Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Vateshwar Siddhant
Front matter
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KINAAR
श्रीवटेश्वराचार्य-विरचितः
वटेश्वरसिद्धान्तः
संस्कृत-हिन्दी-विज्ञान-भाष्योपपत्ति-समलंकृतः
सम्पादक
प्राचार्यवर पंडित रामस्वरूप शर्मा
संचालक:
ज्योतिषाचार्य पंडित मुकुन्दमिश्रः
उपसंचालक:
ONOTE
CATISA
प्रकाशक:
इंडियन इंस्टीट्यूट आफ श्रास्ट्रानोमिकल
एण्ड संस्कृत रिसर्च
[ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं।] प्रकाशक- इण्डियन इस्टीट्यूट आफ आस्ट्रानोमिक्ल एण्ड सस्कृत रिसर्च, २२३६, गुरुद्वारा रोड, करौलवाग, नई दिल्ली-५ भारत सरकार के वैज्ञानिक तथा सास्कृतिक विभाग के अनुदान से प्रकाशित प्रथम संस्करण १९६२ मूल्य चालीस रुपए मनेजर पद्मश्री प्रकाशन द्वारा एवरेस्ट प्रेस, दिल्ली में मुद्रित Foreword The Indian Institute of Astronomical and Sanskrit Research is now presenting its first publication in the shape of the first volume of VATESHWAR SIDDHANT to facilitate the study of the science of Astronomy as known to the ancient people of "India. We hope that it will be found useful by the Learned Societies interested in that subject. The publication has been made possible by the munificence of the Govern. ments of India and of Jammu and Kashmir for which our grateful thanks are due to them and also to Professor Humayun Kabir, the Honourable Minister for Scientific Research Cultural Affairs and Bakshi Ghulam Mohammad, the Honourable Prime Minister of Jammu & Kashmir. Our thanks are also due to the Governnients of Nepal, Uttar Pradesh, Rajasthan and Madhya Pradesh and to many other persons who have kindly helped in the good cause by becoming patrons and members and by giving donations and valuable advice and suggestions. and to Brijlal Nehru, President, NEW DELHI, 1-3-1962 Indian Instilute of Astronomical 1 mit वटेश्वर-सिद्धान्त मङ्गलाचरण- "ब्रह्मकुशशिबुध-भृगु-रवि-कुज-गुरु-कोरण-भगवान्नमस्कृत्य । आर्यभटस्त्यिह निगदति कुसुमपुरेऽभ्यचितं ज्ञानम् ॥" के अनुसार ही अपने सिद्धान्तमय ग्रह्मक्षास्थितिव्रमानुसार वटेश्वराचार्य ने भी मङ्गला- चरण किया है जो कि अधोलिखित है- "ब्रह्मावनोन्दु-बुध-शुक्र-दिवाकरार-जीवार्क-सूनु-भगुस्न पितरौ च नत्वा। याह्म' ग्रळे गणित महदत्तसूनुर्वक्ष्येऽखिलं स्फुटमतीव वटेश्वरोऽहम् लेकिन मार्यभटगीतिकापाद मे एक युग ४३२०००० में भूभगए-१५८२२३७५०० इतना होता है यह कह कर "अनुलोमगतिनोस्थ पश्यत्यचल विलोमग यद्वत् । मचलानि भानि तद्वत्समपश्चिमगानि लङ्कायाम्" इससे भूभ्रमण स्वीकार करते हैं, लेकिन बटेश्वरा- चार्य भूभ्रमरण को नहीं मानते है. उराका (भूभ्रमण) खण्डन भी नहीं करते हैं। पार्यभटीय के टीकाकार परमेश्वर कहते हैं कि वस्तुत 'स्थिरंद भूमि' ब्रह्मगुप्त ने इस मार्यभटमत का खण्डन किया है यदि कहा जाय कि ब्रह्मगुप्त जैसे इसके अतिरिक्त बहुत स्थलो मे खण्डन दिया है वैसे ही यहा भी किया है उनका स्वभाव ही प्रार्यभटमत पण्डन का है लेकिन सो वात नहीं है, आर्यभट स्वय पहले 'अनुलोमगतिौस्य' इत्यादि लिखकर- "उदयास्तमयनिमित्त नित्य प्रवहेण वायुना क्षिप्तः । लङ्कासमपश्चिमगोभपञ्जरः स ग्रहो भ्रमति ॥" इस लेख मे भूभ्रमण को स्वीकार नही करते हैं, मार्यभट के अपने मन में भी 'पृथ्वी अपने पक्ष के ऊपर घूमती है इस तरह को धारणा दृढ नहीं थी- यह उनके लेख से मालूम होता है, ग्रहो के भगणादि साधन के लिए गणित भूभ्रमणधारक है इसके लिए प्रमाण है, ग्रह भगणादि ज्ञान के लिए कोई प्रक्रिया भी नहीं दिखलाई है, इन्ही कारणो से भार्यभट मत के श्रद्धालु वटेश्वराचार्य ने भूभ्रमणविषयक उनके मत को स्वीकार नहीं किया है, पस्तुत माकाश में जो ग्रहादियो के पिण्ड हैं वे सब परसर भाकर्षण शक्तिया से चलते ही हैं, जो गणितातो या अन्यरचयिता जिस पिण्ड पर रहते हैं वह उसको स्थिर मानकर भिन्न ग्रहादि पिण्डो से चल मानते है, हमारे भारतीय प्राचीनाचार्यों के पृथ्वीपिण्ड के स्थिरत्य "स्वीकार करने में यही कारण है, मार्यभट ही की तरह उनके मतिरिक्त हमारे प्राचीनाचार्य और नवीनाचार्य भी भूभ्रमण जानत थे। लेकिन मार्यभट की तरह स्पष्ट शब्दो मै उसका उल्लेख नही करने म पूर्व कथित धारण ही कारण है । मङ्गलाचरण के बाद वटेश्वराचार्य मुनि मादि से बनाये हुए शास्त्र के अम्पासवल से अपने मे ग्रन्थरचना करने की क्षमता दिखाकर प्राहरफुसिद्धानमाथित युगादिमान मोर ग्रहो के स्पष्टीकरणादि कुछ भी ठीक नहीं है इस- लिए ब्रा गुप्त मत के निराकरण के लिए मुनि मादि रचित शास्त्रसम्मत अन्य बनाने की प्रावश्यक्ता जानकर इस ग्रन्य (वटेश्वरमिदान्त) की रचना करते हैं । .
भूमिका 'श्रुत्युत्तमाङ्गमिदमेव यतो नियोगः कालेज्यनत्तुं-तिथि-पर्व-दिनादि पूर्वे। वेदी ककुब्मवन-कुण्ड-तदन्तरादि ज्ञेयं स्फुट श्रुमिविदां बहुमत्यमस्मात् ॥' इससे वटेश्वराचार्य स्व-रचित ज्योतिष ग्रन्थ (वटेश्वरसिद्धान्त ) मे वेदो के प्रधानाङ्गत्व नेत्रस्वरूप दिखलाते हैं । इस ज्योतिष ग्रन्थ के वेदो के प्रधान अङ्ग होने के कारण इसके पढने के लिए किन्हे अधिकार है, किन्हे अधिकार नही है-इस विषय के लिए जिस तरह अन्य भाचायं लोग कहते हैं उस तरह ये प्राचार्य (वटेश्वर) नही कहते है । इस विषय मे भास्क- राचार्य इस तरह कहते हैं-- तस्माद् द्विजेरध्ययनीयमेतत्पुण्य रहस्य परमं च तत्त्वम् । यो ज्योतिषं वेति नरः स सम्यक् धर्मार्थकामान् लभते यशश्च ॥ महाभाष्यकार भी 'बाह्मणेन निष्कारण पडगो वेदोऽध्येतव्यो शेयश्च' कहते हैं, सिद्धानशेखर मादि ग्रन्यो में भी इस विषय में बहुत लिखा गया है । सिद्धान्त ग्रन्थ वे लारण वटेश्वराचार्य ने जो कहे हैं भास्करकथित लक्षण से कुछ कम है । भास्कराचार्योक्त मे 'प्रश्ना. स्या सोतरा. । यन्त्रादि यत्रोच्यते, यह है वटेश्वरसिद्धाल मे प्रत्येक अधिकार में प्रश्ना- ध्याय है किन्तु प्रश्नो के उत्तर नहीं है, इस ग्रन्य मे सिद्धान्तग्रन्य लक्षण मे यन्त्र नाम वा भी उल्लेख नहीं है । अन्य प्राचीन ज्योतिष ग्रन्यो और नवीन ग्रन्थो मे भी 'चतुर्युगसहस्रण ब्रह्मणो दिनमुच्यते' इस पुराणकृथित ब्रह्मदिन के समान ही ब्रह्मदिन देखते हैं, लेकिन आर्यभट सिद्धान्त (मार्यभटीय) और पटैश्वरसिद्धान्त मे एक हजार आठ (१००८) युगो का एक ब्राह्मदिन कहा गया है, ये दोनो प्राचार्य युगचरणो (सत्ययुगादि) को भी समान ही मानते है । लेकिन अन्य प्राचार्यों ने युग चरणो मे प्रसादृश्य (असमानता) स्वीकार की है । मनुमान में भी मतभेद है । पुराणो में और पूर्वकथित प्राचार्यद्वय के अतिरिक्त प्राचार्य ग्रन्थो मे इकहत्तर (७१) युगो का एक मनुप्रमाण कहा गया है, परन्तु आर्यभटीय में बहत्तर (७२) युगो का एक मनु कहा है, वटेश्वराचार्य भी इसी को मानते हैं- 'चत्वार्याहू सहस्राणि वाणा तु कृन युगम्' इत्यादि मनुस्मृतिकथित वचन प्रमाण से देवमान से सत्ययुगचरणमान-४०००, श्रेतायुगचरणमान= ३०००, द्वापरयुग- चरणमान% २०००, पलियुगवरणमान % १०००, इन सब के योग करने से युगमान% ४०००+३०००+२०००+ १०००=१२०००, तथा युगस्य दशमो भागश्चतुस्त्रि द्वन सङ्गणा । क्रमात्कृतयुग दीना पप्ठाश सन्ध्ययो. स्वक , इम सूर्यसिद्धान्तोक वचन से सन्ध्या सन्च्याशसहित सत्ययुगादि घरण= ४८००, ३६००, २४००, १२००, और इन युगचरणो के क्रममा. सन्ध्यासन्ध्याश-८००, ६००, ४००, २००, मनुस्मृति मादि स्मृतिशास्त्र प्रन्यो में सन्ध्या सन्ध्यारा रहित केवल गुड हो सत्ययुगादिचरणमान मनु मादि स्मृति शास्त्रकार रहे हैं । यदि उन सत्ययुगादि चरणमानो को तीन मो माठ (३६०) से गुण दिया जाय तो भातरादि ययित उनके मान माते हैं । 'युगाना सप्तभि संसामन्यन्तरमिहोच्यते' इमरे मसार ७१ युग=१ मनु, एक ग्रह्म दिन मे पौदह मन होते है इसलिए १४ मनु=७१ पुगX१४=६६४ युग, लेकिन 'मन्घय वटेश्वर-सिद्धान्त स्युमनूना कृताब्दः समाः' इत्यादि से चौदह मनु सम्बन्धी सध्या सन्ध्याचा मान =६ युग, इसलिये १४ मनु+सन्ध्या सन्ध्याग=EE४ युग+६ युग =१००० युग - १ वाहादिन -१ कल्प, इससे पुराणोक्त वचन के अनुकूल ही प्राचीनाचार्य और नवीनाचार्य कथित ब्रह्मदिन प्रमाण सिद्ध हुप्रा, बहत्तर युगों का एक मनु होता है उसके वरा से ब्रह्मदिन प्रमाण-१००८ युग पार्यभट ने जो कहा है जिसको वटेश्वराचायं भी कहते है, इसमें अधिक प्रमाण नहीं मिलने के कारण ब्रह्मगुप्त ने उनके मत का खण्डन किया है । कलियुगादि से पहले तीन युग चरण बीत गये हैं इम ब्रह्मगुप्तकथित विषय का भी खण्डन वटेश्वराचार्य करते हैं, जैसे- "युगपादान जिष्णुसुतस्त्रीन् यातानाह कलियुगादौ यत् । तस्य द्वापरे पादो युगगतये ये स्फुटो नाऽतः ॥" लेकिन वटेश्वराचार्य भी तो 'युगत्रिवृन्द सदृशाइ ध्यस्त्रय' इससे उसी बात को कहते हैं ब्रह्म गुप्तोक्त जिस विषय का खण्डन करते हैं। वटेश्वराचार्य क्या खण्डन करते हैं वे हो जान सकते है । ब्रह्मगुप्तोक्त भूपरिध्यानयन का भी खण्डन करते हैं । वस्तुत. ब्रह्मगुप्त का वह पानयन ठीक नहीं है । ब्रह्मगुसोक्त बहुत विषयो का खण्डन अपने सिद्धान्त मे बटेश्वरा- चार्य ने किया है, लेकिन ये खण्डन ठीक है या नहीं इस बात को विवेचक लोग विचार करें। मार्यभटमत खण्डन के लिये ब्रह्मगुप्त ने जिस तरह के वचन का प्रयोग किया है उसी तरह ब्रह्मगुप्तमतखण्डन के लिए वटेश्वराचार्य का है । जमे आर्यभट मत खण्डन के लिये ब्रह्म. गुप्तोत वाय ये है- "स्वयमेव नाम यत्कृतमार्य मटेन स्फुटं स्वरिणतस्य । सिद्ध सदस्फुटत्वं ग्रहणादीनां विसंवादात् ।। जानात्येकमपि यतो नार्यभटो गरिएतकालगोलानाम् । न मया प्रोक्तानि ततः पृथक् पृथक् दूपणान्येषाम् ।। प्रार्यभटदूषणानां संख्यावक्तुं न शक्यते यस्मात् । तस्मादयमुद्दे शो बुद्धिमतान्यानि योज्यानि ॥" अपने सिद्धात (वटेश्वरसिद्धात) मे ब्रह्मगुप्त मतपण्डन मे वटेश्वरोक्त वचन ये है- "भानुभुजादियोगाच्चन्द्र शुक्लं प्रकल्पितं तेन । नो लग्नभुजानुगतं वत्ति न शुक्लं सुतो जिप्रयोः ।। जिष्णुसुतं दूपरणानां संख्यां वक्तुं न शक्यते यस्मात् । तस्मादयमुपदेशो बुद्धिमताऽन्यानि योज्यानि ॥ एकमपि न वेत्ति यतो जिप्णुमुतो गणितगोलानाम् । न मया प्रोवतानि ततः पृथक् पृथम् दूषणान्येषाम् ॥" वैधविधि को जानने वाले ग्रह्मगुप्त के जिस तरह अनेक विवेचनात्मक विषय से सम्पन्न नाना तरह से तात्त्विक विचार मे युक्त हाह्मपुस्ट सिद्धात है उमी तरह के वटेश्वर.'
५ , भूमिका सिद्धात भी है । इन दोनो महारथी प्राचार्यों की अपूर्व प्रतिभा मे किसी के मन में लेशमात्र भी सन्देह नहीं हो सकता है । इन दोनो आवार्यों के बाद जो प्राचार्य हुए हैं वे सब बहुत स्थानो में इन्ही दोनों प्राचार्यों के सिद्धातग्रन्थ में लिखित विषयो के ही प्रतिपादन करते हैं। मेरा कथन सत्य है या असत्य ये बातें इन दोनो प्राचार्यों के सिद्धातग्रन्थ (ब्राह्मस्फुटसिद्धात और वटेश्वरसिद्धात) को और अन्य सिद्धातग्रन्थ देखने से स्पष्ट है । प्राक्षं (नाक्षत्र), चान्द्र, सौर, सावन, बाह्म (ब्रह्मासम्बन्धी) जैव (वृहस्पतिसम्बन्धी), पंत्र्य (पितृसम्वन्धी) देव (देवतासम्बन्धी) मानव (मनुष्यसम्बन्धी) इन नव प्रकार से मानो मे सौरमान, चान्द्र- मान, सावनमान और नाक्षत्रमान इन चारो मानो से मनुष्यो के व्यवहार चलते हैं, भास्करा- चार्यादि मिद्धातो में पूर्वकथित चारो मानो (सौर, चान्द्र, सावन और नाक्षत्र) से ही मनुष्यो के व्यवहार कार्य व हे गये हैं लेकिन वटेश्वराचार्य उपयुक्त नौ प्रकार के मानो मे 'कन किन में कौन-कौन कार्य होना चाहिए इसका वर्णन करते हैं, जैसे- "पर्वावमतिथिकरणाधिमासकज्ञानमैन्दवान्मानात् । प्रभवाद्यब्दाः पष्टियुगानि नारायणादीनि ।। प्राङ्गिरसादेतेषां ज्ञप्ति पैञ्याच्च पैतृको यज्ञ । कामलजासुरदैवस्तेपामायुः परिच्छित्तिः।। अध्ययननियमसूतकमखगतयः सच्चिकित्सा च । होरामुहूर्तयामाः प्रायश्चितोपवासाश्च ॥ आयुर्दायश्च नणा गमनागमने च सावनान्मानात् । ऋत्वयनविपुवदन्दा युगं क्षयर्ड्स' दिनस्य सौरात्स्यु । ज्याद्याविधयश्चाक्षाच्छशधरभगरपोद्भवाश्च नाक्षनात् । मासाश्च वासराणां सज्ञाः सदसत्फलावगतिः ॥" इस सिद्धात मे ग्रहादि के भगणादि साधन युगमान के द्वारा किये गये है, यदि युगीय भगणादि को कल्प मे लाना हो तो युगीय भगणादि को एक प्रयुत (१००००) से गुणने वे कल्पीय हो जाते हैं । यदि कल्पीय भगणादि को ब्रह्मा की आयु मे लाना हो तो उनको ७२००० इतने से गुणने पर ब्रह्मा की आयु मे पा जाते हैं । जैसे- युग प्रमाण=४३२००००, पत्पप्रमाण-४३२०००००००० कल्पवर्ष ४३२०००००००० १०००० इसलिए युगवर्ष से क्ल्पवर्ष को १०००० युगवर्ष ४३२०००० इतना अधिक होने के कारण युगोत्पन्न ग्रहादि भगणादि को १०००० इतने से गुणने से क्ल्प में वे भगणादिक होते हैं । इसी तरह कल्पीय ग्रहभगणादि को ब्रह्मा की प्रायु मे लाना हो तो ब्रह्मायुवर्ष ४३२००००००००४३६०x२x१०० कल्पवर्ष =७२००० इससे सिद्ध होता ४३२०००००००० हैं कि कल्पीय ग्रहादि भगणादि को ७२००० इतने से गुणने पर ब्रह्मा को प्रायु मे ग्रहादि भगण हो जायेंगे । अहर्गणानयन भी वटेश्वराचार्य ने अनेक प्रकार से क्यिा है, अर्गण मे अभीष्ट वार ज्ञानार्थ अहर्गण को सात से भाग देकर जो शेष रहे उसमे एक जोड़ देने से - यटेश्वर-सिद्धान्ते पत्तमान पार होता है । प्रत्येक पहाणानपन प्रकार में इसी तरह लिखा है इन्हीं के अनुसार सिद्धान्तरोपर में श्रीपति ने भी अनेक प्रकार से ग्रहगंणानयन किया है और पहर्गण से दत्त. मान यार ज्ञान के लिए उमो तरह दिया है, परन्तु हरएप मवस्था में सैर ही नहीं करता पाहिए, स्थितिविशेष मे निरेन भी यरना चाहिए जमाधि सिद्धातनिरोमरिण में भास्करा- धार्य कहते हैं- 'मभीष्ट वारार्यमहर्गणश्चेत्सको निरेपस्तिथयोऽपि तद्वन्' इत्यादि । इनसे प्राचीन मूर्यसिद्धात में महगए है संक निरेक करण सम्बन्ध में कुछ भी नहीं कहा गया है। लघ्वहगंगानयन भी बटेश्वराचार्य ने किया है। माहास्फुटसिद्धात में ब्रह्मगुप्त भी 'लघ्व- हर्गणानयन' किया है परन्तु मिदातशेखर में उसके बानयन के लिए कुछ भी उल्लेख नहीं है, इसमे क्या पारण है मानुम नही होता भास्कराचार्य ने भी लघ्वहगंणानयन सिद्धान्त- शिरोमरिण में किया है यद्यपि यह आनयन ठीक नहीं है तथापि एक अपूर्व विषय है, प्रस्तुत सिद्धान्तोक्त वश, मासेश कालहोरेश ज्ञान के लिए विधिया और उनके क्रमप्रदर्शन के लिए जो विधिया हैं तदनुरूप ही मिद्धान्तशेखर मे श्रीपति यथित है, इनको देखने से मालूम होता है कि श्रीपति ने ये विपय ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त से या वटेश्वरमिद्धान्त से लेकर लिखे हैं । ब्रह्मगुसोक्त रविसकान्ति का भी प्रपोलिखित इलोक् द्वारा प्राचार्य (वटेश्वर) खण्डन करते है। जैसे- सक्रान्तिर्घमायोः समस्तसिद्धान्ततन्त्रवाह्याऽत । कुदिनामज्ञानान्मन्दोवस्य स्फुटो नाऽकः ।। कल्पितमगरद्युचराः कल्पितकुदिनः प्रकल्पितंश्च युगः । परिधीनामज्ञानाद दृष्टिविरोधारस्फुटा नाऽतः।। ब्रह्मगुप्तोक्त युगमान ही को वटेश्वराचार्य जव अशुद्ध कहते हैं तो उसके सम्बन्ध से साधित ग्रहागणादि मान भी मशुद्ध ही होगा इसलिए उन भगणो द्वारा साधित ग्रह भी अशुद्ध ही होंगे प्रत अशुद्ध स्फुट रविवश से जो सक्रातिकाल होगा वह भी अशुद्ध ही होता है, लेकिन वटेश्वर का यह कथन तभी ठीक हो सकता है जब ब्रह्मगुप्तोक्त युगादिमान ठीक नहीं होगा, प्राय भटकथित युगादि मानों को वटेश्वराचार्य भी स्वीकार करते हैं। ब्रह्मगुप्तकथिन युगादिमान ठीक नही है, हमने जो कहा है वही ठीक है इसके लिए कोई प्रवल प्रमाण नहीं देते हैं, तब उनका कथन किस तरह माननीय होगा । स्मृतिकारादि कथित पूर्वोक्त मानो के साथ ब्रह्मासोक्त मानों की तुल्यता के कारण मौर वटेश्वरस्वीकृत मानो को स्मृतिकारादि कथित मानो से विभिन्न होने के कारण इनका क्थन दुराग्रहपूर्ण है यह मेरा मत है, इसको विवेचक लोग विचार कर समझे इनका मध्यमाधिकारीय प्रश्नाध्याय बहुत ही उत्तम है, उममै बहुत उत्तम उत्तम प्रश्न है, लेकिन ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त में भी इसी तरह के बहुत प्रश्न हैं, यह कहना कठिन है कि ये प्रश्न वटेश्वराचार्य के अपने हैं या बाह्य स्फुसिद्धान्त के आधार पर लिखे हैं, इस विषय का निर्णय विश ज्योतिपिक लोग स्वय करेंगे।
७ भूमिका स्पष्टाधिकार स्पष्टाधिकार मे प्रार्यभट ब्रह्मगुस प्रादि सब प्राचार्यों ने वृत्त के एक पाद मे २२५ दो सौ पच्चीस कला वृद्धि करके चापो की चौबीस ज्या साधन कर अपने अपने सिद्धान्तग्रन्थ मे पठित किया है । लेकिन वटेश्वराचार्य ने छप्पन (५६) सज्ञक विकला सहित कलात्मक ज्या साधन कर पठित किया है । इष्टचाप ज्यानयन विधि एक ही तरह की हैं। भास्कराचार्य ने भोग्य खण्ड स्पष्टीकरण किया है, वटेश्वरावार्य भोग्यखण्ड स्पष्टीकरण का नाम नहीं कहते हैं लेकिन शेपाराज्यानयन देखने से भास्करकृत भोग्यखण्ड स्पष्टीकरण ठीक वटेश्वरोक्त के सदृश हैं । वटेश्वरोक्त शेषाशज्यानयन में यदि गौप्य ज्यान्तरार्ध के स्थान पर गतप्यखण्ड के अन्तराध और प्रथम चाप के स्थान में दशाश लिया जाय तव दोनो प्राचार्यों के प्रकारो में कुछ भी भेद नहीं रहेगा, शेपारज्या शब्द से शेप चाप सम्बन्धिनी ज्यावृद्धि समझनी चाहिए, इस विषय मे सिद्धान्तशेखर मे श्रीपति कुछ भी नहीं कहते है । प्राय अनेक स्थलो मे ब्रह्मगुप्तकथित या वटेश्वराचार्य कथित विपयो के अनुरूप ही श्रीपति ने लिखा है लेकिन यहा किस कारण से कुछ मही लिखा नहीं कह सकते । भास्वरोक्त भोग्यखण्ड स्पष्टीकरण प्रकार का मूल ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तकथित प्रकार या वटेश्वरोक्त शेपाप ज्यानयन ही हो सकता है, उनका यह अपना खास प्रकार नहीं है इसमे कुछ भी सन्देह नहीं । यद्यपि वटेश्वरोक्त से भास्करोक्त प्रकार सूक्ष्म है लेकिन भास्करोक्त प्रकार भी सूक्ष्म नहीं है उसमे भी बहुत स्थूलता है यह उसकी उपपत्ति देखने ही से स्पष्ट है । अन्य प्राचार्यों के ग्रहस्पष्टी- करण के सदृश ही इनका (वटेश्वर का) भी ग्रह स्पष्टीकरण है, मङ्गलादि ग्रहो के स्पष्टीकरण के लिए चार फल (मन्दफलार्ध शीघ्रफलाधं, मन्दफल और शीघ्रफल ) सब प्राचार्य कहते है, मध्यम रवि और मध्यम चन्द्र केवल अपने अपने मन्दपल सस्कार करने ही से स्पष्ट रवि और स्पष्ट चन्द्र होते हैं, लेकिन मध्यम कुजादिग्रहो के लिए पूर्वोक्त चार फलो का सस्कार जो कहा गया है उसमे मन्दफलार्ध और शीघ्रफलार्ध संस्कार करने के लिए कुछ भी कारण नहीं मालूम होता है, केवल अपने अपने मन्दफल और शीघ्रफल' के सस्कार करने ही से कुजादि मध्यम ग्रह स्पष्ट कुजादि ग्रह होत हैं यह विषय गोल पर स्पष्ट देखने में आता है । मन्दफलार्ध और शीघ्रफलार्ध सस्कार विषय मे सब प्राचार्यों ने केवल प्रागम प्रमाण लिखा है । स्पष्टीकरण के लिए किसी भी प्राचार्य का स्वतन्न विचार नहीं है ग्रहो के मन्दगतिफलानयन और शीघ्रगतिफलानयन अन्य प्राचीनाचार्यों के सदृश ही वटेश्वराचार्य ने भी किये है । अन्याचार्यों की अपेक्षा भास्करोक्त बहुत ही अच्छा है। सूर्य- सिद्धान्त मे नतम की चर्चा नहीं की गई है, वटेश्वराचार्य ने भी उसके विषय मे कुछ नही लिखा है । लेकिन यह ठीक नहीं है, स्पष्टीकृत ग्रह मे भुजान्तरादि सस्कार करने पर भी जो स्पष्ट ग्रह होते हैं वे स्वगोलस्य स्पष्टग्रह होते है । वे जिस गोल में हम लोगो को दृश्य होते हैं उन्ही को वास्तव स्पष्टग्रह हम लोग कह सकते है, गणितसाधित पूर्वकथित स्वगोलस्थ स्पष्ट ग्रह मे जितना स स्कार करने से हम लोगो से स्पष्टपह (प्रत्यक्षीभूतग्रह) होते हैं उमी सस्कार का नाम नतकर्म कहा गया है, सिद्धावशिरोमरिण में भास्कराचार्य ने रवि और चन्द्र को नतकर्मानयन किया है जो कि ब्रह्मगुप्तसम्मत है-स्वय भासराचार्य कहते हैं। लेकिन यह प्रानमन ठीक नहीं है, यह विषय नतोपपत्ति देखने ही से स्पष्ट है । तथापि वटेश्वर-सिद्धान्ते उनके पानयन पादरणीय हैं क्योकि इन्होने एक अद्भुत नवीन विषय वहा है । जिसके बिना मम्पूण स्पष्टीकरण निरर्थक दहा जा सकता है । क्योकि जिन स्पष्टग्रहो के लिए स्पष्टी. करणा का विधान लिखा गया है उन विधानो से वस्तुत ठीय स्पष्ट ग्रह की सिद्धि न हो तव तो वह विधान ही असफल हो सकता है इसलिए जिन आचार्यों ने नतकमौनयन नहीं किया उनमे वह त्रुटि है, ब्रह्मगुप्त पोर भास्कर ने नतकर्म साधन कर अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया है, प्रार्यभटादि प्राचीनाचार्यों में किसी का भी दृष्टिपात उदयान्तर सस्कार के ऊपर नहीं हुमा, केवल भास्कराचार्य ही ग्रहगणोत्पन्न ग्रह में उदयान्तरासु सम्बन्धी ग्रह- चालन पन सस्कार की आवश्यक्ता समझ कर विधिपूर्वक उसका साधन कर सस्कार किया है । उदयान्तर साधन म नास्वराचार्य को क्या नुटि है , उसको दिखला पर उसका वास्त- वानय कसे होता है और उसका परमत्व कब होता है ये सब बातें प्रसङ्गवश इस ग्रन्थ मे स्थान विशेष पर हमने दिखलाई है । भारसरकथित उदयान्तर का मूल सिद्धान्तशेखर के विप्रश्नाधिकार मे श्रीपतिकृत विपुवाश और भुजाश का अन्तरानयन है यह विसी का मत है । परन्तु उक्त ग्रन्थ के उक्त अधिकार में उक्त विपुवाश और भुजारा का अन्तरानयन नहीं देखने के कारण वह मत ठीक नहीं मालूम होता है ।। अभी तक इस देश के ज्योतिषी लोग जानते हैं कि तात्कालिक गतिसिद्धान्त का ज्ञान सबसे पहले भास्कराचार्य को हुमा, 'फलाश- खानान्तर शिजिनीनी' इत्यादि भास्वरोक्त की उपपत्ति देखने से तथा "दिनान्तरस्पष्टखगान्तर स्याद् गति. स्फुटा तत्समयान्तराले। कोटी फलघ्नी मृदुकेन्द्रभुक्तिस्त्रिज्योद्धता ककिमृगादि केन्द्रे ॥ तया युतोना ग्रहमध्यभुक्तिस्तात्कालिकी मन्दपरिस्फुटा स्यात् ॥" इसकी उपपत्ति देखने से तथा तात्कालिकी मदपरिस्फुटा स्यात्' यहा तात्कालिकी शब्द देखने से भी ज्योतिषी लागो की पूर्वोक्त धारणा को पुष्टि होती है । इसी तरह 'कक्षामध्यगतिर्य- प्रेखाप्रतिवृत्तसम्पाते । मध्यव गति स्पष्टा पर फल तत्र खेटस्य, इस भास्करोक्ति से वहा (कक्षामध्यगतिर्यग्रेखा प्रतिवृत्त के सम्पात मै ग्रह रहने से) ग्रहो की मदस्पष्टगति और स्पष्टगति के बराबर होने के कारण शीघ्रगति फलाभाव होना चाहिए, उसी पूर्वकथित स्थान को भास्कराचार्य गीप्रगति फलाभाव स्थान कहते हैं । चलन क्लन मे तात्कालिक गति का यह मिद्धाल है कि किसी चलराशि के परमत्व में और परमाल्पत्व मे उसकी तात्कालिक गति शून्य होती है भास्वरकथित पूर्वोक्त स्थान मे नीघ्र फल के परमत्त होने के कारण उसकी तात्कालिक गति शून्य होनी चाहिये, यही भास्कराचार्योक्ति से भी होती है, लल्लाचार्य शिष्यधीवृद्धिद नामर अपने सिद्धान्तग्रन्थ में कक्षावृत्त और प्रतिवृत्त के योग. विन्दु मे ग्रह के रहने मे दीघ्रगति फलाभाव स्वीकार करते हैं जिमरा खण्डन गणिताध्याय म भास्कराचार्य धीवृद्धिदे पलपल ग्रुगतेयंदुक्त लल्नेन तन्न गदिद गएकविचिन्त्यम्' इत्यादि से बहुन युक्तियुक्त किया है । इन सब को देखने से भी भास्कराचार्य के तात्कालिज गति- गिद्धान्तविषयक ज्ञान में कुछ भी सन्देह नही रह जाता है । लेकिन भास्कराचार्य रो अति- शय प्राचीन वटेश्वराचार्य भी तात्कालिक गतिसिद्धान्त को जानते थे यह भाकरकथित भोग्य खण्ड स्पष्टीकरण मूलभूत वटेश्वरोक्त गपाशज्यानयन देखने ही से स्फुट हो जाता भूमिका है । भासरीय लीलावती को निमृष्टार्थती नाम की अपनी टीका में 'चापोननिघ्नपरिधि प्रथमाह्वय स्यात्' इत्यादि की व्याख्या में मुनीश्वर लिखते हैं- 'दो. कोटिभागरहिनाभिता खनागचन्द्रास्तदीयचरसोनशरादिग्भि' इत्यादि ज्याखण्ड विना ही चाप मे श्रीपतिकृतज्यानयन ये अवलम्बन से ग्रहलाघव में गणेशदेवज्ञ ने मव प्रकार लिखा है-'इति कृत लघुवावशिन्जिनी ग्रहणमं विना द्युतिसाधनम् ।' इस करण कुतूहलस्थ छायागाधनविषय भास्कराचार्याभिमान का मूलकारण यही श्रीपरिकथित प्रकार है । गणकतरङ्गिणी मे महामहोपाध्याय पण्डित सुधाकर द्विवेदी के लेख से भी मालूम होता है कि पूर्व कथित प्रवार श्रीपति ही का है। बहुत पहले से भी ज्योतिषको मे इस वात की प्रसिदि है कि इस प्रकार के रचयिता थीपति ही हैं। लेकिन वटेश्वरसिद्धान्त के स्पष्टाधिकारीय 'ज्याखण्डविना स्फुटीकरणाध्याय' के अधोलिखित श्लोव देखने से मालूम होता है कि पूर्वोक्तिप्रकार श्रीपति का नहीं है- चक्राशा भुजार्शविरहितनिहतास्तविहीनविभक्ता, खव्योमेप्ववेदैः सलिलनिहताः पिण्डराशिः प्रदिष्टः । पड्भाशघ्ना भुजांशा निजकृतिरहितास्तत्तुरीयांशहोन- भक्ता स्यापिण्डराशिविशिखनयनभूव्योमशीतांशुभिर्वा ॥ सिद्धान्तशेखर मे श्रीपति ने निम्नलिसित श्लोक मे ज्याविना इष्टज्या का चापानयन विया है--- ॥ "इएज्यया विनिहताः शरभास्कराशा ज्यापादयुक त्रिभगुरणेन हुता फलं तत् । त्यक्त्वा खनन्दकृतितः ८१०० पदमभ्रनन्दभागाच्युतं भवति धन्वविना ज्यकाभिः।" लेकिन इसीका आनयन वटेश्वरसिद्धान्त में निम्नलिखित रूप में है- त्रिभनवगुरणयुक्तो न्यातुरीयोऽत्र हारो विशिखरविसचन्द्र स्ताड़ितायास्तु मौा । खखविशिखखवेदैराहता वेटजीवा त्रिभगुरणकृतिघातज्यासमासेन भक्ता ॥ फलहीना नवतिकृतिस्तन्मूलेन च वर्जिता नवतिः । शेष धनुरथवा यन्त्रिज्याखण्डविनय फलम् इससे मालूम होता है कि उपर्युक्त दोनो प्रकार 'वटेश्वरसिद्धान्त' ही से लेकर श्रीपति ने सिद्धान्तशेखर' में लिखा है-(१) 'वटेश्वराभिषेन ज्योतिविदा विरचित एको- ज्योतिषसिद्धान्तअन्य प्रासीदिति तत्परनिभिरनेकानन्धकारस्थाविधातृभिश्च तन्मत- प्रतिपादनास्फुटमेव । परमय ग्रन्थ प्रायो लुप्त एवाभूदिति बहुधैव प्रतीयते । एतत्सम्बन्धे गणक्तरङ्गिण्याम “यथा ब्रह्मगुप्तेनार्यमतादीना खण्डन कृत तथैव वटेश्वरेण सिद्धान्ते बहुत्र ब्रह्मगुप्तखण्डन कृतमस्ति, अस्यैव 'कजन्मनोऽष्टी सदला समाययु' रित्यादिना ब्रह्मण प्रायु सार्धवर्षाष्टक गतमिति मत प् । अस्य सिद्धान्तग्रन्थो मया सम्पूर्णो न दृष्ट ग्वालियर महाराजा- श्रितस्य श्रीवालज्योतिर्विदो गेहेऽयमस्तीति श्रुत्वा तत्रासकृत्पर प्रेपित परन्त्र द्यावधि विम- प्युत्तर न प्राप्तम्" श्रीमान् म०म० सुधाकर द्विवेदिमहोदयो लिसितवान् । श्रीमान् भास्कराचार्य 'तथा वर्तमानस्य कस्यायुपोऽधंगत सार्धवर्षाष्टक पेचिदूच" इत्युक्त्या सार्धवर्षाप्टक वटेश्वरमतमेव लक्ष्यीकरोति । मुजालाचार्यकृत लघुमानसम्य इन्दूच्चोनाककोटिघ्नेत्यादि दृग्गणितक्यकृच्चन्द्रसस्कारविषये तट्टीया कृता लल्लाचायण + वटेश्वर-सिद्धान्त . श्लोक्यस्यास्यावरणमेवमुच्यते । “अथ चन्द्रस्य ग्रहसमागमच्छायाराङ्गोन्नतिहासाधने वटेश्वरोक्त सिद्धान्तोस्तहक्कर्मविशेष लोकद्वयेनाहेति"। अथ श्रीपतिनापि सिद्धान्तोसरे प्रहयुद्धाध्याये २४ श्लोकैवंटेश्वरसिद्धान्तानुमार एव चन्द्रस्य विलक्षण सस्कारो ब्रह्मगुप्त- लल्लाद्यनुक्त' प्राय उक्त इति । अश्व श्रीपतिना- धोजिष्णुजार्यभटलल्लवटेशसूर्यदामोदरप्रभृतयोऽपि च तन्त्रकाराः। शक्ताः प्रवक्त ममलामिह तन्तयुक्तिमस्मद्विधो जड़मतिस्तु कयं प्रवक्ति । इत्युक्त्यायभट ब्रह्मगुप्तलल्लाचार्य सममेव वटेश्वरस्यापि नामोल्लेख क्रियत इति बटेश्वरसिद्धान्त सर्वमान्य प्रासीदिति प्रतीयते । प्रत्र शङ्करवालकृष्णदीक्षितमतेन वटेश्वर- कृत एक वरणसारनामा ग्रन्य ८२१ शकाब्दे रचित इति श्रूयते यन काश्मीरत्याक्षाशा ३४६ एतन्मिता ग्रन्योक्त्या सिद्धयन्ति प्राय सर्वेऽपि ज्योतिषसिद्धान्तरचयितार एक करणग्रन्थमपि व्यवहारोपयोगिन रचितवन्त एवासन्निति वटेश्वरसिद्धान्तानुसारी करणसार इत्याख्यो ग्रन्थश्च घटेश्वरकृत प्रासीदिति च प्रतीयते परमधुना वटेश्वरसिद्धान्त , करणसारश्च न कुत्राप्युपलभ्यो वार्तागोचरी स्त इत्यलमतिविस्तरेण (२) । (१) यहा से लेकर (२) यहा तक सिद्धान्तशेखर के परिशिष्टस्थ लेख से भी मालूम होता है कि वटेश्वरसिद्धान्त के ऊपर अधिक श्रदा रहने के कारण श्रीपति ने पूर्वोक्तज्या और चाप का आनयन उसी सिद्धान्त से लेकर लिखा है और भुजकोटिज्यादिसाधनविना महर्गरण ही से ग्रहस्पष्ट करने के प्रकार वटेश्वरसिद्धान्त मे अधोलिखित हैं- स्वोच्चनीचपरिवर्तशेपकाद भूदिनैः कृतहतात्पदानि तु । शेषकान्त्रिगुरिणताद्गृहादितः पूर्ववच्च भुजकोटिसाधनम् मन्दजं बलभवं च तद्वतंभू दिनभंगरलितिकोद्धतः । खेचरस्य भगणावशेषकं संस्कृतं कलिकयाऽखिलं स्फुटम् ।। दो.फलेन सवितुश्चरासुभि स्वेन देशविवरेण चोक्तवत् । संस्कृतं कुदिनमाजितं भवेन्मङ्गलादिखचरः परिस्फुट ॥ यह विषय ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त, घटेश्वर सिद्धान्त और सिद्धान्त शेखर मे वसिव है, इस विषय को भास्कराचार्यादि ने अपने सिद्धान्तग्रन्थो मे क्यो नहीं लिखा इसको वे ही लोग जान सकते हैं । श्रीपति ने इस विषय को ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त या वर्टवरसिद्धान्त में लिया होगा क्योंकि उनके सामने दोनो सिद्धान्त मादर्शरूप में उपस्थित थे । ॥ अन्य सिद्धान्तमन्यो में जैसे अन्य अधिकार सब अलग अलग से है ही पाताधिकार भी पृथक् ही है परन्तु वटेश्वरसिद्धान्त में स्पष्टाधिकारान्तर्गत ही पाताध्याय है, पाताधिकार सम्बन्धी सब विषय स्पष्टाधिरारान्तर्गत ही वरिणत है, सिद्धान्तशेपर के पाताध्याय में वरिगत सब विषय प्राह्मस्फुटसिद्धान्तोक्न या वटेश्वरसिद्धान्तोक्न हैं इन दोनो सिद्धान्तोक्त विषयों से बुध भी विशेष बात नहीं है। इस सिदान्त में स्पष्टाधिकार सम्बन्धी प्रश्नाघ्याय भूमिका भी उसो (स्पष्टाधिकार) के अन्तर्गत है और इस अधिकार मे प्रस्फुटीकरण के अलग अलग अध्याय हैं । जैसे- मूर्याचन्द्रमसो स्फुटीवरणविधि प्रथम । स्वोच्चनीचग्रहस्फुटीकरविधिद्वितीय । प्रतिमण्डलस्पष्टीकरणविधिस्तृतीय । ज्याखण्डविना स्फुटीवरणविधिश्चतुर्थ । फ्लज्या- स्फुटोकरणविधि पञ्चम । तिय्यानयनविधि पछ । प्रश्न विधि सप्तम । यह कम और क्सिी सिद्धान्त ग्रन्थ में देखने में नहीं आता है, वर्णानयन के विषय में भी इस ग्रन्थ में बहुत पहा गया है जो भास्करादि सिदान्त में नहीं है ।। त्रिप्रश्नाधिकार मे भी प्रतिपादन शैली प्रार्यभटादि प्राचीनाचार्य और उन (वटेश्वर) से नवीनाचार्य (श्रीपति भास्कर प्रादि) से विलक्षण ही देखने म पाती है, जैसे-विपुवच्छा. यानयनविधि प्रथम । लम्बाक्षज्यानयनविधिद्वितीय । क्रान्तिज्यानयनविधिस्तृतीय । धुज्यानयनविधिश्चतुर्थ 1 कुज्यानयनविधि पञ्चम अग्रानयनविधि पप्ठ । स्वचराध- प्राणज्यासाधन विधि सप्तम । लग्नादिविधिरप्टम' । द्यु दलभादिविधिर्नवम । इप्टच्छाया- विधिदशम सममण्डलप्रवेशविधिरेवादश । कोणशकुविधिदिश । छायातोऽनियन- विधिस्त्रयोदश । छायापरिलेखविधिश्चतुर्दश । प्रश्नाध्यायविधि. पञ्चदश । इन अध्यायो मे वरिणत विषयो के देखने से ग्रन्थकार के अद्भुत पाण्डित्य का परिचय मिलता है। मूर्यसिद्धान्त, ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त, वटेश्वरसिद्धान्त और सिद्धान्तशेखर मे कोणशकु साधन प्रकार एक ही तरह के है । परन्तु वटश्वरसिद्धान्त म अनेक प्रकार से उसका साधन किया गया है । कोरणशकु साधनविधि नामक अध्याय म तृतीय श्लोक से नवम श्लोक तक बहुत जगह लघु सज्ञक के भेद से वे दिखलाये गये है जैसे 'इष्टश्रवणाभ्यस्ता अग्रास्त्रिज्योढ़ता लघुका' इत्यादि, धृतिगुरिणतास्त्रिगुणहृता अनातिवृत्तगा भवन्ति लघुका , इत्यादि, 'वाऽग्रा- स्तदृतिगुणितास्त्रिज्याभक्ता भवन्ति तद्वृतिगा । लघका हि विदिड नार' इत्यादि इनके अतिरिक्त सब प्राचार्यों ने केवल एक ही प्रकार से कोरणशकु का प्रानयन किया है केवल श्रीपति ने सिद्धातशेखर म अन्य प्राचार्यों की अपेक्षा अधिक प्रकार लिखे हैं, भास्कराचार्य ने अप्राकृति द्विगुरिणता त्रिगुणस्य वर्गात' इत्यादि से असकृत्प्रकार द्वारा जो कोणाकु का साधन किया है उसका मूल 'इप्टानान्तरकृत्या द्विगुरिणतयोदग्वियुक्' इत्यादि वटेश्वरोक्त या 'इनारकाया सहितोनिताया इप्टेन' इत्यादि श्रीपत्युक्त प्रकार ही हो सकता है, लेकिन कोणशकु साधन प्रकार क्सिी प्राचार्य का ठीक नही है। भास्करोक्तकोण श कुसाधन मा खण्डन उत्तरगोल मे- "युग्माश्वोनाक्षप्रभावर्गनिनी बाराध्य शज्याहिकावविभक्ता। अक्षच्छायावर्गयुक्तं . फलाच्च दनान्यूना स्याखिल सो यगोले ॥" इससे महामहोपाध्याय सुधाकर द्विवेदी ने किया है और दक्षिण गोल में उसका खण्डन सिद्धान्तशिरो की टिप्पणी मे संशोधक (महामहोपाध्याय वापूदेव शास्त्री) मे निम्नलिखित पद्य से किया है।
१२ वटेश्वर-सिद्धान्त "अक्षप्रभाकृतिविहीनदिनिनः पञ्चाधिभागजगुरगो विहृतो द्विकाश्वः । अक्षप्रभाकृतियुत : फलतोऽनकाच्च न्नाऽल्पा तदा न सदिद रवियाम्यगोले।" भास्कर प्रकार के उपर्युक्न खण्डन से ही उसके मूलभून वटेश्वरसिद्धान्तोक्न और श्रीपत्युक्न कोणदाकु प्रानयन का भी सण्डन समझना चाह्येि । जिम देश मे सत्रह अङ्गल मे अधिक पलभा है वहा उत्तर गोल मे चार कोणाकु उतन्न होते हैं और दक्षिण गोल में कोणा ' का प्रभाव होता है इस भास्करोक्न वासना भाप्योक्न वा मूल प्राचीनोक्तकोण- शंकु साधन हो है । इच्छादिक् छायानयन के लिए 'मममण्डलप्रगविधि" मे इष्टकोण ग कु साधन किया गया है। भास्कराचार्य ने 'प्यासाध वर्ग पलमाकृतिघ्नो दिग्ज्यावृति- दिशवर्गनिघ्नो । तत्मयुति स्यात्' इत्यादि मे इस्टच्छायाकर्णमापन किया है, वस्तुत भास्करोक्त प्रकार का मूल वटेश्वर प्रकार ही है । मूर्यमिद्धान्त कार और मिद्धान्त शेखरकार इम विषय मे कुछ भी नहीं कहते हैं इसोमे मालूम होता है कि भास्कराचार्य का उपयुक्त प्रकार अपना प्रकार नहीं है, नियनाधिकार के आदि मे वटेश्वराचार्य ने अनेक प्रकार से दिग्ज्ञान क्यिा है जिनम कुछ प्रकार अन्य मिद्धान्तो म नही पाये जाते हैं । भाभ्रम के सम्बन्ध से दिक्ज्ञान प्रकार वटेश्वराचार्य का जैमा है तदनुरूप ही श्रीपति का प्रकार भी है, घायाभ्रमण मार्गज्ञानार्थ 'इप्टेन्हि मध्ये प्राक् पश्चाद् धृते वाहत्रयान्तरे । मत्स्यद्वयान्तरयुने' इत्यादि से सूर्यसिद्धान्त- कार और 'अग्रेषु चिन्हानि विधाय वृत्तमियोऽवगाहै ' इत्यादि से लल्लाचार्य ने जो युक्ति दिखलाई है वटेश्वराचार्य भी तदनुस्प ही कहते हैं, ये मव प्राचार्य छायाभ्रमण मार्ग वृत्ता- पार स्वीकार करते हैं उसी के सम्बन्ध मे दिवज्ञान भी किये हैं, परन्तु मेए से अतिरिक्त साक्षदेश में छायाभ्रमण मार्ग सदा वृत्ताकार नही होता है इसलिए सिद्धान्तशिरोमणि के गोलाध्याय मे भास्कराचार्य ने 'भावितयाभाभ्रमण न सत्' इत्यादि से उन लोगो के वृत्ताकार छायानमण मार्ग का खण्डन किया है जो कि बहुत ही युक्तिमङ्गत हैं । यद्यपि छायाश्रमण मार्ग कमा होता है इसके सम्बन्ध में भारतराचार्य ने अपना विचार कुछ भी नहीं व्यक्त किया तथापि मव देशो म सदा छायाभ्रमरण मार्ग वृताकार नहीं होता है इस विषय को सबमे पहले वे ही समझ सके । सूर्य मिद्धान्तकार ने छायाभ्रमण मार्ग वृत्ताकार होता है इस बात को कहकर उससे और कुछ काम नहीं लिया है जैसा कि वटेश्वराचार्य श्रीपति ने उससे काम (दिक्ज्ञान) लिया है जो ठीक नहीं है वटेश्वराचार्य के विप्रश्नाधिकार के प्रदनाध्याय में जो भनेक प्रकार के प्रश्न हैं उनमे बहुत प्रश्नो के उत्तर सिद्धान्त शेखर मे पाये जाते हैं, मेपादि राशियो के निरक्षोदय मान साधन प्रकार ब्रह्मगुप्त वटेश्वर थीपति प्राचार्यों के एक ही तरह के हैं, स्वदेशीय राश्युदय मान से लग्नानयन प्रकार वटेश्वराचार्य और श्रीपति के एक ही तरह के हैं लग्नानयन म कुछ विशेष बातें नहीं कहते हैं, मध्य सिद्धान्तो की अपेक्षा इन दोनो प्राचार्यों के सिद्धान्तो में विशिष्ट वान य हैं 'स्वदेशीय राश्युदय विना विलग्न मोर काल साधनप्रकार तथा स्वदेशीयोदय विना रवि और लग्न के अन्तरामु साधन प्रार' चन्द्रग्रहणाधिकार में रवि और चन्द्र से स्फुट बनावणं साधन प्रबार वटेश्वरसिद्धान्त में जसा है उसबै सदृश ही मिद्धान्तशिरोमरिण में 'मन्दध्रुतिक्श्रुितिवत्प्रसाध्या तया विभग्या द्विगुणा विहीना । विज्यावृति शेषहृता स्पृटा स्याल्लितातिस्तिग्गरचेविधोत्र ॥ भास्कराचार्य पावार है । भाउ तर ज्योतिपियो को यही धारणा थी कि यह प्रकार भास्कराचार्य का है -सब भूमिका परन्तु वटेश्वरसिद्धान्त के प्रकाशित होने पर उसमे उस प्रकार को देखकर वह धारणा दूर हो जायण, इस सिद्धान्त (वटश्वरसिद्धान्त) मे छाद्य और छादक निर्णय में और रवि, चन्द्र और भूभा विम्बानयन में कहीं भी राहु या भूभा का नाम स्पष्ट नहीं कहते है- जगह उसके स्थान पर तम कहते है, लेकिन मध्यमाधिकार मे "खण्डयति तमोऽर्धन क्षपाकर तिग्माशु विधुदलेन । राहुन च ग्रहण प्राहुस्ने समस्त प्राचार्या" ग्रन्थकार के इस लेख से मालूम होता है कि ये राहुकृत ग्रहण ही मानते हैं, इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि इस अधिकार मे जहा जहा 'तम' शब्द का प्रयोग इन्होने किया है उन सव स्थलो मे उससे राहु ही को समझना चाहिए। सिद्धान्तशेखर मे श्रीपति ने 'राहुनिराकरणाध्याय लिखा है लेकिन राहुविम्बानयन और भूभाविम्वानयन दोनो उक्त ग्रन्थ में देखने है इससे मालूम होता है कि उनके मन मे निश्चय नहीं था कि राहुकृत चन्द्रग्रहण होता है या भूभाकृत भास्कराचार्य सिद्धान्तशिरोमरिण के गोलाध्याय मे छाद्य और छादक के निर्णय के सम्बन्ध में कहते है "अश्छादकाच्चन्द्रच्छदक पृथुतरोऽवगम्यते, कुत । यतोऽर्धखण्डितस्येन्दो विषाणयो कुण्ठता दृश्यते स्थितिश्च महती। अर्कस्य पुनर,खण्डितस्य तीक्ष्णता विषाणयो स्थितिश्च लघ्वी। एतत्कारणद्वयानुपपत्त्याऽर्कस्यच्छादकोऽन्य स च लधु । एव रवीन्द्वोनं च्छादको राहुरिति वदन्ति । कुत । दिग्देशकालावरणादिभेदात् । एकस्य प्राकस्पर्श । इतरस्म पश्चात् । रये क्वापि ग्रहणमस्ति क्वापि नास्ति । क्वापि दन्तिादग्रत क्वापि पृष्ठत । अतो राहुकृत न ग्रहणम् । नहि यह्वा राहव । एव के वदन्ति । वेवलगोलविद्यास्तदभिमानिनश्च । इद सहिता- वेदपुराणवाह्यम् । यत सहितामु राहुरष्टमो ग्रह ‘स्वर्भानुहं वा पासुर मूर्यतमसा विव्याध" इति माध्यन्दिनीश्रुति । सर्वं गङ्गासम तोय सर्वे ब्रह्मसमा द्विजा । सर्व भूमिसम दान राहुप्रस्ते दिवाकरे ॥ इत्यादि पुराण वाक्यानि । अतोऽविरुद्ध मुच्यते । राहुरनियतगतिस्तमोमयब्रह्मवर- प्रदानाद्भूभा प्रविश्य चन्द्र छादयति चन्द्र प्रविश्य रविं छादयतीति सर्वागमानागवि रुद्धम् वही पर राहु का विम्वादिसाधन नहीं किया है ग्रहण म राहु की कुछ जरुरत नहीं है, राहु की अनियतगति के कारण और ग्रहण म स्पर्शादि की निश्चित दिशा के कारण राहुकृत ग्रहण का खण्डन स्पष्ट ही है । बडे दूरदर्शी ग्रहो से वर पाय हुए वटश्वराचाय ने भी स्पष्टरूप से भूभा का नाम निर्देश नहीं किया है यह बहुत आश्चर्य है। भूभा (राहु) विम्यानयन वटै- स्वराचाय न जिस तरह किया है, तदनुरूप ही श्रीपति और भास्वराचार्य ने किया है, इन सब के मत से 'वधित रविवर्ण चन्द्रकक्षा मे जहा पर लगता है उस विन्दु म मूर्यबिम्य और भूबिम्ब की क्रमस्पर्स रेपा के ऊपर जो लम्ब करेंगे वही भूभा व्यासाचं प्राता है, लेकिन यह पदों के लिए उपयुक्त नहीं है इसलिए उन सब के मत ठीर नहीं हैं। वर्धितरविकर्ण और चन्द्रकला ये योगविन्दु से उसी रेखा (वधितरविवर्ण) के ऊपर जो लम्बरेसा होती है उमो मुनीश्वर भूभाव्यासाचं कहते है । यह भी पूर्वोक्त कार्य के लिए अनुपयुक्त है, प्रत इनका भी मत ठीक नहीं, स्पर्शरेखा और चन्द्रकला के योग विन्दु से मध्यरेखा (वधित- रविकर्ण) के ऊपर जो लम्ब रेखा होती है वही वास्तव भूभाव्यासार्ध है जिसका साधन वटेश्वर सिद्धान्त सिद्धान्त तत्वविवेद में यमलावर ने दिया है जो कि बहुत ही टीक है। म. म. पगित सुधाकर द्विवेदीजी ने वास्तव भूमाविम्बानियन किया है, सनोधकौक्त भूमाविम्बानियन ठीक नहीं है । वटेश्वराचार्य में रवि, चन्द्र और भूभा (राह) के योजनात्मक विम्बो के कलात्मकी- करण के लिए जो नियम कहे हैं सो ठीक नहीं हैं। पीपति और भास्कराचार्य का भी विम्द. क्लानयन तत्सदमा ही है। इन पाचार्यों ने स्थित्यर्ध और विमर्ष के साधन प्रसवृत्मकार से किये हैं, सकरप्रकार से उनके (स्थिन्यर्घ और विमर्ष) प्रानयन सिद्धान्तशिरोमरिंग की टिप्पणी मे म०म० पण्डित वापूदेवदाबी (मशोधक) और सूर्य सिद्धान्त की मुधावपिणी टीका में म० म० पण्डित सुधाकर द्विवेदी ने किया है, ये दोनो प्रकार वटेश्वराचार्योक्न स्पित्य और विमदा के भानयन स्थल में हमने दिखलाये हैं, माधवलन और आयनवलन के साधन उत्मज्याविधि हो से इनका भी है जैसा लल्लाचार्यकृत है । शिष्यधीवृद्धिद में लल्लोक्न साधन मधोलिखिन है। स्पर्शादिकालजनतोत्क्रमशिन्जिनीमिः क्षुण्णाक्षभा पलभवधवरणेन भक्ता। चापानि पूर्वनतपश्चिमयोः प्रमेण सौग्येतराणि समवेहि यथाक्रमेण ॥ ग्राह्मात्सराशित्रितयाद् भुजज्याव्यस्ता ततः प्राग्वदपरमश्या । तस्या धनुः सतिगृहेन्दु दिक् स्यात्क्षेपो विपातस्य विधोदिशि स्यात् ।। अपक्रमक्षेपपलोद्भवाना युतिः क्रमादेकदिशा कलानाम् । कार्यो वियोगोऽन्यदिशां ततो ज्या ग्राह्या भवेत्सावलनस्य जीवा ॥ सिद्धान्तोसर मे श्रीपति ने भी वलनो के पानयन इसी तरह किये है, प्रायनवलन और माक्षवलन के सस्कार करने से स्पष्ट वलन होता है। लेकिन लल्लाचार्य वटेश्वराचार्य और, श्रीपति प्राचार्य प्रायनवलन प्राक्षवलन और शर इन तीनों के सस्वार (योग पौर वियोग) स्प सष्ट वलन रहते हैं, पर सस्कार जो दिये हैं सो ठीर नहीं है 'दलनानयने क्षप शितो- यस्ते कुवुद्धय' इत्यादि मे भास्कराचार्य ने उसका खण्डन युक्तियुक्त किया है। उन प्राचार्यो के उरमज्या प्रकार में साधित बलनो के खण्डन भी उनके बहुत पाण्डित्यपूर्ण है । कमला• वर ने सिद्धान्ततत्वविवेक मे आक्ष ग्लन और प्रायनावलन के बिना ही सप्ट वलनानयन किये हैं जो बहुत ही सुन्दर है । अङ्ग ललिप्तानयन भी पिसी भाचार्य का ठीक नहीं है, वटेश्वराचार्य ने उन्नत जातानुपात से उसका पानयन किया है। श्रीपति और भास्कराचार्य दो प्रकार से (सइक्दनुपात से और उन्नत कालानुपात से) उसका पानयन क्यिा है । भास्करा- चार्य कहते हैं दिशश्चनुमान से जो पन माता है वह मूक्ष्म मे और उन्नत कालानुपातागत फल स्कूल है, लेकिन सूक्ष्मभाव और स्यूलत्व का ज्ञान होना बहुत कठिन है। भास्कराचार्य को कैसे उगका पता चला सो नहीं कह सकते हैं । इस ग्रन्थ में चन्द्रग्रहण परिलेस रविरह- पाधिकार में परिले सविधि नामक अध्याय में है रविमहाधिकार ही के अन्तर्गत पर्वतान विधिनामक पञ्चमाध्याय है, परन्तु सिद्धान्तशेखर में सूर्यग्रहणाध्याय के दाद पर्वसम्भ- वाध्याय है, सिद्धान्तशिरोमणि भे पौर सिद्धान्ततत्त्वविवेव म चन्द्रग्रहसाधिकार से पहले प्रर्यसम्भवाधिकार है, इन भिन्न भिन्न लेखकम मे अपनी-अपनी रुचि ही धारण कह सकते हैं।
भूमिका १५ इस पुस्तक के सम्बन्ध मे सन् १९४१ मे मेरे मन में विचार उत्पन्न हुअा, कि भारत के छ शास्त्रो मे से नेत्ररूप ज्योतिपशास्त्र की ग्रोर भारतीय जनता का कोई ध्यान नहीं है जिस कारण यह दिन-प्रतिदिन अवनति की प्रोर जा रहा है, क्यो न इसकी रक्षा की जाय । तभी मैंने प्रतिज्ञा की कि यथाशक्ति मैं अपने जीवन मे ज्योतिपशास्त्र की उन्नति के लिये कार्य वरूगा। यह कार्य कोई लघु कार्य नहीं था, क्योकि इसमे ज्योतिप का प्रचार, प्राचीन हस्तलिखित प्रथो का प्रकाशन एव भारत तथा अन्य देशो, विभिन्न राज्यो एव स्थानो पर उपेक्षित पढी हुई ज्योतिष पुस्तको को खोज तया उनका सम्मादन, मुद्रण एव प्रकाशन प्रादि कार्य है । इस वृहत् कार्य साधन के लिए तो सस्था' पो आवश्यक्ता होती हैं जो इस कार्य को अग्रसर करे तथा शुभ परिणाम तक पहुचा सके। प्रत तभी एक संस्था स्थापित करने का विचार पाया और ५ दिसम्बर सन् १६४३ को लाहौर के प्रोरियण्टल कालेज के प्रिसि- पल डा. लक्ष्मणस्वरूप डी लिट् महोदय द्वारा 'कुशल ज्योतिष कार्यालय' नामक सस्था का उद्घाटन कराया। उद्घाटनवाल मे गोस्वामी ईश्वरदास जी (भारत बैंक के डिस्ट्रिक मैनेजर) ने सभा की अध्यक्षता की। उन्ही दिनो ज्यौतिप का वार्य प्रारम्भ कर दिया और ज्योतिष के तीन अगो- सिद्धान्त, होरा, सहिता में से होरा शास्त्र की, प्राचार्य हेमप्रभ सुरी रचित 'प्रैलोक्यप्रकाश' नामक पुस्तक को पाठान्तरो सहित हिन्दी टोकायुक्त १९४५ मे प्रकाशित किया। तदनन्तर सन् १९४७ मे भारत स्वतन्त्र हुआ तथा पजाव का विभाजन हो गया। तब हमने भी पजाब छोडकर भारत की राजधानी दिल्ली में अपना ज्यौतिप अनुसन्धान केन्द्र बनाया। ज्योतिप को पूर्ण रूप से समुन्नत करना एक व्यक्ति के वश का कार्य नही जब तक कि इस कार्य में जनता का सहयो। प्राप्त न हो। यह विचार कर मैंन श्री वृजलाल जी नेहरू एव अन्य सदस्यो के समक्ष जनता सरक्षण सस्था (Public body) बनाने का एण्ड प्रस्ताव रखा और उन कृपालु महानुभावो ने “इण्डियन इन्स्टीच्यूट प्राफ अस्टोनोमिकल सस्कृत रिसचं' नामक संस्था का मूत्रपात किया उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुरयमन्त्री माननीय श्री डा० सम्पूर्णानन्द जो के करकमलो से इस बृहज्योतिष सस्था का उद्घाटन कार्य सम्पन्न हुआ । तदनन्तर सस्था ने अपने कार्य का ज्योतिप-विज्ञान 'नामक' मासिक पत्रिका के रूप में श्रीगणेश किया । प्राचार्य वटेश्वर का नाम मैंने अलबेल्नी की भारतयात्रा मे पढा। अलबरूनी ने लिखा है कि वटेश्वर-सिद्धान्त नाम का एक उत्तम ग्रन्थ भारत मे है जिसमे ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त पर मालोचना की गई है । मेरे मन मे उत्कण्ठा थी कि यह ग्रन्थ मुझे प्राप्त हो जाये। इसके बाद "गणकतरगिणी"मे भी महामहोपाध्याय सुधाकर द्विवेदी रचित के 'स्वाध्याय' से १६ वें पृष्ठ पर वटेश्वराचार्य प्रणीत 'वटेश्वरसिद्धान्त' के न प्राप्त होने की विवशता देखी । इससे उत्कण्ठा और भी बढी । इस पुस्तक के लिये मैंने प्रयत्न शुरू किया । भारत में वटेश्वर-सिद्धान्ते विहार, काश्मीर एव अन्यान्य राज्यो में मैंने गकर हस्तलिखित प्रति की प्राप्ति का प्रयल विया किन्तु कही भी यह पुस्तर उपलब्ध न हुई । अन्त में मैंने इसकी खोज लाहौर- स्थित विश्वविद्यालय के वृहत पुस्तकालय में की और वहा मेरा मनोरथ पूर्ण हुमा । मुझे पहा हस्तलिखित प्रति उपलब्ध हो गई। तदनन्तर मैंने श्री जगदीश शास्त्री एम ए एम श्री एल द्वारा 'वटेश्वरसिद्धान्त' की प्रति को वही बैठकर नकल करवाया। इस प्रकार यह महान् ज्योतिपग्रन्थ प्राप्त हुमा । पुस्तक ता प्राप्त हो गई किन्तु उसी रूप म मुद्रण कगने से कोई लाभ नहीं दिखाई देता था इसलिए मैंने उसे भाप्य, उपपत्ति और हिन्दीभापानुवाद सहित छापने का विचार किया किन्तु पर्याप्त समय तक इस कार्य को सुसम्पन्न करने के लिए किसी योग्य ज्योतिषी की खोज में रहा, अन्त में श्री पडित विश्वनाथ झा द्वारा सिद्धान्त ज्योतिप के प्रकाण्ड पडित मुकुन्दमिश्र ज्योतिषाचार्य का पता चला । उन्ह इस कार्य का सुसम्पन्न करने के लिये मैंने युलाया । उन्होने अपने महान परिश्रम से इस पुस्तक के सम्पादन, सस्कृत भाष्य, उपपत्ति और हिन्दी टीका प्रादि म मुझे पूर्ण सह्योग प्रदान किया । इस प्रकार यह पुस्तक प्रभी तीन अधिकार के इस विशाल स्वरूप म आज प्रापके समक्ष प्रस्तुत है । इमसे ज्योतिष के प्रचार म कितना कार्य होगा तथा इस पुस्तर से ज्योतिष महानुभाव कितने अग्रसर हो सकेंग-यह वात विद्वन्मुण्डली पर ही छोडता हूँ। - प्राभार ग्रहण इस कार्य में ज्योतिप के परम विद्वान् श्री ५० विश्वनाथ भा ज्योतिषाचार्य ने मुझे जो होरा तथा गणितकार्य म सह्याद प्रदान किया है उसके लिए मैं उनका हृदय प्राभार स्वीकार करता हूँ। प्रूफ पढ़ने में महान सहायक विद्याभास्कर लक्ष्मीनारायण शास्त्री तथा इस कार्य की सम्पन्नता के लिये मैं भारत सरकार के सास्कृतिक व वैज्ञानिक विभाग तथा प्रातीय सरकारो और अपने सस्था के सदस्यो का अनुगृहीत हूँ। भृगु प्राधम विदुपाम् मनुचर नई देहली ३१.१०६१ रामस्वरूप शर्मा भूमिका पानन्दपुरनामके नगरे श्रुतिस्मृति-धर्मानारविचारबुशलो महदत्तभट्ट- नामको द्विज आसीत्, तत्पुत्रो लब्धग्रहप्रसादः सकलज्योतिपिकसार्वभौम प्रस्तुत- ग्रन्थ (वटेश्वरसिद्धान्त) रचयिताऽतिप्रतिभावाञ्छ्रीमान् वटेश्वराचार्यों द्विशून्याप्ट- (८०२) मिते शाकव जन्म लेभे । अानन्दपुर प्राय. पञ्चनद (पञ्जाव) प्रदेशान्त- र्गतमस्तीति जनश्रुत्या ज्ञायते । स्वनामसज्ञिते सिद्धान्ते (वटेश्वरसिद्धान्ते) प्रत्ये- काधिकारसमाप्तिस्थले 'इति श्रीमदानन्दपुरीयमहदत्तभट्टसुत वटेश्वरविरचिते स्वनामसज्ञिते स्फुटसिद्धान्त' इत्यादि ग्रन्थकारलेखादपि ज्ञायते यदयमा- नन्दपुरवास्तव्य पासीत् । पञ्चनदप्रदेशान्तर्गत यदानन्दपुर तदेवतस्याऽनन्द- पुरमुत तद्भिन्न तन्निरर्णायकप्रमाणाभावान्निणेनु न शक्यते । अस्तु, जन्मसमया- चतुर्विशतिमिते वयसि प्रस्तुतग्रन्थ स्वनामसजित सिद्धान्त ग्रन्थकारो रचितवा- निति तदुक्त ग्रन्थवचनाद् ज्ञायते, तदुक्तश्लोकश्चय था- 'शकेन्द्रकालाद् भुजशून्यकुञ्जरै (८०२) रभूदतीतर्मम जन्म हायनः । अकारि सिद्धान्तमितः स्वजन्मनो मया जिनान्दै (२४) र्यु सदामनुग्रहात् ॥" अय निस्कन्धज्योतिष (सिद्धान्त सहिता-होरा) शास्त्रनिपुणात्स्वसमये- ऽद्वितीयात् काव्यकलाभिज्ञाज्ज्योतिपिकाच्छ्रीपते (जन्मसमय शकाब्द ६२१ रप्यतिप्राचीन आसीदिति द्वयोर्जन्मसमयावलोकनेनैव स्फुटीभवति । लुप्तप्रायस्यैत सिद्धान्तरत्नस्य विद्वत्समाजेषु प्रचूर प्रचार प्रासीदिति भास्कराचार्यविरचित सिद्धान्तशिरोमणेप्टिप्पणीस्थात् 'कजन्मनोऽधौ सदला समाययु ' वटेश्वरसिद्धान्तीय वचनाद् ब्रह्मायुपि तत्सिद्धान्तीयग्रहादिभगणपाठदर्शनाच्च ज्ञायते यद् 'अतो युज्या कुर्वते ता पुनर्येऽप्यसत्स्वेषु तेभ्यो महद्भ्यो नमोऽस्तु' सिद्धान्तशिरोमणिस्थ भास्क रकृतोऽयमाक्षेपो वटेश्वराचार्य लक्ष्यीकृत्यनास्ति, गणक्तरङ्गिण्यामेतत्सिद्धान्त- ग्रन्थविपये महामहोपाध्याय-पण्डितसुधाकरद्विवेदिमहोदयलेखादप्यस्य प्रचुर- प्रचारे न कश्चित्सन्देहः। वटेश्वराचार्य आर्यभटमतपोपको ब्रह्मगुप्तमतविरोधी चाऽसीत् । आर्यभटीयगीतिकापादे प्रार्यभटकृतमङ्गलाचरणस्य- "ब्रह्मकुशशिबुध-भृगु-रवि-कुज-गुरु-कोरण-भगरणान्नमस्कृत्य । आर्यभटस्त्यिह निगदति कुसुमपुरेऽभ्यचितं ज्ञानम् ॥"
पश्यत्यचल वटेश्वर-सिद्धान्ते अस्यानुम्पमेव ग्रहकक्षास्थितिक्रमानुसार मङ्गलाचरण स्वसिद्धान्ते कृत- वान् । यथा- "ब्रह्मावनीन्दु-युध-शुक्र-दिवाकरार-जोवार्क-सूनु-भगुरून पितरौ च नत्वा । ब्राह्म ग्रहक्षं गणित महदससूनुर्वक्ष्येऽखिल स्फुटमतीव वटेश्वरोऽहम् ।।" परन्त्वार्यभटीयगीतिकापादे एकस्मिन् युगे ४३२०००० भूभगरणा = १५८२२२७५०० एतावन्तो भवन्तीति कथयित्वा "अनुलोमगतिनास्थ विलोमग यद्वत् । अचलानि भानि तद्वत्समपश्चिममानि लङ्कायाम्" अनेन भूभ्रमण म्वीकरोत्यार्यभट । पर वटेश्वरेण भूभ्रमण न स्वीक्रियते, तत्खण्डनमपि न क्रियते आर्यभटीयटीकाकारेण परमेश्वरेण कथ्यते यद्वस्तुत स्थिरैव भूमि'। आर्यभट- मतस्यास्य खण्डन ब्रह्मगुप्त न कृनम् । यदि कथयिष्यते यद् ब्रह्मगुप्त न यथाऽम्य मनस्य खण्डन बहुन स्थले मृत तथैवानापि कृतम् । आर्यभटमतखण्डनकरण तत्स्व भाव , परन्तु तनहि। प्रार्यभटेन स्वयमपि पूर्वम् 'अनुलोमगति स्थ' इत्यादि लिखित्वा "उदयास्तमयनिमित्त नित्य प्रवहेण वायुना क्षिप्त । लङ्कासमपश्चिमगोभपञ्जर स ग्रहो भ्रमति ॥" अनेन भूभ्रमण नहि स्वीक्रियते । आर्यभटस्य स्वमनस्यप्येव 'पृथ्वी स्वाक्षो- परि भ्रमति' दृढधारणा नाऽसोऽदिति तल्लेखादेव ज्ञायते। ग्रहादिभगणादीना साधनार्थ गरिणत भूभ्रमणाधारकमस्तीत्येतदर्य काऽपि प्रक्रिया नावलोक्यते तस्मा- देव कारणात्तन्मतसमर्थवेन वटेश्वराचाण भूभ्रमणविषयक तन्मत नाङ्गी- कृतम् । वस्तुतस्तु आकाशे ये ग्रहादिपिण्डास्ते परस्पराऽऽकषणवशतश्वलन्त्येव परन्तु गणितज्ञा ग्रन्थ रचयितारो वा यन पिण्डे निवसन्ति ते त पिण्ड तदितराश्च ग्रहादिपिण्डान् भ्रमणशीलान् स्वीकुर्वन्ति । पृथिव्या स्थिरत्वस्वीकरणेऽप्ययमेव हेतु', आर्यभटसदृशमेवारमाक प्राचीना अर्वाचीनाश्वाऽऽचार्या भूभ्रमण जानन्ति स्म परन्तु यथाऽऽर्यभटेन स्पशब्देन भूभ्रमण व्यलेखि तथा तदुल्लेखे पूर्वकथित- कारणमेव कारणम् । अस्तु, मङ्गलाचरणानन्तर वटेश्वराचार्य मुन्यादिरचित- तद्विपयकग्रन्थवलेनाऽश्मनि ग्रन्थरचनक्षमत्व प्रदश्यं ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तोक्त- युगादिमान ग्रहभगणादिमानञ्च विमपि समीचीन नास्ति तन्मतनिराकररणार्थ- मुन्यादिरचितशास्मसमत ग्रन्थरचनावश्यकताञ्च ज्ञात्वा तद्रचना करोतीनि- 'श्रुत्युत्तमाङ्गमिदमेव यतो नियोग. कालेऽयनर्तु-तिथि-पर्व दिनादि पूर्वे। वेदो ककुन्नवन-कुण्ड-तदन्तरादि ज्ञेय स्फुट थति विदा बहुमत्यमस्मात् ॥' अनेन स्वरचितज्यौतिपनन्धे (वटेश्वरसिद्धान्ते) वेदस्य प्रधानाङ्ग (नेस) त्व प्रदर्शयति, परमेतस्य वेदस्य प्रधानाङ्गत्वात्ले पामेतत्पठनेऽधिकार एतस्मिन् विपये यथान्यराचार्य. कथित तथाऽनेन न कथ्यते । एतद्विपये भास्करेणैव कथ्यते। ।
भूमिका १६ तस्माद द्विजरध्ययनोयमेतत्पुण्य रहस्यं परमं च तत्त्वम् । यो ज्योतिष वेत्ति नरः स सम्यक् धर्मार्थकामान् लभते यशश्च ॥ महाभाष्यकारेणापि 'ब्राह्मणेन निष्कारण पडङ्गो वेदोऽध्येतव्यो ज्ञयश्च' कथ्यते, एतद्विपये सिद्धान्तशेखरादिग्रन्थेषु बहुलिखितमस्ति, एतदाचार्यकथितसिद्धा. न्तग्रन्थलक्षणेऽपि भास्करकथिततल्लक्षणत किञ्चिन्यूनत्वमस्ति, भास्करोक्ते 'प्रश्नास्तथा सोत्तरा , यन्मादि यत्रोच्यते, इत्यस्ति परमन सिद्धान्ते प्रत्येकाधिकारे तत्तदधिकारसम्बन्धिन प्रश्ना सन्ति, तदुत्तराश्च न सन्ति, यन्नादेरपि चर्चा नास्ति, अन्येषु प्राचीनज्योतिपसिद्धान्तग्रन्थेषु नवीनसिद्धान्तग्रन्थेषु च 'चतुर्युग- सहस्रण ब्रह्मणो दिनमुच्यते' इति पुराणकथितब्रह्मदिनतुल्यमेव ब्रह्मदिन वरिण- तमस्ति परन्त्वार्यभटीये वटेश्वरसिद्धान्ते चाऽधिकसहस्रयुगैस्तद्दिन कथ्यते, तथ- तयोर्मतेन युगचरणमानान्यपि समानान्येव सन्ति, किन्त्वेतदतिरिक्ताचार्यमतेन युग- चरणे स्वसादृश्यमस्ति, मनुमानेऽपि मतभेदोऽस्ति पूर्वकथितसिद्धान्तग्रन्थद्वये द्विसप्ततियुगैरेको मनुरुक्तोऽस्ति, पुराणेषु वटेश्वराऽर्यभटातिरिक्ताऽचार्यसिद्धान्तेषु चैकसप्ततियुगैर्मनुरुक्तोऽस्ति । 'चत्वार्याहु सहस्राणि वारणा तु वृत युग' मित्यादिमनुस्मृतिकथितवचन- प्रामाण्याद्देवमाने सत्ययुगचरणमानम् = ४०००, नेतायुगचरणमानम् = ३०००, द्वापरयुगचरणमानम् = २०००, कलियुगचरणमानम् = १०००, एतेपा योगकरणेन युगमानम् = =४०००+३०००+२०००+१००० =१००००, तथा ''युगस्य दशमो भाग- श्चतुस्मिद्वय कसङ्ग ण । मात्कृतयुगादीना पष्ठाश सन्ध्ययो स्वक" इति सूर्यसिद्धा- न्तोक्तवचनेन सन्ध्यासन्च्याशसहितयुगचरणा = ४८००, ३६००, २४००, १२००, तथैपा क्रमश सन्ध्यासन्ध्याशा =८००, ६००, ४००, २०० मनुस्मृत्यादिस्मृतिग्रन्थेषु सन्ध्याशरहित केवल शुद्धमेव सत्ययुगादिचरणमान कथितम् । यदि तानि सत्ययुगा- दिचरणमानानि पटवाधिकशत तय ३६० गुण्यन्ते तदा भास्करादिकथिततन्मानानि समागच्छन्ति, 'युगाना सप्तति सैका मन्वन्तरमिहोच्यते' इत्युक्तयनुसारेण ७१ युग- --१ मनु , परन्त्वेकस्मिन् ब्रह्मदिने चतुर्दश मनवोऽत १४ मनव =७१ युगx१४ =६६४ युग, परन्तु ‘सन्धय स्युर्मनूना कृतान्दै समा' इत्युक्तेश्चतुर्दशमनुसम्बन्धि- सन्ध्यासन्ध्याशमानम् =६ युग, अत १४ मनु+सध्या सन्ध्याश=६६४ युग+६ युग-१००० युग = १ ब्राह्मदिनम्-१ कल्प । अत पुराणादिकथितबाह्मदिनानु. कूलमेव प्राचीनाचार्यनवीनाचार्यकथित ब्राह्मदिन सिद्धम् । आर्यभटमतेन द्विसप्तति- युगैरेको मनुर्भवत्यतस्तन्मतेन ब्राह्मदिनम् =१००८ युग वटेश्वरावार्योप्येतदेव स्वीकरोति । अन मताधिक्याभावात्स्मृत्यादिकथितविरुद्धत्वाच्च ब्रह्मगुप्तेनाऽस्य- खण्डनमकारि, कलियुगादित पूर्वयुगचरणत्रय व्यतीतमिति ब्रह्मगुप्तोक्तस्य खण्डन वटेश्वरेणैव क्रियते- २० वटेश्वर-सिद्धान्ते "युगपादान् जिप्णुसुतस्त्रीन् यातानाह कलियुगादौ यत् । तस्य द्वापरपादो युगगतये ये स्फुटो नाऽतः ॥" परं वटेश्वरेणापि तु 'युगत्रिवृन्द सहशाऽड घ्रमस्त्रयः' पद्येनानेन ब्रह्मगुप्तोक्त- मेव कथ्यते । बटेश्वरेण कि सण्डयते इति तैरेव कथयितु शक्यते । ब्रह्मगुप्तोक्तभूपरि- ध्यानयनस्यापि खण्डनमनेन क्रियते । वस्तुतो ब्रह्मगुप्तोक्त तदानयनं समीचीन नास्ति, ब्रह्मगुप्तोक्तबहुविषयाणा खण्डन वटेश्वरेण स्वसिद्धान्ते वृत पर तत्समीचीन मवेति विवेचकाः स्वयमेव विचारयन्तु । आर्यभटमतखण्डनार्थ ब्रह्मगुप्तेन यादृशाना प्रयोगः यथाऽऽयभटमतखण्डनार्थ ब्रह्मगुप्तोक्तवाक्यानि- "स्वयमेव नाम यत्कृतमार्यभटेन स्फुटं स्वगणितस्य । सिद्ध तस्फुटत्वं ग्रहणादीनां विसंवादात् ॥ जानात्येकमपि तो नार्यभटो गणितकालगोलग्नाम् । न मया तानि ततः पृथक् पृथक् दूपरणान्येपाम् ॥ प्रार्यभटदूषणानां संस्था वक्तुं न शक्यते यस्मात् । तस्मादयमुद्देशो बुद्धिमताऽन्यानि योज्यानि ॥" स्वसिद्धान्ते ब्रह्मगुप्तमतखण्डनविपये वटेश्वरोक्तवाक्यानि- "भानुभुजादियोगाच्चन्द्र सुवलं प्रकल्पितं तेन । नो लग्नभुजानुगतं वेति न शुक्ल सुतो जिष्णोः ॥ जिष्णुसुतं दूषणानां संख्या वक्तुं न शक्यते यस्मात् । तस्मादयमुपदेशो बुद्धिमताऽन्यानि योज्यानि ॥ एकमपि न वेत्ति यतो जिष्णुसुतो गरिगतगोलानाम् । म मया प्रोक्तानि ततः पृथक् पृथग दूषणान्येषाम् ॥" वेधविधिज्ञस्य ब्रह्मगुप्तस्य यादृशोऽनेकविवेचनात्मकविपयसम्पन्नो विविध तात्विकविचारयुक्तो ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तोऽस्ति तादृश एव वटेश्वरस्यापि सिद्धा- न्तोस्ति, एतयोमहारथिनोराचार्ययोरपूर्वप्रतिभाया कस्यापि मनसि लेशमात्रोऽपि सन्देहो न भवितुमर्हति । एतदाचार्यद्वयानन्तर ये केचन ग्रन्थरचयितार प्राचार्या प्रभूवन ते सर्वे बहुषु स्थलेषु स्वस्वसिद्धान्तग्रन्थ एतदाचार्यद्वयसिद्धान्तग्रन्यस्य विषयप्रतिपादनमेव कृतवन्त , ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त-बटेश्वरसिद्धान्तयोर्दर्शनेनंतदति- रिक्तसिद्धान्तप्रन्थदर्शनेन च मकथनमिति सत्यमसत्य वेत्यस्य ज्ञान भविष्यति तद्विदा विवेचकानम् । मानव देवजैव पैश्यार्थवाह्यसौरन्दवसावनानि मानानि सर्वेषु सिद्धान्तग्रन्थेषु प्रतिपादितानि सन्ति, तेषु चतुभि (सौरचान्द्रसावन- नाक्षत्र") रेव मानर्मानवाना मर्व व्यवहाराश्चलन्तीति भास्य रादिसिद्धान्तग्रन्थेषु वर्णिता मन्ति, किन्विह सिद्धान्ते पुरोदीरितनवविधमानः कानि कानि कार्याणि व्यवहृतानि भवन्तीति वणितानि सन्ति यथा- - नव २१ अन भूमिका "पर्वावमतिथिकरणाधिमासक्ज्ञानमैन्दवान्मानात् । प्रभवाद्यब्दा पष्टियुगानि नारायणादीनि ।। प्राङ्गिरसादेतेपा ज्ञप्ति पंच्याच्च पैतृको यज्ञ । फामलजासुरवस्तेपामायु परिच्छिति ॥ अध्ययननियमसूतकमखगतय सच्चिकित्सा च । होरामुहूर्तयामा प्रायश्चित्तोपवासाश्च ॥ प्रायुयश्च नृणा गमनागमने च सावनान्मानात् । ऋत्वपनदिपुवदध्दा युग क्षयझै दिनस्य सौरात्स्यु ।। ज्याद्याविधयश्चारिछशधरभगणोद्भवाश्च नाक्षत्रात् । मासाश्च वासरारमा सजा सदसत्फलावति ॥" सिद्धान्ते अहर्गणग्रहभगणादिसाधनानि युगमानादेतत्साधितानि सन्ति, यदि युगोयग्रहभगणादय क्ल्पीया अपक्षिता भवेयुस्तदा ते युगीया भगरणा- दय एकायुते १०००० न गुणनीया , यदि च कल्पीया ग्रहभगणादयो ब्रह्मायुप्यपे- क्षिता भवेयुस्तदा ते वल्पीया भगरणादय द्विसप्तति सहस्र ७२००० गुगनीया , यथा युगमानम्=४३२००००, कल्पप्रमाणम् =४३२०००००००० कल्पवर्ष प्रत ४३२०००००००० १०००० तेन कल्पवर्ष-युगx१००००, तथाच युगवर्ष ४३२०००० ब्रह्मायुवर्ष ४३२००००००००४२४३६०४१००, -७२००० ब्रह्मायुर्वर्ष- कल्पवप ४३२०००००००० ७२०००४ कल्प, एतेन पूर्वोक्तसिद्धिर्भवति । अत्र सिद्धान्ते (वटेश्वरसिद्धान्ते) ऽहर्गरणानयनमप्यनेक प्रकार कृतमस्ति, तेषु कुनापि कुनापि पद्य प्वशुद्धयोऽपि वर्तन्ते अहर्गणादभीष्टवारज्ञानार्थमहर्गरणे सप्तभक्त ऽवशिष्टे सैककृते सति वर्तमानवारो भवत्येवमेव सर्वन दृश्यते, परन्तु सर्वदा सैककरण न भवति स्थितिविशेपे निरेक- करणमप्यावश्यक भवति, एतद्विपये सिद्धान्तशिरोमणी भास्कराचार्येणव वथ्यते । यथा- 'अभीष्टवारार्थमहर्गणश्च सको निरेकस्तिथयोऽपि तद्वदित्यादि' सिद्धान्त- शेखरे श्रीपतिनापि बहुभि प्रकारैरेतत्साधन कृतमस्ति, परन्तु तस्मा (अहर्गणात्) दभीष्टवारार्थ वटेश्वराचायस्यैव मार्ग (सककरणरूप ) स्तेनाऽपि गृहीतोऽस्ति, सूर्यसिद्धान्ते संकनिरेककरणसम्बन्धे किमपि नहिं प्रतिपादितमस्ति प्रस्तुत- सिद्धान्ते लघ्वहर्गणानयनमप्यनेक प्रकारवटेश्वरेण कृतमस्ति, ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते- ऽपि तदानयनमस्ति, किन्तु सिद्धान्तशेखरे तदानयन दृग्गोचर न भवति, भास्कराचार्येणापि सिद्धान्तशिरोमणौ तदानयन कृतमस्ति, यद्यपि लघ्वहर्गणा- नयन कस्यापि समीचीन नास्तीति तदानयनावलोकनेन स्फुटीभवति, तथाप्येक- मपूर्वचमत्कारपूर्ण तदानयनमस्ति, अत्र सिद्धान्ते वर्षेशमासेशकालहोरेश ज्ञानार्थ तत्क्रमप्रदर्शनार्थ च ये विधय सन्ति तदनुरूपा एव सिद्धान्तशेखरेऽपि २२ वटेश्वर-सिद्धान्ते सन्ति, ब्रह्मस्फुटमिद्धान्तेऽपि तद्दर्शनेन ज्ञायते यद् ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ता वटेश्वर- सिद्धान्ताद्वोद्धत्य सिद्धान्तशेखरे लिखितः । ब्रह्मगुप्तोक्तरविसक्रान्तिकालस्यापि खण्डन वटेश्वरेण कृतिमस्ति । यथा-- सक्रान्तिघर्माशो समस्तसिद्धान्ततन्त्रवाह्याऽत । कुदिनानामज्ञानान्मन्दोच्चस्य स्फुटो नाऽक ॥ कल्पितमगणैर्यु चरा कल्पितकुदिन प्रकल्पितंश्च युग । परिधीनामज्ञानाद दृष्टिविरोधात्स्फुटा नाऽत ॥ वटेश्वराचार्य मते ब्रह्मगुप्तोत्तयुगमानमेव समीचीन नास्ति तदा तत्सम्वन्धेन साधितग्रहभगणादिकानामसमीचनत्वात्तत्साधितग्रहादीनामप्यसमीचीनत्वादशुद्धस्फुट रविवशेन साधित सक्रान्तिकालोऽप्य शुद्ध एव भवेत् । वटेश्वरोक्तमिद तदैव समी- चीन भवितुमर्हति यदा ब्रह्मगुप्तोक्तयुगादिमान समीचीन न भवेत् । प्रार्यभटोक्तयुगा- दिमानमेव वटेश्वराचार्येण स्वीक्रियते, ब्रह्मगुप्तोक्त तद्युक्तियुक्त नहि, मया यत्कथ्यते तदेव युक्तियुक्तमेतदर्थं किमपि प्रबलप्रमाण नोपस्थाप्यते तहि कथमेतत्कथन मान्य भवेत् । स्मृतिकारोक्तयुगादिमानं सह ब्रह्मगुप्तोक्तमानाना सामञ्जस्याद्वटेश्वर- स्वीकृतमानानाञ्चाऽसामञ्जस्याद्वटेश्वरकृतखडन दुराग्रहपूर्णमस्तीति मन्मतम् । विवेचका सुधिय स्वय विवेचयन्तु । एतस्याऽऽचार्यस्य मध्यमाधिकारीय प्रश्ना- ध्यायोऽतीव शोभनोऽस्ति, तर विलक्षणा प्रश्ना सन्ति, ब्राह्मरफुटसिद्धान्तेऽप्येतत्स- दृशा एव बहव प्रश्ना सन्ति यदवलोकनेन वटेश्वरोक्ता प्रश्ना स्वकीया ब्रह्मगुप्तो- ताऽधारका वेत्यस्य निर्णय विज्ञा ज्योतिषिका स्वयमेव कुर्वत्विति ।। स्पष्टाधिकार अत्राधिकारे ब्रह्मगुप्तादिभि सर्वैराचार्यैर्वृत्तस्यैकस्मिन् पादे तत्त्वावि २२५ कलावृद्धया चापाना चतुर्विशतिसख्यका जीवा साधिता , पर वटेश्वराचार्य पट्- पञ्चाश (५६) सख्यका सविकला क्लात्मकज्या साधिता । इटचापज्यानयन- विधि सर्वेपा समान एव, एतन्मते रिज्या=३४३८ । ४४", भास्कराचार्येण भोग्यखण्डस्पष्टीकरण कृतम । वटेश्वराचार्येण भोग्यखण्डस्पष्टी- करणस्य नाम न कथ्यते परन्तु तदुक्तरोपाशज्या- मे / यो...मxशे -शेपचापसज्यावृद्धि, स्वरूपे गौप्यज्यान्तरार्धस्थले गतैयखडान्तरार्धग्रहणेन यो प्रथमचापस्थले दशाशग्रहणेन च अशे _यो - अरशे -भाम्बरोक्त प्रचा २० स्पप्टभोग्यखड, शेपारागुणकाङ्क स्पष्टमेव भास्करोक्तस्पष्टभोग्यसड भवेत् । शेषाश- ज्याशब्देन शेपचापसम्बन्धिनी ज्यावृद्धिोध्या, सिद्धातशेयरेऽत्र विपये श्रीपतिना विमपि न पथ्यते । पर ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते तदानयनमस्त्यतो भास्करोक्त-भोग्यखड. सष्टीकरणप्रबारसस्प स्वोयो नास्तोति क्यने न कश्चित्सन्देह । तन्मूल ग्राह्मन २३ भूमिका • फुटसिद्धान्तोक्त भोग्यखडस्पष्टीकरण वटेश्वरोक्त शेपचापसम्बन्धिज्यावृद्धयानयन वा भवितुमर्हति । वटेश्वरोक्ताद्भास्करोक्तप्रकार सूक्ष्म किन्त्वत्रा (भास्करप्रकारे) पि यहुस्थौल्यमस्तीति तदुपपत्तिदर्शनेन जायते । अन्याचार्योक्तग्रहस्पष्टीकरण सटश एव वटेश्वरस्याप्पस्नि, मत्यरविचन्द्रौ स्वस्वमन्दफलेन सस्कृती स्फुटौ भवत । किन्तु कुजादिग्रहसष्टीकरणायं फलचतुष्टय(मन्दफलाध,शीघ्रफलार्ध मन्दफल, शीघ्र- फलञ्च) सर्वैराचार्यरभिहितम् । मन्दफलार्धशीघ्रफलार्घसस्कारयो किमपि कारण गोलेनावलोक्यते, एतद्विपये सर्वैराचार्य 'अनाऽगम एव प्रामाण्यम् कथ्यते। मन्दफल- शीघ्रफलयो मस्कार कुजादिमध्यमग्रहे परमाऽवश्यक , पर तत्स्फुटीकरणार्थ तत्फलद्वयार्धमपि सर्व सस्क्रियते । ग्रहस्सष्टीकरणविषये कस्याऽप्याचार्यस्य शुद्ध स्वतन्त्र स्वमत नास्ति । ग्रहाणा मन्दगतिफलानयन चाऽन्याचार्योक्तसदृशमेव वटेश्वरोक्तमपि, अन्याचार्यापेक्षया भास्करोक्त तदानयन सूक्ष्ममस्ति, वटेश्वराचार्येण ननकर्मसम्बन्धे किमपि न लिखितम् । सूर्य सिद्धान्तेऽपि तदानयनोल्लेग्यो नास्ति परमिति समीचीन न भवितुमहति, स्पष्टीकृतग्रहा भुजान्तगन्तरादिसस्कारसस्कृता स्वगोलस्था स्पष्टा भवन्ति, ते ग्रहा यत्र गोलेऽस्माक दृग्गोचरीभूता भवन्ति तत्रैव तेऽस्माक स्पष्टग्रहा , स्वगोलस्थस्पष्टग्रहा यावता सस्कारेण सस्कृता अस्माक स्पष्ट- प्रहा भवन्ति तस्यैव सस्कारस्य नाम नतकर्म कथ्यते । रविचन्द्रयोनतकानयन ब्रह्मगुप्तोक्तसमत सिद्धान्तशिरोमणी भास्करेगाभिहितम् । परमेतदानयन न समीचीनमिति नतकर्मोपपत्तिदर्शनेन स्फुट भवति । तथापि तदानयनमादरणीय मेकस्य चमत्कारपूर्णस्याऽऽवश्यकमस्कारविशिष्टस्य प्रतिपादितत्वात् । एतन्नत- कर्म विना सम्पूर्ण ग्रहस्पष्टीकरण निरर्थकमेवास्तीनि कथयितु शक्यते । यतो येपा ग्रहारणा स्पष्टीकरणा) यानि विधानानि सन्ति तैयदि ते स्पष्टा न भवेयुस्तदा तद्वि- धानान्येवासफलानि भवितुमर्हन्ति । तेन यराचार्यनतकनियन न कृत तेपामिय त्रुटि । ब्रह्मगुप्तभास्कराचार्यों नतकर्मसाधनद्वारा स्वस्वदूरदर्शिताया परिचय दत्तवन्तौ । आर्यभटादिप्राचीनाचार्येषु कस्याप्युदयान्तरसस्कारोपरि दृष्टिपातो नाभूत् । केवल भास्कराचार्येणैवाहर्गणोत्पन्नग्रहेपूदयान्तरासु सम्बन्धिग्रहवाल- फलसस्कारस्याऽवश्यकताज्ञात्वा तदानयन कृत्वा सस्कार कृत । भास्करोक्तोदया- न्तरे किं स्थौल्य तद्वास्तवानयन कथ भवेत्तत्परमत्व च कुन भवेदित्यादि सर्वेविषया अत्र ग्रन्थे प्रसङ्गवशाद्यथास्थान दर्शिता मया, एतेनाऽचार्येणोदयान्तर न कथ्यते । भास्करकथितोदयान्तरस्य मूल सिद्धान्तशेखरनिप्रश्नाधिकारे श्रीपतिकृत विपु- वाशभुजाशयोरन्तरानयनमस्तीति कस्यापि मतमस्ति, परमुक्तग्रन्थस्योक्ताधिकारे तदर्शनेन तन्मत तथ्य न प्रतिभाति ॥ भारतीया ज्योतिविदो जानन्ति स्म यच्चल- राशेस्तालालिगतिसिद्धान्त सर्वप्रथम भास्कराचार्य एव ज्ञातवान् 'फलाश- खाद्वान्तरशिञ्जिनीनी द्राक्केन्द्रभुक्तिरि' त्यादेरुपपत्तिदर्शनेन "दिनान्तरस्पष्ट- खगान्तर स्याद् गति स्फुटा तत्समयान्तराले। कोटी फलघ्नी मृदुकेन्द्रभुक्तिस्त्रिज्यो- द्ध ता किमृगादिकेन्द्र ॥ तया युतोना ग्रहमध्यमुक्तिस्तात्कालिको मन्दपरिस्फुटा २४ वटेश्वर-सिद्धान्ते स्यान्" तदुपपत्तिदर्शनेन च तात्कालिको मन्दपरिस्फुटा स्यादन तात्कालिको'- शब्दावलोकनेन च पूर्वोक्तज्योतिपिवधारणाया पुष्टिर्भवति । एवमेव 'कक्षा- मध्यगतिय खाप्रतिवृत्तसम्पाते मध्यं व गति स्पष्टा पर फन तर खेटस्य' इति भास्करोक्त्या कक्षामध्यगतिर्यग्रे खाप्रतिवृत्तसम्पाते ग्रहे मन्दस्पष्ट स्पष्ट गत्यो समत्वात्तव शीघ्रगतिफलाभावो भवितुमर्हति, तव शीघ्रफ्लस्यापि परमत्व भवति, चलनकलने चलराशेस्तात्कालिकगत सिद्धान्तोस्ति यत्कस्यापि चलराशे परमत्वे परमाल्पत्वे च तात्कालिकी गति शून्यसमा भवति । पूर्वोक्तस्थान स्थे ग्रहे शीघ्रफलस्य परमत्वात्तत्तात्कालिको गति (शीघ्रगतिफल) शून्यसमा भवितुमर्हति, तात्कालिकगतिसिद्धान्तेन यच्छीघ्रगतिफ्लाभावस्थान सिद्ध तदेव भास्करोक्तमप्यस्त्यतो भास्कराचार्यश्चलराशेस्तात्कातिकगति सिद्धान्त जानाति स्मे यत्र न कश्चित्सन्देह । भास्कराचाय तोऽतीव प्राचीनो वटेश्वराचार्यश्चलराशि- तात्कालिकगतिसिद्धान्त जानाति स्मेति भास्करकथितस्पष्टभोग्यखण्डमूलभूतस्य घटेश्वरोक्तशेपासज्यानयनदर्शनादेव स्पष्ट नवति ।। भास्कराचार्य रचितलीला- वत्या निसृष्टार्थदूत्यभिघाया स्व टीकाया चापोननिघ्नपरिधि प्रथमाह्वय स्यादि' त्यादेाख्याया मुनीश्वरो लिखति यत्- 'दो कोटिभागरहिताभिहता खनागचन्द्रास्तदीय चरणोनशरार्क दिग्भि' इत्यादि ज्याखण्डै विना चापादेव श्रीपतिकृतज्यानयनावलम्वेन ग्रहलाघवे गणेश दैवशेन सर्वे प्रकारा लिखिता इति कृत लघुकामु कशिञ्जिनीग्रहणकर्म विना धु तिसाधनम्,' इति करणवुतहलस्थच्छायासाधनविपयकभास्कराचार्याभिमान- मूलकारणमपि श्रीपत्युक्तोऽय भवार एव गणकतरङ्गिण्या महामहोपाध्यायसुधा करद्विवेदिमहोदयलेखादपि ज्ञायते यत्पूर्वोक्तप्रकार श्रीपतेरेवास्ति, वहो पूर्व- कालादपि ज्योतिपिकेषु प्रसिद्धिरस्ति यदेतस्य प्रवारस्य रचयिता श्रीपतिरेवास्ति परन्तु वटेश्वरसिद्धान्तस्य स्पष्टाधिकारीयज्याखण्डविना स्फुटीकरणाध्याय- स्याधोलिखितश्लोकदर्शनेन विदित भवति यत्पूर्वकथितप्रकारो वटेश्वरा- चार्य स्यास्ति, श्रीपतेनं हि चक्रा(शा भुजार्शविरहितनिहतास्तविहीनविभक्ता, खव्योमेष्वभ्रवेदै सलिलनिहता पिण्डराशि पहिय पड्भाशघ्ना भुजाशा निजकृतिरहितास्तत्तरीयाशहीने- भक्ता स्पात्पिण्डराििवशिखनयनभूव्योमशीताशुभिर्वा ।। सिद्धातशेखरे श्रीपतिनाऽधोलिसितश्लोवेन ज्याभिविनेष्टज्यायाश्चापानयन कृतमस्ति- "इज्यया विनिहता शरभास्कराशाज्यापादयुत विभगुरणेन हृता फल तत् । स्यक्त्या खनन्दकृतित ८१०० पदमभनन्दभागाच्च्युत भवति धन्वविना ज्यकामि ॥"
भूमिका २५ परमेतदानयन वटेश्वरसिद्धान्तेऽधोलिखितमस्ति- त्रिभनवगुणयुक्तो ज्यातुरीयोऽत्र हारो। विशिखरविखचन्द्र स्ताडितायास्तु मौा ।। खखविशिखखवेदैराहता वेटजीवा । निभगुरणकृतिघातज्यासमासेन भक्ता ॥ फलहोना नतिकृतिस्तन्मूलेन च वजिता नवति । शेष धनुरथमा यत्त्रिज्याखण्डैविनेव फलम् ॥ उपर्युक्त ज्यातश्चापानयनार्थ मपि श्रीपतिप्रकारस्तस्य स्वकीयो नास्ति, प्रायो वटेश्वरसिद्धान्तादेवोद्धत्य लिखित । (१) वटेश्वराभिधेन ज्योतिर्विदा विर- चित एको ज्योतिपसिद्धान्तग्रन्थ पासीदिति तत्परिवत्तिभिरनेक ग्रंथकार र्याख्या- विधातृभिश्च तन्मतप्रतिपादनात्स्फुटमेव, परमय ग्रन्थ प्रायो लुप्त एवाभूदिति बहु- धैव प्रतीयते, एतत्सम्बन्चे गणक्तरङ्गिण्याम् "यथा ब्रह्मगुप्त नाऽर्थभटादीना खण्डन कृत तथैव वटेश्वरेण सिद्धान्ते बहुत्र ब्रह्मगुप्तसण्डन कृतमस्ति, अस्यैव 'वजन्मनोऽप्टी सदला समाययु' रित्यादिना ब्रह्मरण आयु सार्धवर्याप्टक गतमिति मतम् । अस्य सिद्धान्तग्रन्थो मया सम्पूर्णो न दृष्ट, ग्वालियरमहाराजाश्रितस्य श्रीवालज्योतिविदो गेहेऽयमस्तीति थुत्वा तत्रासकृत्पत्र प्रेपित परन्त्वद्यावधि किमप्युत्तर न प्राप्नम्" श्रीमान् म० म० सुधाकरद्विवेदिमहोदयो लिखितवान् । श्रीमान भास्कराचार्य 'तथा वर्तमानस्य कस्यायुपोध गत सार्धवर्षाष्टक केचिदूचु' इत्युक्त्या सार्धवष्टिक वटेश्वरमतमेव लक्ष्यीकरोति । मुजालाचाय- कृतलघुमानसस्य इन्दूच्चोनार्ककोटिनेत्यादि दृग्गणितैक्यकृच्चन्द्रसस्कारविपये तट्टीका कृता यल्लयार्येण श्लोकद्वयस्यास्यावतरणमेवमुच्यते । 'अथ चन्द्रस्य ग्रह- समागमच्छाया शृङ्गोन्नतिहक्साधने वटेश्वरसिद्धान्तोक्तहक्कमविशेष श्लोक- द्वयेनाहेति' । अथ थोपतिनापि सिद्धान्तशेखरे ग्रहयुद्धाध्याये २४ श्लोकटेश्वर- सिद्धान्तानुसार एव चन्द्रस्य विलक्षण सस्कारो ब्रह्मगुप्तलालाधनुक्त प्राय उक्त इति । अथ च श्रीपतिना- श्रीजिष्णुजार्यभटलल्लवटेशसूर्यदामोदरप्रभृतयोऽपि च तन्त्रकारा । शक्ता प्रवक्त ममलामिह तन्नयुक्तिमस्मद्विधो जडमतिस्तु कथ प्रवक्ति इत्युक्त्याऽर्य भट ब्रह्मगुप्त-लल्लाचार्य सममेव वटेश्वरस्यापि नामोल्लेख क्रियत इति वटेश्वरसिद्धान्त सर्वमान्य ग्रासीदिति प्रतीयते । अन शङ्करवालकृष्ण दीक्षितमतेन वटेश्वरकृत एक करणसारनामा ग्रन्थ ८२१ शकाब्द रचित इति श्रूयते, यत्र काश्मीरस्याक्षाशा ३४ 16 एतन्मिता ग्रन्थोक्तचा सिद्धयन्ति, ऽपि ज्योतिषसिद्धान्तरचयितार एक करणग्रन्थमपि व्यवहारोपयोगिन रपितवन्त एवासन्निति वटेश्वरसिद्धान्तानुसारी करणसार इत्यारयो ग्रन्थश्च वटेश्वरकृत प्राय सर्वे २४ वटेश्वर-सिद्धान्ते स्यात्" तदुपपत्तिदर्शनेन च तात्कालिकी मन्दपरिस्फुटा स्यादन 'तात्कालिको शब्दावलोकनेन च पूर्वोक्तज्योतिपिवधारणाया पुष्टिर्भवति । एवमेव 'कक्षा मध्यगतिर्य मेखाप्रतिवृत्तसम्पाते मध्य व गति स्पष्टा पर फ्ल तन खेटस्य' इति भास्करोक्त्या कक्षामध्यगतिर्य खाप्रतिवृत्तसम्पाते ग्रहे मन्दस्पष्ट स्पष्ट गत्यो समत्वात्तव शीघ्रगतिफलाभावो भवितुमर्हति, तत्र व शीघ्रपलस्यापि परमत्व भवति, चलनकलने चलराशेस्तात्कालिक्गत सिद्धान्तोऽस्ति यत्तस्यापि चलराशे परमत्वे परमाल्पत्वे च तात्कालिकी गति शून्यसमा भवति । पूर्वोक्तस्थान स्थे ग्रह शीघ्रफलस्य परमत्वात्तत्तात्कालिकी गति (शीघ्रगतिफल) शून्यसमा भवितुमर्हति, तात्कालिकगतिसिद्धान्तेन यच्छीघ्रगतिफ्लाभावस्थान सिद्ध तदेव भास्करोक्तमप्यस्त्यतो भास्कराचार्य श्वलराशेस्तात्वारिकगति सिद्धान्त जानाति स्मे यत्र न कश्चित्सन्देह । भास्कराचाय तोऽतीव प्राचीनो वटेश्वराचार्यश्चलराशि- तात्कालिकगतिसिद्धान्त जानाति स्मेति भास्करकथितस्पष्टभोग्यखण्डमूलभूतस्य वटेश्वरोक्तशेपाशज्यानयनदर्शनादेव स्पष्ट भवति ॥ भास्कराचार्य रचितलीला वत्या निस्ष्टार्थदूत्यभिधाया स्वटोकाया 'चापोननिनपरिधि प्रथमाह्वय स्यादि' त्यादेरियाया मुनीश्वरो लिखति यत्-- 'दो कोटिभागरहिताभिहना खनागचन्द्रास्तदीयचरणोनशराकदिग्भि' इत्यादि ज्याखण्डैविना चापादेव श्रीपतिकृतज्यानयनावलम्वेन ग्रहलाघवे गणेश- दैवज्ञेन सर्व प्रकारा लिखिता इति कृत लघुकार्मु कशिजिनीग्रहणकर्म विना द्य तिसाधनम्' इति करणकुतूहलस्थाछायासाधनविषयकभास्कराचार्याभिमान- मूलकारणमपि श्रीपत्युक्तोऽय प्रकार एव गणक्तरङ्गिण्या महामहोपाध्याय सुधा- करद्विवेदिमहोदयलेखादपि ज्ञायते यत्पूर्वोक्तप्रकार श्रीपतेरेवास्ति, वहो पूर्व- कालादपि ज्योतिपिपु प्रसिद्धिरस्ति यदेतस्य प्रकारस्य रचयिता श्रीपतिरेवास्ति परन्तु वटेश्वरसिद्धान्तस्य सप्टाधिकारीयज्याखण्डविना स्फुटीकरणाध्याय- स्याधोलिखितश्लोकदर्शनेन विदित भवति यत्पूर्वकथितप्रवारो वटेश्वरा- चार्य स्यास्नि, श्रीपतेनहि चकार्याशा भुजार्शविरहितनिहतास्तविहीनविभक्ता, खव्योमेप्वभ्रवेदै सलिलनिहता पिण्डराशि प्रदिष्ट । पड्भाशध्ना भुजाशा निजकृतिरहितास्तत्तरीयाशहीने- भंक्ता स्यापिण्डराविशिखनयनभूव्योमशीताशुभिर्वा । सिद्धातशेखर श्रीपतिनाऽधोलिखितश्लोवेन ज्याभिविनेष्टज्यायाश्चापानयन कृतमस्ति- "इष्टज्यया विनिता शरभास्कराशाज्यापादयुक् विभगुरपेन हृता फ्ल तत् । त्यक्त्वा पनन्दकृतित ८१०० पदमभ्रनन्दभागाच्युत भयति धन्वविना ज्यकामि ॥"
भूमिका परमेतदानयन वटेश्वरसिद्धान्तेऽधोलिखितमस्ति- । त्रिभनवगुरणयुक्तो ज्यातुरीयोऽत्र हारो। विशिखरविखचन्द्र स्ताडितायास्तु मौा । खखविशिखखवेदैराहता वेटजीवा । निभगुरणकृतिघातज्यासमासेन भक्ता। फलहीना नवतिकृतिस्तन्मूलेन च वजिता नवति । शेष धनुरथवा यत्तिज्याखण्डविनैव फलम् ।। उपर्युक्त ज्यातश्चापानयनार्थमपि श्रीपतिप्रकारस्तस्य स्वकीयो नास्ति, प्रायो वटेश्वरसिद्धान्तादेवोद्धत्य लिखित । (१) वटेश्वराभिधेन ज्योतिर्विदा विर- चित एको ज्यौतिपसिद्धान्तग्रन्थ पासीदिति तत्परिवत्तिभिरनेक ग्रंथकारारया- विधातृभिश्च तन्मतप्रतिपादनात्स्फुटमेव, परमय ग्रन्थ प्रायो लुप्त एवाभूदिति बहु धैव प्रतीयते, एतत्सम्बन्वे गणकतरङ्गिण्याम् "यथा ब्रह्मगुप्त नाऽर्थभटादीना खण्डन कृत तथैव वटेश्वरेण सिद्धान्ते वहुन ब्रह्मगुप्तखण्डन कृतमस्ति, अस्यैव 'कजन्मनोऽप्टी सदला समाययु' रित्यादिना ब्रह्मण आयु सार्धवर्षाष्टक गतमिति मतम् । अस्य सिद्धान्तग्रन्थो मया सम्पूर्णो न दृष्ट, ग्वालियरमहाराजाश्रितस्य श्रीवालज्योतिर्विदो गेहेऽयमस्तीति श्रुत्वा तनासकृत्पन प्रेपित परन्त्वद्यावधि किमप्युत्तर न प्राप्तम् ' श्रीमान् म० म० सुधाकरद्विवेदिमहोदयो लिखितवान् । श्रीमान् भास्कराचार्य 'तथा वर्तमानस्य कस्यायुपोऽध गत सार्धवर्षाष्टक केचिदूचु' इत्युक्त्या सार्धवष्टिक वटेश्वरमतमेव लक्ष्यीकरोति । मुजालाचाय- कृतलघुमानसस्य इन्दुच्चोनार्ककोटिघ्न त्यादि दृग्गणितक्यकृच्चन्द्रसस्कार विषये तट्टोका कृता यल्लयाफेरण श्लोकद्वयस्यास्यावतरणमेवमुच्यते । 'अथ चन्द्रस्य ग्रह- समागमच्छाया शृङ्गोन्ननिहक्साधने वटेश्वरसिद्धान्तोक्तहक्कमविशेष श्तोक द्वयेनाहेति । अथ श्रीपतिनापि सिद्धान्तशेखरे ग्रहयुद्धाध्याये २४ श्लोकटेश्वर सिद्धान्तानुसार एव चन्द्रस्य विलक्षण सस्कारो ब्रह्मगुप्तलालाद्यनुक्त प्राय उक्त इति । अथ च श्रीपतिना- श्रीजिष्णुजार्यभटलल्लवटेशसूर्यदामोदरप्रभृतयोऽपि च तत्रकारा। शक्ता प्रवक्त ममलामिह तन्नयुक्तिमस्मद्विधो जडमतिस्तु कथ प्रवति ॥ इत्युक्त्याऽर्य भट ब्रह्मगुप्त लल्लाचाय सममेव वटेश्वरस्यापि नामोल्लेख क्रियत इति वटेश्वरसिद्धान्त सर्वमान्य ग्रासीदिति प्रतीयते । अत्र शङ्करबालकृष्ण दीक्षितमतेन वटेश्वरकृत एक करपसारनामा अन्य ८२१ शकाब्द रचित इति श्रूयते, यत्र काश्मीरस्याक्षाशा ३४ । एतन्मिता ग्रन्थोक्तया सिद्धयन्ति, प्राय सर्वे ऽपि ज्यौतिपसिद्धान्तरचयितार एक करणग्रन्थमपि व्यवहारोपयोगिन रचितवन्त एवासन्निति वटेश्वर सिद्धान्तानुसारी करणसार इत्याख्यो ग्रन्थश्च वट श्वरकृत २६ वटेंश्वर-सिद्धान्त आसीदिति च प्रतीयते, परमधुना वटेश्वरसिद्धान्त करणसारश्च न कुत्राप्युप- लभ्यो वार्तागोचरौ स्त इत्यलमतिविस्तरेण (२) (१) इत प्रारभ्य (२) एतत्पर्यन्त सिद्धान्तशेखरस्य परिशिष्टस्थलेखादर ज्ञायते यदृटेश्वरसिद्धान्तोपरि श्रीपते श्रद्धाऽधिक्यमासीत्तेनैव हेतुना पूर्वोक्तज्या चापयोरानयन तत्सिद्धान्तादेवौद्धत्य श्रीपतिना प्रायो लिखित भवेदित्यनुमीयते । तथा भुजकोटिज्यादिसाधनमन्त राहणादेव स्फुटग्रह क्तुं प्रकारोऽन सिद्धान्ते ऽधोलिखितस्पेरणाऽस्ति। स्वोच्चनीचपरिवर्तशेषकाद् भूदिन कृतहतात्पदानि तु । शेषकान्त्रिगुरिणतादगृहादित पूर्ववच्च भुजकोटिसाधनम् ॥ मन्दज बलभव च तद्वतमू दिनभंगरलिप्तिकोद्धतः। खेचरस्य भगणावशेषक सस्कृत कलिकयाऽखिल स्फुदम् ॥ दो फलेन सवितुश्चरासुभि स्वेन देशविवरेण चोक्तवत् । सस्कृत फुदिनभाजित भवेन्मङ्गलादिखचर परिस्फुट ॥ विषयोऽय ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तवटेदवर सिद्धान्त सिद्धान्तशेखरेषु वरिणतो- ऽस्ति भास्कराचार्यादिभि कथमय विपयो न लिखित इति त एव ज्ञातु शवनुवन्ति, श्रीपतिना प्रायो ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तावटेश्वरसिद्धान्ताहा प्रायो लिखितो भवेद्य- तस्तत्समुखे तत्सिद्धान्तद्वयमादर्शरूपेणोपस्थितमासीत् । अन्येषु सिद्धान्तग्रन्थेषु यथाऽज्येऽधिवारा पृथक् पृथक् सन्लि तथैव पाताऽधि- कारोऽपि पृथगवास्ति, किन्त्विह सिद्धान्ते स्पष्टाधिकारान्तर्गत एव पाताध्यायोऽस्ति, अव पाताध्याये पाताधिकारसम्बन्धिन सर्वे विपया वणिता सन्ति, स्पष्टाधि- कारसम्बन्धिप्रश्नाध्यायोऽप्येतदधिकारान्तर्गत एवास्ति, तथैतदधिकारे ग्रहस्फुटी- करणार्थ पृथक् पृथगध्याया सन्ति, यथा-- सूर्याचन्द्रमसो स्फुटीकरणविधि प्रथम । स्वोच्चनीचग्रहस्फुटीकरणविधि- द्वितीय । प्रतिमण्डलस्पष्टीकरणविधिस्तृतीय । ज्याखण्डविनास्फुटीकरण- विधिश्चतुर्थ.। फलज्यास्फुटीकरणविधि पञ्चम । तिथ्यानयनविधि पष्ठ । प्रश्नविधि सप्तम । क्रमोऽय यस्मिन्नप्यन्यसिद्धान्तेनावलोक्यते। कर्णानयने- ऽप्यत्र ग्रन्थे बहु कथितमस्ति यच्च भास्करादिसिद्धान्ते नोपलभ्यते । त्रिप्रदनाधिकारेऽपि विषयप्रतिपादनशैली, प्रार्यभटादिप्राचीनाचाय भ्यो वटेश्वरतो नवीनाचार्यश्रीपतिभास्करादिभ्यो विलक्षणंव दृग्गोचरीभूता भवति यथा- विपुवच्छायानयनविधि प्रथम । लम्बाक्षज्यानयनविधिद्वितीय । क्रान्ति- ज्यानयनविधिस्तृतीय । युज्यानयनविधिश्चतुर्थ । युज्यानयनविधि पञ्चम ।
२७ अग्रोनयनविधि पप्ठ । स्वचरार्धप्रारणज्यानयनविधि सप्तम । लग्नादिविधि- रष्टम । धुदलभादिविधिर्नवम । इष्टच्छायानयनविधिदशम । सममण्डलप्रवेश- विधिरेकादश । कोरगश विधिदिश । छायातोऽनियनविधिस्नयोदश । छाया- परिलेसविधिश्चतुर्दश । प्रश्नाध्यायविधि पञ्चदश इति, अन्यायेप्वेतेपु वणित- विषयावलोकनेन सदाचार्यस्याद्भुतप्रतिमाया परिचयो मिलति । सूर्यसिद्धान्त- ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त वटेश्वरसिद्धान्त सिद्धान्तशेखरेषु कोरणश कुसाधनमेकमेव, वट श्वरसिद्धान्ते तत्साधनगनेक प्रकार कृतमस्ति, येषु प्रथम प्रकार पुरोदी- रिताचार्यकोरणश कुसाधनवदस्ति, योगश दुसाधनविधिनामकेऽध्याये तृतीय- श्लोकानवम श्लोक यावद्वहुन लघुक्सज्ञक्भेदेन तत्साधनानि प्रदर्शितानि सन्ति, यथा 'इष्टश्रवणाभ्यस्ता अग्रास्त्रिज्योद्धृता लघुका इत्यादि' धृतिगुरिणतास्त्रिगुण- हृता अग्रा धृतिवृत्तागा भवन्ति लघुका इत्यादि' 'वाऽप्रास्त तिगुणितास्त्रिज्या भक्ता भवन्ति तद तिगा । लघुवा हि विदिड नार इत्यादि' सिद्धान्तशेखरे श्रीपति- नाऽप्यनेके प्रकारा लिखिता , सिद्धान्तशिरोमणी भास्कराचार्येण 'अग्राकृति द्विगु- गिता निगुणस्य वर्गादि' त्यादिनाऽमकृत्प्रकारेण यत्कोणशड कोरानयन कृत तस्य मूलम् 'इष्टाग्रान्तरकृत्या द्विगुणितयोदग्वियुगि' त्यादि वट श्वरोक्तम् 'इनानकाया सहितोनिताया इष्टे नत्यादि श्रीपत्युक्त कोणश कुसाधन वा भवितुमर्हति । परन्तु तदानयन केपामपि समीचीन नास्ति, उत्तरगोले भास्करोक्तकोणश कुसाधनस्य खण्डनमधोलिखितानुसार म० म० मुधाकरद्विवेदिन कृतवन्त "युग्माश्वोनाक्षप्रभावर्गनिन्नी वाणाध्य शज्या द्विकाचविभक्ता। अक्षच्छायावर्गयुक्त फलाच्च दना न्यूना स्याखिल सौम्यगोले ॥" दक्षिणगोले च तत्सण्डन सिद्धान्तशिरोमणेष्टिप्पण्या सशोधकेन (म० म वापूदेवशास्निणा) अधोलिखितश्लोकेन कृतमस्ति- "प्रक्षप्रभाकृतिविहीनहद्रिनिघ्न पञ्चाधिभागजगुरगो विहतो द्विकाश्वै । प्रक्षप्रभाकृतियुतं फलतोऽनकाच्चन्नाऽल्पा तदा न सदिद रवियाभ्यगोले॥" उपर्युक्तभास्करोक्तप्रकारखण्डनेनैव तत्प्रकारमूलभूतयोर्वट श्वरोक्त- श्रीपयुक्तप्रकारयोश्चापि खण्डन बोध्यम । यन देशे सप्तदशाङ्ग लाधिका विपु वती तनोत्तरगोले कोणश कुचतुष्टयमुत्पद्यते । दक्षिणगोले च तदभाव इति भास्कर- वासना भाष्योक्तस्यापि मूल तत्प्राचीनकोगशड क्वानयनमेवास्ति। इच्छादिक्- छायानयनाथ सममण्डलप्रवेशविधिनामकेऽध्याये इष्टकोणशदोरानयन वटेश्व- रेणाभिहितमस्ति, भास्कराचार्येण तु व्यासार्धवर्ग पलभाकृतिन्नो दिग्ज्याकृति- द्वदिशवर्गनिम्नी । तत्सयुतिरि' त्यादिनेष्टच्छायाकानयन कृतम, वस्तुतो भास्करोक्तप्रकारस्य मूल वटेश्वरोक्तप्रकार एव भवितुमर्हति । सूर्यसिद्धान्त- २८ वटेश्वर-सिद्धान्ते कारादिभिरेतद्विपये किमपि न पथ्यते । विप्रश्नाधिकारादावाचार्येण बहुभि प्रकारंदिग्नान कृतमस्ति येपु कतिचन प्रकारा अन्येषु सिद्धान्तेषु नोपलभ्यन्ते । भाभ्रमसम्बन्धेन दिज्जानप्रकारो वदे श्वराचार्योक्तसदृश एव श्रीप-युक्तस्तत्प्रका- रोस्ति, वृत्ताकारच्छायाभ्रमणमार्गार्थम् 'इष्टन्हि मध्ये प्राक् पश्चाद्धृते बाहु- त्रयान्तरे । मत्स्यद्वयान्तरयुतेरि' त्यादिना सूर्यसिद्धान्ते 'अनेपु चिन्हानि विधाय वृत्तमिथोऽदगाहैरि' त्यादिना शिप्यघीवृद्धिदे सिद्धान्ते या युक्ति प्रतिपादितास्ति सैव वट स्वराचार्यस्यापि, सिद्धान्तशेखरे श्रीपतेश्चापि, परन्तु वृत्ते छायाभ्रमण सर्वदा भेरावेव भवति, तरिक्त साक्षे देशे न्यूनाधिक्स कुवशेन छायाभ्रमणमार्गा वृत्तपरवलयदीर्घवृत्तातिपरवलयरेखाकारा भवन्ति, निरक्षे विपुवहिने रेखाकारो भाभ्रम , तेनैव हतुना सिद्धान्तशिरोमणेगोलाध्याये भास्कराचार्येण भात्रितयाद भाभ्रमण न सदि' त्यादिना वृत्तपारच्छायाभ्रमणस्य खण्डन त, वृत्ते सर्वदा छायानमण भवत्येव नहि, तहि भान्नमवृत्तसम्बन्धेन येराचार्वटेश्वर तल्ल- प्रभृतिभिर्दिग्ज्ञान कृत तदपि युक्तियुन नहि, यद्यपि छायाभ्रमणमार्गाकृति- सम्बन्धे भास्करेण स्वविचारो न प्रदर्शित किन्तु पूर्वोक्तखण्डन तद्विषयकतज्ज्ञान पाटव व्यनक्ति । मेपादिराशीना निरक्षोदया साधनप्रकारो ब्रह्मगुप्तवट श्वर- श्रीपतीना समान एवास्ति, स्वदेशीयराश्युदयमाने लग्नानयनप्रकारेऽपि न किम- प्यन्तरमस्ति किन्तु स्वदेशोदयविना विलग्नविघटिक्योरानयन रविलग्नयोरन्त- रासु साधनञ्चाऽत्र सिद्धा ते प्रदर्शिनमस्ति । सिद्धान्तोखरेऽपि तदानयन दृश्यते किन्तु भास्करादिसिद्धान्तेपु नावलोक्यत। एतदधिकारीयप्रश्नाघ्याये ये प्रश्ना सन्ति तेषु बहूनामुत्तर सिद्धान्तशेखरेऽप्यस्ति, चन्द्रग्रहणाधिकारे रविचन्द्रयो स्फुटकला कणसाधनमेतद्ग्रन्थकारकृतमस्ति, सिद्धान्लशेखरादिसिद्धान्तेषु तदु- लेखो न दृश्यते, सिद्धान्तशिरोमणी भास्कराचार्येरग 'मन्दथुतिक् श्रुतिवत्प्रसा- ध्या तया विभज्या द्विगुणा विहीना । विज्याकृति शेपहृता म्फुटा स्याल्लिप्ता श्रु तिस्तिग्मरचेवियोश्च त्यनेन तदानयन कृतमस्ति, परमेतद्ग्रन्थे (वटे श्वर- सिद्धान्ते) तत्साधनदर्शनेन भास्वरोक्त तत्माधन स्वकीयमेतदीय वेति कथितु न शवनुम । छाद्यच्छादकयोनिर्णयेऽन्येषु रविचन्द्रभूभाविम्वादिसाधनेषु चाऽऽचार्येण भूभाया नाम कुत्रापि न लिखित सर्वत्र व तम इत्यव लिख्यते, अयमाचार्योऽपि राहु- कृत ग्रहण स्वीकरोति, सिद्धान्तशेखरे भूभा विम्बानयन राहुविम्बानयनमपि दृश्यते यदि राहुराब्देन भूभाया एव ग्रहण तेन कृत भवेतदा तु तय्यमेवाऽन्यथा राहत भूभारत का चन्द्रग्रहण भवतीत्येतद्विषयक निश्चयस्तन्मनमि नामीदिति कयितु शवयते । तेन तु राहुनिरापरणाध्यायो लिखितो.म्ति तर्हि राहोरपि पिम्बानयन क्य कृतमिति महदाश्चर्यम् । भातराचार्येण "प्रच्छादनाचन्द्रच्छादर पृथु- तरोऽगम्यतै । कुन ? यतोऽधखण्डितम्येन्दोविधारणयो कुष्टता दृश्यते स्थिनिश्च महती । सर्वस्य पुनरर्घखण्डितस्य तीक्ष्णता विषारयो स्थितिश्च लघी। एत- वारणयानुपपत्याऽस्य च्छादवोऽन्य स च लघु । एव रवीन्द्वोर्न छादको राहु भूमिका २६ रिति वदन्ति, बुत ? दिदेशकालावरगादिभेदात् । एक्स्य प्राय स्पर्श इतरस्य पश्चात् । रवे क्वापि ग्रहणमस्ति क्यापि नास्ति । क्वापि दर्शान्तादनत क्वापि पृष्ठत । अतो राहुकृत न ग्रहणम् । नहि वह्वो राहव । एव के वदन्ति । केवल- गोलविद्यास्तदभिमानिनश्च । इद सहिता वेद पुराण वाह्यम् । यत सहितामु राहुरष्टमो ग्रह । “स्वर्भानुर्ह वा प्रामुर सूर्य तमसा विव्याध" इति माध्यन्दिनी श्रुति । सर्व गङ्गासम तोय सर्वे ब्रह्मसमा द्विजा । सर्वे भूमिसम दान राहुप्रस्ते दिवाकरे ॥ इत्यादिपुराणवाक्यानि । अतोऽविरुद्ध मुच्यते। राहुरनियतगतिस्तमोमय- ब्रह्मवरप्रदानाद् भूभा प्रविश्य चन्द्र छादयति । चन्द्र प्रविश्य रवि छादयतीति सर्वागमानामविरुद्धम्" सिद्धान्तशिरोमणेर्वासनाभाप्ये लिखितम् । पर कुनापि राहो किमपि विम्बादिक न साधितम् । ग्रहणे राहो किमपि प्रयोजन न भवति, ग्रहणे स्पदिदिनियमाद्यवलोक्नेन राहोनियतगतित्वाच राहुकृतग्रहणस्य स्पष्टमेवास्ति, अतिदूरदर्शिनो लब्धग्रहप्रसादा वटेश्वराचार्या अपि कथ स्पप्टशब्देन भूभाया नाम निर्देश न कृतवन्त इति महदाश्चर्यम् । स्थिति- विमर्दा प्रयोरानयनमसकृद्विधिनाऽनेनापि कृतम् । सकृत्प्रकारेण तदानयन सिद्धान्त. शिरोमणेष्टिप्पण्या म० म० पण्डित वापूदेव शास्त्रिरणा (सशोधन) सूर्य सिद्धा. न्तस्य सुधावपिरगोटीकाया म० म० पण्डित सुधाकर द्विवेदिना च कृतमस्ति, प्राचार्योक्तस्थित्यर्धविमर्धियोरानयनस्थले सकृत्प्रकारेण तदानयनमेतन्महानु- भावद्वयकृत मया प्रदर्शितमस्ति, प्राक्षायनवलयो साधनमुत्क्रमज्या विधिनवं तेना- प्याचार्येण लल्लाचार्योक्तवत्कृत, शिष्यधीवृद्धिदे लल्लाक्त तत्साधनञ्च- खण्डन स्पर्शादिकालजनतोत्क्रमशिञ्जिनीभि क्षुण्णाक्षभा पलभवववरणेन भक्ता। चापानि पूर्वनतपश्चिमयो क्रमेण सौम्यतरारिण समवेहि यथाक्रमेण ॥ ग्राह्यारसराशित्रितयाद भुजज्याव्यस्ता तत प्राग्वदपक्रमज्या। तस्या धनु सत्रिगृहेन्दुदिक् स्यात्क्षेपो विपातस्य विधोदिशि स्यात् ।। अपक्रमक्षेपपलोद्भवाना युति क्रमादेकदिशा कलानाम् । कार्यों वियोगोऽन्यदिशा ततो ज्या ग्राह्या भवेत्सा वलनस्य जीवा ॥ सिद्धान्तशेखरे श्रीपतिनाऽप्येवमेवानयन कृत वलनानाम् । प्रायनाक्षवल- नयो सस्कारेणेव स्पष्टवलन भवति, परमेभिर्लल्लवटेश्वर श्रीपत्याचार्य स्तदर्थ- (स्पष्टवलनार्थ) माक्षायनवलनशराणा सस्कार त । शरसस्कारकरण न युक्त- मतदयं 'वलनानयने क्षेप क्षिप्तो यस्ते कुबुद्धय' इत्यादिना भास्करेणातीव युक्तियुक्त खण्डन कृतम् । उत्क्रमज्यया वलनानयनप्रकारखण्डनमपि तत्कृतम- म.म वटेश्वर-सिद्धान्ते तीच पाण्डित्यपूर्णमस्ति, कमलाकरेगावाजायनवलनद्वय विनं व स्पष्टवलनानयन कृतमस्ति, अङ्ग ललिप्तानयनमपि कस्यापि (ग्राचार्यस्य) समीचीन नास्ति, वट. एवरेणोन्नतकालानुपातेन तदानयन कृतमस्ति, श्रीपतिना भास्करेण च प्रकार. द्वयेन 'शड क्वनुपातेनोन्नतकालानुपातेन च) तदानयन फुनम् । तत्र भास्करण कथ्यते यच्छड ववनुपातागत फल सूदममुन्नतकालानुपातागतफलम्च स्थूलं भवति, अनयोः सूक्ष्मत्व स्थूलत्वयोनिमतीव दुपंदमस्ति, भास्करेण कथमेतयोः सूधमत्व स्थूलत्वञ्च ज्ञातमिति कथयितु न शक्यते। भूभाविम्वानयन वटेश्वरेण यथा कृत तदनुस्पमेव श्रीपत्युक्त भास्करोक्त श्वास्ति, एतेषामनेन वर्धितरविकर्णो यत्र चन्द्रकक्षायां लगति तद्विन्दुत: स्पर्शरेखो (सूर्यविम्बभूबिम्बयो क्रमस्पर्शरेखो) परि यो लम्बस्तदेव भूभाच्यासार्धमायाति, परमेतत्स्पर्शोचित भूभाव्यासार्ध नास्त्यतस्तन्मत न शोभनम् । मुनीश्वरेण वर्धित. रविकर्णचन्द्रकायोर्योग बिन्दुतस्तद्रे खो (वर्धित रविवर्ण) गरि यो लम्बस्तदेव भूभाव्यासाचं कथ्यते ,एतत्कथितभूभाव्यासार्धमपि स्पर्शानुपयुक्तत्वान्न शोभनम् । स्पर्शरेखाचन्द्र कक्षयोर्योगबिन्दुतो मध्यरेसो (वर्धितरविकर्ण) परि यो लम्ब- स्तदेव वास्तवभूभाव्यासार्धम् । यत्साधन सिद्धान्ततत्त्वविवेके कमलाकरेण युक्तियुक्त कृतम् । सुधाकरद्विवेदिनाऽपि वास्तवभूभाविम्वार्धानयनं कृतमस्ति, सशोधकोक्तञ्च तदानयन स्थूलमस्ति, वटेश्वरेणापि रविचन्द्रभूभा. (राहु) बिम्बाना योजनात्मकाना कलात्मकीकरणानयनं शोभन न कृत, श्रीपतिना भास्करेण चैतत्सदृशमेव तदानयन कृतमस्ति, चन्द्र ग्रहणपरिलेखोऽत्र ग्रन्ये सूर्य- ग्रहणे तत्परिलेखेन सहवास्ति, पर्वज्ञानविधिनामको रविग्रहणाधिकारीयपश्च. माध्यायस्तदन्तर्गत एवास्ति, पर सिद्धान्तशेखरे सूर्यग्रहणाध्यायात्पर पर्वसम्भवा- ध्यायोस्नि, सिद्धानशिरोमणो सिद्धान्ततत्त्वविवेके च चन्द्रग्रहणाधिकारात्पूर्व- मेव पर्वसम्भवाऽधिकारोऽस्ति,एषु भिन्नभिन्नलेखक्रमेपु स्वस्वरुचिरेव कारण वक्तु शक्यते । प्रस्तुत पुस्तक-विषये एकचत्वारिंशदुत्तरकोनविंशतितमे क्रिस्ताब्दे (१९४१) मम मानसे विचार: 'समजनि यत् भारतीयेपु पत्सु शास्त्रेपु नेत्ररूप ज्योतिप शास्त्र प्रनि जनतायाः नहि किमपि ध्यानम्, येनेद प्रतिदिनम् अवनत्युन्मुखम्, कथ नेद संरक्षणीयम् ! तदेव मया प्रतिज्ञात यत् यथाशक्ति ग्रह स्वजीवने ज्योतिषशास्त्रस्योन्नत्य कार्य विधास्ये । एतत्वार्य नास्ति लघुरूपम्, यत. अस्मिन् कार्ये ज्योतिपस्य प्रचार, प्राचीनाना पाण्डुलिपिवद्धाना ग्रन्याना प्रकाशनम् एव भारतेऽन्यदेशेषु विभिन्न- राज्येषु तथान्यस्थानेषु उपेक्षिता ज्योतिपनन्यानामन्वेपण. तेपा सम्पादनं मुद्रण प्रकाशनादिक च कायं वर्तते । अस्य वृहत कार्यस्य सिद्धय 'सस्थायाः' प्राव- श्यकता भवति, या एतत्कार्य साधयेत् तथा गुभपरिणाम उपलभेत । अतस्तदेव सस्थामेकां स्थापयितु व्यचारयम् । दिसम्बरमासस्य पञ्चतारिकाया अयश्चत्वारि:
भूमिका शदुत्तरकविंशतितमे विस्ताब्दे (२ १२ १९४३) लयपुरस्थप्राच्यमहाविद्यालयस्य (ोरियण्टल कालेज ) प्राचार्यारणा श्रीलक्ष्मणस्वरूपमहोदयाना करकमलाभ्या 'बुगल ज्यौतिपकार्यालय' नामक्सस्थाया उद्घाटनमवारयत् । उद्घाटनावसरे गोस्वामी श्री ईश्वरदास (भारतधनकोपस्य, देशीयाध्यक्ष ) सभाया. अध्यक्षतामल- चकार। प्रकाशन तेपु दिवसेषु कार्यारम्भे जाते ज्यौतिपाङ्गनये सिद्धान्त होरा सहितासु होरा- शास्त्रस्य, प्राचार्यहेमप्रभसूरिविरचित 'लोक्यप्रकाश' नामक पुस्तकस्य पाठा- न्तर सहित हिन्दीटोकायुक्त पञ्चचत्वारिंशदधिक्कोनविंशतितमे विस्ताब्दे (१६४५) समभवत् । तदनन्तर सप्तचत्वारिंशदुत्तरकविंशतितमे निस्ताब्दे (१९४७) भारतवर्ष स्वतन्नमभवत्, पञ्चापदेशस्य भागद्वये विभाजनमभवच्च । तदा वयमपि जन्मभूमि विहाय भारतस्य राजधान्या दिल्लीनगयीं स्वज्योतिपानुसन्धानकेन्द्रमरचयाम । ज्योतिष पूर्णरूपेण समुन्नतकरण नैव जनस्य काय, यावदस्मिन् महति कर्मणि जनताया साहाय्य न भवेत् । इत्थ विचार्य ग्रह श्रीवृजलालनेहरुमहोदयस्य तथाऽन्यसदस्याना समक्ष 'जनता-सरक्षण' सस्थाया स्थापनस्य प्रस्तावम् अस्थाप- यम् । ते वृपालु महानुभावै भारतीयज्यौतिप सस्कृतानुसधानसस्थाया (इण्डि. यन इन्स्टीटयूट आफ अस्ट्रानोमिकल एण्ड सस्कृत रिसर्च) सूत्र-पातमकारि । उत्तरप्रदेशस्य भूतपूर्व मुरयमन्निभि माननीय श्रीसम्पूर्णानन्दमहोदय स्वकर- कमलाभ्याम् अस्या वृहत्मस्थाया उद्घाटन सुसम्पादितम् । तत सस्थेय स्ववार्य- स्यारम्भ 'ज्योतिष-विज्ञान' नाम्न्या मासिकपत्रिकयाऽकरोत् । प्राचार्याणा श्रीवटेश्वरमहानुभावाना नाम मया अलबेरुनी यात्रियो भारत- यातायामपठम् । अलवेरूनी तस्यामलिखत् यत् वटेश्वरसिद्धान्तनामक एकोत्तमो ग्रन्थो भारते विद्यते यस्मिन् ब्रह्मस्फुटसिद्धान्तविपयिकी पालोचना वर्तते । मम चेतसि उत्कण्ठाऽसीत् यद् ग्रन्थोऽय कय मामुपलभ्येत । गरणक्तरगिण्यामपि महामहोपाध्यायसुधाकरद्विवेदिरचिते स्वा- ध्याये वटेश्वराचार्यप्रणीतस्य वटेश्वरसिद्धान्तस्य अनुपलब्धिविवशतामाश्यम् । इद पुरतक लन्धुमहयतमानोऽभवम् । भारतस्य विहारप्रान्ते, काश्मीरेषु एव अन्यान्येषु राज्येपु अह गत्वा हस्तलिखितग्रन्थस्यास्य प्राप्त्यै प्रयत्नमकरवम् । किन्तु कुत्रापि नहि लब्धवान् ग्रन्थमिमम् । अन्ते मयाऽस्यान्वेपण लवपुरस्थ-विश्व- विद्यालयस्य बृहत्पुस्तकालयेऽकारि तन सफलमनोरथोऽभवम् । अह तत्र हस्त, लिखित वटेश्वरसिद्धान्तमुपलब्धवान् । तत अह श्री जगदीशशास्ति एम० ए०, एम० ओ० एल० महोदयद्वारेण वटेश्वरसिद्धान्तस्य प्रतिलिपिमकारयम् । इत्थम् अय महान् ज्यौतिपग्रन्यो हस्तगतो जात । तत ३२ वटेश्वर-सिद्धान्ते पुस्तक तु प्राप्त विन्तु तयव मूलस्पेण मुद्रापणेन नहि कोऽपि लाभो दृश्यते स्म, अत सभाष्य मोपपत्ति हिन्दीभाषानुवादसहितश्च मुद्रितो भवेदिति व्यचारयम । किन्तु पर्याप्ता वेला यावत् अस्य कार्यस्प सुसम्पन्नाय नहि कश्चित् सहायो योग्यो ज्योतिपी मिलित । बहुनालानन्तर श्रीपण्डितविश्वनाथ (झा) द्वारेण सिद्धान्त ज्योतिपस्य प्रकाण्डविद्वास श्रीमुकुन्दमिधज्योतिपाचार्या अववोरपथमव तरिता । पाहूताश्चास्य कार्यस्य सम्पादने । तै महानुभाव स्वमहता परिश्रमेय पुस्तकस्यास्य सम्पादने सस्कृतभाष्योपपत्तिहिन्दीटीकादिलेखने च मा महान् सहयोग प्रादायि । इत्थविधिना पुस्तकमिदमिदानीम् अधिकारमयस्य विशालस्वस्पेण भवता समक्ष प्रस्तूयते । अनेन ज्यौतिपस्य प्रचारकायें क्यिाल्लाभो भविष्यति तथाऽनेन ग्रन्थेन ज्योतिपिका महाभागा वियन्मानम् अग्रेसरो भवितु शक्ष्यन्ति- एतत् सर्व विद्वन्मण्डलायत्त मन्ये । प्राभार स्वीकार अस्मिन्कर्मणि ज्योतिपस्य परमविद्वान् श्रीपण्डितविश्वनाथ (झा) ज्योति- पाचार्यवयें गणित कर्मणि च मह्य महान् सहयोगोऽदायि तदर्यमह हृदयेन तेपामाभार गृह्णामि । प्रूफसशोधनकमरिण महान् सहायको विद्याभास्करो लक्ष्मी- नारायण शास्त्री धन्यवादाह । तथा कार्यस्यास्य सम्पन्नताये भारतशासनस्य सास्कृतिक वैज्ञानिक विभागाना प्रान्तीयशासनाधिकारिणा अस्या सस्थाया सद- स्याना चानुगृहीतोऽस्मि । मृगु प्राधम विदुषामनुचर' नई देहली रामस्वरूप शर्मा T विषयानुक्रमणिका or ६ ७ ह २५ ३४ मध्यमोधिकार: प्रथमोऽध्यायः- मंगलाचरणम् ग्रन्थारम्भकारणम् ज्योतिपशास्त्रस्य वेदाङ्गत्वनिरूपणम् सिद्धान्तग्रन्थलक्षणम् कालमानम् युगादिमानम् रविबुधशुक्राणा कुजगुरुशनिशीघ्रोच्चानाञ्च भगणमानम् युगे चन्द्रकुजरानीना भगणमानम् शनेषु धशोघ्रोच्चयोश्व भगणा चन्द्रमन्दोच्चभगणाः चन्द्रभगणाश्च ब्रह्मायुपि रविकुजगुरूणा भगरणा ब्रह्मायुपि शनिवुधशुक्रमन्दोच्च भगणा. मगलादिग्रहाणा पातभगणा ग्रन्धकारस्य स्वजन्मममय ग्रन्थकालश्च द्वितीयोऽध्यायः-- मानविवेकः वार्हस्पत्यवर्पवर्णनम् युगपठितभगणेभ्यः कल्पीयभगरणज्ञान ततो ब्रह्मायुपि भगरराज्ञानम् कालस्य नव मानानि सृष्टयारम्भकालवर्णनम् केपु कार्येषु केपा मानानामुपयोगः तृतीयोऽध्यायः- धुगरण (महर्गण) विधिः अहर्गणानयनस्य द्वितीयः प्रकार पुनरहर्गरणानयनम् पुन. प्रकारान्तरेणाहर्गणानयनम् ४० ४२ . ५४ ५८ ५६ ५६ ६४ ७६ ८१ ८२ ३ ८६ वटेश्वर-सिद्धाले स्फुटाधिमासोपज्ञानम् प्रकारान्तरेणाहणानयनम् शुद्धिदिनज्ञानम् प्रकारान्तरेणाहर्गणसाधनम् प्रकारान्तरेणाहणज्ञान तथा दिनशुद्धिश्च पुनरर्गरणानयनम् ८८ ५६ " " ६६ ६७ १०० १०३ ११२ लघ्वहर्गरणानयनम् ब्रह्मदिनादौ गतसावन दिनानि कृतयुगमानानि च कलियुगादावहर्गरण कल्लादितो युगादितो वा व्यस्तदिनाधिपज्ञानम् सावनाहरणतश्चान्द्राहर्गणमान सौराहणज्ञानञ्च एकस्य मानज्ञानेन अन्यस्य कथ ज्ञानम् पुन प्रकारान्तरेगाहर्गरणानयनम् पुनरहगंगानयनम् प्रकारान्तरेणाहरणसाधनम् चतुर्थोऽध्याय -(सर्वतोभद्रनामक ) अहर्गरणद्वारा ग्रहानयनम् लघ्वहगरातो मध्यम रविज्ञानम् मध्यचन्द्रानयनम् एकस्य भगणादिग्रहस्य ज्ञानेनाभीष्ट द्वितीयग्रहसाधनम् अधिमासावमशेपाभ्या चन्द्रानियनम् अधिशेपात् सूर्यचन्द्रयोरानयनम् अधिमासावमशेपाभ्या चन्द्रानियनम् पुन प्रकारान्तरेण चान्द्रार्कानयनम् सूर्यक्लातो रविचन्द्रयोरानयनम् चन्द्रकलातश्चन्द्ररख्योरानयनम् पुनश्चन्द्ररव्योगनयनम् अधिमासावमशेषाभ्या सूर्य ज्ञात्वा चन्द्रानयनम् अवमशेषघट्यानयनम् रविचन्द्रयोरानयनम् पुन रविचन्द्रानयनम् पुनस्तदानयनम् पुनश्चन्द्रार्कयोरानयनम् चन्द्रपातेन रविचन्द्रयोरानयनम् १२० १२५ १३३ १३७ १३८ १४१ १४१ १४३ १४५ विषयानुक्रमणिका प्रकारान्तरेण रविचन्द्रयोरानयनम् " १४७ १५१ १५४ १५६ १५८ १६२ १६२ १६४ १६५ प्रकारान्तरेण ग्रहानयनम् अनुलोमगतीन् ग्रहान् विलोमानविलोमांश्चानुलोमान् कर्तुम् उरायद्वयम् स्वसोवनदिनवशेन ग्रहाणाम एकगत्याः मानम् एकग्रहज्ञानेन द्वितीयग्नहज्ञानम् ग्रहैक्यज्ञानेन पृथक् पृथग् ग्रहानयनम् इष्टगुणगुणितग्रहद्वयस्य ग्रहत्रयादेर्वेष्टहरभक्तग्रह- द्वयस्य ग्रहत्रयादेवा योगान्तर ज्ञात्वेष्टग्रहानयनम् गतचान्द्रदिनान्तकालिकग्रहानयनम् गतसौरदिनान्तकालिकग्रहानपनम् देवासुरयोरुदयास्तकालिकग्रहानयनम् बार्हस्पत्यवन्तिकालिकग्रहानयनं ब्रह्मदिनादिकालिक- ग्रहानयनम् कलियुगादौ ग्रहानय नम् त्रैराशिकानीतपदार्थेपु लघुकरण भाज्यभाजक- योई ढत्वलक्षणश्च ग्रहादीना क्षेपा पञ्चमोऽयायः- अथ प्रत्ययशुद्धि अधिमासानयन शुद्धिश्च पुनरप्यधिमासानयन शुद्धिश्च पुनस्तदेव १६६ १६७ १६७ १७० १७१ १७३ २७३ १७४ " " " " वर्षपतिज्ञानम् १७५ पुनः " अब्दप्रत्ययानयनम् चान्द्रवर्षमम्बन्धेन वर्षपतिज्ञानार्थम् " " १७८ चान्द्रवपंपतिज्ञानार्थम् उपयुक्ता ग्रहध्रुवकाः सौरवदिौ ग्रहादो ध्रुवका. कुजानयनम् बुदशीघोचानयनम् १८० - - 12 ४ वटेश्वर-सिद्धान्ते १८१ शुक्शीघ्रोच्चानयनम् शनेरानयनम् इदानी चन्द्रमन्दोच्चानयनम् प्रकारान्तरेण तदानयनम् चन्द्रपातानयनम् मध्यमरविमेपादिकस्य सावनार्गणस्यानयनम् प्रकारान्तरेणाहरणानयनम् १८२ १८२ १८२ १८३ १८८ १८५ १८७ १८ " " " १६० १६२ १६३ १६४ १६७ १६८ प्रकारान्तरेण लध्वहगणानयनम् पुन प्रकारान्तरेगाहर्गणानयनम् प्रकारान्तरेण लघ्वहर्गरणानयनम् रविमासान्तधिमासानयनम् लघ्वहर्गणानयनम् सौरदिनान्तकालिकचन्द्रादिपतिाद्यशा चन्द्रवर्पपतिज्ञानार्यमहर्गरणानयनार्थमवतरणम् चन्द्रवर्षपतिज्ञानार्यमहर्गणानयनम् अारणानयने विशेपम् चान्द्रमाससम्बन्धेन मासपतिज्ञानम् चान्द्रवर्षपतिदिनपत्योर्मानम् चन्द्रादिग्रहादीना प्रतिमासक्षेपा कुजादीना ग्रहाणा प्रतिमासक्षेप (धनकला). कलासम्बन्धे तद्गतिजानम् पठोऽध्याय अथ करविधि ग्रहण विना रविचन्द्रयारानयनाय करणविधि अधिमासावगोपाभ्या रविचन्द्रयोरानपनार्थ विधि ग्रहर्गणाथ करणविधि ग्राणान्मध्यमग्रहानयनार्थ करविधि उपमहार सप्तमोध्याय प्रय प्रमाणविधि अण्वादिप्रमाणक्यनपुर सर योजनप्रमाण वदनायवक्षाप्रमाणम् खवक्षाप्रमाग विमाकारकमिति निस्प्यते अभक्ष्यायवक्ष्यादिगम्बन्ध पुनरप्याह १९६ २०१ २०० ००१ २०२ २०३ २०५ २०६ २१० - २१० २१२ २२४ २१५ २१५ २१७ २१७ २२२ २२५ २२७ २२८ २३० २३२ विषयानुक्रमणिका ग्रहाणाम् वक्षामकक्षा च निदिशति ग्रहाणामेकदिनयोजनगतिसख्यया निर्दिशति पुनरपि ग्रहानयनम् युगे ग्रहा कियन्ति योजनानि भ्रमन्तीत्याह बुधशुक्रयो कक्षाविपये विशेपम् दुजगुररानीना विशेषम् दिनपतिमासपतिवर्षपतिहोरापतिज्ञानार्थ विधि ग्रहाणा गतावतुल्यत्वे कारणम् अपमोऽध्याय - अथ देशान्तरविधिः अधुना लङ्कामारभ्य मेरुपर्यन्तसमरेखास्थिता प्रसिद्धदेगा पुरान्तरयोजनम् देशान्तरसम्कारमनुभापते प्रथमपक्षोक्तदूपण प्रदर्शयन् पूर्वपक्षान्तरमनुभापते स्वाभिमत देशान्तर प्रतिपाद्य ग्रहेषु तत्पल (देशान्तरफल). मस्कारज्ञानम् स्पष्टदेशान्तरस्लमकारमुक्त्वा वारप्रवृत्तिज्ञानम् वारादिज्ञानम् गहाणा दिनगतिज्ञानप् भुजान्तरफलादिमस्सार प्रनिपाच वर्षाधिपतिज्ञानम् सावनमासपतिज्ञानार्थम् पालाहोरेशनानमुक्त्वा वर्षमामहारेशाना क्रमप्रदर्शनम् पुनरपि होरेगज्ञानम् नवमोऽध्याय प्रय प्रश्न विधि तमादी तदारम्भप्रयोजनम् प्रश्न अन्यप्रश्न अन्ये प्रपना अन्ये प्रग्ना बन्यो प्रश्नो प्रन्ये प्रपना मध्यगति च विमलाममिन्यम्योत्तरायमुपपत्ति महादापगतो धवरान्वयोन्य य प्रमाधयेदिन्युत्तगयंमुपपनि २३४ २३५ २१८ २३६ २४६ २४३ २४४ ४१ २४७ २४० २०० ०५० ६ वटेश्वर-सिद्धान्ते २५२ २५२ २५३ २५४ २५४ २५५ २५५ २५७ २५८ २५६ २५६ २६१ २६२ अन्ये प्रश्ना अन्ये प्रश्ना अन्ये प्रश्ना अन्ये प्रश्ना अन्य प्रश्न अन्य प्रश्न अन्य प्रश्न अन्य प्रश्न अन्य प्रश्न अन्य प्रश्न अन्ये प्रश्ना अन्ये प्रश्ना अन्यौ प्रश्नो दशमोऽध्याय :- अथ दूपरणानि इदानी ब्रह्मगुप्तोत्तिदूषणकथनार्थमवतरणम् ब्रह्मगुप्तोतयुग खण्ड्यते पुनरपि युगचरणान् निराकरोति ब्रह्मोक्तमृष्टिप्रलयौ न समीचीनाविति निर्दिशति ब्रह्मोक्तदिनमासवर्षहोरापतीन् खण्डयति कल्प सण्डयति आर्यभटमतेन क्ल्पादौ वारो न समीचीन इत्येतत्ममाधान करोति ब्रह्मगुप्त दूपयति पुनरपि ब्रह्मगुप्तस्य युगादि दूपयति कलियुगादौ ब्रह्मगुप्तोक्त गतयुगचरणान् खण्डयति ब्रह्मगुप्तोत्तपृष्ट यादिकाल खण्डयति ब्रह्मगुप्तोक्ताल्पगत गतयुगचरणाश्च खण्डयति ब्रह्मगुप्तोत्तग्रहभगवान् खण्डयति कुजस्य भगणचतुष्टयकल्पन खण्डयति ब्रह्मगुप्तोत्तदेशान्तरयोजन सण्डयति ब्रह्मगुप्त दूपयति ब्रह्मगुप्तस्य सूर्यसक्रान्ति दूपयति ग्रह्मगुप्तोल-भूव्यासाधं सण्डयति ब्रह्मपत्ति ग्यानयनवण्डनम् ब्रह्मगुतमत सण्डयति २६४ २६४ २६७ २६६ २७० २७१ २७४ २७५ २७६ २७७ २८२ २८२ २८३ २८४ २८५ २८५ २८७ २८८ २८६ २६० ७ विषयानुक्रमणिका ब्रह्मगुप्तोक्त-भीमशीघ्र-परिधिभाग-स्फुटीकरण-खण्डनम् ब्रह्मगुप्तोक्त-छायाभ्रमणं खण्डयति ब्रह्मगुप्तोक्त-चन्द्रभा सण्डयति राहुकृतग्रहणं भवतीत्याह ब्रह्मगुप्तोक्तवित्रिभलग्ननताशं खण्डयति ब्रह्मतोक्तहक्कमसंस्कृतग्रहः समीचीनो नेति सण्डयते चन्द्रशृङ्गोनतो ब्रह्मगुप्तोक्तस्पष्टभुजं खण्डयति ब्रह्मगुप्तं दूपयति पुनर्बह्मगुप्तं दूपयति २६२ २६३ २६६ २६७ २६६ ३०० ३०१ ३०४ स्पष्टाधिकारः प्रथमोऽध्याय:- तबादौ स्फुटीकरणस्य प्रयोजनमाह स्पष्टीकरणादिमर्वग्रहगणितस्य ज्यामूलकत्वात्प्रथम ज्या. कथ्यन्ते रव्यादिग्रहाणा मन्दपरिधीनाह केन्द्रमभिधीयते ततो भुजकोटिज्यादिकल्पना च भुजज्याकोटिज्ययोरेकतो द्वितीयज्ञान क्रमज्याज्ञान च कमज्योत्क्रमज्याभ्या व्यासानयनम् इष्टचापज्यानयनम् प्रशादिज्यानयनम् पुनरपि ज्यानयनम् ज्यातश्चापानयनम् पुनश्वापानयनम् दोषाशज्यानयनम् शेषज्यानयनाथं विचार. रवीन्दोः स्पष्टीकरण भुजान्तरकर्मानयनम् ३०६ ३०६ ३१८ ३२३ ३२४ ३२५ ३२६ ३२६ ३२६ १३३० ३३१ ३३२ ग्रहारणा च यम ३४० ३४४ ३४५ ३४६ स्पष्टगतिपरिभाषा मन्दगतिफलानयनं ततः सष्टगत्यानयनम् मन्दवेन्द्रज्यान्तरमानीयते पुनर्मन्दगतिफलानयनं ततः स्पष्टगत्यानयनम् पुनः रविचन्द्रयोर्मन्दगतिशलानयनम् पुनस्तानपनम् ३५१ ३५२ वटेश्वर-मिद्धान्ते ३१५ ३५६ ३५८ ३५६ ३६० ३६१ ३६२ ३६४ ३६८ द्वितीयोऽध्याय.-- स्वोच्चनीचग्रहस्फुटीकरण विधिः तनादौ युजादिग्रहाणा स्फुटन्वार्थ भचतुष्टयममार बुक्गुनयोविगेपः शोनफ्लानयनम् कानयनम् भुजफल विनैव करनयनम् पुनरपि वर्णानयन प्रकारद्वयम् पुन कर्णानयनम् पुन कानयनम् पुनस्तदानयन प्रकारद्वयम् कुजादिम्पष्टीकरणसम्बन्धेऽवतरणम् गतिस्फुटोकरणम् केन्द्रमभिधीयते ततो मन्दशीघ्रफ्लयोधनर्णव्यवस्था अधुना विध्यन्तरेरा फलस्फुटीकरणम् भानीताना भुजफलाना सयोगवियोगप्रकार भुजकोटिज्यादिसाधनेविनाशुगरणादेव स्फुटग्रहवां प्रकार स्पष्टभगरपशेषज्ञानार्थम् ग्रहस्फुटत्वार्य सस्कारः पूर्वोक्त 'पूर्ववञ्चाभुजनोटिमाघनमि' त्यस्य स्पष्टीकरणम् भुजफलम्य नामान्तरम् चन्द्रस्य देशान्तरसम्कार भुजातरमस्कार. तृतीयोऽध्यायः प्रतिमण्डलस्पष्टीकरणविधिः प्रार-यते नीचोचवतव्यामाधानयनम् करनयनम् वर्णसम्वन्येन केन्द्रकोटिज्यानयनम् कानयनमुक्त्वा ग्रहमध्यममस्कार. देय मध्ये शोध्यमित्यादे स्पष्टीकरणम् पदवानाम् ग्रहयष्टगतेगनयनम् पुनर्मन्दपलायन शीघ्रफलानयन च म्नष्ट ग्रहान्मध्यग्रहानयनम् ३७१ ३७२ ३७३ ३७५ २५५ ३७८ २८१ ३८४ २८६ ३६१ ३६४ ३६६ ३६७ ४०० ४०० ४०० ४०३ ४०४ ४०४ विषयानुक्रमणिका चतुर्थोऽध्यायः- स्फटीकरणम् अर्थ ज्यामबिना स्फुटीकरणम् ज्याभिविना भुज ज्यानयनम् भुजफलकोटिफलयो साधनार्थम् ज्याभिविना चापानयनम् भोमादिग्रहाणामतिशीघ्र-शोघ्रादिगतयः भौमादिग्रहाणा वक्रारम्भकालिकेन्द्राशा. भीमादीना वादिनानि भौमादीना निरंगदिनानि भीमादीनामुदयास्तकेन्द्रागा. चुध शुक्रयोः पूर्व-पश्चिमदिशोदयास्तदिनानि पञ्चमोऽध्यायः- अथ फलज्यास्फुटीकरणविधि मन्दभुजफलगीघ्रभुजफलयोरानयनम् ग्रहस्पुटीकरणम् कोटि विना कनियनम् केन्द्रसम्बन्धे विशेषम् गतिस्पशेकराणम् उदयास्तदिनानयन वक्रानुवादिनानयनम् निरादिनानयनम् पप्ठोऽध्याय:- निम्यानयातनिशिः नयादी निप्यानयनम् नक्षयानयनार्थम् म्युलमानयनमभिधाय मूक्ष्मानयनम् अभिजितो भुक्तिः अन्य विगपम् करणानयनम् योगानयनम् व्यतीतियानगोधणम् माधारन मानिगाम्यगमवागंभमानम् गति नन्दगो विप. ४०५ ४०७ ४०८ ४१० ४१२ ४१३ ४१८ ४१५ ४१६ ४१८ ४२१ वटेश्वर-सिद्धान्ने ४३४ ४३५ पातस्य गतागतत्वम् एद पातमध्यमभिधायेदानी पाताद्यन्तकालपरिज्ञानम् रविचन्द्रयो समलिताधानम् रविचन्द्रयो समभागसमराशिस्थानम् सक्रान्तिकालराशिकरणतिथियोगानामन्तवाल निर्णेतुमाह सप्तमोऽध्याय:- अथ प्रश्नविधि. प्रश्ना अत्ये प्रश्ना अन्यो प्रश्नो अन्ये प्रश्ना अन्ये प्रश्ना पुनरत्ये प्रश्ना अन्ये प्रश्ना ४३८ ४३८ ४४१ ४५० ४५२ विप्रश्नाधिकारः - ४५६ प्रथमोऽध्याय त्रिप्रश्नारम्भप्रयोजनम् पुनदिग्ज्ञानम् पुनर्दिज्ञानम् पुनरपि दिग्ज्ञानम् ४६० ४६१ ४६२ " ४६४ ४६४ ४६५ भाभ्रमरेखावशेन दिग्ज्ञानम् पुनरपि दिग्ज्ञानम् छायात कर्ण करणेच्छाया शकुस्वरूपम् प्रकारद्वयेन पलभानयनम् पलभाज्ञानम् भुजद्वयज्ञानपलभाज्ञानम् छायाकर्णद्वय तद्भ जद्वय च ज्ञात्वा पलभाज्ञानम् पुनरपि प्रकारद्वयेन पलभापलकर्णयो साधनम् कान्तिज्ये पलभाज्ञानम् पुनरपि पलभाज्ञानम् ४६६ ४६६ ४६७ ४६६ ४७० " ४०१ ४७३ विषयानुक्रमणिका द्वितीयोऽध्यायः- अथ लम्बाक्षज्यानयनविधिः लम्बाक्षज्ययोरानयनम् पुन. लम्बाक्षज्यानयनद्वयम् पुन अक्षज्यालम्बज्ययो साधनानि ग्रानयनम् ४७४ ४७५ ४७७ " " ४७८ " ४८० '४८१ ४८२ ४८४ तयोरेवोत्क्रमज्यानयनम् पुनम्तयोरेवानयनम् पुन. अक्षाशलम्बाशयो उत्क्रमज्यानयनम् पुनस्तयोरेवानयनम् लम्बाक्षज्ययोरानयनम् पुनस्तयोरेवानयनम् पुनरपि तयोरेवानयनम् पुनस्तयोरेव प्रकारद्वयेनानयनम् पुनरप्यक्षज्यालाघवम् पुनरपि लम्बज्यानयनम् अक्षज्यालम्बज्योश्चाप विधायायनागानयनम, ४८७ ४८८ ४८६ ४.० ४६१ तृतीयोध्यायः- अथ क्रांतिज्यानयनविधिः क्रान्तिज्यानयनम् " ४३३ ४६३ १६४ ४६५ ४१८ ४६६ पुन क्रान्तिज्यासम्बन्धे ग्राह पुन क्रान्तिज्यानयनानि पुनरपि कान्तिज्यानयनानि पुनम्तदानयनम् पुन क्रान्तिज्यानयनानि चतुर्योऽध्यायः- मय घुग्णनयनविधि पज्यानयनम् पुनस्तदानयनम् ५०१ . ५०२ १ १२ क्टेश्वर-सिद्धान्ते ५०४ पुनस्तदानयनम् पुनस्तदानयनद्रयम् पुनम्तदायनानि पञ्चमोऽध्याय अथ कुज्यानयनविधि. पुन कुज्यानयन प्रकारद्वयेन ५०६ " ५०६ ५०६ ५१० ५११ " " पुन कुज्यानयनानि पुनस्तदानयनानि पष्ठोऽध्याय- अग्रानयनविधि तनादौ अग्रानयनानि पुनरग्रानयनानि पुनस्तदानयनानि ५१५ ५१७ ५१६ ५२१ - ५२३ ५२३ ५२५ सप्तमोऽध्याय अथ स्वचराधज्याप्राणसाधनविधि चरार्धज्यानयनानि पुन चरज्यानयनानि पुन तदानयनानि पुन तदानयनम् पुन चरज्यानयनानि पुनस्तदानयनानि पुनरपि चरज्यानयन प्रकारद्वयेन उपसहार ५२८ ५२६ ५३० ५३२ गष्टमोऽयाय अथ लानादिविधि निरक्षोदयसाधनम् गुना रागीना निरक्षोदयमाधनम् पुस्तदानयनम् निप्पन्नाम्नान् अम्न पाह ar ५८८ ५८५ ५४८ ५५० ५५१ ५५२ ५५५ पियानुक्रमणिका पूर्वानोते स्वदेशीयराश्युदयमान लग्नानयनम् लग्नादिष्टकालानयनम् प्रकारान्तरेण लग्नानयनम् पदा इष्टापूनामत्यत्वात्तभ्यो भोग्यासवो न शुद्धास्तदा क्थ लग्नसाधनमित्याह इटासुम्य भुक्तासूना शुद्धी लग्नसाधनमुक्त्वा तस्मादिष्ट कालानयनम् रवितो लग्नेऽल्पे सतीष्टकालानयनम् स्वदेशोदयविना लग्नरव्योरन्तरासुमानः तम् प्रकारान्तरेण तदानयनम् नवमोऽध्याय.--- अथ धुबलभादिविधि. दिनार्धशक्वयं मध्यच्छाया-दिग्व्यवस्था मध्यच्छाया छायाकर्णयोरानयनम् दिनार्धहृत्यन्त्ययोरानयनम् गसाधनानि क्वानयनम् शक्वानयनानि शाक्वानयनप्रकारान्तराणि पुन पुनस्तदानयनानि दिनाधकरणानयनानि पुनर्मध्यकर्णानयनम् मध्यच्छायानयनम पुनर्मध्यपनियनम् धुज्याल्पोरानय नम् हत्यानयनम् सामोऽध्याय प्रथेप्टच्यायाविधि मगंवृत्तानावगेन पायारणांनयनम् पगंवृत्ताग्रायमेन दाबानयनम् भाररागानम् पुनम्न गारनानि " ५६६ ५७० ५७२ ५७२ बटेश्वर सिद्धान्ते ५७५ ५७६ अथेष्टाक्वानयने पुन प्रसारान्तराभ्या तदानयनम् पुनरिएशक्वानयनम् मध्यराकुतोऽभीष्टशको रानयनम् उन्नतकालानयनम् प्रकारान्तरेगोन्नतकालानयनम् उन्नतकालादिष्टान्त्यानयनम् पुनरुन्नतकालानयनम् विशेपम् एकादशोऽध्यायः- अथ सममण्डलप्रवेशविधि कोरणशक्वानयनम् समशकुसाधनानि पुनस्तदानयनानि समकानयनानि ५८२ ५८३ ५८५ ५८८ ५८६ ५६१ द्वादशोऽध्यायः- अथ कोरणशकुविधि कोरणशक्वानयनम् पुनरपि कोणश क्वानयनम् ५६३ १६३ " ६०० ६०१ ६०३ पुनरपि कोणशकुसाधनम् प्रयोदशोऽध्याय.- अथ धायातोऽर्कानयनविधिः रविक्रान्त्यानयनम् सममण्डलशकुज्ञानेन रविज्ञानम् रविभुजज्यानयनम् कर्णवृत्तापातो रविज्ञानम् रविमुजज्यानयनम् चतुर्दशोऽध्यायः-- प्रय छायापरिलेसविधि भाभ्रमरेसानिरूपण श कुभ्रमरेखानिरूपण च भाभ्रमवशेन दिग्ज्ञानम् ६०७ ६०६ ६०६
विषयानुक्रमणिका
६१२
गृहपटलाभ्यन्तरे सूर्यावलोकनविधिः
इष्टच्छायावृत्ते पलभा सस्थितिः
छायापरिलेखः
पञ्चदशोऽध्यायः-
प्रय प्रश्नाध्यायविधिः
तदारम्भप्रयोजनम्
तत्र प्रश्न:
६१७
६२०
६२१
अन्ये प्रश्नाः
अन्ये प्रश्नाः
अन्ये प्रश्नाः
अन्ये प्रश्नाः
अन्ये प्रश्नाः
प्रन्ये प्रश्नाः
प्रन्ये प्रश्ना
६३४
६३७
प्रन्यः प्रश्न:
अन्यः प्रश्नः
अन्यः प्रश्न
६३६
द्वित्राः शब्दाः था। श्रीवटेश्वरसिद्धान्त की रचना प्राज से लगभग ६०० वर्ष पहले हुई थी। लिखे जाने के थोडे ही दिन के भीतर, इसकी गणना सिद्धान्त-ज्योतिष के लब्धप्रतिष्ठ ग्रन्थो में हो गई । यह आश्चर्य का विषय है कि जिस पुस्तक ने विद्वत्समाज मे इतना समादर प्राप्त किया था, वह कुछ दिनो मे नाम-शेपमात्र रह गई थी । यह हर्प का विषय है कि बडे अन्वेपण के पश्चात् उसकी एक हस्तलिखित प्रति पण्डित रामस्वरूप शर्मा को मिल गई। उसका प्रकाशन करवे उन्होने उपयोगी कार्य किया है । कुछ मित्रो की सहायता से उसका जो विज्ञान-भाष्य लिखा गया है व हिन्दी टीका दी गई है उससे उपयोगिता और भी बढ़ गई है । उपपत्तियो मे उस प्रक्रिया का व्यवहार करके, जो आधुनिक गणित-ग्रन्थो में प्रयुक्त होती है, विद्याथियो के लिए उपा- देयता की मात्रा को कई गुना बढा दिया है। जिस व्यक्ति ने २४ वर्ष के वय मे ऐसा ग्रन्थ लिखा उसकी प्रतिभा निश्चय ही असा- धारण रही होगी । ग्रन्य को देखने से इस अनुमान की पुष्टि होती है । परन्तु इसके साथ ही कुछ और बातो को ओर भी ध्यान जाये बिना नही रहता । जिन दिनो पुस्तक लिखी गई थी, उस समय भारतीय विज्ञान में अधोमुखी प्रवृत्ति का प्रारम्भ हो गया ज्योतिष प्रत्यक्षमूलक शास्त्र है । जिस व्यक्ति ने २४ वर्ष की अवस्था मे ऐसी पुस्तक लिखी, निश्चय ही उमने अाकाशवर्ती पिंडो के प्रत्यक्ष अध्ययन मे अधिक समय नहीं लगाया । उसके ज्ञान की गम्भीरता चाहे जो रही हो, पर वह ज्ञान गुरुमुख से और पुस्तको से प्राप्त हुआ था । उसका प्राधार वेधशाला में किया गया प्रयोग व अध्ययन न था। वही प्रवृत्ति आज भी है लोग पुस्तक पढकर ज्योतिषी बन जाते हैं । लोकोक्ति के अनुसार, "वावा वाक्यम् प्रमाणम्' का युग आ गया था । कालिद स के इस कहने को कि 'पुराणमित्येव न माधु सर्वम्' लोग भूल चले थे । व्याकरण न दर्शन के समान ज्योतिप भी शास्त्रार्थ का विषय बन गया था। वटे- श्वरसिद्धान्त म पूरा एक अध्याय, ब्रह्मगुप्त के खडन में दिया गया है । उमका शीर्षक ही है 'अन्यदूपणानि' । यह हो सकता है कि भू-भ्रमण प्रादि विन्ही विषयो पर ग्रन्थकार को मार्यभट्ट के मत मे स्वारस्य हो और ब्रह्मगुप्त के मत मे वरस्य, परन्तु ब्रह्मगुप्त को मूर्ख मिद्ध करने का प्रयास अशोभन है । कही वह कहते हैं, ' रविशशिनोरज्ञानात् तिथेनं पचागमपि वेति" । वही उनके लिए 'विनष्टम' जैसे विशेषण का प्रयोग किया गया है। जब किमी विद्या की उन्नति का प्रवाह रक जाता है तभी प्राचीन ग्रन्थो को सर्वोपरि प्रामाणिवता दी जाती है । उनको देवो व ऋषियो की कृतिमात्र कहा जाने लगता है और उनसे लघुमात्र भी भिन्न बात पहना प्रज्ञान या ही द्योतक नहीं प्रत्युत एक प्रकार से पाप समझा जाने लगता है । प्राज हमारे यहा ज्योतिप व वैद्यर मे यही हो रहा है। उपना का मार्ग बन्द सा हो गया है। ब्रह्मगुप्त के सम्बन्ध मे वटेयर की यह प्रापत्ति है कि 'जिप्रगुतनयो मिजवुद्धपा दिव्यशास्त्रमपहाय भन्यद् प्राहे' अर्थात् ब्रह्मगुप्त ने देवादिरचित शास्त्रो को छोडकर अपनी बुद्धि से उसमे भिन्न वहा है । जो प्रशसा की बात होनी चाहिए थी वहीं दोप बन गई। रही-वहीं तो दोषदान के नशे में ऐमा तवं दे गये हैं जिम पर हमी पाती है । कम से कम भेरी बुद्धि में यह बात नही वैय्ती।
भूल व्यक्ते, भूव्यासाघे महयप्रविते गणितमोक्षम्यात् । कर्तव्य व्यामा प्रययमुनिरतस्त्वतिगणितजाइयमिदम् ॥ पृथ्वी वा व्यागार्य १००० मानना चाहिए क्योंकि इसमे गणित की मूक्ष्मता है । ब्रह्म- गुप्त ने जो ७६० स्वीकार पिया है इसमें मरिणतजाड्य है । पृथ्वी का घ्याम वस्तुस्थिति का अग है । वह न तो ठीक ठीक १००० है और न ही ७६० । यदि ब्रह्मगुप्त ने गणना करने में को तो वह भूल बनलानी चाहिए। सूक्ष्मता व जडता अप्रामगिक है । मैं यह सव ग्रन्थ को निन्दा करने के लिए नहीं लिख रहा हूँ वरन् यह दिखलाने के लिए कि वैज्ञानिव ह्राम के युग म ऐमी प्रवृत्तिया प्रोत्साहित होती हैं । युद्धि का उपयोग, पुराने ज्ञान के सचय व परम्पर के छिद्रान्वेपण म होने लगता है । वटेश्वर के पई सौ वर्ष वाद भारत के गणिताकाग मे भास्कर जमे दीप्तिमान् नक्षत्र का उदय हुमा, जिन्होंने न्यूटन क्लाइ पिटज के कई शतादी पहले ताबालिक गति ये नाम से Differential Calculus को उपजन किया । कितने मेद की बात है कि परवर्ती भारतीय गणितज्ञ इस प्रक्रिया का मूल ममझ न मवे और कुछ ने तो उमासडन करने मे ही पानी कृतक्त्यता समभी। अब काल ने कराट ली है । ऐमी आशा करनी चाहिए कि भारत फिर ज्ञान के क्षेत्र में अग्रसर होगा। लखनऊ -सम्पूर्णानन्द (भू० पू० मुख्य मन्त्री, उत्तर प्रदेश) ३१-१०-६१ सम्मति-उपकुलपति, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वटेश्वरसिद्धान्त विज्ञानभाष्योपपत्तिसहित श्री रामस्वरूप शर्मा द्वारा सम्पादित पुस्तक का अवलोकन किया । ऐतिहासिक दृष्टि से ८२६ शक काल में इम अन्य को निर्माण श्रीवटेश्वराचार्य ने किया है क्योकि २४ वर्ष की आयु में उन्होंने इस अन्य पा निर्माण किया था और प्राचार्य का जन्म शव ६०२ वरिणत है । यथा--- "गकेन्द्रकालाद्भुज-शून्य-कुज्जरैरभूदतीनर्मम जन्महायने । प्रकारि राधान्तमिते. स्वजन्मनो मया जिनाव्दासदामनुग्रहात् ।।" व०सि० अध्याय १ श्लोक २१ । लोक से उक्त बातें स्पष्ट हैं। गणकत रङ्गिणी पृ० सं० १६ पक्ति १४ में लिखा है- "यथा ब्रह्मगुप्ते नाऽऽर्यभटादीना खण्डन कृत तथैव वटेश्वरेण स्वसिद्धान्ते बहुर ब्रह्मगुप्त- खण्डनं कृतमस्ति ।........ अस्य सिद्धान्त- प्रन्थो मया सपूर्णो न हए । ग्वालियरमहाराजाश्रितस्य श्रीबालज्योतिविदो गेहेश्यमस्तीति शुत्वा तनासत्पत्र प्रेषित परन्त्वद्यावधि किमप्युत्तर न प्राप्तम् ।" गणपतरङ्गिणी उक्त गद्य मे स्पष्ट है कि यह ग्रन्य अब तक अनुपलब्ध रहा है । विद्वान सम्पादक ने उक्त ग्रन्थ को केवल प्राप्त ही नहीं किया है अपिच सुन्दर विज्ञानभाष्योप- पत्ति सहित अन्य का सम्पादन कर सिद्धान्त ज्योतिष के एक महान प्रयास को सफल बनाया है। पुस्तक तीन अध्यायो म प्रकागित हो रही है। सिद्धान्त ग्रन्थो में कम-से-कम १४ अध्याय पाये जाते हैं । जैसे सूर्यमिद्धान्त १४ अध्यायो म प्रााशित है । इमसे स्पष्ट है कि यह अन्य प्रभी अपूर्ण है, अर्थात् यह अन्य सांदमात्र है। ग्रासिद्धान्त का सशोधन पर इम ग्रन्थ का निर्माण प्राचार्य वर्टश्वर ने किया था जैसा नि मगलाचरण से स्पष्ट है। मगलाचरण में ही कक्षा-म का उलोस भाचार्य ने पिया है । यह अन्य प्राचार्यों की अपेक्षा अपना वैशिष्ट्य रयता है । अब वटेश्वरसिद्धान्त को विज्ञानभाप्योपपत्ति तथा हिन्दी टीका ने सर्वसुगम बना दिया है । वास्तव में यह बहुत ही उत्तम प्रयास है । नवम शतक (शप याल) मे इतने बडे ग्रन्य का होना ज्योतिष के इतिहास को गौरवान्वित करता है । मुझे विश्वास है रिस अन्य के माध्यम से सम्पादन ने ज्योतिष शास्त्र को विशेष प्रगति प्रदान परने का प्रयास किया है । माया है विद्वान् लोग इससे विशेष [साभ उठायेंगे और सम्पादय का प्रयास पूर्ण सफर होगा यही मेरी मुभ वामना है। एन० एच० भगवती ३१.१०.१६६१ उपकुलपति काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
वटेश्वर-सिद्धान्ते
मध्यमाधिकार-स्पप्टाधिकार - त्रिप्रवाधिकाररूपं
पूर्वार्द्धम्
॥ श्रीगणेशाय नम ॥ वटेश्वरसिद्धान्तः विज्ञानभाष्योपपत्तिसहितः तत्र मध्यमाधिकारे प्रथमोऽध्यायः ब्रह्मावनीन्दुबुधशुक्रदिवाकरार-जीवार्कसूनुभगुरुन् पितरौ च नत्वा । ग्राह्य ग्रहङ्क्षगरिणत महदत्तसूनुर्वक्ष्येऽखिल स्फुटमतीव वटेश्वरोऽहम् ।।१।। विज्ञानभाष्यम् -- ग्रह महदत्तसूनु (महदत्तनामक पण्डितपुर ) वटेश्वराचार्य ब्रह्म (ख-शून्य, परमात्मा वा), अवनी (पृथ्वी), इन्दु (चन्द्र ), बुधशुक्रको (प्रसिद्धौ) दिवाकर (सूर्य), पार (भीम), जीव (वृहस्पति ), अर्कसूनु (शनैश्वर), भानि (नक्षत्राणि) गुरुः (विद्यागुरु ) एतान् पितरौ (जन्मदातारी) नत्वा(नमस्कृत्य) अखिल (सम्पूर्णम्) ब्राह्म (ब्रह्मगुप्तकृत ब्रह्मसिद्धान्तीय वा) ग्रहक्षं गणितम् (ग्रह- नक्षत्रस्थूलगणितम्) अतीव (अतिशय) स्फुटम् (स्पष्टम्) वक्ष्ये ( वे) ॥१॥ प्रश्न सर्वप्रथम ब्रह्मशब्दोपादानमस्ति तदनन्तर पृथ्वीतो नक्षत्रकक्षावृत्त- पर्यन्त ग्रहस्थिति वरिणतास्ति । व ब्रह्मत्युक्त्या ब्रह्मशब्देन खस्य आकाशस्य शून्यस्य वा, पृथ्वीतो नक्षत्रकक्षावृत्त यावत् कक्षावृत्ताना केन्द्ररूपस्य भूकेन्द्र-सज्ञ कस्यात्यन्तार्पणशक्तिसम्पन्नस्य च ग्रहण कर्तव्यमन्यथा पृथ्वीतो नक्षत्र-कक्षा- वृत्त-पर्यन्तमुपयु परिस्थितग्रहापेक्षया ब्रह्मणोऽवस्था तस्याघोगतत्वापत्तिः ब्रह्म- स्थानस्य सर्वोर्ध्वगत्वादतो ब्रह्मशब्देन ब्रह्मणो ग्रहण न युक्त प्रतीयते अथवा ब्रह्माण्डगोलान्तर्गतानवनीन्दुबुधशुनादीन् नत्वेत्यर्थ क्तव्य । ग्रन्थकारवृत-मगलाचरणवरिणत ग्रहस्थित्या सह पृथिव्या स्थितिरपि वणितास्ति, पर पृथिव्या प्राकृति कीदृशी वर्तत एतस्य विचार क्यिते । अचिद् वृक्षादिविरलितसमावनी क्यिद्रेप्टिका स्तम्भाग्रस्थोद्दीपित-शीशक घटप्रदीप निशाया दृष्ट्वा तत्समुस तदासन्न च गते सति स्तम्भमूलेप्येक दीप दृष्ट्वा दृष्ट्यवरोधकाभावेऽपि पूर्व क्थ न दृष्टमतो दृष्टयवरोधिका भूरेवेत्यनुमितम् । अतो भूपृष्ठे वक्रत्वमस्तीति सिद्धम् ।
२ वटेश्वर-सिद्धान्त अथ सत्यपि वृक्षाग्राचतुर्दिक्षु समाकाशे पृथव्यामेव पक्व फल पतत् दृष्ट्वा भूपृष्ठ निष्ठाखिल विन्दुप्वाकृष्ट शक्तिरस्तीत्यनुमित, तथा मापनेन वृक्षा- ग्रात् पतनविन्दु यावद्वद्धरेखारपतनेतर-विन्दुपु वद्धरेखा, अत पृथिव्या बहि स्थ- विन्दो पृष्ठस्थ विन्दुगत रेखाणा यहि खण्डानि>केन्द्रगरेखा-यहि खण्ड , इति गोलीय नैसर्गिकधर्मदर्शनात् गोलत्वमस्ति कच्चिदिति । अतस्तावत् गोलत्य प्रकल्प्यान सन्ति गोलीयधर्मा नवेति परीक्षा क्रियते । पृथिव्या स्थानद्वये समस्तस्तम्भ द्वयमारोप्यकस्तम्भस्य शीर्य बिन्दुतो- ऽन्यस्तम्भाग्र विद्धम् । पृथ्व्यन्तर्गत एकस्तादृशो बिन्दुरस्ति, यस्मिन् विशिष्टाऽऽ कर्षण शक्तिरस्ति यो हि बिन्दु पृथिवीपृष्ठस्थ पदार्थान् स्वाभिमुखमाक्पयति स विन्दु (भूमज्ञक ) । पृथिव्या पृष्ठे स्थापित स्तम्भद्वय भूविन्दोराकर्षण शक्तिवशात्तत्र (भू) विन्दी मिलति (च, प) समस्त स्तम्भ द्वयाग्र , च विन्दुस्थ दृष्ट्या द्वितीयस्तम्भाग्र (प) विद्धम् । च विन्दुस्थ दृष्टिलग्नकोणस्तुरीययन्त्रद्वारा मापनेन विदित । एतत्तुल्य एव प विन्दु लग्न कोण , अत च प भू त्रिभुजे १८०-(<च+<प)=<भू । चप स्तम्भानान्तरमपि मापनेन विदितमस्ति तदोक्त निभुजेऽनुपात क्रियते। = भूप भूव्यासार्ध+स्तम्भ अत्र स्तम्भस्य शोधनेन भू व्यासार्ध मानमवशिष्टम् । एव भूव्यासार्ध- ज्ञान जातम्, एवं कृते सर्वत्रेव फलसाम्यमुपलब्धमतो भूर्गोलाकाराऽस्तीति सिद्धम् । वस्तुतस्तु भूदीपिण्डाकाराऽस्ति, पर तन लघुव्यास वृहद्व्यासयोरत्यलान्त रस्वात्तयो समत्व कलितमाचारिति । चतुर्थे पृष्ठे दत्त चित्र द्रष्टव्यम् । तथा च मङ्गलश्लोकवरिंगतग्रहस्थितिदर्शनेनव रव्यादिवारगणन मोऽपि सिद्धयति । यथा ग्रहस्थिति --चन्द्र , बुध , शुक्र , रवि , कुज , गुरु , शनैश्चर । एते कमा उपर्युपरिक्रमेण सन्ति । मन्दादध मेणव चतुर्था दिवसाधिपा इति सूर्यसिद्धान्तोवते शनश्वरतोऽधोध प्रमेण चतुर्थश्चतुर्थो वारेशो भवति । यथा शनैश्चरतश्चतुर्थो रविरत प्रथगदिनपति सूर्य , मूर्यादधश्चतुर्थश्चन्द्रोऽस्ति तेन द्वितीयदिनपतिश्चन्द्र । चन्द्रादधश्चतुर्थों मगलो तस्तृतीयो दिनपतिर्मङ्गल, मङ्गलादघश्चतुर्थो बुधोऽनश्चतुर्थो दिनपतिवूध इत्यादि, एव वारगणनाक्रम सर्व. प्रथम भारतीयरेव गारिणतिक वृत इति । प्रथ पृथ्वीतो नक्षत्र यावदुपयु परिक्रमेण स्थिताना तेषां (चन्द्रबुधगुकरव्या दोना) स्थितेर्ज्ञान क्य भवेदचन्द्रादुपरि युधस्तदुपरि शुक्र इत्यादेर्शान क्यमित्ये- तदर्य वेधेन प्रविम्बीय ज्ञान क्रियते । स्तम्भाग्रान्तरXज्यारच ज्या<भू - व चित्र न०१ पत्र भूए मध्यमाधिकार विग्रहविम्बकेन्द्रम् १ भूभूकेन्द्रम् पृ-पृष्ठस्थानम् च दृष्टिस्थानम् पृच=दृष्टय च्छ्रिति. भू विग्रहविम्बीयकर्ण. पृवि-पृष्ठकर्ण भू प-भूव्यासाघम् पृ च वि निभुजे च पृ विं, पृच वि तुरीययन्त्र द्वारा मापनेन विदितो तत १८०-(<च पृवि+ रच वि) पृवि च तत उक्त त्रिभुजे कोणनयस्य दृष्टय - च्छायस्य च ज्ञानादनुपातेन पृवि विदित भवेत्, तथा १८०-- <च पृवि=< विं तदा भू पृ वि त्रिभुजे भू पृ, पृ वि भुजयोस्तदन्तर्गतकोणस्य च ज्ञानात् त्रिकोणमित्या भू वि ज्ञान भवेदयमेव ग्रह बिम्बीय कर्ण । एव सर्वेषा ग्रहाणा विम्बीय-कर्णज्ञान कृत्वाऽऽचार्यग्रहकक्षा व्यासार्ध- मान पठितम् । तत्र सर्वग्रहापेक्षया चन्द्रविम्वीयकर्णमानमल्पमायाति चन्द्रकर्ण- तोऽधिक बुधकर्णमान ततोऽधिक शुक्रकर्णमान, ततोऽधिक रविकर्णमानमित्यादि, तेन भूकेन्द्राद्विम्वीय-कर्णव्यासार्थेन यद्वृत्त तदेव ग्रहकक्षावृत्त भवत्यतश्चन्द्रकक्षावृत्ता- दुपरि बुधकक्षावृत्तम्, तदुपरि शुक्रकक्षावृत्त, तदुपरि रविकक्षावृत्तमित्यादिमङ्गल- श्लोकवरिणत-स्थिति-क्रमेण सर्वेषा कक्षा वृत्तान्युपर्युपरि क्रमेण भवन्ति । एतावता मिद्धम् यद्येषु मार्गेषु ग्रहा भ्रमन्ति सच मार्गो वृत्ताकारो भवति, यस्य नाम कक्षा- वृत्तमित्यर्थात भूकेन्द्राद् ग्रहविम्बकेन्द्रगत मूत्रम् ग्रहकक्षाव्यामार्धम् तद्वशत पृथिव्या केन्द्रमभित उपर्युपरि ग्रहाणा वृत्ताकारा कक्षा , नवीनैस्तु सूर्यकेन्द्राभिप्रायेण दोर्षवृत्ताकारकक्षाया अहभ्रमण स्वीक्रियते । दीर्घवृत्तस्यकनाभी रविकेन्द्र तस्माद्- बहिर्मन्दकर्णाने बुध, शुक्र, भूमि, मगल, गुरु-शनीना कक्षा क्रमश ऊर्ध्वाधर- रूपेण मन्तीति ॥१॥ हिन्दी भाप्यम्- मैं महदत्त पडित का पुत्र घटेश्वराचार्य ब्रह्म (परमात्मा), या शून्य (भूकेन्द्र विन्दु) पृथिवी चन्द्र, बुध, शुक्र, रवि, भीम, वृहस्पति शनैश्चर, नक्षत्र, प्राचार्य गुरु, अपने जन्मदाता माता पिता इन सब को प्रणाम कर ब्रह्मगुप्त वृत ममस्त ग्रह नक्षत्रो का गणित (स्यूल गरिणत) को अतिशय स्पष्ट बहता हूँ। यहाँ मर्वप्रथम ब्रह्म शब्द दिया गया है। उमके बाद पृथिवी मे नक्षत्र तक ग्रह- स्थिति वरिणत है। 'मोस ब्रह्म' इम उक्ति में ब्रह्म गद से प्रापाश मानो शून्य का अर्थात् पूर्व परिणत पृथिवी से नक्षत्र तक प्रत्यक्षा वृतो के केन्द्रम्प भूपेन्द्र नामक प्राक्पणक्तियुक्त विन्दु का ग्रहण करना चाहिये। यदि ग्रह्म शब्द में ब्रह्म ही का ग्रहण करेंगे तो ब्रह्म या - वटेश्वर-सिद्धान्त स्थान ग्रहों से पृथिवी से भी नीचा हो जाएगा जो उचित नही है। ब्रह्म शब्द मे शून्य (भूपेन्द्र बिन्दु) ही का ग्रहण करना उचित है, या ब्रह्माण्ड गोलान्तर्गत पृथिवी, चन्द्र, बुध, शुक्र प्रादि यो नमस्कार कर ब्राह्म गणित को सष्ट कहता हूँ। एसा अध परना चाहिये। यहा पर (मङ्गलाचरण म)वही हुई ग्रहस्थिति के साथ पृथ्वी की भी स्थिति कही गई है, पर पृथ्वी का आकार कैसा है इसके सम्बन्ध में विचार करता है । वृक्षादि रहित किमी समान जगह पर म कुछ दूरी पर ईटो के खम्भे के उपर जलती हुई लालटेन प्रादि प्रकाशमान • चीजो को देखकर उमके तरफ गमीप जाने पर उस खम्भे वी जड म भी रात्रि में एक लालटेन देख कर मन म पाया कि जब कोई चीज दृष्टि की प्रवरोधव नहीं थी तो एक ही समय में दोनो लालटेनो को क्यो नही देखा। इमम अनुमान किया कि पृथ्वी ही दृष्टि की अवरोधक है। इससे मिद्ध हुप्रा वि पृथ्वी के पृष्ठ में वक्रता (टेढापन) है । चारो तरफ पाया के बराबर रहने पर भी पृथ्वी के पृष्ठ पर पके फल को गिरते हुए देवकर पृथ्वी के पृष्ठ पर प्रत्येक बिन्दु मे मावर्षण शक्ति है 1... इस तरह का अनुमान हुअा है तथा वृक्षाग्र स पतन विन्दु तक रखा < पतनेतर बिदु तक रेखा इस लिये पृथ्वी पृष्ठ पर वहिगत बिन्दु स पृथ्वी पृष्ठ तक रखापो के बहिर्खण्ड > केन्द्रग रखा बहिखण्ड, यह गोल पदार्थ म होता है। इसलिये पृथ्वी म भी किसी तरह का गोलत्व ज्ञात हुआ। पहले पृथ्वी भे गोलत्व स्वीकार कर परीक्षा करनी है कि इसम गोलीय धर्म है या नहीं। पृथ्वी पृष्ठ पर दो जगह मे दो बराबर खम्मो को गाहकर एक खम्भे के अप्रभाग म दृष्टि रखकर दूमर खम्भे के अग्रभाग को देखा। पृथ्वी के भीतर एक ऐसा बिन्दु है जो पृथ्वी पृष्ठ पर की चीजो को अपनी तरफ खीचता है । अत दोनो खम्भ बढकर उसी विन्दु में उम चिदु का नाम भू है। जो गणित द्वारा निम्न प्रकार से गिद्ध है। चप = खम्भो वा अग्रान्तर है इसे नाप कर जाना। -<च का ज्ञान तुरीय यन्त्र द्वारा कर लिया। इसी कोण के बराबर < प कोण भी है। ... प्रत १८० (>च+<प)= <भू तब च प भू त्रिभुज मे अनुपात से चप. ज्या<च. ज्या भू व्यासाध + खम्भा इसमे खम्भा वियुक्त करने से भूव्यामा अवषिष्ट रहा । इस प्रकार हर एक जगह वरने से भू व्यासाध का मान बरावर देख लिया । प्रत पृथ्वी गोलाकार है यह उपपन्न हुमा ! वस्तुत पृथ्वी का प्राकार दीघ पिण्डाकार है लेकिन उमके सघुव्यास और बृहद बहुत ही वम अन्तर है। इसलिए प्रत मिलते हैं। 'प- व्यास म चित्र न. २ .
मध्यमर्माधिकार दोनों व्यासों को बरावर प्राचीन प्राचार्यों ने माना है । प्रते पृथ्वी में गोलत्व सिद्ध मङ्गलश्लोक मे वणित ग्रहस्थिति को देखने से रवि, सोम, मगल प्रादि वार गणना- क्रम भी मिद्ध होता है । जैसे चन्द्र, बुध, शुक्र, रवि, वुज, गुरु, शनि ये उपरि-उपरि क्रम से है। 'मन्दादध क्रमेणव चतुर्था दिवसाधिपा' इस सूर्यसिद्धान्त की उक्ति से शनि से नीचे नीचे क्रम में चौथे दिनपति होते हैं । जमे-शनि मे चौथा रवि है अत...यह प्रथम दिनपति हुआ । रवि से चौथा अध क्रम से चन्द्र है प्रत दूसरा दिनपति चन्द्र हुअा 1 चन्द्र से नीचे क्रम में चौथा भौम है अत तृतीय दिनपति मगल हुप्रा इत्यादि । इस प्रकार वार-गैरणना-क्रम रवि, मोम, मगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र, शनि-इन दिनो का ज्ञान सर्वप्रथम भारतीय ज्योतिपियो ने किया। पृथिवी मे नक्षत्र तक चन्द्र, बुध, शुक्र, रवि, वुज, गुरु, पानि, नक्षत्र ऊपर उपर क्रम से इन सब की स्थिति का ज्ञान कैसे होता है। इसके लिये वेध से ग्रहो के विम्वीयर्ण का ज्ञान अपेक्षित है। चित्र न १ देखिये विः =ग्रह बिम्ब केन्द्र पृ=पृष्ठस्थान दृष्टिस्थानम् पृच दृष्टि की ऊंचाई भूविग्रह विम्बीय कर्ण पृर्वि-पृष्ठ करण भू पृ= भूव्यामा च पृवि, पृ च वि ये दोनो कोण तुरीय यन्त्र मे नाप कर जान लिया, तव १८०- (<च पृ वि +<पृ च वि)=< विं च तव पृ च वि निभुज में पृच दृष्टि-उच्छिति और तीनो कोणो के ज्ञान से पृ वि का भी ज्ञान हो जायगा । १०-<च पृ वि<भूवि तव भूपृ वि त्रिभुज में भू पृ, पृ वि दोनो भुजो के तथा तदन्तर्गत कोण के ज्ञान से त्रिकोण मिति मे (भूवि ) इमका ज्ञान हो गया । यही ग्रह विम्बीय कर्ण है । इसी तरह गव ग्रहो के विम्बीय वणों का ज्ञान कसे प्राचार्य ‘ग्रहक्क्षाव्यासार्ध पटित कर चुके हैं। सव ग्रहो के बिम्बीय वर्षमानो से चन्द्र विम्योय वर्ग छोटा होता है । चन्द्रविम्वीय कर्ण से <बुध विम्वीय वर्ण इममे अधिक शुक्र विम्बीय वर्ण, उससे अधिन रवि विम्वीय -- + ६ वटेश्वर-सिद्धान्ते वर्ण इससे अधिक भौमविम्बीय कणं इत्यादि । मत चन्द्र कक्षावृत्त से उपर बुध कक्षावृत्त और बुध कक्षा वृत्त से ऊपर शुक्र कक्षावृत्त और इससे ऊपर रवि पक्षावृत्त इत्यादि होता है । इममे यह भी सिद्ध होता है कि जिस मार्ग म ग्रह चलते हैं वह मार्ग वृत्ताकार है । ग्रह कक्षा व्यासावश से पृथ्वी केन्द्र ( भूकेन्द्र ) के चारो ओर नीचे अपर क्रम मे ग्रहो का कक्षावृत्त है। आधुनिक ज्योतिषी लोग सूर्य केन्द्राभिप्रायिक दीर्घवृत्ताकार पक्षावृत्तो में मब प्रहो का भ्रमण होना मानते हैं। दीर्घवृत्त की एक नाभि में रवि केन्द्र है और उसके वाहर मन्दकर्णाग्र में बुध, शुक्र, पृथ्वी, कुज, गुरु, गनेश्चर इन ग्रहो का कक्षावृत क्रम में ऊर्ध्वाधर रूप से हैं ॥१॥ कालक्रियागणितगोलमहागमार्थ ज्ञानप्रपञ्च-विमलीकृतचारुधीभिः दिव्यः प्रदर्शितमिदं मुनिमियंदज्ञाः कुर्मो वय तदवलोक्य गुणाः स तेपाम् ॥२॥ विभा -कालक्रिया (बुटयादित प्रलयान्त यावत् कालगणना कालसाधन वा) गणित ( व्यक्तमव्यक्त च ) गोल (खगोल, भगोल, ग्रहगोलादि) महागम ( प्रामाणिकातीव प्राचीनग्रन्थ ।) एतेपा यथार्थज्ञानवैशयेन विमलीकृन- सुन्दरबुद्धिभि दिव्यमुनिभि (दिव्य ज्ञानिभि महात्मभि ) इद (ज्योतिपशास्त्र) प्रदर्शितम् (जनसाधारणसमक्षे रक्षितम्) तदवलोक्य (तत्प्रदर्शित ज्यौतिपशास्त्र दृष्ट्वा ) यदज्ञा वय ( यज्ज्ञानरहिता वय ) तच्छास्त्र कुर्म । तेषा महात्मना मगुण (पाशीर्वादफलम् ) अर्थात् ज्योतिषशास्त्र-ज्ञानरहितेन मया यद् ग्रन्थ- प्रणयन क्रियते तन्मुनिप्रणीत-ग्रन्थावलोकनफलम् । एतावतेत्यपि सिद्धयति, यदाचार्यों वटेश्वर आत्मनि ज्योतिषशास्त्रानभिज्ञत्व प्रदर्शयन् भङ्गयन्तरेण वालक्रियागणितगोलादेरभिज्ञख प्रदर्शयति, क्थमन्यथाऽनभिज्ञन ग्रन्थकरण भवितुमतीति ॥२॥ हि भा -त्रुटयादि से लेकर प्रलयान्त तक कालगणना वा कालसाधन, गणित (व्यक्त तथा प्रव्यक्त) खगोल भगोन ग्रहगोलादि, प्रामाणिक बहुत प्राचीन ग्रन्यादि के यथार्थ ज्ञान से माफ सुन्दर बुद्धि वाले दिव्य ज्ञानी मुनि महात्मानो द्वारा यह ज्योतिष शाम्ब दिखलाया गया है । उमको (मुनिप्रणीत ज्योतिष शास्त्र को) देखकर ज्योतिष शास्त्र में अनभिज्ञ मैं ज्योतिषशास्त्रीय ग्रन्थ को करता हूँ, यह उन्ही महात्मानो के भागीर्वाद का फल है। इममे पूर्वाचार्यों के प्रति (मुनि-महात्मामो के प्रति) अपनी वृतजना प्रकाशित करते हुए माचार्य (वटेश्वर) वाल किया गरिएन गोलादि विषयो वे अतीव शानी अपने को दूमरे ढग से प्रकट करने हैं ॥२॥ ग्रन्थारम्भवाराणमाह कि तुच्छबुद्धि कृतदृष्टि-विमेद एषा कोक्तं युगं स्फुटमुपैति संदेकतो न । यस्मादत. सकलशाखविचारसारं प्रोद्मास्यतेऽखिलमपारत-कुदृष्टिमार्गम् ॥३॥ विभा.यस्मात् कारणात् एपा (महात्मना मुनीना यथितविषयेभ्य इति शेप' ) तुच्छत्रुद्धिकृत दृष्टिविभेद (अल्पबुद्धि द्वारा रचिन ग्रन्थेषु प्रत्यक्ष.
