- चिन्तानिरोधरूप समान अर्थ मे प्रयुक्त हुए है। उदाहरणस्वरूप स्वयम्भूस्तोत्र को लिया जा सकता है । १. ज्ञानसारगत इस श्लोक में यद्यपि रूपस्थध्यान का नामोल्लेख नही किया गया है, फिर भी प्रसग के अनुसार उसमे प्रकृत रूपस्थध्यान का ही लक्षण कहा गया दिखता है। २. ज्ञानार्णव मे इस ध्यान के प्रसग मे आद्य जिनभास्कर (आदि जिनेन्द्र-८), वृषभसेन आदि (पादि जिनेन्द्र के गणघर-१३), अरहन्त (२६), महेश्वर (२७), आदिदेव (२८), सन्मति, सुगत, महा- वीर (२६), वर्धमान और वीर आदि अनेक नामो का निर्देश किया है। ३. इस पद्धति मे पिण्डस्थ और पदस्थ ध्यानो मे कुछ विशेषता नही रही है । ४. योगशास्त्र मे भी आगे (६, ८-१०) विकल्प रूप मे जिनेन्द्रप्रतिमा के रूप के ध्यान को रूपस्थध्यान कहा है। ५. ध्यानस्तव मे यहा रूपस्थ और रूपातीत ध्यानो के प्ररूपक श्लोको मे जिस प्रकार के पद प्रयुक्त हुए हैं, जैसे-'देव स्वदेह' (३१), 'कर्तार चानुभोक्तार' (३३) आदि, उनसे ग्रन्थकार के अभिप्राय का ठीक से वोध नही होता। ६. (क) युजे. समाधिवचनस्य योग , समाधि ध्यानमित्यनान्तरम् । त. वा. ६, १, १२. (ख) योगो ध्यान समाधिश्च धीरोध स्वान्तनिग्रहः । अन्त.सलीनता चेति तत्पर्याया. स्मृता बुधं ॥ प्रा. पु २१-१२.

- २६ ध्यानशतक उसमे इन तीनो ही शब्दो का उपयोग एकाग्रचिन्तानिरोधस्वरूप राग-द्वेष से रहित आत्मस्थिति अर्थ मे किया गया है । यथा- १ आदि जिनेन्द्र की स्तुति करते हुए वहा यह कहा गया है कि हे नाभिराय के नन्दन ! आपने समाधिरूप तेज (अग्नि) से अज्ञानादि दोपो के सूल कारणभूत कर्म को भस्मसात् करके आत्महितपी भव्य जनो को तत्त्व का उपदेश दिया। २ चन्द्रप्रभ जिनकी स्तुति मे कहा गया है कि हे प्रभो । आपने अपने शरीर के प्रभामण्डल से वाह्य अन्धकार को तथा ध्यान रूप दीपक के सामर्थ्य से अभ्यन्तर अन्धकार (अज्ञान) को भी नष्ट कर दिया है। ३ मुनिसुव्रत जिनेन्द्र की स्तुति करते हुए कहा गया है कि हे जिन | आपने अपने अनुपम योग के सामर्थ्य से आठो कर्मरूप मल को नष्ट करके मुक्तिसुख को प्राप्त किया है। इस प्रकार इन तीनो शब्दो के अर्थ मे सामान्य से एकरूपता के होते हुए भी लक्षण आदि के भेद से कुछ विशेपता भी दृष्टिगोचर होती है। यथा- -- ध्यान- आचार्य कुन्दकुन्द ने ध्यान को सम्यग्दर्शन व ज्ञान से परिपूर्ण और अन्य द्रव्य के ससर्ग से रहित कहा है । तत्त्वार्थसूत्र मे अनेक अर्थों का पालम्बन लेने वाली चिन्ता के निरोध को-अन्य विषयो की अोर से हटाकर उसे किसी एक ही वस्तु मे नियन्त्रित करने को-ध्यान कहा गया है। ध्यानशतक और आदिपुराण मे स्थिर अध्यवसान को-एक वस्तु का पालम्बन लेने वाले मन को ध्यान कहा गया है। भगवती आराधना की विजयोदया टीका मे राग, द्वेष और मिथ्यात्व के सपर्क से रहित होकर पदार्थ की यथार्थता को ग्रहण करने वाला जो विपयान्तर के सचार से रहित ज्ञान होता है उसे ध्यान कहा गया है । वही आगे एकाग्रचिन्ता निरोध को भी ध्यान कहा गया है। तत्त्वार्थसूत्र के समान तत्त्वानुशासन मे भी (ग) प्रत्याहृत्य यदा चिन्ता नानालम्वनवतिनीम् । एकालम्बन एवंना निरुणद्धि विशुद्धधी ॥ तदास्य योगिनो योगश्चिन्तकाग्मनिरोधनम् । प्रसख्यान समाधिः स्याद् ध्यान स्वेष्टफलप्रदम् ॥ तत्त्वानु. ६०-६१. (घ) योग. समाधि , स च सार्वभौमश्चित्तस्य धर्म । यो. सू भाष्य १-१. १. स्वदोपमूल स्वसमाधि-तेजसा निनाय यो निर्दय-भस्मसात् क्रियाम् । जगाद तत्त्व जगतोऽथिनेऽञ्जसा वभूव च ब्रह्मपदामृतेश्वर ॥ स्व. स्तो. १-४. (इस शब्द का उपयोग आगे श्लोक ४-१ और १६-२ में भी हुआ है) २. यस्याङ्गलक्ष्मीपरिवेशभिन्नं तमस्तमोरेरिव रश्मिभिन्नम् । ननाश वाह्यं बहु मानस च घ्यान-प्रदीपातिशयेन भिन्नम् ॥ स्व. स्तो. ८-२. (इसका उपयोग आगे श्लोक १६-४, १७.३, १८-१० और १६-५ मे भी हुआ है) ३. दुरित-मल-कलमष्टक निरुपमयोगवलेन निर्दहन् । अभदभवसोत्यवान् भवान् भवतु ममापि भवोपशान्तये ॥ स्व. स्तो. २०-५. (इसका व्यवहार भागे श्लोक २२-१, २३-१ और २३-३ में भी हुआ है) ४. दसण-णाणसमग्ग झाण णो अण्णदव्वसजुत्त । पचा. का. १५२. ५. त. सू. ६-२७. ६. ध्या.. ३. श्रा. पु. २१-६. ७ भ. प्रा. विजयो. २१ व ७०.

प्रस्तावना २७ -- एकाग्रचिन्तानिरोध को ध्यान का लक्षण निर्दिष्ट किया गया है । आ. अमितगति (प्रथम) विरचित योग- सार-प्राभूत मे ध्यान के लक्षण का निर्देश करते हुए यह कहा गया है कि आत्मस्वरूप का प्ररूपक रत्न- त्रयमय ध्यान किसी एक ही वस्तु मे चित्त के स्थिर करने वाले साधु के होता है जो उसके कर्मक्षय को करता है। तत्त्वार्थाधिगमभाष्यानुसारिणी सिद्धसेन गणि चिरचित टीका मे आगमोक्त विधि के अनुसार वचन, काय और चित्त के निरोध को ध्यान कहा गया है । महर्षि पतञ्जलि विरचित योगसूत्र मे ध्यान के लक्षण का निर्देश करते हुए यह कहा गया है कि धारणा मे जहा चित्त को धारण किया गया है वही पर जो प्रत्यय की एकतानता (एकाग्रता) है- विसदृश परिणाम को छोडकर जिसे धारणा मे पालम्वनभूत किया गया है उसी के पालम्बनरूप से जो निरन्तर ज्ञान की उत्पत्ति होती है- उसे ध्यान कहते हैं। योगसूत्र के अनुसार यह यम-नियमादिरूप पाठ योगागो मे सातवा है। महर्षि कपिल मुनि विरचित साख्यसूत्र मे राग के विनाश को (३-३०) तथा निर्विषय मन को (६-२५) ध्यान कहा गया है। विष्णुपुराण मे ध्यान के लक्षण को स्पष्ट करते हुए यह कहा गया है अन्य विपयो की ओर से नि स्पृह होकर परमात्मस्वरूप को विपय करने वाले ज्ञान की एकाग्रता सम्वन्धी परम्परा को ध्यान कहा जाता है । यह यम-नियमादि प्रथम छह योगागो से सिद्ध किया जाता है। समाधि- सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थवार्तिक मे समाधि के स्वरूप को प्रगट करते हुए यह कहा गया है कि जिग प्रकार भाण्डागार मे अग्नि के लग जाने पर बहुत उपकारक होने के कारण उसे (अग्नि को) शान्त किया जाता है उसी प्रकार अनेक व्रत-शीलो से सम्पन्न मुनि के तप मे कही से वाधा के उपस्थित होने पर उस वाधा को दूर कर जिसे धारण किया जाता है उसका नाम समाधि है। प्रा वीरसेन ने समाधि के लक्षण का निर्देश करते हुए यह कहा है कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र मे जो सम्यक् अवस्थान होता है उसका गाम समाधि है। तत्त्वानुशासन मे ध्याता और ध्येय की एक- रूपता को समाधि कहा गया है। समाधितन्त्र की प्रा. प्रभाचन्द्र विरचित टीका में समाहित-समाधि- युक्त-अन्त करण के अर्थ को स्पष्ट करते हुए उसे एकाग्रीभूत मन कहा है" । पाहुडदोहा मे समाधि की विशेषता को प्रगट करते हुए यह कहा गया है कि जिस प्रकार नमक पानी मे विलीन होकर समरस हो जाता है उसी प्रकार यदि चित्त प्रात्मा मे विलीन होकर समरस हो जावे तो फिर जीव को समाधि मे - १. तत्त्वानु. ५६. २. योगसारप्रा ६-७. ३. त. भा. सिद्ध वृ. ६-२०. ४. तत्र प्रत्ययकतानता ध्यानम् । यो. सू. ३-२. ५ रागोपहतिया॑नम् । सा द ३-३०, ६-२५ भी द्रष्टव्य है । ६ तद्रूपप्रत्ययैकाग्रयसन्ततिश्चान्यनि स्पृहा । तद् ध्यान प्रथमैरङ्गैः षड्भिनिष्पाद्यते नृप ॥ ६, ७, ८६. ७. यथा भाण्डागारे दहने समुपस्थिते तत्प्रशमनमनुष्ठीयते वहूपकारकत्वात् तथाऽनेकव्रत-शीलसमृद्धस्य मुनेस्तपस कुतश्चित् प्रत्यूहे समुपस्थिते तत्सधारण समाधि । स मि. ६-२४, त वा ६, २४, ८. ८. दसण-णाण-चरित्तेसु सम्ममवट्ठाण समाही णाम । धवला पु.८, पृ. ८. ६ सोऽय समरसीभावस्तदेकीकरण स्मृतम् । एतदेव समाधि स्याल्लोकद्वयफलप्रद ॥ १३७॥ १०. समाहितान्त.करणेन--समाहितम् एकाग्रीभूत तच्च तदन्त करण च मनस्तेन । समाधि टी. ३.

२८ ध्यानशतक और क्या करना है ? अभिप्राय यह है कि वाह्य विपयो की ओर से निस्पृह होकर चित्त का जो प्रात्म- स्वत्प मे लीन होना है यही समाधि का लक्षण है। योगसूत्र मे उस ध्यान को ही समावि कहा गया हैं जो ध्येय मात्र के निर्भासरूप होकर प्रत्यया- स्मक स्वरूप से शून्य के समान हो जाता है--ध्याता, ध्येय और ध्यान इन तीनो के स्वरूप की कल्पना से रहित होकर निर्विकल्पक अवस्था को प्राप्त हो जाता है। इस सूत्र की भोजदेव विरचित वृत्ति मे ' 'सम्यक् प्राधीयते एकाग्री क्रियते विक्षेपान् परिहत्य मनो यत्र स समाधि ' इस निरुक्ति के अनुनार निष्कर्ष- रूप में यह कहा गया है कि जिसमे सब प्रकार की अस्थिरता को छोडकर मन को एकान किया जाता है उसे समाधि कहते है। ध्यान और समाधि मे यह भेद है कि ध्यान में ध्याता, ध्येय और ध्यान इन तीनो के स्वरूप का निर्भास होता है, पर समाधि मे उनके स्वरूप का निर्माम नहीं होता। यह उक्त सूत्र में निर्दिष्ट यम-नियमादिरूप पाठ योगागो मे अन्तिम है। विष्णुपुराण मे समाधि के स्वरूप को दिखलाते हुए यह कहा गया है कि उसी परमात्मा के स्वरूप का जो विकल्प से रहित ग्रहण होता है उसका नाम समाधि है । इसकी मिद्धि ध्यान से होती है। न्यायसूत्र की विश्वनाय न्यायपचानन विरचित वृत्ति मे चित्त की जो अभीष्ट विषय मे निष्ठता है उसे समाधि कहा गया है । सम्गघि का यह लक्षण एकाग्रचिन्तानिरोध जैसा ही है । योग- नियमसार मे योग के स्वरूप का निर्देश करते हुए यह कहा गया है कि अपनी आत्मा को राग- द्वैपादि के परिहारपूर्वक समस्त विकल्पो को छोडते हुए विपरीत अभिनिवेश से रहित जिनप्ररूपित तत्त्वो मे योजित करना, यह योग का लक्षण है। युजे समाधिवचनस्य योग , इग निरुक्ति के अनुसार तत्त्वार्थ- वार्तिक मे योग को समाविपरक कहा गया है । तत्त्वानुशासन में अनेक पदार्थों का आलम्वन करने वाली चिन्ता को उन सबकी ओर से हटाकर किसी एक ही अभीप्ट अर्थ मे रोकना, इसे योगी का योग कहा गया है। हरिभद्र सूरि ने उस सभी निर्मल धर्मव्यापार को योग कहा है जो मोक्ष से योजित करता है। उनके द्वारा योगबिन्दु मे योग के ये पाच भेद निर्दिष्ट किये गये हैं---अध्यात्म, भावना, ध्यान, समता और वृत्तिसक्षय । इनमे उचित प्रवृत्ति से युक्त व्रती योगी जो मंत्री आदि भावनायो मे गमित जीवादि तत्त्वों का शास्त्राधार से चिन्तन करता है, उसका नाग अध्यात्मयोग है। चित्तवृत्ति के निरोधपूर्वक प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त होने वाला जो उस अध्यात्मयोग का अभ्याम है उमे भावनायोग कहा जाता है। स्थिर दीपक के समान किसी एक प्रशस्त वस्तु को विषय करने वाला जो उत्पादादिविषयक भूक्ष्म उपयोग से युक्त चित्त है उसे ध्यानयोग कहते है"। अविद्या के निमित्त से जो इष्ट-अनिष्ट की करपना होती है उसको दूर कर शुभ-अशुभ विपयो मे जो समानता का भाव उदित होता है उसे समतायोग कहा जाता है"। १ जिमि लोणु विलिज्जइ पाणियह तिमि जइ चित्तु विलिज्ज । ममरसि हवइ जीवडा काइ ममाहि करिज ॥ पा. दो १७६ २. तदेवार्थमात्रनिर्भामं स्वरूपशून्यमिव ममाधि । यो मू ३.३ ३ तस्यैव कल्पनाहीन स्वरुपग्रहण हि यन् । मनमा ध्याननिष्पाद्य ममाथि सोऽभिधीयते ॥ ६, ७,६०. ४. समाधिश्चित्तस्यामिमतनिष्ठत्वम् । न्या सू. वृत्ति १-३, पृ १५३ ५ नि.सा. १३७-३६ ६ न. वा. ६,१,१२. ७. तत्वानु. ६०.६१ ८. योगपि १; योगबिन्दु ३१. ६ योगाय. ३५८० १० यो वि.६६०. ११ वहीं ६२ १२. पी४. - प्रस्तावना २६ मन के द्वारा विकल्परूप तथा काय के द्वारा परिस्पन्दरूप जो अन्य के सयोगस्वरूप चित्तवृत्तिया उदित होती हैं उनका इस प्रकार से निरोध करना कि जिससे उनका पुन. प्रादुर्भाव न हो सके, यह वृत्तिसक्षय- योग कहलाता है। महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र मे चित्तवृत्तियो के निरोध को योग कहा है। भगवद्गीता मे आसक्ति को छोडकर कार्य करते हुए उनकी सिद्धि व प्रसिद्धि मे सम-हर्प- विषाद से रहित होना, इसे योग कहा गया है। भगवद्गीता का अभिधेय भगवद्गीता यह महाभारत का एक अश है। कौरवो और पाण्डवो के बीच जब युद्ध प्रारम्भ होने को था तव अर्जुन की इच्छानुसार कृष्ण ने उसके रथ को युद्धभूमि मे ले जाकर दोनो सेनानो के मध्य मे खडा कर दिया। वहा सामने विपक्ष के रूप मे स्थित गुरु द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह और दुर्योधन आदि गुरुजनो व बन्धुजनो को देखकर अर्जुन का हृदय व्यथित हो उठा । वह कृष्ण से बोला-हे कृष्ण सामने युद्ध की इच्छा से उपस्थित इन गुरुजनो और बन्धुजनो को देखकर मेरा सव शरीर काप रहा है। युद्ध मे इनका वध करके कल्याण होने वाला नही है। इन गुरुजनो और बन्धुजनो का घात करके मुझे न विजय चाहिए, न राज्य चाहिए और न सुख भी चाहिए । यदि ये मेरा घात करते है तो भी मैं इनका घात नहीं करना चाहता। इस प्रकार दयाहृदय व अश्रुपूर्ण नेत्रो से युक्त विषण्णवदन अर्जुन को देखकर कृष्ण ने उसे युद्धोन्मुख करने के लिए जो आध्यात्मिक उपदेश दिया वह गौता का प्रमुख अभिध्येय रहा है। वह गीता १८ अध्यायो मे विभक्त है। प्रत्येक अध्याय के अन्त मे जो अन्तिम पुष्पिकावाक्य है उसमे उसे योग- शास्त्र कहा गया है। वैसे तो सम्पूर्ण ग्रन्थ मे ही कुछ न कुछ योग की चर्चा की गई है, पर उसके छठे अध्याय मे विशेष रूप से योग और योगी के स्वरूप का विचार किया गया है । अर्जुन के उपयुक्त विषादपूर्ण वचनो को सुनकर श्रीकृष्ण बोले कि जिनके लिए शोक न करना चाहिए उनके लिए तू शोक करता है और पण्डिताई के वचन बोलता है। परन्तु पण्डितजन जिनके प्राण चले गये हैं उनके लिए और जो जीवित है उनके लिए भी शोक नही किया करते है। इस प्रकार अर्जुन को प्रथमत ज्ञानयोग का उपदेश देते हुए आगे फिर कहा गया है कि मैं कभी नहीं था, या तू कभी नही था अथवा ये राजा लोग नही थे ऐसा नहीं है, तथा ये सब आगे नहीं रहेगे सो भी बात नहीं है- आत्मा के नित्य होने से ये सब पूर्व मे थे और भविष्य में भी रहने वाले है। जिस प्रकार इस शरीर मे क्रम से कुमार अवस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था प्राप्त होती है उसी प्रकार अन्य-अन्य शरीर भी प्राप्त १. योगविन्दु ४६६. २ योगश्चित्तवृत्तिनिरोध' । यो. सू १-२ ३ योगस्थ कुरु कर्माणि सग त्यक्त्वा धनजय । सिद्धयसिद्धयो समो भूत्वा समत्व योग उच्यते ॥ २-४८. य सन्यासमिति प्राहुर्योग त विद्धि पाण्डव । न हयसन्यस्तसकल्पो योगी भवति कश्चन ॥ ६.२ सर्वभूतस्थमात्मान सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ।। ६-२६. (अध्याय ६ के १७-२३ श्लोक भी द्रष्टव्य है)। ४. भ गी १, २८-३५. ५ अशोच्यानन्वशोचस्त्व प्रज्ञावादाश्च भाषसे । गतासूनगतासूश्च नानुशोचन्ति पण्डिता ॥ भ. गी २.११. - ध्यानशतक . -- हुया करता है । इस वस्तुस्थिति को समझकर घोर पुरुप मोह को प्राप्त नहीं होते हैं। शीत-उष्ण और सुस-दुख के देने वाले जो इन्द्रियविषय आगमन के साथ विनष्ट होने वाले हैं उनको तू सह-स्वभावत: ' नष्ट होने वाले उनके लिए शोक मत कर । हे पुरुपश्रेष्ठ | दुस और सुख को समान समझने वाले जिस पुरुप को वे क्षणभगुर विपय व्याकुल नही किया करते है वह अमरत्व के योग्य होता है-जन्म- मरण से रहित होकर मुक्त हो जाता है । जो असत् है उसका कभी सद्भाव नही रहता और जो सत् है उसका कभी प्रभाव नहीं होता, इस सत्-असत् के रहस्य को तत्त्वज्ञ जन ही जानते हैं। इस प्रकार अवि- नाशी व नित्य शरीरधारी (जीव) के जो ये शरीर है वे तो विनश्वर ही हैं, अतएव तू इस वस्तुस्थिति को समझकर युद्ध कर -उससे विमुख न हो । इत्यादि प्रकार से यहा अजुन को शरीर की नश्वरता और प्रात्मा की नित्यता का विस्तार से उपदेश दिया गया है। यहा स्थितप्रज्ञ के स्वरूप को प्रगट करते हुए यह कहा गया है कि हे पार्थ । मनुष्य जब मनोगत सब इच्छामो को छोडकर अपने आप अपने में ही सन्तुष्ट होता है तब उसे स्थितप्रज्ञ कहा जाता है। स्थितप्रज्ञ मुनि दुखो मे उद्विग्न न होकर सुख की ओर से निस्पृह रहता हुआ राग, भय और क्रोध से रहित होता है। आगे वहा और भी यह कहा गया है कि जो पुरुप विषयो का ध्यान करता है उसकी उनमें जो आसक्ति होती है उससे काम, काम से क्रोव, क्रोध से सम्मोह, सम्मोह से स्मृतिविभ्रम, स्मृति- विभ्रम से बुद्धि का नाश और उस बुद्धिनाश से वह स्वयं नष्ट हो जाता है-कल्याणकर मार्ग से भ्रष्ट होकर कष्ट सहता है । (यह भगवद्गीतोक्त सन्दर्भ जैन तत्त्वज्ञान-विशेषकर आध्यात्मिक तत्त्वज्ञान- से कितना मिलता हुआ है, यह ध्यान देने के योग्य है।) प्रागे छठे अध्याय में योग के स्वरूप को दिखलाते हुए यह कहा गया है कि जो कर्म के फल की अपेक्षा न रख कर कर्तव्य कार्य को करता है वही वस्तुत सन्यासी और योगी है, केवल अग्नि और क्रिया (कर्म) से रहित योगी और सन्यासी नहीं हैं, क्योकि सन्यास का नाम ही तो योग है । जिसने सकल्पो का सन्यास (त्याग) नही किया है ऐसा कोई भी पुरुप योगी नही हो सकता। जव पुरुष इन्द्रियविषयो में और कर्मों में आसक्त नहीं होता तव समस्त सकल्पो का परित्याग कर देने वाले उसको योग पर पाढ कहा जाता है। प्राणी अपने आप ही अपना उद्धार कर सकता है और अपने आप ही अपने को दुर्गति मे भी डाल सकता है। यथार्थ मे वह स्वय ही• अपना वन्धु (हितपी) और स्वयं ही अपना शत्रु है । जिमने प्रात्मा के द्वारा प्रात्मा को जीत लिया है वही अपना बन्धु है तथा जिसने अपने ऊपर विजय प्राप्ल नही की है उसे ही अपना शनु समझना चाहिए। जिसने इन्द्रियो और मन को जीत लिया है तथा जो गीत-उष्ण, सुख-दुस और मान अपमान मे अतिशय शान्त है-राग-द्वेप से रहित हो चुका है- उसके पास परमात्मा है। जिसकी प्रात्मा ज्ञान-विज्ञान से सन्तुष्ट हो चुकी है, जो पत्थर और सुवर्ण मे समानता की बुद्धि रसता हुमा कूटस्य है-सदा समान रहने वाला है तथा जितेन्द्रिय है, ऐसे योगी को युक्त-योग से सयुक्त कहा जाता है । ऐमा योगी सुहृत्, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य व वन्धु जनो के विषय में तथा सत्पुरुपो और पापियो के भी विषय में समवृद्धि रहता है- उनमे न किसी से गग करता है और न अन्य से द्वेप भी करता है। १ भ.गी २, १२-१८, प्रागे भी ३८ तक द्रष्टव्य है। २ वही २, ५४.५५. ३ वही २, ६२-६३, ४. वहीं ६, १-२. ५ यही ६, ४.७. ६. वहीं ६, ८-६.

प्रस्तावना आगे योग में स्थिरता प्राप्त करने के लिए योगी को क्या क्या करना चाहिए, इसे स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि उसे इन्द्रियो व अन्त करण को नियन्त्रित करके आशा और परिग्रह का परित्याग करते हुए एकान्त मे अकेले स्थित होकर आत्मचिन्तन करना चाहिए । साथ ही उसे किसी पवित्र प्रदेश मे स्थिर आसन को स्थापित कर व उसके ऊपर बैठकर मन को एकाग्र करते हुए चित्त व इन्द्रियो की प्रवृत्ति को स्वाधीन करना चाहिए। इस प्रकार योग मे स्थित होकर वह स्थिरतापूर्वक शरीर, शिर और ग्रीवा को सम व निश्चल करता हुआ दिशाओ के अवलोकन को छोड़ देता है और अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि रखता है। जो योग्य आहार-विहार एव कर्मों के विषय मे उचित प्रवृत्ति करता है तथा यथायोग्य शयन व जागरण भी करता है उसके दुखो का नष्ट करने वाला वह योग होता है। जिस समय स्वाधीन हुआ चित्त आत्मा मे ही अवस्थित होता है तव समस्त कामनाओ की ओर से नि.स्पृह हो जाने पर उस योगी को युक्त-योग से युक्त-कहा जाता है । जिस प्रकार वायु से रहित दीपक चलायमान नही होता उसी प्रकार मन को नियन्त्रित करके योग मे स्थित हुआ योगी उस योग से चलायमान नहीं होता। जिसको पाकर योगी अन्य किसी की प्राप्ति को अधिक महत्त्व नही देता, तथा जिसमे स्थित रहकर वह भारी दुख से भी विचलित नही होता, उसका नाम योग है। उसे समस्त दुःखो का नाशक जानकर योगी को विरक्त चित्त से उसमे सलग्न होना चाहिए। साथ ही वह सकल्प से उत्पन्न होने वाली सभी इच्छामो का पूर्णरूप से परित्याग करके तथा मन के द्वारा इन्द्रियसमूह को नियन्त्रित करके धीरे-धीरे उपरत होता हुआ धीरतापूर्वक मन को प्रात्मस्वरूप मे स्थित करता है और अन्य कुछ भी नही सोचता है । यदि योगी का मन अस्थिर है तो वह जिस जिस कारण से विषयो की ओर जाता है उस उस की ओर से उसे रोककर आत्मा मे नियन्त्रित करना चाहिए । भगवद्गीता व जैन दर्शन गीता के अन्तर्गत उपर्युक्त विषयविवेचन को जब हम जैन दर्शन के साथ तुलनात्मक दृष्टि से देखते है तब हमे दोनो मे बहुत कुछ समानता दिखती है। जैन दर्शन नयप्रधान है। उसमे द्रव्याथिक नय की अपेक्षा जहा आत्मा आदि को नित्य कहा गया है वहा पर्यायाथिक नय की अपेक्षा उन्हे अनित्य भी कहा गया है । गीता मे शरीर की नश्वरता को दिखलाते हुए प्रात्मा को नित्य कहा गया है । आत्मा की यह नित्यता द्रव्याथिक नय की अपेक्षा जैन दर्शन को भी अभीष्ट है। यही कारण है जो वहा द्रव्याथिक नय अथवा निश्चय नय के आश्रय से जहा तहा आत्मा को नित्य व अविनश्वर कहा गया है। १ उदाहरणार्थ गीता मे यह कहा गया है कि सबके शरीर मे अवस्थित जीव या आत्मा जन्म- मरण से रहित सदा अबध्य है-शाश्वत है, इसीलिए शरीर के नष्ट होने पर भी उसका वध नही किया जा सकता है । यथा- न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽय पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २-२० देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात सर्वाणि भूतानि न त्व शोचितुमर्हसि ॥ २-३० यही अभिप्राय जैन दर्शन मे भी प्रकारान्तर से इस प्रकार प्रगट किया गया है- एप्रो मे सस्सनो अप्पा गाण-दसणलक्खणो। - १. भ.गी. ६, १०-१३. २. वही ६, १७-१६. ३. वही ६, २२-२६.

३२ ध्यानशतक सेसा मे वाहिरा भावा सव्वे संजोगलखणा' । मूला. २ १२. यो न वेत्ति परं देहादेवमात्मानमव्ययम् । लभते सन निर्वाणं तप्त्वापि परम तपः॥ समाधि ३३. अजातोऽनश्वरोऽमूर्तः कर्ता भोक्ता सुखी बुधः । देहमानो मलमुक्तो गत्वोर्ध्वमचल प्रभुः ॥मात्मानु. २६६. २ गीता मे जन्म व मरण का अविनाभाव इस प्रकार प्रगट किया गया है- जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्धवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २-२७. यही अभिप्राय जैन दर्शन में भी देखा जाता है- मृत्योर्मृत्यन्तरप्राप्तिरुत्पत्तिरिह देहिनाम् । तत्र प्रमुदितान् मन्ये पाश्चात्ये पक्षपातिनः ॥ प्रात्मानु. १८८ प्रहतं मरणेन जीवित जरसा यौवनमेष पश्यति । प्रतिजन्तु तदप्यहो स्वहितं मन्दमतिनं पश्यति ॥ चन्द्र. च. १.६६. ३ गीता मे शरीरान्तर की प्राप्ति के लिए जीर्ण वस्त्रो का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि मनुष्य जिस प्रकार जीर्ण वस्त्रो को छोडकर अन्य नये नये वस्त्रो को ग्रहण किया करता है उसी प्रकार प्राणी जीर्ण शरीरो को छोड़कर अन्य अन्य नवीन शरीरो को धारण किया करता है। समाधिशतक मे भी उस वस्त्र का उदाहरण देते हुए प्रकारान्तर से कहा गया है कि वस्त्र के सघन, जीर्ण, नष्ट अथवा रक्त होने पर उसको धारण करने वाला मनुष्य जिस प्रकार आत्मा को- अरने को -मघन, जीर्ण, नष्ट अथवा रक्त नही मानता है उसी प्रकार शरीर के भी सघन, जीर्ण, नष्ट, अथवा रक्त होने पर विद्वान् मनुष्य प्रात्मा को सघन, जीर्ण, नण्ट अथवा रक्त नहीं मानता है । इसका कारण यही है कि जिस प्रकार प्रात्मा से भिन्न वस्त्र है उसी प्रकार उससे भिन्न शरीर भी है। आगे गीता के समान उसी वस्त्र का उदाहरण देते हुए फिर से यह कहा गया है कि जो विवेकी जीव आत्मा को ही आत्मा मानता है-शरीर मे प्रात्मबुद्धि नही रखता-वह अपने शरीर की अन्य गति को-एक शरीर को छोडकर दूसरे शरीर को ग्रहण को-निर्भयतापूर्वक एक वस्त्र को छोडकर दूसरे वस्त्र के ग्रहण के समान ही मानता है, इसीलिए उसे मरण का कुछ भय नहीं रहता। ४ गीता मे यह निर्देश किया गया है कि जो असत् है उसका कभी सद्भाव नही रहता और जो सत् है उसका कभी अभाव नहीं होता। इसी प्रकार जैन दर्शन के अन्तर्गत पचास्तिकायादि ग्रन्थो में भी कहा गया है कि भाव का--- सद्भूत पदार्थ का-कभी नाश (प्रभाव) नहीं होता और प्रभाव (असत्) की कभी उत्पत्ति नहीं होती। १ नि. सा. गा. १०२ व वरागवरित श्लोक ३१-१०१ भी द्रष्टव्य है। २. वामासि जीर्णाणि यया विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तया शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २-२२ ३. समाधि. ६३-६६. ४. पात्मन्येवात्मघीरन्यां शरीरगतिमात्मनः। मन्यते निर्भय त्यक्त्वा वस्त्र वस्त्रान्तरग्रहम् ॥ समाधि. ७७. ५. नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत । उनयोपि दृष्टोऽन्तस्त्यनयोत्तत्त्वशिनि. ॥ २-१६. ६. भावस्म त्यि पामो त्यि प्रभावस्स चेव उप्पादो। गुण-पज्जयेसु मावा उप्पाद यये पकुवति ।। पंचा. १५. नयामती जन्म मतो न नागो दोपस्नमःपुद्गलभावतोऽस्ति । स. स्तो. ५.४.

प्रस्तावना . के समान । ५ गीता मे सयमी व असयमी की विशेषता को प्रगट करते हुए कहा गया है कि अन्य सव प्राणियो (असयमियो) के लिए जो रात्रि है-आत्माववोध से रहित अज्ञानजनित अवस्था है-उसमे सयमी जागता है-वह उससे अलिप्त होकर प्रबुद्ध रहता है और जिसमे अन्य प्राणी जागते हैं-व्यवहार मे सलग्न रहते है-वह विवेकी मुनि के लिये रात्रि है-रात्रि के समान है, अर्थात् रात्रि मे जिस प्रकार समस्त व्यवहार कार्य को छोडकर अन्य प्राणी सो जाते हैं उसी प्रकार सयमी मुनि सोते हुए उस सव लोकव्यवहार से अलिप्त रहता है। लगभग इमी अभिप्राय को प्रगट करते हुए समाधिशतक मे भी कहा गया है कि जो व्यवहार मे सोता है--विषयसुख से विमुख रहता है-वह आत्मा के विषय मे जागता है-प्रवुद्ध रहता है, और जो व्यवहार मे जागता है--शरीर आदि की क्रियानो मे उद्यत रहता है--वह आत्मा के विषय मे सोता है--प्रात्मस्वरूप से विमुख रहता है। ६ गीता मे श्रद्धा व ज्ञान पर बल देते हुए कहा गया है कि जो जितेन्द्रिय पुरुष श्रद्धा से युक्त होता है वह ज्ञान को प्राप्त करता है और फिर उस ज्ञान को पाकर वह शीघ्र ही उत्कृष्ट शान्ति को प्राप्त कर लेता है । इसके विपरीत जो ज्ञान और श्रद्धा से रहित होकर सशयालु होता है वह इस लोक और परलोक के भी सुख से वचित रहता है। जैन दर्शन मे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को मुक्ति का कारण माना गया है। गीता का पूर्वोक्त निर्देश भी इसी अभिप्राय को प्रगट करता प्राय को प्रगट करता है। वहा जो सर्वप्रथम श्रद्धा का निर्देश किया गया है उसे जैन पारिभापिक शब्द से सम्यग्दर्शन कहा जा सकता है। कारण यह कि जैन दर्शन मे तत्त्वश्रद्धा को ही सम्यग्दर्शन कहा गया है। आगे ज्ञान का निर्देश दोनो मे समान है। जैन दर्शन में जिस प्रकार सम्यग्दर्शन के बाद ही ज्ञान (सम्यग्ज्ञान) की प्राप्ति मानी गई है उसी प्रकार गीता मे भी श्रद्धा के वाद ज्ञान की प्राप्ति का निर्देश किया गया है। गीतागत श्लोक ४-३६ मे जो 'सयतेन्द्रिय ' पद है वह सम्यक्चारित्र का द्योतक है, क्योकि इन्द्रियो को नियन्त्रित करके विषयो से निवृत्त होने का नाम ही तो चारित्र है। ७ गीता मे कहा गया है कि प्रात्महितैषी जीव को स्वयं अपने ही द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए और आत्मा को सकट मे नही डालना चाहिए । कारण यह कि आत्मा ही आत्मा का बन्धु है १ या निशा सर्वभूताना तस्या जागति सयमी । यस्या जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने ॥ २-६६. (यह श्लोक 'उक्त च' आदि के निर्देश के विना ज्ञानार्णव मे पृ १९४ पर ज्यो का त्यो उपलब्ध होता है, वहां केवल 'सर्वभूताना' के स्थान में सर्वभूतेषु' पाठ है) २ (क) व्यवहारे सुषुप्तो यः स जागात्मगोचरे । जागर्ति व्यवहारेऽस्मिन् सुषुप्तश्चात्मगोचरे ॥७५ (ख) स्वजीविते कामसुखे च तृष्णया दिवा श्रमार्ता निशि शेरते प्रजा । त्वमार्य । नक्त-दिवमप्रमत्तवानजागरेवात्मविशुद्धवर्त्मनि ॥ स्व स्तो १०-३ ३. श्रद्धावान् लभते ज्ञान तत्पर सयतेन्द्रियः। । ज्ञान लब्ध्वा परा शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ४-३६ अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च सशयात्मा विनश्यति । नाय लोकोऽस्ति न परो न सुख सशयात्मन ॥ ४-४०. ४. सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्राणि मोक्षमार्ग । त सू. १-१ ५. तत्त्वार्थश्रद्धान सम्यग्दर्शनम् । त. सू १-२.

३४ ध्यानशतक और वही अपना शत्रु है-दूसरा कोई अपना बन्धु और शत्रु नही है। जैन दर्शन के अन्तर्गत समावितन्त्र में भी प्रकारान्तर से यही कहा गया है कि अपनी प्रात्मा ही अपने लिए जन्म को-जन्म-मरणरूप ससार को प्राप्त कराती है और वही निर्वाण को~-मुक्तिसुस को-भी प्राप्त कराती है। इसीलिए वास्तव में अपनी आत्मा ही अपना गुरु-हित की शिक्षा देने वाला वन्धु है, अन्य कोई गुरु नही है। ८ गीता में योग की स्थिरता के लिए दीपक की उपमा देते हुए यह कहा गया है कि जिस प्रकार वायु से रहित दीपक स्थिर रहता है उसी प्रकार चित्त की चचलता से रहित योगी का योग भी स्थिर रहता है। ध्यानशतक मे उक्त दीपक की उपमा देते हुए यह कहा गया है कि जिस प्रकार घर में स्थित वायु. विहीन दीपक अतिशय स्थिर रहता है उसी प्रकार एकत्व-वितर्क-अविचार नाम का दूसरा शुक्लध्यान उत्पाद, स्थिति (ध्रुतता) और व्यय से किसी एक ही पर्याय मे स्थिर रहता है-वह एक अर्थ से अर्था- न्तर मे, शब्द से शब्दान्तर मे और एक योग से योगान्तर मे संक्रमण नहीं करता है। ६ गीता में कहा गया है कि जो योगी स्थिर होकर शरीर, शिर और ग्रीवा को समान और निश्चल धारण करता हुआ दिशामो को नहीं देखता है, किन्तु अपनी नासिका के अग्रभाग का अवलोकन करता है वह निर्वाणस्वरूप परम शान्ति को प्राप्त करता है । यथा- सम काय-शिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः। सप्रेक्ष्य नासिकानं स्व दिशश्चानवलोकयन् ॥ ६-१३ लगभग यही भाव वरागचरित, तत्त्वानुशासन और अमितगति-श्रावकाचार के निम्न श्लोको मे उपलब्ध होता है- मध्ये ललाटस्य मनो निधाय नेत्रभ्रुवोर्ग खलु नासिकाने। एकाग्रचिन्ता प्रणिधानसंस्था समाधये ध्यानपरो बभूव । वरांगच. ३१-६६. नासाग्रन्यस्तनिप्पन्दलोचनो मन्दमुच्छ्वसन् । द्वात्रिंशद्दोपनिमुक्तकायोत्सर्गव्यवस्थित ॥ तत्वान ९३ स्थित्वा प्रदेशे विगतोपसर्गे पर्यद्धवन्धस्थितपाणि-पधः । नासाप्रसंस्थापितदृष्टिपातो मन्दीकृतोच्छ्वासविवृद्धवेगः ॥ अमित. श्रा. १५-६१ जैन दर्शन के साथ योगसूत्र की समानता महर्षि पतञ्जलि विरचित योगसूत्र यह योगविषयक एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। उसमे सक्षेप से योग के महत्त्व को प्रगट करते हुए उसकी सागोपाग प्ररूपणा की गई है। वह समाधि, सापना, विभूति और १. उद्धरेदात्मनात्मान नात्मानमवसादयेत् । प्रात्मैवात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन ॥६-५ वन्धुरात्मात्मनस्तम्य येनात्मैवात्मना जित.। अनात्मनस्तु पद्यत्वे वर्तेनात्मय गयुवन् ।। ६.६. २ नयत्यात्मानमात्मैव जन्म निर्वाणमेव च । गुगरात्मात्मनस्तस्मान्नान्योऽस्ति परमार्थत. ॥७५. लगभग यही अभिप्राय प्रष्टोपदेग के ३४वें प्लोक में भी प्रगट किया गया है। ३. या दीपो निवातन्यो नेते गोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तम्य युनतो योगमात्मन ॥६-१६. ४.ज्या..७९-८०.

4 प्रस्तावना . कैवल्य इन चार पादो में विभक्त है। समस्त सूत्रसख्या उसकी १९५ (५१+५५+५५+३४) है । उसके प्रथम पाद मे चित्तवृत्तिनिरोध को योग का स्वरूप बतलाकर उसके उपाय को दिखलाते हुए प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति इन पाच वृत्तियो को क्लिष्ट व अक्लिष्ट बतलाया है। आगे सप्रज्ञात व असप्रज्ञात समाधि के स्वरूप के साथ ईश्वर के स्वरूप को भी प्रगट किया गया है। द्वितीय पाद मे क्रियायोग का निर्देश करते हुए हेय, हेयहेतु, हान और हानोपाय इन चार के स्वरूप को प्रगट किया गया है। इसी से भाष्यकार ने उसे चतु! हरूप शास्त्र कहा है। साथ ही वहा यम-नियम आदि पाठ योगागो का निर्देश करते हुए वहा उनमे प्रथम पाच योगागो का विचार किया गया है। प्रथम यम योगाग के प्रसग मे अहिंसा व सत्य आदि के तथा द्वितीय नियम योगाग के प्रसग मे शौच व सन्तोष आदि के स्वरूप को दिखलाते हुए उनके पृथक् पृथक् फल को भी प्रगट किया है । तृतीय पाद मे धारणा, ध्यान और समाधि इन शेष तीन योगागो के स्वरूप का निर्देश करते उन तीनो के समुदाय को सयम बतलाया है। आगे अन्य प्रासगिक कथन के साथ योग के आश्रय से उत्पन्न होने वाली विभूतियो को दिखलाया गया है । चतुर्थ पाद मे उक्त विभूतियो (सिद्धियो) को जन्म, औपधि, मत्र, तप और समाधि इन यथा- सम्भव पाच निमित्तो से उत्पन्न होने वाली बतलाकर आगे शका-समाधानपूर्वक कुछ अन्य प्रासगिक चर्चा करते सत्कार्यवाद के साथ परिणामवाद को प्रतिष्ठित और विज्ञानाद्वैत का निराकरण किया गया है । विशेष इतना है कि परिणामवाद को प्रतिष्ठित करते हुए भी पुरुप को अपरिणामी-चित्स्वरूप से कूटस्थ नित्य-स्वीकार किया गया है । अन्त मे कैवल्य के स्वरूप को प्रगट करते हुए ग्रन्थ को समाप्त किया गया है। प्रस्तुत योगसूत्र यद्यपि प्रमुखता से साख्य सिद्धान्त के प्राश्रय से रचा गया है, फिर भी उसकी रचना मे अन्य दर्शनो की उपेक्षा नहीं की गई है, उनका भी यथावसर आश्रय लिया नया है। महर्षि पतञ्जलि की इस मध्यस्थ वृत्ति के कारण उनका यह योगसूत्र प्राय सभी सम्प्रदायो मे प्रिय रहा है। प्रकृत मे हम जैन दर्शन के साथ भी उसकी कितनी समानता रही है, इसका विचार करेंगे । जैन दर्शन के साथ उसकी समानता शब्दो और विपयविवेचन की भी अपेक्षा दृष्टिगोचर होती है । शब्दसाम्य- योगसूत्र मूल और उसके व्यास विरचित भाष्य मे भी ऐसे अनेक शब्द उपलब्ध होते हैं जो प्राय जैन दर्शन को छोडकर अन्य दर्शनो में प्रचलित नहीं हैं। यथा- वितर्क, विचार-ये दो शब्द निम्न योगसूत्र में प्रयुक्त हुए है-वितर्क-विचारानन्दास्मितानुगमात् सम्प्रज्ञात (१-१७)। ये दोनो शब्द जैन दर्शन के अन्तर्गत तत्त्वार्थसूत्र (९, ४१-४४) और स्थानाग (४-२४७) आदि अनेक ग्रन्थो में पाये जाते हैं । भवप्रत्यय-यह शब्द योगसूत्र में इस प्रकार उपयुक्त हुआ है-भवप्रत्ययो विदेह-प्रकृतिलयानाम् (१-१६) । यह षट्खण्डागम (५, ५, ५३), तत्त्वार्थसूत्र (१-२१), नन्दीसूत्र हरि. वृ (पृ २६) और धवला (पु १३, पृ २६०) आदि अनेक जैन ग्रन्थो मे उपलब्ध होता है । मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा-इन चार शब्दो का उपयोग योगसूत्र मे इस प्रकार हुआ है-मैत्री- करुणा-मुदितोपेक्षाणा सुख-दुख-पुण्यापुण्यविषयाणा भावनातश्चित्तप्रसाधनम् (१-३३) । भगवती आराधना १ यथा चिकित्साशास्त्र चतुर्दूहम्-रोगो रोगहेतुरारोग्य भैषज्यमिति, एवमिदमपि शास्त्र चतुर्दूहमेव । तद्यथा-ससार ससारहेतुर्मोक्षो मोक्षोपाय इति । तत्र दु खबहुल. ससारो हेय , प्रधान-पुरुषयो सयोगो हेयहेतु , सयोगस्यात्यन्तिकी निवृत्तिनिम्, हानोपाय सम्यग्दर्शनम् । यो. सू भा २.१५ (लगभग यही अभिप्राय तत्त्वानुशासन श्लोक ३-५ मे भी प्रगट किया गया है)। २ आगे समापत्ति के चार भेदो का उल्लेख करते हुए सूत्र १, ४२.४४ मे भी उनका उपयोग हुआ है।

३६ ध्यानशतक (१६९६), तत्त्वार्थस्त्र (७-११), ज्ञानार्णव (४, पृ. २७२) और योगगास्न (४-११७) आदि अनेक जैन ग्रन्यो में उक्त मंत्री ग्रादि भावनानो को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। तत्त्वार्थसून मे मुदिता के स्थान में प्रमोद और उपेक्षा के स्थान मे माव्यस्थ्य गन्दो का उपयोग हुपा है, जिनके अर्थ में कुछ भेद नहीं है। अविद्या -- योगस्य (२-३) मे क्लेश के इन पाच भेटो का निर्देश किया गया है--विद्या, अस्मिता, राग, द्वेप और अभिनिवेश । इनमें अविद्या यह अस्मिता आदि उत्तर चार क्लेशो की जनक है । उसका स्वम्प आगे इस प्रकार कहा गया है-अनित्यागुचि-दु म्यानात्मसु नित्य-शुचि-सुपात्मन्यातिरविद्या (२-५) । प्रागे (२-२४) मोहरूप इस अविद्या को विवेकत्यातिरुप मयोग का कारण कहा गया है । यह शब्द समाधिशतक (१२ व ३७) तथा तत्त्वार्थवातिक आदि अनेक जैन ग्रन्थो मे उपलना होता है। अभिप्राय भी उनका उभय सम्प्रदायो मे समान है। अविद्या के स्थान में अधिकाश जैन गन्यो मे प्रज्ञान' और मोह शब्दो का भी व्यवहार हुआ है । राग, द्वेष--पूर्वोक्त क्लेश के भेदभूत राग और द्वेप का स्वरूप योगसूत्र में इस प्रकार कहा गया है-सुखानुगयी राग , दुखानुभयी द्वेष (२, ७-८)। इन दोनो शब्दो का उपयोग पटमण्डागम (४. २, ८, ८-पु, १२, पृ २८३), कपायप्राभृत (३ व १३), श्रावकप्रज्ञप्ति टीका (३६३) और ध्यानशतक (१० व ४६) आदि जैन ग्रन्थ्रो में प्रचुरता से हुअा है । यम-इस शब्द का उपयोग योगसूत्रगत निम्न सूत्र में किया गया है-अहिंसा-सत्यास्तेय-ब्रह्म- चर्यापरिग्रहा यमा (२.३०) । जैन दर्शन में उम शब्द का उपयोग रत्नकरण्डक (८७), स्थानाग (२-३) और उपासकाध्ययन (७६१) आदि ग्रन्यो मे हुआ है। महाव्रत-इस शब्द का उपयोग इम योगसूत्र मे हुग्रा है-~-जाति-देश-काल-समयानवच्छिन्ना सार्वभौमा महाव्रतम् (२-३१) । उमका उपयोग चारित्रप्राभृत (३१), मूलाचार (१-४ व ५-६७), दशवकालिक (४-३), पाक्षिकसूत्र (पृ १८) और तत्त्वार्थसूत्र (७-२) आदि अनेक जैन ग्रन्थो मे - हुया है। नियम-इसका उपयोग योगमूत्र में इस प्रकार किया गया है-शौच-सन्तोप-तप स्वाध्यायेश्वर- प्रणिधानानि नियम (२-३२) । इस शब्द का उपयोग नियमसार (३) रनकरण्डक (८७) और उपा- सकाध्ययन (७६१) आदि जैन ग्रन्थों में किया गया है। कृत, कारित, अनुमोदित~इन शब्दो का व्यवहार योगमूत्र में इस प्रकार किया गया है- वितर्का हिसादय कृत कारितानुमोदिता लोभ-क्रोव मोहपूर्वका मृदु-मध्याधिमाया दुपाजानानन्तफना इति प्रतिपक्षभावनम् (२.३४)। इनका उपयोग तत्त्वायमूत्र (६.८) व श्रावस्प्रनप्ति (३३१) प्रादि जैन ग्रन्यो में हुमा है। विशेष इतना है कि तत्त्वार्थमूत्र में अनुमोदित के स्थान में अनुमत नया श्राबा- प्रज्ञप्ति मे क्रम मे भगेति, कारयति और अनुजानाति इन प्रियापदो का उपयोग हुआ है। परन्तु अभि प्राय उनका दोनो मे समान ही है। सोपनाम, निरुपम-~-इन दो गन्दी का उपयोग योगसूत्र ३ग प्रकार किया गया:-योग- मम निरपण व कर्म तत् मयगादपरान्नमानमरिष्टेभ्यो वा (३-२२) 1 उनमे मृरा गन्न उपक्रम १ अविद्या विषयात्मिवा गर्यभायेप्यनित्यानात्मानि-दुगेषु नित्य मा-गुचि-मृगाभिमानापा। न. वा. १, १,४६, प्रवि। यमलो बद्धिविपर्याय । प्रार नि हरि. मन म टि. २. टीप ११ व २३, "गा . हरि ब. ५० ('समान गनु यष्ट' मारिन्दान पर); भानगेय मियानगानम्निमशानम्, गिरणा कारणामो विदामा । म मा. गिर ग. २-५ , मिनानम् ? महान महानतम । टोप टी २३ ३. अमानराणन मोह । या श. रिय ४६मान-माया-नोग- मायनि-मोजाय. जगतापी-पपगायक-foगाराना गम्भी। 47 २६..

प्रस्तावना ३७ उससे सहित का नाम सोपक्रम और रहित का नाम निरुपक्रम है। यह उपक्रम शब्द तत्त्वार्थाधिगम भाष्य (२-५२) व उसकी हरि व सिद्ध. वृत्तियो (२, ५१-५२) आदि अनेक जैन ग्रन्थो मे व्यवहृत हुआ है। सोपक्रम और निरुपक्रम शब्दो का भी उपयोग तत्त्वार्थाधिगम भाष्य (२, ५१-५२)। उसकी हरिभद्र व सिद्धसेन विरचित वृत्तियो (२-५२) और षट्खण्डागम की धवला टीका (पु ६ पृ ३६ व पु १०, पृ. २३३-३४ व २३८) आदि मे हुआ है। प्रकाशावरण~-इसका उपयोग योगसूत्र के इन सूत्रो मे हुआ है-तत क्षीयते प्रकाशावरणम् (२ ५२), वहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा तत प्रकाशावरणक्षय (३.४३) । पटखण्डागम (१, ६-१, ५--पु ६, पृ ६ आदि) व तत्त्वार्थसूत्र (८.४) आदि अनेक जैन ग्रन्थो मे इसके समानार्थक ज्ञानावरण व ज्ञानावरणीय शब्दो का उपयोग हुमा है । अणिमा--इसका उपयोग योगसूत्र मे इस प्रकार हुआ है-ततोऽणिमादिप्रादुर्भाव कायसम्पद्धधर्मा- नभिघातश्च (३-४५) । अणिमा व महिमा आदि ऐसे शब्दो का व्यवहार तिलोयपण्णत्ती (४-१०२६), तत्त्वार्थवातिक (३, ३६, २) और धवला टीका (पु. ६, ७५) आदि जैन ग्रन्थो मे बहुतायत से हुआ है। वज्ञसहननत्व--इसका उपयोग योगसूत्र मे इस प्रकार हुआ है--रूप-लावण्य-बल-वज्रसहननत्वानि कायमम्पत् (३-४६) । वज्रर्षभनाराचसहनन और वज्रनाराचसहनन जैसे शब्दो का उपयोग पट्खण्डागम (१, ६-१, ३६- पु ६, पृ. ७३) व सर्वार्थसिद्धि (८-११) आदि अनेक जैन ग्रन्थो मे हुआ है। कैवल्य-इसका उपयोग योगसूत्र के इन सूत्रो मे किया गया है -तदभावात् सयोगाभावो हानम्, तद् दृशे कैवल्यम् (२-२५), तद्वराग्यादपि दोषवीजक्षये कैवल्यम् (३-५०), सत्त्व-पुरुपयो शुद्धिसाम्ये कंवल्यम् (३-५५), पुरुषार्थशून्याना गुणाना प्रतिप्रसव कैवल्य स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तेरिति (४-३४) । 'केवलस्य भाव कैवल्यम्' इस निरुक्ति के अनुसार 'केवल' शब्द से कैवल्य बना है । जैन दर्शन मे सर्वज्ञ व सर्वदर्शी के ज्ञान को केवलज्ञान स्वीकार किया गया है । केवलज्ञान शब्द का उपयोग षट्- खण्डागम (५, ५, ८१-पु. १३, पृ ३४५), तत्त्वार्थसूत्र (१०-१), तिलोयपण्णत्ती (४-६७४) और पचसग्रह (दि. १-१२६) आदि अनेक जैन ग्रन्थो मे हुआ है। केवलज्ञान से सम्पन्न अरहन्त को केवली और उनकी उस अवस्था को कैवल्य कहा गया है। कैवल्य इस शब्द का उपयोग भी स्वयम्भूस्तोत्र, समाधिशतक', आत्मानुशासन' और सिद्धिविनिश्चय (७-२१) व उसकी टीका आदि मे किया गया है। उपर्युक्त विवेचन से यह भली भाति विदित हो जाता है कि जैन दर्शन मे व्यवहृत बहुत से शब्द योगसूत्र मे भी उसी रूप मे व्यवहृत हुए हैं तथा अभिप्राय भी उनका प्राय दोनो दर्शनो मे समान रहा है। विषय की समानता- जिस प्रकार जैन दर्शन और योगसूत्र में अनेक शब्दो का समान रूप मे व्यवहार हुआ है उसी प्रकार दोनो की विषय विवेचनप्रक्रिया में भी बहुत कुछ समानता पायी जाती है । जैसे वितर्क, विचार-जैन दर्शन मे शुक्लध्यान के जिन चार भेदो का निरूपण किया गया है उनमे प्रथम शुक्लध्यान वितर्क व विचार से सहित तथा द्वितीय शुक्लध्यान वितर्क से सहित होकर भी विचार १ एकान्तदृष्टिप्रतिपेसिद्धिन्यायेषुभिर्मोह-रिपु निरस्य । असि स्म कैवल्य-विभूतिसम्राट् ततस्त्वमहन्नसि मे स्तुवाहं ॥११-५ २. समीक्ष्य कैवल्यसुखस्पृहाणाxxx॥ समाधि ३ ३ xxx कैवल्यालोकितार्थे xxx ॥ प्रात्मानु १४ ४ केवलस्य कर्मविकलस्य आत्मनो भाव कैवल्यम् । सिद्धिवि टी ७-२१, पृ ४६१. । - - - ३८ ध्यानशतक से रहित माना गया है। उनमे श्रुतज्ञान-विशेषरूप से ऊहापोह करने का नाम वितर्क है। द्रव्य को छोडकर पर्याय का और पर्याय को छोडकर द्रव्य का चिन्तन करना, एक पागमवाक्य को ग्रहण कर अन्य प्रागमवाक्य का व उसको भी छोडकर वाक्यान्तर का चिन्तन करता, तथा एक योग को छोडकर दूसरे योग का व उसको भी छोडकर योगान्तर का चिन्तन करना; इसका नाम विचार है। उधर योगसूत्र में योग के ये दो भेद निर्दिष्ट किये गये हैं-सम्प्रज्ञात समाधि और असम्प्रज्ञात समाधि । जिस समाधि के द्वारा सशय-विपर्ययादि से रहित भाव्य (ईश्वर और पच्चीस तत्त्व) का स्वरूप जाना जाता है उसे सम्प्रज्ञात समाधि और जिसमे किसी ज्ञेय का ज्ञान नही होता उसे असम्प्रज्ञात समाधि कहा गया है । दूसरे शब्दो मे उन्हे क्रम से सवीज (सालम्ब) समाधि और निजि (निरालम्ब) समाधि भी कहा गया है। उनमे सम्प्रज्ञात समाधि वितर्कादि से अन्वित होने के कारण सवितकं, सविचार, सानन्द और सास्मित के भेद से चार प्रकार की है। जव स्यूल महाभूतो (आकाशादि) और इन्द्रियो को विपयरूप से ग्रहण करके पूर्वापर के अनुसन्धानपूर्वक शब्द व अर्थ के उल्लेख भेद के साथ भावना की जाती है तव सवितर्क समाधि होती है । इसी पालम्बन मे जब पूर्वापर के अनुसन्धान और शब्दोल्लेख के विना भावना प्रवृत्त होती है तव निवितर्क समाधि होती है। तन्मात्रा (शब्दादि) और अन्त करणरूप सूक्ष्म विषय का आलम्बन लेकर जब तद्विषयक देश, काल व धर्म के अवच्छेदपूर्वक भावना प्रवृत्त होती है तब सविचार समाधि होती है। इसी पालम्बन मे जो देश, काल व धर्म के अवच्छेद के विना धर्मी मात्र को प्रकाशित करने वाली भावना की जाती है उसे निविचार समाधि कहा जाता है। इस प्रकार जैसे जैन दर्शन प्ररूपित प्रथम शुक्लध्यान मे द्रव्य-पर्यायादि के ज्ञानपूर्वक शब्द व अर्थ को परिवर्तन के साथ चिन्तन होता है, जिससे कि उसे सवितकं व सविचार कहा गया है। वैसे ही योगसूत्र प्ररू- पित सम्प्रज्ञात समाधि मे भी पूर्वापरानुसन्यानपूर्वक शब्द व अर्थ के विकल्प के साथ स्थूल (अाकाशादि महाभूतो व इन्द्रियो) और सूक्ष्म (तन्मात्रा व अन्त करण) तत्त्वो का चिन्तन होता है, इसीलिए उसे सवितर्क व सविचार समाधि कहा गया है। जिस प्रकार जैन दर्शन प्ररूपित द्वितीय शुक्लध्यान मे शब्द, अर्थ और योग का सक्रमण (परस्पर परिवर्तन) न होने के कारण उसे अविचार-उक्त विचार से रहित कहा गया है उसी प्रकार योगदर्शन में तन्मात्रा और अन्त करण रूप सूक्ष्म विषय का पालम्बन लेने वाली चतुर्थ (निर्विचार) समाधि में भी देश, काल और धर्म के अवच्छेद से रहित धर्मी मात्र का प्रतिभास होने के कारण उसे निविचार कहा गया है । जैन दर्शन के अनुसार मोह, ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इन चार घाति कर्मों का जब विनाश हो जाता है तब केवलज्ञान के प्रगट हो जाने पर केवली के तीसरा और चौथा शुक्लध्यान होता है । ये दोनो ध्यान मन के विनष्ट हो जाने के कारण समस्त चित्तवृत्तियो से रहित होते हैं। इसीलिए उनमे ज्ञान-जेय आदि का विकल्प तही रहता। यही अवस्था प्राय योगसूत्रोपदिष्ट असम्प्रज्ञात समाधि की है। वहा भी समस्त चित्तवृत्तियों का विनाश हो जाने के कारण पूर्णतया चित्त का निरोध हो जाता है। इसलिए वहा भी कुछ जय नहीं रहना । इसी कारण उसकी 'सम्प्रज्ञात' यह सजा सार्थक है। हरिभद्र सूरि ने अपने योगविन्दु में पृथक्त्ववितर्फ मविचार और एात्यक्ति प्रविचार इन दो शुक्नध्यानो को सम्प्रज्ञात समाधि तया सूक्ष्मक्यिाप्रतिपाति और ध्युपरतक्रियानियति इन दो गुगलच्यानी १.त. मु. ६, ४१.४४. . २ नवीज पोर नियोंज ध्यान या सलग उपरमकाध्ययन (६२२-२३) में भी हुमा है। ३ योगमून भोजदेव विरचित वृत्ति १-१७. ४, म नि:ज समापि । न त निन् मप्रसायन इत्यसप्रशान. (यो. गू भाक्ष्य १.२) नमामिति बेश सभापती पराप्रमात निधी न ममाधि. । यो ग. गोम, यू १-१८.

प्रस्तावना ३६ को असप्रज्ञात समाधि जैसा कहा है। मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा--जैन दर्शन मे अहिंसादि व्रतो के दृढीकरण तथा धर्मध्यान की सिद्धि के लिए मैत्री आदि चार भावनाओ के चिन्तन का उपदेश दिया गया है। इसी प्रकार योगसूत्र मे भी समाधि की सिद्धि मे अन्तरायभूत चित्तविक्षेपो के निषेधार्थ प्रथमत किसी एक अभिमत तत्त्व के अभ्यास का-चित्त को पुन पुन उसमे सलग्न करने का उपदेश दिया गया है और तत्पश्चात् उक्त चित्त की प्रसन्नता के लिए उपयुक्त मैत्री आदि के चिन्तन की प्रेरणा की गई है । तत्त्वार्थसूत्र आदि जैन ग्रन्थो मे जहा मंत्री शब्द के साथ कारुण्य, प्रमोद ओर माध्यस्थ्य शब्दो का उपयोग किया गया है वहा योगसूत्र मे उक्त मैत्री शब्द के साथ करुणा, मुदिता और उपेक्षा शब्दो का उपयोग किया गया है। यह केवल शब्दभेद है, अर्थभेद कुछ भी नहीं है। हरिभद्र सूरि ने तो अपने षोडशक प्रकरण मे योगसूत्रगत उन चार शब्दो का उसी रूप में उपयोग किया है । विशेष इतना है कि तत्त्वार्थसूत्र आदि जैन ग्रन्थो मे जहा मैत्री को प्राणिमात्रविषयक, करुणा या कारुण्य को क्लेशयुक्त (दुखी) जीवविषयक, प्रमोद या मुदिता को गुणी जीवविषयक और माध्यस्थ्य (उपेक्षा या उदासीनता) को अविनेय (विपरीतवृत्ति) जीवविषयक निर्दिष्ट किया गया है वहा योगसूत्र मे मैत्री को सुखी जीवविषयक, करुणा को तत्त्वार्थसूत्र के ही समान दुखी जीवविषयक, मुदिता (प्रमोद) को पुण्ययुक्त जीवविषयक और उपेक्षा को पुण्यहीन (धर्म- विहीन या प्रतिकूल) जीवविषयक निर्दिष्ट किया गया हैं। इस प्रकार चित्त की स्थिरता की प्रमुख कारण होने से दोनो ही दर्शनो मे उपर्युक्त चार भावनाओ पर जोर दिया गया है। उनके पाश्रय से जहा अहिंसादि व्रतो मे दृढता होती है वहा समाधि या ध्यान मे स्थिरता भी होती है। तत्त्वार्थसूत्र मे उपर्युक्त मैत्री आदि भावनाओ के निर्देश के पूर्व मे अहिंसादि पाच व्रतो की पृथक् पृथक् पाच भावनामो का निर्देश करते हुए यह कहा गया है कि हिंसादि पापो मे उभय लोको से सम्बन्धित अपाय (अनर्थ) और अवद्य (पाप या निन्दा) के दर्शन का चिन्तन करना चाहिए। अनन्तर अगले सूत्र मे तो वहा यहा तक कह दिया है कि आत्महितैषी जीव को उपर्युक्त हिंसादि महा पापो को दुख ही समझना चाहिए। अव योगसूत्र को भी देखिये । वहा जाति (मनुष्यादि), आयु और भोग (इन्द्रियविषयादि) को शुभाशुभ कर्मों का फल बतलाकर यह कहा गया है कि उनमे जो पुण्य के आश्रय से उत्पन्न होते है वे प्राणियो को सुखप्रद होते है तथा जो पाप के आश्रय से उत्पन्न होते हैं वे उन्हे दुखप्रद होते है। अन्त मे विवेकी योगी को लक्ष्य करके यही कह दिया है कि विषमिश्रित भोजन के समान उक्त जाति आदि जहा परिणाम मे दुखप्रद होते है वहा वे तृष्णा के बढाने वाले होने से सन्ताप के जनक भी होते हैं। इसके अतिरिक्त अभीष्ट विषयो की प्राप्ति मे जो सुख का अनुभव होता है तथा अनिष्ट विषयो की प्राप्ति मे १. समाधिरेष एवान्य सम्प्रज्ञातोऽभिधीयते । सम्यक्प्रकर्षरूपेण वृत्त्यर्थज्ञानतस्तथा ॥४१९. असम्प्रज्ञात एषोऽपि समाधिर्गीयते परै। निरुद्धाशेषवृत्त्यादितत्स्वरूपानुवेधत ॥ ४२१ (इनकी स्वोपज्ञवृत्ति द्रष्टव्य है) २. त सू ७-११, ज्ञानार्णव ४, पृ २७२ (आगे श्लोक १६-१६ भी द्रष्टव्य हैं); योगशास्त्र (४-११७). ३. यो. सू. १, ३२-३३० ४. परहितचिन्ता मैत्री परदु खविनाशिनी तथा करुणा । परसुखतुष्टिर्मुदिता परदोषेक्षणमुपेक्षा ॥४-१५. ५. यो सू. भोज वृ १-३३ ६. हिंसादिश्विहामुत्रापायावद्यदर्शनम् । दुःखमेव वा। त. सू ७, ६-१०. H ४० ध्यानशतक जो दुस का अनुभव होता है वह ऐसे सस्कार को उत्पन्न करता है कि जिसने संमार का कभी विनाश नहीं हो सकता । इन सब कारणो से योगी को उक्त जाति आदि दुम ही प्रतीत होते हैं । इस प्रकार से जैन दर्शन के समान योग दर्शन मे भी हिसादि पापो अथवा उन्ही जैसे जाति, मायु एव भोगो के विषय में दु खस्पता के ही अनुभव करने की प्रेरणा की गई है। महायत-जैन दर्शन के अन्तर्गत चारित्रप्रामृत (२९-३०), मूलाचार (१, ४.६ व ५, ६१ से ६७), तत्त्वार्थसूत्र (७, १-२), दगवैकालिक (४-७, पृ. १४८-४६) और पाक्षिकसूत्र (पृ. १५-२६) आदि अनेक ग्रन्धो मे अहिंसादि महाव्रतो का विधान किया गया है । इन व्रतो का परिपालन चूकि जीवन पर्यन्त किया जाता है, इसलिए उन्हें यम कहा जाता है। इसी प्रकार से उक्त पाच महाव्रतो का विधान योगसूत्र में भी किया गया है । यहा योग के जिन आठ अगो का वर्णन किया गया है उनमे प्रयम योगाग यम ही है । हिंसा के अभावरूप अहिंसा, सत्य, पर- कीय द्रव्य के अपहरण के अभाव रूप अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का वहा (२-३०) यमरूप मे निर्देश करते हुए आगे (२-३१) यह कहा गया है कि जाति, देश, काल और समय के अवच्छेद से रहित उक्त अहिंसादि पांच सार्वभौम महावत माने जाते हैं । सार्वभौम कहने का कारण यही है कि उनके परि- पालन मे जाति व देश आदि की कोई मर्यादा नहीं रहती। उदाहरणार्थ "में ब्राह्मण का पात नहीं करूगा, तीर्थ पर किसी प्राणी का घात नही करूगा, चतुर्दशी के दिन किसी जीव की हत्या नहीं करूगा, अथवा देव व ब्राह्मण के प्रयोजन को छोडकर अन्य किसी भी प्रयोजन के वश जीवहिंसा न करूगा" इस प्रकार से जो अहिंसा का परिपालन किया जाता है उसे क्रमश जाति, देश, काल और समय की अपेक्षा रखने के कारण सार्वभौम नहीं कहा जा सकता। किन्तु उक्त जाति प्रादि की मर्यादा से रहित जो पूर्णरूप से हिंसा का परित्याग किया जाता है उसे ही सार्वभौम अहिंसामहाव्रत माना जाता है यही अभिप्राय सत्यमहावत आदि के विषय मे भी ग्रहण करना चाहिए । इस प्रकार से उक्त अहिंसा प्रादि पाच महाव्रतो का स्वरूप जैसा जैन दर्शन में प्ररूपित है ठीक उसी रूप में उनका स्वरूप योगसूत्र में भी निर्दिष्ट किया गया है। कृत, कारित, अनुमत-जैन दर्शन मे प्रास्रव व उसके भेद-प्रभेदो का निर्देश करते हुए उनके प्राचार जीव और अजीव बतलाये गये हैं। सरम्भ, समारम्भ व प्रारम्भ, मन, वचन व काय ये तीन योग, कृत, कारित व अनुमत, तथा क्रोध, मान, माया और लोभ ये चार कपायें; इनका परस्पर सम्बन्ध रहने से उक्त जीवाधिकरण के १०८ (३४३४३४४) भेद माने गये हैं । यह पासव कपाय के वग होकर मन, वचन अथवा काय के प्राश्रय से हिंसादि के स्वय करने, अन्य से कराने अथवा करते हुए अन्य का अनुमोदन करने पर जीव के होता है। उसमे तीन या मन्द एव ज्ञात या अज्ञात भाव की अपेक्षा विशेषता हुप्रा करती है। प्रकारान्तर से यही भाव योगसूत्र में भी प्रगट किया गया है। यहा उपर्युक्त महायता के प्रसग गे यह कहा गया है कि वितर्फ स्वरूप-योग के प्रतिकूल माने जाने वाले~-जो हिंसादि पाप : ये क्रोग, लोभ अथवा माह के वश होकर स्वयं किये जाते है, अन्य गे कराये जाते हैं, अपचा उगमें प्रवृत्त अना की अनुमोदना के विषय हंति है। माप ही वे गृह (मन्द), मध्य प्रयवा अधि (जीय) माा हमा फरते है। उनका फल अपरिमित दुरा य अमान होता है। इसलिए योगी को उजत हिमादि स्थापय ग १. मति मूने तद्विपारी जात्यायु गा । ते दाद-परितापफना पुण्यापुण्यंगत्यात् । परिणाम-नाम- मंमार गुणवृत्तिविरोपाच्च दुयीय नव वियेफिन. । यो. पू. २, १३-१५ २.नियम परिमितमानो पायज्जीय यमो नियने ।। रनक, ५७. ३. स. गु ६, ६.८% ग गि. ६,६८; . या.६६, ७.६.

प्रस्तावना - -- कारण श्रादि को जानकर प्रतिकूल भावना के आश्रय से उनका परित्याग करना चाहिए। इस प्रकार तुलनात्मक दृष्टि से विचार करने पर यह निश्चित प्रतीत होता है कि उक्त हिंसादि के परित्याग के विषय में जो पति जैन दर्शन में अपनायी गई हे लगभग वही पद्धति योगसूत्र में भी स्वीकार की गई है। अहिंसा का महत्त्व-- तिलोयपण्णत्ती, हरिवशपुराण और ज्ञानार्णव आदि अनेक जैन ग्रन्थो मे यह निर्देश किया गया है कि जो महात्मा हिंमा एव राग-द्वेषादि को छोडकर वीतरागता की परमकाष्ठा को प्राप्त हो जाता है उसके समक्ष स्वभावतः जातिविरोधी जीव भी-जैसे सर्प व न्योला, विल्ली व चूहा एव सिंह व हिरण आदि भी-अपने उस स्वाभाविक वर को छोडकर आनन्दपूर्वक साथ साथ विचरण करते है। यही अभिप्राय योगसूत्र में "अहिंसाप्रतिष्ठाया तत्सन्निधौ वैरत्याग (२-३५)" इस सूत्र के द्वारा प्रगट किया गया है। सोपफम-निरुपका-अनेक जैन ग्रन्थो में आयु के ये दो भेद निर्दिष्ट किये गये हैं-सोपक्रम और निरुपक्रम । जिस आयु का विघात-प्राणी का असमय मे मरण-विप व शस्त्रादि के निमित्त से हो सकता है वह सोपक्रम आयु कहलाती है तथा जिस आयु का विघात असमय मे नही हो सकता है-जैसे देवो की आयु का-उसे निरुपक्रम आयु कहा जाता है । तत्त्वार्थसूत्र में उन्हे अपवर्त्य और अनप- वत्यं प्रायु कहा गया है । जिस कारणकलाप के द्वारा दीर्घ काल की स्थिति वाली प्रायु को अल्प काल की १. वितर्कवाधने प्रतिपक्षमावनम् । वितर्का हिंसादय कृत-कारितानुमोदिता 'लोभ-मोहपूर्वका मृदु- मध्याघिमात्रा दु ग्वाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् । यो. सू २, ३३-३४ २ ति प. (४-८६६) मे कहा गया है कि तीर्थकर के केवलज्ञान उत्पन्न हो जाने पर जो ग्यारह अतिशय प्रगट होते हैं उनमें तीसरा अहिंसा-हिंसा का अभाव है। आगे वहा यह भी कहा गया है कि वीतराग जिनके माहात्म्य से उनकी समवसरण सभा मे आतक, रोग, मरण, उत्पत्ति, वैरभाव, कामवाघा और भूख-प्यास की पीडा नहीं होती। यथा-- प्रातक-रोग-मरणुप्पत्तीमो वैर-कामवाहाम्रो । तण्हा-छुहपीडाप्रो जिणमाहप्पेण ण हवति ॥ ४-६३३. यही अभिप्राय हरिवशपुराण में भी प्रगट किया गया है- ततोऽहि-नकुलेभेन्द्र-हर्यश्व-महिपादय । जिनानुभावसम्भूतविश्वासा शमिनो वभु ॥ २-८७. अविद्या-वैर-मायादिदोपापायाप्ततद्गुणा । हरीभाद्या विभान्त्यन्ये तिर्यञ्चस्तादृशो यथा ॥ ह पु ५७-१६० ज्ञानाणंव मे भी कहा गया है- सारङ्गी सिंहशाव स्पृशति सुतधिया नन्दिनी व्याघ्रपोत मार्जारी हसवाल प्रणयपरवशा केकिकान्ता भुजङ्गम् । वैराण्याजन्मजातान्यपि गलितमदा जन्तवोऽन्ये त्यजन्ति श्रित्वा साम्यकरूढ प्रशमितकलुष योगिन क्षीणमोहम् ।। ज्ञानार्णव २६, पृ २५०. ३. द्विविधान्यायू पि---अपवर्तनीयानि अनपवर्तनीयानि च । अनपवर्तनीयानि पुनद्विविधानि सोपक्रमाणि निरुपक्रमाणि च । अपवर्तनीयानि तु नियत सोपक्रमाणीति । त भा २-५१, प्रोपपातिकाश्चा- सख्येयवर्षायुषश्च निरुपक्रमा । चरमदेहा. सोपक्रमा निरुपक्रमाश्चेति । एभ्य औपपातिक-चरमदेहा- सख्येयवर्पायुयं शेपा मनुष्यास्तियंग्योनिजा सोपक्रमा निरुपक्रमाश्चापवायुषोऽनपवायुषश्च भवन्ति । xxx उपक्रमोऽपर्तननिमित्तम् । त भा २-५२. (शेष आगे के पृष्ठ पर) ४२ ध्यानशतक स्थिति से युक्त किया जाता है उसका नाम उपक्रम है। इस प्रकार के उपक्रम ने युक्त प्रायु को सोपक्रम और उससे रहित वायु को निरुपत्रम पहा जाता है। योगसूत्र में भी योग के आश्रय से उत्पन्न होने वाली अनेक प्रकार की मिद्धियो का निरूपण करते हुए उम प्रसग मे यह कहा गया है कि सोपक्रम और निरुपक्रम के भेद से कर्म दो प्रकार का है। जो योगी उमके विषय मे ध्यान, धारणा और समाधिरूप सयम को करता है कि कौन कर्म शीघ्र विपाक वाला और कौन दीर्घकालीन विपाकवाला है उसके ध्यान की दृढता से अपरान्तज्ञान-शरीर के छूटने का ज्ञान-उत्पन्न होता है कि अमुक देश व काल मे शरीर छूट जाने वाला है। यह ज्ञान प्राध्यात्मिक, प्राधिभौतिक और आधिदैविक रूप तीन प्रकार के अरिष्ट से भी उत्पन्न होता है। उक्त बोगसूत्र के भाष्य और टीकामो मे प्रकृत उपक्रम को स्पष्ट करते हुए ये दो उदाहरण दिये गये है-१ जिस प्रकार गीले वस्त्र को फैला देने पर वह शीघ्र ही सूख जाता है उसी प्रकार सोपत्रम कर्म भी कारणकलाप के आश्रय से शीघ्र विनष्ट हो जाता है। इसके विपरीत जिस प्रकार उक्त वस्त्र को सकुचित रूप में रखने पर वह दीर्घ काल मे सूख पाता है यही अवस्था निरुपक्रम कर्म की भी समझना चाहिए । २ जिस प्रकार सूते वन मे छोडी गई अग्नि वायु से प्रेरित होकर शीघ्र ही उसे जला देती है तथा इसके विपरीत तृणसमूह मे क्रम से छोड़ी गई वही अग्नि उस तृणराशि को दीर्घ काल मे जला पाती है उसी प्रकार सोपक्रम और निरुपक्रम कर्म के विषय में भी जानना चाहिए। ये दोनो उदाहरण तत्त्वार्थाधिगम भाष्य (२-५२) मे अपवर्तन के प्रमग मे दिये गये है । विदो- पता यह है कि वहा प्रथमत. तृणराशि का उदाहरण देकर मध्य मे एक गणित का भी उदाहरण दिया गया है और तत्पश्चात् वस्त्र का उदाहरण दिया गया है। गणित का उदाहरण देते हुए यह कहा गया है कि जिस प्रकार कोई गणितज्ञ किसी सख्या विशेष को लाने के लिए विवक्षित राशि को गुणकार और भागहार के द्वारा खण्डित करके प्रावर्तित करता है उसी प्रकार करणविशेष के प्राथय से कमविशेप का भी अववर्तन (ह्रस्वीकरण) होता है । इस प्रकार सोपक्रम और निरुपक्रम का विचार दोनो ही दर्शनी में समानरूप से किया गया है। उत्पादादित्रय-जैन दर्शन मे द्रव्य का लक्षण उत्पाद, व्यय और प्रीव्य से युक्त मत् गाना गया है। उसका अभिप्राय यह है कि जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक पदार्थ उक्त उत्पादादि तीन मे गहित है। वस्तु मे पूर्व पर्याय को छोडकर जो नवीन पर्याय उत्पन्न होती है उसका नाम उत्पाद और पूर्व पर्याय में विनाग का नाम व्यय है। इन दोनो के माथ वस्तु में जो अनादि स्वाभाविक परिणाम नदा विद्यमान रहता है उसे ध्रौव्य कहा जाता है। उदाहरणार्य जव सुवर्णमय क्ढे को तोडकर उसको सामान बनवायी जाती है तब माफल र अवस्या का उत्पाद और कटेप अवस्था का व्यय होता है। इन दोनो के होते भी जो उनमें सुवर्णरूपता सदा विद्यमान रहती है, यह उमका प्रौव्य है। जैन दर्शन का यह एक तमोपक्रमणमुपक्रम प्रत्यासन्नीकरणकारणमुपप्रमगन्दाभिधेयम्, अनिदीर्घकालरियरयप्यायुर्यन कारणविशेषेणाध्ययमानादिनाऽल्पकालस्थिनिकमापने ग कारणकताप उपक्रम , सन सादृयोमेग मोपक्रमायनपवर्तनीयान्यायपि भयन्ति । निर्गतीपक्रमाणि निमामाज्यवमानादिकारण मानापा- भावात् । त. भा. सिद्ध वृ. २०५१., शवला पु. ६.६ तथा पु. १०.. २३३.३४ ५ पृ. २३८ भी द्रष्टव्य है। १. स्पाना. अभय.व.४,२, २६६ पृ. २१०. २. यो. स. ३-२२ ३. त.मू. १, २१-१०.

प्रस्तावना ४३ - प्रमुख सिद्धान्त है। इस प्रकार की परिणमनशीलता योगसून मे भी स्वीकार की गई है। वहां चित्त की एकाग्रतारूप परिणाम के प्रसग मे प्राकाशादि भूतो व श्रोयादि इन्द्रियो मे धर्म, लक्षण और अवस्था रुप तीन परि- णामो का व्याख्यान करते हुए धर्मी के लक्षण मे यह कहा गया है कि जो शान्त, उदित और अव्यपदेश्य धर्मों से अन्वित होता है उसे धर्मी कहा जाता है। जो धर्म अपने अपने व्यापार को करके अतीत अध्वान मे प्रविष्ट होते है-व्यय या विनाश को प्राप्त होते हैं वे शान्त कहलाते हैं तथा जो अनागत अध्वान को छोडकर वर्तमान अध्वान में अपने व्यापार को किया करते हैं उन्हे उदित-उत्पाद अवस्था से सहित-कहा जाता है। साथ ही जो धर्म उक्त दोनो अवस्थाओ मे शक्तिरूप मे विद्यमान रहते हुए कहने मे नही पाते है उन्हे अव्यपदेश्य (ध्रौव्य) कहते है। इसे स्पष्ट करते हुए योगसूत्र की भोजदेव विरचित वृत्ति मे यह उदाहरण दिया गया है- सुवर्ण रुचकरूप धर्म को छोडकर स्वस्तिक रूप वर्मान्तर को जव गहण करता है तव वह सुवर्णरूपता से अन्वित रहता है दोनो ही अवस्थाप्रो मे वह उसे नही छोडता है । इस प्रकार वह सुवर्ण कथचित् भिन्नरूपता को प्राप्त उन धर्मों में सामान्य (धर्मी) व विशेष (धर्म) रूप से अवस्थित होता हुआ अन्वयी रूप से प्रतिभासित होता है। आगे कहा गया है कि पूर्वोक्त धर्मो का जो क्रम है-जैसे मिट्टी के चूर्ण से उसका पिण्ड, उससे कपाल और उनसे घट; उसकी भिन्नता पूर्व धर्म को छोडकर धर्मान्तर के ग्रहणरूप धर्मी के परिणाम की भिन्नता मे हेतु है-उसकी अनुमापक है। उक्त तीन परिणामो के धारणा, ध्यान और समाधिरूप सयम से-~धर्म-धर्मी आदिम्प उपर्युक्त विकल्पो के निरोध से-~-योगी के अतीत व अनागत का ज्ञान प्रादुर्भूत होता है। आगे कैवल्यपाद में भी सत्कार्यवाद का समर्थन व विज्ञानवाद वा निराकरण करते हुए परिणाम- वाद को प्रतिष्ठित किया गया है। विशेष इतना है कि पुरुष को अरिणामी (कूटस्थ नित्य) स्वीकार किया गया है। । १ न सामान्यात्मनोदेति न व्येति व्यक्तमन्वयात् । व्येत्युदेति विशेपाते सहेकत्रोदयादि सत् ॥ कार्योत्पादः क्षयो हेतोनियमाल्लक्षणात् पृथक् । न तो जात्यायवम्थानादनपेक्षा खपुष्पवत् ।। घट-मौलि-सुवर्णार्थी नाशोत्पाद-स्थितिण्वयम् । शोक-प्रमोह-माध्यस्थ्य जनो याति सहेतुकम् ।। पयोव्रतो न दध्यत्ति न पयोऽत्ति दधिव्रत । अगोरसवतो नोभे तस्मात्तत्त्व श्रयात्मकम् ॥ प्रा. मी ५७-६०. स्थिति जनन-निरोघलक्षण चरमचर च जगत् प्रतिक्षणम् । इति जिन सकलज्ञलान्छन वचनमिद वदता वरस्य ते ॥ स्व. स्तो २०.४. २ शान्तोदितो तुल्यप्रत्ययो चित्तस्यैकाग्रतापरिणाम । एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्म-लक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याता । गान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपात धर्मी । यो. सू. ३, १२-१४ ३ तत पुन यथा सुवर्ण रुचकरूपधर्मपरित्यागेन स्वस्तिकरूपधर्मान्तरपरिग्रहे सुवर्णरूपतयाऽनुवर्तमान तेषु धर्मपु कथचिद्भिन्नेषु धर्मिरूपतया सामान्यात्मना धर्मरूपतया विशेषात्मना स्थिनमन्वयित्वेन अवभासते। यो सू भोज, वृत्ति ३-१४. ४ क्रमान्यत्व परिणामान्यत्वे हेतु । परिणामत्रयसयमादतीतानागतज्ञानम् । यो सू ३, १५-१६ ५ तस्मात् सतामभावासम्भवादसता चोत्पत्त्यसम्भवात्तस्तधमविपरिणममानो धर्मी सदैवकरूपतयाश्व. तिष्ठते । यो. सू भोज वृ. ४-१२. ६. यो. सू४, १२-१७ ध्यानशतक इस प्रकार जैन दर्शन में स्वीकृत उत्पादादि तीन के प्राश्रय से जैसे वस्तु को यथनिन् परिणागी म्वीकार किया गया है लगभग उसी प्रकार योगदर्शन में भी शान्त, उदित और अमापदेश्य गमों के याश्रय ने वस्तु को परिणामी स्वीकार किया गया है। वहा उत्पाद का ममानार्थक शन्द उदिन, व्यय फा समानार्थक शान्त और ध्रीन्य का समानार्थक अव्यपदेश्य है। फंचल्य- जैन दर्शन के अनुसार मोह, ज्ञानावरण, दर्गनावरण और अन्तराय का क्षय हो जाने पर जीव के जव केवलज्ञान प्रगट हो जाता है तब उसे केवली कहा जाता है। केवली समस्त पदार्थों का ज्ञाता-द्रष्टा (सर्वज्ञ) होता हुया वीतराग-राग-द्वेप से पूर्णतया रहित -होकर प्रात्मस्वस्त मे अवस्थित होता है। केवली की इस अवस्था का नाम ही कैवल्य है। केवली के उपयुक्त स्वरूप को मूलाचार (७-६७), आवश्यक नियुक्ति (८६ व १०७६), सर्वार्थसिद्धि (६-१३), तत्त्वार्याधिगमभाष्य (१९, ५-६, पृ ३१६) और तत्त्वार्थवार्तिक (६, १३, १ व ६, १, २३) आदि अनेक प्रन्यो मे प्रगट पिया गया है। योगसूत्र मे कैवल्य का उल्लेख चार सूत्रो मे हुआ है। सर्वप्रथम वहा सूत्र २-२५ मे यह कहा गया है कि सम्यग्ज्ञान के द्वारा अविद्या का प्रभाव हो जाने में जो द्रष्टा (पुरुष) और दृश्य (बुद्धिमत्य) के सयोग का प्रभाव हो जाता है उसे हान कहते हैं । यही हान -दुखस्प समार का नाशकेवल पुरुष का कैवल्य कहलाता। प्रागे योग से प्रादुर्भूत होने वाली अनेक प्रकार की विभूतियो का निर्देश करते हुए मूत्र ३-५० मे यह कहा गया है कि रजोगुण के परिणामस्वरूप शोक के विनष्ट हो जाने पर चित्त की स्थिरता की कारणभूत जो विशोका सिद्धि' प्रगट होती है उसके प्रगट हो जाने पर जब योगी के वैराग्य उत्पन्न होता है तव उसके समस्त रागादि दोषो को कारणभूत अविद्या (मोह या मिथ्याजान) के विनष्ट हो जाने से दुस की प्रात्यन्तिकी निवृत्तिरूप कैवल्य प्रादुर्भूत होता है। उस समय सत्यादि गुणो को अधिकार के समाप्त हो जाने पर पुरुप (आत्मा) स्वरूपप्रतिष्ठिन हो जाता है। तत्पश्चात् सून ३-५५ में प्रकारान्तर से फिर यह कहा गया है कि सत्त्व और पुगए दोनो की शुद्धि के समानता को प्राप्त हो जाने पर पुरुष के कैवल्य उत्पन्न होता है--वह मुक्ति को प्राप्त हो जाता है । समस्त कर्तृत्वविषयक अभिमान के निवृत्त हो जाने पर सत्व गुण का जो अपने कारण मे प्रवेश होता है, इसका नाम सत्त्वशुद्धि तथा उपनरित भोक्तृत्व का जो प्रभाव हो जाता है, इसका नाम पुरुषशुद्धि है। आगे कैवल्य पाद मे दम (४, २४-३३) मूत्री द्वारा पौवल्य का विवेचन मारते हुए कहा गया है कि योग और अपवर्ग स्प पुग्पार्य के समाप्त हो जाने पर जो रात्वादि गुणों का प्रतिप्रमय--प्रतिपक्षगून परिणाम के ममाप्त हो जाने में विकार यी अनुत्पत्ति है उगे कंवत्य कहा जाता है, प्रगया चिनशक्ति का जो स्वस्प मात्र में अवस्थान है उमे कयल्प ममझना चाहिये। meromauniya १ स्वरूपायस्थिति पुमस्तदा पक्षीणकर्मण. । नाभावी नायचंतन्य न चैतन्यमनर्थकम् ॥ तत्त्वानु २३४ २. देवी पीछे 'कयत्य गन्द, पृ. ३७. . विमोगा विगत गुगमगमत्यागमोमो रज परिणामी यम्मा मा विनोका पाम गिनि. निवन्धिनी । यो. मू. भोज. यति १.३६. ४. यो ग. (भोज वृत्ति ३...) ५ गाय पुरगणो सृद्धिसामी पयत्यम् । यो. ग. ३-५५ (माRT मंगभिमाननियन्या बरानुप्रये. मुदि, पपग शुनिग्निभोगाभार , frii गमाना गृनी पर संयमुपाते । भोर. दक्षि) ६. पुरषायंगम्याना गुणाना प्रतिप्रमय व निra fififगी। योग. ४.३३ ।

प्रस्तावना .४५ - इस प्रकार जैसे जैन दर्शन मे केवलीकी कैवल्य अवस्था को राग, द्वेष, मोह एव अज्ञानता आदि दोषो से रहित स्वात्मस्थिति स्वरूप माना गया है वैसे ही योगदर्शने मे भी राग-द्वेषादि दोषो की बीज- भूत अविद्या के विनष्ट हो जाने पर आविर्भूत होने वाली उक्त कैवल्य अवस्था को प्रात्यन्तिको दुख- निवृत्तिरूप स्वीकार किया गया है । वही पुरुष, प्रात्मा अथवा चेतना शक्ति की स्वरूपप्रतिष्ठा है। जैन दर्शन मे उसे आत्यन्तिक स्वास्थ्य कहा गया है। जिस प्रकार सिद्धिविनिश्चय की टीका (७-२१) मे 'फेवलस्य कर्मविकलस्य प्रात्मनो भावः कैवल्यम्' इस निरुक्ति के अनुसार कैवल्य का स्वरूप प्रगट किया गया है उसी प्रकार योगसूत्र की भोज- देव विरचित वृत्ति मे (२-२५) 'यदेव च सयोगस्य हान तदेव नित्य केवलस्यापि पुरुषस्य कैवल्य व्यप- दिश्यते' यह निर्देश करते हुए उसका स्वरूप प्रगट किया गया है । भाष्यगत शब्दसाम्य- जिस प्रकार जैन दर्शन के अन्तर्गत उपयुक्त कितने ही शब्द मूल योगसूत्र में प्रयुक्त हुए हैं उसी प्रकार उसके व्यास विरचित भाष्य व भोजदेव विरचित वृत्ति आदि मे भी ऐसे अनेक शब्द उपलब्ध होते हैं जो जैन दर्शन मे यत्र तत्र व्यवहृत हुए है । यथा- सर्वज्ञ- यह शब्द योगसूत्र में इस प्रकार व्यवहृत हुआ है-तत्र निरतिशय सर्वज्ञवीजम् (१-२५) । इसके भाष्य मे सर्वज्ञ के स्वरूप को प्रगट करते हुए यह कहा गया है कि त्रिकालवर्ती अती- न्द्रिय पदार्थों का जो हीनाधिक रूप मे बोध होता है, यह सर्वज्ञ का बीज (हेतु) है। यह क्रम से वृद्धि को प्राप्त होकर जहा निरतिशय-उस वृद्धि रूप अतिशय से रहित-होकर परम काष्ठा को प्राप्त हो जाता है-वह सर्वज्ञ कहलाता है। जैन दर्शन के अन्तर्गत समयसार (२६), पचास्तिकाय (१५१), आप्तमीमासा (५) और प्राप्त- परीक्षा (१०७-६) आदि अनेक ग्रन्थो मे उस शब्द का व्यवहार हुआ है तथा उसके लक्षण का निर्देश जैसा पूर्वोक्त योगसूत्र के भाष्य में किया गया है लगभग वैसा ही उसका लक्षण उन जैन ग्रन्थो मे भी पाया जाता है। वहा उसके समानार्थक प्राप्त, अर्हत्, जिन व केवली आदि अनेक शब्दो का उपयोग किया गया है। जिस प्रकार योगसूत्र के भाष्य मे उसकी सिद्धि "अस्ति काष्ठाप्राप्ति सर्वज्ञवीजस्य, सातिशय- त्वात् परिमाणवत्" इस अनुमान के द्वारा की गई है-उसी प्रकार जैन दर्शन के अन्तर्गत प्राप्तमीमासा मे उसकी सिद्धि ज्ञान के अतिशय के स्थान मे अज्ञानादि दोषो की प्रतिशयित हानि के द्वारा की गई है । यथा-दोषावरणयोहानिनिःशेषास्त्यतिशायनात् । क्वचिद्यथा स्वहेतुभ्यो बहिरन्तर्मलक्षय ॥ आ मी ४. कुशल, चरमदेह-योगसूत्र मे अविद्या, अस्मिता, राग, द्वाप और अभिनिवेश इन पाच क्लेशो का निर्देश करते हुए उनमे अविद्या को शेष अस्मितादि चार का क्षेत्र-उत्पत्तिस्यान--कहा गया है । प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार स्वरूप उन अविद्या प्रादि का विवेचन करते हुए उसके भाष्य (२-४) मे कहा गया है कि चित्त मे शक्ति मात्र से स्थित उक्त अविद्या आदि का, बीज रूप में अवस्थित रहकर भी प्रबोधक के अभाव मे अपने कार्य को न कर सकना, इसका नाम प्रसुप्त है। इस प्रसग मे भाष्य मे कहा गया है कि जिसका क्लेशरूप वीज दग्ध हो चुका है उसके अवलम्बन के सन्मुख होने पर भी उन - १ स्वास्थ्य यदात्य न्तिकमेव पुसा स्वार्थों न भोगः परिभड्गुरात्मा तृषोऽनुषजान्न च तापशान्तिरितीदमाख्यद् भगवान् सुपार्श्व ॥ स्व. स्तो ७-१. २ यदिदमतीतानागत प्रत्युत्पन्न प्रत्येक-समुच्चयातीन्द्रियग्रहणमल्प बह्विति सर्वज्ञ-वीजमेतद् विवर्धमान यत्र निरतिशय स सर्वज्ञः । भाष्य, ४६ ध्यानशतक अविद्या प्रादि योगो के अकुरित होने की सम्भावना नहीं रहती। इसीलिए क्षीणक्नेश को कुगल' व चरमदेह कहा गग है (चरमदेह शब्द का उपयोग आगे सूत्र ४-७ के भाष्य में भी किया गया है)। प्रागे योगसूत्र २-२७ के भाष्य में केवली पुरुप के स्वरूप को दिसलाते हुए कुरान का पक्षण इम प्रकार प्रगट किया गया है-एतस्यामवस्थाया गुणसम्बन्धानीत स्वरूपमागज्योतिरमल. केपली पुरुष इति । एता सप्तविधा प्रान्तभूमिप्रज्ञामनुपश्यन् पुरुष फुशल इत्यास्यायने । प्रतिप्रमवेऽपि नित्तम्य मुक्त. कुगल इत्येव भवति, गुणातीतत्वादिति । उपर्युक्त कुगल शब्द आगे सून २-१३, ४-१२ और ४-३३ के भाष्य मे भी व्यवहृत हुआ है। ४.१२ के भाष्य मे तो उसके साथ अनुष्ठान भी जुडा हुआ है । योगसूत्र २-१४ की भोज-वृत्ति मे कुशल कर्म को पुण्य कहा गया है। प्रकृत में उमका अर्थ क्षीणमोह जैसा है। जैन दर्शनगत प्राप्तमीमामा (८) आदि ग्रन्थो में कुगल शब्द प्राय पुण्य कर्म -सदानरण के लिये व्यवहृत हुआ है । मर्वार्थमिद्धि ( ७) आदि मे निर्जरा के प्रसग मे उसे कुगलमूला निर्दिष्ट किया गया है। चरमदेह शब्द का उपयोग तत्त्वार्थसत्र (२-५३) हरिवशपुराण (६१-६२) और तत्वानु- शासन (२२४) आदि में तद्भवमोक्षगामी जीद के निये--जिने आगे नवीन शरीर नहीं धारण करना पड़ेगा-किया गया है' । योगमूत्रगत चरमदेह शब्द का भी अभिप्राय वही है । प्रक्षीणमोहावरण, क्षीणक्लेश योगसूर १-२ के भाष्य में प्रक्षीणमोहावरण और मूग २-४ के भाष्य मे क्षीणक्लेश शब्दो का उपयोग हुआ है। जैन दर्शन में इनके ममानार्थक क्षीणमोह व क्षीणकपाय गव्दी का प्रयोग अधिक हुआ है। जैसे-समयसार (३८), तत्त्वार्थसूत्र (६-४५) और दि. परसग्रह (१-२५) प्रादि । प्राप्तमीमामा में अरहन्त अवस्था मे दोप और आवरण की हानि सिद्ध की गई है। दोप से अभिप्राय वहा राग, द्वेप, मोह एव अनानादि का तथा प्रावरण मे अभिप्राय भानावरण व दर्शना- वरण आदि का रहा है । योगग्य के भाष्य में उपर्युक्त प्रवीणमोहावरण का भी प्राय. वैसा ही अभिप्राय रहा है । वहा प्रक्षीणमोहावरण यह चित्त के विशेषणरूप में प्रयुक्त हुआ है। सम्यग्दर्शन-योगसूत्र के भाप्य में यह कहा गया है कि अनादि दुसरूप प्रवाह से प्रेरित गोगी यात्मा और भूतसमूह को देखकर समस्त दुगो के क्षय के कारणभूत सम्यग्दर्शन की शरण में जाता है-दुःपनिवृत्ति का कारण मानकर वह उसे स्वीकार करता है। यही पर प्रागे उसे समार के हान मा उसमे मुक्ति पाने का उपाय भी कहा गया है। १ तदेवमीश्या सप्तभिप्रान्तभूमिप्रमायामुपजाताया पुरुप. कुगलः (इसके म्यान में 'वन. पाट भी पाया जाता है) प्त्युच्यते । यो ग भोज वृ २-२७ । २. योगगून १-२४ के भाप्य में भी कुपल व अपुगाल के भेद से कर्म को दो प्रकार निर्दिष्ट किया गया है। यथा-मुगलाशलानि फर्माणि । ३. चरग ममारान्तयति नद्भवमोक्षगारण ग्लयारापय जीयगम्बलि शरीर ययययमनागपगगन- मुक्त यम्यामो परमागेर । गो. जी गग. य जी टीका ३७४ । ४ दोषावरणयोनिनि शेपान्यतिमायनान । पनियथा मन्यो यरिनार 11 ५. नक्ष्य (प्रन्यास्पर्मर चित्तमस्यम्) प्रक्षोणमोहायरण पंत मनोमानमपित रामायया धर्म- मान-धराम्यवारग मयति । गो. गु भा. १-२ १. नानादिना दुम चोरमा मानमारमान नाग्राम न सादा गोगी माया सम्मान मा प्ररला इति। vyानीगाय गापामगा। गो. म. भाग २१५., प्रागै गत १३५ माग में भी उस मायनस प्रारनापेक्षा य. খাননি। .

