Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner

Shri Madhrgavati Sutram

N.v.vaidya · 2011/03

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Front matter

Published by
Shri Mangaldsa L Gbadial
For
The Manazing Trusteos of
Shri VIJAYADEVSUR SANGH QSAN SANITI
The Gcdiji Jain Temple and Charities
Pydon, Bombay s
The Trustees of (Shri Vijayadevsur Sangh )
The Godiji Jain Temple & Charities
(1) Sheth Gokuldas Lallubhai
(2) Sheth Panachand Rupcband
(3) Sheth Laxmichand Durlabhju.
(4) Sheth Bbarchanibhai Naginbhai Jhaverk.
(5) Sheth Keshavlal Bulak hidas
(6) Sheth Mohaplal Maganlal,
(7) Sheth Mohanlal Tarachand JP
(8) Sheth Laxmichand Raichand Sarvaiya
(9) Sheth Raranchand Choonilal Dalia
(10) Sheth Mulchand Vadilal
(11) Sheth Fulcband Naginbhar Jhaveri
(12) Sheth Ranchhoddas Chhotalal,
Printed by
K. G SRARANGPANI
Aryabhushan Press
9151 Shivapozgar Poona

SHRI VIJAYADEVSUR SANGH
SERIES No9
श्रीमद्भगवती सूत्रम्
(पञ्चदश गोशालकास्य शतकम् )
श्रीमदभयदेवमूरिवर्यविहितविवरणयुतम् ।।
EDITED BY
Prof N V VAIDYA MA
Fargusson College Poona 4
1954

No text on this page.

Preface The University of Bombay has prescribed the Fifteenth Sataka from the Bhagavatı Sūtra (Gosila Mata ) for the M A examination for the years 1954 and 1955 It was edited by Dr P L Vaidya as an Appendix to bis edition of Urasugadasão But that edition is now out of print and the students, therefore are finding it difficult to procure the copies of the text Many students wrote to me requesting me to undertake the publication but I was hesitating--for obvious reasons I then requested my friend Shri Popatlal Shab ML A., to do sometbin. in the matter ard I am glad to state that he imme dlately promised to d fray the entire publication costs and asked me to proceed with the work immediately It was a very generous gesture on his part and I am indeed very grateful to him for tbe same In the meantime I had al o written to the Trustees of the Shri Godiji Maharaj Jain Temple and charities regarding the difficulty expericaced by the students and the Trustees though none of them knew me personally very kindly and generously agreed to publish the text as well as the commentary on behalf of their series viz The Vijayadevsur Sangh Series I am indeed grateful to the enlightened Trustees of the above mentioned chanı ties for their very generous & spontaneous response to my request I have no doubt that the students of the M A clas would also be equally grateful to the Trustees for this Dnyāna Dana I am indebted to my student friend Shri P N Mulay B A BT, for preparing the Press-copy of the commentary 28-12-54 Fergus.on College Poona 4 NY VAIDYA श्री गोडी पाश्वनाथाय नम । । PUBLISHERS NOTE We the members of Shree Vijayadevsur Sangh Gnan Samitt are glad to publish this GOŚĀLA-MATA the Fiftenth chapter of Shree Bhagavatı Satra- as the 9th Volume of Vijayadevsur Sangh Series We are very much grateful to Professor N V Vaidya, M A for advising us to take up the publication work and for his taking so much interest to give facilities to the student world All honour goes to Shri N V Vaidya for editing this work and giving his valuable time without any expectations We will feel ourselves doubly rewarded if more and more students come forward to take up the study of Ardha-Magadbi Language Members Of Vijayadevsur Sangh Gnan Samiti (1) Sheth keshavlal Bulakbidas (2) Sheth Ratanchand Chunilal Dalia (3) Sheth Panachand Rupchand ( 4 ) Sheth Laymichand Rarchand Saravaiya (5) Sheth Fattehchand Zaverbhar (6) Narottamdas Bhagvandas Shah. (7) Mobanlal Dipchand Choksi (8) Chhotalal Girdharbhat (9) Mangaldas Lallubbal Ghadialı 4 4 OUR PUBLICATIONS (1) भी सूत्रस्ताव भाग १ भाग २ (१) श्री एच पतिक्रमणसूत्र सार्थ (गुजराती) विवामाईन पृट ६४ (v) नामाक्ति नागरिक, शेठ मोतीशाह (यजगती ) 2-6-0 (5) JAINISM IN GUJABAT ( 1100 A D to 1600 A, D ) 5 0-0 ॥ श्रीमद्भगवतीसूत्रम् ॥ पनरमम सय ॥ (मूत्राणि ५३९-५६०) नमो सुयदेवयाए भगवई ।। १ तेण कालेण तेण समएण सावत्थी नाम नयरी होत्या। दण्णगी। तीस ण सारत्यी नयपि यहिया उत्तरपुरस्थिम दिसीमाए 5 तत्थ ण कोट्टए नाम चेदए होत्था धमा। तत्य " सारथीए नयरीप हालाहला नाम कुंभकारी आजीविश्रीवासिया परियसइ अहा जान अपरिभूया, आजीवियसमयसि लट्ठा गहियहा पुच्छियहा रिणिच्छियट्ठा अद्विमिंजपेम्माणुरागरत्ता, अयमाउसो आजीवियसमए अटे, अय परमट्टे, सेसे अण? ति आजीवियसमपण अप्पाण 10 भावमाणी विहर॥ १ तेण कारेण तेण समण्ण गोसाले मसारिपुत्ते चउन्चीसरास- परियाए हालालाप कुमकारीए कुभकरावणसि आजीवियसप- सपरिवुद्ध आजीरियसमएण अप्पाण भायेमाणे विहइ । तए ण तस्स गोसालस्स मखलिपुत्तरस अन्नया कयाइ इमे छ दिमायरा अतिय 15 पाउमवित्था। त जहा-१ साणे, एक्लदे, ३ कपिणयारे, ४ अच्छिदे, ५ अग्गिोसायणे, ६ अनुणे गोमायुपुते। तप एण ते छ दिसायरा अरिह पुव्यगय मग्गदसम सपहिं २ मइदसणेहिं निजूदति, सा गोसाल मसरिपुत्त उबट्ठाइसु । तए ण से गोसाले मखलिपुत्ते तेण अट्ठगस्स महानिमित्तस्स केणइ उहोयमेत्तेण सन्येसि पाणाण सर्वसिं 20 भूयाण स वेसि जीगाण सव्येसि सत्ताण इमाइ छ अणइकमाणनाइ वागरणारयागरेद। त जहा-१ लाम २ अलाम १ सह ४दुख

2
श्रीमद्भगवतीमूत्रम्
५जीरिय ६ मरण तहा। तए ण में गोसाले मसापुत्री तेग
अट्ठगन्स महानिमित्तम्स केणइ अरोयमेत्तेण सावत्थीए नयरीए
अजिणे जिणप्पलावी, अणरहा अरप्पला, अकेवली कल्प्पिलानी,
अस ग्लू सबप्पलाशी अजिण जिणसह पगासमाणे विहाहग
(सू० ५३९)
३ तए ण सारीए नयरीष सिंघाडग र पहेस बहुजणो
अनमनस्स एवमा क्खइ, जाव एव पस्वेद'एव खलु देवाणुप्पिया,
गोसाले मखलिपुत्त जिणे जिणप्पलादी नाव पगासेमाणे विहरह, से
कमे म एकतण कालैण तण समण सामी समासद, जार
10 परिसा पडिगया। तेण कालण तेण समण्ण समणस्स भगवा
महावीरस्स ज? अन्तवासी इदभूइ नाम अणगारे गोयमगोतेण जाब
उदउण एवं हा विस्यमा नियादसए नाव अडमाणे बहुजणसद
निसाभेद, बहुजणो अम्नमलस्स एवमाइक्वर ४- 'पर खल
देवाणुप्पिया, गोमाले मसलिपुत्त जिणे जिणप्पलावी जाव पगासेमाणे
15 विहरद, से कमेयं मन्ने एय।।
४ त ण मगर गोयमे बहुजणस्म अतिय एयम? सोचा निसम्म
जीव जायसड्डे नाव मत्तपाणं पडिदसइ, आव पज्जुवासमाणे एय
वयासी-"एच खलु अह भत, छट्ट त चव नाव जिणमद्द पगामेमाण
विहरहा से कहमेय भत, ण्य" त इन्छामि ण भते गोसालस्स
20 मरलिपुत्तस्स उहाणपरियाणिय परिकहिय । गोयमा' इसमणे भगव
महावीरे भगव गायम एव वयासी-जण गोयमा से बहुजणे अन्न
मनस्स एयमाइदरवइ ४.-- एच एलु गोताले मसलिपुत्ते जिणे
जिणप्परावी व पगामेमाणे पिहरह त ण मिच्छा। अह पुण
गोयमा, एवमाइक्खामि जाव परुचमि--'एय खलु एयस्त गोसालस्स
2 मखलिपुत्तस्स मसलिनाम मख पिया होत्था। तस्स ण मखलिस्म
मखस्स भदा नाम भारिया हात्था, सुकुमाल जाव पडिस्मा तए

पन्नरसम सय
B
ण सा भद्दा भारिया अन्नया कयाइ गुधिणी यावि होत्या। तेण
कालेण तेण समरण सरवणे नाम सनिवेसे होत्था, रिद्धस्थिमिय
नाव मनिभप्पगासे पासादीए। तत्थ ण सरवणे संनिवेसे
गोवहले नाम माहणे परिवसइ, अड्डे नाव अपरिभूए, रिउन्य नाव
सुपरिनिटिप यावि होत्या तस्स ण गोबहुलस्स माणस्स गोसाला
यावि होत्था । तए ण से मेखली मखे अन्नया कयाइ भद्दाप भारियाए
गविणीए सद्धि चितफलगहत्थगए मखत्तणेण अप्पाण भावेमाणे
पुषाणुपुचि चरमाणे गामाणुगाम दूरग्जमाणे जेणेव सरवणे सनिवेसे
जणे गोबदुलस्स माणस्स गोसाला तेणेव उवागच्छइ २ गोबहुलस्स
माहास्स गोसालाए एगदेससि भडनिरोप करेइ, २ सरवणे 10
सनियसे उच्चनीयमज्झिमाइ कुलाइ घरसमुदाणास भिक्खायरियाए
अइमाणे वसहीए सवओ समता मग्गणगवेसण करेइ, मग्गणगवेसण
करेमाणे तस्सेर गोबहुलस्स माणस्स गोसालाए एगदेससि
चासापास उवागए।
५ ताण सा भद्दा भारिया नगण्ड भासाण बहुपडिपुण्णाण 15
अट्ठमाण राइदियाण वीइकताण भुकुमाल जाव पडिरूवग दारग
पयाया। तए ण तस्स दारगस्स अम्मापियरो पकारसमे दिवसे
वीरकते नाव वारसाहे दिवसे अयमेयाख्य गोण गुणनिप्फन नाम
धेज्ज करति- जम्हा ण अम्द इमे दारए गोबलस्स माणस्स
गोसालाए जाए त होउ ण अम्ह इमस्स दारगस्स नामधेज्ज 20
'गोसाले, 'गोसाले ति। तए ण तस्स दारगस अम्मापियरो
नामधेज्ज करति गोसाले। ति। तर ण से गोसाले दारए
उम्मुवालमावे विग्णायपरिणयमेत्ते जोरणगमणुप्पत्ते सयमेन
पाहिएक चित्तफलग करेइ " चित्तफलगहत्यगए मखत्तणेण अप्पाण
भावमाणे यिहरह।। (सू०५४०)
क

श्रीमद्भगवतीमूत्रम् ६ तेण कालेण तेण सभएण अह गोरमा, तीस वासाइ अगार- चासमझे सित्ता अम्मापिदि देवत्तगाहिं एवं जदा भावशाए पाय एग देवदूसमादाय मुई भवित्ता अगाराओ अणगारिय पाचइत्तए। तए ण अह गोयमा, पदम बास अद्धमासअदमासण सममाणे अष्ट्रियगाम निस्साए पढम अतरावास वासायास उवागए। दोच्च वास मासमासेण खममाण पुवाणुपुर्वि चरमाणे गामाएगाम दूहग्जमाणे जेणा रायगि नयरे, जेणेर नालदा पहिरिया, जेणेर तनुमायसाला, तेणेव उवागरचामि, अहापहिम्ध उग्गह ऑगिण्यामि, ततवायसालाए एगदेससि घासावास उवागए। तए ॥ अह 10 गोयमा, पढम मासखमण उयसपज्जित्ताण विहरामि। ७ ता ण से गोसाल मसारिपुत्ते चित्तफरगइत्यगए मखत्तणेण अप्याण भावमाणे पुत्वाणपुटिय घरमाण वरमाण जाव दूइज्जमाणे जेणेव रायगिहे नगरे, जेणेव नारदा पाहिरिया, जेणेव तत्वायसाला तणय उवागच्छद ततुवायसालाप 18 एगदेसमि भडनिकम्वेव करद, २ रायगिह नयरे उच्चनीय जाव अस्वस्थ कत्थ वि वसहि अलममाणे तीसे य तंतवायसालाप एगदेससि वास- वास उवागए, जत्थेव ण अह गोयमा । तर अह गोयमा, पढममार- वसमणपारणगंसि तवायसालाओ पडिनिक्समामि, २ नारदा- बाहिरिय मज्मज्झेण जेणेन रायगिह नयरे तेणेव उवागच्छामि 20२ रायगिहे नयरे उच्चनीय नाव अहमाणे विजयस्स गाहावदस्स गिह अणुपवि?। तए ण से विजए गाहावइ मम एज्जमाण पासइ, २त्ताइट्ठखिप्पामेव आसणाओ अभुट्टर, २पायपीहाओ पञ्चोकहर, २ पाउयाआ ओमुयइ, २ एगसाडिय उत्तरासग रेड, २ अजलि- मऽलियहत्थे मम सत्तटुपयाइ अणुगच्छद, २ मम तिक्खुत्तो दुआयाहिणपयाहिण करेइ, २ मम वइ नमसइ, २ मम विउलेण पन्नरसम सय 5 असणाणखाइमसाइमण पडिलाभेस्सामि त्ति कट्ठ तुट, पडिलाभेमाणे वितुरे, पडिलाभिए यि तुटे । तरण तस्स विजयस्स गाहारइरस तेण द पसुद्धणं दायगसुद्धण पडिगागसुद्धण तिरिहेण तिकरणसुद्धण दापण मए पडिलाभिए समाणे देवाउए निवद्ध, ससार परित्तीकए, गिहसि य से दमाइ पच दिमाइ पाउडम्याद, तजहा- वसुधारा बुटा, 5 २ दानद्ध मण्जे कुसुमे निवाइए, ३चमुक्तेरे कर, ४ आयाआदेव दुदुभीआ ५अतरा वियण आगासे 'अहा दाणे दाण' तिघुटे। तएण रायगिहे नगरे सिंघाडग नाव पहेसु बहुजणो अरमन्नस्स एचमाइक्खइ ४, धने ण देवाणम्पिया, विजए गाहाबई, कयस्थेण देवाणुप्पिया विजय गाहापई, कयपुण्णे ण देशप्पिया विजए गाहारई, कय 10 लक्षणे ण देवाणुप्पिया, विजय गाहावई, कया ण लोया देवाणुप्पिया, विजयस्स गाहावइस्स, सुर द्वे ण देवाणुप्पिया, माणुस्सा जम्म- वियफले विजयस्स गाहापइस्स, जस्स ल गिहसि तहारूवे साहु साहारे पडिलाभिए समाणे इमाइ पच दिव्याह पाउ भूयाइ, त जदा- १ वसुधारा वुट्टा, जाव 'अहो दाणे दाणे' ति युट्टे । त धने कयत्थे 15 करपुष्पण कपलवणे, कया ज रोया, सुलद्ध माणुस्सए अम्म- जीवियफले विजयस्स गाहायइस्स। ८ तण ण स गोसाले मस्खलित्ते बहुजणस्स अतिए एयम सोचा निसम्म समुपजससए समुप्पलकोउहल्ले जेणेन विजयस्स गाहावइस्त गिहे तेणेर उपागच्छद, २ सा पासा विजयस्स 20 गाहावास्स मिहसि धसुहार वुटु, दसद्धरण कुसुम नियडिय, मम च विजयस्त गाहावास्स गिहाओ पडिनिकावममाण पासइ, २त्ता छ? जेगेर मन अतिप तेगेर उरागच्इ, २त्ता मम तिक्ता आयाहि गपयाहिण करे, २ त्ता मम याइ नमसर, •त्ता मम पर्व वयासो-'तुझे ण भने, मम धम्मायरिया, अह | 23

6
श्रीमद्भगवतीमूत्रम्
तुज्झ धम्मतवासी ! तए ण अह गोयमा, गोसाररस मसलिपुत्तरस
एयम नो आदामि, नो परिजाणामि, तुसिणीए सचिट्टामि । तरण
अह गोयमा, रायगिहाओ नयराओ पडिनिवसमामि, २त्ता नारद
बाहिरिय मज्झमज्झेण जर तवायसाला, तेणेव उवागच्छामि
5२त्ता दोच्च माससमण उयसपजिताण विहरामि। तए
ण अह गोयमा, दोच्च मासवरसमणपारणगसि तवायसालासो
मडिनिवखाममि, २ नारद वाहिरिय मग्झमझेण जेणेर रायगि नयरे
जाव अडमाणे आणन्दस्स गिह अणुप्पविद्ध । तए ण से आणदे
गाहावई मम एज्जमाय यासइ, एवं वहद विजयरस नवरं मम विउलाप
10 खजगविहीए पडिलाभेरसामि ति तुडे, सेस ते चव भाव तच्च
मासक्खमण उवसपन्जिताण रिहामि । तप ण अह गीयमा, तव
भासक्खमणपारणगसि तत्वायसालाओ पढिनिवरत्रमामि, २ तहेव
जाय अहमाणे सुणदास गाहावास्म मिद अणुपविटे । तए ण से
सणद्गाहावई, एव जहेव विनयगादवई नवरं मम सयकामगुणिपण
15 भोयणेण पटिलाभेइ, सेम त चैव पाव
मासबसमार्ण
उपसपजित्ताण विहरामि । तीसे ण नालदाए पाहिरियाप अदूरसामते
एल्थ ण कोटाप नाम सनिवेसे होत्था वण्णओ। तत्थ ण कोहराए
सनिधेसे बहुले नाम माहणे परिवसा अढे जाव अपरिभूष, रिउ क्य
भाव सुपरिनिट्टिए यावि होत्था। तए ण से बहुले मारणे
20 कत्तियचाउम्मासियपाडिरगति विउरेण मनुघयसजुत्तेण परमण
मारणे आयामेत्थातए ण अह गोयमा, चउत्थमासवरखमणपारणसि
ततुवायसालाी पहिनिवखमामि मालद बाहिरिय मज्झमझेण
निग्गच्छामि २ जेणेव कोल्लाए सनिवेसे तेणव उवागच्छामि कोहराए
सनिवेसे उच्चनीय जाब अहमाणे बहुलस्स माहणस्स गिह
25 अणुप्पविट्ट । तए ण से बहुले माहणे मम एजमाण, तहेव नाव,
चउत्थ

पन्नरसम सय T मम विउऐण महुघयसजुत्तेण परमन्त्रेण पडिलाभेरसामि त्ति तुट्टे। ससे नहा विजयस्म॥ वेव ९ तए ण से गोसाले मखलिपुत्ते मम ततुयायसालाए अपासमाणे रायगि नयरे सभितरवाहिरियाए मम सव्यओ समता भग्गणगवेसण करेइ, मम कत्थ धि सुइ या खुइ या पयतिं वा अरभमाणे जणेय 5 ततुवायसाला तेणेर उवागच्छद, २ साडियाओ य पाडियाओ य कुढियाओ य वाहणाओ य चित्तफलग च माणे आयामेइ, २ सउत्तरो? मुड कारेइ, २ ततुपायसालाओ पडिनिकरखमा, २ नालद पाहिरिय मज्झमझण निग्गच्छइ, २ जेणेर कोहागसनिवेसे तेणेव उवागच्छन । तए ण तस्स कोलागस्स सनिवेसस्स पहिया बहुजणो 10 अन्नमसस्स एवमाइकखइ ४-'धले णे देवाणुप्पिया, बहुले माहणे । जाव, जीवियफले बहुलस्स माणस्स। त ण तस्स गोसालस्स मखलिपुत्तस्स बहुजणस्स अतिय एयभट्ट सोच्चा निसम्म अयमेयास्ये अज्झथिए जाप समुप्पज्जित्था- 'जारिसिया ण मम धम्मायरियरस धम्मोवदेसगस्स समणस्स भगवओ महावीरस्स इड्डी जुत्ती जसे बल 15 पीरिए पुरिसक्कारपरक्कमे लद्धे पत्ते अभिसमनागए, नो सल अस्थि तारिसिया ण अन्नरस कस्सइ तहास्यरस समणस्स या माणस्स या दही जुत्ती नाव परफमे लद्धे पत्ते अभिसमन्नागण, त निस्सदिद्ध च ण एत्थ मम धम्मायरिए धम्मोवदेसए समणे भगर महावीरे भविस्सइ त्ति कट्टु कोहागसनिवेसे सभितरवाहिरिए मम सम्बओ समता 20 मागणगवेसण करेइ, मम सयो जाब फरेमाणे कोरागसनिवसस्स पहिया पणियभूमीए भए सद्धि अभिसमन्नागए। तए ण से गोसाले मखलिपुत्ते तुझे मम तिक्युत्तो आयाहिण पयाहिण नाव नमसित्ता एय ययासी-'तुभेण भतं मम धम्मायरिया,अहण तुज्झ अतेवासी तए ण अह गोयमा गोसालस्स मखलिपुत्तस्स एयमट्टै पढिसुणोमि ।

8
श्रीमद्भगवतीसूतम्
तए ण अह गोयमा, गोसारेण मावलिपुत्तेण सद्धि पणियभूमीप
छ पासाइ लाम अलाभ सुख दुपस सकारमसकार पच्चणुभवमाणे
अणिच्चजागरिय विहरित्था ॥ (सू० ५४१)
१० तए ण अह गायमा, अलया कयाइ पढममरयकालसमयसि
5 अप्पट्टिकायसि गोसालण मसलिपुतण सद्धि सिद्धत्थगामाओ
नयराओ कुम्मगाम नयर मपट्टिए विहाराए । तस्स णसिद्धस्थगामस्स
नयरस्स कुम्मगामस्स नयरस्स य अतरा पत्थ ण मह पगे तिलथभए
पतिए पुफिप हरियगोरेजमाणे सिरीए अईयर उयसोभेमाणे २ चिट्टइ।
तए ण से गोसाले मसलिपुत्ते त तिलथभग पासइ, असा मम घर
10 नमसइ, २ चा नमसित्ता पर बयासी-एस प भने, निलयभए कि
निष्फजिस्सइ नो निष्फजिस्सी एप य सत्त तिलपुप्फजीरा
उदाइत्ता कहिं गन्निहिति, कहिं उवानिहिति ?' तए ॥ अह
गोयमा, गोसाल मग्बलिपुत्त एप क्यासी-'गोसाला, एस ण तिलथमा
निप्फन्निस्सइ, नो न निष्फजिस्सइ एप य सत्त तिलपुप्फजीवा
1. उदाइत्ता एयरस चेव तिलथभगस्स एगाए तिलसगलियाए सत्त
तिला पद्यायाइरसति। तए ण से गोसाल मसलिपुत्ते मम एवं
आइवस्वमाणस्स एयमट्ट नो सद्दहर, नो पत्तियइ, नो रोपड़, ण्यमट्ट
असदहमाणे अपत्तियमाणे अरोएमाणे मम पणिहाए 'अय |
मिछायादी भयउ ति कट्ठ मम अतियाओ साणेय २ पञ्चोसकर,
20२त्ता जेणेव से तिलथभए तेणेव उवागछ, . त तिलथभग
सलेटुयाय चत्र उप्पाहेर, २ ता एगत ण्डे । तवणमत्त च ॥
गायमा, दिव्य अभद्दरप पाउ भूए । तरण मे दिव अभवद्दल
विप्पामेव पतणतणाण्ड, खिप्पामेर पपिग्नुयाइ, सिप्पामेन नचोदा
नारमट्टिय परिररपफुतिय रयरेणविणासण दिन सलिलरादग वास
वासद, जेण से तिल्थमए आसत्थ पचायाए, तत्थेन वद्धमूले, तरथेर