७ . मध्यमाधिकार विभेद कि नार्थान् मुनिकथित-विषयेभ्योऽल्पबुद्धि द्वारा रचितग्रन्थेषु प्रत्यक्ष- विभेदोऽस्त्येव, कोक्त (ब्रह्मगुप्तकथितम् ) युग (युगादिमानम्) सदा (सर्वदा) एकत (एकमपि) स्फुट नोपैति (न प्राप्नोति) अर्थात् ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते ब्रह्मगुप्त- कथित युगादिमानमेकमपि स्पष्ट न भवति अत (अस्माद्ध तो) अखिल (सम्पूर्ण) अपास्तकुदृष्टिमार्ग ( निराकुलाशुद्धपद्धतिम् ) सकलशास्त्रविचारसार (सम्पूर्ण- शास्त्रविचाररहस्यम्) मया प्रोद्भास्यते (प्रकाश्यते) प्रकाशित करोम्यह वा ।।३।। हि मा-जिम कारण अल्पबुद्धि द्वारा रचित ग्रन्यो में प्रत्यक्ष विभेद उन मुनियो द्वारा कथित विषयो मे क्या नहीं है अर्थात् मुनियो द्वारा कथित विषयो से अल्प बुद्धिद्वारा रचित ग्रन्थो मे प्रत्यक्ष विभेद है ही । ब्रह्मगुप्त के ग्रन्थ ( ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त ) मे कथित एक भी युगादिमान स्पष्ट नही होता है । इसलिए मैं इस प्रशुद्ध पद्धति को हटाकर सम्पूर्ण शास्त्री का सारभूत ग्रन्थ को करता हू (बनाता हू) ॥३॥ इदानी ज्योतिषशास्त्रस्य वेदाङ्गत्वनिरूपणमाह- श्रुत्युत्तमाङ्गमिदमेव यतो नियोगः कालेऽयनतु तिथिपर्वदिनादिपूर्वः । वेदोककुब्मवनकुण्डन्तदन्तरादि श य स्फुट श्रुतिविदां बहुमत्यमस्मात् ॥ ४ ॥ विभा~यत ( यस्मात् कारणात् ) अयनतु, तिथि, पर्व, दिनादि पूर्वे काले अयने (उत्तरायणे, दक्षिणायने ) ऋतव ( वसन्तादय पट ) तिथय ( प्रतिपदादय ) पर्वाणि ( सक्रान्ति-ग्रहणादीनि ) दिनानि ( रव्यादय ) एत- दादिपूर्वककाले, नियोग ( वेदविहित-क्रियाणा प्रयोगो ( शास्त्रात् ) वेदी ककुब्भवन कुण्डतदन्तरादि स्फुट ज्ञेय ( यज्ञवेदी, दिक्, यज्ञमण्डप) कुण्डानि, तदन्तरादि (दैर्घ्य विस्तारादि) इति स्फुटम् ज्ञातव्य भवति ( अर्थात् अयन तिथि-पर्वादि काले वेदविहितक्रियाणा विनियोगो भवति, तत्कालज्ञानञ्च ज्योतिषशास्त्राद् भवति, यज्ञवेद्यादिरचना तर दिग् ज्ञान दैर्घ्य विस्तारादिज्ञानञ्च ज्यौतिपशास्त्रादेव भवति ) अस्माद्ध तोरिदमेव ज्यो- तिषशास्त्र श्रुत्युत्तमाङ्गम् ( वेदप्रधानाङ्ग नेत्ररूप ) श्रुतिविदा (वैदिकानाम् ) वहुमत्य ( वहुसम्मत ) ज्ञेयमिति ||४|| ज्योतिषशास्त्रस्य वेदाङ्गत्व-तदङ्ग-प्रधानत्वविपये सिद्धान्तशिरोमणी भास्करेरा कथ्यते । यथा- वेदास्तावद्यज्ञकर्मप्रवृत्ता प्रोक्तास्ते तु कालाश्रयेण । शास्त्रादस्मात् कालबोधो यत स्याद्वेदाङ्गत्व ज्योतिषस्योक्तमस्मात् ।। शब्दशास्त्र मुख ज्यौतिष चक्षुषी, श्रोत्रमुक्त निरुक्त च कल्प करो। या तु शिक्षाऽस्य वेदस्य सा नासिका पादपद्मद्वय छन्द आद्यधुंध ॥ वेदचक्षु किलेद स्मृत ज्यौतिप मुख्यता चाङ्गमभ्येऽस्य तेनोच्यते । सयुतोऽपीतर कर्णनासादिभिश्चक्षुपाऽङ्गन हीनो न किञ्चित् कर ॥ तस्मात् द्विजैरध्ययनीयमेतत् पुण्य रहस्य परम च तत्त्वम् । भवति) अस्मात् यज्ञा १० बटेश्वर-सिद्धान्ते भास्कराचार्येण सिद्धान्त ग्रन्यलक्षरणे वटेश्वरापेक्षयाऽन्येऽपि बहवो विपया प्रतिपादिता सन्ति । यथा- "त्रुट्यादि-प्रलयान्त-कालक्लना-मानप्रभेद 'क्रमाच्चारश्च | मदा द्विधाऽत्र गरिणत प्रश्नास्तथा सोत्तरा । भूधिष्ण्या ग्रहसस्थितैश्च क्थन यत्रादि यनोच्यते । मिद्धान्त स उदाहृतोत्र गरिणतस्वन्धप्रवन्धे बुधै ॥” इति ॥५॥ हि. भा-जिस ग्रन्थ म त्रुत्यादि सम्पूर्ण कालमान, ग्रहादि के उदयास्तवश सावन दिन, कुट्टकगणित युक्त समस्त व्यक्त अव्यक्त गणित, ग्रह, नक्षत्र, पृथ्वो इन मव की स्थिति ग्रहपिण्ड, नक्षत्रपिण्ड, पृथ्वीपिण्ड, विम आकार के हैं और वहां पर किस रूप म है इन सव का वर्णन जिम ग्रन्थ म उत्तम तरह स किया जाय उम मुनिवरों ने सिद्धान्त वहा है। सिद्धान्त ग्रन्थ के लक्षण के विषय मे भास्कराचार्य ने प्राचार्य वटवर जी से कुछ पोर विशेष बातें कही हैं । "पत्रादि यत्रोच्यते म मिद्धान्न उदाह्त परन्तु वरेश्वराचार्य ने उक्त भास्कराचार्य के समान अपने अन्य में कही भी यत्रादि का वर्णन नहीं किया है । यही भास्कराचार्य के सिद्धान्त विषय परिभाषा मे विदोषता देखी जाती है ॥५॥ प्रादौ ससर्ज भगण झष मेप सन्धि-संस्थग्रहै. सह ग्रहस्फुरदंशुजालम् । ब्रह्मा प्रतिक्षरगमर्कजसोमकक्षा वनवप्रतिनिबद्धमिनेन्दुवश्यम् ॥६॥ वि भा --ब्रह्मा (म्रप्टा) प्रादौ (प्रथमत) झप मेप सन्धि सस्थ ग्रहै सह (रेवत्यन्तस्थित ग्रहै सार्धम्) ग्रहम्फुरदशुजालम् (ग्रह किरण द्वारा देदीप्यमानम्) भगरण (नक्षत्र समूहम्) प्रतिक्षरणगम् (निरन्तर चलाय मानम्) । अर्कज सोम क्क्षा वक्त्रध्रुवपतिनिवद्ध (शनिक्क्षातश्चन्द्रकक्षा यावत् तदभिमुख ध्र वयष्टिसन्नद्धम्)। इनेन्दुवश्यम् (सूर्यचन्द्राधीनम्) ममर्ज रचितवान् अर्थात् भगणदि सस्थ ग्रहै मह ध्रुवयष्ट्याधारे प्रतिक्षण चलायमानम् भगण रचितवान् । ब्रह्मगुसोप्येवमेव कथयनि-ध्र वतारा प्रतिवद्ध-ज्यौनिपचन प्रदक्षिणगमादौ। पौपणाविन्यन्तस्यै सह ग्रहै ब्रह्मणा सप्टम् । अन ग्रन्थार क्थनेन ज्ञायते यदाकारी ये ग्रहा यानि नक्षत्राणि च सन्ति सर्व- पा सृष्टिकर्ता ब्रह्मवास्ति परन्तु "सूर्य प्रात्मा जगतस्तस्युपश्च नि" वेदोक्त्या ब्रह्मा मूर्यस्य पुत्र सिद्धयति तदा पुत्रात् ब्रह्मरण पितु सूर्यस्य क्य सृष्टिर्भवेत् ' तथा च "सूर्याचन्द्रमसौ घाता यथा पूर्वमवल्पयत्" इत्यादि वेदोत्तयाऽपि ब्रह्म (प्रजापति) द्वाराऽऽकाशी ग्रहादिमृष्टिर्न भवतीनि। प्रत्र धाताराब्देन परमेश्वरस्य ग्रहण ब्रह्मणो नहि, ब्रह्मा केवल पार्थिव सुप्टिवर्ताऽस्ति पायाशीय-सृष्टिकर्ता नहि, ब्रह्मरणा तेजोमय मूर्ये एको विशिष्ट प्रकारावधंर शोरावस्पपदार्थो नियोजितो यद्वारा सूर्यस्य प्रकामोनोव दूरे गच्छेत् । अतो ब्राह्मप्रतये (ब्रह्मणो दिनान्ते) स विशिष्ट पदार्थ सूर्ये नियोजितो वनप्टो भवति, येन तन (प्रलयकाले) अन्धकारो जायते । यद्यपि मूर्यस्तस्मिन् मध्यमाधिकारः - समयेऽपि वर्तत एव किन्तु तदा सूर्येऽतीव प्रकाशाल्पता जायते एतेनेव कारणेन सूर्य सिद्धान्ते ब्रह्मकल्पाद् भिन्नः सृष्टिकल्पः प्रतिपादितोऽस्ति । मूर्येण यत् समर्थनं सिद्धान्ततत्वविवेके कमलाकरेण कृत भास्करमतसण्डनश्च कृत. मिति । ग्रन्थकारपद्येन ज्ञायते यद् भगोल भ्रमणेन सहैव ग्रहगोलस्यापि भ्रमण प्रतिक्षण ध्रुवकीलद्वयगतसूया (ध्रुवयप्टि) धारे भवति । कथमित्युच्यते । भूगर्भादिष्ट-व्यासार्धको हि गोलो भगोलः । भचा-भगोलयोः ध्रु वसूत्रयप्टि- प्रोतत्वेन सहैवागमनादि-भवनाद् भगोलससक्तयोमन्दशीघ्रगोलयोः ग्रहाधि- करणयोरपि तत्सहैव गमन मिति । अथ ध्रुवमूत्राधिकरणकम् पश्चिमाभिमुख भचकभ्रमणम् तत्यूयमध्ये कदम्बमूत्र ब्रह्मणा तथा निवद्धम्, यथा कदम्बमूत्र भचक्रस्य पश्चिम भ्रमे विघ्न न कुर्वत् सप्ट कराघातजनितभ्रमे भचक्र पृष्ठे कदम्वस्थाने सचितं भूत्वा स्थिर भवेत् । तेन ध्रुवसूत्र ध्रुवस्थानादुत्तवेग- विरामान्त प्रागपरदिशि २७° पर्यन्तम् भचक्रस्य पृष्ठ पर्पति । प्रतीत्यर्थमस्य वामकरतले दक्षतर्जनीमध्यमे समारोप्य गतिभ्या ते प्रचाल्य सर्व दर्शयेत् । तेन ध्रुवतारा न स्थिरा केवल ध्रुवस्थानमेव स्थिरमिति सिद्धमतोऽया. चार्योक्तं, ध्रुवप्रतिनिवद्धमिति साधु सगच्छते । अत्र भास्करेण, तदन्ततारे च नथा ध्रुवत्वे" इति यत्कथ्यते तत्तथ्य नास्ति । उपरि-लिखित युक्त्यैव स्फुटमतः सिद्धान्ततत्त्वविवेके कमलाकरेण तस्य यत् सण्डनं "ध्रुवतारा स्थिरा ग्रन्थे मन्यन्ते ते कुबुद्धय ।" इत्यादिना कृतम् तत्समीचीन प्रतिभाति । हि भा.- भगणादि (रेवत्यन्त) में स्थित ग्रहो के साथ शनि कक्षा से अधोऽध क्रम से चन्द्र कक्षा तक चन्द्राभिमुस नक्षत्र गणो को ब्रह्मा ने बनाया, जिनमे मूर्य और चन्द्र प्रधान हैं । ब्रह्मगुप्त भी इसमे सम्मत हैं । जैसे- ध्र व-तारा-प्रतिबद्ध-ज्योतिश्चक्न प्रदक्षिणगमादौ । पौणाश्चिन्यन्तस्थ सह ग्रहै. ब्रह्मणा सृष्टम् ॥ प्राचार्य के क्थन से मालूम होता है कि आकाश में जो ग्रह और नक्षत्र गरा है सव के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ही है लेकिन "मूर्य प्रात्मा जगतस्तस्युपश्च" इस वेद- वचन से ब्रह्मा सूर्य के पुत्र सिद्ध होते है, तब पुत्र (ब्रह्मा) से पिता (सूर्य) वी सृष्टि कैसे सम्भव हो सकती है । और, "मूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमक्ल्पयत्" इस वेदमन में भी ब्रह्मा द्वारा माकाशीय ग्रहादि सृष्टि नहीं होती है। यह स्पष्ट सिद्ध है। यहां धाता शब्द से परमेश्वर का ग्रहण क्यिा गया है । ब्रह्मा का ग्रहण नही किया है । ब्रह्मा केवल पृथ्वी पर की सृष्टि करता है, अाकाशीय ग्रहादि सृष्टिकर्ता ब्रह्मा नही है । ब्रह्मा तेजोमय सूर्य में एक ऐसा प्रकाश फैलाने वाला शीशा रूप पदार्थ रख देता है, जिसके द्वारा सूर्य की रोगनी बहुत दूर तक जाती है । इसलिये ब्राह्मलय (ब्रह्मा का १२ वटेश्वर-सिद्धान्ते दिनान्त में) वह प्रयारा फैलाने वाली चीज नष्ट हो जाती है । जिमसे उम ममय (प्रलय पाल) में अन्धकार हो जाता है । यद्यपि सूर्य भगवान् उस समय भी रहते है किन्तु उनमें अत्यन्त प्रकाश की कमी रहती है । इसी कारण से सूर्य सिद्धान्त में ब्रह्मवल्प से सृष्टि- वल्प भिन्न माना गया है जिसका समाधान सिद्धान्ततत्त्वविवेक अन्य में कमलाकर भट्ट ने किया है और भास्कर मत का खण्डन किया है । ग्रन्थकार के क्थन से मालूम होता है कि भगोत भ्रमण के साथ ही ग्रहगोल का भी भ्रमण घरावर दोनो ध्रुव कीलो में गई हुई रेखा (ध्र पर्याप्ट) के आधार पर होता हैं ऐसा क्यों होता है ? भूगर्भ से इष्ट व्यामाधं से भगोल बनता है। भचक्र और भगोल दोनो का ध्र व यप्टि के आधार पर साथ ही माने जाने के कारण भगोल ममक्त मन्द गोल और शीघ्र गोल का भी (जिनमें ग्रह भ्रमण करते हैं ) साथ ही भ्रमण होता है । घु बमूत्र (ध क्याप्ट) के प्राधार पर भचक्र का भ्रमण पश्चिमाभिमुख होता है उसके बीच मे ब्रह्मा कदम्बमूत्र को उस ढग से बांध देता है जिसम कदम्बसूत्र भचक्र के पश्चिमाभिमुस भ्रमण में बाधा नहीं करते हुए ब्रह्मा के हाथ के प्राघात से उत्पन्न भ्रमण में भचक्र के पीठ पर कदम्ब स्थान मे गड वर स्थिर हो, इसलिये ध्रुव सूत्र ध्रुवस्थान से पूर्व पथित वेग के विराम (अन्त तक ) पूर्व और श्चिम . २७० पर्पन्त भचक्र के पीठ को रगडता है । इसलिये ध्रुवतारा स्थिर नहीं हैं, केवल ध्रुवस्थान ही स्थिर है, यह सिद्ध हुा । प्रत सिद्धान्तशिरोमणि में "तदन्ततारे च तया घ्र पत्व भास्करोक्त का खण्डन सिद्धान्ततत्त्वविवेक में कमलाकरभट्ट ने किया है। कमलाकर यह भी कहते हैं कि ध्र व स्थान स्थिर है ध्र व सारा स्थिर नहीं है । यया- 'प्र वतारा स्थिरा ग्रन्थे मन्यन्ते ते कुबुद्धय" वटेश्वराचार्य यहाँ "ध्र वप्रति- निबद्धमित्यादि" युत्तिसगत कहते हैं ।।६।। पाह्मणा भचक्र निर्मायाऽकाशे क्षिप्त तदा तत्कराघातेन । तस्याऽन्दोलिका गतिर्जाता तद गतिज्ञानार्थमधोलिखितविधिः- प्रथम ज्योतिषशास्त्र-मूलभूत भचक्र सम्वन्धे किञ्चिद्विचार्यते । भचक्र- मिति शब्दाताराणामाधारे गोलत्वध्वनि । यतो भचक्रस्थाने भसघेनाप्य- दोपात् । अतोऽन भाना (नक्षत्राणाम्) चनस्य (समूहस्य) चक्र गोल इत्येक् शेष- समासो नेय । भचक्र कय गोलत्वमानन्त्यञ्चेति विचार । दृष्टिभ्या भचक्रस्थकनक्षने विद्ध दृष्टिसूत्रद्वय दृष्टिद्वयान्तर्गत सूत्र- र्जायमानत्रिभुजे नक्षत्र-लग्नकोणस्येन्द्रियाग्राह्यान्छन्यसमत्वादनुपातेन दुष्टियान्तर्गतरेखा दृष्टिलग्नकोण द्वययोगार्धज्या -दृष्टिसूत्र अनन्त । ज्या दृष्टिसूत्रयोरन्तत्वादिष्ट स्थान केन्द्रिकानन्त-च्यासार्धक भचक्रमिति सिद्धम् ।
मध्यमाधिकारः १३ उक्त- कदम्बाख्यताराया द्यु ज्याचाप स्थिर कदम्बे ताराणा च चल दृश्यते तेन भचनस्य काचित् प्रवहेतर निदानाऽपि गतिरस्तीत्यनुमितम् । स च कदम्बोत्पन्न मह- वृत्तरूपमार्गे स्यादिति गोल युत्यैव स्फुटम् । अस्या आन्दोलिकाकारगते कारण प्रवहाधिकरणक भचक्र-त्यागकालिक-स्रष्ट्र-कराघातमेवेत्यनुमितम् । महवृत्ते प्रवप्रधानमागीन्नाडीमण्डलात् प्रस्तुतगतिमूलक यावन्मित भचक्रस्य चलनसकलन तावदेवाचार्य प्रागपराख्या अयनाशा परिभापिता । तत्साधनमुक्तमहवृत्ताधिकरणकसार्वदिकावस्थान-विशिष्टस्य पूर्णप्रकाशवतो नक्षतविम्वस्य ग्रविम्बस्य वाऽवलम्बेन कर्तुं शक्यमतस्तावत् सूर्यबिम्बस्यैव । अथ तच्चलनम् (भचक्रस्य चलनम्) वेवेन निर्णीयते तन तावदुक्तमहवृत्तमा- निर्णय । पर तस्य भूगर्भाधीनत्वात्तस्य चागम्यत्वात् पृष्ठादेवोपाय । दृष्टिस्थाना- देव दृश्यगोल भूगर्भात् स्थिरगोल च कृत्वा गोलयो केन्द्रग-दृष्ट्या दृश्य- गोलीय भगोलीय परिणतो भचरस्थ ध्रुवताराभ्याम् नवत्यशेन कृते तत्तद्गो लीय-नाडीवृत्ते ध्रुवसूनकेन्द्रान्तरैर्जातत्रिभुजधरातलच्छिन्नगोलद्वयी मार्गे च तत्तद्याम्योत्तरवृत्ते । स्वनाडीवृत्तयाम्योत्तरवृत्त धरातलयोर्योगरेखा स्वनिरक्षो- धिरसूत्रम्, वर्धितकेन्द्रान्तररेखा चोर्ध्वाधरसूनम् । ध्रुवसूनस्य नाडीवृत्तधरातलो- परिलम्बत्वाद् ध्रुवसूनयोश्च समान्तरत्वात् भगोलीय दृश्यगोलीयनाडीवृत्त धरातले समानान्तरे सिद्ध । अथ दृष्टिस्थानात् स्थिरगोलीय (भगोलीय) नाडीवृत्त धरातलोपरि कृतो लम्बो नाडीवृत्तधरातलयोरन्तरम् । गोलद्वयेऽक्षाशयो समत्वात्तज्ज्ञान- मेव भवितुमर्हति यथा- अक्षज्या x केन्द्रातर रेखा त्रिज्या =धरातलान्तरम् । रविगतदृष्टिसूनस्वनाडी- वृत्त-भूतलयो स्वगोले (वेधगोले)ऽन्तरम् =वेधगोलीय क्रान्तिज्या। दृग्गोलीय कान्तिज्यामापनेन ज्ञातवातो दृग्गोलीय क्रान्तिज्या X दृष्टिकर्ण =ग्रहाद्दृग्गोलीय- दृग्गोलीयव्या निरक्षोधिरोपरि कृतलम्ब रेखा-लम्ब , लम्व-धरातलान्तर ग्रहगोलीय प्रान्तिज्या । एतज्ज्ञानेन ग्रगोजाग्या नि =भगोलीय क्रान्ति ज्या= स्थिरगोलीय बिम्बीयकर्ण क्रान्तिज्या, अस्याश्चाप क्रान्ति । % 3D वटेश्वर-सिद्धान्ते X मुके भो लोग ophy इ-दृष्टिस्थानम् ग्रहगोले र रवि भूर-रविविम्वीयवर्ण हवेधगोलकेन्द्रम् भूपेन्द्रान्तरम् दृप-- धरातलान्तरम् प=स्थिरगोले स्वस्तिकम् ख, वेधगोले व स्वस्तिकम् भू म=भगोलीय निरक्षोधिर- मूत्रम् हन-वेधगोलीय निरक्षोधिर मूत्रम् । दर-दृप्टिकर्ण । चित्र न. ३ र,म, भगोलीय कान्तिज्या रव-- दृग्गोलीय क्रान्तिग्यार,, विन्दुतो वैधगोलीय निरक्षोधिर-रेयोपरि- लम्ब । पुनद्वितीयेहि पप्टिदण्डात्मक कालेर्माधिष्ठान-विन्दुर्याम्योत्तरे गिन्तु ध्रुवप्रोतवृत्त तवागतोऽनन्तर यावता कालेनाओं याम्योतरवृत्ते समागत पड़- गुरिणत तत्वालमान रनिरक्षोदययोविपुवागयोरन्तर स्यात्, याम्योत्तरवृत्तम्य निरक्षादेशीय क्षिनिजत्वात्, क्रान्तिश्योक्त-युक्त्या ज्ञाता, वृत्वैव बहुपु दिनेषु गोल. मेव म्वाग्रे सस्थाप्य तत्र नाडीवृत्तास्य महद् वृत्त विधाय तत्म्येष्ट-विन्दो पूर्व-पूर्व- अमेग विपुवाशानगन् दत्वेष्टविन्दो प्रत्येय दानाप्रविन्दो च वृतध्रुव प्रोतवृत्तषु तत्तत्त्रानो (प्रत्यालिन प्रान्ती) दत्वा क्रान्तिद्वयाग्रलग्न महदवन यन तलान्यग्रेषु गमित्युपतधमतो रविभ्रमणमार्गो महद् वृत्तमिति मिद्धम् । मान्त्यग्रेषु गत्यात्तत्कान्तिवृत्तमिनि सना योभनेति । प्रय पूर्वोत्तोपपत्ती कालमान नाडीवृत्तेऽद्गीत रथ नाडीवृन यालवृत्त- मिस्तुभ्यते। प्रयत्वायुना भ्राम्पमाशे.पि भगोरे यहुभिरपि वनं गतु यामाचिना- गणा स्थिरतपोरलय ध्रुवनारामृत ध्रुवम्यानाद् राज्या-चापान्तरमुपलभ्यते । एनावावगत पद्वानव भगोलपृष्ठ निम्धिरवेन्दो पन्न नाडीवृत्तान्होगा- वृत्तयोघं रानलम्वयम्, नाम्योपलव्य प्रवद्वायुवेग-भ्राम्य माणोक्त मण्डलद्वयम्य- वाव सम्वेन वागरानोचिता, अनाचनन्नम्पाम्याच्युतोषम- चाम्यागमनिर्गीन- गवंदेशापवान्, इयमेव युक्ति प्रानीनार्वाचीन घटीयन्वादिभि सोपेगोत्पलम् ।
. मध्यमाधिकार अधुना विपुवाशयोरन्तर क्रान्तिद्वयञ्च ज्ञात्वा परमक्रान्त्यानयनम् । नाडीवृत्तक्रान्तिवृत्तोत्पन्नकोण परपक्रान्तिस्तत् प्रमाणम्य कल्पितम् । विपुवाशान्तरम् -वि, सनर नम=क्रान्ति =क्रां, च शान्ति , का, । नच-वि। % 3D न मध्यावयव :- तदा मध्यजा दोा-विज्यागुरणेत्या- दिना ज्यार त्रि-स्पक्रा, कोस्पय ज्यार त्रि =कोस्पय (१) स्पना तथा ज्या (र+वि) निस्पका, कोस्पय ज्या(र+वि) त्रि कोस्पय (२) स्पना, (१) (२) अनयो समीकरणम् व श भलो तथा १ न ज्यार गुरु ज्या रनि ज्या (र+वि) नि पक्षी नि स्पका स्पकार स्पना, गुरिणतौ तदा ज्यार म्पका, ५-ज्या(र+वि) अन स्पका गु स्पका स्पका तदा ज्यार गुज्या (रवि) चाययोरिष्टयो>ज्ये इत्यादिना ज्यार को ज्यावि+को ज्यार ज्यावि नि पक्षी विगुणितौ तदा ज्यार गु नि ज्यार काज्यावि+कोज्यार ज्यावि समशोधनेन ज्यार गु त्रि-ज्यार कोज्यावि-कोज्यार ज्यावि= 'ज्यार (गु निकोज्यावि) ज्यार ज्यावि व्यक्त पक्षौ द्वादशभिर्गुणिती कोज्यार गु निको ज्यादि ज्यार १२ ज्कोज्यार स्परनि व्य प्राभ्या या पलभा अक्षाशस्पशरेखो वा सा व्यक्ताद्यिस्मिन्देशे १२४ व्य, वा त्रि व्य एतत्तुल्य पलभा अक्षाश स्पग रेखा वा तहे शीयाक्षाशमानमेव र मानम् । ततो य मान व्यक्तमेवेति सिद्धमभीप्टम् । अथ यत् क्रान्ति वृत्ताधार भचनस्य चलन तदेव निरूपित रविमार्गरूप- ज्यार नि को ज्यार-१२४व्य, वा वटेश्वर सिद्धान्ते कान्तिवृत्तमिति निर्णय घ्र वस्याने कदम्ब याम्योत्तर-वृत्तस्थाने कदम्वप्रोत- वृत्त नाडीवृत्तस्थाने प्रान्तिवृत्तमक्षज्यास्थाने दृक्षेपञ्च नीत्वा या पूर्वोक्ता युक्ति संवानापि, किन्वत लम्बरेखा-नाडोवृत्तघरानलान्तर= इत्युपलब्धमत सिद्धम् । प्रय रेवत्या शराभावनिर्णय उक्त-गोलद्वयकेन्द्रात् कदम्बे रेवत्याचे सूत्रे नौते केन्द्रद्वय-लग्म-कोण- माने शरकोटितुल्ये, कदम्बगतयो रेवतीगतयोश्च रेखयो ममानान्तरत्वात्ताभ्या- मूनो नवत्या =गरचाप =० इत्युपलब्धम् । एवमेव पुष्यमपाशतभिपजा नक्षनाणा शराभाव अल चो भवति । तेन "पैन पुष्पान्तिम कामरणानामित्यादि" भास्त्र- रोक्त सिद्धमिति । अथ गोलद्वय केन्द्रात् ध्रुवे रेवत्याञ्च रेखे नोते गोलद्वय केन्द्रलग्न कोणमाने राज्याचापमिति तुल्ये ध्र वगतयो रेवतीगतयोश्च रेखयो समानान्तरत्वात् । अन ६०--रेवती द्यु ज्या चाप रेवती क्रान्त्यश, तत निxज्याका ज्याजि ज्याभु, अस्याश्चापमयनागा , परमाम्ते=२७° भवन्ति । अत प्रसगागनाना गोलद्वयी लग्न विनिभ दृक्षेपचापाक्षाश चापादीना समत्वोपपत्तिरुह्यति । ग्रहे प्रथमपदे तत्कालीन क्रान्तीना वेवेन क्रमादधिकत्व द्वितीयपदे ह्रास व तृतीयपदे प्रथमवच्चतुर्य द्वितीवदृश्यतेऽतो ग्रहाणा प्राग्गतित्व सिद्धम् । ग्रहाणा वहदिन प्रवहस्य त्वेनैव दिनेन भगणपूनिरत प्रवहगत्य- पेक्षया तदल्पगतित्व सिद्धम् । भप मेप सन्धिसस्थग्रं हैरित्यायु क्त्या भूपेन्द्रा- ट्रेवतीगतसूत्रे ग्रहा ऊर्ध्वाधरजमेण ब्रह्मरणा निवेशिता इत्यनेन प्रहविम्बीय- वर्गानामममत्व मूच्यते, ग्रहपिण्डाना गोलत्व नवेति निर्णय । गोलमेन क्वापि सस्थाप्य दृष्टिस्याने समा यष्टित्रयस्तथा स्थापिना यथा गोलस्पर्शकरारिए दृष्टिमूगारिणस्युस्तानि च दृश्यवृत्ताधारसममूचीगतानि आधारवृत्त घरातल- ममानान्तरधरातल यष्ट्यपु मिथो बद्धरेखात्रयजनित विमुजोपरिष्ठ वृत्तमुत्त मूच्या कर्णेषु लगतीनि मुस्पष्टम् । तद् वृत्त केन्द्रगन दृष्टिमूत्र वर्धित सदा- धारवृत्तकेन्द्रगतञ्च ते गोलघमी । अयं तावद् ग्रहपिण्डे गोलत्व प्रकल्प्योक्त- गोलमा. श्यन्ते जो ग्रहपिण्डे गोलब सिद्धम् । उताक्षेत्र सस्थाम-सस्मोन कतम दृष्टिमून विम्बकेन्द्रग दृष्टिमूत्राणामानयन विम्वन्यासार्यानयनमि- त्यादय स्फुटा एवेति बिम्बीयकानयन प्रागुक्तमन्यया वा तदानयन कार्यमेव तत्तविम्बीय-कानामसमत्वमुपलब्धमिति । अथ वेधगोले दिने क्रान्तिवृत्त निवेशनप्रकार । पृष्ठच्छायातो गर्भच्छाया नानमयवा हप्ट युच्छाय+भूयासार्थ, दृष्टिकवि-बायको बन्न त्रिभुजे भुजपताना भूके नाम एन सम्म च नानात् ।
मध्यमाधिकारः १७ ज्यानताशX १२ -गर्भच्छाया, तत प्रय कोज्यान आये पदेपचयिनीत्यादिनार्क- पदज्ञानम् । क्रान्तिवृत्तयोधरातलान्तर विज्ञाय क्रान्तिज्ञान ततो भुजाराज्ञानम् । भुजाशज्ञानादकपदज्ञानाच्चार्कज्ञानम् । लम्बाश-नताशा ज्याचापा- शैर्जायमानत्रिभुजे भुजत्रयज्ञानात् "त्रिज्या गुणाद् धरणिकोटिगुणाविहीनादि- त्यादिविलोमेन" ध्रुवलग्नकोणस्य नतकालस्य कोटिज्ञानम् । नतकालकोटिचाप-चरचापयो. सस्काररूपमिष्टकाल प्रकल्प्य ज्ञात- तात्कालिकार्करण लग्नज्ञानम् । ततो लग्नज्ञाने लग्नपदज्ञानेन च लग्नभुजांशज्ञानम् । एतत्तुल्यमेव वेधगोलेऽपि गोलसन्धिलग्न-विन्दुगतयोस्तत्तद्गोलीयरेसयो समानान्तरत्वात्, लग्नमुजाशज्ञानाच्च लग्नक्रान्ति-ज्ञानम् । तत नि ज्याका ==अग्रा इयमपि गोलयो समा (पूर्वस्वस्तिक गतयोलग्न- ज्यालम्व गतयो रेखयो समानान्तरत्वात् ) अय वेधगोले पूर्वस्वस्तिकाल्लग्नगोल- क्रमेण (दक्षिणगोले पूर्वस्वस्तिकाद् दक्षिणदिशि उत्तरगोले लग्ने सति पूर्व- स्वस्तिकादुत्तरदिशि) क्षितिजे लग्नानाचापसम छित्वा छेदितविन्दोलग्न- भुजाश व्यासार्धवृत्त छिन्नविन्दुगत ध्रुवप्रोत वृत्तात्त ल्यान्तरे नाडीवृत्ते लगि- प्यति । तत्र लग्नपदक्रमनिश्चितकविन्दु-छिन्नबिन्द्रो प्रोतमेक महद् वृत्त कार्य तदेव क्रान्तिवृत्तम् । अथ वेधगोले रात्रौ कान्तिवृत्तनिवेशनप्रकार । पूर्वनिर्णीत शराभाव नक्षत्राणा "पत्रः-पुष्यान्तिमवारुणाना" मेकतमे विद्ध यावास्तन्नताशो वेधगोले तावानेव भगोलेऽप्यतो वेधगोले मापनेनोक्तनताश- मान विज्ञाय विद्धनक्षत्र रवि प्रकल्प्य पूर्ववत् कृतेऽत्रापि जात क्रान्तिवृत्त- निवेशनम् । ननु पैत्रः-पुष्यान्तिमवारुणानामेकतम सदोदित एव, कथमित्युच्यते । पुष्य =३ । ३ । २० । ० उपरि ३ ११६ ! ४० } . उपरि ४ । १३ । २० । ० यावत् शतभिषक् =१०।६।४०1० उपरि १० । २०1 10 यावत् रेवती =११ । १६ । ४० ५ ० उपरि १२ । 0 1 0 1 0 यावत् एन पश्यन् प्रवह्वशेन गोल भ्राम्यन् मेषादेरारभ्य प्रतिविन्दु क्षितिज- स्थ कुर्वन् विचारितेभीष्टसिद्धि स्यात् । अयवा शराभावनक्षत्रद्वय सदोदित- मेव पड्भान्तराल्पान्तरत्वात् परिणत-नक्षत्र-द्वयगत वृत्त क्रान्तिवृत्तमिति ।। अथ वेधगोलीय ग्रहज्ञानेन भूगर्भगोलीय ग्रहज्ञानम् ॥ वेवगोले दृष्ट्या परिणतबिम्बस्य स्पष्टभोग-चिह्न (बिम्बोपरिगत- कदम्बप्रोतवृत्त यत्र क्रान्तिवृत्तै लगति तच्चिह्नम्), तद्गोलीयग्रह एव भूगर्भगोली. योऽपीति ग्रहपरिचय. 1 यावत् । मघा =४।००० वटेश्वर-सिद्धान्ते अथ परिभाषा वैधगोलीयस्यानम् =स्थान, स्थानीय दृग्वृत्तभूतलेन छिन्नस्य भूगर्भ- गोलस्य छेदितप्रदेशस्तद्गोलीय दृवृत्तम् । तस्य (तद्गोलोय दृग्वृत्तस्य ) गर्भगो- लीय-श्रान्तिवृत्तस्य च योगविन्दु =प । भूगर्भात् प विन्दुगता रेखा=प मजिका दृष्टित स्थानगता रेखा फ सज्ञिका। अथ प-फ रेखे समानरे (रेखागणित ११ अध्याययुक्त्या) रैवत्तीगते च रेसे समानान्तरे (गोलद्वये क्रान्तिवृत्त धगतलयो समानान्तरत्वात्) तेन भूगर्भ लग्न दृष्टि स्थान लग्नकोणयो साम्यात् मिद्ध यद् भूगर्भगोले रेवतीत पविन्दुपर्यन्त भगोले वेधगोलीय स्पष्टग्रहतुल्य (भगोलीय रेवतीत प विन्दु पर्यन्तम् = वेधगोलीय रेवतीत स्थानपर्यन्तम्) केन्द्र लग्नकोणस्य चापमानत्वात् । स्थानीयनताश-प विन्दूत्थ नताश , प, फ रेखयो समानान्तरत्वात् । स च ननाशो वेधगोले मापनेन विदित । तथा विम्वीय नताश प विन्दूत्य नताश-चापाभ्या जायमान कोण स्त्र स्वस्तिकलग्नो यावान् वेधगोले तावानेव भूगर्भगोले (गोलद्वय धरातलेक्त्वान्) स च नताशोत्लन्न-कोणो वेयगोले मापनेन ज्ञेयस्ततो भूगर्भगोलपृष्ठे सजातत्रिभुजे, "निज्यागुरणाद् धरणि-कोटिगुणादित्यादि विलोमेन, परिणत विम्ब प विन्दु प्रोन- वृत्तीयाघार चापज्ञानम् । तथा च वेधगोलीय शर क्रान्तिवृत्त धरातलान्तरयोर्ज्ञानाद् भूगर्भ गोले शारज्ञानम् (पयापूर्व नाडीवृत्त धरातलाल रज्ञानेन वेघगोलीय मान्ति- ज्ञानेन भूगर्भ गोलीय क्रान्ति ज्ञान कृत तथैवानाऽपि शरज्ञान कृतम् )। अतश्चापीय जात्ययुक्त्या गर्भ गोलीय ग्रह प विन्द्वोरन्तरचापस्य सस्का- रास्यस्य ज्ञानम् । गोसं कानिवृत अ =सस्कारचापम् । वेधगो स्पग्रह सस्कारचा-भूगर्भ- गोलीय स्पष्टग्रह । नाव प चित्र न०५ अथ सस्कारचापस्य घनर्णव्यवस्था । तत्र परिभाषा वेधगोलीय क्रान्ति वृत्तम् -इष्ट का वृत्तम् । भूगर्भगोलोय क्रान्तिवृत्तम् =वास्तवक्रान्तिवृत्तम्, विम्बीय कणंगोलीय क्रान्तिवृतवास्तव प्रान्ति वृत्तम् ।
1 मध्यमाधिकारः १६ वधिता प रेखा वास्तव क्रान्तिवृत्ते यत्र लग्नाः तत्र प, बिन्दुः । बिम्बत इष्ट-कान्तिवृतघरातले या शरज्या लम्बस्तस्या (शरज्याया.) मूल क्षाख्यं वर्धिताया फ रेखायामेव स्यात् फ रेखा तु स्थानीय दृग्वृत्त धरातले, उक्त शरज्या वर्धिताऽवधिता वा वास्तव कान्तिवृत्तधरातले लम्ब स्यात्, एतदुक्त भवति स्थानीय दृग्वृत्त धरातलनिष्ठत. क्ष विन्दोस्तिव क्रान्तिवृत्त धरातले लम्ब. क्रियते । स च लम्बो यस्या दिशि स्थानीय दृग्वृत्त वास्तव-क्रान्तिवृत्तधगतलाभ्या- मुत्पन्नकोणोऽल्प: स्यात्तस्या दिशि पतिप्यति । भूगर्भादि म्बकर्ण व्यासार्धन यो गोलस्तत्रोच्यते- प विन्दुत्थ दृग्वृत्त वास्तव, क्रान्ति-वृत्ताभ्यामुत्पन्नकोणो दृक्षेप-चापाभिमु- खोल्प: स्यात्, क्ष विन्दुस्तु वास्तव क्रान्तिवृत्त धरातलो/धरसूत्रयोर्मध्ये- स्यात् । यत. फ रेखैव मध्ये वर्तते । एभि. सिद्ध यत् दृक्षेपवृत्तात्पूर्व कपाले ग्रहे सति रेखात. प्रतीच्यामेव लम्ब. पतिप्यति । यत' प रेखा स्थानीय दृग्वृत्त वास्तव क्रान्तिवृत्त धरातलयोर्योगरेखा, भूगर्भाल्लम्वमूलगतरेखा प' विदुतः प्रती- च्यामेव क्रान्तिवृत्त लगिप्यति स एव विन्दुभूगर्भाभिप्रायिक-ग्रहस्थानम् । त्रिज्या- गोलेऽपीयमेव स्थिति । पश्चिमकपालेऽप्येवमेव विचारणीयम् । अत. सिद्ध वित्रिभादूने ग्रहे सस्कारचाप धनमन्यथा ऋणमिति ।। हि भा -ब्रह्मा ने भचक्र को निर्माण पर प्रकाश मे फेव दिया तब ब्रह्मा के हाथ के प्राघात से उसकी आन्दोलिका गति उत्पन्न हुई । उम गति के ज्ञान के लिये अधोलिखित झनी चाहिये । पहले ज्योतिष शास्त्र के मूलभूत भचक्र के विषय मे कुछ उपपत्ति सम-विचार करते हैं । भचक्र शब्द से ताराग्रो के प्राधार मे गोलत्व की ध्वनि होती है। क्योकि भचक स्थान में भसच कहने मे भी दोषाभाव है अत यह नक्षत्रसमूह (भचक्र) के चक्र (गोल) ऐसा एकशेष समास में अर्थ करना चाहिये । भचक्र मे गोलत्व और अनन्तत्व क्यो है इसके लिये विचार । दो दृष्टि स्थान से भचक्रस्थ क्सिी तारा को वेध करने से दृष्टि सूनद्वय और दृष्टि- हयान्तगत सूत्रो से जो त्रिभुज बनता है उसमे तारालग्न कोण शून्य है अत उक्त त्रिभुज में दृष्टिद्वयान्तर्गत रेखा दृष्टि द्वयलग्न कोणद्वय योगार्धज्या दृष्टिमून ज्या (०) इस तरह दृष्टि सूनद्वय के अनन्तत्व इटस्थान केन्द्रिक अनन्त व्यासार्ध वाला भचक्र सिद्ध हुआ ।। कदम्ब तारा का धुज्या चाप स्थिर है, कदम्ब मे तारापो को चल देखते हैं । इससे सिद्ध होता है कि प्रवह वायु से भिन्न भी भचक्र गति के कारण है वह कदम्बोत्पन्न नवत्यश वृत रूप मार्ग मे है यह बात गोल युक्ति से स्पष्ट है। इस प्रान्दोलिकाकार गति के कारण भचक छोड़ने के समय के ब्रह्मा के हाथ का प्राधात ही है ऐमा अनुमान किया गया । उक्त महद्वृत्तमे प्रवह के प्रधान मार्ग ( नाडीवृत्त) से प्रस्तुत गति के मूलभूत जितने भचक्र चलन का सङ्कलन होता है वही प्राचार्यों से अयनारा कहा गया है । उसके अनुपात से- -अनन्त m- २० वटेश्वर-सिद्धान्ते साधन उस महवृत्तस्थ प्रकाशवती तारा अथवा ग्रहविम्ब वे वा से कर सकते हैं। अब भचक्र चतन ज्ञानवेध से करते हैं। पहले पूर्वोक्त महढ्त मार्ग का निर्णय करते हैं । लेकिन वह भूगर्भाधीन है, भूगर्भसम्बन्धी पदार्थज्ञान कठिन है इसलिये भूपृष्ठ ही से काम करते हैं। दृष्टिस्थानवश करके एक गोल वनाइये जिसका नाम दृश्यगोल अथवा वेधगोल है । भूगर्भ से जो गोल होगा वह स्थिर गोल अथवा भगोल कहलाता है। दोनो गोलो के केन्द्रस्थ दृष्टि से भचक्रस्थ ध्रुव तारागत रेखाद्वय स्व-स्व गोल में जहा-जहा लगता है दोनो गोल मे परिणत भव तारा होगी, परिणत भवो के केन्द्र मान कर नवत्यश व्या- सार्धवृत्त दोनो गोल मे नाडीवृत्त होगे, दोनो ध्वसूत्र (दृष्टिस्थान और भूनेन्द्र से भचक्रस्थ नव-तारागत रेखाद्वय ) और केन्द्रान्तर रेखाओ (भूवेन्द्र से दृष्टिस्थानगत रेखा ) मे जो विभुज बनता है उन धरातल ( त्रिभुज रूपी धरातल ) से कटित गोलद्व य में मार्ग दोनो गोल में याम्योत्तर वृत्त हैं। स्वनाडीवृत्त याम्योत्तर वृत्त धरातल की योगरेखा दोनो गोल में निरक्षोधिर सूत्र है । वर्धित केन्द्रान्तर रेखा ऊर्ध्वाधर सूत्र है । नाडोवृत्त धरातल के ऊपर प्रवमूत्र लम्व है, दोनो गोल के ध्रुव सूत्र समानान्तर है, इसलिये दोनो नाडीवृत्त घरातल समानान्तर होगे, दृष्टिस्थान से स्थिरगोलीय नाडीवृत्त धरातल के ऊपर जो लम्व होगा वह नाडीवृत्त घरातलान्तर है, दोनो गोल मे प्रक्षाश बराबर हैं, प्रत धरातलान्तर ज्ञान इस प्रकार होगा । यथा अक्षज्या- केन्द्रान्तरे त्रि =धरातलान्तर । रविगत रष्टिसूत्र स्वनाडी घृत (वैधगोलीय नाडीवृत्त) धरातल का अन्तर वेधगोल मे वेधगोलीय क्रान्तिज्या है। हम्पो- लीय क्रान्तिज्या (वेघगोलीय क्रान्तिज्या) मापन द्वारा विदित ही है इसलिये दृग्गोलीय क्रान्तिज्या दृष्टिकर्ण दृग्गोलीय व्या३ -- ग्रह मे दृग्गोलीय निरक्षोर्ध्वाधर रेखा के ऊपर लम्ब लम्ब-घरातलान्तर=ग्रहगोलीय क्रान्तिज्या, इसके ज्ञान से ग्रगोकाज्याxवि =भगोलीय क्रान्तिज्या-स्थिरगोलीय कान्तिज्या, बिम्बीयर्ण चाप करने से स्थिरगोलीय कान्ति हुई । यहाँ चित्र (१) देखिये, भू-भूकेन्द्र, - दृष्टिस्थान, र=ग्रह गोल मे रवि, भूर-रवि विम्बीय वर्ण, हवेधयोल केन्द्र, भूह केन्द्रान्तर । य==घरातलान्तर स=स्थिरगोल में खस्वस्तिक, स, =वेघगोलीय खस्वस्तिक । भूम =भगोलीय निरक्षो - घरम् हन=वेधगोलीय निरक्षोधिरम् । हरप्टिकम् । र, म भगोलीय क्रान्तिज्या र,व-दृग्गोलीय कान्निग्यार, विन्दु मे वेधगोलीय निरक्षोधिर रेखा के आर लम्ब पिर दूसरे दिने ६० दण्डारमय वात मे जहाँ पर रवि है वह विन्दु याम्योत्तर वृत्त (ध व प्रोतवृत्त) मे वहीं पर माया याद मे जितने काल मे रवि याम्योसर वृत्त में पाये मध्यमाधिकारः २१ उस काल को छ से गुणा देने से रवि के निरक्षदेशीय दोनो उदय के विपुवाशान्तर हो गया (याम्योत्तर वृत्त को निरक्ष देश के क्षितिज होने के कारण ) पूर्वोक्त युक्ति से क्रान्ति विदित है । इस तरह बहुत दिनो तक करके अपने प्रागे एक गोल को रख कर उसमे नाडीवृत्त महवृत्त बना कर तत्स्यित (नाडीवृत्त स्थित) इष्ट बिन्दु से पूर्व पूर्व क्रम से विपुवाशान्तर दान देकर इष्ट विन्दु और दानाग्र विन्दुप्रो मे ध्रुव प्रोत वृत्त कर देना ! उन ध्र व प्रोतवृत्तो मे प्रत्येक दिन की क्रान्ति देकर दो क्रान्ति के अग्रगत महत्त कर देना वह प्रत्येक क्रान्ति के अग्रगत होता है, ऐसा देखा जाता है इसलिये रवि भ्रमण मार्ग महवृत्त सिद्ध हुमा, क्रन्तियो के अग्र मे जाने के कारण उसका नाम क्रान्तिवृत्त है। पहले पी उपपत्ति मे नाडीवृत्त मे कालमान स्वीकार किया गया है। नाडीवृत्त कालवृत्त क्यो है इसके लिये विचार करते हैं । प्रवह वायु द्वारा भगोल के घूमने पर भी बहुत वर्षों में भी किसी तारा की स्थिरता के कारण ध्रव स्थान से धुज्या चाप मे अन्तर नहीं पाया जाता है इसीसे सूचित होता है कि वास्तव भगोल पृष्ठस्थ स्थिर केन्द्रोत्पन्न नाडीवृत्त धरातल और अहोरात्र वृत्त घरातलो मे स्थिरता है । उनमें एक रूप से प्राप्त प्रववायु वग से भ्राम्यमाए कथित नाडीवृत्त और अहोरात्र वृत्त के अवलम्वन से काल- । यही युक्ति घटीयन्त्रादि के द्वारा काल-ज्ञान के लिये प्राचीनाचार्यों गरगना उचित की है । अव विषुवाशद्वय के अन्तर और क्रान्तिद्वय जान कर परम क्रान्ति ज्ञान के लिये विचार । चित्र (२) देखिये । नाडीवृत्त और क्रान्तिवृत्त से उत्पन्न कोण परम क्रान्ति है, उसका प्रमाण=य, मानते है, विषुवाशान्तर=वि, सन=र, नमक्रान्तिका, चश= =क्रान्ति, का, मध्यावय-र तव मध्यजा दोा विज्या गुणा प्रान्त्यस्पर्शरेखाहतिर्भवेद् इस नियम से ज्यार मि ज्यार त्रिपक्रो कोस्पय. कोस्पय (१) स्पक्रा तथा ज्या (र+वि) त्रि-स्पना, वोस्पय : ज्या (र+वि) त्रि = कोस्पय २) स्पा ज्यार त्रि_ज्या (र +वि) त्रि (१) (२) इन दोनो वा समीकरण करनेसे दोनो पक्ष को स्पना स्पा' त्रि भाग देवर स्पका' गुणा दीजिये तव ज्यार सका, स्पका' =ज्या (र+वि) यहा स्पता 'गु तव ज्यार गु- ज्या (र+यि) चापयोरिष्टयोदोज्य मिथ कोटिज्यका हो इत्यादि ज्यार योज्यावि+ज्यायि योग्यारदोनो पक्षो को त्रि से गुरगने से ज्यार गु त्रि मि = ज्यार योग्यावि+ज्यावि पोज्यार समसोपन से ज्यार गु गि-ज्यार फोग्यावि= स्पमा से ज्यार गु:
२२ वटेश्वर-सिद्धान्ते ज्यार ज्यादि ज्यावि, कोग्यार=ज्यार (गु त्रि-योज्यावि) प्रत -व्यवन वोग्यार गु त्रि-कोग्यावि ज्यारx१२ दोनो पक्षो को बारह से गुणने से ज्यार त्रि कोज्यार -१२४व्य वा -स्पर=त्रि व्य कोज्यार । इन पर से जो पलभा या अक्षाश स्पर्शरेखा होगी व्यक्त हो गयी, अर्थात् जिस देश मे १२४ व्य वा नि व्य एतत्तुल्य क्रमश पलभा वा अक्षाश स्पर्शरेखा होगी उस देश के अक्षारामान र होगा, इस परसे य मान सुलभ ही है । जिसे क्रान्तिवृत्त के आधार पर भचक्र का चलन है वही पूर्व निरूपिन रवि भ्रमण मार्ग रूप क्रान्निवृत्त है इसका निर्णय करते हैं। यहाँ ध्र व स्थान की जगह पर क्दम्ब, याम्योत्तर वृत्त के स्थान पर कदम्ब प्रोत- वृत्त, नाडीवृत्त के स्थान पर क्रान्लिवृत्त, अक्षज्या के स्थान पर इक्षेप लेकर नाडीवृत्त घरा- तलान्तरादि ज्ञानाथं जो युक्ति बतलायी गई है वही युक्ति यहां भी समझनी चाहिये । लेकिन यहा लम्बरे-धरातलानर%0 यह उपलब्ध होता है, प्रत मिद्ध हो गया । अव रेवती के शराभाव के विषय मे विचार करते हैं। पूर्वकथित गोलद्वय (वेधगोल, स्थिरगोल) के केन्द्र से बदम्ब मे और रेवती में रेखाग्रो को लाने से केन्द्रद्वयलग्न कोणद्वयमान सरकोटि के बरावर है क्योकि कदम्बगत रेखाद्वय और रेवतीगत रेखादय ममानान्तर हैं । १०-गरकोटि-दारचाप= ० यह उपलब्ध होता है, इसी तरह मघा, पुप्य, शतभिप इन नक्षत्रो के भी गराभाव उपलब्ध होता है । इसलिये "त्रिपुण्यान्तिमवारुणानामि"त्यादि भास्कराचार्य कहते हैं ।। गोलद्वयकेन्द्र मे ध्रव मे पौर रेवती मे रेखायें लाये तब गोलद्धयकेन्द्र लग्न कोणमानाज्याचाप तुल्य होंगे क्योकि प्रवतारारेखाद्वय और रेवतीगत रेखाद्य मानान्तर हैं त्रि. ज्यानो इसलिये ६०- -रेवती धुज्याचाप-रेवतीशान्त्यरा तब =ज्याभु, इमके चाप ज्याजि करने से भयनाम प्रमाण होगा वह परम (परमायना)=२७° होते हैं । यहाँ प्रसङ्गवरा उपपत्त्यन्तर्गत प्राये ए गोलद्वय के लग्न, वित्रिम दृक्षेपचाप-प्रक्षाम प्रादियो के समत्व की उपपत्ति स्वयमैव समझनी चाहिये । ग्रह के प्रथम पद में रहने से वेघ से तत्कालीन क्रान्ति के क्रम मे अधिकत्व द्वितीय पद मे हासत्व प्रथम पदवत् तृतीय पद मे, चतुर्थ पद मे द्वितीय पदवन देखते हैं इसलिये ग्रहो के प्रागतित्व (पूर्वाभिमुखचलन) मिद्ध हुआ। ग्रहो के बहुत दिनो में भगण पूरा होता है । प्रबह के एक ही दिन मे भगणपूर्ति होती है इम- लिये प्रवह गति के अपेक्षा ग्रहो के पल्पगतित्व सिद्ध हुप्रा । प्राचार्योत "झपमेषमन्धि-मस्वग्रहै" इत्यादि पद्य से सिद्ध होता है कि भूकेन्द्र से रेवनोगत मूत्र में ऊर्ध्वाधर (ऊचे नीचे) क्रम से ब्रह्मा ने ग्रहो ये निवेगित किया और ग्रहविम्बीय वर्गों का प्रममत्व सूचित होता है, ग्रह पिण्डो मे गोलत्व है या नहीं इसके लिये विचार। ।
समाचार ज्यानताशX १२ -गर्भच्छाया । कही पर एक गोल को रख कर दृष्टिस्थान मे समानयप्टिनय को उस तरह रखें जिससे दृष्टिसूत्र सव गोल को स्पर्श करे अर्थात् दृष्टिसूत्र सव गोल की स्पर्शरेखायें हो और वे दृष्टिसूत्र सब दृश्य वृत्ताधार सम सूची वर्णरेखायें है, आधार वृत्त धरातल के समानान्तर धरातल यष्टित्रयाग्र में परस्पर रेखायें पर देने से जो निभुज बनता है तदुपरि- गतवृत्त पूर्व कथित सूची कों में लगता है। उम वृत्त के केन्द्र मे दृष्टिस्थान से जो रेखा (दृष्टिसूत्र) जायगी उसको बढाने मे प्राधार वृत्त के केन्द्र मे जाती है सब गोलीय धर्म है । अब पहले ग्रह पिण्ड मे गोलत्व स्वीकार कर पूर्व कथित गोलीय धर्म देखते हैं । इमलिय' ग्रह पिण्ड मे गोलत्व सिद्ध हुा । कथित क्षेत्र-सस्थान के स्मरण करने से कौन दृष्टिमूत्र विम्ब केन्द्रगत होता है, और दृष्टिमूत्र के प्रानयन, बिम्वव्यासार्धानयनादि सब बाते स्पष्ट ही हैं, विम्बीय वर्णानयन पहले लिखा जा चुका है अथवा दूसरे तरह से भी उसका प्रानयन करना चाहिये . विम्बीय कणों के प्रानयन करने से उनमे असमत्व पाया गया इसलिये ग्रह कक्षामो में ऊधिरत्व सिद्ध हुना ॥ दिनमे वेधगोलीय क्रान्तिवृत्त निवेशन प्रकार । पृष्ठच्छाया से गर्भच्छायानयन अथवा दृष्ट्युच्छ्राय+भूव्यासाचं, दृष्टिकरणं, विम्बीयकरणं, इन भुजो में जो त्रिभुज बनता है उसमे तीनो भुज विदित है इसलिए त्रिकोण मिति से भूकेन्द्र लग्ननताश कोण का ज्ञान हो जायगा। तव- कोज्यान नव "माद्ये पदेऽपचयिनी पलभाऽल्पिका" इत्यादि से रवि पदनान होगा । दोनो गोल (वेधगोल और स्थिरगोल) के क्रान्तिवृत्त घरातलो के अन्तर जान कर शान्ति ज्ञान करना, उस पर से भुजाश ज्ञान, भुजाश ज्ञान से रविपदज्ञान उस पर मे रविज्ञान हो जायगा । नताश लम्बाश, धुज्याघापारा इन तीनो भुजो से उत्पन्न त्रिभुज मे तीनो भुजो के ज्ञान मे "त्रिज्या गुणाद्धरणिकोटि गुणाद्विहीनात् इत्यादि के विलोम से ध्र वलग्नकोण (नतकालकोटि) का ज्ञान हो गया, नतकालकोटिचाप और चरचाप के सस्कारजनित पदार्थ को इष्टकाल मान कर विदित तात्कालिक रवि पर से लग्न ज्ञान हो जायगा, लग्न ज्ञान से और लग्न पद ज्ञान से लग्न भुजाशज्ञान होगा, इसके वरावर ही वेधगोल म भी होगा क्योकि गोलसन्धिबिन्दु और लग्न बिन्दुगत रेरग दोनो गोल के समानान्तर है, लग्न मुजामा त्रि० ज्याला शान से लग्न क्रान्ति ज्ञान होगा तब = अग्रा, यह भी दोनो गोल में बरावर होगी, क्योकि गोलद्वयकेन्दो से पूर्व स्वस्तिकगत रेखाद्वय और लग्नगत रेषाद्वय समानान्तर है वधगोल में पूर्वस्वस्तिक से लग्नगोलक्रम मे (दक्षिणगोल मे पूर्व स्वस्तिक से दक्षिण तरफ उत्तरगोल में लग्न रहने से पूर्वस्वस्तिर मे उत्तर तरफ) क्षितिज मे लग्नाग्राचाप तुन्य काट पर कटित विन्दु से लग्न भुजारा व्यासार्घवृत्त कटित विन्दुगत घ्र व प्रोतवृत्त मे तुल्यान्तर पर नाडीवृत्त मे लगेगा, वहा पर लग्न पद कम से निश्चित एक विन्दु और कटित विन्दु मे लगा कर जो वृत्त होगा वही कान्तिवृत्त है। ज्याल २४ वटेश्वर-सिद्धान्ते तक मषा-४ . " तक " . " " वैधगोल में रात्रि में प्रान्तिवृत्त निवेशन प्रकार। पूर्वनिर्णीताराभाव नात्रो मै क्मिी नक्षत्र का वेधजनित वैधगोल मे जो नताश प्रमाण होता है तत्तुल्य ही भगोल मे भी होता है। वेधगोल में नताशमान को मापन द्वारा जान कर विद्ध नक्षत्र को रवि मान कर पूर्ववलिया सम्पादन करने से यहा भी प्रान्तिवृत्त निवेशन हो जायगा । पूर्व निणीत पराभाव नक्षत्रो मे कोई एक बराबर सदोदित वयो रहता है इसका विचार । पुष्प =३ 1३1२०1० इससे ऊपर ३ । १६ । ४० । इससे ऊपर ४ १३. २०॥ सातमि-१०।।. १०।२०। रेवतो =११ । १६ । ४० । . १२ । इसको देखते हुए प्रवहद्वारा गोल को घुमाते हुए मेपादि से लेकर प्रत्येक विन्दु को क्षितिजस्थ करते हुए विचार करने पर प्रभीष्ट सिद्धि होती है । अथवा पराभाव नक्षत्रम सदोदित रहते ही हैं, वेघगोल में जहा पर उक्त नक्षत्रद्वय परिणत होंगे तद्गत (परिणत नक्षत्रद्वयगत) वृत्त क्रान्तिवृत्त होता है ।। वेधगोलीय ग्रहज्ञान से भूगर्भगोलीय ग्रहज्ञान प्रकार। वेधगोल मे दृष्टि से परिणत विम्ब का स्पष्ट भोगचिन्द (विम्बोपरिगत वदम्ब प्रोत- वृत्त क्रन्तिवृत्तका सम्मानविन्दु) वेघगोलीय ग्रह है। इसी तरह भूगर्भ गोल में भी ग्रह होता है। परिभाषायें घेघगोलीय स्थान=स्थान, स्थानीय दृग्वृत्त धरातल से कटित भूगर्भगोल का प्रदेश तद- गोलीय (भूगर्भगोलीय) दृवृत्त है, उमका मोर गभंगोलीय क्रान्तिवृत्त का योगविन्दु प, भूगर्भ से प विन्दुगत रेखा प सनक है । दृष्टि से स्थानगत रेखा फ सज्ञक हैं। प, फ दोनो रेखायें समानान्तर है (रे० ११ प्र० युक्ति से) रेवतीगत रेखाद्वय समा- नान्तर हैं, मत भूगर्भ लग्नकोण दृष्टिस्थान लग्नकोण के वरावर हुआ अर्थात् भूगर्भगोल में रेवती मे प विन्दु तक चाप वेधगोलीय स्पष्ट ग्रह के बराबर (भगोलीय रेवती प विन्दु तक चाप= वेधगोलीय रेवती से स्थान तक) स्थानीय नताशप बिन्दु के नताश, क्योंकि प, फ रेखाद्वय समानान्तर है । वेधगोल मे वह नताश मापन से विदित है । तथा विम्बीम नतारा प विन्दु वे नताप से उत्पन्नकोण सस्वस्तिर सलग्न, वेघगोल मे जितना है उतना ही भूगर्भ गोल मे भी है । वह नताशोत्सन्न कोण वेधगोल मै मापन से जान लेना तव भूगर्भ गोल के पृष्ठ पर जो त्रिभुज बनता है उसमे "निग्यागुणाद् धरणिकोरिगुणात्" इत्यादि विलोम से परिणत विम्ब प विन्दुगत वृत्तीयाऽधारचाप का ज्ञान हो गया मोर वेधगोलीय गर, कानिवृत्तधरातलान्तर के शान से भूगर्भगोल मै घरजान (जैसे पहले नाडीवृत्त घरातला. म्तर शान से मोर धेघगोलीय क्रान्ति ज्ञान से भूगर्भ गोलीय क्रान्ति ज्ञान किया गया है उसी तरह यहा भी सरज्ञान किया) प्रत चापीयजात्ययुक्ति से गर्भगोलीय ग्रह मोर प मध्यमाधिकार २५ विन्दु के अन्तर चाप (जिमका नाम सस्कार है) ज्ञान हो जायगा। - सस्कारचाप । वेधगोलीय ग्रह+सस्कारचा भूगर्भगोलीय स्पष्टग्रह सस्कारचाप की धन और ऋण की व्यवस्था । परिभाषा वेधगोलीय क्रान्तिवृत्त= इष्टका । भूगर्भगोलीय कावृ= वास्तव क्रान्तिवृत्त, बिम्बीय कणंगोलीय क्रान्तिवृत्त वा स्तव क्रान्ति, प रेखा को बढाने से वास्तव क्रान्तिवृत मे जहा लगती हैं वहा प विन्दु है । विम्ब मे इष्टक्रान्तिवृत्त धरातल के ऊपर जो लम्ब करते हैं वह शरज्या है । गरज्या मूल विन्दु=क्ष है । यह विन्दु वधित फ रेखा ही में है । फ रेखा स्थानीय दृग्वृद्ध धरातल मे है। पूर्वकथित शरज्या वधित या अवधित वास्तव क्रान्तिवृत्त धरातल पर लम्ब है । स्थानीय दृग्वृत्त धरातल निष्ठ क्ष विन्दु से वास्तव क्रान्तिवृत्त धरातल पर लम्ब करने से उसका मूल विन्दु 'जिस तरफ स्थानीय दृग्वृत्त वास्तव कान्तिवृत्त से उत्पन्नकोण जिस तरफ अल्प होता है उसी तरफ पतित होता है। भूगभ से विम्बीय कर्ण व्यासार्धगोल मे कहते है । प विन्दुगत दृग्वृत्त वास्तव क्रान्तिवृत्त से उत्पन्नकोण दृक्षेपाभिमुख अल्प होता है । वास्तव क्रान्तिवृत्त धरातल और कवधिर मूत्र के मध्य मे क्ष विन्दु है । क्योकि फ रेखा मध्य में है । इन सब से सिद्ध होता है कि पेप वृत्त से पूर्व क्पाल मे ग्रह के रहने से रेखा से पश्चिम ही लम्ब पतन होगा। क्योकि प रेखा स्थानीय दृग्वृत्त धरातल और क्रान्ति- वृत्त धरातल की योग रेखा है, भू गर्भ से लम्ब मूल गत रेखा प विन्दु से पश्चिम ही क्रान्ति- वृत्त म लगेगी, वही बिदु भू गर्भाभिप्रायिक ग्रह स्थान है । त्रिज्यागोल में भी यही स्थिति है। पश्चिम कपाल मे भी इसी तरह विचार करना, इससे सिद्ध हाता है, वित्रिम से ग्रह प्रल्प हो तो मस्कारचाप धन होता है अन्यथा ऋण होता है । इति ॥८॥ प्रधुना कालमान क्थयति फमलदलनतुल्य काल उक्तस्त्रुटिस्तच्छतमिह लवसजस्तच्छत स्यान्निमेषः । सदल-जलधिभिस्तविहैवाक्षर तत्कृतपरिमित-काष्ठा-तच्छरान वासु ॥७॥ वि० भा०-कमज-दलन-तुल्य काल (सूच्या भिन्नै कमलपुष्पे यावान् समयो लगेत् स समय शुटिसज्ञक उक्त । तच्छन (युटिगत) लवसजक । तच्छा (लवशत) निमेष (नेत्रपक्षमपाते यावान् समय) स्यात् । तै सदल जलधिभि (सार्धचतुर्भािनमे) इह गुर्वक्षर (एकगुर्वक्षरोच्चारणकाल) तत्कृत-परिमित. (गुर्वक्षरचतुष्टयोच्चारणममय) काष्ठासज्ञक । तच्छरार्धन (साधंद्वय-काष्ठामितेन) प्रमु (प्राणसनक काल) भवतीति ॥७॥ यथा सूच्या भिन्न पद्मपत्रे य समय स त्रुटिसजक १०० युटि १ लय १०० लव १ निमेष (नेत्रयो पक्षमपातकाल) , बटेश्वर-सिद्धान्ते - =१ निमेष तत्पर, २३ काष्ठा=१ असु । ४३ निमे दीर्घाक्षरोच्चारणसमय । ४ दोर्धाक्षरोच्चारणसमय १ काष्ठा कालमानाना विभागकल्पने सिद्धान्तशिरोमणी भास्करोक्तपद्यानि- योऽक्षणोनिमेषस्य खरामभाग म तत्परस्तच्छतभाग उक्ता । त्रुटिनिमेष तिभिश्च काष्टा तत्त्रिंशता सद्गणक कलोक्ता ॥ निशत्वलाी पटिकाक्षरण स्यान्नाडीद्वय ते खगुणदिनञ्च । गुर्वक्षरै खेन्दुमितरसुस्तै पड्नि पल तैटिका खपड्भि ।। इत्यादय स्वस्थ पुरुषस्य नेत्रपक्ष्मपातकाल निमेप तत्पर श्रुटि १०० १८ निमेष-१ काष्ठा, ३० काष्ठा-१ कला ३० कला-१ नक्षघटिका, २ घटिका=१ क्षण ३० क्षण-१ दिनम् अथवा दशगुर्वक्षरोच्चारणकाल = १ असु ६ असु=१ पलम् ६० पल-१ घटिका, ६० ५०=१ दिनम् । (क) सिद्धान्तशेखरे श्रीपत्युक्त कालमान विभाग कल्पनैव मस्ति,भास्करोक्तारिक चिदपि भिना नास्ति । मोमसिद्धान्ते (क) सहश एव कालमानविभागोऽस्ति- दशगुर्वक्षर प्राण पड्भि प्राणविनाडिका । तत्पष्ट्या नाडिका प्रोक्ता नाडीपट्या दिवानिशम् ।। ब्राह्मसिद्धान्ते तु कालमानविभागोऽधोलिखितोऽस्ति- अष्टादश निमेपास्तु काष्ठा त्रिंशत्तु ता कला । तासा त्रिंशत् क्षरणस्तेऽपि पटनाडीति प्रशस्यते ॥ यद्वा गुर्वक्षराणा तु दशा प्राण उच्यते । पभि प्राणविनाडी तु तत्पष्टया घटिका नथा ।। नाडीपष्टया ह्यहोरात्रसित ।।६।। ग्रन्थकारोक्त कालमानानि सूर्य सिद्धान्तोत कालमानेभ्यो भिमानि सन्ति । यथा सूर्य सिद्धान्तोक्त-कालमानानि । :-१तत्परसजा । ३० तत्पर १ निमेष । १८ निमेष-१ काप्ठा ३० काप्ठा-१ क्ला ३० कला=१ घटी २ घटी=१ मुहूर्त ३० मुहूर्त-१ दिन नाक्षत्रम् । १०० त्रुटि- मध्यमाधिकारः वटेश्वरसिद्धान्त निमेषकाल =१०००० श्रुटि सूर्यसिद्धान्त निमेपकाल =३००० श्रुटि द्वयोर्महान् भेदोऽस्तोति। हि.भा. -कमलपुष्प को सुई से छेदने मे जितना समय लगता है । उसे एक श्रुटिसशक काल कहते हैं। १०० त्रुटि =१ लव १०० लव-१निमेप ४३ निमेष= १ दीर्घ अक्षर उच्चारणकाल ४ दीर्घ प्रक्षरोच्चारणकाल--१ काष्ठा २३ काष्ठा=१ असु वटेश्वरसिद्धान्त के कालमान से सूर्यसिद्धान्तोक्त कालमान भिन्न है, जैसे सूर्यसिद्धान्तोक्त कालमान निम्नलिखित है १०० त्रुटि= १ तत्पर ३० तत्पर-१ निमेष १८ निमेप=१ काष्ठा ३० वाप्ठा-१ कला ३० क्ला=१ पटी २ घटी =१ मुहूर्त ३० मुहूर्त=१ नाक्षत्रदिन वटेश्वर सिद्धान्त के अनुसार निमेषकाल--- १०००० त्रुटि मूर्यसिद्धान्त के अनुसार निमेपकाल=३००० त्रुटि दोनो मे बहुत अन्तर है। कालमानो के विभाग के सम्बन्ध मे सिद्धान्तशिरोमणि मे भास्कराचार्य कहते हैं । योदणोनिमेपस्य खराम भाग इत्यादि। स्वस्थ पुरुष के १ पक्षमपात में जितना समय लगता है उमे निमेषकाल कहते हैं। निमेप -तत्पर तत्पर त्रुटि १८ निमेष पाप्ठा ३. बता=१ नाक्षत्र घटिका ३० क्षरण=१ दिन । ३० काष्ठा=१ पला २ घटिका-१ क्षण (मुहूतं) प्रथवा दरा गुरु प्रक्षरो के उच्चारण करने में जो समय लगता है उसे एक ममु बहते हैं।
वटेश्वर-सिद्धान्ते २८ ६ असु = १ पल ६० पल%3D१ घरी ६० घटी-१ दिन सिद्धान्तशेखर म श्रीपति भी इसी तरह कहते हैं । सोमसिद्धान्त मे (क) इसी तरह कालमान है । दशगुर्वक्षर प्राग इत्यादि। ब्रह्मसिद्धान्त में कालमान अधोलिखित हैं- अष्टादश निमेपास्तु इत्यादि ॥७॥ प्राः पल पडसवो घटिफा पलाना षष्टया दिन च घटिका खलु पष्टिमाहु। मास खवह्निभिरथाब्दमिनाहत त क्षेत्रे च कालसदृशावयव तथाहुः ॥८॥ -पडमव (पट्प्राणा) आर्भ पल (नाक्षत्रपलमेकम्) पलाना पष्टया (पष्टिपले ) घटिका (एकदण्ड ), घटिकाना पष्टिं (दण्डाना पष्टि) दिन प्राचार्या आहु । खवह्निभिदिन (निशद्भिदिन) मास, इनहत (द्वादश- गुरिणत) त (मास) गब्द (वर्षम्) पाहु । तथा क्षेत्रे काक्षाया कालसदृशावयवम् (वर्षादिसदृश भगणाद्यवयवम्) प्राचार्या कथितवन्त इति ।।६।। एतदेव स्पष्ट विलिख्य प्रदर्श्यते ६ असु =१ नाक्षनपलम् ६० पलम् =१ घटी ६० ५०=१ दिनम् ३० दिन=१ मास १२ मास = १ वर्पम् । विभा तथा ६० पल =१ पटी ६० विकलाभि १२ माम = १ वर्षम् तयेव १२ राशिभि = १ भगरण ३० दिन =१ माम ३० अशे = १ राशि ६० घटीभि १ दिनम् ६० कलाभि = १ प्रश -१ कला सिद्धान्तशिरोमणी भास्कराचारप्येवमेव क्थ्यते, यथा- गुर्वक्षर सेन्दुमित रसुस्त पनि पल तैटिका खपभि । स्याद्वा घटीपष्टिरह खरामर्मामो दिनम्तै ढिकुभिश्च वर्षम् । क्षेत्रे समायेन समा विभागा स्युश्चक्रगत्यशकलाविलिप्ता ।। सिद्धान्तशेखरे श्रीपतिनाप्येवमेव कय्यते- मास प्रोक्तविशताऽहनिशाना द्विघ्न पडभिस्तश्च वर्ष प्रदिष्टम् । एव चकाशिलिप्ता विलितास्तुल्या क्षेत्रेऽनेहसान्दादिकेन ।।८।।
मध्यमाधिकार. २६ हि भा. :-६ असुप्रो का एक नाक्षत्र पल होता है, साठ पल की एक घटी होती है । साठ घटी का एक दिन होता है । तीस दिन का एक महीना होता है । यारह महीनो का एक वर्ष होता है । जैसे-- ६ अमुक १ पल ६० घटी= १ दिन १२ माम= १ वर्ष ६० पल-१ घटी ३० दिन-१ माम " " पक्षा में वर्षादि सहम भगणाद्यवयव होते हैं। जैसे १२ मास% १ वर्ष इसी तरह १२ राशि%१ भगण ३० दिन= १ माम ३० अंश- १ राशि ६० घटी= १ दिन ६० कला- ६० पल-१दण्ड ६० विक्ला-१ कला मिद्धान्तशिरोमणि मे भास्कराचार्य इसी तरह कहते हैं । यथा- गुर्वक्षरं खेन्दुमितेरसुस्न पड्भि इत्यादि । मिद्धातगिरामणि मे भास्कराचार्य इसी तरह कहते हैं मास प्रोक्तस्रि साहनिशानाम् इत्यादि ।।८।। " युगादिमान वथयति - दन्ताब्धयोऽयुतहता युगमर्कमानाच्चन्द्राद्रयो युगगुणा मनुरेक उक्तः । कल्पश्चतुर्वशमनुर्घ निश च तो द्वौ कस्य स्ववर्षशतमन सदायुरुक्तम् ॥६॥ वि भा -दाताधय (४३२) अयुत (१००००) हता (गुणिता) तदा ४३२०००० अर्वमानात् (मौरवर्षमानान्) युग (महायुग) भवति अर्यात् ४३२०००० सौरवरेक महायुगमान भवति । चन्द्राव्य (७१) युगगुणा (महायुग-गुरिणता ) अर्थात् ७१ महायुगे , एको मनु उक्त (कथित ) चतुर्दशमनु एक कल्पो भवति । तो वो (कल्पो) क्स्य ब्रह्मण धुनिश (अहोरात्र) भवनि, स्ववर्षशत (स्वदिनमानवशेन) वर्षगत तदायु उक्तम् (कथितम्) । एतदेव स्पष्ट विलिस्य प्रदर्यते- ४३२०००० सौरवर्ष = १ महायुगम् ७१ महायुग-१ मनु १४ मनव =१ कल्प । २कल्प - ब्रह्मम्मोहोरायम् ३६० अहोरात्र-१ ब्रह्मणो वर्पम् १०० वर्षाणि ब्रह्मण प्रायुः । कृतयुगे धपादा =४ प्रेतायाम् द्वापरे चतुर्णा युगचरगना योगो महायुगम क्लो " =१ वृतयु+प्रेतायु+द्वायु+वयु मपा योगः ३० वटर-सदान्त ततोऽनुपात दशभिर्धर्मपादमहायुगमान लभ्यते तदकचरणे कि समागमिष्यति कलिप्रमाणम् -४३२००००x१ =४३२०००८ कलिप्रमाणम् इदमेव द्विगुणित तदा द्वापरमानम् = ८६४००० त्रिगुरिणत तदा त्रेतामानम् = १२६६००० चतुर्गुणित तदा कृतयुगमानम् = १७२८००० एतेनाचार्येण युगचरणमान-सम्बन्धे न किमपि कथ्यते केवलमग्ने (म अधि. ६ अध्याये) कथ्यते यदार्यभटस्वीकृत युगचरणमान तथ्यमस्ति तेनार्यभटेन सर्वारिण युगचरणानि समान्येव कप्यन्ते । हि भा~चार मो बत्तीम को एक मयुत मे गुणने से ४३२०००० मौरवर्षमान से महायुगमान होता है । ७१ महायुग का एक मनु होता है, चौदह मनु का एक पल होता है दो कल्प का ब्रह्मा का अहोरात्र होता है, तीन सौ माठ अहोरात्र वा १ ब्राह्म वर्ष होना है, १०० सौ वर्ष वा ग्रहा की मायु होती है। जैसे ४३२०००० सौरवर्ष= १ महामुग १४ मनु= १ क्ल्प ३६० अहोरात्र १ ब्रह्मवर्ष ७१ महायुग=१ मन् २ कल्प= १ ब्रह्माहोरात्र १०० वर्ष = बह्मा की प्रायु होती है । वटेश्वराचार्य युगचरणमान के सम्बन्ध मे कुछ भी नहीं कहते हैं। प्रागे (मध्यमा- धिकार के ६ अध्याय) मे कहते हैं कि आर्यभट स्वीकृत युगचरणमान ठीक है, आर्यभट सब युगचरणो को बराबर मानते हैं । अयक कल्पो ब्रह्मदिनम् भवति एतावता सिद्धयति यत्सष्टचादित (ब्रह्मदिनादित ) सृष्टयन्त (ब्रह्मदिना-त यावत्) ब्रह्मा रवि पश्यति, यत उदय- पालाद्यावत्कालपर्यन्त सूर्यदर्शन भवति, स एव काल दिनशब्देन व्यवहृतो भवति । पर सृष्टयादित सृष्टयन्त यावद्ब्रह्मा रवि पश्यति नवेति विचार । सर्वेपा देवाना वासस्थान सुमेरुपर्वते (उत्तरदिशि) वर्तते तेन ब्रह्माप्युत्तर- दिश्येव कुत्रापि भवेत् । अत परमदक्षिणेऽर्थात् धनुरन्ताहोरायवृत्ते रविभवे- तदा धनुरन्ताहोराववृतम्य प्रतिबिन्दुतो भूगोलस्य या स्पर्शरेखा भवेयु- स्तासा स्पर्शरेखारणा ध्रुवसूण साकमुत्तरदिशि कुत्राप्येकम्मिन्न व विन्दो योगो भवेत् । प्रथम ध्रुवमूत्रेण सह स्पर्शरेखाणा योगो भवेन्नवेति विचार । (केरन <नकेर=<केनस्स पर <स्प=360 केनस्प कोण समको- पाल्प सिद्ध , एवमेव के चस्प, कोणोऽपि समकोणाल्पस्तेन ध्रुवसूत्रेण सह स्पर्शरेखाणा योगो भवेत्परमेकस्मिन्नेव विन्दो योगो भवेनवेति विचार ।
मध्यमाधिकारः निरव रपियोतीप याम्पोत्तर वृत्त र स, र = रविगोलीय याम्योत्तराहोरात्र वृत्तयो सम्पात विन्दू र, स विन्दुभ्या भू विम्बस्य कृते स्पर्शरेसे निल, निरक्षोवधिरे- खायां क्रमशः न, च विन्दुद्वये लग्ने । केर, के रन रेखे कार्ये, केस्प न स्प पृ केस्प, भूव्या- स्पे %3D चित्र न ६ <रकेम , माधम् । केर केरा - रविकरणं । के भूकेन्द्रम् । रम, सम - अहोरायवृत्तव्या- सार्धम्=परमाल्पाद्युः ज्याचापम् । <सकेम = परमाल्पाचा <निकेम-६०, : <नकेर-जिनामा । <मकेम =परमाल्पाचा। अथ केस्पर, केस्प, त्रिभुयो केर केस, केस्प, केस्प, स्पर-स.स.:. <केरस्प=<केसस तेन केरस्प+<केरम=<स्परम=<फेमस्प, +केसम%<स्प,सम स्पर्शरेखयो वसूण सहकस्मिन्नेव विन्दो योगो भवेदेवमेवान्यासा- मपि स्पर्शरेसाणा ध्र योण साक तस्मिन्ने व विन्दो योगो भवितुमर्हति । यत्र योग- स्तर यो विन्दु कम्प्य । अत्र यो विन्दो यो द्रष्टा भवेत्स सर्वदा रवि पश्येत् । म (योगविन्दु ) भूपृष्ठम्यानापियति दूरे वर्तते तदानयन क्रियते। <केरन-कुच्छन्नकला, <नफेरजिनाम पुन्छनकला - जिनाम <स्पनके, <नोयो-६० <नयोके%80-(कुकला । जिनाग) तदा केस्पयो त्रिभुजेऽनुपात. भूव्यानि कोटिज्या (कुच्छन्नक +जिनाग) -येयो .. फेयो-के-केयो-भूव्या = पृयो-७६ योजन ब्रह्मा तु यो विन्दुतोऽप्यतिदूरे चाप्यतो ब्रह्मा मर्वदेव (मथ्यादित. सृष्टयन्त यावन्) रवि पश्यतीति सिद्धम् ।। हि.भा.-ब्रह्मा का दिन एर पल ये परावर होता है। हम यह गिर होता है कि गृहपादि में गृष्टपन सा ग्रह्मा रवि को देगते हैं। जिसमें उन्यास में पम्ना ना दिन माना जाना है। - वटेश्वर-सिद्धान्ते परन्तु सृष्टपादि से सृष्टमन्त तब ब्रह्मा रवि को देखते हैं या नहीं, इसके लिये विचार करते हैं। देवतामो या निवास स्थान मुमेरु पर है, पर मुमेरु पर्वत उत्तर की तरफ है इसलिये ब्रह्मा भी उत्तर ही तरफ वही होंगे । इसलिये रवि जय परम दक्षिण होगे अर्थात् धतुरन्ताहोरात्र. वृत्त में होगे तव धनुरन्ताहोरात्र वृत्त के प्रतिविन्दु से भूबिम्ब की जो स्पर्शरेमायें होगी . उन सब को ध्र वसूत्र (दोनो ध्रुव में गई हुई रेखा) के साथ एक ही विन्दु पर योग होगा। पर पहले यह विचार करना चाहिये - वि ध्र वमूत्र के साथ स्पर्श रेखा का योग होता है या नहीं। (केरल+<नकेर <नस्प पर<प= ६०:: वेनस्प कोण, समकोणाल्प सिद्ध हुना। इसी तरह केचस्प, कोण भी ममवोणाल्प है इमलिये ध्र व मूत्र के माय स्पर्श- रेखामो का योग अवश्य होगा। लेकिन एक ही विन्दु मे योग होता है या नहीं इसके लिये विचार करते हैं। स, र-रविगोलीय याम्योत्तरवृत्त और धनुरन्ताहोरात्रवृत्त वा योगविन्दु है । र स विन्दुमो से भूबिम्ब को स्पर्शरेखा (निल) निरक्षो घर रेखा मे न, च विन्दु पर लगती है । केर, केस रेखा कोजिये केस्प- वेस्प, भूच्या ३, परवेम =रविवर्ण, भू-भू केन्द्र रम, सम धनुरन्ताहोरात्र वृत्त व्यासाध=परमाल्प युज्याचा,< रकेम=सकेम = परमाल्पाचा प्रत <नकेर=जिनाश,<केरमजिनाग,<केमम-जिनाम <केरन=< केस=कुच्छन्नक्ला, रस्प+<केरम-<स्परम-<केसस्प, +<केसम=<स्प,सम मत रस्प, सस्प, स्पर्शरेखायो का योग ध्र व मूत्र के साथ एक ही विन्दु पर होगा यह सिद्ध हुा । इसी तरह और भी स्पर्शरेखायें ध्रवे सूत्र के साथ उसी विन्दु पर मिलेंगी यह सिद्ध हुमा, भ्र व सूत्र के साथ स्पर्शरेखामो को एक ही विन्दु पर जहा योग हुआ वहाँ योग विन्दु रखिये, योग विन्दु पर जो होगे उनको बरावर रवि का दर्शन होगा, वह विन्दु (यो) भूपृष्ठ (पृ) स्थान से कितने दूर पर है इसका साधन करते <के रन-कुच्छन्नकला,<नकेर-जिनाश .:. कुच्छन्नक्ला+जिना=(स्पनके <नकेयो-१० :<नयोके%80 (कुच्छन्नक्ला+जिनाग) तव के स्पयो जात्य निभज मे अनुपात करते हैं भू व्या ३xत्रि कोज्या (कुक्ला+जिनाश) केयो-के-केयो भू व्या-पृयो-७६ योजन । प्रह्मा यो विन्दु से भी बहुत दूर पर है इसलिये ब्रह्मा वरावर (मृष्टयादि से प्रलय पर्यन्त) रवि को देखते हैं अर्थान् मृष्टयादि से प्रलय पर्यन्त एवं कल ब्राह्म दिन सिद्ध हुमा । - वेयो, .
मध्यमाधिकार कजन्मनोऽष्टौ सदलाः समाययुम्तथा समाता मनवो दिनस्य वा। युगतिवृन्द सहशाइ ध्रयस्त्रयः फलेवागेकगुणा शकावधे ॥१०॥ विभा-कजन्मन (ब्रह्मण) अायुप सदला अष्टौ समा (सार्धाष्टवाणि) समाययु (समाप्ति गता अर्थाद्वयतीयु) तथा दिनस्य नववर्षस्य प्रथमदिने पड्- मनको व्यतीता , युगविवृन्द (सप्तविंशतिप्रमित युग) व्यतीतम्, सदृशाध्रयस्त्रय (तुल्ययुगा विनय ) व्यतीता , कले शकावधि (कलियुगादित शकारम्भ यावत्) नवागंकगुणा (३१७६) एतावन्ति वर्षाणि व्यतीतानि सर्वपा योगकरणेन स्ट्या- दित शकादि यावत्कल्पगतवर्षाणि भवन्तीति । प्राचार्यरंग कल्पगतवर्षाणि न लिखितानि -भास्कराचार्येण तानि लिखितानि याता पड् मनको युगानि भमितान्यन्या गाघ्रिनय, नन्दाद्रीन्दुगुणास्तथा शकनृपस्यान्ते कलेर्वत्सरा । गोऽद्रीन्द्वयद्रिकृताङ्क दस्र नगगो चन्द्रा शकाब्दान्विना , मा सङ्कलिता पितामहदिने स्युर्वर्तमाने गता ।। यथा गणितम् ६ मनु+७ सन्धि+२७ युग+३ युग चरण+३१७६= =६ मनु+७ सन्धि+२७ युग+ (युग-कलियुचरण)+३१७६ =६४७१ मयु+७४४४४३२०००+२७ युग+ (युग-क्युचरण) +३१७६ -६४७१४४३२००००+७X४X४३२०००+२७४४३२००००+ (४३२००००-४३२०००) +३१७६ =६४७१४४३२००००+२८४४३२००००+२७४४३२००००+ (४३२००००-४३२०००) + ३१७६ =१८४०३२००००+१२०६६०००+११६६४००००+३८८८+३१७६ =१९७२९४७१७६ कल्पगत वर्ष भास्कर कथित-कन्पगत-वर्षाणि । ग्रह्मणो गतायुविपये सूर्यसिद्धान्ते लिखितमस्ति यत् 'परमायु शन तस्य तयाहोरामसख्यया । प्रायुपोऽमित तस्य शेपकल्पोऽयमादिम ॥" इति । अनाव मतद्व विध्ये भास्कर । तथावत्र्तमानस्य पम्यायुपोऽध गत सार्धवर्षाप्टर केचिदूचु । भवत्वागम कोऽपि नाम्योपयोगो ग्रहावर्तमान युयातात्प्रमाध्या इति ।। १० ।। हि भा~ब्रह्मा को मायु के माडे पाट वर्ष बीत गय, तथा नवम वर्ष के प्रथम दिन म घ मनु बीत गये हैं, मत्ताईम युग बीत गये, युग (महायुग) नीन चरण (मस्ययुग, त्रना, द्वापर) बीत गये, पलियुगादि में गवादि (गकारम्भ) तय ३१७६ वर्ष बीत गए । इन मय के योग करने में मृटयादि में गादि तर बल्गन वर्ष होने हैं, इनका गरिमा उपरि. लिगित देखिये । वटेश्वराचार्य ने लगत वर्ष नही लिगे हैं। भाग्नराचाप ने निगा है जो सरात विज्ञानभाष्य मे दिपलाया गया है। ब्रह्मा को गाय रे विषय में मूर्यमिदानगर न वटेश्वर-सिद्धान्ते. + लिखा है-परमायु शतं तस्य इत्यादि । इसलिये दो तरह मत होने पर मिदानगिरो- मणि म भास्कराचार्य ने लिया है कि तथा वर्तमानस्य इत्यादि । मूर्यमिद्धान्त के मत से आयु का आधा भाग वीत गया इस तरह दो मत होने पर भारत- गवार्य कहते हैं कि कोई भी आगम हो, मुझे उमकी जरूरत नही (ब्रह्मा की गतायु में कुछ भी जरूरत नहीं है) क्योकि ग्रहो का माधन तो वर्तमान प्रहर्गरण पर में वरना है । इनि ॥१०॥ अय रविवुधशुक्राणा कुजगुस्थानि-दीघ्रोच्चानाञ्च भगणमान क्ययति खाभ्र खाभ्र दशनाब्धयो युगे भागवेन्दुसुत सूर्यपर्ययाः । शोप्रतुङ्ग मगरणाः प्रकीर्तिताः सूर्यसूनु सुरपूजितासृजाम् ॥११॥ वि भा -युगे (महायुगे) खान खानदशनाब्धय (४३२००००) भार्गवेन्दु. मुन-सूर्यपर्यया (शुक्र-वुधरवि भगणा भवन्ति) एते एव सूर्य सूनु सुरपूजितासृजाम् (शनि-गुरु मङ्गलाना) शीघ्र-तुङ्गभगरणा (शीघ्रोच्चभगणा) प्रकीर्तिता (कथिता)। अर्थान्महायुगे रविबुधशुक्राणा यावन्तो भगवास्तावन्त एव शनिगुरुमङ्गल- शीघ्रोच्चानामपि भवन्तीति । उपपत्ति -मध्यमरविसमावेव मध्यमवुधशुक्री भवत । तथा रविरेव शनिगुरुमङ्गलाना शीघ्रोच्चम् । अतो रविभगणसमा =बुघशुक्रयो गणा = शनिगुरुमगल-शीघ्रोच्चभगणा । अथ युगसौरवर्ष=युगरविभगरण । पर युगसौरवर्वाणि-४३२०००० युगरविभगरा =युगसौरवारिण-४३२०००० --युगबुधभगण = युग- शुक्रभगण शनिशीघ्रोच्चभगण मङ्गलशीघ्रोच्चभगरण =गुरुशीघ्रोच्चभगण मिदम् ॥११॥ एक महायुग में शुक्र बुध मूर्यो वा भगण ४३२०००० होते हैं इतने ही गनि गुरु मङ्गलो के शीघ्रोच्चो का भगण ॥ उपपत्ति- मध्यमरवि के वरावर मध्यम बुध और शुक्र होते हैं । शनि, गुरु और मङ्गल इन नीघोच्च रवि है इसलिए महायुग में रविभगण =बुधभगण = शुक्रमगरण निगीघ्रोच्चभगरण=गुरुशीघोच्चभगण = मङ्गलशीघ्रोच्चभगण परन्तु युगमोरवर्ष=युगरविभगण, युगमौरवर्ष=D४३२०००० :. युगे रविभपण-४३२०००० =चुपभगए-गुगभगण गनिमीघ्रोच्चमगर= मध्यमाधिकारः गुरुशीघ्रोच्चभगण =मङ्गलशीघ्रोच्चभगण : उपपन्न हुआ ॥११॥ युगे चन्द्रकुजगनीना भगणमान क्थयति । शशिनोरसवह्निसुरेषु नगक्षितिभृद्विषयास्त्वचलात्मभुवः । गजपक्ष गजाङ्ग-नवद्विभुजा खयमाक्षि कृतत -गुरणाश्च गुरोः ॥१२॥ वि भा -शशिन (चन्द्रस्य) रसवह्निसुरेषु नगक्षितिभृद्विपया (५७७५३३३६) महायुगे भगणा भवन्ति । अचलात्मभुव (कुजस्य) गजपक्ष गजाङ्ग- नवद्विभुजा (२२६६८२८) भगरणा भवन्ति, गुरो. (वृहस्पते) खयमाक्षिकृतत्तु गुरणा (३६४२२०) भगणा भवन्ति ॥ चन्द्रभगणोपपत्ति अथ ग्रहवेधार्थ गोलबन्धोक्तरीत्या गोलयन्त्र विरच्य खगोलान्तर्गतो भगोल कार्य । वेधगोलीय क्रान्तिवृत भगरणाशाङ्कित तथा तत्रत्यवेधवृत्तमपि (कदम्ब- प्रोतवृत्त) भगणाशाङ्कित कार्य तद्गोलयन्त्र दृढीकृत्य गोलकेन्द्र ध्रुवाभिमुखयष्टी निवेश्य रात्री गोलकेन्द्रगत दृष्टया रेवती तारा विलोक्य गोलयत्रीयक्रान्तिवृत्ते (रेवती) मेपादिमतयेत् । तथा गोलकेन्द्रगतदृष्टयं व चन्द्र विलोक्य वेधगोलीय (गोलयन्त्रीय) परिगतचन्द्रोपरि कदम्बप्रोतवृत्त निवेशनीयम् । एव सनि कदम्ब- प्रोतवृत्त-तप्रत्यक्रान्तिवृत्तयोर्य सम्पात स एव वेधागत स्पष्टचन्द्रो ज्ञातव्य । मेपादित स्फुटचन्द्रावधि (स्पष्टचन्द्रावधि) क्रान्तिवृत्ते ये राश्यशादयस्ते गरणनीया । स एव तस्मिन् काले स्पष्टचन्द्रो राश्यादिको भवेत् । एवमन्यस्मिन्नपि दिने स्पष्टचन्द्रो वेदितव्य तदा विदितमन्दोवात्स्पष्टचन्द्राच्च "स्फुट ग्रह मध्यखग प्रकल्प्येत्यादि" विलोमेन तन्मन्दफलमानीय तेन सस्कृत स्पष्टश्चन्द्रो मध्यमचन्द्रो भवेत् । एव दिनद्वये मध्यमचन्द्रो ज्ञात्वाऽन्तरेण चन्द्रमध्यमा गति विज्ञाय "योकेन दिने तावती चन्द्रगतिस्तदा युगनुदिनै किमित्यनुपातेन" चन्द्रभगरणा उत्पद्यन्ते ॥१२॥ हि भा-चन्द्रमा के भगण-५७७५३३३६ होते हैं । मगल के भगए-२२६६८२८ वृहस्पति के भगण == ३६४२२० उपपत्ति -ग्रह के वेध के लिये गोलवन्ध नियम के अनुसार गोलमन्त्र बनावर खगोल के भतर्गत भगोल को करना चाहिये, रचितगोलीय (वेधगोलीय) क्रान्तिवृत्त मे ३६० प्रा चिन्हित रना और यहां के वैधवृत्त का (क्दम्ब प्रोतवृत्त) भी ३६० प्रश मे चिन्हित कीजिये । उस गोलयन्त्रको स्थिर परखें गोलवेन्द्र मे ध्र वाभिमुखयष्टो करके रात्रि मे गोलवेन्द्रगत दृष्टिद्वारा रेवतीतारा को देखकर वैधगोलीय क्रान्तिवृत्त में रेवती को (मेषादि को) भक्ति करना। पौर गोलवेन्द्रगत दृष्टि द्वारा चन्द्रमा को देखकर वेधगोल में परिणत चन्द्र के कार नद्गोलीय पदम्ब प्रोतवृत्त करना । इसतरह वेधगोलीय कदम्ब प्रोतवृत्त क्रान्तिवृत्त का जो मम्पात है वही वेधागत स्पष्टपद ममभना चाहिये । मेषादि मे (रेवती मे) स्पटचन्द्र तक प्रातिवृत्त में जो रास्यमादि है उमो गिन लेना चाहिये, वही उम ममय राश्यादिप स्पष्टचन्द्र होते हैं।
वटेश्वर-सिद्धान्ते इस तरह मोर दिन में भी सचन्द्र का ज्ञान करना चाहिये । तव मन्दोच मोर स्पष्टचन्द्र से विलोम विधि (मध्यमचन्द्र मे सष्टचन्द्रमाधन को विपरीत क्रिया मे) चन्द्रमन्दफल नारर स्पष्टचन्द्र में संस्कार करें तव मध्यमचन्द्र होंगे । एव दो दिन मध्यमचन्द्र जानकर प्रतर करने में चन्द्रमध्यमगति समझनी चाहिये, तब "एक दिन में इतनी चन्द्रगति पाते हैं तो कुदिन में क्या" इस अनुपात मे चन्द्रमगण प्राजायगे । ॥१२॥ राने घशुक्रगीघ्रोचयोश्च भगवाना । गजपटारषट् मनवश्व मानेः शशिसूनचलस्य सरसहि युता। नखखादि-गुणाडू-नगक्षितयो भृगुपुर-चलस्प बुधर्गदिताः ॥१३॥ वि भा -दाने (शनैश्चरस्य) गजषट् शरपटमनव (१४६५६८) भगवा भवन्ति । शशिमूनुचलस्य (बुधशीघ्रोच्चस्य) सरस (६०) युता नवखाद्विगुणाङ्क: नगक्षितय (१७९३७०८०) भगणा भवन्ति । भृगुपुत्रचलस्य (शुक्रगीघ्रोच्चस्य) दुर्धर्गदिता , एतस्यानिमश्लोकेन सम्बन्ध ॥१३॥ वुधशुकयो शीघ्रोच्चोपपत्ति पूर्वस्या दिशि चक्रयन्त्रवेवेन रविशुक्रयोरन्नराशा ज्ञातव्या , स्पष्टर ~विस्सशुक्र = अन्तर्राशा , स्पष्टरवि-अन्तराश स्पष्टशुक्र । स्पष्टशुक्रतो मन्दफलमानीय स्पष्टशुक्र विपरीत धनर्ण कार्य तदा मदस्पष्टशुको भवेत् । स्पष्टरवेरपि विलोमविधिना मध्यमरविज्ञान कार्य तयोर्यदन्तर तच्छीघ्रोफल घन मृण वेनि । अर्यान्मध्यमरवि. तुल्यनस्य तन्मन्दफलव्यस्तसस्कृतानीत स्पष्ट शुक्रस्यान्तरेण यदृण धन वा शीघ्र- फल तदेव स्पष्टशुक्रमदस्पष्टगुक्रयोर तरमपि शीघ्रफल भवतीति । प्रत्यह वेधेन परम शीघ्रफलमानतेश्यम्, एतस्य शीघ्रफलस्य परमत्व प्राय कक्षामध्यगनियंग्रेखा- प्रतिवृत्तसम्पातस्थे ग्रहे एव भवति । तत्र स्पष्टशुत्राच्छीघ्रोच्च राशिनयान्तरे वर्तते तेन स्पष्टगुक्र-३ रागि शीघ्रोच्चम् एव द्वितीयपर्ययेऽपि पूर्वोक्त नैव विधिना गोघ्रोच्च ज्ञातव्यम् । एतयो शीघ्रोच्चयोरलर तद्दिनज शीघोच्चगतिर्भवेत्ततोऽनुपातो यद्येतत्कालातरदिन रिय शीघोच्चगतिस्तदेवेन दिनेन किमिनि फ्लमेकदिनजा शोघ्रोच्चगतिस्ततोऽनुपातेन “यद्येकन दिनेनेय शीघ्रोच्चगतिस्तदा कुदिनै केनि" शीघ्रोच्चभगणा । एवमेव बुघस्यापि भगणोपपतिरनुसन्धेयेति ॥१३॥ हिमा -दानवर का भगण =१४६५६८ बुधगीघ्रोचभगण= १७६३३०८० शुक्रगीप्रोच्चभगण मागे के शोर में है। पूर्व दिशा में चक्र- यन्त्र द्वारा स्पष्टरवि शुक के अन्लराम समझना चाहिए, उन अन्तराम को स्पष्टरवि में घटाने स्पष्ट शुक्र हो जायेंगे। स्पष्टशुक पर मे मन्दपल माघन कर सक में विलोम सस्वार ‘करने मे मन्दस्पष्टशुक्र होगें । सटरदि पर मे भी विलोमविधि से मध्यमरवि कासान करना चाहिए, दोनो के मन्नर करने पर धन या ऋण गोध्रपल होगा मर्यात मध्यमरवि- -तुल्यमध्यमशुक्र वा और मन्दफल व्यस्त सस्मृत लाये हुए स्परशुक्र का अन्तर करन पर जो धन पा ऋण शीघ्रफल होता है वही स्पष्टशुक्र-मन्दस्पष्टशुक्र का अन्तर शीघ्रपल होना है। इस से मध्यमाधिकार. ३७ तरह प्रत्येक दिन वेध से परमगीघ्रफल लाना चाहिये । शीघ्रफल का परमत्व प्राय कक्षा- मध्यगनिर्यग्रे खा प्रतिवृत्त मम्पान मे ग्रह के रहने से होता है प्रत वहाँ स्पष्टशुक्र से शीघ्रोच तीन राशि पर होता है इसलिए स्पष्टशुक्र-३ राशि-शीघ्रोचो एव द्वितीयभगण में भी वेध मे पूर्व विधिद्वारा शीघ्रोच्च का ज्ञान करना, इन दोनो शीघ्रोच्चो का अन्तर उनने समय की शीघ्रोच्चगनि होती है नब अनुपात करते हैं कि प्रथम वेधदिन द्वितीय वेधदिन के अ तर मे यह शीघ्रोचगति पाते है तो एक दिन मे क्या फल एक दिन सम्बन्धी गीघ्रोच्चगति होगी तब "यदि एक दिन मे यह शीघ्रोच्चगति तब कुदिन मे क्या" इस अनुपात से युग में शुक्र का भगण आ जायगा । इसी तरह बुधभगणानयनोपपत्ति भी होती । इति ।।१३॥ अथ चन्द्रमन्दोच्वभगणान् चन्द्रपातभगणाचाह । रसील गुणाक्षि भुजाभ्रनगाः शिखिखाश्विकरीभपयोनिध । हिमगच युगळेगणेमगुरगाद्वियमाग्निभुजाः शशिपातभवाः ॥१४॥ वि भा - रशील गुणाक्षि भुजाभ्रनगा (७०२२३७६) शक्शीघ्रोच्चभगण. (एतस्य पूर्वोक्त १३ श्लोकेन सम्बन्ध ) शिखिखोश्विकरीभ पयोनिधय (१८८२०३) हिमगूच्च-भवर्क्षगणा (चन्द्रमन्दोच्च-भगणा), इभगुणाद्वियमाग्नि-भुजा (२३२२३८) शशिपातभवा (चन्द्रपातोत्पन्ना ) भगणा भवन्तीति ।। उपपत्ति शुक्रशीघ्रोच्च भगणोपपत्तिस्तु प्रागुक्त व अधुना चन्द्रमन्दोच्चोपपत्ति प्रद- यते । प्रत्यह वेधेन चन्द्रस्फुटगतयो विलोक्या । एतस्या गते परमाल्पत्व यस्मिन् दिने दृष्ट तत्र दिने मध्यमस्फुटचन्द्रो समा भवेताम् तदा तदेवोच्चस्थानम् । यत उच्च- स्थे ग्रहे फलाभाव गतेश्च परमात्मत्वम् । ततोऽनन्तर तस्माद्दिनादारभ्यान्यस्मिन् पर्यये प्रतिदिन चन्द्रवेधद्वारा तथैवोच्चस्थान ज्ञयम् । इदमुच्चस्थान पूर्वोच्च स्थानादय भवति । तयोरन्तर तहिनजा चन्द्रोच्चगतिर्भवेत् । तत यद्येतावद्भिर- न्तरदिनैरियमुच्चगतिस्तदैकेन दिनेन किमित्यनुपातनंकदिनजा चन्द्रगति । यद्येकेन दिनेनेय चन्द्रोच्चगतिस्तदा कुदिनं किमित्यनुपातेन (युग) चन्द्रमन्दोच्च- भगणा समागच्छन्तीति ॥१४॥ हि भा -शुक्रगीघोच्च भगण-७०२२३७६ इसको १३वें श्लोक से सम्बन्ध है इसकी उपपत्ति वही देखिये- चन्द्रमन्दोच्च भगए-४८६२०३ चन्द्रपात भगरा-२३२२३८ चन्द्रमन्दोच्चभगरणोपपत्ति प्रतिदिन वेध में चन्द्र स्पष्टगति देखनी चाहिये, इम गति को परमाल्पता जिम दिन देखो जायगी उग दिन मध्यपग्रह-पप्टग्रह (मध्यमचन्द्र-स्सप्टचन्द्र) बराबर होगे, तब यही उच्चस्यान होगा जिम लिये उच्चस्थान में ग्रह रहने में पल-०, गति की परमापता होती तत वटेश्वर-सिद्धान्ते है । उसके बाद उप दिन मे प्रारम्भ कर दुमरे भगण में भी प्रयेक दिन वेप में पूर्वोक्त नियम द्वारा चन्द्रमन्दोच्च स्थान का ज्ञान करे । यह चन्द्रमन्दोच्च स्थान पूर्व वपिन चन्द्रमन्दोच्च स्थान मे पागे होता है। दोनो के मन्तर करने में उनने दिन सम्बन्धिनी चन्द्रमन्दोच्च गति होगी, तब "यदि इतने दिन में यह चन्द्रमन्दोच्चगति पार्नु हैं तो एक दिन में क्या" इम अनुपात से एक दिन वो चन्द्रमन्दोच्चगति होगी। इस पर मे अनुपात द्वारा "एक दिन में यह चन्द्रमन्दाच्चगति पाते हैं तो कुदिन में क्या" चन्द्रमन्दोच्चभगए प्रमाण प्रा जायगा । इति । चन्द्रपात-भगरपोपपत्ति । प्रत्यह चन्द्रवेधाद्दक्षिणमरे क्षीयमाणे यस्मिन् दिने शराभावो दृष्टस्ताने मान्तिवृत्ते तत्स्थान चिन्हित तत्र यावाश्चन्द्र स चक्रशुद्ध पातो भवेत् । एवं द्वितीयपर्य येपि पातस्यान ज्ञेयम् । इद पूर्वपातस्थानात्पश्चिमे समागच्छत्यन पातस्य विलोमा गतिरस्तोत्यस्य प्रतीतिर्जाता, द्वयोः पातयोरन्तरेण तद्दिनजा पातगति- स्ततोऽनुपातो यद्यतावद्भिरन्तरदिनैरिय पातगतिस्तदकेन कुदिनेन किमित्यनु- पातेनैकदिनजा पातगतिस्ततो यद्य केन दिननेय पातनिस्तदा युग-कुदिनं किमिति ममागच्छति युगचन्द्र पातभगणा इति ॥१४॥ चन्द्रपात भगणोपपत्ति । प्रत्येक दिन चन्द्रमा के वेध करन म जिम दिन दक्षिण भार सीयमाण होने पर नाराभाव देखा जायगा उस दिन क्रान्ति वृत्त म उस स्थान को अङ्कित कर देना, वहा पर जितना चन्द्रप्रमाण होगा उसको वारह राशि में घटाने मे पात होगा इमी तरह, दूसरे पर्यय म भी पातस्थान समझना चाहिये । पर यह पात-स्थान पूर्वपातम्थान में पश्चिम होता है, इससे पात को विगोमगति मिद्ध होती है । दोनो पातो के अन्तर करने मे उतने दिनो मे पातगति होगी तब मनुपात करते हैं कि इतने अन्तर दिनो में यह पातगति पाd हैं तो एक दिन मे क्या प्रा जायगो' एक दिन सम्बन्धी पातगति, तव अनुपान करने हैं कि 'एक दिन में यह पानगति नो युग-कुदिन मे क्या' इस अनुपात मे युग चन्द्रपातभगए आ जायगे । ॥१४॥ कमलविष्टरवस्त्र-सरोरुह-स्कुटगिरामिहिता मुनिपर्यया । य इह तानपि वरिम युगोद्भवान् घुबरलन्यवरो भुजगोष्टयः ॥१५॥ इदानी ब्रह्मायुपि रविकुजगुरूणा भगरपानाह- मन्दतुङ्ग मगरणोऽन्ज-जोविते भूमि-पङ्कज शराष्टयो रवे । लोहितस्य शरपट शिवोरगा धोकृताङ्ग-दहनेन्दवो गुरो ॥१६॥ विभा-अजजीविते (ब्रह्मजीवनकाले) कमल-विष्टर-वक्त्र सरोरुह- म्फुटगिरा (ब्रह्ममुख-कमल-पष्टवाण्या) ये मुनिपर्यया (मुनीना कृते भगणा) अभिहिना (कथिता) तान् युगोद्भवानपि (युगोत्पन्नानपि) भगवान्, द्यु चर- लब्धवर (प्रहप्राप्तप्रसाद ) मह (वटेश्वर) वच्मि (वे)। मुजगोश्टय इति निर. र्धक प्रतिभाति।
मध्यमाधिकार. ब्रह्मायुषि-भूमि-पङ्कज-श राष्टय (१६५११) रवैर्मन्दोच्चभगणा। लोहि- तस्य (मङ्गलस्य) शरपट-शिवोरगा (८११६५) मन्दोच्चभगरणा ! धोकृताङ्क- दहनेन्दव (१३९४५) गुरोर्मन्दोच्चभगणा भवन्तीति ॥ १५-१६ ।। हि भा -ब्रह्मा के जीवनकाल म ब्रह्मा के मुखकमल से निकली हुई स्पष्ट- वारणी द्वारा मुनियो के लिये जो भगण कहा गया है । ग्रहो के प्रसाद से मैं (वटेश्वर) युगोत्पन्न उन भगणो को भी कहता हूँ । ब्रह्मा को आयु मे- रवि का मन्दोच्चभगए-१६५११ मङ्गल का मन्दोच्चभगण-८११६५ वृहस्पति का मन्दोच्चभगण== १३६४५ रविमन्दोच्च-भगरपोपपत्ति । मिथुनस्थे रवौ कस्मिश्चिदपि दिने रेवतीतारकोदयाद्यावतीभिर्धटिकाभी रविरुदितस्तावतीभिर्मीनान्ताल्लग्न साध्यम् । तत्र यल्लग्न स तदा म्फुट रवि । एवमन्यदिनेऽपि तयो स्फुटरव्योर्यदन्तर सा स्फुटगति । एव प्रतिदिन स्फुटगतयो ज्ञातव्या । यस्मिन् दिने गते परमाल्पत्व तर दिने यावान् रविस्तावदेव रवेर्म- न्दोच्चम् । एव द्वितीयपर्ययेऽपि मन्दोच्च शेयम् । एतन्मन्दोच्च प्रथममन्दोच्चाद- ग्रे भवति । यद्यपि मन्दोच्चस्यास्य बहुप्वपि वर्षेषु गतिर्नोपलभ्यते तथापि चन्द्रमन्दो- चवदस्यापि गति स्वीक्रियते । तयोर्मन्दोच्चयोरन्तर तद्दिनजा मन्दोन्चगति - वेत् । ततोऽनुपातेन "यद्य तावद्भिरन्तरदिनरिय मन्दोच्चगतिस्तदैकेन दिनेन कि जातकदिनजा रविमन्दोच्चगति । "ततोऽनुपातेन रवर्मन्दोच्चभगरणा समागच्छ- न्तीति । युगीयभगणादय कल्पीयभगरणादयश्च ब्रह्मायुपि कथमागच्छन्ति तदर्थ- मग्रे (द्वितीयाध्यायस्य सप्तमश्लोके) प्राचार्योक्तिविधिज्ञेय ।।१५-१६ ।। हि भा -मियुन से रवि के रहने पर किसी भी दिन रेवती नक्षत्र के उदय से जितनी घटी मे रवि उदित हो उतनी घटी करके मीनान्त से लग्न साधन करना, तय जो लग्न ही बर्दा स्पष्ट रवि होगें, दूसरे दिन भी इस तरह करना, दोनों स्पष्ट रवि के अन्तर स्पष्टगति होती है, इस तरह प्रत्यक दिन स्पष्टपति समझनी चाहिये । जिम दिन में गति की परमाल्पता होगी उस दिन जितने रवि होगे उतने ही रवि मन्दोच्च प्रमाण होगे, इस तरह दूसरे पर्यय में भी मन्दोच्च ज्ञान करना, यह मन्दोच्च पूर्व मन्दोच्च से प्रागे होता है, यद्यपि इम मन्दोच्च की गति बहुत वर्षों मे भी नही उपलब्ध होती है तथापि चन्द्रमन्दोच्च की तरह पहा भी प्राचार्य ने इसको गति स्वीकार की है। दोनो मन्दोच वै अन्तर बरने पर उतने दिनो को मन्दोचगति होगी। तब अनुपात से "इनने अन्तर दिन में यह रविमन्दोच्चगति पाते हैं तो एक दिन में क्या" एक दिन की रविमन्दोच्चगति भाई, इम पर से मनुपात द्वारा रविमन्दोच भमण प्राज्ञायेंगे। युगीय- भगणादियो को या कल्पीय भागादियो को ब्रह्मा को भायु में लाने के लिये प्रागे वटेश्वर-सिद्धान्त (दूसरे प्रध्याय के सप्तम श्लोक मे) प्राचार्य ने नियम लिने हैं ॥१५-१६) इदानी ब्रह्मायुपि शनि-बुध-शुक्र-मन्दोच्च-भगणनाह । - कृतसप्तनवद्विपर्वताः शनैः क्षितिगोदोमु निमूभृदन्धपः । शशिजस्य सुरारिमन्त्रिको विकृताहिकपञ्चमूमयः ॥१७॥ वि भा --ब्रह्मायुपि कृतसप्तनवद्विपर्वता. (७२६७४) शनर्मन्दोच्चभगणा' क्षितिगोदोमुं निभूभृदब्धय (१७७२६१) शशिजस्य (बुधस्य) मन्दोच्चभगरणाः द्विकृताप्टद्विक्पश्चभूमय (१५२८४२) मुरारिमन्त्रिण. (शुक्रस्य) मन्दोच्च- भगरणा ॥१७॥ ब्रह्मा को आयु म नंबर का मन्दोच्चभगएः-७२६७४ बुध का मन्दोद्यमगण==४३७२६१ शुक्र का मन्दोच्चभगण =१५२८४२ उपपति. एतेफा (मङ्गल बुध-बृहस्पति-शुनशनश्वराणा) मन्दोच्चभगणोपपत्ति.। वेधेन स्फुटग्रह ज्ञात्वा त मन्दस्फुट प्रकल्प्य तत शीघ्रफलमानीय स्फुटग्रहे तद्विलोम सस्कृत्येवमसकृन्मन्दस्पुटग्रहो वेदितव्य । एक प्रतिदिन मन्दस्फुटो ज्ञेय । धनमन्द फले क्षीयमाणे स मन्दस्फुटग्रहो यस्मिन् दिने मध्यतुल्यो भवेत्तदा तत्तुल्यमेव मन्दोच्च ज्ञेयम् । एव द्वितीयपर्ययेऽपि मन्दोच्च ज्ञेयें ततो रविमन्दोच्च भगरणवदत्रापि भगरणा नेया इति ॥१७॥ हि मा -वेघ मे स्फुटग्रह जानकर उसे मन्दस्पष्ट मानकर सीघ्रपन साधन करना, स्फुटग्रह म उमको विलोम मस्कार करने पर द्वितीय मन्दरपष्टप्रह होगा। इस तरह प्रमकृत्वम करने से मन्दस्पष्टग्रह का ज्ञान होगा। इस तरह प्रतिदिन मन्दस्पष्टग्रह जानना चाहिये । धन मन्दफ्न क्षीयमाण रहने पर बिम दिन मन्दस्पष्टग्रह मध्यमाह के बराबर होगा उस दिन उमीके बराबर मन्दोच्च होगा । इस तरह द्वितीय पर्यय मे भी करना । तब रविमन्दोच्चभगण के अनुमार यहा भी मन्दोचभगए का ज्ञान हो जायगा ॥१७॥ मङ्गलादिग्रहाणा पातभगरपानाह । नवकुनगाट कुवेदारेषु श्रुतिहरिणाङ्कमधीमतिनन्दाः । शरशिखिधोरस रामरसाभ्र द्विपकृतमेन्दुरसाशशाङ्काः ॥१८॥ जलधिगजत नखा, यमशून्य द्विनवगुणा, द्विकृतेन्दुगुणश्च । बुधसित कुजसुरेज्य भनीनां कमतमवापुपि पातमसड घाः ॥१९॥ पि भा -कमलभवायुपि (ब्रह्मायुयि) युधमिनकुजसुरेज्यगनीना (बुध. शुक्रमङ्गल-गुरुगनेश्वगणाम् एते कमा पातभसाड्या (पातभगरणा ) भवन्ति यथा नवकुनगाष्ट कुवेदशरेषु श्रुनिहरिणा भधीमनिनन्दा (१५५२७१४५५४१८७१६) दारनिखि धोरम रामरसाभ्रद्विपकृतभेन्दुरमाक शशाका (१९६१२७४८०६३६५५५) जलधिगजतुनखा (२०६८४) यमशून्यद्विनवगुणा (३६२०२) द्वितेपुभुव (१५४२) मध्यमाधिकार जमा पो आयु मे बुध, शुक्र, मङ्गल, गुरु और शनैश्चर इन सब के निम्नलिखित पात भगए होते हैं । जैसे- "" बुधपात भगण=६५५२७१४५५४१८७१६ शुक्र =१६६१२७४८०६३६५५५ मङ्गल" =२०६८४ =३६२०२ शनि =१५४२ उपपत्ति । पृष्ठाभिप्रायिक शरज्ञानाद्गर्भीयशर ज्ञात्वा तदभावस्थले यो हि गणितागत- मन्दस्पष्टग्रह म एव चक्रशुद्ध पात स्यात् । बुधशुझयो पातभगरोऽङ्काधिक्यदर्शना- रुलाघवार्थ तत्केन्द्र भगवान् तत्र विशोध्य पातभगरणत्वेन प्राचीना स्वीकुर्वन्ति । तत एव कारणात् “मन्दस्फुटाखेचरत स्वपातयुक्तादित्यादिना शरसाधनार्थ- केन्द्रकरणे मध्यम रवि मन्दस्पष्ट शुक्रयोरन्तररूपेण मन्दफलेन विपरीत-सस्कृत- शीघ्रोच्चस्थाने यो हि शर स एव सर्वन भवत्यतो बुध शुक्र शराभावस्थाने मन्द- फलव्यस्त सस्कृतशीघ्रोच्च द्वादशशुद्ध पात स्यात् । एव द्वितीयपर्ययेऽपि, ततोऽ- नन्तर मन्दोच्चभगणोपपत्तिवदनाप्युपपत्त्या भगरणा आनेतव्या इति । वस्तुतो ब्रह्मायुपि भगरणकथनमेव व्यर्थ यत करपे एव सर्वेपा भगणपूत्ति- भवति कल्पा (ब्रह्मदिना) नन्तर सर्वेपा ग्रहाणा लयो भवति तेनानेककल्पाना भगराकथन निरर्थकमेवातो भास्कर पाक्षिपति यथा यत सृष्टिरेपा दिनादो दिनान्ते लयस्तेषु सत्स्वेव तच्चारचिन्ता । अतो युज्यते कुर्वते ता पुनर्येऽप्यसत्स्वेषु तेभ्यो महद्भ्यो नमोऽस्तु ।। हि भा -पृष्ठाभिप्रायिक दारज्ञान से गर्भीय शर जान कर उसके प्रभावस्थान मे जो गणितागत मन्दस्पष्ट ग्रह होते हैं वही चाशुद्ध (१२-पात) पात होता है। बुध और शुक्र के पातभगरण मे अको के अधिक होने के कारण गरिणतलाघवार्थ उनके केन्द्र भगरा को उसमे घटा कर पात भगण प्राचीनाचार्य स्वीकार करते हैं। उसी कारण से "मन्दस्फुदात्मेचरत इत्यादि प्रकार से" शरमाधनाथ वेन्द्र के लिये मध्यम रवि स्पप्ट गुना- न्तर रूप मन्दफल करके विपरीत सस्कृत गोप्रोच्चस्थान में जो शर होगा वही सब जगह होता है इसलिये बुध और शुक्र के शराभाव स्थान में मन्द फ्ल व्यस्त सस्कृत शीघ्रोच्च को यारह राशि में घटाने पर पात होता है। इस तरह दूसरे पर्यय में भी पानज्ञान करना चाहिये । उसके बाद रवि मन्दोच्च भगणोपपत्ति के तरह यहा भो पात भगरण शान होता है ॥ १८-१६॥ प्रह्मा वो पायु भगण पाठ करना ही व्यर्थ है क्योकि पल्प (१ ब्रह्मा- के दिन) के बाद सब ग्रहा का लय हो जाता है । पल मे ही मय के भगणो की पूत्ति होती है। इसलिए अनेक कल्पों का भगण कहता व्यर्थ है मत भास्कराचार्य ने प्राक्षेप दिया है । यया यत सृष्टिरेपा दिनादौ दिनान्ते इत्यादि ।
चटेश्वर-सिद्धान्ते स्वशीघ्रनीचोच्चक वृत्तपर्ययह तावशिष्टाः खगपातपर्ययाः। शुक्रयोस्तचल केन्द्र संयुति वदन्ति पातानथवा मनोपिराः ॥ २० ॥ वि भा --स्वशीघ्रनीचोच्चक वृत्तपर्यय (स्व-शीघ्रोच्च-पातादि- भगण ) खगपातपर्यया (ग्रहभगणादि-पातादिका ) साध्या हृतावशिष्टा (भग- णान् त्यक्त्वा शेषा राश्यादिका ग्राह्या) बुध-शुक्यो पाते तच्चलकेन्द्र सयुनि (शीघ्र-केन्द्र योग) कृत्वा तदा मनीषिण (पण्डिता ) पातान (वास्तव पातान्) वदन्ति ।। बुध शुक्रयो पातविपये भास्करोऽप्येवमेव कथयति, यथा ये चाऽत्र पातभगणा पठिता ज्ञभृग्वोस्ते शीघ्रकेन्द्रभगरगरधिका यत स्युरिति ।। हि. मा-अपने अपने दोनोच्च पातादि भगरयो द्वारा ग्रहो के भगणादि पातो का साधन करना चाहिये । उनमे भगण को छोड कर राश्यादि का ग्रहण करना चाहिये । बुध पौर शुक्र के पातो मे उनके शीघ्र केन्द्र जोडने से उनके वास्तव पात होते हैं, ये बातें पण्डित लोग कहते हैं बुध और शुक्र के पात के विषय मे भास्कराचार्य भी ऐसे ही कहते हैं । यथा पेचाश्त्र पातमगणा इत्यादि ॥२०॥ ग्रन्थवार स्वजन्मसमय अन्यवालश्च कथयति । शकेन्द्र कालाद्भुज शून्य कुञ्जररभूदतीतर्मम जन्महायने । प्रकारि राद्धान्तमित स्वजन्मनो मया जिनाम्दधु सदामनुग्रहात् ॥ २१ ॥ वि मा -शकेन्द्रकालात् (शकारम्भत ) भुजशून्यकुसर (८०२) हायन (वर्षे ) प्रतीत (गत ) मम जन्माभूत् (अर्याच्छकारम्भात्पर ८०२ वर्षेषु व्यतीतेपु मम जन्माभूत्) | सदा (ग्रहाणा) अनुग्रहात् (कृपात) स्वजन्मन (स्वजन्मस मयात्) जिनाब्दै (चतुर्विशतिवर्षे) इतै (गत ) अर्थात् (जन्मसमयात् २४ वर्षेषु व्यतीतेषु ) मया राद्धान्त (सिद्धान्त) अकारि (कृतम्) । इति वटेश्वरसिद्धान्ते मध्यमाधिकारे भगणनिर्देशनामक प्रथमाध्याय समाप्त। हि भा -शरवर्षारम्भ से १२ इतने वर्ष बीतने पर मेरा जन्म हुपा, अपने जन्म के समय से चौवीस वर्ष बीतने पर यहो की कृपा से मैंने इस सिद्धान्त की रचना की।॥ २१॥ इति वटेश्वरसिद्धान्त मे मध्यमाधिकार म भगरा निर्देश नामक प्रथमाध्याय समाप्त हुमा !
मध्यमाधिकारस्य द्वितीयाध्याये मानविवेकः जलधर रस पञ्चश्मामृदग्नि द्विपक्ष- द्विपक शरशशाङ्का भोदयाः स्युयुगेऽमी ।। निज भगरण विहीना खेचरस्योदया' प्राक् दिनकृदुदय राशिः सावनो भूदिनाख्यः॥१॥ - वि भा -एकस्मिन् युगेऽमी “१५८२२३७५६४" एतावन्तो भोदया (नाक्षत्र- दिनानि) स्युरिति ते भोदया खेचरस्य (ग्रहस्य) निज भगणविहीना सन्त , तदु दया (ग्रहसाबनदिनानि स्यु , दिनकृदुदयराशि (सूयोदयसमूह) सूर्यसावन , स एव भूदिनाख्य कुदिन सज्ञक । उपपत्ति- प्रथमदिने उदयकाले क्रान्तिवृत्ते नक्षत्रेण साक सूर्योदयो दृष्ट पुन द्वितीयदिने नक्षत्रोदयानन्तर सूर्योदयो दृष्टोऽतो नाक्षत्रकदिने सावनदिनकज रवि गति कलो- त्पन्ना सुयुक्त एक सावनान्तर्गत नाक्षनीय कालो भवेद्यथा. १ नाक्षत्र दिन + रविगतिकलोत्पन्नासु=१ सावन दिनान्त पाति नाक्षत्र- काल , एव दिनद्वयस्य २ नाक्षनदिन+ २ दिनज रविगति योगासु-२ सावन दिनान्त पाति नाक्षत्रका एव यस्मिन्निष्टदिने नाक्षत्रकालोऽपेक्षितस्तद्दिन- सख्यक नाक्षत्र दिनमिष्ट दिन गतियोग कलासु युक्त तदेष्ट दिनान्त पाति नाक्षय- कालो भवेदिति नियमादेकस्मिन् वर्षे नाक्षत्रकाल कियान् भवेदस्य विचार क्रियते । वर्षान्त पाति सावनसख्या तुल्ये नाक्षनदिने एकवर्षसम्बन्धि रविगतियोगो द्वा दशराशिसमोऽर्थात्क्रान्तिवृत्तमेवातस्तदुत्पन्नासु नैकनाक्षत्रदिनेन युक्तस्तदा वर्षांन्त पाति नाक्षत्रदिनान्यद्वन्ति पाति भभ्रमा स्यु.। वर्षान्त पाति सावनस + १ वर्षान्त पातिभभ्रम ततोऽनुपातेन" यद्य कस्मिन् वर्षे वर्षान्त पातिभभ्रमस्तदा युगवर्षे विमित्यनेन" युगे भभ्रमा = (वर्षान्त पातिसावनस+१) युगवर्ष वर्षान्त पातिभभ्रमx युगवर्ष वर्षान्त पातिसावनस x युगवर्ष +युगवर्प =युगसावनस + युगवर्ष युगभभ्रम-युगकुदिन+ युगवर्ष =१५८२२३७५६४ अथ युगभभ्रम-युगकुदिन+युगवर्प पर रवियुगभगरण युगवर्ष • युगमभ्रम-युगवुदिन+युग रविभगण % 3D वटेश्वर-सिद्धान्ते ततः युगमभ्रम-युगरविभगण-युगकुदिन-युगरविसावन दि एवमेव युगमभ्रम-युगग्रहमगण-युगग्रहवुदिन प्रत उपपन्नम्। हि भा.-एक युग मे १५८२२३७५६४ इतने नाक्षत्र दिन होते हैं, युगभभ्रम मे युगग्रह, भगए घटाने से युगग्रह कदिन होते हैं, युगरवि मावन-युगकुदिन संशक है ।।१।। उपपत्ति। प्रथम दिन उदयकाल में क्रान्तिवृत्त मे नक्षत्र के साथ रवि का उदय देखा गया, दूसरे दिन नक्षत्रोदय के बाद सूर्योदय देखा गया, इसलिये एक नाक्षत्र दिन मे एक सावन दिन सम्बन्धी रविगति कालोत्पनासु जोडने से एक सावनान्तर्गत नाक्षत्र दिन होगा, यथा - १ नाक्षत्रदिन+रविगति कलोत्पन्नासु= १ सावनान्तर्गत नाक्षत्रकाल, एव दो दिनो में २ नाक्षत्रदिन+२ दिन मम्बन्धी गति योगासु-२ सावन दिनान्तर्गत नाक्षत्रकाल, इम तरह जिस इष्ट दिन मे नाक्षत्रकाल वा प्रयोजन हो उस इष्टदिन सस्यक नाक्षत्रदिन में इष्टदिन सम्बन्धी गति योगक्ला सम्बन्धी प्रसु जोडने से इष्टदिनान्तर्गत नाक्षत्रकाल होगा। इस नियम से एक वर्ष मे नाक्षत्र काल किनने होगे इसका विचार करते हैं । वर्षान्तर्गत मावन सस्या तुल्य नाक्षत्र दिनो में एक वर्ष सम्बन्धी रविगतियोग १२ राशि के बरावर होता है प्रात् क्रान्तिवृत्त के बराबर होता है इसलिये एतदुत्पन्नासु प्रमाण एक नामदिन होता है, "मत १ वर्षान्तर्गत सावन सख्या मे एक जोडने से एक वर्षान्तर्गत मभ्रम होगा यथा १ वर्षान्त पाति मावनस+१-१ वर्षान पाति भभ्रम, मब अनुपात से युग मे भभ्रम साते हैं यथा एक वर्ष में एक वर्षान्त पाति भभम पाते हैं वो युग यष मे क्या इस अनुपात (१वर्षान्त पातिमावनम+१ युगवर्ष युग भभ्रममागया, युगमभ्रम= =१ वर्षान्त पाति- १ मन युग -वर्षान्त पाति सावनस युगदपं+ युगव वर्षान्न-पातिभध्रम युगवर्यः युग सावनम+ युग-युगवुदिन+युगव -युगमनम =१५८२२३७५६४, पहले से स्वरूप से युगबुदिन+युगवर्षयुगमभ्रम पर रविपुगभगण: - युगरविवर्ष : युगबुदिन+ युगरविभगए-युगमभ्रम :: युगमनम-गरविभगए- युगदुदिन-युगरविसाधन इसी तरह युगमभ्रम-युगपहमगए युगग्रङ्कुदिन इससे पाचार्योक्त पद्य उपपन्न हुपा ॥१॥ % + मध्यमाधिकार. भगरा विवरशिष्टा ये द्वयोस्तद्वियोगा रविशशि भगणोत्यास्ते शशाङ्कस्य मासाः । दिनकरमगरणा ये तानि वर्षारिण मानोः ऋतुदिन निकरस्था मोदयाः प्राक् प्रदिष्टाः ॥२॥ विभा -रविशशिभगणोत्था (रविचन्द्रभगणोत्पन्ना) ये वियोगा (अन्तरारिण) ते द्वयो (रविचन्द्रयो) भगणविवरशिष्टा (भगवान्तरविशेषा) शशाङ्कस्य मासा (चान्द्रमासा) भवन्त्यर्थाधु ग-रविचन्द्रभगणान्तरतुल्या युग- चान्द्रमासा भवन्तीति । ये दिनकर भगरणा (युगरविभगरणा ) भानो (सूर्यस्य) तानि वर्षाणि (सौरवर्षाणि) अर्याधु गे ये रविभगणास्तत्तुल्यान्येव रविवाणि (सौरवाणि) भवन्ति तै सौरवर्षे ऋतुदिननिकरस्था अर्याहतुमास-दिनादीना ज्ञान भवति, भोदयास्तु प्राक् प्रदिष्टा (पूर्व कथिता)। प्रत्र "भगण-विवरशिष्टा" इति शोभन न प्रतिभाति । उपपत्ति यथामान्तकाले रविचन्द्रयोरन्तराभाव (अमान्ते रविचन्द्रयोरेका स्थित- त्वात्) तदनन्तर रविचन्द्रयोश्चलनेन चन्द्रगतेराधिक्यात्पूर्वामान्तविन्दौ गत्वाऽने पुनरपि चन्द्रो रविणा महयोग परिष्यति तदा द्वितीयामान्तकालो भवेत्, प्रथमामान्ताद् द्वितीयामान्त यावच्चान्द्रमास । तर चन्द्रगति =१२ राशि+ रविगति =१ च भगण+रविगति, अत एकस्मिश्चान्द्रमासे रविचन्द्रगत्यन्तरम् - चग~-रविग-१ चभगण । ततोऽनुपातो यद्य कचन्द्रभगणतुल्य रविचन्द्रयोगत्य- न्तर यदा भवेत्तदैकश्चान्द्रमासस्तदा युगीयगत्यन्तरेण (युगभगणान्तरेण) कि समागच्छन्ति रविचन्द्रभगणान्तरतुल्याश्चान्द्रमासा इति । युगे यावन्तो रविभगणास्तावन्त्येव युगवाणि-युगसौरवर्षाणि । अन्यत्- सर्व स्फुटमेवेति ।। २ ॥ . हि भा -रवि भौर चन्द्र के युग में जो भगण है उनका अन्तर तुल्य युगवान्द्रमास होता है । युग मे जितने रविमगरण हैं उतने ही युग रविवर्ष वा युग सौरवपं होने हैं, उमीसे ऋतु, माम, दिनो वा ज्ञान होता है और मभ्रम तो पहले कहे जा चुके हैं ॥२॥ उपपत्ति। भमान्त काल म रवि और चन्द्र एक जगह रहते हैं इसलिये वहा (ममान्तवाल मे) उनका मन्तराभाव होता है, बाद में दोनो के चलने से चन्द्रगति के प्रधिक होने के कारण चन्द्र पूर्व स्पान में (मभीष्ट विन्दु म) जाकर रवि के गाप योग करेंगे तो पिर दूगरा भमान्तकाल होगा, प्रयमामान्त से द्वितीयामान तक एक चान्द्रमाम है, इगलिये एक चान्द्र- माम म चन्द्रगति:-१२ रागि+रविनि-१ भगण+रविगति .:चनि-रविनि १ भगए वटेश्वर-सिद्धान्ते इस पर से अनुपात करते हैं कि एकभगण तुल्य रविचन्द्र गत्यन्तर में एक चान्द्र. मास पाते है तो युगीय रविचन्द्र गत्यन्तर (युगीय रविचन्द्र भगणान्तर) मे बया, इस अनुपात से रविचन्द्र के युगभगणान्तर तुल्य युग चान्द्रमास पाते है प्राचार्योक्त सिद्ध हो गया । । युग मे जितने रविभगण है उतने ही युग सौरवर्प है यह स्पष्ट है । इति ॥ २ ॥ स्वग्रहोचमगरणान्तर जगुः स्वोच्चनीच परिवर्त सजकम् । मासराशि विवरं शशीनयोपत्तदुक्तमधिमाससज्ञकम् ॥३॥ विभा -स्वग्रहोच्चभगणान्तर (ग्रहभगरपोच भगणयोरन्तर) स्वोचनीच- परिवर्तस ज्ञकम् (शीघ्र केन्द्रभगण मान) अर्याद्य गे उच्चग्रह भगरणान्तस्तुल्या धेन्द्र भगणा भवन्ति, तथा शगीनयो (चन्द्रग्व्यो) मास राशिविवर यतदधिमास- सशकमर्थाच्चान्द्रमाससौरमासयोरन्तरमधिमास-सज्ञकमिति ।। उपपत्ति । मध्यग्रह-मन्दोच्च-मन्द केन्द्र तथा मध्यग्र, मन्दोच्च =मध्यकेन्द्र, अनयोरन्तरम् =मध्यगति-मन्दो. चगति- मन्दकेन्द्रगति । ततो युगे मध्यग्रहभगण-मन्दोच्चभगण-मन्दकेन्द्र भगरण एवमेव शीघ्रोच्चभगण-शीघ्रग्रहभगण == गोनकेन्द्रभगण अधिमासोपपत्ति । अर्थवसावन दिने चन्द्रगति --७६०' । ३५" रविगति =५६।" अनयोग्न्तरम् -७३१ २७" =१२° 1 ११ । २७" अथ यत चग-रविग-१२' =१ तिथिरत मावन दिन पूत्तिकालात् प्रागेव घान्द्रदिनपूतिरिति । चादि <सादि <सौदि, सौदि=६०' ६० क्ला रविगतिर्यदा भवेतदा सौरदिनत्ति । मावनदिन पूत्तिस्तु ५६' ।" एतत्तुल्यरदिगतावेवातो दिनसख्यया मौदि <चादि :: युग चान्द्रमाम-युग सौरमाम-युगाधिमास । हि मा ग्रह पौर उच्च का भगणान्तरतुल्य वेन्द्रभगण होता है और चान्द्रमास पौरमास का मन्तर पधिमाम (मनमाम) कहलाता है ।।३।। - उपपत्ति ग्रह और उद का प्रन्नर केन्द्र बहलाता है। मायन-मन्दोन्च-मन्दवेन्द्र दोनो के अन्तर बरने से मप्यम,-मन्दोम, मन्दवन्द्र, मध्यमाधिकार. १ १ मध्यगति-मन्दोच्चगति= मन्दवेन्द्रगति, युग मे मध्यग्रहभगण-मन्दोच्चभगए मन्द के भगण, इसी तरह शीघ्रोच्चभगण-मन्दस्पप्टग्रहभगण शीघ्रकेन्द्र भगरण ।। अधिमास की उपपत्ति एक सावन दिन मे चन्द्रगति = ७६०। ३५" दोनो के अन्तर करनेसे ७३१ । २७ २७" रविगत ५६ ।" -१२° । ११ । २७" लेकिन जव चन्द्रगति-रविगत = १२° तव एक तिथि होती है, इसलिये सावन दिन पूर्तिकाल से पहले ही चान्द्रदिन पूर्तिकाल सिद्ध हुमा, चादि<सादिसौदि सौदि = ६०, अर्थात् रवि की गति जव ६०० होती है तो एक सौर दिन की पूर्ति होती है, और सावन दिन की पूर्ति ५६, १८, इतनी रविगति मे होती है, इसलिए सख्या करके मौदिस युगचामास-युमौरमास= युगाधिमास सिद्ध हुमा ॥३॥ क्षितिशशिनोबियसान्तरमाहुस्तिथिविलयान नृसमा रविवर्षम् । पितृदिवस विधुमासमिनाब्दं दितितनयामरवासरसजम् ॥ ४ ॥ वि भा-क्षितिशशिनोदिवसान्तर (सावनदिन चान्द्रदिनयोरन्तर ) तिथि विलयान् तिथिक्षय-अवम वा रविवर्ष (सौरवर्ष) नृसमा (मानववर्ष) विधुमास (चान्द्रमास ) पितृदिवस , इनान्द (सौरवप) दितितनयामरवासर (राक्षसदेवयोदिनम्) प्राचार्या जगु । अर्थाच्चान्द्र सावन दिनयोरन्तरमवमदिनम् सौरवप तुल्य मानववर्ष पितृदिन चान्द्रमासतुल्य, सौरवर्षतुल्य देवराक्षसयोदि- नमाचार्या कथयन्तीति ।।४॥ । चादिम सज्ञम् उपपत्ति भूकेन्द्राचन्द्रवेन्द्रगत सूत्र पितृत्रिज्यागोले यबलग्न तत्र कल्पितश्चन्द्र पितृ ख मध वा (तदूर्ध्व भागवारिणणाम्) तज्जनित नवत्यशवृत तक्षितिजम् पितृ स मध्ये यदा रविर्गच्छे तदाऽमान्तकालस्तव चन्द्रस्य स्थितत्वात् । ऊर्ध्व ख स्वस्तिकगतेरवौ दिनाधं भवति तेन सिद्ध यदमान्तकाले पितृदिनाधं भवति, एव यदा द्वितीयामान्तकालस्तदा पुन पितृदिनाथं भवेतदा प्रथमामान्ताद् द्वितीया मान्त यावच्चान्द्रमास =प्रथम-द्वितीय पितृ-दिनाघ कालान्तर, पर प्रथम द्वितीय पितृ दिनाच कालान्तर = प्रथम द्वितीयसूर्योदयान्तरकाल-१ अहोरात्र सिद्ध यत्पित्रणामहोरात्रम् =एकचान्द्रमास । प्रत प्राचार्योक्त सिद्धम् । परमाचार्योक्त दिना काचित्रुटिरस्ति, यथा अथ पितृक्षितिजस्थे रवौ तदुपरि पल्पित चन्द्रप्रोतमिष्टवृत्त कल्पित चन्द्रोपरि पदम्ब प्रोतवृत्तश्च कृत तदा कान्तिवृत्त कदम्ब प्रोतवृत्तेष्ट वृत्त जनित जात्यविभुजे वर्णचापम् कोटि चापम् =१० अतस्तदुदयास्तकालयो सदैव रवि- . - वटेश्वर-सिद्धान्ते चन्द्रान्त =to भवेदिति सिद्धम् (कल्पित चन्द्रगत कदम्ब प्रोतवृत्त क्रान्तिवृत्तयो योगि विन्दोश्चन्द्रत्वात्) अत. कृष्णपक्षष्टाम्यर्धे (सार्धेसप्तम्याम्) उदय शुक्लपक्ष साधंसप्तम्यामस्तो ज्ञेय । यदा र~च-६ राशि तदा पूर्णिमाया रात्र्यधम् । तस्मिन अमान्ते च दिनार्धम् । परमेव दिनरात्यर्धे तदैव यदा कल्पित चन्द्रकेन्द्रगत क्दम्ब- प्रोतवृत्त यायोत्तरवृतमेव भवेत् । अतस्तस्य क्वाचिरकत्वात् याम्योत्तरवृत्तात् कल्पितचन्द्रगत कदम्ब प्रोतवृत्त क्रान्तिवृत्तं पूर्व पश्चिमे वा लगेत् तदेव चन्द्रस्थानम् । तस्मिन् स्थाने यदा रविरागच्छेत्तदाऽमान्तकालोऽन अमान्तकाल+प्रायनहक्कम- कलासु वास्तवदिनार्धम् । पूर्व दिनार्धसम्बन्धेन यत्पितृरणामहोरात्र प्रदर्शित तन्न समीचीन दिनार्धकालस्यावास्तवत्वात् ।।४।। हिमा -चान्द्रदिन सादन दिनो का अन्तर क्षयदिन होता है । मौरवर्षतुल्य मानववर्ष होता है, पितरो का दिन (यहोरात्र) एक चान्द्रमास के बराबर होता है । और देव तथा राक्षस का अहोरात्र एक सौरवर्ष के बराबर होता है । उपपत्ति। भूकेन्द्र से चन्द्रवेन्द्रगत मूत्र पितृ त्रिज्या गोल में जहा लगता है वहा पितरो का खस्वस्तिक या कल्पित चन्द्र है । उसको केन्द्र मानार नवत्याव्यामा से जो वृत्त होगा वही पितृक्षितिज वृत्त है । पितृ सस्वस्तिक मे जव रवि जायगे तव पितरो का दिनार्ध होगा वही ममान्तकाल भी है इसमे सिद्ध होता है कि पिनरो का दिनाघंकाल अमान्त में होता है, एव जब रितीय अमान्त होगा तब फिर पितरो का दिनाघं होगा तब प्रथमामान्तकाल से द्वितीयामान्तकाल तर वाल= १ चन्द्रमाम = प्रथम पिन दिनाघ- साल द्वितीय पितृदिनाघेकालान्तर पर प्रथम द्वितीयदिनापकालान्तरप्रयमद्वितीयमूर्योदयानरकाल-पहोरात्र मिद हुमा वि पिनरो का अहोरात्र प्रमाण (पितृदिन) चान्द्रमाम पे बराबर होता है। इनमे पितृदिनार्घकाल ठीक नहीं है यथा- पितृक्षितिज मे जब रवि है तब रविरेन्द्र और कल्पित चन्द्रवेन्द्रगत इएवृत्त कर देना, कल्पित चन्द्र के ऊपर कदम्ब प्रोनवृत्त कर दीजिये तव क्रान्तिवृत्त कदम्ब प्रोतवृत्त-इष्टवृत्तो से जो चापीय जात्य त्रिभुज बनता है उममे वर्णचाप-१० पितरो के उदय और मस्तकाल म र~-६० = रविचन्द्रान्तराम, बरावर होगा, · कृष्णपक्ष की साई सहमी में उनका उदय होता है शुक्लपक्ष को सादे मप्तमी में प्रस्त होता है जव र~च =६ राशि तव पूर्णिमा मे रायधं (दोपहररात्रि) होता है। अमान्तकाल म दिनाघं होता है। लेविन इस तरह दिनाथं मोर राय तव ठोप होगा जब वल्पिन चन्द्रवेन्द्रगत कदम्ब प्रोत. वृत्त याम्योत्तरवृत्त ही होगा। ऐसी स्थिति भी हो सकती है इसलिए पलिनचन्द्र केन्द्रगत पदम्य प्रोतवृत्त प्रान्तिवृत मे याम्योत्तरवृत्त मै पूर्व या पश्चिम मे लगेगा यहो चन्द्रस्थान है । वहा जव रवि पाजायगे तो ममान्तवाल होगा, मन प्रामन्तवालपायन हक्ककिनामु -वास्तवदिनार्य, दिनाकाल वे प्रवाम्नविव होने कारण पितरो या महोरात्र प्रमाण भी ठीक नहीं है यह मिट हुमा ॥४॥ वोटिचा =१० .
मध्यमाधिकार ४६ अथ देवासुरदिनोपपतिः उत्तरध्रुवो देव खस्वस्तिकम् । दक्षिणध्रुवश्च राक्षस खस्वस्तिकम् । ध्रुवो- त्पन्ननवत्यशवृत्त (नाडीवृत्त) तयो क्षितिजम् । तदुत्तरे रविर्यदा मेपात्कन्यान्त यावत्तावद्देवदिनमसुरनिशा च, एव नाडीवृत्ताद्दक्षिणे रवौ तुलादेर्मीनान्त यावत्ता- वहेव निशाऽसुरदिन च भवति । अत सौरवर्षतुल्य रविचक्रभोगकालमान देवासु- राणामहोरान भवतीति । वस्तुतस्तु १ चक्रभोगकाल-तयोर्यु रानान्तकालिकायन- गत्युत्पन्नकाल वास्तव द्यु रात्रम् परमाचार्येणायनगत्युत्पन्नकाल: ० कल्पि- तोऽतस्तज्जन्या त्रुटिरत ज्ञेयेति ॥४॥ हि भा-देवो का ऊर्ध्व खस्वस्तिक उत्तरध्र व है । राक्षमो का ऊर्ध्वखस्वस्तिव दक्षिण ध्रव है । नाडीवृत्त दोनो (देव, राक्षस) का क्षितिजवृत्त है, जब रवि मेपादि से पन्यान्न तक रहेंगे तव नाडीवृत्त से ऊपर होने के कारण ६ महीनो का देव दिन होगा, और ६ महीनो की राक्षमरात्रि होगी। इसी तरह जब रवि तुलादि से मोनान्त तक रहेंगे तो ६ महीनो की देवरात्रि और ६ महीनो का राक्षसदिन होगा । देवा और राक्षसो का अहोरात्रमान = दिन+रात्रि-१ रविभगएभोगकाल =१ सौरवर्ष प्रत आचार्योक्त सिद्ध हुमा । पर यहाँ १ चक्रभोगकाल-~-अहोरात्रान्तकालिक अयनाशगत्युत्पनकाल =वास्तव- अहोरातमान लेकिन प्राचार्य न ऋणखण्ड को शून्य मान लिया है । इसलिये एक सौरवर्ष तुल्य दव, राक्षम का" अहोरात्रमान जो कहा गया है सो स्थूल है, यह मिद्ध हुमा ॥४॥ पूर्वोपपत्ती लिखित यणपक्षसार्थसप्तम्या पितृणामुदयकाल शुक्ल- पक्षसार्धमतभ्यामस्तकालो भवति । परमिति न भवति यथा-- भूकेन्द्राचन्द्रकेन्द्रगता रेखा वधिता यन चन्द्रपृष्ठे लग्ना तद्विन्दुतश्चन्द्रगर्भ- क्षितिजसमानान्तरधगतल गार्य तत्पितृपृष्ठक्षितिजधरातलम् । एतद्यत्र रवि- कक्षाया लगति तत्र यदि रविर्भवेत्तदा पितृणामुदयकाल स्यात् । रविविन्दो भूके- न्द्राद्रे खा नेया तदैक त्रिभुजमुत्पन्न, भूकेन्द्रादविं यावद्रविकर्ण एको भुज । भूकेन्द्रा- चन्द्रपृष्ठ यावत् (चन्द्रवर्ण+चन्द्रव्यासार्ध) द्वितीयो भुजः । पृष्ठक्षितिजधरातले रवितश्चन्द्रपृष्ठ यावत्तृतीयो भुजोऽस्मिन् जात्यत्रिभुजेऽनुपात क्रियते, यदि रवि- पणेन त्रिज्या लभ्यते तदा (चक+चच्या ३)ऽनेन किमित्यनुपातेन समागता सित- वृत्तीयान्तर कोटिज्या तत्स्वरूपम्.. वि० (चकर्ण+च व्या) रविक ५० वटेश्वर-सिद्धान्ते __१०-चाप ७३ - चित्र न०० चे अस्याश्चाप नवतेविंशोध्य तदा रविचन्द्रयो सितवृत्तीयान्तराशा भवेयु १०-चाप=सितवृत्तीयान्त- राशास्ततो भक्ता व्यर्कविधोलवा- यमकुभिरित्यादिना चाप गततिथि १२ १२ एतेन सिद्ध यद्यदा पितॄणामुदय भू कालस्तदा तत्कालीनतिथिप्रमाणम् =७३- चाप तेन कृष्णपक्ष साई- पृ-चन्द्रपृष्ठस्थानम् । १२ च =चन्द्रकेन्द्रम् । सप्तभ्यामुदयो न भवितुमर्हति किन्तु भू =भूकेन्द्रम् । सार्धसप्तम्या चापस्य द्वादशाश विशो रन=पितृपृष्ठक्षितिजम् । च, =रविगोले परिणतचन्द्र । धनेन यद्भवति तत्रोदयो भवेत् । एव- रच,न= रविगोलीय सितवृत्तम्। मस्तेऽपि विचार कार्य । एतावता र रवि । "कृप्तो रवि पक्षदलेऽभ्युदेत्यादि" भूर-रविकर्ण । भास्करेण यदुक्त तन समीचीनमिति भूपृ=चन्द्रक+च व्या । भूच =चन्द्रकर्ण । सिद्धम् उपर्युक्तखण्डन म म सुधार च पृचन्द्र व्या३ वरद्विवेदिना कृतमस्ति । परमनापि त्रुटिरस्ति यत उयुक्तोपपत्ती सिनवृत्तीयान्तरवशेन गततिथि प्रमाणमानीत तन्नोचितम्, कान्तिवृत्तीय रविचन्द्रान्तरवशेन गतिथिप्रमाण समुचित भवितुमर्हति । तर्हि वाम्नवानयन कथ भवेदिति विचार्यते । पूर्वयुक्त्या सितवृत्तीयान्तर ज्ञानमस्ति तदा मितवृत्तीयान्तर क्रान्निवृत्तीयान्तर घरचापर्य- चापीय जात्यमिभुज तत्र वर्णभुज-चापयोञ्जनात् भुजकोटिज्याxवोटिकोटिज्या- पिणंकोज्या -शरकोज्या नावृत्तीयान्तरकोज्याप्रिमितवृत्तीयान्तरोग्या घिमितवृन योग्या गरकोज्या मावृत्तीयान्तखोज्या, अम्याश्याप नवतेविंशोध्य तदा प्रान्तिवृत्तीयान्तरागा भवेयुम्नतस्तिथिज्ञान मुगममिति ॥ हिमा -पूर्व यथित उपपत्ति में कहा गया है कि वृष्ण पक्ष की साद मप्तमी में मध्यमाधिकारः १२ पितरो का उदयकाल होता है और शुक्ल पक्ष की साढे सप्तमी मे अस्तकाल होता है लेकिन यहठीक नहीं है । जैसे (क) क्षेत्र देखिये। भूकेन्द्र से चन्द्रकेन्द्र गत रेखा को बढाने से पृ-चन्द्रपृष्ठ स्थान चन्द्रपृष्ठ मे जहाँ लगती है उस विन्दु से चन्द्रगर्भ च=चन्द्रवेन्द्र । क्षितिज धरातल के समानान्तर धरातल कर देने से वह धरातल रवि कक्षा में जहाँ लगता है वहा च, रविगोल में परिणतचन्द्र रवि के रहने से पितरो का उदयास्त होता है। रचन, रविगोलीय सितवृ भूकेन्द्र से उम विन्दु मे (रवि मे) रेखा ले पाने से र रवि ! भूर रविवरणं एक त्रिभुज बनता है। भूर-रविकर्ण, भूपृ= भूच -चन्द्रकर्ण । चन्द्रकर्ण+च व्या ३ भूपृर त्रिभुज मे= अनुपात च पृचन्द्रव्या करते है मिX चन्द्रवर्ण+चव्या ३) रविवर्ण =ज्या <भूरपृ=सितवृत्तीयान्तर कोटिज्या इसका चाप करने से सितवृत्तीयान्तर कोटि-चाप, नवत्यग में घटाने से ६०- चाप = सितवृत्तीय रविचन्द्रान्तराश अव इम पर से भक्ता व्यर्क विधोलवा इत्यादि से गत- ६०-चाप तिथि प्रमाण आ जायगा, ६ इससे सिद्ध होता है कि जब पितरो के १२ चाप उदयकाल मान कर तिथ्यानयन करते हैं तो साढे मप्तमी मे; ऋण आता है। इसलिय १२ 'कृष्ण पक्ष के साढे सप्तमी मे उदयकाल कहना ठीक नहीं है । एव शुक्ल पक्ष के माडे सप्तमी में अस्तवाल भी कहना ठीक नही होता है । भास्कराचार्य यही बात 'कृष्ण पक्ष के सादे सप्तमो मे पितरो का उदय और शुक्ल पक्ष के साढे सममी में प्रस्त होता है' कहते है जिसका खण्डन उपर्युक्त रीति से म म सुधाकर द्विवेदी ने किया है । परन्तु इनके खण्डन मे भी त्रुटि है उपर्युक्त खण्डन मे सितवृत्तीय रवि चन्द्रान्तराश वश से जो तिथ्यानयन किया गया है सो ठीक नहीं है क्रान्तिवृत्तीय रविचन्द्रान्तराश को बारह से भाग देने से गततिथि प्रमाण ठीक होता है । तब वास्तवानयन कैसे होगा इस लिये विचार । पूर्व युक्ति से सिंत- वृत्तीयान्तराश जान पर सितवृत्तीयान्तराश क्रान्तिवृत्तीयान्तरांश, गर इन करणं, कोटि भुज- चापो मे जो चापीय जात्यत्रिभुज यनता है उसमे भुजकोटिज्या X कोटिकोटिज्या-त्रि- वर्णवोटिज्या सरकोज्या X माग कोज्या=xिमिवृक्ष कोज्या त्रि-सिवम वोज्या --प्रावृप्र कोज्या इमरे चाप को नवत्या में घटाने मे क्रान्ति शरवोज्या वृत्तीयान्तराश होगा, इम पर मे तिथ्यानयन करना चाहिय ।। इति ।। सिद्धान्ततत्त्वविवेके कमलाकरेण कुत्र सदोदितरविदर्शन भवेदेतदर्थ बहु प्रतिपादित-मस्ति, प्रसङ्गाद-त्रोच्यते। कस्मिन् देशे दृश्याशवशेन सदा रविदर्शन मवेदिति विधार्यते ।
वटेश्वर-सिद्धान्ते स्वाधोनिरक्षखस्वस्तिक स्वाघ सस्वस्तिकयोरन्तरमक्षाशा । तत्र यद्य- क्षाशा = जिनाश+कुच्छनकला तथाऽघोनिरक्षखस्वस्तिकादुत्तररविपरमगमन- प्रान्तबिन्दुतो भूविम्बस्य स्पर्शरेखा तदूर्ध्वाधररेखाया ममान्तरा तेन तयोर्योगा- भावादूर्ध्वाधररेखाया न कोऽपि तादृशो विन्दुर्य स्थितो द्रष्टा सदा रविमवलोकयेत् । अथ यन अक्षाशा >जिनाश+कुच्छनकला तत्र परमरविगमनप्रान्त बिन्दुतोऽध सस्वस्तिक यावत् = कुच्छनकला । तत्र तत्परम रविगमनप्रान्त बिन्दुतो भूविम्बस्य या स्पर्शरेखा साऽवश्य तदूर्वाधरसूत्रेण मिलति तत्र तद्योग बिन्दुगत द्रष्ट, सदा रविदर्शन भवेत् । यतस्तन अक्षाशा >जिनाश+बुच्छनकला अतो लम्बाशा = ९०-अक्षाश<१० - (जिनारा+कुच्छनकला) = ६६-कुच्छन्नकला उभयत्र २४ योजनेन लम्बाश+२४<६६-कुच्छनकला+२४= 80 --कुच्छनकला-वुच्छतकोटि अर्थात् लम्बाश+२४< कुच्छनकोटि एतेन सिद्ध यल्लम्बाशचतुर्विशत्यशयोोगतुल्य ई श्यादाकै पुच्चनकोट्य ल्पकर्यदृष्टिस्थान भवेतद्वशेन सदैव रविदर्शन भवेदिति ॥ एतावता कुच्छन्न कोट्यल्पक दृश्यकाशोद्भवै स्वहक चिह्नजयोजनैश्च । सर्वाक्षदेशेऽपि कुगर्भभूजादध स्वतदृश्यलय समन्तात् ।। अस्ति खगेन्द्राश्रित गोलमध्ये सन्दर्शन यत्तदपीह चित्रम् । कुच्छ नकोट्यल्पक दृश्यकाशैरुक्त कुगर्भ क्षितिजादध स्थे । कमलाक्रोक्तमुपपद्यते । अत्रैव यदि दृश्याशा गर्भक्षितिजादुपरिगतास्तदा कथ तदुपपतिरिति विचार्यते। (का) भू= भूकेन्द्रम् । पृ भूपृष्ठ स्थानम् -कुच्छन्नचापम् नच-दृश्याशा। भू कुच्छन-दृश्याश= नस- नच-चस, चग%६० प्रत ९०-चस-80- (कुच्छन-ह)= सग-< सभूग=<नरभू तत पभूर त्रिभुजेऽनुपात ल VISM लच- 'नस 피의 ज चित्र न. ८ मध्यमाधिकार 32 भूव्या ३xत्रि ज्या<परभू =भूर तत भूर-भूपृ-भूर-भूव्या ३=पुर- भूव्या xनि ज्या<परभू -भूव्या भूव्या ३xत्रि कुच्छन्न दृश्याशान्तर कोज्या भूव्या पृर । एतद्वशतो दृश्याशज्ञानमपि सुबोधमत एतावता कमलाकरोक्तसूत्रावतार ॥इति ॥४॥ ऊर्ध्वस्थिता दृश्यलवा यदि स्यु कुच्छन्न भागानधिकास्तदानीम् । कुच्छन्न-दृश्याश-वियोग-कोटिज्यया हृत त्रिज्यकया विनिघ्नम् । कुखण्डक तत्तु कुखण्डकोन कुपृष्ठनोऽप्यूचंगदृष्टि-चिन्हम् ॥ इति ॥४॥ हि भा-सिद्धान्ततत्त्वविवेक मे कमलाकर ने कहा पर वरावर (सदा) रविदर्शन होता है इसके सम्बन्ध मे बहुत उपपादन किया है, प्रसङ्ग से यहां कहते हैं । किस देश मे दृश्याश वश करके सदैव रविदर्शन होता है इसके लिये विचार करते है । वहाँ अधो निरक्ष खस्वस्तिक और स्वाघ खस्वस्तिक के अन्तर अक्षाश है। वहा यदि प्रक्षा-जिनाश+कुच्छन्नकला तव अधोनिरक्ष खस्वस्तिक से उत्तर तरफ रवि के परमन प्रान्त बिन्दु से भूविम्ब की जो स्पर्शरेखा होगी वह ऊर्ध्वाधर खस्वस्तिक गतरेखा को समानान्तर होती है । इमलिये दोनो के योगाभाव से ऊर्ध्वाधर सूत्र मे कोई भी ऐसा बिन्दु- नहीं है जहा पर दृष्टिस्थान रख कर द्रष्टा सदा रवि वो देखे । जहा अक्षारा>जिनाश+कुच्छन्नवला वहा परमरविगमनप्रान्तविन्दु और अधो सस्वस्तिक के अन्तर=कुच्छन्नक्ला प्रत पहा परमरविगमनप्रान्तविन्दु से भूबिम्ब को ज स्पर्शरेखा होगी वह ऊधिर सूत्र के साथ अवश्य मिलेगी, उस योग बिन्दुगत द्रष्टा को वरा घर रवि दर्शन होगा। यहा प्रक्षाश>जिनाश+कुच्छन्नकला प्रत लम्बाश- (E-प्रक्षाश<- ( जि+कुक ) या लम्बाश<६६-धुच्छन्नक्ला दोनो मे २४ जोडने से मम्बाश+२४<६६-कुच्छन्नक्ला+२४%80-~कुच्छन्नकला-कुच्छन्नकोटि मर्थात् लम्बाग+२४<कुच्छन्नकोटि इससे सिद्ध होता है कि पुच्छन्नयोटि से मल्स लम्याग+२४ एतत्तुल्य दृश्यावश से जो दृष्टिस्यान होगा उसके वश मे बराबर रविदर्शन होगा | इससे कमलापरोक्त सूत्र उपपन्न हुग्राम गुडलकोट्यल्पक दृश्यकासोदय इत्यादि ।
वटेश्वर-सिद्धान्ते यहा यदि दृश्यास गर्भ क्षितिज से ऊध्वंस्थित होंगे तव उपपत्ति कैसे होगी सो दिख- लाते हैं (क) क्षेत्र देखिये। भू-भूवेन्द्र । पृ-पृष्ठस्यान । लच= कुच्छन्नमला-नस । नच=दृश्यारा, कुच्छन्नक्ला-दृश्यारा-नम-नचमच। चग=१०.१०-सच-६० -(कुच्छन्न-दृश्याश) =मग=<स भूग%<नरभू अब परभू त्रिभुज मे अनुपात करते हैं भूध्या ३४ त्रि. = भूरभूर-भूपृ-पर-भूर ज्या<परभू -भूव्या भूव्या ३४त्रि -भूव्या पर कुच्छन्न दृश्यासान्तर कोज्या इसके वा से दृश्याग ज्ञान भी सुलभ है । ऊध्वंस्थिता हम्पलवा यदि स्यु इत्यादि । इदानी वाहंम्पत्यवर्ष वर्णन करोति । %3D गुरुभगणाऽग्दर्क वधोन्दगण स्यात्विदशगुरोविजयाश्विनपूर्वः। द्विगुरिपतपर्यय संयुतिरुक्ता दिनकरचन्द्रमसोऽर्थनिपाताः ॥५॥ वि मा -गुरुभगरणार्कवध (बृहस्पतिभगणद्वादशघात ) त्रिदशगुरो (बृहस्पते ) विजयाश्विनपूर्व (विजयादिनामक्पष्टि , अाश्विनादिनामक द्वादश वा) अन्दगण स्यात् (वर्षसमूहो भवेत्) अर्थाबृहस्पतिभगणा द्वादशगुणास्तदा विज- यादिनामकानि पष्टिवाह स्पत्य वर्षाणि वा, प्राश्विनादिनामकानि द्वादशवार्हस्पत्य- वर्षाणि भवन्ति । तथा दिनकरचन्द्रमसो (सूर्य चन्द्रयो) द्विगुरिणत पर्यय-सयुति (द्विगुरिणत भगण्योग ) अर्थनिपात (अर्थनिपातसज्ञका ) उक्ता (कथिता ) अर्थात् रविचन्द्रयोदिगुरिणत भगणयोगस्य नामार्यनिपात इति । बृहस्पतेर्मध्यगत्यैकराशिभोगकालो वार्हस्पत्यवर्पमिति सर्व सिद्धान्तग्रन्यकार प्रतिपादितोऽस्ति यथा मध्यगत्याभभोगेन गुरोर्गौरववत्सरा इति । तथा "बृहस्पतेर्मध्यम राशिभोगात्सम्वत्सर साहितिका वदन्ति" (भास्कर) एतदादिवान्यनेकानि तत्माधवचनानि सन्ति । अत्राचार्येण गुरुभगा द्वादश- गुणास्तदा राश्यादिकानि तत्प्रमाणानि भवन्ति, तान्येव विजयादिकानि वार्हस्पत्य- पष्टिवर्धारिण, आश्विनादिद्वादशवर्षाणि वा” कथ्यन्ते परमन्य राचार्य सूर्यसिद्धान्त. कारादिभिरितोऽधिकानि तत्सम्बन्धे प्रतिपादितानि यथा सूर्यसिद्धान्ते- "द्वादशघ्ना गुरोर्याता भगणावर्त्तमानकै । राशिभि सहिता शुद्धा पष्टया युविजयादय' गुरोर्गतभगणा द्वादशगुणास्तदा राश्यादिका भवन्ति तत्र वर्तमानमुरुराशियोजनेन पष्टयाभक्तं न च रोपाणि विजयादिपष्टि-सख्यक-गुरुवर्षाणि भवन्ति, सृष्टवादी विजयवर्षसद्भावाद्विजयादितो गणना समुचितेति ॥शा मध्यमाधिकार हि भा -गुरु भगण को बारह से गुणने से विजयादि नाम के साठ वा प्राश्विन आदि नाम के बारह बार्हस्पत्यवर्ष होते है। रवि और चन्द्र के द्विगुणितभगण योग "अर्थ- निपात" सज्ञक कहा गया है । गुरु (बृहस्पति) की मध्यमगति द्वारा एक राशिभोगवाल वार्हस्पत्यवर्ष होता है यह मब सिद्धान्त ग्रन्थकारी का कहना है । यथा मध्यगत्या भभोगेन गुरोगौरववत्सरा इति तथा 'बृहस्पतेमध्यम-राशिभोगात्सम्वत्सर साहितिका वदन्ति" (भास्कर) इसके सम्बन्ध म अनेर वचन है । यहा प्राचार्य (वदेश्वर) गुरुभगरण को बारह से गुणने पर जो राश्यादिक उनका प्रमाण होता है उसीको विजयादि नामक साठ वा अश्विनादि- नामक बारह वार्हस्पत्य वर्ष कहते हैं। लेकिन सूर्यसिद्धान्तकारादि अन्य आचार्य इनसे और अधिक बातें इसके सम्बन्ध मे कहते हैं। जैसे "द्वादशघ्ना गुरोर्याता भगणा वर्तमानक इत्यादि । गुरु के गत भगणो को बारह से गुणन पर राश्यादिक होता है उसमे गुरु के वर्तमान राशिप्रमाण जोडने से साठ से भाग देने से शेष विजयादि साठ गुरु वर्ष होते है। मृहपारम्भ मे विजय वर्ष रहने के कारण विजयादि से गणना उचित ही है ।।५।। उत्सपिरणी प्रथममेव युगार्धमुक्ता ज्ञेया द्वितीयमपसपिरिणकाभिधाना । मध्ये युगस्य सुषमा खलु दुप्पमा स्या- दाद्यन्तयो कुमुदिनी वनबन्धुयोगात् ॥ ॥६॥ वि भा --युगस्य मध्ये, प्रथममेव युगार्ध (युगस्य पूर्वाध) उत्सर्पिणी (उत्सर्पिणी नामिका) उला (कथिता) द्वितीय युगार्ध (युगस्योत्तरार्ध) अपसपिणि- काभिधाना (अपसपिणी सज्ञका) ज्ञेया (बोद्धव्या) आद्यन्तयो (तयोरादावन्ते च) कुमुदिनीवनबन्धुयोगात् (सूर्यसयोगात्) ते पूर्वकथिते (उत्सर्पिणी-अपसर्पिणी नामके) सुपमा दुप्पमा चे (क्रमश सुपम दुप्पमे चे) ति शेये ॥६॥ आर्यभटीये तु "उत्सर्पिणी युगाध पश्चादपसपिणी युगाधं च । मध्ये युगस्य सुपमादावन्ते दुप्पमेन्दूच्चात्" इति पाठोऽस्ति । एतद्विपये युगस्य समभागद्वय कृत्वा पूर्वार्धस्योत्सर्पिणी द्वितीयास्यापसपिणीति सज्ञा जैनमतानु मारत कृता, तथा युगस्य समभागनय कृत्वाऽऽद्यन्तयोर्दु समा मध्यस्य च सुपमा सज्ञा चेति च प्रतिपादिता, अर व्याख्याकारैरिन्दूच्चादीना कालभेदेन गते दो भवतीत्याचार्य कथयतीति व्यारयान मन्मते तन्न तथ्य प्रसङ्गानुसारतोत्र ग्रहभगरणादो भेदप्रदर्शनानौचित्यात् । इन्दूच्चस्यैव पदस्य प्रयोगकरणे प्रमाणा- भावाच्च मन्मते तु "उत्सपिणी युगाध पश्चादपसपिणी युगाधं च । मध्ये युगस्य सुसमादावन्ते दु समाग्न्यशात्” इति पाठ माधु स च लेसकाध्यापकाध्येतृ-दोप- रन्यथाजात इति गणक्तरङ्गिण्या म म प सुधाकर द्विवेदिभिलिखित तत्समीचीन प्रतिभातीति ।।
वटेश्वर-सिद्धान्ते समानद हि.मा --युग के मध्य में पहला युगाघ (युग के पूर्वाधं) उत्मपिणी नाम के हैं। दूसरा युगाधं (युग के उत्तरार्ध) अपसपिणी नाम का समझना चाहिये । उन दोनो के प्रादि और अन्न मे मूर्य के मयोग होने से वे ही (उत्मपिणी-अपपिपी) क्रम में मुपमा मौर दुष्पमा कहलाती है। प्रार्यभटीय में "उत्सपिणी युगा, पश्चादपमपिणी युगाधं च । इत्यादि गएकतर्राङ्गणो मे म म प सुधार द्विवेदी जी लिखते हैं कि युग के भाग करके पूर्वार्ध की उमर्पिणी परार्घ को अपमर्पिणी मना जनमत दे अनुमार की गई, और युग के समान तीन भाग करके प्रादि और अन्त को दुसमा, मध्य को मुषमा सज्ञा कहो गई है। यहाँ व्याख्याकार ने “चन्द्रमा के उच्चादियो वे कालभैद में गति में भेद होता है यह प्राचार्य क्त है। इस तरह व्याख्या की है । मेरे मन मे वह के अनुसार यहाँ ग्रहभगणादि म भेद देखना अनुचित है। शोकोक पद्य में "इन्दून्च" पदका प्रयोग करने में प्रमाण नहीं है इसलिये ठीक नहीं है। मेरे मत में "उत्मपिरणी युगाचं पश्चादपसपिणी युगाधं च । मध्ये युगस्य सुसमाऽऽदावन्ते दु ममाग्यशात्" यह पाठ ठीक है, यह पाठ लेखको, अध्यापको, पढने वालों के दोषो से भि हो गया, यह द्विवेदीजी का कहना ठीक मालूम होता है ।। पूर्वकथित पष्टिमस्यकाना वार्हस्पत्यवर्षाणा विजयादिकाना नामान्यधोत्र लिखितम्मेण ज्ञेयानि। विजप विश्वावमु २५ पिंगल शुक्ल ठीक नहीं है. प्रमङ्ग जय १४ पराभव कालयुक्त ३८ प्रमोद ५० चित्रभानु ३ मम्मय प्लवग सिद्धार्थी प्रजापति मुमान ४ दुर्मुस कोलक रोद ४० अगिरा ५२ तारण ५ हेमलम्ब १७ सौम्य २६ दुर्मति श्रीमुख ५३ पापित ६ विलम्ब १८ माधारण ३० दुन्दुभि भाद ५४ व्यय विवारी १९ विरोधकृत् ३१ रधिरोदारी ४३ युवा ५५ सर्वजिन ६ दावरी परिधावी ३२ राक्षस घाना १६ सर्वधारो प्लव २१ प्रमादी क्रोधन ईश्वर ५. विरोधो १० गुभत् २२ मानन्द अयं बहुधान्य ५८ विकृत ११ बोधन २३ राक्षस प्रभव प्रमायो १५ १६ १२ क्रोधी २४ विमव विक्रम नन्दन मध्यमाधिकारः ५७ युगपठिनभगणेम्य. कलीयभगए ज्ञानं ततो ब्रह्मायुपि भगणनानञ्चाह । ॥७॥ यद्युगोत्थमिह पर्ययादिकं तद्भुजान गगनेन्दु (१०००) ताड़ितम् । कल्पनं खखनखग्रहाहतं तद्भवेत्कमलविष्ट रायुषि वि. भा. -इह (अस्मिन् ग्रन्थे) युगोत्थं (महायुगोत्पन्न) यत्पर्ययादिक (भगणादिक) तत् भुजाभ्रगगनेन्दुभिः (१०००) ताडितं (गुणित) तदा कल्पज (कल्पोद्भवं) भगणादिकं भवेत् तथा कल्पज भगणादिकं खखनखग्रहा (७२०००) हतं (७२०००) एभिगुणितं सत् कमलविष्ट रायुपि(ब्रह्मायुय) भगणादिक भवेदिति ॥७॥ (१) भुजाभ्रम् (शून्यद्वयम्) हि.भा. - इस ग्रन्थ मे युग मे जो ग्रहादियो के भगणादि पठित है उनको १००० एक हजार से गुणने से क्ल्पसम्वन्धी भगणादि प्रमाण हो जायेगे । और कल्पमम्बन्धी भगरपादि प्रमाणो को ७२००० इतने से गुणने पर ब्रह्मा की आयु में भगणादि प्रमाण होते है ॥७॥ उपपत्ति यदि युगवयुगपठित भगरणा दिमान लभ्यते तदा कल्पवर्षे किमित्यनुपातेन कल्पे भगणादिमानम्- युगभगणादिमान X कल्पवर्ष युगवर्ष _युगभगणादिमान X४३२००००००० ४३२०००० -युगभगणादिमान १०००=कल्पभगणादिमान । अत मिद्ध यद्युगपठित- भगणादिमान १००० गुरिणतं तदा ब्रह्मायुपि भगणादिमान भवेत् । प्रथ १००० युग- १ ब्रह्मदि-१ कल्प । २००० युगः ब्रह्माहोराराम् । तत: २००० युग४३६०- १ ब्रह्मवर्प पर ब्रह्मायु = १०० वर्ष = २००० यु४३६०४१००= ब्रह्मायु -७२०००००० युग कल्पसम्बन्धिभगणादिमानं ग्रह्मायुष्यानीयते यथा कल्पभाणादिमान ब्रह्मायुः कल्पभगणादिमान ४७२०००००० युग कल्पवर्ष १००० यु . =कल्पभगणादिमान ७२०००-ब्रह्मायुपि भगणादिमानम् अत: मिद्ध यत्कल्पीय भगणादिमानं ७२००० गुणित तदा ब्रह्मायुपि तन्मान भवेत् । प्रत प्राचार्योक्त युक्तियुक्तम् ॥६॥ हि.भा. ---युगपठिन भगरणादि मानो को बल्म में लाने के लिए अनुरात पलं है. 'यदि युग वर्ष में युगपठिन भगणादिमान पाने हैं तो मल्पवर्ष में क्या" इम अनुरात रो मन ५८ वटेश्वर-सिद्धान्ते में भगणादिमान = युगभगणादिमान X कल्पवर्ष युगभगणादिमान X४३२००००००० युगवर्ष ४३२०००० = युगमगणादिमान X १००० । इसम सिद्ध हुप्रा वि युग पठिन भगणादिमानो को १००० से गुरणने पर क्ल्स सम्बन्धी भगणादिमान होते है ।। १००० युग%१ ब्रह्मदिन-१ कल्प २००० युग= १ ब्रह्माहोरात्र पर ३६० अहोरात्र= १ वर्ष २००० युग ३६०=१ ब्रह्मवर्ष लेकिन ब्रा की गायु = १०० वर्ष' २००० यु४३६०x१००-ब्रह्मायु: ७२०००००० युग भव पल सम्बन्चो भगणादिमानों को ब्रह्मा । वी पायु में लाते हैं, जैसे कल्पभगणादिमान ४ ब्रह्मायुर्वपं वल्पभगणादिमान ४७२०००००० युग कल्पवर्ष १००० यू = ७२०००४ वल्प भगणादिमान = ब्रह्मा की प्रायु मे भगणादिमान । इममे निद्ध हुआ कि कल्पसम्बन्धी भगणादिमानो वो ७२००० इतने मे गुणो से ब्रह्मा की आयु में उनके मान पाजायेंगे माचार्य का क्थन मुक्तियुक्त है इति ॥६॥ - मथ कास्य नवमानान्याह- पार्श चान्द्रमस सौर सावन ब्राह्मजैव पितृदेव दैत्यजः । काल एभिरनुमीयतेऽव्ययो येन माननवकस्य च व्ययः ॥८॥ वि. मा ---पास चान्द्रमस मौरमावन मालजैव पितृदेव दैत्यजं (पूर्ववयित- रेभि) माने अव्यय (अविनाशो व्यापक )काल (ममय ) अनुमीयते (अदिनाद्यनन्त- स्थ कालस्य यद्यपि विभागो न भवितुमर्हति तथापि लोकव्यवहारार्थ पूर्वोक्त नवमान- द्वारा विभक्तकालस्य प्रतीतिर्भवति) येन माननवरस्य (पूर्वकथित नवधा कालमान- स्य) व्ययो भवति (अदिव्ययकालस्यैतन्माननववद्वारा व्ययो भवतीति)। प्रन "दैत्यज" अय पाठोऽसाधु प्रतिभानि (देवदैत्यजमानयो समत्वान्) तेन (देव- दत्यज) प्रत्र देवमयजेरिति पाठ मात्रु (प्रन्येपु सिद्धान्तग्रन्थेपु तथवोत्तत्वात्" यथा सिद्धान्तशिरोमणी भास्करोक्तम्- "एव पृथडमानवदेवजैव पंत्र्याक्षं मोरेन्दव सावनानि । ब्राह्म च काले नवम प्रमाण ग्रहास्तु माध्या मनुजै स्वमानात्" || हि भा-नाक्षत्रमान, चान्द्रमान, मौरमान, मावनमान, ब्राह्म (ब्रह्मसम्बधी) मान, वाहस्पत्यमान, पितृमम्बन्धी मान, देव-दैत्य सम्बन्धी मान इन्ही नौ प्रकार के कालमान मे ध्यापन (मव्यय) काल की कल्पना की जाती है । (यद्यपि जिम काल का न मादि है न भन्त है उमा विभाग वरना प्रमम्भव है नथापि व्यवहार के लिय उम अम्पय काल का व्यय (मारम्भ-पन्नादि) समभा जाना है। यहां, प्राचार्योक पद्य में "दत्यज" यह पाठ अगहन मासूम पडता है क्योकि देवो भोर त्यो ये बालमान ए हो (बराबर) होने के
मध्यमाधिकारः
कारण देव कालमान मे दैत्य कालमान का पृथक पाठ नही हो सकता, दोनो (देव, दैत्य)
मानो के एक होने के कारण आचार्योक्त पद्य से पाठ ही कालमान पाता है, इनमे प्राचार्य ने
मानव मान को छोड दिया है दैत्यमान के स्थान पर मानवमान कहना चाहिये अर्थात
"दैत्यज" शब्द के स्थान पर "मयंज वा मानव " होना चाहिये । अन्य ग्रन्यो मे दैत्यमान
नही यह कर मानवमान ही कहा गया है, जैसे भास्कराचार्य कहते हैं
"एव पृथड मानवदेवजेव" इत्यादि ॥६॥
अथ सृष्टपारम्भकालवर्णनमाह ।
त्रुटयादि पद्मोद्भव जीवितान्तः कालः समं तेन झपाजसन्धौ ।
लङ्का कुजस्थ घचरैः प्रवृत्तो- रदिने चं त्रसितादितोऽयम् ॥६॥
निभा ---त्रुटयादि पद्मोद्भवजीवितान्त (त्रुटयादितो ब्रह्मायु पर्यन्त)
य काल (समय) तेन कालेन सम (माध) लङ्का कुजस्थ | चरै (लक्षाक्षिति-
जस्थैर्ग्रहै ) झपाजसन्धौ (रेवत्यन्ते) स्थित रदिने चैत्र-सितादित (चर-शुक्ल-
प्रतिपदादित ) अय (सर्वोऽपि काल ) प्रवृत्तो बभूवार्थात् "लङ्कायामऊदये चैत्रशुक्ल-
प्रतिपदारम्भेऽकदिनादावश्विन्यादौ" सर्वेपा युगाना मन्वन्तराणा सौरादिमासाना
वारणा कल्पस्य चैककालावच्छेन प्रवृत्तिर्बभूवेति ||६||
हि भा -युटयादि से ब्रह्मा की प्रायु पर्यन्त कालो के साथ मीन मेप की सन्धि
(रेवत्यन्त) म लड्का क्षितिजस्थ ग्रहो के रहन पर रविदिन मे चैत्र शुक्ल प्रतिपदारम्भ से इन
मय काला की प्रवृति हुई अर्थात् लका के मूर्योदय काल में चंद्र शुक्ल प्रतिपदारम्भ में रवि-
वार प्रश्चिन्यादि में सब युगादिमन्वलर-वल मोरादिवर्ष मामादि की प्रवृत्ति हुई । इति ॥६॥
प्रथ वेषु कार्येषु कृपा मानानामुपयोग इत्याह ।
पर्वावमतिथि करणाधिमासक ज्ञान मैन्दवान्मानात् ।
प्रभवाद्यब्दाः षष्ट्रियुगानि नारायणादीनि ॥१०॥
अङ्गिरसादेतेषां ज्ञप्ति. पैश्याच पैतृको यज्ञः ।
कामलजासुरदैवैस्तेपामायु परिच्छिति ॥११॥
वि भा-पर्व (ग्रहणादि ) अवग (तिथिक्षय ) तिथि प्रसिद्धव, करणानि
(तिथ्यर्धस्पाणि) अधिमास (मलमास ) एतेपा ज्ञान ऐन्दवान्मानात् (चान्द्रमा.
नात्) भवति, पष्टि (पष्टिमस्यका ) प्रभवाद्यब्दा (प्रभवादिवाणि) नारायणा-
दीनि (नारायणादि नामवानि) युगानि यानि मन्ति, एतेपा अप्ति (ज्ञान), अङ्गि-
रमात् (वाईस्पत्यमानात्) भवति, पैदिव (पितृसम्बन्धी) यज्ञ (थाद्धादि )
पंन्यान्मानात् (पितृसम्बन्धिमानात्) वर्तव्य । (कामलजासुरदेवं (बाहादत्य-
देवमान )
तेपा (ब्रह्मदत्यदेवाना) आयु परिच्छिति. (प्रायुगणना)
कार्येति ॥ १०.११ ॥
६० वटेश्वर-सिद्धान्ते - हि भा-पर्व (ग्रहण प्रादि), तिपिक्षय, तिथि, करण (तिष्य) मलमाम, इन मव का ज्ञान चान्द्रमान से करना चाहिये, प्रभव प्रादि साठ वर्षों वा और नारायण प्रादि नाम के युगो का ज्ञान बृहस्पति सम्बन्धी मान मे करना चाहिये, पितृसम्बन्धी यज (श्राद्धादि), पितृसम्बन्धी मान (पत्र्यमान) मे करना चाहिये, ब्राह्ममान से ब्रह्मा की आयु गणना, आसुरमान और देवमान से क्रमश प्रमुरो और देवो की प्रायु की गणना करनी चाहिये ॥१०-११॥ अध्ययन नियमसूतक मखगतयः सञ्चिकित्सा च । होरामुहूर्तयामाः प्रायश्चित्तोपवासाश्च ॥१२॥ आयुायश्च नृणां गमनागमने च सावनान्मानात् ।। ऋत्वयनविषुवदब्दा युगं क्षयौं दिनस्य सौरात्स्युः ॥ १३ ॥ विभा-अध्ययननियमा (वेदवेदाङ्गपनारम्भसम्बन्धिनियमा) सूतक (जननाशौच मरणाशीच ) मखगतय (यज्ञसम्पादनविधय.), सचिकित्सा (शोभनरूपेण रोगिणामोपधादिप्रयोगारम्भ ), होरा (लग्न राश्य वा) मुहूर्ताः (शुभवार्थमुचितसमया ) यामा (प्रहरादिविचारा) प्रायश्चित्तमुपवासाश्व, नृणा (मनुप्यारणा) आयुर्दाय (जीवनदैर्घ्यम्) गमनागमने (मनुष्याणा यातायातयो रुचितविचार ) इत्येया ज्ञान सावनमानाद्भवति । ऋतवो (वसन्तादय) अयने (उत्तरायण-दक्षिणायने), विषुवद्दिनम् (मेपतुलसकान्ती) अब्दा (वर्षाणि) युग (महायुगादि ) दिनस्य क्षयी (दिनह्रासवृद्धी) सौरमानादेतेषा ज्ञान भवतीति ।। १२-१३ ॥ हि भा-वेद-वेदाङ्गो के पठन सम्बन्धी नियम, जननमरणाशीप, यागादि धार्मिक वायों की विधि, अच्छी तरह रोगियो के लिये भोपाधि प्रादि का प्रयोग मारम्भ करना, होरा (लग्न वा राशि मा प्राधा), क्मिी शुभ कार्यविशेष के लिये उचित समय, प्रहर का विचार प्रायश्चित्त मोर उपवास, मनुष्यो के मायुर्दाय, मनुष्यो के माने जाने के लिये समुचित विचार, ये सब बातें मावन मान से बरनी चाहिये । ऋतु (वसन्तादि) मयन (उत्तरायण- दक्षिणायन) विपुवदिन (मेषमक्रमण-तुलमक्रमरणदिन) वर्ष-युग, दिन का घटना, बढना ये राब बाने मौरमान से बहनी चाहिये ।। १२-१३ ॥ ज्याद्या विधयश्चाक्षीच्छशधर भगरपोद्भपाश्च नाक्षत्रात् । मासार्ध-वासराणां संजाः सदसत्फलावगतिः घि भा -ज्याद्या ज्यादीना लक्षणानि तत्साधनानि च स्पप्टाधिकारे सन्ति तेन तानि तत्रैव ज्ञातव्यानि । अथवा तत एव ज्ञातन्यानि । केभ्यो मानेभ्य. कानि कानि कार्याध्येतस्मिन् विपयेऽन्याचार्यापेक्षया वटेवरेणाधिवानि लिखिता-- नीति (ज्या, वोटिज्या, स्पर्शरेग कोटिस्पर्शरेसा, छेदनरेखा, वोटिच्छेदन- रेगा, उरन मज्या, वोट्यु लमज्या) विषय (ज्यादिसाधनाथ साधनानि विधान वा) प्रान्मिानात् (नाक्षत्रमानात्) ज्ञातव्या इति सराधरभगणोद्भवाश्च (चन्द्रभगण- मध्यमाधिकारः - . भोगाश्च नाक्षत्रमानादेव । मासार्धवासराणा सज्ञा. (मासपक्षदिननामानि) सदस- स्फलावगति. (शभाशुभफलज्ञानम्) नाक्षत्रमानादेव ज्ञातव्येति । हि.भा -(१) ज्या प्रादि (ज्या, कोटिज्या, स्पर्शरेखा, कोटिस्पर्शरेखा, छेदनरेखा, कोटिच्छेदनरेसा, उत्क्रमज्या, कोन्यु तक्रमज्या की विधियों नाक्षनमान मे समझनी चाहिये, चन्द्रभगरणभोग भी नाक्षत्रमान से जानना चाहिये, मास, पक्ष, दिनो के नाम और शुभ प्रशुभ फल ज्ञान नाक्षत्रमान मे समझना चाहिये । (१) ज्या आदि के लक्षण और साधन स्पप्टाधिकार में है इमलिये ये सब वही पर समझने चाहिये अथवा वही से समझना चाहिये । किन मानो से कौन-कौन का काम करना चाहिये इस विषय में अन्य प्राचार्यों मे वटेश्वराचार्य अधिक बाते रहते हैं ॥ १४ ॥ (१)- यथाज्यादीना (ज्या, कोटिज्या, स्पर्शरेखा, कोटिस्पर्शरेखा,छेदनरेखा, कोटिच्छेदन, उत्कमज्या वाण =शर, कोट्य कमज्या) परिभाषा लिख्यन्ते ज्यादयश्चापीया कोणीयाश्च भवन्ति । के=वृत्तकेन्द्रम् । चसं, रल परस्पर लम्बरूपिण्यौ व्यास- T रेखे, केच रिज्याकेर । नच%D किमपि चापमस्ति यस्य ज्या, कोटिज्या, स्पर्श- रेखा, कोटिस्पर्शरेखा इत्या. के दय का भवन्तीति विचार । व रचचापम् ६०, रच -~~नच--१० -चाप = नर- कोटिचापम् । नच चापस्यक- प्रान्ते (च) विन्दी केन्द्रात् (के) चित्र न०६ विन्दुतो केच रेखा नेया तदुपरि चापस्य द्वितीयप्रान्तात् (न विन्दुत) कृतो लम्ब - नम न च चापस्य ज्या-चापज्या । एव नरकोटिचापस्य ज्या नव = चार- कोटिज्या । च विन्दुतो वृत्तस्पर्शरेसा कार्या केन्द्राच्चापस्य द्वितीयप्रान्त (न) विन्दी केन रेखा नेया सा वर्धिता या वृतस्पर्शरेखाया लगति तत्र श विन्दु वल्प्यस्तदा राच रेखा नच चापस्य स्पर्शरेखा नच चापस्पर्शरेखा = शच । केश रेसा चापच्छेदन रेखा। एक नर चापस्य रविन्दुतो वृत्तस्पर्शरेखा कार्या केन्द्रान् (केविन्दुत ) द्वितीय प्रान्त (न) विन्दुगता केन रेखा या तस्या स्पर्मरेसाया तगति तत्र विन्दु फ्ल्यस्तदा परेसा रन चापस्य सरेया अर्थात् कोटिम्पनरेखा, केप कोटि- च्छेदनरेसा, चम : चापोकमज्या - वारण = भर । रव-कोट्य कमज्या त्रिज्या चापज्या - त्रिज्या चापकोटिज्या, यस्य यस्यापि कोणम्य ज्या, ल - D तया योगकोटिज्या %3D % 3D मध्यमाधिकार कोटिज्या, स्पर्शरेखा, कोटिस्पर्शरेखा इत्यादय वा भवन्त्येतदर्थ विचार । यथा लनम कोऽपि कोणोऽस्ति यस्य ज्यादय का भवन्तीति प्रदश्यन्ते नल रेखाया कोऽपि प विन्दुगृहीत । प विन्दुतो नम रेयोपरि परलम्ब वार्यस्तदा रनरप = ६० ज्या< नरप त्रिज्या अर चिन न०१० त्रिज्या- १ गृह्यते । लनमयोग को पर १ पर नपर त्रिभुजेऽनुपातेन शोरगज्या नप नप १४ नर नर नप नप पर योगज्या मए पर कागकोटिज्या योगस्पर्शरेखा नर नर नप नर पोगायोटिज्या नप नर पोणज्या योगवोटिम्पयरे पर पर नप १ नप पोगच्छमनरेगा पोणोटिज्या नर नर नप नप योगवोटिवेदनरेगा गज्या पर नप योगवोटिज्या योग्गोबमग्या १ योगाम्या बागायत मग्या ॥१४॥ सति वटेश्वर मिनाले मध्यमाधिकारे कामाविमो द्वितीयाध्याय । हि मा-या प्रादिपो (ग्या वारिया सोमा बारिमाया, सोग घोहिमनरेगा उनमज्या बाग-गर वारिया वो मय) यो परिमापाय furt.ज्या पाहिमपीय और पागोरानी। मग चित्र (1) पिर। * पोटाचा न परम्पर मावा पाग गाय है। बर-विन्यास 115/- 4/2/24/12/24/9/9/24/३ नप - - वटेश्वर-सिद्धान्ते नच कोई एक चाप है जिसकी ज्या, कोटिज्या, स्पर्शरेखा आदि क्या होती है इमका विचार करते है। रच चाप=६०, रच-नच%80-चाप =नर= कोटिचाप । नच चाप =चाप । चाप के एक प्रान्त (च) विन्दु मे वेन्द्र से केच रेखा कीजिये । उसके ऊपर चाप ये दूमरे प्रान्त न विन्दु से नम लम्ब कीजिये तब नम रेखा नच चाप की ज्या होती है । नम= चापज्या । इसी तरह नरकोटि चाप की ज्या= चाप कोज्या= नव । चाप के एक प्रान्त च विन्दु मे वृत्त की स्पर्शरेखा कीजिये । केन्द्र से दूसरे प्रान्त (न) में लाई हुई केन रेग्वा वृत रपर्शरेखा मे जहाँ लगती है वहाँ श' विन्दु रखिये राव शच= चापस्पर्शरेखा, केन: चापच्छेदनरेखा, एव नर चाप के र विन्दु मे वृत्तस्पर्शरेखा कीजिये । केन्द्र से न विन्दु मे लाई -हुई रेखा वढ कर उस रेखा म जहाँ पर लगती है वहाँ प बिन्दु है तब रस- कोटिस्पर्शरेखा, वेप- कोटिच्दैन् नरेखा, चमचाप की उत्क्रमज्या बाराशर । रव-कोटिचाप की उत्क्रमज्या-त्रि-- चापज्या-मिज्या-चाप कोटिज्या= उज्या किमी कोण की (ज्या, पोटिज्या, स्पर्शरेखा, कोटिस्पर्शरेखा, छेदनरेखा, कोटिच्छेदन रेखा, उत्तमज्या, कोट्युत्क्रमज्या क्या होती है उसके लिये विचार । चित्र न (१०) देखिये लनग एक कोण है जिसकी ज्या, कोटिज्या भादि क्या होती है , यह दिसलाना % 3D D नल रेखा म वोई प विन्दु लेकर उससे नम रेखा के ऊपर परलम्ब कीजिये, तब <नरप८६०, ज्या <नरप = त्रिज्या यहाँ ग्रिज्या १ लेते हैं पर नपर त्रिभुज मे अनुपात से कोणज्या नप नर =कोणकोटिज्या नप नव पर कोणग्या कोणस्पर्शरे नर कोणकोटिज्या तथा कोणरोटिज्या नर पोरायोटिस्प कोणज्या पर १ नप पोरगन्छेदनरे कोणकोटिज्या नर नप वोरणरोटिच्छेरेसा= योगज्या पर • योरपोटिज्या वोरण की उत्प्रमज्या, १ कोणग्या = कोणकोटि को उक- मग्या ॥१४॥ इनि वटेश्वरगिद्यान्न म मध्यमाधिवार में पालमान विवेक नामा द्वितीयाध्याय गमाप्त हुमा। १ १ % मध्यमाधिकारस्य तृतीयाध्याये द्युगण (अहर्गरण) विधि कोत्पत्ति कल्पयुगयात समा इनघ्ना मासान्विता खगुरणसङ्ग गिता ग्रहोमिः। युक्ताः पृयक्त्वधिकसङ्गणिता इनाहैलंब्याधिमासदिवसः सहिता पृथक् पृथक् ॥॥ दिनक्षयघ्ना शिशिराशु वासरंरवाप्तहीनाहगरविजिता । धुराशयस्तेष्वगभक्तशिष्टको दिनाधिपो व्योमचराधिपादिक ॥२॥ विभा--कोत्पत्तिवल्पयुगयातसमा (ब्रह्मोत्पत्तिकालाद्वर्त्तमानकल्पस्य यावन्तो युगाब्दा व्यतीता) इनघ्ना (द्वादशगुणिता) मासान्विता (वर्तमान वर्षस्य चैत्रशुक्लप्रतिपदादितो यावत्यो गतमाससस्यास्ता योज्या) खगुणसङ्ग गिता त्रिशद्गुणिता) अहोभियुक्ता (गतामान्ताद्वर्तमानदिन यावत्तिथिसख्याभियुक्ता) पृथक् (स्थानद्वये स्थाप्या) अधिकसङ्गगिता (ते स्थापिता अङ्का एकत्र युगाधि- माससख्याभिगुणिला ) इनाहैर्लयाधिमासदिवस (युगसौरदिने भक्ता सन्ता ये लब्धाधिमासदिवसास्तै) सहिता (द्वितीयस्थानस्थापिता अड्डा युक्ता ) ते पृथव पृथक् स्थाप्या , दिनक्षयघ्ना (ते पृथक् स्थापिता अड्डा एकत्र युगावगुणिता) शिशिरागुवासरैरवाप्तहीनाहगण (युगचान्द्रदिनर्भक्ता सन्तो ये लब्याक्षयवासरा स्तद्वितीयस्थानस्थापिता अड्ा) विवजिता (हीना कार्यास्तदा) द्युगशय (सावनाहर्गणो भवेत्) तेप्वगभक्तशिष्टक (तेषु समानीत सावनाहरणेषु सप्तभक्त यु ये शेपास्त ) व्योमचराधिपादिक (रव्यादिक ) दिनाधिप (वारसति ) भवेदिति । हि भा - ब्रह्मोत्पत्तिकाल मे वतमान वर्ष के जितने युगव वीत गये हैं उनका बारह से गुण देना गुणनफल म वक्तमान वर्ष के चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से जो गतमास मस्या हो जोड देना, उसको तीस मे गुणा देना, उसमे गत अमावास्यान्त से वर्तमान दिन तक तिथि मख्या जोड कर दो स्थानो मे रखना, एक स्थान स्थित सस्या को युग की अधिमास से गुए कर युग मौर दिन से भाग देने पर जो लब्धि (मधिमास दिन) पावें, इसे दूसरे स्थान मे रपे हुए अड्को मे जोड देना, झे दो स्थानो म रखना, एक स्यान को सख्या को युग की अवमदिर मस्या से गुण कर युग चान्द्रदिन मे भाग देने से जो सन्धि (क्षयदिन) हो उमे दूसरे स्थान मे रमे हुए मङ्मा म घटाने से सावनाहर्गण होता है, इसमे (सावना हगए मे) सात में भाग देने से जो दोप रहे वह रवि से गणना करने से बारपनि होते हैं ।। १-२॥ उपपत्ति वजन्मनोऽप्टी ययुरित्यादिना सष्टपादितो वर्षान्त यावद् गतवर्षाणि गव गव४ १२ गतसोरमासा चैत्रादिगत चान्द्र- मामतुल्य रेव सौरमासंयुतास्तदा सृष्टघादितो गतसौरमासा =गव४१२+गत सख्या सदलासमा गत मध्यमाधिकार =गताधिमास+ युगसौ इचा- चान्द्रमास तुल्य सौरमास, त्रिंशता गुणनेन सृष्टयादितो गतसौरदिनानि = (गवx १२+गतचान्द्रमास तुल्य सौरमास)४३०, इष्टतिथि-तुल्यै सौरदिनयुक्तानि तदा मृष्टयादित इप्ट चान्द्रान्त यावत्सौर दिनानिभवन्ति=(गव४ १२+गतचान्द्रमामतुः ल्यसौरमास)x३०+ इष्टतिथितुल्यसौरदिन- इसौरदिनानि ततोऽनुपातो यदि युग- सौरदिनयुगाधिमासा लभ्यन्ते तदेष्टसौरदिनै किमित्यनेन लब्धा सशेपाधिमासा युगाधिमामX इसौर अधिशे यसौरदि -यत सौरचान्द्रान्तरमधिमासा (प्रय पूर्वगतसौरमासाश्चनादि चान्द्रमासतुल्यैरेव सौरमासयुक्तास्तत्राधिशेषतुल्यमधिक, गृहीत भवेदतोऽनुपातागतमधिशेपग्रहण नाऽय क्रियते, अत इप्टसौरदि+गताधि- दिन-तिथ्यन्ते चान्द्राहर्गण-इचा । ततो यदि युगचान्द्रयुगावमानि लभ्यन्ते तदेष्टवान्नै किमित्यनुपातेन सशेपावमानि युगोवम इचा. अवमशे --गतावम+ -प्रत इष्टचान्द्रे एतस्य गोधनेन न्युचा युचा गतावम+. अवमशे अवमशे =इचा-गतावमा तिथ्यन्ते युचा युचा सावनाहर्गरण परमपेक्षितस्तु सूर्योदयकालिक सावनाहर्गणोऽतो "दर्शाग्रत सक्रमकालत प्राक् सदैव तिष्ठत्यधिमासशेपमित्युक्त " तिथ्यन्तकालिक मावनाहर्गणो ऽवमशेपयुक्त तदा सूर्योदकालिक सावनाहर्गण = इचागतावम-अवमशे , अवशे युचा युचा -इचा-गतावम अत सर्वमुपपन्नम् ॥ अय सृष्टवादितो भुवि लोकरगणना कथ समारब्धेति निर्णीयते। सृष्टयादिर्नाम लड्का प्रथम सूर्योदयकालो भूस्थजनाना दिनाधराव्यर्धास्तकाल स्यात् । स कालो यदि सपा रविवारीय एव स्वीक्रियते तदा रेखात पश्चिमे दोपापत्ति- भंवेद्यथा। इष्टात्पर य सूर्योदयस्तस्मात्परमग्रिमदिनगणनाऽऽरभ्यते लोकरिति युक्तव्यवहारेण रेखात पश्चिमे प्रयममूर्योदयात्पर सोमवारगणना स्यात् । अतएवार्कोदयादूर्ध्वमधश्च ताभिरित्यादिना सृष्टयादिकाल एव सोमवारप्रवृत्तिकाल स्यादिति सिद्धस्तदसङ्गतम् । नोचेत् सृष्टयादिकालात्पर यदा यदा यत्र यन प्रथम मूर्योदयस्तदा तदा तत्र तत्र रविवार इति क्ल्प्येत तदा रेसात प्राच्या प्रथममूर्यो दयात्पर यो लङ्काद्वितीयसूर्योदय सोमवारप्रवृत्तिवाल स एवार्योदयावं. मधश्च ताभिरित्यादिना रविवार प्रवृत्तिकाल मियति । रेसात प्राच्या दोपा पतिरतो रेखात पश्चिमे प्रथममूर्योदयात्पर रविवारगणना प्राच्या सोमवार- गरणना समारब्धेति । एतेन नैकत्र य स्पष्टचार एव मवंत्र स्पष्ट्रवार इनि यत ७०।१२।३६"<१ D अत वटेश्वर-सिद्धान्ते अथ लझा सूर्योदयकालोन मध्यमतिथेरज्ञानात् स्वदेशोदयकालीन स्पष्टतिथिमेव लड्बोदयवालोनमध्यमतिथि मत्वाऽहरणानयन कृतमाचारण । अत स्वदेशोदयकाले या स्पष्टतिथि सैव लबोदयकाले मध्यमतिथिभविष्यनि नति विचार । अथ मध्यरविरमा स्पष्टरवि =स्पर अनयोरन्तरे द्वादशभक्त तदा स्पष्टति= मध्यच+चर्मफ=स्पष्टचन्द्र -स्पच मच~मर चमफरमफ.स्पच-स्पर रमचरमफ =स्पति=मति+ १२ १२ १२ स्पन--स्पर स्पति, मच-मर. र=मति १२ १२ अथ परमचन्द्रमन्दफजम् =५°10'" अनयोर्योग परम रवि मन्दफलम् =२११०३१" परम च म फ+परपफ-७°।१२।३६"< १२° प्रत परमस्पति-परममति परममपि १२ स्पष्टमध्यमतिथ्योरन्तरमेकनिथ्यल्पमेवेति सिद्धम् । एतेन मध्यम तिथ्यन्तात् चयफXरम फ पूर्व परतो वा एतत्त ल्यान्तरे स्पष्टतिथ्यन्तोऽभू-द्भविप्यतीति १२ सिद्धम् । अत स्वदेशोदयकाले या स्पष्टतिथि सैव लङ्कोदयकाले मध्यमतिथि कदा चिदेव स्यादिति निणीतम् । तेनाहरणोऽभीप्टवारार्थ संको निरेक्श्च कार्य । परञ्चात्र स्वदेशोदयकालीन स्पष्टतिथिलकोदयकालीनमध्यमतिथिनं स्यात्तदा साधिताहर्गरण सान्तर एव, तदप्यन्तर तिथ्यन्तरतुल्यमेव प्रतो यावत्स्वदेशोदयकालीन स्पष्ट तिथि लहोदयकालीन मध्यमतिथ्योरन्तर रुपतुत्य तावदेव सैकनिरेकरप- सस्कार शोभन । यावच्चोक्तनिथ्योरन्तर -२, यथा स्वदेशोदयकाले स्पष्ट तिथि =५ मी, मध्यमतिथि =६ष्ठी, स्वदेशोदयकाले स्पष्टतिथि =६ष्ठी, मध्य मतिथि =७मी, एवमित्यादि तावद्विसस्करणमेव भवितुमर्हति । अतोऽन तावत्सर्वत्र द्विसस्करणस्य योग्यता भवति नवेति निणीयते। कस्या अपि मध्यमतिथे रादितो मध्यम स्पष्टतिथ्यन्तर परम यत्तत्त ल्यमग्रनो दानेन यो बिन्दुस्तत्पर्यन्तमेतत्पूर्व- स्पष्टतिथेरन्तबिन्दुरागमिप्यति न कदापि तदने । प वि मध्यमगत्यन्नरम् =७३१ । २७ प्रतो मध्यमतिथिप्रमाणम्=५६ 12 130 मध्यमस्पष्ट तिथ्यन्तर परमाल्प मध्यमसावन घट्यादि =३५ । २६ । २६ मध्यमस्पष्ट तिथ्यन्तान्तर परम स्पष्टसावनघट्यादि =३६।१८१२६ (५६ । ३ । ३८)-(३६ ॥ १८ ॥ २९)-१६ । ४५। ६ (क) क्मानमरमादल्प पदापि न स्यात् । अतोऽस्य कमानस्यान्तविन्दुलकोदयकाले कल्पिते सिद्ध यद्रेसात प्राच्या यस्मिन् देगे चर देशान्तरयोग कमानतुल्यस्तद्देश- घ मध्यमाधिकार ६७ पर्यन्त कदापि द्विसस्करणस्य योग्यता न स्यात् । एव रेसात प्रतीच्याम् । अत एक- सस्करण सर्वदेशिकत्व द्विसस्करणस्याल्पदेशिकत्व सिद्धम् । तेनैकसंस्करणमेव युक्तियुक्तमिति । प्राचार्यवटेश्वरेणाहाणानयने विशेषविचारो न वृतोऽतस्तत्सम्ब न्धे किश्चिदुच्यते । अहर्गरणानयनेऽभीष्टाहश्च नाद्यन्तरे ये स्पष्टमासादयश्चान्द्रास्ते पामेव प्रयोजनम् । तन तदन्तरेऽङ्ग ल्यधिकरणगणनया यावन्तो मासा उपलन्धा- स्त एव गृहीता सन्ति । अतएवाभीष्टाहश्च नाद्यन्तरे स्पप्टोऽधिमास पतितोऽस्ति चेत्तदा तज्जनिताशुद्धिरहर्गणेऽवश्य पतिप्यतीति विशेप क्रियते । तष्टतिथ्यन्त- सौरान्तयोरन्तरस्थोऽधिशेपो मासाल्प कदाचिन्मामोऽपीत्यहर्गरणानयनवास- नोक्त स्मर्त्तव्यमिति । यदि स्पप्टोऽधिमास पतितोऽस्ति तदा यद्यधिशेप एकमासस्तदाऽधिमासा नयनेन गताधिमासा ये प्रागमिप्यन्ति तेप्वेवेवास्याप्यागमात्साधिताहर्गण शुद्ध एवात सस्वारो न कर्तव्य । यदाऽधिशेपो मासाऽल्पस्तदाऽऽगताधिमासान् सैकान् कृत्वाऽहर्गण साध्य । “अन्यथेष्टतिथ्यन्त-३० तिथि" एतत्तुल्यतिथ्यन्त कालि- काहर्गरण प्रागमिप्यतीति दोपापत्ति यदि च स्पष्टोऽधिमासोऽपतितोऽस्ति तदा यद्यधिशेपो मासाल्पस्तदाऽहर्गरण शुद्ध एवातोन सस्कारो न कर्तव्य । यद्यधिशेष एकमासस्तदाऽऽगताधिमासान् निरे- कान् कृत्वाऽहर्गण साध्य । 'अन्यथेष्टतिथ्यन्त +३० तिथि ' एतत्तुल्यस्तिथ्यन्त- कालिकाहर्गण प्रागमिप्यतीति दोषापत्ति । अथ यदेवमहर्गरण सस्कर्तव्यस्तदाऽधि शेषश्च नादयो मासाश्च किविशिष्टा ग्राह्याश्चन्द्रार्क साधने तदर्थविचार । उक्त प्रथमसस्कारकाले आगताधिशेपः अधिशे । वास्तवाधिशेष= कसी कसौ कामा X ३० _अशे+३० करमा, कसौ उक्त द्वितीयसस्कारकाले च कसौ प्रो कग्रमा ३०_अशे+कग्रमा ३० पागताधिशेः कसौ क्सौ कसो क्सी चैत्रादिगतमासाश्च क्रमेण संकान निरेकान् कृत्वा चन्द्रार्को माध्याविति । अथ वृहदहर्गणे यदोक्तसस्कारस्तदा लघ्वहर्गणे विविशिष्ट सस्वारस्तदर्थ विचार । यदा स्पष्टोऽधिमाम पतितोऽस्ति तदा यद्यधिशेषो मामस्तदा माधित चान्द्राहर्गण- एव नान्द्रवर्पोरितो यश्चयसितादिगतस्तिथिसमूह स एव वास्तव । यदा च मासाल्पस्तदान्य सस्कार क्तुं युज्यते स तथाऽधिमासम्य नियि होला लव- हर्गरण माध्य । यदा स्पष्टोऽधिमासोपतितोऽस्ति तदा यद्यधिोपो पाल्पम्नदा गृहोन चैत्रसितादिगत तिथिसमूह एव वास्तव । यदा चाधिगेपो मामस्नदा माधिन चया. अशे % 3D + D ग्रशे वास्तवाधिशे= - ६८ वटेश्वर-सिद्धान्ते सितादिगत तिथिसमूह-३० तिथि-वास्तव चत्र सितादिगत तिथिसमूह । अतोऽत्र वास्तवोप = चैसिगतिथिसमूह-३०-शुद्धि-चैसिनि ममूह-(३०, शुद्धि) एतावता यत्तिथिसघे सस्कृन तत्छुद्धावेव मस्कृतमभूदिति स्फुट दृश्यते ।। एतावता स्पष्टोऽघिमाम पतितोपोत्यारभ्य गुया तदा खदहनरित्यन्त भास्करोक्त सम्यगुपपद्यते सूर्य सिद्धान्तकार-सिद्धान्तोखरकारादिभिरेतद्विपये किमपि न कथ्यते । तैस्तु लघ्वाणानयनमपि न कृतम् । वटेश्वरेण क्षयमास सम्बन्चे न विशेषरूपेण विचार कृतोऽनस्तत्सम्बन्धे किञ्चिद्विचार्यते । यदा स्पष्टचामा>स्पसौमा तव क्षयमामोऽत कदैवमित्य- विष्यते। उच्चस्थाने स्परग-मरग- रमगतिफल १ सा० १८०० सष्टमोमासा- मरग-रमगफ न्त पासावन तथा १ सा० १८००= मसौरमासान्न पातिसावन अतोऽत्र स्पसीमा>ममौमा मरग १ साX२१६०० अथ यदा चगफतदा = स्पष्ट चामासान्त पाति- मच--(मरग-रमगफ) सावन १सा४२१६०० तथा = मचान्द्रमासान्न पानिसावन मचामा>स्पचामा मचग-मरग १ साX१८००-मसो मासान्त पाति सावन, मचग-७६०' । ३५"डयो. मरग मरग-५६ रन्तरकरणेन ७३१ । २७">५६' ।" मसौमा>मचामा अत स्पमौमा>मसोमा>मचामा>स्पचामा तथा कक्षा मध्यगतिर्यग्रेम्बा प्रतिवृत्तमम्पाते मरग स्परग स्पसौमा मसौमा तथा स्पचामा=मचामा तनापि स्पसौमा=मसीमा>मचामा स्पचामा स्पसौमा>स्पचामा, अथ नीचस्थरने १ मा १८००-म्पमोमामान्त पासावन । ममीमा>स्पसौमा 'मरग+रमगफ १साX२१६०० मनग-(मरंग+रमगफ) स्पष्ट चामामान्न पासावन मचामारस्पचामा एतावता स्पोमा<मौमा>मचामा <स्पचामा गध्यमसौरमासात् स्पष्ट सोरमासमध्यमचान्द्रमामयोरल्पत्वेन म्पनौमा<=>मचामा एतत्ययमपि सम्भाव्यते तथा स्पमोमा<=>यचामा एतत्मयमपि सम्भाव्यते निर्णायकाभावात् । प्रतोत्र ए -१८०० मध्यमाधिकार गणितमेव शरणम् । नीचे रविमन्दगतिफलम्-२ । १४" अनयोर्योग ६१' । २२" रविमध्यगति-५'८" -स्परग १ साX१८००-१८०० -२६।२०-स्पसौमा। स्परग ६११२२ मचग=७६०' । ३५" अनयोरन्तरम्=७२६' १३" १ सा/२१६०० स्परग=६१' । २२" ७२६ ।१३ २६ । ३७ एव यदा स्यात्तदा प्रत्यक्षत स्पसौमा<स्पचामा इति दृश्यते अत क्षय मासलक्षरण कदाचित्स्यादिति प्रतीतिर्जाता। पर कदा स्पचामा स्पसौमा इत्यन्विष्यते । २१६०० --छेदगमेन मचग-(मरग+रमगफ) मरग+रमगफ २१६०० (मरग+रमगफ) = १८०० {मचग-(मरग+रमगफ)}अपवर्तनन १२ ( मरग+रमगफ )= मचग-( मरग+रमगफ)= १२ मरग+१२ रमगफ =मच ग-मरग-रमगफ समयोजनादिना १२ मरग+१३ रमग मचग -मरग १३ रमगफम्मचग-१२ मरग -मरग = १३ मरग मचगम--१३मरग मचग रमगफ मरग-४।४१ १३ १३ एतेन सिद्ध यद्यदा रवेमर्मन्दगतिफल (१।४१) भवेत्तदा स्पचामा = स्पसौमा एव स्यादिति। अथ कस्मिन् स्थले १ । ४१ इद रवेमन्दगतिफल भवेत्तदर्थविचार । तत्कोदिजीवा कृतवाशभक्त त्यादि भास्करोक्त्या लघ्वी केन्द्रकोज्या, =रमगफ लघ्वीकेकोज्या = ५४ (११ ४१) - ५४ । २२१४ अस्याश्चापम् तथा कर्त्तव्य यथा भोग्यपण्डा स्फुटीकरण निरपेक्ष शुद्धमानमागच्छन् तद्यया। (६०५४) ३४३८__(6०५४५७३ = = (४'1३२" । ४२) ५७३-२२६२। १२० २० १८३३६, २४०६६, २६०४ ज्या प्रोह्य तत्वाश्विह्नावशेपमित्यादिना चापम केन्द्रकोटि, ग्रत केन्द्रामा (४६+६०)+ (01 १५) = १३६ + (०) १५) - ४.१६ | १५' या वर्तमानकालीन रवेर्मन्दोच्चम् % - =११४१ - D -- २०१८* एतद्युन तदा केन्द्राश+मन्दोच्च वटेश्वर-सिद्धान्ते रा - (४।१६ । १५) + (२०१८) = ७।७।१५' अर्थाद दृश्चिके गर्जेम्पत्रामा स्पसौमा एव भविष्यतीति सिद्धम् । अतोन्मालालादारभ्य पुनयंदैनत्तुल्य गनिफन स्यात्तावत्वालपर्यन्त क्षयमामपात मम्भाव्यते । विश्व नीचात्तुल्यान्तर उभयतस्तुत्यमेव गतिफ्न म्यादत २७० (४६ | १५) = २२० । ४५ D - ग ग ७।१०। ४५' अत्र मन्दोच्चयोजनेन (७। १० । १५') + (12) ६।२८° ! ४५' अर्थान्मरान्तपर्यत यावदविर्गमिप्यति तावदेव क्षयमाममम्भवोतो भाम्बरेग "क्षय कात्तिकादिनयेरणान्यत स्यादित्युक्तम्" अथ यदा क्षयमासो भवति तदा दर्पमध्येऽधिमामय भवतीनि निम्प्यते यदा क्षयमामपातस्तदा य स्पष्टसौरमास स्पष्टचान्द्रमामोदरे पतितस्तदादि सक्रान्तिविन्दावधिमामानयनेन मावगेपा ये गताधिमामाम्तनाधिोपमल्पतरमेव भवतीति दर्शनादवगम्यते । अत क्षयमामपातकालात्पूर्वमामान्तेऽवम्यमधिमामपान स्यात् । एवमेतद्दर्शनादेवान्तसक्रान्तिविन्दौ यदधिोपमागच्छति तत्तिश्चितन्यून- मामसममित्यवगम्यतेऽतोऽग्रेऽवश्य मामासन्नेऽधिमासपातो भविष्यतीति वर्षमध्ये धिमासद्वय भवेदेवेति , सर्व भाम्बरेण एव सिद्धान्नगिरोमणी म्फुट लिविन- मस्तीति। उत्पत्ति हि भा-"क्जन्मनाऽप्टो मदला समाययु" इत्यादि स मृदयादि में वर्तमान कल के जितने युग वर्ष बीते हैं उनका नाम गत वर्ष रखिये। तब गव x १२= गन मौरमास इममें चैत्रादि गत चान्द्रमास तुल्य ही सौरमास जोडन से मृप्टधादि से गन सौरमाम होंगे। गव४१२ गतचान्द्रमास तुन्य सौरमाम-मृष्ट्यादि से गत सौर माम-गरमाम दिनात्मक करने से गत सोरदि= (गव ४ १२+गत चान्द्रमास तुन्य सौरमाम)x३० इसमे इष्ट तिपितुल्यमौरदिन जोडने मे (गव X १२+गत चान्द्रमाम तुल्य सौर माम) x ३०+ इष्टनिइमौरदिन, तब "यदि युगमौर दिन म युगाधिमाम पाने हैं तो इष्ट अधिो - सौरदिन म क्या इस अनुपात से युगाधि माम X इसी =गताधिमाम+ युमो यहाँ पहले युचा गतमोर माम म चंत्रादि गत चान्द्रमास तुल्य मौरमाम जोडे थे इमलिये सौर चान्द्र के अन्तर तुन्य अधिशेष अधिक जोड़ा गया था । प्रत अनुपातागत अधिशेष को यदि छोड देते हैं नो उस त्रुटि का (पहले अघिदोष तुल्प अधिक लेने का) निराकरण हो जायगा इसलिये येवल गनाचिदिन का इष्ट सौर दिन में जोड़ने मे निप्यन्नवालिक चान्द्राहरण होगा इमोदि+गताधिदिन=निप्यन्त कालिक चान्द्राहगरण तव युगचान्द्र में युगावमदिन पाते हैं -इचा तो इप्टचान्द्र दिन में क्या इस अनुपात से मध्यमाधिकार: + युगावमX इचा. अवशे =गतावम+ इप्ट चान्द्राहर्गण मे घटाने से युचा युचा अवशे इचा-गतावम =तिथ्यन्त कालिक सावनाहर्गण, इसमे अवम शेष जोडने में युचा सूर्योदय कालिक सावनाहर्गण होगा, इचा-गतावम- अवमशे , अवशे युचा 'युचों ==इचा-गतावम सूर्योदयकालिक सावनाहगण । पृथ्वी पर सृष्ट्यादि काल से वारगणना क्यो प्रारम्भ की गई इसका निर्णय करते हैं। लङ्का प्रथम सूर्योदय काल का नाम सृष्टचादि है। वह काल यदि सब के लिये रविवारीय स्वीकार करते हैं तब रेखा से पश्चिम में दोपापत्ति होगी। इष्ट दिन के बाद जो सूर्योदय होता है उसके बाद अगले दिन की गणना प्रारम्भ करते है यही वारगणना के लिये व्यवहार है। इस तरह व्यवहार युक्त गणना में रेखा से पश्चिम देश में प्रथम सूर्योदय के बाद सोमवार गणना होती है। इसलिये “अर्कोदयादूर्ध्वमधश्च ताभि- रित्यादि से मृष्टयादि काल ही सोमवारप्रवृत्तिकाल है यह मिद्ध हुप्रा पर यह असङ्गत है । यदि नही तो मृष्टयादि के बाद जहाँ जहाँ जव जब प्रथम सूर्योदय होगा वहाँ यहाँ तब तय रविवार कल्पना करने से रेखा से पूर्व मे प्रथम सूर्योदय के बाद जो लङ्का द्वितीय सूर्योदय सोमवार प्रवृत्ति काल है वही अर्कोदयादूर्ध्वमधश्च ताभिरित्यादि से रविवार प्रवृत्तिकाल मिद्ध होता है । रेखा से पश्चिम में दोपापत्ति होती है इसलिये रेखा से पश्चिय में प्रथम सूर्योदय के बाद रविवार गणना रेषा से पूर्व में सोमवार गणना प्रारम्भ हुई। लका सूर्योदय वालिय मध्यमतिथि के नही विदिन होने के कारण स्व- देशोदयवालिक स्पष्ट तिथि को लवोदयवालिक मध्यमतिथि मान कर प्राचार्य न अहगंगान- यन किया हैं इसलिये स्वदेशोदयकाल में जो स्पष्टतिथि है वही लड़ोदयकाल में मध्यमतिथि होगी या नहीं इसके लिये विचार करते हैं । मध्यमरवि +रविमफल-स्पप्टरविरपर=मर + रमफ मध्यमचन्द्रचन्द्रन फल-स्पष्टचन्द्र=स्पच =मच चमफ मचेमरच मफरमफ दोनों के अन्तर को बारह से भाग देने पर= १२ -स्पति-मति च मफरमफ स्पच-स्पर =स्पप्ठतिथिम्पनि। १२ १२ =मध्यमतिथि:-मति पथ परमचन्द्रमन्दफल=५ ।२।६" दोनो ये योग करने से ७० १२' 1 ३६"<१२ परम रवि मन्दफल- २° । १०।३१" ७।१२।३६" ७।१२" । ३६" इमलिये परम स्पष्टति-परममनि- <१ इममे स्पष्ट है कि १२ स्पच-स्पर मच-मर पर ७२ वटेश्वर-सिद्धान्ते परमस्पष्ट तिथि और परममध्यम तिथि वा अन्तर एव तिथि से छोटा होता है, इसलिये च मफ-+-रमफ मध्यमतिथ्यन्त मे पहले या पीछ इतने अन्तर पर स्पष्टतिथ्यन्त हो गया १२ रहेगा या होगा यह मिद्ध हुअा, प्रत स्वदेशोदयकाल में जो स्पष्टतिथि होगी वही लड्को- दय काल मे मध्यमतियि कभी ही होगी-इसीलिये वार (दिन) लाने के लिये माधित ग्रह गरण में एक जोडना चाहिये या घटाना चाहिये। लेरिन यदि स्वदेशोदय कालिक स्पष्टतिथि मध्यमतिथि नहीं होगी तब साधित अहर्गण मे कुछ अन्तर पडेगा, वह अन्तर भी तिथ्यन्तर के बराबर होता है इसलिये जब तक स्वदेशोदयवालिक स्पष्टनिधि लोदयकालिक मध्यम- तिथि का अन्तर एक के बराबर होगा तभी तक "एक जोडनाया घटाना" इस तरह का सस्कार ठीक है। जब तक दोनो तिथियों का अन्तर= २ है, जैसे स्वदेशोदयकाल में स्पष्ट- तिधि =५ मी है, मध्यमति- ६ष्ठी या स्वदेशोदय काल में स्पतिथि-६ प्ठी है, मध्यम- तिथि =७ मी इत्यादि तव तक अहगंण मे दो सस्कार करना चाहिये, विमी मध्यमतिथि के आदि से परमस्पष्ट मध्यमतिथि के अन्तर तुल्य मागे दान देने से जो विन्दु होता है, उम विन्दु पर्यन्त इससे पूर्व स्पष्टतिथ्यन्त बिन्दु आवेगा कदापि उससे आग नही, पटी प.वि . रविचन्द्र के मध्यमगत्यन्तर=७३१ । २७ मध्यमतिथि प्रमा=५६ । ३। ३८ मध्यम और स्पतिघ्यन्तर परमाल्प मध्यमसावन घश्यादि=३५ ॥ २६ ॥ २६ मध्यम और स्पष्टतिथ्यन्तर परमाधिव स्पष्टसावनपट्यादि-६६।१८ । २६ (५६ । ३ । ३८)-(३६ | १८१२६)=१६ । ४५। ६ का मान इससे छोटा कभी भी नहीं होता है, इसलिये इस 'क' मान वे अन्त विन्दु को लोदयाल म मानने से सिद्ध होता है कि रेखा से पूर्व जिस देश में घर मोर देशान्तर "का योग (क) मान के बराबर होता है उस देश तक दो सस्वार की सम्भावना किसी भी तरह नहीं हो सकती है । इसी तरह रेसा से पश्चिम देश मे भी विचार करना, इसलिये ग्रहण में एक सस्वार की व्यापकता, दो सवार को प्रव्यापकता मिद्ध हुई। मत एव मस्वार ही ठीक है ॥ माचार्य वटेश्वर ने महर्गणानयन में विशेष विचार नहीं किया है इसलिए उमके सम्बन्ध मे कुछ विचार करते हैं। महगणानयन मे अभीष्टदिन और चंवादि के मन्तर में जो सप्ट चान्द्रमामादि होते हैं उन्ही का प्रयोजन होता है वहाँ उगरे अन्नर में गणना करने से जितने मान उपलब्ध होते हैं वे ही ग्रहण किये गये हैं। इसलिए यदि इप्ट- दिन भौर चंत्रादि के अभ्यन्तर में स्पष्टाधिमाम पतित हो तो तजनित त्रुटि प्रहगंए में अवश्य होगी । वहा इष्टतिप्प त पौर सौरान्त के मध्य में जो मागाल अधिशेष है वह कभी एव महीना के वरायर भी होता है यह वात प्रदर्गणानयन को उपपत्ति देखने मे साफ होती है। यदि स्पटाधिभार पनित है तर अधिशेष यदि एक माम दे बराबर है तब अधिमाम मध्यमाधिकार ७३ %D- अधिशे - कसौ कममा ३० साधन से जो गताधिमास पावेंगे उन्ही मे इसके भी आने से साधिताहर्गरण शुद्ध ही होता है इसलिए किसी सस्वार की जरूरत नही होती है । यदि अधिशेष एक मास से अल्प हो तब अधिमासानयन से जो गताधिमास आवे उनमे एक जोडवर अहगण साधन करना चाहिए नहीं तो इप्टतिथ्यन्त--३० तिथि एतत्तुल्य तिथ्यन्त कालिक अहर्गरण पाने से दोपापत्ति होती है । यदि स्पष्टाधिमाम अपतित है तब यदि अधिशेष मामाल्प हो तो अहर्गण शुद्ध ही होता है इसमे विमी मस्कार की जरूरत नहीं होती है । यदि अधिशेप एक महीना के बराबर हो तो अधिमासानयन से जो गताधिमाम आवे उनमे एक घटाकर अहर्गरणानयन करना चाहिए नहीं तो "इष्टतिथ्यन्त + ३० तिथि" एतत्तुल्य तिथ्यन्तकालिक अहर्गण प्राने से दोपापत्ति होती है । यदि अहर्गण में इस तरह के सस्कार होते हैं तब अधिशेप और चैत्रादि माम किस तरह ग्रहण करना चाहिए चन्द्रमा और रवि के साधन के लिए, उसके लिए विचार करते है। अधिशे अधिो प्रथम मस्कार के अवमर में पागताधिशे = वास्तवाधिो कसौ' कमो ग्रमा ३० अधिशे + कपमा x ३०, + द्वितीय सस्वार समय में पागता- कसो कसौ अधिशे अधिशे कप्रमाX ३० कसौ वास्तवाधिशे %D क्सो अधिशे क्सौ चनादि गत मासो मे एक और निरेक कर चन्द्रमा और रवि के साधन करना चाहिए । बृहदहर्गण मे जब इस तरह के सस्कार किये जाते है तब लघ्वर्गण म किस तरह के सस्कार करना चाहिए इसके लिए विचार करते हैं । यदि स्पष्टाधिमास पतित है तब अधिशेप एक महीना के बराबर हो तो चान्द्रागंण ही में चान्द्रवर्ष के उर्वरित जो चैन सितादि गततिथि समूह है वही वास्तव है । यदि अधिशेप मामाल्प है तव जो सस्कार करना चाहिए वह और अधिमाम की तिथि लेबर लघ्वहारा माघन करना चाहिए । यदि स्पाधिमाम अपतित है तब अधिशेष यदि मासाल्प हो तो जो चंग सितादिगत थिसमूह लिया गया है वही वास्तव है । यदि शेष एक महीना के बराबर हो तो साधिन पंसितादिगत तिथिसमूह = वास्तव चे ग्रसितादिगत तिथिममूह, इमलिए चमिगततिथिसमूह--३० चंमिगतिममूह (३०+ शुद्धि) दमको देसने से स्पष्ट है कि जिसको तिथिमघ में संस्कार करना चाहिए वह शुद्धि ही में किया गया है। इन मय मे "स्पष्टोधिमाम पतितोऽपि" इत्यादि मे लेकर 'शुद्धया तदा सदनयुनया" यहा तर भास्वरोक्त उपपन्न होता है । मूर्यमिदान्तवार और मिदान दोसरवार ने इन विषयों में कुछ भी नहीं वहा है । उन्होंने लघ्वहगंगानयन भी नहीं किया है। वटेश्वराचार्य क्षयमाम के विषय म विशेषविचार नहीं किया है इसलिए उसने सम्बन्ध में कुछ विचार करते हैं ॥ ३० तिथि यहा वास्तव वटेश्वर-सिद्धान्ते जब पचामा > स्पसौमा तभी क्षयमाम होता है इसलिए क्व इस तरह की स्थिति होती है । इसके लिए विचार करते हैं। १ माX१८०० उच्चस्थान मेस्सरगमरग-रमगफ, -स्पष्ट मौरमामान्त पाति मावन मरग-रमगफ तथा १ मा X १८०० मरग = मध्यम सौमामान्त पातिसावन । : स्पमौमा > ममोमा १साX२१६०० जब चगफ: तव मच स्पष्टचान्द्रमासान्त पातिमावन गफ १ साX२१६०० तथा - मध्यम चान्द्रमासान्त पासावन मच ग मरग १सा x१८०० मचामा स्पचामा । =ममौरमासान्त पामावन मरग मचग% ७६०, ३५" मरग - ५६' ।" दोनो के अन्तर = ७३१ । २७" > ५६'।" मामा > मचामा m : स्पसोमा प्रत स्पमोमा> मसोमा > मचामा > स्पचामा । तथा कक्षा मध्यगतिर्यग्रेखा प्रतिवृत्त का सम्पात मे मरग = स्परग । = ममीमा तया स्पचामा मचामा वहा भी स्पोमा = मसौमा मचामा चामा स्पमौमा > स्पचामा । नीचस्थान मे १ सा x १८०० स्पष्टमोरमासान्त पानिमावन, मसौमा > स्पनीमा मरग+ रमगफ १सा x २१६०० = स्पचामामान्त पासावन मचामा <स्पचामा। मचग- (मरग + रमग प) इसमे मिद्ध होता है कि सासोमा < मसौमा > मचामा < पचामा, मध्यम सौरमास से स्पष्ट सौरमाम और मध्यमचान्द्र माम वे अल्प होने के कारण रूपसौमा <=> मघामा ये तीनो हो रावन हैं। तथा स्पसौमा < = > स्पनामा ये भी ती! हो सकते है। इसलिए यही गणित ही शरण है। नीचस्थान में रविमन्दगफ - २।१४" रविमध्यग दोनो के योग =६१ । २२"= सरंप = ५६ ।" माx१८०० स्परग १८०० ६१ । २२ = २६ । २० - स्पगौमा ७१० ३५" दोनो के मनर D ७२६।१३" स्परग = ६१' । २२" १ मा x २१६०० ७२६।१३ मध्यमाधिकारः ऐसी स्थिति में प्रत्यक्ष देखने में आता है कि स्पसौमा < स्पचामा इसलिए क्षयमाम का लक्षण कभी होता है यह प्रतीति हुई। लेकिन कब स्पचामा = स्पसौमा इसके लिए विचार करते हैं। २१६०० १८०० छेदगम करने से मचग -(मरग + रमगफ) मरग+ रमगफ २१६०० (मरग + रमगफ) १८०० {मच ग (मरण + रसगफ) अपवर्तन देनेसे १२(मरग+रमगफ)= =मचग--(मरग+रमगफ)=१२ मरग+१२ रमगफ = मचग-मरग-रमगफ सशोधन करने से १२ मरगफ-+-१३ रमग=मचग-मरम ::१३ रमगफमच ग-१३ मरग मच ग-१३ मरग मच ग : रमगफ- -मरग-१.४१ - इमसे सिद्ध होता है कि जब रवि के मन्दगतिफल (११ ४१) इतना होगा तव स्प. चामास्पमौमा ऐमा होगा। किस स्थान मे (१ । ४१) इतना रवि के मन्दगति फल होता है इसके लिए विचार । तत्वोटिजीवावृतवाणभक्ता इत्यादि से लघुकोज्या = १ ४१- रमगफ, लकेन्द्रकोग्या- (११ ४१)४५४% ५४ । २२१४% 8० । ५४, इसके चाप करते हैं । (६० । ५४) ३४३८ (६० । ५४) ५७३ = (४' । ३२" । ४२"") ५७३ १२० २२६२, १८३३६, २४०६६, २६०४ ज्या प्रोद्यतत्त्वाश्चिहतावशेष इत्यादि से चाप- ४२°११५ = केन्द्रकोटि इमलिए केन्द्राय:- (४६६०) + (०।१५)= १३६+ (०।१५) २० रा --४ । २६०।१५' इसम वर्तमानकालीन रविमन्दोच्च जोडने से रा (४ । २६° । १५') + (२ । १८° )=७ । ७° । १५' अर्थात् रवि के वृश्चिर म रहने से स्पचामा= स्पमौमा ऐमा होता है यह मिद्ध हुप्रा । इसलिए उम काल में लेकर फिर जय एनत्तुल्य गतिफल होगा तावत्वाल पर्यन्त क्षयमाम पात की मम्भावना होगी । लेकिन नीय स्थान में दोनो तरप तुल्यान्तर म तुल्य ही गतिफल होता है इसलिए २७० -(४६।१५) . = २२० । ४५'७ ॥ १०° ४५' यहा रवि वे मन्दोच्च जोडने से (७।१०। ४५' ) (२॥१८°)%3D२८° । ४५ मयान मकरान्त पर्यन्त जब तब रवि जायेंगे तभी तब क्षयमान सम्भव होता है इमलिए भास्कर ने "क्षय कातिवादियनान्यन' इत्यादि टीप ही कहा है । जय भयमाम होता है तब वर्ष के मध्य म दो प्रपिमान होते हैं। इमरे लिए विचार बरते है । जय दायमाम पात होता है तो स्पष्ट मौरमाम स्पष्ट चान्दमाम ये मध्य ही में पर वटेश्वर-सिद्धान्ते ये मव जाता है तव प्रथम सक्रान्ति विन्दु म अघिमासानयन से अधिशेप महित जो गताधिमाम प्रावेमा उनमे अधिशेप बहुत छोटा होता है इमलिए क्ष्यमाम पातकाल मे पूर्व मासान्त में अवश्य ही अधिमामपात होता है । इसी तरह इसके देखने ही से अन्त सत्रान्ति विन्दु में जो अधिशेष पाता है वह विञ्चिन्नयून एक माम के बराबर होता है इसलिए आगे मामा सन्न म अवश्य ही अधिमास पात होगा प्रत वर्ष मध्य म दो अधिमाम मिद्ध हुए । वातें भास्कराचार्य ने अपने सिद्धान्तशिरोमणि म स्पप्ट कही हैं । अथ केषु केपु शाकवर्षेषु क्षयमासोऽभूभविप्यत्यादेनिर्णयार्थ विचार्यते । यदि कात्तिवात्पूर्व कस्मिन्नपि मासेऽधिमासपातस्तदैव कात्तिकादित्रये क्षयमाससम्भव इति । विश्वासावधिमासपातो वर्षाद्यधिशेपस्यार्थाप्राकनन प्राक्तन वान्ताधिशेपस्य शुद्धिमज्ञकस्य वशेनैव भवितु शक्यत इत्यल्पविचारेणेव स्फुटम् । उक्तशुद्धेरभाव उक्ताधिमासस्याप्यभावात् । अतो यादृशीपु शुद्धिपूक्ताधिमासपातस्तासामेवैक- तमा 'यदा किलैवविंशति शुद्धिस्तदा भाद्रपदेऽधिमास" इत्थ भास्वरेणोदाहृता यासना भाष्ये । अतस्तद्वत् यदोक्तशुद्धि २१ तदा भाद्रपदोऽधिमास कथमिति विचार । मेपादिक्रमेण राशीनामाद्यन्तकालीन स्पष्टाफ ०,१,१,२,२,३ ११, १२ रागय एभितितात्कालिक मन्दोच्चेन २५१८° स्वस्वमध्यार्काद्विलोम- प्रकारेण साध्या । तत्राऽपन्नयोर्द्वयोर्द्वयोरन्तरेणानुपातेन __(१ सा - अन्तरक) लब्धदिनानि स्पष्टसौरमासा शिरोमणेष्टिस्पराया ते लिखिता सन्ति । अथ कन्या पूर्यमारणमासस्य भाद्रत्वेन आदित उक्तपञ्चसौरमासैपु पृथक् पृथक् चैत्रादि स्पष्ट- चान्द्रमासा कर्तुं युज्यन्ते स्वस्वस्पष्टाधिशेपावमाय । तत्रर्णखण्ड स्वल्पान्तरान्मध्यम- चान्द्रमाससमये व्यतीतम् प्रतिवर्षे तत्काले १ सा x २१६०० मचग + चगफ (मरग+ रगफ) = स्पचान्द्रमासान्त पातिसावन । अत्र "चन्द्रगतिफल" अस्य निश्चयाभावात् रमग अथ ते शेषा २६।३१।५० २६।३११५० २६१३१५० २६।३१५० २६।३११५० ३०॥५॥३३ ३१॥५८५६ ३११३७।३२ ३१।२८।३५ ३१ २०५२ १।२३।४३ १।३३१६ 1 ५४२ १।५६.४५ १।३१। २ १। २३ । ४३ स्वल्पान्तरात्स्पष्टभाद्रमास २। ५। ४२ (२६ । ३७ । ०) - (८ । ३२ । १८) २१ । ४ । ३२ १। ५६१४५ अतो यदा किलकाविंशति शुद्धिस्तदा भाद्रपदोधिमास १।३१। २ इति युक्तियुक्तमेवेति ॥ ८।३२।१८ सर्वाधिशेप अथ यादृश्या गुद्धौ तदग्निमे वर्षे उक्ताऽधिमासपातस्तादृशी शुद्धिरने पुनर्यद्वर्षान्ते स्यात्तदग्रिमे वर्षे:वश्यमुत्ताधिमासपातेन क्षयमासमम्भव किञ्च यन्मि- सर्व पूर्णाधिमासा लभ्यन्ते तन्मिता एव समा (वर्षाणि) उक्तशुद्धिद्वयनिष्ठवर्षा- D मध्यमाधिकार न्तयोरन्तरे स्यु कथमिति कथ्यते । वर्गस्यान्तेऽधिमासानयनेन गग्रमास + शु== मावयवाधिमास तदने पूर्णाधिमासोत्पादक्वन्तेिऽधिमासानयनेन गनमा + एक द्वित्यधिमाम + शुद्धि = गनमा, + शुद्धि - सावयवा- सिद्धम् , अथ कियन्मितैर्वर्षे पूर्णाधिमासास्तज्ज्ञानम् । कामास ४१-१५६३३००००० कल्पसौरवर्ष ४३२००००००० धिमास, - ०+2 २+2 २+2 २+2 ६+2 १+2 ११, ७+2 ३+३ अथाऽऽसन्नमानग्रहणेन क्रमत एकवर्षेऽधिमास सख्या एतद्दर्शनात्स्फुटमेतद्यत् -- हरमिते व भाज्यमितोऽधिमासस्तेन यस्मिन् वर्षे क्षयमासस्तदारभ्य हारमित पुन पुन क्षयमाससम्भव । तनातिम्थूलत्दा- दाद्यचतुष्टय त्यक्तम् । शेषेषु च १६, ११२, १४१, २६३ एतानि ग्रहीतु युक्तानि पूर्वापक्षया सूक्ष्मत्वादल्पदिनात्मकत्वेन लोके प्रतीत्युत्पत्तेश्च । तत्रापि भास्वरेण मुख्यतया १६, १४१ इमावेव गृहीती किच्च प्रागग्रतश्चति भास्करभाष्येण १६, १४१ १६ १२२ १४१ + १६ १६०, १४१ एतानि स्वयमेव गृहीतान्य भवन् । युक्तिसिद्धमेव तत् यतो यदा क्षयमासस्तत पूर्व परश्च १६ वर्षे थायमान इति युक्त्यव सिद्धमस्ति । अतो १४१ ऽस्मादपि पूर्व परतो १६ वर्षे क्षयमाम इति सिद्धम् । पिञ्च भाम्बरगृहीतेभ्योऽपि मूक्ष्मस्वल्पदिनात्मरमरि २६३ इद मान भासरेण क्य न गृहीत तदर्थ मुधाकरद्विवेदिनाऽक्षिप्यते । युवेदेन्दुवर्षे कानिद्गोकुवनवेन्द्रादयहीने पुवेदेन्दु वएँ । क्षयाम्या स्थितिर्भाव गनिम्त्ता न रामारिनेमें रिमर्थ न वेदमि ।। हि भा-प्रय विन विन गारवर्षों में क्षयमाम हो गया है पौर होगा इसके लिए विचार परले हैं। यदि वातिर में पहले दिनी महीने म मधिमा पा होता है नभी यातितादि. भय मामो मधयमा गम्भव होता है। लेकिन यह मधिमामपात वर्षादि प्रपिगेप में मान् वटेश्वर-सिद्धान्ते पहले-पहले के शुद्धिसज्ञक वर्षान्ताधिशेष के वा ही में हो सकता है । उस शुद्धि के प्रभाव से उक्ताधिमास का भी प्रभाव होता है.। इसलिए जिस तरह की शुद्धियो में उक्ताधिमास पात होता है उन्ही शुद्धियो मे एक "यदा किलकविंशति गुद्धिस्तदा भाद्रपदोऽधिमाम" इस तरह भास्कर कथितोपपत्ति भाष्य मे है। इसलिए जव उक्त शुद्धि-२१ तव भाद्रपद अधिमास क्यो होता है इसके लिए विचार । मेपादि क्रम में राशियो के आदि भोर अन्त- कालिक स्पष्ट रवि=०, १, १, २, २, ३ ११, १२ राशि इन पर मे विदित ताला- लिक रवि मन्दोच्च के द्वारा अपने अपने मध्यम रवि से दिलोम प्रकार से साधन करना। "१ सा अन्तरक' पहा प्रासन्न के दो दो के अन्तर से अनुपात- द्वारा लब्ध दिन स्पष्ट सौर- रमंग मास होते हैं जो सिद्धान्तशिरोमणि के टिप्पणी मे लिखित है। कन्यार्क में पूरा होने वाले मास को भाद्रमाम होने से आदि मे उक्त पाचो सौरमासो में अलग अलग चत्रादि स्पष्ट चान्द्रमासो को करना युक्तियुक्त है अपने अपने स्पप्राधिरोप और अवम के लिए । वहा ऋणखण्ड स्वल्पान्तर से मध्यम चान्द्रमास ममय ही व्यतीत हो जाता है प्रत्येक वर्ष मे तत्काल मे १ सा X २१६०० मच गचगफ मासान्त पाति सावन, इसमें चन्द्रगति फल के निश्चयाभाव से वे शेप अघोलिसित हैं। -स्पष्ट चान्द्र- -(मरग+रगफ) २६ । ३१ । ५०/२६ । ३१ । ५० २६ । ३१ । ५० २६ । ३१। ५०।२६।३१। ५० ३० । ५५ । ३३ | ३१ । ५८ । ५६ | ३१ । ३७ । ३२ ३१ । २८ । ३५३१।२।५२ ६ २ । ५। ४२ १। ५६ । ४५ १।३१। २ १।२३।४३ स्वल्पान्तरात्म्पप्टभाद्रमास- (२६ । ३७1०)--(८ । ३२ । १८)=२१॥ ४ । ३२ प्रतो, यदेकविंशति शुद्धिस्तदा भाद्रपदोऽधिमास इत्यादि भास्करोक्त युक्तियुक्न सिद्ध हुआ ॥ २।५ । ४२ १। ५६ । ४५ ८ । ३२ । १५-मर्वाधिशेष प्रव- जिम तरह की शुद्धि में अग्रिम वर्ष मे उक्ताधिमास पात होता है उस तरह की मुद्धियो मे फिर जिस वन्ति मे होता है उससे अग्रिमवर्ष में प्रवश्य ही उताधिमास पात से क्षयमाम सम्भव होता है किन्तु जितने वर्षों में पूर्णाधिमास की उपलब्धि होती है उतने ही वर्ष उक्त शुदिन्यनिष्ठ वर्षान्तद्वय के अन्तर में होते है क्यो. ऐमा होता है, तदर्थ युक्ति- वर्ष वे अन्त म अधिमामानयन से गामास+शु-मावयवाधिमाग उससे मागे पूर्णाधिमासोत्पादक वर्षान्त भे अधिमासानयन से गताधिमाम+एकदिन्यधिमाम-गु-- यममा, +शुद्धि=सावयवाधिमाम : पूर्वोक्त सिद्ध हुमा ।
मध्यमाधिकार: ७६ वितने वर्षों में पूर्णाधिमास होता है उसके लिए विचार प्रमाX१ १५६३३००००० कल्पवर्ष ४३२००००००० १४४०० +2 २+2 १+2 २+2 २+2 १+1 १+2 ७+2 ३+३ प्रामन्नमानग्रहण मे क्रम से एक वर्ष मे अधिमास संख्या- ४५ इनके देखने से स्पष्ट है कि हर तुल्य वर्ष में भाज्य तुल्य अधिमास होता है इसलिए जिस वर्ष में क्षयमास होता है उससे लेवर हार तुल्य वर्षों में फिर फिर क्षयमाम मम्भव होता है उनमे प्रति स्यूलत्व के कारण पहले के चार मानो को छोड दिया गया। शेषमानो मे १६, ११२, १४१, २६३ ये ग्रहण करने के लिए युक्तियुक्त है उनमे भी भास्कर ने मुख्यरूप मे १६ । १४१ इन्ही दोनो को लिया है । विन्तु "प्रागग्रतश्च" इम भास्करभाष्य मे १६, १४१ --- १६% १२२, १४१ + १६%D१६०, १४१ यह तो स्वय लिये गये। जब क्षय- माम पात होगा उससे पहले और पीछे १६ वर्षों मे क्षयमास होगा अंत १४१ इमसे भी पहले और पीछे १६ वर्षों में क्षयमाम सिद्ध होता है। भास्वर गृहीत वर्षों से भी सूक्ष्म २६३ यह मान भास्कराचार्य ने क्यो नही ग्रहण किया। तदर्थ म म सुधाकर द्विवेदी जी ने प्राक्षेप किया है जैसे- "कुवेदेन्दुव क्वचिद्गोकुवर्षे” इत्यादि ।।२।। प्रथाहर्गणानयस्य द्वितीय प्रकार । पातोऽर्कमासनिकरः क्षरणदाकराहैनिम्नोऽकंवासरहृतो गगनाग्निनिघ्नः । तिथ्यन्वितः कुदिनसङ्ग.णितो विभक्तश्चन्द्र धमिदिनगणः सलु घाससकः ॥३॥ वि. भा.-यात. (गतः) अर्कमासनिकरः (मौरमाससमूह.) क्षणदाफराहै. (युगचान्द्रदिनमान.) निघ्नः (गुणितः) अवासरहृतः (युगसौरदिनर्भक्तः) गगना- ग्निनिघ्नः (त्रिंगद्विगुणित) तिथ्यन्वितः (गततिथिसख्यया युक्तः) कुदिन सङ्ग गित. (युग मावनदिन गुरिणतः) चन्द्राभिविभक्तः (युगचान्द्रदिनहतः) फलं वा दिनगणः (मावनागरगो वित्) दिनपतिज्ञानायं यदि प्रहर्गणः सप्तभक्त: शेपो रव्यादिगणनया वर्तमानवारो नागच्छेत्तदाऽहगण: मंक: (एफेन सहित.) कायं. 2 वटेश्वर-सिद्धान्ते प्राचार्येण केवल 'सक ' इत्येव कथ्यते परं निरेक करणास्यपि स्थितिर्भवत्यतः "सको निरेश्व" कथन युक्तिसङ्गतमिति । हि भागतसौरमासममूह को युगचान्द्रदिन सख्या से गुणा वर युगसौरमाम सख्या से भाग देना फल को तीस (३०) से गुणा करना, गत तिथि संख्या को जोडना फिर युग दिन मख्या से गुणकर युगचान्द्र दिन में भाग देना तव जो लब्धि होती है वही अहर्गण होता है, 'उस ग्रहण पर से यदि दिनपति ठीक नही आवे तो अहर्गण में एक जोडना या घटाना चाहिये तब उस अहगंग पर मे ठीक वर्तमान दिन आजायेंगे । यहा प्राचार्य ने केवल एक जोड़ना ही कहा है, परन्तु कभी कभी एक घटाने की भी स्थिति प्राजाती है इमलिये एक घटाना भी कहना चाहिये ।।३।। उपपत्ति. यदि युगसौरदिनयुं गचान्द्रदिनानि लभ्यन्ते तदा गतसौरदिनै किमित्यनुपातेन गतसौर दिनसम्बन्धि चान्द्रदिनानि तत्स्वरूपम् -युगचान्द्रदिन ४ गतमौरदिन युगसौरदिन युगचादिX गतसौरमास x ३० युगचादि Xगतसौरदि युगसौरदिन गतसौरदिस युगसौरदि चादिन । अत्र शुक्ल प्रतिपदादितो वर्तमानदिन यातिथिसख्यायोजनेन वर्तमानदिन यात्तिथ्यन्तकालिक चान्द्राहर्गण = युगचादिX गतसौरमास ४३० युगसौरदि गततिथि, ततोऽनुपातो यदि युगचान्द्रदिनैर्युगकुदिनानि लभ्यन्ते तदाऽऽनीत चान्द्राहर्ग- णेन किं सगागमिष्यति तत्सम्बन्धि सावनाहर्गण । अहर्गरातो दिनपतिज्ञानार्थ कदाचित्कदाचिदहर्गरण सैको निरकेश्च कार्य --एतस्य कारण (१२) श्लोकोपपत्ती मया प्रदर्शितम् । + हि भा ---युगसौर दिन मे युगचान्द्र दिन पाते हैं तो गतसौर दिनो मे क्या इस अनुपात मे गतमौर दिन सम्बन्धी चान्द्रदिन प्रमाण प्रा गया युगचादिगतमोरदि युगसौरदि युगचादिX गतमौरमास ४३० -- गतसौरदिमचान्द्रदिन, इसमे वर्तमान महीना के शुक्ल युगमौरदि प्रतिपदा म वर्तमान दिन तक तिथिसख्या जोडने में वर्तमान दिन तक चन्द्राहण हुआ, युगवादिX गनमारमाम४३० +गतिथि चान्द्राहर्गण । तव अनुपात करते हैं कि युग- युगसौरदि चान्द्रदिन मे युगकुदिन पाते हैं तो चान्द्राहर्गण म क्या मा जायगा तत्सम्बन्धो मावनाहरण, अहर्गरण से दिनपतिज्ञान के लिये कभी कभी महर्गण में एक जोडा जाना है, या घटाया जाता है। इसका कारण १२२ श्लोको की उपपत्ति में दिखला चुके हैं इति ।।३।।
मध्यमाधिकार ८१ युगसोदिX ग्रहर्गण =गतसौदि + % 3D युकु पुनरहणानयनम् । युगक्वहना रवियातवासराः समन्विता सूर्यदिनोत्यशेषकं । विभाजिता. सूर्ययुगोत्यवासररहर्गरण स्यादथवैफसयुत ॥४॥ वि भा -रवियातवासरा (गतसौरदिवसा) युगक्वघ्ना (युगकुदिन- गुणिता ) सूर्यदिनोन्यशेपर्व (अहर्गरणसम्बन्धि सौरदिनशेष ) समन्विता (युक्ता) सूर्ययुगोत्यवासरे (युगसौरदिन) विभाजिता (भक्ता) अथवाम्हण भवेत् । एकसयुत (एकयुत ) तदा वास्तवाहर्गरण स्यात् (अहर्गरणे सप्तभक्ते यद्यभोप्ट- वारो नागच्छेत्तदाऽहर्गण सैकोऽथवा निरेकश्च कार्य ) इति ॥४॥ अयोपपत्ति । यदि युगकुदिनेयुगसौरदिनानि लभ्यन्ते तदाऽहर्गणेन किमित्यनुपातेन सशेषा- गतसौरदिवसा समागतस्तत्स्वरूपम्= शे पक्षी युकुदि 'युवदि' गुणितो तदा युगसौदि,अहर्गण--युकुदि गतसौदि+शे पुन पक्षी 'युसौदि' भक्ती तदा- युकुदि गतसौदि+शे अहर्गरण , अनेनाचार्येणाऽहणे युसोदि सर्वश्रेवाभीष्टवारज्ञानार्थं सैककरणमेव लिखित कुनापि निरेककरणस्य चर्चा न कृता, सिद्धान्तशेखरे श्रीपतिनाप्यहर्गणानयनेषु सककरणमेव लिखित परमिय त्रुटि- रस्ति । निरेककरणस्यापि स्थितिर्भवति, सिद्धान्तशिरोमणी भास्कराचार्येण सैक्करण निरेककरणश्चाभिहित यथा अभीष्टवारार्थमहर्गणश्चेत्सको निरेकस्तिथयोऽपि तद्वन् । तदाऽधिमासावमशेषके न कल्पाधिमासावमयुक्तहीने ॥ हि भा-गत सौर दिन को युगकुदिन से गुण देना शेष (ग्रहगण सम्बधी सौरदिन दोप) जोडकर युगसौरदिन मे भाग देने से ग्रहगण होता है । ग्रहगण मे एक जोडने से वास्तवा- हगण होता है । अभीष्टदिन मानार्य ग्रहगए म सात से भाग देने से एक आदि शेष रहने पर रवि मादि दिन समझना चाहिये, अहर्गण म सात से भाग देने मे यदि दिन ठीक पावे तो महर्गण को शुद्ध समझना चाहिये। यदि एक दिन वा अन्तर हो तो एक जोडवर या कही घटापर भी प्रहगण लेना चाहिय, यदि अधिक दिन का अन्तर पढे तो अहर्गण को पद मममता चाहिय । वहा पुन जाच के लिय गणित करनी चाहिये ॥४॥ उपपत्ति यदि युग बुदिन म युगसौर दिन पाते हैं तो महगरण म पया इम मनुपात से दोप युगमोरदिXमहगण =गतसोरदिन माहित गत सोरदिन पाते हैं। दोना पक्षो युबुदि युबुद्धि फो "यदि' से गुएने से युगसोदि प्रहगंग-युकुदि गनमौदि+दो फिर दोना पक्षों को । ८२ वटेश्वर-सिद्धान्ते "पुगसौदि" से भाग देने से युकुदि गतमौदि+शे युमोदि =महर्गण, ग्रन्थकार महर्गरण में मव जगह एक जोडना ही कहते हैं परन्तु अहर्गए पर से इप्ट दिन लाने पर यदि ठीक नहीं आता है तो अहर्गरण में वही एक जोडा जाता है। सिद्धान्त शेखर में श्रीपति ने भी अहह्मणानयनो मे प्रत्येक स्थान में एक जोडना ही लिखा है रिमी प्रकार मे अहर्गण निरेक (एक घटाना) करल को नहीं लिया है । भास्कराचार्य ने सिद्धान्त- शिरोमणि मे दोनो बानें कि करना, निरेक करना) लिखा है अर्थात् साधित महरंग पर इप्टवार ज्ञान के लिये यदि महर्गरण मे एक जोडने से अभीष्टवार मावे तो एक जोडना यदि एक घटाने से ही इष्टवार मावे तो एक घटा देना चाहिये । जैसे "भभीएवारार्थमहर्गणश्चेत्मक" इत्यादि ॥४॥ पुन प्रकारान्तरेणाहर्गणानयनम् । वृद्धयहावम-विशेष सङ्ग.णा प्रतसूर्यदिवसा विनाजिता. । प्रोक्तवदविदिनस्त्वहरणः सैकयात रविवासरान्विताः ॥५॥ विभा-प्रेतसूर्यदिवसा (गतमोरवासरा) वृद्धचहावमविशेषसगणा (मुगावमाधिदिनान्तरगुणिता) रविदिन (युगसौरदिन ) विभाजिता (भक्ता) संकयात रविवासरान्विता (एकसहित गतसौरदिनयुता) तदा पूर्ववदहर्गणो भवेदिति ।। ५॥ अस्योपपत्ति मथ युचान्द्रदि-युसावनदि-युअवमदि । युवादि-युसौरदि-युगापिदिन अनयोरन्तरेण युचादि-युसौदि-(युचादि-युसावदि)=युगापिदि-युगावमदि -युगचादि-युसौरदि-युगचादि+युमावनदि =युगसावनदि-युगसौदि-युगाधिदि-युगावमदि ततोऽनुपातो यदि युगसौरदिनरिद युगाधिदिनावमान्नर लभ्यते तदा गन सौरौंदन विमित्यनुपातनेष्ट सावर्नादनेप्ट सौर दिनयोरन्तरम् = (युगाधिदि-युगावमदि)गसौदि (युगमावनदि-युगमौदि) गमौदि युमोदि युगसौदि =इष्टनावनदि-इसौरदिगनाहरण-गतसोरदि . (युगाधिदि-युगावमदि) गसौदि । गमौदिगताहर्गण युसोदि अत्रेष्ट वार ज्ञानार्थमगण को निरेपश्व कार्य परमाचायग निरेववरण न कथ्यते । एतावताचार्योक्त मुपपन्नम् ।। ५ ।।
मध्यमाधिकार हि भा -गतसौर दिन को युग के अधिमास दिन और अवम के अन्तर स गुणकर युगसौर दिन से भाग देने स जो फल हो उसमे गतसौर दिन और एक जोडने स अहगण होता उपपत्ति युगवादि-युसावनदि=युगावम युचादि-युगसौरदि युगाधिदिन दोनो के अन्तर करने से . पुसौदि युचादि---युमोदि--(युचादि-युगसावनदि)=युचादि-युसौदि-युचादि+ युसा यदि युसादि-युसौदि=युगाधिदि-युगावमदि अव इस पर से अनुपात करते है यदि युगसौर दिन म युगाधिदिन प्रौत अवम का अन्तर पाते हैं तो गतसौरदिन मे क्या इस अनुपात से इप्टसावनदिन और इप्टसौर (गतसौर) दिन (युगाधिदिन-युगावम) का अन्तर पाया, - इसावनदि-इप्टसौदि=गताहगण-गसौदि युगसो (युगाधिदि-युगावम) गसौदि +गसौदि=गताहगण प्रहगए से इप्टवार ज्ञान के प्रिय अहाण म एक जोडना या घटाना चाहिये । परतु प्राचाय एक घटाने के लिये नही वहते है ॥ ५॥ प्रथ स्पुटाधिमासशेषज्ञानम् भूदिनरधिकशेपमाहत वाऽधिकरवमशेषमेतयो । सयुति शशधरासाजिता स्यात्स्फुट त्वधिकमासशेषकम् ।। ६ ॥ वि भा-अधिक्शेप (अधिमासशेप) भूदिन (युगकुदिन ) आहत (गुणित) वा अवमशेषम् (क्षयशेपम्) अधिक (युगाधिमास ) गुणित, एतयो सयुति (योग) शशधर धुभाजिता (युगचान्द्रदिन-भक्ता) तदा स्फुट (मूक्ष्म) अधिकमासशेषक स्यादिति ॥ ६॥ मत्रापपत्ति प्रथ युगावमxअहर्गरण = गतावम+ अयो युकुदि समगाधनेन पुदि %D युगावम अपगण अवगे. यदि =गतायम, अयाहर्गरणयोजनेन यदि जातानि गतचान्द्रदिनानि-युगावम महर्गरण-अवशे यदि +महर्गरण युप्रवम प्रहगण+ युकुदिरअहरण-अपसे युयुदि - .
। 'युचादि) युद्ध अधिगेxयुप्रमा . वटेश्वर-सिद्धान्त अहर्गरण (युअवम+युकुदि)-अवशे_ अर्गणxयुचदि-आवशे युकुदि युकुदि सुप्रमा ४ गतचादि ततोऽनुपातेन सशेपा गताधिमासा युचादि (अहण x युचादि - अवशे) युप्रमा अधिशे = गताधिमा + युचादि x युकुदि युवादि अहर्गण ४ युचादि x युग्रमा- अवो X युअमा= गताधिमा + युचादि ४ युकुदि अधिशे पक्षो युगकुदिनर्गुपितो तदा युचादि अहगण - युचादि + युग्रमा-अवशेxयुप्रमा... अधिशेष (गताधिमा युचादि = महर्गरण युप्रमा-अवशेxयुअमा=गप्रमाx युदि+ युवादि युचादि समयोजनेन महर्गरा युअमा-गप्रमायुकुदि+अवशेxयुबुदि, अवशेxयुग्रमा युचादि युचादि =गममा युवुदि+ अधिशेxयुबुदि: अवशेxयुप्रमा युचादि =गनमा युकुदि+ स्पष्टाधिशेष अहर्गा गप्रमाxयुकुदि + स्पष्टाधिशे =एतेन "गताधिकघ्ना युग्रमा स्फुटरोपसयुता इत्याद्यप्युपपद्यते" तथोपरिलिखितोपपत्ती अधिशेxयुबुदि+अवशेxयुअमा = स्पष्टाधिमामगेप एतेन च ' भूदिनर युचादि धिकशेपमाहत वाऽधिक " इत्यादि सिद्धमिति सिद्धान्नशेखरे श्रीपतिना. प्येतदनुरूपमेव वध्यते । यथा पल्पोत्याधिकमासभूमिदिवसस्नाधिशेपे हते तद्योग गशिवासरे सविहुत स्पष्टाधिशेपो भवेत् । ६माहप्नोऽथ गताधिमानिचय स्पष्टाधिोपान्वित कल्पोत्याधिकमासहृद्दिनगणा स्यु पूर्ववन्मध्यमा । ब्रह्मगुप्त नाप्येतदेव कथ्यते । यथा- गुणमधिमासकशेष मुगवुदिनरवमशेषमधिमास । तद्युतिरिन्दुदिनहताऽघिमासशेप स्फुट भवति ।।
मध्यमाधिकारः भूदिन गताधिमासकघात. स्पष्टाधिमासशेषयुत. भक्तो युगाधिमास रहर्गण. पूर्ववन्मध्या ॥ इति ॥६॥ हि भा -अधिशेप को युगकुदिन से गुण देना और अवमशेप को युगाधिमास मे गुण देना, दोनो के योग मे युगचान्द्रदिन से भाग देने से स्फुट अधिमाम शेप होता है ॥६॥ . उपपत्ति - गतावम+ युकुदि अब अनुपात से युममा गचादि युगवाम अहर्गस अवशे -समशोधन करने से युकुदि युकुदि युगावम अहर्गण-अवशे -=गतावम, इसमे महर्गरण को जोडने रो गतचन्द्र दिन होंगे युकुदि युगावम अहर्गण-अवशे +महर्गण-गताचान्द्रदिन। युदि ____युगावम X अहर्गण-अवशेX ग्रहण X युकुदि_महर्गण (युगावम+युकुदि)-प्रयो युकुदि ___अहमण : युचादि-अवशे '= गमाधिमास+ अधिगे युबुदि युचादि युचादि (महगण- युचादि-अवशे) युप्रमा =गताधिमाम+ अधिशे युदि X युचादि युवादि प्रहगंण युचादि युग्रमा अवशेxयुप्रमा ==गताधिमास+ अधिशे युचुदि युवादि युचादि दोनो पक्षो यो "युबुदि" से गुण देने से प्रहर्गण X चादि X युप्रमा-प्रवो युग्रमा =युकुदिx गताधिमा + युचादि युचादि महगंगयुग्रमा- - यदि गताधिमा+ युचादि युवादि दोनो पक्षो मे. पचादि महगरण युपमा=युबुदि मताधिमा युचादि युवादि मधिशे युदि+अवशे युममा यहा- - स्फुटाधिमासशे...(१) युवादि तय महगंग पुममा युबुदि गताधिमा स्पृटाधिरी मुदि गणधिमा+स्पुटाधिो = महर्गण, इममे “गतापिरम्ना स्फुटशेषमयुताः" पुपमा अधिशे युबुदि अवशे युप्रमा प्रधिो युदि -- अवशेxयुप्रमा जोडने से अधियो युगुदिन भवो युपमा ८६ वटेश्वर-सिद्धान्ते इत्यादि उत्पन्न हुआ, और (१) इमसे 'भूदिनरधिक्शेपमाहत वाऽधिकं इत्यादि उपपन्न सिद्धा तशेखर मे श्रीपति भी इसी तरह वहते हैं । जैसे 'क्ल्पोत्याधिकमास भूमिदिवसहनाधिशेप ह्ते इत्यादि । ब्रह्मगुप्त भी इसी तरह कहते हैं। जैसे गुणमधिमासकशेप इत्यादि। प्रकारान्तरेणागरणानयनम् । गताधिकघ्ना स्फुटशेषसयुता कुवासराश्च छ गणोऽधिकोद्धृता । वि भा-कुवासरा (युगकुदिवसा ) गताधिकघ्ना (गताधिमासगुरिणता ) स्फुटशेषसयुता (स्फुटाधिमासशेपयुक्ता) अधिकोघृता (युगधिमासभक्ता) तदा धुगण (ग्रहगरण ) भवेदिति ।। अस्योपपत्ति पूर्वश्नोको (६ श्लोक) पपत्तो द्रप्टव्येति । हि भा-युग कुदिन को गताधिमास मे गुण देना, म्पुटाधिमाम शेष को जोडकर युगाधिमास से भाग देने से प्रहगरण होता है । इसकी उपपत्ति पूवश्लोक (६ श्लोक) की उपपत्ति म देखिये। पुन प्रकारेगाहगणानयनम् । सशेष यातावम भूदिनाहते युगावमैलन्धमहर्गणोऽथवा ॥७॥ विभा-अथवा सरोपयातावमभूदिनाहते (युगकुदिनसशेषगतावमयोते) युगावमभक्ते लब्ध (फल) ग्रहर्गणो भवेदिति ।। अनोपपत्ति । यदि युगकुदिनयुगावमानि लभ्यन्ते तदाऽहणेन किमित्यनुपातेन समागच्छन्ति मशेषारिण गतावमानि तत्स्वरूपम् - युप्रव अहर्गरण अवशे = गतावम+ युकुदि अवरो। पक्षौ "युकुदि" गुणितो तदा युअव अहर्गरण युदि (ग गतावम+ युकु तत युकुदि (गतावम+ युयु -अहर्गण युप्रव अत उपपन्नम् ॥७॥ हिभा-युग कुदिन मोर शेष सहित गतावम व पात में युगावम म भाग देने से महर्गरण होता है। उपपत्ति 'यदि युगकुदिन म युगावम पाते हैं तो प्रहगण में क्या' इम अनुपात से दोष सहित --- अवशे मक) मध्यमाधिकारः गतावम का प्रमाण पाता है, युअव अहरण अवशे -गतावम+ दोनो पक्षो को युकुदि युदि "युकु" के गुणने से युअव अहगण-युकुदि (गतावम+ दोनो पक्षो को "युप्रव” युक से भाग दें जैसे युकुदि (गतावम + अवशे) युकु =प्रहर्गण, इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुआ ७॥ युभव प्रय धुद्धिदिनजानमाह शशधरमगरणघ्ने यातसूर्या राशौ युगरविदिनभक्ते मण्डलादि. शशाङ्कः। त्रिकुहतदिनहीनोऽसौ च भागादिकोऽक्षरपिहतगतवरन्वित शुद्धयहानि 10 विभा-यातसूर्यधुराशी (गतसौरदिने) शशधरभगणघ्ने (युगचन्द्रभगण- गुणिते) युगरविदिनभक्ने (युगसौरदिनभक्ते) तदा मण्डलादि (भगणादि) शशाङ्क (चन्द्र ) स्यात् असौ चन्द्र त्रिकुहतदिनहीन (त्रयोदशगुणित सौरदिन. रहित ) भागादिक कार्य , अक्षतिगतवर्षे (पञ्चगुरिणत गतवर्षे ) अन्वित (सहित ) तदा शुद्धिदिनानि भवन्ति ।।८।। हि भा -गतसौरदिनकरे युगचन्द्र भगण से गुण देना, युगसौर दिन से भाग देने पर भगणादिचन्द्र होने हैं। उसमे तेरह गुणित सौरदिन घटाकर प्रशादिक करना, उसमे पञ्चगुरिणत गत वर्ष जोडने पर शुद्धिदिन होते हैं ॥८॥ अनोपपत्ति अथ युगचन्द्रभगण X अहर्गरण = अहर्गणसम्बन्धि-१३४ असर + अधिमास युगबुदि भगणादिव~१३ भगणादिरपि अमास पर युचभगण X गतसौरदि युगसौरदि =भगणादिच भगणदिच--१३भगणादिरवि- युचभगण गतसौरदिन युगसौरदि १३मगरणादिर प्रधिमास एपस्मिन् वर्षे याहाद्यम् =५४८।२२।७।३० अब पञ्चातिरिक्तावयवान् विहाय केवल पञ्च गृहीता यदा पञ्चगुरिणत गतवर्षयोजनेन यद्भवति तस्य नाम "शुद्धिदिनम्" रमितमाचारण, प्रा निकुहदिनहीनम्याने (त्रिवृहतरविहीन) इनि पाठ समुचित प्रतिभाति ||८|| युगनन्द्रमगरण महगंग युदिन =१३४अमर+प्रधिमा अगरणसभगणादिचन्द्र भगणादिच-१३४ भरणादिरवि-प्रभाम % घटेश्वर-सिद्धान्ते मुगचभगण+गतसौदिन भगणादिचन्द्र युगसौरदि प्रत भगणादिच-१३ भगणादिरवि =अमास युगचभ Xगतमौरदि युगसौरदि १३ भगणादिरवि हिमा-एक वर्ष में क्षयदिनादि=५।४८।२२।७।३० यहां पर केवल पांच लेकर बाकी भवयव को छोड दिया गया तब ५X गतवर्ष उममे जड़ने से जो होता है उसका नाम सुदिदिन कहते हैं । अर्थात ५ गव+युगचभगण ४ गतसौरदिन -१३ भगणादिरवि शुद्धिदिन युगसौरदि यहा 'त्रिकुहत दिनहीनोऽमौचभागादिक" इत्यादि इसके स्थान पर 'विकुहतरवि में हानी सोच भागादिक" ऐसा पाठ उचित मालूम होता है | प्रकान्तरेणाहर्गणमाधनमाह। मोदयर्गतखरासुवासरा. संगुणा युगदिनेशवासरः । माजिता. कथितशुद्धिजिताः स्यादा राशिरयवैकसंयुत ॥६॥ वि भा गतख राशुवासरा (गतसौरदिवसा ) भोदय (युगभोदय- सस्याभि, सगुणा (गुणिता) युगदिनेशवासर (युगसौरदिन) भाजिता (भक्ता) कथितशुद्धिवजिता (८ श्लोकानौतशुद्धिदिनै रहिता) तदा धुराशि (अहर्गण) स्यादिति । हि.भा. --गत सोरदिन संख्या को युगीय भोदय संख्या से गुण देना युगसौरदिन से भाग देना फल में पूर्व वही हुई शुद्धि को घटाने से अहर्गण होता है ॥६॥ उपपत्ति यदि युगसौरदिनयुग भोदय सख्या लभ्यते तदा गतसौरदिनै किमिन्यनुपातेन गतसौरदिनसम्बन्धि नाक्षत्रदिनानि तत्स्वरूपम् - युगभोदय ४गतसौरदि युगसौरदिन अत्र यदि शुद्धिदिनानि ऊनीनियन्ते तदाऽहाणो भवेदिति ॥६॥ महा गतमोरवर्प सम्बन्धी नाक्षत्रदिन लाते हैं । यदि युगमोरदिन युगभोदय पाते हैं तो गतमोरदिन में क्या इरा अनुपात से गतमोरदिन सम्बन्धी नाक्षत्र दिन प्रमाण माया युगभोदय ४गतमौरदि इसम शुद्धिदिन के घटाने से अहर्गण होता है । युगसौरदि पुन प्रकारारान्तरेणाहणज्ञान तथा दिनशुद्धिज्ञानभ्चाह । भोदया भगणान्तरेण वा प्रोक्तवद्दिनगणोऽवत्सरः ॥१०॥ नवाप्टरामाग रस: समाहत. खखाभ्रषट्क प्रविभाजित. फलम् । खरामशेष दिनशुद्धिरिष्यते मधो सितादेर्दिवसदिनाब्दप ॥१॥ ..
मध्यमाधिकार ८१ विमा 3- वा (अथवा) भोदयाकंभगणान्तरेण (युगपठित भोदय-रवि. भगणयोरन्तरेण) प्रोक्तवत् (पूर्वकथितरीत्या) दिनगरण (अहर्गण) ज्ञेय । अर्कवत्सर (गतसौरवर्षसमूह ) नवाष्टरामाङ्गरस समाहत (६६३८६ एत- गुणित ) खखाभ्रपटकप्रविभाजित (६००० एभिर्भक्त ) फल (लब्ध) खरामशेष (त्रिंशद्भक्तावशिष्ट ) मधो सितादेदिवस (चैत्रशुक्लप्रतिपदादिदिन ) दिनशुद्धि (शुद्धिदिनसशक) इष्यते (कथ्यते) ततो दिनाब्दप (दिनपतिर्वर्षपतिश्च) भवेदिति ॥१०-११ ।। अत्रोपपत्ति । भभ्रमास्तु भगणविवर्जिता यस्य तस्य कुदिनानितानिवेत्यादिना युभभ्रम-युरविभगण-युकुदिन=युगसावनाहरण । अथकवऽधिदिनानि-११ । ३ । ५२ । ३० । ० = १०+१ वसदिनाद+ १ वर्षसअवमादि वर्ष सम्प्रधिदिन ४ गतवप ततोऽनुपातेन गताधिमास १ वर्ष ३० - (१०+१ वर्षसदिनादि+ १ वर्षसअवमादि) x गतवर्ष ३० अन भाज्ये गतवर्षातिरिक्तानि खण्डानि मिलित्वा ६००० वर्षे ६६३८६ इति भवन्ति तदा गताऽधिमासा ६६३८६X गतवर्ष, अधिदिनात् त्रिंशता भागे हने ३०४६००० कल्पगताधिमासा जायन्ते शेपश्च चैनादि प्रथमार्योदयस्य रविमण्डलस्य च मध्ये सावनो हर्गगो भवति यस्य नाम शुद्धिदिनम् । तत कल्पगताब्ददिनयुतौ वारस्ति- धति । वारश्च प सावनात्मक । शुद्धिदिनमपि सावनात्मकम्, तेन वर्षदिनयोगे दिन- शुद्धेविंशोधनेन येऽवशिष्टास्तावन्तो वाराश्च त्रादेर्गता स्यु । रूप च गुद्धे सविक्ल- स्वाद्दीयतेऽन्यथारूपयोजनस्याऽऽवश्यका न भवेत् तत सप्तभक्ते शेषश्च यादी वाराधि- पतिर्भवत्येवमेव वर्षपतिश्चति ।[१०-१।। हि भा ---युग पठित भोदय और रविभगण का अन्तर करने स मर्गण होता है। गतसौरवपं को ६६३८६ इनसे गुणकर ६००० इतने मे भाग देना जो लब्धि हो उसम तीस से भाग देने से जो शेष रहता है चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से दिन शुद्धि वायत है इस पर से वर्ष पति पौर दिनपति के ज्ञान होते हैं ॥१०.११॥ D उपपत्ति 'भभ्रमास्तु भगविवर्जिता यस्य पुदिनानि तानि वा इम नियम से युगमोदय-- पुरभगए युयुदि। एक वर्ष मे मयिदिन=११।३१५२ । ३०० - १०+१ वर्ष सदिनादि+ १ वटेश्वर-सिद्धान्ते १ वर्ष मनवमादि इससे अनुपात द्वारा मताघिमाम-१ वर्ष सग्रधिदिन ४ गतवर्ष १ वर्ष४३० = (१०+१ वर्ष सदिनादि+१ वपसअवमादि) गतवर्ष -यहा भाज्य मे गतवर्ष के अतिरिक्त %- ३० जो खण्ड सब हैं वे मिलकर ६००० वर्षों ६६३८६ होते हैं तव गताधिमास: ६६३८६ गतवर्ष अधिदिन को तीस से भाग देने से गताधिमास होते है शेष चत्रादि प्रथम- ३०X६००० सूर्योदय और रविवर्षान्त के बीच मे सावनाहगंण होता है इमी का नाम शुद्धिदिन है । गत. वर्ष दिनयोग करने से दिनसमूह सावनात्मक होता है शुद्धिदिन भी सावनात्मक है । इसलिये वर्ष दिन योग म शुद्धिदिन को घटाने से जो शेष रहता है ने चत्रादि से गतदिन है। शेष सहित शुद्धि के रहने से एक उसमे जोडना चाहिये यदि शुद्धि शेपसहित न रहे तो एक जोडने की जरूरत नहीं है । सात से भाग देने से चैत्रादि में वारपति होते हैं । एव वर्षपति भी होते हैं ।। १०-११॥ पुनरहर्गणानयनमाह विश्वरामनवमङ्गलकर्कस्ताडिता गतसमा विभाजिताः । खाभ्रखाङ्ग दहनैरवाप्तक शुद्धिहीनमथ चैत्र शुक्लत ॥१२॥ वासरैयुतमवमवर्जित वर्यवासरयुत दिवागरण. । विमा - गतसमा (गतसौरवत्सरा) विश्वरामनवमङ्गलैकक (१८९३१३ एभि ) ताडिता (गुरिणता) खाभ्रखाङ्गदहन (३६०००) विभाजिता (भक्ता) अवाप्तक (लब्ध) शुद्धिहीन (गुद्धिदिनरहित) चैत्रशुक्लतो वासरे (चत्रशुक्ल- प्रतिपदादित इष्टदिन यावदिन ) युत (सहित) अवमवजित, वर्पवासरयुत (३६० दिनसहित) तदा दिवागण (अहर्गरण ) भवेदिति ॥१२।। अयोपपत्ति एकस्मिन् वर्षे सावनदिनाद्यम्-३६५ । १५ । ३१ । १५ । ० ततो गतवर्ष- सम्बन्धि दिनाद्यम् = (३६५ । १५ । ३१ । १५ ) गतवर्ष =(३६०+५। १५ । ३१॥ १५) गतवर्ष अत्र १५ । ३१ । १५ इति ६०० वर्षे ६३१३ भवति तदा (३६० x ५ ४६३१३) गतवर्ष 'पुन ५ एतेन सवर्णनेन (३६०+५+६३१३) गतवर्ष ३६००० (३६० + १८००००+६३१३) गतवर्ष ३६० ग+ १८६३१३ गतवर्ष ३६००० सम्बन्धि दिनादि, अत्र चैत्रशुक्लप्रतिपदादितदिनमस्यायोजनेन तत्र शुद्धि न विशोध- नेन च क्षयघटी विशोधनेनाहरणो भवेदिति ॥ १२ ॥ हिमा-गतसौरव को १८६३१३ इतन से गुण पर ३६००० इसमें भाग देकर =गतवप
.