प्रस्तावना ४७ जैन दर्शन मे सम्यग्दर्शन को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। वहा तत्त्वार्थसूत्र आदि अनेक ग्रन्थो मे उसे हेयस्वरूप ससार की हानि का-उससे मुक्त होने का प्रमुख कारण कहा गया है। उसकी इस प्रमुखता का कारण यह है कि उसके विना ज्ञान-चारित्र भी यथार्थता को नहीं प्राप्त होते। सम्यग्ज्ञान-यह शब्द योगसूत्र २-२८ के भाष्य मे उपलब्ध होता है । जैन दर्शन के अन्तर्गत उक्त तत्त्वार्थसूत्र आदि ग्रन्थों मे सम्यग्दर्शन के साथ इसे भी मोक्ष का कारण कहा गया है। योगसूत्र २-४ की भोजदेव विरचित वृत्ति मे यह कहा गया है कि सम्यग्ज्ञान के द्वारा मिथ्याज्ञानरूप अविद्या के हट जाने पर दग्धवीज के समान हुए क्लेश अकुरित नही होते'। आगे सूत्र २-१६ की उत्थानिका मे भी उक्त वृत्ति मे उसी अभिप्राय को व्यक्त किया गया है केवली- योगसूत्र ३-५५ के भाष्य मे कहा गया है कि जब पुरुष के कैवल्य प्रगट हो जाता है तब वह स्वरूपमात्र-ज्योति निर्मल केवली हो जाता है । कैवल्य के स्वरूप को दिखलाते हुए वहा यह निर्देश किया गया है कि ज्ञान से प्रदर्शन हट जाता है, प्रदर्शन के हट जाने से अस्मिता आदि आगे के क्लेश नही रहते, तथा उन क्लेशो के विनष्ट हो जाने से कर्मविपाक का अभाव हो जाता है । इस प्रकार इस अवस्था मे सत्त्वादि गुणो का अधिकार समाप्त हो जाने से वे दृश्यत्वेन उपस्थित नही रहते । यही पुरुप का कैवल्य है। मूलाचार (७-६७), आवश्यक नियुक्ति (८६ व १०७६), सर्वार्थसिद्धि (६-१३) और तत्त्वार्था- धिगम भाष्य (का ६, पृ ३१९) आदि अनेक जैन ग्रन्थो मे उक्त केवल शब्द व्यवहार हुआ है । अज्ञान, प्रदर्शन, राग, द्वेष एव मोह आदि के हट जाने से पूर्णज्ञानी (सर्वज्ञ) होकर स्वरूप मे स्थित होना, यह जो केवली का स्वरूप है वह प्राय दोनो दर्शनो मे समान है। जैन दर्शन, भगवद्गीता और योगदर्शन प्रादि मे प्रतिपादित ध्यान अथवा योग के विषय मे परस्पर कितनी समानता है, इसके विषय मे यहा कुछ तुलनात्मक दृष्टि से विचार किया गया है। यद्यपि यह कुछ अप्रासगिक सा दिखता है, फिर भी जो पाठक अन्य सम्प्रदाय के ध्यानविषयक ग्रन्थो से परिचित नहीं हैं वे कुछ उससे परिचित हो सकें, इस विचार से यह प्रयत्न किया गया है। जैन दर्शन के समान अन्य दर्शनों में भी योगविषयक महत्त्वपूर्ण साहित्य उपलब्ध है। उसमे योगवाशिष्ठ आदि कुछ ग्रन्थ प्रमुख हैं। अब आगे हम प्रस्तुत ध्यानशतक पर पूर्ववर्ती कौन से जैन ग्रन्थो का कितना प्रभाव रहा है, इसका कुछ विचार करेंगे- ध्यानशतक और मूलाचार आचार्य वट्टकेर (सम्भवतः प्र-द्वि. शती) विरचित मूलाचार यह एक मुनि के आचारविषयक - १. सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्राणि मोक्षमार्ग । त. सू. १-१. २. विद्या-वृत्तस्य सम्भूति-स्थिति-वृद्धि-फलोदया । न सन्त्यसति सम्यक्त्वे बीजाभावे तरोरिव ।। रत्नक. ३२. ३. तस्या च मिथ्यारूपायामविद्याया सम्यग्ज्ञानेन निवतिताया दग्धबीजकल्पाना येषा न क्वचित् प्ररोहो- ऽस्ति । यो. सू भोज. वृत्ति २-४ ४ तदेवमुक्तस्य क्लेश-कर्म-विपाकराशेरविद्याप्रभवत्वादविद्यायाश्च मिथ्याज्ञानरूपतया सम्यग्ज्ञानोच्छे- द्यत्वात् सम्यग्ज्ञानस्य च साधनहेयोपादेयावधारणरूपत्वात्तदभिधानायाह- ५. परमार्थतस्तु ज्ञानाददर्शन निवर्तते, तस्मिन् निवृत्ते न सन्त्युत्तरे क्लेशाः, क्लेशाभावात् कर्मविपाका- भाव । चरिताधिकाराश्चैतस्यामवस्थाया गुणाः न पुनदृश्यत्वेनोपतिष्ठन्ते । तत् पुरुषस्य कैवल्यम् । तदा पुरुपः स्वरूपमात्रज्योतिरमल. केवली भवतीति । भा ३-५५ H ध्यानशतक महत्त्वपूर्ण गन्य है । वह बारह अधिकारो मे विभक्त है। उसके पचाचार नामक पाचये अधिकार में तप प्राचार की प्रापणा करते हुए अन्यन्तर तप के जो छह भेद निर्दिष्ट किये गये है उनमे पाचवा ध्यान है । इस ध्यान को वहां सक्षेप मे (गा. १९७-२०८)प्ररूपणा की गई है। वहीं सर्वप्रथम ध्यान के मातं, रोद्र, धर्म और शुक्ल इन चार भेदो का निर्देश करने हुए उनमे पात और रोद्र इन दो को अप्रगस्त तथा धर्म और शुक्ल इन दो को प्रशस्त कहा गया है (१९७)। आगे उन चार ध्यानों के स्वरूप को यथाक्रम से प्रगट करते हुए यह कहा गया है कि अमनोज्ञ (अनिष्ट) के सयोग, इष्ट के वियोग, परोपह (क्षुधादि की वेदना) और निदान के विषय मे जो कपाय सहित ध्यान (चिन्तन) होता है उसे पातं- ध्यान कहते हैं (१९८) । चोरी, असत्य, मरक्षण-विपयभोगादि के साधनभूत धनादि के सरक्षण और छह प्रकार के प्रारम्भ के विपय मे जो कषायपूर्ण चिन्तन होता है उसे रौद्रध्यान कहा जाता है (१६६)। उपर्युक्त पातं और रौद्र ये दोनो ध्यान चूकि सुगति-देवगति व मुक्ति की प्राप्ति मे वाधक है, अतएव यहा उन्हे छोडकर व धर्म और शुक्ल ध्यान में उद्यत होकर मन की एकाग्रतापूर्वक उनके चिन्तन की प्रेरणा की गई है (२००-२०१) । आगे क्रमप्राप्त धर्मध्यान के प्राज्ञाविचय, प्रपायविचय, विपाकविचय और सस्थानविचय इन चार भेदो का निर्देश करते हुए पृथक् पृथक् उनके स्वरूप को भी प्रगट किया गया है। अन्तिम सस्थान- विचय के प्रमग मे यह भी कहा गया है कि धर्मध्यानी यहा अनुगत अनुप्रेक्षाम्रो का भी विचार करना है। तदनन्तर उन बारह अनुप्रेक्षाग्रो के नामो का निर्देश भी किया गया है (२०१-२०६)। तत्पश्चात् शुक्लध्यान के प्रसग मे यहा इतना मात्र कहा गया है कि उपशान्तकपाय पृथक्त्व- वितर्क-वीचार ध्यान का, क्षीणकपाय एकत्व-वितर्क-अवीचार ध्यान का, सयोगी केवली तीसरे सूक्ष्मक्रिय शुक्नध्यान का और अयोगी केवली समुच्छिन्ननिय शुक्लध्यान का चिन्तन करता है (२०७-२०८) । मूलाचार मे जहा प्रसगप्राप्त इस ध्यान की सक्षेप मे प्ररूपणा की गई है वहा ध्यानविषयक एक स्वतत्र ग्रन्य होने से ध्यानशतक मे उमकी विस्तार से प्ररूपणा की गई है। दोनो मे जो कुछ समानता व अममानता है वह उस प्रकार है- मूलाचार में मामान्य से चार घ्यानो के नामो का निर्देश करते हुए प्रात व रौद्र को अप्रशस्त और धर्म व शुक्न को प्रशस्त कहा गया है (५-१९७) । इसी प्रकार ध्यानशतक में भी उक्त चार ध्यानो फे नाम का निर्देश करते हुए उनमे अन्तिम दो ध्यानी को मुक्ति के साधनभूत तथा पातं व रौद्र इन दो को मसार का कारणभूत कहा गया है (५) । यही उनकी अप्रशस्तता और प्रशस्तता है। गूलाचार में प्रार्तध्यान के चार भेदो का नामनिर्देश न करके सामान्य से उसका स्वरूप मात्र प्रगट किया गया है। उस स्वरूप को प्रगट करते हुए अमनोज्ञ के योग, इप्ट के वियोग, परीपह और निदान इस प्रकार में उसके चिन्तनीय विषय के भेद का जो दिग्दर्शन कराया गया है उससे उसके चार भेद सप्ट हो जाते हैं (५-१६८) । तत्वार्थमूत्र (६-३२) में जहा उसके तृतीय भेद को वेदना के नाम मे निर्दिष्ट किया गया है यहा प्रकृत मूलाचार में उसका निर्देश परीपह के नाम से किया गया है। ध्यानशतप में भी उनके चार भेदो का गामनिर्देश नहीं किया गया, फिर भी उसके गार भेदी का मप जो पृया पृषक पार गायापी (६-६) के द्वारा निर्दिष्ट किया गया है उससे उमफे चार भद प्रगट (१६.२२)। यहा उनका कुछ अमव्यत्यय प्रयश्य है। जैसे प्रथम भेद में अमनीश के वियोग, द्वितीय भेद मे पून गेगादि पो पेदना के वियोग, तृतीय भेद में अभीष्ट विषयों को घेदना (अनुगरग) यो प्रवियोग और मनुष्य मेद में निदान के विषय में निन्तन । पम प्रकार मूलाधार मे जो मितीय है यह rपान में तृतीग है तथा मृलागार में जो मृगीय है यह प्यानातक में द्वितीय है। गफ प्रतिसित दोनों में वियोग गैर प्रषियोग गियर भी पूछ विशेगना रही है। जगे-गुमापार में धन पा गांग (सपोग) सोने र यो विषय में गंगाप परिणति होती है उगे प्रयग पाया है। ।

प्रस्तावना ४६ पर ध्यानशतक मे अमनोज्ञ विपर्यों के वियोग के लिए तथा उनका वियोग हो जाने पर भविष्य मे पुन उनका सयोग न होने के विषय मे जो चिन्तन होता है उसे प्रथम आर्तध्यान कहा गया है । यह केवल उक्तिभेद है, अभिप्राय मे कुछ मेद नहीं है । मूलाचार मे आर्तध्यान के समान गैद्रध्यान के भी स्वरूप का सामान्य से निर्देश किया गया है, उसके भेदो का नामनिर्देश नहीं किया गया (५-१६६)। फिर भी विषयक्रम के निर्देश से उसके चार भेद स्पष्ट दिखते हैं । यहा चतुर्थ भेद का विषय जो छह प्रकार का आरम्भ निर्दिष्ट किया गया है उसे हिंसा का ही द्योतक समझना चाहिए । ध्यानशतक में भी यद्यपि रौद्रध्यान के उन चार भेदो का नामनिर्देश तो नहीं किया, फिर भी आगे वहा चार (१९-२२) गाथाओ द्वारा उनके लक्षणो का जो पृयक् पृथक् निर्देश किया गया है उससे उसके चार भेद स्पष्ट हो जाते है । आगे (२३) उनकी चार सख्या का भी निर्देश कर दिया गया है। मूलाचार मे धर्मध्यान के आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय और सस्थानविचय इन चार भेदो का स्पष्टतया नामनिर्देश करते हुए उनके पृथक् पृथक् लक्षण भी कहे गये हैं (२०१-५) । ध्यानशतक मे उसके उन चार भेदो का नामर्दिश तो नही किया गया, किन्तु उसके प्ररूपक भावना आदि बारह द्वारो के अन्तर्गत ध्यातव्य द्वार की प्ररूपणा (४५-६२) मे जो आज्ञा, अपाय, विपाक और द्रव्यो के लक्षण व संस्थान आदि के स्पष्टीकरणपूर्वक उनके चिन्तन की प्रेरणा की गई है उससे उसके वे नाम स्पष्ट हो जाते हैं । विशेष इतना है कि मूलाचार मे उसके द्वितीय भेद के लक्षण मे जहा कल्याणप्रापक उपायो, जीवो के अपायो और उनके सुख-दुख को चिन्तनीय कहा गया है (५.२०३) वहा ध्यानशतक मे राग- द्वेषादि मे वर्तमान जीवो के उभय लोको से सम्बद्ध अपायो को चिन्तनीय निर्दिष्ट किया गया है (५०)। इसके अतिरिक्त मूलाचार मे धर्मध्यान के चतुर्थ भेद के लक्षण को प्रगट करते हुए उसमे ऊर्ध्वलोक, अधोलोक और तिर्यग्लोक के आकारादि के चिन्तन के साथ अनुप्रेक्षाओ के चिन्तन की भी आवश्यकता प्रगट की गई है तथा आगे उन अनित्यादि बारह अनुप्रेक्षाओ के नामो का निर्देश भी कर दिया गया है (५, २०५-६)। परन्तु ध्यानशतक मे व्यापक रूप मे उसका व्याख्यान करते हुए यह कहा गया है कि धर्मध्यानी को उसमे द्रव्यो के लक्षण, सस्थान, आसन, विधान, मान (प्रमाण) और उनकी उत्पादादि पर्यायो के साथ कादि भेदो मे विभक्त लोक के स्वरूप का भी चिन्तन करना चाहिए। इसके अतिरिक्त यहा यह भी कहा गया है कि जीव के स्वरूप, उसके ससार परिभ्रमण के कारण, और उससे उद्धार होने के उपाय का भी विचार करना आवश्यक है (५२-६२) । यहा अनुप्रेक्षा द्वार एक पृथक् ही है जहा यह कहा गया है कि ध्यान के विनष्ट होने पर मुनि अनित्यादि भावनाओ के चिन्तन मे उद्यत होता है (६५) । यहा उन अनित्यादि भावनाओं की संख्या और नामो का कोई निर्देश नही किया गया। मूलाचार में शुक्लध्यान के प्रसग मे इतना मात्र कहा गया है कि उपशान्तकषाय पृथक्त्व-वितर्क- वीचार ध्यान का, क्षीणकषाय एकत्व-वितर्क-प्रवीचार ध्यान का, सयोगी केवली तीसरे सूक्ष्मक्रिय ध्यान का और अयोगी केवली समुच्छिन्नक्रिय ध्यान का चिन्तन करता है (२०७-८) । परन्तु ध्यान- शतक मे उसके पालम्बन व क्रम (योगनिरोधक्रम) आदि की चर्चा करते हुए ध्यातव्य के प्रसग मे पृथ- वत्व-वितर्क-सविचार आदि चार प्रकार के शुक्लध्यान के पृथक् पृथक् लक्षणो का भी निर्देश किया गया है १. तत्त्वार्थसूत्र मे (९-३६) भी उसके इन चार भेदो की सूचना विषयभेद के अनुसार ही की गई है। २. टीकाकार हरिभद्र सूरि ने उसके स्पष्टीकरण मे अनित्य, अशरण, एकत्व और ससार इन चार भावनाओ का निर्देश किया है (इसका प्राधार स्थानाग का ध्यान प्रकरण रहा है-सूत्र २४७, पृ. १८८) । इसी प्रसग मे आगे हरिभद्र सूरि ने प्रशमरतिप्रकरण से बारह भावनाओ के प्ररूपक पद्यो को भी उद्धृत किया है। - ध्यानशतक । (७७-८२) । उनके स्वामियो का निर्देश धर्मध्यान के प्रसग (६४) में किया गया है। मूलाचार में शुक्लव्यान को छोडकर अन्य पार्त आदि किसी भी ध्यान के स्वामियो का निर्देश नहीं किया गया, जब कि ध्यानशतक में पृथक् पृथक् उन चारो ही घ्यानो के स्वामियो का निर्देग यथास्थान किया गया है (१८, २३, ६३, व ६४) । इन दोनो ग्रन्थो मे ध्यान के वर्णन में जहा कुछ समानता दृष्टिगोचर होती है वहा कुछ उसमे विगे- पता भी उपलब्ध होती है। इसको देखते हुए भी एक ग्रन्थ का दूसरे की रचना में कुछ प्रभाव रहा ऐसा प्रतीत नहीं होता। ध्यानशतक व भगवती-अाराधना भगवती-पाराधना प्राचार्य शिवायं (सम्भवत २.३री शती) के द्वारा रची गई है। पारा- धक को लक्ष्य करके उसमे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और तप इन चार पाराधनामो की प्ररू. पणा की गई है । उनमें भी समाधिमरण के प्रमुख होने के कारण क्षपक को प्राश्रय से मरण के १७ भेदो मे पण्डित-पण्डितमरण, पण्डित-मरण, बाल-पण्डितमरण, बालमरण और बाल-बालमरण इन पाच मरण- भेदो का कथन किया गया है। वहा भक्तप्रत्यास्यान के भेदभूत सविचार भक्तप्रत्याख्यान के प्रसंग मे यह कहा गया है कि जो ससार परिभ्रमण के दुखो से डरता है वह सक्लेश के विनामक चार प्रकार के धर्म और चार प्रकार के शुक्लध्यान का ही चिन्तन किया करता है । वह परीपहो से सन्तप्त होकर भी कभी प्रार्त और रौद्र इन दुर्व्यानो का चिन्तन नही करता (१६६९-७०)। इसी प्रसग मे वहा दो गाथाम्रो द्वारा क्रम से चार प्रकार के प्रार्त और चार प्रकार के रोद्रध्यान की सक्षेप में सूचना की गई है और तत्पश्चात् यह कहा गया है कि इन दोनो को उत्तम गति का प्रतिवन्धक जानकर क्षपक उनसे दूर रहता हुमा निरन्तर धर्म और शुक्ल इन दोनो ध्यानो में अपनी बुद्धि को लगाता है (१७०२-४) । पश्चात् शुभ ध्यान में प्रवृत्त रहने की उपयोगिता को प्रगट करते हुए सक्षेप मे ध्यान के परिकर की सूचना की गई है । तदनन्तर धर्मध्यान के लक्षण व पालम्बन का निर्देश करते हुए उसके आशाविच- यादि चारो भेदो का पृथक् पृथक् लक्षण कहा गया है (१७०५.१४) । धर्मघ्यान के चतुर्थ भेदभूत सस्थानविचय के स्वरुप को दिखलाते हुए यहा भी मूलाचार के समान इस संस्थान विचय मे अनुगत अनुप्रेक्षानो के चिन्तन की आवश्यकता प्रगट की गई है। प्रसगवश यहाँ उन प्रध्रुवादि बारह अनुप्रेक्षानो का नामनिर्देश करके उनमे किम प्रकार क्या चिन्तन करना चाहिए, इसकी विस्तार से प्ररपणा की गई है (१७१४.१८७३ ) । आगे यह कहा गया है कि उक्त वारह अनुप्रेक्षायें धर्मध्यान को पागम्बनभूत है। ध्यान में मालम्बनों के प्राश्रय से मुनि उस ध्यान मे शुत नही होता। वाचना, पृच्छना, परिवर्तना और अनुशा ये उक्त धर्मध्यान के पालम्बन है। लोक धर्मध्यान के पालम्पनो मे भरा हुआ है, ध्यान का इच्छुक क्षपक मन से जिस पोर देगता है वही उग घमायान का पालम्बन रो जाता है (१८७४-७६) । इस प्रकार में आपक जब धर्मध्यान का प्रतिक्रमण कर देता है तब वह अतिशय विशुद्ध मेदया गे मुक्त होकर गुपलध्यान को ध्याता है। प्रागे उग शुक्मध्यान के बार मेंदों का निर्देश कर उनमा गम पृपक स्वरूप भी प्रगट किया गया है (१८७७-८६) । प्रागे पहा गया है कि इस प्रकार मे धापक जय एकाग्रचित्त होना हुपा प्यान का धाय नेवा हे राब यह गुणणि पर पारपोकर बहुत अधिक पमं की निजंग करता है। अन्त मे ज्यान के माहारम्पको दिपलाते हुए इस प्रकरण को समान लिया गया है। भगवनी-मागपना में पाय, मयुता (नि.मगा), माय और उपर उनको सम्यम्यान ना नाम-परिपापर निगा गया है। ये पम्मध्यानी 2 स्यमायतमा फसे । पपवा नमसी प्रस्तावना ५१ - सूत्र मे-आगमविषयक उपदेश मे---स्वभावतः मचि हुआ करती है। प्रस्तुत ध्यानशतक (६७) मे भी धर्मध्यान के परिचायक लिंग का निर्देश करते हुए यह कहा गया है कि आगम, उपदेश, आज्ञा और निसर्ग (स्वभाव) से जो धर्मध्यानी के जिनोपदिष्ट पदार्थों का श्रद्धान हुआ करता है, वह धर्मध्यान का लिंग (हेतु) है । दोनो ग्रन्थगत उन गाथानो मे शब्द व अर्थ से यद्यपि बहुत कुछ समानता दिखती है, फिर भी ध्यानशतक मे उक्त अभिप्राय भगवती-आराधना से न लेकर सम्भवत स्थानाग से लिया गया है। उसके साथ समानता भी अधिक है। इसी प्रकार भगवती-पाराधना मे धर्मध्यान के जिन आलम्वनो का निर्देश किया गया है। उनका उल्लेख यद्यपि ध्यानशतक (४२) मे किया गया है, फिर भी वहा उनका उल्लेख भगवती-आराधना के आश्रय से न करके उक्त स्थानाग से ही किया गया दिखता है। भगवती-आराधनागत इस ध्यान प्रकरण की समानता पूर्वोक्त मूलाचार के उस प्रकरण के साथ अवश्य कुछ रही है। दोनो ग्रन्थो मे विषयविवेचन की पद्धति ही समान नही दिखती, बल्कि कुछ गाथायें भी दोनो ग्रन्थो मे समान रूप से उपलब्ध होती है। यथा-मूला ५, १९८-२०० व भ प्रा. १७०२.४. तथा मूला. २०२-६ व भ. प्रा. १७११-१५ ध्यानशतक और तत्त्वार्थसूत्र आचार्य उमास्वाति (वि. द्वि-तृ. शती) विरचित तत्त्वार्थसूत्र १० अध्यायो मे विभक्त है । उसमे मुक्ति के प्रयोजनीभूत जीवादि सात तत्त्वो की सक्षेप मे प्ररूपणा की गई है। उसके नौवें अध्याय में सवर और निज। के कारणभूत तप का वर्णन करते हुए अभ्यन्तर तप के छठे भेदभूत ध्यान का सक्षेप मे व्याख्यान किया गया है-उसका प्रभाव ध्यानशतक पर विशेषरूप मे रहा दिखता है । यथा- १ तत्त्वार्थसूत्र मे सर्वप्रथम ध्यान के स्वरूप, उसके स्वामी और काल का निर्देश करते हुए यह कहा गया है कि एकाग्रचिन्तानिरोध का नाम ध्यान है। वह उत्तम सहनन वाले जीव के अन्तर्मुहूर्त काल तक रहता है। ध्यानशतक मे उसके स्वरूप का निर्देश करते हुए जो यह कहा गया है कि स्थिर अध्यवसान को ध्यान कहते हैं, उसका अभिप्राय तत्त्वार्थसूत्र जैसा ही है। कारण यह कि स्थिर का अर्थ निश्चल और अध्यवसान का अर्थ एकाग्रता का पालम्बन लेने वाला मन है। तदनुसार इसका भी यही अभिप्राय हुआ कि मन की स्थिरता या एक वस्तु मे चिन्ता के निरोध को ध्यान कहते हैं। आगे उसे स्पष्ट करते हुए यही कहा गया है कि एक वस्तु मे जो चित्त का अवस्थान-चिन्ता का निरोध है-उसे ध्यान कहा जाता है और वह अन्तर्मुहूर्त मात्र रहता है। तत्त्वार्थसूत्र मे जहा उसके स्वामी का निर्देश करते हुए यह कहा गया है कि वह उत्तम सहनन वाले के होता है वहा ध्यानशतक मे उसे और अधिक स्पष्ट करते १ धम्मस्स लक्खण से अज्जव-लहुगत्त मद्दवोवसमा । उवदेसणा य मुत्ते णिसग्गजाओ रुचीनो दे ॥ भ ा १७०६ २ धम्मस्स ण झाणस्स चत्तारि लक्खणा पं० त०-प्राणारुई णिसग्गरुई सुत्तरुई प्रोगाढरुती। स्थानाग २४७, पृ १०८ ३ पालवण च वायण पुच्छण परियट्टणाणुपेहायो। धम्मस्स तेण अविरुद्धाओ सव्वाणुपेहाओ ॥ भ आ. १७१० व १८७५. ४. धम्मस्स ण झाणस्स चत्तारि पालवणा प० तं०-वायणा पडिपुच्छणा परियट्टणा अणुप्पेहा । स्थानाग २४७, पृ १५८. ५. त. सू ६-२७ - ध्यानशतक हुए यह पाहा गया है कि इस प्रकार का यह ध्यान छमायो के-केवली से भिन्न अल्पज्ञ जीवी हेही होता है । केयलियो का वह ध्यान स्थिर अषयमानरल न होकर योगी को निरोपस्वरूप है। दमका कारण यह है कि उनके मन का अभाव हो जाने से चिन्तानिगेपम्प ध्यान गम्भव नही है। मन रह जाती है सहनन के निर्देश की बात, सो उसका निर्देश ध्यानगतक मे गागे जापार शुक्लध्यान के प्रसग में पिया गया है। २ तत्त्वार्थसूर मे जो अन्तिम दो ध्यानो को-धर्म और शुवा ध्यान को -- मोक्षमा पारण निर्दिष्ट किया गया है उससे यह स्पष्ट सूचित होता है कि पूर्व के दो ध्यान---आतं और रोद्र-मोक्ष के कारण नहीं हैं, किन्तु सनार के कारण है। यह सूचना ध्यानगतक मे स्पष्टतया शब्दो द्वारा ही कर दी गई है। ३ तत्त्वार्थसूय में जहा अमनोज्ञ पदार्थ का सयोग होने पर उसके वियोग के लिए होने वाले चिन्ताप्रवन्ध को प्रथम प्राध्यान कहा गया है वहा ध्यानशतक मे उमे कुछ और भी विकामिन फरते हुए यह कहा गया है कि अमनोज्ञ पदादि विषयो पोर उनकी आधारभूत वस्तुप्रो के वियोगविषयक तथा भविष्य मे उनका पुन सयोग न होने विषयक भी जो चिन्ता होती है, यह प्रम माध्यान का लक्षण है। इमी प्रकार से यहा गेप तीन आतंध्यानो के भी लक्षगो को विकसित किया गया है। ४ तत्त्वार्थमूत्र में सर्वार्थसिद्धिगम्मत नपाठ के अनुसार मनोज्ञ पदार्थों का वियोग होने पर उनके संयोगविषयक चिन्तन को दूमग और वेदनाविषयक चिन्तन को तीसरा प्रातध्यान मूचित किया गया है। इसके विपरीत ध्यानशतक मे गलरोगादि वेदनाविषयक प्राध्यान को दूसरा और इष्ट विषयादिको की वेदना (अनुभवन) विषयक चिन्तन को तीसरा पार्तध्यान कहा गया है। यह कथन तत्त्वार्याधिगमगम्मत सूयपाठ के अनुसार उमके विपरीत नहीं है। ५ अविरत, देशविरत नौर प्रमत्तसयत इन गुणस्थानो मे उक्त प्राध्यान की सम्भावना जैसे तत्त्वार्थमूत्र मे प्रगट की गई है वैसे ही वह ध्यानणतक मे भी इन्ही गुणस्यानो मे प्रगट की गई है। ६ तत्त्वार्थ मून की अपेक्षा ध्यानातक मे प्रत प्रार्तध्यान से सम्बन्धित कुछ अन्य बातो को भी चर्चा की गई है। जैसे-वह किस प्रकार के जीव के -~~वह किस प्रकार के जीय के होता है, कोनसी गति का कारण है, यह रामार का वीज क्यो है, प्राध्यानी फे लेश्यायें कोनमी होती है, तथा उसकी पहिचान फिन सेतुप्रो के द्वारा हो मगती है; इत्यादि। ७ तत्वाधंसूत्र में जहा एक ही मूत्र के द्वारा रोदध्यान के भेदो व त्यागियो का निर्देश पर हुए उगके प्रकरण को नमन कर दिया गया है" यहा ध्यानातक मे सत्यायमूरोक्त उन चार भेदी को स्यस्य १ घ्या. पा. २-३. २. घ्या. ६४. ३. त गू. ६.२६ (परे मोक्षस्तू इनि बननात् पूर्व प्रान-गोरे गगानू इत्युगा गर्वात --ग. मि. ६.२६) ४. घ्या..५. ५ त गू.६-३०. पा...। ६ त गू ६.३.३३ पा. भ. ७.६. ७ विगै मनोगस्य । वेदनाATI.म्.६,३१-३२. १. वेदनासानावित मनानाम् । त ग.६, २-12 १०.. मृ ... या १६. ११ का. १०.१७ १२. ग.३५ प्रस्तावना ५३ . को स्पष्ट करते हुए उसके स्वामियो का भी निर्देश किया गया है। इसके अतिरिक्त वहा आर्तध्यान के समान रौद्रध्यान के भी फल व लेश्या आदि की चर्चा की गई है। ८ तत्त्वार्थसूत्र मे एक सूत्र द्वारा धर्मध्यान के चार भेदो का निर्देश मात्र करके उसके प्रकरण को समाप्त कर दिया गया है। पर ध्यानशतक मे उसकी प्ररूपणा भावना, देश, काल, आसनविशेष, आलम्बन, क्रम, ध्यातव्य, ध्याता, अनुप्रेक्षा, लेश्या, लिंग और फल इन बारह अधिकारो के आश्रय से विस्तारपूर्वक की गई है। तत्त्वार्थसूत्रोक्त उसके चार भेदो की सूचना यहा ध्यातव्य अधिकार मे करके उनके पृथक् पृथक् स्वरूप को भी प्रगट किया गया है। ९ जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है तत्त्वार्थसूत्र में सर्वार्थसिद्धिसम्मत सूत्रपाठ के अनुसार धर्म- ध्यान के चार भेदो का निर्देश मात्र किया गया है, उसके स्वामियो का निर्देश वहा नही किया गया । पर उसकी टीका सर्वार्थसिद्धि मे उसके स्वामियो का निर्देश करते हुए यह कहा गया है कि वह अविरत- सम्यग्दृष्टि, देशविरत, प्रमत्तसयत और अप्रमत्तसयत इनके होता है। उक्त तत्त्वार्थसूत्र के भाष्यभूत तत्त्वार्थवार्तिक मे पृथक् से उसके स्वामियो का उल्लेख तो नही किया गया, किन्तु इस सम्बन्ध मे जो वहा शका-समाधान है उससे सिद्ध है कि वह, जैसा कि सर्वार्थसिद्धि मे निर्देश किया गया है तदनुसार, असयतसम्यग्दृष्टि, सयतासयत, प्रमत्तसयत और अप्रमत्तसयत जीवो के होता है। पर उक्त तत्त्वार्थसूत्र मे ही तत्त्वार्थाधिगमसम्मत सूत्रपाठ के अनुसार उस धर्मध्यान के भी स्वामियो का उल्लेख किया गया है । वहा यह कहा गया है कि वह चार प्रकार का धर्मध्यान अप्रमत्तसयत के साथ उपशान्तकषाय और क्षीणकपाय के भी होता है। जैसा कि यहा उसके स्वामियो का निर्देश किया गया तदनुसार ही ध्यानशतक (६३) मे भी यह कहा गया है कि धर्मध्यान के ध्याता सब प्रमादो से रहित मुनि जन, उपशान्तमोह और क्षीणमोह निर्दिष्ट किए गए है। इसकी टीका मे हरिभद्र सूरि ने उपशान्त- मोह का अर्थ उपशामक निम्रन्थ और क्षीणमोह का अर्थ क्षपक निम्रन्थ प्रगट किया है । १० तत्त्वार्थसूत्र मे शुक्लध्यान की प्ररूपणा करते हुए उसके चार भेदो मे प्रथम दो का सद्भाव श्रुतकेवली के और अन्तिम दो का सद्भाव केवली के बतलाया गया है । पश्चात् योग के आश्रय से उनके स्वामित्व को दिखलाते हुये यह कहा गया है कि प्रथम शुक्लध्यान तीन योग वाले के, दूसरा तीनों योगो मे से किसी एक ही योगवाले के, तीसरा काययोगी के और चौथा योग से रहित हुए अयोगी के होता है। आगे यह सूचित किया गया है कि श्रुतकेवली के जो पूर्व के दो शुक्लध्यान होते हैं उनमे प्रथम वितर्क व वीचार से सहित और द्वितीय वितर्क से सहित होता हुआ वीचार से रहित है। प्रागं प्रसगप्राप्त वितर्क और वीचार का लक्षण भी प्रगट किया गया है। १. ध्या. श. १६-२७ २ त सू ६-३६ ३ ध्या श २८-६९ ४. प्राज्ञाविचय ४५-४६, अपाय विचय ५०, विपाकविचय ५१, सस्थानविचय ५२-६२. ५ आज्ञापाय-विपाक-संस्थानविचयाय धर्म्यम् । त सू ६-३६. (यहा मूल सूत्रो मे आर्तध्यान (६-३४), रौद्रध्यान (६-३५) और शुक्लध्यान (६, ३७-३८) के स्वामियो का निर्देश करके भी धर्मध्यान के स्वामियो का उल्लेख क्यो नहीं किया गया, यह विचारणीय है।) ६ तदविरत-देशविरत-प्रमत्ताप्रमत्तसयताना भवति । स सि ६-३६ ७. त वा ६, ३६, १४.१६ (देखो पीछे पृ. १३) ८ आज्ञापाय-विपाक-सस्थानविचयाय धर्ममप्रमत्तसयतस्य । उपशान्त-कषाययोश्च । त. सू ६,३७-३८ ६ गाथा ६३ मे उपयुक्त निद्दिट्टा' पद से यह प्रगट है कि ग्रन्थकार के समक्ष उक्त प्रकार धर्मध्यान के स्वामियो का प्ररूपक तत्त्वार्थसूत्र जैसा कोई ग्रन्थ रहा है।

५४ ध्यानशतक - यह सभी शुक्लध्यानविषयक विवेचन ध्यानगता मे यथास्थान किया गया है। उगसे मनन्धित तत्त्वार्थसूत्र के सूत्र और जनशतक को गाधायें इन प्रकार हैं- त.मू.---६, ३७-३८, ६.४०, ६,४१-४४. घ्या. श.-~६४, ८३, ७७.८० ध्यानशतक और स्थानांग प्राचारादि बारह अगो मे स्थानाग तीसरा है। वर्तमान मे वह जिस स्प में उपलब्ध है उगम सकलन वलभी वाचना के ममय देवद्धिगणि क्षमाश्रगण के तत्वावधान में वीरनिर्वाण ये वाद६८० वर्ष के ग्राम पाम हुप्रा है । उसमे दग अध्ययन या प्रकरण हैं, जिनमे यथाक्रम से १, २, ३ प्राति १० पर्यन्त पदार्थों व क्रियानो का निरूपण किया गया है। उदाहरण स्वरुप प्रथम स्थानक मे एक पात्मा है, एक दण्ड है, एक क्रिया है, एक लोक है, इत्यादि । इसी प्रकार द्वितीय स्थान मे लोर मे जो भी वन्तु विद्यमान है वह दो पदावतार युक्त है । जैसे - जीव-अजीव, प्रस-क्यावर, इत्यादि । इमी क्रम से अन्तिम दसम स्थान मे १०-१० पदार्थों का सकलन किया गया है। प्रकृत मे चौथे अध्ययन या स्थानक मे ४-४ पदार्थों का निरूपण किया गया है । वहा नार प्रकार का ध्यान भी प्रसगप्राप्त हुआ है। उसका निरूपण करते हुए वहा मामान्य मे ध्यान के प्रात, रोद्र, धर्म और गुक्ल इन चार भेदो का निर्देश किया गया है। तत्पश्चात् उनमें से प्रत्येक को भी चार-चार भेदो का निर्देश वग्ने हुए यथासम्भव उनके चार-चार लक्षणो, चार चार पालम्पनों और चार चार अनुप्रेशानी का भी निर्देश किया गया है। स्थानाग प्ररूपित यह सब विषय प्रकारान्तर से ध्यानशतक में प्रात्ममान् कर लिया गया है। साथ ही उसे स्सप्ट करते हुए यहा कुछ अधिक विस्तृत भी किया गया है । यथा--- १ आर्तध्यान स्थानाग मे चार प्रकार के प्राध्यान में में प्रथम प्राध्यान के स्वरूप को प्रगट करते कहा गया है कि अमनोन विषयों के सम्बन्ध से सम्बद्ध हा प्राणी जो उनके वियोगविपयक चिन्ता को प्राप्त होता है, इमे प्राध्यान (प्रथम) कहा जाता है। इमे पुछ अधिक स्पष्ट करते हुए ध्यान में यह कहा गया है कि द्वेष के वा मनिनना गो प्राप्त हुए प्राणी के जय अमनोम इन्द्रियविषयी और उनकी प्राचारभूत यस्तुनो मा गयोग होता है नय यह उनके विरोग के लिए जो कि निनाार होता है कि किस प्रकार मे ये मुमग पृषा होंगे इमे, तया उना वियोग हो जाने पर भी नयिष्य में उनका पुन सयोग न होने के लिए भी जो चिन्ता होगी। उगे, प्रथम प्राध्यान पाहते हैं। इसी प्रकार से म्यानाग मे निर्दिष्ट द्वितीय पोर तृतीय मातं ध्यान के नक्षी को भी यहा प्रणिय सष्ट लिया गया है। पिप इतना है कि म्यानाग में निगे मग मानना हा गया है यह ध्यान. पता नीमग तथा जिग म्यानांग में तीगग प्रायान हा गया। पर ITIHAIR में गग। १. पारा । पदर। गाग्यिा । गेम II , गून १-४. २. अन्थि व मांगे न मर मोवमार, ता -मीरनेय मोयना । गमे व पाया। म्यानम२. गूम.. ३. प्रमालमपोगमा नाग विनोगगमनागी यादि भनि । भाग १.८, पृ. १६. हुए यह ५ मgirin सग पशि मामा भाग २, Umrpati विनमागमी माविमा दाना.. Es, I...

प्रस्तावना स्थानाग मे परिजुषित (अनुभूत) कामभोगो से संयुक्त होने पर प्राणी को जो उनके अवियोग- विषयक चिन्ता होती है उसे चतुर्थ प्रार्तध्यान कहा गया है। परन्तु ध्यानशतक मे इन्द्र व चक्रवर्ती आदि की गुण-ऋद्धियो की प्रार्थनारूप निदान को चौथा आर्तध्यान कहा गया है। इस परिवर्तन का कारण यह प्रतीत होता है कि स्थानागगत उक्त चतुर्थ प्रार्तध्यान का लक्षण द्वितीय पार्तध्यान से भिन्न नहीं दिखता । स्थानाग के टीकाकार अभयदेव सूरि ने अपनी टीका मे इसे स्पष्ट करते हुए यह कहा है कि द्वितीय आर्तध्यान अभीष्ट धनादि से जहा सम्बद्ध है वहा चतुर्थ प्रार्तध्यान उस धनादि से प्राप्त होने वाले शब्दादि भोगो से सम्बद्ध है, इस प्रकार उन दोनो मे यह भेद समझना चाहिए। शाश्त्रान्तर मे द्वितीय और चतुर्थ के एक होने से उनमे भेद न रहने से उन्हें तीसरा प्रार्तध्यान माना गया है तथा चतुर्थ प्रार्तध्यान निदान को स्वीकार किया गया है। यह कहते हुए उन्होने आगे ध्यान- शतक की प्रार्तध्यान से सम्बद्ध चारो गाथाओ को (६-९) को भी उद्धृत कर दिया है । इस प्रकार शास्त्रान्तर-से उनका अभिप्राय तत्त्वार्थसूत्र और ध्यानशतक का ही रहा दिखता है। स्थानाग मे जो प्रकृत आतंध्यान के चार लक्षण (लिंग) निर्दिष्ट किये गये हैं उनमे क्रन्दनता, शोचनता और परिदेवनता इन तीन को ध्यानशतक मे प्राय उसी रूप में ले लिया गया है, किन्तु 'तेपनता' के स्थान मे वहा ताडन आदि को ग्रहण किया गया । अभयदेव सूरि ने 'तिपि' धातु को क्षरणार्थक मानकर तेपनता का अर्थ अध्रुविमोचन किया है। रौद्रध्यान- स्थानाग मे रौद्रध्यान का निरूपण करते हुए उसके चार भेद गिनाये गये है-हिंसानुबन्धी, मृषानुवन्धी, स्तेयानुवन्धी और विषयसरक्षणानुबन्धी । ध्यानशतक मे उनका इस प्रकार से नामोल्लेख तो नही किया गया, किन्तु वहा जो उनका स्वरूप कहा गया है उससे इन नामो का वोध हो जाता है। स्थानाग मे रौद्रध्यान के ये चार लक्षण निर्दिष्ट किये गये है—ोसन्नदोष, बहुदोष, अज्ञानदोष, और आमरणान्तदोप" । ध्यानशतक मे वे इस प्रकार उपलब्ध होते हैं-उस्सण्ण (उत्सन्न) दोष, बहुल- दोष, नानाविधदोष और आमरणदोष"। इनमे प्रोसण्ण और उस्सण्ण, बहु और वहुल तथा आमरणान्त और आमरण इनमे अर्थत कोई भेद नहीं है। केवल अण्णाण और णाणाविह (नानाविध) मे कुछ भेद १ परिजुसितकामभोगसपोगसपउत्ते तस्स अविप्पभोगसतिसमण्णागते यावि भवइ ४ । स्थाना पृ १८८. २. ध्या. श.६. ३ द्वितीय वल्लभधनादिविषयम्, चतुर्थ तत्सपाधशब्दादिभोगविषयमिति भेदोऽनयोर्भावनीय । शास्त्रान्तरे तु द्वितीय-चतुर्थयोरेकत्वेन तृतीयत्वम्, चतुर्थं तु तत्र निदानमुक्तम् । उक्तं च-(ध्या. श. ६-६)। स्थाना. टीका २४७, पृ. १८६ ४. निदान च । त. सू ६-३३ ५. अट्टस्स ण झाणस्स चत्तारि लक्खणा प० (पण्णत्ता) त० (त जहा)-कदणता सोचणता तिप्पणता परिदेवणता । स्थाना. पृ १८६. ६ ध्या श. १५. ७. तेपनता-तिपे क्षरणार्थत्वादश्रुविमोचनम् । स्थाना टीका ८. रोद्दे झाणे चउविहे प० त०-हिंसाणुबन्धि मोसाणुबधि तेणाणुबधि सारक्खणाणुबघि । स्थाना. पृ.१८८. ६. ध्यानशतक १६-२२. १०. रुहस्स ण झाणस्स चत्तारि लक्खणा प० त०--भोसण्णदोसे बहुदोसे अन्नाणदोसे आमरणदोसे । स्थाना. पृ १८८. ११. ध्या. श. २६.

५६ ध्यानशतक हो गया दिखता है। फिर भी दोनो ग्रन्यो के टीकाकार प्रम ने अभयदेव सूरि भोर हरिभद्र सूरि ने उनका जो अभिप्राय व्यक्त शिया है वह प्राय. समान ही है। ३ धर्मध्यान- न्यानाग मे मंध्यान के ये चार भेद निर्दिष्ट किए गए हैं-प्राज्ञा विचय, अपायविचय, विपाक- विषय और सस्यानविय । ध्यानगतक में उसके इन नामो का निर्देश नहीं किया गया है। किन्तु यहा उनके भावनादि बारह अधिकागे मे से ध्यातव्य अधिकार के प्रसंग में आज्ञा एव अपाय आदि का जो स्वम निर्दिष्ट किया गया है उमने उसके वे चार भेद स्पष्ट हो जाते है। स्थानाग मे धर्मच्यान के ये चार लक्षण कहे गए है-प्राज्ञाचि, निमगरचि. सूपरचि और अवगाव- रुचि । ध्यानातक में प्रकारान्तर से उनका निर्देश इस प्रकार किया गया है-पागम, उपदेग, प्रामा और निसर्ग से जिनप्ररूपित तत्वो का श्रद्धान। इनग प्रदान पद 'रुचि' का समानार्थक है। माना और निमगं ये दोनो अन्यों में शब्दश समान ही हैं। सूत्र के पर्यायवाची आगम गन्द का यहा उपयोग किया गया है । स्थानाग में चौथा लक्षण जो अवगाहरुचि कहा गया है उसमे अवगाट का अयं द्वादशांग का अवगाहन है, उससे होने वाली रुचि या श्रद्धा का नाम प्रवगावरचि है । इसके स्थान में ध्यानातक में जो 'उपदेश' पद का उपयोग किया गया है उनका भी अभिप्राय वही है । कारण यह कि यागम के अनुसार तत्त्व के व्याख्यान का नाम ही तो उपदेश है। इस प्रकार अवगाढरुचि और उपदेशश्रद्धा में भेद नहीं है । स्थानाग में धर्मध्यान के ये चार पालम्बन कहे गए हैं-वाचना, प्रतिप्रच्छना, परिवर्तना और अनुप्रेक्षाइनमे से वाचना, प्रच्छना और परिवर्तना ये तीन ध्यानगतक गे शब्द ममान ही हैं । म्या- नाग में चौया आलम्बन जो अनुप्रेक्षा कहा गया है उसके स्थान में ध्यानशतक में अनुचिन्ना पो ग्रहण किया गया है । वह अनुप्रेक्षा का ही समानार्थक है। दोनो का ही अर्थ सूत्रायं का अनुस्मरण है। म्थानाग मे धर्मध्यान की ये चार अनुप्रेक्षायें कही गई है-एकानुप्रेक्षा, अनित्यानुप्रेक्षा, प्रमरणानु- प्रेक्षा और सनारानुप्रेक्षा। ध्यानातक में धर्मध्यान से सम्बद्ध एक अनुप्रेक्षा नाम का पृथक् प्रकरण है । उसके सम्बन्ध में वहा इतना मात्र कहा गया है कि धर्मध्यान के समाप्त हो जाने पर मुनि सवंदा अनित्यादि भायनामों के - १. प्रज्ञानान्-शास्त्रमस्कारात् हिमादिप्वधर्मम्वरूपेषु नरयादिकारणेषु धर्मपान्मुक्याया पति- स्तल्लक्षणो दोपोजानदोष । स्याना टी पृ. १६०.; नानाविषेषु स्यकत्वक्षग-ममनोगननादिपु हिसाधुपायेप्यमादप्येवं प्रवर्तते इति नानाविषदोष । घ्या. . टी २६. २. धम्म माने पबिहे पप्पडोगारे ५० न.--प्राणाविरत प्रयायपिनो वियागयिनले गठागरिदने। वाना. पृ. १८८ ३. ध्या. -मामा ४५-४६, पपाय ५०, विपास ५१, सम्यान १२-६२. ४. धम्मग्म प मापन्म पत्तारि लमाणा प०१०-बाणाई मिमगाई मुत्ता प्रोगाणी स्पाना. पृ.१९९. ५. घ्या..६७. ६. धम्मस्म भानाम पतारि पासवमा १००-चापमा परिपुराना परिपहला प्रणता राना पृ.१२८. ३. पम्मम्ममा पारि म १००-yin पिनाना अमराना मागा। पानां. पृ. १५८.

प्रस्तावना चिन्तन मे तत्पर होता है । वहा अनित्यादि भावनाओ की संख्या का कोई निर्देश नहीं किया गया। टीकाकार हरिभद्र सूरि ने उसको स्पष्ट करते हुए यह कहा है कि 'अनित्यादि' मे जो आदि शब्द है उससे अशरण, एकत्व और ससार भावनाओ को ग्रहण किया गया है। साथ ही आगे उन्होने यह भी निर्देश किया है कि मुनि को 'इष्टजनसम्प्रयोगद्धिविषयसुखसम्पद' इत्यादि ग्रन्थ के आश्रय से बारह अनु- प्रेक्षामो का चिन्तन करना चाहिए। स्थानाग मे चतुर्थ स्थान का प्रकरण होने से सम्भवत वहा चार ही अनुप्रेक्षालो की विवक्षा रही है। पर ध्यानशतक मे ऐसा कुछ नही रहा । इससे वहा उनकी संख्या का निर्देश न करने पर भी 'अनि- त्यादि पद से तत्त्वार्थसूत्र एव प्रशमरतिप्रकरण आदि मे निर्दिष्ट बारहो अनुप्रेक्षाओ के चिन्तन का अभि- प्राय रहा दिखता है। सम्भवत यही कारण है जो ध्यानशतककार ने 'अणिच्चाइभावणापरमों' ऐसा कहा है । यदि उन्हें पूर्वोक्त चार अनुप्रेक्षाओ का ही ग्रहण अभीष्ट होता तो वे 'अनित्यादि' के साथ 'चार' सख्या का भी निर्देश कर सकते थे। पर वैसा यहा नही किया गया। इसके अतिरिक्त तत्त्वार्थसूत्र (९-७) और प्रशमरतिप्रकरण आदि ग्रन्थो मे सर्वप्रथम अनित्यानुप्रेक्षा उपलब्ध होती है। पर स्थानाग मे निर्दिष्ट उन चार अनुप्रेक्षाओ मे प्रथमत. एकानुप्रेक्षा का निर्देश किया गया है। अतः तदनुसार यहा अनित्यादि के स्थान मे 'एकत्वादि' ऐसा निर्देश करना कही उचित था। ४ शुक्लध्यान- स्थानाग मे शुक्लध्यान के ये चार भेद निर्दिष्ट किए गये हैं-पृथक्त्ववितर्क सविचारी, एकत्व- वितर्क अविचारी, सूक्ष्म क्रिय-अनिवर्ती और समुछिन्नक्रिय-अप्रतिपाती । ध्यानशतक मे शुक्लध्यान के इन चार भेदो की सूचना उनके विषय का निरूपण करते हुए ध्यातव्य प्रकरण में की गई है। स्थानाग मे शुक्लध्यान के जिन चार लक्षणो का निर्देश किया गया है उनको ध्यानशतककारने उसी रूप मे ग्रहण कर लिया है। विशेषता यह है कि यहा दो गाथाओ के द्वारा उनके स्वरूप को भी स्पष्ट कर दिया गया है। स्थानाग मे शुक्लध्यान के जिन चार आलम्वनो का निर्देश किया गया है उन्ही का सग्रह ध्यान- शतक मे भी कर लिया गया हैं। . १. ध्या. श६५ २. हरिभद्र सूरि ने इस प्रारम्भिक वाक्य के द्वारा प्रशमरतिप्रकरण नामक ग्रन्थ की ओर सकेत किया है । वहा 'इष्टजनसम्प्रयोगद्धिगुणसम्पद' इत्यादि १२ श्लोको मे बारह अनुप्रेक्षाओ का वर्णन किया गया है । उन सब श्लोको को यहा प्रकृत वाक्याश के आगे प्रशमरतिप्रकरण से चौकोण [] कोष्ठक मे ले लिया है। ३.जैसे कि शुक्लध्यान के प्रसग मे 'णिययमणुप्पेहाओ चत्तारि चरित्तसपण्णो' वाक्य के द्वारा चार सख्या का निर्देश किया गया है । ध्या. श. ८७. ४. सुक्के झाणे चउन्विहे चउप्पडोसारे ५० त०-पुहुत्तवितक्के सवियारी १, एकत्तवितक्के अवियारी २, सुहुमकिरिते अणियट्टी ३, समुच्छिन्नकिरिये अप्पडिवाती ४ । स्थाना. पृ. १८८. ५. पृथक्त्ववितर्क सविचारी ७७-७८, एकवितर्क-अविचारी ७६-८०, सूक्ष्मक्रिय-अनिवर्ती ८१, व्युच्छिन्नक्रिय-अप्रतिपाती ५२. ६. सुक्कस्स ण झाणस्स चत्तारि लक्खणा प० त०-अन्वहे असम्मोहे विवेगे विउस्सग्गे । स्थाना. पृ. १८८. ७. ध्या.श.६०. ८. ध्या श.६१-६२. ६. सुक्कस्स ण माणस्स चत्तारि मालबणा प० त०-खती मुत्ती महवे अज्जवे । स्थाना पृ. १८८. १०. ध्या. श. ६६. - ध्यानशतक कहा गया . न्यानाग मे शुक्लध्यान की ये चार अनुप्रेक्षायें निर्दिष्ट की गई है-मनन्तवृत्तितानुप्रेशर, विपरि- णामानुप्रेक्षा, प्रशुभानुप्रेक्षा और अपायानुप्रेक्षा' । इन्ही चारो का सकतन कुछ स्पष्टीकरण के साथ ध्यान- गनक में भी किया गया है | भेद केवल उनके क्रम में रहा है। उपर्युक्त तुलनात्मक विवेचन को देखते हुए इममे मन्देह नही रहता कि स्थानाग के अन्तर्गत ध्यानविषयक उम मभी सन्दर्भ को ध्यानशतक मे यथास्थान गभित कर लिया गया है। प्रकृत स्थानाग मे ध्यान के भेद-प्रभेदो का निर्देश करते हुए उनमे से चार प्रकार के प्रातं और चार प्रकार के रौद्रव्यान के स्वरूप को दिखला कर उनके लक्षणो (लिंगो) का भी निर्देश किया गया है तथा धर्म और शुक्लव्यान के चार नार भेदों के स्वरूप को प्रगट करते हुए उनके चार चार लक्षणो, पालम्बनो और अनुप्रेक्षाग्रो की भी प्ररूपणा की गई है। पर वहा न तो ध्यानसामान्य का लक्षण और न उसके काल का भी निर्देश किया गया हैं। इसके अतिरिक्त उक्त चार ध्यान किम गुणस्थान से किस गुणस्थान तक सम्भव है, जीव किस ध्यान के आश्रय से कौन सी गति को प्राप्त होता है, तथा प्रत्येक के आश्रित कौनसी लेण्या आदि होती है; इत्यादि का विचार भी वहा नहीं किया गया । किन्तु ध्यानातक मे उन सबका भी विचार किया गया है। इससे यह समझना चाहिए कि घ्यानशनक की रचना का प्रमुख आधार स्थानाग तो रहा है, पर साथ ही उसको रचना मे तत्त्वार्थसूत्र प्रादि अन्य ग्रन्थो का भी प्राश्रय लिया गया है। ध्यानशतक और भगवतीसूत्र व औपपातिकसूत्र पूर्वोक ध्यानविषयक गो सन्दर्भ स्यानाग में पाया जाता है वह सब प्रायः गदग. उमी रूप में भगवतीसूत्र और प्रोपपातिकमूत्र में भी उपलब्ध होता है। प्रत. पुनरक्त होने से उनके प्राश्रय से यहा कुछ विचार नहीं किया गया। उनमे जो साधारण शब्दभेद व क्रमभेद है वह इस प्रकार है- स्थानाग और भगवतीसून मे अातंत्र्यान के लक्षणों में जहा चौथा 'परिदेवनता है यहा भोप- पातिकमूत्र मे वह 'विलपनता' है। इन दोनो के अभिप्राय में कुछ भेद नहीं है। स्थानाग और भगवतीसूत्र में जहा धर्मध्यान के चार लक्षणों में तीसरा मूमरचि और नीया अवगाटरूचि है यहा प्रोपपातिकमूत्र म तीमरा उपदेशरुचि और चीया सूत्ररूचि है । ध्यानातक में भी दूसग लक्षण उपदेशश्रद्धान कहा गया है । परन्तु जैसा कि ऊपर स्पष्टीकरण किया जा चुका है, तदनुसार उन दोनो में अभिप्रायभेद कुछ नहीं रहा। स्थानाग मोर भगवतीमूत्र के अन्तर्गत धर्मध्यान की नार अनुप्रंक्षामों में जहा प्रथमत. एगारगानुप्रेक्षा है यहा प्रोपपातिक में प्रयमत. अनित्यानुप्रेक्षा का निर्देश किया गया है, एकत्यानुप्रेक्षा का स्थान यहां तीमरा है। ध्यानगवक मे भी 'मनित्यादिभावना' के रूप में निर्देश किया गया है, मग्या सी गुरू मूवना यहा नहीं की गई है। ग्यानाग प्रौर भगवनीमूत्र में निर्दिष्ट पुरनध्यान के चार भेदी ग तोगरा गूधमाश्यानियती पोर गोया मउिन्नफियानिपानी है। पर मोपपातिकमूत्र में अनियती और पापा मध्यापपरोकर में मृधमप्रियाप्रतिकाती और ममुनिन्नविनिश्ती में निर्दिष्ट : मी प्रकार प्रोपागूत्र में गुमान के मरो, मालमनों और पनुशाग्री में भी दुल पोदामा गरमंद य रमभेदहमा है। १. गुगाम मान्म गगारि अनुमायो १० 70-अपनगनिमार्णका निमिााणा प्रमु. भाग मानहा। माना १९. *. ३ भगोगा (आमनाग) २५.७.२१.६२.; धोint २०, 7. ४३.

प्रस्तावना ध्यानशतक और धवला का ध्यानप्रकरण प्राचार्य भूतबलि-पुष्पदन्त (प्राय प्रथम शताब्दी) विरचित पट्खण्डागम पर प्रा. वीरसेन स्वामी (स्वी शताब्दी) द्वारा एक धवला नामक विस्तृत टीका रची गई है। पट्खण्डागम के वर्गणा नामक पाचवें खण्ड में एक कर्म अनुयोगद्वार है। उममे १० कर्मभेदो के अन्तर्गत वें तपःकर्म का निर्देश करते हुए उसे छह अभ्यन्तर और छह बाह्य तप के भेद से वारह प्रकार का कहा गया है। उसकी व्याख्या करते हुए आ. वीरसेन ने अपनी उस टीका मे अभ्यन्तर तप के पाचवें भेदभूत ध्यान की प्ररूपणा इन चार अधिकारो के द्वारा की है-ध्याता, ध्येय, ध्यान और ध्यानफल । तदनुसार वहा प्रथमत ध्याता का विचार करते हुए उसमे कौन कौनसी विशेषतायें होना चाहिए, इसे स्पष्ट करने के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण विशेषणो का उपयोग किया गया है। इस प्रसग में उन्होने 'एत्थ गाहा' या 'गाहाम्रो' कहकर ध्यानशतक की इन गाथाओं को उद्धृत किया है'.--२, ३६-४०, ३७, ३५-३६, ३८, ४१-४३ और ३०-३४ । कुछ गाथायें यहा भगवती आराधना से भी उद्धृत की गई है। आगे धवला में क्रमप्राप्त ध्येय की प्रस्पणा मे अनेक विशेषणो से विशिष्ट प्ररहन्त, सिद्ध और जिनप्ररूपित नौ पदार्थों आदि को ध्येय-ध्यान के योग्य-कहा गया है। तत्पश्चात् ध्यान का निरूपण करते हुए उसके धर्म और शुक्ल इन दो भेदो का ही वहा निर्देश किया गया है, तप कर्म का प्रकरण होने से वहा सम्भवतः पात और रोद इन दो ध्यानो को ग्रहण नही किया गया। वह धर्मध्यान ध्येय के भेद से चार प्रकार का कहा गया है-पाशाविचय, अपायविचय, विपाकविचय और सस्थानविचय । प्राज्ञा, आगम, सिद्धान्त और जिनवचन ये समानार्थक शब्द है। इस आज्ञा के अनुसार प्रत्यक्ष व अनुमानादि प्रमाणो के विषयभूत पदार्थो का जो चिन्तन किया जाता है उसका नाम आज्ञाविचय है। इस प्रसग में यहा 'एत्य गाहाम्रो' कहकर ध्यानशतक की ४५-४६ गाथायें उद्धृत की गई हैं। इसके आगे एक गाथा (३८) और उद्धृत की गई है जो मूलाचार (५-२०२) मे उपलब्ध होती है । मिथ्यात्व, असयम, कपाय और योग से उत्पन्न होने वाले जन्म, जरा और मरण की पीडा का अनुभव करते हुए उनसे होने वाले अपाय का विचार करना, इसे अपायविचय धर्मध्यान कहते है। इस प्रसग मे यहा ध्यानशतक की ५०वी गाथा उद्धृत की गई है। इसके माथ वहा कुछ पाठभेद को लिए हुए एक गाथा मूलाचार की भी उद्धृत की गई है, जिसका अभिप्राय यह है कि अपायविचय मे ध्याता कल्याणप्रापक उपायो-तीर्थंकरादि पद की प्राप्ति की कारणभूत दर्शनविशुद्धि आदि भावनामो-का चिन्तन करता है, अथवा जीवो के जो शुभ-अशुभ कर्म है उनके अपाय (विनाश) का चिन्तन करता है । विपाकविचय धर्मध्यान के स्वरूप को बतलाते हुए यहा यह कहा गया है कि प्रकृति, स्थिति, अनुभाग १. ५ ख ५, ४, २५-२६-पु १३, पृ ५४ २ धवला में इनकी ऋमिकसख्या इस प्रकार है--१२, १४-१५, १६, १७-१८, १९, २०-२२ और । २३-२७. (पु. १३, पृ. ६४-६८). ३ धवला पु. १३, पृ. ६९-७०. ४ हेमचन्द्र सूरि विरचित योगशास्त्र मे भी इन दो दुर्व्यानो को ध्यान में सम्मिलित नही किया गया है (४-११५)। ५. धवला में इनकी क्रमिकसख्या ३३-३७ है (पृ. ७१) । ६ घवला मे उसकी ऋमिकसख्या ३६ है (पृ. ७२) । ७ मूलाचार ५-२०३. (यह गाथा भगवती आराधना (१७११) मे भी उपलब्ध होती है); धवला मे उसकी क्रमिकसख्या ४० (पृ. ७२) ।

६० . ध्यानशतक और प्रदेश के नेट ने चार प्रकार के शुभ-अशुभ कर्मों के विपाक का स्मरण करना, इसका नाम विपाप- विचय है। इस प्रमग में यहा ध्यानातक को ५१वी गाथा उद्धृत की गई है। एमके माय ही यहा मूलाचार को भी एक गाया उधृत यो गई है। धवला में संत्यानविय धर्मध्यान के स्वत्प का निर्देश करते हुए कहा गया है कि तीनो लोगो के पागार, प्रमाण एव उनमें वर्तमान जीयो की आयु मादि का विचार करना; यह मस्थानविषय पमध्यान कहलाता है । इन प्रमंग मे वहा ध्यानशतक की ५ (५२-५६) गाथायें उपत की गई है। इस मागे वहा एक गाया ऐमी है जो क्रम मे ध्यानातक की ५८वी और ५७वी गाथामों के उत्तरा के योग से निष्पन्न हुई है। तदनन्तर इसी प्रमग में वहा ध्यानगतक को ६२, ६५, ३-४, ६६-६८, ६३ भोर १०२ ये गाथायें प्रम ने उद्धृत की गई है। अन्त में धवला मे जो शुक्लध्यान की प्ररूपणा की गई है वह प्राय. तत्त्वायंसूर और म्यानातक के ही समान है। इस प्रसंग में यहा ध्यानातक की ६६, १०१, १००, ९०.६२, १०३, १०४ (पू.), ७५ और ७१७२ ये गायायें प्रम ने उद्धृत की गई है। साथ ही वहा भगवती धाराधना पो भी १८८०-८८ गायायें उद्घत फी गई है। दोनों में कुछ पाठभेद- इस प्रकार धवला (पुस्तक १३) मे जो ध्यानातक की लगभग ४६-४७ गाथायें उद्धृत की गई हैं उनमें ऐमे कुछ पाठभेद भी हैं, जिनके कारण वहां कुछ गाथाम्रो का अनुवाद भी अमंगत हो गया है। यहां हम 'होइ-होज्ज, भूदोव-भूप्रोव, द्वियो-ठियो, लाह-लाभ' ऐमे कुछ पाठभेदो को छोड़कर अन्य जो महत्त्वपूर्ण पाठभेद उक्त दोनो ग्रन्यो मे रहे हैं, और जिनके कारण अभेद होना भी गम्भय . उनको एक तालिका दे रहे हैं। सम्भव है उसमे पाठको को कुछ लाभ हो सके। इसके अतिरिका भविष्य में यदि धवला पु. १३ के द्वितीय सतारण की आवश्यकता हुई तो उसमे तदनुसार कुछ समोधन गो किया जा सकता है। - .40 १. धवला मे उसकी ऋमिकासरया ४१ है (पृ ७२) । २. मूलाधार ५.२०४ , यह गाया भगवती प्रारापना (१७१३) में भी पानी जाती है। ३. घयता में इनकी प्रमिकमाया ४३.४७ ( ७३)। ४. धवाला में उगसी मामिगमन्या ४८ (७३)। ५. धरना में उनकी कमियम ४६, ५०, ५१-५२, ५३-५५, ५६, ५७, ( ७६.७७) है। ६ अपना १३, पृ. ७३.८८, ७. पथना में उनसी मिकमान प्रकार है-६४, ६५, ६६, ३७.६६, ७०,७१, ७४, ७५.३६. ८. पवना से उनको गिरगंगा प्रसार-५८.६३,७२-७४. ६. जगे-9, गा २१२ २२, ६ गा २४ 7 २७, ७१ गा. ३५.३१, गा.४८ मा पाठभेद मम्मयन. ITTITो प्रमामानी में पानी गा. ५६ घऔर ५७६ असा सन में पानी में Amit rail गः ।। "AIRAT * मा ५८१७ में गया errTAIIT मा l भामा १८४९ : पाम गोrARE प्रमा TREAT : MumrITATIHIT (TETrint nire}, REATRE AIR, म ा ा, 7 urinat गा: TEr नीम amar | - प्रस्तावना पाठ ध्या श गा. पाठ - ६४ धव पु.१३, पृ. गाथांक १२ १४ १५ १६ ६७ १८ २० २१ - तो जत्थ . . ग २२ २३ ६८ २४ २५ " 22 २७ चलतय २ जया ण ज्झाणावरोहिणी २ खविय ४० ३७ झाणेसु णिच्चल तहा पयइयव्व ४१ णाणुपेहाओ ४२ सव्वमावासया इ दव्वालबणो ४३ वेरग्गजणियानो ३० मणोवारण ३१ ज्झायइ णिच्चल सकाइसल्लरहियो ३२ पसमत्थेयादिगुणगणोवईयो पोराणवि णिज्जरा णिभवो ३४ -णमणग्ध ४५ ज्झाएज्जो ४६ तत्थ मइदुब्बलेण य ४७ तन्विज्जाइरियविरहदो णाणावरणादिएण य सरि-सुठ्ठज्जाणवुज्झज्जो ४८ -मवितत्थं तहाविह अणुवगय ४६ -मोहा ण अण्णहा -लोगावाए ज्झाएज्जो लोगभागादि ५३ णयर ५४ भोइ सयसावमीण ५६. णाणमयकण्णहारं वर ५७ चारित्तमयमहापोय। चल तय जिया ण झाणोवरोहिणी समिय जो तो] जत्थ झाणे सुणिच्चल तहा[4] यइयव्व णाणुचिंतामो सद्धम्मावस्सयाइ इ दढदव्वालवणो वेरग्गनियताओ' मणोधारण भाइ सुनिच्चल सकाइदोसरहिओ पसमत्थेज्जादिगुणगणोवेओ पोराणविणिज्जर णिभो -णमह[ण ग्य' माइज्जा तत्थ य मइदोब्लेण तग्वि- हायरियविरहनो णाणावरणोदएण य सइ सुठ्ठ ज न बुज्झज्जा -मवितह तहावित अणुवकय -मोहा य णण्णहा -लोयावानो भाइज्जा लोयभेयाइ णरय भोय सयसावयमण अण्णाण-मारुएरियसजोग- विजोगवीइसताण। ७१ ३४ ." ३५ " ३७ ७२ ३६ ४५ ४६ ४७ -- ४८ १ ध्या श मे यहा 'जो' पद के असम्बद्ध होने से कोष्ठक मे उसके स्थान में 'तो' पद की सम्भावना प्रगट की गई है । पर धवला के निर्देशानुसार वह मूल मे ही पाठ रहा है। २ यहा कोष्ठक मे जो [प] पाठ की सम्भावना प्रगट की गई है वह भी धवला के उक्त पाठ से सिद्ध है। ३ गा ३० की टीका मे 'जनित' यह पाठान्तर भी प्रगट किया गया है। ४ यहा अर्थ की सगति बैठाने के लिए जो 'ह' के स्थान मे 'ण' की कल्पना की गई है वह धवला के इस पाठ से सुसगत है।

६२ ध्यानशतक ३ विचितज्जो ४६ कि बहुमो फि पदमा ५० ६५ विचितेज्जा परणा মণিমালামী पम्मरमाण जो पुषि चित्तावत्याप चिता भाणतर ३ ४ ५४ त लिंग ५५ ७७ ६३ १०२ ८० नपाणो सजमरणोxxxमुणेयम्यो मवर विणिज्जग भाण-पवणायहूया प्रावणाई पवणगहिरो दुम प्रवहाउसमोह-विवेग-विउस्सग्गा वीभद देहविषितxxxमव्वहा ८२ •मणिचादिचितणापरमो घम्ममाणे जिह व पुन चितावत्याग चिता-ज्माणतर तल्लिग सपण्णा संजमरदाxxxमुणेयन्बा मंवर-णिज्जरा ज्माणप्पवणोवहया मालवणेहि पवणुगदो धुव अभयारामोहविवेगविसग्गा बोहर देह विचित्तxxxसव्वदो वि सोयायवादिएहि मि सारी- रेहि बहुप्पयारेहिं । कमेण तहा जोगजल जमाणजलणेण ॥ पहाणज्मरमत तह वादरतणुविसय जोग- विस झाणमतवनजुत्तो। अगुभावम्मि गिर मदि १०१ ६० " ६७ " ६६ १२ य १०३ १०४ ७१ सीयाऽऽययाइएहि य सारीरेहि सुबष्णगारेट। कमेण जहा तर जोगिमणोजल ८६ ७४ जाण ॥ ७५ 5 पहाणयरगत राह तिरपण-तणधिराय गणोयिम जोग-मसयस तो। परमाणु मि पिर भक्ष ध्यानशतक व धादिपुराण का ध्यानप्रकरगा पापाय जिनसेन (स्या गती) नाग विनित महापुराण एमपोगनिर अन्य ।गा यात. पुराण मोर सरपुराण इन दो भागों में विभक्त है । राजा धमिप मे प्रन पर गौतम कार में जो उसके लिए प्रधान का न्यायान किया पा उसकी नई करगे पाणिगण के २१ पत्र में मां विम्वार में माना निण लिया गया है प्यान पापी प्रभागि हिताना मी क्यैि चनपति में बरा गुट समानता टिगोर होनी है। नगा को नी, पारिगण हो लोग भी artो म यो मामी में पाया ग माटीमाप्रमग पिया मे गागागा--- ' याम मगन में सपा सामान RTrarrioritern माजी पिर प्रयामान का REET RAT नाम मा ringantire (afrom fat गागर', प्राधा और न RIP Irry fair में प्रकार का Trai ki ar rasim है।

प्रस्तावना जिनो का-सयोग केवली और प्रयोग केवली का ध्यान स्थिर अध्यवसानरूप न होकर योगो के निरोधस्वरूप है । अन्तर्मुहूर्त प्रमाण ध्यानकाल के समाप्त हो जाने पर चिन्ता अथवा ध्यानान्तर-अनु- प्रेक्षा या भावनारूप चिन्तन होता है । इस प्रकार से बहुत वस्तुप्रो मे सक्रमण के होने पर ध्यान का प्रवाह चलता रहता है। यही बात आदिपुराण में भी इस प्रकार से कही गई है- एक वस्तु मे जो एकाग्रतारूप से चिन्ता का निरोध होता है वह ध्यान कहलाता है और वह जिसके वज्रर्षभनाराचसहनन होता है उसके अन्त- र्मुहुर्त काल तक ही होता है। जो स्थिर अध्यवसान है उसका नाम ध्यान है और इसके विपरीत जो चला- चल चित्त है--चित्त की अस्थिरता है उसका नाम अनुप्रेक्षा, चिन्ता अथवा भावना है । पूर्वोक्त लक्षण- रूप वह ध्यान छद्मस्थो के होता है तथा विश्वदृश्वा-सर्वज्ञ जिनो के-जो योगास्रव का निरोध होता है उसे उपचार से ध्यान माना गया है । समानता के लिए दोनो के इन पद्यो को देखिये- ज थिरमज्झवसाण तं भाणं ज चलं तय चित्तं । त होज्ज भावणा वा अणुपेहा वा अहव चिता ॥ ध्या श. २. स्थिरमध्यवसान यत् तद ध्यानं यच्चलाचलम् । सानुप्रेक्षाथवा चिन्ता भावना चित्तमेव वा ॥ प्रा. पु २१-६ ध्यान के भेद- आगे ध्यानशतक मे आर्त, रौद्र, धर्म और शुक्ल इन ध्यान के चार भेदो का निर्देश करते हुए उनमे अन्तिम दो ध्यानो को निर्वाण का साधक तथा आर्त व रौद्र इन दो को ससार का कारण कहा गया है। आदिपुराण मे आगे सामान्य ध्यान से सम्बद्ध कुछ अन्य प्रासगिक चर्चा करते हुए यह कहा गया है कि प्रशस्त और अप्रशस्त के भेद से ध्यान दो प्रकार का है। इस भेद का कारण शुभ व अशुभ अभि- प्राय (चिन्तन) है । उक्त प्रशस्त और अप्रशस्त ध्यानो मे से प्रत्येक दो दो प्रकार का है। इस प्रकार से ध्यान चार प्रकार का कहा गया है-आर्त व रौद्र ये दो अप्रशस्त तथा धर्म और शुक्ल ये दो प्रशस्त । इनमे प्रथम दो ससारवर्धक होने से हेय और अन्तिम दो योगी जनो के लिए उपादेय है। १ प्रार्तध्यान- आगे ध्यानशतक मे चार प्रकार के प्रार्तध्यान का स्वरूप दिखलाते हुए उसके फल, लेश्या, लिंग (अनुमापक हेतु) और स्वामियो का निर्देश किया गया है। इसी प्रकार आदिपुराण मे भी उक्त चार प्रकार के प्रार्तध्यान के स्वरूप को प्रगट करते हुए उसके स्वामी, लेश्या, काल, आलम्वन, भाव, फल और परिचायक हेतुओ का निर्देश किया गया है। २ रौद्रध्यान- आर्तध्यान के पश्चात् ध्यानशतक मे पृथक् पृथक् चार प्रकार के रौद्रध्यान के स्वरूप को दिख- लाते उसके स्वामियो, फल, उसमे सम्भव लेश्यामो और परिचायक लिंगो का विवेचन किया गया है। आदिपुराण में भी इस प्रसग में प्रथमत 'प्राणिना रोदनाद् रुद्र , तत्र भव रौद्रम्' इस निरुक्ति के साथ उसके हिंसानन्द आदि चार भेदो का नामनिर्देश करते हुए यह कहा गया है कि वह प्रकृष्टतर तीन दुर्लेश्याओ के प्रभाव से वृद्धिंगत होकर छठे गुणस्थान से पूर्व पाच गुणस्थानो मे सम्भव है । काल उसका अन्तर्मुहूर्त है। तदनन्तर उसके उपर्युक्त चार भेदो का पृथक् पृथक् स्वरूप बतलाकर उसके परिचायक लिंगो १ ध्या श २-४ २. पा. पु २१, ८-१०. ३. ५. ४. प्रा. पु. २१, ११-२६.. ५.' ६-१८. ६. आ. पु. २१, ३१-४१. " १६-२७. . " .

६४ ध्यानशतक और फल का निर्देग किया गया है। हिमानन्द के प्रसंग में यहा मिक्थ्य मत्स्य पौर अरविन्द नामक विद्याधर का उदाहरण दिया गया है। प्रादिपुराण मे कुछ विशेष कथन- पश्चात् इम प्रमंग में यहा यह महा गया है कि अनादि वासना के निमित से ये धोनी समस्त ध्यान बिना किसी प्रयत्नविशेष के होते है। मुनि जन इन दोनो दुानों को छोड़ार मन्तिम दो ध्यानों का अन्यान परते हैं। उत्तम ध्यान की मिद्धि के लिये यहा ध्यानसामान्य की अपेक्षा उनके परिफमा -देग, काल व प्रासन मादिरूप मामग्रीविशेष-को अभीष्ट बताया है। परिकर्म का यह विवेचन यधपि नामान्य ध्यान को लक्ष्य में रराफर किया गया है, फिर भी इस प्रसग मे कुछ ऐसा भी ययन किया गया है जो यथास्थान ध्यानशतागत धर्मध्यान के प्रकरण में उपलव्य होता है और जिससे वह विशेष प्रभावित भी है । उदाहरणार्थ उक्त दोनो ग्रन्थो के इन पचो मा मिलान किया जा सकता है- निच्च चिय जुवइ-पसू-नपुंमग-फुसीलवज्जिय जइणो। ठाण वियणं भणिय विसेसम्रो माणशासमि ॥ घ्या. श. ३५. स्त्री-पशु-क्लीय-संसक्तरहित विजनं मुनेः । सर्वदयोचितं स्यानं ध्यानफाले विशेषतः ।।प्रा. पु. २१.७७. x x X जन्चिय देहावत्या जिया झाणोयरोहिणी होइ । झाइज्जा तदवत्यो सिनो निसपणो निवण्णो या ॥ ध्या.. ३६. देहावस्या पुनर्यय न स्याद् ध्यानोपरोधिनी। तवयस्यो मुनिध्यायेत् स्थित्याऽसित्वाऽपिशव्य वा ॥मा पु २१.७५. x समासु यट्टमाणा मणमो गं देस-काल-चेट्ठासु । परफेवलाइलाम पत्ता यसो समियपाया ॥ घ्या ४० यद्देस-फाल पेष्टासु सस्वेिव समाहिता. । सिताः सिद्धन्ति सेत्स्यन्ति नात्र सन्नियमोऽस्त्यतः ॥ प्रा. पु. २१.०२. प्रादिगणगत उता तीनो लोकों में प्रानगतक की गागापो का भाव तो पूर्णराया fift हो, माय ही उनका प्राकृत पदो मे मंगत रूपान्तर मी गो र त्यो लिए गए। इम पफार परिषमपी प्रणा गर रात यहा घ्यावा, “गेय, गान मोर उम करके साइन की प्रतिमा Tी गई है और सबनुमार भागे उनको जगम, प्राणा भी की गई। ध्येय प्रापना के बाद यहा दमप्राय गान मा ना पहा गया; from पम्नुपिषम प्रान प्रपिरान का नाम ध्यान है । या प्रश्न और गुड के दो प्रकार पाहै। यह प्राप्त प्रतिमानप यान मुनिका पारा Trयानि पारितुग में गामा , प्राधप गा. िभी गाfr पाठ हार न के ?. मग शो देग, पार न पागला पाीिम को ग प ATTIT भनयान प्रकरण मेमा मागि X । १. पा. मु.२१. १२.५३. २. मानशिशार. या. (३-४८) प्रो. पा. (१३०६.1) मे या पा १, मा.पु.२१,१४.६४. ४. .te: १.४.२१, पा, १९२.९६ प्रौरा, १.पा.पु. २१.१३२० प्रस्तावना पूर्वोक्त ध्याता की प्ररूपणा मे वहा यह कहा गया है कि जिन ज्ञान-वैराग्य भावनामो का पूर्व मे कभी चिन्तन नहीं किया गया है उनका चिन्तन करने वाला मुनि ध्यान मे स्थिर रहता है । वे भावनायें ये हैं-ज्ञानभावना, दर्शनभावना, चारियभावना और वैराग्यभावना। इन चारो भावनाओ के स्वरूप का भी वहा पृथक् पृथक् निर्देश किया गया है। इस कथन का आधार भी ध्यानशतक रहा है । वहा धर्मध्यान के बारह अधिकारो मे प्रथम अधि- कार भावना ही है। इस प्रसग मे निम्न गाथा और श्लोक की समानता देखिये- पुवकयभासो भावणाहि माणस्स जोग्गयमुवेइ । तानो य णाण-सण चरित-वेरग्गजणियाप्रो ॥ ध्या श ३० भावनाभिरसंमूढो मुनियान स्थिरीभवेत् । ज्ञान-दर्शन-चारित्र-वैराग्योपगताश्च ताः ॥मा. पु. २१-६५ इस प्रसग मे आदिपुराणकार ने वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षण, परिवर्तन और सद्धर्मदेशन इनको ज्ञानभावना कहा है। ध्यानशतककार ने इन्हें धर्मध्यान के पालम्बनरूप से ग्रहण किया है। ज्ञानभावना का स्वरूप दिखलाते हुए ध्यानशतक मे यह कहा गया है कि ज्ञान के विषय में किया जाने वाला नित्य अभ्यास मन के धारण-अशुभ व्यापार को रोककर उसके अवस्थानको तथा सूत्र व अर्थ की विशुद्धि को भी करता है। जिसने ज्ञान के आश्रय से जीव-अजीवादि सम्वन्धी गुणो की यथार्थता को जान लिया है वह अतिशय स्थिरबुद्धि होकर ध्यान करता है। ३ धर्मध्यान- ध्यानशतक मे धर्मध्यान की प्ररूपणा करते हुए उस पर माल्ढ होने के पूर्व मुनि को किन किन बातो का जान लेना आवश्यक है, इसका निर्देश करते हुए प्रथमत भावना आदि वारह अधिकारो की सूचना की गई है। उनमे से आदिपुराण मे ध्यानसामान्य से सम्बद्ध परिकर्म के प्रसग मे, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है। देश, काल, आसनविशेष और आलम्बन की जो प्ररूपणा की गई है वह ध्यानशतक से बहुत कुछ प्रभावित है। ध्यानशतक मे ध्यातव्य का निरूपण करते हुए ध्यान के विषयभूत (ध्येयस्वरूप) प्राज्ञा, अपाय, विपाक और द्रव्यो के लक्षण-सस्थानादि इन चार की प्ररूपणा की गई है। ध्यातव्य या ध्येय के भेद से जो धर्मध्यान के आज्ञाविचय, अपायविचय, विणाकविचय और सस्थानविषय ये चार भेद निष्पन्न होते है उनकी प्ररूपणा आदिपुराण मे भी यथाक्रम से की गई है। ध्यानशतक मे आज्ञा की विशेषता को प्रगट करते हुए उसके लिए जो अनेक विशेषण दिए गये हैं उनमे अनादिनिधना, भूतहिता, अमिता, अजिता (अजय्या) और महानुभावा इन विशेषणो का उपयोग आदिपुराण में किया गया है। ध्यातव्य के चतुर्थ भेद (सस्थान) की प्ररूपणा करते हुए ध्यानशतक मे द्रव्यो के लक्षण व सस्थान मादि तथा उनकी उत्पादादि पर्यायो के साथ पचास्तिकायस्वरूप लोक, तद्गत पृथिवियो, वातवलयो १. आ. पु. २१, ६४.६६. २. मा पु २१-६६. ३. ध्या. श.४२ ४. ध्या श. ३१ ५ या पु २१, ५७-५८ व ७६-८० ६ मा पु २१, ८१-८३ ७ मा पु २१, ५६-७५. ८. या पु. २१-८७. ६. ध्या. श.-आज्ञा ४५.४६, अपाय ५०, विपाक ५१, सस्थान ५२-६० १०. आ. पु-आज्ञा २१, १३५-४१, अपाय १४१.४२, विपाक १४३-४७, संस्थान १४८-५४. ११ ध्या श. ४५.६ मा पु २१, १३७-३८.