पन्नरमम सय 9 10 पट्टिए। ते य मत तिलपुप्फजीवा उदाइत्ता तम्सन तिल्थमगरस एगाप तिलसगलियाए सत्त तिला पञ्चायाया ॥ (सू० ५४२) ११ तए ण अह मायमा गोसालेण मावलिपुत्तेण सद्धि जेणेर कुम्मगामे नयरे तर्णन उपागामि । तए ण तस्स कुम्मगामस्स नयरस्स बहिया वेसियायण नाम बालतबस्सी छ?ण' आगशिवत्तण ताम्मेग उट्ट बाहाओ पगिग्झिय २ सूराभिमुहे आयारणभूमीए आयारमाणे निहरइ । आश्च्चतेयतारियाओ य से छप्प- दीआ स आ समताअभिानेस्सरत, पाणभूयजीसत्तदयट्ठयाए च ण पडियाआ तथरभुजो पच्चीसभइ। तए ण स गासाल मावलिपुत्ते येसियायण घालतमस्सि पासइ, २ त्ता मम अतियाओं सणिय २ पच्चीसकर, साजणेर योमियायणे बालतपस्सी तणन उपागच्छइ, पसियायण पारतस्सि एप क्यासी-'किं भर मुणी, मुणिए, उदाट जूयासेन्जायरए" तरण से बेमियायणे वालतरस्मी गोसालस्म मखरिपुत्तस्स ण्यम नो आदाइ नो परियाणइ, तुमिगीए सचिट्ठइ । तण से गासाले मसलिपुत्ते वेसियायण बालतस्सि दोश्च पि 15 तच पि एर वयासी-'किं मन मुगी, मुणिए, जान सेनायरए । तप ण स वसियायणे बालतपस्सी गोसारेण मंग्वरिपुतण दोच्च पि तच्च पि एव बुत्त समाणे आमुरुत्ते जाव मिसिमिसेमाण आयारणभूमीओ पत्रोरुहह • तेयासमुग्धारण समोहन्ना, २ सत्तट्ठपयाइ पच्चोसकर, २ गोसालस्म मरररिपुत्तस्स रहार सरीरगसि तेय निसिरह । 20 तए ण अह गोयमा, गोसालप्स मपलिपुत्तस्म अणुकपणट्टयाए वेसियायणस्म धारतरस्सिस्म तेयपडिसाहरणट्टयाए एस्थ ण अतरा अहसीयलिय तयलस्स निसिरामि, जाए सा मम सीयलियाए तेरेस्साए वेसियायणम्म पालतपस्सिस्म मा उसिणा तेयलेस्सा पडिया। तए ण से बेमियायण बालतरस्मी ममं सीयलियाए 20 10 श्रीमद्भगवतीसूनम् तेयलेस्साए सीओसिण तेयलेम्स पहित्य जाणित्ता गोसायरस मरारिपुत्तरस सरिगरस किचि आवाह या यावा या छविच्छय या अकरिमाण पासित्ता सीआसिण तेयलम्म पडिसाइरह, २ मम पर वयासी- 'से गयमय भगव, से गयमेय भगय । तप ण गोसाल 5 मखलिपुत्ते मम पद वयासी-किंण भते, एस जूयासेग्जायरष तुम्मे पय ययासी-'से गयमेय भगव, मे गयमय भगव" तर अह गोयमा गोसाल मखलिपुत्त एव वयासी- 'तुम ज गोसाला धेसियायण वास्तवस्सि पाससि, १ ता मम अतियाओ सणिय २ पचोसकसि, जेणेव वेसियायणे चालतपस्सी तेणेव उवागन्दसि, 10 वेसियायण चालतवस्सि एच वयामी-'किं भय मुणी, मुणिण, उदाहु जूयासेज्जायरए" तए से सियायणे वाल्लवस्सी तव एयमह नो आढाइ नो परिजाणइ, तुसिणीए सचिट्ठह । तए ण तुम गोसाला, वेसियायण बालतरस्सि दोच्च पितञ्च पि एव पयासी-किं भव मुणी, मुणिए, जाव सेज्जायरए। तए ण मे बेमियायणे चार- 15 तपस्सी तुम दोच्च पि तच्च पि एप वुत्ते समाणे आसुरुत्ते नाव पञ्चो- सका, २त्ता तय यहाए सरीरगसि तेयलेरस निस्सिरह। ताण अह गोसाला तव अणुकपणट्टयाए बेसिशयणस्स पालतवस्मिरम सीयतेयलेस्सापदिसाहरणट्टयाए पत्थ ण अतरा सीयलिय तेयलेरस निस्सिरामि, जाद पदिय जाणित्ता तर य सरीरगस्स किचि आवाह 20 यावाबाह या छविच्छेय या अकीरमाण पासिता सीओसिण तेयलेस्म पडिसाहरइ मम एव चयासी-'से गयमेय भगव, से गयमय भगव । तए ण से गोसाले मसलिपुत्ते मम अतियाओ एयमट्ट मोचा निसम्म भीए व सजायमए मम वदह नमसर, २त्ता एव घयासी- कह ण भते, सग्वित्तविउत्तयरेस्से मवह । तए १ अह गोयना, गोसाल पतरसमसय 11 मावलिपुत्त पच वयासी-'जे ण गोसाला, एगाए सणहाए कुम्मास- पिडियाए एगेण य वियहासपण छट्टउटण अणिविखतेण तवोकम्मेण उह पाहामी पगिज्झिय २ जाव विहर सण अतो छहं मामाण सग्वित्तपिउरतेयलेसे भरदात से गोसारे मसलिपुत्ते मम एयमट्ट सम्म विणएण पडिसुण॥ (मू०५४३) 3 १२ त ण अह गायमा अन्नया कयाद गौसारेणं भवलि- पुतण सद्धि फुभ्मगामाओ नयराशी सिद्धत्यगाम नयर सपट्टिए विहाराप, जाहे य मो त देस हमागया, जत्य ण से तिल्थमए। तए ण से गोसाले मखलिपुत्ते मम एच ययासी- 'सुटमेण भत, सया मम एवं आइक्खा जाय पस्वद-10 गोसाला एस तिल्यमए निम्फज्जिरसा, नो न निष्फग्जिरस', ते चव नाव पञ्चायाइसति, तण मिच्छा। म च ण पच्चक्रवर्मन दीसह-स से तिल्थमए नो निष्फन्ने, अनिष्फलमेर ते य सत्त तिलपुप्फजीया उदाइत्ता २ नो एयरम घेर तिल्थमगस्स पगाए तिलसगलियाए सत्त तिला पञ्चायाया। तए ण अह गोयमा, गोसाल 15 मखलिपुत्त पय वयासी- तुम ण गोमाला, तया मम एच आइका- माणस्म लाव परुवमाणस्स एयम? नो सद्दहमि, नो पत्तियमि, ना रोपसि, एयम? अमदहमाण अपत्तियमाणे अरोपमाणे मम पणिहाए 'अयण मिच्छावादी भवउ ति क् मम अतियाओ सणिय . पचौसक्कसि, २त्ता जेणे से तिरथमए तेणेव उवागच्छसि जाव 20 एगतमते एवेसि। तपसणमेत गोसाला, दिव्ये अमदए पाउ मूए। तए ण से दिव्ये अमवद्दएए सिप्पामेव त चव जाद तस्स चेर तिल्यमगस्स एगापतिलसगल्यिाए सत्त तिला पन्चायाया। त एस ण गोसाला, से तिल्थमए निष्फन्ने, नो अनिष्फन्नमवाते य सत्त तिलपुप्फजीया उदाइत्ता २ व्यस्त धेच तिलर्थमयस्स पगाए 12 श्रीमद्भगवतीसूत्रम् तिलसगलिया सत्त तिला पन्चायाया। एक सल गोसाला, धणस्मड- काश्या पउटुपरिहार परिहाति। तए से गोसाले मसलिपुत्ते मम एमाइकरामाणस्स लाव पत्रमाणस्म एप्रमट्ट नो सदरद ३, एयम असदहमाण जाव अरापमाणे जेणे से तिलथमपणे उबागद, ताओ तिलथभयाओ त तिलसगलिय सुहुइ, २त्ता करयलसि सत्त तिले पप्फोटेइ । तए न तम्स गोसालम्म मलिपुत्तम्म ते मत तिने गणमाणस्स अयमेयात्वे अग्झत्यिए नाव समुपज्जित्था-'एव खलु सपनीमा पि पउपरिहार परिहरति ।। एस ण गायमा, गासालस मापलिपुत्तस्स पउढे एस ण गोयमा, गोसालस्स मलि पुत्तस्म मम 10 अतियाओ आयाए अनक्रमणे पण्णते॥ (सू०५४३) १३ तास गासाले मखलियुत्ते गाए सगहाए कुम्मासपिडियार २ एगण य रियडासरण उट्टेण अणिक्खित्तेण तवाकम्मेण उद्ध वाहाओ पगिज्झिय २ भाव विहरह। तप ण से गासाले मरलिपुत्ते अतो छह माताण सखि निउरतेषलेते जाए॥ (१०५४५) 15 तए ण तस्स गोसारस्स मसलिपुत्तस्स अन्नया कयाइ इम छ दिसाचरा अतिय पाउम्भवित्था। त जहा १ साणे ते चब सब जाव अजिणे जिणसद पगामेमाणे पिहरद । तमा बलु गोयमा, गोसाले मखलिपुत्ते जिणे, निणप्पलायी जाय जिसद पगासेमाणे विहरी गोसार मन्त्ररिपुत्ने अभिणे, जिणप्पलायी जार पगासे- 20माणे विदरह। तए ण सा महइमहालया महञ्चपरिसा हा सिने (भग०३ १२) नाव पडिगया। तए ण सावीए नगरीए सिंघाडग जार बजणो अग्नमलस्स ज्ञाव पस्पर-'जण देवाणुप्पिया, गोसाले मालिपुत्त जिणे जिणम्पलानी बार विहद त मिन्छ। समणे भगर महानगरे एव आश्वसइ नार परूवे । एवं बन्दु तस्स गोसालस्त मखलिपुत्तस्स मखलीनाम मसे पिया होत्या। DF पन्नरसमसय 13 तए ण तस्स मवालस्स, एव । घव सर्व भण्यि व नाव आजिणे जिणसद्द पगासेमाणे विहरह, त मो खलु गोसाले मखलिपुत्ते जिण, जिणप्पलावी नावविहरइ । गोसाले मखलिपुत्ते आजिणे जिणप्पलानी नाव विहरह। समणे भगा महावीरे जिणे जिणप्पलावी जाव जिणसद पगासेमाणे विहरइ ।। तए ण से गोसाले भरवलिपुत्त बहुजणस्म अतिय एयमट्ट सोच्चा निसम्म आसुरुत्ते जाव मिसिमिसमाणे आयावणभूमीओ पच्चोकहा, १ सास्य नार मज्झमझेण जेणेन हाराहला कुमकाए कुमकारावणे तणध उपागच्छइ २ हालाहलाए कुभकारीए कुभकारावणसि आजीवियसघ- सपरिखुढे मया अमारस बहमाणे एव यायिनिहरद ॥ (सू०५४२/10 १५ तेण कारेण तेण समपण समणस्स भगरओ महावीरस्स अतेवासी आणदे नाम थेरे पग भद्दए जावे विणीए उट्ठछट्टेण अणिक्सित्तेण तयोकम्मेण सजमेण तयसा अप्पाण भारमाणे शिहरह। तए ण से आणदे थेरे छट्टवसमणपारणगसि पढमाए पोरिसीए, एव नहा गोयमसामी तहन आपुच्छइ, तहेव जाव उच्चनीयमाझिम पाव 15 अहमाणे शलाहलाए सुभकारीए पुभकारायणस्स अदूरसामते वीश्वया । तए, ण से गोसाले मखरिपुत्ते आणद येर हालाहलाए कुभकारीए कुभकारायणरस अदूरसामतेण वीइवयमाण पासइ, ar एव क्यासी-'एहि ताव आणदा, इओ एम मह उपमिय निसामेहि।। तएस आणदे थेरे गोसालेण मखरिपुत्तेण एव वुत्ते समाणे जेणर 20 हालाहलाए कुमकारीएकुभकारावणे, जेणेर गोसाले मरलिपुत्ते सेणैव उवागच्छइ । तए ण से गोसाले मरदलिपुत्ते आणद येर एव क्यासी- एन खलु आणदा इभी चिराईयाए अद्धाए केइ उधावया वणिया अत्यत्थी अथगसी अत्थकस्त्रिया अत्यापिपासा अत्यगरेसणयाए नाणाविहविउत्पणियभडमायाए सगडीसागडेण मुबहुं भचपाण 25 14 श्रीमद्भगवतीस्तम पत्थयण गहाय एग मह अगामिय अणाहिय छिनाराय दहमद अड िअगुप्परिट्ठा । तए ण तसिं यणियाण तीसे अगामियाप नाद हिमाद अडवीए किंचि देस अणुप्पत्ताण समाणाण से पुस्यगटिप उदए अणुपुष्येण परिभुजेमाणे परिभुजेमाणे ग्बीणे। तए ण ते वणिया खीणोदगा समाणा तण्डार परि मरमाणा अनमने सद्दापति, २ एव ययासी-एव सलु देशणुप्पिया, अम्ह इमीमेअगामियाय ना अइवीए किचि देस अणुप्पत्ताण समाणाण से पुश्चगहिए उदए परिभुजेमाणे खीणे, स सेय खलु देशाणुप्पिया, अम्ह इमीस अगामियाए वार अडचीए उद्गस्स सन्यओ समता मग्गणगरेसण करेतपति कटु 10असमनस्स अतिए एयम पडिसुणति, २ तीसे ण अगामियाप जार अडचीए उदगस्स सचओ समता मागणगवेसण करति, उद्गस्स सम्यो समता मम्गणसण करेमाणा एग मद वणसह आसादति किण्ह किण्होभास जाव निपुरवमय पासादीय जाव पढिन्य। तरस ण वणसहस्स बहुमझदेसमाए पत्थ ण मग धम्मीय 15 आसांदति। तस्स ण धम्मीयस्स चतार वपुओ अदभुग्गयाओं अभिनिसहाओ तिरिय सुसपग्गहियाओ, अहे पत्नगरुवाओ, पत्नगद्धमत्राणसठियाओ पामादीयाओ भाव पढिरूपाओ। तए ते वानिया हट्ट अन्नमन्न सदावति, २ एवं वयासी-'एव खलु दवाणुप्पिया, अम्हे इमीसे अगामियाए जाव स वी समना मागण- 20 गवसण करेमाणेkि इमे बसडे आसादिए, किण्हे किण्होभासे । इमस्स यणसइस बहुमग्झदेमभाग इमे यम्मीए आसादिए, इमस्स ण यम्मीयास चत्तारि वप्पुओ अम्भुग्गयाओ जाव पडि- स्वाओ। त सेय रालु देवाणुप्पिया अम्ह इमस्स पढम चपि भिदित्तए, अवियाइ ओराले उद्गरयण अस्सादेस्सामो। तए ण ते । अन्नमनस्स अतिय एयमट्ट पडिक्षणति, २ तस्स बग्मीयस्स पन्नरसम तय 12 पदम वप्प मिदति । तं ण तत्थ अच्छ पत्थ जच्च तणुय फालिय. यण्णाभ ओराल उद्गरयण आसादति।तरण ते वणिया हवद्ध पाणिय पिवति, २ चाहणाइ पन्जनि,' भायणाई भरति, भरेत्ता दोच्च पि अनमन्न एर क्यासी- एप सतु देवाणुप्पिया, अम्हेहिं इमस्स यामीयस्म पढमाए बप्पाए मिनाए ओराले उदगररणे अस्सादिए, त. सेय खलु देशणुप्पिया, अम्ह इमस्स यम्मीयस्स दोच्च पि यप्प भिदित्तए, अवियाइ एत्य ओराल सुबण्णरयण आमादेस्मामो।। तप ण ते वणिया अनमनस्म आतय एयमट्ठ पडिसुणति, २ तस्म धम्मीयस्स दोच्च पि वप्प मिदति। ते ण तत्य अच्छ उच्च तापणिन महत्थ महग्य महरिह ओराल सुवष्णरयण अस्सादत्तिा तरण ते 10 वाणिया दुत मायणाइ भरति, पाहणाइ भरति २ ता तच्च पिं असमन एव बयासी-'एर खलु देवाणुप्पिया, अम्हे इमस्स धम्मीयस्स पढमाए वप्पाए भिसाए ओराले उदगरयणे आसादिए, दोचाए वप्पाए भिन्नाए आराल सुरणरयणे अस्मादिए, त सेय खलु देवाणुप्पिया, अम्ह मस्स यम्मीयस्स तच्च पि वप्प मिदितए। अवि 15 याई पत्य ओराल मणिरयण अस्सादेस्सामोतए ण ते धणिया अन्नमलस्म अतिय एयमट्ट पडिमुणति, २ तस्स यम्मीयस्स तच्च पि वप्प मिदति । त ण तत्थ रिमल निम्मल नित्तल निकल महत्य महाघ महरिह ओराल मणिरयण अम्साइति । तए ण ते वणिया हट्टर भायणार भरत, २त्ता चउत्थ पि असमक्ष एव वयासी-20 'पय रालु देवगणुप्पिया, अम्हे इमस्स पढमाए वप्पाए मिनाएओराल उदगरयणे अस्मादिए दोच्चाए यप्पाए भिक्षाए ओराले सुवण्णरयणे अस्सादिए, सच्चाए वप्पाए भिनाए औराले माणरयणे अस्सादिए, त सेय खलु देवाणुप्पिया, अम्द इमस्स धम्मीयस्स चउत्थ पि यप्प मिदित्तए, अवियाइ उत्तम महाय महरिह ओरार धाररयण श्रीमद्भगवतीमूत्रम् 16 अस्सादेस्सामो तप ण तेसिं वणियाण एगे वणिए दियकामए, सहकामए, पत्यकामए, आणुफपिप, निस्सेसिए हियसुदनिस्सेस- कामए ते वणिए एव वयासी-'ज्य सलु देवाणप्पिया, अम्हें इमस्स यम्मीयस्स पढमाए वप्पाए जावं तच्चाए बप्पाए भिसाए ओराले 5मणिरयणे अस्सादिप, त होउ अलाहि पजत्त, एसा चउत्थी यप्पा मा भिज्जउ, चउत्थी ण वप्पा सउयसागा यावि होत्था तए ण ते वणिया तस्स पणियस्स हियकामगरस नाव हियसनिस्सेस- कामगस्स एबमाइक्खमाणस्स नाव परुचेमाणरस एयभट्ट नो सद्दहति, जाव नो रोपति, एयमट्ट असहरमाणा गाव अरीण्माणा तस्स 10वमीयस्स धउत्थ वि वप्प भिंदति । ते ण तत्थ उग्गधिस जाद अणागल्यिचडतिव्वरोस समुहं तरिय चयल धमत दिट्ठीविस सप्प सघट्टेति । तप ण से दिट्टीविसे सप्पे तेहिं वणिपहिं सघट्टिए समाणे आसुरुत्ते जाप मिसिमिसेमाणे सणिय २ उट्टेद २ ता सरसरसरस्स वम्भीयस्स सिहरतल दुम्हेइ, २ आइच्च निन्झाइ, २ ते पणिप 15 अणिमिसाए दिट्टीए सरओ समता समभिलोपइ । तए ण ते वणिया तेण दिट्टीविसेण सप्पेण अणिमिसाप दिट्टीप सवओ समता समभि- लोइया समाणा खिप्पामेच समहमतोवगरणमायाए एगाहच कृदार्च भासरासीकया यानि होत्था । तत्थ ण जे से घणिए तेसिं यणियाण हियकामए जाव हियसहनिस्सेसकामए से ण अणुकपयाए देवयाप 20 सभडमत्तीवगरणमायाप नियग नगर साहिए"। एवामेव आणदा, तव विधम्मायरिएण धम्मोवएसरण समगेण नायपुत्तेण ओराले परियार आसाइए, ओराला शिविण्णसदासलागा, सदयमणुयासुरे लाए पुन्यति गुवति युगति इति खलु 'समगे भगव महावीरे, इति । त जइ मे से अज्ज किंचि सि वयइ, तो ण तवेण तेपण एगारच भासरासि करेमि, जहा या धारेण ते वणिया। तुम च ण

पन्नरसम सय
17
आणदा, सारक्सामि सगोवामि, जहा वा से वणिम तेसि वणियाण
हियकाम व निस्सेतकामए अणुकपयाए देवयाए समड नाव
साहिए। त गच्छ ण तम आणदा, तर धम्मायरियस्स धम्मोरएसगस्स
समस्स नायपुत्तम्म एयमट्ट परिकदेहि तप ण से आणदे धेरे
गोसारेण मंत्रलिपुत्तेण ५५ वुत्ते समाणे भीए धाव सजायमप
गोसालस्स मंगलिपुत्तस्स अतियानी हालाहलाए फुभकारीए
फुभकारायणाओ पदिनिक्खमइ, २ सिघं तरिय सापत्य नार
मझमशेण निगच्छद, २त्ता जेणेर कोट्टए चेहए, जेणे समण
मगर महावीर तेणेय उवागच्छइ २ समण भगव महावीर, तिक्त्तो
आयाहिण पयाहिण करेन अत्ता वह नमसइ, २त्ता एव वयासी-10
'एप खलु अह भत, छट्टक्रमणपारणगसि तुमहिं अटमणुनाए
समाणे सावत्थीप नयरीए उच्चनीय ताव अडमाणे हालाहलाप
कुभकारीए पाव वीइनयामि। तए ण गोसाले मखलिपुत्ते मम
हालाहलाए नाव पासित्ता पर बयासी-'एहि, ताव आणदा, ओ
एग मह उरमिय निसामेहि । तए | अह गोसालेण मंग्वलिपुत्ते 15
एव वुत्ते समाणे जेणेर हालाहलाए कुभकारीए पुमकारावणे, जेणेव
गोसाले मदलिपुत्ते तेणेय उवागच्छामि । तए ण से गोसाले
मखलिपुत्ते मम एव धयासी-'एव खलु आणदा, इओ चिराईयाए
अदाए केइ उचारया यणिया, एव त चव स व निरवरास भाणिय व जाव
नियगनयर साहिए। तं गच्छ तुम आणदा, धम्मायरियरस 20
धम्मोवपसगरस नाव परिक्हहि ॥ (सू० ५४७)
१६ त पमू ण मते, गोसाले मरलिपुत्ते तवेण तेएण एगार
कृडाहच भासरासिं करेत्तए? सिए ण भते, गोसालस्स मखरिपुत्तस्स
नाव करेत्तप-समत्येण भते, गोसाले जाव करेत्तए। पमूण आणदा
गोसाले भैखलिपुत्ते तवेणू नाय करेत्तए। पिसपण

18 श्रीमद्भगवतीसूत्रम् पाव करेत्तए । समय ण आणदा गोसाले जाव करेत्तए, नो चेय ण अरहते भगरते परियावणिय पुण रेज्जा । जायइए ण आणदा, गोसाल्स्स मैखलिपुत्तस्स तवतेए, एत्तो अणतगुणविसिट्टयराए चैव तवतेए अणगाराण भगवताण, खतिखमा पुण अणगारा भगवती । 5जावइप पण आणदा, अणगारा भगवताण तयतए, पत्ती अणत- गुणविसिट्टयराए चेय तवतेए थेराण भगवताण, खतिवमा पुण थेरा भगवतो । जावइए ॥ आणदा, थेराण भगवताण तवतेए एत्तो अणतगुणविसिट्टयराए चैव तयतेए अरहताण भगवताण, खतिखमा पुण अरहता भगवतो। त पभूण आणदा 10 गोसाले मखलिपुत्ते तयेण तेपण जाव करेत्तए विसए ण आणदा, जाव करेत्तप, समत्थे आणदा, भाव करत्तप नो ओर ण अरहते भगवते, परियावणिय पुण करेज्जा॥ (सू० ५४८) १७ त गच्छ ण तुम आणदा, गोयमाईण सभणाण निग्गथाण एयम? परिकहोरि-माण अज्जी, तुम्भ केइ गौसाल मखलिपुत्त 13 धम्मियाए पडिचोयणाए पडिचोएउ धम्मियाए पडिसारणाए पडिसारेउ, धम्मिएण पढीयारेण पडीयारेउ, गोसा ण मसलिपुत्ते समणेहिं निगर्हि मिच्छ विप्पढिवन्ने। तए ण से आणदे यरे समणेण भगवया महावीरेण एव वुत्ते समाणे समण भगव महावीर बदर नमसइ, ताजेणव गोयमाइसमणा निग्गथा तेणेव उघागरउद२ 20 गोयमाइसमणे निग्गथे आमतेइ, २त्ता एप बयासी-' एव सलु अञ्जो, छट्टवखमणपारणगास समणेण भगवया महावीरेण अक्ष्मणुनाए समाणे सायर्थाए नयरीए उच्चनीय तं चव सब नाव नायपुत्तरस एयमट्ट परिक हि त मा अज्जी, तुम्भ केइ गोसार मसलिपुत्त धम्मियाए पडिचोयणाप पडिचोएउ न व मिच्छ विप्पडिवने। (सू०५०९) 25 १८ जाव च ण आणदे थेरे गोयंमाईण समणाण निग्गयाण पत्नरसम सय 19 एयम8 परिकहे ताव च ण से गोसाले मंपरिपुत्ते हालाहला कुभकारीप कुमकारावणाओ पडिनिक्खमई २त्ता आजीवियसघ- सपरिखुढे महया अमरिसं यमाणे सिग्ध तुरिय नाव सात्य नयरिं मज्झमझेण निग्गच्छद २त्ता जेणेव कोट्ठए चेहए जेणेव समणे भगर महावीरे तेणेव उवागच्छद, २समास्स भगवी महानीरस्स अदूरसामते ठिच्चा समण भगर महावीर एव वयासी- 'सटु आउसो कासया, मम पर धयासी, साहु ण आउसो कासया, मम पच पयासी, गोसाले मसलिपुत्ते मम धम्मतेवासी२॥जेण से मरखलिपुत्ते तव धम्मतेवासी सेणसकेसमाभिजाइए भवित्ताकारमासे फाल किच्चा अनयरेस देवलोएस देवत्ताप उववन्ने अरण उदाइनाम10 फुढियायाए, अजुणस्स गोयमपुत्तस्स सरीरग विप्पजहामि २ गोसालस्स मसलिपुत्तस्स सरीरंग अणुप्पविसामि, २ इम सत्तम पउट्टपरिहार परिएरामि। जे वि यावि आउसो कासवा, अम्ह समयसि के सिज्झति या सिज्झिस्सति वा स ते चउरासी महाकप्पसयसहस्साइ सत्त विश्वे, सत्त सनिगम्भे, सत्त पउट्टपरिहारे, 15 पच कम्माणि सयसहस्साइ सहि च सहस्साइ छच्च सप तिन्निय कम्मसे अणुपुव्येण खवइत्ता तओ पच्छा सिन्झति पुज्झति मुच्चति परिनिव्यायति सयदुक्खाणमत रेंस चा करेंति या करिस्सति या। से जहा या गगा महानदी जभी पढा, जहिं या परजुयत्थिया, एस ण अद्धा पचजोयणसयाइ आयामेण, अद्धजोयणं विकसभेण, पच 20 भणुसयाइ उन्हेण, एएण गगापमाणेण सत्त गगाओ सा पगा महा गंगा, सत्त महागगामी सा एगा सादीणगंगा, सत सादीणगंगाओ सा एगा मच्युगगा, सत्त मधुगगाओ सा एणा लोदियगगा, सत्तलोहिय- गगाओ सा पगा आरतीगगा, सत्त आवतीगगाओ सा एगा परमावती, एवामेव सपुव्यावरण एग गंगासयसहस्स सत्तर सहरसा उच्च 25 ।