मध्यमाधिकारः
६१
जो लब्धि हो उसमे शुद्धि दिन को घटा देना चैत्र शुक्लादि से दिन सख्या जोड देना अवम
को घटा देना और वर्ष को दिनमख्या ३६० जोड देना तब अहर्गरण होता है ॥१२३ ।।
उपपत्ति
एक वर्ष में सावनदिनादि-१६५ । १५ । ३१ । १५ । ० तब गतवर्ष सम्बन्धी
सावन दिनादि प्रमाण (३६५ । १५ । ३१ । १५) गतवर्ष = (३६०+५।१५। ३१ ।
१५ ) गतवर्ष यहा १५ । ३१ । १५ ये ६०० वर्षो मे ६३१३ इतने होते है तब (३६० -५-५॥
६३१३)
६३१३
गत वर्ष फिर ५ इसके साथ सवर्णन करने मे (३६०+५+
गतवर्ष
६००
६००-६०
३६०+५+
-[३६०+
३६०००
१८६३१३
गतवर्ष
१८६३१३ गतवर्ष गतवर्य सम्बन्धिदिनादि, इसमे
= ३६० गव +
३६०००
चैत्र शुक्लादि से दिनसख्या जोडने तथा शुद्धिदिन घटाने से जो हो उसमे क्षयाह घटाने से
प्रहर्गरण होता है ।। १२३ ।।
पुनरहर्गणानयनम् ।
विश्वराम नवभिः समाहताः खाभ्रषट्कविहृता. फल च यत् ॥१३॥
प्राग्वदक्षरसरामसगुणैरब्दकैयुतमहर्गणोऽथवा भवेत् ।
विमा - समा (गतसोरवत्सरा) विश्वराम नवमि (६३१३ एभि )
समाहता (गुणिता ) खाभ्रपटक विहृता (६०० भक्ता) यत्फल भवेत्तत् प्राग्वत्
(पूर्ववत्) अक्षरसराम सगुण (३६५ गुणित ) अब्दकै (गतवर्षे ) युत (सहित)
अथवाहर्गणो भवेदिति ।।१३३॥
अनोपपत्ति ।
अर्यकस्मिन् वर्षे सावन दिनाद्यम् =३६५।१५।३१।१५ ततोऽनुपातेन गतवर्ष-
सम्वन्धि दिनाद्यम् (गव ४३६५ + गव (१५।३१।१५) अन १५५३१११५ तत् ६००
वर्षे ६३१३ रेतत्तुल्य भवति तदा गतवर्पसन्यन्धि १३ फलमानीया "३३५ गव"
इन योजनेनाहर्गणो भवेत् ३६५ गव+
६३१३ गव
अहर्गरण
६००
सिद्धान्तशेखरे श्रीपतिनेत किञ्चिदधिर क्य्यते, यथा-
विषय रसगुणध्ने कल्पयाताब्दराशी
सविकल दिवसाध चाब्दिकाहर्गरण च ।
क्षिप भवति सराणि मावनाना दिनाना
नियतमधिकमासस्नराविनापि ॥ इति ।।१३३॥
हि.भा. गत गौर वर्ष को ६३१३ इतने से गुग वर ६०० मे भाग देवर जा
लब्धि हो उसको ३६५ गुणिन गत वर्ष में जोडने से महर्गरण होता है ॥१३॥
१२ बटेश्वर-सिदान्ते उपपत्ति हि. भा.--एक सौर वर्ष मै सावनदिनाद्य = ३६५११५॥३१॥१५ मनुपात से गत वर्ष सम्बन्धी दिनाद्य = गव X ३६५+गव (१५॥३१॥१५) यहा १५१३१११५ ये ६०० वर्ष मे ६३१३ इतने होते हैं तव ६३१३ इसको गत वर्ष मे गुण वर ६०० से भाग देकर जो पर होगा "३६५ गद" में जोड देने से अहगंण होता है ३६५ गव+गवX33ग्रहगरण सिद्धान्तशेखर में श्रीपति इमसे कुछ अधिक रहते हैं, यया "विपयरमगुणध्ने क्ल्पयाताब्दराशौ" इत्यादि ॥ १३३ ।। पुनरहगणानयनम् । विश्वरामशरवेदताड़िताः खानखाङ्गगुरणभाजिताः फलं च यत् ॥१४॥ प्राग्वब्धिरसरामताडितरस्कयुतमहर्गरगोऽयवा । विभा-अथवा गतवत्सरा विश्वरामशरवेदताडिता (४५३१३ एभि- गुरिणता ) खाभ्रखाङ्ग गुणभाजिता (३६००० एभिर्भक्ता ) फल यद् भवेत्तत् प्राग्वत् (पूर्ववत्) अधिरसरामताडित (३६४ गुणित ) अब्दक (गतवर्षे ) युत (सहित) तयाऽहर्गरगो भवेदिति ॥ अत्रोपपत्ति । अत्रकवर्षे सावनदिनाद्यम् ३६५।१५।३१।१५ ततोऽनुपातेन गतवर्ष- मम्बन्धिदिनाद्यम्-गवx३६५ +गव (१५।३१।१५) = गव+३६४ + गव+गव (१५।३१।१५) अत्र (१५॥३१॥१५) तत् ६०० वर्षे ६३१३ रेतत्तुल्य भवति तदा गवx३६४+गव + ग ४९३१३ = गव४३६४+ (गव+ गव X६३१३) ६०० ६००४६० =गव ४३६४+(गव+ =३६८ गव+ १६००० गव+गव ६३१३ ३६००० ३६००० -३६४ गव+४५३१३ गव. अहर्गण एतावताचार्योक्तमुपपन्नम् ॥१४।। ३६००० हि भा.- अथवा गत सौरवर्ष को ४५३१३ इतने से गुण कर ३६००० मे भाग देकर जो फल हो उमको ३६४ गुरिएक गत वर्ष जोडने मे प्रगण होता है ।।१४॥ उपपत्ति। एक वर्ष में साइन दिनादि ३६४१२३१११५ अनुपान से गत वर्ष सम्बन्धी दिनादि =गव (३६२१॥३१॥१५)= गब ४३६५+गव (१५३३१।१५) =३६४ गव+गव+गव (१५३१११५) यहा १५३११५ ये ६०० वर्ष में *३१३ इतना होता है तब गव ४३६४+गवगव X६३१३, ६०० गवX६३१३ गव ६३११) मध्यमाधिकार ६३ -गवX३६४-+गव+गवX६३१३ =गव४३६४+गव+गवX६३१३ ६००४६० ३६००० = गव+३६४+३६००० गव+गवX६३१३ % 31 -गव४३६४+गवX४५३१३ -अहर्गण। ३६००० इससे प्राचार्योक्त उत्पन्न हुा ।।१४॥ अथ लघ्वहर्गणमाधनमाह अब्दवेदरसरामकाहति वा क्षिपेद्दिनगणो लघुभवेत् । एवमेव शतशः प्रसाधयेद वासरोधमलघु लघुक्रमात् ॥१५॥ वि.भा -अब्दवेद रसरामकाहति (शकादितो कस्यापि युगस्यादितो व यद्यहर्गणानयनमभीप्ट तत्र ये गताब्दास्ते ३६४ गुणनीया गुणनफल) तनत्य गत- वर्ष सम्बन्धि घट्यादिफले, ४५३१३ गुरिणत गतवर्षे क्षिपेद्योजयेत्तदा लघुदिनगणो (लघु सावनाहर्गरणो भवेत्), एवमेव अनयवरीत्या क्रमात् अलघु (महान्त) ला (अल्प) दिनौघ (सावनाहर्गण) शतश (प्रकारशतैः) प्रसाधयेदिति ॥ १५ ॥ हि भा-किसी युगादि या शकादि से यदि अहर्गरणानयन करना हो तो वहा की गतवर्प सख्या को ४५३१३ से गुण देने से, उसमे ३६४ गुरिणत गतवर्ष सख्या जोडने मे लघु प्रहरीण होगा। इस तरह सैकडो प्रकार से बृहदर्गण वा लम्वहर्गरण का साधन करना चाहिये ॥ १५ ॥ अनोपपत्तिस्तु तृतीयाध्याये १४ श्लोकोपपत्तिवदेव ज्ञेया, केवल गतवर्ष- सख्याया विभेद तन ( १४ श्लोके ) गतवर्षस्थाने गतसौरदिवसा गृहीता , अत्र गतवर्षस्थले शकादित इष्टयुगादितो वाऽहर्गरणानयने क्रियमाणोऽवत्या ये गताब्दास्ते ग्रहीतव्या इति । भास्कराचार्येण वर्षान्तादिष्टदिनपर्यन्त दिनगणस्य नाम लघ्वहर्गा कथ्यतेऽद्विषन्निकालिकाहर्गणस्येष्टाहर्गरणस्य चान्तर लघ्वहगण इति । प्रय लबहन कदा साक्पब कदाच निरवयब इति निरम्यते । सदाऽयम- शेषाभावस्तदा सूर्योदयामान्तवन्तिानामेकर स्थितत्वात्सौराहगरण चान्द्राहरण- सावनाहर्गरयाना निरवयवत्वमन्यथा सावयवत्वमिति, अथ निरपलक्षण कल्पे किय- मितमिति विचार्यते । यदा च निरपलक्षणमस्ति तदा सौराहगंण चान्द्राहर्गण- सावनाहगणाना महत्तमापवर्तनाकोऽन्वेष्टव्यास्तदा महत्तमापवर्ताकन तेर्गणा अपत्तिता कार्या लब्धितुल्यवर्षे पुन पुनस्तेपा निरवयवत्वम् । अथचापतित- सौराहर्गणमानानि किद्भिर्वर्वपान्ते भविष्यतीति विचार. । महत्तमापवर्ताङ्कना- पवर्तनेन यावन्ति दिनानि तानि ३६० भजनेन यान्यवशिष्ट्रानि भवेयुस्तानि येनाङ्कन गुणनेन ३६० भवत्तरेव गुणक-तुल्यवर्षस्तान्यपवर्तित सौराहगणमानानि वन्तेि भविष्यन्तीति सिद्धान्तितम् ।
६४
वटेश्वर-सिद्धान्ते
एवञ्च "अपत्तित चान्द्राहर्गरण-सावनाहर्गणमाने विद्भिर्वर्वन्तेि भवि-
प्यत इति विचार्यते । सौराहाणेन साक चान्द्राहर्गण सावनाहर्गरणयोमहत्तमापवर्त्त-
नाङ्कमन्विष्यापवर्तनाङ्केनापत्तिते ते चान्द्राहर्गणसावनाहर्गणमाने लब्धितुल्य-
वर्षे पुनर्वन्तेि भविष्यत इति ।। १५ ।।
हि भा–इसको उपपत्ति तृतीयाध्याय १४ शोक मे लिखित उपपत्ति की तरह जाननी
चाहिये, केवल गतवर्ष मख्या में भेद है। १४ शोक मे गतवर्ष स्थाने गतमौर वर्ष सख्या ली
गई है, यहा गतवर्ष स्थान मे शकादि से या किसी युगादि से अगरणानयन मे यहा की गतवर्ष
सख्या लेनी चाहिये, भास्कराचार्य वर्षान्त से इप्टदिन पर्यन्त दिन समूह को लभ्वहर्गरण
कहते हैं अर्थात् वर्षान्तकालिक अहर्गण इप्टाहगणक अन्तर को लघ्वहर्गरण' कहते हैं ।
लम्वहरण क्व सावयव होता है और क्व निरवयव होता है इसके लिये विचार
करते हैं।
जब अवम शेपाभाव होगा तव सूर्योदय-प्रमान्तकाल, वर्षान्त इन सब को एक जगह
रहने के कारण सौराहगण-चान्द्राहर्गण सावनाहरण के निरवयवत्य होता है अन्यथा मावय-
वत्व होता है।
निरग्रलक्षरण कल्प मे कितने होते हैं इमवे लिये विचार करते हैं। जब निरन-
लक्षण हैं तव "सौराहर्गरण चान्द्राहर्गण-सावनाहरण" इन सव के महत्तमापवर्तनाव
निकाल कर-महत्तमापवर्तनाडू से उन अहगंणो को अपवर्तन देने से जो लब्धि होगी तत्तुल्य
घर्षों में फिर-फिर उन ग्रहणो का निरवयत्व सिद्ध हुआ । अव अपत्तित मौराहगरण फ
मान कितने वर्षों में वर्षान्त में होगा इसके लिये विचार करते हैं। महत्तमापवर्तनाङ्क से
अपवत्तन देने से जितने दिन होगे उनको ३६० मे भाग दने मे जो शेष बचता है उसको जिस
अङ्क में गुणने से ३६० होगा उन्ही गुणकावतुल्य वर्षों में वे अपत्तित सौराहर्गणमान फिर
वर्षान्त में होंगे।
इसी तरह अपत्तित चान्द्राहर्गणमान, अपत्तिन सावनाहर्गणमान क्तिने वर्षों में
वर्षान्त में होंगे इसके लिये विचार करते हैं । सौराहगण के साथ चान्द्राहर्गण और सावना-
हर्गण का महत्तमापवर्तनाङ्क निकाल कर अपवर्तनाङ्क मे चान्द्राहाए और सावनाहर्गण
को अपवर्तन देने से जो लब्धि पायेगी तत्तुल्य वर्षों में पुन वे वर्षान्त में होगे, इति ॥१५॥
प्रय ब्रह्मादिनादो गतमावनदिनानि कृतादियुगमानानि चाह ।
शून्य नखागनबंकरसेला भूदिवसा द्यु गरण: कदिनादौ।
यात युगादगरणश्च कृतादौ तिव्यमुखस्त्रिगुपः कृतभक्त ॥१६॥
वि भा -कदिनादो (ब्रह्मदिनादौ) शून्यनखाइनवैकरमेला (१६१६६२००)
भूदिवसा (सावनवासरा )धुगरण (अहर्गण) व्यतीत पासीत्। वृतादो (सत्य-
मुगादौ यातयुगाब्दगरण.) (गतयुग वर्षसमूह ) निगुण कृतभक्त (अर्थान्महायुगस्य
त्रि चरणत्रय व्यतीतम् ॥ १६ ॥
हि.भा.-ब्रह्मादिनादि म १६१६६२०० सावनाहर्गण बीत गय थे । मत्ययुगादि में
गनयुगवर्ष महायुग के तीन चरणबीन गये थे ॥१६॥
मध्यमाधिकार कलियुगादावहर्गणमाह । तद्योगः कल्पादौ | गणः कोत्पत्तितोऽथवा निघ्नः नवगुण रसाष्ट नवनग नेदभुजः कुदिनवेदिशिः ॥१७॥ रवैकाक्षिशरशर वसुनवरूपाक्षतत्त्ववस्वगाडाः। कल्यादौ धु गणोऽयं कलिगत धु गणेन संयुतस्त्विष्टः ॥१८॥ विभा -तद्योग (पूर्वकथिताना योग) कोत्पत्तित (ब्रह्मदिनादित ) कल्यादौ द्य गण (सावनाहर्गण ) अथवा कुदिनवेदशि (कल्पकुदिनचतुर्थाश )नव- गुण रसाप्ट नव नगवेद जै (२४७६८६३६) निघ्न (गुरिणत ) तदा रवैकाक्षिशरशर- वसुनवरूपाक्षतत्त्ववस्वगाङ्का (६७८२५५१९८५५२१०), कल्यादौ धुगण सावना- हर्गण । अब कलिगताहर्गरणेन युक्तस्तदा. कल्पादित इष्टदिन यावदिष्टाहरणो भवेत् ।। १७-१८ ॥ हि भा --उपर बहे हुए मानो के योग करने में कलियुगादि मे ग्रहगरण होता है । अथवा पल्प कुदिन के चतुराश को २४७६८६३६ इतने से गुणने से ६७८२५५१९८५५२१० इतने कलियुगादि मे अहर्गरण हो है । इसमे कलि के गताहर्गण जोडने से पल्पादि से इष्टाहर्गरण होता है ।।१७-१८॥ अनोपपत्ति कल्पादित कल्यादि यावद्यानि सौरवाणि तानि विदितानि सन्ति, नतोऽनु- पातेन मदि कल्पवर्षे कल्पवुदिनानि लभ्यन्ते तदैभि (कल्पादित कल्यादि यावत्सौर- वर्षे ) किमित्यनुपातेन कल्पादित कल्पादि यावत्सावनाहर्गण कल्पकुदिन कत्पादित कल्यादि यावन्सौव कल्पवर्ष फरपकुदिन - कल्पादित कल्यादि यावत्सीव कल्पकृदिx३_ कल्पवर्ष ४४ वर्ष कल्पवुदिन .४ २४७६८६३६=१७५२५५१९८५५२१० = कलियुगादावहर्गरण । प्रत्र कल्पादित कल्पादि यावदहर्गरणयोजनेनेप्टदिन सावनाहगंगो भवेदिति ।। १७-१८ हि भा -क्लादि मे फलियुगादि तर जितने मौरवपं हैं विदित है तव उम पर मे अनुपात करने हैं । यदि वल्लवपं गे वलवुदिन पाते हैं तो वलादि मे वलियुगादि तर सौरवर्ण में क्या पाजायेंगा पलादि मे कलियुगादि तब सावनाहगंग- कल्पवुदिन ४ पल्लादिन याल्यादि यावत्मौवर्ष % 3D पन्यवप ...पल्लवुदिन ४ पल्यादित स्पादियावत्सौर-४ ४xवप वटेश्वर-सिद्धान्ते Y अकदिन पल्यादित कल्यादि यावत्सोवर्ष ४४ कलकुदिन पल्पवर्ष ४पठितगुरणकाङ्क यल्पकदिन -x २४७६८६३६=६७८२५५१९८५५२१०- कलियुगादिकामावनाहगंण । - १ ॥१७-१८॥ प्रथ वल्पादितो युगादिनो वा व्यस्तदिनाधिपज्ञानमा । सप्ताभ्यस्तात्कुदिनाद्ध गरगोनात्सप्तमाजिताच्छेपम् । तेन च मन्दसिताद्यो व्यस्तगणनया दिनाधिपतिः ॥१९॥ हि. भा -सप्ताभ्यस्तात् (सप्तगुणितात) कुदिनान् (कल्पकुदिनाद्युग- कुदिनाद् वा) धुगणोनात् (अहर्गणरहितात) सप्ताभाजित (सप्रभक्तात्) शेष यत्तेन व्यस्तगणनया (विलोमगणनया) मन्वसिताद्य (शनिशुकादिक) दिमाधिपतिः (दिनपति) भवेदिति ॥१६॥ अत्रोपपत्ति । सप्तभक्तेहगणे शेय यदि शे,, तथा "७ युकुदि-महर्गणे' ऽस्मिन् सप्ततप्टें शेष=शे तदा शे-७ शे, अतो-शे, ऽस्मान्यादित क्रमगणना सैव ७-शे, अस्मात् शन्यादेविपरीतगणना । यथा यदि शे, १ तदा मगणनया वर्तमान सोमवारस्तथा शे=६ । अस्माद रवि । शनि । शुक्र ।गुरु । वुध । कुज । इति विपरीत- गरानया वर्तमान सोम एव जात ॥१६।। हिमा -सात गुणित क्ल्पकुदिन या सातमुखित युगकुदिन मे महर्गरण घटा कर सात मे भाग देने से जो शेष होता है उस करके विपरीतगराना द्वारा शनि पुक्र मादि दिनपति होते हैं । उपपत्ति प्रहगए को सात से भाग देने से जो शेष रहता है उसका नाम=शे, मोर ७ युकुदि-अहर्गरण इमभे सात मे भाग देने से जो शेष रहता है उसका नाम=ो तव दो- ७-0, इमलिये-हो, इससे जो रव्यादिव क्रमगणना होती है वही ७-मो, इससे शनि पादि को विपरीतगणना होती है। जैसे यदि = १ तदा क्रमगणना से वर्तमान सोमवार होता है तथा शे-६ इमसे रवि । शनि । शुक्र । गुरु । बुध । कुज । विपरीतगणना स वर्तमान सोम ही आता है ।।१६॥ प्रय सावनाहर्गणतनान्द्राहगणनान सौराहगंणज्ञानच क्रियते। घुगणोऽधोऽवम गुणितात्कुदिनहृतादाप्तयुविधोडुंगरण । पृयाधिकागो विपुदिनहृतोऽधिमासदिनजितोऽाहा ॥२०॥ .
मध्यमाधिकार
६७
वि. भा- गण (सावनाहर्गण ) अघ (स्थानद्वये स्थापनीय ) एकनाऽवम
गुरिणतात (युगावमदिनगुणितादहर्गणात) कुदिनहृतात् (युगकुदिनभक्तात्) प्राप्त
(लब्ध)यत्तेन द्वितीयस्थानस्थोऽहरणो युक्तस्तदा विधोर्चुगण (चान्द्राहर्गणो भवेत्) ।
अय पृथक् (स्थानद्वये स्थाप्य ) एकन अधिकगुण (युगाधिमासदिनगुणित ) विधु-
दिनकृत (युगचान्द्रदिनभक्त ) यल्लब्धमधिमासदिन तेन द्वितीयस्थानस्थश्चान्द्रा-
हर्गणो हीनस्तदाऽर्काहा (सौरदिवसा ) भवन्तीति ॥२०॥
हि. भा-सावनाहर्गरण को दो जगहो मे रखना एक जगह अहर्गण को युगायमदिन से
गुण कर युगकुदिन से भाग देने से जो लब्ध होता है, उसे द्वितीय स्थान स्थित सावन अहर्गरण
मे जोड देना तब चान्द्राहर्गरण होता है । इसको दो जगहो मे रखना, एक जगह युग के अधि-
मास दिन से गुण देना, युगचान्द्र दिनो से भाग देने से जो फल (गत अधिमामदिन) पावे उसे
दूसरे स्थान मे रखे हुए चान्द्राहर्गण मे घटा देने से सौराहारण होता है ।।२०॥
उपपत्ति ।
अत्रानुपातो यदि युगकुदिनयुगावमदिनानि लभ्यन्ते तदाहर्गणेन फिमित्यनु-
पातेनाहर्गणसम्बन्धिगतावमदिनानि समागच्छन्ति, तत्स्वरूपम्
__ युगावमदिनX अहर्गण एतेन फलेन सावनाहर्गणो युक्तस्तदा चान्द्राहर्गणो भवेत्
युगकुदिन
सावनाहर्गण+अनुपातागतावमदिन चान्द्राहर्गरण
तत यदि युगचान्द्रदिनयुगाधिदिनानि लभ्यन्ते तदाऽनीत चान्द्राहर्गणेन किं
समागच्छन्ति गताधिदिनानि तत्स्वरूपम् =
-युगाधिदिन - चान्द्राहर्गण गताधिदिन ।
युचा
एते समागत गताधिदिनैश्चान्द्राहर्गणो हीनस्तदा सौराहगण = चान्द्राहर्गण--
अनुपातागतगताधिदिन अत उपपन्नमाचार्योक्तम् ॥२०॥
उपपत्ति
हिमा -यहा अनुपात करते हैं कि युगकुदिन मे युगावम दिन पाते हैं तो प्राण मक्या
इस अनुपात से गतावम दिन प्राते है,
युगावमदिन+महर्गण
!= गतावमदिन, इन्हे सावनाहर्गा
युकुदिन
में जोडने से सावनाहगंणगतावमदिन= चान्द्राहगण, इस पर से पुन अनुपात करते हैं कि
यदि चान्द्रदिन मे युगाधिदिन पाते है तो चान्द्राहर्गण मे क्या इस अनुपात से गताधिदिन
आ जायेंगे।
युगाधिदिन+चान्द्राहर्गण.
'- गताधिदिन, इनको चान्द्राहरण मे पटाने में
युचादि
सौराहर्गण हो जायगा, चान्द्राहगण = मताधिदिन-सौराहर्गरण, इससे प्राचार्योक्त पद्य
उपपन्न हुमा ॥२०॥
इदानीमेक्स्य मानज्ञानेनान्यस्य ज्ञान क्यमित्याह ।
पातावमेन्दु दिनराशिचयः स्वशिष्टया युक्तोनितोऽवमहृतो विधुवासरा वा।
एवं गताधिकारयश्च रविद्युराशिरन्योन्यतोऽवमदिनानि गताधिमासा. ॥२१॥
१८ चान्द्रदिन समूह ) वा वटेश्वर सिद्धान्त वि भा-यातावमेन्दुदिनराशिचय (गताबम स्वशिष्टया ( स्वशेपेण ) युक्नोनित. ( सहितरहित ) अवमहृत विधुवासरा (चान्द्रदिवसा) भवन्तीति । अर्यादेपा सरोपावमादीना परस्पर- सङ्कलनेन व्यवक्लेन वाऽवमभक्तेन यथा चान्द्रदिवसा भवन्ति तथा सर्व कर्मकार्यम् । एव गताधिदिन सौरदिनस्य गुणनेन पूर्ववद्भागहरणेनयुक्तो नितेत्यादि करणेना- वमदिनानि गताधिसासाश्च भवन्तीति ||२|| हि भा-गतावम, चान्द्रदिन मौरदिन, सशेषाधिमाम इन सब को परम्पर जोडने पटाने, गुरगने से अवम से भाग देन म, चान्द्रदिन का ज्ञान होता है । इसी तरह गताधिमासदिन से सौरदिन को गुण कर परस्पर भाग देन से, जोडन, घटाो म प्रवम और अधिमास मादि का ज्ञान होता है ॥२१॥ पुन प्रकारान्तरेणाहगरपानयनमाह । पृथगिनदिनराशिश्चन्द्रमघ्नो विभक्त शतगुणित खखेषु व्योमवेदविहीन । रसनग नवल द्विव्योमरामश्च युक्त पृथगिन हृतरराशिद्विष्टइत्थ विभक्त ।। २२ ॥ खाग्नि बँक शरपण्युखयुतो रामखाग भजितास वजित । स्याद् धुराशिरविसावनोऽयवा- वि मा -इनदिनरागि (गतसौरवासर) पृथक (स्थानद्वये) स्थापित । एकत्र चान्द्रभघ्न (चन्द्रराशिगुणित ) शतगुणित खसेपु व्योमवेदै (४०५००००) विभक्त (भाजित ) फल रसनगनवलद्विव्योमरामै (३०२९७६) विहीन (रहित ) शेष पृथक् स्थापित सौरदिने युक्त (सहित) पूर्वहरेण विभक्त (भाज्य ) फल पृथक् (स्थानद्वये स्थाप्यम्) एक्न खाग्निसंक्शरपण्मुखै ( १६५१०३०) युत रामखागजिताप्तवजित ७०३ एतद्भजनेन यत्फल) तेन द्वितीयस्थाने होन तदा धुराशि रविसावन (रविसावनाहर्गण) स्यादिति ॥ २२ ॥ हि मा---गतसौर दिन को दो जगह रखना, एव जगह उसे चद्रराशि से गुण देना, ४०५०००० इस भाग देना, जो लब्धि प्रावे उसमे (३०२६७६) घटा देना शेष को द्वितीय स्थान मे रखे हुए सौरदिन मे जोड देना, उपरोत्तहर से भाग देना, लब्धि को दो जगहो मे रखना, एक जगह १६५१०३० जोड देना, ७०३ इस भाग दने से जो लब्धि हो उसे द्वितीय स्थान स्थित सख्या में घटाने से सूर्य का सावनाहगण होता है ॥२२॥ अत्रोपपत्ति । यदि युगसोरदिनयुगाधिदिनानि लभ्यन्ते तदा गतसौरदिन किमित्यनुपातेन लब्धानि सोपाधिमासदिनानि तत्स्वरूपम् = युगाधिदिन ४ गतसौरदि- युगसौरदि युगसौरदि अत्र यदि युगाधिदिनयुगसौरदिनस्थले तत्तन्मानानि गृह्यन्तै . गताधिदिन+ अधिोपदि,
मध्यमाधिकारः
%
अत्रापि युगावम-
तदाऽपवर्तनादिना युगाधिदिनX गतसौरदि. २७१४ गतसौरदि. गताधिदिन+
युगसौरदि
४०५००००
३०२९७६ ३०२६७६
प्रत्र
इति त्यक्त तदा लब्धगताधिदिनर्गतमासदिनं
४०५०००० ४०५००००
सहितं तदा चान्द्रदिनं भवेत्पुनरपि स्थानद्वये स्थाप्यम् ।
ततोऽनुपानो यदि युगचान्द्रदिनयुगावमदिनानि लभ्यन्ते तदा समानीत-
चान्द्रदिनः किमित्यनुपातेन सशेपावमदिनानि तत्स्वरूपम्
युगावमदि समागतचान्द्रदि
गतावमदि+
अवमशेदि
युगचांदिन
युचादि
दिनादि मानग्रहणेनापवर्तनेन च
युगावमदि समागतचादि
= गतावमदिन
७०३
१६५१०३० एतेन लब्धफलेन पृथक् स्थापित चान्द्राहर्गणमानानि रहितानि शेषा-
७०३
णि च त्यक्तानि तदा सावनाहर्गरणो भवतीति । अत्र श्लोकपद्ये त्रुटिरस्तीति ।
अत्र पद्ये पृथगिनदिनराशिश्चन्द्रभघ्न इत्यादि वर्तते तत्र चन्द्रभघ्न इत्यनेन
चन्द्रराशिगुणित इत्यर्थो न कार्यः । चन्द्रभघ्न' (२७१) इत्यनेन गुरिणत
इत्यर्थोऽवधेय इति ॥२२॥
हि भा.-पदि युगसौर दिन मे युगाधिमास दिन पाते हैं तो गतसौर दिन मे क्या इम-
अनुपात से शेप सहित गताधिदिन पा जायगा,
युगाधिमासदिX गतसोदि
=गताधिमामदिन
युगसौदि
अधिो
युगसौदि
यहा युगाधिमासदि, युगसौरदिन इनको अपने-अपने युगपठित दिनसस्या लिसने से
मोर अपवर्तन देने से २७१४ गतसौदि=गताधिदि, शेष को छोड दिया गया। गतमौर दिन
मे गताधिदिन जोडने से चान्द्र दिन हुअा, तब अनुपात करते हैं । युगवान्द्र दिन में युगावमदिन
पाते हैं तो प्राये हुए चान्द्रदिन मे क्या इस अनुपात से शेप सहित गतावमदिन पावेगा
युगावमदिन समागतचान्द्रदि
प्रवमसे
=गतावमदि+
युगचादि
युचा
यहाँ युगावमदिन, युगवान्ददिन इनके स्थान पर इनके युगपठिन मान लेने से और अपवत्तं नादि
देने से अपवत्तित युगावदि समागतचादि
पातिको
=गतावमदिन
४०५००००
७०३
दोष को छोड देने से चान्द्राहगण मे (समागत चालदि) में गनावम दिन को पटाने
से सायनाहगंगा हो जायेगा । यहाँ पर चन्द्रभग्नः शद मे चन्द्रराशि रो पुषित वा प्रहण
नहीं परला चाहिये किन्तु २७१ इनसे गुरिणत समझना चाहिये ॥२२॥
१०० वटेश्वर-सिद्धान्ते पुनराणानयनम् सूर्य मासनिकरो द्विधा स्थितः ॥ २३ ॥ गोगजाग्नि रसषड्गुणो हृतः खाभ्रखान रसरूपबाहुमिः । लब्धमास सहितोऽभिताड़ित. खाग्निमिस्तिथियुत पृथग् धृतः ॥२४॥ मूर्छनाभनवखाक्षिभिर्हतः खाकं भक्तशिशिराशुवासरः । लब्धहीनदिवसापर्वाजतः स्यादव राशिरिनसावनोऽथवा ॥२५॥ वि. भा-सूर्यमासनिकर (सौरमासगण ) द्विधा (स्थानद्वये) स्थित (स्था- पनीय ), एकत्र गोगजाग्निरसपगुणो हत (६६३८६ एतैगुणित ) खानखाभरस- रूपबाहुभि (२१६०००० एतर्भजनेन ये लब्धा मासास्त ) सहित द्वितीयस्थानस्थित- सौरमासगणो युक्त ) साग्निभि (निद्भि) ताडित (गुरिगत ) तिथियुत (वर्त- मानमासस्य शुक्लप्रतिपदादितो गतिथिसख्याभिर्युक्त , पृथग्धृत (स्थानद्वये स्थानीय ) एकत्र मूर्छनाभ्रनवखाक्षिभि (२०६०२१) हत (गुरिणत ) खार्कभवत शिशिराशुवासरं (द्वादशभक्त-युगचान्द्रदिनभक्त सन्) लब्धहीन दिवसापर्वजित (लब्ध रवमदिनद्वितीयस्थानस्थिताको हीन) तदा अथवा इनसावन धुगरण (सूर्यसावनाहर्गरण) स्यादिति ॥ २४-२५ ।। हि भा-गत सौरमासगण को दो जगह रखना, एक जगह उसको (६६३८६) इमसे गुणकर (२१६००००) इससे भाग देना जो मासात्मक भागफल हो उसे द्वितीय स्थान में हुए गतसौरमासगरण में जोड देना, तब तीस से गुणकर वर्तमान मास के शुक्ल प्रतिपदा से गततिथि सख्या जोड देना, उसको दो जगह मे रराना, एक जगह (२०६०२१) इतने से गुणा करना बारह से भाग लिये हुए युगचान्द्र दिन से भाग देना, लब्धि (प्रवम दिनो को) द्वितीय जगह मे रखे हुए अजो मे घटा देना तव सूर्य का सावन अर्गण होता है ।।२४-२५॥ उपपत्ति प्रथम प्रकारेण यदहगणानयन कृत तत्रैव युगपठित सौरमासादिमान सगृह्य गणित क्रियते यथा तबाहर्गणसाधनावसरे गतसौरमासगरणादनुपात कृत युगाधिमासX गतसौरमास युगसौरमास १५६३३३६४ गतसौमा_ ५३१११२X गतसौरमास ६६३८६४ गतसौरमा ५१८४०००० १७२८०००० २१६०००० गताधिमास इति द्वितीयस्थानस्य सौरमासगणे युक्तस्तदा चान्द्रमासगणो वर्तमानमासस्य गतामान्त यावद्भवेत्, प्रिंशद्गुणनेन वर्तमानमासस्य गतामान्त यावच्चान्द्रदिनानि भवन्ति, अत्र वर्तमानमासस्य शुक्ल प्रतिपदादित इष्टदिन यावतिथि सख्या योज्या तदेष्टदिन यावच्चान्द्राहर्गरगोभवेतत युगावमदिर चान्द्राहाण_ २५०८२०५२ Xचान्द्राहाण युगचादि १६०३००००८० 39254 . ग्रहण करने से %3 मध्यमाधिकार. = १२५४१०२६४चान्द्राहर्गण, ६२७०६३४ चान्द्राहरण ८०१५०००४० ४००७५००२० २०६०२१४ चान्द्राहर्गरण_२०६०२१४चान्द्राहर्गरण =गतावमदिनानि १३३५८३३४० युगचान्द्रदि १२ अत चान्द्राहर्गरण-गतावमदि= सावनाहर्गरण ॥ २४-२५।। हि भा -प्रथम प्रकार से जो ग्रहर्गरणानयन किया गया है उमी मे पठित युगसौर- मासादि प्रमाण लेकर गणित करते है। जैसे महर्गणानयन में गतसौरमास गण पर से अनु- पात किया गया युगाधिमास) गौमा. यहा पर पठित युगाधिमास मख्या- युगसौरमास [---युगसौरमास सख्या १५६३३३६ गतसोमास ५१८४०००० ५३१११२४ गतसोमा ६६३२६X गतसौरमास = गताधिमाम । इसको गतसौरमास मे १७२८०००० २१६०००० जोडने से वर्तमान मास के गतामान्न तक चान्द्रमासगण हो जायेंगे । इन्ह तीस से गुणने से गतामान्त तक चान्द्रदिन होगे इनम वर्तमान माम के शुक्ल प्रतिपदा से इष्टदिन तक तिथि- सख्या जोडने से इष्ट दिन तक चान्द्राहगण होगा, तब युगावमदिन - चान्द्राहर्गरण... २५०८२०५२४ चान्द्राहर्गण युगचादि १६०३०००००० १२५४१०२६४ चान्द्राहगण - ६२७०६३ ४ चान्द्राहर्गण २०६०२१४ चान्दाहर्ग ८०१५०००४० ४००७५००२० १३३५८३३४० २०६०२१४ चान्द्राहरण =गतावमदिन । युगचादिन १२ चान्द्राहर्गण-गतावमदिन = सावनाहर्गण ॥ २४-२५ ।। प्रकारान्तरेणाहर्गरण साधनम् विश्वाग्निनन्द मान्यग्नि शशिध्ना भाजिताः समाः। सखाभ्राङ्गगुरगलब्ध मेषाद्यहयुत च वा ॥२६॥ वि भा -समा (गताब्दा) विश्वाग्निनन्द मन्वग्निशशिघ्ना (१३१४६३१३ एभिर्गुरिगता) खखानाङ्कगुण (३६०००) भाजिता (भक्ता ) लब्ध मेपाद्ययुत (मेपसकान्तित इष्टदिन यावहिनसस्यया सहित) वाहगण इति ॥ ६१ ॥ हि भा -गतमोरवयं को १३१४६३१३ से गुणकर (३६०००) इतने से भाग देन से जो सन्धि हो उसमे मेषादि मे इष्टदिन तक जितनी दिनमस्या हो जोड देना तव मगरण होता है ॥ २६ ॥ %3- .
D १०२ वटेश्वर-सिद्धान्ते अत्रोपपत्तिः (१) अकवर्षे सावनदिनादि =३६५ । १५ । ३१ । १५ । ० ततोऽनुपातेनगतवर्षसम्बन्धिदिनाद्यम् = (३६५ । १५ । ३१ । १५ । ०) गतवष १ वर्ष (३६५ । १५ । ३१ । १५ । ०) गतवर्ष अन १५ । ३१ । १५ । ० इति ६०० वर्षे ६३१३ एतत्तुल्य भवति तदा ( ३६५ +९३१३ ) गतवर्ष, पुनरपि ३६५ एतेन सह सवर्णनेन (३६५+ ६०६३१३.) गतवर्ष = ३६५+ ३१३)गतवर्ष ३६०००/ = (१३१४००००+१३१३)गतवर्ष= १३१४९३१३४ गवर्ष =गतवर्षसदिनादि ३६००० ३६००० अत्र मेपादितो दिनसख्या योजनेनाहर्गणो भवेत् ।। इति वटेश्वरसिद्धान्ते मध्यमाधिकारे शुगरणविधिस्तृतीयोऽध्याय समाप्तिमगात् । हि भा–एक वर्ष मे सावनदिनादि=३६५ । १५ । ३१ । १५ । ० तब अनुपात से गतवर्प सम्बन्धी दिनादि = (३६५ । १५ । ३१ । १५ । ०) गतवर्ष यहा १५ । ३१ । १५ । ० यह ६०० वर्षों मे १३१३ एतत्तुल्य होता है (३६५+ ६३९३) गतवर्ष, फिर ३६५ इसके साथ सवर्णन वरने मे (१६५+५:४३.) गतवर्ष- ( ३६५+३३१३) गतपर्य (१३१४००००+६३१३) गतवर्ष _ (१३१४६३१३) गतवर्ष ३६००० ३६००० गतवर्ष सदिनादि इसमे मेषादि से दिनसख्या (इष्टदिन तक) जोडने से अहर्गण प्रमाण होगा। इति वटेश्वरसिद्धान्त के मध्यमाधिकार में शुगए विधि नाम का तीसरा अध्याय सम्पूर्ण हुमा । . तब ३६५ सर्वतोभद्रनामकः चतुर्थोऽध्यायः तत्रादौ प्रहगंगद्वारा ग्रहानयनमाह । धुगणे भगणाभ्यस्ते कुदिनहते पर्ययादि गतखेटाः । रव्युदये लङ्कायां मृदूच्चपाताः स्वकुद्युमिः साध्याः ॥१॥ वि.भा.-धुगुरणे ( अहर्गणे ) भगरणाभ्यस्ते (युगग्रहभगरणगुणे ) कुदिनहृते (युगकुदिनभक्त) तदा पर्ययादिगतखेटा (भगरणादिकग्रहाः) भवन्ति, लङ्काया (लङ्काक्षितिजे) रव्युदये ते ग्रहा अगच्छन्ति, एवं मृदूच्चपाताः (मन्दोच्च- पातादय ) स्वकुधुभि (स्वसावनदिन.) साध्या' । अत्रोपपत्तिः। युगग्रहभगण अहर्गण. भगरणशे गतभगए+ प्रतिदिनजनित गतिकलो- युगकुदिन त्पन्नासु वैषम्यमूलक प्रतिकुदिन वैषम्येनेताहशानुपाताभावादेकवान्त.पाति स्पष्ट- कुदिनानामेकत्रिताना कृतस्वसस्यकसमखण्डाना मध्यसावनमेव स्पष्टगतिकलाभ्यो मध्यगतिकलेति च कृत्यैकस्तादृशो ग्रहश्च कल्पितो भवेद्यस्य दिन मध्य- मसावन तद्गतिकला च मध्यमगति क्ला भवेत्तदा तत्कुदिनेनैवमनुपात' स्यात् । परश्चायं क्रान्तिवृत्ते चालितो भवेत्तत्र समचापजासूनामप्यसमत्वात् । अथ वर्षान्त.पास्पसावनयोग वन्ति.पास्पसावनस वर्षान्तःपातिस्पष्ट-सावनयोगसम्बन्धिनाक्षत्रम् = वर्षान्त.पातिस्पटसावस + १ ना व पास्पष्टसावसं+१ ना-१+ १ना अतः१मध्यसावन- वापास्पसावस -मध्यमसा यमपास्पसावनस २१६०० असु. २१६०० पला -मध्यगतिवला ८१ना. पर चमपास्पसास चपास्पसावनम वटेश्वर-सिद्धान्ते अत मध्यगति कला समासु = २१६०० असु मसावन-१ ना+मगतिक- वनपास्पसावनस लासमासु पर कला तुल्या असवो नाडीमण्डल एवातो नाडीमण्डल एवोक्तग्रहश्चा• लनीय इति सिद्धम् । अत स्वस्वभगणादनेनानुपातेन नाडीमण्डलीय मध्यमार्कस्य काल्पनिकत्वात्कल्पिते क्रान्तिवृत्तीय मध्यमार्क आगतोश्य मध्यमग्रह अत आचार्यों "रव्युदये लड्काया" वदतीति । आचार्योक्त "रव्युदये लङ्काया" मिद समीचीन नास्ति यत आचार्येणात्रोदयान्तर शून्य कल्पितमिति ॥ १ ॥ हि भा - अहर्गरण को युग ग्रहभगण से गुणकर युगकुदिन से भाग देने से भगणा- दिक ग्रह लड्का क्षितिजोदय कालिक होत हैं । इसी तरह अपने अपने सावनदिनो से मन्दोच्च पातादि साधन करना ॥१॥ . मशे उपपत्ति युगग्रहभगण महर्गण -गतभग+ युव प्रथ वर्षान्त पाति स्पप्टसावनयोग वर्षान्त पातिस्प सावनस -१मध्यमसा वर्षान्त पाति स्पष्टसावनयोग सम्बन्धी नाक्षत्र-वर्षान्त पातिस्पष्टसावनस+१ ना वर्षान्त पातिस्पप्टमावनस+१ ना प्रत १ मध्यमसावन- वन्ति पाति स्पप्टसाम १+ २१६०० असु वर्षान्त पातिस्पसावनस 3१ना+ वापास्ससास लेकिन २१६०० बला =मध्यगतिरला वर्षान्त पाति स्पष्टसावनस इसलिये मध्यगतियला ममासु = २१६०० प्रमु वर्षान्त पातिस्पसावनम पत मध्यमसावन %3D१ ना+मध्यगतिकलासमासु पर बलातुल्य भमु नाडीवृत्त ही में होती है इसलिये पूर्वोक्तानुपात से जो ग्रह पाते हैं उनको नाडीवृत्त मे ले जाना चाहिये यह गिद्ध तुपा प्रत अपने अपने युगभगण से अनुपात द्वारा जो ग्रह पाते हैं वे प्रातिवृत्तीयमध्यमार्योदय वालीन (लङ्काक्षितिजोदयकालीन) होते है यह प्राचार्य का बर्थन ठीक नहीं है क्योरि नाडोवृत्तीयमध्यमा क्रान्ति वृत्तीयमध्यमा पा अन्तर (उदयान्तर) यहा सूप मानते हैं सभी रव्युदये लवाया हो सकता है, प्रन्यथा नही॥१॥ प्रसङ्गादुदयान्तर सम्बन्चे निश्चिद्विवार्यते । अहर्गरणादनुपातेन यो ग्रह समागच्छति स मध्यमसावनान्तविन्दुवोद्-ि मध्यमाधिकार १०५ गोलसन्धितो रविभुजाशव्यासार्धवृत्त यत्र नाडीवृत्ते लगति तद्विन्दुक । रव्युपरिगत ध्रुवप्रोतवृत्त कार्य तन्नाडीवृत्ते यत्र लगति ततो भुजाशवृत्तनाडीवृत्तसम्पात याव- दुदयान्तरासव । एतत्सम्बन्धिग्रहगतिकलाप्रमारणमानीयते, तत्रानुपातौ यद्यहोराना सुभिग्रहगतिकला लभ्यन्ते तदोदयान्तरासुभि किमित्यनुपातेनोदयान्तरासुसम्बन्धिनी ग्रहगतिस्तत्स्वरूपम् ग्रहगतिकला उदयान्तरासु अहोरानामु एतत्फल यद्यहरणानीत- आहे (ग्रहणान्तकालिक ग्रहे) सस्क्रियते तदा ध्रुवप्रोतवृत्त नाडोवृत्त सम्पातविन्दौ (मध्यमार्योदयकाले) ग्रहो भवेत् । उदयान्तरस्वरूपदर्शनेन स्पष्टमवसीयते यद् भुजाश विपुवायोरन्तरम् =उदयान्तरम् । सम्पातविन्दौ मध्यमरवौ विधुवाश- भुजाशयोरभावादुदयान्तराभाव । तथाऽयनसन्धिस्थे मध्यमरवावपि तयो समत्वादुदयान्तगभाव एतयोर्मध्ये ह्य दयान्तरमुत्पद्यते । पूर्वमनुपातेन यदु- दयान्त रफलमानीत तन समीचीन यत उदयान्तरासु मध्येऽपि ग्रहाणा काचिद्गति- भवति तद्ग्रहण तु न कृतमत पूर्वानीतोदयान्तरफ्लेन सस्कृतोऽहर्गणान्तकालिक ग्रहो नहि मध्यमार्कोदयकालिको भवेत् । अतएव वास्तवोदयान्तरप्रमाणम्त्य एतदुदयान्तरासु मध्ये या ग्रहगतिस्तन्जनितासुभिर्यदि पूर्वोक्तमुदयान्तर सस्क्यिते तदा वास्तवमेवोदयान्तर भवति । अथवास्तवोदयान्तरकाले ग्रहगति = ग्रहगतिकxय राशिकला एतत्सम्वन्ध्यसुप्रमाणज्ञानार्थमनुपातो यदि अहोरानासु १८०० मिनिरक्षोदयासवो लभ्यन्ते तदोदयान्तरकलाभि किमित्यनुपातेन तत्सम्बन्ध्य ग्रगक यxनिरक्षोदयासु सुप्रमाणम् अहोरानासु X १८०० 'अहोरागामु -१ असुजगति - ग्रगक अन निरक्षोदयासु = १ कलोत्पन्नासु तथा १८०० तत १ असुजगति ४१ क्लोत्पन्नासु xय-पूर्वानीतासव । पूर्वोक्तोदयान्तरे सस्करणेन वास्तवमुदयान्तरम् =पूर्वकथितोदयान्तर+१ असुजग ४१ कलोत्पन्नासु xय-य समशोधनेन पूर्वकथितोदयान्तर र-य-१ अमुजंगति १ कलोत्पनासुत्रय =य (१F१ असुजग ४१ क्लोत्पन्नासु) पूर्वकथितोदयान्तर ११ असुजग ४१ क्लोत्पन्नामु एतेन म म श्रीमुधार रहिवेदिमूत्रम् । "एवामुजातगनिसङ्गणितपतिलोत्पन्नामु रास्युदयहीनयुतेन तेन । स्पेण पूर्वमुदयान्नरमत्र भवन स्वार्ण ग्रहे युग युजो पदयो म मेरा ॥ प्रत उपपद्यते ।
तथा १०६ वटेश्वर-सिद्धान्ते या त्रुटि प्राचीनोक्तोदयान्तरकर्मणि तादृश्येव भुजान्तरकर्मणि चरकर्मणि चास्ति वास्तवनयनमप्येकविघमेवार्थात्प्राचीनोलोदयान्तरवशतो यद्वास्तवोदयान्तर कृत तत्र हरे यत्फलमस्ति तदेव फल प्राचीनोक्तभुजान्तराचराञ्च तद्वास्तवानयने भवति, केवल भाज्ये यन प्राचीनोक्तमुदयान्तर तत्र प्राचीनोक्तभुजान्तर चरञ्च भवतीति ।। अथवा वास्तवोदयान्तरसाधनम् । अथोदयान्तरम् =भुजास-विपुवास तदा चापयोरियोरित्यादिनोदयान्तरज्या ज्याभुकोज्यावि-योज्याभुज्यावि पर पद्युXज्याभुज्यावि त्रि द्यु कोटिज्याभु नि-गोज्यादि ज्याभु कोज्याभु त्रि-कोज्याभु. पशु ज्याभु = उदयान्तरज्या, तुल्यगुणक पृथकरणेन ज्याभु. कोज्यानु (वि-पा) _ज्याभु. वोज्याभु ज्याजिउ मि द्यु यि द्यु दयान्तरज्या अत्र ज्याजिउ=जिनाशोकमज्या हरभाज्यौ त्रि+पधु गुणितो तदा (नि+पद्यु) (ज्याभु कोज्याभु ज्याजिउ) (पि+पयु) त्रि छु (त्रि ज्याभु कोज्याभु+पधु ज्याभु कोज्यामु) ज्याजिउ (नि+पद्यु) वि. धु ज्याजिउ (योग्यावि ज्याभु)+ज्यावि योज्याभु), मि (नि+पद्यु ज्याजिउ ज्या (वि+भ) • (१) त्रि द्यु 34 -उदयान्नरज्या मि+पयु एतेन 'विपुवागभुजासयोगजीवा जीनभागोत्रमजीक्याविनिघ्नी । परमाल्प धुज्यया विभता पिभजीवायुतयोदयानरज्या ।। इनि विशेपोत्तमूत्रमुपपद्यते । (१) एतल्या पदर्गनेन गिडपति यत् "ज्याजिउ, नि+पद्यु" प्रनयो स्थिरत्वाद्य ज्या (वि+भु) तम्य परमत्व भवेत्तत्रयोदपान्तरस्यापि परमत्व भवेनगर परमा ज्या (वि+मु) =नि प्रर्याद्यत्र भुजाम+विपुवाश =t० भवेत- श्रवोदयान्तरस्य परमत्वम् । तथा मति १०७ मध्यमाधिकार त्रि ज्याजिउ परमोदयान्तरज्या । त्रि+पधु परमोदयान्तर =परमोदयान्तरकालीनभुजाशा । परमोदयान्तर = पग्मोदयान्तर- । अस्याश्चाप परमोदयान्तरम् । तत सक्रमणगणितेन १०+परमोदयान्तर :४५+ ९०-परमोदयातर तथा २ कालीनविषुवाशा । अन्यथा वा परमोदयान्तरकालोन भुजाशज्ञानम् । क्रान्तिवृत्ते र रवि सनाडी क्रान्तिवृत्तसम्पात सर=भुजाशा । सन=विपु- वाशा । नाडीवृत्ते सर भुजाश- तुल्य सम दान दत्वा मर वृत्तकार्य न रसम कोणार्धकारि सच वृत्त कार्य तदा सच चाप मर चापो- परि लम्वरूप भवेत् । < रसन= -जिनाशा १८०-जिनाश=<रसम, च <रसच%3<मसच १८०-जिनाश २ जिनाश- जिनार्ध- २ कोटि । चित्र न ११ अथ यदोदयान्तर परम भवेत्तदा भुजाश+विषुवाश=१० तेन परमोदया- न्तरकाले मनचाप भुजाश+विषुवाश६० अतो नमर चापीय जात्ये नमकोटि- चापस्य नवत्यशत्वात्कर्ण चाप (रम) मपि नवत्यशतुल्य भवेत् । तेन चर= ज्या ४५ / त्रि -परमोदयान्तर चम=४५ तदा रचस चापीयजात्येऽनुपात ज्या (o-जिनाश) कालीन भुजज्या। अस्याश्चाप तदा परमोदयान्तरकालीन भुजाशा भवेयुरिति । एतेन "रिज्येपु वेदाशगुणेन ताडिता जिनार्ध कोट्युत्थगुणेन भाजिता। तदीयचापेन समा भुजाशका यदा तदा तत्र परोदयान्तरम्" ॥ इत्युपपद्यते ।
१०८ मध्यमाधिकारः 'एतद्वलैनकस्य “परमोदयान्तरज्ञानेनाहर्गणज्ञान कथं भवेत्") प्रश्नस्योत्तरं सत्वरमेव भवेद्यथा परमोदयान्तरज्ञानेन पूर्वप्रतिपादितरीत्या तत्कालीन भुजाश. ज्ञान भवेत्ततो "निरनचनादपि कुट्टकेनंतद्विलोमेन" हर्गरणज्ञान भवेदेवेति ।। कमलाकरेणोदयान्तरं न स्वीक्रियते प्रत्युत भास्करोक्तोदयान्तरस्य खण्डन क्रियते। कमलाकरेग भास्करोक्तोदयान्तरानयने "मध्याकभुक्ता असवो निरक्षे ये ये च मध्यार्ककलासमाना." इत्यादौ निरयणमध्यमरवर्गतिकलातुल्या असवः सायनरवेर्गतिकलोत्पन्ना सवोहि गृहीता अतस्तयोरन्तरे कृतेश्यनाशस्य पर- मत्वसमये परमायनाशमितमेवोदयान्तरम् । ततोऽनुपात. क्रियते यद्यहोरात्रामुरभि. रगतिकलास्तदाऽयनाश कलातुल्यो दयान्तरासुभिः का जाता रविचालनकला- स्तत्स्वरूपम्न अहोरात्रासु परमायनाशा.-२७° एतत्कला =२७४६०=१६२०, रविमध्यम गतिः=५६।" अहोरानासवः- २१६०० ततो रवेश्चालनकला. (५६' ।' )४१६२०= २१६०० रगक अयनाशकला . ४' स्वल्पान्तरात् (७६०' । ३५")X१६२० तथा चन्द्रमगति =७६०' । ३५" ततश्चन्द्रचालनकला:- २१६०० =५६' स्वल्पान्तरात् घ ततो "भक्ता व्यर्क विधोलवा यमकुभिरित्यादिना" गततिथि = 0 1४ एव योगादावपि एतावता कमलाकरेण कथ्यते यदुदयान्तरस्वीकरणे भास्कर- कथितमार्गेण परमायनाशकाले पूर्वोक्तरीत्या तिथ्यादी घटी चतुष्टयमन्तर भवत्य- तस्तदुदयान्तर न तथ्यम् । पर कमलाकर-खण्डनमिद न शोभनं, भास्करेण तु सायनमध्यमरवेरेव गतिकलातुल्यासवो गतिकलोत्पन्नासवश्व गृहीतास्तेन तयो- रन्तरकरणेनायनाशस्य नाशो भवेत्तदाऽयनाशसम्बन्धेन यत्खण्डन कृत तन्न युक्तम्। भास्करोक्तो दयान्तरस्य कमलाकरकृत खण्डनान्तरमपि वर्तते परमेकमपि खण्डनं युक्तियुक्त नहि वर्तते, ये उदयान्तर न स्वीकुर्वन्ति तेषामेव तह पणम् । भास्क- रेणोदयान्तर स्वीकृत्याऽतीव स्वबुद्धिमत्ता प्रदर्शितेति ॥ १ ।। हि.भा -यहा प्रसङ्गवश उदयान्तर के सम्बन्ध मे विचार करते हैं । अहर्गरण से अनुपात द्वारा जो ग्रह पाते हैं सो मध्यम सावनान्त विन्दु मे (अर्थात् गोलसन्धि से रवि भुजारा व्यामार्धवृत्त नाडीवृत्त में जहा लगता है उस विन्दु मे) रवि के ऊपर ध्रवप्रोत वरने से वह वृत्त नाडीवृत्तं मे जहा लगता है वहा से मुजारावृत्त नाडीवृत्त के सम्पात तर उदयान्तरासु हैं, उदयान्तरासुसम्बन्धिनी ग्रहगतिकला प्रमाण अनुपात से लाते हैं ।
उदयान्तर काल में ग्रहगति = ग्रहगतिक य मध्यमाधिकारः १०६ यदि अहोरात्रासु मे ग्रहगतिवला पाते हैं तो उदयान्तरासु में क्या इस अनुपात से उदयान्तरासु सम्बन्धी ग्रहगति पाई ग्रहगतिकला X उदयान्तरासु - उदयान्तरकला अहोरात्रासु इस फल को यदि अहर्गरणानीत ग्रह मे (मध्यम सावनान्त कालिक ग्रह म) ससार करते हैं तब रत्युपरिगत ध्र वप्रोतवृत्त नाडीवृत्त के सम्पात विन्दु मे ग्रह होते है। उदयान्तरामु प्रमाण भुजाश विपुवाश के अन्तर है, नाडीवृत्त क्रान्तिवृत्त के सम्पात विन्दु मे मध्यम रवि के रहने पर विषुवाश भुजारा के अभाव के कारण से उदयान्तराभाव होता है । तथा अयनसन्धि में मध्यम रवि के रहने पर भुजाश-विपुवाश इस लिये वहा भी (अयनसन्धि में भी) उदया- न्तराभाव हुअा, इन दोनो (गोलसन्धि और अयनसन्धि) के बीच में मध्यम रवि के रहने से उदयान्तर होता है । पहले अनुपात से जो उदयान्तरफल पाया है सो ठीक नहीं है क्योकि उदयान्तरासु के मध्य मे भी ग्रह को कुछ गति होगी उमका ग्रहण नहीं किया गया है । इस लिये पूर्वानीत उदयान्तरपल सस्कृतमध्यमसावनान्त कालिकग्रह (अहर्गणानीतग्रह) मध्यमार्कोदयकालिक (निरक्षक्षितिजोदयकालिक) नही होगे । इसलिए वास्तव उदयान्तर प्रमाण===य मानकर उदयान्तरासु मध्य मे जो ग्रहगति होती है तज्जनित असुप्रमाण करके यदि पूर्वोक्त उदयान्तर को सस्कार करते हैं तो वास्तव उदयान्तर प्रमाण होगा। वास्तव एतत्सम्बन्धी असुप्रमाण जानने के लिये अनुपात अहोरात्रामु करते है यदि राशिकला १८०० मे निरक्षोदयासु पाते है तो उदयान्तरक्ला में क्या इस अनुपात से तत्सम्बन्धी असुप्रमारण प्राया == ग्रगक य निरक्षोदयासु. अहोरात्रासुX १८०० अहोरात्रामु = १ कलोत्पन्नासु १८०० इसलिये १ असुजगति ४१ कलोत्पन्नामु य उदयान्तकलासग्रसु, इसको पूर्वोक्त उदयान्तर मे सस्कार कर देने से वास्तव उदयान्तर होगा । पूर्वकथित उदयान्तर = १ असुजगति x १ कलोत्पन्नासु य य समशोधन करने से पूर्वकथित उदयान्तर व्य+१ असुजगX१ कलोत्पन्नासु य =य(१+१असुजग ४१ कलोत्पन्नामु) पूर्वकथित उदयान्तर १+१ असुजग-१ कलोत्पन्नासु इससे म म प श्री सुधाकर द्विवेदी का सूत्र उपपन्न हुआ। एकासुजातगतिसङ्गा गितकलितो इत्यादि । प्राचीनोक्त उदयान्तर कर्म मे जो श्रुटि है वैमी ही त्रुटि भुजान्तर कर्म, और चरकर्म में भी है, वास्तवानयन भी एक ही तरह के है । उपर्युक्त वास्तव उदया तर स्वरूप मे जो हर है वही हर वास्तवभुजान्तर और वास्तवचर मे भी होगा, भाज्य में पूर्वकथित सुजान्तर, पूर्वकथित चर होगा इति ग्रगक यहा १असुजग और निरक्षोदयासु प्रत -य।
११० वटेश्वर-सिद्धान्ते अथवा दूसरे प्रकार से वास्तव उदयान्तर साधन । भुजाग-विपुवाश=उदयान्तर । चापयोरिष्टयोर्दोज्य इत्यादि से ज्यामु कोज्यावि-कोज्याभु ज्यावि -उदयान्तरज्या। त्रि पघु ज्याभु परन्तु =ज्यादि विद्यु कोज्यानु त्रि =कोग्यावि धु तब उत्यापन देने से ज्यामु कोग्यासु त्रि-कोज्याभु ज्याभु पद्यु उदयान्तरज्या। त्रि धु ज्याभु कोज्याभु (त्रि-पद्य) ज्याभु कोज्याभु ज्याजिउ गि यु यहा त्रि-पद्यु=जिनाशोत्क्रमज्या हर और भाज्य को 'त्रि+पधु" इससे गुणने से (त्रि+पधु)(ज्याभु कोज्यामु ज्याजिउ)_ त्रि ज्यामु कोज्याभु + ज्याभु कोग्याभु पद्यु (त्रि+पद्यु) विद्यु (त्रि+पद्यु) त्रि घु ' (त्रि+पद्यु) त्रि घु ज्याजिउ (कोज्यापि ज्याभु+ज्यावि कोज्याभु) _ज्याजिउ Xज्या (वि+भु)_ त्रि (त्रि+पद्यु) - नि+पद्यु उदयान्तरज्या ज्याजिउ ज्या (वि +भु) , इसम ज्याजिउ, तथा - इसस विपुवारा भुजाशयोगजीवा जिनभागोत्क्रमजीवया विनिम्नी। परमाल्प युज्यया विभक्ता त्रिभजीवायुतयोदयान्तरज्या ।। यह विशेषोक्त मूत्र उपपन्न हुआ। पूर्वानीत उदयान्तरज्या त्रि+पद्यु त्रि+पद्यु ये दोनो स्थिर है तव जहा पर ज्या (वि+) इसका परमत्व होगा वही पर उदयान्तर का भी परमत्व होगा । परन्तु कोई भी ज्या त्रिग्या से अधिक नहीं होती है इमलिये जहा ज्या (वि+भु)=पि अर्यात् वि+भु= ६० वही पर उदयान्तर का परमत्व होगा। ज्याजिउ त्रि -परमोदयान्तरग्या । इमका चाप परमोदयान्तर प्रत त्रि+पद्यु तब सक्मणगणित से १०+परमोश्या तर -४५+ २ परमोदयान्तर. =परमोदयान्तर २ मध्यमाधिकारः वालोन भुजाश तथा ६०-परमोदयान्तर परमोदयान्तर २ % 3D परमोदयान्तरकालीन विषुवाग । सर- अथवा परमोदयान्तरकालीन भुजांशानयन । यहा क्षेत्र (न० ११) देखिये, क्रान्तिवृत्त मे र-रवि ! स नाडीवृत्त और क्रान्तिवृत्त के सम्पात = रविभुजारा । सनविषुवाश । नाडीवृत्त में मर भुजाय तुल्य सम दान देवर मर वृत्त कर दीजिये । रम म कोण वे अधंकारिवृत्त कर दीजिये तब स च चाप मर चाप के ऊपर लम्ब होगा । स च= कोणार्धकारिवृत चाप । <रसन=जिनाश, १८०-जिनाश:<रसम,<रमच=<मसच- १८०-जिनाश २ 60-जिनाश =जिनार्थ कोटि २ जब उदयान्तर का मान परम होता है तव भुजाश+विपुवाश-६० इसलिये परमो- दयान्तर काल में मन चाप = मुजाश+विपुवाश= ६० इसलिये नमर चापीय जात्यत्रिभुज में नम कोटि चाप के नवत्यश के वरावर होने से रम करणंचाप भी नवत्यश तुल्य होगा, अत चर-चम=४५ तव रचम चापीय जात्य त्रिभुज मे अनुपात से ज्या ४५+नि =परमो- ज्या जि) (६०- २ दयान्तर कालीन भुजज्या । चाप करने से परमोदयान्तर कालीन भुजाश प्रमाण होगा। इससे अधोलिखित सूत्र उत्पन्न हुमा त्रिज्येषु वेदाशगुणेन ताडिता जिनार्धकोट्य स्थगुरणेन भाजिता। तदीयचापेन समा भुजाशका यदा तदा तत्र परोदयान्तरम् ।। इसके बल से "परमोदयान्तर ज्ञान से अहर्गणानयन कैसे होगा" इस प्रश्न का उत्तर बहुत लाघव से हो जायगा परमोदयान्तर ज्ञान से पूर्व प्रतिपादितरीति से तत्कालीन भुजाश ज्ञान हो जायगा, उस पर से "निरपचकादपि कुट्टकेन" इत्यादि के विलोम से अहर्ग गज्ञान हो जायगा। कमलाकर उदयान्तर नही मानते है बल्कि भास्कर कथित उदयान्तर का करते हैं भास्करोक्तोदयान्तरानयन मे "मध्या भुक्ता प्रसवो निरक्षे ये ये च मध्यार्कक्ला- समाना" इत्यादि मे कमलाकर ने निरयणमध्यम रवि की गति क्ला तुल्यासु और सायन- मध्यमरवि की गति कलोत्पन्नाम लेकर भास्करोक्तोदयान्तर का खण्डन करते है । जैसे कमला- कर कल्पना के अनुसार दोनो के (निरयण मध्यमरवि गतिकला तुल्यासु और सायन रविगति- कलोत्पन्नासु) अन्तर करने से प्रयनाशतुल्य उदयान्तर रहता है । इस पर से परमायनाश काल में अयनाशकला सम्बन्धी रवि और चन्द्र की चालनक्ला लाते हैं। यथा यदि अहोरात्रासु मे खण्डन ११२ वटेश्वर-सिद्धान्ते रविगति पला पाते हैं तो अयनाराकलातुल्य उदयान्तरामु मे क्या आ जायगा अयनाराक्ला सम्बन्धी रवि चालनफल- रदिगतिकला अपनाशकला ,रविमध्यगतिक्ला: ५६!", अहोरामासु परमायनारा=२७° एतत्सम्बन्धी क्ला=२७४६० = १६२०, अहोरात्रामु-२१६०० (५६५1८")४१६२० : परमायनाशक्लासम्बन्धी रविचालनक्ला- २१६०० स्वल्पान्तर से। इसी तरह परमायनाशकला सम्बन्धी चन्द्रचालनकला= (७९० ॥३५") x १६२० २१६०० = ५६' स्वल्पान्तर से अव "भक्ताव्यर्कविधोलवा यमकुभिर्याता तिथि इत्यादि से तिथिमान घटी ।४।० इमी तरह योगादियो म भो । इससे वमलाकर ने दिखलाया है कि यदि उदयान्तर स्वीकार करते हैं तो भास्करपाथित रीति से परमायनासकाल म पूर्व प्रदर्शित युक्ति से तिषियोगादि में चारपटी अन्तर पडता है अत भास्करोक्तोदयान्तर ठीक नहीं है । लेकिन कमलावरोक्त यह सण्डन ठीक नहीं है भास्कराचार्य तो सायनमध्यमरवि को गतिकला तुल्यासु तथा मायन मध्यमरवि की गतिरलो- त्पलाम के अन्तर रूप उदयान्तर कहते हैं उन दोनो के अन्तर करने स अयनाश नष्ट हो जायगा । कमलाकर अपने मन से निरयण मध्यमरवि को गतिफलाम लेकर खण्डन किया है भास्कराचार्य के पद्य "युवतायनाशस्य तु मध्यमस्य ' इत्यादि देखने से साफ हो जाता है कि कमलाकर मनगढन्त निरयणरवि की गतिक्लासु लेकर तत्सम्बन्ध में सण्डन किया है जो कि विलकुल ठीक नहीं है । भास्करोक्तोदयान्तर का खण्डन कमलाकर ने दूसरे ढग से भी किया है, लेकिन वह भी ठीक नहीं है, जो उदयान्तर को नही स्वीकार करते हैं उनमें यह दोष है। उदयान्तर सस्कार स्वीकार कर भास्कर ते अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दिया है।॥ १॥ मथ नम्वहर्गरातो मध्यमरविज्ञानमाह लघुदिवागरणतोऽन्द विवजिताविचतुर्युगपर्यय ताडितात् । खरसपश्च नर्गक शिवाहुते विरहिताद् गत भास्करपर्ययः ॥२॥ खगुणचन्द्र गुणाङ्क समुद्रफु त्रिशक्षिभिर्भजितादिनभादि तत् । विमा-पदविवजितात् (गतवर्परहितात्) लघुदिवागत (लघ्वहर्ग- गत) रविचतुर्युग पर्ययताडितात् (युगपठित रविभगणगुणितात्) सरमपञ्च नग व शिवाहत (१११७५६० एतद्गुणित ) गतभास्करपर्यय (गतरविभगरण।) विरहितात् (होनात्) खगुणचन्द्र गुरणाङ्क समुदकु विशिभि (१३१४६३१३० एत- मितरई) भजितात् (भक्तात्) पल यत्तत् इनभादि (राश्यादिव रवि) भवेदिति ॥
मध्यमाधिकारः युकु हि.भा-लघ्वहगण मे गतवर्ष घटाकर जो हो उसको रवि के पठित युग भगण से गुण देना १११७५६० एतद्गुणितगतरविभगए घटा देना शेष को १३१४६३१३० इतने से गाग देने से राश्यादिक रवि होते हैं । २३ ।। अत्रोपपत्तिः । यदियुगकुदिनयुगरविभगणा लभ्यन्ते तदालध्वहर्गणेन किमित्यनुपातेन लघ्व हर्गणसम्बन्धिभगणादिको रविः= युगरविभगण X लध्वहर्गरण. युकुदि युरविभगण (३६४ गव + गव X४५३१३) युगकुदि ३६००० अत्र लघ्वहर्गणे यत्प्रथमखण्ड गतवर्पसम्बन्धि वर्तते तत्र गतवर्परहितमेव लघ्वहर्गरणं स्वीकृत्य रव्यानयनं क्रियते । युगरविभगण (लघ्वहर्गरण-गव) =गतरविभगण+ शे युगकुदिन युकुदिन युगरविभगण (लघ्वहर्गण-गव शे गतरविभगण युगकु युगरविभगण (लघ्वहर्गण-गव)-गतरविभगण युक शे युकु युकु राश्यात्मक करणेन राश्यादिको रवि १२४ ६ युगरविभगण(लग्रहर्गण-गव)–गतरविभगण X युकु युक युकु युगरविभगण (लग्रहर्गण-गव)-गुणकाङ्क,xगतरविभगण_शे युक युक १२ १२ =युगरविभगण (लग्रहण-गव)-गुणकाङ्कगतरविभ शे पठितहर पठितहर राश्यादिको रवि । स्वल्पान्तरात् अत उपपन्नम् । उपपत्ति युगकुदिन मे युगरविभगण पाते हैं तो लघ्वहर्गण मे क्या इस अनुपात से लध्वहरए युगरविभगण X लम्वहर्गण =भगणादिरवि पूर्वानीत सम्बन्धी भगणादि रवि आ जायगे, यु लघ्वहरणस्वरूप मे गतवर्ष सम्बन्धी जो फल है उसमे केवल गतवर्ष को लघ्वहर्गण मे घटाकर जो शेष रहता है तत्सम्बन्धी मध्यम रवि लाते हैं युगरविभगण (लघ्वहर्गण-गद) युकुदिन शे गरविभ+ युकु युगरविभगण (लध्वहर्गण-गव शे -गरविभगण== युकुदि यु } -१२ शे -- %3D -
D
दो
%
3D
वटेश्वर-सिद्धान्ते
सुगरविभगण (लम्बहर्गण-गव)-गरविभगण X युकुदिन दो
-इसयो राश्यारमय
युकुदि
युकुदि
युरविभगण (लघ्यहाँण-गब)-गरविभगण X युकु ४१२-१२ दो
करने से
युकु
यु
__ युगरविभगण (लघ्वहर्गण-गव)-गतरविभगण X युए...
युकु
१२
. युगरविभगरण (लघ्वहर्गण-गव)-गुणवाङ्क गत रविभगए
पठिनहर
पठितहार
-राश्यादिरवि स्वल्पान्नर में
इससे प्राचार्योक्त पद्य उपपन्न हुमा ॥ २३ ।।
मध्यमचन्द्रानयनमाह
शशिचतुर्युग पर्यय ताडिताजिनखषड् गजदोनव खेषुभिः ।। ३ ॥
विनिहतर्गतवत्सरकैर्यु सावि चतुर्युगसावन भूदिनः ।
विभजिताद्भगणादिशशी भवेत्तिकुहतेन समासहितं च तत् ॥४॥
वि. भा -शशिचतुर्युग पर्यय ताडितात् (चन्द्रपठित युगभगण गुणिता-
दहर्गणात्) जिनखपड्गजदोनवखेषुभि (५०६२८६०२४) विनिहत (गुणित)
गतवत्सरक (गतवर्षे ) युतात् (सहितात्) रविचतुर्युगसावनभूदिन (रवियुगकुदिन)
विभजितात् (भवतात) भगणादिशमी (भगणादिकश्चन्द्र ) भवेत् । इति चन्द्रप्रमाण
त्रिकुहतेन समासहित (त्रयोदशगुणितवर्षयुत) तदा वास्तव शशी भवेत् ॥३-४।।
हि भा -प्रहर्गण का चन्द्र के पठित युगभगण से गुण देना ५०९२६६०२४
एतद्गुणित गतवर्ष जोड देना रवि के युग सावन (युगकुदिन) म भाग देने से भगणादिक चन्द्र
होते हैं। इनमें तेरह गुरिणत गतवप जोडने पर वास्तव चन्द्र होते है ।।३-४।।
अत्रोपपत्ति
प्रत्र लध्वहर्गरणस्वरूपम् ३६४ गव+गवX४५३१३-१३ गव+३५१ गव
३६०००
+गवX6५३१३
मत्र ३५१ गव+गव४ एतदेव लघ्वहर्गरण मत्वा
३६०००
५६०००
तत्सम्बन्धि भगणादि चन्द्रमानीय १३ गव योजनेन वास्तव भगणादिचन्द्रो भवेत् ।
(३५१ गव+गवX४५३१३)युगचन्द्रभगण गव(३५१+ ४५३१३)xयुचभ
३६०००
३६०००
युकुदि
युकुदि
गव ४१२६८१३१३४ युगचभगण_लघ्वहर्गx युचाभगरण
युकुदिन
युकुदिन
एतन्मान १३ गव योजित तदा वास्तवश्चन्द्रो भवेदिति । अत्र "जिन-
खण्डगज-दोनव खेपुभिरित्यारभ्य युतादित्यन्तमसङ्गतमिव प्रतिभाति ॥३.४॥
मध्यमाधिकार. उपपत्ति पूर्वानीत लघ्वहरण का स्वरूप-३६४ गव+गवx ४५३१३ -इसमे १३ गव छोड ३६००० कर बाकी को अर्थात् ३५१ गव+गवX: ४५३१३ गX १२६८१३१३ इसको लध्व- ३६००० हगंण मानकर अनुपात से जो भगणादि चन्द्र पावेंगे उनमे १३ गव जोडने से वास्तविक भगणादि चन्द्र होंगे। यहा पर "जिन खपड्गजदोनवखेपुभि' इत्यादि से "युतात्" यहा तक निरर्थक मालूम पडता है ॥३.४॥ वेद गुणे ग्रुगणे परिकल्पित इप्टभगरणसगुणिते । भूदिनभक्त शेषं यत्तद्रविवर्षसंगुरण क्षिपेत् ॥५॥ वि भा-धगणे (अहर्गणे) वेदतु गुरणे (६४ एभिर्हते) परिकल्पिते, इष्ट भगण सगुणिते ( इष्टग्रहयुगभगरणमख्या गुणिते ) भूदिनभक्त (युग वुदिन भक्त) शेपं यत्तत् गत सौरवर्षसगुणित तत्र क्षिपेत्तदा मध्यमग्रह स्वादिति ।।५।। हि भा-अहर्गरण को चौसठ से गुणा कर जो हो उसको एक विशिष्ट प्रहगंण मानना, उस कल्पित विशिष्ट महर्गरण को इप्टग्रह के युगभगरण से गुण देना, युगयुदिन से भाग देवर जो शेप रह उमको गत सौरवर्ष से गुणकर जोड देने से मध्यमग्रह होता है ॥ ५॥ ,अनोपपत्ति लाहर्गण X६४= विशिष्टाहर्गण तदाऽनुपातेन युगग्रहभगण x विशिष्टाहर्ग युबुदिन शे भगणादिन+ - अत्र शेष गतवर्पगुण योज्य तदा मध्यमग्रहो भवेदिति ॥१॥ युकुदि (शोशुचा+शोशुचा +क्षेपदिन) भास्करोक्त लघ्वहर्गण स्वरूपम् = शोशुचा- ६४४ लध्वहर्गण==६४ शोशुचा-(शोशुचा+ शोगवा ७०३ + क्षेदि) इत्येव (६४४ लघ्वहर्गरण) विशिष्टमहर्गरण प्रकल्प्यानुपातेन यो हि भगरणादिक ग्रहो भवेत्स च लध्वहर्गणगुणकाङ्कन भजनीयो यश्चाग्रिमश्लोके वरिणतोऽस्ति ॥५॥ उपपत्ति लमहर्गण४ ६४ - कल्पित अहर्गरण इम पर से अनुपात करते हैं कि युगग्रहभगण - कल्पित अहर्गरण = भगणादिन+ शे यहा शेष को गतवर्ष से युदि युकुदि कर जोड देना चाहिए तब वास्तव मध्यमग्नह होता है ॥२॥ %3D ७०२ ६४ (शोशुषा+गोशुचा +क्षेपदिन) सोशुचा भास्नरोक्त लध्वहगए ६४ वटेश्वर-सिद्धान्ते :: ६४४ लघ्वहर्गण-६४४ शोशुचा-(गोशुचा+ गोशुचा + क्षे पदि) ७०२ ६४४ लम्बहारा इमको एक विशिष्ट ग्रहण मानकर अनुपात में जो भगणादिग्रह होंगे उनको लघ्वहर्गरण के गुणकाक मे अपवत्तंन करना जिस बात को अग्रिम श्लोक को कहते हैं ॥ ५ ॥ लघुदिन भगणाभिहतौ कुदिनाप्तमतः खगो भचक्रादिः । परिकल्पिताहवानं गतवर्षगुणं विनिक्षिपेत्तत्र ।।६।। नि.मा-लघुदिन भगणाभिहतो (लघ्वहगंण युगग्रहगभगपाते) बुदिनाम (युगकुदिनभक्त यल्लब्ध) भचक्रादि (भगग्गादिक ) खग (ग्रह ) भवेत् । परिक- ल्पितात् (पूर्वकल्पितादहर्गरणात्) यत्फल तद्गतवर्षगुण ( गतसौरवपंसख्यया गुणित) तन ग्रहे योग्य तदा वास्तवो मध्यग्रह स्यादिति ।।६।। हि भा–लम्वहर्गण युगग्रह भगण के घात मे युगवुदिन से भाग दन में भगणादि ग्रह होते हैं । इसमे पूर्वकल्पित अहगण मे जो फल हो उसको गतवर्ष मख्या गुरणकर जोड देना चाहिए तव वास्तविक मध्यमग्रह होता है ।।६।। मनोपपत्ति पूर्ववदेव वोध्येति । इदानीमेक्स्य भगणादिग्रहस्य ज्ञानेनाभीष्टद्वितीयग्रहमाघनमाह इप्टग्रहभगएगुरगो ग्रहः सभगरणः एवपर्ययभक्तः। भगरगावभीष्ट खचर कुदिनरेवं दिनगरणः स्यात् ॥७॥ वि भा-सभगए (भगणसहित ) ग्रह (ज्ञातग्रह) अर्थाज्ज्ञात-भगणादि- ग्रह । इष्टग्रहभगरणगुण (साध्येष्टग्रहभगणगुण ) स्वपर्यय (निजभगरगरज्ज्ञिात ग्रहभगण ) भक्त (भाजित ) तदा भगणाद्यभीष्ट खचर (भगणादिक इष्टग्रह ) भवेत् । एव कुदिन (युगकुदिन ) विलोमेन दिनगण (अहर्गण ) स्यात् । हि भा-ज्ञातभगणादि ग्रह को इप्टग्रह (माध्यग्रह) भगण से गुण देना, प्रान युगभगण (ज्ञातग्रह) के युगभगण से भाग देने से भगणादिक प्रभोप्टग्रह होता है। इसी तरह युगकुदिन द्वारा विलोम विधि से अर्गण होता है । उपपत्ति यदि युगनु दिनतिग्रहभगणा लभ्यन्ते तदाऽहगणेन विमित्यनुपातेन भग- णादिको ज्ञातग्रह (१) ज्ञातगृहयुगभगण अर्गरण = भगणादिज्ञातग्रह । एवमेव युगबुदिनर्यदीष्टग्रह युकुदिन युगभगरणा लभ्यन्ते तदाऽहणेन किमित्यनुपातेन भगणादिक इष्टपह= इग्रहयुगभगण ग्रहण युगदुदिन (२) अत (१) अस्मिन् )२) अनेन भक्त ज्ञातम्रयुगभगरण इष्टग्नहयुगभगए भगणादिइष्टगृह भगणादिज्ञातग्रह पक्षी "भगणादि इष्टग्रह" तदा मध्यमाधिकार ११७ %3D - गुणितो तदा ज्ञातग्रह युगभगण भगणादिइटग्रह भगणादि ज्ञातग्रह। इष्टग्रहयुगभगरण भगरणादिज्ञातग्रह (इष्टग्रहयुगभगण = भगरणादि इष्टग्रह । ज्ञातग्रहयुगभगण ग्रहादहर्गणज्ञानार्थ विलोमविधिर्यथा युगग्रहभगण अहर्गण भगणादिग्रह युगकुदिन भगणादिग्रह ४ युगकुदिन = अहर्गणम त आचार्योक्तमुपपन्नम् । युगग्रभगरण उपपत्ति यदि युगकुदिन मे ज्ञातग्रह युगभगरण पाते हैं तो अहगंण मे क्या इस अनुपात में भगणादि ज्ञातग्रह ज्ञातग्रह युगभगण X अहर्गरण, इसी तरह इष्टग्रहयुगभग ४ अहर्गण. यु युगकुदिन भगणादि इटग्नह अत भगणादि इष्टग्रह इष्टग्रह युगभगण दोनो पक्षो को "भगणादि ज्ञातग्रह" भगणादिज्ञातग्रह ज्ञातग्रहयुगभगरण इष्टग्रहयुगभगण - भगणादिज्ञातग्रह, इसी तरह ग्रह पर से गुण देने से भगणादि इष्टग्रह-= ज्ञातग्रहयुगभगण विलोम विधि से अहर्गण का ज्ञान होता है जैसे युगग्रहभगए अहर्गरण -भगणादिग्रह युगग्रहभगण X अहर्गण==युकुर भगणादिग्रह युकु युकुर भगणादिन = अहगण इसम प्राचार्योक्त उपपन्न हुअा ॥ ७ ॥ युगग्रहभगए अथाधिमासावमशेषाभ्या चन्द्रार्कानयन म म सुधाकरोक्त प्रदर्श्यते । कल्पसोर तिथिघात सयुता स्वस्वभुक्त्यवमशेपसहति । हीनिताऽप्यधिकमासशेषकै सहता र यदकाम्पले दिन । चन्द्राकर्भवति तत्स्वभुक्तिज भागमानमिनचन्द्रयो किल । चन्द्रामानमवधेहि सयुत द्वादशध्नतिथिभि स्फुट बुधा !! रवीन्द्वोदिनसख्याया कल्पे चेत्कल्प्यते समा। मद्विधौ भास्करस्येन्दुरव्यो स्वल्पान्तगन्मिति ।। अनोपपत्ति रव्यब्दान्तादिष्ट तिथ्यन्त यावञ्चान्द्राहा चं गति- वर्षान्ताधिशेx३० - कसौ चैगति र कसौ-वान्ताधिशे ४३० इटचान्द्राहा , एतत्सम्वन्धि सौर । व तिथ्य- कसो । -- वटेश्वर-सिद्धान्ते % 3D कवा कृचा क्चा तेशात्मको रविवर्षान्ते भगण पूत्तित्वात् । अतस्तिथ्यन्ते रवि कसौxइचा (चैगति x क्सौ-वर्षान्ताधिशेx३०)_ चंगति X कसौ-वर्षान्ताधिशे४३०, प्रत- कचा कसौ स्तिथ्यन्ते चन्द्र =र+१२चगति चैगति X कसौ-वर्षा ताधिशेx३० +१२चगति, कचा क्षशे अथ तिथ्यन्तसूर्योदययोरन्तर सावनात्मकम् = एतत्सम्बधि चालन रखे रगक क्षशे १सादि क्या चगरक्षशे तथा चन्द्रस्य प्रत सूर्योदयकालिको रवीन्दू १ सादिकचा चैगति x कसौ--वर्षान्ताधिशे X३०+ रगक Xक्षशे - रवि । कचा चैगति कसौ--वर्षान्ताधियोx३०+ चग क्षरी + १२ चैगति चन्द्र क्चा एतेन कल्पसौर तिथि घात सयुतेत्याद्यारभ्य स्फुट बुधा इत्यन्त सुधाकरोक्त- सूत्रमुपपद्यते ।। अत्र यदि स्वल्पान्तरात् वसोवचा तदा रविचन्द्रो समो, वान्ताधियो= तिथ्यन्त कालिकाधिो रगरक्षसे क्षसे -चंगति+ तदा रवि =चंगति- वर्षान्ताधिो ४३०॥ वान्ताधिो रग कचा कचा पचा कचा कचा वर्षान्ताधिोचगति+रविधनफ -यन्तिाधिशे . -चगति+ क्षशे पठितहार चामा वचामा यत रविधप । सूर्योदयकालिक रवि पटिनहा सूर्योदयकालिकचन्द्र १३ चंगति + चगरक्षो वर्षान्ताधिो ४३० वचा क्षचग वान्ताधिशे १३ चैगति क्चा ३० D रंग मध्यमाधिकार =१३ चैगति+ क्षशेx(१३x31) वर्षान्ताधिशे। चग यत पठितहार कचामास =१३-13 =१३ चंगति+रविधफ (१३४१३). वान्ताधिशे कचामास १३ चैगति+चन्द्रधनफ- वान्ताधिशे कचामा =सूर्योदयकालिक चन्द्र--(२) (१) (२) एतद्दर्शनेन 'कोट्याहतर्यद्भवभरित्यादि' भास्करोक्तमुपपद्यत इति ।। उपपत्ति 3D वर्षान्त से इष्ट तिथ्यन्त पर्यन्त चान्द्र दिन-चगतिवन्तिाधिशेx३० क्सौ चैगति कसो-वर्षान्ताधिशेx३० = इष्टचान्द्रदिन, एतत्सम्बन्धी सौरदिन हो तिथ्यन्तम कसौ प्रशात्मक रवि होते है क्योकि वर्षान्त मे रवि के भगण पूरा हो जाता है, इसलिए तिथ्यन्त मे कमौर्इचा कसौ (चंगति x क्सौ--वर्षान्ताधिशे X ३०) क्चा क्चा कसौ रवि गति ४ कसौ-वर्षान्ताधिशे ३० प्रतस्तिथ्यन्त में चन्द्र =र-1 १२ चंगतिः- कचा चंगतिर कमी-वर्षान्ताधिशे४३० + १२४ चैगनि तिथ्यन्त और सूर्योदय के अतर मावना कचा स्मक- क्षशे एतत्सम्बन्धी रवि के चालन- रगक क्षशे -और चन्द्र के चालन पचा १मादिकचा . घग क्षशे १ सादिकचा इसलिए सूर्योदय कालिक रवि चंगति कसौ वर्षान्ताधिशे४३० रगक क्षो + कचा क्चा चंगति x कसौ--वर्षान्ताधिोx३०+ रगक X क्षशे, इसी तरह चन्द्र= चैगति X कसौ-वन्तिाधिशेx३०+चगक क्षशे बचा यहा स्वल्पान्तर में यदि क्सौ-कचा तव रवि और चद्र बराबर होगे, वर्षान्नाधिशेष- वर्षान्ताधिशे४३० रगरक्षशे तिथ्यन्तकालिकाधिशे, रविचंगति-~- चा कचा +१२ चैगति
१२०
वटेश्वर-सिद्धान्ते
वर्षान्ताधिशेx३०+
तथा चन्द्र=१३ चैगति-
चग क्षसे
कचा
वचा
अथवा रविचंगति
গ্রহ
चा
रंग
वर्षान्ताधिशे
क्चा
यहा
चा
':२७११००००००-हा
रंग
चग
क्षशेरग वर्षान्ताधिशे
तथा चन्द्र = १३४चंगति+ रग
क्चों
कचा
१३+१३
क्षशेx ग
क्षशे
हा
-:D
रविधनफल, तथा
=चन्द्रधनफ रविधफ (१३+
हा
वर्षान्ताधिशे
इमलिए चैगति+ रविधनफल-
• सूर्योदयकालिकरवि
कचामा
तथा १३४च गति + रविधफ (१३+१३)-
वर्षान्ताधिशे
=मूर्योदयकालिकचन्द्र
३५ क्चामा
म
(१) इससे "वल्पमौरतिथिघातसयुता' इत्यादि म मुधाकरोक्त सून
उपपन्न हुआ ।
(२) इससे 'कोट्याहतयंभवभ' इत्यादि भास्करोक्त भी उपपन्न होता है । इति ।।
इदानीमधिमासावमशेषाभ्या चन्द्रार्कानयनम् ।
अवमावशेषगुरिणता युगाधिमासाः कुवासरविभक्ताः।
लब्धयुतोऽधिकशेषः शशिमासहृतो दिनादिफलम् ॥८॥
कुदिनहतमवमशेष दिनादितद्वर्षमासदिनयोगः ।
पृथगम्यस्तो विश्व रधिकफलोनावुमाविनेन्द्र वा ॥६॥
विभा-युगाधिमामा (युगपठिताधिमासा) अव मावशेपगुरिणता (क्षय.
शेषगुणिता) बुवासरविभक्ता (युगकुदिनहता) लब्धयुत (लब्धफलेन सहित)
अधिकशेप , शशिमासहृत (युगचान्द्रमासभक्त ) फल दिनादि ज्ञेयम् । अवमशेष
(क्षयशेप) कुदिनहृत (युगवुदिनभक्त) फल दिनाद्यात्मकम् । तद्वर्षमासदिनयोग
पृथा स्थाप्य । विश्व (त्रयोदशभि) अभ्यस्त (गुणित ) उभौ (त्रयोदशगुणिती
पृथक् स्थापित पृथक् स्थापितौ) अधिकफलोनौ अवमावशेषगुणिता इत्यादिनानी
नेनाधिफ्लेन होनौ) तदा इनेन्दू (मूर्यचन्द्रौ) भवेतामिति ॥६॥
मध्यमाधिकार अत्रोपपत्ति । अथाहर्गरणानयने सौरात्मक क्षयशेप क्षयो -एतस्य चान्द्रात्मक करणेन युचा क्षयशे युचा- युचा क्षशे =क्षयशेषसम्बन्धिचान्द्र युकुदिन । अत सूर्योदयकालिक यु क्षशे क्षशे ततोऽनुपातेन युअमाx युक युकु =क्षयोपान्त पाति तिथि --चगति+ युसौ मासात्मकाधिशेपवृद्धि । तिथ्यन्तकालिकोऽधिशेप अमाशे अतो मासात्मको वास्तवाधिमासावयव सूर्यो- युसी क्षशे दये अमाशे युप्रमा एतत्सम्बन्धिसौरदिनानि- + युसौ युसौ युसो (अमाशे+युअमाXक्षशे) अमाशे+युअमाxक्षशे युकुदि युवायुसी युचा पर सूर्योदय कालिकतिथिसख्यक सौरे तात्कालिकाधिमासपोने तदा सूर्योदये रव्यशा , यत सोरान्ते रव्यशा --चैगति+ क्षशे अत सूर्योदयेऽशात्मको रवि युक क्षशे चैगति+क्षसे (अमाशे+युअमात्र युकु युकु युचा युकु =-चंगति + क्षशे - अधिशेफल पर पूर्वप्रदर्शित सूर्योदयकालिक तिथि = चंगति+क्षशे द्वादश गुरिणता तदा युकु रविचन्द्रान्तराशा =१२ (चैगति + क्षशे अतश्चन्द्र क्षधे) क्षशे १२ (चंगति+- युकु) + रवि=१२ (चगति+क्षसे शो) + [नंगति xक्षो- (ममाशे+युअमाx क्षशे युक १२२ वटेश्वर-सिद्धान्ते =१३ (चैगति+क्षशे यो)-चन्द्र युक = १३ (चैगति+क्षशे --अधिशेफ अत प्राचार्योक्तमुपपनम् ।।८ -।। अवशे नेन विलब्धश्चान्द- प्रय ककु अथवा म. म.प सुधाकरद्विवेदिकृतोपपत्ति चत्रादेर्यावन्तश्चान्द्रमासा गतास्तावन्त सौरमासा रविराशयो यावन्ति च चान्द्रदिनानि तावन्तो रविभागा कल्पितास्तनावमशेष सावनावयवाद्यश्चान्द्रदिना- वयवस्तत्समो रविभागश्चौदयिकाथं योजित । चान्द्रदिनावयवार्थमनुपातो यदि युगकुदिनैर्युगचान्द्रदिनानि लभ्यन्ते तदाऽवमशेपावयवेना युचादि दिनावयव अवशे -प्रय दिनादिश्च त्रादिगतमासदिनादौ योजित स रवि कल्पित । युकुदि अय रविश्व तत्स्थचान्द्रसौरान्तरेणाधिशेपोत्पन्न रविराश्यादि चालनेना- धिको जातोऽतस्तच्छोधनेन वास्तवो मध्यमरवि स्यात् । अय गणितागत चान्द्रम- धिशेपमवमशेपोत्थ चान्द्रदिन समसौरदिनावयवोत्येनाधिशेपेण युत तदा वास्तवा- अवशे धिशेष भवति तत्र पूर्वागतावमशेषसम्बन्धी चान्द्रदिनावयव युक युगाधिमासैर्गुणितो युगसौरदिनर्भक्तो लब्ध तजनितमधिशेषम् = युसौदि युबुदि अधिशे -पूर्वगरिणतागतमधिगप च% द्वयो- युकु युसौदि युसौदि युसौदि योगेन वास्तवाधिशेषम् = अधिशे+फ एतत्सम्बन्धिसौर राश्यादि (यदि युग- युसौदि चान्द्रमासयुगसौरदिनानि लम्यन्ते तदेष्टाधिशेष समचान्द्रमास किं लब्धानि सौर- दिनानि अधिशे+फ एतानि विशद्भिक्तानि तदा राश्यादि=अधिशे+फ युचामा अधि+फ -अधिशेफ अनेन पूर्वकल्पितो रवि_नस्तदोदयिको रवि- युचादि भवति स च तत्स्थ चान्द्रावयवेन कल्पित रविसमेन द्वादशगुणेन सहितश्चन्द्रो भवति चान्द्रदिने रविचन्द्रयोदशभागान्तरत्वादत उपपन्नम् । इत्येव सिद्धान्तशेखरे श्रीपतिनापि कथ्यते, तद्वाक्य च पल्पाधिमासगुरिणतादवमावशेपात् माहोद्धृतात्फलयुत पधिमासशेपम् । मासादिव फलमत सशिवासरै स्यारक्ष्माहै हम दिवसायवमावशेषात् ।। युप्रमा अवशे युधमा अवशे - - ३० युमाचा मध्यमाधिकार, १२३ चत्रादितो विगतमासदिनैर्युत तत्कृत्वा दिनाद्यथ पृथक् गुरिणत च विश्व . । मासादिना विरहिते विहिते क्रमेण यद्वा दिवाकरतुपारकरौ भवेताम् ।। हि.भा --युग के अधिमास सख्या को अवमशेष से गुण कर युगकुदिन से भाग देना जो फल हो उससे अधिशेष को जोडना उसमे युगचान्द्र माम मे भाग देना, फल दिनादि समझना । अवशेष को युगकुदिन से भाग देना फलदिनादि होता है अब उन सब का (वर्ष, मास, दिनादि) योग करना, इसका नाम योग रखना, इमको दो स्थान में रखना, एक स्थान मे उसको तेरह से गुण देना, दोनो मे (एव स्थान मे योगफ, दूसरे स्थान मे १३ गुरिणत योगफल) अधिकफल "अवमावमेषगुणिता इत्यादि से शशिमासहत तक" को घटा देना तब रवि और चन्द्र होते हैं। उपपत्ति क्षय महर्गरण साधन मे सौरात्मक क्षय शेष-= -इसको चान्द्रात्मक करते है। युचा क्षशे युचाx क्षयरों =क्षयशेस चान्द्र, प्रत सूर्योदयकालिक तिथि: चंगति+. क्षशे युक युकु युद क्षशे तव अनुपात में युकु =क्षयशेषान्त पाति मामात्मक अधिशेप वृद्धि युमो तिथ्यन्तकालिक अधिशेष अमाशे इसलिये सूर्योदयकालिक मासात्मत्र वास्तवाधिशेषावयव युसो युचा युप्रमाx युममा क्षशे युसी अमाशे युसौ (अमाशे+युममा ४ क्षी -एतत्सम्बन्धिसौरदिन युकु यु युसी युचा युसो समाशे+युग्रमा क्षशे -अधिोफल युचा परन्तु सूर्योदय कालिक तिथि सख्यक सौरदिन मे तात्कालिक मधिशेष घटाने मे मूर्यो- दय काल में प्रशात्मक रवि होंगे, : मौरान्त में प्रशात्मक रविचंगनि+- क्षो युकु %E प्रत क्ष प्रमागे+युप्रमा युवा सूर्योदय काल में प्रशास्मय रवि-चैगति+दारी युद्ध क्षणे = अति + युद्ध --अधिशेफ १२४ वटेश्वर-सिद्धान्ते लेकिन पहले कही हुई सूर्योदय कालिक तिथि =चंगति+क्षसे बारह से गुसने पर रविचन्द्र यु वे अन्तराग-१२ (चैगति+ क्षशे यकु .चन्द्र --अन्तराश+रवि रवि+१२(चंगति+ क्षशे युक =चैगति+क्षशे क्ष -(प्रमाणे+युममाx १२ (चगति+शे + युचा = १३ (चंगति + क्षशे)_(अमाशे+युप्रमा ४क्षशे). युचा -१३ (चैगति+ युक था) क्षशे) अधिशेषफल इससे प्राचार्य का पद्य उपपन्न हुमा । अथवा म म सुधाकर द्विवेदीकृत उपपत्ति चंद्रादि से जितने चान्द्रमासगत है उतने सौरमाम (रविराशि) और जितने चान्द्रदिन उतने रवि का अश मान लिये वहा सावनावयव भवमशेष चान्द्रदिनावयव है प्रौदयिकाथ तत्तुल्यरव्या जोडिये । चान्द्रदिनावयव के लिये अनुपात करते हैं यदि युगकुदिन मे युगवान्द्र प्रवशे युवादि_प्रवगे दिन तो मवमशेपावयव में क्या आ जायगा चान्द्रदिनावयवः युचादियुक युदि इस दिनादि को चैत्रादिगतमाम दिनादि में जोडकर जो होता है उमो रविक्ल्पना कीजिये । यह रवि भी वहा के चान्द्र सौर के अन्तररूप अधिशेपोत्पन्न रविराज्यादि चालन करके अधिक हो गया है इसलिए उसको घटा देने से वास्तव मध्यम रवि होते हैं। गणितागत चान्द्राधिशे को अवमशेषजनित चान्द्रदिन तुल्य मौरदिनावयव जनित अधिशेष करके जोडने में प्रव वास्तवाधिशेष होता है। पूर्वागत अवमशेषसम्बन्धी चान्द्रदिनावयव: इमको युगाधिमाम युकु से गुणकर युगसौरदिन से भाग देने से तजनित अधिशेष प्रमाण हुमा युममा प्रवसे, युमोदि युक फ युगमा प्रवशे युक युमोदि युसोदि पूर्व वे गरिएतागन मधिशेष% अधिनी युमोदि - दोनो के योग करने से वास्तावाधिशेष हुभायधिशे+फ -वास्तवाधियो, अब मनुपान करते हैं, युगचान्द्रमास मे युगमौरदिन पाते हैं तो इष्टाधिमेष- युमोदि मध्यमाधिकारः १२५ % 3-- तुल्य चान्द्रमास में क्या इस अनुपात से सौरदिन प्रमाण- अधिशे+क तीस से भाग देने से युचामा राश्यादिः अधिशे+फ_अधिशे+फ. = अधिशेष फल इमको पूर्वकल्पित रवि में घटाने से ३० युचामा युचादि प्रौदयिय रवि होते हैं इसमे वहा के द्वादशगुणित रवि के वरावर चान्द्रावयव को जोडने मे चन्द्र होते है इममे उपपन्न हुआ। सिद्धान्तशेखर मे श्रीपति भी इस तरह कहते है उनके पद्य निम्नलिखित है- परपाधिमामगुणितादवमावशेपादित्यादि । अथाधिशेषात्सूर्यचन्द्रयोरानयनमाह । अधिकफलमर्कगुरिणतं चन्द्रांशेभ्यो विशोध्य विश्वांशः । सूर्यो विश्वगुंरिणतः समन्वितः शीतगुर्वा स्यात् ॥१०॥ विभा --अधिकमल (८-९ श्लोकोपपत्तिप्रदर्शितमधिशेपफल ) अगुरिणत (द्वादशगुणित) चन्द्राशेभ्य (अशात्मकचन्द्रेभ्य ) विशोध्य (ऊनोकृत्य) अस्य विश्वास (प्रयोदशाश) सूर्य (रवि) स्यात् । सूर्यो (रवि) विश्वगुणित (त्रयोदशभिर्गुणित , तेन फलेनार्थात् द्वादशगुणिताधिशेपफलेन समन्वित (युक्त) तदा शीतगुश्चन्द्रो भवेत्। हि भा-अधिक फ्ल (८-६ श्लोको की उपपत्ति में प्रदर्शित अधिशेष फल) को बारह से गुणवर अशादि चन्द्रमा मे घटाने से और तेरह से भाग देने में सूर्य का प्रमाण होता है । मूर्य को तेरह से गुणकर उम फल (बारहगुरिणत अधिरोप फल) पर जोडने से चन्द्र के प्रमाण होता है। उपपत्ति ८-६ श्लोकोपपत्तिवलेन सूर्योदयकालिकोऽशात्मकरवि = चं गति+क्षशे_ यु अधिशेफल तथा १३(चं गति+धी)-अधिशेफल-प्रशादिकश्चन्द्र । अत्र यद्यशात्मक चन्द्र द्वावशगुणितमधिशेषफल विशोध्यते तदा १३ (चंगति+ क्षशे -)-अधिरोफल युक -~-१२४ अधिशेफ १३x { { चैगति + क्षय)-अधिशेफ १ अस्य त्रयोदशाश -अधिशेफ इति प्रत्यक्षमेनाशात्मक रविप्रमाणतुल्यं दृश्यते । युक तथा सूर्यस्त्रयोदशगुणितस्तदा १३(चं गति+पुणे)-१३ अघिोषफ्न चगति + क्षदो य)-अधिशेषफल १२६ वटेश्वर-सिद्धान्ते प्रम यदि द्वादागुणिताधिशेप फन योज्यते तदा १३ ४ (चगति , क्षरी यु इति प्रत्यक्षमेवोपरिलिखित चन्द्रतुल्य दृश्यते तेनाचार्योक्त युक्ति-युक्तमिति ॥ १० ॥ उपपत्ति क्षसे (८-६) श्लोकों को उपपत्ति से प्रशात्मक रविचंगति+ अधिशेफ मौर १३(चगति+ क्षो) -अधिोफ=मशामरचन्द्र । यहाँ यदि चन्द्र में १२ बारह गुपित मधि- युए ऐप पन को घटा देने है ता १३ (चंगनि+क्षदो -१३ अधिशेफ=१३ (चंगति + क्ष यु यु -अधिोफ्ल इमको तेरह से भाग देने सेचं गति+क्षदो -अधिगेफ यह प्रत्यक्ष ही मूर्घ युग के बराबर होता है । और इस मूर्य प्रमाण को तेरह मे गुरगने पर १३ १२(पंगति+) -१३ अधिशेफ हा इसम यदि बारह गुणिन अघिदोष फल जोड देते हैं तो क्षशे चंगति+ -)-अधिशेषफ्न यह उपरिलिखित चन्द्र के बराबर हो गया युक इसलिय प्राचार्य का क्थन ठीक है ॥१०॥ गततिथि युतावमाद्य द्वादश गुरिणत च भागपूर्व स्यात् । तेन विहीनश्चन्द्रोऽर्को युक्तो विधुर्वा स्यात् ॥११॥ वि भा ---गततिथियुतावमाद्य (चैत्रादिगततिथिसहितमवमशेष) द्वादश- गुणित तदा फल भागपूर्व (अशादिक) भवेत् । तेन फलेनानीतेन विहीन (विशोधित ) चन्द्रोऽकों (रवि) भवेत् । तथा तेन फ्लेन युक्त (सहित ) प्रर्क (रवि) वा विधु (चन्द्र) स्यादिति ॥११॥ हि भा --चत्रादि गतिथि करके युत अवमशेष को बारह से गुण देने से फ्ल अशात्मक होने है । उस फल को चन्द्रमा में घटाने मे रवि होने हैं भोर रवि में उस फल को जोडने से चद्र होत हैं ॥१२॥ नत्रोपपत्ति क्षयरों अय मावनात्मकोऽतश्चान्द्रात्मकार्थमनुपात क्चा रचा क्षशे क्ष क्षयशेपान्त पातिचान्द्र, अत्र गतिथियोजनेनाहर्गरणान्त क्कुxवचा-ककु अम क्षयशेष % 3D मध्यमाधिकारः १२७ यावत्तिथिप्रमाणम् गतिथि+क्षशे , -चैनामान्तादहगणान्त यावत्तिथि: ककु /गतति+क्ष यत च-र-=१२ तदैकातिथिरतोऽनुपातेन १२(गतति नक्षले) ) अहर्गणान्ते रविचन्द्रान्त राशा । गतति+क्षयश चन्द्र -रवि-+अन्तराग% रवि+१२ ककु तथा रवि चन्द्र-१२ (गतति+क्षयो) अत्र सर्वत्र ककु स्थाने युकु बोध्यम् । ककु एतेनोपपन्नमाचार्योक्तम् । भाम्फरेणं रवि+१२ गतति + क्षयशे)=रवि+१२ गतति+ क्षयशे ककु क्षय रवि+१२ गतति+ -पर "१३१४६३०३७५००" मिति स्थले १३१४६३०३७५०० १३१४६००००००० हारो गृहीतो यत्सम्बन्चे स्वभाष्ये "प्रायेषु सप्तमु स्थानेषु शून्या. न्येव कृत्वा भागहार पठित । यतस्तथाकृत एकापि विकलानान्तर भवति, लिखित परमिनि समीचीन नास्ति, एतदुपपत्ति सिद्धान्तशिरोमणिवासनाया या लिखिता. ऽस्ति साऽपि समीचीना नास्तीत्येतदर्थ मल्लिखितोपपतिरबैव विलोक्या वटेश्वराचार्ये- रांतद्विषये नहि कोऽपि विचार कृत । केवल भास्करेगव भाप्ये हारसम्बन्चे लिखितो यश्च न समीचीन इति ।। - % 32 कचा-१ वस्तुतस्तु परमक्षयाहशेप-कचा-१, तदा वास्तव परमक्षेप हा अवास्तव परमक्षे कचा-१ अनयोग्न्तरम् । हा > अवास्तवहार-अहा। अवास्तवह बातोऽन्तरम् कचा हा-हा-वचा ग्रहा+हा हा हा पचा (हा--प्रहा)-(हा-ग्रहा) हा अहा (हा-अहा) (क्चा-१) ....(१) अथ नहा=१३१४६३०३७५०० हा अहा १२ क्षो तथा .-क्षेपः हा वास्तवहारादल्पे हारे क्य भास्वरेण ज्ञात य १३१४६००००००० दोहगहार ग्रोनेवापि विपलानान्तर भपति तदर्थमुपाय, 1 पक हाय .. १२८ वटेश्वरसिद्धान्ते अथ (१) स्वरूपम् (हा--प्रवाहा) (कचा-१) कल्प्यतेऽत्र प्रहाच्य हा अहा (हा-य) (कचा-१)_हा (कचा-१)—य (कचा-1 तदाऽन्तरम् हा-य विकलीकृतमेतत् ३६०० हा (कचा-१)-३६००य (कचा-१) एतद्रूपाल्प स्वीकृत्य विषमीकरण हा-य ३६०० हा (कचा-१)-३६००य (कचा-१)< १ हा-य : ३६००हा (कचा-१)-३६०० य (कचा-१) <हा य तत समयोजनेन ३६००हा (कचा-१)<हाय+३६००य (कचा-१) वा ३६००हा (कचा-१)<य हा+३६०० (कचा-१) ३६००हा (कचा-१) <य उत्थापनार्थ मानानि लिख्यन्त हा+३६०० (कचा-१) ३६००४हा=४७३३७४६३५०००००० ३६००४ हा (कचा-१)=७५८८१६५४७४२६५६१६२५०६५०००००० ३६०० (कचा-१)= ५७७०७६६३६६६६६४०० हा-१३१४६३०३७५०० ३६०० (कचा-१)+हा-५७७०६२७८६३०३३६०० तत उत्थापनेन ३६००हा (वचा-१) ७५६८१६५४७४२६५६१६२५०६५०००००० हा+३६०० (कचा-१) ५७७०६२७८६३०३३६०० १३१४६००४१३७५ <यX १३१४६३०३७५०० किन्तु १, २ सस्ययोरन्तवतिन्य संख्या य मानम् । पर भास्करेए (१३१४६००४१३७५) अस्मादपि न्यूनो हार स्वीकृतोन एतावताऽपि श्री भास्कर स्वीकृतोना "१३१४६०००००००" नेन हारेण क्षयाहशेषाधिक्ये कदाचिद्विकलास्थान मान्तर स्यादित्यनुमित भवति । अतो १३१४६००४१३७५ ऽस्मादधिक उक्तगणिते गरिणतलाघवार्थ खाभ्र साभ्र गरखाभ्र नन्दशक्र विश्वमितो १३१४६००५०००० वा लक्षाहतेन्दु खनन्दराक विश्वमितो १३१४९० १००००० ऽथवा प्रयुतघ्नवनन्दशक विश्वमितो १३१४६१०००००० हारथेद्गृहीतो भवेत्तदेकाऽपि विकलानान्तर भवतीति सिद्धधति । परमक्षयाहोपे भास्करोक्त व्यभिचरतीति । यद्यप्यस्य लेखस्यात्राऽऽवश्यक्ता नाइश्मीलिन्तु सिद्धान्तशिरोमणेर्वासनाया वेनापि भारसरोक्तभाप्पस्या "लाघवार्थमाद्य पुसप्तसु स्थानेषु शुन्यान्येव धृत्वा 2- मध्यमाधिकार. १२६ भागहार. पठित । यतस्तथाकृतएकाऽपि विकलानान्तर भवति" स्योपपत्तिरभिहिता साच मन्मते न समीचोनेति प्रौढगणकनिष्पक्षपातबुद्धया निर्णतव्येति ।।११।। उपपति क्षय क्षयो - यह सावनात्मर है इमको चन्द्रात्मव करने के लिए अनुपात करते है D कचा वक कचा गतति+ भयो) १२४ (गतति + धी) कचा क्षरी क्षयरो=क्षयरोपान्त पातिचान्द्र यहा गत तिथि जोटने से अहर्गणान्नपर्यन्त वकु तिथि प्रमाण होगा क्षयशे -चैत्रामान्त से महर्गणान्त तक तिथि क्कु चन्द्र-रवि तिथि : चन्द्र-रवि= १२ ति==१२ ( गतति + क्षयशे १२ =महर्गणान्त मे रवि चन्द्रान्तराम प्रत चन्द्र-रवि + १ (गतति + झाने) ककु तथा रविचन्द्र क्षशे यहा सब जगह क के स्थान मे युयु समझना प चाहिए। इममे प्राचार्योक्त उपपन्न हुप्रा । यहा भास्कराचार्य ने रवि+१२ गतति+ १२क्षयो वकु रवि+१२ गति+क्षपशे व = रवि+१२ गति+ क्षयगे १३१४६३०३७५०० एमा विये है और १३१४६३०३७५०० एमवे स्थान पर १३१४६००००००० यह हार लिये हैं इसके विषय में अपने माध्यम "मायेषु सामु स्थानेषु अन्यान्यद वृत्या भाराहार परित । यतस्तथात एवापि विवलानान्तर भवनि" लिखे है। परन्तु यह ममीचीन नही है । इस भाप्य की उपपत्ति सिद्धान्तशिरोमणि की वामना में जो लिखी गई है वह भी ठीक नहीं है इसके लिए मेरी लिसी हुई उपपत्ति यही देखिये । वटेश्वराचायं हार के विषय में कुछ भी नहीं रहते हैं, रेवल भास्कराचार्य ने ही हार के विषय में लिया है जो टीर नहीं है ।। वस्तुत परमक्षयाहगे=चा-१। तव याम्नव परम . भवास्तव परमक्ष वचा-१ • हा> प्रवाम्नवहा - प्रहा प्रयास्तव हा क्षेपदयो, पनर करने में हा-हाच॥ पाहा हा. महा प्रन्तर ... .
वटश्वर-सिद्धान्त क्षया शेप यहा क १२ -१३१४६३०३७५००%3D हो । हा वास्तव हर में अल्पहर म भास्वरन में मममा दि १३१४६००००००० इनने हर लेने में एक विकला का भी अन्तर नरी होता है। इसके लिए विचार करते हैं । -प्रन्तर । यहा बल्पना वचा हा-हा-यचा प्रहा+हा (१) इस स्वरप = हा प्रहा वरने हैं महा - य क्चा (हा--ग्रहा)-(हा-ग्रहा) हा प्रहा (हा-ग्रहा) (कचा-१) (हा-य) (क्चा-१) हा ग्रहा हा य हा (क्या--१}---(चा-१) विक्लात्मत्र करने में हाय ३६०० हा (क्चा-१)-३६००य (वचा--१) इसका पाल्प स्वीकार कर हा य विषमीकरण करने से ३६०० हा (क्चा-१)-३६०० य (बचा--१) <१ हा य :: ३६०० हा (कचा--१)-३६०० य (वचा-१) <हा य ममयोजन मे २६०० हा (कचा-१)<हा य + (चा– १) ३६०० य वा ३६०० हा (क्चा--1} <य हा+३६०० (क्चा-१)} ३६०० हा (क्चा--१) <य उज्यापन के लिए मान लिसने है । हा+३६०० (क्चा----१) ३६००हा = ४७३३७४६३५०००००० ३६०० हा (क्चा-१)= ७५८८ १६५४७४२६५६१६२५०६५०००००० ३६०० (चा-१)== ५७७०७६६३६६६६६४०० । हा= १३१४६३०३७५०० ३६०० (कचा--1)+हा-५७७०६२७८६३०३३६०० उत्यापन देन में ३६०० हा (चा-) ७५८८१६५४७४२६५६१६०५०६५०००००० हा+३६०० (क्चा-१) ५७७०९२३८६३०३३६०० =१३१४६००४१३७५ <<१३१४३३.३३५०० मध्यमाधिकार विन्तु १, २ दोनो मस्यामो ये अन्तर्वर्ती य का मान है लेकिन भास्कराचार्य १३१४६००४१३७५ इमसे भी कम हार स्वीकार करते हैं, लेकिन भास्कर स्वीकृत इस हर १३१४६००००००० से भी क्षयाटेप के आधिक्य मे कदाचित् विक्ला स्थान सान्तर (अन्तर महित) होता है । इसलिए १३१४६००४१३७५ इसमे अधिक १३१४६००५०००० वा १३१४६०१००००० अथवा १३१४६१०००००० इम तरह का हर यदि स्वीकार किया जाय तब "एकापि विक्ला नान्तर भवति" यह सिद्ध होता है । लेकिन परमक्षयाहशेप में भास्करोक्त का व्यभिचार होता है । यद्यपि यहा इस लेख की आवश्यक्ता नहीं थी विन्तु मिद्धान्तगिरोमणि की वासना में किसी ने भास्वरभाष्य "लाघवार्थमायेपु सप्तमु स्थानेषु शून्यान्येव कृत्वा भागहार पटित , यतस्तथात एकापि विकलानान्तर भवति" की उपपत्ति लिखी हैं जो हमारे मत मे ठीक नहीं है इमको प्रौढ ज्योतिषी लोग निष्पक्ष होकर विचार करें ।।११॥ स्थवाऽधिमामावमयोपाभ्या चान्द्रानियनम् अर्केन्द्वोर्गति गुरिणतमवमशेषं विधुदिनस्थिता लिप्ता । मासाहानि भभागा रविविधुर्विश्वसंगुरिणतः ॥१२॥ अधिमास शेषकाद्यः शशाङ्कमासैरवाप्यतेऽशादिः । तेनोभावपि होनो गृहादिको वा रवीन्दू स्तः ॥ १३ ॥ विधु नि भा-अवमशेष (क्षयशेष) अन्दो (सूर्याचन्द्रमसो) गतिगुरिणत (गत्या गुणित) विधुदिन स्थितालिप्ता (युगचान्द्रर्भजनेन यत्फल तत्कलादिकम्) मामाहानि भभागा (गतमासतुल्यो राशिस्तथा दिनतुल्या प्रशा) इत्थ राश्यादिको रविभवति । म (रवि) विश्वसगुणित (अयोदशगुणित ) तदा (चन्द्र स्यात्) अधिमासशेषकात्-शशाङ्कमास (युगृचान्द्रमासह तात्) योऽशादि , अवाप्यते (लभ्यते) तेन फलेन, उभावपि (सूर्य चन्द्रौ) हीनौ तदा गृहादिको (राश्या- दिको) रवीन्दू (सूर्यचन्द्रौ) स्त (भवत ) इति ।। १२-१३ । हि भा --अवमशेप को रवि और चन्द्र की गति मे गुणकर युगचान्द्र से भाग देने पर फल क्लादि ममझना, गतमास तुल्य राशि और गतदिन (निथि) तन्य प्रश समझना इस तरह राश्यादि गूर्य होते हैं । और मूर्य को तेरह से गुणने से चन्द्र होने है । अधिमाम शेष मे युग चान्द्रमास से भाग देने में जो अगादिपल होता है उसको ऊपर माधिन मूर्य और चन्द्र में घटाने से तिश्यन्तकालिक मूर्य और चन्द्र होते है ।। १२-१३ ।। - अयोपपत्ति । अय चैयादित इष्टतिथ्यन्त यावच्चान्द्राह तुल्ये सौरे कल्पितेऽभीष्टमोरान्त- विन्दावशात्मको मध्यम रविर्भवैदित्यर्गणानयनोपपत्तिदर्शनेन स्फुटमेवाजोगा- १३२ ५-५-र-सिद्धान्त स्मको मध्यमरवि सौरान्ते चनादिगतिथिससौर तथा चाधिशेषप्रमारण तिथ्यन्तमौरान्तर्गत यच्चान्द्रात्मकमहर्गणानयने समागत तत्सम्वन्धि सौरान्तकमा नीय सौरान्तपिन्दुकेऽशान्मने मध्यमरवौ विशोध्य तदा तिथ्यन्ते मध्यमरविर्भ- वेनथा ३०X अधिो युमोदि =चान्द्रात्मकमविशेषम् सत सौरात्मकाऽधिशेपज्ञानार्थ- मनुपातो यदि युगचान्द्रदिनैयुग सौरदिनानि लभ्यन्ते तदा चान्द्रात्मवाधिशेप कि समागच्छति सौरात्मकमधिशेपम् - युसौx३०४ अधिशे ३०४अधिशे युसौरयुचादि युचादि युचादि युवामा' अधिशे_ अधिशे, सौरान्त विन्दुवेंशा त्मक मध्यमरवावेतस्य शोधनेन निथ्यन्ते मध्यमरवि चैगतिससौ- अशे युचामा परन्तु १२४ चैगति ससौतिथ्यन्ते रवि चन्द्रान्तरागा , अन १२४चं गतिससी -तिथ्यन्तकालिकरवि=तिथ्यन्तकालिक चन्द्र =१२४चं गतिससौ+च गतिसमो- अधिो '-१३ चैगतिमसौ अधिगे युचामा युचामा तिथ्यन्तकालिक चन्द्र । - - तयोस्तिय्यन्त कालिकरविचन्द्रयो मूर्योदयकालिकज्ञानार्थमवमशेप सम्बन्धि तयोर्गतिफनमानीयते, यथा यद्य फेन दिनेन रविगतिलभ्यते तदाऽवमोष विमित्यनुपातेनावमशेप सम्बन्धि रविगतिकला अवो रगx चग अवो -रविक्लासज्ञवा। एव '= अवमशेसचग= युवा युचा चन्द्रकला, तिथ्य-तकालिप रविचन्द्री क्रमशो रविक्ला चन्द्रकलाभ्या सहिती तदा मूर्योदयकालिको भवेतामिति ।। प्राचार्योत्तपद्य 'अर्वन्द्वोमंतिगुणितमवमशेष विधुदिन-स्थिता लिप्ता" ऽस्मिन् विधुदिनस्थिता लिप्ता इत्यगुद्ध प्रतिभातीनि ।।१२-१३ उपपत्ति पंपादि से इष्ट निथ्यन्त पर्वल जिनने चाइदिन हैं तत्तुल्य सौरदिन मानने मे इष्टसौरान विदु म मध्यम रवि होते है यह वान अहर्गणानयन को उपपत्ति दसने से माफ है दत्रिय गोरान में प्रगारमा रचित्रादि गतियि मध्यमौर, तथा तिष्यात भौर मध्यमाधिकारः १३३ मोरान्त के अन्तर्गत जो चान्द्रात्मक अधिशेष है अहर्गणानयन में तत्सम्बन्धी मौरात्मक अधि- शेष लाकर सौरान्त विन्दुक अशात्मक मध्यम रवि में घटाने से निथ्यन में मध्यमरवि होते हैं। जैसे ३०४ अधिशे युमो - चान्द्रात्मक अधिशे । इसको सौरात्मक करने के लिए अनुपात करते हैं यदि युग चान्द्रदिन मे युगमौरदिन पाते हैं तो चान्द्रात्मक अधिशेष मे क्या, इम अनुपात से सौरात्मक अधियोप प्रमाण पाया। युमोx३०४ अधिशे ३. अधिशे अधिशे अधिशे मोरात्मक अधिोप युमो युचादि युवादि युचादि युचामा ६ अत. सौरान्त विन्दुक अशात्मक मध्यम रवि मे उमको घटाने से तिथ्यन्त मे मध्यमरवि होने है अधिशे चंगति ससौ =तिथ्यन्नकालिकरवि । परन्तु १२४ चंगतिममौ निथ्यन्तमालिक- युचामा रविचन्द्रान्तराम इसलिये १२४चैगति ससौ+तिथ्यन्तकालिक रवि तिथ्यतकालिरचन्द्र अधिशे अधिगे = १२४ चैगतिममौ+चंगतिससौ- युचामा युचामा इन तिथ्यन्तकालिक रवि और चन्द्र को मूर्योदयकालिक लाने के लिए अवमगेप अवशे सम्बन्धी उन दोनो के गतिकला लाते हैं जैसे रगX अवमशेसरग =रविक्ला । =१३४चंगतिममी ma युचा चगX अवशे अयशेसवग=चन्द्रकला युवा तिथ्यन्तकालिक रवि मे रविक्ला को और तिथ्यन्तकानिक चन्द्र मे चन्द्रकला को जोड़ने में उदयकालिक रवि और चन्द्र होते हैं । प्राचार्योक्त 'अकॅन्द्वोर्गति गुरिणतमवमगेप विधुदिनम्यिता लिप्ना' इस पत्र में विधुदिन-स्थिता लिप्ता यह अशुद्ध मालूम होता है ॥ १२-१३ पुन प्रकारान्तरेणाह। वाकंना वमशेपा द्विश्वान युगावमातमककलाः । इन्दोर्वेदसुरघ्ना द्यगावमयं हृतरवमशेषात् ॥१४॥ फुत्रिद्वीभदिगृनिंगकुरसभखाश्विभिस्त्वयमशेषात् । लब्ध कलारवीन्द्वोरक्तवदेतो धुमासभागगृहैः ॥१५॥ पि. भा.-वा (अथवा) अघ्नावशेषात् (द्वादशगुणितक्षयपात्) विम्बघ्न- १३४ वटेश्वर-सिद्धान्ते युगावमाप्त (प्रयोदशगुरिणतयुगावमभक्तलब्ध) प्रवासा (अवमोपमम्बन्धिकलात्म- करविगति ) वेदसुरघ्नात् (३३४ एतद्गुणितात्) अवमशेषात् (क्षयावशिष्टात्) युगा. वम (युगक्षय ) हृत (भक्त) वा इन्दो (चन्द्रस्य) क्ला अर्थादवमप मम्बन्धिचन्द्र- गतिकला, अयवा [-अवमोपात् कुत्रिद्वीभदिगृक्ष ( (२७१०८२३१) नगरसभ- खाश्विभि (२०२७६१७) क्रमशोभक्तालब्ध रवीन्हो (सूर्यचन्द्रयो )क्ला ,द्यमासभाग- गृहै [गतदिन (तिधिश्च) अग (भाग) गतमाम राशि ज्ञात्वा] उक्तवत् (पूर्ववत्) एनी (रविचन्द्रौ) ज्ञातव्याविति ॥१४-१५॥ मे हि भा -बारहगुरिणत प्रवमोप को तेरह गुणित युगावम मे भाग देने पर लब्धि प्रकला (क्षयगेषसम्बन्धी रविगतिकला) होती है । और अवमगेप को ३३४ गुरण घर युगावम भाग देने से लब्धि चन्द्रमा की कला (अदमदोष सम्बन्धी चन्द्रगतिवला) होती है या अवम शेष को क्रमदा २७१०८२३१, २०२७६१७ भाग देने मे रवि और चद्र की पला होती है और गतदिन (तिथि) को अग, गतमाम को राशि ममभकर पूर्ववत् रवि और चन्द्र ममझना चाहिये ११४-१५॥ अनोपपत्ति । अथावमशेषमानम् अवशे. एनत्सम्बन्धि रविगति रंग अवो युचा युचा अवशे हरभाज्य- युचा रग अवशे४१२ द्वादशभिर्गुण्यते तदा अवशे४१२ युचा १२ युचा४१२ ग १३ युगावम १३ युगावम रग =रविफलम् । एवमवमपसम्बन्धि चद्रगति - चग अवशे युचा चग रंग अवगे युचा रग ==१३४ अवशेx१२ यचा:१२ १३४अवशेx१२ १३ युगावम अवशेX १२ युगावम --चफ्लम् । % 3D अथवा अवशे अवशे युचा पठिनाङ्क रविफलम् । तथा मध्यमाधिकारः अवश-१२-चन्द्रफल= अवशे अवशे चन्द्रफलसाधने युगावम युगावम पठिता १२ इन्दोर्वेदमुरघ्नादिति स्थले "इन्दोर्टोन्दु परिघ्नादिति पाठ समीचीन प्रतिभाति" अत उपपन्नमाचार्योक्तम् ।।१४-१५।। उपपत्ति । अवमशेपमान अवशे युचा एतत्सम्बन्धी रविगति- रग अवशे युचा अवशे हरभाज्य को बारह से गुणने से अवशं ४ १२... अवशेx१२ युचा X १२ १३ युगावम रग रविकला ." युचाX१२ --१३ युगावम, इसी तरह अवमरोप सम्बन्धी चन्द्रगति चगX अवशे युचा चग रग अवशे युचा ग १३X अवशेx१० युना १२ रग अवगे-१२ १३ x अवशे४१२ १३ युगावम %3D चन्द्रफल। अथवा युगावम प्रवा-१२ १३ युगावम रविफल अवशे १३ युगावम १२ अवयं पठितहर रविफल । अवशेx १२ अवश एव चन्द्रफल= प्रवेश युगावम युगावम पठितहर - पन्द्रफल इसमे प्राचार्योक उपपर हुआ ॥१४-१५॥ प्रथ मूर्यकलातो रविचन्द्रयोरानयनमाह द्विरसघ्नाः सूर्यकला बारगविभक्ता रविघ्नतिथिभागः। युक्ता विधोविंशोध्याः सूर्यः सूर्योनितश्चन्द्रः ॥१६॥ वि भा-सूर्यक्ला ( १४ श्लोकोक्ता ) द्विरसघ्ना (६२ एभिर्गुणिता) वारणविभक्ता (पश्चभत्ता) रविघ्नतिथिभाग (द्वादशगुरिणततिथिभि ) युक्ता (महिता) विधो (चन्द्रात्) विगोध्या (होना ) तदा सूर्यो भवेत् । सूर्यान्वित वटेश्वर-सिद्धान्ते । - (मूर्ययुक्न.) चन्द्रो भवेदिति ।।१६।। हि.भा-सूर्यक्ला (१४ श्लोक में माधित मूर्य कला) को वामठ से गुणकर पाच में भाग दने पर जो फल हो उसे बारह गुरिणन नियि में जोड़ देना, चन्द्रमा में घटा देने में मूर्य होते है । उमी में सूर्य को जोडने से चन्द्र होते हैं ।।१६॥ अत्रोपपत्ति. अवमशेप सम्बन्धि सूर्यगते म मूर्यकला, एतत्सम्वन्धि घट्यात्मकमानम्= ६०४ सूर्यक्ला रविगतिकला घट्यात्मकफलम् । तिथौ योजनेन सूर्योदय कालिक- तिथिमानम् रविगतिक द्वादशभिर्गुणनेन १२ १२ति+६०४मूकला १२ = १२ति + ६० सूकला ६० सूकला १२ ति + रविगक रविगक १२ स्वल्पान्तरात् तथा च (६०) स्थाने स्वल्पान्तरात् ६२ गृहीतम् तदा १२ति+ ६२ मुकला चन्द्र-रवि = ति + ६०X सूकला_चन्द्र-रवि %3D ५ +रवि--चन्द्र :: १२ ति + ६२ सूक्ला ५ वा. रवि = चन्द्र-(१२ ति + ६२ मूकला) प्रत उपपन्नम् ।।१६।। उपपत्ति अवम शेष सम्बन्धी रविगति को सूर्यकला कहते हैं । मूर्यकला को पट्यात्मक करने के लिए अनुपान करते है । यदि रविगनिकला में साठ पटी तो मूर्य कला में क्या इस अनुपात ६.X मूवला से घश्यात्मक फल पाया। = घश्यात्मक सूक्ला, रविगक्ला इसको तिथि मे जोडने से सूर्योदय बालिक तिथि प्रमाण होगा। / चन्द्र-रवि ति+ ६०४मूक्ला रविगतिकला -=ोदयितिथि -- वारह से गुणने से १२ति + ६०xमुक्ला४१२ दिगतिक = १२ति+ ६०४मूक्ला रविगत .
मध्यमाधिकार. १२ति + ६०४सूकला ५ = १२ति+ सूकला स्वल्पान्तर से - चन्द्र तथा चन्द्र-- वि.भा : र+१२ति+ ६२ सूक्ला ६२ सूकला (१२ति + ५ ५ -रवि . सिद्ध हुप्रा ॥२६॥ अथ चन्द्रकलातश्चन्द्ररव्योरानयनमाह । खखकृतनवत्रिकोनाः शशिलिप्तास्तिथिहतार्कभागयुताः । क्षेप्याः सवितरि चन्द्रश्चन्द्रात्संशोधितः सूर्यः ॥१७॥ शशिलिला. (पूर्वसाधितचन्द्रकला.) खखकृतनवतिकोना (३६४०० एभी रहिता) तिथिहतार्कभागयुता (द्वादशगुणिततिथियुक्ता) सवितरि (सूर्य) क्षेप्या (योज्या) चन्द्रो भवेत्, चन्द्रात्मशोधित (खखकृतनवेत्यादि नाऽनीतमस्कारश्चन्द्राद्रहित ) तदा सूर्यो भवेदिति ।। अनोपपत्ति । अवमशेपसम्बन्धि चन्द्रगते म चन्द्रकला, एतत्सम्वन्धि घट्यात्मकमानम् = ६०४ चन्द्रकला तिथौ योजनेन सूर्योदयकालिकतिथि = ति+ ६० चन्द्रकला चन्द्रगक चगक चन्द्र-रवि द्वादशभिर्गुणनेन १२ ति+ १२४६०४ चन्द्रकला १२ चगक चद्रक-चन्द्र-सूर्य अत उदयवालिकश्चचन्द्र १२ ति+चन्द्रकला+सूर्य -चन्द्र वा चन्द्र-(१२ ति+चकला)=सूर्ग उदयकालिकायाम् अत्र चन्द्रकलाया ३६४०० इति यद्विशोधितमाचार्येण तत्तथ्य न प्रतिभाति अन्यत्सर्व समीचीनमिति ॥१७॥ हि भा.--पूर्वसाधित चन्द्रकला मे ३६४०० पटाकर यारह गुणित तिथि को जोड देना तव जो हो उसको सूर्य मे जोडने से चन्द्र होते हैं । चन्द्र में घटाने से सूर्य होते हैं। भवमशेष सम्बन्धी चन्द्रगनि का नाम चन्द्ररला है। एतत्सम्बन्धी घयात्मर मान ६० चन्द्रकला इसको तिथि में जोडने से उदयवालिय तिथि होगी चगव - %3D १२ ति+ - ६.xचन्द्रकला -उदयवालिरातिथि: चन्द्र-रवि ति+ बारह मे ७२०Xचगक गुण देने मे १२ नि+१२४६०४ चन्द्रकला 'नि+ चगर st०1३५ D१२ ति+मगर -चन्द्र-रवि (स्वल्पान्तर में) १३८ वटेश्वर-सिद्धान्ते अत १२ ति+चगक+रवि-सूर्योदयकालिन चद्र, सूर्योदयच- (१२ ति+चगक) -सूर्योदयकालिक रवि । यहा पर चद्रकला म ३६४०० इतना घटाकर जो प्रागे की क्रिया की गई है सो ठीक नहीं मालूम पडती है ।।१७।। पुनश्च दरव्योरानयनमाह । त्रिखकुहुताशन विकला गोघ्नावमहता कला गतस्तिथिभि । सूर्यघ्नैरशयुता सार्काश्चन्द्रो विधुस्तदूनोऽकं ॥१८॥ वि भा–त्रिखकुहुतागनविकला (३१०३ एतावत्यो विक्ला ) गोनावम- हृता (नवगुणितावमभक्ता ) तदा क्ला स्यु । सूर्यघ्नर्गततिथिमि (द्वादशगुणित गततिथिमि ) युता (सहिता ) सार्वा (रविसहिता ) च द्रो भवेत् । तदून (तद्रहित ) विधु (चन्द्र ) अर्क (सूर्य ) भवेदिति ॥१८॥ अत्रोपपत्तिस्तु सुगमैव । हि भा-३१०३ इतनी विकला को नव गुणित अवम से भाग देने पर क्ला होनी है । उसम वारहगणित गततिथि जाड देना इमम रवि के जोडने से चद्र होते हैं । चन्द्र में घटान से रवि होते हैं ॥१८॥ इमकी उपपत्ति सुगम ही है। प्रयाधिमासावमापाग्या सूय ज्ञावा चद्रानयनम् । नगगुगतिथिगोकुभुज शशिमासंश्व क्षयाधिशेषाभ्याम् । लव्धकला विविराशो रविगुरपतिथिभिश्च सयुत सविता ॥ १६ ॥ भवति शशो, शीताशुविवजितो वा सहस्राशु ॥ १६ ॥ वि भा–क्षयाधिशेषाभ्या (अवमाधिक गेपाभ्या) क्रमशो नगगुणतिथिगो कुभुज (२१९१५३६) शशिमास (चान्द्रमास ) विभाजिताभ्या लब्धालाविवराण (लब्धक्लान्तराश) रविगुणतिथिभिश्च (द्वादशगुणितगततिथिभिश्च) सयुत (सहित ) सविता (मूय ) शशी (च'द्र ) भवति । शीताशु (चन्द्र) द्वादशगुरिणत तिथिभिविजित (रहित ) तदा सहस्रा (सूर्य) भवेदिति । अत्र लयाला विवरारिति पाठ साधु प्रतिभाति ।। हि भा -क्षयाप और अधिशेप म कमा २१६१५३६ इसमे तथा चा द्रमास स भाग देने मे फलान्तर को रवि में जोड देना और बारह गुणित गनिपि वो भी रवि म जोडना सब चद्र होते हैं। यदि चद्रमा म बारह गुरिणत तिथि घटा देते हैं तो रवि होते हैं ।। १६॥ प्रयोपपत्ति । संघामान्तत इष्टतिथ्यन्तावधि यास्तिथयस्तत्तुल्ये सौरममारो-इष्टमास - ::ति-च-र . -नि अधिशे अवशे-ति+ मध्यमाधिकार. १३६ सोरान्त विन्दावशात्मको मध्यमरविर्भवति । तेन सौरान्लेशात्मको रवि =ति । तथा सौरान्ततिथ्यन्तयोरन्तर्गतमधिशेपप्रमाण चान्द्रात्मक यदस्ति तत्सम्बन्धि सौरान समानीय सौरान्तविन्दुकाशात्मकरवौ शोधनेन तिथ्यन्तकालिको मध्यम- रविर्भवति । अत्र सौरात्मकाधिशेषज्ञानार्थमनुपात क्रियते यदि युगचान्द्र युग- सौरदिनानि लभ्यन्ते तदा चान्द्रात्मकाधिशेपै. कि जात फल सोरात्मकमधिशेपम् ३० अरो, युसौ.३० अशे_ अधिशे एतस्य तिथौ शोधनेन तिथ्यन्तकालिक युसौ युवा युचा युचा अधिशे रवि.=ति । अय चैकस्मिन् दिने यदि रविगतिर्लभ्यते तवाऽवमशेष युचा रविग अवशे कुदिनात्मक. किं जाता नत्सम्बन्धि रविगति (१) युचा १२ति -च -र र+१२ति-चन्द्रस्तिथ्यन्तकालिक १२ सूर्योदयकालिक रवि+१२ तिसूर्योदयकालिकचन्द्र। पर तिथ्यन्तकालिक रवि+अवमशेप सरविगति सूर्योदयकालिकरवि = रवि+ रविगति अवशे =सूर्योदयकालिकरवि युचा -ति- अधिशे, रविगति अवशे, युचा युचा पुचा युचा रग अवशे अधिशे. '- सूर्योदय रवि । युचा युचा अवशे सूर्योदयकालिक+१२ ति सूर्योदयचन्द्र १३ ति+ पठिताक पत्रा प्रत सूर्योदय च -१२ ति-सूर्योदय कालिकरवि अत उपपन्नम् ॥१६॥ हि.भा-चंत्रामान्त मे इष्टतिथ्यन्त तक जो तिथि है तत्तुल्यमौर प्रमाण रहने मैटरमाम * सौरान्त विन्दु मे घशात्मवरवि होते हैं । इगलिये मोरान्त मे अगात्मरविनि। और सौरान्त तिध्यन्त के अन्तर्गत जो चान्द्रात्मक अधिरोप है तत्सम्बन्धी गोर ने पाकर मोगल विन्दु ये प्रशात्मय रवि मे घटाने मे तिघ्यन्त बानिक मध्यमरवि होते हैं । हा मांगना मधिशेप ज्ञान के लिये अनुपात करते हैं । यदि युगवान्द्र मे युगमौर दिन पाते हैं दो चान्द्रा- स्मय पधिप में धया फन मौरात्मक अधिशेप माया,। ३० अविरा मुसा_१० अधिग युमो युचा माधि लिपि में इमरो पटाने मे तिम्पन्नवालिारविनि-अपि पुषा पुत्रा % 3D -ति-अधिशे , अवर्ग + अधिशे १४० वटेश्वर-सिद्धान्ते दिन मे रविगति पाते हैं तो कुदिनात्मक अवम शेप मे क्या इस अनुपात से अवमशेष मम्बन्धी रविगति- %3D . रविगx अवसे + ति- + + । परन्तु १२ ति = च-र : २+१२ तिचद्र= तिथ्यन्त वा चन्द्र युचा सूर्योदयकालिक र + १२ ति-मूर्योदय कालिाचन्द्र लेक्नि तिथ्यन्तकालिकरवि+अवमशेस रविगति = सूर्योदयकालिकरवि रविग-अवशे अधिो रग अवमर्श =रवि+ =ति- युचा युचा युचा अधिशे प्रवर्श -ति- अधिशे प्रवी युचा युचा युचा पठितहर रग अवशे अधिशे -ति+ =सूर्योदयकालिर रवि पठिनहर युचा पर सूर्योदयकालिकरवि+ १२ ति=मूर्योदयकालिकचन्द्र प्रदर्श अधिो :: १३ ति+ = मूर्योदयकालिकचन्द्र पटितह युचा तथा सूर्योदयवालिक चन्द्र–१२ तिम् सूर्योदयकालिक रवि इससे माचार्योत उपपन्न हुआ ॥ १६-१६॥ फलविवरं मध्यमतिथिः शेपकला द्वादशोद्धता नाड्यः ॥ २० ॥ वि.मा-फलविवर (रविचन्द्रान्त राश) द्वादशोद्धत मध्यमतिथिर्भवति । शेपकला द्वादशोद्धतास्तदा नाड्य (घटिका ) स्यु ॥ इति । हि.भा--रवि चन्द्रान्तराश को वारह से भाग देने से मध्यमतिथि होती है । शेपकला से भाग देने से घटी होती है।। २०॥ अत्रोपपत्ति। पदि द्वादशांशेरेका तिथिस्तदाशेषांश किमिति तत्स्वरूपम् = १ तिशेधारा १२ ६० घटीमापाश शेपवला घट्यात्मक पलम् । मन दोपकला द्वादशोढता नाड्य इति तध्यमुक्तम् ॥२०॥ यदि बारह मा में एक तिषि (६० घटो) तो पाम में बया इस अनुपात में पास सम्बन्धी पश्यात्मप पत्र माता है। १ ति शेपान ६. घटीxपाहा १२ पोपवता हो सघश्यात्मक पल ।.:, उपपन्न हुमा ॥ २० ॥ को बारह - मध्यमाधिकारः १४१ घट्यात्मक अथावमशेपघट्यानयनमाह खरसघ्नात् कुदिनाप्तावम शेषातिथे ड्यः॥ वि. भा.-खरसनात् (पष्टिगुरिणतात्) कुदिनाप्तावमशे पात् (कुदिनभक्ता- वमशेषात्) तिथेर्नाड्य (क्षयघटिका' स्यु)। हि भा -कुदिन से भाग लिया हुअा अवमशेष को साठ में गुणने से होता है। उपपत्ति. अथावमशेषप्रमाणम् बान्द्रात्मकम् - अवशेप अमानुपातो यद्य कतिथौ युकुदिन पष्टिघटिकास्तदाऽवमशेष किं जातमवमशेपमान घट्यात्मकम् - -अवमशेप घटी। ६०४यवशे युकुदिन अवशे चान्द्रात्मक अवमशेष- । अव अनुपात करते हैं कि यदि एकतिथि युगदिन साठ दण्ड पाते हैं तो अवमशेप मे क्या इस अनुपात मे घट्यात्मक अवमशेप प्रमाण पाया। ६०xअवशे =प्रवमशे घटी । इसमे प्राचार्योक्त मिद्ध हुप्रा ।। युकुदि अथ रविचन्द्रयोरानयनमाह द्विगुरगतिथिलिप्तिकाम्यो नगर्नु लब्धाधिकाप्तरविहतपुक् । त | गिनो विश्वगुणो विधुस्तदूनस्त्रयोदशहृदर्कः ।। २१ ॥ वि भा--द्विगुणतिथिलिप्तिकाभ्य (द्विगुणनिथिकलाभ्य ) नगर्तुलब्धाधिका- तरविहत युक् (६७ एलद्भवता सन्तो यानि लब्धान्यधिकफलानि तैदिशगुरिणततिथि योज्या) तद्य र (तत्सहित ) विश्वगुण (योदशगुणित ) इन (सूर्य) विधु (चन्द्र ) भवेत्, विधुस्तदून (चन्द्रस्तत्फलरहित ) योदशहत् (त्रयोदशभक्त ) तदा अर्क (सूर्य) भवेदिति ।। २१ ।। अत्रोपपत्ति रधिकाप्त फलेऽर्कगुणे इत्यादिवदेव बोध्येति ॥२॥ हि भा,--द्वि गुण तिथिकला मे ६७ से भाग देने मे जो फल होता है उसको बारह गुरिणत अधिक फल मे जोड देना उममे तेरह गुणित सूर्य को जोड़ने में पन्द्र होते हैं । चन्द्र में उमको घटाकर तेरह मे भाग देने से रवि होते हैं ॥ २१ ॥ इमको उपपत्ति “अधिकाप्तफलेऽवंगुणे" इत्यादि को उपपत्ति की तरह समझना ॥२१॥ पुना रविचन्द्रानयनमाह अधिकातहतो धगरणः कुदिनहतः पर्यपादिफललब्धिः । शशिवरप्येवं फलान्तरं विश्वहुद्वाऽर्कः ॥ २२ ॥ समाफलेनाशीतगोरिना हतेन चन्द्रमाः । विवजितः सहस्रगुः सहस्रगुयुतः शशी ।। २३ ॥
-
पर
१४२
वटेश्वर-सिद्धान्ते
वि. मा -द्यु गण (अहर्गण) अधिकाप्तहत (अधिकफलगुणित ) बुदिनहृत
(युगकुदिनभक्त ) पर्ययादि फललब्धि (भगणादिलब्धफल) भवेत् । शशिवर्षे (युग-
चन्द्रभगणे ) अपि एव फल साध्य, फलान्तर विश्वहत् (त्रयोदशभक्त) अथवाऽर्क
(सूर्य ) भवेत् । अशीतगो (सूर्यस्य) इनाहतेन (द्वादशगुणितेन) समाफ्लेन
(भगएफलेन) विवर्जित (हीन ) चन्द्रमा (चन्द्र ) सहस्रगु (सूर्य) भवेत् ।
तेन फलेन युत सहस्रगु (मूर्य ) शशी (चन्द्र) भवेदिति ॥२२-२३॥
प्रत्रोपपत्ति
यदि युगकुदिनैर्यु गाधिमासा लभ्यन्ते तदाहरणेन किमित्यनुपातेन लब्धा-
गताधिमासा । युगाधिमा X अहर्गण = गताधिमास, एव युगाघिमासयुं गचन्द्रभगणा
युकु
लभ्यन्ते तदा गताधिमासे कि लब्ध भगणादिकम् = युचभX गताधिमा
युगाधिमास
युगचभगण
युगरविभगण
युचगभगरण= १३xयुगरविभगरण
प्रतोऽधिकफलसम्बन्धि यद्रवि भगणादि फल तत् त्रयोदशगुणित यद्यधिक-
फ्ले योज्यते तदाऽधिकफल सम्बन्धि भगरणादि चन्द्रो भवेत् । यदि चाधिकफल
चन्द्र विशोध्यते योदशभिर्भज्यते तदा रविभवेदिति । अत श्लोकोवली 'समा-
फलेनाशीतगोरिनाहतेन चन्द्रमा इति स्थले ' समागतेनाशीतगोविश्वहतेन चन्द्रमा"
इति पाठ सा प्रतीयते तथा शशिवरित्यत्र वर्षगन्देन भगगो बोध्य इति ।
॥२२-२३॥
हि भा -अहगण को अधिक फल से गुणकर युग कुदिन में भाग देने में भगणादि
पल होता है । इमी तरह चन्द्र भगण में भी फ्ल लाना, दोनो फ्लो के अन्तर करन से जो
हो उसको तेरह से भाग देने से रवि होते हैं अर्थात् चन्द्रमा म अधिक पल को घटाने से जो
हो उनको तरह से भाग देने पर रवि होते हैं और तेरह गणित रवि मे मधित फल जोडने
मे चद्र होत हैं ॥२२ २३॥
उपपत्ति
यदि युगकुदिन म युगाधिमास तो महगण मे क्या इस अनुपात में जो फल पाता है
यही अधिक फल है । मधिक फल सम्बन्धी चद्रभगणादिपल लाइपे अथवा युगाधिमास,
युगबुदिन, युगच भगण पर मै पनुपात म भगणादि चद्र पाते हैं उमम अधिक पल को
घटान मे तेरह गुरिणत रवि होने है क्योकि युचभगण
युगरभगण
तथा युवभगए-१३ युगरविभगण = युगाधिमाम
प्रत अधिकार सम्बधिचर-प्रधिक्फम-१३ रवि अधिक्फ्लसचद्र-अधिकफ
रवि ॥२२२३॥
मध्यमाधिकारः १४३ पुनस्वदानयनमाह। अधिकाप्तफलेऽगुरणे विश्वाहत भानुसंयुते चन्द्रः । चन्द्रो वा तद्धोनो विश्वहतो मध्यमः सविता ॥२४॥ वि. मा.--अधिकाप्तफले (अधिकमाससम्भूतफले) अर्कगुरणे (द्वादशगुरिंगते) विश्वाहतभानुसयुते (प्रयोदशगुणितरविसहिते) तदा चन्द्रो भवेत् । तद्धीन. (तेन फलेन रहितः) चन्द्रः विश्वहृतः (त्रयोदशभक्त.) तदा मध्यम. सविता (मध्यम- सूर्यो) भवेदिति ।। अनोपपत्तिः अधिकफलमर्कगुरिणतं चन्द्राशेभ्यो विशोध्य विश्वाश इत्यादिना स्पष्टमेव । तत्र यत्कथित तत. किश्चिदप्यधिकमान न कथ्यतेऽतोत्रापि वासना तथैव ज्ञेयेति-केवल- मधिकफलेऽन्तरमस्ति, तावता न काचिद्धानिरधिकफलस्थानेऽत्रानत्यमधिक फल ग्रहीतव्यमिति ॥२४॥ हि.भा --अधिकफल को बारह से गुणवर तेरह गुणित रवि मे जोडने से चन्द्र होते हैं । और चन्द्र में उस फल को (वारहगुणित अधिकफल को) घटाकर तेरह मे भाग देने से मध्यम मूर्य होते है। उपपति "अधिक फलमर्कगुरिणत चन्द्राशेम्यो विशोध्य विश्वास" इत्यादि श्लोक वी उपपति जिस तरह की गई है उसी तरह यहा भी उपपत्ति करनी चाहिए । उममे यहा कुछ भी विशेष बातें नही है केवल अधिक फल मे अन्तर है इसलिए उपपत्ति करने में यहा का अधिक फल लेना चाहिए। अधिक्फलमकंगुरिणतमित्यादि श्लोकोपपत्ति में वहा का अधिवपल ग्रहण करना चाहिए ॥इनि॥२४॥ युगभोदयाहते वा युगकुदिनोद्धृते च भगणादि । सवितृगृहादिकं यद्भगरणाश्च गतर्फपरिवर्ताः॥२५॥ वि भा.अहर्गणे युगभोदयाहते (युगपठित भोदयगुणिते) युगकुदिनोद्धृते (युगकुदिनभक्ते) भगणादिफल भवेत् तत मवितृगृहादिक (रविराश्यादिक) भवेत् भगगाश्व (अनुपातागता गतभगणा ) गतर्फपरिवर्ता (नक्षवगतभगएरः स्यु ॥इति॥ उपपति अहर्गणतोऽनुपातेन यथा भगरणादिग्रहानयनं तथानापि कार्यमर्थात् युगभोदय Xग्रहर्ग (युत् + युरभ)ग्रह, -ग्रह-+ भगणादिर युक युत युकु प्रमाहरणे शोषिते भगणादि रविम्ततो राश्यादिरविनान भवेन् । अह+ युरभ ग्रह
वटेश्वर-सिद्धान्ते
हि भा -प्रहगंण को युगभोदय से गुण कर युगकुदिन से भाग देने मे भगणादि फल
होता है । मनुपात से जो गतभगण प्राता है वह नक्षत्रगत भगए है ॥२५॥
उपपत्ति
अहगंण से अनुपात द्वारा जमे भगणादि ग्रहानपन होता है यहा भी उमी तरह
करना चाहिये प्रर्थान् युभोदय X प्रह_ (युयु + युरभ) मह = 4+रवि, अहर्गण को घटान
युकु
युए
में शेष मध्यम रवि होंगे ॥२५॥
पुनश्चन्द्रार्कयो रनयनमाह
अधिमास हतो द्य गण. फुदिनहत पर्ययादि तद्युक्त ।
विश्वप्नोऽर्कश्चन्द्रोहीनस्त्रयोदशहृदर्क ॥२६॥
वि भा -धुगण (अहर्गरण) अधिमासहत (युगाधिमासगुरिणत ) कुदिन-
हृत (युगकुदिनभक्त ) पर्ययादि (भगणादिफल यत्) तद्युक्त (तेन भगणादिफलेन
सहित ) विश्वघ्नोऽर्क (त्रयोदशगुरिणत रवि ) तदा चन्द्रो भवेत् । चन्द्रस्तेन फलेन
हीन (प्रानौतेन फलेन रहितश्चन्द्र ) त्रयोदशहृत् (त्रयोदशभक्त ) तदाऽर्क (रवि)
भवेदिति ।।२६।।
अनोपपत्ति ।
इन्दुमण्डलगुणेन्दु सगुणबध्नचविवरेऽघिमासका इत्युक्तेर्युगाधिमास-
म्वरूपम्युच भगरण-~१३ युरविभगण = युगाधिमास एतत्स्वरूपदर्शनेनैव स्पष्ट-
मवसीयते यदहगंणादनुपातेन या गाधिमास सम्बन्धी भगणादिफल तन यदि त्रयो-
दशगुणित रवि भगणादिफल योज्यते तदा भगणादिकश्चन्द्रो भवेत् । यदि तदेवाधि-
मास सम्बन्धि भगरणादि फल चन्द्र विशोध्यते त्रयोदशभिहते च रविर्भवे-
देवेति ।। २६ ॥
हि भा - महगंण को युगाधिमास मे गुणकर युगकुदिन से भाग देने से जो भग-
णादि फल हो उगको तेरह गुरिणत रवि म जोडने से चन्द्र होते हैं। मोर उमी फल को
चन्द्र में पटा कर तेरह से भाग देने से रवि होने हैं ॥२६॥
उपपत्ति
-
इन्दुमण्डल गुणेन्दुम गुणमध्न चन विवरेऽधिमामा , इम उनि मे युगवभगण
१३ युगरविभगण% युगाधिमास, इसको देखने से स्पष्ट है कि महगण से अनुपात द्वारा जो
युगाधिमाम सम्बन्धी भगणादि फल हो उममें यदि तेरह गुणित रवि भगणादि फल को
जोड देंगे तो भगवादिर चन्द्र होते हैं । यदि उमी अधिमाम सम्बन्धी फल को चन्द्र मे घटा
करह से भाग देते हैं तो रवि होते हैं । इति ॥ २६ ॥
मध्यमाधिकारः १४५ अथचन्द्रपातेन रविचन्द्रयोरानयनमाह । शशिपातैर्वा | गणे निहते कुदिनोद्धृते च भगरगादि । तत्सहितो रविरिन्दुर्विविहीनोऽथ धर्माशुः ॥२७॥ वि भा-युगणे (अहर्गणे) शशिपातं (युगपठितचन्द्रपातभगणं ) निहते (गुरिंगते) कुदिनोद्धृते (युगकुदिनभक्ते) भगणादिफल भवेत् । तत्सहितो रवि (तत्फलयुक्तोरवि ) इन्दु (चन्द्र ) भवेत् विधु (चन्द्र ) विहीन (तेन फलेन रहित ) तदा धर्माशु (सूर्य) भवेदिति ॥२७॥ अत्रोपपत्ति युगचान्द्रपातभगणरनुपातेना 'युगकुदिनैर्युगचन्द्रपातभगरणा लभ्यते तदाह- गणेन किमिति" नेन यत्फलमागच्छति तद्यदि रवी योज्यते तदा चन्द्रो भवेत् । चन्द्र च तत्फल विशोध्यते तदा सूर्यो भवेदेवेति ॥ सूर्यस्य पाताभावाञ्चन्द्रपातयुगभगणे- नानुपातागतफल क्रमशो रविचन्द्रे धनम् तदा तौ भवत इति ॥३७॥ हि भा -प्रहर्गरण को युगपठित चन्द्रपात भगरण से गुणकर युगकुदिन से भाग देने मे जो भगणादिफल होता है उसको रवि मे जोडने मे चन्द्र होते है यदि चन्द्र मे उस फल को घटा देते हैं तो रवि होने हैं ॥ २७ ॥ उपपत्ति युगचन्द्रपातभगण से अनुपात "युगकुदिन मे युगचन्द्रपात भगण पाते है तो अहर्गण में से जो भगणादिफल आता है उसको यदि रवि में जोड़ते हैं तो चन्द्र होते हैं। यदि उस फल को चन्द्र मे घटा देंगे तो रवि हो जायेगे। रवि को अपना पात नहीं हैं, चन्द्रपात युगभगण से जो अनुपात द्वारा भगणादिफल होता है उसको रवि मे जोडने मे चन्द्र होत हैं । और चन्द्र म घटाने मे रदि होते हैं । स्पष्ट ही बात है ।।२७।। . युगव्यतीपातहतावहर्गणाध गक्षमावासरलब्धमब्बितम् । क्षपाकरोन भगरणादि भास्करो विवस्वतोन रजनीकरो वा ॥२८॥ वि भा --अहर्गरणात्-युगव्यतीपातहतात् (युगपठितव्यतीपातभगरा गुणात्) युगक्षमावासरलब्ध (युगकुदिनभक्त यत्फल) तदन्दित (द्वादशभक्त) यत्फल (चन्द्ररहित) तदा भगणादिभास्कर (भगणादिसूर्यो भवेत्) विवस्तोन (तनैव फले सूर्यहीन) तदा रजनीकर (चन्द्र ) भवेदिति ॥२८॥ अनोपपत्ति पूर्ववदेव बोध्येति हि.भा-प्रहगंण को युगपटिन व्यतीपान भगरण में गुणवर युगबुदिन म भाग दन से जो फल होता है उमको बारह से भाग दीजिए, इसम चन्द्रमा के पटाने म सूर्य होते हैं और उसी पल में मूर्य को घटाते है तो चन्द्र होते हैं ।। उपपत्ति पूर्ववत् समझनी चाहिये ॥२८॥ " क्या क्षपाकरोन
१४६
वटेश्वर-सिद्धान्ते
प्रकारान्तरेण रविचन्द्रयोरानयनम् ।
वाशाडुमासाप्तफलोनसंपुतं पृथक् तमर्धाकृतमकशीतगू।
वि भा-शशाङ्कमासाप्तफलोनसयुत (अहर्गणसम्बन्धि यचान्द्रमासफ्न
तद्रहित युत) पृथक् (स्थानद्वये स्थापित) त (रविचन्द्रयोग) अर्धीकृत (द्वाभ्या
भक्त) तदाऽर्कशीतगू (सूर्याचन्द्रमसौ) भवेतामिति ।। मिद्धान्तशेखरे श्रीपतिनंत-
द्विपयेऽतिस्पष्ट मुन्दर प्रतिपादितमस्तीति ।।
अस्योपपत्ति
यदि युगकुदिनयुगचान्द्रमासा लभ्यन्ते तदाऽहणेन किमित्यनुपातेनाहरण
सम्बन्धि चान्द्रमासफलम् -
युचामा अह _ (युचभ युरभ) ग्रह
युकु
यु
युचभ ग्रह
युरभ ग्रह = भगणादिच-भगणादिरविअन्तरम्
युकु
युकु
रविचन्द्रयोग =योग
यो अन्तर योग+अन्तर
चन्द्र ।
२
अत उपपन्नम्।
हि भा -चान्द्रमास सम्बन्धी फल को दो जगहो में रसे हुए रविचन्द्र योग मे घटाना
पोर जोडना, प्राधा करना तब क्रममा रवि और चन्द्र होते हैं ।
मिदानशेखर म घोपनि ने इस विषय में बहुत अच्छा प्रतिपादन किया है ।
यत
२
उपपत्ति
%3D
मन्नर
यदि युगबुदिन मे युगचान्द्र माम पाते हैं तो ग्रहण म यया इम अनुपात मे चान्द्र-
माम सम्वन्धी फल प्राया, युचामा ४ ग्रहगए
(युचभ - युरभ) प्राण
युक
युकु
युचभर महर्गरण युरम महर्गण.
भगणादिच-भगणादिरवि:
युद्ध
राव और चन्द्र के योग = यो
यो---अन्तर
रवि ।
यो+प्रन्तर
= चन्द्र, प्रत उपपन्न हुमा ।
२
२
अघिमासाप्तफलेन जितश्चतुर्दशाश- सविताऽथवा भवेत् ॥२९॥
निभा --अधिमासाप्तफ्लेन (महर्गणमम्बन्ध्यधिमासफ्लेन) वजित
(होनस्तयोश्चन्द्रव्योर्योग ) चतुर्दमाग (चतुर्दशभक्त ) अथवा सविता (सूर्य)
भवेदिति ॥२६॥
मध्यमाधिकार. ४७ अस्योपपत्ति । यदि युगकुदिनयुगाधिमासा लभ्यन्ते तदाऽहर्गणेन किमित्यनुपातेनाहर्गण- सम्बन्ध्यधिमासफलम् __ युगाधिमा अह युकु (युचभ-१३ युरभ) अह युचभअह -१३ युरभX अह -भगणादिच -१३ युकु यु युकु भगणादिरअन्तर कल्पितम्-च-१३ र रविचन्द्रयोर्योग ==यो च+र यो-अन्तर - च+र-च + १३ र = १४ र यो-अन्तर रवि । अत सिद्धम् ॥ हि भा--अधिमाममम्बन्धी फल को रविचन्द्र के योग म घटाकर चौदह मे भाग देने से रवि होने हैं। .. %D - उपपत्ति यदि युगकुदिन मे युगाधिमास पाते हैं तो अहर्गण मे क्या इस अनुपात से महर्गरण मम्बन्धी अधिमास फल प्राया । युप्रमा ग्रह (युचम-१३ युरभ) अहर्गण युकु युकु युचभ ग्रहण १३ युरभ ग्रहगण = भगणादिच १३ भगणादिर, युकु युकु - च--१३२% अन्तर मान लिया। रवि और चन्द्र वे योग= च+र-यो मत योगअन्तर%१४ र यो अन्तर १४ यो-प्रधिमासफल मत प्राचार्योस्त मिद्ध हुप्रा ॥२६॥ प्रकारान्तरेण रविच द्रयोरानयनम् । पुगावमध्नो चुगरणः क्यहोद्धृतो पासरादिसहिताहिनौघतः। प्रोक्तवद्रविरनुष्णदोधितिर्वा भवेद्विपलमंशकादिक ॥३०॥ वि. मा-शुगरण. (ग्रहगरण) युगावमध्न (युगक्षयदिनगुरिणत ) क्वहोद. धृत. (युगवुदिनभक्त) वामरादि (दिनादि) फर दिनीपत (महागात १४८ वटेश्वर-सिद्धान्ते सहितात् (युक्नात्) तत प्रोक्तवत् (पूर्व कथितरीतिवत्) अशकादिक (भागादिक) रवि (सूर्य) अनुप्णादीधिति (चन्द्र ) वा (अथवा) भवेदिति ॥३०॥ हि भा-अहर्गण को युनावमदिन से गुण कर युगकुदिन से भाग देना दिनादि फल को ग्रहण में जोड देना उससे पूर्वकथित रीति से प्रमादिक रवि और चन्द्र हाते हैं ॥३०॥ उपपत्ति (१) यदि युगकुदिनयुगचान्द्रदिनानि लभ्यन्ते तदाऽहर्गणेन किमित्यनुपातेना- गणसम्बन्धीनि चान्द्रदिनानि तत्स्वरूपम् = युचा ग्रहण (युकु+युअवम) अहगंग युकु अहर्ताए युकु युकु युकु अहर्गण+ युभव यहाण एतद्वशतो रविचन्द्रो युकु माध्याविति । % 3D + युअव अहर्गरण उपपत्ति - %3D (२) यदि युगकुदिन म युगचान्द्रदिन पाने है तो महगंण म क्या इम मनुपात मे माण सम्बन्धी चान्द्रदिन पाते हैं। युचा महर्ग (यु+ युपवम) प्रहगंण युक युकुर महर्गण युप्रवम महर्गण = महर्गण+ युग्रवम महर्गए यु दमवे वा मे रवि पोर चद्र के माधन करना ॥३०॥ वियोगराशिर्वा गणेन ताडित हैरवाप्त भगणादि तद्युत । ग्रहोऽल्पभुक्तिहि भवेबद्गति हद्गतिर्वा वियुतोऽल्पभुवितक ॥३१॥ विमा - वियोगराशि (धुगीयग्रहान्नर ममूह ) मरणेन (प्राणेन) ताडित (गुणित ) क्वहैरवाप्त (युगकुदिन भक्त) पा भगणादिव यत्तद्युत (तेन महित ) अल्पमुक्तिग्रह (मन्दनिर्ग्रह ) तदा बृहद्गति (शीघ्रगतिग्रहो भवेत्। बृहद्गतिग्रह , वियुत (तेन फलेन रहित ) तदाऽल्पभुक्निको ग्रह (मन्दगतिग्रह) भवेदिति ॥३१॥ पत्रोपपत्ति । यदि युगवुदिनयु गोय गीघ्रमन्दगतिग्रयोरन्नर लभ्यते तदाहरणेन विमित्य (युगगीघ्रगतिप्र-युगमन्दगतिन) अगरण एतपत यदि मन्द नुमतेन पलम् = युगबुदिन मध्यमाधिकारः १४६ ग्रहे योज्यते तदा शीघ्रगति हो भवेद्यदि च शीघ्रगतिग्रहे विशोध्यते तदा मन्दगति- ग्रंहो भवेदिति ।। ३१ ।। हि भा -दो ग्रहो के अन्तर को ग्रहगण से गुणकर युगकुदिन मे जो फल हो उसको मन्दर्गातग्रह में जोडने से शीघ्रगतिग्रह होते है । उसफल को गोध्रगति ग्रह घटाने से मन्दगति ग्रह होते हैं ||३१॥ उपपत्ति यदि युगकुदिन मे युगीय शीघ्रगतिग्रह मन्दगतिग्रह का अन्तर पाते है तो अहर्गरण मे क्या इस अनुपात में जो फल आता है उसको मन्दगतिग्रह मे जोडने से शीघ्रगतिग्रह होंगे और उस फल को यदि शीघ्रगतिग्रह में घटा देंगे नो मन्दगतिग्रह होते हैं ।।३१।। स्वपर्ययक्याहतवासरौघत क्षितिद्य लब्धं भगणादिकं द्विधा । वियोगलब्धोनयुतं तथाधितं वियत्सदो वा भवतोऽत्र मध्यमौ ॥३२॥ वि. भा -स्वपर्ययैवयाहतवासरोघत (निजभगरणयोगगुरिणताहर्गरणात्) क्षितिद्य लब्ध (युगकुदिनभक्तात्फल) भगणादिक यत्तद् द्विघा (स्थानद्वये) वियोग- लब्धोनयुत (युगभगणान्तरजनितफलेन हीन युत) अपित (द्विभक ) तदा मध्यमी वियत्सदो (मध्यमौ ग्रहौ) भवत इति । अत्रोपपत्ति शीघ्रग्रहभगण+मन्दगतिग्रहभगण = भगायोग शीघ्रग्रहभगण-मन्दगतिग्रहभगण भगणान्तर ततोऽनुपानो यदि युगकुदिन गणयोगो लभ्यते तदाऽहर्गणेन किमित्यनुपातेन भगरणयोग x अहर्गण_ (शीग्रभ+मग्रभ) अहर्गरण - भगणादिशीग्र+भगरणा- युकु दिमग्र= भगरण्योगजग्रह एवमेव भगणान्तर ग्रहगण = (शीग्रभ-मग्रभ) अहर्गरण भगणादिशीग्र- युकु युकु भगणादि मन= भगणान्तरजग्रह अनयोर्योग भगणादिशीन+भगरणादिमग्र+भगणादिशोग्र~भगरणादिमन-२ भगरगादिगोन = भगगयोगजन-+ भगणान्तर ज ग्रह-२ भगरणादिशीग्र भगणयोगजग्र+भगरणान्तर जनह भगणादिशोग्न तथा तयोरेवान्तरेण भगणादिशीन+भगणादिमन--(भगरगादिशीग्र-भगणादिमग्र) -२ भगणादिमन भगरणयोगजग्र-भगवान्तरजग . %3D प्रत.
वटेश्वर-सिद्धान्ते भगरणयोगजग्र--भगणान्तरजन =भगणादिगा। ययोग्रयोर्भगरणयोगेन भगणान्तरेण च तदानयन वृतम् । तयोरेक शीघ्रगतिग्रहोऽन्यो मन्दगतिग्रह इति, अत उपपन्नम् ॥ ३२ ॥ हिमा -दो ग्रहो के भगरण योग से ग्रहगण को गुणवर युगकुदिन से भाग देना जो भाग पल हो उसको दो जगहों मे भगणातर पर म जो पल हो इस पल करके एक जगह हीन करना, दूसरी जगह जोड देना, दोनो को दो मे भाग देने म दोनो मध्यम ग्रह (शीघ्रगति ग्रह, मन्दगति ग्रह) होते हैं ॥ ३२ ।। उपपत्ति दो नहो के भगण योग भगवान्तर से उनके माधन करते है। दोनो ग्रहो में एक शीघ्रगति ग्रह है दूसरे मन्दानि ग्रह हैं। सोनभगण-मन्दगभगण = = भगरणयोग मीनभगरण--मन्दग्रभ=भगणान्तर (शीग्रभ+मग्न भ) अगए तब अनुपात स =भगणादिशीग्र+भगणादिमय = भगायोगजम (शीग्रभ--मग्रम) ग्रहगए. -भगरपादिशीन-भगणादिमन भगवान्तरजग्न युकु दोना के योग करने से भगरायोजनह+भगणान्तरजन=२ भगणादि शीप उही दानो के अन्तर करने मे भगणयोग्रह-भगणान्तरजन= २ भगणादिमन भगरणयोगजग्र+भगणान्तरजग्र -२ भगणादिनन २ भगणयोगजग्र--भगणान्तरजन =भगणादिमग्र २ इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुप्रा ॥३२॥ तदूनभुषितना होन खेचरेण वृहद्गति. । शीघ्रभुक्तिनहेगोन मृदुभुक्तिग्रहो भवेत् ॥३३॥ वि भा-ऊनभुक्तिना खेचरेण (मन्दगतिग्रहेण) तत्फल (भगएयोगज- फल) होन (रहित) तदा वृहद्गति (शोधगति ) ग्रहो भवेन्, तदेव फल शीघ्र- भुक्तिग्रहेण (शीघ्रगतिग्रहेण) उन (रहित) तदा मृदुभुक्तिग्रह (मन्दगतिमह ) भवेदिति ।। ३३॥ अस्योपपत्तिस्तु ३२ श्लोकोपपत्त्यैव सिद्धा यतस्तदुपपत्ती भगण्योगजग्ग्रह - भगणादिशीग्र+भगरणादिमग्र इसी तरह प्रत मध्यमाधिकार १५१ भगणयोगजग्र-भगणादिमन -भगणादिशीग्र नया भगण्योगजग्र-मगरणादिशीन-भगरणादिमग्र अत सिद्धम् ।। ३३ ॥ हि भा--भगणयोगजफल म म दगतिग्रह को घटा देने से शीध्रगतिग्रह होते है तथा उसी म मोघ्रगति ग्रह को घटाने में मदतिग्रह होते हैं ॥३३॥ इसकी उपपत्ति ता ३२ शोक की उपपत्ति से ही सिद्ध है । क्योकि उसकी उपपनि स भगण्योग्र-भगणादिगीग्र+भमग्र भगरणयोग्र--भमग्र भगरपादिशीग्र तथा भगरणयोग-भगणादिगणीन-भमग्र प्रत सिद्ध हो गया ॥३३॥ प्रकारान्तरेण ग्रहानयनमाह । ग्रहोदयघ्नो धुगरण क्वहोद्धृतो गतोदयो भाद्यवशेषकाद् गृहे । क्षयस्वमर्का बृहदल्पभुक्तिनहे ग्रहोऽप्येवमिनोऽथवा भवेत् ॥ ३४॥ वि भा - गण (अहर्गरण ) ग्रहोदयान (युगग्रहसावनगुणित ) क्वहोद् धृत (युगकुदिनभक्त ) तदा गतोदय (गतस्वसावनतुल्य भगणादिग्रह ) अवशेष- कात् (शिष्टात्) यद्भादिफन (राश्यादिफल) तत् अर्कात् (रवित ) वृहदल्पभुक्तिग्रहे सति (अधिक गतिग्रहेऽल्पति ग्रहे च सति) गृहे (रविराश्यादिके) क्षयरव (ऋण धन) कार्य तदा ग्रहो भवेत् । अथ वमिन (सूर्य) भवेदिति ॥ ३४ ॥ अनोपपत्ति युग्रभ- अहर्गण- मगरणादिग्रह । युकु पर युभभ्रम-युग्रभ-युग्रकुदिन युभभ्रम-युग्रकुदि-युग्रभ ( उत्थापनन 3D % (युभभ्रम-युग्रयादि) अहर्गरण. (युकुदि+युरभ--युग्रकुदि) अहगण, युक यु अहर्गण+ युरभ ग्रहर्गण_युग्नकुदि ग्रहण युक युकु = अहगण+गरभगण+र राश्यादि- (गतस्वसावनतुल्यभ+राश्यादि) - अगरण+गरभ+ र राश्यादि-गतस्वसावन तुल्यभगरण-राश्यादि भगणाना प्रयोजनाभावाद् गतभगणास्त्यक्तास्तदा रविराश्यादि-रास्यादि-ग्रहराश्यादि %D
१५२
वटेश्वर-सिद्धान्ते
युग्रहकु अहर्गण
यु
= गतस्वसावनतुभ + अत्र
शे तत्सम्बन्धि राश्यादिः
युक युकु
१२xगे.
दो शे
- राश्यादि
युकु हर
१२
एतक्ताऽऽचार्योक्तमुपपन्नम् । यदि च युगकुदिनादिस्थाने कल्पीय कुदिनादि
प्रमाण गृह्यत तदाऽनेनैव "असावनदिवागरणो हत. स्वस्वसावनदिनस्तु कल्पज-'
रित्यादि भास्करोक्तमप्युपपद्यते इति ॥ ३४ ॥
हि भा -प्रहगंण को युग ग्रह सावनदिन से गुणकर युगकुदिन से भाग देने से गत
स्वसावनतुल्यभगण प्रादि ग्रह होते हैं शेष मे जो रादयादि फल होता है उसको रवि से
अधिक गनिग्रह और अल्पगनिग्रह रहने पर रवि राश्यादि मे धन ऋण करने से राश्यादिग्रह
होने है, अथवा इसी तरह रवि होते हैं ।। ३४ ।।
उपपत्ति
युग्रभ ग्रहगंण
-भगणादिग्रह। लेक्नि युभभ्र-युप्रकुदि= युग्रभ
उत्थापन देने मे
(युभभ्रम-~-युग्रकुदि) महर्गण. (युदि+युरभ-युप्रकुदि) महर्गण_
युक
युकु
अहर्गण+ युरभ ग्रहगण- युप्रकुदि ग्रहण,
यक
- महर्गण+गतरभगण+र राश्यादि-(ग स्वमावन तुल्य भ+ रात्यादि)
ग्रहण+गत र भगण+र रास्यादि- ग स्वसावन तुल्य भ-राश्यादि
यहा भगरणो के प्रयोजनाभाव से छोड देते हैं,
तव रवि राश्यादि-राश्यादि=ग्रहराश्यादि
युग्रकुदि प्रहर्गमा
हो
=गत स्वमावन तुल्यभग+ -यहा -एतत्सम्बन्धी राप्यादिकफल
युक
युकु
युक
शे
दो
= राश्यादि :-
युक
हर
-
१२शे
प्राचार्योक्त पद्य उपपन्न हुआ, यदि युगकुदिनादि के स्थान पर कल्प कुदिनादि प्रमाण
ग्रहण किया जाय नव "असावनदिवागणो हत स्वस्वसम्वनदिनैस्तु कल्पज" इत्यादि
भास्वरोक्त भी उपपन्न होता है ॥३४॥
प्रकंवत्खचरभोदयंगताः स्वोदयास्तदुदयावधिहः ।
प्रोक्तवद्रविविधूत्वनेकधा स्वावमाप्तिविकलोक्तकर्मणा ॥३५॥
मध्यमाधिकार १५३ वि.भा --अकंवत् (यथा युगरविसावनदिन दयैश्च रव्यानयन तथैव) सचरभोदय (युगग्रहसावनंदिन दयश्च) गता स्वोदया (गतभगणादिका ग्रहा भवन्ति) ग्रहस्तदुदयावधि (यस्य भगणेर्यो ग्रह आनीयते स तस्यैवोदयकालिको भवति) प्रोक्तवत् स्वावमाप्तिविकलोक्तकर्मणा (अवमफल-शेपकथित पद्धत्या) अनेकधा रविवियू (सूर्याचन्द्रमसौ) भवत इति ॥३५॥ अनोपपत्ति । यदि युगदिने युगस्वोदया लभ्यन्ते तदाऽहर्गणेन विमित्यनुपातेन गत- स्वोदया. समागता । ततो यदि युगकुदिनयुगनक्षनभवा ग्रहा लभ्यन्ते तदाहगणेन किमिति समागतागतनक्षनभगाभवग्रहा , ततो यदि युग नक्षत्र भगएभवग्रहे युगस्वोदयशोधनेन युगग्रहभगरणालभ्यन्ते तदेष्टनक्षत्रमगणभवग्रहे इष्टग्रहस्योदय सोधनेन क इतोष्टग्रहो लभ्यते इति ॥३५॥ अथवा युगग्रहयुदि ग्रह (युभोदय-युग्रभ)पहर्गण यु युकु युभोदय अहर्गण =गत नक्षम भगरणभवग्रह- यु भगणादिन= इष्टग्रह ॥३५॥ हि. भा-रवि साधन वे सट्टा (जैसे युग रवि सावन दिन और युग रविमोदय से रवि या साधन होता है उसी प्रकार) युग ग्रह मावन दिन मौर भोदय पर से ग्रह का माधन वरना वह ग्रह अपने सायनान्त पालिव होते हैं अपने प्रवमफ्न और रोष से रथित रीति पे द्वारा अनेक प्रकार ये रवि और चन्द्र होते हैं ॥३॥ उपपत्ति यदि युग पुदिन मे युग स्वोदय पाते है पहाण में क्या इन अनुपात से गत स्योदय भाते हैं । फिर मनुपात करते हैं यदि युग युदिन मे युग नक्षत्र भगरण जनित ग्रह पाते हैं तो महर्गण म क्या इन अनुपात से गन नक्षत्र भगणोत्सन ग्रह पाते हैं। नव युग नभन भाग जनित ग्रह म युग स्यादय घटाने मे युग प्रद भगण पात है तो इप्टनक्षत्रभगरण जनितग्रह में पट ग्रह स्योदय घटाने मे क्या मा जायगा इष्ट ग्रह प्रमाण इति । युनभ. अर्गरण प्रपवा युग दि x महगंग (युग मोदय-पग प्रह भाग) महगंगा मयुधि पत युभोयरपगंग युर मगग प्रागंण म गत नसत्र मगरा अनिता-भगगादिएह ॥३॥ -
वटेश्वर-सिद्धान्ते
हदानीमनुलोमगतीन् ग्रहान् विलोमान् विलोमाश्चानुलामान् क्त्तुमुपायद्वयमाह ।
ध गरगोन भूदिनघ्न पठित ग्रहपर्ययो महोय हृत ।
सगरणादि विलोमगतिम्रहोऽनुलोमश्च्युतश्चक्रात् ॥३६॥
वि भा-पठित ग्रहपर्यय (युगपठिन ग्रहभगरण) द्यगणोनभूदिनघ्न
(अहर्गरण रहित युगकुदिन गुणित) महीधे हृत (युगकुदिन भक्त ) तदा भगा
विलोमगति (भगरणादिको विपरीतगतिको) ग्रहो भवेत्-चनात् (भगरणात्)
च्युत (शोधित) तदाऽनुलोमग (क्रमगतिको ग्रह ) भवेदिति ॥३६॥
अनोपपत्ति ।
यदि युगबु दिनर्युग ग्रहभगणा लभ्यन्ते तदाऽहर्गरणोन युगदिन विमित्यनुपातेन
भगणादिको विलोमतिको ग्रह समागतस्तत्म्वरूपम् =
युग्रभx (यु-अहर्गण)
युकु
यत युकुदिन-प्रहर्गण इत्यहर्गणान्तायुगान्त याबद्दिनानि सन्ति, ततोऽनु-
पातेन पूर्वोक्त न ये भगरपादिका ग्रहा समागच्छेयुस्ते दिलोमगतिका एव, एते एव
विलोमगतिकग्नहा भगणाच्छुद्धास्तदाऽनुलोमगतिका ग्रहा भवन्तीति समुचित.
-
मेवेति ॥३६॥
यदि प्रगण रहित युगकुदिन का युग ग्रह मगरण स गुण कर युग पुदिन स भाग देने
हैं तो भगणादि विलोमगतिक ग्रह होते हैं भगरण मे विलोमगतिक ग्रह घटाने से अनुलोम
(अमिक) गतिक ग्रह होते है ।।३६।।
उपपत्ति
हि भा-यदि युग कदिन म युग ग्रह भगरण पाते है तो प्रहगण रहित युग कुदिन
में क्या इस अनुपात से भगरणादि विलोमगतिक ग्रह आते है उनका स्वरूप ऐसा है
युप्रभ x (युकु-महगण) यत युकु-प्रहगण= वह महगणान्त स युगान्त तक दिन
युव
ममूह है इससे पूर्वोक्तानुपात द्वारा जो भगणादिक ग्रह पाते हैं वे विलोमगतिक ही होंगे।
इही (विलोमगतिक मह) को भगण मे घटाने स प्रमिक गतिग्रह (अनुलोम गतिक ग्रह)
हो जायगे उचित ही हैं यह आचाय वा वथन युक्ति युक्त है ।। ३६ ।।
मूदिने खगभगरगोनहते | राशो युगक्षमाद्य हृते।
भगणादिय॑स्तर्गात गणाच्छुद्धो ग्रहोऽनुलोमगति ॥ ३७ ॥
वि भा --धु राशी (ग्रहणणे) सगभगणोन दिने (युगग्रहभगणरहित-
युगकुदिन) ते (गुणिते) युगक्षमाय हृते (युगकुदिनभवते) फल भगणादि व्यस्त-
गति (विलोमगति ) यही भवेत् । पानीतो विलोमगतिको ग्रहो भगरणान्छुद्धस्तदा
अनुलोमगति (मार्गगति ) ग्रहो भवेदिति ॥ ३७ ॥
मध्यमाधिकार
१५५
अस्योपपत्ति ।
यदि युगयुदिनयुग ग्रहभगणोन कुदिन प्रमाण लभ्यते तदाऽहणेन किमि-
त्यनुपातेन भगणादि विलोमगतिक ग्रह समागतस्तत्स्वरूपम् =
(युकुदिन युगग्रहमगण) अहर्गण भगणादि विलोमगतिग्रह । युदि-युग्र-
युकु
भगरण अस्मादनुपातेन यो ग्रह समागच्छति तस्य विलोमगतित्व समुचितमेव ।
ऋमिक गतिग्रहार्थं स एवानीतो विलोमगतिकग्रहो भगरगच्छुद्धस्तदाऽनुलोमगति-
ग्रहो भवेदिति ।। ३७ ॥
हि भा -प्रहर्गरण को युग ग्रहमगण रहित युगदुदिन से गुणवर युगकुदिर से भाग
देने से भगणादि विलोमगतिर ग्रह पाते हैं। मगरण ग घटाने स कमिरगति ग्रह
होते हैं ।। ३७ ॥
उपपति
यदि युगवुदिन भ युगग्रहमगरण रहित युगवुदिन पाते हैं तो प्रहगरण म क्या इस अनु
पात से भगणादि विनोमगतिक ग्रह पाते है ।
(युयु-प्रभगण) पह
- भगणादि व्यस्तगतिग्रह । यु युग ग्रहभाग इस पर से अनु
युनु
पात द्वारा जो ग्रह पाते हैं उनम व्यस्तगतित्व होना समुचित ही है । मागगतिग्रह के लिये
उही व्यस्तगतिग्रह को भगण म पटा देना चाहिये तय मागगनिवग्रह होते हैं ॥ ३७॥
भावतभंगणाद्य ग्रहोदयंश्चान्तरे तयोर्युचर ।
यस्य गतोदयसिद्ध भावतफल स एव सदाचर ।। ३८ ॥
वि भा --भावतें (युगनक्षमभगणं ) ग्रहोदयश्च (युगग्रह सावनदिन )
भगरणाद्य फन यद्भवति तयोरन्तरे द्यु चर (ग्रह ) भवेत् । यस्य ग्रहस्य गतोदय-
मिद्ध भावनं फल स एव सय घर (गोमनग्रह ) भवेदिति ।।
अस्योपपत्ति ३५ श्लोकोपपलिदानन म्फुटति ॥३८॥
हि भा-युग नक्षत्र भगग्गा ग पोर युगग्रह मावन स भगणादि पल जो होता है
उन दोनो ये पन्तर करल से ग्रह होते हैं पर्याद भभम जनिनग्रह म मावदित जनितमह को
घराने ग इष्ट मध्यमाह होते हैं । भायतफ्ल (भगए अनिन पर) जिग मद में
उदय (मापनदिन म) मिस होता है यही सोमनाह है ॥
गरो उपाति ३५सो की निगराष्ट है | 100
उदय समासाद प्रसोर्मोदयहीनातयंतयोरुदय ।
नगरपाधल्पग उदयस्ताहिपुजोन्योऽल्पगोऽयवापाय ॥ ३६॥
१५६ वटेश्वर-सिद्धान्ते निभा-ग्रहयो (द्वयोग्न यो) भोदयहीनार (युगपठित भोदयरहितात) उदयसमामात् (युगसावनदिनयोगात्) तथतयो (ग्रहयो । उदय (सावनदिन) भगणादिफल यन् तद्वियुज (तसहित ) अल्पग उदय (मन्दगतिग्रह सावनदिन निकर ) तदाऽन्य (अन्यग्रहभगरण) अथवा अन्यस्य सावनदिननिकरे यदि तद्भग- णादिफल विशोध्वते तदा'ल्पगतिग्रहभगरण स्यात्ततो ग्रहानयन सुगममिति ।। ३६ ॥ अत्रोपपत्ति युमन्दगतिग्रहसावनदि+युशीघ्रगतिग्रहसा-युभोदय = मन्दगतिग्रसाशोग- प्रभ यदि मन्दगतिग्रह सावने तत्फल विशोध्यते तदा शोगग्रगण तत शीघ्रगति ग्रहानयन सुगमम् । अथवा शीघ्रगतिग्रसा-- मन्दगतिग्रभ इति यदि शीघ्रगतिग्रह सावने विशाध्यते तद। मन्दगतिग्रहभगरणस्ततो मन्दगतिग्रहज्ञान सुगममिति ।।३।। हि भा–युगपटित भोदय परके होन दो ग्रहो वे युग सावनदिन योग से तथा उन ग्रहो के युग सावन दिनो से भगए फल को मन्दगति ग्रह के सावन दिन में घटाने से शीघ्रगति ग्रह का भगण होता है अथवा शीघ्रगनिग्रह सावनदिनो मे भगण फल को घटाते हैं तो मन्द- गतिग्रह भगण होता है उस पर से ग्रहानयन सरल है ॥ ३९ ॥ उपपत्ति युमन्दगतिग्रहमावन + युशीघ्रगतिग्रसा-युभोदय=युमन्दगगिनसा- युगीगमभगरण इसको युमन्दगतिग्रसावन में घटाने से युशीघ्रग्रह भगरण होता है इस पर गोघ्रगतिप्रह शान हो जायगा। एव युमगनमा+युशोगग्रसा-युभोदय= गोगप्रसा-मगप्रभ इमको शीग्रमावन मे घटाने से मन्दगतिग्रहभगण होगा, इस पर से मन्दगतिग्रह ज्ञान हो जायगा ॥ ३६॥ इदानी स्वमावनदिनदशेन प्रहाणामेदिनगत्यानमाह । निजभगणोदययोगो नावस्तिद्वियोगोनभगः । धुकरितराम्युदयमन्द महशीघ्रप्रहान्युदयै ॥४०॥ चक्र पलाना मगणा द्युभिरुदयर्यस्य भाजितास्तस्य । एकदिनावच्छिन्ना गतिम्रहस्योदयावधिका ॥४१॥ विमा.--निजभगरपोदययोग (स्वभगएमावनदिनयोग) भाव . (भोदया) तद्वियोगोनभगण (ग्रहभगरा सावनदिनान्तररहितग्रहभगण ) इतरा- भ्युदयान (ग्रहसावनदिन ) मन्दग्रहशीघ्रग्रहाभ्युदय (मन्दगतिग्रहशीप्रगतिग्रह सावनदिन) चक्रपलाना भगरणा (चत्रकलागुरिणता ग्रहयुगमगणा) यस्य प्रहस्योपयुक्तरुदयावे (सावनदिन ) भाजिता (भक्ता) तस्य (ग्रहस्य) उदया- वधिका (प्रौदयिका) एवं दिनावच्छिन्ना (एक्दैनिका) गतिभंवेदिति । ।।४० ४१।। अयोपपत्ति । युगग्रहभगरण+युगग्रह दिन युगभभ्रम ।
१ D मध्यमाधिकार १५७ तथा युगग्रहभगए युगग्रहसावन-अन्तरम् । अन युगग्रहभगण-अन्तर=युगग्रहसावन ततोऽनुपातो यद्येकग्रहभगरणाशश्चक्रकला लभ्यन्ते तदा ग्रहयुगभगरणाशे । कमित्यनुपातेन समागच्छन्ति ग्रहभगणकलास्तत्स्वरूपम् = चक्रकला ग्रहयुगभगण -चक्र कला ग्रहयुगभगण ततोऽनुपातो यदि ग्रहयुग कुदिन युगभगणकला लभ्यन्ते तदैकेन दिनेन किमित्यनुपाते नैकदिनजा ग्रहगति- कला भवेत् ग्रहयुगभगणकला ४१ चत्रकला ग्रहयुगभगए। एकदिनसम्व- ग्रहयुगकदिन ग्रहयुगकुदिन धिनी ग्रहकला । यद्यप्येतया ग्रहगत्या किमपि कायं न चलेद्यतो हि ग्रहगति स्वसाव- नान्तर्गता पठिता नास्ति, रविसावनान्तर्गता पठितास्ति, तथापि स्वसावनसम्बन्धन कथ ग्रहाणा गतिरागच्छत्येतदर्थ ग्रन्थकारेण युक्ति प्रदर्शिता । एतावताऽऽचार्योक्तमुपन्नम् ॥ ४०-४१ ।। हि मा -अपने भगण और सावनदिन के योग भभ्रम होते है याने युगग्रहभगण और ग्रहयुग सावन दिन के योग युगभभ्रम है । युगग्रगण और ग्रहयुगसावनदिन के अन्तर करके रहित ग्रहयुगभगण ग्रहयुगसावन दिन होते हैं, मन्दगतिग्रह और शीघ्रगतिग्रह युगसावन दिनो से उनकी एक दिन सम्बन्धिनी गति लाते हैं । चक्रकलागुणित ग्रहयुगभगए को जिस ग्रह के उपर्युक्त युगसावन दिन से भाग देते है उनको एक दिन सम्बन्धी गतिकला प्रमाण आ जाता है जो कि प्रोदयिक होती है ।। ४०-४१ ।। उपपत्ति ग्रहयुगभगरण + ग्रहयुगसावनदिन=युभभ्रम । ग्रहयुगभगण-ग्रहयुगसावनदि-अन्तरम् । अत ग्रहयुगभ-अन्तर =ग्रह युगसावनदिन, इससे एक दिन सम्बन्धी ग्रहगति साधन करते हैं। यदि एक भगरणाश मे चक्राला पाते हैं तो ग्रहयुगभगरणाश मे क्या इस अनुपात से चक्रकला ग्रहयुगभगण --चक्रकला X महयुगभगण - ग्रहयुगभगरण कला प्रमाण आया। ग्रहयुगभगणकला । इस पर से पुन अनुपात करते हैं । यदि ग्रहयुगसावन दिन मे ग्रहयुगभगणक्ला पाते हैं एक दिन मे क्या इस अनुपात से एक दिन सम्बन्धी ग्रहगतिकला आई। ग्रहयुगभगणX१ चक्राला ग्रहयुगभगरण एकदिनमग्रहगति । यद्यपि ग्र युगमावनदिन ग्रहयुगसावन १ वटेश्वर-मिद्धान्ते इम ग्रहति में कोई काम नही होगा । क्योकि रविमावनानगंन ग्रहनि पटित है। म्द वि- नान्तर्गत नही । तयापि अपने मादन दिन से कम ग्रहगतिज्ञान होता है इसके लिए प्राचार्य ने यह विधि दिखनाई है ।।४०.४१॥ प्रयवग्रहलानेन द्वितीयग्रतानमाह । अन्यग्रहभगरण गुणा इपग्रह मण्डलोद्धताः खेटा. । हारान्यगुरगाम्यस्ताद् द्यगुरणाविष्टाहो भवति ॥४२॥ हि मा-खेटा ( इष्टग्रहा ) अन्यग्रहभगण गुणा ( माध्यग्रहभगरण गुरिणता) इप्टनमण्डलोद्घता (मिद्धग्रहभगणभना) हारान्यगुणाभ्यस्नात् (स्वकोयहारादन्यगुणगुणितात्) युगणात् (अहर्गणात्) इप्टग्रहो भवति ।।४।। अस्योपपत्ति इप्टग्नह =मिद्धनह । अन्यग्रह = साध्यग्रह । मिद्धग्रहभगग्ग =मिग्रम साध्यग्रहभगण =साग्रभ । अथग्रहानयनरीत्या । युगसिग्रभ४ अहर्गरण सिद्धन । तथा युगमायभ ग्रह = साध्य युगकु यु सिद्धन तदा साध्या युगसाग्रभ सिनयुसाग्रम मिग्न xयुमाग्रभ साग्र ४ युसिग्नभ -सान युमिग्रम इप्टग्रह युअन्यग्रभ -= अग्रह, एतेनाचार्योक्तमुपपन्नम् । युइग्रभ भास्कराचार्येणापि "साध्यस्य च गुणित प्रसिद्धो भक्तो निज स्यादथवा प्रसाध्य इत्यादिना तदेव कथ्यते यदेतेन ग्रन्थकारेण "अन्यग्रह- भगणगुणा" इत्यादिना क्थ्यते । सिद्धान्तशेखरे श्रीपतिनापि "विज्ञातक्ल्पभगण- विहृतेषु साध्यचक्र पु यद्भगरणपूर्वमित्यादिना" तदेवकथ्यते न कश्चिद्विीप - युगमिग्रभ तत " इति ॥४२॥ हि मा-इप्ट ग्रह दो अन्यग्रह युगभंगा से गुणवर युगइप्टरह भगण से भाग देने मे अन्य ग्रह होते हैं । अपना हार दूमरे के गुणन मे गुणन से महगंण मे इस तरह ग्रह होते हैं ॥४२॥ उपपत्ति यहा इप्टग्रह =विदितग्रह =मिद्धग्रह । मन्यग्रह - विदितग्रह माध्यग्रह तव ग्रहानयनरीति से युमिग्रा महर्गण मिन, मध्यमाधिकार १५६ तथा सिग्र युसाप्रभ युगसाग्रभ अगरण साग्रह युकु मिग्र युमिग्रम प्रत छेदगम से सिम युमाग्रभ साग्र युसिमभ युसाग्रम इप्टन गुमन्यग्रभ ग्रत -साग्र - -अग्रह युमिग्रम युइग्रभ इसमें प्राचार्योक्त उपपन्न हुआ। सिद्धान्तशिरोमणि मे भास्कराचार्य भी यही विषय कहते हैं, यथा "साध्यस्य चक्रगुंगित प्रसिद्धो भक्तो निज स्यादथवा प्रसाध्य ।" इत्यादि, सिद्धान्त- शेसर मे श्रीपति भी यही विषय कहते हैं । जैसे- "विज्ञातकल्पभगणविहृतेषु साध्यचक्र पु" इत्यादि ।।४२।। इदानीमिप्टगुणगुणितग्रहयोH हाणा वा योगोऽन्तर वेप्टहरभक्तग्रहयोगं हाणां वा योगोऽन्तर ज्ञात्वाभीष्टग्रहानयनार्थमाह । द्वयोबहूनामथवा यथेच्छया हतोद्धृताना युतिरन्तरं तया। सपर्ययाणां हतमिष्टपर्ययग्रंहस्तथा भूत मसंघ भाजितम् ॥४३॥ वि. मा-द्वयोर्ग ह्योर्भगरणसहितयोराद्भगणादिग्रहयोयंथेच्छया (स्वेच्छया) इष्टगुण गुरिणतयोयु तिरद्दिष्टा तथा तयोरेवान्तरमुद्दिष्टम् तथा द्वयोरिष्टहारकोद्धत- योर्य तिरुद्दिष्टाऽन्तर वोद्दिष्टम् । अथवा वहूना ग्रहाणामिष्टगुणगुणिताना युतिरुद्दिष्टा- ऽन्तर वोद्दिष्टम् तथा बहूनामिष्टहारकोद्धताना युतिरुद्दिष्टान्तर बोद्दिष्टम् । इष्टपर्यये ( इष्टप्रयुगभगणे.) पूर्वोक्लोद्दिष्टसमूह हत (गुणित ) तथाभूतभसवभाजितम् (इष्टगुणगुरिंगतयोरिष्टहारभक्तयोर्वा ग्रहद्वयभगणयोर्योगेनान्तरेण वा तथेष्टगुरण- गुणितानामिष्टहरभरताना वा (बहूना ग्रहाणा) भगरणाना योगेनान्तरेगा वा भक्तम् तदा ग्रह (इष्टग्रह ) भवेदिति । अनंतदुक्त भवति द्वयोग्रहयोर्भगरणादिमान यथा प्राप्तमेवादाय-एकस्पे. गवाराभ्या सगुगय सयुज्य स्थापयेत् । तर भगरणादिविलिप्तान्ता पश्चगुण- पारा भवन्ति तंगुणवरिष्टग्रहयुगभगरण पृथक् पृथक् सगुराय स्वहरभंगणान्तमागे. पयेत् । नतो याभ्यां गुणकाराभ्या गुरिणतो ग्रही योजितो ताभ्यामेव (गुणवाराभ्या) गुणितो तयोरेव भगणी सयुज्य तेन योगस्पेण हारेण भजेत्तदेष्टमध्यमग्रहो भवेत् । तथेष्टगुरगगुगितयोग्र हयोरन्तरेगोष्टग्रहयुगभगण पृथक पृथक भक्त्वोपर्यारोप्य ययोर्मध्यमग्रहाविष्टगुणवगुणितो विश्लेपितो तयोरेव तद्गुणगुरिणतयोभंगण्यो. रन्तरेण भजेतदेष्टग्रहो भवेत् । एव बहूनागपि ज्ञेयम् ।।४।। मनोपपत्ति. यदीष्ट गुणगुणितयोग्रं भगगयोर्योगनान्तरेण वेष्टग्रह युगभगगा लभ्यन्ते से इष्टग्रह १६० वटेश्वर सिद्धान्ते तदा तद्गुणगुणतियोभंगणादिविलिप्तान्तयोर्योगेनान्तरेण वा किमित्यनुपा तेनेष्टग्रह समागच्छति, एव वहूना योगेऽन्त रेऽपि नैराशिकेनेष्टग्रहो भवेत् । तथेष्टहार भक्तयोर्भगरणयोर्योगेनान्तरेण वेष्ट ग्रहयुगभगणा लभ्यन्ते तदेण्हारभक्तयोभगरणादि ग्रह्योोगेनान्तरेण वा किमित्यनुपातेनेष्टग्रहो भवेत् । एव वहूनामपि ज्ञेयमिति ।। ४३ ॥ हि भा-इष्टगुण गुरिणत दो भगणादि ग्रहा का योग या अन्तर उद्दिष्ट हो तथा इटहर से भक्त दो भगणादि ग्रहो का योग या अन्तर उद्दिष्ट हो अथवा इप्टगुण गुणित बहुत भगरणादिग्रहो का याग या अन्तर उद्दिष्ट हो तथा इटहर से विभक्त बहुत ग्रहो का योग या अन्तर उहिष्ट हो तो उन सब को इप्टग्रह (साध्यग्रह) वे युगभगण से गुण देना और इष्ट गुणगुपित ग्रहद्वय के भगए योग वा अन्तर मे भाग देना तथा इष्टहर भक्त ग्रहदय के भगए योग वा अन्तर से भाग देना इटगुणगुरिणत बहुत भगणादिग्रह के भगरणयोग वा अन्तर से भाग देना तथा इष्टहर भक्त बहुत ग्रहभगणो के योग या अन्तर से भाग देना तब इष्टग्रह होता है। इष्टगुण गुरिणत ग्रहद्वय को योग करके स्थापन करना उस गुणक युग भगण को गुण देना, और इष्टगुणगुणित ग्रहद्वय के भगपयोग से भाग देने से इटग्रह होते हैं । इस तरह इष्टगुणगुणित ग्रहद्वय के अन्तर करके रखना उस इष्टगुणक से इष्टग्रह के युग भगण को गुण दो। इप्टगुणगुणितग्रहद्ध य के भगरणान्तर मे भाग देने से इष्टग्रह होता है । इसी तरह बहुत ग्रहो म भी जानना चाहिए। उपपत्ति यदि इष्टगुणगुणित ग्रहदय भगरा योग या अन्तर में इष्टग्रह युग भगरा पाते है तो उस इष्टगुणक से गुरिणत ग्रहद्वय योग या अन्तर म क्या इम अनुपात से इप्टग्रह पाते है । इम तरह बहुत ग्रहो के योग या अन्तर मे भी अनुपात ते इप्टग्रह वा साधन होता है । तथा इष्ट हार से विभक्त भगरपदय के योग या अन्तर म इष्टप्रह युगभगरण पाते है तो इष्टहार विभक्त महद्वय के योग या अन्तर मे क्या इस अनुपात में इएमह पाते है । इस तरह बहुत ग्रहो मे जानना चाहिये ॥४३॥ द्वयादीनामिष्टस्त पृथगिच्याघ्नैर्युतोनित वाच्यम् इष्टाभिहत युतथोनितया द्वयादिप्रहसत्यया भक्तम् ।। ४४ ।। सर्वधन तत्तेपा भगरणक्यविभाजित पृयग्गुरगपेत् । गुरणे स्वस्त्वयनानि त्विष्टरिष्टस्य वा भवति ॥४५॥ विभा-यादीना (द्वयादिग्रहाणा) ऐक्यम् (युति ) पृथक इच्छान (इष्टगुणित) तेरिष्ट ग्रं हैयुंतोनित कार्यम् । इष्टाभिहतयुतयोनितया (इष्टगुणक सहितया रहितया च) द्वयादिग्रहसरयया, भक्त (भाजित) सत्पल तेपा (ग्रहाणा) सर्वधन (योग) भवेत् । स्थ (स्वकीय) गुणं (इष्टगुणवं ) पृथव गुणयेत् भग मध्यमाधिकारः । एक्यावभाजित (भगरणयोगन भक्त) तदा अयनानि स्यु । वा इष्ट गुणकैरिष्टस्य भवतीति । पृथक् स्थिता ग्रहा न ज्ञायन्ते तदैवय च न ज्ञायते किन्तु एतावत् ज्ञायते तस्मादैक्यादिष्टगुणगुरिणतो यदा प्रथमो ग्रहो योज्यते विशोच्यते वा तदैतावत्सरय- मैक्य कार्यमूनाना वैक्य कार्यम् । ततो ग्रहसख्यया तदैक्य विभजेत्तदेष्टगुणकारो ग्रहसरया च ज्ञायते । यदि गुणगुरिणतानामुहिताना योगस्तदा गुणक-ग्रहसख्यायोगो हरः । तथा गुणगुरिणत रहितानामुद्दिष्टाना योगस्तदा गुणकग्रहयोरन्तरेण भजेत्तदा ग्रहैक्य भवेत् । एतस्माद् ग्रहै स्याद् ग्रहमान कार्यमिति ॥ ४४-४५ ।। अनोपपत्ति यदा ग्रहैक्य ग्रहसख्या स्थानगतमेकर क्रियते तदा प्रहैक्य ग्रहसत्यया गुरिणत भवति यदीष्ट गुरिणतर्ग्रहैधिक पृथक् पृथगेकन क्रियते तदा तदैक्य गुण- ग्रहैक्याधिक भवति तेन ग्रहमख्यया गुणयुतया विभज्यते-यदा चेष्टगुरिणत है. पृथक् पृथगूनमेकर क्रियते तदा तदैक्य गुणगुरिणतग्रहैक्योन भवत्यतो गुरणकोन- ग्रहसख्यया विभज्यते तदा सर्वग्रहयोगो भवति ततो ग्रहज्ञान स्वयमेव कार्य- मिति ।। ४४-४५॥ हि भा-~दो प्रादि ग्रहो के योग को पृथक् इष्टगुरिणत उन ग्रहो करके युत और हीन करना, इष्ट गुणक वरलै युत पोर हीन दो आदि ग्रहसख्या से भाग देने से फल उन ग्रहो का सर्वधन (योग) होता है । इस योग को गुणक से पृथक गुण देना भगण योग स भाग देने स ग्रह होते है ।। ४४-४५ ॥ अलग अलग स्थित ग्रह नहीं जानते है, और उनके योग भी नहीं जानते हैं, लेकिन इतना जानते हैं कि उम ग्रहैक्य म यदि गुणगुरिणत प्रथम ग्रह को जोडते है या घटाते है तो इतने सख्यक ग्रहो के ऐक्य करना, जिसने ग्रह को घटाते है उनका भी योग करना, बाद में हसा मे ऐत्य का भार देने से इष्ट एक और गृहसल्या विदित होती है सदि गुण- गुरिणत उद्दिष्टी का योग हो तो गुण र और ग्राख्या के योग हर होता है, यदि गुणगुणित उद्दिष्टो का अन्तर है ता गुएप और ग्रहसख्या के अन्तर हर होता है, इसमे ग्रहैक्य आता है, इस पर मे ग्रहज्ञान करना चाहिये ।। उपपत्ति यदि ग्रहत्य को ग्रह मस्या स्थान मे रमार जोडते हैं तो ग्रहैक्य ग्रह्मस्या में गुरिणत हाता है, यदि ग्रहैक्य म इष्टगुणित ग्रहो को जोहते है तो ग्रदेवय गुग्णव' और ग्रहो के योग से युत होता है । इसलिय गुण युत ग्रहमख्या में भाग देते हैं, यदि ग्रहेग्य में इगुरिगल ग्रहो वो घटाते है तो ग्रहैक्य गुणन और ग्रहो के योग करके हीन होता है इस
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वटेश्वर-सिद्धान्त
लिये वहा गुणकोन ग्रहसख्या में भाग देते हैं। तव ग्रहैक्यहोता है । इम पर से ग्रहानयन
करना चाहिये ।। ४४.४५ ।।
इदानी ग्रहैक्यज्ञानेन पृथक पृया ग्रहानयनमाह ।
पदस्वमिष्टसगुणग्रहैयुं तोनमुद्धृतं
पृथक् पृथग निजगुरगयुतिस्ततो विभाजिता ।
पदप्रमाणरूपक' गह तैर्भुवायुतं
युतोनितः पदं भवेत्ततो विशेषमानयेत् ।। ४६ ॥
विभा–पदस्व (सर्वधन ग्रहैक्य वा) इष्टसगुणग्न है (इष्टगुणगुणितग्रहै )
युतोन पृथक् पृथक् निजगुण (स्वगुणकाई) उद्धृत (भक्त) तदा युतिर्भवेदर्थात्
(एकमारभ्यानवान्ता यावन्तो ग्रहा जिज्ञासितास्तेषा तावता भगणाना मध्यम-
ग्रहाणा वा यथाक्रममक्य कृत्वा पृथक् स्थापयेत् । तानेव पृथक स्थितान् यया
कयाऽपोष्टसख्यया पृथक पृथक, सङ्ग राय प्रतिराश्येकत्र स्थितेषु ग्रहैक्य युक्त्वा
तदपि प्रतिराश्येकत सर्वान योजयेत् । सा युतिशब्दवाच्या) गुणे (इष्टगुणक)
युतोनित (सहितरहित ) पदप्रमाणरूपक (पदसंख्यक्ग्रह ) सा (पूर्वानीता)
युति , विभाजिता (भक्ता) पद (सर्वधन भगणक्य वा) भवेत्ततो विशेष (ग्रह)
अानयेत् । यदीप्टगुणगुणितग्रहायोजितास्तदा ग्रहस्थाने गुणक युक्त्वा तद्युति
भाजयेत् । अन्यथा वेवलमेकेन युक्तेन ग्रहस्थानेन भाजयेत्तदा ग्रहैक्य भगरण क्य
वा समागच्छति, तस्मादक्यात् यथा स्वमुद्दिष्टास्त्यक्त्वा शिष्ट पूर्वगुणकेन हरेन्
योजिता ग्रहभ गणास्तन्मध्यमग्रहा वा पृथक पृथक सिद्धयन्ति । अथवा इष्ट
सख्यागुरिंगतान् प्रतिराशि तद्ग्रहैक्यात्त्यक्त्वा शिष्ट प्रति राश्येक स्यानगमुद्दिष्टत्वेन
स्थापयेत् । अपरत्र स्थित यथाक्रम योजयेत् सा ता ति । तामेव युति पूर्वगुणक
हीन ग्रंहस्थान जयेत्तदा ग्रहैक्य भवेत् । ततो ग्रहैक्योद्दिष्टयोनिश्लेष गुणकेन हरेत्
पृथक् पृथग भगरणा ग्रहा
आगच्छन्तीति ।।,४६ ॥
हि भा-सर्वधन या प्रयोग मे इष्टगुणितग्रह को जोडना या घटाना, अलग अलग
अपने गुसकानो से भाग देना तब युति होती है अर्थात् एक से लेकर जितने ग्रह ज्ञातव्य हो उनम
उनने भगणो को या मध्यमग्रहो के यथाक्रम से योग कर अलग रखना चाहिये । उन्ही पृथक्
स्थितो वो जिस किसी इष्ट संख्या से पृथक् पृथक् गुणकर एकन स्थित प्रति राशि में प्रयोग
को जोडकर उन सब को भी प्रसिराशि मे जोडना वहा युति कहलाती है । पदसख्यक ग्रह
मे इष्ट गुणक को जोडकर या घटाकर जो हो उससे पूर्वानीत युति में भाग देने से सवधन या
भगण्योग होता है उस पर से ग्रह को साधन करना ।
यदि इटगुणगुणित ग्रह जोडते हैं नव ग्रहस्थान में गुणन को जोडकर युति में भाग
देना चाहिये । अन्यथा ग्रहस्थान में एक नाडकर भाग देना चाहिये । तव ग्रहयोग माता है ।
तब ग्रहयोग प्रौर उहिष्ट के अन्तर मे गुणव से भाग देने मे ग्रह होते हैं ।।४६।।
इदानी मिष्टगुणगुणितग्रह्यस्य ग्रहत्रयादेवेंष्टहरभक्तग्रह द्वयस्य ग्रहत्रयादेवी
योगान्तर ज्ञात्वेप्टग्रहानयनमाह ।
इच्छाहतोद्धृताना ग्रहमगरगाना युतिविशेषो वा।
कुदिनमन्वितो विहीन माध्यग्रहपर्ययै कुदिनभक्त ॥४७॥
मध्यमाधिकार शेषवियुग्युतमस्मात्स्वमृण चेदन्यपर्ययलब्धम् । इटभगम्युतोना इष्टानहता. स्युरन्यभगरणास्ते ॥४॥ वि. मा -ग्रहभगरणाना (ग्रहपर्ययाणा) इच्छाहतोद्धृताना (इटगुणगुणि- ताना भक्ताना वा) युति (योग) वा विशेष (अन्तर) कुदिनभक्त (युगकुदिन- भाज्य ) शेपवियुग्युत (शेपेण रहित सहित च) कुदिन कार्य, अन्यपर्ययलब्धम् (अन्यभगएफल) स्वमृण चेत् (यदि प्रश्नाधारेऽन्यभगएफल धन ऋण वा) तदा कुदिन शेपहीन, शेपयुत कुर्यात् । तादृशेषु कुदिनेषु साध्यग्रहपर्यय (इष्टग्रहभगण ) अन्वित (सहित ) विहीन (रहित ) अन्यभगरगफल प्रश्नाधारे चेद्धन तदेप्टग्रह- भगरणा अपि कुदिनेपुयोज्या , अन्यभगणफलमृण चेत्कुदिनेषु इष्टग्रहभगणारत्याज्या , इष्टगुणभक्तास्तदा ते अन्यभगणा जायन्ते ततोऽन्यग्रहानयन मुगममिति ॥४७-४८।। अनोपपत्ति । यदि युगग्रहभगणा इष्टगुणकुदिनैर्युता वा होनास्तदा तेभ्योऽपि राश्यादिक- ग्रह स एव भवति । यतस्तेऽहर्गरणगुणा युगकुदिनभक्तास्तदा इष्टसमभगणाधिकोना पूर्वभगणा भवन्ति । भगण शेपमपि पूर्वसममेव भवेत् । तेनेष्टगुणगुणिताना ग्रहभग- पाना योगान्तर कुदिनाधिक चेत्कुदिन र्भाज्य तदा शेषप्रमाणमेव ग्रहभगरणा कल्प- नीया । येभ्यो राश्यादिग्रह इष्टगुणगुणित ग्रहयोगान्तरसम एव भवेत् । यदाऽन्य- भगणग्रहो धन तदाऽन्यभगरणयुतशेप इष्टग्रहभगणसमम्तेन तदा शे+अन्यभगण -इष्टभगरण समशोधनेन इभगए शे-अन्यभगण-इभ शे+ युकुदि (यदा चान्यभगणोत्पन्नग्रहश्वणं तदा शे-अन्यभगण=इभगण शे-इभगरण =अन्यभगण=शे-इभगण+युकुदि । अत उपपन्नम् ॥ हि भा-इष्ट गुणगुणित या भक्त ग्रहभगणो के योग या अतर को युगबुदिन से भाग देने से जो शेप हो उस करके हीन और युन कुदिन को करना चाहिये । यदि प्रश्न के आधार पर अन्यभगणफ्ल धन हो तव तो कुदिन मे शेप घटा देना चाहिय, यदि प्रश्न के आधार पर अन्य भगणफल ऋण हो तो कुदिन म शेष को जोड देना चाहिय, शेप रहित सहित कुदिन में इप्टग्रहभगण को जोडना और घटाना चाहिये, अन्यभगणफल यदि प्रश्नाधार मै धन हो तब इटग्रगण को कुदिन मे जोडना, यदि अन्यभगवफत ऋण हो तब इप्टग्रह . भगण को कुदिन में घटाना चाहिये, इष्टगुणक मे भाग देने से अन्यग्रह भगरण होता है इस पर से अन्य ग्रह साधन सुलभ है ।।४७-४८॥ - उपपति। यदि इष्टगुणित कुदिन करके इष्टग्रह भगण को जोड़ते हैं या घटाते हैं तो उम पर से भी राश्यादि ग्रह वही होते है। क्योकि उसको प्रहर्गरण से गुण कर युगकुदिन से भाग देने मे इष्टतुल्य भगण परवे मधिर और हीन पूर्वभगए होता है । भगणरोप भी पूर्व भगएशेष फै बराबर होता है । इसलिए इप्टगुणगुणित ग्रहमगरणो वे योग या न्तर बुदिन से अधिक रहने वटेश्वर-सिद्धान्ते से कुदिन से भाग देना चाहिये, शेष जो रह उमो को ग्रहभगण कल्पना करना जिसमे राश्यादि. ग्रह इष्ट गुणगुणित ग्रहो के योगान्तर वरावर हो, जय अन्य भगणग्रहपन है तव अन्य भगण- युत शेष इप्टग्रहभगण के बरावर हाता है, इसलिये दोप- अन्यभगण =इभगण, ममगोधन करने से अन्यभग प==इभगरप-शे=इभगण-शे+युकुदिन । यदि अन्यभगणोपन्नग्रह ऋप है तव गेप-अन्यभगण=इमगण अत शे-इभगण-अभगण-दो-इभगण+युक्, प्रत प्राचार्योक्त उपपन्न हुमा ॥ ४८ ॥ अथ गतचान्द्रदिनान्तकालिक ग्रहानयनमाह गतचन्द्रवासरघ्ना ग्रहमगरायुगशशाङ्कदिनमवताः । भगणादि | चरः स्याद्रजनीकरवासरावधिकः ॥४६॥ वि भा -ग्रहभगणा (युगग्रह पठित भगणा) गतचन्द्रवासरघ्ना ( गत- चान्द्राहर्गरणगुरिणता) युगशशाङ्कदिनभक्ता (युगपठित चान्द्रदिनभाजिता) रजनीकरवासरावधिक (चन्द्रदिनान्तिक) भगणादिद्युचर स्यात् (भगणादिग्रह स्यात् ) इति ॥४६॥ अत्रोपपत्ति. यदि युगचान्द्रदिनैयु गग्रहभगरणा लभ्यन्ते तदा गतचान्द्रदिनै पिमित्यनु- पातेन भगणादिको ग्रह समागतस्तत्स्वरूपम् -- युग्रभरगतचादि परमय ग्रह युचा गतचान्द्र दिनान्त कालिक इति स्पष्टमेवेति ४६॥ हि भा-युगग्रहभगण को गतचान्द्र दिन से गुण देना युगचान्द्र दिन मे भाग देने मे भगणादिग्रह होते हैं वे चान्द्रदिनान्त कालिक होने हैं ॥४६।। उपपत्ति यदि युगचान्द्र दिन मे युगग्रह भगरण पाते है तो गतचान्द्र दिन क्या इम अनुपान से भगणादिग्रह पाये उनका स्वरूप = युग्रभरगचादि ग्रह चान्द्रदिनान्त वालिक हाते युचा है ॥४६॥ अथ गतसौरदिनान्तवालिक्ग्रहानयनमा सौरदिनर्वा गुरिणता ग्रहलगरणा माजिता युगादिनः । भगणादिफल शुचरो दिनकरगतवासरस्यान्ते ॥५०॥ वि. मा-ग्रहभगणा (युगग्रहपठितभगणा) सौरदिने (गतसौराहगण ) गुरिणता , युगादिन (युगपठित सौरदिन) भाजिता (भवता ) फल दिनकर- गतवासरस्यान्ते (गतसौरदिनावसाने ) भगणादिद्युचर (भगणादिग्रह ) भवेदिति ॥५०॥ ये मध्यमाधिकार अस्योपपत्ति यदि युगसौरदिनैयु गनभगरणा लभ्यन्ते तदा गतसौराहारणे किमित्यनु- पातेन भगणादिको ग्रहस्तत्स्वरूपम् युग्रहभगण गतसौराहारण अय ग्रहोऽनत्या- युसौदि हर्गणा (गतसौराहगण) न्तकालिको भवेदेवेति ॥५०॥ हि भा --ग्रह के युग पठित भगण को गतसौरदिन से गुणकर युगसौर्गदन म भाग देन से भगणादि ग्रह होते है ये गतसौर दिनान्तकालिक होते है ।। ५० ॥ , उपपत्ति । यदि युगमौर दिन मे युगग्रहभगण पाते है तो गतसौर दिन में क्या इम अनुपात में भगणादिग्रह पाये, युगग्रहभगण गतसौरदिन गतभगरणादिग्रह। ये ग्रह गतमौर दिनान्त युगसौरदि कालिक होते है । ग्रह ग्रहगणान्तकालिक प्राते है, यहा अहर्गण गतसौरदिन है इसलिये ग्रह गतमौर दिनातकालिक होगे ।। ५० ॥ इदानी देवासुरयोरुदयास्तकालिक्ग्रहानयनमाह । याताब्दिाम्यस्ता धु चरमसइ घा युगार्कवर्षहृता । मण्डलपूर्व. खचरः सुरासुराकॊदयास्तसमये स्यात् ।। ५१ ।। वि भा --धुचरभसङ्घा (युगग्रहभगणा) यातार्काब्दाभ्यस्ता (गतसौर- वर्षगुरिगता) युगार्कवर्पहृता (युगमौरवर्षभक्ता ) तदा सुरासुरार्योदयास्तममये (देव राक्षसोदयास्तकाले) मण्डलपूर्व खवर (भगणादिग्रह) भवेदिति ।। ५१ ।। अस्योपपत्ति । यदि युगसौरवपैयुंग ग्रह भगरणा लभ्यन्ते तदा गतसौरवर्षे किमित्यनुपातेन गतभगरणादिको ग्रहस्तत्स्वरूपम् = युग्रभगण गतसौवप प्रय ग्रहो गनमौर- वन्तिकालिक (देवराक्षसाहोरात्रान्तकालिक ) भवेदिति ।। ५१ ॥ हि भा-ग्रह के युगभगण को गतमौर वर्ष मे गुणकर युगसौरवर्ष मे भाग देने से भग पादिग्रह गनमोरवन्तिकालिक (लेव और राक्षस के अहोरात्रान्तकालिक) होो हैं ।।५।। युसौव उपपत्ति यदि युगमारवर्ष म युगग्रहभगण पाते हैं तो गतमोर वर्ष म क्या इम अनुपात मे गत. सौरवर्षान्तरालिक ग्रह पाते हैं भगवादि ग्रह ।। ५१॥ युमोद युगभगवाXगसौव 2 वटेश्वर-सिद्धान्ते इदानी याहस्पत्यवर्षान्नवालिरमहानयन ब्रह्मदिनादिवालिकग्रहानयन चाह । गुरगतवर्षनवा गुरुवर्षमुसे ग्रहाः कदिवसादो। साध्या मृचपाता ग्रहाश्य मोनाजसन्धिस्याः॥ ५२ ॥ मि. भा--गुरुगतववर्षभवा ग्रहा. (वृहस्पतिमतवर्षसम्बन्धिनो ग्रहा) गुरु- वर्षमुखे (बृहस्पतिवर्षादौ) भवन्ति । कदिवसादो (ब्रह्मादिनादौ) मोनाजसन्धिस्या. (अश्विन्यादौ रेवत्यन्ते वा) मृदूच्चपाना (मन्दोचनातादय.) ग्रहाश्च साध्या इति ।। ५२ ।। हि भा- वृहस्पति के गत वर्ष सम्बन्धी ग्रह बृहस्पति के यदि में होते हैं मर्यान् वृहस्पति के वर्षान्तकालिक होते हैं । ब्रह्मदिनादि में अश्विन्यादि या रेवत्यन्त में मन्दोच्च पातादि और ग्रहो के माधन करना चाहि ॥ ५२ ॥ इदानी पलियुगादी ग्रहानयनमाह स्वखहृतलब्धपुतभगणाः कल्पादौ ते ग्रहादयो नन्दाः। भगरपघ्नाः खखरवाभेन्दु हतलिप्तायुताः कलियुगादौ ॥५३॥ वि. मा--स्वखहनलब्धयुतभगरणा ( स्वमून्यभक्तलब्धयुतभगरणा ) कल्पादौते ग्रहादय स्यु । नन्दा (नव) भगणना (कल्पभगणगुणिता) खखखा- धेन्दु (१००००) हतलिप्तायुता (१०००० भक्तकलासहिता) तदा कलियुगादी ग्रहादयो भवन्ति ॥५३॥ अस्योपपत्ति द्वापरान्तकालिक्ग्रहाद्यानयनार्थ सत्ययु - त्रेतायु + द्वापर-३११८००० कल्पवारिग = ४३२००००००० तदोऽनुपातेन ॥ यदि कल्पवर्षे कल्पोक्तग्रहादि भगणा लभ्यन्ते तदै ३८८८००० भि किमित्यनुपातेन द्वापरान्तकालिका ग्रहाद्या- ग्रहादिभगण ४३८८८००० अपवर्तनेन स्तत्स्वरूपम् ४३२००००००० ग्रहादिभगण X ६ =द्वापरान्तकालिकग्रहा ध्रुवसनका । तथा अहर्गण- १०००० द्वापरान्नहर्गरण अस्माद्ग्रहादिप्रमाणान्यानीय यदि द्वापरान्तग्रहे ध्रुवाख्ये योज्यते तदा कल्यादौ ग्रहाद्या भवन्तीति अत्र 'स्वग्वहृतलब्धयुतभगण इत्ययुक्न प्रतिभाति ॥५३॥ हि भा-अपना गूच भक्त फ्ल करके युतभगरण क्ल्पादि में ग्रहादि होते हैं ।। नौ- गुरिणत भगए दो १०००० इतने से भाग देने मे जो फल हो उमको उममे जोड़ने में बलि. युगादि मे ग्रहादि होते हैं। उपपत्ति मत्ययु+तायु + द्वापरयु=३८८९०००, कल्पवर्षप्रमाण-४३०००००००० इम अनुपात करते हैं वि यदि कलवर्ष मे क्लग्रहादिभगरण पाने हैं तो ३८८८००० इममे क्या इम अनुपात से द्वापरान्त में ग्रहादि प्रमाण माया । रो १०००० मध्यमाधिकार ग्रहादि भगरणX३८८८००० ग्रहादिभगण X ३८८८_ ग्रहादिभगए XE ४३२००००००० ४३२०००० अथवा ग्रहण-द्वापरान्ताहर्गण इस पर मे ग्रहादि साधन कर द्वापरान्तकालिक ग्रहादि मे जोड़ने से क्लयुगादि मे ग्रहादि होते हैं । अथवा पूर्वप्रदर्शित फल को कल्पादि ग्रहादि में जोडने से कलियुगादि मे ग्रहादि होते है । यहा "स्वखहृतलब्ध युतभगणा" यह पाठ ठीक नहीं मालूम होता है ।। ५३ ।। इदानी पैराशिकानीतपदार्थेषु लघुकरण भाज्यभाजकयोई ढत्वलक्षणच्चाह । राशिफेन सर्व ज्ञाताज्ज्ञेयं प्रसाधयेबहुना । अपत्तितर्लधुः स्याद् गुणहारैरेतदेव पूर्वोक्तम् ॥४॥ अन्योन्यभक्तशिष्टया तावपवत्या लघू दृढकसंजो। कल्पादाविन्दुच्चे त्रिभं क्षिपेत्पड्गृहाणि शशिपाते ॥५५॥ विभा -बहुना राशिकेन (अनेकौराशिकद्वारा) ज्ञातात् (विदितविषयात्) ज्ञेय (ज्ञातव्य) सर्वं प्रसाधयेत् (ग्रानयन कृत्वाऽऽनयेत्) अपत्तित. (समाङ्कभक्त) (गुणकभाजक ) लघु स्यात् (तत्स्वरूपमल्प भवति) एतदेव पूर्वोक्तम् । अन्योन्य- भक्तशिष्टया (परस्परभजनावशेपेण) तो लघू (गुण कहारो) अपवल् (भजनीयौ) तदा तो दृढक्मज्ञौ भवत । कल्पादो (मृष्टयादी) इन्दुच्चे (चन्द्रमन्दोच्चे) त्रिभ (राशिय) क्षिपेत् (योजयेत्) शशिपाते (चन्द्रपाते) पड़गृहाणि (पडाशय ) क्षिपेयुरिति ॥५४-५५।। हि. भा-अनेक राशिद्वारा विदित पदार्थ से ज्ञातव्य मय विषय वा माधन परना, गुणक पोर हर में समाज से भाग देने से उसका स्वरूप छोटा हाता है । यही पहले वहा गया है । गुणव और हर इन दोनों मे परस्पर भाग देने से जो शेष रहता है उममे लघु गुणक और लघु हर को भाग देने से जो होता है अर्थात् गुणक और हर म परम्पर भाग देने से जो शेष रहता है उसमे भक्त गुणा और हर दृढ़ सज्ञक होते हैं। पलादि म चन्द्र. मन्दोछ म तीन रामि जोडना चाहिये और चन्द्रपात मे छ राशि जोडना, इति ॥५४-५५।। इदानी ग्रहादीनाक्षेपानाह । हौ तिरेकशरा नगरामा क्षेप्या गृहादि रवितुङ्ग। वेदाधयः खबारणा साराः क्षेप्या गृहादि कुजमन्दे ॥५६॥ मुनयोऽष्ट द्विवेदाः कृतेयवो भादि चन्द्रजस्योच्च । विषया द्विदृशोऽप्टकृता. कुगुणा राश्यादि जीवो ॥ ५७॥ यमलो नसास्त्रयोदश यमलायोज्याः सितस्य भाधच्चे। मुनयोऽक्षदिशोऽङ्गशरा देया शनेगूहाद्य च्चे ॥५॥ ककुभो नसादिशोऽर्का राश्याद्यसृजः प्रयोजयेत्पाते । रुद्रा दिशोऽधेचन्द्रा. कृतेपयो भा देवुधपाते ॥५६॥ प्रप्टो नसा सं या निपाते भादिसंपोग्यम् । का|भंव कुदिनाप्ताः फलिगदिनपर्पया हतास्ते स्यु.॥६०॥ इति सर्वतोभदृश्चतुर्यः ।।
१६८ वटेश्वर-सिद्धान्ते वि भादौ (२) धृति (१८) एकशरा (५१)नगरामा (३७) इति राम्या. दिका गृहादि रवितुङ्ग राश्यादि रविमन्दोच्च) क्षेप्या (योज्या )। तथा वेदा (४) घय (५) खवाणा (५०) खशरा (५०) गृहादिकुजमन्दे (राश्यादि मङ्गलमन्दोई) क्षेप्या (योज्या) ॥ ५६ ।। मुनय (७) अष्टय (१६) द्विवेदा (४२) कृतेषव (५८) भादिचन्द्रजस्योच्च (राश्यादि बुधमन्दोच्चे) क्षेप्या (योज्या)। विपया (५) द्विदृश (२२) अष्टकृता (४८) कुगुणा (३०) राश्यादिजी- वोच्च (राश्यादि बृहस्पति मन्दोच्च) योज्या । २७ ॥ यमलो (२) नखा (२०) त्रयोदश (१३) यमला (२) मितस्य (शुक्रस्य) भाद्यञ्च (राश्यादि मन्दोच्च) योज्या । मुनय (७) अक्ष (५) दिश (१०) अङ्गशरा (५६) शनं (शनैश्चरस्य) ग्रहाद्युच्चे (राश्यादि मन्दाचे) देया (क्षेप्या ) ।। ५८ ॥ ककुभ (१०) नखा (२०) दिश (१०) अर्का (१२) इति राश्यादि, असृज पाते (कुजस्य पाते) प्रयोजयेत् । रुद्रा (११) दिश (१०) अङ्कचन्द्रा (१६) कृतेपद (५४) भादिबुधपाते (राश्यादि बुधपाते) क्षेप्या ॥५६॥ वा अष्टो (८) नवा (२०) ख (०) राज्यादिपाते याज्यम् । ते भगणा (ब्रह्मदिनादिग्रहादि भगणा) कलिगतदिनपर्ययाहता (कलिगतदिनभगणगुणा ) ब्रह्मादिनोपन कुदिन भक्ता ) तदा पलिगतदिनान्तिकाम्ने ग्रहाद्या भवन्तीति ॥६० ॥ अत्र युक्तिस्तु स्पष्टवास्ति ॥ यथा-- सौरवान्ते ग्रहानयनाय कल्पगताहर्गणस्य खण्डद्वय (कल्पादित क्ल्यादि पावत्प्रथमरचण्ड कलियुगादित इष्टवर्षपर्यन्त द्वितीय खण्ड प्रकल्प्यानुपात क्रियते यदि कल्पकुदिन भगणा लभ्यन्ते तदा कल्पगतागण विमित्यनुपानेनाभीष्टवान्ते भगगादिग्रह - कल्पावत्यादि यावदहर्गणग्रभ कलिगताहर्गरण ग्रभ वधु प्रत्र प्रथमखण्डे का यद्भगमगेप तस्यैव नाम क्षेप । एतनियमेन सर्वेपा ग्रहादीना क्षेपा उत्पाद्या पलिंगताहर्गरणाना प्रभगणाना पातान् स्वस्वपठितक्षेपयुताकपबुदिनर्भक्नाद् भगणादिफन रविमण्डलान्तिका ग्रहा भवन्ति, अब मेपादियुगणफलेन (लघ्वहर्ग- गोत्पन्नग्रहेण) योजनेनेष्टदिने ग्रहा भवन्ति, ग्रहानयनाथमेव क्षेपारणा पाठ कृतो वर्ष- मम्बन्धेनाप्यनुपातेन भगणादिग्रहानयन भवितुमर्हनि पूर्वमहर्गणेन यथाऽनुपा- ताऽभिहितम्तथैव वर्षेरप्यनुपात कार्यों यथा- + " " " " " " " " " मङ्गल पात मे " बुधसात मे " मध्यमाधिकार: कल्पात्कल्यादि सावद्वर्ष ग्रभ + कलेगतव X अभपूर्व कल्पगताहर्गणस्य खण्ड- कल्पवर्ष कव द्वय कृतमन कल्पगतवर्षारणा खण्डद्वय कृतमन्यत्पूर्ववदिति ।। इति श्रीवटेश्वरसिद्धान्ते मध्यमाधिकारे सर्वतोभद्रनामकश्चतुर्थोऽध्याय । हि मा राश्यादि रवि मन्दोच्च मे २ । १८ । ५१ । ३७ ये राश्यादि जोडना चाहिये । ॥ मङ्गल मन्दोच्च मे ४ ॥ ५ । ५० । ५० ये राश्यादि जोडना चाहिये । बुधमन्दोच्च में ७) १६, ४२ ॥ ५४॥ वृहस्पति मन्दोच्च मे ५ । २२ । ४८ । ३१ । शुक मन्दोच्च में २। २० । १३ । २॥ ॥ शनैश्चरमन्दोच्च मे ७ । १० । २० । १० । १२ ११ । १० । १६ । ५४, अथवा ८ । २० । ० राश्यादि पात मे जोडना चाहिये । ब्रह्मदिनादि मे ग्रहादि भगणो को कलिगत दिन भगण से गुणकर ब्रह्मदिनादिक कुदिन से भाग देने से कलिगत दिनान्त- कालिक ग्रहादि होते हैं ।। ५६-६० यहा युक्ति स्पष्ट है । जैसे सौर वर्षान्त मे ग्रहानयन के लिये क्ल्पगताहर्गण के दो खण्ड (कल्पादि से कल्यादि तक प्रथमखण्ड, कलियुगादि से इटवर्षपर्यन्त द्वितीय खण्ड) मानकर अनुपात करते है । यदि कल्पबुदिन मे ग्रहभगण पाते है तो कल्पगताहगंण में क्या इस अनुपात में इष्टवर्षान्त मे भगणादिग्रह कल्पादि से कल्यादि तक महर्गरणग्रभ कलिगताहर्गण अभ यहा प्रथममण्ड में जो भगण शेप रहता है उसी के नाम क्षेप है । इस नियम में सब ग्रहादियों के क्षेप लाना पाहिये 1 वर्ष से भी अनुपात हो सकते हैं जिसे कल्पादि से कल्यादि तक वर्ष ग्रभ कलिगतव ग्रभ पहले कल्पगताहर्गरण के दो खण्ड विये थे । यहा कल्पगतवर्ष के दो खण्ड किये हैं। शेष बात पूर्ववत् ।। इति श्री वटेश्वरसिद्धान्त मे मध्यम अधिकार मे सर्वतोभद्र नामकः चौथा अध्याय समाप्त हुमा। + क्व कव पञ्चमोध्यायः अथप्रत्यद्वशुद्धिः इदानीमदादावधिदिनादि दिनादिक्षयाहादियाधनमाह । शुद्धिशब्दस्य शोधनारिक्तैकत्रीकरणादयोऽर्था अपि सम्भवन्ति, तेष्वत्रको करणार्थ एवास्ति, तथाहि इष्टवान्ते प्रत्यब्दसम्बन्धीना सावनाद्यवमादीन मेक- जीकरण प्रत्यब्दशुद्धि , ततो यस्मिन् कुदिनन्दप्रवेश स तदब्दपतिरिति परिभाषा हृदि सधार्य कुदिनानामेकरिताना सप्ततष्टिताना सप्ताल्पो य सावययो दिनगरगोऽय मशेपो वा पृथक पृथक सातष्टितानामेवैकत्रिताना सम्भवे सति पुन सप्तत प्टिताना तेपा योऽवशेषस्तत्र रव्यादिगणनया यो वार सोऽउदपतिरित्याचार्यों वदति । वेदाग्नित्रिगुणस्निभूगुणविल पक्षखाङ्काश्विभि । यातान्दा गुपिता क्रमादपहृता खानाङ्गानन्दोन्मिते ॥ लब्धान्यध्यहवासरावमगरणा याता खखाङ्गोङ्कक । शेषेभ्यो घटिका फलानि च भवेयु शेषकेभ्योऽपि हि ॥१॥ वि भा-याताब्दा (गतसौरवत्सरा) वेदाग्नितिगुणं (३३.४ एभि) त्रिभूगुणविल (८३१३ एभि ) भूपक्षखाङ्काश्विभि (२६०२१ एभि ) गुरिणता क्रमात् (क्रमश ) खाभ्राङ्गनन्दोमिते (१६०० एभि ) अपहृता (भक्ता ) लब्धानि (फलानि) याता (गता ) अध्यहवासरावमगणा (गताधिदिनादि सावनदिनादि क्षयदिनाद्या ) भवन्ति, पुन खखाङ्गाङ्क (६६०० एभि ) शेपेभ्य फलानि घटिका भवेयु , तच्छेपकेभ्योऽपि पूर्ववत्फलानि भवतीति ।।१।। अग्रोपपत्ति । एकस्मिन् सौरवर्षे पठित सावनदिनादि-क्षयदिनाधिदिनादीनि ६६०० वराचार्य पठिताधिदिनादि गुणका उत्पद्यन्ते, अथवा भास्करोक्त प्रत्यब्दशुद्धिस्थ दिनाद्यवमाद्यानयनवदवापि कार्य विन्तु सर्वत्र (स्थानत्रये) खाभ्ररसनवाभि सक- पन कार्यमिति ॥ १॥ वि भा -प्रत्यब्दगुद्धि नाम के अध्याय को प्रारम्भ करते है। पुद्धि गब्द का प्रय शोधन याने घटाना होता है कि तु उमर अलावा एकत्रीकरण (एव जगह मिलाना) मादि अथ भी होते हैं। उन पर्यो म यहा एकत्रीकरण ही प्रय है, इप्टवान्त मे प्रतिवप सम्बधी सावनादि अवमादियो का एकत्रीकरण करने को प्रत्यधशुद्धि' षत हैं। जिस दिन मे वषप्रवेश होता है वही वषपति होता है यह परिभाषा है । इसको मध्यमाधिकारः १७१ अपने हृदय मे रखकर एकत्रित कुदिनो को सात से भाग देने से सात से अल्प अहर्गण या अवम शेष पृथक् पृथक् सात से विभक्त एकत्रित उन सब के जो शेष रहते हैं रवि आदि गणना से जो दिन आता है वही वर्षपति होता है ये वाले प्राचार्य लोग कहीं हैं। गतसौरवर्ष को तीन जगह रखकर ३३३४, ८३१३, २६०२१ इसे गुणवर क्रमा ६६०० इतने से भाग देने से गताधिदिन, गतसावनदि, गतावमदिन होते हैं, शेष मे १६०० इनसे जो फल होती है घटी होती है, पुन उसके शेष से पूर्ववत् ही पलादि फल होते हैं ॥१॥ उपपत्ति एक वर्ष में पठित सावन दिनादि, क्षयदिनादि, अधिदिनादियो ६६०० वर्षों में प्राचार्य पटित गुणकाई उत्पन्न होते हैं । अथवा भास्करकथित प्रत्यब्दशुद्धिस्य दिनादि क्षयाहादि की तरह यहा भी करना चाहिये लेकिन तीनो स्थानो मे ६६०० इनसे सवर्णन करना चाहिये ॥१॥ इदानीमधिमासानयन शुद्धि चाह । होनराशिदिनसंयुतिर्युता दिग्नवत्सरगरणेन भाजिता । खाग्निभिस्त्वधिकमासकाः फलं शुद्धिरत्र विकल दिनादिकम् ॥२॥ वि मा-हीनराशिदिनसयुति (क्षयाहादि दिनादियुति ) दिग्घ्नवत्सर. गणेन (दशगुणित गतवर्षसमूहेन) युता (सहिता) खाग्निभि (निशद्धि ) भाजिता (भक्ता) फल (लब्ध) अधिकमासका स्यु । विकल दिनादिक (दिनाद्य- वशिष्ट विंशद्भक्तावशिष्ट वा) अन शुद्धि (शुद्धिसज्ञ दिन भवति) ॥२॥ त्ति एपस्मिन् वर्षे सावनदिनाद्यम् =३६५ । १५ । ३० । २२ । ३०=३६५ +१ वर्ष सदिनाद्य एकस्मिन् वपदमानि=५ १५८ १२२१७१३० -५२१ वर्षस प्रवमय अत एकवर्षे चान्द्राहा =३७१ । ३ । ५२ । ३० 10-३७०+१ वर्पसदि +१ वर्षस अवमदि एकस्मिन् वर्षे सौराहा =३६० । अनयोरन्तरेण एकस्मिन् वर्षेधिदिनानि-१६१३१५२।३०। ०=१०+१ वर्षस दिनादि +१ वर्षस अवम ततोऽनुपातेन गताधिमामा. १ वर्षस अधिदिन गतवर्ष १ वर्ष४३० पञ्चमोध्यायः अथप्रत्यद्वशुद्धिः इदानीमव्दादावधिदिनादि दिनादिक्षयाहादिमाधनमाह । शुद्धिशब्दस्य शोधनारिवतैकत्रीकरणादयोऽर्था अपि सम्भवन्ति, तेवकत्री- करणार्थ एवास्ति, तथाहि, इष्टवान्ते प्रत्यब्दसम्बन्धीना सावनाद्यवमादीनामेक- त्रीकरण प्रत्यब्दशुद्धि , ततो यस्मिन् कुदिनेऽब्दप्रवेश स तदब्दपतिरिति परिभाषा हृदि सधार्य कुदिनानामेकत्रिताना सप्ततष्टिताना सप्ताल्पो य सावयवो दिनगणोऽव- मशेपो वा पृथक्-पृथक् सप्ततष्टितानामेवैकनिताना सम्भवे सति पुन सप्ततरिताना तेपा योऽवशेषस्तत्र रव्यादिगणनया यो वार सोऽब्दपतिरित्याचार्यो वदति । वेदाग्नित्रिगुरगस्त्रिगुणविल पक्षखाङ्काश्विमि । यातान्दा गुरिणता क्रमादपहताः खानाङ्गनन्दोन्मितः ।। लब्धान्यध्यहवासरावमगरणा याताः खखागाडकः । शेषेन्यो घटिका फलानि च भवेयु शेषकेभ्योऽपि हि ॥१॥ वि भा–याताब्दा (गतसौरवत्सरा) वेदाग्निनिगुणं (३३६४ एभि) विभूगुणविल (८३१३ एभि) भूपक्षखाङ्काश्विभि (२९०२१ एभि ) गुणिता कमात् (क्रमश ) खाभ्राङ्गनन्दोन्मिते (६६०० एभि) अपहृता (भक्ता ) लब्धानि (फलानि) याता (गता) अध्यहवासरावमगरणा (गताधिदिनादि सावनदिनादि- क्षय दिनाद्या ) भवन्ति, पुन खखानाङ्कक (६६०० एभि ) शेपेभ्य फ्लानि घटिका भवेयुः, तच्छेपकेभ्योऽपि पूर्ववत्फलानि भवन्तीति ॥१॥ अनोपपत्ति । एकस्मिन् सौरवर्षे पठित सावनदिनादि-क्षयदिनाधिदिनादीनि ६६०० वराचायं पठिताधिदिनादि गुणका उत्पद्यन्ते, अथवा भास्करोक्त प्रत्यब्दगुद्धिस्थ दिनाद्यवमाद्यानयनवदनापि कार्य विन्तु सर्वत्र (स्थानत्रये) साभ्ररसनवभि सव- र्णन कार्यमिति ॥१॥ विभा-प्रत्यब्दशुद्धि नाम के अध्याय को प्रारम्भ करते हैं । शुद्धि गन्द का मर्य गोधन याने घटाना होता है किन्तु उमर अलावा एकत्रीकरण (एक जगह मिलाना) प्रादि अथं भी होते हैं। उन मयों में यहा एकत्रीकरण हो मर्थ है, इप्टवन्त मे प्रतिवर्ष सम्बधी सावनांदि प्रवमादियो का एकत्रीकरण करने को "प्रत्यपशुद्धि" कहते हैं । जिस दिन मे वर्षप्रवेश होता है वही वर्षपति होता है यह परिभाषा है । इसको मध्यमाधिकार. १७१ अपने हृदय मे रखकर एकत्रित कुदिनो को सात से भाग देने से सात से अल्प अहर्गरण या अवम शेष पृथक् पृथक् सात से विभक्त एकत्रित उन सब के जो शेष रहते है रवि आदि गणना से जो दिन प्राता है वही वर्षपति होता है ये बाते प्राचार्य लोग कहते हैं। गतसौरवर्ष को तीन जगह रखकर ३३३४, ८३१३, २६०२१ इसे गुणकर क्रमश १६०० इतने से भाग देने से गताधिदिन, गतसावनदि, गतावमदिन होते हैं, शेष मे १६०० इनसे जो फल होती है घटी होती है, पुन उसके शेप से पूर्ववत् ही पलादि फल होते हैं ॥१॥ उपपत्ति एक वर्ष मे पठित सावन दिनादि, क्षयदिनादि, अधिदिनादियो १६०० वर्षों में प्राचार्य पटित गुणकाङ्क उत्पन होते हैं । अथवा भास्करकथित प्रत्यब्दशुद्धिस्थ दिनादि क्षयाहादि की तरह यहा भी करना चाहिये लेकिन तीनो स्थानो मे ६६०० इनसे सवर्णन करना चाहिये ॥१॥ इदानीमधिमासानयन शुद्धि चाह । होनराशिदिनसयुतिर्युता दिग्ध्नवत्सरगरणेन भाजिता। खाग्निभिस्त्वधिकमासकाः फल शुद्धिरत विकल दिनादिकम् ॥२॥ वि भा-हीनराशिदिनसयुति (क्षयाहादि दिनादियुति ) दिग्घ्नवत्सर गणेन (दशगुणित गतवर्षसमूहेन) युता (सहिता) खाग्निभि (विंशभि ) भाजिता (भक्ता) फल (लब्ध) अधिकमासका स्थु । विकल दिनादिक (दिनाद्य- वशिष्ट प्रिंशद्भक्तावशिष्ट वा) अन शुद्धि (शुद्धिसज्ञ दिन भवति) |२|| अस्योपपत्ति एकस्मिन् वर्षे सावनदिनाद्यम्=३६५ । १५ । ३० । २२ । ३०=३६५ +१ वर्ष सदिनाद्य एकस्मिन् वर्षेऽवमानि५ । ४८ । २२ ७ । ३० =५+ १ वर्षस अवमध अत एकवर्षे चान्द्राहा =३७१ । ३ । ५२ । ३०।०-३७०+१ वर्षसदि +१ वर्षस अवमदि एकस्मिन् वर्षे सौराहा =३६० । -३६० । अनयोरन्तरेण एकस्मिन् वर्षेधिदिनानि = १६॥३॥५२॥ ३०॥ =१०+१ वर्षस दिनादि +१ वर्षस अवम ततोऽनुपातेन गताधिमासा - १ वर्षस अधिदिन ४ गतवर्ष १ वर्ष ४३० पञ्चमोध्यायः अथप्रत्यद्वशुद्धिः इदानीमन्दादावधिदिनादि दिनादिक्षयाहादिसाधनमाह । शुद्धिशब्दस्य शोधनारिक्तैकत्रीकरणादयोऽर्था अपि सम्भवन्ति, तेप्वौकत्री- करणार्थ एवास्ति, तथाहि इष्टवर्षान्ते प्रत्यब्दसम्बन्धीना सावनाद्यवमादीन मेक- त्रीकरण प्रत्यब्दशुद्धि ततो यस्मिन् कुदिने ब्दप्रवेश स तदब्दपतिरिति परिभाषा हृदि संधाय कुदिनानामेकत्रिताना सप्ततष्टिताना सप्ताल्पो य सावयवो दिनगणोऽव मशेपो वा पृथक पृथक सप्ततष्टितानामेवैकत्रिताना सम्भवे सति पुन सप्ततष्टिता। तेपा योऽवशेषस्तत्र रव्यादिगणनया यो वार सोऽब्दपतिरित्याचार्यों वदति । बेदाग्नित्रिगुणस्त्रिभूगुणविल पक्षबाडुश्विमि । यातान्दा गुरिणता क्रमादपहृता खाभ्राङ्गानन्दोन्मिते ।। लब्धान्यध्यहवासरावमगरणा याता खखागाडकं । शेन्यो घटिका फलानि च भवेयु शेयकेभ्योऽपि हि ॥१॥ विभा याताब्दा (गतसौरवत्सरा) देदाग्नित्रिगुणे (३३,४ एभि) त्रिभूगुणविल (८३१३ एभि) भूपक्षखाङ्काश्विभि (२६०२१ एभि ) गुणिता क्रमात् (क्रमश ) खाभ्राङ्गनन्दोन्मिते (६६०० एभि ) अपहृता (भक्ता ) लब्धानि (फलानि) याता (गता ) अध्यहवासरावमगणा (गताधिदिनादि सावनदिनादि क्षय दिनाद्या ) भवन्ति पुन खखागाइ (१६०० एभि ) शेपेभ्य फलानि घटिका भवेयु , तच्छेपकेभ्योऽपि पूर्ववत्फलानि भवन्तीति ॥१॥ अनोपपत्ति । एकस्मिन् सौरवर्षे पठित सावनदिनादि-क्षयदिनाद्यधिदिनादीनि ६६०० वक्राचार्य पठिताधिदिनादि गुणका उत्पद्यन्ते, अथवा भास्करोक्त प्रत्यब्दशुद्धिस्थ दिनाघवमाद्यानयनवदनापि कार्य विन्तु सर्वत्र (स्थानत्रये) खाभ्ररसनयभि सव- न कार्यमिति ॥ १॥ विमा-प्रत्यब्दशुद्धि नाम क मध्याय को प्रारम्भ करते हैं । शुद्धि गन्द का प्रथ शोधन याने घटाना होता है वितु उसक अलावा एकत्रीकरण (एक जगह मिलाना) आदि अथ भी होते हैं। उन प्रों में यहा एकत्रीकरण ही प्रय है, इप्टवान्त मे प्रतिवप मम्दधी सावनादि अवमादियो वा एकत्रीकरण करने को प्रत्ययशुद्धि पहत हैं । जिम दिन में वपप्रवेश होता है वही वपपति होता है यह परिभाषा है । इसरो मध्यमाधिकार. १७१ अपने हृदय में रखकर एकत्रित कुदिनो को सात से भाग देने से सात से अल्प अहर्गरण या अवम शेष पृथक् पृथक् सात से विभक्त एकत्रित उन सब के जो शेष रहते हैं रवि आदि गणना से जो दिन आता है वही वर्षपति होता है ये बाते आचार्य लोग कहते हैं। गतसौरवर्प को तीन जगह रखकर ३३३४, ८३१३, २९०२१ इसे गुणकर क्रमश ६६०० इतने से भाग देने से गताधिदिन, गतसावनदि, गतावमदिन होते हैं, शेष मे १६०० इनसे जो फल होती है घटी होती है, पुन उसके शेप से पूर्ववत् ही पलादि फल होते हैं ॥१॥ उपपत्ति एक वर्ष में पठित सावन दिनादि, क्षयदिनादि, अधिदिनादियो १६०० वर्षों में प्राचार्य पठित गुणकाङ्क उत्पन्न होते हैं ! अथवा भास्करकथित प्रत्यब्दशुद्धिस्थ दिनादि क्षयाहादि की तरह यहा भी करना चाहिये लेकिन तीनो स्थानो मे ६६०० इनसे सवर्णन करना चाहिये ॥१॥ इदानीमधिमासानयन शुद्धि चाह । होनराशिदिनसंयुतिर्युता दिग्घ्नवत्सरगणेन भाजिता। खाग्निभिस्त्वधिकमासका: फलं शुद्धिरत्र विकलं दिनादिकम् ॥२॥ वि भा~हीनरागिदिनसयुति (क्षयाहादि दिनादियुति ) दिग्ध्नवत्सर- गरणेन (दशगुरिणत गतवर्षसमूहेन) युता (सहिता) खाग्निभि (विशद्भि) भाजिता (भक्ता) फल (लब्ध) अधिकमासका स्थु । विकल दिनादिक (दिनाद्य- वशिष्ट निंशद्भक्तावशिष्ट वा) अत्र शुद्धि (शुद्धिसज्ञ दिन भवति) ॥२॥ अस्योपपत्ति एकस्मिन् वर्षे सावनदिनाद्यम्-३६५ । १५ । ३० । २२ । ३०=३६५ +१ वर्ष सदिनाद्य एकस्मिन् वर्षे जमानि-५१४८१२२१७१३० -५+१ वर्षस अवमष अत एकवर्षे चान्द्राहा - ३७१ । ३ । ५२ । ३० । ०=३७०+१ वर्पसदि +१ वर्षस अवमदि एकस्मिन् वर्षे सौराहा -३६० । अनयोरन्तरेण एकस्मिन् वर्षेचिदिनानि- १६॥३॥ ५२। ३०1 0-१०+१ वर्षस दिनादि +१ वर्पस अवम ततोऽनुपातेन गताधिमासाः १ वर्षस अधिदिन गतवर्ष १ वर्ष ३० १७२ बटेश्वर-सिद्धान्ते (१०+१ वर्षसंदिनादि+१ वर्षसंभवमादि) गव %3D 1 १० गव+१वर्पसंदिनादि गव+१ वर्षसअवमादिxगव ३० - १०-गव+गतवर्षसदिनादि+गतवर्पसंग्रवमादि ३० अत्राधिशेषस्य शुद्धिसंज्ञा कृताऽऽचार्येणैतावताऽचार्योक्तमुपपद्यते । सिद्धान्त- शिरोमणी भास्कराचार्येरणाऽप्येतदनुरूप एव प्रकारोऽभिहित. । यथा, दिनादिक्षया- हादिदिग्ध्नाव्दयोग. खरामहता. स्यु प्रयाताधिमासाः । भवेच्छुद्धिसंज्ञ यदत्राव- शिष्टमित्यादि, सिद्धान्तशेखरे श्रीपतिनापि "दशगुणाब्ददिनावम संयुति. सदर्ने - विहृता अधिमासकाः । भवति शुद्धचभिध खलु शेषकमित्यादि" वटेश्वराचार्योक्ता- नुरूपमेव कथ्यते इति ॥२॥ वि. भा.-क्षयाहादि और दिनादि के योग में दशगुरिणत गतवर्ष जोड कर तीस से भाग देने से मधिमास होता है, अवशेष शुद्धिसज्ञक है ॥२॥ उपपत्ति एक वर्ष में सावनदिनादि=३६५ । १५ । ३० । २२ । ३०=३६५+ १ वर्षमदिनादि एक वर्ष में अवम=५ । ४८ । २२ । ७ । ३०%D५+ १ वर्षसंक्षयाहादि दोनो के योग करने से एक वर्ष मे चान्द्रदि-३७१ ॥ ३॥ ५२ ॥ ३० ॥ ०=३७०+१ वर्षसदिनादि +१ वसक्षयाहादि एक वर्ष रदि-३६०। दोनो के अन्तर करने से एक वर्ष में अधिदिन=११ । ३ । ५२ । ३०=१०+१ वर्ष सदिनादि +१ वर्पसक्षयाहादि अव अनुपात से गताधिमास= १ वर्षसमधिदिन गतवर्ष १ वर्ष४३० (१०+ वर्षसदिनादि+१ वर्षसक्षयहादि) गव १० गव+१ वर्षस दिनादि गव+१ वर्षसक्षयाहादिर्गव - - १० गव+ गतवर्षसदिनादि + गतवर्षमायाहादि यहा प्राचार्य मधिशेष या ३० नाम 'शुद्धि' रसा है । सिद्धान्तशिरोमणि मे भास्वराचार्य भी इसी तरह कहते हैं, जैसे- मध्यमाधिकारः १७३ "दिनादि क्षयाहादि दिग्घ्नाव्दयोग खरामहंत रयु' प्रयाताधिमासाः भवेन्शुद्धिमज्ञ यदत्रावशिष्टमित्यादि" और सिद्धान्तशेखर मे श्रीपति भी इसी तरह कहते है । जैसे- "दश गुणाब्द दिनावम मयुति खदहनविहृता अधिमासका । भवति शुद्धधभिधं खलु शेपवमित्यादि" श्रीपति वे क्थनानुसार ही वटेश्वराचार्य और भास्कराचार्य ने भी अधि- मासानयन किया है, कुछ भी अन्तर नहीं है इति ॥२॥ इदानी पुनरप्यधिमासानयन शुद्धि चाह । अध्यहानिशिवनिम्नहायनेरन्वितानि खदहनोद्ध तानि वा । लभ्यतेऽधिकगरणोऽवशिष्टकं शुद्धिभद्रमथवा दिनादि यत् ॥३॥ विभा-अध्यहानि (अधिदिनानि) शिवनिघ्नहायने (एकादशगुणित- गतवः) अन्वितानि (युक्तानि) खदहनोद्धृतानि (त्रिंशद्भक्तानि) वा (अथवा) अधिकगण (अधिकमासगण ) लभ्यते (प्राप्यते) अवशिष्टक (शेष) दिनादि यत् (दिनाद्यवयव यत्) शुद्धिभद्रम् (शुद्धिसज्ञकम्) इति ॥ ३ ॥ अस्योपपत्ति । पूर्वश्लोकोपपत्तिप्रदर्शितान्येकवर्षेऽधिदिनानि = ११ । ३ । ५२ । ३० । ० (११ । ३१५२ । ३०1०)गव. ततोऽनुपातेन गताधिमासा १६५४३० ११ गव+ (३ । ५२ । ३०१० गव) _११ गव+गतवर्प स अधिदिन - गताधिमास ३० एतावताचार्योक्तमुपपन्नम् ॥३॥ हि भा.--अधिदिन को ग्यारह गुणित गतवर्ष मे जोडकर तीस से भाग देने से प्रधिमास होता है । दिनादि शेष जो रहता है यह शुशिमा (शुद्धिसज्ञक) है।" %3D उपपत्ति । - - पूर्व श्लोव की उपपत्ति में प्रदर्शित एक वर्ष में अधिदिनम्-११ । ३ । ५२ ३० १० (११ । ३ 1 ५२ । ३० । • गव इसमे अनुपात द्वारा गताधिमासः १वर्ष ३० ११ गव+ (३ । ५२।१०।०) गव, ११ गवXगतवर्ष स अधिदिन ३० गरो माचार्योस्त पद्य उपपन्न हुमा ॥३॥ इदानी पुनस्तदेवाह । गोवसु निरसपहताः समाः साभ्रखाभ्रति भाजिताः फलम् । मासकाधिकसंज्ञक तथा शुद्धिसंजमयवा दिनादिकम् ॥ ४॥ ३०
१७४
वटेश्वरसिद्धान्ते
वि भा-समा (गताब्दा) गोवसुनिरसपड हता (६६३८६ गुणिता.)