ध्यानशतक और द्वीप-समुद्रादिको को चिन्तनीन (ध्येय) बतलाया है । साथ ही उपयोगादिस्यहरजीर य उनके पोदयजनित ममार-समुद्र में मवावर स्वार को दिखलाते हुए उससे पार होने के उपायविषयक धिगार फरने को भी प्रेरणा की गई है। मी प्रकार प्रादिपुराण में भी संम्यानविय धर्मध्यान की प्ररपणा करते हुए सोगे माकार जीवादि तत्वो, द्वीप-समुद्री एव यातलयादि को निन्तनीय कहा गया है। साथ ही यहां यह भी रहा गया है कि जीवभेदी व उनके गुणी का विचार करते हुए उनका जो अपने ही पूर्वत मार्ग के प्रभाव से ससार-समुद्र में परिभ्रमण हो रहा है उसका तथा उसमे पार होने के उपाय का भी विचार करना चाहिए । तुलना के रूप में इस प्रसग को निम्न दो गाचायें और श्लोक द्रप्टव्य हैं- खिइन्यलय दीर-सागर-नरय विमाण-भवणाइमंठाण । वोमाइपठाणं निययं लोगटिइविहाणं ॥ घ्या. श ५४ द्वीपाधि-वलयानबीन सरितश्च सरासि च । विमान-भवन-यन्तरावाम-नरकक्षितिः ॥ प्रा. पु २१.१४६. X फि बहुणा सस्य चिय जीवाइपयत्यवित्थरोवेयं । सवनयसमूहमय झाएज्जा रामयसभावं ॥ घ्या. ा ६२ फिमत्र पहनोफ्तेन सर्वोप्यागमयिस्तरः। नय भङ्गशनाकीर्णो ध्येयोऽध्यात्मविशुद्धये ॥ प्रा पु. २१-५४. आगे प्रादिपुराण में उक्त धर्मध्यान के काल व स्वामी का निर्देश करते हुए कहा गया है कि वह अन्तर्मुहूर्त काल तक रहता है तथा अप्रमत्त दगा का पालम्बन लेकर अप्रमत्ती में परम प्रकर्ष को प्राप्त होता है । इसके अतिरिक्त उसका प्रयस्थान प्रागमपरम्परा के अनुसार गम्यग्दृष्टियो पोर शेप गया. सयतो व प्रमत्तसयतों में भी जानना चाहिए। आगे लेक्ष्या मा निर्देश करते हुए यह कहा गया है rि यह प्रष्ट पुद्धि को प्राप्त तीन लेप्यापो से वृद्धिंगत होता है। तत्पश्चात् वहा धर्मध्यान मे सम्भव धायोपगिक भाव का निर्देश करते हुए उग सम्पनर बाह्य चिह्नों (लिंगो) की गूचना की गई है। उमका फल पाप गमों को निरा पोर पुमोदय मे प्राण होने वाला देवगुग बतलाया है। माय ही यहा यह भी कहा गया है कि उसरा मामान पान गर्ग की प्रान्ति पोर पारम्परित मोर को प्राप्ति है। इस पान मे भुत होने पर मुनि को अनुप्रेक्षापो के गाय भारनामो का चिन्तन करना चाहिए, जिरासे गंसार का प्रभाव किया जा सके। ध्यानतर में मिन भावनादि १२ प्रधियारों के प्राग्य में धर्मध्यान यो प्रणामी गई। उनमे गरे स्वामी, नेपया मोर फरमादिरा भी समानुसार विचन पिया गया है। स्थानीय विषय में प्राउ दोनो प्रन्यों में कुछ मतभेद रहा है । यथा- ध्यानमारक में अन धर्मप्यान में यातामा उल्लेग मरो हुप पर मारा गया प्रमा मुनि गया मतमोट और क्षीगमोह उगाने | REET पोर Matter पनि गरिने उगनी टोरा. गागा नि मौerr fir frा किमान उममा पर गीता anान मा up MELA # irritary मुमान ....... 4. पु.११:३८ ५. भा... 1.mriuTREET, REET ना। - न । . Irry प्रस्तावना ६७ परन्तु आदिपुराण मे, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, उक्त धर्मध्यान के स्वामित्व का विचार करते हुए उसका सद्भाव असयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान से सातवें अप्रमत्त गुणस्थान तक ही बतलाया गया है। यह अवश्य विचारणीय है कि वहा 'वह अप्रमत्त दशा का पालम्बन लेकर अप्रमत्तो मे परम प्रकर्ष को प्राप्त होता है यह जो कहा गया है उसका अभिप्राय क्या सातवें अप्रमत्तसयत गुणस्थान से ही रहा है या आगे के कुछ अन्य अप्रमत्तो से भी । आगे वहा यह भी कहा गया है कि आगमपरम्परा के अनुसार वह सम्यग्दृष्टियो, सयतासयतो और प्रमत्तसयतो मे भी होता है। यह मान्यता सर्वार्थसिद्धिकार और तत्त्वार्थवार्तिककार की रही है। शुक्लध्यान- शुक्लध्यान का निरूपण करते हुए आदिपुराण मे आम्नाय के अनुसार उसके शुक्ल और परम- शुक्ल ये दो भेद निर्दिष्ट किये गये हैं। उनमे छद्मस्थो के शुक्ल और केवलियो के परमशुक्ल कहा गया है। इन भेदो का सकेत ध्यानशतक में भी उपलब्ध होता है, पर वहा परमशुक्ल से समुच्छिन्नक्रिया- प्रतिपाती नामक चतुर्थ शुक्लध्यान अभीष्ट रहा है। आगे दोनो ग्रन्थो मे जो शुक्लध्यान के पृथक्त्ववितर्क सविचार आदि चार भेदो का निरूपण किया गया है वह बहुत कुछ समान है। ध्यानशतक मे शुक्लघ्यानविषयक क्रम का निरूपण करते हुए एक उदाहरण यह दिया गया है कि जिस प्रकार सब शरीर में व्याप्त विष को मत्र के द्वारा क्रम से हीन करते हुए डकस्थान मे रोक दिया जाता है और तत्पश्चात् उसे प्रधानतर मत्र के द्वारा उस डकस्थान से भी हटा दिया जाता है उसी प्रकार तीनो लोको के विषय करने वाले मन को ध्यान के बल से क्रमश हीन करते हुए परमाणु मे रोका जाता है और तत्पश्चात् जिनरूपी वैद्य उसे उस परमाणु से भी हटाकर उस मन से सर्वथा रहित हो जाते है। यही उदाहरण प्रकारान्तर से आदिपुराण मे भी दिया गया है। यथा-वहा कहा गया है कि जिस प्रकार सव शरीर मे व्याप्त विष को मत्र के सामर्थ्य से खीचा जाता है उसी प्रकार समस्त कर्मरूपी विष को ध्यान के सामर्थ्य से पृथक् किया जाता है। उक्त दोनो ग्रन्थो मे एक अन्य उदाहरण मेघो का भी दिया गया है । यथा- जह वा घणसंघाया खणेण पवणाहया विलिज्जति । झाण-पवणावहूया तह कम्म-घणा विलिज्जति ॥ ध्या. श. १०२ यद्वद् वाताहताः सद्यो विलीयन्ते घनाधनाः। तद्वत् कर्म धना यान्ति लयं ध्यानानिलाहताः ॥ प्रा. पु. २१-२१३. इस प्रकार दोनो ग्रन्थो की वर्णनशैली तथा शब्द, अर्थ और भाव की समानता को देखते हुए इसमे सन्देह नही रहता कि आदिपुराण के अन्तर्गत वह ध्यान का वर्णन ध्यानशतक से अत्यधिक प्रभावित है । यहा इस शका के लिए कोई स्थान नहीं है कि सम्भव है आदिपुराण का ही प्रभाव ध्यानशतक पर रहा हो, कारण इसका यह है कि ध्यानशतक पर हरिभद्र सूरि के द्वारा एक टीका लिखी गई है, अत. ध्यानशतक की रचना निश्चित ही हरिभद्र के पूर्व मे हो चुकी है और हरिभद्र सूरि निश्चित ही श्रा. जिनसेन के पूर्ववर्ती हैं । इससे यही समझना चाहिए कि आदिपुराण के रचयिता जिनसेन स्वामी के समक्ष प्रकृत ध्यानशतक रहा है और उन्होने उसका उपयोग उसमे किये गये ध्यान के वर्णन मे किया है। ध्यानशतक व ज्ञानार्णव प्राचार्य शुभचन्द्र (सम्भवत वि की ११वी शती) विरचित ज्ञानार्णव यह एक ध्यानविपयक १ आ. पु. २१, १५५-५६. २. स. सि. ९-३६, त. वा. ६, ३६, १३-१५. ३. आ. यु. २१-१६७. ४. ध्या.श. ८९ ५. घ्या. श. ७१-७२. ६. प्रा. पु. २१-२१४. । १ ક ध्यानातक महत्त्वपूर्ण अन्य है। इनमें मुद्रित प्रति (परम शुनप्रभावक मण्डल, बम्बई) के अनुगार ४२ प्रकरण । परासस्या लगभग २२३० है। मस्कृत भाषामय ये पद्य अनुष्टुम्, मार्या, इन्द्रवा, इन्द्रवंशा, उपजाति, उपेन्द्रवचा, पृथ्वी, मन्दानान्ता, मानिनी, बसन्ततिलका, परास्म, शार्दूलविकोटिन, दामिनी, निरिणी मोर सम्परा जैसे छन्दो मे रचे गये हैं। अन्य की मापा, कविता पौर पदलालिम प्रादि को देगते अन्यकार की प्रतिभागालिता का पता सहज में लग जाता है। सिद्धान्त को ममंग होने के साथ ये एक प्रतिभागम्पन्न उत्कृष्ट कपि भी रहे है । गन्य मे उक्त ४२ प्रकरण स्वय ग्रन्थकार के द्वारा विभक्त किये गये है, ऐमा प्रतीत नहीं होता। मून अन्य मे मही मिगी भी प्रकरण का प्रायः निर्देश नहीं रिया गया है। विषयविवेचन भी प्रकरण के अनुसार क्रमबद्ध नहीं है, किसी एक विषय की चर्चा पाए यही बीच बीच में अन्य विषय भी चचित हुए हैं। अन्य ग्रन्यो के भी बहुत-गे पर उममे 'उपतं च' पारि मे संत के साथ और बिना गिती मकेत के भी समाविष्ट हुए है, भले ही उनका मगाये यहा चाहे स्वर गन्ययार ये द्वारा लिया गया हो अपना पीछे अन्य अध्येतामों के द्वारा। अन्य में प्रमुगता से ध्यान की प्ररपणा तो की हो गई है, पर नाप मे उरा ध्यान की सिद्धि में निमित्तभूत अनित्यादि भागनामी, महिसादि महायतो और प्राणायामादि अन्य भी अनेक विषय चचित हुए हैं। इसीलिए उगो 'मानापंग' और 'ध्यानशास्त्र' ये दो मार्थक नाम ग्रन्यकार को प्रभीष्ट रहे हैं। अन्य का कुछ भाग गुमापित जंगा an प्रस्तुत प्यानगतक में ध्यान व उसमे सम्पद जिन विषयो का वर्णन किया गया। उन सबरा कपन इम मानार्णव में भी प्राय यथाप्रसग किया गया है। पर दोनो की वर्णनसी मिन्न रही है। घ्यानशतक का विषयविवेचन पूर्णतया क्रमबद्ध व व्यवस्थित है, किन्तु जैगा नि कार गोत किया गया है, शानाणंव में वह विपर्यायवेचन का क्रम प्राय, व्यवस्थितरूप में नहीं रह गका है। इन दोनो ग्रन्यो में माही काही शब्द व अयं की जो ममानता दिगती है यह इस प्रकार है- जं पिरमभवसाण तं भाणं जंचलं तयं चित्तं । तं होज्ज भायणा या अणुपेहा या महय चिता ।। प्या श २. एफाप्रचिन्तानिरोधो यस्तद् ध्यान भायना परा। मनुप्रेक्षापंचिन्ता या तज्जरभ्युपगम्यते ॥ माना. १६, पृ. २५६. x ४ निच चिय जुबह-पम-नघूमर-पुसीमयन्मिय जहणो । टाण विजण भनिय विमेराम्रो भाणकालमि॥ध्या 7.३५. यय रागादयो दोपा अमन यान्ति लाययम् । तय यसतिः साप्यो ध्यानमाले विशेषत. ॥ शाना .८, २७८. पिरकरोगाप पुण गणोप भानुनि चलमणाण । गामगि जणादणे गुने र य ग विगेगी।। ध्या. 7. ३.. पिनने जनगीण सुम्पित यु.मिपि पा। यधि पर रियर चित्त माति निधनम् ॥माना २२. १. २६०, गन्यामु यमाला मग संग-सार महागु। पसंता:माभं पसा यानी runा. म.MANKARNA मोर ११.ir,T.४४,५.४५ (मि gferr. मार मिशार' गाना frrounा।)

प्रस्तावना - तो देस-काल-चेट्ठानियमो झाणस्स नत्थि समयमि । जोगाण समाहाणं जह होइ तहा पयइयव्व ।। ध्या श. ४१. वज्रकाया महासत्त्वा निःकम्पाः सुस्थिरासना । सर्वावस्थास्वल ध्यात्वा गताः प्राग्योगिनः शिवम् ।। १३, पृ. २७६. सविग्नः संवृतो धीर स्थिरात्मा निर्मलाशय. । सर्वावस्थासु सर्वत्र सर्वदा ध्यातुमर्हति || २१, पृ. २८०.। इस प्रकार की समानता को देखते हुए भी ज्ञानार्णव पर ध्यानशतक का कुछ प्रभाव रहा है, यह सम्भावना नहीं की जा सकती है। इसका कारण यह है कि प्रा. जिनसेन के द्वारा आदिपुराण के २१वें पर्व मे जो ध्यान का वर्णन किया गया है उसका प्रभाव ज्ञानार्णव पर अत्यधिक रहा है । अत यही सम्भव है कि ज्ञानार्णवकार ने ध्यानशतक को आधार न बनाकर आदिपुराण के आश्रय से ही ध्यानविषयक प्ररूपणा की है। ग्रन्थकार प्रा शुभचन्द्र ने स्वय ही ग्रन्थ के प्रारम्भ मे आ. जिनसेन के वचनो के महत्त्व को प्रगट करते हुए उनका स्मरण किया है। पूर्वोल्लिखित ज्ञानार्णव के श्लोक १६, ८, २२ तथा १३ और २१ क्रमशः आदिपुराण पर्व २१ के ६, ७७, ८३ और ७३ श्लोको से प्रभावित हैं । आदिपुराण का वह ध्यान का प्रकरण ध्यानशतक से विशेष प्रभावित है, यह पहिले प्रगट किया ही जा चुका है । ध्यानशतक व योगशास्त्र जैसा कि ग्रन्थ के नाम से ही प्रगट है, प्रस्तुत योगशास्त्र यह योगविषयक एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। उसके रचयिता सुप्रसिद्ध हेमचन्द्र सूरि (वि की १२वी शती) है । वह १२ प्रकाशो मे विभक्त है । उनमे से प्रथम तीन प्रकाशो मे सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रस्वरूप रत्नत्रय; तथा चतुर्थ प्रकाश मे कषायो, इन्द्रियो एव राग-द्वेषादि की विजय के साथ समताभाव की प्राप्ति को अनिवार्य बतलाते हुए अनित्यादि बारह और मैत्री आदि चार भावनाओ की भी प्ररूपणा की गई है। यही पर ध्यान के योग्य अनेक आसनो का स्वरूप भी दिखलाया गया है । पाचवें प्रकाश मे विस्तार से प्राणायाम का निरूपण करते हुए छठे प्रकाश मे उससे होने वाली हानि का दिग्दर्शन कराया गया है तथा धर्मध्यान की सिद्धि मे निमित्तभूत मनकी स्थिरता की आवश्यकता प्रगट की गई है। सातवें प्रकाश मे ध्यान के इच्छुक योगी को पूर्व मे ध्याता, ध्येय और फल के जान लेने की प्रेरणा करते हुए ध्येय के प्रसग मे उसके पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और रूपातीत इन चार भेदो का निर्देश किया गया है व उनमे से प्रथम पिण्डस्थ ध्येय की प्ररूपणा की गई है । आठवें प्रकाश में पदस्थ और नौवें प्रकाश मे रूपस्थ ध्येय का निरूपण किया गया है । दशम प्रकाश मे रूपातीत ध्येय का दिग्दर्शन कराते हुए विकल्परूप मे उस ध्येय के ये चार भेद भी निर्दिष्ट किये गये है-प्राज्ञा, अपाय, विपाक और सस्थान । आगे यथाक्रम से उनके आश्रय से भी धर्मध्यान की प्ररूपणा की गई है। ग्यारहवें प्रकाश शुक्लध्यान का निरूपण करके वारहवें प्रकाश मे अनुभवसिद्ध तत्त्व को प्रकाशित किया गया है। ध्यानशतक का प्रभाव- तुलनात्मक दृष्टि से देखने पर इस योगशास्त्र के ऊपर ध्यानशतक का प्रभाव स्पष्ट दिखता है। - मे यथा- १ जिस प्रकार ध्यानशतक को प्रारम्भ करते हुए ग्रन्थकार ने मगलस्वरूप योगीश्वर वीर को नमस्कार करके ध्यानशतक के कहने की प्रतिज्ञा की है (१) उसी प्रकार प्रा. हेमवन्द्र ने योगीश्वर महावीर जिन को नमस्कार करते हुए योगशास्त्र के रचने की प्रतिज्ञा की है (१, १.४) । २ जिस प्रकार ध्यानशतक मे स्थिर अध्यवसान को-मन की स्थिरता को-ध्यान का लक्षण १. जयन्ति जिनसेनस्य वाचस्त्रविद्यवन्दिता । योगिभिर्यत् समासाद्य स्खलितं नात्मनिश्चये ॥ ज्ञाना. १६, पृ. ८.

ध्यानशतक बतलाकर उनकी स्थिति अन्तमहतं मात्र महो गई है तया गप में यह भी निगरिया गया है कि ऐसा प्यान छपरयो में होता है, मै वलियो पा ध्यान योगो के निरोपन्याप है (२.३); मी प्रमार रो रही माय योगमारम में भी प्रगट दिया गया है (४-११५)। मागे ध्यानातक में यह भी पता है कि भन्तन मात्र ध्यानकाल के पश्चात् चिन्ता प्रच्या ध्यानान्तर होता है, इस प्रकार बहुत यन्तुपो में रामण के होने पर ध्यान की सन्तान दीर्घ काल तक चल सकती है। ठीक यही अभिप्राय योगमारत में भी व्यक्त किया गया है। दोनो में शब्दो व अर्थ यी समानता द्रष्टव्य है- अंतोमहत्तपरयो चिता झागंतर य होजाहि । सुधिरं पि होज्न यावत्युसमे भाणसताणो ॥ घ्या. श. ४. मुहर्तात परतश्चिन्ता यद्वा ध्यानान्तर भवेत् । बहसको तु स्याद् दीर्धापि ध्यानसन्ततिः ॥ यो. शा. ४-११६. इसी प्रकार गुलध्यान के प्रसंग में उपयुक्त ध्यानशतका की पुछ गापाम्रो मा योगमायण में छाया- नुवाद किया गया जैगा दिराता है। यथा- निध्याणगमणकाले फेवलिणो दरनिवजोगस्त । सुहमफिरियाऽनिर्याट्ट तश्य माण तणुफायफिरियस ।। ८१. तस्य य सेलीसीगयस्स सेलोव्य निष्पपस्स । योन्छिन्नफिरियमपदिवाइज्माणं परमसुपकं ॥ घ्या. ॥ ८२. निर्वाणगमनरामये पेलिनो दरनिरुतयोगस्प । मूक्ष्मप्रियाप्रतिपाति तृतीयं फोतितं शुक्लम् ।। पेयलिन बोलेशीगतस्य शैलयदफम्पनीयस्य । उत्सक्रियमप्रतिपाति तुरीय परमशुक्लम् ।। यो मा ११, ८.६. इसी प्रकार मागे गा. ८३-८४ का मिलान योगशास्त्र के ११, १०-११ तोको से तथा गा. ८५, ८६, का मिलान योगशास्त्र . ११-१२ प्लोको से किया जा सकता है। - कुछ विशेषता- vm- या मह विप रमरणीय है कि मा. हेमचन्द्र ने ग्रन्य गो प्रारम्भ (१-४) मे तया प्रगत मे (१२-१ ५ १३.५५) गे भी यर मृचना की है कि मैंने धृत के मात्रय से और गुममुग मे जो योगयिपयर शान प्राप्त रिया है तदनुसार उमाल यगंन मरता हुमा में मुछ अपने अनुभव के प्राधार गे भी कया पार गा । इममे गित है कि उन्होंने प्रस्तुत ग्रन्थ में यागमपरम्परा के अनुनार तो योग का वर्णन किया की, गाय ही उन्होने अपने अनुभव के आधार ने उगमे पुछ विशेषता भी प्रगट की है, जो इम प्रकार १ पागम मे पान २ पानं, रोग, पमं पोर रात में पार भैध मर गये। पर पा. गग गरे मेवों में प्रारं प्रौर ग: इन दोनों को मम्मिनित न पप ग ग यो मर्म पौर में से प्रकार माह बनाया। २ प्यार में पान Tी मापना मा (२८.२९) मागे पामय में की गई। परन्तु पा.नन्द्र में गी उपेक्षा फार माग र अनुमार art १. ग-यानाम:४3.2.12% मार 10 और tariya E-२० मादि। २. Emiriram raiframm। गदिम् ॥ ४.११५ Pी पा. मोर पिपित गाना दौरा ( ११.१ ७.) भी प्राणी मनिनिनिटि1ि 10 --- प्रस्तावना ७१ ध्यान का कथन किया है (७-१) । ३ आगमपरम्परा मे व ध्यानशतक मे भी पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और रूपवजित इन चार ध्येय- भेदो के अनुसार चार प्रकार के ध्यान की कही कुछ प्ररूपणा नहीं की गई है, पर मा हेमचन्द्र ने अपने इस योगशास्त्र मे ध्यान के इन चार भेदो की विस्तार से प्ररूपणा की है। ४ ध्यानशतक मे ध्यातव्य (ध्येय) के प्रसग मे श्राज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय और संस्थानविचय इन धर्म ध्यान के चार भेदो की ही प्ररूपणा की गई है। वहा पिण्डस्थ-पदस्थ आदि चार ध्यानो के विषय मे कुछ भी निर्देश नही किया गया है । परन्तु योगशास्त्र मे इनको प्रमुख स्थान दिया गया है तथा उपर्युक्त आज्ञाविचयादि चार धर्मध्यान के भेदो का विवेचन विकल्परूप मे किया गया है। ५ ध्यानशतक मे ध्याता का विचार करते हुए समस्त प्रमादो से रहित मुनि, उपशान्तमोह और क्षीणमोह इनको धर्मध्यान का ध्याता कहा गया है (६३) । परन्तु योगशास्त्र मे ध्याता की विशेषता को प्रगट करके भी (७, २-७) धर्मध्यान के स्वामियो का कही कोई निर्देश नही किया गया। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, धर्मध्यान के स्वामियो के विषय मे कुछ मतभेद रहा है । सम्भव है हेमचन्द्र सूरि ने इसी कारण से उसकी उपेक्षा की है। ६ ध्यानशतक मे धर्मध्यान से सम्बन्धित लेश्याओ का निर्देश करके भी उसमे सम्भव क्षायोप- शमिक भाव का कोई उल्लेख नहीं किया गया है (६६) । परन्तु योगशास्त्र मे धर्मध्यान मे सम्भव उन लेश्यामो के निर्देश के पूर्व ही उसमे क्षायोपशमिक आदि भाव का सद्भाव दिखलाया गया है। ७ स्थानाग, व्याख्याप्रज्ञप्ति, मूलाचार, तत्त्वार्थसूत्र एव ध्यानशतक आदि प्राचीन ग्रन्थो मे प्राणा- याम को ग्रहण नहीं किया गया है। परन्तु योगशास्त्र मे उस प्राणायाम का वर्णन करते हुए विविध प्रकार के वायुसचार से सूचित शुभाशुभ की विस्तार से चर्चा की गई है। साथ ही वहा परकायप्रवेश आदि का भी कथन किया गया है। हा, यह अवश्य है कि आ हेमचन्द्र ने वहा महर्षि पतञ्जलि विरचित योग- शास्त्र मे निर्दिष्ट उस प्राणायाम का विस्तार से वर्णन करते हुए भी उसे अनावश्यक और अहितकर बतलाया है (६, १-५)। १ यहा क्रम से ७वें प्रकाश मे पिण्डस्थ (८-२८), वें प्रकाश में पदस्थ (१-८१), वें प्रकाश मे रूपस्थ (१-१६) और १०वें प्रकाश मे रूपातीत (१-६) ध्यान का वर्णन किया गया है । २. एव चतुर्विधध्यानामृतमग्न मुनेमन । साक्षात्कृतजगत्तत्त्व विधत्ते शुद्धिमात्मन ॥ आज्ञापायविपाकाना सस्थानस्य च चिन्तनात् । इत्थ वा ध्येयभेदेन धर्मध्यान चतुर्विधम् ॥ यो. शा. १०, ६-७. पिण्डस्थ-पदस्थ आदि उक्त चार प्रकार के ध्यान की प्ररूपणा आ. शुभचन्द्र विरचित ज्ञानार्णव मे संस्थानविचय धर्मध्यान के प्रसग मे (पृ, ३८१-४२३) और आ अमितगति विरचित श्रावकाचार (१५, ३०-५६) मे विस्तार से की गई है। ३. तत्त्वार्थाधिगमभाष्यसम्मत सूत्रपाठ के अनुसार तत्त्वार्थसूत्र मे धर्मध्यान के स्वामियो का निर्देश इस प्रकार किया गया है-आज्ञापाय-विपाक-सस्थानविचयाय धर्ममप्रमत्तसयतस्य । उपशान्त-क्षीण- कषाययोश्च । ६,३७-३८. ४. धर्मध्याने भवेद् भाव क्षायोपशमिकादिक । लेश्या क्रमविशुद्धा. स्यु पीत-पद्म-सिता पुनः ॥ १०-१६ (क्षायोपशमिक भाव की सूचना आदि- युराण (२१-१५७) व ज्ञानार्णव (ज्ञोक ३६, पृ २७०) मे की गई है) ५. ज्ञानार्णव मे भी उस प्राणायाम का विस्तार से वर्णन करते हुए (श्लोक १-१०२, पृ. २८४-३०३) भी उसे अनिष्टकर सूचित किया गया है (श्लोक १००, पृ ३०२ व व श्लोक ४-६, पृ. ३०५) ।

७२ ध्यानशतक ८ ध्यानातफ में धर्मध्यान के ध्यातामों का उत्रा करने के मान्तर यह कहा गया है। ये हो धर्मध्यान दे पाता प्रतिपय प्रास्त सहगन से युक्त य पूर्वश्रुत के धारक होते हुए पूर्व को दो गुलामानो के भी ध्याता होते हैं (६३-६४)। योगमाल में इमे पुछ स्पष्ट मारते हुए यह महा गया है कि प्रथम महनन से युक्त पूर्वश्रुत के माता शुक्लध्यान को करने में तमपं होते हैं। कारण यह विहीन बनयालीमा इन विषयो के वशीभूत होने से च कि स्थिरता को प्राप्त नहीं होता, इसीनिए ये सुगनमान के पितारी नहीं है (११, २-३)। नगमग यही अभिप्राय तत्वानुशासन (३५-३६) मोर मानाव में भी प्रगट किया गया है। हम प्रमग मे सम्बन्मित जानाणंच और योगशारन पोलोगो की समानता देखने योग्य है-- चलत्पेवाल्पसत्यानां प्रियमाणमपि स्थिरम् । चेतः शरीरिणां शस्यद् विपर्यापुरलीकृतम् ॥ ज्ञाना. ५, पृ. ४२५, न त्यागित्वमतः शपले विद्यतेऽन्यल्पचेतताम् । प्राधमंहननस्पेय तत् प्रणीतं पुरातनः ॥ नाना. ६, पृ. ४२५. इदमादि[म]संहनना एवाल पूर्यदिनः पर्तुम् । स्थिरता न याति चितं फपमपि यत् स्यल्पसत्यानाम् ।। पत्ते न सल स्वास्थ्यं ध्याफुलितं तनुमा मनोविषयः । शुक्लध्याने तस्मानास्त्यधिफारोऽस्पसाराणाम् ॥ यो. शा. ११, २.३. यहा जानार्णव में उपयुक्त 'पत्यल्पचेतसाम्' यो समक्ष जो योग में 'स्वरपसत्यानाग' पद प्रयुक्त हमारे वह भाव को अधिक स्पष्ट कर देता है। इस प्रकार ध्यानशतक के साय योगशास्त्र को समानता व प्रगमानता को देशमार मह निदिमा प्रतीत होता है कि प्रा हेमनन्द्र ने उग ध्यानातक को हृदयंगम करो उमसे यथेच्छ विषम यो माग किया है और उनका उपयोग अपनी चि गा अनुनार योगदान को रनमा मेया है। पर विपपिये- पन गोली उनकी ध्यानात मार से भिन्न रही है। टीका व टीकाकार हरिभद्र सूरि टीका-प्रातुन ग्रन्प में मूल के गाघ सस्कृत टोपा मुद्रित है यह यश्रुत विद्या प्रगिरि. नट मूरि के द्वारा रची गई है । टीका गरि सक्षिप्त है फिर भी पानं गा योग जगतम प्रग के भार मो भी हममें स्पष्ट किया गया है। गाय ही यहां जयाप्रमग अनेक प्रानी मानों को प्रमाण में रप में उसरण दिये गये हैं उनमें भायायचीय भपिा जगता है। टीकार जोr m पर गरपापिपपा गाभवी यी नानागा होनादिमीरा भी पाय एक हो टीसा मी मा पो पर उपलब्ध ना। टीमापार में मने अन्यमा मुटपाटमेट भी मिला न दोगे समारमा witxn टीम पर भी दिया। निमः रिये नमना चेदानुपाणी वान थेयिागमा Anirre 1 Arrar rt मोkmEET in भी-Enfirm IET iiiif-nam " farmiriti IIR TIRI Ritrirint for firm ** - 11 rat Harami TRITINE | 1 Mamaste Ti... २anfrrent , प्रस्तावना ७३ उन्होने सद्धर्म का उपदेश देने वाली याकिनी-महत्तरा को अपनी धर्ममाता माना। इसी से उन्होंने स्वरचित अधिकाश ग्रन्थो के पुष्पिकावाक्यो मे अपने को जैन श्वेताम्बर सम्प्रदाय का अनुयायी याकिनी-महत्तरा का सूनु घोपित किया है। वे सस्कृत भाषा के तो अधिकारी विद्वान् पूर्व मे ही रहे हैं, अब जैन धर्म मे दीक्षित होकर उन्होने जैनागमो का भी गम्भीर अध्ययन कर लिया व प्राकृत भाषा के भी अधिकारी विद्वान् हो गये । हरिभद्र सूरि का समय विक्रम सवत् ७५७ से ८२७ (ई. सन् ७०० से ७७०) माना जाता है। वे कुवलयमाला के कर्ता उद्योतन सूरि के कुछ समकालीन रहे है। उनके द्वारा उक्त दोनो ही भाषाम्रो मे जहा अनेक मौलिक ग्रन्थ रचे गये हैं वहा अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थो पर टीका भी की गई है। उनमे कुछ इस प्रकार हैं- मूल ग्रन्थ- १ धर्मसग्रहणी २ श्रावकप्रज्ञप्ति (स्वोपज्ञ टीका सहित) ३ पचाशक प्रकरण ४ पंचवस्तुक प्रकरण (स्वो. टीका सहित) ५ योगविशिका ६ योगविन्दु (स्वो. टीका सहित) ७ योगदृष्टिसमुच्चय ८ शास्त्रवार्तासमुच्चय ६ षड्दर्शनसमुच्चय १० धर्मविन्दु प्रकरण ११ अष्टक प्रकरण १२ पोडशक प्रकरण १३ समराइच्चकहा १४ उपदेशपद १५ अनेकान्तजयपताका १६ अनेकान्तवादप्रवेश १७ लोकतत्त्वनिर्णय १८ सम्वोध प्रकरण १६ सम्बोधसप्तति प्रकरण, इत्यादि टीकायें- १ आवश्यकसूत्र २ दशवकालिक ३ पाक्षिकसूत्र ५ प्रज्ञापनासून ६ अनुयोगद्वार ७ नन्दीसूत्र ८ ललितविस्तरा ६ तत्वार्थवृत्ति, इत्यादि इन टीकामो मे उन्होने सैकडो प्राचीन ग्रन्थो के उद्धरण दिये हैं । इससे उनकी बहुश्रुतता का परिचय सहज मे मिल जाता है । इनके द्वारा निर्मित ग्रन्थो और टीकामो के अन्त मे प्राय उपकार की स्मृतिस्वरूप 'याकिनी-महत्तरासूनु' उपलब्ध होता है। साथ ही उन्होने अपनी इन कृतियो के अन्त मे प्राय. 'भवविरह' शब्द का उपयोग किया है। ४ पचसूत्र १. श्री-हरिभद्राचार्यस्य समयनिर्णय., पृ. १-२३ (जैन साहित्यशोधक समाज, पूना) तथा 'जैन साहित्य का वृहद् इतिहास' भाग ३, पृ. ३५६.

प्रस्तावना ध्यानस्तव ग्रन्थ और ग्रन्थकार प्रस्तुत अन्य का ध्यानस्ता' यह एक सार्थक नाम है। ग्रन्थकार श्री भाकरनन्दी ने इसमे १०० प्लोको में द्वारा जिनन्तुनि के रूप में सक्षेप से ध्यान का गुव्यवस्थित य क्रमवद वर्णन किया है। ग्रम्प पद्यपि सक्षिप्त है. फिर भी उममें ध्यान के मावश्यक गनी अगों का ममावेश की मुशलता से किया गया है । अन्य के मक्षिप्त व मुन्दर विषयविवेचन को देखते हुए अन्रकार की बहुश्रुराता मा परिणय साज में ही मिल जाता है। ध्यानस्तव के अतिरिक्त उनके द्वारा तत्त्वायंगूत पर एक महत्त्वपूर्ण यत्ति भी लिगी गई है, जो ग्रन्यगत सभी विषयों को मरल पौर सुबोध भाषा मे प्रन्पटित पारती है। इसे उगमा 'मुगबोधा वृत्ति' यह सायंक नाम समझना चाहिए । इस वृत्ति के प्राधार सायमिति, तत्त्वार्थयातिक पार तत्यायंफ्लोगवातिमा अन्य रहे हैं। ध्यानस्तव मे जो नौ पदार्यो, सात तत्त्वों और उर द्रव्यो मा विवंचन किया गया है उममा प्राधार उपर्युक्त तत्त्वाधसूत्र की टोकाप्रो के अतिरिक्त मुनि नेमिपन्द्र गितान्तिदेय विरचित द्रव्यसग्रह भी रहा है। अन्यमार भामारनन्दी ने सम्मान को अपने जन्म में पवित्र किया, माता-पिता उनकारी तथा वे अन्त तक गृहस्प रहे हैं, मुनिगम में दीक्षित हुए, प्रथया भट्टारप पद पर भागीन हुए। स्यादि उनके जीवन गम्बन्धी वृत्त के जानने के लिए कोई माधन-मामग्री उपप नहीं है। अन्यले मना में जो दो लोको मे मंक्षिप्त प्रास्ति' उपलव्य है उगमे इतना मान जात होगा ये गपंगा मे प्रमिप्य मोर निननन्द्र के शिष्य थे। गचंगा यह नाम न होकार सम्मयतः उगी एक प्रभास सापि रही। भारतीय मानपीठ में प्रसागि ध्यानम्नम की प्रम्नायना म उगती पिणी गदिमा मुमारी सुनु) प्रोगि ये बाग यह मम्मायना प्रगट की गई है कि उनका नाम पमनानी राया उपनाम पशुसंग य गमायु है । उन्होंने या यह गो गरेन किमान सत्यानि की प्रगति में राम, निती भागनिपिनामपियध' इत्यादि पनीर में विगत में 'ममनटी' नाम पर आ गया है, पर या गि प्रसार में पढ़ा जाम में गाने पानी पिया', मामीमग पर शिधार बने हुए प्रति गम्भागना में राममय १RYuri (६. १९१० मा ११२०) माना है। 20 १. पागे माप मानो तुम पीmarया गा| २. गोराति भी पाया ArAmit fritter: Crimi (Rainr.६६) ! t. AMETET (1) frri)| ४. reी प्रशासना... ३५.६, प्रस्तावना ७५ - - प. शान्तिराज जी शास्त्री ने तत्त्वार्थवृत्ति की प्रस्तावना मे भास्करनन्दी के समय पर विचार करते हुए उन्हें १३-१४वी शताब्दी का विद्वान् माना है। जैसी की स्व प मिलापचन्द जी कटारिया के द्वारा सम्भावना व्यक्त की गई है, तदनुसार भास्करनन्दी का समय वि. स. की सोलहवी शताब्दी ठहरता है। ध्यानस्तव की प्रशस्ति मे जिन सर्व. साधु का उल्लेख किया गया है (६६) उसमे उपयुक्त 'शुभगति' के स्थान मे 'शुभयति' पाठकी कल्पना के आधार पर वे उससे उन शुभचन्द्र को ग्रहण करते हैं, जिन्होने दिल्ली-जयपुर की भट्टारकीय गद्दी चलायी व जिनका समय वि. स. १४५० से १५०७ रहा है। इन शुभचन्द्र के पट्ट पर जो जिनचन्द्र प्रतिष्ठित हुए वे भास्करनन्दी के गुरु हो सकते हैं। इन जिनचन्द्र का समय वि. स. १५०७ से १५७१ माना जाता है । इस प्रकार से भास्करनन्दी का समय वि. की १६वी शताब्दी सम्भावित है। ध्यानस्तव की रचना के समय ग्रन्थकार के समक्ष निम्न ग्रन्थ रहे हैं व उन्होने उसकी रचना मे यथासम्भव उनका कुछ उपयोग भी किया है-प्रवचनसार, समयसार, पचास्तिकाय, तत्त्वार्थसूत्र, रत्न- करण्डक, स्वयम्भूस्तोत्र, युक्त्यनुशासन, सर्वार्थसिद्धि, समाधिशतक, तत्त्वार्थवार्तिक, तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक, तत्त्वानुशासन, कार्तिकेयानुप्रेक्षा, द्रव्यसग्रह व उसकी ब्रह्मदेव विरचित टीका, अमितगति-श्रावकाचार और ज्ञानार्णव आदि। इनका ध्यानस्तव के ऊपर कितना प्रभाव रहा है, इसका स्पष्टीकरण मागे किया जायगा। इनमे पिछले द्रव्यसग्रह, अमितगति-श्रावकाचार और ज्ञानार्णव ये तीन ग्रन्थ हैं जो प्राय विक्रम की ११वी शताब्दी में रचे गये हैं। इससे इतना तो प्रतीत होता है कि प्रस्तुत ध्यानस्तव के कर्ता भास्कर- नन्दी ११वी शताब्दी के बाद हुए हैं, पर वे उसके कितने बाद हुए हैं, इसका निर्णय तब तक नही किया जा सकता जब तक कि कुछ उपयुक्त सामग्री सुलभ न हो सके। ग्रन्थ का विषय परिचय - जैसा कि ग्रन्थ का नाम है 'ध्यानस्तव' तदनुसार ही उसमे जिनस्तुति के रूप मे ध्यान की प्ररू- पणा की गई है । इस प्रकार का अपना अभिप्राय ग्रन्थकार ने मगल के रूप मे ग्रन्थ के प्रारम्भ मे ही व्यक्त कर दिया है। उन्होने सर्वप्रथम वहा यही कहा है कि मैं (भास्करनन्दी) आत्मसिद्धि के लिये योग से सम्पन्न स्तवनो के द्वारा अनन्त गुणो से व्याप्त परमात्मा की स्तुति करता हू (१-२)। आगे उक्त आत्मसिद्धि को स्पष्ट करते हुए यह कहा गया है कि आसक्ति से रहित सम्यग्दृष्टि जीव के जो सम्यग्ज्ञान- पूर्वक निज आत्मा की उपलब्धि होती है उसका नाम सिद्धि है। वह स्वात्मोपलब्धि शुद्ध ध्यान के ही उप- योग से होती है, उसके बिना वह सम्भव नही है। प्रकारान्तर से फिर भी उस आत्मसिद्धि के विषय मे यह कहा गया है कि अथवा ज्ञानावरणादि कर्मों के विनष्ट हो जाने पर जो अनन्त ज्ञानादि गुणो की प्राप्ति होती है या स्वात्मसवेदन होता है उसे हे भगवन् । आप के द्वारा सिद्धि कहा गया है (३-४) । आत्मा जो ज्ञानस्वरूप है उसका प्रतिभास यदि किसी को समाघि मे स्थित होने पर नहीं होता है तो मोह स्वभाव (अज्ञानस्वरूप) होने के कारण उसे ध्यान नहीं कहा जा सकता है (५)। ध्यान के लक्षण को दिखलाते हुए उसके जो आर्त, रौद्र, धर्म्य और शुक्ल ये चार भेद निर्दिष्ट किये गये हैं उनमे प्रथम दो ससार के कारण तथा अन्तिम दो मोक्ष के कारण हैं (६-८) । अनन्तर उक्त आर्त और रौद्र ध्यानो के स्वरूप को दिखलाकर उनके स्वामियो का भी निर्देश किया गया है (९-११) । घHध्यान के प्रसग मे प्रथमत जिनाज्ञा, अपाय, कर्मविपाक और लोकसस्थान के विचार को धर्म कहकर तत्पश्चात् विकल्प रूप मे उत्तम क्षमा आदि को, वस्तुस्वरूप को, सम्यग्दर्शनादि को और मोह-क्षोभ से रहित प्रात्मा के भाव को धर्म का लक्षण बतलाते हुए उससे अनपेत ध्यान को धर्म्यध्यान कहा गया है। १. त वृत्ति की प्रस्तावना पृ ४७-४८ २. महावीर स्मारिका १६७२, खण्ड २, पृ. २१-२२.

७६ ध्यानस्तव - माप ही यहा पर भी गृषित किया गया है रि मुग्न मागंप्यान माम मौरक्षाफक दोनो मणिगी पूर्व पप्रमत्त रे, पोर गौण धबध्यान प्रमतादि तीन ये-प्रमतमयत, गंपतासयत पोर गपिरतगम्माष्टि इन तीन रे-होता है (१२-१६)। पुस्तध्यान के प्रमग में उसके सरा का निर्देश करते हुए कहा गया है कि पतिगर पुन गे पं. ध्यान है यही शुक्लध्यान है जो दोनो श्रेणियों में होता है । पर चार प्रकार सा है। उन गार भेदो में प्रथम वितक, वीचार और पृययत्व से महित तपा इगो विपरीत दुगरा गित से ना प पोचार से रहित होकर एकरव से युक्त होता है। वितकं फा प्रयं ध्रुतज्ञान और पृथपत्य मा भयं विभिन्न मयों का प्रतिभाग है। गोग, पान्द योर भयं के नाम को वीचार कहा जा है। ये दोनो गुस्सम्यान पूर्व- वेदी (श्रुतवली) से होने है। योग की अपेक्षा वे श्रम से तीनो योग वाले शोर पिगी एक ही योग याने के होते हैं । तीसरा मृधमकिय-प्रातिपाती पुक्लध्यान परीर की मूक्ष्म प्रिया से युक्त सयोग केयसी के होता है। समुच्छिन्नस्यि-अनिवनी नाम या चोथा शुक्लध्यान नमस्त प्रात्मप्रशो को स्पिरता से मुक्त प्रयोग फेवनी से होता है (१६-२१) । यहा यह सफा उपस्थित हुई है कि अनेक पदार्थों का पालम्बन करने वालो चिन्ता गब मोर मे नष्ट हो जाने पर गवंज जिनके मम्भव नहीं है तब वैसी अवस्था में उक्त चिन्ता में निरोपाप यह ध्यान मवंम के फैमे सम्भव है ? इसके समाधान में यह कहा गया है कि योग पो प्रयोग गैलियो के जो देशतः मा पूर्णरूप से योगो का निरोध होता है वही उनका ध्यान है। प्रथया ममपूर्वप्रमापन नग को अपेक्षा उनके ध्यान का सदभाव समझना चाहिए (२२-२३)। मागे पूर्वोक्त सब ध्यान यो फिर से रिण्टम्य, पदस्य, स्पस्थ और स्पातीत के भेद से गार प्रभार फा निर्दिष्ट पिया गया है (२४)। उनमें से पिण्ठस्य ध्यान में अनेक प्रतिगयो य प्रातिहामांदि से विभूषित होकर कर्म को भस्ममान करते हुए अपने शरीर में स्थित मरहन्त परमेष्ठी का ध्यान प्रिया जा लिया जागा (२५-२८) । पदस्य ध्यान में ध्याता एकाग्रतापूर्वक भरहन्त के नामपदो में सयुक्त मा को पता (२६) स्पम्प ध्यान उम योगी के कहा गया है जो जिनेन्द्र के नामाक्षर और पर प्रतिदिन का मिन्न घ्यान मार रहा हो । अपया जो गुस, घयल, प्रात्मा से भिन्न य मानिहायादि गे विभूषित पागेर में माहित अरहन पर ध्यान करता है उमर ध्यान को सच पान गगमना पाहिए (36.३१)। जो अपने में पित, गरीर प्रमाण, भान-गम्बम्प, हर्ष-विपार मे रहिन पोर गार्म-गर निगम पारमगरा परमात्मा का ज्यान मारना, उसमें मोक्ष मा रण म पान मस गया (३२-३६) । यता ध्यान का न गमान हो जाता है। पर ध्यानपिनमा गर्ग कजिन शो नर को उनकी स्तुति में किया गया है, यतएव यहां देय पोर प्रमो' प्रालि गोपन पदो में मार पाया मजा' पपा गीत'मादिपली मा उपयोग किया। पागै गार यदिगमा पोरामा म पपमा प्रगट करने का है। जो पगेगापि में ममरार और पलार यदि दो या गरमा मन मोर मा गरमागमाने में पानी र गराई (२७) को सम्मान, rrrr पोर mirrit ना हर प्रमाण, नप पोर nि मायव में पाया में शामिोजागो, AITHril मा प्रापत में गर्म (२८.३१) । म मामा भागीदारा. या TIER सानोमा (४.५६), mri (५७). ri (५% १४), पाप attrai (:...}, प्रमा: (१) .7(११-36) ri (33st Ref Fit ! Fort.mratri, RITE Iranirmirfrre rat ri NHAT, Tant E८... Aatt) पिता है। Fr प्रस्तावना ভও सम्यग्दर्शनादि तीन को समुदित रूप मे मोक्ष का कारण बतलाकर ग्रन्थकार ने स्तुतिविषयक अपनी प्रस- मर्थता को व्यक्त करते हुए यह कहा है कि हे देव ! आप रुष्ट या सतुष्ट होकर यद्यपि किसी का कुछ भी नही करते है, फिर भी मनुष्य आपके विषय मे एकाग्रचित्त होने से स्वयमेव उसका फल प्राप्त करता है । मैंने यह जो कुछ भी स्तुति के रूप मे कहा है वह ध्यानविषयक भक्ति के वश होकर ही कहा है, न कि कवित्व के अभिमानवश । यदि मैं अल्पज्ञ होने से इसमे कुछ स्खलित हुआ हू तो विशिष्ट निर्मल बुद्धि के धारक विद्वान् उसे शुद्ध कर लें (६२-६८)। अन्त मे ग्रन्थकर्ता भास्करनन्दी ने अपना सक्षिप्त परिचय देते हुए इतना मात्र कहा है कि शरीर की ओर से अत्यन्त नि.स्पृह व दुश्चर तपश्चरण करने वाले एक सर्वसाधु हुए । उनके एक शिष्य श्रुत- समुद्र के पारगामी जिनचन्द्र हुए। उनके भास्करनन्दी नामक शिष्य ने आत्मचिन्तन के लिये ध्यान से समन्वित इस स्तवन को रचा है (९६-१००) । ध्यानस्तव पर पूर्व साहित्य का प्रभाव सर्वप्रथम यहा यह स्मरणीय है कि ध्यानस्तव के कर्ता भास्करनन्दी ने तत्त्वार्थसूत्र के ऊपर एक सुखबोधा नाम की सुबोध वृत्ति रची है । इस वृत्ति की आधार उक्त तत्त्वार्थसूत्र के ऊपर पूर्व में रची गईं सर्वार्थसिद्धि, तत्त्वार्थवातिक और तत्त्वार्थश्लोकवातिक प्रादि महत्त्वपूर्ण टीकायें रही हैं । प्रस्तुत ध्यानस्तव मे ध्यान व उसके प्रसग से जीवाजीवादि नौ पदार्थों, सात तत्त्वो, छह द्रव्यो, प्रमाण-नय-निक्षेपो और मोक्ष के मार्गभूत सम्यग्दर्शन, ज्ञान एव चारित्र का जो विवेचन किया गया है उसका आधार तत्त्वार्थसूत्र की उक्त टीकायें रही हैं। उनके अतिरिक्त पूर्वनिर्दिष्ट (पृ.७५) अन्य भी जो ग्रन्थ उसके आधारभूत रहे हैं उनका प्रस्तुत ध्यानस्तव से कहा कितना सम्बन्ध रहा है, इसका यहा विचार किया जाता है। १ प्रवचनसार-ध्यानस्तव के अन्तर्गत १४वें श्लोक मे मोह-क्षोभ से रहित आत्मा के भाव को धर्म कहा गया है । इसका आधार प्रवचनसार की यह गाथा रही है- चारित्तं खलु धम्मो धम्मो जो सो समो ति णिहिट्ठो । मोहक्खोहविहीणो परिणामी अप्पणो हि समो ॥ १-७ २ पचास्तिकाय-ध्यानस्तव (४०) में जीवाजीवादि नौ पदार्थों का जिस क्रम से निर्देश किया गया है वह उनका क्रम पचास्तिकाय मे उपलब्ध होता है । यथा- जीवाजीवा भावा पुण्ण पाव च पासव तेसि । सवर णिज्जर बंधो मोक्खो य हवति ते अट्ठा ॥१०८।। ३ समयसार- यही उनका क्रम समयसार (गा. १५) मे भी देखा जाता है। यह उनका क्रम तत्त्वार्थसूत्र (१-४) में निर्दिष्ट उनके क्रम से भिन्न है । ४ तत्त्वार्थसूत्र-ध्यानस्तव (८-२१) मे जो ध्यान के स्वरूप व उसके भेद-प्रभेदो का निरूपण किया गया है वह तत्त्वार्थसूत्र के अन्तर्गत ध्यान के प्रकरण (६, २७-४४) से प्रभावित है । ५ रत्नकरण्डक- ध्यानस्तव के श्लोक १४ मे जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को धर्म कहा गया है वह रत्नकरण्डक का अनुसरण करता है । रत्नकरण्डक मे उपयुक्त 'सदृष्टि ज्ञान-वृत्तानि धर्म धर्मेश्वरा विदु' इस श्लोक (३) के अन्तर्गत 'सदृष्टि-ज्ञान-वृत्तानि' पद को ध्यानस्तव मे जैसा का तैसा ले लिया गया है। ६ स्वयम्भूस्तोत्र-ध्यानस्तव के ६३वें श्लोक में यह कहा गया है कि हे देव | आप अनन्त गुणो से युक्त हैं, फिर भला मैं आपकी स्तुति-उन गुणो का कीर्तन-कैसे कर सकता हू? फिर भी मैंने १. तत्त्वानुशासन (५१) मे रत्नकरण्डक के उक्त श्लोक के इस पूर्वाध को अविकल रूप मे ग्रहण कर लिया गया है। - ७८ ध्यानस्तव । जो इस प्रकार से स्तुति की है वह ध्यान के अनुराग यश ही की है। यह कपन स्वयम्भूस्तोष के किन पलोको से प्रभावित है- गुणस्तोफ सदुल्लध्य तयाहुत्यकया स्तुतिः । धानन्त्यात गुणा वक्तुमाश्यास्त्पयि सा रूपम् ।। ८६. तथापि ते मुनीन्द्ररय यतो नागापि फोतितम् । पुनाति पुण्यको स्ततो यूयाम किचन ।। ८७. (इसका इलोक १५वा प्रौर ७०वा भी द्रष्टव्य है) ध्यानस्तव के ६४ व ६६वें श्लोक मे जो यह कहा गया है कि हे देव ! भाप गष्ट या सन्तुष्ट होकर यद्यपि किसी का कुछ भी बुरा भला नहीं करते हैं, फिर भी मनुष्य एकाग्रचित्त होकर पापना ध्यान करने मे समुचित फल को प्राप्त करता है, उसका प्राधार स्वयम्भूस्तोम के ये इलोक गई हैं.. न पूजयार्यस्त्वयि वीतरागे न निन्दया नाथ विवान्तवरे । तथापि ते पुण्यगुणस्मृतिनः पुनाति चित्त दुरिताम्जनेन्य. ॥ ५७. सुहत्त्वयि श्री-सुभगत्वमश्नुते हिपन त्वयि प्रत्ययवत् प्रलीयते । भवानुदासीनतमस्तयोरपि प्रभो ! पर चित्रमिदं तवेहितम् ॥६६. ७ युक्त्यनुशासन-ध्यानस्तव के पूर्वोक्त ६६वें श्लोक का अभिप्राय गुपत्यनुशासन में गोशोक २-३ के समान है। ५ सर्वार्थसिद्धि-ध्यानस्तव (६) मे नाना अर्थों का पालम्बन करने पानी पिन्ना में एक प में नियंत्रित करने को जो ध्यान का लक्षण कहा गया है वह मर्वार्थ सिति (९-२७) मे निविष्ट यान इम लक्षण से प्रभावित है-नानार्यावलम्बनेन चिन्ता परिम्पन्दवती, तस्या अन्याशेषमन्यो शायर एकस्मिन्नने नियम एकाग्रचिन्तानिरोध इत्युच्यते । ध्यानस्तव के ६१ लोक गे कर्मादान की निमित्तभूत नियामो के निरोष को जो सम्पमा मारिए कहा गया है वह समिति में निर्दिष्ट (१-१) चारित्र के इम नक्षण मे प्रभावित है-समाकारणनिति प्रत्यागूणस्य भानवत कर्मादाननिमित्तकियोपरमः सम्यकनारिणम् । प्रागे ध्यानस्तव के ६२वें नोक मे प्रोगधि का उदाहरण देते हुए सम्पादनादि सीन को समान रूप मे मोक्ष का कारण पाहा गया है । यह गभिप्राय सर्वार्थमिति मूत्र १-१ की उत्यानिका मैं ग प्रार व्यक्त किया गया है-xxxव्याध्यभिभूतस्य तहिनिवृत्युपायभूतभेगजाविषयव्यरतशानादिगामयाभाग- वद प्यन्तं मानादिर्मोक्षप्राप्त्युपायो न भवति । कि तदिलितय गमुदितामिति । १ समाधिसतक-ध्यानरतय (३६) में जो यहिगत्मा गे, म्यरूप का निर्देश किया गया है या ममाधिशतक के इम लक्षण गे प्रभायिन है - यहिगत्मा गैगरी जानामानि(1)। मही भाय गमागितायें व ५४२ पापा भी प्रगट फिया गया। १० तस्यावातिक ध्यानार (१५-१६) मे गम्यंप्यान में ग्यामियों का नि RT" उममा गभाय प्रमंयागम्यादष्टि र अप्रमरागगरा तर पार गुणगानों में प्रगट रियामा। गया प्राचार सत्यागानिर पा र नामिरियम मद (E, ३६, १२.१४) है। ११ सत्यायनोरयागिरगानयनांनी या माना गया* Furnfirmatmi १. मादिगण (२१, ५५.१६). TRAITA (६) प्रो. * (२८, 7) मोत्री मीरग मा मिनाहा rat aur in A TV ifrा दही'. तो Firm माग viit if मोरया'. द्वारा AENT: मानी गई प्रस्तावना - ७४ - । - - रूप ध्यान जड़ता अथवा तुच्छता स्वरूप नही है, उसका आधार तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक का वह प्रसग रहा है। १२ तत्त्वानुशासन-१ ध्यानस्तव मे ध्यान के लक्षण के पूर्व यह कहा गया है कि समाधि मे स्थित योगी को यदि आत्मा ज्ञानस्वरूप नही प्रतिभासित होती है तो मोहस्वभाव होने के कारण उसके ध्यान को यथार्थ ध्यान नहीं कहा जा सकता है (५)। इसका आधार तत्त्वानुशासन का निम्न श्लोक रहा है जो शब्द और अर्थ दोनो से ही समान है- समाधिस्थेन यद्यात्मा बोधात्मा नानुभूयते । तदा न तस्य तद् ध्यानं मूविन्मोह एव सः॥१६॥ २ ध्यानस्तव में ध्यान के लक्षण का निर्देश करते हुए यह कहा गया है कि चिन्ता के निरोध- स्वरूप वह ध्यान न तो जडतारूप है और न तुच्छ प्रभाव स्वरूप भी है, किन्तु वह ज्ञानस्वरूप आत्मा के सवेदनरूप है (६-७)। ध्यानस्तव का यह कथन मूलत तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक से प्रभावित रहा है। साथ ही वह तत्त्वा- नुशासन के निम्न श्लोको से भी प्रभावित है। चिन्ताभावो न जनानां तुच्छो मिथ्यादृशामिव । दृग्बोध-साम्यरूपस्य स्वस्य सवेदन हि सः॥ १६०॥ स्वरूपावस्थितिः पुंसस्तदा प्रक्षीणकर्मणः । नाभावो नाप्यचैतन्यं न चैतन्यमनर्थकम् ॥२३४॥ ३ ध्यानस्तव मे विकल्परूप से पाच प्रकार धर्म के स्वरूप को दिखलाते हुए उससे अनपेत (सम्बद्ध) ध्यान को घHध्यान कहा गया है (१२-१५) । यह अभिप्राय तत्त्वानुशासन के इन श्लोको मे निहित है- सदृष्टि ज्ञान-वृत्तानि धर्म धर्मेश्वरा विदुः । तस्माद्यदनपेत हि धम्यं तद् ध्यानमभ्यधुः ॥५१॥ मात्मनः परिणामो यो मोहक्षोभविवजितः। स च धर्मोऽनपेतं यत्तस्माद् धर्म्यमित्यपि ॥५२॥ शून्यीभवविद विश्व स्वरूपेण धृतं यतः । तस्माद्वस्तुस्वरूप हि प्राहुधर्म महर्षयः ॥५३॥ ततोऽनपेतं यज्ज्ञान तद् घHध्यानमिष्यते । धर्मो हि वस्तुयाथात्म्यमित्याऽप्यभिधानतः ॥५४॥ यश्चोत्तमक्षमादिः स्याद् धर्मो दशतयः परः। ततोऽनपेतं यद् ध्यानं तद् वा धयमितीरितम् ॥५५॥ ४ उक्त दोनो ग्रन्थो मे निश्चय और व्यवहार नयो का स्वरूप समान रूप में इस प्रकार कहा गया है- अभिन्नकर्तृ-कर्मादिविषयो निश्चयो नयः। व्यवहारनयो भिन्नकर्तृ-कर्मादिगोचरः॥ तत्त्वा. २६. अभिन्नकर्तृ-फर्मादिगोचरो निश्चयोऽथवा । व्यवहारः पुनर्वेव ! निर्दिष्टस्तद्विलक्षणः ।। ध्या. स्त. ७१. १. देखिये ध्यानस्तव श्लोक ६ का विवेचन, पृ. ५.; यह अभिप्राय तत्त्वानुशासन में भी श्लोक १६० व २३४ के द्वारा प्रगट किया गया है। २. त. श्लो. ६-२७, ५-६, पृ. ४९८-९९. ३. यह उत्तरार्ध भाग सोमदेव विरचित उपासकाध्ययन (११३) मे जैसा का तैसा उपलब्ध होता है । - ८० ध्यानस्तव इसके पूर्व प्यानस्तव के ७० प्लोफ में इन दोनो नयो के लक्षण में यह कहा जा चुका है जो ययावस्थित द्रव्य मोर पर्याय का निश्चय कराता है उसे निश्चयनय तपा इसमें विपरीत को यार नय कहा जाता है। अगले श्लोया (७१) मे चूकि उन दोनों नयो का लक्षण प्रकारान्तर से पुराना गया है, इसलिए उसकी सूचना करने के लिए यहा 'प्रथया' पद मा उपयोग किया गया है, जिसमीक तत्त्वानुशासन मे प्रावश्यकता नही रही । १३ फातिकेयानुप्रेक्षा-ध्यानस्तव के अन्तर्गत १३वें दलोक में 'उत्तमो वा तितिक्षादिपस्तुमान. थापर' यह निर्देश करते हुए उत्तम क्षमादिरूप दस घमों को व वस्तु के स्वरूप को धर्म कहा गया है। यह अभिप्राय कार्तिकेयानुप्रेक्षा की इस गाथा में निहित है- धम्मो वत्युसहायो समादिभायो य वसविहो धम्मो । रयणतयं च धम्मो जीवाण रक्सणं पम्मो ॥४७॥ १४ द्रव्यसंग्रह-जैसा कि ग्रन्य के नाम से ही प्रगट है, मुनि नेमिचन्द्र सितान्तिदेय (१५वी पाती) विरचित द्रव्यसग्रह में जीवादि छह द्रव्यो की सक्षेप से प्ररूपणा की गई है। उसमें समस्त गाथायें ५८ है। उनमे प्रारम्भ की २७ गाथानो मे उक्त छह द्रव्यो मी प्ररूपणा करके समापार ११ (२८-३८) गाघाप्रो मे जीव-अजीव आदि नौ पदार्थों को प्ररूपणा की गई है। अन्तिम मोक्ष पदार्ग का विवेचन करते हुए यह कहा गया है कि व्यवहार से उम मोक्ष का कारण सम्यग्ददांन, सम्यग्नान गौर सम्यक्चारित्र हैं तथा निश्चय से इन तीनो स्वरूप निज आत्मा है । इस प्रकार प्रसग पाकर यहा उरत सम्यग्दर्गनादि तीन का भी विवेचन करते हुए (३६-४६) यह कहा गया है कि निश्चय पोर पयहार से भेद से दो भेद रूप उस मोक्षमार्ग को चूकि मुनि जन ध्यान के प्राश्रय से ही प्राप्त करते है, पाएन प्रयत्नपील होकर उस ध्यान का अभ्यास करना योग्य है (४७) । इस प्रसग से यहा मागे धान को भी प्ररपणा की गई है। प्रस्तुत ध्यानस्तव में ध्यान की प्ररूपणा करते हुए आगे यह कहा गया है कि हे देव । जो मागरमा प्रमाण, नय और निक्षेप के आश्रय से नो पदार्थो, सात तत्वो, छह द्रव्यो, पाच प्रस्चिनायो और गैर य प्रात्मा के भेद को यथार्थरूप से जानता है वही पाप को देख सकता है-आप का ध्यान करने में समर्थ होता है। इस प्रसग से जो यहा उक्त पदार्थों प्रादि का निरूपण किया गया है यह पूषोn. सग्रह से काफी प्रभावित है । यपा- १ द्रव्यराग्रह मे ध्यवहार और निश्चय नय की अपेक्षा जीय को लक्षण का निर्देश पर यह कहा गया है कि व्यवहार से जिसके इन्द्रिय, बल, भागु और मान-प्राण (प्यासोच्छ्यास) ये पार प्राण पाये जाते हैं वह जीव कहलाता है तथा निश्चय नय को अपेक्षा जिमके चेतना पायी जाती है उसे जोग गाहा जाता है। ध्यानस्तव में जीव का लक्षण प्रपमरा पदार्थप्ररपणा गे प्रसग में पोर तपश्या* प्रसग में निर्दिष्ट किया गया है । पदार्य के प्रकरण में जो उगमा सना यह क्षण निधि किया गया है वह द्रव्यसमह के अनुमार निश्चय नपारित लक्षण है समाप में प्रकरण में जो उममा 'माधारण मयुक्त' यह लक्षण निर्दिष्ट किया गया है यह द्रव्याग्रह के प्रमुगार उममा ययाहार गयापित Teri | 1 - - १. रात्यानुशामन मे भी यारी पभिप्राय प्यन किया गया है। दोगोपी ममाना दलीय है- गपरिंतुग्लिो ध्यान यम्गादयाप्यो दिपियो नि। मादयस्य ध्यान गुपियः सदाप्यपाग्यालयम् ।। सरपानु. ३३. दुबि पि मोगा मा पानगदि मुनी निममा । गमा पपत्तरिता जून माग ममममह ॥.ग.४३.

ध्यानस्तव इनके पूर्व मानन्नय सोन नो नोमान में जोनसपस्यिा समोर पानिला राना है निवनय पा रोनार नप रहा नाता है। मनसोक (१) म किन सेनों नमो का नाम प्रकारात न.! गया , मनिए उसको सुगना करने के लिए यह प्रया' पर का उपयोग किया गया है. fittis तत्रानुशासन में मारपरा नही रही । १३ फानियानुप्रेक्षा -मानस के मनान १३ ओर में उसमा fiftariefinits. पापर.' यह निम करने उतम Afteen मोबास्तु के सर को धर्म कहा गया है। यह अभिशाप यानुप्रेक्षा को इस गाया में निहित है- धम्मो पत्यसहायो पनाग्निायो य वसविही पम्मो। रयगत्तम च धम्मो जीवाणं रस्सगं धम्मो॥७॥ १४ अप्पसह-माग्रिन्म नाम से ही प्रगट है, मुनि नमिपत्र fraries (81 दानी) रिचित व्यगर में जोयाहि यो को गोप स प्रहाना की गई है । म समान गाया ५८ है। उनले प्रारम्भ की २७ गायामों में उछह दमों की प्रपना REAL ११ (२८-३०) गाथामो में जीप मी प्रादि नो पार्यों को प्ररूपणा की गई है। मन्तिम मोहराम का विपन करने नए मह हा गया है कि व्यपहार से जम मोदी का कारण सम्मान, सम्मान मोर मम्बावाग्नि या मिना से इन तीनोम निज प्रारमा है। इस प्रकार प्रगा पाकर महा मम्यांना तीन का भी विवचन करते हुए (३१-४६) या कहा गया Eि FREE मोर मार में सोभर कर उग मांशमा को मिनि जन पान पाप हो प्राप्त कर पा प्रयत्नशील होकर जरा ध्यान का प्रभास करना योग्य (४७) । दश प्रसग में पदो का मान कामा प्रभा को गई। प्रस्तुत ध्यानल मे पानी सपना र मागे महकारा गया fatrika प्रगान, नम पोर ति प्राश्रम में जो पायो, मात iriinा, पit प्रतिको पोरगारो मामा को यमापंकजा. ही मार को 11-मार का मान कर मर्म होता है। समय से जो पहा पायो मानिसमा पा है File art. मागे काही प्रमाविमा-- १ ! हार और निent An inter Ren aurat १ मा ६f AAHIT गनिम के कि, :, मानु मोर -पान (Int) : पार कर मा. बानी Har Hist att || मा far tit पानी मागी मान में RTRER: REATRE और RTE APF RAH talat | TIL RAI 44100 मगर मनुमा EिNT Ife for Hit LIFE AITHI म* is re Frienाममा viff sugar ki nangi ta, nो १. शाम भाfal orientist attant Fitkatretainmitial.ln ruianalitimainst thinku rang it, Hin, and ... .

प्रस्तावना २ द्रव्यसग्रह मे उपयोगस्वरूप जीव के लक्षण मे समाविष्ट चेतना को स्पष्ट करते हुए यह कहा गया है कि व्यवहार नय की अपेक्षा आठ प्रकार का ज्ञान और चार प्रकार का दर्शन यह जीव का सामान्य लक्षण है, किन्तु निश्चय की अपेक्षा इस भेदकल्पना से रहित शुद्ध ज्ञान व दर्शन ही जीव का लक्षण है। ध्यानस्तव मे भी उस चेतना के सम्बन्ध मे यह कहा गया है कि वह चेतना ज्ञान और दर्शन से अनुगत है। आगे उस ज्ञान के सत्य व असत्य की अपेक्षा आठ (५+३) और दर्शन के चार भेदो का लक्षणनिर्देशपूर्वक व्याख्यान किया गया है। ३ द्रव्यसग्रह मे यथाप्रसग यह निर्देश किया गया है कि छद्मस्थो के जो ज्ञान होता है वह दर्शन- पूर्वक होता है, परन्तु केवली भगवान् के वे दोनो (ज्ञान-दर्शन) साथ ही होते है। उक्त ज्ञान-दर्शन की पूर्वापरता का उल्लेख ध्यानस्तव मे भी उसी प्रकार से किया गया है। ४ द्रव्यसग्रह मे आस्रव का निरूपण करते हुए उसके दो भेद निर्दिष्ट किये गये हैं-भावानव और द्रव्यास्रव । आत्मा के जिस परिणाम के द्वारा कर्म का आगमन होता है उसे भावास्रव कहते हैं, वह मिथ्यात्व आदि के भेद-प्रभेदो से बत्तीस (५+५+१५+३+४) प्रकार का है । ज्ञानावरणादि कर्मों के योग्य जो पुद्गल द्रव्य का आगमन होता है उसे द्रव्यानव कहा जाता है। लगभग इसी प्रकार का अभिप्राय ध्यानस्तव मे भी सक्षेप से इस प्रकार प्रगट किया गया है- जीव के जिस भाव के द्वारा कर्म का आगमन होता है उसे भावानव कहते है, जो रागादि अनेक भेर्दो स्वरूप है । योग अथवा द्रव्य कर्मों के आगमन को आस्रव (द्रव्यास्रव) जानना चाहिए। ५ द्रव्यसग्रह मे संवर के दो भेदो का निर्देश करते हुए कर्मास्रव के रोकने के कारणभूत चेतन परिणाम को भावसवर और कर्मास्रव के रुक जाने पर जो द्रव्य कर्म का निरोध होता है उसे द्रव्यसवर कहा गया है । आगे यहा भावसवर के ये भेद कहे गये है व्रत, समिति, गुप्ति, धर्म, अनुप्रेक्षा और अनेक भेदभूत चारित्र। ध्यानस्तव में भी यही कहा गया है कि प्रास्रव का जो निरोध होता है उसे सवर कहते हैं। वह द्रव्य और भाव के भेद से दो प्रकार का है, जो तप व गुप्तियो आदि के द्वारा सिद्ध किया जाता है। इस प्रकार वह अनेक प्रकार का है। ६ इसी प्रकार द्रव्यसग्रह मे दो प्रकार की निर्जरा का भी निर्देश करते हुए यह कहा गया है कि यथाकाल-कर्मस्थितिकाल के अनुसार-अथवा तप के द्वारा जिसका रस (परिणाम) भोगा जा चुका है वह कर्मपुद्गल जिस भाव के द्वारा आत्मा से पृथक् होता है उसका नाम भावनिर्जरा है, तथा कर्म- पुद्गल का जो आत्मा से पृथक् होना है उसका नाम द्रव्यनिर्जरा है । इस प्रकार निर्जरा दो प्रकार की है। ध्यानस्तव मे भी इसी अभिप्राय को प्रगट करते हुए यह कहा गया है कि तप के द्वारा अथवा काल के अनुसार जिसकी शक्ति-फलदानसामर्थ्य-को भोगा जा चुका है वह कर्म जो विनष्ट-प्रात्मप्रदेशो से पृथक्-होता है उसका नाम निर्जरा है, जो चेतन-अचेतनस्वरूप है-भाव व द्रव्य के भेद से दो प्रकार की है। उक्त दोनो ग्रन्थो के इन पद्यो मे जो शब्द व अर्थ की समानता है वह दर्शनीय है- जहकालेण तवेण य भुत्तरसं कम्मपुग्गल जेण । भावेण सडदि या तस्सडणं चेदि णिज्जरा दुविहा॥ द्र. सं. ३६ - १. द्रव्यसग्रह ६. २. ध्यानस्तव ४१-४७ (तुलना के लिए द्र. स. की ४-५ व ४२-४३ गाथायें भी द्रष्टव्य है) ३. द्रव्यसग्रह ४४. ४. ध्यानस्तव ४८. ५. द्रव्यसग्रह २६.३१. ६. ध्यानस्तव ५२. ७.द्रव्यसग्रह ३४-३५. ८. ध्यानस्तव ५३. Asann4- ध्यानस्तव तपोवपासना कम पर मना ! नस्यत् नि नजानम् ॥at स. ५६. मान, गांप, 4. कामा uithोनो त्यो fast भाकिया गया। नांनी मिनी का FIR Firmitो है। मना ना मान मनुनार पाना पाम, मन, मन, प्रमोद मान नपा को युग और माल के मा नो पाटि frunnitut. राम' नमनार' मानुसार जोर, मोर पुन, पा, पाप, नरनिया को म कम TEE नोnia निमरिया गया। प्र के समान मानम गुम पार IT का भीग और मार ar nहा गया है। मामला मनिष्टि पुचता का Meri पनातिर नो पcिe Tuet ता पग पगार थप भार माला लिगमनमह म पूर्व Hai ' भी लिया गया, पर माता का रो सिमकार ससप पाया II प्रकार भाष बया में नहीं होता है। इस यही प्रतीत हानिकार TE Tमो usat मानिदो नानीमा मह सामार गेलो हो"। माह मे निमा सम्पन्नानि स ग त हा मfo HRATो नाम सिगार मानून माला 60 लिए नो पा मोरयामा रा निरोया है पर गया। 4 - १. ग. - ग ३२, मो.- Pा ५५, नो . २... ग.१.४ ३ पान चयन गरrinा मन्ग-पा। inा में समान समपानी... २८. 1. नोजोमा पुगni i मान । मना.निबमोमास पर ।। प. हा... . t-trafffilion NEET...] चरित: narifteen Arr confenfrathite it alrite! 1 . २, १०.२५ E. 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KHATE HERE: A RETTE :: PAHENiti मा पा ! २१:11.!.!.() . oft 1.2 ९ fatfaiiafter t" :.4r.fel : 1 ... ... .....nit- -- ४, traft tutatist ..1 1 प्रस्तावना ५३ लगभग इसी प्रकार से उसके लक्षण का निर्देश करते हुए 'ध्यानस्तव मे भी यह कहा गया है कि आसक्ति से रहित होकर समीचीन श्रद्धा के धारक (सम्यग्दृष्टि) सम्यग्ज्ञानी जीव के ससार के कारण को नष्ट करने के लिए कर्मादान की कारणभूत क्रियाओ का जो निरोध होता है उसका नाम सम्यक्- चारित्र है। द्रव्यसग्रह मे ध्यान के प्रसग मे यह कहा गया है कि मुनि जन चूकि निश्चय व व्यवहार रूप दोनो प्रकार के मोक्षमार्ग को ध्यान के आश्रय से ही प्राप्त किया करते है, इसीलिए प्रयत्नशील होकर ध्यान का अभ्यास करना चाहिए। यह कहते हुए आगे उसके विषय मे इतना मात्र निर्देश किया गया है कि यदि विचित्र ध्यान की सिद्धि के लिए चित्त की स्थिरता अभीष्ट है तो इष्ट व अनिष्ट विषयो में मोह, राग और द्वेष को छोड देना चाहिए। इसमे ध्यान की सिद्धि के लिए जो चित्त की स्थिरता की आवश्यकता प्रगट की गई है वह ध्यान के लक्षण की ज्ञापक है, कारण यह है कि चित्त की स्थिरता का ही नाम तो ध्यान है । साथ ही वहा जो मोह, राग और द्वेष के परित्यागविपयक प्रेरणा की गई है उससे ध्याता के स्वरूप का बोध हो जाता है । अभिप्राय यह है कि जो इष्ट-अनिष्ट विषयो से राग, द्वेष एव मोह (आसक्ति) को छोड़ चुका है वही एकाग्रचिन्तानिरोध स्वरूप ध्यान का ध्याता होता है। यहा मूलग्रन्थकार ने ध्यान के भेद-प्रभेदो का कोई निर्देश नही किया । जैसा कि गाथा ४६ मे निर्देश किया जा चुका है, मोक्षमार्ग की प्राप्ति का कारणभूत होने से सम्भवतः उन्हें उस ध्यान के प्रशस्त व अप्रशस्त भेद अभीष्ट नही रहे हैं। फिर भी टीकाकार श्री ब्रह्मदेव ने गाथा ४८ मे उपर्युक्त 'विचित्त- झाणप्पसिद्धीए' पद के अन्तर्गत 'विचित्र' शब्द से अनेक प्रकार के ध्यान को ग्रहण करते हुए उसके आतं, रौद्र, धर्म और शुक्ल इन चार भेदो के साथ उनमे प्रत्येक के अन्तर्भेदो का भी व्याख्यान किया है। ये भेद-प्रभेद तत्त्वार्थसूत्र आदि अनेक ग्रन्थो मे सुप्रसिद्ध है । तदनुसार ध्यानस्तव मे भी यथास्थान उन भेद-प्रभेदो की प्ररूपणा की गई है। टीकाकार ब्रह्मदेव ने ध्यान के विशेपणरूप पूर्वोक्त 'विचित्र' शब्द से विकल्परूप मे एक श्लोक को उद्धृत करते हुए पदस्थ, पिण्डस्थ, रूपस्थ और रूपातीत इन ध्यान के विविध भेदो की भी सूचना की है। १५ अमितगति-श्रावकाचार- इसमे सम्यक्त्व के सराग और वीतराग इन दो भेदो के स्वरूप को दिखलाते हुए क्षायिक सम्यक्त्व को वीतराग और शेष दो को सराग कहा गया है। आगे यह निर्देश किया गया है कि जो सम्यक्त्व प्रशम व सवेग आदि से प्रगट होता है उसे सराग सम्यक्त्व कहा जाता है। वीतराग सम्यक्त्व का लक्षण उपेक्षा है (२, ६५-६६)। अमितगतिश्रावकाचार के समान ध्यानस्तव (८२-८४) मे भी सम्यक्त्व के उक्त दो भेदो का निर्देश करते हुए एक को सरागाश्रित और दूसरे को वीतरागाश्रित बतलाया है । वहा सराग सम्यक्त्व का लक्षण प्रशम-सवेगादि से प्रगट होना और वीतराग सम्यक्त्व का लक्षण विशुद्धि मात्र-राग-द्वेष के प्रभावस्वरूप उपेक्षा-कहा गया है। दोनो मे कुछ शब्दसाम्य भी इस प्रकार है- १. ध्यानस्तव ६०-६१ २ देखो पीछे पृ ८० का टिप्पण १. ३ मा मुज्झह मा रज्जह मा दूसह इट्ठणि?अट्ठसु । थिरमिच्छहि जइ चित्त विचित्तझाणप्पसिद्धीए ।।द्र स ४८. ४ बृहद्र. टी. ४८, पृ १७४-७७ ५ ध्यानस्तव ८-२१. ६ बृहद्र. टी ४८, पृ १८५, ध्यानस्तव २४-३६ मूल मे यह दोनो ग्रन्थो का कथन सर्वार्थसिद्धि व तत्त्वार्थवार्तिक पर आधारित है। यथा-तद् द्विविध सराग-वीतरागविषयभेदात् । प्रशम-सवेगानुकम्पास्तिक्याद्यभिव्यक्तिलक्षणं प्रथमम् । प्रात्म- विशुद्धिमानमितरत् । स. सि. १-२, त. वा. १, २, २३-३१. ७.

मग-मासिम कारनाशनम् । मराम दानापमा परम् ॥ भ. श्री २.६६. प्रमाणात पातोमातिापत । चौरस्य यतिमातमत गरामरय दानम् ॥ या. ३. पुमो विशरिमान गीत रामाभयं माम् ॥ पूर्ग सानो ग्रनमा धर्म, समर प्रगानीमा I fifteen- पापमपानामसत्ययाः प्रवासाः । अनन्तानन्तनानाले पुगतानामवास्ताः ।। म प्रा. ३.३२. धर्माधर्मीयाना सायातीतप्राता। व्योम्नोतव पुगताना विधा तया ॥ प्या. स. १३. मनी मनीमार पर सरकार मा मालावरम निरोधो यः परः स निगयते । नायध्यविमान विविध. तसवरः ॥प. प्रा. ३ ५६ मासनस्य निरोयो यो ट्य-भावाभिधात्मक। तपोगरयादिनिः साध्यो नल्या संपरो हिस' | घ्या. a ५३. अमितावागार ३.३६, ३-१.४, ३-६३ पोर १५-१७ भी मग भ्यान H५२, ५५,५१ प्रोर १३.१५सीको ने मिन किया जा । अमिताता-यायापार न पाहि पासिया बना दिया उनका वर्णन प्राना में भी किया है। गया ~~ पिन १५.१.४३ १५,१०-१३ 24,५५-५६ दीना मामाकी समान - -मन गुमारिलायन। मा २. inct Amar fortunar farm | प्रमानवीयता स्वयमभव ॥ म पा. १५-५. 3. --zafnaisrin Enा. 1. २६ - प्राnिarinaar | प्र. पा. १५.११. - Tamang AIMERIT २५. EVERITAIfsniitata ! प पा ११.१५ uintHNIC anR. All (" #hattisETurairat. 4 . Start -11... rutti mit १ . 4-1 at R',. HIREE: 4 4 . r , . .

प्रस्तावना - वर्णन विस्तार से किया गया है वहा ध्यानस्तव में उसका वर्णन बहुत संक्षेप से किया गया है। फिर भी वह अपने आपमे परिपूर्ण है । उसमें ज्ञानार्णव के साथ कुछ समानता दृष्टिगोचर होती है । यथा- ज्ञानार्णव मे वहिरात्मा के स्वरूप को दिखलाते हुए यह कहा गया है कि जो शरीर आदि मे आत्म- बुद्धि रखता है उसे बहिरात्मा जानना चाहिए। इस बहिरात्मस्वरूप को छोडकर व अन्तरात्मा होकर विशुद्ध व अविनश्वर परमात्मा का ध्यान करना चाहिए। यहा उस अन्तरात्मा के स्वरूप को दिखलाते हुए यह कहा गया है कि जो बाह्य पदार्थों का अतिक्रमण करके आत्मा मे ही आत्मा का निश्चय करता है वह अन्तरात्मा कहलाता है। ध्यानस्तव मे भी लगभग इसी अभिप्राय को व्यक्त करते हुए यह कहा गया है कि जो जीव शरीर, इन्द्रिय, मन और वचन मे ममकार व अहकार बुद्धि को करता है वह बहिरात्मा कहलाता है और हे भगवन् । वह आपको देख नही सकता है आपका ध्यान करने में असमर्थ रहता है । इसके विपरीत जो शरीर व आत्मा मे भेद करता हुआ सम्यग्दर्शन-ज्ञान चारित्र से सम्पन्न होकर प्रमाण, नय और निक्षेप के आश्रय से नौ पदार्थों, सात तत्त्वो, छह द्रव्यो और पाच अस्तिकायो को यथार्थरूप में जानता है उसे अन्तरात्मा कहते है और वह आपको देख सकता है-~परमात्मा के ध्यान में समर्थ होता है। ध्यानस्तव मे जिन पिण्डस्थ-पदस्थ आदि ध्यानों का सक्षेप से विचार किया गया है उनका वर्णन ज्ञानार्णव' मे काफी विस्तार से किया गया है। दोनो के वर्णन मे शब्द व अर्थ से कुछ समानता इस प्रकार देखी जाती है- 'पिण्डस्थ च पदस्थं च रूपस्थ रूपवजितम्' यह श्लोक का अर्ध भाग समानरूप से दोनो ग्रन्थो मे पाया जाता है। 'सर्वातिशयसम्पूर्ण' यह पद समान रूप से ज्ञानार्णव (७८, पृ. ४०१ व २, पृ. ४०६) और ध्यान- स्तव (२६) दोनो मे देखा जाता है। ज्ञानार्णव (१३, पृ ४३३) मे प्रथम शुक्लध्यान का निर्देश करते हुए यह कहा गया है- सवितक सवीचार सपृथक्त्व तदिष्यते । ध्यानस्तव (१७) मे भी उसका निर्देश इस प्रकार किया गया है-सवितकं सवीचार सपृथक्त्व- मुदाहृतम् । । - - १. ज्ञाना. श्लोक ६,७ व १०, पृ. ३१७ १८. २ ध्यानस्तव ३७-३६ (श्लोक ३९ मे उपयुक्त 'प्रमाण-नय-निक्षेपै.' पद ज्ञानार्णव के श्लोक ८ (पृ ३३८) मे भी उसी प्रकार पाया जाता है । ३ ज्ञानार्णव के अतिरिक्त इन चारो ध्यानो का वर्णन अन्य भी कितने ही ग्रन्थो में किया गया है (देखिये पीछे प्रस्तावना पृ १८-२५) । ४ पृ. ३८१-४२३ (इन चारो ध्यानो का विस्तार से निरूपण योगशास्त्र के सातवें, आठवें, नौवें और दसवें इन चार प्रकाशो में भी किया गया है, पर वह ज्ञानार्णव से सर्वथा समान है।) ५. ज्ञाना १, पृ. ३८१ (पूर्वाध); ध्यानस्तव २४ (उत्त).

विषयानुक्रमणिका (ध्यानशतक) ૨ ३ nि पीर को गाम कर चानापन पनि गाना नाम मानका गगनी मान समान होने पर II मम्मी कसा होता है ना ATEST मानना कर मातंगाना BEIFT पर नार र पातमान में पर .माnि है, माटीर रन Ruriचान को माना ! से निग CHAमा RT til? THERETIRIT धमनरेगा जान पाया। मन गो प्रागन नागा मनिमinium में - प्रnिist भवानमा पगंधान पान if का F1**9c1 पध्याय (m); mat ५ Trirat 7 mir या मा att 1 NDTfil • पो भो. urint मो trintin. -THEtatt * ? * Patihin 17. 401 it trutr FREER ܕܐ ܐ !?ܕܙ. ܬ݁ܳ ܕ݁ܶܝܢܚ;; २... - S . . ३ , . 4 14 है ....1 11 .