श्रीमद्भगवतीसुत्रम् गुणपक्ष गगासया मयतातिमम्खाया। तासि दुविहे उद्धारे पण्णते, त जहा-सहुमवादिकलेवरे घेय, वायरचार्दिकलेवरे चैव । तत्थ म जे से सहुमवादिकल्वर से टप्पे। तत्य ण ज से वायरयादिकलेवरे तोण घाससए २ गए एगमेग गगाचालय अवहाय जायदएर्ण कालेण से कोहरखीणे नीरए निलवे निहिप भवर से त सरेसरप्पमाण। एएण सरप्पमाणेण तिलि सरसयसाहस्सीओ से एगे महाक्प्प। चउरासीइ महाकप्पसयसहस्साइ से एग महामाणसे। अणताओ सजूहाओ जीये चय चइत्ता उपरिले माणसे सह देव उववज्जा। से ण तत्थ दिनाइ भागमोगाइ भुजमाणे बिहरह, २त्ता ताओ देव 10 लोगाओ आउक्खएण३ अपतर चय चइत्ता पदमे सनिगमे जीवे पच्चायाइ १। से ण ताहिंतो अणतर उट्पट्टित्ता मज्झिहे माणसे सजूहे देवे उयवजा। से ण तत्थ दिवाइ भागमोगाइ जाप निहारत्ता ताआ वलरोगाओ आउक्सएण ३ नव चइता, दाच्चे सलिंग मे जीवे पच्चायाइ २ से तओहिंता अणतर उवाहित्ता हेहिले माणसे 13सजूहे दवे उववज्जद ३॥ से ण तत्थ दिव्याई बाद चहत्ता तच्चे सन्निग भे जीवे पच्चायाइ ३। सेण तओहिंतो जाव उव्याहत्ता उवग्लेि माणुसत्तरे सजूहे देवे उवान्जिहिह । सण तत्थ दिव्वाइ भोग जाव चइत्ता चउत्थे सनिगडमे जीये पच्चायाइ ४ । से ण ताहितो अणतर उदयाट्टित्ता मझिल्ले माणुसुत्तरे सजूहे देव उपवज्ज ५। से ण 20 तत्थ दिव्याइ भोग जाव चइत्ता पचम सनिगन्भे जीरे पच्चायाइ ५। सण तओहितो अणतर उव्याहत्ता होहल्ले माणुसत्तरे सजृहे देवे उववज्जइ ६ से श तत्थ दिन्चाइ भोग आ चइत्ता छट्टे सागि भे जीव पच्चायाइ ६। से ण तओहितो अणतर उव्यट्टित्ता बभलोगे नाम से कप्पे पण्णत्ते, पाइणपढीणायए उणदाहिणचित्थिपणे पहा । 25 अगपदे जाव पच चर्डिसगा पण्णता। त जहा-१ असोगराईसए, - पनरसम सय 21 जाव पडिष्या। से ण तत्य देवे उववज्जइ ७। से ण तत्थ दस सागरोयमाइ दिव्याइ भोग जाव चइत्ता मत्तमे सनिगमे जीने पच्चायाइ ७ । से ण तत्य नवण्ह मासाण बहुपडिपुण्णाण अट्ठमाण भाव वीइकताण सुकुमालगमदरए मिउरटलकुचियकेसए मट्टगइतट- कण्णपीढए देवारमारमप्पमए दारए पयायइ । सेण अह कासया। तप अह आउसो कामपा, कोमारियप वज्जाए कोमारपण घमचेरवासेण अपिद्धकपणए चेव सपाण पहिलभामि २ इमे सत्त पउपरिहारे परिहरामि। त जहा-१ एणेरजस्स, २ महरामस्स, ३ मडियस्स, ४ रोहस्स, ५ मारदायरस, ६ अज्जुणगस्म गोयमपुनस्स, ७ गोसालरस मखलिपुत्तरस । तत्य ण जे से पहमे पउट्टपरिहारे से 16 रायगिहरस नयररस बहिया मडिकुच्छिास चेइयसि उदाइरस कुडियायणरस सरीर विप्मजहामि, २ एणेज्जगरस सरीरंग अणुप्प- पिसामि, २ बावीस वासाइ पढम पउट्टपरिहार परिहरामि । तत्थ ण जे से दोच्चे पउपरिहारे से ण उद्दडपुरस्म नयरस्स बहिया चदोयरणसि चेश्यसि ण्णेज्जगस्स सरीरंग विप्पजहामि, २ मलरामस्स सरीरंग 15 अणुप्पपिसामि, २ ण्णवीस यासाई दोच्चं पउपरिहार परिहरामि। तत्थ ण जे से तन्चे पउट्टपरिहारे से ण चपाए नयरीए पहिया अगमदिराम चेइयसि मल्लरामस्स सरीरंग पिप्पजहामि, ९ मडियस्स सरीरंग अणुप्पयिसामि, २वीस यासाइ तच्च पउदृपरिहारं परिहरामि। तत्थ ण जे से चउत्थे पउपरिहारे से ण वाणारसीए नयरीए बहिया 20 काममहावणसि घेइयसि मंडियस्स सरीरंग विप्पजहामि, २ रोहस्स सरीरंग अणुप्पविसामि, २ एगणरीस घासाइ चउत्थ परदृपरिहार परिहामि। तत्थ ण जे मे पचमे पउपट्टपरिहारे से ण आलभियाए नयरीप यहिया पत्तकालगयसि चेश्यसि रोहस्स सरीरंग विप्पजहामि, २ मारहायरस सरीरंग अणुप्पविसामि, २ अट्ठारस वासाइ पचम 5पउहपरिहारे से ण इहेव सावत्यीय नयरीए हालाहलाए कुमकाए 29 श्रीमद्भगवतासूत्रम् पाट्टपारहार परिहामि । तत्थ ण जे से छ? पउपरिहारे से बैसालीए नयरीए वाहिया काडियायणासे चेदयसि भारद्दायरस विपजहामि, ९ अजुणगस्स गोयमपुत्तस्त सरीरंग अणुप्पवितामि २ सत्तरस वासाइ छ? पउपरिहार परिहरामि । तत्य ण जे से शत्तमें सरीर कुभकारावणसि अन्जुणगरस गोयमपुत्तरस सरीरंग विप्पजहामि, २ गोमालस्स मर लिपुत्तस्स मरीग्ग 'अल थिर, धुव धारणिज्ज सीयसह उण्डसह सुहास पिचिरदसमसगपरीसहोवसग्गसह थिर. सघयण' ति फटु त अणुप्पविसामि, २ सोलस थासाइ हम सत्तम 10 पासपरिहार परिहायमि। एयामेर आउसो कासया, एगण तेत्तीसेण यामसपण सत्त पउपरिहारा परिदरिया भवतीतिमक्खाया। तसष्ट्र ण आउसोकासवा, मम एव वयासी-सागुण आउसोकासपा, मम एच वयासी-'गोसाले मरलिपुत्ते मम धम्मतवासिति २॥(सू०५५०) १९ ताण समण भगय महावीरे गोसाल मखलिपुत्त एव चयासी- 15. गामाला, स जहानामए तणए सिया, गामेटहिं पर भरमाणे एकत्थ य गनु वा दरिया दुग्ग या निन्नया परयचा विसम चा अणस्साएमाणे गण मह उपणालोमेण या सणलीमेण या कप्पासपम्हण या तणसूपण याअत्ताणावरेत्ताणचिटुजा, सेणअणारिश आगरियामिति अप्पाण मना, अप्पच्चन य परउन्ममिति अप्माण मनद, आणिलुफ निलम- 20 मिनि अप्पाण मना, अपलाप पलायमिति अध्याण मन्सइ, पामेर तुम पिगासाला, अणने सत असमिति अप्पाण उपलभमितमा पर मसारा नारिहास गोमारा, सघरतेसा छाया नीअरा(सू०५५१) २० सपण से गासाले मपरिपुत्त समशेण भगवया महावीरेण एवं धुत्ते ममाणे आसुरुत्त ५ समण भगर महावीर उचारयाहिं आउसाद आउस, १ उमास्याहिं उद्धसणाहिं उद्धर, ता

पतरसम सर्य
23
उद्यापयाई निम्भरणा िनिम्मोह • उद्यावयाहिं निच्छोडणाहिं
निच्छादेइ, २ पव पयासी-'नद्दे सि कयार, पिणटे सि फयान, भट्टे
सि कया:, नपिणढमढे सि क्या, अज्ज न भासि नादि ते
ममाहितो सुहमयि।। (सू० ५५२)
२१ तेग कालण तेण समपण समणम्म भगरी महावीरस्स 5
अंतेवामी पाइणजाणवए सवाणुमूई नाम अणगारे, पगरभद्दप भाव
यिणीप, धम्मायरियाणुरागेणं एयम? असदहमाणे उट्टाए उढेर,
जेणेव गोसाले मागलिपुत्ते तेणेर उयागच्छर, २ गोमाल मस्खलिपुत
पर क्यासी-जे वि तार गोसाला, तहारूयस्म समणस्स या
माणस्स या अतिय एगमविआरियं धम्मिय समयण निमामा, से वि 10
साय बंदर नमसद, काय पण मगर देवय चइय परशुरासद,
स्मिग पुण तम गोसाला, भगरया चेर पवाविष, भगण्या चेर
मुदाविए, भगरया चेय सेनापिए, भगवयाचेर सिपाविप, भगवया
चेव घरमरकर, भगवओचवामिच्छ पिप्पडिवतमाएपगोसाला,
नारिहसिगासाला, सच्चेव तसा छाया नो अन्ना'तपणसे गोसाले 15
मगलिपुत्त सवाणुभूरणाम अणगारेण एर वुत्ते समाणे आमुरुत्ते
५ सपाणुभूई अणगार तरेण तेण्ण पगाहच्च कृताच भामरासि
करेइ । ताण से गोसाले मखरिपुत्ते सव्याणु अणगार तरेण तेण्ण
एगाहच्च कृदाहरच भासरामि करता दोच्च पि समण भग
महावीर उच्चावयाहिं आउसणाहिं आउसइ नाव सुर नत्यि। 20
२० कारण तेण समएण समणस भगवओ महागीरम्स
अनपरासी कोसर जाणपए सुनश्यते नाम अणगारे पगइमद्दपाव
विगीए धम्मायरियाणुरागण नहा राधाणुभुई नदेव भाव स चैव
ते सा छाया नो अन्ना। तए ण से गोसाले मखलिपुते सुनखत्तर्ण
अणगारेण पत्र बुत्ते समाणे आसुरुत्ते ५ मुनकराच अणगार 25

21 श्रीमद्भगवतीसूत्रम् तवेण तेपणं परितावेहातए ण से भुनक्तत्ते अणगारे गोसालेणं मखलिपुतण तवेण तेएण परितायिए समाणे जेणेव समणे भगवं महागीरे तेणेय उवागच्छद, २ समण भगव महावीर तिवायुत्तो पदइ नमसइ, २त्ता सयमेप पच महव्ययाइ आरुभेइ, २ समणाय समणीओ 5 य खामेइ, आलोदयपडिकते समाहिपत्ते आणुपुचीए कालग २३ तए ण से गोसाले मखलिपुत्ते सुनपखत्त अणगारं तवेण तेएण परितावेत्ता तच पि समण भगर महावीर उच्चावयाहिं आउसणादि आउसइ, सवै त चव आव सुह नथि। तए ण समणे भगय महावीरे गोसाल मखलिपुत्त एव क्यासी-जे वि ताय गोसाला, 10 तहाधस्स समणस्स या माणस्स वा त चव मा पज्जुवासा, किमंग पुण गोसाला तुम मए चेर पव्याविए नाव मप चेव बहुस्सुई- कप, मम चेव मिच्छ विप्पडियने त मा एच गोसाला, जाव नो अक्षा । तपण से गोसाले मखलिपुत्ते समणेण भगग्या महावीरेण एव बुत्ते समाणे आमरुत्ते ५ तेयासमुग्यापण समोहनार, सत्तट्ट पयाद 15 पच्चोसकारत्ता समणस्स भगवओ महावीरस्स यहाए सरीरगसि तेय निसिरह । से जहानामए घाउकलिया इवा वायमडलिया इवा सेलास वा पुडासे या थभास या थूभसि वा आवारेज्जमाणी वा निवारिज्जमाणी वा सा ण तत्थ नो कमइ नो पक्षमइ एवामेय गोसालस्स वि मखलिपुत्तस्स तवे तेए सभणस्स भगवओ महावीरस्स 20 वहाए सरीरगसि निसिढे समाणे से ण तत्थ नो कमइ नो पक्कमइ अचियचिर्य करेइ, रत्ता आयाहिणपयाहिण करेइ, २ उह बेहास उप्पाए । से ण तओ पटिहए पडिनियत्ते समाणे तमेन गोसालस्स मरलिपुत्तस्स सरीरंग अणुव्हमाणे २ अतो अगुप्पयि? । तप ण से गोसाले मातलिपुत्तेसएज एण अनाइट्टे समाणे समण भगव महागीर एवं ययासी-'तुम ण आउसो कासवा, मम तवेण तेपण अन्नाइट्टे

पन्नरसम सय
25
समाणे अतो उण्टं मासाण पित्तज्जरपरिगयसरीरे दायफतीए
छउमत्थे चेव काल करेस्ससि। तए ण सम भगय महावीरे
गोसाल मखलिपुत्त एव चयासी-'नो खलु अह गोसाला, तव तयण
तपण अन्नाइ8 समाणे अतो डण्ह नाव काल करेस्सामि अहण
अन्नाइ सोलस वासाइ जिणे सहत्थी विहरिस्सामि। तुम ण गोसाला,
क्षप्पा चेय सएण सेएण अनाइटे समाणे अतो सत्तरत्तस्स
पित्तज्जरपरिगयसरीरे जाव उउमाथे क्षेत्र वार करेस्सास।
“२४ तए ण सानत्थीए नयरीए सिंघाडग नाव पडेसु बहुजणो
अनमन्नस एवमाइक्मइ, जाव एव पदो-'एव खलु देवाणुप्पिया,
सारथीए नयरीए बहिया कोट्ठए चेहए दुवे जिणा सलवेति, एग 10
ययति- तुम पुदि काल करेस्मसि, एगे बदति- हम पुचि काल
करेस्ससि। तत्य ण के पुण सम्मावाई के पुण मिच्छाराई। तत्य
ण जे से अहप्पहाणे जणे से घयइ- समणे भगव महावीर सम्मारा,
गोसाले मखलिपुत्ते मिच्छागाई। अज्जो समणे भगव महावीरे
समणे निग्गये आमतेत्ता पव व्यासी-अज्जी, से जहानामए तणरासी 15
है या कट्टरासी इवा पत्तरासी इ वा तयारासी इवा तुसरासीया
भुसरासीह या गोमयरासी इवा अवक्ररासी इवा अगणिझामिए
अगणिझूसिए अगणिपरिणामिए हयतेए गयतेए नट्ठतेप भट्ठतेए
लुत्तए विणतेए जाव एवामेर गोसाले भखलिपुत्ते मम यहाए
सरीरगसि तेय निसिरेत्ता हयतेए गयतए नाव विणतेए जाए। त20
छदेण अज्जी, तुमे गोसाल मंलिपुत्त धम्मियाए पहिचायणा
पडिचोपट, २ धम्मियाए पहिसारणाए पडिसारेट, २ पम्मिएण
पडोयारेण पडोयारेह, २ अट्ठहि य हेहि य पसिणेहि य वागरणेहि
थकारणेहि य निष्पट्टपसिणवागरण रेह
. १५ तए णते समणा निागया समणेण भगवया महावीरेण एव

पहिचोयणाए पडिवीपति, २ धम्मियाए पडिसारणाए पडिसारा- २ धम्मिपण पडोयारणं पढोयारति, २ अट्टेहि य ऊहि य कारणाह - २६ तए ण से गोसाल मसलिपुत्त समणेहि निग्गथेहिं धम्मियाए पढिचोयणाए पढिचोइज्जमाण जाव निप्पट्टपसिणवागरण कौरमाणे आसुरुत्ते जान मिसिमिसमाण नो संचाण्ड समणाण निग्गथाण श्रीमद्भगवतीसूत्रम् वुत्ता समाणा समण भगव महातीर वदति नमसति २ जेणेव गोस मसलिपुत्त तेणेय उवागच्छति २ता गोसाल मसलिपुत्त धम्मिय 5जावयागरण करति। सरीरगस्स किंचि आवाह वा वाबाह वा उप्पापत्तप, छविच्छन या 10 करतए। तए ण ते आजीरिया थरा गोसाल मतलिपुत्त समणेटिं निग्गथेहिं धम्मियाए पदिचोयणाए पडिचोपज्जमाण धम्मियाप पढिसारणाएपटिसारिज्जमाण, धम्मिण्ण पडायारण पडायारज्जमाणं अहि य हकहि य भाव कीरमाण आसुरुत्त भाव मिसिमिसमार्ण, समणाण निग्गयाण सरीरगस्स किंचि आवाहया यामाह या छविच्छे 15 या अकरमाण पासंति, ९ गौसालस्स मररिपुत्तस्म अतियाओ आयाए अयममति, जेणव समणे भगव महावीरे तणय उवागच्छति, समर्ग भगय मदायीर तिम्रुत्ता आयादिणं पयाहिण करति यति ममसति,समर्ण भगयं महावीर उयसपरिजत्ताण विहरति । अत्यगाया आजीपिया थरा गोसारे व मरारिपुत्त उपसंपाग्जत्तार्ण यिदति। ७ ताज म गामाले मंगलिपुप्त जम्मट्टाए. हव्यमाग तमढे असाहमाण, कमाई पराप्माण, बीणा नीमगमाणे पार्टियाण सामार सुममाण, अपद पंद्रयमाण, पुर्याल पम्फादमाण इत्ये गणगुणमाण, दादि यि पापी ममि काटमाण, हा हा अE THIsr. गि निकदुगमगम मगर मा मावीरस्म अंतियामा काट्रयामा सभा पर्दिनिासमर, जगा सापयी मयणे, जार हायता

पनरसमसय
27
कुमकारीप कुमकारावणे तेणेप उवागच्छइ, २ हालाहलाए कुमकारीए
कुमकारवणसि अवकृणगहत्यगए, मज्जपाणग पियमाणे, अमिक्खण
गायमाणे, आभिवखण नच्चमाणे, अमिक्सण हालाहलाए कुमकारीए
अजलिकम्म क्रमाणे, सीयलएण मट्टियापाणएण आयचणिउदएण
गायाइ परिमिंचमाणे रिहरह॥ (सू० ५५३)
5
२८ 'अज्जो' त्ति समणे भगर महाबारे समण निग्गये आमतेत्ता
एर बयासी-जानइए ण अज्जो गोसारण मसलिपुत्तण मम
चहाए सरीरगसि तए निसट्ट, से ण अलाहि पजत्ते सोल्साह
जणवयाणात जहा-१ अगाण, चगाण, ३ मगहाण, मल्याण,
५ मारवगाण, ६ अच्छाण, ७ वच्छाण, ८ कोच्छाण, ९ पाहाण, 10
१० लाढाण,११ यजाण, ११ मोलाण, १३ कासीण, १४ कोसलाण,
१५ अवाहाण, १६ सभुत्तराण धायाए वहाए उच्छादणयाए भासी-
करणयाए। ज पि य अज्जा, गोसाले मरालिपुत्ते हालाहलाए
कुमकारीए कुभकारावणसि अवकृणगहत्थगए, मज्जपाण पियमाणे,
अभिवखण आर अजलिकम्म करेमाणे विहरद, तस्स वि यण 15
वज्जस्स पच्छायणट्टयाए इमाइ अट्ट चरिमाइ पन्नइ । त जहा-
१ चरिमे पाणे, २ चरिम गेय, ३ चरिमे नट्टे, ४ चरिमे अजलिकम्मे,
५चरिम पावसल्सबट्टए महामहे, ६चरिमे सेयणए गधहत्थी,७चरिमे
महासिलाकटए सगामे, ८अह च ण इमासे ओसप्पिणीए चवीसाए
तित्थकराण चरिमे तित्थकरे सिज्झिस्स जाव अत करिस्स ति। ज20
पियअज्जो गोसाले मखरिपुत्ते सीयलपण मट्टियापाणएण आयचाण
उदएण गायाइ परिसिंचमाण विहरड़, तस्स मि य ण वजस्त
पच्छायणट्टयाए इमाइ चत्तारि पाणगाइ चत्तारि अपाणगाइ पन्नवेह ।।
२९ से कि त पाणए। पाणए चविहे पण्णत्ते।त जहा-
२ गोपटप, र हत्यमदियए, ३ आयरतत्तप, ४ सिलापमट्टए, से 25

28 श्रीमद्भगवतीसूत्रम् पाणए ॥ से किंत अपाणए ? अपाणए चाय पण्णते। जहा- १ थालपाणए २ तयापाणए, ३ सिंबल्पिाणप, ४ सद्धपाणए । से कि त थालपाणए जण दाथाला या दाधारण चा दाकुभम या दाकलम या मीयलग उरग हत्येहिं परामुसइ, न य पाणिय पिया, 5 से तथालपाणए । से कि त तयापाणए ? जण अब वा अवाढग या बहा पागपद भाव बोर वा तिदुरुय या तरुणग वा आमग वा आसगास आवीलेइ वा पवीलेइ चा, न य पाणिय पियइ से त तयापाणए । से कित सिंबल्पिाणए ! जण कलसगलिय या मुग्ग- सिंगलिय वा माससगलिय वा सिंबलिसगलिय वा तकाणिय आमिय 10आसगसि आनीलेश या पवीलेइ वा, न य पाणिय पियर, से त सिंवलिपाणए । से कि त सुद्धपाणप: ज ण इम्मासे सुद्धखाइम खाइ, दो मासे पुढविसथारोवगए य, दो मासे कट्टसथारोयगए, दो मासे दमसथारोक्गए। तस्स बहुपडिपुण्णाण छह मासाण अतिमराईप इमे दो देवा महड्डिया जाव महेसक्खा अतिय पाउन्भवति । 15त जहा-पुण्णभद्दे य माणिभद्दे य। तए ण ते देवा सीयल्पहि उलापहि हत्योहं गायाइ परामुसति । जे ण ते देवे साइज्जद, से ण आसीविसत्ताए कम्म पकरेल, जे ण ते देवे नो साइज्जइ तस्स ण सास सरीरगसि अगणिकाए समवइ, सेण सपण पण सरीरग झामेइ २त्ता तओ पच्छा सिज्झइ जाव अत करेइ, सेत सुद्धपाणए । 20 ३० तत्थ ण सावीए नयरीए अयपुले नाम आजीविओवासए परिवसइ, अड्डे नाव अपरिभूए, जहा हागहरा जाव आजीवियसमएण अप्पाण भावमाणे विहरह। तए ण तस्स अयपुलम्म आजीवि- ओवासगस्स असया कयाइ पुख्यरत्तापरत्तकालसमयसि युडुबजागरिय जागरमाणस्स अयमेयास्वे अज्झात्थिए जाव समुप्पज्जित्था-किंसठिया 25 हा पण्णत्ता ! तए तस्स अयपुरस्स आजीविओबासगास दो

पतरसम सय
29
मय जाब
पि अयमेथारूवे अजमाथिए भाव ममुप्पजिया-'वं खलु मम
धम्मायरिए, धम्मोवदेसए गोसाले मसलिपुत्ते उप्पननाणदसणधरे गाय
सञ्चन्न सम्बदरिसी इहेच साययाए नयरीए हालाहलाए कुभकारीए
कुंमकारारणासि आजीवियसयसपरिवुद्ध आजीरियसमपण अप्पाण
भारेमाणे विहद। त सय पलु मे कल व जलते गोसाल 5
मेसलिपुत्तं वदित्ता जाव परजुवासित्ता इम एयाम्पधागरण यागरित्तए,
त्ति कटु एवं सपहइ " सा फल भाव जलत बहाए
अप्यमहग्यामरणालफियसरीर साओ गिहाओ पदिनिकखमा २त्ता
पायरिहारधारण साथि नयार मज्झमग्झेण जेणय हालाहलाए
फुभकारीए कुमकारागणे तेणेर मागच्छइ,२त्ता गोसाल मंलिपुत 10
हालाहलाए कुमकारीए बुभकारावणमि अवाणगहत्यगय नार
अजलिसम्म करेमाण सीयलएण मट्टिया जार गायाइ परिसिंचमाण
पासइ, २त्ता लजिए विलिए विटु सणिय २ पोसफइ । तर ते
आजीबिया थेरा अयपुल आजीविओवासग लज्जिय जाव पचासकमाण
पासइ (पासति), रत्ता एवं पयासी-'एहि तार अयपुला, एत्तो
तए ण से अयपुले आजीविभोयासप आजीवियथेरोहिं एवं वुत्ते
समाणे जर आजीरिया थेरा तेणेव उवागच्छद, २आजीविए थरे
वा भमंसद, १ नद्यासन घाव पमुपासह। अयपुला'
आजीरिया थेरा अयपुल आजीविओवासग एप वयासी-'से नूण ते
अयपुला, पुग्यरत्तापरत्तकालसमयसि जाप किंसठिया हटा पण्णता120
तप ण तर अयपुला, दोच पि ते चेष सव माग्यि व भाव सात्यि
नपरि मज्झमझेण जेणेव हालाहलाए धुमकारीए फुभकाराधणे,
जेणेव इह तणेव यमागए । सनूण ते अयपुररा अट्टे समझा देता
अस्थि: । 'जपि य अयपुरा, तर धम्मायरिए धम्मोपदेसए गोसाले
मेललिपुत्ते हालाहलाए कुभकारीए