खाभ्रखाभ्रधृतिभाजिता (१८०००० भक्ता ) फल (लब्ध) मासकाद्यधिकसज्ञ.
(अधिमासनामक) भवेत् । दिनादिकमवशिष्ट शुद्धिसज्ञकमिति ॥ ४॥
अस्योपपत्ति ।
यदि युगरविभगरणयुगाधिमासा लभ्यन्ते तदा गतवर्षे. किमित्यनुपातेन
गताधिमासास्तत्स्वरूपम् =
युगाधिमासX गतवर्ष_ १५६३३३६४ गव
युगरविभगण ४३२००००
हरभाज्यौ चतुर्विशत्यापत्तितौ तदा
६६३८६४गव
गताधिमासा.।
१८००००
एतावताऽचार्योक्तमुपपन्नम् ।।
हि मा-गतवर्ष को (६६३८८) इससे गुणकर १८०००० इतने से भाग देने से
अधिमास होता है । दिनादियोप नाम शुद्धि है ।।
उपपत्ति
यदि युगरवि भगरण में युगाधिमास पाते हैं तो गतवर्ष मे क्या इस अनुपात से गता-
१५६३३३६४गव
युगाधिमास गतवर्ष
धिमाम आता है,
'यहा हर और भाज्यको
युरविभगण
युगभगण=४३२००००
६६३८६X गव
चौबीस (२४) से अपवर्तन देने से
= गताधिमास, इससे माचार्योक्त पद्य
१८००००
उपपन्न हुमा ॥४॥
इदानी पुनरपि तदेवाह ।
रुद्र निम्न निजहार संयुतरध्यहानि गुणकः प्रसाधयेत् ।
तानि खाग्निजिताधिमासका वाऽवशिष्ट दिवसा विशुद्धयः ॥५॥
विभा-अध्यहानि (अधिदिनानि) रुद्रनिनिजहारमयुत (अधिदिन-
गुणहार ) प्रसाधयेत्, तानि (अधिदिनानि) खगग्निजिताधिमासका (अधिदिनानि
त्रिंशद्भक्तानि तदाऽधिमासका ) भवन्ति, अवशिष्टदिवसा (रोपदिनानि) विशु-
द्धय (शुद्धिमज्ञका ) भवन्तीति ॥१॥
अत्रोपपत्तिस्तु भस्यवाध्यायस्य तृतीयश्लोकोपपत्ति हृदि निधाय बोध्यान
किमपि विशेष वस्तु न क्थयति ग्रन्थकार इति ॥ ५॥
हि भा-अधिदिन अपने गुणक हर मादि के द्वारा साधन करना, अधिदिन वो तीस
से भाग देने से मधिमास होता है । शेष दिन पुद्धिमज्ञक है ।।५।।
उपपत्ति
इसकी उपपत्ति इसी प्रध्याय के तीसरे दलोव को उपपत्ति को मन मे रखकर समझनी
चाहिमे । कुछ विशेष बातें आपकार नही कहते हैं ॥ ५ ॥
। मध्यमाधिकारी १७५ अथ वर्षपतिज्ञानमाह । वत्सरान्वितदिनेषु सप्तभिर्भक्तशेषमिह वत्सराधिपः । स्युस्ततो रविभसंघकान्तिका मध्यमा दिविचराः सुखेन हि ।। ६ ।। वि. मा.--वत्सरान्वितदिनेषु (गताब्ददिनयोगेपु) सप्तभिर्भक्त शेपं वत्सरा- धिप: (वर्षेशः) भवति । मध्यमादिविचराः (मध्यमग्रहाः) रविभसङ्घकान्तिकाः (रविभगणान्तकालिकाः) सुखेन स्युरिति ।। ६ ।। अनोपपत्तिः। अथकस्मिन् वर्षे सावनदिनाद्या =३६५ । १५ । ३१ । १५-३६५+ दिनानि, तत इवन्तेि सावनदिनाद्यम् =३६५X गव+गवxदिनादि, कल्पादितोऽभीष्ट वन्तेि सावयव: सावनाहर्गगणः, अत्र प्रथमखण्डे सप्तभक्त यच्छेषं द्वितीय खण्डेऽपि सप्तभक्त यच्छेप तयोरेकत्रीकरणं भवति, एतेन रव्यादि वारगणनया वर्षपतिज्ञानं सुखेनैव भवेदिति ।। शेपस्य वासना सुगमैव यत. कल्पवर्षेः कल्पग्रह- भगणा लभ्यन्ते तदा गतवः किमित्यनुपातेन सौरभगणान्ते ग्रहा. समा- गच्छन्तीति ।। ६॥ हि.भा -गतवर्ष और दिन के योग मे सात भाग देने से जो शेप रहता है वह वर्षपति होता है । और रविभगणान्त मे मध्यमग्रह सुगम ही मे होते है ॥ ६ ॥ उपपत्ति। एक वर्ष मे सावनदिनादि-३६५ । १५ । ३१ । १५ । ०-३६५+दिनादि इस पर से इप्टवर्षान्त मे सावनदिनादि-३६५४ गव+गवxदिनादि-अल्पादि मे इप्टवन्ति में सावयव सावनाहगण, यहा प्रथमसण्ड में मात से भाग देने से जो शेष रहता है और द्वितीय खण्ड में सात में भाग देने से जो दोप रहता है दोनो के समिथण हैं इससे रवि आदि वारगणना से वर्षपति ज्ञान मुगम ही है । अवशिष्ट की उपपत्ति सरल ही है क्योकि कल्पवर्ष मे कल्पग्रह- भगण पाते हैं तो गतवर्ष मे क्या इस अनुपात से रवि भगणान्त मे मध्यमग्रह पाते है ॥ ६॥ पुनस्तदेवाह । पञ्चावत्सरहतिताव जिताधिकहितह तप्ता । शेषसप्त विवर समाधिपो वा दिनाधिप समाधिपः स्फुटः ॥७॥ वि. भा -पश्चवत्सरहति. (पञ्चगुणितगतवत्सरः) अवमः (क्षयदिनः) युता (महिला) अधिकदिन (अधिकमामदिन ) विवजिता (रहिता) नगः (सप्तभिः) हता (भक्ता) शेषसप्तविवर समाधिपः (वर्षपतिः) अथवा दिनाधिप समाधिप: स्फुट. (दिनपतिवर्षपतिश्च) स्फुटः कथ्यते ग्रे इति ॥७॥ अस्योपपत्तिः । अथकव क्षयाहाद्यम्-५1 ४८ ! २२ 1७।३० ततो गतवर्षसम्वन्धि दायाहाधम्गव (५। ४८ । २२।७।३०) =५ गव+गव (०१४ । २२।७।३०) ११७६ वटेश्वर-सिद्धान्ते तथैकवधिघटधात्मकम् =०।३। ५२ । ३० १० गतवर्ष सम्बन्ध्यधिक घट्यात्मकम्-गव (0 1 ३ । ५२ । ३०10) अतोऽनयोरन्तरम् = ०। ४८ । २२ । ७।३०)-गव ( ०1३ । ५२ । ३०।०) गतवस अवमघट्यादि-गतवसंग्रधिदिघ. :. ५ गव+गतवसायमघट्यादिवसअधिदिघ. सप्तष्टिते शेपो रव्यादि- वारगणनया वर्षपतिर्भवेदिति ॥७॥ हि.भा.गतवर्ष और पांच के घात मे क्षयदिन जोड देना प्रविदिन घटाकर सात से भाग देने मे जो शेप रहे उसे सात मे घटाने से वर्षपति होता है । अथवा स्फुट दिनपति मोर वर्षपति के विचार आगे कहते हैं ॥७॥ - उपपत्ति। एक वर्ष में क्षयहादि=५। ४८ । २२ । ७ । ३० गतवर्षसम्बन्धिक्षयाहादि = गव (५। ४८ ! २२ । ७ । ३०) =५ गव+गव (01 ४0 1 २२ । ७ । ३०) एक वर्ष में अधिक दिन घट्यादि=01३। ५२ । ३० । . गतवर्ष सम्बन्धी अधिकदिन घट्यादि गव ( । ३ । ५२ । ३० 10 ) प्रत दोनो के अन्तर-गव (०। ४८ । २२१७ । ३०)व ( 1 ३ 1 ५२ । ३० । .) = गवस अवम घट्यादि-गवस अधिदिप :. ५ गव+गतवस अवम घट्यादि-गवस मधिदिघ सात से भाग देने से शेष रवि मादि गरानाम से वर्षपति होगा ॥३॥ इदानीमब्दपरयानयनमाह द्विनिध्नेवत्सरनिकरेऽधिकोनिते युतेऽवमनिकरण होनिता शुद्धिः। स्वभागहार-युतगुणर्यथोक्तवद्दिनादितेपद हृतशेषमन्दपः ।।।। वि. मा.-वत्सरनिकरे ( गतवर्षसमूहे ) अधिवोनिते (अधिमासहीनिते) द्विनिघ्ने (द्विगुरिणते) अवमनिकरण (क्षयदिनसमूहेन) युते (सहित) एतेन फलेन शुद्धि. हीनिता (रहिता) स्वभागहारयुतगुणैः पूर्ववद्दिनादिफलं तेषु अवहतशेष (सप्तभक्तावशिष्ट) अन्दपः (वर्षपति.) भवेदिति ॥८॥ अस्योपपत्ति. ३६०४गव-गतवर्ष सम्बन्धिसौदि, परगतवर्षसं अधिमादि-३० गवसंम +मो प्रतो गतवर्ष सचान्द्रदि गवससौदि+गवसममादि -३६० गव+३० गवस प्रमादि+प्रशे गवससावन-गतवस चन्द्रदि - गतवर्पसम्बन्धिक्षयाहा: सावयवाः -३६० गव+३० गवसप्रमा+अशे-(५ गव+क्षयदि+क्षयो) --३६० गव+३० गवसममा+अमे-५ गव-क्षदि-क्षशे प्रतः ७ मध्यमाधिकारः १७७ यथायोग्यं सप्ततष्टखण्डग्रहणेन गतवससा गवससा, =३ गव+२ गवसंग्रमा+अशे-५ गव-क्षदि--क्ष -३ गव+२ गवसंग्रमा+ (अशे-क्षशे)-५ गव -क्षदि ---३ गव+२ गवसंग्नमा+शुद्धि~-५ गव-क्षदि =शुद्धि-२ (गव-गवसंप्रमा)-क्षदि =शु- { २ (गव-गवसप्रमा)+क्षदि ? अयं सप्ततष्टः सन् रव्यादिगणनया वर्तमानवारबोधकोऽवो भवेदिति सुस्पष्टमेव । पर निरवयवशुद्धिः > २६ ईदृशी कदापि न स्यात् । गव-गामा क्षदि >२६ इति बहुधा सम्भाव्यते, अत: ऋणखण्डं प्रथम सप्ततष्टित कृत्वा शेष शुद्धेविंशोध्य पुनः सप्ततक्षण विधेयमिति ॥८॥ हि. भा.- गत वर्ष में अधिकमास को घटाकर द्विगुणित करना अवमदिन जोड देना तब जो फल हो उमको शुद्धि में घटा देना अपना भागहार जोड गुणक द्वारा पूर्ववत् दिनादि- फल जो हो उसमे सात से भाग देने में जो शेष रहे वह वर्षपति होता है ।। उपपत्ति ३६० x गवः गतवर्षससोरदि, पर गतवर्षसममादि-३० गवंसप्रमा+प्रशे इसलिए गवसर्गादि-गवस सौदि-+गवसममादि- -३६० गव+३० गवसप्रमादि+प्रशे प्रत. गवससावन = गवसचादि-गतवर्षसक्षयाहा सावयवाः =३६० गव+३० गवसप्रमा+अशे-(५ गव+क्षदि+क्षशे) -३६० गव+ ३० गवसममा+प्रो-५ गव-क्षदि-क्ष सात से भाग देने से १ गतवमसावन = गवमसावन-३ गव+२ गवसप्रमा+अरो-५ गव-क्षदि-क्षसे =३ गव+२ गवर्मग्रमा+ (अशे-क्षशे)-५ गव-क्षदि = ३ गव+२ गवसममा+मुद्धि-५ गवसदि -शुद्धि-२(गव-गवमप्रमा)-क्षदि =शुद्धि-{ २ (गव-गवमममा) + क्षादि } इसयो गान मे भाग देने से रव्यादि गणना अम से वर्तमान वारबोधक अव होता है। पर निरवयव सुद्धि >२६ ऐसो कदापि नही होती है । गव-गग्रमा+क्षदि > २६ यह बहुपा हो मरना है इसलिए ऋण सण्ड को पहले मात माग देरर जो शेष रहे उम का शुद्धि में पटापर फिर सान से भाग देना चाहिए । %3D १७८ वटेश्वर-सिद्धान्ते . इदानी चान्द्रवपंसम्बन्धेन वर्षपतिज्ञानार्थमतिदिशति । इत्यब्दपोऽयमभिहितोऽघुना विधोः समापतिमधुसितपूर्ववासरे । समागरणाद्दिननिकरं यथोक्तवत् प्रसाध्य चेह गतवत्सराधिपः । चि. भा.-- - इति (एव) अय (पूर्वोक्त.) अब्दपः (वर्षपतिः) अभिहितः (कथित ) . अधुना (इदानी) विधोः (चन्द्रस्य) मधुसितपूर्ववासरे (चैत्रशुक्लादि- दिने) समापति- (वर्षपति. कथ्यते इति शेपः । यथोक्तवत् (पूर्वकथितवत् ) समा- गरणात् (वर्षसमूहात्) दिननिकर (अहर्गण) प्रसाध्य (साधन कृत्वा) गतवत्सरा- धिप (गतवर्षपति ) बोध्य इति ॥६॥ हि भा इस तरह पूर्वोक्त वर्षपति कहा गया है । इस समय चन्द्र का चैत्रगुक्ल प्रतिरदादि मे वर्षपति कहते हैं । पूर्ववत् गतवर्ष से अहंगंण साधन कर गतवर्षपति ज्ञान करना चाहिये ॥ इदानी तदाह। वाऽवमद्विकहतेः फलं च यत्प्रोझच वर्षशरघाततोऽन्दपः । शुद्धिहीनदिवसेषु वाऽब्दपो होनरात्रटिकाब्दसंयुतः ॥१०॥ वि भा --- वा अवमद्विकहते फल यत् (द्विगुणितमवम यत्) वर्षशरघाततः (पञ्चगुणितगतवर्पत ) प्रोझय (शोधयित्वा) शुद्धिहीनदिवसेषु (शुद्धिरूपाव- मदिनेषु) प्रोग्झयाग्दपतिर्भवेत् । अथवा हीनरामघटिकान्दसयुतः (अवमघटीरूप- शुद्धिदिनवर्पयोग ) अब्दप. स्यात् । होनरावपटिकाशब्देन शुद्धिदिनान्युच्यन्ते । अनोपपति । कल्यादेरिष्ट सौरवर्षान्त सावनदिनानि = ३६५ गव+दिनादि एभ्योऽमान्त- व्यब्दान्त मध्ये यानि सावनानि शुद्धि मितानि तानि विशोध्य तदा चैत्रादी सावन दिनानि-३६५ गव+दिनादि-शुद्धि एतानि सप्तभिर्भक्तानि वर्तमानवारार्थ सैकानि तदा रवितो वार = गव+दिनानि-शुद्धि+१, कदाचिद्रूपयोगविनापि यारो जायते यदि शुद्धिः सपा भदत्तदैव दिनाब्दयुतो रूप योज्यमन्यथा (शेपरहितगुद्धौ) रूपयोजनस्यावश्यक्ता न भवेदिति ॥ १० ॥ हि.भा. - वा अवम और दो के घातफल जो हो उसको पञ्चगुणित गतवर्ष मे घटाकर या शुद्धि रहितदिनादि में या अवमघटीरूपशुद्धिदिनवर्ष जोडने में वर्षपति होते हैं ॥१०॥ उपपत्ति । पूर्वाध की उपपत्ति सरल ही है । बल्लादि से इष्टसौरवर्षान्न तक मावनादि ३६५ गव+दिनादि इसमे अमान्त और सौरवर्षान्त के मध्य मे जो सावन शुद्धि है उनको पटा देने से चत्रादि में मावन दिन होते हैं ३६५ गय+दिनादि-इमको सात में भाग देना और वर्तमान वार के लिए एक सहिन कला तय रवि से वार होते हैं गव+दिनादि-शु+१ वभी कभी बिना रूप जोड़ने से
मध्यमाधिकार
१७६
भी वार हो जाते हैं यदि शुद्धिस शेष (शेप सहित) हो तभी दिनादि और वप योग में एक
जोडना चाहिये अयथा नहीं ॥१०॥
इदानी चा द्रवपपतिज्ञानाथमाह ।
एवमर्कभगरणाब्द प्रेरितरैन्दवस्य करण प्रसाधनम् ।
होनाह नाडी वियुता विशुद्धया नव्य शशाङ्काब्दपतिस्तु सौर ॥११।।
स नाडियुक्तोऽथवारूपयुक्त शुद्धचा विहीनो विधुवर्षप स्यात् ।
विभा-एव (अनया वा रीत्या)अर्कभगणाब्दप्ररित (सूर्यभगणवर्पसञ्चालित )
करणे (क्रियाभि साधनैर्वा) ऐन्दवस्य (चान्द्रमस) प्रसाधन (वर्षपत्याद्यानयन)
भवेत् । हीनाहनाडी (क्षयघटी) विशुद्धया (पूर्वोक्तशुद्धिसज्ञकेन) वियुता (रहिता)
कार्या तदा नव्य (नवीन) शशाङ्काब्दपति (च द्रवर्षपति ) भवेत् । स सौर
(अब्द ) नाडियुक्त (दिनाद्येन युक्त) रूपयुक्त (एकसहित) शुद्धया विहीन
(शुद्धिरहित ) तदा विधुवर्षप (चन्द्रवर्षपति ) स्यादिति ।। ११३ ॥
अगोपपत्ति ।
शुद्धिहीनदिवसेषु वाव्दप इत्याद्य पत्तिवदस्याप्युपपत्तिोंध्येति ॥११॥
हि भा--इस तरह सूयभगण और वप से प्ररित साधनो द्वारा च द्रवपपति प्रादि का
साधन होता है । क्षयघटी म पूवकथित शुद्धि को घटाने से चद्र वपपति होते है । गतसौरवप
मे दिनादि जोड देना एक जोडकर शुद्धि को घटाने से चन्द्र वपपति होते हैं ॥११॥
उपपत्ति ।
शुद्धिहीनदिवसेषु वाब्दप इत्यादि की उपपत्ति की तरह इसकी भी उपपत्ति समझनी
चाहिय ॥११॥
इदानीमुपयुक्तान् ग्रह वकानाह ।
प्राग्वदविव सिद्धि खेचराणा सूर्याहतशुद्धिर्भागादिक्शशी वा ॥१२॥
विभा-प्राग्वत् (पूर्ववत्) रविवर्षे (सौरवर्षे) खेचराणा (ग्रहाणा)
सिद्धि , वा मूर्याहतशुद्धि भागादिशशी (द्वादशगुरिणतगुद्धि सौरवादी) चन्द्रो
भवेदथाद् भागाद्यश्चन्द्रस्य ध्रुवको भवेत् ॥१२॥
सर्वप्रथम सूर्यध्रुवकक्थनमवाचितमस्ति पर मोरवादी ग्वेनगा-
भावान पथ्यते ॥१२॥
अनोपपत्ति ।
रविचन्द्रयोदशाशान्तरणका निधिर्भवति तैन तिथयो द्वादमगुणितास्तदा
रविचन्द्रयोरन्त रागा भवेयुस्ते सूर्य योज्याम्नदा चन्द्र स्यात् । मौग्वादी
भुक्तास्तिथय शुद्धिमिता अता द्वादशगुग्गामुद्धिरन्नरागा, पर सौरवपदिौ ग्वश्चक्र-
पूतित्वाद्राश्यादिमूर्यस्य शून्यतुल्य वन मूर्यध्रुववाभावादविचन्द्रालगमा पर
चन्द्रस्य भागादिका ध्रुवर इति ॥१॥
१८० वटेश्वर सिद्धान्ते हि मा पूर्ववत् सौरवर्षों से ग्रहो की सिद्धि होती है या बारह मे मुरिगत शुद्धि प्रशादिचन्द्र होते हैं अर्थात् प्रशादि चन्द्र ध्र वक होते हैं ।। उपपत्ति यहा सबसे पहले सूर्य के प्रवर कहने चाहिये, पर मूर्य के प्रवक को नही कहते हैं इसका कारण यह है कि मौरवादि मे रवि के ध्रुवक के प्रभाव होने से नहीं कहा गया, रवि और चन्द्र के बारह प्रश अन्तर होने से एक तियि होती है। तिथि को बारह से गुणने से रवि और चन्द्र के अन्तराश होते हैं उसको रवि मे जोडने से चन्द्र होते हैं । सौर वर्षादि में भुक्ततिथि शुद्धि के बराबर है इसलिये शुद्धि को वारह से गुणने से रवि और चन्द्र के अन्तराश हुए। लेकिन सौरवर्षादि मे रवि के भगण पूरा होने के कारण राश्यादि रवि के शून्य होने से सूर्य के ध्रुव का भाव हुमा प्रत रवि और चन्द्र के अन्तराश ही भागादिक' चन्द्र धुवक हुए ॥१२॥ प्रथ सौरवदो ग्रहादिघ्र वकानाह। चन्द्रोच्चपातावथ वर्ष राशि व्योमाश्रमोरजनोकरश्च । शीताशुवेदैः कुभुज कुचन्द्रः पयोधिराम खखपक्षभागः ॥१३॥ भौम कुनन्देन्दुभिरिन्दुजस्य शीघ्र तथा वेदशरैः सुरेज्य । व्योमाग्निमिस्तत्वयमै सितस्य शीघ्र शनि नुभिरब्दराशिम् ॥१४॥ वि.भा -स्पष्टार्था । ग्रहादीनामेकवर्पसम्बन्धीया भागादि का ध्रुवका पठिता इति । ॥१३-१४।। हि भा -इनके अर्थ स्पष्ट है। ग्रहो के तथा चन्द्रपात और चन्द्रमन्दोच्च के एक सौरवर्ष के मादि मे भागात्मक ध्रुवक पठित हैं । चन्द्रोच्च का ४० 1 चन्द्रपात का १६, एव चन्द्रोच्च का ४१, पात का २१ । चन्द्रोच्च का ११, चन्द्रगत ३४, चन्द्रोच्च का २०० । चन्द्रपात=0 | मङ्गल के ११६, बुधशीघोच्च के ५४, गुरु के ३० शुक्रशीघोच्च का २२५ । शनि के १२ ॥ १३-१४ ॥ ग्रह चन्द्रपातमन्दोच्ची के एक वर्ष सम्बन्धी ध्रुवक पठित किये गये हैं ॥१३-१४॥ पूर्व चन्द्रानयनमुक्तमिदानी कुजादीना तदानयनमा । तत्रादौ कुजानयनम् सप्तव्योमाक्षिवेदाग्निहतात्सूत्फलं क्षिपेत् । तच्छून्यखखखाप्टाभ्रभूमि जो रवेदं ले ॥१५॥ विभा-सप्तव्योमाक्षिवेदाग्नि (३४२०७ एते ) हतात् (गुरिणतात्) सूर्यात्, शून्यस-खखाटाघ्रभूभि (१०८००००) भजनाद्यत्फल तद्रवेदले (सूर्या) क्षिपेत्तदा भूज (कुजोऽर्थात्कुजो भवेत्) ।। १५ ।। अत्रोपपत्ति कुजस्य कर्पभवान् ध्रुवकान् गतवर्पण सगुणितान् कृत्वा गुणनभजना- मध्यमाधिकारः १८१ दिना तदीयमानमुपपद्यते सर्वेषा ग्रहादीनामेकवर्षभवध्रुवक गतवर्षे सगुसय गुणनभजनादिना ग्रहाद्या उपपद्यन्ते ।। १५ ।। हि भा-भूर्य को ३४२०७ इतने से गुणकर १०१०००० इनसे भाग देने से जो फल हो उसको रवि के ग्राधे में जोड़ने से चूज के मान होते हैं । कुज के एक वर्षसम्बन्धी परित ध्रुवक को गतवर्ष से गुणकर गुणन-भजनादि से उनके ध्रुवा' उपपन्न होते हैं। सब ग्रहो के लिये यही क्रम है हर एक ग्रह के पठित ध्रुवक को गतवर्ष से गुणकर गुणन भजनादि से उनके मान उपपन्न होते हैं ॥ १५ ॥ इदानी बुधशीघ्रोच्चानयनमाह । सुरपश्च नखहतायत्खखान पश्चाग्निशशिभिराप्त यत् । क्षेप्य वेदहतेतद् बुधशो वा भवत्येवम् ।। १६ ।। वि. भागतवत् सुरपश्व नखहतात् (२०५३३ एतैर्गुणितात) खखाभ्र- पश्चाग्निराशिभि (१३५००० एतैर्भजनात्) यदाप्त (यल्लब्ध तद्वेदहते) । (चतुर्गु- गिते) गतवर्षे क्षेप्य तदा बुधशोध (बुधशीघ्रोच्च ) भवति ।। उपपत्त्यर्थं कुजानयने प्रक्रिया प्रतिपादितवेति ।। १६ ।। हिमा गतवर्ष को २०५३३ इनसे गुणकर १३५००० इनसे भाग देकर जो फल हो उसको चार से गुणित गतवर्ष म जोडने से बुध शीघ्रोच्च होते हैं ॥ १६ ॥ इदानी शुक्रशीघ्रोच्चानयनमाह । शिवतत्त्वगुणहतोनादयुतद्वयभाजितादाप्त यत् । तभृगुपुत्रचलोच्च भवतोह मुनीरित वापि ॥ १७ ॥ विमा गतवर्षात्-शिवतत्त्वगुणहतोनादयुतद्वयभाजितात्-प्राप्त भृगु- पुनचलोच्च (शुनशीधकेन्द्र) भवति, इति मुनोरित (मुनिकथित) अस्तीति । गवX ३२५११- २०००० हि भागतवर्ष को ३२५११ इनसे गुणवर २०००० इनसे भाग लेकर जो हो गव ३२५११ उसको उगम घटाने से बुध शोमोच्च होता है गवX ३२५११-. गुरुगीघ्रोच्च। गव ४३२५११=शुक्रशीघ्रोच्चम् । - २०००० इदानी पानेरानयनमाह । रविषान्य योज्यं लब्ध नगवंकताडिताद्वानो। सचतुष्टयाप्टशशिभिर्या रविमनुर्भवत्येवम् ॥१८॥ वि.मा-रविसाग्न्य (रवेस्विरादा) नगसंक्ताडिताद्वानो (१०७ एतद्- १०७ रवि + १०७ रवि । + ८११७ रवि 8 १८२ वटेश्वर सिद्धान्ते गुणितसूर्यात) खचतुष्टयाप्टशशिभिर्भक्ताद्यपलब्ध (१८०००० एभिभक्ताद् यरफल) तर्योज्य तदा रविसूनु (शनैश्चर ) भवेदिति । शनि ॥ १८॥ ३० १८०००० हि भा -रवि के तीसर्वे प्रश म १०७ गुरिएत रवि म १८०००० इतने स भाग देकर जो पज हो उसको जोडने स शनि होते हैं । शनि ॥ १८ ॥ १८०००० इदानी चद्रमन्दोच्चानयनमाह । रविनवभागे योज्य नगेकचन्द्राप्टताडिता, खचतुष्टयवेदेन्द्र हिंमगच वा भवत्येवम् ॥१६॥ नि मा-रविनवभागे (रविनवागे) नगेकचन्द्रास्ताडिताद्धानो (८११७ एतद्गुणितसूर्यात्) खचतुष्टयवेदेन्द्र (१४४०००० एभि ) एभिर्भाजिता यल्लब्ध तद्योज्य तदा हिमगूच (चन्द्रमन्दोच्च ) भवेत् ।। रवि चन्द्रमन्दोच्चम् ।। १६ ॥ १४४०००० हिमा -रवि के नवम भरा म ८७१७ एतद्गुणित रवि को १४४०००० इनसे भाग देने से जो पल हो उसको जोड न म चद्रमन्दोच्च होता है ।। १६ ।। प्रकारान्तरेण तदानयनमाह । सवितृनखाशे योज्य नगकचन्द्राष्टताडिताद् भानो । खचतुष्टयवेदेन्द्र हिमगूच वा भवत्येवम् ॥ २० ॥ वि भा-सवितृनखारो (सूर्यविंशत्यशे) नगैकचन्द्राष्टताडिताद् भानो (८११७ एतद्गुणितसूर्यात) चतुष्टयवेदेन्द्र । (१४४००००) भक्ताद्यन्लव्य तद्योज्य तदा चन्द्रमदोच्च भवेत् ॥ २० ॥ रवि + चन्द्रमन्दोच्चम्। २० १४४०००० हि भा-रवि के बीसवें प्रा मे ८११७ एतद्गुरिणत रवि को १४४०००० इनसे भाग देकर जो फल हो उसको जोडने से चन्द्रमन्दोच्च होना है ।। २० ।। रवि रवि ८११७ चद्रमन्दोच्च ॥ २० ॥ १४४०००० इदानी चद्रपातानयनमाह प्रयुतरसकभुजे शशधरपातोऽयवा लब्धम् । वि भा-अयुतरसकभुज (२१६००००) एतर्भक्ताद्वात्लब्ध शशधरपात (चन्द्रपात ) स्यादिति । ८११७ रवि %3D २० मध्यमाधिकार १८३ एतेपामुपपत्तयो मगलानयनलिखितपद्धत्या कार्या । हि मा-२१६०००० इतने से गतवर्ष को भाग देने से चन्द्रपात प्रमाण होता है ।। इन सव की उपपत्तिया कुजानयन मे लिखी हुई रीति से करनी चाहिये । इदानी मध्यमरविमेषादिक्स्य सावनाहगणस्यानयनमाह । चंत्रादिस्तिथिनिकर शुद्धिविहीनः पृथागुणो रुद्र. ॥२१॥ अवमघटीभ्यः षष्ट्या लब्धयुतस्त्रिखनगहताभ्य । निखनगहतावमोनो युगरणोऽब्दावमघटीसमेत. स्यात् ॥२२॥ वि भा-चैत्रादिस्तिथिनिकर (चैनशुक्लप्रतिपदादित इष्टदिनपर्यन्त तिथिसमूह ) शुद्धिविहीन (पूर्वोक्तशुद्धिदिनादिना रहित ) पृथक् (स्थानद्वये स्थापनीय ) एकन रुद्रं (एकादशभि) गुण (गुणित ) त्रिखनगहताभ्योऽवम- “घटीभ्य (७०३ गुणितावमघटीभ्य ) पप्टया लब्धयुत (पष्टचा भागे हृते यत्फल तेन सहित) त्रिखनगहतावमोन (त्रिखनग ७०३ हृताप्त रवमदिनादिघटिकान्त रहित उपरिस्थापितो राशि) अब्दावमघटीसमेत (वन्तिक्षयघटीयुक्त ) तदा शुगरण (अहर्गरण) भवेदिति ।।२१-२२।। अत्रोपपत्ति चैत्र शुक्लाद्यास्तिथयो यदि शुद्धि सावनदिनविंशोध्यन्ते तदा चैनाद्यवमशेष रव्युदयामावास्यान्तयोरन्तरे ते द्व' अप्येकनावमाशत्व भजत । अवमाशा अधिका शुद्धयूनास्तिथिपु द्रप्टच्या । यतश्च नादितिथिभ्यो सौरवन्तिचैत्रशुक्लायोरन्तर चान्द्र शुद्ध भवति केवल सर्व समाशा अद्यापि न शुद्धयन्ते । ततोऽनुपातो यदि त्रिव्योमनग (७०३) तुल्यैश्वान्द्रदिनरेकादशावमानि लभ्यन्ते तदा सौरवर्षान्ताद्गत तिथिभि किमित्यनुपातेन सौरवन्तेि यदवमशेष समागत तत्त व योज्यते । यत शुद्धिशोधनावसरे न शोधित तद्योज्यते तदेव शुध्यति । चान्द्रदिनान्युपरि शुद्धानि भवन्ति । अतोऽवमाशा ७०३ गुणिता सवर्णीभवन्ति, एव यदाप्तमेकादश गुणा तिथिषु यावदवमाशास्तेष्वेव तिथिप्वधिकास्तिष्ठन्ति । ते च तिथिभि सह एकादश- गुरखा जाता । एव यत्फल समागत तदेकादशगुणिततिथिपु प्रयोज्यावम भवति । तत ७०३ विभज्य ऊनरावा लभ्यन्ते शेपमिप्टदिने सावन लब्धोनरामाश्च सौर- वन्तितिथिगणाद्विशोध्याहर्गणो भवतीति ॥२१-२२॥ हि भा-चैत्र शुक्ल प्रतिपदादि से इष्टदिन पर्यन्त जो तिथि ममूह है उसम पूर्वोक्न शुद्धि दिन को घटाकर दो जगहों में रखना, एक स्थान म ग्यारह स गुण देना, ७०३ मुणित प्रवमघटी में साठ से भाग लेने से जो लब्धि हो उमे जोड देना, ७०३ भक्त अवमानकरव उपरि स्थापित राशि म घटा देना अपमघटी जोड देना तब ग्रहाण होता है ॥२१-२२।। उपपत्ति पत्रादि ति मे शुद्धि सावन दिन वा घटा देते हैं तो मूर्योदयामान्त काल के अन्तर चंत्रादि भवमरोप रहता है शुद्धि रहित तिथि प्रवमास होता है । चंप्रमालादि तिथि से सोर.
१८४ वटेश्वर-सिद्धान्ते वर्षान्त और चैत्रशुक्लादि का अन्तर शुद्धि चान्द्रतिथि है । अव अनुपात करते है, यदि ७०३ चा दिनों में ११ ग्यारह अवम पाते हैं तो सौरवर्षान्त से गततिथि मे क्या इम अनुपात से वर्षान्त में जोड अवमशेप आता है उसको वहीं पर जोड़ते हैं। चान्द्रदिन शुद्धि हैं इसलिए अवमाग को ७०३ गुणने मे मवर्णन हो जाता हैं । इस तरह जो पत्र प्राता है उसको ग्यारह गुणित तिथि म जोड देने मे अवम होता है। बाद में ७०३ से भाग देने से जो क्षय घटी शेष आती है उसको सौरवर्षान्तकालिक तिथिगण (चान्द्राहाण) म घटाने से सावनाहर्गण होता है ॥२१-२२॥ प्रकारान्तरणाहरणानयनम् । मध्वाद्यास्तिथयो वा सावननाड्योऽय शुद्ध, यूना. । पृथगजनिम्नास्तिथिभिहीनघटीभिस्निखाद्रि गुरिणताभि ॥२३॥ लब्धपुतास्त्रिखमुनिभिर्लयावमवजितो घुगण । वि भा –वा मध्वाद्यास्तिथय (चैत्रशुक्ल प्रतिपदादितस्तिथिनिकर ) सावननाड्य शुद्धयूना (शुद्धिदिनरहिता) पृथक् (स्थानद्वये स्थाप्या) अजनिघ्ना (एकादश गुणिता) त्रिखाद्विगुणिताभि (७०३ एतैर्गुणिताभि ) तिथिभित्न' घटीभि (क्षयशेपतिथिघटीभि) लब्धयुता ( एकादशगुरिणत शुद्धिरहिततिथी लब्धफल सहिता) त्रिखमुनिभिलब्धावमवर्जित (७०३ भजनेन यल्लब्धमवम तेन शुद्धिरहिततिथिमिकरो रहित ) तदा द्युगण (अहर्गण.) भवेदिति ॥२३॥ अनोपपत्ति लघ्वहगणेऽवमानयनाथं निखनाचान्द्रदिन रेकादशमितान्यवमानि स्वल्पा- न्तरात्प्रकल्प्याऽनुपातो यदि ७०३ चान्द्रदिनरेकादश तुल्यान्यवमानि लभ्यन्ते तदा शुद्धयू नतिथिभि किमित्यनुपातेन यत्फल तत्र वर्षान्तक्षयरोपयोजनेनावमानि भवन्ति ११ (चैति---शुद्धि) + क्षयरो -अवमानि ७०३ - ११ (चंति-शुद्धि) .. ७०३ क्षयशे ११ (चंति-शु) ७०३ क्षयरो ७०३ ७०३ ७०३ एतान्येवावमानि शुद्धिरहिततिथौ रहितानितदाऽर्गणो भवेदिति ।। हि मात्रशुक्लादि तिथियो में शुद्धि घटाकर जो हो उनको दो स्थानो म स्थापन करना, एक स्थान म ग्यारह मे गुण देना ७०३ गुणित मवमशेप घटी जोड कर ७०३ इमसे भाग देने से जो पर अवम हो उसको द्वितीय स्थान म रमे हुए शुद्धि रहित तिथि म घटाने से मगरण होता है ॥२३॥ उपपत्ति । सम्पहर्गण में अवमानयन के लिये ७०३ चान्द्रदिनो से ग्यारह प्रवम को स्वल्पान्तर से मानवर अनुगत परते हैं । यदि ७०३ चान्द्रदिनो मे ग्यारह अवम पाते हैं तो सुद्धिरहित तिथि मे धया इस मनुपात से जो पा भावेगा उसमे क्षय शेप जोडने से प्रवम प्रमाण होंगे। पृथक् स्थापित ७०३ ७०३ मध्यमाधिकारः १८५ ११ (चत-गु)+मशे-अवम- ११ (चैति-शु+७०३ क्षशे) इसको द्वितीय स्यान में रखे हुए शुद्धिरहित तिथि में घटाने से लध्वहर्गरण प्रमाण होता है ॥ २३ ॥ पुनः प्रकारान्तरेणाहगंगानयनमाह । शुद्ध मूना वा तिथयश्च त्राद्यास्त्रिरपस्त्रिखस्वरभक्ताः ॥ २४ ।। मध्यफलेषु च युक्तास्त्रिख सप्तहृतावमघटीभ्यः । हीनाभ्योऽष्टकृति हृदवमोनोऽन्योऽवमनाडिकायुतो धुगरण. ॥ २५॥ वि.मा.-वा शुद्धयूनाश्च प्राद्यास्तिथयः (शुद्धिरहित चैत्रादितियिनिकरः)त्रिः (स्थानत्रये स्थाप्याः) एकत्र त्रिखस्वरैः (७०३ एभिः) भक्ताः (विभाजिता) मध्यफ- लेषु (द्वितीयस्थानस्थापित पूर्वोक्त पु) योज्याः, त्रिखसप्तहृतावमघटीभ्यो होनाभ्यः (७०३ एतद्विभक्तावमतिथिघटीभ्यो रहिताभ्यः) अष्टकृतिहदवमोनः (अष्टवर्ग ६४ भजनेन यदाममवमं तेन रहितः) अन्यः (तृतीयस्थानस्थापितः पूर्वोक्तः) अवम- नाडिकायुक्तस्तदाधुगणः (अहर्गणो) भवेत् ।। २४-२५॥ अत्रोपपत्तिः। वर्षान्तादिष्टदिनपर्यन्तं दिनसमूहो लघ्वहर्गणोऽर्थाद् वन्तिकालिकेष्टकालि- कयोरहर्गणयोरन्तर लध्वहर्गणः । एतस्यैवानयनं क्रियते । वर्षान्तकालिक-सावनाहर्गण:-गतचा+अधिशे-क्षयदि+दिघ.. (१) अन गतचा= कल्पादितो युगादितो वा चैत्रामान्त यावच्चान्द्रदिनानि । दिघ= सूर्योदयतो वर्षान्तं यावद्दिनादिघट्यः । तथेटाहर्गण:- गतचां+ चैति-क्ष,दि (२) (१) (२) अनयोरन्तरेण लघ्वहर्गणः-चैति--शुद्धि+क्षदि-क्ष,दि =चैति-शु-(क्ष,दि-क्षदि)=चति-शु-क्षयदिनान्तर...(क) अथाऽधुना क्षयदिनान्तरानयनार्थमनुपातः क्रियते कल्पावम इचां '=इएचान्द्रसम्बन्धीयावमानि । कचा इचां-वर्षान्तादिष्टतिथ्यन्त यावत् । एतानि वन्तिक्षयघटीभिरन्तरितानि (वन्तेि दायदिनपूरभावात) अतएव क्षयघटी सम्बन्धिदिनः सहितानि तान्यवमानि वास्तवमेवावमदिनपूर्ति- स्थानात् (क) स्थितं सावनात्मकमवमदिनप्रमाणं भवेत् । कमव-इचा क्षयदिनान्तर कप्रव ४ इचोx६४ कचा कचा४६४ फसव४६४५ इचां, क्षघX६३. दाप कचा ६४ ६०४६४ ६०४६४ क्षध टाघX६४ - + १८६ वटेश्वर-सिद्धान्ते - (१-+-) इन चैति- शु+क्षघ- क्षघ क्षघX२१ + कचा/ ६४ ६०४६४ २०४६४ क्षष क्षघX२१ ७०३ ६४ ६०४६४ २०४६४ क्षघ इचा इचा इचां+ + +क्षष चंति-गु+ -+क्षघ ७०३ ६० ७०३ ६४ इचा क्षघ क्षघ चैति-शु+ शिष+ ७०३ ७०३४६० ७०३४६० ६४ चैति-शु. क्षय चैति-शु+ +क्षघ- ७०३ ७०३४६० ६४ चैति-शु-(क्षयदिनान्तर) (क) एतत्स्वरपमुत्थापनेन क्षय ७०३ ७०३४६० = लघ्वहरण. अत्र यास्त्रुटयस्ता उपपत्तिदर्शनेनैव स्पष्टा ::उपपन्नम् ।। २४ २५॥ हि भा ---त्रादि लिपि मे शुद्धि घटाकर जो हो उसको तीन स्थान में रखना, एक स्थान में ७०३ इतने से भाग देकर जो फल हो उसको द्वितीय स्थान मे जोड देना अवमपटी जोडना, प्रथमघटोको ७०३ इतने से भाग देकर उसमे घटा देना, चौंसठ से भाग देकर जो पल हो उसको तृतीय स्थान में स्थापित पूर्वोक्त (शुद्धिरहित चैत्रादितिथि) में घटाने से लघ्व- हर्गम होता है। उपपत्ति । वर्षान्त से इष्टदिनपर्यन्त दिन समूह को लघ्वहगंग पहने हैं अर्थात् वर्षान्तकालिक महगंण इष्टवालिक महर्गण के अन्तर तध्वहगंण है । इमका पानयन करते हैं। वर्षान्तकालिक सावनाहगंणगतचा+अधिशे-सयदि दिघ । (१) यहा गनचा-वल्यादि या युगादि से चंत्रामान्त तक चान्द्राहगण दिष- मूर्योदय से वन्ति तक दिनादि घटी मोर इप्टाहगए-गवचा+ति---श, दि. (१) (२) इन दोनो के मन्तर करने से नम्वर्गपति-शुद्धि+पादि । धादि ति-शु- मध्यमाधिकार १८७ =चैति-शु-(स, दिक्षदि)=चैति-शु-भयदिनान्तर (क) क्षयदिनान्तरानयन के लिये अनुपात करते हैं कल्पावमXइचा -इचा स अवम । यहा इचा=वर्षान्त से इष्टतिथ्यत तक यह वर्षान्त क्षयघटी करके अन्तरित है (वर्षान्त मे क्षयदिन पूर्ति के प्रभाव से) इसलिये दिनीकृत क्षयघटी करके उन अवम को जोडने से वास्तव ही अवमदिन पूर्तिस्थल से (क) स्थित साव- नात्मक अवमदिन प्रमाण होते हैं। कावXइचा क्षध कमवइचाX६४ =क्षयदिनान्तर- + क्षघX६४ 1 कचा ६० कचा४६४ कचा कमवX६४ कचा x इचा क्षघX६३ -+- ६०X६४ + क्षघ ६०४६४ १ शे कचा + इचाक्षध क्षघX२१ + ६०४६४ २०४६४ क्षष क्षप-२१ + ६०४६४ २०४६४ = (१+ . ) ना + इचा इचा+ -+ ७०३ + क्षप ६० क्षघ २१ चति-शु + इचा + ७०३ क्षपx२१ २० २० ६४ क्षघ पति-शु+ +क्षध+ क्षष ६०-७०३ ७०३ ६०४७०३ (चति-पु)+क्षप- (चनि-शु)+ ७०३ ६.४७०३ -क्षयदिनान्तर ६४ (चति---शु+क्षय- =लध्वहगण प्रत (क) इसमे उत्थापन देने से घ (चंति~-शु)+ १.४७०३ (ति-शु}~- ६४ इसमे क्या क्या त्रुटि हैं उपपत्ति देखने ही से स्पष्ट है। इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुआ ॥ २४-२५ ॥ पुन प्रकारान्तरेण लघ्वहर्गणानयनमाह । अथवा तिथयश्चत्राद्या शुद्ध यूनितास्त्रिरथ ।
१८८ बटेश्वर-सिद्धान्ते निखनग हृतफलसहितो मध्यः कुमुजहतावमघटोम्यः ॥ २६॥ खभुनीप्तयुगन्धिरसैलब्धावमजितो धंगण. । निभा-अथवा चैत्रायास्तिथय (शुक्लादि तिथिनिवरा) शुद्ध यूनिता (शुद्धिरहिता.) त्रि (स्थानत्रयस्थाप्या) त्रिसनग हतफलसहितो मध्य (एकत्र एभिभंजनेन यत्फल तेन सहितो द्वितीयस्थानस्थापित) कुभुजहतावमघटीभ्य: (२१ गुणितावमघटोभ्य ) समुजाप्तयुत् (विशत्या भजनेन यत्पल तेन युक्) अधिर- संलंब्धावमजित. (६४ एभिभंजनेन यल्लब्धमवम तेन तृतीयस्थानस्थापितो रहित ) तदा शुगए. (ग्रगण) भवेत् ।। २६ ।। मत्रोपपत्ति अथ पूर्वश्लोकोपपत्तो क्षयदिनान्तरम् = क्षपX२१ + ६०४६४ २०४६४ इचा+ सप २१ + ७०३ ६०४६४ २०६४ इचो इयां दाघX२१ (चंति-शु)+ हाथ X२१ क्षय १+ ७०३ -) ६४ चा क्षष + अध इचान + ७०३ २० ७०३ २० + इचा (चंति-भु)+ ७०३ (ति-- ६४ क्षष २१.. २० %3D प्वगंग ति--- দাবি इचा इति तुल्य यल्पितमाचारोति पूटि ! ७०३ ७०३ थप ५२१ एतस्य नाम भास्वरेण क्षेपदिन पथ्यते इति । २० एनायनाचार्योत्त मुपपनम् ॥ २६ ॥ हिमा -पपया मंत्रादितिपि मे पुनिपटा पर जोहो उगोतीन स्थान मे स्थापित परना, सम्मान में ७.३ मे मार देकर जोपा हो उमयो हिनीय पानमे जोर देना। अवमपरी पो २१मो गुगत पर बोम में भाग देकर जो पन हो उगे उम म जोडना *ग में भाग देवर को सवम हो उमरी कृतीय स्थान म स्थापित पत में घटाने से पहाए होता है। বলি पही मोर को मेदिनानर लाया गया है । (+) + :-दिनार .x. एप मध्यमाधिकार १८९- इचा+ इचा क्षघ =इचा+ + + क्षघ २१ ७०३४६४ ६०४६४ २०४६४ इचा क्षघ क्षाX२१ + ७०३ ६० २० क्षयदिन ६४ + %3D क्षष अत (क) इसमे उत्यापन देने से लघ्वहगण- इचा (इचा+ (ति--)- +क्षपx२१, क्षघX२६ २० (चंति-शु}+ इचा ७०३ + क्षघ २१ २० = (ति-शु}-- लध्वहगरण चति-शु मानते हैं इसलिए यह प्रानयन भी यहा पाचाय ७०३ ७०३ नहीं है। इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुआ ॥२६॥ पुन प्रकारान्तरेणाहगणानयनम् । शुद्ध, यूनस्तिािनकरश्चनादद्विष्ठो दिनाहतायुक्त ॥२७॥ विश्वक्षणहतावमघटिकात खभुजलब्ध्या । गोविरसहृदवमोनो दिननिकरोऽवमघटीसमेतो वा ॥२८॥ रि भा --चैनात्तियिनिकर (चैत्रशुक्लादितिथिसमूह ) शुद्धचू न (शुद्धि रहित ) द्विष्ठ (स्थानद्वये स्थाप्य ) अवमघटीसमेत (अवमघटया युक्त ) दिनाह तात् (सप्तगुरिणतात्), विश्वक्षणहतावमघटिकात (२१३ एतद्गुणितावमघटीत ) खभुजलब्च्या (विंशत्या भजनेन या लब्धिस्तया) युक्त (सहित ) गोनिरसहृदबमोन (६३६ एभिर्भजनेन यल्लब्धमवम तेन रहित पृथक् स्थापित पूर्वोक्त) तदादिननि कर (अहर्गण) भवेदिति ॥२७ २८॥ अस्योपपत्ति पूर्वश्लोकोपपतिपर्यालोचनया स्फुटेति । हि भा-चैत्रादि से जो तिथियमूह है उसमे शुद्धि को घटा कर दो स्थानोम रखना, एक स्थान मे उसमे अवमघटी जोड देना अवमघटी को सात से गुण कर वीस से भाग देकर उसमे जोडना तथा २१३ इससे गुणित अवमघटी को चीस से भाग देकर उसमे जोड देना ६३६ से भाग देकर जो अवम हो उसको पृथक स्थापित पूर्वोक्त (शुद्धिरहित चैत्रादितिथि) मे घटाने से अहगरण होता है ।। इसकी उपपत्ति पूवश्लोको की उपपत्तियो से स्पष्ट है ।।२७ २८) - १६० वटेश्व-सिद्धान्ते प्रकारान्तरेण लघ्वहाणानपनमा । वाऽवमघटिकायुक्तस्तिथिनिकर शुद्धिहीनोऽध । दिग्नाश्वमघटिकाम्य खरसाप्तयुतोऽभुजरसहताम्य ॥२६॥ नवगुणरस विभवत फलावमोनो नवेद्य गए । विमा वा तिथिनिकर (चत्रादितिथिसमूह ) शुद्धिहीन (शुद्धिरहित ) मध (पृथक स्याप्य ) अवमघटिकायुक्त , दिग्नाऽवमघटिकाभ्य (दगगुणिताश्वम- घटीभ्य ) तथा अङ्कमुजरसहताभ्योऽवमघटिकाभ्य (६२६ गुणितावमघटिकाभ्य) खरसाप्तयुत (पष्टया भजनेन यल्लन्ध तेन युत ) नवगुणरसैविभक्त (६३६ एभिभक्त) फलावमोन (लब्धावमेन पृथक् स्थापितो रहित ) तदा द्युगण (अर्गण) भवेदिति ॥ अस्याप्युपपत्ति पूर्व वदेव जे येति । हि भा-चत्रादितिथि म गुद्धि वो घटाकर दो जगह रखना, एक जगह में अवमपटो जोडना । दगगुणित भवमघटी मे तया ६२६ गुणित प्रवमघटी म साठ से भाग देकर जो फल हो उसे उसमे जोड देना ६३६ इतने से भाग देने से वो लन्ध अवम हो उसको पूर्वोक्त पृथर स्थापित (शुद्धिरहिततिथि) म घटाने से महगण होता है । इसकी भी उपपत्ति पूर्ववत् समझनी चाहिये ॥२६॥ प्रथ रविमासान्तेऽधिमासानयनम् । विश्वाग्नि नन्दाष्टकुभिमूच्र्छनाभ्राद्भुखातिमि ॥३०॥ रविमासा हता भक्ता खखाभ्रद्वित्रिसागर । दिनावमानि तद्योग खाग्निभवतोऽधिमासका ॥३१॥ मोष दिनादिशुद्धि विकल दिनशेषत । दिग्घ्नमासस्प योगात्स्यात्स्फुटश्चाधिकमासक ॥३२।। वि भा-विश्वाग्निन्दाष्टवुभि (१८६३१३) मूछनाभ्रासाक्षिभि (२०६०२१) रविमासा (इष्टसौरमासा ) हता (गुणिता) खखाभ्रद्वित्रिसागर १४३२७००) भत्ता (भाजिता ) दिनावमानि स्यु (एकत्र दिनाद्य परत्रावमाद्यम्) तद्योग (तयोदिनादिक्षयायोर्योग ) खाग्निभक्त ( सिद्भक्त ) तदाऽधिमासा स्यु दिग्भमास्ययोगान् (दशगुणितसौरमासयोजना) स्फुट (सूक्ष्म ) अधिमासको भवेत् । शेष दिनादिशुद्धि स्यात् । प्रमोपपत्ति । कलियुग दिनाथम् = १८९३१३। अवमाद्यम् = २०६०२१ तदाऽनुपातासौर- मान्तकालिक दिनाद्यमवमाद्य चानेतय्यम् । यदि कलिवर्षे पूर्ववपित दिनाद्यमवमाद्य च लभ्यते तदा रविमास विमित्यनुपातेन रविमासान्तिक दिनाद्यमवमाय भवेत् । प्रय सोरवर्षेरणानुपात उचित सौरमासान्नहि। ततो दिनादिक्षयाहादिग्नान्दयोग" मध्यमाधिकारः इत्यादिवत्सौरमाससम्बन्धेन गताधिमासा. सौरमासान्तिका समागमिष्यन्तीति ॥ हि.भा १-८६३१३, २०६०२१ इनको सौरमास से गुणकर ४३२००० इतने से भाग देने से दिनादि और अवमादि होते हैं । दोनो के योग मे तीस से भाग देने से अधिमास होता है । दशगुरिणतमास जोडने से स्पुट अधिमास होता है । शेप दिनादि शुद्धि होती है ॥३०-३२॥ उपपति कलियुग मे दिनादि-१८६३१३ । यवमादि-२०६०२१ तब अनुपात से इष्ट सौरमासान्तकालिक दिनादि और अवमादि लानी चाहिये । यदि कलिवर्ष मे उपरिलिखित दिनादि और अवमादि पाते हैं तो इष्ट सौरमास मे क्या इस अनुपात से सौरमासान्तकालिक दिनादि और अवमादि का प्रमाण प्राजायगा । यहा सौरवर्ष पर से अनुपात करना उचित है । परन्तु सौरवर्ष से अनुपात करने से सौरवन्तिकालिक होगा तब दिनादि और अवमादि से "दिनादि क्षयाहादि दिग्ध्नाब्दयोग" इत्यादि के तरह इष्टसौरमास सम्बन्ध से सौरमासान्त कालिक अधिमास होता है ॥३०-३२॥ इदानी लध्वर्गणानयनमाह । शुद्ध यूना दिवसा मासाद्गताः शिवहताः पृथक् । अवमविकलाद्विगोरसनिधनात्स्वच्छेदसंयुतात् ॥३३॥ निखनगहतात्फलोनाद्ध गरणे मासाधिपस्ततो ज्ञेयः । वि भा–मासात् (गतसौरमासात्) गतदिवसा (गतसौरदिवसा) शुद्धय ना (शुद्धिदिनरहिता) शिवहता (एकादशगुरिणता ) पृथक् (स्फानद्वये स्थाप्या) अवमविकलात् (अवमशेपात्) द्विगोरस निनात् (६९२ गुरिणतात्) स्वच्छेदसयुतात्, विखनगहतात् (७०३ भक्तान्) फलोनात् (फलरहितात्) धुगण (अहर्गण ) भवेत्, ततोऽहर्गरणान्मासाधिप (मासेश ) ज्ञेय ॥३३॥ अस्योपपत्ति (२१-२२) श्लोकोपपत्तिवद्दोध्या, तत्र तिथिसम्बन्धेनोपपत्ति- रगतसौरमासदिन सम्वन्वेनोपपत्ति कार्येत्येतावदेवान्तरमिति, तन याशी विदश- वर्णनशैली न ताही वर्ततेऽत्र किन्तु विषयस्त्वक एव तय वर्षपतिविचारोऽन माम- पतेरिति । हि भागतसौरमास सम्बन्धी दिनो (गतमोर दिनो में) शुद्धिदिन को घटा कर ग्यारह से गुण देना उपको दो स्थानो मे रपना, गवमशेप को ६६२ मे गुणपर अपना हर जोडकर ७०३ से भाग देकर जो फल हो उसको घटाने में अहाण होता है। उस पर में माम पति का ज्ञान करना चाहिए ॥३३॥ इनकी उपपति (२१-२२) श्लोक को उपपत्ति की तरह समझनी चाहिए, वहा तिथि के सम्बन्ध से उपपत्ति की गई है यहा गनमौरदिनों से उपपत्ति बग्नी चाहिए यही अन्तर है लेकिन जिस तरह प्रतिपादन ली वहा है यहां कुछ संकुचित रूप में है। विषय १६२ वटेश्वर सिद्धान्ते वही कहते हैं किन्तु कहन को स्परेखा कुछ सवुचित है वहा वर्षपति का विचार है यहा भासपति का विचार है दोनों म प्रहाण की जरूरत होती है इसलिये वहा भी प्रहगरण का ज्ञान किया गया है यहा भी अहमण का ज्ञान किया गया है ॥३३॥ द्विसेभ कुगुनन्दजिनगिनंगाकं ॥३४|| द्वाभ्या तु सौराहगण हन्याल्लिप्ता निशाकरात् । विभा-द्विखेभ (८०२) कुगुणे (३१) नन्दजिन (२४६) वारणे (५) नगाङ्कन (१७) द्वाभ्या सौराहम्ण हन्यात् (गुरायेत्) तदा निशाकरात् (चन्द्रा- दारभ्य सर्वेपा ग्रहाणा) लिप्ता (कला) स्युरिति । अन युक्ति । क्ल्पसौरदिन कल्पग्रगणकला लभ्यन्ते तया गतसौरदिनै किमित्यनु- पातेन तेन सौरदिनान्तकालिका ग्रहा समागच्छन्ति , कल्पनभकX गतसोदि कसौदि =ग्रहकला अत्र क्ल्पभगणकलाया क्ल्पसौरदिनर्भजनेन श्लोकोक्ता गुणकाङ्का समागच्छन्ति तदा सौराहर्गरण गुपकाङ्क= चन्द्रादिग्रहकला, एते क्लात्मकग्रहा सौराहमणातकालिका भवन्ति । अत सिद्धम् ।।३४।। हि भा-८०२, ३१, २४६ ५, ६७, २ इन भकों से सौराहगण को गुणन से घद्रादिग्रहा की क्ला होती है मर्यान कलात्मक चद्रादिग्रह सौराहमणान्त कालिक हाते हैं ॥३४॥ उपपत्ति । यदि त्यसोरदिन मे क्सग्रहभगण क्ला पाते हैं तो सौराहगए म क्या इस अनुपात से सौरदिनान्तमालिक ग्रहाला भाती है, कल्पग्रहभगणक सौराहगरण क्सौरदि महालात महा पर क्त्यपहभगणरला म पल्पसौरदिन से भाग देने से क्रमस श्लोकोच चद्रादि ग्रहो ये गुणकाङ्क होते हैं तव सौराहणXगुर्गरणकाङ्क-चद्रादिपकला सौराहगणान्तकालिक । इदानी सोरदिनान्तवालिवचन्द्रादिग्रहपातायानाह । येदाग्नित्रिभुजे सप्तव्योमबाहुभि सैककं ॥३॥ वेदाङ्गाक्षिभुज पञ्च पञ्च व्योम निसाकर । कृतनन्दशराडूश्च द्विवेदाद्विधास्थित ॥३६॥ खसव्योमाप्टभिरुच्चपातानिजसगुण । शिवनेगाङ्गवितिखवेदान्यक्षिरसंक्के ॥३७॥ खसखाक्षिनगाशर्वा दिनकृद्दिवसान्तिका । रिमा-वेदाग्निविभुज (२३३४) सप्तव्योमबाहुभि संक्क (एकत्तहित सप्तन्यभुज २०८) वेदाङ्गातिमु (२२६४) पञ्चपञ्चव्योमनिशावर (१०५५) मध्यमाधिकार १६३ कृतनन्दश राई (१५६४) द्विवेदाङ्ग (६४२) द्विधास्थितम् (स्थानद्वये स्थापित- रर्थादुपरि प्रोक्नेश्चन्द्रादिग्रहगुणयारध ) प्रदर्शितश्चन्द्रमन्दोच्च गतयुधपातशुक्रपात गुणकाई) सखव्यामाप्टभि (८०००) शिवनेनाङ्ग विशिख (३६२११) वेदाग्न्य- क्षिरसकक (१६२३४) खखखाक्षिनगारी (७२००० अश) निजसङ्गणे (म्वगुण- काई) उच्चपाताशे (चन्द्रमन्दोच्चपाताद्यशं ) दिनकृतदिवसान्तिका (सौराहर्ग- गान्तकालिका) चन्द्रादिग्रहमन्दोच्चपातादयो भवन्तीति ।। अनोपपत्ति । यदि वल्पसौरदिनै कल्पग्रहमन्दोच्चपातादि भगणाशा लभ्यन्ते तदा सौराह- गणेन किमित्यनुपातेन सौराहगरणान्तकालिकाश्चन्द्रादिग्रहास्तदुच्चपातादयोशात्मवा भवेयुरिति तत्स्वरूपम् कल्पग्रहादि भगणारा Xसौराहगण चन्द्रादिग्रहमन्दोच्च- क्सौरदि पातभगणाशग्रहणेन गुणकाङ्क सौराहगण-चन्द्रादिग्रहमन्दो पाताशा सौरा- हर्गणान्ते, गुणकाका सर्वेषा चन्द्रादिग्रहाणा मन्दोच्चपाताना स्वस्वभगरणाग वशेन भिन्ना भिन्ना भवन्ति, ते च गुणकाङ्का शोकोक्ता सन्तीत्यत सिद्धम् ॥३५-३७।। हि भा .२३३४, २०८, २२६४, १०५५, ६५६४, ६४२ चन्द्रादिग्रहो के लिये इन गुणकाका से और च द्रमन्दोच्चपाता के लिये (८०००) ३६२११, १६२३४, ७२०००, इन गुणकाङ्को से ये ग्रह सौराहगंणान्तकालिय होते हैं । उपपत्ति यदि कल्पसौरदिन म कल्पग्रहादिभगणाश पाते हैं तो सौराहगंण म क्या इस अनुपात से सौराहणान्तकालिक चद्रादिग्रहो वा तथा उनके मन्दोचपातो के अशात्मक प्रमाण आता कल्पग्रहादिभगणाश x सौराहर्गण-ग्रहादि के अशात्मक मान । यहा कल्पभगणाश के है। कल्पसौदि स्थान में चन्द्रादिग्रहो मे से या मन्दोच्च पातो म स जिसका भगणाश ग्रहण करेंगे उनको प्रशात्मक प्रमाण पाते हैं । सौराहगए गुणक अशात्मक चन्द्रादिग्रह या पातमन्दोच, भगरणाश के भिन्न भिन्न होने से गुणकाव भी भिन्न भिन्न होता है , वे गुणकाइ श्लोक कथित हैं । इस तरह सौराहणान्तकालिक सब ग्रह, चन्द्रमन्दोच्च पात, बुध और शुक्र होते हैं ॥३५-३७॥ इदानी चन्द्रवपंपतिज्ञानाथमहाणानयनामवतरणमाह । प्राग्वविदिवसेभ्यो गुणकेन्य खाग्निसङ्गहरेरण दिवसायमान शुद्धिरिनदिवसयुतिदिनाधिपश्च तथा ॥३॥ वि भा-प्राग्वत् (चत्रादितिथिनिकर इत्यादिवत्) रविदिवसेभ्यो गुणकेभ्य (सौराहगण रूपाहर्गण गुणकादिभ्य ) खाग्निसङ्ग.एहरेण (त्रिंशद्गुणितहरेण) अत्र दिवसावमा (अवमदिन) शुद्धि (दिनादिशुद्धि ) इनदिवसयुति (सौराहारण- पात घटेश्वरसिदान्ते युति ) अर्थाद्यथा चंत्रादितिथिनिकर इत्यादिनाहगंगानयन विधाय दिनपतिज्ञान भवति तथवानापि सौरागणान्ते दिनपनिज्ञान भवतीत्यहाणानयनयावतरण- त्पमस्ति, श्लोकेप्वग्निमेष्वेतदनुसारमेवाहर्गणानयन क्रियते इति ॥३८॥ हि भा–पहले की तरह ( चैत्रादितिपिनिकर इत्यादि की तरह ) मौरदिनरूप अहर्गण के गुस्सक से और तीम गुरिणत हर स कार्य करना चाहिये यहा अवदिन शुद्धि है । शुद्धि-सौरदिन के योग पर में दिनपति का ज्ञान करना। वर्षों का अभिप्राय यह है कि "चत्रादिनियिनिकर" इत्यादि में ग्रहगंणानयन र जिम तरह दिनपति-ज्ञान दिया गया है उसी तरह यहां भी मौराहगंगान्त म दिनपनि ज्ञान करना चाहिये यह प्राणानयन के लिये अवतरण है आगे के दलोको मे इसी के अनुसार अगणानपन दिया जाता है ॥३०॥ इदानी चन्द्रवर्षपतिज्ञानार्यमहर्गणानयनमाह । भाविभक्तदिनेन्यो वर्षाग्यवमोपत. खगुरणात् ॥३६॥ मासाश्च त्रसिताद्या' शेपदिवसास्ततोऽभाष्टाः । दिवसशुद्धिविहीना कार्यास्तेभ्यो युगवमपि ॥४०॥ ऊनासावनधुद्धिर्भानोर्वर्षान्तदिननैः। शेषं शोध्य युगणो वर्षपतेनिमस्माद्वं ॥४॥ वि मा.-भाराविभक्तदिनेभ्य (३६० विभक्तमोरदिनेभ्य ) वर्षाणि (सौर- वाणि) भवन्ति खगुण (निशद्धिगुणितादिनि शेप ) अवमशेपत (अवमोपात्) चैनसिताद्या ये मासास्तदन्तर्गता दिवसास्तत शेषदिवसाश्चाभीष्टा दिवसा अर्थान्चन शुक्लप्रतिपदादित इष्टदिन यावदिष्टदिवसा , दिवसशुद्धिविहीना (शुद्धदिनरहिता) कार्या , तेभ्योऽवमपि (वर्षान्तकालिक दिनक्षयरोप) युक् (योज्यम्) जना (क्षयरोपा) सावनय शुद्धि (सावनदिनगुद्धि ) भवति, भानोर्वपान्तजै (मूर्यस्य वर्षान्तकालिक) उनै (दिनक्षय ) शाध्य (विहीन) शेप (अवशिष्ट) धुगण (अहर्गण) भवेत् । अस्मान् (अहर्गरसान्) वर्षपनि कार्यमिति । अत्रोपपत्ति चंगुक्ल प्रतिपदादितो ये मासागतास्सत्सम्बन्धीनि यानि दिनानि तथा वर्तमानमासस्यैष्टदिन यावत् यावन्ति दिनानि, इति मिलित्वेष्ट्रदिनानि भवन्ति ते यदि शुद्धिदिनानि विशोध्यन्ते तदा चैत्रायवमशेष सूर्योदयामान्तयोरन्तर भवति तत्र वर्षान्त कालिकमवमशेप योज्यम् । यत शुद्धिदिनशोधनावमरे न मोधित तद्योज्यने तदेव शुध्यति,तथा तत्र वन्तिकालजावमदिनविंशोधनेनाहर्गयो भवेत्स च सप्तभक्ता• वशिष्टो वर्षपत्यादिरिति ।।३६-४१ ।। हि भा -सोन मो माठसे मोर दिनोम माग देने मेमोर वर्ष होते हैं । तोगुरिएत प्रवम गेष म चंचगुवादि जो मान हैं तदनगंव दिन और रेप दिन(वर्तमान माम का इदिन तर दिन- मया) मिलकर प्रमीप्ट दित है । प्रभीष्ट दिन सस्था म मुद्धि दिन से घा देना उसमे - मध्यमाधिकारः १६५ वर्षान्त वालिक क्षयशेष जोड देना, वन्तिकालिब क्षय दिन घटा देने से अहर्गरण होता है । इस पर से वर्षपति का ज्ञान परना चाहिये । उपपत्ति चैत्र शुक्ल प्रतिपदादि से जो मास है (गतमास) सम्बन्धी दिनो म वर्तमान माम के इष्टदिन तक सख्या जोडने से जो दिन होते हैं वे इप्टदिन है । उनमे दिनशुद्धि को घटा देने से शेष चत्राद्यवम शेष होता है। इसमें वन्तिकालिक अवमशेप को जोडना चाहिये क्योकि शुद्धिदिन घटाने के समय नहीं घटाया गया उसका जोडना वही घटाना होगा । उसमे वर्षान्त कालोत्पन्न दिनक्षय को घटा देने से महर्गरण होता है, इसमे मात से भाग देने से शेष वर्ष पत्यादि होते हैं ।। ३६ ४१॥ इदानीमहर्गणानयने विशेषमाह । द्विनवरसध्नाद्भक्तात्स्वच्छेदेनावमाद विशुद्धयति न चेत् । शोध्य युगमाद्रूपे शुद्ध गुरणाखागसयुताश्छेद्याः ॥ ४२ ।। शेष तद्दिवसोस्य विकल त्ववमस्य विजेयम् । वि भा-द्विनवरसध्नात् (६६२ गुरिणतात्) स्वच्छेदेन विभक्तात् (स्वहरेण भक्तात्) अवमात् (क्षयदिनात्) चेद्यदि शुद्धि (दिनशुद्धि ) न विशुद्धयति तदाऽवम शेपा गुणखाग (७०३) सयुता कार्यास्तत शुद्धि शोधयेत् । छेद्या (हरेण भाज्या) शेष तद्दिवसोत्थ (सौरदिनान्तकालिक) अवमस्य विकन (अवमशेप) विज्ञेयम् । एतस्मात्साधितात् धु गणात् (अहर्गणात) रूपे शुद्धे (एकहीने) वास्तवोऽहर्गणो भवेदिति ॥ अनोपपत्तिस्तु यद्यपि 'चैत्रादिस्तिथिनिकर" इत्यादि पर्यालोचनया) स्फु- टाऽस्ति तथापि किञ्चिदुच्यते । 'मासाश्च सिताद्या शेपदिवसास्ततोऽभीष्टा । दिवसशुद्धि विहीना" अष्टदिनसख्याया शुद्धिशोधन कृत्वा तदुपपत्ति प्रतिपा- दिता, यदि शुद्धिर्न शुध्यति तदा कि कार्यमित्येवान कथ्यते। चैत्रादिस्तिथिनिकर इत्यादेरुपपत्तौ “यदि शुद्धिसावनदिनैश्च त्र शुक्ल प्रतिपदादितिथय ऊनीनियन्ते तदा चैत्राद्यवम शेष सूर्योदयामान्तयोरन्तर भवति, अवमाशा अधिका शुद्ध यूना द्रष्टव्या । ततो यदि ७०३ सख्यकश्चान्द्रदिनरेकादशावमानि लभ्यते तदा वन्तिाद् गततिथिमि विमित्यनुपातेन सशेपावम प्रमाणमायाति, वन्तेि यदवमशेप तत्त व योज्यते यत शुद्धिशोधनावसरे न शोधित तद्योज्यते तदेव शुध्यति, चन्द्रदिनान्युपरि शुद्धानि सन्ति, अतोऽवमाशा ७०३ गुणिता सवर्णीभवन्ति, एव यल्लब्धमेकादा- गुणतिथिषु यावदवमाशास्तेष्वेव तिथिप्वधिकास्तिष्ठन्ति ते च तिथिभि सहैकादश- गुणा भवन्ति यत ७०३ एभ्य एकादश विशोधनेन ६९२ एतावन्तोश्वमाशा जाता गुणका । स्वच्छेदो भागहार फलमेकादशगुणिततियिषु योज्यमवम भवति" इति हृदि निधायात्र विचारकरणेन स्फुट भवति । द्विनवरघ्नात्स्यहरेण विभक्तादवम शेपाच्छुद्धिर्न शुध्यति तदा ७०३ युक्तादवमशेपाच्छोधयेत् । अर्थादवमशेपे ७०३ १६६ वटेश्वर-सिद्धान्ते सयोज्य पश्चाछुद्धि शोधयेत् । शुद्धिशब्देनातावमदिनानि कथ्यन्ते । तत पूर्वोक्त- कियाकरणेन वान्तावमशेप भवति । अत्र योहण समागच्छति तनाप्येकयोजन कार्यमिति ।। ४२॥ हि.भा- यदि ६६२ से गुणित अपने हर से विभक्त अवमशेष में शुद्धि नही घटे तो भवम- वेष में ७०३ इतना जोडकर शुद्धि को घटाना उम पर से जो शेष रहे उसको अपने हर से भाग देना तव वर्पान्तकालिक अवम शेप होता है । इस पर से जो महर्गरण होता है उसमें एक जोडना चाहिये ॥ इसको उपपत्ति यद्यपि "चत्रादिस्तिपिनिकर" इत्यादि को देखने से साफ है तथापि कुछ कहते हैं “मासाश्चत्रसिताद्या देपदिवसास्ततोऽभीष्टा । दिवसगुद्धिविहीना" यहा इष्टदिन सस्या से घुद्धि को घटावर उपपत्ति वही गई है। लेकिन यदि शुद्धि न घटे तब क्या करना चाहिये वही वात यहा कहते हैं । "चैत्रादिस्तिपिनिकर" इत्यादि की उपपत्ति में यदि चैत्र शुक्ल प्रतिपदादि तिथियो म सुद्धि सावन दिन को पटा देते हैं तो सूर्योदय और अमान्त के अन्तर्गत चैत्राद्यवम शेप रहता है। तव यदि ७०३ इतने चान्द्र दिनो मे ११ प्रवम पाते हैं तो वर्षान्त से गततिथि में क्या इस अनुपात से दोष सहित गतावम प्रमाण माता है । वर्षान्त म जो अवम है उसको वही जोडना चाहिये क्योकि शुद्धि घटाते समय न घटाया गया उसका जोडना गोधन का काम करता । चान्द्रदिन शुद्ध हैं । इमलिये प्रदमाश को ७०३ गुणने से सजातीय हो जाता है। इस तरह जो लब्ध होता है ग्यारह गुणित जो भवमारा हैं वे उन्ही तिथियों में अधिक हैं वै तिथियों के साथ ग्यारह गुरिणत होते हैं क्योकि ७०३ इनम ११ ग्यारह घटाने में ६६२ इतने अवमाश गुणक होते हैं । हर से भाग देन पर जो होता है उसको ग्यारह मुरिणत तिथि म जोडने से मवम होता है।" इनको माने हृदय में रख कर विचार करने से सब बार्ने माफ हो जाती हैं। यदि ६१२ से गुरिणत अपने हर से विमवत भवम शेप म शुद्धि न पटे तो अवम शेप म ७०३ जाडकर शुद्धि को घटाना चाहिये । मुद्धि से यहा भवमदिन ली गयी है । इस पर मे पूर्वोक्त क्रिया द्वारा वर्षान्तकालिक मवम. शेष होता है । इस पर से जो पहर्गए मावे उसम एक जोडना चाहिये ।। ४२ ।। इदानी चान्द्रभाससम्बन मासपतिज्ञानमाह । त्र्यग सप्तनभोऽधि मिहता रजनीश मासका भवता । नन्दाप्टाग्नि रसाक्षि द्विभुजैर्मासाधिपो मासात् ।। ४३ ॥ वि. मा-रजनीशमासा (गतचान्द्रमामा ) न्यगसप्तनभो बिधनिहता (३४०७७३ एतगुणिता) नन्दादाग्नि रसाक्षि द्विमुजे (२२२६३८६ एभि) भक्ता (विभाजिता ) तदा मासात् मासाधिपो भवेत् ।। मत्रोपपत्ति । अनानुपात नियते यदि युगचान्द्रमासयुगसावनदिनानि लभ्यन्ते तदेष्ट- चान्द्रमास विमित्यनुपातेने चान्द्रमामसम्बघिसावनदिनानि तत्स्वरूपम्- युदिन गतचान्द्रमास प्रत्र हरभाज्यस्थयोयुं गचान्द्रमास युगकुदिनयोरपवतंनेन युचामा हरगुरणाचुत्पद्यते । ततो मामपतिज्ञान सुगममिनि ॥
मध्यमाधिकारः १६७ हि भा--गतचान्द्रमास को ३४०७७३ इतने से गुणकर २२२६३८६ इनसे भाग देने से जो फल होता है उससे मासपति होते हैं (अर्थात् मासपति का ज्ञान होता है) ॥ ४३ ॥ उपपत्ति यहा अनुपात करते हैं यदि युग चान्द्रमास मे युगकुदिन पाते हैं तो गतचान्द्रमास मे क्या इस अनुपात मे गतचान्द्रमाससम्बन्धी सावन दिन प्रमाए प्रा जायेंगे । युकुदिन ४ गतचान्द्रमास गतचान्द्रमाससम्बन्धी कुदिन । यहाँ हर और गुणक का युचामा अपवर्तन देने से पठितहर और गुणक होते हैं, तब मामपति ज्ञान सुलभ है।। ४३ ॥ इदानी चान्द्रवर्षपतिदिनपत्योनिमाह । स्वच्छेदेन युगाधिमासनिहता मासा गता भास्करा भानोर्मासगरणोद्धृता फलयुताश्चान्द्रा शरस्ताड़ितात् । शेषादङ्गशरेषु बारणखनवस्तम्वेरमाप्ताशकं- रूनश्चत्रसितादि मासकगरणो रव्याधचन्द्र पौ॥४४॥ वि.भा--स्वच्छेदेनेत्यस्य पूर्वग्लोकेन सम्बन्ध । गता भास्करा मासा. (गतसौरदिवसा ) युगाधिमासनिहता (युगपठिताधिमासगुणिता) भानोर्मास- गणोद्धृता (युगपठित सौरमासभाजिता ) फलयुता गता भास्करा मासा (फ्ल- सहिता गतसौरमासा ) तदा चान्द्रा (इष्ट चान्द्रमासा ) भवन्ति, शरै (पञ्चभि ) साडितात् (गुणितान्) शेपात्, अङ्गशरेषु वाणखनवस्तम्बेरमाप्ताराक (८६०५५५२ एभिर्भजनेन यत्फल) तरून (वर्जित ) चैनसितादिमासकगणो भवेत् । ततो रव्यादिकश्चान्द्रवर्पपतिदिनपतिश्च भवेदिति ॥ ४४ ।। अनोपपत्ति । यदि युगसौरमासयुगाधिमासा लभ्यन्ते तदा गतसौरमासै किमित्यागता अशे गताधिमासा सशेपास्तत्स्वरूपम् = युप्रमा गतसौमा =गप्रमा+: युसीमा युसीमा गतसौरमासे गताधिमासयोजनेनेष्ट चान्द्रमासा भवन्ति । ततोऽनुपातो यदि ८६०५५५६ चान्द्रमास पञ्चक्षयमासा लभ्यन्ते तदाऽऽनीतचान्द्रमास किमित्यनुपातेन गतावम सशेपा समागच्छन्ति, एभिरूनिता पूर्वानीत चान्द्रमासा इष्टसावनमासा भवन्ति ततो दिनपत्यादिज्ञान सुगममिति ॥ हि भो गत सौरमास को युगपठित अधिगास से गुणकर युगपठित सौरमास से भाग देने से जो फल हो उसको गतसौरमास में जोडने से इप्टचान्द्रमास होते हैं । पञ्चगुरिणत शेष मे ८६०५५५६ से भाग देने पर जो फल हो उसको इष्टचान्द्रमास मे घटाने से इष्ट सावन मास होता है इस पर से रव्यादि चन्द्रवर्षपत्यादि होते हैं ।। ४४ ।।
१६८ वर्टश्वर-सिद्धान्ते उपपत्ति युप्रमX गसौमा यदि युगसौरमास मे युगाधिमास पाते हैं तो गतसौरमास मै क्या इम अनुपात से प्रशे सशेषगताधिमास प्रमाण पाते हैं। -गग्रमा+ -गनसौरमाम में युसीमा युमोमा गताधिमास जोडने से इप्टचान्द्रमास होते हैं । तव अनुपात करते हैं कि ८६०५५५६ चान्द्रमास मे ५ पाच क्षयमाम पाते हैं तो मानीत चान्द्रमास म क्या इस अनुपात से सशेप गतावम प्रमाण प्राता है । इसको पूर्वानीत चान्द्रमास में घटाने से इप्टसावनमाम होते हैं । इस पर से रव्यादि वर्षपति दिनपति का ज्ञान सुलभ है ।। ४४ ।। इदानी चन्द्रादिग्रहादीना प्रतिमासक्षेपानाह । तिथयोपशो देया प्रतिमासमशकादिकुजे ॥ एव शशिसुतशीघ्र खार्काः खशराः शरेषवोमासि ॥४५|| पूर्ववदमरपतीज्ये वाहग्नि धिष्ण्यानि सनवकानि ॥ मानवन्दितशीघ्र नगवेदा त्रीन्दवोऽधिकृताः ॥४६॥ लिप्तादिभास्करसुते नदविषया पञ्चशीतकरा ॥ शिशिरकरेंऽशादी शिखिनो विवृतिनिशाकरकराध ॥४७॥ ग्रहणविचीयें पाते कलादि खगुणा खसागरा सूर्या ॥ भूदेवा रामशरा पाते गजमूर्च्छना हि लिप्सोना ॥४८॥ वि भा-तिथय (१५) अष्टदृश (२८) प्रतिमास अशकादिकुजे (प्रशादि- मङ्गले) क्षेप्यमिति । एव खार्का (१२०) खगरा (५०) शरेपव (५५) मासि (प्रत्येकमासे) शशिसुतशीघ्र (बुधशीघ्रोच्चे) क्षेप्या । पूर्ववत् अमरपतीज्ये (बृह- स्पती) वाह्वग्नि (३२) धिष्ण्यानि (२७) सनवकानि (नवसहितानि तानि) प्रतिमास क्षेप्यानि, नगवेदा (४७) त्रीन्दव (१३) अब्धिता (४४) मास दानव वन्दितशीघ्र (शुक्रशीघ्रोच्चे) क्षेप्या । नवविपया (५६) पञ्चशीतक्रा (१५) लिप्तादिभास्करमुते (कलादिशनैश्वरे) क्षेप्या । शिखिन (३) विधृति (१७) निशाकरकरा (२१) शिशिरकरेऽशादी (चन्द्राशादो) क्षेप्या । खगुणा (३०) खसागरा (४०) सूर्या (१२) ग्रहणविचीय पाते (राही) क्लादौ क्षेप्या । पाते भूदेवा (३३१) रामशरा (५३) गजमूर्च्छना (१०८) लिप्तोना (एतावन्तोऽङ्का लादिपु हीना कार्या) इति ॥४५-४८॥ अग्रोपपत्ति । यदि कल्पसौरमास कल्पग्रहादिभगरणाशा लभ्यन्ते तदैकेन सौरमासेन विमिति फलमेकमानसम्बन्धि ग्रहायशास्तत्स्वरूपम् = कल्पग्रहादिभगणाश४१ कल्पसौमा _कल्पग्रहादिभगणाश कल्पसौमा अन चन्द्रादिग्रहाणा पातस्य च कल्पपठितभगणाना ।
मध्यमाधिकारः १६६ कल्पसौरमासप्रमाणस्य च मानग्रहणेनोपयुक्ताना प्रहारणा पातस्य च प्रतिमासक्षेपा समागमिष्यन्ति ये च श्लोकोक्ता सन्ति । युगसौरमासयुगग्रहभगणवशेनापि पूर्वव. मासक्षेपप्रमाणानयन कार्यमिति । हि. भा-१५, २८ प्रतिमास अंशादिमङ्गल में जोडना, १२० १ ५० १ ५५ प्रत्येक मास में बुधशीघोच मे जोडना, वृहस्पति मे ३२ । २७ । ६ प्रतिमास जोडना, शुनशीघोच्च म ४७ । १३ १ ४४ प्रत्येक महीना जोडना, ५६ | १५ क्लादि शनैश्चर मे जोडना । ३ । १७ । २१ अशादि चन्द्रमा मे जोडना, ३० । ४० । १२ कलाद्रि राहु मे जोडना । ३३१ १ ५३ । २१८ क्लादिपात मै घटाना चाहिये ॥४५-४८।। उपपत्ति %3 यदि पल्पसौरमास मे कल्प चन्द्रादिग्रह और पात के भगणाग पाते हैं तो एक सौरमास में क्या इस अनुपात से एक सौरमास म उनके प्रशारम प्रमाण मा जायगे । कल्पग्रहादिभगणारा४१ कल्पग्रहादिभगणारा यहा चद्रादिग्रहो के और पात कल्पसौमा कल्पसौमा के पठित भगणो के मान और कल्पसौरमास से उत्थापन देने से चद्रादिग्रहा के और पात के प्रति मासक्षेप प्रमाण आ जायेंगे जो कि श्लोको मे कहे गये हैं । यहा युगपठित भगण और सौरमास से भी पूर्ववत् अनुपात द्वारा उक्त ग्रहादियों के प्रतिमासक्ष प आजायेंगे ॥ इति ।। ॥४५-४७॥ इदानी कुजादीना ग्रहाणा प्रतिमासक्षेप (धनकला) कलासम्बधे तद्गतिज्ञानमाह । गोऽकर्नागनख पयोधिखसुरै पक्षाष्टिभिर्मासजा। स्त्रिद्वयङ्ग शरधोकुभि सुरगजभू जादिक स्वकला ॥ हानिर्जीवबुधाकंजेषु कलिका मासोपभोगा हृता । खाज्याशेरिनवासरे ग्रगतिनें या तत सावना ॥ ४६॥ हि मा-गोऽक (१२६) नागनखे (२०८) पयोधिखसुरै (३३०४) पक्षा- ष्टिभि (१६२) विद्वयङ्ग (६२३) शरधीकुभि (१५५) सुरगजे (८३३) मासजा (मासोत्पन्ना) भूजादिक स्वकला (कुजादिग्रहधनकला) भवन्ति । जीवबुधार्क- जेषु (वृहस्पतिबुधशीघ्रोच्चशनैश्वरेपु) हानि (एतेषा कथितकला हीना कार्या) मासोपभोगा कलिका (मासभोग्यकला उपर्युक्ता) खाज्याशे (त्रिंशद्भि) हता (भवता) तदा इनवासरे (एकसौरदिने) ग्रहगति , तत सावना गतिज्ञयेति ।। अस्योपपत्ति । इत पूर्व ग्रहादीना प्रतिमासक्षेपाशा आनीता । अधुना प्रतिमासक्षेपकला आनीयन्ते । पूर्ववत् ग्रहादिपठित भगणकलाभि पठितसौरमासंश्चानुपातेन प्रति- मासक्षेपकला आगच्छन्ति, एतासामेव नाम धनकला , ततोऽनुपाते-कसौरदिनेतद् गति पठिनग्रहप्रतिमासक्षेपकलाx१ पठितग्रहप्रतिमासक्षेपकला ३० ३० दिन २०० वटेश्वर-सिद्धान्ते तत सावनदिने ग्रहगतिज्ञ येति ॥ इति वटेश्वरसिद्धान्ते मध्यमाधिकारे प्रत्यन्दशुद्धि. समाप्ता । हि.भा-१२६, २०८, ३३०४, १६२, ६२३, १५५, ८३३ ये मङ्गलादिग्रहो की मासिक घनकला (क्षेपकला) बृहस्पति वुधशीघ्रोच. शनैश्चर इन ग्रहो में इनकी दोपक्लानों को ऋण करना चाहिये । प्रतिमास क्षेपक्लानो को तीस से भाग देन से एक सौरदिन में ग्रहगति होती है उससे सावनदिन मे ग्रहगति जाननी चाहिये ।।४।। उपपत्ति इससे पहले ग्रहादियो के प्रतिमास क्षेपाश लाये गये हैं। यहा प्रतिमास क्षेपकला लाते हैं। पूर्ववत् ग्रहादि के पठित भगएकला और पठित सौरमास मे अनुपात द्वारा प्रतिमासक्षेपक्ला प्राती है । इन्हीं का नाम धनकला है उस पर से अनुपात करने से एक सौरदिन में उनकी गति ग्रहपठित प्रतिमास पक्ला-१ ग्रहपठित प्रतिमाक्षेक इससे सावनदिन मे ग्रहगति ३० दिन जानना ॥४६॥ इति घटेश्वरसिद्धान्त में मध्यमाधिकार में प्रत्यब्दशुद्धि नामक पाचवा अध्याय समाप्त हुप्रा॥ ३० षष्ठोऽध्यायः अथ करणविधि इदानीमहर्गरण विना रविचन्द्रयोरानयनाय करणविधिमाह । अधिमासाप्तविकल ग्रहमण्डलशेषकारिण चैत्रादौ । अधिमासावमभागः प्रोक्तनिजमुद्धरेद्दिनादिफलम् ॥१॥ रविचन्द्रभूमिदिवसा अधिकावमपर्ययोदघृता हाराः । बहुतरशेधे स्वधिया गुणक सञ्चिन्त्य गुरणा हत विभजेत् ॥२॥ देयं गुणा करवधे हारः क्षेप्यो गुरणाहतं क्षेप्यम् । तद्भागहारशकलादधिकं शेषं तदा हरेद्वारात् ॥३॥ सैकश्छिन्नो हार : शेषं च धनं क्षयाह्यमितर स्यात् । . तद्भक्ताः क्षितिदिवसाः प्रोत्पन्नहरा हताः क्षयस्य गुणाः ॥४॥ वि. मा --अधिमासाप्तविकल ग्रहमण्डलशेपाणि (अधिमासात्प्राप्तग्रहभगरणादि शेषाणि भवन्ति ) प्रोक्तं . (कथित ) अधिमासावमभगणं (अधिमासावमशेषः) निजमुद्धरेत् तदा चैत्रादो दिनादिफल भवेत् । रविचन्द्रभूमिदिवसाः (युगसौरदिन- युगचान्द्रदिन युगकुदिनानि) अधिकावमपर्ययोद्धता (अधिकावमपभक्ताः) हाराः बहुतरशेपे (अनेकशेपे) स्वधिया (स्ववुया) गुणक सञ्चिन्त्य (विचार्य) गुणाहतं (गुणगुणित) हरेण विभजेत् देय गुणाकरवधे इत्यादि स्पष्टम् ॥१४॥ हि.मा.~-अधिमाम से प्राप्त ग्रहमगरण शेप होते हैं कयिन अधिमान अवमोप में भाग देना तव चत्रादि मे दिनादिपल होता है । युगमौरदिन युगचान्द्रदिन, युगबुदिन को अधिशेष, प्रवमशेष से भाग देवर हार होता है । बहुतरशेप शेप में अपनी बुद्धि से विचार पर गुणन से गुण देना हार में भाग देना, प्रागे लोगो अर्थ माफ है ||१४|| इदानीमधिमामावमशेषाम्या रविचन्द्रयोरानयनार्थ विधिमा । अधिमासाघमजाम्यामेव गुणकाम्या हता रवीन्दुगतयः । भक्ता निजहाराद्वा विनोधरेन्ट्रेषफलसंजन | वि. भा.--अधिमामावमजाभ्यामेव मुग्णवाभ्या (अवममेषाधियान्या) - २०२ वटेश्वर-सिद्धान्ते रवीन्दुगतय (रविचन्द्रगतय ) हता (गुरिणता ) निजहरात् (स्वाकीयहरात्) भक्ता (विभाजिता) वा विशोधयेत् तदा शेषफलसज्ञ स्यात् । यद्यप्यधिशेपावमशेपाभ्या रविचन्द्रयोरानयनेधिशेपेण रविचन्द्रयोगतेर्गुणन न भवति विन्त्वीदायकार्थमधिशेपस्य प्रयोजन भवति, याचार्योक्तपद्यमनाशुद्ध प्रति भानोति ॥५॥ हिमा --अधिमास शप और अदमशेष रूपगुणक से रवि और चन्द्रगति को गुण कर अपने हर मे भाग देना या हत म घटाना जो शेप रहा है वह शेषफल सज्ञक है ।। यद्यपि अधिशेष और अदमदोष से रवि और चन्द्र के प्रानयन के लिये अधिशेष से रविगति और चन्द्रगति को नहीं गुणन किया जाता है रवि पौर चन्द्र को प्रौदयिक करने के लिये उमकी जरूरत होती है । यहा प्राचार्योक्त पद्य अशुद्ध मालूम होता है ॥५॥ इदानीमेकाहगणेन मिद्धान् ग्रहानन्याहाणे ममानीयते । घटान्ददिनसमूहा पृथग्गुरणकताडिता द्विधा विभक्ता.। क्षयधनगरोन लब्धा वियुतयुता मध्यमा नूय ॥६॥ वि मा-इप्टाब्ददिनसमूहा ( इप्टवीयाहर्गणा ) पृथक् गुणकताडिता (स्वगुणेन गुणनीया ) क्षयधनगणेन (ऋणाहणेन धनाहगणेन च ) विभक्ता (भाज्या ) तदा भूयो द्विघा वियुतयुता (ऋणात्मका धनात्मकाश्च) मध्यमग्रहा भवन्तीति ॥६॥ हि मा --इष्टवर्ष सम्बधी अहर्गण को अलग अलग गुणक से गुण कर ऋणाहाण भौर धनाहगण से भाग दने से दो प्रकार के ऋण मध्यमग्रह और धनमध्यमग्रह होत हैं ।।६।। एक प्रहगण से सिद्धाहो से द्वितीय प्रहगण सम्बन्धी लाने के लिय अनुपात किया सिद्धभगणादिन ग्रहगण = महगण सम्बधी भगणादिन इति ॥६॥ प्रहगरण इदानीमहर्गणार्य करणविधिमाह । क्षेप्ययुता होना वा शोध्येन विभाजिताश्च हारेप। प्रधिमासा शशिदिवसरवमान्येव तदूनिता शुगरण ॥७॥ विभा -क्षेप्ययुता (क्षेपणयोग्यपदार्था सहिता ) शोध्येन (गोधनयोग्यैन) होना (रहिता) हारेण विभाजिता यथाऽधिमासा भवेयुस्तथा कार्य, एव शशि- दिवस (चान्द्रदिन ) यथाऽवमानि भवेयुम्तथा कार्य तदा चान्द्रदिने तदनिता (अवमा रहिना सन्त) धुगण (अर्गरण ) भवेदिति॥ पूर्व “यातावमेन्दुदिनराशिचय स्वगिष्टया युक्तोनितोऽवमहतो विधुवासरा या। एव गताधिक्गुणाश्च रविधुरागिरन्योऽन्यतोवमदिनानि गताधिमामा" इत्यत्र पथा कार्यकरणप्रक्रिया प्रतिपादिताऽस्ति तर्धवाऽवाप्यधिमासावमदिन- योनिार्थ वार्या ततोहाररासिद्धिर्भवेत् ॥७॥ जायगा
मध्यमाधिकार
२०३
-
हि भा --जोडने योग्य पदार्थ को जोडने से घटाने योग्य को घटाने से हर से भाग
देने से जैसे अधिमाम ज्ञान हो करना चाहिये। इस तरह चान्द्रदिन से अवमदिन के ज्ञान
से हो करना चाहिये, चान्द्रदिन में अवमदिन को घटाने से अहर्गरण होता है ॥७॥
इदानीमहर्गरणान्मध्यमग्रहानयनार्थ करणविधिमाह ।
धुगणे गुरणकभ्यस्ते धनयुजि मध्योनितेऽथवा भक्त ।
हारेण भगरणपूर्वी ग्रहो धुराशे क्षयस्वगरणवृद्धचा ॥८॥
वि भा-धुगणे (अहर्गणे) गुणकाभ्यस्ते (यथायोग्यगुणकगुरिणते) धन-
युजि मध्योनिते (अर्थाद्विलोमगतिग्रहार्थमनुपातस्थ मध्यमफलेन ग्रहभगणेन हारे
हीनिते) हारेण विभक्ते तदा धुराशे (अहर्गणात्) क्षयस्वगणवृद्धया (ऋणा-
हर्गणधनाहर्गणवृद्धया) भगरणपूर्वो ग्रह (भगणादिग्रह ) भवेदिति ।। ग्रहानयने
केपा केपा गुणहारादीनामावश्यकता भवन्तीत्येवानेन कथ्यतेऽचार्येणेति ।।८।।
हि भा.--अहर्गण को अपने गुणक से गुण देना विलोमगति ग्रहशान के लिये हार
मे मध्यफ्ल (ग्रहभगरण) को घटाना, अपने हार से भाग देना तव ऋणात्मक और धनात्मक
अहर्गरण के वश से भगणादि ग्रह होते है ।।६।।
ग्रहानयन में किन किन गुण, हर और क्षेपकादि को जरूरत होती है वहीं यहा रहा
है । यद्यपि इन सब को कहने की आवश्यकता नहीं है पर प्राचार्य ने इन सब के लिये एक
अध्याय ही बनाया है ॥८॥
भगणादिकेनोनयुते मध्य स्यादेवमेव धुगणान्ते ।
विधिवत्केन्द्रफलानि तु कृत्वा धुचरोऽनुपातत स्पष्टः ।।६।।
वि.भा.-एवमेव (अनेनैव पूर्वोक्तविधिना) भगणादिके फले ऊनयुते (ऋण-
धने) शुगणान्ते (अहर्गरणान्तेऽर्थादहर्गरणादनुपातेन समागतो भगणादिमध्यमग्रहोह-
गरणान्ते) मध्य रयात् विधिवत् अनुपाततः (त्रैराशिकात्) केन्द्रकलानि (केन्द्रज्यो-
त्पन्नानि मन्दफलशीघ्रफलादीनि) कृत्वा स्पष्ट (प्रत्यक्षीभूतः) धुचर (ग्रहः)
साध्य इति ।
स्पष्टग्रहा कथमागच्छन्ति तदर्थमुपकरणानि कथ्यन्ते ग्रन्थकारेरोनि ||
हि भा. इसी तरह पूर्वोक्त नियम से भगणादिफल घन ऋण रहने पर अर्थात् धना-
हर्गण और ऋणाहर्गरण से माधित भगणादिग्रह के ऋण और धन रह्न मे वे अहर्गरणान्न
विन्दु में ऋण और धन मध्यम ग्रह होते है उसके बाद विधिपुरस्सर अनुपात से केन्द्रज्योत्पन्न
मन्दपलादि परके स्पष्टप्रह साधन करना, इनि ।।
इसमे स्पष्टग्रह साधन के लिये उपकरण कहते हैं ।
इदानीमुपसहारमाह ।
युगाधिमासावमपर्ययारणा निरग्रतः यत्र युगे स्फुटानाम् ।
कार्य सुसक्षिप्तमनन्यदृष्टं सुसारमेयं करणं जड़ानाम् ॥१०॥
२०४ वटेश्वर सिद्धान्ते गि भा -यन युगे स्फुगना युगाधिमासावमपर्ययारणा (युगाधिमासभगणाना, क्षयमासभगणाना च) निरग्रता (निशेषता) भवेत् तथा कार्य, इति सुसक्षिप्त (अतिशयेन लघु ) अनन्यदृष्ट (अन्यराचार्यविलोक्तिम्) जडाना (कुष्ठधिया) सुखावमेय (सुखपूर्वकवेद्ययोग्य) कारण प्रोक मयति ।।१०॥ इति वटेश्वरसिद्धान्ते मध्यमाधिकारे करणविधिर्नामक पाठोध्याय समाप्त । हि भा-जिस युग म युगाधिमास भगण और अवममास भगणा को निशेषता होती है उस तरह करना चाहिए। बहुत सक्षिप्त और जिमको प्रय माचार्यों ने नही देखा जड लोगो के सुगम तरह समझने के लायक करण (करणविधि नाम के अध्याय) को मैंने कहा ॥१०॥ इति वटरवरमिद्धान्त म मध्यमाधिकार म करणविधि नामक पष्ठ अध्याय समाप्त हुग्रा ।।
सप्तमोऽध्यायः अथ प्रमारपविधि इदानीमण्वादिप्रमाणक्थनपुर सर योजनप्रमाण वदन् सक्क्षाप्रमाणमाह । रवेहान्त स्थितरश्मितोय प्रकाश प्रायात्यणवोऽष्टभिस्तै । कचाग्रमण्टौ खलु तानि लिक्षा तोभिश्च यूकाऽष्टभिरेवमुक्ता ॥१॥ यवोऽष्टयूकोऽङ्ग लमष्टभिस्तैराङ्ग लद्वादशभिवितस्ति । वितस्तियुग्मेन कर करधनुश्चतुभिरेको द्विसहस्रमुक्त ॥२॥ क्रोशस्तुतैबन्धुसमैहि योजन तोमवृत्त कथयन्ति सन्त । खव्योमपूर्णतुंनगेषु खोक्षि ग्रहाब्धि भूतत्त्वस्वपक्षचन्द्र ॥३॥ वि भा-रवे (सूर्यस्य) गृहान्त स्थितरश्मित (गृहाभ्यन्तरस्थितकिर- एत ) अय प्रत्यक्षीभूत प्रकाश आयाति तन यद्रज पालोक्यते, तैरटभि (अष्टभी रजोभि) अगवो भवन्नि, अष्टो अगव क्चान (केशाग्रम्) तान्यष्टौ लिक्षा, अष्टभिस्ताभि (अष्टलिक्षाभि ) यूका उत्ता, अष्टयूक (अष्टसख्यक्यूक) यव कथित , तरभि (अष्टसज्ञकयवै ) अङ्ग लम्, अङ्ग लद्वादगभि (द्वादशाङ्गले ) वितस्ति , वितस्तियुग्मेन (वितस्तिद्वयेन) कर (हस्त ) चतुर्भि कर एक धनु । तद्विसहस्र (धनु सहस्रद्वयम्) एक क्रोश उक्त (कथित ), ते (क्रोशं) बन्धु- समें (चतुभिस्तुल्यै ) एक योजनम् । तैर्योजन खव्योमपूर्णतुनगेपु खाक्षि ग्रहाश्वि. भूतत्त्व स्वपक्ष चन्द्र (१२२२५१४९२०५७६०००)व्योमवृत्त(सक्क्षावृत्तप्रमाण) सन्त पाधव ) कथयन्तीति ।। सिद्धान्तशेखरे श्रीपतिनैतत् सम्बन्धे एव कथ्यते । यथा वेश्मान्त पतितेषु भास्करकरेप्वालोक्यते यद्रज, स प्रोक्त परमाणुरष्ट गुणितस्तैरेव रेणुर्भवेत् । तर्वालाग्रमथाष्टभि क्चमुबलिक्षा च यूकाष्टभि , स्याताभिश्च तदाप्टवेन च यवोऽष्टाभिश्च तरङ्ग लम् ।। तै स्याद्वादशभिवितस्तिरुदितो हस्तश्च द्वाभ्या पुन- श्वाप हस्तचतुष्टयेन धनुपा क्रोश सहस्रद्वयम् । एक क्रोशचतुष्टयेन गदित साम्वत्सयोजन यक्षा भूग्रहिण्यबिम्बपरिधि व्यासादि सचिन्तयेदिति ।। अयादि प्रमाणार्यमाचार्यक्यनमेव प्रमाणमिति १-३ ।।
२०६ वटेश्वर-सिद्धान्ते हि. मा.-गृह के अन्दर पतिन सूर्य विरणों में जो रज देखने में प्राता है, उम आठ रज के एक असु प्रमाण होता है, आठ अणुप्रो से पंग का अग्न होता है, पाठ केयान से एक लिक्षा (लोख) होती है, आठ लिक्षा से एक यूका (ठील) होती है, अाठ यूवा से एक यव (जौ) होता है, आठ यव के एक अगल होता है, वारह प्रगल के एक वितस्ति (वीता) होती है, दो वितस्ति से एक हाथ होता है, चार हाय से एक घनुप होता है, दो हजार घनुष के एक कोश होता है, चार कोग से एक योजन होता है, उस योजन मान से १२२२५१४६२०५७६००० इतने व्योमवृत्त (खकक्षा) सज्जन लोग कहते हैं । सिद्धानशेखर मे श्रीपति इस विषय मे इस प्रकार कहते हैं । यथा "वेश्मान्त पतितेषु भास्वरवरेप्वालोक्यते यद्रज ।" इत्यादि अणु आदि के प्रमाणो के विषय मे आचार्य क्थन ही प्रमाण है ॥ १-३ ॥ खरक्षाप्रमाणाद्यर्थमुपपत्ति ।। आकाशे यन्मिते भागे सूर्यकिरणाश्चतुर्दिक्षुगच्छन्ति स भागो वृत्ताकारको भवति तस्यैव नाम खकक्षा, एतस्या प्रमाणज्ञानार्थकोप्यको गोलाकारको मणिही- तस्तस्य प्रकाश पृथिव्या चतुर्दिक्षु वृत्ताकारे गच्छति तस्य वृत्तस्य (मणिप्रकाशवृत्तस्य) व्यासार्ध परिधिप्रमाणञ्च मापनेन ज्ञातुं शक्यते गोलाकारमामार्धमपि मापनेन विदितमस्ति, ततो यद्य तावति गोलाकारमणेामाघे एतावान् मणिगोल- प्रकाशप्रसारो लभ्यते तदा सूविम्वव्यासाधे किमित्यनुपातेन समागच्छति सूर्य- विम्ब-किरणप्रसारप्रमाण खक्क्षा (खमाका क्खति घर्पति ग्रहो यावत्यल्पे तन्मितमाकाशखण्ड खकक्षेत्यन्वथं नाम) सज्ञकमिति, परमेतदानयन तदैव समी- चीन भवितुमर्हति यदा च मरिगगोलप्रकाशसूर्यबिम्वप्नकाशयो साजात्य भवे. त्तमापि व्यासार्धसम्वन्धन योऽनुपातोऽभिहित स न समीचीनो यतो "वृत्तयो फल- सम्बन्धो भवतीह सदा सम । तद्व्यासवर्गजातेन सम्बन्धेन विदा स्फुट" मित्युक्त्या व्यासार्धवर्गसम्बन्धेनानुपात कर्तव्यस्तदा समोचीन भवितुमर्हति, यदि च मणि- गोलप्रकाशसूर्यविम्वप्रकाशयोजात्य तदा व्यासार्धवर्गवशेनाप्यनुपातेन खकक्षाप्रमाण समीचीन न भवितुमर्हतीति ॥ अय खकक्षाप्रमाण किमाकारकमिति निस्प्यते। नव्यमतेनाऽकाशे रविकिरणद्वारा यावती तमोहानिस्तदाकार को हम इत्यंतदर्थ विचायतें । सूर्यो र्दीर्घवृत भ्रमति खकक्षाकृतिरपि तादृश्येव भवितु- महंति । प्राचार्योक्तेन खक्क्षाप्रमाणेन मूर्यवेन्द्रात्तमोहानिजनितवृत्तपर्यन्त यद्रेसा. प्रमाण तस्मिन् . दीर्घवृत्तबृहद्व्यासप्रमाण योज्यमधोभागेऽपि, एवं दीर्घ वृत्तलघुव्यास प्रमाणमप्यूर्वभागेऽधोभागेऽपि योजित यद खानमारा भवेदेत- वय (दीर्घवृत्तवृहद्व्यासयोजनेन, तथा दीर्घवृत्तलघुव्यासयोजनेन च यद्रसा- द्वय) तदवृदयास लघुव्यासञ्च स्वीकृत्य मन्निमितदीर्घवृत्त लक्षणस्थ दीर्घवृत्त. - 'मध्यमाधिकारः २०७ रचनाप्रकारेण यदि दीर्ववृत्तरचना क्रियते तदा रचितदीर्घवृत्ताकार एव तमो- हानिजनितमार्गो (खकक्षा) भवेत्परन्त्वनन्तदूरे स्थितत्वात्तत्र दीर्घवृत्त वृत्तमिव प्रतिभात्यतः प्राचीनाचार्यः खकक्षाऽऽकृतिवृत्ताकारैव स्वीकृतेति ।। भास्कराचा- येण "कोटिन नखनन्दपट्कनखभूभूभृद्भुजङ्गन्दुभि- ज्योति.शास्त्रविदो वदन्ति नभस. कक्षामिमा योजन।" इत्यादिना खकक्षामान कथ्यते, चतुर्वेदाचार्येणापि “द्विच्छिद्रपट्के- त्यादिना" भिन्नमेव तत्प्रमागमाचार्योक्तात्कथ्यते इति ॥१-३॥ हि.भा.--प्राकाम मे चारो ओर सूर्य का प्रकाश जितने भाग मे जाता है वह वृताकार है उसी का नाम खक्क्षा है, इस खक्क्षा के मानज्ञान के लिये, एक गोलाकार मणि लेते है। उसका प्रकाश पृथ्वी पर चारो तरफ वृत्त के रूप मे फैलता है, मापन से उस वृतका ब्यासार्ध और वृत्तपरिधिप्रमाण विदित हो जायगा, मणिगोल का भी व्यासाधु मापनद्वारा विदित है, तब अनुपात करते हैं मरिणगोल व्यासाधं मे मरिषगोल प्रकारा वृत्तपरिधिमान पाते हैं तो सूर्यविम्वव्यासाधं मे क्या इस अनुपात मे सूर्यविम्व प्रकाशवृत्त (खकक्षा) का ज्ञान हो जायगा । परन्तु इस तरह सकक्षा ज्ञान तभी ठीक हो सकना है जबकि मणिगोल प्रकाश में और सूर्यविम्ब प्रकाश में साजात्य होगा, यदि दोनो प्रकाशो में साजात्य नहीं रहेगा तब उक्त नियम से खक्क्षा ज्ञान नही हो सकता है । दोनो प्रकाशो मे सजातीयत्व मे भी व्यासार्ध पर से जो अनुपात किया गया है सो ठीक नहीं है क्योकि दो वृत्तो के फलसम्बन्ध दोनो वृत्तो के व्यासवर्ग के सम्बन्ध के वरावर होता है इसलिये व्यासाधंवर्ग से अनुपात करना चाहिये तव खरक्षा प्रमाण ठीक पा सस्ता है अन्यथा नहीं । इति । खकक्षा की प्राकृति (प्राकार) कैसी है इसके विषय मे विचार करते हैं । नवीन मत से सूर्य किरण द्वारा प्राकारा के जितने भाग को तमोहानि होती है उसका प्राकार कैसा है इस पर विचार करना है । मूर्य दीर्घवृत्त मे भ्रमण करते हैं, सक्क्षा का प्राकार भी उसी प्रकार का होना चाहिये । प्राचार्योक्न खकक्षा प्रमाण से सूर्यरेन्द्र से तमो- हानि जनित वृत्त पर्यन्त जो रेखा है उसका नाम है । उसमे दीर्घवृत्त वृहद्वधाम प्रमाण अवं और अधो भाग में भी जोडने से जो रेखा होगो उसको वृहद्वघास मान कर तथा दीर्घवृत्त के लघु व्यास को भी ऊर्ध्व भाग एव अधोभाग मे जोडने से जो रेखा होगी उमे लघुव्याम मान पर हमारी दीर्धवृतलक्षण पुस्तर की दीर्घवृत्त रचना प्रकार से जो दोवृत्त होगा वही तमोहानि जनित मागं (सरक्षा) होगा, परन्तु अनन्त दूर में रहने के कारण वहा दीर्घवृत्त-वृत्त के तरह मालूप होता है इसलिये प्रावोनाचार्य लोग खक्षा को वृताकार स्वीकार मरते हैं। भारतरावार्य मकसा मान के विषय में करते हैं कि "पोटिननंब-नन्द पट्वनगभू" इत्यादि वटेश्वराचार्योक्त में भिन्न है, चतुर्वेदाचार्य भी "द्विन्धिद्रपट्" इत्यादि में प्राचार्यो सकक्षा मान से भिन्न पहले है ॥ १-३॥
૨૦e वटेश्वर-सिद्धान्ते इदानी तस्या एवाऽवाशक्क्षाया सस्थानप्रकारमा । गगने गगनस्थावितयो वितयो नयत्प्रकुर्वन्ति । यावत्तादिह नभोद्दीप्तो भानवो भानो ॥४॥ हि भा-यावत् (यत्पर्यन्त) गगने (अाकाशे) गगनस्थावितय (आकाश- स्थोल्कादय ) वितय (दिग्दाहादय ) नय प्रकुर्वन्नि (इतस्ततो भ्रमन्ति) तावत् (आकाशस्य तद्भाग यावत्) भानो (सूर्यस्य) भानव (किरणा) नभोद्दीप्ता आकाशोज्जलीभूता ) भवन्ति अर्थादाकादशस्य यद्धायपर्यन्तमुल्कादिग्दाहादिक भवति तद्भागपर्यन्त सूर्यकिरणा गच्छन्ति, सूर्यकिरणा प्राकारो चतुर्दिक्षु यद्भाग- पर्यन्त गच्छन्ति स एव भाग खकक्षेति । इत पूर्व खकक्षामान कथितमाचार्येण पर का नाम खकक्षेति कथ्यतेऽनेन श्लोकेन, श्रीपतिनापि खकक्षासम्बन्धे इत्थमेव कथ्यते । यथा रविगभस्तिनिरस्ततमोनभ परिधियोजनमानमिद भवेत् । भास्करेगापीदमेव कथ्यते । यथा- दिनकरकरनिकरनिहततमस स परिधिरुदितस्तैरिति ॥ ४ ॥ हि मा---जहा तक प्रकाश में उल्का दिग्दाहादि परिभ्रमण होता है आकाश के उस भाग तन मूर्य की किरण अाकाश म उज्ज्वलीभूत होती है अर्थात् आकाश के जितने भाग तक उल्का दिग्दाहादि है उतने भाग तक सूय किरण जाती हैं, चारो तरफ आकाग मे भूयकिरणें जितनी दूर तक जाती हैं वहीं भाग खक्क्षा है । इससे पहले श्लोर मे सकक्षा- मान कहा गया है। परन्तु खकक्षा क्या है सो इससे प्राचाय कहते है । खरक्षा के विषय म थीपति भी इसी तरह कहते हैं । जैसे- रविगभस्तिनिरस्तमोनभ इत्यादि । भास्कराचाय भी यही कहते हैं- 'दिनकरवरनिकरनिहत इत्यादि ॥ ४ ॥ इदानी कक्षाप्रकारेण ग्रहानयन वक्तु खक्क्षानयन ततो ग्रहकक्षानयन कुवन भकक्षानयन चाह । रविशशियुगघात खाक्षिभक्त खकक्ष्या शशिभगणहता वा दिनचक्रस्प लिप्ता : निजभगएविभवता साग्रहस्य स्वकक्ष्या भवति खरसनिघ्न सूर्यकक्ष्या भकक्ष्या ।।५।। विभा-रविशशियुगपात खाक्षिभक्त (विशतिहत ) सक्क्ष्या भवति, वा (अथवा) दिग्नचक्रस्य लिप्ता ( दशगुणितस्ववक्षाकला ) शशिभगणता (चन्द्रभगरणगुरिगता) निजभगणविभक्ता (चन्द्रभगरणभक्ता) तदा सा रहस्य स्ववक्ष्या (ग्रहकक्षा) भवति, सरमनिना, (पष्टिगुणिता) सूर्यवक्ष्या, भवक्ष्या (नक्षत्रकक्ष्या) भवनीति । एतेनाऽचार्येण श्रीपतिनापि खकक्ष्या इत्यादि पथ्यते भास्करदिभि कक्ष्यास्थाने वक्षा क्थ्यते यथा खवक्षा, भक्क्षेत्यादि ।।५।। अनोपपत्ति । प्रथ ३ चभगण% भक्क्षा । तथा ६०४ रविरक्षा-भक्क्षा मव्यमाधिकारः २०६ % 3D A : ३ चभगरण-६०४ रविकक्षा तत ३ च भगरण चभगरण रविकक्षा- २० पर खकक्षा-रविकक्षा रविभगण अत चभगण रविभगण =खकक्षा २० अत्र रविशशियुगघात (रविचन्द्रयुगभगणघात) बोध्य । "ब्रह्माण्डमेतन्मितमस्तु नो वा कल्ये ग्रह कामति योजनानि । यावन्ति पूर्व- रिह तत्प्रमाण प्रोक्त खकक्षास्यमिद मत न" इति भास्करोक्त्या ग्रहभगण Xग्रह- कक्षा-खकक्षा, अत चन्द्रभगण चन्द्रकक्षा= खकक्षा, तेन ग्रहभ ग्रहक = चन्द्रभगण चकक्षा चभगए चकक्षा = ग्रहकक्षा, अन १० च भगण = चन्द्रकक्षा। ग्रहभगरण तया ६०४ मूर्यकक्षा=भकक्षा अत्रागम एव प्रमाणमत उत्पन्नम् ॥५।। हि भा --रविचन्द्रभगण घात को बीस से भाग देने से खकक्ष्या होती है। दमगुरिणत खकक्ष्या कला को चन्द्रभगण से गुणकर अपने भगण (ग्रहभगण) से भाग देने से ग्रहकक्ष्या होती है । सूर्यकक्ष्या को साठ से गुणने से भकक्ष्या होती है। वटेश्वराचार्य और श्रीपति भी पक्ष्या कहते हैं, जैसे भकक्ष्या, खक्क्ष्या इत्यादि, लेकिन भास्कराचार्यादि उसको कक्षा कहते हैं जैसे भकक्षा, खकक्षा इत्यादि । उपपत्ति । ३ चभगण-भकक्षा तथा ६० रविक्क्षा= -भकक्षा ३ चभगए . ३ चमगण=६० रविवक्षा इसलिये चभगरण २० -रविवक्षा परन्तु खकक्षा रविकक्षा X रविभगण इसलिये चभगण + रविभगरण =खक्क्षा २० यहा रविशशि युग घात से रविचन्द्र के युग भगण का गुणनफल समझना चाहिये । ब्रह्माण्डमेतन्मितमस्तु नोवा क्ल्पे ग्रह कामति योजनानि । यावन्ति पूर्वरिह तत्प्रमाण पोक्त सरक्षास्यमिद मत न" इस भास्वरोक्ति से ग्रहमगरण ग्रहनक्षा-सवक्षा एव चन्द्रभगए चकक्षा-खक्क्षा..ग्रभXप्रक्षाचभ चक्क्षा चभचक्क्षा इसलिये -ग्रक्क्षा, यहा १० चभगरा-चक्क्षा ग्रभ तथा ६०४ सूर्यवक्षा= भक्क्षा इममे पागम हो प्रमाण है । इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुमा ।।
२१०
वटेश्वर सिद्धान्ने
इदानी भवक्ष्याववक्ष्यादिसम्बन्ये पुनरप्याह ।
सखनगमुनिभक्ता वा खकक्ष्या भकक्ष्या निगुण विधुभसंघो वोडुवृत्तं प्रदिप्टम् ।
नखहतरविवर्षश्चन्द्रकक्ष्या हिमाशो खहृतपरिवतस्वितो धाम घाम ।। ६ ।।
विभा-अथवा खक्दया स्वसनगमुनि (७३००) भवता (हृता) तदा भक्ष्या
भवति, वा निगुण विद्युभसद्ध (निगुणितचन्द्र भगरण ) उड वृत्त (नक्षत्रवृत्त
भवक्ष्या वा) प्रदिष्टम् (कथितम्) नखहृतरविवर्षे (विंशतिमूर्यभगरण) चन्द्रवक्ष्या
भवति । हिमाशो (चन्द्रस्य) नखहृतपरिवर्ते (विशतिगुणितभगरण) भास्वत
(सूर्यस्य) घाम धाम (किरणमन्दिर सूर्यकिरणावरणपरिधिति) ।।६।।
अस्योपपत्ति ।
= भकक्षा । कक्षाप्रमाण पठितमेवास्ति तेन सक्क्षा
=भक्क्षा
'पठिताङ्क
भक्क्षा
अथवा ३४चभगरण=भवक्षा। यत
चभगण
रविभगरण
= चन्द्ररक्षा । २०४ चन्द्रभगरग= सक्क्षा इति सर्व परीक्षणीय
२०
वस्तु विद्यते, सर्वेषा पठिताङ्कान सगृह्य द्रष्टव्य यदिति भवति नवेति ।।६।।
हि भा-अथवा खकक्षा को ७७०० इतने से भकक्ष्या होती है वा निगुणित चन्द्र-
भगण भक्क्ष्या होती है । बीस से भक्त रविभगए चन्द्रवक्षा होती है। बीस गुरिगतचन्द्र-
भगरा सूय किरणावरणपरिधि (सक्क्षा) प्रमाण होता है ।
उपपत्ति ।
= भकक्षा । खकक्षा प्रमाण विदित है इसलिये
पठिताङ्क
सक्क्षा
-
७७००
साक्षा
वकक्षा
=भवक्ष्या।
७७००
अथवा ३Xचभगण-भक्क्षा । यत
भक्क्षा
चभगए
रविभगरण
- चक्षा । २०४चभगण खक्क्षा, यहा चन्द्रभगणादि का मान लेकर
२०
गणित द्वारा इसयो देखना चाहिये ।। ६ ॥
इदानी प्रहाणा कक्षा भवक्षा च निदिशति
पञ्चाशोननगाङ्गतुनगगजनापाक्षियोजन नो ।
कक्ष्या शशिनो दिग्घ्ना भगरणा कलाधररिणतनयस्य ॥७॥
नेत्रवसुरविहुताशनजलधिशरै षड्भुजङ्गश्च ।
भूमिख यमान्धि धराधरशराशकैश्च शशधरसुतस्य ।।८।।
नेत्रागवेदसायकयमर्तुभिजित समुद्रशशिचन्द्रः ।
सुरशरखाङ्गाक्षिलवहिरसुरगुरोर्योजन कक्ष्या ॥६॥
नवखेषु खतत्त्वद्वित्रिभिरणेघराभ्रजलधियुगवगैः ।
शिवनेत्राटकुभागजिनवेदागधरणिधरचन्द्रः ॥१०॥
मध्यमाधिकार. . रविकुशरैः सप्ताग्नि स्तम्भेरम दिग्नवर्भू गुसुतस्य । रविजस्य खनगचन्द्रशराशेषु गजः खचन्द्रवसुचन्द्रः ॥११॥ पर्वतदिनसमायोजनसख्याभचक्रवृत्तस्य । वसुगगनाभ्रनभोग द्विव्यगचन्द्र : समस्तस्य ॥१२॥ एपामर्था स्पष्टा एवेति । कथमेपा रव्यादीना ग्रहाणा नक्षत्रस्योपर्युक्तानि कक्षामानानि सन्ति तज्ज्ञा नार्थं युक्ति स्पष्ट वास्ति, यत पूर्व सर्वेपा भगरणा पठिता सन्ति । पठितभगणः खक्क्षामितानि योजनानि लभ्यन्ते तदैकेन भगोन कि खकक्षा ममागमिप्यति ग्रहक्क्षामानम् - एतेनैव नियमेन सर्वेपा ग्रहाणा ग्रहभगण कक्षामानानि समानेतु शक्यन्ते यानि चोपरि लिखितानि सन्ति, परमेतमाचार्योक्तानि कक्षामानानि भाष्करादिकथितग्रहकक्षामानेभ्यो भिन्नानि सन्तीति प्रत्यक्षमेवा- स्तीति न कक्षायोजनमानपाठोऽपि समोचीनोन प्रतिभातीति । ७-१२।। हि भा-इन सब के अर्थ स्पष्ट ही हैं रव्यादि ग्रहो को और नक्षत्र की क्यो इतनी कक्षामिति है इसके ज्ञान के लिये युक्ति सरल है । पहले सब के भमरण पठित है, इसलिये पठितभगए मे खकक्षा योजन पाते हैं तो एक भगण में क्या इस अनुपात से ग्रहनक्षमान आ जायेंगे --ग्रहकक्षा इस नियम ग्रह गए से सब यहो के पक्षामान तथा नक्षत्र कक्षामान ला सकते हैं जो कि ऊपर लिखित हैं। पर इनके पठित ग्रहक्षामान तथा नक्षत्र कक्षामान भास्करादि पठित ग्रहादि कक्षामान से भिन्न है कक्षायोजन मानो का पाठ भी समीचीन नहीं मालूम पडता हैं ।।७-१२।। इदानी ग्रहाणामेकादिनयोजनगत्यानयन गनयोजनानयन चाह । वव हैः खकक्ष्या विहृता ग्रहाणा गतिस्तदिष्टधु गणाहतिः स्युः। ग्रहोपभुक्तानि तु योजनानि खवृत्तमाना गरणाहतेर्वा ॥ १३ ॥ विमा-बक्क्षा (पूर्वोक्ता) क्वहै (युगकुदिन ) विहृता (भक्ता) तदा- ग्रहाणा गति (योजनगति ) स्यात् तदिष्टद्युगणाति (योजनगत्यहर्गणघात ) ग्रहोपमुक्तानि योजनानि (ग्रहगतयोजनानि) स्यु । वा (अथवा) खवृत्तमानधुगरणा- हते (सक्क्षाहर्गरणघातात् क्वहैर्भक्तात्) ग्रहगतयोजनानि स्युरिति ॥१३॥ अस्योपपति.। यदि युगकुदिन. खक्क्षा योजनानि लभ्यन्ते तदैवेन दिनेन रिमित्यनुपातेन समागच्छति गतियोजनम् == ततोऽनुपातो यद्य केन दिनेनेः गनियोजन कुदि' लभ्यते तदाऽहणेन मिमिति समागच्छति गतयोजनम् -गतियोजन महर्ग खकक्षा खरक्षा १
२१२
वटेश्वर-सिद्धान्ते
सक्क्षा अर्गण
=गतियोजन ग्रहगरण, वा
=गतयोजन
एतावताऽऽचार्योक्तमुपपन्नम् ॥
श्रीपतिनाप्येतदेव कथ्यते "कल्पभूदिनहताम्वरक्क्षा स्याद् ग्रहस्य खलु यो
जनमुक्तिः । तद्गुणाद्दिनगरणाद् द्यु चराणां योजनानि हि गतानि भवन्ति ।
खकक्षया वा निहतो छु राशिः क्वहैविभक्तो गतयोजनानोति"
भास्करेणापि "कल्पोद्भव. क्षितिदिनगगनस्य कक्षा भक्ता भवेदिनगतिर्ग-
गनेचरस्ये" त्यादिना तदेव कथ्यते। श्रीपतिना भास्करेण च कल्पसम्बन्धेन कथ्यन्ते
एतेनाचार्येण (वटेश्वरेण) युगसम्बन्वेन कथ्यते । एतावदेवान्तरमिति ।। १३ ॥
हि भा-खकक्षा को दुदिन से भाग देने ले ग्रहो की योजन गति होती है।
उसका भौर महर्गण का घात करने से गतयोजन प्रमाण होता है । अथवा यह गतयोजन-
मान खक्षा और महर्गरण के घात मे कुदिन से भाग देने मे होता है ॥ १३ ।।
सक्क्षा
उपपत्ति
यदि युगबुदिन मे सकक्षा योजन पाते हैं तो एक दिन में क्या इस अनुपात से गति
योजन प्रमाण पाया, -ग्रहगतियोजन । फिर अनुपात करते हैं । यदि एक दिन में
कुदि
यह गति योजन पाते हैं तो अहर्गरण में क्या इम मनुगत से गतयोजन माया,
गतियोजन x महर्गण = गतियोxमहर्गरण वा
सक्षा महर्गरण ... गतयोजन । इमसे
१
कुदि
प्राचार्योक्त उपपन्न हुमा ।
श्रीपति भी मिसान्तदोखर में ये ही याते रहते हैं।
कलाभूदिन हृताम्बर कक्षा स्याद् ग्रहस्य खलु योजनभुक्ति । तद्गुणाद् दिनगणाट्य-
चराणा योजनानि हि गतानि भवन्ति ।। सक्क्षया वा निहनो दुरासि . हैविक्तो गनयोजना-
नीति । भास्कराचार्य भी सिद्धान्नगिरोमणि मे "बल्लोद्भवं क्षितिदिनंर्गगनस्य चक्षा भक्ता
भवेददिनगनिर्गगजेच रस्त्यादि" मे उमी विषय को कहते हैं, श्रीपति और भास्कराचार्य कल्प
सम्बन्ध में रहते हैं भौर वटेश्वराचायं युगसम्बन्ध से कहते हैं, इतना ही अन्तर है ॥१३॥
इदानी ग्रहाणामेरदिनयोजनगति मस्यया निदिदाति
शरगुरणारेषु वसुरसखंरगधरः सेनत्त द्विनमोगः ।
शरखनवागयुक्त योजनमुक्तिहस्य सर्वस्य ॥१४॥
हि.भा-प्रहाणा योजनात्मरगति प्रमाण 'शरगुणशरेषु वसुरमवरणपररि-
यादिना, कथ्यते, इय योजनात्मकगति. सर्वेषा ग्रहाणा तुल्यैव भवति, इति ॥१४॥
मध्यमाधिकारः : खकक्षा उपपत्तिः। खकक्षा पूर्व योजनात्मकगतिप्रमाणमानीत -योजनात्मकतिः पठिताङ्क कुदि एतयोः स्थिरत्वात्सर्वेषां ग्रहाणां योजनात्मगति: समंव भवितुमर्हति, कला- त्मिका गति. सर्वेषा ग्रहाणामतुल्या भवति, श्रीपतिनापि "तुल्या गतियोजनवम- नेपां लिप्ता प्रकृत्या मृदुशीघ्रभावः, सिद्धान्तशेखरे प्रतिपादितम् । भास्कराचार्येणागि "समागतिस्तु योजनैनभः सदा सदा भवेत् । कलादिकल्पनावशान्मृदु द्रुता च सा स्मृते" त्यादिना तदेव कथ्यते इति ॥१४॥ हि.भा.शरगुणशरेषु इत्यादि से ग्रहो को योजनात्मकगति प्रमाण कहते है ॥१४॥ उपपत्ति खकक्षा पहले योजनात्मकगति प्रमाण लाया गया है, योजनात्मक गति कुदि ==पठितास, इसमे सकक्षा, युकुदि इन दोनो के स्थिर रहने के कारण हर एक ग्रह की योजनारमक गति प्रमाण वरावर होगा, हर एक ग्रह का योजनात्मकप्रति प्रमाण अनुपात से यही पाता है कुदि सिद्धान्तशेखर में श्रीपति भी यही विषय कहते हैं तुल्या गतिर्योजनवमनपा निप्ता प्रकृत्या मृदुशीघ्रभाव. । भास्कराचार्य भी इस बात को कहते हैं । "समागतिस्तु योजनेर्नभ सदा सदा भवेत् । पलादि कल्पनावशादित्यादि" इति ॥१४॥ एव साधनान्यभिधाय कक्षाप्रकारेण मध्यग्रहानयनमाह अभीष्टखेटपर्ययरसूनि तानि माजयेत् । खवृत्तियोजनम्रहः स एव पर्ययादिक ॥१५॥ वि. मा-अभीष्टखेटपर्यये. (इष्टग्रहभगण ) तानि असूनि भाजयेत्तदा यो हि ग्रहो भवति स एव खवृत्तियोजन (खकक्षायोजन) पर्ययादिक. (भगणादिक ) ग्रहो भवेदिति ॥१५॥ अस्योपपत्तिः। यदि सकक्षायोजन ग्रंहभगणा लभ्यन्ते तदा गतयोजनः किमित्यनुपातेन ग्रभरगतयो भगणादिमध्यमस्तत्स्वस्पम् खक गतयो गतयो =ग्रहक्क्षा. पक ग्रहका यतः खक ग्रम एतावताऽऽचार्योक्तमुपपनम् ।
हिमा २१४ वटेश्वर-सिद्धान्ते श्रीपतिनापि "स्वकक्षया वा गतयोजनानि हृतानि मध्या भगणादिका स्यु । इत्यादिना सिद्धान्तशेखरे तदेव प्रतिपादितम् ॥१५।। '–इष्ट ग्रह भगण मे गतयोजन में भाग देना, उस पर से जो ग्रह पाते हैं वही खकक्षा योजन से मध्यम ग्रह भगरणादिक होते हैं ॥१५॥ उपपत्ति । यदि खकक्षा योजन मे ग्रह भगण पाते हैं तो गत योजन में क्या इस अनुपात से ग्रभरगतयो गयो भगणादि मध्यमग्रह पाते हैं गयो खक खक प्रक्क्षा ग्रभ इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुग्रा । सिद्धान्तशेखर मे ‘स्वकक्षया दा गतयोजनानि हृतानि मध्या भगणादिका स्यु" इत्यादि से उमी विषय को कहते हैं ॥१५॥ पुनरपि ग्रहानयनमाह । योजनानि निजकक्ष्ययाऽथवा भाजितानि भगरणादि खेचरः। व्योमवृत्तगुरिणतयुराशितो माजिताद्धि कुदिननकक्ष्यया ॥१६॥ विभा-अथवा योजनानि ( गतयोजनानि) निजकक्ष्यया ( स्वकक्षा- मित्या) भाजितानि (भक्तानि) तदा भगणादि खेचर (भगरणादि ग्रह) भवेत् । व्योमवृतगुणिताराशित (खकक्षागुणिताहगंणात्) कुदिनघ्नकक्ष्यया (कुदिन- गुणितस्वकक्षया) भाजितात् (भक्तात्) वा भगणादिग्रहो भवेदिति ।।१६।। अस्योपपत्ति । गतयोजन पूर्वमेव सिद्ध यत्- =भगरणादि मध्यमग्रह । पर- ग्रहकक्षा बुदि खकक्ष महर्गरण =भगणादिमग्र । अत उपपन्नमाचार्योक्तम् । बुदिX ग्रहकक्षा हि भा-मथवा गत योजन को अपनी वक्ष्या से भाग देने से भगणादिग्रह होत हैं । वा रक्षा मुरिणत पहाण मे दुदिन गुणित ग्रहनक्ष्या से भाग देने से भगगादि ग्रह होते हैं ॥१६॥ खकक्षा ग्रह -गतयो . उपपत्ति । गतयोजन पहले सिद्ध हुमा कि -=भगणादिमध्यम ग्रह । ग्रतक्षा खरक्षा महाग परन्तु गतयो : सकक्षा महर्गण दुधि इममे प्राचार्योत उपपन्न हुमा ।।१६।। % 3D बुदिX ग्रहह्व -भगणादिन।
मध्यमाधिकारः २१५ युगे ग्रहा कियन्ति योजनानि भ्रमन्तीत्याह । भवृत्ततुल्यानि हि योजनान्यमी व्रजन्ति पूर्वाभिमुखं स्ववृत्तगाः। इनात्मषष्ट्या समगा दिवौकसः खवृत्ततुल्यानि युगस्य वत्सरः ।।१७।। वि. मा.-स्ववृत्तगाः (स्वकक्षास्थिता.) अमी (ग्रहा.) पूर्वाभिमुख भवृत्त- तुल्यानि (क्रान्तिवृत्तप्रमाणानि) योजनानि व्रजन्ति, इनात्मपष्टया (एकदिनेन) दिवौकसः (ग्रहा.) समगा. (समगतिकाः) भवन्ति, युगस्य वत्सर. (युगवर्षे.) खवृत्ततुल्यानि योजनानि वजन्तीति । एतेनेदमेव कथ्यते यदेकभगणे योजन मानेन स्वकक्षाप्रमितं ग्रहचलन भवति, एकदिने च योजनात्मकगतिः सर्वेपा तुल्य. भवति, युगवर्षे खकक्षायोजनमितं ग्रहचलनं भवतीति ।।१७।। हि.भा.-अपनी कक्षा में पूर्वाभिमुख चलते हुए एक भगण पूरा होने पर अपनी कक्षा- स्थित योजन के बराबर चलते हैं । एक दिन मे ग्रहो के योजनमान से चलन (योजनात्मक गति) बराबर है। और युगवर्प मे ग्रहो के चलन योजनमान से खकक्षा योजन के बराबर होता है ॥१७॥ बुधशुक्रयो. कक्षाविषये विशेषमाह । रविभगरणहता बुधसितचलकक्ष्यायोजनयुगाब्दाः स्युः । बुधसितयोर्यत एवं लिप्ता भोगतोऽनयोः सौर. ॥१८॥ विमा बुधसितचलकक्ष्यायोजन (बुधशकशीघ्रोच्चकक्ष्यायोजन ) रवि भगणना ( रविभगणगुरिणताः ) तदा युगाब्दा. स्यु (युगवरिण स्यु ) यतः (यस्मात् कारणात्) अनयोर्बुधसितयो (बुधशुकयो ) चलकक्ष्याया (शीघ्रोच्चकक्षाया) भ्रमतो. एव सौर. (सूर्यसम्बन्धि) लिप्ता भोगतो भवत्यर्थावुधशुक्रयो कलात्मक- भोग शीघ्रोच्चकक्षाया रविगत्यैव भवतीति ॥१८॥ अस्योपपत्ति । बुधशुक्रयो. युग भगण कक्षा>खकक्षा तथा वुधशुक्रशोधोच्चयो. युगभगण कक्षा-स्वरक्षा अन्यग्रहाणा शीघ्रोच्चाना तु युभ ४ कक्षा >< पक्षा खकक्षा अतोऽय इति स्वकक्षासमं न भवति, तदोचाना शुद्धमानयन न युगभगए भविष्यति । पर येपा कक्षा शुद्धाऽगता तेषा तच्छुद्धक्क्षावलम्वेन यथा शुद्धमा- नयनं भवति तथात्राप्येतदसुद्धक्क्षावलम्वेनैवैतेपामपि मुद्धमानयनं कर्तव्यमिति चेत्तदा पल्प्यता तावदगुद्धपक्षायामेव भ्रमण तदा सक अहर्गरण अगएस युकु सरक्षा, पुनरनुपातः 3 वटेश्वर-मिद्धान्ते -- % 3D १ भगण x अहर्गरण सखक सकर अहर्गरण ४१ भग -ग्रहगणस खक्क्षा जनित अशुद्धकक्षा युकुमशुद्धक भगणादिग्रह खवक्षा परन्तु अशुद्धोच्चक्क्षा उत्थापनेन युगोच्चभ खकक्षा ग्रह युउभ४१भगरण ग्रह युउभ अहर्गरणस उच्चभगरणादिन खकक्षा यु युकु अनाशुद्धमूलभूतखकक्षयोईरगुणकयो शेऽन्तिमस्वरूपे दोपाभावाच्छुद्धमेवानयन जातम् । एव बुधमुक्योरप्यशुद्धावलम्वनमेव शरणम् । पर युरभ = यूवुभ = युसुभ मर=मवुमशु इति दर्शनात् -=वुकक्षा= शुक= रकक्षा इति ग्रहण कृत्वा पूर्वोक्त्या युदुभ युगुभ युरभ रव्यानयन कार्य तदा तत्तुल्यावेव मध्यमौ बुधशुक्रो भवेताम् । पर वास्तवावेता- वनन्तरोक्तरीत्याऽनेतव्यो तदा स्वस्वशीनोच्चवक्षाया रविगत्या तो भ्रमत खकक्षा खक खक 3D इति ॥१८॥ इसलिये यहा खक हि भा--बुध और शुक्नशीघ्रोच कक्षा योजन से रवि भगण को गुणने से युगवर्ष होत हैं क्योकि अपनी शीघ्रोच्च कक्षा म भ्रमण करते हुए बुध और शुक्र का क्लात्मक भोग सूयमम्बन्धी है अर्थात् शीघ्रोच कक्षा म उनके भ्रमण रविगति से होता है ।।१८।। उपपत्ति । बुध और शुक्र के युग भगण कक्षा > सकक्षा तथा वुध को शीघ्रोच के युग भगण - कक्षा=खकक्षा अन्य ग्रहो के शीघ्रोच के युगभरक्षा >< खकक्षा -यह स्वकक्षा के बराबर नहीं होता है । तव तो उच्चो का शुद्ध पानयन युभगण नही होगा, लेक्नि जिनकी कक्षा शुद्ध पाई है उन सव के शुद्ध कक्षावश जिस तरह शुद्ध मानयन होता है उसी तरह यहा भी अशुद्ध कक्षावश मे इन सव का शुद्ध आनमन करना चाह्येि, यह यदि अाग्रह है तब तक अशुद्ध रक्षा ही में भ्रमण स्वीकार कीजिये तब खक X महर्गण = अहर्गणस खकक्षा, फिर अनुपात कीजिये युकु १ भगरा अहर्गरस खवक्षा खकक्षा महा ४१ भगण प्रसुद्धकक्षा युकुमशुद्धक अगरणस खकक्षा जनित भगणादिन परञ्च युगोच्चभ =प्रमुख उच्चकक्षा, उत्थापन देने से खक महXयुउभX१ भगण, युउमरग्रह सकक्षायु अहर्गण म उच्च भगणादिन युग इस तरह शुद्ध ही मानयन होगया । इम तरह बुध मौर शुक्र के लिये भी प्रमुख का अवलम्बन करना ही शरण है। खकक्षा -- "मध्यमाधिकार परन्तु युरभ-युवुभ युसुम :मर= मवुमशु सम खक -बुकक्षा-सुरक्षा रविवक्षा इस पर से रवि युवुभ युशुभ युरभ का पानयन करने से रवि हो मध्यम बुध और शुक्र होगे । अर्थात् अपनी अपनी गीघोच्च कक्षा में रविगति से भ्रमण करते हैं यह सिद्ध हुमा ॥१८॥ इदानी कुजगुरुशनीना विशेपमाह । चलकक्ष्याया भ्रमतोः कुजगुरुशनैश्चराः कक्ष्याः । इतरमगरगाहता अध्वा तच्छोघ्राणामतश्चार्फ ॥ १६ ।। वि.भा-चलकक्ष्याया भ्रमतोनियस्य पूर्वश्लोकेन सम्बन्ध । कुजगुरुशन श्चरा कक्ष्या (मङ्गलवृहस्पतिशनैश्चरकक्ष्या ) इतरभगरणाहता (भिन्नभगरण- गुरिणताः) तदा खक्क्षामान भवति, अतः कारणात् तच्छीघ्राणा (तेपा शीघ्रोद्वाना) अध्या (मार्ग) अर्क (रवि) भवतीति ॥ अस्योपपत्तिः पूर्वश्लोकोपपत्त्यन्तर्गता बोध्या । हि भा-मङ्गल, बृहस्पति, शनैश्चर इन मव की पक्ष्या को दूसरे ग्रहभगण से गुणने से कक्षा के मान होते हैं इसलिए उन सव की शीघ्रोच्चमार्ग रवि (रविकक्षा) है। इसकी उपपत्ति पूर्वश्लोक' को उपपत्ति मे दिसलाई गई है ॥ १६॥ शशिज-शुक्राक-महीसुताङ्गिरः शनैश्चरार्माणि यथाक्रम क्षितेः । ऋः परित्याप्तसुरक्षसां पुरि भ्रमन्नि तिर्यक वितरे हि भूतले ॥२०॥ विना-शशिज्ञ शुक्रामहीसुताङ्गिर शनैश्च राक्षाणि (चन्द्र बुध शुक रवि- कुजगुरुशनश्च रनक्षनारिण) यथाक्रम क्षिते (पृथिव्याः) उपरिस्थितानि सन्ति, अर्यात्पृथिवीत उपरि ऊर्ध्व मेण स्वस्वकक्षाया पूर्वोक्तग्रहनक्षनापि सन्ति, ऋक्ष परिष्यातसुरक्षसा पुरि ( राक्षसव्यालङ्कानगाँ) वितरे भूतले (पृथिवीभिन्न- घरातले) तिर्यक् (निर्यपेरण) भ्रमन्तीति ॥ शशिज्ञशुक्राळदीना कयमीहरूपेरण तदवस्थितिस्तत्वारण मङ्गलश्लोक एव प्रदिपादितमतस्ततव द्रष्टव्यमिति ॥२०॥ हि भा-~चन्द्र बुध शुक्र रवि मगर बृहस्रति शनैश्चर और नक्षत्र यै मर पृषिको से कार पृथ्वी को चारो तरफ गिनवी कक्षा घेरे हुए हैं उसमे (पक्षावृत्ती में) स्थित है । जो ग्रह और नाम नवापुरी में पृथिवी से भिन्न धरातलों में भ्रमण परते हैं। चन्द्र बुध शुक्र रवि मङ्गलादि ग्रहो की स्थिति जिम प्रम में लिसी गई है उसमे क्या यारण है सो मङ्गलालोक ही में परिणत है इमलिये ये वा] वही पर देखनी चाहिये ॥२०॥ इदानी दिनपतिमामविरंपनिहोरापतिमानायं विधीनाह होरेश्वराः सप्त निश्चराद्या पयाम शीघ्रजवाश्चतुर्यः । दिनाधिपः सापनमासनायः स्यात्सप्तमोऽन्दाधिपतिस्मृतीयः ।। २१ ॥
२१८ वटेश्वर-सिद्धान्ते विधोर्ययोध्छ धुपतिस्तु पञ्चमो भवेच्च पष्ठोऽन्दपतिस्तु सावन । अनन्तरो मासपतिश्च सप्तमो भवेच्च होराधिपतिर्ययात्रमम् ।। २२॥ वि भा-शनैश्चराधा यथाक्रम शीघ्रजवा (कक्षामेरा स्थिता दानश्च रादि ऋमिक्शीघ्रगतिका ) सप्तग्रहा होरेश्वरा (होराधिपतय ) स्यु । चतुर्थो दिनाधिपति (बारेश), सप्तम सावनमासनाथ (सावनमासपति ) तृतीय अब्दाधिपति (वर्षपनि ) भवेत् । विधो (चन्द्रान्) यथोध्वं (उर्वनमेग) पञ्चमो धे पति (दिनपति ) पष्ठ सावनोऽन्दपति (सावनवयुग ), अनतर (चन्द्रादूर्व- अमिक) मासपति (मासेश) अत्र भवेच्च सप्तम होराधिपरिश्च यथानम भवेदिति ।। २१-२२ ॥ यथा क्क्षात्मेणापर्युपरिस्थिता शनैश्चरतोऽघ प्रमेण, चन्द्रत उपरिक्रमेण सप्तम श्चन्द्रादयो ग्रहा हारेशा सप्तमो ग्रहो होरेश्वर चन्द्र शनि वुध वृहस्पति (गुरु) शनैश्वर शुक्र मङ्गल रवि रवि मङ्गल मङ्गल शुक्र रवि बृहस्पति (गुरु) बुध दानश्वर । चन्द्र बुध निश्चरातोप चद्रत उपरिक्रमेण गर्नस्त्ररतोयोग्य मोमत उपरिक्रमेण प्रहा कमेण चतुर्यदचतुयो पञ्चान्तरितग्रहा मेगा मप्नम माराम दिनपति दिनपतय सप्तमो भामेश बानि सोम सानि सोम मङ्गल बुध सोम बुध वुध गुन खुज वृहस्पति (गुरु) शुक्र रवि बुध गुन राव गुर शनि मङ्गल गुन शनन्धर गनेश्वरतोय अमेण तृतीयस्तृतीयो चन्द्रत उपरिक्रमेण पप्ठ पछा ग्रहो यश्वर । ग्रहो वश । गानि सोम मङ्गल. गुरु रविः रवि सोम .
बुध । - मध्यमाधिकार २१३ सोम बुध मनश्चर रवि शुक्र एतेनाचार्येण होराधिपति मासपति वर्षपत्याद्यर्थ क्यमोहनी गणना ना तत्र युषित वेत्यर्थम् अनोपपत्ति रादयधम्होरा, तेन मेपादितो राशीना यादृश्यवस्थितिस्ताश्येव होग एामपि भवेन ग्रहरक्षास्थित्या यस्य ग्रहस्य कक्षा सर्वोध्धंगता स एव ग्रह प्रथमहोरे- शो भवितुमर्हति तेन सर्वोध्वंक्षाया गनेश्वरस्य स्थितत्वात्प्रथमहोरेग स एव भवेत्, दितीयादिहोरेशास्तु तस्मादधोध कक्षाम्थग्रहा भवितुमर्ह त्यत एतदनु- सारेण शनि गुरु मङ्गल राव शुक्र बुध चन्द्रा प्रथमादि होरेशा, मियन्त्यत होरेश्वरा सप्तरानेश्वराद्या यथानम शीघ्रजवा , प्राचार्योक्तमिद युक्तियुक्तम् अथच होरामानम् =२३ घटी, मध्यममानेनाहोरायप्रमाणम् =६०, तेनाहाराने होरासस्या -२४ होरेश ग्रह सरया=७, सेन होरम -२४ प्रभ भजनाच्छप- मानम् =३=गत होरेगा , तदग्रिमे दिने प्रथमहोराधिपतिश्चतुर्थग्रहो भवेत्म एव च दिनाधिपतिरपि प्रपमाधिकारपरिपूर्णत्वादत चतुर्थो दिनाधिप' प्राचार्योवत युक्तिसङ्गतम् । वश विचारायं वारम्भे यो दिनपति स एव वर्षपतिरपि भवनि तेनैव- सायनवर्षदिनसस्याया सप्तभवताया शेपम्-३, (एयमावनवपदिनमस्या ३६० दि) प्रत प्रत्येक वर्षे गतदिनाधिपतयस्त्रय , तदग्रिमवारम्भे गावगाच- तुर्थग्रहो दिनपतिर्भवति, अयोध पक्षास्थिनिवगात्म च चतुर्वग्रहस्तृतीया भवत्यत 'पदाधिपतिस्तृतीय' प्राचार्योस्तमिद तामति । मासेश्वरविचारार्थम् 'मावनमासनाप स्यात्मप्तम' इत्यागार्योत शोमन नप्रतिभाति। सूर्यसिखातेऽपि-'मन्दादघनमेण स्युचतुर्या दिवसाधिपा । वर्षाधिपतयस्तद्वत्तीया पग्निोतिना ॥ जया मेगा मशिनो मामानामधिपा स्मृा । होरेशा मूतनपादयोग्य प्रमगनपा ।। पूर्वपपिनवटेश्वराचार्योक्न मानेसर मानविधि मिसानोपा समान. विध्यो पाप म्पष्टमेवान्ति पर 'विषापयो पनिरि' स्यादी मामेश्वर गणनाम गूमिलानपारोतिमहा एय। "पष्टो.सपनिम्नु सायन-प्रा. नरो मागानिध गप्तमो भनेर होरापितनिधारम' मिग्पनामापागा.
२२० वटेश्वर-सिद्धान्ते में मेरा यथाक्रममिनि न सिद्धयति तथा च होरेसज्ञानाथं चन्द्रादूर्वक्रमेण सप्तम सप्तमो ग्रहो होरेशो भवतीत्याचार्येण यत्वथ्यते तत्र यदि चन्द्रादूर्व स्थित सप्तमो ग्रह (शनि) प्रथमहोरेशस्तत सप्तमो द्वितीयहोरेश इत्यादि तदा 'होरे- श्वरा सप्तशनैश्चराया यथाक्रम शोघ्रजवा , इत्येव सिद्धति, यदि प्रथमहोरेश- श्चन्द्रस्तत सप्तम शनिहितीयहोरेश इत्यादि गणनमस्तदाऽय क्रमविलक्षण एव विज्ञ रिति विचार्य ज्ञेयम् ।। सिद्धान्तशेखरे श्रीपतिना त्वेतद्भिन्नमेव क्थ्यते यथा- सावनाब्दपतिमत्र चतुर्थं मासनाथमपि विद्धि तृतीयम् । वासरेश्वरमनन्तरमात् पप्ठमेव खलु हौरिकमीगम् ।। अन युक्ति । सावनवर्पप्रमाणे ३६० सप्तहते च नीपशिष्यन्ते तत- श्चार्याच्चतुर्थ सावनवर्षपति (रविवारे कल्पारम्भ त्वात) त्रयाणा गतत्वाद् वत्त- मानस्य चतुर्थत्वात् । निंशतो मासप्रमाणस्य सप्तभिहरणे द्वयमवशिष्यते तत्र द्वी व्यतीतौ वर्तमानस्तृतीय मासाधिपति । तथा रविदिने प्रथम कातहोरेशो रवि- रेव द्वितीयो रविमारभ्य पष्ठस्तस्मात्पष्ठस्तृतीय इति, दिनान्तरे तु तत्तदिनाधि- पतिरेव प्रथमहोरेशो द्वितीयस्तस्मात्पष्ठ इत्यादि चिन्त्यमिति त्रिचतुरनन्तरपष्ठा सावनमासाब्ददिवसहोरेशा इति ब्रह्मगुप्तोवित- रपोति ।। २१-२२ ॥ हि मा-कक्षाक्रम से स्थित शनैश्चरादि ऋतिक प्रगति ग्रह होराधिपति होते हैं। चौथे चौथे ग्रह (हानश्चर से अधोध कम से) दिनपति होते हैं । सातवें सातवें ग्रह सावनमासपति होते हैं, तीसरे तीसरे ग्रह वर्षपति होते हैं। चन्द्र से उपरिक्रम से पाचवे पाचवें ग्रह दिनपति होते हैं, छठे छट ग्रह सावन वर्षपति होते हैं । चन्द्र से उध्व कम से मासपति और सप्तम होराधिपति होते हैं ।। २१-२२॥ । यधा कक्षा कम से उपयुं परि स्थित धादिग्रह। शनैश्चर से अयोग्य हम से होरेस चन्द्र से उपरिक्रम से सातवें सातव ग्रह होरेम १ शनि १ चन्द्र २. पानेचर २ युध ३. शुक ३ मङ्गल ४. रवि ४. रवि ५. मङ्गल ५. रवि ७. शनि ६. तुक ७ युध ७. चन्द्र १. गोम १. सोम १. शनि २. रवि ३. सोम ३. शुक्र ४. शुक्र ४. मङ्गल ५. युध ५. रवि ६. दानि ७. रवि १. शनि मध्यमाधिकारः २२१ शनिश्चर से अधोऽध |न्द्र से उपरिक्रम से गनेचर से अघोऽध क्रमसे मोम से उपरि कमसे क्रम से चौथे चीये ग्रहांचवे पाचवे ग्रह पातवें सातवें ग्रह मामेश मासे होते हैं । दिनपति दिनपति होते हैं १ शनि २. मङ्गल २. सोम २. बुध ३. बुध ३. बुध ४. वृहस्पति ४. रवि ५ शुक्र ५. मङ्गल ६. वृहस्पति ६ मङ्गल ७. गुरु ७ गुरु ७. पानि शनैश्चर से अध: क्रमसे तीसरे तीसरे चन्द्र से उपरि क्रम से छठे छठे ग्रह २५॥ ग्रह वश होते हैं। होते हैं। १. सोम २. मङ्गल ३. रवि ४. सोम ४. युध ५ वृहस्पति ५. पानि ६. रवि ७. युप वटेश्वराचार्य ने होरादिपति शान के लिये पयो इस तरह की गणना की है इसमे यया युक्ति है उसके लिए उपपत्ति राज्यहोरा इपलिय मेपादि राशियों थी धिर स्पिनि ये अनुसार ही होरामों पी भी स्थिति होगी, ग्रहया स्थिति ये मनुमार शनैश्चर यी कक्षा सय ग्रहों की पक्षापो से कार हैं इसलिये प्रयम होराधिपति शश्नर हुर, दिलोपादि होरापिरति गनेश्वर से प्रपोय पसा स्थित यह होते हैं इसलिए इसके अनुसार दानरपर, गुरु, मगल, रवि, शुभ, युध, चन्द्र ये ग्रह प्रयमादि होरेग सिद्ध हुए। मत 'होरेसरा गप्न शनचराधा ययाम शीघ्रत्रया" यह प्राचार्पोक्त युक्तियुक्त है। होरामान-२१ घटी. मध्यम मान से महोरात्र मान-६०५, इगलिए प्रहारान में होरा संख्या-२४ होरेगामाया मन होरा सम्या में मान में भाग देने से दोग -३गत होरेस, माओ दिन में प्रथम होराधिपति पौधे पर होते हैं यही प्रयमाधिरार गै दिनापिाति हो है गरिय 'पतुपों दिनापिर' पर पापायों है। या ये नि पारम्भ में जो दिनपनि । यही वर्षपति भी होते हैं गरिए एप सापन दिनसम्मा ३६० साा से भाग देने गे - नहर पर या में गन दिलाधिपति, उससे भगने यारम्भ में गतवर्ष मेमोपा ह दिन होता है, मोत्यः ६. मङ्गल २२२ वटेश्वर सिद्धान्ते कक्षास्थितिवदा से वह चौथा ग्रह तीसरा होता है अत 'प्रदाधिपतिस्तृतीय यह प्राचार्योक्न सिद्ध हुमा। मासेश्वर विचार के लिये 'सावनमासनाथ स्यात्तप्तम, यह प्राचार्योंत ठीक नहीं मालूम पडता है। सूर्यसिद्धान्त में भी 'मन्दादप क्रमेण स्युरचतुर्या दिवसाधिपा । वर्षाधिपतयसत्तृतीया परिणीतित ॥ उध्वंक्रमेण राशिनो मासानामधिपा स्मृता । होरेशा. सूर्यतनपाधोऽध क्रमास्तया ।' पूर्ववदित वटेश्वराचार्योक्त मामेश्वर ज्ञानविधि और न्यसिद्धान्तोक्त मामेश्वर ज्ञानविधियों में अन्तर स्पष्ट है । लेकिन 'विघोर्ययोज़ घुपति' इत्यादि में मामेश्वर गण- कम सूर्य मिसान्नोस्तानुसार ही है 'पप्ठोऽदपतिस्तु सावन , अनन्तरो मासपतिश्च सप्तमो भवेच्च होराधिपतियथाक्रमम्, इम प्राचार्योक्त गणनाक्रन से यथाक्रम जो पहले हैं उसकी सिद्धि नहीं होती है और होरेमा ज्ञान के लिए चन्द्र से ऊर्यक्रम से सप्तम-सप्तम ग्रह होरेमा होते हैं इस प्राचार्योक्ति में यदि चन्द्र से ऊर्ध्वस्थित सातवें ग्रह (शनि) प्रथम हरेश उससे सातवें ग्रह (गुरु) इत्यादि गणना क्रम हो तब तो 'होरेश्वरा सप्तर नंदचगद्या यथाक्रम दीनजवा ' यही सिद्ध होता है, यदि प्रथम होरेशचन्द्र होते हैं द्वितीय होरेगा उससे सातवें ग्रह (शानि) होते हैं इत्यादि गणनाक्रम रखता जायगा तव एक विलक्षण ही गणनाक्रम होगा, इसको विज्ञ लोग विचार कर समझे ॥ सिद्धान्तशेखर में श्रीपति इनसे भिन्न ही कहते हैं । जैसे, सावनाब्दपतिमत्र चतुर्थ मासनाथमपि विद्धि तृतीयम् । वासरेश्वरमनन्तरमोत् पष्ठमेव खलु होरिखमीशम् ।। इसकी युक्ति यह है कि सावन वर्प प्रमाण को ३६० सात से भाग देने से तीन शेप रहता है इसलिये रवि से चौथे ग्रह सावनवर्षपति होते हैं । (कल्पारम्भ में रविवार होने के कारण रवि से गणना करते हैं), तीस दिन के मास होते हैं इसलिये उमम सात से भाग देने से दो शेष रहता है, उसमे दो गत है वर्तमान तृतीपमासाधिपति होते हैं । तथा रविदिन मे प्रथम काल हात रवि ही होते हैं हनीप पाल होता रवि से घडे ग्रह होते हैं, इसी तरह छो ग्रहकाल होरेदा होते हैं । दूसरे दिन मे बहो दिन प्रथमवाल होरेस होता है । उससे छ छठे ग्रह द्वितीयादि काल होरेदा होते हैं। ब्रह्मगुप्त भी इसी बात को कहते हैं यया त्रिचतुरन तरपष्टा सावनमासान्ददिवसहोरेशा ।। इति ।। इदानी ग्रहाणा गतावतुल्यत्वे कारणमाह । मत्पे हि वृत्ते तु भचक्रलिप्ता. स्वल्पा महत्यो महतीन्दुरस्मात् । अल्पेन कालेन लघु स्ववृत्त भ्रमत्यनल्पं महतार्कसूनुः ॥२३ ।। .
सम मध्यमाधिकार २२३ प्रारणेन लिप्ताभमुदेति पूर्वे भूजे हरेऽत व्रजति ग्रहश्च । स्वभुक्तिलिप्तायुतचक्रलिप्ता भोगैस्सम तेन यतो जवत्वम् ॥ २४ ॥ विभा-हि (यत ) अल्पे वृत्ते (लघुनि वृत्ते) भचत्रलिप्ता (भचत्रकला ) स्वल्पा (लघ्व्य ) महति वृत्ते (बृहदवृत्ते) मह्त्य क्ला सन्ति । अस्मात् कारणात् इन्दु (चन्द्र ) अल्पेन कालेन (अल्पीयसा समयेन) लघु स्ववृत्त (लघु स्वाक्षावृत्त) भ्रमति, अक्सनु (शनैश्वर ) महता कालेन अनलप (महत्स्वरक्षावृत्त) भ्रमति । लिप्नाभ (कलादिनक्षत्रविम्व) पूर्वे भूजे (पूर्वक्षितिजे) -उदेति (उदय गच्छति) परे भूजे (पश्चिमक्षितिजे) अस्त ब्रजति, (अस्त प्राप्नोति), ग्रहश्च स्वभुवितलिप्ता- युतचत्रलिप्नाभोग (स्वगति कलायुचककलातुल्य भोग) तेन नक्षनेग (सार्थ) पूर्वे भूजे व्रजति, यतो जवत्वम् (गतित्व)अस्ति, एतावताऽनेन कथ्यते यत्वेन चिन्हकनेण सह ग्रह पूर्वक्षितिजे उदित , नक्षत्रतु नाक्ष घटीना पाटया पुनस्तयो- दय गच्छति, पर ग्रहस्य स्वगति रस्तीत्यतो नक्षनोदयानन्तर गतिकलोत्पनासुभि ग्रहोदयो भवति तेन ग्रहस्पष्टसावनम् -चक्राला+ग्रहगतिक लोत्पनासु-ग्रहोरात्रा+गतिलोत्पनासु यत चक्र कला-२१६००-चक्रासु। ६० घटी+ग्रहगतिकला अथवा तुल्यास मध्यमसानम् ६० + ग्रहगतिकलोसनासुस्पष्टसावनम् । अल्पे हि वृत्ते तु भवलिप्ता इत्यादिना कलात्मकगतो न्यूनाधिक्त्व सावन- मानेप्वपि न्यूनाधिवत्व प्रदर्शयत्याचार्य । योजनात्मरगति सर्वेपा ग्रहाणा तुल्यं- वास्ति विन्तु कलात्मकयतिभिना मिना भवति तदशेनैव ग्रहेषु शीघ्रगतित्व मन्द गतित्व च भवतीति । भास्कराचार्येरणाप्येतदेव क्थ्यते- समागतिस्तु योजनैर्नभ सदा सदा भवेत् । क्लादि कल्पनावशान्मृदु द्रता च सा स्मृता । 'पक्षा सर्वा अपि द्विविपदा चक्रलिप्ताडितास्ता वृत्ते लघ्व्यो लघुनि महति स्युर्महत्यश्च लिप्ता । तस्मादेते शशिज भृगुजादित्यभौमेज्यमन्दा मन्दानान्ता इव शशधराभान्ति यान्त क्रमेण ।। २३-२४ ॥ इति वटेश्वरसिद्धाते मध्यमाधिकारे पक्ष्याविधानग्रहानयनविधि सप्तमो. - ध्याम समाप्त । हि भाटे वृत्त म भचक्र यला छोटो है पोर वडे वृत्त में भयाका बरी है इगलिय पठमा प्रपा छोर वृत्त वा भ्रमण स्वल्प ही बार म परते हैं मोर पनचर प्रपन रहे वृत्त (प्रपनी यडी रसा) या भ्रमण महत प्रधिर पार में बरत - २२४० वटेश्वर-सिद्धान्ते नक्षत्र पूर्व क्षितिज मे उदित होता है और पश्चिम क्षितिज मे प्रस्तंगत होता है, ग्रह अपनो गतिकला युत भचक्नकला करके पूर्व क्षितिज मे उदित होते हैं अर्थात् क्सिी नक्षत्र के साथ ग्रह पूर्व क्षितिज मे उदित हुए द्वितीय उदय पहले नक्षत्र का होगा (क्योकि नक्षत्र को गति नहीं है, बाद में ग्रह का उदय ग्रहगतिक्लोसन्नासु करके होगा इसलिये भचकाला+ प्रहगतिकलोत्पन्नासु = ग्रहस्सप्टसावन और ग्रह मध्यम सावन =६०+ ग्रहगतिकलातुल्यासु । 'अल्पे हि वृत्ते तु भचक्रलिप्ता' इत्यादि से क्लात्मक गनियो मे न्यूनाधिक्त्व दिखलाते हैं, ग्रहो की योजनात्मक गति बराबर है किन्तु कलात्मक गति वरावर नहीं है इमी वारण से ग्रहो मे शीघ्र गतित्व और मन्दगतित्व होता है । इस विषय मे भास्कराचार्य भी यही बात कहते हैं । यथा- "समागतिस्तु योजननंभ सदा सदा भवेत् ।" इत्यादि इति वटेश्वरसिद्धान्त मे मध्यमाधिकार में वक्ष्याविधान महानयनविधि सप्तम अध्याय समाप्त हुआ। * अष्टमोऽध्यायः अथ देशान्तरविधिः घुिना लङ्कामारभ्य मेरुपर्यन्तसमरेखास्थितान् प्रसिद्धदेशानाह। लङ्का कुमारी तु ततस्तु काश्ची पानाटमर्यास्य पुरी महोष्मती। श्वेतोऽचलोऽस्मादपि वत्स गुल्म पू. स्यादवन्ती त्वनु गर्गराटम् ॥१॥ आश्रमं पतनमालवनगर पट्टशिवमेव पुरोहितकम् । स्थाधीश्वरस्तु हिमवान् हिमेरलेखाध्वकर्मणि नास्त्यपरम् ॥२॥ वि. मा.-अर्यास्यपुरी (स्वामिकात्तिकस्थानम्) महिप्मती (माहिष्मती) श्वतोऽचलः (सितपर्वतः) अन लेखाशब्देन रेखा बोध्या, श्लोकद्वयस्या? रेखास्थित- देशप्रसिद्ध नाम विपयत्वानोच्यते ॥१२॥ हि. मा.--उपर्युक्तश्लोकद्वय मे रेखास्थित देशों का वर्णन है, जिन देशो के नाम प्रसिद्ध हैं। इसलिये श्लोको के अर्थ नही लिखते हैं ॥१-२॥ प्रघुना देशान्तरमस्कार वनु तदुपयोगिनी भूपरिधिव्यासाबाह । कृतनगदिग्भि मेासः स्याद्योजनभंगोऽग्निहतः । खशराहृतः परिधिः स्पष्टोऽतो दशकरणिका स्यात् ॥३॥ वि.मा.-कृतनगदिग्भि. (१०७४) समः, योजन. (योजनमाने) भूमेप्स. (पृथिव्या विस्तृति.) स्यात् व्यासः भगीग्निहत. (३६२७ गुरिणत ) सशरापहृतः (१२५० भक्त ) तदा परिधि (भूपरिधि.) भवेत, अतः दशकरणिका . (दशमूलं) स्पष्टः परिधिरिति ॥३॥ अस्योपपत्तिः भूव्यासज्ञानं मङ्गल लोके ग्रहकक्षास्थितिनिर्णयावसरे प्रदर्शितमेर तता भूपरिध्यानयनं "प्यासे भनन्दाग्निहते विभक्ते खबापसूर्य" रित्यादिना स्फुटमे । प्रत्र व्यासः १०७४ तत उक्तरीत्या भूपरिधिः= भन्या ४३६२७ १२५० १०७४४३६२७ ५३७४३६२७ -२१०८९६ 3३३७५+ १२५० ६२५ पं त्यज्यते तदा भूरिधिः-३३७४ : भूव्या १०७४ १०७४ ४६ भूगरि २२६ वटेश्वर सिद्धान्ते भून्या = (३+ ९५२) =१० स्वल्पान्तरात् भूप भूव्या'४१० ततो मूलेन भूप= भूव्या /१० यदि भूव्या=१ तदा भूप=V१० अत स्पप्टोऽतो दशकरणिका स्यादित्युक्तम् । परमाचार्योवतव्यासे भूप = व्या/१० सूर्यसिद्धान्ते तद्वर्गतो दशगुणादित्यादिना यद् भूपरिध्यानयन कृत तदप्युपपनम् । पर (३+ १५२.)'<१० अत सूर्यसिद्धान्तस्य सुधावपिण्या टोकाया "तर्गतोऽदशगुणा" दित्यादि पाठ समुचित इति म म. पण्डित सुधाकर- द्विवेदिना लिखित । तन "प्रदशगुणादर्थाविधि यूनदशगुणादि" त्यर्थ कर्तव्य" इति । व्यासात्परिध्यानयन परिर्वा व्यासानयन समीचीन न भवितुमर्हति । यथा चापम > ज्या < स्पर्शरेखा परिधि त्रि > ज्या ३० परिधि > ज्या ३०x१२ वा परिधि> .x१२ १२ वा परिधि > निx६ वा परिधि > ४६ परिधि . २ व्या व्यास परिधि नथा <स्प४५ परिधि <स ४५४८ वा परि<axc व्या वा परिधि र ४४८ वा परि<व्या४४ प्रत परिधि <४ व्यास परिधि -> ३ < ४ इति दर्शनासिद्ध यत्परिधिव्यासयो सम्बन्धस्या व्यास स्थिरत्वानियतव्यासानियतपरिधिज्ञान भवितुमर्हतीति व्यासमानमनेन श्रीपत्यादि- व्यासमानाद्भित कल्पितमिति ॥३॥ हि भा -१७४ इतना योजन भूभ्यास है, भूपाम को ३६२७ इतने से गुण कर १२५० इममे भाग देशे से भूरिपि प्रमाण होता है । प्रत दावे मूत्र सष्ट भूपरिधि प्रमाण उपपत्ति भूम्यास शान मङ्गलोर में ग्रहक्षा स्थिति क्रम के निलयावसर म सिना चुरे हैं। भूव्यास भूपरिधि ज्ञान 'व्यासे भन दाग्निहा इत्यादि रीति से स्पष्ट है यथा यहा मूव्यास-१०७४ तब उक्त रीति से मध्यमाधिकारः २२७ भूव्या (३+ १४३९) भव्या४३६२७ १०७४४३६२७५३७४३६२७ २१०६७६६ ४६ :-३३७४+ १२५० १२५० १२५० १२५० देष के त्याग वसे से भूप-३३७४ ३३७४ १५२ १०७४ १०७४ १५२ तव भूयार -१० स्वल्पान्तरात् : भूप- भूच्या२४१० १०६४ यदि भूया = १ तदा भूर--१० :: भूप-/१० पर प्राचार्योक्त व्यास मे भूप-स्या/१०, तड्वर्गतो ददागुणादित्यादि सूर्यसिद्धान्तोक्त भूपरिध्यानयन भी उपपन्न हुआ। लेकिन (३+ १३५.) < १० इस लिये सूर्यसिद्धान्त की सुधा. वर्षिणी टीका में "तर्गतोऽदशगुणादित्यादि" पाठ समुचित है, म म पण्डित सुधाकर द्विवेदी ने लिखा है वहा “प्रदशगुणात् अर्यातिश्चिन्यून दस से गुणना' इत्यादि अयं करना चाहिये । व्यास पर से परिधि का पानयन वा परिधि से व्यास का प्रानयन ठीक नहीं हो सकता है यया चा > ज्या < स्पर्शरे परिधि > ज्या ३० परिधिज्या ३०x१२ वा परिधि > १२ नि:१२ . २ वा परिधि > निx६ वा परिधि > व्या X६ २ परिधि व्यास परिधि और <स्प ४५ परिधि< र ४५४८ वा परिधि <Xि of-पि प्रत. व्या वा परिधि < ४८वा परिधि <ध्या४४ २ परि ->३<४ इससे सिद्ध होता है कि व्यास परिधि और व्याम के सम्बन्ध की अस्थिरता के कारण नियत व्यास से नियत परिधि नहीं सक्ती या परिधि से व्यास भी ठीक नही पा सकता है ॥३॥ इदानी पुरान्तरयोजनज्ञानमाह । तिर्यक् लेखा पत्तनपलनिजपलयोविशेषशेषांशः। क्षितिपरिणाहो निनश्चक्राशहदध्यवाहः स्यात् ॥४॥ वि. भा-नियंग्लेखा पत्तनपल निजपलयोविशेषशेपार्श (तियंक स्थित- रेखादेशाज्ञारा स्वदेशाक्षाशयोरन्नरजनितरोपागं) क्षितिपरिणाह (भूपरिधि.) निन्न (गुणित ) चाशत् (३६० भक्त ) तदा अध्यवाहः (रेवापुर-स्वपुरान्तर- योजन) स्यादिति ।। ४ ।।
२२८ वटेश्वर-सिद्धान्ते प्रत्रोपपत्तिः। रेखापुरस्वपुरयोरक्षाशान्तररनुपात , यदि भाशंभू परिधि-योजनानि लभ्यन्ते तदाक्षाशान्तराशं किमित्यनुपातेन तयोः पुरयोरन्तरयोजनानि तत्स्व- भूपरिधियोजन अक्षाशान्तर पम् - -पुरान्त रयोजनम् । अत उपपन्नम् ॥ ४॥ हि भा-रेखापुर और अपने पुर के जो अक्षाश है दोनो के अन्तर से भूगरिधि को गुण कर ३६० मा से भाग देने से दोनो पुरो के मनर योजन होता है ॥४॥ उपपत्ति । रेखापुर स्वपुर के अक्षाशान्तर= प्रक्षामान्तर तव अनुपात करते हैं कि यदि भारा में मे भूपरिधि योजन पाते हैं तो अभागातराश मे क्या इस अनुरात से पुरानर योजन प्रमाण माता है। भूरिधियोxअक्षाशान्तर -पुरान्तरयोजन:सिद्ध हो गया ॥४॥ इदानी देशान्तरमस्कारमनुभाषते लेखा स्वरान्तर्योजनसंज्या श्रुतिस्तु लोकोक्ता। तद्दो. कृतिविवरपदं कोटि देशान्तर प्रोक्तम् ॥५॥ देशान्तरगतिवातारवृत्तलब्धं विशोधये पुरत । देयं कलादिपश्चाल्लेखाया मध्यमे युचरे ॥६॥ विभा-लेखा स्वपुरान्तर्योजनमख्या (समरेखास्थितनगरतियस्थित- स्वनगरयोरन्तरयोजनसख्या) लोकोक्ता (लोककथिता) श्रुति. (कर्ण) अर्या- दस्मदीयदेशात्समरेखा स्थितास्मदेकदेशस्थ नगरस्येयन्ति योजनानीति लोक- कथनेन ज्ञातानि, इति कर्ण , तद्दो कृतिविवरपद (क्रवर्ग पुरान्तरयोजनरूप- भुजवर्गान्त रमूल) कोटिदेशान्तर प्रोक्तम् (आत्मदेशरेखास्यदेशयोरन्तरे ऋग्वोभून योजनमान कथितम्)। देशान्तरगतिघातात् (आनीतदेशान्तरग्रहगतिगुणनफलत) कुवृत्तलब्ध (स्फुटभूपरिधिभजनाद्यस्फल) कलादिनदेखाया पुरत (रेखात. पूर्वदेशे) मव्यमे धुचरे (मध्यमग्रह) विशोषयेत्, पश्चात् (रेखात. पश्चिमदेशे) मध्यमे धुचरे देय (योज्य) तदा स्वदेशमध्यमग्रह उन्मण्डले भवतीति शेषम् ॥ प्रस्योपपत्ति । स्वदेशेन सह तुल्याक्षो समरेखास्थितो यो, देशस्तस्याभीप्टरेवास्थस्य ज्ञाताक्षस्य देशस्य चान्तरे कियन्ति योजनानोति जिज्ञासितम्। तन्नानुपातो यदि भाशंभू परिधियोजनानि लभ्यन्ते तदा स्वदेशेन सह तुल्याक्षसमरेखास्थितदेशस्य मध्यमाधिकार: २२६ लोकप्रसिद्धसमरेखास्थितदेशस्य चान्तरे कियन्ति योजनानि फल दक्षिणोतर- योजनामिका भुजा रेखान्तस्य देशस्वदेशयोरन्तर तत्र स्वदेशस्य ज्ञाताध्वरेखास्य देशम्य चान्तर कर्ण । तत्कृत्योरन्तरमूल योजनात्मिका पूर्वापरा स्वदेशेन सह तुल्याक्षस्य ममरेखास्थितदेशस्य स्वदेशस्य चान्त रात्मिका कोटिरिति ।। अथ स्फुटपरिधियोजनंग्रहगतिलभ्यते तदा देशान्तरयोजन किमित्यनु- पातेन कलादिक फल समरेखाया प्राग्देशेषु ग्रहमध्ये शोध्य यतो रेखात पूर्वे योद्रप्टा स रेसास्थद्रष्टुः सकाशात्पूर्व मेवोद्यन्त रवि पश्यत्यतो देशान्तरफल विशोध्यते । पश्चात्तु दीयते तनत्याना तावति भुक्ते रवेर्दर्शनात्तदा स्वदेशोदयकालीनमध्यग्रह स्यादिति ।। उक्तोपपत्ती स्पष्टभूपरिधिवशेन देशान्तरयोजनसम्बन्धिग्रहगतिक्ला- प्रमाणमानीत पर स्पष्टभूपरिधिज्ञान कथ भवेत्तदर्थ विचार्यते । भूकेन्द्राल्लम्बाशवृत्ताधारा सूची कार्या, तत्सूचीकर्णा भूगोले यत्र यत्र लगन्ति तदाकृतिवृत्ताकारा भवति तस्सव नाम स्पष्टभूपरिधि । तन्निप्ठयोजन स्पष्टभूप- रिधियोजनम् । भूपृष्ठस्थानाद् ध्र वयष्ट्युपरि यो लम्वस्तदेव स्पष्टभूपरिधिव्या- सार्धम् । व्यासार्धमेको भुज । स्पष्टभूपरिधिव्यासार्ध द्वितीयो भुज । ध्रुवप्टि- खण्ड तृतीयो भुज । अत्र निभुजे भूकेन्द्रलग्नकोण - लम्बाश । स्पष्टभूपरिधि- व्यासामू विन्दुलग्नकोण D६०, तदा यदि निज्यया भूव्यासाध लभ्यते तदा किमिति कोणानुपातेन समागत सप्टभूपरिधिव्यासार्धम् भूव्या ३४ लम्बज्या ततोभू व्यासान भूपरिधिमान लभ्यते तदा स्पष्टभूपरिधि- नि व्यासार्धन कि समागच्छति स्पष्टभूपरिधिप्रमाण तत्स्वरूपम् भूपरिधिx स्पष्टभूपरिधि व्या रे लम्बज्यया भूव्या भूपरिघि भूव्या ३ x लम्वज्या- भूपरिधि लम्बज्या एतेन स्पष्टभूप- त्रिभूव्या ३ रिविरमाण विदित जात, सूर्यसिद्धान्ते "लम्बज्यानस्त्रिजीवाप्त स्फुटोभूपरिधि." रित्यादिना सिद्धान्तशिरोमणी "लम्बजा गुणितो भवेत्कुरिधि" रित्या दिना भास्क रेणापि तदेवानीतमिति ।। ५-६ ।। हि.भा-समरेखा स्थित नगर तिर्यक् स्थित स्वनगर वो अन्तर योजन सस्थालोदित पर्ण है, पुरान्तर योजन रूप भुज है, दोनो के वर्गालर मूल वोटि देशान्तर कथित है, देशान्तर योजन भोर ग्रहगति वे घात मे स्पष्ट भूपरिधियोजन से भाग देने से जो फल होता है उसको रेसा से स्वदेश के पूर्व सरफ रहने से मध्यमग्रह में पटाने से रेया से स्वदेश के पश्चिम रहने पर मध्यम प्रह में जोडो से स्वदेशोदय कालीन मध्यम ग्रह होते हैं । ५-६ ।" उपपति। अपने देश पेमारा ये दरायर अक्षांश वाला समरसा स्थित जो देश है उसका पर अभीष्ट रेखास्थित विदित मांस वाले देश के अन्तर में कितने योजन है सो मानना २३० वटेश्वर-सिद्धान्ते है । वहा अनुरात करते हैं कि यदि मारा (३६०) मे भूपरिधि योजन पाते हैं तो स्वदेशाक्षामा तुल्य-अक्षाश वाले समरेखासियत देश और लोप्रसिद्ध समरेखास्थित देश के अन्तर मे क्या इस अनुपात से फन दक्षिणोतर योजनात्मक मुज पाया, रेखादेश स्वदेश का अलर वहा अपने देश और विदितावरेसा देदा के अन्तर वर्ण है, दोनों के वर्गान्तर मूल पूर्वापर देशा- न्तर (कोटिदेशान्तर) कोटि प्रमाण हुमा । अव अनुपात करते हैं कि स्फुटपरिधि योजन में प्रहगतिकला पाते हैं तो देशान्तर योजन में क्या इस अनुपात से जो क्लादि फल माता है रेखा से स्वदेश के पूर्व रहने पर स्वरेखोदयकालिक मध्यमग्रह में घटाने से रेखा से स्वदेश के पश्चिम रहने से स्वरेखोदयकालिक मध्यमग्रह मे जोडने से स्वदेोदयकालिक मध्यमग्रह होते हैं। इस उपपत्ति मे स्पष्ट भूपरिधि योजन पर से देशान्तर योजन सम्बन्धी ग्रहगतिकता प्रमाण लाया गया है पर सप्टभूगरिवि योजन का ज्ञान कसे होता है इसके लिये विचार करते हैं । भूकेन्द्र से लम्बाश वृत के प्रतिबिन्दु मे रेखायें लाने से लम्बाश वृत्त के आधार पर एक सूची बन जायगी, सूचीवर्ण (भूकेन्द्र से लग्दादरा वृत्त के प्रति विन्दु में लाई हुई रेखायें) सब भूउष्ठ म जहा जहा लगता है उसका आकार वृत्ताकार होता है, उसी वृत्त का नाम स्पष्ट भूपरिधि है । भूष्ठ स्यान से व वप्टि के ऊपर जो लम्ब होता है वही स्पष्टभू- परिधि व्यासाध है। यहा एक जात्य त्रिभुज बनता है, भूव्यासाचं कर्ण, स्पष्ट भूपरिधिच्या. साधं कोटि, ध्रव मूत्र का खण्ड भुज, इस त्रिमुज मे भूपेन्द्र लग्नकोण = लम्बार्श, स्पष्ट भूप- रिधिव्यासार्थ मूल विन्दु लग्न कोण=६० तब उक्त त्रिभुज मे कोरणानुपात करते हैं, यदि त्रिज्या में भूव्यासार्ध पाते हैं तो लम्बज्या मे क्या इस अनुपात से स्पप्रभूपरिधिव्यामा प्रमाण भूच्या ३४ लज्या '=स्पष्टभूपरिधि व्याई । तथा भूभ्यासाधं मे यदि भूपरिधि पाते हैं तो स्पष्ट भूपरिधिव्यायाधं मे क्या पा गया स्पष्ट भूपरिधि प्रमाण भूरिधि४ स्पष्टभूरिधि व्या भूपरिधि भूव्या ३४लज्या भूपरिधि लग्या त्रिभूव्या ३ नि इससे स्पष्ट भूपरिधि प्रमाण विदित हो गया, सूर्यसिद्धान्त मे "लम्बज्याघ्नस्त्रिी. वाप्त स्फुटो भूरिधि सक इत्यादि से तया सिद्धान्तशिरोमरिण में “ लम्बज्यागुणितो भवेत्कुपरिधि स्पष्टस्त्रिमन्याहृत" इत्यादि से भास्कराचार्य भी उसी विषय को कहते हैं ।। ५.६ ॥ इदानी प्रथमपक्तिदूपण प्रयन् पूर्वपशान्तरमनुभाषते श्रुतिपोजनास्फुटरवाद वात्वात्कुपरिधेश्च नेष्टमिदम् । स्वपदांश्च वजितान् केचिन्छ्रवणे देशान्तर जगु प्रोक्तम् ॥७॥ पलयोजन तथान्ये भावशतो हि घर्मा शो.। कोटिलपुरवापूर्व मिथ्याद्विशेषतोऽन्यच्च ॥८॥ विभा -श्रुतियोजनास्पुटत्वात् (लोकोक्तयुतियोजनानिश्चयत्वात्) पूर्व भुजोटिकणंयोजनसम्मन्येन यद्देशान्तरानयन कृत तरस्फुट म भवतीत्यर्थ , माया भूव्या ३ मध्यमाधिकार २३१ तत्र कारणमाह कुपरिधे (भूपरिधे) वक्रत्वात्, नहि सुनिपुणमतिरपि कश्चित् हस्तेन दण्डर जुन्या वा लोकप्रसिद्धानि योजनानि निर्णीतवान् तस्माज्जनप्रसिद्धर- नेकान्तियत्वात्, इद मत नेप्ट (शोभन नास्तीति भाव)। केचिन् (ग्राचार्या) स्वपदान् (अपसारयोजनमार्गान) वर्जितान् । श्रवणे (पूर्वोक्तकणे) प्रोक्त देशा. न्तर (कथितदेशान्तर) जगु (कथितवन्त ) अ ये (प्राचार्या ) धर्माशो (सूर्यस्य) भावशत (छायासम्वन्धत ) पलयोजन (देशान्तरयोजन कृतवन्त ) पूर्व (पूर्व- कथित श्रुतियोजनादित्यादिनाऽभिहित) अन्यत् (भिन्न सूर्यच्छाया सम्बन्धेन कथित) कोटिलघुत्वात् प्राद्विशेपत .(प्रार्पग्रन्थान्तरादादार्पग्रन्यविरोधात्) मिथ्या (निरर्थकमिति) अननदुवत भवति । जलसमीकृतभूमौ मध्याह्नकाले छाया यथावदवगम्य तच्छायया 'छायातोऽनियनविधिना" रविमानयेत् । तथा वक्ष्ययाणविधिना समरेखानिवासिना मध्याह्नकाले स्फुट रवि कुर्यान् । तयो रव्योर्यदन्तर तद्देशा- न्तरप्रमाणम् । ततो रव्यन्तराराप्रमाणेनानुपातेन देशान्तरयोजनज्ञान सुगमम् । उपर्युपतयो पक्षयो स्थौल्य प्रदर्शयत्याचार्य । भुजकोटिकरण वेन कल्पितानि देशान्तरयोजनानि स्थूलानि तथव छायावशतोऽपि देशान्तरयोजनानि स्थूला- नीति । कोटिलघुत्वादित्यत्र कोटिशब्देन यदि क्रान्तिग्रहण क्रियेन तदा श्रीपत्यु- तेन सहाऽस्याचार्योक्तस्य समाञ्जस्य भवेद्यथा श्रीपत्युक्तम् । मध्यप्रभागतरवेगंरिगतागतस्य स्यादन्तर यदिह तत् क्षितिवेप्ट नन्नम् । भक्त लवेन विषयान्तरयोजनानि स्थूलानितान्यपि भवन्त्यपमाल्पकत्वात् ।। कुतश्चिद्देशात् ममपूर्वापरेऽन्यस्मिन् देशे द्विना देशान्तरघटिकास्तावतीभि- रपि घटिकाभिरिहापत्र नस्य न वृद्धिर्नापि हास । यत्र तु पञ्चदशटिका परम- देशान्तर यमकोटिलङ्कादौ तत्राप्यपक्रमस्य वृद्धि हाँसो वा पटवला । तत्र अंग- शिक यदि निज्यया परमकाान्तर्लभ्यते। तदा पञ्चदशघटिकाभि कि समाग- च्छन्ति पट्कला तावतीभिरपर मलिप्ताभिनव छायागतो विशेप उपलभ्यते । अत- श्छायाकंगगितागतायोरन्तर न भवति तेन देशान्तरयोजनानयन गगनग्रास कल्पमिति।। ७.८ ॥ हि भा-लोकप्रसिद्ध श्रुतयोजन के अनिश्चितत्व से भूपरिधि यो वक्रता के पारण से भुनकोटि वर्ण सम्बन्ध से देशान्तर योजनानमन टोर नहीं है । स्यादि कोई भी निपुण युद्धि वाला प्रादमी हाय से दण्ड (लगगा) मे या रस्सी मे लोकमसिद्ध योजन या निर्णय नहीं किया है । कोई कोई प्राचार्य अपसार योजन पो यरित पर पर्ण हो यो देशातर यहत है । प्राय प्राचार्य मूर्य की छाया सम्बध से देशान्तर रहते हैं । योटि परम ने सत्व ये कारर पहले का दशान्तर और मापं के साथ मन्तर होने से दूसरा देवानर भी प्पयं है। यहा इस तरह पहा गया है कि जल से समान की हुई पृथ्वी पर मध्यात्य स में पाया जान पर उस पर से वक्ष्यमाण विधि (मागे यही हुई रीति) रो रवि का साधन परना वटेश्वर-सिद्धान्ते और वक्ष्यमाण विधि से समरेखावासियो के मध्मान्ह वाल में रवि का साधन करना, दोनो रवियो के अन्तर करने से देशन्तर प्रमाण होता है । उस रवि के अन्तराश पर से अनुपात द्वाग देशान्तर योजन ज्ञान सुगम है । भुज कोटि और कणं योजन पर से कल्पित देशान्तर योजन स्पून है उसी तरह छायावग से देशानर योजा स्यून है। कोटिल पुत्वा इत्यादि में यदि कोटि शब्द से अबकर (क न्ति) का ग्रहण किया जाय तव श्रीपतिकायत विषयो के साथ वटेश्वराचार्य-वरित उपयुक्त विषयो का सामञ्जस्य हो जायगा । धीपति इस विषय में इस तरह कहते हैं जैसे- मध्यप्रभागतरवेगरिणतागतस्य स्यादन्तर यदिह तव क्षितिवेप्टनिघ्नम् । भक्त लवेन विषयान्तरयोजनानि स्यूलानि तान्यपि भवन्त्यपमाल्यकत्वात् ॥ विसी देश से भिन्न समपूर्वापर देश मे दो तीन देशान्तर घटी लेने से उतनी ही घटी मे अपक्रम (क्रान्ति) मे न कुछ ह्रास या वृद्धि होती है । जहा पर पन्द्रह घटी परम देशान्तर है यमकोटि या लड़ा भादि मे, वहा भी कान्ति की वृद्धि या ह्रास ६ क्ला है वहा अनुपात कीजिये कि यदि त्रिज्या में परमकान्ति पाते हैं तो पन्द्रह घटी में क्या इस अनुपात मै छ क्ला पाती है इतनी क्रान्ति क्ला में छायागति में कोई विशेषता नहीं उपलव्य होती है । इसलिये छायार्क और गणितागतार्क वा अन्तर नहीं है इसलिये देशान्तर योजनानय सग्रास कल के बराबर है। इति ।। ७८ ।। इदानी स्वाभिमत देशानर प्रतिपाद्यग्रहेषु तत्फल (देशान्तरफल) सस्कार ज्ञानमाह । गणितागतशीताशो. प्रग्रहकाल प्रसाध्य निजविषये। प्रत्यक्षरण तदन्तरकालो देशान्तर स्पष्टम् ॥६॥ तरखेचरगतिघातात् पष्टयाप्तकलोनसंयुत. प्राग्वत् । खचरः स्वधाम्नि मध्या मध्यमतियिनाडिकास्वेवम् ॥१०॥ विभा-निजविपये (स्वदेशे) गणितागतशीताशो प्रग्रहलाल (चन्द्र. गणितागत स्पर्शकाल) प्रसाध्य (साधयित्वा) प्रत्यक्षेण (दृष्टया वेवेन वा) प्रग्रह- कालोऽवलोकनीय , तदन्तकाल (गणितागतस्पर्शकालवेघागतस्पर्शकालान्तरकालः) स्पष्ट देशान्तर भवति (दोषरहित देशान्तर भवति)। तत्सेचरगतिघातात् (स्पष्ट देशान्तरग्रहगतिवधान् ) पष्टमाप्तक्लोन- सयुत (पटमा विभवतालन्ध यत्वलादिपल तेन रहित सहितश्व) प्राग्वत् (रेखात पूर्वपश्चिमत्र मेण) खचर (ग्रह) कार्यस्तदा स्वधाम्नि मध्या ग्रहा भवन्ति । एव मध्यनिथिनाडिकासु फल (देशान्तरयोजनघटीफ्ल) सस्वर्त्तव्यमिति 118-१०॥ प्रमोपपत्ति । गणितेन चन्द्रस्य स्पर्शकाल साध्य । यदि गणितसाधितरपर्शवालान्तर वैयेन स्पर्शकालो दृष्टस्तदा द्रष्टा रेखात पूर्वदिशि भवेयतो द्रष्टा रेसात पूर्वदिशि यथा यथा गच्छति तथा तथा रेसोदयापूर्वमेव रव्युदय पश्यति । इतोज्यधात्वे . + मध्यमाधिकार २३३ द्रष्टा पश्चिमदिशि भवेत् । हग्ग्रहणकालयोरन्तरमाद् गणितागतस्पर्शकालवेधागत- स्पर्शकालयोरन्तर, देशान्तरघटिका । ततोऽनुपातो यदि घटीपप्टया ग्रहगतिलभ्यते तदा देशान्तरघटीभि कि समागता देशान्तरघटोसम्बन्धि ग्रहगतिकला, फलमेतत्पूर्ववद्रेखात प्रागृण पश्चाद्धनमिति ॥ तथाच यदि स्पष्ट-भूपरिधियोजन पष्टिघटिका लभ्यन्ते तदा देशान्तरयोजन किमित्यनुपातागतफल कर्मयोग्यासु तिथिषु ऋण धन वा कार्यमिति ॥६-१०।। हिमा --अपने देश मे चन्द्रमा के गणित द्वारा स्पर्शकाल साधन करना और वेध मे भी स्पर्शवाज साना दोनो कालो के अन्तर स्पष्ट देशान्तर होता है। देशान्तर और ग्रहगति के घात से माठ से भाग देकर जो फल हो उसको पूर्ववत् ग्रह में ऋण धन करने से स्वदेशोदयकालिक मध्यम ग्रह होते है। मध्यम तिथि मे भी देशान्तर योजन सम्बन्धी घटी फल सस्कार करना चाहिए ॥६-१०॥ उपरत्ति गणित से चन्द्रमा वे स्पर्गवाल माधन करना, यदि गणितागत स्पर्शकाल के बाद बंध से स्पर्शकाल देखने में आवे तव द्रष्टा रेखादेश से पूर्व दिशा में होता है। क्योवि द्रष्टा रेखा से पूर्व दिशा में ज्यो ज्यो जाता है त्यो त्यो रेखोदय से पहले ही रवि को उदिन देखता है, इससे अन्यथा द्रष्टा रेखा में पश्चिम मे होता है। गणितागत स्पर्शकाल वेधागत स्पर्शकाल का अन्तर देशान्तर घटी है । अव इस पर से अनुपात करते है यदि साठ घटी मे ग्रह गतिकला पाते है तो देशान्तर घटी में क्या इस अनुपात से जो कलात्मक पल प्राता है उसको पूर्ववत् ग्रह मे ऋण और धन करने से स्वदेशोदयवालिव” ग्रह होते है। और यदि स्पष्ट भूपरिघि योजन म माठ घटी पाते है तो देशान्तर योजन म ६xदेशान्तरयो - देशान्तरयो सघटी' इस अनुपात से जो घटधादि फ्ल स्पभुपयो पाना है उसको मध्यम तियिघटी में संस्कार करना चाहिये ।।९-१०॥ इदानी स्पदेशान्तरफलमस्कारमुक्रवा वारप्रवृत्तिज्ञानमाह पष्टिहतः क्षितिपरिधिर्देशान्तरनाड़िकाहतः स्पष्टा । योजनसंख्याऽध्यमितो फलमस्याः पूर्ववत्सचरे ॥११॥ पष्टयम्यधिकोने संख्यागतकाले रेखापरपूर्वे द्रष्टा । क्षितिजे देशान्तरघटिकाभिः प्राग्लेखाया इनोदये पश्चात् ॥१२॥ वारप्रवृत्तिरुक्ता पश्चात्स्वार्कोदयात्पूर्वम् । वि.भा.--क्षितिपरिधि (स्पष्टभूपरिधि) देशान्तग्नाडिकात (देशान्तर- घटीगुरिणतः) पष्टिहुत (पष्टिभक्त) तदा फल स्पष्टा योजनमस्या अध्वमिती ( देशान्तरपटिकाया) भवत्यर्थात्स्पष्टदेशान्तग्योजनसम्या भवतीति । म्पप्ट- . च्या " 32 २३४ घटेश्वर सिद्धान्ते देशान्तरक्थनस्येद तात्पर्य यत्पूर्व "तद्दो कृतिविवरपद कोटिदेशान्तर प्रोत्त'. मित्यादिनानीत देशान्तर स्यूल तेन वात्र स्पष्टा देशान्तरयोजनसस्या कथ्यते । अस्या (देशान्तरयोजनसस्यात) पानीत फल क्लात्मक वचरे (ग्रह) पूर्ववहरण धन विधेयम् । सरयागतकाले (देशान्तरघटीमिते) पप्टयभ्यधिकोने (पष्टितोऽधिकेऽल्पे च) ट्रप्टो रेखापरपूर्वे (रेखात पश्चिमाया पूर्वस्या च) भवति । लेखाया प्राग्देशे (रेखात पूर्वदेशे) क्षितिजे देशातरघटिकाभि , इनोदय (सूर्योदय ) प्राग्भवति, वारप्रवृत्ति पश्चाद् भवति, लखाया पश्चात् सूर्योदयो देशान्तरघटीभि पश्चाद्भवति, वारप्रवृत्ति स्वार्कोदयात्पूर्व भवतीति ॥११-१२।। अत्र युक्ति स्पष्टवास्ति । हि भा-स्पष्ट भूपरिधि का दशान्तर घटी स गुणकर साठ में भाग देन से जा फ्ल होता है वह स्पष्ट देशान्तर योजनसख्या है यहा स्पष्ट शब्द देन का तात्पय यह है कि पहल जो 'तद्दो कृति विवरपद कोटिदेशान्तर प्रोक्तम् इत्यादि से जो देशान्तरानयन किया गया है वह स्थूल है, यहा म्पप्ट दाब्द मूक्ष्मत्वमूचक है इस देशान्तर योजन पर स जो ग्रहगति पल होता है उसको पूर्ववत् ग्रह मे ऋण और घन करना चाह्यि । देशान्तर घटी साट स अधिक और न्यून रहने से द्रष्टा क्रमश रेखा स परिचम और पूर्व होता है । रेखा से पूर्व देश म दगा न्तर घटी काल करके सूर्योदय पहले होता है वारप्रवृत्ति पश्चात् होती है रेखा स पश्चिम देश म देशान्तर घटी करके मूर्योदय पोछे होता है वारप्रवृत्ति पूर्व होती है ।। ११ १२ ।। यहा युक्ति स्पष्ट ही है। वारादिज्ञानमेवाह । दक्षिणगोले पूर्व लेखायाश्चरदलेन वारादि ॥१३ ।। उत्तरगोले पश्चाद्दिनोदयाचरदलेनैव । वि भा -दक्षिण गोले चरदलेन (चरखण्डकालेन) लेखाया पूर्व वारादिरा- देखा सूर्योदयात्पूर्व चरखण्ड कालेन दिनवारप्रवृत्ति भवति । सूर्योदय पश्चाद्दिनवार- प्रवृत्ति पूर्वमित्यर्य " उत्तरगोले चरदलेनैव (चरखण्डकालेनैव ) सूर्योदयात्पश्चा- द्दिनवारप्रवृत्ति , सूर्योदय पूर्व दिनप्रवृत्ति पश्चादित्यर्थ ॥ १३ ॥ अनोपरति । पूर्वश्लोके कथित यत्प्राच्या देशान्तरघटीभिर्दिनवारप्रवृत्ति सूर्योदयादृवं भवति, प्रतीच्या ततोऽधो यतो लङ्कोदये वारादि । अतएवोतरगोलगे रवी चरखण्ड घटीभिरू वं वारप्रवृत्ति यतस्तदोन्मण्डल क्षितिजादूर्ध्वम् । दक्षिणे वधस्तत्रोदया दघो वारप्रवृतिरिति । सिद्धान्तशेखरे श्रीपतिनाप्येवमेव क्थ्यते यथा--
मध्यमाधिकार
लोदग्याभ्यसूत्रात् प्रथममपरत पूर्वदेशे च पश्चा-
दध्वोत्याभिवटीभि सवितुरुदयतो वासरेशप्रवृत्ति ।
शेषा सूर्योदयात् प्रान् चरशकलभवंश्वासुभिर्याम्यगोने
पश्चात्तं सौम्यगोले युतिवियुतिवशाचोभयो स्पष्टकाल इति ।
सिद्धान्तशिरोमणी भास्करेणापोत्यमेव कथ्यते-
अर्कोदयादूर्वमधश्च ताभि प्राच्या प्रतीच्या दिनपप्रवृत्ति ।
अवं तथाऽधश्वरनाडिकाभी रवानुदग्दक्षिणगोलसस्थे ।। इति ।। १३ ।।
हि भा–दक्षिण गोन म रेखा से पूर्व रेसा सूर्योदय मे पहले ही चरखण्ड घटी
परवे दिन वार प्रवृत्ति होती है । (सूर्योदय पीछे और दिन वार प्रवृत्ति पहले होती है),
उत्तर गोल म उसी चरग्वण्ड घटी करके सूर्योदय से पीछे दिन वार प्रवृत्ति होती है (मूर्यो
दय पहले और दिनवार प्रवृत्ति पीछे होती है) ॥ १३३ ।।
उपपत्ति
पहले दलोक में कहा गया है कि रेखा से पूर्व म देशातर घटी करने दिनवार
प्रवृत्ति होती है, पश्चिम देश म पोछे दिनवार प्रवृति होती है। इसलिये उत्तर गोल म रवि
के रहने से चरखण्ड घटी करके पहले दिनप्रवृत्ति होती है जिसलिये वहा अपने क्षिनिज से
उमण्डन ऊपर है । दक्षिण गोल मे विपरीत स्थिति होती है ।
सिद्धान्तशेखर म श्रीपति भी इसा नरह कहते हैं। यथा---
"लकोदग्याम्यसूयात् प्रथममपरत रयादि
मिद्धान्तशिरोमणि म भास्कराचार्य भी इमी तरह कहते हैं
सर्वोदयादूघ्वमपाच ताभि इत्यादि ।
इदानी ग्रहाग्गा दिनगतिमानमाह।
भूदिवसभंगरणेभ्य क्लादिलब्धिस्तु चारभोगोऽस्मात् ॥१४॥
वि भा--भूदिवस (युगवुदिन कल्पनुदिनर्वा) भगरणेभ्य ( गुगपठिनभग-
रणेभ्य वल्पभगरोभ्यो वा) क्लादिलब्धि (क नादिफ्ल) वारभोग (ग्रहगति )
भवेदिति । अम्मादित्यम्याग्रिमश्लोकेन सम्बप इनि ॥१४॥
अग्रोपपत्ति ।
यदि युगयु दिनयुगग्रहभगरणा लभ्यन्ते तदेवेन दिनेन विमित्यागतम दिनज
ग्रहगतिस्तत्स्यम्पम् - युग्रभ४१-युप्रभ-ग्रहगति ॥ प्रत प्राचार्योक्तमुप-
युत् युए
पनम् ॥१४॥
वटेश्वर मिद्धाले हि भाग मंदिन या कमदिन में तथा ग्राम राम कादिक जो फल होना है वह ग्रहनो। यान महानि हानी है 'सम्मात् 'इमको मनोक ने सम्बन्ध है ॥१४॥ उपपत्ति । मे यदि युगदिन म युगग्रह भगा पाते हैं तो एक दिन म क्या इन अनुपात एक दिन की ग्रहाति पाती है, युग्रन - युप्रभ = ब्रहानि इनम प्राचार्योस्तु पान्न तु यु हुप्रा १४ ॥ इदानी जान्नरफ्लादिमम्बार प्रतिपाद्य दर्षाधिपतिनमाह । ग्रहवद भुजान्तरपल देशान्तरवरदलेनापि ।। कार्य कल्पगतेन्यो गणेभ्य खरसाग्निभाजिताल्लन्यम् ॥१५॥ त्रिघ्नमगनवतोप सावनसमाधिप संक्म् ।। वि भा-देगान्तर चरदलेनापि (देशान्तर चरदलेन सत्तेनापि) अस्माद् ग्रहाद् भुजान्तरपल ग्रह्मत्वार्य, देशान्तरचरदलसस्कृतम्हे भुजालर- फल सस्करणीयमित्यर्थ । कल्पगतेभ्यो धुगणेभ्य (कल्पगताहर्गरणेभ्य ) खरसाग्नि- भाजिताल्लब (३६० भजनात्फ्ल) त्रिन (त्रिगुरिणत) अगभक्तशेप (सप्तभक्ता- वशिष्ट) सैक (स्पसहित ) तदा सावनसमाधिप ( सावनवर्षपति ) भवेदिति ॥ १५ ॥ अथ भुजान्तरकोपपति । मध्यमार्कोदयिका ग्रहा येन कर्मणा स्पष्टार्कोदयिका भवेयुस्तस्यैव नाम भुजा- न्तरम् । मध्यमस्पष्टरव्योरन्तर मन्दफ्लम् । अतो रविमन्दफ्लक्ला सम्बन्ध्यसु- प्रमागमानीयते तनानुपातो यदि राशिकलाभिनिरक्षोदयासवो लभ्यन्ते तदा रवि- म दफलकलाभि किमित्यनुपातैनागता रविमन्दफ्लासवस्तत्स्वरूपम्- निग्धोदयाx रमफक्ला -तत एतत्सम्बन्धि ग्रहगतिकलाप्रमाणमानीयते यद्यहोरामासुभि हगनिकला लभ्यन्ते तदा रविमन्दफ्लालासुभि किमित्यनुपगतेन रविमन्दफलासु सम्बन्धि ग्रहगति = ग्रहगतिकला रविमन्दपलामु अहोरात्रासु निरक्षोदयासु ४ रविमफ्कला ग्रगतिक एतत्पल यदि मध्यमार्योदय- १८००४ अहाराणासु कालिक ग्रहे सस्क्रियते तदा स्फुटार्कोदयकालिका ग्रहा भवन्तीति । प्रय मन्दफलासुमध्येऽपि ग्रहाणा काचिद् गाँभिवति सा च न गृहीतात पूर्वोक्तमानयन न समीचीनमतो वास्तवानयनम् । १८०० मध्यमाधिकार अथ वास्तवभुजान्तरप्रमाणम्य नगरय तदानुपातेन अहोरानासु = १ असुजगतिय तथा निरक्षोदयास्य '-१ कलोत्पन्नासु Xय-फलकलासु तत. १८०० ग्रगx फलासु_ अगxनिरक्षोदयासु xय अहोरात्रासु -१ असुजगति ४१ दलो प- १८०० ग्रहोरात्रासु न्नासुर्य .. - एतत्फत यदि पूर्वानीतभुजान्तरफले सस्क्रियते तदा वास्तवभुजान्तर भवेत् । पूर्वानीतभुजान्तर + १ असुजगति X १कलोत्पन्नासु ४य= य समशोधनेन पूर्वानीत भुजान्तर=य १ असुजग-१ कलोत्पन्नासुxय भ्य (१+ १ असुजगति ४१ कलोत्पन्नासु) पूर्वानीत भुजान्तर --य-वास्तवभुजान्तरम् ।। १+१ असुजगति ४१ कलोत्पन्नासु प्राचार्येण भुजान्तर फलसाधन स्पष्टाधिकारे कृतमप्र प्रसङ्गवशात्स्थौल्य प्रदर्श्य वास्तवानयनमपि प्रदर्शित मयेति । अथ कल्पगताहगरण ३६० एभिविभक्त यदि शेषाणि स्युस्तदा स्पाधिक निगुरिणत लब्ध कर्तव्य नान्यया । तत. सप्त- भक्त शेप रविमारभ्य सावनवर्पपतिर्भवेत् । शेपदिनानि च वर्षाधिपते प्रवृत्तस्य च गतानि दिनानि तान्येव ३६० एभ्यो विशोध्य गम्यदिनानि, निगुण तल्लब्ध क्रियते यतो ३६० अब सप्तभक्त त्रीण्यवशिष्यन्ते, अतश्चतुर्थश्चतुर्थो वर्षपतिर्भवति, वर्षाधिपतिरागमप्रामाण्याद् भवतीति ॥ १५३ । हि भा-देशान्तर चर खण्ड सस्कार करने पर भी उस ग्रह में भुजान्तर फल सस्कार करना चाहिये, कल्पगलाहर्गण को ३६० से भाग देने से जो फल हो उसको तीन में गुण कर मात से भाग देने से जो शेष हो उसमे एक जोड देना चाहिये नव सावन वर्षपनि होते है ॥ १५॥ भुजान्तर कम की उपपत्ति । मध्यमार्कोदय कालिक ग्रह में जितना सस्कार करने से स्पप्टार्योदयकालिक ग्रह होते हैं उसी या नाम भुगान्तर है । मध्यमार्क और स्टार्क का अन्तर रविमन्दफल है। इसलिये रवि मन्दफल क्लासम्बन्धी असु प्रमाण लाते है । यदि १८०० कला मे (एक राशिकला मे) निरक्षोदयासु पाते हैं तो रवि मन्द फ्ल बला में क्या इस अनुपात से रविमन्दफ्लालामु- निरक्षोदयासु ४ रमफ प्रमाण पाया, -रविमन्दफ्लागु । इस पर से फिर अनुपात करते हैं। १८०० यदि अहोरायागु मे ग्रहगति बला पाते हैं तो रवि मन्दफ्लासु मे क्या प्रा जायगा रविमन्द- ग्रग मन्दपलासु फलासु सम्यन्धो ग्रहगति प्रगास, = रविमन्दपलामु मं ग्रहगति महोरात्राम् २३८ वटेश्वर-सिद्धान्ते ग्रगx फलासु- = य । निरक्षोदयासुरमफ४ग्रग इस फन को यदि मध्यमार्योदय कालिक ग्रह में १८०० X अहोरात्रामु मस्कार करते है तब स्पष्टार्कोदय कालिक ग्रह होते हैं । लेकिन यहा मन्दफलासु के भीतर जो ग्रहगति है उसका ग्रहण नहीं किया गया है इसलिये यह प्रानयन ठीक नहीं है इसलिये वास्तवानयन करते है। कल्पना करने है वास्तव भुजान्तर प्रमाण-य निरक्षोदयासुर्य तब अनुपात से = १ कलोत्पन्नामु४ य, फिर अनुपात से = फलामु १८०० ग्रम निरपदयामुxय '= १ असुजगति X १ कलोत्पन्नामु य अहोरावामु १८००४ अहोरात्रासु इसको पूर्वानीत भुजान्टर म सस्कार करने से वास्तव भुजान्तर प्रमाण होगा पूर्वानीत भुजान्नर + १ असुजगX १ क्लोत्पन्नासु Xय=य समशोधन बरन से पूर्वानीत भुजान्तर =य+१ असुजग X १ कलोत्पन्नासुर य = य (१+१ अमुजगति ४१ क्लोत्पन्नासु) पूर्वानीत सुजान्तर ११ असुजग-१ कलोत्पन्नासु अत सिद्ध हो गया । प्राचार्य ने भुजान्तर फल साधन स्पष्टाधिकार में किया है, यहा प्रराङ्गवा उस साधन मे स्थूलता दिखा कर वास्तवानयन भी हमने दिखलाया है। कल्पगताहगंण को ३६० से भाग देने से यदि शेप रहे नो उसमे एक जोडकर त्रिगु- गित कर देना चाहिये यदि दोप नही रहे तय नहीं, वाद म सात से भाग देने मे शेष रवि से लेकर सावन वर्षपति होते हैं । शेष दिन वर्षाधिपति और प्रवृत्त का भी गतदिन होते हैं उन्ही को ३६० में घटाने मे गम्य दिन होते है । लब्धि को तीन से इसलिये गुणते हैं क्योकि ३६० म मात से भाग देने मे तीन शेष रहता है, इसलिये चौथे चौथे वर्षपति होते हैं। वर्षाधिपति भागमप्रामाण्य से होत हैं।। १५६॥ इदानी सावनमामपतिज्ञानार्थ माह क्रमशो हि मास्कराद्यो मासाधिपति खहन्यभुग्भक्ताः ॥१६॥ धुगरणा फल द्विनिम्न सक नगभक्तविफल स्यात् ॥४॥ गि भा.-कमगो हि भास्कराद्य एतस्य पूर्वश्लोवेतन श्लोवेनापि सम्बन्ध । पूर्व श्लोके विघ्नमगभक्तरेप संघ प्रमगो भास्कराद्य सावनसमाधिप इत्यन्वय कार्य ॥ युगरणा (वल्पगनाहर्गण) यव्यभुग्भत्त (त्रिंगद्विभाजित ) फ्ल द्विनिघ्न वार्य (द्विगुणित) कार्य प्रिंाताहृते यदि नेपाणि भवन्ति तहि द्विनिम्न संव मध्यमाधिकार २३६ लब्ध कार्य नान्यथा ततो नगभक्तविकल (सप्तभक्तावशिष्ट) क्रमशो भास्कराद्य (सूर्यादिक ) मासाधिपतिर्भवेत् । शेपदिनानि च मासाधिपते प्रवृतस्य च गतानि तान्येव निशतो विशोध्य गम्यदिनानि, तस्यैव मासाधिपतेर्भवन्ति, द्विगुण च लब्ध क्रियते यत सप्तभिस्तिशतो हृते द्वयमवशिष्यते, तृतीयस्तृतीयो मासपतिरागम प्रामाण्याद्भवतीति ।।१६॥ हि भा --अहर्गरण को तीस स भाग देने से जो फल हो उसको दो से गुण देना चाहिये, तीस से भाग देने से यदि शेष रहे तो लब्धि को दो से गुरण पर एक जोडना चाहिये, अ यया नहीं । सात से भाग देन से जो शेष रहता है सूर्यादिमासाधिपति होत है । शेप मासानिति प्रवृत्त का गत दिन है, उसी को तीस म घटा देने से गम्य दिन होते हैं । लब्धि को दो मे इसलिए गुणने है कि तीस में सात से भाग देने से दो शेष रहता है । तीसरे तीसरे मासपति आगम प्रमाण से होत है ।। १६३ ।। इदानी कालहारेशज्ञानमुक्त्वा वपमासहोरेशाना क्रमप्रदर्शनमा । ऊर्व वारप्रवृत्तदिनगतघटिका चाहति पञ्चभक्ता होरेशा सैकमाप्त नगहुतविकल वासरेशाच्च यर । पञ्चाभ्यस्त फल वा हिमकरसहित स्यारक्रमेण धुनाथो मासेश स्यातृतीयोऽब्दपतिदिनपतिस्तच्चतुर्थो द्वितीय ॥१७॥ विमा -वारप्रवृत्तरुध्वं (वारप्रवृत्तितोऽनन्तर) दिनगतपटिका द्वधाहति (द्विगुणितदिनगतघटिका) पञ्चाहता) प्राप्त (लब्ध) मैक (रूपसहित) नगहृत विकल (सप्तभक्तावशिष्ट) पष्ठा (पाठपप्टनामिका) वासरेशात् (बारेश्वरात्) होरेशा भवन्ति । अथवा फल (पूर्वलब्ध ) पञ्चाभ्यस्त (पञ्चगुणित) हिमकर- सहित (रूपयुक्त) क्रमेण चुनाथ (वारेश ) भवति । तृतीय (तृतीयस्तृतीय) मासेश (मासाधिपति ) अब्दपतिदिनपति (घर्षपति मूर्य ) द्वितीय (द्वितीय- वर्षपनि ) तच्चतुर्थ (सूर्याच्चतुर्थ ) इति । १७३॥ अत्रापपत्ति । अहोरात्रमध्ये चतुर्विशत्य कालहोरा भन्ति महागरप्रमाणम् = ६० घटी। तदानुपातो यदि पष्टिघटिकाभिश्चतुर्विशत्य कालहोरा लभ्यत तदा वारादिदिनगतघटिकाभि विमित्यनुपातेन मशेषा गतवालहोरास्तत्स्वरूपम्= २४४ वारादिदिनगतघ २४वारादिदिनगतघ से गतकालहोरा+ ६० =गतकालहा, एतद्गतालहोरा- प्रमाण सैक सप्तभक्त रोपप्रमित वारेशात् पप्ठ पळ कालहारेश्वरो भवति । अय २५वारादिदिनगघ = गतकाल हो+ प्राचार्यग- नि न गृह्यत । ५ ५ अत्र दोपस्य शोधनेन २४वारादिदिनातघ-दो ५ ५ २४० वटेश्वर-मिद्धान्ने अथवंककालहोराया पन्चालरितग्रह. पालहोरेशो भवति तदा गतकाल- होराया निमित्यनुपातेन गतकालहोरा सम्बन्धि कालहोरेग ममागच्छति वर्तमान- कालहोरेशार्थ तत्र मैक कार्यः । तृतीयस्तृतीयोमामपति , रविवर्षपतिः, द्वितीयो वर्षपती रवितश्चतुर्थ तृतीयो वर्षपतिस्तस्माच्चतुर्थ इत्यादि "निचतुरनन्तरपष्ठा मावनमामान्ददिवमहोरेशा" इनि ब्रह्मगुप्तोक्त" मावनमामवादिपतिज्ञानार्थं गणानक्रम प्राचार्योक्तमश एव वर्षपतिमामपत्यादिगणनसम्बन्धे सिद्धान्तशेवरे श्रीपतिनाप्यतदेव कथ्यते । "सावनाब्दपतिमन चतुर्थ मासनाथमपि विद्धि तृतीयम् । वासरेश्वरमनन्तरमति पप्ठमेव खलु हौरिकमीशम् ।। इति ।।१७।। हि.भा-वार प्रवृत्ति के बाद दिनगत घटी को दो से गुण कर पाच से भाग देने से जो फल हो उसमें एक जेडकर सान से भाग देन में जो शेष रहता है वह वारेग मे घटे छडे क्रम मे होरेदा होते हैं । अथवा पूर्वानीत फ्ल वो पाच में गुणकर एक जोडने से प्रम मे वारेश होते है । तीसरं तीसरे मामेरा होने हैं, दर्पपति मूर्य होते है, द्वितीय वर्षपनि उनसे चौथे ग्रह होत हैं तृतीय वर्षपति उनमे चौये ग्रह होते हैं. इत्यादि ॥ १७३ ।। उपपत्ति । घटान ५ से अहोरात्र मे चौबीस काल होरा हाती है, अहोरात्र का मान ६० दण्ड है तब अनुपात परते है यदि माठ घटी मे चौवाम काल होरा पाते हैं तो वारादि दिनगत घटी मे क्या इम अनुपात से सशेष गतकाल होरा प्रमाण पाया, २४४ वारादि दिनगघ ६० २४ वारादि दिगतप दो '=गतकाल होरा+ दोनों पक्षो में स ५ ५ २४ वारादिग्रय शे =गतकाल हो, इम गतकाल होरा में एक जोडकर मात से भाग देने मे शेप तुल्य 'प्रथम काल होरेदा (वारेग) मो छठे छठे ग्रहह्वाल होरेसा २४वारादि दिनगम दो हाले है। =गनकाल हो। यहा प्राचार्य -इसका ग्रहण नहीं ५ करते हैं । अथवा एक काल होरा में पाच अन्तरित ग्रहकाल होरेश होते हैं तो गतकाल होरा में क्या इस अनुपपरत में एतकाल होगा सम्बकी काल होरेस पारते है पर्तमान काल होलेके शानार्य उसमें एक जोड देना चाहिये सात स अधिक रहने पर सात मे भाग देना चाहिये तब वर्तमानकाल होरेश ज्ञान हो जायगा । नृतीय तृतीय ग्रह मासपति होते है, रवि प्रथम वर्षपति होने हैं, द्वितीय वर्षपति रवि में चौथे ग्रह होते है, तृतीय वर्षपति उनसे चौथे ग्रह होने हैं इत्यादि, 'त्रिवतुरनन्तरपप्ठा. मावन मामाब्द दिवस होरेशा" यह ब्रह्मगुज कथिन सावन मामेग वश आदि ज्ञान के लिए गणना क्रम बटेश्वराचार्योक्त महम ही है ।
मध्यमाधिकार २४१ वर्षपतिमासपत्यादि के गणना विषय में सिद्धान्तशेखर मे श्रीपनि भी यही वातें बहते है- सावनाब्दपतिमनं चतुर्य मामनाथमपि विद्धि तृतीयम् । वासरेश्वरमनन्तरमन पण्ठमेव खलु हौरिक्मीग ॥ १७३ ।। इदानी पुनरपि होरेमज्ञानमाह सूर्योदयलग्ने होरा द्विघ्ना पञ्चगुणाः पर्वतोद्धृता । शेषा सैक दिवसाधिपतिक्रमेण होरापतिः पाठः ।। १८३ ।। वि.मा -यस्मिन्निष्टकाले कालहोरा ज्ञातुमिच्छति तस्मिन् काले तात्का- लिक लग्न कार्य तस्मात्तात्कालिकरविं विशोध्य शिष्टानि ग्रहारिग द्विन्नानि सन्ति होरा भवन्ति, शेपा. सैका (रूपयुक्ता ) पञ्चगुणा रूपयुक्ता कार्या , शेपाभावे पञ्चगुणासु होरासु रूप न योजयेत् । ते सप्तभक्ता अवशेषाङ्कसम दिवसाधिपति- क्रमेण होराधिपतिर्भवति ॥ सूर्योनलग्नस्य राशीन् भागीकृत्याधस्तनभागे सयुज्य पञ्चदशभिर्हरेत्, यत्पल ता होरा इत्युच्यन्ते । यदि पञ्चदशभिर्हते शेषमस्ति तदा लब्ध पञ्चगुण कृत्वा रूप योज्यम् । शेपाभावे प न योजयेत् । तस्मात्सप्तभक्तावशिष्टाङ्कसमो दिनपतिक्रमेण होराधिपतिर्भवति । अत्रोपपत्ति । कान्तिवृत्ते यत्र रविस्तस्माल्लग्न यावत्तान्तिवृत्त यावन्तोऽशास्तावन्त पञ्चदशभक्ताहोरात्व बजन्ति, यतो राश्यर्धनता होरा भवन्ति, लब्धाश्च पञ्चगुणा क्रियन्ते । यत षष्ठ पप्ठ कालहोरेशो भवति तेन द्वयोहोरेशयोरन्तर पञ्च, प्रतो होरा पञ्च गुणा सर्वे वारा भवन्ति, अवागमप्रामाण्याद्दिनपादिगणना। यदि लब्धहोरा सशेषा भवेयुस्तदा तन वर्तमानार्थ स्प योज्यते इति । सिद्धान्तशेखरे श्रीपतिनाप्येव पथ्यले- मोनलग्नस्य गृहाणि होरा द्विघ्नानि ता पञ्चगुणा सरोपा । चेद्रपयुक्ता दिनपादपस्ते होराधिनाथा कमशो भवेयु ।। १८६ ।। इति वटेश्वरसिद्धान्ते मध्यमाधिकारे देशान्तरविधिरष्टमोध्याय ममाप्त । हि भा--जिस काल में कालहीराज्ञान करना है उम पाल में लग्नानयन प्रकार में तात्तालिर लग्न माधन करना उमम ताकालिप रवि को घटा कर प राशि द्विगुणित होरा है, शेष सहित रहने में एक जोडवर पाच मे गुग देना जोर देना चाहिये, दोषा- भाव में पञ्चगुरिणत होरा म एव नहीं जोटना चाहिय, उमरो मान में भाग देने में शेषाङ्क- तुल्य दिनपनि क्रम में होराधिपति होते है ! मूर्य रहित लग्न मे जो रामि है उसको प्रभ चना पर नीचे वे प्रग को जोडयर पन्द्रह में भाग देना, जो पर होता वह हारा है। पन्द्रह से भाग देने मे यदि गेप रहता है तव सन्धि को पार से गुग्ग पर 7 जोड़ देना .