विषयानुक्रमणिका ८७-८८ धर्मध्यान मे सम्भव लेश्याओ का निर्देश ६६ । केवली के मन का अभाव हो जाने पर भी धर्मध्यान के अनुमापक हेतु ६७-६८ शुक्लध्यान की सम्भावना ८४-८६ शुक्लध्यान के आलम्बन ६६ | शुक्लध्यान के समाप्त होने पर चिन्तनीय धर्मध्यानगत क्रम की अपेक्षा शुक्लध्यानगत चार अनुप्रेक्षाओ का निर्देश क्रम की विशेषता शुक्लध्यान मे सम्भव लेश्या ८६ शुक्लध्यान के इस प्रसग मे मनोयोग- शुक्लध्यान के अनुमापक लिंगो का निर्देश निरोध के क्रम की प्ररूपणा ७१-७५ करते हुए उनका स्वरूप ९०-६२ वचन व काय का निरोप ७६ | धर्मध्यान और शुक्लध्यान का फल ६३-६५ शुक्लध्यान के प्रसग मे ध्याता का निरूपण ध्यान मोक्ष का हेतु है, इसका अनेक करते हुए उसके चार भेदो का स्वरूप ७७-८२ दृष्टान्तो द्वारा स्पष्टीकरण ६६-१०२ योगाश्रित शुक्लध्यान के चार भेदो के ध्यान का ऐहलौकिक फल १०२-४ स्वामियो का निर्देश ८३ ध्यान का उपसहार १०५ - (ध्यानस्तव) श्लोक सख्या ३०-३१ ३२-३६ ३७ ३८-३६ ४० ४१-४२ ४३-४५ ४६.४७ विषय श्लोक सख्या विषय आत्मसिद्धि के निमित्त परमात्मा की स्तुति १-२ रूपस्थ ध्यान का स्वरूप सिद्धि का स्वरूप ३-४ | रूपातीत ध्यान का स्वरूप ज्ञानस्वरूप प्रात्मा के प्रतिभास विना ध्यान बहिरात्मा के देवदर्शन की असम्भावना सम्भव नहीं ५ अन्तरात्मा के देवदर्शनविषयक सामर्थ्य ध्यान के स्वरूप का निर्देश करते हुए वह नौ पदार्थों का निर्देश अध्यात्मवेदी के होता है, इसका जीव का लक्षण चेतना वतलाते हुए उस स्पष्टीकरण ६-७ चेतना का स्वरूप ध्यान के चार भेदो का निर्देश करते हुए स्वरूपनिर्देशपूर्वक ज्ञान के आठ भेद व आर्त-रौद्र की ससारहेतुता व धर्म-शुक्ल उनका स्वामित्व की मोक्षहेतुता का निर्देश दर्शन का स्वरूप व उसके भेद आर्तध्यान के चार भेद व उनके स्वामी ज्ञान-दर्शन क्रम से होते है या साथ, चार भेद स्वरूप रौद्रध्यान का स्वामित्व ११ इसका स्पष्टीकरण धर्म के स्वरूप को दिखलाते हुए उससे अन- अजीव का लक्षण पेत धर्म्यध्यान के चार भेदो का निर्देश पुण्य के दो भेद व उनका स्वरूप व स्वामित्व १२-१३ पाप के दो भेद व उनका स्वरूप शुक्लध्यान के स्वरूप को प्रगट करते प्रास्रव का स्वरूप उसके चार भेद व स्वामित्व १६-२१ सवर का स्वरूप व भेद मोह के क्षीण हो जाने पर सर्वज्ञ के ध्यान निर्जरा का स्वरूप कैसे सम्भव है, इसका स्पष्टीकरण २२-२३ बन्ध का स्वरूप ध्यान के अन्य चार भेद २४ मोक्ष का स्वरूप पिण्डस्थ ध्यान का स्वरूप २५-२८ सात तत्त्वो की सूचना पदस्थ ध्यान का स्वरूप छह द्रव्यो का निर्देश ४८ ४६ ५२ ५४ ५६ २६ तुगाकर Tat पिनाना करना ममानित .२, मानी गमी... रन,ft 1 forfifini Hit aat. सोम प्रस्तिका मनाम कौनगरानी rit.it सविधान र गाउमगर मोक्षमार्ग TANT HTrरगा मन्तिम शुद्धि पत्न (ध्यानशता) (प्यानस्तष) पर गुष ३ गुवा RITTो + Aft १० पाय 11मा न attraffe .imit • irritti far 4 १० रको भू + म Thtriart 2 . * * totke it . utari नेन 14 ...... Fifette . " . , . nars ki shairit श्रीमद्धरिभद्रसूरि-विरचित-वृत्त्या समन्वित ध्यानशतकम् (ध्यानाध्ययनापरनामधेयम्) घ्यानशतकस्य च महार्थत्वाद्वस्तुत शास्त्रान्तरत्वात् प्रारम्भ एव विघ्नविनायकोपशान्तये मङ्गलार्थ- मिष्टदेवतानमस्कारमाह- वीरं सुक्कझाणग्गिदड्ढकम्मिघण पणमिऊणं । जोईसरं सरण्णं भाणज्झयणं पवक्खामि ॥१॥ वीर शुक्लध्यानाग्निदग्धकर्मेन्धन प्रणम्य ध्यानाध्ययन प्रवक्ष्यामीति योग, तत्र 'ईर गति-प्रेरणयो.' इत्यस्य विपूर्वस्याजन्तस्य विशेषेण ईरयति कर्म गमयति याति वेह शिवमिति वीरस्त वीरम्, किंविशिष्ट तमित्यत आह-शुच क्लमयतीति शुक्लम्, शोक ग्लपयतीत्यर्थ , घ्यायते-चिन्त्यतेऽनेन तत्त्वमिति ध्यानम्, एकाग्रचित्तनिरोध इत्यर्थ , शुक्ल च तद् ध्यान च तदेव कर्मेन्धनदहनादग्नि शुक्लध्यानाग्नि , तथा मिथ्या- दर्शनाऽविरति-प्रमाद-कषाय-योग क्रियते इति कर्म-ज्ञानावरणीयादि, तदेवातितीव्रदु खानलनिबन्धनत्वा- दिन्धन कर्मेन्धनम्, ततश्च शुक्लध्यानाग्निना दग्ध-स्व-स्वभावापनयनेन भस्मीकृत कर्मेन्धन येन स तथाविध- स्तम्, 'प्रणम्य' प्रकर्पण मनोवाक्काययोगर्नत्वेत्यर्थ , समानकर्तृकयो पूर्वकाले क्त्वा-प्रत्ययविधानात्, ध्यानाध्ययन प्रवक्ष्यामीति योग , तत्राधीयत इत्यध्ययनम्, 'कर्मणि ल्युटू' पठ्यत इत्यर्थ , ध्यानप्रतिपादकमध्ययन २, तद् याथात्म्यमङ्गीकृत्य प्रकर्षण वक्ष्ये- अभिधास्ये इति, किंविशिष्ट वीर प्रणम्येत्यत आह-'योगेश्वर योगीश्वर वा' तत्र युज्यन्ते इति योगा -मनोवाक्कायव्यापारलक्षणा , तैरीश्वर -प्रघानस्तम्, तथाहि-अनुत्तरा एव भगवतो मनोवाक्कायव्यापारा इति, यथोक्तम्-'दव्वमणोजोएण नणणाणीण अणुत्तराण च । ससयवोच्छित्ति केवलेण नाऊण सइ कुणइ ॥१॥ रिभियपयक्खरसरला मिच्छितरतिरिच्छसगिरपरिणामा । मणणिव्वाणी वाणी जोयणनिहारिणी ज च ॥२॥ एक्का य अणेगेसि ससयवोच्छेयणे अपडिभूया। न य णिविज्जइ सोया मैं शुक्लध्यानरूप अग्नि के द्वारा कर्मरूप ईंधन के जला देने वाले योगीश्वर व शरणभूत वीर को नमस्कार करके ध्यानाध्ययन को कहूगा। विवेचन-यहा ग्रन्थकार ने सर्वप्रथम वीर को नमस्कार करके प्रकृत ध्यानाध्ययन-ध्यान के प्ररूपक इस ध्यानशतक ग्रन्थ-के रचने की प्रतिज्ञा की है । 'वीर' से यहाँ अन्तिम तीर्थंकर महावीर जिन की अथवा ज्ञानावरणादिरूप समस्त कर्म को नष्ट करके मुक्ति को प्राप्त कर लेने वाले परमात्मा की विवक्षा रही है । उस वीर की विशेषता यहा शुक्लध्यानाग्निदग्धकर्मेन्धन, योगेश्वर अथवा योगीश्वर और शरण्य इन तीन विशेषणो के द्वारा प्रगट की गई है- १. शुक्लध्यानाग्निदग्धकर्मेन्धन-शुच क्लमयतीति शुक्लम्' इस निरुक्ति के अनुसार जो ध्यान शोक आदि दोषो को दूर करने वाला है वह शुक्लध्यान कहलाता है । "क्रियते इति कर्न' इस निरुक्ति के अनुसार जो मिथ्यादर्शन व अविरति आदि के द्वारा किया जाता है-बाधा जाता है-ऐसे ज्ञानावरणा- दिरूपता को प्राप्त पुद्गलपिण्ड को कर्म कहा जाता है। वह दुःखरूप अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए 'गानाराम -- TERIग. ift: htritt artist :: :: मामा !::, नाना Piratis... नाrare inter IITHI TETantr: Taranawitri, RiRetitisinter sti firit . . नाम - गला tirteम. •itin: भाना..:- TERMITTEE . ETTurmin, न, fatantrongirlfrient.tit. • Rial • गोयामिLE, Artti ant मान, निमा...REFift rift- Ri. Krifrr:frirani ! | RETIRift.t पिरमरमाणं तं नाचतं तयं चितं । तं होज्न भावणा या अणुपहा या प्रत्य चिना ॥२॥ गग-निकम मान-~it -4 मि. iitut लानन्' प्रा. RETraffinitiatinit"irt. ':31 TEfer free, tantriilft sirlfriends II- Inा मा.माना Trirint, n frarel, whitt ! r-marterirrifi Arth. Himal fort 18377179741 ni for vin if initiati, si i Pol 1, 17-p"$*$ ii ofs पिन रा काम करता है। इस मा को 3. पीर ARE नि ! rrfant. IT नारमान वा गरा २. गोगामीजी, कान, IITTER.iturt, पोरापोगनातीनी मान या. पारम), पाne TV पोर untia a ak - Trt 4 है। stitute जीगर'm faitanामना... मना है . HARRANIKHATAT IRR ME} # MImarthi । पाग में aitin frया - धाम में atr in Aust ki Turril-नए intremisartan itset in urintी net | Hindi ARUITlanet 1. ग.nittat it i artant 't Fifti tatti ismirmitteep wrt tu पारा MEng - RAAKAARom- ARNamade loma A 4. Katirikt १ मा भाग. Exit Fast Tr 4 chatrniml को Wwth Akrit triitoint in tink | 4taal+ Mat ......THI KAA Ant Mein REER HAR # to t taken Hawa yet air Air it Fily THE STREATMant taeol -- سد . - ध्यानसामान्यस्वरूपादि गाथार्थ ॥२॥ इत्य ध्यानलक्षणमोपतोऽभिधायाधुना ध्यानमेव काल-स्वामिभ्या निरूपयन्नाह- अंतोमुहुत्तमेत्तं चित्तावत्थाणमेगवत्युमि । छउमत्थाणं झाणं जोगनिरोहो जिणाणं तु ॥३॥ इह मुहूर्तः सप्तसप्ततिलवप्रमाण कालविरोपो भण्यते, उक्त च-फालो परमनिरुद्धो अविभज्जो त 'तु जाण समयं तु । समया य असरोज्जा भवति ऊतास-नीमासा ||१॥ हदम्न अणवगल्लस्स णिरुवफिट्टस्म जतुणो । एगे ऊसास-नीसासे एस पाणुत्ति वुच्चइ ।।२।। सत्त माणूणि से योये सत्त थोवाणि ते लवे। लवाण 'सत्तहत्तरीए एस मुहुत्ते वियाहिए ॥३।। अन्तमध्यकरणे, ततश्चान्तर्मुहूर्तमात्र फालमिति गम्यते, मात्रशब्द- स्तदधिककालव्यवच्छेदार्थ, ततश्च भिन्नमहतंगेव कालम् । किम् ? "चितावम्यानम्' इनि चित्तस्य मनस अवस्थान चित्तावस्यानम्, अवस्थिति अवस्थानम्, निष्पकम्पतया वृत्तिरित्ययं । पव ? 'एकवस्तुनि' एकम् अद्वितीयम्, वसन्त्यस्मिन् गुण-पर्याया इति वस्तु चेतनादि, एक च तद्वस्तु एकवस्तु, तस्मिन् २, 'छद्म- स्थाना ध्यानम्' इति, तत्र छादयतीति छद्म पिधानम्, तच्च ज्ञानादीना गुणानामावारफत्याज्ज्ञानावरणादि- लक्षण पातिकम, छानि स्थिताश्छास्था अफेवलिन इत्यर्थ, तपा उपम्यानाम्, 'ध्यान' प्राग्वत्, ततश्चाय समुदायार्थ --अन्तर्मुहर्तकाल यच्चित्तावस्थानमेकस्मिन् वस्तुनि तच्छमस्थाना ध्यानमिति, 'योगनिरोधी जिनाना तु' इति, तत्र योगा -तत्त्वत औदारिकादिशरीरसयोगममुत्था प्रात्मपरिणामविशेपव्यापारा एव, यथोक्तम्-औदारिकादिशरीरयुक्तम्याऽऽत्मनो वीर्यपरिणतिविशेप काययोग, तयौदारिका-वैक्रियाहारक- शरीग्व्यापाराहृतवाग्द्रव्यसमूहसाचिव्याज्जीवव्यापारो वाग्योग , तथौदारिक-बक्रियाहारकशरीरव्यापाराहृत- मनोद्रव्यसमूहसाचिव्याज्जीवव्यापारी मनोयोग इति, अमीषा निरोपो योगनिरोध, निरोधन निरोपः, प्रलयकरणमित्यर्थ , केपाम् ? "जिनाना' केवलिनाम्, तुशब्द एवकारार्थ , स चावधारणे, योगनिरोध एव न तु चित्तावस्थानम्, चित्तस्यैवाभावात्, अथवा योगनिरोपो जिनानामेव ध्यान नान्येपाम्, अशक्यत्वादित्यल विस्तरेण, यथा चाय योगनिरोधो जिनाना ध्यान यावन्त च कालमेतद्भवत्येतदुपरिप्टावक्ष्याम इति गाथार्य ॥३॥ साम्प्रत छद्मस्थानामन्तर्मुहूर्तात् परतो यद्भवति तदुपदर्शयन्नाह- अब इस ध्यान के फाल और स्वामी का निरूपण करते हैं-- अन्तर्मुहूर्त काल तक जो एक वस्तु मे चित्त का अवस्थान है वह छप्रस्थो का ध्यान है तथा योगो का जो निरोध है-उनका जो विनाश है-वह जिनो (केवलियो) का ध्यान है ।। विवेचन-एक वस्तु मे जो स्थिरतापूर्वक चित्त का अवस्थान होता है, इसका नाम ध्यान है । इस प्रकार का ध्यान छद्नस्थो के होता है और वह उनके अन्तर्मुहूर्त फाल तक ही सम्भव है-इससे अधिक काल तक उसका रहना सम्भव नहीं है । 'वसन्ति अस्मिन् गुण-पर्याया' इति वस्तु' इस निरुक्ति के अनुसार जिसमे गुण और पर्याये रहती हैं वह वस्तु (जीव आदि) कहलाती है। 'छादयतीति छद्म' अर्थात् जो प्रात्मा के ज्ञानादि गुणों को आच्छादित करता है उसे छद्म कहा जाता है, जो ज्ञानावरणादि घाति फर्मस्वरूप है । इस प्रकार के छद्म मे जो स्थित है, अर्थात् जिनके ज्ञानावरणादि चार घाति फर्म उदय मे वर्तमान हैं, वे छद्मस्थ-केवली से भिन्न अल्पज्ञानी-कहलाते हैं। एक वस्तु मे चित्त को एका- प्रताप पूर्वोक्त ध्यान इन छद्मस्थ जीवो के ही होता है-केवलियो के वह सम्भव नहीं है, क्योकि, उनके चित्त का अभाव हो चुका है । केवली के जो कम से योगो का निरोध होता है उनका प्रभाव होता है, यही उनका ध्यान है। इस प्रकार का वह ध्यान उक्त केवली के ही सम्भव है-छद्मस्थ के नहीं। औदारिक आदि शरीरो के सम्बन्ध से जो जीव का व्यापार होता है उसका नाम योग है। वह मन, वचन और काय के भेद से तीन प्रकार का है। इनके निरोध के क्रम की प्ररूपणा आगे (गा ७०-७६) ग्रन्थकार द्वारा स्वय की गई है ॥३॥ छद्मस्थो के अन्तर्मुहूर्त काल तक ही ध्यान होता है, यह कहा जा चुका है। इसके पश्चात् उनके क्या होता है, इसे आगे स्पष्ट किया जाता है- ४ - ध्यानशतकम् [४- अंतोमुहुत्तपरो चिंता झाणंतरं व होज्जाहि । सुचिरंपि होज्ज बहुवत्थुसंकमे माणसंताणो ॥४॥ 'अन्तर्मुहूर्तात् परत' इति भिन्नमुहूर्तादूर्ध्वम्, 'चिन्ता' प्रागुक्तस्वरूपा तथा 'ध्यानान्तरं वा भवेत् तत्रह न ध्यानादन्यद् ध्यान ध्यानान्तर परिगृह्यते । किं तर्हि ? भावनानुप्रेक्षात्मक चेत इति, इद च ध्यानान्तर तदुत्तरकालभाविनि ध्याने सति भवति, तत्राप्ययमेव न्याय इति कृत्वा ध्यानसन्तानप्राप्तियंत अतस्तमेव कालमान वस्तुसङ्क्रमद्वारेण निरूपयन्नाह-'सुचिरमपि' प्रभूतमपि, कालमिति गम्यते, भवेत् बहुवस्तुसङ्क्रमे सति 'ध्यानसन्तान' ध्यानप्रवाह इति, तत्र बहूनि च तानि वस्तूनि बहुवस्तुनि आत्मगत-परगतानि गृह्यन्ते, तत्रात्मगतानि मन प्रभृतीनि परगतानि द्रव्यादीनीति, तेषु सड्क्रम सञ्चरणमिति गाथार्थ ॥४॥ इत्थ तावत् सप्रसङ्ग ध्यानस्य सामान्येन लक्षणमुक्तम्, अधुना विशेषलक्षणाभिधित्सया ध्यानोद्देश विशिष्टफलभाव च सक्षेपत प्रदर्शयन्नाह- अटें रुई धम्म सुक्कं झाणाइ तत्थ अंताई। निव्वाणसाहणाई भवकारणमट्ट-रद्दाइं ॥५॥ आतं रौद्र धयं शुक्लम्, तत्र ऋत दुखम्, तन्निमित्तो दृढाध्यवसायः, ऋते भवमा क्लिष्टमित्यर्थ ,हिंसा- द्यतिक्रौर्यानुगत रौद्रम्, श्रुत-चरणधर्मानुगत धर्म्यम्, शोधयत्यष्टप्रकार कर्म-मल शुच वा क्लमयतीति शुक्लम्, अमूनि ध्यानानि वर्तन्ते, अधुना फलहेतुत्वमुपदर्शयति-तत्र ध्यानचतुष्टये 'अन्त्ये' चरमे सूत्रक्रमप्रामाण्या- धर्म-शुक्ले इत्यर्थ , किम् ? 'निर्वाणसाधने' इह निवृति निर्वाण सामान्येन सुखमभिधीयते, तस्य साधने- कारणे इत्यर्थ , ततश्च-अट्टेण तिरिक्खगई रुद्दज्झाणेण गम्मती नरय । धम्मेण देवलोय सिद्धिगई सुक्क- झाणेण ॥१॥ इति यदुक्त तदपि न विरुद्धयते, देवगति-सिद्धिगत्यो सामान्येन सुखसिद्धेरिति, अथापि निर्वाण अन्तर्मुहूर्त के पश्चात् उनके चिन्ता अथवा ध्यानान्तर होता है। प्रात्म-परगत बहुत वस्तुप्रो मे संक्रमण (संचार) के होने पर उस ध्यान की परम्परा दीर्घ काल तक चल सकती है। विवेचन-यहा अन्तर्महूर्त के पश्चात् छद्मस्थ जीवो के जो ध्यानान्तर का निर्देश किया गया है उससे ध्यान से भिन्न अन्य ध्यान को नहीं ग्रहण करना चाहिए, किन्तु भावना व अनुप्रेक्षा स्वरूप चित्त को ग्रहण करना चाहिए। वह ध्यानान्तर भी तभी होता है जब कि उसके पश्चात् ध्यान होने वाला हो। यही क्रम आगे भी समझना चाहिए। इस प्रकार से ध्यान का प्रवाह आत्म-परगत बहुत वस्तुओं मे संचार के होने से दीर्घ काल तक चल सकता है। यहां प्रात्मगत से अन्तरंग मन आदि की तथा परगत से बहिरग द्रव्यादिक की विवक्षा रही है ॥४॥ इस प्रकार सामान्य से ध्यान का लक्षण कहकर अब आगे उसके भेद और उनके फल का निर्देश करते हैं- प्रात, रौद्र, धर्म या धर्म्य और शुक्ल ये उस ध्यान के चार भेद हैं। इनमे अन्त के दो ध्यान- धर्म्य और शुक्ल-निर्वाण के साधक हैं तथा आर्त और रौद्र ये दो ध्यान संसार के कारण हैं। विवेचन-'ऋते भवम् पार्तम्' इस निरुक्ति के अनुसार दुख मे होने वाली संक्लिष्ट परिणति का नाम प्रार्तध्यान है। हिंसादि रूप अतिशय क्रूरतायुक्त चिन्तन को रौद्रध्यान कहते हैं। श्रुत और चारित्ररूप धर्म से युक्त ध्यान घHध्यान कहलाता है । 'शोधयति अष्टप्रकारं कर्म-मलं शुचं वा क्लमय- तीति शुक्लम्' इस निरुक्ति के अनुसार जो ध्यान ज्ञानावरणादि आठ प्रकार के कर्मरूप मल को दूर करता है अथवा शोक को नष्ट करता है उसे शुक्लध्यान कहा जाता है। यहा उक्त चार ध्यानो मे से धर्म और शुक्ल को जो निर्वाण का कारण तथा आर्त और रौद्र को संसार का कारण कहा गया है इसे सामान्य कथन समझना चाहिए। विशेषरूप से पागम मे आर्तध्यान को नियंच गति का, रौद्रध्यान को नरकगति का, धर्मध्यान को देवगतिका और शुक्लध्यान सिद्धगति का कारण बतलाया गया है। जैसे- अट्टण तिरिक्खगई रुद्दझाणेण गम्मती नरय । धम्मेण देवलोय सिद्धगई सुक्कज्झाणेण ॥ -

-६]
आर्तध्याननिरूपणम्
मोक्षस्तथापि पारम्पर्येण धर्मध्यानस्यापि तत्साधनत्वादविरोध इति, तथा 'भवकारणमात-रौद्रे' इति तन
भवन्त्यस्मिन् कर्मवशवतिन प्राणिन इति भव ससार एव, तथाऽप्यत्र व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्ति [त्तः]
तिर्यग्नरकभवग्रह इति गाथार्थ ॥५॥ साम्प्रत यथोद्देशस्तथा निर्देश इति न्यायादार्तध्यानस्य स्वरूपाभिधाना-
क्सरः, तच्च स्वविपय-लक्षणभेदतश्चतुर्दा । उक्त च भगवता वाचकमुख्येन-आर्तममनोज्ञाना सम्प्रयोगे
तद्विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वाहार ॥ वेदनायाश्च ॥ विपरीत मनोज्ञादीना[मनोज्ञानाम्] ॥ निदान च ॥[त. सू.
६, ३१-३४] इत्यादि । तत्राऽऽद्यभेदप्रतिपादनायाह-
अमणुण्णाणं सद्दाइविसयवत्थूण दोसमइलस्स।
धणियं विमोचितणमसंपोगाणुसरणं च ॥६॥
'अमनोज्ञानाम्' इति मनसोऽनुकूलानि मनोज्ञानि इष्टानीत्यर्थ , न मनोज्ञानि अमनोज्ञानि तेषाम्, केषा-
मित्यत आह–'शब्दादिविषयवस्तूनाम्' इति शब्दादयश्च ते विषयाश्च, आदिग्रहणाद्वर्णादिपरिग्रह , विषी-
दन्ति एतेषु सक्ता प्राणिन इति विषया इन्द्रियगोचरा वा, वस्तुनि तु तदाधारभूतानि रासभादीनि, ततश्च-
शब्दादिविषयाश्च वस्तूनि चेति विग्रहस्तेपाम्, किम् ? सम्प्राप्ताना सता 'धणिय' अत्यर्थ 'वियोगचिन्तन'
विप्रयोगचिन्तेति योग, कथ नु नाम ममैभिवियोगः स्यादिति भाव, अनेन वर्तमानकालग्रह , तथा
सति च वियोगेऽसम्प्रयोगानुस्मरणम्, कथमेभि सदैव सम्प्रयोगाभाव इति, अनेन , चानागतकोलग्रह, च-
शब्दात् पूर्वमपि वियुक्तासम्प्रयुक्तयोर्वहुमतत्वेनातीतकालग्रह इति, किंविशिष्टस्य सत इद वियोगचिन्तनाद्यत
आह–'द्वपमलिनस्य जन्तोरिति गम्यते, तत्राप्रीतिलक्षणो द्वेपस्तेन मलिनस्तस्य तदाक्रान्तमूरिति
इस प्रकार सामान्य व विशेष को विवक्षा होने से दोनो प्रकार के उस कथन मे कुछ विरोध
नहीं समझना चाहिए। दूसरे–निर्वाण का अर्थ निर्वृति अथवा सुख होता है, तदनुसार धर्मध्यान
जहा सांसारिक सुख का कारण है वहा शुक्लध्यान मोक्षसुख का कारण है, इस प्रकार से भी ये दोनों
ध्यान निर्वाण के साधक सिद्ध हैं । इसके अतिरिक्त निर्वाण शब्द से यदि मोक्ष का ही ग्रहण किया जाय
तो भी परम्परा से धर्मध्यान भी मोक्ष का कारण सिद्ध है ही। 'भवन्ति अस्मिन् कर्मवशवतिनः प्राणिनः
इति भव.' इस निरुक्ति के अनुसार भव का अर्थ ससार है, क्योकि संसार मे ही प्राणी कर्म के वशीभूत
होते हैं । यद्यपि उस भव मे नर-नारकादि चारो गतिया समाविष्ट हैं, फिर भी विशेष विवक्षा से यहा
संसार से तिर्यंच और नरक इन दो ही गतियो को ग्रहण किया गया है ॥५॥
आगे ग्रन्थकार उक्त चारो ध्यानो का क्रम से वर्णन करते हुए सर्वप्रधम चार प्रकार के प्रार्त-
ध्यान मे प्रथम प्रार्तध्यान का निरूपण करते हैं-
द्वेष से मलिनता को प्राप्त हुए प्राणी के अमनोज्ञ (अनिष्ट) शब्दादिरूप पाचो इन्द्रियो के विषयों
और उनकी आधारभूत वस्तुनो के विषय मे जो उनके वियोग की अत्यधिक चिन्ता होती है तथा भविष्य
मे उनके असप्रयोग का उनका फिर से सयोग न हो इसका-जो अनुस्मरण होता है वह प्रथम आर्तध्यान
माना गया है।
विवेचन-अमनोज्ञ का अर्थ मन के प्रतिकूल या अनिष्ट होता है । 'विषीदन्ति एतेषु सक्ताः
प्राणिन इति विषयाः' इस निरुक्ति के अनुसार जिनमे आसक्त होकर प्राणी दुख को प्राप्त होते है उन्हे
विषय कहा जाता है । अथवा जो यथायोग्य श्रोत्रादि इन्द्रियो के द्वारा ग्राह्य शब्दादि हैं उन्हे विषय
जानना चाहिए। उक्त शब्दादि की आधारभूत वस्तुयें रासभ-कर्णकटु ध्वनि करने वाला गधा-
आदि हैं । उन अनिष्ट विषयो और उनकी आधारभूत वस्तुओ का यदि वर्तमान मे संयोग हैं तो उनके
वियोग के सम्बन्ध मे सतत यह विचार करना कि किस प्रकार से इनका मुझसे वियोग होगा, तथा
उनका वियोग हो जाने पर भविष्य मे कभी उनका फिर से संयोग न हो, इस प्रकार उनके असंयोग का
चिन्तन करना; यह प्रथम आर्तध्यान है। इसके अतिरिक्त भूतकाल मे यदि उनका विगोग हुआ है
अथवा सयोग ही नहीं हुआ है तो उसे बहुत अच्छा मानना, यह भी उक्त आर्तध्यान है ॥६॥

w M . . -- ध्यातशतकम् [७- गाथार्थः ॥६॥ उक्त प्रथमो भेदः, साम्प्रत द्वितीयमभिधित्सुराह- तह सूल-सीसरोगाइवेयणाए विजोगपणिहाणं । तदसंपयोगचिता तप्पडियाराउलमणस्स ॥७॥ 'तथा' इति घणियम्-प्रत्यर्थमेव, शूल-शिरोरोगवेदनाया इत्यत्र शूल-शिरोरोगी प्रसिद्धौ, आदि- शब्दाच्छेषरोगातङ्कपरिग्रह , ततश्च शूल-शिरोरोगादिभ्यो वेदना शूल-शिरोरोगादिवेदना, वेद्यत इति वेदना तस्या, किम् ? 'वियोगप्रणिधान' वियोगे दृढाध्यवसाय इत्यर्थ , अनेन वर्तमानकालग्रह , अनागतमधि- कृत्याह-'तदसम्प्रयोगचिन्ता' इति तस्या-वेदनाया कथञ्चिदभावे सत्यसम्प्रयोगचिन्ता-कथ पुनर्ममानया आयत्या सम्प्रयोगो न स्यादिति ? चिन्ता चात्र ध्यानमेव गृह्यते, अनेन च वर्तमानानागतकालग्रहणेनातीत- कालग्रहोऽपि कृत एव वेदितव्य., तत्र च भावनाऽनन्तरगाथाया कृतव, किविशिष्टस्य सत इद वियोगप्रणि- घानाद्यत आह-तत्प्रतिकारे' वेदनाप्रतिकारे चिकित्सायामाकुल व्यग्न मन अन्त करणं यस्य स तथावि- घस्तस्य, वियोगप्रणिधानाचार्तध्यानमिति गाथार्थ. ॥७॥ उक्तो द्वितीयो भेद, साम्प्रतं तृतीयमुपदर्शयन्नाह- इट्ठाणं विसयाईण वेयणाए य रागरत्तस्स । अवियोगऽज्झवसाणं तह संजोगाभिलासो य॥८॥ 'इष्टाना' मनोज्ञाना विपयादीनामिति, विषया पूर्वोक्ता, आदिशब्दाद् वस्तुपरिग्रह , तथा 'वेदना- याश्च' इष्टाया इति वर्तते। किम् ? अवियोगाध्यवसानमिति योग , अविप्रयोगदृढाध्यवसाय इति भाव, अनेन वर्तमानकालग्रह , तथा सयोगाभिलापश्चेति, तत्र 'तथेति' धणियमित्यनेनात्यर्थप्रकारोपदर्शनार्थ, सयोगाभिलाष-कथ ममैभिविपयादिभिरायत्या सम्बन्ध इतीच्छा, अनेन किलानागतकालग्रह इति वृद्धा व्याचक्षते, च-शब्दात् पूर्ववदतीतकालग्रह इति, किविशिष्टस्य सत इदमवियोगाध्यवसानाधत आह-राग- रक्तस्य, जन्तोरिति गम्यते, तत्राभिष्वङ्गलक्षणो रागस्तेन रक्तस्य तद्भावितमूरिति गाथार्थ ॥८। उक्त- स्तृतीयो भेद, साम्प्रत चतुर्थमभिधित्सुराह- देविंद-चक्कवट्टित्तणाई गुण-रिद्धिपत्थणमईयं । अहमं नियाणचितणमण्णाणाणुगयमच्चंतं ॥६॥ अब द्वितीय आर्तध्यान का स्वरूप कहा जाता है- शूल व शिरोरोग आदि की पीडा के होने पर उसके प्रतीकार के लिए व्याकुल मन होकर जो उसके वियोग के विषय मे-उसके हट जाने के सम्बन्ध मे-दृढ अध्यवसाय-निरन्तर चिन्तन-होता है तथा उक्त वेदना के किसी प्रकार से नष्ट हो जाने पर भविष्य मे पुन. उसका संयोग न हो, इसके लिए जो चिन्ता होती है, यह दूसरे प्रार्तध्यान का लक्षण है। भूतकाल मे यदि उसका वियोग हुआ है अथवा उसका संयोग ही नहीं हुआ है तो उसे बहुत मानना, इसे भी दूसरा ही प्रार्तध्यान समझना चाहिए ॥७॥ आगे तृतीय आर्तध्यान का निरूपण करते है-- रागयुक्त (आसक्त) प्राणी के अभीण्ट शब्दादि इन्द्रियविषयो, उनकी आधारभूत वस्तुओ और अभीष्ट वेदना के विषष मे जो उनके प्रवियोग के लिए सदा ऐसे ही बने रहने के लिए-अध्यवसान (निरन्तर चिन्तन) होता है तथा यदि उनका सयोग नही है तो भविष्य मे उनका सयोग किस प्रकार से हो, इस प्रकार की जो अभिलाषा बनी रहती है। यह तीसरे प्रार्तध्यान का लक्षण है ॥८॥ आगे चतुर्थ आर्तध्यान का स्वरूप कहा जाता है- इन्द्रो और चक्रवतियों आदि (बलदेवादि) के गुणो और ऋद्धि की प्रार्थना (याचना) रूप निदान का चिन्तन करना, यह चौथा आर्तध्यान कहलाता है । अतिशय प्रज्ञान से अनुगत होने के कारण उसे अधम (निकृष्ट) समझना चाहिए। विवेचन-आगामी भोगो की आकांक्षा का नाम निदान है। जिस संयम व तप आदि के द्वारा ७ -१६ आर्तध्याननिरूपणम् दीव्यन्तीति देवा-भवनवास्यादयस्तेपामिन्द्रा प्रभवो देवेन्द्रा -चमरादय तथा चक्र-प्रहरण तेन विजयाधिपत्ये वर्तितु शीलमेषामिति चक्रवर्तिन भरतादय , आदिशब्दाद् गलदेवादिपरिग्रह , अमीषा गुणऋद्ध- य. देवेन्द्र-चत्रवादिगुर्णद्धय , तत्र गुणा सुरूपादय , ऋद्धिस्तु विभूति , तत्प्रार्थनात्मक तद्याञ्चामयमित्यर्थः, किं तत् ? 'अधम' जघन्य 'निदानचिन्तन' निदानाध्यवसाय , अहमनेन तपस्त्यागादिना देवेन्द्र स्यामित्यादि- रूप , आह-किमितीदमधमम् ? उच्यते-यस्मादज्ञानानुगतमत्यन्तम्, तथा च नाज्ञानिनो विहाय सासारिकेपु सुखेष्वन्येपामभिलाष उपजायते-उक्त च-अज्ञानान्धाश्चटुलवनितापाङ्गविक्षेपितास्ते, कामे सक्ति दधति विभवाभोगतुङ्गार्जने वा । विद्वच्चित्त भवति च महत् मोक्षकाकतानम्, नाल्पस्कन्धे विटपिनि कपत्य- सभित्ति गजेन्द्र ॥१॥ इति गाथार्थ ॥६॥ उक्तश्चतुर्थों भेद, साम्प्रतमिद यथाभूतस्य भवति यद्वर्द्धन चेदमिति तदेतदभिधातुकाम आह- एयं चउन्विहं राग-दोस-मोहंकियस्स जीवस्स। अट्टज्माणं संसारवद्धणं तिरियगइमूलं ॥१०॥ 'एतद्' अनन्तरोदित 'चतुर्विध' चतुष्प्रकार 'राग-द्वेष-मोहाङ्कितस्य' रागादिलाञ्छितस्येत्यर्थ , कस्य ? 'जीवस्य' आत्मन , किम् ? आर्तध्यानमिति, तथा च इय चतुष्टयस्यापि क्रिया, किंविशिष्टमित्यत आह- ससारवर्द्धनमोघत , तिर्यग्गतिमूल विशेपत इति गाथार्थ ॥१०॥ पाह–साधोरपि शूलवेदनाभिभूतस्यासमा- घानात् तत्प्रतिकारकरणे च तद्विप्रयोगप्रणिधानापत्ते तथा तप सयमासेवने च नियमत सासारिकदु ख- वियोगप्रणिधानादार्तध्यानप्राप्तिरिति ? अत्रोच्यते-रागादिवशवर्तिनो भवत्येव, न पुनरन्यस्येति, आह च । - ग्रन्थकार मज्झत्थस्स उ मुणिणो सकम्मपरिणामजणियमेयंति । वत्थुस्सभावचितणपरस्स सम[म्मं] सहतस्स ॥११॥ मध्ये तिष्ठतीति मध्यस्थ , राग-द्वेषयोरिति गम्यते, तस्य मध्यस्थस्य, तु-शब्द एवकारार्थ , स चाव- घारणे, मध्यस्थस्यैव नेतरस्य, मन्यते जगतस्त्रिकालावस्थामिति मुनिस्तस्य मुने, साधोरित्यर्थ, स्वकर्म- परिणामजनितमेतत् शूलादि, यच्च प्राक्कर्मविपरिणामिदैवादशुभमापतति न तत्र परितापाय भवन्ति सन्त, निर्वाध व शाश्वतिक सुख के स्थान स्वरूप मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है उस सयम व तप के फलस्वरूप अनेक प्राकुलताओ के कारणभूत इन्द्रादि के अस्थायी सुख की याचना करना, यह अतिशय अज्ञानता- मूलक ही है, कारण यह कि अज्ञानियो को छोडकर अन्य कोई भी विवेकी जीव उस अमूल्य तप आदि के फलभूत तुच्छ सांसारिक सुख की अभिलाषा नहीं कर सकता। यह चतुर्थ प्रार्तध्यान का स्वरूप है ॥६॥ उक्त चार प्रकार का प्रार्तध्यान किस प्रकार के प्राणी के होता है तथा उसका क्या परिणाम होता है, इसे आगे स्पष्ट किया जाता है- यह चार प्रकार का प्रार्तध्यान राग (आसक्ति), द्वेष (अप्रीति) और मोह (अज्ञान) से लाछित (कलुषित) प्राणी के होता है, जो तियंचगति का मूल कारण होने से ससार का बढानेवाला है ॥१०॥ यहां यह शका उपस्थित होती है कि शूलवेदनादि से आक्रान्त साधु के भी विकलता हो सकती है, और यदि वह उसके निराकरण मे प्रवृत्त होता है तो उसके वियोगविषयक चिन्तनरूप आर्तध्यान का प्रसग प्राप्त होता है। दूसरी बात यह भी है कि साधु जब तप व सयम का आराधन करता है तब उसके सासारिक दुख के वियोगस्वरूप प्रार्तध्यान का होना अनिवार्य है, कारण यह कि उक्त सासारिक दुख से छुटकारा पाने के लिए ही तो तप व सयम का परिपालन किया जाता है। इस शका के समाधान स्वरूप ग्रन्थकार आगे कहते हैं- मुनि राग और द्वेष के मध्य में स्थित होता है-वह न किसी वस्तु को इष्ट मानकर उससे राग करता है और न अनिष्ट मानकर उससे द्वेष करता है। इसीलिए शूल आदि की वेदना के होने पर वह विचार करता है कि यह अपने पूर्वकृत कर्म के विपाक से हुई है। इस प्रकार वस्तुस्वभाव के चिन्तन मे ܝ ܀ F ध्यानशतकम् [१२- उक्त च परममुनिभि-'पुन्धि खलु भो। भो। कडाण कम्माण दुच्चिण्णाण दुप्पडिक्वंताण वेइत्ता मोक्खो, नत्थि अवेदइत्ता, तवसा वा झोसइत्तेत्यादि, एव वस्तुस्वभावचिन्तनपरस्य 'सम्यक्' शोभनाध्यवसायेन सहन मानस्य सत .कुतोऽसमाधानम् ? अपि तु धर्म्यमनिदानमिति वक्ष्यतीति गाथार्थ. ॥११॥ परिहृत आशङ्का- गत प्रथमपक्ष , द्वितीय-तृतीयावधिकृत्याह- कुणो व पसत्थालवणस्स पडियारमप्पसावज्ज । तव-संजमपडियारं च सेवनओ धम्ममणियाणं ॥१२॥ कुर्वतो वा । कस्य ? प्रशस्त ज्ञानाद्युपकारकम् आलम्च्यत इत्यालम्बन प्रवृत्तिनिमित्तम्, शुभमच्या वसानमित्यर्थ । उक्त च-काह अछित्ति अदुवा अहीह, तवोवहाणेसु व उज्जमिस्स । गण च णीती अणुः सारखेस्स, सालवसेवी समुवेइ मोक्ख ॥१॥ इत्यादि, यस्यासी प्रशस्तालम्बनस्तस्य । किं कुर्वत इत्यत प्राह-'प्रतीकार' चिकित्सालक्षणम् । किंविशिष्टम् ? 'अल्पसावद्यम्' अवद्य पापम्, सहावद्येन सावद्यम्, अल्प- शब्दोऽभाववचन' स्तोकवचनो वा, अल्प सावध यस्मिन्नसावल्पसावद्यस्तम्, धर्म्यमनिदानमेवेति योग । कुत निर्दोषत्वात्, निर्दोपत्व च वचनप्रामाण्यात् । उक्त च-गीयत्यो जयणाए कडजोगी कारण मि निहोसो ति, इत्याद्यागमस्योत्सर्गापवादरूपत्वात्, अन्यथा परलोकस्य साधयितुमशक्यत्वात्, साधु चैतदिति । तथा 'तप.- सयमप्रतिकार च सेवमानस्य' इति तपासयमावेव प्रतिकारस्तप सयमप्रतिकार , सासारिकदु खानामिति गम्यते, त, च सेवमानस्य, च-शब्दात्पूर्वोक्तप्रतिकार च । किम् ? 'धम्यं' धर्मध्यानमेव भवति । कथ सेवमा- स्य ? 'अनिदानम्' इति क्रियाविशेषणम्, देवेन्द्रादिनिदानरहितमित्यर्थ । पाह-कृत्स्नकर्मक्षयान्मोक्षो भवत्वि- तीदमपि निदानमेव ? उच्यते-सत्यमेतदपि निश्चयत प्रतिपिद्धमेव । कथ? मोक्षे भवे च सर्वत्र नि- स्पृहो मुनिसत्तम । प्रकृत्याऽभ्यासयोगेन यत उक्तो जिनागमे ॥१॥ इति । तथापि तु भावनायामपरिणत सत्त्वमङ्गीकृत्य व्यवहारत इदमदुष्टमेव, अनेनैव प्रकारेण तस्य चित्तशुद्धे क्रियाप्रवृत्तियोगाच्चेत्यन वहु 7 तत्पर हुआ वह उसे समतापूर्वक भलीभांति सहता है-वह उसके वियोगविषयक चिन्तन से व्याकुल नहीं होता । इसीलिए राग-द्वेष से रहित होने के कारण उसके उक्त वेदना के वियोगविषयक प्रार्तध्यान सम्भव नहीं है । हां, जिसका अन्तःकरण राग-द्वेष से कलुषित होता है उसके वह अवश्य होता है ॥११॥ इस प्रकार उपर्युक्त शंका के अन्तर्गत प्रथम पक्ष का समाधान करके अब आगे उसके द्वितीय और तृतीय पक्ष का-रोगजनित वेदना के प्रतीकार एवं सांसारिक दुख के वियोगविषयक आर्तध्यान के प्रसंग का समाधान किया जाता है--- जो साधु प्रशस्त-ज्ञानादि के उपकारक-पालम्बन का प्राश्रय लेकर उक्त वेदना का अल्प सावधयुक्त प्रतीकार करता है तया निदान से रहित होता हुआ तप-संयमरूप प्रतीकार का सेवन करता है उसके निदान से रहित धर्मध्यान ही रहता है, न कि प्रार्तध्यान ।। विवेचन-प्रवृत्ति का निमित्तभूत जिसका उत्तम अध्यवसाय ज्ञानादि का उपकारक है वह उक्त शूलरोगादि का जो प्रतीकार करता है वह या तो सर्वथा पाप से रहित होता है या अल्प ही पाप से सहित होता है । इसी से उसके प्रार्तध्यान न होकर निदान रहित घHध्यान ही होता है । इस प्रकार से शंकाकार की शफागत उस द्वितीय पक्ष का निराकरण हो जाता है जिसमें यह कहा गया था कि रोग का प्रतिकार करने पर उसके अनिष्टविप्रयोगजनित पार्तध्यान का प्रसंग अनिवार्य होगा। शका- गत तीसरा पक्ष यह था कि तप व संयम के पाराधन मे नियम से सांसारिक दुख के वियोगविषयक प्रणिधानस्वरूप प्रार्तध्यान रहने वाला है। उसका निराकरण करते हुए यहां यह कहा गया है कि सासारिक दुख के प्रतीकारस्वरूप तप-सयम का पाराधन करने वाला साधु चूंकि उनका आराधन इन्द्रादि पद की प्राप्तिरूप निदान के विना करता है, अत एव वह प्रार्तध्यान न होकर धर्मध्यान ही है । इस पर यह कहा जा सकता है कि उसमे भी समस्त कर्मों के क्षयरूप मोक्ष की प्राप्ति की जो इच्छा रहती है वह भी निदान ही है । इसके समाधान मे यह कहा जा सकता है कि वस्तुत: वह निदान ही है, - . ? 4 ? -१४] आर्तध्याननिरूपणम् वक्तव्य तत्तु नोच्यते ग्रन्थविस्तरभयादिति गाथार्थ ॥१२॥ अन्ये पुनरिद गाथाद्वय चतुर्भेदमप्यार्तध्यानमधि- कृत्य साधो. प्रतिषेधरूपतया व्याचक्षते, न च तदत्यन्तमुन्दरम्, प्रथम-तृतीयपक्षद्वये सम्यगाशङ्काया एवानुप- पत्तेरिति । आह-उक्त भवताऽऽर्तध्यान ससारवर्द्धन मिति । तत्कथम् ? उच्यते-बीजत्वात् । बीजत्वमेव दर्शयन्नाह-- रागो दोसो मोहो य जेण संसारहेयवो भणिया। अट्ट मि य ते तिणिवि तो तं संसार-तरुवीयं ॥१३॥ रागो द्वेषो मोहश्च येन कारणेन 'ससारहेतव' ससारकारणानि 'भणित' उक्ता परममुनिभिरिति गम्यते, 'पार्ते च' प्राध्याने च ते 'त्रयोऽपि' रागादय सम्भवन्ति, यत एव ततस्तत् 'ससारतरुबीज' भववृक्ष- कारणमित्यर्थ । आह-यद्येवमोधत एव ससारतरुबीजम्, ततश्च तिर्यग्गतिमूलमिति किमर्थमभिधीयते , उच्यते -तिर्यग्गतिगमननिवन्धनत्वेनैव ससारतरुवीजमिति । अन्ये तु व्याचक्षते-तिर्यग्गतावेव प्रभूतसत्त्व- सम्भवात् स्थितिबहुत्वाच्च ससारोपचार इति गाथार्थ ॥१३॥ इदानीमार्तघ्यायिनो लेश्या प्रतिपाद्यन्ते- कावोय-नील-कालालेस्साओ पाइसंकिलिट्ठायो । अट्टज्माणोवगयस्स कम्मपरिणामजणिआश्रो ॥१४॥ कापोत-नील-कृष्णलेश्याः, किम्भूता ? नातिसक्लिष्टा' रौद्रध्यानलेश्यापेक्षय नातीवाशुभा- नुभावा भवन्तीति क्रिया, कस्येत्यत आह-आर्तध्यानोपगतस्य, जन्तोरिति गम्यते किंनिबन्धना एता इत्यत आह-कर्मपरिणामजनिता, तत्र-'कृष्णादिद्रव्यसाचिव्यात्, परिणामो य आत्मन । स्फटिकस्येव तत्राय, लेश्याशब्द' प्रयुज्यते ॥१॥' एता कर्मोदयायत्ता इति गाथार्थ ॥१४॥ आह कथ पुनरोघत प्रतएव उसका भी प्रागम मे निषेध किया गया है। वहां कहा गया है कि उत्तम मुनि वही है जो मोक्ष और ससार दोनों के ही विषय में निःस्पृह रहता है । परन्तु जो जीव भावना में परिपक्व नहीं है उसको लक्ष्य करके व्यवहारतः उसे भी-मोक्षविषयक इच्छा को भी निर्दोष माना गया है। कारण यह कि इस प्रकार से उसके चित्त की शुद्धि होती है और उत्तम अनुष्ठान में प्रवृत्ति भी होती है ॥१२॥ पूर्व मे (गा १०) जो उक्त चार प्रकार के प्रार्तध्यान को संसारवर्धक कहा गया है उन सबको स्पष्ट करते हुए यह कहा जाता है- जिस कारण जिन राग, द्वेष और मोह (आसक्ति) को संसार का कारण कहा गया है वे तीनों ही प्रकृत पार्तध्यान मे सम्भव है। इसीलिए वह (मार्तध्यान) ससार रूप वृक्ष का बीज है-उसका कारण है । यहा यह शंका हो सकती है कि जब वह प्रार्तध्यान सामान्य से ससार का कारण है तव उसे तियंचगति का मूल क्यों कहा गया है ? इसका समाधान यह है कि वह तिर्यचगति मे गमन का कारण होने से ही संसाररूप वृक्ष का बीज है-उसे बढाने वाला है। प्रकारान्तर से उसके समाधान मे यह भी कहा जाता है कि प्रचुर (अनन्तान्त) जीव चूंकि तिर्यंचगति मे ही पाये जाते हैं, साथ ही उसका काल भी अधिक है। इसीलिए तिर्यचगति मे संसार का उपचार किया गया है ॥१३॥ आगे प्रार्तध्यानी जीव के सम्भव लेश्याओ का निर्देश किया जाता है- आर्तध्यान को प्राप्त हुए जीव के कर्म के उदय से उत्पन्न हुई कापोत, नील और कृष्ण ये तीन अशुभ लेश्यायें होती हैं। विशेषता इतनी है कि वे उसके अतिशय सक्लिष्ट नहीं होती-जिस प्रकार रौद्रध्यानी के वे अतिशय प्रभावक होती है उस प्रकार प्रकृत प्रार्तध्यानी के वे उतनी प्रभावक नहीं होती, उसको अपेक्षा इसके वे हीन होती हैं। जिस प्रकार काले प्रादि रंग वाले पदार्थ की समीपता से स्वच्छ स्फटिक मणि का तद्रूप-काले आदि रंगस्वरूप-परिणमन होता है उसी प्रकार कर्म के उदय से जीव का जो परिणमन होता है उसे लेश्या कहा जाता है ॥१४॥ अब जिन हेतुनो के द्वारा सामान्य से प्रार्तध्यानी का परिज्ञान होता है उनका निर्देश किया जाता है- ।

ध्यानशतकम् [१५- एवार्तध्याता ज्ञायत इति ? उच्यते-लिड्गेभ्य तान्येवोपदर्शयन्नाह- तस्सऽक्कंदण-सोयण-परिदेवण-ताडणाई लिगाई। इट्ठा ऽणि?विनोगाऽविनोग-वियणानिमित्ताई ॥१५॥ 'तस्य' आध्यायिन आक्रन्दनादीनि लिङ्गानि, तत्राऽऽक्रन्दनम्-महता शब्देन विरवणम्, शोचन- स्वत्वश्रुपरिपूर्णनयनस्य दैन्यम्, परिदेवन पुन पुन क्लिष्टभापणम्, ताडनम् उर शिर'कुट्टन-केशलुञ्च- नादि, एतानि 'लिङ्गानि' चिह्नानि, अमूनि च इष्टानिष्टवियोगावियोग-वेदनानिमित्तानि, तष्टवियोगनि- मित्तानि तथाऽनिष्टावियोगनिमित्तानि तथा वेदनानिमित्तानि चेति गाथार्थः ॥१५।। किं चान्यत्- निदइ य नियकयाइं पसंसइ सविम्हरो विभूईयो। पत्थेइ तासु रज्जइ तयज्जणपरायणो होइ ॥१६॥ "निन्दति' च कुत्सति च "निजकृानि' आत्मकृतानि अल्पफल-विफलानि कर्म [कर्माणि] शिल्प- कला-वाणिज्यादीन्येतद् गम्यते, तथा 'प्रशसति' स्तौति बहुमन्यते 'सविस्मयः' साश्चर्य. "विभूती.' परसम्पद इत्यर्थ , तथा 'प्रार्थयते' अभिलपति परविभूतीरिति, 'तासु रज्यते' तास्विति प्राप्तासु विभूतिपु राग गच्छति, 'तदर्जनपरायणो भवति' तासा विभूतीनामजने उपादाने परायण उद्युक्त तदर्जनपरायण इति, ततश्चैवम्भूतो भवति, असावप्यार्तध्यायीति गाथार्थ. ॥१६॥ कि च- सद्दाइविसयगिद्धो सद्धम्मपरम्मुहो पमायपरो। जिणमयमणवेक्खंतो वट्टइ अट्ट मि झागंमि ॥१७॥ शब्दादयश्च ते विषयाश्च तेषु गृद्धो मूच्छित' काक्षावानित्यर्थ , तथा सद्धर्मपराङ्मुख. प्रमादपर तत्र दुर्गतौ प्रपतन्तमात्मान धारयतीति धर्म, संश्चासौ धर्मश्च सद्धर्म -क्षान्त्यादिकश्चरणधर्मो गृह्यते, तत पराङ्मुख , 'प्रमादपर' मद्यादिप्रमादासक्त , 'जिनमतमनपेक्षमाणो वर्नते आर्तघ्याने' इति, तत्र जिना तीर्थ- करा, तेषा मतम् आगमरूप प्रवचनमित्यर्थ, तदनपेक्षमाण तनिरपेक्ष इत्यर्थ । किम् ? वर्तते आत्तध्याने इति गाथार्थ ॥१७॥ साम्प्रतमिदमार्तध्यान सम्भवमधिकृत्य यदनुगत यदनहं वर्तते तदेतदभिधित्सुराह- तदविरय-देसविरया-पमायपरसंजयाणुगं झाणं । सव्वप्पमायमूलं वज्जेयव्वं जइजणेणं ॥१८॥ 'तद्' प्रार्तध्यानमिति योग, 'अविरत-देशविरत-प्रमादपर-सयतानुगम्' इति तत्राविरता मिथ्या- प्राक्रन्दन, शोचन, परिदेवन और ताड़न; ये उस आर्तध्यानी के परिचायक हेतु हैं जो इष्टवियोग, अनिष्ट-प्रवियोग और वेदना के निमित्त से होते हैं । महान् शब्द के उच्चारण पूर्वक रुदन करने का नाम आक्रन्दन है। अश्रुपूर्ण नेत्रों की दीनता को शोचन (शोक) कहा जाता है। बार-बार सक्लेश युक्त भाषण करना, इसे परिदेवन कहते हैं। छाती व शिर आदि के पीटने को ताड़न कहा जाता है। इन चिह्नों के द्वारा प्रार्तध्यानी की पहिचान हो जाती है ॥१५॥ इसके अतिरिक्त- वह अपने द्वारा किये गये निरर्थक या अल्प फल वाले कार्यों की निन्दा करता है तथा प्राश्चर्य- चकित होकर दूसरों की विभूतियो की प्रशंसा करता है व उनके लिए प्रार्थना करता है-उनकी इच्छा करता है । यदि वे इच्छानुसार उसे प्राप्त हो जाती हैं तो वह उनमे अनुराग करता है, और यदि वे नहीं प्राप्त हुई हैं तो वह उनके उपार्जन मे उद्यत होता है ॥१६॥ और भी-- वह शब्दादि रूप इन्द्रिय विषयो मे लुब्ध होकर समीचीन धर्म से विमुख होता हुआ प्रमाद मे रत होता है-मद्यादि के सेवन मे प्रासक्त होता है, इस प्रकार वह जिन-मत की अपेक्षा न करके उक्त पार्त- ध्यान में प्रवृत्त होता है ॥१७॥ ॥ अब वह प्रार्तध्यान किन के होता है इसका निर्देश करते हुए उसे छोड़ देने की प्रेरणा करते है- वह प्रार्तध्यान अविरत-मिथ्यादृष्टि व असयतसम्यग्दृष्टि, देशविरत-एक-दो आदि अणु- अतो के धारक श्रावक और प्रमादपुक्त संयत (प्रमत्तसंयत) जीवों के होता है। वह चूंकि सब प्रकार के . - ? । -२०] रौद्रध्याननिरूपणम् ११ दृष्टय. सम्यग्दृष्टयश्च, देशविरता एक-द्वयाद्यणुव्रतधरभेदा श्रावका , प्रमादपराः प्रमादनिष्ठाश्च ते सयताश्च प्रमादपरसयता, ताननुगच्छतीति विग्रह , नवाप्रमत्तसयतानिति भाव । इद च स्वरूपतः सर्व- प्रमादमूल वर्तते, यतश्चैवमतो 'वर्जयितव्यम्' परित्यजनीयम् केन ? 'यतिजनेन' साधुलोकेन, उपलक्षणत्वात् श्रावक-जनेन, परित्यागार्हत्वादेवास्येति गाथार्थ ॥१८॥ उक्तमार्तध्यानम्, साम्प्रत रौद्रध्यानावसर , तदपि चतुर्विधमेव, तद्यथा -हिंसानुवन्धि मृषानुबन्धि स्तेयानुवन्धि विषयसरक्षणानुवन्धि च । उक्त चोमास्वातिवा- चकेन–हिंसा-ऽनृत-स्तेय-विषय-सरक्षणेभ्यो रौद्रम् इत्यादि [त सू ६-३६]। तत्राऽऽद्यभेदप्रतिपादनायाह- सत्तवह-वेह-बंधण-डहणंऽकण-मारणाइपणिहाणं। अइकोहग्गहपत्यं निग्घिणमणसोऽहमविवागं ॥१६॥ सत्त्वा. एकेन्द्रियादय तेषाम् वध-वेध-बन्धन-दहनाऽङ्कन-मारणादिप्रणिधानम्-तत्र वध ताडन कर- कशलतादिभि., वेघस्तु नासिकादिवेधनं कीलिकादिभि , वन्धन सयमन रज्जु-निगडादिभि., दहन प्रतीत- मुल्मुकादिभिः, अङ्कन लाञ्छन श्व-शृगालचरणादिभि , मारण प्राणवियोजनमसि-शक्ति-कुन्तादिभि., आदिशब्दादागाढ-परितापन-पाटनादिपरिग्रह , एतेषु प्रणिधानम् । अकुर्वतोऽपि करण प्रति दृढाव्यवसान- मित्यर्थ , प्रकरणाद् रौद्रध्यानमिति गम्यते । किविशिष्ट प्रणिधानम् ? 'अतिक्रोधग्रहप्रस्तम्' अतीवोत्कटो य क्रोध रोष, स एवापायहेतुत्वाद् ग्रह इव ग्रहस्तेन ग्रस्तम् अभिभूतम्, क्रोधग्रहणाच्च मानादयो गृह्यन्तै । किविशिष्टस्य सत इदमित्यत आह-'निघृणमनस' निघृण निर्गतदय मन चित्तमन्त करण यस्य स निघृण- मनास्तस्य, तदेव विशेष्यते 'अधमविपाकम्' इति अधम जघन्यो नरकादिप्राप्तिलक्षणो विपाक परिणामो यस्य तत्तथाविधमिति गाथार्थ ॥१९॥ उक्त प्रथमो भेद , साम्प्रत द्वितीयमभिघित्सुराह- पिसुणासन्भासन्भूय-भूयधायाइवयणपणिहाणं । मायाविणोऽइसंधणपरस्स पच्छन्नपावस्स ॥२०॥ 'पिशुनाऽसभ्याऽसद्भूत-भूतघातादिवचनप्रणिधानम्' इत्यत्रानिष्टप्य सूचक पिशुन पिशुनमनिष्ट- प्रमाद का मूल कारण है, इसलिए मुनिजन को उसका परित्याग करना चाहिए। यहां मुनिजन को जो उसके छोड़ने का उपदेश दिया गया है, उसे उपलक्षण जानकर उससे श्रावक जनो को भी ग्रहण किया गया है । तात्पर्य यह है कि अनर्थ का मूल होने से उक्त पार्तध्यान का त्याग मुनि व श्रावक दोनो को ही करना चाहिए ॥१८॥ इस प्रकार प्रार्तध्यान का निरूपण करके आगे क्रम प्राप्त रौद्रध्यान का वर्ण किया जाता है। वह भी हिंसानुबन्धी, मृषानुवन्धी, स्तेयानुबन्धी और विषयसरक्षणानुबन्धी के भेद से चार प्रकार का है। उनमे प्रथम का निरूगण करते हैं- अतिशय क्रोधरूप पिशाच के वशीभूत होकर निर्दय अन्तःकरण वाले जीव के जो प्राणियो के वध, वेघ, बन्धन, दहन, अंकन और मारण आदि का प्रणिधान-उक्त कार्यों को न करते हुए भी उनके करने का जो दृढ विचार होता है, यह हिंसानुवन्धी नामक प्रथम रौद्रध्यान है। इसका विपाक अधम (निकृष्ट) है-उसके परिणामस्वरूप नरकादि दुर्गति प्राप्त होने वाली है। चावुक आदि से ताड़ित करना, इसका नाम वध हैं। कील आदि के द्वारा नासिका आदि के वेधने को वेघ कहा जाता है, रस्सी आदि से बांधकर रखना, यह बन्धन कहलाता है। उल्मुक आदि से जलाने को दहन करते हैं। तपी हुई लोहे की शलाका आदि से दागने (चिह्नित करने) का नाम अकन है । मारण से अभिप्राय प्राणविघात का है ॥१९॥ अब क्रमप्राप्त द्वितीय (मृषानुबन्धी) रौद्रध्यान का स्वरूप कहा जाता है- मायाचारी व परवंचना-दूसरो के ठगने मे-तत्पर ऐसे प्रच्छन्न (अदृश्य) पाप युक्त अन्त:- करण वाले जीव के पिशुन, असभ्य, असद्भूत और भूतघात आदि रूप वचनो मे प्रवृत्त न होने पर भी जो उनके प्रति दृढ अध्यवसाय होता है, यह मृषानुबन्धी नामक द्वितीयः रौद्रध्यान का लक्षण है ।।

यता - १२ ध्यानशतकम् [२१- सूचक 'पिशुन सूचक विदु' इति वचनात् । सभाया साधु सभ्य न सभ्यमसभ्य जकार-मकारादि । न सद्भू- तमसद्भूतमनृतमित्यर्थ । तच्च व्यवहारनयदर्शनेनोपाधिभेदतस्त्रिधा। तद्यथा-प्रभूतोद्भावन भूतनिह्नवो- अर्थान्तराभिधान चेति । तत्राभूतोद्भावन यथा सर्वगतोऽयमात्मेत्यादि, भूतनिह्नवस्तु नास्त्येवात्मेत्यादि, गाम- श्वमित्यादि अवतोऽर्थान्तराभिधानमिति । भूताना सत्त्वानामुपघातो यस्मिन् तद् भूतोपघातम्-छिन्द्धि भिन्दि व्यापादय इत्यादि, आदिशब्द प्रतिभेद स्वगतानेकभेदप्रदर्शनार्थ , यथा पिशुनमनेकधाऽनिष्टसूचकमित्यादि, तत्र पिशुनादिवचनेष्वप्रवर्तमानस्यापि प्रवृत्ति प्रति प्रणिधान दृढाध्यवसानलक्षणम्, रौद्रध्यानमिति प्रकर- णाद् गम्यते । किविशिष्टस्य सत इत्यत आह-माया निकृति', साऽस्यास्तीति मायावी तस्य मायाविनो वणिजादे, तथा 'अतिसन्धानपरम्य' परवञ्चनाप्रवृत्तस्य अनेनाशेषेष्वपि प्रवृत्तिमप्या(म्या)ह, तथा प्रच्छन्नपापस्य' कूटप्रयोगकारिणस्तस्यैव, अथवा धिग्जातिककुतीथिकादेरसद्भूतगुण गुणवन्तमात्मान स्याप- तथाहि-गुणरहितमप्यात्मान यो गुणवन्त स्यापयति न तस्मादपर प्रच्छन्नपाणेऽस्तीति गाथार्थ ॥२०॥ उक्तो द्वितीयो भेद , साम्प्रत तृतीयमुपदर्शयति- तह तिव्वकोह-लोहाउलस्त भूभोवघायणमणज्ज । परदव्वहरणचित्त परलोयावायनिरवेक्खं ॥२१॥ तथाशब्दो दृढाव्यवसायप्रकारसादृश्योपदर्शनार्थ । तीव्री उत्कटी तो क्रोध-लोभौ च तीव्रक्रोध-लोभी ताभ्यामाकुल अभिभूतस्तस्य, जन्तोरिति गम्यते । किम् ? 'भूतोपहननमनार्यम्' इति हन्यतेऽनेनेति हननम्, उप सामीप्येन हननम् उपहननम्, भूतानामुपहनन भूतोपहननम्, पाराद्यात सर्वहेयधर्मम्य इत्यायं नाऽय॑मना- यम्, किं तदेवविधमित्यत पाह-परद्रव्यहरणचित्तम्, रौद्रध्यानमिति गम्यते, परेपा द्रव्य परद्रव्य सचित्तादि, तद्विषय हरणचित्त परद्रव्यहरणचित्तम्, तदेव विशेष्यते-किम्भूत तदित्यत पाह-परलोकापायनिरपेक्षम् विवेचन-अनिष्ट के सूचक बचन को पिशुन वचन कहा जाता है। गाली प्रादि रूप अशिष्ट वचन का नाम असभ्य वचन है । अयथार्थ वचन को असद्भूत कहते हैं । वह तीन प्रकार का है-अभूतो- भावन, भूतनिह्नव और अर्थान्तराभिधान । प्रात्मा सर्वव्यापक है, इत्यादि प्रकार के कथन को अभूतो- भावन कहा जाता है। इसका कारण यह है कि प्रात्मा वस्तुतः वैसा नहीं है-वह तो प्राप्त शरीर के प्रमाण रहता है, न वह सर्वव्यापक है और न अणुरूप भी है। प्रात्मा है ही नहीं, इत्यादि प्रकार के सदप- लापक-विद्यमान वस्तु का प्रभाव प्रकट करने वाले-वचन को भूतनिह्नव कहते हैं। गाय को घोडा और घोडा को गाय कहना, इत्यादि प्रकार के वचन का नाम अर्थान्तराभिधान है । मार डालो, काट डालो, इत्यादि प्रकार से प्राणिघात के सूचक वचन का नाम भूतघात है । उक्त वचनो मे प्रवृत्त न होते हुए भी उनकी प्रवृत्ति के प्रति जो जीव का दृढ विचार रहा करता है, यह द्वितीय (मृषानुवन्धी) रौद्रध्यान का लक्षण है । यह रौद्रध्यान उस कपटी व वचक मनुष्य के होता है जिसके अन्तःकरण में पाप छिपा रहता व जो स्वयं गुणवान् न होते हुए भी अपने को गुणवान् प्रकट करता है ॥२०॥ आगे स्तेयानुबन्धी नामक तीसरे रौद्रध्यान का स्वरूप कहा जाता है- इसी प्रकार जो तीन क्रोध व लोभ से व्याकुल रहता है उसका चित्त (विचार) दूसरो के चेतन- अचेतन द्रव्य के अपहरण मे सलग्न रहता है । यह परद्रव्य के हरण का विचार निन्ध तो है ही, साथ ही वह प्राणिहिंसा का भी कारण है। इस प्रकार का रौद्रध्यानी परलोक मे होने वाले अपाय-नरकगति की प्राप्ति प्रादि-की भी अपेक्षा नहीं करता । विवेचन-लोकव्यवहार मे धन को प्राण जैसा माना जाता है । जो दुष्ट दूसरे के धन का अप- हरण करना चाहता है वह इसके लिए धन के स्वामी का घात भी कर डालता है। कदाचित् वह हत्या न भी करे, तो भी अपने धन के चले जाने से प्राणी अतिशय दुखी होता है और कदाचित् सक्लेश के वश होकर वह आत्मघात भी कर बैठता हैं। इस प्रकार परद्रव्य का अपहरण करने वाला रौद्रध्यानी अव्य व भाव दोनो ही प्रकार की हिंसा का जनक होता है, जिसके परिणामस्वरूप उसका नरकादि , -२३] रौद्रध्याननिरूपणम् १३ इति, तत्र परलोकापाया-नरकगमनादयस्तनिरपेक्षमिति गाथार्थ ॥२१॥ उक्तस्तृतीयो भेद , साम्प्रत चतुर्थ भेदमुपदर्शयन्नाह- सद्दाइविसयसाहणधणसारक्खणपरायणमणि? । सव्वाभिसकणपरोवघायकलुसाउल चित्तं ॥२२॥ शब्दादयश्च ते विषयाश्च. शब्दादिविपयास्तेषा साधन कारणम्, शब्दादिविपयसाधन च (तच्च) तद्धन च शब्दादिविषयसाधनधनम्, तत्सरक्षणे-तत्परिपालने परायणम् उद्युक्तमिति विग्रहः, तथाऽनिष्टम् -सतामनभिलपणीयमित्यर्थ, इदमेव विशेष्यते-सर्वेषामभिशङ्कनेनाकुलमिति सम्बध्यतेन विद्म क किं करिष्यतीत्यादिलक्षणेन, तस्मात्सर्वेपा यथाशक्त्योपघात एव श्रेयानित्येव परोपघातेन च, तथा कलुप- सत्यात्मानमिति कलुषा-कपायास्तैराकुल व्याप्त यत् तत् तथोच्यते, चित्तम् अन्त करणम्, प्रकरणारीद्रध्या- नमिति गम्यते, इह च शब्दादिविषयसाधन 'धनविशेषण किल श्रावकस्य चैत्यधनसरक्षणे न रौद्रध्यानमिति ज्ञापनार्थमिति गाथार्थ ॥२२॥ साम्प्रत विशेषणाभिधानगर्भमुपसहरन्नाह-- इय करण-कारणाणुमइविसयमणुचितणं चउन्भेयं । अविरय-देसासंजयजणमणससेवियमहण्णं ॥२३॥ 'इय' एव करण स्वयमेव, कारणमन्ये , कृतानुमोदनमनुमति , करण च कारण चानुमतिश्च करण- कारणानुमतय , एता एव विषय गोचरो यस्य तत्करण-कारणानुमतिविषयम्, किमिदमित्यत आह-'अनुचि- न्तन' पर्यालोचनमित्यर्थः । 'चतुर्भेदम्' इति हिंसानुवन्ध्यादिचतुष्प्रकारम्, रौद्रध्यानमिति गम्यते । अधुनेदमेव स्वामिद्वारेण निरूपयति-अविरता सम्यग्दृष्टय , इतरे च देशासयता. श्रावका , अनेन सर्वसयतव्यवच्छेद- माह, अविरत-देशासयता एव जना अविरतदेशासयतजना , तेषा मनासि चित्तानि, ते ससेवित सञ्चिन्ति- तमित्यर्थ , मनोग्रहणमित्यत्र ध्यानचिन्ताया प्रधानाङ्गल्यापनार्थम् । अधन्यमित्यश्रेयस्कर पाप निन्द्यमिति गाथार्थ ॥२३॥ अधुनेद यथाभूतस्य भवति यद्वर्द्धन चेदमिति तदेतदभिधातुकाम आह- दुर्गति को प्राप्त करना अनिवार्य हो जाता है ॥२१॥ अब क्रमप्राप्त विषयसरक्षणानुवन्धी नाम के चौथे रौद्रध्यान के स्वरूप का निर्देश किया जाता है- शब्दादिरूप इन्द्रियविषयो का कारण धन है। इसी से विषयासक्त जीव का चित्त उस धन के संरक्षण मे उद्यत रहता है । उसके मन में सबके प्रति यह सन्देह बना रहता है कि न जाने कौन कब क्या करेगा, इससे यथाशक्ति सवका घात कर डालना श्रेयस्कर है, इस प्रकार का जो उसका कलुषित विचार रहता है, यह चौथा रौद्रध्यान है। वह अनिष्ट है-आत्महितषी सत्पुरुष उसकी कभी इच्छा नहीं करते ॥२२॥ आगे उक्त चार प्रकार के रौद्रध्यान का उपसहार करते हुए उसके स्वामियो का निर्देश किया जाता है- इस प्रकार यह चार प्रकार का अनुचिन्तन (रौद्रध्यान) करण-स्वय करना (कृत), (कारण- अन्य से कराना (कारित)-और अनुमति-दूसरे के द्वारा किये जाने पर उसका अनुमोदन करना, इन तीन को विषय करने वाला है, उस जघन्य (निकृष्ट) रौद्रध्यान का चिन्तन अविरत-वतरहित मिथ्यादृष्टि व सम्यग्दृटि और देशत. असंयत-पाचवें गुणस्थानवर्ती श्रावको के मन द्वारा किया जाता है । अभिप्राय यह है कि उक्त चार प्रकार के रौद्रध्यान मे से प्रत्येक कृत, कारित और अनुमोदित के भेद से तीन प्रकार का है और वह पहिले से पाचवें गुणस्थान तक होता है, आगे के प्रमत्तसयत आदि गुणस्थानो मे वह नहीं होता ॥२३॥ वह चार प्रकार का रौद्रध्यान किस प्रकार के जीव के होता है और क्या करता है, इसे आगे प्रगट करते है- - - १४ ध्यानशतकम् [२४- एयं चउन्विहं राग-दोष-मोहाउलस्स जीवस्स । रोहमाणं संसारवद्धणं नरयगइमूलं ॥२४॥ 'एतत् अनन्तरोक्तम्, चतुर्विधम् चतुष्प्रकार राग-द्वेष-मोहाङ्कितस्य, आकुलस्य वेति पाठान्तरम् । कस्य ? जीवस्य आत्मन । किम् ? रौद्रध्यानमिति, इयमत्र चतुष्टयस्यापि त्रिया, किंविशिष्टमिदमित्यत माह-'ससारवर्द्धनम्' ओघत , 'नरकगतिमूल' विशेषत इति गाथार्थः ॥२४॥ साम्प्रत रौद्रध्यायिनो लेश्या. प्रतिपाद्यन्ते- कावोय-नील-काला लेसानो तिव्वसंकलिट्ठामो। रोद्दज्माणोवगयस्स कम्मपरिणामजणियानो ॥२५॥ पूर्ववद् व्याख्येया, एतावास्तु विशेप-तीव्रसक्लिष्टा अतिसक्लिष्टा एता इति ॥२५॥ पाह-कथ पुन रौद्रध्यायी ज्ञायत इति ? उच्यते-लिङ्गेध्य , तान्येवोपदर्शयति- लिंगाई तस्स उस्सण्ण-बहुल-नाणाविहाऽऽमरणदोसा। तेसि चिय हिंसाइसु बाहिरकरणोवउत्तस्स ॥२६॥ 'लिङ्गानि' चिह्नानि 'तस्य' रौद्रध्यायिन , 'उत्सन्न-बहुल-नानाविधाऽऽमरणदोपा' इत्यत्र दोषशब्द प्रत्येकमभिसम्बध्यते-उत्सन्नदोष बहुलदोष. नानाविधदोप आमरणदोपश्चेति । तत्र हिंसानुबन्ध्यादीनाम- न्यतरस्मिन् प्रवर्तमान , उत्सन्नम् अनुपरत वाहुल्येन प्रवर्तते इत्युत्सन्नदोष । सर्वेष्वपि चैवमेव प्रवर्तत इति बहुलदोषः । नानाविधेषु त्वक्त्वक्षण-नयनोत्खननादिषु हिंसाद्युपायेष्वसकृदप्येव प्रवर्तते इति नानाविध- दोष । महदापद्गतोऽपि स्वत , महदापद्गतेऽपि च परे आमरणादसञातानुताप कालसौकरिकवत् अपि त्व- समाप्तानुतापानुशयपर इत्यामरणदोप इति। तेष्वेव हिंसादिषु, आदिशब्दान्मृपावादादिपरिग्रह , ततश्च तेष्वेव हिंसानुबन्ध्यादिपु चतुर्भेदेषु । किम् ? बाह्यकरणोपयुक्तस्य सत उत्सन्नादिदोपलिङ्गानीति, बाह्यकरणशब्देनेह वह चार प्रकार का रौद्रध्यान राग, द्वेष और मोह से व्याकुल जीव के होता है । वह सामान्य से उसके संसार को बढाने वाला है तथा विशेष रूप से वह नरकगति का मूल कारण है ॥२४॥ आगे रौद्रध्यानी के सम्भव लेश्याओ का निर्देश किया जाता है- रौद्रध्यान को प्राप्त हुए जीव के कर्मपरिपाक से होने वाली फापोत, नील और कृष्ण ये तीन अतिशय संकिलिष्ट अशुभ लेश्या हुआ करती हैं। जिस प्रकार काले आदि रंग वाले किसी पदार्थ की समीपता से स्फटिक मणि मे कृष्ण वर्णादि रूप परिणमन हुआ करता है उसी प्रकार कर्म के निमित्त से प्रात्मा का जो परिणमन होता है उसका नाम लेश्या है और वह कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पद्म, और शुक्ल के भेद से छह प्रकार की है ॥२॥ आगे रौद्रध्यानी के चिह्नो को दिखलाते हैं- उक्त हिंसानुबन्धी प्रादि चार प्रकार के रौद्रध्यान मे वाह्य करण-वचन और काय-से उप- युक्त-उपयोग युक्त होकर प्रवृत्त हुए-रौद्रध्यानी जीव के उत्सन्नदोष, बहुलदोष, नानाविधदोष और अामरणदोष ये दोष होते हैं । ये उसके लिग-ज्ञापक चिह्न हैं, जिनके द्वारा वह पहिचाना जाता है । विवेचन-रौद्रध्यानी जीव सदा हिंसादि पापो मे प्रवर्तमान रहता है, अतः उसके उक्त चार के दोष देखे जाते हैं। पूर्वोक्त हिंसानुबन्धी प्रादि चार प्रकार के रौद्रध्यान मे से किसी एक मे जो वह बहुलता से प्रवर्तमान रहता है, यह उसका उत्सन्न दोष है । वह उक्त सभी रौद्रध्यानो मे जो इसी प्रकार से-बहुलता से-प्रवृत्त रहता है, यह उसका अनुमापक बहुल दोष है। वह चमड़ी के छीलने एवं नेत्रो के उखाड़ने आदिरूप हिंसा के उपायो मे जो निरन्तर इसी प्रकार से प्रवृत्त रहता है, इसे उसका ज्ञापक नानाविधदोष जानना चाहिए। वह स्वयं भारी प्रापत्ति से ग्रस्त होकर तथा वैसी ही आपत्ति से ग्रस्त दूसरे के विषय मे भी कालसौकरिक के समान जीवन पर्यन्त पश्चात्ताप से रहित होता है, यह उस का परिचायक आमरण नाम का दोष है ॥२६॥ और भी - -३०] धर्मध्यानप्ररूपणागतानि द्वादशद्वाराणि वाक्कायो गृह्येते, ततश्च ताभ्यामपि तीव्रमुपयुक्तस्येति गाथार्थ ॥२६॥ किं च- परवसणं अहिनंदइ निरवेक्खो निनो निरणुतावो । हरिसिज्जइ कयपावो रोदज्झाणोवगयचित्तो ॥२७॥ इहाऽऽत्मव्यतिरिक्तो योऽन्य स परस्तस्य व्यसनम् आपत् परव्यसनम्, तत् 'अभिनन्दति' प्रतिक्लिष्ट- चित्तत्वाद् बहु मन्यत इत्यर्थ-शोभनमिद यदेतदित्थ सवृत्तमिति, तथा 'निरपेक्ष' इहान्यभविकापायभय- रहित , तथा निर्गतदयो निर्दय , परानुकम्पाशून्य इत्यर्थ , तथा निर्गतानुतापो निरनुताप, पश्चात्तापरहित इति भाव , तथा कि च-'हृष्यते' तुष्यति 'कृतपापः' निर्वतितपाप सिंहमारकवत्, क इत्यत आह-रौद्र- घ्यानोपगतचित्त इति, अमूनि च लिङ्गानि वर्तन्त इति गाथार्थ ॥२७॥ उक्त रौद्रध्यानम्, साम्प्रत धर्म- ध्यानावसर, तत्र तदभिघित्सयवादाविद द्वारगाथाद्वयमाह- झाणस्स भावणानो देसं कालं तहाऽऽसणविसेसं । आलंबणं कम झाइयव्वयं जे य झायारो ॥२८॥ तत्तोऽणुप्पेहाम्रो लेस्सा लिंग फलं च नाऊणं । धम्म झाइज्ज मुणी तग्गयजोगो तो सुक्कं ॥२६॥ ध्यानस्य प्राग्निरूपितशब्दार्थस्य । किम् ? 'भावना' ज्ञानाद्या, ज्ञात्वेति योग, किं च-देश तदु- चितम्, काल तथा आसनविशेष तदुचितमिति, आलम्बन वाचनादि, क्रम मनोनिरोधादि, तथा ध्यातव्य ध्येयमाज्ञादि, तथा ये च ध्यातार अप्रमादादियुक्ता , तत अनुप्रेक्षा ध्यानोपरमकालभाविन्योऽनित्यत्वाद्या- लोचनारूपा, तथा लेश्या शुद्धा एव, तथा लिङ्ग श्रद्धानादि, तथा फल सुरलोकादि, च-शब्द स्वगतानेक- भेदप्रदर्शनपर, एतद् ज्ञात्वा । किम् ? धर्म्यम् इति धर्मध्यान घ्यायेन्मुनिरिति । तत्कृतयोग धर्मध्यान- कृताभ्यास , तत पश्चात् शुक्लध्यानमिति गाथाद्वयसमासार्थ ॥२८-२९॥ व्यासार्थ तु प्रतिद्वार ग्रन्थकार स्वयमेव वक्ष्यति, तत्राऽऽद्यद्वारावयवार्थप्रतिपादनायाह-- पुवकयन्भासो भावणाहि माणस्स जोग्गयमुवेइ । तानो य नाण-दसण-चरित्त-वेरग्गनियताओ ॥३०॥ पूर्व-ध्यानात् प्रथमम्, कृत निर्वतितोऽभ्यास प्रासेवनालक्षणो येन स तथाविध , काभि पूर्वकृता- भ्यास ? भावनाभि करणभूताभि , भावनासु वा भावनाविषये, पश्चाद् ध्यानस्य अधिकृतस्य, योग्यताम् अनुरूपताम्, उपति यातीत्यर्थ , ताश्च भावना ज्ञान-दर्शन-चारित्र-वैराग्यनियता वर्तन्ते, नियता परिच्छि- जिसका चित्त रौद्रध्यान मे व्यापृत रहता है वह दूसरे की आपत्ति मे प्रसन्न होता हुआ उसके विनाश के भय से रहित और दया से विहीन होता है, तथा इसके लिए वह पश्चाताप भी नहीं करता। साथ ही वह पापाचरण करके हर्षित भी होता है ॥२७॥ इस प्रकार रौद्रध्यान के कथन को समाप्त करके आगे धर्मध्यान की प्ररूपणा करते हुए प्रथमतः दो द्वारगाथाओ का निर्देश करते हैं- मुनि को ज्ञानादि भावनाओ, देश, काल, प्रासनविशेष, पालम्बन, क्रम, ध्यातव्य, ध्याताओ, अनु- प्रेक्षानो, लेश्यामो, लिंग और फल को जानकर धर्मध्यान का चिन्तन करना चाहिए। इस प्रकार धर्म- ध्यान का अभ्यास करके तत्पश्चात् शुक्लध्यान का चिन्तन करना चाहिए ॥२८-२९॥ आगे यथाक्रम से इन द्वारो का निरूपण करते हुए ग्रन्थकार प्रथमतः भावनाओ के प्रयोजन और उनके विषय को स्पष्ट करते हैं- जिसने ध्यान से पूर्व भावनाओ के द्वारा अथवा उनके विषय मे अभ्यास कर लिया है वह ध्यान की योग्यता को प्राप्त होता है-ध्यान करने के योग्य होता है। वे भावनायें ज्ञान, दर्शन, चारित्र और वैराग्य से नियत हैं-उनसे सम्बद्ध हैं। गाथागत 'नियतामो' के स्थान मे 'जणियाओं' पाठान्तर के अनुसार यह अर्थ होगा-उक्त भावनायें ज्ञान, दर्शन और चारित्र से उत्पन्न होती हैं ॥३०॥ - १६ ध्यानशतकम् [३१- ना, पाठान्तर वा जनिता इति गाथार्थ ॥३०॥ साम्प्रत ज्ञानभावनास्वरूप-गुणदर्शनायेदमाह- णाणे णिच्चन्भासो कुणइ मणोधारणं विसुद्धि च । नाणगुणमुणियसारो तो भाइ सुनिच्चलमईओ ॥३१॥ ज्ञाने श्रुतज्ञाने, नित्य सदा, अभ्यास आसेवनालक्षण , करोति निर्वर्तयति । किम्? मनस अन्त - करणस्य, चेतस इत्यर्थ , धारणम् अशुभव्यापारनिरोधेनावस्थानमिति भावना तथा 'विशुद्धि च' तत्र विशोधन विशुद्धि सूत्रार्थयोरिति गम्यते, ताम्, च-शब्दाद् भवनिर्वेद च, एव 'ज्ञानगुणमुणितसार' इति-ज्ञानेन गुणाना जीवाजीवाश्रितानाम् ‘गुण-पर्यायवत् द्रव्यम्' [त सू ५-३७] इति वचनात्, पर्यायाणा च तदविनाभावि- नाम्, मुणित ज्ञात सारः परमार्थो येन स तयोच्यते, ज्ञानगुणेन वा ज्ञानमाहात्म्येनेति भाव , ज्ञात सारो येन, विश्वस्येति गम्यते, स तथाविध । ततश्च पश्चाद् 'ध्यायति' चिन्तयति । किविशिष्ट. सन् ? सुष्टु- अतिशयेन निश्चला निष्प्रकम्पा सम्यग्ज्ञानतोऽन्यथाप्रवृत्तिकम्परहितेति भाव , मति बुद्धिर्यस्य स तथाविध इति गाथार्थ ॥३१॥ उक्ता ज्ञानभावना, साम्प्रतं दर्शनभावनास्वरूप-गुणदर्शनार्थमिदमाह- संकाइदोसरहिरो पसम-थेज्जाइगुणगणोवेभो । होइ असंमूढमणो दसणसुद्धीए झाणंमि ॥३२॥ 'शङ्कादिदोपरहित' शङ्कन शङ्का, आदिशब्दात् काक्षादिपरिग्रह , उक्त च-'शङ्काकाङ्क्षा- विचिकित्साऽन्यदृष्टिप्रशसा-पग्पाषण्डसस्तवा सम्यग्दृष्टेरतिचारा [त सू. ७-१८] इति, एतेषा च स्त्र- अव ज्ञानभावना के स्वरूप व उसके गुण के प्रगट करने के लिए यह कहा जाता है- ज्ञान (श्रुतज्ञान) के विषय मे निरन्तर किया गया अभ्यास मनके धारण को करता है-उसे अशुभ व्यापार से रोक कर स्थिर करता है तथा सूत्र और अर्थविषयक विशुद्धि को भी करता है। इस प्रकार ज्ञान के द्वारा जिसने गुणों के जीव और अजीव में रहने वाले गुणो एवं उनकी अविनाभावी पर्यायों के भी-सार (यथार्थता) को जान लिया है अथवा ज्ञान गुण के द्वारा जिसने विश्व के सार (यथार्थ स्वरूप को) जान लिया है वह अतिशय स्थिरबुद्धि होकर ध्यान करता है । अभिप्राय यह है कि ज्ञान के अभ्यास से ध्यान की कारणभूत मन की स्थिरता होती है, अतः ध्यान की सिद्धि के लिए ज्ञान का अभ्यास करना प्राकश्यक है ॥३१॥ अव दर्शनभावना के स्वरूप और गुण को दिखलाते हैं- जो शका-कांक्षादि दोषो से रहित होकर प्रश्रम-स्वमत और परमत सम्बन्धी तम्वविषयक परि- ज्ञान से उत्पन्न प्रकृष्ट श्रम-अथवा प्रशम एवं जिनशासनविषयक स्थिरता आदि गुणों के समूह से युक्त होता है उसका मन दर्शनविशुद्धि के कारण ध्यान के विषय में मूढता (विपरीतता) को प्राप्त नहीं होता। विवेचन-जीवादि पदार्थ जिस स्वरूप से अवस्थित हैं उनका उसी रूप से श्रद्धान करना, इसका नाम सम्यग्दर्शन है । उसके ये पाच दोष (अतिचार) हैं जो उसको मलिन किया करते हैं-शंका, कांक्षा, विचिकित्सा अथवा विद्वज्जुगुप्सा, परपाषण्डप्रशसा और परपाषण्डसंस्तव । जिनप्ररूपित पदार्थों में जो धर्मास्तिकाय आदि गहन पदार्थ हैं उनका बुद्धि को मन्दता के कारण निश्चय न होने पर 'अमुक पदार्थ ऐसा ही होगा या अन्यथा होगा' इस प्रकार से सन्देह करना, यह शंका कहलाती है। वह देशशका और सर्वशका के भेद से दो प्रकार की है। प्रात्मा क्या असख्य प्रदेशों वाला है या प्रदेशो से रहित निरवयव है, 'इस प्रकार देशविषयक शंका का नाम देशशका है। समस्त अस्तिकाय क्या ऐसे ही होगे या अन्य प्रकार होगे, इस प्रकार समस्त ही अस्तिकायो के स्वरूप मे सन्देह करना, यह सर्वशंका कहलाती है। इस प्रकार का सन्देह मिथ्यात्वरूप ही है। कहा भी गया है- पयमक्खर च एक्क जो न रोएइ सुत्तनिहिट्ट । सेस रोयतोबि हु मिच्छट्ठिी मुणेयन्वो॥ अर्थात् जिसको सूत्रनिर्दिष्ट एक पद या अक्षर भी नहीं रुचता है उसे शेष अन्य सबके रुचने पर - -३२] दर्शनभावनास्वरूपम् १७ रूप प्रत्याख्यानाध्ययने न्यक्षेण वक्ष्याम, तत्र शङ्कादय एवं सम्यक्त्वाख्यप्रथमगुणातिचारत्वात् दोपा शवादिदोषास्तै रहित त्यक्त , उक्तदोपरहितत्वादेव किम् ? 'प्रश(श्र)म-स्थैर्यादिगुणगणोपेत' तत्र प्रकर्पण भी मिथ्यादृष्टि जानना चाहिये । इसका कारण यह है कि किसी एक पदार्थ के विषय मे भी यदि सन्देह बना रहता है तो निश्चित है कि उसकी सर्वज्ञ व वीतराग जिनके ऊपर श्रद्धा नहीं है । शंकाशील प्राणी किस प्रकार से नष्ट होता है और इसके विपरीत नि.शक व्यक्ति किस प्रकार सुखी होता है, इसके लिए पेयापापी दो वालको का उदाहरण दिया जाता है । दूसरा दोष काक्षा है । सुगतादिप्रणीत विभिन्न दर्शनो के विषय मे जो अभिलाषा होती है उसे काक्षा कहा जाता है । वह भी देश और सर्व के भेद से दो प्रकार की है। अनेक दर्शनो मे से किसी एक ही दर्शन के विषय मे जो अभिलाषा होती है वह देशकाक्षा कहलाती है। जैसे सुगत (बुद्ध) प्रणीत दर्शन उत्तम है, क्योकि उसमे चित्त के जय को प्ररूपणा की गई है और वही मुक्ति का प्रधान कारण है, इत्यादि । सभी दर्शनो की अभिलाषा करना, यह सर्वकाक्षा का लक्षण है। कपिल, कणाद और अक्षपाद आदि के द्वारा प्रणीत सभी मतो मे अहिंसा का प्रतिपादन किया गया है तथा उनमे ऐहिक क्लेश का भी प्रतिपादन नही किया गया, अतएव वे उत्तम है; इत्यादि । अथवा इस लोक और परलोक सम्बन्धी सुखादि की अभिलाषा करना, इसे कांक्षा दोष जानना चाहिये। जिनागम मे उभय लोक सम्बन्धी सुखादि की अभिलाषा का निषेध किया गया है । इसलिए वह भी सम्यक्त्व के अतिचार रूप है। एक मात्र मोक्ष को अभिलाषा को छोड़ कर अन्य किसी भी प्रकार की अभिलाषा सम्यक्त्व की घातक ही है। काक्षा करने और न करने के फल को प्रगट करने के लिए राजा और अमात्य का उदाहरण दिया जाता है। सम्यक्त्व का तीसरा दोष विचिकित्सा अथवा विद्वज्जुगुप्सा है। जो पदार्थ युक्ति और आगम से भी घटित होता है उनके फल के प्रति सन्दिग्ध रहना, इसका नाम विचिकित्सा है। ऐसी विचिकित्सा वाला व्यक्ति सोचता है कि अतिशय फष्ट के कारणभूत इन कनकावली प्रादि तपों का परिणाम मे कुछ फल भी प्राप्त होने वाला है या यो ही कष्ट सहन करना है। कारण कि लोक मे कृषक (किसान) आदि की क्रियायें सफल और निष्फल दोनो ही प्रकार को देखी जाती हैं। शका जहां समस्त व प्रस- मस्त द्रव्य-गुणो को विषय करती है वहाँ यह विचिकित्सा केवल क्रिया को ही विषय करती है, अतएव इसे शका से भिन्न समझना चाहिए। इसके सम्बन्ध मे एक चोर का उदाहरण दिया गया है । जैसा कि ऊपर निर्देश किया जा चुका है, सम्यक्त्व का तीसरा दोष विकल्परूप में विद्वज्जु- गुप्सा भी है । जिन्होने ससार के स्वभाव को जानकर समस्त परिग्रह का परित्याग कर दिया है वे साधु विद्वान् माने जाते हैं, उनकी जुगुप्सा या निन्दा करना, इसका नाम विद्वज्जुगुप्सा है । जैसे—ये साधु स्नान नहीं करते, उनका शरीर पसीने से मलिन व दुर्गन्धयुक्त रहता है, यदि वे प्रासुक जल से स्नान कर लें तो क्या हानि होने वाली है, इत्यादि प्रकार की साधुनिन्दा । ऐसी निन्दा करना उचित नहीं हैं, कारण कि शरीर तो स्वभावत: मलिन ही है। इसके विषय मे एक श्रावकपुत्री का उदाहरण दिया जाता है। सम्यक्त्व का चौथा दोष है परपाषण्डप्रशंसा। परपाषण्ड का अर्थ है सर्वज्ञप्रणीत पाषण्डो से भिन्न अन्य पाखण्डी-क्रियावादी (१८०), प्रक्रियावादी (८४), प्रज्ञानिक (६७) और वैनयिक (३२) रूप तीन सौ तिरेसठ प्रकार के मिथ्यादृष्टि । उनकी प्रशंसा या स्तुति करना, इसका नाम परपाषण्ड- प्रशसा है । इसके सम्बन्ध मे पाटलिपुत्रवासी चाणक्य का उदाहरण दिया जाता है । पांचवां सम्यक्त्व का दोष है परपाषण्डसस्तव । पूर्वोक्त पाषण्डियो के साथ रहकर भोजन व वार्तालापादि रूप परिचय बढ़ाना, यह परपाषण्डसस्तव कहलाता है । यहाँ सौराष्ट्रवासी श्रावक का उदा: हरण दिया गया है। AM । ~ तस्य १८ ध्यानशतकम् [३३- श्रम प्रश्रम खेद , स च स्व-परसमयतत्त्वाधिगमरूप , स्थैर्य तु जिनशासने निष्प्रकम्पता, आदिशब्दात्प्रभाव- नादिपरिग्रह , उक्त च-स-परसमयकोसल्ल थिरया जिणसासणे पभावणया। आययणसेव भत्ती दसणदीवा गुणा पच ॥१॥ प्रश्रम-स्थैर्यादय एव गुणास्तेषा गण समूहस्तेनोपेतो युक्तो य स तथाविध , अथवा. प्रशमादिना स्थैर्यादिना च गुणगणेनोपेत २, तत्र प्रशमादिगुणगण. प्रशम-सवेग-निर्वेदाऽनुकम्पाऽऽस्तिक्या- भिव्यक्तिलक्षण , स्थैर्यादिस्तु दर्शित एव, य इत्थम्भूत असौ भवति 'असम्मूढमना' तत्त्वान्तरेऽभ्रान्तचित्त इत्यर्थ , दर्शनशुद्धया उक्तलक्षणया हेतुभूतया, क्व ? ध्यान इति गाथार्थ. ॥३२॥ उक्ता दर्शनभावना, साम्प्रत चारिनभावनास्वरूप-गुणदर्शनायेदमाह- नवकम्माणायाणं पोराणविणिज्जरं सुभायाणं । चारित्तभावणाए झाणमयत्तेण य समेइ ॥३३॥ 'नवकर्मणामनादानम्' इति नवानि उपचीयमानानि प्रत्यग्राणि भण्यन्ते, क्रियन्त इति कर्माणि ज्ञानावरणीयादीनि, तेपामनादानम् अग्रहण चारित्रभावनया, समेति गच्छतीति योग , तथा 'पुराणविनिर्जराम्' चिरन्तनक्षपणामित्यर्थ , तथा 'शुभादानम्' इति शुभ पुण्य सात-सम्यक्त्व-हास्य-रति-पुरुषवेद-शुभायुर्नाम- गोत्रात्मकम्, तस्याऽदानम् ग्रहणम् । किम् ? चारित्रभावनया हेतुभूतया ध्यानम्, च-शब्दान्नवकर्मानादानादि च, अयत्नेन अक्लेशेन समेति गच्छति प्राप्नोतीत्यर्थ । तत्र चारित्रभावनयेति कोऽर्थ ? 'चर गति-भक्षणयो' इत्यस्य 'अति-लू-धू-सू-खनि-सहि-चर इत्रन्' [पा ३-२-१८४] इतीत्रन्प्रत्ययान्तस्य चरित्रमिति भवति, चरन्त्यनिन्दितमनेनेति चरित्र क्षयोपशमरूपम्, तस्य भावश्चारित्रम् । एतदुक्त भवति-इहान्यजन्मोपात्ता- ष्टविधकर्मसञ्चयापचयाय चरणभावश्चारित्रमिति, सर्वसावद्ययोगविनिवृत्तिरूपा क्रिया इत्यर्थ , भावना अभ्यासश्चारित्रभावनेति गाथार्थ ॥३३॥ उक्ता चारित्रभावना । साम्प्रत वैराग्यभावनास्वरूप-गुण- दर्शनार्थमाह- सुविदियजगस्सभावो निस्संगो निन्भनो निरासो य । वेरग्गभावियमणो झाणमि सुनिच्चलो होइ ॥३४॥ सम्यक्त्व को कलुषित करने वाले इन दोषो से रहित होकर जो प्रश्रम व स्थैर्य आदि गुणो से युक्त है वह इस दर्शनविशुद्धि के द्वारा ध्यान मे दिग्भ्रान्त नहीं होता। गायोक्त 'पसम' शब्द का सस्कृत रूप प्रश्न और प्रशम होता है। तदनुसार प्रश्रम का अर्थ स्वसमय और परसमय सम्मत तत्त्वो के अभ्यास से उत्पन्न होने वाला खेद है । प्रशम के प्राश्रय से प्रशम, सवेग, निर्वेद, अनुकम्पा और आस्तिक्य इन सम्यक्त्व के परिचायक गुणो का ग्रहण किया गया है। स्थर्य से जिनशासनविषयक स्थिरता अभि- प्रेत है ॥३२॥ अब चारित्रभावना के स्वरूप और उसके गुण को दिखलाते हुए यह कहा जाता है- चारित्रभावना के द्वारा नवीन कर्मों के ग्रहण का प्रभाव, पूर्वसचित कर्मों की निर्जरा, शुभ (पुण्य) कर्मों का ग्रहण और ध्यान, ये बिना किसी प्रकार के प्रयल के ही प्राप्त होते हैं । विवेचन-सर्वसावद्ययोग (पापाचरण) की निवृत्ति का नाम चारित्र और उसके अभ्यास का नाम चारित्रभावना है । इस चारित्रभावना से वर्तमान मे प्राते हुए ज्ञानावरणादि कर्मों का निरोध होता है तथा पूर्वोपाजित उन्हीं कर्मों की निर्जरा भी होती है। इसके अतिरिक्त उक्त चारित्रभावना के प्रभाव से सातावेदनीय, सम्यक्त्व, हास्य, रति, पुरुषवेद, शुभ प्रायु, शुभ नाम और शुभ गोत्र, इन पुण्य प्रकृ- तियो के ग्रहण के साथ ध्यान को भी प्राप्ति होती है। ये सब उस चारित्रभावना के आश्रय से अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं ॥३३॥ आगे वैराग्यभावना के स्वरूप व उसके गुण को प्रगट करते हैं- जिसने चराचर जगत् के स्वभाव को भलीभाँति जान लिया है तथा जो सग (विषयासक्ति), भय और आशा से रहित हो चुका है उसका अन्तःकरण चूंकि वैराग्यभावना से सुसस्कृत हो जाता है इसी.