30 श्रीमद्भगवनीसूत्रम् नाव अजलिं करेमाणे विहरइ, तत्य विण भगवं इभाइ अट्ट चरिमाइ पनवेइ, त जहा-चरिमे पाणे जाव अत करेस्सह। जेविय अयपुला, तव धम्मायरिए धम्मोपदेसए गोसाले मखलि पुत्ते सीयलण्ण मट्टिया भाव विहरद, तस्य विण भगव इमाइ चत्तारि पाणगाह चत्तारि 5 अपाणगाइ पन। से कि त पाणए। २ भाव तो पच्छा सिज्झइ जार अत करे । त गच्छण तुम अयपुला, एस चेव तव धम्मायरिए धम्मोवदेसए गोम ले मखलिपुत्ते हम एयारून वागरण चागरिता ति। ३१ तपणे से अयपुले आजीविभोवासए आजीविहि येरोहि पव वुत्ते समाणे हट्टतट्टे उठाए उद्वेद, २ जेणेव गोसाले मखलिपुत्ते 10 तेणेष पहारेत्थ गमणाए । तए ण ते आजीविया थेरा गोसालस्स मबलिपुत्तस्स अबणगपडावणद्वयाए एगतमंते सगार कुञ्चति । तए ण से गोसाले मखलिपुत्ते आजीवियाण थेराण सगार पडिच्छा, २ अबकृणग एगतमते पडेइ । तए ण से अयपुले आजीविभोरामा जेणेव गोसाले मखलिपुत्ते तेणेव उवागच्छद, २ गोसाल मखलिपुत्त 15 तिक्खुत्तो जाव पजुवासइ । 'अयंपुला, इ गोसाले मंसलिपुत्ते अयपुल आजीनिओवासग एव वयासी-सेनूण अयपुला, पुष्यरत्ता- वरत्तकालसमयसि ना जेणेव मम अतिय तेणेव हव्यमागप। से नूण अयपुला, अढे सम? ! 'ता अस्थि तनो रालु एम अवकृणप, अवचीयप ण पसे। सिठिया हहापण्णता वसीमूलसठिया एला पणण्ता। वीण वाह रे वीरगा, वीण धापहि ।। तए ण से अयपुले 20 'आजीवियोधासप गोसारण मखलिपुत्तेण इभ एयाम्व वागरण वागरिए समाणे हवाह जाव हियए गोसाल मलिपुन बदाइ नमसइ, २ पसिणाइ पुच्च३, २ अट्ठाइ परियाइयर, २ उट्टाए उट्टेड, २त्ता गोसाल मखलिपुन बदद नमसइ, २सा दाव पडिगए। 25 ३२ तए ण से गोसाले मसलिपुत्ते अप्पणो मरण आमोएइ, २त्त पन्नासम सय 31 भाजीविए थेर साया, २पय ययासी-'तम्मेण देवाणुप्पिया, मर्म कालगय आणेत्ता सुरभिणा गधोडपणं दाणेद, २ पाएसएमालाए गधकासाईप गाया सुरंद, २ सरसेण गासीसचदणेणं गायाई अस्पिद, महरिह ईसलवखण पडसादग निर्यमेह,२ सन्याल कार- विभूसिय करए, २परिसहस्सवाहिणि सीयं पुरुहद, २ सावत्थीप5 नयरीए मिंधाढग आव पदेस महया महया सईण उग्धोसेमाणा एवंघदद 'एव खलु देराप्पिया,गोसाले मंगाटपुत्ते जिणे मिणप्पसायी जाव जिणसद्द पगासेमाणे विहरित्ता इमीसे ओसप्पिणीप घउ साप तित्ययराणं चरिमे तित्थयरेसिद्ध पार सव्याफ्सप्पहीणा विसबार- समुदएण मम सरीरगस्स नीहरण करह। तपण ते आजीविया 2010 गोसालस्स मखलिपुत्तस्स एयम? विणएण पटिसणेति ॥ (सू०५५४) ३३ तप ण तस्म गोसालस्स मरगलिपुत्तस्स सत्तरसि परिणम मार्णसि पटिलद्धसम्मत्तस्सअयमेयाख्येअज्झस्थिपावसमुप्पजित्या- 'नो खलु अह जिणे जिणप्पलायी जाव जिणसद्द पगासेमाणे यिहरिए । अहणगोसाले चेपमतलिपुत्तेसमणघायएसमणमारण समणपदिणी415 आयरियमझायाण अयसकारण अवण्णकारप अवित्तिकारए याहिं असम्भावुम्भारणादि मिच्छत्ताभिनिवेसहि य अप्पाणं या परयातमय या धुग्गाहेमाणे धुप्पाएमाणे विहरिता सपण तेएण असाढे समाणे अता सत्तरत्तम्स पित्तग्जरपरिगयसरीरे दायक्वतीए छउमत्थे चैव काल करेस्स । समणे भगव महावीरे जिणे जिणप्पलाची पाव 20 जिणसद पगासेमाणे विहरह', - पर मपट्टेड, २ आजीविए थरे सदाया, २ उच्चारयसवहसारिए करेइ २ पर्य ययासी- खलु अर जिणे, जिणप्पलावी पगासेमाणे विरिष । अह ण गोसाले मखलिपुत्ते समणधायप नाव छउमत्थे धेय काल फरिम्स। समणे भगव महावीरे जिणे जिणप्पलायी जाव जिणसद पगासेमाणे 32 श्रीमद्भगवतीसूत्रम् विहरदात तुम्भे ण देवाणुप्पिया, मम फालगय जाणेत्ता चामे पाप सुरेण वधर, २ तिखुतो मुहे उछुरह, २ त्ता सावत्थीए नयरीप सिंघाडग जाव पहेसु आकपिकट्टि करेमाण] महया महया सद्देर्ण उम्घासेमाणा२ण्वं यदह-नो खलु दवाणुप्पिया, गोसाले मरलिपुत्ते 5 जिणे जिणप्पलानी नाव विहरिए। एस ण गोसाले चैव मरालिपुत्ते समणधायए जाव छउमत्थे चेय कालगए। समणे भगय महागीरे जिणे जिणप्पलावी जाव चिहरइ। महया अणिड्डीअसकारसमुदपण मर्म सरीरगस्स नीहरण करेज्जाह । एव धदित्ता कारगए (सू० ५.५) २४ तए ण आजीविया थेरा गोसाल मखलिपुतं काल्गय जाणित्ता 10 हालाहलाए कुभकारीए कुंमकारावणस्स दुधाराइ पिहति २त्ता हालाहलाप कुंभकारीए कुमकारावणस्स बहुमज्झदेसमाए साथि नयरिं आलिहति २त्ता गोसालस्म मसलिपुत्सम्म सरीरंग यामे पादे सुषेण बंधति २ ता तिक्त्ता मुद्दे उद्दुभति, २त्ता सावत्थीप नगरीए सिंघाडग नाव परेसु आकनिकाह करेभाणा नीय २ सद्देण उग्धोस- 15 माणा २ एव वयासी- 'नो खलु देवाणुप्पिया, गोसाले मावलिपुते निणे जिणप्पलावी जाव विहरिए। एस ण गोसाले चेव मखलिपुत्ते समणघायए जाव उमत्थे चेव कालगए। समणे भगव महावीर जिणे, जिणप्पलायी जाप विहर। सवपडिमोक्खणग करते २ दोच्च पि पूयासकारयिरीकरणट्टयाए गोसालस्स मसलिपुत्तस्स 20 वामाओं पादाओ सर्व मुयति, २ हालाहलाए कुंभकारीए कुभकारा- वणस्स दुचारवयणाइ अवगुणति, गोसालस्स मेसलिपुत्तस्स सरीरग सुभिणा गंधोदपण पहाणति, ते घेव पाव महया इडिसकारसमुदएण गोसालस्स भेग्वलिपुत्तस्स सरीरस्स नीहरण करति । (सू०५५६) ३५ तएणसमणे भगवमहावीरेअनया क्याइसावत्थीओनयरीओ 95 कोट्टयाओचयाओ पडिनिक्समइ, २वहिया जणग्यविहार विहरइ ।।

पुनरसम सय
33
३२ तेण कारण तेण समएण मढ़ियगामे नाम नयरे होत्या,
चण्णा। तस्स ण मढियगामस्स नयरस्स पहिया उत्तरपुरत्यिमे
दिसीमाए पत्य ण साण(ल)कोट्टए नाम चेहरा होत्था, वणयो नाव
पुढपिसिलापट्टओतिस्सण साण(ल)कोहगसण चेइयत्त अदूरमामते
एत्य ण महंगे मालुयाफच्छर यानिहोत्था, किण्हे फिग्दोमास पाव
निपुरजभूए, पत्तिए पुटिफर फलिए हरियगरेरिग्जमाणे सिरीण अईव
२ उपमोभमाणे चिट्ठा। तत्यण मढियगामे यो रेवा नाम गाहावणी
परिवसइ अट्ठा नाव अपरिभूया। तए ण समणे भगय महावीरे
अग्नया क्याइ पुनाणुपुनिचरमाणे भार जणेर महियगामे नयरे
जेणेव साण(ल)कोट्ठए चेदए नाव परिसा पडिगया। तए ण समणस्स 10
भगाओ महावीररस सरीरगसि चिउर रोगायके पाउ भूप, उज्जले
नाव दुरहियास पित्तग्जरपरिगयसरीरे दाहवतील यावि हिरह,
अवियाइ रोहियान्चाइ पि परेड, चाउज्वग्ण वागरेह-'एर खलु
समणे भगव महापीरे गोसालस्स मसलिपुत्तस्त तरेण तेषण अनाढे
समाणे अतो इण्ट मामाण पित्तनरपरिणयसरीरे दाहसकतीए 10
उउमत्थ चेय काल करिस्सइ । तेण कालगतेग समग्ण समणस्म
भगवओ महावीरस्स अवासी सीहे नाम अणगारे पगामदए भाव
विणीए मालुयाकच्छगस्त अदूरसामते उद्वेण अनिक्खित्तेग २
तयोकम्मेण उहवाहा जाब विहरह। तए ण तम्स सीहरूस अणगारस्स
झागतरियाए पट्टमाणम अयमेयारूपे जाव ममुप्पञ्जित्था-20
"ए खलु मम धम्मायरियस्त धम्मोपदेतगरम ममगत भगरओ
महावीरस्त सरीरगसि विउ रोगायके पाउ भूप उज्जले बार
उउमत्थे चेच काल करिस्ता। यदिहलनि य ण अलतित्यिया-
'उउमथे चेव कालग इमेण एयालग महयाम गोमाणसिण्ण
दुक्वेण अभिमूएममाणे आयागभूमीनो प चोरुहर, जेणेर र
-

31
श्रीमद्भगवर्तासूत्रम्
मालुयाक्च्डए तेणेव उवागच्छद, रत्ता मायाकच्छग अतो
अणुपरिसइ २ महया २ सद्देण कुहुकुष्टुरस परुन्ने। 'अज्जोति
समगे भगय महावीरें समणे निग्गये आमवेद, एर क्यासी-
'एव रालु अज्जो मम अतेवासी सीहे नाम अणगारे पगश्मदए,
5 त चव राव भाणियव्व नाव परुन्ने। त गस्टर ण अज्जो, तुभे सीह
अणगार सद्दह ।। तए ण ते समणा निग्गथा समणेण भगवया
महावीरेण एर वुत्ता समाणा समण भगव महागीर वदति नमसति, २
समणस्स भगवओ महागीररस अतियाओ साण र कोट्टयाओ चेश्याओ
पडिनिवग्नमति, २ जेणेव मालुयाकच्छप जेणेव सीहे अणगारे तेणेव
10 उवागच्छति २ सीह अणगार एवं चयासी-'सीहा, धम्मायरिया
सद्दापति ।। तपण से सीहे अणगारे समर्हि निग्गयहिं सद्धिं
मालुयाकच्छगामी पर्दिनिवसमइ २ जेणेव साण(ल)कोट्ठए चेइए,
जेणेव समणे भगत महावीरे तव उवागच्चदरसमण भगय महावीर
तिम्खुत्ती आयहिणपहिण जाव पज्जुवासद। 'सहिाइ समणे
15 भगव महावीरे सहि अणगार पर चयासी- से नूण ते सीहा
झाणतरियाए वहमाणस्स अयमेयास्य नाव परुन्न। से नूण ते
सीहा अट्ट सम?, हता अस्थि ।'त नो खलु अह सीहा,
गोसालस्स मखलिपुत्तस्स तवेण तेपण अन्ना हे समाण अती छण्ड
मासाण जाव काल करेस्स, अह ण अन्नाइ सोरस यासाइ जिणे
20 सुहत्थी विहरिस्सामि । त गच्छद ण तम सहिा मढ़ियगाम नयर
रेवईए माहापदणीप गिहे। तत्थ ण रेचईए गाहापाप मम अट्टाए
दुवै क्योयसरीरा उचक्खडिया तहिं नो अट्ठो। अस्थि से असे
पारियासिए मज्जारकडए बुक्कुडमसए, तमाहादि, एएण अट्ठो।
तए ण से सीहे अणगारे समणेण भगवया महारीरेण एव वुत्ते
जाव हियए समण भगव महावीर बदह नमसइ
समाणे दृष्ट
23

पन्नरसमसय
35
२त्ता अतुरियमचवलमसमत मुदपोत्तिय पडिलेहइ, २ जहा गायममामी
नाव जेणेव समणे भगय महारे तेणेर उवागद, . समण
भगव महावीर बदइ नमसइ २त्ता समणस्स भगवओ महावीरस्स
अतियाओ साण(लोकोट्टयाओ चेइयाओ पहिनिक्समइ, अवारय
नाव जेणेव मढियगामे नयरे तेणेन उपागच्छद २ मादयगाम नयर,
मज्झमझेण जेणेच रेवईए गाहारणीप गिहे तेणेव उवागच्छ
रेवइए गाहावदणीए गिह अणुप्पविटे। तए ण सा रेवई गाहावाणी
सीह अणगार एज्जमाण पासद, हतु विप्मामेन आसणाभो
अन्मुइ २ सीह अणगार सत्तट्ट पयाइ अणुगच्छद, २ तिक्युत्तो
आयाहिण पयाहिण करेइ, वर नममद एवषयासी- 'सदिसतुण
10
देवाणप्पिया, किमागमणप्पओयण" तए ण से सोहे अणगारे रसह
गाहानइणि एर वयासी-पखलु तुमे देवाणुप्पिए, समणस्स भगरओ
महावीरस्म अट्ठाए दुये कयोयसरीरा उसक्सडिया, तेहिं नो अट्टो अस्थि
त अने पारियासिए, मजारकडए एकदमसप, एयमाहराहि, तेण
अट्ठा । तए | सा रेपइ गाहावश्णा सीह अणगार एर बयासी-13
कसण सीहा, से नाणी या तपस्सी या, जण तव एस अट्टे मम तार
रहस्सकडे र समसाए, जमाण तुम जाणास! एव जहा सहा ताव
जआ ण अह जाणामि। तए ण सा रेवइ गाहापदणी सीहस्स
अणगारस्स अतिय एयभट्ट सोचा निसम्म हट्टहा जणव भत्तचर
तेणे उसागइ २त्ता पत्तग मोएइ, २ ता जणा सीहे अणगार 20
तणव उपागच्छ,त्ता सीहस्स अणभारम्स पदिग्गगसि तसर
सम्म निस्सिरइ । तए ण तीए सईए गाहारणीए तेण दरसुद्धण
नाव दाणण सीहे अणगारे पडिलाभिए समाण देवाउए निरखें, नहा
विनयरा नाब जम्मनीवियफल रेवइए गाहारइणीए रेपईगाहा-
वाणी। माह अणगार रेवइए गाहापदणीnel
4

36
श्रीमद्भगवतीसूत्रम्
पहिनिक्समद, रता मढियगाम नयर मज्झमझेण निग्गच्छद २ जहा
गोयममामी नाव भत्तपाण पडिदसेइ, २ समणरस भगवओ महागीरस्स
पाणिसि त सय सम्म निस्सिरह। तए ण समणे भगव महावीरे
अमुच्छिए बार अणज्झोपवने बिलमिर पन्नगभूपण अप्पाणे
5 तमाहार सरीरकोटगास पक्खियह । तए ण समणस्स भगरी
महावीरस्स तमाहार आहारियस्स समाणस से विपुले रोगायके
खिप्पामेव उपसम पत्ते हे जाप, आरोग्गे, बलियसरीरे तट्टा समणा,
तुट्ठाओ समणीओ, तुट्टा सापया तुट्टाओ सावियाओ, तहा देवा
तुवाओ देवीओ सदेवमणुयासुरे रोए तट्टे, 'हट्टे जाए समणे भगव
10 महावीरे, दृढे जाण सभणे भगव महावीरे।। (सू० ५५७)
३७ 'भते त्ति भगव गोयमे समण भगर महावीर बदइ नमसइ,
२ एव बयासी पर सलु देवाणुप्पियाण अतेवासी पाइणजाणवप
समाणुभूइनाम अणगारे पगइभदए नाव विणीए । से ण भते तदा
गोसालण मखरिपुत्तेण तवण तेपण भासरासीए समाणे कहिं गए,
1. कहिं उपवने, 'एव पलु गोयमा, मम अतेवासी पाइणजाणवए
सवाणुभूइनाम अणगारे पगइभद्दए जाद पिणीए । से ण तदा
गोमालेण मसालिपुण भासरासीकए समाणे उड चदिमसूरिय नाव
उमलतक्महास के कप्पे वीरवदत्ता सहस्मारे कप्पे देवत्ताए उपवने।
तत्यणं अत्थेगक्ष्याण देवाण अट्टारस सागरोवमाइ ठिई पण्णत्ता। तत्थ
20 ण सधाणुभूइस्स वि देवस्स अट्ठारस सागरीरमाइलिई पण्णता से
समायभूइ देवे ताओ देवलोगामा आउभारण
भरकारएण
दिक्खएण नाव महादिहे वामे सिग्झिहिइ नाव जत करेटिइ॥
३८ एप खलु देवाणुप्पियाण अतेवामी कीसलजाणवए सुनश्वत्ते
नाम अणगारे पगइमदए नाब विणीए। सेज भते, तदा ण गोसालेण
5 मरलिपुत्तेण तवेण तेएण परिताविए ममाणे कालमासे काल किच्चा

पन्नरसमसय 37 कहिं गए, कहिँ उयाने एक खलु गोयमा, मम अतपासी सुनकाते नाम अणगारे पगइभदए नाव विणीए। सेण तदा गोसालेण मखलि. पुत्तेण तवेण तेपण परिताविए समाणे जेणेव मम अतिए तेणेर उवा- गच्छद, बदइ नमसइ, २ सयमेव पच महव्ययाइ आरुभेइ २ समणा य समणीओ य सामेइ, २ आरोइयपदिक्कते समाहिपत्ते कालमासेर काल विच्चा उह चदिमप्रिय नाव आणयपाणयारणकप्पे वीईवइत्ता अच्युष कप्पे देवत्ताए उपपन्ने । तत्थ ण अत्थेगइयाण देवाण बानीस सागरोवभाइ टिई पपणत्ता।तथ ण सुनक्खत्तस्स वि देवस्स बावीस सागरोपमाद सेस हा सन्याभूल जाव अत काहिह ।। (सू०५५८) ३९ एय एलु देवाणुप्पियाण अतेवासी कुसिस्से गोसाले नगम 10 मंखलिपुत्ते । सेज भते, गोसाले मखलिपुत्ते कालमासे कार विच्चा कहिं गए कहिं अरन्ने ? एन खलु गोयमा, मम अतेवासी कुसिस्से गोसार नाम मरालिपुत समणवायए, बाद छउमत्थे चेव कालमामे काल किच्चा उट्ट चंदिमसूरिय नाव अच्चुए कप्पे देवत्ताए उयचन्न । तत्य ण अत्यगश्याण देवाण यापीस सागरोधमाइ टिपण्णत्ता। तत्य 15 ण गोलारस वि देवरस वाचीत सागरावमाइ ठिई पण्णता॥ ४० से पण मते गोसाले देवे ताओ देयरोगाओ आउपसरण ३ जाव कटिं उबग्निदिइ ? गोयमा, इहेच जवुद्दीवे दीवे मारहे यासे निंझगिरिपायमूले पुढेसु जणपएसु सयबारे नयरे समुइस्स रनो मदाए भारियाए दुन्डिसि पुत्तत्ताए पच्चायाहिह । सेण तत्थ नचण्ट 20 मासाणं बनु पडिपुण्णरण नाव वीदकताण जाव सुम्व दारए पयाहिए। ४१ ज रयणि च ण से दारए जाइदिइ, त रयणि च ण सयदुवार नयर समितरवाहिरिए भारग्गसो य कुभागती य पउमवासे य रयणवासे य यासे वासिहिइ।तए ण तस्स दारगरस अम्मापियरो एकारसमे दिरसे बीइकते नाव सपत्ते पारसाहदिवस अयमेयास्य १ 38 श्रीमद्भगवनीसूनम् गोण्ण गुणनिष्फन्न नामधेज्ज कादिति- 'जम्हा ण अम्ट इमसि दारगसि जायसि समाणसि सयदुवारे नयर समितरवाहिरिए जार रयणपासे पुढे,त होउण अम्ह इमस्स दारगरस नामधेज्ज महापउमे महापउमेरा तरण तम्स दारगस्स अम्मापियरो मधेज करेहिति महापउमे ति। तए ण त महापउम दारग अम्मापियरो साइरेगह- वासजायग जाणित्ता सोमणसि तिहिकरणदिवसनक्सत्तमुहुत्तसि मत्या १ रायाभिसेगेण आभिसिंचेहिति।से ण तत्य राया भविस्सद, महयाहिमवत जाव विहारस्सइ । तरण तस्समहापउमस्स रनी अन्नया क्याइ दो देना महटिया नार महेसरसा सेणाम्म काहिति। त जहा 10 पुण्णमद य माणिमद्दे य। तए ण मयदुयारे नयरे बहवे राईसरतलघर नाव सथापभिरओ अनमल सदावे हिंति, २त्ता एव वपर्टिति- जम्हा ण देवाणुप्पिया, अम्द महापउभस्म रनो दो देवा महड्डिया नाव मेणाम्म करति, त जहा-पुष्णमद्दे य माणिम य, त होउ ण देवाशुप्पिया, अम्ह महापउमम्मरनो दोच्च पिनामधेने 'दरसेणे 15 देवसेणे । तए ॥ तस्स महापउमस रमो दोच्चे घि नामधेने मरिस्सर देवसेण ति॥ ४२ तए ण तस्स देवसणस्रा रन्नो अन्नया कयाइ सेए सखतल. विमल्सनिगाले चउहते एस्थिरयणे समुप्पज्जिस्सह । तप ण से देवसेणे राया त सेय सपतर विमरसनिगास चउद्दत थिरयण दुनडे 20 समाणे सयहवार नयर भन्समझेण आभिकरण २ अभिजाहिद निजाहिर य। तए ॥ सयबारे नयरे वहरे राईसर जाव पमिईओ अन्नमन सदानेहिति, २ वर्दिति- 'जम्हा ण देवाणुपिया अर देवसेगस्त रन्नो सेए ससतत् सनिगास चउहते हस्थिरयणे समुप्पन्ने, त होउ ण देवाणुप्पिया, अम्ह देवसेगस्स रन्नो तच्चे गिनामधेग्जे - पनरसमसय 39 'रिमलवाहणे विमलवाहणे ति। तए ण तस्त देवसेणस्स रनो तन्चे निनाम्धेग्जे 'विमलपाहणे ति॥ १३ तए ण से विमल पाहणे राया अन्नया कयाइ समहें निग्गयो मिच्छ विप्पडिवज्जिहिइ, अप्पेगइप आउसेहिह, अप्पेगा। अरहसिहि अप्पेगइप निच्छोडेहिह, अप्पेगइप निभत्थे(च्छे)दिइ, अप्पगाए बधेहिद, अप्पेगइए निरुभेहि अपेगइयाग छविच्छेद करहिह अप्पेगाए पमारहिह, अप्पेगल्याण उद्दधेहिइ, अप्पेगश्याग चत्य पडिग्गः कवल पायपुउण आडिदिदि चिच्छिदिहिद मिदिहिह अरहरिदिइ, अप्पेगश्याण भत्तपाण बोधिदिदिइ अप्पगइए निलगरे करेहिह, अप्पेगइ निसिए करहिह । तर ण सयावारे नगरे वटवे 10 राईसर भाव वहिति - एव सलु देवाणुप्पिया, विमलयाहगे राया समर्दि निग्गथेटि मिच्छ विप्पडिवन्ने अपेगइ आउस्सइ जाव निधिसए करेइ । त नो खलु देवाणुप्पिया, एय आद सेय नो खलु एय विमलवारणस्स रन्ना सेय, नो खलु एय रज्जस्म या टुस्स या घल्म्स या वाणम्स या पुरस्स वा अते उरस्त या जणग्यास चा सेय, 15 जण पिमरवाणे राया समगहिं निग्गदि मिच्छ विपडिबन्ने, त सेय खलु देवाणुपिया, अम्ह विमलवाहण राय एयम? विक्षरित्तप । त्ति कटु अन्नमस्स अनिय एयमट्ठ पदिसुणति, २ जेणेव विमल- घारणे राया तेणे उपागच्छनि, २ करयल्परिग्गदिय विमलयाण राय जण रिजएण बद्धावति, २ एव वहिति- 'एव खलु देगणु-20 प्पिया समगेरि निग्गदि मिच्छ रिम्पतिवन्ना, अप्पेग आउ- स्सति पार अप्पेगइए नित्यिसप करति। तनो सलु एय देवाणु- पियाण सेय नो रालु एय अम्द सेय नो खलु एय रुजस्स या नाव जण यस्स वा सय ज ण देवाणुप्पिया, समगाह निम्नहिं मिल विप्पडियानातविरमण देवाणुपियशापयत्सअस्स अकरगशेप ॥95 श्रीमद्भगवतीसूनम ४८ तए ण से विमलवाणे राया तहिं बरहिं राईसर भार सत्याहप्पभिदादि एयम रिते समाणे 'नो धामी तिनो तया ति मिच्छाविणएण एयमह पहिसणदिइ । तस्स ण सर दुवारस्स नगरस्स बढ़िया उत्तरपुत्यिमे दिसीमाए एत्य ा सभूमि- 5 भागे नाम उज्जाणे भविस्सइ सन्चोग्य वयो। तेर्ण कालेण तण समपण विमलरस अरहमी पउम्पए सुमगर नाम अणगारे जाद- सपन्न नहा धम्मधोमस्स वण्णओ नाव सरित्तविउल्तेयलेरसे तिनाणी- चगए, सुभूमिभागरस उजाणरस अदूरसामंते छहढण अणिविपत्तेण जाव आयावेमाणे विहरिस्सा 30 ४५ तर मे विमरबारणे राया अन्नया कयाइ रहचरिय काउ निज्जाहिद (हए पा से विमलवाहणे राया सुभूमिमागरम उपसागरस अदूरसामते रहचरिय करेमाण सुमगल अणगार उट्ठउद्वेण पात्र आयामा पासिहिद २ आसुरुते नाव मिसिमिसेमाणे समगल अणगार रसिरेण नोटावहिह। ताण से समगले अणगारे विमल- वाहणेण रक्षा रहमिरेण मालाथिए समाणे सणिय २ उहिद, २त्ता दोच्च पिउड बाहाओ पगिनिय २ाव आयामाणे विहरिस्मइ। सए ण से विमलवाणे राया समगल अणगार दोच्च पि रमिरेण नोलावेदि। तए ण से मगले अपगारे विमलवाहणण रक्षा दोन्च पि रहसिरेण नीहाधिए समाणे सणिय २ उहहिद २ ओहिं पउज- 20 हिद २ चिमटयारणस्स रण्णो तीयद्ध ओहिणा आभोपाहिइ . विमरवाहण राय एव वाहिद- 'नो खलु तुम विमलवाहणे राया नौ खलु तुम देवखणे राया नोखलतम महापउमेराया। तमण इओतचे भवग्गणे गोसाले नाम मेररलिपुत्ते होत्या समवायए अब उउमाये चैव कारगर। जई ते तदा सवाणभूइणा अणगारेण पभुणा दि 25 होऊण सम्म सदिय समिय तिइविराय अहियासिय जर ते तदा