२४२ वटेश्वर-सिद्धान्त चाहिये। शेष के प्रभाव में रूप नही जोहना चाहिये । उममे मात से भाग देने में जो शेष रहना है तत्तुल्य दिनपति क्रम मे होराधिपति होते हैं । १३ ।। उपपत्ति। - क्रान्तिवृत्त मे जहा रवि है वहाँ मे लग्न ता जितने प्रग है उतने को पन्द्रह में भाग देने से होरा होती है, क्योकि राशि मावे को होरा कहते हैं । लकिन को पाच मे गुगते हैं ग्योकि छठे छठे ग्रवाल होरेश होते हैं । इमलिये दोवाल होरेश का अन्तर पाच होता है, प्रत होरा को पाच में गुणने मे मब दिन हो जाय गे । यहा दिनपति मगरगना में मागम प्रमाण ही है। यदि तब्ध होरा मशेष हो तो वर्तमान के लिये उसमें एक जोड देना चाहिये। मिद्धान्तशेखर में श्रीरनि भी इसी तरह वहते हैं- मोनलग्नस्य गृहाणि होरा इत्यादि ॥ १३ ॥ इति वटेश्वरमिदान्त म मध्यमाधिकार में देगान्तरविधि नामा मष्टम प्रध्याप समाप्त हुमा ।।
नवमोऽध्यायः अथ प्रभविधिः तत्रादौ तदारम्भ प्रयोजनमाह । अाकर्ण्य कुतन्त्रविदः प्रश्नान ग्लानिमुपयान्ति नष्टशिरसः । यस्मादतः स्वधोभिः प्रश्नाध्यायं समुच्यते वक्त म् ॥१॥ वि मा-यस्मात्कारणान् कुतन्त्रविद (अधमज्योति शास्त्रज्ञा) प्रश्नान् (विविधप्रश्नकदम्बकान्) यावर्ण्य (श्रुत्वा) नष्टशिरस (मस्तिष्कशून्या ) ग्लानि (लज्जा) उपयान्ति (प्राप्नुवन्ति) अतोऽस्मात्कारणान् स्वधीभि (निजबुद्धिभि) प्रश्नाध्याय (प्रश्नप्रकरण) वक्त म् (कथयितु ) समुच्यते (कथ्यते) मयेति ॥१॥ हि भा-जिस कारण से अल्पज्ञ ज्योतिषी लोग नाना प्रकार के प्रश्नो को सुनकर मस्तिष्पचून्य होकर लज्जा को पाते हैं, इस कारण अपनी बुद्धि के अनुमार प्रश्नाध्याय को हम कहते है ॥ १॥ इदानी प्रश्नमाह। प्रानयति यो धुराशि विनाधिमासंस्तया तिथिप्रलय । रविदिवसेभ्योऽस्माद धुचराद्य सो हि तन्त्रज्ञ ॥२॥ वि भायो व्यक्तिविशेष अधिमासविना तथा तिथिप्रलय (क्षयदिन) विना रविदिवसेभ्य (सौरदिनेभ्य ) शुगशि (महर्गरण) प्रानयति ( साधयति ) अस्मात् ( अहर्गरणात् ) शुचराद्य (ग्रहाद्य ) प्रानयति स तन्मज्ञ (गणक ) अस्तीति ॥२॥ अम्योतरार्थमुपपत्ति । अर्थकस्मिन् सौरव सावनदिनाद्यम् =३६५॥ १।३१।१५।० अमावयवान् १॥३॥१५ त्यक्त्वा ३६५ केवलमित्येव गृहीतानि । ततोऽनु- पातन गतवर्षसम्बन्धिदिनादि-३६५ गव । अथ युगसौग्वयु गमोरमावन दिनान्तराणि लभ्यन्ते तदेवेन सौरवण विमित्यनुपाने कस्मिन सौरवर्षे सौर- सावनदिनान्तराणि समागतानि ततोऽनुपातो यद्येकवर्षे इदमन्तर तदा गतवर्षे किमित्यनुपानेन यत्फल मागच्छेतत्पूर्वफ्ले ३६५ गव योग्य तदाहाणे भवेत् । ततो ग्रहज्ञान सुलभमिति ।
२४४ वटेश्वर सिद्धान्ते हि भा---जो व्यक्ति अधिमाम और अधम का छोट वर मारदिन मे प्रहगण साधन करता है वह तन्त्रज्ञ (ज्योतिषी) है। इम प्रदन । उत्तर पे लिए उपपत्ति एक मौर वर्ष म सावनदिनादि ३६५।१५।३१।१५१० यहा १५॥३१॥१५ इनको छोड कर केवल ३६५ दिन ग्रहण करते हैं तव अनुपात में गतवर्ष सम्बन्धी सावनदिन-३६५४ गतवर्ष । प्रव युगसौर वर्ष म यदि युग मौरदिन और मावन दिन का अन्तर पाते हैं तो एक मौरवर्ष में क्या इस अनुपात से एक सोर वर्ष म सौरग्नि और मादनदिन के अन्तर पा गये । तव अनुपात करते हैं कि यदि एक सौरवप मे यह अतर पाते हैं तो गतवर्ष म क्या इस अनुपात से जो फल होगा उमको पूर्वानीत "३६५ गव' पल म जोडने से ग्रहगए प्रमाण प्राजायेंगे। इम पर से ग्रहानयन मुगम है । इनि ॥३॥ इदानीमन्यप्रश्नमाह । अधिमास शशिमासैरवमै कुदिनविनाऽनै य मानयति । धुगणं रविदिवसेभ्यो वेत्ति प्रकट स मध्यगतिम् ॥३॥ विभा-य (व्यक्तिविशेष ) अधिमास (प्रसिद्धर्मलमास ) शशिमास (चान्द्रमास ) अवम (तिथिक्षय ) कुदिन (प्रसिद्ध सावन दिन ) बिना रविदिव- सेभ्य (सौरदिनेभ्य ) धुगरण (अहर्गण) आनयति (साधयति) म प्रस्ट मध्यति वेत्तीति ॥३॥ दे अस्योतरार्थमुपपत्तिस्तु द्वितीयश्लोकोपपत्यैव स्पुटेति ।। हि भा–जो व्यक्ति विशेष अधिमास, चान्द्रमास, अवम और कुदिन इन मव बिना अहर्गरण साधन करता है वह मध्यगति को जानता है ॥३॥ इसक उत्तर के लिए उपपत्ति द्वितीयश्लोक वी उपपत्ति से माफ है ॥२॥ इदानीमन्यान प्रश्नानाह । कुदिन शशिदिवसंश्च पराशुदिवसान करोति त हान् । अधिक सरिकलैरवममवमरधिकमानयति य स तन्त्रज्ञ ॥४॥ वि भा–य कुदिन , शशिदिवस (चान्द्रदिन) खराशुदिवसान् (सूर्य- वासरान्) करोति (प्रानयति) तैर्भाहान् (नक्षत्रदिवसान्) आनयति, तथा अधिक सविक्ल (सशेषाधिकमास ) अवम मगेपं अवमैश्वाधिव य आनयति स तन्त्रज्ञोऽस्तीति ॥४|| अत्र प्रथमप्रश्नस्य द्वितीयप्रश्नस्य चोत्तर स्फुटमेव । तृतीयचतुर्थप्रश्न- योरुत्तरार्थमुपपत्ति । गतावमतस्तच्छेपाच्चानुपानेन गतचान्द्राहानयनस्य स्फुटा युक्ति । सौर- %3D मध्यमाधिकार २४५ दिनेभ्यश्चान्द्रदिनेभ्यश्च गताधिमासा समा एव् लभ्यन्ते तच्छेपमपि सममेका युग- सौरदिनहरोऽन्यन युगचान्द्रदिनहर इति सर्व सौरेभ्य साधितास्ते चेदधिमासा- स्तदैन्दवा" इत्यादि भास्करोक्त न स्फुटम् । ततश्चान्द्राह्त आगतैर्गताधिमासैदिनी- कृतश्चान्द्राहा विहीना गतसौराहा भवन्ति तेभ्य पुनर्गताधिमासाहरणेनेष्टग्रहाद्य मुखेन ज्ञायते गतसौरदिनेभ्यो गताधिमामशेषत समीकरणम् । गसौदि युग्रमा युसौदि गममा+अधिशे, पक्षयो ३० युप्रमागग्रमा पोजनेन युअधिमा (गसौदि+गअधिमादि) =गचादि युगमा । = गमधिमा (युसौदि+युअधिमादि) + अधिशे --युचादि गधिमा+अधिशे प्रत सौरचान्द्रेभ्य समागताधिमासा लभ्यन्तेऽधिशेष च सममिति ॥४॥ हि मा--जो व्यक्ति विशेष युगकुदिन और युग चान्द्र दिन मे सौर दिन वे पानयन करते हैं और उस पर मे नाक्षत्र दिन के साधन करते है तथा मशेष अधिमाम से अवम पौर सोप अवम से अधिमास के पानयन करते है वे तन्त्रज्ञ है ॥४॥ महा प्रथम और द्वितीय प्रश्न के उत्तर मरल ही हैं। तृतीय और चतुर्य प्रश्नो के उत्तर के लिए उपपत्ति गनावम से और उसके शेष मे अनुपात द्वारा गनचान्द्र दिनानयन स्पष्ट ही है । मौर- दिन और चान्द्रदिन मे गताधिमास बराबर ही आते है उसके शेष भी बराबर होते हैं। एक स्थान मे युगसौरदिन हर होते हैं द्वितीय स्थान मे युगचान्द्रदिन हर होते हैं। ये सब बात "सोरेभ्य साधितास्ते चेदधिमासास्तदन्सवा" इत्यादि भास्कर कथित से स्पष्ट है। चान्द्रदिन से जो गताधिमास दिन याये उसे चान्द्र दिन म घटान मे गतसौर दिन होते हैं उमसे फिर गताधिमासाहाण से इष्टग्रहादि का ज्ञान मुलभ ही हो जायगा। गतसौरदिन और गताधिमाम शेप मे समीकरण गमौदि युअधिमा- युसोदि गममा + अधिशे दोनो पक्षो म ३० युप्रमा गरमा जोडने म युप्रधिमा (गसौदि+गअधिमादि)%3D गचादि युप्रमा = गमधिमा (युमोदि+युमधिमादि) +अधिशे =युचादि गमधिमा+अधिशे इमलिये सौर और चान्द्र मे तुल्य ही गताधिमाम और अधिशेष पाये ।। ४ ।। इदानीमन्यान् प्रश्नानाह। धुगरणाहते रवीन्द्र ताम्यामिष्ट ग्रहं चान्यम् । बहुधा य: शशिन इनं रवेरिन् करोति गएकः स ॥५॥ विभा-धु गणाहते (ग्रहगरणगुणिते) रवीन्दू (मूर्याचन्द्रमसौ) उद्दिष्टों पत्त ते, ताभ्या (अहागगुणित-रविचन्द्राभ्या) य (व्यत्तिविक्षेप । अन्य (भिन्न)
२४६
वटेश्वर सिद्धान्त
इष्ट ग्रह करोति तथा शशिन (चन्द्रात्) इन (सूर्य) रवे (मूर्यात्) इन्दु (चन्द्र)
यो वहुधा करोति स गणकोऽस्तीति ।। ५॥
एतेषा प्रश्नानामुत्तरार्थमुपपत्तय ।
रवि x महर्गरण । चन्द्र महर्गरण प्राभ्या पृथक् पृथक् चन्द्ररव्योञ्जन क्रियते
यथा प्रथम तयोर्योग कार्यस्तदा रवि अहर्गण+ चन्द्र ग्रहण ग्रहाण
(रवि+चन्द्र) तथा च अहर्गरण युगरविभगण+ग्रहण युचभगण= प्रह
(युरभ + युचभ) ततोऽनुपातेन अह (युरभ+युचभ)एभिर्यु गचन्द्रभ : I लभ्यन्ते तदा
अह (रवि+चन्द्र) अनेन किमिति ममागतश्चन्द्र =
अह (रवि+चन्द्र)xयुचभ
अह (युरभ+युचभ)
(ग्रहरवि+अह x चन्द्र) युचभ = चन्द्र
अहX युरभ+अहX युचभ
अह (रवि + चन्द्र) युरभ रवि= (ग्रह X रवि+अहX चन्द्र) युरभ
ग्रह (युरभ+युचभ)
अह युरभ+ग्रह युवभ
एतेन रविचन्द्रयोञ्जन जातम् । ततो रविचन्द्रयोर्मध्ये एक सिद्धग्रह साध्य-
ग्रहमिष्टग्रह मत्वा “साध्यस्य चक्र गुणित प्रसिद्धो भक्तो निजै " इत्यादिनाऽन्यस्येष्ट-
ग्रहस्य ज्ञान सुशकमिति ।। ५ ।।
हि भा-अहर्गरण गुणित रवि और चन्द्र उद्दिष्ट है इन दोनो से जो (व्यक्तिविशेष)
अन्य ग्रह के साधन करते है। चन्द्र से रवि, और रवि से चन्द्र के साधन अनेक प्रकार से
करते है वे ज्योतिषी हैं ॥५॥
D
वा
इन प्रश्नो के उत्तर के लिये उपपत्ति
प्रहरीए रवि । प्रहरीण चन्द्र ये दोनो विदित है तव इन दोनो पर से पृथक-
पृथक् रवि और चन्द्र के ज्ञान करते है।
प्राण X रवि+अहगंण चन्द्र= योग । तथा अहर्गण - युरविभगण+प्रह
युचभगण तब अनुपात करते हैं कि यदि प्रह युरभ+मह युचभ इसमे=यो, युग चन्द्रभगएण
पाते हैं तो प्रहारवि+ग्रह.चन्द्र इसमे क्या इस अनुपात मे चन्द्र के मान पा जायगे ।
(अह रवि+ग्रह चन्द्र) चभगण
=चन्द्र । इसी तरह अनुपान में
अह पुरग+ग्रह युचभ
(पद रवि+ ग्रह चन्द्र) युरभगण =रवि । इस तरह रवि और चन्द्र के ज्ञान हो
अह युरभ+मह युवभ
गये है । तब इन दोनो म से विमी एव को मिद्ध ग्रह और साध्यग्रह को इष्टग्रह मानवर
'साध्यस्य पर गुणित प्रसिद्धो भवता निज" इत्यादि भास्वरोक्न मे इग्रह के ज्ञान
हो जायेंगे ॥५॥
मध्य .||-कार २०७ इदानीमन्यो प्रश्नावाह अश्विन्यौदायिकानयवेष्दिवौकसाम्युदयकाले । साधयति दिविचरान् यो गणको मुख्य. स तन्त्रविदाम् ॥६॥ विभायो गणक (ज्योतिपिर) अश्विन्यौदयिकान् (अश्विन्युदय- कालिकान्) दिविचरान् (ग्रहान्) अयवेष्टदिवौकसाभ्युदयवाले (इष्टग्रहोदयकाले) दिविचरान साधयति (आनयति) स तन्त्रविदा ( तन्नज्ञाना ज्योतिर्विदा वा) मुख्य (प्रधान ) अस्तीति ॥६॥ अनोपपति ग्रहभगणरूनानि भदिनानि,ग्रहस वानदिनानि भवन्ति । तत स्वसावन- रिष्ट्राश्विन्योदयिका मध्यमग्रहा भवन्त्यर्थाद् यदीष्टग्रहोदयिका ग्रहा साध्यास्तदेष्टग्रह- सावनाहर्गणतो यद्यश्विन्यौदयिकास्तदेष्टभदिनतो मध्यमा ग्रहा पूर्ववत्साध्या 'भभ्रमास्तु भगविवर्जिता यस्य तस्य पुदिनानि तानि वा' इत्यादि भास्करोक्त- मेतदनुरूपमेवेति । ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते ब्रह्मगुप्नोक्तमप्येतत्सदृशमेव, यथा ब्रह्मगुप्तोक्त- वाक्यम्- "भदिनानि ग्रहमगरणस्वनानि भवन्ति सम्वनदिनानि । इष्टाश्चिन्यौदयिका स्वसाक्ने पूर्ववन्मध्या ॥ इति ॥६॥ हि भा-जो ज्योतिषी अश्विनी के उदयवालिक ग्रहो को अथवा इष्टग्रहोदय कालिक ग्रहा क माधन करते हैं वे ज्योनिपियो में प्रधान है।।६।। इसके उत्तर के लिये उपपत्ति भदिन म ग्रहभगण को घटाने से ग्रह सावन दिन होते है। तव अपन मावन से पूववत् अर्थात् यदि इष्ट ग्रहादवालिक ग्रह साधन करना हो तो इष्ट ग्रह सावनाहर्गण पर से यदि अश्विनी क उदयवालिप ग्रह माधन करना हो तो इए भदिन पर से मध्यम ग्रह पूर्ववत् साधन करना । 'भभ्रमास्तु भगण विवजिता यस्य नस्य बुदिनानि तानि वा इत्यादि भास्करात इमरे अनुरूप ही है। साह्मपुसिद्धान म ब्रह्मगुप्तोक्त भी इमी के महा है । उनका वचन निम्नलिखित है- "भदिनादि ग्रहभगणनानि भवति सावनदिनानि । इष्टाश्विन्योदयिका स्वमावन पूर्ववन्मध्या ।। इति ॥६॥ इदानीमन्यान् प्रश्नानाद । वार वलोमविधिना स्पष्टतमाद्य करोति सोपात । द्युसदा च विलोमति मध्यति च विमलाशम् ।।७।। महदल्पगती धुचरावन्योऽन्य य प्रसापयेद् बहुधा । ग्रहमकमर्कमयया करोति खचर स तन्त्रज्ञ. 10 १ २४० वटेश्वर-सिद्धान्त विमा -य (व्यक्तिविशेष) सप्टनमात् ( अतिशयसष्टात् ) मक्षेपात् (सक्षेपस ) विलोमविधिना (उत्तमपद्धत्या) वार (दिन) प्रसाधयेदित्येक प्रश्न । द्युसदा (ग्रहारणा) विलोमगति (अनुलोमगनिग्रह विलोमगति) य प्रसाधयेदिति द्वितीय प्रश्न । ग्रहाणा गध्यगति विमलाश (म्पष्टगति) य प्रसाधयेदिति तृतीयचतुर्यप्रश्नौ। महदरपगती द्युचरो (शीघ्रमन्दग्रही) अन्योऽन्य (परम्पर) य प्रसाधयेदिति पञ्चम प्रश्न । ग्रहम् अर्क (रवि) वा अकं खचर (ग्रह) य क्गेति (इति पप्ठ प्रभ) स तन्त्रज्ञ (ज्योतिर्विज्ञ ) अस्तीति । ७८ प्रथमप्रभस्योत्तरार्थमुपपत्ति अहर्गणे सप्तभक्ते यदि शेषप्रमाणम् =दो, तथा सप्तभक्त '७ बुदि-ग्रह- गण' अय शेपमान यदि शे कल्प्यते तदा ७-शे, से । अत -दो, अस्माद् या रवित मगणना सैव ७ -शे, अम्मात् शन्यादेविपरीतगणना भवेद्यथा- यदि शे, =१ तदा प्रमगणनया वर्तमानवार सोमो भवेत्तथा शे-६ अस्मात् रवि । शनि । शुक्र । गुरु 1 बुध । कुज ।इति विपरीतगणनया वर्तमानवार सोम एव जातोऽत सिद्धम् ।। हि भा ---जो व्यक्ति सक्षेप मे अतिशय स्फुट विलोम रीति म दिन साधन करत है यह एक प्रश्न हुमा । ग्रहो की विलोम गति (मिक गति ग्रह को विलोमगनि फरना) के साधन जो करत हैं यह दूसरा प्रश्न हुा । ग्रहो की मध्यम गति और स्पष्ट गति के माधन जो करत है य तनीय और चतुय प्रश्न है। गीनगनि प्रह और मन्दगति ग्रह के परस्पर साधने (गीनगति ग्रह म मन्द गति ग्रह और मन्द गति ग्रह से शीत गति ग्रह) जा करने है यह ५वा प्रश्न है। ग्रह को रवि और रवि को ग्रह जा करते है वे तज्ञ (ज्योतिषी) हैं ॥७॥ यहा प्रथम प्रश्न के उत्तर के लिय उपपत्ति प्रहगण म सात में भाग देन म जो दोष रहता है उसका नाम ग, पोर '७ कुदि-प्रहगण' इमम सात मे भाग देने म गेप का नाम शश रखत है तब ७-दो-शे इमलिए-दो, इमसे जा रव्यादि स म गणना होती है वही -शेइस परम दयारिम विपरीत गखाना होती है । जम- यदि दश =१ तब मगराना म वत्तमान वार सोम याण। और = ६ इम पर स रवि । शनि । शुक्र । गुरु । बुध । कुज विपरीत गणना में भी वतमान वार सोम ही प्राया। इति ॥ द्युसदा च विलोमगतिमित्यस्योत्तरार्थमुपपत्ति इप्टग्रहयुगभगणोनेभ्यो युगकुदिनेभ्यो ये शेपास्तत्ममैयुंगभगणरहर्गणा- दनुपातेन यो मध्यमग्रह स्यात्स यद्यनुलोमगरतदा विलोमो भवेद्विलोमगो वा मध्यमाधिकारः २४६ ऽनुलोगगतिर्भवतीति ।। यथा युकुदि-इग्रयुगभगरा एतेऽहर्गरणगुणा युगकुदिनभक्ता लब्धभगणादिके भगरणानपास्य राश्यादिको ग्रह क्रियते तदेष्टग्रहश्चक्रशुद्धो भवत्यतो ऽनुलोमगो विलोमो भवतोति ॥ अथवा युकुदि अहर्गरगोनाना युगकुदिनाना यानि दोपरिण ते. शेपैगम्याहर्गणे हयुगभगण- श्वानुपातेन पूर्ववत्कृतोऽनुलोमगो ग्रहो विलोमगतिर्भवति विलोमश्चानुलोमगो मध्यो वा भवतीति यथा यदि गम्याहर्गुणेनानेन 'युकुदि-ग्रहर्गरण' भगरणात्मको ग्रह साध्यते तदा ग्रहयुभगण (युकुदि-अहर्गण) = प्रयुभगण-- ग्रयुभ x महर्गरण =ग्रह युकुदि अत्रापि भगणाना त्यागाद्वाश्यादिको ग्रहश्चक्रशुद्ध उत्पद्यतेऽनोऽनुलोमगो विलोमगो विलोभगश्चानुलोभगो भवतीति । ब्रह्मगुप्तोप्येवमेव कथयति । यथा-- "इप्टभगरणेन भूदिनशेषैर्भगण कृतो मध्य । अनुलोमगो विलोमो विलोमगो वाऽनुलोमगति ॥" सिद्धातशेखरे श्रीपतिनाप्येवमेव कथ्यते । यथा च तद्वाक्यम्- "चक्रोनितक्षितिदिनप्रकरावशेषश्चक्री वृतोऽयमनुलोमगतिविलोम । प्राग्वद्विलोमगतिरप्यनुलोमग स्याद् यद्वा द्यु राशिरहिनै वुदिन स्वचक ॥" "धुमदा च विलोमगति" इम प्रश्न के उत्तर के िलये उत्पत्ति । युग कुदिन में इष्ट ग्रह युग भगण को घटाने में जो शेष रहता है नत ल्य युग भगए से प्रहर्गरण द्वारा अनुपान से मध्यम ग्रह होता है वह यदि अमिरगतिक है तो विलोम- गतिक होता है और यदि विलोमगतिक है तो ऋमिकगतिक होता है । जैसे युकुदि-इग्रयुभगण इसको प्रहगंण मे गुण कर युग कुदिन मे भाग देने से जो भगण विफल होता है उसमे भगरण को घटाकर राश्यादिर ग्रह करते हैं तब इप्टग्रह चक्र शुद्ध होते हैं। इसलिए अनुलोमग ग्रह विलोमग होने हैं। अथवा युग कुदिन में अहर्गरण को घटा कर जो दोष (गम्पहरण) रहते हैं उममे और ग्रह युग भगण से अनुपात द्वारा पूर्ववत् किये हुये प्रमिक गति ग्रह विलोमगनिक होते हैं और विलोमगतिक मध्यम ग्रह क्रमिक गति ग्रह होते हैं। यया--- युकुदिन- महाण इम गम्याहर्गरण से मध्यम ग्रह माधन करते हैं- प्रयुभगए (यदि-महगंण) प्रयुभगण महर्गण -प्रयुभगरण- यदि यदि यहा भी भगरणो वे छोडने गे रामपादिर ग्रहवा शुद्ध होते हैं। इसलिये अनुलोमग प्रह विलोमग और विलोमग ग्रह मनुलोमग होते है।
वटेश्वर-सिद्धान्ते ब्रह्मगुप्त भी इसी तरह कहते हैं । "इष्टमगरपोन भूदिनोपभंगणं, वृतो मध्य । अनुलोमगो विलोमो विलोमगोवाप्नुलोमगति ॥" सिद्धान्तशेखर मे श्रीपति भी इसी तरह कहते हैं । यथा-- "चक्रोनितक्षितिदिनप्रकारावशेषश्चन " इत्यादि । अथ मध्यगति च विमलायमित्यस्योत्तरार्थमुपपत्ति. । अथ रविचन्द्रानयनप्रकारेण सूर्योदयेऽभीष्टदिने चैमादितः सावयव चान्द्र- मासादि.मा+दि+क्षयशेल । रवि-मा+दि+क्षशेल-अधिमाल चन्द्र=१३ (मा+दि+क्षयशेल)-अधिमाल । अधिमाल = अधिमासफल तत स्वफलसस्कृत रवि स्वफलसस्कृतच्चान्द्रादिशोध्य स्पष्टरविचन्द्रान्तरें साधितं तद्द्वादशभक्तं चान्द्र मासादि स्यात् । एव द्वादशभक्त रविमन्दफल व्यस्त द्वादशभक्त चन्द्रफल च दिनादि यथागत मध्यमचान्द्रमसादिकेऽस्मिन् 'मा+दि+क्षशेत' सस्कृत भवति । एव तिथे(क्त घट्यात्मक लड्वाया चान्द्रात्मक जातम् । सायन- घट्यर्थमेकस्मिन् सावनदिने रविचन्द्रगत्यन्तर द्वादशभक्त फल चान्द्र प्रसाध्यानुपातो यद्येतच्चान्द्रावयवेत सावना पष्टिघटिका लभ्यन्ते तदा तिथिविकलेन कि लब्धा लङ्काया स्फुटास्तिथिमुक्तघटिकास्तत्र देशान्तरचरसस्कारेण स्वदेशे स्फुटार्कोदये स्फुटास्तिथिमुक्ता घटिका भवन्तीति । अत्रीपरिलिखित मध्यमरवि चन्द्रवशेन मध्यमतिथिज्ञान सुगममेव । प्रश्ने "विमलाशम्" वर्तते-विमलाशगब्देन यदि स्पष्टान्तराशास्तदाऽप्युपर्युक्तोपपत्त्येव सर्वं स्फुटमिति ॥ अथ महदल्पगती धुचरावन्योन्य य प्रसाधयेदित्युत्तरार्थमुपपत्ति शीघ्रग्रहभंगण+मन्दग्रहभगण भगणयोग = योग शोघ्रग्रहभगण-मन्दप्रभगए= भगवान्तर अन्तर तत सक्रमणेन यो+न -शीघ्रग्रहभगण ततोऽनुपातेन शीघ्रगतिग्रह (यो+) अहर्गण योx महर्गण अX प्रहरीण २४युकुदि २ युकु योगजग्रह अन्तरजग्रह शीघ्रगतिग्रह । २ एवमेव मन्दगतिग्रगण ततोऽनुपाते न मदगति ग्रह- (यो-म) महर्गण_योXमहर्गरण_ प्रमहर्गण_ २xयुक २ युकु योगजग्रह अन्तरजग्रह =मन्दगतिग्रह। २ २ यदि शीघ्रगतिग्र-अन्तरजग्र-मन्दगतिग्र । मन्दगति+मन्नरजन शीघ्रग्रह । %3- R + %3D - - २ युकु + २ यो-म २ २ युकु 4 मध्यमाधिकार: ग्रहमकमर्कमयवा सचरमिति प्रश्नस्योत्तरमपि पूर्वोक्नोपपत्तिबलेनव जात यत शीघ्रमन्दगनिग्रह्योरेक ग्रहमन्य रवि प्रकल्प्य पूर्ववदेवोपपत्ति कार्येति ।। ७८ ॥ "मध्यगति च विमलासम्" इस प्रश्न के उत्तर के लिये उपपत्ति । रवि और चन्द्र के ग्रानयन प्रकार से अभीष्ट दिन म सूर्योदयकाल में चैत्रादि से साव- यव चान्द्रमासादि-मा+दि+क्षयशेल । रविः मा+दि+क्षयशेल-अधिमाल । प्रमाल-अधिफल चन्द्र-१३ (मा+दि+क्षयशेल)- अधिमाफल । अपने मन्दफल सस्कृत रवि को अपने मन्दफल सस्थत चन्द्र मे घटाकर स्पष्ट रवि और स्पष्ट चन्द्र के अन्तर माधन कर बारह से भाग देने से चान्द्रमामादि होता है । इस तरह वारह से भक्त रविमन्द फ्ल व्यस्त द्वादशभक्त च द्रमन्दपल पूर्वागत मध्यम चान्द्रमासादि (मा+दि+क्षशेल) सस्कृत होता है । इस तरह तिधिभुक्त प्रयात्मक लका मे चान्द्रात्मक हुमा । सावन घटी के लिये एक सावन दिन मे रविव प्रगत्यनर को बारह मे भाग देने से जो चान्द्र फल होता है उस पर से अनुपात परते है यदि इस चान्द्रावयव मे सावन साठ घटी पाते है तो तिथि शेप म क्या फल लदा में स्पष्टतिथि मुक्त घटी प्रमाण होता है इसम देशान्तर-मुजान्तर-चर कर्म सस्कार करने से अपने देश में सप्ट रव्युदयकाल में स्पष्ट तिथिभुवत घटी होती है । उपरि- लिखित मध्यम रवि और मध्यम चन्द्रवरा मध्यमतिथि ज्ञान सुलभ ही है। तथा प्रश्न में 'विमलासम्" इससे यदि स्पष्टान्त राश लेते है तो भी उपयुक्त उपपत्ति से उसका ज्ञान सुलभ ही है ।। ५वे प्रश्न के लिये उपपत्ति । शीघ्रग्रहभगरण+मन्दग्रहम - भगरणयोग-यो सोधनहभगण-मन्दग्रहम = भगरणान्तर-प्र यो+म तब सक्रमण शीघ्रग्रभ ! तथा =मन्दगभगए २ २ (या+अ)प्रदर्ग शीघ्रप्रभ ग्रहणयोग्रहगए. अXअहर्गा प्रद अनुपात २४युकु युकु २ युकु २ युकु योगजग्रह अन्तरजन -शीनग्रह २ २ मन्दग्रहभगण अहर्गण (यो-य) अहर्गण- यो ग्रहगरण... अXअहर्गए तथा युकु २ युक २ युकु २ युकु योगजग्रह अन्तरजन '-मन्दगतिग्रह । २ २ यदि शीघ्रगतिग्रह-अन्तरजग्रह मन्दगतिग्रह मन्दगतिग्रह+अन्तरजग्रह-शीघ्रगतिग्रह । छठे प्रश्न का उत्तर ५ व प्रश्न की उपपत्ति से ही हो जायगा क्योकि शीघ्रगतिग्रह और मन्दगतिग्रह मे एक को ग्रह और दूसरे को रवि मानकर ५ व श्लोक को उपपत्ति केवल से ग्रह और रवि के ज्ञान हो जायगे ॥ ७८ ।। यो- से + २५० वटेश्वर-सिद्धान्ते ब्रह्मगुप्त भी इसी तरह कहते हैं । "इष्टभगणोन भूदिनरोपभंगरण कृतो मध्य । अनुलोमगो विलोमो विलोमगोवाऽनुलोमगति ।" सिद्धानशेपर में श्रीपरि भी इसी तरह कहते हैं । यथा- "चक्रोनितक्षितिदिनप्रकारावशेर्पश्चक्र " इत्यादि । अथ मध्यगति च विमलाशमित्यस्योत्तरार्थमुपपत्ति । अथ रविचन्द्रानयनप्रकारेण सूर्योदयेऽभीष्टदिने चैत्रादित सावयव चान्द्र- मासादि =मा+दि+क्षयशेल । रवि-मा+दि+क्षगेल-अधिमाल चन्द्र =१३ (मा+दि+क्षयशेल)- अधिमाल । अधिमाल = अधिमासफल तत स्वफलसस्कृत रविं स्वफलसस्कृतच्चान्द्राद्दिशोध्य स्पष्टरविचन्द्रान्तर साधित तवादशभक्तं चान्द्र मासादि स्यात् । एव द्वादशभक्त रविमन्दफ्ल व्यस्त द्वादशभक्त चन्द्रफल च दिनादि यथागत मध्यमचान्द्रमसादिकेऽस्मिन् 'मा+दि+क्षशेल' सस्कृत भवति । एव तिथे क्त घट्यात्मक लङ्काया चान्द्रात्मक जातम् । साचन- घट्यर्थमेकस्मिन् सावनदिने रविचन्द्रगत्यन्तर द्वादशभक्त फ्ल चान्द्र प्रसाध्यानुपातो यद्येतच्चान्द्रावयवेन सावना पष्टिघटिका लभ्यन्ते तदा तिथिविक्लेन कि लब्धा लङ्काया स्फुटास्तिथिमुक्तघटिवास्तत्र देशान्तरचरसस्कारेण स्वदेशे स्फुटार्योदये स्फुटास्तिथिमुक्ता घटिका भवन्तीति । अत्रोपरिलिखित मध्यमरवि चन्द्रवशेन मध्यमतिथिज्ञान सुगममेव । प्रश्ने "विमलाशम्" वर्तते-विमलाशशब्देन यदि स्पष्टान्तराशास्तदाऽप्युपर्युक्तोपपत्त्यैव सर्व स्फुटमिति ।। अथ महदल्पगती द्युचरावन्योन्य य प्रसाधयेदित्युत्तरार्थमुपपत्ति शीघ्रग्रहभगए+मन्दग्रहमगरण भगरणयोग= योग शीघ्रग्रहभगण-मन्दग्रभगण = भगणान्तर=अन्तर तत सक्रमणेन यो+न =शीघ्रग्रहभगण ततोऽनुपातेन २ शीघ्रगतिग्रह (यो+अ) अहर्गरण या X महगंग २४युकुदि २ युकु २ युकु योगजग्रह अन्तरजग्रह + शीघ्रगतिग्रह । यो-म एवमेव मन्दगतिग्रगण ततान्नुपातेन मदगति ग्रह %3 (यो-अ) ग्रहगंण_यो प्रहगण अ४ अर्गण २ युए २ युकु योगजग्रह अन्तरजग्रह =मन्दगतिग्रह । २ यदि शीघ्रगतिग्र-अन्तरजनमदगतिन । मन्दगति+अन्तरजग्र=शीघ्रग्रह । प्रअहर्गरण - % 3D २ २ २४ युकु मध्यमाधिकारः . अहमर्फमर्कमथवा खचरमिति प्रश्नस्योत्तरमपि पूर्वोक्तोपपत्तिवलेनैव जात यत शीघ्रमन्दगतिमयोरेक ग्रहमन्य रवि प्रकल्प्य पूर्ववदेवोपपत्ति कार्येति ॥ ७.८ ॥ "मध्यगति च विमलाशम्" इस प्रश्न के उत्तर के लिये उपपत्ति । रवि और चन्द्र के ग्रानयन प्रकार से अभीष्ट दिन में सूर्योदयकाल मे चैत्रादि से साव- यव चान्द्रमामादि-मा+दि+क्षयशेल । रविः-मा+दि+क्षयशेल-अधिमाल । अमाल अधिफल चन्द्र= १३ (मा+दि+क्षयशेल)-~अधिमाफल । अपने मन्दफल मस्कृत रवि को अपने मन्दफल सस्कृत चन्द्र में घटाकर स्पष्ट रवि और स्पष्ट चन्द्र के अन्तर साधन कर बारह से भाग देने से चान्द्रमासादि होता है । इस तरह बारह से भक्त रविमन्द फल व्यस्त द्वादशभक्त चन्द्रमन्दफल पूर्वागत मध्यम चान्द्रमासादि (मा+दि+क्षशेल) सस्कृत होता है । इस तरह तिथिमुक्त घस्यात्मक लङ्का मे चान्द्रात्मक हुआ । सावन घटी के लिये एक सावन दिन में रविचन्द्रगत्यन्तर को बारह से भाग देने से जो चान्द्र फल होता है उस पर से अनुपात करते है यदि इस चान्द्रावयव मे सावन साठ घटी पाते है तो तिथि शेप मे क्या फल लङ्का में स्पष्टतिथि मुक्त घटी प्रमाण होता है इसमे देशान्तर-भुजान्तर-चर कर्म सस्कार करने से अपने देश मे सष्ट रव्युदयकाल मे स्पष्ट तिथिभुक्त घटी होती है । उपरि- लिखित मध्यम रवि और मध्यम चन्द्रवश मध्यमतिथि ज्ञान सुलभ ही है। तथा प्रश्न मे 'विमलाशम्" इससे यदि स्पष्टान्तराश लेते है तो भी उपर्युक्त उपपत्ति से उसका ज्ञान सुलभ ही है। ५वें प्रश्न के लिये उपपत्ति । शीघ्रग्रहभगरण + मन्दग्रहम - भगरणयोग-यो शीघ्रग्रहभगण-मन्दग्रहभः = भगणान्तर- यो+म यो- से तब सक्रमण -शीधग्रम । तथा -मन्दनभगरण २ २ (यो+अ)अहर्ग शोघ्रग्रभ X अर्गण_यो x अहर्गण + अX ग्रहण अब अनुपात २Xयुकु युक २ युक योगजग्रह शीघ्रग्रह मन्दग्रहभगण अहर्गरण (यो-अ ) अहगंण योX अहर्गरण अXअहर्गरए युकु २ युकु २ युद योगजग्रह अन्तरजग्र मन्दगतिग्रह । २ यदि शीघ्रगतिग्रह-अन्तरजग्रह -मन्दर्गातग्रह मन्दगतिग्रह+अन्तरजग्रह शीघ्रगतिग्रह । छठे प्रश्न का उत्तर ५ वें प्रश्न की उपपत्ति से ही हो जायगा क्योकि शीघ्रगतिग्रह और मन्दगतिग्रह में एक को ग्रह और दूसरे को रवि मानकर ५ वें श्लोक की उपपत्ति केवल से ग्रह और रवि के ज्ञान हो जायगे ।। ७-८ ।। २ युकु अन्तरजग्र २ तथा- - २ युकु । २५२ वटेश्वर-सिद्धान्त इदानीमन्यान् प्रश्नानाह प्रत्युदयं प्रतिपादं ग्रहमुक्ति वेत्ति यो ग्रहाम्युदयात् बहुधा करोति तेभ्यो भावाचं स तन्त्रज्ञः ॥६॥ वि भा-य. ग्रहाभ्युदयात् (ग्रहसावनात्) प्रत्युदयं प्रतिपाद ग्रहमुक्ति (ग्रहगति) वेति (जानाति) तेभ्यो भावर्ताद्य (नक्षनभगणाद्यम्) बहुधा करोति स तन्त्रज्ञोऽस्तीति ||६॥ अस्योतरार्थमुपपति । अथ यदि युगपुदिनयुगग्रहसावन दिनानि लभ्यन्ते तदाऽहगंणेन विमित्य- नुपातेन समागतानि गतसावनदिनानि, भभ्रमोत्पन्नग्रह एतेनानीतेन फलेन होनः कार्यस्तदा मध्यमग्रहो भवति । यस्य भगरगर्यो ग्रह प्रानीयते स तस्यैवोदयकालिको भवति, नक्षत्रपरिवत्तरानीतो नक्षत्रोदयिकालिको भवति । तथा स इत्यश्विनी- नक्षत्राणा प्रथम तदुदयकालिको ग्रहो भवति, अस्मादश्विन्यौदयिकाद् भगणात् यस्योदया शोध्यन्ते शिष्टस्तस्यैव मध्यमो भवति ततस्तद्गतिज्ञान नक्षत्रभगणादि- ज्ञान सुलभमिति ॥६॥ हि भा -जो व्यक्ति विशेष ग्रहसावन दिन से प्रत्युदय और प्रतिपद मे ग्रहगति को जानते हैं और उनसे अनेक प्रकार नक्षत्र भगरणादि को लाते हैं वे ज्योतिषी हैं ||६|| इसके उत्तर के लिये उपपत्ति । यदि युगकुदिन में युगग्रह सावनदिन पाते है तो अहर्गण म क्या इस अनुपात से गत- सावनदिन प्राते है। इसको भभ्रम से जायमान ग्रह में घटाने से मध्यम ग्रह होते हैं । जिसके भगणो द्वारा जो ग्रह साधित होते हैं वे उमो पे उदयकालिक होते हैं , नक्षत्रपरिवर्त (नक्षत्रभगण) से साधितग्रह नक्षत्र के उदयकालिक होते है, इस तरह अश्विनी नक्षत्रोदय कालिक ग्रह होते हैं । इस अश्विनी के उदयकालिक भगण में जिसके उदय (सावन) को घटाते हैं शेप उसी का मध्यम होता है इस पर से इस गति और नक्षत्र भगणादि ज्ञान सुलभ है ॥६॥ इदानीमन्य प्रश्नमाह । अन्यभगए-गुरगादागरणात्प्रश्नाक्षराहतादथवा । कुरुते यो ग्रहमिष्टं सच्छेदगुरगापवर्तज्ञ ॥ १० ॥ विभा.न्य (व्यक्तिविशेष ) अन्यभगरणगुणात् (साध्यग्रहेत रभगण- गुणितात्) छ गणात् (ग्रहगणात्) अथवा प्रश्नाक्षराहतात् (प्रश्नकथितगुणका गुणितात् | गरणात्) इष्ट (साध्य) ग्रह कुरुते स छैदगुरणापवर्त्तज्ञ (हरगुणभजन- पण्डित) अस्तीति ।। १० ।। उपपत्ति साध्यग्रह -इन । अन्यग्रह =अग्र, अन्यभगण ग्रहण एतस्मादिष्टपहा- नयन कर्तव्यमस्ति ।
ट
अग्रभ
मध्य प...
२५३
अथ युगकुदिनैरन्यग्रहभगणा लभ्यन्ते तदाऽहणेन किमिप्यनुपातेनान्यग्रह-
स्तत्स्वरूपम्-
अग्रभXअहर्गरण,
तथा यद्यन्यग्रहभगणरन्यग्रहो लभ्यन्ते तदेष्टग्रह-
युकु
भगणे. किं समागत इप्टग्रह
अन्यग्र इग्नभ
अत्रान्यग्रहस्वरूपेणोत्यापनात्
अग्रभx इग्रभ अहर्गण
-इन छेदगमेन
युकु अग्रभ
अग्रभइअभx अहर्गण= युकुर अग्रभन्न पक्षी इग्रम भक्तौ तदा
अग्रभ अहगरण- युकु अग्नभइग्र,
-हर इन।
युकु अग्रभ
इग्रभ
इग्रम
अग्रभ अहर्गरण
- इग्न .:. सिद्धम् ॥
तत.
हि. भा-जो व्यक्तिविशेष अन्यभगण गुरिणत अहर्गरण से अथवा प्रश्न कथित
गुणगुणित अहर्गरण से इप्टग्रह के साधन करते हैं वे गुणक और हार के अपवर्तन में
पण्डित हैं ।। १० ॥
इसके उत्तर के लिये उपपत्ति ।
साध्यग्रह-इन । अन्य ग्रह अग्र । अन्यभगए महर्गण इस पर से इष्टग्रहानयन
करना है।
यदि युग कुदिन मे अन्यग्रभगण पाते हैं तो अहर्गरण मे क्या इस अनुपात से अन्य ग्रह
पाते हैं,
अग्रभ.ग्रहण
-- अग्न । तथा यदि अन्यग्रहभगण मे अन्यग्रह पाते हैं तो इष्पग्रह-
युकु
भगण मे गाया गये
अन X इयभ इसमे अन्यग्रह स्वरूप को उत्यापन देने से
इष्टग्रह %
अग्रभ
अग्रभ इग्रभ अहर्गरण
- इग्र, छेदगम से अग्रभ इग्रभ अहर्गण-युकु अग्रभ इन दोनो पक्षों
युकु अग्रभ
को इग्रभ से भाग देने से अग्रभ-अहर्गणः
युकु अग्रभ इन
-हरइन । युकु अग्रभ
इग्रभ
इग्रभ
अग्रमा प्रहगरण
प्रत
: सिद्ध हो गया ॥१०॥
इदानीमन्यान् प्रश्नानाह
इष्टग्रहावमेन्यो मध्यतिथि तदिवौकसाभ्युदयात् ।
रविशीतगू च बहुधा यो वेत्ति स वेति मध्यगतिम् ।। ११ ।।
वि माय इप्टग्रहावमेभ्य (इप्टग्रहादवमाञ्च) तदिवौकसाभ्युदयात्
(तद्ग्रहोदयकालात्) मध्यतिथि वेत्ति (जानाति) तथा रविशीतगू (सूर्याचन्द्रमसौ)
वेत्तिस मध्यगति वेत्तीत्यह मन्ये ॥ ११॥
"
२५४
वटेश्वर-सिद्धान्ते
प्रयोत्तरार्थमुपपत्ति ।
यथा रविज्ञानेनावमेन च चन्द्र ज्ञान भवति स चन्द्र सूर्योदयपारियो
भवति तथैव ग्रहह्मानेनावमज्ञानेन च चन्द्रानयन कार्य परमय चन्द्रो ग्रहोदय-
कालिको भवेत् । तद्ग्रहज्ञानेनैव "साध्यस्य च गुंरिणत प्रसिद्धो भक्तो निज
स्यादथवा प्रसाध्य
अनेन विधिना रविज्ञान कृत्वा ततस्तिथिज्ञान
कार्यमिति ।। ११ ।।
हि भा–इष्ट ग्रह और अवम से उस ग्रह के उदयकाल स (ग्रहोदयवान म) जो
मध्यम तिथि को जानता है और रवि, चन्द्र को जानता है वह मध्यगति को जानता है ॥१२॥
इमके उत्तर के लिये उपपत्ति ।
जैसे रवि और अवम मे चद्रज्ञान होता है पर वह चद्र मूर्योदयकालिप होत हैं।
उसी तरह इप्टग्रह और अवम से चद्रज्ञान घरमा शहिये पर यह चद्रग्रहोदयवालिक
होंगे । उम ग्रह से ' साध्यस्य चक्र गुणित प्रसिद्धो भवतो ग्जि स्यादथवा प्रसाध्य ' इम
नियम से रवि ज्ञान करके तिथिनान करना चाहिय ।। ११ ।।
इदानीम या प्रश्नाना।
अपत्तितगुणहारे यो | गणादीन करोति सक्षेपात् ।
कल्पाब्जजन्मनो वा कृतात्कलेर्वा स तन्त्रज्ञ ॥१२॥
रि भा-यो (व्यक्तिविशेप) अपत्तितगुणहारे सक्षेपात् कल्पान्जजन्मन
(ब्रह्मदिनादित) वा कृतात् (सत्ययुगादित ) वा क्ले (कलियुगादित ) | गणा-
दीन (अहर्गरणादीन्) क्रोति (साधयति) स तन्त्रज्ञोऽस्तीति ॥ १२ ॥
अनोत्तरार्थमुपपत्ति ।
आचार्येण स्वयमेव पूर्व कत्पादित कल्यादि यावदहर्गणानयन कृत्वा तत्र
कल्यादित इष्टदिनपर्यन्तमहर्गरण मानीय सयोज्य कल्पादित इष्टदिनपर्यन्तमहगणा-
नयन कृतमस्ति । कलियुगादित कृतयुगादितो वाम्हर्गग्गज्ञान सुगममेवेति ॥ १२ ॥
हि भा-जो व्यक्ति विशेष अपत्तित गुण और अपवर्तित हर से ब्रह्मदिनादि म
या सत्ययुगादि से वा कलियुगादि से मक्षेप से अहगण साधन करते हैं वे तत्रज्ञ हैं ॥१२॥
इससे उत्तर के लिये उपपत्ति ।
प्राचाय स्वय पहले कल्पादि से कलियुगादि तक ग्रहगण साधन कर उसम कलियुगादि
से इष्टदिन तक महगण माधन कर जोड़कर इदिन तक अहगण लाय हैं । वृतयुगादि से या
कलियुगादि से प्रहाणानयन मुलभेन होगे ॥ १२ ॥
इदानीमय प्रश्नमाह।
द्वित्रिगुरणयो रवीन्द्वोर्योगादष्टोद्धृताज्ज्ञहीनाद्यात् ।
प्रानयतोष्टयुचर करामलकवास वेत्सि मध्यगतिम् ॥ १३ ॥
मध्यमाधिकारः २५५ वि.भा--द्वित्रिगुणयो रवीन्द्रो. (द्वाभ्यां त्रिभिर्गुरिणतयो सूर्याचन्द्रमसो) योगात्, ज्ञहीनाढ्यात् (बुधरहिताध क्तात्) अष्टभक्तात् य इष्टद्य चर (इष्टग्रह) आनयति (साध्ययति) स करामलकवत् (हस्तम्थधानीफलवन्) मध्यगति वेती- स्यहं मन्ये ॥ १३ ॥ एतत्प्रश्नोतरार्यमुपपत्ति योर्बहूनामथवेत्याद्यनुसारेण कार्येति । हि.भा-द्विगुणित रवि और विगुणित चन्द्र के योग मे बुध को हीन या युत करके आठ से भाग फल से जो (व्यक्तिविशेष) इष्टग्रह के माधन करते है वे हाथ में रखे हुये धावीफल की तरह मध्यगति को जानने है ॥ १३ ।। इसके उत्तर के लिये उपपत्ति "द्वयोर्वहूनामथवा" इत्यादि के अनुसार करनी चाहिये ।। १३ ॥ इदानीमन्यप्रश्नमाह। नवधी गोहत भूमिज गुरुशनि योगाद् दिगोशगुरिणताभ्याम् । ज्ञसिताभ्यां युक्ताद् यो वेत्तोहखगं स तन्त्रज्ञः ॥ १४ ॥ वि भा.-नवधी गोहत भूमिज गुरुशनियोगात् (नव पञ्चनव-गुणित-कुज- गुरु-शनियोगात्) दिगोगगुणिताभ्या ज्ञसिताभ्या (दशैकादशगुणित बुधशुक्राभ्या) युक्ताद्य इप्टग्रह वेत्ति स तत्रज्ञोऽस्तीति ।। एतस्योपपत्तिरपि "द्वयोर्वहूनामथवे" त्याद्यनुसारेण कार्येति ।। हिमा--नव पाच नव गुरिणत कुज, गुरु और शनि के योग में दश और ग्यारह गुरिगत बुध, शुक्र जोडन से जो होता है उस पर से इष्ट ग्रह को जो जानते हैं वे ज्यो- तिपी हैं ।। १४ ॥ इसके उत्तर के लिये उपपत्ति "द्वयोर्वहूनामथवा" इत्यादि के अनुसार करनी चाहिये ।।१४।। इदानीमन्य प्रश्नमाह। रवि शशि कुज बुधयोगः पृथक् पृथक् त्रिगुणितश्च तैहीनः । युक्तो वा तदद्योगात् स्वधनगुरु वेत्ति यः स तन्त्रज्ञः ॥ १५ ॥ वि मा-रवि शशि कुजबुधयोग (रवि चन्द्र मङ्गल बुध योग ) पृथक् पृथक् त्रिगुणितस्तैींनो युक्तो वा तदा स्वधनगुरु (वृहस्पति) पृथक् पृथक् ग्रहान वा यो वेत्ति (जानाति) स तन्वज्ञोऽस्तीति ॥ १५ ॥ अस्योत्तरार्थ मुपपत्ति । रवि+ चन्द्र+म+बुध+३ रवि+३ चन्द्र +३ म+३ बु-४ रवि+४ च+४ म+४ वुम्यो योxयुगुभगरण - २५६ वटेश्वर-सिद्धान्ते तथा ४ रयुभगण+ ४ चयुभ+४यु=म भगण+४ बुयुभगण =यो, ततोऽनुपातो यो "यो,” भिगुरयुगभगणा लभ्यन्ते तदा योऽनेन विमि- त्यनुपातेन समागतो गुरु = यो (४ रवि+४ च+४ म+४ बु) युगुभगरण, ४ रयुभ+४ चयुभ+४युमभ+४युवुभ तथा चैतेन नियमेनैव रव्यादीना प्रश्नोक्तानामपि ज्ञान भवितुमर्हति । एवमेव त्रिगुणितश्च तैीन इनि प्रश्नस्याप्युत्तरमिति ।। १५ ।। अथ रवि शशि कुजबुध योग इत्यादेस्त्तरार्थमुपपत्ति । सर्वेपामेकजातीयानामिष्टग्रहाणा योग सर्वधनसनकम् । इष्टगुणगुणित- प्रथमनहो यदि सर्वधने विगोध्यते योज्यते वा यो भवति स ज्ञायते । तेनैवेष्टगुणेन गुणितो द्वितीयग्रहो यदि सर्वधने विशोध्यते योज्यते वा यो भवति सोऽपि ज्ञायते । एवमेवाभीष्टान् सर्वान् ग्रहान् तेनैव गुणेन गुरिगतान् सर्वधनाद्विशोध्य सयोज्य वा या या सग्या भवन्ति तास्ता पृथक् पृथक् ज्ञायन्ते, धनानि पृथक् पृथक् ग्रह- मानानि, यावन्त इप्टा ग्रहास्तत्पद गच्छमान वा, एतेनेद प्रतिफलति गच्छधनमिष्ट- गुणितर्धनहैया तोन सद्व्यक्तमस्ति पृथक् पृथक् तत्सहित कार्य गुणकेन गुण ग्रहमान सर्वधने युतोन कृत तेन गुणवेन युतोन पद कार्य तेन हृत लब्ध सर्वधन भवति, अतोऽस्मादवशेषाणि पृथक् पृथक् ग्रहमानानि ज्ञायन्ते । कल्प्यन्ते ग्रहमानानि ग्रह, २, 3) , इष्टगुण - इ, सर्वधनम् = स युतोने कृते मस्या ६१, १२ तदा सइ ग्र+ह, सईयर =१२, सइ ग्र3=3 सर्वयोगेन ह,+१+ =प स इ (ग्र+++ =प स+इ सम (+ इ) ६+६+3 सिद्धम् । प - प्रत . यत सइ ग्रह, एव सर्वेपा ग्रहाणा मानानि ३ स्यु ॥१॥ हि मारवि, च, मगल, और बुध इनवे योग मे विगुणित उही को पृथक पृथक् जोडने और धगने से जो होता है उसमे गुरु (वृहस्पति) या अलग अलग महो के मान जो जानते हैं वे ज्योतिषी हैं ।।
मध्यमाधिकारः २५७ -- इम प्रश्न के उत्तर के लिये उपपत्ति । यथा प्रश्नोक्ति से रवि+चन्द्र+म++३+३ च+३ म+३ बु=४ र+४ च+४ म+४ बु==यो तथा ४ रयुभ+४ चयुभ+४ म युभ+४ बुयुभयो, तब अनुपात करते हैं कि यदि यो, इममें गुरु के युगभगण पाते हैं तो यो इनमे क्या इस अनुपात से गुरु के प्रमाण प्रा जायगे । यो/ युगुभगण (४ रि+४ च+४+४ वु) युगभगण, यो, ४ रयुभ+४ युचभ+४ म युभ+४ बुयुभ इसी तरह प्रश्नोक्त रवि आदि ग्रहो के ज्ञान भी हो जायगे । और हीन पक्ष में भी इसी तरह उपपत्ति करनी चाहिये ।। रवि शशि मगल बुध योग इत्यादि के उत्तर के लिए उपपत्ति एक जातीय सय ग्रहो के योग सर्वधनराज्ञर हैं । यदि सर्वधन में इप्टगुरप गुगिन प्रथम ग्रह को घटाते हैं या जोडते है तब जो होता है सो जानते हैं। उसी गुणक मे गुणित द्वितीय ग्रह को यदि सर्वधन मे घटाते है या जोडते हैं तब जो होता है वह भी जानते हैं । इस तरह उसी गुणक से गुरिकन सत्र इष्टग्रहा को मर्वधन में घटाने से या जोडने से जो जो सख्या होती है वे सब जानते है, धन सब पृथक् पृथक् ग्रहमान है। जितने इप्टाह हैं वे पद या गच्छमान है । इससे यह सूचित होता है कि गच्छधन मे जिस इप्ट गुरिणतग्रह को युत या हीन करने से व्यक्त है अलग अलग उसको जोडना चाहिए। ग्रहमान को इप्ट गुणक से गुण कर सर्व धन मे युत और हीन करते हैं नो उस गुणक करके पद को युत और ऊन कीजिये उससे भाग देने से लब्धिमान सर्वधन होते है । इस पर से शेपो के मान पृथक् पृथक् ग्रहमान होते है । कल्पना करते हैं ग्रहो के मान अ, २, ३, ४ [इष्टगुण --इ] सर्वधन-म युत ऊन करने पर सख्या मे ११, १२ तब स + इ, १-६, ! स+इ २-१२ ! स + इ -२ सब के योग करने से ह++3+ ==4 स + इ (ग्र++न+ इ सस (प इ) ह++3 प्रत ६ क्योकि सई -१, प्रत सह सन, इस तरह सब ग्रहो के मान होते हैं ॥१५॥ इदानीमन्य प्रश्नमाह । सर्वग्रहयोगो वा सप्तगुणस्तै पृथक् पृथग्युक्तः । होनो वा तद्योगात् के सर्वे स्वधनगुरवः ।। १६ ॥ ) --पस इ २५८ घटेश्वर-सिद्धान्ते विमा-वा सर्वग्रह्योग सप्तगुणस्तरेव सर्वग्रहै पृथक् पृथक् युक्तो हीनो वा तदा म स्वधनगुरव के इति प्रश्न । अस्योपपत्ति पूर्व वदेव स्पुटेति ।। १६ । हि भा- सब ग्रहो के योग मे सप्तगुरिणत उन ग्रहो को पृथक् पृथक् नोडने या घटाने में जो होता है उसमे उन ग्रहो के मान क्या हैं यह प्रश्न है। इसके उत्तर के लिये उपपत्ति पूर्ववत् स्पष्ट है ॥ १६ ॥ इदानीमन्य प्रश्नमा । दशगुरिणतः शीतांशुस्त्रिगुणेन पुतोऽन्यपर्ययाप्तेन । विदाहतेन मिश्र. शनिविहीनोऽयवान्यमगरणाः के ॥ १७ ॥ विभा --गीताशु (चन्द्र ) दशगुणित , त्रिगुणेनान्यभगरगफ्लेन युत, विदाहतेन (बुधगणितेन) मिश्र (युक्त ) शनि विहीनस्तदाऽन्यभगरणा के ।।१७।। अस्योत्तरार्थमुपपत्ति । यदि युगग्रहभगण इष्टगुणकुदिनयुता वा हीनास्तदा तेभ्योऽपि राश्यादिको ग्रह स एव भवति यतस्तेऽहर्गणगुणा कुदिनर्भक्ता इप्टसमभगणाधिकोना पूर्व भगणा भवन्ति भगणशेप तु पूर्वसममेव । अतोऽनेप्टगुणगुणाना ग्रभगरणाना- मैक्यान्तर कुदिनाधिक तदा कुदिन वनशेपमेव ग्रहभगणा कल्प्या येभ्यो राश्यादि- ग्रहोऽभीष्टगुणगुणग्रहयोगान्तसम एवोपपद्यते । अथान्यभगणग्रहो यदा धन सदाऽन्यभगण्युत शेपो दृप्टग्रहभगरणसमोऽतस्तदा शे+अभे-इभ. अभः- इभ -दो-इभ+ युकुदि--हो। एव यदाऽन्यभगरभवोग्रहश्वर्ण तदा शे- अभ- इभ अभ-शे-इभ शे+युकुदि-इभ । एतेनैव यथोत्तर कार्यमिति ॥ हि भा -चन्द्र को दस मे गुणकर त्रिगुणित अन्य भगए फन करके जोडना, बुध- गुपित जोडना शनि को घटा देना तव अन्य भगणं क्या होता है ।। १७ ॥ इसने उत्तर के लिये उपपत्ति । युगग्रगण म इप्रगुणगुरिणत कुदिन जोडने या घटाने से जो होता है उस पर से राश्यादिग्रह वही होता है क्योकि उगको (युणग्रहभगण को) अहर्गण से गुरगार युगधुदिन से भाग देने से इष्टमममगण करके युहीन पूर्व भगण होते हैं और भगरण शेष भी पूर्वतुल्य ही होता है। इसलिये यहा इप्टगुणगुरिणत ग्रह भगणो वे योग या अन्तर वुदिन से अधिक हो तो कुदिन से भाग देना, शेप ही को प्रहभगरा मानना जिसमे राश्यादिक ग्रह अभीष्टगुणगुणिन प्रयोग या अन्तर ही उपपन्न हो, यदि अन्य भगणग्रह धन है तो अन्यभगण युत शेष दृष्ट ग्रह- यदि मध्यमाधिकारः २५६ भगरण तुल्य होता है इसलिये शे+प्रभ-इभ..प्रभ-इभ-शे=इभ+पुकुदि-हो। ऐमे ही जव अन्यभगरणोत्पन्न ग्रह ऋण है तव शे-~-प्रभ-इभ ..अभ-शे-इभशे+युदि-इभ इमी तरह उत्तर वरना चाहिये ।। १७ ॥ इदानीमन्यं प्रश्नमाह । भोमस्त्रिभुजाम्यस्तस्त्रिगुणगुस्नोऽन्यभगरणलब्धेन । होनो रविः समतो मन्दो वाऽन्यग्रहभगरणाः के ॥१८॥ वि. भा. भोमः (बुज.) त्रिभुजाभ्यस्तः (२३ गुणित ) त्रिगुणगुरून. निगुणिनवृहसनि_न) अन्यभगरणलब्धेन हीन , रविः समेत. (युक्तः) वा मन्दः (शनैश्वर) समेतस्तदाऽन्यग्रहभगणा. के ॥१८॥ अस्योत्तरार्थमुपपत्ति १७ श्लोकोपपत्तिदर्शनेन स्फुटेति । हि.भा - मङ्गल को २३ गुण देना, त्रिगुणित गुरु को घटा देना, अन्य भगणफल को घटाना रवि या दानश्वर यो गेड देना तब इस पर से अन्य ग्रहो के भगए क्या होगे ॥१८}} इसके उत्तर के लिये १७ श्लोक की उपपत्ति देखनी चाहिए ॥१८॥ इदानीमन्यान् प्रश्नानाह। सम्वत्सरादिशुद्धि करोति बहुधा ततश्च दिनराशिम् । धुगरणावि च बहुधा दिवसक्षयशेषकाच्च रजनीशम् ॥१६॥ वि भा–सम्वत्मरादिशुद्धि ततो दिनराशि. (अहर्गण) घ गणात् (ग्रहणात्) रविं, तत दिवसक्षयशेपकाच्च (अवमशेपाच्च) रजनीशम् (चन्द्र) य करोति स तन्नज्ञोऽस्तीति । एतस्योत्तरार्थमुपपत्ति शुद्धिदिनज्ञान तु पूर्वकृतमेव ततो लघ्वहर्गणज्ञान कार्य यथा लघ्वहर्गणेऽवमानयनाथै ७०३ चान्द्रदिनरुद्र ११ मितान्यवमानि स्वल्पान्तरतः प्रकल्प्यानुपात कृतस्तद्यथा- वदिगंततिथय = इति-अधिशेति एता रुद्र गुरणा ७०३ भक्ता वर्षादिक्षयशेप- युत्तास्तदाऽवमानि ११ (इप्टति-अधिशेति), वक्षसे + ७०३ ११(उति-~-अधिशेति)+७०३ वक्षशे ६६०० ७०३ ११ (इति-अधिशेति) + _११ वक्षरो। ६६२ वक्षसे ६६०० १६०० % 3D २६० वटेश्वर-सिद्धान्ते __११ इति-(अधिशेति- वक्षसे)} +६६२ वक्षरे ७०३ ११ (इति-शु}+६६२ वक्षसे ६६०० इत्येव शोधितचान्द्रे ( शुद्ध यून चान्द्रे) ७०३ विशोध्यते तदा लघ्वहरणो भवेत् । एतद्वशतो रविज्ञान कार्यम् । ततो मध्यमरवितोऽवमोपाच्च मध्यमचन्द्रानयनम् । यथा क्षयशे इष्टदिने सूर्योदये सावयवाश्चान्द्राहा.= इति+ - एते द्वादशगुणास्तदा युदि रविचन्द्रान्तरासा भवन्ति ते रवी शिप्यन्ते तदा चन्द्रो भवतीति ।। हि भा -वर्षादि शुद्धिज्ञान उस पर से अहर्गज्ञान, अहगंग मे रविज्ञान, रवि और क्षयोप से चन्द्रज्ञान जो करते है वे तन्त्रज्ञ हैं । इराके उत्तर के लिए उपपत्ति शुद्धिदिन ज्ञान ता पहले किया जा चुका है । इससे (शुद्धिदिन से) लघ्वहर्गरण ज्ञान करते है। लघहर्गण मे अवम के लिये ७०३ चान्द्र दिनो मे ११ अवम स्वल्पान्तर से मानकर अनुपात करते हैं यथा वर्षादिगतति = इष्टति - अधिशेति इसको ग्यारह से गुणकर ७०३ में भाग देकर जो हो उममे वर्षादि क्षयशेष जोडने मे अवम होता है । ११ (इष्टति-अधिोति) वक्षो + -प्रवम ७०३ ६६०० ११ (इति---अधिोति) + ७०३ पक्षशे ७०३ D वक्षोX११ ६१२ वक्षनरी ११ (इति-अधििित) + + ६६०० ६६०० ७०३ वक्षो इति-(अधिशेति- + ६६०० ६६०० ૭૭૨ वक्षो ६६२ ११ (इति--गुद्धि) + ६६०० - इम शोधित चान्द्र (शुद्धिरहित चान्द्र) में पटाने से लम्वहरण होता है । इस पर से रविज्ञान सुलभ ही है ।
मध्यमाधिकार २६१ अब मध्यम रवि और क्षय शेष मे मध्यम चन्द्रानयन करते है । इष्ट दिन के सूर्योदय क्षय काल में सावयव चान्द्रदिन-इति+. इसको बारह से गुणने से रवि और चन्द्र के युदि अन्तराश होते हैं, इसको रवि में जोड़ने से मध्यम चन्द्र होते है ||१६|| इदानीमन्यान् प्रश्नानाह धुगरणाद् ग्रहा दिनाद वा समाधिपसावनधुमासेशो। यः सो गएको होरेशं वारादि वेत्ति निजविषये ॥२०॥ स्पष्टार्थम् । एतेपामुत्तगर्थमुपपत्तय । दिननिशतक सावनमासो भवति । अतोऽहर्गणस्त्रिशद्भक्तस्तदा लब्धा गता सावनमासाम्ते द्विगुणिता कार्या यतस्विशद्दिनात्मके सावनमासे सप्तभक्ते द्वयमवशिष्यते वर्तमानमासेशार्थ सैका कार्यास्तत सप्तभक्ते रव्यादिमासमाधि- पतिर्भवति, यत कल्यादौ मासंपति रर्क एवाऽऽसीदतो रव्यादितो गणना समुचि- तेति । तया च ३६० दिनरेक सावनवत्सर कल्पित प्राचीनस्ततस्तैदिनर्भक्तोऽह- गणो लब्धा गतवत्सरास्ते निगुरिणता यत ३६० दिनात्मके एकस्मिन् सावनवर्षे सप्तभक्ते वयमवशिष्यते वर्तमानवर्षपत्यर्थं त्रिसगुणा सैकाश्च कार्या इति । होरेशज्ञानार्थम् प्रथमा होरा दिनपतेद्वितीया दिनपते पप्ठस्यैव पष्ठ पष्ठ कालहोरेशोभवति, अतो द्वयोहोरेशयोरन्तर पञ्च तेन होरा पञ्चगुणा सर्वे वारा भवन्ति यदि होरा सावयवास्तदा वर्तमानहोरेशानयनार्थ ते पञ्च गुणा सैका कार्यास्तत. सप्तभवते दिनपाद् होरेशो भवतीति । अन चतुर्वेदाचार्येणार्कोनलग्नभागा पञ्चदशभक्ता होरा भवन्तीति काललवान् सार्धद्विघटीभवान् पञ्चदशलवान् प्रकल्प्य क्षेत्राशान्तरैरकलग्नान्तरभागैरनुपान कृत स च गणितयुक्तितो न युक्त इति शेष स्पष्टमिति ॥ २० ॥ हि मा+श्लोक का अर्थ स्पष्ट है । इन प्रश्नो के लिए उपपत्ति । तीस दिनो का एक सावन मास होता है इसलिए अहर्गण को तीस से भाग देन से लब्ध गत सावन मास होता है, उनको (गत सावन मास को) दो से गुण देना चाहिए क्योकि तीस दिनात्मक सावन मास मे सात से भाग देने से दो शेष रहता है। वर्तमान मासपति के लिए उसमे एक जोडकर सात से भाग देने में रवि आदि मासाधिपति होते हैं। कल्याणादि मे मासपति रवि थे इसलिए रवि आदि गणना समुचित है। तथा ३६० दिनो के एक सावन वर्ष प्राचीनो ने माना है इसलिए उन दिनो से . २६२ वटेश्वर-सिद्धान्ते अगरण म भाग देने से लब्ध गतवर्प होते हैं इनको तीन मे गुरगना चाहिए क्योंकि ३६० दिनात्मक एक वर्ष म मात से भाग देने से सप तीन रहता है। वर्तमान वर्षपति के ज्ञान के लिए तीन से गुण कर एक जोडना चाहिए । होरेम नान के लिए विधि प्रथम होरा दिनपति की होती है । द्वितीय होरा दिनपति म छठे ग्रह की होती है इस तरह छठे छठे ग्रह काल होरेस होते हैं इसलिए दो काल होरेश के अन्तर पाच है। अत होरा को पाच से गुसने से सब वार हाते हैं यदि होरा सावयव होता हो तो वर्तमान होरेश के लिए उसको पाच से गुणा वर एक जोड देना चाहिए तव सात से भाग देने से दिनपति क्रम से होरेश होते हैं । यहा चतुर्वेदाचार्य रवि और लग्न के अन्तराश का पन्द्रह से भाग देवर होरा कहते हैं । अढाई दण्ड से उत्पन्न कालाश को पन्द्रह अस मानकर लग्न और रवि के अन्तरास स अनुपात किया है जो गणित युक्ति मे ठीक नहीं है । शेप विषय स्पष्ट है ॥२०॥ इदानीमन्यौ प्रश्नावात् । प्रतिकक्ष्यात खचरान् तस्माद्देशान्तर स्फुट वेत्ति । य. सोऽन्धिमेखलाया भुवि तन्त्रविदा भवेन्मुस्यः॥२१॥ विभा-य प्रतिकक्ष्यात (कश्याप्रकारात्) खचरान् (ग्रहान्) स्फुट देशान्तर वेत्ति (जानाति) स अब्धिमेखलाया भुवि (समुद्रवेष्टितपृथिव्या) तन्नविदा (ज्योति शास्त्रज्ञाना) मुख्य (प्रधान ) भवेदिति ॥ २१ ॥ अनोत्तरार्थमुपपत्ति । यदि कुदिन खकक्षा योजनानि लभ्यन्ते तदैकेन दिनेन किमित्यनुपातेन योजनात्मिका ग्रहगतिम्तत्स्वरूपम् = सतोऽनुपातो यद्येक दिनेनेय योज- नात्मिका ग्रहगतिस्तदाहगणेन किमित्यनुपातेनागतानि गतयोजनानि योजनात्मकनगग्रहण अत्र योजनात्मकग्रहगतेस्त्थापनेन खकक्षा अहाण गतयोजन बुदि तदा ग्रहभगणX गतयो = भगणादि मध्यमग्रह । गतयोजन _गतयोजन भगरणादि मध्यमग्रह । खकक्षा ग्रहक्क्षा गभगरण ततो ग्रहज्ञानेन देशान्तरज्ञान सुलभमेवेति ॥ २१ ॥ इति वटेश्वरसिद्धान्ते मध्माधिकारे प्रश्न विधिनामको नवमोध्याय समाप्त ।। सक्क्षा D खकक्षा -
मध्यमाधिकारः
हि.भा--जो कक्षा प्रकार से ग्रहो को जानता है उस पर से (ग्रह पर से) स्पष्ट
देशान्तर को जानता है । वह समुद्रवेष्टित पृथिवी मे ज्योतिषियों में प्रधान है ।। २१ ।।
इनके उत्तरं के लिए उपपत्ति ।
यदि कुदिन मे सकक्षा योजन पाते तो एक दिन में क्या इस अनुपात से एक दिन
साक्षा
की यह योजनारमरगति प्रायो, योजनात्मकति । अब इस पर से अनुपात करते
कुदि
हैं कि यदि एक दिन में यह योजनात्मक गति पाते है तो अहर्गण मे क्या इस अनुपात से
गत योजन प्रमाण पाई,
योजनात्मग्रग-अहर्गरण
गतयोजन
सक्क्षा ग्रहण
१
बुदि
तब अनुपात करते हैं कि यदि खक्क्षा योजन मे ग्रह मगरण पाते हैं तो गतयोजन मे इस अनु-
पात से भगणादि मध्यम ग्रह पाते हैं ।
प्रभगणरगतयो
गतयो
- भगणादि मध्यमग्रह
गतयोजन
खवता
खक ग्रहकक्षा
ग्रभगरण
प्रह से देशान्तर ज्ञान मुलभ है ।। २१ ।।
इति वटेश्वरमिद्धान में मध्यमाधिकार म प्रश्न विधि नामक नवा अध्याय
समाप्त हुमा
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दशमोऽध्यायः अथ दूपणानि इदानी ब्रह्मगुप्तोक्तिदूषणक्थनाथमवतरणमाह । दिव्यशास्त्रमपहाय यदन्यत्प्राह जिष्णुतनयो निजबुद्धया । तस्य शास्त्रलवमधीततयोऽह दूषणानि कतिचित्कथयामि ॥१॥ वि भा-जिष्णुतनय (ब्रह्मगुप्त ) दिव्यशास्त्र (देवादिप्रणीत शास्त्र) अपहाय (त्वक्त्वा) निजबुद्धया (स्वबुद्धया) अन्यद्यच्छास्त्र (भिन्न यच्छास्त्र) प्राह (कथितवान्) तस्य (ब्रह्मगुप्तस्य) शारवलय (शास्ताग) अधीततया (अध्ययनत्वेन) अह (वटेश्वर ) कतिचिद्रूपणानि कथयामि (ब्रह्मगुप्तप्रणीतग्रन्थस्याशमध्ययनत्वे- माह तत्रत्यानि क्यिन्ति दूपणानि कथयिष्ये) ॥१॥ हि मा ----ब्रहागुप्त दिव्यशास्त्र (देव मुनि प्रणीत शास्त्र) को छोड कर अपनी बुद्धि से जा भिन्न शास्त्र कहा है उम मास्त्र के कुछ अश को पढ़ने के कारण मैं कुछ दोषो को कहता हू ॥१॥ इदानी ब्रह्मगतोतयुगवरणपण्डन निर्दिशति जिष्णुपुत्रकथितयुगाडि घ्रभि खेचरा नहि यत स्वपर्ययै । भुञ्जते सममतो युगाघ्रर्य श्रीमदार्यभटकीतिता स्फुटा ॥२॥ वि मा-यत (यस्मात्कारणात् ) जिष्णुपुनकथित (ब्रह्मगुप्तोक्त) युगाज्रिभि (युगचरण ) खेचरा (ग्रहा) स्वपर्यय सम (स्वभगणस्तुल्य) नहि भुञ्जते (नहि भोग कुर्वते) प्रत (अस्मात्कारणात्) श्रीमदार्यभटवोत्तिता (श्रीमदार्य- भटकथिता) युगाडघ्रय (युगपादा ) स्फुटा (सूक्ष्मा) अय ग्रन्थे गृह्यन्ते ॥२॥ ब्रह्मस्फुटमिदान्ते ब्रह्मगुप्तोक्तयुगपदा अधोनिखिता सन्ति युगदशभागो गुणिन कृत चतुभिरिअभिगुणस्त्रेता । द्विगुणो द्वापरमेवेन मङ्गण पलियुग भवति ।। एतदनुमारेण कृतयुगपाद = १७२८००० त्रेतायुगपाद = १२६६०००, द्वापर- युगपाद%८६४०००, पलियुगपाद =४३२००० एते युगपादा सौरवर्षमानेन पटिता सन्ति ।
-- " " द्वापर " " " " " " " " कलि ॥ मध्यमारोधकार २६५ ब्रह्मसिद्धान्ते ब्रह्मया युगपादा अधोलिखितक्रमेण कथिता - दिव्यान्दाना सहस्राणि द्वाददर्शव चतुर्युगम् । युगस्य दशमो भागश्चतुस्जिद्वय क्सङ्गण । क्रमात्कृतयुगादीना पाठाश सन्धय स्वका । एतदनुसारेण चतुर्युगमानम् -१२००० दिव्यवरिण वृतयुगचरणमानम् = ४८०० दिव्यवरिण नेतायुगचरणमानम्- ३६०० २४०० कलि - १२०० यदि दिव्यवरिण ३६० एभिगुण्यन्ते तदा सौरवाणि भवन्ति तथाकृते सौरवात्मकानि कृतादियुगचरणमानानि कृतयुचरणमानम् =४२००४३६०% १७२८००० सौरवरिण नेतायुगचरणमानम-३६००४३६०-- १२६६००० द्वापर -२४००४३६०८८६४००० =१२००४३६०८४३२००० ब्रह्मगुप्तेन भास्कराचार्येण चेमान्येव युगचरणमानानि स्वस्वसिद्धान्ते कथितानि । ब्रह्मगुप्तोक्तानि युगचरणमानानि, भास्कराचार्योक्तयुगचरणमानार्थ निम्नलिखितानि पद्यानि सन्ति । यथा- 'खखाभदन्तसागरैर्युगान्नियुग्मभूगुणे क्रमेण सूर्यवत्सरं कृतादयो युगाड- प्रय । इत्यादि ब्रह्मगुप्तेन भास्वराचार्येण च सौरवर्षमानेन युगचरणमानानि कथितानि ब्रह्मणा दिव्यवर्षमानेन सर्वेषु सामञ्जस्यमस्ति न कश्चिदोष । सूर्य- सिद्धान्तेऽपि ब्रह्मकायतसदृशान्यव दिव्यमानेन युगचरणमानानि कथितानि सन्ति । यथा- तवादशसहस्राणि चतुर्युगमुदाहृतम् । सूर्याब्दसरयया द्वित्रिसागररयुताहत । सन्ध्यासन्ध्याशसहित विज्ञ य तच्चतुर्युगम् । वृतादीना व्यवस्थेय धर्मपादव्यवस्थया । मनुस्मृतावपि दिव्यमानेन युगचरणानि पठित्तानि सन्ति । यथा- चत्वार्याहु सहस्राणि वर्षाणा च कृत युगम् । तस्य तावच्छती सन्ध्या सन्ध्याशश्च तथाविध । इतरेषु ससन्ध्येपु ससन्ध्याशेपु च त्रिषु ।। ब्रह्मसिद्धान्तोक्तयुगचरणमानान्येव सूर्यसिद्धान्तोक्तानि मनुस्मृत्युक्तानि च युगचरणमानानि सन्ति तानि दिव्यवर्षमानेन कथितानि सन्ति, ब्रह्मगुप्तकथितानि भास्करथितानि च युगचरणमानानि सौरवर्षमानेनैतावता ब्रह्मगुप्तोत्तो न कश्चि होप सर्वेषु सामञ्जस्यमेवास्ति, मन्मते ब्रह्मगुप्तोक्त समीचीनमेवास्तीति ।
२६६ वटेश्वर-सिद्धान्ते युगचरणसम्बन्धे यस्याऽयंभटस्य मत स्वीकृत्य ग्रन्यकारो ब्रह्मगुप्तमतं खण्डयति, तस्यैवार्यभटमतस्य खण्डनं ब्रह्मगुप्तेनेत्य कृतं, यथा- युगपादानार्यभटश्चत्वारि समानि कृतयुगादीनि । यदभिहितवान् न तेपां स्मृत्युक्तसमानमेकमपि ।। महायुगस्य चतुर्थाशतुल्यानि कृतयुगादीनि चत्वारि युगचरणमानानि कथ्यन्ते मार्यभंटेन, तेषु युगचरणेष्वेकमपि स्मृत्युक्तयुगचरणसम नास्ति, मनुस्मृत्यादौ कृतादयो युगादा समानाः, अत आर्यभटोक्ताः समा युगपादा. स्मृतिविरुद्धा, तथा चार्यभट 'युगपादा ग ३ च' इति पोलिशसिद्धान्ते च दिव्यमानेन कृतादीनामब्दा मनुस्मृत्यादिवत्पठिताः। तद्वाक्य च- अष्टाचत्वाशित् पादविहीना कमात्कृतादीनाम् । अब्दास्ते शतगुणिता ग्रहतुल्ययुग तदेकत्वम् ।। ब्रह्मगुप्तमतस्य खण्डन वटेश्वरेण यत्कृत तदुराग्रहपूर्णमिति ॥ हि.भा.-जिस कारण से ब्रह्मगुप्तकथित युगपरणवश अपने अपने भगए को पूरा भोग नही करते हैं इसलिये मार्यभट कथित स्पष्ट युगचरण में ग्रहण करता हूँ। उपपत्ति ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त मे ब्रह्मगुप्त कथित युगपरए अधोलिखित है- युगदशभागो गुणित. कृत चतुर्भिस्त्रिभिगुणस्त्रता। द्विगुणो दापरमेवेन सङ्ग,णः कलियुग भवति । इसके मनुसार कृतयुगचरण मान=१७२८०००, प्रेतायु=१२९६०००, द्वापरयु- ८६४०००, पलियुच%D४३२०००, ये सौरवर्षमान से पटित हैं। ब्रह्मसिद्धान्त मे ब्रह्मा दिव्यवमान के युगचरणो को कहते हैं। जैसे- दिव्यान्दाना सहस्राणि द्वादशंव चतुर्युगम् । इत्यादि इस नियम से चतुर्युगमान% १२००० दिव्यवर्ष कृतयुगचरण%D४८००, त्रेतायुच=३६००, द्वायुच-२४००, वयुच= १२०० यदि दिश्यवर्ष को ३६० इससे गुणते हैं तो सौरवर्ष हो जाते हैं प्रत सौरवर्षमान से कृतयुच ४८००४ ३६० = १७२८०००, युच-१२६६०००, दायुच = २४००४३६०- ८६४०००, कलियुच= १२००४३६० -४३२००० ब्रह्मगुप्त मौर भास्कराचार्य ने अपने अपने सिद्धान्त मे ये ही युगचरणमान पटित दिये हैं। ब्रह्मगुप्त कषित युगचरणमान पहले ही कहे जा चुके हैं। भास्कराचार्य लिखित युगचरणमान निम्नलिखित हैं। 'सखाभदन्तसागरगुंगाग्नियुग्मभूगुणः । प्रमेण सूर्यवत्सरः कृतादयो युगाज्रयः ।'
मध्यमाधिकार २६७ इत्यादि ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य ने सौरवर्षमान से युगचरण कहे हैं और ब्रह्मा दिव्यमान से इससे कुछ भी दोप नहीं है। सब मे सामअस्य है । मूर्यसिद्धान्त मे भी ब्रह्मवयित के सदृश ही है । यथा- "तद्वादश सहस्राणि चतुर्युगमुदाहृतम् ।" इत्यादि मनुस्मृति मे भी दिव्यमान से युगचरणमान कहे गये हैं। यथा--- "चत्वार्याह सहस्राणि वर्षाणा च कृत युगम् ।" इत्यादि युग चरण के विषय में जिन आर्यभट के मत को स्वीकार कर अन्यफार ब्रह्मगुप्त मत के खण्डन करते हैं उन्ही आर्यभट मत या सण्डन ब्रह्मगुप्त इस प्रकार करते हैं। यथा- "युगपादानार्यभटश्चत्वारि समानि कृतगुगादीनि ।" इत्यादि महायुग के चतुर्याश के वरावर कृतयुगादि चारो युगचरण के मान बराबर मार्यभट कहते हैं उनके कथित युगचरणों मे एक भी स्मृतिकथित युगचरण के तुल्य नहीं है, मनुस्मृति आदि ग्रन्थो म सब युग चरण समान नहीं हैं इसलिये आर्यभटोक्त समान चारो युगचरण स्मृति के विरुद्ध है । जैसे आर्यभट का वाक्य है-'युगपादा ग ३ च इति । पोलिशसिद्धान्त मे दिव्यमान से कृतादि युगचरणो के वर्ष मनुस्मृति प्रादि की तरह पठित हैं उनके वाक्य ये हैं। "अष्टाचत्वारिंशत् पादविहीना कमारकृतादीनाम् । इत्यादि ब्रह्मगुप्त मत का खण्डन वटेश्वर जो करते हैं वह दुराग्रहपूर्ण है ।। इदानी ब्रह्मगुप्तोक्तयुग खण्डयते । स्मार्तमस्य युगमेव चेत्कय नो रवेरुपरि शीतदीधिति । तत्स्मृत्युक्तवदिहापि नेप्यते हन्त । सापि युगकल्पना मृषा ॥ ३ ॥ कल्पमेव युगमुच्यते त्वया तत्कय युगमपेशल न ते। प्राप्यते युगमिद स्वयंव नो त्वत्कृत मुनिगरगरसतत ॥४॥ विमा-चेत् (यदि) अस्य (ब्रह्मगुप्तस्य) युग (महायुग) स्मार्तम् (स्मृत्युक्त ) तदैतन्मते शीतदीधिति (चन्द्र ) रवेरुपरि (सूर्यादुपरि) कथ नो "स्मृतिकार सूर्यादुपरि चन्द्रोऽस्तीति कथ्यते, स्मृत्युक्तयुगमानस्वीकरणे ब्रह्मगुप्तमतेऽपि सूर्यादुपरि चन्द्रो भवितुमर्हति पर तथा तत्कृतग्रन्थे नास्तीति दोष " यदि स्मृत्युक्तवत् (स्मृत्युक्तानुसारम्) इह (अस्मिन् ब्रह्मगुप्तग्रन्थे) नेप्यते (न कथ्यते) तदा हन्त ! (खेदे) सापि पूर्वोक्तापि युगकल्पना मृपा (व्यर्था) जाता यदि त्वया (ब्रह्मगुप्तेन) कल्पमेव युग (महायुग) उच्यते (कथ्यते) तदा ते (तव) तत् युग (कथितमहायुग) अपेशल (अतथ्य) कथ न, इद युग त्वयैव प्राप्यते (लभ्यते)
२६८
वटेश्वर सिद्धान्ते
त्वत्कृत ग्रहमगरणादिक मुनिगरण नो प्राप्यते तत (तस्मात् कारणात्) त्वत्कृतं
असत् (अशोभनम्) इति ॥४॥
हि भा–पदि ब्रह्मगुप्त पथित युगमान स्मृति कथित युगमान है तब ब्रह्मगुप्त के
मत से चन्द्रमा सूय से ऊपर क्यो नहीं है अर्थात् स्मृतिवार चद्रमा को सूर्य से ऊपर मानते
हैं । स्मृति कथित युगमान स्वीकार करने से ब्रह्मगुप्त के मत म भी सूप से चन्द्रमा को ऊपर
होना चाहिये पर वैसा ब्रह्मगुप्तकृत अन्य मे नहीं है, यह दोप है यदि इस ग्रथ (ब्रह्मसिद्धान्त)
स्मृनिकथिन युगमान नही कधित हैं तव तो युगवल्पना ही करना मिथ्या है। यदि वल्प
ही को आप युग कहते हैं तव तो प्रापवा युग अतथ्य क्यो नही है । इस युग वो पाप ही प्राप्त
वरते हैं मुनिगण इसको नही प्राप्त करने हैं अर्थात् मुनिगणं इस युग को नहीं लेते हैं, जिसको
पाप लेते हैं इसलिये मुनिगणो के साथ विरोध होने के कारण आपका युग प्रसत् है ॥ ४॥
पुनरपि ब्रह्मगुप्तोतयुगचरणान् निराकरोति
पुलिश रोमक सूर्य पितामह प्रकथित तकल्पयुगाद्मिभि ।
नहि समा खलु जिष्णुसुतेरिता कथमपीह यतो न तत स्फुटा ॥५॥
'वि भा -यत (यस्मात्) पुलिश रोमक सूर्य पितामहप्रकथित (पुलिश.
रोमकादिग्रन्थकारप्रोक्त ) मृतकल्पयुगाड्घ्रिभि (मृतप्राययुगचरण) समा
(तुल्या) जिष्णुसुतेरिता (ब्रह्मगुप्तकथिता युगाड घ्रय ) कथमपि नहि सन्ति तत
(तस्मात् कारणात्) स्फुटा (सूक्ष्मा ) नेति । अर्थाद्यद्यपि पुलिशरोमकसूर्यादिकथिता
युगाइ प्रयो मृतप्राया सन्ति तथापि तत्तुल्या अपि ब्रह्मगुप्तोक्तयुगाड्घ्रयो न सन्ति
तेनैव कारणेन ब्रह्मगुप्तोक्तयुगाड घ्रय सूक्ष्मा न सन्ति । यदि पुलिशरोमकादि-
कथितयुगाड प्रयो मृतः सन्ति तदा तत्तुल्यब्रह्मगुप्तोक्त युगचरणेऽपि तत्र
सूक्ष्मताभावोत आचार्यकथनमिति शोभन न प्रतिभाति । सूर्यकथितयुगचरण एव
ब्रह्मगुप्तेन स्वीकृतास्तदा कथ सूयकथितयुगचरणतुल्या ब्रह्मगुप्तोक्ता युगचरणा न
सन्तीत्याचार्येण कथ्यन्ते । पितामहसिद्धान्तेनापि न कश्चिद्विरोधोऽस्तीति ॥५॥
हि मा-जिस हेतु से पुलिग रोमक सूर्य पितामह अथवारो ने जिन मृतप्राय (मुर्दा
के बरावर) युग चरणो को कहे हैं उनके बरावर ब्रह्मगुप्त कथित युगचरण नहीं है, इस
कारण से उनके कथित युगचरण स्पष्ट (सूक्ष्म) क्थमपि नहीं हैं अर्थात् यद्यपि पुलिरोगक
सूर्यादि कथित युगचरण मुर्दा के वरावर हैं तथापि उनके बरावर भी ब्रह्मगुप्तोक्त युगचरण
नहीं है इसलिये सूक्ष्म नहीं है । यहा मुझे कहना है कि जब पुलिश रोमकादि प्राचाय कथित
युगचरण मृतप्राय है तब तो ब्रह्मगुप्तोक्न युगचरण उनके बराबर होने पर भी सूक्ष्म नहीं हो
सक्ता, इसलिये मुझे प्राचाय का यर क्थन ठीक नही मालूम पडता है मूय कथित युगचरणो
को ही ब्रह्मगुप्त ने अपने प्रथम लिखा है तब वटेश्वराचाय क्यों कहते है कि सूर्योक्त युग
घरण के बरावर ब्रह्मगुप्तोवत युगचरण नहीं है। पितामसिद्धान्त से भी ब्रह्मगुप्तोक्ति मे
कोई विरोध होता है ॥ ५ ॥
मध्यमाधिकार २६३ ब्रह्मगुप्तोक्तसन्ध्यामान खण्डयति मनुरपि यदि सध्ययकया स्याद द्वितयमसद् द्वयमेव चेल चका। निजमतिपरिकल्पितपाश्च सन्ध्या न च मनुना पुलिशेन वा स्मृतास्ता ॥६॥ वि. भायदि मनुरपि (मनुप्रमाणमपि) एकया सन्ध्यया सिद्धोऽस्ति भवन्मते तदा द्वितय (युगचरणप्रमाण मनुप्रमाण च) असत् (अशोभनम) द्वयमेव चेच्छोभन तका सन्ध्या न शोभना अर्यात्सन्च्याद्वय भवति तन भवद्भिब्रह्मगुप्त "युगस्य दशमो भागश्चतुस्त्रिद्वय कसङ्गण । मात्कृतयुगादीना पाठाश. सन्धय स्वका इत्यादिना सन्ध्याद्वयस्य ग्रहण न कृत केवलमेकस्या एव सन्ध्याया ग्रहण क्रियते, युगचरणेषु मन्वन्तरादिपु सन्ध्याद्वयप्रमाण योज्यते, एक्स्या सन्ध्याया ग्रहणे दोष इति, चेद्भवन्मते द्वयमपि "युगचरणमान मनुमानञ्च" शोभन तदैकसन्ध्याग्रहण न युक्त सन्ध्याद्वयमानयोजनेन तन्मानप्य समीचीनत्वात् । निजमतिपरिकल्पिता या सन्ध्या (स्वबुद्धिकल्पिता या सन्ध्या ) ता मनुना पुलिशेन वा स्मृता (कथिता ) अदिता सन्ध्या भवत्वाल्पिता एव नान्यमन्वादिभि कथिता इति ॥६॥ हि मा-यदि मनु का प्रमाण एक सध्या से अापके मत से सिद्ध है तब दोनो (युग चरण और मनुप्रमाण ठीक नहीं है । यदि दोनो (युगचरण और मनुमान) ठीक है तो एक सन्ध्यामान स्वीकार करना ठीक नहीं है । सध्या दो होती हैं । परतु युगस्य दशमो भागश्च- तुस्त्रिद्वये कसङ्गण । क्रमात्कृतयुगादीना पप्ठारा मधय स्ववा' इत्यादि से आप (ब्रह्मगुप्त) ने दोनो सन्ध्यामान नहीं ग्रहण किया, येवल एक ही मध्यामान ग्रहण किया है। परन्तु युग चरणो मे और मनु प्रमाण म दोहा सन्ध्यामान जाडा जाता है, एक सध्यामान जोडने से दोष होता है, यदि आपके मत से दोनो (युगचरणमान और मनुमान) ठीक है तो एक सन्ध्याग्रहण करना ठीक नहीं है । आप अपनी बुद्धि से जिस सन्ध्यामान की वल्पना करते हैं वह मध्यामान न मनु से कहा गया है और न पुनिगाचाय से कहा गया है अत मापसे कथित सन्ध्यामान ठीक नहीं है ॥ ६ ॥ इदानी, पुनरपि. युगचरणान् निराकरोति । घरणश्चतुरशक स्मृतो यो वत लोकेन दशाशक क्वचित् । युगकल्पसमानवाच्यतानयतस्तस्फुटतामित कृता॥७॥ वि भा-चतुरशक (चतुर्थांश ) चरणे य स्मृत (कथित ) वत (अहो ।} लाकेन (केनापि जनेन) क्वचित् (कुत्रचित्स्थले) दशाशक (दशमाश ) कथित । युगकल्पसमानवाच्यतानयत (युगकल्पयोस्तुल्यत्वस्वीकारजनितदोषन्यायेन) अभित ( सर्वतोभावेन) तत्स्फुटता कृता (तत्सूक्ष्मता कृतेति ) अर्थाद्य - गस्य दशमो भाग इत्यादिना महायुगदशाशवगेन यानि युगचरणान्यभिहितानि तैयुगकल्पतुल्यता स्वीकारजनितदोपस्य स्पष्टीकरण कृत तेन ब्रह्म- गुप्तेन । एकस्य दोपस्य युगकल्पयोस्तुल्यतास्वीकरणजनितस्य दोपान्तरेण महायुग- वटेश्वर-सिद्धान्ते दशाशवशेन कथितयुगचरणजनितदोपेण परिमार्जन कृतमिति ब्रह्मगुप्तो पर्याप । वटेश्वराचार्येण कथ्यते यन्महायुगस्य चतुर्थाशतुल्यान्येव युगचरणानि भवितु. मर्हन्ति तन ब्रह्मगुप्तेन दगाशवशेन युगचरणान्यभिहितानि इति तन्मते दोप एतेन दोषान्तरेण युगकल्पयोस्तुल्यत्वकल्पनाजनितदोपस्य स्पष्टीकरण ब्रह्मगुप्तेन क्रियते इत्याक्षिपतीति ब्रह्मगुप्तेन यस्यार्यभटमतस्य खण्डन "युगपादानार्यभट- चत्वारि समानिष्टकृतयुगादीनि' यदभिहितवान्न तेषा स्मृत्युक्तसमानमेकमपि" श्लोकेनानेन क्रियते तदेवार्यभटमत स्वीकृत्य वटेश्वरेण ब्रह्मगुप्तमत खण्ड्यते महदाश्चर्यमिति ॥ हि भा-चतुर्थीदा चरण को कहते हैं । युग चरण याने युग चतुर्थारा इसको बही पर दशाश पहा गया है इससे युग और कल्प के तुल्यता स्वीकार करने मे जो दोप था उसका स्पष्टीकरण किया गया है ब्रह्मगुप्त से, अर्थात् युगचरण महायुग का चतुर्थाश होना चाहिये परन्तु 'युगस्य दशमो भाग' इत्यादि से ब्रह्मगुप्त ने जो युगधरणमान कहे हैं ठीक नहीं है । एक दोप तो ब्रह्मगुप्त में यह था कि युगमान प्रौर कल्पमान मे तुल्यता स्वीकार करना, दूसरे दोष 'युगस्य दामो भाग इत्यादि से 'युगचरणो का मान स्वीकार करना" द्वारा उस दोप का स्पष्टीकरण करते हैं अर्थात् एव दोष का स्पष्टीकरण दूसरे दोष द्वारा ब्रह्मगुप्त ने किया है यह ब्रह्मगुप्त के ऊपर आक्षेप है । ब्रह्मगुप्त जिस आर्यभटमत का खण्डन युगपादानार्यभट- चत्वारि समानिष्कृतयुगादीनि । यदभिहितवान्न तेपा स्मृत्युत्तममानमेकमपि ' इस दलोक दारा करते हैं उसी प्रायभटमत को स्वीकार कर वटेश्वराचाय ब्रह्मगुप्त मत वा खण्डन परते हैं यह बहुत माश्चर्य है ॥७॥ इदानी ब्रह्मोत्सृष्टिप्रलयो न समीचीनाविति निविंशति जगदुत्पत्तिप्रलयो कमलजनित उवाच यत्तदसत् । वेदाना नित्यत्वाच्छ्रति वाक्याना गतिर्भवति ।। ८॥ वि भा-कमलजनित (ब्रह्मगुप्त ) जगदुत्पत्तिप्रलयौ यदुनाच (यत्व थित- वान्) तदसत् (तदशोभनम्) वेदाना नित्यत्वात् (प्रपौरपेयत्वात्) श्रुतिवावयाना (वेदोक्तवचनाना) गतिर्भवति (प्रास्था भवति) वेदा पुरुषकृता न सन्ति तेन वेदोक्तवचनेषु लोकानामास्था भवतीति । उपपत्ति "ग्रहह्म देवदैत्यादि प्रतिवल्प चराचरम् । वृताद्विवेदंदिव्यान्दै रातनं सृज्यते मया" इत्यादि ब्रह्मोक्तम्य सण्डन नियतेऽनेन वटेश्वराचार्येण, सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमवल्पयदि" स्यादि वेदोत्तवाक्यमाश्रित्याऽचार्येण कथ्यते यद्ब्रह्मदिना- दावेव सर्वेषा भूस्थानामावासस्थाना जीवाना मृष्टिर्भवति तथा तद्दिनान्ते लयश्च भवनि, ब्रह्मरणा कथ्यते यद्ब्रह्मदिनाद्यनन्तर ४७४०० दिव्याब्देपु व्यतीतेषु ग्रहादीना- मावासस्थाना मृष्टिर्भवति । वेदवाक्ये इति तु लिसित न वर्तते पाह्मदिनादावेव प्रह्मद्वारा ग्रहादिसृष्टिर्भवति । ब्रह्मरणा यतथ्यते सूर्यसिद्धान्तेऽपि तथैवास्ति । यथा "ग्रह्म देवदत्यादि मृजतोस्य चराचरम् । कृताद्विवेदा दिव्यान्दा शतना वेघसो गता ।।
मध्यमाधिकारः २७१ मन्मते तु ब्रह्मकथनं समीचीनमेवास्ति वेदोक्तवचनस्य चर्चाऽऽचारण या कृता ब्रह्मोक्तो तावतां न काचिदापत्तिरिति विज्ञ विवेचनीयमिति ॥८॥ हि.भा.-ब्रह्मा ने संसार की उत्पत्ति और प्रलय जो कहा है वह ठीक नहीं है, वेदों के नित्यस्व के कारण वेद कथित वाक्यो मे गति (आस्था) होती है ॥८॥ उपपत्ति वटेश्वराचार्य "ग्रहः देव दैत्यादि प्रतिकल्पं चराचरम् । कृताद्विवेदैदिव्याब्दः शतघ्न: सज्यते मया" इत्यादि ब्रह्मोक्त का खण्डन करते है। प्राचार्य का कहना है कि "सूर्याचन्द्र- मसौ धाता यथा , पूर्वमकल्पयत्" इत्यादि वेदोक्त वचन ब्रह्मदिनादि मे भूस्थित और माकाशस्थित ग्रहादियो की सष्टि होती है और ब्रह्मदिनान्त मे उन सब का लय होता है" ब्रह्मा का कहना है कि ब्रह्मदिनादि के वाद ४७४०० इतने दिव्य वर्ष बीतने पर ग्रहादि की सष्टि होती है, वेदवाक्य मे यह तो लिखा हुआ नहीं है कि ब्रह्मदिनादि मे ग्रहादि सष्टि होती है । ब्रह्मा जो कहते हैं सूर्यसिदान्त में भी वैसा ही है । यथा- ग्रहक्ष देवदत्यादि-सज्यतेऽस्य चराचरम् । कृतादिवेदा दिव्याब्दा. शतघ्ना वेधसो गताः । हमारे विचार से ब्रह्मोस्त सृष्टि प्रलय ठीक ही है, वेदोक्त वचन से उसमे कुछ भी दोष नही पाता है इस विषय को विज्ञ लोग स्वय भी विचार करें॥८॥ इदानी ब्रह्मोक्तदिनमासवर्षहोरापतीन खण्डयति शीघ्रक्रमानिएक्ता होरादिनमासवर्षपा पात्रा। मन्ददिनादेिवेति नवा तत्स्वरूपमपि ॥९॥ वि. मा.- धावा (ब्रह्मणा) मन्ददिनार्कादेः (मन्दगतिग्रहरव्यादेः) शीघ्र- क्रमात् (शीघ्रगतिग्रहकमेण) होरादिनमासवर्षपाः (होरेशदिनेशमासेशवशा) निरुता (कथिता.)तत्स्वरूपमपि (होरादीनास्वरूपपि) न वेत्ति (न जानाति) Hell उपपत्तिः ब्रह्मसिद्धान्ते होरेशादि ज्ञानार्थमाचार्यकथित (शीप्रमामादित्यादि) क्रमोन दृश्यते किन्त्वार्यभटीये आर्यभटेन होरेशादि ज्ञानार्थमय कमोऽङ्गीकृतो यथा तद्वाक्यम्। सनते होरेशाः शनैश्चराद्या यथाक्रमं शीघ्राः । शीघ्रक्रमाच्चतुर्था भवन्ति सूर्योदयाद् दिनपाः ।। शोघ्रक्रमः कालहोरायामपि । शीघ्रक्रमाचतुर्था एव दिनपाः। तच्च काल- होरानुसारेणेव दिनाधिपत्यं, यतोऽहोराने चतुविशतिः कालहोराः तासु सप्तभिः क्षयितासु तिन एवावशिष्यन्ते ततश्चतुर्विशत्याः परायाः परेधुगदिभूताया प्राधि- पत्य शोधकमाञ्चतुर्थस्यय हि युज्यत इति, प्रादिकालहोराधिपतेरेव दिनाधिपत्या- चतुर्थ एव दिनाधिपतिः परेयुः । एवं मासाधिपत्यमपि, वर्तमानसावनमासे यमायः कालहोराधिपः (तस्यैव) । एवमन्दाधिपतिम ।
२७२ घटेश्वर-सिद्धान्ते अतएवाह सूर्यसिद्धान्ते "लब्धोनरावरहिता लङ्कायामाधरानिक । सावनो धुगण. सूर्याद् दिनमासाद्दपास्तत ॥ सप्तभि क्षयित. शेष: सूर्याद्यो वासरेश्वर । मासाब्ददिनसख्याप्त द्विविघ्न रूपसंयुतम् । सप्तोद्धृतावशेषौ तु विज्ञ यो मासवर्षपौ । यो हि विषयो ब्रह्मसिद्धान्ते नास्ति तत्खण्डनमाचार्येण क्रियते परन्तु तेपा- मेव (शीघ्रक्रमाद्घोरेशादीना) आर्यभटोक्तानाखण्डन न क्रियते इति महदाश्चर्यम्॥९॥ हि.भा -मन्ददिन रव्यादि से शीघ्रगतिग्रह क्रम से होरेश, दिनेश, वश ब्रह्मा से जो कहा गया है वे उनके स्वरूप को भी नहीं जानते हैं ॥६॥ उपपत्ति ब्रह्मसिद्धान्त मे होरेशादि ज्ञान के लिये 'शीघ्रक्रमादित्यादि' क्रम नहीं देखते हैं किन्तु आर्यभटीय में मार्यभट ने होरेशादि ज्ञान के लिये इस क्रम को स्वीकार किया है। जैसा कि उनका वाक्य है –'सप्नते होरेशा' इत्यादि । काल होरा मे भी शीन क्रम है । शीघ्र क्रम से चौथे ही दिनपति होते हैं । कालहोरा के अनुसार ही उसका दिनाधिपतित्व होता है । क्योकि अहोरात्र मे चौबीस काल होराए होती हैं। उनमे सात से भाग देने पर तीन ही शेप रहता है । इसलिये चौबीसवी होरा के बाद दूसरे दिन मे प्रथम होरा के आधिपत्य शीघ्रक्रम से चौथे ही उपयुक्त है । आदिकाल होराधिपति दिनाधिपति ही से दूसरे दिन में चौथे ग्रह दिनाधिपति होते हैं। इसी तरह मासाधिपति और वर्षपति के लिये भी विचार करना । प्रत सूर्यसिद्धान्त मे कहते हैं- "लब्धोनरावरहिता" इत्यादि । ब्रह्मसिद्धान्त मे जो विषय नहीं कहा गया है उसका खण्डन प्राचार्य (वटेश्वर) करते हैं परन्तु शीघ्र क्रम से होरेशादि ज्ञान के लिये प्रार्यभटोक्त कथन के खण्डन नहीं करते हैं यह बहुत ही माश्चर्य का विषय है ॥६॥ इदानी क्ल्प खण्डयति । कल्पादौ यद्यर्क. कल्पान्ते भास्करि कथं न भवेत् । निजयचनव्याघातात्स्वबुद्धिकल्पः कृतः कल्पः ॥ १० ॥ विभा.-कल्पादो यदि अर्व (सूर्य) तदा कल्पान्ते भास्करि (शनश्चर ) कथं न भवेत् । इति निजवचनव्याघात् स्वबुद्धि कल्प (स्वबुद्धयनुसारकल्पित- कल्प) कल्प कृतस्तेनेति ॥१०॥ उपपत्ति. कल्पान्ते सर्ने ग्रहा पातगन्दोच्चादय एकस्मिन्नेव सूत्रे प्रोता मण्य इवोधिर- प्रमेण स्थिता भवन्ति कल्पान्ते शनैश्वरो भवत्येव तावता करपे को दोप आग- च्छतोति ग्रन्थकार (वटेश्वर ) एव ज्ञातुं शक्नोति मण्डनमिति वाग्वल मात्रमिनि ।। - मध्यमाधिकार २७३ आर्यभटोऽपि मनुसन्धिसम युग कथयति यतस्तन्मते शखयुग एकमनु । अर्थात् द्विसप्ततियुगैस्तन्मते एको मनुर्भवति, वर्गाक्षराणि वर्ग, इत्याचार्यभटसङ्कतेन श-७० । ख-२ द्वयोर्योगेन शख =७२, आर्यभटेन द्विनगै ७२ युगैरेको मनु स्वी- कृतोऽतस्तन्मते मनुसन्धिर्युगसमझलितार्थ इत्यनुमीयते । तन्मतेऽप्येकस्मिन् कल्पे चतुर्दश मनवोऽतस्तन्मतेनैककल्पमानम् ==७२ युx १४- १००८ यु आर्यभटोक्तवाक्य च। दिव्य वर्षसहस्र ग्रहसामान्य युग द्विपटकगुणम् । अष्टोत्तर सहस्र ब्राह्मो दिवसो ग्रहयुगानाम् ॥ (कालनिया पा ८ श्लो) अन्येपा ब्रह्म ब्रह्मगुप्तादीना “ मतेनैककल्पमा==१४ मनव =१४४७१ यु-६६४ यु अत्र मनुसन्धिमान ६ यु योजनेन ६९४ यु+६ यु-१००० यु-१ कल्प- ब्रह्मदिनम्। इत्येव स्मृतिपुराणादावपि "चतुर्युगसहस्रण ब्रह्मणो दिनमुच्यते" कथित- मस्ति । अनयोर्मतयोमध्ये कतर मत समीचीनमित्येतस्य निर्णयोऽतीव कठिनोऽस्ति, तर्हि ग्रन्थकारेण (वटेश्वरेण) कल्पादौ यद्यर्व कल्पान्ते भाप्करि" रित्यादिना यत्खण्ड्यते तन्मह्य न रोचते ॥ १०॥ हि मा-कल्पादि म यदि रवि है तो कल्पान्त में शनैश्चर क्या न होगे यह अपने वचन व्याघात से अपनी बुद्धि के अनुसार कल्प माना गया है ।। १० ।। उपपत्ति । कल्पान्त मे सव ग्रह और पात मदोच्चादि एक ही सूत्र मे अर्ध्वाध क्रम से स्थित रहते हैं । वल्पान्त म शनैश्चर भी रहते ही हैं इससे कल्प कल्पना में क्या दोष पाता है इस विषय को वटेश्वराचार्य ही जान सकते हैं । यह खण्डन वाम्बल से है । प्रार्यभट भो युगसमान ही मनुसधि कहते हैं, क्योकि उनके मत म 'ख युग एक मनु' अर्थात् ७२ युग का एक मनु होता है 'दर्गावराणि वर्गे' इत्यादि आर्यभट के सङ्केत से शु-७०, १-२ दोनो के योग करने से श् ख=७२, ७२ युगा के आर्यभट एक मनु मानते हैं । ब्रह्मगुप्तादि आचार्य ७१ युग के एक मनु मानते है प्रत आर्यभटमत से एक कल्प के मान-१४४७२ यु-१००८ यु । आर्यभट भी एक कल्प में चौदह मनु मानते हैं। प्रार्यभट के वचन है- दिव्य वर्षसहस्र ग्रहसामान्य युग द्विपद वगुणम् । इत्यादि ग्रहा-ब्रह्मगुप्त मादि प्राचार्यों के मत में एक कल्पमान-७१ युग=१४ मनु =१४४७१ यु-१६४ यु २७४ वटेश्वर सिद्धान्ते इसमे मनुसन्धिमान ६ यु जोड देने से ६६४ यु+६ यु-१००० यु-१ पल्प ब्रह्मदिन यही स्मृति और पुराणादि म भी 'चतुर्युगसहरण ब्रह्मणो दिनमुच्यते' कथित हैं। इन दोनो मतो म कौन मत ठीक है यह कहना बहुत कटिन है । तव प्रथकार (वटरवर) 'कल्पादौ यद्यक कल्पान्ते भास्करि कय न भवेत् ।' इत्यादि मे जो खण्डन करते हैं वह मेरे मत से ठीक नही है ॥ १० ॥ इदानीम् आर्यभटमतेन क्त्पादो वारो न समीचीन इत्येतत्समाधान परोति । प्रोकारो दिनवारे हतोतकल्पसद्युयुताद् युगरणात् । नासो घटते यस्मादोङ्कारो विस्तरस्तस्मात् ॥११॥ वि मा यस्मात्कारणात् अतीतकल्पधुसयुताद् धुगरणात् ( गतकल्पदिन- मुतादहणणात्) दिनवारे (कल्पाद्यौदपिवगुरदिने) असौ प्रोवार (स्वीकार ) न घटते तस्मादोकारो विस्तर इति ॥११॥ उपपत्ति आर्यभटेन स्वतन्त्र 'गुरुदिवसात् भारतात् पूर्व' मित्यनेन कल्पादौ गुरवार स्वीकृतस्तत्खण्डन ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते ब्रह्मगुप्तेन निम्नलिखितश्लोकेन कृतम् । अोद्वारो दिनवारो गुरुरौदयिकोऽस्य भवति कल्पादो। न भवत्यर्को यस्मादोङ्कारो विस्तरस्तस्मात् ।। यस्मादस्यार्यभटस्योङ्कार (स्वीकार) कल्पादावोदयको दिनवारो गुरुर्भवति रविन भवति तस्मादस्योङ्कार स्वीकारो विस्तर आधाररहितोऽर्थाद- प्रामाणिक (स्तर स्तरणमास्तरणम् विगत स्तरो यस्य स विस्तर इति)। आर्यभटमतेन कलियुगारम्भात्पूर्व वर्तमानकल्पे ६मनवो व्यतीता युगपादनय च । तन्मते ७२ युगैरेको मनु कृतादयश्च युगपादा सर्वे समा अतस्तन्मतेन कल्पादौ गतयुगानि-७२४६+४३२४- द्वापरान्ते क्ल्पाद् गतयुगानि, एतानि युगसावनदिवस १५७७६१७५०० गुणितानि जात सावनाहर्गरण । ४३२४१५७७६१७५०० + २६४४७६३७५ x ३ अय सप्ततप्टो जातो द्वापरान्ते वार =५४५+३४३%२५+६=३४ पुन सप्ततष्टिते शेपम् =६ अय सैक कलियुगादौ वार =७=० अतो यदि गुरुवाराद् गणनारऽऽभ्यते तदा कलियुगादौ गतवार = वर्तमानो गुरुरेव सिध्यत्यत आर्यभटमतेन कल्पादी गुरुवार प्रायाति । ग्रन्थकारेणाऽऽयंभटमतस्य समाधान क्रियते परमेतत्समाधान न समीचीन । वस्तुत प्रार्यभटस्य मत न समोवीन ब्रह्मगुप्तेन यत् सड्यते तत्तय्यमेवेति ॥११॥ हि भा-जिस कारण से ताल्लदिनयुत अहगण से क्लादि म पौयिद गुरुदिन मध्यमाधिकारः २७५ मे जो प्रोद्वार (स्वीकार) कहा गया है सो नहीं घटता है इसलिए बहुत विस्तर प्रोद्धार (स्वीकार) समझना चाहिये ॥११॥ उपपत्ति आर्यभट ने अपने सिद्धान्त में 'गुरुदिवसात् भारतात् पूर्वम्' इस युक्ति से कल्पादि मे गुरुवार किया है उसका खण्डन ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त मे ब्रह्मगुप्त ने निम्नलिखित श्लोक द्वारा किया है । "प्रोकारो दिनवारों" इत्यादि । जिस कारण से प्रायभट का स्वीकार कल्पादि मे प्रौदयिक दिन वार गुरु होते हैं रवि नही होते हैं इस कारण से इनका स्वीकार विस्तर (प्राधाररहित अर्थात् अप्रामाणिक) ४ अगुप्हात अधोलिखित युक्ति से खण्डन करते हैं। आर्यभटमत से कलियुगारम्भ से पहले वर्तमान कल्प मे ६ मनु बीत गये हैं और तीन युगचरण और उनके मत से ७२ युग के एक मनु होते हैं, सब गुण चरण बराबर होते हैं इसलिए उसके मत से कलि के आदिमे गतयुगमान =७२४६+8=४३२१-द्वापरान्त मे क्ल्प से गतयुग इनको युग सावन दिन से गुगने से सावनाहरण होते हैं । ४३२४ १५७७६१७५००+ १५७७६१७५००४३ =४३२४१५७७६१७५०० +३६४४७६३७५४३ इसको सात से भाग देने से द्वापरान्त मे वार होते हैं ५४५+ ३४३=२५+६=३४ इसको फिर सात से भाग देने से शेष=६ इसमे एक जोडने से कलियुगादि मे वार=७०० इसलिए गुरुवार से गणना प्रारम्भ करते हैं तो कलियुगादि में गतवार ०, वर्तमान पार गुरु ही सिद्ध होते हैं इसलिए आर्यभटमत से कल्पादि में गुरुवार पाते हैं यही ब्रह्मगुप्त का खण्डन है। वटेश्वराचार्य (अन्यकार) आर्यभट मत का समाधान करते हैं पर वह समाधान ठोक नहीं है, वस्तुत आर्यभट मत ठीक नहीं है, ब्रह्मगुप्तकृत खण्डन ठीक ही है ॥११॥ इदानीं ब्रह्मगुप्त दूपयति । तिथिकरराधिष्ण्ययोगा ग्रहणादौ व्यमिचरन्ति दृष्टन। रविशशिनोरजानात्तिर्न पञ्चाङ्गमपि वेत्ति ॥१२॥ वि.मा-रविशशिनो (सूर्याचन्द्रमसो.) ग्रहणादौ तिथिकरणधिष्ण्ययोगाः (साधिततिथिकरणनक्षत्रयोगा) दृष्टेन (प्रत्यक्षरण) व्यभिचरन्ति, तिथेरज्ञानात् (तिथिज्ञानाभावात्) स (ब्रह्मगुप्त )पञ्चाङ्गमपि(तिथिपत्रमपि)न वेत्ति (न जानाति) ब्रह्मगुप्त न चन्द्रसूर्ययोग्र हणकालिकतिथिस्पष्टीकरण मूर्यचन्द्रयोश्च तात्कालिको. करण स्वसिदान्ते कृतमेव गणितागततिथ्यादीना वेधागतं. सह को भेदो भवति वटेश्वरेण न कथ्यते वेवलमित्येव क्थ्यते यवेधेन तत्रान्तर पतति तिथ्यादितावा- लियीकरण यथाऽन्यः (सूर्यादिमि.) वृत तथंव बागुप्त नापि कृत तदाऽन्यकृत- २७६ वटेश्वर-सिद्धान्ते तिथ्यादिषु दोपो नास्ति, केवल ब्रह्मगुप्त नतिथ्यादावेव दोप, क्यं भवतीत्यवार ऽचार्योक्तक्थन मेव प्रमाण नान्यत्वारण वक्तु शक्यतेऽस्माभिरिति ॥ १२ ॥ हि भा-मूर्य और चन्द्र का ग्रहणादि मे तिथि, वरण, नक्षत्र, योग प्रत्यक्ष ये माय व्यभिचरित होते हैं । तियि वे अज्ञान के कारण से ब्रह्मगुप्त पञ्चाङ्ग (तिथिपत्र) को भी नही जानते हैं । ब्रह्मगुप्त ने ग्रहणकाल म मूर्य और चन्द्र दे तात्यानिकीरण अपने मिद्धान्त में लिसा है तात्कालिक रवि और चन्द्रवा से तिय्यादि का भी स्पष्ट ज्ञान हो जाता है । तव वैधागत उनके माना से गणितागत मानो में क्या अन्तर पढता है यह विषय वटेश्वराचार्य नही कहते हैं, केवल इतना ही कहते हैं कि तिथ्यादि ग्रहण म व्यभिचरित होती है। जमे सूर्यसिद्धान्तकारादि ने अपने अपने अन्य में ग्रहणकालिक रवि और चन्द्र के लिये तात्कालिकी- करण किया है वैसे ही ब्रह्मगुप्त न भी किया है, तव ब्रह्मगुप्त ही वे मत का खण्इन क्यों करते हैं और इनके तिथ्यादि म क्या दोष है इममे केवल वटश्वराचार्य का कहना ही प्रमाण है कोई दूसरा कारण नहीं कह सकते हैं । इदानी पुनरपि ब्रह्मगुप्तस्य युगादि दूपयति । खम मोक्त्या घटते न जिष्णुसुरोक्तं युगादि किञ्चिदपि। यस्मान्मृपैव तस्माद्ब्रह्मोक्तमिति यन्चकार तदसच्च ॥ १३॥ वि भा -यस्मात्कारमात् जिष्णुसुतोक्त (ब्रह्मगुप्तोक्त) किञ्चिदपि युगादि (युगचरणमानादि) खब्रह्मोक्त्या (ग्राकाशस्थस्य ब्रह्मण क्थनेन) न घटते अर्थादेकमपि युगचरणादिमान ब्रह्मगुप्तोक्त ब्रह्मकथित युगादिमान सह न मिलति कस्मात्कारणात् मृपैव (मिय्यव) ब्रह्मोक्त (ब्रह्मकथित) इत्येव यच्चकार (युगचरणा- दिमान कृतवान्) तदसत् (तदशोभनम्) वटेश्वरेण कथ्यते यद ब्रह्मगुप्त न यद्युग- चरणादिमानमभिहित तद् ब्रह्मोक्त नहि ब्रह्मोक्तेन सहैकमपि न मिलति तेन ब्रह्म- गुप्तोक्त युगादिमान न शोभनमिति । उपपत्ति युगचरणसम्वन्धे ब्रह्मगुप्तोक्त ब्रह्मोक्तवचनानि कमशो निम्नलिखितानि सन्ति- खचतुष्टयरदवेदा रविवर्षाणा चतुर्युग भवति । सन्ध्या सन्ध्याशे सह चत्वारि पृथक्कृतादीनि ॥ युगदशभागो गुरिणत कृत चनुमिम्मिभिराएकना। द्विगुणो द्वापरमेकेन सङ्गण कलियुग भवति ।। तथा च ब्रह्मोक्तवचनम् - दिव्याब्दाना सहस्राणि द्वादशैव चतुर्युगम् । युगस्य दशमो भागश्चतुस्त्रिद्वये कसङ्ग ण । कमात् कृतयुगादीना पष्ठाश सन्धय स्वका ॥ ब्रह्मगुप्त न सौरवर्षमानेन युगचरणानि कथ्यन्ते ब्रह्मणा दिव्यवर्षप्रमा ऐनैतावता ब्रह्मगुप्तोक्तो न कश्चिद्दोप इति वटेश्वरेण व्यर्थमेव खण्ड्यते ।। १३ ।।
, मध्यमाधिकार २७७ हि मा-जिस कारण से ब्रह्मगुप्तकथित युगचरगादि मान कुछ भी ब्रह्मपथित युगचरणादि के साथ नहीं मेल खाता है, इसलिये ब्रह्मोक्त को जो कहते हैं वह मिथ्या (भूठ) है और वह ठीक नहीं है। प्राचार्य (वटेश्वर) कहते हैं कि ब्रह्मगुप्त ने जो युगचरणादि मान कहा है वह ब्रह्म कथित युगचरणादि मानो के साथ कुछ भी नही मेल साता है इसलिये ब्रह्मगुप्त के क्थन झूठ है और ठीक नहीं हैं। उपपत्ति युगचरणो के विषय में निम्नलिखित ब्रह्मगुप्त के वचन हैं । 'सचतुष्टयरदवेदा" इत्यादि । निम्नलिखित ग्रह्मोक्त वचन है । 'दिव्यावदाना सहस्राणि" इत्यादि । ग्रह्मगुप्त सौरवर्षमान से युगचरण कहते हैं और दिव्यवर्षमान से ब्रह्मा जी कहते हैं इससे ब्रह्मगुप्त कथन मे कोई दोप नहीं पाता है, ८टश्वराचायं व्यथं ही खण्डन घरते हैं ।। १३ ।। इदानी कलियुगादौ ब्रह्मगुप्तोक्तगतयुगचरणान् खण्डयति युगपादान् जिप्णुसुतस्त्रीन् यातानाह कलियुगादौ यत् । तस्य द्वापरपादो युगगतये व स्फुटो नात ॥ १४ ॥ वि भा-जिप्णुसत (ब्रह्मगुप्त ) कलियुगादौ (कलियुगचरणप्रारम्भे) यातान् (गतान्) नीन् युगपादान् (कृतनेताद्वापरयुगचरणान) यत्प्राह (कथितवान्) तस्य (युगत्रयचरणस्य) द्वापरपाद (द्वापरयुगचरण) युगगतये (युगगत्यर्थमस्ति तेन तद्गणना न भवति) अतो ब्रह्मगुप्तस्याय पक्ष स्फुटो नेति । उपपत्ति आचार्येण कथ्यते यत्पतियुगादी युगपरणय व्यतीतमासीदिति ब्रह्मगुप्तेन यत्वथ्यते तच्छोभन नास्ति, यतो द्वापरयुगचरणकलियुगस्य गत्यर्थमस्ति, कले- रेक एव चरण । एकेन चरणेन योऽपि चलितु न शक्नुयादतो द्वापरचरणस्य सतयुगचरणे गणना न भवितुमर्हति तेन ब्रह्मगुप्तवयन न समीचीनमिति । पर वटेश्वरेणापि पूर्व लिखित यत्- "वजन्मोऽप्टी सदला समाययुस्तथा समामा मनको दिनस्य पट् । युगभिवृन्द सहशाद ध्रयस्त्रय क्ले वाम गुणा गावचे ॥" कलियुगादौ युगचरणमय व्यतीतमित्यनेन "वटेश्वरेण" अपि पूर्व स्वीहत- मेव तह ब्रह्मगुप्ामतपण्डन क्य क्रियते इत्यादि जातु न गम्यते ।। ग्राह्मस्फुटसिद्धान्ते ब्रह्मगुप्तेना चोलिमितपद्धत्यार्यभटमत सण्डयते तत्य- क्षपातिना (मार्यभटपक्षपातिना) वटेश्वरेग तम्मिन्नेव विषये ब्रह्मगुप्तमत सण्डयते।
२७८ चटेश्वर सिद्धान्त आर्यभटो युगपादास्त्रीन् यातानाह कलियुगादौ यत् । तस्य कृतान्तयंस्मात् स्वयुगाद्यन्तो न तत् तस्मात् ।। आर्यभट. कलियुगादी त्रीन् युगपादान् यातान् कथितवान् । यच्च प्रसि तद्ग्रन्यतः । यस्मात् कारणात् तन्मते तस्य स्वयुगाद्यन्तौ तदेवस्यादिरन्यस्यान्त इति द्वौ कृतान्तः कृतयुगमध्ये भवतस्तस्मात् तद्युग न सत् । प्रार्यभटमतेन एकयुगान्तादन्यस्यारम्भात् कलियुगादिपर्यन्त प्रयोयुगपादाः ३४४३२००००=३२४००००, प्राचार्य (ब्रह्मगुप्तमते च) ४३२००००४६ कृ++द्वा= =३८८५००० द्वयोरन्तरे वर्षाणि ६४८००० १० एतानि चाचार्यमतेन सख्याधिकत्वात् कृतयुगमध्येज आर्यभटोक्तयुगा- द्यन्तौ कृतयुगान्त । इहाचार्येण स्वकृतयुगमध्ये आर्यभटोक्ती युगाद्यन्तो प्रतिपा- दितौ । तत्र यदि आचार्योक्तयुगादो ग्रहाणा मेपमुखे स्थिति. स्यात् तदेदं खण्डनं युक्तियुक्तमन्यया वाग्वलमेतदिति ज्योतिर्विदा स्फुटमेव । उभयो– ह्मगुप्तकृतखण्डनवटेश्वरकृत - ब्रह्मगुप्तमतखण्डनयोस्तुलना कृत्या कस्य कथन समीचीनमिति सुधियो विभावयन्तु । मन्मते तु ब्रह्मगुप्तमतमत्र विषये समीचीन वटेश्वरेण विद्वेषवुद्धया खण्डयते ॥ १४ ॥ हि भा-ब्रह्मगुप्त ने कलियुगादि मे 'तीन युग चरण बीत गया था यह जो कहा है सो ठीक नहीं है क्योकि उन गत तीन युग चरणो मे द्वापर चरण युगगति के लिये है इसलिये द्वापरचरण की गणना उसमे नही होनी चाहिये । उपपत्ति प्राचार्य का कहना है कि कलि के एक चरण होने के कारण वह चल नहीं सकता है क्योकि एक चरण से कोई भी नहीं चल सकता है । द्वापर युग चरण उसके दूसरे चरण का काम करता है, इसलिये व्यतीत युग चरएनय मे द्वापर की गणना नहीं होनी चाहिये। भत ब्रह्मगुप्त का मत ठीक नहीं है। लेकिन पहले वटेश्वराचार्य भी इस बात को स्वीकार कर चुके हैं । यथा "कजन्योऽप्टी सदला." इत्यादि यहा ब्रह्मगुप्तमत के खण्डन का कारण नहीं मालूम होता है ।। ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त मे अधोलिखित क्रम से ब्रह्मगुप्त आर्यभटमत का खण्डन करते हैं। मार्यभट के पक्षपाती वटेश्वराचार्य उसी विषय मे उल्टे ब्रह्मगुप्त मत का खण्डन करते हैं। "मार्यभटो युगपादास्त्रीन्" इत्यादि । मार्यभट ने कलियुगादि तीन गत युग चरणो को कहा है । जो उनके अन्य से प्रसिद्ध है । जिस कारण उनके मत मे एक के पारम्भ से दूसरे का मन्त ये दोनो कृत युग के मध्य ही मे होता है, इसलिये वह युग ठीक नहीं है ।
मध्यमाधिकार: २७६ आर्यभटमत से एक युग के अन्त से द्वितीय के प्रारम्भ से कलियुगादि पर्यन्त तीन ४३२००००४३ युगचरण- =३२४००००, ब्रह्मगुप्त के मत से कृ++द्वा= ४३२००००४६ -३८५८००० दोनो के अन्तरमे वर्ष=६४८००० १० इतने वर्ष ब्रह्मगुप्त के मत मे कृतयुग के मध्य में है, इसलिये आर्यभटोक्त युगाद्यन्त कृतयुगान्त है । यहा ब्रह्मगुप्त ने स्वकृत युगमध्य में प्रार्यभट कथित युगाद्यन्त को कहा है। यदि ब्रह्मगुप्त कथित युगादि में मेपादि में ग्रहो की स्थिति हो तब तो ब्रह्मगुप्तकृत खण्डन ठीक है अथवा नहीं। प्रार्यभट मत के ब्रह्मगुप्तकृत खण्डन और ब्रह्मगुप्त मत के वटेश्वराचार्य द्वारा सण्डन इन दोनो मे क्या ठीक है इसको पण्डित लोग विचार करें। मेरे विचार से इस विषय मे ब्रह्मगुप्त मत ठीक है । वटेश्वर द्वैपबुद्धि से उनके मत का खण्डन करते हैं ॥ १४ ॥ लासमयाम्योत्तररेखायां भास्करोदये मध्याः। जिप्णुसुतेनोक्तं यत्तत्स्फुटं विषुवतोऽन्यत्र ॥१५॥ दिनवारादिप्रवृत्तिः पश्चादुज्जयिनो दक्षिणोत्तरायाः प्राक् । चरदलसंस्कारवशान्न तत्स्फुटं गोलबाह्यस्य ।। १६ ।। वि. भा.-लङ्का समयाम्योत्तररेखाया भास्करोदये मध्या इति जिप्णु- सुतेन (ब्रह्मगुप्त न) यदुक्त (यत्कथित) तत् विपुवत (विषुव खात.) अन्यत्र (भिन्नस्थले) स्फुट भवेत् । उज्जयिनी दक्षिणोत्तराया (अवन्तिसमरेखामूत्रात्) पश्चात् (पश्चिमदेशे) प्राक् (पूर्वदेशे) चरदलसस्कारवशात् दिनवारादिप्रवृत्तिर्गोल- बाह्यस्य (गोलबहिर्भूतस्य गोलानभिज्ञस्य वा मते) भवति तत्स्फुटं (सूक्ष्म) नेति । उपपत्ति. अथ लङ्का समरेखातः पश्चिमे देशे देशान्तरघटोभिः पूर्व वारप्रवृत्तिभवति, सूर्योदयः पश्चाद्भवति, पूर्वदेशे देशान्त रघटीभिरिप्रवृत्ति पश्चाद्भवति; सूर्योदयः पूर्व भवति । दक्षिणगोले चरखण्डासुभिः प्राक् दिनवारप्रवृत्तिरति सूर्योदयः पश्चा- द्दिनवारप्रवृत्तिः पूर्व भवति । उत्तरगोले चरसण्डामुभिः पश्चाद्दिनवारप्रवृत्तिः, सूर्योदयः पूर्व" भवत्यर्थाच्चरसण्डदेशान्तरघटीभितिवियुतिवशादिनतदीशयोः स्पष्टकालो भवतीति। एतेनाचार्येरणापि पूर्व "द्रष्टा क्षितिजे देशान्तरपटिकाभिरित्यारभ्योत्तरगोचे पश्चादिनोदयादित्याद्यन्त यावत्" विषयोऽयमेवाभिहितः । परमत्र ब्रह्मगुप्तकथितस्य तस्यंच (वटेश्वरेणापि स्वीकृतस्य) सण्डनं क्रियते । अग्रतु केवलमित्येव कथ्यते यत् "न तत्स्फुट गोलवाह्यस्य", कारणमनिमश्लोके कथ्यते इति ।
२८० वटेश्वर-सिद्धान्ते ने अन विषये ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते ब्रह्मगुप्तवाक्यम्- लड्कासमयाम्योत्तररेखाया भास्करोदये मध्या. । देशान्तरोनयुक्ता रेखाया प्रागपरदेशेषु ॥ लड्दासमयाम्योत्तररेखायामालदायाम्योत्तररेखाया ये तिष्ठन्ति तेपा भास्करोदये मध्यमरव्युदयकाले मध्यमा ग्रहा अहर्गणेन भवन्तीत्यर्थ । रेखाया प्रागपरदेशेषु च गणिता गताग्रहा देशान्तरफ्लेन क्रमेणोनयुतास्तदा स्वनिरक्षोदयकालिका भवन्ति । अनोदयान्तरसस्कारेण वास्तवा स्वनिरक्षो- दये ग्रहा भवन्तीति भास्करेणोदयान्तरसस्कार प्रानीत इति । आर्यभटेन ग्रन्थ- द्वय रचित तत्र प्रथमग्रन्थेनौदयिको ग्रहो य आगच्छति तस्माद् द्वितीयग्नन्थागत याधरात्रिको ग्रहो दिनगतिचतुर्थाशेनोनो भवति, अर्थाद् द्वयोहयोरन्तरे ग्रहगति. चतुर्थाशकला भवन्ति यतोऽनयो कतर वास्तवमित्यार्यभटेन न निश्चितमतस्त- न्मतेनकमपि न स्फुटमिति ब्रह्मगुप्त माऽर्यभटमत खण्डित तद्विरुद्ध वटेश्वरेण ब्रह्म- गुप्तमत खण्ड्यते ॥ १५ ॥ हि भा-"लङ्कासमयाम्योत्तरेखाया भास्करोदये मघ्या" इत्यादि ब्रह्मगुप्त जो कहा है वह विपुवत रेखा से भिन्न स्थान मे स्फुट होता है, उज्जयिनी समरेखा सूत्र से पश्चिम देश मे और पूर्व देश म घर खण्ड सस्कारवश से जो दिनवार प्रवृत्ति कही गई है वह गोल शून्यो के मत मे है, वह सूक्ष्म नही है । उपपत्ति लद्धा समरेखा से पश्चिम देश में देशान्तर घटी करके पहले वारप्रवृत्ति होती है, मूर्योदय पश्चात् होता है । पूव देश मे देशान्तर घटो करके पीछे वारप्रवृत्ति होती है, सूर्यो. दय पहले होता है। दक्षिणगोल मे चरखण्ड काल करके पहले दिनवार प्रवृत्ति होती है, मूर्योदय पीछे होता है। उत्तरगोल मे चर खण्ड काल करये पश्चात् दिनवार प्रवृत्ति होती है सूर्योदय पहले होता है। प्रर्यान् चर देशान्तर घटी योग वियोगवश से दिन दिनपति का स्पष्टकाल होता है। बटेश्वराचार्य भी पहले "द्रष्टा भितिजे देशान्तरपटिकाभिः" इत्यादि से "उत्तरगोले पश्चादिनोदयात्" इत्यादि तर यही बातें कही हैं लेकिन ब्रह्मगुप्त कधित उसी विषय का राण्डन यहा पर करते हैं । यहा केवल इतग ही कहते हैं कि "न तत्स्फुट गोलवाहस्य' इसका कारण मागे के श्लोकों मे कहते हैं। लदासमयाम्योत्तर रेखा मे भर्याद लड़ा याम्योत्तर रेखा म जो लोग रहते हैं उनके रव्युदयकाल म मध्यमग्रह पहाण से माते हैं । रेसा से पूर्व और पश्चिम देश में गणितायत ग्रह में देशान्तर फ्ल क्रम से उन मोर सहित करने से वास्तव अपने निरक्षोदय. पालिक ग्रह होते हैं । इसम उदयान्तर सस्कार से मपने निरसोदय म वास्तव ग्रह होते हैं इसीलिये भास्कराचार्य उदयान्तर सवार लाये हैं ।। मार्यभट ने दो अन्य वनार्य प्रयमग्रन्थ से मौदायिक ग्रह जोमाते हैं उससे द्वितीय प्रथागत मध्यमाधिकारः २८१ अर्धरात्रि का ग्रह दिनगति चतुाश करके हीन पाते हैं अर्थात् दोनो ग्रहो के अन्तर करने से ग्रहगति के चतुपाश कला होती है । इन दोनो ग्रहो (ग्रन्यद्वयानीत ग्रहो) मे कौन ग्रह वास्तव है इसका निश्चय आर्यभट ने नहीं किया इसलिये उनके मत से एक भी ग्रह ठीक नहीं है-यह ब्राह्मगुप्त ने अपने सिद्धान्त मे आर्यभट मत का खण्डन किया है। जिसके उत्तर मे ग्रन्थकार (वटेश्वर) यहाँ ब्रह्मगुप्त मत के खण्डन करते हैं, यह खण्डन विद्वेप बुद्धि वश किया जाता है ॥१५॥ प्रायंभटस्य वारादि दूपयति ब्रह्मगुप्त सूर्यादयश्चतुर्था दिनवारा यदुवाच तदसदार्यभट । लकोदये यतोऽस्यास्तमय प्राह सिद्धपुरे ॥ आर्यभटेन 'शीघ्रक्रमाच्चतुर्था भवन्ति सूर्योदयो दिनपा." इति स्वतन्त्रे लिखितम् च', बु, शु. र, कु, गुरु, श । कक्षाक्रमेण ग्रहाणा सस्था । तत्र शीघ्रक्रमात् सूर्यादयो ग्रहा र, च, म, बु, गु, गु, श उपरिप्टा ग्रहा मन्दगतयोऽध स्था शीघ्रगतयो भवन्ति, ते च रवित शीघ्रक्रमादध स्थ ग्रहगण- नया (विपरीतगणनया) रवेरनन्तर बुध इत्यादि गणनयेति स्फुटम् । अथ गोलपादे च तेनवार्यभटेन 'उदये यो लङ्काया सोऽस्तमय सवितुरेव सिद्धपुरे' इत्युक्तम् । तेनायमर्थ सूर्यादयश्चतुर्था दिनवारा दिनपा भवन्तीति यदाय- भट उवाच तदसत् । यन स एव लोदये सिद्धपुरेऽर्कस्यास्तमय प्राह । अर्थादि लकोदये वारादिस्तदा सिद्धपुरेऽपि कय न स एव वारादिरत आर्यभटोक्तवारगरगना न स्थिरा अथ चार्यभटरचितग्रन्थद्वये एकस्मिन् युगसावनदिनानि-१५७७९१७५०० लङ्कायामर्कोदये सृष्टि । अन्यस्मिन् युगसावनदिनानि=१५७७६१७८०० लङ्का- यामधराने सृष्टि । ग्रन्थद्वयतो वारगणनायामेक दिनमन्तर पतत्यत आर्यभटोक्त- वारादिनं समीचीन इति ब्रह्मगुप्त न तन्मत खण्डितम् । आर्य भटपक्षपातिना वटेश्वरेण वारादिसम्बन्धे ब्रह्मगुप्तमत खण्डयते । वारादिसम्बन्धे ब्रह्मगुप्तमत समीचीनमेवेति सुधियो विभावयन्तु ।। १६ ॥ आर्य भटोक्त वारादि का ब्रह्मगुप्त खण्डन करते हैं- सूर्यादयश्चतुर्या दिनवारा यदुवाच तदमदार्यभट । लड्रोदये योऽस्यास्तमय प्राह सिद्धपुरे ॥ मार्यभट ने 'शोधनमाञ्चतुर्या भवन्ति मूर्यादयो दिनपा' अपने सिद्धान्त में लिसा है-कक्षा क्रम से ग्रहस्थिति इस प्रकार है च, बु, शु, र, कु, गु, शशीघ्र क्रम से मूर्या- दिग्रह र, सो, म, बु, गु, गु, श, उपरिस्थित ग्रह मन्दगतिग्रह, और अघ स्थ ग्रह शीघ्रगति होते हैं । वे रवि से शीघ्र कम से अपस्थ ग्रह गणना के अनुमार रवि के बाद शुक्र उनके बाद बुध इत्यादि गणना कम से होते हैं । गोलपाद मे उन्ही प्रार्यभट ने 'उदये यो लाया
२८२
वटेश्वर-सिद्धान्त
सौतमय सवितु मिद्धपुरें इस तरह कहा है । इमलिये मूर्यादि चतुर्य दिनवार दिनपनि होने
हैं-यह जो मार्यभट ने कहा है सो ठीक नहीं है। क्योकि उन्दीप्रार्यभट ने लद्रोदय सिद्धपुर म
ग्रस्त पहा है । अर्थात् यदि लद्दोदय मे वारादि है तो सिद्धपुर में सो वही वारादि नहीं होगा
इसलिये आर्यभटोत वार गणना टीक नहीं है। मार्यभटरचित प्रन्यद्वय में एक मे सुग-
सावनदिन=१५७७६१७५००, सदा सूर्योदयकाल में सृष्टि। दूसरे ग्रन्थ मे युगमावन
दिन= १५७७६१७८००, लद्दा रामिवाल : मृप्टि, ग्रन्थद्वय से वारगणना म एव दिन
चा अन्तर पाता है । इसलिये प्रायंभटोन वारादि ठीक नहीं है । मार्यमट पक्षपाती प्रन्य-
कार (वटश्वर) यहा ब्रह्मगुप्त मत का खण्डा करते हैं । वस्तुत ब्रह्मगुप्तमत ठीक ही है।
दुराग्रहदश खण्डन दिया जाता है ।। १६ ।
इदानी ब्रह्म गुप्तोत्तमृट्यादिकाल खण्डयनि
तत्कालायनचलन भगरराविशेषे प्रकल्पितं सवितु ।
तनाशाश्चन्द्रादिग्रहे प्रदेयास्तत स्फुटा. सर्वे ॥ १७ ॥
अतएव विनप्टमति प्रागुदये भास्करस्य मेपादौ ।
कथयति शास्त्राज्ञानात्तत्रायनचलनमभिहित मुनिभि ।।१८।।
वि भा-सवितु (मूर्यस्य) भगणविशेपे अयनचलन (अयनगति ) प्रक-
सितम्, तन प्रशा (अयनाशा) चन्द्रादिग्रहे प्रदेया (अर्यादय नगतिना सर्वे चन्द्रा-
दयो ग्रहा युक्ता कार्या) तदा सर्वे ग्रहा स्फुटा स्यु ! प्रतएव विनष्टमति (भ्रप्ट
बुद्धिको ब्रह्मगुप्त ) भास्करस्य (मूर्यस्य) मेषादौ प्रागुदये शास्त्राज्ञानात् कथयति,
तर (तस्मिन स्थले) मुनिभि अयनचलन (अयनगनि ) अभिहित (कथितम्) ।
प्राचार्येण (वटेश्वरेण) कथ्यते यद्ब्रह्मगुप्तेन "लङ्कासमयाम्योत्तररेखाया
भास्करोदये मध्या" इत्यादि यत्व थ्यते तत्रायनगतिसस्कृनरव्युदये कथनमुचित.
मासोत् यतस्तन काप्ययनगतिस्तु भवेदेव तद्ग्रहण ब्रह्मगुप्तेन न कृतमतस्तन्मत न
युक्त मिति । एतस्यैतत्कथन समीचीन प्रतिभातीति ।।१७-१८।।
हि भा-मूर्य के भगणविशेष म अपनगति कलित वी गई है । वहा पर अयनारा-
चन्द्रादिग्रह म जोडने से वे सब प्रह स्पप्ट होते हैं । इसलिए नष्ट युद्धि वाले ब्रह्मगुप्त
ने
प्रागुदय भास्करस्य मेपादो' यह शास्त्र के न जानने के कारण कहा है, वहा पर मुनियो
स अयनगति कही गई है। वटश्वराचार्य कहते हैं कि ब्रह्मगुप्त ने "लकासमयाम्पोत्तररेखाया
भास्वरोदये मघ्या यह जो कहा है । वहा प्रयनगति सस्कृत रव्युदप करना उचित था,
क्योंकि वहा पर कुछ भी तो अपनगति होगो, परन्तु वे उसका ग्रहण नही क्यि इसलिए
उनमा मत ठीक नहीं है । इनका यह क्यन ठीक मालम पडता है । वहा पर अयनगनि अनि
र्वाच्य रही होगी जिसका ग्रहण करना अतीय दुर्घट था इसलिए वहा पर अयनगति मस्तार
नही दिये मुझ तो यही मालूम होता है ॥१७-१८॥
इदानी ब्रह्मगुप्तोसलगत गतयुगचरणाश्च खण्डयति
न समा युगकल्पा- कल्पादिगत कृतादियातश्च ।
ब्रह्मोक्तं जिष्णुसुतो नातो जानाति मध्यगतिम् ॥१६॥
मध्यमाधिकार २८३ विभा.--युगकल्पा कल्पादिगत (कल्पगतवर्षमान) कृतादियात (सत्ययुगादि गतयुगचरणमान) ब्रह्मोस्तै (ब्रह्म कथित ) समा (तुल्या) न सन्ति, अतोऽस्मात् कारणान् जिष्णुसुत (ब्रह्मगुप्त ) मध्यगति न जानातोति । वटेश्वराचार्य कथ्यते ब्रह्मगुप्तकथित युगकल्प-कल्पगत-गतयुगचरणमानानि, ब्रह्मकथितस्तस्तु- ल्यानि न सन्ति तेन ब्रह्मगुप्तमत न शोभनम् । उपपत्ति ब्रह्मणा सष्टिकाल (४७४०० दिव्यवर्षारिण) कथितोऽस्ति, प्रह्मगुप्तेन सृष्टिकालोनाभिहितोऽत कल्पगतवर्षे तुपार्यक्य भवेदेव। ब्रह्मगुप्तेन युगमानानि सौर- वर्षमानवारणा दिव्यवर्षमान कथ्यन्ते तयो सामञ्जस्य भवेदेव । ब्रह्मणा कियन्ति युगचरणानि गतानि तत्र स्पष्टीकरण न क्रियते, ब्रह्मगुप्तेन नोणि कृतादियुगचरणानि गतानीति कथ्यन्ते । ब्रह्मोक्तस्य सूर्यसिद्धान्तोक्त न सक्य वर्तते। बटेश्वराचायंकथन कियत्स्यशेषु तथ्य कियत्स्वशेषु चातथ्यमिति विवेचनीय विवेचकैरिति ।।१६।। हि भा~-युगमान, क्ल्पमान, कल्पादिगतवर्ष, सत्ययुगादि युगचरण ब्रह्मगुप्त ने जो कहा है वे ब्रह्मकथित युग-कल्यादि माना के साथ मेल नहीं खाने हैं याने दोनो (ब्रह्मा ब्रह्मगुप्त) से कथित युगादिमानो म अन्तर पडत हैं इसलिय ब्रह्मगुप्त मध्याति को नहीं जानते हैं ॥१६॥ उपपत्ति ब्रह्मा ने सृष्टिकाल (४७४०० दिव्यवर्ष) कहा है, ब्रह्मगुप्त ने नहीं कहा है इसलिए क्लागतवर्ष म अन्तर अवश्य होगा । युगमान ब्रह्मगुप्त सौर वपमान से कहते हैं और ब्रह्मा दिव्यवर्षमान से कहते हैं । इसलिये ब्रह्मगुप्त पथित युगमान म दोप नहीं कहा जा माता है। सम्बन्ध म ब्रह्मा स्रष्टीकरण नहीं किया है लेकिन ब्रह्मगुप्त साफ कहते हैं कि कृतादि तीन युगचरण बीत चुक है, मूर्यसिद्धान्तोक्त के साथ ब्रह्मोत का ऐक्य है । हाम कितने प्राम वटेश्वराचाय का क्यन ठीक है पितन प्रा म नहीं ठीक है। इस बात के कार स्वर बुद्धिमाना को विचार करना चाहिए ॥१६|| इदानी ब्रह्मगुप्ताक्तग्रहभगवान् खण्डयति वास्तवभगरणधु चरो याद तादृङ्न कल्पितंर्भवति । कल्पितमगरगयुं चर स्याचाहशस्तयैव स्यात् ॥२०॥ विभा- चर (ग्रह) वास्तवमगरगहन (वास्तवयुग भगरणयहियो भवति) कल्पितर्भगण (अवास्तवभगणं) तादृक् न भवति (ताहगो न भवनि) पल्पितभगण (अवास्तवझगणं ) यादृशो ग्रह स्यात् तथैव म्याददिवास्तवमगरण- योदशोऽवास्तवग्रहो भवितुमर्हनि, तथैव भवतीति ॥२०॥ प्रयोपपत्ति । प्राचायकवनस्य तालमिदमम्नि यद्य गमानस्वास मोचीनत्याधुग. पठितग्रहभगरणा अपि ममोचीना न भवितमहनि तदाऽममीचीन भगराद्वारा साधिता ग्रहा अपि न वान्तवा , अवास्तवभगणद्वारा ये ग्रहा पागच्छेयुम्तेऽवाम्नवा गत युगचरण २८४ वटेश्वर-सिद्धान्ते एवातो ब्रह्मगुप्तोरताऽवास्तवभगणसाधितग्रहाणामवास्तवत्वात्तन्मत न समो- चीनमिति ॥२०॥ हि भा.-वास्तव भगरण से जसे ग्रह होते हैं अवास्तव मगरण से वैसे नहीं होते हैं, प्रवास्तव भगण (कल्पित भगण) से जैसा ग्रह होना चाहिए वैसा ही होता है ॥२०॥ उपपत्ति प्राचार्य (वटेश्वर) के कहने का तात्पर्य यह है कि युगमान के ठीक नहीं रहने से युगपटिन ग्रह भगण भी ठीक नहीं हो सकता है। तव अशुद्ध भगण द्वारा जो साधित यह होंगे वे भी अशुद्ध ही होंगे। प्रत ब्रह्मगुप्त कधित करिसत भगण (अवास्तव भगए) से माषित ग्रह के अवास्तवत्व होने के कारण उनका (ब्रह्मगुप्त का) मत ठीक है ॥२०॥ इदानी कुजस्य भगणचतुष्टयकल्पन खण्डयति भगरणाद्यं चतुष्कं कुजस्य भगणेपुटगृक्षधियः । शरगुरपरसपञ्चायवा द्वीपुशरागा द्विगो द्विनन्दा वा ॥२१॥ अनया दिशाऽसृजोऽन्ये भगरपाः कल्प्याः सहस्रशोन्यस्य । धु चरस्योच्चस्य तथा परमार्या नात्र केचित्स्युः ।।२२।। वि मा-कुजस्य (मङ्गलस्य) भगरणेपुदृगृक्षधिय (५२७२) शरगुणरसपञ्च (५६३५) अथवा द्वोपुशरागा (७५५२) वा द्विगोद्विनन्दा. (६२९२) इति चतुष्क भगरणाद्य जिष्णुसुतेन कल्पितम् । अनया दिशा (कवितपद्धत्या) असूजः (कुजात) अन्यस्य धुचरस्य (भिन्नग्रहस्य तथोच्चस्य) सहस्रशोऽन्ये भगणा. कल्प्या. (अर्था- धया कुजस्य भगणचतुष्टय कल्पित तथैव कुजातिरिक्तान्यग्रहस्योच्चस्य वा सहस्रशो भगरणा कल्पनीया ) अत्र केचित् परमार्था न स्यु (अत्र किमपि परमतत्त्व नास्ति) इति ।।२१-२२॥ अत्रोपपत्ति ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते मङ्गलस्य भगणचतुष्टय पठित नास्ति यथाऽचार्यण कथ्यते तहि केनाऽधारेण ग्रन्थकारणोपयुक्तमगरणचतुष्टयमान कथयित्वा खण्डयते ब्रह्मगुप्तगतमिति वटेश्वराचार्य एव ज्ञातु शक्नोतोति ।।२१ २२।। हि भा ---मगल के ५२७२ या ५६३५, अथवा ७५५२ वा ६२९२ ये चार तरह के भगए ब्रह्मगुप्त ने कहा है इस तरह मगल से भिन्न ग्रह प्रथवा उच्च के हजारो भगण की कल्पना हो सकती है । इस तरह की भगए कल्पना में कोई तत्त्व नहीं है ।। २१-२२ ।। उपपत्ति ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त मे मगल वे चार तरह के भगण पठित नही देखने में भाते हैं । जैस कि बटेश्वराचार्य कहते हैं । तब किस माधार पर प्राचार्य पूर्वकथित भगण चतुष्टय मान लिम कर खण्डन करते हैं, ये बाते बटेश्वर ही जान सकते है।
मध्यमाधिकार २८५ यह समझ में नहीं आती है कि जिस विषय का उल्लेख ब्रह्मगुप्तसिद्धात म नही है उसका भी खण्डन किया जाता है। बहुत आश्चर्य की बात है ॥ २१ २२ ॥ इदानी ब्रह्मगुप्तोक्तदेशान्तरयोजन खण्डयति । भूपरिधिः खखखभरा स्थूल स्थाण्वीश्वरोज्जयिन्यासु । अक्षान्तरेण सिद्धा योजनसंख्या न सम्यगत ॥२३॥ वि भा-खखखशरा (५०००) स्थूल (अवास्तव ) भूपरिधि (भूगोल- परिधि) अतोऽस्मात्कारणात् स्थाण्वीश्वरोज्जयिन्यासु (एतेषु पूर्वोक्तप्रसिद्ध- नगरेषु) अक्षान्तरेण (अक्षाशान्तरेण) सिद्धा (साधिता) योजनसख्या सम्यक् (शोभना) नास्तीति। उपपत्ति अनाचार्येण कथ्यते यद्ब्रह्मगुप्तेन स्थूल भूपरिधिमान ५००० योजनमित स्वीकृत्य चक्राशे (३६०) भूपरिधियोजनानि लभ्यन्ते तदाऽक्षाशान्तरेण किमित्यनु- पानेन यानि योजनान्यागच्छन्ति तानि न शोभनानि तेन ब्रह्मगुप्तमत न शोभनमिति, भूगोलपरिधियोजनमान तु सर्वेपा मते स्थूलमेव भवितुमर्हति तेन भूगोलपरिधिवशेन खण्डनमिद शोभन नास्तोति ॥२३॥ हि भा– भूपरिधिमान ५००० स्थूल है । इमलिये स्थावीश्वर और उज्जयिनी नगरो म अक्षाशान्तर से सिद्ध जो योजनसख्या (देशान्तर योजनसख्या) ठीक नहीं है । उपपत्ति वटेश्वराचार्य कहते हैं कि ब्रह्मगुप्त भूगोलपरिधि का मान ५००० योजन स्थूल स्वीकार कर तीन सौ साठ (३६०) मे भूपरिधि योजन तो अक्षाशान्तर म क्या इससे योजनात्मक मान (देशान्तर योजन) प्राता है सो ठीक नहीं है क्योकि भूगोल परिधिमान स्थूल है । अत: ब्रह्मगुप्त मत ठीर नहीं है । भूगोल योजनमान प्र येक प्राचाय के मत म स्थूल ही हो सकता है । इसलिये भूगोल परिधि सम्बन्ध से खण्डन करना ठीक नही मालूम पड़ता है। इदानी ब्रह्मगुप्त दूपयति भूपरिधेरज्ञानाद व्ययं देशान्तरं तदज्ञानात् । न स्फुटतिय्यन्तज्ञान तन्नाशाग्रहणयोर्नाश ॥२४॥ भूपरिधिखण्डवर्गदेशान्तरयोजन. कृत तेन । तदतीव गणितजाड्य प्रदर्शित जिष्णुतनयेन ॥२५॥ वि भा-भूपरिधे (स्पष्टभूपरिधे) अज्ञानात् (अविदिनत्वात्) देशान्तरम्- (देशान्तरक्लादिफल) व्यर्थ (निरयंवम्) तदज्ञानात ( देशान्तरकलादिफला- ज्ञानात्) स्फुटतिथ्यन्तज्ञान) न भवेत् तन्नासात् (स्पष्टतिय्यन्तानानात्) ग्रहणयो (सूर्यचन्द्रग्रहणयो) नाशो भवेदर्थाद् ग्रहणयोनि न भवेदिति ।। सप्टभूपरिज्ञानाभावाद्देशान्तरफलस्य "स्पष्टभूपरिधियोजन ग्रहगति- कला लभ्यन्ते तदा देशान्तरयोजनं विमित्यनुपातागतदेशान्तरमम्बन्धिकलात्मक- .
२८६ वटेश्वर-सिद्धान्ते फलस्य" ज्ञानमसम्भवम् । देशान्तरसम्बन्धिालात्मकफ्लाजानात्स्पप्टतिथ्यन्न ज्ञान न भवितुमर्हति । सष्टतिथ्यन्ताज्ञानाद् ग्रहणपो (सूर्यचन्द्रग्रहणयो) इतरेपा ग्रहणोपयोगिपदार्थाना ज्ञान न भवेदतो ब्रह्मगुप्तमत न युक्तमित्या- चार्य कृतखण्डन समीचीनमस्ति ॥ २४ ॥ तेन ( ब्रह्मगुप्तेन ) भूपरिधिखण्डवर्ग ( भूगोलपरिध्यर्धवा ) देशान्तर- योजनश्च पृत (देशान्तरकलाफलमानीतम्) तदतीय गणितजाड्य (अत्यन्त- गणितजडत्व) जितनयेन (ब्रह्मगुप्तेन) प्रदर्शितम् ।। उपपत्ति ब्रह्मगुप्तेनाधोलिखितयुवतया देशान्तरपलानयन कृत यथा- भूपरिधि खखखसरा रेखा स्वाक्षान्तराससङ्ग रिणता । भगणाशहता पलकृतहीना देशान्तरस्य कुति । शेषपदगुरिणतभुक्तिभूपरिधिहृता क्लादिलघमणम् । उज्जयिनी यामोत्तररेखाया प्राग्धन पश्चात् ।। उपयुक्तपद्येन देशान्तरयोजनानयनस्यासमीचीनत्वात्ततो भूपरिधि- वशेन देशान्तरकलाफलस्यासमीचीनत्वाच्च "उज्जयिनीयाम्योत्तरेखाया प्राग्धन" मित्यादिना य स्वदेशोदयकालको ग्रहो भवेत्तस्याप्यसमीचीनस्व- मेवातो ब्रह्मगुप्नमत न तथ्यम् ब्रह्मगुप्तेन स्पष्टभूपरिधिज्ञानमन्तरेव भूपरिधि- वशेन देशान्तरकलाफल साधितमिति महती त्रुटि कृता तेन, वटेश्वराचार्येण युक्ति- युक्त मेव खण्डयते इति ॥ २५ ।। हि भा-स्पष्ट भूपरिधि के अज्ञान से देशान्तर क्लादि फल निरर्थक है, देशान्तर मलादिफ्ल के निरर्थक होने स (देशान्तर क्लादिफल के अज्ञान से) स्पतिथ्यन्त ज्ञान नहीं होता है। स्पष्टतिथ्यन्त के ज्ञान न हाने से ग्रहण (मूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण) का ज्ञान नहीं हो सकता है अर्थान् दोना प्रहण नष्ट हो जायगा ॥ स्पष्ट भूपरिधि के अज्ञान स "स्पप्ट भूपरिघि योजन में ग्रहगति कला पाते हैं तो देशान्तर योजन से क्या" इस अनुपात से देशान्तर योजन सम्वन्धी कलात्मक फल का ज्ञान असम्भव है । देशान्तर क्वात्मक पल के ज्ञान न रहने से स्पप्ट तिघ्यन्त का ज्ञान नहीं हो सकता । स्पष्टतिथ्यन्त के ज्ञान न होने से और जो ग्रहणोपयोगी विषय है उनका ज्ञान नही हो सकता है । तव तो ग्रहण का शान (स्पर्शादि का ज्ञान) हो ही नहीं सकता है। इसलिये ब्रह्मगुप्त का मत ठीक नहीं है। यह प्राचायकृत खण्डन ठीक है ॥२३॥ भूपरिध्यप वग से पौर देगा तर ोजन से देशान्तर क्लात्मव फ्ल ब्रह्मगुप्त लाया गया है यह मत्य त गणित जरता उहोने दिसलायी है । उपपत्ति निम्नलिखित विनया द्वारा ब्रह्मगुप्त ने देशान्तर फ्लानयन दिया है- "भूपरिधि, पसखारा रेमा स्वाक्षान्तराा समुरिणता ।" इत्यादि । . उपरिलिखित पद्यो र देशान्तर योजनानयन के पममीचीनता के कारण उम पर से भूपरिधि योजनदश से देशान्तर क्लात्मक पर की मममीवीनता के कारण "उज्जमिनी- - से मध्यमाधिकार २८७ याम्योत्तररेसाया प्राग्धन" इससे जो स्वदेशोंदयवालिक होता है यह भी टोय नहीं होता है इसलिए ब्रह्मगुप्तमत ठीक नही है । ब्रह्ममप्त नै विना स्पष्ट भूपरिधि के भूपरिधि से देशान्तर फलानयन क्यिा है यह बडी युटि उन्होने की है। वटेश्वराचार्य का यह सण्डन बहुत ठीक है ॥२५॥ इदानो ब्रह्मगुप्तस्य सूर्यसक्रान्ति दूषयति संक्रान्तिर्धमाशो. समस्तसिद्धान्ततन्त्रवाया हिं1-- कुदिनानामज्ञानान्मन्दोबस्य स्फुटो नाकं ॥२६॥ - वि.भा-धर्माशो (सूर्यस्य) समाति (सनास्तिवाल ) समस्तसिद्धान्त- तन्यवाह्या (सम्पूर्णसिद्धान्तग्रन्थ तन्त्रग्रन्यवहिता ) कथमिति चेतदाह । मन्दोच्चस्य पुदिनाना (युगनुदिनाना) अज्ञानात् (अविदितत्वात्) स्पुटोऽर्य (स्पष्ट- सूर्य ) न भवति । अर्थाद्रविमन्दोचज्ञान रवियुगपठिनकुदिनेभ्य कृतमुचित तु युगपठिन- मन्दोच्चकुदिनेभ्यस्तज्ज्ञान, तदा रविपठितयुगबु दिनेभ्य साधित रविमन्दोच्चवदशेन यद्रविमन्दफल तदवास्तव तेन सस्कृतो मध्यमरवि स्फुटरविरप्यवावास्तव एव, एतदस्फुटरविवशेन य सक्रान्तिकाल सोप्यवास्तव एवे याचार्यकृनसण्डनम् । परमन विचारणीय वस्त्विद वर्नते सिद्धान्तादिनन्थेषु सर्वश्रव "पठिनरवि युगयुदिनवशेनैव यत्र यत्र पठितयुगपुदिनस्यावश्यक्ता भवति तत्र तत्र" वार्यारिण नियन्ते ग्रहादीना स्वस्व दिनवगेन कार्याणि न क्यिन्तेन्त पूर्वाक्तदोषो बहुपु म्थलेषु समागच्छति तहिं केवल रविसकान्तावेव कथ दोपो दीयते। यदि ब्रह्मगुप्तयित. युगस्याचार्यमतेऽसमीचीनत्वाद् युगमन्दोच्चवुदिनादीनामप्यसमीचीनत्वमतस्तत्मा- धितस्य मन्दो चस्यासमीचीनत्वात्स्फुटरविरप्यवास्तव एव'गमिष्यनि तेन तत्म- मान्तिकालोप्यवास्तव एव । अयमपि दोष सर्व व समामिप्यनि प्राचार्योक्तमिद समीचीन न प्रतिभातीति ॥२६॥ हिमा - मूर्य का समानिकार मम्पूर्ण मिद्धात और तापम म यहिभून है पयोकि रवि मन्दोच बुदिन (युगकुदिन) के मसात के कारण स्पष्ट रवि वे ज्ञान नहीं होता है । वटेश्वराचार्य पे बहने का अभिप्राय यह है कि रवि मन्दोम का ज्ञान रवि व युग पदिन युदिनों में किया गया है । लेश्नि उचित तो है कि युगपटिन मन्दोघ युदिन पर में उमा जान दिया जाय, परतु सो नही दिया जाता है। तर तो रविपठिन युग मुदित र साधित रवि मन्दोपा जो रवि मन्दपन होगा वह पवास्तव होता, उमा मध्यम रवि में मसार परन से जो स्पष्ट र होते हैं वह भी मयास्तव हात ई यही मानाय गान का परन्तु यहा विचारसीप विषय यह है रि गिदानादि ग्रन्या म जहा जहा पनि युग युदिन सो पारश्वरना हुई है वहा पहा पदिन रवि युग मुदिन ही में मर पाप नियन्ये हैं। ग- लिए पूर्व पिन दोष पहन बगहा म सा माना है तब पर रमितानि ही म यो दाप होते हैं। यदि मोत समान मावा रे मा म प्रमोबीन जहा है ना मोय युग बुदिशादिये टीर होन पे पारण उस पर गे गायिन मन्दोय गो पामीननगरे कारण
२८८
वटेश्वर-सिद्धान्ते
स्पष्ट रवि ठीक नहीं होते हैं इसलिए रविसवानि काल मी टोक नहीं है । यह दोष भी
बहुत जगहों में होगा इसलिए प्राचार्य का कथन टीक नही मालूम होता है 1|२६||
पुनः गुप्तमत सण्डयति
कल्पितभगरणेषु चरः कल्पितकुदिन: प्रकल्पितंच युगः ।
परिघोनामजानाद् दृष्पिविरोधात्फुटा नातः ॥२७॥
वि. भा.कल्पितभगण (अशुद्धभगण) कल्पित दिन (अशुद्धकुदिन:)
प्रकल्पितैश्च युगः (अशुद्धयुगमान ) धुचराः (ग्रहा.) अतोस्मात् कारणास्फुटा न
परिधीनां (स्पष्टभूपरिध्यादीना ) अज्ञानात् (अविदितत्वात् ) दृष्टिविरोधात्
(दर्शनायोगत्वात्) । अत्र स्पष्टभूपरिधिज्ञान ब्रह्मगुप्तेन कृतमेव नहि । मध्यम-
भूपरिधिरपि ५००० योजनमित स्थूल एव गृहीतो वास्तवमध्यमभूपरिधिरप्यविदित
एवात. (परिधीनाम्) कथ्यते । यद्येतद् (वटेश्वर) मते ब्रह्मगुप्तोक्त युगमानमवास्तवं
तदा युगकुदिन, युगभगणमानप्यवास्तवमेवातस्तत्साधितग्रहा अप्यवास्तवा एव, परं
ब्रह्मगुप्तकथित, युगमानमवास्तवमिति वटेश्वरेणेव क्श्यते नान्यरिति ॥२७॥
हि भा.-बल्पित भगणो (अशुद्ध भगरपो) से कल्पित कुदिनो (माद्ध कुदिनो) से
प्रल्पित युगों (अशुद्ध युगो) से साधित ग्रह स्पष्ट नहीं होते हैं। क्योकि परिघि (स्पष्ट
भूपरिधि मध्यम परिधि) के अज्ञान के कारण और प्रत्यक्ष से विरोध होने के कारण स्पष्ट
प्रह नहीं होते ।।२७॥
स्पष्ट भूपरिधि का ज्ञान ब्रह्मगुप्त ने किया ही नहीं, मध्यम भूपरिघि भी ५००० योजन
स्थूल ही ग्रहण की है इसलिए वास्तव मध्यम भूपरिघि भी अविदित ही है। यदि घटे-
श्वराचार्य के मत में ब्रह्मगुप्तोक्त युगमान अवास्तव है तव युग कुदिन, युग ग्रह भगण
मान भी अवास्तव होगा इसलिए उन पर से साधित ग्रह भी अवास्तविक होंगे ।
लेक्नि ब्रह्मगुप्तोक्त युगमान प्रवास्तविक है यह वात घटेश्वराचार्य ही रहते हैं, अन्य
प्राचार्य नहीं कह्ते ॥२७॥
इदानी ब्रह्मगुप्तोक्त-भूच्यामाघ खण्डपति
त्यक्ते भूच्यासाधे सहस्रप्रसमिते गणितसौदम्यात् ।
कर्तव्यं व्यासार्घ खनवमुनिरतस्त्वतिगणितजाडयमिदम् ॥२८॥
विमा-गरिगतसौक्ष्म्यात् (गणितमूक्ष्मवात् ) सहस्रप्रसमिते (१०००
तुल्ये) भूव्यासाईं (भूव्यासखण्डे) त्यक्ते खनवमुनिः (७६०) व्यासाचं कर्तव्य-
मर्थात् १००० एतत्तुल्ये भूव्यासाधस्वीकरणे गणितमूक्ष्मत्व विहाय किं ७६०
मामाघम्बीकरणमेव त्वत्कर्तव्य भवेत् । अतोऽस्मात्कारणान् इदं (७६० एतत्तुल्य-
भूव्यासाचं स्वीकरणम् । अतिगणितजाडघम् (अतिशयगणितजड़त्व) अस्तीति,
१००० एतत्तुल्यमेव भूव्यासार्धस्वीकरण गणितमूक्ष्मत्वदृष्टितो ग्रहणमुचितमासीत् ।
तदपहाय ७६०
ल्यं यत्स्वीकृत तद् भवद्गणितजाडयमस्तीति ॥२८॥
मध्यमाधिकार २८६ हि. मा-एक हजार तुल्य भूव्यासार्धमान त्याग करने से गणितमूक्ष्मता के कारण ७६० एतत्तुल्य भूव्यासार्थ स्वीकार करना ही प्रापका क्तव्य है यह तो अत्यन्त गणित- जहता है। अर्थात् १००० इतना भूव्यासाचं गणितसूक्ष्मता को ख्याल से लेना चाहता था, उसको छोड कर ७६० इतना भूव्यासाचं जो स्वीकार किया है यह तो पापको गणित- जहता है ॥२८॥ इदानी ब्रह्मगुप्तोक्तज्यानयनखण्डनमाह जिनजीवासंग्रह स्याद्रसाङ्कभागो भमण्डलस्य समः। यदभिहितवान् न तच्छरस्तत्र तत्स्फुटं मुनिसमस्तस्य ।। २६ ॥ भमण्डलसमभागं परपुरुषवदाख्यात तत्र । याति यत समन्दो द्वितयं विबुध कथ भवति ॥ ३० ॥ नातोऽस्ति ज्यानियम शरसोक्षम्यादन्तिवर्तनं युक्तम् । सप्तकशरे निवृत्तिजिष्णुसुतस्यैव युक्ततमा ॥ ३१ ॥ वि भा-भमण्डलस्य (क्रान्तिवृत्तस्य) रसाङ्कभाग (९६ अश) जिन- जीवासग्रह (अर्थात् चकलाया पण्णवतिभाग २२५ प्रथमचापमेतत्तुल्यचतु- विशतिप्रमितचापाना तत्सख्यकज्याना सग्रह स्यात्) यदभिहितवान् (कथित- वान्) तत्र तच्छर (तेपा चापानामुत्क्रमज्यासग्रहो न स्यात्) तत् मुनिसमस्तस्य (मुनिकदम्बकस्य) स्फुट मतमस्त्यर्थादुत्क्रमज्यासग्रहोऽपि कार्य । तन (तस्मिन् स्थले) भमण्डलसमभाग (कान्तिवृत्तसमानखण्ड) परपुरषरत् प्राख्यात (कथितम्) यतो समन्द (मन्दबुद्धियुक्त ) द्वितय (मार्गद्वय) यात्यर्थादकर भमण्डलस्य ६६ एतत्प्रमिता समाना कथिता द्वितीयस्थले भमण्डलस्य समविभागा एव कथिता इति भिन्ना भिन्नामुक्ति विलोक्याल्पज्ञ सन्देहमुपयाति, विवुध (पण्डित ) कय द्वितय (मार्गद्वयाश्रयण) भवति, अर्थात्पण्डितस्त्वेकमेव मार्गावलम्बी भवति । अतो ज्यानियमो न शरसौक्ष्म्यात् (उत्तमज्यासूक्ष्मत्वात्) तदन्तिवर्त न (ज्याव्यवहार- कार्य) युक्तम् (तथ्यम्) सप्तकशरे (प्रथमचापत सप्तमचापपर्यन्तमुत्तम ज्याया) निवृत्तिजिष्णुसुतस्यैव (ब्रह्मगुप्तस्यैव) युक्ततमेति ।। उपपत्ति ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते यत्र चतुविशज्याखण्डानि पठितानि तमोत्तमज्या- खण्डान्यपि पठितानि सन्ति, तत्र ये दोपा सर्वेपामाचार्याणा ग्रन्ये सन्ति तेऽवापि वतन्ते, वटेश्वरेण भिन्ना भिना कल्पना मनसि कृत्वा निरर्थकमेव ब्रह्मगुप्तमत खण्ड यते । ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तदर्शनेनंतत्कथनमेकरि न मिलति । नाऽतोऽस्ति ज्यानियम इत्यादि यत्कथ्यते तदन्येपामप्याचार्याणा जीवाविपये भवितुमर्हति । मन्मते तु निरर्थक मेव खण्ड्यतेऽनेन । न किमपि ब्रह्मगुप्तकथितादन्येषु कयनेषु वलक्षण्यमिति ।। २६-३१॥ हि भा~मान्तिवृत्त के छियानवे भाग करने से प्रति भचकाला को ६६ में भाग देने से जो लब्धि होती है वह प्रथम चाप है । ऐसे ऐमे चौवीस चापों की ज्यामो के साहको ब्रह्म.
वटेश्वर-सिद्धान्ते
२८८
स्पष्ट रवि टोक नहीं होते हैं इसलिए रविसमानि काल भी ठीक नहीं है । यह दोप भी
बहुत जगहों में होगा इसलिए प्राचार्य का कथन ठीक महो मालूम होता है ॥२६॥
पुनर्बह्मगुप्तमत खण्डयति
कल्पितभगणंद्युचरः कल्पितकुदिनै प्रकल्पितेश्च युगः ।
परिधीनामज्ञानाद् दृष्टिविरोधारफुटा नातः ॥२७॥
वि मा - कल्पितभगण (अशुद्ध भगणं) कल्पित दिन (अशुद्धकुदिन )
प्रकल्पितश्च युगं (अशुद्धयुगमान ) द्युचरा (ग्रहा ) अतोस्मात् कारणास्फुटा न
परिधीना ( स्पष्टभूपरिप्यादीना) अज्ञानात् (अविदितत्वात् ) दृष्टिविरोधात्
(दर्शनायोगत्वात्) । अत्र स्पष्टभूपरिधिज्ञान ब्रह्मगुप्तेन कृतमेव नहि । मध्यम-
भूपरिधिरपि ५००० योजनमित स्थूल एवं गृहीतो वास्तवमध्यमभूपरिधिरप्पविदित
एवात (परिधीनाम्) क्थ्यते । यद्येतद् (वटेश्वर) मते ब्रह्मगुप्तोक्त युगमानमवास्तव
तदा युगकुदिन, युगभगणमानप्यवास्तवमेवातस्तत्साधितग्रहा अप्यवास्तवा एव, पर
ब्रह्मगुप्तकथित, युगमानमवास्तवमिति वटेश्वरेणव कथ्यते नान्यरिति ॥२७॥
हिमा -कल्पित भगणो (अशुद्ध मरणो) से पल्पित बुदिनो (प्रशुद्ध कुदिनी) से
प्रबल्पित युगो (मगुट युगो) से साधित ग्रह स्पष्ट नहीं होते हैं। क्योकि परिघि (स्पष्ट
भूपरिधि मध्यम परिधि) के प्रज्ञान के कारण और प्रत्यक्ष से विरोध होने के कारण स्पष्ट
ग्रह नही होते ॥२७॥
स्पर भूपरिधि का ज्ञान ब्रह्मगुप्त ने दिया ही नहीं, मध्यम भूपरिधि भी ५००० योजन
स्मूल ही ग्रहण को है इसलिए वास्तव मध्यम भूपरिपि भी अविदित ही है। यदि वटे-.
श्वराचार्य के मत में ब्रह्मगुप्तोक्त युगमान प्रवास्तव है तब युग कुदिन, युग ग्रह भगण
मान भी प्रवास्तव होगा इमलिए उन पर से साधित ग्रह भी भवास्तविक होंगे ।
लेकिन ब्रह्मगुप्तोक्त युगमान प्रवास्तविक है यह वात वटेदवराचार्य ही कहते हैं, मन्य
भाचार्य नहीं रहते ॥२७॥
इदानी ब्रह्मगुप्तोक्त-भूव्यायाधं सहयति
त्यक्त भूयासाईं सहस्रप्रसमिते गणितसौपम्यात् ।
कर्तव्य प्यासा खनवमुनिरतस्त्वतिगणितजाड्यमिदम् ॥२८॥
विमा-गरिगतसौम्यात् ( गणितमूक्ष्म वात् ) सहस्रप्रसमिते (१०००
तुल्ये) भूव्यासा (भूव्यासखण्डे) त्यक्ते सनवमुनि (७०) व्यासाचं कर्नया
मर्थात् १००० एतत्तुल्ये भूध्यामाधम्वीकरणे गणितमूदमत्व विहाय कि ७६०
ग्यासाघम्वीकरणमेव त्वत्वत्तव्य भवेत् । अतोऽम्मावारणान् इद (७६० एतत्तत्य-
भूव्यासार्घ स्वीवरणम् । प्रतिगणितजाडघम् (अतिशयगणितजइत्व) प्रस्तीनि,
१००० एतत्तुल्यमेव भूव्यामाईस्वीकरण गणितसूक्ष्मत्वदृष्टितो ग्रहणमुचितमासीत्।
तदपहाय ७६० एतत्तत्य यत्स्वीकृत तद् भवद्गणितजाइयमस्तीति ॥२८॥
मध्यमाधिकार २८६ हि भा-एक हजार तुल्य भूभ्यासार्धमान त्याग करने से गणितसूक्ष्मता के कारण ७६० एतत्तुल्य भूव्यासाध स्वीकार करना ही आपका वर्तव्य है यह तो अत्यन्त गणित- जडता है। अर्थात् १००० इतना भूव्यासार्ध गणितसूक्ष्मता को ख्याल से लेना चाहता था, उसको छोड कर ७६० इतना भूव्यासाधं जो स्वीकार किया है यह तो आपकी गणित- जडता है ॥२८॥ इदानी ब्रह्मगुप्तोक्तज्यानयनखण्डनमाह जिनजीवासग्रह स्याद्रसाडभागो भमण्डलस्य समः । यदभिहितवान् न तच्छरस्तत्र तत्स्फुटं मुनिसमस्तस्य ।। २६ ।। भमण्डलसमभागं परपुरुषवदाख्यात तत्र । याति यत. समन्दो द्वितय विबुध कथ भवति ॥ ३० ॥ नातोऽस्ति ज्यानियम शरसौम्यादन्तिवर्तनं युक्तम् । सप्तकशरे निवृत्तिजिष्णुसुतस्यैव युक्ततमा ॥ ३१ ॥ विभा-भमण्डलम्य (क्रान्तिवृत्तस्य) रसावभाग (६६ अश) जिन- जीवासग्रह (अर्थात् चक्रकलाया पण्णवतिभाग २२५ प्रथमचापमेतत्तुल्यचतु- विशतिप्रमितचापाना तत्सख्यकज्याना सग्रह स्यात्) यदभिहितवान् (कथित- वान्) तन तच्छर (तेपा चापानामुत्क्रमज्यासग्रहो न स्यात् तत् मुनिसमस्तस्य (मुनिकदम्बकस्य) स्फुट मतमस्त्यर्थादुत्क्रमज्यासग्रहोऽपि कार्य । तत्र (तस्मिन् स्थले) भमण्डलसमभाग (क्रान्तिवृत्तसमानखण्ड) परपुस्पात् पाख्यात (कथितम्) यतो समन्द (मन्दबुद्धियुक्त ) द्वितय (मागद्वय) यात्यर्थादेकन भमण्डलस्य ६६ एतत्प्रमिता समाना कथिता द्वितीयस्थले भमण्डलस्य समविभागा एव कथिता इति भिन्ना भिन्नामुक्ति विलोक्याल्पज्ञ सन्देहमुपयाति, विबुध (पण्डित ) कय द्वितय (मार्गद्वयाश्रयण) भवति, अर्थात्पण्डितस्त्वेकमेव मार्गावलम्बी भवति । अतो ज्यानियमो न शरसौक्ष्म्यात् (उत्क्रमज्यासूक्ष्मत्वात्) तदन्तिवतं न (ज्याव्यवहार- कार्य) युक्तम् (तथ्यम्) सप्तकशरे (प्रथमचापत सप्तमचापपर्यन्तमुत्क्रम- ज्याया) निवृत्तिजिप्णुसुतस्यैव (ब्रह्मगुप्तस्यैव) युक्ततमेति ।। उपपत्ति ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते यर चतुर्विराज्याखण्डानि पठितानि तत्रोकमज्या- खण्डान्यपि पठितानि सन्ति, तत्र ये दोपा सर्वेपामाचार्याणा ग्रन्थे सन्ति तेऽनापि वर्तन्ते, वटेश्वरेण भिना भिन्ना कल्पना मनसि कृत्वा निरर्थकामेव ब्रह्मगुप्तमत खण्ड यते । ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तदर्शने तत्कथनमेकमपि न मिलति । नाऽतोऽस्ति ज्यानियम इत्यादि यत्कथ्यते तदन्येषामप्याचार्याणा जोवाविपये भवितुमर्हति । मन्मते तु निरर्थकमेव खण्डयतेऽनेन । न किमपि ब्रह्मगुप्तकथितादन्येषु कथनेषु वलक्षण्यमिति ।। २९-३१ ।। हि भा-मातिवृत्त के छियानवे भाग करने से अर्थात् भचक्राला को ६६ से भाग देने से जो लब्धि होती है वह प्रथम चाप है । ऐसे ऐसे चौवीस चापो की ज्याप्रा के संग्रह को ब्रह्म
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२६०
वटेश्वर-सिद्धान्ते
गुप्त ने जो कहा है वहां शर (उन चापो को उत्क्रनन्यायें) नहीं कहा है 1वहा उत्क्रममा भी
कहनी चाहिये ये बातें हर एक मुनि के विचार सम्मत है। वहां पर वातिवृत्त के ममभाग पर
पुरुष की तरह जो कहा गया है उमम मन्दबुद्धि लाग दो तरह के मार्ग म जाते हैं याने एक
जगह कान्तिवृत्त के ६६ मे भाग देवर जो होता है उसी को प्रथम चाप रहते हैं ऐसे ऐसे
चौबीस चापो की ज्याम्रो के सग्रह कहे गये हैं ! दूसरी जगह देवल क्रान्तिवृत्त के समभाग कहे
गये हैं इन दोनो के देखने से दो तरह की कल्पना मन म माती है । परतु पण्डित तो वैमे
नही कर मरते, व क्यो मे करेंगे । इमलिये ब्रह्मगुप्त के मिद्धान्त म ज्यानो के लिये कोई
नियम नहीं है । उत्तमज्यानो की सूक्ष्मता से ज्यामी का व्यवहार हो सकता है । प्रथम चाप
से सप्तम चाप म निवृत्ति ब्रह्मगुप्त ही के लिये ठीक हो सकती है ।। २६३१ ।।
उपपत्ति
ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त म भचक्रकला २१६०० छियानवे से भाग देने से २२५ लब्धि
आती है यही प्रथम चाप है । वृत्तपरिधि के चतुर्याश=६० अदा है । इसकी वला ५४०० है
इसम २२५ से भाग देने से २४ प्राता है अर्थात् नवत्यश कला म २२५ क्ला तुल्य चौवीस
चाप होगे अर्थात् प्रथम चाप=२२५, द्वितीय चाप =२२५४२, तृतीय चाप = २२५४३
इत्यादि इन पापो की ज्याखण्डायें और उत्तमज्यालण्डायें ब्रह्मगुप्त ने लिखी हैं । वटेश्वराचार्य
कहते हैं कि वहा न उत्तमज्या खण्डा और न उत्क्रमज्या बी सूक्ष्मना वही गई है । पर ब्राह्मस्फुट
सिद्धान्त म जहा पर ज्याखण्ड पठित है वही उत्क्रम खण्ड भी पठिन है । और सिद्धान्तो
मे जिम तरह ज्याखण्डानो के साथ उत्क्रमज्या खण्डायें रहती हैं इसम भी उसी तरह हैं।
उत्क्रम खण्ड की जरूरत जहा होगी वहा इन खण्डालो से काम लिय जाते हैं । उनको सूक्ष्मता
की जरूरत वहा नहीं है वटेश्वराचाय अपने मन म नयी नयी बातें क्ल्पना वर ब्रह्मगुप्त
नाम पर खण्डन करते हैं । ब्राह्मस्फु-सिद्धान्त देखने स इनकी वही हुई एव भी दात नही
मिलती। जिन बातो को ब्रह्मगुप्त ने नहीं कहा है उन बातो को भी, उनके नाम से कह कर
अर्थात् यह ब्रह्मगुप्तायिन है, खण्डन करते हैं । ब्रह्मगुप्त के विषय म जो वार्ते कहते हैं वे
मन्य प्राचार्यों के विषय म भी लागू हो सकती है, किन्तु दूमरो के नाम से खण्डन नहीं करते
है । हमारे मत म वटेश्वर के खण्डन निरथक हैं ॥ २६३१ ।।
इदानी ब्रह्मगुप्तमतं सण्डयति
लम्वाक्षज्यानयने तो नतज्या प्रकारवचन यत् ।
प्रोवाच क्षेत्रफल जिनजीवासङ्गत तदसत् ॥३२॥
पूर्वाचार्यस्पष्टीकरण मदृष्ट यतस्तेन ।
न भवति दृग्गणितवय गणितसम गोलय ह्यस्य ॥ ३३ ॥
विमा-लम्वाक्षज्यानयने (लम्बग्याक्षज्ययो साधने) अतोऽग्रे नतज्या-
प्रकारवचन यत् तथा जिनजीवामङ्गत (चतुर्विशज्ज्यामम्बद्ध) क्षेत्रफल यत्प्रो-
वाच (कथितवान्) तदमत् (तच्छोभन न) तथा यत (यम्मात्कारणात्) तेन
(ब्रह्मगुप्तेन) पूर्वाचार्यस्ष्टीकरण (प्राचीनाचार्यकृतग्रहादिस्पष्टीकरण) मदृष्ट
(न दृष्टम्) तस्माद् गोलबाह्यम्य (गोलवद्भूितस्य गोलानभिज्ञस्य वा) गरिपत-
सर (गणितागतग्रतुल्य ) हगणितक्य न भवतीति ॥३२ ३३॥
मध्यमाधिकार २६१ उपपत्तिः ब्रह्मगुप्तकृत ब्रह्मस्फुटसिद्धान्ते लम्वाक्षज्ययो साधनावसरे नहि कस्या अपि नतज्यायास्तत्साधनस्य वा चर्चाऽस्ति तथा च चतुर्विशतिमस्यज्यासम्बन्धेनापि तत्र पुस्तके क्षेत्रफलसाधन नास्ति ब्रह्मगुप्तकृत स्पष्टीकरणे प्राचीनोक्तस्पटी- करणापेक्षया का श्रुटि विलोक्य वटेश्वरेण कथ्यते यत्पूर्वाचार्योक्तस्पष्टीकरण ब्रह्म- गुप्तेन नहि दृष्ट तेन तत्कृतग्रहादिगणितेन दृग्गणितैक्य न भवति । ब्रह्मगुप्तेनापि स्वत प्राचीनस्पाऽऽयभटस्प बहुषु स्थलेषु खण्डन कृत्वा कथ्यते यदेतस्य दोपस्य पारावारो नास्ति तहि ब्रह्मगुप्तेन स्वत कस्य पूर्वाचार्यस्य स्पष्टीकरण नावलोकितम् । यद्यपि ब्रह्मगुप्तेन बहुन स्थले अर्थमेवाऽऽर्यभटमतस्य खण्डन कृत तथैव वटेश्वरे- गापि व्यर्थमेव दुराग्रहवशतो ब्रह्मगुप्तमत खण्ड्यते । येपा विषयाणा ब्रह्मस्फुट- सिद्धान्ते चर्चाऽपि नास्ति तानपि विषयान् तदुवतान् (ब्रह्मगुप्तकथितान्) कथयित्वा खण्ड्यते । उपयुक्तश्लोकयोर्येपा विषयाणा खण्डन वटेश्वरेण क्रियते तेप्वेकोऽपि विषयो ब्रह्मस्फुटसिद्धान्ते नास्ति ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तावलोक्नेन सर्व स्फुट भवतीति ।। ३२-३३ ॥ हि भा -लम्बज्या और अक्षज्या के साधन म आगे नतज्या प्रकार वचन जो है तथा चौबीस सख्यक जीवा के सम्बन्ध में क्षेत्रफल जो कहा गया है सो असत् है । जिस धारण से ब्रह्मगुप्तने पूर्वाचार्यों के स्पष्टीकरण को नहीं देखा है अत उनके गणित से दृग्गरिए- तैक्य नही होता है याने वेधागत ग्रहादियो म और ब्रह्मगुप्त गणित द्वारा ग्रहादियो म समता नहीं होती है प्रत ब्रह्मगुप्तकृत गणित ठोप नही है । ब्रह्मगुप्त मत के खण्डन वटेश्वराचार्य करते हैं ।। ३२-३३ ।। उपपति ब्रह्मगुप्तकृत बाह्मस्फुटसिद्धान्त म लम्बज्या और अक्षज्या के माधन स्थल म नतज्या या उसके साधन की चर्चा नहीं की गई है । और चौवीस मख्या ज्यासम्बन्ध से भी क्षेत्रफल उस पुस्तक में नहीं है । ब्रह्मगुप्त वृत ग्रहादि स्पष्टीकरण म प्राचीनोक्त स्पष्टीकरण की अपेक्षाया क्या त्रुटि को देखकर वटेश्वराचार्य कहते हैं कि ब्रह्मगुप्त न पूर्वाचार्यों के सप्टोर रण को नहीं देता, इसनिये ब्रह्मगुप्त गरिएत द्वारा जो ग्रहादि पाते हैं उनम हव तुल्यता नहीं होती है याने वेधागत ग्रहादियो के साथ ब्रह्मगुप्तत गणित से पाए हुये ग्रहादियों की समता नही होती है । ब्रह्मगुप्त भी मपने से प्राचीन प्रायभट मत के सण्डन मे कहते हैं कि भार्यभट के दोपो का पारावार नहीं है । तब ब्रह्मगुप्त न दिन पूर्वाचार्यों के स्पष्टीकरए को नहीं देना यद्यपि जिस तरह बहुत स्वलो में ब्रह्मगुप्त ने व्ययं माभट मत रा सण्डन दिया है उसी तरह यटे- वर ने भी निरपर यहुत स्थलोम ब्रह्मगुप्त मत वा सण्डन किया है। ग्राह्यस्पुरमिक्षान्त म जिन विषयों का उल्लेस नहीं है उन विषयों को ब्रह्मगुप्नोति यह पर पण्डन परते हैं। उप- {त लोगो में जिन विषयो को लेकर बटेश्वराचार्य सण्टन ररते हैं उनम मे एक भी विषय ग्राह्यस्पुटगिद्धान्त म प्रतिपादित नहीं है । ब्राह्मसिदान्न देखने मे राष्ट है ।। ३२-३३ ।।
२६२
वटेश्वर सिद्धान्ते
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इदानी ब्रह्मगुप्तोक्वभौमगीघ्रपरिधिमागस्फुटीकरराखण्डनमाह ।
यदि मन्ये सस्कारश्चलपरिघौ भूसुतस्य किं न तया।
चन्द्रसितादे स्मादागमभासात् स्फुटा नात ॥३४॥
वि मा.- यदि भूसुतस्य (बुजस्य) चलपरिधी (गीघ्रपरिघो) सस्कार
इत्यह मन्ये तदा तथा (तादृश सस्कार ) कस्मादागमभासात् (कस्मात्कल्पिता-
दागमात्) चन्द्रसितादे कि नार्थायादृशेनागमेन कुजचयपरिधी ब्रह्मगुप्तेन
सस्कारोऽभिहितस्तादृशेनैवागमेन चन्द्रशुक्रादिग्रहचलपरिधो कथ न सस्कारोऽभि-
हितोऽतस्तद्वशेन साधिता स्फूटा गति स्फुटा नेति ॥३४॥
उपपत्ति
कुजस्य शीघ्रकेन्द्र यस्मिन् पदे स्यात्तत्र गगम्ययोर्येऽल्पा भागास्तेपा
ज्या कार्या सा विभागोने सप्तभिरगर्मुरिणता पञ्चवेदभागज्याया भक्ता लब्धारी-
मुंगकर्यादिगीघ्र केन्द्र कुजमन्दोच प्रमेणाधिको हीनश्च कार्यस्तदा स्पष्टीकरणोप-
योगि झुजमन्दोच्च स्फुट भवति । भौमस्य मन्दपरिधिभागा =७० । भ्यशोना
वेदजिना २४३°१४० भागा मन्दोच्चमस्कारार्थ ये पूर्वमाप्ता मागास्तै सर्वदा ऊना-
स्तदा भोमस्य स्फुट शीघ्रपरिधि स्यात् ततोऽधोलिखितक्रमेण तत् स्फुटीकरण
भनति । गणितागते मध्यमभौमे प्रथम मन्दफ्लार्थ ययागत धन वा ऋण देयम्।ततोऽर्ध-
मन्दफलसस्कृतमध्यमभौमेमन्दफनसस्कृतान्मध्यमभौमाद्यच्योघ्रफल तदधं
यथागत धनमृग वा दयम् । पुनरर्धफ्लद्वयसस्कतान्मध्याद्यन्मन्दफल तत्सस्कृता
ग्मध्याद् यच्छोघ्रपन च ते सम्पूर्णे गणितागते भौमे देये यथा दुघगुरुरानीना
कृतेऽसत्कर्मकरण भवति तथाऽत्रापि कार्य मेव भौम स्पष्टो भवति । तत स्फुटा
गतिश्च ग्रहदरसाध्येति ।
ग्रन्थकारेण कथ्यते यद्यादृश सम्कार कुजचलपरिघौ ब्रह्मगुप्तेन कृतस्ता.
दश एव सस्कारेऽन्येपा दुधादीना चलपरिधो कय न कृतस्तत्र काऽपि तादृशी युक्तिर्न
मिलति येन तदुक्ति स्वीकार्या, केवल ब्रह्मगुप्तेन कथ्यते यदागमप्रामाण्यादेव
कियते । यागमागमप्रामाण्य कुजस्य कृते ताहन बुधादीना कथ न मिलस्यतस्तत्क
ल्पितम गमप्रमाररास्यासमीचीनत्वाद्ब्रह्मगुप्तस्फुटीकृतचलपरिधिवशत साधिता
स्पगति. स्फुर. नेत्यतम्तन्मत. न. ममीचीनम् । वस्तुतो. बह्मगुरुपयन समन्येत
वटेश्वराचायकथन वेति कथनमतीव दुर्घट, यत्र युक्तिर्न मिलति तय त्वागम-
मेवाऽऽश्रयणीय भवति । तदागमप्रमाण मान्यामान्य वेति विवेचका स्वयमेव
विचारयन्त्विति ॥ चन्द्रसितादेरिति पाठोऽसमीचीन प्रतिभाति चन्द्रस्य शीघ्र-
परिधेरभावादिति ॥३४॥
हि भा~यदि मगन की शीघ्र परिघि म मस्कार को मानते हैं तो किस कल्पित
मागम प्रमाण सवड, शुक्र मादि ग्रहा की चल परिधि म उस तरह का मस्सार नहीं दिया
गया। मन उस पर से माधित ग्रह वो सष्ट गति टोक नही है ॥३॥
मध्यमाधिकार उपपत्ति मगल के शीघ्र केन्द्र जिस पद में हैं वहा गत और गम्य म जो भाग अल्प है उसकी ज्या करनी चाहिये उसको ६४०' इसको ज्या से गुण कर ४० पैतालीस प्रश के ज्या से भाग देना, जो भागफल अशात्मक हो उसे मृगादि और अर्कादि केन्द्र में शीघ्र केन्द्र रहने पर कुज मन्दोच मे युत और हीन करना तव स्पष्टीकरणोपयुक्त कुज मदोच स्फुट होता है। मगल के मन्दपरिघ्यश-७०, श्यशोन २४४° अश अर्थात् २४३१४५' अश मन्दोच्च सस्कार के वास्ते जो पहले प्राप्त अा है उस करके हीन करने से मगल की स्फुट शीघ्र परिधि होती है इस पर से मगल का स्पष्टीकरण इस तरह होता है । गणितागत मध्यम मगल म यथामत धन या ऋण मन्द फल के प्राधा सस्कार करना तब अर्ध मन्द फल सस्कृत मध्यम मगल पर मे जो शीघ्र फल हो उसके प्राधे को यथागत धन या ऋण को अर्थ मन्द फल सस्कृत मध्यम मगल मे सस्कार करना । फिर अधं फलद्वय सस्कृत मध्यम से जो मन्द फल साधिक हो तत्सस्कृत मध्यम पर से जो शीघ्र फल हो वे दोनो फल (मन्दफल और शीघ्रफल) सम्पूर्ण गणितागत मध्यम मगल में देना । उसके बाद बुध, गुरु, शनि की तरह असकृत्कर्म करने से स्पष्ट माल होते हैं। स्पष्टगति ग्रहवत् साधन करना । अर्थात् दिनान्तर स्पष्ट खगान्तर ही उस समय के अन्तर मे स्पष्टगति होती है । ग्रन्धकार कहते हैं कि मगल को शीघ्र परिघि म ब्रह्मगुप्त ने जैसा सकार किया है वैसा ही अन्य ग्रहो (बुधादि) की शीघ्र परिधि में क्यों नही किया गया । ब्रह्मगुप्त का कहना है कि आगम प्रमाण से इस तरह के संस्कार करते हैं। जिस तरह के प्रागम प्रमाण मगल के लिए है उसी तरह के वुवादिग्रहो के लिए क्यो नहीं है इसलिये ब्रह्मगुप्त- स्वीकृत कल्पित आगम प्रमाण के असमीचीनल मे ब्रह्मगुप्तक्थन ठीक नही है । वस्तुत' ब्रह्मगुप्तकथन ठीर है या वटेश्वराचार्य कथन, यह कहना बहुत कठिन है । जहा युक्ति नही मिलती है वहा मागम प्रमाण ही का प्राश्रयण करना होना है। भागमप्रमारए मान्य है या नहीं इस विषय को विवेचक लोग स्वप विचार करें। 'चन्द्रसितादे यह पाठ ठीक नहीं मालूम होता है क्योरि चन्द्रमा को भी परिधि नही होती है ॥३४॥ इदानी ब्रह्मगुप्तोक्न वृत्त छायाम्रमण खण्डयति । दृड मात्रमेव कथिता छायासिद्धिहि मन्दान्वितौघधिया। प्रजाज्वरप्रचलित छायात्रितयाद्धि यभ्रमणम् ॥३५॥ प्रस्तावेधादन्यज्जियोस्तनयस्य भाभ्रमणम् । वलये तद्धिनशोभनमिति नहि तुच्छबुद्धिमिष्टम् ॥३६॥ जिष्णुसुतैर्नान्यत्र तुसोतो जानाति तभ्रमणम् । प्रस्तावेधादन्यानजिप्रमोस्तनपस्प भाविनी भापि ॥३७॥ विभा-मन्दान्वितौघधिया (मन्दयुक्तपितवुद्ध्या) दृड्मात्रमेव छाया सिद्धि कथिता । प्रजाज्वरप्रचलित ( बुद्धिप्रयुक्तज्वरचलित ) छायात्रितयाद भ्रमण यत् ( कालत्रयजनितच्चायाप्रयाणभ्रमण यत् ) ताभ्रमणमर्यातत् छायाप्रयाण पत्र भ्रमति तदेव भाभ्रमरणम् । जियोस्तनयस्य (ब्रह्मगुप्तस्य) वटेश्वर-सिद्धान्ते अस्तावेचात् (मेरो ) अन्यद्वलये (वृत्ते) तत् (छायाभ्रमण) शोभन न (समीचीन नास्ति) इति तुच्छबुद्धिभि (अल्पबुद्धिभिब्रह्मगुप्त )न हप्टम् । अतोज्यत्र (मेरोभि- न्नस्थले) स (ब्रह्मगुप्त) तभ्रमण (छायाभ्रमण) न जानाति, जिप्पोस्तनयस्य (ब्रह्मगुप्तस्य) भाविनी भापि (धागामिनी छायापि) प्रस्तावेधात् (मेरो) अन्येति ।। ३५-०३७ ॥ अनोपपत्ति ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते ब्रह्मगुप्तेन वृत्ताकारभाभ्रमरेखासम्बन्धेन दिज्ञान कृतमस्ति यथा। त्रिच्छायाग्रजमत्स्यद्वयमध्मगसूत्रयोयु नित्रर्य । सोत्तरगोले याम्या शङ्क तलाइक्षिणे सौम्या । छायाग्रभ्रमरेखा सूचयुतेवृत्तपरिधिरग्रस्पृक् । मध्यच्छायाऽन्तरमुदगितरदा शङ्कम मण्डलयो ॥ इप्टदिने दिग्मध्यस्थशझोरछायावय ज्ञात्वा तदप्रेमत्स्यद्वय मुलाद्य तन्मुख- पुच्छमध्यगरेखयोर्यत्र युतिस्ततो यो वृत्तपरिधि सोऽनस्पृक् भवति । अत परिधि- रेखेव छायाग्रभ्रमरेखा भाभ्रमरेखा भवति । वटेश्वराचार्येणापि वृत्त एवच्छायाभ्रमण स्वीक्रियते तहि ब्रह्मगुप्तोत्तस्य खण्डन स्वोक्तस्यापि खण्डन भवेदिति सण्डनेनालम् । वस्तुतरछायाभ्रमणमार्ग कुन कुन कोश इति प्रदश्यते । रविकेन्द्राच्छङ्क वनगता रेखा पृष्ठक्षितिजधरातले यत्र लगति तत शङ्क: मूल यावत् छाया । एकस्मिन् दिने रविक्रान्तियदि स्थिरा करप्यतेऽर्थादेकमेवाहोरात्र- वृत्त कल्प्यते तदा तदहोरानवृत्तस्थप्रतिरविकेन्द्रविन्दुत शङ्कवग्रगता रेखा यत्र- यत्र पृष्ठक्षितिजधरातले लगन्ति तत शङ्क, मूल यावत् छाया । छाया स्वरूपदर्शनेन सिध्यति यच्छड्क्वग्रादहोरात्रवृत्ताधारा सूची कार्या सा विषमसूची। पृष्ठक्षितिज- धरातलेन छिना यादृश वनमुपादयति तादृश एव च्छाया भ्रमणमाग । अथ मेरौ छायाभ्रमणमार्ग कीदृश इति विचार्यते । शड्क्वन ध्रुवमूत्रेऽस्ति, गड्ववादहोरात्रवृत्ताधारा विषमसूची पृष्ठक्षितिजधरातलेन (नाडीवृत्तघरातल- समानान्तरधरातलेन) छिन्ना सनी छेदितप्रदेशो वृत्ताकार एव भवति (मेरवासिना क्षितिज नाडीवृत्तम्) । नाडीवृत्तधरातलाहोरात्रवृत्तधरातलयो समानान्तरत्वा- दहोरामवृत्ताधारविषयसूची प्राधारवृत्तधरातल (अहोरात्रवृत्तधरातल) समा: नान्तरधरातलेन पृष्ठक्षितिजधरातलेन (नाडीवृत्तधरातलसमानान्तरधरातलेन) दिना सती छेदितप्रदेशो वृत्ताकार एव भवितुमर्हति, प्रतिभावोधकयुक्त्या, अत सिद्ध मेरो सदैव भाभ्रममार्गो वृत्ताकार एव भवेत् । साक्षदेशे न्यूनाधिक्राङ्क वशेन रेखा, वृत्तम्, दीर्घवृत्तम्, परवलयम्, अतिपरवलयम्' इति पञ्चधा छायाभ्रमण- मागों भवति । निरक्षेविपुवद्दिने छायाभ्रमणमार्गो रेखाकारो भवति । ग्रन्थकारण (वटेवरेण) यत्वण्डयते तत्ममीचीनमेव । सूर्यसिद्धान्तेऽपि 'इप्टेऽन्हिमध्ये प्राव - मध्यमाधिकारः २६५ पश्चाद्धृते वाहुनयान्तरे। मत्स्यद्वयान्तरयुतेस्त्रिस्कसूत्रेण भाभ्रम । वचनेनानेन च्छायाभ्रमणमार्गो वृत्ताकार एव सूर्येगा स्वीकृत यत्खण्डन सिद्धान्तशिरोमणी भास्करण 'भात्रितयाद् भाभ्रमण' मित्यादिना कृतम् । छायाभ्रमणसम्बन्धे विशेषार्थ भाभ्रमरेखानिरूपण द्रष्टव्यमिति । हि.भा.~मन्दयुक्त दूपित बुद्धि से छायासिद्धि कही गई है । बुद्धि प्रयुक्त ज्वर से प्रचलित तीनकालिक छायाप्रभ्रमण जहा होता है वही भाभ्रमण (छायाभ्रमण) है । ब्रह्मगुप्त के छायानमण मेरु से भिन्न स्थल मे वृत में ठीक नहीं है (अर्थात् ब्रह्मगुप्त जो वृत्ताकार छायाभ्रमण मार्ग मानते हैं सो मेरु में ठीक है। मेह से भिन्न स्थल में ठीक नहीं है ) इस विषय को तुच्छ बुद्धि वाले ब्रह्मगुप्त नहीं देखने । इसलिये मेरु से भिन्न स्थल में छायाभ्रमण - को ब्रह्मगुप्त नहीं जानते हैं । उनकी आगे की छाया भी मेरु से भिन्न-स्थान हो के लिए है ॥३५-३७॥ उपपत्ति ग्राह्मस्फुटसिद्धान्त मे ब्रह्मगुप्त ने वृत्ताकार भामरेखा सम्बन्ध से दिदा का ज्ञान किया है जो अधोलिखित है। "त्रिच्छायाग्रजमत्स्यद्वयमध्यगमूत्रयोयुतियंत्र" । इत्यादि इप्ट दिन मे दिग्मध्यस्थशङ्क, के छायात्रय जानकर उनके अग्रो से मत्स्यद्वय (दो मछली के प्रागार) बनाकर उनके मुख पुच्छ मध्यगत रेखाद्वय या जहा योग होता है वहा से जो वृत्तपरिधि होती है वह छायाग्रगत होती है। अत वृत्तपरिधि रेखा ही छायाग्रभ्रम रेखा होती है । ब्रह्मगुप्त तीन कालिक छायाप्रो के परस्पर अग्रगत रेखाम्रो से जो त्रिभुज बनता है तदुपरिगत जो वृत्त होता है उसी को छोया भ्रमण मार्ग कहते हैं । प्राचार्य (बटेश्वर) इसका खग्डन बरते है । तव बहुत अच्छा समझा जाता यदि य स्वय वृत्ताकार छायाश्रमण नहीं मानते । वस्तुत छाया भ्रमण मार्ग पहा कहा कैसा होता है सो मैं दिखलाता है। रवि केन्द्र से दाइ, के अग्रगत रेखा पृष्ठक्षितिज घरातल म जहा लगती है वहा में राइ मूल तव रसाछाया है । एक दिन मे यदि रवि की प्रान्ति स्थिर मानी जाय याने एक दिन म एक ही अहोरात्र वृत्त माना जाय तब अहोरात्र वृत्त के प्रति विन्दुस्य रवि पेन्द्र से माइकु के अग्रगत रेखायें पृष्ठ क्षितिज धरातल मे जहा-जहा लगती है वहा वहा से साइकु मूल तर छाया में हैं । छाया के स्वरूप देखने से सिद्ध होता है कि क्यम से महोरामवृत्त के प्राधार पर जो विपमसूची होगो उमको पृष्ठ क्षितिज परातल मे काटने पर जैसी उसकी पानि होगी वैसा ही घायाभ्रमण मागं होगा। मेर मे छायाभ्रमण मार्ग के लिए विचार करते हैं। मेरुवासियो पे क्षितिज वृत्त नाडीवृत्त है । नाडीवृत्त पोर महोरात्र वृत्त समाना- न्तर है इसलिए शववन से महोरात्र वृत्ताधारा विषमसूचीको पृष्ठ क्षितिज धरातल (नाडीवृत्त धरातल के समानान्तर घरातल) से वाटने में कटित प्रदेश वृत्तावार होगा (मनिमायोधप की मुक्ति से) मन मेरू में सर्वदा छायाभ्रमण मार्गवृत्ताकार ही होगा, यह मिटान्न हमा । साक्ष देश में न्यूनाघिर गाव मे रेसा, वृत्त, दीपवृन, परवलय, प्रतिपरयलय, २६६ वटेश्वर-सिद्धान्ते य पाच तरह के छायाभ्रमण मार्ग होते हैं, निरस देश म विपुवद्दिन म घायाभूमण माग रेखाकार होता है । प्राचार्य (वटेश्वर) का खण्डन ठोक है । सूर्यसिद्धात म "इष्टहि मध्ये प्राक् पश्चाद्धृते वाहुत्रयान्तरे। मत्स्यद्वयान्तरयुतेस्त्रिस्पृक्सूत्रण माश्रम" इससे सूम भग वान (सूर्याशपुरुष) न भी छायाभ्रमणमार्ग वृत्ताकार हो कहा है। लल्ल आदि प्राचार्य ने भी इसी तरह कहा है जिनका खण्डन सिद्धातशिरोमणि म भास्कराचार्य "भात्रितयाभाभ्रमणम्' इत्यादि से किया है। छायानमण के सम्बन्ध में विशेष जानकारी के लिए "भाधमरेसा निरूपण' पुस्तक देखनी चाहिये १३५.३७ ।। इदानी ब्रह्मगुप्तोक्त-चन्द्रभा खण्डयति । अन्ययोजनविम्बनिरागमश्चेन्दुभा कुवद्या सा। निजकर्णे यातीति ग्रहणे प्रतिवेति नो किश्चित् ॥३॥ नावगतो वा गोलो ग्रहादिक्स्यानमपि नो क्षेत्रम् । नापि रविग्रहहृदय जिप्णुसुतो गोलदाह्योऽयम् ॥३६॥ विभा-निरागमै (अप्रामाणिक) अन्यद्योजन विम्ब कुवत् (पृथिवी- सदृशी, अर्थाद्यथा पृथिव्या छाया (भूभा) भवति तथैव) येन्दुभा (या चन्द्रच्छाया) सा ग्रहणे निजकर्णे (चन्द्रभाकणे) याति, इति हेतोजिष्णुसुत (ब्रह्मगुप्त) किंचित् नो प्रतिवेत्ति (जानाति) । गोलो नावगत (न विदित ) ग्रहादिकस्थानमपि (ग्रह- मन्दोच्चशीघ्रोच्चादिस्थानमपि) न येत्ति, तथा क्षेत्रम् (तत्तद्विपयसाधनार्थमुपयुक्त क्षेत्रम्) रविग्रहहृदम् (सूर्यमध्यग्रहणादिकमपि) जिप्णुमुतो ब्रह्मगुप्तो नो वेत्त्यतोज्य ब्रह्मगुप्त , गोलवाह्य (गोलज्ञानवहित ) अस्तीति ॥३८-३९।। उपपत्ति ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते ब्रह्मगुप्तेन चन्द्रभासम्बन्धेन किगलिखितमस्ति किन्तु ब्रह्मसिद्धान्ते ब्रह्मणा यत्र भूभानयनमस्ति तत्रैव चन्द्रभाकर्णसाधनमपि कृतमस्ति यथा तद्वाक्यानि । भूच्छायेलागतस्याथ तरणिभ्रमणे विधो । मूचीमध्यमक्षाया कियतीति महीश्रव ।। स्फुटमूर्येन्दुभक्तिघ्नो भक्तो मध्यमया फलम् । स्फुटार्कचन्द्रकर्णाप्त फलमर्कमृगाकयो । मानेच्छमध्यकर्णा स्तु प्राज्भय सूच्यापि भाधव । तिथ्य क्लाया सन्त्येवमेतदधं विधो श्रव ।। एतत्पद्यदर्शनेन "निजवणे यातीत्यादि" क्टेश्वरक्थन न सिध्यति । चन्द्रभावणंसाधन ब्रह्मरणा कृत तावता तस्य को दोष , ब्रह्मगुप्तेन तु चन्द्रभायाश्चर्चा कुत्रापि न वृता प्राचार्यकथनमिद तथ्यहीनमिति ॥३५-३६॥ हिमा-प्रप्रामाणिक दूसरे योजन विम्य से पृथिवी की तरह प्रर्थात् जैसी पृथिवी की छाया उसी तरह चन्द्र भा होती है । वह पदमा महण म अपने रणं (चन्द्रभावर्ण) में जाती है । प्रागुप्त कुछ भी नही जानते हैं ।
मध्यमाधिकार २९७ ब्रह्मगुप्त गोल नही जानते हैं, ग्रह प्रादि मन्दोच्च शीघ्रोच्च और पातो के स्थान नहीं जानते हैं । क्षेत्र को (उन उन विषयो के साधन के लिए उपयुक्त क्ष त्र) नही जानते हैं। सूर्य के मध्य ग्रहणादि को भी नही जानते हैं । वे (ब्रह्मगुप्त) गोलज्ञान से बहिर्भूत हैं ॥३८-३६॥ उपपत्ति याहास्फुटसिद्धात मे ब्रह्मगुप्त ने चन्द्रमा के सम्बन्ध मे कुछ भी नही कहा है । चन्द्रमा के विषय में ब्रह्मसिद्धात मे ब्रह्मा ने लिखा है जो अधोलिखित है- "भूच्छायेला गतस्याथ तरणिभ्रमणे विधो ।" इत्यादि इन पद्यो के देखने से "निजकरणे यातीत्यादि" इससे जो बटेश्वराचार्य खण्डन करते हैं वह ठीक नहीं मालूम पड़ता। ब्राह्मस्फुटसिद्धात मे उपयुक्त विषय की कही भी चर्चा नहीं है, इसलिये यह प्राचार्य का खण्डन स्वकपोलकल्पित कहना चाहिये ॥३८ ३६॥ इदानी राहुकृतग्रहण भवतीत्याह । खण्डयति तमोऽर्धन क्षमाकरं विधुदलेन तिग्माशुम् । राहुकृतं च ग्रहणं प्राहस्ते समस्त प्राचार्याः ॥४०॥ विभा-तम (राहु ) अर्धन क्षपाकर (चन्द्र ) खण्डयति विघुदलेन (चन्द्रबिम्बप्रविष्टेन राहुणा चन्द्रविम्वार्धन) तिग्माशुम् (सूर्य) खण्डयति, ते समस्त प्राचार्या (सर्वे प्राचार्या ) राहुकृत ग्रहण प्राहु (कथितवन्त ) ॥४०॥ उपपत्ति चन्द्रग्रहणं पूर्वत. स्पर्श पश्चिमतो मोक्ष । सूर्यग्रहणे चैतद्विपरीतम् । राहो- गतेरनिश्चयात् (राहो कस्या दिशि गतियथाऽन्येषा सूर्यादीना ग्रहाणा पूर्वाभिमुख गतिस्तथा राहोर्नास्ति) सूर्याचन्द्रमसोहणे स्पर्श मोक्षदिशोनिश्रयत्वादात ग्रहण न भवतीति सिद्धान्तम् । पुराणादौ राहुकृतग्रहरणस्य वर्णनमस्ति तेनैव हेतुना भास्करेण सिद्धान्तशिरोमणो केनापिरुपेरण ज्यौतिपमतयो समन्वय कृत- स्तद्वाक्य यथा-- राहु कुभा मण्डलग शशाङ्क शशाङ्कगश्छादयतीनविम्बम् । तमोमय शम्भुवरप्रदानात्सर्वागमानामविरुद्धमेतत् ॥ वस्तुतो ग्रहणेन सह राहोर्न कोऽपि सम्बन्ध । सूर्यविम्बभूविम्बयो क्रम- स्पर्शरेगा यत्र यत्र चन्द्रकक्षाया लगन्ति तज्जनितमार्गों वृत्ताकारो भवति तदेव भूभावृत्तम्, वर्धितरविकर्णश्चन्द्रयक्षाया यत्र लगति तय तदृत्तकेन्द्र भवति, पूर्णान्ते रवित पड्भान्तरे चन्द्रो भवति रवित पड्भान्तरे सदैव भूभारेन्दम् । तेन यस्या पूणिमाया मानक्या_दन. शरो भवति तस्या ग्रहण भवति, मानक्यातुल्ये परे बहि स्पर्शो भवति छाद्यच्छादय विम्बयोश्चन्द्रविम्बभूमाविम्बयो प्रतश्चन्द्र- ग्रहणे चन्द्रश्चाद्यो भूभा धादिया, दर्श सूर्ये दुसगम इत्युक्तेरमाया सूर्याचन्द्रमसो- २६८ वटेश्वर-सिद्धान्ते रेकसूत्र ऊर्ध्वाध क्रमेण स्थितत्वाद् यस्याममाया तय मानक्यातुल्यश्चन्द्रशरो भवे- तस्या तयोबिम्बयोवहि स्पर्शो भवति मानक्यार्धाल्यूने शरे ग्रहण भवति, सूर्यग्रहरणे चन्द्रश्छादक सूर्यश्छाद्यो भवत्येतत्प्रसगे भास्वरेण कथ्यते । यथा- “पश्चाद्भागाज्जलदवदध सस्थितोऽभ्येत्यचन्द्रो भानोविम्ब स्फुटदसितया छादयत्यात्ममूर्त्या। पश्चात्स्पर्शो हरिदिशि ततो मुक्तिरस्याथ एव क्वापि च्छन्न क्वचिदपिहितो नेप कक्षान्तरत्वात् ॥" सूर्यचन्द्रग्रहणयो स्पर्शमोक्षादिस्थितिविलोक्नेन राहुकृत ग्रहण न भवतीति सिद्धान्तितम् । ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते ब्रह्मगुप्तेन । आर्यभटो जानाति ग्रहाष्टगति यदुक्तवास्तदसत् । राहुक्त न ग्रहण तसातो नाप्टमो राहु ॥ इत्यादिनाऽऽर्यभटीयराहुकृतग्रहणस्य खण्डन क्रियते । आर्यभटेन राहुक्त नोक्त ब्रह्मगुप्तवाग्वलमेतत् । तथा च तद्वाक्यम् । छादयति शशी सूर्य शशिन महती च भूछाया। (गोल पा. श्लो २७) राहुकृतग्रहणस्य तु वहूनि खण्डनानि सन्ति, वटेश्वराचार्येणापि राहुकृत सूर्याचन्द्रमसोर्ग्रहण स्वीक्रियते कथ्यते च यदत्र समस्तानामाचार्यारणा सम्मतिरस्ति, मन्मते तु कोऽपि सिद्धान्तग्रन्थप्रणेताऽऽचार्य स्वसिद्धान्ते राहुक ग्रहण लिखितवान् । वस्तुतो राहुकृत ग्रहणमयुक्तमिति ॥४०॥ हि भा.-राहु आधे बिम्ब से चन्द्रबिम्ब को खण्डित करता है, चन्द्रविम्बा से सूर्य को खण्डित करता है। राहुकृत (राहु द्वारा) ग्रहण को सब प्राचार्य कहते हैं ॥४०॥ उपपत्ति चन्द्रग्रहण मे पूरब से स्पर्श और पश्चिम से मोक्ष होता है, सूर्यग्रहण मे इसके विपरीत होता है । जैसे सूर्य प्रादि ग्रहो की गति पूर्वाभिमुख है वैसे राहगति का कोई निश्चय नहीं है इसलिये राहुकृत ग्रहण नही होता है। लेकिन पुराणादि मे राहुकृत ग्रहण के वर्णन है इसलिये पुराणादि कथित ग्रहण और ज्योतिष म कथित ग्रहण के समन्वय के लिये भास्कराचार्य सिद्धान्तशिरोमणि में कहते हैं- "राहु कुभामण्डलग शशाङ्क पाशाङ्कगरछादयतीनविम्बम् । इत्यादि । मर्यान् दाकर जी के वरप्रदान से अन्धकारमय गहु भूमाबिम्ब मे प्रवेश कर चन्द्रमा यो ढक्ता है पौर सूर्य ग्रहण के ममय चन्द्र विश्व में प्रवेश कर राहु सूयविम्ब को ढवता है। इस तरह किसी को ग्रहण मे कुछ कहने का अवसर नही होगा । लेकिन यदि ठीक से देखा तो ग्रहण के साथ राहु का कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। सूर्यविम्ब और भूविम्ब पी क्रमस्पर्श- रेखायें चन्द्रकक्षा में जहा-जहा लगती हैं वह प्रदेश वृत्तावार होता है उसी को भूभा. घृत्त कहते हैं । वर्धित रविकणं चन्द्ररक्षा में जहा लगता है वही विंदु उस वृत्त वा केन्द्र .
मध्यमाधिकारः २६६ (भूभा केन्द्र) होता है । पूर्णिमा मे सूर्य से ६ राशि पर चन्द्र रहते हैं और सूर्य से बरावर भूभा केन्द्र ६ राशि पर रहता है । इसलिए पूर्णान्त में चन्द्रविम्ब और भूभाविम्ब के एक जगह रहने के कारण ग्रहण की सम्भावना हो सकती है । तव प्रत्येक पूणिमा मे चन्द्रग्रहण क्यो नही होता ? इसका कारण यह है चन्द्रविम्ब और भूमाविम्ब का मानक्या, (व्यासार्धयोग) चन्द्रशर के वरावर जव होता है । तब दोनो विम्बो का बहि स्पर्श होता है। मानक्या से चन्द्रशरके न्यून रहने से ग्रहण होता है यह स्थिति प्रत्येक पूर्णिमा मे नही होती है। जिस पूर्णिमा मे वसी स्थिति होती है उसमे ग्रहण होता है । चन्द्रग्रहण मे चन्द्र छाद्य और भूभा छादिका है। सूर्यग्रहण मे सूर्य छाद्य और चन्द्र छादक होते हैं, इस प्रसग मे भास्कराचार्य कहते हैं- "पश्चाभागांजलदवध संस्थितोऽभ्येत्य" इत्यादि । सूर्य और चन्द्र के ग्रहण मे स्पर्श और मोक्षादिस्थिति देखने से साफ मालूम होता है कि राहु कृत ग्रहण नहीं होता है । ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त में ब्रह्मगुप्त 'आर्यभटो जानाति ग्रहाटगतिम्" इत्यादि । इससे आर्यभटीय राहुकृत ग्रहण का खण्डन करते हैं, ब्रह्मगुप्त का यह व्यर्थ खण्डन है । आर्यभट ने राहुकृत ग्रहण नहीं कहा है जैसा कि उनका वचन है-- छादयति शशी सूर्य शशिनं महती च भूछाया।" (गोलपाद श्लो २७) राहुकृत ग्रहण का बहुत खण्डन है । ग्रन्थकार वटेश्वर भी राहु कृत सूर्य और चन्द्र के ग्रहण मानते हैं और कहते हैं कि इस विषय को सब प्राचार्य' कहते हैं । लेकिन मेरा विचार है कि ज्योति सिद्धान्त ग्रन्य के रचयिता किसी भी प्राचार्य ने अपने सिद्धान्त मे राहुकृत ग्रहण को नही लिखा होगा । अगर किसी ग्रन्थ मे लिया भी होगा तो वह प्रयुक्त समझना चाहिये । वस्तुत राहुकृत ग्रहण प्रयुक्त है ॥ ४० ॥ इदानी ब्रह्मगुप्तोक्तवित्रिभलग्ननतारा खण्डयति वित्रिभलग्नापक्रमपलांश योगान्तरं त्रिभोनलग्नस्य । नरमागास्तदयुवतं दृक्षेपं वित्रिभस्य यतः ।। ४१ ॥ वि. मा.-वित्रिम लग्नापक्रम पलाशयोगान्तर (विनिमलग्नकान्त्यक्षयो- योगान्तरं) त्रिभोनलग्नस्य (वितिभलग्नस्य) नतभागाः (नतांशाः) इति यदुक्तं तदयुक्त (तन तय्यम्) यतस्तद्वित्रिभस्य हक्षेपमस्तीति ॥४१॥ उपपत्ति: अनेन ब्रह्मगुप्तोक्तस्याधोलिखितस्य खण्डनं क्रियते- तस्य कान्तिज्योदक यदाऽसजीवा समा न तदा ॥ अवनतिरतोऽन्यथा भवति सम्भवे तदुदयविलग्नसमम् । कृत्वा तदुदितघटिकास्तच्छ स्तचरमाणः ।।
३०० चटेश्वर-सिद्धान्ते अवनतेरानयस्य हक्क्षेपाधीनत्वाद्यदा दृवक्षेपामावस्तदाऽवनतेरभावः । प्राचार्येण (ब्रह्मगुप्तेन) स्वल्पानदेशे याम्योत्तरवृत्त एवं स्वल्पान्तराद्वित्रिभस्थिति प्रकल्प्य तस्य दिनाघंवत् प्रान्त्यक्षसस्वारेण नताशप्रमाणमानीत तत्समीचीन नास्तीति प्रत्यक्षमेव दृश्यते वटेश्वरेण यत्वण्डवते तत्समीचीन पर तत्र कोहगेन भाव्यमिति न क्थ्यत इति ।। ४१ ॥ हि भा-वित्रिमलग्न को क्रान्ति और प्रक्षाश के योग और अन्तर करके वित्रिम- लग्न नताश प्रमाण जो कहा गया है सो टोक नहीं है । क्योकि वह विनिम का दृक् क्षेप है । उपपत्ति इससे अधोलिखित ब्रह्मगुप्तोक्त का खण्डन करते हैं- 'तस्य क्रान्तिग्योदा यदाक्षजीवा समान तदा ।" इत्यादि नति के प्रानयन दृक्शेप के अधीन है इसलिये जय हक्क्षेप का प्रभाव होगा सब मति का प्रभाव होगा । ब्रह्मगुप्त स्वललाक्ष देश मे याम्योत्तर वृत्त ही मे स्वत्लान्तर से वित्रिन स्थिति को मान वर दिनाघ काल की तरह वित्रिम क्रान्ति पौर प्रक्षास के सस्तार करके नतास प्रमाण लाये हैं। अक्षारा क्रान्ति के समत्व मे वित्रिभनताशाभाव होगा । वित्रिम नताशा- नयन टीक नही है यह प्रत्यक्ष ही देखते हैं। अन्यकार (वटेश्वराचार्य) जो खण्डन करते हैं वह ठीक है, परन्तु वहा क्या होना चाहिये सो नही कहते हैं ।। ४१ ।। इदानी ब्रह्मगुप्तोक्लहवामसस्कृतग्रह समीचीनो नेति सण्ड्यते । उदयास्तमयभानोरि टे काले ग्रहस्य दृक्कर्म । कृतवान् जिष्णुसुतो यस्त्वौदयिके सुगरिपतजाइयं तत् ॥४२॥ वि भा --इप्टे काले (इष्टसमये) उदयास्तसमयभानो (सूर्योदयास्त वालयो) ग्रहस्य हक्कम प्रौदयिके ग्रहे जिष्णुमुत (ब्रह्मगुप्त ) यत्कृतवान् तत् सुगणितजाड्यमस्तीति ॥ ४२ ॥ उपपत्ति ब्रह्मगुप्त नाऽयनवकर्मानयन कृत्वा तत्सस्कृतग्रह कृत्वा पश्चादक्षज हवकर्म- साधन कृतम् । तन उत्तरे शरेऽक्षज हक्कम कलाभिरूनो दक्षिणे शरे युत कृतायन- दृक्कम फ्लो ग्रह उदयाख्यलग्न भवति । अस्तलग्नमाधने तु उत्तरे शरेऽक्षज टुक्कम क्लासहितो दक्षिरणे रहित सपड्भ कृतायनफल खेटो ग्रहे पश्चिम- क्षितिजेऽस्त गते पूर्वक्षितिजे यल्लग्न तदस्तलग्न भास्करमते । अन ब्रह्मगुप्त न तस्मात् पट्टाशि विशोध्य पश्चिमक्षितिजे ग्रहेऽस्तगते यदस्तलग्न तदेव ग्रहास्न- लग्न कल्पितम् । ब्रह्मगुप्तोत्तमायनहक्कम साधनम्-- विक्षेत्र सत्रिराशि क्रान्तिवधो व्यासदलहतो लिप्ता । शोध्यास्तयो, समदिशोयद्यान्यदिशोस्तयो क्षेप्या ॥
मध्यमाधिकारः ३०१ अक्षजहक्कम साधनम्- विपुवच्छाया गुरिणताद्विक्षेद् द्वादशोद्धृतात्सोम्यात् । फलमृणधन धनमृणं याम्यादुदयास्तमयलग्ने । हक्कानयने किं स्थौल्यमिति न प्रतिपादितं ग्रन्थकारेण (वटेश्वरेण) किन्तु तत्सस्कृतग्रहे दोपो दीयते तत्र किं भवेदित्यपि न कथ्यते इति । आर्यभटोक्ताऽय- नाक्षक्कम गो. खण्डनं ब्रह्मगुप्तेन यत्कृतं तत्समाधानं तलक्षपातिनाऽनेन ग्रन्थ- कारेण न क्रियते केवलं तदुक्तं (ब्रह्मगुप्तोक्त) खण्ड्यते तत्र स्वमतं प्रतिपाद्यते नहि, दृक्कम संस्कारे ब्रह्मगुप्तेन यदभिहितं तद्भिन्नक्रियाकरणे न काऽपि युक्तिरिति ॥ ४२ ॥ हि.भा-इप्ट समय मे सूर्योदय और सूर्यास्तकाल में प्रौदपिक ग्रह मे ग्रह के हार मं. सस्कार ब्रह्मगुप्त ने जो किया है सो ठीक नहीं है । उपपत्ति ब्रह्मगुप्त ने पहले प्रायन इक्कर्म साधन करके ग्रह मे उसके सस्कार कर पीछे प्रक्षण हक्कम साधन किये हैं। उत्तरसर में प्रायनहर्म सस्कृतग्रह में प्रक्षज इक्कम'क्ला को पटाने से दक्षिण शर मे जोडने से उदयलग्न होता है । अस्त लग्न साधन मे उत्तरसर में मायनहक्कम सस्कृत ग्रह मे अक्षज हक्कर्म कला को जोडने से दक्षिण भर मे घटाने से पौर सपड्भ (६ राशि जोडने से) ग्रह पश्चिम क्षितिज में अस्त रहने पर पूर्व क्षितिज मे जो लग्न होता है वह भास्कर के मत मे ग्रस्त लग्न है । यहा ब्रह्मगुप्त ने उसमे ६ राशि पटाकर पश्चिम क्षितिज में ग्रहास्त रहने पर जो लग्न होता है उसी को ग्रहास्त लग्न माना है । यहां पर ब्रह्मगुप्तोक्न प्रायन हक्कम साधन अघोलिखित है- "विक्षेपसत्रिराशि क्रान्तिवधो व्यासदलहृतो लिप्ताः ।" इत्यादि अक्षज पार्म साधन- "विपुवच्छाया गणिताद् विक्षेपाद् द्वादशोद्धृतात्मोम्यात् ।" इत्यादि एक्कम साधन मे क्या त्रुटि है इस बात को वटेश्वर नहीं पहले किन्तु स्वरम सस्कृत ग्रह में दोप दते हैं यहा क्या होना चाहिये सा भी नहीं कहते हैं। मायभंटाक्त मायन एक्कम पोर प्रक्षज हक्कम' का सण्डन ब्रह्मगुस ने जो दिया है उनका समाधान मार्य- भट पक्षपाती वटेश्वराचार्य ने नहीं दिया येवल सण्डन करते हैं । अपना मत वृष भी नहीं पहते हैं । हक्कम संस्थार के विषय मे ब्रह्मगुम ने जो बहा है उसके मियाय दूसरा क्या हो सकता है ।। ४२॥ इशानी चन्द्रामोन्नतो ब्रह्मगुप्तो कम्पष्टभुजं सण्डयति भानुभुजादियोगाच्चन्द्र शुक्ले प्राल्पितं तेन । नो लग्नमुजानुगतं वेत्ति न शुक्ल सुतो निप्पोः ॥४३॥ वि. मा.-भानुभुजादियोगात् (रविभुजचन्द्रभुजयोः संस्काररूपात्स्पष्ट- मुजात) तेन (ग्रह्मगुप्लेन) चन्द्र शुम्न प्रकलिन, लग्नभुजानुगतं (लग्नमुजसम्ब.
३०२ वटेश्वर-सिद्धान्ते न्धित ) नो प्रतो जिष्णो सुत (जिष्णुपुत्रो ब्रह्मगुप्त) शुक्ल (सुनलागल) न वेत्तीति ।। ४३॥ उपपत्ति प्रथममेतदर्थ ब्रह्मगुप्तमत प्रतिपाद्यते । ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते तदुक्तवाक्यम्- पृथगन्तरसयोगी मुजो यतोऽर्थात् शशी समान्यदिशो । दृग्ज्यावर्गात् स्वात् पृथव् स्ववर्ग विशोध्य पदे ॥ वियुतसहिते रवीन्द्वोरेकान्यकपाल सस्थयोराद्य । रविशशिहाड क्वन्तरमन्योऽग् दृश्यशङ्का वैक्यम् ।। प्राद्यान्यवर्गयो'तिमूल पूर्वापरा भुजाकोटि । भुजकोटिकृतियुतिपद तिर्यक् कर्णोऽस्य चन्द्रोऽग्रे ॥ रविचन्द्रयोर्भुजयो समान्यदिशोरन्तरसयोगो प्रमश स्पष्टभुजो भवेत् । रवितो यदिशि चन्द्र सैव स्पष्टभुजदिग् ज्ञेया। स्वस्वहग्ज्यावर्गे स्वस्वभुजवर्ग- विहीने पदे तदा पूर्वापररेखाया तयो रवीन्द्वो कोटी भवत । एकान्यक्पाल- सस्थयो रवीन्द्वो कोटयोवियुतसहिते ये भवत स प्राद्य । रविचन्द्रदृाव वन्तर मन्यसज्ञक । अर्थात् यदि रविचन्द्रौ क्षितिजादुपरि भवेता तदा तयो क्शकू एक- जातोयौ भवतोऽतस्तयोरन्तरमन्यसज्ञ भवति । यद्येक क्षितिजादुपरि, अन्य क्षिति- जादधस्तदाऽध स्थस्यादृक्शकुरूलस्थस्य दृक्शङ्क । प्रोतऽनयोरक्य तदाऽन्यो भवति । भुजकोटिवगंयोगपद तियक् कर्ण । कर्णाग्रे चन्द्रविम्बमस्तीति ।। अकस्मिन् गोले रविचन्द्रो प्रकल्पविम्वान्तरसूत्ररूप कर्ण साध्यते । रविकेन्द्राच्चन्द्रशकूपरि यो लम्बस्तन्मूलाच्चन्द्रबिम्बकेन्द्रपर्यन्तमन्यसज्ञम् । लम्बमूलान्पूर्वापररेखाया समानन्तरा गा रेखा तदुपरि रविकेन्द्रात्कृतो यो द्वितीयो लम्बस्तन्मूलात्प्रथमलम्बमूलपर्यन्तमेवाऽऽद्यस ज्ञा । तयोराद्यान्ययोर्वर्गयुते द्वितीयलम्बमूलाच्चन्द्रविम्बकेन्द्रपर्यन्त रेखा द्वितीयलम्वोपरि लम्बस्पा भवेत् (रे० ११ अ० युक्तया) द्वितीयलम्वश्च पूर्वसाधितस्पष्टभुजसम । तयोर्वर्गयोग- पदमेकगोलीय-रविचन्द्रयोविभ्वान्तरसूत्र कर्णो भवति । एवमत्र भुजकोटिक यस्मिन् परातले तत् क्षितिजधरातले समप्रोतधरातलवन लम्वस्पमतो द्रष्टु समुखे नेद क्षेत्र मादर्शवत् । अतएवाऽस्यक्षेत्रस्य स्वशृङ्गोन्नती भास्करेण खण्डन कृतम् । शृङ्गोवत्युत्तराधिकारे ब्रह्मगुप्तेन- व्यर्केन्द्धभुजज्या दिगुणाऽन्द्वन्तर भवति कर्ण । तद्वर्गान्तरपदमिदमिन्दुभुजाग्रान्तर कोटि ॥' इत्यनेन प्रकारान्तर प्रदर्शितम् । इत्यपि समीचीन नास्ति। भास्करब्रह्म- गुप्तयो प्रकारेण शृङ्गोनतिनं समोचीनेति कमलाकरेण सिद्धान्ततत्त्वविवेके पद मध्यमाधिकार ३०३ स्पप्ट प्रतिपादितम् । एकगोलस्थरविचन्द्राभ्या यत्सर्व कार्य कृतं तन्न युक्त स्वस्वगोलस्थिताभ्यामेव ताभ्या सर्व कार्य (परिलेखादिव) समीचीन भवेत् वटे- श्वराचार्यकथनमत समीचीनमिति पूर्वोपपत्तिदर्शनव स्फुटमिति ॥ हि भा-रवि और चन्द्र के भुजसस्कार रूप स्पष्ट भुज से चन्द्र मे जो शुक्लाङ्गल को कल्पना ब्रह्मगुप्त ने की है लग्नभुज का अनुसरण नहीं दिया गया अत ब्रह्मगुप्त शुक्ल को नहीं जानते हैं। उपपत्ति पहले इसके लिये ब्रह्मगुप्त मत का प्रतिपादन करते हैं। इसके सम्बन्ध मे उनका निम्नलिखित वाक्य है- "पृथगन्तरसयोगी भुजो यतोऽति शशी सामान्यदिशो" इत्यादि । रवि और चन्द्र के भुजो के एक दिशा मे अन्तर भिन्न दिशा में योग करने से स्पष्ट भुज होता है। रवि से जिधर चन्द्र रहते है वही स्पष्टभुज की दिशा है । अपने अपने हग्ज्या वर्ग में अपने अपने भुजवर्ग को घटावर मून लेने से पूर्वापर रेखा मे रवि और चन्द्र की कोटि होती है। एक कपाल में रवि और चन्द्र के रहने से कोटि के अन्तर भिन्न काल में योग करने से जो होते हैं वह पाद्य सज्ञक है । रवि और चन्द्र के दृक्शङ क्वन्तर अन्य सज्ञक है। अर्थात् यदि रवि और चन्द्र दोनो क्षितिज से ऊपर हैं तो दोनो दृशङ्क, एक- जातीय होते हैं इसलिये उन दोनो वा अन्तर अन्य सजक होता है। यदि रवि और चन्द्र मे एक क्षितिज से ऊपर और दूसरे क्षितिज से नीचे हैं तब नीचे वाले के अहशङ्क, और कार वाले वे हक्शन, होते हैं । इसलिये दोनो के योग यहा अन्य होता है। प्राद्य और अन्य के वर्ग योग मूल पूर्वापर कोटि होती है । भुज और कोटि के वर्गयोग मूल तिर्यकरूप वर्ण होता है । इस कर्ण के अग्र मे चन्द्रविम्व केन्द्र है । एक गोल में रवि और चन्द्र को मान वर विम्बान्तर सूत्ररूप कर्ण साधन करते है। रवि केन्द्र चन्द्रशइ.के ऊपर जो लम्ब होता है उसके मूल से चन्द्रविम्ब केन्द्र तक अन्य सज्ञक है । लम्बमूल से पूर्वापर रेखा को जो समानान्तर रेखा होती है रविकेन्द्र से उससे ऊपर जो द्वितीय लम्व होता है उसके मूल से प्रथम लम्बमूल पर्यन्त रेगा प्राय सजव है (रेसा गरियत युक्ति से) प्राग और अन्य के वर्ग योगमूल द्वितीय लम्ब मूल से चन्द्र विम्ब केन्द्र पर्यन्त रेसा द्वितीय लम्ब के ऊपर लम्ब रूप होती है (रे० ११ म० युक्ति से) मौर द्वितीय लम्ब स्पष्ट भुज के बरावर है। दोनो के वर्ग योगमूल एवघरातलीय रवि चन्द्र या विम्यान्तर मूत्र वर्ण होता है। यहां भुजबोटि मौर जिस घरातल मे है वह क्षितिज परातल में सम प्रोन घरातत की ३०४ वटेश्वर-सिद्धान्ते तरह लम्ब रूप नहीं है । इसलिये दर्शक के सामने यह क्षेत्र ऐनक की तरह नहीं होता है। इसलिये इस क्षेत्र का खण्डन भास्कराचार्य ने सिद्धान्तगिरोमणि मे दिया है। शृङ्गोन्नति के उत्तराधिकार मे ब्रह्मगुप्त "व्यकॅन्दर्घभुजज्या द्विगुणान्द्वन्तर भवति वर्ण ।" इत्यादि इससे प्रकारानर दिखलाया है । परतु यह भी ठीक नहीं है । भास्कर और ब्रह्मगुप्त के प्रकार से रागोन्नति ठीक नही होती है । ये वात सिद्धान्ततत्त्वविवेक म कमलाकर ने स्पष्ट कही हैं । एक गोलस्य रवि और चन्द्र से सव काम किये गये हैं उचित तो था स्वस्व- गोलस्य रवि और चन्द्र पर से परिलेखोपयुक्त उपकरण का साधन करना पर ऐसा नहीं किया गया है । यहा पर अन्यकार (वटेश्वर) का खण्डन ठीक है । यद्यपि के कारण नही बतलाते हैं तयापि उनका कयन ठीक है ।। ४३ ।। इदानी ब्रह्मगुप्त दूपयति जिष्णुसुतदूपणाना सख्या वक्त न शक्यते यस्मात् । तस्मादयमुद्दे शो बुद्धिमताऽन्यानि योज्यानि ।। ४४ ॥ एकमपि न वेत्ति यतो जिष्णुसुसो गरिणतगोलानाम् । न मया प्रोक्तानि तत पृथक् पृथक् दूषणान्येषाम् ॥४५॥ वि भान्यस्मात् कारणात् जिप्णुसुतदूपणाना (ब्रह्मगुप्तदोपाणा) सख्या (परिमिति) वक्तु (क्थयितु)मया न शक्यते, तस्मात् कारणात् अय पूर्वप्रति- पादितो दोपोच्चय उद्देश उदाहरणरूप एव जेय, तदुदाहररावलेन बुद्धिमता. न्यानि दूपणानि योज्यानि । जिष्णुमुत (ब्रह्मगुप्त ) यतः (यस्मात्कारणात्) गणितगोलानाम् (गणिताना गोलाना च) एकमपि विपयन वेत्ति (जानाति) तत (तस्मात् कारणात्) एपा (ब्रह्मगुप्ताना ) पृथक् पृथक् दूपणानि (दोप- कदम्बकानि) मया न प्रोक्तानि (न पषितानि) ।। ४४-४५ ॥ हि भा-जिस कारण से ब्रह्मगुप्त के दोपो यो सख्या हम नही पह सकते हैं इस. लिये बुद्धिमान लोग दूसरे उपदेशो की योजना करें ॥४॥ जिस कारण से ब्रह्मगुप्त गरिणत और गोल के एक विषय वो भी नहीं जानते हैं इस- लिये इनके दोषों को हमने अलग अलग नहीं कहा है ॥ ४५ ॥ इदानी पुनम्र ह्मगुप्त दूपयति नो कालविधि गोल नो तभ्रमणं न घाऽपि प्रत्यक्षम् । गोतानुगतं सर्य भ्रमणानानाशेयमीद्दमो हास्य ।। ४६ ।।
मध्यमाधिकारः ३०५ वि. मा.--जिप्णुसुतः कालविधि (कालगणनादिक) नो वेत्ति, गोलं नो वेत्ति तभ्रमण (गोलम्रमण) प्रत्यक्षमपि न किमपि वेत्ति सर्व वरतु पूर्वप्रतिपादित काल- वि यादिक गोलानुगतं (गोधीलन) अस्ति, भ्रमणाज्ञानात् (गोलभ्रमणाज्ञानात्) अस्य (ब्रह्मगुप्तस्य) इयमीदृशी दशा (वस्त्वनभिज्ञता) अस्तीति ॥४६॥ इति श्रीमदानन्दपुरीयमहदत्तसुतवटेश्वरविरचिते स्वनामसज्ञिते स्फुट- सिद्धान्ते मध्यगति. प्रथमोऽधिकार समाप्त । इति दशमोऽध्याय. हि. मा --ब्रह्मगुप्त कालविधि को नही जानते हैं और गोल को तथा गोलभ्रमण को नहीं जानते हैं और प्रत्यक्ष (ग्रहणादि) को भी नहीं जानते हैं। सर्वविषय गोलाधीन है गोल के अज्ञान के कारण ब्रह्मगुप्त की इस तरह की दशा ( हर एक विषय को धन- भिज्ञता) है। इति श्रीमदानन्दपुरीय महदत्त सुत वटेश्वर-विरचित अपने नाम वाले स्फुट-सिद्धान्त (वटेश्वरमिद्धान्त) में मध्यगति नामक प्रथम अधिकार समाप्त हुआ। दसवा अध्याय समाप्त वटेष्वर सिद्धान्त: स्पष्टाविकार वटेश्वर सिद्धान्तः स्पष्टाधिकारः तभादो स्फुटीकरणस्य प्रयोजनमाह । नोचोच्चवशाद द्यचरः कक्ष्यायां दृश्यते न मध्यसमः। यस्मादतः स्फुटत्वं नीचोच्चविधागतो वक्ष्ये ॥१॥ दि. मा.-यस्मात्कारणात् नीचोच्चवशात् (नीचोच्चाकर्षणवशात्) धुचरः (स्पष्टग्रहः) कक्ष्यायां (कक्षावृत्ते) मध्यसमः (मध्यग्रहतुल्य ) न दृश्यतेऽनोनीचोच्च- विधानत (नीचोच्चनियमत ) स्फुटत्व (स्पष्टीकरण) वक्ष्ये ॥ अयं तदुवत भवति कक्षावृत्ते मध्यमग्रह परिकल्पितः । न च कक्षावृत्ते पार- माथिको ग्रहो मध्यमगत्या प्रतिवृत्ते भ्रमति, किन्तु स्पष्टगत्या प्रतिवृत्ते परिभ्रमन कक्षावृत्ते दृप्यते, अतोऽह तादृश स्पष्टीकरण वक्ष्ये येन प्रतिवृत्तस्थो ग्रहः कक्षावृत्ते हक्तुल्यो भवेदिति ॥१॥ हि भा-अब स्फुटगति अध्याय प्रारम्भ किया जाता है इसमे पहले स्पष्टीकरण के प्रयोजन कहते हैं । जिस कारण नीच और उच्च के वश से सप्टग्रह पक्षावृत्त मे मभ्यमन्ह के कर नही देखे जाते है इसलिए नीच और उच्च के नियम से स्फुटीकरण को मैं बहाई॥१॥ कक्षावृत्तस्य स्पष्ट ग्रह मध्यमगति से प्रतिवृत्त में भ्रमण करते हैं, किन्तु मुटदिने प्रतिवृत्त मे भ्रमण करते हुए ग्रह कक्षावृत्त मे देखे जाते हैं इसलिए वह केसी करण को कहता है जिससे प्रतिवृत्त स्थितग्रह कदा वृत्त में इटल है। इदानी स्पष्टीकरणादि-सर्वप्रहगणितरय ज्यामूलक दावमा सन अर्धज्या रसवारपः फरशशिशशिनो गजानन्द्रयः। वेदोत्कृत्यो व्योमस्तम्भैरम वाहवो रमाग्निपुराना नेत्र नबहुतभुजो गजजलपिकृताः इतननो पसः मन्दशिलीमुखधारणाः सरमायतवः खानाला तस्वागाः खापनगाः दाराग्निनागा नवमः। रामान्या प्रगगजनन्दाः कुद मन्द ह1ि शरपशिया. स्तम्मेरमा निविदा दिना सप्त सप्त पाशिन स्पिनिङ्गहरा
३१०
वटेश्वर-सिद्धान्ते
नवखाङ्क भुवो रस शर नव चन्द्राः करसशून्य कराः ।
नगकृत सकरा द्विनव व्योम भुजाः सप्त विश्व नेत्राणि ॥ ६॥
खधृति यमा वेद भुजा द्विभुजा रसषड् भुजाक्षीरिण ।
वसुखाग्नि यमाः खशरत्रिभुजा प्राकाश नन्द गुरणय मलाः ॥७॥
खगुरण जिनाः खागजिना नवाभ्रतत्वान्यगाब्धि तत्त्वानि ।
वेदाप्टेपुयमाः शशिद्वयनभुजा नगेषु रस यमलाः ॥८॥
द्विनव रस यमाः सप्तद्विनग भुजाश्चन्द्र पट् नगाक्षीरिण।
वेदाङ्क भानि रस यमवसु नेनाण्यष्ट पक्ष वसु यमलाः ॥६॥
नव वस्वष्ट भुजा नवशशि नन्द यमा गजाब्धि नवदसाः।
नग सप्ताङ्क भुजाः कृत खखरामाः शशि गुणानहव्यभुजः॥ १० ॥
सप्त विशिखा भ्ररामास्त्रिनाग खगुरणा नवानशशिरामाः।
भूगुण मारणा अाय्येकगुणा रसधरा धरैकगुणाः॥११॥
विशिख विशिख बाह्वग्नयो बाहु धरित्री घराक्षि हव्यभुजः।
क्रमपरिपाट्या जीवाश्छिद्रस्तम्भैरम द्विगुणाः ।। १२॥
शर खसुरा नखदेवा वेद त्रिसुरा नगाब्धि गुण रामाः।
खाङ्ग त्रिगुणा भूनग नाकगृहा नेत्र नाग गुण रामाः ।। १३ ।।
शशिनन्दाग्निगुणा भूखान्धिगुणा रसकराब्धिहव्यभुजः ।
खाग्नि समुद्र हुताशीस्त्रित्र्यन्धिगुणाः शराग्नि युग रामाः॥१४॥
रसवह्निवेदरामा पर्वत वडवानाधि हतभुजः ।
सप्त गुरु वेदरामा नग गुण वेदानयो लिप्ताः ॥१५॥
प्रासा विकलास्तिथयो नन्दभुजः क्वब्धयः पयोदशराः ।
रस विशिषाः सप्तसरा अग्निशरात्रिकृता. शराक्षीणि ॥१६॥
नवविशिखाः पञ्चयमाः सकता. पञ्चाब्धयो द्विरदरामाः
तिरिपु वेदा मङ्गल विशिखा. पक्ष पवस्वरङ्गगुणाः ॥१७॥
भूबाणारसयारणास्तत्त्वानि जलाग्नयः कृभुजः।
नगवेदा नन्दकृता वसुनेत्रायग्नि जलघयो दन्दाः ॥ १८ ॥
विशिख शरा नेशराः कुभुजा द्वियमा हुताशनावेदे ।
पवोऽलनेत्राण्यब्धियमा द्वोपचो रससमुद्राः ॥ १६॥
प्रङ्गान्यग्नि पृषेत्का वेदा नव वहयोऽवागुणाः ।
स्प सायकवेदा कुशरा गजभूमय शराः सूर्याः ॥२०
गजरामा नेत्रयमास्तत्वानि कृताब्धयः कुनेत्राणि ।
विश्व भुजा सायकनिगमा गरगवाह्वस्तिययः॥२१॥
स्पष्टाधिकार: खभुजा नन्दगुरगा दश त्रिशरा नन्दाऽब्धयोऽक्षशराः। विश्वे कुधृता अतिधृतिरङ्गानि गुण अधिनेत्राणि ॥ २२ ॥ सप्ताध्वयों धृतिर्नगविशिखा गुणसागराः शरगुरणाश्च । दन्ता रामा रामकृता रामेषवो वासराः कुकृताः ॥ २३ ॥ सूर्यानन्द समुद्रा रदा नखा वह्नि चन्द्रमसः । ईशा मनवोऽग्निभुजा रसाग्नयो वेदसायका विधृतिः ॥ २४ ॥ वेदकृता वियदिषवः खं भूदा नगा रुद्राः। अष्टिर्नेत्रभुजा नव नेत्राण्यगवह्नयो विशिखवेदाः ॥ २५ ॥ पञ्चशराः पड़तवो नग मुनयो नन्द कुञ्जरास्त्रिदशः । नगरुद्रा रदचन्द्रा वसु मनवो वेदरस चन्द्राः ।। २६ ॥ द्वयष्टभुवः शून्य नखाः खाक्षिभुजा खाधिनेत्रारिए । फूत्कृतयस्त्यष्टभुजा रसखगुरणा व्योमगीर्वाणाः ॥२७॥ वेदेषुगुणा नवनगरामाः शराब्धयो रससमुद्राः । खानाब्धयोऽङ्क कुञ्जरवेदा धृतिसायका गजाब्धिशरा. ॥२८॥ नवनग विशिखा जलधर शश्य॒तवो गुरणकृताऽङ्गानि । रसनगरसाः खशशधरनागाः पृषत्काधिधरणिधरः ॥ २६ ॥ खाधिनागा रसकुगजास्त्रिशरगना जलदनन्द वसवश्च । वसुभुज नन्दा नगरसविलानि रसखान हरिगाडरः ॥३०॥ ऋत्वन्धिदिशो भगाष्टख भुवोऽङ्कनेत्र शशिचन्द्रमसः । कुनग शिवा विश्वाऽर्का रसतत्वभुवः खखाग्निरूपाणि ॥३१॥ वेदकृताग्नि शशाडा नवा विश्वे शराग्निकृत चन्द्राः । क्व मनवो मतिययोऽब्ध्यग शरचन्द्रा द्विबाहुरस चन्द्राः ॥ ३२ ॥ खना गरस भुवो भूभूनग शशिनो रसाग नग चन्द्रमस । भगशशितयोऽगरसद्विप शशिनोऽकनन्दरजनीशाः ।। ३३ ॥ सप्ताङ्गाङ्कभुवो एकुखभुजा ध्योमागशून्यनेवारिस । द्वोनभुजाः कृतनग शशिनेनाण्यङ्गाक्षिबाहुनेनाणि ॥ ३४ ॥ अङ्गागाक्षि मुजा रदरामभुजा रस पञ्चाग्नि नयनानि । नवरामजिना गुरणनव सिद्धा सप्तायितत्वानि ।। ३५ ।। घायुत्कृतयः पर्वतशराङ्ग नेत्राणि रुद्रभानीह। समाङ्गमानि यमपम नागभुजा नगनगष्टकरा ॥३६॥ सुरनव भुजा नवाट छिद्राक्षोण्यन्धि जलपि शून्यगुणाः । सस पुगुणा रसपञ्चबाह्वानयश्चन्द्रराम गुणरामाः ।। ३७ ।।
३१२ वटेश्वर-सिद्धान्ते नग गुणवेद हुताशा विकला सन्ति स्थिताः पृथक् चंपाम् । वसव कुभुजाः खगुणाः स्यु कुरामा जिनाः खरामा ॥३०॥ पञ्चशरा नेत्रगुणा रामा नवबाहवो द्विप समुद्राः । भूर्वसवो हौ चन्द्रा नगवेदाः पड्भुजा अचल बारणा ॥३६॥ विशतिरिषु हत्यभुज कुकृता वसवोऽद्योऽक्षभुजा । रामा कुगुणा वर्गा सप्ताना पञ्च पञ्चशराः ॥ ४०॥ वेदगुणाश्च पृषत्काः सिद्धा नवबाहव. कुभुजाः। नव विशिखा रामभुजा इलाग्नयो वह्निनयनानि ॥४१॥ ख नवचन्द्रा द्विभुजा रसरसा नन्दवह्नयोऽगभुजाः । त्रिशरा नन्दपृषत्का गुरगान्धय. सायका विशिखाः॥ ४२ ॥ खकृता. कुशरा मङ्गलहत्यभुजो वसुशरा द्विशरा । व्योमभुजा नवचन्द्राः खशराः कुशरा गीति ॥४३॥ निकरा द्विशराश्छिद्रप्रनिम्नगेशा इनश्चन्द्रः । अति पञ्चशरा नगबारगाग्निभुजा दिशोऽङ्कभुवः ॥ ४४॥ अकृता रसरामास्त्रिकृता प्रचला खाऽधयोद्धकताः । नवविशिखा रसनेनाण्यङ्गान्येकेपवोधयोऽद्धभुवः॥ ४५ ॥ शरवेदा हप्पभुजस्तिथपोऽभुज कृतापस्निग्या । प्रगगुरपवेदहुताशा. कलिका विकलाः समुद्र जलघय सप्त ॥ ४६ ॥ जलखाट शशिधृति शशिनः कलिका शराग्नयो विकलाः । त्रिज्याकृतिरहनव त्रिभुवा कथिता गणजिनाशज्या. ॥४७॥ परिणतवशगास्तु जीवा घण्णवति प्रोदिताः क्रमेव । करणीमूलग्रहणातुल्यत्वं प्रथमजीवया धनुष. ॥४८॥ एवामा स्पष्टा एव। अनोपपत्ति । 'अन्धराचार्य पदमध्ये २५ कला तुल्यान्तरे चतुविशत्यो जीवा साधीयत्वा पठिता सन्ति एभिनन्थकार पण्णवति सख्यका जीवा क्लात्मिका पठिता याश्चोतरिलिखिता सन्ति । उपर्युक्तज्याना पाठे वि वीजमिति कथ्यते, बिज्योरक- मज्या निहतेदलस्य मूल तदर्धायकगिजिनी स्यादित्यादिना मोत्तमज्याकृति- योगमूनान्मूलमित्यादिना का, त्रिज्या राशिज्येत्यादिना सर्वासा जीवाना ज्ञान सुलभेन भविष्यति । प्राचीन पूर्वोक्तरीत्येव सर्वासा जीवाना मानानि साधयित्वा पठितानि, नवीनानां मतेनापि तज्ज्ञान सुसेन भवितुमर्हति । २२५' क्लान्तन्ति- चतुर्विशति जीवा पाडे "जीवा स्वसप्तारियुगासहीना द्विघ्नी चे"त्यादि प्रकारो धा , .