१६ -३५] वैराग्यभावनास्वरूपम् सुष्टु अतीव, विदित ज्ञातो जगत चराचरस्य, यथोक्तम्- जगन्ति जङ्गमान्याहुर्जगद् ज्ञेय चरा- चरम् । स्वो भाव स्वभाव -जन्म मरणाय नियत बन्धुर्दु खाय धनमनिर्वृतये । तन्नास्ति यन्न विपदे तथापि लोको निरालोक ॥१॥ इत्यादिलक्षणो येन स तथाविध , कदाचिदेवम्भूतोऽपि कर्मपरिणतिवशात्ससङ्गो भवत्यत आह-'नि सङ्ग' विपयजस्नेहसङ्गरहित , एवम्भूतोऽपि च कदाचित्सभयो भवत्यत आह–'निर्भय इहलोकादिसप्तभयविप्रमुक्त, कदाचिदेवम्भूतोऽपि विशिष्टपरिणत्यभावात्परलोकमधिकृत्य साशसो भवत्यत आह-"निराशसश्च' इह-परलोकागसाविप्रमुक्त, च-शब्दात्तथाविधत्रोधादिरहितश्च, य एवविधो वैराग्य- भावितमना भवति स खल्वज्ञानाद्यपद्रवरहितत्वाद् ध्याने सुनिश्चलो भवतीति गाथार्थ ॥३४॥ उक्ता वैरा- ग्यभावना, मूलद्वारगाथाद्वये ध्यानस्य भावना इति व्याख्यातम् । अधुना देशद्वारव्याचिख्यासयाऽऽह -- निच्चं चिय जुवइ-पसू-नपुंसग-कुसीलवज्जियं जइणो। लिए वह ध्यान मे अतिशय स्थिर हो जाता है उससे कभी विचलित नहीं होता । विवेचन-'तास्तान देव-मनुष्य-तियंड्नारकपर्यायान् प्रत्ययं गच्छतीति जगत्' इस निरुक्ति के अनुसार बार-बार देव-मनुष्यादि अवस्थाओ को प्राप्त करने वाले प्राणिसमूह का नाम ही जगत् है। जगत्, लोक और ससार ये समानार्थक शब्द हैं । वह जगत् अनित्य व अशरण होकर 'यह मेरा है और मैं इसका स्वामी हूँ इस प्रकार के मिथ्या अहकार से ग्रसित होता हुआ जन्म, जरा और मरण से आक्रान्त है। जो जन्मता है वह मरता अवश्य है और मरण का दुख ही सर्वाधिक दुख माना जाता है । प्राचार्य समन्तभद्र का यह कथन सर्वथा अनुभवगम्य है-यह अज्ञानी प्राणी मृत्यु से डरता है, परन्तु उसे उससे छुटकारा मिलता नहीं है । साथ ही वह सुख को चाहता है, पर वह भी उसे इच्छानुसार प्राप्त नहीं होता । यह जगत् का स्वभाव है। फिर भी अज्ञानी प्राणी इस वस्तुस्थिति को न जानकर निरन्तर मरण के भय से पीड़ित और सुख की अभिलाषा से सदा सन्तप्त रहता है। जड शरीर के सम्बन्ध से जो कर्म का बन्धन होता है उससे चेतन-माता-पिता आदि-और अचेतन-धन-सम्पत्ति प्रादि-इन बाह्य पदार्थों मे ममत्वबुद्धि होती है जिसके वशीभूत होकर वह उन विनश्वर पर पदार्थों को स्थायी समझता व उनके सरक्षण के लिए व्याकुल होता है । वह यह नहीं जानता कि जन्म-मरण का अविनाभावी है, जिन बन्धु जनो को प्राणी अपना मानता है वे वास्तव मे दुख के ही कारण हैं, तथा जिस धन से वह सुख की कल्पना करता है वह सुख का साधन न होकर तृष्णाजनित दुख का ही कारण होता है, इस प्रकार लोक मे ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं है जो दुख का कारण न हो, ऐसी वस्तुस्थिति के होते हुए भी खेद है कि यह अज्ञानी प्राणी अपनी अज्ञानता से स्वय दुखी हो रहा है। इस प्रकार के जगत् के स्वभाव को जो जान चुका है उसे न तो विषयो मे आसक्ति रहती है, न इहलोक व परलोकादि सात भयो मे से कोई भय भी पीड़ित करता है, और न इस लोक व परलोक सम्बन्धी किसी सुख की इच्छा भी रहती है। इस प्रकार वह अपने अन्तःकरण के वैराग्य से सुवासित हो जाने के कारण ध्यान मे अतिशय निश्चल हो जाता है ॥३४॥ इस प्रकार भावना के भेद व उनके स्वरूप को दिखलाकर अब क्रमप्राप्त देशद्वार का निरूपण करते हैं- साधु का स्थान तो सदा ही युवति-मनुष्यस्त्री व देवी, पशु-तियंचस्त्री, नपुंसक और १. अनित्यमत्राणमहक्रियाभि प्रसक्तमिथ्याध्यवसायदोषम् । इद जगज्जन्म-जरान्तकात निरञ्जना शान्तिमजीगमस्त्वम् ॥ बृ. स्वयभूस्तोत्र १२ २ विभेति मृत्योर्न ततोऽस्ति मोक्षो नित्य शिव वाञ्छति नास्य लाभ । तथापि बालो भय-कामवश्यो वृथा स्वय तप्यत इत्यवादी ॥ बृ. स्वयंभू ३४. ३. प्रचतने तत्कृतबन्धजेऽपि ममेदिमित्याभिनिवेशकग्रहात् । प्रभड्गुरे स्थावरनिश्चयेन च क्षत जगत्तत्वमजिग्रहद् भवान् । बृ स्वयभु १७.

२० ध्यानशतकम् [३५- ठाणं वियणं भणियं विसेसो झाणकालंमि ॥३५॥ 'नित्यमेव' सर्वकालमेव, न केवल ध्यानकाल इति । किम् ? 'युवति-पशु-नपुसक-कुशीलपरिवजित यते स्थान विजन भणितम्' इति । तत्र युवतिगव्देन मनुप्यस्त्री देवी च परिगृह्यते, पशुगब्देन तु तिर्य- स्त्रीति, नपुसक प्रतीतम्, कुत्सित निन्दित गील वृत्त येपा ते कुशीला, ते च तथाविधा द्यूतकारादय , उक्त चजइयर-सोलमेठा वट्टा उभायगादिणो जे य । एए होति कुसीला वज्जेयव्वा पयत्तेण ॥१॥' युवतिश्च पशुश्चेत्यादि द्वन्द्व , युवत्यादिभि परि-समन्तात् वजितम्-~-रहितमिति विग्रह , यते तपस्विन मावो, 'एकग्रहणे तज्जातीयग्रहणम्' इति साध्व्याश्च योग्य यतिनपुमकस्य च । किम् ? स्थानम् अवकाशलक्ष- 'णम्, तदेव विशेष्यते-युदत्यादिव्यतिरिक्तशेपजनापेक्षया विगतजन विजन भणितम् उक्त तीर्थकरंगणाधर- उदमेवम्भूत नित्यमेट, अन्यत्र प्रवचनोक्तदोपमम्भवान् । विगेपनो ध्यानकाल इत्यपरिणतयोगादिनाऽन्यत्र ध्यानस्याजराधयितुमशक्यत्वादिति गायार्य ॥३५॥ इत्थ तावदपरिणनयोगादीना स्थानमुत्तम्, अधुना परि- गतयोगादीनधिकृत्य विशेपमाह- थिर-फयजोगाण पुण मुणीण झाणे सुनिच्चलमणाणं । गामंमि जणाइण्णे सुण्णे रणे व ण विसेसो ॥३६॥ तत्र स्थिग सहनन-वृतिभ्या बलवन्त उच्चन्ते, कृता निर्वतिता , अभ्यस्ता प्रति यावन् । के ? युज्यन्न इति योगा ज्ञानादिभावनाव्यापारा सत्त्व-मूत्र-तप प्रभृतयो वा गन्ते रतयोगा , स्थिराइच ते कृतयोगाम्चेति विग्रहस्तपाम् । अत्र च स्थिर-गतयोगयोञ्चतुभंगी भवति । तद्यथा-थिरे गामेगे णो कयजोगे इत्यादि, स्थिरा वा, पौन पुन्यकरणेन परिचिता कृता योगा यन्ते तयाविधान्तपाम् । पुन गन्दा विगेगणार्थ । किम् । विशिनष्टि ? नृतीयभगवता न नेपाणाम्, स्वभ्यस्तयोगाना वा मुनीनामिति, मन्यन्ते जीवादीन् पदार्था- निनि मुनयो-विपश्चित्साववस्तेपा च, तथा ध्याने अधिकृत एव धर्मध्याने मुष्ठ अतिशयेन निश्चल निष्प्र- कम्प मनो येपा ते तथाविधास्तेपाम्, एवविधाना स्थान प्रति ग्रामे जनातीर्णं गून्येऽरणे वा न विशेष इति । तन असति बुद्धयादीन् गुणान् गम्यो वा करादीनामिति गाम मनिवेशविगेप , इह 'एकग्रहणे तज्जा- तीयग्रहणात्' नगर-खेट-कर्वटादिपरिग्रह इति, जनाकीर्ण जनाकुले वाम एवोद्यानादी वा, तथा गून्ये तस्मिन्नेवारण्ये वा कान्तारे वेति, वा विकल्पे, न विशेपो न भेद , सर्वत्र तुल्यभावत्वात्परिणतत्वात्तेपामिति कुशील-जुमारी आदि निन्द्य पाचरण करने वालो से रहित निर्जन कहा गया है। फिर ध्यान के समय तो वह विशेष रूप से उपर्युक्त जनो से होन होना चाहिए ॥३॥ ऊपर जो ध्यान के योग्य स्थान का निर्देश किया गया है वह अपरिणत (अपरिपक्व) योग आदि चाले साधु को लक्ष्य करके किया गया है, आगे परिणत योग आदि से युक्त साधु को लक्ष्य करके उसमे विशेषता प्रगट की जाती है- जो मुनि स्थिर-संहनन और धैर्य से बलवान्-और कृतयोग हैं-ज्ञानादि भावनाप्रो के व्यापार से अथवा सत्व, सूत्र व तप आदि से संयुक्त हैं-उनका मन चूकि अतिशय स्थिरता को प्राप्त हो जाता है, अतएव उनके लिए जनसमूह से व्याप्त गाव मे और निर्जन वन मे कुछ विशेषता नहीं है-वे स्त्रियो आदि के आवागमन से व्याप्त गाव के बीच मे और एकान्त वन मे भी स्थिरतापूर्वक ध्यान कर सकते हैं ।। विवेचन-'मन्यते जीवादीन् पदार्थात् इति मुनिः' इस निरुक्ति के अनुसार जो जीवादि पदार्थों को जानता है उसका नाम मुनि है । तदनुसार जिन साधुओ ने जीवाजीवादि तत्त्वो को भलीभाँति जान लिया है उनका मन अतिशय निश्चल हो जाता है । इसलिए वे गाव या वन मे कहीं पर भी स्थित होकर ध्यान कर सकते हैं। प्राचार्य अमितगति ने यह ठीक ही कहा है- जो विद्वान् साधु पर पदार्थों से भिन्न आत्मा मे आत्मा का अवलोकन कर रहा है वह यह विचार करता है कि हे आत्मन् ! तू ज्ञान-दर्शनस्वरूप अतिशय विशुद्ध है। ऐसा साधु एकाग्रचित्त होकर जहाँ १. जूइयर-सोलमेट्टा उन्भायगादिणो जे य । एए होति कुमीला वज्जेयव्वा पयत्तेण ।। (हरि टीका मे उद्धत) - ध्यानयोग्यदेश-कालनिरूपणम् २१ . - गाथार्थ ॥३६॥ यतश्चैव- जो [तो] जत्थ समाहाणं होज्ज मणोवयण-कायजोगाणं । भूप्रोवरोहरहियो सो देसो झायमाणस्स ।।३७॥ यत एव तदुक्त 'तत ' तस्मात्कारणाद् 'यत्र' ग्रामादौ स्थाने 'समाधान' स्वास्थ्य भवति' जायते, केषामित्यत आह--'मनोवाक्काययोगाना' प्राग्निरूपितस्वरूपाणामिति । आह-मनोयोगसमाधानमस्तु, वाक्काययोगसमाधान तत्र क्वोपयुज्यते, न हि तन्मय ध्यान भवति ? अनोच्यते-तत्समाधान तावन्म- नोयोगोपकारकम्, ध्यानमपि च तदात्मक भवत्येव । यथोक्तम्-'एवविहा गिरा मे वत्तव्वा एरिसी न बत्तन्वा । इय वेयालियवक्कस्स भासो वाइग झाण ॥१॥ तथा-सुसमाहियकर-पायस्स अकज्जे कार- गमि जयणाए । किरियाकरण ज त काइयझाण भवे जइणो ॥२॥ न चात्र समाधानमात्रकारित्वमेव गृह्यते, किन्तु भूतोपरोधरहित , तत्र भूतानि पृथिव्यादीनि, उपरोध तत्सङ्घट्टनादिलक्षण , तेन रहित. परित्यक्तो य एकग्रहणे तज्जातीयग्रहणात्' अनृतादत्तादान-मैथुन-परिग्रहाद्युपरोधरहितश्च स देशो 'ध्यायत , चिन्त- यत , उचित इति शेष , अय गाथार्थ ॥३७॥ गत देशद्वारम्, अधुना कालद्वारमभिघित्सुराह-- कालोऽवि सोच्चिय हि जोगसमाहाणमुत्तमं लहइ । न उ दिवस-निसा-वेलाइनियमण झाइणो भणियं ॥३८॥ कलन काल कलासम्हो वा काल , म चार्द्धतृतीयेपु द्वीप-समुद्रेपु चन्द्र-सूर्यगतिक्रियोपलक्षितो कहीं भी स्थित होता हुआ समाधि को प्राप्त करता है ॥३६॥ इसी कारण से- इसलिए जहाँ मन, वचन और काय योगो को समाधान (स्वास्थ्य) होता है वही प्रदेश ध्यान करने वाले योगी के लिए उपयुक्त होता है। विशेष इतना है कि वह भूतोपरोध से रहित--प्रार्णािहसा एव अमत्यभाषण आदि से रहित होना चाहिए । विवेचन-अभिप्राय यह है कि जहाँ पर मन, वचन एव काय योगो को स्वस्थता है--उनके विकृत होने की सम्भावना नहीं है तथा जो प्राणिविघात, असत्यता, चोरी, अब्रह्म (मैथुन) और परि- अह रूप पापाचरण से रहित है वही स्थान ध्यान के लिए उपयोगी माना गया है। यहाँ यह शका हो सकती है कि ध्यान के लिए मन की स्वस्थता तो अनिवार्य है, किन्तु वचन और काय को स्वस्थता का उपयोग नहीं है, क्योकि ध्यान वचन व कायरूप नहीं है, वह केवल मनरूप है । इसका समाधान यह है कि वचन और काय को स्वस्थता मनयोग की उपकारक है । दूसरे, ध्यान वचन व कायस्वरूप भी है। कहा भी गया है- मुझे ऐसे वचन बोलना चाहिए और ऐसे नही बोलना चाहिए, इस प्रकार 'विचारपूर्वक जो बोलता है उसके वाचनिक ध्यान होता है। जो ध्याता मुनि हाथ-पाँवो को स्वाधीन रखता हुआ अयोग्य कार्य नहीं करता है तथा आवश्यक योग्य कार्य को यत्नपूर्वक करता है उसके इस प्रकार के अनुष्ठान को कायिक ध्यान कहा जाता है। इस प्रकार वचन और काय की स्वस्थता चूकि मनोयोग की उपकारक है-उसे स्वस्थ रखती है, इसलिए उसे भी ध्यानरूप जानना चाहिए ॥३७॥ अव क्रमप्राप्त कालद्वार का निरूपण किया जाता है- देश के समान काल भी ध्यान के लिए वही योग्य है जिसमे योगो को उत्तम समाधान प्राप्त होता है। ध्याता के लिए दिन, रात और वेला-काल के एक देशरूप मुहूर्त आदि के नियम १ आत्मानमात्मन्यवलोक्यमानस्त्व दर्शन-ज्ञानमयो विशुद्ध । एकाग्रचित्त खलु यत्र तत्र स्थितोऽपि साधुर्लभते समाधिम् ॥ द्वात्रिंशिका २५. १ एवविहा गिरा में वत्तव्बा एरिसी न वत्तव्वा । इय वेयालियबक्कस्स भासमो वाइग झाण ॥ तथा सुसमाहियकर-पायस्स अकज्जे कारणमि (2) जयणाए। किरियाकरण ज त काइयझाण भवे जइणो॥ (हरि. टीका उद्) वहाँ कुछ

२२
ध्यानशतकम्
[३६-
दिवसादिरवसेय , अपिशब्दो देशानियमेन तुल्यत्वसम्भावनार्थ । तथा चाह- कालोऽपि स एव, ध्यानोचित
इति गम्यते, 'यत्र' काले 'योगसमाधान' मनोयोगादिस्वास्थ्यम् 'उत्तम' प्रधान 'लभते' प्राप्नोति, 'न तु' न
पुनर्नव च तुशब्दस्य पुनःशब्दार्थत्वादेवकारार्थत्वाद्वा । किम् ? दिवस-निशा-वेलादिनियमन घ्यायिनो
भणितमिति । दिवस-निशे प्रतीते, वेला सामान्यत एव, तदेकदेगो मुहर्तादि, अादिशब्दात्पूर्वाह्णापराह्लादि
वा, एतनियमन दिवैवेत्यादिलक्षणम्, पायिन सत्वस्य भणितम् उक्त तीर्थकर-गणधेरनैवेति गाथार्थः
॥३०॥ गत कालद्वारम्, साम्प्रतमासनविशेपद्वार व्याचिख्यासयाऽऽह-
जच्चिय देहावत्था जिया ण झाणोवरोहिणी होइ ।
झाइज्जा तदवत्यो ठिो निसण्णो निवण्णो वा ॥३९॥
इहैव या काचिद् 'देहावस्था' शरीरावस्था निपण्णादिरुपा। किम् ? 'जिता' इत्यभ्यस्ता उचिता
वा, तथाऽनुष्ठीयमाना 'न ध्यानोपरोधिनी भवति' नाधिकृतधर्मध्यानपीडाकरी भवतीत्यर्थ , ध्यायेत् तदवस्य
इति-सैवावस्था यस्य स तदवस्थ , तामेव विशेपत. प्राह -'थित ' कायोत्सर्गेणेपन्नतादिना 'निषण्ण'
उपविष्टो वीरासनादिना निविण्ण' सन्निविष्टो दण्डायतादिना 'वा' विभापायामिति गाथार्थ ॥३६॥ पाह
-~-किं पुनरय देश-कालासनानामनियम इति ? अनोच्यते-
सव्वासु वट्टमाणा मुणो जं देस-काल-चेटासु ।
वरकेवलाइलाभं पत्ता वहुसो समियपावा ॥४०॥
तो देस-काल-चट्ठानियमो झाणस्स नत्थि समयंमि ।
जोगाण समाहाण जह होइ तहा [प]यइयन्व ॥४१॥
'सर्वासु' इत्यशेपासु देश-काल-चेष्टासु इति योग , चेष्टा देहावस्था, किम् ? 'वर्तमाना.' अवस्थिताः,
के ? 'मुनयः' प्राग्निरूपितशब्दार्था. 'यद्' यस्मात्कारणात्, किम् ? वर. प्रधानश्चासौ केवलादिलाभश्च
वरकेवलादिलाभ , त प्राप्ता इति, आदिशब्दान्मन पर्याज्ञानादिपरिग्रह , किं सकृदेव प्राप्ता. ? न, केवल-
वज 'बहुश' अनेकश , किंविशिष्टा ? 'शान्तपापा' तत्र पातयति नरकादिग्विति पापम्, शान्तम् उपशम नीत
पाप यस्ते तथाविधा इति गाथार्थ ॥४०॥ यस्मादिति पूर्वगाथायामुक्त तेन सहास्याभिसम्बन्ध , तस्मा-
द्देश-काल-चेष्टानियमो ध्ययानस्य 'नास्ति' न विद्यते । क्व ? 'समये' प्रागमे, किन्तु 'योगानाम्' मन प्रभृ-
तीना 'समाधानम्' पूर्वोक्त यथा भवति तथा '[]यतितव्यम्' [प्रयत्न कार्य इत्यत्र नियम एवेति
?
-
का निर्देश नहीं किया गया है। तात्पर्य यह है कि परिपक्व ध्याता किसी भी काल में निर्बाध रूप से
ध्यानस्थ हो सकता है ॥३८॥
प्रव प्रासनविशेष का व्याख्यान किया जाता है--
पासनादि के रूप मे अभ्यस्त जो भी देह की अवस्था ध्यान मे बाधक नहीं होती है उसी अवस्था
मे स्थित ध्याता कायोत्सर्ग से, वीरासनादि से अथवा दण्डायत प्रादि स्वरूप से ध्यान मे तल्लीन हो
सकता है ॥३॥
यहाँ शंका हो सकती है कि ध्यान के लिए उक्त प्रकार देश, काल एवं अवस्था का अनियम क्यों
कहा गया-उनका कुछ विशेष नियम तो होना चाहिए था ? इसके समाधानस्वरूप मागे यह कहा
जाता है-
उक्त शका को लक्ष्य कर यहाँ यह कहा जा रहा है कि मुनि जनों ने देश, काल और चेष्टा-
शरीर की अवस्था; इन सभी अवस्थानों में अवस्थित रहकर चूंकि अनेक प्रकार से पाप को नष्ट करते
सर्वोत्तम केवलज्ञान प्रादि को प्राप्त किया है, इसीसे ध्यान के लिए पागम मे देश, काल और चेष्टा
का--पासनविशेषादि का कुछ नियम नहीं कहा गया है, किन्तु जिस प्रकार से भी योगो का-मन,
वचन, काय का-समाधान (स्वस्थता) होता है उसी प्रकार प्रयत्न करना चाहिए ॥४०.४॥

ध्यानस्य आलम्वनानि प्रतिपत्तिक्रमश्च २३ गाथार्थ ॥४१॥ गतमासनद्वारम्, अधुनाऽऽलम्बनद्वारावयवार्थप्रतिपादनायाह- आलंबणाई वायण-पुच्छण-परियट्टणाऽणुचिताओ। सामाइयाइयाई सद्धम्मावस्सयाइ च ॥४२॥ इह धर्मध्यानारोहणार्थमालम्ब्यन्त इत्यालम्बनानि 'वाचना-प्रश्न-परावर्तनाऽनुचिन्ता' इति । तत्र वाचन वाचना, विनेयाय निर्जराथै सूत्रादिदानमित्यर्थ , शङ्किते सूत्रादी सशयापनोदाय गुरुप्रच्छनं प्रश्न इति, परावर्तन तु पूर्वाधीतस्यैव सूत्रादेरविस्मरण-निर्जरानिमित्तमभ्यासकरणमिति, अनुचिन्तनम् अनुचिन्ता मनसवाविस्मरणादिनिमित्त सूत्रानुस्मरणमित्यर्य, वाचना च प्रश्नश्चेत्यादि द्वन्द्व , एतानि च श्रुतधर्मानु- गतानि वर्तन्ते, तथा 'सामायिकादीनि सद्धर्मावग्यकानि च' इति, अमूनि तु चरणधर्मानुगतानि वर्तन्ते, सामायिकमादौ येपा तानि सामायिकादीनि, तत्र सामायिक प्रतीतम्, आदिशब्दान्मुखवस्त्रिका-प्रत्युपेक्षणा- दिलक्षणसकलचक्रवालसामाचारीपरिग्रहो यावत् पुनरपि सामायिकमिति, एतान्येव विधिवदासेव्यमानानि, सन्ति-शोभनानि, सन्ति च तानि चारित्रधर्मावश्यकानि चेति विग्रह , अावश्यकानि नियमत करणीयानि, च समुच्चये इति गाथार्थ ॥४२॥ साम्प्रतममीपामेवाऽऽलम्बनत्वे निवन्धनमाह- विसमंमि समारोहइ दढदव्वालंबणो जहा पुरिसो। सुत्ताइकयालंबो तह झाणवर समारहइ ॥४३॥ 'विपमे' निम्ने दु मञ्चरे 'समारोहति' सम्यग परिक्लेशेनोवं याति । क ? दृढ वलवद् द्रव्य रज्ज्वा- द्यालम्वन यस्य स तथाविध , यथा 'पुस्प' पुमान् कश्चित्, 'सूत्रादिकृतालम्बन' वाचनादिकृतालम्बन इत्यर्थ , 'तथा' तेनैव प्रकारेण 'ध्यानवर' धर्मध्यानमित्यर्थ, समारोहतीति गाथार्थ ॥४३॥ गतमालम्बन- द्वारम् । अधुना क्रमद्वारावसर , तत्र लाघवार्थ धर्मस्य शुक्लस्य च (त) प्रतिपादयन्नाह- भाणप्पडिवत्तिकमो होइ मणोजोगनिग्गहाईप्रो । भवकाले केवलिणो सेसाण जहासमाहीए ॥४४॥ ध्यान प्राग्निरुपितशब्दार्यम्, तस्य प्रतिपत्तिक्रम इति समास , प्रतिपत्तिक्रम प्रतिपत्तिपरिपाट्यभि- घीयते, स च भवति मनोयोगनिग्रहादि, तत्र प्रथम मनोयोगनिग्रह ततो वाग्योगनिग्रह तत. काययोग- अव आलम्बन द्वार का निरूपण करते हुए उसके अवयवार्थ को स्पष्ट करते हैं- वाचना, प्रश्न, परावर्तन और अनुचिन्ता तथा सामायिक आदि व सद्धर्मावश्यक प्रादि ये ध्यान के पालम्बन हैं। विवेचन-कर्मनिर्जरा के निमित्त शिष्य के लिए जो सूत्र आदि का दान किया जाता है उसका नाम वाचना है। सूत्र आदि के विषय मे शका के होने पर उसे दूर करने के लिए जो गुरु से पूछा जाता है वह प्रश्न कहलाता है। पूर्वपठित सूत्र आदि का विस्मरण न होने देने तथा कर्मनिर्जरा के निमित्त अभ्यास करना, इसे परावर्तन कहा जाता है। अविस्मरण आदि के लिए मन से ही सूत्र का अनुस्मरण करना, इसका नाम अनुचिन्तन है । ये चारो श्रुतधर्म का अनुसरण करने वाले हैं । तथा सामायिक आदि व सद्धर्मावश्यक (चारित्रधर्मावश्यक) ये चारित्रधर्म का अनुसरण करने वाले हैं ॥४२॥ इनको पालम्बनता किस प्रकार से है, इसे आगे दृष्टान्त द्वारा प्रगट किया जाता है- जिस प्रकार कोई पुरुष रस्सी आदि किसी प्रबल द्रव्य का आश्रय लेकर विषम-ऊँचे-नीचे आदि दुर्गम-स्थान पर चढ़ जाता है उसी प्रकार ध्याता सूत्र आदि का पूर्वोक्त वाचना आदि का-आश्रय लेकर उत्तम ध्यान (धर्मध्यान) पर आरूढ हो जाता है ॥४३॥ अब अवसरप्राप्त क्रमद्वार का वर्णन करते हुए लाघव की अपेक्षा से धर्म और शुक्ल इन दोनो ही ध्यानों के क्रम को दिखलाते हैं- भवकाल मे-मोक्षप्राप्ति के पूर्व अन्तर्मुहूर्त प्रमाण काल तक रहने वाली शैलेशी अवस्था मे- केवली के ध्यान (शुक्ल) की प्राप्ति का क्रम मनोयोग आदि का निग्रह है-क्रम से मनयोग, वचनयोग - - २४] ध्यानशतकम् [४५- निग्रह इति । किमय सामान्येन सर्वथैवेत्थम्भूत क्रम ? न, किन्तु 'भवकाले' केवलिनः-अत्र भवकालशब्देन मोक्षगमनप्रत्यासन्न अन्तर्मुहूर्तप्रमाण एव शैलेश्यवस्थान्तर्गत परिगृह्मते, केवलमस्यास्तीति केवली तस्य, शुक्लध्यान एवायं क्रम । शेपस्यान्यस्य धर्मध्यानप्रतिपत्तुर्योग-कालावाश्रित्य किम् ? 'यथासमाधिना' इति यथैव स्वास्थ्य भवति तथैव पतिपत्तिरिति गाथार्थ ॥४४॥ गत क्रमद्वारम् । इदानी ध्यातव्यमुच्यते, तच्चतुर्भेदमाज्ञादि । उक्त च-प्राज्ञाऽपाय-विपाक-सस्थानविचयाय धर्म्यम् [त. सू ६-३७] इत्यादि, तत्राऽऽद्यभेदप्रतिपादनायाह- सुनिउणमणाइणिहण भूयहियं भूयभावणमह[ण] ग्ध । अमियमजियं महत्थ महाणुभावं महाविसयं ॥४५॥ झाइज्जा निरवज्जं जिणाणमाणं जगप्पईवाणं । अणिउणजणदुण्णेयं नय-भंग-पमाण-गमगहणं ॥४६॥ सुष्टु अतीव, निपुणा कुशला सुनिपुणा ताम्, आज्ञामिति योग, नैपुण्य पुन सूक्ष्मद्रव्याधुपदर्शक- त्वात्तथा मत्यादिप्रतिपादकत्वाच्च । उक्त च-सुयनाणमि नेउण्ण केवले तयणतर । अप्पणो सेसगाणं घ जम्हा त परिभावग ॥१॥ इत्यादि, इत्थ सुनिपुणा ध्यायेत् । तथा 'अनाद्यनिधनाम्' अनुत्पन्नशाश्वतामि- त्यर्थ , अनाद्यनिधनत्व च द्रव्याद्यपेक्षयेति । उक्त च-"द्रव्यार्थादेशादित्येपा द्वादशाङ्गी न कदाचिन्नासीत्" इत्यादि । तथा 'भूतहिताम्' इति-इह भूतशब्देन प्राणिन उच्यन्ते, तेपा हिता-पथ्यामिति भाव , हितत्व पुनस्तदनुपरोधिनीत्वात्तथा हितकारिणीत्वाच्च । उक्त च-'सर्वे जीवा न हन्तव्या' इत्यादि, एतत्प्रभा- वाच्च भूयास मिद्धा इति । 'भूतभावनाम्' इत्यत्र भूत सत्य भाव्यतेऽनयेति भूतस्य वा भावना भूतभावना, और काययोग के निग्रह (निरोघ) रूप है। शेष (धर्मध्यानी) के उसकी प्राप्ति का क्रम समाधि के अनुसार है-जिस प्रकार से भी योगो की स्वस्थता होती है उसी प्रकार से उसको प्रतिपत्ति का क्रम समझना चाहिए ॥४४॥ आगे ध्यातव्य (ध्येय) द्वार को प्ररूपणा की जाती है। वह (ध्यातव्य) आज्ञा, अपाय, विपाक और संस्थान के भेद से चार प्रकार का है। उनमें प्रथमत. दो गाथाओं द्वारा प्राज्ञा का विवेचन किया जाता है- अतिशय निपुणा, अनादि-निधना, प्राणियों का हित करने वाली, भूतभावना-सत्य को प्रगट करने वाली, अना, अमिता, अजिता, महार्था, महानुभावा और महाविपया; ऐसी जो लोक को दीपक के समान प्रकाशित करने वाले जिन भगवान् की निर्दोष प्राज्ञाजिनवाणी-है उसका निर्मल अन्त क- रण से ध्यान करना चाहिए । नय, भंग, प्रमाण और गम से गम्भीर वह जिनाज्ञा अनिपुण-सत्-असत् का विचार न करने वाले अज्ञानी जनो के लिए दुरवबोध है । विवेचन-ध्यातव्य का अर्थ ध्यान का विषय है, जिसका कि उसमे चिन्तन किया जाता है। वह आज्ञादि के भेद से चार प्रकार का है। उनमे प्रथमत. आज्ञा (जिनाजा) को विशेषता को प्रगट करते हुए उसके चिन्तन की यहाँ प्रेरणा की गई है। वह प्राज्ञा चूकि सूक्ष्म द्रव्य आदि की प्ररूपक होने के साथ मतिज्ञान आदि की प्रतिपादक है, इसीलिए उसे अतिशय निपुणा कहा गया है। कहा भी है- श्रुतज्ञान मे निपुणता है, तत्पश्चात् केवलज्ञान में निपुणता है जो मति प्रादि शेष ज्ञानों की प्रतिपादक (प्रकाशक) है । उक्त प्राज्ञा का प्रवाह द्रव्याथिक नय की अपेक्षा अनादि काल से चला आया है और अनन्त काल तक रहने वाला है, इसलिए उसे उत्पत्ति और विनाश से रहित होने के कारण अनादि- निधना कहा गया है। किसी भी प्राणी का निघात नहीं करना चाहिए, यह जिनाज्ञा के द्वारा सर्वत्र निर्देश किया गया है। इसीलिए उसे भूतिहिता-भूतो (प्राणियो) की हितकारक-जानना चाहिए। 'भूतभावना' मे भूत का अर्थ सत्य है, वह अनेकान्तवाद के प्राश्रय से उस सत्य को यथार्थ वस्तु स्वरूप को-प्रगट करती है, इसीलिए उसे 'भूतभावना' विशेषण से विशिष्ट बतलाया गया है। अथवा भूत मूल भाग के लिये सस्कृत टीक देखिये । (प्रवचनसार ३-३८, भगवती आराधना १०८) - १ ध्येयान्तर्गतजिनाज्ञाया विशिष्टत्वम् २५ अनेकान्तपरिच्छेदात्मिकेत्यर्थ , भूताना वा-सत्त्वाना भावना भूतभावना, भावना वासनेत्यनान्तरम् । उक्त च-कूरावि सहावेणं राग-विसवसाणुगावि होऊण । भावियजिणक्यणमणा तेलुक्कसुहावहा होति ॥१॥ श्रूयन्ते च चिलातीपुत्रादय एवविधा वह्व इति । तथा 'अनाम्' इति सर्वोत्तमत्वादविद्यमानमूल्यामिति भाव । उक्त च-सव्वेऽवि य सिद्धता सदव्वरयणासया सतेलोक्का । जिणवयणस्स भगवो न मुल्लमित्त अणघेण ॥१॥ तथा स्तुतिकारेणाप्युक्तम् ~कल्पद्रुम कल्पितमात्रदायी, चिन्तामणिश्चिन्तितमेव दत्ते । जिनेन्द्रधर्मातिशय विचिन्त्य, द्वयेऽपि लोको लघुतामवति ॥१॥ इत्यादि, अथवा 'ऋणनाम्, इत्यत्र ऋण- कर्म, तद्ध्नामिति, उक्त च-ज अन्नाणी कम्म खवेइ बहुयाहि वासकोडीहिं ।। त नाणी तिहिं गुत्तो खवेइ ऊसासमित्तेण ॥११॥ इत्यादि, तथा 'अमिताम्' इत्यपरिमिताम्, उक्त च-सव्वनदीण जा होज्ज वालुया सव्वउदहीण ज उदय । एत्तो वि अणतगुणो अत्यो एगस्स सुत्तस्स ॥१॥ अमृता वा मृष्टा वा पथ्या वा, तथा चोक्तम्-जिणवयणमोदगस्स उ रत्ति च दिवा य खज्जमाणस्स। तित्ति बुहो न गच्छइ हेउसहस्सोवगूढस्स ॥१॥ नर-नरय-तिरिय-सुरगणससारियसव्वदुक्ख-रोगाण । जिणवयणमेगमोसहमपवग्गसुहक्खयफलय ॥२॥ सजीवा वाऽमृतामुपपत्तिक्षमत्वेन साथिकामिति भाव, न तु यथा-तेषा कटतटभ्रष्टैगजाना मदविन्दुभिः । प्रावर्तत नदी घोरा हस्त्यश्व-रथवाहिनी ॥१॥ इत्यादिवन्मृतामिति, तथा 'अजिताम्' इति शेषप्रवचनाज्ञा- भिरपराजितामित्यर्थ । उक्त च-जीवाइवत्युचिंतणकोसल्लगुणेणऽणण्णसरिसेण । सेसवयणेहिं अजिय जिणिंदवयण महाविसय ॥१॥ तथा 'महार्थाम्' इति महान्-प्रधानोऽर्थो यस्या सा तथाविधा ताम्, तत्र पूर्वा- पराविरोधित्वादनुयोगद्वारात्मकत्वान्नयगर्भत्वाच्च प्रधानाम्, महत्स्था वा अत्र महान्त'-सम्यग्दृष्टयो भव्या एवोच्यन्ते, ततश्च महत्सु स्थिता महत्स्था ता च, प्रधानप्राणिस्थितामित्यर्थ , महास्था वेत्यत्र महा पूजोच्यते, तस्या स्थिता महास्था ताम्, तथा चोक्तम्-सव्वसुरासुरमाणुस-जोइस-वतरसुपूइय णाण । जेणेह गणहराण छुहति चुण्णे सुरिंदावि ॥१॥ तथा 'महानुभावाम्' इति तत्र महान्-प्रधान प्रभूतो वाऽनुभाव साम- र्थ्यादिलक्षणो यस्या सा तथा ता, प्राधान्य चास्याश्चतुर्दशपूर्वविद सर्वलब्धिसम्पन्नत्वात्, प्रभूतत्व व प्रभूत- शब्द का अर्थ प्राणी भी होता है, इस प्रकार प्राणियो की भावना (वासना) रूप होने से भी उसे भूत- भावना समझना चाहिए। कहा भी गया है-रागरूप विष के वशीभूत हुए स्वभावतः क्रूर प्राणी भी-जैसे किरातीपुत्र आदि-अन्तःकरण से जिनवाणी की भावना द्वारा तीनो लोको के सुख के भोक्ता होते हैं । गाथोक्त 'अहम्घ[अणग्घ]' शब्द के अभिप्राय को व्यक्त करते हुए टीकाकार ने प्रथमतः उसका 'अना' सस्कृत रूप ग्रहण करके उसे सर्वोत्कृष्ट होने से अमूल्य बतलाया है। पश्चात् विकल्प- रूप मे उसका 'ऋणघ्ना' संस्कृत रूप मान कर उन्होने ऋण का अर्थ कर्म बतलाते हुए उसे कर्म की घातक बतलाया है। प्रमाण रूप मे एक प्राचीन गाथा' को उद्धृत करते हुए वहा यह निर्देश किया गया है कि जिस कर्म को अज्ञानी जीव अनेक करोड़ वर्षों में क्षीण करता है उसे ज्ञानी जीव तीन गुप्तियो से युक्त होकर उच्छ्वास मात्र काल मे क्षीण कर डालता है। वह जिनाज्ञा अपरिमिता इस- लिये है कि उसके अर्थ का कोई प्रमाण नहीं है-वह अनन्त है । कहा भी है-सब नदियो की जो वाल तथा सब समुद्रो का जो जल है उससे भी अनन्तगुणा एक सूत्र का अर्थ होता है । अथवा गाथोक्त 'प्रमिय' शब्द का रूपान्तर 'अमृता' भी होता है, तदनुसार उक्त जिनामा को अमृत के समान हितकर समझना चाहिये । अथवा 'अमृता' से उसे सजीव-विनाश से रहित-जानना चाहिये। अन्य प्रवचना- ज्ञानो द्वारा पराजित न होने के कारण उसे अजिता कहा गया है। वह पूर्वापर विरोध से रहित होती हुई अनुयोगद्वारस्वरूप व नयो से गभित होने के कारण महार्था कही जाती है । गाथोपयुक्त 'महत्य' पद के रूपान्तर 'महत्स्थाम्' व 'महास्थाम्' भी विकल्प रूप मे ग्रहण किये गये हैं। तदनुसार सम्यग्दृष्टि भव्य जैसे महान् पुरुषो मे स्थित होने के कारण उसे 'महत्स्था' कहा गया है, अथवा महा का अर्थ पूजा होता है, उसमें स्थित होने के कारण उसे 'महास्था' भी कहा गया है। वह जिनाज्ञा महानुभावा-~-महान् सामर्थ्य १. प्रव. सा. ३-३८%भ. प्रा.१०८.

१ २६ ध्यानशतकम् [४७- - कार्यकरणात्, उक्त च-पभू ण चोद्दसपुव्वी घडायो घडसहस्स करित्तए' इत्यादि, एवमिह लोके, परत्र तु जघन्यतोऽपि वैमानिकोपपात । उक्त च-उववाओ लतगमि चोद्दसपुन्बोस्स होइ उ जहण्णो। उक्कोसो सव्वळे सिद्धिगमो वा अकम्मस्स ॥१॥ तथा 'महाविषयाम्' इति महद्विषयत्वं तु सकलद्रव्यादिविपयत्वात् । उक्त च-दव्वनो सुयनाणी उवउत्ते सव्वदव्वाइ जाणई' इत्यादि कृतं विस्तरेणेति गाथार्थ. ॥४॥ 'ध्यायेत्' चिन्तयेदिति सर्वपदत्रिया, 'निरवद्याम्' इति अवद्य पापमुच्यते निर्गतमवद्य यस्या सा तथा ताम्, अनृतादिद्वात्रिंशद्दोषावद्यरहितत्वात्, क्रियाविशेषण वा। कथ ध्यायेत् ? निरवद्यम्-इहलोकाद्याशसारहि- तमित्यर्थ । उक्त च--'नो इहलोगट्टयाए नो परलोगट्टयाए नो परपरिभवो अह नाणी' इत्यादिक निरवद्य ध्यायेत्, "जिनाना' प्राग्निरूपितशब्दार्थानाम् 'प्राज्ञा' वचनलक्षणा कुशलकर्मण्याज्ञाप्यन्तेऽनया प्राणिन इत्याज्ञा ताम् । किविशिष्टाम् ? जिनाना-केवलालोकेनाशेषसशय-तिमिरनाशनाज्जगत्प्रदीपानामिति, प्रावि विशेष्यते 'अनिपुणजनदु याम्' न निपुण अनिपुण अकुशल इत्यर्थ , जन लोकस्तेन दुर्शयामिति-दुर- वगमाम्, तथा 'नय-भङ्ग-प्रमाण-गमगहनाम्' इत्यत्र नयाश्च भङ्गाश्च प्रमाणानि च गमाश्चेति विग्रहस्तर्ग- हना-गह्वरा ताम्, तत्र नैगमादयो नयास्ते चानेकभेदा । तथा भङ्गा क्रम-स्थानभेदभिन्ना , तत्र क्रमभङ्गा यथा एको जीव एक एवाजीव इत्यादि, स्थापना || II | SI I 55 111 S1 S1 551 स्थानभङ्गास्तु यथा प्रियधर्मा नामक नो दृढधर्मेत्यादि । तथा प्रमीयते ज्ञेयमेभिरिति प्रमाणानि द्रव्यादीनि, यथानुयोगद्वारेषु, गमा-चतुर्विशतिदण्डकादय., कारणवशतो वा किञ्चद्विसदृशा. सूत्रमार्गा यथा पड्जीव- निकायादाविति कृत विस्तरेणेति गाथार्थ ॥४६॥ ननु या एवविशेषणविशिष्टा सा वो मपि न शक्यते मन्दधीभि , प्रास्ता तावद्धधातुम्, ततश्च यदि कथञ्चिन्नावबुध्यते तत्र का वार्तेत्यत आह- तत्थ य मइदोब्बलेणं तन्विहायरियविरहनो वावि । यगहणत्तणेण य णाणावरणोदएणं च ॥४७॥ हेऊदाहरणासभवे य सइ सुठ्ठ जं न बुज्झज्जा । सब्वण्णुमयमवितहं तहावि तं चितए मइम ॥४८॥ 'तत्र' तस्यामाज्ञायाम्, चशब्द प्रस्तुतप्रकरणानुकर्षणार्थ । किम् ? जडतया चलत्वेन वा मति- दौर्बल्येन-बुद्धे सम्यगर्थानवधारणेनेत्यर्थ , तथा 'तद्विधाचार्यविरहतोऽपि' तत्र तद्विध सम्यगविपरीत- तत्त्वप्रतिपादनकुशल , आचर्यतेऽसावित्याचार्य सूत्राथा-वगमार्थ मुमुक्षुभिरासेव्यत इत्यर्थ , तद्विधश्चासा- - से सम्पन्न-और महाविषया-समस्त द्रव्यादिको को विषय करनेवाली है । इस प्रकार की वह जिनामा नय, भग, प्रमाण और गम से गम्भीर होने के कारण मन्दबुद्धि जनो को दुरवबोध है। वस्तु अनेक धर्मा- स्मक है, उनमे से जो विवक्षावश किस एक धर्म को ग्रहण किया करता है उसका नाम नय है, वह नेग- मादि के भेद से अनेक प्रकार का है। क्रम व स्थान के भेद से जो अनेक भेद होते हैं उन्हें भग कहा जाता है। क्रमभग जैसे-एक जीव, एक अजीव, बहुत जीव बहुत अजीव, एक जीव एक अजीव, इत्यादि (षट्खण्डागम पु. ६, पृ. २४६, अनुयोगद्वार पृ. १४४-४५) । स्थानभंग जैसे--कोई प्रियधर्मा तो होता है, पर दृढ़धर्मा नहीं होता; इत्यादि। जिनके द्वारा ज्ञातव्य वस्तु के मान का परिज्ञान होता है वे द्रव्य, क्षेत्र एवं काल आदि प्रमाण कहलाते हैं। चतुर्विशतिदण्डक आदि को गम कहा जाता है। ऐसी उस अनुपम जिनवाणी के चिन्तन के लिये यहाँ प्रेरणा की गई हैं ॥४५-४६।। अब आगे यह स्पष्ट किया जाता है कि उक्त जिनाज्ञा (जिनागम) यद्यपि कई कारणों से मन्द- बुद्धि जन के लिये दुरवबोध है, तो भी बुद्धिमान् प्राणी को 'सर्वज्ञ का मत यथार्थ है' इस प्रकार से उसका चिन्तन करना ही चाहिए- बुद्धि की दुर्बलता से, वस्तुस्वरूप का यथार्थ व्याख्यान करनेवाले प्राचार्यों के प्रभाव से, ज्ञेय (जानने के योग्य धर्मास्तिकायादि) को गम्भीरता से, ज्ञानावरण के उदय से तथा जिंज्ञासित पदार्थ के - -५०]] जिनस्य नान्यथावादित्वम् २७ वाचार्यश्च तद्विघाचार्य, तद्वि रहत. तदभावतश्च, चशब्द अबोधे द्वितीयकारणसमुच्चयार्थ , अपिशब्द. क्वचिदुभयवस्तूपपत्तिसम्भावनार्थ , तथा । 'ज्ञेयगहनत्वेन च' तत्र ज्ञायत इति ज्ञेय धर्मास्तिकायादि, तद्गह- नत्वेन गह्वरत्वेन, चशब्दोऽवोध एव तृतीयकारणसमुच्चयार्थ , तथा 'ज्ञानावरणोदयेन च तत्र ज्ञानावरण प्रसिद्धम्, तदुदयेन तत्काले तद्विपाकेन, च-शब्दश्चतुर्थावोधकारणसमुच्चयार्थ । अत्राह-ननु ज्ञानावरणोदया- देव मतिदौर्बल्य तथा तद्विधाचार्यविरहो ज्ञेयगहनाप्रतिपत्तिश्च, ततश्च तदभिधाने न युक्तममीषाम: भिधानमिति ? न, तत्कार्यस्यैव सड्क्षेप-विस्तरत उपाधिभेदेनाभिधानादिति गाथार्थ. ॥४७॥ तथा- तत्र हिनोति गमयति जिज्ञासितधर्मविशिष्टानानिति हेतु-कारको व्यञ्जकश्च, उदाहरण चरि- त-कल्पितभेदम्, हेतुश्चोदाहरण च हेतूदाहरणे तयोरसम्भव , कञ्चन पदार्थ प्रति हेतूदाहरणासम्भवात्, तस्मिंश्च, च-शब्द पञ्चम-षष्ठकारणसमुच्चयार्थ , 'सति' विद्यमाने । किम् ? 'यत्' वस्तुजात 'न सुष्ठू बुद्ध्येत' नातीवावगच्छेत् 'सर्वज्ञमतमवितथ तथापि तच्चिन्तयेन्मतिमान्' इति तत्र सर्वज्ञा तीर्थकरास्तेषा मत'सर्वज्ञमत वचनम् । किम् ? वितथम् अनृतम्, न वितथम् अवितथ सत्यमित्यर्थ, 'तथापि' तदवोध. कारणे सत्यनवगच्छन्नपि 'तत्' मत वस्तु वा 'चिन्तयेत्' पर्यालोचयेत् 'मतिमान्' बुद्धिमानिति गाथार्थः ॥४८॥ किमित्येतदेवमिन्यत आह-- अणुवकयपराणुग्गहपरायणा जं जिणा जगप्पवरा । जियराग-दोस-मोहा य णण्णहावादिणो तेण ॥४६॥ अनुपकृते परैरवर्तिते सति, परानुग्रहपरायणा धर्मोपदेशादिना परानुग्रहोद्युक्ता इति समास , 'यत् यस्मात् कारणात्, के ? 'जिना.' प्राग्निरूपितशब्दार्था , त एव विशेष्यन्ते-'जगत्प्रवरा' चराचरश्रेष्ठा इत्यर्थ , एवविधा अपि कदाचिद् रागादिभावाद्वि तथवादिनो भवन्त्यत आह-जिता निरस्ता राग-द्वेष-मोहा यस्ते तथाविधा, तत्राभिष्वङ्गलक्षणो राग अप्रीतिलक्षणो द्वेष अज्ञानलक्षणश्च मोह , च-शब्द एतदभाव- गुणसमुच्चयार्थ , 'नान्यथावादिन तेन' इति तेन कारणेन ते नान्यथावादिन इति। उक्त च-"रागाद्वा द्वेषाद्वा" इत्यादि गाथार्थ ॥४६॥ उक्तस्तावद्धयातव्यप्रथमो भेद , अधुना द्वितीय उच्यते- रागद्दोस-कसाया ऽऽसवादिकिरियासु वट्टमाणाणं । इह-परलोयावाओ माइज्जा वज्जपरिवज्जी ॥५०॥ राग-द्वेष-कषायाऽऽश्रवादिक्रियासु प्रवर्तमानानामिह-परलोकापायान् ध्यायेत् । यथा रागादिक्रिया ऐहिकामुष्मिकविरोधिनी, उक्त च--राग सम्पद्यमानोऽपि दुखदो दुष्टगोचर । महाव्याध्यभिभूतस्य कुपथ्या- नाभिलाषवत् ॥१॥ तथा 'द्वेष सम्पद्यमानोऽपि तापयत्येव देहिनम् । कोटरस्थो ज्वलन्नाशु दावानल इव ज्ञापक हेतु और उदाहरण के असम्भव होने पर यद्यपि तत्त्व को ठीक से नहीं जाना जा सकता है तो भी उसके विषय मे बुद्धिमान् जीव को 'सर्वज्ञ का मत-उसके द्वारा प्रतिपादित वस्तु का स्वरूप-यथार्थ है, वह असत्य नहीं हो सकता' ऐसा विचार करना चाहिए ॥४७-४८॥ इसका कारण यह है कि- जगत् मे श्रेष्ठ जिन भगवान् चूकि राग, द्वेष और मोह को जीतकर-उनसे रहित होकर- परकृत प्रत्युपकार की अपेक्षा न करते हुए धर्मोपदेश आदि के द्वारा दूसरो के उपकार मे तत्पर रहते हैं, अतएव वे अन्यथा कथन नहीं कर सकते-वस्तुस्वरूप का असत्य व्याख्यान नहीं कर सकते । वस्तु- स्वरूप का असत्य व्याख्यान वही किया करता है जो सर्वज्ञ न होकर राग, द्वेष एव मोह के वशीभूत होता है ॥४६॥ अब क्रमप्राप्त ध्यातव्य के द्वितीय भेदरूप अपाय का वर्णन करते है- वर्जनीय (अकार्य) के परित्यागी ध्याता को राग, द्वेष, कषाय और प्रास्रव क्रियानो मे प्रवर्तमान प्राणियो के इस लोक और पर लोक सम्बन्धी विनाश का विचार करना चाहिए। विवेचन-धर्मध्यानी छोडने योग्य असदाचरण का त्याग करता है तथा प्रमाद से रहित होकर रागादि क्रियानो मे प्रवर्तमान जीवो को जो इस लोक और परलोक मे दुख सहना पड़ता है उसका २८ ध्यानशतकम् द्रुमम् ।।रा' तथा 'दृष्ट्यादिभेदभिन्नस्य रागस्यामुष्मिकं फलम् । दीर्घ ससार एवोक्तः सर्व. सर्वदर्शिमिः ॥३॥' इत्यादि । तथा 'दोसानलससत्तो इह लोए चेव दुविखनो जीवो । परलोगमि य पावो पावइ निरया- नल तत्तो ॥१॥ इत्यादि । तथा कषाया.-क्रोधादय , तदपाया पुन.-कोहो य माणो य अणिग्गहीया माया य लोहो य पवड्ढमाणा। चत्तारि एए कसिणो कसाया सिंचति मूलाई पुणन्भवस्स ॥१॥ तथा- अवाः -- कर्मबन्धहेतवो मिथ्यात्वादयः, तदपाय पुन:-मिच्छत्तमोहियमई जीवो इहलोग एव दुक्खाई। निरोवमाइ पावो पावइ पसमाइगुणहीणो ॥१॥ तथा-अज्ञान खलु कष्ट क्रोधादिभ्योऽपि सर्वपापेभ्यः । अर्थ हितमहित वा न वेत्ति येनावृतो लोक. ॥१॥ तया-जीवा पाविति इहं पाणवहादविरईए पावाए। नियसुयघायणमाई दोसे जणगरहिए पावा ॥१॥ परलोगमिवि एव आसवकिरियाहि अज्जिए कम्मे । जीवाण चिरमवाया निरयाइगई भमताण ॥२॥ इत्यादि । आदिशब्द, स्वगतानेकभेदस्यापक, प्रकृति- स्थित्यनुभाव-प्रदेशबन्धभेदग्राहक इत्यन्ये, क्रियास्तु कायिक्यादिभेदा पञ्च, एता. पुनरुत्तरत्र न्यक्षेण वक्ष्याम , विपाक पुन-किरियासु वट्टमाणा काइगमाईसु दुक्खिया जीवा। इह चेव य परलोए ससार- पवड्ढया भणिया ॥१॥ ततश्चैव रागादिक्रियासु वर्तमानानामपायान् ध्यायेत । किविशिष्ट. सन्नित्याह- 'वय॑परिवर्जी' तत्र वर्जनीय वय॑म् अकृत्य परिगृह्यते, तत्परिवर्जी अप्रमत्त इति गाथार्थ ॥५०॥ उक्त खलु द्वितीयो ध्यातव्यभेद , अधुना तृतीय उच्यते, तत्र- पयइ-ठिइ-पएसा ऽणुभावभिन्नं सुहासुहविहत्तं । जोगाणुभावजणियं कम्मविवागं विचितेज्जा ॥५१॥ 'प्रकृति-स्थिति-प्रदेशा ऽनुभावभिन्न शुभाशुभविभक्तम्' इति अत्र प्रकृतिशब्देनाष्टौ कर्मप्रकृतयोऽभि- घीयन्ते ज्ञानावरणीयादिभेदा इति, प्रकृतिरशो भेद इति पर्याया। स्थिति तासामेवावस्थान जघन्यादि । भेदभिन्नम् । प्रदेशशब्देन जीवप्रदेश-कर्मपुद्गलसम्बन्धोऽभिधीयते । अनुभावशब्देन तु विपाक । एते च प्रकृत्यादय शुभाशुभभेदभिन्ना भवन्ति । ततश्चैतदुक्त भवति-प्रकृत्यादिभेदभिन्न शुभाशुभविभक्त 'योगा- चिन्तन किया करता है। जिस प्रकार रोगी प्राणी कुपथ्य के सेवन से दुख पाता है उसी प्रकार विषया- नुरागी जीव रागवश इस लोक मे अनेक प्रकार के कप्ट को सहता है। जैसे—रसना इन्द्रिय के वशीभूत होकर मछलियां धीवर के काटे मे फसकर मरण के दुख को सहती हैं, स्पर्शन इन्द्रिय के वशीभूत हुआ हाथी अज्ञानतावश कृत्रिम हथिनी को यथार्थ हथिनी मानकर गड्ढे मे पड़ता है और परतन्त्र होता हुआ अनेक दुखो को सहता है, इत्यादि । वह दीर्घसंसारी होकर इस लोक के समान परलोक मे भी दुर्गति के दुख को सहता है । जिस प्रकार वृक्ष के कोटर मे लगी हुई आग उस वृक्ष को भस्म कर देती है उसी प्रकार द्वेष भी प्राणी को इस लोक मे सन्तप्त किया करता है तथा परलोक मे नरकादि दुर्गति के दुख को प्राप्त कराता है। इसी प्रकार क्रोधादि कषायो के वशीभूत हुए प्राणी भी दोनो लोको में अनेक प्रकार के दुःखो को भोगा करते हैं। कर्मबन्ध के कारणभूत मिथ्यात्व, अज्ञान एवं प्राणिहिंसादि से निवृत्ति न होने रूप प्रविरति आदि पालव कहलाते हैं। इन प्रास्रवो मे प्रवृत्त रहनेवाले प्राणी भी उभय लोको मे नाना प्रकार के दुःखो को सहा करते हैं । इस प्रकार के चिन्तन का नाम ही अपायविचय है ॥५०॥ आगे उक्त ध्यातव्य के तृतीय भेदभूत विपाक का विवेचन किया जाता है- प्रकृति, स्थिति, प्रदेश और अनुभाव के भेद से भेद को प्राप्त होनेवाला फर्म का विपाक शुभ और अशुभ इन दो भेदो में विभक्त है। मन, वचन व काय रूप योगो और अनुभाव-मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद और कषाय रूप जीवगुणों-से उत्पन्न होनेवाले उस कर्मविपाक का धर्मध्यानी को विचार करना चाहिए। विवेचन-कर्म का जो उदय-फल देने की उन्मुखता है-उसका नाम विपाक है । वह कर्म- विपाक प्रकृति के भेद से, स्थिति के भेद से, प्रदेश के भेद से और अनुभाव के भेद से अनेक प्रकार का होकर भी शुभ (पुण्य) और अशुभ (पाप) इन दो भेदो मे विभक्त है। प्रकृति नाम अंश या भेद का -- -- - -५२] ध्येयान्तर्गतकर्मविपाकनिरूपणम् २६ मुभावजनिव' मनोयोगादिगुणप्रभव कर्मविपाक विचिन्तयेदिति गाथार्थ. ॥५१॥ भावार्थ पुनवंदविवरणा- दवसेय. तच्चेदम्-इह पयइभिन्न सुहासुहविहत्त कम्मविवाग विचितेज्जा, तत्थ पयईउत्ति कम्मणो भेया असा णाणावरणिज्जाइणो अट्ठ, तेहिं भिन्न विहत्त सुह पुण्ण सायाइय असुह पाव तेहिं विहत्त विभिन्नविपाकं जहा कम्मपयडीए तहा विसेसेण चितिज्जा । किं च-ठिइविभिन्न च सुहासुहविहत्त कम्मविवागं विचि- तेजा-ठिइत्ति तासिं चेव अट्ठण्ह पयडीणं जहाण-मज्झिमुक्कोसा कालावत्था जहा कम्मपडीए । किं च--- पएसभिन्न शुभाशुभ यावत्-'कृत्वा पूर्वविधानं पदयोस्तावेव पूर्ववद् वग्यौं । वर्ग-घनौ कुर्याता तृतीयराशे- स्ततः प्राग्वत् ॥१॥ 'कृत्वा विधानम्' इति २५६, मस्य राशे. पूर्वपदस्य धनादि कृत्वा तस्यैव वर्गादि ततः द्वितीयपदस्येदमेव विपरीत क्रियते, तत एतावेव वयेते, ततस्तृतीयपदस्य धर्ग-धनी क्रियते, एवमनेन क्रमेणाय राशिः १६७७७२१६ चितेज्जा, पएसोत्ति जीव-पएसाण कम्मपएसेहिं सुहुमेहिं एगखेत्तावगाढेहिं पुट्ठोगा- ढप्रणतरअणु-वायर-उद्धाइभेएहिं बद्धाण वित्थरओ कम्मपयडीए भणियाण कम्मविवाग विचितेजा। कि च-अणुभावभिन्न सुहासुहविहत्त कम्मविवाग विचितेज्जा, तत्थ अणुभावोत्ति तासिं चेवटुण्डं पयडीण पुटु-बद्ध-निकाइयाण उदयाउ अणुभवण, त च कम्मविवाग जोगाणुभावजणिय विचितेज्जा, तत्थ जोगा. मण-चयण-काया, अणुभावो जीवगुण एव, स च मिथ्यादर्शनाविरति-प्रमाद-कपाया, तेहिं अणुभावेण य जणि यमुप्पाइय जीवस्स कम्म ज तस्स विवाग उदय विचितिज्जइ । उक्तस्तृतीयो ध्यातव्यभेद , साम्प्रत चतुर्थ उच्यते, तत्र- जिणदेसियाइ लक्खण-संठाणा ऽसण-विहाण-माणाई। उप्पायटिइभंगाइ पज्जवा जे य दव्वाणं ॥५२॥ जिना -प्राग्निरूपितशब्दार्थास्तीर्थकरा, तैर्देशितानि-कथितानि जिनदेशितानि, कान्यत आह- लक्षण-सस्थानाऽऽसन-विधान-मानानि । किम् ? विचिन्तयेदिति पर्यन्ते वक्ष्यति षष्ठ्या गाथायामिति । तत्र लक्षणादीनि विचिन्तयेत्, अत्रापि गाथान्ते द्रव्याणामित्युक्त तत्प्रतिपदमायोजनीयमिति । तत्र लक्षण है। उससे प्रकृत मे ज्ञानावरणादि रूप आठ कर्मप्रकृतियो को ग्रहण किया गया है। वे कर्मप्रकृतियां जीव के साथ सम्बद्ध होकर जितने काल तक रहती हैं उसे स्थिति कहा जाता है। वह जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट के भेद से तीन प्रकार की है। जीवप्रदेशों के साथ जो कर्मपुद्गलो का सम्बन्ध होता है वह प्रदेश कहलाता है। अनुभाव नाम विपाक या कर्मफल के अनुभवन का है। उक्त प्रकृति आदि अनेक भेद रूप होकर भी सामान्य से शुभ और अशुभ इन दो भेदो के अन्तर्गत हैं। उनमे सातावेदनीय आदि कर्म- प्रकृतियां और असातावेदनीय आदि कर्मप्रकृतियाँ क्रम से इष्ट व अनिष्ट फल देने के कारण शुर पौर अशुभ मानी गई हैं। इन सबकी विशेष प्ररूपणा षट्खण्डागम, कषायप्राभृत और कर्मप्रकृति प्रादि कर्मग्रन्थों मे विस्तार से की गई है ॥५१॥ आगे क्रमप्राप्त ध्यातव्य के चतुर्थ भेद का निरूपण छह गथाओ द्वारा किया जाता है- धर्मध्यानी को जिन भगवान के द्वारा उपदिष्ट द्रव्यो के लक्षण, आकार, प्रासन, विधान (भेद) और मान का तथा उत्पाद, स्थिति (ध्रौव्य) और भग(व्यय) इन पर्यायों का भी विचार करना चाहिए। विवेचन-आगे गाथा ५७ मे जो 'विचितेज्जा' क्रियापद प्रयुक्त है उसके साथ इन गाथाओ का सम्बन्ध है। इससे गाथा का अर्थ यह है कि जिन देव ने धर्मास्तिकायादि द्रव्यो के उपर्युक्त लक्षण आदि का जिस प्रकार से निरूपण किया है, धर्मध्यानी को उसी प्रकार से उनका चिन्तन करना चाहिए। लक्षण जैसे-जिस प्रकार अविनष्ट नेत्रो से युक्त प्राणी के पदार्थज्ञान मे दीपक या सूर्य का प्रकाश सहायक होता है उसी प्रकार जो जीवो और पुद्गलो के गमन में बिना किसी प्रकार की प्रेरणा के सहायक होता है वह धर्मास्तिकाय कहलाता है। इसी प्रकार जैसे बैठते हुए प्राणी की स्थिति में पृथिवी कारण (उदासीन) होती है वैसे ही जो जीवों और पुद्गलों की स्थिति मे अप्रेरक कारण होता है उसका नाम अधर्मास्तिकाय है। जिस प्रकार वेरो आदि को घट आदि स्थान देते हैं उसी प्रकार जो - [५३- - MES . ३० " ध्यानशतकम् । धर्मास्तिकायादिद्रव्याणा गत्यादि, तथा सस्थान मुख्यवृत्त्या पुद्गलरचनाकारलक्षण परिमण्डलाद्यजीवानाम्, यथोक्तम्-परिमडले य वट्टे तसे चउरस आयते चेव । जीव-शरीराणा च समचतुरस्रादि । यथोक्तम्- चउरसे नग्गोहमडले साइ वामणे खुज्जे । हुडेवि य सठाणे जीवाण छ मुणेयव्वा ॥१॥ तथा धर्माधर्मयोरपि लोकक्षेत्रापेक्षया भावनीयमिति । उक्त च-हेढा मज्झ उवरि छठवी-झल्लरि-मुइगसठाणे॥ लोगो अद्धा- गारो श्रद्धाखेत्तागिई नेनो ॥१॥ तथाऽऽसनानि श्राधारलक्षणानि धर्मास्तिकायादीता लोकाकाशादीनि स्वस्वरूपाणि वा, तथा विधानानि धर्मास्तिकायादीनामेव भेदानित्यर्थः, यथा-'धम्मत्यिकाए घम्मत्थिका- यस्स देसे धम्मत्थिकायस्स पएसे' इत्यादि, तथा मानानि-प्रमाणानि धर्मास्तिकायादीनामेवात्मीयानि । तथोत्पाद-स्थिति भङ्गादिपर्याया ये च 'द्रव्याणा' धर्मास्तिकायादीना तान् विचिन्तयेदिति, तत्रोत्पादादि- पर्यायसिद्धिः 'उत्पाद-व्यय-ध्रौव्ययुक्त सत्' [त सू. ५-२६] इति वचनात्, युक्ति पुनरत्र-घट-मौलि- सुवर्णार्थी नाशोत्पत्ति-स्थितिष्वयम् । शोक-प्रमोद-माध्यस्थ्य जनो याति सहेतुकम् ।।१।। पयोवतो न दद्धचत्ति न पयोऽत्ति दधिव्रत.। अगोरसवतो नोभे तस्मात्तत्त्व त्रयात्मकम् ॥२॥ ततश्च धर्मास्तिकायो विविक्षित- समयसम्बन्धरूपापेक्षयोत्पद्यते, तदनन्तरातीतसमयसम्बन्वरूपापेक्षया तु विनश्यति, धर्मास्तिकाय-द्रव्यात्मना तु नित्य इति । उक्त च-सर्वव्यक्तिषु नियत क्षणे क्षणेऽन्यत्वमथ च न विशेष । सत्योश्चित्यपचित्योरा- कृति-जातिव्यवस्थानात् ॥१॥ श्रादिशब्दादगुरुलध्वादिपर्यायपरिग्रह', चशब्द समुच्चयार्थ इति गाथार्थः ॥५२॥ कि च-- पत्थिकायमइयं लोगमणाइणिहणं जिणक्खायं । णामाइभेयविहियं तिबिहमहोलोयभेयाइं ॥५३॥ जीव, पुद्गल, धर्मास्तिकाय और अर्धास्तिकाय को स्थान देता है उसे प्राकाश कहा जाता है । जो ज्ञान- स्वरूप होकर समस्त पदार्थों का ज्ञाता और कर्मों का कर्ता एवं भोक्ता है उसे जीव कहते हैं। वे जीव संसारी और मुक्त के भेद से दो प्रकार के हैं। स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण व शब्द से युक्त होकर जो मूर्त स्वभाववाले हैं वे पुद्गल कहलाते हैं और संघात अथवा भेद से उत्पन्न होते हैं । सस्थान-पुद्गलों का आकार गोल, त्रिकोण, चौकोण और पायत प्रादि अनेक प्रकार का है। जीवो के शरीरों का प्राकार सम- चतुरस्त्र, न्यग्रोधपरिमण्डल, स्वाति, वामन, कुब्जक और हुण्ड के भेद से छह प्रकार का है। लोक का जो प्राकार है वही धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय का है। लोक का आकार अधोलोक मे वेत के प्रासन के समान, मध्यलोक मे झालर के समान और उर्वलोक में मृदंग के समान है। समस्त लोक का आकार पांवो को फैलाकर और कटि भाग पर दोनो हाथों को रखकर खडे हुए पुरुष के समान है । आसन-पासन का अर्थ प्राधार है। धर्मास्तिकाय आदि का आधार लोकाकाश, लोकाकाश का आधार क्रम से घनोदधि आदि तीन वातवलय और उनका प्राधार अलोकाकाश है। वह अलोकाकाश स्वप्रतिष्ठ है । अथवा उक्त द्रव्यो का आधार अपना अपना स्वरूप समझना चाहिए। विधान-विधान से अभि- प्राय जीव-पुद्गलादि के भेदो का है। मान-धर्मास्तिकाय आदि का जो अपना अपना प्रमाण है उसे मान शब्द से ग्रहण किया गया है । उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य ये द्रव्यो की पर्याय (अवस्थायें) हैं । प्रत्येक द्रव्य अपने पूर्व आकार को जो छोड़ता है उसका नाम व्यय, नवीन प्राकार को जो ग्रहण करता है उसका नाम उत्पाद, और उन दोनो अवस्थाओ मे अन्वयरूप से जो द्रव्य अवस्थित रहता है उसका नाम ध्रौव्य है। जैसे-घट को तोड़ कर उसका मुकुट बनाने पर घट का व्यय, मुकुट का उत्पाद और सुवर्णत्व की ध्रुवता है-उक्त दोनो ही अवस्थामो मे उसकी समान रूप से स्थिति है। ये तीनो प्रत्येक द्रव्य मे सदा ही पाये जाते हैं और यही द्रव्यका स्वरूप है। इन सबका चिन्तन धर्मध्यानी किया करता है ॥५२॥ और भी- जिनेन्द्र देव के द्वारा जो लोक धर्माधर्मास्तिकायादि पांच द्रव्यस्वरूप व अनादि-अनन्त निर्दिष्ट किया गया है उसका भी चिन्तन धर्मध्यानी को करना चाहिए। वह नाम-स्थापनादि के भेद से पाठ या नौ प्रकार का और अधोलोकादि के भेद से तीन प्रकार का है।

-५४]] ध्यातव्यचतुर्थभेदे लोकसस्थानादिविचारः 'पञ्चास्तिकायमय लोकमनानिधन जिनाख्यातम्' इति, क्रिया पूर्ववत् । तत्रास्तय. प्रदेशास्तेषा काया अस्तिकाया, पञ्च च ते अस्तिकायाश्चेति विग्रहः, एते च धमास्तिकायादयो गत्याधुपग्रहकरा ज्ञेया इति । उक्त च-जीवाना पुद्गलाना च गत्युपग्रहकारणम् । धर्मास्तिकायो ज्ञानस्य दीपश्चक्षुष्मतो यथा ॥१॥ जीवाना पुद्गलानां च स्थित्युपग्रहकारणम् । अधर्म. पुरुषस्येव तिष्ठासोरवनिर्यथा ॥२॥ जीवाना पुद्गलाना च धर्माधर्मास्तिकाययो । बदराणा धटो यद्वदाकाशमवकाशदम् ॥३॥ ज्ञानात्मा सर्वभावतो भोक्ता कर्ता च कर्मणाम् । नानाससारि-मुक्ताख्यो जीव. प्रोक्तो जिनागमे ॥४॥ स्पर्श-रस-गन्व-वर्ण-शब्द- मूर्तस्वभावकाः । सङ्घात-भेदनिष्पन्ना. पुद्गला जिन्देशिता' ॥५॥ तन्मय तदात्मकम्, लोक्यत इति लोक- स्तम्, कालत. किम्भूतमित्यत आह-'अनाद्यनिधनम्' अनाद्यपर्यवसितमित्यर्थः, अनेनेश्वरादिकृतव्य- वच्छेदमाह, असावपि दर्शनभेदाच्चित्र एवेत्यत आह–'जिनाख्यात' तीर्थकरप्रणीतम्, आह–'जिनदेशितान् इत्यस्माज्जिनप्रणीताधिकारोऽनुवर्तते एव, ततश्च जिनाख्यातमित्यतिरिच्यते ? न, अस्याऽऽदरख्यापना- थत्वात्, पादरख्यापनादौ च पुनरुक्तदोषानुपपत्तेः। तथा चोक्तम्-अनुवादादरवीप्साभृशार्थविनियोगहेत्व- सूयासु । ईषत्सम्भ्रमविस्मयगणनास्मरणेष्वपुनरुक्तम् ॥१॥ तथा हि-'नामादिभेदविहित' भेदतो नामादि- भेदावस्थापितमित्यर्थ । उक्त च-नाम ठवणा दविए खित्ते काले तहेव भावे य । पज्जवलोगो य तहा अट्टविहो लोगमि [ग] निक्खेवो ॥१॥ भावार्थश्चतुर्विंशतिस्तवविवरणादवसेय , साम्प्रत क्षेत्रलोकमधि- कृत्याह-'त्रिविध' त्रिप्रकारम 'अधोलोकभेदादि' इति प्राकृतशेल्याऽधोलोकादिभेदम्, आदिशब्दात्तिर्यगूर्व- लोकपरिग्रह इति गाथार्थ ॥५३॥ किं च तस्मिन्नेव क्षेत्रलोके इद चेद च विचिन्तयेदिति प्रतिपादयन्नाह- खिइ-वलय-दीव-सागर-नरय-विमाण-भवणाइसंठाणं । वोमाइपइट्ठाणं नियय लोगठ्ठिइविहाणं ॥५४॥ "क्षिति-वलय-द्वीप-सागर-निरय-विमान-भवनादिसस्थान' तत्र क्षितय खलु धर्माद्या ईषत्प्राग्भारा- वसाना अष्टौ भूमय परिग्रह्यन्ते, वलयानि घनोदधि-घनवात-तनुवातात्मकानि धर्मादिसप्तपृथिवीपरिस क्षेपीण्येकविंशति., द्वीपा जम्बूद्वीपादय स्वयम्भूरमणद्वीपान्ता असख्येयाः, सागरा लवणसागरादय स्वय- म्भूरमणसागरपर्यन्ता असख्येया एव, निरया सीमन्तकाद्या अप्रतिष्ठानावसाना सख्येया, यत उक्तम्- तीसा य पन्नवीसा पनरस दसेव सयसहस्साइ । तिन्नेग पचूण पच य नरगा जहाकमसो ॥१॥ विमानानि विवेचन-जहा तक धर्म, अधर्म, प्राकाश, पुद्गल और जीव ये पांच अस्तिकाय-बहुप्रदेशी द्रव्य-देखे जाते हैं उसका नाम लोक है। वह अनादि-अनन्त है-न वह कभी किसी के द्वारा रचा गया है और न किसी के द्वारा वह नष्ट भी किया जाता है। किन्तु अनादि काल से वह इसी प्रकार से चला माया है और अनन्त काल तक इसी प्रकार रहने वाला है। उक्त लोक की विशेष प्ररूपणा टीकाकार के द्वारा आवश्यक सूत्र के चतुविशतिस्तव प्रकरण में की गई है ॥५॥ पूर्वोक्त आठ प्रकार के लोक मे जो क्षेत्रलोक है उसमे क्या विचार करना चाहिए, इसे स्पष्ट करते हुए यह कहा जाता है- पृथिवी, वलय (वायुमण्डल), द्वीप, समुद्र, नरक, विमान और भवन आदि के आकार के साथ ही निसका आधार आकाश आदि है उस शाश्वतिक लोकस्थितिविधान का भी चिन्तन करना चाहिए। विवेचन-क्षेत्रलोक मे धर्मा, वशा, मेघा, अजना, अरिष्टा, मघवा, माघवी और ईषत्प्राग्भारा ये भाठ पृथिवियां हैं। इनमे ईषत्प्राग्भार को छोड़कर शेष सात पृथिवियो को सब ओर से क्रमशः धनोदधि- वातवलय, घनवातवलय और तनुवातवलय ये तीन वायुमण्डल घेरे हुए हैं। इस प्रकार से वे वातवलय इक्कीस (७४३) हैं । जम्बुद्वीप को श्रादि लेकर स्वयम्भूरमण पर्यन्त असख्यात द्वीप और लवणसमुद्र को आदि लेकर स्वयम्भूरमण समुद्र पर्यन्त समुद्र भी असंख्यात ही हैं। नारकबिल उक्त धर्म आदि सात पृथि- वियो मे क्रम से तीस लाख, पच्चीस लाख, पन्द्रह लाख, दस लाख, तीन लाख, पाच कम एक लाख और केवल पांच हैं। चन्द्र-सूर्यादि ज्योतिषी देवो के तथा सौधर्मादि कल्पवासी व कल्पातीत वैमानिक देवों के ? ३२ ध्यानशतकम् [५५- -ज्योतिष्कादिसम्बन्धीन्यनुत्तरविमानान्तान्यसख्येयानि, ज्योतिष्कविमानानामसख्येयत्वात्, भवनानि भवनवास्यालयलक्षणानि असुरादिदशनिकायसम्बन्धीनि असंख्येयानि, उक्तं च सत्तेवय कोडीयो हवति बावत्तरि सयसहस्सा । एसो भवणसमासो भवणवईण वियाणेज्जा'११॥ आदिशब्दादसख्येयव्यन्तरनगर- परिग्रहः, उक्त च-हेट्टोवरिजोयणसयरहिए रयणाए जोयणसहस्से । पढमे वंतरियाण भोमा नयरा अस- खेज्जा ॥१॥ ततश्च क्षितयश्च वलयानि चेत्यादिद्वन्द्वः, एतेपा सस्थानम् आकारविशेषलक्षण विचिन्तयेदिति, तथा 'व्योमादिप्रतिष्ठानम्' इत्यत्र प्रतिष्ठिति प्रतिष्ठानम्, भावे ल्युट्, व्योम-आकाशम्, आदिशब्दाद्वाय्वा- दिपरिग्रह , व्योमादौ प्रतिष्ठानमस्येति व्योमादिप्रतिष्ठानम्, ' लोकस्थितिविधानमिति योगः, विधिः विधान प्रकार इत्यर्थ, लोकस्य स्थिति. लोकस्थिति , स्थिति व्यवस्था मर्यादा इत्यनर्थान्तरम्, तद्विधानम्, किम्भू- तम् ? 'नियतम्' नित्यं शाश्वतम्, क्रिया पूर्ववदिति गाथार्थः ॥५४॥ किं च- उवमोगलक्षणमणाइनिहणमत्यंतरं सरीराओ। जीवमरूविकारि भोयं च सयस्स कम्मस्स ॥५५॥ तस्स य सकम्मजणियं जम्माइजलं कसायपायालं । वसणसयसावयमणं मोहावत्तं महाभीमं ॥५६॥ अण्णाण-मारुएरियसंजोग-विजोगवीइसंताणं । संसार-सागरमणोरपारमसुह विचितेज्जा ॥५७॥ उपयुज्यतेऽनेनेत्युपयोग साकारानाकारादि, उक्त च-'स द्विविधोऽष्ट-चतुर्भेद' [त. सू.२-६], स एव लक्षण यस्य स उपयोगलक्षणस्तम्, जीवमिति वक्ष्यति, तथा 'अनाद्यनिधनम्' अनाद्यपर्यवसितम्, भवा- पवर्गप्रवाहापेक्षया नित्यमित्यर्थ , तथा 'अर्थान्तरम्' पृथग्भूतम्, कुत ? शरीरात्, जातावेकवचनम् शरीरेभ्य. औदारिकादिभ्य इति, किमित्यत आह जीवति जीविष्यति जीवितवान् वा जीव इति तम्, किम्भूतमित्यत आह–'अरूपिणम्' अमूर्तमित्यर्थ , तथा 'कर्तारम्' निर्वर्तकम्, कर्मण इति गम्यते, तथा 'भोक्तारम्' उप- भोक्तरम्, कस्य ? स्वकर्मण आत्मीयस्य कर्मण, ज्ञानावरणीयादेरिति गाथार्थ ॥५५।। 'तस्य च' जीवस्य निवासस्थानो को विमान कहा जाता है । ये विमान ज्योतिषी देवो के असंख्यात और वैमानिक देवों के चौरासी लाख हैं। भवनवासी देवों के निवासस्थानो का नाम भवन है। उनके इन समस्त भवनों का प्रमाण सात करोड़ बहत्तर लाख है। व्यन्तर देवो के निवासस्थान नगर कहलाते हैं, जो असंख्यात हैं । धर्मध्यानी इन सबके प्राकार आदि का विचार किया करता है। साथ ही वातवलयो और आकाश के ऊपर प्रतिष्ठित जो शाश्वतिक लोक है उसकी व्यवस्था आदि का भी वह विचार करता है ॥५४॥ मागे जीव के सम्बन्ध मे वह क्या विचार करे, इसे तीन गाथानो द्वारा स्पष्ट किया जाता है- जीव का लक्षण उपयोग-ज्ञान और दर्शन है। वह अनादि-अनन्त, शरीर से भिन्न, अरूपी और अपने कर्म का कर्ता व भोक्ता है। उसका अपने कर्म से उत्पन्न हुआ जो संसार रूप समुद्र है वह जन्म- मरणादि रूप जल से परिपूर्ण, कषायोरूप पातालो से सहित, सैकड़ों आपत्तियोरूप श्वापदो (हिंसक जल- जीवविशेषो) से व्याप्त, मोह रूप भंवरो से सयुक्त, महाभयंकर और अज्ञानरूप वायु से प्रेरित सयोग- वियोग रूप लहरो की परम्परा से सहित है। वह संसाररूप समुद्र अनादि अनन्त एव अशुभ है । उसका चिन्तन धर्मध्यानी को करना चाहिए । विवेचन-जीव का लक्षण चैतन्यपरिणामरूप उपयोग है। वह साकार और अनाकार के भेद से दो प्रकार का है । जो विशेषता के साथ पदार्थ को ग्रहण करता है उसे साकार (ज्ञान) और जो किसी प्रकार की विशेषता न करके सामान्य से ही वस्तु को विषय करता है उसे अनाकार (दर्शन) उपयोग कहा जाता है । वह जीव जन्म-मरण एवं मोक्ष की परम्परा की अपेक्षा अनादि व अनन्त है। औदारिकादि शरीरो से भिन्न होकर वह अरूपी-रूप-रसादि से रहित (प्रमूर्तिक) और अपने कर्म का कर्ता व भोक्ता है। उसका संसार-जन्म-मरणादि की परम्परा-अपने ही कर्म से उत्पन्न हुई है। प्रकृत मे उक्त ? न -६०] ध्यातव्यद्वारे संसारोत्तरणोपायः 'स्वकर्मजनितम्' प्रात्मीयकर्मनिर्वतितम्, कम् ? संसार-सागरमिति वक्ष्यति तम्, किम्भूतमित्यत पाह- 'जन्मादिजलम्' जन्म प्रतीतम्, आदिशब्दाज्जरा-मरणपरिग्रह., एतान्येवातिबहुत्वाज्जलमिव जलं यस्मिन् स तयाविषस्तम्, तथा 'कषाय-पातालम्' कषाया. पूर्वोक्तास्त एवागाधभव-जननसाम्येन पातालमिव पाताल यस्मिन् स तथाविधस्तम्, तथा 'व्यसनशत-श्वापदवन्तम्' व्यसनानि दुःखानि धूतादीनि वा, तच्छतान्येव पीडाहेतुत्वात् श्वापदानि, तान्यस्य विद्यन्त इति तद्वन्तम् 'मण' ति देशीशन्दो मत्वर्थीय , उक्त चमतु- पस्थमि मुणिज्जह आल इल्ल मण च मणुयं चेति, तथा 'मोहावर्तम्' मोह. मोहनीयं कर्म, तदेव तन विशिष्टभ्रमिजनकत्वादावों यस्मिन् स तथाविधस्तम्, तथा 'महाभीमम्' अतिभयानकमिति गाथार्थः ॥५६॥ किं च-'मज्ञानम्' ज्ञानावरणकर्मोदयजनित प्रात्मपरिणामः, स एव तत्प्रेरकत्वान्मारुतः वायुस्तेने- रितः प्रेरितः, कः ? सयोग-वियोग-वीचिसन्तानो यस्मिन् स तथाविवस्तम्, तत्र सयोगः केनचित् सह सम्बन्ध , वियोगः तेनैव विप्रयोग , एतावेव सन्ततप्रवृत्तत्वात् वीचय कर्मयस्तत्प्रवाह सन्तान इति भावना. ससरण ससारः, [स] सागर इव संसार-सागरस्तम्, किम्भूतम् ? 'अनोरपारम्' अनाद्यपर्यवसितम्, 'अशुभम्' अशोभन विचिन्तयेत्, तस्य गुणरहितस्य जीवस्येति गाथार्थ ॥५७॥ तस्स य संतरणसहं सम्मइंसण-सुवधणमणग्छ । णाणमयकण्णधारं चारित्तमयं महापोय ॥५॥ संवरकयनिच्छिदं तव-पवणाइद्धजइणतरवेगं । वेरग्गमग्गपडियं विसोतियावीइनिक्खोभं ॥५६॥ पारोढुं मुणि-वणिया महग्धसोलंग-रयणपडिपुन्नं । जह तं निव्वाणपुरं सिग्घमविग्घेण पावंति ॥६०॥ ससार के अपरिमित होने से उसे यहां समुद्र कहा गया है जिस प्रकार समुद्र अपरिमित जल से परि- पूर्ण होता है उसी प्रकार जीव का वह ससार भी जल के समान अपरिमित जन्म-मरणादि से संयुक्त है, समुद्र में जहां विशाल पाताल रहते हैं वहां ससार में उन पातालों के समान क्रोधादि कषायें विद्यमान मे यदि श्वापद (हिसक जलजन्तुविशेष) रहते हैं तो ससार मे उन श्वापदों के समान पीड़ा उत्पन्न करनेवाले सैकड़ों व्यसन हैं-सेकड़ों आपत्तियां अथवा लोकप्रसिद्ध जुमा प्रादि व्यसन हैं, समुद्र में जिस प्रकार भवर उठते हैं उसी प्रकार ससार में जन्म-मरण की परम्परा रूप भ्रमण को उत्पन्न करने पाला मोह है, समुद्र जैसे भय को उत्पन्न करता है वैसे ही संसार भी महान् भय को उत्पन्न करने वाला है, तया समुद्र में जहां वायु से प्रेरित होकर लहरो की परम्परा चलती है वहां संसार में उन लहरों को परम्परा के समान अज्ञान रूप वायु से प्रेरित होकर संयोग-वियोग की परम्परा चलती रहती है। इस प्रकार अपने ही फर्म के वश प्रादुर्भूत जो यह संसार सर्वथा समुद्र के समान है उसके चिन्तन को भी यहां प्रेरणा की गई है ॥५५-५७॥ अब उक्त संसार समुद्र के पार पहुंचाने मे कौन समर्थ है, इसे आगे की तीन गाथाओ द्वारा स्पष्ट किया जाता है- उस ससार-समुद्र से पार उतारने में वह चारित्ररूपी महती नौका समर्थ है जिसका उत्तम बन्धन सम्यग्दर्शन है, जो निष्पाप (अथवा अनर्घ-अमूल्य) है, जिसका कर्णधार (चालक) ज्ञान है, जो पालवों के निरोधस्वरूप संवर के द्वारा छेदरहित कर दी गई है, जिसका अतिशयित वेग तपरूप वायु से प्रेरित है, जो वैराग्य रूप मार्ग पर चल रही है, तथा जो दुनिरूप लहरो के द्वारा क्षोभ को नहीं प्राप्त करायी जा सकती है। महा मूल्यवान् शीलागरूप-गृथिवी कायसंरम्भादि के परित्यागरूर-रत्नो से परिपूर्ण उस चारित्ररूप विशाल नौका पर आरूढ़ होकर मुनिरूप व्यापारी उस निर्वाणपुर को-मुक्तिरूप पुरी को--बिना किसी प्रकार की विघ्न-बाधामो के शीघ्र ही पा लेते हैं । हैं, समुद्र -