पन्नरसमसय
सुनसत्तेग अणगारेण भाव अहियासिय, जइ ते तदा समणेण
भगपया महावीरेण पभुणा रिजाव आहियातिय, त नो खलु ते अई
तहा सम्म सहिस्स नाव आहियासिस्स। अह ते नयर सहय सरह
ससारहिय तरेण तेएण एगाहच्च कृडाच्च भासरासिं रेजामि ॥
४६ तप ण से शिमलवाणे राया समगरेण अणगारेण एव वुत्ते ।
समाण आसुरुत्ते जाव मिसिमिसेमाणे सुमंगल अणगार तच्च वि
रहसिरण नोटावेहिए। तए ण से मुमगले अणगारे विमलपाणे
रण्णा तच्च पि रसिरेण नोराविए समाणे आसुरुते पाव
मिसिमिसेमाणे आयावणभूमीओ पच्चोरुद्दइ, २ तेयासमुग्धारण
समोहनिहिइ, ९सत्तट्ठ पयाइ पच्चोसकिदित, २ विमर वाहण राय 10
सहय सरह ससारहिय तरण तेएण पाव भासरासि करहिह ।।
१७ समगले ण मत, अणगारे विमलवाहण राय सहय नाव
भासरासि करेता कहिं गच्छिहिइ कहिं उपवज्जियि! गोयमा
समगल अपगारेण निमलवाहण राय सहय आव भासरासि करता
परदि उहमदसमदुवालसा विचित्तहिं तवोदम्महि अप्पाण15
भावमाण पर यासाइ सामण्णपरियाग पाउणिहिद, २ मासियाए
सरोहणाए सर्टि भत्ताइ अणसणाए, जाव छपत्ता आलोइयपदिक्कते
समादिपत्ते उट्ट चदिम जाच गेपिजविमाणावाससय धीईवइत्ता
सरसिद्ध मदारिमाणे देवताए उपयरिजरिद । तस्य ण देवाण
अजहरमणुभासण तेत्तीस सागरोक्माइ दिई पण्णता । तत्थ 20
समगलरम वि देवरस अजनमणुशासण तेत्तीस सागरेश्मा टिई
पपणता । से ण भते, सुमगर देवे ताओ देवसोमाओ गाव
महादिवे यास मिझिहिल जाव अत काहिद (सू० ५५९)
४८.विमलपाहणे ण भंते, राया सुमगलेण सणगारेण सहा जात
मासासरिए समाण कहिं गच्छिाइ, कहिं उपयजिहिदा गोयमा.१.

12 श्रीमद्भगवतीसूत्रम् विमलयारणे ण राया सुमगलेण अणगारेण सहप पाव भासरसिाकर समाणे अहेसत्तमाए पुटवीए उझोमफालट्टिश्यसि नरयसि नेरइयत्ताप उपजिदिइ। से ण तओ अगतर उरहित्ता मच्छेस उरवरिजारह। से तत्थ सत्थवज्झे दायकतीप कालमासे काल किच्चा दोच्च पि अहेसत्तमाए पुढीप उकोसकालहिश्यसि नरगसि नेइयत्ताप उपजिहि । से ण ती अणतर उ पट्टित्ता दोरच पि मच्छेस उपज्जिदिइ। तत्थ विण सत्ययज्झे बाव फिच्चा छडीए तमाए पुढचीए उकासकालटिइयसि नरगसि नेरइयत्ताए उनपन्जिदिइ। से ण तओरितो भाव उवहित्ता इत्थियास उपरज्जिल्हि । 10तत्य रिण सत्थवझे दार बार दोच्च पिछट्टीए तमाए पुढीप उक्कोसकाल व उनहित्ता दोच्च पि इस्थियासु उपज्जिादेह । तत्य विण सत्यवझे जाव किच्चा पचमाए धूमप्पभाए पुढवाए उकोसकाल न उ पहिता उरपस उपवजिहि । तत्य विण सत्थरशे जाव किच्चा दोच्च पि पचमाए भार उचहत्ता दोच्च 15पि उरएस उपजिदिइ नाव किच्चा चउत्थीए पकप्पमाए पुढयीप उनोसकारटिश्यसि नाव उरट्टित्ता साहस उपजिनहिह । तत्य वि ण सत्यनज्ञ तहे। पाव किच्चा दोच्च पिचउत्थीप पक भाव उपट्टित्ता दोच्च पिसीहेसु उवरग्जिहिइ नाव किच्चा तच्चाप वाटयप्पभाए पुद्धवीए उक्कोसकाल बार उनहित्ता परीस उय- 20वज्जिदिइ। तत्य वि ण सत्थरग्झे नाव किच्चा दोच्च पि तच्चाए वालय जाव उपट्टित्ता दोश्च पि पक्षीसु उरवजिहिह जाव किया दोच्चाए सशरप्पभाए नाव उघट्टित्ता सिरीसरेस उववजिहि । तत्थ विण सस्थ नाव किच्चादोच्च पि दोच्चाए सकरप्पमाए जाव उ पट्टित्ता दोच्च पि सिरीसवेसु उपजिहिइ जाव किच्चा इमीसे रयणप्पभाए पुढचीए उकासकालष्ट्रियसि नरगसि नेरइयत्ताप उव- पनरसम सय 13 चग्जिहिइ नाव उ पट्टित्ता मनीमुउववज्जिदिइातत्यविण सत्यरझे बार फिच्चा असलीस उपन्निहिह। तत्य नि सत्यरज्झे जाव किच्चा दोच्च पि इमीसे रयणप्पमाए पुढवीए पलिओवमरस असखेज्जइमागविइयमि नरगसि मेरइयत्ताए उपयज्जिहिद । से ण तओ जाव उपद्वित्ता जाइ इमाइ सहयरविहाणाइ भवति, त जहाज चम्मपदवीण, लोमपदरीण, समुग्गपारखीण, विययपरवीण, तेसु अणेगसयसहस्सक्युत्तो उद्दाइत्ता तत्थेर भुज्जो पच्चायाहिह । मत्थ विण सत्थरम्झे दायतीए कालमासे काल किच्चा जाइ इमाइ भुयपरिसप्परिहाणाइ भाति, त जहा- गोहाण, नउलाण, जहा परदगारए जाव नाहगा चउप्पाइयाण, तेसु अगसयसहस्सनुत्तो 10 सम हा स'चराण नाव पिच्चा जाइ इमाइ उरपरिमप्पविहाणाइ भगति स जहा- अहीण, अयगराण, आसालियाण, महोरगाण, तेसु अणेगसयसहस्म नाव किच्चा जाह इमाद चउप्पदरिहाणाइ भवति त जहा-एगपुराण, दुपुराण, गडीपदाण, सण पदाण, तेसु अणेगसय- सहस्स नाव किच्चा जाइ इमाइ जल्यरपिताणाइ माति, त जहा-15 मच्छाण, पच्छमाण जार समुमाराण, तेस अणेगनयसहस्स हाद किरचा जाइ इमार चरिदियरिक्षागद भवति, त जहा- अधियाण, पोत्तियाण, पहा परगाए जव गोमयकीदाण तेसु अगसय पार किच्चा जारइमाइ तेइदियविहाणाइ भगति, त जहा- उवचियाण बार हत्यिसाठाण तेसु अणेग जाव किच्चा जाइ इमाइ धादिय-20 विदाणाद मानि त जहा- पुलाकिमियाण पार समुदलिताण तेस अणेगमय र किच्चा जाइ इमाइ सदापिहाण भवति, स जहा- रुपयाण गुच्छाण गाव कुणाण, रोसु भणेगमय व पायाइस्मइ । उस्सन्न च कदुयरकोसु कयरगम सत्य निण सथान्ये आपिशा जाइ इमाइ पाराश्याविहाणार मगति त जहा-पाईण-25 श्रीमद्भगवतीसूत्रम् वायाण जाव सुद्धवायाण, तेस अणेगसयसहस्स आव किच्चा जाइ इमाइ तेनाइयविहाणाइ भवति, त जहा-इगालाण नाव सूरकतमणि- निस्सियाण तेसु अणेगयसहस्स नाम किया जाइ इमाइ आउकाश्य- विदाणाह मरति, तजहा-उस्माण जार सातोदगाण तेसुअणगसय जाव 5 पञ्चायाइस्सइ । उस्सन च ण स्वारोदएम् रातोदपत। समत्थरिण सत्यराजे पाव किया जाइ इमा पुरिमाइयविहाणा भवति, त जहा- पुद्धवीण सकराण नार सूरकताण, तेसु अणेगसय नाग पञ्चाया- हिह। उस्सन च ण खरवायरपुढारमाए, सत्यनि सत्यवो नाव किच्चा रायगि नयाँ वार्हि सरियताए उपजिहि । सत्य 10णि सत्थरझे नाव किच्चा दोच्च विरायगि नयरे अतोसरियताए उपजिदिइ । तत्थ नि सत्थरज्झे पाव किच्चा इहेव जवुद्दीधे दीये भारहे वासे रिझगिरिपायमूले वेभेले मनिसे मारणलसि दारियताए पच्चायाहितए ण त दारिय अम्मापियरो उम्मुक्काबाल- भार जोधणगमणुप्पत्त, पहिस्एण मुक्केण, पडिग्रएण विधारण, 1. पडिरूमयस्स भत्तारस्स भारियत्ताप दलइस्सति सा तस्सभारिया भविस्सइ इट्ठा कता गार अणुमया, भडकरडगसमाणा रकेला इच सुसगोविया, चेलपेडा व सुसपरिग्गदिया, रयणकरडओ विव सुसारक्सिया, सुसगोविया, मा ग साय, मा ण उपद पाव परिरसहोयसागा फुसनु।तए ण सा दारिया अन्नया क्या गुपिणी 20 समुरकुलाओ पुलघर निजमाणी अतरा दयग्गिजालाभित्या कारमासे फाल विच्चा दाहिगिरेगिसुमारे देवेनु देवत्ताप उववज्जिहि॥ ४९ से ण तोहितो अणतर उव्यट्टित्ता माणुस्स विगह समिहिर, २ केरल बोर्टि बुझिहिद, २ मुडे भपित्ता अगाराओ 25 अणगारिय पयरहिह । तत्थ दियण निराहियसामपणे कारमासे पन्नासम सय 45 कार फिच्चा दाहिणि असुरखुमारेस देवेसु देवत्ताए उपज्जि- हिंद। से ण तओहिंतो नाव उत्पट्टित्ता भाणुम विगह त चेर पाव तत्थ रिण चिराहियनामपण कारमासे नाव फिच्चा दाहिणिलेस नागसुमारेस देनेस देवत्ताए उमवज्निदिइ । से ण ताहितो अणतर, एर एपण अभिलारेण दाहिणिरेसु मुवष्णकुमारेस, एर विजु-5 फुमारेस, पर अग्गिमारवज्ज पाव दाहिणिरेसु यणियकुमारेसु । से ण तआ नाव उपट्टित्ता माणुस्स चिग्गह मिहि नाव विराहिय- सामण्ण जोइसिएम देवेसु उपग्निहिद। से ण ती अणतर चय चइता माणुस्स निग्गह लभिहिद नाद अश्रािहियसामण्णे कालमासे काल किचा सोहम्मे कप्पे देवत्ताए उपयज्जिहिद । स ण 10 तओस्तिो अणलर चय चहत्ता माणस दिग्गत रमिहिद, काल बादि धुग्झिदिइ, तत्थ पिण अविराहियसामण्णे कालमासे काल फिच्चा इसाणे कप्य देवत्ताए परिजहिए। से ण तो चश्त्ता माणुस्स विग्गद र मिथिइ । तस्य हि ण अधिराहियसामण्णे फार मासे काल फिच्या मणकुमार कप्पे देवताए उवरग्निहिइ । से ण15 तहितो एव हा सणकुमारे तदा नगरोए, महासको, आणए आरणे । से ण तओ नाव अविराहियमामण्ण कारमास काल किच्चा म यसिद्ध महारिमाण देयत्ताए उनमन्निहिइ। से ण तओहितो अणतर चय चात्ता महाविदहे चासे जाइ इमार कुलाइ भवति- अढाइ नाव अपरिभूयाइ तहप्पगारेसु कुलेसु पुत्तत्ताए परचायादिइ । 20 एवं जना टवगदए दपझ्झनदया ग स वस व्या निरदममा भाणिय दा पार केवलवरनाणदमणे समुप्पजिदिद॥ ५० तए ण से दढप्परने चली अप्पणो तीअद्ध आमाहिद, २ समणे निग्गथे सदावेटिइ, . एप बदहिह-एव रालु अह अनो, इओ चिरा गोसाल नाम मरालिपुत्ते होत्या,

श्रीमद्भगवनीमूनम
समणधायए नाव एउमरी चय कारगए। सामूलग च अर
अज्जी, अणाइय
अणदाग दीरमद्ध चाउरतससारफतारे
अपरियहिए। तमा ण अजा तुम के भर आयरियपरिणीयप,
उपन्झायपरिणीए आयरियउरझायाण अयमकारप अपप्णकार,
5अवित्तिकारए। मा ण सरि परचेर अणाईय अणदाग पर
ससारकतार अशुपरियहिरिइ जहाण अत्। तपणते सममा निग्गया
दढप्पामरस केलिस्स अलिय एयम्झे सोचा निसम्म भीया तत्था
तसिया ससारमपिग्गा पप्पाल फेरि वहिति नमसिदिति, २
तरस ठाणस्स आलाइपहिति निदिनि नाय पदियानिहिति। तपण
10 से दृढप्पाने केवली पहुई वासाइ फवर परियागं पाउणिहिद, २
भप्पणी आउसेस जाणत्ता भत्तं पच्चनसाटिइ, ए मा उपाए
धान समक्खाणमत कादिह। (सू० ५६०)
सेर भते । सेव भते ति जाव चिहरद।
तेयनिसम्गा समत्ता।
समत्तच पसरसम सय एवासरया

श्रीमद्भगवतीसूत्रम् । (व्यारयामज्ञप्ति) अथ पञ्चदश गोगाएकाग्य शतरम् । श्रीमच्चाम्बरनमोमणिश्रीमदभयदेवमूरिभणीता वृत्तिः।। १५ गाशार कशते पड़दिशाचरसमागम-सूत्र ५३९ यारयात चतुदशशतम्, अथ पञ्चदशमारम्यते । तस्य चाय पूरण सह अभिसम्बध-अनन्तरशत कंवली रत्नप्रभादिक वस्तु जानाति इत्युक्त, तत्- परिज्ञान च आत्मसम्घाव यथा भगवता भीम महावीरेण गौतमाय जाविभावित गाशालकस्य स्वशिष्याभामस्य नरमादिगान अधिकृत्य तथा अनन उच्यत इति एवसम्बन्धस्य अस्य इद आदिमूनम् 'तेण' मित्यादि, 'मसलिपुत्ते'त्ति महख यभिधानमइयस्य पुन 'चउवीसनासपरियाए 'त्ति चतुर्विशतिवषयमाणमनन्यापयाय , 'दिसाचर' ति दिश-मरा चरति--यान्ति मयत भगवता वय शिष्या इति दिकचरा देशाटा पा, दिक्चरा भगवच्छिण्या पा वस्थीभूता इति टीकाकार', 'पासा पच्चिज' ति चुर्णिकार, 'अतिय पाउ भविज'त्ति समीपमागता,5 'अट्ठनिह पुव्यगय मग्गदसम'नि अष्टविधम्-अष्टमगार निमित्तमिनि शप, तवेद-दिय१ औत्पातरजान्तरित३ माम? जान५ स्वर६ लक्षण यअन८ ति, पूर्वगत-पूवाभिधानश्रुतविशेषम यगत, तथा मागो-गीतमागनृत्यमागलपणा सम्भा यत, 'दसमगत अव नवमशब्दस्य रतस्य दर्शनानदमदशमाविति दृश्य, ततश्च मागा नवमदशमी यत्र तत्तथा, 'सपाह' - स्वर मइदसटिं' ति मत बद्धमत्या वा दशनानि-प्रमेयस्य परि उदनानि मनि दानानि त , निज्जुईति'त्ति नियथयति पूर्वलक्षणश्रुत्पयाययूथानिधारयन्नि २ स्वकीय २10 18 , श्रीमद्भगवतीमूनम् उदन्तीत्यर्थ , 'उपहाइस' ति उपस्थितयन्त आनितान्त इत्यय, 'अगस्म' ति अभदस्य, 'केणइ ति स्नचित्-तथाविधजनारिदिन स्वपेण, 'उहोयमेत्तेणति उद्देशमारण, 'इमाइ छ अणइक्कमणिज्जाइ' বি মানি ঘষু অবনিমীযান-অধিনুক্কন, আমার 5 पृश्न सता यानि याम्यिन्त-अभिधीयन्ते तानि याकरणानि पुरुषार्थोपयोगि- त्याचैतानि पडुक्नानि, अयथा नष्टमुष्टिचिन्ताराप्रभृती यन्यान्यपि बानि निमित्तगोचराभान्तीति॥ 'अजिणे जिणलागि नि अनि जवीतराग सन् जिनमात्मान प्रापण स्पनात्येवशीलो जिनमलापी, एवमन्यान्यास पानि याच्यानि, नपरम् भहन्-पूजाहा, केवली- परिपूर्णज्ञानादि, विमुक्त 10 भवति ! - 'अजिणे' इत्यादि । (सू ५३९) १५ गोशार कशते गोशालकोत्थानपरियानिकम् सू ५४० 'ए जहा विस्यसए नियहुदेसए' ति दिनीयशतस्य पञ्चमादेशके 'उहाणपरियाणिय'ति परियान-विध यतिस्परिगमन तदेव पारियानिक- चरितम् उत्थानात्-जमन आरम्य पारियानिक उत्थानपारिमानिक तत्परि 1,कथित भगरद्धिरिति गम्यते । 'मखेत्ति मह --चिरफलक यमकर भिलाक- विराष, 'सुरुमार । इह यारत्करणादेव दृश्य- - 'सुकुमालपाणिपाप एक्सणवजणगुणोववेए' इत्यादि । 'रिस्थिमिय' इह यावत्करणादेव दृश्यम् 'रिद्वत्थिमियसमिद्वे पमुइयजणाणपए इयादि, यारया तु मत्, 'चित्तफरगहत्थगए नि चिफर इस्ते गत यस्य स तथा, 20 पाहिए ति एकमात्मान प्रति प्रत्येक मितु फल्कादिनमित्यर्थ ।(सू ५४ ) श्रीधीरेण गोशार सगम ~मू ५४१ अगारवासमझे वलित निजगारवाम -गहवासम युष्य-आसे या 'जहा भाषणाए' ति आचारद्वितीयश्रुतस्कन्धस्य पञ्चदशेऽध्ययने, पञ्चदश गोशालकास्य शतकम् 49 अनन चद सूचित - 'समत्तपहले नाह समणो होह अम्मापियरमि जीयते त्ति समाप्ताभिग्रह इत्यर्थ, 'चिच्चा हिरण चिच्चा सुरपण चिच्चा बल' इत्यादीनि, 'पहम वास' ति विभक्तिपरिणामात् पवन्यापति पचे प्रथमे वर्षे, 'निस्साए 'त्ति निश्राय निश्रा कृत्वत्यर्थ, 'पढम अतरा चास 'ति विभक्तिपरिणामादेव प्रथमऽन्तर अवसरा वर्षस्य-वर्यनासावन्तरवर्ष, अथवाऽन्तरेऽपि-जिगमिपतक्षेत्रमप्राप्यापि यन सति साधुभिरवश्यमारासो विधी यते सोऽन्तरावासो-वर्षाकाल स्तन, 'वासावासं ' ति वषासु वाम - चातु- मासिकमवस्थान वर्षावासस्तमुपागत - उपाभिन । 'दोच्च वास' ति द्वितीय चष, तेवनायसाल' ति कुविन्दशाला, 'अजलिमउलियहत्ये' ति अञ्ज लिना मुकुलिती- मुकुलाकारौ कृती हस्तौ येन स तथा, 'दयसुद्धण' ति 10 दय-ओदनादिक शुद्ध-उद्गमादिदोषरहित यत्र दाने तत्तथा तन, 'दायग सुद्धण' ति दायक शुद्धो यत्राशसादिदोषरहितत्वात् तत्तथा तेन, एवमितरदपि, "तिविरेण ' ति उक्तलक्षणेन विविधन, अथवा विविधेन कृतकारितानुमतिभेदेन -किरणशुद्धन-मनोवाकायशुद्धन, 'यसुहारा युद्धति वसुधारा-द्रयरूपा पारा पणा, 'अहो दाण' ति अहोरादो विस्मये, 'कयत्थे ण' ति कृतार्थ - 15 कृतस्वप्रयोजन , 'कयलखणे ति कृतफ्लवलक्षण इत्यर्थ , 'कया ण लोग' त्ति कृतो शुभफलरी अवयवे समुदायोपचारात् राको इहलोकपरलोको, जम्म- जीवियफले ति जन्मनो जीवित यस्य च यत्फल तत्तथा, 'तहारवे साहु साहुरूचे ति तथारूपे तथाविधे अविज्ञातयतारिशप इत्यर्थ , 'साधी' श्रमणे 'साधुरूपे साध्वाकारे, 'धम्मतेगसि नि शिल्यादिग्रहणार्थमपि शिष्यो भवतीत्यत उच्यते-धर्मान्तेवासी, सज्जगविहीए' ति खण्डखायादिलक्षण-20 भोजनप्रकारेण, 'सन्यकामगुणिएण 'निस कामगुणा- अभिलाषविषय- मूना रसादय सभाता यत्र तत्सत्रकामगुणिनं तेन, परमशति परमानेन- ४ श्रीमद्भगवर्तामूत्रम् 50 क्षरय्या, 'आयामेत्य'ति आचामितवान्, तद्भाजनदानदारशोजिटना- सम्पादनेन तच्छु द्धययमाचमन शक्तिवान् भोजितवानिति तात्पयाय । सभि- तरबाहिरिए' ति सहाम्य तरण विभागेन बाहन च यत्तत्तथा तन, 'मग- णगवेसण' ति अन्वयतो मागण व्यतिरेक्तो गवेषण ततश्च समाहारदन्द्र, 5'सुइव' ति श्रूयत इति श्रुति -शब्दस्ता, चक्षुषा क्लि दृश्यमानाऽथ शब्देन निश्चीयत इति श्रुति ग्रहण, 'खुदव'त्ति क्षण पति - छीत्त ताम्, एपा:- प्यदृश्यमनुष्यादिगमिका भवाति गीता, 'पवात व ति प्रवाति-वारी, 'साडियाओ' त्ति परिधानवस्राणि, 'पाडियाओ'ति उत्तरीयवस्त्राण, वचित् ' भडियाओ' ति दृश्यते तत्र भण्डिका-रन्धनादिभाजनानि, 'माण आयामेह' ति शारिकादीनान् ब्राह्मणान् लम्भयति, शाटिकादीन 10 ब्राह्मणेभ्या ददातीत्यय, 'सउत्तरो?' ति सह उत्तरीष्टेन सारी-सश्मश्रुक यथा भवतीत्येव, 'मुड' ति मुण्डनं कारयति नापितेन, 'पणियभूमीए' ति पणितमुमो-भाण्डविश्रामस्थाने, प्रणातमूमो था- मनोशभूमी, 'अभिसम माएगए' ति मिलित , 'एयमट्ठ पडिमुणेमि' त्ति अभ्युपगच्छामि, .यच्चतस्यायोग्यस्याप्यम्युपगमन भगवतस्तदक्षीणरागतया परिचयनपत्स्नेहगर्भा 15 नुकम्पासद्भावात् छद्मस्थतयाऽनागतदोषानवगमावश्यभापित्याच्चेतस्यार्थस्येति भावनीयामिति । पणियभूमीप तिपणितभूमेराम्य प्रणीतभूमौ वा-मनोज्ञभूमो विहृतवानिति योग 'अणिच्चजागरिय' ति अनित्यचिन्तां कुर्वनिति वास्यशेष । (सू ५४१) तिलस्तम्बाधिकार -सू ५४२ 'पदमसरयकारसमयसिति समयभाषणामागीपीयो शरदभिधीयते। तय प्रथमशरत्कालसमये मागीप, 'अप्पट्टिकायसिति अल्पशब्दस्य अभाववचनमादविद्यमानवर्ष इत्यय, अये तु अश्वयुकार्तिको शरदित्याह', 20 - - पञ्चदश गोशालमारय शतकम् 51 अन्पवृष्टिकायत्वाच तनापि विहरता न दूषणमिति, एतच्चासङ्गतमेव, भगवतोड प्यस्य पयुपणस्य यत्त यवन पर्युपणाकल्पेऽभिहितत्वादिति । 'हरियगरेरि ज्जमाणे' ति हरितक इतिकृत्वा, रेरिज्जमाणे' ति अतिशयन राजमान इत्यर्थ । 'तए ण अह गोयमा' गोमाल मसरिपुत्त एप क्यासि ति, इह यद्भगवत पूर्वकालप्रतिपनमोनाभिग्रहस्यापि मत्युत्तरदान तदकादिक । वचन मुत्कलमित्येवमभिग्रहणस्य संभायमानत्वेन न विरुद्धमिति, 'तिलसगलियाए'त्ति निलकलिकाया, 'मम पणिहाए'तिमा प्राणिधाय -मामाश्रित्याय मिथ्यावादी भवत्वितिरिक्ला कृत्ता, 'अभपहलए' त्ति अम्ररूप दारो-जलस्य दलिय-कारणमभ्रवादलक, पतणतणायद मकर्षेण तणतणायते गर्जतीत्यय , ' नच्चोदग' नि नात्युक यथा भवति, 10 'नाइमट्टिय' ति नातिकदम यथा भवतीत्यथ , 'पविरलपप्फुसिय ' नि पविरला मस्पृशिका-विग्रुषा यत्र तत्तथा, 'रयरेणुविणासण' ति रजो- पातोत्पाटित “योमवर्ति, रेणवश्व-भूमिस्थितपशिवस्तदिनाशन-तदुपशमक, 'सलिलोदगवास' ति सरिरा -शीतादिमहानद्यस्तासामिव यदा-रसा दिगुणसाधम्यादिति तस्य यो वर्ष स सरिलोदश्वषाऽतस्त, 'बद्धमूले ' ति 15 पद्धमूल सन्, 'तत्येर पट्टिप' चियत्र पतितस्तत्र प्रतिष्ठित । (सू ५४२) सू ५४३-४६ वैश्यायनतेजोरेश्या। पउपरिहार । तेजोलेश्या, पीरोपर्यमय । 'पाणभूयनीयसत्तदयट्टयाए' त्ति माणादिषु सामान्यन या दया सेगाथ प्राणादिदयाथसमावस्तत्ता तया, अथवा पत्पदिका एक प्राणानामुच्यासादीना 20 भागत् प्राणा भवनधमकत्वाद्भूता उपयोगलथणत्वानावा सत्त्वोपपेतत्तात्सत्त्वा स्तत कर्मधारयस्तदर्थताय, चशद पुनरर्थ, 'तत्येर ति शिर प्रभृति, .