स्पष्टाधिकार "त्र्यधिन्नमौा अयुतेन लब्धमि" त्यादि प्रकार आश्रयणीय । ६६ सख्यक जीवा =अग्नज्या+पृज्या" तत्प्रथमोत्क्रमज्या निज्या नि ज्ञानानसरे "२ ज्याइ-२ ज्याइ प्रउज्या भक्ता यल्लब्ध तच्छशेनाग्रज्या पृष्ठभ्ययोर्योग ज्ञात्वा तत्र पृष्ठज्याया शोधनेना- ग्रज्याया ज्ञान भवेदेव सर्वासा जीवाना ज्ञान सुलभेनैव भवेत्पाटी-गणितरीत्या वा ज्ञान कृत्वा पाठे पठिता ल विन्दु अथ पठितज्याना स्वरूपदर्शनेन ज्ञायते यद् यथा पदादितश्चापगतिर्वर्धते तथा ज्यागतिरल्पा भवति । कथमिति तदुच्यते- प पच चापम्-च फ चापम् । स द्विगुणित प च चापपूर्ण- ज्या=प फ रेया पफब जात्य त्रिभुजे पफ कर्णार्ध- ल तदा फर-रव पर =न स, न स-फर एतत्स- म्बन्धि चापयोर्मध्ये पन< न फ अर्थात् २ न प<प फ चाप, २न सफ व अतस्तुल्य- चापवृद्धी तुल्य ज्यावृद्धिर्न चिन न०१ भवतीति निश्चितम् । तथा फरर व फाय<यव-चप फ य<च प परन्तु प च% फ च प्रत सिद्ध यच्चापवृद्धिती ज्यावृद्धिरल्पा भवतीति । हि भा-अब स्पष्टीकरणादि सप ग्रह गणित के मूलभूत ज्यानो को बहत है। वृत्तपाद मे ६६ जीवानो या पाठ किया है जिनके मान दलोबो मे वरिणत है। उनके प्रयं स्पष्ट होने के कारण नहीं लिये जाते हैं। . उपपत्ति अन्य माचार्य (सूर्यमिद्धान्तवार ब्रह्मगुप्त प्रभृति) ने पदमध्य मे २२५' क्लान्तरित पर पौवीस ज्यामो ये मान साधन पर पठित किये हैं । ये ग्रन्यार छियानवे वलात्मकज्या विक्ला सहित पठिन किए है जो लोगो म परिणत हैं ये जीवायें किस तरह साधन की गई सो रहते हैं। 'मोत्तमज्या कृति योगमूलाद्दल तदपांशवगिञ्जिनी स्यान्' इसने मथवा "विज्यो- रमज्या निहतेदलस्य मूल तदर्धा शक गिजिनी वा," तथा "विग्याचं राशिज्या' इत्यादि से मब - ३१४ वटेश्वर-सिद्धान्ते ज्यानो के ज्ञान सुलभ हो से हो जायगा, प्राचीनाचार्य ने इन्ही रौतियों से सब ज्याप्रो के मान साधन कर पठित किये हैं । नवीन मन से भी उनके ज्ञान सुलभ ही से हो जाने है । २२५' क्लान्तरित चोवीस ज्याम्रो के पाठ में 'जीवा स्वमप्तारियुगाशहीना द्विघ्नो च पूर्वन्याया' इत्यादि प्रकार का अथवा 'न्यन्धिघ्न मौा अयुतन लब्ध' इत्यादि प्रकार का प्राश्रयण करना चाहिए । वहा त्रिज्या = ३४३८ है । १६ सख्यक जीवाना के ज्ञान के लिए प्रथमोरक्रमज्या एतदाधारक (६६ सख्यक ज्याधारक) लेकर अनग्या और पृष्ठज्या के योग ज्ञान कर उसम पृष्ठज्या को घटाकर अग्रज्या ज्ञान करना अथवा अग्रज्या और पृष्ठज्या घात सशोधक प्रकार से ज्ञान कर उसमे पृष्ठज्या से भाग देने से अग्रज्या होगी । इस तरह सव जीवापो का ज्ञान हो जायेगा । अथवा पाटीगणित रीति से जीवाओ को साधन कर पटिन किये । पठित ज्याना के स्वरूप देखने से मालूम होता कि पदादि से ज्यो ज्या चाप गति बढती है त्यो त्या ज्यागति प्रल्प होती है । क्योकि ऐमा होता है उसके लिए युक्ति चित्र १ देखिए। पच चाप च फ चाप, द्विगुणित प च चाप की पूर्णज्या-प फ रेखा, पकव जात्य विभुज में प फ र्णाघविन्दु=ल, तब भ र=र बन स, न स-फर एतत्सम्बधी चापो म प न <न फ अर्थात् २ न प <प फ चाप, २ न स फ ब प्रत तुल्य चाप वृद्धि म तुल्य ज्यावृद्धि नहीं होती है यह सिद्ध हुमा । तथा फ र=र व फययवचय फप <च प परन्तु प च=फ च इसलिए सिद्ध हुआ कि चापवृद्धि स ज्यावृद्धि मल होती है । पठितज्यासु स्विष्टज्या ज्ञानात्तत्पूर्वाग्रिमज्ययोर्घातानयन समो. धकेन सिद्धान्तशिरोमणेप्टिप्पण्या कृत यया इष्टचापम् = इ । प्रयमचापम्- प्र। तदा ज्या(इ-प्र)-पृष्ठज्या, ज्या(इ+प्र)-प्रग्नज्या अनयोति पृष्ठज्याx (इ-प्र) : ज्या (इ+प्र) चापयोरिप्टयोरित्यादिना ' ज्याइ कोज्याप्र-ज्याप्र कोज्याइ) ( ज्याइ कोज्यान+ज्याप्र कोज्याइ) वि अप्रज्या-ज्या x योगान्तरघातस्य वर्गान्तरसमत्वात् ज्याइ कोज्याप्र-ज्याप्र कोज्याइ पिर - ज्या इ (त्रि-ज्या प्र)- ज्याप्र (त्रि'-ज्याइ) मि ज्या इ. विरे-ज्या ज्या प्र-ज्याप्रति+ज्या ज्या वि - -पृष्टग्या+-अग्नज्या मान स्पष्टाधिकार ज्याइ त्रि-ज्या'प्र नि' त्रि (ज्याइ-ज्याप्र) नि नि =ज्या इ-ज्या' प्रअग्रज्या पृष्ठज्या तत्त्वदनानगाशोना एवमत्राद्य- शिजिनीत्यादिना प्रथमज्धा-२२५७, प्रथमज्या'=५०५६० स्वल्पान्तरात् अत ज्या'इ-५०५६० - अग्रज्याxपृष्ठज्या एतावता"ज्यावर्गात्खरसाक्षान्न वाणोनात्पूर्व- जीवया । अवाप्तमग्रजीवा स्यादग्राप्त पूर्वमिजिनी" एवमासन्नजीवाभ्या गजाग्न्यब्धिगुणमिते । व्यासाऽवावशिष्टज्या सिद्धयन्ति लघुकर्मणा" सशोधकोक्त- मुपपद्यते। एतद्ग्रन्यकारमतेन प्रथमज्यामानम् =५६।१५" एतद्वशेनाग्रज्यापृष्ठ- ज्ययोर्घातानयन ज्ञेयम् । तन पाते पृष्ठज्यया भक्तेऽग्रज्या भवेदग्रज्यया भक्ते च पृष्ठज्या भवेदस्योपपत्ति क्षेत्रयुक्तापि भवतीति । यदि तर इ-प्रथमचा तदा ज्या (इ-प्र)-पृष्ठज्या-० तथा ज्या (इ+प्र)= ज्या २ प्र=अग्नज्या परन्तु अग्रज्या पृज्या-ज्या' इ--५०५६०-ज्या इ-ज्या'प्र=०= प्रग्रज्या४० अग्रज्या-: एतस्य किमपि नास्नि परन्तु यदा पृष्ठज्या: 0 तदा त्वग्रज्यामान भवत्यत सशोधकोक्त- प्रकारो न समीचीन इति विशेषण खग्डते। तया च तद्वाक्यम्- पूर्वज्या यत्र शून्या प्रथमगुणमितिश्चज्ज्यका तहि विद्वन् अग्रज्या नैव सिद्ध्यति प्रथमगदितात्सशोधकोलप्रकारात् ॥ तस्मान्नित्य बुधेन्द्रनिखिलगणितजक्षे तयुक्तिप्रवीण । कार्यो जीवाविधाने सुलभगणितजो मद्विधिश्चादरेण ॥ अन समाधीयते अग्रज्य-पृष्ठज्या-ज्या इ-ज्याप्र यदि पृष्ठज्या= 0 तदा अग्रज्या ४०= ज्या' इ-ज्या वर्गातरम्य योगान्तरवातसमत्वात् अग्र- (ज्याद+ज्याप्र) (ज्याइ-ज्याप्र) परमन ज्याइ-ज्याप्र= ० त अग्न- अग्रज्याx० ज्याx०% (ज्याइ+ ज्याप्र)x० अग्रज्या=ज्याइ+ज्यान अतो लुप्तभिन्नसमीकरणेना तत्र सशोधकोक्तप्रकारेण ग्रज्यामानमुचितमेवागत मतोऽयप्रकार समीचीन एव नात्र कश्चिद्दोप इति ॥ अन विशेपेरणाग्रज्या पृष्ठज्ययोर्योगानयनमभिहित यथा इप्टचापम् । प्रथमचापमप्र । अग्रज्या-ज्या (इ+प्र) पृष्ठज्या- ज्या (इ~-प्र) अथ अग्रज्या+पृष्ठज्या ज्या (+) ज्या (इ-अ) चार योरिप्टयोरित्यादिना। ज्याइयोज्याप्र+ज्याप्र वोज्याइ , ज्याइ कायाप्र-ज्यान नावार वि + नि - ज्याXo- तत घटेश्वर-सिद्धान्ते अग्रज्या+पृष्ठज्या ज्याइ कोज्याप्र २ज्याइ (त्रि-उप्र) नि नि २ज्याइ उप्र ज्याइ. -२ ज्याइ- नि नि उप्र २ ज्याइ -२ ज्याइ =ज्याइ =अग्रज्या+पृष्ठज्या । अत्र त्रि=३४३८, एतावता तदुक्तमूत्रमुपपद्यते । जीवा स्वपप्तारियुगाशहीना द्विघ्नी च पूर्वज्यकया विहीना । स्यादग्रजीवा बृहतीति सर्वा आसन्नजीवाद्वयतो भवन्ति ।। अथ अग्रज्या+पृष्ठज्या-२ ज्याइ-२ ज्याइ पा द्वितीयखडम् (१००००) ४६७ २ ज्याइX१०००० अनेन गुण्यते भज्यते च तदा २ ज्याइ- -२ ज्याइ ४७६४१०००० ज्याइX२०००० =ज्याइ- ज्याइ ४३ = अग्रज्या+पृष्ठज्या। ४६७४१०००० १०००० एतावता "व्यन्धिनमौा अयुतेन लब्ध द्विनज्यकाया प्रविशोध्य शेषम् । विश्लिप्य पूर्वज्यकाऽनजीवा वेद्याऽनमोर्पा खलु पूर्व जोवा ।।" इत्युपपद्यते । पठित ज्याना में इप्टज्या से पूर्व चौर पर (पृष्ठग्या, अग्रज्या) जीवानो के गुणन. के सायन सिद्धातशिरामणि को टिप्पणी म पिये हैं। जैस कल्पना करते हैं इष्टचाप =इ । प्रथमचाप=प्र नव पृष्ठज्या ज्या (इ-प्र), अग्रज्या-ज्या (इ+प्र) दोनो के घात करने से पृष्ठज्या अग्रज्या ज्या (इ-प्र), ज्या (इ+प्र) चापयोरिष्टयोर्दोज्ये इत्यादि से (ज्पाइ. कोज्या-ज्याप्र बोज्याद) (ज्याइ कोज्याप्र + ज्याप्र कोज्याइ) नि =अग्रज्या पृप्टज्या योगान्तर घात वर्गातर के बराबर होता है इस नियम से ज्या इमाज्या'प्र-ज्या कोज्या ड ज्या'इ (त्रि'--ज्या प्र)--ज्या'प्र (त्रि' ज्याप्र) वि ज्याइ यि'--ज्याइ ज्या प्र-ज्या प्रत्रि'- ज्या प्रज्याइ त्रि' ज्या त्रि-ज्या'प्र त्रि_त्रि' (ज्या इ-ज्याप्र) त्रि' ज्या इ-ज्या'प्र प्रप्रज्या पृष्ठ- ज्या तत्त्वावस्नानगागोना एवमत्रायशिन्जिनी इससे २२५-प्रथमज्या । फन - स्पष्टाधिकार ३१७ प्रथमज्या वर्ग-५०५६० या इ-ज्याप्र-ज्या'इ--५०५६० = अज्याxपुज्या इससे "ज्यावर्गास्सरसामान बाणोनापूर्वजीवया, अवाप्समग्रजीवास्यादग्राप्त पूर्व- शिञ्जिनी । एवमासन्न जीवाभ्या गायब्धिगुणमिते। व्यासाऽत्र पनिटज्या सिद्धचन्ति लघुकर्मणा" सशोधकोक्त उपपन्न होता है । ग्रन्थकार (वटेश्वर) के मत से प्रथम ज्या- मान%D५६' । १५" इसके वश से अनज्या पृष्ठ ज्या के घात जानना चाह्येि । उस घात में पृष्ठज्या से भाग देने से अग्रज्या होती है और अग्रज्या भाग देने से पृष्ठज्या होती है। इस की उपपत्ति क्षेत्र युक्ति से भी होती है । यहां यदि इष्ट चा प्रथम चा तय ज्या (इ-प्र)-पृष्ठज्या--0,और ज्या (इ+-प्र) - ज्या २ प्रअग्रज्या परन्तु अग्रज्या ज्या-ज्या इ-ज्या प्र%Do=अग्रज्या ४० इसलिये अग्रज्या-: इसवा मान बुद्ध नही है परन्तु यत अग्रज्या मान है अत मोघरोत प्रकार समीचीन नही है यह विशेष १० सुधाकर द्विवेदी जी खण्डन करत हैं इसके विपय मे उनके वचन यह हैं। "पूर्वाज्या या शून्या प्रथमगुणमितिश्चेज्ज्यका तर्हि विद्वन् ।" इत्यादि यहा सगोधक प्रकार के समाधान परते हैं। अग्रज्या ज्या ज्या इ~-ज्या इ यदि पृष्ठ ज्या-. ज्या इ-ज्या प्र परन्तु वर्गान्तर योगालर घात के वरावर होता है (ज्या इ+ ज्याप्र) (ज्याइ -- ज्याप्र) परन्तु ज्याइ~ ज्याप्र - (ज्याइ+ज्याम). तव अग्नज्मा-.- अग्रज्याx०- अग्रज्याX01 प्रत प्राज्याXo इसलिये अग्रज्या-ज्याइ + ज्याप अत लुसभिन्न समीकरण से ससोधकोक्त प्रकार से यहा अग्नग्या वा मान उचित हो पाया। इगलिये यह प्रकार गमीचीन हो है, इसमे पुछ भी दोप नहीं है । यहा पर विशेष अग्रमा मौर पृष्टज्मा में योगानयन किये हैं। जैसे--पलाना करते है इष्टचाप । प्रथम चाप-=प्र । अग्रज्या ज्या (इ+प्र) पृज्या = ज्या (ड-प्र) तय अग्रग्या+पृज्या ज्या (s+प्र) + ज्या (इ -4) चापयोरिटपारित्यादि मे २ ज्याइ.कोज्या प्र+ज्या प्रबोज्याइ ज्याइकोज्या प्र-ज्या वोग्याइ + त्रि २ ज्याइयोग्या प्र - २ ज्य: उप्र २ ज्याइ (वि-उप्र) L८२ चाइ त्रि २ज्याद त्रि D ३१८ वटेश्वर सिद्धान्ते २ज्याड २ ज्याइ- अग्रग्या पृष्ठम्या ४६७ इममे उनका सून उपप न होना है। जीवा स्वसप्तारि युगागहीना द्विघ्नी च पूवज्यफया विहीना । स्यादगजीवा बृहतीति सर्वा प्रान नजीवाहयतो भवति ॥ २ ज्याइ अग्नज्या+पृज्या=२ ज्याइ--- यहा द्वितीय खण्ड म हर भाग्य को ४६७ २ ज्याइX१०००० ज्याइX२०००० (१००००) इमस गुणने मे २ ज्याइ-- ज्याइ- ४६७४१०००० ४६७४१०००० ज्याइX४३ =२ ज्याइ- =अग्रज्या ज्या । इससे त्र्यब्धिघ्न मौर्या प्रयुतेन ल प द्विप्नज्यकाया प्रविशोध्य शेपम् । विश्लिप्य पूज्यकयाऽग्रजीवा वेद्यानमौा सलु पूवजीवा ।। यह उपपन्न होता है। प्रय ख्यादिग्रहाणा मदपरिधीनाह । शका सदलेन्दुगरणा हगगा द्विभुजा सुरा शिवा स्पष्टा । रसवेदा नागाख्या रव्यादीना भवन्ति मदुपरिधय ॥४६॥ विमा-शका (१४) सदलेन्दुगुणा (३१।३०) इंगगा (७२) द्विभुजा (२२) सुरा (३३) शिवा (११) रसवेदा (४६) एते रव्यादीना ग्रहाणा स्पष्टा नागाख्या मृदुपरिधय (मन्दपरिधय ) भवन्ति ।। ४६ ।। अत्रोपपत्ति । मध्यममन्दस्पप्टग्रहयोरन्तर मन्दफलम् । परममन्दफलज्या मन्दान्त्यफलज्या वश्यते मध्यमग्रहान्म दान्त्यफलज्या व्यासार्थेन यवृत्त तन्मन्दनीचोच्चवृत्तम् । तत्परिधिर्मन्दनीचोचवृत्तपरिधि । एतज्ज्ञानार्थमनुपातो यदि त्रिज्याव्यासार्थे भाशा परिधयस्तदा मन्दान्त्यफलज्या व्यासार्थ किमित्यनुपातेन समागता मन्द नीचोच्च वृत्तपरिधय । सर्वेषा ग्रहाणा मन्दान्त्यफलज्या मानानि वेधेन ज्ञात्वाऽचा येण तहरीन मदनीचोच्चकृत्तपरिधय पठिता ये चाधोलिसिता सन्ति । खेम दपरिधिभागा चन्द्रस्य मदपरिधिभागा -३१।३०' " स्पष्टाधिकार गुरो मन्दपरिधिभागा -३३° शुक्रस्य शने -४६० सूर्यपिद्धान्तमतेन समपदान्ते रविमन्दपरिध्यशा==१४°, चन्द्रस्य-३२°, विषमपदान्ते विंशतिकलोना भवन्ति तेन रविमन्दपरिध्यशा =१३°१४०'। चन्द्रस्य -३१°१४०' भीमा हि ग्रहाणा समपदान्ते मन्दपरिधिभागा क्रमेण ७५°१३०°, ३३ ११२०, ३६' विएमपदान्ते क्मेण मन्दपरिघय ७२१२८°१३२०१११°१४८ सूर्यसिद्धान्ते एतदर्थमधोलिखितानि वाक्यानि सन्ति । रवर्मन्दपरिध्यक्षा मनव शीतगोरदा । युग्मान्ते विषमान्ते च नखलिप्तोनितास्तयो ।। युग्मान्तेऽद्रिय खाग्निसुरा सूर्या नवार्णवा । प्रोजे द्वयगा वसुयमा रदा रुद्रा गजाब्धय । ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते ब्रह्मगुप्तेन रविचन्द्रयोर्मन्दपरिधिभागा भिन्ना एव कथिता यथा तदुत्तानि वाक्यानि- मूर्यस्य मनुद्वितय व्यशोन दिनदले नतस्य प्राक् । तिथिघटिकाभिस्त्र्यशाधिकोनमूनाधिक पश्चात् ।। धुदले जिनलिप्तोन दशनद्वितय द्विशरक्लोन प्राक् । पश्चाद्युतोनमिन्दो सूर्यस्य ऋणे धने परिधि ।। एतदनुसारेण रवेऋएफले धनफले प्रागुन्मण्डलस्थे रवी परिध्यशा =१४१० प्रागुन्मण्डलस्थे रवौ परिध्यशा = :१३१२० मध्यान्हे '-१३१४०' मध्यान्हे =१३१४० पश्चिमोन्मण्डलस्थे रवी =१३२० पश्चिमोन्मलण्डस्थे रवी =१४१० चन्द्रस्य ऋणफले धनफले प्रागुन्मण्डलस्थे चन्द्र परिध्य शा -३०।४४' प्रागुन्मण्डलस्थे चन्द्रपरिध्यशा =३०१४४' मध्यान्हे =३१३६ मध्यान्हे --३११३६ पश्चिमोन्मण्डलस्थे चन्द्रे -३२१२ | पश्चिमोन्मण्डलस्थे ==३०१४४ तथा कुजादिग्रहाणा मन्दपरिव्यशास्तदुक्ता कुजज्य-७०, बुधस्य-३८ । गुरो =३३ । समपदान्ते शुक्रस्य-११ । विषमपदान्ते । शने -३०। भास्कराचार्यगाप्येतदनुसारमेव कथ्यते केवल शनैश्चर मन्दपरिधी पार्यक्यमस्ति। एतेन ज्ञायते यन्मन्दान्त्यफलज्या सदा स्थि- रानेत्यत एवाचायं कथितेषु मन्दपरियशेपु पार्थक्यमस्तीति ॥४६॥ प्रव ख्यादिग्रहो की मन्दपरिधि कहते हैं । हि भा-रवि के मन्दपरिप्पा-१४ । चन्द्र के मन्दपरिभ्या= ३१३०, दुज 11 " " " " %3D ३२० घटेश्वर-सिद्धान्ते के मप-७२ । बुध के मप-२२ । गुरु के मपरिधि-३३। शुक्र के मप%११। शनि के मप-४६॥४६|| उपपत्ति मध्यम ग्रह पोर मन्दस्पष्ट ग्रह के अन्तर मन्दपल है, परमम-दफ्लज्या मन्दान्त्यफलज्या कहलाती है, मध्यम ग्रह को केन्द्र मानकर मन्दान्त्यफलज्याव्यासाधं से जो वृत्त होता है । वह मन्दनीचोच्च वृत्त है । मन्दोच्चनीच परिधिज्ञान के लिये अनुपात करते हैं यदि त्रिज्याव्या- साध मे भाश परिधि पाते हैं तो मन्दान्य फनज्या व्यासाधं में क्या इस अनुपात से मन्दनीचोच्च वृत्तपरिधि पाती है, सब ग्रहो के मन्दान्यफल ज्या मानवेध से जानवर अचार्य उसके वश से मन्दनीचोच्च वृत्तपरिधि पठित किये जो उपयुक्त है । सूर्यसिद्धान्त के अनुसार समपदान्त मे रविमन्दपरिध्यश=१४। चन्द्र के मन्दप-३२, विषमपदान्त में बीम क्ला घटकर रविमन्दपरिघ्यश = १३४०' । चन्द्रमन्दप = ३११४०' भौमादिग्रहो के समपदान्त में क्रमश मन्दपरिध्यश ७५ । ३० । ३३ । १२ । ३९ । विपम पदान्त मे क्रमग मन्द परिध्यश ७२ । २८ । ३२। ११ । ४६. इसके लिए सूर्यसिद्धान्तोक्त अधोलिखित वाक्य है- रवेम दपरिघ्यशा भनव शीतगोरदा युग्मान्त दिपमान्ते च नखलिप्तोनितास्तयो । युग्मान्नेऽर्थाद्रय खाग्नि सुरा सूर्या नवाणंवा । प्रोजे द्वधगा वसुयमा रदा रुद्रा गजाधय ॥ ब्राह्मस्फुटमिद्धात मे ब्रह्मगुप्त रवि और चन्द्र के मन्दपरिघ्यश भिन्न ही कहते हैं, जैसे सूर्यस्य मनु द्वितय यशोन दिनदलेन तस्य प्राक् । तिथिघटिवाभिर यशाधिकोनमूनाधिक पश्चात् ॥ धुदले जिनलिप्तोन दशनद्वितय द्विशरखलोन प्राक् । पश्चाद्युतोनमिन्दो सूर्यस्य ऋणे घने परिधि ।। इसके अनुसार रवि के ऋए फल मे धनफ्ल मे पूर्व उन्मण्डलमे रविके रहने से मन्दपरि-१४१० पूर्व उन्मण्डलमे रविके रहने से मप १३।२०' =१३४० मध्यान्ह मे =१३१४०' पश्चिम उन्मण्डलमे रविके रहने से मप १३०१२०१ पश्चिम उन्मण्डल मे रवि के रहने मप ४०१०' चन्द्र के ऋगफल मे घनफ्ल में पूर्व उन्मण्डलमे चन्द्र के रहने से मप ३०॥४४' पूर्व उन्मण्डलमे चन्द्र के रहने मेमप ३०४४' मध्यान्ह मे =३१॥३६ मध्यान्ह में -३१।३६' पश्चिम उन्मण्डल मे चन्द्र रहने से "३२।२८ पश्चिमउन्मण्डल मे चद्र से रहने से म३०४४' तथा कुजादि ग्रहो के ब्रह्मगुप्तोस्त मन्दपरिध्यमा ये हैं--कुजम प%3D७० । बुधमदा- ३८ । गुरुम प= ३३ । समपदात में शुभम दप-११ । विषमपदात में शुक्म दपनि के मन्दपरिघ्य %-३० । नारसराचार्य भी एतदनुसार ही रहते हैं केवल मानकर वो भन्दपरिधि मे भन्तर पडता है । इससे मालूम होता है कि मन्दान्त्यफलज्या बराबर एक रूप नहीं रहती है जिसके कारण मन्दनीचोच वृत्तपरिधि पाठ में माचार्यों के मतो मे भेद हैं ॥४॥ M मध्यान्ह में " " स्पष्टाधिकार इदानीं भौमादिग्रहाणा शीघ्रपरिधीनाह । त्रिगुणयमा वसुविश्व शरर्तवः खोत्कृती तयाक्षिगुणाः । शंघ्रयास्त्वमी परिधयो भौमादी हि संददशाख्याः ॥५०॥ विभा-निगुणयमा (२३३) वसुविश्वे (१३८) शरत्र्तव (६५) खोरकृती (२६०) अक्षिगुणा (३२) भौमादीना ग्रहाणाममी शैघ्रया परिचय सद. दशाख्या भवन्ति ॥५॥ अनोपपत्ति भौमादिग्रहाणा परमशीघ्रफलानाज्या शीघ्रान्त्यफलज्या कथ्यते, विम्बीयकर्णा- नयनप्रकारेण विम्वीयकर्णजान कृत तस्य परमत्वे उच्चस्थो ग्रहो भवेत्तत्र परमो- चकर्ण -नि+शीघ्रान्त्यफलज्या परमोच्चकर्ण-त्रि= शीघ्रा यफलज्या, तथा विम्बीयकर्णस्य परमालवे नीचस्थाने ग्रहो भवेदतस्तर परमनीचकर्ण =वि- शीघ्रान्त्यफलज्या तत, नि-परमनीचवर्ण-शीघ्रान्त्यफलज्या, अनया रीत्या शीघ्रान्त्यफलज्यामान ज्ञात्वाऽनुपातो यदि त्रिज्या व्यासार्थे भाशा परिधयस्तदा शीघ्रान्त्यफलज्या व्यासापे किमित्यनुपातेन समागच्छन्ति शीघ्रनीचोच्चवृत्तपरिधयो ये चोपर्युक्ता सन्ति, मन्दस्पष्टग्रहाच्छोघ्रान्त्यफलज्याव्यासाधून यवृत्त तच्छीघ्रनी- चोच्चवृत शीघ्रनोचोच्चवृत्तपरिधिर्वा । सूर्यसिद्धान्ते तु शीघ्रान्त्यफलज्याऽपि सदा न स्थिरेति विचार्य समविषम पदान्तभेदेन परिध्यशा भिन्ना भिन्ना कथिता, यथा- कुजादीनामत शैघ्रया युग्मान्तेऽर्थाग्निदलका । गुणाग्निचन्द्रा खनगा द्विरसाक्षीणि गोग्नय ॥ प्रोजान्ते द्विनियमला द्विविश्वे यमपर्वता । खतु दस्रा वियद्वैदा शीघ्रकर्मणि कीर्तिता ॥ इति भास्कराचार्य "एपा चला कृतजिनास्त्रिलवेन होना दन्तेन्दवो वसुरसा वसुबारसदस्रा । पूर्णाधयोऽथ भृगुजस्य तु मन्दकेन्द्र दो शिञ्जिनी द्विगुणिता त्रिगुणेन भक्ता । लब्धेन मन्दपरिधी रहित स्फुट स्यात्तच्छीघ्रकेन्द्रभुजमौर्व्यथ वारानिनी। विज्योद्धृतासु परिधि फलयुक् स्फुट स्याद् भीमाशुकेन्द्रपदगम्यगताल्पजीवा । यशोनशैलगुरिगताम्रयुतस्य राशेमौर्योद्धता प्रलवहीनयुत मृच्चम् । भौमस्य ककिमकरादिगते स्ववेन्द्र लब्धाशविरहित परिधिस्तु शैया ।। एभिः श्लोक कुजादिग्रहाणाशीघ्रपरिधिभागा पटिता , बुजस्य -२४३१४०' वृधशीघ्रोच्चस्य१३२ ।गुरो =६८, शुक्रगीघ्रोच्चस्य =२५८, शनै =४० अनापि
३२२
वटेश्वर-सिद्धान्ते
ब्रह्मगुप्तोक्तशनिमीघ्रपरिधितो भाम्परोक्तपरिघे पार्थक्यमस्ति, भास्करण
मङ्गलशुन्योः परिध्यो स्पष्टीकरण कृत यच्च तदुक्तदलोकेभ्यो ज्ञायते । ग्रन्थकारो.
(वटेश्वरो)क्त शीघ्रपरिधिभ्यो भास्करादिपठिन शीघ्रपरिधीना
महदन्तर-
मिति प्रत्यक्षमेव दृश्यते । ग्रन्यकारेण परिघे स्फुटीकरणादिक किमपि म कृत यथा
भास्करेण कुजशुक्यो कृतम् । भास्करेगापि कथ तयो (दुजशुक्रयो ) एव स्फुटी-
करण कृतमन्येपा न कृतमत्र कारण किमपि न प्रदर्शितमिति ॥५॥
अव भोमादि ग्रहों के दीघ्र परिधिमान कहते हैं।
हिमा-२३३।१३८१६५।२६०।३२ ये कमा भौमादि ग्रहो के बीनपरिघ्यग
( सददशमज्ञक) हैं।
उपपत्ति
भौमादि ग्रहो के परम शीघ्र फल की जो ज्या है वे सीमान्त्यफ्लज्या कहलाती है।
मन्द स्पष्ट ग्रह को केन्द्र मानकर शीघ्रान्त्य फलज्या व्यासाचं से जो वृत्त होता है वही शीघ्र-
नीचोच्चवृत्त परिधि है । उसके ज्ञान के लिये पहले शीघ्रान्त्य फ्लज्या ज्ञान परते हैं। ग्रहो के
बिम्बीय कर्णज्ञान प्रकार से विम्वीय ज्ञान किय, उसका परमत्त जब होगा तब
उच्चस्थान मे ग्रह रहते हैं। इसलिये वहा परमोच्चा-त्रिज्या+गीतान्त्यफ्लज्या एव
विम्वीयरर्ण की परमाल्यता मे ग्रह नीच स्पान म रहते हैं प्रत परमनीचवर्ण-त्रि-शोधा.
न्स्यफ्लज्या परमोधररण-त्रि-शीघ्रान्त्यफ्लज्या। धि-परमनीचवर्ण-शीघ्रान्त्यफलज्या
इस तरह शोप्रान्त्यपजग्या जान कर अनुपात करते हैं यदि निग्याव्यासाधं मे भाश(३६०)
पाते हैं तो शीघ्रान्त्य फ्लज्या व्यासापं में क्या इस अनुपात मे चीननीचोच्च वृत्तपरिधि
प्रमाण माता है । जो अपनी शीघ्रान्य फ्लज्यावश उपर्युक्त के बराबर है।
मूर्य सिद्धान्त मे शीघ्रान्त्य फ्लज्या भी सदा स्थिर नही है यह विचार कर सम विषम
पदान भेद मे भिन्न-भिन्न परिघ्य । पठिन किये हैं। जैसे-
कुनादीनामत घ्या युग्मान्तर्याग्निदपत्रा । गुणाग्निचन्द्रा सनगा द्विरमानोणि
गोऽग्नय । मोजान्ते द्विमियमला द्विविश्वे ममपर्वता । सतुदरा वियदा मोघवर्मरिए
कोत्तिता ॥ इति
भास्कराचार्य ने अधोलिखित पद्या द्वारा प्रधोलिखित शीघ्र परिघि पटिन भी हैं ।
एपा चला तिजिनास्त्रिलवेन हीना दन्तेन्दवो वमुरसा वमुवाणदसा ।" इत्यादि
दुपरिधिः-२४३।४,' बुघशीघ्रोचारिधि= १३२ । गुरुसोमपरिधि = ६८, शुक्र-
शीघ्रोच्च परिधि% ०५८। शनिशीघ्रपरिधि=४० । यहा भी शनिशीघ्रपरिधि ब्रह्मगुप्तोक्त
से भास्करोक्त भिन्न है । भास्कराचार्य ने मङ्गन और गुरु का परिधिस्पष्टीकरण दिया है।
अन्धकार (घटेश्वर) पनि शीघ्रपरिधिमानो से भाम्करादिसठितशीघ्र परिधिमान बहुत भिन्न
है, भास्कराचार्य ने क्षेत्र र कुन मोर शुक्र का ही परिधिम्पष्टीकरण दिया है इमरे कारण को
नही पहा है ॥५॥
म्पदाधिकार इधानी मन्द्रमभिधीयत सेतो भुजकोटिज्यादिकल्पना चाह । मन्दतुङ्गरहितो नभश्वरी मन्दकेन्द्रमथ खेचरोनितम् । शीप्रमत्र चलकेन्द्रमुच्यते तत्पदानि भवनस्त्रिमिस्तिमि ॥५१॥ अयुक् पदेस्तो गतयेययोगुणो भुजाप्रसज्ञो युजि येययातयो । भुजाग्रभागोरक्रममौविकोनिता त्रिमौविका वेतरमौविका भवेत् ॥५२॥ विमा -नभश्वर (देशातरभुजान्तर बीजकर्म सस्कृतो मध्यमग्रहा भौमा. दिमन्दस्फुटश्च) मन्दतुङ्गरहित (मन्दोच्चहीनिन ) तदा मन्दकेन्द्रम् । खेचरोनित (मन्दस्पष्टग्रहरहित) शीघ्र (शीघ्रोच्च ) चलकेन्द्रमुच्यते (शीघ्रकेन्द्र कथ्यते) त्रिभि- स्त्रिभिस्तद्भवन (विभिस्त्रिभि पेन्द्रराशिभि) पदानि भवन्ति अयुक पदे (विषमपदे) गतयेययो (गतागतचापयो ) गुणौ (जीवे) भुजाग्रसजी (गतचा- पज्या, गम्यचापज्या कोटिज्या परमेते भुजकोटिज्ये भुजाग्रसज्ञिके) युजि (समपदे) येययातयो (गम्यगतचापयो ) गुणी भुजाग्रसज्ञो । भुजाग्रभागोत्म्ममाविकोनिता निमोविका ( भुजाग्राशोत्क्रमज्योनत्रिज्या) इतर मौर्विका ( भिन्नभुजाग्रसज्ञका) भवेत् ।। ५१-५२॥ म = वृत्तकेन्द्रम् । मच इष्टचापम् चस: इटचापकोटि । चर-इष्टचापज्या-भुजा- व र ग्रसज्ञकम्। चप-इष्टचापकोटिज्या-द्वितीय भुजाग्रसज्ञकम् । रम- इटचायोत्क्रमज्या- भुजाग्रभागोकमज्या । सप == इष्टचापकोट्यु- प (कमज्या -द्वितीयभुजायभागोत्क्रमज्या । नम --विज्या। नस-त्रिज्या। नम-रम-त्रि-- भुजानभागोत्क्रमज्या -रन-चप-द्वितीय- -कोटिज्या चित्र २ भुजाग्रसज्ञक तथा नस-सद- नप ==त्रि-द्वितीयभुजाग्रभागोत्क्रमज्या-नि-कोटयु कमज्या-भुजाग्रसज्ञक-भुजज्या-चर॥ ५१५२ ।। हि मा--प्रय केन्द्र कहते है उससे भुजज्या और कोटिज्यादि कल्पना कहते हैं। देशातर भुजा तर बीजकर्म सस्कृत मध्यम ग्रह मे भौमादि मद स्पष्ट ग्रह में मन्दोच्च घटाने से मदके द्र होता है । शोघ्रोच्च मे माद स्पष्टग्रह को घटाने से शीघ्रवेन्द्र होता है तीन तीन के द्रागियो के एक एक पद होते हैं। विषम पद में गत चापज्या और गम्य चापज्या सुजान सज्ञक (अर्थात् गत चाप की ज्या, गम्य चाप की कोटिज्या) प्रथम मौर द्वितीय भुजान सज्ञक हैं । समपद मे गम्य और गत चाप को ज्या भुजाय सज्ञक (गम्य चाप को ज्या, और गनचाप को कोटिज्या ) है । भुजामाशोत्क्रमज्या को त्रिज्या म घटाने से भिन्न यटेश्वरलसिद्धान्त अनाम राशा (विपा में भुजांगो समस्या पटाने से योटिग्या समर) होता है ॥ ५१-५२ ।। वित्र दो देखिये । न वृत्तपेन्द्र । मच =इष्टचाप, पम= इष्टचाप कोरि, परप्टचापज्या=भुगाप्रम। पप=इष्टपापकोटिज्या= द्वितीय भुजाग्रसज्ञक रम = पाप की उरकममा भुजान भागोरक्रमज्या । गम: इटपाप कोटि वी उत्तमज्या द्वितीय मुज्ञान भाग की उत्क्रमज्या। नम= त्रिज्या । नस त्रिज्या, नम-रम-त्रि-मुजाग्रभागोत्क्रमच्या=रन: चप -द्वितीय भुजाममनन-कोटिग्या तथा नसमपन्नपत्रि-द्वितीयमुजाग्रभागोरक्रमज्या= त्रिवोट्युत्क्रमज्या= भुजायज्ञक = चर= भुजज्या ॥ ५१-५२ ॥ इदानी भुजज्यालोटिज्ययोरेक्तो द्वितीयज्ञान प्रमज्याज्ञान चाह । त्रिज्या याप्रमौर्यो. कृतिविवरपदं वेतरज्या प्रदिष्टा। बाह्वग्रज्या त्रिमौर्योविवरयुतिहतेमूलमाहुस्तयोर्वा । व्यासस्य प्रस्तजीचा विरहितनिहतेर्यस्पद सा क्रमज्या। ध्यासना व्यस्तजीवा निजकृतिरहिता मूलमस्या क्रमज्या ॥ ५३॥ विभा-निज्यावाहग्रमीयर्यो कृतिविवरपदं (निज्यासुजाग्रज्ययोर्व- र्गान्तरमूल) इतरज्या प्रदिण्टाद्वितीयभुजाग्रज्या कथिता) अर्थात् त्रिज्याभुजज्ययो- बनान्तरमूल कोटिज्या वा त्रिज्याकोटिज्ययोर्वन्तिरमूल भुजज्या भवेत् । वा तयोर्बाह्वग्रज्या विमोििववरयुनिहते पद (निज्या भुजानज्ययोर्योगान्तर- घातमूल) इतरज्या (द्वितीयभुजाग्रज्या) आहु (प्राचार्या कथितवन्त ) । व्यस्त- जीवा विरहितनिहिते (उत्तमज्या रहितगुरिणतस्य) व्यासस्य पद (मूल ) यत् सा मज्या भवति । व्यस्तजीवा (उत्तमज्या) व्यासन्ना (व्यासगुरिगता) निजकृति- रहिता (स्ववर्गहीना) अस्या मूल तदा कमज्या भवतीति ।। ५३ ॥ प्रयोपपत्ति । चित्र द्वितीय द्रप्टव्यम् । नच'--चर--रन =त्रि'- भुजाग्रज्या =नि-भुज- ज्या = द्वितीयभुजानज्या= ० कोटिज्या' मूलेन /नि'-भुजाग्रज्या = (त्रिन भुजाग्रज्या) (घि-भुजाग्रज्या) V(वि+भुज्या) (मि-भुज्या) = द्वितीय भुजाग्रज्या कोटिज्या । चर= रवनमज्या। मत-ध्यास । मर-उत्तमज्या, अथ रेखागणित तृतीयाध्यायेन मर रत= चरxरवउज्या (व्यास-उज्या)-उज्या व्यास -उज्याकमज्या' स्पष्टाधिकार मूलेन Vउज्या (व्यास--उज्या):/उज्या व्यास-उज्या' =कमज्या अत उपपन्नमाचार्योत्तम् ॥ ५३ ॥ हि मा--प्रय भुजज्या और कोटिज्या में से एक दूसरे के ज्ञान और क्रमज्या के ज्ञान कहते है । विज्या और भुजाग्रज्या के वर्गातरमूल द्वितीय भुजाग्रज्या होती है अर्थात् निज्या और भुजज्या के वर्गान्तर मूल कोटिज्या तथा त्रिज्या, और कोटिज्या के वन्तिरमूल भुजज्या होती है । या त्रिज्या और भुजाग्रज्या के योगान्तर घात मूल द्वितीय भुजाग्रज्या या कोटिज्या होती है । व्यास में उत्क्रमज्या को घटाकर और उरक्रमज्या से गुणवर मूल लेने से कमज्या होती है। व्यासगुणित उत्क्रमज्या में उत्क्रमज्या वर्ग घटाकर मूल लेने से क्रमज्या होती है ॥५३॥ उपपत्ति । चित्र (२) देखिये । नच-चर' रम'वि'-भुजामज्या= विभुजज्या: द्वितीयभुजाग्रज्या कोटिज्या' मूल लेने से नि--- भुजाग्रज्या' =V(नि+भुजाग्नज्य ) (नि--भुजानज्या) V(त्रि+भुजज्या) (नि-भुज्या) द्वितीय भुजाग्रज्या कोटिज्या । वर=रव=क्रमज्या । मत~ व्यास 1 मर= उत्क्रमज्या, रेखागणित तृतीय अध्याय से मर रत-चरx रव==उज्या (व्यास-उज्या)= उज्या व्यास-उज्या मूल लेने से क्रमज्या। /उज्या (व्यास--उज्या) =उज्या व्यास - उज्या प्राचार्योक्त उपपन्न हुआ ॥ ५३॥ इटानी क्रमज्योत्नमज्याच्या व्यासानयनमाह । कमरगुरणकृतिविभक्तोत्क्रममौर्या च फल युत हि व्यास । अन्यकोटिभुजाशास्त्रिमाद विहीनाद् गुरगो वाया ॥ ५४ ॥ वि भा.-क्रमणगुणकति (क्रमज्यावर्ग) उत्क्रममौर्या (उत्क्रमज्यया) विभक्ता, फलमुत्क्रमज्ययायुत तदा व्यासो भवेत् । निभात् (राशित्रयात्) विहीनात् (शोधितात्) अन्यकोटिभुजाशाद् गुण अन्या ज्या भवत्यर्थात्कोटिचापरहितनव- त्यशचापस्य ज्या भुजज्या भवेदिति ॥ ५४ ।। अनोपपत्ति पूर्वश्लोकोपपत्तौ सिद्ध यन् उज्या (व्यास- उज्या)=मज्या पक्षौ उज्या भक्ती तदा व्यास-उज्या- नमज्या तत पक्षयो 'उज्या' योजनेन उज्या कमज्या -+ उज्या-व्यास । एतावताऽऽचार्योक्तमुपपन्नम् । लीला- वत्या भास्करण जीवार्धवर्गे शरभक्तयुक्त व्यासप्रमाणमि" त्यादिना एवमेव उज्या वटेश्वर-सिद्धान्ते कथ्यते । अन्यकोटिभुजाशादित्यादिक्थनस्याऽत्रावश्यक्ता नास्ति, म च विषय पूर्व- मेव प्रतिपादितोऽस्त्यन निरर्थकमिव प्रतिभातीति ॥ ४ ॥ हि भा --प्रव कमन्या और उत्तमज्या से व्यास का पानयन करते है । अमज्या- वर्ग मे उत्क्रमज्या से भाग देवर उत्तमज्या जोडने से व्यास होता है। तीन राशि (० अश) में अन्य कोटि भुजाग घटाने से जो शेष रहता है उसका ज्या भुनांग ज्या होती है। उपपत्ति । पहले श्लोक की उपत्ति मे सिद्ध हुआ कि (व्यास-उज्या) उज्या=कमज्या दानो क्रमज्या पक्षो म 'उज्या' से भाग देन से व्यास--उज्या- दोनो पक्षो म 'उज्या' जोडने से उज्या क्रमज्या +उज्या व्यास इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुअा। उज्या लीलावती म भास्कराचार्य 'जीवाधंवर्ग दारभवतयुक्त व्यासप्रमाणम्' इत्यादि से यही बातें कहते है । अन्य कोटि भुजाशाद इत्यादि कह्न की यहा जरूरत नहीं है क्योकि यह विषय पहले कहा जा चुका है जो यहा निरर्थक मालूम होता है ।। ५४ ॥ इदानीमिप्टचासज्यानयनमाह । धनुषाहृतास्त्वभीष्टा लिप्ता ज्या ज्यान्तराहताच्छेपात् । धनुषाहतात्फलयुता ज्या कोटिज्या भुजज्या वा ॥ ५५ ॥ विभा-अभीप्टा लिप्ता (इप्टचापकला ) धनुपाहृता (प्रथपचापभक्ता) तदा ज्या (गतज्या ) भवन्ति, शेपात् (शेपचापात्) ज्यान्त रहतात् (गतज्या भोग्य. ज्ययोरन्तरगुणितात्) धनुपाहृतात् (प्रथमचापभक्तात्) फलयुता ज्या (गतज्या) सदा कोटिज्या वा भुजज्या भवेदिति ।। अनोपपत्ति। व जव वृत्तपाद = ६० । के श =वृत्तकेन्द्रम् । सश=गत- प ज्या। नर=भोग्यज्या: चव-इप्ट- म चापम् । चप-इष्टज्या, गतज्याभोग्यज्ययोर- न्तरम् । सन-प्रथमचा च र अग्रिमज्या, ज अनटचापक्ला लब्धि प्रथमवा के चित्र सरयक्गतज्या, रोपचापम् % ३२७ स्पष्टाधिकार सच, चन-इष्टज्यागतज्ययोरन्तरम् तत., सनम, सचल निभुजयो सजा- य मत्वाऽनुपात क्रियते यदि प्रथमचापेन गतज्याभोग्यज्ययोरन्तर लभ्यन्ते तदा शेपचापेन किमित्यनुपातेनागत शेषचापसम्बन्धि ज्यान्तरम् (भोग्यज्या-गतज्या)xशे (एप्यज्या-गज्या) शे -चल अनेन सहिता गत- प्रथमचा प्रथमचा ज्ये (सश) प्टज्या (चप) भवेत्तत प्राचार्योक्तमुपपद्यते । अथ सनम, सचल निभ- जयो साजात्यमरित नवेति विचायते । केन, केच रेखे कार्य तदा <केनव=80, <केचव = ६० पर चवेप कोणात् नकेर कोणोऽधिकोऽस्त्यत केचप कोण केनर कोणादधिकोऽत सनमकोण सचलकोणादधिक सिद्धोऽत उक्तत्रिभुजयो साजात्य न सिद्ध, तयोस्त्रिभुजयो. साजात्य मत्वाऽचार्गीण ज्यानयन कृतमतस्तदा- नयन न समीचीनमिति । भास्कराचार्यादिभिरप्येवमेव ज्यानयन कृतमस्ति नै तपादे चतुर्विशतिमिता जीवा.पठिता , अनेन ग्रन्यकृता (६६) यण्णवतिसख्यका जीवा पठितास्तेपा ज्यानयनेऽपीयमेव श्रुटिरस्ति या चानास्तीति ।। अथ यदीष्टचाप प्रथमचापादल्प भवेत्तदा गतज्यामानम्-० तत्र एप्यज्या प्रथमज्या अत पूर्वानीतेप्टज्याः ...(एप्यज्या--गज्या) x शे प्रथमचा (प्रज्या-०)xशे प्रज्या शे प्रथमचा प्रथमचा तेन प्रथमचापेन प्रथमज्या लभ्यते तदा शेपचापेन किमित्यनुपातेन शेषाशज्या भवेदिति । अयमेव क्रम उत्क्रमज्यास्वपि भवेत्पर तन महत्स्थौल्य भवति अथ प्रथम- चापम् = प्र, प्रथमचापतोऽल्पेष्टचापम्-इ । तदा प्रज्या इ. प्रज्या'.इ. २-इज्या तत त्रि'-इज्या'-इकोज्या'नि: मूलग्रहणेन गतज्या+ D इकोज्या-नि-प्रज्या' इ. २ त्रिप्र स्वल्पान्तरान् । तत नि-इकोज्या=इउज्या -नि-(त्रि- प्रज्या अन यदि इ-प्र तदा २ त्रि प्र २त्रि प्र प्रज्या प्र उज्या प्रउज्या इ. अत इउज्या २नि एतेन सिद्ध यद्यदि प्र' प्रथमचापवर्गण प्रथमोत्नमज्या लभ्यन्ते तदेष्टचापवर्गेण किमित्यनुपातेने- टोत्क्रमज्या समागच्छत्येतादृश एवानुपात कर्तव्य जमज्यानयने यो विधि स चो- स्क्रमज्यानयने नाश्रयणीयोऽत सूर्य सिद्धान्तोक्त 'चनमज्यास्वपि स्मृत' मिद न समीचीनम् । यद्यपि पूर्वोक्त टोत्क्रमज्यानयनमपि न समीचीन मिति तदुपपत्तिदर्श- ३२८ वटेश्वर-सिद्धान्त नेनैव स्फुटं पर किंक्रियेत, अक्रान्मन्दकर्णोऽपि श्रेयानित्युक्तघा तदानयन प्रद. शिमिति ॥ ५५॥ हि. भा.-प्रव इष्टयान के ज्यानयन कहते हैं । इपचापक्ला को प्रथमनाप से भाग देने से लब्धसख्या गतज्या होती है, शेषचाप को गतश्या और एप्पग्या के अन्तर से गुणकर प्रथमचाप से भाग देने से जो फल हो उसको गतग्या में जोडने से इष्टज्या होती है ॥५॥ उपपत्ति (१) चित्र देखिये । जव =वृत्तपाद है-६० वृत्तकेन्द्र । सा-गतज्या, नर-. एथ्यज्या-अग्निमज्या व इष्टचाप, चप=इप्टज्या, नम=गतल्या पोर एप्यज्या के अन्तर, सन प्रथमचाप इप्टज्यागतज्ययोरन्तरम् चन, सच-शेपचापम् । इष्टचापक्ला प्रथमचाप लब्धसत्यगतज्या । मनम, सचल दोनो त्रिभुजो को सजातीय मानकर अनुपात करते हैं यदि प्रथमचाप में गतज्या एप्यज्या के अन्तर पाते हैं तो शेपचाप मे क्या इस अनुपात से दोष- चाप सम्बन्धी ज्यान्तर पाता है । (एज्या-गतज्या) मे = चल । इसको (मस) गतग्या में जोड़ने से चप इष्टज्या होती है ।। इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुआ। पहले मनम, सचल दोनो त्रिभुजो को सजातीय मानकर अनुपात किया गया है पर उन दोनो में सजातीयत्व है या नहीं इसके लिये विचार करते हैं । केन, केच रेखायें कर देते हैं, तब <नव=६०, <केचव=१० परन्तु चकप कोरा से नकर कोण अधिक है इसलिये केचप कोण केनर कोण से अधिक हुआ प्रत सनम कोण सचल कोण से अधिक सिद्ध हुमा इसलिये उक्त दोनो विभुजो मे सजातीयत्व नही सिद्ध हुमा, परन्तु उक्त त्रिभुजद्वय को सजातीयत्व मानकर प्राचार्य अनुपात द्वारा ज्यानयन किये हैं। इसलिये यह मानयन ठीक नहीं हैं 1 भास्कराचार्यादि भी इसी तरह ज्यानयन किये हैं । ये लोग वृत्तपाद में चौबीस ज्या पटित किये हैं और ये प्रन्यकार ६६ छियानवे ज्या पठित किये हैं, इनके ज्यानयन में जो स्थूलता है वही उन लोगो के ज्यानयन प्रथमचा मे भी है। यदि इष्टचाप प्रथम चाप से मल्प है तब वहा गतज्या=०, एप्यज्या-प्रथमज्या इसलिये पहले लाई हुई इप्टज्या-गतज्या + (एष्यज्या--गलज्या) शे (प्रथमज्या-)ो + प्रथमचा प्रथमचा प्रज्या-दो 'मत प्रथमचाप में प्रथमज्या तो शेष वाप में क्या इस अनुपात से पाशज्या प्रथमचा होती है । यही विधि उत्तमज्या में भी होती है परन्तु उममे बहुत स्पूलता होती है। पदि इष्टचापप्रथम चाप से प्रत्प है तो इष्टचाप -३ । प्रथम चापप्र तब ज्या स्पधाधिकारी ३२६ प्रा प्र प्रत. इउज्या- २त्रि इसके वर्ग को त्रिज्यावर्ग में घटाने से त्रि'-प्रज्या'. इ' =नि'-इण्या'=इकोज्या' मूल तेने से त्रि- प्रज्या =इकोज्या, त्रि--इकोज्या-इउज्या-त्रि-(त्रि- प्रज्या है')_प्रज्या त्रि प्रा यदि इप्रतव उज्या- प्रज्या, प्रउज्या.इ' इसमे सिद्ध होता है कि यदि प्रथम चापवर्ग में प्रथम उत्क्रमज्या पाते हैं तो इष्टचाप वर्ग मे क्या इस अनुपात से इप्टोत्ममग्या कुछ मूक्ष्म पाती है। ऐसा ही अनुपात बरना चाहिए । कमज्यानयन में जो विधि है उसको उत्तमज्यानयन मे नही लेनी चाहिये इमलिये मूर्यसिद्धान्त मे 'उत्तमज्यास्वपि स्मृत.' यह जो कहा है मो ठीक नहीं है । यद्यपि उपर्युक्त उस्क्रमज्यानयन भी ठीक नहीं है यह उमकी उपपत्ति देखने ही से स्पष्ट है । पर क्या दिया जाए, जो दिखलाया गया है उसके अतिरिक्त दूमरी गति नहीं है ॥५॥ इदानीमशादिज्यानयनमाह । अंशादितिथिलब्धं जीवा जीवान्तरा हता भक्ता । पष्टया कलादिलब्धं जीवायुक्त गुणो वा स्यात् । ।।५६॥ भागात्पष्टिगुणाद्वा तिथिभक्त मौविका विशेषहतात् । ज्याविवरात्तभक्ताल्लब्धयुता मौविकाऽप्येवम् ॥७॥ स्पष्टार्थों। अत्रोपपत्ति पूर्ववत्स्फुटवास्तीति । हि भा -दोनों दलोको के अर्थ स्पष्ट है । उपपत्ति भी पहले की उपपत्ति की तरह स्पष्ट ही है। इदानी पुनरपि ज्यानयनमाह । कृतसंगुरिणता लिन्त स्थितियानहता. 'फलं गुए शेयत् ।। ज्यान्तरहताद विभक्तात्तत्वयमलब्धयुग्गुणा जोवाः ॥५॥ वि. मा लिप्ताः ( इष्टचापकला ) कृतसरिणता (चतुभिर्गुणिता.) तिथिवर्ग (२२५) हृताः (२२५ एभिर्भक्ता ) फल गुण. (गतज्या) भवेत् । शेषात् (शेपचापात्) ज्यान्तरहतात् (गतज्यघ्यज्ययोरन्तरगुरिणतात् । तत्त्वयमै- विभक्तात् (२२५) एभिभक्तात्। लब्धयुग्गुणा (लब्धयुक्ता गतज्या) जीवा (इप्टज्या) भवेदिति ॥५॥ अनोपपत्ति अन्यगचार्यवृत्तपादे २२५, २४२२५, ३+ २२५ इत्यादि चापकलाना चतुर्विंशतिसस्यका ज्यामानानि साधयित्वा पठितानि सन्ति, अनेन ग्रन्थकारेगा
तत
वटेश्वर-सिद्धान्ते
२२५ एतच्चापचतुर्थाशचापतुल्यप्रथमचापतद्विगुणितत्रिगुणितादिचापाना ज्या
"पण्णवतिसख्यका साधयित्वा पठिता । अतएवैतन्नियमानुसारेणेप्टचाप यदि
.चतुभिर्गण्येत तदा २२५ एतच्चापानुसार चापमान भवेत्ततस्तच्चापस्य (इष्टचापस्य)
ज्यानयन पूर्ववदेव भवेद्यथा
इष्टचापकला
-लब्धसम्यक गतज्या,
(एज्या--गतज्या)xशे_
-शेषचाप
२२५
२२५
मम्बन्धीय ज्यान्तर एतस्य गतज्याया योजनेप्टज्या स्यात् । भास्कराचार्यादिभिरेव-
'मानयन कृतमस्तीति ॥५८||
पुन ज्यानयन करते है।
हिमा-इष्टचापक्ला को चार गुणकर (२२५) दो सौ पच्चीम में भाग देने से
लब्धसख्यक गतज्या हानी है। शेष चाप को गतज्या एप्टज्या के अन्नर से गुणवर (२२५) से
दो सो पश्चीम मे भाग देवर जो फल होता हो उनको गतज्या मे जोड़ने में इष्टण्या
होती है ॥८॥
उपपति
अन्य प्राचाय वृत्तपाद मे २२५, २२५४२, २२५४३ इयादि चाप
पलामो वो चौबीस ज्यामो के मान माधन कर पठिन किये हैं, और य अथवार २२५ इसके
चतुर्थाशनुल्य प्रथमचाप, २ प्रथमचाप, ३ प्रथमचाप
इत्यादि पापो को ज्याए १६
सरूया माधन वर पटिन क्यि हैं, इमलिय इनर (ग्रन्यवार वे) नियमानुमार इप्दचाप को
यदि चार मे गुरखा देंगे तो २२५ इम चाप ने अनुमार चापमान होगा तय उम चाप के
ज्यानयन पूर्ववत् करना । यया-
r
%D
इष्टचापवन्ना
लन्धमस्या गतग्या । गेप चार से अनुपात करते हैं।
૨૨૬
(एज्या-ज्या)
शेषचार मम्म पो ज्यान्तर, दमको गनग्या म जोडने में इप्टज्या होती
२२५
है । भास्कराचार्य प्रादि इमो तरह ज्यानयन किये हैं ॥१८॥
इदानीं ज्यातरचापानयनमाह ।
ज्या प्रोग्यं वासरपतिः शेषगुणा ज्यान्तराधि हतिभफ्ता।
फलयुक् स्पादसशर शुद्धसंख्या हतिश्चापम् ॥५६॥
विमा यम्या जीवायाश्वापारणमभीप्ट तत्र यावन्यो जीवा विशुद्ध्यन्ति
ता शोधयेच्छेष गतज्येप्टग्ययोग्नर भवेत् । वामरति (२२५) शेपगुणा (ोप-
मम्बन्धीयज्यान्तरगुग्गा) ज्यान्नगब्धिहनिभक्ता (चतुगु गितगतप्यज्यान्तर-
भत्ता) फायुन् रमगर (५६) गुद्धसम्याति (प्रथमचपिशुद्धमाययोति ) तदा
थाप म्पादिति ॥५॥
-- %3D x स्पष्टाधिकार अत्रोपपत्ति । इप्टज्यातोऽल्पा या गजज्यास्तासा मध्ये महत्तमा ज्यामिष्टज्यातो विशोध्य शेषेणानुपात प्रथमचा ज्याशे ५६ ज्याशे ज्याशे २२५ ज्याए-ज्याग ज्याए-ज्याग ज्याए-ज्याग २२५४ज्याशे =शेषरा क्षेत्र ज्यानयने द्रष्टव्यम् । एतेन फलेन (शेषचा ४ (ज्याए-ज्याग) पेन) विशुद्धसख्यागुरिगत प्रथमचाप (५६३१५") युत तदेष्टचाप भवेदत्रापि पूर्व- मनुपातेन यच्छेपचापमानीत तत्समीचीन नास्ति, विभुजयोर्वेजात्यादिति ॥५६॥ अब ज्या से चापानयन करते है। हि.भा-जिस ज्या के चाप करने की इच्छा हो उस (ज्या) में जितनी ज्यायें घटे उनको घटा देना, शेष गतज्या और इष्टज्या वे अन्तर रहता है । दो सौ पच्चीस (२२५) को शेष सम्बन्धीयज्यान्तर से गुण कर चतुर्गुणित ज्यान्तर (युक्तभोग्यज्यान्तर) से भाग देवर जो फल हो उसमे शुद्ध सख्या गुणित प्रथम चाप जोडने से इष्टचाप होता है ॥५६॥ उपपत्ति इप्टज्या से छोटी जो गत ज्यायें हैं सब से बडी ज्या पो इष्टज्या मे प्रथमचाप ज्याशे_२२५. ज्याशे घटाकर शेप पर से अनुपात करते हैं ज्याए-ज्याग ज्याए-ज्याग २२५४ज्याशे शेष चाप, इसको विशुद्ध सख्या गुणित प्रथमचाए (५६।१५") ४ (ज्याए-ज्याग) में जोडने से इष्टचाप होता है । यहा भी अनुपात मे जो शेप चाप लाया गया है सो ठीक नहीं है, क्योकि दोनो त्रिभुज सजातीय नहीं है। ज्यानयन में जो क्षेत्र हैं उसको देखना चाहिए ॥५६॥ पुनश्चापानयनमाह । या ज्या ज्यातः शुद्धास्तत्संख्या ताड़ितं धनुर्युक्तम् । विकलशरासनघाताञ्ज्यान्तरलब्धेन चाप स्यात् ॥६०॥ वि भा -ज्यात (इप्टज्यात ) या ज्या (यत्सख्यका जीवा ) शुद्धास्ता विशोधयेत् । तत्सख्याताडित धनु (विशुद्धसख्यागुणितप्रथमचाप) विकलशरासन- घातात् (शेपप्रथमचापवधान) ज्यान्तरलब्धेन (गत्यप्यज्यान्तरभक्तफलेन) युक्त तदा चाप (इप्टचाप) स्यादिति ॥६०॥ अनोपपत्ति । यस्या इप्टज्यायाश्चापकरणमस्ति तत्र यावत्यो जीवा विशुद्धयन्ति हा विशोधयेत् । शेप गतज्येप्टज्ययोरन्तर भवेत् । ततोऽनुपातो यदि गतेप्यज्ययोरन्त- रेण प्रथमचाप लभ्यते तदा ज्याशेषेण किमित्यनुपातेन शेपचापप्रमाणमागच्छति वटेश्वर-सिद्धान्ते प्रथमचा X ज्याशे =शेपचा, इद तत्स्वत्पम्- शुद्धसम्यागुरिणत प्रथमचपियुन ज्याए-ज्याग तदेप्टचाप भवेदत्रापि शेपचापानयन न समोचीन निभुजयोविजातीयत्वात् । ज्यानयनस्थ चित्रम् द्रष्टव्यम् ॥६०।। पुन ज्या से चापानयन करते हैं। हि भा - इप्टज्या में जितनी ज्या घट, घटा देना, शुद्ध सख्यागुणित प्रथम चाप म, शेष प्रथम चाप के घात मे गतज्या और एप्यज्या के अन्तर से भाग देने से जो पल हो वह इप्टचाप होता है ।॥६॥ उपपत्ति हि मा-जिस इप्टज्या के चापकरण अभीष्ट हो उमम जितनी ज्या घट, घटा देना, शेष गतज्या और इप्टज्या के अन्तर रहता है । तव अनुपात करते हैं यदि गतज्या और एप्यज्या के अन्तर में प्रथम चाप पाते है तो ज्या शेप मे क्या इम अनुपात मे फन शेप प्रथम चाxज्याशे चाप माता है- शेष चाप, इसको शुद्ध मख्यागुणित प्रथम चाप में ज्याए-ज्याग जोडने से इष्टचाप होता है । यहा भी शेष चापानयन ठीक नहीं है क्योकि दोनो त्रिभुज सजातीय नहीं है । ज्यानयन म जो चित्र है उसको देखिये ।।६।। - इदानी शेषाशज्यानयनमा । भुताभुक्तज्यान्तर दलविकलवधात्स्व चापलब्धोनम् । युक्त क्रमोरकम भुक्ताभुक्तखण्डयुतिदल निघ्नम् ॥६॥ विकलाशैभक्त स्वनापमानस्ततो विकलजीवा । वि भा -मुक्तामुक्तज्यान्तरदलविकलवधात् ( गतष्यज्यान्तरार्धरोपचाप- घातात् ) स्वचापलब्धोन युक्त (प्रथमचापभक्ताद् यल्लब्ध सेन होन युत) क्रमोरक्रमभुक्ताभुक्तखण्डयतिदल (क्रमोत्कमज्यापक्षीय गौप्यखण्डयोगार्धम् ) विकलादर्श (शेपारी) निन्नम् (गणित) स्वचापमान (प्रथमचापमान भक्त यत्फल ततो विक्लजीवा (शेपापाज्या) भवेदिति ।।१।। अनोपपत्ति । प्रयाभीष्टसिद्धचर्यमेव सिद्धात । प्र शे अनुपातेन ज्या =ज्या "त्रिज्यो क्रमज्या निहतेर्दलस्य मूल सदर्धा- २ शरशिजिनीत्यादिना नि उसे प्रत समीकरणेन २ प्रचा - ज्या स्पष्टाधिकार प्र ज्या बि उशे प्रचा २ २ उत्थापनेन शे/त्रि उप्र न उशे २ २ प्रचा वर्गीकरणेन शे'xत्रि उप्र.त्रि उशे प्रचा'४२ शे'x उप्र ==उसे अब यदि प्रचा-१० तदा शे 'उप्र -उशे प्रचा - एतेन विशेषोक्तसूत्रमवतरति । आद्योत्तमज्या शेपासवर्गन्नी शतभाजिता । दिगशेप्रमिते ह्याद्य शेपाशोत्क्रशिजिनी ।। गतचापम् गचा शेपचापम् = शेचा, इप्टचापम्-इचा तदा चारयोरिष्टयोर्दोज्य मिथ कोटिज्यकाहते इत्यादिना ज्या (ग+शे) ज्याग कोज्याशे, कोज्याग ज्याशे + नि त्रि परन्तु गतचा+शेचा इचा ज्या (ग+शे)-ज्याइ ज्याग कोज्याशे, कोज्याग ज्याशे अत ज्याइ-ज्याग -ज्याग नि वि ज्याग कोज्याशे+कोज्याग ज्याशे-त्रि ज्याग त्रि ज्याग (कोज्याशे)+कोज्याग ज्याश, -ज्याग उशे+कोज्याग ज्याशे नि त्रि कोज्याग ज्या-ज्याग उशे ज्याप्र गे पर त्रि प्रचा तथा शे' उप्र उशे प्रचा अत उत्थापनेन कोज्याग ज्याप्र शे ज्याग उन श. ज्याइ-ज्याग-ज्यान्तरम् - ज्याप नि प्रचा त्रि प्रचा' - ज्याशे वटेश्वर सिद्धान्ते ३३४ शे /कोज्याग ज्यान चा नि राग जन )= शेपसम्बन्धीय ज्यान्तरम्। (१) प पश-प्रथमज्या, नमः- गतज्या, सच=एप्यज्या sr सटएप्य खण्डम् । म हरगत खण्डम् केम-गतकोज्या गतख+एख. २ गतख+एख '--एस च २ गख एख-२ एस स टज र % 3D - गस-एख हज २ =नल। तन-प्रथमोत्वम- ज्या। नप-नस-प्रथम- चापम् । पत=सत-प्रथमज्या । कोज्याग ज्यान -सज के चित्र न०४ तदा केनम, सजत त्रिभुजयो राजातीयत्वादनुपात कोज्याग गख+एख यो . २ तथा केनम, नतल त्रिभुजयो सजातीयत्वात् ज्याग उप्र ति '=नल गखः %D एख २ %3D अन्तर २ प्रत (१) मस्मिन् स्वरूपे उत्थापनेन दो (यो अप्रो) -शेपसम्बन्धीयज्यान्तर ज्यान तत xस्पभोख =शेषसज्यान्तरम् । प्रचा प्र-गतप्यखण्डातर अत्र यदि प्रथमचापम् १० तदा कोप्टवानगंतस्वम्प भास्वरोक्तस्पष्ट. भोग्यखण्ड भवेत् । प्राचार्य प्रगतगम्यज्यान्तर एह्यते तत्तथ्य नास्ति । एतावता मज्याकरणे आचार्योक्तमुपपन्नम् । प्रथोत्र मज्यापी रि भवतीति विचार्यते । प्रथमचापम् प्र, गतचापम् =ग । इप्टचापम् तदा 5 ज्याशे-ज्या प्रशे %3D नि प्रचा म्पष्टाधिकार ३३५ दोज्यंयो काटिमौव्यश्चित्यादिना कोज्या (गचा+शेचा)-कोज्याइ कोज्याग कोज्याशे ज्याग ज्याशे पर कोज्याग-~कोज्याइ-कोटिज्यान्तरम् त्रि -कोज्याग- (कोज्याग कोज्याशे_ज्याग ज्याश' नि नि कोज्याग-कोज्याग कोज्याशे+ज्याग ज्याश त्रि कोज्याग (नि-कोज्याशे)+ज्याग ज्याशे नि =कोज्याग उसे , ज्याग ज्याशे कोज्यान । -नि नि उसे उपशे प्रचा प्रचा उत्थापनन कोज्याग उप्र, ज्याग ज्यान शे. शे + वि प्रचा प्रचा कोज्याग उन शे ज्याग ज्याप्र नि प्रचा त्रि शे + यो) कोज्यान --उत्क्रमज्यान्त रम् अग्राषि प्रचा प्रचा-२ गख-एग्व प्रथमचापस्य (१०) कल्पनेन तथा अ== तदा कोष्ठकातर्गतस्वरूप- शे स्पष्ट भोख मुत्क्रमज्यापक्षीय भास्करोक्त स्पष्टभोग्यखड भवति । तत शेषसम्बन्धी कोटिज्यान्तरम् । एतावताऽऽचार्योक्तमुपपन्नम् ॥ अंथ पूर्व ज्यानयने 'भोख शे -शेषसम्वन्धीय ज्यातरम् ।' अनुपातेन प्रचा यच्छेपसम्बन्धीयज्यान्तरमानमानीत तत्स्थूल (बहुकलात्मक चापमानस्य सरलत्व क्ल्पनात्) अतोऽजानुपातम्याविकलसस्थानपुर सरमेव येन केनाप्युपायेन यदि तस्यागतस्य स्थूलफलस्य स्फुटत्व भवेत्तदा तत्करणीयमेव, प्राचार्येण तदर्थमेव माधन कृत परमेसावता पूर्वोक्तकोष्टकातर्गतफ्लस्य स्पष्टभोग्यखपडस्वीकर- शे भोख ऐन पूर्वोक्तानुपाते. अस्मिन् भोग्यखण्डस्थले स्पष्टभोग्यग्रेहोऽनुपाता प्रचा अ गतफले सौम्य भवन्नवेति विचायते । यद्यप्नेनाचार्येणे 'यो.... २ प्रचा स्पष्टभोग्यखण्ड न क्थ्यते पर तदुपपत्या तत्स्पष्टभोग्यखण्ड सिद्धमत्यन्यथतावता अरशे एतस्य नाम वटेश्वर-सिद्धान्ते प्रयासेनालम् । यदि यो अं शे स्पष्ट भोग्यखण्ड कथ्येत तदा २ प्रचा पूर्वानुपातागतफलस्याविकलपुर सरं संस्थान जातमेव पर' जातमेव पर पूर्वानुपात शे.भोख शे,स्पभोग्य शे योर्मध्ये प्रचा इति हरगुणकयोस्तुल्य- प्रचा प्रचा त्वदर्शनादुभयवागतसमफले क्रमेण स्थूलत्वस्फुटत्वयोयुक्तिसम्बलितत्वदर्शनाच तथा च स्थूलस्फुटाधारतः क्रमेणावश्यमभीष्टपदार्थे स्थूलस्फुटत्व स्थानान्यथेति युक्तानुभवाच्च, पूर्वानुपातस्थस्थूलभोग्यखण्डतो नवीनानुपातस्थस्पष्टभोग्यखण्डे स्फुटत्वकथनं युक्तम् । तथैतस्यैवानयन क्रियतेऽत इदानी भोग्य खण्डस्पष्टीकरण- माहेति श्रीभास्करस्यावतरगलिखनं सुयुक्तमेवेति । अथ शेपज्यानयनाथ विचारः। कल्प्यते स्पष्टभोग्यखण्डस्पष्टीप्रमाणम्=य. यो अं.शे पूर्वमानीतं स्पष्टभोग्यखण्डस्वरूपम् = + २ २ प्रचा से स्पभोख अत उत्थापनेन यो प्रचा.ज्याशे. '=य पक्षी २ य गुरिणतो तदा य. यो. ज्या=२ या समशोधनेन प्र. ज्याशे==२ य-य. यो पक्षी द्विगुणितौ तदा+२ अ. ज्याशे=४ य-२ य. यो .) युक्तौ तदा म.ज्याशे ४ य'-२य. यो+ + (इ) मूलेन २ य- यो (यो)२ प्र. ज्याशे ततः यो -+अ ज्याशे+ य। पर प्रचा. ज्याशे + २ २ प्रचाय पुनः पक्षी 1) -V . २ (यो) य: एतेन 'खण्डानि विशोध्याथो शेपं यातप्यखण्डविवरघ्रम् । द्विगुणेन तेन यातयक्यार्धकृतेविहीनयुक्ताया. ।। मूलेन तदैक्याधं युकां दलितं भवेत्स्पष्टम् । भोग्यं नमोनमधनुः करणायवं गुरुत्वतोनकृतम् ॥ इति संशोथकोक्तमुपपद्यते स्पष्टाधिकार. ३३७ तत. ज्यागे प्रचा =शे वास्तवशे। ततोऽम्य ज्याज्ञान सुगममेवेति ॥६१|| स्पष्टभोख अब शेषागज्यानयन करते है। हिमा-गत और सभ्य ज्यानो के अन्तरार्ध मे गुरिणत शेप चाप को प्रथम चाप से भाग देवर जो फ्ल हो उसको क्रमज्या प्रकार और उक्रमज्या प्रकार मे गत खण्ड और एप्य खण्ड योगार्ध में हीन युत परके शेपाश से गुणकर प्रथम चाप से भाग देने से जो फल हो उस पर से शेपाश ज्या होती है । ६१ ।। उपपत्ति। आगे चलकर एक सिद्धान्त की आवश्यक्ता होगी इसलिये पहले उस सिद्धान्त की ज्याप्र शे उपपत्ति करते है । प्रथमचाप-प्र, शेपचाप = दो तव अनुपात से २ प्रचा ज्या २ 'त्रिज्योत्क्रमज्या निहतेदलस्य मूल तदर्धाशक शिञ्जिनी' इत्यादि से नि उशे -ज्या अत २ से /त्रि उप्र समीकरण करने से ज्या- २ २/नि उश प्रचा २ २ २ वर्ग करर से शेउप्र. प्रचा शेxत्रि उप्र त्रि उसे दो'उप्र --उशे यहा यदि प्रचा=१० तव -उशे प्रचा४२ २ १०० इससे विशेषोक्त सूत्र उपपन्न हुआ। "प्राद्योत्क्रमज्या शेपाशवर्गघ्नीशतभाजिता । दिगो प्रमित ह्याचे शेपाशोत्क्रमशिन्जिनी" गतचाप- गचा । शेषचाप-शेचा, इप्टचाप - इचा तव "चा पयोरिष्टयोर्दोज्य मिथ कोटिज्यकाहते" इत्यादि मे ज्या (गचा+शेचा)3 ज्याग कोज्याशे कोज्याग ज्याने + नि नि परन्तु गचा+शेषा-इचा ज्या (गचा+शेवा) ज्याइ। इसम ज्याग घटाने से ज्याइ--ज्याग ज्याग कोज्याशे, पोज्याग ज्याशे + '-ज्याग- त्रि त्रि ज्याग कोज्याशे+कोज्याग ज्याशे -ज्याग त्रि ज्याग (कोज्याशे-त्रि)+कोज्याग ज्याशे त्रि वि ज्याग उशे-कोज्याग ज्याशे कोज्याग ज्याशे ज्याग उसे = शेषसम्वन्धीय ज्यान्तर त्रि त्रि ज्याप्रो परन्तु - ज्याशे प्रचा तथा पूर्व सिद्धान्त से =उशे प्रचा २ ३३८ वटेश्वर-सिद्धान्ते त्रि प्रचा त्रि प्रचा प्रत उत्थापन दन से कोज्याग ज्याप्र दो ज्याग दा' उप्र शे /कोज्याग ज्यान ज्याग उप्र प्रचा त्रि घि प्रचा/ शेप सम्बन्धीय ज्यान्तर चिन ४ देखिये । पा=प्रथमज्या । नमःगतज्या, मच-एप्यज्या । सटएप्यखण्डम् । गतख+एख टर-गतखण्डम् । वेम: = गतकाटिज्या, -सज=जर। २ (१) एख - %- गख+ख गव + एम-२ एवं गख एख =टजनल । तन २ २ २ -प्रथमउत्तमज्या नप=नस-प्रथमचाप, पत=सत-प्रथमज्या, तब वेनम, सजत दोना कोज्याग ज्याप गख+एख यो विभुजो के सजातीयत्व व कारण अनुपात करते हैं पि २ २ ज्याग उप गख-एख म तथा बैनम, नतल दोनो त्रिभुजो के मजातीयत्व स नल- नि ૨ यो दो /यो अशे ज्याप प्रचा२ २प्रचा =-शेप सम्बन्धी ज्यान्तर न दोनो(पो. ५) के स्वरुप मे (१) इनम उत्थान देने से - लेविन यहा यदि प्रथमचाप =१०, तथा अ = गतगम्य खण्डान्तर, तब कोप्टनान्तर्गत स्व- रूप भास्करोक्त स्पष्ट भोग्य खण्ड होगा, ग्रन्थकार अ =गतगम्यमान्तर लेते हैं सो ठीक नही हैं, इमसे कमज्या पक्ष म प्राचार्योक उपपन्न हुप्रा ॥ प्रय उत्तमज्यापक्ष में क्या होता है मो विचार करते हैं। प्रथमचाप =प्र, गतचाप-ग, इष्टचाप-इ, शेपचाप दो तव "दोपयो कोटि- मौयोश्च' इत्यादि से कोज्याग कोज्या कोज्या (ग+मे)कोटिग्याइ= ज्याग ज्यादो त्रि नि कोज्याग--बोज्याइनोटिज्यान्तर =वोज्याग- कोज्याग कोज्यादौ ज्याग ज्या त्रि त्रि त्रि कोज्याग-कोज्याग कोग्यागे+ज्याग ज्याशे वि योज्याग (नि-कोज्या)+ज्याग ज्या पि कोज्या उरो. ज्याग ज्यामे उप्र + त्रि परन्तु प्रचा' ज्या प्रश तथा 'ज्यारो गज्यारी) प्रचा स्पष्टाधिकार उस्थापन देने से + - यो)=कोज्यान = उत्क्रमज्यान्तर यहा भी प्रथमचाप काज्याग उ प्र शे, ज्या ज्याप्र शे शे /कोज्याग उ प्र मे ज्याग ज्यान त्रि प्रचा त्रि प्रचा प्रचा त्रि प्रचा नि दो अशे यो + प्रचा प्रचाX२ गतख-एख -१० तथा ग्रहण करने से कोष्ठकान्तर्गत भास्करोक्त उत्क्रमज्या २ पक्षीय स्पष्ट भोग्यग्वण्ड होता है । यहा ग्र थकार अ = गतगम्य ज्यान्तर लते है। सो ठीक नहीं है । इससे प्राचार्योक्त उपप न हुआ । भाख शे या + २ प्रचा पहले ज्यानयन म शेष सम्बधी ज्यान्तर जो अनुपात स शेप सम्बन्धी ज्या प्रचा न्तर नाया गया है मा स्थल है । क्याकि वहा चापमान को सरलात्मक मानकर अनुपात किया गया है। इसलिये यदि किसी तरह अनुपातागत फल का स्फुटत्व हो जाय तो करना ही चाहिय । यदि पूर्वोक्त कोष्ठकान्तगत फल असे)को स्पट्टभोग्य खण्ड मान लें तब अनुपातागत फल म मूक्ष्मता होगी या नहीं इसक लिये विचार करते है । यद्यपि य यो इसका नाम स्पष्ट भोग्य खण्ड नहीं कहत है विन उपपत्ति से २ २ पचा स्पष्ट भोग्य खण्ड सिद्ध होता है नही तो इतने प्रयास स शप सम्बधी ज्यान्तर से क्या फल । यदि उसको स्पष्ट भाग्य पण्ड कहते है तव पूर्वानुपातागत फल का स्वरूप ज्यो का त्यो रहता शे भोख ही है । फेवल भोग्यखण्ड के स्थान म स्पष्ट भोग्य खण्ड वहा रहेगा। दोनो म ग्र थकार तथा प्रचा शे स्पभाख यह गुणक वराबर होने के कारण स्थूलत्व सूक्ष्मत्व प्रत्यक्ष देखने मनाते हैं प्रत शे स्पभोख शे भोख यह पू नुपातागत पल से युक्तिसङ्गत स्पष्ट सिद्ध हुआ इसीलिये प्रचा प्रचा भास्कराचाय ने सिद्धान्तशिरोमणि मे इदानी भोग्यखण्डस्पष्टाकरणमाह यह अवतरण युक्तियुक्त लिखा है ।। ६१ ॥ अवशप ज्यानयन करते है। स्पष्ट भोग्यखण्ड प्रमाण=य या पहले लाये हुए स्पष्ट भोग्यखण्ड प्रमाण= २ प्र दो =य । किन २ प्रचा प्रचाज्याशे स्पभोख ३४० वटेश्वर सिद्धान्ते उत्थापन दन म या म प्रचा ज्यारा या ज्याग -- + दाना पक्षों का २ य स गुण ૨ २ प्रचाय २ य देन स २ य य यो+अ ज्या समगाधन करने स २ य-य या= + ज्याश दाना पक्षा का दा स गुणन से ४ य-२ य यो=+२ अ ज्याग दाना पक्षा म (या) जोड दन स ४ य-२ य या+ F२ ज्यारो मूल लन स २ य- (गो.)- (या) (या) V(यो) २ F२ ज्याश यो प्रत +२ अ ज्याश+ . -य २ इसस सशोधकाक्त मूत्र उपपन्न हुआ । खण्डानि विगाघ्याथो शेप यातप्यखण्डविवरघ्नम् । इत्यादि प्रचा ज्याने -शेवास्तवो इमस इमका ज्यानान सुलभ है ।। ६१ ।। स्पभोख इम पर स- इदानी रवी द्वो स्पष्टाकरण भुजा तरकनियनचाह । परिधिघ्नभाशभाजित भुजकोटिज्ये तयो फले भवत ॥६२॥ रविशशिदो फलचाप मेषतुलादिस्थ निजकेन्द्र ॥ शोध्य क्षेप्यमिनेन्द्वो स्पष्टौ स्त सूर्यफलकलाभिहता ॥६३॥ राश्युदयाश्च रवेरहोरात्रासुभाजितास्तेन सगुरिगता । गतयो ग्रहस्य शन्याभ्रनागमहोभाजिता फल रविवत् ॥४॥ विभा–परिधिनभाशभाजितयुजकोटिज्ये (परिधिना गुणिते भाशं जिते भुजकोटिज्ये) तयोर्भुजकोटिज्ययो फ्ले (भुजफल कोटिफन) भवत । रविशशि दो फलचाप (रविचन्द्रयोर्भुजफ्लचाप) मेनुलादिस्थ निजकेन्द्र (मेपादिकेन्द्रस्थे तुलादिकेन्द्रस्थे च) इनेद्वो (सूर्याचन्द्रमसो ( शोध्य (हीन) क्ष प्य (योज्य) तदा स्पष्टोस्त (मूर्याचन्द्रमसौ स्पष्टौ भवत ) । रवे (सूर्यस्य) रास्युदया (निरक्षोदया ) सूर्यफनकलाभिहता (रविमन्दफ्लक्लागुरिणता) अहारावासुभाजिता (अहो रानासुभिर्मक्ता) तेन फलेन ग्रहस्य गनय सगुणिता (ग्रहगतिवलागुरिणता) शून्या-नागमहीभाजिता (१८०० भत्ता) फन रविवन् (मध्यमरवौ मन्दफल योजनेन यदि स्पष्ट रविस्तदाऽनीतफलमपि मध्यमार्योदयकालिक्ग्रहे योज्य यदि च स्पष्टाधिकार मध्यमरवी मन्दफलविशोधनेन स्पष्टरविस्तदाऽऽनीतफल मध्यमार्कोदयकालिक ग्रहे विशोध्य तदा स्पष्टाकोदयकालिकग्रहो भवेदिति ॥६२-६४॥ अनोपपत्ति मा मन्द प्रतियः कक्षावृत्त न भू 3 भू-भवेन्द्रम् । प- मन्दप्रति- वृत्तकेन्द्रम् । भूप=मन्दान्त्य- फलज्या । उ मन्दोच्चम् । =मन्दप्रतिवृत्ते ग्रह । ग्रउ मन्दकेन्द्रम् । मल-मन्दकेन्द्र ज्या। प लपमन्दकेन्द्रकोटिज्या भूर रेखा वर्धिता तदुपरि ग्रविन्दुतो लम्व -ग्रच-मन्दभुजफलम् । चर -मन्दकोटिफलम् । रन म मन्दान्त्यफलज्या । ग्न= मन्द- केन्द्रकोटिज्या भून-मन्दकेन्द्र- ज्या । भूर-निज्या र-मध्यम ग्रह । श-स्पष्टग्रह । रा- मन्दफलम् गम-कक्षामध्यगतिर्यग्रखा। तय मन्दप्रतिवृत्ततिर्यग्रखा। तदा भूरन. रग्रच निभुजयो साजात्यादनुपात । मन्दकेन्द्रज्या X मन्दान्त्यफलज्या मदभुजफलम् । नि मन्दकेन्द्रकोज्या X मन्दान्त्यफ्ज्या-मन्दकोटिफ्लम् । नि मन्दात्यफज्या मन्दपरिधि पर- अत उत्थापनेन मन्दकेज्या४ मन्दपरिधि रविमदभुजफलम्। मन्दकेकोज्या X मन्दपरिधि कोटिफनम्। रविमन्दकेज्या रविमन्दपरिधि =रविमन्दभुजफ । ३६० चन्द्रमन्दकेज्या र चन्द्रमन्दपरिधि चन्द्रभुजफलम् । चापकरणेन रविचन्द्रयोमन्दभुजफलचापे तयोर्मन्दफ्ले भवत स्वल्पान्तरात् तदा मेपादिकेन्द्रे स्पष्टरवितो मध्यमरवरग्रेस्थितत्वात् मध्यमरवि-रविमन्दफल- चित्र ५ 2- स न वटेश्वर सिद्धान्ते स्पष्टरवि तुलादिकेन्द्र स्पष्टरवितो मध्यमरवे पृष्ठे स्थितत्वात् मध्यमरवि+रविमन्दफ स्पष्टरवि । एव चन्द्रे पि, अनाचार्येण मन्दभुजफ्लचापसम मन्दफल यत्स्वीकृत तन्न समीचीनम् । यत ग्रच-भुजफल । शव-मन्दफलज्या, एतयो साम्ये प्राचार्यकथन समीचीन भवितुमर्हति पर प्रत्यक्षमेव दृश्यते तयो साम्य नास्ति । पठितमन्दकर्णानीय मदभुजफल भन्दफ्लज्यासम भवति, तात्कालिककर्णाग्रीय मन्दभुजफल मन्दफलज्यासम न भवति । यथा ग्र-मन्दप्रतिवृत्ते मध्यमग्रह । भूग्र =तात्कालिमन्दकर्ण । ग्रम- तात्कालिकान्त्यफलज्या ग्रस-मन्द भुजफलम् । नप-मन्दफलज्या, न विन्दुतो भूसरेखाया समानान्तरा रेखा कार्या सा यत्र मग्ररेखाया लग्ना तत्र ग विन्दु ।श विन्दुत भूसरेखो- परिलम्ब =पठितमन्दकर्णा- ग्रीय भुजफ भूश-पठितमन्दकर्ण । न विन्दुतो मग्र रेखाया समान्तरा नज रेसा वार्या सदा नश मज समा. नान्तर चतुर्भुजे मशवज । पर भूग्रम, भूनज त्रिभुजयो साजात्यात् तात्कालिकान्यफज्याxत्रि तात्कालिकामपण पठितान्त्यफलज्या, यतम्निज्यातुल्ये कर्णे यान्त्यफलज्या संव पठितान्त्य- फलज्या, नजम पटितान्त्यपज्या अत भूग= पठितमन्दवर्ण । तथा रश= नप (समानान्तर चतुर्भुजत्वात्) पर रा=पठितमन्दकर्णाग्रीयभुजफ्लम् । नप= मन्दपज्या, एतेन सिद्ध यताटितमन्दवर्गाग्रीयभुजफल मन्दपलज्ययोस्तुल्यत्वात्तद्भुजचापसम मन्दपल भवितुमर्हति । नहि तात्तालिव मन्दभुजपलवाएमम मन्दपल भवेदत प्राचार्योक्त न ममीचीनमिति । श्रीपतिनाऽपि मिशान्तशेवरे एवमेव पथ्यते- दो पतम्य च धनु वतादिव जायते मृदुपन नभ सदाम् । तेन मस्कृततनुदिवाकरो मध्यमो विधुरपि स्फुगे भवेत् ।। इति भास्वराचार्येगापि मन्दभुजफलचापमममेव मन्दपत्र पथ्यते । यथा मूत श्रुतिर्वा मृदु दो पलस्य चाप बुधा मन्दपल वदन्ति ।। मूर्यप प नाभिहता याग्भ्य पल रविवदित्यन्तेन भुजान्लरमाधन क्रियते तदुपपत्तिर्मया मध्यमाधिकारे लिमिता मा तव द्रष्टव्येति ॥६२-६४।। =नज चित्र ६ - स्पटाधिकार हिमा-वेन्द्रज्या और केन्द्रकोटिया को परिधि से गुरणकर भाग (३६०) मे भाग देने से भुजफ्ल और कोटिफल होता है। रवि और चन्द्र के भुजफल चाप को मेपा- दिकेन्द्र में मध्यम रवि और मध्यमचन्द्र म ऋरण करने में तुलादिकेन्द्र मे मध्यम रवि और मध्यम चन्द्र से धन करने से स्पष्ट रवि और स्पष्ट चन्द्र होते है । रवियुत राशि के निरक्षोद- यामु को रवि मन्दफलकला से गुण देना अहोरात्रासु से भाग देकर जो हो उसको ग्रहगति से गुणकर १८०० से भाग देने से जो फल होता है उसको रवि की तरह (मध्यम रवि म मन्द फल जोडने से स्पष्ट रवि होते हैं तो इस लाये हुए फल को भी मध्यमार्योदयकालिक ग्रह मे जोड देना, यदि मध्यमरवि में मन्द फल को ऋण करने से स्पष्ट रवि होते हैं तो मध्यमार्कोदयकालिक ग्रह में ऋण करना तब स्पष्टाकोंदय कालिक ग्रह होता है ) ॥६२-६४|| उपपति चित्र ५ को देखिये। भू-भूकेन्द्र प=मन्दप्रतिवृत्त केन्द्र ५ भूप-मन्दान्त्यफलज्या । उ-मन्दोच्च । ग्र-मन्दप्रतिवृत्त मे मध्यमग्रह । अउ मन्दकेन्द्र। ग्रल =मन्द्रकेन्द्रज्या, लप-मन्दकेन्द्र- कोटिज्या, भूर रेखा को बढा कर उस पर प्रविन्दु से लम्ब करते है । उसका नाम है मन्द- भुजफल =ग्रच । चर-मन्दकोटिफल । रग्र = मन्दान्त्यफलज्या, रन = मन्दकेन्द्रकोटिज्या, भून = मन्दकेन्द्रज्या, र=मध्यम ग्रह । श-स्पप्टग्रह । रश मन्दपल । गमक्षामध्य- गतिर्यग्रेखा । तय -मन्दप्रतिवृत्तमध्यगतिर्यग्नेखा। तब भूरन, रग्रच दोनो त्रिभुजसजातीय है इसलिये अनुपात करते हैं। मन्दवेन्द्रज्या- मन्दान्त्यफलज्या मन्द के कोज्या- मन्दान्त्यपज्या मन्दभुजफ्ल । -मन्द- त्रि नि मन्दान्त्यफज्या मन्दपरिधि कोटिक लेकिन उत्थापन देने में % 3D % 3D मन्दकेज्या X मन्दपरिधि मन्द के कोज्याम परिधि मन्दमुजफ्ल । मन्दकोटिफल ३६० रविमन्दके ज्यारवि मन्द परिधि च म केज्याxचम परिधि = रविम भुजफल । चन्द्र ममुफल चाप करने से रवि और चन्द्र का मन्दभुजफल चाप होता है । इसको प्राचार्य स्वल्पान्तर से मन्दफल के वरावर मानते हैं। तव मेपादिवेन्द्र में स्पष्ट रविसे मध्यम रवि आगे रहते हैं इसलिये मरवि+रमफ-स्पष्ट रवि तुलादिकेन्द्र में स्पष्टरवि से मध्यम रवि पीछे रहते हैं इसलिये मरवि+रमप-स्पष्टरवि इमी तरह चन्द्र में भी होता है । अच-भुजफल । शव मन्दफ्लज्या इन दोनो के वरावर रहने से प्राचार्य का कथन ठीक हो मक्ता है लेकिन प्रत्यक्ष देखते है दोनो बरावर नहीं है।
. ३४४ वटेश्वर-सिद्धान्ते पठिन मन्दराँग्रीय भुजफ्त मन्दफ्तग्या ये बराबर होता है । तात्कालिप वर्णानीय भुजफन मन्दपलग्या के बराबर नहीं होता है। जैसे- यहा चित्र ६ देखिये । ग्र=मन्द प्रनिवृत्त में मध्यपह । भूग्र:=तात्कालिक मन्दवणं =तात्वालिकान्त्यफ्लज्या, असमन्दमुजफ्ल । नप्र=मन्दफ्लज्या, न विन्दु से भूस रेखा की समान्तर रेखा कीजिय ग्रम रेखा में जहा लगती है वहा दश बिन्दु है । । बिन्दु से भूम रेखा वे ऊपर लम्बार=परितमन्दवरग्रीय भुजफल । भूश=पठितमन्दवर्णन बिन्दु से ग्रम रेखा की समानान्वर रेखा नज है तव मरा=नज भग्रम,भूनज दोनो त्रिभुज सजातीय है इमलिये तालालिकान्त्यफ्लज्या त्रि नज-पटितान्यफलज्या । त्रिज्यातुल्याएं मै जो अन्त्य- तात्कालिकमन्दवण फलज्या है वही पटिनान्स्यफलज्या कहलाती है। नज= दशम = पठितान्त्यफ्लज्या। भूग पठितमन्दकरणं, रश नप । लेविन रश पठितमन्दवर्णाश्रीयभुजफल । नप==मन्दफ्लज्या, इमसे सिद्ध हुआ कि पठित मद कणंग्रीय भुजफ्ल और मन्दपलज्या के वरावर होने के कारण उस भुजफ्ल के चाप में वरावर मन्दपल होता है । तात्कालिक मन्दमुज चाप के बराबर मन्दफल नहीं होता है। इसलिय प्राचार्य का क्यन ठीक नहीं है। सिद्धातशेखर में श्रीपति भी इसी तरह कहते हैं । यथा- दो फलस्य च धेनु क्लादिक जायते मृदुफ्त नभ सदाम् । तेन सस्कृततनुदिवाकरो मध्यमो विधुरपि स्फुटो भवेत् ।। भास्कराचाय भी मन्दभुजफल चाप ही को मन्दपल कहते हैं । जैसे- मूल श्रुतिर्वा मृदु दो फलस्य चाप बुधा भन्दपल वदन्ति ।। 'सूर्यफलकलाभिहता यहा में 'फन रविवत्' यहा तक से प्राचार्य मुजान्तर फल साधन करते हैं । उनकी उपपत्ति मध्यमाधिकार म लिखी गयी है । वह नहीं देखनी चाहिय ।।६२ ६४।। इदानी ग्रहाणा चरकर्माह । भानोश्वरासु निहतागतयो ग्रहाणा खानाङ्ग स्वर्गविहता. फलहीनयुक्ता । मेषादिगे दिनपतावुदयास्तसस्था जूकादिके तु खचरा सहिता वियुक्ताः ॥६॥ निभा-ग्रहाणा गतय (ग्रहगतिकला) चरासुनिहता (चरासुभिगुणिता) खानाङ्ग (२६००) विहृता (भक्ता) फलहीनयुक्ता खचरा कार्या दिनपती (सूर्य) मेपादिगेग्रदुतरगोले सति), दिनपती (सूर्य) जूकादिके (तुल ादिस्था- दृक्षिणगोले) सहिता वियुक्ता (युक्ता-रहिता ) खचरा कार्या तदा क्रमश उदयास्त- सस्था ग्रहा भवन्त्यर्थादुत्तरगोले चरफलकलाभिग्रहो रहितो दक्षिणगोले सहित- स्तदौदयिको ग्रहो भवेत्तथोत्तरगोले महितो दक्षिणगोले रहितस्तदाऽस्तकालिक- ग्रहो भवेदिति ॥६५॥ अत्रोपत्ति अहर्गणोत्पन्ना ग्रहालाक्षितिजासता समाग छन्ति, तर देशान्तरसस्कारेण स्ववीयोन्मण्डलवालिका भवन्ति। एतदाचार्यमतेन न्वर्गणोत्थग्रहा लडाक्षितिजस्था स्पष्टाधिकार: ३४५ एव समागन्छन्तीत्यहर्गरणाद् ग्रहानयनदर्शनंव स्फुट भवेत् । परमपेक्षितास्तु म्वक्षिति जोदयकालिका. । तेन स्वक्षितिजोन्मण्डलयोरन्तररूपचरासु सम्बन्धिग्रहगतिमानीयते तत्रानुपातो यद्यहोरात्रासुभिग्रहगतिकला लभ्यन्ते तदा चरासुभि कि समागच्छन्ति चरास्वन्तर्गतग्रहगतिकला । उतरगोले उन्मण्डलस्य स्वक्षितिजादुपरिस्थितत्वा- दानीतच रफलरुन्मण्डलकालको ग्रहो हीन कार्यो दक्षिणगोले युक्त (उन्मण्डलात्स्व- क्षितिजस्योयस्थितत्वात् ) तदा स्वक्षितिजोदयकालिकग्रहो भवेत् । पर चरासु- मध्येऽपि ग्रहाणा काऽपिगतिर्भविष्यति तद्ग्रहणन्त्वाचायण न कृतमत पूर्वोक्त- युक्त्योदयिकग्रहास्तकालिकग्रहश्च न समीचीनास्तत्रासकृत्कर्मणा पूर्वोक्तग्रहसिद्धि । अहोगवामुशब्देन सर्वत्रैव ग्रहाहोरात्रासवो न ग्रहीतव्या ग्रहाहोरात्रा स्वन्तर्गतग्रह- गतिपाठाभावादिति ।।६।। हि भा-ग्रहगति को चरामु से गुण कर २१६०० से भाग देने से जो फल हो उसको उत्तर गोल मे रवि के रहने से ग्रह में घटाने से दक्षिण गोल मे जोडने मे प्रौदयिक ग्रह होते हैं । तया उत्तर गोल मे जोडने से दक्षिण गोल मे घटाने में अस्तबालिक ग्रह होते हैं ॥६५॥ उपपत्ति अहगंणोत्पन्न ग्रह लबाक्षितिजासन्न में आते है, उसमे देशन्तर सस्कार करने से उन्मण्डलकालिक ग्रह होते हैं । इन प्राचार्य के मत मे अहर्गणोत्पन्न ग्रह लकाक्षितिजस्थ होते हैं । यह विषय अहर्गरण से ग्रहानयन देखने से साफ होता है, लेकिन यह अपेक्षित है स्वक्षितिजोदयकालिक इसलिए स्वक्षितिज और उन्मण्डल के अन्तर्गत चरासु सम्बन्धी ग्रह- गति प्रमाण लाते हैं । यदि अहोरात्रामु मे प्रहगति कला पाने है तो चरासु मे क्या इस अनुपात से चरासु सम्बन्धि ग्रहगनि क्ला प्रमाण पाया। उत्तर गोल में अपने क्षितिज से उन्मण्डल के ऊपर रहने के कारण आत चरफल को उन्मण्डलकालिक ग्रह में ऋण करने से दक्षिणगोल में जोडने (उन्मण्डल से स्वक्षिति को ऊपर रहने के कारण) से स्पक्षितिजो- क्ष्यकालिक ग्रह होते है । लेकिन चरासु के अन्तर्गत भी ग्रह को कुछ गति होगी उसका ग्राहगा भाजपा की करते हैं इसलिए प्रत्यापिरन से प्रदिपिक ग्रह और अम्तकालिक प्रह ठीक नहीं होगा वहा असकृत्वमं करने से पूर्वोक्त ग्रह ठीक होगे । अहोरात्र शब्द से सब जगह ग्रह की अहोरामासु नहीं लेनी चाहिए। क्योकि ग्रहाहोरानान्तर्गत ग्रहगति का पाठ नही है ॥६५॥ इदानी सप्टगतिपरिभाषामाह । ह्यः श्वसनाद्यतनयोविशेषजा सूर्ययोर्गतिः स्फुटगतिर्गतागता । श्वस्तनाद्यतनयो रवेविधोरेवमिष्टखचरस्य वा भवेत् ॥६६॥ वि.मा -ह्य स्वरतनाद्यतनयो मूर्ययो (ह्यस्तनाद्यतनयो, वस्तनाद्य- तनयो सूर्ययो } विशेषजा (अन्तरोत्पन्ना) गति , गतागता (प्रतीनगम्या) स्फुट- वटेश्वर-सिद्धान्ते गतिभवेदर्थात् ह्यस्तनायननम्फुट सूर्ययाग्नर गता सूर्यस्पष्टा गतिस्तयाऽद्यनन. श्वस्तनसप्टसूर्ययारन्तर गम्या स्पष्टमूर्यगति । एव श्वस्तनाद्यतनयोरवेविघोरिष्ट- ग्रहम्य ना स्फुटा गतिर्भवदिति ॥६६॥ उपपत्ति सप्टगते परिभाषा क्रियते । ग्रह्योरतर ग्रहगति । ह्यस्तनाद्यतनयोग्रयो- रन्तर गतग्रगति । यद्यतनश्वस्ननग्रह्योरन्तर गम्यग्रहगति । मवेंपा ग्रहादीना गत परिभाषकम्भव भवे ।। अयतनश्वस्तन मध्यमग्रहयोरन्नर मध्यति । अद्यतनश्वम्तनम दोच्चयोरन्तर मन्दोच्चगतिरेव मर्वेपा गतिर्भवतीति ॥६॥ हि मा-चीना हुमा कल और प्राज के सप्टमूर्य का अन्तर गत सूर्य स्पष्टगति होती है और प्राज के स्पष्ट मूय और भावी कन के स्पष्ट सूर्य का अन्तर गम्य सूर्य स्पष्ट गनि होती है। इसी तरह चन्द्र प्रौर दूसरे ग्रह को भी स्पष्टगति होती है । गति को परिभाषा करते हैं किसी भी ग्रह या मन्दोच्चादि को गति को परिभाषा इसी तरह की जाती है । अाज के और कर के मध्यम ग्रह का अन्तर मध्यम ग्रहगति है । आज वे और क्त के मन्दोच्च के मन्नर मन्दोच्चगति है । इसी तरह सब की गति हानी है ॥६६॥ इदानी मन्दगतिफ्लानयन तन स्पष्टगत्यानयन चाह । मन्दतुङ्गगतिजिता गति केन्द्रभुक्तिरिह खेचरस्य सा । दोगुणान्तर हताद्यजीवया भाजिता. स्वपरिणाहपगुणा ॥१७॥ भगवाशहृता फल गतौ निजकेन्द्र मकरादिके क्षय । धनमिन्दुगृहादिके स्फुटा श्रवणाने खलु चान्तमानिका ॥६॥ वि भा-गति (मध्यगति ) मन्दतु गगतिवजिना (मन्दोच्चगतिरहिता) तदा सा खेचरस्य (ग्रहस्य) केन्द्रयुक्ति (मन्दवेद्रगतिर्भवेत्) दोगुणान्तरता (मन्दकेन्द्रज्यान्तरगुणा) आद्यजीवया (प्रथमज्यया) भाजिता (भक्ता) स्वपरि- रगाहसगुणा (स्वपरिधिगुणिता) भगरणाराहता (३६० एभिर्भाज्या) फल मकरादिके निजकेन्द्र (मकरादिके स्वकेन्द्र) गतौ (मध्यगतौ) क्षय (ऋण) कार्य, इन्दुगृहा- दिके केन्द्र (क्वर्यादिकेन्द्र) धन (युक्त) तदा (स्फुटा गति स्यात्) रविचन्द्रयो वृते इयमेव स्पुटा गतिभवेदन्येपा कृते मन्दस्पष्टगतिभवेत् । श्रवरपान खलु चान्तमानि- केत्यस्याग्निमश्लोकेन सम्बन्ध इति ॥६७ ६॥ अग्रोपपत्ति । मन्दवे ज्या मन्दान्त्याज्या नि - मदभुजफलमदफलज्या(स्वत्पात रात्) म दवे ज्याxमदात्यफज्या तथा थि =म'दभुजफ= मदपज्या (स्वलान्तरात्) अथ स्पष्टाधिकारः अनयोरन्तरेण % 3A प मन्दान्त्यफज्या (मन्दकेज्या~मन्दकेज्या)-मन्दफलज्या~मन्द- नि फज्या-मफलज्यान्तरम् -मफलगति (स्वल्पान्तरात्) मन्दान्तफज्याX मन्दकेन्द्रज्यान्तर -=मफलगति नि अथ मन्दवेन्द्रज्यान्तरमानीयते । चन मदकेंद्रम् । च बिंदुतो वृत्त स्पर्शरेखा कार्या तत्र चर-प्रथ- ल मज्या,चप-मद- केन्द्रगति इति र म दत्वा च विदुतो रज रेवोपरि लम्ब चमतदा रम-स्पष्टभोग्य खण्डम् । पच% मद केन्द्रग तदा चरम, चपव निभुजयो साजात्यादनुपात स्पष्ट भोख ४ मदवेन्द्रगति ==मन्दवन्द्रगतिसज्यावृद्धि - मन्दकेन्द्रज्यान्तर प्रथमज्या के चित्र ७ मन्दफत्रग तिस्वरूपे उत्थापनेन मन्दान्त्यफलज्या स्पभोख - मकेग -मफलगति नि ज्यान अन मअन्त्यफज्या_मन्दपरिधि . मन्दरिधि स्पभोख - मका मफलगति नि ३६० २६० ज्यान ततो मकरादि कादिवेन्द्रवशत गृध्यगनमगफ- मस्पग, रविचन्द्रयोर्मध्यमगतिमन्दगतिफलयोश्च ग्रहणादियमेर स्पष्ट गतिभवति ।। एतेनाचार्योक्तमुपपन्नम् । परमेतदानयन न समीचीन यतो मन्दफलज्यान्तरमन्दपलान्तरयो समत्व स्वीकृतमाचार्येरणातो वास्तवानधन क्रियते । मकेज्या मदअफज्या मथ- -मफज्या, पक्षयोश्चलनकलनरीत्या तात्कालिक X % 3D तदामकोफर मग ३४८ घटेश्वर सिद्धाने मप्र फज्या, मकैकोज्याxमग मफकोज्याxमफ्म गतिग्रहणेन त्रि नि मकोटिफ्लxमकेग _मफरोज्या/ मफग नि त्रि प्रत मोफxमकेग-मफकोज्यामफ्ग पक्षी मफकोज्या भक्तो -मफलगति । अनया रीत्या वास्तव मन्दगतिफलानयन मपयोग्या भवितुमर्हति, अथाऽनीतमन्दगतिफलस्वरूप यदि हरभाज्यौ त्रिज्यया गुण्यते मकाफxमकेगxत्रि_भास्कर कथितमगनिफxनि तदा =मगफ्ल मपकोज्यानि मफरोज्या त्रि मगफल, कथ्यते, एतेन सिद्ध यद्भास्त्रोक्त गतिफल निज्यया गुणित मन्दफ्लाटिज्यया भक्त तदा वास्तव मन्दगतिफल भवेदनो विदोपोनसूत्रावतार भास्करोवत गतिफल त्रिज्यया गुरिणत हृतम् । मादीय नवोटिज्यामानेन भवति स्फुटम् ।। इति । ६७-६८ ॥ हि मा-मन्दान्च गति को प्रगति म घटाने में मद दे द्रगति हाती है। उसको (मद बद्रगति को) के दग्यान्तर में गुण देना, प्रपमग्या से भाग देना, जो फन हो मद परिधि से गएकर भाग (३६०) मे भाग देना जो फल (मन्दगतिफ्न) हा उमको मकरादि केन्द्र म मध्यति म ऋण करना मौर बर्यादिवेद म मध्यगति म जोहना तब रवि पौर चद्र की सगति होती है । कुजादि प्रहा की मन्दस्पष्टा गति होती है ॥६७ ६८।। उपपत्ति भास्करेण मकोफX मग - - मदकश्या मान्यपश्या =मदमुजफ्ल=मन्दफ्नज्या (स्वल्पान्तर से) तथा म'रेग्या मदात्यपग्या = म'दभुनक=म'दफ्लन्या (स्वल्पान्तर से) दोना वे अन्तर वरने म मान्यपमा (म'वज्या~मकन्या) -मन्दपन्या~मदपज्या-मदपज्या त्रि न्तर=मन्दप रान्तर=मपलग (स्वलान्तर से) मनावर जामदग्यान्तर -मदपनगनि । त्रि पहा म-ग्यानर ने प्रमाण जात है । (७) चित्र देखिन।
स्पष्टाधिकार. ३४६ चैन==मन्दकेन्द्र । च बिदु से वृत्त स्पर्गरेखा कीजिये । उसमे चर-प्रयमज्या, स्पर्श- रेखा में चप= मन्दकेन्द्रगति । दान देकर च विदु से रज रेखा के कार चम लम्ब कीजिये । तव रम=स्पष्टभोग्यखण्ड, पच==मन्दकेन्द्रगति । चरम, चपव दोनो निभुज मजातीय हैं इसलिये अनुपात करते हैं। स्पष्ट भोखण्ड X मन्दकेन्द्रगति - मग्दवेन्द्रगति सज्यावद्धि मन्दवेन्द्रज्यान्तर इससे ज्याप्रयम मन्दफलगति सरू में उत्यारन देने में मग्रफग्या X स्पभोख ४मकेग '= मफ्लगति त्रिxज्यान मसफच्या_मन्दपरिधि . मन्दपरिधि रपभोख मकेग. नि ३६.Xज्याप्र मफलगति तब मकरादि कर्यादिकेन्द्रवश मध्यगति+मंगतिफल- मन्दस्पष्टगति रवि, चन्द्र के लिये अपनी अपनी मध्यगति और मन्दगति फन लेने से यही स्पष्टगति होती है। इससे आचार्योक्त उपपन्न हुमा । लेकिन यह पानयन ठीक नहीं है क्योकि पहले मन्दफ्लज्यान्तर=मन्दफ्लान्तर मन्दगतिफल, मान लिया गया है । इसलिए वास्तवानयन करते हैं । मकेज्या मअपज्या =मफज्या दोनो पक्षो के चलन बलन से तात्कालिक गति लाने रो त्रि मकेकोज्या X मग मअफज्या मफरोज्या-मफग .x नि मोफर मग त्रि मफरोज्या-मफग त्रि खेदगम से मकोफ मा-मफकोज्या मग मोफम वेग मफरोज्या मफ्ग इम तीन से वास्तव मन्दगतिफनामयन हो सकता है।' पानीत मन्दफनगति स्वरूप मफोक मकेग को त्रिज्या से गुणन भजन करने से मफकोज्या मकोफर मकेग:त्रि भास्वरकथित मगफ नि मफ्लगति, प्रफकोज्या वि मफकोज्या मकोफxमग =भास्करोक्तगतिफल । इममे सिद्ध होता है कि भास्वरोक्त मन्दगति फल को त्रिज्या से गुणकर मन्दफलकोटिज्या से भाग देने से वास्तव मन्दगलिफ्ल होता है ।
वटेश्वर-सिद्धान्तें - इससे विशेषोक्त मूत्र उत्पन्न हुमा- भास्वरोक्त गपिल त्रिज्यया गुणित हतम् ।' इत्यादि ॥६७ ६६॥ इदानी पुनर्मन्दगतिफ्लानयन तत स्पष्टग त्यानयन चाह । निजकेन्द्रगतिः समाहता त्रिभमौर्या मृदुकम्भाजिता । स्वमृदूच्चगति फलान्विता ग्रहभुक्तिस्त्वथवा परिस्फुटा ॥६॥ विभा -अथवा निजकेन्द्रगति (अहम्वमन्दकेन्द्रगति ) निभमौा समाहता (निज्यया गुरिणता) मृदुवर्णभाजिता (मन्दवर्णभक्ता) फलान्विता स्वमृदूचनि (फ्लयुक्ता ग्रहमन्दोच्चगति ) परिस्फुटा ग्रहभक्ति (ग्रस्पष्टगति ) भवेत् ॥ ॥६६॥ अत्रोपपत्ति । म केन्द्रज्यापि प्रथ -स्प केज्या मन्दवर्ण मेकेन्द्रज्या त्रि तथा -स्प केज्या मदक्ण अनपोरन्तरेण मन्दकेन्द्रज्यान्तरxत्रि मन्दकेन्द्रगति x नि स्पष्टकेन्द्रज्यान्तर=स्पष्ट- मन्दकर्ण मन्दकर्ण केन्द्रगति (स्वल्पान्तरात्) मन्दोच्चगति+सागति स्पष्टगति । रविचन्द्रयो कृते इयमेव स्पष्टा गतिर्भवेत् । इदमानयनमपि न समीचीनम् । यत मन्दकेन्द्रज्यान्तरः र=मन्दकेन्द्रगति गन्दन्द्रान्तर तथा सप्टकेन्द्र ज्यान्तरः-स्पष्ट केन्द्रान्तर=स्पप्टवेगति प्राचार्य तुल्या कल्पिता , तत स्पष्टकेन्द्रग+मन्दोच्चगति स्पष्टगति वस्तुत एतान्यानयानि रविन्द्रयोरेव वृते सन्ति, यत एतस्याध्यायस्य नाम रविन्द्रयो स्पुटीकरणविधिरस्तीति ।।८।। हि भा-अपनी वेन्द्रगति को विज्या मे गुणकर मन्दवणं से भाग देने मे जो फ्ल हो उसको मन्दोच्चगनि में जाडने से स्पष्टगति होती है ।।६।। उपपत्ति । मवेज्यात्रि मज्या नि -स्प ज्या। 'सवेश्या मन्दर मग दोना के प्रतर करने से मन्दवे ज्यानर त्रिमन्दवेन्द्रग्यान्तर त्रि मवेगति त्रि - स्पाटवे द्रज्यातरस्पष्टोन्द्रा- मन्दवण मन्दपर्ण D स्पष्टविकारः ३५१ न्तर-स्सप्टकेन्द्रगति (स्वल्पान्तर से) ::मन्दोवति+सग सप्टगति । यह आनयन भी ठीक नहीं है क्योकि मन्दवेन्द्रज्यान्तर-मन्दवेदान्तर-मन्दवेन्द्रग तथा स्पाट केन्द्रस्यान्तरस्पष्टरेन्द्रान्तर-स.प्टोरगति प्राचार्य इन स्व को स्वल्पान्तर से तुल्य माने हैं । ये सब प्रानयन रवि और चन्द्र के लिये है क्योंकि इस अध्याय का नाम ही रविचन्द्रयो स्फुटीकरण विधि' है। इति ॥६६॥ इदानी पुन रविचन्द्रयोभन्दगतिपलानयनमाह । भुनभोज्यगुणान्तरं रके शरनिघ्नं द्विशरेन्दुभाजितम् । शशिनोऽङ्कजलाहत हृतं खकृतभुक्तिपल क्लादि वा॥७॥ मि भारवे (सूर्यरय) भुजभोज्यगुणान्तर (मतगम्यवेन्द्रज्यान्तर') शर- निघ्न ( पञ्चगुणित ) द्विशरेन्दुभाजित (१५२ एभिभक्त) तदा कलादिभुक्तिफल (कलादिगतिफर) भवेत् । शशिन (चन्द्रस्य ) भुजभोज्यगुणान्तरम् अङ्कजलाहत (ऊनपञ्चाशद्गुणित ) मकृत (४० एभि) हत (भक्त ) तदा कलादिगति- फल भवेदिति 119011 अनोपपति । मक ज्यामअफज्या -मभुफ्ला मदफनज्या(स्वल्पान्तरात्) म'केज्यामअफज्या तथा वि 'म'भुजकल-म'दपालज्य अनयोरन्तरेण मप्रफ्ज्या नि x मन्दपेन्द्रज्यान्तर=मन्दपलज्यान्तर-मन्दफ्लान्तरम्म दग- निक (स्वल्पान्तरात्) ममफज्या_मन्दपरिधि मन्दपश्चिमवेन्द्रज्यान्तर मन्दगनिपल अथ . रविपन्दपरिधि - रविमन्दपरिधि मेज्यान्नर -रविमगफ अब हरमाग्यो ५४ रविमवेग्पान्तर पचभिर्गुणितो तथा रविमन्दपरिधिभतो नया ३:०४५ रधिमन्दपरिधि = रविमगतिफल ५५ रिमन्दवे ग्यान्तर चन्द्रमानिधि चन्द्रमोग्यान्तर एवं चन्द्रमसफर १५२ - ३५ बटेश्वर-सिद्धान्ते स्प'केज्या इसमे विशेगोश मूत्र उपपन्न हुमा- भास्सरोक्त गप्पल निज्यया गुरिणत इतम् ।' इत्यादि ॥६७-६८।। इदानी पुनमंन्दर्गतिकवानयन तत स्पष्टगत्यानयन चाह । निजकेन्द्रगतिः समाहता त्रिभमौर्या मृदुकर्णभाजिता । स्वमृदूच्चगतिः फलान्विता ग्रहमुक्तिस्त्वथवा परिस्फुटा ॥६६॥ विभा -अथवा निजकेन्द्रगति (ग्रहस्वमन्दकेन्द्रगति ) निभमौा समाहता (निज्यया गुणिता) मृदुभाजिता (मन्दवर्णभक्ता, फलान्विता स्वमृदूच्चगतिः (फ्लयुक्ता ग्रहमन्दोच्चगति ) परिस्फुटा ग्रभक्ति (ग्रस्पष्टगति ) भवेत् ।। ॥६६।। अत्रोपपत्ति । म केन्द्रज्यानि प्रथ -स्प'केज्या मन्दग मेकेन्द्रज्या नि तथा म दकण अनयोरन्तरेण मन्दकेन्द्रज्यान्तरx वि. मन्दकेन्द्रगति xनि स्पष्टकेन्द्रज्यान्तर स्पष्ट मन्दकर्ण भन्दकर्ण केन्द्रगति (स्वल्पान्तरात्) मन्दोचगति+सकेगति स्पष्टगति । रविचन्द्रयो कृते इयमेव स्पष्टा गतिर्भवेत् । इदमानयनमपि न समोचीनम् । यत मन्दकेन्द्रज्यान्तर=मन्दकेन्द्रगति गन्दरेन्द्रान्त र तथा सप्टकेन्द्र ज्यान्तर= स्पष्ट केन्द्रान्तर स्पप्टकेगति प्राचार्य तुल्या कल्पिता , तत स्पष्टकेन्द्रग+मन्दोच्चगति स्पष्टगति वस्तुत एतान्यानयानि रविन्द्रयोरेव कृते सन्ति, यत एतस्याध्यायस्य नाम रविनन्द्रयो स्फुटीकरणविधिरस्तीनि ॥६॥ हि.भा-अपनी वेन्द्रगति को त्रिज्या मे गुणवर मन्दकरणं से भाग देने से जो पल हो उसको मन्दोच्चगति में जोडने मे स्पप्टगति होती है ।।६।। एपपनि मवेज्यामि मज्याxत्रि -सवेज्या । मन्दवरा 'सज्या मन्दवण दोनो के अन्तर करने से मन्दवेज्यानर त्रि_मन्दपेन्द्रज्यान्तर त्रि_मगति त्रि -स्पाटवेन्द्रग्यान्तर स्पष्ट केन्द्रा- मन्दवरण मन्दवणं मन्दवर्ण ----- -- स्पष्टविकार ३५१ न्तर-स्पष्टवेन्द्रगति (स्वल्पान्तर से) ::मन्दोच्चगति+स्पकेगसप्टगति । यह प्रानयन भी ठीक नही है क्योकि मन्दवेन्द्रज्यान्तर = मन्दवेन्द्रान्तर-मन्दोद्रग तथा स्पप्टकेन्द्रज्यान्तर स्पष्ट केन्द्रान्तर-सप्टकेन्द्रगति प्राचार्य इन सब को स्वल्पान्तर से तुल्य माने हैं । ये सब आनयन रवि और चन्द्र के लिये है क्योकि इस अध्याय का नाम ही 'रविचन्द्रयो स्फुटीकरणविधि ' है । इति ॥६६॥ इदानी पुन रविचन्द्रयोर्मन्दगतिफ्लानयनमाह । भुजभोज्यगुरणान्तरं रके शरनिध्न द्विशरेन्युभाजितम् । शशिनोऽजलाहत हृतं खकृतभुक्तिफलं कलादि वा॥७॥ वि भा -रवे (सूर्यरय) भुजभोज्यगुणान्तर (गतगम्यवेन्द्रज्यान्तर') शर- निघ्न ( पञ्चगुणित ) द्विशरेन्दुभाजित (१५२ एभिभक्त) तदा कलादिभुक्तिफल (कलादिगतिफन) भवेत् । शशिन (चन्द्रस्य ) भुजभोज्यगुणान्तरम् अङ्कजलाहत (ऊनपञ्चाशद्गुणित ) स्कृत (४० एभि) हत (भक्त ) तदा कलादिगति- फन भवेदिति ॥७॥ अनोपपनि । मक ज्याxमग्रफज्या -म'मुफलमदफनज्या(स्वल्पान्तरात्) नि म 'केज्या X मअफज्या तथा त्रि Dम'दफलज्य -म'मुजफल%3D अनयोरन्तरेण मप्रफज्या xमन्दकेन्द्रज्यान्तर=मन्दफ्लज्यान्तर मन्दफलान्तरम दग- लिक (स्वल्पान्तरात्) माज्यर_मन्दारिधि मन्दपरिधि मवेन्द्र ज्यान्तर - मन्दगतिफल रविपन्दपरिधिरविमन्दपरिधि केज्यान्तर अथ -रविमन्दगफ अन हरभाज्यो ३६० पचभिर्गुणिती तथा रविमन्दपरिधिभक्ती तथा ५४ रविमकेज्वालर ३८०४५ रविमन्दपरिधि - रविमगतिफल ५४ रविमन्दकेज्यान्तर चन्द्रमपरिधिरचन्द्रमज्यान्तर एव चन्द्रमरफल १५२
३५२
.
४०
वटेश्वर-सिद्धान्ते
अन हरभाज्यो ४६ गुरिणतो तथा चन्द्रमन्दपरिधिभक्ती तदा
४६ चन्द्रमकेज्यालर_४६४ चन्द्रमज्यान्तर = चन्द्रमगतिफलम् ।
४६X३६०
चम परिधि
मत उपपन्नम् ।
हि भा-रवि के गतगम्य के केन्द्रग्यान्तर वो पाच से गुरणा कर १५२ इतने में
भाग देने से क्लादि गतिफल होता है । पोर चन्द्र के गतगम्य केन्द्रज्यान्तर को ४६ से गुणा
कर ४० इतने से भाग देने से चन्द्र के लादि गतिफ्न होता है ॥७॥
उपपत्ति
मोज्यामग्रफ्ग्या
'ममुजपल=मफ्लण्या (स्वल्पान्तर से)
मकेच्या X ममपन्या
तथा
त्रि
म भुजफ्लम'फ्लज्या (स्वल्पान्तर से)
..
दोनो ने मन्तर करने मे
मप्रफग्या
xमन्दकेंद्रज्यान्तर-मन्दफ्लज्यान्तर-मन्दफ्लान्तर=मन्दगतिपल
नि
(स्वलान्तर से)
ममपज्या मारिधि मन्परिधि मन्दकन्ज्यान्तर
मन्दगतिफल
त्रि
रविमन्दपरिघि रविमन्दोन्द्रस्यान्तर=रविमगतिफ्ल, यहां हरभाग्य को पांच से
गुसकर रविमन्दपरिधि मे भाग देने में ५X रविमन्दकेन्द्रज्यान्तर_ ५४रविम बेग्यान्तर
३६०४५
१५२
रविमपरिधि
-रविमंगपन
चन्द्रमपरिधि चन्द्रमन्द
देत्रज्यानर
एवं
चन्द्रमगतिफ्ल, यहा हरभाग्य को ४६ रो गुणवर
चन्द्रमन्दपरिधि मे भाग देने मे
४६४च द्रमन्द वे ग्यान्तर_४६X चन्द्रमज्या तर
३६०४४६
४०
पम परिधि
-चन्द्रमगनिपल । इमने पाचार्योन उपपन्न हुमा ॥७॥
पुनस्तदानपनमा ।
निजवेन्द्र बहादोजभोग्यधनुगुण शक्तम् ।
धनुषा प्राह्या जीवा विषमपदे व्युत्क्रमाद् युग्मे ॥७॥
स्पष्टाधिकार ३५३ धनुरल्पे धनुर्हते निजभोज्यगुरणान्तराम्यस्ते। तन्मध्यशुद्धमौर्वी वृद्धि. परिधिसगुरणा हृताभाशे ॥७२॥ लब्धधनु स्वमरण वा गतौ स्फुटा हस्तनाद्यतनान्त झा विभा-ओजभोज्यधनुर्गुण शकल (विषमपदभोग्यचापक्रमज्यामानमर्याद भोग्यकेन्द्रज्यामान) निजकेन्द्र (मुक्तकेन्द्रज्यामान) जह्यात् (शोधयेत्) तदा या जीवा सा धनुषा (चापेन समा) ग्राह्याऽर्थात्केन्द्रज्यान्तर केन्द्रान्तरयोस्तुल्यत्व स्वीकार्यम् । विषमदे एव, युग्मे (समपदे) व्युत्नमात् (विलोमात्) ज्ञातव्यम् । धनुरपे (स्वल्पे चापे पूर्वोक्त केन्द्रज्यान्तरतुल्यकेन्द्रान्तरे) निजभोज्यगुणान्तरा- भ्यस्ते (स्पष्टभोग्य खण्डगुणिते) धनुर्हते (चापविहते) तदा मध्यशुद्धमौर्वीवृद्धि (चापान्तरसम्बन्धिज्यावृद्धि ) भवेत् । सा परिधिसगुणा, भाशे (३६० एभि ) हृता (भक्ता) लब्धधनु (लब्धचाप) गतौ (मध्यगतौ) स्व (धन) ऋण वा कार्य तदा ह्यस्तनाद्यतनयोर्मध्ये स्फुटा गतिर्भवेत् 11७०-७२३॥ अत्रोपपत्ति । पूर्व यन्मन्दगतिफलमानीत मअफज्या X मन्दकेज्यार मन्दगतिफल । त्रि स्पभोखXमकेग तत्सम्बन्धे कथ्यते यदा मन्दकेन्द्रज्यान्तर यत्तत्प्रमाण स्पभोख ४मकेग ग्रहीतय्य यदि चापमानमल्प भवेत् । एतदेव मन्दपरिधिना स्पभोख ४ मकेगxमपरिधि गुणित भारी ज्य तदा गतिफल भवेत् । मदगतिफल प्रथमचा४३६० तत मध्यगतिन मन्दगतिफल-स्पप्टगति । वटेश्वराचार्यो विषममिम ज्ञात- वान् यत्पूर्व मन्दकेन्द्रज्यान्तरमन्दकेन्द्रान्तरमन्दवेन्द्रगतीना तुल्यत्वस्वीकरण युक्ति- युक्त नहि, तत्सशोधनमेवार करोति परन्तु मन्दगतिफलसशोधन न कृतवान् तेनंत- स्सशोधनमपि तथ्य नास्ति, अन्यराचार्य रेतद्विपये किमपि न कथ्यते । एतेनाऽचार्यस्य दूरदर्शिता लक्ष्यत इति । एतत्कथनस्यावश्यक्ता नासीद्यतोऽय विषय पूर्व न प्रति- पादितोऽस्ति । ७१-७२३॥ इति वटेश्वरसिद्धान्ते स्पप्टाधिकारे सूर्याचन्द्रमसो स्फुटीकरणविधि प्रथमोध्याय समाप्त ।। हिमा--गम्य वेन्द्रज्या मान में गतवेन्द्रज्या मान को घटाकर जो होता है उसरे मान लाने के लिए यदि चाप छाटा है तो गतवेन्द्र चाप और गम्य केन्द्रचाप के प्रतर (मदरेन्द्रगति) को गतगम्य केन्द्रग्यान्तर (स्पष्टभोग्यखण्ड से) गुसकर चाप से भाग देवर जो फर हो उसको मन्दपरिघि स गुणवर भाग (३६०) म भाग देने से जो फ्त हो उसके ज्याप्रथम प्रथम चाप वटेश्वर-सिद्धान्त चाप को केन्द्रका (मवरादि पर्यादि वेन्द्र के अनुमार) मध्यगति में हीन धन परने में स्पष्टं गति होती है । वीता हुमा पल और माज के ग्रह स्पष्ट का अन्तरगत स्पष्टगति है । मागे वे पल पोर पाज दे स्पष्ट ग्रह के अन्तर गम्य समान है। उपपति में फज्या मादन्द्रज्योन्तर पूर्व में जो मन्दाति फ्त- =मन्दगतिपल, लाये गये त्रि स्पभोर मवेग हैं उसी ये सम्बन्ध मे रहते हैं कि मन्दवेन्द्र ज्यान्तर= इममे यदि चाप ज्याप्रयम छोटा है तो मन्दकेन्द्रज्यान्तर=मन्दकेन्द्रान्तर=मन्दवेन्द्रगति, तथा प्रयमज्या प्रथमचाप लेकर मन्दकेन्द्रज्यान्तर या मन्दोन्द्रगति सम्वन्धिनी ज्यावृद्धि को मन्दपरिधि से गुणकर भाग (३६०) से भाग देकर जो पल हो उसे पेन्द्र (मकरादि, क्वर्यादि) वा मध्यमगति मे ऋण धन करने से स्पष्टगति होती है । प्राचार्य को यह विषय मालूम था कि पहले जो ज्यान्तर पौर चापान्तर अर्थात् मन्दकेन्द्रज्यान्तर=मन्दरेन्द्रातर=मन्दकेन्द्रगति तुल्य स्वीकार किया गया है सो ठीक नहीं है उमीना सशोधन यहा करते हैं, परन्तु फ्लज्यान्तर स्प फ्लगति का सशोधन नहीं हुआ है वयोपि मानीत गतिफल फलज्यान्तर रूप है, फलज्यान्तर के चाप करने से फल गति नहीं हो सकती है, ज्यान्तर के चाप, चाप न्तर के बराबर नहीं होता है । मत. यह सशोधन अधूरा ही रहा परन्तु इस विषय के सम्बन्ध में किसी दूसरे पाच पं ने कुछ नहीं लिखा है । मन्दपेन्द्र ज्यान्तर तुल्य मन्दकेन्द्रगति जो पहले स्वीकार की गई सो ठीक नहीं है, इसलिए उमका सशोधन करना आवश्यक समझ कर यहा सशोधन किया है यद्यपि यह सयोधन भी ठीक नहीं है परन्तु इससे व श्वराचार्य की दूरदर्शिता देखने मे पाती है ।। ७१-७२ ।। इति वटेश्वरसिद्धान्त मे स्पष्टाधिकार म "रविचन्द्र की स्पष्टीकरण विधि" नामक प्रगम अध्याय समाप्त हुमा ।।
द्वितीयोऽध्यायः स्वोच्चनीचग्रहस्फुटोकरणविधिः तत्रादौ कुमादिग्रहाणा स्फुटत्वार्य फलचतुष्टयसस्कारमाह । प्राग्वन्मन्दफलं खगाच्छकलित मध्ये तदूनाच्चला- च्छघ्रयाधं व मृदुस्फुटे धनमरणं केन्द्रजिजूकादिके तस्मान्मन्दफलं महादविकल मध्ये तदूनात्पुन । स्तरछीघ्रफलं च तत्र खचरे कृत्स्नं स्फुटोऽसौ मवेत् ॥१॥ विभा~खगात् (मध्यमग्रहात्) प्राग्वत् (पूर्ववत्) मन्दफल साध्य, शव- लिन (अधित) मध्ये ग्रहे देय (धनत्वे क्षयत्वे वा गोलवशात्कार्य) तद्नात् (अर्ध- मन्द पल सस्कृतमध्यमरहितात) चलात् (शीघ्रोच्चात्) शंघ्रयाधं (शीघ्रफलार्धमर्थ- दर्धमन्दफलसस्कृतमध्यमग्रहे मन्दस्पष्ट ) अजजूबादिके केन्द्र (मेपादितुलादिकेन्द्र) धनमृण कार्यम् । तस्माद् ग्रहात् (द्वितीयफ्लाघसस्कृतग्रहात्) अविकल मन्दफल (सम्पूर्ण मन्दफल) कृत्वा मध्यमे ग्रहे धनमृण कार्यम् । तद्नाच्छीघ्रोच्चात् तद्वत् (पूर्ववत्) शोघ्रफलमानीय तत्र खचरे (तृतीयकर्मसिद्ध मध्यमग्रहे) कृत्स्न (पम्पूर्ण) धनमृण कार्य तदाऽसौ स्फुटो भवेदिति ॥ १ ॥ अनोपपत्ति कुजादिग्रहस्पष्टीकरणार्थ फाचतुष्टय (मन्दफ्लागीघ्रर लार्ध मन्दान- शीप्रफलानि) सस्कार सर्वैराचार्य सूर्यसिद्धान्तकारादिभिर्यथोक्तस्तथवाऽनेनाचा- येणापि क्य्यते, मन्दफलार्धशीघ्रफलायो सकार. क्य क्रियते तदर्थ कार युक्ति- न मिलति केवल पूर्वाचार्योक्तवचनमेव प्रमाणमिति ॥ हि भा~मध्यमग्रह से पूर्ववत् मन्दर साधन बरसा उन प्राय को मध्यपग्रह में केन्द्रवश धन वा ऋण करना चाहिये, प्रपद पल मत मध्यम ग्रह बरसे रहित ीनीन्च से शीघरलसाधन कर उसरे मावे को अयं मन्दपल मुस्कृत मध्यम ग्रह में मैपादि और नृवादि केन्द्रका धन ऋण करना। द्वितौरफ्लाय मस्त मह में मन्दल माधन कर मध्यमाह में -
३५६
वटेश्वर सिद्धान्त
धन वा ऋण करना ! उस करके रहित शीघ्रोच्च से पूर्ववत् शीघ्रफल साधन वर तृतीयम
सिद्धग्रह म धन या ऋण करने मे सष्ट ग्रह होते हैं ॥१॥
उपपत्ति
कुजादि ग्रहों के स्पष्टीकरण के लिय चार फल (मदपलाधं, शीघ्रफ्लापं, मन्दपल,
शीघ्रफल ) के सस्कार सूयसिद्धान्तवार आदि प्राचार्यों ने अपन अपने सिद्धान्त म कहे हैं।
गोल मे दो ही फल (म दफ्ल) और गीघ्रफल) मस्कार की स्थिति देखने में पानी है, मद
फ्लाप और गीघ्रफलाप का सस्कार क्या क्यिा जाता है इसके लिये कोई युक्ति नहीं है
केवल मासवचन प्रमाण है ।। इति ॥ १॥
इदानी बुधशुक्योविवेपमाह ।
ग्रहोनात्स्वचलात्कृत्स्न फल घ्रिय ज्ञशुक्रयो ।
मान्द चव स्वमन्दोनात्सकल मध्यमाद् महात् ॥२॥
वि मा–ज्ञशुक्यो (बुघशुक्यो ) ग्रहोनात्स्वचलात् (ग्रहरहितात्स्वशीनो.
च्चात्) कृत्स्न (सम्पूर्ण) शैघ्रय फ्ल तथा स्वमन्दोनात् मध्यमाद् ग्रहात् सकल
(सम्पूर्ण) मान्द फल साध्यम् ॥ २॥
हि मा-बुध और शुक्र के लिये ग्रह रहित शीघ्रोच्च से दीघ्र फल साधन कर वह
सम्पूर्ण जीघ्र फल सस्कार करना और मदोच्चरहित मध्यम ग्रह पर से साधित मन्दफ्ल
सम्पूर्ण सस्तार करना चाहिये ।।२।
इदानीगोप्रफलानयनमाह ।
प्रमाफलनिगुरपयोविवरक्यमुक्ता केन्द्र कुलीरमकरादिगतेऽन कोटि ।
तद्बग बाहुपलवर्गयुते पद स्यात्कों भुजाफलहतत्रिगुणस्य हार ॥३॥
सब्यस्य चापमिह शीत्रफल प्रदिपमेव मृदुश्रवणको धुचरस्य साध्य ।
बाह्वनपो स गुणकस्निगुणश्व हारस्ताम्यामसावसकृदेवमनिश्चलत्वे ॥४॥
विभा -कुलोरमारादिगते चन्द्र (कर्यादिमकरादिवे द्र) अग्राफ्न
त्रिगुगयो (कोटिप त्रिज्ययो) विवरेवय (अतरैक्य) कोटि (सश कोटि )उत्ता
(कथिता) तद्वगवाहुपलवगयुते (स्पप्रकोटिवगभुजप नवगयोर्योगात्) पद
(मून) वर्ण (शीघ्रवण) भवेत्। भुजाफ्लतत्रिगुणस्य (भुजफ्लगुरिणत
विज्याया) वर्णो हार (भाजन ) लब्धस्य चाप शीघ्रफल प्रदिप्ट (कथितम्) एव
धुपरस्य (प्रहस्य) मृदुधवरणप (मदरण) साध्य । स क्ण बाह्वअयो
(भुजज्यायोटिज्ययो) गुण , विगुण (त्रिज्याहार ) ताभ्या फलाभ्या, प्रनिश्च-
लत्वे (चञ्चलरवे) असहदसो भवेदिति ॥ ३४॥
स्पप्टाधिकार अनोपपत्ति उ च कक्षाकृ शीध पति मशीघ्रप्रतिवृत्ते मन्दस्पष्टग्रह । नस्पष्टग्रह । र-मन्दस्पष्टग्रह । रन शीघ्रफलम्। उ-दीघ्रोच्चम् । भू-भूकेन्द्रम् । नग-शीघ्रफलज्या गा भूर-त्रि। भूम शीघ्रकम् । चित्र मच = भुजफलम् । चर-अाफ्लम् भू = कोटिफ्लम् । मकरादिकेन्द्रे भूर+ रच%=भूचक नि+अंग्राफल -त्रि+ कोटिफा-नीचो- वृत्तीयस्पष्टा कोटि । कांदिवेन्द्र त्रि--अग्राफल-नि-कोफल = नीचोच्च वृत्तीयस्पप्टा कोटि । तथा भूच'+मच = स्पको+भुजफ' =भूम= गीघ्ररणं तत भूमन, भूनग विभुजयो साजात्यादनुपात मुजपलxनि शीघ्रवर्ण शीघ्रपालज्या, अस्याश्चापम् = शोघ्रफलम् । शेषोपपत्ति स्फुटवास्ति ।। ३-४ ।। हि भा-वर्यादिौर मररादि केन्द्र म वाटिपन और विग्या के प्रतर, योग करने से स्पष्टा कोटि होती है, उमरे (स्पष्टवाटि) और भुजात वर्ग के याग कर मूल लन से सोनवणं होता है। विज्या मऔर भुनफल के पात में गोमवरण म माग देकर जो पर हो उसपे चाप करने से ग्रह वे सीन पल होते हैं। इस तरह ग्रह का मन्दवणं साधन बरना, सोन ये द्रज्या, पोर दीघ्रबन्द्र कोटिग्या का वर्ण से गुणकर विज्या से भाग देने पर जो फलद्वय हात हैं उनमे समक्तकम द्वारा वे होत हैं।। ३-४ ।। उपपति चित्र गये। %3- - भू-भूकेन्द्र, ३=ोनोच, मशीनयतिवृत्त म मादस्पटन नम्-एग्रह । र
भुजफन नि
वटेश्वर-सिद्धान्ते
मन्दस्पष्टग्रह । नरशीघ्रफल, नग-शीघ्रफलज्या भूम-शीघ्रकरणं,मच= भुजफ्ल, चर:
कोटिफ्ल, भूर-निग्या, भूमच, भूनग य दोनो त्रिभुज सजातीय है इसलिए मनुपात
करते हैं।
शीघ्रपलज्या, चाप करन से शीघ्र पल हुआ।
शीघ्रण
दोप की उपपत्ति स्पष्ट है ॥ ३.४ ॥
इदानी पानयनमाह
स्फुटकोट्यग्ना फलकृतिविवरात्यफलगुरणकृतियुतेमू लम् ।
कर्ण. स्यादथवा भुजाफलेन विनियोजना नात्र ॥५॥
विमा-स्फुटकोट्यग्रा फलकृति-विवरान्त्यफलगुणकृतियुते (स्पष्टकोटि-
कोटिपल वर्गान्तरान्त्यफल ज्यावंर्गयोगस्य) मूल वा वर्ण स्यात् । अत्र भुजाफलेन
(भुजपलेन) विनियोजना चार त्याद् जपलेन सम्बन्धो स्ति, अग्राफ्लम-
कोटिफलम् ।
प्रकोपपत्ति ।
स्पष्टको'-कोटिफ्ल'+अन्त्यफ्लज्या'
= स्पष्टको+अन्त्यफ्लज्या'-कोटिफ्ल' स्पष्टको+मुजफ्ल'वर्ण
मूलेन / स्पष्टको +भुजफल' कर्ण
श्रत उपपन्नमाचार्योत्तम् ॥ ५॥
अब कानयन कहते हैं।
हिमा-स्पष्टकोटि और कोटिफन इन दोनो के वर्गान्तर मे अन्त्यफलज्या वर्ग
जोडकर मूल लेने से वर्ण होता है यहा मुजफल से सम्बन्ध है अर्थात् भुजफ्ल की सहायता
से क्रांसाधन है।
उपपत्ति
स्पप्टको'-कोरिफ्ल' प्रन्यफ्नग्या'- स्पष्टवो+मन्त्यपज्या-
-कोटिफ्ल'
- स्पष्टको'+भुजफ्न' । मूल लेने से स्पष्टका'+भुजफ' =र्ण
मत प्राचार्योक उपपन्न हुमा ॥५॥
इदानी भुजफन दिनव वर्षानयनमाह ।
सातिविवरहति परफलगुणवर्गसपुता सा स्यात् ।
कर्णकृतिस्तन्मूल कर्णोदो फलगुण विनवायम् ॥६॥
वि भा -तद्युति (सप्टकोटि-कोटिफ्लयोर्योग ) विवरहति (पप्ट-
कोटि वोटिफलयोरलरगुरिगना) परफ्लगुणवगसयु (अन्त्यफ्नग्यायगयुता)
वर्णकृति (कणंवर्ग) तन्मूल वर्णो भवेत् । अय कर्ण, दो फलगुण विनव
(भुजफलग्यासाहाय्यमनरेव) स्यादिति ॥६॥
स्पष्टाधिकार अस्योपपत्ति पूर्वश्लोकोपपत्तौ स्पष्टको'-कोटिफल+अन्त्यफलज्या = कर्ण वर्गान्तरस्य योगान्तरघातसमत्वात् (स्पष्टको कोटिफल) (स्पष्टको-कोटिफल) + अन्त्यज्या = कर्ण' मूलेन V(स्पष्टको+कोटिफल) (स्पष्टको-कोटिफ्ल)+अन्त्यफेज्या कणं एतावताऽऽचार्योवप्तमुपपन्नम् । ॥६॥ हि भा --स्पष्टकोटि और काटिफल के योग को दोनो के (स्पष्टकोटि और कोटि- फल) अन्तर से गुण र अन्त्यफलज्या वर्ग जोडने से कर्णवर्ग होता है, उसका मूलवणं होता है, यह कर्णसाधन भुजफन बिना ही होता है ॥६॥ उपपत्ति पहले श्लोक की उपपत्ति मे सिद्ध हुआ है स्पष्ट को'-कोटिफ्ल'+अन्त्य- फग' करणं' वर्गान्तर योगान्तर घात के बराबर होता है इस नियम से (स्पष्ट को+योटिफल) (सप्टको-कोटिफ्ल)+अत्यफलज्या'=' मूल लेने से (स्पष्टको+कोटिक) ( स्पष्टको-कोटिक ) + अन्त्यपज्या =कणं इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुमा ॥६॥ इदानी पुनरपि कानयन प्रकारद्वयेनाह । भुजफलरहिताग्रया हता वा युतिद्विघ्ने च कृती तदन्धितोने । मूले च गरएकवरंजनेशमान्य जफलकोटिकयो श्रुती प्रदिप्टे ॥७॥ वि मा -वा (अथवा) भुजफलरहिताग्रया (भुजरहितकोट्या) युति (भुज- कोटियोग ) हता (गुणिता) द्विघ्ने (द्विगुणिते) कृती (भुजकोटिवर्गो) तदन्वितोने (पूर्वफलेन सहितरहिते) मूले तदा भुजफलकोटिकयो ध्रुनी (कर्णी) प्रदिष्टे (कथिते) जनेशगान्य (राजमान्य ) गणकश्रेष्ठरिति ।।७।। अत्रोपपत्ति श्लोफोक्त्या (को+भु) (-भु)-यो'-भु' (पो+भ) (यो-भु)को'-भु' अनयोर्योग द्वयोरन्तरेण २ भु'-- को'-भु-भु+यो' =पर्ण गो- (को-भु)-को-को+ मूलन भुको+भुवर्ण मूलेन Vभु+कापर्ण / को+भु कणं अत्र को-म्पप्टा को। मु-मज्या । गर्णमा प्रत उपपन्नमाचार्योक्तम् ॥७॥ २ भुग २ को वटेश्वर-सिद्धान्ते A पुन वर्णानयन दो प्रकार से कहते हैं । हि भा--भुज और कोटि के अन्दर से उनी दोनो के योग को गुणवर द्विगुणि भुजवर्ग और द्विगुणित कौटिवर्ग मे जोडने और घटाने से उस पर से मूल लेने से दो प्रका के कर्ण होते हैं ।। 311 उपपत्ति श्लोकोक्ति अनुसार २ को मूल लेने से मूल लेने से '-मका (को+मु) (को-मु)को'-मु' (को+भु) (को-भु) को२-भुरे दोनो के योग करने से दोनो के मन्नर करने से २९+को'-मु-भु+को'-वर्ण २ को-(को--भु२)=२ को-को' +भुको+भुपरणं VS+कार-वर्ण को भु' -रणं पहा को स्पष्टा को। भु-मोज्या। घर इसमे प्राचार्योक्त उपपन्न हुपा ॥७॥ पुन बनियनमाह ! बधाद् द्विनिम्नास्वविशेषगिता प्रयोजनान्मूलमुशन्ति वा श्रुतिम् । श्रुतिप्रमाणानपनान्तराणि वा ज्ञेपानि विहि सुतीदरणबुद्धिभिः ।।८।। वि भा.-द्विगुणितभुजकोटिघातात्स्वान्तरवर्गयुतान्मूल वा कणं पण्डित कथयन्ति, कर्णमानमाधनान्तराणि सुतीक्ष्णबुद्धिभि पण्डितर्वोध्यानोति ।।८॥ प्रयोपपत्ति श्लोवोत्या (को-भु)+रभु को-वो-भ पो+ मु+भु यो =भु+वो'क' मूलेन कणों भवेदिति 11- हि माद्विगुणित मुजवारिघात मे मतर वर्ग जोड पर मूल लेने से कणं होत है ऐमा पण्डित लोब वहते हैं । या दणंमान के दूसरे दूसरे मानयन भी सीधणबुद्धि था परित लोग सममें ।।। उपपत्ति दलोकोक्ति के अनुसार (को-मु) २+२ कोका-२ भु नो+भु+: मो+को' = वर्ण मूल लेने से पर्ण होता है 115 स्पष्टाधिकारः पुन. कामानियनमाह। द्विघ्नाऽग्राफलताड़ितरित्रभगुणः केन्द्र मृगादिस्थिते, व्यासान्त्यिफलज्ययो. कृतियुतो देय फुलोरादिगे। हेयः स्याच्छ्रवणः पदं परफलव्यासार्धकृत्योयुते- व्यासाप्तं श्रुतिवर्गतश्च फलयोः स्यादन्तरेऽग्राफलम् ॥६॥ वि. भा.--विभगुण (त्रिज्या) द्विघ्नाग्राफलताडितः (द्विगुणितकोटिफ्ल- गुरिणत:) मृगादिस्थिते केन्द्र (मकरादिकेन्द्रस्थिते ग्रहे) व्यासान्त्यफलज्ययो. कृति- युतौ (त्रिज्यान्त्यफलज्ययोर्वर्गयोगे) देय. (सहित ) कुलोरादिगे केन्द्र (कर्यादि- केन्द्रस्थित ग्रहे) हेय (रहित ) पद (मूल) श्रवण (कर्ण) स्यात् । श्रुतिवर्गतः (कर्णवर्गात) परफलव्यासार्धकृयोयु ते (अन्त्यफलज्यात्रिज्ययोवयोगान्) रिक्तं. स्थानं व्यासाप्तं (व्यासभक्त) फलयो (त्रिज्यान्त्य फलज्ययोवर्गयोगरपमेक फलम्- कर्णवर्गे विज्यान्त्यफलज्ययोवर्गयोगातिरिक्त द्वितीय खण्ड व्यासभकत द्वितीय फलम्) अन्तरेऽग्राफल (कोटिफल स्यात्) || अस्योपपत्ति अथ मृगादिकादिकेन्द्रवशात् वि + कोटिफल-नीचोच्चवृत्तीयस्पप्टकोटिः। स्पष्टकोटि + भुजफल = कर्ण( निकोटिफल) भुजफल' -त्रि+२ नि कोटिफल+कोटिफल'+भुजफल' =त्रि+२ त्रि कोटिफल+अन्त्यफलज्या'। : कोटिफ'+मुजफ' =-अफज्या -नि+अन्यफयानि कोफ - कर्ण मूलेननि+अन्त्याज्या' २ नि कोफ -कर्ण। तथाच त्रि+अन्त्यफज्या + २वि कोफ त्रि+अन्त्यफज्या'२ वि. कोफ २थि -नि' + अन्त्यफज्याकोफल=द्वितीयफ । तथा वि+अन्त्यफलज्या-प्रथमफलम् अनयोरन्तरे त्रि+अफज्या + कोफ-(त्रि+अफाज्या') - कोफल, एतावताऽऽचार्योक्तमुपपन्नम् Ill हि.भा.-त्रिज्या यो द्विगुणित योटिफ्त से गुणवर मरादि केन्द्र में त्रिज्या मोर अन्त्यफलज्या के वगं योग में जोड देना, पर्यादि केन्द्र में घटा देना, उसर्व मूल लेने से परणं होता है । क्रांपग मे मन्सपलग्या पोर श्रिया के वगंमोगातिरिक्त सन्द्र में व्यास में भाग देवर जे हो तलहित अन्य ज्या त्रिज्यावगं योगाय पर नथा अन्यत्रज्या विग्या वर्गयोग स्पदिनीय एन के अनर करने में वोटिक्ल होना है ! व्या वटेश्वर-सिद्धान्त उपपत्ति C मकरादि पेन्द्र मोर क्र्यादि केन्द्रवा नियोटिफ्ल-नीचोच्चवृत्तीयसप्टा गे 'तपा स्पष्ट को मफलक (त्रियोरिफल) + भुजफल =Eि+२वि वोरिपत+वोटिफ्ल' भुजफल'' -विनि कोटिपल+अन्त्यफ्लया। .:कोटिष'+ मुजफ' अन्त्यज्य -नि अन्यपग्या+२ त्रि कोफ= कर्ण मूल लेने से रणं हो जायगा । "अब, त्रि+अन्त्यज्या' = प्रथमफल त्रि' अन्त्यपज्या' + २ त्रि कोटिफ=त्रि+अन्त्यपज्या २त्रिकोटिफ व्यास २त्रि %3D =नि+अन्त्यपज्या'+कोटिफ्ल-द्वितीयफ्ल दोनो फ्लो के अन्तर वरन से वि+अफज्या कोटिफ्न-(त्रि+अन्त्यफ्लग्या') = त्रि'+ अ पज्या, + कोटिफ्ल-त्रि-अन्त्यपज्या'=+कोटिफ्ल इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुमा IIEI पुनस्तदानयन प्रकारद्वयेनाह । भुजफलानसमासहते तुते निजविशेषहताप्रभुजाफले। घनमूग क्रमशो गणका धरा पदमुशन्ति तयोरथवा श्रुती ॥१०॥ घि भा -ते भुजकोटी भुजगफलान समासते (भुजकोटियोगगुरिणते) निज- विशेपत्ताग्रभुजाफ्ले (भुजकोट्यन्तरगुणितकोटिभुजप्रमाणे) क्रमशः धनमृण तत्र कार्ये तयो पद बरा (श्रेष्ठा ) गएका (ज्योतिर्विद ) अथवा (प्रकारान्तरेण) श्रुतो उशन्ति (कथयन्ति) इति ॥१०॥ अनोपपत्ति लोगोवत्या को (भु+को) --को भु+को' भु (भु+को)-भु+वा'xभु भु (को-भु)= भु. को-भु को (वो-भु)-पोवोxभु द्वयोरन्तरेण द्वयोर्योग को भु+को'-(भु को-भु') " +यो भु+पो-योxभु -को भु+वो'-भु को+भु' को+ भुवर्ण =पणं मूनेन मूलग्रहणेन V + को वर्ण Vका+भु =करणं । =मु+को' स्पष्टाधिकार अन को स्पष्ट कोटि भुकमरेन्द्रज्या । करणं-म कर्ण प उपपन्नमाचार्योक्तम् ॥१०॥ पुन कणांलयन दो प्रकार मे गरसे है हि.भा.-भुज और कोटि को अलग-अलग भुज और कोटि के योग गे गुण देना, मुजें और कोटि के अनर से गुणित कोटि और भुज को उसम जोडने और घटाने से मूल न लेने से दो प्रकार के करणों को ज्योतिषी लोग कहते हैं ।। १०॥ उपपत्ति श्लोकोक्ति के अनुमार- झ (भु+को) = भु+भु वा को (मुमो)-को भु+का' को (को-भु)-को---को भु भु (को-भु)=भु को-भ दोनो के योग करने से दोनो के अन्तर करने से भु+भु को+को-को भु-भु+को को भु+को'-भु का+भुको+भु =वर्ण मूल नेने से { =वर्णमूल लेने से V+को' = कर्ण /को+ भुर्ण यहा वो स्पष्ट काटि भु-मकेन्या मम्ममणं इगम प्राचार्योन अपन्न हुमा ॥१०॥ इदानी पुगादिस्पष्टीकरणमम्बन्वेवसरणमाह । एवं खेचरमेकमेव गणयन यवाद्ययंव स्फुट भुक्ति स्यादवियरायशिष्टमनयो स्पष्टादिवंय ग्रहै । वहारयाद्यतनेज्यका प्रहमतेः साध्य फल पूर्ववन् मार्द तद्दलसंस्कृतामपनपेत्तच्छीघ्रभुक्तः पृथक ॥११॥ वि.मा-एव (अनेन पूर्वोत्तरमेण ) एकमेव चर (प्रा) गणयन् प्राद्ययैव रीत्या स्फुट (ग्रहस्पष्टीकरण) प्रतिपाद्यते । (अयान्माधारणरूपेण चुनादिग्रहाणा मष्टीकरणमभिधीयते नहि कुनापि स्थापि ग्रहम्योल्लेग क्रियते) अनयोग्य योविय रावशिष्ट (द्विनद्वयग्रहान्तरशेप) मुक्ति स्यात् (ग्रहगति स्यात् सष्टादिकन है सष्टादिया मुक्तिराल्लष्टग्रहयोरन्तर मप्रगति । मध्यमग्रहयो- रन्तर मध्यमगति । वारपाद्यतने यया पूर्ववत् मादं ग्रहगते फन (मन्दगनि. फल) साध्य तद्दलसना (मन्दगनिपतामाता मध्यगत) पृथर, गोधमुक्त - वटेश्वर-सिद्धान्त (शीनोच्चगतित ) अपनयत् (शोषयेत्) तया केन्द्रगतिर्भवेत् । अन वक्रास्याद्यतने इत्यसङ्गतमिव प्रतिभातीति ॥११॥ हि भा -इम पूर्वकथित म स एक ही ग्रह को गणना करते हुए प्राचीन ही रीति मे ग्रहस्पष्टीकरण में पता ह अथात् साधारण स्पस कुजादिग्रहा के स्पष्टीकरण कहता हू कही पर क्सिो ग्रहविशेष वा उल्नेस नहीं करता है। इन दो ग्रहो का (प्रद्यतन श्वस्तन ग्रहो का) अतर ग्रहगति है । स्पष्टादि ग्रह करके स्पष्टादिक्पत्ति होती है । पर्याद प्रद्यनन श्वस्तन स्पष्ट ग्रह का अन्तर स्पष्टगति है । एव अद्यतन श्वस्तन मध्यमग्रह का अतर मध्यमगति है । पूर्वर मदगतिफल साधन र मध्यमगति म सस्कार करने से जो (मन्द स्पष्टगति ) हो उसका शीघ्रोच्चगति म घटा देना तव शेष घाघ्र द्रगति हाती है ॥११॥ इदा । गतिस्फुटीकरणमाह केन्द्रभुत्तिरवशेषमुच्यते ता स्वशीघ्रफलधन्दभोज्यया। जीवपाशशिरसं प्रताडयेद भाजयेच्च चलकर्णजीवया ॥१२॥ लब्धमा निजकेन्द्रभुक्तित शोधयेद्गतिफल धनक्षय । व्यस्तशुद्धिविक्ल दलीत स्यान्मृदुस्फुटगतौ तत पुन ॥१३॥ प्रोक्तचन्मृदुफल समस्तक मध्यमग्रहगतौ यथोदितम् । सविहीनचलकेन्द्रभुतित शीघ्रज च निखिल स्फुट भवेत् ॥१४॥ शोधनीयमधिनो यदा गते शुद्धयतीह चलकेन्द्रज फलम् । भुक्तिमेव फलतस्तदा हरेद्वक्रभुक्तिरवशिक भवेत् ।।१५।। चि भा - अवशेष (शीघ्रोच्चगतितो मन्दस्पष्टगत्यूना यच्छेप ) शीघ्रकेन्द्र- गतिभवति । ता स्वशीघ्रफनधन्वभोज्यया (स्पष्टभोग्यखण्डेT) जीवपाशशिरस (निज्यया) प्रताडयत् (गुणयेत्) चलवण जीवया (शोघ्रवर्णन प्रथमज्यया च) भाजयेत् लब्धमत्र स्पष्ट द्रगति निजके द्रभुत्तित (शीघ्र द्रगतित ) शोधये तदा धनक्षय (धनमृग) तिफन (शीघ्रगतिपल) भवेत् । व्यस्तशुद्धिविकल (विलोमशोधनावशिष्ट ) दगीकृत (अर्धाकृत) मृदुस्फुटगतो (मन्दस्पष्टगतो) सस्वाय तत पुन प्रोक्तवत् (पूर्ववत्) समस्तक मृदुपल ( सम्पूणमन्दफल ) यथोदित मध्यमग्रगती स काय लद्विहीनचलकै द्रभुक्तित (तद्रहितशीघ्रकेद्र भुक्तित ) शीनज फल निपिल (मम्पूर्ण ) सप्काय तदा स्फुटपहो भवेत् । यदा शोचनीय (गणितसाधिा स्पष्ट के द्रगतिप्रयारण) गते (शीघ्रकेन्द्रगतित ) नो शुद्धयति तदा चलवे द्रज पर फनत शोधयेदवशिष्टक वनभुक्ति स्या दिति ॥ १२१५ ॥ अनोपपत्ति । यदि शीघ्रपणेन शीघ्र द्रज्या लभ्यते तदा निज्यया कि समागच्छति स्पष्टये द्रज्या तरम्पम्पम् -- सीवेज्या नि शोक । एवमेव शीपज्यात्रि -स्प'रेद्रज्या शोक स्पष्टाधिकार ३६५ अनयोरन्तरम् ति- (शीकेज्या'शीकेज्या) =रुप केन्द्रज्या'-- स्पकेन्द्रज्या । %3DD नि:शीघ्रकेन्द्रज्यान्तर स्पष्ट केन्द्रज्यान्तरम् शीक अथ स्पभोखंxशीकेग अथ यत. शीघ्रकेन्द्रगतिसज्यावृ--शीघ्रकेन्द्रज्यान्तर उत्थापनेन प्रथमज्या नि स्पभोग्य सीकेग = स्पष्ट केन्द्रज्यान्तरस्पष्ट केन्द्रान्तर= स्पष्ट केन्द्रग शोकण प्रथमज्या (स्वल्पालरात्) तत शोकेग स्पप्टकेगशीघ्रगतिफलम् । मन्दस्पष्टगनावेतस्य सस्करणेन स्पष्टगतिर्भवेत् मन्दस्सग+शीघ्रगतिफ- स्पष्टगति यदा च ऋणात्मिका गतिर्भवेत्तदा सैव वका गतिरिति । प्राचार्योक्त स्पष्ट केन्द्रगतिमाधन न समोचीनमिति तदुपपत्तिदर्शनेनैव स्फुट भवति भास्कराचार्येण सिद्धान्तशिरोमणी तत्साधन समीचीन "फलान- खाकान्तरशिञ्जिनीनी द्राक् केन्द्रभुक्तिरित्यादिना" कृत, भास्कगेकम्माष्टकेन्द्र- गति शीघ्रफलकोज्या शोकेग इतिशीघ्रोच्चगती विगोध्य तदा स्पष्टगति शीघ्र यदा सरकेन्द्रगनिमधिन भवेनदा गीघ्रोच्चगती शीक तन शुद्धयति तत्र विलोमशोधनेन शिष्टा स्पगति क्षयामिका भवेनदेव महति- वक्रा भवेत्परमेव स्थितिर्नीचस्थाने फल काटिज्याया परमवालीघ्रकर्णस्य परमाल्पत्वाच्च भवितुमर्हत्यनेन मिद्ध यन्नीचा मन्न एव ग्रहगतेर्वक्रतारम्भ इति ।।१२-१५॥ हि भा - शीघ्रोचगति में स्पष्ट गति घटाकर जो शेष रहता है वह शीघ्र बन्द्रगनि हैं उसको भोग्यज्या (स्पष्टभोग्यपण्ड) मे गुणवर त्रिज्यया मे गुग्गना, शीघ्रकर्ण और प्रथम ज्या से भाग देकर फर स्पष्टोन्द्रगति होती है, उसको दी केन्द्रगनि में घटाने गे धन या ऋण शीघ्रगतिफल होता है । विलोमशोधन से जो शेष रहना है उमदे पाये को मन्दम्पष्ट गति मे संसार करना, उमसे फिर पूर्ववत् सम्पूर्ण मन्दफ्न मध्यमगति म मस्वार परना, इस तरह फ्ल परवे रहित शीनवेन्द्रगति मे नगीनजपा सम्पूर्ण महार परना तव स्पष्ट- ग्रह होते हैं। यदि गणिनगाधित सप्टगवेन्द्रगति प्रमाण दीन पेन्द्राति में न घटे तो विलोम पटावर जो दोष रहता वह वरगति होती है ।। १२-१५।। उपपत्ति यदि पौधाणं में गीघ्रोन्द्रन्या पाते हैं तो त्रिज्या में क्या इस अनुपात से स्पष्ट शीउग-शीफमोज्या शोकेग ०६६ वटेश्वर-सिद्धान्ते सीवेज्या त्रि देन्द्रज्या पाती है। पीक स्पष्टवेण्या । इमी तरह- गीयज्या त्रि -सज्या शाक दोनो के अन्तर करने में " त्रि (मोज्योज्या)=स'वेज्या सवे ज्या भीक विशीप्रमेन्द्रज्यानर -स'ग्यास्पज्या सीक स्पभोख शोकेग परन्तु = दीनवेग स ज्यावृ=शीप्रोन्द्रज्यान्तर प्रथमज्या नि स्पभोख सीवेग इसलिये उत्थापन से स्पष्टवेन्द्रज्यान्तर=स्पप्टमेन्द्रान्तर - स्पष्ट- शीत प्रज्या केगति (स्वल्पान्तर से), तक सीकेग-पग फ्लगति, इमको मन्दस्पष्टगति मे मस्कार करने में स्पष्ट- गति होती है । जब ऋणात्मक गति होती है तो वहीं वनगवि कहलाती है। प्राचार्य से साधित स्पष्ट केन्द्रगति ठीक नहीं है यह बात उसकी उपपत्ति देखने से ही स्पष्ट है । भास्कराचार्य ने सिद्धातशिरोमणि म "फलाराखावान्तरशिञ्जिनी" इत्यादि से शीपकोज्या शीवेग स्पष्ट केन्द्रगति साधन ठीक किया है । भास्करोक्त स्पष्टकेन्द्रगः- इसको शीक शीनोचगति मे घटाने से ग्रह को स्पष्टगति होती है । शोउग-शोफ्योज्या गीग जब स्पष्ट- शीव केन्द्रगति का मान ज्यादा होगा तव शीघ्रोच्चगति म न घटने ये विलोम सबोधन होगा, तब ऋणात्मक स्पप्टगति होगी तभी ग्रहगति चक्र होगी। यह स्थिति नीचस्थान में पनको- टिग्या के परमत्व से और शीनवर्ष के परमालपत्व मे हो सकती है । इसमे सिद्ध होता है कि नीचासन्न मे ग्रह की वस्ता प्रारम्भ होता है ।।१२ १५ ॥ इदानी केन्द्रमभिधीयते ततोमन्द मोघ्रफ्लयोधनणंव्यवस्थामाह । मन्दग्रहोनमयया विचलश्च सेट केन्द्र ग्रह धनमृग पदयो क्रमेण । मार फ्लच विपरीतमतो हि शीघ्र जेय सदा चश्चलसमणीह ॥१६॥ विभा-मन्दग्रहोन (ग्रहरहितमन्दोच्च ) केन्द्र (मन्दवेन्द्रम्) विचल (शीघ्रोच्चरहित ) सेट (ग्रह) वेन्द्र (शीन केन्द्र ) भवेत् । पदयो प्रमेण (तुला. दिमेपादिवेन्द्रवर्शन, मान्द फ्ल ग्रह धनमृण (तुलादिकेन्द्र धन मेपादिकेन्द्र ऋण) भवति । चञ्चलकर्मणि (शीघ्रवर्मणि) सदा (सर्वदा) अतो विपरीत (मन्द- फलाद्विलोम) शीघ्र (शीघ्रफल) भवत्यर्थान्मेपादिकेद्र गीघ्रफल ग्रहे धन तुलादिवेन्द्र ऋण भवतीति । अन्यराचार्य श्रीपतिब्रह्मगुप्तभास्वरप्रभृतिभिर्मन्दोच्चरहितो ग्रहो मन्द- स्पष्टाधिकार ३६७ केन्द्र, ग्रहरहित शीघ्रोच्च शीघ्रकेन्द्र कथ्यते परमनेन प्रथकारेण शीघ्रोच्चरहितो ग्रह शीघ्रकेन्द्र कथ्यते इति ॥१६॥ हि भाग्रहरहित मन्दोच्च भदवेन्द्र होता है, शीघ्रोचरहित ग्रह शीघ्रकेन्द्र होता है । तुलादि और मेपादि केन्द्रवश मे मन्दफल ग्रह मे धन और ऋण होता है, इससे उलटा गौघ्र फल होता है, अर्थात् नुलादि केन्द्र में ऋण पार मेपादिकेन्द्र में धन है । अन्य प्राचार्य श्रीमति ब्रह्मगुप्त भास्कर प्रादि मन्दोचरहित ग्रह को भन्दकेन्द्र कहते है, ग्रहरहित शीघ्रोच्च को शीघ्रकेन्द्र कहते है परन्तु ये प्रत्यकार (वटेश्वर) शीघ्रोच्चरहित ग्रह को शीघ्रकेन्द्र कहते है ॥१६॥ अधुना विध्यन्तरेण फलस्फुटीकरणमाह । भुजफल वाऽयुजि साधगद् गतायुज्युत्क्रमज्योन निमज्यया फलम् । क्षये क्षयस्वे च धने धनक्षयौ ग्रहेऽथवा केन्द्रपदक्रमाद् भवेत् ॥१७॥ वि भा-वा प्रयुजि (विषमपदे) गतात्केन्द्रचापात् भुजफल साधयेत् । युजि (समपदे) उत्क्रमज्योन त्रिज्यया साधयेत् । केन्द्रपदक्रमात क्षये (ऋणे केन्द्रज्यामाने) भुजफले क्षयस्वे (धनणे)ग्रहे कार्ये, तया धने (धनात्मके ज्यामाने) भुजफले धनक्षयौ (धनणे) ग्रहे कार्य। अनायमर्थ -प्रथमपदे ज्याकरण भवनि, द्वितीयपदे उत्क्रमज्याधन, तृतीय- पदे क्रमज्याधन चतुर्थपदे उत्तमज्या मरण भवति । एव पदकमेण मोक्रमाभ्या केन्द्रज्या प्रसाध्य भुजफलमानयेत् । अत्र वाशब्द प्रकारान्तरसूचनार्थ । एतदुक्त भवति एव पदक्रमेण केन्द्रज्यामुत्पाद्य ' स्वेनाहते परिधिना भुजकोटिजीवे भागे". रित्यादिना मन्दभुजफलानि क्षयधनधनक्षय सज्ञकान्यानेयानोति ॥१७॥ अनोपपत्ति प्रथमपदे गताशाना कमज्या स्वपरिधिगुणा भागहता भुजफत स्फुटमेव । द्वितीयपदे गम्याशाना क्रममा गतोत्कज्यान त्रिज्यासमा मा परिधिगुणा भाशभक्ता परिधि (नि-उत्तमज्या), भुजफल भवेत् एवं भारा समपदे उत्क्रमज्यातो यद्भुजफल तेन परम भुजफल होन तदा वास्तव भुजफलम् । एव क्रमेण चतुर्यु पदेषु भुजफलम् । प्रथमपदे द्वितीयपदे 'परमभुजफन-परिधि उज्या भाश कमज्या परिधि पदान्ते परम भुजफलम् । उज्या परिधि पदान्ते परमभुजफन-- नाश शून्य मुजफलम् तृतीयपदे चतुर्थपदे कमज्या परिधि पदान्ते परम भुजफलम्। परमभुजफल उज्या परिधि भाश भाग प्रत मिद्धम् ॥१७ ३६८ वटेश्वर-सिद्धान्ते हि.भा-विपमपद मे गत केन्द्र चाप मे भुनक्ल साधन वरना समपद में उत्क्रम- ज्याहीन त्रिज्या से माधन वरना । केन्द्र के पद जम मे महारमर पेन्द्रज्यामान में ग्रह मे भुज- फल धन ऋण होता है धन मे भुजपन ग्रह में धन, प्राण होता है। यहा इसका यह अर्थ है कि प्रथम पद मे ज्या ऋण है, द्वितीय पद में उत्क्रमज्या घन है । तृतीय पद में क्रमज्या धन और चतुर्थ पद में उत्तमज्या कारण होती है। इस तरह पद क्रम से क्रम और उत्क्रम मे वेन्द्रज्या करके मुजफन साधन करना । उपयुक्त लोक मे (वा) शब्द प्रकारान्तरसूचक है । पदक्रम से केन्द्रग्या लाकर "स्वेनाहते परिधिना भुज- कोटिजीवे" इत्यादि भास्तरकथित नियम से क्षय, धन, घन, क्षय मझा मुजफल लाना चाहिए ॥१७॥ उपपत्ति %D प्रथम पद म गता ज्या को परिधि से गुणवर भाश भाग देने पर भुजपल होता है, द्वितीय पद मे गम्यादा की कमज्या गतचापागोजमज्यारहित निज्या घे बराबर है उसको परिधि से गुणकर भाश में भाग देने से भजफल होता है । परिधि (नि-उत्क्रमज्या) परिधि उज्या =परमभुजफ्ल+ इस तरह समपद में उत्क्रमज्या भाश भादा से जो भुजफल होता है परमभुजफल में उसको घटाने मे वास्तव भुजफल होता है। इस क्रम से चारों पदो मे भुजफ्ल होता है । प्रथम पद मे द्वितीय पद में क्रमज्या परिधि पदान्त में परमभुजफ्न। उज्या परिधि भारा परमभुजफ्ल- -पदात में भामा शून्य भुजफ्ल तृतीय पदम चतुर्थ पद में क्रमज्या परिधि पदान्त मे परमभुज उज्या परिधि भाग :: सिद्ध हुमा ॥१७॥ इदानीमानीताना भुजफ्लाना सयोगवियोगप्रकारमाह । क्षयस्वं हि ग्रहे कुन्फिलं जीवान्तरं भवेत् । फलयोर्वा विशेषोत्थ व्यत्यासाच्च चले भवेत् ॥१८॥ विमा-ग्रहे (मध्यमग्रहे) पल (मन्दभुजफ्ल) क्षयस्व (मणधन) जीवा- न्तर (ज्यान्तरात्मक ) कुर्यात् । फ्लयो (मन्दभुजफ्लयो) विदोपोत्थ (अन्तराज्जा. यमान) ग्रहे कुर्यात् । चले (शीघ्रवमणि) व्यत्यामात् (विलोमात्) भवेदिति ॥ अस्माय भाव । मन्दे शीघ्रवर्मरिण वा यदि प्रथमपदेवेन्द्र स्यात्तदा केन्द्रेण्यद्भुक्त तत्क्रमज्या ग्राह्या द्वितीयपदेवेन्द्रे द्वितीयपदीपोत्तमज्या परिधिना सगुण्यभाशेर्भक्त्या यत्फल तत्परमभुजतो विशोध्यावशिष्ट ग्रहस्य भुजफल भवति तेग 'क्षयत्वफ्ल'मित्युक्त परम भुजफल स्पष्टाधिकार यदि तृतीयपदे केन्द्र तदा भुक्तस्य क्रमज्या कृत्वा पूर्ववत् फल (भुजफल) समानीय द्वितीयपदोत्पन्नपरमभुजफले योज्यम्। ततस्तस्माद् योगात्प्रथमपदभुजफल विशोध्य तदा ग्रहस्य भुजफल भवेत् । चतुर्थे पदे केन्द्रे तत्पदीयोत्तमज्या परिधिना सगुण्य भाशैर्भक्त्वा फल प्रथमपदीयग्रहपरमभुजफ्ले योज्य तदा वास्तव भुजफल भवेदत्त उक्त "फलयोर्वा विगेपोत्थम्" द्वितीयतृतीयपदोत्पन्नयो परमभुजफलयो- र्धनात्मक्योोंगे ऋणयोर्योग विशोध्य ग्रहस्य भुजफल भवति । मन्दकर्मणि प्रथम- पदे नमज्याजनितभुजफलमृण भवति । द्वितीयपदोत्क्रमज्याजनितफल धन भवति, तृतीयपदे धन चतुर्थपदोत्क्रमज्योत्पन्नमृण भवति । शीघ्र कर्मणि विलोम- मर्थात्प्रथमपदे धनं द्वितीये तृतीये च क्षय , चतुर्थं धनम् । अनेद तात्पर्यम् । भुजफलसाधन कृत्वा तच्चाप मन्दफल भवति मन्दकर्मणि, ततश्च तद्योगान्तरवशाद्यदधिक तद्धनमृण वा ग्रहे कर्तव्यम् । शीघ्रकर्मणि तद्- गुणिताद् व्यासार्धात् स्वकर्णेन भाजिताद् यल्लब्ध तच्चाप फल भवति तदपि फल- योगान्तरवशादेव ग्रहे धनमृण वा कार्य मिति ॥ १८ ॥ हि भा-मध्यग्रह मे ऋण धन भुजफ्ल (ज्यान्तात्मक) सस्कार करना चाहिये । फलद्वय के अन्तररूप में सस्कार करना । शीघ्र कर्म मे विलोमक्रिया होती है । फलग्रह इसका यह अभिप्राय है मन्दकर्म म या शीघ्रकर्म म प्रथम पद में केन्द्र रहने से केन्द्र का जो भुत्ताश है उसको मया लेनी चाहिये । द्वितीय पद म द्वितीयपदीय उत्क्रमज्या को परिधि से गुणकर भाश से भाग देने से जो फल हो उसको मरम भुजफ्ल में घटाने से ग्रह का वास्तव भुजफल होता है । इसलिये "क्षयस्व फ्ल" कहा गया है । तृतीय पद म भुक्तचाप की क्रमज्या कर पूर्ववत् भुजफ्ल लाकर द्वितीय पदीय परम भुजफ्ल मे जोड़ना चाहिये । उस योग म प्रथमपदीय भुजफल घटाने में ग्रह के भुजफल होते हैं । चतुर्थ में केन्द्र रहने से चतुर्थपदीय उत्तमज्या को परिधि से गुणवर भारा से भाग देने से जो फल होता है उसको प्रथमपदीय 'ग्रह परमभुजफल मे जोडने से वास्तव भुजफल होता है इसलिये "फ्लयोर्वा विशे- पोत्यम्' कहा गया है । द्वितीय तृतीय पदीय परम भुजफ्लद्वय (धनात्मक) के योग मे ऋण- द्वय के योग को घटाने मे ग्रह का भुनफल होता है । मन्दकर्म में प्रथम पद मे क्रमज्योत्पन्न भुलफल ऋण होता है। द्वितीयपदीय उत्क्रमज्याजनित फ्ल घन होता है । तृतीय पद मे धन चतुर्थपदीय उत्तमज्योत्पन्न ऋण होता है शीघ्रवर्म म विपरीत होता है। प्रथम पद में धन, द्वितीय और तृतीय पद मे ऋण, चतुर्य पद म धन होता है । इमका तात्पर्य यह है भुजफल साधन कर उसवा चाप मन्द फ्ल होता है म दवर्म में । बाद में उनके योग, अन्तर ददा करके जो अपित रहता है उसको ग्रह में धन या ऋण करना चाह्येि । शीघ्र वर्म म उसको (भुजफ्ल को) त्रिज्या से गुणवर शीघ्रवणं से भाग देने मे जो हो उसका चाप शीघ्रपल होता है । उमको भी पल वे योग, मन्नर वा करके ग्रह में मा ऋण करना चाहिये ॥१८॥ धन , .बटेश्वर सिद्धान्ते इदानी भुजकोटिग्याद्रिमाधविना धुगणादेव स्फुटग्रह यत्तुं' प्रकारमाह । स्वोच्चनीचपरिवत शेषकाद् भूदिम कृतहतात्पदानितु । शेषकात्त्रिगुरिणताद गृहादित पूर्ववच्च भुजकोटिसाधनम् ॥ १६ ॥ निभा-स्वोच्चनीचपरिवर्तशेपकात् (स्वोच्चनीचकेन्द्रभगणीपादाद- ग्रहभगणशेपे स्वच्चनीचभगणशोधने यच्छेप तस्मात्वे द्रभगरगोपात्) कृतहतात (चतुभिY रिगतात्) भूदिन (कुदिन ) भक्तात्फल पदानि (केन्द्रस्य भुक्तानि पदानि) स्यु । शेपकात् (पदप्राप्त्यनन्तरमवशिष्टात्) त्रिगुणात् (निगुणितात) भूदिनभक्ता- ल्लब्धगृहादितो भुनकोटिसाधन भवेन् । यथा पदप्राप्तानन्तरमवशिष्टा निगुणाद- भूदिनभक्ताल्लल्ध भुजज्या भवेत् । गतगम्यज्यान्त रगुरणाच्छेपान् कुदिनभक्ता लब्ध पूर्वस्यापिते! योज्य तदा स्फुटा भवेत् । सा च प्रथमवेन्द्रपदे शेप कुदिनेभ्यो विशो- ध्यावशिए विगुणित कुदिनर्भक्त लब्धा कोटिज्या, गतगम्यज्यान्तरगुणिताच्छेपात् पुदिनैर्यल्लब्ध तत्पूर्वलध्धे ज्या योग्य तदा स्फुटा वोटिज्या भवेत् । गत प्रथम केन्द्रपदे भुजज्या, गम्यै कोटिज्या, द्वितीये केन्द्रपदेऽनोऽन्यथा गतैस्तदूनशेषाद्गम्य- भुं जज्या, तृतीये पदे गत जज्या, गम्य वोटिज्या, चतुर्थ पदे गत कोटिज्या गम्य भुजज्या भवतीति ॥ १६ ।। अनोपपत्ति । भगणशेपादेव केन्द्रादिक साधितमाचार्येण, तत एकस्मिन् भगणे चत्वारि ४४भशे पदानि तदा भगपशपे किमिति पदानि तत एकस्मिन् पदे राशय =३ तदाऽनुपातो यद्य कस्मिन् पदे राशिवय लभ्यते तदा शेषे किमित्यागतास्तत्सम्ब- निधनो राशयस्ततो भुजकोटिसाधन कार्य यच्च भाप्ये लिसितमस्तीति । हि भा भुज काटिज्यादि माधन धिना अहर्गरण ही से स्फुटग्रह के लिये प्रवार कहते हैं । अपन उच्चनीच वेद्र भगएरोप से अर्थात् प्रहभगणशेप में उच्च, नीच के भगरा- शेष घटाने से जो शेप केन्द्र भगण शेष रहता है उसको चार से गुणकर बुदिन से भाग देने के फ्लकेन्द्र के भुक्तपद होते हैं पदप्राप्ति के बाद जो शेष है उसको तीन से गुसकर कुदिन से भाग देने मे जो लब्धपल होता है उससे भुज और कोटि का साधन होता है । जैसे पदप्राप्ति के बाद शेष को तीन से गुरणवर पुदिन से भाग देने मे फल भुजज्या होती हैं । गत पौर गम्य ज्या के अन्दर से गुरिणत खेप को कुदिन से भाग देने से जो पल हाता है उसको पूर्व रमे हुए में जोडने से स्पुट भुजज्या होती है । वह प्रथम केद्र पद म है । शेप को कुदिन म घटाकर । गेप को तीन से गुणकर और बुदिन में भाग देवर कीटिज्या प्राप्त हुई। गत और गम्य ज्या वे अन्तर से गुणित शेष को कुदिन मे भाग देने से जा फल होता है उमनो पूर्व प्राप्त ज्याचं म जो तब स्फुट काटिन्या होती है । पहा वेद पद में गत मे भुजज्या पौर गम्य से वोटिग्या, द्वितीय वैद्र पद म इमसे विपरीत गत में उम ऊन शेप से गम्यो से भुजण्या, तीमरे पद म गतो मे म जज्या पोर गम्यो रोवोटिज्या तथा चौथे पदम गतो से योटिग्या मोर गम्यो से भ जग्या होती है।
स्पष्ट्राधिकार %3- उपपत्ति यहा भगण शेप ही केन्द्रादि का साधन प्राचार्य ने किया है तव अनुपात करते है कि यदि एक भगण मे चार पद पाते हैं तो भगण शेप में क्या इस अनुपात मे पद पाते हैं ४xभो कुदिन -पद । फिर अनुपात करते है कि एक पद में तीन राशि पाते है तो शेष में क्या इस अनुपात से तत्सम्बन्धी राशिया पाती है इन पर से भुज कोटि का साधन करना चाहिए ॥१६॥ इदानी स्पष्टभगरणशेषज्ञानार्थमाह । मन्दजं चलभवं च तद्धतर्भू दिनर्भगरपलिप्तिकोद्धृतः । खेचरस्य भगरगावशेषकं संस्कृत कलिकयाऽखिलं स्फुटम् ॥२०॥ वि. भा - मन्दर्ज (मन्दकर्मोद्भवं भुजफल) चलभवं (शीघ्रकर्मोदभवं भुज- फल) यत् तद्धत (तद्गुणित ) भूदिनैः (कुदिन.) भगणलिप्तिकोद्धृतः (भगण- कलाभिश्चकालाभिर्भवत.) लब्ध. खेचरस्य भगणावशेषक (ग्रहभगणशेप) संस्कृतं तदा फलकलया अखिलं स्फुट (स्पष्ट भगणशेष) भवेदिति ॥२०॥ अत्रोपपत्ति फलकलाश्चकाला भक्तास्तदा भगणात्मिका, फलकला:: चक्रक फक. कुदिन फक कुदिन चक लब्ध इति भगरणात्मक फलकलामान ग्रभगण- चक कुदि कुदिन कुदिन शेपे सस्कृत तदा वास्तव भवेदिति ॥२०॥ हि भा-मन्दकर्मोत्पन्न भुजफल और शीघ्रपर्मोत्पन्न भुजफ्त जो है उनसे कुदिन यो गुणपर भगण कला (चकाला) से भाग देने से जो फल होता है उसको ग्रह भगण शेष मे मस्कार करने से वास्तव भगरण मेष होता है ।।२०॥ उपपति फ्लकला को चपला से भाग देने में भगणात्मक फल बला होती है । फा. युदिन फ्क बुदिन इम भगणारमव पनक्ला यो ग्रह भगण चर चव बुदिन दुदिन बुदिन मेग में मंसार करने में वास्तन भगण दोष होता है ॥२०॥ इदानी ग्रहस्पुटरवार्य मस्वारविशेषानाह । दो फलेन सवितुश्चरासुभिः स्वेनदेशविवरेण चोक्तयत् । संस्कृतं फुदिनमाजितं भवेन्मंगलादिसचरः परिस्फुटः ॥२१॥ वि. भा.- सवितुः (मूर्यस्य) दो.फलेन (भुजफन) परासुभिः (चरसण्ड- फर स्तब्ध चक वटेश्वर सिद्धान्ते प्राण) देशविवरेय (स्वदेशान्तरेण) उक्तवद्यत्पलमाद् भुजान्तरपल, चरा- सुजनितग्रहगतिक्लाफल देशान्तरजनितग्रगतिक्लाफ्ल, कुदिन- भाजित (कुदिनभक्त) यद् भवेत्तं फलं सस्कृत भगणशेप स्पुट भगरारोप भवे- तस्मात्स्फुटभगणशेषाद्यो ग्रह अानीयते स स्फुट एव मगलादिखचरः (मगलादिग्रहो) तथा भवेदिति ॥२१॥ प्रस्योपपत्ति पूर्वश्लोकोपपत्तिदर्शनेनैव स्फुटेति ॥२॥ हि भा-अब ग्रह के स्पुटत्व के लिए सस्कार विशेषा को करते हैं। सूर्य के भुजपल से, चरासु से और अपने देशान्तर मे पूर्ववत् जो फ्लरला मान अर्थात् भुजान्तर पल. क्ला, चरासुसम्बन्धी ग्रहगतिकता और देशान्तर सम्बन्धी ग्रहगतिवना मान हाने है उनको कुदिन मे भाग देने स जो फ्ल हो उन्ह ग्रह भगणाप म मस्कार करन मे सप्टभगण शेष से जो ग्रह पाते हैं वे मगलादि स्पष्टग्रही होते हैं ।।२१।। इसकी उपपत्ति पूर्व श्लोक वी उपपत्ति देखन से म्फुट है ॥२१॥ इदानी पूर्वोक्न पूर्ववच्चाभुजवोटि सापनमि' परय स्पष्टीकरणमाह । पदशेष गतसज्ञ तटून कुदिन गम्यमिति ते द्वे । परावतिघ्ने वुदिनर्भक्त जीवाऽन्तराहताच्छेषात् ।।२२।। कुदिनर्लब्धयुता ज्या भुजकोटिज्येऽथवा पदानुगते । तत्फलमिलाहनिधन चक्रकलामाजित दोघे ॥२३॥ निभा-स्वोच्चनीचपरिवर्तशेषकादित्यादिना यत्पदशेप तद् गतसज्ञम् । तदून (गतमज्ञकेन रहित) कुदिन, गम्य (भोग्यम्) ते द्वे (गतगम्ये) परगवतिघ्ने (६६ एभिर्गुणिते) दिनर्भवते भुजकोटिज्ये भवतः । भुजज्यासम्बन्धिोपाद् गत- गम्यज्यान्त रगुणात् कुदिन भक्ताल्लब्ध पूर्वस्थापिते योजयेत्तदा स्फुटा भुजज्या भवेतथा कोटिज्यासम्बन्धिशेषाद् गतगम्यज्यान्त रहलात्यु दिनभक्ताल्लब्ध तत्पूर्व- लब्धे ज्या योज्य तदा म्पुटा कोटिज्या भवेत् । एते भुजकोटिग्ये पदानुगते भवतोऽर्था- त्पदाधीने स्त ,प्रथमे केन्द्रपदे गताभुजज्या, गम्याताटिज्या, द्वितीये केन्द्रपदे तोऽन्यथा गतात्कोटिज्या, तदूनशेषाद् गम्याद गज्या, तृतीये पदे गताद्भुजज्या,गम्याकोटिज्या चतुर्थे पदे गतालोटिज्या, गम्याद्भजज्या इति, तत्पल, इलाहनिघ्न (कुदिनगुणित) चक्र कलाभाजित (चालाभवत) पा शेपे (ग्रहभगरणोपे) संस्कृत तदा वास्तव- भगरणगेप भवेदिति ।।२२-२३।। श्रोपपत्ति । एकस्मिन् भगणे ज्यामरया =६६। तदा पदरीपात् ६६ एभिगुंगितात्नुदिन- भक्ताल्लब्धाक्समा भुजज्या भवति, पाद् गतगम्यज्यान्तरगुणात्यु दिनभंताद्याला तत्पूर्वस्थापिते योग्य तदा म्पुटा भुजण्या भवेत् । एक गम्यात् (बुदिन-पदो) ६६ nfirifmमान- दिना-rim पोटिज्या, पाच्च गनगम्यज्यान्तरहतात स्फुटाकोटिज्या भवेत् । मेपोगपत्तिमन्दन ॥२२-२३॥ हि भा-उक्त रोना इनोगे या अपं सप्ट ही है ॥२२-२३॥ . ।
स्पष्टाधिकार
३७३
इदानी भुजफलस्य नामान्तरमाह ।
भग्रहान्युदयेभ्यो वा ग्रहे स्पष्टे तु तद्वशात् ।
तहो.फलमिनाख्यो हि सस्कारः परिकीर्तितः ॥२४॥
वि मावा भग्रहाभ्युदयेभ्य (भोदयग्रहसावनदिवसेभ्य ) स्पप्टे ग्रहे अपे-
क्षिते सति तदा तद्वशात् दो फल (भुजफल) इनास्य सस्कार (भुजान्तरसस्कार )
परिकीर्तित (कथित ) रविमन्दफलवलादेव भुजान्तरफलस्य माधन भवत्यतस्तस्य
नाम "इनाख्य सस्कार
॥ इति ॥२४॥
भभ्रमा यस्य ग्रहस्य भगणंल्पा शेपाणि तस्य सावनदिनानि भवन्ति तैरह-
गणे गुणिते युगकुदिनैर्भवते फल गतसावनानि स्यु । भभ्रमोत्पन्नग्रहास्तेन फलेनोना.
स्तदा मध्यमग्रहो भवति यस्य भगणेर्यो ग्रह पानीयते स तस्येवोदयकालिको भवति ।
नक्षत्रपरिवत्तै रानीतो ग्रहो नक्षनोदयिककालिको भवति, तथा सत्यश्विनीनक्षत्राणा
प्रथम तदुदयसालिको ग्रहो भवति । अस्मादश्विन्यौदयिकाद् भगणात् यस्योदया
शोध्यन्ते शेपस्तस्यैव मध्यमो भवतीति । एतद् ग्रहवशाद्यन्मन्दपल वेस्तदशादेव
भुजान्तरफलानयन भवत्यतो दो फलचापाख्य सस्कारोस्य नामेति । २४॥
हि भा--अथवा भादय, ग्रहसाबन दिन पर से यदि स्पष्ट ग्रह जानना हो तो उसके
वा से (भोदय या ग्रहसावन स पानीत मध्यम ग्रह के वग स) जो मुजफल होता है उसका
नाम भुजफ्ल मस्तार या भुजान्तरफलसस्कार कथित है ।
भभ्रम में जिस ग्रह के भगरण को घटाते हैं शेष उम ग्रह ये मावन दिन होते हैं।
अहर्गण को उससे गुणवर कुदिन स भाग देने से गत सावन दिन होने हैं । भभ्रम से जो ग्रह
प्राते हैं उसम पूर्वोक्त फल को घटाने से मध्यम ग्रह हात है । जिसरे भगरण द्वारा ग्रह साधित
होते हैं वह ग्रह उसी के उदयकालिय होते है । नक्षत्र भगणा द्वारा साधित ग्रह नक्षत्रादय.
वालिक होते है। इस तरह अश्विनीनक्षत्रोदयशालिक ग्रह हात हैं। इस अश्विनी के प्रौद-
यिक भगण म जिस के सावन घटाते हैं उसी के मम्म ग्रह हात हैं। इस प्रवरा से जो
मन्दपल होता है रवि उमी मन्दपल के द्वारा भुजातर फन साधन होता है इसलिए उसका
नाम भुजफ्लसस्वार यानि मुजावरमस्कार कहा गया है ॥२४॥
इदानी चन्द्रस्य देशान्तरमवारमाह ।
स्वोदयभोगोपहते देशान्तरयोजने कुवृतहते।
प्राग्वद्धनमणमिन्दोर्ययोदया. प्राग्दिशि निवद्धाः ॥२५॥
विभा देशान्तरयोजने ( पूर्वसाधितस्सप्टदेशान्तरयोजने ) इन्दो
(चन्द्रस्य) स्वोदयभोगोपहते (स्वगतिकलागुरिणते) कुवृत्तहते (भूपरिधिनाभनते)
फत प्राग्वत् गहे धन वा ऋण कार्य, चन्द्रस्य यथोदया (यथापितोदया')
प्राग्दिगि (पूर्वमार्गे पूर्वपद्धतौ वा) नियद्धा मनीति ॥२५॥
७४ वटेश्वर सिद्धान्त प्रमोपपत्ति यदि स्पप्टभूपरिधियोजनन गतिक्ला लभ्यन्ते तदा देशान्तरयोजन किमित्यनुपातेन देशान्तरक्ला समागतास्तत्स्वरूपम् =. ग्रगत देशान्तरयो एतदेव स्पभूया पल रेखात पूर्वापरस्थितदेगवशेन ग्रहे सस्वायं भवति, सर्वेपा ग्रहाणा देशान्तर- फलसाधनमेमरीत्यैव भवति तनस्वारोऽप्येवरूप एव देशातरसम्बार पूर्वकथित एव पुनरत तत्कयनस्य काऽऽवश्यक्तेत्याचार्य एव ज्ञातु शक्नोति । एतेनाऽऽचारण स्पष्टभूपरिध्यानयन न कृतमतो भूपरिधियोजनवशेनानीन देगान्त रफल न ममी- चीनमिति विजयमिति ॥२५॥ भव दशातर सस्कार कहत है। हि भा -पूर्वसाधित स्सप्टदशातर योजन को अपनी गतिकला से गुणार भूपरिघि स भाग दने से जा फल हो उसको ग्रह म घन या ऋण करना चाहिए, चद्र के सावन पूर्व ही के अनुसार समझना चाहिए ॥२५॥ उपपत्ति यदि स्पष्ट भूपरिवि योजन म ग्रहगति कला पान हैं तो देशातर याजन म क्या इस अनुपात से दशातर क्ला आती है । ग्रगर देशातरयो -देशातर क्ला, इसका रेसा- स्पभूपयों देश से पूर्व, पर दस क अनुमार ग्रह म सस्कार करते हैं । सव ग्रहो के दशातर फन साधन एक ही तरह स होता है उसका सस्यार भी पह्न प्राचार्य रह चुके है तब फिर यहा कहने की क्या आवश्यकता है इस विषय को प्राचार्य ही जान सकते हैं। इन प्राचार्य ने स्पष्ट भूप- रिधि क माधन नहीं किया है इसलिए उसके द्वारा माधित देगातर फल भी ठीक नहीं हैं ।॥२५॥ इदानी भुजातरसस्कारमाह । मध्यादधिफे स्पष्टे स्वमण चोने भुजान्तर चतत् । तदुदयगास्तदहोगतयस्तज्जासुपलेन हता ॥२६॥ तदहोरात्रहता होनयुता व्योमवासिन सर्वे । अश्विन्यौदपिकास्तदश्विनी दर्शनान्तरोनयुत्ता ॥२७॥ वि भा-मध्यात् (मध्यमाहात्) सप्ट (स्पष्टग्रहे) अधिले एतदधो- दर्शित भुजान्नर मध्यमार्कोदयकालिकग्रहे स्व (धनम) मध्यान्म्पप्टे ऊने (होने अल्पे वा) तत्फल मध्यमार्योदयकालिक्ग्रहे नाण कार्यम् । अधुना तत्पल (भुजान्तर- फल ) साध्यते तदुदयगा (तत्तेपा नहाया सावनान्तर्गना ) तदहोगतय (तई निक- गतय } तज्जानासुपलेन (भुगान्तरासुपलेन) हता (गुरिणता ) तदहोरात्रता (तदहोरात्रासु भक्ता ) फलेन हीनयुता मध्यमार्कोदयकालिवा ग्रहास्नदा मर्वे व्योम- स्पष्टाधिकार वोसिनः (ग्रहा) स्पष्टार्योदयकालिका भवेयु । अश्विनीदर्शनान्तरोनयुतास्तदा- ऽश्विन्यौदयिका भवन्तीति ।।२६-२७॥ अस्योपपत्तिमध्यमाधिकारे प्रदर्शिताऽस्ति सातव द्रष्टव्येति ॥२६-२७।। इति वटेश्वरसिद्धान्ते सष्टाधिकारे स्वोच्चनीचग्रहस्फुटीकरण विधि द्वितीयोऽध्याय । अब भुजातर सस्कार कहते हैं। ह, मा ~ मध्यम ग्रह से स्पष्ट ग्रह अधिक हो तो नीचे लिखे हुए भुगान्तर फ्ल को मध्यमार्कोदयकालिक ग्रह म धन करना, मध्यम ग्रह से स्पष्ट ग्रह अल्प हो तो भुजातर फ्ल को मध्यमार्योदयकालिक ग्रह में ऋण करना, अव भुजातर फलानयन करते है । ग्रह के सावनागत गति को भुजातरामु से गुणकर ग्रहाहोरात्रासु भाग देने से जो फ्ल होता है उसको मध्यमार्योदय कालिकग्रह मे हीन, करने म स्पस्टार्योदयकालिक ग्रह होते हैं ।।२६-२७॥ इतिवटेश्वर सिद्धात म स्पष्टाधिकार म स्वोच्चनीचग्रहम्फुटीकरण विधि नामर द्वितीय अध्याय समाप्त हुआ।
तृतीयोऽध्यायः इदानी प्रतिमण्डलस्पष्टीकरणविधि प्रारभ्यते इदमभिहित ग्रहारणा स्पष्टोकरणमुच्चनीचविधिन । प्रतिमण्डलायमधुना स्पष्टीकरण प्रवक्ष्यामि ॥१॥ वि भा--इद (पूर्वोक्त) ग्रहाणा स्पष्टीकरणम् उच्चनीचविधिनव (नीचो- वृत्तभगिरोत्यव) अभिहित (कथितम्) अधुना (इदानी) प्रतिमण्डलाख्य (प्रतिवृत्त. सज्ञकम) स्पष्टीकरणमा प्रतिवृत्तभनिद्वारा स्पष्टीकरण प्रवक्ष्यामि (कथयामि) इति । हि भा -यह पहले पहे हुए ग्रहो के स्पष्टाकरण नीचोच्चवृत्तभङ्गी की विधि से कहे गये हैं । इस समय प्रत्तिवृत्त मज्ञक स्पष्टीकरण (प्रत्तिवृत्तभङ्गि द्वारा स्पष्टीकरण) को कहता हूँ ॥४॥ इदाना नीचोच्चवृत्तव्यामा(नयनमाह । परिधिगुणास्त्रिभजीया भगरणाशविभाजिताऽन्त्यफलजीवा । नीचोच्चव्यासदल शरासन चास्य परमफलम् ॥२॥ नि भा-निभजीवा (त्रिज्या) परिधिगुणा (नीचोच्चवृत्तपरिधि- गुणिता) भगणाविभाजिता (चक्राशभक्ता) तदाऽन्त्यफलजीवा (अन्त्यफलज्या) भवेत् इति (अन्त्यफलज्या) नोचोच्चव्यासदल (नीचोच्चवृत्तव्यासाधम्) भवति, अस्य (नीचोच्चवृत्तव्यासदलस्य ) शरासन (चाप) परमफल (अन्त्यफल) भवतीति ।।२।। शीघ्रप्रतिवृत्त ममन्दस्पष्टग्रह । न=मन्दस्पष्टग्रह । उ = शीघ्रोच्चम् । भूकेन्द्रादिष्टविज्या व्यासार्धन (मध्यम पर्णव्यासार्थेन ) वृत्त कार्य तत्वक्षवृत्त- सशकम् । तद्वृनभ्योधिव्यासरेवाया भूपेन्द्रादुपरि ग्रहस्यान्त्यफलज्या तुल्य दान दत्वा तस्माद्दानाप्रबिंदुनो नवत्यशेन वृत्त कार्य तच्छीघ्रप्रतिवृत्तसजवम् स कक्षा पृतम शीचा न T - स्पष्टाधिकारः ३७७ उ कक्षाप्रतीयोधिरव्यासरेखा (उच्चरेखा) प्रतिवृत्ते ऊवं- भागे यत्र लगति तय 'प्रति- वृत्ते उच्चम् (शीघोच्चम्) अधोभागे सैव रेसा वधिता यत्र लगति तय नीचम् । भूकेन्द्रात्कक्षावृत्तीयो घर- व्यास रेखोपरि (उच्चरेखो. परि) लम्बरेखा कक्षावृत्तके- न्द्रगलियंग्रेसा, एव प्रतिवृत्त- केन्द्रातदुचरेखोपरिलम्बरेसा प्रतिवृत्तीयतिर्यग्रेवा, प्रति- वृत्तम विन्दो मन्द स्पष्ट ग्रह । भूउच्चरेसा, म बिन्दुत उच्चरेखाया. समाना- चित्रह न्तरा मच रेखा पार्या, सा कक्षावृत्ते न बिन्दी लग्ना तदा न मन्दस्पष्टग्रह , लप्रति वृत्तकेन्द्रम् । भूल% शीघ्रान्त्यफलज्याचा-मन, न विन्दु केन्द्र मत्वा मन व्यासाघेन यद्वृत्त तच्छी- शीघ्रनीचोचवृत्तम्। भूनरेखा कार्या सोध्वंभागे वधिता तदुपरि म विन्दुतो यो लम्ब- स्तदेव गीघ्रभुजफलम् = मप, नप = कोटिफलम् । न विदुतो भूनरेखोपरि लम्बरेसा नीचोचलीगतिर्यग्नमा तदुपरि म विन्दुतो लम्ब = मरनप= कोटिफल, मम: शीघ्रमेन्द्रज्या मल-मश-शीघ्रकेकोटिज्या। भूनच, नमप त्रिभुजयो मानात्याद- शोकेज्यारशीघ्रान्त्यफलज्या शीघ्रान्त्यफग्या_ नुपात: शीभुजफलम् । पर नि नि मीपरिधि भाग मोकेज्यागीपरिधि =शीभुजफल । यदा शोग्रफेन्द्रज्या-वि तदा सीमान्य- भाश विशोपरिधि गौग्रान्त्यफलज्या-गीघ्रनोचोच्च- फलज्या= शीघ्रभुजफल : भाषा वृत्याः अस्याश्चापम् = शीघ्रान्त्यफलम् । एतावताचार्याक्तमुपपनम् ।।२।। पौन मोनोच्यवृत्त के प्यामार्थानपन करलें ॥२॥ हि.मा.गोमपरिधिमुक्षिा निग्मा को भगवास से भाग देने में सोनाममा %3- घटेश्वर-मिदान्ते होती है वह (गीघ्रान्त्यफ्लज्या) नीचोच्चवृत्त व्यासाधं है । इसका चाप अन्त्यफल (परम- फल ) है ॥२॥ उपपत्ति भू केंद्र विदु को केंद्र मान वर मध्यमवरणं व्यासाय (त्रिज्या) से जो वृत्त होता है वह क्शावृत्त मज्ञक है । कक्षावृत्त की कधिर व्याम रेसा मे भूकेंद्र से ऊपर ग्रह को शीघ्रा- न्त्यप नज्या तुन्य दान देकर उस बिंदु से त्रिज्याच्यासाधं से जो वृत्त होता है उसका शीन- प्रतिवृत्त । रक्षावृत्तीय ऊर्ध्वाधर व्यासरेसा (उच्चरेखा) ऊर्ध्व भाग में प्रतिवृत्त में जहाँ लगनी है वह बिंदु प्रतिवृत्त मे शीघ्रोच्च है । अधोभाग में वही रेसा जहा लगती है वह बिंदु गीन नीच है । भूकंद्र से कक्षावृत्तीय उर्ध्वाधर व्यास रेखा के उपर लम्ब रेखा कक्षा मध्यग तिथंग्रेखा है। प्रतिवृत्त केंद्र से प्रतिवृत्तीय उदधिर व्यास के ऊपर लम्व रेसा प्रतिवृत्त मध्यगतिर्यग्र सा है । प्रतिवृत्त मे मपदस्पष्टग्र उशीघ्रोच्च । भूउउन्धोखा, म बिंदु स उच्चरेखा की समानातर रेखा कक्षावृत्त में न विदु में लगती है इसलिए न= 'दस्पष्ट ग्रह ल- प्रतिवृत्त केंद्र । भू-भूकद्र । चित्र ६ दखिये, भूल = सीमान्त्यफ्लज्यादाच मन, न बिंदु को केंद्र मान कर मन अन्त्यफलज्या व्यासाध से जो वृत्त होता है वही सीन नीचोच्च वृत कहलाता है। भून रेखा को उपर वढा दीजिये उसके ऊपर म विदु से लम्ब (मप) कीजिए वह शीघ्र भुजफल है। नप = कोटिफ्ल भून रेखा के उपर न विदु से जो लम्बरेखा होती है वह शीघ्र नीचाच्चवृत्तीय तियंरेखा है । इसके उपर म विंदु से लम्ब-मर-नप कोटिफन । मस= शीघ्रान्त्यफलज्या, सल=मदा शोकेकोटिज्या मम= शीघ्रकेन्द्रज्या, भूनच । नमा दोनो त्रिभुज सजातीय है इसलिए अनुपात करते है । शानज्यामीप्रान्त्य फज्या शीभुजफ्ल । यदि दीवेज्या=त्रिं तदा शीघ्रान्त्य- नि -शीभुज शीघ्रान्त्यफज्या दशोपरिधि शीवेज्या-दीपरीधि परन्तु = शीघ्रभुजफ्ल त्रि बिरशीपरिधि गीघ्रान्त्यफलज्याः =शीधनीचोच्चवृत्तव्या भाश चाप करने से शीघ्रान्त्यफल (परमफ्स) होता है । इससे आचार्योंक्त उपपन्न हुमा ॥२॥ इदानी कनियनमाह मृगकर्यादौ केन्द्र कोट्यन्त्यफलज्ययोतिविशपः । तबाहुज्या कृत्यो समासमूलं श्रुतिर्भवति ॥३॥ निभा -मृगपर्यादी केन्द्र (मकरादिश्वर्यादिकेन्द्र) कोट्यन्त्यफलज्यणे. मुंतिविशेष (शीघ्रवेन्द्रकोटिज्याऽन्त्यफ्लज्ययोर्योगोऽन्तर) मष्टा कोटि', तदा- %3D फज्या- प्रत भास भाश स्पष्टाधिकार ३७६ हुम्या कृत्यो समासमूल (स्पष्टाकोटिभुजज्ययो वर्गयोगमूल) श्रुति (कर्ण) भवति ॥ अस्योपपत्ति । अन पूर्वश्लोकोपपत्ती प्रदर्शित नवमचित्र द्रष्टव्यम् । मकरादिकेन्द्रे मश: केन्द्रकोटिज्या, शच-अन्त्यफलज्या मश+शच-मच-स्पप्टा कोटि = केन्द्र- कोज्या+अन्त्यफलज्या =भूस, मस=केन्द्रज्या भूम= कर्रा । भूस'+ मस'=स्पकोटि केन्द्रज्या'=भूम वर्ण', स्पिको केन्द्रज्या =कर्ण कर्यादिकेन्द्र म' श' केन्द्रकोटिज्या, श' च = अन्त्यफलज्या, भूम' == कर्ण, भूच' =केन्द्रज्या म'श'-श' च'म' च' = केन्द्रकोटिज्या-अन्त्यफलज्या स्पष्टर कोटि । तत म'च"+भूच भूम'= स्पकोटि'+केन्द्रज्या'करण' मूलेन स्सिकोटि' अन्त्यफज्य कण । अत सिद्धम् ॥ ३॥ पनियन करते है हि भा~-मकरादि केन्द्र म और कादि केन्द्र म शीघ्रवेन्द्र कोटिज्या और अन्त्य- फलज्या के योग और अन्तर करने से स्पटकोटि होती है । स्पष्टकाटि और केन्द्रज्या के वयोग मूल लेने से कर्ण होता है ॥ ३ ॥ उपपत्ति इससे पहले इलोर की उपपत्ति मे लिखित नवें चिन को देखिय । मकरादि म मन= केन्द्रकोटिज्या, शच-अन्त्यफलज्या मश+च-मच-स्पष्टा कोटि-वेन्द्रकोज्या+ अफलज्या= भूस मस-के द्रज्या । भूस-+ मस' =स्पकोटि+केन्द्रज्या - भूम'=कएमूल लेने से स्पिकोटि केद्रज्या 3Tणं । भूम-पर्ण कर्यादि केन्द्र म म'' केन्कोदिज्या, 'च' = प्रत्यफ्लया, भूम'-भूच' - केन्द्रज्या, म' श'--'च'म'च' = केन्द्रकोज्या-अन्त्यपज्या=पश योटि म'च" +भूच'= भूम-सकोटिवेन्द्रज्या'- कण मूल लेन से। स्पोर्टि+केन्या कर्ण प्रत सिद्ध हो गया ॥३॥ पुन वरनियनमाह। स्फुटकोदिकोटिज्यातिविवरात् त्रिगुणवर्गसयुक्तात् । मूल वर्णों वा स्याद विनय चलकेन्द्रबाहुज्याम् ॥ ४॥ तद्योगान्तरघातत्रिज्याकृतियोगमूल यत् । मृगमुखशशिभवनादो कौँ वा स्याद् विनंव बाहुग्याम् ।।५।।
३८० वटैश्वर-सिद्धान्ते विभा-स्फुटकोटिकोटिज्याकृतिविवरात् (स्पष्ट कोटिकेन्द्रकोटिज्ययोर्वर्गा- न्तरात्) निगुणवर्गसयुक्तात् (निज्यावर्गयुतात्) मूल वा चलवेन्द्रवाहुज्या (शीघ्र- केन्द्रज्या) विनैव कर्णो भवेदिति ॥ ४ ॥ तद्योगान्तरघातत्रिज्याकृतियोगमूल यत् (स्पटकोटिकेन्द्रकोटिज्ययो- योगान्तरघातयुतत्रिज्यावर्गस्य मूल यत्) मृगमुखशशिभवनादौ (मकरादिकर्यादि- केन्द्र) वाहुज्या (केन्द्रज्या) विनैव वा कर्ण स्यादिति ।। ५ ।। अनोपपत्ति । अथ स्पष्टकोटि-केन्द्रकोज्या+नि= स्पष्टको+नि केकोज्या' स्प- टको'+केज्या = कर्ण' मूलेन स्को'-के कोज्या+नि कर्ण । स्पष्टको'-- केन्द्रकोज्या+dि= कर्ण प्रथमखण्डे वर्गान्त रस्य योगान्तर- घानसमत्वात् (स्पष्टको+केकोज्या) (स्पको-केकोज्या)+नि कर्ण'मूलग्रहणेन V(स्पष्टको+केकोज्या) (स्पष्टको-केकोज्या)+नि वर्ण, अत्र प्रकारद्वये "विनैव वाहुज्याम्' यत्कथ्यते तत्समीचीन नास्ति तत्र प्रत्यक्षमेव केन्द्रज्या वर्गों- ऽस्त्येवेति ॥ ४५॥ पुन बनियन करते है हि भा-स्पष्ट कोटि और पेद्र कोटिज्या के वर्गान्तर म त्रिज्यावर्ग जोडकर मूल लेने से के द्रज्या बिना ही पण होता है । वा स्पष्ट कोटि और केद्र कोटिज्या के योगा न्तर घात म त्रिज्या वर्ग जोडकर मूल लेने से मकरादिकेन्द्र और वादि केन्द्र मे कणं होता है ॥ ४५ ॥ उपपत्ति स्पष्टकोटि-केन्द्रकोज्या+नि= स्पप्टको' + नि'-कोज्या= स्पष्टको। वेज्या = वर्ण' मूल लेने से स्पटको'-वेवोग्या'+त्रि=कर्ण तथा स्पष्टको'-देवोज्या+ निर्ण' प्रथमखण्ड म वर्गान्तर योगान्तर घात के बराबर होता है इस नियम से (स्पको+वेवोज्या) (स्पको-केयोज्या)-त्रि' करण' मूल लेने सV (स्पको+केकोज्या) (स्पको-केकोज्या)+त्रि'=कर्ण, यहा दोनो प्रकार मे 'विनय याहुग्याम् ' जो कहते हैं मो ठीक नहीं हैं वहा प्रत्यय केन्द्रज्या वर्ग देखने म माता हैं । इनमे प्राचार्योक्त उपपन्न हुआ ।। ५ ।। पुन वरनयनमाह । द्विप्नाग्रज्याऽभ्यस्ता परमफलज्या मृगादिके योज्या। त्रिज्या परफलमौव्यो कृतियोगे कंटादिके शोध्या ॥६॥ बेन्द्रे तस्मान्मूल पर्पो वा स्याद् विनव बाहुज्याम् ।
स्पष्टाधिकारः ३८१ वि भा–मृगादिके केन्द्रे (मकरादिकेन्द्र) द्विघ्नाग्रज्याऽभ्यस्ता परमफलज्या द्विगुणितकेन्द्रकोज्यागुरिणताऽन्त्यफलज्या) विज्या परफलमौर्यो कृतियोगे (त्रिज्याऽन्त्यफलज्यगोर्वर्गयोगे) योज्या (सहिता) कर्कटादिके केन्द्र (कादि- केन्द्र) शोध्या तस्मान्मूल वा बाहुज्या (केन्द्रज्या) विनैव कणों भवेदिति ॥ अस्योपपत्तिः अथ पूर्व सिद्ध यत् स्पष्टको+केज्या = कर्ण। पर मकरादिकर्यादिकेन्द्र - वशात् केकोज्या अन्त्यफलज्या-स्पष्टाको अतः (केकोज्या अन्त्यफज्या)+केन्द्रज्या - कर्ण' =केकोज्या+२ केकोज्या. अफज्या+अफज्या+केज्या' -त्रि--अफज्या'२ केकोज्या अफज्या कर्ण' मूलग्रहणेन /नि+अफज्या +२ केकोज्या. अफज्या=कर्ण । अत उपपन्नम् ।।६।। पुन कानयन करते हैं। हि.भा--मकरादि केन्द्र द्विगुणित केन्द्र कोटिज्या गुणित अन्त्यफलज्या को त्रिज्या पौर अन्त्यफलज्या के वर्ग योग म जोडने से और क्वर्यादिवेन्द्र में पटाने से मूल लेने पर केन्द्रज्या विना ही कर्ण होता है । %3 उपपत्ति। पहले सिद्ध हो चुका है कि स्पष्ट परतु मक ादि और कर्यादि केन्द्रवश से को+केन्द्रज्या - कर्ण' इसलिए उत्थान देने केकोज्या+अन्त्यपज्या-स्पप्टा को से स्पष्टा को+केज्या- (के कोज्या अन्त्यफळ्या)+वेज्या' =केकोज्या+२ केकोज्या अफ्ज्या+अपज्या' +केग्या'त्रि-अपज्या'२ कोज्या अफज्या-कर्ण' मूल लेने से /त्रि+अफज्या'+२ केकोज्या अफज्या वर्ण इमसे प्राचार्योक्न उपपन्न हमा॥६॥ इदानी करएंसम्बन्धेन केन्द्रकोटिज्यानयनमाह । निज्वान्त्यफलज्याकृत्युत्या श्रवणवर्गविवरं यत् ॥७॥ तद्वलितं प्रविभक्तं परफलमौाथ कोदिजीवा स्यात् । अपरेप्टश्रुतियोगातद्विवरनात्पदं वा स्यात् ॥८॥ वि.मा.-निज्यान्त्यफलज्याकृतियुत्या (त्रिज्याऽन्त्यफलज्ययोवायोगेन) श्रवणवर्गविवर' यन् (कर्णवर्गस्य यदन्तर) तद्वलित (द्वाभ्या भक्त) परफ्लमौर्या विभक्त (अन्त्यफलज्यया भक्त) तदा कोटिजीवा (केन्द्रकोटिज्या) स्यात् । अपरेप्ट- श्रतियोगात् केन्द्रज्यावर्णयोगात्) तद्विवरघ्नात् पेन्द्रज्यापर्णयोरन्तरगुणितात) पद (मूल) या कोटिजीवा स्यादिति ।।
३८२ वटेश्वर-सिद्धान्ते अनोपपत्ति । पूर्वानीतकर्णवर्गस्वरूपम्-त्रि+अफज्या+केकोज्या अफज्या करणं तथा कर्ण - (त्रि+अफज्या)-त्रि+अफज्या+२ केकोज्या. -(त्रि+अफ')=नि+अफज्या'२ केकोज्या अफज्या--नि-अफज्या' =२ केकोज्या अफज्या (२ अफज्या) भक्तेन केकोज्या अपज्या कोज्या अफज्या अफज्या अथवा कर्ण-केज्यास्पको' वर्गान्तरस्य योगान्तरघातसमत्वात् (कर्ण+केज्या) (कर्ण-केज्या)=स्पको' मूलेन सप्टकोटि । परमिय स्पष्टा कोटि । पूर्व केन्द्रकोटिज्यामानमानीतमेतद्द्वप सम नास्त्यत प्राचार्येरण "पद वा स्यात्" यत्कथ्यते तत्समीचीन न प्रतिभाति, 'वा' इति प्रकारान्तरद्योतक ७-८।। करण से केन्द्रकोटिज्यानयन करते हैं। हि भाकरण वग और त्रिज्या, अन्त्यफलज्या के वर्गयोगान्तर को दो और अत्य- फलज्या से भाग देने से केंद्र कोटिज्या होती है । अथवा कर्ण और केंद्रज्या के योगातर घात के मूल लेने से केंद्र कोटिज्या होती है ।। ७८ ॥ उपपत्ति । पूर्वानीत वर्ण वर्ग=त्रि+अ फग्याकेकोज्या अफज्या इसको नि+अफज्या' इसके साथ अतर करने से+२ केकोज्या अफज्या इसमें (२ अपज्या) से भाग देने से वोज्या होती है। प्रथवा वर्ण–केंद्रज्या स्पष्टको वर्गातर पोगातर घात के बराबर होता है । इस नियम से (कर्ण+केज्या) (कर्ण-केज्या)=स्पको मूल लने से स्पष्टकोटि होती है । यह स्पष्टा कोटि पूर्वानीत केंद्रकोटिज्या के बराबर नहीं है इसलिए पद्य में (पद वा स्यात्) यह ठीक नहीं मालूम होता है । (वा) यह प्रकारातरसूचक है इति ॥८॥ पुनस्तदानयनद्वयमाह । कोटिभुजातरनिघ्नो भुजाग्रयोगोद्भवस्तदूनयुते । कोटिभुजकृती द्विध्ने तन्मूले स्तोऽथवा श्रवणो | विमा-भुजाग्रयोगोभय (भुजकोटियोगोत्पन्न ) कोटिभुजान्तरनिधन (कोटिभुजान्तरणित ) द्विघ्ने (द्विगुणिते) कोटिमुजती (कोटिभुजवों) तदूनयुते (तेन फ्लेन रहितसहिते) कार्ये तन्मूले अथवा श्रवणी (रों) भवेतामिति ॥६॥ अयोपपत्ति । श्लोकोक्रया को-भु-अन्तरम् । को+भु-योग अन्तरxयोग= (को-भु) (यो+भु)= को-भु' एतेन द्विगुरिणत भुजको. टिवर्गो पृथक् युतोनौ तदा २ भु+को-भु-भु+को मूलेन कर्ण स्पष्टाधिकार, ३८३ स्यात् तथा २को'-(को-भु)-२को-को+भु= को+भुक मूतेन को भवेदिति । अन को-स्पष्टा कोटि । भु-भुज्ज्या= केन्द्रज्या। अत उपपन्नम् ॥ पुन दो प्रकार में कनियन करते हैं। हि.भा.-भुज और कोटि के योग को कोटिभुज के अन्तर से गुणकर जो हो उसको द्विगुणित भुजवर्ग और द्विगुणित कोटिवर्ग मे घटाने और जोड़ने से उनके मूल लेने मे दो प्रकार के पर्ण होते हैं । उपपत्ति श्लोक के अनुसार को-भ = अन्तर । को+भयोग : योगxअन्तर= (को+भु) (को-भु)-को-भु इसको द्विगुणितभु ज्वर्ग और द्विगुणित कोटिवर्ग मे जोडने और घटाने से २ भु+यो-भु-भु+को'वर्ण मूल लेने मे भु+को कर्ण तथा २ को (को-भु)= • को-को+भु'= को+भु'- कर्ण मूल नने रा Vको+भु' =कर्ण । यहा को-स्पप्टा कोटि, भु==भुजज्या=वेन्द्रज्या इससे प्राचार्योस्त उपपन्न हुमा Hell पुन प्रकारत्रयेण तदानयनमाह । निजयुतिहतभुजकोटयो कोटिभुजे स्वान्तराहते स्वमृगम् । मूले श्रुती द्विगुणिताद् वधारपद वाऽन्तरकृतियुतात् ॥१०॥ विभा-निजयुतिहतभुजकोट यी ( भुजकोटियोगगुणितभुजमोटिप्रमाणे) स्वान्तराहते (स्ववीयान्तर (भुजकोट्यन्तर) गुरिणते) कोटिभुजे स्वमृगग (धन हीन) मूले तदा श्रुती (कर्णी) भवत । वा अन्तरकृतियुतात् (भुजकोट्यन्नर वर्गयुतात्) द्विगुणिता वधात् (द्विगुणितभुजकोटिघातात्) पद मून कर्ण स्यादिति ।।१०।। अनोपपत्ति । श्लोकोक्त्या को (भु-यो)=ो मु+को भु (भुको)-भु+भु को भु (पो-मु) = भु को-भु वो (को-भु)-को-को भु प्रनयोरन्तरेगा ततोऽनयोोगेन भु+भु को को-को भु+को'-भु पो+भु-यो'- को भु-भु+को-करण मु-वर्ण मूलेन भु+पो-वर्ण मूलेन को+मुवर्ण ३८४ वटेश्वर-सिद्धान्ते तथा द्विगुणिताद्वधादित्याद्यनुसारेण २ भु को+(को-भु) = २. को+ को'-२ भु को+8=को'+मुकर्ण मूलेन/को+भु' =कर्ण । अनापि को स्पप्टा कोटि । भु केन्द्रज्या एतावताऽऽचार्योक्तमुफ्पन्नम् ।।१०।। पुन तीन प्रकार से वर्णनयन करते हैं । हि मा-भुज और कोटि के योग से गुरिणत भुज और कोटि में अन्तर (मुज कोटि के अन्नर) गुपित कोटि और भुज को जोडने और घटाने से जो होते हैं उनके मूल लेने से दो प्रकार के काम होते हैं । अथवा भुज और कोटि के अन्तर वर्ग करके युत द्विगुणित भुज और कोटि के पात के मूल कर्ण है ॥१०॥ उपपत्ति श्लोकोक्ति के अनुसार वो (भु+को) = को भु+को' भु (भ+को) = भु+भु को भु (को भु) = को भु-भु को (को-भु)-को-को भु दोनो के अन्तर करने से दोनो के योग करने से को भु+को- को भु+भु'वो'+भु भु+भु को+को-को भु = भु+को =-कण मूल लेने से /भु'+को' कर्ण मूल लेने से को'+नु' = करणे तया 'द्विगुणिताद्वधात्पदम्' इत्यादि के अनुसार २भु को+(को-भु)= २ भु. को+यो'–२ को भु+भयो+भुवर्ण' मूल लेने से को+मुकर्ण को-सप्टा कोटि । भु-केन्द्रज्या इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुमा ॥१०॥ इदानी वर्णनयनमुक्त्वा ग्रहमध्यममस्कारार्थमाह । त्रिज्याहता भुजज्या कर्णहता तस्य कार्मुकं तु फलम् । देयं मध्ये शोध्य शोनोई स्यात्स्फुटो धुचर ॥शा मिमा-भुजज्या (सीप्रकेन्द्रज्या) त्रिज्याहता (निज्यागुणिता) कर्ण- हुता (कर्णभक्ता) यत्पल तस्य कार्युक (चाप) मध्ये (मन्दोचे) देय (योज्य) शीमोच्च शोध्य तदा स्फुट द्युचर (ग्रह ) स्यादिति ॥११॥ यदि मन्दस्कुट चिकीपित तदा मन्दवेन्द्र वगेन पूर्ववद्भुजज्याकोटिज्ये साध्ये तत कोट्यन्त्यफलज्ययोरक्यान्तर स्फुटा कोटि कार्या तद्वर्गभुजज्या वर्ग- योर्योगमूल मन्दवर्ण स्यात् ततस्त्रिज्या म्वकेन्द्रभुजज्यया स गुण्य पूर्वोत्त वर्णन भक्ता फ्लम्य चाप यदि प्रथमपदे केन्द्र रादा स्वमन्दोच्चे योजयेत् । यतस्तावदेव स्पष्टाधिकार. ३८५ मन्दोच्चमन्दस्फुटयोरन्तर तदा मन्दोच्च मन्दस्फुटसम भवति । द्वितीयपदे केन्द्र चेत्तदा लब्धचाप चक्रार्धाद्विशोध्य शिष्ट मन्दोच्च योजयेत् । यतस्तावदन्तर मन्दो- चमन्दस्फुटयोस्तदा मन्दोच्चमन्दस्फुटौ तुल्यो भग्त । तृतीयपदे केन्द्र चेत्तदा राशि- पटक तन योजयेत् मन्दोच्चमन्दस्फुटयोस्तावदन्तरत्वात्, ततश्च तो समौ स्याताम् चतुर्थपदे चेत्केन्द्र तदा चक्राद् विशोध्य शेष मन्दोच्चमन्दस्फुटयोरन्तर तन्मन्दोच्चे योजयेत्तदा मन्दोच्च मन्दस्फुटसम भवेत् । अथ शीघ्रस्फुट चिकीर्पित तदा शीघ्रकेन्द्रात् शीघ्रोपकरण कर्णमानीय तेन शीघ्रकेन्द्रज्या सगुण्य रिज्यया विभज्य लब्धस्य वाप शीघ्रकेन्द्र प्रथमपदे चेत् शीघ्राचाद विशोधयेत् तदा शीघ्रोच्च शीघ्रस्फुटसम स्यात् यतस्तावत्तयोरन्तरम् । द्वितीयपदे केन्द्र चेत लब्धचाप चक्रार्धाद् विशोध्य शीघ्रोच्चात्यजेत् तदा तो समो भवेताम् । तृतीयपदे केन्द्र चेत्तदा तयोस्तुल्यत्व भवेत् । चतुर्थे पदे केन्द्र चेल्लब्ध. चाप चकाद्विशोध्यशेष शीघ्रो चाद् विशोधयेत्तदा तयोस्तुल्यत्व भवेदिति ॥११॥ कानयन कहकर ग्रहमध्यम सस्कारार्थ कहते हैं। हि.भा--भुजज्या को त्रिज्या से गुणवर कर्ण मे भाग देने पर जो फल होता है उसके चापको मन्दोच्च मे जोडने से शीघ्रोच्च में घटाने में स्पष्टगह होते है ॥११॥ उपपत्ति यदि मन्दस्पष्ट ग्रह अपेक्षित हो तब मन्दकेन्द्रवश से पूर्ववत् भुजज्या, कोटिज्या करके तव केन्द्रकोटिज्या और अन्त्यफलज्या के योगान्तर रूप स्पष्टकोटि, नया भुजज्या के वर्ग योग- मूल कणं होता है, तब त्रिज्या को केन्द्रज्या से गुणकर पूर्वोक्त कर्ण से भाग देने से जो फ्ल होता है उसके चापको पदि केन्द्र प्रथम पद मे है तो स्वमन्दोच्च मे जोड देना, क्योकि मन्दोच्च और मन्दस्पष्ट का अन्तर उतना ही है तब मन्दोच्च मन्दस्पष्ट बराबर होता है। द्वितीयपद में केन्द्र रहने से लब्धचाप को चक्राधं (६ राशि) मे घटा पर जो शेष रहता है उसको मन्दोच में जोडना चाहिये । तृतीय पद में केन्द्र रहने से उसमे छ राशि जोडना चाहिये क्योकि मन्दोच पोर मन्दस्पष्ट का अन्तर वहा छ राशि चतुर्य पद मे पेन्द्र रहने से चर (१२ राशि) मे घटा देने से शेद मन्दोच और मन्द स्फुट ग्रह को अन्तर होता है उमको मन्दोच में जोडने से मन्दस्फुट होता है। यदि शीघ्र स्फुट अपेक्षित है तो शीघ्रकेन्द्र से शीघ्रकोपययुक्त सामग्रियो द्वारा वरण साधन कर उससे शीघ्रमेन्द्रज्या को गुणकर त्रिज्या से भाग देने मे जो फल होता है उसके चाप स्पष्टकेन्द्र होता है। प्रथम पद में शीघ्रपेन्द्र रहने से लघचाप को शोघ्रोच्च में घटा देना तव शीघ्रोध और शीघ्र स्फुट बरार होगे ! द्वितीय पद मे मीघ्र केन्द्र रहने से पूर्वानीत लब्ध चाप को छ राशि में घटा देने से जो शेष रहता है उसको शीघ्रोच मे घटा देना चाहिए। तब वे दोनो बराबर होगे। तृतीय पद में शीघ्र पेन्द्र रह्न से गोप्रोच में छ राति पो घटाने से दोनो को तुल्यता होती हैं। चतुर्य पद में गीघ्र केन्द्र रहने से मानीत लब चाप को । ३८६ वटेश्वर सिद्धान्ते वारह रागि मे घटा कर जो शेप रहे उमको शीनोच्च म घटाना चाहिये तव दोनो की तुल्यता होती है ॥११॥ इदानी देय मध्ये शोघ्यमित्यादे स्पष्टीकरणमाह । प्रविकृतः प्रयभे चरणे भगणदलाच्छोधितं द्वितीयेऽस्मिन् । पगृहयुतं तृतीये भगणाच्छुद्ध चतुर्थपदे ॥१२॥ वि भा.प्रथमचरणे अविकृत एवार्थात् यथागतमेव बोध्यम् । द्वितीये- ऽस्मिन् पादे भगणदलात् (शशिषटका) विज्याहरा भुजज्येत्यादिनाऽऽनीतफलचाप शोधित तृतीयपादे षड्गृहयुत (पड़ राशियुत) चतुर्थपदे भगणाच्छद (द्वादश राशित शुद्ध ) कार्यमिति ॥ एतस्य सर्वे विपया पूर्वश्लोकभाष्ये विशदरूपेण वरिंगता सन्ति, तत एव ज्ञातव्या ॥१२॥ अब 'देय मध्येशोध्य' इत्यादि का स्पष्टीकरण कहते हैं । हि भा--पूर्व श्लोक से समागत चाप प्रथम पद मे ज्यो का त्यो होता है, द्वितीय पद मे छ रागि में घटाना चाहिये, तृतीय पद मे छ रामि जोडना और चतुर्थ पद मे बारह राशि में घटाना चाहिये। इसके विषय मे सब बातें पूर्वश्लोक के भाग्य मे विगद रूप से कही गई है इसलिए वही में जाननी चाहिये ।।१२।। इदानी पदज्ञानार्थमाह । अग्न्यान्यफलज्यातो यदि पतति तदा प्रथमचरणे । सेवाग्राज्या ततश्पतति तदा मध्यमे ज्ञेयः ॥१३ । मध्यपदे वा परफलरहिते तयाथिके शेषे । पदसजावामीभि फलावगतिरुत्तरत्रान्यत् ॥१४॥ स्पष्टायौँ। इदानी ग्रहस्पष्टगतेरानयनमाह । निजफलमोज्यज्यानो केन्द्रगतिश्चाद्यजीवया भक्ता। त्रिज्यानी कर्णहुता लब्धेनोनास्वशीघ्रमन्दगति ॥ १५ ॥ स्पष्टा भुक्ति' सदां विपरीतविशोधनाच्च चवम् । नोचासन्ने ज्ञेया विलोमगतिसम्भावना विज्ञः॥१६॥ विमा केन्द्रगति (शीघ्रकेन्द्रगति } निजफलभोज्यज्यानी (निजफल- भोज्यज्यया ग्रहस्य स्फुटीनियमारणस्य यच्छीप्रफल भवति तस्य फ्लज्याया निय- मारणाया यद् ज्यान्तर मा फलभोग्यज्या तया गुणिना) प्राद्यजीवया (प्रथम- .शीकेन्द्रज्या त्रि =स्पकेज्या । एव स्पष्टाधिकार ज्यया) भला, सा त्रिज्यानी (विज्यया गुणिता) कर्णहता (कर्णोनभक्ता) लब्धेन ऊना (रहिता) स्वशीघ्रतुङ्गगति (शीघ्रोञ्चगति ) तदा | सदा (ग्रहाणा) स्पष्टा- भुक्ति (स्पष्टा गति ) भवेत् । विपरीतशोधनात् (शीघ्रोच्चगतिरहिताल्लब्धात्) वनत्व (वक्रता) भवेत् । नीचासन्ने (नीचसमीपे द्वितीयपदे) विलोमगतिसम्भा- वना (वक्रगतिसम्भावना) विज्ञज्ञ येति ।। इयमेवोपपत्तिर्मन्दस्पष्टगत्यानयनेऽपि केवल केन्द्रगतिकरण यो पार्थक्यमस्ति तत्स्थाने तत्केन्द्रगति कर्णश्च ग्राह्य इति ।। १५-१६ ।। अत्रोपपत्ति । शी'केज्या त्रि अथ- शीक -स्प'वेज्या शीक अनयोरन्तरेण त्रि (शी केज्या-~शीकेज्या) =स्प'केज्या~स्पकेज्या- विxशीघ्रकेज्यान्तर शीक शीक स्पभोग-शोकेग -शीकेग सज्यावृद्धि - शीघ्रकेन्द्रज्यान्तर प्रज्या तत उत्थापनेन नि स्पभोख शीकेग = स्पष्ट केन्द्रज्यान्तर-स्पष्टपेन्द्रान्तर=स्पष्ट केन्द्रगति प्रज्या शीक (स्वल्पान्तरात्) शीत+स्पन =स्पष्टके शीउ'+स्पग्रस्प के अनयोरन्तरेण शीउग-स्पप्टग्रग%D स्पकेग तत शीउग--स्पप्टकेग-स्पनगशीउग भि स्पभोख शोकेग प्रज्या शीक यदि च शीघ्रोच्चगतिमाने स्पष्ट केन्द्रगतिनं शुद्ध्येनदा विलोमशोधनेन स्पष्टा गत्ति क्षयात्मिका भवेत्सव वक्रगति । पूर्वानीतस्पप्टवेन्द्रगतिस्वरूपे हरे शीघ्रकर्णोऽस्ति तेन शीघ्रवर्णस्य परमात्पत्वे म्पप्टकेन्द्र गतेराधिक्याच्चीघ्रोजगतितोऽधिक्त्वसम्भा- वनाया ग्रहस्फुटगते विलोमदिकत्वाद् वक्रता, युक्ता, परमिय स्थितिर्नीचानन्ने द्वितीयपदे भवेदत प्राचार्योक्तमुपपन्नम् । प्राचार्योक्तरपष्टवेन्द्रगतेरानयन न समीचीनमिति तदुषपत्तिदर्शनेनैव स्फुटम् । सिद्धान्तोसरे श्रीपतिनाऽपि ग्रहस्प- प्टकेन्द्रगतिमाधन समोचीन न कृत, भास्कराचार्येण सिद्धान्नगिरोमणी 'फलाशखाकान्तरशिजिनीनी' • त्यादि समीचीन स्पष्टकेन्द्रगतिमापन वृतमिति ।। १५-१६ ॥ अव ग्रहो क स्पष्टगत्यानयन करते हैं। हिमाशीघ्रवेन्द्रगति को भोग्यराण्ड (स्पष्टभोग्यमण्ड से) गुणवर प्रयमच्या से भाग देना, जो पन हो उसको त्रिज्या मे गुग्णावर कर्ण में भाग देन रो जो फा हो उमरी
३८५
वटेश्वर-सिद्धान्ते
शीघ्रकेन्द्रगति मे घटा देने से ग्रहो को स्पष्टगति होती है । विलोमशोधन मे अर्थात् शीघ्रोच्च.
गति पानीतपल (स्पष्ट केन्द्रगति) मे घटाने से वक्रगति होती है । विपरीतगति की सम्भावना
नीच के आसन्त में समझनी चाहिये ॥ १४-१५ ।।
उपपत्ति
शीवेज्या त्रि = स्पवेज्या । तथा
3-
गीकर
-स्प'वेज्या
सीक
शीक
दोनो के अन्तर करने से
मि
त्रिxोज्यान्तर
(घो वेज्या शीवेज्या)
=स'केज्यावेज्या
शीक
सीक
स्पभोखशीकेग
परन्तु
= गीप्रगिलिस ज्यावृद्धिशीघ्रकेन्द्रज्यान्तर
प्रज्या
उत्यापन देने मे
त्रि स्पभोख गीग
'=स्प'वे ज्या~सकेज्या स्प'के~स्पके= स्पष्टकेन्द्रगति
(स्वलान्तर मे)
शीउ स्पष्टन= स्पष्ट के
शीउ' स्पटम= स्प'क
द्वयोरत्तरे
शोउग-स्पग=स्पकेग शीउग-पकेग-सग
मि स्पभोस शोकेग
बीउग-
=स्पग
प्रग्या पीक
प्रज्याशीक
.
यदि शीघ्रोच्चगति मे स्पष्ट पेन्द्रगति न घटे विलोम शोधन से ऋणात्मक स्पष्ट-
गति होती है वही वक्रगति है । पहले लाई स्पष्ट केन्द्रगति स्वरूप में हर मे जो शीघ्रकर्ण
है उसका मान जब परमाल्प होगा (नीचस्यान मे) तव स्पप्टकेन्द्रगति के मान अधिक होने
के कारण शीघ्रोच्चगति म न घटे इसकी सम्भावना हो सकती है प्रत वहीं पर (नीचा.