ध्यानशतकम्
[६१-
'तस्य च' ससार-सागरस्य 'सतरणसहम्' सन्तरणसमर्थम्, पोतमिति वक्ष्यति, किंविशिष्टम् ?
सम्यग्दर्शनमेव शोभन बन्धनं यस्य स तथाविधस्तम्, 'अनघम्' अपापम्, ज्ञानं प्रतीतम्, तन्मयः तदात्मकः
कर्णधार निर्यामकविशेषो यस्य यस्मिन् वा स तथाविघम्तम्, चारित्रं प्रतीतम्, तदात्मकम्, 'महापोतम्'
इति महाबोहित्थम्, क्रिया पूर्ववदिति गाथार्थः ॥५८॥ इहाऽऽश्रवनिरोध' संवरस्तेन कृतं निश्छिद्र स्थगित-
रन्ध्रमित्यर्थ., अनशनादिलक्षण तप', तदेवेष्टपुर प्रति प्रेरकत्वात् पवन इव तप.पवनस्तेनाऽऽविद्धस्य प्रेरितस्य
जवनतर शीघ्रतरो वेगः रयो यस्य स तथाविधस्तम्, तथा विरागस्य भावो वैराग्यम्, तदेवेष्टपुरप्राप-
कत्वान्मार्ग इव वैराग्यमार्गस्तस्मिन् पतित. गतस्तम्, तथा विस्रोतसिका अपध्यानानि, एता एवेष्टपुर-
प्राप्ति विघ्नहेतुत्वाद्वीचय इव विस्रोतसिकावीचय , ताभिनिक्षोभ्यः निष्प्रकम्पस्तमिति गाथार्थ. ॥५॥
एवम्भूतं पोत किम् ? 'पारोढु' इत्यारा, के ? 'मुनि-वणिज' मन्यन्ते जगतस्त्रिकालावस्थामिति मुनयः, त
एवातिनिपुणमाय-व्ययपूर्वक प्रवृत्तेर्वणिज इव मुनिवणिज , पोत एव विशेष्यते-महार्षाणि शीलाङ्गानि-
पृथिवीकायसरम्भपरित्यागादीनि वक्ष्यमाणलक्षणानि, तान्येवैकान्तिकात्यन्तिकसुखहेतुत्वाद्रलानि महाघेशीला.
गरत्नानि, तैः परिपूर्ण. भृतस्तम्, येन प्रकारेण यथा 'तत्' प्रकान्तं "निर्वाणपुर' सिद्धि-पत्तनम्, परिनिर्वाण-
पुर वेति पाठान्तरम् 'शीघ्रम्' आशु स्वल्पेन कालेनेत्यर्थः, 'अविघ्नेन' अन्तरायमन्तरेण 'प्राप्नुवन्ति' आसा-
दयन्ति, तथा विचिन्तयेदिति वर्तत इत्यय गाथार्थ ॥६॥
तत्थ य तिरयणविणियोगमइयमेगतिय निरावाह ।
साभावियं निरुवमं जह सोक्खं अक्खयमुर्वेति ॥६॥
'तत्र च' परिनिर्वाणपुरे "विरलविनियोगात्मकम्' इति त्रीणि रत्नाति ज्ञानादीनि, विनियोगश्चषा
क्रियाकरणम्, तत प्रसूतेस्तदात्मकमुच्यते, तथा 'ऐकान्तिकम्' इत्येकान्तभावि 'निरावाघम्' इत्यावाधार-
हितम्, 'स्वाभाविकम्' न कृत्रिमम् 'निरुपमम्' उपमातीतमिति, उक्त च-'नवि अस्थि माणुसाण त
सोक्खम्' इत्यादि 'यथा' येन प्रकारेण 'सौख्यम्' प्रतीतम्, 'अक्षयम्' अपर्यवसानम् 'उपयान्ति' सामीप्येन
प्राप्नुवन्ति, क्रिया प्राग्वदिति गाथार्थ ॥६॥
विवेचन-पूर्व तीन (५५-५७) गाथाओ मे जीव के स्वरूप को प्रगट करते हुए कर्मोदयजनित
उसके ससार को समुद्र की उपमा देकर उसकी भयंकरता दिखलायी जा चुकी है। अब इन गाथानो में
उक्त संसार-समुद्र से मुमुक्षु प्राणी कैसे पार होते हैं, इसे नाव के दृष्टान्त द्वारा स्पष्ट किया गया है-
जिस प्रकार व्यापारी जन बहुमूल्य रत्नों को साथ लेकर समुद्र से पार होने के लिए ऐसी किसी सुदृढ़
व विशाल नौका का प्राश्रय लेते हैं जिसके बांधने की सांकल आदि दृढ़ हैं, जो निर्दोष है, जिसका खेव-
टिया अतिशय कुशल है, जो निश्छिद्र होकर अनुकूल वायु के वेग से प्रेरित है, जो अभीष्ट स्थान के
अनुकूल सीधे और सरल मार्ग से जा रही है, और जो आंघी (तूफान) से उठने वाली लहरों से क्षोभ
को प्राप्त नहीं होती है। प्रकृत में व्यापारियों के समान मुमुक्षु जन और नौका के समान चारित्र है।
वह चारित्र सम्यग्दर्शन से स्थिर, निर्दोष, सम्यग्ज्ञान के प्राश्रय से अनुष्ठित, कर्मागम के कारणभूत
मिथ्यादर्शनादिरूप पासवों से रहित-संवर से सहित, बाह्य व अभ्यन्तर तप से प्रेरित, वैराग्य से परि-
पूर्ण और मार्त-रौद्ररूप दुर्ध्यान से क्षोभरहित होना चाहिए। ऐसे अपूर्व चारित्र के द्वारा मोक्षाभिलाषी
मुनिजन कर्मकृत विघ्न-बाधाओं से सर्वथा रहित होते हुए शीघ्र ही उस भयानक संसार से रहित होकर
अविनाशी व निराबाष मुक्तिसुख को प्राप्त कर लेते हैं । इस प्रकार के चिन्तन की ओर भी यहां धर्म-
ध्यानी को प्रेरित किया गया है ॥५८-६०॥
मागे मुक्ति प्राप्त होने पर जीव को जो स्वाभाविक सुख प्राप्त होता है उसका स्वरूप बतलाते हैं-
मुमुन जीव उक्त निर्वाणपुर के प्राप्त कर लेने पर वहां सम्यग्दर्शनादि तीन रत्नो के उपयोग-
स्वरूप, ऐकान्तिक-एकान्तरूप से होने वाले, बाधा से रहित, स्वाभाविक कृत्रिमता से रहित
(प्रात्मीक)-ौर उपमातीत-सर्वोत्कृष्ट-सुख को प्राप्त कर लेते हैं ॥१॥

धर्मध्याने ध्यातृनिरूपणम्
कि बहुणा? सव्वं चिय जीवाइपयत्थवित्थरोवेयं ।
सव्वनयसमूहमयं झाइज्जा समयसम्भावं ॥६२॥
कि बहुना भाषितेन ? 'सर्वमेव' निरवशेषमेव 'जीवादिपदार्थविस्तरोपेतम्' जीवाऽजीवाऽश्रव.
बन्ध-सवर-निर्जरा-मोक्षाख्यपदार्थप्रपञ्चसमन्वितं समयसद्भावमिति योग, किविशिष्टम् ? 'सर्वनयसमूहा-
स्मकं द्रव्यास्तिकादिनयसद्धातमयमित्यर्थ , 'ध्यायेत् विचिन्तयेदिति भावना, समयसद्भाव' सिद्धान्तार्थमिति
हृदयम्, अय गाथार्थ. ॥६२॥ गत ध्यातव्यद्वार, साम्प्रत येऽस्य ध्यातारस्तान् प्रतिपादयन्नाह-
सम्वप्पमायरहिया मुणो खीणोवसंतमोहा थ।
झायारो नाण-घणा धम्मज्झाणस्स निहिट्ठा ॥३॥
प्रमादा मद्यादय , यथोक्तम्-मज्ज विसय-कसाया निद्दा विकहा य पचमी भणिया । सर्वप्रमाद
रहिता सर्वप्रमादरहिता, अप्रमादवन्त इत्यर्थः, 'मुनय.' साधव. 'क्षीणोपशान्तमोहाश्च' इति क्षीणमोहाः
पकनिर्गन्या., उपशान्तमोहा. उपशामकनिम्रन्थाः, च-शब्दादन्ये वाप्रमादिन , 'ध्यातार' चिन्तका, धर्म-
ध्यानस्येति सम्बन्धः, ध्यातार एव विशेष्यन्ते-'ज्ञान-धना.' ज्ञान-वित्ता विपश्चित इत्यर्थ, 'निर्दिष्टा
प्रतिपादितास्तीर्थकर-गणघरैरिति गाथार्थ ॥६३॥ उक्ता धर्मव्यानस्य ध्यातार, साम्प्रत शुक्लध्यानस्या-
प्यायभेदद्वयस्याविशेषेण एत एव यतो ध्यातार इत्यतो मा भूत्पुनरभिवेया भविष्यन्तीति लाघवार्थ चरम-
भेदद्वयस्य प्रसङ्गत एव तानेवाभिघित्सुराह-
एएच्चिय पुब्वाण पुन्वधरा सुप्पसत्थसंघयणा ।
दोह सजोगाजोगा सुक्काण पराण केवलिणो ॥६४॥
'एत एव' येऽनन्तरमेव धर्मध्यानध्यातार उक्ता 'पूर्वयो' इत्याद्ययोद्धयो शुक्लध्यानभेदयो. पृथक्त्व-
वितर्कसविचारमेकत्ववितर्कमविचारमित्यनयो, ध्यातार इति गम्यते, अय पुनविशेष -'पूर्ववरा.' चतुर्द-
शपूर्वविदस्तदुपयुक्ता., इद च पूर्वधरविशेषणमप्रमादवतामेव वेदितव्यम्, न निन्यानाम्, माषन्तुष-मरुदेव्या-
दीनामपूर्वधराणामपि तदुपपत्ते, 'सुप्रशस्तसहनना' इत्याचसहनन युक्ता, इद पुनरोधत एव विशेषणमिति
तथा 'द्वयो' शुक्लयो, परयो उत्तरकालभाविनो प्रधानयोर्वा सूक्ष्मक्रियानिवृत्ति-परतक्रियाऽप्रतिपाति-
लक्षणयोर्थथासख्य सयोगायोगकेवलिनो ध्यातार इति योग, एव च गम्मए-सुक्कज्माणाइदुग वोली-
भागे प्रकृत ध्यातव्य द्वारका उपसहार करते हुए सिद्धान्तार्थ के चिन्तन की प्रेरणा की जाती है-
बहुत कहने से क्या ? जो समय का सद्भाव-पागम का रहस्य-जीवाजीवादि पदार्थों के
विस्तार से सहित और द्रव्याथिक व पर्यायार्थिक आदि नयों के समूह स्वरूप है उस सभी का चिन्तन
धर्मध्यानी को करना चाहिए ॥२॥
अव धर्मध्यान के ध्याता मुमुक्षुम्रो का निरूपण किया जाता है-
धर्मध्यान के ध्याता ज्ञानरूप धन से सम्पन्न वे मुनि कहे गये हैं जो मद्य, विषय, कषाय, निद्रा
और विकथारूप सब प्रमादो से रहित होते हुए क्षीणमोह-मोहनीय कर्म के क्षय मे उद्यत-अथवा
उपशान्तमोह-उक्त मोहनीय कर्म के उपशम मे उद्यत हैं ॥६३॥
ये जो धर्मध्यान के ध्याता कहे गये है वे ही चूकि आदि के दो शुक्लध्यानो के भी ध्याता हैं,
प्रत एव उनका निरूपण फिर से न करना पड़े; इस लाघव की अपेक्षा कर अन्तिम दो शुक्लध्यानो के
साथ उनका निर्देश यहीं पर-धर्मध्यान के ही प्रकरण मे-किया जाता है--
ये ही पूर्वोक्त धर्मध्यान के ध्याता पूर्व दो शुक्लध्यानो के-पृथक्त्ववितर्क सविचार और
एकत्ववितर्क अविचार ध्यानों के-ध्याता हैं । विशेष इतना है कि वे अतिशय प्रशस्त संहनन-वचर्षभ-
नाराचसहनन-से युक्त होते हुए पूर्वघर-चौदह पूर्वो के ज्ञाता (श्रुतकेवली) होते हैं । अन्तिम
शुक्ल-
ध्यानों के सूक्ष्मक्रियानिवृत्ति और व्युपरतक्रियाप्रतिपाति इन दो ध्यानों के ध्याता क्रम से सयोग-
केवली और प्रयोगकेवली होते है ॥६॥

३६ [६५- ध्यानशतकम् ण्णस्स ततियमप्पत्तस्स एयाए झाणंतरियाए वट्टमाणस्स केवलणाणमुप्पज्जइ, केवली य सुक्कलेसोऽज्माणी य जाव सुहुमकिरियमनियट्टि त्ति गाथार्थ ॥६४॥ उक्तमानुषङ्गिकम्, इदानीमवसरमाप्तमनुप्रेक्षाद्वार ध्याचिख्यासुरिदमाह- झाणोवरमेऽवि मुणी णिच्चमणिच्चाइभावणापरमो। होइ सुभाविचित्तो धम्मज्झाणेण जो पुचि ॥६॥ इह ध्यान धर्मध्यानमभिगृह्यते, तदुपरमेऽपि तद्विगमेऽपि, 'मुनिः' साधुः 'नित्य' सर्वकालमनित्यादि- चिन्तनापरमो भवति, प्रादिशब्दादशरणकत्व-ससारपरिग्रह । एताश्च द्वादशानुप्रेक्षा भावयितव्याः-इष्ट- जनसम्प्रयोगद्धिविषयसुखसम्पद [तथारोग्यम् । देहश्च यौवनं जीवित च सर्वाण्यनित्यानि ॥१॥ जन्म-ज- रामरण-भय रभिद्रुते ब्याधिवेदनाग्रस्ते । जिनवरवचनादन्यत्र नास्ति शरणं क्वचिल्लोके ॥२॥ एकस्य जन्म- मरणे गतयश्च शुभाशुभा भवावर्ते । तस्मादाकालिकहितमेकेनैवात्मन. कार्यम् ॥३॥ अन्योऽह स्वजनात्परि- जनाच्च विभवाच्छरीरकाच्चेति । यस्य नियता मतिरियं न बाधते तं हि शोककलिः ॥४॥ अशुचिकरण. सामर्थ्यादाद्युत्तरकारणाशुचित्वाच्च । देहस्याशुचिभावः स्थाने स्थाने भवति चिन्त्यः ॥५॥ माता भूत्वा दुहिता भगिनी भार्या च भवति ससारे। व्रजति सुतः पितृतां भ्रातृतां पुनः शत्रुता चैव ॥६॥ मिथ्यादृष्टिर- विरतः प्रमादवान् यः कषायदण्डरुचि.। तस्य तथास्रवकर्मणि यतेत तन्निग्रहे तस्मात् ॥७॥ या पुण्य-पापयो- रग्रहणे वाक्काय-मानसी वृत्ति । सुसमाहितो हित सवरो वरददेशितश्चिन्त्य. ॥८॥ यद्वद्विशोषणादुपचितो- ऽपि यत्लेन जीर्यते दोषः। तद्वत्कर्मोपचितं निर्जरयति संवृतस्तपसा लोकस्यास्तिर्यक्त्व चिन्तयेदूर्ध्वमपि च बाहल्यम् । सर्वत्र जन्म-मरणे रूपिद्रव्योपयोगाश्च ॥१०॥ धर्मोऽयं स्वाख्यातो जगद्धितार्थे जिनजितारि- गणः । येऽत्र रतास्ते ससार-सागर लीलयोत्तीर्णा ॥११॥ मानुष्यकर्मभूम्यार्यदेशकुलकल्पतायुरुपलब्धी। श्रद्धा-कथक-श्रवणेषु सत्स्वपि सुदुर्लभा बोधि ॥१२॥ प्रशमर. १५१-६२] इत्यादिना ग्रन्थेन, फल चासा सचित्तादिष्वनभिष्वङ्ग-भवनिर्वेदाविति भावनीयम्, अथ किंविशिष्टोऽनित्यादिचिन्तनापरमो भवतीत्यत आह–'सुभावितचित्त.' सुभावितान्त.करण, केन ? 'धर्मध्यानेन' प्राग्निरूपितशब्दार्थेन, 'य.' कश्चित् 'पूर्वम्' पादाविति गाथार्थ ॥६५॥ गतमनुप्रेक्षाद्वारम्, अधुना लेश्याद्वारप्रतिपादनायाह- होंति कमविसुद्धामो लेसानो पीय-पम्म-सुक्कामो। धम्मज्झाणीवगयस्स तिव्व-मंदाइभेयाओ ॥६६॥ इह 'भवन्ति' सञ्जायन्ते, 'क्रमविशुद्धा.' परिपाटिविशुद्धा, का.? लेश्याः, ताश्च पीत-पद्म-शुक्लाः, एतदुक्त भवति-पीतलेश्याया. पद्मलेश्या विशुद्धा, तस्या अपि शुक्ललेश्येति क्रमः, कस्यता भवन्त्यत इस प्रकार ध्याता का निरूपण करके अब क्रमप्राप्त अनुप्रेक्षाद्वार का व्याख्यान किया जाता है- जिस मुनि ने पूर्व में धर्मध्यान के द्वारा चित्त को सुवासित कर लिया है वह धर्मध्यान के समाप्त हो जाने पर भी सदा अनित्य व अशरण आदि अनुप्रेक्षाओ के चिन्तन में तत्पर होता है । विवेचन-ध्यान का काल अन्तर्मुहूर्त है, इससे अधिक समय तक वह नहीं रहता। ऐसी स्थिति में ध्यान के समाप्त हो जाने पर ध्याता क्या करे, इस प्राशंका के समाधानस्वरूप यहां यह कहा गया है कि उक्त धर्मध्यान के विनष्ट हो जाने पर धर्मध्यान का ध्याता अनित्य, अशरण, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, संसार, पालव, सवर, निर्जरा, लोक, धर्मस्वाख्यात और बोधिदुर्लभ, इन बारह अनुप्रेक्षाओं का चिन्तन करता है। इनके स्वरूप के दिग्दर्शन मे टीकाकार के द्वारा प्रशमरतिप्रकरणगत १२ (१५१-६२) श्लोक उद्धृत किये गये हैं । उनका स्वरूप अनेक ग्रन्थों में उपलब्ध होता है ॥६५॥ आगे लेश्याद्वार का वर्णन किया जाता है- 'धर्मध्यान को प्राप्त हुए जीव के क्रम से विशुद्धि को प्राप्त होने वाली पीत, पन और शुक्ल ये तीन लेश्यायें होती है । इनमे प्रत्येक तीन व मन्द मादि (मध्यम) भेदो से युक्त हैं । विवेचन-जिस प्रकार कृष्णादि वर्ण वाली किसी वस्तु की समीपता से स्फटिक मणि में तदरूप -६८] धर्मध्याने लिंगद्वारप्ररूपणा भाह-'धर्मध्यानोपगतस्य' धर्मध्यानयुक्तस्येत्यर्थ., किविशिष्टाश्चता भवन्त्यत आह-तीव्र-मन्दादिभेदा. इति, तत्र तीव्रभेदाः पीतादिस्वरूपेष्वन्त्याः, मन्दभेदास्त्वाद्या, आदिशब्दान्मध्यमपक्षपरिग्रहः, अथवीपत एव परिणामविशेषात् तीव-मन्दभेदा इति गाथार्थः ॥६६॥ उक्त लेश्याद्वारम्, इदानी लिङ्गद्वार विवृण्वन्नाह -- प्रागम-उवएसाऽऽणा-णिसग्गो जं जिणप्पणीयाणं। भावाणं सद्दहणं धम्मज्झाणस्स तं लिगं ॥६७॥ इहागमोपदेशाऽऽज्ञा-निसर्गतो यद् "जिनप्रणीताना' तीर्थकरप्ररूपिताना द्रव्यादिपदार्थानाम् 'श्रद्धानम् भवितथा एत इत्यादिलक्षण धर्मध्यानस्य तल्लिङ्गम्, तत्त्वश्रद्धानेन लिङ्गयते धर्मध्यायीति, इह चागमः सुत्रमेव, तदनुसारेण कथनम् उपदेश, आज्ञा त्वर्थः, निसर्ग. स्वभाव इति गाथार्थ ॥६७॥ किं च- जिणसाहुगुणकित्तण-पससणा-विणय-दाणसंपण्णो । सुअ-सील-संजमरो धम्मज्झाणी मुणयन्वो ॥६॥ 'जिन-साधुगुणोत्कीर्तन-प्रशसा-विनय-दानसम्पन्न.' इह जिन-साघवः प्रतीता, तद्गुणाश्च निरति- धारसम्यग्दर्शनादयस्तेषामुरकीर्तनं सामान्येन सशब्दनमुच्यते, प्रशसा त्वहो श्लाघ्यतया भक्तिपूर्विका स्तुतिः, विनयः अभ्युत्थानादि, दानम् अशनादिप्रदानम्, एतत्सम्पन्नः एतत्समन्वित , तथा श्रुत-गील-सयमरत , तत्र श्रुतं सामायिकादिबिन्दुसारान्तम्, शीलं व्रतादिसमाधानलक्षणम्, सयमस्तु प्राणातिपातादिनिवृत्तिलक्षणः, पयोक्तम्-'पञ्चाश्रवात्' इत्यादि, एतेषु भावतो रत, किम् ? धर्मध्यानीति ज्ञातव्य इति गाथार्थः ॥६॥ गत लिङ्गद्वारम्, अधुना फलद्वारावसर, तच्च लाघवार्थ शुक्लघ्यानफलाधिकारे वक्ष्यतीत्युक्तं धर्मध्यानम् । परिणमन हुना करता है उसी प्रकार कर्म के निमित्त से प्रात्मा का जो परिणाम होता है उसका नाम लेश्या है । वह छह प्रकार की है-कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पन और शुक्ल । इनमे प्रथम तीन अशुभ व पन्तिम तीन शुभ हैं। धर्मध्यानी के जो पीत आदि तीन शुभ लेश्यागें होती हैं वे क्रम से विशुद्धि को प्राप्त हैं-पीत लेश्या की अपेक्षा पद्म और पद्म को अपेक्षा शुक्ल इस प्रकार वे उत्तरोत्तर विशुद्ध हैं। इनमें प्रत्येक तीव, मध्यम और मन्द भेदों से युक्त हैं-उनमे जो अन्तिम अंश हैं वे तीव्र और प्रादि के घंश मन्द हैं, शेष मध्य के अनेक अंश मध्यम हैं ॥६६॥ अब क्रमप्राप्त लिंग द्वार का वर्णन किया जाता है- पागम, उपदेश, प्राज्ञा अथवा स्वभाव से जो जिन भगवान के द्वारा उपदिष्ट जीवाजीवादि पदार्थी का श्रद्धान उत्पन्न होता है वह धर्मध्यान का लिंग-उसका परिचायक हेतु है । प्रागम नाम सूत्र का है। उस सूत्र के अनुसार जो कथन किया जाता है वह उपदेश कहलाता है। इस उपदेश का जो अर्थ या अभिप्राय होता है उसे आज्ञा कहा जाता है । स्वभाव और निसर्ग ये समानार्थक शब्द हैं ॥६॥ मागे इसी प्रसंग में धर्मध्यानी का स्वरूप कहा जाता है- जो जिन, साधु और उनके गुणों के कीर्तन, प्रशंसा, विनय एवं दान से सम्पन्न होता हुआ श्रुत, शील और संयम मे लीन होता है उसे धर्मध्यानी जानना चाहिए । विवेचन-धर्मध्यानी की पहिचान तत्त्वार्थश्रद्धान से होती है, यह पूर्व गाथा में कहा जा चुका । इसके अतिरिक्त उसमे और अन्य कौन से गुण होते हैं, इसका निर्देश प्रकृत गाथा में किया जा रहा है-वह जिन, साधु और उनके गुणो का कीर्तन व प्रशंसा करता है। उक्त जिन आदि का सामान्य से शब्दों द्वारा उल्लेख करना, इसका नाम कीर्तन और स्तुतिरूप मे भक्तिपूर्वक उनको बढ़ा-चढ़ाकर कहना इसका नाम प्रशंसा है। जिन आदि को देखकर उठ खड़े होना व आदर व्यक्त करना, इसे विनय कहा जाता है। भोजन आदि के देने रूप दान प्रसिद्ध ही है। उक्त धर्मध्यान का ध्याता सामायिक आदि बिन्दुसार पर्यन्त श्रुत के परिशीलन में उद्यत रहता हुआ व्रतादि के संरक्षण रूप शील व हिंसादि के परि- त्यागरूप संयम मे तत्पर रहता है ॥६॥ भब यद्यपि फलद्वार अवसरप्राप्त है, पर लाघव की अपेक्षा उसका कथन यहां न करके माने 4 - ३८ ध्यानशतकम् [६९- इदानी शुक्लध्यानावसर इत्यस्य चान्वर्थ प्राग्निरूपित एव, इहापि च भावनादीनि फलान्तानि तान्येव द्वादश द्वाराणि भवन्ति, तत्र भावना-देश-कालाऽऽसनविशेषेषु (धर्म)ध्यानादस्याविशेष एवेत्यत एतान्यना- दृत्याऽऽलम्बनान्यभिघित्सुराह- अह खंति-मद्दवज्जव-मुत्तीओ जिणमयप्पहाणाम्रो । प्रालंबणाई जेहिं सुक्कज्झाणं समारहइ ॥६६॥ 'अथ' इत्यासनविशेषानन्तर्ये, 'क्षान्ति-माईवाऽऽर्जव-मुक्तय' क्रोध-मान-माया-लोभपरित्यागरूपाः, परित्यागश्च क्रोधनिवर्तनमुदयनिरोघ उदीर्णस्य वा विफलीकरणमिति, एव मानादिष्वपि भावनीयम्, एता एव क्षान्ति-माईवाऽर्जव-मुक्तयो विशेष्यन्ते-'जिनमतप्रधाना.' इति जिनमते तीर्थकरदर्शने कर्मक्षयहेतुताम- धिकृत्य प्रधाना. जिनमतप्रधाना, प्राधान्य चासामकषाय चारित्र चारित्राच्च नियमतो मुक्तिरिति कृत्वा, ततश्चैता पालम्बनानि प्राग्निरूपितशब्दार्थानि, यैरालम्बनैः करणभूत शुक्लध्यान समारोहति, तथा च क्षान्त्याधालम्बना एव शुक्लध्यान समासादयन्ति, नाय इति गाथार्थः ॥६६॥ व्याख्यात शुक्लध्यानमधि- कृत्याऽऽलम्बनद्वारम् । साम्प्रत क्रमद्वारावसर, क्रमश्चाऽऽद्ययोधर्मध्यान एवोक्त', इह पुनरय विशेषः-- तिहुयणविसयं कमसो संखिविउ मणो अणुंमि छउमत्थो । भायइ सुनिप्पकंपो झाणं अमणो जिणो होइ ॥७॥ त्रिभुवनम् अघस्तियंगूर्वलोकभेदम्, तद्विषय गोचर पालम्वन यस्य मनस इति योगः, तत्रिभुवन विषयम्, 'क्रमश.' क्रमेण परिपाटया प्रतिवस्तुपरित्यागलक्षणया, 'सक्षिप्य' सङ्कोच्य, किम् ? 'मन.' अन्तः- करणम्, क्व ? 'अणौ' परमाणी, निधायेति शेष , क ? 'छमस्थ' प्राग्निरूपितशब्दार्थ, 'ध्यायति' चिन्त- यति 'सुनिष्प्रकम्प' अतीव निश्चल इत्यर्थ , 'ध्यानम्' शुक्लम्, ततोऽपि प्रयत्नविशेषान्मनोऽपनीय 'अमनाः' अविद्यमानान्त करणः 'जिनो भवति' अर्हन् भवति, चरमयोयोतिति वाक्यशेषः, तत्राप्याद्यस्यान्त- शुक्लध्यान के फलद्वार मे किया जाने वाला है । इस प्रकार धर्मध्यान के समाप्त हो जाने पर अब शुक्ल- ध्यान अवसरप्राप्त है। उसकी प्ररूपणा मे भी वे ही भावना आदि (२८-२९) बारह द्वार हैं, जिनका कथन धर्मध्यान के प्रकरण में किया जा चुका है। उनमे भावना, देश, काल और प्रासनविशेष इन द्वारों में यहां धर्मध्यान से कुछ विशेषता नहीं है, अतः इनको छोड़कर आगे पालम्बन द्वार का निरूपण किया जाता है- क्रोध, मान, माया और लोभ के परित्याग स्वरूप जो कम से क्षान्ति (क्षमा), मार्दव, प्रार्जव और मुक्ति हैं वे जिनमत मे प्रधान होते हुए प्रकृत शुक्लध्यान के पालम्बन हैं । कारण यह कि इनके प्राश्रय से मुमुक्षु ध्याता उस शुक्लध्यान के ऊपर मारूढ़ होता है। उक्त क्रोधादि कषायों के परित्याग से अभिप्राय उनसे निवृत्त होने, उनके उदय के रोकने अथवा उदय को प्राप्त हुए उनके निष्फल करने का रहा है। जिनमत मे प्रधान उन्हें इसलिए कहा गया है कि मुक्ति का कारणभूत जो चारित्र है वह उक्त क्रोधादि कषायो के प्रभाव मे ही प्रादुर्भूत होता है ॥६६॥ अब शुक्लध्यान के अधिकार मे क्रमद्वार अवसरप्राप्त है। धर्मध्यान के प्रकरण मे जो क्रमद्वार का कथन किया गया है उसे आदि के दो शुक्लध्यानो के भी सम्बन्ध मे समझना चाहिए। विशेषता यहां यह है- छमस्थ ध्याता तीनो लोको के विषय करने वाले मन को क्रम से संकुचित करके परमाणु में स्थापित करता हुआ अतिशय स्थिरतापूर्वक शुक्लध्यान का चिन्तन करता है। तत्पश्चात् प्रयत्नविशेष द्वारा परमाणु से भी उसे हटाकर उस मन से रहित होता हुमा जिन-अरहन्त केवली-हो जाता है और तब अन्तिम दो शुक्लध्यानो का चिन्तन करता है। उनमे से जव शैलेशी अवस्था के प्राप्त होने में अन्तर्मुहूर्त मात्र शेष रहता है तब प्रथम का-सूक्ष्मक्रिया अप्रतिपाती शुक्लध्यान का-और तत्पश्चात् शैलेशी अवस्था मे द्वितीय का-ज्युपरतक्रिया अप्रतिपाती शुक्लध्यान का चिन्तन करता है ॥७॥ - - - -७४] शुक्लध्याने मनोयोगनिरोधः मुंहतेन शैलेशीमप्राप्तः, तस्यां च द्वितीयस्येति गाथार्थ ॥७०॥ आह-कथं पुनश्छद्मस्थस्त्रिभुवनविषयं मन सक्षिप्याणी धारयति, केवली वा ततोऽप्यपनयतीति ? अत्रोच्यते- जह सव्वसरीरगय मंतेण विसं निरु भए डके। तत्तो पुणोऽवणिज्जइ पहाणयरमंतजोगेण ॥७॥ 'यथा' इत्युदाहरणोपन्यासार्थ, 'सर्वशरीरगतम्' सर्वदेहध्यापकम्, 'मन्त्रण' विशिष्टवर्णानुपूर्वीलक्षणेन, 'विषम्' मारणात्मक द्रव्यम्, 'निरुध्यते' निश्चयेन ध्रियते, क्व ? 'डके' भक्षणदेशे, 'तत.' डकात्पुनरप- नीयते, केनेत्यत आह–'प्रधानतरमन्त्रयोगेन' श्रेष्ठतरमन्त्रयोगेनेत्यर्थः, मन्त्र-योगाभ्यामिति च पाठान्तर वा, मत्र पुनर्योगशब्देनागद. परिगृह्यते इति गाथार्थ ॥७१॥ एष दृष्टान्त', प्रयमर्थोपनय:- तह तिहुयण-तणुविसयं मणोविसं जोगमंतबलजुत्तो। परमाणुमि निरु भइ अवणेइ तमोवि जिण-वेज्जो ॥७२॥ तथा त्रिभुवन-तनुविषयम्' त्रिभुवन-शरीरालम्बनमित्यर्थ, मन एव भवमरणनिवन्धनत्वाद्विषम्, 'मन्त्र-योगवलयुक्तः जिनवचन-ध्यानसामर्थ्यसम्पन्न परमाणो निरुणद्धि, तथाऽचिन्त्यप्रयत्नाच्चापनयति 'ततो. ऽपि तस्मादपि परमाणो', कः ? 'जिन-वैद्यः' जिन-भिषग्वर इति गाथार्थ ॥७२॥ अस्मिन्नेवार्थे दृष्टान्तान्तर- मभिधातुकाम आह- उस्सारियधणभरो जह परिहाइ कमसो हुयासुन्न । थोविधणावसेसो निव्वाइ तोऽवणीयो य ॥७३॥ तह विसइधणहीणो मणोहुयासो कमेण तणुयंमि । विसइंधणे निरंभइ निव्वाइ तोऽवणीयो य ॥७४॥ 'उत्सारितेन्धनभर' अपनीतदाह्यसङ्घात. यथा 'परिहीयते' हानि प्रतिपद्यते 'क्रमश.' क्रमेण 'हुताशः' वह्निः, 'वा' विकल्पार्थ, स्तोकेन्धनावशेष. हुताशमात्र भवति, तथा निर्वाति' विध्यायति 'तत.' स्तोकेन्ध- नादपनीतश्चेति गाथार्थ ॥७३॥ अस्यैव दृष्टान्तोपनयमाह-तथा विषयेन्धनहीन' गोचरेन्धनरहित इत्यर्थ., मन एव दुख-दाहकारणत्वाद् हुताशो मनोहुताश , 'क्रमेण' परिपाट्या 'तनुके' कृशे, क्व ? 'विषये- धने' प्रणावित्यर्थः, किम् ? 'निरुध्यते' निश्चयेन ध्रियते, तथा निर्वाति तत' तस्मादणोरपनीतश्चेति गाथार्थः ।।७४॥ पुनरप्यस्मिन्नेवार्थे दृष्टान्तोपनयावाह- प्रागे छप्रस्थ तीनो लोको के विषय करने वाले उस मन को संकुचित करके कैसे परमाणु में स्थापित करता है तथा केवली उससे भी उसे कैसे हटाते हैं, इसे दृष्टान्त द्वारा स्पष्ट किया जाता है- जिस प्रकार समस्त शरीर मे व्याप्त विष को मंत्र के द्वारा डंक मे-काटने के स्थान मे-रोका जाता है और तत्पश्चात् अतिशय श्रेष्ठ मंत्र के द्वारा डंकस्थान से भी उसे हटा दिया जाता है, उसी प्रकार तीनों लोकरूप शरीर को विषय करने वाले मनरूप विष को ध्यानरूप मत्र के बल से युक्त ध्याता परमाणु मे रोकता है और तत्पश्चात् जिनरूप वैद्य उस परमाणु से भी उसे हटा देता है ॥७१-७२॥ इसी को आगे दूसरे दृष्टान्त द्वारा पुष्ट किया जाता है-- जिस प्रकार इंधन के समुदाय के हट जाने पर अग्नि क्रम से प्रल्प इंधन के शेष रह जाने तक उत्तरोत्तर हानि को प्राप्त होती है और तत्पश्चात् अल्प इंघन के भी समाप्त हो जाने पर वह बुझ जाती है उसी प्रकार विषयरूप ईंधन की हानि को प्राप्त हुई मनरूप अग्नि भी क्रम से उक्त विषयरूप इंघन के अल्प रह जाने पर परमाणु मे रुक जाती है और तत्पश्चात् उस विषयरूप इंधन के सर्वथा नष्ट हो जाने पर वह मनरूप अग्नि भी बुझ जाती है। अभिप्राय यह है कि मन का विषय यद्यपि असीमित है, फिर भी विषयाकांक्षा के उत्तरोत्तर हीन होने पर उस मन का विषय परमाणु मात्र रह जाता है, तथा अन्त में उक्त विषयाकांक्षा का सर्वथा प्रभाव हो जाने पर वह मन भी विषयातीत होकर नष्ट हो जाता है ॥७३-७४॥

४० , ध्यानशतकम् [७५- तोयमिव नालियाए तत्तायसभायणोदरत्थं वा। परिहाई कमेण जहा तह जोगिमणोजलं जाण ॥५॥ 'तोयमिव' उदकमिव 'नालिकाया.' घटिकायाः, तथा तप्त च तदायसभाजन लोहभाजनं च तप्तायः सभाजनम्, तदुदरस्थम्, वा विकल्पार्थ, परिहीयते क्रमेण यथा, एष दृष्टान्त , अयमर्थोपनयः-'तथा' तेनैव प्रकारेण योगिमन एवाविकलत्वाज्जल योगिमनोजल 'जानीहि अववुद्धयस्व, तथाप्रमादानलतप्तजीव-भाज- नस्थ मनोजल परिहीयत इति भावना, अलमतिविस्तरेणेति गाथार्थ. ॥७॥ 'अपनयति ततोऽपि जिनवंद्यः' इति वचनाद् एव तावत् केवली मनोयोग निरुणद्धीत्युक्तम्, अधुना शेषयोगनियोगविधिमभिधातुकाम माह- एवं चिय वयजोगं निरंभइ कमेण कायजोगपि । तो सेलेसोच थिरो सेलेसी केवली होइ ॥७॥ 'एवमेव' एभिरेव विषादिदृष्टान्त., किम् ? वाग्योग निरुणद्धि, तथा क्रमेण काययोगमपि निरुण- दीति वर्तते, तत. 'शैलेश इव' मेरुरिव स्थिर. सन् शैलेशी केवली भवतीति गाथार्थः ।।७६॥ इह च भावार्थों नमस्कारनियुक्ती प्रतिपादित एव, तथाऽपि स्थानाशून्यायं स एव लेशतः प्रतिपाद्यते तत्र योगानामिदं स्व- रूपम्-औदारिकादिशरीरयुक्तस्याऽत्मनो वीर्यपरिणतिविशेष. काययोगः, तथौदारिक-वैक्रियाहारकशरीर- व्यापाराहृतवाग्द्रव्यसमूहसाचिव्याज्जीवव्यापारो वाग्योग', तथौदारिक-वैक्रियाहारकशरीरव्यापाराहृतमनो- द्रव्यसाचिव्याज्जीवव्यापारो मनोयोग इति । स चामीषा निरोधं कुर्वन् कालतोऽन्तर्मुहूर्तभाविनि परमपदे भवोपग्राहिकर्मसु च वेदनीयादिषु समुद्घाततो निसर्गेण वा समस्थितिषु सत्स्वेतस्मिन् काले करोति, परि- भाणतोऽपि-पज्जत्तमित्तसन्निस्स जत्तियाइ जहण्णजोगिस्स । होति मणोदव्वाइं तव्वावारो य जम्मत्तो ॥१॥ उसे पुष्ट करने के लिए और भी उदाहरण दिया जा रहा है- जिस प्रकार नालिका (क्षुद्र घट) का जल अथवा तपे हुए लोहपात्र के मध्य में स्थित जल क्रम से क्षीण होता जाता है उसी प्रकार योगी के मनरूप जल को जानना चाहिए । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार मिट्टी के पात्र मे स्थित जल क्रम से उत्तरोत्तर चूता रहता है, अथवा अग्नि से सन्तप्त लोहे के पात्र में स्थित जल क्रम से जलकर क्षीण होता जाता है उसी प्रकार अग्नि के समान सन्तप्त करने वाले प्रमाद के उत्तरोत्तर हीन होते जाने से योगी का मन उत्तरोत्तर इन्द्रियविषय की ओर से विमुख होता हुआ फेवली अवस्था में सर्वथा क्षय को प्राप्त हो जाता है ॥७॥ अब शेष वचनयोग और काययोग के निरोधक्रम को भी दिखलाया जाता है- इसी प्रकार से-मनयोग के समान-वह (केवलो) क्रम से वचनयोग और काययोग का भी निरोध करता है। तत्पश्चात् वह शैलेश-पर्वतों के अधिपति मेरु-के समान स्थिर होकर शैलेशी केवली हो जाता है । विवेचन-केवली जिन मनयोग आदि का निरोध करते हैं उनका स्वरूप इस प्रकार है- औदारिक प्रादि शरीरों से युक्त प्रात्मा के वीर्य का जो विशेष परिणमन होता है उसका नाम काययोग है। प्रौदारिक, वैक्रियिक और आहारक शरीर के व्यापार से जिस वचनद्रव्य के समूह (वचनवर्गणा) का आगमन होता है उसकी सहायता से होने वाले जीव के व्यापार को वचनयोग कहा जाता है। इन्हीं तीनो शरीरो के व्यापार से ग्रहण किये गये मनद्रव्य (मनोवर्गणा) की सहायता से जो जीव का व्यापार होता है वह मनयोग कहलाता है। मोक्षपद की प्राप्ति में जब अन्तर्मुहूर्त मात्र काल शेष रह जाता है तब संसार के कारणभूत वेदनीय आदि अधातिया कर्मों की स्थिति के समुद्घात के द्वारा अथवा स्वभाव से ही समान हो जाने पर केवली उक्त योगों का निरोध किया करते हैं। जघन्य योग वाले पर्याप्त मात्र संजी जीवके जितने मनद्रव्य होते हैं और जितना उनका व्यापार होता है उनके असंख्यातगुणे हीन का प्रत्येक समय में निरोध करते हुए केवली असख्यात समयो में समस्त मनयोग का निरोध कर देते हैं । तत्पश्चात् , ~ -७६] शुक्लध्याने वचन-कायनिरोध तदसङ्खगुणविहीणे समए समए निरु भमाणो सो। मणसो सव्वनिरोह कुणइ असखेज्जसमएहिं ॥२॥ पज्जत्तमित्तबिंदियजहण्णवइजोगपज्जया जे उ। तदसखगुणविहीणे समए समए निरु भतो ॥३॥ सव्ववइ. जोगरोह संखाईएहिं कुणइ समएहिं । तत्तो य सुहुमपणगस्स पढमसमग्रोववन्नस्स ॥४॥ जो किर जहण्ण- जोपो तदसखेज्जगुणहीणमेक्केक्के । समए निरु भमाणो देहतिभाग च मुचतो ॥५॥ रु भइ स कायजोग संखाईएहिं चेव समएहिं । तो कयजोगनिरोहो सेलेसीभावणामेइ ॥६॥ सेलेसो किर मेरू सेलेसी होइ जा तहाञ्चलया। होउ च असेलेसो सेलेसी होइ थिरयाए ॥७॥ अहवा सेलुव्व इसी सेलेसी होइ सो उ थिर- याए । सेव प्रलेसीहोई सेलेसीहो अलोवाओ॥८॥ सील व समाहाण निच्छयो सव्वसवरो सो य। तस्सेसो सीलेसो सीलेसी होइ तयवत्यो ॥६॥ हस्सक्खराइ मझेण जेण कालेण पंच भण्णति । अच्छइ सेलेसिंगो सत्तियमेत्त तो काल ॥१०॥ तणुरोहारंभानो झायइ सुहुमकिरियाणियट्टि सो। वोच्छिन्नकिरियमप्पडिवाई सेलेसिकालमि ॥११॥ तयस खेज्जगुणाए गुणसेढीएँ रइय पुरा कम । समए समए खवय कमसो सेलेसिका लेण ॥१२॥ सव्व खवेइ त पुण निल्लेव किंचि दुचरिमे समए। किंचिच्च होति चरमे सेलेसीए तय पर्याप्त मात्र दो इन्द्रिय जीव के जघन्य वचनयोग की जितनी अवस्थायें हैं उनके असंख्यातगुणे हीन वचन- योग की अवस्थाम्रो का वे प्रत्येक समय मे निरोध करते हुए असख्यात समय मे समस्त वचनयोग का निरोध कर देते हैं । इस प्रकार वचनयोग का भी निरोध हो जाने पर वे सूक्ष्म पर्याप्तक जीव का उत्पन्न होने के प्रथम समय में जितना जघन्य योग होता है उससे असख्यातगुणे हीन का प्रत्येक समय मे निरोध करते हैं और शरीर के तृतीय भाग को छोड़ते हुए असख्यात समयो मे काययोग का भी 'निरोध कर देते हैं। इस प्रकार काययोग का निरोध कर चुकने पर वे शैलेशी भावना को प्राप्त होते हैं। शैलेश नाम मेरु पर्वत का है, उस मेरु के समान जो स्थिरता प्राप्त होती है उसे शैलेशी कहा जाता है। पूर्व मे शैलेश न होकर पश्चात् स्थिरता के प्राश्रय से शैलेश हो जाना, यह शैली का अभिप्राय है। 'सेलेसी' यह शब्द प्राकृत का है । इसका सस्कृत रूपान्तर जैसे 'शलेशी' होता है वैसे ही 'शैलर्षि' भी होता है, उसका पर्थ होता है शैल के समान स्थिर ऋषि, ऐसे ऋषि केवली ही होते हैं । अथवा 'स एव प्रलेसी सेलेसी' इस निरुक्ति के अनुसार उसका अभिप्राय लेश्या से रहित केवली ही होता है। अथवा प्रकारान्तर से सर्वसंवररूप शीत का जो ईश (स्वामी) है उसे शीलेश कहा जाता । वे केवली जिन ही होते हैं, जो पूर्व मे शीलेश नहीं थे वे उस केवली अवस्था में शीलेश हो जाते हैं, अतः उन्हें प्रशीलेश से शैलेशी कहा जाता है। इस प्रकार योगनिरोध करके शैलेशी अवस्था को प्राप्त हुए केवली, जिस मध्यम काल से अ, इ, उ, ऋ और लु इन पांच ह्रस्व अक्षरों का उच्चारण होता है उतने काल उस शैलेशी अवस्था में स्थित रहते हैं। यही अयोगफेवली का काल है। केवली कायनिरोध के प्रारम्भ से सूक्ष्मक्रियानिति शक्लध्यान का चिन्तन करते हैं और तत्पपश्चात् उक्त शैलेशी अवस्था में वे सूक्ष्मक्रिय अप्रतिपाति शुक्लध्यान का चिन्तन करते हैं। इस शैलेशीकाल में केवली असख्यातगुणित गुणश्रेणी रूप से रचे गये पूर्वसंचित कर्म का प्रत्येक समय मे क्षय करते हुए सब का क्षय कर देते हैं। उनमे कुछ कर्म का निर्लेप क्षय वे शैलेशीकाल के द्विचरम समय मे और कुछ का उसके अन्तिम समय मे क्षय करते हैं । उनमें से चरम समय में जिन कर्मप्रकृतियों का क्षय किया जाता है वे ये हैं -मनुष्यगति, पचेन्द्रिय जाति, स, बादर, १. तदो अतोनुहुत्त सेलेसि पडिबज्जदि । ततोऽन्तर्मुहूर्तमयोगिकेवलो भूत्वा शैलेश्यमेष भगवानलेश्य- भावेन प्रतिपद्यते इति सूत्रार्थ । कि पुनरिद शैलेश्य नाम ? शीलानामीशः शैलेश , तश्य भाव शैलेश्य सकलगुण-शीलानामैकाधिपत्यप्रतिलम्भनमित्यर्थ । जयघ अ प. १२४६ (घव. पु १०, पृ. , ३२६ का टि १) २. शीलेश सर्वसवररूपचरणप्रभुस्तस्येयमवस्था । शैलेशो वा मेरुस्तस्येव याऽवस्था स्थिरतासाधात् सा शैलेशी । सा च सर्वथा योगनिरोधे पचह्नस्वाक्षरोच्चारकालमाना। व्याख्याप्रज्ञप्ति अभय. वृ १,८, ७२ (घव. पु. ६, पृ. ४१७ का टि. १) - .

- ? ४२ ध्यानशतकम् [७७- वोच्छ ॥१३॥ मणुयगइ-जाइ-तस-बादर च पज्जत्त-सुभगमाएज्ज । अन्नयरवेयणिज्ज नराउमुच्च जसो नाम ॥१४॥ सभवनो जिणणाम नराणुपुन्वी य चरिमसमयमि । सेसा जिणसतानो दुचरिमसमयमि निट्ठति ॥१॥ ओरालियाहिं सव्वाहिं चयइ विप्पजहणाहिं ज भणिय । निस्सेस तहा न जहा देसच्चाएण सो पुव्व ॥१६॥ तस्सोदइयाभावा भवत्त च विणियत्तए समय । सम्मत्त-णाण-दसण-सुह-सिद्धत्ताणि मोत्तूण ॥१७॥ उजुसेढिं पडिवन्नो समयपएसतर अफुसमाणो । एगसमएण सिज्झइ अह सागारोवउत्तो सो ॥१८॥ अलमतिप्रसङ्गेनेति गाथार्थ ॥७६॥ उक्त क्रमद्वारम्, इदानी ध्यातव्यद्वार विवृण्वन्नाह- उप्पाय-ट्टिइ-भंगाइपज्जयाणं जमेगवत्थुमि । नाणानयाणुसरणं पुन्वगयसुयाणुसारेणं ॥७७॥ सवियारमत्थ-वंजण-जोगतरो तयं पढमसुक्कं । होइ पुहुत्तवितक्क सवियारमरागभावस्स ॥७॥ 'उत्पाद-स्थिति-भङ्गादिपर्यायाणाम्' उत्पादादय प्रतीता, आदिशब्दान्मूर्तामूर्तग्रह., अमीषा पर्या- याणा यदेकस्मिन् द्रव्ये अण्वात्मादौ, किम् ? नानानय द्रव्यास्तिकादिभिरनुस्मरण चिन्तनम्, कथम् ? पूर्वगतश्रुतानुसारेण पूर्वविद, मरुदेव्यादीना त्वन्यथा ॥७७॥ तत्किमित्याह-'सविचारम्' सह विचारेण वर्तत इति सविचारम्, विचार अर्थ-व्यञ्जन-योगसक्रम इति, आह च-'अर्थ-व्यञ्जन-योगान्तरत' अर्थः द्रव्यम्, व्यञ्जन शब्द , योग मन प्रभृति, एतदन्तरत. एतावद्भेदेन सविचारम्, अर्थाद् व्यञ्जनं सक्रा- मतीति विभाषा, 'तकम्' एतत् प्रथम शुक्लम्' आद्यशुक्ल भवति, किंनामेत्यत आह-पृथक्त्ववितकं सवि. चारम्' पृथक्त्वेन भेदेन, विस्तीर्णभावेनान्ये, वितर्क श्रुत यस्मिन् तत्तथा, कस्येद भवतीत्यत आह- पर्याप्त, सुभग, प्रादेय, साता-असाता मे से कोई एक वेदनीय, मनुष्याय, उच्चगोत्र, यशःकोति, यदि तीर्थकर नामकर्म सम्भव है तो वह और मनुष्यगत्यानुपूर्वी। शेष जिन कर्मप्रकृतियों का सत्त्व केवली के होता है उन्हें वे द्विचरम समय मे क्षीण करते हैं। उस समय केवली के सम्यक्त्व, ज्ञान, दर्शन, सुख और सिद्धत्व को छोड़कर श्रीदयिक भावो के साथ भव्यत्व भी नष्ट हो जाता है । तब केवली ऋजुश्रेणि (ऋज- गति) को प्राप्त होकर समय के प्रदेशान्तर का स्पर्श न करते हुए साकार उपयोग के साथ एक समय मे सिद्ध हो जाते हैं-मोक्षपद को प्राप्त कर लेते हैं ॥७६।। इस प्रकार क्रम द्वार को समाप्त करके अब ध्यातव्य द्वार का वर्णन करते हैं- एक वस्तु में उत्पाद, स्थिति (ध्रौव्य) और भग (व्यय) प्रादि अवस्थानो का द्रव्याथिक व पर्यायाथिक आदि अनेक नयो के प्राश्रय से जो पूर्वगत श्रुत के अनुसार चिन्तन होता है वह प्रथम शुक्ल- ध्यान माना गया है। वह अर्थान्तर, व्यंजनान्तर और योगान्तर को अपेक्षा सविचार है। पृथक्त्ववितर्क सविचार नाम का यह प्रथम शुक्लध्यान रागभाव से रहित-वीतराग छद्मस्थ के होता है । विवेचन-चार प्रकार के शुक्लध्यान मे प्रथम पृथक्त्ववितर्क सविचार ध्यान है। पृथक्त्व का अर्थ भेद या विस्तार और वितर्क का अर्थ श्रुत है। तदनुसार यह अभिप्राय हुआ कि जिस ध्यान में श्रुत के सामर्थ्य से द्रव्य की उत्पादादि अवस्थाओं का भेदपूर्वक चिन्तन होता है उसे पृथक्त्ववितर्क जानना चाहिए । इस ध्यान मे अर्थ से अर्थान्तर, व्यंजन से व्यजनान्तर और विवक्षित योग से योगान्तर मे संक्र- मण (परिवर्तन) होता रहता है। इसी से इसे सविचार कहा गया है। कारण यह है कि अर्थ, व्यजन और योग के संक्रमण का नाम ही विचार है; उस विचार से सहित होने के कारण उसे सविचार कहना सार्थक है। अर्थ शब्द से यहाँ ध्यान के विषयभूत द्रव्य व पर्याय को ग्रहण किया नया है। इस ध्यान का ध्याता कभी द्रव्य का चिन्तन करता है तो कभी उसको छोड़कर पर्याय का चिन्तन करता है, तत्प- श्चात् पुनः द्रव्य का चिन्तन करता है। इस प्रकार इसमे अर्थ का संक्रमण होता रहता है। व्यजन का अर्थ शब्द है । इस ध्यान का ध्याता कभी एक श्रुतवचन का चिन्तन करता है तो कभी उसको छोड अन्य श्रुतवचन का चिन्तन करता है, इस प्रकार व्यजन का भी संक्रमण होता है। इसी प्रकार तीनो योगो के बीच भी उसमे संक्रमण होता रहता है। पूर्वगत श्रुत के पारगामी श्रुतकेवली ही इस ध्यान के अधि- - -८१] एकत्ववितर्काविचारध्यानस्वरूपम् ४३ 'अरागभावस्य' रागपरिणामरहितस्येति गाथार्थ ॥७॥ जं पुण सुणिप्पकंपं निवायसरणप्पईवमिव चित्तं । उप्पाय-ठिइ-भंगाइयाणमेगंमि पज्जाए ॥७९॥ अवियारमत्थ-वंजण-जोगंतरओ तयं बितियसुक्कं । पुत्वगयसुयालंबणमेगत्तवितक्कमवियारं ॥५०॥ यत्पुन 'सुनिष्प्रकम्पम्' विक्षेपरहित 'निवातशरणप्रदीप इव' निर्गतवातगृहैकदेशस्थदीप इव 'चित्तम्' अन्त करणम्, क्व ? उत्पाद-स्थिति-भङ्गादीनामेकस्मिन् पर्याये ॥७९॥ तत' किमत पाह- आह-अविचारम् असक्रमम्, कुत ? अर्थ- व्यञ्जन-योगान्तरत इति पूर्ववत्, तमेवविध द्वितीय शुक्ल भवति, किममिघा- नमित्यत आह–'एकत्ववितर्कमविचारम्' एकत्वेन अभेदेन, वितर्क व्यञ्जनरूपोऽर्थरूपो वा यस्य तत्तथा, इदमपि च पूर्वगतश्रुतानुसारेणैव भवति, अविचारादि पूर्ववदिति गाथार्थ ॥५०॥ निव्वाणगमणकाले केवलिणो दरनिरुद्धजोगस्स। सुहुमकिरियाऽनिर्याट्ट तइयं तणुकायकिरियस्स ॥१॥ कारी होते हैं ॥७७-७८॥ अब आगे ध्यातव्य के इस प्रकरण में द्वितीय शुक्लध्यान का निर्देश किया जाता है- वायु से रहित घर के दीपक के समान जो चित्त (अन्तःकरण) उत्पाद, स्थिति और भंग इनमे से किसी एक ही पर्याय मे अतिशय स्थिर होता है वह एकत्ववितर्क अविचार नाम का दूसरा शुक्ल- ध्यान है । वह अर्थान्तर, व्यंजनान्तर और योगान्तर के सक्रमण से रहित होने के कारण अविचार होकर पूर्वगत श्रुत का प्राश्रय लेनेवाला है ।। विवेचन-जिस प्रकार घरके भीतर स्थित दीपक वायु के अभाव मे कम्पन से सर्वथा रहित होता हुमा स्थिर रूप मे जलता है-उसकी लो इधर उधर नहीं घूमती है, उसी प्रकार ध्यान की अस्थिरता के कारणभूत राग, द्वेष व मोह के न रहने से एकत्ववितर्क अविचार शुक्लध्यान स्थिर रहता है। पूर्वोक्त पृथक्त्ववितर्क सविचार ध्यान मे जहा उत्पाद, स्थिति और भग इन अवस्थाम्रो का भेदपूर्वक परिवर्तित रूप मे चिन्तन होता था वहाँ इस ध्यान मे उनका चिन्तन भेद को लिये हुए परिवर्तित रूप में नहीं होता, किन्तु उक्त तीनो अवस्थामो मे से यहां किसी एक ही अवस्था का भेद के विना चिन्तन होता है। इसी प्रकार पृथक्त्ववितर्क शुक्लध्यान मे अर्थ, व्यजन और योग का परस्पर संक्रमण होता था, अर्थात् उस ध्यान का ध्याता अर्थ का विचार करता हुआ उसे छोड़कर व्यजन (शब्द) का विचार करने लगता था, पश्चात् उस व्यंजन को भी छोडकर योग का अथवा पुनः अर्थ का चिन्तन करता था । अथवा ध्येयस्वरूप अर्थ द्रव्य या पर्याय है, उक्त ध्याता कभी द्रव्य का चिन्तन करता है तो कभी उसे छोडकर पर्याय का चिन्तन करता है, तत्पश्चात् पुनः द्रव्य का चिन्तन करता है, यह अर्थसंक्रमण हुआ। व्यजन का अर्थ वचन–श्रुतवचन है, उक्त ध्याता एक श्रुतवचन का ध्यान करता हुआ उसे छोड़कर अन्य का ध्यान करता है, उसको भी छोड अन्य का ध्यान करता है, इस प्रकार उक्त ध्यान मे व्यजन का सक्रमण चालू रहता है। उसी प्रकार योग का भी सक्रमण उसमे हुमा करता है-वह कभी काययोग को छोड. कर अन्य योग को ग्रहण करता है तो फिर उसे भी छोडकर पुनः काययोग को ग्रहण करता है । अर्थ, व्यजन और योग का इस प्रकार का संक्रमण प्रकृत एकत्ववितर्क शुक्लध्यान में नहीं रहता, इसीलिए उसे अविचार कहा गया है। पूर्वगत श्रुत का पालम्बन उन दोनो ही शुक्लध्यानो मे समान रूप से विद्य- मान रहता है ॥७६-८०॥ आगे क्रमप्राप्त तृतीय शुक्लध्यान के विषय का निर्देश किया जाता है- मुक्ति गमन के समय कुछ योगनिरोध कर चुकने वाले सूक्ष्म काय की क्रिया से सयुक्त केवली के सूक्ष्मक्रिय अनिवति नाम का तीसरा शुक्लध्यान होता है । - ४४ ध्यानशतकम् [८२- 'निर्वाणगमनकाले' मोक्षगमनप्रत्यासन्नसमये 'केवलिन.' सर्वज्ञस्य मनो-वाग्योगद्वये निरुद्ध सति अर्द्धनिरुद्धकाययोगस्स, किम् ? 'सूक्ष्मक्रियाऽनिवति' सूक्ष्मा क्रिया यस्व तत्तथा, सूक्ष्मक्रिय च तदनिति चेति नाम, निवर्तितु शीलमस्येति निवति, प्रवर्द्धमानतरपरिणामात् न निवर्ति अनिवति तृतीयम्, ध्यान- मिति गम्यते, 'तनुकायत्रियस्य' इति तन्वी उच्छ्वास-नि श्वासादिलक्षणा कायक्रिया यस्य स तथाविधस्त- स्येति गाथार्थ ॥८॥ तस्सेव य सेलेसीगयस्त सेलोव्व णिप्पकंपस्स। । वोच्छिन्नकिरियमप्पडिवाइज्माण परमसुक्कं ॥१२॥ 'तस्यैव च' केवलिन , 'शैलेशीगतस्य' शैलेशी प्रावणिता, ता प्राप्तस्य, किविशिष्टस्य निरुद्ध- योगत्वात् 'शैलेश इव निष्प्रकम्पस्य' मेरोरिव स्थिरस्येत्यर्थ , किम् ? व्यवच्छिन्नक्रिय योगाभावात्, वत् विवेचन-पूर्वप्ररूपित एकत्ववितर्क अविचार नामक द्वितीय शुक्लध्यान के द्वारा ज्ञानावरणादि चार घातिया कर्मों के विनष्ट हो जाने पर जीव सर्वज्ञ व सर्वदशी हो जाता है, तब वह फेवली कहलाता है। केवली तीर्थकर भी होते हैं व सामान्य भी होते हैं। वे अधिक से अधिक कुछ कम (आठ वर्ष व अन्तर्मुहूर्त कम) एक पूर्वकोटि काल तक इस जीवनमुक्त अवस्था में रह सकते हैं। उनकी आयु जब अन्त- मुहूर्त मात्र शेष रह जाती है तब यदि वेदनीय, नाम और गोत्र इन तीन प्रघातिया कर्मों की स्थिति प्रायु- कर्म की स्थिति के बराबर रहती है तो वे उस समय मन व वचन योगों का पूर्णरूप से निरोध करके वादर काययोग का भी निरोध कर देते हैं और सूक्ष्म-उच्छ्वास-नि:श्वासरूप--काययोग का आलम्बन लेकर प्रकृत सूक्ष्म क्रिय-अनिवति शुक्लध्यान पर पारूढ़ होते हैं। यह ध्यान तीनों कालों के विषयभूत अनन्त पदार्थों के प्रकाशक केवलज्ञानस्वरूप है। 'एकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानम्' इस सूत्र में नो 'चिन्ता' शब्द है वह ध्यानसामान्य का वाचक है। इस प्रकार जैसे कहीं पर भुतज्ञान को ध्यान कहा जाता है वैसे ही केवलज्ञान को भी ध्यान समझना चाहिए। सूक्ष्म काययोग मे स्थित रहते हुए चूंकि इस ध्यान की प्रवृत्ति होती है, इसीलिए उसे सूक्ष्मक्रिय कहा गया है । सूक्ष्म काययोग में वर्तमान केवली इस ध्यान के आश्रय से उस सूक्ष्म काययोग का भी निरोध किया करते हैं । तत्पश्चात् वे अन्तिम व्युपरत. त्रिय-अप्रतिपाति शुक्लध्यान के उन्मुख होते हैं। परन्तु यदि पूर्वोक्त प्रकार से उनके वेदनीय आदि की स्थिति आयु कर्म की स्थिति के समान न होकर उससे अधिक होती है तो वे उसे प्रायु कर्म की स्थिति के समान करने के लिए चार समयों मे क्रम से दण्ड, कपाट, प्रतर और लोकपूरण समुद्घात करते हैं । तत्पश्चात् चार समयो मे उक्त समुद्घातो मे फैले हुए प्रात्मप्रदेशो को कम से प्रतर, कपाट और दण्ड के रूप मे संकुचित करके शरीरस्थ करते हैं। इस प्रकार ध्यान के बल से लोकपूरण समुद्घात में वेद- नीय, नाम और गोत्र कर्मों की स्थिति को प्रायु कर्म की स्थिति के समान करके सूक्ष्म काययोग में स्थित होते हुए वे सूक्ष्मक्रिय-अप्रतिपाति ध्यान के ध्याता होते हैं । प्रतिपतन या निवर्तन स्वभाव वाला न होने से इस ध्यान को अप्रतिपाति या अनिवर्ति कहा गया है ॥१॥ प्रागे उक्त केवली के होने वाले व्युपरतक्रिय-अप्रतिपाति परम शुक्लध्यान का निर्देश किया जाता है- शैल (पर्वत) के समान कम्पन-हलन चलन क्रिया-से रहित होकर शैलेशी अवस्था को प्राप्त हुए उक्त केवली के व्युच्छिन्नक्रिय अप्रतिपाति नाम का सर्वोत्कृष्ट शुक्लध्यान होता है ।। विवेचन-उक्त क्रम से जब तीनो योगों का पूर्णरूप से निरोध हो जाता है तब योग से रहित हुए वे केवली प्रयोगकेवली नामक चौदहवें गुणस्थान में प्रविष्ट होकर शैलेशी अवस्था (देखो पीछे गा. ७६) को प्राप्त होते हुए इस व्युच्छिन्नक्रिय-अप्रतिपाति नामक चौथे शुक्लध्यान के ध्याता होते हैं । इससे पूर्व जो श्वासोच्छ्वास के प्रचाररूप सूक्ष्म काय की क्रिया थी, उसके भी विनष्ट हो जाने से इसे व्यच्छिन्नक्रिय या दूसरे शब्द से व्युपरतक्रिय कहा गया है । साथ ही चूंकि सम्पूर्ण कर्म को निर्जरा करने - - -१५] केवलिनश्चित्ताभावेऽपि शुक्लध्यानसम्भावना ४५ 'अप्रतिपाति अनुपरतस्वभावमिति, एतदेव चास्य नाम, ध्यान परमशुक्लम्-प्रकटार्थमिति गाथार्थः ॥१२॥ ॥ इत्थ चतुर्विध ध्यानमभिधायाधुनैतत्प्रतिबद्धमेव वक्तव्यताशेषमभिधित्सुराह- पढम जोगे जोगेसु वा मयं नितियमेयजोगंसि । तइयं च कायजोगे सुक्कमजोगमि य चउत्थं ॥३॥ 'प्रथमम् पृथक्त्ववितर्कसविचारम् 'योगे' मनप्रादौ योगेषु वा सर्वेषु 'मतम्' इष्टम्, तच्चागमिक- श्रुतपाठिनः, "द्वितीयम्' एकत्ववितर्कमविचार तदेकयोग एव, अन्यतरस्मिन् सक्रमाभावात्, तृतीय च सूक्ष्मक्रियाऽनिवर्ति काययोगे, न योगान्तरे, शुक्लम् 'अयोगिनि च' शैलेशीकेवलिनि 'चतुर्थम्' व्युपरतक्रिया- प्रतिपातीति गाथार्थ ॥८३ आह शुक्लघ्यानोपरिमभेदद्वये मनो नास्त्येव, अमनस्कत्वात् केवलिन', ध्यान च मनोविशेष 'ध्ये चिन्तायाम्' इति पाठात्, तदेतत्कथम् ? उच्यते- जह छउमत्थस्स मणो झाणं भण्णइ सुनिच्चलो संतो। तह केवलिणो कामओ सुनिच्चलो भन्नए झाणं ॥४॥ यथा छद्मस्थस्य मन , किम् ? ध्यान भण्यते सुनिश्चलं सत्, 'तथा' तेनैव प्रकारेण योगत्वाव्य- भिचारात्केवलिन. काय. सुनिश्चलो भण्यते ध्यानमिति गाथार्थः ।।८४ा आह-चतुर्थे निरुद्धत्वादसावपि न भवति, तथाविधभावेऽपि च सर्वभावप्रसङ्ग, तत्र का वार्तेति ? उच्यते-- पुन्वप्पोगो चिय कम्मविणिज्जरणहेउतो यावि । सहत्थबहुत्तानो तह जिणचंदागमानो य ॥५॥ के विना उससे निवर्तन (लौटना) सम्भव नहीं है, इसीलिए उसे अनिवति भी कहा जाता है; अथवा उससे प्रतिपतन (गिरना) सम्भव न होने के कारण उसे दूसरे समानार्थक शब्द से अप्रतिपाति भी कहा जाता है। जिस प्रकार तीसरा सूश्मक्रिन-अनिवति ध्यान केवलज्ञानस्वरूप है उसी प्रकार यह भी केवल- भानस्वरूप है। विशेषता इतनी है कि जहां तीसरा सूक्ष्मकाययोग के परिणाम स्वरूप था वहां यह चौथा शुक्लध्यान योगरहित प्रात्मपरिणामस्वरूप है ॥२॥ आगे उक्त चार शुक्लध्यान योग की अपेक्षा किस अवस्था मे होते हैं, यह दिखलाते हैं- उक्त चार शुक्लध्यानो में प्रथम पृथक्त्ववितर्क सविचार ध्यान योग अथवा योगो मे होता है- वह मन आदि तीनों योगों में परिवर्तिरूप से होता है, द्वितीय एकत्ववितर्फ अविचार ध्यान तीनों योगों मे से किसी एक ही योग में अपरिवर्तितरूप से होता है। तीसरा सूक्ष्मक्रियमनिवति ध्यान एक काययोग में ही होता है, तथा चौथा व्युपरतक्रिय-अप्रतिपाति ध्यान योग का सर्वथा अभाव हो जाने पर प्रयोग अवस्था में ही होता है ॥३॥ यहां यह माशंका हो सकती थी कि केवली के जव मन का ही सद्भाव नहीं रहा तब उनके के दो ध्यान-सूक्ष्मक्रिय-अनिवति और ध्युपरतक्रिय-अप्रतिपाति-कैसे सम्भव हैं, क्योकि मनविशेष का नाम ही तो ध्यान है ? इसके समाधानस्वरूप प्रागे यह कहा जा रहा है- जिस प्रकार छद्मस्थ के अतिशय निश्चलता को प्राप्त हुए मन को ध्यान कहा जाता है, उसी प्रकार केवली के अतिशय निश्चलता को प्राप्त हुए शरीर को ध्यान कहा जाता है, क्योकि योग की अपेक्षा वे दोनों ही समान हैं ॥४॥ यहां पुनः यह शंका उपस्थित होती है कि प्रयोगकेवली के तो काययोग का भी निरोध हो चुका है, फिर उनके व्युपरतक्रिय-अप्रतिपाति नामक चौथे ध्यान के समय वह (काययोग) भी फैसे रह सकता है ? इसके समाधानस्वरूप आगे कहा जाता है- संसार में स्थित केवली के चित्त का प्रभाव हो जाने पर भी पूर्व प्रयोग की अपेक्षा, कर्मनिर्जरा का कारण होने से, शब्दार्य की बहुतता से और जिनप्रणीत सागम के आश्रय से सूक्ष्मकिय-अनिर्वात - --- ૪૬ ध्यानशतकम् [८६- चित्ताभावेवि सया सुहुमोवरयकिरियाइ भण्णंति । जीवोवोगसब्भावनो भवत्थस्स झाणाई॥८६॥ काययोगनिरोधिनो योगिनोऽयोगिनोऽपि चित्ताभावेऽपि सूक्ष्मोपरतक्रियो भण्यते, सूक्ष्मग्रहणात् सूक्ष्मक्रियाऽनिवतिनो ग्रहणम्, उपरतग्रहणाद् व्युपरतक्रियाप्रतिपातिन इति, पूर्वप्रयोगादिति हेतु , कुलाल- चक्रभ्रमणवदिति दृष्टान्तोऽभ्यूह्य , यथा चक्र भ्रमणनिमित्तदण्डादिक्रियाऽभावेऽपि भ्रमति तथाऽस्यापि मन प्रभृतियोगोपरमेऽपि जीवोपयोगसद्भावत भावमनसो भावात् भवस्थस्य ध्याने इति, अपिशब्दश्चोदना- निर्णयप्रथमहेतुसम्भावनाथ, चशब्दस्तु प्रस्तुतहेत्वनुकर्षणार्थ., एव शेषहेतवोऽप्यनया गाथया योजनीया, विशेषस्तूच्यते-'कर्मविनिर्जरणहेतुतश्चापि' कर्मविनिर्जरणहेतुत्वात् क्षपकश्रेणिवत्, भवति च क्षपकश्रेण्या- मिवास्य भवोपनाहिकर्मनिर्जरेति भाव , चशब्द प्रस्तुतहेत्वनुकर्षणार्थ , अपिशब्दस्तु द्वितीयहेतुसम्भावनार्थ इति, 'तथा शब्दार्थबहुत्वात्' यथैकस्यैव हरिशब्दस्य शक्र-शाखामृगादयोऽनेकार्था एव ध्यानशब्दस्यापि, न विरोध , 'ध्यै चिन्तायाम्, ध्ये कायनिरोधे, ध्यै अयोगित्वे' इत्यादि, तथा जिनचन्द्रागमाच्चैतदेवमिति, उक्त च-'आगमश्चोपपत्तिश्च सम्पूर्ण दृष्टिलक्षणम् । अतीन्द्रियाणामर्थाना सद्भावप्रतिपत्तये ॥१॥ इत्यादि गाथाद्वयार्थ ॥८५-८६॥ उक्त ध्यातव्यद्वारम्, ध्यातारस्तु धर्मध्यानाधिकार एवोक्ता , अधुनाऽनुप्रेक्षाद्वार- मुच्यते- सुक्कझाणसुभावियचित्तो चितेइ झाणविरमेऽवि । णिययमणुप्पेहाओ चत्तारि चरित्तसंपन्नो ॥७॥ शुक्लध्यानसुभावितचित्तश्चिन्तयति- ध्यानविरमेऽपि नियतमनुप्रेक्षाश्चतस्रश्चारित्रसम्पन्नः, तत्परि- णामरहितस्य तदभावादिति गायार्थ ॥७॥ ताश्चैता.- और न्युपरतक्रिय-अप्रतिपाति ध्यान कहे जाते हैं। कारण इसका यह है कि उनके जीवोपयोगरूप चित्त का सद्भाव पाया जाता है ।। विवेचन-अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार कुम्हार के चाक को एक बार लकड़ी से घुमा देने पर वह लकड़ी के अलग कर देने पर भी पूर्व प्रयोग की अपेक्षा कुछ समय तक स्वयं ही घूमता रहता है उसी प्रकार केवली के मनयोगादि का निरोध हो जाने पर भी पूर्वकालीन जीव के उपयोगरूप भाव. मन के बने रहने से सयोगकेवली के सूक्ष्मक्रिय-अनिवति शुक्लघ्यान (तीसरा) और प्रयोगकेवली के व्युपरतक्रिय अप्रतिपाति शुक्लध्यान (चौथा) सम्भव है। दूसरे, जिस प्रकार कर्मनिर्जरा का कारणभूत ध्यान क्षपकणि में विद्यमान रहता है उसी प्रकार चूकि वह कर्मनिर्जरा केवली के भी होती ही है, अतएव उस निर्जरा का कारणभूत ध्यान उनके भी होना ही चाहिए। तीसरे, एक शब्द के अनेक अर्थ हुआ करते हैं जैसे 'हरि' शब्द के इन्द्र और बन्दर आदि अनेक अर्थ । तदनुसार 'ध्यान' शब्द की प्रकृतिभूत 'ध्ये' धातु के भी चिन्ता, काययोगनिरोध और योगाभावरूप अनेक अर्थ होते हैं। इनमे से यहां चतुर्थ शुक्लध्यान मे-योगो के प्रभावरूप अर्थ को ग्रहण करना चाहिए । चौथा कारण यह है कि जो भी प्रतीन्द्रिय पदार्थ हैं उनके सद्भाव का परिज्ञान आगम और युक्ति से ही हुआ करता है, तदनुसार चूकि प्रयोगकेवली के चौथे शुक्लध्यान का उल्लेख पागम मे किया गया है, अतः चित्त के प्रभाव मे भी उनके उस ध्यान को स्वीकार करना चाहिए ॥८५-८६॥ इस प्रकार ध्यातव्य द्वार के समाप्त हो जाने पर अब क्रमप्राप्त ध्याता की प्ररूपणा की जानी चाहिए, पर चूंकि उसकी प्ररूपणा धर्मध्यान के प्रकरण (गा. ६४) मे, की जा चुकी है, अतएव उसकी पुनः प्ररूपणा न करके अब पागे अनुप्रेक्षा द्वार की प्ररूपणा की जाती है- जिसका चित्त शुक्लध्यान से सुसंस्कृत हो चुका है वह चारित्र से युक्त ध्याता ध्यान के समाप्त हो जाने पर भी सदा चार अनुप्रेक्षाओं का चिन्तन करता है ॥७॥ वे चार अनुप्रेक्षायें ये हैं- ४७ 4 - .. -८६]] शुक्लध्यानस्य लिङ्गानि पासवदारावाए तह संसारासुहाणुभावं च । भवसंताणमणन्तं वत्थूणं विपरिणामं च ॥८॥ आश्रवद्वाराणि मिथ्यात्वादीनि, तदपायान् दुःखलक्षणान्, तथा ससारानुभाव च 'धी ससारो' इत्यादि, भवसन्तानमनन्त भाविनं नारकाद्यपेक्षया, वस्तूना विपरिणामं च सचेतनाचेतनानाम् 'सव्वट्ठाणाणि असासयाणि' इत्यादि, एताश्चतस्रोऽप्यपायाशुभानन्त-विपरिणामानुप्रेक्षा आद्यद्वयभेदसङ्गता एव द्रष्टव्या इति गाथार्थ ॥८॥ उक्तमनुप्रेक्षाद्वारम्, इदानी लेश्याद्वाराभिषित्सयाऽह- सुक्काए लेसाए दो ततियं परमसुक्कलेस्साए। थिरयाजियसेलेसि लेसाईयं परमसुक्कं ॥६॥ पालवद्वारो से होने वाले अपाय, ससार को अशुभरूपता या दुःखरूपता का प्रभाव, जन्म-मरणरूप भवसन्तान की अनन्तता और चेतन-अचेतन वस्तुओ का विपरिणाम-विरुद्ध परिणाम (नश्वरता); ये वे चार अनुप्रेक्षायें हैं जिनका सदा चिन्तन किया जाता है । विवेचन -ध्यान का उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। ऐसी अवस्था मे उस ध्यान के समाप्त हो जाने पर ध्याता क्या करता है, इसे स्पष्ट करते हुए यहां कहा गया है कि वह ध्यान (शुक्लध्यान) के समाप्त होने पर इन चार अनुप्रेक्षामो का चिन्तन करता है-१ आस्रवद्वारापाय-कर्मागम के द्वार- भूत जो मिथ्यात्व व अविरति आदि हैं उनसे जीवों को नरकादि दुर्गतियो में पड़कर जो दुख भोगने पड़ते हैं उनका चिन्तन इस अनुप्रेक्षा मे किया जाता है। २ ससाराशुभानुभाव (या ससारासुखा- नुभाव)-संसार की अशुभरूपता स्पष्ट है । प्राणी एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर को ग्रहण करता है, फिर उसको भी छोड़कर अन्य शरीर को ग्रहण करता है, इस प्रकार अन्य अन्य शरीर के ग्रहण करने और छोडने का नाम ही ससार है जो नरकादि चतुर्गतिस्वरूप है। यदि परमार्थ दृष्टि से देखा जाय तो उन चारो गतियो मे से किसी में भी सुख नहीं है। कारण यह कि अभीष्ट विषयो के प्राप्त होने पर जो सुख का आभास होता है वह सर्वदा रहने वाला नहीं है--विनश्वर है। यद्यपि देवगति मे सुख की कल्पना की जाती है, पर वस्तुत. वहा भी सुख नहीं है। वहां पर भी अधिक ऋद्धि के धारक देवों को देखकर मन मे ईर्ष्याभाव व संक्लेश होता है। इसके अतिरिक्त वह देव अवस्था भी सदा रहने वाली नहीं है-आयु के समाप्त होने पर उसे भी छोडना पड़ता है। उस समय अधिक ब्याकृलता होती है । इतना अवश्य है कि जो सम्यग्दृष्टि होते हैं वे देवपर्याय से च्युत होते हुए संक्लेश को प्राप्त नहीं होते । इत्यादि प्रकार से इस दूसरी अनुप्रेक्षा मे ससार की अशुभता, असारता या दुःखरूपता का विचार किया जाता है। ३ भवसन्तान की अनन्तता-ससार परिभ्रमण के कारण मिथ्यात्व, राग, द्वेष एवं मोह आदि हैं । उनमे भी मिथ्यात्व प्रमुख है । जब तक इस जीव की दृष्टि मिथ्यात्व से कलुषित रहती है तब तक वह मिथ्यादृष्टि अपरीतससारी होता है-उसका ससार अनन्त बना रहता है । इसके विप- रोत जिसको दृष्टि मिथ्यात्वजनित कालुष्य को छोडकर समीचीनता को प्राप्त कर लेती है उस सम्यग्- दृष्टि का संसार परीत हो जाता है तब वह अनन्तससारी न रहकर अधिक से अधिक अर्धपुद्गल प्रमाण संसार वाला हो जाता है। प्रभव्य का ससार अनन्त ही रहता है। इस प्रकार का चिन्तन अनन्त भवसन्तान नामक इस तीसरी अनुप्रेक्षा मे क्यिा जाता है । ४ वस्तुविपरिणाम-ससार मे जो भी चेतन-अचेतन वस्तुयें हैं उनमे विविध प्रकार का परिणाम होता रहता है, स्थायी कोई भी वस्तु नहीं है । वस्तु का स्वभाव ऐसा ही है । इत्यादि विचार इस अनुप्रेक्षा मे चालू रहता है। ये चारो अनु- प्रेक्षायें प्रथम दो शुक्लध्यानो से ही सम्बद्ध हैं, अन्तिम दो शुक्लध्यानो से उनका सम्बन्ध नहीं है। इतना यहा विशेष समझना चाहिए ॥१८॥ अद क्रमप्राप्त लेश्या द्वार का वर्णन किया जाता है- प्रथम दो शुक्लध्यान शुक्ललेश्या में होते हैं, तीसरा सूक्ष्मक्रिय-अनिवति शुक्लध्यान परमशुक्ल- ४८ ध्यानशतकम् [80- - - सामान्येन शुक्लाया लेश्याया 'T' आये उक्तलक्षणे, 'तृतीयम्' उक्तलक्षणमेव, परमशुक्ललेश्यायाम्, 'स्थिरताजितशैलेशम् मेरोरपि निष्प्रकम्पतरमित्यर्थ., लेश्यातीत 'परमशुक्लम्' चतुर्थमिति गाथार्थः ॥१६॥ उक्त लेश्याद्वारम्, अधुना लिङ्गद्वार विवरीषुस्तेषा नाम-प्रमाण-स्वरूप-गुणभावनार्थमाह- अवहाऽसंमोह-विवेग-विउसग्गा तस्स हति लिंगाई। लिगिज्जइ जेहिं मुणी सुक्कज्माणोवगयचित्तो ॥१०॥ अवधाऽसम्मोह-विवेक-व्युत्सर्गा 'तस्य' शुक्लध्यानस्य भवन्ति लिङ्गानि, 'लिङ्गयते' गम्यते यमुनि शुक्लध्यानोपगतचित्त इति गाथाक्षरार्थ. ॥६०॥ अधुना भावार्थमाह- चालिज्जइ बीभेइ य धीरो न परीसहोवसग्गेहि । सुहुमेसु न संमुज्झइ भावेसु न देवमायासु ॥१॥ चाल्यते ध्यानात् न परीषहोपसर्गविभेति वा 'धीर' बुद्धिमान् स्थिरो वा न तेभ्य इत्यवधलिङ्गम्, 'सूक्ष्मेषु' अत्यन्तगहनेषु 'न सम्मुह्यते' न सम्मोहमुपगच्छति, 'भावेषु' पदार्थेषु, न देवमायासु अनेकरूपास्वि- त्यसम्मोहलिङ्गमिति गाथाक्षरार्थ ॥६॥ देहविवित्तं पेच्छइ अप्पाणं तह य सव्वसंजोगे। देहोवहिवोसग्गं निस्सगो सव्वहा कुणइ ॥२॥ देहविविक्त पश्यत्यात्मान तथा च सर्वसयोगानिति विवेकलिङ्गम्, देहोपधिव्युत्सर्ग निःसङ्गः सर्वथा करोति व्युत्सर्गलिङ्गमिति गाथार्थ ॥१२॥ गत लिङ्गद्वारम्, साम्प्रत फलद्वारमुच्यते, इह च लाघवार्थ प्रथ- मोपन्यस्त धर्मफलमभिधाय शुक्लध्यानफलमाह, धर्मफलानामेव शुद्धतराणामाद्यशुक्लद्वयफलत्वात्, अत आह- लेश्या में होता है, तथा स्थिरता से शैलेश (मेरु) को जीत लेने वाला-सुमेरु के समान अडिग- चौथा परमशुक्लध्यान लेश्या से अतीत (रहित) है ॥६॥ अब लिंग द्वार का वर्णन करते हुए उन लिंगो के नाम, प्रमाण, स्वरूप और गुण का विचार किया जाता है- अवध (अव्यथ ?), असम्मोह, विवेक और ब्युत्सर्ग ये उक्त शुक्लध्यान के लिंग-परिचायक हेतु हैं। इनके द्वारा जिस मुनि का चित्त उस शुक्लध्यान में संलग्न है उसका बोध होता है ॥१०॥ आगे उक्त चार लिगो में से प्रथमतः अवध और असम्मोह का स्वरूप कहा जाता है-- वह धीर-विद्वान् या स्थिर-शुक्लध्यानी परीषह और उपसर्गों के द्वारा न तो ध्यान से विचलित होता है और न भयभीत भी होता है, यह उस शुक्लध्यान के परिचायक प्रथम अवध लिंग का स्वरूप है । साथ ही वह सूक्ष्म-अतिशय गहन-पदार्थों के विषय में व अनेक प्रकार की देवनिर्मित माया के विषय मे मूढता को प्राप्त नहीं होता, इसे उसका ज्ञापक असम्मोह लिंग जानना चाहिए ॥१॥ अब आगे की गाथा मे विवेक और व्युत्सर्ग इन दो लिंगों का निर्देश किया जाता है- उक्त ध्याता मुनि प्रात्मा को शरीर से भिन्न देखता है तथा सब संयोगो को भी देखता है, अर्थात् वह ज्ञान-दर्शन स्वरूप चेतन प्रात्मा को जड़ शरीर से पृथक् देखता हुआ उस शरीर और उससे सम्बद्ध स्त्री-पुत्रादि व धन गृहादि के साथ उस सयोग सम्बन्ध का अनुभव करता है जो पृथग्भूत दो या अधिक पदार्थों में हुआ करता है । यही उक्त ध्यान का परिचायक विवेक लिंग है। इसके अतिरिक्त वह परिग्रह ममत्व बुद्धि-से रहित होकर शरीर और अन्य परिग्रह का सर्वथा परित्याग करता है-उनमें से किसी को भी अपना नहीं मानता, यह उक्त शुक्लध्यान का परिचायक व्युत्सर्ग लिंग है ॥२॥ इस प्रकार लिंग द्वार को समाप्त करके आगे क्रमप्राप्त फलद्वार का निरूपण करते हैं। उसमे लाधव की अपेक्षा करके पूर्वोक्त धर्मध्यान के फल का निर्देश करते हुए उसी को अपलध्यान का भी फल कहा जाता है, क्योकि धर्मध्यान के जो फल हैं वे ही अतिशय विशुद्धि को प्राप्त होते हुए प्रादि के दो शुक्लध्यानों के फल हैं- ४६ -९६] धर्म-शुक्लयोः फलाना निरूपणम् होति सुहासव-सवर-विणिज्जराऽमरसुहाइ विउलाई। झाणवरस्स फलाई सुहाणुबंधीणि धम्मस्स ॥९३॥ भवन्ति 'शुभाश्रव-सवर-निर्जराऽमरसुखानि' शुभाश्रव पुण्याश्रव , सवर' अशुभकर्मागमनिरोध , विनिर्जरा कर्मक्षय, अमरसुखानि देवसुखानि, एतानि च दीर्घस्थिति-विशुद्ध्युपपाताच्या 'विपुलानि' विस्ती- र्णानि, 'ध्यानवरस्य' ध्यानप्रधानस्य फलानि 'शुभानुवन्धीनि' सुकुलप्रत्यायातिपुनर्वाधिलाभ-भोगप्रव्रज्या- केवल शैलेश्यपवर्गानुवन्धीनि 'धर्मस्य' ध्यानस्येति गाथार्थ ॥३॥ उक्तानि धर्मफलानि, अधुना शुक्लमधिकृत्याह- ते य विसेसेण सुभासवादोऽणुत्तरामरसुहं च । दोण्ह सुक्काण फलं परिनिव्वाण परिल्लाण ॥१४॥ च विशेपेण 'शुभाश्रवादय' अनन्तरोदिता, अनुत्तरामरसुख च द्वयो शुवलयो फलमाद्ययो, 'परिनिर्वाणम्' मोक्षगमन 'परिल्लाण' ति चरमयोयोरिति गाथार्थ ॥६४॥ अथवा सामान्येनैव ससारप्रति- पक्षभूते एते इति दर्शयति- पासवदारा ससारहेयवो ज ण धम्म-सुक्के । ससारकारणाइ तो धुव धुव धम्म-सुक्काइ ॥६५॥ आश्रवद्वाराणि ससारहेतवो वर्तन्ते, तानि च यस्मान्न शुक्ल-धर्मयोर्भवन्ति ससारकारणानि तस्माद् 'ध्रुवम्' नियमेन धर्म शुक्ले इति गाथार्थ ॥६५॥ ससारप्रतिपक्षतया च मोक्षहेतुनिमित्यावेदयन्नाह- सवर-विणिज्जरानो मोक्खस्स पहो तवो पहो तासि । झाण च पहाणग तवस्स तो मोक्खहेऊय ॥६६॥ सवर निर्जरे 'मोक्षस्य पन्था' अपवर्गस्य मार्ग, तप 'पन्था' मार्ग, 'तयो' सवर-निर्जरयो , ध्यान च प्रधानाङ्ग तपस आन्तरकारणत्वात्, ततो मोक्षहेतुस्तद् ध्यानमिति गाथार्थ ॥६६अमुमेवार्थ सुखप्रति- पत्तये दृष्टान्त प्रतिपादयन्नाह - शुभास्रव-पुण्य कर्मों का प्रागमन, पापास्रव के निरोधस्वरूप सवर, संचित कर्मों की निर्जरा और देवसुख; ये दोघं स्थिति, विशुद्धि एव उपपात से विस्तार को प्राप्त होकर उत्तम कुल एव बोधि की प्राप्ति प्रादि रूप शुभ के अनुबन्धी-उसकी परम्परा के जनक-होते हुए उत्तम धर्मध्यान के फल हैं । अभिप्राय यह है कि धर्मध्यान से पुण्य कर्मों का बन्ध, पाप कर्मों का निरोध और पूर्वोपार्जित कर्म की निर्जरा होती है । ये सब उत्तरोत्तर विशुद्धि को प्राप्त होने वाले हैं। इसके अतिरिक्त उससे पर भव में देवगति की प्राप्ति होने वाली है, जहा प्रायु की दीर्घता व सांसारिक सुखोपभोग की बहुलता होती है । अन्त मे उक्त धर्मध्यान के प्रभाव से फेवलज्ञान को प्राप्त करके शैलेशी अवस्था को प्राप्त होते हुए मुमुक्षु ध्याता को मुक्तिसुख भी प्राप्त होने वाला है ॥३३॥ इस प्रकार धर्मध्यान के फलो का निर्देश करके प्रव शुक्लघ्यान को लक्ष्य करके यह कहा जाता है- विशेषरूप से धर्मध्यान के फलभूत वे ही शुभालव प्रादि तथा अनुपम देवसुख, यह प्रारम्भ के दो शुक्लघ्यानो का भी फल है। अन्तिम दो शुक्लध्यानों का फल मोक्ष की प्राप्ति है ॥१४॥ अथवा सामान्य से ही धर्म और शुक्ल ये दो ध्यान ससार के विरोधी हैं, इसे आगे दिखलाते हैं- जो मिथ्यात्वादि प्रास्रवद्वार ससार के कारण हैं, वे चूंकि धर्म और शुषल ध्यानो मे सम्भव नहीं हैं, इसीलिए धर्म और शुक्ल ध्यान नियमतः ससार के कारण नहीं हैं, किन्तु मुक्ति के कारण हैं ॥५॥ मागे यह दिखलाते हैं कि संसार का विरोधी होने से ही वह ध्यान मोक्ष का कारण है- संवर और निर्जरा ये मोक्ष के मार्ग (उपाय) हैं, उन सवर और निर्जरा का मार्ग तप है, तथा उस तप का प्रधान कारण ध्यान है। इसीलिए वह (ध्यान) परम्परा से मोक्ष का कारण है ॥६६॥ - - ५० - ध्यानशतकम् [६७- अंबर-लोह-महीणं कमसो जह मल-कलंक-पंकाणं । सोझावणयण-सोसे साहेति जलाऽणलाऽऽइच्चा ॥७॥ तह सोज्झाइसमत्था जीवंबर-लोह-मेइणिगयाणं । झाण-जलाऽणल-सूरा कम्म-मल-कलक-पंकाणं ॥९|| 'अम्बर-लोह-महीनाम्' वस्त्र-लोहाऽऽर्द्रक्षितीनाम् 'क्रमश' क्रमेण यथा मल कलङ्क-पड्वाना यथास- वच शोध्या-[ध्य-]पनयन-शोषान् यथासङ्खयमेव 'साधयन्ति' निवर्तयन्ति जलाऽनलाऽदित्या इति गाथार्थ ॥१७॥ तथा शोध्यादिसमर्था जीवाऽम्बर-लोह-मेदिनीगताना 'ध्यानमेव जलानल-सूर्या' कर्मैव मल- कलङ्क-पड्कास्तेषामिति गाथार्थ. ॥१८॥ किं च- तापो सोसो भेो जोगाणं झाणो जहा निययं । तह ताव-सोस-भेया कम्मस्स वि भाइणो नियमा॥६६॥ ताप शोषो भेदो योगाना 'ध्यानत' ध्यानात् यथा 'नियतम्' अवश्यम्, तत्र ताप. दु खम्, तत एव शोष. दौर्बल्यम्, तत एव भेद' विदारणम्, योगाना वागादीनम्, 'तथा' तेनैव प्रकारेण ताप-शोष-भेदा कर्म- णोऽपि भवन्ति, कस्य ? 'घ्यायिन.' न यदृच्छया नियमेनेति गाथार्थ ६६0 किं च- जह रोगासयसमणं विसोसण-विरेयणोसहविहीहि । तह कम्मामयसमणं झाणाणसणाइजोगेहिं ॥१०॥ यथा 'रोगाशयशमनम्' रोगनिदानचिकित्सा, "विसोषण-विरेचनौषधविधिभि' अभोजन-विरेको- (चौ-)षधप्रकार, तथा 'कर्मामयशमनम्' कर्म-रोगचिकित्सा ध्यानानशनादिभिर्योग, आदिशब्दाद् ध्यानवृद्धि- कारकशेषतपोभेदग्रहणमिति गाथार्थ ॥१००।। किं च- जह चिरसंचियमिधणमनलो पवणसहिरो दुयं दहइ । तह कम्मेधणममियं खणेण झाणाणलो डहइ ॥१०१॥ यथा 'चिरसञ्चितम्' प्रभूतकालसञ्चितम् 'इन्धनम्' काष्ठादि 'अनल' अग्नि 'पवनसहित' वायु- समन्वित. 'द्रुतम्' शीघ्र च 'दहति' भस्मीकरोति, तथा दुख-तापहेतुत्वात् कर्मवेन्धनम् कर्मेन्धनम् 'अमितम्' अनेकभवोपात्तमनन्तम्, 'क्षणेन' समयेन ध्यानमनल इव ध्यानानल असौ 'दहति' भस्मीकरोतीति गाथार्थ ॥१०॥ इसको आगे अनेक दृष्टान्तो के द्वारा स्पष्ट किया जाता है- जिस प्रकार जल वस्त्रगत मैल को धोकर उसे स्वच्छ कर देता है उसी प्रकार ध्यान जीव से सलग्न कर्मरूप मैल को धोकर उसे शुद्ध कर देने वाला है, जिस प्रकार अग्नि लोहे के कलक (नग आदि) को दूर कर देती है उसी प्रकार ध्यान जीव से सम्बद्ध कर्मरूप कलक को पृथक् कर देने वाला है, तथा जिस प्रकार सूर्य पृथिवी के कीचड़ को सुखा देता है उसी प्रकार ध्यान जीव से संलग्न कर्मरूप कीचड़ को सुखा देने वाला है ॥६७-६८॥ इसके अतिरिक्त- ध्यान से जिस प्रकार वचनादि योगों का नियम से ताप (दुख), शोषण (दुर्वलता) और भेद (विदारण) होता है उसी प्रकार उस ध्यानसे ध्याता के कर्म का भी नियम से ताप, शोषण और भेद हुमा करता है | और भी- जिस प्रकार रोग को सुखा देने वाली (लधन) अथवा रेचक-रोग के कारणभूत मल को बाहिर निकाल देने वाली-औषधियो के प्रयोग से उस रोग को शान्त कर दिया जाता है उसी प्रकार ध्यान और उपवास आदि के विधान से कर्मरूप रोग को शान्त कर दिया जाता है ॥१०॥ और भी- जिस प्रकार वायु से सहित अग्नि दीर्घ काल से सचित इंधन को शीघ्र जला देती है उसी प्रकार ध्यानरूप अग्नि अपरिमित-अनेक पूर्व भवो मे सचित-कर्मरूप ईंधन को क्षण भर मे भस्म कर देती है ।।१०१॥ अथवा- ' -१०५] ध्यानस्य ऐहिकफल निरूपणम् ५१ जह वा घणसंघाया खणेण पवणाहया विलिज्जति । झाण-पवणावहूया तह कम्म-घणा विलिज्जति ॥१०२।। यथा वा 'धनसवाता' मेघौघा क्षणेन 'पवनाहताः' वायुप्रेरिता विलय विनाश यान्ति गच्छन्ति, 'ध्यान-पवनावधूता' ध्यान-वायुविक्षिप्ता तथा कर्मव जीवस्वभावावरणाद् घना. कर्म-धना , उक्त च- स्थित शीताशुवज्जीव प्रकृत्या भावशुद्धया । चन्द्रिकावच्च विज्ञान तदावरणमभ्रवत् ॥१॥ इत्यादि, 'विली- यन्ते' विनाशमुपयान्तीति गाथार्थ ॥१०२॥ किं चेदमन्यत् इहलोकप्रतीतमेव ध्यानफलमिति दर्शयति- न कसायसमुत्थेहि य बाहिज्जइ माणसेहिं दुक्खेहिं । ईसा-विसाय-सोगाइएहिं भाणोवगयचित्तो॥१०३।। 'न कषायसमुत्थैश्च' न क्रोधायुद्भवैश्च 'बाध्यते' पोड्यते मानसर्दु'खै., मानसग्रहणात्ताप इत्याद्यपि यदुक्त तन्न वाध्यते 'ईर्ष्या-विषाद-शोकादिभि' तत्र प्रतिपक्षाभ्युदयोपलम्भजनितो मत्सरविशेष ईर्ष्या, विषाद वैक्लव्यम्, शोक' दैन्यम्, प्रादिशब्दाद् हर्षादिपरिग्रहः, ध्यानोपगतचित्त इति प्रकटार्थमय गाथार्थः ।।१०३॥ सीयाऽऽयवाइएहि य सारीरेहिं सुबहुप्पगारेहिं । झाणसुनिच्चलचित्तोन ब[बा] हिज्जइ निज्जरापेही ॥१०४॥ इह कारणे कार्योपचारात् शीतातपादिभिश्च, आदिशब्दात् क्षुदादिपरिग्रह , 'शारीरै सुबहुप्रकार अनेकभेदै 'ध्यानसुनिश्चलचित्त' ध्यानभावितमतिर्न बाध्यते, ध्यानसुखादिति गम्यते, अथवा न शक्यते चालयितु तत एव 'निर्जरापेक्षी' कर्मक्षयापेक्षक इति गाथार्थ. ॥१०४॥ उक्त फलद्वारम्, अधुनोपसहरन्नाह- इय सव्वगुणाधाणं दिवादिसुहसाहणं झाणं । नेयं झेयं च निच्चंपि ॥१०॥ 'इय' एवमुक्तेन प्रकारेण 'सर्वगुणाधानम्' अशेषगुणस्थान दृष्टादृष्टसुखसाधन ध्यानमुक्तन्यायात् सुष्ठु प्रशस्त सुप्रशस्तम्, तीर्थकर-गणघरादिभिरासेवितत्वात्, यतश्चैवमत श्रद्धेय नान्यथैतदिति भावनया 'ज्ञेयम्' ज्ञातव्य स्वरूपत 'ध्येयम्' अनुचिन्तनीय क्रियया, एव च सति सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्राण्यासेवि. तानि भवन्ति, 'नित्यमपि' सर्वकालमपि, पाह-एव तहि सर्वक्रियालोप प्राप्नोति ? न, तदासेवनस्यापि तत्त्वतो ध्यानत्वात्, नास्ति काचिदसौ क्रिया यया साधूना ध्यान न भवतीति गाथार्थः ॥१०॥ ॥ समाप्त ध्यानशतकम् ॥ जिस प्रकार,मेघों के समूह वायु से-ताडित होकर क्षणभर मे विलय को प्राप्त हो जाते हैं उसी प्रकार ध्यानरूप वायु से विघटित होकर कर्मरूपी मेघ भी विलीन हो जाते हैं-क्षणभर मे नष्ट हो जाते हैं ॥१०२॥ और तो क्या, ध्यान का फल इस लोक में भी अनुभव मे प्राता है- जिसका चित्त ध्यान मे संलग्न है वह क्रोधादि कषायो से उत्पन्न होने वाले ईर्ष्या, विषाद और शोक प्रादि मानसिक दुःखो से पीड़ित नहीं होता ॥१०३॥ मानसिक दुःखों के समान शारीरिक दुःखों से भी वह वाघा को प्राप्त नहीं होता-- निसका चित्त ध्यान के द्वारा अतिशय स्थिरता को प्राप्त कर चुका है वह कर्मनिर्जरा की अपेक्षा रखता हुमा शीत व उष्ण प्रादि वहुत प्रकार के शारीरिक दुःखो से भी बाधा को प्राप्त नहीं होता-वह उन्हें निराकुलतापूर्वक सहता है ॥१०४॥ इस प्रकार ध्यान के फल को दिखला कर अन्त में उसका उपसंहार करते हुए यह कहा गया है- इस प्रकार सब गुणों के आधारभूत तथा दृष्ट और प्रदृष्ट सुख के साधक उस अतिशय प्रशस्त ध्यान का सदा श्रद्धान करना चाहिए, उसे जानना चाहिए और उसका चिन्तन करना चाहिए ॥१०॥ ॥ ध्यानशतक समाप्त हुमा । सुपसत्थ सद्धयं - परिशिष्ट १ वृत्तिकार हरिभद्र सूरि ने गा. ३२ की टीका में 'एतेषा च स्वरूप प्रत्यारयानाध्ययने न्यक्षेण वक्ष्यामः' यह सफेत किया है। तदनुसार प्रत्याख्यानाध्ययन मे जो सम्यक्त्व के शकादि अतिचारों से सम्बद्ध सन्दर्भ दिया गया है उसे यहां उद्धृत किया जाता है- शङ्कन शङ्का, भगवदह प्रणीतेषु पदार्थेषु धर्मास्तिकायादिष्वत्यन्तगहनेष मतिदी- बल्यात् सम्यगनवधार्यमाणेषु सशय इत्यर्थः, किमेव स्यात् नैवमिति । सशयकरण शङ्का, सा पुनर्बिभेदा-देशशङ्का सर्वशड्का च । देशशङ्का देशविषया, यथा किमयमात्माऽसख्येयप्रदेशा- त्मक स्यादथ निष्प्रदेशो निरवयव स्यादिति । सर्वशङ्का पुन सकलास्तिकायजात एव किमेव नैव स्यादिति । मिथ्यादर्शन च त्रिविधम्-अभिगृहीताऽनभिगृहीत-संशयभेदात् । तत्र सशयो मिथ्यात्वमेव । यदाह-पयमक्खर च एक्क जो न रोएइ सुत्तनिद्दिछ । सेस रोयतोवि हु मिच्छद्दिट्ठी मुणेयन्वो ॥१॥ तथा-सूत्रोक्तस्यैकस्याप्यरोचनादक्षरस्य भवति नर'। मिथ्या- दृष्टिः सूत्र हि न प्रमाण जिनाज्ञा च ॥१।। एकस्मिन्नप्यर्थे सन्दिग्धे प्रत्ययोऽर्हति हि नष्टः । मिथ्यात्वदर्शन तत् स चादिहेतुर्भवगतीनाम् ॥२॥ तस्मात् मुमुक्षुणा व्यपगतशकेन सता जिन- वचन सत्यमेव सामान्यत. प्रतिपत्तव्य, सशयास्पदमपि सत्य सर्वज्ञाभिहितत्वात्, तदन्यपदार्थ- वत्, मतिदौर्बल्यादिदोषात्तु कात्स्न्येन सकलपदार्थस्वभावावधारणमशक्य छद्मस्थेन । यदाह न हि नामानाभोगश्छद्मस्थस्येह कस्यचिन्नास्ति । ज्ञानावरणीय हि ज्ञानावरणप्रकृति कर्म ।।१।। इह चोदाहरणम्-जो सक करेइ सो विणस्सति, जहा सो पेज्जापायो, पेज्जाए मासा जे परि- भज्जमाणा ते छूढा, अधगारए लेहसालानो आगया दो पुत्ता पियति, एगो चितेति-एयानो मच्छियाओ, सकाए तस्स वग्गुलो वाउ जाओ, मनो य । बिइम्रो चितेइ-न मम माया मच्छिया देइ, जीयो । एते दोषा । काक्षण काक्षा-सुगतादिप्रणीतदर्शनेषु ग्राहोऽभिलाष इत्यर्थः, तथा चोक्तम्-कखा अन्नन्नदसणग्गाहो। सा पुनर्बिभेदा-देशकाङ्क्षा सर्वकाक्षा च। देशकाङ्क्षकदेशविषया, एकमेव सौगत दर्शन काक्षति, चित्तजयोऽत्र प्रतिपादितोऽयमेव च प्रधानो मुक्तिहेतुरित्यतो घटमानकमिदं न दूरापेतमिति । सर्वकाक्षा तु सर्वदर्शनान्येव काक्षति, अहिंसादिप्रतिपादन- पराणि सर्वाण्येव कपिल-कणभक्षाऽक्षपादादिमतानीह लोके च नात्यन्तक्लेशप्रतिपादनपराण्यतः शोभनान्येवेति, अथवैहिकामुष्मिकफलानि काङ्क्षति, प्रतिषिद्धा चेयमर्हद्भिरत प्रतिषिद्धानु- प्ठानादेना कुर्वतः सम्यक्त्वातिचारो भवति, तस्मादैकान्तिकमव्याबाधमपवर्ग विहायान्यत्र काक्षा न कार्येति । एत्थोदाहरणम्-राया कुमारामच्चो य आसेणावहिया अडविं पविट्ठा, छुहापरद्धा वणफलाणि खायति, पडिनियत्ताण राया चितेइ-लड्डुय-पूयलगमादीणि सव्वाणि खामि, आगया दोवि जणा, रण्णा सूयारा भणिया-ज लोए पयरइ त सव्व सव्वे रघेहत्ति, उवट्ठविय च रन्नो, सो राया पेच्छणयदिट्ठत करेइ, कप्पडिया वलिएहिं धाडिज्जइ, एव मिट्ठस्स अवगासो होहितित्ति कणकुडगमडगादीणिवि खइयाणि, तेहिं सूलेण मनो, अमच्चेण वमण-विरेयणाणि कयाणि, सोमाभागी भोगाण जामो, इयरो विणट्ठो। विचिकित्सा मतिविभ्रम , युक्त्यागमोपपन्नेऽप्यर्थे फल प्रति सम्मोह -किमस्य महतस्तप:- क्लेशायासस्य सिकताकणकवलनादेरायत्या' मम फलसम्पद् भविष्यति किं वा नेति, उभयथेह , । प्रत्याख्यानाध्ययनगत सम्यक्त्वातिचारस्वरूपम् ५३ क्रिया फलवत्यो निष्फलाश्च दृश्यन्ते कृषीवलानाम् । न चेय शङ्कातो न भिद्यते इत्याशङ्कनीयम्, शङ्का हि सकलासकलपदार्थभाक्त्वेन द्रव्य-गुणविषया, इय तु क्रियाविषयैव, तत्त्वतस्तु सर्व एते आयो मिथ्यात्वमोहनीयोदयतो भवन्तो जीवपरिणामविशेषाः सम्यक्त्वातिचारा उच्यन्ते, न सूक्ष्मेक्षिकाऽत्र कार्येति । इयमपि न कार्या, यतः सर्वज्ञोक्तकुशलानुष्ठानाद् भवत्येव फलप्राप्ति- रिति । अत्र चौरोदाहरणम्-सावंगो नदीसरवरगमण दिव्वगधाण (त) देवसपरिसेण मित्तस्स पुच्छण विज्जाए दाण साहण मसाणे चउप्पाय सिक्कग, हेट्ठा इगाला खायरो य सूलो अट्ठसय वारा परिजवित्ता पाओ सिक्कगस्स छिज्जइ, एव बितिम्रो तइए चउत्थे य छिण्णे आगासेण वच्चति, तेण विज्जा गहिया, किण्हचउद्दसिरत्ति साहेइ मसाणे, चोरो य नग- रारक्खिएहिं परिन्भममाणो तत्थेव अतियो, ताहे वेढेउ सुसाणे ठिया पभाए घिप्पिहितित्ति, सो य भमतो त विज्जासाहय पेच्छइ, तेण पुच्छिो भणति-विज्ज साहेमि । चोरो भणति- केण दिण्णा ? सो भणति-सावगेण, चोरेण भणितम्-इम दव्व गिण्हाहि विज्ज़ देहि, सो सड्ढो वितिगिच्छति-सिज्ज्ञज्जा न वत्ति । तेण दिण्णा, चोरो चितेइ-सावगो कीडियाएवि पाव नेच्छइ, सच्चमेय, सो साहिउमारद्धो, सिद्धा, इयरो सड्ढो गहिरो, तेण आगासगएण लोगो भेसियो ताहे सो मुक्को, सड्ढाव दोवि जाया। एव निव्वितिगिच्छेण होयव्व । अथवा विद्वज्जुगुप्सा-विद्वास साधव विदितससारस्वभावा परित्यक्तसमस्तसङ्गा, तेषा जुगुप्सा निन्दा, तथाहि-तेऽस्नानात् प्रस्वेदजलक्लिन्नमलत्वात् दुर्गन्धिवपुषो भवन्ति, तान् निन्दति- को दोषः स्यात् यदि प्रासुकेन वारिणाऽङ्गक्षालन कुर्वीरन् भगवन्त ? इयमपि न कार्या, देहस्यैव परमार्थतोऽशुचित्वात् । एत्थ उदाहरणम्-एको सड्ढो पच्चते वसति, तस्स धूयाविवाहे कहवि साहवो आगया, सा पिउणा भणिया-पुत्तिगे | पडिलाहेहि साहुणो, सा मडियपसा- हिया पडिलाभेति, साहूणं जल्लगद्धो तीए अग्यानो, चितेइ--अहो अणवज्जो भट्टारगेहिं धम्मो देसियो, जइ फासुएण हाएज्जा को दोसो होज्जा ? सा तस्स ठाणस्स प्रणालोइय- ऽपडिक्कता काल किच्चा रायगिहे गणियाए पोट्टे उववन्ना, गभगता चेव ' अरइं जणेति, गन्भपाडणेहि य न पडइ, जाया समाणी उज्झिया, सा गधेण त वण वासेति, सेणियो य तेण पएसेण निग्गच्छइ सामिणो वदगो, सो खधावारो तीए गध न सहइ, रण्णा पुच्छिय किमे- यति, कहियं दारियाए गंधो, गंतूण दिट्ठा, भणति-एसेव पढमपुच्छत्ति, गो सेणियो, पुन्- द्दिवुत्तते कहिते भणइ राया-कहिं एसा पच्चणुभविस्सइ सुहं दुक्ख वा ? सामी भणइ- एएण कालेण वेदिय, सा तव चेव भज्जा भविस्सति अग्गमहिसी, अट्ठ सवच्छराणि जाव तुज्झ रममाणस्स पुट्ठीए हसोवल्लीली काही, तं जाणिज्जासि, वदित्ता गो, सो य अवहरिओ गंधो, कुलपुत्तएण साहरिया, सवड्ढिया जोव्वणत्था जाया, कोमुइवारे अम्मयाए सम आगया, अभो सेणियो [य] पच्छण्णा कोमुइवार पेच्छति, तीए दारियाए अगफासेण अज्झोव- वण्णो णाममुद्द दसियाए तीए बंधति, अभयस्स कहिय-णामसुद्दा हारिया, मग्गाहि, तेण मणुस्सा दारेहि ठविया, एक्केक्क माणुस्स पलोएउ नीणिज्जइ, सा दारिया दिट्ठा चोरोत्ति गहिया, परिणीया य, अण्णया य बमुक्केण रमति, रायाणिउ तेण पोत्तेण वाहेति, इयरा पोत्त देंति, सा विलग्गा, रण्णा सरियं, मुक्का य पव्वइया । एय विउदुगुछाफल । परपाषडाना सर्वज्ञप्रणीतपाषण्डव्यतिरिक्ताना प्रशंसा, प्रशसन प्रशसा स्तुतिरित्यर्थः । परपाषण्डानामोघतस्त्रीणि शतानि त्रिशष्टयधिकानि भवन्ति । यत उक्तम्-असीयसय किरि- याण अकिरियवाईण होइ चुलसीति । अण्णाणिय सत्तट्ठी वेणइयाण च बत्तीस ॥१॥ इयमपि गाथा विनेयजनानुग्रहार्थ ग्रन्थान्तरप्रतिबद्धाऽपि लेशतो व्याख्यायते-'असियसय किरियाण' इति अशीत्युत्तर शत क्रियावादिनाम्-तत्र न कर्तार-विना क्रिया सम्भवति तामात्मसमवा- २ गाथानुक्रमणिका w wr १०० १०२ ७१ २ ७९ ८० ४ ५२ ६८ ४६ २८ ८८ अट्ट रुद्द धम्म अणुवकयपराणुग्गह अण्णाण-मारुएरिय अमणुण्णाण सद्दाइ अवहाऽसमोह-विवेग अवियारमत्थ-वजण अह खंति-मद्दवज्जव अतोमुहुत्तपरो अनोमुहुत्तमेत्तं अंबर-लोह-महीणं आगमउवएसाऽऽणा आरोदु मुणि-वणिया प्रालबणाइ वायण आसवदारावाए पासवदारा ससार इट्ठाण विसयाईण इय करण-कारणाणुमइ इय सव्वगुणाधाण उप्पाय-टिइ-भगाइ उवप्रोगलक्खणमणाइ उस्सारियघणभरो एए चि पुव्वाण एय चउविह राग एय चउन्विह राग एव चिय वयजोगं कालोऽवि सो च्चिय कावोय-नील काला कावोय-नील-काला किं बहुणा सव्वं चिय कुणो व पसत्था- खिइ-वलय दीव-सागर चालिज्जइ बीभेइ य चित्ताभावेवि सया जच्चिय देहावत्था जह चिरसचियमिघण ३१ २६ ६१ ४७ ५ जह छउमत्थस्स मणो ४६ जह रोगासयसमण जह वा घणसघाया जह सव्वसरीरगय. ६० ज थिरमझवसाण ज पुण सुणिप्पकप ६९ जिणदेसियाइ लक्खण जिण-साहूगुणकित्तण ३ जो (तो) जत्थ समाहाण ६७ झाइज्जा निरवज्ज ६७ झाणप्पडिवत्तिकमो ६० झाणस्स भावणाम्रो ४२ | झाणोवरमे वि मुणी णाणे णिच्चब्भासो ६५ | तत्तोऽणुप्पेहाओ तत्थ य तिरयण २३ तत्थ य मइदोब्बलेण १०५ / तदविरय-देसविरया तस्सऽक्कदण-सोयण तस्स य सकम्मजणिय ७३ तस्स य सतरणसह ६४ | तस्सेव य सेलेसी १० तह तिव्वकोह-लोहा २४ तह तिहुयण-तणुविसय ७६ | तह विसइधणहीणो ३८ तह सूल-सीसरोगाइ १४/ तह सोज्झाइसमत्था २५ | तापो सोसो भेनो ६२ तिहुयणविसय कमसो १२ ते य विसेसेण ५४ | तो जत्थ समाहाण ६१] तो देस-काल-चेट्ठा ८६ | तोयमिव नालियाए ३६ | थिरकयजोगाण पुण १०१ देविंद-चक्कवट्टित्तणाइ १८ ७७ १५ ८२ २१ ७२ ७४ ७ 88 ७० ६४ ३७ ४१ ७५ गाथानुक्रमणिका १ २२ ७८ ४० ३२ ५९ देहविवित्त पेच्छा न कसायसमुत्येहि य नवकम्माणायाणं निच्च चिय जुवइ-पसू निव्वाणगमणकाले निदइ य नियकयाई पढम जोगे जोगेसु पयइ-ठिइ-पएसा परवसणं अहिणदइ पंचत्थिकायमइय पिसुणासन्भासब्भूय पुग्वकयन्भासो पुन्वप्पमोगयो चिय मज्झत्थस्स उ मुणिणो राग-होस-कसाया रागो दोसो मोहो लिंगाइ तस्स उस्सण्ण विसममि समारोहइ ६२ | वीर सुक्कज्माणग्गि- १०३ / सत्तवह-वेह-बधण ३३ ] सहाइविसयगिद्धो ३५ सदाइविसयसाहण पर सवियारमत्थ-वंजण- १६ | सन्वप्पमायरहिया ८३ | सन्वासु वट्टमाणा ५१ सकाइदोसरहिरो २७ संवरकयनिच्छिद्द ५३ । सवर-विणिज्जराम्रो २० सीयाऽयवाइएहि य ३० | सुक्कझामसुभाविय १५ / सुक्काए लेस्साए ११ / सुणिउणमणाइणिहण ५० | सुविदियजगस्सभावो १३ | हेकदाहरणासभवे २६ होति कमविसुद्धामो ४३ / होति सुहासव-सवर १०४ 1 man ૨૪ ४८ - ३ टीकागत विशिष्ट शब्दानुक्रमणिका . P । शब्द गाथाक गाथाक शब्द ईषत्प्राग्भार अज्ञान ५७ . १८ ५३' उच्छ्वास-निःश्वास ३,८१ . 1 - ५५ २६ r ३२ ५५ १८ १८ -१६ 4 - ४५ 1 ३ + २,१०, २४ ५५, ७६ अणुव्रत अधर्मास्तिकाय अनाकार उपयोग अनित्यत्वानुप्रेक्षा अनुकम्पा अनुत्तर विमान अनुयोगद्वार अनेकान्त अन्तर्मुहूर्त अन्यदृष्टिप्रशसा अपध्यान अप्रतिष्ठान अप्रमत्तसंयत अभूतोद्भावनवचन अर्थान्तराभिधान अयोगी अहंत अवलिंग शरणभावना असम्मोहलिंग असि आगमिक श्रुतपाठी प्राज्ञा mr xx ५१ २० ४८ २० ८६ उदाहरण उपधि उपयोग "उपलक्षण उमास्वातिवाचक उल्मुक एकत्वभावना प्रोध “औदारिक शरीर कर्मप्रकृति कर्मविपाक कर्वट कल्पित उदाहरण कषाय कायक्रिया काययोग काययोगनिग्रह कायिक ध्यान कायोत्सर्ग कारक हेतु काल कालसौकरिक काक्षा कुतीथिक कुन्त कूटप्रयोग कृतयोग कृतयोगी केवल केवली १ ७६ ७० ११ ३६ ४८ ३८ २३ ५३ २८ ३२ ३३ ४२ आयतन ३२ २० आयु आवश्यक २० आश्रव आश्रवक्रिया आस्तिक्य ३२ १२ ४५ आहारक शरीर ५५, ७६ ३४ इहलोकभय टोकागत विशिष्ट शब्दानुक्रमणिका ५६ - क्षपक श्रेणी . द्वीप द्वेप धर्मध्यान धर्म्यध्यान .क्षयोपशम क्षेत्रलोक खेट । ५, १२, २७, २९ ११, १२, २६ गणघर नगर ३५, ३८,४६, ६३ ४६ नमस्कारनियुक्ति १२ 1 नय 4 गम गीतार्थ गुणश्रेणि गोत्र -७६ ४५,६२ ५, २१ ३३ ५३ ५१ ६४ 'घन ५४ १५४ । - & नरक नामकर्म नामनिक्षेप निकाचित निग्रन्थ निर्जरा निर्वेद नगम परममुनि परलोक धनवात धनोदधि चतुर्दशपूर्वी चतुर्विशतिदण्डक चतुर्विंशतिस्तव चमर चरणधर्म ४५ ४६ 4 '३२ *- .. ११ ५३ ५, १७ ५, १७, ४२ ४८ ..५० A चरित उदाहरण परसमय ज ६६ ३२ ६१ ७६ . ४५ F चारित्र चिलातीपुत्र चैत्यघन जिन जीव ज्योतिष्क विमान २२ १७ परीषह पर्याप्त पर्यायलोक पचास्तिकाय पाताल ur - है ५५ . पाषण्डप्रशसा . - ३२ ३२ ज्ञान पाषण्डसस्तव पुद्गल पुनरुक्त दोप ५३ ज्ञानावरणीय तनुवात तप तिर्यगति तीर्थकर दण्डायत दर्शन ७६ ५१, ५५ । ५४ १० ५,१३ १७,३५, ३८, ६३ ७७ पुरुपवेद पूर्ववित् प्रत्यास्यानाध्ययन प्रत्युपेक्षण प्रभावना ३२ ४२ ३२ ७ , दर्शनदीपक गुण ३२ प्रमाद दावानल ५० प्रवचन १७ ३२, ५० प्रशम ५३ प्राण ३ - ४५ द्यूतकार द्रव्यनिक्षेप द्रव्यादेश द्रव्यास्तिक नय द्वादशानुप्रेक्षा द्वादशागी . ६२, ७७ ૨૬ बलदेव बाह्य करण भरत भवनवासी .