- समानार्य 52 श्रीमद्भगवनीमूत्रम 'किं मा मुणी मुणिपति, ''मुनि । ती जान, मुरिएर तिमाते तत्प निशारा पानरम्, अथग भियान 'मुनी । तर, 'मुणित' ति मुनिर - तनि, अथवा सभा 'मुनि' मा उन 'मुणिक ' महानि , 'उदा नि उता इति मिना कि 5 जूयासेन्जायरपति यूगा स्थानदानी, सतह पयाइ पच्चीसकर ति "यत्नविशपाथमुरध्र इय प्रशारदानाधमिति, सीउमिण तेयऐस'नि -सापामुष्णा तनालस्या, से गयमेय मगर गयायमेर मगर'निअर गत-अगनमत मया ह भगएन् । यथा भारत ममागदयं न दग्ध, वारच गतरालस्य पुन पुनरुचार,६१ यदगातार मा भारत 10ন নয়ন বাবু, বন্য মুনশনালিঃ গান করবেন মন্ত্রীবাস্তবায়িতাবাসস 'सखित्तजिएयरसे' तिसहि ताऽप्रयागमाल, पिपुलाप्रयागवाल तना तेश्या-धिविशपा यस्य स तथा, 'मनहाए लिसनलया पर निकाय घयमानायामलानसा महास्यायो पक्ष हा मनवे गुरपते 15'कुम्मासपिडियाए' ति कुस्मा - नद्धस्थिभा भुगादया मारा इत्पन्य 'रियडासपण तिकिट-जल तस्याशय आश्रया दा-यान विकास विक्टायो या तन, अमच मस्तागच्युलुकमाहुबद्धा, "जाहे य मोतिपदा च स्मोन्भनामो पय, 'अनिप्फनमेव सिमकारस्यामिकत्वादनिपन एवं 'यणस्मइकाइयाओ पउट्टपरिहार परिहरति नि परिवृत्य २-मत्वा २ 10 यस्तस्यैव वनस्पतिशरीरस्य परिहार - परिभोगस्तवोत्पादोऽसौ परिदत्य परिहारस्त परिहरन्ति-कुन्तीत्यय , 'खुटुइ' ति गोटयति, "पउद्देति परिवत्त परिवत्तवाद इत्यर्थ , 'आयाए अबक्रमणे ति चोपदेशम्, 'अपक्रमणम्' अपसरण 'जहा ra- पञ्चदश गोशालकारख्य शतरम 53 'महया अमरिस' ति महान्तममषम्, 'एपवानिति पर चेति भशापकोपदर्यमानसोपचिन्नम्, अपीति समुच्चय ।(सू ५४३-४६) सू ५४७-४९-~-आनन्दाय गोशालरोक्तो पणिग्दृष्टान्त । तेजशक्ति । नोदनानिषेध । मह उपमिय' नि मम सम्बन्धि महदा विशिएलोपन्यमुपमा इशान इत्यथ , 'चिराईयाए अद्धाए' ति चिरमतीते काले, 'उच्चारय' नि उच्चावचा-उत्तमानुत्तमा, 'अत्यस्थिति दयप्रयोजना, कुन एवम् ? इत्याह--'अत्थलुद्ध' ति दयनालसा, अत एव 'अत्यगोसिय । ति, अर्थगवषिणोऽपि कुन इत्याह- अत्यकापिय ति प्राप्तऽप्यथऽविच्छिन्नेच्छा , 'अत्यपियासिय। ति अप्राप्ताथाविषयसाततप्णा, यत एवमत एवाह-10 'अत्यगनेमणयाए ' इत्यादि, 'पणियभड़े। ति पणिन-यपहारस्तदर्थ भाण्ड, पणिनं या-क्याणक तदा भाण्ड न तु भाजनमिति पणितभाण्ड, 'सगडीसागडेण' ति शाट्यो-गन्त्रिका, शबाना गतीविशेषाणा समूह शाकट, तत समाशाद दोऽतस्तेन, मत्तपाणपत्थयण' ति भक्तपानरूप यत्प ध्यदन-दाम्बल तत्तथा, 'अगामिय' नि अग्रामिझ आमिको वा-15 अनभिलापविषयभूताम्, 'अणोहिय' ति अवियमाानलोषिसमतिगदन येना विद्यमानोहा वा, 'छिनाराय' ति यत्रच्छिन्नसार्थघोषायापाता, 'दहिमद ति दीर्घमागी दीपकाला वा, 'फिण्ड किण्होमास' इह यावत्करणादि दृश्य-'नील नीलोभास हरिय हरिओमास' इत्यादि, व्यारया चास्य प्राग्वत्, ‘महेंग धम्मीयम महातमेक व मकि, 'वप्पुओ' चिवपि 20 शरीराणि शिखरापलिया, 'अभुग्गयाओ'त्ति अभ्युदगतान्यमोहतानि वोच्चानीत्यर्थ, अभिनिसढाओ' ति अभिविधिना निगता सदा- नवयवरूपा केशरिस्क घसगवद् येपा तान्यभिनि शानि, इद च तेषा 7+ . । उधगत स्वरूप अथ नियगाह- "तिरिय सुसपग्गहियानोति सुसपाही । तानि' सुभदनानि नानिम्तिीणानीत्यय , अध फिभूनानि ! इत्याह-'अहे पन्नगद्धरूपाओ'त्ति सोचम्पाणि यादृश पनगस्योदरच्छिन्नस्य पुच्छत ! ऊर्थीहतमद्वमधो विम्नीणमुपर्युपरि चानिरक्षण भरतीत्येर रूप येषां तानि तथा, पनगार्द्धरूपाणि चवणादिनाऽपि भवन्तीत्याह- पन्नगद्धसठाणसठि याओ'ति भावितमेव। 'ओराल उदगरयण आसाइस्सामोति अस्था यमभिप्राय -एवविधभूमिगत्ते ग्लिोदक भवति वल्मीके चावश्यभाविनो गर्ता , जत शिखरभेदे गर्न प्रको भविष्यति तन च जल भविष्यतीति, 'अच्छ' । ति निमल, 'पत्थ' ति पथ्य-रागोपशमहेतु , 'जच्चति जात्य सस्काररहित, 10'तणुय' ति तनुक सुजामि यथ', 'फालियवण्णाभ' ति स्फटिकवण- पदाभा यस्य तत्तथा, अत एव 'ओराल ति प्रधानम्, 'उदगरयण' ति उदा मेव रत्नमुदररत्न उदकजाती तस्योत्कृष्टत्वात्, 'वाहणाई पज्जति' ति बलादिवाहनानि पाययति, 'अच्छ' ति निमल, 'जच्च' ति अगानिम, 'तापणिज्ज' नि तरपनीय तापमह, 'महत्य' ति 15 महाप्रयोजन, 'महग्य' ति महामूल्य, 'महरिहं ' ति मइता याग्य, विमल' ति विगताग तुकमल, 'निम्मल' ति स्वाभाविस्मरहित, नित्तल ति निस्तरमतिवृत्तमित्यर्थ , 'निकल' ति निपल नासादिरलदोषरहित, "यहर रयणनि पन्नाभिधानरत्न, हियकामए ति इह हित अपायाभाव , 'सहकामए' त्ति सुस-आनन्दरूप, 'पत्थकामए' ति पध्यमिव पथ्य-आनन्दकारण वस्तु, 'आशुकपिए' ति अनुस्म्पया चरतीत्यानुमम्पिक , 'निस्मेयसिए । नि 20 नि श्रेयस य माथमिच्छनानि नै श्रेयसिक', अधिकृतगीणजस्थतिरव गुणे फैथियुगपयोगमाइ -'हिए' त्यादि, 'त होउ अाहि पज्जतणे त्ति, तन- तस्माद् भवतु अर पयाप्तमित्येते शदा मतिषेधवाचावेनकार्या आत्यन्तिमतिरपतिपादनाथमुक्ता, 'णे' तिन-अस्माक, 'सउपसागा E पञ्चटश गोशालकाय शतरम् 55 यावि चि इइ चाराति मम्भावनाथ , 'उग्गरिस' नि दुर्जरविष, चदविस' सिंदकनर हायस्थ झागिति यापकदिष, घोरविसति परम्परया पुरुषसहस स्यापि इननसमर्थविष, 'मानिस ! ति जम्बूद्वीपयमाणस्यापि देहस्य यापन- समयविपन्, 'सबकायमहाकाय' ति कायान् शेषाहीनामनिवान्नोऽनिकायोऽन एव महाकायस्तत कर्मधारय , अथवा जतिकायानां मारे महामायोऽतिकाय 5 म्हागराऽनस्त, 'मसिमूसाकालग तिमी-जल, मूषा च- सुरणादि तापनभाननविगोरस्ते इन कालको य स तथा त, 'नयगविसरोसपुण्ण' ति उपनविण-दृशिविपण गेषेण च पूर्णो य स तथा तम्, 'अजगपुजनिगर- न्यगास 'ति अअनपुभाना निकरस्येव प्रकाशो-दीप्तिर्यस्य स तथा त, कालवणवमुलमिह तु दीप्तिरिति न पुनरुक्ततोत, 'रत्तच्छति रक्ता-10 'जमरजुयर चचल चलंतजीह ' ति, जमल-सहवति, युगल-द्रय, चञ्चल पथा भात्येर चलत्यो - अतिचपर योनिद्वयोर्यस्य स तथा त, प्राकृतत्वाचे प प्रमास , 'घरणितट पेणिभूय ' ति धरणीतलस्य घेणीभूतो-यनिताशिग्स करच विशेष इत्र य कृष्ण-दीर्घत्वरणपश्चाद्भागत्वाईमाधात् स तथा नम्, 'उक्कडपुडकुडिलजडुए कालदरियडफडाडोवकरणदच्छ ' ति 15 उत्कटो बलवताऽ येनाध्वसनीयत्वात्, स्कुटो-यस्त प्रयत्नविहितत्वात्, कुटिलो-नम्नत्स्यरूपत्वात्, जटिल -कन्यदेशे केशरिणामियाहीना कमर- सद्भावात्, शो निष्ठुगे बरवत्वात्, विक्टो-विस्तीर्णा य फटाटोप फगासरम्भस्तत्करणे दक्षो य स तथा त, 'रोहागरधम्ममाणधमधमेत- घोस' ति रोहस्येवाकरे ध्मायमानस्य-अमिना ताप्यमानस्य घमघमाय 20 माना-धमधमेतिवर्ण यक्तिमिनोत्पादयन् घोष -शब्दो यस्य स तथा तम्, 'अणागलियचडति-वरोस' ति जनिगरित-अनिवारितोऽनाकलितो साप्रमेयश्चण्ड तीवो रोपो यस्य स तथा त, 'समुहियतुरियचपल धमत पनि शुनो मुख श्वमुख तस्येवाचरण श्वमुखिका-कोरेयकस्थव . 56 श्रीमद्भगवनीसूनम भपणे ता त्वरित च चपरमतिचटुरतया धमन्त-शब्द कुअन्तमित्यथ , 'मरसरसरसरस्स' ति सर्पगनेरनुकरणम्, 'आइच्च निस्शाय'त्ति आदित्य पश्यति दृष्टिलक्षणविषस्य तीक्ष्णतार्थ, 'सभडमत्तोवगरणमायाय' ति मह भाण्डमारया- पणितपरिच्छदेन उपरणमानया च येते तथा, 5'एगाच' ति एका एवं आइत्या-आइनन महारो यन भस्मीकरण तदेकाहत्य तद्यथा भवत्येव, कथमिव ? इत्याह - 'कूडाहच्च' ति कृतस्या- पापाणमयमारणमहायस्येवाहत्या-आहनन यत्र तत् कृाहत्य तथथा भवतीत्येव, 'परियाए । ति पयाय. -अवस्था, 'कित्तिपण्णसद्दसिरोग' त्ति, इह बद्ध यारया- सदिग्यापी साधुवाद कीर्ति, एकदिर यापी वण, 10 अर्द्धदिग्व्यापी शब्द, तत्स्थान एक श्लोक शातियावत्, 'सदेवमणुयासरे रोए'ति सह दवेमनुजरसुरव यो रोका-जीवलोक स तथा तन, 'पुपति' तिवन्ते मत्ति, 'प्लुइगती ' इति वचनात्, ‘गुपति । 'गुप्यन्नि' व्याकुलाभवन्ति, 'गुप याकुलत्वे ' इति वचनात्, 'थुवति' त्ति कचित्तन 'स्तूयन्ते अभिष्ट्रयन्त -- अभिन यन्ते, वचित् परिभमनी दृश्यते, “यक्त 1. चेतदिति, एतदेव दशयति- -' इति खल्वि'त्यादि, इतिशब्द परयात गुणानुवाइनार्थ , 'त' ति तस्मादिति निगमन, 'तरेण तेएण' नि तपोजन्य तजस्ता एस का तेन ‘तजसा तेजोलस्यया, 'जहा या वालेण' ति यथैव ।याल्न' भुजगन, सारक्वामि' ति सरक्षामि दाइभयात्, 'सगोवयामिति सगोपयामि क्षमस्थानमापणन ! (सू ५४७-८९) 20 सू ५५० • परावृत्तपरिहार । 'पभुति प्रभविष्णुर्गोशालको भस्मराशि कतुम् । इत्येक प्रश्न , प्रभुत्व च विधा-विषयमानापेक्षया तत्करणतश्चति पुन पृच्छति-'पिसए' मित्यादि, अनेन च प्रथमो किस , 'समत्येण मित्यादिना तु द्वितीय इति, पश्चदश गोशालकाग्य शतरम 57 'पारितारणिय' नि पारितापनिकी कियो पुन कुर्यादिति । 'अणगाराण' नि सामा यसाधूनां, 'खतिश्पमति क्षान्त्या-बोधनिमाण क्षमन्त इनि शान्तिक्षमा, राण' ति आचार्यादीनां वय मुतपर्यायविराणम् । 'पडिचोयणाए 'चित मतपतिकूला चोदना कर्नयमोताहना प्रतिचोदना तया, 'पहिसाहरणगए,' ति त मत प्रतिकूलतया विस्मतार्थस्मारणा तया, किमुक्त भवति ?-'धम्मिएण' मित्यादि, 'पडायारेण ति प्रत्युपचारेण मत्युपकारेण वा, 'पडोयारेउ ति । प्रत्युपचारयतु ' मत्युपचार करोतु, एक प्रत्युपकारयतु बा, मिच्छं मिपटियन्ने ति मिथ्यात्य रच्थ्य या-अनायत्व विशेषत प्रतिपम इत्यर्थ । 'सुटुण' नि उपालम्भवचनम्, 'आउसो 'क्ति हे आयुष्मन् !- चिरमशस्त जीवित ! 'कासा ति काश्यपगानीय 110 'सत्तम पउपरिहार परिहरामिति सप्तम शरीरान्तरमाश कोमीत्पथ , 'जवि आइ' नि येऽपि च, 'आइ ' ति निपात , 'चउरासीद महाक्प्प सयसहस्साइ' इत्यादि गोशालमसिद्धान्ताय स्थाप्यो, युद्धरम्यनारयात- आह घ चूर्णिकार' ~ सतिद्धत्ताओ तस्स सिद्धतस्म न लक्खिज्जइ' ति, तथा पि शब्दानुसारेण मिश्चिदुच्यते- चतुरशीति 15 महाकल्पशतममाणि सपयित्वेति योग, तन रल्या - कालविरापा, रोकप्रसिद्धा अपि भवन्तीति तव्यवच्छेदाथमुक्त महाकल्या यश्यमाण स्वरूपास्तषा यानि शतसहस्राणि-रक्षाणि तानि तथा, 'सत्त दिव्ये' ति सप्त 'दिव्यान् । देवभवान्, 'सत्त सचूहे' ति सप्त सयूथान-निकायविशपान्, सत्त सनिगभे ति मशिग न्- मनुष्यगमनसती, एत च तमतन 20 मोगामिना ससान्तरा भवन्ति वक्ष्यति चैवैतान् स्वयमपति, 'सत्त पउदृपरिहारे । ति सात शरीरातरमवशान्, एते च सप्तमसनिभानन्तर मीणावसया , तथा 'पचे पादाविद सभाध्यत, पच कम्माणि सयसहस्साइ ति मणि-कमविषय कर्मणामित्यथ, पञ्च शतसहस्राणि रक्षाणि, 'तिति (वात, - 58 नामभगतासून य कम्मसि' ति त्रीश्च कर्मभेदान्, 'खपत्त' ति क्षायित्वा' अतिमाह्य । 'से जहे त्यादिना महाकल्पपमाणमाह, तर से जहा व ति महाकल्प- भमा पाक्योपन्यासाथ , 'जहिं वा परस्यिय' ति यर गत्वा परि- सामस्त्येन उपस्थिता-उपरता समाप्ता इत्यथ, 'एस ण अद्धति 5 गढ़ाया मार्ग, एपण गगापमाणेण' ति गङ्गायात मागस्य चाभेदाद्गगा प्रमाणेनेत्युक्तम्, 'एवामेव' ति उक्तव मेण, 'सपुष्पावरेण । ति सह एवण गडादिना यइपर महागङ्गादि तात् सपूर्वापर तेन भावप्रत्ययलोपदर्शनात सपूवापरतयेत्यर्थ । 'तासि दुविहे' इत्यादि, तासा गङ्गादीना गङ्गाई- गनपालु काकणादीनामित्यर्थ , विविध उद्धार उद्धरणायदैविध्यात्, 'सुहम- 10 घोदिक्टेयरे चेय' ति सूस्मबोन्दीनि सूक्ष्माकारीणि कलेवराणि-असवयात सण्डीकृतवालमाषणरूपाणि यनोद्धारे स तथा, 'वायरवोदिकलेपरे चेच' नि [प्रथापम् १४० ] दादरवान्दीनि-बागकागाण फलेवाणि पारणस्पाणि यन तथा, 'ठप्पे' चि न “याख्येय , इतरस्तु व्याख्येय इत्यर्थ , ' अवहाय' ति अपहाय-त्यक्त्वा, ‘से को? ति स कोठा- 15 मङ्गासमुदायात्मक, 'सीणे' ति क्षाण, स चावशपसद्भावेऽम्युच्यते, यथा क्षीणधान्य काष्ठागारमत उच्यते, 'नीरए' ति नारजा स च तमूर्मि- गरजमाम मभावे उच्यते इत्याइ-'निहनि निर्लर, भूमिभित्त्यादिशशिष्ट निकनालेपाभावात, किमुक्त भवति ! 'निहिए ति निष्टिन'- निरवयवीकृत इनि, 'सेत्त सरे'ति अथ तत्तात्कालखण्ड सर सर स भवति 20 मानससञ्ज्ञ सर इत्यथ, 'सरम्पमाणे' ति सर एवोशलपण प्रमाण- पश्यमाणमहाकल्पादेर्मान सर प्रमाग, 'महामाणसे' त्ति मानसोतर, यदुक्त चतुरशीतिमहारपरातसहसाणानि तत्परूपितम्, अथ समाना दिव्यादीनां अस्पण'इ-'अणताओ सहाओ' तिजनन्नविसमुदायरूपाभिकायात्, चय चइत्त' ति व युवा-ध्यान त्वा, चयदा देइ, 'चहत्त'ति पञ्चश गोशालकारय शताम् 59 त्यक्त्वा, 'उरिले ति उपरितनमध्यमाधस्तनानां मानसानां सद्भावात् तद य यवच्छदायोपरिनन इत्युक्त, 'माणसे' त्ति गङ्गादिमरूपणत मागुक्त स्वरूपे सरसि सर प्रमाणायुष्पयुक्त इत्यर्थ , 'सजूहे' त्ति निकायविशपे दव, 'उव- वज्जइ' त्ति प्रथमो दियभव सजिगभसङ्ख्यासूनाक्त एव, एव निषु मानसेषु सयूथप्नायसयूथसाहितेषु चत्वारि सयूथानि त्रयश्च देवभया , तथा 'मानसोत्तरे'। त्ति महामानस पूवातमहाल्पपमितायुपवति, यच्च प्रागुरु चतुरशीति महों कल्पान् शतसहस्राणि क्षपयित्वति तत्प्रथममहामानसापक्षयेति द्रप्रय, अन्यथा विषु महामानसषु बहुतराणि तानि स्युरिति, एतेषु चोपरिमादिभेदात् निपु मानसोत्त रपुनीण्यव सयूथानि नयश्च देवभवा , आदितस्तु सप्त सथानि पट् च देवभवा , सप्तमदरभवस्तु ब्रह्मलोक, स च सयूथं न भवति, सूने सयूथत्वेनानभिहितत्वादिति, 10 'पाइणपढीणायए उदीणदाहिणवित्थिपणे' ति इहायामरिष्कम्भयो स्थापनामानत्वमग त य, तस्य प्रतिपूर्णच द्रसस्थानसस्थितत्वेन तयास्तुल्य त्वादिति, 'जहा ठाणपए ' ति ब्रह्मलोस्वरूप तथा वाच्ये यथा 'स्थान पद 'मज्ञापनाद्वितीयप्रकरणे, तच्चैद 'पदिपुण्णचदसठाणसठिए अचि मालीभासरासिप्पभे' इत्यादि । असोगवडेंस' इत्यत्र यावत्करणात् 15 'सत्तियण्णनदसएचपगर.सएचूयरडेंसएमझे यबमलोयरडेसए' इत्यादि दृश्य, 'सुकुमालगभदए' ति सुकुमारक्श्चासा भद्रश्च-भद्रमूर्ति रिति समास , र कारककारी तु स्वार्थिकाविति, 'मिउद्धरकुचियकेसए' त्ति मदर कुण्डर मित-दभादिकुण्डलकमिव कुश्चिताश्च केशा यस्य स तथा, 'महगडतलकण्णपीढए' ति मृगण्डतले कणपीठके-कर्णाभरणविशषो 20 यस्य स तथा, 'देवकुमारसप्पमए ' ति देवकुमारवत्सयभ देवकुमारममानपभो पा य स तथा, शब्द साथिक इति, 'कोमारियाए पज्जाए 'चि कुमारस्येय कोमारी मव कीमारिकी तस्यो मन याया विषयभूनायो, ससयान-बुद्धिं मनिटभ इति योग , 'अपिद्धकण्णए चेय' ति कुश्रुतिशगस्याऽसिद्धार्ण 10 GO श्रीमद्भगवनीमूत्रम् -अयुत्पन्नमति रित्यर्थ । 'एणेज्जम्से' त्यान, इणकादय पश्च नामती. भिहिना दी पुनरन्त्यो पितृनामसरिताविति । 'अल थिर नि अत्यर्थ स्थिर विवक्षितकार याववस्यस्थायि सात, 'धुन' ति ध्रुव तद्गुणाना ध्रुवत्वात्, अत एव 'धारणिज्जति धारयितुं योग्यम्, एतदेव भारयितुमाह-सीए' 5 इत्यादि, एवभून च तत् कुत । इत्याह-'थिरसघयण' ति अविघटमान- सहननमित्यर्थ, 'इतिकटु' त्ति — इतिहत्ता' इनिहतास्तरनुपाशामति । (सू ५५०) सू ५५१-५६ स्तेनहटान्त । आक्रोश । तेजोलेश्यामोचनम् । गोशालतेजोलेश्याशक्ति घरमाष्टकमयपुलागमध। सम्यक्त्वोत्पादः । तदुपासककृत नीहरणम्। 'गड व 'त्ति गत श्वभ्र, 'दरि' ति गगानगदिश्तभूविवरविशेष, 'सुग्ग ति दुसगम्य वनगहनादि, 'निन्न' ति निम्न शुष्कसर प्रभृति, पियव" त्ति प्रतीत, सिमति गतपाषाणादि याकुलम्, 'एगेण मद' ति एफेन महता' 'तणसूएण य' ति तणसून ' तणायण, 'अणावरिए त्ति अनारनो साशावरणस्याल्पत्वात 'उबल्भसि'ति उपलम्भयसि दशयसीत्यर्थ, 'तमा एव गोसाल' ति इह दुविति शेप, 'मारिहास गोसार ति इह चत्र कमिति शेष , 'सच्चे ते सा छाय' नि सकते छाया न्यथा दर्शयितु मिष्टा छाया प्रति । 'उच्चारया ति असमप्रसाभि , 'आउसणा" ति मतोऽसि त्वमित्यादिभिवचन , 'लामोशयति । शपति, उद्धसपा नि 20 दुष्कुलीनेत्यादिभि कुराभिमानपातनाथर्वचन , उद्धसेइत्ति कुनायभिमाना दय पातयताव, 'निम्भवणाहिं' ति न त्वया मम प्रयोजनमित्यादिमि परुषवचने, 'निभई 'ति नितरा दुश्मभिधत्तं, 'निडोटणार्हति त्यनास्मदीयास्नीकरारदारनित्यादिभि, 'निच्छोडे। ति प्राप्तमर्थ 15 पञ्चदश गोशालकास्य शतरम् 61 स्यानयनाति, नसिक्याइ 'त्ति नष्ट स्वाचारनाशात्, 'सि' भरसि त्व, 'क्याइ'त्ति कदाचिदिने वितमार्थ , अहमद म य यदुत नष्टस्त्वमसीति, 'विणटेसिति मताऽसि, 'भट्टोसि' ति म्राऽसि- सम्पद व्यपेनाऽसि त्व धर्मग्यस्य योगपयन यागात नविनम्रमोऽसीति, 'नाहि ते' ति नैरत। 'पाईणज्ञाणरए' ति प्राचीनजानपद प्राच्य इत्यथ , 'पचारिए 'ति प्रवाजित शिष्यत्वनाभ्युपगत , 'अभुगमा परन्न' ति घचनात्, 'मुडाविए ति मुण्डितस्य तस्य शिष्यत्वनानुमननात्, 'सहाविपत्ति प्रतित्वन सेषित बनिसमाचारममाया तस्य भगवतो तुमूनत्यान, 'सिकमानिए' ति शिक्षितस्लमोलश्याग्रुपदशदानन , 'बहुस्सुइकए' त्ति नियतिवादारिपनिपानि हेतुभूतत्वान्, 'कोसरजाणपए। ति अयाध्यादेशात्पन | 'याउकल्यिाइ 10 चत्ति यातोत्कलिकास्थित्वा २ यो वातो वार्ति सा बानोत्पलिका, 'चायमहरि याइव' त्ति मण्डलिकाभिर्या वानि, 'सलसि या' इत्यादी तृतायाथ सप्तमी, 'आररिज्जमाणि' ति स्खल्यमाना, 'निवारिज्जमाणि' ति निवत्त्यमाना, मोफमदत्ति न रमते-न प्रभाति, 'नो पक्कमइ'त्ति न प्रक्षण अमते, • अचिताचिंति अञ्चिते-सद्गत अश्चितन वा-सद्गतन दर्शनाश्चि-पुन 15 मनमञ्चिताश्चि , अथवा श्या-गमनेन सह आश्चि-आगमनमश्चयाश्चिगमागम इत्यथ , ता करानि, 'असाइट्टे ति 'अन्यापिष्ट' अभिन्यात , 'सुत्थि' त्ति सुहस्ताा सुहस्ती, अहप्पहाणे जण' ति यथाप्रधाना जनो यो य प्रधान इत्यर्थ , 'अगणिझामिएर त्ति अग्निना ध्मातो-दग्पो प्यामितो था इपग्ध, 'अगणि झुसिए' त्ति अमिना सवित सपितो वा, 'अगणिपरिणमिए' ति अभिना 20 परिणामिन --पूवस्वभावत्याजनेनात्मभाव नीत, ततश्च हनतेजा घुल्यादिना गनतजा, कचित् स्वत एव नष्टतेजा, चिद यस्तीभूततेजा प्रश्तेजा, चित् स्वरूपम्रतेना-ध्यामतेजा इत्यर्थ , लुप्ततेगा क्वचित् अभूततेजा, 'लुप्ल . , - 62 श्रीमद्भगवतासूत्रम् च्छेदने मिदिर धीभावे । इतिवचनात्, रिमुक्त भवति! 'रिणतेए'- विननेजा नि सत्तालभूनतेजा, एकाथा ते शब्दा, 'छदेण' निसाभिमायण यथेष्टमित्यथ , निप्पपमिणवागरण' ति निर्गतानि स्पानि प्रश्न याकरणानि यस्य स तथा तम् । रुदाइ पलोएमाणे ति दीर्घा दृर्दिश मक्षिपमित्यर्थः, मानधनाना इतमानानां रक्षणमिद, 'दाहुण्डाइनीसासमाणे ति निश्चामा निति गम्यते, 'दार्टियाए रोमाइ'नि उत्तरीठस्य रोमाणि, 'अवहु (अपई' ति कृकाटिका, 'पुयलिं पप्फोडेमाणे 'त्ति 'पुततटी' पुतपदेश मस्फोटयन, 'विणिक्षुणमाणे ति विनिधुन्वन्, 'हाहा अहो ओटमस्सीतिकट्ठ' तिहा हा अहो हतोऽहमस्मीति कृत्वा-इति भाणत्वत्यथ, अबकृणगहत्थगचि आम्रफलहस्तगत, स्वीयतपस्तेजोजनितदादोपशमनार्थमामास्थित पामिति 10 गानादयस्तु मयपानहता विकास समरसेया', 'मट्टियापाणपण ' ति मनिकामिश्रितजलन, मत्तिकाजल सामान्यमयस्त्यत आह --'आयवणि ओदएपण ति, इह टीशयारया-आनन्यनिकोदर कुम्भकारस्य यद्भानने स्थित तेमनाय ममिश्र जल तन। 'अलाहि पज्जते' ति जलम् ' जत्यधे पर्याप्त , शक्तो धातायति योग, घातायेति हननाय तदाभिननसापेक्षया, 'वहाए ति वधाय, एतच्च तदाभितस्थावरापेश्या, 'उछायणयाए" त्ति उच्छादनताय सचतनाचतनतद्गतवस्तृच्छादनायेति, एतच्च मकारान- रेणापि भवतीत्यग्निपरिणामोपदशनायाह -'मासीफरणयाए' नि। भाव, चजस्त'त्ति वजस्य-जवयस्य, वनस्य वा मद्यपानादिपापस्येत्यर्थ , 'चरमे त्ति न पुनरिद भविष्यतातिकत्ता चरम, तन पानकादीनि चारि -20 स्वगतानि, चरमता चैपा सस्य निवाणगमनेन पुनरकरणात्, एतानि च किल निर्वाणकाने जिनस्यावश्यम्भावीनीति नास्त्यतेषु दोष इत्यस्य तथा नाहमेतानि दाहोपशमायापसवामीत्यस्य चार्थस्य प्रकाशनार्थत्वादस्यपच्छादनाथानि भवन्ति, . पश्चदश गोशालकास्य शतकम् 63 सुष्करसवकार्दानि तु नाणि बाह्यानि मतानुपयागऽपि चरमसामान्या- जनचिचरअनाय चरमाण्युतानि, जनेन हि त सातिशयत्वाञ्चरमता श्रद्धीयते, ततस्तै सहोक्तानामानणपानमादीनामपि सा सुश्रद्धया भवत्विति बुद्धयेति, 'पाणगाइ नि जलविशेषा मतियोग्या, 'अपाणयाइ' ति पानक अदृशानि शीतलत्वेन दाहोपशमहेतव, 'गोपुट्टए' ति गोपवायत्पतिन, 5 'हत्यमदिय' ति हस्तन मर्दित-मदित मलितमित्यथ , यथतदेवान यनिको दक, 'थालपाणए' ति स्थाल-न(पान!) तत्यानकमिष दाहोपशमहेतुत्वान् स्थालपानकम्, उपर क्षणत्वादस्य भाजनान्तरमहाऽपि दृश्य , एवमन्यान्यपि नगर, त्यक्-उदी, सीम्बरी-वरायादिफरिमा, 'सद्धपाणए 'त्ति दवइस्तस्रश इति, दाथालय ' ति उका स्थारक, 'दावारग' ति उद्धारक, 'दाउभग' 10 त्ति इह कुम्भो महान् , 'दाक्रस' तिकरशस्तु लघुतर , 'जहा पभोगपए' ति प्रज्ञापनायो पोडशपदे, तर चेदमवमभिधायते-'मरवा फणस या दालिम या' इत्यादि, 'तरुणग' नि अभिनवम्, 'जामग' ति अपरम्, आसगसि'त्ति मुख, आवीलेइति 'आपीडयत्' इपत्मपीडयेत्, प्रापत इह यदिति शप, 'कल' त्ति कायो-धान्यविशेष, सिंचलि तिपक्षविशप 115 'पुढविसथारोवगए' इत्यम वत्तत इति शेषो दृश्य , 'जे ण ते दे साइज्जइति यस्तौ दी 'स्वदत ' अनुमन्यते, 'ससि ति स्वक स्वर्गीय इत्यथ ।'इल' ति गोवारिकातृणसमानाकार कीरकविशेष , 'जाय सचन्नू' इति इह यावत्करणादिदं दृश्य-'जिणे अरहा क्यली' ति, यागरण 'ति' प्रश्न, 'धागरित्तए' ति मष्ट, 'पिरिए 'ति' यसक्ति ' सआत यसरी 'विडे' चि बीडा अस्यास्तनि बीड -रज्जाप्रपवानित्यथ , भूमाथऽस्त्यथ प्रत्ययोपादानात्। 'एगतमते 'त्ति विजने मूविभागे यावदयपुलो गोशालका न्तिके नागच्छतीत्यथ , 'सगार' निसङ्कत्तम्', अयपुलो भवत्समीपे जाग मिष्यति ततो भवानाप्रणिक परित्यजतु सवतश्च भवत्ववस्पमिति । 'त नो सलु , 20 4 श्रीमद्भगवतीमूत्रम् एस अबणए ति तदित सिमास्थिफ न भवति, यद्धतिनामयल्स्य यद् भवती अमास्थितया पिकन्पित,रितु इद पद्भवता दृष्टतदासत्वर, एतदेवाइ 'अपचोयए ण एसे' नि, इय य निर्माणगमनकाले आयीयेव, यपानकवादस्या इति । तथा हलासस्थान यत्पृशमार्मात् तयमाह-घसी- मूल सठिय ति, इद च दशीमूल सस्थितत्व तृणगोवालिकाया लोकमतीत मति, एतापत्युक्ते मदिरामविदलितमानिरसा स्मादाद-वीण वाटि रे धीरगा २१ एतदेव सिपपत्नयति, एतचो मादरचन नम्योरामास्य शाचतोऽपि न म्पलीफकारण जात, यो हि सिद्धि गच्छति स चरम गेयादि करोतीत्यादिवचनैविमोदितमतित्वादिति । 'हसलरखण' ति हसस्वरूपं शुक्र मित्यथ , इसचिह्न चेति, 'इडीसमारसमुत्रएण' कया ये सत्कारा 10 पूजाविशेपास्तेषां य समुदय स तथा तेन, अथवा शद्धिसत्कारसमुदयरित्यर्य , समुदयश्च मनाना सई, 'समगधायए' ति अमणयोलजालेण्यापरण- घातदानात घातदो धातका था, अत एव श्रमणमारक इति, 'दाहयकताए। त्ति दाहोत्पत्त्या, सुवेण' ति वकरज्या, 'उहुभह' त्ति अवठी यत- निष्ठी यन, कचित् 'उच्दुमह' चि दृश्यते तर चापशब्द किञ्चिक्षिपतेत्यर्थ, 15 ''आक्दृविका ति आकपकषिकाम्, 'पूयासकारविकिरणयाए। ति पूजासत्कारयो पूर्वपाप्तया स्थिरताहेतो यदि तु ते गोशालकसरिस्य विशिप्रपूजा न कुर्वन्ति तदा रोको जानाति नायं जिनो बम्ब, न चैने मिन शिष्या इत्यवमस्थिरी पूजासत्कारी स्यावामिति तया स्थिकिरणार्थम्,'अब- गुणति' ति अशवृण्वन्ति । (सू ५५१-५५६) सू ५५७-५९ सिंहानीतीपघाबाहाम । सर्वानुभूतिसनक्षर- सायुगति । गोशार कगतिमिल वाहनमनश्च । साण(ल) कोटप नाम चेइप होत्या वण्णओ'नि वदणको 65 - - पञ्चदश गोशालकास्य शताम् वाच्य स च 'चिराईए' इत्यादि । 'जार पुढविसिलापट्टओ' ति पथिवीशिलपट्टकषणक यावत्, स च-'तस्स ण असोगवरपायनस्स हेट्ठा इसिंवधीसमहरीणे' इत्यादि, 'मालुयाकच्छए 'त्ति मालुका नाम एका स्थिका वक्षाविशेषास्तषां यत् कक्ष-गहनं तत्तथा। पिउले । ति शरीर यापक- त्यात्, 'रोगायके' ति रोम-पीडाकारी स चासादातश्च-च्याधिरिति 5 रोगातङ्क, 'उज्जले ति उज्वर पीडापोहल्क्षणविपभरेशेनाप्यकलङ्कित , यावत्करणादिद दृश्य-'तिउले' नीन् ---मनोवाकायलथणानर्थास्तुल यति- जयताति नितुन , पगाढे 'प्रकर्षवान्, 'कक्कसेकशिद यमिवानिट इत्यर्थ , 'कडुए। तथैव, 'बडे। रोद, 'तिव्ये । सामान्यस्य सगितिमरणहतु , 'दुकावे । ति दु खो दु खहेतुत्वात्, 'दुग्गे' ति क्वचित् तब च दुगमिपान 10 भिवनीयत्वात् , विमुक्त भवति ?- 'दुररियासे' ति दुरधिसह्य -~-सोहम शक्य इत्यथ , 'दाइयकतीप' ति दाहो व्युत्कान्त स्वार्थिकक्प्रत्यये दाहज्यु क्रान्तिक , 'अधियाइ ति अपिचेत्यम्युच्चय, 'आई' ति वाक्यालङ्कार, 'लोहियवच्चाइ पि ति रोहितवर्गास्यपि-रुधिरात्मक पुरीपाण्यपि करानि किमन्येन पीडावर्णनेनेति भाव , तानि हि क्लिात्यन्त 15 वेदनोत्पादके रागे सति भवन्ति, 'चाउव्यण्ण' ति चातुर्वण्र्य-ब्राह्मणादि रोक, 'झाणतरियाए 'ति एकस्य ध्यानस्य समाप्तिर यस्यानारम्भ इत्येषा ध्यानान्तरिका तस्या, 'मणोमाणसिएण' ति मनस्यव न बहिर्वचनादिभि रप्रकाशितत्वात् यन्मानसिकं दुख तन्मनोमानसिक तेन, 'दुघे कोया' इत्याद भूयमाणमेवार्थ कचिन्मन्यन्ते, अन्ये त्वादु' -पोतक - पक्षिविशेष 20 स्तद् य फले वर्णसाधात् ते कपाते-कूष्माण्डे, ह्रस्व कपोते कपोतके ते च ते शरीरे वनस्पतिजीवदेइत्वात् कपोतकशरीरे, अथवा कपोतकशरीरे इव धूसरवर्णसाधम्यादेव कपोतकशरीरे कूष्माण्डफले एव ते उपसस्कृते-सस्कृते, तेहिं नो अट्ठो 'ति बहुपारत्वात्, 'पारियासिए' ति परिवासित उत्पनो यस्य स, - He- . 66 श्रीमद्भगवतीसूत्रम् बस्तनमित्यथ , ' मज्जारकडए' इत्यादरपि केचित् भूयमाणमेदाथै म यन्ते, अन्ये त्वा~मानारोवायुविशेषस्तदुपशमनाय कृत-सस्कृत माजोर कृतम्, अगर त्या -मारी~-विरालिकाभिधानी वनस्पतिविशेषस्तेन मृत-भावित यत्तत्तथा, किं तत् । इत्याइ---'कुकुटकमासकर बीजपूरक कराहम्, 'आदराहिति निरवयत्यानिति । 'पत्तग मोएहत्ति पान- पिठाक विशेष मुञ्चति शिका उपरिक्त सत्तस्मादवतारयतीत्यर्थ', 'जहा विजयस्स' ति यथा इहेव इह शते विजयस्य वसुधारायुक्त एत्र तस्या अपि वाच्यमित्यथ , 'दिलमिरे' यादि 'चिले इव । रन्धे इव ‘पनगभूतन सपकल्पन, 'आत्मना करणभूतेन, तसिंहानगारोपनीतमाहा 10 शरीरकाया प्रक्षिपतीति, 'हे' तिहट । निापि, 'अरोगे' ति निप्पीड , 'तहेतु जाए'ति'तु । नोपवान्, 'हा । विस्मित , कस्मादवम् ? इत्याह--'समगे' इत्यादि, 'तुति नीरोगो जात इति। भारागसो यति भारपरिमाणत , भारश्च-भारर पुरुषोहनीयो विशतिपलशतपमाणो बेति, 'छुभागसो यति कुम्भो-जघन्य आटकाना पटया, मध्यमस्त्वशीत्या, 15 उपट पुन शतनति, “पउमयासे य रयणपासे य वासे वासिहिद' सिप । अधिवर्षियति, फिविध ? इत्याह -'पद्मदा पावर्षरूप , एवं रत्न इनि,' सेए ' विश्वेत , कथमूत ? - 'साबदलपिमलसनिगासे' ति शस्य यल - खण्डं तल पातप विमल तत्सनिकाश - सदृश य स तथा, मातायाशेष समास , 'आउसिहिइ' ति आमोशान् दास्यति, 20 निच्छोडेदिइति पुरुषान्तरसम्बन्धिनहस्ताद्यवयया कारणता ये श्रमणाला लतो रिपोजयिनि, 'निभत्येदिह' ति आमाशयनिरिक्तदुर्वचनानि दास्पति, 'पमाहिति भभार- भरणक्रियामारम्भ करिष्यति प्रभारयिष्यति, "उदहिर' चि आशयिष्यति, अथवा पमारिहिह' चि मारयिष्यति, 'उहवेदिर दि उपद्रवान् करिष्यति, आच्छिदिदि ति ईमान छेस्पति, गाल - पञ्चदश गोशालकास्त्य शतरम् 67 'पिच्छिदेहिद' ति शिशरण विवियतया पा सेत्स्यति, मिदिदिवति मसारयिष्यति पानापेसमेनत, 'अपहरिहिति अपहरिष्यनि-उदारयिष्यति, 'निनगरे करेहिह' ति 'निगरान्। नगरनिवान्नान् करिष्यति, राजस्म ध' तिरा यस्य था, राज्य प गमादिपदार्थसमुदाय , आहथ- " स्वाम्यमात्या राष्ट्र ध, कोशो दुर्ग पर मुहत्। सप्ताद्रमुच्यते राज्य, बुद्धिसत्वसमभयम् ॥१॥ राष्णदयम् तदिशेषा, स्न्तुि सर्प- जनपदेकदेश , 'विरमतु ण देवाणु प्पिया एयस्स अट्टस्स अकरणया ति विरमण फिर वचनायोपयामि स्यादत उच्यते- अरणतया- करणनिषधरूपतया। 'विमलस ति विमल जिन फिलोत्सपिण्यामे विशतितम 'समगाये दृश्यते, स पावसविणी चतुर्थनिनस्थाने माप्नोति तस्माचार्वाचीनजिनान्तरेषु बप सागरोपम 10 कोटयोऽनिकान्ता रम्यन्ते, अय च महापद्मो दाविशते सागरोपमाणामन्ते भविष्यतीनि दुखगममिद, अथवा यो दाशिते सागरोपमाणामन्ते तीदु त्सपिण्या भविष्यति तस्यापि 'विमल' इति नाम सभाव्यते, अनेकाभिधाना भिधेयत्या महापुरुषाणामिनि, 'पउप्पए' ति शिष्यसन्तान , 'जहा धम्म घोसस्स बण्णी ति यथा धर्मयोपस्य-एकादशशतैकादशोदेशका 15 भिहितस्य वर्णास्तथाऽस्य वाच्य , स च 'जाइसपने फुलसपने पल्सपने' इत्यादिरिति, 'रदचरिय' ति रथचर्या, 'नोल्लायेदियति नोदपिप्यनि-प्रेरयिष्यति, सहितमित्यादय एकार्था । (सू ५५७ - ५५९) सू ५६० गोशार कस्य ससारे भ्रमणम् । 'सत्यरझ' ति शत्रवध्य सन्, 'दाहवमतीए 'त्ति दाहोत्पत्या काल 20 कृत्वोति योग, दाह पुत्वान्तिको वा मूत्वेति शेष , इह घ यथोक्तकमेणवा- समिभृतयो रत्नप्रभादिषु यत उत्पदन्त इत्यसो तथैवोत्पादित , यदा- "अस्सपणी खलु पन्म दोश्च च सिरीसिवा तइय पक्खी। सीहा जात 68 श्रीमद्भगवतासून चउत्थि उरगा पुण पचमि पुरवि ॥ १॥ उठिं च इत्थियाओ मच्छा मणुया सत्चमि पुनर्वि।" [ असशिन खलु पथमा दितीयां च सरिसृपा तृतीया पक्षिण । सिंहा यान्ति चतुर्थी पञ्चमी पुन पथ्वीमुगा ॥ १ ॥ षष्ठीं च लियो मत्स्या मनुष्याश्च सप्तमी पृथ्वीम् । ] इति, सहचररिहाणाई । ति इह 5 विधानानि-भेदा, 'चम्मपणि' ति व गुलामभतीना, 'होमपक्रतीर्ण । ति हसणभतीना, 'समुग्गपरवीण' ति समुद्गकाकारपवता मनुष्यक्षेत्र बाहिर्तिना, विययपरवीण' ति विस्तारितपशवतो समयक्षनभहिवर्तिनामेवति, 'अणेगसयसहस्सखुत्ती' इत्यादि तु यदुक्न तत्सान्तरमबसेये, निरन्तरस्य पञ्चेयित्वलाभस्योत्पतोऽप्यष्टभवपमाणस्यैव भावात् , यदाह--'पत्रिंदिय 10 तिरियनरा सत्तटुभवा भवग्गहेण ' ति, [ पश्शेन्द्रियत्तिर्यमय सतारवा' भवमहणे ] इति जहा पन्नवणापए। ति प्रशापनाया प्रथमपदे, तब वेदमिद- 'सरडाण सल्लाण' मित्यादि, 'एगखुराण' ति अश्चादीना, 'दुखुराण ति गवादीनां, ‘गडीपयाण' ति इत्यादीना, 'सणहम्पयाण' ति सनखपदाना सिंहादिनखराणा, 'वच्छमाण' ति इह यावत्करणादिद 15 दृश्य- 'गाहाण मगराण पात्तियाण' इत्यन ‘जहा पनवणापप त्ति अनेन यत्सूचित तदिद-- 'मच्छियाण मसगियाण' मित्यादि, 'उबचियाण' इह याकरणादिद दृश्य - 'रोहिणियाण फुथूण पिवि लियाण मित्यादि, 'पुलाकिमियाण' मित्यर यावकरणादिद दृश्य - 'कुच्छिकिमियाण गइलगाण गोरोमाण' मित्यादि, 'रुस्खाण 20 ति वृक्षाणामेकास्थित बबीजाभेदेन दिविधाना, तमेगास्थिका निम्बामादय , पहुबीजा' - अस्थिकतिन्दुकादय, 'गुच्छाण' ति वृन्ताकीपभृतीना, याव करणादिद दृश्य-'गुम्माण लयाण वल्लीण पव्वगाण तणाण चलयाण हरियाण ओसहीण जलव्हाण तितर 'गुमाना नवमालिकापभृतीना- स्ताना पालतादीना, 'वल्लीनां । पुष्पफलाभितीना, 'पर्वकाणाम् । इश् , पञ्चश गोशालकाय शतक्म 69 . . प्रभतीना, 'तृणानां दर्भमादीना, 'वल्याना' तानमालदीना, एरितानाम् । अपगहात दुलीयादीनाम्, 'औषधाना' शालिगोधूमपभतीना, 'जल- रहाणा' कुमुदारीना, 'पुरणाण' ति उहणानाम्, आउायमभतिभूमी फाटानाम् , 'उस्सन च ण' ति बाल्यन पुन , 'पाईणवायाण । ति मनान, पाव करणादा दृश्य-पडीणवायाण दादिणवायाण मित्यादि,5 'सधायाण निमदस्तिमितवायूनाम्, 'इगाराण' इह यावरणादेष दृश्य-'जाराण मुम्मुराण अच्चीण' मियादि, तर च 'ज्वालगनाम् । अनलगम्बद्ध स्वरूपाणा, 'मुमुराण फुस्फुसदा मसृणाभिरूपाणाम्, 'अपिताम्' उनलापतिपदयारानामिति । गोसाण' ति रातिलानाम्, इह यानत्करणा दिद दृश्य - 'हिमाण महियाण' नि, 'पाओदयाण ति सताया-भूमौ 10 या युदा र तानि खातादनि, 'पुटगीण' ति मनिराना, 'सकराण' ति शरिकाणा, यावरणादिद दृश्य- 'धालुयाण उवलाण' ति, 'सूरकताण' नि मणिविशपाणा, 'बाहिं रारिपत्ताए । ति नगरपहियनिवश्यात्वेन, मान्तज पेश्याल्वेने यन्ये, 'अतोरारियताए, 'त्ति नगराम्यन्तरवेश्या बन, विशिष्ट वेश्या नेत्यय । (सू ५६ ) म् ५६१ दारिकामभ्यस्त्वरणयुता भगा दृढप्रतिपभवच । 'पविरूवण्ण सुक्केण । ति मतिरूपान । उस्तिन शुदान, भडकरढगसमाणे ' ति आभरणभाजनतु या आदेयेत्यर्थ, 'तेरफेश इन सुमगोपिय ' ति कला इय-तलाश्रया भाभनविशष सौराष्ट्रप्रसिद्ध , सा च सृष्ठ समाप पिया भवत्य यथा लठति ततश्च तेल हानि स्यादिति, 'चेल 20 पडा र सुमपरिगहिय ' ति चेर पडावत्-वसमा सुष्टु सपरिवत्ता (गहीता)- निरुपद्रवे स्थाने निशिता । 'दारिणिले असुरकुमारेस देसु देवताए उपजिहिइ ' ति विरापितामण्यत्वाद यथाऽनगाराणां 15 - - 70 श्रीमद्भगवतीसत्रम् पमानिविदापत्ति स्यादिति, यह 'दाहिणिहेतु नि प्राच्यते तत्तस्य भूकमत्वन दक्षिणक्षेनप्पेयोत्पाद इतिहरा, 'अतिराहियसामण्णे' ति आराधितचरण इत्यथ, आराधितचरणना चेह चरणप्रतिपत्तिसमयानगरम्य मरणात याभिरतिचारतया तस्य पालना, आह च-"जाराहणा य एत्य चरण 5 पडिपत्तिसमयमा पभिइ । आमरणतमजस्स सनमपरिपालण विहिणा ||१" इनि [आराधना चान गरितिपत्तिममयत आरभ्य । आमरणान्तमजन निधिका सयमपरिगारना ॥ १॥] चेह यद्यपि पारितप्रतिपरिभा निराधायुस्ता अमिङमारवजापरिज्यातिष्पत्तनुभवसहिता दश अपिराधनाभशस्तु यथात सोधमादिदेगसर्गमिद्वयुत्पत्तिहेतव ससाथमच सिद्धिगमनभर इत्यय 10 मटादश चारिसमा उक्ता, श्रूयते चार भाश्चारिन भवति तथा न निराध, अविराधनाभानामा प्रहणानिति, जय वाह्न "ज भग उ चरित्ते' [चारित की भा इत्यत्र सून आदानभपाना युत्तिकृता चार पातत्यात चारित्रप्रतिपतिपिशरिता एउभा माह्या , माराधनाविराधनाविशेषण कायम्, अन्यथा यद् भगरता श्रीमन्महावीरेण शरिफाय मज्या बीजमिनि 15 दापिता तनिरय स्यात्, राम्यमत्वमा रणर बाजमानस्य सिद्धत्यात, यत्तु चारित्रदान तस्य तदश्मचारिने सिादरतस्य स्यादिति, विरल्या पपन्न स्यादिति, यच्च दशसु विगधनाभयेषु तस्य चारिमुपाणिन त यतोऽपि स्यादिति न दाप इति, अयत्वाह - नहित्तिकारवनमानायाभोसायिकृतसूरम यथा “यार यय भवति, आरण्यकर्णिकारणाप्याराधनापत्रम्य समर्थितत्वादिति । 20 जहा उज्याइए इ यादि भावितमेर अम्मडपरिचाजस्थान: इति ॥ दश शत वृत्तिा समाप्तमिनि धीमन्महावीरजिनप्रभावाद गोशाल साहतिवदगतेषु । समस्तनिमेषु समापितेय वृत्ति शते पञ्चदशे मयति ॥१॥ ।। इति श्रीमदमयदेवमृरिचयविहितविपरणयुत पादश 2. गोशाय शतक समाप्तम् ।।