सन्न में क्योकि वर्ण नीच स्थान से पहले से घटते घटते नीच स्थान में परमात्प हो जाता है)
ग्रह की वस्ता होना युक्तियुक्त है। इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुमा । प्राचार्योक्त स्पष्ट केन्द्र
गति को प्रानयन ठीक नहीं यह स्पष्ट केन्द्रगति के पानयन देसने ही से स्पष्ट
है। सिसासरेलर में श्रीपति से भी परवेन्द्रगति के साथ शेष नही पिथे हैं । सिसात-
शिरोमरिण म भास्स राचाय ने पनामसाक्षान्तरशिजिनीनी' इत्यादि से उमका सापन मुक्ति-
युक्त किया है। यही उपपत्ति मन्द स्पष्ट गति के लिए भी है वेवन केन्द्रगति और कर्ण
के स्थान पर तत्रस्य वेन्द्रगति और वर्ण लेना चाहिए ॥१५-१६॥
इदानी पुनमन्दपलानयन सोनपतानयन चाह ।
यलमन्ददोगुरपौवा निजान्त्यफलजोवया हतौ भक्तो।
कर्णव्यासा(म्या फलधनुषी शीघ्रमन्दजे फले स्याताम् ॥१७॥
स्पष्टाधिकारः
३८६
वि.मा.-वा चलमन्ददोगुणी (शीघ्रकेन्द्रज्या मन्दकेन्द्रज्ये) निजान्त्यफल-
जीवया (शीघ्रान्त्यमन्दान्त्यफलज्याभ्या) हतो (गुणितौ) कर्णव्यासार्धाभ्या
(कर्णत्रिज्याभ्या) भक्ती फलधनुपी (फलयोश्चापे) शीघ्रमन्दजे फले (शीघ्रफलमन्द-
फले) स्यातामिति ॥१६॥
अयोपपत्तिः
चित्रम् द्वितीयश्लोकोपपत्तिस्थ द्रष्टव्यम्
शोधान्त्यफज्या शोकेज्या
-शीघ्रफलज्या।
शोकर्ण
मकेज्या. मन्दान्त्यफज्या
अस्याश्चापम्-शीफलम् । तथा
-मभुजफलम् ।
अस्य चापम् - मन्दफलम् । एतावताऽऽचार्योक्तमुपपन्नम् ॥१७॥
अब पुन मन्दफलानयन और सीप्रफलानयन कहते है।
हि.मा.-शीघ्र केन्द्रज्या और मन्दवेन्द्रज्या को अपनी अपनी अन्त्यफलज्या से
गुणकर, कर्ण और विज्या से भाग देने से जो फलद्वय होते है उनके पाप शीघ्रफल और
मन्दफल होते हैं ॥१६॥
उपपत्ति
द्वितीयश्लोक का उपपत्तिस्थ चित्र देखिये।
शीकेज्या. शीशान्त्यफज्या
शीफज्या।
शीवर्ण
मकेज्या मन्दान्त्यफज्या
इसके चाप करने से शीघ्रफल होता है । तथा
त्रि
चाप-भन्दफल । इमसे प्राचार्योक्त उपपन्न हुमा ॥१७॥
मभुजफल इसके
इदानी स्पष्ट ग्रहान्मध्यग्रहानयनमाह ।
शोप्रात्स्पष्ट ग्रहोनान्चलफलमखिलं खेचरः स्यादनष्ट
व्यत्यासात्स्पष्टसंज्ञे धनमृगमसकृत् स्यान्मृदुस्पष्टसंज्ञः ।
तस्मान्मन्दोच्चहीनान्मृदुफलमपि च व्यत्ययादेव कृत्स्नं
तत्रानेटक्षयस्व गदितवदसकृन्मध्यमोऽत्याच तस्मात् ॥१८॥
वि.मा-सप्टग्नहोनात शीघ्रात् (स्पष्टग्रहरहितात् शीघ्राच्चात्) अखिल
चलफल (सम्पूर्ण शीघ्रफल) अनप्टे स्पप्टस (यथास्थानस्थिते सप्टग्रह)
व्यत्मसात् (विलोमात्) धनमृण कार्य (शीघ्रफल धन चेहण, ऋणं चेद्धन कार्य,
एवमसकृत्तदा मृदुस्पष्टसज्ञः (मन्दस्पष्ट.) खेचरः (ग्रहः) स्यात् । मन्दोच्चहीनात्त-
स्मात् मन्दोच्चरहितामन्दस्पष्टग्रहात् कृत्स्नं मृदुफल (सम्पूर्ण मन्दफलं) व्यत्ययादेव
(विलोमादेव) गदितवत् (कथितमार्गण) अनेष्टक्षयस्व (यथास्थमृण धनी तत्र
मन्दस्पष्टग्रहे कार्यम् एवमसकृत्तदामध्यमः ग्रहः स्यात् । तस्मान्मध्यमग्रहादन्य-
दिति ॥१८॥
३ ९० वटेश्वर-सिद्धान्ते अत्रोपपत्ति. शोधोच्चस्फुटग्रहयोरन्तर मन्दस्पष्टग्रहार्यमुपयुक्त शीघ्रवेन्द्र नास्त्यतः प्रथम मन्दस्पष्टग्रहतुल्यमेव स्फुटग्रह मत्वा ततो यथोक्तरीत्या शोघ्रफलमानय तन्च स्फुटनहे व्यत्ययेन सस्कार्य (शीघ्रफल चेद्धन तदा ऋण चेद् धन) एवमसकृत् तदा स्पष्टग्रहाच्छीघ्रफलेनान्तरितो, वास्तवमन्दस्पप्टग्रहो भवेत् । एतस्मात्समागताद् वास्तवमन्दस्पप्टग्रहान्मन्दफल साध्य तस्थावास्तवत्वात्तज्जनितमन्दफलस्या- वास्तवत्वातन विलोमसस्कृतो वास्तवमन्दस्पष्टग्रहोऽवास्तवमध्यमग्रह एवमस- कृत्करणेन वास्तवमध्यमग्रहो भवेदिति । अन्य प्राचीनैरपि स्पष्टग्रहान्मध्यग्रहान- यनमसकृत्प्रकारेण कृत, सिद्धान्तशिरोमणेप्टिप्पण्या सशोधकेन रविचन्द्रयो. स्पष्टादन्येपा मन्दस्फुटादेव सकृत्प्रकारेणैव मन्दफलानयन कृतमिति ॥१८॥ इति वटेश्वरसिद्धान्ते स्पष्टाधिकारे प्रतिमण्डलस्पष्टीकरणविधि- स्तनीयो ऽध्यायः समाप्त. । मव स्पप्टग्रह से मध्यमग्रहानयन कहते हैं । हि भा -स्पप्टग्रह करके रहित शीघ्रोच्च से जो शीघ्रफल हो उसको स्पष्ट ग्रह विलोम (उल्टा) सस्कार करना याने शीघ्रपल धन रहे तो स्पप्ट ग्रह मे ऋण करना, दोन- पल ऋण रहे तो स्पष्ट ग्रह में धन करना । इस तरह वार-बार करने से मन्द स्पष्ट ग्रह होते है । मन्दोच्चरहित मन्द स्पष्ट ग्रह मन्दपल साधन करना, उस सम्पूर्ण मन्दफल को मन्द स्पष्टग्रह में विलोम (मन्दफल धन रहने से मन्द स्पष्ट ग्रह मे मुण, और भन्दफल पण रहने से मन्दस्पष्ट ग्रह में धन) सस्कार करना, इस तरह बार-बार करने से मध्यम ग्रह होने हैं। उम मध्यमग्रह में अन्य बातें जानना ॥१८॥ में । उपपत्ति शीघ्रोच्च और स्फुट ग्रह के अन्तर मन्द स्पष्ट ग्रह के लिये उपयुक्त शीघवेन्द्र नहीं है इसलिये मन्द स्पष्ट ग्रह तुल्य स्फुटग्रह को मानकर यथोक्तरीति से शीघ्रपल साधन कर स्फुटग्रह में विलोम सस्कार (शीघ्रफल पर रहने से ऋण, ऋण रहने मे धन) करने से अवास्तव मन्दस्पष्ट ग्रह होता है इस तरह बार-बार करने में वास्तवमन्द स्पष्टग्रह होते हैं । इम मन्द सप्टग्रह में जो मन्द फल होगा सो अवास्तविक होगा, उसको मन्द स्पप्टग्रह म विलोम सस्तार करने से अवास्तव मध्यम ग्रह होते हैं, इस तरह बार-बार करने से वास्तब मध्यम ग्रह होते हैं । स्पष्टग्रह में मध्यमग्रहानयन लिये सब प्राचीनाचार्यों ने प्रसकृत्पर्म विये हैं सिद्धातशिरोमणि की टिप्पणी में सशोषक रवि पौर चन्द्र के लिए स्पष्ट से मन्य ग्रहो के के लिए मन्द सष्ट से सात प्रकार से मन्द फलानयन किये हैं ॥१८॥ इति वटेश्वरसिद्धात मे स्पष्टाधिकार में प्रतिमडल सप्टोकरराविषि नामक तृतीय अध्याय समाप्त हुमा ।
चतुर्थोऽध्यायः स्फुटीकरणम् अथ ज्याम्खण्डेविना स्फुटीकरणमाह । त्रिज्याशकला सदा स्पष्टीकरणं मयेरितं विधिवत् । अधुना विनय मौशिकलर्वक्ष्ये स्फुटीकरणम् ॥१॥ वि.मा-धुसदा (ग्रहाणा) स्पष्टीकरण त्रिज्याशकले (त्रिज्याव्यासाधैं) विधिवत् (यथोचितविधिना) मया ईरित (कथितम्) अधुना (इदानी) मौर्वी- शकलेविना (ज्याविना) स्फुटीकरण वक्ष्ये ।।१।। हिम-ग्रहो के स्पष्टीकरण त्रिज्याव्यासाध से विधिपूर्वक मैंने कहे अब बिना ज्या के स्पष्टीकरण कहता हू ||१॥ इदानी ज्याभिविनामुजज्यानयनमाह । चक्रार्धा शा भुजार्शविरहितनिहतास्तविहीनविभक्ता, खव्योमेष्वभ्रवेदै सलिलनिहताः पिंडराशिः प्रदिष्टः। पड्भाशघ्ना भुजाशा निजकृतिरहितास्तत्तुरीयांशहीन- भक्ताः स्यास्पिडराशिविशिखनयनभूव्योमशीताशुभिर्वा ॥२॥ विभा-भुजाशर्यदीया जीवाऽपेक्षितास्तविरहितनिहताश्वक्रार्याशा (खना- गेन्दवो भुजाशरूना गुणिताश्च) सलिलनिहता (चतुभिर्गुणिता) तद्विहीन पूर्वोक्तभुजाशरहितगुरिणतभा(शरहित ) खव्योमेप्वभ्रवेदै (४०५०० एभिरक) विभक्तास्तदा पिण्डराशि प्रदिष्ट (कथित) वा (अयवा पडभाराना भुजाशा (१८० एतद्गुणितभुजाशा) निजकृतिरहिता (भुजाशवर्गहीना ) तत्तुरीयाश- हीने (तदीयचतुर्था शरहित ) विशिखनयनभूव्योमशीताशुभि (१०१२५ एभि ) भक्तास्तदा पिण्डराशि (भुजज्या) भवेदिति ॥२॥ अनोपपत्ति । यदि व्यामार्धे भुजज्या तदा द्विगुणव्यासार्धे का लब्धा द्विगुणव्यासाघे भुजज्या ज्याभु २ व्याद -२ ज्याभु, अत पस्मिन्नपि व्यासार्धे द्विगुणभुजाना या व्याद पूज्या संघ द्विद गुरगतच्यासाधं जाण भवतीति । पष्टिव्यासा द्विगुणभुजा -- ३६२ वटेश्वर-सिद्धान्ते शाना पूर्णज्यासाधनाथ स्वल्पान्तराद्वयासस्त्रिगुण परिधि =३६०, चक्रासंश्चर- समचापीयमान लभ्यते तदा द्विगुणभुजागै कि लब्ध तच्चापमानम् -२ भु । तत्त "चापोननिधनपरिधि प्रथमाह्वय स्यादि'त्यादि विधिना खार्कव्यासाधे द्विगुण- भुजाशपूर्णज्या जाता. सार्कमितत्रिज्याया भुजज्या (३६०-२९) २ भु४४४१२० - १८०-४१६४१२० ३६०ix --(३६०-२९)रभु ३८०४३६०४५ -(१८०-भु)भु४४ =(१ .--भु) भु १२० - (१८०-भु)भु४१२० ६०४३६०४५ (१८०-भ) भु ४५४४५४५-(१८०--भु)भु १६ = (१८०-९) भु४१२० यदि खार्क मितत्रिज्यायामिय भुजज्या तदेष्ट- १०१२५-(१८०-भु) भु ४ ४ ४ ४ - निज्याया किमिति जाता भुजज्याः (१८०-भु) मुनि(') १०१२५–(१८०-भु) भु ४ - (१८०-भु) भु त्रिx४ अन त्रिज्या=१ तदा (१८०-भु) भु ४ ४०५००-(१८०-भु)मु ४०५००–(१०-भु)भु (१८० भु) भु नि = भुजज्या। अथ ..(१८०४ भु-भु') नि १०१२५–(१८०-भु) भु १०१२५- (१८०४भु-भु') १८०४भु-भू १०१२५-(१८०४ भु-भु) = भुजज्या-पिण्डराशि । ४ - कोटिचापवशादेवमेव कोटिज्येति । एतावताऽऽचार्योक्तमुपपन्नम् ॥२॥ (१) एतेन सिद्धान्तशेखरे श्रीपतिनोक्त "दो कोटिभागरहिताभिहता खनागचन्द्रास्तदीयचरणोनश राबदिग्भि । तेव्यास खण्डगुरिणता विहृता फले तु ज्याभिविनव भवतो मुजकोटिजीवे"। उपपद्यते । श्रीपतिप्रकारस्यास्य मूल वटेश्वरोक्तप्रकार एवेति विद्वद्भिविविच्य मेयमिति ॥२॥ अव बिना ज्या ये भुजज्यानयन कहते हैं । हि भा-जिस भुजा की जीवा (ज्या) अपभिन है उसमे रहित और गुरिणत भार्यात को चार गे गुणकर उसमे (भुजारा रहित और भुजाग स गुग्गित भार्धात) रहित ४०५०० इतने म म भाग देने से पिण्डराणि (भुजज्या) होती है। १८० इतने से सष्टाधिकार. गुणित भुजांश मे भुजाश वर्ग घटाकर चार से भाग देने से जो फल हो उसको १०१२५ इनमे घटाकर उसमे (१८० गुणित भुजश मे भुजारावर्ग घटा हुआ) भाग देने से पिण्डरागि (भुनज्या) होती है ॥२॥ उपपत्ति यदि व्यासाधं मे भुजज्या पाते हैं तो द्विगुणित ध्यासाधं में क्या इस अनुपात से द्विगुरिंगत व्यासार्थ मे भुजज्या पावेगी ज्याभु २ व्याद, '२ ज्याभु । इससे यह सिद्ध हुआ कि किसी व्याद ध्यासार्ध मे द्विगुणित भुजाश की जो पूर्णज्या होती है वही द्विगुरिणत उस ध्यासार्ध मे भुजज्या होती है । साठ (६०) व्यासाधं मे द्विगुणित भुजाश की पूर्णज्या साधन के लिए स्वल्पान्तर से त्रिगुरिणत व्यास के बराबर परिधि-३६०, अव अनुपात करते हैं चक्राश मे चक्रयम चापीयमान पाते हैं तो द्विगुणित भुजाश मे क्या प्रा जायगा, चापमान = २ भु, तब 'चापोन- निधनपरिधि प्रथमाह्वय स्यात्' इत्यादि नियम से १२० गिज्या मे द्विगुणभुजारा पूर्णज्या ५ श्रा जायगी, १२० त्रिज्या में भुजज्या = (३६०-२४) २ भु ४४१२० ३६०४४- (३६०-२ भु) २ भु - (१८२-मु) भु १६४१२० (१८०-भु) भुx१२० ३६०४३६०४५-(१८०-भु) भु४४०४३६०४५-(१९०-भ) भु १६ (१८०-भु) भु १२० (१८०-भ) भु १२० ४५४४५४५-(१८०-) १०१२५--(१८०--भु) भु %3D ४ भ ४ ४ यदि १२० त्रिज्या मे यह भुगज्या पाते हैं तो इष्ट प्रिज्या में क्या प्रा जायगी इष्ट त्रिज्या में भुजज्या = (१८०-भु) भ नि १०१२५-(१६०-भु) भु ४०५००-(१८०-मु) भु - (१८०-म) भ त्रिxx ४ यहा त्रि=१ तब (१८०-भु) मु४ -भुजग्या। ८.- (१८०-४) मुनि १०१२५-- (१८०--म) भु = भुजज्या (१) ४ (१८०४म.भ.'' १०१२५- (१८०४-भु') १८० मु-मु -मुजज्या। १०१२५ -(१८०Xभु-मुग ४ कोटि-चाप से इसी तरह कोटिज्या होती है। इसमे प्राचार्यो त उपपन्न हुआ। (१) इससे मिदान्तशेखर मे थोपति के पथ "दोपोटिभागरहिवाभिहता. पनाग- ३६४ वटेश्वर-सिद्धान्ते चन्द्रास्तदीयचरमोनशराकदिग्भि | ते व्यासखण्डगुरिणता विहृता फले तु ज्याभिविनंव भवतो भुजकोटिजीवे" उपपन्न होते हैं, परन्तु इस श्रीपति प्रकार का मूल वटेश्वरोक्त प्रकार ही है इस विषय को विवेचक लोग विचार कर समझे ॥२॥ इदानी भुजपलकोटिफ्लयो साधनार्थ माह । परफलगुगनिन्नी हृत्फलज्या त्रिमौा भवति हि भुजजीवा चैव मन्याहतेऽपि । मृदुफलमिह साध्य प्रोक्तवबाहुभाग. स्वफलकमपि चैव बाहुकोट्यंशक स्व.॥३। वि भा - भुजजीवा (भुजज्या) परफलगुणनिती (अन्यफलज्यया गुणिता) निमोाहृत् (निज्याभक्ता) तदा फलज्या भवति, एवमन्याहतेऽपि (केन्द्र कोटिंज्या गुरिणतेऽप्यत्केिन्द्रकोटिज्या गुरिणताऽन्त्यफलज्यायानिज्यया विभक्ताया गय मूल- सज्ञक फलज्यामूलाद् ग्रह यावत्) प्रोक्त्वत् बाहुभाग (भुजारी) मृदुफल (मन्द- फल) साध्यम् । एव स्व (स्वकीय ) वाहुकोटव शक (केन्द्राशके केन्द्रकोट्यशश्च) स्वफलक (भुजफल, कोटिफल) साध्यमिति ॥३॥ अनोपपत्ति स्फुटवास्ति, पूर्वसाधितभुजज्या) कोटिज्याभ्या पूर्ववद् भुज- फलकोटिफले भवेतामेवेति ॥ ३ ॥ अव भुजफल और कोटिफ्ल के साधन के लिये कहते है । हि भा–भुजन्या (केन्द्रज्या) को अन्त्यफ्लज्या मे गुणकर त्रिज्या से भाग देने से फ्लज्या होती है, इम तरह केन्द्रकोटिज्या से भी अन्यफ्लज्या को गुणकर त्रिज्या से भाग देने फलमूल सज्ञक (फ्लज्या मूल से ग्रह तक) होता है । भुजारा (वेन्द्राश) से पूर्ववत् मन्दफल साधन करना चाहिये । एव अपने मुजारा (कन्द्राग) कोट्या (केन्द्र-कोटि में) अपने अपने फ्ल (भुजफ्ल, कोटिफल) साधन करने चाहि ।। ३ ।। इमकी उपपत्ति स्पष्ट हो है । पूर्वसाधित भुजज्या (केन्द्रज्या) और कोटिज्या (केन्द्र वोटिज्या) मे भृजफ्ल और कोटिपल हो वे ही करेंगे ॥ ३ ॥ इदानी ज्याभिविना चापानयनमाह । भिनवगुणयुक्तो ज्यातुरीयोऽत्रहारोविशिखरविसचन्द्र स्ताडितायास्तु मौर्या । खखविशिख खवेदैराहता वेनीवा विभगुणकृतिघातज्या समासेन भक्ता ॥४॥ फलहोना नवतिकृतस्तन्मूलेन न वजिता नवति । शेष धनुरथवा यप्रिज्याखण्डयिनैव फलम् ॥५॥ वि मा-विशिमरवित्रचन्द्र (१०१२५ एमि) ताडिताया (गुरिणताया ) मोर्ध्या (ज्याया) त्रिभनव गुण (त्रिज्या) युक्तो ज्यातुरीय (ज्याचतुर्थाश ) हार वा (अथवा) इष्टजीवा (भुजज्या) सस विभिन्न स्ववेदै (४०५०० एभि) ताडिता (गुणिता) त्रिभगुण वृतिघातज्या समासेन (चतुर्गुणित विज्यावर्ग ज्यायोगेन) से स्पटाधिकार. भक्ता (विभाजिता) फलहीना (फलरहिता) नवतिकृति. (८१००) तन्मूलन वजिता (रहिता) नवतिः (१०) शेप ज्यासण्डैविनैव फलं धनु (चाप) भवेदिति ।। ४-५॥ अत्रोपपत्तिः। द्वितीयश्लोकोपपत्त्या (१८०-भ) भत्रिx४ ४०५००-(१८०-भु) भु = भुजज्या छेदगमेन (१८०-मु) भु त्रि. ४= भुज्या४४०५००-भुज्या (१९०-भु) मु पक्षयो समयोजनेन (१८०-भु) भु. त्रि. ४-+भुज्या (१८०-भु) भु-भुज्या४४०५००%=(१८० -भु) भु (४ त्रि+भुज्या) भुज्या ४०५०० (१८०-भु) भु-१८०४ भु-भुपक्षी (-१) ... - ४नि+भुज्या गुरिणतो तदा- भुज्या १०१२५._. भुज्या १०२०५ हार त्रिभुज्या - भुज्या ४०५०० भु-१८० भु पक्षयो (६०) योजनेन ४नि+भुज्या भुज्याX४०५०० =भु-१८० भु+९० मूलग्रहणेन ४ त्रि+भुज्या ८१०० V ८१००-भुज्या.४०५०० ४ त्रि+भुज्या भु-६० 60- ८१००--भुज्या ४०५०० ४ त्रि+भुज्या =भु=to-V८१००-भुज्या १०१२५ ग्रत उपपन्नमाचार्योक्तम् । वि+भुज्या ४ एतदनुम्पमेव 'इष्टज्यया विनिहता. गरभास्करागा ज्यापादयुक् विभगुरणेन हुता- फन तत् । त्यपरवा सनन्दकृतित. पदमभ्रनन्द भागाच्च्युत भवति धन्वविना ज्यवाभि ।।" श्रीपत्युक्तमिदमिनि ।। ४-५ ।। पर ज्या रिना वापानयन रहते हैं। हि.मा.-१०१२५ एतद्गुणित मुजज्या में निग्या मुक्त सावतुग से भाग देना अपना मुजपा को ४०५०० इतने मे गुणर चतुगुणित निगा और भूजल्या पांग मे भाग । देना, पर मो नपे २० वे वर्ग में पदारर मूल मना उग मूल यो नन्ले में पटावर को ओए रहता है यह बिना मगरे पार होता १.५॥
घटेश्वर-सिद्धान्त उपपत्ति द्वितीयालोक की उपपत्तिसे (१८०-म) म बिX४ -भुजग्या छेदगम से मे ४०५००-(१८०--भु) भु (१८०-भु) मु.त्रि ४४= भुज्या ४०५००~-मुज्या (१८०-भ) भु दोनो पक्षों तुल्य जोडने से (१८०~-मु) भु त्रि. ४+भुज्या (१८०-भु) भु-भुज्या ४०५०० =(१८०-भ) भु (४ विभुज्या)=भुज्या ४४०५००:: भुज्या ४०५०० - ४ त्रि+भुज्या (१८०-भु) भु: त्रि+भुज्या भुज्या १०१२५ = १८० Xभु-भु दोनो पक्षों को (-१) गुण देने से १०- मुज्या ४०५०० =भु'-१८० नु दोनो पक्षों में (१०) जोडने से . ज्या -भु-१५० मु+९० मूल लेने से ४ त्रिभुज्या V भज्या ४०५०० ४ त्रि+भज्या भज्या ४००० प्रत ६०- =भु इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुमा । ४ वि+भुज्या इसके सहमा ही "इष्टज्यया विनिता पारभासरामा ज्यापाद युनिभगुरणेन हृता फल तत् । त्यक्त्वा सनन्दकृतिन पदमभनन्दभागारच्युत भवति धन्वविना ज्यका॥" श्रीपति प्रकार है ॥ ४-५ ।। इदानी भौमादिप्रहाणामतिमीघ्र-शीघ्रादिगतीनाह । स्फुटमध्यमसेवरान्तर दलितं मध्यसगात्स्फुटेऽल्पके । स्वमृग महति स्फुटोनिते स्वचलेऽस्मिन् भवनेयु सेचरः ॥६॥ प्रतिशोप्रगतिः शीघ्रा निसर्गतस्तदनु भाययोराद्य । मन्दाऽपराऽतिमन्दा चक्रा चैवातिवक्राख्याः॥७॥ घर च्युतेऽपि चास्मिन् ग्रहचारमंप एव निरिए । चक्रच्युतस्य मन्दा रहस्य भुक्ति. कुटिलसज्ञा ॥८॥ वि.मा-स्पुटे (स्पष्टप्रह) मध्यसगादरपवे (मध्यमग्रहान्न्यूने) स्फुटमध्यम सेच रान्तर (स्पष्टमध्यमप्रहयोरन्तर) दलित (प्रकृत) स्व (धनम्) महति मध्यमग्रहात्स्पष्टप्रहेऽधिवे) तदन्तराध स्पप्टमध्यमग्रहान्ताम् ऋण (हीन) पार्य, स्पष्टाधिकारः ३६७ स्फुटोनिते (स्पष्टग्रहहीने) अस्मिन् स्वचले (शीघ्रोच्च) तदा भवनेषु (राशिपु) खेचरः (ग्रहः) अतिशीघ्रातिगतिर्भवेत् ।। अत्राऽयमर्थः - स्फुटग्रहोनशीघ्रोच्च मध्यमग्रहात्स्फुटग्रहेऽल्पके मध्यस्फुट- योरन्तरार्धं धनं कार्य मध्यग्रहात् स्फुटेऽधिके तदन्तरार्घ होनं कार्यम्, एवं संस्कृतेषु राशिपु ग्रहोऽतिशीघ्रगत्यादिको भवेत् । हत्तोऽग्ने ग्रहाणामतिशीघ्रादिगतीनां नामा- नि कथ्यन्ते चत्रा (३६८) द्विशोधितास्ता वक्रादिगतयः पुनः स्वाभाविकगतयो भवन्तीति ।। ६.८॥ अब भौमादि ग्रहो को अतिमीन-सीधादिगतियो को कहते हैं । हि.भा. - मध्यम ग्रह से स्पष्टग्रह के मल्प रहने से दोनों (मध्यमग्रह और स्पष्टग्रह) के अन्तराध को स्फुटग्रह रहित शीघोच्च मे धन करना, यदि मध्यमग्रह से स्पष्टग्रह अधिक है तव दोनो के अन्तराध को स्फुटग्रह रहित शीघोच्च में ऋण करना । इस तरह करने से राशियो में ग्रह अनिशीघ्रादि गति होते हैं । इसके बाद ग्रहो की अतिशीघ्रादिगतियो के नाम पहते है । चक्र में (३६० मे) वक्रादि गतियो को घटाने से पुन अपनी स्वाभाविक गति होती है ।। ६-८॥ इदानी भोमादिग्रहाणा वक्रारम्भकालिक्वेन्द्राशनाह । रामाटिभिः (१६३) क्षितिसुतश्चलकेन्द्रभाग- वक्रोन्दुजोऽक्षमनुभि (१४५) गुरुरङ्गसूर्य (१२६) । शुक्र शरतुशाशभिः (१६५) शनिरग्निरुद्र (११३) श्चक्रच्युतैरकुटिला. कथितास्त्वमीभिः ॥६॥ वि मा --क्षितिसुत (१६३ एतं ) चलकेन्द्रभाग (शीघ्रकेन्द्रारी.) इन्द्राः (बुध ) अक्षमनुभि (१४५ एभि शीघ्रकेन्द्राश ) गुरु (बृहस्पतिः) अगम्य, (१२६ एभि शीघ्रकेन्द्रारी ) शुक्र शरत्तु शशिभि (१६५ एभिः) शनिः अनिद्र: (११३ एभि) वक्रीभवति, चक्रच्युत (भगणात्पतित ) प्रमोभिः (एनः केन्द्राम:) अकुटिला. (मार्गा ) भवन्ति ते ।। अथाऽस्योपपति अथ वक्रारम्भकालिककेन्द्राशानयन प्रदश्यते। वक्रारम्भो द्वितीयादे नीचासन्ने भवतीति पूर्व प्रतिमामालिक केन्द्रकोटिज्यामान =य कल्प्यते । तदा करणवर्ग.=प्रि+अन्त्यफग्या'--२ अफरमान- शान्तरशिश्निनोनीद्राक्केन्द्रभुक्तिरित्यादिना उग-2 कर्ण -उग- 140 ३६८ वटेश्वर-सिद्धान्ते अथ द्राक् केन्द्र मोयन्त्यिफ्लज्यागुरगयाक्मात् । मृगकर्यादिके केन्द्र युतोना विज्यकाकृति ॥ शोधकर्णहता लब्ध फलकोटिज्यका भवेत् । इति सशोधकोक्तटिप्पण्या य अफज्या फलकोटिज्या, स्पष्टगतिम्वरूपे उत्थापनेन (नि'न्य न फज्या) केग (नि'—य अफ्ज्या)केग उग-- =स्पग-उग-- क ति+अफ्ज्या-२ अफज्याय (नि केग [-य अफज्या केग) पर वक्रारम्भे स्पष्टगति- त्रि+अफज्या-२ अफज्याय उगति+उग अ फज्या-२ अफज्या य उग--(नि' केग-य अफज्या केग) नि+अफज्या'-२ अ फज्या य =स्पष्टग: ईदगमेन उग त्रि+उग अफज्या-२ अफज्याय उग -(नि' केगन्य अफज्या कैग)- समयोजनेन उग त्रि'+ उग अफज्या-२ अफज्या य उग निकैग-य अफ्ज्या केग समशोधनेन उग त्रि'-त्रि केग+ उग अफज्या'-२ अफज्या य उग=-य अफज्या केग ममयोजनेन उग त्रि'-त्रिकेग+उग अफज्या =२ अ फज्या य उग-य अफज्या वेग नि' (उग-केग)+ उग अफज्या=य अफज्या (२ उग-केग) =त्रि'xमस्पग+उग अफज्या' =य अफज्या (उग+उग-केग) =य अफज्या (उग+मस्पग) निमस्पग+उग अफज्या प्रत अफज्या (उगे+मस्पंग) त्रि'xमग+उग अफज्या अफज्या (उग+मग) यस्वल्पान्तरादन मन्दस्पष्टगति =मध्यमगति स्वीकृताजस्तज्जन्या त्रुटिरत वर्तते । समाग- तस्य (य) अस्य चाप कार्य नवत्यशे योजित तदा वनारम्भकालिककेन्द्राशा भवेयुरिति । (१) एतावता सशोधकोत्तमूनमवतरति । विज्याकृति खचरमध्यभभुक्तिनिन्नी शोघ्रोच्चभुक्तिगुरिणतोऽन्त्यफलस्य वर्ग । योगस्तयो परफलज्यकया विभक्त शीघ्रोच्चभुक्तिसगवेगसमामहच्च ।। ६ ।। - % 3D (१) स्पष्टाधिकार. अव भौमादिग्रहो के वक्रारम्भकालिन केन्द्राश कहते है । हि मा-मङ्गल १६३ इतने शीघ्र केन्द्राश में बुध १४५ गोध्रवेन्द्राश मे बृहस्पति १२६, शुक्र १६५, शनि ११३ शीघ्रकेन्द्राग मे वक्री होते हैं। इन्ही शीघ्र केन्द्रागो को ३६० में घटाने से अवक्री (मार्गी) होते हैं ॥ ६ ॥ उपपत्ति वनारम्भकालिक शीघ्रकेन्द्राशानयन करते हैं ! वक्रारम्भकालिक केन्द्र होटि ज्या- मान%=य मानते है । परन्तु द्वितीय पद म नोचासन्न में ग्रहो का वक्रारम्भ होता है इसलिये पर्णवर्गनि+अफग्या-२ अ फग्या य, फलाशखानान्तरशिञ्जिनीनी इत्यादि म फकोज्याकेग स्पष्टगति। शीक यहा वेग-शोधकेन्द्रग द्वार केन्द्रकोटि मौयान्त्य फलज्या गुणया क्रमात् । मृगक्र्यादिवे उगः-शीघ्रोच्चगति शीकशीका वेन्द्र युतोना विज्यकाकृति । शीघ्रमणहता लब फने कोटिज्यका भवेत् । इस सशोधकोक्त टिप्पणी से वि- '-फलकोज्या स्पष्टगति स्वरूप में यअफज्या पण =उग- 5. HD. उत्थापन देने स उग- ( निय अफज्या) वेग -स्पग कर (वि'- य अ फ्ज्या) केग ( मिग-य नपज्या वेग निपज्या-२ अ पन्या य त्रि+अफज्या --२अपज्याय परन्तु वक्रारम्भ म स्पष्टगति- उगमि+उग प्र फज्या-~२ अफज्या य उग -(त्रि के ग-य अफज्या वेग) नि+प्रपन्या-२ अ फग्या य 30--पग छेदगम मे उग त्रि+उग अपज्या-२ अफज्या य X उग-(त्रि वेग-य अफ्ग्या वेग) ममयोजन से उग त्रि+उग अ फग्या-२ प्रफण्या य उग-बिवेग-पपया वेगममयोधन से उग त्रि-त्रिकेग+उप्र ज्या =२ प्रफच्या य उग~य अफग्या वेग =त्रि' (उग-वेग)+उग अ फग्या' =यxx फग्या (२ उग-वेग)= य अपग्या (उग+उगवेग)= त्रि' मपम - उग प्रपज्या=य प फज्या (उग+ मस्पग) त्रि'माग+गप्रया' नि'मा+उगम पग्या' मज्या (जग+मसग) मपन्या (उग-+मग मन्दस्पग- मध्यमग स्वान्तर रो, मानोर (य) पर वे चार वे नवरयश जोडने मे यारम्न पालिब शीघ्रोन्द्राग होता है । (१) इसमे समोधयोत मूत्र उापन होता है--विग्यावृति' रित्यादि । % 3D +- ४०० वटेश्वर-सिद्धान्ते इदानी भौसादौना व:दिनान्याह । पञ्चतंवः कुदखा बाहुशिवा द्वीपतो द्विगुरगचन्द्राः। वक्रादिनान्युओंजान्निरशदिनशोधितन्युजूनि स्युः ॥१०॥ मि. मा-६५, २१, ११२, ५१, १३२ एतानि मसो भौमादीना ग्रहाणा वादिनानि भवन्ति तानि व निरशदिनशोधितानि (वक्रमार्गदिनसमूहे रहितानि) तदा मार्गदिनानि भवन्तीति ॥ १० ॥ प्रव भौमादि ग्रहो के वकदिन कहते हैं। हि भा.-६५, २१, ११२, ५२, १३२ इतने कम से भौमादि ग्रहो के वदिन होते हैं । उनको निरस दिनों ( वक्र मौर मागदिनममूह के योग ) मे घटाने से मार्गदिन होते हैं ॥१०॥ इदानी भीमादीना निरशदिनाग्याह । खातगा रसरुद्रा नवनरागा पयोधिधोपवना । वसुशंलगुसा क्रमशो भौमादीना निरशनिशाः ॥११॥ विभा–७८०, ११६, ६६६, ५५४, ३१८६नि भौमादिग्रहाणा क्रमशो निरशदिनानि भवन्ति ।।१२।। मन भोमादिग्रहों के निरशदिन कहते हैं । हि भा-७८०, ११६, ६९६, ५५४, ३७८ इतने इतने क्रम से भौमादि ग्रहो के निरसा दिन हैं ॥ ११॥ इदानी भीमादीनामुदयास्तकेन्द्रासानाह । घोयमलेस्त्रिखपःविश्वस्त्रिमतोन्दुभिनंगशशाङ्कः॥ दृश्याः प्रागपराया च्युताश्च भांशाददृश्याः स्युः ।।१२।। विपरीनदिश्पेवं हि जसितो ताजिनजंगुर्भाग. । एप्यातीतकलाभ्यः स्वकेन्द्रभुक्त्या दिनानि स्युः ॥१३॥ वि.मा-धीयमले (२५ एमि) निखपक्ष (२०३) विश्व (१३) त्रिमती- न्दुमि (१५३) नगशशाक (१७) शीघ्रकेद्राश मादयो ग्रहा प्राग्दिशि (पूर्वस्या दिशि) दृश्या भवन्ति, एते भाशात् (३६० चनाशात्) च्युता (शुद्धा ) तदा ते केन्द्राशेरपराया (पश्चिमाया दिशि) अदृश्या (अस्तप्रया) भवन्तीति, एव ज्ञसितो (बुधशुत्रो) ताने (४६) जिन (२४) भाग (अशे.) विपरीतदिशि (पश्चिमाया दिशि) उदय गच्छत । एप्यातीतकलाभ्य स्ववेन्द्रभक्त्या च दिनानि स्युरिति ।। १२ १३ ॥
स्पष्टाधिकारः ४०१ - अत्रोपपत्ति अथ कुजगुरशनीना रविरेव शीघ्रोच्चम् । शीघ्रोच्चस्थाने स्थिताना तेपा ग्रहाणा परमास्त । पश्चाद्रविरधिकगतिवादग्रे गच्छति, ग्रहास्तु तत पश्चास्थि- तास्तन या रविणा सह कालाशतुल्यमन्तर भवेतदा रवेरासनत्ववशेन राज्यन्ते पूर्वदिशि तेपा ग्रहाणा समुदयो दृश्यते तन कालाशतुल्ये स्पष्टकेन्द्राशे या फलज्या तचापयुत कालाशमान तदुदयशीघ्रकेन्द्राशा भवन्तीति ।। यथा शीघ्रान्त्यफलज्या अफज्या । कक्षावृत्ते स्पष्टग्रह =सन, रवे शीघ्रो- चत्वात्स्फुटकेन्द्राशा = कालाशा , ततोऽनुपातो यदि निज्यया कालाशतुल्यस्य स्पष्ट- केन्द्रस्य ज्या लभ्यते तदा शीघ्रान्त्यफलज्यया कि समागच्छति शोघ्रफलज्या तत्स्व- पालाशज्या अफज्या रूपम् त्रि अस्याश्चाप कालागे युत तदोदयकेन्द्रागा भवेयु कालाश+चाप-उदयशीघ्रकेन्द्राशा । अन स्वस्वपटितकालाशाना ज्याभिरन्त्य फलज्याभिश्च गणितेनोदयशीघ्रवेन्द्राशा पागच्छन्ति शन्यतिरिक्तयो मगुर्यो केन्द्राशमाने भास्करादिपठिततदुदयशीघ्रकेन्द्रमानाभ्या भिन्ने भवत इति बुध- शुक्योर्मध्यग्वे समत्वात्तमेव मन्दस्पष्ट मत्वा स्वस्वस्पप्टेन बुधेन शुरए च पालाशतुल्येऽन्तरे पश्चिमाया समुदयो दृश्यते बुधशुक्रयो क्षितिजोपरिस्थित स्वात् । तदा कालाशज्यामि --चापज्या, अस्याश्याप कालाशे युत तदा तयो पश्चिमो- अफज्या दयशीघ्रके द्राशा भवन्ति प्रथमपदे । द्वितीये पदे वक्रीभूय रवितोपगतित्वात्पश्चि- मायामेवास्त गच्छत । तृतीये पदे तयो पुनरुदयो भवति, तयो पुनर्नीचस्थाने पर- मास्तत्वेन पूर्वदिशि रारिशेपे म चोदयो दृश्यो भवति चतुर्थे पदे च तयो काला- शान्तरे स्थितत्वात्त वास्तो भवेत् । तेन पूर्वोदयकेन्द्राशमानम् =चा+१८०- कालाश, प्रथमपदे बुधशुक्यो पश्चिमाय मुदयश्चतुर्थे पदे च पूर्वाभ्यामस्त । तृतीयपदे पूर्वस्यामुदयो द्वितीये पदे पश्चिमायामस्त स्यादत पश्चिमायामुदय केन्द्राशोनभार्धाशा पूर्वस्या, पूर्वस्यामुदयकेन्द्राशोनमार्धाशा पश्चिमायामस्त- केन्द्राशा भवन्ति । श्रीपतिमास्कगद्याचार्यकथितवुधपश्चिमोदयकेन्द्राशमान- (५०) त एतदाचार्यकथित तन्मानमेवाल्पम् । बुधशुन्यो पूर्वोदयकेन्द्रामा अपि तदुक्तोदयकेन्द्राशेभ्यो भिना सन्तीति । अथ ग्रहस्य वक्रोदयास्तादि पठितशीघ्रकेन्द्रागाभीष्टशीघ्रकेन्द्राशयोरन्तर कार्य ततोऽनुपातो यदि केन्द्रगत्रक दिन लभ्यते तदोपर्युक्तशीघ्रकेन्द्राशान्तरण विमित्यनुपातेन समागतदिनवोदयास्तादीना गतत्व वा भविष्यतोति ॥१२-१३॥ भव भौमादिग्रहो के उदयास्त के द्वारा बढे हैं । हिमा-२५, २०३, १३, १५३, १७ इनने दीघ्र के द्वार पर क्रमश भोमादिग्रह ४०२ वटेश्वर-सिद्धान्ते पूर्व दिशा मे उदय होने हैं । भारा (३६७) मे उन केन्द्रागो को घटावर जो दोष रहते हैं उतने केन्द्राश करके पश्चिम दिशा में अस्त होते हैं इस तरह बुर और शुक्र ४६, २४ केन्द्रास करके क्रमग पश्चिम दिशा में उदित होते हैं । एष्य और गतक्ला मे तथा अपनी शीघ्र केन्द्रगति से वोदयादि दिन होते हैं ॥१२-१३।। उपपत्ति मङ्गल, गुरु, और गनैश्चर इनके शीघ्रोच्च रवि है। गीघ्रोच्च स्थान में इन मब का परमास्त होता है, पीछे रवि शीघ्रगति होने के कारण आगे चले जाने हैं और वे ग्रह पीछे प्रवलम्बित रहते हैं वहा रवि से जव कालागान्तर पर ग्रह होते हैं तब रवि से समीपता के कारण राथ्यल मे पूर्व दिशा म उन ग्रहो के उदय देखने है । इसलिये कालाश तुल्य सष्ट केन्द्रामा मे जो फ्लज्या होगी उसके चाप को कालाग मे जोडने से उन ग्रहो के उदय शीघ्र केन्द्रादा होते हैं । जैसे गोध्रान्त्य फलज्या = अ फग्या, कक्षावृत्त में स्पष्टग्रह स्पन, स्फुटकेन्द्रास = कलाश तब अनुपात करते हैं, यदि त्रिज्या में कालाश तुल्य स्पष्ट पेन्द्राग की ज्या पाने हैं तो अन्त्य फलज्या मे क्या इस अनुपात मे फ्लज्या पाती है कालाशज्या ग्रंपज्या -फ्नज्या । - बुध और इसके चाप को क्लाम म जोड देने मे उन ग्रहो के उदय केन्द्रारा होंगे। चाप+ पालाश = उदयची के यहा अपन अपने पठित कालाश की ज्या से और अन्त्यफ्लज्या से गणित करने से उदय केन्द्रारा माते है । मङ्गल और गुरु के केन्द्रमान श्रीपनि भास्कराचार्य प्रभृति प्राचार्य वथित उदयकेन्द्राय मान से भिन्न हैं। बुध और शुक्र मध्यम रवि के बराबर है इसलिये उनको भन्द स्पष्ट मानकर अपने अपने स्पष्ट बुध और शुक्र के माष कालाश तुत्य अन्तर पर पश्चिम दिशा में उदय देखते हैं, क्योकि क्षितिज से ऊपर है । तब वालाशज्यात्रि =चापज्या, इसके चाप को अफ्ज्या बालाश में जोड देने से उन दोनों (बुध और शुक्र) के पश्चिमोदय शीघ्र केन्द्राग होते हैं प्रयम पद मे । द्वितीय पद में की होकर रवि के अल्पगतित्व के कारण वहीं पर भस्त हो जाते हैं । तृतीय पद मे फिर उदय होते हैं, नीच स्थान में दोनो के परमास्त होने के कारण वह उदय पूर्व दिशा में रात्रिरोप में देखा जाता है। चतुर्य पद में रवि से कालागान्तर पर दोनो के रहने के कारण मस्त होते है। इमलिये पूर्वोदय केन्दाश: -चाप+१८०-वाला। प्रथम पद मे बुध और शुक्र पश्चिम दिशा में उदित होते हैं और चतुर्थ पद में पूर्व दिया मे मस्त होने है । तृतीय पद में पूर्व दिशा मे उदय होते हैं और द्वितीय पद में पश्चिम दिशा में प्रस्त होते हैं । इमलिये पश्चिमोदय केन्द्रासोन भाग पूर्व दिशा में अस्त केन्द्राग होते हैं पोर पूर्वोदय केन्द्रागोन भाग पश्चिम दिशा मे ग्रस्त केन्द्राम होते है । श्रीपति भास्तरादि प्राचार्य यिन वुध पश्चिमोदय केन्द्राम (५०) मान गे बटेश्वरा- चाय पथिन वेन्द्रास मान एवं अन्य है, वुध मोर शुक वे पूर्वोदय केन्द्राग मान भी उन पाचार्यों के कथित केन्द्राग मान मे भिन्न है ।
स्पष्टाधिकार. ४०३ ग्रहो के वक्रोदयादि पटिन केन्द्राश और इष्ट केन्द्राश के अन्तर करके मनुपान करते हैं यदि केन्द्रगति में एक दिन पाते हैं तो केन्द्रायान्तर में क्या इस अनुपात मे जो दिन पाने है उतने दिन करके वक्रोदयादि गत या भविष्य होगे ।। १२-१३ ॥ इदानी बुधशुकयो पूर्वपश्चिमदिशोरदयास्तदिनान्याह । नखेन्दवोऽपिः खगुणा द्विजिह्वा अहस्कराण्यर्कदिनानि पश्चात् । प्राच्यां च चन्द्रात्मजदैत्यगुर्दिन्ताः शरव्योम्निचराः प्रदिष्टा ॥१४॥ स्पष्टार्थ ॥१४॥ अवोपपत्ति । पूर्वकथितनियमेनैव स्पष्टेति ॥ इति वटेश्वरसिद्धान्ते स्पष्टाधिकारे ज्याभिविना स्पष्टीकरण विधि- श्चतुर्योध्यायः समाप्त ॥ अर्थ स्पष्ट है ॥१४॥ उपपत्ति पूर्वकथित नियम से स्पष्ट है ।। १४ ॥ रति वटेश्वर मिद्धान्त में स्पष्टाधिकार में ज्या वे विना स्पष्टोवरणविधि नामर चौथा अध्याय ममाप्त हुमा ।
पञ्चमोऽध्यायः अथ फलज्यास्फुटीकरणविधिमाह । भुजकोटिफलश्रवणयं सदा स्फुटता विहिता हि मया विविधाः । कथयाम्यधुनातिविवेकफलस्फुटता भुजयाहमवाप्तवरः ॥१।। वि भा–भुजकोटिफ्लधवर्ण (भुजफलकोटिफलकणे) घुसदा (ग्रहाणा) विविधास्फुटता (अनेकप्रकारका स्पप्टता ) मया पूर्व विहिता (कथिता) अधुना (इदानी) अवाप्तवरोऽह (प्राप्तप्रसादोऽहम) भुजया (भजज्यया) अतिविवेकफल- स्फुटता (अत्यन्त विचारपूर्वक्फलस्पष्टीकरण) कथयामोति ॥१॥ हि भा--भुजफ्ल कोटिपल और वर्गों के द्वारा ग्रहो की स्पष्टीकरण अनेक प्रकार से हमने वहा है अब ग्रप्रसाद से मैं भुजज्या से प्रतिविचारपूर्वक फ्लस्पष्टीकरण को कहता हूँ॥१॥ इदानी मन्दभुजफलशीप्रभुजफलयोरानयनमाह । निजवृत्तगुणा क्रमकेन्द्रगुरणा भगवाशहता फलचापकला. । धुचरफलान्यनुपातफल मृदुज चलज त्वसकृद द्युचरे ॥२॥ विमा-क्रमके द्रगुणा (केन्द्रज्या ) निजवृत्तगुणा (स्वपरिधिगुणिता) भगरणाशहता (भाशभक्ता ) फन वापकला धुचरफनानि (ग्रहफलानि) भवन्ति । अनुपातपल मृदुज (मन्दभुजफ्लचापम दफल) चलज (शीघ्रपल) धुचरे (ग्रहे) असकृत् (वार वार) सस्मार्यमित्यर्थ । भोपपत्ति 1 यदि त्रिज्यया मन्दकेन्द्रज्या लभ्यते तदा मन्दान्त्य फलज्यया किमित्यनुपातेन मकेज्या४मअफग्या समागच्चति मन्दभुजफलम् = नि अस्य चाप मन्दमल भवतीति प्राचीन कथ्यते, यद्यपि तच्चार मन्दफल न भवतीति पूर्वमेव मया तत्कारण प्रव- शितम् । सर्वं प्राचीनरेवमेव क्य्यते । एव शीघ्रभुजफलानयनेऽपि- शीकेज्या गीघ्रान्त्यफज्या = शीघ्रभुजपलम् । एतच्चाप शीघ्रफलम्। अन्य राचार्य वि स्पधाधिकार ४०५ शोधालसम्बन्धे एव न कथ्यते। मध्यमग्रहात्स्पष्टग्रहज्ञानार्थमेतयोरसकृत्सस्करण भवतीति ग्रहानयनावलोक्ने नैव स्फुटमिति त्रिज्यान्त्यपलज्ययोर्य सम्बन्ध स एव भाशपरिध्योरपि तनाऽन्त्यफलज्ययात्रिज्ययो स्थाने परिधिभाशयोहणेनाऽऽचा- ोक्तमुपपद्यते इति ॥२॥ हिमा--के द्रज्या को अपनी परिधि से गुणवर भाश से भाग लेने से जो फल हो उसको चापकला ग्रहो के फल होते हैं । अनुपात जनित मदफ्स और फ्ल बार सस्कार करना चाहिए ॥२॥ ग्रह में बार उपपत्ति यदि रिज्या मे मधले द्रज्या पाते हैं तो मन्दान्त्यफलज्या में क्या इस अनुपात से मकेज्या मसफज्या मन्दभुजफल माता है = मभुजफल । इसके चाप मदफल होता है। यह त्रि प्राचीनाचाय कहते है । यहा मनफज्या_मपरिधि मकेज्याxमपरि 'ममुजफल एव त्रि भाश भाश शी ज्याशीफज्या वेज्याशीपरिधि शीघ्रभुजफल । त्रि भाश इसके चाप करने से शीघ्रफल होता है । शीघ्रफल के विषय में और प्राचाय तरह नही कहते हैं । तात्कालिक मदभुजफल के चाप मदफन नहीं होते हैं यह हम पहने दिखला चुके हैं, इसलिये यह वात वही से समझनी चाहिये ॥२॥ इदानी ग्रहस्फुटीचरणमाह । मन्दोद्भव मध्यखो समस्त सुसस्कृत स्पट वगो हि मन्द । ततस्तदूनात स्वचलाचलोय तस्मिन् समस्त (वसकृत् स्फुट स्यात् ॥३॥ मध्यमश्चलदलाघसस्कृतो मन्दजेन दलितेन चैव हि। मन्दज सकलमेव मध्यमे शीघ्रज च निसिल परिस्फुट ॥४॥ वि.भा -मन्दोद्भव (मन्दकर्मोद्भव पल मन्दफल ) समस्त (सम्पूर्ण) मध्य- खगे (मध्यमग्रहे) सुसस्कृत तदा मन्द स्पष्टवग (मन्दस्पष्टग्रह ) भवेत् । ततो- ऽनन्तर तदूनात्स्वचलात, (मन्दस्पष्टग्रह रहिता छोघ्रोच्चात) चलोत्य फल (शीघ्र- फन ) साध्य तत्समस्त (सम्पूण) तस्मिन् मन्दस्पष्टग्रहे सस्कृन तदा स्फुट स्यात् तस्मात्स्फुटान्मन्दोच विशोध्य मन्दफलमानीय तेन सस्कृतो गणितागतमध्यमग्रही मन्दस्फुट स्यात् । तद्रहिताच्छीघ्रोच्चा पुन शीघ्रफल साध्य तेन सस्कृतो मन्दस्प- टग्रह स्यादेवमसकृद् यावदविशेष । चलाधंसस्कृत (शीघ्रफलार्धमस्कृनोऽर्याच्छोम्रोच्चामध्यम ग्रह विमोध्य शोधकेन्द्र कृत्वा तत शोघ्रफलमानीय तदर्घसस्कृत ) मध्यमग्रह प्रयमसंस्कारयुक्त ४०६ वटेश्वर-सिद्धान्ते मध्यमग्रह स्यात् । ततो मन्दोचरहितान्प्रथमसस्कारयुक्तमध्यमग्रहान्मन्दफल साध्य तदर्घसस्कृत प्रथमसस्कारयुक्तमध्यमग्रहो द्वितीयसस्कारयुक्तमध्यमग्रह. स्यात् । पुनर्मन्दोच्चरहिताद् द्वितीयसस्कारयुक्तमध्यमग्रहान्मन्दवेन्द्र कृत्वा ततो मन्दफलमानीय मध्यमग्रहे मस्कर्तव्य तदा मन्दस्पष्टग्रहो भवेत् । एतन्मन्दस्पष्ट- ग्रह शीघ्रोच्चाद्विशोध्य शीघ्रकेन्द्र कृत्वा तत शीघ्रफलमानीय तेन सस्कृनो मन्द- स्पष्टग्रह स्पष्टग्रह स्यादिति ॥ सूर्य सिद्धान्तेऽप्येवमेव सस्कारविधिर्यथा तदुक्त वाक्यम् । मध्येशीघ्रप लस्यार्धमान्दमर्धफल तथा। मध्यग्रहे मन्दफल सकल शंघ्रय मेव च ॥ भास्करेगापि' 'दलीकृताभ्या प्रथम फनाभ्यामित्यादिना' तथैव कथ्यते ग्रहलाघवे गणेशदेवज्ञेन प्राड मध्यमे चलफलस्य दल विदध्यात्तस्माच्च मान्दमखिल विदधीत मध्ये । द्राक्क न्द्रकेऽपि च विलोममतश्च शीघ्र सर्वच तत्र विदधीत भवेत्स्फुटो. ऽसौ' इत्यनेनभिन्नरूपक सस्कारविधि प्रदर्शित इति ।।३-४|| नत्रोपपत्तिस्तु व्याख्यारूपवास्तीति ॥३-४।। अब ग्रहस्पष्टीकरण कहते हैं । हि भा --मध्यमग्रह मे सम्पूरण मन्दपल सस्कार करने से मन्द स्पष्टग्रह होते हैं। शीघ्रोच्च मे मन्दस्पष्टग्रह को घटाकर शीघ्र केन्द्र करके शोप्रफल स धन बरना । वह सम्पूर्ण शीघ्र फल मन्दम्पष्टग्रह म सस्कार करने से स्पष्टग्रह होते है । उस स्पष्टग्रह मे मन्दोच्च घटा कर मन्दपल साधन करना, उस पल को गरिएतागत मध्यमग्रह मे सस्कार करने से मन्दस्पद- ग्रह होते है, उमको शीघ्रोच्च में घटाकर शीघ्र पल साधन करना, मन्दस्पष्ट ग्रह मे उस शीघपल को सस्कार करने से स्पष्ट ग्रह होते है, इस तरह असकृत् (बार बार) करने से यास्तव स्पष्टग्रह होते हैं । शीघ्रोच्च मे मध्यममह को घटाकर शीघ्र केन्द्र बरसे शीप्रफल साधन करना, उसके प्राधे को मध्यमग्रह में मस्कार करन से प्रथम सस्कार युक्त मध्यमग्रह होते हैं । प्रथम मकार युक्त मध्यमग्रह म मन्दोच्च को घटाकर मन्दपल साधन करना, उसके प्राधे को प्रथम मस्कार युक्त मध्यमग्रह म सस्कार करने से जो होता है, उसको द्वितीय सस्कार युक्त मध्यमग्रह कहते है । इम द्वितीय मस्तार युक्त मध्यम ग्रह में मन्दोच्च घटाकर उन पर मे मन्दपल साधन करना, इसका मध्यमग्रह म मस्कार करने से मन्दस्पष्टग्रह होते हैं । शीघ्रोच्च में इम मन्दस्पष्टग्रह को पटावर गोत्रफल माधन करना इम नीघ्रफल को मन्दस्पष्ट ग्रह में सस्कार करने से स्पष्टग्रह होते हैं। मूर्यसिद्धान्त मे भी इसी तरह मस्कारविधि है । जैम- मध्ये गोधपलस्याध मान्दमर्थ पन तथा। मध्यप्रहे मन्दपल सरनमंघ्रमेघव च 11 भास्कराचार्य भी सिद्धानशिरोमणि म इमी तरह कहते है, जैसे उनके वचन है- 'दलीताम्मा प्रयम फ्लाभ्यामित्यादि' ग्रहलाघव मे गणेशदेवज्ञ 'प्राइमध्यमे चलपलस्य दल विदघ्यात्तस्माच्च मान्दमसिनं विदधीत मध्ये ।
सष्टाधिकार
४०१
द्राक्केन्द्रकेऽपि च विलोममतश्च शीत्र सर्व च तत्र विदधीत भवेत्स्फुटोऽसी ।।"
इसमें भिन्न तरह सस्कारविधि यही है ।। ३-४ ॥
यहा उपपत्ति व्याख्यारूप ही है ।।३-४।।
इदानी वोटि विना करनयनमाह ।
परमफलकेन्द्रजीवाघातात्फलजीवया हुतात्कर्णः ।
कोटि विनाऽथवा स्यात् विज्या दोःफलसमभ्यासान् ॥५॥
विभा~परमफलकेन्द्रजीवाघातात् (अन्त्यफलज्याकेन्द्रज्ययोर्वधात्)
फलजीवयाहतात (फलज्ययाभत्तात्) कोटि विना (स्पष्टकोटिं विना) कर्णो भवेत् ।
अथवा विज्या दो फलसमभ्यासात् (त्रिज्याभुज फलघातात्) फलज्यया भक्तात्
कों भवेदिति ॥५॥
अत्रोपपत्ति
यदि शीघ्रफलज्ययाऽन्त्यफलज्या लभ्यते तदा शीघ्रकेन्द्रज्यया कि समाग-
च्छति शीघ्रपर्णस्तत्स्वरूपम् शीन फज्या शीकेज्या -शीकर्ण । अधवा शीघ्र-
शीफज्या
पलज्यया त्रिज्या लभ्यते तदा शीघ्रभुजफलेन विमिति समागत गीतकणं
निमीमुफ्ल
शीपज्या
स्वोच्चनीचग्रहस्फुटीकरणविधी शीध्रफलानयनस्थ चित्र द्रष्टव्यम् ।।५
अब बिना स्पष्टकोटि के कानयन रहते है।
हि मा अन्त्यफलज्या केन्द्रज्या घात में फलज्या में भाग देने मे वर्ण होता है ।
अथवा विज्या और भुजपत के घात में फ्लज्या से भाग देने म वर्ग हाता है ।।५।।
-
उपपत्ति
.
यदि शीघ्रपतज्या में अन्त्यफनज्या पाते हैं तो शीघ्रवेन्द्रज्या म क्या इस अनुपात
मीघ्रकरणं आता है
शीघ्रान्त्यपज्या रसीवेज्या
गोकार्ग । अथवा शीघ्रपलज्या में यदि
गोफ्लज्या
त्रिज्या पाते है तो भीघ्रभुजफल मे क्या इस अनुपात मे गोप्रवणं पाता है
मिमीभफ
शोवर्ण । इसी तरह मन्दवर्णनयन भी होता है।
दीपज्या
-
स्वोच्चनीच प्रहरपुटीकरणविधि नामक अध्याय में शोधपतानयन के चित्र .
देखिये ॥१॥
४०८ वटेश्वर-सिद्धान्ते इदानी केन्द्रसम्बन्धे विशेषमाह । बाहुज्या समपणे परमफलेनान्वितं निभं केन्द्रम् । त्रिज्यातुल्यश्रवणे परमफलगुरणपण्डचापयुतम् ॥६॥ राशिज्या सगुरिणता निगुणकोटिगुणोऽय होनपदे । अन्यफलजीवयाप्ता परमफलज्या समेणें ॥७॥ त्रिज्यान्त्यफलज्यायुतितुल्ये कर्णे ग्रहस्य केन्द्र हि शून्यसमम् । तद्वियुति समे कर्णे केन्द्र परिपूर्णराशिषट्कगतम् ॥८॥ विभा --बाहुज्या समकर्णे (केन्द्रज्या तुल्यकर्णे) परमफ्लेनान्वित श्रिम (ग्रन्त्यफलयुतनवत्यशसमम) त्रिज्यातुल्यथवणे (निज्यातुल्यवर्णे) परमफलगुण- खण्ड वापयुतम् (अन्त्यफलार्धयुतनवत्यशसमम) केन्द्राशमानमित्यर्थ । अथ त्रिगुणा (त्रिज्या) राशिज्या सगुरिणता (निरादराज्यया गणिता) अन्त्यफलजीवयाप्ता (अन्य. फलज्याभक्ता) तदा हीनपदे (द्वितीयपदे तृतीयपदे च) परमफलज्या समे वर्णे (अन्त्यफलज्या तुल्यकएँ) कोटिगुण (केन्द्रवोटिज्या) भवेत्। निज्यान्त्यफलज्या युतितुल्यवर्णे ग्रहस्य केन्द्र शून्यसम भवेत् । तद्वियुति (विज्यान्त्यफलज्यान्तर) समे कर्णे केन्द्र परिपूरणराशिपट क भवेदिति ॥६.८॥ अनोत्पत्ति अथ द्वितीयपदे वर्णवर्ग =नि'+ अन्त्यपज्या'-रन फज्याxकेकोज्याक' यदि केन्द्रज्या=कर्ण तदा नि+अन्त्यफज्या-२ अफज्या केकोज्या = केज्या=त्रि'--केकोज्या समशोधनेन अफज्या--२ अफज्या केकोज्या= -केकोज्या समयोजनेन अफज्या'-२ अफज्या केकोज्या+केोज्या'- ० मूल. ग्रहणेन वेकोज्या-अफलज्या-० के कोज्या अफज्या वा केकोटि--अन्त्यफल वा ६०+अन्यफ्ल=केन्द्राश ॥ प्रत मिद्ध यद्यदा केन्द्रज्यातुल्य कर्णो भवेत्तदाs- न्यफलयुतनवत्यशसम केन्द्राशमान भवेदकिक्षामध्यगतियग्रेखा प्रतिवृत्त सम्पाते ग्रह एव केन्द्राशमान भवेदिति । यदि कर्ण =त्रि तदा विचार्यते पूर्पकर्णवर्गस्वरूपम् =नि+अन्त्यफज्या' --२ अफज्या. केवोज्याक' त्रि' समशोधनेन अन्यफज्या-२ अफज्या केकोग्यात्रि'--त्रि' पक्षयो समयोजनेन अफज्या=२ अ फज्य, केकोज्या, प्रज्या अफज्या =केकोज्या वा- २ फज्या केन्द्राश-१० २ २ केन्द्राशा अन्त्यफल Do+ एतेन सिद्ध यद्यदा त्रिज्यातु-यकों भवेत्तदाऽन्त्य फलार्धयुतनवत्यशसम केन्द्राशदान भवेदर्थादेतन्मिते केन्द्राशे त्रिज्यातुल्य वर्णो भवतीति । यदा वर्णोऽन्त्यफलज्या समस्तदा केन्द्राशमान किं भवेदिति विचार्यते । प्रथ पूर्ववर्णवर्गस्वरूपम मि+अन्त्यः-२ अफज्या केकोज्या-वण = '-अन्त्य- %D अन्त्यफल केन्द्रकोटि - स्पष्टाधिकार - DO फज्या समशोधनेन त्रि-२ अफज्या केकोज्या=०समयोजनेन नि'२ अफज्या निxनि _राशिज्या त्रिकोज्या एनेन सिद्ध यद्यदा- केकोज्या गत २ अफज्या २ अफज्या अन्त्यफलज्या ऽन्त्यफलज्या तुत्य कर्णो भवेत्तदैतावतो केन्द्रकोटिज्या भवेत्। यदा नि+अन्त्य फज्या=कर्ण तदा केन्द्राशमान किं भवतीति विचार्यते। पूर्वकर्णवर्गस्वरूपम् - नि'+अफज्या--२ अफज्या केकोज्या= कर्ण (त्रि+अफज्या)=त्रि+ अफज्या+२ त्रि अफज्या समशोधनेन-२ अ फज्या केकोज्या=२वि अफज्या --केकोज्या=नि वर्गकरणेन केकोज्या=नि' Vनिकेकोज्या केज्या-0 केन्द्राशा एतेन सिद्ध यद्यदा कर्ण =नि+अफज्या तदा तत्र उच्चस्थाने केन्द्राशा शून्यसमा भवन्ति । यदा त्रि-अ फज्याण तदा नोच- स्थाने पूर्वोक्तयुक्त्या केन्द्रामा = १८०-६ राशि । अत सिद्धम् ॥ ६-८ ।। हि भा -केन्द्रज्या तुल्य कर्ण मे अन्त्यफल युतनवत्यश के बरावर केन्द्राग हाते हैं । त्रिज्या तुल्य वर्ण मे अन्त्यफलयुत नवत्यश वरावर केन्द्राश होते हैं। राशिज्या (तीस अश की ज्या) त्रिज्या से गुणकर प्रत्यफलज्या से भाग देने में अन्त्यफलज्या तुल्य वर्ण में केन्द्राश होते हैं। निज्या और अन्त्यफलज्या के योग तुल्य करण मे वेन्द्राश के अभाव (शूय) होते है, निग्या और अन्त्यफलज्या के अन्तर तुल्य (अन्त्यफलज्या रहित त्रिज्या) कर्ण में केन्द्राश ६ राशि (१८०) के बराबर होते है ॥६८|| उपपत्ति मूल लने से द्वितीय पद मे कर्ण वर्ग=निअफज्या-२ प्र फज्या केकोज्याके', यदि कर्ण-केज्या तब त्रि+अफज्या-२ अफज्या केकोज्या-केन्द्रज्या-त्रि-के कोज्या समशोधन से अफज्या-२ अ फज्या केवोज्या:--कोज्या समान जोडने से अ फग्या'--२५ फज्या केकोज्या+केमोज्या=(कैको या-प्र फज्या) कोज्या-अफज्या%30 केकोज्याः अफज्या वा केकोटि-अन्त्यफल E0+अन्त्यफ केन्द्राश इसमे सिद्ध होता है इतने केन्द्राश मे केन्द्रज्या तुल्य करण होते हैं । यदि कण= वि तव केन्द्राक्ष मान क्या होगा इसके लिये विचार करते हैं। पहल के कणं वगः त्रि अफज्या-२ अफज्या केवोज्याक'-मि' समशोधन करने से अफज्या'-२ प्रज्या केकोज्या-त्रि-त्रि समयोजन से अफज्या -२ अफज्या वेवोज्या प्रफज्या अफज्या देकोज्या वा- वेन्द्रारा २मफज्या २ प्रत्यफल १०+ इससे सिद्ध होता है कि इतने केन्द्राश मे त्रिज्या तुल्य कण होते हैं । यदि २ वर्ण= अन्त्यफलज्या तव विचार करते हैं। पहले वर्ण वग==त्रि+प्रफ्या-~-२ म फज्या देवोज्या-क-प्रफज्या समशोधन करने से त्रि-२ अफग्या कोज्या= समान वि त्रि त्रि रागिज्या त्रि जोडने से त्रि'-२ प्रपज्या वेयोग्या... योग्या २अपज्या २पभज्या भपज्या प्रफल - कोटि के द्वारा २ ४१० वटेश्वर-सिद्धान्ते इससे सिद्ध होता है जब अन्त्यफ्लज्या तुल्य वर्ण होता है तब वोटिज्या इतनी होती है यदि वि+मपज्या=वणं तव केन्द्राा प्रमाण क्या होता है विचार करते हैं। पहले वे कर्ण वर्ग=नि+अपग्या-२ प्रपज्या योग्या'-- (त्रि+पपज्या) =नि' प्रपन्या+२वि प्रपच्या समगोधन करने में -२ अ फग्या कैकोज्या=२ त्रि अपज्या :-देवोज्यानि वा योग्या त्रि' . केज्या =वा केन्द्र= ० इमने सिद्ध होता है जब वर्ण-वि+अपज्या तब वेन्द्रारा शून्य होता है। जब त्रि-अपग्या=र्ण तव पूर्व युक्ति मे वेन्द्राशमान = १८० = ६ राशि होत हैं । प्रत मिद्ध हो गये ।।६-८॥ इदानी गनिम्मष्टीकरणमाह । मृदुवृत्तकेन्द्रभुक्तयोर्वपाद् भभागाप्तहीनयुग्भुक्ति । तच्छीघ्रभुक्तिविवरगिज्याघातात्स्वशीघ्रसजेन ॥ कर्ण माप्तफलोना चलभुक्ति स्पष्टभुक्ति. स्यात् । फक्र स्पष्टगतावपि वक्रारम्भ गतिः शून्यम् ॥१०॥ वि भा-मृदुवृतकेन्द्रयुक्तयोर्वर्वात् ( मन्दपरिधिकेन्द्रगत्योर्धानात् ) भभागाप्त होनयुग्मुक्ति (भागविभक्तफ्लेन रहितसहितमध्यमगति ) मन्दस्पष्टा गांत स्यात् । तच्छीघ्रमुक्तिविवरत्रिज्याघातात् (मन्दम्पप्टगतिरहितशीघ्रोच्चगति त्रिज्यावधात्) स्वगीप्रसज्ञेन कर्णेन (शीघ्रकर्णेन) प्राप्तफलोनाचलभुक्ति (शीघ्र- कर्णभक्तफलेन रहितगीघ्रोचगति ) स्पष्टभुक्ति (ग्रहस्पष्टगति ) स्यात् । वक्र स्पष्टगतो सत्यापि वक्रारम्भे ग्रहस्पष्टगति शून्य भवेदिति ॥६-१०॥ अत्रोपपत्ति यदि त्रिज्यया मन्दकेन्द्रज्या लभ्यते तदा मन्दान्त्यफलज्यया कि समागच्छति मकेज्या ४म अफज्या मकैज्याxमपरिधि मधफज्या मन्दभुजफलम् त्रि भाश नि मपरिधि म केज्याXमपरि भुजकल भाश अनयोर्भुजफलयोरन्तरम् =म'भुजफल~मभुजफल=मफलज्या~मफलज्या =मन्दफ्लान्तर मन्दफलगति (स्वल्पान्तरात) म'केज्याxमपरि मकेज्याxमपरिधि, तदा मन्दफलगति भाश भास मपरिधि (म केज्या~ ~मकेश्या) मपरिधि मगति भाश =मन्दफलगति भास यत भारा ~ %3DC स्पकेज्या एवं स्पष्टाधिकारः अत्राचार्येण म'केज्या ~मकेज्या= 'के-के-मन्दकेन्द्रज्यान्तर = मन्द- केन्द्रगतिः स्वल्पान्तरात्स्वीकृतम् । तत: मगति+मफलगति=मन्दस्पगति । शी घ्रोच्चगति-मन्दस्पग-शोकेगति शीकेज्या.नि शोकज्या.त्रि -स्प'केज्या शीकरण शीक अनयोरन्तरम् शीकेज्या त्रिशीकेज्या त्रि. त्रि (शी 'केज्या~ शीकेज्या) शीक =स्प केज्या शोक शोक 'स्पकेज्या- विxशोकेग शीकरणं -स्प केज्या~स्पकेज्या= स्पकेगति, अत्राचार्येण स्व- ल्पान्तरात् शीघ्रकेन्द्रज्यान्तर-शीघ्रकेन्द्रगति । तथा स्पष्ट केन्द्रज्यान्तर--स्पष्टकेन्द्रा. न्तर=स्पष्टकेन्द्रगति स्वीकृतम् त्रि.शीकेग तदा शौक स्मकेग ततः शीउग-स्पकेग स्पष्टगतिः । यदा च विलोमशोधनं भवेत्तदा स्पष्टा गति.ऋणात्मिका भवेत्तदैव वक्रगति.. परं कदा स्पष्टा गति ऋणात्मिका भवति तत्कारण मयापूर्वमेव लिखितमिति तत एवा- वगन्तव्यमिति ॥ इदमानयन न समीचीनमित्युपपत्तिदर्शनेनैव स्फुटमिति ॥६-१०॥ हि.भा --मन्ट परिधि केन्द्रगति के घात में भाश से भाग देकर जो फल होता है उसको मध्यमगति मे रहित सहित करने से मन्दस्पष्टगति होती है । मन्दस्पष्टगति रहित शीघ्रोच्चगति को विज्या से गुणकर शीघ्रकरणं से भाग देने से जो फल होता है उसको शीघोच्चगति मे घटाने से ग्रह की स्पष्टगति होती है । वक्रारम्भ में गति शून्य होती है ॥ ६-१० ॥ उपपत्ति यदि त्रिज्या मे मन्द केन्द्रज्या पाते हैं तो मन्दान्त्य फलज्मा में क्या इस अनुपात से मवेज्यामप्रफज्या मन्दमुजफल होता है ममुजफ्ल-मफ्लज्या। म'के.ज्या.ममफज्या -म'मुफ=म'फग्या दोनों के अन्तर करने से म मुजफ~मं फ्ल-मद. फज्या-मफज्या-मन्दफलान्तर-मन्दफलगति स्वल्पान्तर से माज्या मम फग्या मवेज्या मंग्न फग्या म 'वैग्याxमपरि मजणाम परि भाग भादा म परिधि (म वैज्या~म ज्या)- म परिधि मन्दवेग मन्दफलगति भाश भाग D
४१२
वटेश्वर-सिद्धान्ते
पहा भी आवायं मवेज्या~म वे ज्या-म'-म=मन्दवेज्यान्तर-मन्दकेन्द्रा.
न्तर= मन्दकेन्द्रगति स्वल्पान्तर से मान लिये हैं।
म परिधि मन्दकैगति मन्दफलपति ।
तब
भाश
तव
=स्प केज्या
-
मध्यम+मन्दफलग-मन्दस्पष्टगति । शोउगम स्पग=शी गति
शीवेज्या नि
-स्प ज्या। एव
शो'केज्या त्रि
शीक
शीय
दोनो के अन्तर बरने से
शो 'केज्या त्रि शोकज्या त्रि मि
(सी केज्या~ गोज्या) =स्प ज्यास्पज्या
शीक
गीक शीक
त्रिशीकेग
'स्पटगति यहा भी शशी केज्या-शीकज्याशी केन्द्रशीके
शीक
=शीघ्रगति ।
तथा स्प'केज्या~स्पकेज्या-स्प'केन्द्र
- स्पष्ट के गति स्वल्पान्तर से माने है
शीउग-स्पष्टकेगति-स्पष्टगति
यदि शीघ्रोच्चगति में स्पप्टकेन्द्रगति नहीं घटेगी तब विलोम शोधन से स्पष्टगति
ऋणात्मक होती है यही वक्रगति कहलाती है। ऐसी स्थिति क्व होनी है इसका कारण हम
पहले लिख चुके हैं ये बातें वही से समझनी चाहिये। यह मानयन विलकुल ठीक नहीं है
यह उपपत्ति देखने ही से स्पष्ट है ।। ६१०॥
इदानीमुदयास्तदिनानयन वक्रानुवदिनानयन चाह ।
प्रस्तोदयकेन्द्रान्त. कलिका केन्द्रगतिभाजिता दिवसा ।
वक्रानुबक्रकेन्द्रान्तरलिप्तास्वैवं हि वक्राहा. ॥ ११ ॥
वि भा.--प्रस्तोदयकेन्द्रान्तरकला केन्द्रगतिभक्तास्तदाऽस्तोदयदिनानि
भवन्ति । एव वक्रानुवकेन्द्रान्तरकला वेन्द्रगतिभक्तास्तदा वादिनानि भवन्ति ।।१।।
अनोपपत्ति
यदि केन्द्रगत्येक दिन लभ्यते तदाऽस्तोदयकेन्द्रान्त कलाभि किमित्यनुपातेना-
ऽस्तोदयदिनानि भवन्ति । एवमेव केन्द्रगत्येक दिन लभ्यते तदा वक्रानुवकान्त
केन्द्रकलाभि. किमित्यनुपातेन वक्रा दिनान्यागच्छन्तीति । पूर्वपठितवदिनोप-
पत्तिरियमेवोह्य ति ।।११।।
भव उदयास्तदिन भोर वनानुवक दिनानयन करते हैं ।
हि भा–प्रस्तोदय केन्द्रान्त कला को पेन्द्रगति से भाग देने से प्रस्तोदय दिन होते
हैं। इसी तरह वक्रानुव वेन्द्रान्तर कला म भी वऋदिन होते हैं ॥ ११॥
स्पष्टाधिकार. ४१३ उपपत्ति यदि केन्द्रगति में एक दिन पाते हैं तो अस्तोदयवेन्द्रान्तर कला में क्या इस अनुपात से उदयास्त दिन पाते हैं। इसी तरह केन्द्रगति में एक दिन पाते हैं तो वजानुवक्र केन्द्रान्तर कला मे क्या इस अनुपात से वह दिन प्राते हैं। पहले ग्रहो के वझ दिन प्राचार्य ने पठिन किये हैं उसकी उपपत्ति यही समझनी चाहिये ॥११॥ इदानी निरशदिनानयनमाह । युगकेन्द्रभगरणभक्ता युगमूदिवसा निरंशदिवसाः स्युः॥११६ ।। वि. मा.-युगभूदिवसा (युगमायनवासरा) युगकेन्द्रमगणभक्तास्तदा निरशदिवसा स्यु ॥ ११ ॥ अनोपपत्ति । एफकेन्द्रभगणे यानि दिनानि तानि निररादिनानि । तज्ज्ञानार्थमनुपातो यदि युगकेन्द्र भगरणयुगसावनदिनानि लभ्यन्ते तदेकेन केन्द्रभगणेन किमित्यनु- पातेनैक केन्द्रभगणसम्बन्धीनि सावनदिना-यागच्छन्ति त एव निरशदिवसा पूर्व निरशदिवसा आचार्येण पठितास्तदुपपत्तिरियमेव योध्या इति ।। ११६ ।। इति वटेश्वरसिद्धान्ते स्पष्टाधिकारे फलज्यास्फुटीकरणविधिर्नामक पञ्चमोऽध्याय समाप्त । मय निरश दिनानयन करते हैं। हि भा--युगदिन म युग केन्द्रमाण से भाग देने पर निरस दिन होते हैं ।। ११६॥ उपपति एक्वेन्द्र भगए म जो दिन है वे ही निरस दिन बहलाते हैं। उनके ज्ञान के लिये अनुपात परते हैं यदि युग केन्द्र भगण म युगयुदिन पाते है तो एर केन्द्र भगण मे क्या इस भनुपात से एक केन्द्र भगण सम्बन्धी सावन दिन होते हैं वे निरस दिन बहलाते हैं। पहले निरम दिन के पाठ प्राचार्य ने किये हैं उसकी उपपत्ति यही सममनी पाहिो ॥ ११॥ इति वटेश्वरसिक्षान्त में स्पष्टाधिकार में पलन्यास्फुटीररणविधि नामर पञ्चम मन्याय समाप्त हुमा ।।
पष्ठोऽध्यायः निध्यानयनविधि तत्रादो तिथ्यानयनमा । मानून वियोर्भागा द्वादशभक्ताः फलं गतास्तिथयः । पष्टिने गतगम्ये गतिविवराशोधृते नाड्यः ।।१।। विमा-भानूनविधोगिा (सूबरहितचन्द्रस्याशा रविचन्द्रान्तरागाः) द्वादशभत्ता फल गतास्तिथयो भवन्ति । गतगम्य (भुक्तभोग्याराप्रमाणे पष्टिघ्ने (पष्टिगुरिणते) गतिविवराशोद्धृते (रविचन्द्रगत्यन्तराशभक्त) तदा नाड्य (गता. नाड्यो भोग्यनाड्यश्च) भवन्तीति ॥१॥ अनोपपत्ति । चक्राशा (३६०) त्रिंशता भक्तास्तदा द्वादश भवन्त्यतो रविचन्द्रयोरन्तराशा प्रतितिथी द्वादशाशा भवन्त्यतोऽनुपातो यदि द्वादभिरदारविचन्द्रान्तरागरेका तिथि- लभ्यते तदेष्टरविचन्द्रान्तराशे किमित्यनुपातेन गतास्तिथयस्तत्स्वरूपम् १४ (च-र) , १२-गताश-भोग्याश ततोऽनुपातो यदि रविचन्द्रगत्यन्त- १२ १२ राशै पष्टिघटिका लभ्यन्ते तदा गताशेर्नोग्याशश्व किमित्यनुपातेन गतनाड्यो भोग्य- नाड्यश्च भवन्तीति ॥१॥ अब तिथ्यानयनविधि अध्याय प्रारम्भ करते हैं । उसमे पहले तिय्यानयन करते हैं। हि भा–रवि और चन्द्र के अन्तराश को बारह से भाग देने से फलगततिथि होती है । तिषिभुक्ताश और भोग्याश को साठ से गुणकर रवि और चन्द्र के गत्यन्त राय से भाग देने से गततिथि घटी पौर गम्यतिथि घटी होती है ॥शा उपपत्ति चाग (३६०) को तीस मे भाग देने से बारह होता है अर्थात् प्रतितिथि में रवि और चन्द्र के अन्तर बारह प्रश होते हैं । इस पर मे मनुपात करते हैं यदि बारह मास रवि चन्द्रान्तराा मे एक तिथि पाते हैं तो इष्ट रविचन्द्रातरारा मे क्या इस अनुपात से गतिथि स्पष्टाधिकार ४१५ प्रमाण प्राता है १(चन्द्र-रवि) गततिथि, १२-~गततिथ्यश- भोग्यतिथ्यश, अब अनु- १२ पात से एतत्सम्बन्धी दण्ड लाते है यदि रवि और चन्द्र के गत्यन्तराश में साठ दण्ड पाते हैं तो गततिथ्यरा और भोग्याश में क्या इस अनुपात से गत घटी, और गम्य घटी आ जायेगी ॥१॥ इदानी नक्षत्रानयनार्धमाह। त्रिगुणा ग्रहस्य भागाः खाब्धिहता भानि येययाते च । नखनिहते स्वगतिहृते दिनादिभुक्तक्ष भोग्यः स्यात् ॥२॥ विभा-ग्रहस्य भागा (इष्टग्रहस्याशा ) त्रिगुणा, खाब्धिहृता (४० एभिभक्ता ) फल भानि (गतनक्षत्राणि) स्यु । शिष्ट वर्नमाननक्षतस्य गतशेप भवति । तत् ४० अस्माद् विशोध्य शिष्ट भोग्य भवेत् ते येययाते (भोग्यभुक्त) नखनिहते (विंशत्या गुणिते) स्वगतिहते (स्वस्पष्टगत्या भक्त) दिनादिभुक्तक्षभोग्य स्यात् (वर्तमाननक्षत्रस्य तेन ग्रहेण गतगम्यानि दिनानि भवन्तीति ।। अनोपपत्ति स्पष्टग्रहस्य मेपादिभिर्भुक्तराशिनंक्षनाणि भवन्ति, सपादद्विनक्षत्ररर्थान्नय- भिनक्षत्रचरण पादय प्रत्येक राशयो भवन्ति, एक राशिकला (१८००) नवभि- भक्तास्तदेवनक्षत्रपादकला भवन्ति चतुभिर्गुणनेन ८०० कला एक्नक्षने क्ला. स्यु । ततोऽनुपातो यद्यष्टशतकलाभिरेक नक्षत्र लभ्यते तदा ग्रहन लाभि कि समा- गच्छति गतनक्षत्राणि तत्स्वरूपम् = १४ ग्रहभागX६० _ ग्रहभाग ३ शे + शिष्ट यदा विंशत्या गुण्यते तदा वर्तमाननक्षत्रम्य गतखण्डस्य क्ला २० पिण्डात्मक भवति तत पूर्ववदिनादि मानमानयमिनि ॥२॥ प्रय नक्षयानयन के निय वाले हैं। दिमा --गह के अंश को तीन. मे. गुगावर चालीस में भाग देश में जो पाप समय होते हैं, शेष वर्तमान नत्र के गत शेप होता है। उसका पानी में घटाने में शेप भोग्य होता है । भोग्य और भुक्त को बीम से गुराकर प्रानी गति में भाग देने में फल बर्व- मान नक्षत्र के उस ग्रह मे भोग्य और मुक्त दिन होते हैं ।।३।। -गलनक्षन Suo ४० 1 " पनि स्पष्ट ग्रह के मेपादि नुस्तगति करक नपत्र होत है। मया दो मात्र प्रयाद नो पार (चरण) करके मपादि प्रत्येक गति होती है। 'क गति का १८०० को नौ गं भाग देने से एक नक्षत्र पाद को कता होती है उसे चार गुणने में ८०० एनसत्र मला होती है । तब अनुपात करने हैं, यदि ८०० मा म एक नक्षत्र पान में गो ग्रहाया में क्या वटेश्वर-सिद्धान्ते १Xग्रहभागX६० ८०० % 3D अनुपात से फन गत नक्षत्र प्रमाण आता है, प्रहभाग ३ ४० %3- शे तनक्षत्र+ शेप को चीस से गुणन से वतमान नक्षत्र के गत खण्ड का क्लापिण्ड हाता . ४० । उस पर पूवव दिनादिमान लाना चाहिए ॥२॥ इदानी स्थूलमानयनमभिधाय सूक्ष्मानयनमाह । स्थूलोऽय स्पष्टोऽसावध्यधं समाधभोगो य । त धम्यधुनाऽभिजित स्फुटभोगोऽह विशेषेण ॥३॥ ब्राह्मोतरा विशाखादित्यान्यध्यधभोगसज्ञानि । वारुणसार्यानिलयाम्येन्द्रान्यर्धभोगीनि ॥४॥ समभोगीन्यन्यानि समभोगो मध्यमा गति शशिन । स्वदलपुताऽध्यर्धाख्यो भागो दलिताहिखण्डमध्य ॥५॥ भगरगावक्राच्छुद्धा भोगोऽभिजितोऽथवेन्दुभगरणहता । माहा फल भहीन घटिकाद्यो भनशशिभगरणा ॥६॥ वियुक्ता पवहाद्गतिना भगाविमक्ता विधो कलादि । भगएकला शशिभुक्त्या भजिता शेषोऽथवा प्रोक्त ॥७॥ धुचरो भभोगहीनो गतयेया लिप्तिका स्वभुक्तिहृता । भवति दिवसादिभोगो द्युचराक्रान्तस्य धिष्ण्यस्य ॥६॥ विभा - अय (कथितप्रकार ) स्थूल ! य अध्यर्वसमाधभोगोऽसौ स्पष्ट । अधुनाह त (स्पष्ट) वच्मि (बवे) विशेषेणाभिजित स्फुटभोग इति । ब्राह्मोत्तरा विशाखादित्यानि (रोहिणीव्युत्तरविशाखापुनर्वसू इतिपट नक्षत्राणि), अध्यर्धभोग- सज्ञानि (अर्धाधिक नक्षत्राणि) भोग प्रत्येकमष्ट विलिप्तोना रसाष्टरुद्रा ११८५।५२ गतिकलाप्रणाममिति । वारुणसार्दािनिलयाम्येन्द्राणि (शतभिगश्लेपास्वाति- भरणिज्येष्ठाख्यानि पटनक्षत्राणि), अर्पभोगानि (च द्रमध्यमगतिकलार्धभोगानि) अन्यानि नक्षत्राणि समभोगीनि (चन्द्रमध्यमगतिकला ७६०॥३५ प्रमाणभोगानि) इत्येव स्पष्टीकरोत्यग्रे ।।३-४॥ शशिन (चन्द्रस्य) मध्यमा गति समभोगोऽर्थाच्चन्द्रमध्यमगति तुल्यानि भोगमानानि येपा तानि नक्षत्राणि समभोगसज्ञानि, स्वदलयुता मध्यमा गति (स्वर्धयुतचन्द्रमध्यमगतितुल्यानि भोगमानानि येपा तानि नक्षत्राणि) अध्याख्य , दलिना (चन्द्रगत्यधतुल्या) येपा भोगकला तानि खण्डमध्य (अर्ध- भोग), चक्रात् (मगरणक्लात) भगणा (सर्वशंभोगा ) मुद्धा (रहिता ) तदाऽभि- जितो भोग स्यात् । अयवेन्दुहृता (चन्द्रभगणभक्ता ) माहा (भूदिवसा) फल भहीन तदा पटिकाद्य स्यात् । कहान् (बुदिनस) भनशशिभगणा (सप्तविंशति गुरिणतचन्द्रभपणा) वियुक्ता (रहिता) गतिना (गतिगुणिता) विधो गण- स्पधाधिकार ४१७ विभक्ता चन्द्रभगएभक्ता) वा कलादिफल स्यात् । भगएक्ला शशिभुक्त्या (चन्द्र- गत्या) भजिता (भक्ता ) अयवा शेष स एव प्रोक्ता । धुचर (ग्रह) भभोगहीन गतयेयालिप्तिका (गतगम्यकला ) स्वभुक्तिहता (ग्रहगतिभक्ता.) तदा धुचरा. कान्तस्य (ग्रहवेष्टितस्य) धिष्ण्यस्य (नक्षत्रस्य) दिवसादिभोगो भवेत् । सर्वदंभोगसख्या =२१३४६ चमकलाभ्यो २१६०० विशोध्य शिष्टा २५४ ऽभिजितो भुक्तिकला प्रमाणम् । अथवा सप्तविंशतिगुणितचन्द्रभगरणा कुदि- नेभ्यो विशोध्याशेपे भगरणे कुदिनभक्त एकदिनभवा कलात्मिका गतिर्भवेत् । इप्ट- ग्रहस्य क्ला समृहा नक्षत्रभोगवला ८०० विशोध्यास्तदा ग्रहमुक्तानि नक्षनारिण भवन्ति, शेप भुक्त ८०० कलाभ्यो विशोध्य शेप गम्य ततो ग्रहगतिकलायामेक दिन लभ्यते तदा गतकलाया गम्यकलाया च विमित्यनुपातेन गतदिनानि गम्पदिनानि भवन्ति शेप स्पष्टम् ॥ ५.८ ॥ अनोपपत्ति पडध्यर्धभोगकलानामक्यम् X६६ चग चग पडर्धभोगकलानामंक्यम् = -४६-३ चग पञ्चदशकभोगकलानामक्यम् = १५ चग =१५ चग सर्वयोगकला =२७ चग चत्रकलाभ्य शुद्धा सर्वयोगकला जाता अभिजिद्भोगकलास्तद्दिनगति चाक-२७ चग इय कुदिनगुणा चक्रकलाभक्ता जाता अभिजितो भगरणा बुदिन-२७ चभगण । युगकुदिन युगचन्द्र भगरणयोग्रहणेन युगे, कल्पपु दिनकल्प चन्द्र भगणयोग्रहणेन कल्पेऽभिजितो भगरणा भवन्तीति ।। हि भा -यह कथित प्रकार स्यूल है । अध्यपं, सम, अयंभोग यह जो है सो स्पष्ट है, इसको अब कहता हू विशेष रूप से अभिजित वे स्फुटभोग को यहता हू । रोहिणी, तीनो उत्तरा, विशाखा, पुनवंमु ये छ नान अध्यर्ध भोगसनक हैं, शतभिषा, अश्लेषा, पा, स्वाति, भरणी, ज्येष्ठा ये छ नक्षत्र अर्धभोग सज्ञा है। अन्य नक्षत्र मव ममभोग सज्ञा है। चन्द्र की मध्यमगति के बराबर भोग वाले नभत्र राय समभोग समर है । चन्द्रगत्ययुत चन्द्रगति के परापर भोग वाले नक्षत्र मव अध्यचं मंज्ञक हैं। चन्द्रगस्य के वरावर भोग याते नक्षत्र अर्घभोग सझर हैं । चक्राला मे भगरण (मशंभोग) को घटाने स अभिजित वा भोग होता है, अथवा बुदिन को चन्द्रभगण से भाग देन से जो पर होता है उसम नक्षत्रहीन परने से परिवादि भोग होता है। मताइम गुगित चन्द्रभगरण यो बुदिन में घटाने स शेष मभिजित् पा पला मण्डल यदि युगदिन में सत्ताइम गुणित चन्द्रमगरण को घटाया जायगा सब मभिजित पा युग मण्डल होना है। इसमे एर महर्ग एका गुणपर बुदिन से भाग दने से भगरणादि पन होता है। यहा भगण और राशि नहीं है चार प्रश, १४ पला पाती है ४१८ वटेश्वर-सिद्धान्ते यही अभिजित् का गतिप्रमाण है । अथवा गतिगुरिणत पूर्व पल को चन्द्रभगण से भाग देने से कलादि फल होता है अथवा भगरएकला को चन्द्रगति से भाग देने से शेप वही फल होता है । ग्रह क्ला म नक्षत्रभोगक्ला ८०० को घटाने से जो गत या गम्यक्ला होती है उसको ग्रहगति से भाग देने से ग्रहाकान्त नक्षन के दिनादि भोग होते हैं । सर्वक्ष भोग सख्या= २१३४६ वो चक्रकला २१६०० में घटाने से शेष रहा २५४ यह अभिजित के गतिकला प्रमाण है । अथवा सत्ताईस गुणित चन्द्रभगण को दिन मे घटाना शेप भगण को कुदिन से भाग देन से एक दिन की कलात्मक गति होती है । इप्टमह कला मे नक्षत्र भोग कला ८०० घटाने से ग्रहमुक्त नक्षत्र होते हैं शेप मुक्त होता है, ८०० सौ कला म मुक्त को घटाने मे गम्य (भोग्य) होता है, तब ग्रहगतिकला में एक दिन पाते हैं तो गतकला और गम्य कला मे क्या इस अनुपात मे गतदिन और गम्यदिन आ जायेंगे । शेप स्पष्ट है ॥ ३-६ ।। उपपत्ति छ मध्यर्धभोगकलापो के योग ३ चंग २ X६=8 चग चग छ अर्घभोगकलापो के योग= X६-३ चग २ पन्द्रह एक भोगकलामो के योग= १५ चग=१५ चग सब योग क्ला -२७ चग इनको चन्द्रकला में घटाने से अभिजित की भोगकला= चक्रक-२७ चग इसको कुदिन से गुण कर चक्राला से भाग देने से अभिजित् के युग या पल्प मे भगण होते हैं कुदिन-२७ च म । युगबुदिन, युगचन्द्रभगण ग्रहण करने से युग मे अभिजित् भगण पायेगा । कल्पकुदिन, कल्पचन्द्र भगण लेने से क्ल म मभिजित भगण पावेंगे ॥३-८॥ इदानीमभिजितो भुक्तिमाह । वैश्वान्त्याघ्रावभिजिच्छ्र वरपघटो चतुष्टपे प्रयमे । तश्रेष्ठं भवति कृतं जातस्य मृत्युरचिरेण ॥६॥ विभा-वैश्वान्त्याघ्रो (उत्तरापाढचतुर्थ चरणे) प्रथमे श्रवणघटी चतुष्टये अर्थादुत्तरापाढस्य चतुर्थसाद श्रवणस्य च प्रथमाश्चतस्रो नाड्योऽभि- जितो भुक्ति स्यात् तन यदि जातकस्येष्ट कृत भवेदात्तत्र यदि कस्यापि जन्म भवेत्तदाऽचिरेण (स्वल्पालेन) मृत्युभवेदिति । अभिजिद्भुक्तिपरिज्ञाने वृद्धरप्येवमुक्नो यथा तद्वाक्यम् - पादश्चतुथं विल विश्वभस्य नाड्यश्चतस्र प्रथमाश्च विप्यो । उक्ताभिजिद्भुक्तिरितोयमस्या स्थितो ग्रहो विध्यति धातृताराम् ।। सिद्धान्तशेखरे श्रीपतिनेत्य कथ्यते 'सा वैश्ववप्राव भमध्यगधिष्ण्य भुक्ति" इति ।।६ ॥
स्पष्टाधिकार
४१६
.
अव अभिजित् की भुक्ति कहते हैं ।
हि भा-उत्तरापाढा के चौथे चरण और श्रवण नक्षत्र की प्रथम चार घटी अभि-
जित् की भुक्ति (गति) है । उसमे जन्म होने से जातक की मृत्यु बहुत शीघ्र होती है, अभि-
जित् की भुक्ति के विषय मे वृद्धो ने भी ऐसा ही कहा है । जैसे उनके वचन हैं-
'पादश्चतुर्थ किल विश्वभस्य नाड्यश्चतस्र प्रथमाश्च विष्णो ।' इत्यादि
सिद्धान्तशेखर में श्रीपति इस तरह कहते हैं “सा वैश्ववैष्णव भ मध्यग दिण्य
भुक्ति" ॥६॥
इमानीमन्य विशेषमाह ।
पड्भानि पोष्णसंज्ञाद्रौद्राद् द्वादश नवेन्द्रसज्ञाच्च ।
प्राग्मध्यान्त्यदलेपु व्रजन्ति योगं समं शशिना ॥१०॥
वि. भा-पोष्णसज्ञात् (रेवतीनक्षनात्) पड्भानि (पड्नक्षनाणि) रौद्रात्
(पात ) द्वादश नक्षत्राणि, इन्द्रसज्ञात् (ज्येष्ठा ) नक्षनारिण प्राग्मध्यान्त्य-
दलेपु (पूर्वार्धमध्यापरार्धेषु) शशिना सम (चन्द्र ण साक) योग (समागम) व्रजन्ति
(प्राप्नुवन्ति) इति ॥१०॥
अव अन्य विशेष कहते हैं।
हि भा-रेवती छ नक्षत्र, प्रार्दी से बारह नक्षन, और ज्येष्ठा से नौ नक्षत्र
पूर्वार्ष, मध्य पराध में चन्द्र के साथ मिलते हैं ॥१०॥
इदानी करणानयन चाह ।
वीनेन्द्र शा भक्ता रसः फनं व्येकमश्वहुतशेषम् ।
करणं गतागतकला गतिविवराशोधृताः कृष्णे ॥११॥
चतुर्दश्यन्ते शकुनिः कुह्वाश्चतुष्पदः प्रथमे ।
नागश्च परे भागे प्रतिपत्पूर्वे च किंस्तुघ्नम् ॥१२॥
विभा-वीनेन्द्र शा (रविचन्द्रान्तराशा ) रस (पड्भि) भक्ता फल व्येक
(रूपरहितम्) प्रश्वहृतशेप (सप्तभक्तावशिष्ट) करण स्यात्, गतागतकला गति -
विवराशोद्धृता (रविचन्द्रगत्यन्तराशभक्ता) तदा वर्तमानकररणस्य गनगम्यादि-
नाडिका सिद्धिरिति ॥११॥
अयोपपत्ति ।
यदा रविचन्द्रयोरन्तराशा द्वादशामसमास्तदैका तिथिर्भवति, करणस्य
तिथेरपभोगित्वात् पड्भिर शै रविचन्द्रान्तराजर्यद्य क करण लभ्यते तदेप्टर विचन्द्रा-
न्तगरी किमित्यनुपातेन गतकरणान्यागन्ति, लव्धेषु चंकमूनोकियते यत
प्रतिपदाद्ययंगतत्वात् विस्तुन्नास्यस्य स्थिरकरणस्य, क्वादोना च शुक्ल प्रतिपद
उत्तरार्धमारभ्य प्रवृत्ते. । गतगम्यादिघल्यानयन तिथिमतगम्यानयनवद् वोध्यम् ।
प्रन्यै श्रीपतिप्रभृतिभिरप्याचार्य रेवमेव करणानयन कृतमस्तोति ॥१॥
४२० वटेश्वर-सिद्धान्ते कृष्ण चतुर्दश्यन्ते (कृष्णाचतुर्दश्या उत्तरार्ध) शकुनि करणम्। कुह्वा (अमावास्याया) प्रथमेऽर्षे चतुष्पद वरणम् । अमावास्याया परभागे (अन्त्यार्ध) नाग करणम् । प्रतिपन्पूर्वे (प्रतिपद पूर्वार्ध) किंस्तुघ्न करण मुक्तमिति ।। १२ ।। स्थिरकरणावस्थानविपये ब्रह्मगुप्त नाप्येवमुच्यते, तथा च तद्वाक्यम्- कृष्णचतुर्दश्यन्ते शकुनि पर्वणि चतुष्पद प्रथमे । तिथ्यर्धेऽन्ते नाग किंस्तुप्रतिपदाद्यर्थे ।। इद स्वीकृत्य लल्लेनाप्येतदनुसारमेव क्च्यते यथा- शशिनि कृशशरीरे या चतुदश्यवश्य शकुनिरपरभागे जायते नाम तस्या । तदनु तिथिदले ये ते चतुष्पादनागे प्रतिपदि च यदाद्य तद्धि किस्तुनमाहु ॥ भास्कराचार्येण "शकुनितोऽसितभूतदलादित्यादिना" कृष्णचतुर्दश्यर्धात्तर यान्यवशिष्टानि त्रीणि प्रतिपत्पूर्वाधं च चतुर्थमिति चत्वारि शकुनिनोऽच्छिकुनि चतुष्पदनागकिस्तुघ्नानीति। सूर्यसिद्धान्ते 'ध्रुवाणि शकुनिर्नाग तृतीय तु चतुप्पदम् । किंस्तुघ्न तु चतुर्दश्या कृष्णायाश्चापरात " || एतेनामावास्या पूर्वापरार्धयोनगिचतुष्पदकरणे कथिते किन्तु तत्पूर्वापर- क्रमे भेदोऽस्त्यत सुधार्पिणीटीकाया प्राय सर्वेपा मते ब्राह्मक्रम एव समीचीन- स्तेन प्रथम शकुनि द्वितीय चतुप्पद तृतीय नागमित्यध्याहार्यम्" लिखितम् । श्रीपतिनापि ब्राह्मक्रम एव स्वीकृतोस्तीति ।। १२ ।। अव करणानयन मौर स्थिर करणो की स्थिति कहते हैं। हि मा. रवि और चद्र के अन्तराश को छ से भाग देकर जो फल हो उसमे एक घटाकर सात से भाग देने से जो शेष रहता है वह करण होता है । गत और गम्यक्ला को रविच द्रगत्य तराश से भाग देने से वत्त मान करण की गत गम्यनाडी होती है ।।१।। उपपत्ति जब रवि मौर चन्द्र के अराग बारह अस होते है तो एक तिथि होती है । तिथि के प्राधे को करण होने के कारण यदि छ अरा रविचद्रारा में एक मरण पाते हैं तो इष्ट रविच दान्त्रण मे या इम अनुपात से गत करण पाते हैं । यहा लगि से एक घटाते. हैं क्योकि विस्तुघ्न नामक स्थिरकरण प्रतिपद के पूर्वाघ म पडता है बवादि चर चरणो की प्रवृत्ति शुक्ल प्रतिपद के उत्तराध से होती है । इन कारणो से पूर्व सन्धि में एक घटाया जाता है । गत घटी और गम्य घटी के प्रानयन तिथि को गत घटी प्रादि के ग्रानयन की तरह सम झना चाहिये । थोपति मादि प्राचाय ने इसी तरह करणानयन किया है । ११ ।। कृष्णचतुदगी के उत्तराध म गकुनिकरण होता है। प्रमावस्या के पूर्वाध मे चतु पदकरण मोर पराप में नागकरण होता है। प्रतिपदा के पूर्वाघ म किंस्तुघ्नकरण होता है ।।१२ ॥
स्पष्टाधिकार हि भा-स्थिर करण की स्थिति के विषय मे ब्रह्मगुप्त भी इसी तरह कहते हैं, उनके वाक्य ये हैं । 'कृष्ण चतुर्दश्यन्ते शकुनि पर्वणि चतुष्पद प्रथमे इत्यादि । इसी को स्वीकार कर इसी के अनुसार लल्लावायं भी कहते हैं-'शशिनि कृश- शरीरे या चतुर्दश्यवश्य शकुनिरपरभागे जायते नाम तस्या.।' इत्यादि । भास्कराचार्य 'शकुनितोऽसितभूतदतात्' इमसे कृष्ण चतुर्दशी के पूर्वार्ध के बाद जो बाकी तीन करण और प्रतिपद के पूर्वाधं में चौथे करण को शकुनि सम्बन्धी करण 'शकुनि, चतुष्पद, माग, विस्तुघ्न' मानते हैं । मूर्यसिद्धान्त मे- प्रवाणि शकुनिनाग तृतीय तु चतुष्पदम्। किंस्तुघ्न तु चतुर्दश्या कप्यायाश्चा. पराधत ॥ इससे अमावस्या के पूर्वार्ध मे नागकरण, पदार्ध मे चतुष्पदकरण कहते हैं किंतु उन करणद्वय के पूर्वापर क्रम मे भेद है इसलिए सुधावपिणी टीका मे (प्राय सब प्राचार्यो के मत से बाह्यक्रम हो ठीक है। अत प्रथम शकुनिकरण, द्वितीय चतुष्पद, तृतीय नाग यह अध्याहार करना चाहिये । ये विषम लिखे हैं। श्रीपतिनै भी ब्राह्मक्रमानुसार ही लिखे हैं इति ॥१२॥ इदानी योगानयनमाह । रविचन्द्रयोगलिप्ताः खखवसुभत्ताः फलं गतायोगा । खरसगुणे गतयेये गतियुतिभक्त फलं नाड्यः ॥१३॥ विमा.- -रविचन्द्रयोगलिप्ता (स्फुट रविचन्द्रयोगकला ) खखवसुभक्ता. (८०० एभिभक्ता ) फ्ल गता योगा स्यु । शेष वर्तमानयोगताराया गतशेप तत् ८०० भागहारात्यक्ताऽवशेष गम्यगतयेये (गतगम्ये) खरसगुणे (६० एभि[गिते) गतियुतिभक्ते (रविचन्द्रगतियोगभाजिते) फल नाड्य (गता नाड यो गम्या नाड्यश्च) भवन्तीति ।।१३॥ अग्रोपपत्ति । यदा रविचन्द्रयोगकला =८०० कला भवन्ति तदैको योगो भवति, ततोऽनु- पातो यदि ८०० क्लाभी रविचन्द्रकलाभिरेको लभ्यते तदेप्टरविचन्द्रयोगकलाभिः विमित्यनुपातेनागच्छन्ति गतयोगा । शेष वर्तमानयोगस्य भुक्त, तद्धर ८०० शुद्ध तदा भोग्यम् । ततो यदि रविचन्द्रगतियोगक्लाया पष्टिघटिका लभ्यन्ते तदा गतगम्यवलाभि. किमित्यनुपातेन गतनाडिका गम्यनाडिकाश्च समागच्छन्ती. स्पत उपपन्नम् ॥१३॥ अव योगानयन कहते हैं। हि.भास्फुट रविचन्द्र योग क्ला को ८०० माठ सौ से भाग देने से फूल - मोग होते हैं । शेप वर्तमान योग तारा दे गत शेष है उसको ८०० हा में व्याने केस ४२२ पटेश्वर सिद्धान्ते होता है, गतक्ला को साठ मे गुणकर रविचन्द्र के गतियोग मे भाग देने से गत घटी और गम्य घटी होती है ॥१३॥ उपपति। जब रवि और चन्द्र को योगक्ला ८०० कला होती है तो एक योग होता है, इससे अनुपात करते हैं यदि ८०० सो रविचन्द्र योग क्ला म एक योग पान हैं तो इप्ट रविचन्द्र- योगकला म क्या इस अनुपात से गत योग के प्रमाण आते हैं । शेष वर्तमान योगतारा के गत शेप है, उसको हर ८०० मे घटाने से गम्य होता है, तब अनुपात करते हैं रविचन्द्र गतियोग क्ला मे यदि ६० घटी पाते हैं तो गतकला और गम्य कला म क्या इस अनुपात से गतघटी मौर गम्य घटी पाती है । इससे प्राचार्योक्त उत्पन्न हुमा ।।१३।। इदानी व्यतीपातदेतिपातयोगक्षणमाह । चक्रार्धे व्यतिपातो रविचन्द्रयुती समाज्यमघुयोगात् । विषवच्चायनभेदे जातिसमत्वे तयोयु तिमचक्र ॥१४॥ वैधतिरेव क्रातिसमत्वे तथायनैकत्वे । ऊनाधिकालिप्ताम्यो गतियुतिलब्ध गरएसाध्या ॥१५॥ स्वफलेन युक्तहीना रवीन्दुपाता दिघावयनसन्धौ । वि भा --रविचद्रयुती चनार्धे (रविचद्रयोगे राशिषटके) अयनभेदे कान्ति- साम्ये समाज्यमधुयोगात् (समपरिमाणकघृतमधुयोगात्) विपवत् (विषमिव) व्यतिपातो व्यतीपातो नामयोगविशेपो भवतीति, विशेषेणात्यन्त मगल पातयति नारा- यतीति व्यतीपातो व्यतिपातो वा योगविशेष । एव तयो रविचन्द्रयोयु तिभचके (रविचन्द्रयोगे द्वादशराशितुल्ये) अयनकत्वे जातिसमत्वे वैधृतिः वैधृतिनामयोग स्यात् । मगल विशेषेण ध्रियते अवरोध्यते इति विघृत , विधृत एव वैघृत ।। ऊनाधिकलिप्ताभ्य (रविचन्द्रयोोंगे चनचक्राहीनाधिक्कलाभ्य ) गतियुति- लब्ध छु गणसाध्या (रविचन्द्रयोर्गतियोगेन विभक्ता लब्ध यद् दिनादिफल तस्मात्) साध्या स्वफलेन युक्तिहीना रवीन्दुपाता । रविचन्द्रराहवो गतगम्य- दिवसकालिका मत्तंच्या इति स्वस्वगतितश्चालनद्वारा तत्तात्कालिनीकरण स्फुट- मेवेत्यनेन यदा रविचन्द्रयोर्योगो द्वादशराशिसमस्तथा पड़ाशिसमस्तदा रविचन्द्र- पातानयनमाचार्येण क्रियते। विधावयनसन्धादित्यस्याग्रिम नोकेन सम्बन्ध । अग्रोपपत्ति । यदा रविचन्द्रयोर्योग पड़ाशितुल्यस्तदा तो भिन्नायनगतावेक्गोलस्थौ च भवत । यथा यद्य व =१ स तदा द्वितीय = रा, एवतयोर्योगे पड़ाशितुल्ये प्रमाणे १९५१२४६३३४४४२ मत्र द्वयोमुं जयोस्तुल्यत्वात्तयो स्थानीये प्रातिसमे भवतो-रातोऽय व्यतीपात नामपात स्यादेवेति ॥ अव रविचन्द्रोगेन सायनरवि- चन्द्रयोर्योगो बोध्य इति ॥१४-१५।।
स्पष्टाधिकार ४२३ यदा रविचन्द्रयोयोगो द्वादशरविसमस्तदा तो भिन्नगोलगतावेकायनगतीच भवेताम् यथा यद्यक =१ रा, तथा द्वितीय =११ रा, एव तयो प्रमाणे १।११।। २११०॥३६॥४८॥७॥६॥७॥५॥ अन द्वयोभिन्नगोलत्वमनयोरेकत्व च, भुजयोस्तुल्यत्वाद्रविक्रान्तिचन्द्रस्थानीयकान्त्योश्च समत्वात्तत्र वैधृतपातस्य सम्भव इति । रविवन्द्रयोर्योगेन सायनयोर्योगो बोध्य इति शेपोपपत्ति स्फुटव ॥१४-१५॥ अव व्यतीपात और वैधृतिपात के लक्षण कहते हैं । हि भा--रवि और चन्द्र के योग छ राशि होने पर प्रयनभेद और प्रान्तिसाम्य होने से समान मात्रा मे मधु और घृत के मिलने से जैसे विष होता है उसी तरह व्यतिपात नामक योग होता है, एव रवि और चन्द्र के योग बारह रागि हो तो क्रान्तिसमत्व और प्रयन वे एकत्व के कारण वैधृति नाम का पात होता है। यदि रवि चन्द्र का योग छ राशि से न्यून हो तो जितना न्यून है वह कन कला कहलाती है । यदि योग छ राशि मे अधिक है तो जितना अधिक है वह अधिक कला कहलाती है । इसी तरह रवि चन्द्र के योग बारह राशि से न्यूनाधिक रहने पर कनकला और अधिकक्ला समझनी चाहिये । उन पलायो को गतियोग से भाग देना जो दिनादिफल हो उन गतप्य दिन करके युक्त और हीन रवि, चन्द्र और पात को करना चाहिए अर्थात् रवि चन्द्र और पात को गत गम्य दिवसवालिक करना चाहिये । अपनी अपनी गति से चालन द्वारा तात्कालिकीकरण स्पष्ट ही है ॥१४-१५ ॥ उपपत्ति यदि रवि और चन्द्र का योग छ राशि के बराबर है तव दोनो भिन्न अयन मे और एक गोलगत होते हैं । जंस यदि एव के मान-१ रा तो दूसरे3५रा, इसी तरह उन दोनो के प्रमाण ११ ।।२।४॥३॥३॥४।२।। यहा रवि चन्द्र के भुजाश तुल्य होने से दोनो को स्था. नीय क्रान्ति बराबर होती है इसलिये यहा व्यतीपात नाम का पातयोग होता है यहा रवि और चन्द्र के योग सायन रवि चन्द्र का योग समझना चाहिये !! यदि रवि और चन्द्र के योग बारह रानि के बराबर है तो दोनो भिन्न गोलगत और एव अयनगत होते हैं जैसे यदि एव के मान=१रा रो दूसरे के मान-११ रा एव उन दोनो के प्रमाण १२११.१२।१०॥३९॥४८॥२७॥६॥६॥७५ यहा दोनो के भिन्न गोलत्व मौर मयन में एक्त्व है, दोनो के भुजाश बरावर होने के कारण स्थानीय क्रान्ति परावर होती है मत यहा वैधृति नाम का पातयोग होते हैं । यहा रविचन्द्र का योग सायन समझना चाहिये । यदि ऊन कता बो रवि मोर चन्द्र ये गतियोग मे भाग दगे तो एप्य दिन पायेंगे और अधिक पला मे भाग देने मे गत दिन पाते हैं उन गत और एप्य दिनों से गुपित गतिकला को पृथर स्यापित करना, गनिवला दिनावयव घटी में गुणवर साठ से भाग देने से जो लब्ध बता हो उसे पूर्व स्थापित म मिलाकर ग्रह मे जोडने यटाने से तात्कालिक ग्रह होते हैं। इस तरह रवि, चन्द्र भोर राह मा तालालितीकरण करना चाहिए ॥१४-१५॥
४२४ वटेश्वर-सिद्धान्ते इदानी साधारण्येन क्रानिमाम्यसभवासभवज्ञानमाह । विदिशो. क्षेपक्रान्त्यो फ्रान्यूनोऽपक्रम परम ॥१६॥ यदि विक्षेपादूनो यात पातस्तदाऽन्यथा भवति । अयनादे. प्रागृवं पञ्चाग्निमिरशक सन्धि ॥१७॥ मि भा-विधौ (चन्द्र) अयनसन्धी तस्य या क्रान्ति सा तस्य स्फुटा परमातस्मात्स्थानादग्रत पृष्ठतो वा यावच्चन्द्रश्वाल्यतै तावत्तस्य क्रान्तिन्यूनैव भवति । अतोऽधिक्या रविक्रान्त्या सह साम्य नास्ति । अतोऽन्यथाऽस्तीति । अयनादितश्चन्द्रा- यनसन्धि ३५ पशिदगै पूर्व पश्चाद्भवतीति । अग्रोपपत्ति अननाचार्येण चन्द्रगोलायनसन्ध्योर्ज्ञान न कृत केवलमित्येव क्य्यते यदय- नादित ३५ अशान्तरे चन्द्रायनसन्धिर्भवति । भास्कराचार्येण चन्द्रगोलायन- सन्ध्योञ्जन कृत, विमण्डलनाडीमण्डलयो सम्पातगतकदम्बप्रोतवृत्त प्रान्तिवृत्त यत्र लगति स चन्द्रगोलसन्धि । तनव नवनि सयोज्य यो विन्दुर्भवति त चन्द्रायनसन्धि कथयति भास्कर । विमण्डलनाडीमण्डलयो सम्मातान्नवत्यशेन यद्वृत्त तत्त्रान्ति- वृत्तै यत्र लगति स विन्दुरेव पूर्वोक्तप्राचीनचन्द्रायनसन्धि । यतश्चन्द्रगोलसन्धौ नवति- योजनेन स एव विन्दु- र्भवति,पर तवृत्त (विम डलनाडीमण्डलसम्पा तोत्पन्ननवत्यशवृत्त, क्रान्तिवृत्तोपरि लम्वरूप प्राचीनोक्त चन्द्रायनसन्धि समी- चीनो नास्ति, विमण्डल नाडीमण्डलसम्पातोत्पन्न- नवत्यशवृत्त विमण्डले लगति तद्विन्दू- परिगत कदम्वप्रोतवृत्त यत्र कान्तिवृत्ते लगति स एक वास्तवचन्द्रायन. सन्धि । नवीना एत. मेव बिन्दु चन्द्रायन- सन्धि कथयन्ति, त्यो (प्राचीनायनसन्धिनवीनायनसन्ध्योरन्तरज्ञान सुल- भेनैव भवितुमर्हति,गोलसन्ध्यन्तरस्य (रविगोलसन्धिचन्द्रगोलसन्ध्योरन्तरस्य) ज्ञान तलरम कदा भवतीत्येतस्यापि ज्ञान सुलभेनैव भवति, प्राचीनायनसन्धिनवीनायन- नास्त्यत यत्र चित्र १० स्पष्टाधिकारः ४२५ सन्ध्योरन्तस्य परमन्य भवति तज्जान यदा भवति परन्तु ग्रन्थविस्तरभ्यादेते विषया प्रय न लिरयन्ते इति ।।१६-१७।। अब साधारण तथा सभवामभव लक्षग कहते है। हिं भा~-चन्द्र के अयनसन्धि में रहने मे जो उनकी क्रान्ति होती है वह परस्मपष्ट क्रान्ति है । उम स्थान में प्रागे पीछे यावत् चन्द्र को चालित करते हैं तावत् उनको क्रान्ति न्यून होती है । इसलिये अधिन रवि क्रान्ति के साथ तुल्यता नहीं होती है। इससे भिन्न ही है। अयनादि से चन्द्रायनसन्धि ३५ अश पर मागे पाछे होती है । उपपत्ति मानाय ने नन्द्र की गोलसन्धि और अयनसन्धि का ज्ञान नही किया है, वेवल इतना वहते हैं कि अयनादि मे ३५ प्रशान्तर पर प्रयनसन्धि होती है। भासतराचार्य ने चन्द्रगोलसन्धि और अयनसन्धि का ज्ञान दिया है, विमण्डल नाडोमण्डल सम्पातगत कदम्बप्रोतवृत्त कानिहन मे जहा लगता है उम विन्दु वो चन्द्रगोलसन्धि कहते है । इसी में ६० मग जोड देने में जो विन्दु होता है उसको अयनसन्धि कहते है। विमण्डन नाडीमण्डल गम्नान में नवत्या- ध्यासाघवृत्त क्रान्तिवृत्त में बहा लगता है वही विन्दु प्राचीनायनमन्धि (भारपिता- यन मन्धि) है क्योकि चन्द्रगोल मन्धि मे १० अश जोडने से वहीं विन्दु होता है। परन्तु यह वृत्त (विमण्डल नाटोमण्डल सम्पातोत्पन नवत्यश वृत्त) आन्तिवृत्त के उपर तम्ब म नहीं है इसलिये भास्वर स्वीकृत चन्द्रायनसन्धि ठीक नहीं है। विमण्इन नाडीमा मनमानी त्पन्न नवन्यशतृत विमण्डल मे जहा लगता है उस बिन्दु रे मर जो रदम्य तारा कीजियेगा वह क्रान्तिवृत्त में जहा लगगा वही वास्तव चन्द्रायन मन्यि है, नवीन मोग इमीको चन्द्रायन सन्धि कहते है। प्राचीनायनसन्धि और नवीनायनमधिश पनामान गुनभन होता है । रविगोलसन्धि और चन्द्रगोलसन्धि का अन्तर मान पोर उमरा परमाय मच होता है इनका ज्ञान भी सुलभ होता है, प्राचीनापनमन्यि और नवीनायनाप अन्तर का परमत्व कव होत है उसके ज्ञान भी होते हैं किन्तु अन्य पिस्तारमय में यह विष यहा नही लिखा जाता है ।।१६-१७॥ इदानी सति च द्रगर विरोपमाह । एकदिशीव्यतिपात क्रायोविदिशोस्तु बंधुतं भवति । दिग्भेदेऽपक्रमए महदप्यूनं वियोन या ॥१८॥ विमा-एकदिशो (एपदिकायो ) मान्योरन्तरं समा int: स्यात् । विदिशो (मिदिवम्थयो ) माल्योयोग बंधन भवति दिदि वियोगदान अपक्रमण (स्पष्टप्रान्तिचाप महदपि रविक्रान्तित्रापाटिक) सुतरामेव न्यूनमिति ॥९॥ अगर एकदियो तान्योन्टागनी वटेश्वर-सिद्धान्त रेव रविचन्द्रयोभवति, प्रान्त्यन्तरे चन्द्रसूर्ययोर्याम्योत्तरभावेन स्थिति । तदन्तर रविचन्द्रयोरहोरात्रवृत्तयोरन्तरम् यदि च चन्द्रमान्ति शरेण भिन्नगोल नीता तदा रविचन्द्रयोरहोरात्रवृत्तयोभिनगोले स्थितत्वात् स्वक्रान्त्यग्रे एकस्योत्तरतोऽन्यस्य स्वक्रान्त्यग्ने दक्षिणतोऽवस्थानास्त्रान्तियोगेनैवाहोरानवृत्तयोरन्तर भवेत् । रखेरहो- रानवृत्त नाडीवृत्तादुत्तरतो दक्षिणतो वा यावतान्तरेण भवेत्तावतवान्तरेण यदि चन्द्रस्याहोरानवृत्त नाडीवृत्ताद् भिन्नदिशि भवेत्तदा वैधृतनामा पात । रविर्दक्षिण- गोलेऽस्ति, तदुपयहोरानवृत्त कार्य, नाडीवृत्तात्तावतान्तरेणोत्तरतश्चन्द्रोपर्यहोरात्र- वृत्त कार्य तदा वैवृत इति । यदा च पुनश्चकालिकचन्द्र उत्तरगोले भवेत्तदोत्तर- प्रान्तरल्पत्वात्तदहोरात्रवृत्तादमन्यस्मिन्नहोरानवृत्त दक्षिणे भ्रमति तदा तमोत्त. योरन्तर मुपाय नाडीवृत्ताद्रवेदक्षिणकान्तितुल्यन्तरे त्तरतस्तवृत्त कार्यम् । वेप्टकालिकचन्द्रस्य यदन्यदहोरानवृत्त तच्चन्द्रस्योत्तरकान्त्यग्र, तेन रवि- दक्षिणकान्तिचन्द्रोत्तरत्रात्योयदन्तर तदेव तदहोरानवृत्तयोरन्तरम् । अय यदि दशरवशाइक्षिणगोल नीतस्तदा चन्द्रस्य सप्टा क्रान्तिर्दक्षिणा भवेत् । इष्टकालिकचन्द्रस्य यद्भिन्नमहोरामवृत्त तदुत्तरे कृताहोरानवृत्तस्य चान्तर तयो कान्त्योर्योग कृले भवति तेन “एकदिशोर्व्यतिपात क्रान्त्योविदिशोस्तु वैधृत भवती- त्युपपन्नम्"। यदि चन्द्रस्य स्थानीयकालेरधिक्स्तच्छरो भिन्नदिवकाया क्रान्तिसी माया सकाशात्स्वा दिश कान्तिचापमानयेत्तादृशस्थिती चन्द्रस्पष्टकान्तिचाप रविक्रान्तिचापादधिकमपि भवेत्तदा न्यूनमेव कल्प्यम् । ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते ब्रह्मगुप्ते नाप्येवमुच्यते, तयाच तद्वाक्यम्- व्यतिपातोऽपक्रमयोदिक्साम्ये वैधृतो दिगन्यत्वे । अधिकोऽप्यून क्ल्प्य दिग्भेदेमक्रम शशिन ॥ शिष्यवृद्धिदतन्ने लल्लेन- कल्प्योऽधिकोऽप्यूनक एव चान्द्र स्फुटोऽपमश्चन्द्रमसोऽन्यदिक्स्थ । इत्युक्तम् । श्रीपतिनाऽपि सिद्धान्तशेखरेलल्लोक्तसामेव क्थ्यते ।।इति ॥१८॥ अव चन्दार रहन पर विशेष कहत हैं। हिमा -एक दिशा म रविवानि और च दक्रान्ति वा अन्तर क्रला तब व्यतिपात योग होता है । भिन्न दिशा म क्रान्ति के याग करने मे बंधूतयोग होता है । दिग्भेद में चन्द्रस्पष्टवान्ति रविक्रान्ति चाप मे अधिक भी हो तो उमे न्यून ही मानना चाहिए । न्यून तो मुतरा न्यून है ही in : उपपत्ति एक दिशा मे रवि प्रौर चन्द्र के वान्त्यन्तर व्यतिपात योग म होता है क्योकि एक गोल मे रवि और चन्द्र के रहने हो से व्यतिपात योग होना है । क्रान्त्य तर पर उत्तर दक्षिण के समरदिपौर चन्द्र की स्थिति है। मान्यन्तर रवि चन्द्र के महोरात्रवृत्तो का पन्तर
स्पष्टाधिकारः
४२७
है, यदि शर के द्वारा चन्द्रकान्ति भिन्नगोल मे लाई गई तव रवि चन्द्र के अहोरात्रवृत्तो के
भिन्नगोल में रहने के कारण अपने कान्स्यग्न पर एक को उत्तर दूसरे को अपने क्रान्त्यग्र पर
दक्षिण रहने से दोनो क्रान्तियो के योग करने से ही अहोरात्रवृत्तान्तर होता है । रवि के
अहोरात्रवृत्त नाडीवृत्त से जितने अन्तर पर उत्तर या दक्षिण है उतने ही
अन्तर पर यदि चन्द्र के अहोरानवृत्त नाडी वृत्त से भिन तरफ हो तव वैधृत नाम
का योग होता है । रवि दक्षिण गोल मे है उनके ऊपर अहोरात्रवृत्त कर देना, नाडीवृत्त से
उतने ही अन्तर पर उत्तर तरफ चन्द्र के आर अहोरात्रवृत्त कर देना, तब वैधृत होता है।
यदि चक्रकालिक (जिस समय रविचन्द्र के योग बारह राशि के बराबर होता है ) चन्द्र उत्तर
गोल में हैं तब उत्तर क्रान्ति के अल्पता के कारण उनके अहोरात्रवृत्त से दक्षिण भिन्न हो-
रात्रवृत्त मे भ्रमण करते हैं तब वहाँ उन दोनो अहोरात्रवृत्तो के अन्तरज्ञान के लिये उपाय
करते है । नाडीवृत्त से रवि को दक्षिण क्रान्ति तुल्यान्तर पर उतर तरफ अहोरात्र वृत्त
करना, वा इष्टकालिक चन्द्र के जो भिन्न अहोरात्रवृत्त है वह चन्द्र के उत्तर कान्त्यग्र पर,
इसलिये रवि दक्षिण क्रान्ति और चन्द्र की उत्तरा क्रान्ति का जो अन्तर है वहीं उन अहो
रात्र वृत्तो का अन्तर है। यदि शरवश से दक्षिण गोल में लाये गये तब चन्द्र वी स्पष्टा
क्रान्ति दक्षिण होगी । इष्टकालिक चन्द्र का जो भिन्न अहोरात्र वृत्त है उसका और उत्तर
तरफ जो अहोरात्र वृत्त किये हुए हैं उन दोनो के अन्तर उन दोनो क्रान्तियो के याग करने से
होता है, इसलिये 'एकदिशोऽयतिपात कात्योविदिशोस्तु वैधृत भवति' यह उपपन्न हुभा ॥
यदि चन्द्रस्थानीय क्रान्ति से अधिकशर भितदिशा की क्रान्ति सीमा से अपनी तरफ क्रान्तिचाप
को लावे तो उस स्थिति मे चन्द्र स्पष्ट क्रान्तिचाप को रविक्रान्ति चाप से अधिक रहने पर
भी न्यून मानना चाहिये । ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त मे ब्रह्मगुप्त भी इसी तरह कहते है । जैसे उनके
वाक्य है-
व्यतिपातापक्रमोदिक्साम्ये वैधृतो दिगन्यत्वे ।
अधिकोऽप्यून क्ल्प्यो दिग्भेदेऽपक्रम शगिन ।।
शिप्यधीवृद्धिदतन्त्र मे लल्लाचार्य ने-
'कल्प्योऽधिकोऽप्यूनक एव चान्द्र स्फुटोऽपमश्चन्द्रमसोऽन्यदिकस्य ।'
कहा है।
लल्लोक्त सदृश ही श्रीपति भी सिद्धान्तशेखर मे कहते हैं ॥१८॥
इदानी पातस्य गतागतत्वमाह ।
विषमपदगे यदीन्दी क्रान्तिमहतो सहस्रगुक्रान्तेः ।
भूतोऽन्यथा तु भावी समपदगे व्यत्ययातपातः ॥१६॥
वि.मा.-यदि इन्दौ (चन्द्र) विषमपदगे कान्ति: (चन्द्रस्फुटा व्र
सहस्रगुकान्ते. (सूर्यकान्तेः) महती (अधिका) भवेत्तदा पातो भूतः - (गत.) अन्यथा
भावी पातो भवेत् चन्द्र समपदगे व्यत्ययात् (विलोमात् ) पातो भवतीति ॥१६॥
४२८ वटेश्वर-सिद्धान्ते अत्रोपपत्ति. गोलसन्धो चन्द्ररव्यो पदादिः, विषमपदे (प्रथम तृतीय वा) गोलसन्धिताऽग्रे यथा यथा तयोर्गमन भवेत्तथा तथा तत्क्रान्तिर्वर्धते, पदान्ते क्रान्तः परमत्वं भवेत् । तेन विपमपदीयचन्द्रक्रान्तियदि रविकान्तितोऽधिका भवेत्तदा तु चन्द्रो रवः क्रान्ति- स्थान प्राप्य तदुल्लड घ्याग्रगतो भवेदतः पातो गतोज्ययप्यः । एव द्वितीय चतुर्थे च पदे यथा यथा रविचन्द्रावने गच्छतस्तथा तथा तत्क्रान्तिरपचीयते, गोल- सन्धौ क्रान्ति शून्या भवेत् । समपदे चन्द्रक्रान्तिर्य दि रविक्रान्तितोऽल्पीयसी तदा ऽग्रगतश्चन्द्र परावर्त्य रविक्रान्तिस्थानं प्राप्याल्पक्रान्तिर्जातोऽर्थाद् गोलसन्धि प्रत्यागन्तुं लग्नस्तदाऽपि गत एव पातोऽन्यथप्य इति । ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते- मेपतुलादाविन्दोरपक्रमे रव्यपत्रमादूने। एप्यो ह्यधिकेऽतीतो विपरीतः ककिमकरादौ ॥ इति ब्रह्मगुप्तोक्त , शिष्यधीवृद्धिदतन्त्रै- "अयुग्मजश्चान्द्रमसोऽपमश्च दपक्रमाद् भानुमतोऽधिक: स्यात् । समोद्भवो वापि लघुस्तदेतो निपातकालो भविताऽन्यथाऽतः ।।" इति लल्लोत च । सिद्धान्तशिरोमणी- "प्रोजपदेन्दुक्रान्तिमहती सूर्यापमाल्लघु समजा । यदि भवति तदा ज्ञेयो यात. पातस्तदन्यथा गम्यः॥" इति भास्करोक्त च सर्वमेकरूपमेवेति ॥१६॥ भव पात के गर्नप्यत्व बढे हैं हि भा-यदि चन्द विषमपद में हो उनको स्पप्टक्रान्ति रविक्रान्ति से बढी हो तब पात गत होता है इससे प्रन्यया भावी (एप्य) होता है, ममपद मे विलोम (उल्टा) होता है ॥१६॥ उपपत्ति गोल मन्धि पदादि है । विषम पद (प्रथग या नृतीय) में गोलसन्धि से मागे ज्यो. ग्यो रवि मौर चन्द्र जायेंगे त्यो त्यो उनकी क्राति बढती है। पदन्न में पाति का परमत्य होता है। इसलिये विषमपदीय चद्रनाति यदि रविक्राति मे अधिक होगी तो चद्र रवि प्रातिस्थान को पाकर उसको छोडकर पागे चले जायेंगे इमलिये पातयोग गत होगा, इस मे पन्या एप्य होता है । एक दिनीय और चतुर्थपद मे ज्यो ज्यो रवि और चन्द्र मागे जाते है त्यो त्यों उनकी प्राति घटती है गोन सधि मे काति अभाव होता है । ममपद में चन्द्र क्राति यदि रविक्राति से छोटी है तो मागे गये हुये चद्र लौटकर रविक्राति स्थान को पावर अल्प- क्रातिक हो जाते हैं मर्षान् गोलमधि में लौटने सगते हैं तथापि गतपात योग होता है भन्यया एप्प होता है इति ॥ पाह्मस्फुटसिदात में ब्रह्मगुप्त भी इसी तरह कहते हैं। जैसे उनके वाक्य हैं- - स्पष्टाधिकार: मेपतुलादाविन्दोरपक्रम रख्यपक्रमादूने । एप्यो ह्यधिकेऽतीतो विपरीत पकिमकरादौ ।। शिप्यधीवृद्धिदतन्त्र मे लल्लाचार्य भी इसी तरह कहते हैं- 'अयुग्गजश्चन्द्रमसोमवेद' इत्यादि । सिद्धातशिरोमणि म भास्कराचार्य भी इसी तरह कहते हैं- "प्रोजपदेन्दुकातिमहती इत्यादि ।।१६।। इदानी यस्मिन् काले रविचन्द्रयोगश्चक्राधचक्र वा तस्मात्कालाद्गता गतस्य क्रान्तिसाम्यकालस्य ज्ञानमा । विवरयुतियतिपाते युतिविवर वैधृते समान्यदिशो । क्रान्त्यो प्रथमो राशिस्तथेटपटिकाभिरन्योऽपि ॥२०॥ यदि भूतो भावी वा द्वयोविशेषोऽन्यथा युतिहार । प्राद्यहतेष्टनाड्या प्रथमवशान्मध्यमेताभि ।।२।। तात्कालिक हैस्तरसकृत्ववशिष्टमध्यनाडोघ्नम् । विभा-समान्यदिशो (एकदिवकयोभिन्नदिक्कयोश्च) बान्त्यो (रविचन्द्र- कान्यो ) विविरयुति (अन्तर योगेऽर्थादेकदिक्कयो कान्त्योरन्तर भिन्नदिक्कयो बान्त्योर्योग ) व्यतिपातयोगे प्रथमो राशि (प्रथमसज्ञक )भवतीर्थ , वैधृते योगे समा न्यदिशो (एकदिक्कयोभिन्नदिक्कयोश्च) क्रान्त्यो , युतिविवर (योगोऽन्तरमर्थादेक- दिक्कयोोगो भिन्नदिक्कयोरन्तर ) प्रथमसज्ञक । तथेप्टघटिकाभि अन्योऽपि राशि साध्य । एतदुक्त भवति काचिदिष्टघटिका परिकल्प्य ताभी रविचन्द्र राहुगती सगुण्य पष्टिभिर्भक्त्वा फल कलादिक तेपु (रविचन्द्रराहुषु गतगम्पपातकालयो- धनणं कृत्वा तत्कालेऽपि रविचन्द्रयो कातिमाने समानीय (विवयुनिर्व्यतिपाते युति- विवर" मित्यादिना अन्योऽपि राशि साध्य । यदि प्रथमोऽन्यश्च भूत (गत )वा भावी (गम्य ) तदा द्वयो (प्रथमान्ययो) विशेष (अन्तर) अन्यथाऽर्थात्तयोर्मध्ये एको गतो द्वितीयो गम्यस्तदा तयोर्युति (योग) श्राद्यहतेष्टनाड्या (ग्राद्यगुणित- पूर्वकालतेष्टनाड्या) हारो भवेत् । आधगुणितपूर्वकल्पितेष्टनाडोहारविभक्ता- लब्धघटीभि प्रथमवशाद्गत भविष्यद् वा मध्य (पातमध्य) वोध्यम् । एताभिर्घटीभि हीनयुतस्तैस्तात्कालिक (रविचन्द्रराहुभि ) असकस्यिया मध्य (पातमध्य) भव- तीति । नाडीनमित्यस्याग्रिमलोकेन सम्बन्ध । अत्रोपपति व्यतीपातयोगे एकदिशो क्रान्त्योरन्तर भवति रविचन्द्रयोरेकगोले स्थित- त्वात, तत्वान्त्यन्तर रविचन्द्रयो रहोरायवृत्तयोरन्तरम् । यदा हि चन्द्रकान्त शरे- णान्यगोल नीता तदा तयो क्रान्त्योर्योग कार्य (रविचन्द्रयोरहोरात्रवृत्तयोमिन- ४३० वटेश्वर-मिद्धान्ते भिनगोले स्थितत्वात्) एक्म्य स्वक्रान्त्यग्रे उत्तरतोऽन्यस्य स्वान्त्यग्रे दक्षिरणतोऽन. प्रान्त्योर्योगवाहोरात्रवृत्तयोरन्लर भवेत् । नाडीवृत्तादुत्तरतो दक्षिणतो वा याव- तातरेण रवेरहोरानवृत्त नाडीवृताद् भिन्नदिगि तावनान्नरेगन यदि चन्द्रस्याहो- रामवृत्त भवेत्तदा वैधृतनामा पात म्यात् । अथ दक्षिणगोलेरविरम्ति तदुपर्यहोरात्र वृत्त कार्य नाडीवृत्तादुत्तरतस्तावतान्तरेण भिनमहोराववृत्त कार्य नर यदि चन्द्रो भवेत्तदा वैघृतपात इति भाव । यदा चमालिक्श्चन्द्र उत्तरगोले भवेत्तदा स्वोत्तर- कारल्पत्वातस्मादहोरामवृत्ताद्भिन्ने होरायवृत्ते दक्षिणतो भ्रमति तदा तयो- वृत्तयोरन्तरज्ञानार्थ नाडोवृत्तादुत्तरे रवेदक्षिणकान्त्यन्तरेन्होरानवृत्त कार्यम् । अतो रविदक्षिणक्रान्तेश्चन्द्रोन्तरकान्तेश्च यदन्नर तदेव तयोरहोरात्रवृत्तयोरन्त- रम् । यदि शरेण दक्षिणगोल नोना तदा चन्द्रस्फुटा क्रान्तिदक्षिणा भवेत्, अत्रेप्ट- कालिकचन्द्रस्य यद्भिन्नमहोरावृत्त तस्योत्तरे कृताहोरानवृतस्य चान्तर कात्यो- योगेनैव भवेत् । अतो युतिविवर वैधृते ममान्यदिगोरित्युक्तम् । तत्वान्त्योरन्तर प्रथमसज्ञकम् । प्रान्त्यन्तरस्य ह्रासोन्मुखस्य यदाऽभावनदा क्रान्तिमाम्य भवेत् । नदह्रासस्य वृद्धित्व नैव कत्तुं शक्यतेऽत इप्टघटीभिश्चालितयो रविचन्द्रयो पूर्वव- जान्त्यन्तर नेय तदन्यसज्ञकम् । तयो प्रथमान्ययोर्यदन्तर तदिष्टघटीमम्बन्धि- मान्त्यतरस्यापचयमानम् । तेन तयोग्न्तर कृतम् । परमेव तदैव यदा प्रथमान्य- कालयोर्गत गम्य वा लक्षणम्। यदि प्रथमकाले गतलक्षणमन्यकाले गम्यलक्षण तदा तत्र प्रथमान्ययोोंगे कृतेऽन्तर कृत भवेत्ततोऽनुपातो यद्ये तावता क्रान्त्यन्तरा- पचयेनेष्टघटिका लभ्यन्ते तदा प्रथमेन विमित्यनुपातेन या घटिका भवन्ति ताभि- वटिकाभिरमकन्फर्मणा म्पुटा भवितुमर्हन्तीत्याचार्योक्तमुपपन्नम् ।।२० २१॥ हि भा ----अब जिम समय म रवि और चन्द्र के योग ६ राशि मा १२ राशि होता है उम काल से गत मोर गम्य क्रान्ति माम्यकाल का ज्ञान कहते हैं। व्यतीपात याग म एक दिशा को रवि चन्द्रकान्ति के अन्तर, भिन्न दिशा को रवि- चन्द्रान्ति के योग प्रथम मज्ञक है। वैघृत योग म एक दिशा की रवि चन्द्रवान्ति के योग, भिन्न दिशा की क्रान्तियो के अन्तर प्रथम मशव हैं । और इप्ट पटी करके अन्य रागि भी साध्य न करना, कोई इष्टघटी मानवर उममे रवि, चन्द्र और राहु इनकी गतियो को गुण- कर साठ से भाग देवर जी क्लादि फल ही उमको गत और गम्य पातकाल मे रवि, चन्द्र और राहु में धन, ऋण करके उस काल मे रवि और चन्द्र की क्रान्ति लाकर पूर्ववत् (विवर- युनिव्यं तिपाते इत्यादि के अनुसार) अन्य रामि भी माधन करना, यदि प्रथम और अन्य भूत या भावी हो तब दोनो के मन्तर इससे अन्यथा अर्थात् एक गत और दूसरे गम्य हो तो दोनो के योग प्रथम गुणिन पूर्वकल्पित इष्टघटी वे हर होने हैं। प्रथम गुणित इघटी को हर मे भाग देकर जो घश्यादिक फ्ल होता है उम करके प्रथमवश गन गम्य पातमध्य भना चाहिये । इतनी घटी (पूर्वानीत घटी) करके हीनयुत तालानिए रवि, चन्द्र और राहु घरचे प्रसप्रकार से पातमध्य होता है ।। २०-२१ ।। सम- स्पप्टाधिकारः उपपत्ति व्यतीपात योग में रवि पोर चन्द्र के एक गोल में रहने के कारण एक दिशा की रविचन्द्र क्रान्ति के अन्तर भिन्न दिशा की क्रान्तियो का योग प्रथम सज्ञक होता है । क्रान्त्य- न्तर रवि चन्द्र के अहोरात्र वृत्तो का अन्नर है, जब चन्द्रकान्ति गर के द्वारा भिन्न गोल मे लाई गयी तव दोनो क्रान्तियो का योग करना चाहिये, क्योकि रवि और चन्द्र के अहोरात्र वृत्त भिन भिन्न गोल में है, एर के अहोरामवृत्ते उत्तर म अपने प्रनत्यग्र पर हैं दूसरे के अहोरात्रवृत्त दक्षिण म अपने कान्त्यग्न पर है इमलिये वहा दोनो कान्तियो के योग करने ही से अहोरात्र वृत्तान्तर होता है, नाडीवृत्त से उत्तर या दक्षिण जितने अन्तर पर रवि का अहोराम वृत्त है उतने ही अलर पर नाडीवृत से भिन्न तरफ यदि चन्द्र के ग्रहोरात्र वृत्त हो तव वैधृत नाम या पात होता है । रवि दक्षिणगोल मे है रवि के ऊपर अहोरात्रवृत्त कर देना, नाडीवृत्त मे उत्तर उतने ही अन्तर पर अन्य ग्रहोरात्र वृत्त करना उसमे यदि चन्द्र होगे अर्थात वह यदि चन्द्र के अहोरात्र वृत होगा तो वैधृत पात होता है । जब चकालिक (जिस समय रवि चन्द्र के योग बारह राशि के बराबर होता है) चन्द्र उत्तर गोल मे होगे तव अपनी उत्तरा क्रान्ति की अल्पता के कारण उस अहोरात्रवृत्त से भिन्न प्रहाराप्रवृत मे दक्षिण तरफ भ्रमण करते है तर उन दोनो वृत्तो के अन्तरज्ञान के लिये नाडीवृत से उत्तर रवि के दक्षिण क्रान्त्यग्र पर ग्रहोरात्रवृत्त कर देते हैं तव रवि की दक्षिण क्रान्ति प्रौर चन्द्र की उत्तर क्रान्ति के अन्तर जितने होगे उतने ही दोनो अहोरात्रवृत्तों के अन्तर होंगे। यदि शर के द्वारा चन्द्र क्राति दक्षिण लाई गयो तव चन्द्र की स्फुना क्रान्ति दक्षिण होगी, यहा इप्टकालिक चन्द्र के जो भिन्न अहोरात्र वृत्त होगे उमके और उत्तर तरफ किये हुए अहोरात्र वृत्तो के अन्तर दोनो क्रातियो के योग ही म होगा। इसलिए 'युतिविवर वैधृते समान्यदिशो' यह कहा गया है । वह कान्त्यन्तर प्रयम मज्ञा है । ह्रासोन्मुख क्रान्त्यन्तर वा जव अभाव होगा तब क्राति साम्य होगा, उस ह्रास का वृद्धित्व नही कर सकते हैं इसलिए इप्टघटी करके चालित रवि और चन्द्र के पूर्ववत् कान्त्यन्तर लाना वह अन्य मज्ञक है। प्रथम और अन्य का जो अन्तर है वह इष्टपटी सम्बन्धी क्रान्त्यन्तर का अपचयात्मक मान है इसलिए दोनो क अन्तर किये गये । लेकिन ऐसा तब भी होगा जब कि प्रथमकाल और अन्यकाल के गत या गम्य लक्षण होगे । यदि प्रथमकाल में गत लक्षण और अन्यकाल म गम्य लक्षण होगे तब वहा प्रथम और अन्य के काम करने ही में अन्तर होगा। जब अनुपात करते है यदि इस क्रान्त्यन्तर अपचय मे इप्टघटी पाते है तब प्रथम मे क्या इस अनुपात से जो घटी होती है उसके द्वारा असकृत्वम मे स्फुट होते है। इसमें प्राचार्योक्त उपपन्न हुमा ।।२०-२१॥ एवं पातमध्यमभिधायेदानी पाताद्यन्तकालपरिज्ञानमाह । मानक्या भक्त प्रथमेनाप्तघटिकाभिराद्यन्तौ ॥२२॥ निजबिम्बापक्रान्त्या रविमानापक्रम जहातीन्दुः । यावत्सममार्गगतस्तावत्पातोक्तफलसिद्धिः ॥२३॥ वि भा.- --मानक्या (पूर्वानीनस्पप्टेष्टपटिकाभिश्चक्रार्धचक्रकालिको रविचन्द्रौ प्रचाल्प पातमध्यकालिको कृत्वा तयोबिम्बे साध्ये तयोरर्धयोयोंगो - ४३२ वटेश्वर-सिद्धान्त मानश्या म्) मध्यनाडीघ्न (मानीतम्पष्टघटीभिर्गुणित) प्रथमेन भवनमाप्त. घटिकाभि (लब्धघटिकाभि) आद्यन्तौ (पातमध्यकालारपूर्वत पातस्याऽदि 1. तथा ताभिरेव लब्धघटिकाभि पातमध्यकालादप्रत पातस्याल ) इन्दु (चन्द्र) निजबिम्बापनान्त्या (स्फुटनान्त्या) रविमानापक्रम (रविक्राति) जहाति (उल्लङ्घ्याग्रे गच्छति) यावसाल चन्द्र सममार्गगत एवाहोरात्रगतस्ताव- त्पातोक्तफलसिद्धि । अर्थाद् यावरजान्त्योरन्नर मानण्यार्धादल्प भवति तावद् बिम्बैकदेशजकान्त्यो साम्यात्तत्फल भवति तदभावे तत्फ्लाभाव इति । अतो याव- मान्तिसाम्य तावदेव तस्य पल वाच्य तेन यस्मिन् दिने पातस्तत्समस्त दिन न दुष्टमिति पलितम् । अनोपपत्ति यदा क्रान्तिसाम्य तदेव पातस्तस्मात्यालात् प्राक् परतश्च पातम्य क्थमव- स्थानम् । तन कान्तिसाम्याभावात् क्रान्तिसाम्य नाम पात । विम्बमध्यकाति- विम्वार्धेन रहिता सती पाश्चात्यविम्वप्रान्तस्य तावती प्रातिर्भवति, विम्बमध्य- कातिविम्वार्धन युता सती अग्रतो विम्वप्रान्तस्य प्रातिर्भवति । एव रविचन्द्रयोश्च, अन विश्वे पृष्ठमग्र च याम्योतरभावेन क्थ्यते । रविविम्वपृष्ठकान्तिर्यावती तावत्येव यदा चन्द्रस्याग्रप्रान्तनाति , तदा तयोविम्बयोरेकदेशेन कात्यो साम्या- त्यातस्याऽऽदि । तदा तयोविम्वकेन्द्रयोरन्तर मानक्यातुल्यम् । तत प्रमेण गच्छतो रविचन्द्रयोर्यदा विम्वकेन्द्रीयक्रातिसाम्य तदा पातमध्यम् । तदनन्तर चन्द्रपृष्ठप्रातस्य रवेरग्रप्रातस्य च यदा कातिसाम्य तदा पातान्त । यत कान्त्य- नर यावन्मानक्यार्धान्न्यून तावत्पातोऽस्तीति । अथ पातमध्यसाधने यत्प्रथमसज्ञ कात्यन्तर याश्चासकृत्प्रकारेण स्पष्टीकृता इप्टघटिवास्ततोऽनुपातो यदि प्रथम- तुल्येन कात्यतरेणतावत्यो घटिका लभ्यन्ते तदा मानक्यातुल्यातरेण विमित्यनुपा- तेन या घटिका समागच्छन्ति ता स्थित्यर्धघटिका स्थूलास्तत्स्फुटीकरणम् । तात्कालिक्यो रविचद्रयो पुन कात्यतर कार्य तन्मानक्या_सन्न ततोऽनुपात यद्यनेन प्रान्त्यतरेणतावस्य स्थित्यर्धघटिका लभ्यन्ते नदा मानक्यातुल्येन किमि- त्येवमम कृत्त घटीना स्फुटत्वम् ।।२२ २३॥ हि भा-प्रब पातमध्य को कह कर पात के आदि पौर अत वाल जान कहते हैं । पहले लाई हुई स्पप्ट इप्टघटी करके चकाध और चतकालिक रवि और चन्द्र को चालन देकर पातमध्यकालिक कर उन दोनो के विम्ब साधन करना, दोनो न्यासार्यों के योग मानक्या है, इसको पूर्वानीत स्पष्ट इष्ट घटी से गुस कर प्रथम से भाग देने से जो घटिकादि फ्ल हो उतने करके पात मध्यकाल से पूर्व पात की प्रादि होती है और उतनी ही घटी करके पानमध्यकाल से भागे पात का अन्त होता है। चन्द्र अपनी स्पुट क्राति करके रवि क्रान्ति को लाप कर मागे जाते है । जब तक रवि और चन्द्र सम मार्ग (एक मार्ग याने एक अहोरात्र म रहते है तब तक पात वा पत होता है । अर्थात् जव तक क्रान्त्य तर स्पष्टाधिकारः मानक्या से अल्प होता है तब तक विम्ब के एक प्रदेश की क्राति वरावर होने से उसका फल ऋषियों ने कहा है उसके प्रभाव मे फलाभाव जानना चाहिये इसलिए जब तक क्रानि- साम्य रहता है तभी तक उसका पल होता है अत जिस दिन पात होता है वह समदिन दुष्ट नहीं होता है ।।२२-२३॥ उपपत्ति क्रम - जव क्राति साम्य होता है तो पात होता है। उस काल से (कान्तिसाम्यकाल) श्रागे और पीछे क्यो पात की स्थिति होती है। क्योकि वहा क्रान्तिसाम्य नहीं है। क्रान्ति- साम्य हो का नाम पात है। विम्वमध्यक्राति मे विम्वार्ध जोडने से आगे के बिम्ब प्रात की क्राति होती है । इस तरह रवि और चन्द्र दोनो की होती है । यहा विम्ब मे आगे पीछे से मतलव याम्योत्तर भाव से है। रविविम्ब पृष्ठमाति के वरावर जव चन्द्रविम्ब के अग्र- प्रान्त की काति होगी तब उन दोनो बिम्बो वे एक देश की क्राति वरावर होने से पात की आदि होती है । तब दोनो बिम्बकेन्द्रो के अन्तर मानक्याध के बराबर होता है । उसके बाद भ्रमण करते हुए रवि और चन्द्र की केन्द्रीय प्राति जब बराबर होगी तब पातमध्य होता है । उसके बाद चन्द्र पृष्ठप्रातीय क्रान्ति जव रवि के अग्रप्रान्तीय क्रान्ति के बराबर होगी तब पात का अन्त होता है। क्योकि मानक्या में क्रान्त्यन्तर जब तक न्यून रहेगा तब तक पात रहेगी। पात मध्यसाधन में क्रान्यन्तर पाद्यसज्ञक है और अमकृत्प्रकार मे स्पष्टीकृत इप्ट घटी जो है उन पर मे अनुपात करते हैं । यदि प्रथम तुल्य क्रान्त्यन्तर में ये इप्ट घटी पाते है तो मानक्या तुल्य अन्तर में क्या इस अनुपात में जो घटी आती है वह स्थित्यर्थ घटी स्थूल है उसका स्पुटीकरण करते हैं। तात्कालिक रवि और चन्द्र के पुन प्रान्त्यन्तर करना वह मानक्याधं के पास न होता है, उस पर से अनुपात करते हैं यदि इस कान्त्यन्तर म यह स्थित्यधंघटी पाते है तो मानक्यार्घ म क्या इस तरह असकृन करने मे उमका स्फुटत्व होता है ॥२२-२३॥ इदानी रविचन्द्रयो समलिप्नाधानमाह । तिथिगतयेय घटीन्यो रवीन्दुभुक्तो विभाजिते यष्टया। फललिप्तावियुतयुतौ तिच्यन्ते समकलौ भवत ॥२४॥ गतयेय विकलघ्ने गती रवीन्द्वोर्गमान्तरेण हृते । फललिप्ताभिः प्राग्वद्वियुतयुती समकलो स्तः ॥२५!! तिथियेय यातघटिकातुल्यकलाभियुतोनितेन्दुरवी । तिथिलिप्तामिश्चैव समलिप्तो वा विधूप्यकरौ ॥२६॥ वि भा.-रवीन्दुभुक्ती (रवीन्द्र गती) तिथिगतयेयघटीन्यो (तिथिगतगम्य- नाडिकागुणिते) पष्टया विभाजिते फललिप्तावियुतयुतो (लब्धरलारहितयुती) तो तिथ्यन्ते (इष्टतिथ्यन्ते) समकलो (कयाद्यवयवेन तुल्यौ) भवत ॥ रवीन्द्वोर्गती (रवचिन्द्रगती) गतयेयविक्लघ्ने (गतगम्योपगुग्गिते) गमान्तरेण (गत्यन्तरेण भक्ते) फलकलाभि पूर्ववद्वियुतयुतरविचन्द्रौ समक्लो भवत. ॥ तिथियेययान.
वटेश्वर-सिद्धान्त घटिकातुल्यक्लाभि (तिथिगम्यगतपटीतुरयकलाभि ) तिथिलिप्ताभिश्च (तिथि- क्लाभिश्च) युतोनितेन्दुरवी वा समक्लो विधूप्यकरौ (चन्द्रसूर्यो) भवेताम् ।।२४-२६॥ अयोपपत्ति यदि पप्टिघटीभी रविगतिकला लभ्यन्ते तदा तिथिगत गम्यघटीभि किमित्यनुपातेन तिथिगतगम्यकला समागच्छन्ति । एव चन्द्रगनिकलावशेन तिथि- गतगम्यकला समागमिप्यन्ति । आभि स्वस्वगत गम्यकलाभिवियुतयुतो रविचन्द्री तिथ्यन्ते समकलो भविष्यत । शेपोपत्ति स्फुटवास्तीति ॥२४-२६।। अव रवि और चन्द्र का समक्ला स्थान बहते हैं। हिमा -रवि और चन्द्र की गति को तिथि को गत घटी और गम्य घटी से गुण- कर साठ से भाग से जो फल कला हो उम करके रहित और सहित रविचन्द्र की गति को करने में इप्टतिथ्यन्त में बलाद्यवयव करके रवि और चन्द्र बरावर होते हैं। रवि और चन्द्र की गति को तिथिगत शेप और गम्य शेष से गुणकर गत्यन्तर मे भाग देने से जो फ्लक्ला हो उन करके पूर्ववत् रहित सहित करने मे रवि और चन्द्र- कलाद्यवयवेन वरावर होते हैं । तिथि गम्य और गत घटी तुल्य क्ला करके तथा तिथि- कना करके महित और रहित चन्द्र और सूप क्लायवयवेन बराबर होते हैं ॥२४ २६॥ उपपत्ति यदि माउ घटी म रविगति बना पाते हैं तो तिथिगत घरी और गम्य घटी म क्या इस अनुपात मे गत वाला और गम्य कला पाती हैं। इस तरह चन्द्रगति कलावश कर गत कला और गम्य कला पाती है । इन अपनी अपनी गत क्ला और गम्य बला करके रहित और महित रविचन्द्र इप्ट तिम्यन्त म कलादि मवयद करके बराबर होते हैं । शेप की उपपत्ति स्पष्ट है ॥२४-२६।। इदानी रविचन्द्रयो समभागसमराशिस्थानमाह । करणान्ते तिय्यन्ते समौ कलाभिस्तथा च पूर्णान्ते । समभागौ मासान्ते समराशी भास्करेन्दू स्त. पारा विभा-पूर्णान्ते (पूणिमाया) भास्करेन्दू (रविचन्द्रौ) समभागौ (प्रशाद्य- वयवेन तुल्यौ) मासान्ते (अमान्ते) समराशी (राश्याद्यवयवेन तुल्यो) स्तः (भवत ) इति ॥२७॥ अत्रोपपत्ति । रविचन्द्रयोरन्तर यदा द्वादशभागसम तदैका तिथिर्भवति, स्फुटमासान्ते निशत्तिथय । अतो रविचन्द्रान्तरागा =३०४१२३६० वा शून्यसमा । अतो स्पष्टोधिकार. ४३५ राश्याद्यवयव रविचन्द्रौ समौ पूर्णिमाया पचदश तिथय । अतो रविचन्द्रान्तरम्- १५४ १२-१८०६ राशय । अतो रविचन्द्रावशाधवयवस्तुल्यौ भवत. अन्यथा कथ तयोरन्तरे केवल राशय एव भवन्ति एव कस्मिन्नपितिथ्यन्ते रविचन्द्र- योरन्तराशा द्वादशापवा एव । तेन तदन्तरे कला विकला समत्वादेव केवल भागा उत्पद्यन्ते इति ॥ ब्रह्मगुप्तेनाप्येवमुच्यते राश्यशकलाविकला. स्फुटमासान्तेऽश- लिप्तिकाविकलाः। पक्षान्ते तिथ्यन्ते समा रवीन्द्वोः कला विकला । श्रीपति- लल्लादिभिरप्येवमेव कथ्यते इति ।।२७।। अव रवि और चन्द्र के समाश और समराशि स्थान कहते है। हि भा~पूर्णान्त मे चन्द्र और रवि अगाद्यवयवेन वराबर होने है । अमान्त मे रास्यादि करके बराबर होते हैं ॥२७॥ उपपति रवि और चन्द्र का अन्तर जद बारह अश होता है तव एवं तिथि होती है । स्फुट मासान्त मे तीस तिथिया है। प्रत ३०/ १२ =३६० या शून्य-रविचन्द्रान्तराग । इसलिए अमान्त मे राश्यादि रवि और चन्द्र बराबर होते हैं । पूर्णान्त मे तिथि - १५ इस- लिए रवि चन्द्राश% १५४१२-१८०-६ राशि, इसलिए पूर्णान्त में प्रशाद्यवयव करके रवि और चन्द्र बराबर होते हैं । अन्यथ' दोनो के अन्तर केवल छ राशि होंगे। एक क्सिी तिथ्यन्त मे रवि और चन्द्र का अन्तराश द्वादश भक्त ही होगा। इसलिए उनके अन्तर मे क्ला विक्ला के समत्व रहने के कारण केवल अग ही पाते हैं । ब्राह्मस्फुटसिद्धात मे ब्रह्म- गुप्त भी इसी तरह रहते हैं। जैसे उनके वाक्य है- राश्यशकला विकला म्फुट मासासँऽशलिप्निका विरला । पक्षान्ते तिथ्यने समा रवीन्द्रो कला विक्ला ॥ श्रीपति लल्लाचार्य प्रादि प्राचार्य इसी तरह कहते हैं ॥२७॥ इदानी सक्रान्तिकालराशिकरणतिथियोगानामन्तकाल नितुमाह । गत्यंशहतबिम्बं संक्रमकालो ग्रहस्य घटिकादिः । पुण्यतमोऽस्यायं राश्यन्तं त्यजति रविविम्बे ॥२॥ शशिबिम्बं षष्टिगुरण गतिविवरहृतं च करगतिथ्यन्तम् । गतिपुतिहृदयोगान्तं मिश्रफलमत्र स्थितो धुचरः ॥३०॥ प्रत एवानिष्टानामाद्यन्तौ तिथिकररगयोगानाम् । नेष्टौ विष्टिरिस्तिथिस्यहस्पक् दिनं भवति ॥२६॥ विभा-ग्रहस्य विम्व गत्यशहत (गत्यशभक्त) तदा घटिकादि सक्रमण- काल. । अर्कस्य (सूर्यस्य) अय सक्रमणकाल पुण्यतम (अतिपुण्यतम स्मृतिपुराणे. पूक्त) रवि विम्बे (स्वमण्इले) राश्यन्त त्यजति (पूर्वार्धपुण्यकालेन पूर्वराश्यन्त वटेश्वर सिद्धान्ते .जति, परार्धन पुण्यकालेन परराशे पूर्वभाग विशति) । शशिविम्व (चन्द्रविम्ब) ष्टिगुण (पष्टयागुणित) गतिविवरहत (रविचन्द्रगत्यन्तरभक्त ) तदा करण- तथ्यन्तम् (पष्टिगुणित चन्द्रविम्वे रविचन्द्रगत्यानरभक्त यद्घट्यादिफल तत्करण- तथ्यो प्रान्त स्यात्) । पप्टिगुण चन्द्रविम्ब गतियुतिहत् (रविचन्द्रगतियोगभक्त ) नदा योगान्त भवति । तत्र लब्धे अस्य पूर्वार्धन निर्गमकाल उत्तरकालेनोत्तर- रवेश । अातिथ्यन्ते, करणान्ते योगान्ते च स्थितो शुचर (ग्रह ) मिश्रफल (पूर्वा रतिथ्यादीना फल) विधत्ते । अतएवानिष्टाना तिथिकरणयोगाना आद्यन्तो नेप्टी (अशुभी), विष्टि (भद्रा) वार (दिन) तिथि , इति व्यहस्पृक्सज्ञक दिन भवतीति । अत्रोपपत्ति अनानुपात यदि ग्रहगतिक्लाभि पप्टिघटिया लभ्यन्ते तदा ग्रहबिम्बकलाभि ग्रविकला किमित्यनुपातेन समागता विम्बघटी तत्स्वरूपम् = ६०X विक ग्रगतिक्ला ग्रहणकला ६० विकला = सक्रान्तिकाल । अन्यग्रहसत्रान्तिकालापेक्षया रविसकान्ति- ग्रहगत्यश स्मृतिपुराणवरिणतोऽनीव पुण्यजनक यदि रविचन्द्रगतियोगेन पष्टिघटिका लभ्यते तदा चन्द्र विम्बालाया किमित्यनुपातेन तिथिकररायो प्रान्तकाल समागच्छति, तव पष्टिगुरिणतचन्द्रविम्बे रविचन्द्रगतियोगभक्तं तदा योगस्य प्राप्तकाल (एक्योगाद् योगान्त रगमन काल ) ममागच्छति, शेप सप्टम् । ब्रह्मगुप्तेन ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते इत्थ कथ्यते- मानार्थान् पष्टिगुगाद निहता-नाडिकादिलब्धेन । राश्यान्तात्प्रागादि पश्चादन्तोकसमान्ते ।। मतान्तिपुण्यकालो यल्लब्ध नाडिकादितद्विगुणम् । म्नानजपहोमदानादिकोऽय धर्मो विशिष्टफल ॥ एव नक्षतान्तात् तिथिकरणान्ताच्छमिप्रमाणार्धात् । पष्टिगुणाविरागिनोभु वत्यलरलब्धघटिकाभि ॥ मिद्धान्तोसरे श्रीपतिनेत्य कथ्यते- पष्टिघ्न मूविम्ब स्फुटगतिविहृत सोऽवसनातिकाल । पुण्य स्मृत्यादिपूफ्नस्त्यजति दिनमणिमण्डने भान्तमेवम् । पष्टिघ्ने चन्द्रबिम्बेऽप्युडुकरणनिथिप्रान्तमन्त युतेर्वा चान्द्रमा भुक्त्येन्दुभान्वोगतियुतिवियुतिभ्या मान्नाडिवादि ॥२८-३०।। इति वटेश्वरमिदान्ते मष्टाधिकारे तिथ्याद्यानयन विधि पष्ठोयाय समाप्त । काल स्पष्टाधिकार. ४३७ हिमा ---अब समान्तिकाल, राशिकरण तिथियोगा का अन्तकाल कहते है । ग्रह- विम्ब को रविचन्द्र के गत्यश से भाग देने से जो घटी आदि फल होता है वह सक्रमणकाल है। रवि का यह सक्रमणकाल बहुत पुण्यप्रद है। रवि अपने मण्डल मे राश्यन्त को छोडते है अर्थात्पूर्वाधं पुण्यकाल से पूर्व राश्यन्त को छोडते है, और परार्धपुण्यकाल परराशि के पूर्व भाग मे प्रवेश करते हैं । चन्द्रविम्व को माठ में गुण कर रविचन्द्र के गत्यन्तर से भाग देने से फ्लकरण और तिथि का प्रान्त होता है। साठ मे गुणित चन्द्रविग्च को रवि- चन्द्र वे गतियोग से भाग देने से योगान्त होता है (लब्धि के पूर्वाध से निर्गमकाल और उत्तरार्ध से उत्तर में प्रवेश) तिथ्यन्त राश्यन्त, करणान्त, योगान्त मे स्थितग्रह मिथफ्ल (पूर्वापर राश्यादिफल) करते है इसलिए अनिष्ट तिथि, करण और योग के आदि और अन्त नेष्ट (अशुभ) है । और विष्टि (भद्रा) दिन, तिथि यह "यहस्पृक् दिन" कहलाता है ॥२५-३०॥ उपपनि यदि ग्रहगति कला में साठ घटी पाते हैं तो ग्रहबिम्ब कला मे क्या इस अनुपात से प्रविक ६०४ ग्रहविर विक विम्बघटी प्रमाण प्राता है =सक्रमण ग्रगतिक ग्रगतिक ग्रहगत्पन काल, अन्यग्रह सक्रान्तिकाल की अपक्षा रवि का सक्रमणकाल बहुत पुण्यद है ।। २८ ।। यदि रवि और चन्द्र के गत्यन्तर मे साट घटी पाते है तो चन्द्र विश्व कला में क्या इस अनुपात से तिथि और वरण प्रान्त प्राता है । और साठ गुणित चन्द्रविम्ब कला में रवि और चन्द्र के गतियोग से भाग देने से योग वा प्रान्तकाल होता है ।। शेष विषय स्पष्ट है । ब्रह्मगुप्त ब्राह्मस्फुटमिदान्त म इस तरह कहते हैं- 'मानार्धात् पष्टिगुणाद्भुक्निहृतान्लाडिवादितब्धेन ।' इत्यादि । सिद्धान्तशेपर मे धीपति इस तरह कहते हैं- 'पष्टिन सूर्यविम्ब स्फुटगतिविहन सोझमक्रान्तिकाल ।' इत्यादि ॥२८.३०॥ इति वटेश्वरसिद्धान्त में स्पष्टाधिकार में तिथ्याद्यानयनविधि नामक छठा अध्याय ममाप्त हुप्रा।
सप्तमोऽध्यायः अथ प्रश्नविधि स्पटगतावपि वच्मि प्रश्नाध्याय मुदे हि देवविदाम् । मतिकुमुदिनी शशाङ्क कुतन्त्रविन्नागसिंहमहम् ॥१॥ विभा-स्पष्टगतावपि (स्पष्टगतिनामफेऽधिकारेऽपि) मतिकुमुदिना नाशाडू (बुद्धिरूपकैरवण्याश्चन्द्रसदृश) कुतन्त्रविनागसिंह (प्रसत्तन्त्रज्ञगज- सिह ) प्रश्नाध्याय देवविदा (ज्योति शास्त्रज्ञाना) मुदे (हर्षाय) अह वच्मि (ब) इति ॥२॥ हि भा-स्पप्रगति नामक प्रधिकार म भी बुद्धिरूप कुमुदिनी के पद सहा और प्रसत् तत्र के जानन वाले व्यक्ति विशेष रूप हाथी के लिए सिंह स्प प्रश्नाध्याय को ज्योतिषियो के हर्ष के लिय मैं कहता हू॥१॥ इदानी प्रश्नानाह। कोट्यशक्यं कुरुते भुजज्या बाह्व शकर्वेत्ति च कोटिजीवाम् । बाहुज्ययाऽग्रा हि तया च दोा जानात्यसौ स्पष्टगति ग्रहाणाम् ॥२॥ वि भा–य कोटय शव जज्या कुरुत तथा वाह्य शक (भुजा) कोटि जीवा (कोटिज्या) वाहुज्यया (भुजज्यया) अग्ना (कोटिज्या) तथा तया (कोटि- ज्यया) दोया भुजज्या कुरते असौ ग्रहारणा स्पष्टगति जानातीत्यह म ये ॥२॥ एतदुत्तरार्थमुपपत्ति वोटिचापतो भुजज्याज्ञान यथा ६० कोट घशभुजारा, ज्यासाधनरीत्यै त्यस्य ज्या भुजज्या भवेत एव ६०=भुजाशकोटयश ज्यासाधनेन कोटिज्या भवेत् । तथा भुजग्याज्ञानेन वि'-भुजज्या कोटिज्या, तथा कोटिज्याज्ञानेन त्रि-कोटिज्या भुजज्या मत सिद्धम् ।।
स्पष्टाधिकारः
प्रब प्रश्न कहते हैं।
हि. भा -जो व्यक्तिविशेष कोट्यम से भुजज्या जानते है, और भुजाश से
वोटिज्या जानते है, भुजज्या से कोटिज्या जानते हैं. कोटिज्या मे भुजज्या जानते है वे
ग्रहो की स्पष्टगति को जानते हैं ।।२।।
इनके उत्तर के लिये उपपत्ति
कोट्यश से भुजज्या ज्ञान, E-कोट्यश-भुजारा ज्यासाधन नियम से इसकी
ज्या भुजज्या होती है, इसी तरह ६०-भुजारा-कोट्यश इसकी ज्या कोटिज्या होती है ।
भुजज्या ज्ञान से नि' भुजज्या कोटिज्या। तथा कोटिज्या ज्ञान से नि'-कोटिज्या'
=भ जज्या इस तरह सब प्रश्नो के उत्तर हो गये ॥२॥
पुनरम्यान प्रश्नाना।
क्रमज्यया स्वोत्क्रममौविकां तथा निजक्रमज्यां श्रवरणं विना ग्रहम् ।
भुजज्यया च श्रवणाच कोटिका तयाच दोा कुरुते स धीवरः ॥३॥
घि भा --क्रमज्यया (ज्यया) स्वोत्क्रममौविका (भुजाशोत्नमज्या) कोटिज्यया
कोट्युत्क्रमज्या तथोकमज्यया निजक्रमज्या, श्रवण (कर्ण) विना भुज-
ज्यया ग्रहम्, श्रवणात (कर्णात ) कोटिका (कोटि ) तया (कोटिक्या) दोऱ्या
(भुजज्या) य. कुरुते स धोवर (बुद्धिश्रेष्ठ ) अस्तीति ॥३।।
एतदुत्तरार्धमुपपत्ति ।
उत्क्रमज्याज्ञानेन (व्यास - उज्या)x उज्या-क्रमज्या मूलेन
V(व्यास-उज्या) उज्या-कमज्याक्रमज्याज्ञानेनोरक्रमज्याज्ञान ज्या व्यासयोगा-
न्तरघातमूलमित्यादिनोत्क्रमज्याज्ञान भवेदेव । अथवा त्रि-पोट्युत्क्रमज्या =
भुजज्या । त्रि-कोज्या-भुजोत्तमज्या एव नि-भुजोकमज्या-कोटिज्या, नि
-भुजज्या कोट्युत्क्रमज्या ।'
तथा कर्णज्ञानेन स्पष्टकोटिज्ञानम् । मृगकर्यादिवेन्द्रवशास्पप्टा पोटि =त्रि-
अन्त्यफलज्या /कर्ण' -भुजज्या'म्पप्टकोटि । वा /कर्ण-स्पष्टको'
भुजज्या ।।::सिद्धम् ।।३।।
मय अन्य प्रदनो को रहते हैं।
हि भा.जमग्या से अपनी उस्लमग्यायो तया उत्तमज्या से अपनी मन्या की
विना कणं ये भूजज्या से यह यो, पर्श से स्पष्टकोटि को, सप्टकोटि से भुजग्या को जो
जानते हैं दे मच्छो युधि वाले हैं ॥३॥
वटेश्वर-सिद्धान्ते
इनके उत्तर के लिये उपपत्ति
(व्यास-उज्या) उज्या=कमज्या' मूल लेने से /(व्या-उज्या) उज्या=कमज्या
इससे उत्क्रमज्या ज्ञान से क्रमज्या ज्ञान हो गया, अब क्रमज्या ज्ञान से 'ज्या व्याम योगान्तर
घातमूल' इत्यादि से उत्क्रमभ्या ज्ञान हो जायेगा, अथवा त्रि-कोट्युत्क्रमज्या = मुजज्या,
त्रि-कोज्या = भुजोत्क्रमज्या, त्रिभुजोत्नमग्या कोटिज्या, त्रि-भुजज्या=चोट्यु-
रक्रमज्या।
फज्या
पर्णज्ञान में स्पष्ट बोटिज्ञान मरादि प्रौर क्वर्यादिवेन्द्रवश स्पप्टको-त्रि+अन्त्य.
/कणं'-भजज्या = स्पष्टको । १/वर्ण-स्पो' =भ जज्या ..सिद्ध हो
गया ॥३॥
पुनरन्यप्रश्नानाह ।
स्पष्टमेव खचर | राशितो वेत्ति वाभिहितसे चरोदये।
अश्विनस्य खलु वा प्रसाधपेद्यः स वेत्ति विमला स्फुटां गतिम् ।।४।।
वि भा ---यो धुराशित (सहगंणात ) स्पष्टमेव खचर (ग्रह) वेत्ति, वा
अभिहितखेवरोदये (कथितग्रहोदयकाले) वा अश्विन्ययोदयिके प्रसाधयेत् म
विमला स्फुटा गनि वेतीति एतदुत्तर यद्यपि पूर्व कथितमपि तथाप्युच्यते ।
इप्टग्रहभगणरहगण सगुन कुदिन जेद्य लुब्धा भगरणास्ते प्रयोजना-
भावात्याज्या शिष्ट ग्रहभगण शेप ग्राह्यम् । एवमुच्चभगणरहर्गण सगुण्य
कुदिनर्भक्त्वा ये लब्धा भगणास्ते त्याज्या शिष्ट भगणशेष ग्राह्य तद्ग्रहभगणशेषे
शोध्य तदा केन्द्रभगणशेष भवेत् । ततोऽनुपात क्रियते यद्य कस्मिन् भगणे
चत्वारिपदानि लभ्यन्ते तदा भगणशेषे विमित्यनुपातेनाऽऽगतानि पदानि ४४ भने
कुदिन
तत एकस्मिन् पदे यदि राशिनय लभ्यते तदा शेपे किमित्यागतास्तत्सम्बन्धिनो राश-
यस्ततो भुजकोटिसाधन कार्यम् । ततो मन्दभुजफलशीघ्रभुजफलाभ्या गुणितानि
कुदिनानि भगणकलाभिभक्तानि लब्धफलहनगणशेष सस्कृत तदा स्पष्ट भगरणरोप
भवति । ततो भुजान्तरचरफलदेशान्तरफलानि कुदिनभक्तानि यानि फलानि भवे-
युस्तै संस्कृत पूर्व भगरणशेप स्फुट भगणशेष भवेत्तस्मात्स्फुटभगणशेपा यो ग्रह
पानीयते स स्फुट एव भीमादिग्रहो भवेदिति ।
शेषप्रश्नोत्तरार्थमुपपत्ति ।
मध्यमार्कोदयकालिकग्रहा भुजान्तरसस्कारेण स्पष्टार्कोदयकालिका भवन्ति
निरक्षदेशे पुना रविचरासुभि स्वदेशे स्पष्टार्कोदयकातिका भवन्ति, इत्थमिष्टमध्यम-
स्पष्टग्रहान्त रकलाभिस्तदुत्पन्नासवो रविवदिशेदयिकभुजान्तर साध्य रविवत्स्व-
चरासुभि (इष्टग्रह्मरासुभि ) स्वचालनफल साध्य तत्सस्करणेन स्वदेशे स्पष्टेष्ट-
ग्रहोदयकालिका ग्रहा भवन्ति, यद्यश्विन्यौदयिका स्पष्टग्रहा अपेक्षितास्तदा नक्षत्रस्य
फलाभावाद् भुजान्तर न भवतीति ॥४॥
स्पष्टाधिकार
४४१
अव अन्य प्रश्नो को कहते हैं
हि भा-जो व्यक्ति विशेष महर्गरण से स्पष्टग्रह को जानते हैं, या कथित ग्रहोदय
काल में या अश्विनी के उदयकाल म साधन करते है वे ग्रह को स्पष्ट गति को जानते
हैं ||४||
इसका उत्तर पहले कह चुके है तथापि यहाँ पुन कहते हैं
इष्ट मध्यग्रह भगण को अर्गण से गुण वर कुदिन से भाग देने पर लब्ध भगए
को छोड देना, शेप ग्रहभगण शेष ग्रहण करना । इस तरह उच्च के पठित भगरण को अहगरा
से गुण कर कुदिन से भाग देने से जो भगणफुल हो उसको छोड कर भगण शेष ग्रहण
करना । इस भगरण शेष को ग्रह भगण शेष म घटाने से केन्द्र भगण शेप होता है । तव
अनुपात करते है यदि एक भगरण म चार पद पाते हैं तो भगण शेप म क्या इस अनुपात म
पद प्रात हैं।
४xभशे
फिर अनुपात करते हैं यदि एक पद म तीन राशिया पाते हैं तो शेप
कुदिन
मे क्या शेप सम्बन्धी राशियो के प्रमाण पाते है इस पर से भुजज्या कोटिज्या का ज्ञान सुलभ
है । तब मन्दभुजफल और शीघ्रफल से मुणित कुदिन को भगण क्ला से भाग देने से जो
फल होता है उसको भगण रेप म सस्कार करने से वास्तव भगणशेष होता है । उसके
बाद भुजान्नर फल, चरफल देशान्तर फल को पूर्ववत् कुदिन स भाग देने से जो फ्ल होता
है उसको पूव भगरण शेष में सस्कार करने स स्फुट भगणशेष होता है। इम स्पुट भगण
शेष से जो ग्रह पाते है सो स्पष्ट ही कुजादिग्रह होते हैं ।
शेप प्रश्नो के उत्तर के लिए उपपत्ति
मध्यमार्कोदयकालिक ग्रहो को भुजा तर सस्वार से स्पप्टार्योदय कालिक करते हैं
निरक्ष देश म फिर चरफल के द्वारा स्वदेश में स्पप्ठार्कोदय कालिब करते हैं। इस तरह इष्ट
मध्यमग्रह और स्पष्टक्ला जनित असु रवि की तरह इष्टोदधिक भुजालर साधन करना और
सूप की तरह इष्टग्रह चरासु से अपना चालनफन साधन करना तव उसके सस्कार करने से
इष्ट ग्रहोदयकाल म ग्रह होते है । यदि अश्विन्यौदयिक ग्रह अपेक्षित है तो नक्षत्र के
फलाभाव के कारण भुजान्तर नही हाता है ॥४॥
इदानीमन्यान् प्रश्नाना ।
ज्याभिविनय कुरुते भुनकोटिजीवा चाप च यत्फुटखग च करोति मध्यम् ।
तुङ्गात्तयोच्चगतिमध्यगतो स्फुटा वो चेष्टा करामलकवासदास वेति ॥५॥
विभाज्याभिविनंव यो भुजकोरिजीवा तथा चाप परोति, तुङ्गात्
(उच्चात्) स्फुटखग (स्पष्टग्रह ) मध्य परोति स करामलक्वद्युसदा (ग्रहाणा)
चेष्टा (गति) वेत्त्यन्यत्म्पष्टम् ॥५॥
व्याद वटेश्वर-सिद्धान्ते एतदुत्तरार्थमुपपत्ति। यदि व्यासाघे भुजज्या लभ्यते तदा द्विगुरित व्यामार्धे किं जाताद्विगुणित- व्यासार्धं भुजज्या तत्स्वरूपम् = ज्याभु २ व्याद = २ ज्याभु । अत कस्मिन्नपि व्यासार्धे द्विगुणभुजाशाना या पूर्णज्या संव द्विगुणित तव्यामा भुजज्या भवतीति। पष्ट्रिव्यासार्धं द्विगुणितभुजाशाना पूर्णज्यासाधनार्थ स्वल्पाल रतो व्यासम्निगुण परिधि =३६० । ततश्वनाशश्वकममचापीयमान लभ्यते तदा द्विगुणभुजारीः कि लब्ध तच्चापमानम् = २ भु. ततश्चापोननिघ्नपरिधि प्रथमादयः स्यादिन्यादिना १२० व्यासे द्विगुणभुजाशपूर्णज्या जाता, १२० त्रिज्याया भुजज्या _ (३६०-२९) २ ४४४ १२० ३६०१४-१- ( ३६०-२भु ) २भु (५८०-भु) भु ४१६४ १२० ३६०४३६०४५ -( १८०-भु) भु४४ (१८०-भु) भु १२० ६०४३६०४५ (१८०-भु) भु ४ ४ %3- (१८०-भु) भुX १२० १०१२५- (१८०-भु) भु ततो यदि खामितत्रिज्यायामिय ४ भुजज्या तदेष्टविज्याया किमिति जाता भुजज्या= (१८०-भु) भु त्रि १०१२५ -- ( १८०-भ) भु (१८०--भु)भु नि४४ ८०५००-१०-भु)भु - (१८०४भु-भु) नि १०१२५--(१८०४ भु-मु') -भुजज्या . सिद्धम् । एव कोटिचापवगतोऽपि भवेदिति । हिमा-ज्या विना जो व्यक्ति विशेष भुजग्या और वोटिज्या लाते हैं तथा चाप नाने हैं, और उच्च मे स्पष्ट ग्रह को मध्यम करते है अर्थात् उच्च प्रौर स्पष्ट ग्रह से मध्यमग्रह साधन करते हैं वह ग्रह स्पष्टगति को जानने हैं । शेप स्पष्टार्थ है ॥शा इनके उत्तर के लिए अपत्ति । यदि च्यामाधं में भृजग्या पाते हैं तो द्विगुणित व्यामार्घ में क्या दम अनुपान से स्पष्टाधिकार. ४४३ द्विगुणित व्यामा मे भुजज्या पाती है। ज्याभु २ व्याद । २ ज्याभु । व्याद= व्यासदल व्याद इसलिए किसी भी व्यासाचं मे द्विगुरिणत भुजाश की जो पूर्णज्या होती है वही द्विगुणित उस व्यासार्थ मे भुजज्या होती है । ६० व्यासार्ध मे द्विगुणित भुजाश को पूर्णज्या साधन के लिए स्वल्पानर से त्रिगुणित व्यास=परिधि-३६० । तव अनुपात करते हैं यदि चक्राश में चक्रतुल्य चापीय मान पाते हैं तो द्विगुरिणत भुजारा में क्या प्रा जायगा उस चाप के मान-२ भु । तव 'चापोननिधनपरिधि प्रथमाह्वय स्यात्' इत्यादि से १२० व्यास मे द्विगुण भुजाश को पूर्णज्या हुई । १२० त्रिज्या मे भुजज्या- (३६०-२ भु) २ भु४४४१२० { १८०-भु )मु४१६४१२० ३६०४:-(३६०-२भु)२भु ३६०४३६०४५ -(१८०–भु)भु४४ (१८०-भु)४१२० (१८०-भु)भुx १२० ६.x३६०४५ ( १८०-भु ) भु १०१२५– (१८०-भु %3- यदि १२० ४ त्रिज्या मे यह भुजज्या पाते है तो इष्ट त्रिज्या मे क्या आ जायगी भुजज्या= (१८०-भु) भु त्रि (१८० --भु) भु निx४ १०१२५-( १८०-भु ) ४०५००-(१८०-भु) भु %3- ४ (१८०४ भु-भु) नि १०१२५--(१८०४ भु-भु) =भुजज्या, इसी तरह कोटि चापवश करके कोटिज्या होगी। :. सिद्ध हो गया। द्वितीयप्रश्नस्य (ज्यातश्चापानयस्य) उत्तरार्थमुपपत्ति । पूर्वप्रकारेण (१८०-मु)भु त्रि ४ ४०५००-(१८०-भु)भु --भुजज्या, छेदगमेन (१८० --भु)मु नि ४--भुजज्या ४४०५००-भुज्या (१८६-भु)भु ममयोजनेन (१८०-मु)मुनि ४+भुज्या (१८०-मु)मु = भुज्या ४०५०० =(१८०-) (४ नि+मुग्या) भुग्याX४०५०० =(१८०-४) भु= मुज्या १०१२५ अनि+मुज्या वि+भुज्या प्रत भुज्याx१०१२५ १८०xभु-पक्षी (-१) मुग्गितौ तदा- =मु'-१८०४भुल +मुग्या वटेश्वर-सिद्धान्ते भूज्या १०१२५ प्रत त्रि+भज्या =ल । नत मु-१८०४ भु+ल=" पर भु-१०/६०-ल सिद्धम् । द्वितीय प्रश्न (ज्या मे पागनयन) के उत्तर के लिए उपपत्ति । पूर्व प्रकार से (१८०-मु)भु ति ४४ ४०५००-(१९०-भु)भु भुजज्या । छेदगम करने से (१८०-भु)भु त्रि ४=भुज्या ४०५००-भुज्या (१८० -मु)भ समयोजन से (१८०-भु)भु त्रि ४+ मुग्या (१८०-भु)भु-भुज्या ४४०५०० = (१८०-भु)भु (४ त्रि+भुन्या) मन मुज्या X १०५०° = (१८०-भु)भु = शुन्या १०१२५ =१८०xभु-भुल ४ नि+ज्या त्रि+भुज्या यहा मुज्या १०१२५ ज! ममगोधन करने से भु–१८०४ भु+ल. त्रि+भुज्या प्रत मु=६०/६० प्रत मिद हो गया। तृतीयप्रश्नस्य (उच्चम्पष्टग्रहैर्मध्यमग्रहानयनम्य) उत्तरार्थमुपपत्ति । शीघ्रात्म्सप्टग्रहोनाच्चलपलमखिलमित्यादिना पूर्व स्पष्टग्रहमानान्मध्यम- ग्रहानयनमाचार्येण कृतमस्ति, एतदुपपत्तिश्च मया तत्र लिखिता, ब्रह्मगुप्तेन भास्करा- चार्येण चासकृत्प्रकारेण स्पष्टग्रहान्मध्यग्रहानयन कृतमस्ति, एतेन ग्रन्थकारेणा- प्यसकृत्प्रकारेरणव तदानयन कृतम् । स्पष्ट ग्रहेण रहित मोनोच स्पप्टवेन्द्र भवति ततोऽनुपातस्त्रिज्यया यदि स्पष्टकेन्द्रज्या लभ्यते तदाऽन्त्यफलज्यया कि समागच्छति सवृदेव स्पष्टा शीनफ्लज्या तन्नाप वास्तवमेव गोध्रफलम् । ब्रह्मगुप्तादिकथित- सप्टोनिया जमतो मन्दोच्चरहिलस्पष्टवेन्द्रतो यदा पुन पुनम्तदेव मन्दफलमाग- च् तदा बियासमाप्ति । आन्तिमम्पप्टग्रहाद् यन्मन्दपल तदेवोपान्तिमतुल्यान्य- स्पष्टग्रहाच्चातो मन्दोच्चरहितस्पप्टकेन्द्रत सकृदेव वास्तव मन्दफल भवति ब्रह्म- गुप्तादिभिवंटेश्वरेण न न्यर्थ मेवामद्विधि प्रतिपादित इति ॥५॥ पर तृतीय प्रश्न (उच्च भोर स्पष्टपह से मध्यमग्रह ज्ञान) के उत्तर के लिये उपपति । मोघ्राम्पष्ट ग्रहोनान्चनपनमवितम् इत्यादि मे पहले स्पष्ट ग्रह मे मध्यम ग्रह शान प्राचार्य ने किया हुआ है उसकी उपपनि वहा हम लिख चुके हैं। ब्रह्मगुप्त भास्व राचार्य और ये मन्यवार भी पमन् प्रकार में स्पष्टप्रद म मध्यमग्रह का ज्ञान दिया है। शीघ्रोध में स्पष्टाधिकारः स्पष्टग्रह को घटाने स स्पष्ट केन्द्र होता है तव अनुपात करते है यदि त्रिज्या में स्पष्ट केन्द्रज्या पाते है तो अन्त्यफलज्या में क्या इस अनुपात से सकृत् ही ( एक ही बार मे ) स्पष्ट शोध फलज्या आती है, इसका चाप वास्तव शीघफन है। ब्रह्मगुप्तादि स्पष्टीकरण क्रियाक्रम से मन्दोच रहित स्पष्ट केन्द्र से जब बार-बार वही मन्दफ्ल पाता है तव क्रिया की समाप्ति होती है । उपान्तिम स्पग्रह से जो मन्दफल होता है वही उपान्तिम तुल्य अन्तिम स्पष्टग्रह से भी, इमलिए मन्दोच रहित स्पष्ट केन्द्र से सकृत् ही वास्तव मन्दफन होता है । ब्रह्मगुप्तादि प्राचायो ने व्यर्य हो असकृत् प्रकार कहा है। इति ॥५॥ इदानीमन्यौ प्रश्नावाह । त्रिज्यासमः कोशि शीघ्रकेन्द्र कर्णो भुजज्यासदृशाच्च कस्मिन् । ब्रूहि स्फुटां वेत्सि यदि ग्रहाणां चेष्टा तथाऽग्रान्त्यफलज्यया च ॥६॥ वि.भा-कोशि शीघ्रकेन्द्र विज्यासम (त्रिज्यातुल्य.) कर्णो भवेत् । कस्मिन् शीघ्रकेन्द्र भुजज्यासहश. (केन्द्रज्यातुल्य ) शीघ्रकर्णो भवेत्, यदि ग्रहाणा स्फुटा चेष्टा (स्पष्टगति) स्व वेसि तदा ब्रूहि (कथय) तथाऽग्रान्त्यफल- ज्ययेत्यस्याग्रिमश्लोकेन सम्बन्ध इति ॥६॥ प्रथमप्रश्नस्योत्तरार्थमुपपत्ति । यदा कक्षावृत्तशीघ्रप्रतिवृत्तयोर्गोगबिन्दौ ग्रहस्तदा तत्र त्रिज्यानुल्यः शीघ- कर्णो भवति, तत्र शीघ्रकेन्द्र प्रमाण कियदिति विचार्यते कक्षावृत्तप्रतिवृत्तयो सम्पातस्य द्वितीयपदे स्थितत्वात्तत्र कर्णवर्गस्वरूपम् = त्रि'+अ फज्या'--२ अफज्या. केकोज्या=कर्ण'। यदि कर्ण-नि तदा त्रि-अ फग्या'-२ अफज्या केकोज्या-तिसमशोधनेन अफज्या'-२ अफज्या के कोज्या-नि-त्रि'30 समयोजनेन अफज्या अफज्या-२ अ फज्या के कोज्या तत अफज्या-२ केकोज्या.:. २ =केकोज्या चापकरणेन. =केकोटि =80-शीकेन्द्र : शोकेन्द्र-१०+ २ एतेन सिद्ध यद् यदैतत्तुल्य शीघ्रकेन्द्र भवेतदा तत्र विज्यातुल्य शीघ्रकों भवेदिति । अथ द्वितीयप्रश्नो (को दृशे शीघ्रकेन्द्रशीघ्रकेन्द्रज्यातुल्यः शोधकर्णः) तरायं- मुपपत्तिः । अथ कर्णवर्गस्वरूपम् =केन्द्रज्या तदा वि+प्रफज्या-२ अंकज्या. केकोज्या= कर्ण यदि कर्ण केन्द्रज्या तद्रा त्रि+अफज्या-२ अफज्या. फेकोज्या कर्ण' -शीकेन्द्रज्या =नि केकोज्या , प्रफल अफल % 3D २
%3D0
वटेश्वर-सिद्धान्ते
समशोधनेन
अफज्या-२ अफज्या वेकोज्या:-केकोज्या समयोजनेन
अफज्या-२ नफज्या कोज्या+कोज्या=(केवोज्य -प्रपज्या)
मूलेन।
वेकोज्या-अन्त्यफच्या केकोज्या -अपज्या तत
ज्या=
अफकोज्या वा शोकेन्द्रज्या=अन्त्यफ्लको, एतेन मिद्ध यद्यप्रान्त्यफलकोटितुल्य
शीघ्रकेन्द्र भवेत्तत्र शीघ्रकेन्द्रज्यातुल्य शीघ्रको भवेदिति ॥६॥
अब दो अन्य प्रश्ना को कहते हैं।
हिमा-क्तिने शीघ्र द्रम त्रिज्या तुल्य गीन वरण होता है । और क्तिने शीघ्र केन्द्र
मे शीघ्र के द्रज्या तुन्य शीघ्रवणं होता है । 'अग्रान्त्यफाज्यया च' इसको अगले श्लोक व
साथ सम्बध है ॥६॥
प्रथम प्रश्न (त्रिज्यातुल्य शीघ्रवर्ण क्तिने भीघ्रवेन्द्र म हाता है) के उत्तर के
लिय उपपत्ति।
जब कक्षावृत्त और शीघ्र प्रतिवृत्त के योग बिंदु में ग्रह रहते हैं तो त्रिज्या
तुल्य शीघ्रर्ण होता है। वहा नीघ्र केन्द्र प्रमाण क्या है इसके लिये विचार करते हैं ।
कक्षावृत्त और प्रतिवृत्त के योगविन्दु द्वितीय पद में हैं इसलिए वहा शीतकण वर्ग=त्रि
+अरुग्या-२ अफज्या वेकोज्यावरण' जव कर्णपि तव विप्रपन्या'-२अफयो
केकोज्याकरण-वि' समशोधन करन से म फ्ज्या'-२ अफज्या वेकोज्या=0
२ अफज्या =२ अफ्ज्या केकोज्या वा अफ्ज्या=२ केकोज्या तव
मपन्या
-वोग्या
२
प्रफल
प्रपन्न
चाप करने से
=के द्रकोटि =१०-वेन्द्र १०+ केद्र इमसे सिद्ध हुमा जहा.
२
२
पर प्रत्यफलाध युत नवत्या तुल्य दोघ्रकद्राग होगा वहीं त्रिज्या तु य शीघ्र वरण
होता है ।।
प्रव द्वितीय प्रश्न (क्तिने शीघ्रकेद्र में शीघ्र केन्द्रज्या तुल्य शीघ्ररण होता है)
के उत्तराय उपपत्ति ।
पहल
वरण
वग-त्रि
+अफज्या'-२ अफ्ज्या केवोज्या-
कण', यदि कर्सशी द्रग्या तव त्रि+अ फग्या'–२ प्रपज्या वेकोज्या शोकज्या:
निवेकोग्या' समशोधन करने से अफज्या-२ ज्या कोज्या=
=-ककोज्या
समान जोडने से
म फग्या-२ म फज्या केकोज्या+केकोज्या. मूल
लेने से
केकोज्या-म फल्या = मेरोग्या-मज्या वा शीघ्र केद्रप्रफल वोटि
इसस मिद हुमा कि जहा पर अन्त्यफल कोटि के बराबर शीघ्र केद्र होता है वही पर शीघ्र
केद्रग्या तुत्य शोनाए होता है ॥६॥
स्पष्टाधिकार इदानीमन्यान् प्रश्नानाह । केन्द्रमिष्टफलस्ततोऽथवा तद्ग्रहस्य गहश्यकेन्द्रके। वकेन्द्रमनुवक्र केन्द्रक तदिनानि गरणक स उच्यते ॥७॥ विभा -अग्रान्त्यफलज्यया केन्द्रमिष्टफलतोऽथवा ग्रहम्य दृगदृश्य केन्द्रके (उदयास्तकेन्द्राशके) वकेन्द्र (वक्रारम्भकालिककेन्द्राश) अनुव केन्द्रक तद्दिनानि च यो जानाति स गणक (ज्योतिवित्) उच्यते (कथ्यते) । वारम्भकालिककेन्द्रा शा ३६० एभ्यो विशोधितास्तदाऽनुवक्र (मार्ग) केन्द्राशा भवेयुस्तदिनानि(वानुवन दिनानि) यो जानाति स गणक कथ्यते ॥७॥ अथ तद्ग्रहस्य दृगहश्यकेन्द्रकेएतदुत्तरार्थमुपपत्ति । कुजगुरुशनीना शीघ्रोच्चरविरेवास्ति, तस्मात्तेपा ग्रहाणा शीघ्रोच्चस्थाने परमास्तो भवेत् ततोऽनन्तर शीघ्रगतित्वाद्रविस्ततोऽग्रतो गच्छति यदा कालाशतुल्य मन्तर भवेत्तदा रविमामीप्यवशेन रात्र्यन्ते तेपा पूर्वदिश्युदयो दृश्यते तेन कालाश तुल्ये सप्टकेन्द्राशे यच्छीघ्रफन तद्युता कालाशास्तदुदयशीघ्रकेन्द्राशा भवेयु । यथा रखे शोघ्रोच्चत्वात्स्पष्टकेन्द्राशा =कालाशा । ततोऽनुपातो यदि त्रिज्यया स्पष्ट- केन्द्राशज्या (कालाशज्या) लभ्यते तदाऽन्त्यफलज्यया किमित्यनुपातेन कालाशज्या अन्त्यफज्या अस्थाश्चापम्न - कालाशयुत तदा तेपा नि कुजगुरुशनीनामुदयकेन्द्राशा = कालाश+फ बुधशुयोर्मध्यगरविसम एव मध्यम मध्यममेव मन्दस्पष्ट प्रकल्प्य स्वस्वस्पप्टेन बुधेन शुक्र ण वा कालागतुल्येऽन्तरे पश्चिमाया तदुदयोऽवलोक्यते प्रथमपदे तत कालाशज्या नि =स्पकेज्या अस्याश्चाप कालाशसहित तदा पश्चिमोदये तत्वेन्द्रा शा भवन्ति । द्वितीयपदे च वक्रीभूय तनव चास्त गच्छत । तृतीय पदे तदुदय पुन दृश्यते नीचस्थाने तयो परमास्त गतत्वात् । पूर्वदिशि सत्यवशेपे स चोदया दृश्यते । चतुर्थे पदे कालागान्तरस्थयोस्तयोस्तत्रैवास्ताविति । तेन पूर्वोदयकेन्द्राशा -स्पके+(१८०-कालाश) प्रथमपदे बुधशुक्यो पश्चिमोदयश्चतुर्थपदे च पूर्वदि. श्यस्तस्तृतीयपदे पूर्वदिभ्युदये द्वितीयपदे च पश्चिमास्त स्यात् । तेन पश्चिमोदय. केन्द्राशोनभाशा पूर्वदिशि पूर्वोदयकेन्द्रागोनभाशा पश्चिमदिशि तदम्तकेन्द्राशा भदन्तीति ॥ तद्दिनानीत्यस्योत्तरार्थमुपपत्ति । यदि केन्द्रगत्येक दिन लभ्यते तदास्तोदयान्त केन्द्रक्लाभि किमित्यनु- पातेन यानि दिनानि समागच्छन्ति तान्येव तद्दिनानीति । तथा वनानुवकान्त, केन्द्रकलाभिश्च पूर्ववदनुपाते नानुवक्वक्रदिनात्यागच्छन्तीति ॥७॥ फलज्या % 3D अफलज्या ४४८ वटेश्वर-सिद्धान्ते कालाशग्यामन्यपज्या अब अन्य प्रश्नो को कहते हैं । हि.भा--प्रग्रा (केन्द्रकोटिज्या) और अन्त्यफ्लज्या से केन्द्र उस पर से इटपल उसमे ग्रह के दृश्यवेन्द्र (उदयपेन्द्र) अदृश्यकेन्द्र (अस्तकेन्द्र), वकवेन्द्र और अनुवक्रयेन्द्र, और उनके दिन, (उदयास्तदिन, बवानुवादिन) को जो जानते हैं वह अच्छे ज्योतिषी हैं ॥७॥ ग्रह के उदयास्त केन्द्राशानयन के लिये उपपत्ति कुज, गुरु और शनि इनवे मोघोच्च रवि है, इसलिये शीघ्रोच्च स्थान में उन ग्रहो के परमास्त होता है उसके बाद उन ग्रहों से रवि शीघ्रगति होने के कारण उनसे आगे जाते हैं जब उन ग्रहो के साथ कालाश तुन्य अन्तर होता है तव रवि के माथ समीपता के कारण रात्रिशेष मे पूर्वदिगा म उन ग्रहो के उदय देखते हैं । अत कानारा तुल्य स्पष्ट केन्द्राश में जो शीघ्रफल होगा उसको कालारा म जोडने से उनके उदयशीघ्र केन्द्रास होते हैं, यथा रवि के शीघ्रोच्च होने के कारण स्पष्ट केन्द्राश-कालाश तव अनुपात करते हैं यदि त्रिज्या में स्पष्ट केन्द्रज्या (कालागज्या) पाते हैं तो अन्त्यफ्लग्या मे क्या इस अनुपात से फलज्या पाती है। -फ्लज्या । इसके चाप को कालास में जोडने से उन ग्रहो के उदय केन्द्रास होते हैं, कालाश+फ्ल-उदयकेन्द्राम, बुध और शुक्र के मध्यम रवि ही मध्यम है मध्यम ही को मन्दम्पष्ट मानकर अपने अपने स्पष्ट बुध, या शुक्र से कालाश तुल्य अन्तर कालाग्यात्रि पर पश्चिम दिशा में उनके उदय देखते हैं प्रथम पद में । प्रत 'सज्या इमके चाप में कालाम जोडने से उनके पश्चिमोदय केन्द्राश होते हैं । द्वितीय पद में वक्र होकर वे वही मस्त होते हैं । तृतीय पद में उनके उदय फिर देखते हैं नीच स्थान मे उन दोनो के परमात्त होने के कारण, पूर्व दिशा में रात्रिरोप में वह उदय देखते हैं । चतुर्थपद मे पाला- शान्तरित पर स्थित होने मे वही पर प्रस्त होते हैं । इमलिये पूर्वोदय केन्द्रारा स्पके+ (१८०–कालारा) प्रथम पद म दुध और शुक्र के पश्चिमोदय और चतुर्थ पद में पूर्व दिशा मे अस्त, नृतीय पद में पूर्व दिशा म उदय, द्वितीय पद म पश्चिमास्त होते हैं । इसलिये पश्चि- मोदय केन्द्रारा को ३६० में घटाने से पूर्व दिगा मे और पूर्वोदय केन्द्रास को ३६० में घटाने से पश्चिम दिशा में प्रस्त केन्द्रास होते हैं। अब उदयास्त और वक्रानुवदिन ज्ञान के लिये उपपति। यदि केन्द्रगति में एक दिन पाने है ता उदयास्तान्त. केन्द्रकला म क्या इस अनुपात से उदयास्तदिन पाते हैं । एवं वनानुवक्रान्त केन्द्राला पर मै पूर्ववत् अनुपात मे वज्ञानुवक दिन प्राते हैं ॥७॥ यत्रवेन्द्रमनुवनवेन्द्रमिति प्रश्नोत्तरार्धमुपपत्ति । वक्रारम्भो द्वितीयादे नीचासन्ने भवतीनि पूर्वप्रदर्मितमस्ति, अथ वक्रारम्भ- मालिक्सोप्रवेन्द्रासानयनाथं तसोटिज्याप्रमाण= य कल्प्यते । प्रपच्या स्पष्टाधिकार ४४३ -स्पष्टगतिप्रन केगः-शीघ्रकेन्द्रगति कर्ण उग-- (त्रि'- तर कण-त्रि+अफज्या =२ अफज्या य । फलाशखाधान्त रशिञ्जिनीनी द्राककेन्द्रभुक्तिरित्यादिना उग- फकोज्या का शीक उगम =शीघ्रोच्चगति शोक-शीघ्रकर्ण -क द्राक् केन्द्रकोटि मौान्त्यफलज्या गुणया क्रमात् । मृगकर्यादिके केन्द्र युतोना त्रिज्यकाकृति । शीघ्रकर्णहृता लब्ध फलकोटिज्यका भवेत् । इति सशोधकोक्तटिप्पण्या यअफज्या -फलकोज्या तत स्पष्टगतिस्वरूपे उत्थापनेन -य. ज्या)केग (त्रि' --य अफज्या) केग स्पग-उग--- नि+अफज्या -२ फज्याय (त्रिकेग-य अफज्या वेग) =उग-- निअफज्या =0 (वक्रारम्भे ग्रहगति 1-0 भवति) -२अफज्याय उग नि+उग अफज्या'--२ अ फज्या य उग-त्रि केग-य अफज्या केग स्पग-० त्रि+अफज्या-२ अ फज्या य छेदगमेन उग त्रि+उग अफज्या-२ अफज्याय उग- -त्रि केग-य अफज्या केग दोनो पक्षो मे समान जोडने से उग नि+उग अफज्या उग-२ अफज्या य उग-वि केग+ य अ फग्या केग समशोधन करने से उग नि-त्रि केग+उग अफज्या =२ अफज्या य उग- .य अफज्या केग =धि' (उग-केग)+उग+ फज्या=य अफज्या (२ उग-केग) = नि'x मस्पग+ उग अफज्या'==य अफज्या (उग+उग-केग) =य अफज्या (उग+मस्पग) वि.मस्पग+ उग अफ्ज्या निमग+उग अफज्या प्रत अफज्या (उग+मस्सग) अफज्या (उग+ मग) अत्र स्वल्पान्तरात् मन्दस्पगति मध्यगति । अस्याश्वाप नवतियुत तदा वक्रारम्भे केन्द्राशा भवेयुरिति ॥ वक्वेन्द्राशा ३६० एभ्यो विशो पितास्तदा नुवन (मार्ग) केन्द्राशा भवन्ति । ततो वनानुवऋदिवसज्ञान सुलभमेवेति ॥७॥ अव वक्रालिब और अनुवालिक केन्द्रागानयन रले हैं। हि मा-चक्रारम्भ द्वितीय पद म नीचासन्न म होता है यह बात पहले वह चुर्वे है। वक्रारम्भकालिक शीघ्रवेन्द्रानयन के लिय उसकी कोदिग्या वे मान य मानते हैं। वहा पर कएंवर्ग, ----य ।
४५० उग- वटेश्वर-सिद्धान्त त्रि+अ फग्या-२ म पग्या. य = वर्ण', फ्लागखाद्धान्त रशिन्जिनीनी इत्यादि से फ्कोज्या वेग स्पप्रगति यहा वेग-शीघ्रमेन्द्रगति । शीक उग=गोत्रोच्चगति शोक शोघ्रकरणं - द्राक् केन्द्रकोटिमौन्त्यिफलच्या गुण्या क्रमात् । मृगकर्यादिके केन्द्र युतोना त्रिज्यका कृति ॥ शीघ्रवर्ण हृता लब्ध पलकोटिज्यका भवेत् । इस मशोधकोक्न टिप्पणी से निय अफज्या . %20 = फकोज्या । इसमें स्पष्टगति स्वरुप मे उत्थापन देने से क (त्रि'-य अ फ्ज्या) केग उग- -स्पप्टगति उग- (नि'-य अफज्या) वेग क' त्रि+अफज्या'-२ माज्या य विवेग---य अफज्या वेग उग- (वक्रारम्भे ग्रगति-० होती है) त्रि+अफज्या-२ अ फ्ज्या.य उग त्रि+ उग अपज्या--२ अफज्या य उग- --(त्रिवेग-य अफज्या केग) त्रि+ फज्या-२ अपज्या य छेदगम से उग त्रि+उग अंफग्या' २ अफज्या य उग-~-(नि वेग-य अपज्या वेग)- समान जोडने से उग पि+उग प्रपन्या' २ अफज्या य उग-त्रि केग-य.अफज्या केग समशोधनादि से उग वि-विकेग+उग अफग्या'=२ अ पज्या य उग-य अपज्या वेग =भि' (उग-केग)+उग अ फग्या' =य अ फग्या (२ उग-केग) नि'xमस्पग-+उग अ फग्या' =य अपग्या (उग+उग-वेग)-य अ फ्ज्या (उग+मस्ग) त्रि'मम्पग+उग अफ्ज्या' = य । यहाँ स्वल्पान्तर से मम्मष्टग-मध्यमग अपज्या (उग+ मस्पग) त्रि' मग+उग प्रफ्ज्या' =य इसके चाप को नवत्यश मे जोड़ने से म फज्या (उग+मस्पग) वक्रारम्भकालिक शीघ्रवेन्द्राश होता है। वक्ररेन्द्राय को ३६० इममें घटाने से मनुवक्र केन्द्रारा होता है । इससे चक्र अनुवक्र दिन ज्ञान मुलभ हो है ।।७।। इदानोमन्यान् प्रश्नानाह। स्फुटक्ष भोग बहुधाऽभिजिद्गति स्फुटा गति वाऽभिजितो हि वेत्ति यः। दिवौकसः संक्रमकालनाडिका स वेत्ति सम्यगणितं स्फुटागते ॥८॥ प्रत तब प्पप्टाधिकार वि भा-स्फुटर्ख भोग (स्पष्टनक्षत्रभोग) बहुधा (अनेकधा) अभिजिद्गति तथाऽभिजित स्फुटा गति वा, दिवौकस (ग्रहस्य) सक्रमनाडिका (सक्रमणकाल) यो वेत्ति (जानाति) स मम्यक् स्फुटागतेर्गणित (स्पष्टगतिगणित) वेत्तीति |८|| प्रथमप्रश्नस्योत्तरार्थमुपपत्ति । येषा नक्षत्राणा भोगश्चन्द्रमध्यमगतिसमरतानि नक्षत्राणि समभोगसज्ञकानि चन्द्रमध्यमगतेरर्धतुल्यो भोगस्तान्यर्धभोगसज्ञकानि । येषा च चन्द्रगत्यर्धयुतचन्द्र- गतिसमभोगस्तान्यध्यर्धभोगसज्ञकानि । इत्येव स्फुटक्ष भोगा । द्वितीयप्रश्नोत्त- राथं सर्वक्ष भोगसख्या =२१३४६, चाकला २१६०० भ्यो विशोध्याऽवरोप- सख्या २५४ ऽभिजो गतिकलामानम् । अथवा "भन्नशशिभगरणा वियुक्ता कदात्) इत्यादिना तद्गति साव्या सैव स्पष्टा गति कथ्यतेऽत्र सम्बन्ध विशेप स्पष्टोधिकारस्य तिथ्यानयनविधिनामकाध्यायस्य ६७ श्लोकोपपत्तौ द्रष्टव्य इति । दिवौकसा समकालनाडिकामित्युत्तरार्थमुपपत्ति । यदि ग्रहकलाया पष्टिघटिका लभ्यन्ते तदा ग्रहविम्बकलाया किमित्यनुपातेन सक्रमणकल घट्यस्तत्स्वरूपम् = अविक ६०xविक ग्रहर्विक ग्रगतिक ग्रहगतिक ग्रहगत्यश ६० मण काल । एव सर्वेषा ग्रहागा सक्रमणकालानयन भवति तन रविसक्रातिकालो- ऽतीव पुण्यप्रद इति ।। अव अन्य प्रश्नो को कहते है। हि भा.-स्पष्ट नक्षन भोग को, अनेक प्रकार की अभिजित् को गति और अभिजित् को स्पष्टगति को मोर ग्रहस क्रान्तिकाल को जो जानते है वे स्पष्टगति गणित को अच्छी तरह जानते है ॥ ८॥ प्रथम प्रश्न के उत्तर के लिय उपपत्ति। जिन नक्षत्रो के भोग चन्द्रमध्यमगति के बराबर है वे समभोग सजक है जिन नक्षत्री के भोग चन्द्रमध्यगति के प्रार्ध के बराबर है वे अचंभोगसज्ञक है । जिन नक्षत्रों के मोग चन्द्रगत्यधं युत चन्द्रगति के बराबर है वे अध्यधंभोगसज्ञक है। ये ही स्फुरदं भोग है। द्वितीय प्रश्न के उत्तर के लिये मर्वक्ष भाग सख्या २१३४६ को चक्राला २१६०० में घटाने से २५४ क्ला अभिजित् का गतिक नामान होता हैं। प्रथवा (भघ्नागिभगरणा वियुक्ता क्वहाद) इत्यादि पूर्वोक्त से अभिजित् की गति साधन वरना यही अभिजित् की स्पष्टगति वही जाती है, इसके विषय में विशेष विम्यानयनविधि नामक अध्याय के ६७ श्लोकोपपत्ति में देखना ।। 'दिवौकम समपालनाडिवा' इस प्रश्न के उत्तर के लिय उपपत्ति । यदि ग्रहगति पलो मे साठ घटी पाते हैं तो यह विम्बकला में क्या इस मनुरात से ૪૫૨ वटेश्वर-सिद्धान्ते ६.४ प्रविम्वाजा_प्रहविम्बवला सक्रमणकाल घटी प्रमाण प्राता है ग्रहगतिकला ग्रहगतिकला ६० ग्रविम्बकला =सक्रमणकाल । इस तरह सब ग्रहो के मामणवाल के आनयन ग्रहगत्यश होता है । उनम रविमानिकाल मब में पुग्यद है || इदानी पुरत्या प्रस्तानाह । प्राधन्तो व्यतिपातवैधृतिकयोमंतिकारयोश्च स्फुट तिथ्यन्त करणान्तमेव हि तथा योगान्तमाक्ष तथा । यो जानाति समौ खराशुशशिनौ लितासराश्यादिक- यह स्मृत दिवसानिव स गएको नान्योऽस्ति तस्यापरः ॥६॥ वि मा -मृतिकारयो (मरणकारकयो ) व्यतिपातवैवृतिक्यो (व्यनि- पातवतिनाम्नो पातयो ) प्रायन्ती, तिथ्यन्त करणान्त, योगान्त तथा प्राक्ष (नाक्षत्रान्त ) यो जानाति लितासराश्यादिक कलासराश्यादिक ) समो (तुल्यो) खराशुशशिनौ (रविचन्द्रौ) न्यह स्पृग्दिवसाधिप (यह म्पृग्दिनपति) यो जानाति स गणक । तस्यापर (भिन ) अन्य (गणक) नास्तोति ॥ ९ ।। प्राद्यन्तौ व्यतिगनव वृतिश्योरित्यस्योत्तरार्थमुपपत्ति । यदानान्तिसाम्य तदेवपातस्तस्मात्वालाप्राक् परतश्व पातस्य क्थमवस्था- नम् । तत्र क्रान्तिसाम्पाभावात् कान्तिसाम्य नाम पान । विम्बमध्यनान्तिविम्बा- धेन रहिता सनी पाश्चात्तविम्बधानप तातो निर्भवति, विम्बमध्यकान्ति- विम्बार्चन सहिता सती अतो विम्बमान्नम्य मान्तिर्भवति, एव रविचन्द्रयोश्च, अन विम्बे पृष्ठमग्र च याम्योत्तरमावेन करने रविविम्वप्टकान्तिर्यावती तावत्येव यदा चन्द्रस्थानानान्तिस्तदा तयोबिम्बयोरेक्देशन प्रात्यो साम्या- तातस्यादि । तदा तयोविम्वकेन्द्रयोरन्तर मानक्यातुल्यम् । तत कमेण गच्छतो रविचन्द्रयोर्यदा विम्बकेन्द्रोयकान्निसाम्य तदा पातमध्यम् । तदनन्तर चन्द्रपृष्ठप्रान्तस्य रवेरग्रप्रान्तस्य च यदा मान्निसाम्य लदा पातान यत बान्त्य- न्तर यावन्मानश्यान्न्यूिन तावत्पातोऽस्तोनि, अथ पातमध्यमापने यत्प्रथमसज्ञ मान्यन्तर याश्वासकृत्प्रकारेण सप्टोकता इष्टघटिकास्ततोऽनुपातो यदि प्रथम- तुल्येन बान्त्यन्त रणनावत्यो घटिका लभ्यन्ते तदा मानक्यातुल्यान्तरेण किमि- त्यनुपातेन या घटिका समागच्छति ता स्थित्यधंघटिया स्यूलास्तत्स्सप्टोकर- पम् । तात्कालिक्यो रविचन्द्रयो पुन क्रान्त्यन्नर कार्य तन्मानक्यासत ततो. ऽनुपातो यद्यनेन क्रान्त्यन्तरेणतावत्य स्थित्ययंघटिवा लभ्यन्ते तदा मानक्याधं तुल्येन किमित्येवमसत्तद्घटोना स्फुटत्वमिनि ।।
स्पष्टाधिकारः ४५३ तिथ्यन्तकरणान्तमेवेत्यस्योत्तरार्थमुपपत्ति । यदि रविचन्द्रयोगत्यन्तरेण पटिटिका लभ्यन्ते तदा चन्द्रविम्बकलाया किमित्यनुपातेन यद्बट्यादिफ्ल तत्करणतिथ्यो प्रान्त स्यादिति । योगान्तमाक्ष तथेत्येतदुत्तरार्थमुपपत्ति । यदि रविचन्द्रयोर्गतियोगकलाया पप्टिघटिका लभ्यन्ते तदा चन्द्रविम्ब- क्लाया किमित्यनुपातेन यद् घट्यादिफल तद्योगस्यान्त भवति । तन लन्धे अस्य पूर्वार्धन निर्गमकाल उत्तमकालेनोत्तरप्रवेश इति । यदि च चन्द्रगतिकलाया पप्टिघटिका लभ्यन्ते तदा चन्द्रविम्वक्लाया किमित्यनुपातेन यघटयादिफलं तनक्षत्रम्यान्त भवति ।। समी सराशुशगिनी लिप्ताशराश्यादिका वित्येतदुत्तरार्थमुपपत्तय । यदि पप्टिघटीभी रविगतकला लभ्यन्ते तदा तिथिगतघटीभिगम्यघटीभिश्च कि समागच्छन्ति तिथिगतकला , गम्यकलाश्च, एव चन्द्रगतिवशेनापि तिथिगति- क्ला गम्यकलाश्चागच्छन्ति, पाभि स्वस्वगतगम्यकलाभिर्वियुतयुतौ रविचन्द्रौ तिथ्यन्ते (इप्टतिथ्यन्ते) समकलौ भवत । रविचन्द्रयोरन्तर यदा द्वादशभागसम तदेवा तिथिर्भवति स्फुट- मासान्ते प्रिंशत्तिथय । अतो रविचन्द्रान्तराशा =३०४१२==३६० वा शून्यसमा , अतोऽमान्ते रास्याद्यवयवे रविचन्द्रो समौ पूरिणमाया पञ्चदशतिथय । अतो रवि- चन्द्रान्तर = १५४ १२= १८०८६ राशय । अतो रविचन्द्रावशाद्यवयवस्तुल्यो भवत । अन्यथा कथ तयोरन्तरे वेवल राशय एव भवन्ति । एव कस्मिन्नपि तिथ्यन्ते रविचन्द्रयोरन्तराशा द्वादशापवा एव तेन तदन्नरे कला विक्ला समत्वादेव केवल भागा उत्पद्यन्ते शेपप्रश्नोत्तर मुलभमेवेति ॥६॥ व्यतिपान और वैधृतपात के आद्यन्तवालानयन के लिये उपपत्ति। हि भा-जव क्रान्तिसाम्य होता है तो पात होता है उस काल से (कान्तिसाम्यकाल से) आगे और पीछे क्यों पात की स्थिति होती हैं क्योरि वहा कन्तिसाम्य नहीं है। क्रान्तिसाम्य हो या नाम पात है, विम्ब विम्वक्रान्ति मे विम्याधं घटाने मे पीछे वे विम्ब प्रान्त वो उतनी ही कान्ति होती है । बिम्बमध्यकान्ति मे बिम्बाध जोडने से प्रागे वे विम्वप्रान्न की क्रान्ति होती है । इस तरह रवि और चन्द्र दोनो की होती है । यहा बिम्ब म मागे पीछे से मतलव याम्योत्तर भाव मे है । रवि विम्ब पृष्ठ पालि के वरावर जव चन्द्र विम्ब वे परप्रान्त की मालि होगी तब उन दोना विम्वो के एक देश को कान्ति बराबर होने मे पात की प्रादि होती है। तब दोनो विश्व रेन्द्रो के अन्तर मानश्याय के बराबर होता है उसके बाद सम में भ्रमण करते हुए रवि प्रोर चन्द्र की येन्द्रीय प्रानि जय वरावर होगी तव पातमभ्य होता है । उसके बाद चन्द्रपृष्ठ प्रान्तीय प्रान्ति जब रवि के मनप्रान्तीय प्रान्ति में परापर होगी
४५४
वटेश्वर-सिद्धान्ते
तव पात का अन्त होता है । क्योकि मानक्याधं से क्रान्त्यन्तर जव तक न्यून रहेगा तब तक
पात रहेगा। पातमध्य साधन में क्रान्त्यन्तर पाद्य मशा है और असकृत्प्रकार से स्पष्टीकृत
इष्ट घटी जो है उन पर से अनुपात करते हैं यदि प्रथम तुल्य क्रान्त्यन्तर में यह इष्टघटी पाते
हैं तो मानक्या तुल्य अन्तर मे क्या इस अनुपात मे जो घटी पाती है वह स्थित्यघंघटी
स्थूल है उसका स्कुटीकरण करते हैं तात्कालिक रवि और चन्द्र के पुन क्रान्त्यन्तर वरना
वह मानक्या के ग्रासन्न होता है उस पर मे अनुपात करते हैं यदि इस क्रान्त्यन्तर में यह
स्थित्यर्धघटी पाते हैं नो मान क्यार्ध मे क्या इस तरह अमकृत् करने से उनका स्पुटत्व
होता है । इति ।
तिथ्यन्त और करणान्त का ज्ञान कैसे होता है इस प्रश्न के उत्तर के लिये उपपत्ति ।
यदि रवि और चन्द्र के गत्यन्तर में साठ घटी पाते हैं तो चन्द्र विम्वक्ला में क्या
इम अनुपान से जो घट्यादि फल होता है वह तिथि और करण के प्रान्त है ।
योगान्त पौर नक्षत्रान्त ज्ञान कैसे होता है इन प्रश्नो के उत्तर के लिये उपपत्ति।
यदि रवि और चन्द्र की गतियोग कला मे साठ घटी पाते हैं तो चन्द्रविम्बकला में
क्या इस अनुपात से जो घट्यादि पल होता है वह योग का अन्त है
।
यदि चन्द्रगति क्ला में साठ घटी पाते है तो चन्द्रविम्वकला मे क्या इसमे जो घट्यादि
फल होता है वह नक्षत्र का अन्त है अर्थात् क्षत्रान्तर गमनकाल है ।
अब रवि और चन्द्र वव कलादि वद अनादि, और क्व राश्यादि बरावर होते हैं
इन प्रश्नों के उत्तर के लिय उपपत्ति ।
यदि साट घटी म रविगति कला पाते है तो तिथिगत घटी और गम्य घटी में क्या
इसमें तिथि गतवला मोर गम्यक्ला आती है, एव चन्द्रगतिवा करके भी तिथि गतवला,
गम्याला पाती है । अपनी अपनी गतकला और गम्याला करके रहित और महित रवि और
चन्द्र निथ्यन्त मे क्लाद्यवयव वर वरावर होते है ।
रवि पौर चन्द्र के अन्तर जव बारह अश के बराबर होता है तब एक तिथि होती
है, स्फुटमासान्त मे तीस तिथिया हैं, इसलिये रवि और चन्द्र वे अन्तराग--३०४१२-
३६० या शून्य के वरावर, इसलिये ममान्त मे रवि और चन्द्र राश्यादि करके बराबर होते
है। परिणमा में पन्द्रह तिथिया है इसलिये रवि चन्द्र वे अन्तर= १५४१२-१८० = ६
राशि, इमलिये परिणमा मे रवि पौर चन्द्र प्रमादि बरावर होते हैं । अन्यथा क्यो दोनो के
मन्नर में देवल रानिया ही हैं । इस तरह किसी भी तिच्यन्त में रवि प्रौर चन्द्र बे मन्तरामा
वार मे प्रपवयं ही होंगे इसीलिए उनके अन्तर में वसा, विक्ला के समत्व के कारण
देवल मरा ही रहते हैं । इति 11
शेप प्रश्न के उत्तर सुलभ ही हैं ॥ ६॥
स्पष्टाधिकारः इदानीमन्यान् प्रश्नानाह। अत्यन्तशीघ्रामथ शीघ्रसंज्ञां निसर्गजातां मृदुसंजितां च । सुमन्दवेगां खलु चक्रनाम्नीमतीतवक्रां कुटिला तयवम् ॥१०॥ प्रष्टप्रकारां धुचरस्य भुक्ति यः केन्द्रभेदैगरणक स सम्यक् । वि.मा.- अत्यन्तशीघ्रा शीघ्रतरामतिशीघ्रा वा) शीघ्रसज्ञा (शीघ्रा) निसर्गजाता (मन्दगति) मृदुसज्ञिता (मन्दगति) सुमन्दवेगा (मन्दतरा) वक्र- नाम्नी (वक्रगति) प्रतीतवका (मार्गगति) कुटिलामित्यष्टप्रकारा द्यु चरस्य (ग्रहत्य) भुक्ति (गति) केन्द्रभेदैयों जानाति स सम्यग्गणक (शोभनो ज्योतिवित्) इति ॥१०॥ अत्रोपपत्तिर्वक्रादिकेन्द्राशानयनेन मुलभवेति । इति प्रश्नविधिः सप्तमोऽध्याय इति श्रीमदानन्दपुरीयमदत्तसुतवटेश्वरविरचिते स्फुटसिद्धान्त स्वनामसज्ञिते स्पष्टाधिकार. समाप्त । हि.भा शीघ्रतर या अतिशीघ्र, शीघ्रसज्ञव निसर्गसन्नर (मन्दगति) मन्दागति, मन्दतर गति, वक्रगति, मागंगति, दुटिस गति ये आठ प्रकार की ग्रहगतियो को केन्द्रभेद मे जो जानते हैं वे अच्छे ज्योतिषी है ॥१०॥ इसकी उपपत्ति पक्रादिवेन्द्रोशानयन से स्पष्ट है ।। इति प्रश्नविधि नामक सातम अध्याय समाप्त हुआ। इति श्रीमदानन्दपुरीय महदत्त पण्डित के पुत्र वटेश्वररचित स्फुटसिद्धान्त स्पष्टाधिकार समाप्त हुप्रा । .
वटेश्वर सिद्धान्ते त्रिप्रश्नाधिकारः प्रथमोऽध्यायः अथ त्रिप्रश्नाधिकारःप्रारम्भते । सत्रादौ तदारम्भप्रयोजनमाह । विप्रश्नोक्त्या निखिलं सुगम मष्टाधिकारजं यस्मात् । विप्रश्नाह तस्मादधिकारं स्पष्टममिधास्ये ॥१॥ स्पष्टार्थम् । इदानी दिग्ज्ञानमाह। समभुवि वृत्तेशद्धोमध्यस्य प्रभाक्रामद्यत्र। प्रविशत्यपति ककुभो क्रान्तिवशात्स्तोऽपरंन्द्राख्ये ॥२।। वि भा-समभुवि (जलेन समीकृताया भूमी) वृत्त (माध्यान्हिकच्छापा- प्रमाणतोऽधिकेन कर्कटकेन लिखितवृत्त) मध्यम्य शङ्को तदृ त्तकेन्द्रस्थापित शको प्रभा (छाया) क्रमात् क्रान्तिवाद्यत्र तस्मिन् वृत्ते प्रविशति, अति (निर्गच्छति) अपरन्द्राख्ये (पश्चिमपूर्वसज्ञके) ककुभी (दिशौ) स्त इति ॥२॥ अत्रोपपत्ति । जलसमीकृतभूमौ माध्यान्हिकच्छायाप्रमाणतोऽधिकककंटेन वृत्त विलिख्य तत्केन्द्र द्वादशाङ्ग लशकुनिवेश्य । तस्य प्राक्कपालस्थे मूर्ये या पश्चिमभागे वृत्तपरिधौ छायान लगति नत्र प्रथम विन्दुः कार्यः। पुन. पश्चिमकपालस्थे रवी तस्यैव शङ्कोरछायान पूर्वभागे वृत्तपरिधौ यत्र निर्गच्छति तत्रान्यो विन्दुः कार्यः । प्रथमविन्दु. पश्चिमाऽन्यबिन्दुश्च पूर्वादिग्व्यवहारोपयोगिनी ज्ञया, तद्गता रेसा नहि वास्तवपूर्वाप ररेसायाः समानान्तरा (छायाप्रवेगनिर्गमविन्द्वोरग्रयोर- ममत्वात्) तस्मादाचार्योक्तनियमेन वास्तवपूर्वापररेयायाः समानान्तररेखायाः ज्ञान न जातमतस्तद्विधिन शोभनः, भास्कराचार्यण छायाप्रवेगनिर्गमविन्द्वोरम- योरममत्वातदन्तरानयन 'तत्कालापमजोक्योस्तु विवराद, भारमित्याहता- दित्यादिना' कृत्वा तद्वशेन (कर्णवृत्तानान्तरदानेन) म्फ्टा प्राची दिक् माधिना पर कर्णवृत्तानान्तरस्य वृत्तपरिधौ दानानौचित्याद् भास्करमतेनापि न वास्तवपूर्वार- दिगो नजातमता वाम्नवपूर्वापरज्ञानार्थ प्रदश्यते अवास्तवपूर्वापररेगा।
वटेश्वर-सिद्धान्ते
विन्दु केन्द्र मत्वा तदर्धव्यासार्धन वृत्त कार्य तस्मिन् वृत्त स्थूलपूर्वविन्दुत साविता-
ग्रान्तरतुल्या पूर्णज्या देया, स्थूलपश्चिम विन्दुतत्पूर्णज्याग्रगता रेखा वास्तवपूर्वापर
रेखाया समानान्तरारेखा भवेत् , ततो वास्तवपूर्वापरज्ञान मुलभमेवेति ॥२॥
अब दिज्ञान कहते है।
हिमा-जल से समीकृत भूमि म मध्या हकालिक छाया प्रमाण मे अधिक कस्ट
से लिखित वृत्त के केन्द्र म स्थापित द्वादशागुला की छाया कान्तिदश से क्रमश उस वृत्त
परिघि म जहा प्रवेश करती है और जहा निर्गत होती है वे दोनो विन्दु पश्चिम और
पूर्व दिशा होती है ।।२॥
उपपत्ति
जल से समीकृत पृथ्वी म मध्यान्हि छाया प्रमाण से अधिर वर्कट मे वृत्त बनाकर
उसके केन्द्र मे द्वादशागुलशकु स्थापित करना, पूर्वक्पाल में सूर्य के रहने से उस शबु की
छाया पश्चिम भाग में वृत्त परिधि में जहा लगती है उमको प्रथम बिन्दु नाम रखना, पुन
पश्चिम कपाल मे सूर्य के रहने से उमी शकु के छायाप पूर्वभाग में वृत्तपरिधि मे जहा
निगत होता है उसका नाम अन्य बिन्दु रखना, प्रथम विन्दु पश्चिम दिशा और अन्य बिन्दु
पूर्व दिशा व्यवहारोपयोगिनी समझनी चाहिए । इन दोनो विन्दुप्रो म गत रेखा वास्तव
पूर्वापर रेखा की समानान्तर रेखा नही होती है क्योकि उन दोनो बिन्दुओ (प्रथम बिन्दु
मौर अन्य बिन्दु) की अग्रायें बराबर नहीं है । इसलिए प्राचार्य के नियम से वास्तव पूर्वापर
रेखा की समानान्तर रेखा का ज्ञान नहीं हुा । यदि वास्तव पूर्वापर रेखा की समानान्तर
रेषा का ज्ञान इनके नियम से होता तब वेन्द्रविन्दु से उस रेखा की समानान्तर रेखा करने
से वास्तव पूर्वापर रेखा का ज्ञान हो जाता। भास्कराचाय छायाप्रवेश बिन्दु और छाया
निर्गम बिंदु के अग्रामो के अन्तरानयन "तत्वालापमजीवयोस्तु विवराद् भावर्णमित्याहतात्"
इत्यादि से करके उसके वरा से (वर्णवृत्तानान्तर दान से, स्फुट पूर्व दिशा का ज्ञान दिया है,
परन्तु कर्ण वृत्तानान्तर को वृत्त परिधि मे दान देना अनुचित है इसलिए भास्कराचार्य के
प्रकार से भी वास्तव पूर्वापर रेसा का ज्ञान नही होता है, तव वास्तव पूर्वापर रेखा का
शान किस तरह होगा इसलिए निम्नलिखिन युक्ति समझनी चाहिए।
स्यूल पूर्वापर रेखा (छायाप्रवेश विन्दु और छायानिर्गम विन्दुगत रेसा) के अर्ध
बिन्दु का केन्द्र मानकर उस रेखा के प्राधा व्यासा से वृत्त बनाना, उस वृत्त मे स्थूल पूर्व
विन्दु से मप्रातर तुल्य पूर्णज्या रूप दान देना, उस पूर्णज्या के अग्र म पश्चिम विन्दु से
जो रेखा करेंगे यह वास्तव पूर्वापर रेखा की समानान्तर रेखा होती है। केन्द्रविन्दु से उसकी
समानान्तर रेखा करने मे वास्तव पूर्वापर रखा होती है इस तरह वास्तव पूर्वापर रेखा
याज्ञान होता है ॥२॥
इदानी पुनदिज्ञानमाह।
तुल्पप्रभारयोर्वा पूर्वापरयोः कपालयोबिन्दू ।
कार्यावपक्रमवशादपरन्द्राख्यो दिशौ भवत. ॥३॥
विप्रश्नाधिकार: विभा.-वा (अयवा) पूर्वापरयोः (पूर्वपश्चिमयो ) कपालयो , तुल्यप्रभा- ग्रयो. (तुल्यच्छायाग्रयो.) विन्दू कार्यों, अपक्रमवशात्-अपरन्द्राख्यो (पश्चिम-पूर्व- संजको) दिशौ भवतोऽर्थात् पूर्वापरकपालयोस्तुल्यच्छायाग्रयोयौं बिन्दू तनाऽद्य पश्चिमा दिक्, अन्यः पश्चिमकपालस्थे रवो य उत्पन्न. स पूर्वा दिक् पूर्वा परक्पालयो- स्तुल्यच्छायाग्रयोर्ये क्राती तयोर्वशा भेद उत्पद्यते इत्यध्याहार्यम् । अनोपपत्तिर्भास्करोक्त व स्फुटा। भास्करोक्तकर्णवृत्तानान्तरदानेनापि न स्फुटा प्राची भवतीत्यादिपूर्वश्लोकोपपत्तिदर्शननेन सर्व स्फुटमिति ॥३॥ अव पुन. दिग्ज्ञान कहते है। हि.भा--प्रथवा पूर्व और पश्चिम क्पाल मे क्रान्तिवग से जो तुल्य छायान के द्वय होते है वे पश्चिम और पूर्व सज्ञक दिशायें होती है अर्थात्, पूर्व और पश्चिम कपाल मे तुल्य' छायाय के जो दो विन्दु होते है उनमे प्रथम विन्दु पश्चिम दिशा होती है और अन्य विन्दु पश्चिम कपाल मै रवि के रहने से जो उत्पन्न होता है वह पूर्व दिशा होती है ॥३॥ उपपत्ति "वृत्तम्भ सुसमीकृतक्षितिगते केन्द्रस्य शङ्कोरित्यादि भास्करोक्त से इसकी उपपत्ति स्पष्ट है, कर्णवृत्तापातर दान देने से भी स्फुट पूर्वदिशा का ज्ञान नहीं होता है इत्यादि सव वाते पहले श्लोक की उपपत्ति देखने मे स्पष्ट है ॥३॥ इदानी पुनर्दिज्ञानमाह। वृत्तं रवौ प्रविष्टे सममण्डलसंजितं प्रभा या स्यात् । समपूर्वापरगा सा सौम्या यत्र ध्रुवः सा स्यात् ॥४॥ विभा-सममण्डलसशित वृत्त (पूर्वापरवृत्त) रखो (सूर्य) प्रविष्टे (प्रवि- शति) सति या प्रभा (छाया) सा समपूर्वापरगा भवति यन (यस्या दिशि) ध्र व सा सौम्या (उत्तरा) दिक् म्यादिति, अनंतदुक्त भवति यदा रवि पूर्वापरवृत्त भवेत्तदा तात्कालिकच्छायास्थितिवशेन पूर्वापरजान सुगममेव । अथवा ध्र व सर्वत उत्तरेऽस्ति, ध्रुवदर्शनेनोत्तरदिग्ज्ञान भवेत्तद्विरुद्धदिग्दक्षिणादिगेवमुत्तरदक्षिण- दिशो नेन दक्षिणोत्तरेखाया अर्धविन्दुतम्तदुपरि लम्वरूपा या रेखा वास्तवपूर्वा. पररेखा भवेदनया रीत्याऽपि पूर्वापरदिशोनि भवितुमर्हतीति ॥४॥ प्रय पुन. दिग्नान कहते हैं। हि. मा-पूर्वापर वृत्त मे रवि के प्रविष्ट होने से जो छाया होती है वह समपूर्वापर गत होती है और जहा ५ वे है वह उत्तर दिया है । कहने का अभिप्राय यह है कि जब रवि सममण्डल में प्रवेश करते हैं तब जो पाया होती है उसको स्थिति बशर र पूर्वापर दिशाज्ञान मुलभ हो है । प्रयदा घ्र वतारा मवमे उत्तर तरफ है, प्रदर्शन से उत्तरदिमा शान हो जायेगा उससे विश्व भाग में जो दिया वह दक्षिण दिशा है उमाशान हो जायेगा। इस तरह
४६२
वटेश्वर-सिद्धान्ते
दक्षिणोत्तर के ज्ञान से रेखा के अर्घ विन्दु से उसके ऊपर जो सम्म रेखा होगी वही वास्तव
पूर्वापर रेखा होती है इस तरह भी पूर्वापर का ज्ञान होता है ॥४॥
इदानी पुनरपि दिग्शानमाह ।
इप्टामा भुजकोटिरचितत्रिभुजस्य वा श्रवरपतुल्या ।
यत्रेप्टामा यावत्तावत्पूर्वापरा कोटिः ।।
वि भा --इप्टाभा भुजकोटिरचितनिभुजस्य (इष्टछायावर्ण , भुजो भुज
कोटि कोटिरिति कर्णभुजकोटिभिरत्पत्रिभुजस्य) श्रवणतुन्या (वर्णतुल्या)
यत्र यावदिष्टाभा (इप्ट-छाया) भवेतावत्कोटि पूर्वापरा भवेदिति ||
अनोपपत्ति ।
शङ्क, मूलात्पूर्वापररेखोपरिकृतो लम्बो भुजसज्ञक । भुजमूलाद्वृत्तकेन्द्र
यावत्पूर्वापररेखाया कोटि । शङ्क मूलात्केन्द्र यावत् छायाकर्ण , इति भुजकोटि-
कर्णरुत्पन्नत्रिभुजस्य स्थितिवशेन पूपिररेखाया ज्ञान सुशकेनैव भवितुमर्हति । यत
उक्त त्रिभुजे छायारूपकर्णस्य भुजस्य च वर्गान्तरमूलस्पा पूर्वापररेखा खण्डस्पा
कोटिर्भवेदेतस्या एव वर्धनेन पूर्वापरा भवेदिति ॥५॥
अब पुन दिज्ञान कहत हैं।
हि भा - इप्टच्छाया वर्ण, भुजमुज, कोटिमज्ञा कोटि इन कर्णभुज और कोटि
से जो त्रिभुज बनता है उसके वर्ण के बराबर जहा इष्टच्छाया होती है वहा कोटि पूर्वापर
होती है ॥५॥
उपपत्ति
शाङ्क.मूल से पूर्वापर रेखा के ऊपर जो लम्ब करते हैं वह भुज है । भुजमूल से केन्द्र
तक पूर्वापर रेखा मे कोटि है । गत मूल से केन्द्र तक छाया इन भुजकोटि और कणं से
उत्पन्न त्रिभुज म छायारूप वर्ण और भुज के वर्गान्तर मूल जने से पूर्वापर रेखा में कोटि
प्रमाण होता है इसी को बढा देन म पूर्वापर रेखा होती है। इस तरह भी पूर्वापर रेखा का
ज्ञान हो सकता है ॥५॥
इदानी पुनरपि दिग्नानमाह ।
यत्रास्तमेति कश्चिदधुचर क्रन्त्यिा विनोदय याति ।
वरुपामरपत्योदिशौ पतेते क्रमादथवर ॥६॥
नि भा -काश्चित् धुचर (कोऽपि ग्रह ) नारया विना (कान्त्यभावेन) यत्र
(यस्मिन् स्थाने) अस्तमेति (अस्त प्राप्नोति) यत्र चोदय याति क्रमात् वरुणामर-
पयोदिशो (वरुणेन्द्रयोदिशौ पश्चिमपूर्वो) पतेताऽर्थाद् ग्रहस्य ब्रान्त्यभावोऽस्त्य-
तोऽन्तकाले पश्चिमस्त्रस्तिके उदयकाले स पूर्वस्वस्तिके नहीं भवेदेतावताऽपि
पूर्वापरज्ञान भवितुमहंतीति ॥ ६ ॥
विप्रश्नाधिकारः
अव पुन दिग्ज्ञान कहते हैं।
हि भा-कोई ग्रह विना क्रान्ति के जिस स्थान में अस्त होता है वह पश्चिम दिशा
होती है और जहा उदित होता है वह पूर्व दिशा होती है अर्थात् ग्रह के क्रान्ति के प्रभाव
रहन से अस्तकाल मे ग्रह पश्चिम स्वस्तिक में होगे तथा उदयकाल में पूर्व स्वस्तिक मे । इम
तरह ठीक पूर्व और पश्चिम दिशा का ज्ञान होता है, इन दोनो विन्दुओ मे जो रेखा होगी
वही वास्तव पूर्वापरा रेखा होगी ॥६॥
इदानी भाभ्रमरेखावशेन दिग्ज्ञानमाह ।
छायात्रयाग्रज मीनद्वयमध्यगसूनयोयुं तिर्यत्र ।
याम्या सोत्तरगोले सौम्या याम्ये हि शङ्क तलात् ॥७॥
छाया त्रितयाग्र स्पृकसूत्रयुतेवृत्तमालिखेत्तत्र।
लेखां न जहात्येमा वनितेव कुलस्थिति कुलोत्पन्ना |८||
याम्योतरलेखाया | दलामा वृत्तशङ्क विवरं यत् ।
याम्योदग्वा ज्ञेया विज्ञ भ्रमप्रपञ्चकुशलहि ॥६॥
वि भा--इप्टेऽन्हि दिग्मध्यस्थशङ्कोरछायात्रय ज्ञात्वा तदग्रं मत्स्यद्वय-
मुत्पाद्य तन्मुखपुच्छमध्यगरेखयोर्य न युति सोतरगोले याम्या दिग् ज्ञेया यदि
जिनाल्पाक्षे देशे कदाचिच्छङ्क, मूलाइक्षिरणे छायान सा युतिर्भवति तदा सा सौम्या
ज्ञेया ॥७॥
सूनयुते (मत्स्यद्वयमुखपुच्छनिर्गतसूत्रयुते ) वृत्तमालिखेतदेव छाया
नितयाग्रस्पृक् (छाया नितयाग्रगत भाभ्रमरेखा) भवति, इमा लेखा (वृत्तपरिधि
भामरेखा वा) सा छाया न जहाति (न त्यजति) कुलस्थिति (कुलमर्यादा) कुलो-
त्पन्ना (कुलीना) वनितेव (स्त्रीव) अर्थाद्यथा कुलीना स्त्री कुलमर्यादा न त्यजति
तथैव सा छायापि तवृत्तपरिधि (भाभ्रमरेखा) न त्यजतीति ॥६॥
वृत्तशङ्क विवर (शङ्क मूलभाभ्रमरेखयोरन्तर) यत् सेव याम्योत्तर-
लेखाया द्यु दलाभा (मध्यच्छाधा) भवति । सा च याम्या (दक्षिणा) उदया
(उत्तरा वा) भवति । अर्थाज्जिनाधिकाक्षदेशे मध्यच्छाया सर्वदोत्तरा भवति
जिनाल्पाक्षे देशे यदा रवेरुत्तरा क्रान्तिरक्षाधिका तदा शङ्कोमध्यान्हे छाया
दक्षिणाभिमुखी भवति, । इष्टऽन्हि मध्ये प्राक् पश्चाते वाहुनयान्तरे ।
मत्स्यद्वयानरयुतोस्तिस्पृक्स्प्रेण भाभ्रम इति सम्प्रति प्रसिद्धसूर्यसिद्धान्तेऽप्ये-
वमेव । लल्लादिभिरप्येवमेवोदित स्वतन्त्रे । भाम्बरेणास्यैव 'भाषितयाभाभ्रमण
न सदस्माद् दिक् पलाय चे' त्यादिना भाभ्रमरणम्य खण्डन कृतम् । वस्तुतो यद्य-
कस्मिन् दिने रविक्रान्ति. स्थिरा भवेत्तदा मेरो भामरेखा वृत्ताराग भवेत् ।
साक्षदेशे न्यूनाधिश कुवगेन वृत्तदीर्घवृत्तपरवलयातिपरवलयरेखाकारा भाभ्रमरेखा
भवति, निरक्षे विषुवद्दिने रेसाकारा भवतीति स्वयमेव विज्ञ विचार्य ज्ञेयेति ॥ ६ ॥
वटेश्वर-सिद्धान्त
अब भाभ्रम के सम्बन्ध से दिग्ज्ञान कहते हैं
हि.भा.-इष्टदिन में दिग्मध्य स्थिति शङ्क, की तीन छाया जानकर उनके प्रयो
से दो मछलिया बनाकर उनके मुख और पुच्दगत रेखाद्वय का योग जहा पर होता है वह
उत्तर गोल मे दक्षिण दिशा होती है यदि जिनाल्पाक्ष देश मे कदाचित् शङ्क, मूल से दक्षिण
छाया में वह योग हो तव उसको उत्तर दिशा समझनी चाहिये ॥७॥ मत्स्यद्वय के मुख
पुच्छ निर्गत सूत्रो के योग विन्दु से वृत्त बनाना वही वृत्तपरिधि तीनों छायामो से अवगत
गत होती है वही भाश्रम रेखा है । छायाये इस वृत्तपरिधि को नहीं छोड़ सकती हैं जैसे
कुलीन स्त्री अपनी कुल मर्यादा को नहीं छोडती है ॥८॥ शङ्क.मूल और भाभ्रम रेखा के जो
अन्तर हैं वही मध्यच्छाया होती है वह दक्षिण या उत्तर होती है । जिनाधिकाक्ष देश में
मध्यच्छाया सर्वदा उत्तर होती है तब मध्यान्हकाल मे दान की छाया दक्षिण मुख
की
होती है।
'इष्टेऽन्हि मध्ये प्रार पश्चाद्धृते बाहुपान्तरे । मत्स्यद्वयान्तरयुते स्त्रिस्मृमूत्रण
भाभ्रम' यह प्रसिद्ध सूर्यसिद्धान्त मे भी छायाभ्रमण 'भाभ्रम' इसी तरह है। अपने अपने
तन्त्र मे लल्लादि माचार्य ने भी इसी तरह कहा हैं, भास्कराचार्य ने 'भाषितयाभाभ्रमण न
सदस्माद् दिक् पलाद्य च" इत्यादि से पूर्वोक्त भाप्रम (वृत्ताकार ) वा खण्डन किया है । यदि
एक दिन मे रवि की क्रान्ति स्थिर मानी जाय चब मेरु में छाया भ्रमण मार्ग वृत्ताकार होता
हैं। साक्षदेश में न्यूनाधिक राक वश मे वृत्त, दोघवृत्त, परवलय, प्रतिपरवलय, और
रेखा मे पाच तरह के छाया भ्रमण मार्ग होते है । निरक्ष देश में विपुद्दिन में छाया भ्रमण
मार्ग रेखाकार होता है ॥ ७-६ ।।
इदानी पुनरपि दिग्ज्ञानमाह ।
उदयति पौगं यत्र श्रवणो वा सा दिगिन्द्रस्य ।
स्यूलाय वा प्रदिष्टा चित्रा वारयन्तर विबुधैः ॥१०॥
स्पष्टार्थम् ।
इदानी छायात कणं कर्णाच्छाया चाह ।
शङ्क.प्रमाणवर्गाच्छायावर्गान्वितास्पदं कर्ण ।
कर्णकृतेः शङ्ककृति विशोध्य मूल प्रभा भवति ।।११।।
वि भा--छायावन्वितात् (छायावर्गयुतात्) राय प्रमाणवर्गात्पदं
(मूल) कर्णो भवेत् । कर्णकृते. (कर्णवर्गात्) शक कृति (शङ्क, वर्ग) विशोध्य
मूल प्रभा (याया) भवतीति ।।११।।
प्रत्रोपपर्ति । तत्कृत्योर्योगपदमित्यादिना स्फुटवास्तोति ॥११॥
मब छाया से पर्ण भौर कणं से छाया को कहते हैं ।
हि भादा वुवर्ग मे छायावर्ग जोडकर मूल लेने से पणं होता है, नणंवर्ग में
घाइवर्ग को घटाएर मूल लेने से पाया होती है ॥११॥
निप्रश्नाधिकारः उपपत्ति 'तत्कृत्योर्योगपदम्' इत्यादि से स्पष्ट है ॥११॥ इदानी सडकुस्वरूपमाह । कार्य स्थण्डिलमथवा वृत्त भ्रमसिद्धमस्तकं विपुलम् । भगरणांशाडि तपरिधि स्वस्कन्धसमुच्छ्रित च सिद्धाशम् ।।१२।। स्पष्टार्थ । इदानी पलभानयन प्रकारद्वयेनाह । अग्रा द्वादशगुरिणता क्रान्तिज्या भाजिता पलश्रवण । श्रुतिशड फ्वन्तरगुणितात्तद्योगान्मूलमक्षा मा ॥१३॥ क्रान्तिज्यानाकृत्योविशेषमूल घुमण्डले कुज्या। द्वादशगुरिणता कुज्या क्रान्तिज्याहृत्पलाभा वा ॥१४॥ वि भा-अग्रा द्वादशगुणिता क्रान्तिज्या भाजिता (क्रान्तिज्या भक्ता) तदा पलश्रवणः (पलकर्ण) भवेत् । श्रुतिशड क्वन्तरगुरिणतात् (पलकर्णद्वादशान्तर- गुणितान्) तद्योगात् (पलकर्णद्वादशयोगात) मूल तदाऽक्षामा (पलभा) भवेत् ॥१३॥ कान्तिज्यानाकृत्योविशेषमूल (क्रान्तिज्याप्रयोर्वर्गान्तरमूल) द्युमण्डले (अहोरानवृत्त) कुज्या भवेत् । कुज्या द्वादशगुणिता क्रान्तिज्या भक्ता वा पलाभा (पलभा) भवेदिति ।।१३-१४॥ अनोपपत्ति । अक्षक्षेत्रानुपातेन पलकणं तत /पलक'-१२' - पलभा V(पलक+१२) (पलक-१२) एतेन १३ श्लोक उपपद्यते । तथा /अग्रा-काज्या'- कुज्या तत कुज्या १२ पलभा माज्या एतेनोपपन्नमाचार्योक्तम् ॥१३-१४।। प्रय दो प्रकार से पलभा के पानयन कहते हैं। हि मा-मया को द्वादरा से गुणर क्रान्तिज्मा से भाग देने में पलकणं होती है। पलक्ण और द्वादश के अन्तर में उसके योग (पलकणं पौर द्वादश के याग) को गुणकर मूल लेने से पलभा होता है ॥१३॥ कान्तिग्या प्रौर मग्रा के वर्गान्तरामूल कुग्या ोती है । कुग्या को द्वादशा से गुणवर प्रान्तिज्या से भाग देने से पलमा होती है ॥१३-१४॥ उपपत्ति माक्षेत्रानुपात से ममा १२ पसरणं : पला'-१२' = पसभा परन्तु जोग्या अग्रा.१२ क्राज्या वटेश्वर सिद्धान्त वर्गान्तर योगान्तर घात के बराबर होता है इसरिय / पलव'-१२== V(पल + १२) (पनक-१२)=पलभा इससे १३वा लोन उपपन्न हुआ ॥१३॥ तथा प्रया-क्राज्या, =कुज्या कुण्या १२= पलभा । काज्या इसस प्राचार्योक्त १८ वा दलाक उत्पन्न हुआ ।।१२-१४।। पुनरार पलमाज्ञानमाह । सूर्याभिमुखी यष्टिर्धार्या तत्निभज्यया तुस्या। यद्वच्छायाभाव शङ्क स्तल्लम्बक प्रोक्त ॥१५॥ तत्पूर्वापरलेखाविवर बाहु यष्टितुल्य दृग् । ज्याको यष्टिर्यु दलभुजो हम्ज्यया तुल्य ॥१६॥ बाह्यग्रयो समासो भिन्नदिशोरतर नृतलम् । तद् द्वादशगुरिणत वा शङ्क, विभक्त पलाछाया ॥१५॥ घि भा–त्रिभज्यया तुल्या यष्टि मूर्याभिमुखी तथा धार्या यथा छाया- भावो भवेत्तदा तत्पूर्वापररेसयोरन्तर भुजो भवेत् । मध्याह्नकालिकभुजो दृाज्या तुल्यो भवेत् । भुजानयोरेक दिक्कुयोर्योगो भिनिदिक्कयोरन्तर शक तल भवति तद्द्वा. दशगुरिणत शङ्क भक्त तदा पलभा भवेदिति ॥१५-१ ।। शोरूपा एवोपपत्तय इति । पुन पलभाज्ञान के लिय रहत हैं। नि भा-निज्यातुल्य यष्टि मूर्याभिमुख उम तरह रखना चाहिये जिससे छाया के अभाव हो वहा शङ्क.मूल म पूर्वापर रेखा पयन्त भुज होता है । मध्यान्हकालिक मुज. हरज्यातुल्य होता है एक दिशा में भुज और अग्रा के योग करने भिन्न दिशा में अन्तर करने से गङ्क तल होना है उसको द्वादश से गुणकर भइ मे भाग देने से पलभा होती है ॥१५-१७॥ यहा रोक रूप ही उपपत्ति है ।। १५ १७ ॥ इदानी भुजद ज्ञाने पलमाज्ञानमाह । इष्टान्पभुजयो समान्यककुभोविशेषतयोग । सूर्याहतो विमक्त शकविवरेण वा पलच्छाया ॥१८॥ वि भा--ममान्यक्कुभो (तुल्यान्यदिशो) इष्टान्यभुजयोविशेषसयोग (समदिक्कयो जयोरन्तर भिन्नदिक्कयो नयोर्योग ) सूर्याहत (द्वादशगुरिणत ) गड कोनिवरेण (श पन्तरेण) विभक्तस्तदा पतच्छाया (पलभा) भवतीति ।। अनोपपत्ति 1 अथ शड कन्तर कोटि । शङ्क,तलान्तर भुज । हृत्यन्तर वर्ण । इति भुजकोटिकर्णयिमान त्रिभुजमप्यक्षेत्रसजातीयमेव भवस्यतोऽनुपात । यदि प त्रिप्रभाधिकार ४६७ शड कन्तरेण शड कुतलान्तर भुजो लभ्यते तदा द्वादशेन -किमित्यनुपातेन समाग- शतलान्तरX१२ च्छति पलभ%3 अथ गोले एकस्मिन् वृत्ते यदेव भुजान्तर चा शङ्कतलान्तर भुजयोगस्तदेव शङ्कतलान्तर दृश्यतेऽत (भु+मु) १२ =पलभा । एतावताऽऽचार्योक्तमुपपद्यते ।। १८ ।। शड कन्तर अव भुजद्वय ज्ञान से पलमा ज्ञान कहते है । हि भा--एक दिशा मे भुजद्वय के अन्तर करने से जो हो और भिन्न दिशा के भुज- द्वय के योग करने से जो हो उसयो वारह से गुणकर शड ववन्तर से भाग देने से पलभा होती है ॥१८॥ उपपत्ति शड क्वन्तरकोटि, शङ्कतलान्तर भुज, हृत्यन्तरण इन कोटिभुज कणों से जो त्रिभुज बनता है यह अक्षक्षेत्र के सजातीय होता है इसलिये अनुपात करते हैं यदि शडक्व न्तर मे शङ्कतलान्तर पाते है तो द्वादश में क्या इस अनुपात से पलभा आती है शङ्क तलान्तर १२ =पलभा । गोन में एक अहोरानवृत्त म जो भुजान्तर या भुजयोग होता शडक्वन्तर है वही शङ्क तलान्तर होता है । इसलिये (भु+भु') १२ = पलभा, इससे प्राचार्योक्त उप- शड क्यन्तर पन्न हुमा ॥१८॥ इदानी छायाकर्णद्वय तद्भुजद्वय च ज्ञात्वा पलभाज्ञानमाह । अन्योन्यकर्णनिन्नौ श्रुतिविवरहृतौ प्रभाद्वयस्य यो बाहू । तत्फलविवरयुती समान्यककुभो पलच्छाया ॥ १६ ॥ वि भा -प्रभादयस्य (छायाद्वितयस्य) यौ वाहू (भुजी) अन्योन्यकर्णनिघ्नो (परस्परछायाकर्णगुणिती) श्रुतिविवरहती (छायाकर्णान्तरभक्तौ) समान्य- ककुभो (तुल्यान्यदिशो तत्फलविवरयुती (परस्परछायाकणंगुरिणतभुजयोरछाया- कर्णान्तरभक्तयोरन्तरयोगो) पलच्छाया (पलभा) भवेदिति ।। १६ ।। अत्रोपपत्ति । अन कल्प्यते पलभामानम्-य । इय दक्षिरणेन भुजेन युता जाता रणं वृत्ताग्रा-य+भु इय विज्यागुणा पर्णभक्ता जाताग्रा- (य+भु).नि छाव य त्रिभु वि एवमन्यमुजादपि । पलभोत्तरेण भुजेनोना जाता कर्णवृत्ताग्रा= %3D- छाक =य1 वटेश्वर-सिद्धान्ते य-भु इय विज्यागुणा कर्णभक्ताग्रा=(य-भु') त्रि_ यत्रि-भु'त्रिततोऽगयो छान छा'क समीकरणम् = यति+भु त्रि_ यनि-भु' नि दिगमैन छाक छा'क (य त्रि+भु त्रि) छाक छाक (य नि-भुत्रि) =य त्रि छा'क+भुति छाक छाक य त्रि-छाक भुनि समशोधनादिना भु त्रि छा'क+छाक भु त्रि-छाक य त्रि-छाक य त्रि =त्रि (भु छा'क+छाक भु')=य नि (छाक छाक) •भु छाक+छाव.'(य छाक~छा'क)तत भु छाक छाक भु डाक-छाक यदि भुजद्वयमेकदिक्क भवेत्तदाभ छा'क-छाक भु' =य अत उपपन्नम् ॥१६॥ छाक-छाक अब छाया वर्णद्वय और उसके मुजद्वय जान कर पलभाज्ञान कहते हैं । हि भा-दोनो छायानो वे जो भुजद्वय है उनको परस्पर छायाएं से गुणकर छायाकर्णान्तर से भाग देकर जो हो उन दोतो फ्लो के एक दिशा में अन्तर भिन्न दिशा में योग करने से पलभा होती है । यहा भुजद्वय के एक दिशा और भिन्न दिशा के सम्बन्ध से विचार करना चाहिये ॥ १६ ॥ उपपत्ति यहा कल्पना करते हैं पलभाय । इसम दक्षिण भुज जाडने से वर्गवृत्ताग्रा होती है य+भु- कर्णवृत्ताना इसको त्रिज्या से गुणकर वर्ण से भाग देने से मना होती है (य+मु) त्रि अग्रा । इसी तरह दूमरे भुज से भी होता है यथा पलभा में उत्तर भुज छाक पटाने से कर्णवृत्ताग्रा होती है । य-भुवर्णवृत्ताप्रा, इसको त्रिज्या स गुणवर वर्ण से भाग दने से अग्रा होती है (य-मु')त्रि - य त्रि-भुत्रि =प्रपा । दोनो अमानो के समीकरण करने से छाक' छाक यवि+मुनि यत्रि-पत्रि घेदगम वरन से छाक छाक यवि या'क+भुवि छा=य त्रि द्वार-भुत्रियाक समगोधनादिसे मुत्रि धा'क+भुत्रि छाछाक य नि-छा' य त्रि =वि (सु छाक'+भु' छाक)=य वि (धार-छा'क) भु याद+भुपाद = य (धा-या):: मुहा+छाक डाक-याक विप्रभाधिकारः य। यदि दोनो भुज एक दिशा होगे तव भु छाप-मुछार छारछाक इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुमा ।। १६॥ इदानी पुनरपि प्रकारद्वयेन पलभापलवर्णयो. सापनमाह । द्वादशगुणिता वाऽमा सममण्डलशङ्क,भाजिताऽक्षामा । समकर्णगुणा कुज्या पलजीवारहृत्पलाभा वा ।।२०।। स्ववृतिः समशङ्कहता रविगुणिता च पलश्रवणः । त्रिज्या द्वादशगुरिगता भक्ता लम्बज्ययाऽथवा कर्णः ॥२१॥ वि. भा.-वा अग्ना द्वादशगुरिणता सममण्डलशङ्कभाजिता (समशङ्कमक्ता) तदा अक्षाभा (पलभा) भवेत् । अथवा कुज्या समकर्णगुणा, पलजीवाहृत् (अक्ष- ज्या भक्ता) तदा पलाभा (पलभा) भवेत् ॥२०॥ स्ववृत्तिः (तद्धति) रविगुणिता (द्वादशगुणा) समशन हृता (समशङ्क भक्ता) तदा पलथवरण. (पलकर्ण) भवेत् । अथवा त्रिज्या द्वादशगुरिगना, लम्ब- ज्यया भक्ता तदा कर्ण (पलकणं ) भवेदिति ॥ २०-२१ ।। अनोपपत्ति । अक्षक्षेत्रानुपातेन प्रमा १२ पलभा । परन्तु ग्रज्या अतोऽग्राया उत्यापनेन त्रि कुज्या १२ पलभा समश अज्या अज्या एतेन २० तम श्लोक उपपद्यते ।। अथाक्षक्षेत्रानुपातेन समरा त्रि १२ = प्रलकर्ण ग्रत उपपन्नम् ॥ २०-२१ ॥ त्रि कुज्या -अग्रा . समश कुज्या समकणं - तद्दति १२ पलकर्ण। तथा लज्या अब फिर भी दो प्रकार से पालमा पोर पलक के साधन पहते हैं। हिमा-वा असा वो द्वादश से गुणपर ममरा, से भाग देने से पलमा होती है। अथवा दुज्या वो ममरणं से गुणवर प्राग्या में भाग देने से पलमा होती है ॥२०॥ त नि को द्वादश से गुणकर समाह मे भाग देने में पता होता है । अथवा विग्या को दादा से गुरणार नामग्या में भाग देने में पलकणं होता है ।। २०.२१ ॥ उपपत्ति प्रसपानुपात मे मप्रा.१२. -पलमा। परन्तु =मा इममे पसाम वटेश्वर-सिद्धान्ते म्वरूप म अग्रा को उत्यापन देने से ममकर्ण पुण्या त्रि कुण्या १२ % 3D -पभा । समक्ष प्रज्या प्रज्या इससे वीसवा श्लोक उपपन्न हुआ। प्रक्षनेत्रानुपात मे तति १२ =पलकर्ण। पर तमृति त्रि समश समरा लज्या तद्धति १२ त्रि १२ % 3D -पर्ण इसमे प्राचार्योक्त उपपन्न हुआ ॥२०-२१॥ समदा लज्या इदानी कान्तिज्ञाने पलतानमाह । दिनदलहग्ज्या वाप क्रान्त्या युतजितं क्रियतुलादौ । प्रक्षो दक्षिणाज्या धनुषोना क्रान्तिरक्ष स्यात् ॥२२॥ वि भा-क्रियतुलादौ (मेपादितुलादिकेन्द्र) दिनदलहग्ज्याचाप (मध्यान्हनताशचाप) बान्त्या युतवर्जित तदाऽक्ष (अक्षाश ) भवेत् । दक्षिण- दृग्ज्याधनुपोनाक्रान्ति (दक्षिणनताशचापोनबान्ति ) अक्ष स्यादिति ।।२२।। अवोपपत्तिरति सुगमैवेति । अब कान्तिज्ञान मे अक्षाश ज्ञान कहते हैं। हि भा -मपादि और तुलादि केन्द्र मे मध्यान्हमालिक नताश चाप म क्रान्ति चाप को जोड़ने और घटाने से प्रभाव होता है। दभिरण नताश चाप को क्रान्ति मे घटाने में अक्षाश होता है ॥२२॥ इसकी उपपत्ति गोत म स्पष्ट है ॥ इदानी पुनरपि पलभाज्ञानमाह । शङ्क, परिकल्प्य भुज त्रिभुजेन विलोक्येद् ध्र वमुदीच्याम् । यन्त्रेण दृष्टिभुजयोविवरामा वा पलच्छाया ॥२३॥ नि भा-शङ्क, (द्वादशाङ्गल) भुज परिवरप्य निभुजेन यानेण (द्वादश- पलभा पलायोरन्पन्नत्रिभुजम्पयन्त्रेण) उदीच्याम् (उत्तरदिशि) ध्रुव (ध्रुव- तारा) विलोक्येत् तदा दृष्टिभुजान्तर यद्भवेत्सा पलमा स्यादिति ॥२३॥ प्रव पुन पलभाज्ञान बहते है। हि मा-दादमाग,लग दु को भुन मानकर द्वादा, पलभा, पलकणं इनमे उपन्न जो त्रिभुज होता है तद्पो यन्त्र के द्वारा उत्तर नरफ ध्र व तारा को देखने से दृष्टि भोर भुज था अन्तर जो होता है मही पलभा हाती है ।।२३।।
त्रिप्रश्नाधिकारः इदानी पुनरपि पलभाज्ञानमाह । उदयास्तसूत्रतः स्याच्छड्कनप्ररोपणी स्वतिः। नृतलास्तोदयसूत्रान्तरं रविगुरणं नृत्पन्नाभा वा ॥२४॥ स्ववृतिर्वा सूर्यगुणा शङ्क विभक्ता पलश्रवणः । इप्टच्छायाम्यस्तं नृतल दृग्ज्योघृतं पलामा वा ॥२५॥ वि. भा-उदयास्तसूत्रत शड कनप्ररोपणी (उदयास्तसूनाच्छड्कन यावदुद- यास्तसूनोपरिलम्बस्पा) स्वधृति (हृति.) भवेत् । नृतलास्तोदयसूत्रान्तर (शङ्क, मूलस्वोदयास्तसूत्रान्तर शङ्कतल ) रविगुण ( (द्वादशगुरिणत) नृहत् (शङ्क भक्त) वा पलाभा (पलभा) भवेत् ॥२४॥ स्वधृति (हृति ) सूर्यगुरणा (द्वादशगुणिता) शङ्क, विभक्ता तदा पलश्रवण (पलकर्ण) भवेत् । नृतल (शङ्क तल) इष्टच्चायाभ्यस्त (इष्टच्छायागुरिणत) दृग्ज्योधृत (दृग्ज्याभक्त ) वा पलाभा (पलभा) भवेदिति ॥२४ २५।। अवोपपत्ति शतल४१२ -पलभा । अक्षक्षेत्रानुपानेन शङ्का हरज्या १२ प्रथ छाया। छाया शतल दृग्ज्या हरज्या १२४शतल XEFAT शङ्क. शङ्का १२४शतल =पलभा शङ्क. छाया शतल = पलभा । अत प्राचार्योक्तमुपपन्नम् ॥२४-२५।। दृग्ज्या इति वटेश्वरसिद्धान्ते निप्रश्नाधिकारे विपुवच्छाया- साधनविधि प्रथमोऽध्याय ।। अव पुन पलभाज्ञान कहते हैं । हि भा -उदयास्त मून से शक के अन तक उदयास्त मूत्र के ऊपर लम्बरूप रेखा स्वति (हति) होती हैं । शङ्क.मूल और स्वोदयास्त मूत्र के अन्तर (महतल) को द्वादश से गुणवर शङ्क, से भाग देने से वा पलभा होती है । हृति को द्वादग से गुणवर शङ्क, मे भाग देने से पलकणं होता है । शङ्क,तल को इप्टच्छाया मे गुरणकर हाज्या मे भाग देने से पथवा पलभा होती है ॥२४-२५॥ उपपति शतल १२ प्रक्षक्षेत्रानुपात पलभा।
४७२
वटेश्वर सिद्धान्ते
हरज्या १२
पाडू.