६० ध्यानशतकम् ५६ भावमन भिन्नमुहूर्त , १६(उ.) ३६ , 1 ३७ २०. २० ४५ ४८ २० . ૨૨ ५६ ४० १६ विषयसरक्षणानुबन्धी वीरासन वेदनीय वैमानिक व्यञ्जकहेतुं व्यवहारनय पुत्सर्गलिंग शक्ति शिल्पकला शैलेश्य श्रावक श्रुतज्ञान श्रुतज्ञानी श्रुतधर्म श्वापद षड्जीवनिकाय सन्निवेश १६ ६४, ७७ १८, २२, २३ ३१, ४५ ४२ ५, ४२ ५६ ३,३८ ४६ २६ समय ३ ७६ भूतनिह्नववचन भूतीपघात वचन मतिज्ञान 'मत्वर्थ मन पर्याय मनोयोग मरुदेवी मिथ्यात्व मिथ्यादर्शन मिथ्यादृष्टि मुखवस्त्रिका मुहूर्त मृषानुबन्धी मृषावाद मेरु मोक्ष मोह योग योगी रति रत्ना पृथिवी राग लब्धि लव लान्तव लोक वणिक् वाग्योग 'वाग्योगनिग्रह वाचकमुख्य वाचना वाधिक ध्यान वाणिज्य विचार विचिकित्सा वितर्क विपाक विवेकलिंग ६, १२ ४६ '३, ३६ १,८६ १८, २३, ३१, ४५ समुद्घात सम्यक्त्व सम्यग्दृष्टि सर्वज्ञ सर्वसयत सर्वार्थविमान सवेग ४८ “२३ ५४ ८,४६ ३२ ससार ३ ३६, ६४ ७६ ४५ २० ४२ ५ ४४ ५ सहनन साकारोपयुक्त सात सामाचारी सिद्धिगति सिंहमारक सीमन्तक सूत्र स्तुतिकार स्तेयानुवन्धी स्तोक स्वसमय हास्य हिसानुबन्धी हेतु ह्रस्वाक्षर . २८ २७ ५४ ३१ ४५ १८ ३ ३२ १६ १२ १५, २६ ४० ७६ ४ मूल ग्रन्थंगत विशिष्ट शब्दानुक्रमणिका शब्द सस्कृत रूप अर्थ गाथाक ८२ - २ अक्कदण प्रानन्दन अजोगी अयोगिन् प्रज्जव पार्जव मज्भवसाण मध्यवसान अट्टज्माण श्रार्तध्यान अणज्ज अनार्य अणिच्चाइभावणा अनित्यादिभावना अणुचिंता मनुचिन्ता ५ महान शब्द के द्वारा चिल्लाना शैलेगी केवली मायापूर्ण व्यवहार का त्याग मन, एकाग्रता का पालम्बन सक्लेश रूप. परिणाम हेय धर्म प्रवर्तक अनित्यादि भावनाओ का चिन्तन विस्मरण न होने देने के लिए मन से ही सूत्र का अनुस्मरण अनुत्तर विमानवासी देव स्मृतिरूप ध्यान से भ्रष्ट हुए जीव की चित्तवृत्ति कर्मविपाक - ४२ ६४ . अणुत्तरामर अणुपेहा अणुभाव २,२९ अनुत्तरामर अनुप्रेक्षा अनुभाव अर्थ अमन अमनोज्ञ अवध द्रव्य-पर्याय ७६ भ्रमण ७० . २ अमणुण्ण 'अवह. ६०,६१ . ८२ - प्रवाय अवियार अविरय अवाय अविचार अविरत । ८० अन्त करण से रहित केवली मन के प्रतिकूल, अनिष्ट परीषह व उपसर्ग के द्वारा ध्यान से विचलित या भयभीत न होना अपाय, दुख अर्थ, व्यजन और योग के सक्रमण से रहित व्रत रहित मिथ्यादृष्टि व सम्यग्दृष्टि असभ्य वचन, अपशब्द तीन प्रकार का असत्य वचन , पदार्थों व देवमाया के विषय मे मूढता का अभाव कुत्ता व शृगाल आदि के पावो से चिह्नित १८, २३ असम्भवयण असभ्य वचन, २० - - असन्भूय वयण असम्मोह असद्भूत वचन २० असम्मोह- ६०,६१ अकण अकन करना १६ ३,४ अन्तर्मुहूर्त भिन्नमुहूर्त काल सूत्र - अतोमुहुत्त भागम आणा। आमरणदोस . आगम-7 ६७ सूत्र का अर्थ आज्ञा आमरण दोष स्व अथवा अन्य के महती आपत्ति को प्राप्त होने पर भी कालसौकरिक के समान मरण पर्यन्त पश्चाताप न करना सूत्रार्थ के ज्ञान के लिए मुमुक्षु जन जिसकी । सेवा किया करते हैं २६ पायरिय प्राचार्य ६२ ध्यानशतकम् -- . {। । - - निरन्तर प्रवृत्त रहना पालबण मालम्बन धर्मध्यान पर आरूढ होने के लिए जिसका सहारा लिया जाता है १२,४२,६६ पासव पानव कर्मबन्ध के कारणभूत मिथ्यात्व आदि पासवदारावाय मानवद्वारापाय मिथ्यात्व आदि से उत्पन्न होने वाला दु:ख ईसा ईर्ष्या प्रतिपक्षी के अभ्युदय को देखकर मन मे उत्पन्न होनेवाले मात्सर्यभावरूप ईर्ष्या १० 'उदाहरण उदाहरण दृष्टान्त 'उप्पाय उत्पाद उत्पाद, उत्पत्ति ५२, ७७,७९ "उवएस उपदेश सूत्र के अनुसार कथन करना ६७ 'उवयोग उपयोग । साकार (ज्ञान) व निराकार(दर्शन) ५५ उिवसग्ग उपसर्ग उपसर्ग, देव-मनुष्यादि कृत उपद्रव ६१ उवसतमोह उपशान्तमोह उपशामक निर्ग्रन्थ 'उस्सण्णदोस उत्सन्न दोष हिंसानुबन्धी आदि किसी एक रौद्रध्यान मे २६ एगत्तवितक्कमवियार एकत्ववितर्क अविचार जिस ध्यान मे भेद से रहित व्यजन, अर्थ व योग के सक्रमण रहित वितर्क (श्रृंत) होता है कम्म कर्म ज्ञानावरणादिरूप परिणत पुद्गल . १ कम्मविवाग कर्मविपाक कर्मोदय ५१ कलुस कलुष प्रात्मा को कलुषित करने वाली कषाय २० कायकिरिय कायक्रिया उच्छ्वास-नि.श्वासरूप काय की क्रिया कायजोग कायवोग औदारिकादि शरीर से युक्त जीव के वीर्य की परिणतिविशेष ३,७६ काल काल कलासमूह अथवा चन्द्र-सूर्य आदि की गमन- क्रिया से उपलक्षित दिन आदि कालालेस्सा कृष्णलेश्या कृष्णलेश्या १४, २५ कावोयलेस्सा कापोत लेश्या कापोत लेश्या १४, २५ कित्तण कीर्तन सामान्य से निर्देश करना ६८ केवली केवलिन् केवलज्ञान से संयुक्त ४४, ७६ खंति क्षान्ति शान्ति-क्रोध का परित्याग ६६ खिइ क्षिति धर्मा आदि आठ पृथिविया खीणमोह क्षीणमोह क्षपक निर्ग्रन्थ ६३ गम गम चतुर्विशतिदण्डक आदि ४६ चक्कवट्टी चक्रवर्तिन् • चक्र के धारक भरतादि सम्राट चारित्त चारित्र चारित्र, अशुभ क्रिया का परित्याग, अनिन्द्य आचरण ३३, ५८ चारितभावणा चारित्रभावना समस्त सावध योग की निवृत्तिरूप क्रिया का अभ्यास चित्त चित्त भावना, अनुप्रेक्षा और चिन्ता रूप तीन प्रकार का अनवस्थित अध्यवसान चिता चिन्ता भावना और अनुप्रेक्षा से रहित मन की प्रवृत्ति - - 8 २, ३, ७६ २,४ मूल ग्रन्थगत विशिष्ट शब्दानुक्रमणिका ६३१ 1 ग . ३ जोगी.. . , । - . 1 छउमत्य छमस्थ ज्ञानादि गुणो के आवारक घातिकर्मरूप छद्म मे स्थित (अल्पज्ञ) ३, ७०, ८४ जिण जिन तीर्थंकर केवली-राग, द्वेष एव मोह के विजेता ३,१७,४६,६८,७० जिणमय जिनमत प्रवचन, तीर्थङ्करदर्शन १७, ६९ जिणाणमाण जिनानाम् अाज्ञा जिनाज्ञा, जिनवाणी जोईसर ये गेश्वर, योगीश्वर, योगो से प्रधान, योगियो से अथवा योगियो ! - योगिस्मर्य के ईश्वर, योगियो के द्वारा ध्यातव्य जोग योग औदारिक आदि शरीरो के सयोग से उत्पन्न होने वाले आत्मपरिणाम का विशेष व्यापार ३, ७८, ८० जोगणिरोह योगनिरोध मन, वचन व काय योगो का विनाश योगिन् धर्म या शुक्ल ध्यानरूप योग से सहित झाइयव्व ध्यातव्य ध्यान के योग्य प्राज्ञा आदि २८ झाण ध्यान स्थिर अध्यवसान, अन्तर्मुहूर्त काल तक एक “वस्तुमे चित्त का अवस्थान अथवा योगनिरोध २,३ भाणज्भयण। ध्यानाध्ययन ध्यानप्रतिपादक अध्ययन, प्रकृत ग्रन्थ को नाम १ झाणप्पडिवत्तिकम ध्यानप्रतिक्रम मनयोगादिके निग्रहरूप ध्यानप्रतिपत्ति की परिपाटी ४४ माणसंताण ध्यानसन्तान ध्यान का प्रवाह ४. झायार ध्यातृ (ध्यातार) प्रमादादि रहित ध्याता २८ ठिह स्थिति ज्ञानावरणादिरूप कर्मप्रकृतियो के जघन्यादिरूप " - मे अवस्थित रहने का काल, धर्मास्ति- कायादि का द्रव्यरूप मे अवस्थान णाण ज्ञान वस्तु का मतिज्ञानादिरूप बोध णाणावरण ज्ञानावरण ज्ञान का आच्छादक कर्मविशेष ४७ णाणाविहदोस नानाविध दोष चमडी के छिलने व नेत्रो के निकालने आदि रूप अनेक हिंसादि के उपायो मे निरन्तर प्रवृत्त रहना २६ णिज्जरा निर्जरा कर्म का क्षय तणुकायकिरिय तनुकायक्रिय उच्छ्वास-निःश्वासादिरूप सूक्ष्म ' कायक्रिया ८१ तव तपस् अनशन आदि रूप तप १२, ५६ ताडण ताडन छाती व शिर का कूटना एवं बालो का नोचना आदि १५ तिरयण त्रिरल ज्ञान, दर्शन व चारित्ररूप तीन रत्न तिरियगइ तिर्यग्गति तियंचगति थेज्ज स्थैर्य जिनशासन मे स्थिरता दहण दहन अग्नि आदि से जलाना १६ दसणसुद्धी दर्शनशुद्धि शकादि दोषो के परिहारपूर्वक प्रशमादि गुणो से युक्तता ३२ -- - -- ५१, ५२ ३१,५६ । M - । से युक्त - ६४. ध्यानशतकम् दान द्वीप - देवो का प्रभु दान दीव देविद देसविरय देसासंजय देहोवहिवोसग्ग दोस । देवेन्द्र देशविरत देशासयत देहोपषिव्युत्सर्ग द्वेष धर्म, धर्म्य- घम्म धम्मज्माणी - धर्मध्यानिन् नय नय नरयः नियाण नरक निदान - 1 - 7 निव्वाण नीललेस्सा पएस पज्जव पणिहाण निर्वाण नीललेश्या प्रदेश पर्याय प्रणिधान - भोजन आदि का प्रदान करना जम्बूद्वीप आदि ६ एक-दो यादि अणुव्रतो के धारक श्रावक १८ देशत सयम से रहित २३ देह व उपाधि का त्याग ६२ प्रीति का अभाव ६,४६ धर्म-दुर्गति मे पडते हुए जीव का उद्धारक, धर्म्य-श्रुत और चारित्ररूप' धर्म से अनुगत ध्यान विशेष ५, १७ धर्मध्यान का ध्याता ६८ नंगम-सग्रहादि के भेद से नय अनेक प्रकार का है सीमन्तक आदि नारकबिल ५४ इस तप या त्याग के आश्रय से मैं देवेन्द्र या चक्रवर्ती हो जाऊ, इस प्रकार की प्रार्थना 8 निर्वाण, मोक्ष ५, ६०,८१ लेश्याविशेष १४, २५ जीवप्रदेशो के साथ कर्म-पुद्गलो का सम्बन्ध उत्पादादिरूप पर्याय प्राणिहिंसादि को न करते हुए भी उसके प्रति दृढ अध्यवसाय १६, २० समस्त वस्तु का ग्राहक ज्ञान मद्यादि प्रमाद १७, ६३ पीत लेश्या से विशुद्ध एक लेश्या ज्ञानावरणादिरूप आठ कर्मप्रकृतिया शैलेशीगत केवली का उत्कृष्ट शुक्लध्यान ८२, ८६ सयोग केवली की अतिशय विशुद्ध लेश्या ८६ जिसका विभाग न हो सके ऐसा पुद्गलविशेष (७२ बार-बार सक्लेशयुक्त भाषण । १५. पूर्वपठित सूत्र आदि का विस्मरण न होने देने तथा निर्जरा के निमित्त जो अभ्यास किया जाता है क्षुधा-तृषा आदि की वेदना स्वमत और परमत के तत्त्वविषयक अभ्यास से उत्पन्न होने वाला प्रकृष्ट श्रम (प्रश्रम) अथवा कषायो की शान्ति- रूप प्रशम ३२ भक्तिपूर्वक स्तुति प्रदेशममूह वाले धर्मास्तिकायादि पाच द्रव्य ५२ पमाण प्रमाण है " ५१ पमाय. पम्हलेस्सा पय परमसुक्क परमसुक्कलेस्सा परमाणु परिदेवन परियट्टणा प्रमाद पद्मलेश्या प्रकृति परमशुक्ल परमशुक्ललेश्या परमाणु परिदेवन परावर्तन . ४२ परीषह परीसह पमम प्रश्रम, प्रशम - पसरणा पत्रत्यिकाय प्रगसना, प्रशसा पचास्तिकान ५३ पूर्वगत श्रुत M - मूल ग्रन्थगत विशिष्ट शब्दानुक्रमणिका पायाल पाताल अगाध जल से परिपूर्ण लवणादि समुद्रगत पाताल (गर्तविशेष) पिसुणवयण पिशुनवचन मनिष्टसूचक वचन २० पीयलेस्सा पीतलेश्या पपलेश्या से कुछ कम विशुद्ध एक लेश्या ६६ प्रच्छना, प्रश्न सूत्र मादि मे शका के उत्पन्न होने पर उसे दूर करने के लिये गुरु से पूछना ४२ पुज्यगयसुय उत्पादपूर्वादिरूप पूर्वगत श्रुत ७७, ८० पुग्वधर पूर्वधर उपयोग सहित चौदह पूर्वो के ज्ञाता पुहुतवितक्क-सपियार पृथक्त्ववितर्कसविचार भेद अथवा विस्तार के साथ श्रुत से युक्त एक शुक्लच्यान बहुलदोस बहुलदोष हिंसानुबन्धी आदि सभी रोद्रध्यानो में निरन्तर प्रवृत्त रहना बंधण बन्धन रस्सी या साकल आदि से बाघना १६ बाहिरकरण बाह्यकरण वचन व काय भव भव जहा प्राणी कर्म के वशीभूत होते हैं, जन्म- मरणरूप ससार ५ भवकाल भवकाल मोक्षगमन के समीपवर्ती शैलेशी , अवस्था के अन्तर्गत अन्तर्मुहूर्त प्रमाण काल भवण भवन भवनवासी देवो के भवन भवसन्तान अनन्त शुक्लध्यान मे चिन्तनीय एक अनुप्रेक्षा भग क्रमभेद व स्थानभेद से उत्पन्न होने वाले 'भेद, द्रव्य की एक विनाशरूप भवस्था ४६,५२,७७.७६ भावणा भावना ज्ञान-दर्शनादि रूप चार भावनायें भावणा भावना ध्यानाभ्यास की क्रिया २, ३० भूषायवयण भूतषात वचन छेदने-भेदने मादिरूप प्राणिषात सूचक वचन मध्यस्थ रोग-द्वेष के बीच में स्थित (उदासीन) T मणोजोग औदारिक, बैंक्रियिक और माहारक शरीर के व्यापार से प्राने वाली मनोवर्गणा के माश्रय से होने वाला जीव का व्यापार मगोजोगणिग्यह मनोयोगनिग्रह मनोयोग का विनाश ममोषारण मनोधारण मशुभ व्यापार से रहित मन का प्रस्थान महव मादव मानकषाय के परित्यागरूप धर्मविशेष ६६ बत विशिष्ट बों की पानुपूर्वी रूप मत्रवाक्य माणसदुक्ख मानसिक सक्लेश १०३ मायावी मायाविन् माया से युक्त मारण मारण । तलवार मादि के द्वारा प्राणों का वियोग करना १६ भूषि मुनि लोक की अकालिक अवस्थाका माननेवाला साधु ११,६. मुक्ति मुक्ति मुक्ति, कर्म का क्षय मोक्षपथ मोक्षमार्ग (संवर व निर्जरा) ६६ मोह मोह प्रज्ञान भवसताण-प्रणत -८९ भग P मनोयोग, - । " xP4 १ है 1 मानसिक दुःख २० - मोरखपह १ ६६ ध्यानशतकम् - . ८,४९ ...,१०० वणि व ६० , ३ ४ म -- वलय 7 " - - राग राग 'विषयासक्ति रुद्द हिंसादिविषयक अतिशय क्रूरतायुक्त रौद्रध्यान ५.२४ रोगानयसमण रोगाशयशमन रोग की-निदानपूर्वक चिकित्सा लेश्या लेश्या । स्फटिक मणि के समान कृष्णादि द्रव्य की समीपता से होने वाला आत्मपरिणाम १४,२५,६६,८६ लोग लोक * • पाच अस्तिकायरूप लोक वणिय आय-व्यय का ध्यान रखने वाला वणिक, व्यापारी वत्थु वस्तु जिसमे गुण-पर्याय बसते है-रहते हैं वस्तुसक्रम वस्तुपरिवर्तन, अर्थसक्रान्ति वत्थू विपरिणाम वस्तूना विपरिणाम चेतन-अचेतन वस्तुओ का विरुद्ध परिणमन, उनकी नश्वरता चयजोग वाग्योग औदारिक, वैक्रियिक और आहारक शरीर के व्यापार से आने वाली वचनवर्गणा के आश्रयसे होनेवाला जीवका व्यापार ७६ वलय धर्मा आदि सात पृथिवियो -का परिक्षेपण करने वाला बायुमण्डल वह वध ताडन चंजण व्यञ्जन शब्द ७८,८० वायण वाचना चाचना-निर्जरा के निमित्त शिष्य के लिए "सूत्रार्थ का प्रदान करना विउस्सग्ग व्युत्सर्ग देह-व-उपधि का परित्याग Ep,.६२ विणय विनय "अभ्युत्थानादि T विमाण विमान ज्योतिषी आदि देवो के निवासस्थान, विरेयणोसह विरेचनौषध विरेचक (दस्तावर) औषधि - विवेग विवेक. । देह से मात्मा को पृथक् समझना विसय विषय : जिनमे आसक्त होकर प्राणी दुख को प्राप्त -होते हैं ६ विसाय विषाद , विषाद, विकलता विसोसण विशोषण :-- 2 अनशनादि के द्वारा होने वाला कर्म का शोषण (विनाश) १०० चौर वीर विशेषरूप से कर्म को नष्ट करने वाला या कल्याण को प्राप्त होने वाला -१ वेज वैद्य वैद्य ७२ वेयणा वेदना वेदना, पीड़ा का अनुभव वेह वेष “कील आदि से नाक श्रादि का छेदना वोच्छिन्नकिरिय व्युच्छिन्नक्रिय अप्रतिः क्रिया से रहित होकर स्थिरस्वभाव- वाला अप्पडिवाइ पाति शुक्लच्यान ८२ सहादिविसय शब्दादि विषय शब्द प्रादि इन्द्रियविषय सद्धम्मावस्सय सद्धर्मावश्यक ४२ समीचीन चारित्र से अनुगत सामायिकादि T T 7 1- ४२ ..1 -- ५४ है --- : १०० i".80 57 . . P tr मूल ग्रन्थगत विशिष्ट शब्दानुक्रमणिका ६७ ७८ ४८ सघयण ३२ ६४ १२, ६८ ५२ सजम सयम सठाण सवर। सवर ससार 1- ५६, ९३ ५७ १३ '८८ सागर सारीर दुक्ख.. ५४ १०४ । सावय 4. , T. . A - ५६ ६८ an 3 ." ७ समाहि समाधि समाधि (स्वस्थता) सम्मद्दसण सम्यग्दर्शन तत्त्वार्थश्रद्धान सवियार सविचार अर्थ, व्यजन और योग की संक्रान्तिरूप विचार से सहित सवण्णु सर्वज्ञ तीर्थङ्कर, अरहन्त सकाइदोस शकादिदोष सम्यग्दर्शन के अतिचारभूत शका-काक्षा आदि सहनन सहनन-हड्डियो का बन्धनविशेष प्राणातिपातादि पापो से निवृत्ति सस्थान जीवो आदि के शरीर की आकृति मिथ्यात्वादि आस्रवो का निरोध, अशुभ कर्मों के आने का निरोध ससार जन्म-मरण आदि की परम्परा ससारहेड ससारहेतु ससार के कारण-राग-द्वेषादि ससारासुहाणुभाव . संसाराशुभानुभाव शुक्लध्यान मे चिन्तनीय अनुप्रेक्षा विशेष सागर .. लवणसमुद्रादि शारीरिक दुख शीत-आतप आदि शारीरिक दुख -श्वापद जलजन्तुविशेष . साहू- - साघु. मुनि सिरोरोग शिरोरोग शिर का रोग सील शील... व्रत आदि का समाधान सीलग शीलाग, पृथिवीकायविषयक सरम्भका परित्याग आदि श्रुत सामायिक आदि बिन्दुसार पर्यन्त श्रुत सुक्कझाण. ३ शुक्लध्यान शोक को नष्ट करने वाला, अथवा आठ प्रकार from के कुर्मरूप मल को शुद्ध करने वाला शुक्लध्यान. सुक्कलेस्सा शुक्ललेश्या पद्मलेश्या से विशुद्ध लेश्याविशेष सुहासव शुभास्रव, पुण्यासव सुहुमकिरियाऽनियट्टि, सूक्ष्मक्रिय-अनिवति जो शुक्लघ्यान सूक्ष्म क्रिया से युक्त होकर निवृत्त होने वाला नहीं होता, सूलरोग शूलरोग. रोगविशेष सेलेस. -शैलेश शैलेश-पर्वतो का राजा मेरु सेलेसी सुमेरु के समान स्थिरता (शलेशी), अथवा ani, ET - शीलेश सुमेरु के समान स्थिरता को प्राप्त ऋषि (शलर्षि), अथवा सर्वस्वरस्वरूप शीलो --17 सेलेसीगय शैलेशीगत शैलेशी अवस्था को प्राप्त अयोगकेवली .सोग. शोक, दीनता सोयण, ३. शोचन आसुओ से परिपूर्ण नेत्रो की दीनता जिज्ञासित धर्म से युक्त पदार्थों का गमक हेतु . सुअ. ક - . - . RAM १,५ १ १३ । . है m4 - ७६ शैलेशी, शैलर्षि, १ . की प्रभुता . क शोकर- ७६ १२ १०३ १५ ४८ 14- हेतु."

- 4 ५ टीकागत निरुक्त शब्द शब्द अनुप्रेक्षा असद्भुत असभ्य अस्तिकाय आचार्य - इत्यर्थः छमस्थ आतं निरुक्ति श अनु पश्चाद्भावे प्रेक्षणं प्रेक्षा, चारित्र सा च स्मृतिध्यानाद् भ्रष्टस्य चित्तचेष्टेत्यर्थः २ न सदभूतमसद्भूतम्, अनृत- मित्यर्थः २० सभायां साधु सभ्यम्, न सभ्य- मसभ्य जकार-मकारादि २० प्रस्तय. प्रदेशा, तेषा काया: अस्तिकायाः ५३ आचर्यतेऽसावाचार्यः, सूत्रार्था- वगमार्थ मुमुक्षुभिरासेव्यत ४७ कुशलकर्मण्याज्ञाप्यन्ते प्राणिन इत्याज्ञा ऋते भवमार्तम्, क्लिष्टमित्यर्थः ५ पारात् यातं सर्वहेयधर्मभ्य इत्यार्यम् इह धर्मध्यानारोहणार्थमा जगत् लम्व्यन्त इत्यालम्बनानि ४२ उपयुज्यतेऽनेनेत्युपयोगः साका जीव रानाकारादिः मिथ्यादर्शनाविरति -प्रमाद देव कषाय-योगः.क्रियत इति कर्म ज्ञानावरणीयादि १,३३ धर्म कुत्सितं निन्दितं शील वृत्तं पेषा ते कुशीला', ते च घयंध्यान तथाविधा द्यूतकारादयः ३५ ध्यान ग्रसति बुढ्यादीन् गुणान्, गम्यो वा करादिनामिति ग्राम, सन्निवेशविशेषः ३६ | पाप चक्र प्रहरणम्, तेन विजया- प्रमाण धिपत्ये वर्तित शोलं येषा ते ' चक्रवर्तिनः भरतादयः & निरुक्ति 'चर गति-भक्षणयो' इत्यस्य 'अति - लू-धू-सू-खनि-सहि चर इत्रन्, इतीत्रन्प्रत्या- न्तस्य चरित्रमिति भवति, चरन्त्यनिन्दितमनेनेति चरित्र क्षयोपशमरूपम्, तस्य भाववश्चारित्रम्, एतदुक्त भवति इहान्यजन्मोपात्ताष्ट- विधकर्मसञ्चयापचयाय चरणभावश्चारित्रमिति, सर्वसावद्ययोगविनिवृत्तिरूपा क्रिया इत्यर्थः। छादयतीति छम पिधानम्, तच्च ज्ञानादिगुणानामावा- रकत्वाग्ज्ञानावरणादिलक्षण : पौतिकर्म, छपनि स्थिवाएछ- द्यस्था', अकेवलिन इत्यर्थः जगन्ति जनमान्यादुर्जगद् शेवं बराचरम् । ३४ जीवात जीविष्यति जीवित- . वान् वा जीप ईति दीव्यन्तीति देवाः भवववा- स्वादयः दुर्गती प्रपतन्तमात्मान धारय. तीति धर्म. श्रुत-चरणधर्मानुगत धर्म्यम् घ्यायते चिन्त्यतेऽनेन तत्त्वमिति ध्यानम्, एकाग्रचित्तनिरोष इत्यर्थः पातयति नरकादिष्विति पापम् ४० प्रमीयते ज्ञेयमेभिरिति प्रमा- णानि द्रव्यादीनि प्रकर्षण श्रमः प्रथम खेद, स ५ उपयोग कर्म - - कुक्षील ग्राम s चक्रवर्ती - प्रथम टीकागत निरुक्त शब्द ५३ लोक्यते इति लोक वसन्त्यस्मिन् गुण-पर्याया इति वस्तु चेतनादि mm विषीदन्ति एतेषु सत्ता प्राणिन इति विषया इन्द्रियगोचरा ६ च स्व-परसमयतत्त्वाधि लोक गमरूपः ३२ वस्तु भवन्त्यस्मिन् कर्मवशवतिनः प्राणिन इति भवः संसार विषय एवं ५ भावना भाव्यत इति भावना, ध्याना- भ्यासक्रियेत्यर्थ. २ | वीर मध्यस्थ मध्ये तिष्ठतीति मध्यस्था, राग-द्वेषयोरिति गम्यते ११ मनोज्ञ मनसोऽनुकूलानि मनोज्ञानि ६ मुनि मन्यते जगतस्त्रिकालावस्था- शरण्य ११,६० मुति मन्यन्ते जीवादीन् पदार्था- निति मुनयो विपश्चित्साधवः ३६ योग । युज्यन्त इति योगाः मनोवा शुक्ल क्कायव्यापारलक्षणा:XX युज्यते वानेन केवलज्ञाना शुक्ल दिनां मास्मेति योगः-धर्म- शुक्लध्यानलक्षणः "१ | हेतु योगीश्वर सः (बीख:) वा विद्यत इति । योगिनः साधवः मिति मुनिः -- 'ईर गति-प्रेरणयो' इत्यस्य विपूर्वस्याजन्तस्य, बिशेषेण ईरयति कर्म गमयति याति वेह शिवमिति वीर. शरणे साधुः शरण्यः, त रागा- दिपरिभूताश्रितसत्त्ववत्सल रक्षकमित्यर्थ. शुच क्लमयतीति शुक्लम्, शोक मुलपयतीत्यर्थः शोधयत्यष्टप्रकार कर्ममलं शुच वा.क्लमयतीति शुक्लम् हिनोति गमयति जिज्ञासितधर्म- विशिष्टान निति हेतुः कारको व्यज्जकरच . ५ 4 टीकागत अवतरणवाक्य र 8 -- ४५ - + अज्ञानं खलु कष्टं जगन्ति जङ्गमान्याहुर्जगद् ज्ञेयं चराचरम् ३४ अज्ञानान्धाचटुलवनिता जन्म-जरा-मरणभयै [प्रशमरति. १५२] अट्टेण तिरिक्खगई ५ जन्म मरणाग नियत ३४ अनुवादादरवीप्सा ज अण्णाणी कम्मं [प्रव. सा. अन्योऽह स्वजनात् परि [प्रशमरति. १५४] ६५ - जिणवयणमोदगस्स उ ४५ अति-लू-धू-मू-खनि-सहि-चर इत्रन् ३३ | जीवाइवत्थुचितण अशुचिकरणसामर्थ्या- [प्रशमरति. १५५] ६५ | जीवाना पुद्गलाना च गत्युपग्रहकारणम् ५३ अहवा सेलुल्व इसी [विशेषा. ३६६४] ७६ / जीवाना पूद्गलाना च धर्माधर्मास्तिकाययोः ५३ आगमश्चोपपत्तिश्च ८५ / जीवाना पुद्गलानां च स्थित्युपग्रहकारणम् आज्ञापाय-विपाक-संस्थानविचयाय धर्म्यम् जीवा पाविति इहं । [त. सू. ६-३७] ४४ | जूहयर-सोलमेठा ३५ आर्तममोज्ञानां सम्प्रयोग [त. सू. ६, ३१-३४] ५ जो किर जहण्णाजोमो [विशेषाः ३६६१] ७६ इष्टजनसप्रयोगद्धि [प्रशमरति. १५१] ज्ञानात्मा सर्वभावज्ञो उजुसैढिं पडिवण्णो [विशेषा. ३७०८] ७६ | तणुरोहारंभाओ [प्र. ३६६७] उत्पाद-ध्यय-ध्रौव्ययुक्त सत् [त. सू. ५-२६ ५२ / तदसङ्ख[ग] गुणविहीणे. [३६५८] ७६ उववाओ लंतगमि ४५ / तयसखेज्जगुणाए [३६८०] ७६ एकस्य जन्म-मरणे [प्रशमरति. १५३] ६५ | तस्सोदइया भावा [३६८५] ७६ एक्का य प्रणेगेसि १] तीसा य पन्नवीसा ५४ एव च गश्मच-सुक्कझाणाइ दुग ६४ | तेषा करतढभ्रष्टः ४५ एवविहा गिरा मे ३७ थिरे णामेगे णो कयजोगे इत्यावि ओरालियाहिं सव्वाहि [विशेषा. ३६८४] ७६ | दवप्रो सुयनाणी उवउत्ते सव्वदव्वाइ जाणई ४५ औदारिकादिशरीरयुक्तस्यात्मनो वीर्यपरिणति दनमणोजोएण विशेषः काययोगः....."मनोयोगः इति ३ | दृष्ट्यादिभेदमिन्नस्य कालो परमनिरुद्धी ३ | दोसानलससत्तो ५० काहं अछित्ति अदुवा १२ | द्रव्यादेशादित्येषा द्वादशङ्गी न कदाकिन्ना किरियासु वट्टमाणा सीत् इत्यादि ४५ कूरावि सहावेण ४५ | देषः सम्पद्यमानोऽपि कृत्वा पूर्व विधान ५१ | घम्मत्थिकाए घम्मत्यिकायस्स देसे धम्मत्यि- कृष्णादिद्रव्यसाचिव्यात् १४ कायस्स पएसे ५२ कोहो य माणो य अणिग्गहीदा धर्मोऽय स्वाख्यातो [प्रशमरति. १६१] गीयत्थो जयणाए १२ धी ससारो इत्यादि गुण-पर्यायवद् द्रव्यमिति [त सू. ५-३७] ३१ | नर-नरय-तिरिय-सुरगण ५२ / नवि अत्थि मानुसाणं ६१ घट-मौलि-सुवर्णार्थी [आप्तमी टोकागत प्रवतरणवाक्य ३ ३२ ५२ ५२ ४५ ८८ ७६ णाम ठवणा दविए ५३ सत्त पाणूनि से थोव नो इहलोगट्ठयाए नो परलोगट्टयाए ४६ / सत्तेवय कोडीनो पज्जत्तमित्तविदिय (विशेषा. ३६५६) ७६ स द्विविधोऽष्ट-चतुर्भेदा [त. सू २-६] पज्जत्तमित्तसन्निस्स [३६५७] ७६ | स-परसमयकोसल्ल पञ्चावात् इत्यादि ६८ | समचउरसे नग्गोहमडले पभूण चोद्दसपुन्वी "४५ सर्वव्यक्तिषु नियत पयोव्रतो न दध्यत्ति [प्राप्तमी ] ५२ / सर्वे जीवा न हन्तव्या. इत्यादि परलोगमि वि एवं ५०. सव्वट्ठाणाणि प्रसासयाणि इत्यादि परिमडले य वट्टे ५२ | सव्वनदीण जा पिशुन सूचक विदुः इति वचनात् २० | सव्ववइजोगरोह [विशेषा. ३६६०] मणुयगइ-जाइ [विशेषा. ३६८२] ७६ | सव्वसुरासुर-माणस मतुयथमि मुणिज्जइ ५७ | सव्वसुरेहितो वि हु माता भूत्वा दुहिता [प्रशमरति. १५६] सच खवेइ त पुण [विशेषा. ३६८३] सव्वेवि य सिद्धता मानुष्यकर्मभूम्या [प्रशमरति. १६२] सभवनो जिणणाम [विशेषा ३६८३] मिच्छत्तमोहियमई ५० सील व समाहाण [विशेषा. ३६६५] मिथ्यादृष्टिरविरत. [प्रशमरति. १५७] ६५ सुयणाणमि नेउण्ण" मोक्षे भवे च सर्वत्र यद्वद्विशेषणादुपचितो [प्रशमरति. १५६]'६५ / सैलेसो किर मेरु [विशेषा ३६६३] सुसमाहियकर-पायस्स या पुण्य-पापयोर-[प्रशमरति. १५८] स्थित शीताशुवज्जीव रागः सम्पद्यमानोऽपि ५०.स्पर्श-रसगन्ध-वर्ण रागाद् वा द्वेषाद् वा हट्ठस्स अणवगल्लस्स. ... . रिभियपयवखरसरला हस्सक्खराइ मज्झष [विशेषा. ३६६६] रु भइ स कायजीन [विशेषा. ३६६२] ७६ हेट्ठा मज्झे उवरि लोकस्याषस्तिर्यग् [प्रशमरति. १६०] ६५ | हेट्ठोवरि जोयणस्स ६५ ७३ ४५ - + - . ७६ T१२ A ७६ १०२ . +Mv- ४६ U ३ ७६ -- " - - ५४ ।

। ७ टीका के अनुसार पाठभेद १. राग-द्वेष-मोहावितस्य, आकुलस्य वेति पाठान्तरम् । गा. २४ २. नियताः परिच्छिन्ना, पाठान्तरं वा जनिता । गा. ३० ३. परिनिर्वाणपुरं वेति पाठान्तरम् । गा. ६० ४. मन्त्र-योगाभ्यामिति च पाठान्तर वा। गा. ७१ ? ८ टीकानुसार मतभेद १. अन्ये पुनरिदं गाथाद्वयं चतुर्भेदमप्यार्तध्यानमधिकृत्य साधोः प्रतिषेधरूपतया व्याचक्षते । गा.१२ । २. अनेन किलानागतकालपरिग्रह इति वृक्षाः न्याचक्षते । गा.८ ३. अन्ये तु व्याचक्षते तिर्यग्गतावेव प्रभूतसत्त्वसम्भवात् संसारोपचारः इति । गा. १३ ४. प्रकृति-स्थित्यनुमाव-प्रदेशबन्धभेदग्राहक इत्यन्ये । गा. ५० है टीकागत ग्रन्यनामोल्लेखादि - i + 14 . 3 १. उक्तं च भगवता वाचकमुख्येने। गा. ५ २. उक्त च परममुनिभिः-पुवि खलु । गा. ११ ३. उक्तं चोमीस्वातिवाचकन-हिंसानृत-स्तेयं-विषयसंरक्षणेभ्यो रोदम् । गा.१८ ४. सिंहमारकवत् । गा. २७ ५. एतेषा स्वरूप व प्रत्याख्यानाध्यये न्यक्षेणं वक्ष्यामः । मा. ३२ ६. श्रूयन्ते च चिलातीपुत्रादयः एवविधा बहव. इति । गा. ४५ ७. तवा च स्तुतिकारेणाप्युक्तम्-कल्पद्रुम. कल्पितमात्रदायी.....॥ गा. ४५ ८. भावार्थः पुन. वृद्धविवराणादवसेय. xxx जहा कम्मपयडीए तहा विसेसेण विचितिजा xxx वित्थरो कम्मपयडीए भणियाणं कम्मविवागं विचितेजा। गा. ५१ ६. भावार्यश्चतुर्विशतिस्तवविधरणादवसेय. । गा. ५३ १०. याष-तुषमरुदेव्यावीनामपूर्वधराणामपि तदुपपत्तेः। गा. ६४ ११. भावार्थो नमस्कारनियुक्ती प्रतिपादित एव । गा. ७६ १२. मरुदेव्यादीना वन्यथा। गा. ७७ १० टीकागत न्यायोक्तियां १. यपोद्देशस्तथा निर्देश इति न्यायादातव्यानस्य स्वरूपाभिधानावसरः । मा. ५ २ एकग्रहणे तज्जातीयग्रहणमिति साळ्याश्च योग्य यतिनपुसकस्य च । गा. ३५ ३ एकमहणे तज्जातीयग्रहणात् नगर-खेट कर्वटादिपरिग्रहः इति । गा. ३६ ४. एकग्रहणे तज्जातीयग्रहणात् अदत्तादान मैथुन-परिग्रहाधुपरोषरहितश्च । गा. ३७ श्री-भास्कर-नन्दि-विरचितः ध्यानस्तवः

ध्यान माहात्म्य
ध्यानाज्जिनेश ! भवतो भविनः क्षण
देहं विहाय परमात्मदशां व्रजन्ति ।
तीव्रानलादुपलभावमपास्य लोके
चामीकरत्वमचिरादिव धातुभेदाः ॥
प्रा. कुमुदचन्द्र-कल्याणमन्दिर १५.

- श्री भास्करनन्दि-विरचितः ध्यानस्तवः 4 परमज्ञानसवेद्यं चीतवाध सुखादिवत् । सिद्ध प्रमाणतः सावं सर्वज्ञ सर्वदोषहम् ॥१॥ अन्तातीतगुणाकीणं योगाढ्यर्वास्तवैः स्तवैः। संस्तुवे परमात्मान लोकनाथं स्वसिद्धये ॥२॥ नो परमात्मा उत्कृष्ट ज्ञान के द्वारा सवेद्य (जानने के योग्य), सुखादि के समान बाधा से, रहित, प्रमाण से सिद्ध, सबके हित मे उद्यत, समस्त पदार्थों का ज्ञाता, समस्त दोषों का विनाशक अनन्त गुणो से व्याप्त और लोक का अधिनायक है; उस की मै (भास्करनन्दी) योग से सम्पन्न वस्तुभूत स्तवनो के द्वारा आत्मसिद्धि के लिए स्तुति करता हूं। विवेचन-यहाँ योग (ध्यान) की प्ररूपणा मे उद्यत होकर ग्रन्थकार भास्करनन्दी यह अभिप्राय प्रगट करते हैं कि जो भी सब दोषो को नष्ट करके परमात्मा होता है वह योग के प्राश्रय से-धर्म और शुक्ल ध्यान के प्रभाव से ही होता है। इसलिए मैं उस परमात्मा को योग से सम्पन्न-ध्यान के प्ररूपक-स्तोत्रो के द्वारा स्तुति करता हू । प्रयोजन उसका स्वसिद्धि-प्रात्मोपलब्धि है ॥१-२॥ वह सिद्धि क्या है, किसके होती है, और उसका उपाय क्या है, इसे पागे स्पष्ट किया जाता सिद्धिः स्वात्मोपलम्भः स्याच्छुद्धध्यानोपयोगतः । सम्यग्दृष्टेरसगस्य तत्वविज्ञानपूर्वतः[कः] शुद्ध ध्यान के उपयोग से-शुक्ल ध्यान के प्राश्रय से-जो निज प्रात्मा की उपलब्धि- स्वात्मानुभवन-होता है उसका नाम सिद्धि है। वह प्रसंग-ममत्वबुद्धि से रहित-सम्यग्दृष्टि के सम्यग्ज्ञानपूर्वक होती है । विवेचन-ज्ञानावरणादि पाठ कर्मों के नष्ट हो जाने पर जीव को जो प्रात्मस्वरूप को प्राप्ति होती है उसे सिद्धि कहा जाता है । मुक्ति या मोक्ष इसी के नामान्तर हैं । इस सिद्धि के साधन सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र हैं । इनकी पूर्णता शुक्लध्यान के आश्रय से हुआ करती है। इसी अभिप्राय को व्यक्त करते हुए ग्रन्थकार ने प्रकृत श्लोक मे उक्त सिद्धि का अधिकारी उस सम्यग्दृष्टि जीव को बत- लाया है जो ध्यान के बल से तत्त्वज्ञानपूर्वक प्रसंग हो चुका है। दृष्टि, दर्शन, रुचि और श्रद्धा ये समानार्थक शब्द हैं । जिस जीव की वह दृष्टि मिथ्यात्व को छोडकर यथार्थता को प्राप्त कर चुकी है वह सम्यग्दृष्टि कहलाता है। सम्यग्दर्शन के प्राप्त हो जाने पर जीव के जो होनाधिक ज्ञान होता है वह सम्यकस्वरूप मे परिणत होकर सम्यग्ज्ञान कहलाता है। सम्यग्ज्ञान को प्राप्त हुना मुमुक्षु जीव प्रात्मो- त्यान के लिए क्रम से घय॑ध्यान और शुक्लध्यान का प्राश्रय लेता है और उसके प्रभाव शुद्ध प्रात्मस्वरूप के आच्छादक कर्म-कलक को नष्ट करता हुआ असग हो जाता है । संग, मूर्छा, परिग्रह, राग-द्वेष,और प्रासक्ति ये समानार्थक शब्द हैं। राग-द्वेष अथवा प्रासक्ति के उत्तरोतर होन होते जाने से नौव पूर्णतया स्वावलम्बी होकर जो, परम वीतरागता को प्राप्त कर लेता है, यही सर्वोत्कृष्ट प्रकार स्वरूप से प्रसिद्ध उक्त सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र के द्वारा -है- मुक्त हो जाता है ॥३॥ , क ४ ध्यानस्तवः कर्माभावे ह्यनन्तानां ज्ञानादीनामवापनम् । उपलम्भोऽथवा सोक्ता त्वया स्वप्रतिभासनम् ॥ अथवा-कर्मों के विनष्ट हो जाने पर जो अनन्त ज्ञानादि की प्राप्ति होती है, यही स्वात्मा की उपलब्धि है जो प्रात्मप्रतिभासस्वरूप है । इसे ही हे भगवन् ! अापने सिद्धि कहा है ।। विवेचन-ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, प्रायु, नाम, गोत्र और अन्तराय ये पाठ कर्म हैं। इनमे ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय ये चार घातिया कर्म हैं जो क्रम से ज्ञान, दर्शन, सम्यक्त्व और वीर्य इनके विघातक हैं। उनका प्रभाव हो जाने पर जीव सयोग- केवली नामक तेरहवें गुणस्थान को प्राप्त कर अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख और अनन्त वीर्य स्वरूप अनन्तचतुष्टय को प्राप्त कर लेता है । यही पार्हन्त्य अवस्था अथवा जीवन्मुक्ति है। तत्पश्चात् अयोगकेवली नामक चौदहवें गुणस्थान मे वेदनीय, प्रायु, नाम और गोत्र इन चार अघातिया कर्मों के भी नष्ट हो जाने पर जीव सिद्ध होकर निर्वाध शाश्वतिक सुख को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार सिद्धि को प्राप्त हुआ मुक्तारमा उक्त आठ कर्मों के अभाव मे क्रम से केवलज्ञान, केवलदर्शन, अव्याबाघत्व, क्षायिक सम्यक्त्व, अवगाहनत्व, सूक्ष्मत्व, अगुरुलधुत्व और अनन्त वीर्य इन आठ गुणो का स्वामी हो जाता है। कहा भी गया है- मोहो खाइयसम्म केवलणाण च केवलालोयं । हणदि हु प्रावरणदुर्ग अणंतविरियं हर्णेदि विग्ध तु । सुहुमं च णामकम्म हणेदि पाऊ हणेदि अवगहण । अगुरुलहुग च गोदं अव्वाबाहं हणेइ वेयणिय ॥ (गो. जी. जी. प्र. टीका ६८ उद्धृत) अर्थात् मोहनीय कर्म क्षायिक सम्यक्त्व का, दो आवरण-ज्ञानावरण और दर्शनावरण-क्रम से केवलज्ञान और केवलदर्शन का, विघ्न (अन्तराय कर्म) अनन्त वीर्य का, नामकर्म सूक्ष्मत्व का, आयुकर्म अवगाहनत्व का, गोत्रकर्म अगुरुलघुत्व का और वेदनीय अव्यावाघत्व का घात करता है ॥४॥ आगे यह दिखलाते हैं कि ज्ञानस्वरूप प्रात्मा का अनुभव होने पर ही ध्यान सम्भव है, उसके विना वह सम्भव नहीं है- समाधिस्थस्य यद्यात्मा ज्ञानात्मा नावभासते। न तद् ध्यानं त्वया देव गीत मोहस्वभावकम् ॥ हे देव ! जो समाधि मे स्थित है उसे यदि प्रात्मा ज्ञानस्वरूप प्रतिभासित नहीं होता है तो आपने उसके उस ध्यान को मोहस्वरूप होने के कारण ध्यान नहीं कहा ॥ विवेचन यद्यपि सामान्य से चार प्रकार के ध्यान के अन्तर्गत पात व रौद्र भी हैं, परन्तु यहां ध्यान से समीचीन ध्यान की विवक्षा रही है, लोकरूढि मे भी ध्यान से समीचीन ध्यान का ही ग्रहण किया जाता है । वह समीचीन ध्यान मिथ्यादृष्टि के सम्भव नहीं है, किन्तु सम्यग्दृष्टि के ही होता है । इसीलिए यहा यह कहा गया है कि जिसे शरीरादि से भिन्न ज्ञानस्वरूप प्रात्मा का प्रतिभास नहीं होता उसके समाधिस्थ जैसे होने पर भी वस्तुत. ध्यान सम्भव नहीं है । कारण यह कि मिथ्यात्व से ग्रसित होने के कारण उसे स्व-पर का विवेक ही नहीं हो सकता ॥५॥ आगे ध्यान का स्वरूप कहा जाता है- नानालम्बनचिन्ताया यदेकार्थे नियन्त्रणम् । उक्त देव त्वया ध्यान न जाड्य तुच्छतापि वा ।। अनेक पदार्थो का आलम्बन लेने वाली चिन्ता को जो एक ही पदार्थ में नियत्रित किया जाता है, इसे हे देव ! प्रापने ध्यान कहा है। वह ध्यान न तो जड़ता स्वरूप है और न तुच्छता रूप भी है । विवेचन-"उत्तमसहननस्य॑काग्रचिन्तानिरोधोयानम्" इस सूत्र में कहा गया है कि मनेक पदार्थों की ओर से चिन्ता को हटाकर उसे एक पदार्थ पर रोकना, यह ध्यान कहलाता है और वह उत्तम संहनन वाले के अन्तर्मुहूर्त काल तक होता है । १. त. सू.६-२७.

ध्यानलक्षणम् ५ - - एकाग्रचिन्तानिरोधस्वरूप इस ध्यान के लक्षण को स्पष्ट करते हुए आचार्य प्रकलंक देव के द्वारा कहा गया है कि 'अग्न' का निरुक्तार्थ मुख अथवा अर्थ (पदार्थ) है, तथा पदार्थों के विषय में जो अन्त - करण का व्यापार होता है उसका नाम चिन्ता है । इसका अभिप्राय यह है कि गमन, भोजन, शयन एवं अध्ययन प्रादि अनेक क्रियाओं में अनियमितता से प्रवर्तमान मन को जो किसी एक क्रिया के कर्तारूप से अवस्थित किया जाता है, इसे एकाग्रचिन्तानिरोध कहा जाता है। फलितार्थ यह है कि एक द्रव्य परमाणु अथवा भाव परमाणु रूप अर्थ मे जो चिन्ता को नियत्रित किया जाता है, इसे ध्यान समझना चाहिए। जिस प्रकार वायु के प्रभाव मे निर्वाधरूप से जलने वाली दीपक की लौ चंचलता से रहित (स्थिर) होती है उसी प्रकार प्रात्मा के वीर्यविशेष से विभिन्न पदार्थों की ओर से रोकी जाने वाली चिन्ता बचलता से रहित होती हुई एकाग्रस्वरूप से स्थित होती है। लगभग यही अभिप्राय तत्त्वार्थश्लोकवातिफ के रचयिता प्राचार्य विद्यानन्द का भी रहा है। तत्त्वार्याधिगम भाष्यानुसारिणी टीकामो के कर्ता हरिभद्र सूरि और सिद्धसेन गणि अपनी अपनी टीका मे समान रूप से 'अग्न' का अर्थ श्रालम्बन और 'चिन्ता' का अर्थ चचल चित्त करते हैं । उक्त चचल चित्त के अन्यत्र होने वाले संचार को रोककर उसे एक के आश्रित अवस्थित करना, यह निरोध का अभिप्राय है । तात्पर्य यह है कि एक वस्तु का प्राश्रय लेने वाला जो स्थिर अध्यवसान है उसका नाम ध्यान है। इस प्रकार का वह ध्यान छद्मस्थो के ही होता है, केवलियो के नहीं । फेवलियो का ध्यान वचन और काय योगों के निरोधस्वरूप है । कारण यह कि उनके चित्त का अभाव हो चुका है। यही अभिप्राय ध्यानशतक मे भी प्रगट किया गया है। प्रकृत श्लोक मे भास्करनन्दी ने जो अनेक अर्थों का पालम्बन लेने वाली चिन्ता के एक अर्थ में नियत्रित करने को ध्यान कहा है वह उक्त तत्त्वार्थवार्तिक आदि का अनुसरण करने वाला है। यहां भास्करनन्दी ने यह भी कहा है कि वह ध्यान जड़ता अथवा तुच्छता रूप नहीं है । इसका कुछ स्पष्टीकरण हमे तत्त्वार्थश्लोकवातिक मे उपलब्ध होता है। वहा शका के रूप मे यह कहा गया है कि ध्यान (योग) का स्वरूप तो चित्तवृत्ति का निरोध है, न कि एकाग्रचिन्तानिरोध ? इस शंका के ऊपर प्रतिशंका उप- स्थित करते हुए पूछा गया है कि चित्तवृत्तिनिरोध से क्या आपको समस्त चित्तवृत्तियों के निरोधरूप तुच्छ प्रभाव अभीष्ट है अथवा वह (चित्तवृत्ति का निरोध) स्थिर ज्ञानस्वरूप अभीष्ट है ? इनमे समस्त चित्तवृत्तियों के निरोधस्वरूप तुच्छ प्रभाव को यदि ध्यान माना जाता है तो वह प्रमाणसगत नहीं है। परन्तु इसके विपरीत यदि उस चित्तवृत्तिनिरोध को स्थिर ज्ञानस्वरूप स्वीकार किया जाता है तो वह हमें अभीष्ट है। इस प्रकार प्रकृति में जो तुच्छतारूप ध्यान का निषेध किया गया है उसका आधार निश्चित ही तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक का उक्त प्रसग रहा है, ऐसा प्रतीत होता है । इसके अतिरिक्त जड़तास्वरूप ध्यान का जो निषेध किया गया है वह प्रायः साख्य मत के अभिप्राय को लेकर किया गया है। सांख्य मत के अनुसार प्रकृति (प्रधान) और पुरुष ये दो तत्त्व प्रमुख हैं। इनमे पुरुष को स्वभावतः ज्ञान से रहित माना गया है। इसका कारण यह रहा है कि ज्ञान प्रनित्य है, और तब वैसी अवस्था मे पुरुष को उस ज्ञान से अभिन्न मानने पर उसके जो अनित्यता का प्रसग प्राप्त होगा वह दुनिवार होगा। इस प्रकार १. त वा ६, २७, ३-७, पृ. ६२५ २. त. श्लो ६, २७, ५-६, पृ. ४९८-६६. ३. त भा हरि. व सिद्ध. वृत्ति ६-२७. ४. ध्यानशतक २-३. ५. त. श्लो ६, २७, १-२ (यहा पाठ कुछ त्रुटित हो गया दिखता है)।

६ - ध्यानस्तवः [७- पुरुष के ज्ञान (चेतनता) से रहित होने पर ध्यान भी जड़ता को प्राप्त होता है। सम्भवतः इसी अभि- प्राय को लेकर जड़रूपता का भी निषेध किया गया है। यह अभिप्राय भी उक्त तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक में निहित है ॥६॥ यह वस्तुस्वरूप अध्यात्मवेदी के अनुभव में स्वयं प्राता है, यह आगे कहा जाता है- ज्ञस्वभावमुदासीनं स्वस्वरूप प्रपश्यता। स्फुटं प्रकाशते पुंसस्तत्त्वमध्यात्मवेदिनः ॥७॥ जीव का स्वरूप ज्ञानमय व उदासीन-राग-द्वेष से रहित है, इसे जो देखता-जानता है उस अध्यात्मवेदी को स्पष्ट रूप से तत्त्व प्रतिभासित होता है । विवेचन-पीछे श्लोक ५ मे यह कहा जा चुका है कि समाधि मे स्थित होते हुए भी जिसे ज्ञान- मय आत्मा प्रतिभासित नहीं होता है उसका वह ध्यान वस्तुत ध्यान नहीं है, किन्तु मोहरूप होने से वह ध्यानाभास है। इस पर यह शंका हो सकती थी कि तो फिर ध्यान किसके सम्भव है ? इसके समा- धान स्वरूप यहां यह कहा गया है कि जो ज्ञायकस्वभावरूप प्रात्मस्वरूप को देख रहा है, ध्यान यथार्थतः उसके होता है, क्योकि वह मोह से रहित होकर प्रात्मतत्त्व को जानता है ॥७॥ आगे ध्यान के भेद और उनके फल का निर्देश किया जाता है-- आर्त रौद्र तथा धर्म्य शुक्ल चेति चतुर्विधम् । तत्राद्यं संसृतेहेतुद्वयं मोक्षस्य तत्परम् ॥८॥ ध्यान प्रात, रौद्र, धर्म्य और शुक्ल के भेद से चार प्रकार का है। उनमे प्रथम दो ध्यान मार्त और रौद्र-संसार के कारण हैं तथा अन्तिम दो-धर्म्य और शुक्ल-मोक्ष के कारण हैं ।।८।। प्रागे ध्यान के उक्त चार भेदो मे प्रथमत प्रार्तध्यान का स्वरूप दो श्लोको मे कहा जाता है- विप्रयोगे मनोज्ञस्य सप्रयोगाय संततम् । सयोगे चामनोज्ञस्य तद्वियोगाय या स्मृतिः ॥६॥ पुंसः पीडाविनाशाय स्यादात सनिदानकम् । गृहस्थस्य निदानेन विना साधोस्त्रयं क्वचित् ।। अभीष्ट पदार्थ का वियोग होने पर उसके सयोग के लिए, अनिष्ट का सयोग होने पर उसके वियोग के लिए, तथा पीडा के विनाश के लिए जो जीव के निरन्तर स्मरण या चिन्तन होता है वह आर्तध्यान कहलाता है। साथ ही भोगाकांक्षारूप जो निदान है वह भी प्रार्तध्यान के अन्तर्गत है। इस प्रकार विषयभेद से प्रार्तध्यान चार प्रकार का है । उनमे गृहस्थ के तो वे चारो सम्भव हैं, परन्तु साधु के निदान के विना पूर्व के तीन पातध्यान कदाचित् हो सकते हैं । विवेचन-पात यह 'ऋत' शब्द से बना है। ऋत का अर्थ दुख होता है, तदनुसार दुख के निमित्त से या दुख मे जो सक्लेश परिणाम होता है उसे प्रार्तध्यान कहा जाता है। वह विषय के भेद से चार प्रकार का है---१. अभीष्ट स्त्री-पुत्रादि अथवा धन-सम्पत्ति आदि का वियोग होने पर उनके संयोग के लिए जो विचार रहता है यह प्रथम प्रार्तध्यान है। इसी प्रकार इप्ट पदार्थों के सयोग के होने पर उनका कभी वियोग न हो इसके लिए, और यदि उनका सयोग नहीं है तो किस प्रकार से उनकी प्राप्ति हो इसके लिए भी जो निरन्तर सक्लेशरूप परिणाम रहता है, यह सब प्रथम प्रार्तध्यान के अन्तर्गत २ अनिष्ट पदार्थ का सयोग होने पर किस प्रकार उसका मुझसे वियोग हो, इसके लिए जो निरन्तरचिन्तन होता है, तथा भविष्य मे कभी किसी अनिष्ट पदार्थ का संयोग न हो, इसके लिए भी जो निरन्तर विचार रहता है, यह दूमरा प्रार्तध्यान है। ३. रोगादिजनित पीड़ा के होने पर उससे फिस प्रकार छुटकारा हो, इसके लिए तथा यदि पीड़ा न भी हो तो भी भविष्य मे कभी किसी प्रकार को पीडा न हो, इसके लिए भी जो निरन्तर विचार रहता है, यह तीसरा प्रार्तध्यान माना गया है । ४. भविष्य मे इन्द्र व चक्र वर्ती श्रादि के भोगो की प्राप्ति के लिए जो यह प्रार्थना की जाती है कि मेरे द्वारा अनुण्ठित तप व सयम के प्रभाव से मुझे अमुक प्रकार का सुख प्राप्त हो, इसका नाम निदान है। यह चौथे प्रकार का प्रार्तध्यान त. श्लो. ६, २७, ३, पृ. ४६७-६८. - १. ।