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॥ प्रथमं परिशिष्टम् ॥
[श्रीमत्सूत्रकृताते द्वितीय श्रुतस्कन्ध पष्ठ अध्ययनम् ]
गोसाले-
पुराकड जद्द इम सुणेह मेगन्तयारी समणे पुरासी।
से भिक्खुणो उरणेत्ता अणेगे आइक्सपण्टि पुढो चित्यरेण ॥१॥
साजीविया पट्टयियायिरेण सभागओ गणओ भिक्खुमज्झे।
आइावमाणो बहुजन्नमत्थ न सधयाई अपरेण पुच॥२॥
एगन्तमेर अदुवा वि एहि दोवन्नमन न समेह जम्हा।
अद्दे-
पुचि च पण्हि च अणागय वा पगन्तमेव पडिसधयाइ ॥३॥
समिच लोग तसथावराण खमकरे समणे माणे या।
आइक्खमाणो वि सहस्समझे एगतय सारयई तहाचे ॥४॥
धम्म कहतस्स उ नस्थि दोसो
खतरस दतस्स जिइदियस्स।
भासाय दोसे य विरजगस्स
गुणे य भासाय निसेवगस्स ॥५॥
महवए पच अणुब्यए य तहेव पचासन सपरे या
विरह इह स्सामणियम्मि पुण्णे पारसकी समणे त्ति बेमि ॥६॥
गोसाले-
सीओदग सेवउ वीयकाय आहायकम्म तह इत्यियाओ।
एगन्तचारिस्सिह अम्ह धम्मे तपस्सिको नामिसमेइ पाव ॥७॥

श्रीमद्भगवती सूत्रम्
अद्दे-
सीओदग वा तह वीयकाय आहायकम्म तह इत्थियाओ।
एयाइ जाण पडिमेवमाणा अगारिणो अस्समा भवन्ति ॥८॥
सिया य बीओदग इत्थियाओ पडिसेबमाणा समणा भवतु ।
अगारिणो वी समणा भवतु सेवाति ऊ त पितहप्पगार ॥९॥
जे यानि वीओदगभोइ मिक्खू भिक्ख विह जायइ जीवियट्ठी।
ते नाइसजोगमचिप्पहाय कायोनगा णतकरा मवति ॥१०॥
गोसाले-
इभ क्य तु तुम पाउकुव्य पावाइणी गरिहसि सव्य एव ।
अद-
पायाश्णो पुढी पुढो किट्टयन्ता सय सय दिद्धि करन्ति पाउ ॥११॥
ते अन्नमन्नस्स उ गरहमाणा अक्षति भी समणा मारणा य।
सओयअथीअसोयनस्थि गरहामु दिलुिन गरहामु किवि॥१२॥
न किचि रूवेणऽभिधारयामो सदिष्टिमग तु करेमु पाउ।
मग्गे इम किट्टिए आरिएहि अणुत्तरे सप्पुरिसहि अजू ॥११॥
उड अहेय तिरिय दिसासु तसा य जे वारजे य पाणा।
भूयाहिसकाभि दुराउमाणा नो गरहइ बुसिम किंचि लोए॥१४॥
गोसाले-
आगन्तगारे आरामगारे समणे उभीएन उदयास।
दक्खा हु सती बहरे मणुस्सा ऊणाइरित्ताय वालगाय॥१५॥
महाविणो सिक्खिय बुद्धिमता सुत्तेहि अत्येहि य नित्यक्षा।
पुच्छिम मा णे अणगार अन्ने इइ सकमाणो न उइ तत्थ ॥१६॥

प्रथम परिशिष्टम्
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अद्दे-
नाकामकिया न य पालकिया गयाभिओगेण कुओ मरण।
वियागरज पसिण नया वि सकामकिच्चणि आरियाण ॥१७॥
गता च तत्था अद्या अगता वियागरेज्जा समियासुपस्ने ।
अणारिया दसणओ परित्ता इइ संकमाणो न उवे तत्य ॥ १८॥
गोसाले-
पपण जहा यणिए उदयट्ठी आयस्म हेउ पगरे सग।
तकनमे समणे नायपुत्त इश्चेव मे होइ मई वियक्का ॥१९॥
अद्दे-
नरन फुज्जा पितुणे पुराणं चिच्चामइ ताइ य साह पर।
एयावया वमन ति चुत्ता तस्सोदयट्ठी समणे त्ति घेमि ॥२०॥
समारभते धणिया भूयगाम परिगह चेव ममायमाणा।
ते नाइसजोगमाविप्पाय आयरस हेड पगरति सर्ग ॥२१॥
वित्तेमिणो मेटुणसपगाढा ते भोयणट्ठा यणिया ययति।
वय तु कामसु अग्झोववन्ना अणारिया पेमरसेसु गिद्धा ॥२२॥
आरंभग व परिगह च अविउस्सिया निस्सिय आयदडा।
तसिं च से उदएज पयासी घउरतणताय दुहाय नेह ॥२३॥
नेगति नच्चति य ओदप सो वयति ते दो विगुणोदयम्मि ।
से उदए साइमणतपत्ते तमुदय सायद ताइ नाइ ॥२४॥
अहिंसय सव्वपयाणुक्पी धम्मे ठिय कम्मविवेगहेउ ।
तमायदडेहिं समायरता अयोहिप ते पढिरूवमेय ॥२५॥

॥ दितीय परिशिष्टम् ॥ [दीघनिकायस्थसामन्जफलनात्] १९ एकमिदाह भन्ने समय ये मलिगोसाली तेनुपसकाम उपसरमिन्या मालिगोसालेंन मद्धि समोदि समोदनीय कर्थ 5 साराणीय पीतिसारत्या परमन्त निसीमित निसिली वो अद मन्त मरगलिंगीसार एतदवोच। “यथा नुस्खोइमानि, मो गोसाल, पुथुसिप्पायतनानि सय्यर्थीद हत्याराहा पे सक्षा नु खो भी गोसाल पवमेव दिर धम्मे सदिट्टिक सामजप पन्जापेतु" ति॥ २० पर चुत्ते भन्ते मालिगोसारी म एतदोच। 'नस्थि 10 महारान हेतु, नात्य पच्चयो सत्तान सकिलेसाय आहेतुअपच्चया सत्ता सफिलिस्सन्ति । नत्यि हेत, नत्थ पचया मत्तान विसद्धिया, अहेतुअपचया सत्ता सुिज्झन्ति । नत्य अत्तकार, नत्थ परकारे. [सुमङ्गलविलासिनीनाम्न्या दीघनिकायटीकाया ] १९ पत्य पन मावलीति तरस नाम, गोमालाय जाताना गोसारो ति 15 दुतिय नाम । त किर सकद्दमाय भूमिया तत्पर गहेत्या गच्छन्त 'तात, मा खलि' इति सामिको आह । सो पमादेन सरित्या पतित्वा सामिकरस भयेन पलायितु आरद्धो । सामिको उपधावित्या दमाकरण अग्गइसि । सो साटक घड्डत्वा अचेटको हुत्या पगायि । २० मारवलिबादे पच्चयो हतुवचनमेव ! उभयेनापि विमानमेव काम 20 दुच्चरितादि सकिलेसपच्चय, कायसुचरितादि च विसद्धिपच्चय परिक्खिपति । अत्तकारे ति अत्तकारो। येन अचना क्तकम्मेन इमे सत्ता देवत्तं पि मारत पि बहा कि सावकबोषित पञ्चेबोधि पिसरतापिपापुणन्ति, ।

द्वितीय परिशिष्टम् नथि पुरिसकारे, नथि बल, नत्यि पिरिय नस्थि पुरिसथामी, नतिय परिसपरकमो। सवे सत्ता सवे पाणा सवे भूता सवे जीरा अपसा अबला अविरिया नियतिसगतिमारपरिणताछस्सेवामिजातिसु सुरादुक्ख पटिसवन्ति । चुदस सो पनिमानि योनिपमुखसतसह- स्सानि सहिच सतानि छ च सतानि, पक्षच कम्मुनो सतानि पक्ष 5 . तपि परिक्खिपति। दुनियराइन य परकार परस्म ओबादानुमासनि निम्साय ठपेत्त्वा महामत्त अवमलो जनो मनुस्ससोभापत आदि कता यात्र अरहत्त पापुणानि, त परकार परिखिपति । एवमय बालो जिनचक पहार देति नाम। मथि पुरिसफारे ति येन पुरिसकाोन सत्ता वृत्तप्पकारसपचिया पापुणन्ति तं पल परिविपति । नत्थि विरिय ति सादीनि सवानि पुरिसकार.10 ववचनाने 'इद नो पिरियन इद पुरिसत्यामेन इदं पुरिसपाकमेन पवत्त ति, एव परताचनपरिक्षेपकरणसेन पनेतानि विसु आदियति । सरे सत्ता ति ओढगाणगदभायो अनवमेमे परिगण्हाति । सम्धे पाणा ति एकिन्द्रियो पाणो दिइन्द्रियो पाणो तिआदिरसन पदात । सवे भूता ति अण्डकोस वधिकोसेसु भूने सभूते संधाय वदति । सवे जीया ति भालियवगोधूमादयो 15 सपाय वदति । तेसु हि सो विरुदनभावेन जीवसम्ञी। अवसा अवला अनिरिया ति तस अत्तनो वसो वा बल वा विरिय वा नत्थि । नियति सगतिभावपरिणता ति। रथ नियती ति नियत्ता, सगती ति उन अभिजातीन तत्य तत्थ गमन, भागो ति सभावो येत्र । एव नियतिया च समतिया च भावेन च परिणता नानप्पकारत पत्ता। येन हि यथा भरितम्न 20 सो तथैव भरति, येन नभक्ति व सो न भवनति दरसेति। छस्सेवाभिजातिस ति छसु एव अभिजातिसु उत्वा सुग च दुक्ख च परिसवेदेन्ति । अज्ञा सुग्वदुक्रवभूमि नाति दस्मेति योनिपमुखसतसहस्सानीति पमुखयोनीन 76 श्रीमद्भगवतीमूत्रम् घ फम्मानि तीणि पक्म्मानि कम्मे च अहफम्मे थ, पट्टि पदिपदा, ट्ठन्तरकप्पा, एटमिजातियों, अट्ट पुरिसममिया पनपत्रास आजीयसते, एकनपास परिय्याजकसते, एएनपझास नागायास सते, पीसे इन्द्रियसते, तिसे निरयसते, छत्तिम रमोपायो, सत 5सजिगामा, मत्त असनिगमा, सत्त निगण्ठिगामा, सत्त देवा, उत्तमयोनीनं पुससतसहरसानि अध्यानि म सदिसताति, मानि पछसतानि, पर ध कम्गुनी सतानीति पर कम्मानि शाति काल तक्मत्त रन निरया दिष्टुिं दीपति । परच कम्मानि तीणि घसम्मानीति आदिसु नि एसेच भयो । केपि पनाह पर कम्मानीति पशिनिपक्सेन 10भणात, सीणी नि तोणि कापारमादिरसेनाति । कम्मे प अपने धाति, एत्य पनरस कायाम प पचम्मि प कम्म नि लगि मनाकर्म उपहार्म ति । इहि पटिपदा नि बाढि परिपदा ति बदनि । द्वन्तरकप्पा नि एक्करिंभ कणे धतुष्टि अन्तरकप्पा नाम दोन्ति। अयं पन अन्न दे अनानन्तो एमाद । छलमिजातियो ति कण्हाभिजाति नलिभिजानि 1 लोहिताभिजाति हल्दिाभिजाति मुकाभिमाति परममुकाभिमाति सी मा छ अभिनातिया पदति । तत्य मारभिका सूकरिमा सान्तिका मागविका ला मच्छयातका चारा चीरघातका धनागारिका पपा पनडे पिकषि कुकरकम्मन्ता, अयं कण्हाभिजातीति वदति । भिवस् मालाभिमातीति वदति । ते किर पतुसु पञ्चयम् कण्टके (कन्दा) पविखपित्या सादन्ति । भिक्कू प 20 कण्टक (फन्दक) वृत्तिका ति अयं हिस्स पालि येत्र । अथवा कण्ठस्युतिका पर नाम एके पभाजिता ति पदति । इमे मिर पुरिमहिदीहि पण्डरतरा। गिही ओदातपसना अपेल्कसायका इलिदाभिजातीति पदति । अय अपनो पच्चयदायके निगण्ठे वि पि जेटुकतरे करोति । आणविक आनीपिनियो अप द्वितीय परिशिष्टम् सत्त मानुसा, सत्त पेसाचा, सत्त सरा, सत्त पदुवा, सत्त पदुवा. सतानि, सत्त पपाता सत्त पपातसतानि, सत्त सुपिना सत्त सुपिन सतानि पुल्लासाति महाकप्पुनो सतसहस्सानि यानि वाले घ पण्डिते च सघावित्या ससरित्या दुक्खस्सन्त करिस्सन्ति । तत्य नत्यि-इमिनाह सीलन वा यतेन वा तपेन या ब्रह्मचरियन या 5 मुक्काभिजाताति वदति । ते किर पुरिमेहि चहि पण्डरता । नन्दो च्छो, किसो सच्चिो मक्खलिगोसाली परमसुकाभिजातीति पदति । ते रि सब्बेहि पि पण्डरतरा। अट्टपुरिमभूमियो ति, मन्दभूमि विवाभि विमसनभूमि उजुगत. भूमि सेखभूमि समणभूमि जिनभूमि पनभूमीति इमा अट्ठ पुरिसभूमियो ति पदति । तत्य जातदिनसतो पटाय सत्तदिवसे सबाधठानतो निम्वन्तत्ता सत्ता मन्दा 10 होन्ति मोमूहा । अय मन्दमूमीति वदति । ये पन दुग्गतितो आगता होन्ति, ते अभिण्ड रादन्ति चेत्र दिवन्ति च, सुगतितो आगता तं अनुस्मरित्या अनुस्सरित्ता हसन्ति । अय खिड्डाभूमि नाम । मातापितुम हत्य वा पाद वा मञ्च वा पीठ का महत्वा भूमियं पदनिकखमन पन वीमसाभूमि नाम । पदसा गतु समत्यकालो उजुगतमि नाम । सियानि सिम्सनकालो सरल 15 भूमि नाम । धरा निक्सम्म पम्वजनकालो समणभूमि नाम । आचरिय सेषित्वा विजाननकालो जिनभूमि नाम । भिक्ख च पन्नको जिनो न किंचि आहानि एव अराभिं समण पन्नम्मीति वदति ! एकृनपत्रास आजीवसते ति एमनपास आजीववृत्तिसतानि । परिवाजकसते ति परि भाजप अन्जा- सतानि । नागावाससते ति नागमण्डलसतानि । वीसे इन्द्रियसते ति वीम 20 इन्द्रियसतानि । तिसे निरयसते ति तिस निरयसतानि । रजोधातयो ति रजआकिण्णटानानि हत्थपाठपादपीठानि सघाय वदति । सत्त सञ्चिगमा ति ओटुगोणगभअजपसुमिगमाहिसे सधाय वदति । असजिगन्मा ति 78 श्रीमद्भगवतीसूत्रम् अपरिपक्ष या क्म्म परिपाचेस्सामि, परिपकवा कम्मै फुस्स फुस्स व्यन्तिकरिस्सामि इति । हेव नस्थि दोणामते सुखदुवम्बे परियन्तक्टे ससारे, नयि हायनवहुने नत्थि उपसारकसे । सेय्यथापि नाम सत्तगुटे खित्ते निवेठियमानमेव फलेति, परमर पाले च पण्डिते । 5 सालियरगोधूममुग्गफगुवरक्कुसके सधाय वदति । निगण्ठिग भा ति गण्ठिम्हि जातगभा, उरषेछनागदपा सधाय पदति । सत्त देवा ति भइ देवा, सो पन सत्ता ति पदति । मानुसा मि अनन्ता, सो सता ति पनि । सत्त पिसाचा नि पिसाचा महन्तामहन्ता सता ति वदति । सरा मि महासरा । कण्णमुण्डरयारअनातससीहप्पपाततियग्गलमुचरिन्दकुणालदहे 10 गहेत्वा पदति । पचुटा() ति गण्टिका । पपाता ति महापपाता । पपात सतानीति खुद्दकपातसतानि । सुपिना ति महामुपिना । सुपिन सतानीति खुद्दकसुपितसतानि । महाक्प्पुनो ति महाप्पान । तत्थ एकम्हा महासरा वस्मसते कुसग्गेन एक उदाविद् मीहरित्या सत्तखर्नु तम्हि सरे निरुदके कते एको महामणो ति पदति । एवरूपान महारपान 15 चतुरासीतिसतसहस्सानि सेपेत्वा वाले च पण्डिते च दुक्सस्सन्त रोन्तीति अयमम्स द्धि । पण्डितो पिकिर अन्तरा मुज्झितु न सकोति, बालो कि ततो उद्ध न गच्छति । सीरेन वा ति अचेकसीलेन या अन्जन था येन क्न चि । यतेना नि तादिसेनेव । तपेना ति तपोकम्मेन । अपरिपक्का परिपाचेति नाम, यो 'अइ पण्डितो' ति अन्तरा बिसुन्झति । परिपक 20 फुस्स फुस्स व्यन्तिकरोति नाम यो अहं बाये। ति दुत्तपरिमाण काल अतिमित्या याति । हेव नत्थीति एव नस्थि, तहि उभय पि न सका कातु ति दीपेति । दोणमिते ति दोणन मिते, दोणेन मित विय ! सुखदुक्खे ति सुख दुक्ख । परियन्तकटे ति बुत्तपरिमाणेन कालेन कटपरियन्ते । नस्थि द्वितीय परिशिष्टम् 79 च सघायित्वा ससरित्वा दुक्खस्सन्त करिस्सन्तीति । इत्य सो में भन्ते मक्खलिगोसालो सदिटिक सामग्मफल पुट्ठो समानो ससारविसद्धि व्याकासि। हायनवडने ति नस्थि हायनवडनानि। न ससारो पण्डितस्स हायति, न पालरम बट्टतति अत्यो। उकसायकसे ति उकसावकमानि, हायनवड्डनानेमेवेत पत्रचन 5 इदानि त अत्थ उपमाय साधेन्तो सेय्यथापि नामा ति आदिमाह । तथ सत्तगुळे तिघेठेत्वा कत्तमुत्तराळ । निवेठियमानमेव फलेतीति पचलेषा वा रुक्लग्गे वा ठत्वा खित्त सुत्तप्पमाणन निम्वेठियमानमेव गच्छति, सुते सीणे तत्व तिटुति न गच्छति । एवमेवं वृत्तकालतो उद्ध न गच्छति दस्मेति ॥

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ARDHAMĀGADHĨ AND PRAKRIT WORKS Edited By Prof. N V VAIDYA, MA Fergusson College POONA 4 (India) • (1) ANTAGADADASÃO & ANUTTAROVAVĀIYADASÃO Out of print (2) BAMBHADATTA & AGADADATTA Out of print (3) RAYAPASENAIJJASUTTAM The Second Uçadga of the Jain Canon Out of priat (0) NAYADHAMMAKAHÃO The Sixth Anga of the Jaia Canon Complets Text only 7-80 Critically Edited for the frst time ( NĀYADHAMMAKAHÃO Chapters IV-VIII & IX & XVI-Two Volumes 7-0-0 (6) PAUMACARIYA of Vimalisūri Chapters I-IV 4 0-0 cm SAMARĀICCAXAHĀ Of Haribhadrasari: Chapter VI Out of print (8) DASAVEYALIYASUTTAM The docond Malssetra of the Jain Canon Chapters I-VI 2 0-0 (9) USĀNIRUDDHAM: BY CANTOS I&IT 2-4-0 RĀMA PĀNIVĀDA (10) NALAKAHĀ & VARUNAKAHĀ From KUMĀRAPĀLAPRATIBODHA (11) UTTAMADHYAYANASŪTRAM The First Azlasītra Of The Jain Canon Complete Text Only Fdited By RD Yadekar & NV Vaidya 200 Fergusson College Poona-4 Text Edited with English Translation, Notes and Iotroduction JAINISM IN GUJARAT (1100 A, D To 1600 A D) By C B SHETH, M. Some Opinions With great raterest, I read your book 'jalnis Gujarat It is a very helpful work, being a mine of in formation which you have put together with great industry Please accept my greetings Dr A N Upadhye Vice-Principal Rajaram College Kolhapur Jainism in Gujarat is an original work on the history of Gujarat It was written at the invitation of the University of Bombay It fills up a gap in the Litera ture on the history of Gujarat that has not taken adequate account of the unique contributions made by Jainism to the history and culture of Gujarat, This work dealing with a rich and glorious beritage preserved by Jainism in Gujarat will be very useful to students of Indian History ( Agian) I have read with great interest the comprehensive and well-documented narratne of the Jain contribution to the history and culture of Gujarat and Saurashtra written by Mr Chimanlal B Sheth in English The writer has consulted all available literatute which is extant in Sanskrit Prakrit and Gujarati on the subject and he has tried bis utmost to connect it with the relevant Persian literature on that period The treatment is lucid and balanced KH Kamdar Professor of History and Politics Vallabh Vidyanagar

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Shri Madhrgavati Sutram

Author
N.v.vaidya
Title
Shri Madhrgavati Sutram
File name
Shri Madhrgavati Sutram
Text
OCR done
Citation
1954
Published
2011/03
Publisher
Poona Aryabhusan Press Shivajinagar
Language
Sanskrit
Pages
88
Library
Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Classification
Devotional
DLI number
553158
Barcode
99999990044334.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
m182ugCdPTS
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