पार्त-रौद्र-धर्म्यध्यानानां स्वरूपम् ७ . - है। उमत चार प्रकार के प्रातध्यान मे गृहस्थ के तो वे चारों ही हो सकते हैं, किन्तु मुनि के निदान नहीं होता-शेष तीन उसके भी हो सकते हैं । यह दुनि तियंचगति का कारण है ॥६-१०॥ मागे रौद्रध्यान के स्वरूप व उसके स्वामी का निर्देश किया जाता है- हिंसनासत्यचौर्यार्थरक्षणेभ्यः प्रजायते । करो भावो हि यो हिलो रौद्रं तद् गृहिणो मतम् ॥ हिंसा, प्रसत्य, चोरी और धनसंरक्षण के लिए जो हिंसाजनक र भाव होता है वह रौद्रध्यान कहलाता है और वह गृहस्थ के माना गया है-मुनि के वह नहीं होता है । विवेचन-'रोदयति परान् इति रुद्रः' इस निरुक्ति के अनुसार जो दूसरों को रुलाता है उसे रुद्र कहा जाता है। तदनुसार क्रूर प्राणी अथवा दुख के कारण को रुद्र समझना चाहिए। इस प्रकार क्रूर प्राणी के द्वारा किये जाने वाले कार्य का नाम रौद्रध्यान है। वह विषय (ध्येय) के भेद से चार प्रकार का है-हिसानुबन्धी, मषानुबन्धी, स्तेयानुवन्धी और विषयसरक्षणानुवन्धी। दूसरे प्राणियों के वध- बन्धन प्रादि का जो निरन्तर विचार रहता है, यह प्रथम (हिसानुबन्धी) रौद्र ध्यान है। असत्य, असभ्य अथवा जिससे दूसरे प्राणी को दुख पहुंचने वाला हो ऐसे वचन के बोलने की जो प्रवृत्ति होती है उसे भवानुबन्धी रौद्रध्यान कहते हैं । अतिशय क्रोध अथवा लोभ के वश होकर जो दूसरे के द्रव्य के हरण का विचार होता है वह स्तेयानुबन्धी रोद्रध्यान कहलाता है । इन्द्रियविषयों के साधनभूत धन के संरक्षण का जो निरन्तर विचार रहता है उसका नाम विषयसरक्षणानुबन्धी (चौथा) रौद्रध्यान है। यह चार प्रकार का निकृष्ट रौद्रध्यान मिथ्यादृष्टि प्रादि सयतासयत पर्यन्त पाच गुणस्थानो मे ही सम्भव है, प्रमत्तसंयतादि शेष गुणस्थानो मे वह सम्भव नहीं है । वह नरकगति का कारण है ॥११॥ अब क्रमप्राप्त धर्म्यध्यान के स्वरूप को दिखलाते हुए धर्म का स्वरूप प्रगट करते हैं- जिनाजा-कलुषापाय-कर्मपाकविचारणा। लोकसंस्थानविचारश्च धर्मो देव त्वयोदितः॥१२॥ अनपेतं ततो धर्माद्यत्तद् धयं चतुर्विधम् । उत्तमो वा तितिक्षादिर्वस्तुरूपस्तथापरः ॥१३॥ जिनदेव की प्राज्ञा (जिनागम), पाप के अपाय, कर्म के विपाक और लोक के आकार का जो विचार किया जाता है उसे हे देव ! आपने धर्म कहा है। उस धर्म से जो दूर नहीं है उससे परिपूर्ण है-वह धम्यंध्यान कहलाता है, जो विषय के भेद से चार प्रकार का है। अथवा उत्तम क्षमा-मार्दवादि- स्वरूप धर्म का लक्षण जानना चाहिए, वस्तु का जो स्वरूप या स्वभाव है उसे भी प्रकारान्तर से धर्म कहा जाता है। विवेचन-जो विचार धर्म से सम्पन्न होता है उसे यहां धर्म्यघ्यान कहा गया है। प्रसंगवश यहां धर्म के स्वरूप का विचार करते हुए प्रथमतः जिनाज्ञा आदि के विचार को धर्म बतलाया है। वह उक्त जिनाना प्रादि के भेद से चार प्रकार का है। इनमे जिनाज्ञा (जिनागम) का विचार करते धर्मध्यानी यह विचार करता है कि तत्त्व को दुरवबोधता और ज्ञानावरण के उदय के कारण यदि किसी तत्त्व का बोध मुझे ठीक से नहीं होता है तो इससे जिज्ञासित तत्त्व का स्वरूप अन्यथा नहीं हो सकता, वह उस प्राप्त के द्वारा कहा गया है जो सर्वज्ञ-समस्त तत्त्वो का ज्ञाता-और राग-द्वेष से रहित है। तत्त्व का असत्य निरूपण वही करता है जो या तो अल्पज्ञ है या राग-द्वेष के वशीभूत है। इस प्रकार से जिनागम के विषय में विचार करना यह उस धर्म का प्रथम भेद है। कलुष नाम पाप का है, जीव के साथ जो अनादि काल से भवभ्रमण के कारणभूत कर्म-मल का सम्बन्ध हो रहा है उसका विनाश किस प्रकार से हो, इसके विषय मे जो विचार किया जाता है उसका नाम कलुषापाय है। यह उस धर्म का दूसरा भेद है । इसमे प्रकारान्तर से यह भी विचार किया जाता है कि मिथ्यात्व के वशी- भूत होकर राग-द्वेष से अभिभूत हुए प्राणी जो अपाय को प्राप्त हो रहे हैं—जन्म-मरण रूप संसार में परिभ्रमण कर रहे हैं उनका उससे किस प्रकार उद्धार होगा। कर्म ज्ञानावरणादि के भेद से पाठ क्योंकि ध्यानस्तव. [१४- प्रकार का है। उसकी उत्तर प्रकृतियां अनेक हैं। जीव के साथ सम्बन्ध होने पर जो उनका फलदान- शक्ति के रूप में अनेक प्रकार का विपाक होता है उस संबका विचार करना, यह उस धर्म का तीसरा भेद है। अपोलोक, मध्यलोक और ऊर्ध्वलोक में विभक्त लोक के आकार आदि के साथ उसमें स्थित नारक, मनुष्य-तियंच एवं देवो आदि के दुख-सुख का विचार उस धर्म के चौथे भेद में किया जाता है। इस प्रकार चार भेदो मे विभक्त उस धर्म से युक्त जो चिन्तन होता है उसे घHध्यान कहा जाता है । ध्येयस्वरूप उस धर्म के भेद से वह घHध्यान भी चार प्रकार का है-पाशाविचय, अपायविचय, विपाक- विचय और संस्थानविचय । प्रकारान्तर से वह धर्म उत्तम क्षमा, मार्दव, प्रार्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, प्राचिन्य और ब्रह्मचर्य के भेद से दस प्रकार का भी है। इन सबका विचार भी धर्म्यध्यान में किया जाता है। जीवादि पदार्थों में जिसका जो स्वरूप या स्वभाव है उसे भी धर्म कहा जाता है। यह धर्म का व्यापक स्वरूप है । इस धर्म का भी धर्म्यध्यानी अनेक प्रकार से चिन्तन किया करता है ।।१२-१३॥ प्रागे अन्य प्रकार से भी उस धर्म और उससे अनपेत धर्म्यध्यान के स्वरूप का निर्देश करते हुए वह किनके होता है, इसे स्पष्ट किया जाता है- सदृष्टिज्ञानवृत्तानि मोहक्षोभविवर्जितः । यश्चात्मनो भवेद् भावो धर्मः शर्मकरो हि सः॥ अनपेतं ततो धर्माद् धर्मध्यानमनेकधा । शमकक्षपकयोः प्राक् श्रेणिभ्यामप्रमत्तके ॥१५॥ मुख्यं धर्म्य प्रमत्तादित्रये गौणं हि तत्प्रभो। धर्म्यमेवातिशुद्धं स्याच्छुक्लं श्रेण्योश्चतुर्विधम् ॥ जीव का मोह के क्षोभ से रहित जो भाव (परिणति) होता है उसका नाम धर्म है और वह सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान व सम्यक्चारित्रस्वरूप होकर सुख का-मोक्षसुख का कारण है। उस धर्म से अनपेत घHध्यान भी अनेक प्रकार का है। हे प्रभो! वह धर्म्यध्यान मुख्यरूप से उपशमक और क्षपक की श्रेणियो से-उपशमणि और क्षपकणि से-पहिले अप्रमत्तसंयत (सातवें) गुणस्थान मे होता है तथा गौणरूप से वह प्रमत्तादि तीन–प्रमत्तसयत, सयतासयत और असंयतसम्यग्दृष्टि (६, ५, ४)-गुणस्थानो मे होता है। अतिशय विशुद्धि को प्राप्त हुआ वह धर्म्यध्यान ही शुक्लध्यान होता है। वह चार प्रकार का है, जो दोनो श्रेणियो मे--उपशमणि के अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मसाम्पराय और उपशान्तमोह गुणस्थानो मे तथा क्षपकश्रेणि के अपूर्व- करण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मसाम्पराय और क्षीणमोह गुणस्थानो मे होता है ।।१४-१६॥ आगे तीन श्लोको मे शुक्लध्यान के उक्त चार भेदो मे प्रथम दो भेदो का निर्देश करते हुए उनके स्वरूप व स्वामियो को दिखलाते हैं- सवितर्क सवीचारं सपृथक्त्वमुदाहृतम् । आद्यं शुक्ल द्वितीयं तु विपरीतं वितर्कभाक् ॥१७ श्रुतज्ञानं वितर्कः स्याद्योगशब्दार्थसंक्रमः। वीचारोऽथ विभिन्नार्थभासः पृथक्त्वमीटितम् ।। श्रुतमूले विवर्तेते ध्येयार्थे पूर्ववेदिनो । उक्ते शुक्ले यथासंख्यं त्र्येकयोगयुजोविभो॥१६॥ प्रथम शुक्लध्यान वितर्क, वीचार और पृथक्त्व से सहित तथा दूसरा शुक्लध्यान इससे विपरीत- वीचार और पृथक्त्व से रहित-होता हुमा वितर्क से सहित है। वितर्क का अर्थ श्रुतज्ञान है। योग, शब्द और अर्थ के संक्रम (परिवर्तन) को वीचार कहते हैं। विभिन्न अर्थ का जो प्रतिभास होता है उसे पृथक्त्व कहा गया है । हे प्रभो ! उक्त दोनों शुक्लध्यान अपने ध्येय अर्थ के विषय मे श्रुत के प्राश्रित होकर यथाक्रम से तीन योगवाले व एक ही योगवाले पूर्ववित्-अङ्ग-पूर्वश्रुत के ज्ञाता (श्रुतफेवली)-के - होते हैं । - A - m . , --२२] शुक्लध्यानविचारः ६ विवेचन-शुक्लध्यान के चार भेदो मे प्रथम शुक्लध्यान का नाम पृथक्त्ववितर्क सविचार है। पृथक्त्व का अर्थ भेद है। प्रथम शुक्लध्यानी द्रव्य-पर्याय अथवा उत्पाद, व्यय एव ध्रौव्य रूप अवस्थामो का भेदपूर्वक चिन्तन किया करता है । अर्थ, व्यजन और योग के परिवर्तन को वीचार कहते हैं। उक्त प्रथम शुक्लण्यानी द्रव्य-पर्यायस्वरूप अर्थ में कभी द्रव्य का और कभी द्रव्य को छोड़कर पर्याय का चिन्तन करता है। व्यजन का अर्थ शब्द है, वह जो कभी एक श्रुतवाक्य का चिन्तन करता है तो कभी उसको छोडकर अन्य श्रुतवाक्य का चिन्तन करता है, इसका नाम व्यंजनसक्रम है। वह तीन योगो मे किसी एक का और फिर उसको छोड़कर अन्य योग का चिन्तन करता है, यह योगसक्रम है। वह प्रथम शुक्ल- ध्यान इस प्रकार के अर्थसक्रमादि से सहित होता है, इसीलिए उसे सविचार कहा गया है। वह तीनो योग युक्त श्रुतकेवली के होता है। द्वितीय शुक्लध्यान का नाम एकत्ववितर्क अविचार है । इस शुक्लध्यान में प्रथम शुक्लध्यान के “समान न तो 'द्रव्य-पर्याय आदि का भेदपूर्वक चिन्तन होता है और न उसमे उपर्युक्त तीन प्रकार का संक्रम भी रहता है, इसीलिए उसे एकत्व (पृथक्त्व से रहित) वितर्क अविचार शुक्लध्यान कहा गया है । वह तीन योगो मे से किसी एक ही योग वाले श्रुतकेवली के होता है। उक्त दोनो शुक्लध्यानों में श्रुतज्ञान के 'आश्रय से नय-प्रमाण के अनुसार चिन्तन होता है, इसीलिए दोनो को सवितर्फ कहा गया है ।।१७-१६॥ आगे तीसरे शुक्लध्यान के स्वरूप व उसके स्वामी का निर्देश किया जाता है- सूक्ष्मकायत्रियस्य स्याद्योगिनः सर्ववेदिनः। शुक्लं सूक्ष्मनियं देव ख्यातमप्रतिपाति तत् ॥ सूक्ष्म काय की क्रिया से युक्त सर्वज्ञ सयोगफेवली के तीसरा शुक्लध्यान होता है। वह हे देव ! सूक्ष्मक्रिय अप्रतिपाति नाम से प्रसिद्ध है ।। विवेचन-तीसरा शुक्लध्यान तेरहवें गुणस्थानवर्ती सयोगकेवली के होता है । सयोगकेवली का काल अन्तर्मुहूर्त व आठ वर्ष कम एक पूर्वकोटि वर्ष प्रमाण है। मुक्ति की प्राप्ति मे जब थोड़ा सा काल शेष रह जाता है तब उक्त फेवली योगो का निरोध करते हैं। इस प्रकार योगनिरोध करते हुए जब उनके काय की क्रिया उच्छ्यास-निःश्वास मात्र के रूप मे सूक्ष्म रह जाती है तब उनके उक्त ध्यान होता है, इसीलिए उसे सूक्ष्मक्रिय कहा गया है तथा प्रतिपतनशील न होने के कारण उसके लिए अप्रतिपाति यह दूसरा विशेषण भी दिया गया है ॥२०॥ अब चौथे शुक्लध्यान के स्वरूप व उसके स्वामी का निर्देश किया जाता है- स्थिरसर्वात्मदेशस्य समुच्छिन्नक्रियं भवेत् । तुर्य शुक्लमयोगस्य सर्वज्ञस्यानिवर्तकम् ॥२१ जब पूर्वोक्त सर्वज्ञ केवली के समस्त प्रात्मप्रदेश स्थिरता को प्राप्त हो जाते हैं तब योग से रहित हो जाने पर उनके समुच्छिन्नक्रिय अनिवति नाम का चौथा शुक्लध्यान होता है । विवेचन-यह अन्तिम शुक्लध्यान प्रयोगविली के शैलेश्य अवस्था मे होता है। शंलेश्य का अर्थ है समस्त शीलो का स्वामित्व । योग का प्रभाव हो जाने पर चौदहवें गुणस्थान को प्राप्त प्रयोगकेवली समस्त शोल-गुणों के स्वामी हो जाते हैं (शील के भेद प्रभेदों के लिए देखिए मूलाचार फा शील-गुणाधिकार)। उस समय उनके उक्त ध्यान होता है। यहा सूक्ष्म काय की क्रिया के भी नष्ट हो जाने से इस ध्यान को समुच्छिन्नक्रिय और निवृत्ति से रहित हो नाने के कारण भनिवति कहा गया है। इस प्रकार इस ध्यान को ध्याते हुए प्रयोगकेवली अ इ उ ऋ और लु इन पांच ह्रस्व प्रक्षरो के उच्चारणफाल मे मुक्ति को प्राप्त कर लेते हैं ॥२॥ यहां माशंका- नानार्थालम्बना चिन्ता नष्टमोहे न विद्यते । तन्निरोधेऽपि यद् ध्यानं सर्वज्ञ तत् कथं प्रभो।। - , ध्यानस्तवः • [२३- जिसका समस्त मोहनीय कर्म नष्ट हो चुका है उसके अनेक पदार्थों का पाश्रय लेने वाली चिन्ता नहीं होती है। ऐसी अवस्था में उस चिन्ता का निरोध हो जाने पर जो ध्यान होता है वह हे प्रभो! सर्वज्ञ के-सयोग व प्रयोग केवली के-कैसे हो सकती है ? ॥२२॥ इसका समाधान- योगरोधो जिनेन्द्राणां देशतः कास्यतोऽपि वा। भूतपूर्वगतेर्वा तद् ध्यानं स्यादौपचारिकम् ॥ जिनेन्द्रो के एक देशरूप से अथवा सर्वदेशरूप से भी जो योगो का निरोध होता है वही उनका ध्यान है । अथवा भूतपूर्वगति-भूलप्रज्ञापन नय की अपेक्षा-उपचार से उनके ध्यान जानना चाहिए । विवेचन-चिन्ता का जो निरोष होता है वह ध्यान है, यह पूर्व में कहा जा चुका है। सयोग- केवली और प्रयोगकेवली के मन के न रहने से यद्यपि वह चिन्तानिरोधस्वरूप ध्यान सम्भव नहीं है, फिर भी उनके क्रम से अल्प व पूर्ण रूप मे जो योगो का निरोध होता है उसे ही उनके उपचार से ध्यान माना गया है। अथवा जिस प्रकार दण्ड के द्वारा कुम्हार के चाक के एक बार घुमा देने पर कुछ समय तक वह दण्ड के प्रयोग के विना भी घूमता रहता है उसी प्रकार पूर्व मे मन का सद्भाव रहने पर जो चिन्ता रही है उसका उस मन के अभाव में भी पूर्व प्रयोग की अपेक्षा उपचार से सद्भाव समझना चाहिए। इस प्रकार चिन्ता के प्रभाव में भी उक्त दोनों केवलियो के उपचार से ध्यान माना गया है ॥२३॥ मागे उस ध्यान के अन्य चार भेदों का भी निर्देश किया जाता है-~- उक्तमेव पुनर्देव सर्व ध्यानं चतुर्विधम् । पिण्डस्थ च पदस्थं च रूपस्थं रूपवजितम् ॥२४ हे देव ! पूर्व में निर्दिष्ट वही सब ध्यान चार प्रकार का है-पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और रूप- वजित (रूपातीत) ॥२४॥ अव उनमें से प्रथमतः पिण्डस्थ ध्यान का स्वरूप चार श्लोकों में कहा जाता है- स्वच्छस्फटिकसंकाशव्यक्तादित्यादितेजसम् । दूराकाशप्रदेशस्थ संपूर्णोदप्रविग्रहम् ।।२५ सर्वातिशयसपूर्ण प्रातिहार्यसमन्वितम् । परमात्मानमात्मान भव्यानन्दविधायिनम् ॥२६ विश्वज्ञ विश्वदृश्वानं नित्यानन्तसुख विभुम् । अनन्तवीर्यसंयुक्त स्वदेहस्थमभेदतः ॥२७ दहन्तं सर्वकर्माणि शुद्धद्धध्यानवह्निना । त्वामेव ध्यायतो देव पिण्डस्थध्यानमीडितम् ॥२८ हे देव ! निर्मल स्फटिक मणि के समान होने से जिस प्रापके परमौदारिक शरीर का तेज सूर्य प्रादि के समान प्रगट हो रहा है, जो दूरवर्ती आकाश के प्रदेशो में निराधार स्थित है' समचतुरस्त्रसंस्थान से युक्त होने के कारण जिनका शरीर सम्पूर्ण सुन्दर है, जो समस्त (३४) अतिशयो से परिपूर्ण हैं, पाठ प्रातिहार्यों से सुशोभित हैं, जिनकी आत्मा परमात्मस्वरूप को प्राप्त कर चुकी है, जो भव्य जीवों को आनन्द के करने वाले हैं, विश्व के ज्ञाता व द्रष्टा हैं, शाश्वतिक अनन्त सुख से सहित हैं, ज्ञान की अपेक्षा सर्वव्यापक हैं, अनन्त वीर्य से सयुक्त हैं, अभेदरूप से अपने शरीर मे स्थित हैं, तथा जो निर्मल उद्दीप्त ध्यानरूप अग्नि के द्वारा समस्त कर्मों के जलाने वाले हैं। ऐसे प्रापका ही- सर्वज्ञ व वीतराग जिन देव का हो-जो ध्यान करता है उसके पिण्डस्थध्यान कहा गया है ।।२५-२८॥ आगे दूसरे पदस्यध्यान का स्वरूप कहा जाता है- तव नामपदं देव मंत्रमकाग्र्चमीर्यतः । जपतो ध्यानमाम्नातं पदस्थं त्वत्प्रसादतः ॥२६ हे देव ! तुम्हारे प्रसाद से जो एकाग्रता को प्राप्त होकर आपके नामपद का नाम के अक्षर. स्वरूप मंत्र का जाप करता है उसके पदस्यध्यान कहा गया है। अभिप्राय यह है कि प्रकृत पदस्यम्यान १. केवलज्ञान के उत्पन्न होने पर जिन देव का शरीर पृथिवी से पाच हजार धनुष पर चला जाता है। ति. प. ४.७०५. - - १ + 10 -३७] रूपस्थ-रूपातीतध्यानयोः स्वरूपम् में पंचनमस्कार मंत्र के पदो का, अ सि प्रा उ सा प्रादि परमेष्ठिवाचक अक्षरों का तथा ॐ ह्रीं प्रादि बीजाक्षरों का ध्यान किया जाता है ॥२६॥ अब रूपस्थध्यान का स्वरूप कहा जाता है- तव नामाक्षरं शुभ्रं प्रतिबिम्बं च योगिनः । ध्यायतो भिन्नमीशेदं ध्यानं रूपस्थमीडितम् ।। हे ईश ! जो योगी तुम्हारे नामाक्षर का और भिन्न धवल प्रतिबिम्ब का ध्यान करता है उसके रूपस्थ ध्यान कहा जाता है.॥३०॥ प्रागे प्रकारान्तर से पुनः उसी रूपस्थध्यान का स्वरूप कहा जाता है- शुद्ध शुभ्रं स्वतो भिन्न प्रातिहार्यादिभूषितम् । देव स्वदेहमहन्तं रूपस्थं ध्यान[य] तोऽथवा ।। अथवा हे देव ! जो शुद्ध, धवल, आत्मा से भिन्न और प्रातिहार्य आदि से विभूषित अरहन्त जैसे अपने शरीर का ध्यान करता है उसके रूपस्थध्यान होता है ॥३१॥ अब रूपातीत ध्यान का स्वरूप कहा जाता है- रूपातीतं भवेत्तस्य यस्त्वां ध्यायति शुद्धधीः । प्रात्मस्थं देहतो भिन्न देहमात्र चिदात्मकम् ॥३२॥ हे देव ! जो निर्मलबुद्धि जीव अपने ही प्रात्मा मे स्थित, शरीर से भिन्न और शरीर से रहित होकर भी उस छोडे हुए शरीर के प्रमाण मे अवस्थित चेतनस्वरूप ऐसे आपका ध्यान करता है उसके रूपातीत ध्यान होता है । अभिप्राय यह है कि निर्मल स्फटिक मणि मे प्रतिबिम्बित जिनरूप के समान समस्त कर्मों और शरीर से भी रहित हुए सिद्ध परमात्मास्वरूप अपने प्रात्मा का जो चिन्तन किया जाता है उसे रूपातीतध्यान कहा जाता है ।।३२।। प्रागे चार श्लोको मे इसी रूपातीत ध्यान को स्पष्ट किया जाता है- सख्यातीतप्रदेशस्थं ज्ञानदर्शनलक्षणम् । करिं चानुभोक्तारममूर्त च सदात्मकम् ॥३३ कथंचिन्नित्यमेकं च शुद्ध सक्रियमेव च । न रुष्यन्तं न तुष्यन्तमुदासीनस्वभावकम् ॥३४ कर्मलेपविनिर्मुक्तमूर्ध्वव्रज्यास्वभावकम् । स्वसंवेद्यं विभु सिद्धं सर्वसंकल्पवर्जितम् ॥३५ परमात्मानमात्मानं ध्यायतो ध्यानमुत्तमम् । रूपातीतमिदं देव निश्चित मोक्षकारणम् ॥३६ जो विशुद्ध प्रात्मा असंख्यात प्रदेशो मे स्थित है, ज्ञान-दर्शनस्वरूप है, कर्ता व भोक्ता है, रूप- रसादिस्वरूप मूति से रहित होकर प्रमूर्तिक है। उत्पाद, व्यय व ध्रौव्यस्वरूप है। कचित् नित्य, एक व शुद्ध है। क्रिया से सहित है, जो न रुष्ट होता है और न सन्तुष्ट भी होता है, किन्तु उदासीन स्वभाव वाला है। कर्मरूप लेप से रहित है, ऊर्ध्वगमन स्वभाव वाला है, जो स्वकीय सवेदन का विषय होकर व्यापक व सिद्ध है, तथा जो समस्त सकल्प विकल्पो से रहित है। ऐसे परमात्मस्वरूप प्रात्मा का जो ध्यान करता है उसके यह उत्कृष्ट रूपातीत ध्यान होता है। हे देव ! यह ध्यान निश्चय से मोक्ष का कारण है ॥३३-३६॥ आगे यह दिखलाते हैं कि बहिरात्मा जीव उस शुद्ध परमात्मा को नहीं देख सकता है- देहेन्द्रियमनोवाक्षु ममाहकारबुद्धिमान् । बहिरात्मा न सपश्येद् देव त्वां स बहिर्मुखः ॥३७ शरीर, इन्द्रिय, मन और वचन इनके विषय मे ममकार और अहकार बुद्धि रखने वाला यह बहिरात्मा जीव बहिर्मुख होने से–पर को अपना समझने के कारण हे देव ! आपको नहीं देख सर्फता है ॥ - विवेचन-बहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा के भेद से जीव तीन प्रकार के हैं। उनमें जिसे तत्त्व-प्रतत्त्व को पहिचान नहीं होती वह बहिरात्मा कहलाता है। वह अदेव को देव, कुगुरु को गुरु और कुत्सित धर्म को धर्म मानता है तथा जड़ शरीर व इन्द्रिय प्रादि जो चेतन प्रात्मा से भिन्न हैं उन्हें भी १२ ध्यानस्तवः - . वह अपना मानता है । 'यह मेरा है और मै इसका स्वामी हूं इस प्रकार की ममकार और अहंकार बुद्धि से ग्रसित होने के कारण वह धर्म से पराङ्मुख रहता है। इसीलिए यहां यह कहा गया है कि वहिरात्मा जीव अज्ञान के वशीभूत होने से अपने शुद्ध स्वरूप का अनुभव नहीं कर सकता है ॥३७॥ भागे दो श्लोको मे अन्तरात्मा के स्वरूप को दिखलाते हुए यह कहा जा रहा है कि वह प्रात्म- स्वरूप के देखने में समर्थ होता है- पदार्थान् नव यो वेत्ति सप्त तत्त्वानि तत्त्वतः । षड्द्रव्याणि च पञ्चास्तिकायान् देहात्मनोभिवाम् ॥३॥ प्रमाणनयनिक्षेपैः सदृष्टिज्ञानवृत्तिमान् । सोऽन्तरात्मा सदा देव स्यात्त्वां दृष्टुमलं क्षमः। ॥ सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र से संयुक्त जो जीव प्रमाण, नय और निक्षेप के आश्रय से नौ पदार्थों, सात तत्वो, छह द्रव्यों, पांच अस्तिकायो और शरीर व आत्मा के भेद को यथार्थरूप में जानता है उसे अन्तरात्मा कहा जाता है और वह हे देव ! सदा ही आपके देखने में समर्थ रहता है । इसे सम्यग्दर्शन का माहात्म्य समझना चाहिए ॥३८-३९॥ अब उपर्युक्त नौ पदार्थों के नामो का निर्देश किया जाता है- जीवाजीवौ च पुण्यं च पापमानवसंवरौ । निर्जरा बन्धमोक्षौ च पदार्था नव संमताः ॥४० जीव, अजीव, पुण्य, पाप, प्रास्रव, सवर, निर्जरा, वन्ध और मोक्ष ये नौ पदार्थ माने गये हैं ॥४०॥ आगे उक्त नौ पदार्थों का निरूपण करते हुए प्रथमतः जीव का स्वरूप कहा जाता है- चेतना लक्षणस्तत्र जीवो देव मते तव । चेतनानुगता सा च ज्ञानदर्शनयोस्तथा ॥४१॥ हे देव ! आपके मत मे जीव का लक्षण चेतना माना गया है। वह चेतना ज्ञान और दर्शन में अनुगत है । अभिप्राय यह है कि जीव का लक्षण जानना और देखना है । जानने और देखने रूप वह चेतना ज्ञान और दर्शन के भेद से दो प्रकार की है ॥४१॥ इसे भागे और भी स्पष्ट किया जाता है- जीवारब्धक्रियायां च सुख दुःखे च तत्फले। यथासम्भवमीशेय वर्तते चेतना तथा ॥४२॥ हे ईश! यह चेतना यथासम्भव जीव के द्वारा प्रारम्भ की गई क्रिया और उसके फलस्वरूप सुख च. दुःख मे रहती है। अभिप्राय यह है कि जीव के द्वारा जो भी कार्य प्रारम्भ किया जाता है वह या तो सुख का कारण होता है या दुख का फारण होता है। किस प्रकार के कार्य से सुख होता है और किस प्रकार के कार्य से दुख होता है, यह विचार करना चेतना का कार्य है ॥४२॥ अव ज्ञान के स्वरूप और उसके भेदो का निर्देश किया जाता है- प्रतिभासो हि यो देव विकल्पेन तु वस्तुनः । ज्ञानं तदष्टधा प्रोक्तं सत्यासत्यार्थभेदभाक् ॥ हे देव ! यह घट है अथवा पट है, इस प्रकार के विकल्प के साथ जो वस्तु का प्रतिभास (बोध) होता है उसे ज्ञान कहते हैं । सत्य और असत्य अर्थ को विषय करने के कारण यह ज्ञान सामान्य से दो प्रकार का है-सम्यग्ज्ञान और मिथ्याज्ञान । वही ज्ञान विशेषरूप से पाठ प्रकार का है ॥४३॥ प्रागे दो श्लोको में उन आठ भेदो का निर्देश किया जाता है- मतियुक्तं श्रुतं सत्यं समनःपर्ययोऽवधिः । केवलं चेति सत्यार्थ सदृष्टेनिपञ्चकम् ॥४४ कुमतिः कुश्रुतज्ञान विभङ्गाख्योऽवधिस्तथा । ज्ञानत्रयमिदं देव मिथ्यादृष्टिसमाश्रयम् ॥४५ मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन.पर्पयज्ञान और फेवलज्ञान ये पांच भेद सत्य अर्थ के विषय करने वाले सम्यग्ज्ञान के हैं । यह पांच प्रकार का सम्यग्ज्ञान सम्यग्दृष्टि जीव के होता है । कुमति, फुफ्त और विभग अवधि ये तीन ज्ञान मिथ्यादृष्टि के माश्रय से रहने वाले मिथ्यालान हैं। उक्त पांच सम्या- - - - -५२] नवपदार्थप्ररूपणा १३ शानो में इन तीन मिथ्याज्ञानो के मिला देने पर ज्ञान के सामान्य से पाठ भेद हो जाते हैं ॥४४-४५॥ अब दो श्लोकों मे दर्शन के स्वरूप और उसके भेदो का निवेश किया जाता है- वस्तुसत्तावलोको यः सामान्येनोपजायते। दर्शन तन्मतं देव बहिरन्यच्चतुर्विधम् ॥४६ चक्षुरालम्बनं तच्च शेषाक्षालम्बन तथा। अवध्यालम्बनं पुंसो जायते केवलाश्रयम् ॥४७ हे देव । सामान्य से जो वस्तु की सत्ता मात्र का अवलोकन होता है उसे दर्शन माना गया है। यह चार प्रकार का है-चक्षुदर्शन, प्रचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन । जो दर्शन-सत्ता मात्र का अवलोकन-जीव के चक्षु इन्द्रिय से प्राश्रय से होता है उसे चक्षुदर्शन, चक्षु को छोड़ शेष इन्द्रियो के प्राश्रय से होने वाले दर्शन को अचक्षुदर्शन, अवधिज्ञान के पालम्बन से होने वाले दर्शन को अवधिदर्शन और केवलज्ञान के प्राश्रय से होने वाले दर्शन को केवलदर्शन कहा जाता है ।।४६-४७॥ मागे वह दर्शन ज्ञान से पूर्व होता है या उसके साथ होता है, इसको स्पष्ट किया जाता है- दर्शनं ज्ञानतः पूर्व छद्भस्थे तत्प्रजायते। सर्वज्ञ योगपद्येन केवलज्ञानदर्शने ॥४८ वह दर्शन छद्मस्थ के-केवली से भिन्न अल्पज्ञ के-जान से पूर्व होता है । किन्तु सर्वज्ञ के केवल ज्ञान और केवलदर्शन दोनों एक साथ होते हैं ॥४॥ आगे क्रमप्राप्त दूसरे अजीव पदार्थ का स्वरूप कहा जाता है- जीवलक्ष्मविपर्यस्तलक्ष्मा देव तवागमे । अजीवोऽपि श्रुतो नूनं मूर्तामूर्तत्वभेदभाक् ॥४६ हे देव ! जो जीव के लक्षण से भिन्न लक्षण वाला है-ज्ञान-दर्शन चेतना से रहित है-उसे मापके पागम मे अजीव सुना गया है, अर्थात् उसे पागम मे अजीव कहा गया है । वह मूर्त और अमूर्त के भेद से दो प्रकार का है। विवेचन-जो ज्ञान व दर्शन रूप उपयोग से रहित है उसे अजीव कहते हैं । वह पांच प्रकार का है-धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, आकाश, काल और पुद्गल । उनमे एक मात्र पुद्गल मूर्त-रूप, रस गन्ध व स्पर्श से सहित-और शेष धर्म प्रादि चार अमूर्त--उक्त रूप-रसादि से रहित हैं ॥४६॥ अब पुण्य के दो भेदो का निर्देश करते हुए उनका स्वरूप कहा जाता है- शुभो यः परिणामः स्याद् भावपुण्यं सुखप्रदम् । भावायत्तं च यत्कर्म द्रव्यपुण्यमवादितत् ।। जीव का जो शुभ परिणाम होता है उसे भावपुण्य कहा जाता है, वह सुख का देने वाला है । जो कर्म भाव के अधीन है-राग-द्वेषादिरूप शुभ परिणामो के आश्रय से बन्ध को प्राप्त होता है-उसे अव्यपुण्य कहा गया है जो पुद्गलस्वरूप है ॥५०॥ आगे पाप के दो भेदो का निर्देश करते हुए उनका स्वरूप कहा जाता है- पुण्याद् विलक्षणं पापं द्रव्यभावस्वभावकम् । ज्ञातं सक्षेपतो देव प्रसादाद् भवतो मया ॥५१ पुण्य से विपरीत स्वरूप वाला पाप है । वह भी द्रव्य और भाव के भेद से दो प्रकार का है। हे देव! आपके प्रसाद से मैने इस सबको संक्षेप में जान लिया है। विवेचन--पुण्य जहां प्राणी को सुख देने वाला है वहां उससे विपरीत पाप उसे दुख देने वाला है। जिस प्रकार भाव और द्रव्य के भेद से पुण्य दो प्रकार का है उसी प्रकार पाप भी भाव और द्रव्य के भेद से दो प्रकार का है । जीव का जो अशुभ (कलुषित) परिणाम होता है उसे भावपाप कहते हैं तथा उसके प्राधय से जो जीव के साथ पौद्गलिक कर्म का वन्ध होता है उसे द्रव्यपाप कहते हैं ॥५॥ प्रास्त्रव का स्वरूप कर्मागच्छति भावेन येन जन्तोः स ात्रवः। रागादिभेदवान् योगो द्रव्यकर्मागमोऽथवा ।। जीव के जिस परिणाम के द्वारा कर्म पाता है उसे प्रास्रव कहते हैं । अथवा द्रव्य कर्म के प्रागमन का कारण जो रागादिभेद युक्त योग है उसे पासव जानना चाहिए। .

१४
ध्यानस्तवः
विवेचन-जिस प्रकार नाव में छेद के हो जाने पर उसके भीतर पानी पाने लगता है उसी
प्रकार जीव के जिन परिणामो के निमित्त से कर्मों का आगमन होता है उन्हें प्रास्रव कहते हैं । यह मानव
भी भाव और द्रव्य के भेद से दो प्रकार का है। मिथ्यात्व व अविरति मादिरूप जिन परिणामो के
आश्रय से कर्मों का आगमन हुआ करता है उनका नाम भावात्रव है तथा उन परिणामो के द्वारा जो
द्रव्य कर्मों का आगमन होता है उसका नाम द्रव्यास्रव है। यह प्रास्रव योगस्वरूप है ॥५२॥
संवर का स्वरूप-
प्रास्त्रवस्य निरोधो यो द्रव्यभावाभिधात्मकः। तपोगुप्त्यादिभिः साध्यो नकधा संवरो हि सः॥
मास्रव के निरोध का नाम संवर है। वह द्रव्य व भाव स्वरूप होने से दो प्रकार का है जो तप
व गुप्तियो आदि के द्वारा सिद्ध किया जाता है । इस प्रकार से वह अनेक भेद वाला है ।
विवेचन-नवीन कर्मों के आगमन के रुक जाने का नाम संवर है। वह भी द्रव्य व भाव के
भेद से दो प्रकार का है । जिन सम्यक्त्वादि परिणामों के द्वारा प्राते हुए कर्म रुक जाते हैं उन्हें भावसंवर
कहा जाता है । उक्त परिणामो के आश्रय से प्राते हुए द्रव्य कर्मों का जो निरोध हो जाता है, इसे द्रव्य-
संवर जानना चाहिए । गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा और परीषहजय ये उस संवर के साधन हैं। मन,
वचन और काय योगो के निग्रह को गुप्ति कहते हैं। गमनागमनादिविषयक समीचीन (निरवद्य) प्रवृत्ति
का नाम समिति है। वह ईर्या-भाषा आदि के भेद से पांच प्रकार की है। जो दुख से हटा कर सुख-
स्थान (मोक्ष) को प्राप्त कराता है वह धर्म कहलाता है। इसका स्वरूप पहिले कहा जा चुका है
(१२ १४) । वार-बार चिन्तन का नाम अनुप्रेक्षा है। वह अनित्य व प्रशरण आदि भेद से बारह प्रकार
की है । क्षुधा एव तृषा (प्यास) श्रादि की वेदना के उपस्थित होने पर उसे कर्मोदयजनित जानकर निरा.
कुलतापूर्वक सहन करना व सयम से च्युत न होना, इसका नाम परीषहजय है। वह क्षुधा-तृषा आदि के
भेद से बाईस प्रकार का है । निन्द्य आचरण को छोड़कर सदाचार में प्रवृत्त होना, इसे चारित्र कहते हैं ।
वह सामायिक प्रादि के भेद से पांच प्रकार का है। इन गुप्ति-समितियों प्रादि के अनेक प्रकार होने से
वह
संवर भी अनेक प्रकार का है ॥५३॥
निर्जरा का स्वरूप-
तपोयथास्वकालाभ्यां कर्म यद् भुक्तशक्तिकम् । नश्यत्तन्निर्जराभिख्यं चेतनाचेतनात्मकम् ॥
तप और अपने परिपाककाल के पोश्रय से जिसकी शक्ति को-अनुभाग को-भोगा जा चुका है
ऐसा कर्म-पुद्गल जो विनाश को प्राप्त होता है उसका नाम निर्जरा है । वह चेतन व अचेतन स्वरूप है।
विवेचन-प्रात्मा से सम्बद्ध कर्म-पुद्गल का उससे पृथक् होना, इसे निर्जरा कहते हैं । वह
भाव और द्रव्य के भेद से दो प्रकार की है। जिस प्रकार आम प्रादि फलों को पाल मे देकर उनके
स्वाभाविक पाककाल से पहिले ही पका लिया जाता है उसी प्रकार तपश्चरण के द्वारा जो कर्म को भी
अपनी स्थिति के पूर्व मे ही परिपाफ को प्राप्त कराकर उदय मे लाया जाता है उसे भावनिर्जरा कहते
हैं। वे ही कर्म अपनी स्थिति के पूर्ण होने पर फल को देकर जो निर्जीर्ण होते हैं, इसे द्रव्यनिर्जरा कहा
जाता है ॥५४॥
वन्ध का स्वरूप
जीवकर्मप्रदेशानां यः संश्लेषः परस्परम् । द्रव्यवन्धो भवेत् पुंसो भाववन्धः सदोषता ॥५५
जीव और कर्म के प्रदेशो का जो संश्लेष-परस्पर एक क्षेत्रावगाहरूप संयोग होता है उसे
धन्ध कहते हैं । वह भी द्रव्य और भाव के भेद से दो प्रकार का है। उक्त प्रकार से फर्मप्रदेशों का जीव
के प्रदेशों के साथ सम्बद्ध होना, इसका नाम द्रव्यवन्ध है तथा जीव के जिस सदोष परिणाम के द्वारा ये
फर्म-पुद्गल उससे सम्बन्ध को प्राप्त होते हैं उसे भाववन्ध कहा जाता है ॥५५॥

सप्ततत्त्वानां षड्द्रव्याणां च प्ररूपणा १५ मोक्ष का स्वरूप- बन्धहेतोरभावाच्च निर्जराभ्यां स्वकर्मणः । द्रव्यभावस्वभावस्य विनाशो मोक्ष इष्यते ॥५६ बन्ध के कारणभूत मिथ्यात्वादि (मालव) के प्रभावरूप संवर से तया द्रव्य-भावरूप दोनों प्रकार की निर्जरा से जो द्रव्य व भाव रूप अपने कर्म का विनाश होता है उसका नाम मोक्ष है। अभि- प्राय यह है कि समस्त कर्म-पुद्गलों का प्रात्मा से पृथक् हो जाना, इसे मोक्ष कहा जाता है। वह द्रव्य और भाव के भेद से दो प्रकार का है। जिस परिणाम के द्वारा राग-द्वेषादिरूप भाव फर्म का विनाश होता है उसे भावमोक्ष कहते हैं तथा द्रव्य कर्मों के विनाश का नाम द्रव्यमोक्ष है ॥५६॥ इस प्रकार नौ पदार्थों का निरूपण करके आगे उनके अन्तर्गत सात तत्वो को कहा जाता है-- १ पदार्था एव तत्त्वानि सप्त स्युः पुण्यपापयोः । अन्तर्भावो यदाभीष्टो बन्ध मानव एव वा ॥ जब बन्ध अथवा प्रास्त्रव में ही पुण्य व पाप का अन्तर्भाव अभीष्ट हो तब पूर्वोक्त नो पदार्थ ही सात तत्त्व ठहरते हैं। विवेचन-पूर्व (३८) मे नौ पदार्थों और सात तत्त्वो का पृथक् पृथक् निर्देश किया गया है। तदनुसार नौ पदार्थों का निरूपण कर देने पर वे सात तत्व कौन से हैं, यह आशंका हो सकती थी उसके समाधान स्वरूप यहां यह कहा जा रहा है कि उन नौ पदार्थों से पृथक् सात तत्त्व नहीं है, किन्तु वे उन्हीं के अन्तर्गत हैं । यथा-- -जीव, अजीव, प्रास्त्रव, सवर, निर्जरा, बन्ध और मोक्ष ये सात तत्त्व माने गये हैं । इनमे से मानव और बन्ध मे पूर्वोक्त नौ पदार्थों के अन्तर्गत पुण्य का और पाप का अन्तर्भाव कर देने पर वे नौ पदार्थ ही सात तत्त्व ठहरते हैं। कारण यह कि द्रव्य और भावरूप शुभाशुभ फर्म का नाम पुण्य और पाप है । वे उक्त दोनो प्रकार के प्रास्रव व बन्ध स्वरूप ही हैं, उनसे भिन्न नहीं हैं ॥५॥ आगे छह द्रव्यो की प्ररूपणा करते हुए प्रथमतः उनके नामो का निर्देश किया जाता है- जीवः सपुद्गलो धर्माधर्मावाकाशमेव च । कालश्चेति समाख्याता द्रव्यसंज्ञा त्वया प्रभो॥ पूर्वनिर्दिष्ट वह जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, प्राकाश और काल इनका निर्देश हे प्रभो! आपने द्रव्य नाम से किया है-ये छह द्रव्य कहे गये हैं ॥५८।। अब उनमे से पहिले जीव का स्वरूप कहा जाता है--- प्राणधारणसंयुक्तो जीवोऽसौ स्यादनेकधा । द्रव्यभावात्मकाः प्राणाः द्वधा स्युस्ते विशेषतः॥ जो प्राणो को धारण करता है उसे जीव कहते हैं । वह अनेक प्रकार का है। प्राण द्रव्य और भाव स्वरूप दो प्रकार के हैं, विशेषरूप से वे दस हैं--पाच इन्द्रियां, तीन बल, आयु और श्वासोच्छ्वास ।। विवेचन -जिनके आश्रय से प्राणी जीवित रहता है उन्हे प्राण कहा जाता है। वे सामान्य से चार हैं-इन्द्रिय, बल, आयु और श्वासोच्छ्वास । इनमे इन्द्रियां पांच हैं-स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र । मन, वचन और काय के भेद से बल तीन प्रकार का है। इस प्रकार विशेषरूप से वे दस हो जाते हैं-५ इन्द्रियां, ३ बल, आयु और श्वासोच्छ्वास । इनमे से एकेन्द्रिय जीव के स्पर्शन इन्द्रिय, कायबल, आयु और श्वासोच्छ्वास ये चार प्राण पाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त द्वीन्द्रिय जीवों मे रसना इन्द्रिय और वचन बल इन दो के अधिक होने से छह प्राण, तीन इन्द्रिय जीवो के एक प्राण इन्द्रिय के अधिक होने से सात प्राण, चार इन्द्रिय जीवों के एक चक्षु इन्द्रिय के अधिक होने से आठ प्राण, प्रसज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों के एक श्रोत्र इन्द्रिय के अधिक होने से नौ प्राण और संज्ञी पवेन्द्रिय जीवों के एक मन के अधिक होने से दस प्राण पाये जाते हैं। ये प्राण द्रव्य-भाव के भेद से दो प्रकार भी हैं। इनमें द्रव्य- इन्द्रियो आदि को द्रव्यप्राण और भाव इन्द्रियो प्रादि को भावप्राण जानना चाहिए ॥५६॥ पुद्गल द्रव्य का स्वरूप--- स्पष्टिकेन संयुक्ता रसर्वर्णैश्च पञ्चभिः। द्विगन्धाभ्यां यथायोग द्वेधा स्कन्धाणुभेदतः ।। जो यथासम्भव शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, मृदु, कठोर, लघु और गुरु इन पाठ स्पर्टी सें; श्वेत, - - - ध्यानस्तवः [६१- नील, पीत, हरित और रक्त इन पांच वर्षों से; खट्टा, मीठा, कडवा, कषायला और तीखा इन पाच रसों से; तथा सुगन्ध और दुर्गन्ध इन दो गन्धों से; इस प्रकार इन बीस गुणों से सहित होते हैं उन्हे पुद्गल कहते हैं। वे स्कन्द और अणु के भेद से दो प्रकार के हैं। इनमे जिसका दूसरा खण्ड नहीं हो सकता है ऐसे पुद्गल के सबसे छोटे अंश को अणु और दो या दो से अधिक अणुओं के संयोग युक्त पुद्गलो को स्कन्ध कहा जाता है ॥६॥ आगे उक्त पुद्गलों की और भी कुछ विशेषता प्रगट की जाती है- स्थूला ये पुद्गलास्तत्र शब्दबन्धादिसंयुताः। जीवोपकारिणः केचिदन्येऽन्योऽन्योपकारिणः।। वे पुद्गल स्थूल और सूक्ष्म के भेद से दो प्रकार भी हैं। इनमें जो स्थूल पुद्गल हैं उन मे से कितने ही शब्द व वन्य प्रादि (स्थूल, सूक्ष्म, संस्थान, भेद, तम, छाया और प्रातप) से सहित होते हुए जीवों का उपकार करने वाले हैं-उनके सुख-दुःख एवं जीवन-मरण आदि के कारण हैं। कुछ दूसरे पुद्गल परस्पर में भी एक दूसरे का उपकार करने वाले हैं-जैसे राख वर्तनों का एवं सोडा-सावुन वस्त्रो का इत्यादि ॥६॥ अव उपयुक्त छह द्रव्यो मे क्रिया युक्त द्रव्यों का निर्देश करते हुए धर्म व अधर्म द्रव्यो का स्वरूप कहा जाता है- जीवाः पुद्गलकायाश्च सनिया वणिताः जिनः । हेतुस्तेषां गतेधर्मस्तथाधर्मः स्थितेर्मतः॥६२ उक्त द्रव्यो मे जीवो और पुद्गलों को जिन देव ने क्रिया (परिस्पन्दादि) सहित कहा है । उन जीव और पुद्गलों के गमन का जो कारण है उसे धर्मद्रव्य और उनकी स्थिति का जो कारण है उसे अधर्म द्रव्य माना जाता है ।।६२॥ आगे प्राकाश द्रव्य के स्वरूप व उसके भेदो का निर्देश किया जाता है- यद् द्रव्याणां तु सर्वेषां विवर दातुमर्हति । तदाकाशं द्विधा ज्ञयं लोकालोकविभेदतः ॥ जो अन्य द्रव्यो के लिए भी विवर (छिद्र---अवकाश) देने के योग्य है उसका नाम प्रकाश है। उसे लोकाकाश और अलोकाकाश के भेव से दो प्रकार जानना चाहिए। जहां तक जीवादि द्रव्य पाये जाते हैं उतने प्रकाश को लोफाकाश और शेष अनन्त आकाश को अलोकाकाश कहा जाता है ॥६३॥ अब काल द्रव्य का लक्षण कहा जाता है- वर्तनालक्षणः कालो मुख्यो देव तवागमे । अर्थक्रियात्मको गौणो मुख्यकालस्य सूचकः ॥६४ हे देव ! आपके पागम मे जिसका लक्षण वर्तना है उसे मुख्य काल कहा गया है तथा प्रक्रिया- स्वरूप जो काल है वह गौण काल है और वह मुख्य काल का सूचक है । विवेचन-जो वर्तते हुए पदार्थों के वर्तन में उदासीन कारण है वह काल कहलाता है । वह निश्चय और व्यवहार के भेद से दो प्रकार का है । निश्चयकाल का लक्षण वर्तना-वस्तुपरिणमन का सहकारी कारण होना है। वह अणुस्वरूप है। लोकाकाश के जितने (प्रसख्यात) प्रदेश हैं उतने ही वे कालाणु हैं जो लोकाकाश के एक-एक प्रदेश पर रत्नराशि के समान पृथक-पृथक् स्थित हैं। उस मुल्य (निश्चय) काल की पर्यायस्वरूप जो समय व घटिका आदि रूप काल है उसे व्यवहार काल कहा जाता है ॥१४॥ इस प्रकार छह द्रव्यो का निरूपण करके अव उनमे अस्तिकाय द्रव्यो का निवेश किया जाता है- द्रव्यषटकमिद प्रोक्त स्वास्तित्वादिगुणात्मकम् । कायाख्यं बहुदेशत्वाज्जीवादीनां तु पञ्चकम् ।। ये छह द्रव्य अपने अस्तित्व-वस्तुत्वादि गुणों स्वरूप कहे गये हैं। उनमें काल को छोड़कर जीवादि पांच द्रव्य बहुत प्रदेशों से युक्त होने के कारण काय कहे जाते हैं ॥६शा मागे काल द्रव्य काय क्यो नहीं है, इसे स्पष्ट किया जाता है- - - -६९] प्रमाण-नयविचारः १७ कालस्यक-प्रदेशत्वात् कायत्वं नास्ति तत्त्वतः । लोकासंख्यप्रदेशेषु तस्यकैकस्य सस्थितिः।। काल के एकप्रदेशी होने के कारण वस्तुतः कायपना नहीं है। उसका एक-एक प्रदेश लोक के प्रसंख्यात प्रदेशों पर स्थित है। विवेचन-उत्पाद, व्यय और प्रौव्य स्वरूप अस्तित्व (सत्) से सयुक्त होने के कारण छहों द्रव्यों को प्रस्ति कहा जाता है । जो काय (शरीर) के समान बहुत प्रदेशों से सयुक्त हैं वे काय कहलाते हैं। काल चूंकि एक प्रदेश वाला है, इसलिए उसे अस्ति तो कहा जाता है, पर काय नहीं कहा जाता। किन्तु शेष द्रव्य बहुतप्रदेशी हैं, इसलिए उन्हें अस्ति के साथ काय भी (अस्तिकाय) कहा जाता है। यहां यह शंका हो सकती है कि पुद्गल के अन्तर्गत परमाणु भी तो एकप्रदेशी हैं, फिर उन्हें काय कैसे कहा जाता है। इसके समाधान मे यह कहा जा सकता है कि परमाणु यथार्थतः तो काय नहीं है, किन्तु वे स्कन्धों मे मिलकर बहुतप्रदेशी होने की योग्यता रखते हैं, अतः उन्हें उपचार से प्रस्तिकाय समझना चाहिए। काल मे चूंकि बहुतप्रदेशी होने की योग्यता नहीं है, इसलिए उसे उपचार से भी फाय नहीं कहा जा सकता है । यही कारण है जो श्लोक में 'तत्त्वतः' पद को ग्रहण किया गया है ॥६६।। प्रागे उक्त बहुतप्रदेशी द्रव्यों में किसके कितने प्रदेश हैं, इसका निर्देश किया जाता है- धधिमकजीवानां संख्यातीतप्रदेशता । व्योम्नोऽनन्तप्रदेशत्वं पुद्गलानां त्रिधा तथा ॥६७ धर्म, अधर्म और प्रत्येक जीव ये असंख्यात प्रदेशो से युक्त हैं । आकाश अनन्त प्रदेशों से युक्त हैं। पुद्गलों के प्रदेश तीन प्रकार हैं-संख्यात, असख्यात और अनन्त । परमाणु और यणुक आदि ऋत्कृष्ट सख्यात, तक प्रदेशो वाले स्कन्धो मे सख्यात प्रदेश रहते हैं, सख्यात से आगे एक अधिक प्रदेश से लेकर अनन्त से पूर्व उत्कृष्ट असख्यातासख्यात से युक्त प्रदेशों वाले स्कन्धो मे असख्यात प्रदेश रहते हैं। इसके आगे महास्कन्ध तक सब पुद्गलस्कन्धो मे अनन्त प्रदेश रहते हैं। जितने आकाश को एक परमाणु रोकता है उतने क्षेत्रप्रमाण का नाम प्रदेश है ॥६७॥ पीछे श्लोक ३६ मे पदार्थपरिज्ञान के साधनभूत प्रमाण का निर्देश किया गया है, उसके स्वरूप व भेदो को यहा दिखलाते हैं- प्रमाणं वस्तुविज्ञानं तन्मोहादिविजितम् । परोक्षेतरभेदाभ्यां द्वेधा मत्यादिपञ्चकम् ॥६८ मोह प्रादि-संशय, विपर्यय व अनध्यवसाय-से रहित वस्तु के विशिष्ट (यथार्थ) ज्ञान को प्रमाण कहते हैं । वह प्रत्यक्ष,व परोक्ष के भेद से दो प्रकार का है। उनमे मति व श्रुत ये दो ज्ञान परोक्ष तथा अवधि, मनःपर्यय और फेवल ये तीन ज्ञान प्रत्यक्ष हैं। इस प्रकार इन पाच ज्ञानो को प्रमाण माना गया है। विवेचन-प्रविशद या अस्पष्ट ज्ञान को परोक्ष कहते हैं। वह दो प्रकार का है-मति और श्रुत । जो ज्ञान इन्द्रिय व मन की सहायता से उत्पन्न होता है वह मतिज्ञान कहलाता है। इस मतिज्ञान के निमित्त से जो विवेचनात्मक ज्ञान होता है उसे श्रुतज्ञान कहा जाता है, जो बारह अंगस्वरूप है। प्रत्यक्ष के तीन भेद हैं-अवधिज्ञान, मन पर्ययज्ञान और फेवलज्ञान । द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव को मर्यादा लिए हुए जो इन्द्रिय की सहायता से रहित ज्ञान होता है उसका नाम अवधिज्ञान है। इन्द्रिय व सहायता से रहित जो दूसरे के मन मे स्थित चिन्तित व अचिन्तित पदार्थ को जानता है उसे मन. पर्ययज्ञान कहते हैं। जो त्रिकालवर्ती समस्त द्रव्यो व उनकी पर्यायो को युगपत् जानता है उस अतीन्द्रिय शान का नाम केवलज्ञान है। वह इन्द्रिय आदि किसी अन्य की सहायता नहीं लेता है, इसीलिए उसकी 'केवल' यह सार्थक संज्ञा है । इसी कारण उसे असहाय ज्ञान भी कहा जाता है ॥६॥ आगे चार श्लोको मे नय के स्वरूप और उसके भेदो का निर्देश किया जाता है- नयो ज्ञातुरभिप्रायो द्रव्यपर्यायगोचरः। निश्चयो व्यवहारश्च द्वधा सोऽहंस्तवागमे ॥६६ . । मन की -- १८ ध्यानस्तवः [७०- द्रव्यं वा योऽथ पर्यायं निश्चिनोति यथास्थितम् । । नयश्च निश्चयः प्रोक्तस्ततोऽन्यो व्यावहारिकः ॥७०॥ अभिन्नकर्तृकर्मादिगोचरो निश्चयोऽथवा । व्यवहारः पुनर्देव निर्दिष्टस्तद्विलक्षणः ॥७१॥ द्रव्यार्थपर्ययार्थभ्यां पुनर्देव नयो मतः। सर्वे श्रुतविकल्पास्ते ग्राह्यभेदादनेकधा ॥७२॥ द्रव्य अथवा पर्याय को विषय करने वाला जो ज्ञाता का अभिप्राय होता है उसे नय कहते हैं। वह हे महन् ! आपके पागम में दो प्रकार कहा गया है-निश्चयनय और व्यवहारनय । जो यथावस्थित द्रव्य अथवा पर्याय का निश्चय करता है उसे निश्चय नय कहा गया है। उससे भिन्न व्यावहारिक-लोक- व्यवहार में काम आने वाला व्यवहार नय है । अथवा हे देव ! जो कर्ता व फर्म प्रादि कारकों में भेद न करके वस्तु को विषय करता है उसे निश्चयनय कहा गया है। व्यवहार नय उससे भिन्न है। तथा हे देव ! द्रव्यार्थ और पर्यायार्थ से-द्रव्य को विषय करने और पर्याय को विषय करने के कारण- भी नय दो प्रकार का माना गया है। श्रुत के भेदभूत वे सब नय ग्राह्यभेद से-अपने द्वारा ग्रहण करने योग्य विषय के भेद से-अनेक भेदरूप हैं। विवेचन-वस्तु अनेकधर्मात्मक है । -उनमे से ज्ञाता को जब जिस धर्म की अपेक्षा रहती है तब वह उसके लिए मुख्य और शेष धर्म गौण हो जाते हैं। यथा-सुवर्णमय कड़ों को तोड़ कर जब उससे मुकुट बनाया जाता है तब अपेक्षाकृत उसमें नित्यता व अनित्यता दोनो धर्म विद्यमान रहते हैं। कड़ों को तोड़ कर मुकुट के बनाये जाने पर भी दोनो में सुवर्णरूपता तदवस्थ रही, उसका विनाश नहीं हुआ, यही द्रव्यस्वरूप से मुकुट की नित्यता है। पर कड़ों रूप अवस्था से वह मुकुटरूप अवस्था को प्राप्त हुआ है, अतः उसमें पर्याय को अपेक्षा अनित्यता भी है। इसी प्रकार एक-अनेक, शुद्ध-अशुद्ध और भिन्न-भिन्न प्रादि परस्पर विरुद्ध दिखने वाले धर्मों का भी एक ही वस्तु मे अपेक्षाकृत अस्तित्व समझना चाहिए। इस प्रकार का जो विवक्षावश ज्ञाता का अभिप्राय रहता है, इसी का नाम नय है। वह नम निश्चय और व्यवहार के भेद से दो प्रकार का है। जो नय यथावस्थित द्रव्य अथवा पर्याय का निश्चय करता है उसे निश्चय नय कहा जाता है। इस प्रकार के लक्षण से ग्रन्थकार को सम्भवत नेगम संग्रह मादि सातो नय निश्चय के रूप मे अभीष्ट रहे हैं। इसके विपरीत जो यथावस्थितरूप में द्रव्य या पर्याय को ग्रहण न करके अन्यथारूप में उसे ग्रहण करता है उसका नाम व्यवहार नय है। जैसे--सूत को देते हुए यह कहना कि वस्त्र बुनकर लामो। इस प्रकार के कथन में यथावस्थित वस्तु का ग्रहण नहीं रहा । कारण यह कि सूत के पृथक्-पृथक् अंशों के बुनने पर वस्त्र निर्मित होता है, वस्त्र नहीं बना जाता । इस प्रकार यथार्थता के न रहने पर भी चूंकि सूत देने वाले का अभिप्राय सूत को बुनकर वस्त्र बनाने का ही अभिप्राय रहता है, अतएव यह व्यवहार नय कहलाता है । इसी प्रकार आटा पिसाना है, भात बनायो, तेल की शीशी लामो, इत्यादि व्यवहार नय के अन्य उदाहरण भी समझना चाहिए। आगे ग्रन्थकार ने 'अथवा' कहकर प्राध्यात्मिक दृष्टि को लक्ष्य में रखते हुए प्रकारन्तर से भी उक्त निश्चय और व्यहार नयो का स्वरूप इस प्रकार बतलाया है-जो फर्ता और कर्म आदि का भेव न करके शुद्ध द्रव्य मात्र को ग्रहण करता है वह निश्चय नय कहलाता है। जिस प्रकार मिट्टी स्वयं घट रूप परिणत होती है, अतः निश्चय नय को दृष्टि से यह नहीं कहा जा सकता कि कुम्हार ने देयदत्त के लिए मिट्टी से घट को बनाया है। इस नय की दृष्टि से प्रात्मा शुद्ध नायक स्वभाव है, वह कर्म का कर्ता व भोक्ता आदि नहीं है। इसके विपरीत व्यवहार नय कर्ता व कर्म प्रादि के भेद को स्वीकार करता है । जैसे-जीव को राग-द्वपादि का कर्ता मानना। प्रकारान्तर से नय के दो भेद अन्य भी है-द्रव्याथिक नय और पर्यायाथिक नय । जिसका अर्थ (प्रयोजन या विषय) द्रव्य ही है, अर्थात् जो मुरयता से द्रव्य को ही ग्रहण करता है, उसे द्रव्यापिक नय कहते हैं जैसे प्रात्मा सर्वथा शुद्ध व कर्म-मल से रहित है। जो पर्याय को प्रमुखता से यस्तु को ग्रहण म - 1 - 1 -७८] निक्षेपविचारः करता है उसे पर्यायाथिक नय कहा जाता है-जैसे ससारी आत्मा कर्म-मल से लिप्त रहने के कारण मशुद्ध है, इत्यादि। जिस प्रकार सर्वदेशमाही प्रमाण श्रुत के विकल्परूप है उसी प्रकार एक देश के विषय करने वाले उपर्युक्त सब नयों को भी श्रुत के विकल्पभूत समझना चाहिए। कारण यह कि विचारात्मक एक भृतज्ञान ही है, अन्य कोई भी ज्ञान विचारात्मक नहीं है ।।६६.७२॥ मागे क्रमप्राप्त निक्षेप का स्वरूप कहा जाता है- जीवादीनां च तत्त्वानां ज्ञानादीनां च तत्त्वतः । लोकसंव्यवहारार्थ न्यासो निक्षेप उच्यते ॥ लोकव्यवहार के लिए जो यथार्थत जीव-जीवादि तत्त्वो और ज्ञान आदि का न्यास किया जाता है-प्रयोजन के वश नाम आदि रखे जाते हैं, इसे निक्षेप कहा जाता है ।।७३॥ अब उस निक्षेप के भेदो का निर्देश करते हुए उनका स्वरूप कहा जाता है- सच नामादिभिर्भेदैश्चतुर्भेदोऽभिधीयते । वाच्यस्य वाचक नाम निमित्तान्तरवजितम् ॥७४ वह निक्षेप नाम आदि (स्थापना, द्रव्य और भाव) के भेद से चार प्रकार का कहा जाता है । उनमें गुण, क्रिया व'जाति आदि अन्य निमित्तो की अपेक्षा न करके अभिधेय पदार्थ का वाचक (सूचक) जो नाम रखा जाता है उसे नामनिक्षेप कहते हैं। जैसे-देव के द्वारा दिये जाने की अपेक्षा न करके किसी का 'देवदत्त' यह नाम रखना ॥७४।। मागे क्रमप्राप्त स्थापना और द्रव्य निक्षेपो का स्वरूप कहा जाता है-- प्रतिमा स्थापना ज्ञया भूत भावि च केनचित् । पर्यायेण समाख्यात द्रव्यं नयविवक्षया ॥७५ प्रतिमा को स्थापनानिक्षेप जानना चाहिए । जो किसी विवक्षित पर्याय से हो चुका है या आगे होने वाला है उसे नयविवक्षा के अनुसार द्रव्यनिक्षेप कहा जाता है । विवेचन--स्थापना दो प्रकार की है-तदाकार (सद्भाव) स्थापना और प्रतदाकार (असद्- भाव) स्थापना। जिनके प्राकार वाली प्रतिमा मे जो जिन देव की स्थापना (कल्पना) की जाती है वह तदाकार स्थापना कहलाती है । जो स्थाप्यमान वस्तु के प्राकार मे तो नहीं है, फिर भी प्रयोजन के वश उसमे वैसी कल्पना करना, इसे अतदाकार स्थापना कहते हैं। जैसे-हाथी ऊट प्रादि के आकार न होते हुए भी सतरज की गोटों में उनकी कल्पना करना । जो मत्री पद से मुक्त हो चुका है उसे तत्पश्चात् भी मंत्री कहना, तथा प्रागे वस्त्ररूप मे परिणत होने वाले तन्तुमो को वस्त्र कहना, इत्यादि को द्रव्य- निक्षेप कहा जाता है ॥७॥ अब निक्षेप के चौथे भेदभूत भावनिक्षेप का स्वरूप कहा जाता है- पर्यायेण, समाकान्तं वर्तमानेन केनचित् । द्रव्यमेव भवेद् भावो विख्यातो जिनशासने ॥७६ किसी (विवक्षित) वर्तमान पर्याय से युक्त द्रव्य को ही जिनागम मे भावनिक्षेप कहा गया है । मभिप्राय यह है कि जो द्रव्य वर्तमान पर्याय मे है उसे उसी पर्याय की मुख्यता से कहना, इसका नाम भावनिक्षेप है । जैसे-मंत्री जिस समय मत्रणा का कार्य कर रहा है उसे उसी समय मत्री कहना, अन्य समय में नहीं ॥७॥ मागे मोक्षमार्ग का स्वरूप कहा जाता है- सम्यग्दर्शनविज्ञानचारित्रत्रितयात्मकः। मोक्षमार्गस्त्वया देव भव्यानामुपदर्शितः ॥७७ हे देव ! प्रापने भव्य जीवो के लिए सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीन स्वरूप मोक्ष का मार्ग दिखलाया है। अभिप्राय यह है कि रत्नत्रयरूप से प्रसिद्ध उक्त सम्यग्दर्शनादि मोक्षप्राप्ति के उपाय हैं ॥७॥ सम्यग्दर्शन का स्वरूप- विपरीताभिमानेन शून्य यद्रूपमात्मनः । तदेवोत्तममर्थानां तच्छुद्धानं हि दर्शनम् ॥७॥ - M . २० ध्यानस्तवः [७६- विपरीत अभिमान-दुराग्रह या वैसे अभिप्राय-से रहित जो आत्मा का स्वरूप है वही पदार्थों मे श्रेष्ठ है । उस प्रात्मस्वरूप फा श्रद्धान करना, इसे सम्यग्दर्शन कहते हैं ॥७॥ मागे ३ श्लोकों मे उस सम्यग्दर्शन के दो भेदों का निर्देश करते हुए उनका स्वरूप कहा जाता है- तन्निसर्गात् पदार्थेषु कस्याप्यधिगमात्तथा । जीवस्योत्पद्यते देव द्वेधैवं देशना तव ॥७९॥ निसर्गः स्वरूप स्यात् स्वकर्मोपशमादियुक् । तमेवापेक्ष्य यज्जातं दर्शनं तन्निसर्गजम् ॥८० परेषामुपदेश तु यदपेक्ष्य प्रजायते । त्वयाधिगमनं देव तच्छद्धानमुदाहृतम् ॥८१॥ वह सम्यग्दर्शन किसी जीव के निसर्ग से-परोपदेश के विना स्वभावत.-तथा किसी के पदार्थ- विषयक अधिगम (ज्ञान) से उत्पन्न होता है। इस प्रकार से हे देव ! पाप का दो प्रकार का उपदेश है। अपने कर्मों के अनन्तानुवन्धी क्रोधादि चार एवं मिथ्यात्व, सम्यमिथ्यात्व और सम्यक्त्व ये तीन दर्शनमोहनीय इस प्रकार सात कर्मप्रकृतियो के-उपशम प्रादि से युक्त जो निज स्वरूप है उसका नाम निसर्ग है । उसी निसर्ग की अपेक्षा करके जो सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है उसे निसर्गज कहा जाता है। जो तत्त्वश्रद्धान दूसरों के उपदेश की अपेक्षा करके उत्पन्न होता है उसे हे देव ! आपने अधिगमण सम्यग्दर्शन कहा है। विवेचन-इसका अभिप्राय यह है कि इन दोनों सम्यग्दर्शनों में पूर्वोक्त सात प्रकृतियों के उप- शम प्रादि के समान रूप से रहने पर भी जो तत्त्वश्रद्धान दूसरे के उपदेश के विना पूर्व संस्कार से उत्पन्न होता है वह निसर्गज सम्यग्दर्शन कहलाता है तथा जो तत्त्वश्रद्धान दूसरे के उपदेश के प्राधय से उत्पन्न होता है उसे अधिगमज सम्यग्दर्शन समझना चाहिये । यह इन दोनो सम्यग्दर्शनो मे भेद है ॥७९-८१॥ अव प्रागे तीन श्लोकों मे प्रकारान्तर से उक्त सम्यग्दर्शन के अन्य दो और तीन भेदो का निर्देश करते हुए सराग और वीतराग सम्यग्दर्शन का स्वरूप कहा जाता है- अथ चैव द्विधा प्रोक्तं तत्कर्मक्षयकारणम् । सरागाधारमेकं स्याद्वीतरागाश्रयं परम् ॥१२॥ प्रशमादथ संवेगात् कृपातोऽप्यास्तिकत्वतः । जीवस्य व्यक्तिमायाति तत् सरागस्य दर्शनम् ।। पुंसो विशुद्धिमान तु वीतरागाश्रयं मतम् । द्वेधेत्युक्ता[क्त्वा] त्या देव घाप्युक्तमदस्तथा ।। कर्मक्षय का कारणभूत वह सम्यग्दर्शन दो प्रकार का कहा गया है-एक सरागाश्रित और दूसरा वीतरागाश्रित । जो सम्यग्दर्शन प्रशम, सवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्य इन गुणों के प्राथय से जीव के प्रगट होता है वह सराग जीव का दर्शन (सरागसम्यग्दर्शन) कहलाता है और जो जीव की विशुद्धि मात्र स्वरूप सम्यग्दर्शन है वह वीतरागाश्रित सम्यग्दर्शन माना गया है। इस तरह दो प्रकार का कहकर उसे तीन प्रकार का भी कहा गया है ।। विवेचन सम्यग्दर्शन के अन्य भी दो भेद हैं-सरागसम्यग्दर्शन और वीतरागसम्यग्दर्शन । राग युक्त जीव के तत्त्वश्रद्धान को सरागसम्यग्दर्शन और रागभाव से रहित जीव के तत्वज्ञान को वीतरागसम्यग्दर्शन कहा जाता है। इनमे प्रथम सरागसम्यग्दर्शन के परिचायक ये चार चिह्न हैं--प्रशम, सवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्य । इनमे क्रोधादि फपायो उपशमन का नाम प्रशम है। संसार, शरीर और भोगों से विरक्ति होने के साथ जो धर्म में अनुराग होता है उसे संवेग कहते हैं । दीन दुखी व सन्मार्ग से भ्रष्ट होते हुए जीवो के विषय मे जो दयाई परिणति होती है उसे अनुकम्पा कहा जाता है। सर्वज्ञ वीतराग के द्वारा जैसा जीवादि तत्वों का स्वरूप कहा गया है उसको उसी प्रकार मानकर वृढ़ श्रद्धा रखना, इसका नाम प्रास्तिक्य है । ये गुण उपत सम्यग्दर्शन के अनुमापक हैं ।।८२-८४॥ भव मागे चार श्लोकों मे उसके पूर्वनिर्दिष्ट तीन भेदों को कहा गया है- - । - -९१] सम्यग्दर्शनप्ररूपणा २१ मिथ्यात्वं यच्च सम्यक्त्वं सम्यमिथ्यात्वमेव च । क्रोधादीनां चतुष्कं च संसारानन्तकारणम् ।।' श्रद्धानप्रतिघात्येतत् ख्यातं प्रकृतिसप्तकम् । एतस्योपशमादौपशमिकं दर्शनं मतम् ॥८६॥ क्षयात्क्षायिकमाम्नातं त्वया देव सुनिर्मलम् । सम्यक्त्वोदीरणात्षण्णामुदयाभावतस्तथा ॥ तासामेव तु सत्त्वाच्च यज्जात तद्धि वेदकम् । सम्यग्दर्शनमीदृक्षं निश्चितं मोक्षकांक्षिणाम् ।। मिथ्यात्व, सम्यक्त्व और सम्यमिथ्यात्व ये तीन दर्शनमोहनीय तथा अनन्त संसार के कारणभूत कोषादि चार (अनन्तानुवन्धिचतुष्टय) ये सात प्रकृतियां श्रद्धान की घातक प्रसिद्ध हैं-सम्यग्दर्शन का घात करने वाली हैं। इनके उपशम से प्रौपशमिफ सम्यग्दर्शन माना गया है। हे देव ! और उन्हीं के क्षय से जो अतिशय निर्मल सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है उसे प्रापने क्षायिक सम्यग्दर्शन कहा है। सम्यक्त्व प्रकृति की उदीरणा से, शेष छह प्रकृतियों के उदयाभाव से तथा उन्हीं के सत्त्व से-सदवस्थारूप उपशम से- जो सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है वह वेदक सम्यग्दर्शन कहलाता है । सम्यक्त्व प्रकृति के वेदन से-उदय में रहने से-उसका 'वेवक' यह सार्थक नाम है। तथा उपर्युक्त सात प्रकृतियों के क्षयोपशम से उत्पन्न होने के कारण उसका 'क्षायोपशामिक' यह दूसरा नाम भी सार्थक है। इस प्रकार का वह सम्यग्दर्शन निश्चित ही मोक्षाभिलाषी जीवो के होता है। विवेचन-विपरीत अभिनिवेश से रहित दृष्टि का नाम सम्यग्दर्शन है। उपर्युक्त भेदों के प्रति- रिक्त वह सम्यग्दर्शन निश्चय और व्यवहार के भेद से भी दो प्रकार का है। शरीर प्रादि से भिन्न निर्मल मात्मस्वरूप का श्रद्धान करना, यह निश्चय सम्यग्दर्शन कहलाता है तथा जीवादि सात तत्त्वों का जो यथार्थ श्रवान होता है, वह व्यवहार सम्यग्दर्शन कहलाता है। जो जीव अनादि काल से मिथ्यादृष्टि रहा है उसके प्रथमतः प्रीपशमिक सम्यग्दर्शन होता है, जो अन्तर्मुहूर्त काल तक ही रहता है। तत्पश्चात् उस सम्यग्दर्शन का धारक जीव मिथ्यात्व को प्राप्त हो जाता है । इस प्रकार मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ कोई जीव वेदक सम्यग्दर्शन को प्राप्त कर लेता है, कोई प्रासन्न भव्य जीव क्षायिक सम्यक्त्व को प्राप्त कर लेता है तथा कितने ही मिथ्यादृष्टि बने रहते हैं। इस सम्यग्दर्शन के प्राप्त हो जाने पर जीव को हेय-उपादेय का विवेक हो जाता है। वह अधिक से अधिक पर्व पुद्गलपरावर्तन काल तक ही ससार में रहता है, तदनन्तर वह नियम से मुक्ति को प्राप्त कर लेता है ॥८५-८८॥ • इस प्रकार प्रस्तुत मोक्षमार्ग में प्रथमतः सम्यग्दर्शन का निरूपण करके अब क्रमप्राप्त सम्यग्ज्ञान का स्वरूप कहा जाता है- जीवादीनां पदार्थानां यो याथात्म्यविनिश्चयः । तदभ्यधायि विज्ञानं सम्यग्दृष्टिसमाश्रयम् ॥ जोवादि पदार्थों का जो यथार्थतः निश्चय होता है उसे विज्ञान-विशिष्ट ज्ञान (सम्यग्ज्ञान)- कहा गया है। वह सम्यग्दृष्टि के प्राश्रय से होता है, मिथ्यादृष्टि के नहीं होता ॥९॥ अब अवसरप्राप्त चारित्र का स्वरूप दो श्लोको द्वारा कहा जाता है- ज्ञानिनं मुक्तसंगस्य ससारोपायहानये । प्रशस्तापूर्णभावस्य सम्यक्सद्धानधारिणः ॥१०॥ कर्मादाननिमित्तानां क्रियाणां यन्निरोधनम् । चारित्रं यन्मुमुक्षोः स्यान्निश्चितं मोक्षकारणम् ॥ समीचीन श्रद्धान का धारक-निर्मल सम्यग्दर्शन से सम्पन्न-जो सम्यग्ज्ञानी' जीव संसार के उपायभूत मिथ्यादर्शनादि के नष्ट करने के लिए प्रशस्त भावों में उद्यत होकर ममत्व बुद्धि से रहित होता हुमा कर्मग्रहण की कारणभूत क्रियानो का निरोध करता है उस मोक्षाभिलाषी जीव के सम्यक्- चारित्र होता है । वह निश्चित ही मोक्ष का कारण होता है। अभिप्राय यह है कि संसार की कारणभूत क्रियाओं को-अशुभ प्रवृत्ति को छोड़कर सदाचार में प्रवृत्त होना, यह सम्यक्चारित्र कहलाता 1६०-६१॥ - . - - २२ ध्यानस्तवः [९२- मागे यह बतलाते हैं कि उक्त सम्यग्दर्शनादि तीन समस्तरूप में ही मुक्ति के कारण हैं, व्यस्तरूप में नहीं श्रद्धानादित्रयं सम्यक् समस्तं मोक्षकारणम् । भेषजालम्बनं यद्वत्तत्त्रय व्याधिनाशनम् ॥२॥ उक्त समीचीन श्रद्धानादि तीन (रत्नत्रय) समस्त होकर-तीनो एफ रूप मे होकर-ही मोक्ष के कारण हैं, न कि पृथक् रूप में एक, दो या तीन भी । जैसे-औषषि के पालम्बनभूत (औषषिविषयक) वे तीन-श्रद्धान, ज्ञान और प्राचरण-रोग के विनाशक हुआ करते हैं। अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार औषधि का श्रद्धान, ज्ञान और प्राचरण (उसका सेवन) ये तीनो सम्मिलित रूप में ही रोग के विनाशक होते हैं, न कि पृथक् रूप मे; उसी प्रकार जीवादि तत्त्वविषयक श्रद्धान, ज्ञान और प्राचरण (चारित्र) ये तीन भी सम्मिलित रूप में ही कर्मरूप रोग के विनाशक होते हैं, पृथक् रूप में नहीं ॥२॥ अन्त मे ग्रन्थकार ६ श्लोकों मे प्रस्तुत ग्रन्थ का उपसंहार करते हुए स्तुतिविषयक अपनी अशक्यता को प्रगट कर स्तुति करने के कारण मादि को दिखलाते हैं- अन्तातीतगुणोऽसि त्वं मया स्तुत्योऽसि तत्कथम् । ध्यानभक्त्या तथाप्येवं देव त्वय्येव जल्पितम् ।। यन्न तुष्यसि कस्यापि नापि कुप्यसि मुह्यसि । किंतु स्वास्थ्यमितोऽसीति स्तोतुंचाह प्रवृत्तवान् ।। इत्येवं युक्तियुक्तार्थैः प्रस्फुटार्थमनोहरैः। स्तोकरपि स्तवैर्देव वरदोऽसीति संस्तुतः ॥६५॥ रुष्ट्वा तुष्ट्वा करोषि त्व किंचिद्देव न कस्यचित् । किन्त्वाप्नोति फलं मर्त्यस्त्वय्येकानमनाः स्वयम् ॥६६॥ इति संक्षेपतः प्रोक्त भक्त्या सस्तवभर्मणा । किचिज्ज्ञ न मया किचिन्न कवित्वाभिमानतः ।। यन्मेऽत्र स्खलितं किंचिच्छद्मस्थस्यार्थशब्दयोः। तत्सवित्त्यैव सौजन्याच्छोध्यं शुद्धद्धबुद्धिभिः॥ हे देव ! आप अनन्त गुणो से युक्त हैं, ऐसी स्थिति में मैं आपकी स्तुति कसे कर सकता हूं? फिर भी मैंने आपके विषय मे जो स्तुतिरूप से इस प्रकार कहा है वह ध्यानभक्ति से-ध्यानविषयक अनुराग के वश ही कहा है। हे देव ! यतः आप किसी के प्रति न सन्तुष्ट होते हैं, न रुष्ट होते हैं, और न मोहित होते हैं, किन्तु स्वस्थता (मात्मस्थिति) को प्राप्त हैं। इसी से मै आपकी स्तुति करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूं। हे देव ! इस प्रकार से मैंने युक्ति युक्त अर्थ से परिपूर्ण एवं स्पष्ट अर्थ वाले मनोहर थोड़े से ही स्तवनों के द्वारा 'पाप वरद हैं-अभीष्ट सर्वश्रेष्ठ मुक्ति के दाता हैं' इस हेतु से स्तुति की है । हे देव ! पाप क्रुद्ध अथवा सन्तुष्ट होकर किसी का कुछ भी अहित या हित नहीं करते हैं, फिर भी आपके विषय मे एकाग्रचित्त हुमा मनुष्य-तन्मय होकर प्रापका स्मरण करने वाला भव्य जीव-स्वयं ही अभीष्ट फल को प्राप्त करता है । अल्पज्ञानी मैने इस प्रकार से स्तुति के रूप मे जो कुछ संक्षेप में कहा है वह भक्ति के वश होकर ही कहा है, कवित्व के अभिमान से नहीं कहा, अर्थात् 'मैं कवि हूं' इस प्रकार के अभिमान को प्रगट करने के लिए मैंने यह ध्यान का वर्णन नहीं किया है, किन्तु भक्ति से प्रेरित होकर ही उसे किया है। मैं अल्पज्ञ हूं, इसीलिए यदि अर्थ अथवा शब्द के विषय मे इस वर्णन मे कुछ स्खलित हुया हूं तो निर्मल व तीक्ष्ण बुद्धि वाले विद्वान् सुजनता वश उसे अपने समीचीन ज्ञान के द्वारा शुद्ध कर लें ॥६३.९८॥ अन्तिम प्रशस्ति- नो निष्ठीवेन्न शेते वदति च न परं एहि याहीति जातु नो कण्डूयेत गात्रं व्रजति न निशि नोद्घाटयेद् द्वान दत्ते। नावष्टम्नाति किचिद् गुणनिधिरिति यो बद्धपर्यंकयोगः कृत्वा संन्यासमन्ते शुभगतिरभवत्सर्वसाधुः प्रपूज्यः ॥६६॥ जो न थूकता है, न सोता है, न कभी दूसरे को 'पापो व जाम्रो' कहता है, न शरीर को तुग- लाता है, न रात्रि में गमन करता है, न द्वार को सोलता है, न उसे देता हैबन्द करता है, और न पूर्वक मृत्यु -१००] ग्रन्थकर्तुः प्रशस्तिः २३ किसी का माश्रय लेता है। ऐसा वह गुणो के भण्डारस्वरूप सर्वसाधु पयंक पासन से योग (समाधि) मे स्थित होता हुमा अन्त में संन्यास को करके-कषाय व चतुर्विध आहार का परित्याग करके सल्लेखना- को प्राप्त होकर-उत्तम गति से युक्त हुआ। इस प्रकार से वह सर्वसाधु-इस नाम से प्रसिद्ध को प्राप्त मुनि अथवा सर्वश्रेष्ठ साधु-अतिशय पूजनीय हुमा ॥६॥ तस्याभवच्छू तनिधिजिनचन्द्रनामा शिष्यो नु तस्य कृतिभास्करनन्दिनाम्ना। शिष्येण संस्तवमिमं निजभावनाथं ध्यानानुग विरचितं सुविदो विदन्तु ॥१०॥ उस सर्वसाधु का जिनचन्द्र नामक शिष्य हुआ जो श्रुत का पारगामी था। उसके--जिनचन्द्र के--पुण्यशाली भास्करनन्दी नामक शिष्य ने ध्यान के अनुसरण करने वाले ध्यान को प्ररूपणा युक्त- इस स्तोत्र को अपनी भावना के लिए प्रात्मचिन्तन के लिए रचा है, यह विद्वज्जन ज्ञात करें ॥१०॥ ॥ समाप्त। पाठभेद - जैन सिद्धान्त भास्कर भाग १२, किरण २, पृ. ५४, १-६ (जनवरी १९४६) मे प्रकाशित प्रस्तुत ध्यानस्तव मे और भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित (सन् १९७३) ध्यानस्तव मे जो कुछ महत्त्वपूर्ण पाठभेद रहे हैं उनका निर्देश यहा किया जाता है- श्लोक जैन-सिद्धान्त-भास्कर भारतीय ज्ञानपीठ दोषहम् दोषदम् ज्यक [त्र्येक] क ४५ दृष्टिसमाश्रयम् दृष्टिममाश्रयम् ४६ बहिरन्तश्चतु- बहिरन्यच्चतु- भावभिदात्मक भावाभिधात्मकः धर्मस्थितेर्मत धर्म. स्थितेर्मत. यथास्थितम् यथास्थितिम् ७५ भूतभावि ७८ त्तमतार्थाना त्तममर्थाना द्वधव द्वेघेव मय॑स्त्वय्येकान मय॑स्त्वयकान हेहि हाहीति एहि याहीति नोद्घाट्येद्वान दत्ते नोद्घाटयेद् द्वार्न धत्त शिष्योऽनु 1 ७० भूत भावि । ब शिष्यो नु - .

श्लोकानुक्रमणिका राख्या ६० २९ ४ ७२ श्लोकांश अथ चैव द्विधा प्रोक्त अनपेत ततो धर्माद् अनपेतं ततो धर्माद् अन्तातीतगुणाकीणं अन्तातीतगुणोऽसि त्व अभिन्नकर्तृकर्मादि प्रात रौद्र तथा धयं श्रावस्य निरोधो यः इति सक्षेपत प्रोक्त इत्येव युक्तियुक्तार्थं उक्तमेव पुनर्देव कथचिन्नित्यमेक च कर्मलेपविनिर्मुक्त- कर्मागच्छति भावेन कर्मादाननिमित्ताना कर्माभावे ह्यनन्ताना कालस्यकप्रदेशत्वात् कुमति. कुश्रुतज्ञान क्षयात् क्षायिकमाम्नातं चक्षुरालम्बन तच्च चेतनालक्षणस्तत्र जिनाज्ञा-कलुषापाय जीव-कर्मप्रदेशाना जीवलक्ष्मविपर्यम्त- जीव स पुद्गली धर्मा- जीवाजीवौ च पुण्य च जीवादीना च तत्त्वाना जीवादीना पदार्याना जीवाः पुद्गलकायाश्च जीवारख्यप्रियायां च शस्वभावमुदामीन सख्या श्लोकाश ८२ | ज्ञानिनो मुक्तसंगस्य १३ | तन्निसर्गात् पदार्थेषु १५ ! तपोयथास्वकालाम्या २ तव नामपद देव १३ तव नामाक्षर शुन ७१ / तस्याभवच्छ तनिधि- तासामेव तु सत्त्वाच्च ५३ / दर्शन ज्ञानत पूर्व ६७ | दहन्त सर्वकर्माणि ६५ / देहेन्द्रिय-मनोवाक्षु २४] द्रव्यपटकमिद प्रोक्तं ३४ द्रव्य वा योऽथ पर्याय ३५ | द्रव्यार्थ-पर्ययार्थाम्यां ५२ | धर्माधर्मकजीवाना ६१ | नयो ज्ञातुरभिप्रायो ४नानार्थालम्बना चिन्ता ६६ / नानालम्बनचिन्तायाः ४५] निसर्ग स्वम्वरूप स्यात् ८७ नो निष्ठीवेन्न होते ४७ / पदार्या एव तत्त्वानि ४१ / पदार्थान्नव यो वेत्ति १२ | परमज्ञानसवेद्य परमात्मानमात्मान ४६ | परेषामुपदेश तु ५८ पर्यायेण समाकान्त ४० | पुण्याद्विलक्षण पाप ७३ | पुसः पुसः पीडाविनामाय ८६ | पुमो विशुद्धिमान तु ६२ प्रतिभामो हि यो देय ४२ प्रतिमा स्थापना शेया प्रमाण-नय-निक्षेपः ६६ २२ ६ ६९ ३८ ३६ १ ८४ ४३ श्लोकानुक्रमणिका २५ सख्या ६२ r १६ ७४ १४ - ७५ श्लोकाश प्रमाणं वस्तुविज्ञान प्रशमादथ संवेगात् प्राणधारणसयुक्तो बन्धहेतोरभावाच्च मतियुक्त श्रुतं सत्य मिथ्यात्वं यच्च सम्यक्त्व मुख्य धयं प्रमत्तादि- यद् द्रव्याण तु सर्वेषा यन्न तुष्यति कस्यापि यन्मेऽत्र स्खलित किंचित् योगरोधो जिनेन्द्राणा स्ष्ट्वा तुष्ट्वा करोपि त्वं रुपातीत भवेत्तस्य वर्तनालक्षण. कालो वस्तुसत्तावलोको य विपरीताभिमानेन विप्रयोगे मनोज्ञस्य विश्वज्ञ विश्वदृश्वान शुद्ध शुभ्र स्वतो भिन्न सख्या श्लोकाश ६८ | शुभो य परिणामः स्याद् ५३ श्रद्धानप्रतिघात्येतत् ५६ | श्रद्धानादिययं सम्यक् ५६ श्रुतज्ञान वितर्क स्याद् ४४ | श्रुतमूने विवर्तते '५ म च नामादिभिर्भेदः १६ | मददृष्टि-ज्ञान-वृत्तानि ६३ | समाधिस्थस्य यद्यात्मा ६४ सम्यग्दर्शन-विज्ञान ६८ | सर्वातिशयसम्पूर्ण २३ | सवतकं सवीचार ६६संख्यातीतप्रदेशस्थ ३२ मिद्धि स्वात्मोपलम्भ ६४ | सूक्ष्मकायकियस्य स्याद् ४६ | स्थिरसर्वात्मदेशस्य ७८ स्थूला ये पुद्गलास्तत्र ६ / स्पष्टिकेन संयुक्ताः २७ | स्वच्छस्फटिकसकाश- ३१ | हिंसनासत्यचीर्यार्थ- २६ १७ " २० २१ २५. ११ L (Inju - विशिष्ट शब्दानुक्रमणिका शब्द श्लोकाक | शब्द श्लोकांक ५८, ६४ ४०, ४६ काल ६० कुमति २६ । कुश्रुत ४५ ८३ ४८ १५ ८७ अजीव अणु अतिशय अधर्म अधिगमज सम्यग्दर्शन अध्यात्मवेदी अनन्तज्ञान अनन्तवीर्य अनन्त सुख अनुकम्पा (कृपा) अन्तरात्मा अप्रमत्तक अमूर्तत्व प्रयोग प्रक्रिया अहंन् अलोकाकाश अवधि अस्तिकाय अस्तित्व गुण अहकार प्राकाश प्रात आस्तिकत्व १० ६४ ७७,६१ ६, २२ ४१, ४२ ४८ ५८, ६२ कृपा ८१ केवल ७ केवलज्ञान ४] केवलदर्शन २७ क्षपक २७ क्षायिक दान ८३ | गुप्ति ३६] गृहस्थ १५ | गौण काल ४६ चारित्र २१ चिन्ता ६४] चेतना ३१ | छद्मस्थ ६३ । जिनचन्द्र ४४ | जिनशासन जिनेन्द्र ६५। जीव ३७ ज्ञान ५८, ६३. तत्त्व ८,१० तप तितिक्षा ४०, ५२, ५७ तुच्छता दगंन द्रव्य द्रव्य (अचेतनात्मक) निजरा ध्य पाप १०० ४०, ४१,५६ ५३,५४ ६ आसव - ३,४६,४८, ७८ ३८,५८ उदयाभाव उदीरणा औपचारिक औपशमिक दर्शन ५१ द्रव्य पुण्य काय द्रव्य प्राण कायत्व विशिष्ट शब्दानुक्रमणिका २७ श्लोकाक शब्द पलोकाक वान्द ५६ ५६ ५३ १०० २३ ३७ ६४ स,३६,४०,५६ ७७ २ द्रव्य नय ७२ भावपाप द्रव्य निक्षेप ७५ | भावपुण्य द्रव्य बन्ध ५५ भावप्राण द्रव्य मोक्ष भावबन्ध "द्रव्य सवर ५३ | भावमोक्ष धर्म १२, १३, १४, १५, ५८, ६२ | भावसंवर धर्मध्यान १५ | भास्करनन्दि धम्यं ८, १३, १६ | भूतपूर्वगति ध्यान ६ मति नय ३६, ६९ मन पर्यय नामनिक्षेप ७४ ममकार निक्षेप ३६, ७३ मिथ्यात्व निदान १० मिथ्यादृष्टि निर्जरा ४०, ५४ मुख्य काल 'निश्चय नय १६,७०,७१ भूर्तत्व निसर्गज सम्यग्दर्शन मोक्ष पदस्थ २४ | मोक्षमार्ग पदार्थ ३८ योग 'परमात्मा २, ३६ योगनिरोध परोक्ष ६८ योगी पर्यवयोग ६९ रूपवजित •पर्ययार्थ नय रूपस्य पाप ४०, ५१ रूपातीत पिण्डस्थ २४, २८ रौद्र पुण्य ४०, ५० लोकाकारा 'पुद्गल ५८, ६१, ६२ विज्ञान 'पूर्ववेदी १६ वितर्क “पृथक्त्व १८ । विभग प्रकृति ८६१ विश्वदृश्वा प्रतिबिम्ब वीचार प्रमाण ३६, ६८ वीतराग सम्यग्दर्शन ८३ वृत्त "प्राण ५६ | वेदक सम्यग्दर्शन प्रातिहार्य २६ व्यवहार नग चन्ध ४०, ५५, ५७ शमक बहिरात्मा ३७ शुक्ल -भावनिक्षेप श्रुत भाव (चेतनात्मक) निर्जरा ५४ श्रुतज्ञान २३ २०, ३० २४ २४, ३०, ३१ ३२, ३६ ८, ११ ६३ 18 १७, १८ ४५ २७ ८२,८४ १४ प्राम ६६, ७०, ७१ १५ ८,१६ १६, ४४ १८ २८ ध्यानस्तवः श्लोकांक श्रेणि ६ सदृष्टि १७ १७ E8 ४०,५३ सपृथक्त्व समाधि समुच्छिन्नक्रियअनिवति सम्यक्चारित्र सम्यक्त्व सम्यग्ज्ञान सम्यग्दर्शन सम्यग्दृष्टि सम्यड्मिथ्यात्व सराग सम्यग्दर्शन सर्वज्ञ सर्ववेदी श्लोकाक | शब्द १५, १६ / सर्वसाधु १४, ३६,४४ : सविचार १७ / सवितर्क ५ सन्यास सवर ७७ सवेग ८५ | साधु सिद्धि ७७, ७८ | सूक्ष्मकायक्रिय ३, ८६ | मूक्ष्मक्रियसप्रतिपाति स्कन्ध .५२, ८३ स्थापनानिक्षेप १ | स्वप्रतिभास २० ३,४ २० २० १ ६०

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Dhyanshatak Tatha Dhyanstav

Author
Siddhantshastri, Balchandra
Title
Dhyanshatak Tatha Dhyanstav
File name
Dhyanshatak Tatha Dhyanstav
Text
OCR done
Published
2010/05
Publisher
Veer Seva Mandir, Delhi
Language
Sanskrit
Pages
198
Library
Bhartiya Shruti Darshan Kendra
DLI number
327158
Barcode
99999990002645.00
Scanning centre
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