छाया दरल_हग्ज्या १२ संतल १२ शंतल
-छाया।
हरज्या हग्ग्या पडू शङ्क
छाया शनल
हरज्या
= पलभा इमसे प्राचार्योक्त उपपन्न हुमा ॥२४-२५॥
इति वटेश्वरसिद्धान्त में विप्रनाधिकार मे विषुवच्चायोना साधनविधि
नामा प्रथम अध्याय समाप्त हुमा ।।
द्वितीयोऽध्यायः
अथ लम्बाक्षज्यानयनविधिः
इदानी लम्वाक्षज्ययोरानयनान्याह
पलभार्कवर्गगुरिगतौ त्रिज्यावर्गों पलश्रवणकृत्या।
रतायवासमूले पलजीवा लम्बजोवेस्तः ॥१॥
अथवा भार्ककृतिने त्रिज्ये भाहृतश्रवणभक्त ।
केवलया श्रुत्या लब्धी छायार्कसंगुरिंगते ॥२॥
वि भा -निज्यावर्गों पलभाऽर्कवर्गगुणिती (पलभा द्वादशवर्गाभ्या पृथक्-
गुरिणतो) पलश्रवणकृत्या (पलकर्णवर्गण) भक्तो, अवाप्तमूले (लब्धयोर्मूले ग्राह्य)
तदा पलजीवा लम्बजीवे स्त (अक्षज्यालम्वज्ये भवत ) ।। अथवा त्रिज्ये भार-
कृतिन (पलभाद्वादशवर्गगुणिते) भार्कहतश्रवणभक्त (पलभा पलकर्णघातेन द्वादश-
पलकर्णघातेन च विभाजिते) तदाऽक्षज्यालम्बज्ये भवत । अथवा गिज्ये छाया-
मन गिते (पलभाद्वादशगुणिते) केवलया श्रुत्य (केवलपलऐन) विभाजित नदा
लब्धी----अक्षज्यालम्बज्ये भवत । इति ॥१२॥
अनोपपत्ति
अक्षज्या लम्वज्या विज्याभिर्भुजकोटिकर्जायमानाक्षक्षेत्रम्य पलभा
द्वादशपलकणे जोटिकणेस्त्पन्नाक्षक्षेत्रण सजातीयन्यादनुपातो यदि पलकर्ण-
वगैरण पलभावर्गो लभ्यते तदा निज्यावर्गेण विमित्यागतोझज्यावर्गस्नम्वरम्
पलभा नि
पलभा त्रि
मूलेन
-अक्षज्या। एब
पलत'
गम्बज्या मूलेन
पलक
पलकर
पलभा' त्रि पलभा नि
पलक
-प्रक्षज्या
पलभा पला पलकर्ण
01 दि १२xगि
-लम्पज्या।
१२ पलकर्ण
१२.नि
१२xनि
तुज्या अथवा
%3D
m
पक
पूर्व प्रथमश्लोरेन वर्गानुपातद्वारा येक्षज्या लम्बज्ये ममानीने नत्र वर्गानुस.
तम्याऽवश्यकता नाऽऽगीवथ वर्गानुपानेन तयोगनयन पृतमानायेंगो-याचार्य एय
ज्ञात शयनोतीति मन्मते तु वर्गानुपातररण निरर्थक मिति ॥१॥
४७४ वटेश्वर-मिद्धान्ते प्रव लम्बज्या और अक्षज्या के ग्रानयन करते हैं। हिमा-त्रिज्यावर्ग को पृथक् पतभावर्ग और बाहर के वर्ग मे गुणाकर पलकणं वर्ग से भाग देकर जो फल हो उन दोनो के मूल अक्षज्या और लम्बग्या होती है । अथवा त्रिज्या को पृथक् पलभा वर्ग और द्वादश वर्ग से गुण कर, मग पलमा पलारणं वे धान और द्वादश पल- कणं के घान से माग देने से अक्षज्या और लम्बज्या होती है । अथवा त्रिग्या को पृथक पलभा पौर द्वादन मे गुण कर पल में भाा देने में अक्षया और लम्बज्या होती है ।।१२।। अपत्ति प्रक्षज्या मुज, लम्बज्या कोटि, त्रिज्या कणं इन भुजबोटि और कर्ण से जो त्रिभुज बनता है वह पलमा भुज, द्वादश कोटि, पलरणं इन भुजकोटिकों में उत्पन्न त्रिभुज का मजातीय है इसलिए अनुपात करते हैं यदि पलार्ग वर्ग में पलभावर्ग पाते हैं तो त्रिज्यावर्ग मे क्या इस अनुपात से प्रभज्या वर्ग आता है पलभ त्रि = अक्षग्या मूल लेने से पलका पलभा घि =पक्षज्या । एव १२' त्रि पलक पलक' =लंज्या मूल लेने से १०४ त्रि -सज्या पलक अथवा १२ त्रि पलमा त्रि -प्रक्षज्या - पलकर्ण पलमा त्रि पलभा पलकर्ण १२' त्रि १२ पलक लज्या पलक प्रथम श्लोक की उपपत्ति म वर्गानुपात करन को प्रावश्यक्ता नहीं थी, क्योकि वर्गानु. पान प्राचार्य ने दिया यह बान पाचाप ही जान सकते हैं, हमारे विचार मे वह निरर्थक है। वर्गानुपान करने की कोई प्रावश्यक्ता नही है ॥१२॥ पुनस्तयोरेवानयनद्वयमाह । त्रिज्ये छायाप्ने कर्णहृते वा पलावलम्बज्ये । नृच्छायानिहते वा छायाङ्कन ते चान्ये ॥३॥ वि भा -वा निग्ये पृथक् छायाऽर्वघ्ने (पलभाद्वादशगुणिते) कर्णहृते (पलकर्णभक्ने) पलापलम्वज्ये (अक्षज्यालम्बज्ये) भवत । वा पूर्वोक्तफले नृच्छाया निहढे (द्वादशपलभागुणिते) छाया गयूद्धृते (पलभाद्वादशभक्त) तदाऽन्ये ते स्त इति ।।३।। प्रयोपपत्ति पल त्रि प्रक्षक्षेत्रानुपातेन पलाण %D अक्षज्या १२xपि पलब =लम्वज्या।
पिप्रश्नाधिकारः ४७५ % नि. १२ नि. पभा अक्षज्याX१२ अथवा. पलभा. नि. १२ लंज्या. पभा_१२४त्रि, पभा तथा पलभा पलक पलभा १२ पकणं १२. = लम्बज्या - अक्षज्या पलक पलक अत प्राचार्योक्त युक्तियुक्तमिति ॥३॥ पुन, अक्षज्या और लम्बज्या के प्रानयन कहते हैं । हि. भा-त्रिज्या को पृथक् पलभा और द्वादश मे गुणकर पलकर्ण से भाग देने में अक्षज्या और लम्वज्या होती है । अथवा पूर्वोपन फल को हादय और पलभा मे गुणकर पलभा और द्वादश मे भाग दो से अन्य होते हैं अर्थात् अक्षज्या तम्बग्या में व्यत्याम होता है ॥३॥ उपपति यक्षक्षेत्र के अनुपात से पभा त्रि --अक्षज्या पलक १२xत्रि पलक लज्या लज्या.पभा तथा पलव.पभा त्रि पभा यज्या प्रज्याx१२ पभा नि १२ १२४नि. पमा प्रथवा पभा पक्गाX१२ घि १२ - लज्या पलव परम् प्रत प्राचार्योस्त युक्तियुक्त है ।।३।। पुनरक्षज्यालम्वज्ययो माधनान्याह । लम्बज्याकृतिहीनात् त्रिज्यावर्गास्पदं पलज्या वा। पलजीवा विज्याकृति वियुतिपदं लम्बरुज्या वा ॥४॥ कुज्या भाकरीना भावृत्तायोद्धृताऽयवाक्षज्या। चिनभागज्याऽकंज्या त्रिज्याऽग्रज्ययादवलम्बज्या ।।५।। लम्बग्योन समेत त्रिज्याघातात्पदं पलज्या वा। अक्षज्यपोनयुक्तत्रिगुरणवधान्मूलमितरा या ॥६॥ विमा लम्बज्या कृतिहीनात् त्रिज्यावर्गात (लम्यज्या वगर्गहतान् प्रिज्या- वर्गात) पद (मूल) वा पलज्या (अक्षज्या) भवेत् । पलजीवा विग्यातिषियुनिषद (त्रिज्याक्षज्ययोगन्ति रमूल) या लम्बज्या (लम्बकज्या) भवेत् ।। अथवा बुग्या माना (आयाणगुणा) भावृतागोता (छायावणंगोलीपायया भाना) तदासज्या भवेत् । भारगंना (छायारणिता) जिनभाज्यानार्मज्या (जिन- ज्यागुणित रविभुजज्या) मिज्यायग्यया (विज्यागुणितमायारगंगोलीयाग्रया) हत (भक्ता) नदायलम्बज्या (लम्बग्या) भयेन् । प्रयया लम्बज्योनसमेत निग्या- पानात् (लम्रज्यया रहितमहिनविज्ययोर्वधात्) पदं (मूल) पलज्या (प्राग्या) कुज्या त्रि कुज्या त्रि वटेश्वर सिद्धान्त भवेत् । प्रक्षज्ययोनयुक्तत्रिगुणवधात् (मक्षग्ययारहितसहित त्रिज्ययोर्घातात्) मूत वा इतरा (लम्बज्या) भवेदिति ॥४-६।। अनोपपत्ति अथ-/ नि-लज्या प्रक्षज्या। तथा /त्रि'-अक्षज्या =लम्बज्या । छायाकर्णगोलीयाग्रा त्रि प्रक्षक्षेत्रानुपातेन =अक्षज्या । पर -प्रा छायण अत उत्थापनेन -कुज्या नि छाक -अक्षज्या छाकगोलीयाग्रा त्रि डाकगोयग्रा नि छायाक कुज्या छाक माज्या नि तथा -लम्बज्या, अत्राप्यग्राया उत्थापनेन छाकगोअग्ना अग्रा भाज्या त्रि काज्या चाकण -लम्बज्या। छायाकरणगोमग्रा त्रि छायाकर्णगोप्रमा छायाकरी जिनज्या भुजज्या, परन्तु 'प्राज्या तत मान्तिज्याया उत्थापनेन त्रि जिज्या भुज्या छाकर्ण लम्बज्या ॥ त्रि छाकर्णगोमग्रा तथाच त्रि-लज्या' अक्षज्या वर्गान्तरस्य योगान्तर पातसमत्वात् । V(त्रि+लज्या) ( गिलज्या) अज्या । एव /त्रि--अक्षज्या = लम्वज्या वर्गान्तरस्य योगान्तरघातसमत्वात, (नि+अज्या) (मि-अज्या)लम्बग्या मत उपपन्न सर्व मिति ।।४६॥ - . हि भा-लम्बग्या वग को त्रिज्यावर्ग म घटा कर मूल लन से अक्षज्या होती है, मयका विज्यावग म अक्षज्या को घटाकर मूत लन से लम्बज्या होती है ॥ प्रयवा कुज्या को छायाकग म गुणवर छायावण गालीय प्रना मे भाग देने से मक्षज्या होती है। जिनग्या गुणिन त्रिज्या को छायारणं से गुणकर त्रिज्या और छायाधणं गोलोय अया के पात से भाग देन स नम्बज्या होती है ॥ अथवा लम्बग्या करक रहित और सहित त्रिज्या के धात कर मून ने म अक्षज्या होती है । तथा अनन्या करने रहित और सहित त्रिज्या के धात कर मूल लन में लम्बज्या होती है ॥४६॥ उपपत्ति लिज्या प्रक्षन्या । क्या /त्रि-प्रज्या लन्या प्रश्वा त्रिप्रताधिकारः प्रमा कुन्या छाया प्रक्षक्षेत्रानुपात से पुज्या. छायावणंगोलीयाग्रा त्रि -प्राज्या। परन्तु -प्रा छायावरणं माज्या में स्वरूप में अग्रा को उत्थापन देने में दुज्या, त्रि छायाकगोपना नि छायागीप्रमा छायाव काज्या वि प्रक्षज्या तथा लम्बया । यहा भी अनारे स्वरूप को उत्यापन देने में अग्रा काज्या.नि काया.छायाक त्रिज्या भुजज्या छायाकगोग्रा.त्रि -काज्या छायाकगोपना लम्बज्या । परन्तु छायाए अत. कान्तिज्या के स्वरूप को उत्थापन देने से जिग्या. भुज्या, छापान =लम्पज्या। मि. डायागोमग्रा अथवा निया' अज्या वर्गान्तर योगान्तर घात के बराबर होता है । इसलिये V[नि+लज्या) (त्रि-मन्या) =अक्षज्या। तथा प्रि---अज्या सज्या यह भी वर्गान्तर योगान्तर पात के बराबर होने से /(वि+अज्या) (प्रि-अज्या)- लम्बज्या । प्रत प्राचार्योंक्त उपपन्न हुमा ।।४.६।। पुनस्तयोरेवानयनान्याह। फुज्या कांतिज्ये वा रिज्याध्नेऽग्रज्यया हते ते स्तः। अग्रा समशड कुज्ये त्रिगुरणप्ने तधृति हते वा ॥७॥ स्वधृतिहदवा त्रिज्ये नृतलनरहने पलावलम्बग्ये । प्रक्षावलम्बकामु कहोनत्रिोहाद् गुणौ वा ते ॥८॥ वि. मावा कुज्या क्रान्तिज्य विज्याघ्ने (त्रिज्यागुणिते) अग्रज्यया (प्रप्रया हृते (भक्ते)ते स्तः (अक्षज्यालम्बज्ये भवत ) । वा अग्रासमशङ्क ज्ये त्रिध्याने तद् धृतिहते (तद्धतिभक्ते)तदाऽक्षज्यालम्बज्ये भवत. । वा त्रिज्ये नृतलन रघ्ने(श तल- स्वकृतिहृत् (हत्या भक्त) तदा पलावलम्बज्ये ( अक्षज्यालम्वज्ये) भवतः । वा प्रक्षावलम्बका वहीन निगेहात् (अक्षांशलम्वादरहित नवत्यशचापात् ) गुणी (ज्ये) ते (लम्बज्या अक्षज्ये) भवत इति ७.८|| अयोपपत्तिः । अक्षज्या लम्बज्या त्रिज्याभिभुजकोटिकाहित्पन्नमेकमक्षक्षेत्रम् । बुग्या. क्रान्तिज्या ग्राभिमुंजकोटिकर्ण रुत्पन्न द्वितीयमक्षक्षेत्रम् । ननयोस्मिभुजयोः सजातीयत्वादनुपातः । पुज्या.मि. मोज्यामि -प्रक्षज्या 1 तथा सम्वज्या. अग्रा अग्रा -अक्षज्या ।तथा- -अक्षज्या। वटेश्वर-सिद्धान्ते तथाऽग्रासमशड कु तद्धृतिर्भुजकोटिवर्णरत्पन्ननिभुज पूर्वोक्त त्रिभुज सजा- तीय मतोऽनुपात अंग्रा नि समगड युनि =लम्बज्या। तद्धृति तति अथवा शड कुतल शड कुतिभिभुजकोटिवणम्त्पन्नत्रिभुजपूर्वोक्तनिभुजसजा. तीयमतोऽनुपात शड कुतल त्रि शडकु नि हति '= लम्बज्या अन स्वधृति शब्देन हतिर्बोध्या वा ज्या (६०-लम्बाश)=अक्षज्या। ज्या (०-अक्षारा) -लम्वज्या अत उपपन्नमाचार्योक्त सर्व मिति ।।७८|| हि भा-वा कुज्या और क्रान्तिज्या का त्रिज्या म गुणवर अग्ना स भाग दन स प्रथज्या और लम्बज्या होती है वा अग्रा और ममगक, को त्रिज्या स गुणकर तद्धति स भाग देने म अक्षज्या पीर नम्वज्या होती है । वा त्रिज्या को गद,तल और शइस पृथक गुणकर स्वति (हति) स भाग दने स अक्षज्या और लम्वज्या होती है। अक्षाग और लम्बाग रहिन नवत्या चाप को ज्यायें लम्बग्या और प्रक्षज्या होती है ॥७।। उपपत्ति । दुज्या नि प्राज्यानि =ज्या मना त्रि अक्षज्या, लम्बज्या, और त्रिज्या इन भुजकोटिक्र्णो स उत्पन एक अक्षक्षेत्र तथा कुज्या क्रान्तिज्या और अमा इन भुजकोटिकणों से उत्प न द्वितीय पथक्षेत्र इन दोना के सगतीय हाने के बारए अनुपात करत है -अभज्या तथा अग्रा तया अभा, समशड्द, और तधृति इन भुजकोटिकों स उत्पन्न त्रिभुज पूर्वोक्त त्रिभुज के सजातीय है इमलिय अनुपान करते हैं =अक्षज्या। समा छु त्रि - लम्बज्या तद्धृति तात अथवा शङ्कता शक, और हृति इन मुजकोटिकों स उत्पन त्रिभुजे पूर्वोक्न त्रिभुज क संजातीय है इमलिय अनुपात करते हैं गइ तन त्रि हृति यहा स्वधृति शब्देन हृति समझनी चाहिय । वा ज्या (१०-लम्वारा) =अक्षज्या : तथा ज्या (६०-अक्षाग)= लम्बज्या इति ॥७॥ -प्रभज्या। शङ्कत्रि सम्वज्या। पुनस्तयोरेवानयनाह । समाङ्क, क्रान्तिनरैरक्षज्यास्ताडिता क्रमाद् यिभजेत् । अप्राकुम्यानृतलरवासयो घाऽवलम्बग्या ॥६॥ .
त्रिप्रश्नाधिकारः लम्बज्याः क्रमशो वा कुज्याना नृतलताड़ितास्तु हरेत् । क्रान्तिज्या समशन स्वेष्टनररक्षमौर्व्यः स्युः ॥१०॥ जिनभागगुणरविभुजगुरणघातः समनरहनोऽयवाक्षज्या । क्रान्तित्रिभारपघातः समनरहृतोऽथवाऽक्षज्या ॥११॥ वि. भा --अक्षज्या पृथक् समशड कु क्रान्तिनरैः (समगइ कु क्रान्तिज्येष्ट- शड कुभिः) ताड़िताः (गुरिणताः) क्रमात अनाकुज्यानृतलैरवाप्तय. (अग्रावुभ्या- शङ कुतलर्भजनात्प्राप्ता.) अथवा लम्बज्या भवन्ति ।। वा लम्बज्या क्रमश कुज्या- ग्रानृतलताडिता' (कुज्यानाशड कुतल[रिणता ) क्रान्तिज्या समशड कुस्वेष्टनर (क्रान्तिज्या समाड कुस्वेष्टशड कुभि ) हरेत् तदा अक्षमौर्य (अक्षज्या ) भवन्ति ।। अथवा जिनभागगुणरविभुजगुणघातः (जिनज्याभुजज्ययोवंध) समनरहृत (समश कुभक्त ) अक्षज्या भवेत् । अथवा क्रान्तिविभगुणघात (क्रान्तिज्यात्रिज्य- योर्घातः) समनरहृत (समशड कुभक्तः) अक्षज्या भवेदिति ।।६-११|| पत्रोपपत्ति। अग्ना, समशः । तद्धति एतैर्भुजकोटिकणेरुत्पन्नमेक त्रिभुजम् । कुण्या- क्रान्तिज्याऽग्राभिर्भुजकोटिकणेंद्वितीय त्रिभुजम् । शड कुतलशड कुहृतिभिमुंज- कोटिकणेरुत्पन्न तृतीय विभुज अक्षज्यालम्बज्यात्रिज्याभिर्भुजकोटिकर्णरुत्पन्न चतुर्थ त्रिभुजम् । एपा सजातीयात् अक्षज्या समशइक अग्रा लज्या। कांज्या.अक्षज्या कुज्या लज्या। प्रक्षज्या तथा ३सडकु. =लज्या । एवमेव शड, तल लंज्या कुज्या लज्याअग्रा अक्षज्या। -अक्षज्या । काज्या समगड कु लज्या.शड कुतल-अक्षज्या शड कु जिज्या भुजज्या काज्या.पि. अथवा अक्षज्या परन्तु. काज्या समराड कु दि उरत उत्थापनेन जिज्या.भुज्या.त्रि_जिज्या भुजज्या, '-अक्षज्या। समशड दुनि अत उपपन्नमाचार्योक्त सर्व मिति ॥ ६-१०११॥ समराड कु ४५० वटेश्वर-सिद्धान्ते पुन, उन्ही अक्षज्या और नवज्या के प्रानयन पत है। हि भा-अथवा अक्षज्या का ममगाइ, क्रान्निज्या, और इप्टमव में पृथक् पृयत् गुणकर क्रम में अग्रा, कुग्या, और गड कुतल मे भाग देन से सम्वज्या हाती है। अथवा लम्बग्या को पृथक् पृथक् बुज्या, अग्रा और श तल मे गुणकर क्रमश क्रान्तिज्या ममगर, में भाग दने मे अक्षज्या हानी है ॥ दा जिनज्यागुरिगत भुजच्या को सम• हाक म भाग देने म अक्षज्या होती है । वा आन्तिग्या और पिज्या के घान मे समग, स भाग देन से अशज्या हाती है ॥११॥ और इप्टाइ. उपपत्ति। मया, ममग, तनि इन भुभयोटिकणों मे उत्पन्न एक त्रिभुज, कुज्या, फ्रान्निज्या, अग्रा इन भजकोरियों स उत्पन्न द्वितीय रिभुज, गडू तल, राक, हृति इन भुजकोटिवणों से उत्पन्न तृतीय निभुज, प्रवज्या, लम्बज्या, त्रिज्या इन भुजबोटिवों से उत्पन्न चतुर्य विभुग इन विभुजो में सजानीय हान के कारण अनुपात करते है। अक्षज्या ममान-लज्या । रात इसी तरह ३ रा. क्राज्या प्रक्षज्या अक्षज्या शह लज्या, लज्या अग्रा बुज्या तल ज्या कुज्या लज्या अग्रा लज्या पाइतल ----प्रक्षज्या। यक्षज्या। -प्रक्षज्या क्राज्या समराक. बाज्या नि जिज्या भग्ना प्रयवा -प्राज्या। परन्तु ममराव त्रि आज्या इममें उत्यापन देने से जिज्या भुजज्या त्रि -प्रक्षज्या समग त्रि जिज्या भुजज्या समगइ प्रत प्राचार्योत उपपन्न हुआ ॥ ६-११ ॥ प्रय तयारेवोत्तमज्यानयनमाह । कुज्याग्रयोरपक्रमगुरणागयोरन्तरे निभज्याघ्ने । अग्राहृते क्रमात्ते ध्यस्ताक्षज्याऽवलम्वज्ये ॥१२॥ निभा-कुण्याग्रया , अरक्रमगुग्णाग्रयो (प्रालिज्यानयो ) अन्तरे विभज्या- धुने (निज्यागुणिते) अग्राहुने (अग्राभक्त) =मात् ते व्यस्ताक्षज्यानलम्बाज्ये अक्षारालम्बागयोगत्व मज्ये) भवत इति ।।१।। अग्रोपपत्ति । -यक्षज्या तत. गि-अक्षज्या-लम्बागोत्क्रमज्या अग्रा -त्रि- पुग्या मि त्रि अना-ज्या त्रि.त्रि (प्रग्रा-कुज्या) लम्बा. अग्ना अग्रा प्रक्षक्षेत्रानुपातेन तुज्या नि विm. शोकज्या तथा क्रांज्या त्रि लंज्या ततः त्रि-लम्बज्या अक्षांशोत्क्रमज्या अग्रा =त्रि- क्राज्या.त्रि_ त्रि अग्रा-क्राज्या त्रि_नि (अग्रा-क्राज्या)- अक्षाशो- अग्रा अंग्रा अग्रा कमज्या एतावताऽऽचार्योक्तमुपपन्नम् ॥ १२ ॥ अब अक्षाश और लम्वाश के उत्कमज्यानयन कहते हैं । हि.भा -कुज्या और अग्रा के अन्तर को तथा क्रान्तिज्या और अग्रा के अन्तर को त्रिज्या से गुणकर अग्रा से भाग देने से क्रमश लम्बागोत्क्रमज्या और अक्षाशोत्क्रमज्या होती है ।।१२॥ उपपति। पुज्या नि = अक्षज्या, नि-अक्षज्या=लम्वाशोत्क्रमज्या-त्रि- कुज्या.त्रि अग्रा प्रग्रा त्रि.अग्रा-ज्या त्रि_त्रि (अग्रा-कुज्या) = लम्बाशोत्क्रमज्या । %3- अग्रा अग्रा एवं काज्यात्रि =लज्या, त्रि-लज्या--प्रक्षाशोत्क्रमज्या-त्रि अंग्रा क्राज्या नि प्रमा नि अग्रा-जाज्या त्रि_ नि (अग्रा—क्राज्या) अत प्राचार्योक्त उपपन्न हुआ ॥ १२ ॥ अना अग्रा पुनस्तयोरेवानयनमाह । श्रुत्यर्कयोः श्रुतिभवोविवरे त्रिगुणाहते श्रुतिविभक्त । उत्क्रमपललम्बज्ये क्रमलम्बपलत्रिभगुणविवरे वा ॥१३॥ वि. भा. त्यर्कयो (पलकर्णद्वादशयो) श्रुतिभयोः (पलकर्णपलभयो) विवरे (अन्तरे) त्रिगुणाहते (त्रिज्यागुणिते) श्रुतिविभक्ते (पलकणंभक्ते) तदो- क्रमपललम्बज्ये भवतः । अथवा क्रमलम्वपलत्रिभगुणविवरे (लम्वज्यात्रिज्य- योरन्तरेऽक्षज्यात्रिज्ययोरन्तरे) अक्षाशलम्बाशोत्क्रमज्ये भवत इति ॥१३॥ अत्रोपपत्तिः । लम्वज्या, त्रि-लंज्या=अक्षाशोत्क्रमज्यात्रि- १२४ त्रि पलकर्ण त्रिपक-१२xत्रि_त्रि (पकर्ण-१२), पलभा.वि. अक्षज्या ततः पक पलक पलक १२xनि पक - तथा वटेश्वर सिद्धान्ते नि-अक्षज्या-लम्बागोकमज्या= =त्रि- पभा नि_ त्रिपक- पभा.वि पक पक 3D नि (पक -पभा), एतावताऽऽचार्योक्तमुपपन्नम् ॥ १३ ॥ पक पुन अक्षाग और लम्बान के उत्क्रमज्यानयन कहते है । हि भा--पलकणं और द्वादश के अन्तर को, पलवण और पलभा के अन्तर को त्रिज्या स गुगकर पलवर्ण स भाग दन म प्रक्षाशोत्क्रमज्या और लम्बाशात्मज्या होती है अथवा लम्बज्या और जिज्या के अन्तर तथा प्रभज्या और त्रिज्या के अन्तर अक्षांगोत्क्रम- ज्या और लम्बाशोत्क्रमज्या हाती है ।।१३।। उपपत्ति १२४नि = लज्या, त्रि-लज्या-अधाशाक्रमज्या-त्रि-१२xनि पक पलक त्रि पक-१२ त्रि त्रि (पक-१२) पभावि प्रभज्या त्रि---प्रक्षज्या-लम्बा- तथा %3- पक पक पक पभा नि पक पक त्रि पक-मा त्रि त्रि (पक-पभा) शोत्क्रमज्या=गि- पक इसस प्राचार्योक्त उपप न हुन। ।। १३ ।। पुनरक्षाशलम्बाशयोरुत्क्रमज्यानयनमाह । प्रना तद्धृत्यन्तर तद्धृतिनृविवरे त्रिभगुणध्ने । तद्धृत्या प्रविभक्ते चोरक्रम-लम्बालज्यके स्त ॥१४॥ घि भा -अग्रा तद्धृत्यन्तरतद्धृतिनृविवरे (अग्रातभृत्योरन्तरतद्धति- समशक्कोरन्तरे) निमगुगणघ्ने (विज्यागुरिणते) तद्धृत्या प्रविभक्ते तदा उत्तमलम्ब- पलज्यके (लम्बाशाक्षाशयोरलमज्ये) स्त (भवत ) इति ॥१४॥ अनोपपत्ति अक्षज्या, तत नि-अक्षज्या लम्बाशोत्क्रमज्या ज्या= त्रि-अग्रा त्रि_तद्धति रि-अग्रा त्रि_त्रि (तद्धृति–अग्रा), तवृति तद्धृति तद्धति अक्षक्षेत्रानुपातेन अग्रा त्रि तदान =ल उज्या। एवं समश त्रि लज्यो, तत नि-लज्या-अक्षागोलमाया- तदति निप्रश्नाधिकार ४८३ %- समाङ्क तद्धति नि- समश त्रि_नि तद्धृति-समश नि.त्रि (तद्धृति-समश =उज्या। तद्धृति तद्धृति तवृति ग्रत उपपन्नमाचार्योक्तम् ॥१४।। अब पुन अक्षाश और लम्बाश के उत्क्रमज्यानयन कहते है। हि मानना और तद्धृति के अन्तर को तथा तद्धृति और समशङ्क, वे अन्तर को त्रिज्या से गुणवर तद्धृति से भाग देने से लम्बाश और रक्षा की उत्तमज्या होती है ।।१४।। उपपति। अक्षक्षेत्रानुपात से अग्रा नि --अक्षज्या त्रि -अक्षज्या-लम्बाशोत्क्रमच्या तद्धृति अग्रा त्रि_नि तद्धति-- अग्रा नि_त्रि (तद्धति~अग्रा) =लउज्या । तद्धृति तदात तद्धृति त्रि एवं शमश त्रि वि लज्या. - लज्या:-अक्षाशोत्क्रमज्या=f7-- तद्धृति तति शितडति समश त्रि त्रि (तद्धति-समय) = अक्षाशोत्मज्या । इसमें प्राचा- तद्धति र्योक्त उपपन्न हुमा ॥१४॥ पुनस्तयारेवानयनमाह । नृतलस्वधृतिविशेष स्पतिनृविवरे त्रिमौविकाम्यस्ते । स्ववृत्या प्रविभक्त बोकमलम्बरुपलमौविके भवत ॥१५॥ विभा-नृतलस्ववृतिविशेषस्वधृतिनृविवरे (शङ्कतलहृत्योरन्तरहृति- शक्कोरन्तरे) विमौविवाभ्यस्तै (त्रिज्यागुणिते) स्वधृत्याप्रविभक्त (हृत्याभक्त) अथवा उत्तमलम्बवपलमौविके (लम्बाशाक्षाशयोरुत्तमज्ये) भवत इति ॥१५॥ अयोपपत्ति । = अक्षज्या तत नि-अक्षज्या-लम्बाशोलमज्या=त्रि- हृति मतल त्रि.वि हति-शतल त्रिवि (हति-शतल) लउज्या। हृति हृति तथा लज्या तत त्रि-लज्या प्रक्षाशोनमज्या-नि-दाइ त्रि त्रि हति-शङ्क, निवि (हृति-शङ्क) अक्षाशोत्नमज्या । स्वधृतिशब्देन हुति- हति हति योध्या। एतावताऽऽचार्योक्तमुपपन्नम् ॥१५॥ शङ्कतल त्रि हृति राङ्क मि हति ४८४ बटेश्वर-सिद्धान्ते पुन उही दोना वे मानयन कहत हैं। हि मा-शङ्क,तल और हति के अन्तर का तथा हति और शक के अन्तर को त्रिज्या म गुणकर हृति से भाग दने स लम्बाश और मक्षाश की उत्तमज्या होती है ॥१५॥ उपपत्ति मक तल त्रि -अक्षज्या नाडूतल त्रि =लज्या तथा भनि हृति वि -अक्षज्या+लम्वासारक्रमज्या-त्रि- हृति मिति -पातल हुत्रि _त्रि (हति-पातल) =उज्या हृनि हृति हृति त्रि त्रि-ज्या =अशागोजमज्यात्रि- हृति त्रि हृति-गायि_त्रि (हृति-कु) =पउज्या । स्वधृति से हृति समझनी हृति चाहिय । इमस माचार्योन उपपन्न प्रा॥१५॥ इदानी लम्बाभज्ययोरानयनान्याह । उत्क्रमपललम्बज्याहृतो पलगुरगावलम्बगुणवर्गों। लम्धे त्रिज्यारहिते लम्बाक्षज्ये व्यासघ्नस्वकृतिबंजिते व पदे ॥१६॥ पललम्बज्ये व्यासो तदूनगुणी ते पदे वा स्त ॥१६॥ विभा-पलगुणावलम्वगुणवर्गों (अक्षज्यालम्बज्ययोद!) उत्तमपल- लम्बग्याहतो (अक्षारालम्बागयोगरत मज्याभक्तो) लब्धे रिज्यारहिते (त्रिज्यया होनिते) तदा लम्बाक्षज्ये भवत । प्रयवा व्यासघ्नम्वनियजिते (उत्तमज्या- गुरिणतच्यासे उत्तमज्यावर्गहीन) पदे (मूले) तदा पललम्बज्ये (प्रक्षज्यालम्बज्ये) भवत । अथवा तदूनगुणो (उत्तमज्यया हीनगुणिती) व्यासो पदे (मूले) ते (पल- लम्बज्ये) स्त (भवत ) इनि ॥१६॥ प्रतापपत्ति । देवुनवेन्द्रम् । पनचाप-अक्षागचापम् । पर-अक्षज्या नर-अक्षाशोकमज्या। नच -व्याम । वन-त्रिज्या,चपन = ६० तदा परन त्रिभुजयो माजा यादनुपात पर पर प्रजज्या -- रचवेर प्रक्षामात्नमज्या +वेच लज्या+त्रि मन रच-च= प्राज्या -विलज्या, यदि च पन साभामज्या चाप लम्बासचाप तदा पूर्ववत लम्बज्या' च लम्बागाकमज्या चित्र नं०११ -पि प्रक्षया । एतेन प्रथमप्रवार उपपद्यते। र चर, विप्रश्नाधिकारः ४८८ - पर पर पर अथ ::पर=रच४ रन%=(नचरन) रन रन रन = अक्षज्या=(व्यास-अउज्या) अउज्या व्यास अउज्या-अउज्या' मूलेन अक्षज्या =Vव्यास अउज्या-अउज्या' एवमेव लम्वज्या=/व्यास लउज्या-लउज्या' तथा अक्षज्या=/व्या-अउज्या) अउज्या लम्बज्या= (व्या-लउज्या) लउज्या एतेनोपपन्न सर्वमिति ॥१६॥ अव लम्बज्या और अक्षज्या के प्रानयन तीन प्रकार से कहते है। हि भा - अक्षज्या और लम्बज्या के वर्ग को अक्षाशोत्क्रमज्या से भाग देकर जो फ्ल उनमे त्रिज्या घटाने से क्रमश लम्बजा और अक्षज्या होती है । अथवा अक्षाश और लम्बास उत्क्रमज्या को व्यास मे घटा कर अपनी-अपनी उत्कमज्या से गुण कर मूल लेने से कर अक्षज्या और लम्बग्या होती है । अथवा व्याम को अक्षाशोत्क्रम या और लम्वाशोत्क्रम से पृथक पृथक् गुण कर अपनी अपनी उत्क्रमाया वर्ग घटा कर मूल लेने से क्रमश अक्ष और लम्बग्या होती है ॥१६॥ उपपत्ति चित्र देखिये । के-वृत्तकेन्द्र । पनचाप =अक्षाशचाप, पर=अक्षश्या नरः अक्षारा की उत्क्रम-या। नच ध्यास । केन -त्रिज्या केर= लम्वन्या । <चपन - पर पर तब चपर, परन दोनो त्रिभुज मनातीय हैं इसलिये अनुपात करने हैं रन प र - प्रक्षज्या अक्षाशोत्क्रमग्या %3D रच = देर+केच लज्या+त्रि प्रक्षज्या अत रच-च- -दिलज्या। यदि इसी तरह पनचाप प्रक्षाशारक्रमज्या लम्चज्या लम्बाश मानकर पूर्ववत् उपपत्ति करें तो -मिप्रक्षज्या । इमसे प्र लम्बागारक्रमज्या प्रकार उपपन हुग्रा। यदि पन चाप अक्षाश है पर पर पर' तो ::पर'=रच ४ रन=(नव-रन)रन-प्रक्षाज रन रन = (व्यास --अउज्या) अटज्या =व्याम प्रउज्या-प्रउज्या' वटेश्वर सिद्धान्ते मूल लेने से व्या X अउज्या--प्रउज्या' = अक्षज्या इसी तरह /व्या उज्या-उज्या'=ल ज्या नया व्या-उना) प्रया=प्रपा, (व्या-लउज्या)ल उज्या = लज्या इससे प्राचार्योक्त अपन्न हुमा ।।१६।। पुनस्तयोराननमाह । उत्क्रमजीवान्तरकृति होनत्रिज्याकृतेर्दलं यत्तत् । पलगुरगहल्लम्बच्या लम्बज्याहृतपलज्या वा ॥१७॥ पि भा-उत्क्रमजीवान्तरकृतिहोनत्रिज्याकृते । (अक्षाशलम्बाशोनमज्या- 'तरवर्गहीनत्रिज्यावर्गस्य) दल अर्धम् यत्तत् पलगुणहृत् (अक्षज्याभक्त ) तदा लम्बज्या स्यात् । लम्बज्याहृतदा पलज्या (अक्षज्या) वा भवेदिति ॥१७॥ अनोपपत्ति त्रि-ज्या अक्षाशोकमया । नि-प्रक्षज्या लम्बाशोत मज्या अनयोरन्तरम् त्रि-अज्या-(नि-ज्या)=नि-प्रज्या-त्रि+लज्या= लज्या--अक्ष -उत्तमज्यान्तर नि'-अक्षाशलम्बाशोत्तमज्यान्तर=नि'-(लज्या-- अज्या) =त्रि'-(लज्या-लज्या, अज्या+अज्या')= त्रि--(नि-२ लज्या अज्या) =त्रि-नि+२ लज्या अज्या=२ लज्या अज्या त्रि'-अक्षाशलम्बाशोत्तमज्यान्तर' २ अत लज्या अज्या वि'-अक्षाशलम्बाशोत्नमज्यान्तर' तत -अक्षज्या, वा नस्मिन्नेवाक्षज्यया २लज्या भवते लम्बज्या भवेदत प्राचार्योक्तमुपपन्नम् ॥१७॥ प्रव पुन उही दोनो के पानयन कहते हैं। हि मा--प्रभाग पौर लम्बाश के उस्क्रमज्यान्तर वर्ग करके हीन त्रिज्यावर्ग के साधे को प्रक्षज्या म भाग देने मे लम्वज्या होती है और नम्वज्या में भाग देने म प्रज्या होती है ।।१७॥ उपपत्ति। पिज्या प्रभाशोकमज्या। त्रि-प्रज्या लम्बासोलमज्या दोनो के अन्तर करने में त्रि--अग्या-(नि-लग्या)=नि प्रज्या-त्रि+लज्या- लज्या-प्रग्या उत्क्रमज्यान्तर
विप्रश्नाधिकार
४६७
अत त्रि-अक्षाशलम्वाशोत्क्रमज्यान्तर'-त्रि--(लज्या-प्रज्या)
=-त्रि-(लज्या'--२ लज्या अज्या+अज्या')=त्रि'-(त्रि-२ लज्या अज्या)
-त्रि-त्रि+२ लज्या अज्या=२ लज्या अज्या
वि-प्रक्षागलम्वामोत्तमज्यान्तर'
लज्या प्रक्षज्या, प्रक्षज्या से भाग देने से
२
मि-प्रक्षामलम्बाशोत्क्रमज्यान्तर'
=लज्या, उमीमें लम्बज्या से भाग देने,
२ अज्या
से अक्षज्या होती है । इससे प्राचार्योक्त पद्य उपपन्न हुअा ॥१७॥
प्रत
पुनरपि तयोरेवानयनमाह ।
विज्यावर्गात द्विगुणाद् व्यस्तगुणान्तरकृति विशोध्य पदम् ।
उक्तान्तरोनयुक्त दलित पललम्बकश्ये वा॥१८॥
विभा -निज्यावर्गाद द्विगुणिात् व्यस्त गुणान्तरकृति (अक्षाशलम्बाशयो-
रुत्क्रमज्यान्तरवर्ग) विशोध्य पद (मूल) उक्तान्नगेनयुक्त (अक्षाशलम्बाशयो-
रुत्क्रमज्यान्तरमेकन हीनमपरव युक्त) दलित (अधिकृत) अथवा पललम्वकज्ये
(अक्षज्या लम्बज्ये) भवत ॥१८||
अनोपपत्ति
अथ लम्बाशोत्तमज्या-अक्षाशोत्क्रमज्या लज्या-अज्या उत्क्रमज्यान्तर
तत रनि'-उत्क्रमज्यान्तर' =२ त्रि'-(लज्या-अज्या)
२ नि'-(लज्या-२ लज्या अज्या + अज्या') =नि'
-(नि'-२ लज्या अज्या)
=२नि'-नि+२ लज्या अज्या=त्रि+२ लज्या अज्या-लज्या'
+ग्रज्या+२ लज्या अज्या
= (लज्या+अज्या) मूले/त्रि'- उन मज्यान्तर' =लज्या+अज्या
लज्या-ज्या उत्न मज्यान्तर तत मनमणगणितेन
V२ त्रि'-उत्तमज्यान्तर'-उत्तमज्यान्तर,
.
प्रज्या
१/घ'उज्यान्तर' + उज्यान्तर
-लज्या
२
एतावताऽऽचार्योक्नमुपपद्यते ॥१८॥
४८८ वटेश्वर-सिद्धान्ते अव पुन उन्ही दोनो के ग्रानयन कहते हैं। द्विगुणित विज्यावर्ग में अक्षाश और लम्बाग के उत्क्रमग्यान्तर वर्ग घटाकर मूल लेना उसमे उस उत्क्रमज्यान्तर को हीन और यत कर प्राधा करने मे प्रक्षज्या और लम्बज्या होता है ॥१८॥ उपपत्ति । लम्बामोत्क्रमज्या--अक्षाशोत्क्रग्या-लज्या-ग्रज्या उत्क्रमग्यान्तर २ त्रि'-उत्क्रमज्यान्तर' =२ नि'-(लज्या-ज्या) =२ त्रि'-(लज्या -लज्या अज्या+ग्रज्या)=२त्रि'-(नि'-२ लज्या अज्या) =२ त्रि'-त्रि'+२ लज्या अज्या=त्रि+लज्या अज्या-लज्या+अज्या+२ लज्या प्रज्या (लज्या+अज्या) मूलग्रहणेन /२ नि'-उत्क्रमज्यान्नर'=लण+अज्या। लज्या-ज्या= उत्तमज्यान्तर तव सक्रमण गरिणत से /२ -उत्क्रमज्यान्तर'---उत्क्रमग्यान्तर=अया। २ /२fr'-उत्क्रमग्यान्तर+उत्क्रम याम -लया। २ इसमे प्राचार्योत उपपन्न हुमा ॥१८॥ पुनम्तयारेव प्रभारद्वयेनानयनमाह । तदाऽक्षयोन लम्बलवन्याऽक्षज्यावलम्बगुरगहीनम् । त्रिज्योरक्रमाक्षलम्बकगुणान्तरे लम्बकाक्षज्ये ॥१६॥ निभा-या तत्फत (उत्तमज्यावर्गहीनद्विगुग्गिनिज्यावर्गमूल ) अक्षज्योन (अक्षज्यया होन) तदा लम्बलवज्या (लम्बाराज्या) भवेत् । तदेव फल अवलम्वगुण- होन (लम्बज्यया रहित) तदाऽक्षज्या स्यात् । वा त्रिज्योत्क्रमाक्षलम्वगुणान्तरे (त्रिज्याक्षाशोन्मज्यान्तरविज्यालम्बासोनमज्यान्तरे च) लम्बकाक्षज्ये (लम्बा- क्षज्ये) भवत इति ॥१॥ प्रत्रोपपत्ति. पूर्वानीतस्वरूपम् = लज्या+अज्या=/२ नि-उत्तमज्यान्तर' अन यदि नम्बज्या विशोध्यते तदाऽक्षज्या भवेत् । अक्षज्याया वियोधनेन लग्यज्या भवेदेव । तथा त्रि-प्रयागोत्रमज्या=ल ज्या । नि-लावासोत्तमज्या-अक्षज्या। अत. सिद्धम् ॥ १६ ॥ हि मा-उम फ्ल म (उत्तमज्यान्तर वर्गरहिन द्विगुणित विज्यावर्ग में) अक्षग्या पटाने में लम्बग्या होती है और लम्बग्या वो घटाने मे अनन्या होती है । प्रथवा विज्या और प्रभागोत्क्रमज्या वे अलर लम्बग्या होती है पोर विग्या लम्दागोजमज्या वे अन्तर मक्षग्या होती है !! १९॥
निप्रश्नाधिकार: ४८६ उपपत्ति । पूर्वानीत स्वरूप लज्या+अज्या-/२ वि-उत्क्रमज्यान्तर' इममे प्रक्षज्या को घटाने से लम्बज्या और लम्बज्या को घटाने से अक्षज्या होती है । तथा त्रि-प्रक्षाशोत्क्रमज्या लज्या। नि-लम्बामोत्तमज्या = प्रज्या प्रत सिद्ध हो गया ॥१६॥ इदानी पुनरप्यक्षज्यासाधनमाह चरदलजीवायुज्यावधोऽग्रया भाजितोऽथवाऽक्षज्या। समकापनामजीवाघातोऽकहृतोऽथवाऽक्षज्या ॥२०॥ वि मा --अथवा चरदलजीवाद्युज्यावध (चरज्याद्यज्ययोर्घात ) प्रत्रया । भाजित (अग्राभक्त ) अक्षज्या स्यात् । अथवा समकरर्णाऽपर मजीवाघात (सम- मण्डलकर्णक्रान्तिज्ययोर्वच ) अहृत (द्वादशभक्त ) अक्षज्या भवेत् ।।२०।। अनोपपत्ति । अक्षक्षेत्रानुपातेन कुज्या नि -अक्षज्या । परन्तु चरज्या धुज्या अग्रा पुज्या वि अत उत्थापनेन चरज्या द्य ज्या त्रि. चरज्या ज्या. -अज्या । अग्रा क्रान्तिज्या त्रि नि२ तथा अनानि =समशङ्क. - प्रक्षज्या । परन्तु समकर्ण समशङ्क. काज्या नि समक अतोऽक्षज्यास्वरूपे समराकोरुत्यापनेन भाज्या त्रि नि १२ मि१२ समक %3D माज्या समकर्ण = अक्षज्या । एतावनाऽऽचार्योक्तमुपपन्नम् ॥३०॥ १२ अव पुन अक्षज्या माधन करते हैं हि भा-अथवा चरज्या और धुज्या वे पात में प्रया मे भाग देने में यक्षग्या होती है अथवा समार्ग मोर क्रान्निग्या वे पान में बारह में भाग देने में प्रक्षज्या होती है ॥२०॥ उपपनि। माक्षेत्रानुपात में मुख्यात्रि -प्रक्षज्या। परन्तु चरज्या ज्या त्रि -कुण्या इसलिये
४००
वटेश्वर-सिद्धान्ते
घरज्याधुनि_चरज्या द्यु-प्रज्या
अक्षज्या के स्वरूप मे कुज्या को उत्थापन देन मे
अग्रा त्रि
अग्री
क्राज्या त्रि
तथा
प्रक्षज्या।
परन्तु
ममवणं
घि १० = ममगइ, इसलिये अक्षज्या वे स्वरूप में
ममशङ्क.
प्राज्या निममक
ममगाइ, को उत्थापन देने में
व्राज्यात्रि
त्रि १२
व्राज्याममक
-प्रक्षज्या
१२
नि १२
समक
इससे प्राचार्योक्त प्रकार उपपन्न हुप्रा ॥२०॥
इदानी पुनरपि लम्वज्यानयनमाह ।
पलभाहल्लम्बज्या नृतलामात् नृभाक्षगुरगघातात् ।
श्रुतिगुरिणता क्रान्तिज्या भावृत्ताग्रोधृता वा स्यात् ॥२१॥
मि भा --नृभाक्षगुणघातात् (शङ्क.पलभाऽक्षज्यावधात्) नृतलाप्तात्
(शङ्कतलभक्तात्) पलभाहृत् तदा लम्बज्या भवेत् । अथवा क्रान्तिज्या श्रुति-
गुणिता (छायाकर्णगुणा) भावृत्ताग्रोद्धृता (छायाकर्णगोलीयाग्रया भक्ता) तदा
लम्बज्या भवेत् ॥२१॥
अत्रोपपत्ति ।
श्लोकपूर्वाधोक्तानुसारेण शङ्क, पलभा अक्षज्या
पलभा शडकुतल
राड Xअक्षज्या
-लम्बज्या।
शड क्तल
बान्तिज्या कि
छायाग्रीयाग्रा नि
-अग्रा
अथवा
-लज्या । परन्तु छायाकर्ण
अग्रा
माज्या नि
प्राज्या वि छायाक
प्रतो लम्बज्यास्वरूपेऽग्राया उत्थापनेन
छायानीयाग्रा वि छायाग्रीयाग्रा त्रि
छायाक
भाज्या छायाक
at लज्या । एसेनाऽचार्योक्तमुपपन्नम्। श्लोकपूर्वार्धे पलमा
छायाग्रीयाना
गुणनभजन क्रियते तावता किमपि फल न भवति, मन्ये पदपूर्त्यर्थमाचार्येणव
कृतमिति ॥२१॥
अब पुन लम्वन्या के मानयन कहते हैं ।
हि मा-दादुपलमा और अक्षज्या के पात मे पलभा और गडकुतल के पात से भाग
देने से लम्बग्या होती है । अथवा प्रान्तिया को छायावरणं से पुरणकर छायाकर्णवृत्तीयाया
से भाग देने मे लम्बज्या होती है ॥२१॥
त्रिप्रश्नाधिकार
४६१
उपपत्ति
श्लोको के पूर्वार्धाक्ति के अनुसार गड Xपलभा प्रक्षज्या
पतभा शडकुनल
शकु असल्या
सम्बज्या
घाइतल
काज्या नि
प्रयवा
लज्या । परन्तु
छायाकर्णवृतप्रमागि
-अग्रा
अग्रा
छायाक्ण
लम्बज्या स्वरूप में अग्रा को उत्थापन देने से-
काज्या मि
छायावर्ण वनग्रा गि
छायाक
प्राज्यामि छायाक काज्या छायाक
छायाकर्णवृअग्रागि
-लम्बज्या श्लोक वे पूर्वार्ध म पलभा से
छायावृषणप्रया
गुणकर पलभा से भाग देते हैं इसस कुछ लाभ नही होता है । मालूम होता है आचार्य ने पद-
पूर्ति के लिये ऐसा किया है, इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुआ ॥ २१॥
इदानीमक्षज्यालम्बज्ययोश्चाप विधायायनागानयन निदिशति ।
रधनुषी लम्बाक्षावुलमधनुपी तथोक्रमाह्वाम्याम् ।
याम्योऽक्षोऽक्षच्छामा याम्याऽजतुलाक्षविवरज्या ॥२२॥
विज्यागुरिणता भक्ता परमापक्रान्तिजीवयाप्तधनु ।
देय प्रहे यदा भा दक्षिण गोलादिगम्यभानुमत ॥२३॥
महती मेवादिगतच्छायातस्त्वन्यथा शोध्यम् ।
यातोऽव्यया विधेय चापरिप्रश्नकर्मविधौ ॥२४॥
पाश्यन्तरिताद् वा भानुमतोऽभीष्ट कालिकात्साध्यम् ।
अयनचलन स्ववुद्ध्या गणकेन हि चापचतुरेण ॥२५॥
विभा-तद्धनुपी (तयोर्लम्वाक्षज्ययोश्चापे) लम्वाक्षौ (लम्बाशाक्षागो)
भवत । तयोक्रमाह्वाभ्या (लम्बाशाक्षाशोलमज्याभ्याम्) उत्त्र मधनुपी (उत्त.
मचापे) भवत । अक्ष (प्रक्षाग) याम्य (दक्षिणदिक्क ) अक्षच्छाया (पलभा)
याम्या (दक्षिणदिक्का) अजतुलाक्षविवरज्या (मपादि तुलादि-विन्द्वोरक्षाशान्तर-
ज्या) गिज्यागुणिता, परमापक्रान्तिजीवया (परमकान्ति ज्यया) भक्ती, अवाप्त.
धनु (फलचाप) वार्य ग्रहे दय यदा दक्षिणगोलादि (तुलादि) गम्यमूर्यस्य मेपादि-
गतच्छायात (मेपादिगतसूर्यच्छायात ) महती भवेन् । अन्यथा मेपादिगतच्छायात-
स्तुलादिगम्बच्चायाऽल्या भवेतदा तानीन फा ग्रहे शोध्य याते (दक्षिएगो.
लादितोऽनाते रवी अन्यथा पूर्वोक्तधात्वि विपरीत ग्रह वर्तव्यम् । वा चाप-
विप्रश्नकर्मविधौ पड़ादयन्तरितत्वात् अभोकालिकाद् भानुमत (मूर्यात्) चापच-
तुरेण (नागीयगणितकुशनेन) गग्गवेन (ज्योतिविदा) म्वयुद्ध्या अयनचलन
(अयनाशन) माध्यमिति ॥२२॥
वटेश्वर-सिद्धान्ते . अनोपपत्तिः । मेपादितुलादिविन्द्वोरक्षाशान्त रज्या विज्यया गुण्या परमक्रान्तिज्यया भक्ता तदाऽक्षाशान्त राशसम्बन्धि भुजज्या भवेत्तचापकरणोनाक्षाशान्तरसम्वन्धि सम्पात- चलन भवेदेतत्फल यदि मेपादिगतच्छायातस्तुलादिगम्यसूर्यच्छाया महती तदा ग्रहे धनमन्यथाहीन तदाऽयनागगतिसस्कृतग्रहो भवेदन्यत्सर्व स्फुटमेवेति ॥२२-२५।। इति वटेश्वरसिद्धान्ते विप्रश्नाधिकारे लम्बाक्षज्यानयनविधि: द्वितीयोऽध्याय. समाप्तः । अव अक्षज्या और लम्वज्या के चाप करके अयनांशानयन कहते हैं । हि भा.-लम्बज्या और अक्षज्या वे चाप करने से लम्बाश और अक्षाश होते हैं । लम्बा- गोत्क्रमज्या और प्रक्षागोरक्रमज्या से चाप करने पर उत्क्रम चाप होते हैं। अक्षाश की दिशा दक्षिण है । पलभा की दिशा भी दक्षिण है ! मेपादि और तुलादि बिन्दुओ की अक्षाशान्तरज्या को त्रिज्या से गुणकर परम क्रान्तिज्या से भाग देने पर जो पल हो उसके चाप को ग्रह मे धन करना, यदि दक्षिणगोलादि (तुलादि) गम्य मूर्य की छाया मेपादिगत सूर्यच्छाया से बडी हो तब, अन्यथा मेपादिगत छाया से उस छाया के अल्प रहने मे पूर्वानीत फल को ग्रह मे ऋण करना दक्षिणगौलादि वे गत रहने मे धन और ऋण विपरीत होता है वा चापीय त्रिप्रश्न कार्यविधि मे छ राशि के अन्तर रहने से प्रभीष्टकालिक सूर्य से मम्बन्धी विषय में चतुर ज्योतिषी लोग अपनी वृद्धि से अयन चलन के साधन करे ॥ २२२५ ॥ उपपत्ति मेपादि और तुलादि बिन्दुपो की अक्षाशान्तरज्या को त्रिज्या से गुरणकर परम मान्तिज्या से भाग देने में प्रक्षाशान्तर सम्बन्धीय भुजज्या होती है। चाप करने से प्रक्षाशान्तर सम्बन्धीय प्रयनगति (सम्पातगति) होती है। यदि मेपादिगतच्छाया से तुलादि गम्य सूर्य- छाया अधिक हो तब रम फल को ग्रह में धन करना अन्यथा हीन करना तब प्रयनाम सस्कृत ग्रह होते है । अन्य विषय स्पष्ट है ॥ २२-२५ ।। इति वटेश्वरमिद्धान्त में विप्रनाधिकार मे लम्वाक्षज्यानयनविधि नामक दूसरा अध्याय ममाप्त हुमा ।। चाप तृतीयोऽध्यायः प्रथ क्रान्तिज्यानयनविधिः त्रादौ कान्तिज्यानयनमाह। क्रान्तिः परा जिनाशाः पराक्रमज्या जिनांशकज्योक्ता । तद्गुरिगताऽभुजज्या त्रिगुरणहदिष्टायमज्या स्यात् ॥१॥ वि.मा.परा कान्ति- (परमकान्ति.) जिनाशाः (चतुर्विशत्यशा) परा- कमज्या (परमक्रान्तिज्या) जिनाशकज्या (जिनज्या) उक्ता (कथिता) । अर्क- भुजज्या (रविभुजज्या) तद्गुणिता (जिनज्यागुणिता) त्रिगुणहृत् (त्रिज्याभक्ता) इप्टापमज्या (इप्टाक्रान्तिज्या) स्यादिति ॥१॥ अव क्रान्तिज्यानयन कहते हैं । हि.भा.- परमक्रान्ति जिनाश (चौवीस अग) है, परम क्रान्तिज्या जिनज्या कथित है। रवि को भुजज्या को जिनज्या से गुणवर त्रिज्या से भाग देने से इष्ट क्रातिज्या होती है ॥१॥ अथवा क्रान्तिज्यानयनमाह । अष्टकृतिर्वा गुरिणता रविभुजजीवयाऽप्टकुलकुभक्ता। स्वेष्टापक्रमजीवा तच्चापं क्रान्तिरिष्टा स्यात् ॥२॥ वि भा.-अथवा अप्टकृतिः (अष्टचत्वारिंशत्) रविभुजजीवया (रवि- भुजज्यया गुरिणता अप्टकुखकु (१०१८) भक्ता तदा स्वेप्टापाक्रमजीवा (स्वेप्ट- क्रान्तिज्या) भवेत् । तच्चापमिष्टा क्रान्ति. ॥२॥ अत्रोपपत्ति: । अथ गोलसन्धितो नवत्यंशवृत्तमयनप्रोतवृत्तम् । गोलसधितोऽयनसन्धि (क्रान्तिवृत्तायनप्रोतवृत्तयो. सम्पात) यावत्नान्तिवृत्ते नवत्याः । गोलसन्धितो- ऽयनप्रोतवृत्तनाडीवृतयोः सम्पात यायन्नाडीवृत्त नवत्यशः । नाड़ीक्रान्तिवृत्तयोर. न्तरेऽयनप्रोतवृत्ते परमकान्तिः । तदा नवरयशनवत्यंशाजिनांश जत्रयरुत्पन्नमेक विभुजम् ! क्रान्तिवृत्ते यत्र रविरस्ति तदुपरिगतभवप्रोतवत्तं यत्र नाड़ीवृत्त ४६४ घटेश्वर-सिद्धान्ते लगति लगति ततो रवि या वध्रुवप्रोतवृत्त क्रान्ति । गोलसन्धितोरवि यावत्क्रान्ति- वृत्ते रविभुजाशा. । गोलसन्धितो नाडीवृत्तध्रुवप्रोतवृत्तयो. सम्पातं यावन्नाडीवृत्ते विपुवाशा । भुजाशविपुवाशक्रान्त्यशैरुत्पन्न द्वितीयविभुजम् । एतयो. क्रान्ति- क्षेत्रयोाक्षेत्रसजातीयत्वादनुपातो यदि विज्यया जिनज्या लभ्यते तदा रवि- जिज्या. रभुजज्या भुजज्यया किमित्यनुपातेनागतेष्टकान्तिज्या तत्स्वरूपम् = त्रि ४८xरभुज्या अन जिनज्यात्रिज्ययो. २६ एभिग्पवर्तनेन -इकाज्या स्व- २०१८ ल्पान्तरात् । एतच्चापमिष्टक्रान्तिरित्युपपन्नमाचार्योक्तमिति ॥२॥ अब पुन क्रान्तिज्यानयन कहते है। हि.भा-अथवा रवि की भुजज्या से ४८ से गुणकर १०१८ इतने से भाग देने से इप्टान्तिज्या होती है। उसका चाप इष्टक्रान्ति होती है ॥२॥ उपपत्ति। गोलसन्धि से नवत्यदा वृत्त अयन प्रोतवृत्त है। गोलसन्धि से अयनसधि (क्रान्ति- वृत्त और मयनप्रोतवृत्त के सम्पात) तक क्रान्तिवृत्त में नवत्यश, गोलमन्धि मे नाडीवृत्त और अयनप्रोतवृत्त के सम्पान तक नाडीवृत्त मे नवत्यश, अयनप्रोतवृत्त मे नाडीवृत्त और कान्तिवृत्त के अन्तर्गत जिनाश (परमकाति) इन नवत्यश, नवत्यं, जिनारा तीनो भुजी से एक त्रिभुज, और क्रान्तिवृत्त म जहा पर रवि है तदुपरिंगत ध्र व प्रोतवृत्त जहा नाड़ीवृत्त में लगता है वहा से रवि तक ध्र व प्रोतवृत मे इप्टक्रान्ति, गोलसन्धि से रवि तक क्रान्तिवृत्त मे रविभुजारा, गोलसन्धि में ध्र व प्रोतवृत्त नाडीवृत्त के सम्पात तक नाडी वृत्त मे विपुवाश, विपुवाश, भुजाश, ब्रान्त्यश इन तीनो भुजो से उत्पन्न द्वितीय चापीय जात्यविमुज है । इन दोनो क्रान्तिक्षेत्र के ज्याक्षेत्र के सजातीय होने के कारण अनुपात करते हैं यदि निग्या मे जिनज्या पाते है तो रविभुजज्या मे क्या इस अनुपात से रवि की इष्टक्रान्तिज्या पाती है । त्रिज्या रभुज्या त्रि 'इक्राज्या, यहा जिनज्या और त्रिज्या में - . २६ इमसे मरवर्तन देने मे ४८ Xरमुग्यो-इप्ट व्राज्या (स्वल्पान्तर मे) इसके चाप करने १०१० से इप्टकान्ति होती है ॥२॥ पुन. क्रान्तिज्यामम्बन्धे माह । प्रथवा क्रमजीवाभि. प्रागुक्ताभिगुगोऽपमज्या स्यात् । क्रान्तिकलाभिर्भावी क्रान्ति कलाः पूर्ववत्साध्याः ॥३॥ विभा-प्रथवा क्रमजीवाभिः प्रागुक्ताभि. कपजीवाभि. (पूर्वकधितकम- ज्याभिः) क्रान्तिक्लाया गुणः (ज्या) साध्यः, साममज्या (क्रान्तिज्या) स्यात् ४६५. विप्रश्नाधिकारः क्रान्तिकलाभिः मौर्वी (ज्या) क्रान्तिज्या स्यात् । पूर्ववत्कान्तिकलाः साध्या इति ॥३॥ पुन क्रान्तिज्या के विषय मे पहले है। वि. भा. अथवा पूर्व कथित क्रमञ्या से क्रान्तिवला की ज्या साधन करना दह कान्तिज्या होती है । क्रान्तिकला पर से ज्या क्रान्तिज्या होती है। क्रान्तियला पूर्ववत् माधन करना ॥३॥ पुन क्रान्तिज्यानयनान्याह । लम्बज्येष्टनसमनरसूर्यगुरिणता क्रमादिला मौर्यो । अक्षज्यानृतलानाऽक्षाभाहदवाऽयमज्याः स्युः ॥४॥ द्वादश लम्बज्येप्टनुसमनरनिहताः क्रमेण वाऽग्रज्या। अक्षश्रुति त्रिभुजज्या निजति तद्धृतिहृदपमज्याः॥५॥ अग्राक्षश्रुति-निजधृतिविष्कम्भदलहूं तः समनरो वा । कुज्याऽक्षामा स्वेष्टनुपलगुरगनिघ्नोऽपमज्याः स्युः ॥६॥ वि. भा.-~-इलामौर्वी (कुज्या) क्रमात् लम्वज्येप्टनृसमनरसूय. (लम्ब. ज्येप्टशंकु समशकु द्वादशभिः) गुरिणता, क्रमात् अक्षज्यानृतलाग्राऽक्षाभाहृत् (अक्षज्याशंकतलानापलभा) भक्ता तदाऽपमज्याः (क्रान्तिज्या ) स्यु ॥४॥ अथवा अग्नज्याः (अग्रा) द्वादशलम्बज्येष्टनृसमनरनिहता. क्रमेण अथ तित्रिभजज्या निजति तद्धतिहत् (पलकर्णविज्याहृतितद्धतिभिर्भक्ता) तदाऽपमज्या. (क्रान्ति- ज्या.) स्यु. ॥५॥ अथवा समनर (समशकु) कुज्याऽक्षमा स्वेष्टनृपलगुणनिधन (कुज्यापलभास्वेष्टशकुक्षज्यागुणित ) अग्राक्षश्रुतिनिजधृति विष्कम्भदले (अग्रापलकर्णहृतित्रिज्याभि) हुत. (भक्त) तदाऽपमज्या (क्रान्तिज्या) स्युरिति ॥४.६॥ अयोपपत्ति । प्रथाऽक्षक्षेत्रानुपातेन लज्याकुज्या इशक x कुञ्या = काज्या। अक्षज्या शकुतल समशंकु कुज्या, -काज्या । तया १२४ कुज्या -क्रांज्या एतेन प्रथमश्लोक उपपद्यते । काज्या। अंग्रा पलभा अथवा १२ मग्रा लज्या. अग्रा 'काज्या। -काज्या। इशकु. अग्रा -काज्या। पलकर्ष तथा एतेन द्वितीयश्लोक उपपद्यते तद्धति समरा प्रया-क्रांज्या.
वटेश्वर-सिद्धान
अथवा
कुज्या समस
पलभा समरा
इस समदा
-काज्या।
प्राज्या।
ताज्या।
हति
अक्षज्या समश
वि
'काज्या एतावता तृतीयश्लोक उपपद्यते ॥४६॥
अत्र प्रथम-द्वितीय तृतीय श्लोक-शब्देनाबान्त्यश्लोकत्रय ग्रहीतव्यमिति ।
पुन अनेक प्रकार से क्रान्तिज्या वे पानयन कहते है ।
हि भा--बुज्या को क्रमश लम्बज्या, इप्टशङ्क, समाइ, मौर द्वादश से गुणकर
क्रमा अक्षज्या, गड़नल अग्रा और पलभा स भाग देने से कान्तिपया होती है ।।४॥ अथवा
मना को दादा, लम्बज्या इप्टनु, और समसयु मे पृथक-पृथक् गुणकर क्रमश पलणं,
विज्या, हति, और तवृति से भाग देने से क्रान्तिज्याए होती हैं ॥५प्रयवा समराकु के
पृथक् पृथक् कुम्पा, पलभा, इटाकु और पक्षापा से गुजपर अपस प्रमा, पलकणं हृष्टि
और त्रिज्या से भाग देने मे क्रान्तिज्पाप होतो हैं ॥४-६॥
उपपत्ति
लज्या ज्या
मक्षक्षेत्रानुपात स
अक्षज्या
व्राज्या
इशकू ज्या
=काज्या।
शतले
समगडककल्या
-अाज्या
मना
१२४ ज्या
पलभा
प्राध्या
इससे चौथा श्लोर उपपन्न हुपा ।
अपवा
१२xममा
पलाण
काज्या।
लज्या प्रमा
--शज्या।
साइकु अमा
हृति
-क्राच्या
ममनपा
तद्धनि
वाग्या इमसे पाचवा स्तोक उपपन्न हुमा ।
मथवा
ग्या मभग
प्रपा
पलभा समदा
वाज्या।
पलक
इम समय
-प्रांज्या
हनि
पपाया. समर्श
वाज्या । इमो घटा चोर उपपन्न हुमा ।।४-६।।
पुनरपि क्रानिग्यानयनान्याह ।
प्रक्षावलम्बनतदति स्त्रिज्पाकृति भाजितापमज्या वा।
नुतलाना कुगुरिबतां तदतिरपा तिकृतिभक्ता ॥७॥
विप्रनाधिकारः ४६७ । द्वादश पलभा गुरिणते पललम्बज्ये समश्रवणभक्त । क्रान्तिज्ये वा कुज्याग्राकृतिविश्लेषमूलं वा ॥६॥ निमा-अथवा अक्षावलम्वघ्नतद्धृति (अक्षज्यालम्बज्यागुरिणतः तधृति ) त्रिज्याकृतिभाजिता (त्रिज्यावर्गभक्ता) अपमज्या (क्रान्तिज्या) भवेत् अथवा तद्धृति नृतलघ्नशड कुगुरिणता (शड कुतलगुणितशड कुना गुरिगता) स्वतिकृति भक्ता (हृतिवर्गविभाजिता) क्रान्तिज्या भवेत् ॥ अथवा पललम्बज्ये (अक्षज्या लम्बज्ये) पृथक् द्वादशपलभागुणिते समथवरणभक्त (समकर्णभक्त) तदा क्रान्तिज्ये भवत वा कुज्याऽग्राविश्लेपमूल (कुज्याऽग्रावर्गान्तरमूल) कान्तिज्या भवेदिति ॥७॥ अनोपपत्ति अक्षक्षेत्रानुपातेन अज्या तद्धृति त्रि वि अनानास्वरूपस्योत्यापनात् अज्या लज्या तद्धति 'ताज्या अथवा त्रि गाड कुतलxतद्धति शड कुंx अग्रा. काज्या अत्राग्रऽस्वरप- हृति हृति स्योत्यापनेन शड कुतल शड कुर्तद्धति, क्राज्या। अथवा हृति' अज्याx१२४सश द्वादश पलभागुणिते इत्यादिश्लोकानुसारेण समकरण त्रि १२ प्रज्या सश -काज्या। त्रि लच्या पलभा.ल ज्या पभाल ज्या पभा सरा_अज्या सग समकर्ण त्रि लज्याXअग्रा -अग्रा तत माज्या ना। तत अज्या १२ %3D तथा %2 वाज्या त्रि १२ त्रि १२ सश अथवा अग्राचापक्रान्तिचापचरसण्डैरुत्पन्ननिभुजन्याक्षेत्रे अग्रा-कुस्या' = क्रान्तिज्या। एतावताचार्योक्तमर्वमुपपन्नम् 11७11 अब पुन अनेक प्रकार मे कान्तिज्यानपन करते हैं। हि.भा.-अथवा अक्षज्या सम्बजा गुणित तदति में विग्यावर्ग से भाग देने से क्रान्तिग्या होती है । मयदा गङ्घतल और शड्बु से गुणित तद्धृति (हृति) वर्ग में भाग देने से क्रान्तिज्या होती है। मथवा पक्षज्या मोर लम्बज्या को द्वादश मोर पलभा में गुणवर समरणं से भाग देने से दो तरह की क्रान्तिग्या होती है । वा पना मोर ज्या रे वर्गालर मूल प्रान्तिग्या होतो है ॥७-८॥
४६८
वटेश्वरसिद्धान्ते
उपपत्ति।
प्रक्षक्षेत्र के अनुपात
से
प्रज्या तर ति
लज्या प्रग्रा
-प्रा.:. 'प्राज्या. इससे अग्रा-
त्रि
त्रि
के स्वस्त को उत्थापन देने से
अज्या लंज्या तद्धति
===ाज्या । अथवा
-- अग्रा.: शकुप्रग्ना
शङ्क तल तहति
==ाज्या इसमे अना के स्वरूप को
हृति
उत्थापन देने से शकु शकुंतल तद्धति
-क्राज्या। अथवा
हति'
द्वादशपलभा गुरिणते' इत्यादि श्लोक के अनुसार
प्रज्याx१२ अज्या १२ प्रज्या समशकु.
क्राज्या।
समकर्ण
त्रि
%3D
त्रि १२
समशक
लज्या पलभा
लज्या पलभा
समक
लज्यापभा सश
त्रि १२
अज्या मश
-काज्या।
नि
वि१२
समश
अथवा अपाचाप क्रान्तिचाप मोर चरखण्ड चापो मे उत्पन्न त्रिभुज के ज्याक्षेत्र में
मग्रार-कुज्या 'काज्या। इनसे प्राचार्योक्त सब उपपन्न हुए ॥७-८ ॥
पुनस्तदानयनमाप।
पलकर्णहृतो दिनदलमरोऽकहत फलकुगुणप्रतिविशेषः।
माम्योत्तरयोस्तत्त्रिगुरणकृतिवियुतिमूलमपमज्या ॥६॥
वि.मा --दिनदलनर (दिनाघंशङ्क,) पलकर्णहत. (पलकर्णगुणितः)
अहृन् फलकुगुणप्रतिविशेष (द्वादशभक्त न यत्फल स कुज्याप्रतिविशेपोदि
धुज्या) याम्योत्तरपो. (दक्षिणोत्तरयो भवत्यर्थायुज्याया. स्वरूप दक्षिणोत्तर-
रूप भवति, तत्त्रिगुणकृतिवियुतिमूल (धुज्यात्रिज्ययोर्वर्गान्तरमूल) अपमज्या
(क्रान्तिज्या) भवेदिति ।। ६॥
अत्रोपपत्तिः।
पलक दि २ नं दिन हतिः-धुज्या
अक्षक्षेत्रानुपातेन
ततस्त्रिज्याक्रान्तिज्या ज्याभिरुत्पन्नजात्यत्रिभुजे त्रि'-घु ज्या'
तिज्या।
एतावतोपपनमाचार्योक्तमिति ॥ ६॥
विप्रश्नाधिकारः 4 ४६३ पुन क्रान्तिज्यानयन कहत है । हि भा- मध्यान्हशडकु को पलवर्ण से गुणकर वारह से भाग देने से याम्यातरा- कार धुज्या होती है। उसके और विज्यावर्ग के अन्तर करके मूल लेने से क्रान्तिज्या होती है ॥ ६॥ उपपत्ति पलर xदिशदि ३ हृति= छ ज्या, तव त्रिज्या, अनुपात से क्रान्निज्या और ज्या से उत्पन्न जात्यत्रिभुज मे V विद्युज्या' = काज्या इससे प्राचा. र्योक्त उपपन्न हुआ॥ ॥ पुन क्रान्तिज्यानयनान्याह । धुज्यात्रिज्याकृत्योविशेषमूलं स्वपाक्रमज्या वा। त्रिज्या धुज्यायोगाग्निजान्तरघ्नात्पद वा स्यात् ।।१०।। द्युज्याघातगुरिणता चरार्धजीवाऽक्षमा त्रिशिजिन्यो । घातेन हृता लब्धं स्वेटापक्रान्तिजीवा वा ॥११॥ निभा-वा धु ज्यात्रिज्याकृत्योविशेपमूल ( शुज्यात्रिज्ययोगन्तिर. मूल ) अपक्रमज्या (क्रान्तिज्या) भवेत् । वा त्रिज्या धुज्या योगात् निजान्तरघ्नात) (त्रिज्याद्य ज्यान्तरगुरिणतात्) पद (मूल ) क्रान्तिज्या स्यात् । चराधजीवा (चरज्या) द्यु ज्याघातगुणिता (धु ज्याद्वादशघातगुरिणता) अक्षभा विशि- जिन्योर्घातेन (पलभा निज्ययोर्वधेन) हृता (भक्ता) लब्ध स्वेप्टापक्रान्तिजीवा (स्वेष्टकान्तिज्या) भवेदिति ॥१० ११॥ अनोपपति । अथ नियु'-माज्या वर्गान्तरस्य योगान्तरघातसमत्वात् १२Xकुज्या V(त्रि+द्य) (त्रि-यु)- -क्राज्या। पलभा चरॅज्या द्य परन्तु कुज्या प्रत कान्तिज्यास्वरूपे कुज्योत्यापनात् वि १२४चरज्या द्य = क्राज्या, एतावताऽचार्योक्तमुपपन्न सर्वमिति ।।१० १०॥ त्रि पलभा इति वटेश्वरसिद्धान्ते विप्रश्नाधिकारे मालिज्यानयनविधि. तृतीयोऽध्यायः समात. ॥ काज्या!अथवा
५००
वटेश्वर-सिद्धान्त
अब पुन क्रान्तिज्यानयन कहते हैं ।
हि भा-अथवा धु ज्या पोर त्रिज्या के वर्गान्तर मूल कातिग्या होती है। अथवा
त्रिज्या और धुज्या के योग को अन्तर से गुणकर भूल लेने से क्रान्तिज्या होती हैं। अपवा
चरज्या को ग्रुग्या और द्वादय के घात से गुणवर पलमा मोर त्रिज्या के घात से भाग देने
से क्रान्तिज्या होती है ।। १०.११॥
उपपत्ति।
काज्या, वर्गान्तर योगान्तर घात के बरावर होता है इसलिये
१२ ज्या-काज्या
Vfr'-'=(त्रि+घ) (त्रि-छ)= नाज्या । अथवा
पलभा
चरज्या द्य
परन्तु
कुज्या अत क्रान्तिज्या के स्वरूप म कुण्या को उत्थापन
१२४चरज्या द्य
s= काज्या, इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुप्रा ॥१०-११॥
विपलमा
इति वटेश्वर सिद्धान्त में त्रिप्रश्नाधिकार में क्रान्तिज्यानयनविधि नामक
तृतीय अध्याय समाप्त हुभा ॥
चतुर्थोऽध्यायः
अथ धुज्यानयनविधिः
तनादौ गुज्यानयनमाह।
क्रान्तिज्यावर्गोनास्त्रिज्यावर्गात्पदं घुजीवा स्यात् ।
त्रिज्या क्रान्तिज्यान्तरसमासघातस्य मूलं वा ॥१॥
विभा.कान्तिज्यावर्गोनात् त्रिज्यावर्गात् क्रान्तिज्यावर्गरहिता त्रिज्या-
वर्गात) पद (मूल) द्यु जीवा (धु ज्या) स्यात् । वा त्रिज्याक्रातिज्यान्तरसमास-
घातस्य (त्रिज्याक्रान्तिज्ययोर्योगान्तरवधस्य) मूल द्य ज्या स्यादिति ॥१॥
अयोपपत्ति ।
त्रिज्याक्रान्तिज्याधुज्याभिरुत्पन्नजात्यत्रिभुजे /त्रि'-क्राज्या' = धु, वर्गा-
न्तरयोगान्तरघातसमत्वात् + क्राज्या) त्र-काज्या) =द्य
सिद्धम् ॥१॥
अव धुज्यानयन कहते हैं।
हि भा. - क्रान्तिज्या वर्ग को त्रिज्यावर्ग में घटाकर मूल लेने से घुज्या होती है ।
प्रथया त्रिज्या मोर क्रान्तिज्या के योगान्तर घात के मूल लेने मे द्य ज्या होती है ॥१॥
उपपति।
त्रिज्या क्रान्तिज्या और घुज्या से उत्पन्न जात्य त्रिभुज में त्रि'-काज्या'छ,
परन्तु वर्गान्तर योगान्तर घात के बराबर होता है इसलिए/(त्रि+प्राज्या) (त्रि-प्राज्या)
=धु ..सिद्ध हुमा ॥१॥
पुनस्तदानयनमाह।
व्यस्त प्रान्तिज्याहृत्क्रान्तिगुणकृतिः पलं त्रिभज्योनम् ।
धुज्या वा व्यस्तापमजीवा विस्यान्तरं वा स्यात् ॥२॥
वि.मा.-क्रान्तिगुणकृतिः (क्रान्तिज्यावर्ग.) व्यस्तकान्तिज्याहृत् (क्रान्त्यु-
क्रमज्यया भक्ता) पल त्रिभज्योनं (विभज्यया होन) वा ग्रुग्या भवेत् । वा व्यस्ता.
पमजीया विषयान्तर (कान्त्युत्क्रमज्या त्रिज्ययोरन्तर) युज्या स्यादिति ॥२॥
न के ५०२ वटेश्वर-मिद्धान्त अग्रोपपत्तिः। के वृत्तकेन्द्रम् । नपचापम् प्रान्ति- चापम् । पर क्रान्तिज्या । रन= कान्यु. कमज्या । पन रेखा-कान्निपूर्णज्या । केच-- केन=त्रिज्या। केर-क्रान्तिकोटिज्या=द्यु । <चपन =t० तदा पचर, परन त्रिभुजयोः परxपर_पर' साजात्यादनुपात. रन रन क्रान्तिज्या =रच- विद्यु क्रान्त्युत्क्रमज्या क्रांज्या' अतः -त्रि। च क्रान्त्युत्क्रमज्या चिन न. १२ तथा त्रि-क्रान्त्युत्क्रमग्या छ । एतेनोपपन्नमाचार्योक्तम् ।।२।। पुन द्यज्यानयन कहते हैं । हि.भा.-क्रान्तिज्यावर्ग में क्रान्ति की जनमज्या से भाग देकर जो फल हो उसमे त्रिज्या घटाने मे शुज्या होती है। दा क्रान्ति को उन्क्रमज्या और निग्या के अन्तर ग्रुग्या होती है। उपपत्ति। उपरिलिखित चित्र देखिए। वृनवेन्द्र ! नचचाप = कान्तिचाप, पर- शान्तिज्या रत क्रान्ति को उत्क्रमज्या । पनरेखा=कान्तिपूर्णग्या । वैचवेन= त्रिज्या। केर शान्तिकोटिज्या=गया। (चपन-१० नव पचर, परन दोनो त्रिभुजो के पर' ब्रान्तिग्या सजातीय होने में मनुपात करते हैं पर पर रन प्रान्त्युत्क्रमज्या = रच-त्रि+छु । माज्या' --त्रि-द्य । तथा वि- क्रान्त्युत्क्रमग्या= छु । क्रान्युत्क्रमज्या इसमें प्राचार्योक्त्त उपपन्न हुप्रा ||२|| पुनस्तदानयनमा । क्रान्ति त्रिभान्तरज्या घुज्या वा चरदलजीवया विहृता । त्रिज्या क्षितिजीवाघ्नाऽहोरात्रार्धजीवा वा ባንክ वि.भा.-वा क्रान्तित्रिभान्तरल्या (ब्रान्तिनवरयगयोरन्तरजाति- कोटिज्या) द्यु ज्या भवेत् । वा क्षितिजीवाघ्ना त्रिज्या (कुज्यागुणितत्रिज्या) चर- दलजीवया विहता (चरज्यया भत्ता) तदाऽहोरात्रार्घजीवा (द्य ज्या) भवेदिति ।।३।। %D रन पत
त्रिप्रश्नाधिकारः
अत्रोपपत्ति ।
ज्या (६o-क्रान्ति) क्रान्तिकोटिन्या-धु ज्या । अथवा क्षितिजाहोरात्र-
वृत्तयो सम्पातोपरिगत ध्रुवप्रोतवृत्त यत्र नाडीवृत्त लगति तस्मात्पूर्वस्वस्तिक
यावन्नाडीवृत्ते चरचापम् । एतावता त्रिभुजद्वय जातम् । क्षितिजाहोरात्रवत्त-
सम्पातोपरिगतध्रुवप्रोतवृत्ते ध्रुवान्नाडोवृत्त यावन्नवत्यश प्रथमो भुज । धृवात्पूर्व-
स्वस्तिक यावदुन्मण्डले नवत्यशो, द्वितीयो भुज । नाडीवृत्ते चरचाप तृतीयो भुज
इत्येक त्रिभुजम् । ध्रुवात्क्षितिजाहोरानवृत्तयो सम्पात यावद् ध्रुवप्रोतवृत्ते द्यु या-
चापमेको भुज । ध्रुवादुन्मण्डलाहोरानवृत्तयो सम्पात यावदुन्मण्डले ा ज्याचाप
द्वितीयो भुज (अहोरात्रवृत्ते तृतीयो भुज । एतयोस्निभुजयो यक्षि त्रसाजात्यादनुपात
वरज्या धु-
'-धु। अत उपपन्नम् ॥३॥
चरज्या
*- कुल्या प्रत कुज्या. नि.
पुन द्यु ज्या के प्रानयन करते हैं।
हि भा-वा क्रान्ति और नव यश के अन्तर की ज्या युज्या होती है । अथवा त्रिज्या
को बुज्या से गुणकर चरज्या से भाग देन से द्यज्या होती है ।
उपपत्ति
ज्या (६०- कान्ति)= क्रान्ति कोटिज्या- छु । अथवा क्षितिजवृत्त और अहोरात्रवृत्त
के सम्पातात प्रक्रेतवृत्त नाडीवृत्त म जहा लगता है वहा से पूर्वस्वस्तिक तक नाडीवृत्त
म चर चाप है । अब दो त्रिभुज उत्पन्न हुए क्षित्रिजाहाराप्रवृत्त मम्पातगत ध्र व प्रोतवृत्त
मे प्रव से नाडीवृत्त पर्यन्त नवत्यश प्रथम भुज । ध्र व से पूर्वस्वस्तिक पयन्त उमण्डल में
नवत्यश द्वितीय भुज । नाडीवृत्त म चार चाप तृतीय भुज । यह प्रथम त्रिभुज है । ध्र व से
क्षितिजाहोरात्रवृत्त के सम्पात पयन्त ध्रवप्रोतवृत्त मे द्युज्याचाप एक भुज । ध्र व से उन्मण्डला
होरात्रवृत्त के सम्पात तक उमण्डल में घु ज्याचाप द्वितीय भुज, अहोरात्रवृत्त में तृतीय भुन,
यह द्वितीय विभुज है, दोनों त्रिभुजो के ज्याक्षेत्र सजातीय हैं इसलिए अपात करते हैं
चरज्या धु
कुज्या
द्यु, प्रत उपपन्न हुमा ॥३॥
त्रि
कुज्या त्रि
-
%
30
चरज्या
पुनस्तदानयनमाह।
तिगुरिंगता त्रिभजोवा हृताऽन्त्यया वा घुमौविका भवति ।
शाड कु त्रिज्याऽक्षथ तिवधाददिनगुणोऽर्काऽन्त्ययाप्त वा ॥४॥
वि भा-विभजीवा (त्रिज्या) धृतिगुणिता (हृतिगुणिता) अन्त्यया हुता
(भक्ता) वा द्युमोविका (द्यज्या) भवति । वा शड कुत्रिज्याऽक्षश्रुतिवधात् (गड कु.
त्रिज्यापलकर्णघातात्) अर्याऽन्त्ययाप्त (द्वादशगुणिताऽन्त्यभक्त फ्ल) वा ग्रुज्य
भवतीति ॥४॥
वटेश्वर सिद्धान्ते -धु । अनोपपत्ति क्षितिजाहोरात्रवृत्तसभातोपरिगत ध्रुवनातवृत या नाडीवृत्त लगति तद्विन्दुत पूर्वापरसूनस्य समान्तरसून कार्य तम्घ नाम चराग्रहयवद्ध सूत्रमू । एतदुपरि ग्रहोपरिगतध्रुवप्रोतवृत्तनाडीवृत्तयो समाताल्लम्ब कार्य सैवेष्टान्त्या । भूकेन्द्राद् ग्रहोपरिध्रुवप्रोतवृत्तनाडीवृत्तसम्पाते रेखा नेया सा त्रिज्यको भुज । इशान्त्या दितीयोभुज । भूकेन्द्रादिष्टान्त्या मूल यावत्ततीयोभुज इति भुजत्रयरुत्पनमेक निभुजम् । तथ होरात्रवृत्त के द्रा ग्रहगता रेखा धुज्यको भुज । ग्रहात्स्वोदयास्त- सूत्रोपरि कृतो लम्बो हतिसजका द्वितीयो भुज । अहोरात्रवृत्तगभकेन्द्राद्धृतिमूल यावत्तृतीया भुज । इति भुजनयरुत्तन द्वितीय निभुजम् । एतयोस्त्रिभुजयो साजात्य भवत्यतोऽनुपात इहृति त्रिज्या इहति त्रि इअन्त्या धु इअन्त्या प्राचार्येरणेपास्थानेऽन्स्यैव कथ्यते । अय पलकण शडकु =हति अतो द्यु ज्यास्वरूपे हृतेरुत्थापनात् । पलक शड कु त्रि '=य प्रत उपमनम् ॥४॥ १२४ त्या पुन युज्या के प्रानयन कहते हैं । हि भा-त्रिया को हृति स गुगर अन्त्या से भाग देने मे द्य ज्या होती है । वा गङ कु त्रिज्या और पलकण के घात म द्वादा गुणिन अन्या से भाग देने से ज्या होती है ॥४॥ उपपत्ति मितिजाहोरात्रदत्त के सम्पात के ऊपर घ वप्रोतवृत्त करने से वह (ध्र वोतवृत) नाडीवत्त म जहा लगता है उस विदु मे पूर्वापर मूत्र के समानान्तर मूत्र पर देना उसके नाम चराप्रयबद्ध मूत्र है । उसके ऊपर प्रोपरिगत ध्रवप्रोतवृत्त नाडीवत्त के सम्पात से जो लम्ब होता है उसके नाम इष्टान्त्या है । भूपे द से ग्रहोपरिगत ७ वप्रोतवन और नाडीवृत्त के समान मे रेवा लाने से वह विज्या एक भुज । इशा या द्वितीयभुज । भूपेंद्र से इष्टान्त्या मूल तर तृतीय भुज इन तीनों भुजी से एक विभुज हुमा । अहाराषदन के गभरेद्र से ग्रहगत रेखा छ ज्या एकभुज ग्रह मे स्वोग्यास्त सूत्र के ऊपर लम्ब इष्टहति द्वितीयभुज । महोरात्रवत्त में गभवेद्रम इष्टहति मून तर रेखा तृतीयभुज इन तीनो भुजो से उत्तम द्वितीय त्रिभुज टुमा । ये दोनों त्रिभुज मजातीय हैं इसलिए अनुपात करते हैं । हनि त्रि . इमत्या भाचाय इष्टान्रया इहनि त्रि इति नि -इमन्या प्रन्या पा प्रत्या तथा इष्ट हृति को इति बहते हैं। पलवy . -हति प्रत घुज्या र स्वरूण प्रश्नाधिकार ५०५ पलक शड बु त्रि मे हृति को उत्थापन देने =धु । अत उपपन्न हो गया ॥४॥ १२ अन्त्या पुनस्तदानयनमाह । त्रिज्यानृतलाऽश्रुतिघातात्पलभाहृतान्त्ययाप्त वा। अक्षज्याऽग्राघाते चरगरणभक्त ऽथवा धुज्या ॥५॥ वि गा–वा निज्यानृतलाऽक्षश्रुतिघातात् (निज्याशड कुतलपलकर्ण- घातात्) पलभाहृतान्त्ययाप्त (पलभागुणितान्त्यया भक्त फल) ज्या भवेत् । अथवा अक्षज्याऽग्राघाते, चरगुणभक्त ( (चरज्ययाभक्त) धुज्या भवेदिति ।।५।। अनोपपत्ति अथ पूर्वानीत धुज्यास्वरूपम्= हृति नि पलक शडतल । परन्तु अन्त्या पलभा =-हृति अतो छु ज्यास्वरूपे हृतेरुत्थापनात् पलक शतल त्रि = ध ज्या। अन्त्या पलभा तथा कुज्या नि चरज्या -धु । पर कुज्या नि -अक्षज्या ज्या नि अग्रा =अग्रा अक्षज्या तत कुज्या त्रि - अग्रा अक्षज्या चरज्या चरज्या =द्यु सिद्धम् ॥५॥ पुन धुज्यानयन रहते है। हि भा-अथवा त्रिज्या शतल और पलकणं इनवे धात म पसभा गुणिन अन्त्या से भाग दने मे धुज्या होती है । अथवा प्रज्या और अग्रा ये घात म चरज्या से भाग दे मेन युज्या होती है ॥५॥ उपपत्ति पूर्वानीत घुज्या वे स्वरूप हृति नि हृति रामे मन्त्या पलभा धुज्या स्वरूप में हनि को उत्थापन देने मे पलव दाता त्रि प्रत्यापलभा द्युन्या । प्रयया बुज्या नि वज्या त्रि =धु । परन्तु -प्रभज्या : बुज्या त्रिपक्षज्या मना चरज्या पलपातल । परन्तु मना इमलिए मक्षज्या प्रमा -ग्या : मिद हुमा ॥ चरज्या घरज्या
घटेश्वर-सिद्धारते
पुनस्तदानयनद्वयमा ।
क्रमगुरणपलमा त्रिज्या घातोऽर्कगुरपचरजीवयाप्तो वा ।
पलमाऽक्षगुरणसमनरवधोऽर्कगुणचरभक्तोना ॥६॥
वि भा -वा क्रमगुरणपलभा त्रिज्याधान (क्रान्तिज्या पलभा त्रिज्या-
घात ) अर्कचरजीवयाप्त (द्वादशगुरिणतचरज्यया भक्त ) फल ज्या भवेत् ।
अथवा पलभाऽक्षगुणसमनरवध (पलभा क्षज्यासमशङ्कघात ) अर्वगुणचरभक्त
(द्वाददागुरिगतचरज्यया भक्त) | ज्या भवेदिति ॥६॥
अत्रोपपत्ति
ज्या नि
पलभाxक्राज्या
अथ
=द्य
कुम्या अतो ज्यास्व-
चरज्या
१२
स्पे कुज्यया उत्थापनात्
पभावाच्या त्रि
'= धुज्या एतेन प्रथमप्रकार उपपद्यते ।
चरज्याX१२
-
। परन्तु
प्रक्षज्यासमा
प्रथ
-प्राज्या अक्षज्या समश=
=नि प्राज्या
पत्र
पलभा प्राज्या त्रि
पलभा अक्षज्या समश
तत
=धु -
एतेन द्वितीयप्रकार
चरज्या X १२
चज्या १२
उपपद्यते ।।६।।
अब पन गुज्या के प्रानयन दो प्रकार से कहते हैं ।
हि भा–वा कातिग्या पलभा और त्रिज्या क पात म द्वादशगुणित चरण्या से भाग
दन स च ज्या हाती है । भथवा पलभा-प्रमज्या मोर सम्शा इनवे घात म द्वादशगुणित
चरज्या म भाग दन से धुज्या होती है ॥६॥
उपपत्ति ।
कुज्या त्रि
पसभा क्राज्या
-धुज्या । परतु
'=कुज्या इममे ग्रुग्या स्वरूप में ज्या
१२
को उत्थापन देने म
पलभा द्वाज्यात्रि
पज्या इसमें प्रथम प्रकार उपपन्न हुमा ।
चरज्या५१२
भाग्यासमा
--भाज्या
त्रि
प्रसग्या समा-त्रि क्राज्या
पसभा काग्या त्रि. प्रभाग्याxममा पलभा
तव
'= ज्या इमगे द्वितीय प्रकार उपपन्न
चरज्या४१२ चज्या४१२
होता है ॥६॥
भिप्रभाधिकारः पुनस्तदानयनान्याह। पलभाऽक्षस्त तिवयोऽक्षकर्णचरगुरणहद वा। धुदलहृति कुज्योना सौम्ये याम्ये युता युज्ये ॥६॥ वि. मा -वा पलभाक्षतद्धृतिवध (पलभाऽक्षज्या तद्धृतिघात ) अक्षकणं- चरगुणहृत् (पलकर्णचरज्याभ्या भक्त ) तदा द्यु ज्या भवेत् । अथवा द्यु दलहृतिः (मध्यान्हहृति ) सौम्ये (उत्तरगोले) कुज्योना (कुज्यया रहिता) याम्ये (दक्षिणगोले) युता तदा द्यु ज्ये भवत ॥७॥ अनोपपत्ति %3D पूर्वानीत द्यु ज्यास्वरूपम् = अक्षज्या समश पलभा १२ चरज्या अक्षज्या समश पलभा पलक _ अक्षज्या तद्धति पलभा १२४ चरज्यापर्ण चरज्या पलक 'धु ज्या । एतेनोपपद्यते प्रथम प्रकार । अथवोतरदक्षिणगोलक्रमेण मध्यहुति + कुज्या-धुज्या । अत सिद्धम् ॥६॥ इतिवटेश्वरमिद्धान्ते निप्रश्नाधिकारे घुज्यानयनविधिश्वतुर्थोऽध्याय ॥ पुन धुज्या का प्रानयन कहते है । हि भा-चा पलभा यक्षज्या और तदति के घात को पलवगा और चरज्या के घात से भाग दने से धु ज्या होती है। अथवा मध्यान्हहृति म उत्तरगोल म व ज्या को घटाने से और दक्षिणगोल मे जोडने स ाज्या होती है ।।६।। उपपति अज्या समश पलभा अज्या समश पलभा पल पूर्वानीत घुज्या के स्वरूप x १२Xचरज्या १२ चरज्या पलर अश्या तदृति पलभा '= द्यज्या, इसमे प्रथम प्रकार उपपन्न हुना। चरज्या पलव प्रथया उत्तर और दक्षिण गाम में मध्यहृतिक ग्या-धुज्या इसमे द्वितीय प्रकार सिद्ध हुग्रा ॥७॥ इनि वटवर मिशान में विप्रनाधिकार मे दुग्यानयनविधि नामा चतुर्थ अध्याय गमाप्त हग्रा
पञ्चमोऽध्यायः
प्रय कुज्यानयनविधिः।
नवादी कुज्यानयनमा ।
कान्तिज्याऽअज्यानी लम्वकजीवा विभाजिता कुज्याः
विषुवच्छाया गुरिणता क्रान्तज्याऽर्कोद्धृता वा स्यात् ॥१॥
मि. भा.-क्रान्तिज्या अक्षज्यानी (अक्षज्यागुरिगता) लाबक्जीवा विभा-
जिता (लग्बज्याभक्ता) तदा कुज्या भवेत् । अथवा क्रान्तिज्या विपुवच्छाया-
गुरिणता (पलभया गुणिता) अर्कोद्धृता (द्वादशभक्ता) कुज्या भवेदिति ॥१॥
अगोपपत्ति..
तथा अक्षज्या
अक्षक्षेत्रानुपातेन अक्षज्या क्राज्या
-बुज्या,
लज्या
ल ज्या
पलमा ज्या
प्रत
=कुज्या, अत उपपन्नमिति ॥ १॥
१२
पलभा
%3-
अव कुज्या के प्रानयन दो प्रकार मे रहते हैं।
हि भा-क्रातिज्या को प्रक्षज्या मे गुणवर लम्बज्या में भाग देने से बुग्या होता
है । अथवा क्रयन्तिच्या को पलभा में गुणवर द्वाददा मे भाग देने से बुग्या होती है ॥१॥
उपपत्ति ।
अनुपात
से
प्रक्षज्या क्राज्या
लज्या
प्रक्षज्या
बुग्या । तथा
लज्या
पलभा
१२
पलभाबाज्या
मन
'कुज्या । इसमें प्राचार्योक्त उपपन्न हुमा ॥१॥
पुन बुज्यानयन प्रसारद्वयेनाह ।
क्रान्तिज्याऽप्राघाते समनरभक्तेऽयवा महोजोवा ।
वाऽपा विपुवातो पलकर्षविभाजिता कुज्या ॥२॥
विप्रश्नाधिकार ५०६ नि.मा-अथवा क्रान्तिज्याऽग्राघाते समनरभक्ते (समशड्कुभक्त) तदा महीजीवा (कुज्या) भवेत् । वा अग्रा विपुवद्भानी (पलभा गुरिणता) पलकर्ण- विभाजिता (पलकर्णभक्ता) तदा वुज्या स्यात् ।।२।। अनोपपत्ति । यदि समशड्कुकोटावना भुजो लभ्यते तदा क्रान्तिज्याकोटौ किमित्यनु- पातेन समागता कुज्या अथवा पलकणे पलभा भुजो लभ्यते अग्रा.काज्या समा , तदाऽग्राकणे किमित्यागता कुज्या पलभा अग्रा पलकर्ण अत उपपन्नम् ॥२॥ , पुन दो प्रकार से कुज्या का प्रानयन कहते है । हि मा-अथवा क्रान्तिज्या और अग्रा व पात मे समशड्दु में भाग देने से ज्या होती है । अथवा प्रणा को पलमा से गुणफर पलार्ण से भाग देने मे कुज्या होती है ।।२।। उपपत्ति। यदि समगड्कु कोटि में अग्रा भुज पाते है तो क्रान्तिज्या कोटि म क्या इस अनुपात में अग्राकाज्या कुज्या माती है '- कुज्या । अथवा पलवर्ण म पलभा भुज पाते है तो अग्रा समरा मे पा जायगी कुज्या- पलभाप्रपा इससे प्राचार्योक्न उपपन्न हुमा ॥२॥ पलक ३ पुन कुज्यानयन प्रकारद्वयनाह । अग्राकृतिविभक्ता तद्धृत्या वा फलं कुजोवा स्यात् । नृतलाम्यस्ता वाऽग्रा स्वतिविभक्ता महोजीवा ॥३॥ वि भा-अग्राकृति (अग्रावर्ग) तवृत्या विभक्ता फलं बुजीवा (कुज्या) स्यात् । वा अग्रा नृतलाभ्यस्ता (शकुतलगुरिणता) स्वधृतिविभक्ता (हत्या भक्ता) तदा महीजीवा (कुज्या) भवेदिति । अयोपपत्ति । यदि त तिवणेऽग्राभुजो लभ्यते तंदाग्राकणे किमित्यागता कुज्या अग्रा' अथवा हृतिकणे शकुतल भुजो लभ्यते तदाऽग्रावणे तद्धति किमिति समागता बुज्या- दश कुतल Xअग्रा एतेनोपपन्नम् ॥३॥ अग्रा अग्रा तद नि अग्रा अग्रा तति हृति ज्या। ५१० वटेश्वर-सिद्धान्ते पुन दा प्रकार स कुज्यानयन कहत हैं। हि भा–वा अग्ना वग को तवृति में भाग दने स ज्या होती है। प्रथवा प्रमा को शकुतन मे गुणवर हृति म भाग देन से बुग्या हाती है ।।३।। उपपत्ति। यदि तद्धति कर्ण म अग्राभुज पात है ता अग्रावण म क्या इस अनुपात स कुज्या अग्रा माती है ==ज्या । अथवा यदि हृतिकरण म श कुतल भुज पात तवृति दातल अग्रा है तो अनार्ण म क्या इस अनुपात स कुज्या पाती है इसमे प्राचार्योस्त उपपन्न हुा ।।३।। पुन कुज्यानयन प्रकारद्वयनाह । लम्बनिमगुरगवघलब्ध समनुर्वाक्षगुणवगंधाताद्यत् । त्रिज्यार्कघातलन्ध समनृपलभाक्षगुरगघाततो वा स्यात् ॥४॥ वाऽक्षति रविघातात्समनृपलभाकृतिघातत फल कुज्या । तद्धति लम्बगुरपघातहतोऽक्षगुरगाया समनृघातो वा ॥५॥ विभा –वा समनु (समशको ) अक्षगुणवर्गघातात् (समशक्क्षज्यावर्ग- घातात) लम्बनिभगुणवधलब्ध (लम्वज्यात्रिज्ययोर्यानभक्ताद्यत्फ्ल) कुज्या भवत् । वा समनृपलभाक्षगुणघातत (समशकुपलभाऽक्षज्यादधात्) निज्याघातलब्ध (निज्या द्वादशघातभक्ताद्यत्फल) सा कुया भवेत् ॥४४॥ वा समनृपलभाकृतिघातत (समशक्पलभावर्गवधात्) अक्षथ तिरवि- घातात् (पलकर्णद्वादशघातभक्तात्) फ्ल कुज्या स्यात् । वा अक्षगुणाना समन- घात (अक्षज्यानासनशकुव५) तद्धतिलम्वगुणघात हृत (ततिलम्बज्याघात- भक्त ) तदा ज्या भवेदिति ॥४५॥ अंत्रोपपत्ति । सा %D ज्यादाज्या अक्षक्षेत्रानुपातनः =कुज्या। परन्तु- अज्या समश माज्या लज्या नि अज्या क्राज्या अज्या अज्या सश कुज्यास्वरूपे कान्तिज्याया उत्यापनन लज्या लज्यात्रि मज्या' सश अज्या पलभा =कुज्या। परन्तु तत उत्थापनेन लज्या अज्या सग पभा ज्या एतेन चतुर्थ श्लोक उपपद्यतो । 3- लज्या त्रि १२ मि ३ विप्रश्नाधिकारः - . %3- अज्या पलभार अज्या संश पभा पभा.मरा पभा पभा सश तथा- पलक १२ त्रि पक.१२ =कुज्या अज्या भाज्या अग्रासमा अथवा कुज्या। परन्तु लज्या तवृति = क्राज्या कुज्यास्वस्पे काति- १२ पक ज्याया उत्थापनेन अज्या अग्रा.समश ल ज्या कुज्या एतेन पञ्चमश्लोक उपपद्यते।।४-५॥ / अब पुन बुज्या के प्रानयनो को कहते है । हि मा.--वा समगा और अक्षज्यावर्गपात मे लम्बज्या और त्रिज्या के पात से भाग देने से कुज्या होती है। वा समश पलभा और अक्षज्या के घात में विज्या और द्वादश के पात से भाग देने से युज्या होती है ॥ वा समगकु और पलभावर्ग के धात मे पलवर्ण और द्वादश के पात में भाग देने से बुग्या होती है । वा प्रक्षज्या, अग्रा और ममशक के घात मे तद्धति और लम्बज्या के घात में भाग दन मे कुज्या होती है ॥४-५॥ उपपत्ति) . लज्या नि लज्यामि -ज्या। अज्यामश प्रक्षक्षेत्र के अनुपात से अज्या भाज्या =कुज्या । परन्तु -क्राज्या लज्या त्रि कुज्या के स्वरूप मे क्रान्तिज्या को उत्थापन देने से- प्रज्या काज्या अज्या ज्या मदा ज्या' सग लज्या प्रज्या पभा अज्या'मा पभा प्रज्या मा इमलिये लज्या १२ इससे चौथा श्लोव उपपन्न हुप्रा ॥४॥ प्रज्या पभा पभाज्यामा पभापभा राग तथा प्रन पलक १२ त्रि १२१ पभामा अज्या भाज्या कुज्या । अथवा =कुच्या १२पक परन्तु %3D लज्या त्रि १२ वि %3- प्रपामग परन्तु काग्या । इममें कुग्यास्वरूप मे क्रान्तिग्या को उत्पापन देने से तदति मज्या प्रणासन -ग्या । इसमे पञ्चम श्लोक उपपन्न हुप्रा ॥6॥ तदति लज्या पुन कुञ्यानयनान्याह यासज्यावर्गहता प्रिगुणकृतिहता च तह तिः कुज्या। वाक्षाभायगंहता तब तिरक्षययणकृति हुत्कुज्या ।।६।। - वटेश्वर-सिद्धान्ते वा नृतलवर्गनिहता स्वधृतिकृतिहृता च तद्वति। कुज्या वाटश कुयातोमाभान. स्वतिरविहृत् ॥७॥ घातो वामगुणनो लम्बज्या स्वतिधातहत्कुत्या । वनाभिहतो घातः कुञ्या स्वधृतिसमनरतिहत् ॥८॥ पुन बुज्यानयनान्याह । घि भा --वा तद्वति (तद्धति.) अक्षज्यावर्गहता (प्रक्षज्यावर्गगुरिगता) त्रिगुणकृतिहुता (त्रिज्यावर्गभक्ता) तदा वुज्या भवेत् । वा तद्व ति. (तद्ध ति ) अक्षाभावर्गहता (पलभावर्गगुणिता) अक्षश्रवणकृतिहत् (पलकर्णभक्ता) तदा कुज्या भवेत् ॥ वा तद्वति (तद्धति ) नृतलवर्गनिहता (गकुतलवर्गगुणिता) स्वधृतिकृतिता (हतिवर्गभक्ता) तदा कुज्या भवेत् । वा अग्रेटशकुघात , अक्षा- भान (पलभागुरिणत ) स्वधृतिरविहत् (हतिद्वादमघातभक्त ) तदा वुज्या भवेत् ॥ वा घात अक्षगुणन (अक्षज्यागुरिगत) लम्बज्यास्वतिघातहृत् (लम्बज्याहृतिघातभक्त ) कुज्या भवेत् । वा घात , अग्राभिहत (अग्रागुणित ) स्वधृतिसमनरहतिहृत् (हतिसमशवृधातभक्त) तदा कुज्या भवेत् ॥६८।। अनोपपत्ति. अज्या तद्धति नि कुज्या । परन्तु नि अग्रा कुज्याया स्वरूप अनाया उत्थापनेन अग्या अज्या तहति__ अज्या तद्ध ति. त्रि त्रि नि -कुज्या। पलभा शकुतल' त्रि पलक' हृति अज्या' तद्धति पलभा' नद्धतिशतलतद्धति अज्या अग्रा ग्रज्या पर %3D %3D अत पलक हति' - ज्या। %3D - शतल अग्रा पभाइश तथा हति 'कुज्या। पर -शतल, कुज्यास्वरूपे पभाइम अग्रा घात पभा उत्थापनेन -=ज्या- प्रन ना इश-घात १२ हृति १२ हति' घातप्रज्या घातग्रा प्रज्या प्रग्रा ल ज्या हृति लज्या सश प्रत उपपपन्नम् ॥ ६८ ॥ पुन बुग्या के मानयनो को कहते हैं । हि मा-या तर ति यो प्रमज्या वग से गुगकर विज्यावर्ग में भाग देने से बुज्या होती है। तर ति को पलमा वर्ग से गुणवर पलवण वर्ग रो भाग दने से मुज्या होती सदा हनि कुज्या विप्रनाधिकार है । वा तद्धति को शकुनलनग स गुणकर हतिवग से भाग दन रा बुज्या होती है। वा अग्रा और इप्टश कु के घात को पलभा से गुणकर द्वादश और हृति के घात मे भाग देने स कुज्या होती है ।। वा पात को अक्षज्या से गुणकर लम्बज्या और हृति के घात मे भाग देने से कुज्या होती है । वा पात को अग्रा स गुणकर हृति और समशकु के घात से भाग दने से कुज्या होतो है ।। ६८॥ उपपत्ति। यज्याप्रमा प्रज्या तद्धति -कुज्या । परन्तु -अग्रा इमस कुज्या के स्वरूप म अग्रा त्रि वि को उत्थापन दने से प्रज्या ज्या तद्धति_ ग्रज्या तद्धति -कुज्या। वित्रि त्रि' पलभा मतल इसलिये पलक हृति' अज्या' तद्धति पलभा तद्धति शतलतद्धति =कुज्या ग्रज्या परन्तु नि पलक । - घात अग्रा - पुज्या- हृति समदा दाकलापमा पभाइश तथा = कुज्या। परतु .--शतल इसस कुज्या व स्वरूप में १२ पलभाइश अग्रा शकुन्तल को उत्थापन देने से -कुण्या । हृति १२ घातपभा यहाग्रा इशघात हुति १२ घात प्रज्या हृति नज्या इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुआ ||६८ ॥ इदानी पुनस्तदानयना याह । धुदलहुतिधुज्यान्तरमथवा कुज्या जीवया गुरिणत । उन्नतगुरपस्त्रिगुणहतस्तद्वतिविवर महीजीवा ॥६ धुज्या हता चरज्या निज्या भाज्या पलगुणभावृत्ताग्रावध । निजश्रवणहक्षितिज्वा कान्तिज्याप्राकृत्योविवरपद या महोजोवा ॥१०॥ नि भा--अथवा द्य दलहतिय ज्यान्तर (मध्यहति | ज्ययोरन्तर) कुज्या भवेत् अथवा उन्नतगुण (उन्नतज्या) घुजीवया गुणित (धुज्यागुणित ) त्रिगुण हृत (त्रिज्याभक्त ) तद्वृतिविवर (फ्लतद्धत्योरन्तर) महीजीया (ज्या) भवेत् ।। वा चरज्या युज्याहता (युग्यागुरिगता) विज्याभाज्या तदा महौजीवा भवेत् । अथवा पलगुगभावत्तागायध (अक्षज्या यावर्णगोलीयाग्राघात) निजश्रवणहत् कला अग्रा छायाव = कर्णवृताग्रा । ५१४ वटेश्वर-सिद्धान्ते (छायाकर्णभक्त ) तदा क्षितिज्या (ज्या) भवेत् । वा क्रान्तिज्याध्याकृत्योविवर- पद (कान्तिज्या यावर्गान्तरमूल) महोजोवा (ज्या) भवेदिति ॥ १०॥ अनोपपत्ति । मध्यान्ह द्यु ज्या फुज्या-हति अतो द्यु ज्या-मध्यहति=कुज्या। तथा सून कुजोवागुणित विभक्तमित्यादि भास्करोक्त्या उन्नतज्या युज्या त्रि =तद्धृति-~-कुज्या तद्धृति --कला-ज्या । चरज्या ज्या अथवा = कुज्या। नि नि अक्षज्या करणवृत्ताग्रा_अक्षज्या अग्रा छावर्ण _अज्या गग्रा तथा छायाक वि छावर्ण मि - ज्या वा अग्रा'-काज्या बज्या। एतावताऽचार्योक्तमुपपन्नम् ॥६-१०॥ इति वटेश्वरसिद्धात त्रिप्रश्नाधिकारे कुज्यानयनविधि पन्चमोऽध्याय ॥ अब पुन बुज्या क पानयमो को कहत हैं । हि मा-पयवा मध्यहति और गुज्या क अन्तर कुज्या हाती है। वा उन्ननज्या को द्यु ज्या से गुणकर भिज्या स भाग दन म जो फ्ल होता है उसक और तदृति के अन्तर करने से कुज्या होती है । अयवा अक्षज्या और कण वृत्तान पात म छाया कणं से भाग देने से कुज्या होती है । वा क्रान्तिज्या और अग्रा के वर्गान्तरमूल कुज्या होती है ॥६१०॥ उपपत्ति । मध्याह काल म धुज्या-+-बुया- मध्यह ति धुज्या- मध्यहृति-कुण्या । तथा मूत्र कुजीवा गुणित विभक्त मित्यादिभोस्करोक्त स उन्नतज्या धज्या -=क्ला तहति-बुज्या त तिबेला-ज्या चरज्या ग्रुग्या भग्रा छाया अथवा त्रि =कुज्या। .-छाया कण गो प्रमा मनग्या व वृत्ताग्रा.प्रक्षागा घार्ण मज्या प्रमा छायाक त्रि छावण नि वा प्रया'-कोज्या =कुज्या इमम प्राचार्मोक्न उपपन्न हुमा ।।६ १०॥ ज्या। इति वटेश्वरसिद्धान्त में विप्रश्नाधिकार म कुग्यानयनविधि नामक पचम अध्याय समाप्त हुआ।
षष्ठोऽध्यायः प्रथाग्रानयनविधिः । तवादावग्रानयनान्याह । परमापक्रमजीवानी रविभुजजीवा लम्बगुणभक्ता। अग्रा क्रान्तिज्या वा त्रिज्यानो लम्बजीवाहृत् ॥१॥ प्रक्षश्रवणाभ्यस्ता क्रान्तिज्याऽर्कोदधृताऽथवाऽग्रज्या। तद्धतिहताऽपमज्या समनरभक्ताऽथवाऽग्रज्या ॥२॥ स्वतिध्नाऽपमजीवा स्वेप्टनरेणोद्धृताऽथवाऽप्रज्या । कुज्याक्रान्तिज्याकृतिसमासमूलमथवाऽग्राज्या ॥३॥ कुज्यात्रिज्यागुरिणता पलजीवा भाजिताऽथवाऽग्रज्या। विषुवत्कर्णाम्यस्ता कुज्या वाऽक्षद्युतिहृताऽग्रा ॥४॥ वि भा -रविभुजजीवा (रविभुजज्या) परमापक्रमजीवानी (परमकान्ति- ज्यागुरिंगता) लम्वगुणभक्ता (लम्बज्यया भक्ता) तदाऽग्रा स्यात् । वा क्रान्तिज्या- ऽक्षज्याघ्नी (अक्षज्यया गुणिता) लम्वजीवाहत् (लम्बज्या भक्ता) तदाऽग्रा भवेत् ॥१॥ अथवा क्रान्तिज्या, अक्षश्रवणाभ्यस्ता (पलकणंगुणिता) अर्कोद्धृता (द्वादशभक्ता) तदाऽग्रज्या (अग्रा) भवेत् । अथवा, अपमज्या (क्रान्तिज्या) तद्धतिहता (तद्धतिगणिता) समनरभक्ता (समशकुभक्ता) तदाऽग्रज्या (अग्ना) भवेत् ॥२॥ प्रशवा, अपमजीवा (क्रान्लिज्या) म्वधृतिघ्ना (हृतिगुरिगता) म्वेष्टनरेगोद- धृता (स्वेप्टशकुभक्ता) तदाऽग्रज्या (अग्ना) भवेत् । अथवा कुज्या क्रान्तिज्या कृतिसमासमूल (कुज्याक्रान्तिज्ययोर्वर्गयोगमूल) अग्राज्या भवेत् ।।३।। अथवा कुज्या, विज्यागुरिणता, पलजीवाभाजिता (अक्षज्याभक्ता) तदा sप्रज्या भवेत् । वा कुज्या, विपुवत्करणाभ्यस्ता (पलकणंगुणिता) अक्षद्युतिहृता (पलभा भक्ता) तदाऽग्रा भवेत् ॥४॥ एतदुपपत्तयः। वि.क्रांज्या 'अग्रा। परन्तु लज्या वि जिज्या. भुजज्या-ज्या प्रतः प्रय पलक D वटेश्वर-सिदान्ते नि जिज्या भुजज्या_जिज्या भुज्या अना। कान्तिज्याया उत्थापनन लच्या नि लज्या त्रि क्राज्या अथवा -अग्रा एतेन प्रथमश्लोष उपपद्यते ॥१ लज्या वि प्राज्या त्रि प्रथ अग्रा पर -अत उत्थापनेन जाताना ल ज्या राज्या ૨૨ पक वाज्या, नि तद्धति तथा अत उत्थापनेन अग्रा- तद्धति प्राज्या १२ लज्या समा समक्ष एतेन द्वितीयश्लोक उपपद्यते ॥२॥ तदृति_हूति समश इशा प्रत उत्थापनेन व तद्धृति प्राज्या "अना। तथा कुज्या कान्ति- ममश इश ज्याऽग्राभिर्भुजकोटिकणेयमानत्रिभुजे कुज्या + प्राज्या' =अग्रा एतेन तृतीय- श्लोक उपपद्यते ॥३॥ तथाऽक्षक्षत्रानुपातेन त्रि पलक पर अक्षज्या एतेनोत्था अज्या पलभा पनेन घि कुज्या_पत्ता ज्या 'अग्रा एतेन चतुर्थश्लोक उपपद्यते ॥४॥ प्रज्या पलभा अथ पूर्वानोतानास्वरूपम् = तद्धति काज्या, परन्तु समर्श ह.ति प्राज्या त्रि पुज्या-अग्ना, अव अग्रा के प्रानयनो को कहते हैं। रविभुजज्या को परमकान्तिज्या से गुणकर लम्बया से भाग देने से मना होती है । अथवा क्रास्तिग्या को त्रिज्या से गरगर लम्बग्या स भाग देने से मना होती है ॥१॥ अथवा नातिज्या का पलकर्ण से गुणकर द्वादश से भाग देने स प्रग्रा होती है। मथवा क्रान्तिज्या को तद्धति से गुणकर ममाकु म भाग देने स प्रग्रा होती है ॥२॥ अथवा क्रान्तिज्या वो ह ति से गुणकर इप्टाक से भाग दने से मना होती है। अथवा कुज्या मोर क्रान्तिज्या के वगयोग मूल प्रपा होती है ॥३॥ अथवा कुग्या को विज्या स गुणकर प्रक्षज्या स भाग देन से अग्रा हाती है । अथवा कुज्या को पलकण से गुणकर पलभा स भाग देने स अग्रा होती है ॥४॥ उपपत्ति । त्रि क्राज्या लज्या प्रया । परन्तु जिज्या भुग्या त्रि काज्या इसस क्रान्ग्यिा स्वरूप को अग्रा 1 लज्या %3- % 34 विप्रश्नाधिकारः उत्यापन देने से त्रि. जिज्या. भुज्या_जिज्या. भुज्या इसमें प्रथम श्लोक लग्या. त्रि उपपन्न हुप्रा ॥२॥ त्रि. क्राज्या त्रि पलक वि.काज्या अथवा -ग्रा, परन्तु इससे उत्यापन देने से लज्या लज्या १२ लग्या पलक.काज्या पलक _तद्धति . पलक. काज्या तद ति. क्राज्या --प्रगा। तथा १२ ममग १२ समश -प्रमा., इससे द्वितीय श्लोक उपपन्न हुआ। तद्धति.काज्या तथा .ह.ति इससे उत्थापन देने समस तद्धति क्रांज्या ह ति क्राज्या -अग्रा । तथा कुज्या, क्रान्तिज्या और अग्रा इन भुजकोटि समग कर्णो से उत्पन्न त्रिभुज मे Vबुज्या'+क्राज्या=अग्रा, इससे तृतीय श्लोक उपपन्न अग्रा.। परन्तु तद्धति समश हुपा ॥३॥ नि. कुज्या प्रक्षक्षेत्रानुपात से -प्रमा, पर त्रि प्रज्या पलक .त्रि. ज्या पलभा प्रज्या प्रज्या पलक. कुज्या प्रमा, इससे चतुर्य श्लोक उपपन्न हुअा ॥४॥ पलभा पुनरगानयनान्याह। तद्धृतिकुज्याघातान्मूलं पूर्वापरे कुजे वाऽना । स्वधृतिघ्ना कुज्या नृतत विभक्ताऽयवाऽग्रज्या १५॥ समनाऽक्षज्या गुपितो लम्बज्या भाजितोऽयवाऽग्रज्या । विषुवच्छायागुणितः समना वाऽर्कोद्धृतोऽप्रज्या ॥६॥ कुज्यागुरिणतः समना क्रान्तिज्या भाजितोऽथवाऽप्रज्या। समना नृतलाम्यस्तः शंकुविभक्तोऽयवाऽग्रज्या ॥७॥ तद्धतिरक्षज्यानी व्यासाविभाजिताऽथवाऽप्रज्या । प्रयवाऽक्षच्छायानी ततिरक्षश्रुतिहताना वि. मा.-तद्धृतिकुज्याघातात् मूल वा पूर्वापरफुजे (पूर्वपश्चिमक्षितिजे) अग्रा भवेत् । अथवा कुज्या स्वधृतिघ्ना (हतिगुरिणता) नृतलविभक्ता (गकुनल- भक्ता) अग्रज्या भवेत् ।। अथवा समना (समगः) अक्षज्यागुरिणतः, लम्बज्या भाजितः (लम्बज्याभक्त) अग्रज्या (अग्रा) भवेत् । अयवा समना (ममगंक:) विषुवच्छायागुरिणतः (पलभागुणितः) अर्कोवृतः (द्वादशभक्तः) अग्रज्या भवेत् ।। अथवा समना (ममशंकु) कुज्यागुणिनः, क्रान्निज्याभाजितः अग्रज्या भवेत् ।
- लज्या पलभा ५१८ पटेश्वर-सिद्धान्त अथवा समना (समशक) नृतलाभ्यस्त: (शंकुतलगुरिणतः) शंकुविभक्तः, तदा अग्रज्या (प्रा) भवेत् ।। अथवा तद्धृति , अक्षज्यानो (अक्षज्यागुरिणता) व्या- साविभाजिता (त्रिज्याभक्ता) तदाऽग्नज्या भवेत् । अयवा तद्धृतिः, प्रक्षच्छाया- घ्नी (फ्लभागुरिणता) अक्षश्रुतिहृता (पलकर्णभला) तदाऽना भवेत् ॥८॥ एतेषामुपपत्तय । अक्षक्षेत्रानुपातेन तद्धृति कुज्या =अग्रा : तद्धति कुज्या=यग्रा मूलेन अग्रा Vतात कुज्या अग्रा । अथवा हृत्ति कुज्या अग्रा एतेन पञ्चमश्लोक उप- शङ्क तल अक्षज्या समश पपद्यते ।। अथवा प्रज्या पलभा यग्रा । तथा अत उत्थापनेन लज्या १२ अज्या समश पलभासमा एतेन पठश्लोक उपपद्यते ॥ अथवा ज्या १२ पलभा समश -अना। पर पलभा सश कुज्या अत उत्थापनेन १२ ૧૨ क्राज्या १२ कुज्या समग = अग्रा । तथा ज्या श कुनल कुज्या सग काज्या काया श काज्या अग्रा, एतेन सासमश्लोक उपपद्यते ।। अयवा ग्रज्या. तद्धति त्रि अग्रा तथा ग्रत उत्थाानेन अज्या तद्धति त्रि वि पभा तद्धनि =अग्रा, एतेन अष्टमग्लोक उपपद्यते । पलक पुन प्रया रे मानयनो को वहने हैं हि भा-उद्धृति और यग्रा के धात के मूल लेने से मना होती है । अथवा कुज्या को हति में गुणकर कुतन रे भाग देने में अग्रा होनी है ॥५॥ अथवा समश को अक्षज्या से गुरणार लम्वन्या से भाग देने से अग्रा होती है। प्रयवा समग वो पलभा से गुणपर द्वादश में भाग देने से प्रणा होती है ॥६॥ अथवा समानु को कुज्या से गुणकर क्रान्तिज्या मे भाग देने से अग्रा होती है । प्रयवा समग को भारतल में गुणकर शकु मे भाग देने से मना होती है ॥५॥ अथवा तद्धति को प्रक्षज्या में गुणकर विज्या मे भाग देने से प्रग्रा होती है । अथवा तदति को पलभा मे गुग्णवर एलरर्ण मे भाग देने से प्रना होती है ||८|| उपपत्ति . शकुतल समश श प्रज्या पलभा पलक पक्षक्षेत्र के अनुपात मे तहनि त ग्या -प्रपा :: तहति पुज्या प्रमा' मूल मनी निप्रश्नाधिकार: ५१० हति कुन्या लेन से तद ति कुज्या =अग्रा । अथवा शतल प्रया इससे पञ्चमश्लोक उपपन्न पलभा हुमा ॥५॥ अथवा अज्या समय लज्या =अग्रा । परन्तु प्रज्या लज्या इससे उत्थापन देने से पलभाममग प्रज्या समश लज्या प्रया । इससे पहरलोक उपपन्न हुआ ॥६॥ अथवा १२ % 3D १२ इससे उत्थापन देने से कुज्या ममग, शक % 3D एलव पलभा समश पलभा =अग्रा परन्तु कुज्या पलभा समन अत उत्थापन देने से १२ क्राज्या १२ कुज्या समश बुज्या ममग्रा तथा शकुतल प्राज्या ताज्या भक क्राज्या शकुतल समश --प्रया इससे सप्तमदलोष उपपन्न हुआ ॥७॥ अथवा प्रज्या पद्धति ---ग्रा। त्रि पलमा परन्तु अज्या तदति_पलमा तद्धति अत उत्यापन देने से -प्रग्रा, त्रि पलक त्रि इससे अष्टमदलोव उपपन्न हुआ । पुनस्तदानयनान्याह । तद्धृतिसमनरकृत्योविशेषमूलं कुजे वाऽग्रा । भुजशङ्क, तलवियुतियुतो सा कुजे वाऽग्रा | त्रिज्याऽक्षामा गुरिणता सममण्डलकर्णभाजिता थाऽग्रा । नृतलं समशकोयंद्रवायुदस्थे भवेत्साना ॥१०॥ त्रिज्याभावृत्ताग्राघाते भाकरणंभाजिते वाऽना। भावृत्ताग्राहग्ज्यावधे प्रमाभाजिते वाया ॥११॥ विभा- -वा तधृतिसमनरवृत्याविशेषमूल (नधृतिसमग कुवर्गान्त रमूल) कुजे (क्षितिजे) अग्रा स्यात् । अथवा भुजगवुतलवियुतियुती (भुजशकुतलयोर्योगान्तरे) अग्रा भवेत् ॥ अथवा त्रिज्या अक्षाभागुरिगना (पलभा गुरिणता) सममण्डलकर्ण- भाजिता (ममकणंभक्ता) तदाग्रा भवेन् । अयवा रखो (सूर्य) उदवस्ये (उत्तरे) समशहोर्यन्नृतल (शङ्कतल ) साऽग्रा भवेत् 1110}} अथवा विज्या भावृत्ताग्राघाते (विज्याछायावणंगोलीयायावधे) भावणंभाजिते (दायारणंभक्त) तदायर भवेत् । अथवा भावृत्तामा दृज्यावधे (छायाकणंगोलीयाना दृग्ज्याघाते) प्रभा. भाजिते (छायाभक्त) तदाऽग्रा भवेदिति ।।११।। एपामुपपत्तय ममराव तदितिभिभुजकोटिकणर्जायमानाक्षेत्रे तिहति-सममा 'अप्रा। तथा गमूलात्पूर्वापरसूत्रोग्लिम्ब.= भुज. । प्रमा नि छाया ५२० वटेश्वर-सिद्धान्त शकुमूलात्स्वोदयास्तसूत्रोपरिलम्य मानलम् । स्वोदयास्तपूर्वापरमूत्रयोरन्त- रम् अग्रा । अग्राश कुतलयो मस्कारेण भुजो भवति, तद्विलोमेन श तलम्भुजः अग्ना, अग्रा गोलदिवका भवति, श कुतलस्य दिक् दक्षिणा, पूर्वापरसूना यद्दिशि पलभासन ग कुमूल तहिग्भुजसज्ञकम् । एतेन नवमश्लोक उपपद्यते =ग्रा १२ पलभा समxनि पलभात्रि अत्र हरभाज्यौ त्रिज्यया गुरिंगतो तदा १२४नि १२४नि सदा पलभानि -अना। अथवा समप्रवेशविन्दो सूर्ये यच्छडकुतल संवाग्रा भवति । समकर्ण एतेन दशमश्लोक उपपद्यते ।।१०।। कर्णवृत्तानानि =अग्रा । परन्तु -छायावरणं अत उत्थापनेन छायार्ण इंग्ज्या कणवृत्ताना त्रि_ कर्णवृत्तामा दृरज्या 'अग्रा एतेन एकादशश्लोक उपपद्यते ।।११।। त्रिछाया छाया दृग्ज्या अब पुन अग्रा के प्रानयन प्रकारो का कहते हैं। हि भा-तहति और ममश क वर्गान्तरमूल क्षितिज म प्रना होती है । अथवा भुज पौर शकुना के योगातर करने स अग्रा होती है ॥६अथवा विस्या को पलभा से गुरगमर समर्ण म भाग देने से अग्रा हाती है । अथवा रवि के सममण्डल मे रहने म जो शकुनल होता है वह अना है ।।१०।। अथवा त्रिज्या और कर्णवृत्ताग्रा के घात म छायारणं मे भाग देने से अग्रा होती है । अथवा कणवृत्ताप्रा और हाज्या वे घात में छाया से भाग देन मै प्रना होती है। उपपति। मना, समग और तहति इन भुजबोटिवरणों मे जो जात्य त्रिभुज बनता है उसमें Vतति'--समा'- अना। शकुमूल से पूर्वापर मूत्र के ऊपर लम्ब-भुज । शकुमून स्वोदयाम्न मूत्र के कार लम्ब =कुतल । स्वोदयासामून और पूर्वापर मूत्र के अन्तर:- पग्रा । प्रत मतल+भुज-प्रणा । शक्तल की दिशा दक्षिण है । पूर्वापर सूत्र से याव- मूल जिस दिशा म रहता है उम दिशा का मुज होता है । अंग्रा की दिशा गाल दिया है। इमम नवम तोर उपपन्न इा l अथवा. प्रया, इसने हर और भाग्य मे पलभा समय को त्रिज्या मे गुण देन मे पभा ममापि पमा त्रि १२xत्रि सा पभा त्रि -प्रणा पथवा मम. ममम . विप्रश्नाधिकार प्रवेश बिन्दु म रवि के रहन से जो शकुतल होता है वह अया है । इससे दमवा श्लोक उपपन्न कणवृत्ताग्रा त्रि हुआ ॥१०॥ अथवा =अग्रा परन्तु- -डायार्ण इमसे उत्थापन देने छाया त्रिछाया से कर्णवृत्तामा त्रि त्रिछाया कणवृत्ताना दृग्ज्या -अप्रा । इससे ग्यारहवा श्लोक उपपन्न छाया दृग्ज्या हुया ॥११॥ पुनस्तदानयनान्याह। कुज्याशड क्योतिोऽक्षज्यान. स्वधृति लम्बगुरणवधहत् । घात कुज्यागुरिणत क्रान्तिज्या स्वधृति घातहृद्वाऽना ॥१२॥ वाऽक्षाभाघ्नो घात सूर्यघ्नस्वधृतिभक्तोऽया। शुज्या चरगुरणघातोऽक्षज्या भक्तोऽथवाऽग्रज्या ॥१३॥ वि भा ---कुज्याशड्कोर्घात , अक्षज्यान (अक्षज्यागुणित ) स्वधृतिलम्ब- गुणवधहृत् (हृतिलम्वज्ययोतिभक्त ) तदाऽग्रज्या भवेत् । अथवा पात (कुज्याश क्वोर्घात ) कुज्यागुरिणत , क्रान्तिज्यास्वधृतिघातहत् (क्रान्तिज्याहृति- घातभक्त ) तदा अग्रा भवेत् ॥ अथवा घात अक्षाभान्न (पलभागुरिणत ) सूर्यन्नस्वधृतिभक्त (द्वादशगुणितहतिभक्त ) तदाऽग्रा भवेत् । अथवा धु ज्याचरगुण. घात (ध ज्याचरज्ययोवंध) अक्षज्याभक्तस्तदाऽग्रज्या (अग्रा) भवेदिति॥१२-१३॥ अनोपपत्ति त्याश कुतल अत्र व्यस्तनराशिकेन ल ज्या हति हृति कज्या हृति घात अज्या 'अना। अथ कुज्या शकु= घात, तदा प्रमा लज्या हृति अज्या कुज्या घात कुज्या परन्तु प्रत -अंग्रा। लज्या प्राज्या काज्या हृति कुज्या पलभा घात पलभा तथा प्रत -अंग्रा। माज्या १२ १२४ हृति तथा 'चरज्या कुज्या विचरज्या धु पक्षी अक्षज्यया भक्तो द्य चरज्या द्य सदा अगा। एतेनोपपन्न सर्वमिति ॥१२-१३॥ अज्या अज्या अत्र कुज्या शक्वापात इति प्रकारोऽम्मभ्य न रोचते कथमाचार्येण तथा. ऽऽनयन कृतमिति त एवं ज्ञातु शक्नुवन्तीति ।। इति वटेश्वरसिद्धान्त विप्रनाधिकारेऽग्रानयनविधि पप्ठोऽध्याय ॥ श्लोकोक्त्या कुज्या श कु अज्या %3D- श कुतल कुज्या नि कुज्या वि ५२२ वटेश्वर-सिद्धान्ते पुन अना के प्रानयनो को कहते हैं। हि भा-कुण्या नौर शक के घात को अक्षज्या से गुणकर हुति और लम्बग्या के घात से भाग देने से अग्रा होती हैं । अथवा घात (कुज्या प्रौर शक के घात) कुन्या से गुणकर क्रान्तिज्मा गुरिणत हुति से भाग देने से अप्रा होती है ।।१२।। अथवा घात को पलमा से गुणकर द्वादश गुरिंगत हृति मे भाग देने से मना होती है । अथवा द्यज्या और चरज्या के घात को प्रक्षज्या से भाग देने से अग्रा होती है ॥१३॥ उपपत्ति । श्लोक के अनुसार कुज्या शक प्रज्या लज्या हृति कुज्या यकृतल -यहा व्यस्तौ राशिक हृति से कुज्या हृति =अग्रा । यहा कुज्या शकुम्घात शकुतल कुज्या शकु अज्या घातप्रज्या तब =मग्रा । परन्तु लज्या हृति लज्या हृति घात प्रज्या घात कुज्या -प्रमा लज्या हृति क्राज्या हृति प्रज्या लज्या ज्या क्राज्या घात पलभा १२ हति' कुज्या वि तथा -चरज्या कुज्या त्रि= चरज्या धु दोनों पक्षो को प्रक्षज्या से भाग दने से कुज्या त्रि 32 प्रज्या चरज्या द्य अग्रा, इमसे मव उपपन्न हो गये। यहा 'बुज्या प्रज्या शयोर्षात यह प्रकार मुझे ठीक नहीं मालूम होता है ॥ १२-१३ ।। इति वटेश्वरसिद्धान्त म त्रिप्रश्नाधिकार म अग्रानयनविधि नामक, छठा अध्याय समाप्त अष्टमोऽध्यायः अथ स्वचराधज्याप्रारणसाधनविधि तत्रादौ चराधज्यानयनायाह । कुज्या त्रिज्या गुरिणता ग्रुज्याभक्ता चरार्धजीवा स्यात् । अन्त्याहता कुजीवा धृतिभक्ता वा चराधज्या ॥१॥ अन्त्योन्नतज्ययोर्वा विशेषशेष चराधजीवा स्यात् । यनगृहीतयुदलतिथिघटी विवरनाडिकाज्या वा ॥२॥ निमा-कुज्या विज्या गुरिणता धुज्याभक्ता तदा चरार्धजीवा (चराधज्या) स्यात । वा कुजीवा (कुज्या) अत्याहता (अन्त्यागुरिंगता) धृतिभक्ता (हृतिभक्ता) तदा चरार्धज्या स्यात ॥१॥ अथवा अन्त्योन्नतज्ययो (अन्त्यामूनयो ) विशेष शेप (अन्तरशेपमर्यादन्त्यासूनयोरन्तर) चरार्धजीवा (चरार्धज्या) स्यात् । अथवा यन्नगृहीतादलतिथिघटीविवरनाडिकाज्या (दिनार्धपञ्चदशघट्योरन्तरज्या ) चरज्या भवेदिति ॥२॥ अनोपपति । क्षितिजाहोरात्रवृत्तसम्पातोपरिगत ध्रुवप्रोतवृत्तनाडीवृत्तसम्पातात्पूर्व- स्वस्तिक यावन्नाडीवृत्त चरचापम् । क्षितिजाहोरात्रवृत्त सम्पातोपरिगतध्रुव- प्रोतवृत्ते ध्रुवान्नाडीवृत यावनवत्यश । उन्मण्डले ध्रुवात्पूर्वस्वस्तिक यावन्न- वत्यश । नाडोवृत्ते चरचापमिति भृज अर्यरत्पन्नमेक त्रिभुजम् । ध्रुवाक्षितिजा होरामवृत्तसम्पात यावद् ध ज्याचापम् । ध्रुवादु मण्डलाहोरात्रवृत्तसम्पात यावदु न्मण्डले शु ज्याचापम् । अहोरात्रवृत्ते कुज्याचापमिति भुजप्रयरुत्पन्न द्वितीय- त्रिभुजम् । एतयोस्निभुजयोाक्षेत्रसाजात्यादनुपात कुज्या त्रि - चरज्या। तथा क्षितिजाहोरात्रवृत्तसम्पानोपरिगत ध्रुवप्रोतवृत्तनाडीवृत्त सम्पातात्पूर्वापरसूत्रस्य समानान्तरमूत्र कार्य तदुपरिग्रहोपरिगतध्रुवप्रोनवृत्त नाडोवृत्तसम्पातालम्ब कार्य सेवाऽन्त्यको भुज । भूकेन्द्राद्ग्रहोपरिध्र वप्रोतवृत्तनाडोवृत सम्पातगता त्रिज्या द्वितीयो भुज । भूकेन्द्रादन्त्यामूल यावतृतीयोभुज इति भुजयरत्पनमेव निभुजम् । तथाऽहोराप्रवृत्तगर्भवेन्द्राद्ग्रहगताद्य ज्ययो भुज । ग्रहात्म्योदयास्तसूत्रोपरिलम्बो- हतिद्वितीयो भुज । ग्रहोरात्रवृतगर्भवेन्द्रातिमूल यावत्तृतीयो भुन इनि भुज मयं.
%- - %3D द्य ५२४ वटेश्वर-सिद्धान्त रुत्पन्न द्वितीयनिभुजम् । एतयोखिभुजयो सजातीयादनुपातो यदि धु ज्यया इति- हुति.नि. त्रि अन्त्या लभ्यते तदा त्रिज्यया किमित्यनुपातेनागतान्त्या, धु द्यु हृति तदा पूर्वानीतचरज्यामानम् =कुज्या. त्रि' _कुज्या अन्त्या एतेन प्रथमशोक हुति उपपद्यते ॥ अथ ग्रहोपरिघ्र व प्रोतवृत्त नाडीवृत्तसम्पाताच्चराग्रद्वयवद्धसूनो (क्षितिजा- होनवृत्त सम्पातोपरि ध्रव प्रोतवृत्त नाडीवृत्त सम्पातात्पूर्वापरसूत्रसमानान्तर सूत्रस्य चराग्रहयवद्धसूत्रस्य) परिलम्वोऽन्त्या, तथा तत एवं पूर्वापरसूनोपरि लम्ब =सूत्रम् । अत. अन्त्या -सूनः-चरज्या । तथा चोन्मण्डलगाम्योतरवृत्तयो- रन्तरे पञ्चदश नाड्य । स्वक्षितिजोन्मण्डलमोरन्तरे चरखण्डकाल । उत्तरगोले स्वक्षितिजादुपरि दक्षिणगोले चाध उन्मण्डल मस्त्यत उत्तरगोले चरपटीसहिता दक्षिणगोलरहिता पञ्चदशनाड्यो गोलयोदिनार्धमान भवेत् । एतद्विलोमेन दिनाघ- पञ्चदशघट्योरन्तर चरार्धमान तेन दिनार्धपञ्चदशघटयोरन्तरज्या चरज्या भवेदत एतेनोपपद्यते द्वितीयश्लोक ॥ १२|| अव चरज्या के पानयनो को कहते है। हि भा-पुज्या को त्रिज्या से गुणकर ज्या से भाग देने से चरज्या होती है । पपया कुज्या को अन्त्या से गुण कर हृति से भाग देने से चरज्या होती है ॥ अथवा अन्त्या और उन्नत कालज्या के अन्तर करने से जो शेष रहता है वह चरया होती है। अथवा यन्त्र गृहीत दिनाथं और पन्द्रह घटी के अन्तर की ज्या होती है ।।१२।। उपपत्ति। क्षितिज्या होरात्रवृत्त सम्पात के ऊपर ध्रुव प्रोतवृत्त करने से वह ध्रुव प्रोतवृत्त नाडीवृत्त मै जहा पर लगता है वहा से पूर्व स्वस्तिक तक नाडोवृत्त में चरवार है । क्षितिजा- होरात्रवृत सम्पातगत ध्रुवप्रोततृत्त में ध्र व से नाडीवृत्त तक नवत्या चाप एफ भुज, घव से पूर्व स्वस्तिक तक उन्मण्डल मे नवत्या द्वितीय भुज, नाडोवृत्त में चरचाप तृतीयभुज, इन तोनो भुजो से एक त्रिभुज बना । तथा ध्रुव स शितिजाहोरात्रवृत्त सम्मात तक न प्रोत. वृत्त म य ज्या चाप एक भुज, घ व से मण्डलाहोरात्रवृत्त के सम्पात तर उन्मण्डल में धज्याचाप द्वितीयभुज, होरात्रवृत्त मे बुग्याचाप तृतीयभुज, इन तीनो भुजो से उत्पन्न द्वितीय त्रिभुज चना, इन दोनो त्रिभुजो के ज्या क्षेत्र मजातीय है इसलिए अनुपात है । == चरजा । नथा ग्रहोपरि ध्रुव प्रोतवृत्त नाडोवृत के सम्पात से चरायद्वयवद्ध मन अन्त्या एक मुज, भूकेन्द्र से ग्रहोपरिगत ध्र व प्रोतवृत्त नाडीवृत्त सम्मातगत त्रिज्या द्वितीय भुन, भूकेन्द्र से अन्त्या मूलगत रेखा तृतीय भुज इन तीनो भुजो से एफ त्रिभुज बना । अहोरात्रवृत्त गमरेन्द्र में ग्रहगत धुज्या रेखा एक भुज, ग्रह से स्वोद- वृज्या वि के ऊपर लम्ब रेयाः हृति नि अन्त्या =अन्त्या .. % 3D ध स्वरूप कुज्या वि % 3D- निप्रश्नाधिकार ५२२ यास्त सूत्र के ऊपर लम्बहृति द्वितीय भुज, अहोरात्रवृत्त गर्भकेन्द्र से हति मूल तर तृतीय भुज इन तीनो भुजों से उत्पन्न द्वितीय त्रिभुज बना । इन दोनो त्रिभुजो के सजातीय होने के कारण अनुपात करते है हृति -तब पूर्वानीत घरज्या के त्रि कुज्या अन्या. चरज्या इससे प्रथम श्लोक उपपन्न हुप्रा ॥१॥ हृति ग्रहोपरिणत ध्र व प्रोतवृत्त नाडीपत्त के सम्पात विन्दु से चराग्रद्वय वद्ध सूत्र के ऊपर लम्ब रेखा-अन्त्या और उसी विन्दु स पूर्वापर मूत्र के उपर लम्बरेया--सूत्र इसलिए अन्त्या--सूत्र-चरज्या । तया उन्मण्डल और याम्योत्तरवृत के अन्नर म १५ घटी है । और अपने क्षितिज और उन्मण्डल के अन्तर-चरखण्डवाल है । अपने क्षितिजे कध्वंयाम्यो- तर वृत्त तक दिनाधकाल है । इसलिए दिनार्धकाल पोर पञ्चदश (१५) घटी के अन्तर (चर) ज्या चरज्या होती है। इससे द्वितीय श्लोक उपपन्न हुमा ॥१-२।। पुतश्चरज्यानयनान्याह । पलजीवा गुरिगताना ज्याभक्ताऽथवा चराधज्या। क्रान्तिनिभगुरपघातोऽक्षाभाघ्नोऽाहृतद्युजीवाहृत् ॥३॥ अक्षज्यानो घातो लम्बज्या धृतिवधोवृतो वा स्यात् । कुज्यानो वा घातोऽपमधृतिघातोद्धृत सा स्यात् ॥४॥ वि भा -प्रमा, पलजीवागुरिगता (अक्षज्यागुरिणता) धु ज्याभक्ता, अथवा चरार्धज्या भवेत् । वा क्रान्तिनिभगुणघात (क्रान्तिज्यामिज्ययोर्षात ) अक्षाभान (पलभागुरिणत ) मकहित द्य जीवाहृत् (द्वादशगुरिणत धुज्यया भक्त ) तदा चरज्या भवेत् ॥६॥ वा घात , अक्षज्यान (अक्षज्यागुणित ) लम्बज्याति- वधोद्धृत (लम्बज्या द्यु ज्ययोतिभक्त ) तदा चरज्या स्यात् । वा घात , बुज्यान (कुज्यागुरिणत ) अपमधृतिघातोद्धृत (क्रान्तिज्याद्य ज्ययोर्घातभक्तः) तदा सा (परस्या) स्यादिति ॥३४॥ अबोपपत्ति । वज्या मि =चरज्या. कुज्या विचज्या धु पक्षौ (अक्षज्या) भतौ तदा धु युचज्या प्रज्या प्रग्रा - अग्रा तत चरज्या धु= प्रज्या अग्रा =चज्या, अज्या प्रज्या ध. पल भाभाज्या पभानाज्यात्रि तथा- 'चरज्या एतेन १२ धु १२४द्यु पलभामाज्या नि तृतीयश्लोक उपपद्यते ॥३॥ अय-- -चरज्यापन वाग्या त्रिपात १२ धु कुज्या निच - -बुज्या नत कुज्या नि ૫૨૬ वटेश्वर-सिद्धान्ते तदा- घात पलभा पति अक्षज्या घात कुज्या =चरज्या: -चज्या । एतेन १२४ धु छल ज्या प्राज्याध. चतुर्यश्लोक उपपद्यते ।।३.४॥ अब पुन चरण्या के ग्रानयनो को कहते हैं। हि मावा अप्रा को प्रक्षज्या से गुणकर छु ज्या से भाग देने से चरज्या होती । अथवा क्रान्तिज्या त्रिज्या घात को अक्षमा (पलभा) से गुणकर द्वादश गुरिणत शुज्या से भाग देने से चरज्या होती है ।।३।। वा पात (बान्तिज्या और त्रिज्या के धात) को अक्षज्या से गुणपर लम्बज्या और घु ज्या के पात से भाग देने मे चरज्या होती है । वा घात को कुज्या से गुणकर क्रान्तिज्या पौर द्य ज्या के घात से भाग देने मे चरज्या होती है ॥४॥ उपपत्ति है 'चरज्मा ज्या त्रिचण्या घ, दोगो पक्षों को प्रक्षज्या से भाग देने चज्या द्य से कुज्या वि प्रया · चरज्या धु =प्रया अग्रा दोनो पक्षो में शुग्या से मच्या प्रज्या माग देने से भग्या प्रमा चरज्या तथा पलभाक्राज्या १२ कज्या त्रि कुज्या तव पसभाकाज्यात्रि ज्या- इमस तृतीय श्लोक' उपपल हा ॥३॥ १२४ पलभा वाग्या त्रि -चरज्या यहा प्राग्या त्रि= धात तव २२४द्य. पान ज्या पात पलभा १२ धु घात प्रक्षज्या लज्या धु इममे चतुर्थ श्लोर उपपन्न प्राज्या पुनस्नानयनान्याह । 'मान्त्यक्षरयासमपतिधातो धज्या समनवधहृत् । स्वपति कान्यक्षग्या घातो धुप्टेप्टनरयधहा ॥५॥ तवृतिप्लगुणतिहतिरवतम्बद्युगुणघातभक्ता था। सत्तिपतगुण पातोऽक्षाभानोऽक्ष तिद्यगुणवप्रया ।।६।। विभा.-मात्यक्षाज्या ममधृतिघात (क्रान्लिज्याक्षज्या ततिवध.) धुज्या समन्वघहत् (दुज्या ममग कुभक्त ) तदा वा चरज्या भवेत् । वा स्वधुतिकात्य. पाग्याधान (हतिकान्तिज्याक्षज्याघात ) ज्येष्टनरवघहत् (युज्येष्टा घात. भक्त) तदा चरज्या स्यात् वा तवृति यलगुणनिहानि (तत्याज्यावर्ग अवलम्ययुगुरणपातभक्ता (लम्बज्याय उपयोतिभक्त) तदा चरग्या भवेन् । पा धु. समश समश -भग्रा के स्वरूप को उत्थापन देने काज्या मज्या तडावरज्या तथा. त्रिप्रश्नाधिकारः ५२७ तवृति पलगुणघात (तख़त्मक्षज्याघात ) अक्षाभान (पलभागुणित ) अक्ष- थतियुगुणवधहृत् (पलकर्णबुज्याघातभक्त ) तदा चरज्या भवेदिति ।।५-६।। अयोपपत्तय । अथ पूर्व सिद्ध यत् अग्रा अक्षज्या चरज्या। परन्तु तद्धति माज्या द्य समश =अग्ना ततोऽयाया उत्थापनेन क्राज्या अज्या तद्धृति -चरज्या। अत्र तद्धति हुति काज्या अज्या हति प्रत =चरज्या Xइश काज्या. अज्या. तद्धति क्राज्या_अज्या अथ -चरज्या: धु. सश सश लज्या क्राज्या. अज्या तद्भुति_अज्या. अज्या तद्धृति _अज्या 'तद्धति चरज्या धु सन धु लज्या धु ल ज्या क्राज्या पलभा काज्या अज्या तद्धृति_पलमा अज्या तवृति तथा सश पलकर्ण धु. सश एतेन सर्वमुपन्नमाचार्योक्तम् ।।५-६।। पुन घरज्या के मानयन प्रकारो को कहते हैं। हि भा.-क्रान्तिज्या, अक्षज्या और तति के पातो को धुज्या पोर समशन के घात से भाग देने से घरज्या होती है । वा हृति कान्तिज्या और प्रक्षज्या पे घात को धुज्या और इष्ट शकु के पात से भाग देने से परया होती है। वा तदृति और प्रक्षज्या वर्ग के पात को लम्बज्या और घुश्या के घरन से भाग देने से परज्या होती है। अथवा तक्षति और प्रक्षज्या घात को पलभा से गुणकर पलवर्ण पौर धुज्या के पात से भाग देने से चरज्या होती है ॥५-६॥ उपपति। अग्रा.अक्षज्या पहले के सिद्ध स्वरूप चरज्या (परन्तु तहति. ब्राज्या तहति सक्ष हति_काज्या भज्या. हुति 'टचरज्या .. धु पलक -चज्या, धु. ममम मज्या क्राज्या काग्पा. प्रज्या. तदति-चरज्या, परन्तु घुसा %352 मन उत्यापन देन में वटेश्वर-सिद्धान्त घात कुज्या-चज्या । एतेन घांत पलभा घातXअक्षज्या तदा चरज्या १२४धु धुल ज्या काज्या द्य. चतुर्यश्लोक उपपद्यते ॥३४॥ अब पुन घरज्या के प्रानयनो को कहते हैं। हि भावा अप्रा को अक्षज्या से गुणकर शु ज्या से भाग देने से घरज्या होती है । अथवा क्रान्तिज्या निग्या घात को मक्षभा (पलभा) से गुणकर द्वादश गुणित धुज्या से भाग देने म चरज्या होती है ॥३॥ वा घात (क्रान्तिग्या भौर त्रिज्या के घात) को प्रक्षज्या से गुणवर लम्वज्या भौर धुज्या के घात से भाग देने से चरज्या होती है ! वा पात को कुज्या से गुणकर क्रान्तिज्या पौर ज्या वे घात से भाग देने मे घरग्या होती है ॥४॥ उपपत्ति ज्या नि '- चरज्या ज्या त्रिज्या घ. दो पक्षो को प्रक्षज्या से भाग देने घु कुज्या दि चउपाध चरज्या धुमज्या प्रमा दोनो पक्षो में धुज्या से भज्या से D प्रज्या मज्यामग्रा ज्या वि भाग देने से चरज्या। तथा पलभाकाज्या १२ ज्या तब चर. गलभा काज्या वि इसमे तृतीय श्लोव उपपन्न हुमा १३॥ १२४ पलभा क्राज्यात्रि चरज्या पहा ताज्या त्रि= घात तव १२४. घातप्रक्षम्या परज्या- घात कुन्या इससे चतुर्थ दलोव उपपन्न घात पलमा १२Xचु हुमा ।। ३-४॥ लग्या प्राज्या पुनस्तदानयनान्याह। प्रान्मक्षग्यासमतिघातो धुज्या समनुषधहत् । स्वति कात्यक्षज्या घातो घुप्टेप्टनरवधवा ॥५॥ तवृतिपंतगुणकृतिहतिरवलम्बधुगुरगपातभक्ता धा। तदत्तिपलगुण घातोऽक्षाभानोऽक्षय तिगुणवपद्दता ॥६॥ विभा -प्रात्यक्षज्या समधृनिधात (शान्तिज्यामज्या तद्धृतिवध ) घुज्या- समन्वयत् (धुज्या ममश बुभक्त) तदा या चरज्या भवेत् । वा स्वधुतिकात्य. राज्याघात (हतिवान्तिग्याक्षज्याधान ) युज्येप्टनरवधहत् (धुज्येष्टा कुपात: ६) तदा चरग्या स्यात् वा तद्वतियलगुणकृतिहति (तदधृत्यक्षग्यावर्ग वलम्बद्यगुरणपातमता (लम्बज्याध ज्ययोनिभक्त ) तदा परग्या भवेत् । था विप्रश्नाधिकार तवृति पलगुणघात (तद्धृत्यक्षज्याघात) अक्षाभान (पलभागुणित ) अक्ष- श्रतियुगुणवधहृत् (पलकर्णाज्याघातभक्त ) तदा चरज्या भवेदिति ॥५-६॥ अत्रोपपत्तय । अग्रा अक्षज्या तद्ध तिव्राज्या अथ पूर्व सिद्ध यत् 'चरज्या। परन्तु समश द्य चरज्या। प्रय =अग्रा ततोऽयाया उत्थापनेन भाज्या ज्या तवृति द्य. समश समर्श काज्या अज्या हृति -चरज्या । =हसि - - अत TXइस काज्या. अज्या तद्धति माज्या_प्रज्या अथ '-चरज्या धु. सश सश लज्या भाज्या. अज्या तदति अज्या. अज्या तवृति अज्या 'तद्धति चरज्या घु सश द्यु लज्या धु लज्या काज्या पलभा काज्या अज्या तद्धति_पलमा अज्या तद्धति तथा सरा पलकर्ण धु. सश धु पलक चज्या, एतेन सर्वमुपन्नमाचार्योक्तम् ॥५-६॥ पुन चरज्या के प्रानयन प्रकारो को कहते हैं। हि भा.-क्रान्तिज्या, प्रभज्या और तद्धृति में घातो को घुग्या और समराक के घात से भाग देने से चरज्या होती है । वा हात कान्तिज्या और प्रक्षज्या के पात को गुज्या पौर इप्ट शकु के पात भाग देने स घर या होती है। वा तदृति और अक्षया वर्ग के पात को लम्बया और घुज्या के घात स भाग देने स परज्या होती है। अथवा तद्धति और प्रक्षज्या पात को पलभा से गुणकर पलकणं और घुज्या के घात से भाग देने से चरल्या होती है ।।५-६॥ उपपत्ति। प्रप्रा. प्रक्षज्या पहले वे सिद्ध स्वरूप-- -चरज्या परन्तु तद ति. माज्या समा क्रामा अग्या तति प्रया के स्वरूप का उत्थापन देने मे -चरज्या । तथा ताति द्यु. समन - D काज्या प्रग्या हति परज्या । इन धु इस प्राज्या. प्रग्या. तद्धति काज्या प्रज्या --चरज्या, परन्तु सश लग्या - प्रत उत्यापन देने म પર૬ वटेश्वर-सिद्धान्त मज्या. प्रग्या. तर ति_अज्या'.तद्धति 'चरज्या। तथा यु. लज्या धु. लज्या पलमा एभर इसलिए मदा भाज्या. अग्या. तदति_पलभा प्रज्या. तहति -चरज्या । धु सश धु पलक इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुए ॥५-६।। . पुनस्तदानयनमाह। फुल्याघ्नो वा घातोऽग्रायुगुणयधोद्धृतश्चरार्धज्या। नृतलहतो वा घातः स्वधुतियुज्यावधिभक्तः ॥७॥ विभा.-वा घात (तद्धत्यक्षज्याघात) कुज्याघ्न. ( कुज्यागुणित.) अग्राद्य गुणवघोद्धृत (अगाध ज्याघात भक्त.) तदा चराधज्या भवेत् । अथवा घात , नृतलहत (शकुतलगुणित ) स्वधृतिय ज्यावधविभक्त. (हृतियुज्याधातभक्तः) तदा चरज्या स्यादिति ॥७॥ अत्रोपपत्तिः। १ 'हृति अप पूर्वानीतचरज्यास्वरूपम् = पभा. अज्या तद्धति अत्र अज्या. तद्धृति धु. पलक घाव पलभा भा -घात तदा -चरज्या परन्तु -कुज्या- शतल प्रतः धु पलक पलक अग्रा धात ४५भा_घात कुज्या-घात श तल =चरज्या अत उपपन्नम् ।।७।। यु पलक घात अग्रा धु हृति पुन चरज्या के प्रानयन कहते हैं। हि भा-घात को कुज्या से गुणकर अया पोर शुज्या के पात से भाग देने में घरज्या होती है । वा घात को श कुतल से गुणकर हृति और ज्या के पात से भाग देने से चरज्या होती है ।।७।। उपपत्ति । पहले वे घरज्या सरूप. पभा अज्या तति, यहा अग्या. तद्धति % पात द्य. पलक --चरज्या । परन्तु कुज्य घात.पभा धु पलक तब -- %3D पलक घात. पभा इसलिए धु. पक घात. ज्या घात.शतल धु हति --चज्या, इसमे उपपन्न हुप्रा ।।७॥ धु.मग्रा विप्रश्नाधिकार. ५२६ पुनश्चरज्यानयनान्याह। समनृतल पलगुरणहतिरिएनरद्य गुणघातभत्ता वा। त्रिज्यानानृतलवघा ज्याधृतिघातलब्धं वा ॥६ अन्त्याग्रानृतलवधः स्वधृतिवर्गहतोऽथवा चराधज्या। नृतलापम त्रिगुणहतिरिटन्युगुणघातहृच्चरापंज्या ॥६॥ वि भा -समनृतलपलगुरणहति (समराड कु गड कुतलाऽक्षज्याघात) इष्टनरा गुणघातभक्ता (इष्टशड कुछ ज्याघातविभाजिता) वा चरज्या भवेत् । वा त्रिज्या प्रानृतलवधात् (निज्याना शड कुतलघातात् ) युज्याधुतिघातलब्ध (धुज्याहतिघातभक्तफल) चरज्या भवेत् ।।८वा अथवा अन्त्याग्राण्ड बुतलघात ) स्वधृतिवर्गहृत (हृतिवर्ग भक्त ) चराधज्या भडत् । वा नृतलापम निगुणहृति (गड कुतल क्रान्तिज्या त्रिज्याघात.) इष्टनृद्य गुणघातहत् (इपशड कु घुज्याघात- भक्ता) तदा चरार्घज्या भवेदिति ।।६1) अयोपपत्तय शतल समश अग्रा अक्षज्या अक्षक्षेत्रानुपातेन अग्रा। परन्तु -चरज्या द्य शतल समश अज्या ततोऽग्राया स्वरूपस्योत्यापनात् =चरज्या। इग द्यु कुज्या नि द्य %3- -तत उत्थापनात् हृति यु. दातल अग्रा शतल अग्रा मि तथा ज्या तत -चज्या हति हुति । एतेन अष्टमश्लोक उपपद्यते ॥ शतल अग्रा त्रि नि अन्त्या तथा = चरज्या । परन्तु हृति द्य गु टातल अग्रा अन्या शतल अग्रा त्रि -चरत्या। 'घरज्या, अन हरभाज्यो हृति दातल मि प्राज्या मतल नि माज्या क्रान्तिज्यया गुणितावनया भत्तौ तदा हृति यु माज्या इाद्य भग्रा = चज्या, एतेनोपपन्नमाचार्योतमिति ॥६॥ प्रय पुन घरज्या ये मानयनो को कहते हैं । हि भा-रामशड कुगर कुतल और मज्या के पात को इगह और घु ज्या पात मे भाग देते ग चरज्या हाती है । त्रिज्या, मग्रा और महपतर के पात मे द्यग्या और हानि के पात म भाग देन म या धाग्या होती है। प्रथवा अन्त्या, मा पोर ग कुनल में पात म हलि वर्ग से भाग देने में परग्या होती है। या गडक्तम, प्रान्तिया और पिल्या में पान में गुज्या पार म माग देने में परापन्या होती है ।। 1 a माहौर वटेश्वर-सिद्धान्ते उपपत्ति भग्रा प्रक्षज्या दातल सश =चज्या, परन्तु धु इदा =प्रपा प्रतोऽग्राया स्वरूपस्योत्यापनात हृति यु % 3D हृति द्यु दा तल सग प्रज्या शतल ग्रा -चज्या। तथा = ज्या तव अनुपात से ध. इस हृति कज्या त्रि शतल अग्रा त्रि -चज्या- इससे पाठवा श्लोक उपपन्न हुमा ॥ द्यु दश तल अग्रा त्रि त्रि प्रत्या =चज्या परन्तु इसलिये उत्थापन देने से द्य हृति शतल अप्रा अन्त्या शतल अग्रा नि -चज्या। हृति = चज्या यहा हर भाज्य को क्रान्तिज्या म हृति यु. शतल वि क्राज्या गुरग कर अग्रा से भाग देन स. शतल त्रिज्या -चज्या हुति द्यु क्राज्या अग्रा इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुआ ॥ २॥ इदानी पुनस्तदानयनान्याह । नृतलान्त्यापमगुणहतिरिष्टनैतिघातहृच्चार्धज्या । धृतिकुगुणपलगुणवधान्नृतलाज्यावघाप्त वा ॥१०॥ क्रान्तिपलगुणधतिवधायुज्या नरघातहृच्चरार्घज्या । त्रिगुणतिवधो धुज्याहृत्प्रोन्नतगुणान्तर वा स्यात् ॥११॥ भा-नृतलान्त्यापम गुणहति (शड कुतलान्त्या क्रान्तिज्याघात ) दनृतिघातहृत् (इष्टशड कु हतिवधहृत्) तदा चरार्घज्या भवेत् । अथवा धृतिकु. गुरणपलगुणवधात् (हृतिकुज्याक्षज्याघातात्) मृतला ज्यावधाप्त (शड कुतल. धु ज्ययोर्षाताद्यल्लब्ध) सा चरार्वज्या भवेत् ।।१०।। वा कान्निपलगुणधृतिवधात् (क्रान्तिज्याक्षज्याहृतिघातात) धुज्यानरघातहृत् (धे ज्याराड कुवघहत्) तदा चरार्धज्या भवेत् । अथवा त्रिगुणधृतिबंध (त्रिज्याहृतिघात ) | ज्याहृत् (द्य ज्या- भक्त) तस्य प्रोनतगुणस्य ( सूत्रस्य ) अन्तर भवेदिति ॥१०-११॥ अत्रोपपत्ति अथ पूर्वानीतचरज्यास्वरूपम् = मतल त्रि प्राज्या त्रि पर च शतल अन्या क्राज्या त उत्थापनात् चज्या । तथा च म हृति यत्फल वा चरज्या प्रन्स्या इश द्य निप्रश्नाधिकारः कुज्या. त्रि कुज्या. त्रि %D =चरज्या । परन्तु हृति. अज्या त्रि अत उत्थापनात् द्यु शड कुतल कुज्या. हृति. अज्या -=चरज्या। एतेन दशमश्लोक उपपद्यते। घ. धु. शतल प्रय पूर्वचरज्यास्वरूम् शंतल. त्रि. क्राज्या परं शतल. त्रि प्रज्या ह ::शतल.त्रि=अज्या. हृति ततउत्थापनात् अज्या. हृति. क्राज्या =चरज्या। . इश. धु इश. द्य. त्रि. हृति तथा =अन्त्या, अन्त्या-उन्नतज्या=चरज्या धु अत उपपन्नमाचार्योक्तम् ॥१०१-१॥ अव पुनः चरज्या के पानयनो को कहते हैं। हि.भा.---दाड कुतल अन्त्या और क्रान्तिज्या के पास मे इष्टराड कु और हृति के घात से भाग देने से चरज्या होती है । वा हृति कुज्या और अक्षज्या के घात में शड कुतल मौर शु ज्या के घात से भाग देने से परज्या होती है | वा क्रान्तिज्या प्रक्षज्या और हृति के पात मे द्यु ज्या और शकु के घात मे भाग देने से चरज्या होती है। अथवा त्रिज्या पोर हृति के घात मे द्य ज्या से भाग देने से जो फल हो उसका और उन्नत का लज्या के अन्तर चरज्या होनी है ॥१०-११॥ उपपति शतल त्रि क्राज्या त्रि पूर्वानीत चरज्या के स्वरूप = लेकिन प्रत्या इरा.घ. धु हृति प्रत उत्थापन देने से श तल. त्रि. मन्या क्राज्या -चज्या। इस हृति ज्या त्रि तथा -चज्या । परन्तु हति. अज्या =नि इसमे उत्थापन देने से . शतल कज्या. त्रि कुज्या. हृति. प्रज्या -चन्या इससे दमवां श्लोव उपपन्न हुमा । धु. शतल एवं चरज्या वे स्वरूप तल. नि व्राज्या गतल.पि परन्तु -प्रज्या इमा. घु तल. निग्या. हनि इममे उन्यापन पन्त्या हति माग्या -चरज्या। इ.यु.
५३२ वटेश्वर-सिद्धान्ते प्रत्या नि हृति तथा अन्त्यां-उकाज्या-चरज्या धु, इमसे आवायॊक्त उपपन्न हुआ ||१०-११।। इदानी पुनरपि चरण्यानयन प्रकारद्वयेनाह । पलगुणकृतितद्ध तिघातस्त्रिज्या गणघातभक्तो वा । उद्धृत्यान्त्याक्षगुणकृतिघातस्त्रिज्याकृतिस्वधृतिघातभक्तो वा ॥१२॥ वि भा -पलगुणनितद्धतिघात ( अक्षज्यावर्गतद्धत्योर्धात.) विज्या. द्य गणघातभक्त (रिज्या ज्ययोर्षातभक्त) वा चरज्या भवेत् । वा उद्धत्यान्त्याक्ष- गुणकृतिधात ( तद्धत्यान्त्याक्षज्यावर्गघात ) · त्रिज्याकृतिस्वघृतिघातभक्त (त्रिज्यावर्गहृतिघातभक्त) चरज्या म्यादिति ।।१२।। अनोपपत्ति अज्या तद्धृति अग्रा प्रज्या 3अग्नी तथा त्रि '=चरज्या, अत्र चरज्याम्वरूपे धु अनाया उत्थापनात् अज्या तद्धृति अज्या_ग्रज्या तवृति. --चरज्या हति नि प्रये -अन्त्या चरज्यास्वरूपे धुज्याया धु अन्त्या अज्या' तदृति अज्या'. तद्धति अन्त्या उत्थापनात् =चरज्या वि हति त्रि m त्रि द्य. नि . हृनि त्रि % 3D नि हृति. अन्त्या एतेनोपपन्नमाचार्योक्तम् ।।१२।। भव पुन दो प्रकार से चरज्यानयन कहते हैं। हि भा -प्रक्षज्या दग और तति के घान को त्रिज्या और छु ज्या के घात से भाग देने से चरज्या होती है। प्रथवा तद्धति, प्रन्या और भक्षज्यावर्ग के घात में विज्यावर्ग पौर हृति के घात से भाग देने से चरज्या होती है ।।१२।। उपपति पप्रा मज्या -=चरज्या । परन्तु अज्या तदृति =प्रणा इससे चरज्या के स्वरूप में घ. त्रि प्रज्या त ति मना को उत्थापन देने से -चरज्या । हृति त्रि -प्रन्या । इति त्रि मस्या =यु इसमे पूर्वानीत घरज्या स्वरूप म घुज्या गो त्रिप्रश्नाधिकारः तद्धति त्रि हृति प्रज्या उत्थापन देने से अज्या. तद्ध ति. मन्त्या चरज्या इससे प्राचार्योक्त त्रि हति. त्रि प्रन्त्या उपपन्न हुभा ॥१२॥ इदानीमुपसंहारमाह । चरफ्लभानादीनां दिग्मात्र साधनानि कथितानि । निखिलानिन शवयाते पर्जन्यस्येव जलधाराः ॥१३॥ वि. भा --चरफलभानादीनां साधनानि मया दिग्मात्र कथितान्या- त्पूर्व कुज्यापलभा कान्तिज्या चरज्याऽग्रादीना यानि साधनानि मयाऽभिहितानि केवल दिग्दर्शनरूपाणि, निखिलानि (सम्पूर्णानि) कथयितु न शक्यन्ते, पर्जन्यस्य (मेघस्य) जलधारा इवार्थाद्यथा मेघस्य जलधाराया. सीमा नास्ति तथैवोपर्युक्त- विषयाणामपि नास्तीति ॥१३॥ इति वटेश्वरसिद्धान्ते त्रिप्रश्नाधिकारे स्वचराधज्याप्राणसाधनविधिः सप्तमोऽध्यायः समाप्त ॥ अब उपसहार कहते है। हि भा.-चर, पलभा और अग्रा प्रादियों के साधन दिग्मार अर्थात् दिग्दर्शन कप मे हमने कहा है उन सब के सम्पूर्ण विषयो को नहीं कह सकते हैं जैसे मेघ को जलधारा की सीमा नहीं है उसी तरह उन विषयो की भी सीमा नहीं है ।।१३॥ इति वटेश्वरसिद्धान्त मे विप्रश्नाधिकार में स्वचराधज्या. प्रारणसाधनविधि नामक सप्तम मध्याय समाप्त हुप्रा ॥
सप्तमोऽध्यायः प्राप्त अथ लातादिविधिः तत्रादौ निरक्षोदयसापनमाह । अज वृषमियुनान्तज्या मियुनान्तद्युग्यया हता भक्ताः । स्वरूपाज्ययाप्तधनुरन्तराणि लद्धोदयप्राणाः॥॥ वि भा --अजवृपमिथुनानज्या (मेपवृषमिथुनान्तराशिज्या) मिथुन। न्तराज्यया (परमाल्पाज्यया) इता (गुणिता ) स्वस्वा ज्यया भक्ता., धनुग्न्तराणि (प्राप्तफलाना चापान्योऽय शुद्धानि) तदा लड्रोदयप्राणा (लको दयासव ) भवन्नीति ॥२॥ अयोपपत्ति राश्यादिविन्दुयंदा निरक्षक्षितिजे समागच्छति ततो यावता कालेन राश्यन्त- बिन्दुस्तक्षितिजे समागच्छति स एव कालस्तद्राशेनिरक्षोदयासुरवाश्याद्य पति ध्र वप्रातवृत्त कार्य तथा राश्यन्तोपरि ध्र वप्रोतवृत्त कार्य तयोध्रवप्रोतवृत्त- योरन्नगतनाडीवृत्तीयचाप तद्राशेनिरक्षोदयासु प्रमाण तदानयन क्रियते । ध्रुव -ध्रुव । गो-गोल- सन्धि = मेपादि । मे= मेपान्तविन्दु । वृ=वृपा- न्त विन्दु । मि=मिथुनान्त गोमे=मेपान्तभुजाशा =३० । गोव-वृपान्तभु- ६० । गोमि=मि. थुनान्त भुजाशा =६०। धु गोन मेपोदयमानम् नच वृपोदयमानम् । चश =मियनोदयमानम् । ध्र मे गो =मेपान्ता ज्याचापम् । ध्र वृ=वृपान्तधुज्याचापम्। ध्र मिमिथुनान्ता चा-परमाल्पद्य ज्याचापम्। <घ्र गोमे-परमाल्पद्य ज्याशा. । मि श जाशा म चित्र न०१३ - निप्रश्नाधिकार ५३५ तदा ध्रुगोमे चापीयत्रिभुजेऽनुपात परमाल्पाज्याXएकराशिज्या मेषान्तद्य ज्या परमाल्पा ज्या. मेपान्तज्या --मेपनिरक्षोदयज्या। एक ध्रुगोवृचापीयत्रिभुजे कोणा- मेपान्ता ज्या नुपातेन परमाल्पा द्विराशिज्या परमाल्पा, वृपान्तज्या वृपान्तद्य वृपान्तद्य =ज्या (मेपोदय+वृपो- दय) अस्याश्चापम् =मेषोदय वृपोदय अत्र मेपोदयमानशोधनेन वृपोदयमान भवेत् । एवमेव परमाल्पद्य ज्या विपरमाल्पा, त्रि-त्रि-ज्या (मेपोदय+वृपोदय+ मिथुनान्ता परमाल्पा मिथुनो) अस्याश्चापम् -मेपोदय-वृषोदय+मिथुनोदय अत्र मेपोदय+वृपोदय शोधनेन मिथुनोदय प्रमाण भवेदेतेनाचार्योक्तमुपपद्यते॥ भास्कराचार्येणापि सिद्धान्तशिरोमणो "मेपादिजीवास्त्रिगृहय मोा चरणा हृता स्वस्वदिनज्ययाप्ता । चापीकृता प्राग्वदधोविशुद्धा मेपादिकानामुदयासको वा" इत्यनेनेत्थमेव मेपादिराशीना निरक्षोदय (लकोदय) मानानि साधितानि सूर्यसिद्धान्तेऽपि त्रिभद्य कर्णार्धगुण स्वाहोगनार्धभाजिता., इत्यादिनेत्थमेव राशीना निरक्षोदयमानसाधनमभिहितमस्तीति ।।१।। अव लग्नादिविधि नामक अभ्याय प्रारम्भ किया जाता है उसमे पहले राशियो के निरक्षरोदय मान के साधन कहते हैं। हिमा-मेवान्तज्या, वृपान्तल्या और मिथुनान्नग्या को मिथुनान्ता ज्या (परमाल्प- धुज्या) रो गुणकर अपनी प्रपनी धुज्या में भाग देकर जो फल हो उनके चाप को मधोऽध शुद्ध करने से उन राशियो के लड्रोदयासु मान होते हैं ॥१॥ उपपत्ति उपर दिये चित्र को देखिये। ध्रुव - ध्रुव । गा-गोलसन्धि = मेपादि। मे=मैपान्त विन्दु । वृ=वृपान्त बिन्दु । मिमिधुनान्तयिन्दु। गोम- मेपान्तभुजाय-३०, गोवृ=वृपा. न्तभुजारा-१०, गोमि=मिधुनान्तमुजाश=to, गोन-मेपनिरक्षोदयमानच-वृपनिर. क्षोदयमान, चशमियुननिरक्षोरममान । ध्र मे-मेपान्तदुज्याचाप प्रवृ=वपान्ताज्यावाप ध्र मिमियुनान्ताग्याचाप-परमाल्पाज्याचाप<घ्र गोमेपरमाल्पाग्यास । घगोमे चापोप त्रिभुज मे कोणानुपात में परमाल्यधुण्या एरराशिग्या_परमालपा भेषान्तज्या मपान्तद्यु मेषान्ता मेपनिरोदयग्या । इसके चाप वरने मे मेपनिरपोदय मान हाता है। इसी तरह प्र गोव- पापीय त्रिभुज मे योणानुपात मे परमाल्पा द्विरागिज्या_परमाल्पा युपान्तण्या पान्त यूपान्तद्यु (मेपोदय+वृषोदय) इसके चाप परने मे मेपोस+वृषोदय इगम मेषोदय घटाने में योदय ग्या ५३६ वटेश्वर-सिद्धान्ते परमात्मा नि =त्रिज्या होता है । एव घ्र गोमिचापीय त्रिभुज म पोरणानुपात में पतमाल्पा (मेषोदय+वृपोदय+मियुनोदय) चाप करने से मेपोदय + वृषोदय +मियुनोदय इसमे मैपो. दय+वृपोदय घटाने से मिथुनोदयमान होता है इससे प्राचार्योक्त पद्यु उपपन्न होता है । सिद्धान्तशिरोमणि में भास्कराचार्य भी 'मपादिजीवाषिगृह घुमौर्या सुण्णा हृता स्वस्वदिन ज्ययाप्ता" इत्यादि मे इसी तरह मेषादि रागियो के निरक्षोदयमान साधन किया है । मूर्यसिद्धात मे भी 'त्रिभाकर्णाधंगुणा स्वहोरात्राधभाजिता' इत्यादि से इमी तरह राशियो के निरसोदयमान के माधन किये हैं ॥१॥ इदानी पुना राशीना निरक्षोदयसाधनमाह । क्रान्तिज्या राशिज्या कृतिविवरपर्हता त्रिभज्याप्ताः । स्वाज्ययाऽतधनुषो विवराण्यथवा निरक्षराश्युदयाः ॥२॥ वि भा-त्रिभज्या (निज्या) क्रान्तिज्या राशिज्या कृतिविवरपदै (स्वस्व. क्रान्तिज्याराशिभुजाशज्योर्वन्तिरमूलै ) हता (गुरिणता) स्वाज्ययाभप्ता (स्वस्वाज्यया भक्ता) प्राप्तधनुपो विवराणि (प्राप्तफलचापानामन्तराणि) अथवा निरक्षराश्युदया (लकोदया) भवन्तीति ।।२।। अनोपपत्ति । प्रय मेपान्तोपरिगतध्रुवप्रोतवृत्ते मेपान्तानाडीवृत्त यावन्मेपान्तक्रान्ति- भुंज एको भुज । गोलसन्धितो मेपाना यावन्मेपान्तभुजाशा को द्वितीयो भुज । नाडीवृत्ते मेपान्तविपुवाशा (मेपनिरक्षोदया) कोटिस्तृतीयो भुज इति भुजकर्ण कोटिभिरुत्पन्नस्य चापीयजात्यविभुजस्य ज्याक्षेवबन्धन क्रियते । भूकेन्द्राद्गोल- सन्धिगता रेखा कार्या तदुपरि मेपान्नाल्लम्ब कार्य सा मेपान्तज्या (मेपान्तभुज ज्या) । तया भूकेन्द्राद् ध्रुवप्नोतवृत्तनाडीवृत्तयोर्योगगता रेखा कार्या, तदुपरि मेपान्ता. ल्लम्ब कार्य मा मेषान्तक्रान्तिज्या, एतयो (मेषान्तज्या-मेपान्तकान्तिज्ययो- म् लगता रेखा कार्या सा नाडीवृत्तधरातलगता, क्रान्तिज्यायो नाडीवृत्तघरातलो. परिलम्बस्वात्तद्रे खोपर्यपि लम्बत्वमतो मेपान्तज्या-मेपान्तकान्तिज्या तन्मूलगत- रेखाभिर्यज्जात्यत्रिभुज जात तदेव पूर्वोक्तचापीयजात्यत्रिभुजस्य ज्याक्षेत्र भवि- तुमर्हति । परमत्र त्रिभुजे भेषान्तज्या-मेपान्तकान्तिज्ये मेपान्तभुजाशतत्क्रान्त्यश- योस्पेि, तन्मूलगता रेखा विपुवाशचापस्य ज्या नास्ति, विपुवाराज्या तु गोल. सन्धिगतरेखोपरि मेपान्तगतध्रुवप्रोतवृत्त नाडीवृत्तयो सम्पाताल्लम्बम्पा रेखा- ऽस्ति । क्रान्तिज्यामूलाद् भकेन्द्र यावद्रे सा धुज्याऽस्ति । मेपान्तज्या-तत्क्रान्तिज्य- यो लगता रेखा गोलसन्धिंगतरेस्रोपरिलम्वरूपाऽस्ति । मेपानानाडोवृत्तघरातलो- परि कान्तिज्यायालम्बत्वसिद्धकरणनियमेन, एतावता मजातोय विभुजद्वय जागते भूकेन्द्राद्धृवप्रोतवृत्तनाडीवृत्तसम्पातगता रेखा विज्यावण एको भुज ! ध्रुवप्रोतवृत्तनाडीवृत्तसम्पातागोलसन्धिगतरेम्बोपरि लम्बो विपुवाशज्या भुजो त्रिप्रश्नाधिकारः ५६७ 3D पद्यु त्रि. पद्यु %- द्वितीयो भुज.। विपुवाशज्या मूलाद् भूकेन्द्र यावद्विषुवांशकोटिज्या कोटिस्तृतीयो भुजः, इति कर्णभुजकोटिभिरुत्पन्नमेकं त्रिभुजम् । तथा क्रान्तिज्यामूलाद् भकेन्द्र यावा ज्या कर्ण एको भुजः । मेपान्तज्या-तत्क्रान्तिज्ययोर्मुलगता रेखा भुजो द्विती- यो भुजः । मेपान्तज्यामूलाद् भूकेन्द्र यावत्कोटिस्तृतीयो भुज । इति कर्णभुजकोटि- भिरुत्पन्न द्वितीयं त्रिभुजम् । एतयोः साजात्यादनुपात. क्रियते मेपान्यद्य ज्यया यदि बद्धरेखा लभ्यते तदा त्रिज्यया कि समागच्छति मेषान्तविपुवागज्या (मेपनि- रक्षोदयज्या) बद्धरेखा. त्रि मेपान्तद्यु त्रि /मेपान्तज्या-मेपान्तक्राज्या' अस्याश्चाप तदा मेषनिरक्षोदयमानम् । एव मेधु त्रि Vवृषान्तज्या-वृपान्तक्राज्या' =वृपान्तविपुवाशज्या ज्या (मेपो. वृपान्तद्यु दय+वृपोदय) चापकरणेन मेपोदय + वृषोदय अत्र मेपोदयशोधनेन वृपोदयमान त्रि त्रि भवेत् । एवमेव मिथुनान्तद्यु Vमिथुनान्तज्या-मिथुनान्तक्राज्या'= त्रि-परमकाज्या' =' त्रिज्या (मेपोदय+वृउ + मिउ) चापकर- पद्यु ऐन मेपोदय + वृपोदय+मिथुनोदय अत्र मेपोदय+वृपोदय शोधनेन मिथुनोदय- मान भवेदिति ॥ पूर्वप्रदर्शितचापीयजात्यत्रिभुजस्य ज्याक्षेत्रवन्धनेन सिद्ध यत्कस्यापि चापीयजात्यक्षेत्रस्य ज्याक्षेत्रे कर्णचापस्य ज्या सर्वदा वास्तवा भवति भुजकोटिचापयोरेकस्यापि ज्या वास्तवा भवति तदितरस्य चापस्य ज्या वास्तवा न भवति किन्तु यस्य चापस्य ज्या वास्तवा तच्चापकोटि व्यासार्धवृत्ते परिणता भवति यथोपरि प्रदर्शितचापीयजात्यत्रिभुजस्य ज्याक्षत्रे मेपान्तज्या कर्णचाप- ज्या वास्तववास्ति मेपान्तक्रान्तिचापस्यापि ज्या वास्तवास्ति किन्तु मेपान्तविपु- वांशचापज्या वास्तवा नास्ति किन्तु मेपान्तक्रान्तिकोटिव्यासार्धवृत्ते (युज्या- वृत्त) परिणताऽस्ति तेन सा विज्या वृत्ते परिणमनेन वास्तव विपुवाशज्या (निर- क्षोदयज्या) भवतीति ॥२॥ प्रत्र पुन राशियो के निरसोदयमानानयन कहते हैं । ह.भा.- प्रिज्या को अपनी अपनी राशि भुजग्या और क्रान्तिज्या के वर्गान्तरमूल गुणकर अपनी अपनी युज्या से भाग देकर जो फल हो उनके चापो के प्रधोऽध शुद्ध करने मे निरक्षदेशीय राश्युदय मान होते हैं ।।२।। उपपत्ति मेषान्तो परिगत घ्र व प्रोतवृत्त मे मेपान्त से नाडीवृत्त तक मैपाल क्रान्ति भुज एक भुज मेपान्त भुजारा वणं द्वितीय मुज । नाडी वृत्त मे मेषान्त विपुवाश (मेपनिरक्षोदय) से घरातल के ५३८ वटेश्वर-सिद्धान्ते कोटि तृतीय भुज, इन भुज करणं और योटि से उत्पन्न चापीय जात्य विभुज वे ज्याक्षेत्र परत हैं। भूकेन्द्र से गोल सन्धिगत रेखा करता उमरे कार मेपान्त से जो सम्परेखा होती है वह मेपान्तज्या है । भूकेन्द्र में घप प्रोत वृत नाडीवृत वे मम्मात में रेखालाना उमके कपर मेषान्त से जो लम्व रेसा होती है वह मेपान्त झान्निग्या है । इन दोनो (मेषान्तज्या और मेपान्त क्रान्तिग्या) की भूलगत रेखा (घद्धरेखा ) नाडीवृत घरातलगत है । क्रान्तिप्पा नाही- वृत्त धरातल के ऊपर लम्व है इसलिये इस बद्ध रेखा के पर भी क्रान्तिभ्या लम्ब होगी प्रत मेपान्तज्या-मेषान्त क्रान्तिज्या और बद रेखाग्रा में जो जात्य त्रिभुज हा है वही पूर्वोक्त चापीय जात्य विमुज का ज्याक्षेत्र हुा। लेकिन इस विमुज में मेपान्तज्या और मेषान्त- क्रान्तिग्या क्रमा मेपान्तमुजाराज्या पोर मेपाल क्रान्तिचाप को ज्या है पर वद्ध रेसा विपु- वारा चाप की ज्या नहीं है, क्याकि गोलमन्धिगत रेखा के ऊपर नाडीवृत्त ध्रुव प्रोत वृत्त मम्पात से जो लम्बरेखा होगी वही विपुवागज्या है । क्रान्निग्या के मूल मे भूवेन्द्र पर्यन्त रेसा धुज्या है । बद्धरेखा गोल सन्धिगत रेखा अपर लम्व है मेपान्त से नाडो वृत्त ऊपर क्रान्तिज्या के लम्बत्वकरण नियम से, अव दो त्रिभुज बनते हैं, भूवेन्द्र से नाडीवृत्त प्रार ध्रुव प्रोत वृत्त सम्पातगत विज्या रेसा कर्म भुज । विपुवाराज्या भुज द्वितीयभुज, विषुवाराज्या मूल से भूवेन्द्र तक विपुवारा कोटिल्या कोटिनृतीय भुज इन करणंमुज और कोटि से एक त्रिभुज बना । तथा क्रान्तिच्या मूल मे भूकेन्द्र तब शु ज्या कर्ण एक मुज, बद्ध रेखा भुज द्वितीयमुज । मेयान्तज्या मूल से भूकेन्द्र तक कोटि तृतीय भुज, इन कर्णभुज और कोटि से उत्पन द्वितीय त्रिभुज हुमा । इन दोनो त्रिभुजो के सजातीय होने के कारण अनुपात करते हैं यदि मेपान्त | ज्या म बद्धरेखा पाते है तो त्रिज्या म क्या इस अनुपात से मैपान्त विषुवाराज्या (मेपनिरक्षोदयज्या) पाती हैं । वडरेखा त्रि मषान्तद्य Vमेपान्तज्या--मपान्तनाज्या' इसके चाप करने से मेपनिरक्षो मेद्य त्रि दयमान होता है। एव- वृपा तद्यु Vवृषानज्या-पान्तक्राग्या' वृणन्न नि:- ज्या (मेषान्त+पोदय) चाप करने से मेपोदय+वृपोदय इसम मेपोदय को घटाने मे वृपोदय नि मान होता है । इसी तरह त्रि /मिन्तज्या-मियुन माज्या': मिथुनान्तद्यु पद्य त्रि-परमकाज्या' = पद्यु =त्रिज्या (मव+उ+मिउ) चाप परले से मेउ पद्य +उ+मिउ इसमे मेउ+वउ घटाने से मिथुनोदयमान होता है पूर्व प्रदर्मित चापीय जात्य त्रिभुज के ज्या क्षेत्र देखने से सिद्ध होता है कि क्सिी चापीय जात्यक्षेत्र के ज्याक्षत्र मे कणं चार की ज्या सर्वदा वास्तविक होती है । मुज और वोटिदाप में एक की ज्या वास्तव होती है इतरचाप की ज्या वास्तव नही होती है किन्तु जिस चाप की ज्या वास्तविक होती है उस चाप के कोटि व्यासार्ध वृत्त । परिणत होती है, जैसे पूर्व प्रदर्शित चापीय जात्य त्रिभुज के ज्याक्षेत्र में मेपान्तज्या वर्णनापज्या वास्तव है, मेषान्तान्ति चाप की ज्या भी वास्तव %E त्रिप्रश्नाधिकार. ५३६ है लेकिन मेपान्त विपुवाशचापज्या वास्तव नहीं है किन्तु मेपान्तकान्ति कोटिव्यासाचं वृत्त मे (धु ज्यावृत्त मे) परिणत है इसलिये उसको त्रिज्यावृत्त मे परिणामन करने से वास्तव विपुवांशज्या (निरक्षोदयज्या) होती है ॥२॥ पुनस्तदानयनमाह। मेषातिक्रान्तिज्या ज्यायोगहतात्तदन्तरान्मूलम् । त्रिज्यागुणं घुजीवाऽवाप्तचापान्तराण्ययवा ।।३।। वाजादिक्रान्तिज्या ज्यायोगहतात्तदन्तरान्निन्नात् । त्रिज्याकृत्या धुज्याकृत्याप्तपदधनुरन्तराण्ययवा ॥४॥ वि.मा.--अथवा मेपान्तकान्तिज्यायोगहतात्तदन्तरात् (मेपादिराशि क्रान्तिज्यातद्भुजज्ययोर्योगगुणितात्तदन्तरात् (मेपादिराशिक्रान्तिज्यातद्भुजज्य- योरन्तरात्) मूल विज्यागुण (विज्यागुरिणत) धु जीवाऽवाप्त चापान्तराणि (ध - ज्याविभक्त सद्यानि फलानि तच्चापान्तरारिण) मेपादिराशीना निरक्षोदयमानानि भवन्तीति ॥३॥ अथवा मेषादिक्रान्तिज्या ज्यायोगहतात्तदन्तरात् (मेपादिराशिकान्ति- ज्या तद्भुजज्ययोर्योगगुणितात्तदन्त रात्) त्रिज्याकृत्या (त्रिज्यावर्गण) निनात् (गुरिणतात) धु ज्याकृत्याप्तपदधनुरन्तराणि (धु ज्यावर्गभक्ताद्यानि फलानि तच्चा- पान्तराणि, मेपादिराशीना निरक्षोदयमानानि भवन्तीति ॥४॥ अनोपपत्ति । त्रि पूर्व द्वितीयश्लोकोपपत्तिसिद्धस्वरूपम् Vमेपान्तज्या-मेकाज्या मेय. =मेनिरक्षोदयज्या= छि त्रि मद्य V(मेषान्तज्या+मेकाज्या) (मेपान्तज्या-मेकाज्या एव त्रि वृद्य /(वृपान्तज्या+वृक्राज्या) (वृपान्तज्या-वृक्राज्या) ज्या (मेनिउ+ त्रि वृनिउ) एवमेव मिद्य, (मिथुनान्तज्या+पक्राज्या) (मिथुनान्तज्या--पक्राज्या) D पद्य नि -V(त्रिपक्राज्या) (त्रि-पाज्या) =ज्या (मेनिउ+ वृतिउ+मिनिउ) एतेपा चापान्यधोऽध. गुद्धानि तदा मेवादिराशीनां निरक्षोदयमानानि भवन्तीति ॥३॥ नि अथवा मा (मपान्तज्या --मेकाज्या') =मेनिरक्षोदयज्या' मूलन
वटेश्वर-सिद्धान्ते
Vनि' (मेषान्तज्या --मेवाज्या' वर्गान्तरस्य योगान्तरघातसमत्वात्
मेधु'
नि' (मेपान्तज्या+मेवाज्या) (मेपान्तज्या-मेकाज्या)
मेधु
=मेपनिरक्षोदयज्या
1 नि (वृषान्तज्या + वृक्राज्या) (वृपान्तज्या-वक्राज्या)
वृद्य'
=ज्या (मेपनिरक्षोदय + निरक्षोदय)
एवमेव । त्रि {नि+परमकाज्या) (नि-पक्राज्या}=
पद्य
ज्या (मेनिरक्षोदय+ वृनिरक्षोदय+मिनिरक्षोदय)
एषा चापान्यधोऽध शुद्धानि नदा मेपादिराशीना निरक्षोदयमानानि
भवन्तीति ॥४॥
हि भा --अथवा मेषादि राशिया की क्रान्तिज्या और भुजण्या के योग से उन्ही के
अन्तर को गुणकर मूल लेना उनको त्रिज्या से गुणकर अपनी अपनी धु ज्या से भाग देने स
जो फल पावे उनके चाप को अधोऽध शुद्ध करने में मेपादि राशियो के निरक्षोदय मान
होते हैं ॥३॥
अथवा मेषादि राशियो की भुजज्या और क्रान्तिज्यो के योगान्तर घात को त्रिज्या
वर्ग से गुणकर अपने अपने छु ज्या वग में भाग देकर जो पल हो उनके मनो के चापो को
मघोऽध शुद्ध करने में उनके निरक्षोदयमान होते हैं ॥४॥
उपपत्ति ।
वि
पहले के दूसरे श्लोक की उपपत्ति मसिद्ध स्वम्प समपान्तज्यो'-मकाज्या-
मैद्य
-V(मेषान्तज्या+मकाज्या) (मेपानग्या-मेक्राज्या) =मनिरक्षोदयज्या एवं
मेद्य
-Vवृषानज्या+वृक्राज्या) (वृपानज्या-ज्या)-ज्या (मनिउ+ वृनिउ)इमी नरद
प.। (मिथुनान्नज्या+परणाग्या} (मिनान्तज्या-परक्राज्या)
त्रि
Vi+पाग्या) {-पक्काज्या) =ज्या (मनिउन वृनिउ-+-मिनिउ)
पयु
इन सब के चाप कर पयोष गुद्ध करने में मेषादि रागिय के निरमोदय मान
होते हैं ॥३॥
विप्रश्नाधिकारः ५४१ अथव त्रि' (मेपान्तज्या'-मेकाज्या')=मेनिरक्षोदयज्या' वर्गान्तर के योगान्तर घात के वरा- मेद्य वर होने से त्रि' (मेषान्तज्या+मेलाज्या)(मेपान्तज्या-मेकाज्या)=मेनिरक्षोदज्या' मंदा २ मूल लेने मे V त्रि' (मेषान्तज्या+ मूक्राज्या( (मेषान्तज्पा--मेकाज्या)= मेनिरक्षोदयज्या इसी तरह मेद्य, V त्रि' (वृपान्तज्या+वृक्राज्या) (वृपान्तज्या-वृक्राज्या) वृद्य ज्या (मेनिरक्षोदय+वृनिरक्षोदय) इसी तरह Vत्रि' (त्रि+पक्राज्या) (त्रि-पक्राज्या) पद्यु ज्या (मेनिरक्षोदय + वृनिरक्षोदय+मिनिरक्षोदय) इन सब के चाप करने मे और अयोऽध शुद्ध करने से मेपादि राशित्रय के निरक्षो- दय मान होते हैं ॥४॥ अथ निष्पन्नास्तानमूनाह । ते चाडागागभुवो १६७६ऽङ्गगोगशशिनः १७६६ शराज्निगोचन्द्राः१९३५ । व्यस्तास्तथा चरदलोनयुता निजधाम्नि पट्सु चोकमतः॥५॥ निजसप्तम उदयासुभिरस्तं राशि समेति नियमेन । लकोदयासुभि स्वर्याम्योत्तरवृत्तमायाति ॥६॥ वि भा.--ते च पूर्वोक्तप्रकारेण समागता निरक्षादयासव एतावन्तः श्लोकोक्ता भवन्ति । शेप स्पष्टमिति ॥५.६।। अत्रोपपत्ति । स्वदेशनिरक्षदेशाऊदयान्तर चरम् । मेपादिस्त स्वदेशे निरक्षच समकाल- मुदेति पर मेपान्तविन्दु पूर्व स्वक्षितिजे तत पश्चादुन्मण्डले लगति । तेन चरख- ण्डोनो निरक्षमेपोदयः स्वदशीयमेपोदयो भवेत् । एव वृपमिथुनोदयोरपि भवति । किन्तु कादौ चरखण्डानामपचीयमानत्वाद्धन भवति । तुलादावुन्मण्डलस्य स्व- क्षितिजादध स्थितत्वाच्चरखण्डानि धनानि भवन्ति । मकरादौ हि चरखण्डानाम- पचीयमानत्वादृणानि भवन्तीति सर्व बुद्धिमता गोलोपरि ज्ञेयमिनि ।। हि. मा-पूर्वोत प्रकार मे मेपादि रागियो वे जो निरशोदयामु प्रमाण पाये है वे श्लोक यथित वे अनुमार हैं । शेर यात स्पष्ट है ।।५-६।।
वटेश्वर सिद्धान्ते . उपपत्ति स्वदेशार्कोदय और निरक्षदशार्कोदय के अन्तर घर है। मेप्रादि अपने देश और निरसदेश म एक ही समय म उदित होती है। लेकिन मेपान्त विन्दु पहले अपने सितिज म उदित होता है उसके वाद उमण्डल में इसलिये निरक्षदेशीय मेपोदय म चरखण्डा घटाने से स्वदेशीय मेपोदयमान होता है । इसी तरह वृप और मिथुन का भी समझना चाहिये । लेकिन बर्यादि मे चरखण्डा के अपचीयमानत्व के कारण धन होते हैं। तुलादिया में अपने भितिज से उमण्डल के नीचा होने के कारण चरखण्ड धन होते हैं। मकरादियो में चरखण्ड के अपचीयमानत्व के कारण ऋण होते हैं । ये मब बातें गोल क ऊपर स्वयं समझनी चाहिए ॥५६॥ इदानी पूर्वानीत स्वदेशीयराश्युदयमानलंग्नानयनमाह । धगतादिवा विलग्न निशिषड्भयुताद्रवे साध्यम् । भोग्यात्तात्कालिकरविभवनागतकलागुरिणता ॥७ ।। स्वोदयकाला विमता राशिकलाभि फलाऽसवोऽसुम्य । प्रोोट भ्यो मोग्य क्षिपेद्रयौ तदनु यावन्त ॥८॥ शुद्धचन्त्युदया राशीन क्षिपेद्रवो तावतोऽवशेष च । खगुणप्रमशुद्धोदयहृद्भागादौ क्षिपेद्विलग्न प्राक् ॥ ६ ॥ विभा-दिवा (दिवसे) द्य गतात् (दिनगतकालात्) लग्नानयन कार्य, निशि (रातो) पड्भयुताद्रवे (भाधयुक्तरवित ) लग्न साध्यम् । भोग्यात् (यस्मि निष्टकाले लग्नसाधनमभीष्ट तस्मिन् काले तात्कालिक रवि प्रसाध्य रव्याकान्त राशेर्नोग्याशात्) लग्न साध्यते । स्वोदयकाला (रव्यानान्तराशेरुदयासव ) रवि भवनागतकला मुणिता (रव्याान्तिराशेर्नोग्यक्लाभिषु गिना राशिकलाभि (अष्टादशशतकलाभि) विभक्ता फलाऽसव ( फल रव्यानान्तराशे ग्यासको भवन्ति ) तेऽसव इष्ट भ्योऽसुभ्य (इष्टकालेभ्य ) प्रोह्य भोग्य (भोग्याशमान) रवी क्षिपेत् (योजयेत्) तदनु (पश्चात्) यावन्तो राश्युदया शुद्धयन्ति ते सोध्या तावतो राशीन् रखो क्षिपेत् (यावन्तो राक्ष्युदया शुद्धास्तपा राश्युदयाना सख्या पूर्व रवी क्षिपेत्) अवशेष खगुणन (त्रिंशता गुरिणत ) अशुद्धोदयहृत् (अशुद्धराश्युदय- प्रमाणेन भक्त) फलमशात्मक रखो भागादी (अ शादो) क्षिपेत्तदा प्राव (प्रथम) विलग्न (प्रथमलग्नं ) भवदिति ।।७-६।। अनोपपत्ति । प्रयोदयक्षितिजकान्तिवृत्तयो सम्पातबिन्दुलंग्नमुच्यते तज्ज्ञानार्थमिष्टकाल तात्कालिवरथ्यो प्रयोजन भवत्यर्थाद्वर्तमानरपोएकालयोनिन तज्ज्ञान भवितु इति । रविभोग्यासु लग्नभुक्तासु रविलग्नान्तरालोदयासूना योगरूपमेवेष्टकाल- पानम् । अत्रेकाले यदि वर्तमानरवे ग्यासुप्रमाण शोध्यते तदालग्नमुक्तासु रवि- त्रिप्रश्नाधिकारः लग्नान्तरालोदयप्रमाणयोर्योगोऽवशिप्यतेऽतो वर्तमानरवे (तात्कालिकरवे ) भोग्यासु प्रमाणमानीयते तत्रानुपातो यदि राशिकलाभिस्तात्कालिकरव्याक्रान्त- राश्युदयाऽसवो लभ्यन्ते तदा तात्कालिकरविभोग्यकलाभि किमित्यनुपातेन समागच्छति तात्कालिकरविभोग्यासवस्तत्स्वरूपम् == राश्युदयासु रविभोग्यकला राशिकला एव समागत रविभोग्यासु प्रमारणमिष्टकाले शोध्य तदा लग्नभुक्तासु रविलग्ना- न्तरालोदयासु प्रमाणयोर्योगोऽवशिष्यते । खावपि भोग्याशान् क्षिप्वा वर्तमान- राति पूरयेत् । तथाऽधुनाऽऽनीतलग्नभुक्तासु रविलग्नान्तरालोदयासु योगे रवि. लग्नान्तरालोदयासव शोध्या (शेपादर्थादिष्टकाले रविभोग्यासु शोधने य शेपस्त- स्मादुत्तरान् राश्युदयाश्च शोधयेत्, यावन्तो राश्युदया शोधितास्तेपा शोधिताना राश्युदयाना सख्या पूर्वरवी क्षिपेत् । ततोऽनुपातो यद्यशुद्धोदयासुभिस्त्रि शदशा लभ्यन्ते तदा शेपासुभि किकित्यनुपातेन यदशात्मक फल तद्रवो देय तदा राश्यादिक लग्न भवेदिति परमितिलग्नानयन न समीचीन "क्षेत्राणा स्थूलत्वात्स्थूला उदया भवन्ति राशीनामि' त्याद्यक्ते राश्युदयमानम्याममीचीनत्वात्तत्सम्बन्वेन साधि- ताऽन्यविपयस्याप्यसमीचीनत्वमेवाऽन एतस्याऽचार्यस्याऽन्येपामपि प्राचीना- चार्यारणा यल्लग्नानयन तत्र समीचीनम् ॥ सिद्धान्तशिरोमणेष्टिप्पण्या "या सायनार्कस्य भुजज्यका सेत्या" त्यादिना लग्नानयन सशोधकेन कृतमस्ति तत्र श्रुटिमवलोक्य म म पण्डित मुधाकरद्विवेदिना तदानयन कृत, तदानयन- प्रकार- आकागमध्यविषुवाशवशात्प्रकुर्याद्यष्टि दिवाकरमत्र मकोटिभागान् । यष्टि जिनाशजगुण विपुवाशक च स्वाक्षाढय हीनदिनभागमित क्रमेण ।। सौम्यानुदग्गोलगते प्रकल्प्य साध्यो भुजाशोऽथ भुजारारन्यो । युतेर्मित सायनलग्नमान भवेत्स्फुट गोलविदा वुधानाम् ।। सिद्धान्तशिरोमणेप्टिप्पण्या चन्द्रदेवशास्त्रियोऽपि लग्नानयनमस्ति परन्तु तत्सर्वापेक्षया सुधाकरद्विवेदिनामेव तदानयन समीचीनमस्ति । एतद्विपये विगे. पज्ञानार्थं मत्कृत लग्नानयन विलोक्य तक पूर्वाचार्यकृतलग्नानयनक्रियापेक्षया किया लाघवमुत गौरवमित्यादि तदानयन (लग्नानयन) चमत्कृतिरपि द्रव्या विवेचरिति ॥७॥ हि.भा-दिन में दिनगतकाल मे और रात्रि म छ राशि जोडकर लग्नानयन धरना चाहिये । वत्त मान रवि की भोग्यक्ला को वर्तमान रवि राशि के स्वोदयास से गुग्णकर राशिकला से भाग देने से रवि यो भोग्यागु होती है, इस भोग्याग प्रमाण को दृष्टामु (इष्ट- माल) मे घटा कर भोग्याग को रवि म जोड देना चाहिए। इसके बाद मेष में (इष्टकाल में रवि भोग्यागु घटाने गे जो शेष रहा है, जिसने राश्युदयमान पटे पटा देना, निम रानि का लदयमान नहीं पटैगा उसका नाम 'पद्धोदय' है, जितने रायुदयमान पटे हैं उन रास्युदयो सी मम्या यो पूर्व रवि में जोड देशा, शेष 'इष्टामु मे रविभोग्यागु और राइयुदय मानों को वटेश्वर सिद्धान्ते भागादि घटाने से जो दोष रहा है) को तीस से गुणवर अशुद्धोदय से भाग देने जो (भशादि) पल होता है उसको रवि में जोडने से प्रथम लग्न होता है ||६|| उपपत्ति । उदयक्षितिज और फ्रान्ति वृत्त के सम्पात विन्दु को लग्न कहते हैं, इसका साधन इटकाल और रवि के ज्ञान से किया जाता है, रविभोग्यासु, सग्नमुक्तासु पोर रवि, लग्न के बीच मे जो राशिया हैं उनके उदयमानासु इन सब के योग रूप ही इष्टवाल है, इस इष्ट- काल मे यदि रवि भोग्यासु प्रमाण घटा दिया जाय तो लग्नमुक्तासु और रवि लग्नान्तरा- लोदय का योग रहेगा इमलिए रवि भुक्तासु प्रमाण अनुपात से लाते हैं । यदि राशिकसा मे घर्तमान रवि राश्युदयासु पाते हैं तो वर्तमान रवि भोग्यकला मे क्या इम अनुपात से वत्त- मान रविभोग्यासु प्रमाण प्राता है वर्तमान रवि राश्युदयामु रविभोग्यक =वर्तमान राशिकला रवि भोग्यासु । इसको इष्टासु म घटाने से जो शेष रहता है उसका नाम दोष रखते हैं । रगि म भोग्या को भी जोडकर वर्तमान राशि को पूरा करना। पानीत शेप मे वत्तमान रवि राशि के बाद जिन राशियो के उदयमान घटे उन्हे घटा देना, शेष का नाम शेषासु रखना जिरा राशि का उदयमान नहीं घटे उसका नाम 'अशुद्धोदय' रखना, जितनी राशियो के उदयमान घटे हैं उनको सख्या पूर्व रवि में जोड देना, तव अनुपात करते हैं यदि प्रसुद्धो. दयासु मे तीस अश पाते हैं तो शेषासु मे क्या इस अनुपात से जो अशात्मक फ्ल मावे उसको रवि मे जोड देने से राश्यादिक लग्न प्रमाण होता है । लेकिन यह लग्नानयन ठीच नहीं हैं "क्षेत्राणा स्थूलत्वात्स्थूला उदया भवन्ति राशीनाम्" इत्यादि वचन प्रमाण से राशियो के उदयमानो की असमीनता के कारण उसके सम्बन्ध से जो अन्य विषय साधित होंगे वे भी मसमीचीन होंगे इसलिए इन आचार्य का तथा अन्य प्राचीनाचार्यों का लग्नानयन ममीचीन नहीं है, अन्य प्राचीनाचार्यों ने भी उदयमान ही के सम्बन्ध से लग्नानयन किया हैं। सिद्धान्तशिरोमणि की टिप्पणी मे "या सायनाकस्य भुजज्यवा सा" इत्यादि से लग्नानयन सशोधन किया हुआ है उसमे कुछ त्रुटि देखकर म म पण्डित सुधाकर द्विवेदी ने उसका मानयन किया है, उनका मानयन प्रकार अधोलिखित है- "माकाशमध्य विषुवादावशात्प्रकुर्याद्यष्टि दिवाकरमपकमकोटिभागान् ।" इत्यादि सिद्धान्तशिरोमणि वे टिप्पणी मे चन्द्रदेव शास्त्री का भी लग्नानयन है परन्तु उन सब की अपेक्षा द्विवेदी जी का लानानयन समीचीन है । लग्नानयन में विशेष बातो के ज्ञान के लिए हमारा 'लग्नानयन' देखना चाहिये, पूर्वकृत लग्नानयन में जो क्रियायें हैं उनकी प्रपेक्षा हमारे लग्नानयन में क्रियासूक्ष्मता या क्रियागौरव, चमत्कार इत्यादि विवेचको को देखना चाहिए ।। ७६॥ इदानी लग्नाविष्टकालानयनमाह । लग्नाकंयोगंतच्या मंशा निजभोदया हता भक्ताः। खगुगस्तदन्तरालोदयमिधा इटाऽसवोासकृत् ॥१०।। .
त्रिप्रभाधिकार ५४५ व भा -लग्नाऽर्कयो (लग्नरच्यो ) गतेप्या अशा (भुक्ताशा भाग्याशाश्च) निजभोदयाहता (रव्याक्रान्तराशिस्वदेशोदयगुणिता ) सगुण (निशद्धि ) भक्ता स्तदा लग्नस्य मुक्तासवो रवे ग्यासवो भवन्ति, एतयोर्योगमध्ये, अन्तरालोदयमिश्रा (रविलग्नयोर्मध्ये यावन्तोराशयस्तदुदया योज्या) तदाऽसकृदिष्टासवो भवन्तीति॥१०!! अत्रोपपत्ति यस्मिन् राशौ रविवर्तते तस्य ये भोग्याशा (भुक्ताशाग्रतो राश्यन्त यावत्) तेभ्योऽनुपातेन यदि त्रिंशदर्श रव्याक्रान्त राशे स्वदेशोदयासत्रा लभ्यन्ते तदा रवि. भोग्याश के" अनेन समागच्छन्ति रविभोग्याशा । एव लग्नभुक्ताशवशतोऽन्य नुपातेन लग्नभुक्तासवो भवन्ति तथा रवेरातो लग्नापूर्व रविलग्नयोर्मध्ये येऽसवइति याणा (विभोग्यासु लग्नभुक्ता रविलग्नान्तरालोदयासूना) योगे फतेऽभीष्टकाल स्यात् ।। अय वालस्तात्कालिक रविशादस कृत्साधित सूक्ष्मोऽन्यथा स्थूल भास्क राचार्येणापि “अर्कस्य भोग्यस्तनुभुक्तयुक्तो मध्योदयाद य समयो विलग्नादि त्यादिनाऽन्ये श्रीपतिप्रभृतिभिरप्याचार्य रेतदेव कथ्यते नाऽन मतपम्यमिति सुज्ञ ज्ञयमिति ॥१०॥ हि भा-लग्न के गताश (भुक्तारा) रवि के भोग्याश को स्वदेश राश्युदय स गुण कर तीस से भाग देने से लग्न की मुक्तासु पोर रवि की भोग्यासु होती है इन दोनो के याग म रवि और लग्न के मध्य में जितनी राशिया है उनके स्वदेशोदयमान जोडन से असकृतम से इष्टकाल होता है । १० ॥ उपपत्ति जिन रागि म रवि हैं उt जो भोपात (भुकाशाग्र से राश्चन्त तक) है तत्सम्ब की प्रसु प्रमाण लाते हैं जैसे तीस प्रश मे रव्याक्रान्त राशि के स्वदेशोदयासु पाते हैं तो रवि के भोग्याश म क्या इस अनुपात से रवि की भोग्यामु प्राती है । लामभुक्ताम से भी लान भुक्तामु ल पाकर दोनो के योग म रवि और लग्न के मध्य म जितनी राशिया हैं उनके उदयमान जोडने मे इष्टवाल होता है । यह इटकाल तात्कालिक रविवश साधन करन म असकृत्कम द्वारा मूक्ष्म होता है | भास्कराचार्य भी अबस्य भोग्यस्तनुभु कयुक्त ' इत्यादि से तथा श्रीपति आदि मव ग्रावाय इसी बात को कहते हैं इसम विमी का मनवपम्प नहा है ।। १०॥ प्रकारान्तरेण लग्नानपनमा । उस्क्रमतो मेषादोन क्रमेण जूकादिकान् प्रकल्प्य ता । रात्रिय व्यत्ययत षड्भयुत प्राग्विलग्न वा ।। विभा -मेपादीन् उत्तमन (ध ग्यान्) जूदित गाव) मग प्रकल्प्य रात्रिय व्यत्ययत (रानिदिनयाविलामात्) यलन तन पड्मयुन (पा शिसहित) वा प्राग्विलग्न (प्रथमलग्न) भवेदिनि ।। ११!! अनोपपत्तिश्लावियव स्पष्टेति ||१||
वटेश्वर सिद्धान्ते
हि भा–वा, मेयादि राशियों को विलोम तरह से और तुलादि राशियो को क्रम
से मानकर रात्रि और दिन मे व्यत्यय (उल्टा) मानकर जो लग्न होता है उसमे 5 राशि
जोडने मे प्रयम लग्न होता है ।। ११ ।।
इसकी उपपत्ति व्याख्या ही से स्पष्ट है ।।१।।
इदानी यदेष्टासूनामरूपत्वात्त म्यो भोग्यासवो न शुद्धास्तदा क्थ लग्नसाधनमित्याह ।
भोग्यात्कालादूनः काल खगुणाहतो निजोदयहृत् ।
अंशादिफलं सूर्ये संयोज्य प्राग्विलग्नं स्यात् ।। १२ ।।
पड्मयुगुदपरविरस्तविलग्नं भवति निश्चयेन ॥ १२६ ।।
वि भा -काल (प्राणिभूत इष्टकाल ) भोग्यात्कालात् (प्रारिणभूतादभुक्त-
कालात्) यदि ऊन (न्यून ) तदा प्राणिभूतेष्टकालः खगुणहत' (निशद्गुणित )
निजोदयहत् (रव्याक्रान्त राश्युदयेन भक्त ) लब्धमशादिक फल सूर्ये मयोज्य
(रवौ योज्य) तदा प्राग्विलग्न (प्रथमलग्न) स्यात् । पड्भयुगुदयरवि (मपभो.
दयकालोनरवि ) अस्तविलग्न (मतमनग्न) भवतीति ॥१२-१२३।।
अत्रोपपत्ति ।
यदि भोग्यासुभि इष्टकालास प्रमाण मल्प स्यात्तदा रयानान्तराश्युदयासु-
भियदि त्रिंशदशास्तदेष्टकालासुभि के इत्यनुपातेन समागतमशादिफल रवी योज्य
तदा लग्न भवति । तदोदयकालीनरविरेव पड़ाशियुतस्तदाऽस्तलग्न भवेदिति
वालरपि बुध्यते भास्करेणापि "भोग्यतोऽत्पेष्टकालात्खरामाहतादित्यादिना"
श्रीपतिनाऽपि "यदीष्टकालान पतत्यभुक्तमि"त्यादिनैतदेव कथ्यतेऽन्यैरपि सर्वे.
रेवमेव कथ्यते ।। १२-१२३ ।।
हिमा -यदि भोग्यकलामु से इष्ट कालामु अल्प होतब इक्लासु को तीस से गुण-
कर रव्याकालराशि के स्वदेशोदय से भाग देने से जो न शादि फल हो उमको रवि में जोडने
मे लग्न होता है । उदयकालिक रवि मे ए रागि जोडने मे अस्त लग्न (मप्तमलग्न)
होता है । १२-१२६ ।।
उपपत्ति।
यदि भोग्यामु प्रमाण मे इष्टवालामु प्रमाण अस हो तो अनुपात करते हैं यदि रवि
जिम राशि में है उस रागि ये स्पदेशोत्यामु में तीन अदा पाते हैं तो इष्टा लागु मे
क्या इस अनुपात में जो प्रमादिन फन पाता है उसको रवि म जोडने से लग्न होता है ।
उदयरालीन रवि में छ राशि जोडने मे मस्तनग्न (मप्तमनग्न) होता है ॥ भास्कराचार्य
भी "मोग्यतोज्येष्टकालारखरामाहनान्" इत्यादि से तथा श्रीपति भी "यदीष्टकालाल पत-
त्यभुक्त" इत्यादि गे इसी बात को कहते है अन्य मद आचार्य भी एव स्वर से इमी मात
को पहने हैं ॥१२.१२॥
विप्रश्नाधिकारः
५४७
इदानीमिष्टासुम्य भुक्तासूना शुद्धो लग्नसाधनमुक्त्वा तस्मादिष्टकालानयनमाह ।
एकस्मिन् यदि भवने विलग्नसूर्यो तदा तयोविवरे ।
भागाः स्वोदयगुरिणता वियदग्निविभाजिताः कालः ॥१३॥
वि. भा-यदि विलग्नसूर्यों (साधितलग्न रवी) एकस्मिन् भवने (एक-
राशौ) भवतस्तदा तयोविवरे (लग्नरव्योरन्तराले) ये भाग (अशा ) ते स्वोदय-
गुणिता (रव्याक्रान्तराशिस्वदेशोदयगुणिता ) वियदग्निविभाजिता (विश.
द्भक्ता) तदा काल (इष्टकालः) स्यात् । लग्नरची यदैकराशिगतौ भवतस्तदाऽभुक्त
त्यक्त्वा लगनस्य भुक्ताशैर्लग्न साध्य रव्याक्रान्तराशेरुपरितन रागिषु लग्नसाधने-
ऽभुक्तस्य प्रयोजन भवति । तेन लग्नरव्योरन्तरकालसाधनाथं लग्नरव्योरन्तरे
येऽशादयस्ते एव गृह्यन्त इति ॥ १३ ।।
अनोपपत्ति ।
यदि लग्नसूर्यावेकस्मिन्नेव राशौ भवतस्तदाऽनुपातेन "विशदशर्यदि
रव्याक्रान्तराश्युदयमान लभ्यते तदा रविलग्नान्त राशं किमिति" अनेन यदस्वा-
त्मक फल समागच्छेत्स एवेष्टकाल स्यात् ॥ भास्कराचार्येण "यदैव भे लग्नरवी
तदा तद्भागान्तरमोदयखाग्निभाग" इत्यादिना श्रीपतिना च "सूर्योदयावे रुग्रहे
यदास्तस्तदन्तराशानुदयेने" त्यादिनाऽन्यैरप्पाचार्यः स्वम्मसिद्धान्ते एतादृश एव
प्रकारोऽभिहित इति विज्ञज्ञयमिति ॥ १३ ॥
हि भा - यदि लग्न और सूर्य एक राशि में हो तो दोनो के अन्तराश को रवि जिम
राशि मे हो उसके स्वदेशोदय मान से गुणकर तीस से भाग देने से इष्टकाल होता है । यदि
लग्न और रवि एक राशि मे हो तो प्रभुक्त को छोडकर भुक्ताश मे लग्न साधन करना
गहिये । रवि जिस राशि में है उससे आगे की राशियो मे अभुक्त का प्रयोजन होता है । इस.
लिए लग्न और रवि के अन्तर सम्बन्धी वालज्ञान के लिये लग्न और रवि के अन्तर म जो
अदा है वही ग्रहण किये जाते हैं ।। १३ ।।
उपपत्ति ।
यदि लग्न और रवि एक राशि में है तो "तीस प्रश मे यदि रव्यामात राशि के
स्वदेशोदय मान पाते है तो रवि और लग्न के अन्तराश मे क्या" इस अनुपात से जो अस्या-
स्मक फल पाता है वही इष्ट शाल है ॥ भास्कराचार्य "यद कभे लग्नरवी तदा तद्भागान्तर-
नोदयखाग्निभाग" इत्यादि से और श्रीपति भी सूर्योदयावरहै यदास्तरतदन्तराशानुदयेन"
इत्यादि मे अन्य आचार्य भी अपने अपने सिद्धान्त में इसी तरह के प्रकार लिखते हैं ॥१३ ।
इदानीं रवितो लग्नेऽल्पे सतीपवालानयनमाह ।
रजनीशेपाल्लने रब्यूने साधितः कालः।
धुनिशाच्छोध्य कालस्तत्कालरविक्शादसकृत् ॥ १४ ॥
५४८
वटेश्वर-सिद्धान्ते
वि.मा.-लग्ने रव्यूने (रवितोऽल्पे) तदा साधितः काल: "एकस्मिन् यदि
भवने विलग्नसूर्यावि" त्यादिनाऽऽनीतः कालो रजनीशेपात् (रात्रिशेयवशाक्षिति-
जतोऽधो भवति) तस्मात्सकालो द्य निगात् (अहोरात्रात्) शोध्यस्तदा तत्कालरवि.
वशादसकृत्कालो भवेदिति ॥१४॥
अत्रोपपत्ति ।
अथ तात्कालिकरविकेन्द्रोपरिगताहोरात्रवृत्तयो क्षितिजवृत्तयो सम्पातात्ता-
त्कालिकरवि यावत्सावनात्मक इष्ट काल । तथोदयकाले यत्र रविः स चौदपिक
स प्रववेगादिष्टकाले यन गतस्तदुपरिगताहोरात्रवृत्तक्षितिजवृत्तयो सम्मातादुदय-
रवि यावन्नाक्षनात्मक इष्टकाल. । लग्नसाधने सावनात्मक इष्टकालो
गृह्यते परन्तु रारयुदयास्तु नक्षत्रात्मकास्त_प्टासुभ्यो राश्युदया. कयं शोध्यन्ते
(द्वयोविजातीयत्वात्) भास्करेगतदर्थमेव कथ्यते "लग्नार्थमिष्टघटिका यदि सावना.
स्तास्तात्कालिकाऽर्ककरणेन भवेयुराय । प्रायोदया हि मशीभ्य इहापनेयास्ता-
त्कालिकत्वमथ न क्रियते यदाय" लग्नात्कालसाधने सकृत्कर्भण. कारणमपि
तात्कालिकरविग्रहणमेवेति ।। १ ।।
हि भा यदि रवि मे लग्न अल्प हो तव "एकस्मिन् यदि भवने" इत्यादि स
जो
इप्टवाल पाया है वह रात्रि शेषवश मे क्षितिज से नीचा होता है इसलिए उस इप्टकाल
को
अहोरात्र में घटा देना चाहिए तय तात्कालिक रवि वग करके असकृत्प्रकारेण इप्टकाल होता
है ।। १४ ।।
उपपत्ति
तात्कालिक रवि केन्द्रोपरिगत अहोरात्रवृत्त और क्षितिज वृत्त के सम्पात मे तारका-
लिक रविकेन्द्र तक सावनात्मक इष्टवाल है । उदयकाल मे जहा रवि रहते हैं वह प्रौदयिक
रवि है । वह प्रवहवेग से इप्टकाल मे जहा गये हैं उनके उपर जो अहोरात्रवृत्त होगा वह
क्षितिजवृत्त मे जहा पर लगेगा वहा (उदयर-युपरिगत अहोरात्रवृत्त और शितिजवृत्त के
सम्पात) से उदय रवि तक नाक्षत्रात्मक इष्टकाल है। लग्न साधन मे मावन इष्टकाल या
ग्रहण करते हैं । लेकिन राशियो का उदयमान नाक्षत्रात्मक है तब इष्टासु मे रास्युदयो को
क्यो घटाते है (दोनो मे विजातीयत्व होने के करण योगानर नहीं होना चाहिए) इसी को
भास्कराचार्य कहते हैं "लग्नार्थ मिष्टघटिवा" इत्यादि लग्न पर से इप्टकाल ज्ञान के लिए
अमवृत्तम के कारण भी तात्कालिक रवि का ग्रहण करना ही है ।। १४ ।।
इदानी स्वदेशोदयविना लग्नरव्योरन्तरामुमानानयनमाह ।
भानोलंड्रोदयवत्प्राणाः साध्याश्वरासवश्वापि ।
तद्वियुतिर्मकरादो कर्यादौ तु युतिः प्रारणाः ॥१०॥
स्पष्टा स्युर्मेषादौ कवर्यादौ तु भार्धतः शुद्धा ।
जूकादौ भापुता मकरादौ शोधिताश्चात् ॥१६॥
लग्नाचवं प्राणाः सूर्याकलाभिनितास्त्वयाल्पाश्चत् ।
ख खपटद्वपेन युक्ता विनोदयलंग्नकाल: स्यात् ॥१७॥
त्रिप्रश्नाधिकार 11 मा-भानो (सूर्यस्य) लोदयवत् (लकोदयानयनरीतिवत्) प्राणा (उदयासव ) साध्या , चरासवश्व साध्या , मकरादी (मकरादिपट्के रवौ) तद्वियुति (तयोरानीतयोरुदयासुचरास्वो) वियुति (विश्लेष) कवर्यादौ (कर्यादिपट्के- रवी) युति (तयो समानीतयोरस्वोर्योग ) तदा या असुकला भवेयुस्ता एव मेपाटी (मेषादिराशिये प्रथमपदे रखी स्थिते) स्पष्टा रविभुक्तिकला भवन्ति कर्यादी (कादिराशिनये रवौ द्वितीयादे) ता कला भावंत शुद्धा (राशि- पटकेभ्यो विशोधिता) जूकादी (तुलादिराशिनये तृतीयपदे रकौ) ता कला भाई- युता (पाशिसहिता) मकरादौ (मकरादिशिनये चतुर्थपदे रवी) ता कला- श्चक्राच्छोधिताः (चत्रकलाभ्यो हीना) तदा शेपा स्पष्टा रविभुक्तकला भवन्ति । लग्नाच्चवम् । अत्रायमर्थ --लग्नादपि लोदयसाधनवदसव साध्या , लग्नादेव चराधासवश्च साध्या । एतयोरस्वोरन्तरयोगौ मकरक्र्यादिपु लग्नवशादन्तर मेपादिपदविकल्पनादविवदेव, प्राणा (लग्नभुक्ला) भवन्ति । एवमुपरिलिखित- नियमेन रविलग्नयो पृथक् पृथक् स्पष्टा भुक्त कला भवन्ति । तत सूर्यकलाभिरानी- ताभि , अनिता (रहिता) लग्नकला कार्या । चेद्यद्यल्पा (सूर्यकलातोलग्नकला न्यूना ) तदा खखपवयेन (२१६००) भुक्तालग्नकला कार्यास्त न रविकला ऊनिता- स्तदा शेपा रविलग्नयोरन्तरासवो यावद्भिरभि सूर्योदयमारभ्य तल्लग्नम् । यदि रविकलाभ्यो लग्न भुक्ता कला शोध्यन्ते तदा रब्युद द्विलोमेन कालसिद्धि- रिति ॥१५-१७॥ अनोपपत्ति लकोदयसाधनावसरे राश्यन्तेषु राश्युदयमानानि साधिनानि, अत्र राशिम- ध्येष्वपि माध्यानि | लग्नरव्योश्चरानियनोपपत्ति पूर्वविधिनैव वोध्या। शेपोप- पत्ति घ्यावलोकनेनैव स्पष्टेति ॥१५-१७॥ हि मा–लवोदय साधन रीति के अनुमार सूर्य के उदयासुप्रमाण साधन करना तथा चरासु भी साधन करना, मकरादि छ राशियो मे रवि के रहने से उन दोनो (रव्यु- दयामु पोर चरायु) के अन्तर करने से तथा क्वर्यादि ५ राशियो मै रवि में रहने में रव्युदयामु और चरासु के योग करने से जो अमुकला होती है वही मपादि तीन राशि (प्रथम पद) मे रवि के रहने म स्पष्ट रवि भुक्तकला होती है । यदि तीन राशि (द्वितीय पद) में रवि के रहने से उन क्लापो को छ राशि मे घटान से, तुलादि तीन राशि (तृतीय पद) म रवि के रहने से उन कलाप्रो को छ राशियो में जोडने से मकरादि तीन राशि (चौथे पद) मे उन क्लाप्रो यो चक्र म घटाने में स्पष्ट रविमुक्त क्ला होतो है ! लग्न से इसी तरह लग्नमुक्त क्ला होती है । जैसे लद्धोदय साधन की तरह लग्नोग्यासु साधन करना, तथा पूर्ववत् ही लग्न के चरार्धायु साधन करना, मकरादि और र्यादि मे लग्न के रहने मे उन दोनो अमुप्रो के अन्तर और योग करना चाहिए । इसके बाद मेपादि पद रपि की तरह निया परने में लग्न को मुक्त कला होती है । इस तरह रवि और सान को स्पष्टमुक्त कला प्रमाण मा गया । उसके बाद लग्न मुक्त कला में रवि युक्त कला कम वटेश्वर-सिद्धान्ते को घटाना, यदि रवि मुक्त क्ला से लग्न भुक्त क्ला स्वल्प हो तो लग्न में २१६०० क्ला जोडकर सूर्य भुक्न कला को उसमे घटाने से रवि और लग्न के अन्तरामु प्रमाण होता है । यदि मूर्य कला मे लग्न कला घटे तो रव्युदय मे विलोम रीति से कालसिद्धि होती है ॥१५-१७॥ उपपत्ति । राशियो के लड कोदय साधन में राश्यन्त में राशियो के उदयमान साधन किये गये है। ग्हा राशियो के मध्य मे भी माधन करना चाहिए। रवि और लग्न को चरानियनो- पपत्ति पूर्ववन् माधन करना । शेप वार्ते भाप्य देखने से स्पष्ट है ।।१५-१७॥ प्रकारान्तरेण तदानयनमाह ! उदया. पष्टिविभक्ता कालांशाश्चरासवश्चापि । चरखण्डलबहीनयुक्तास्ते पूर्ववत्कार्याः ॥१८॥ तेः कालांशः पूर्व वदेव ष्टकालांशकेभ्यश्च । लग्न लग्नादपि पटिकाः स्यु स्वोदयविना वाऽपि ॥ १६ ॥ वि भा.--उदया (लकोदयासव ) पष्टिविभक्ता (पप्टया भक्ता) तता कालाशा भवन्ति । चरा सवोऽपि पष्टिभिर्भाज्यास्तदा चरा(शा. स्युः। चर• खण्डलवै (चरार्धाशै ) ते कालाशा पूर्ववत् होनयुक्ताः कार्या (चरर्धाशा, क्रमस्था- पितेभ्यो मेषादिकलाशेभ्य क्रमशस्त्याज्या । उत्क्रमस्थापितेपूत्क्रमतो युक्ता तुलादि- क्रमस्थापितेपु क्रमचरार्धाशा शोध्या । मकरादिपूत्क्रमस्थापितेषु उत्क्रमतो युवता. स्तदा स्वदेशोदया भवन्ति । ते कालाश (सस्कृतलकोदयकालाशमान.), इष्ट- कालाशकेभ्यश्च (इष्टासव पट्या भक्ता इष्टकालाशास्तेभ्य ) लग्नानयनप्रकारेणा- "भोग्यात्तात्कालिकरविभवनागतकला इत्यादि" अनेन लग्न साध्य तदेवाभीष्ट- लग्नमिति लग्नाकाला नयनमपि पूर्वयुक्या कार्य नाऽत्र कोऽपि विशेष इति ॥१८-१६।। एतदुपपत्तिर्भाध्येनैव स्पष्टेति ॥१८-१९॥ इति वटेश्वरसिद्धान्ते त्रिप्रश्नाधिकारे लग्नादिविधिरष्टमोऽध्यायः । हि भा --लकोदयामु को साठ से भाग देने से कालाश होते हैं, चरार्धासु को भी माठ में भाग देने से चरार्धात होते हैं । क्रमस्थापित मेषादि कालाशो में चरार्धाश को घटा देना चाहिये । उत्करस्यापित उक्त बालागो में उत्क्रम मे जोड देना चाहिए । तुलादि क्रम स्थापित कालाशो मे क्रम से चरार्धाश को घटाना तथा मकरादि उत्क्रम स्थापित कालाशो में उत्क्म से जोडना तब स्वदेशोदय होते हैं । उन सस्कृत लहोदय कालाममानो से तथा इष्ट- कालारा (इप्टागु वो माठ मे भाग देने से इसकालारा होते हैं) से लग्नानयन प्रकार "भोग्या- तात्कालिन रविभवनागरना" इत्यादि मे लग्न माधन करना वही इष्ट लग्न होता है । इन पर मे पूर्व युक्ति से पालग्नयन भी करना चाहिए इसमें कोई विशेपता नहीं है ॥१८-१६।। इमरी उपपत्ति भाष्य हो से स्पष्ट है ॥१८-१६॥ इति वटेशरमिटान्त में त्रिप्रनाधिकार में लग्नादिविधि नामर अष्टम अध्याय समाप्त हुमा।
नवमोऽध्यायः
अथ द्यदलभादिविधि
तत्रादौ दिनार्धशक्वर्थमाह ।
कान्त्यक्षान्तरयोग समान्यककुभो ताशका खाक्षाः।
तज्ज्या दृग्ज्या दोा नताशकोनास्निगृहभागाः ॥१||
उन्नतभागा. कोटिस्तज्ज्या दोान्तर तथा शङ्कः ।
उन्नतजीवा त्रिज्या करें यतिस्तथा नलकः ॥२॥
निभा-समान्यककुभो (तुल्यभिन्नदिशो) क्रान्त्यक्षान्तरयोगोऽर्था-
देकदिक्कयो क्रान्त्यक्षाशयोरन्तर भिनदिक्कयोस्तयोर्योगस्तता नताशका स्युस्ते च
खाक्षा (एतत्मज्ञका ) तज्ज्या (नताशज्या) दृग्ज्या सा च दोा (भुजज्या)
भवति, नताशकोनास्निगृहभागा (नताशहीना नवति ) उन्नतभागा (उन्नताशा )
तज्ज्या दोान्तर (भिन्नभुजज्या) सा कोटि । तथा उन्नतजीवा (उन्नाशज्या)
शङ्क, निज्याकर्ण , तथा यष्टिर्नलक (यप्टेरेव नाम नलब )ज्ञातव्य इति ॥१२॥
अनोपपत्ति
मध्यान्हकाले याम्योत्तरवृत्ते यदि रवि खस्वस्तिकनिरक्षखस्वस्तिक-
योरन्तरेऽस्ति तदा रवितो निरक्षखस्वस्तिक यावत्नान्ति । खस्वस्निनिरक्षत्र-
स्वस्तिकयोरन्तरेऽक्षाशा । अयानयोरन्तरकरणेन रवित खम्वन्तिक यावनताग-
सज्ञक । यदि रविनिरक्षखस्वस्तिकाद्दक्षिणदिशि तदा तर कान्यक्षारायोयोग-
करणेन नतागा भवन्ति । एतज्ज्या (नताशज्या) दृग्ज्या, नतागोननवतिर्नताश-
वोटिरुन्नताशस्तज्ज्याशङ्क
कोटिसज्ञक । गिज्याएं दति हग्ज्यागक
त्रिज्याभिभुजकोटिकणेरेक छायाक्षेत्र समुत्पद्यत इति ॥१
हि भा -क्रान्ति और प्रक्षाग के एक दिशा दन में मनर और भिन्न दिशा रहने
से योग करने से नताश होता है ! इसको खाक्ष भी कहते हैं। उसी मा (ननामग्या)
दृग्ज्या कहलाती है । यह दोा (भुजमानक) है । न्ता' को नन्द में घाने में जो मेष
रहता है उसे उन्नतारा कहते हैं उनकी ज्या (रन्नता या) गंटिदोर्यान्तर (निमिष्ट
मुजज्या) कहते हैं यह कोटि है इमको मधु कहते हैं । विन्या का है । यष्टि को नतक यही
है ॥१२॥
५५२ वटेश्वर-सिद्धान्ते उपपति। मध्यान्ह काल म याम्योत्तरवृत्त मे यदि खस्वस्तिक और निरक्षखस्वस्तिक के बीच म रवि है तो रवि से निरक्षवस्वस्तिक तक क्रान्ति है और खस्वस्तिक, तथा निरक्षसस्वस्तिक के अन्तर अक्षाश है, यहा दोनो के अन्तर करने से रवि से खस्वस्तिक ता रवि का नतारा होता है । यदि रवि निरक्ष खस्वस्तिक से दक्षिण हैं तब क्रान्ति और अक्षारा के योग करने म न श होता है । इसकी ज्या (नताशज्या) दृग्ज्या कहलाती है । यह मुज है, नताश को नब्बे में घटाने से जो शेष रहता है उसे नताश कोटि या उन्नताश (रवि से क्षितिज पर्यन्त) कहते हैं इसको ज्या (उन्नताराज्या) शकु कहलाती है । दाज्या शकु त्रिज्या (भृजकोटिकों) से एक छायाक्षेत्र बनता है ।।१२।। इदानी मध्यच्छाया दिग्व्यवस्थामाह । सौम्यक्रान्तेरपेक्ष' याम्या धुदलभाऽन्यथा सौम्या । घुज्यातो लम्बज्या यदि महतो लध्वी स्यात्तदाऽप्येवम् ॥३॥ गुज्या धनु समेत पलेन समेन यदा विभादूनम् । याम्याऽन्यथेतराभा तत्रिभविवर नताशा स्यु ॥४॥ लम्बक्रान्त्योर्योगस्त्रिमाधिकश्चद धुखण्डमा याम्या । सौम्याऽन्यथा त्रिभोनस्तन्नतभागा स्युरयवैपाम् ॥॥ रि भा--सौम्यकान्ते (उत्तरान्तित ) प्रक्षेऽन्पे (अक्षाशाऽल्पे) द्यु दलभा (मध्य छाया) याम्या (दक्षिणा) भवति, अन्यथा (सौम्यक्रान्तेरक्षाशाधिके) मध्यच्छाया सौम्या (उत्तरा) भवति यदि | ज्यातो लम्वज्या महती, लध्वी च स्यात्तदाप्येवमेव मध्यच्छायादिगिति ।।३॥ पलेन समेन (अक्षाशतल्येन) द्यु ज्याधनु समेत (द्य ज्याचापसहित) यदा त्रिभादून (नवत्यशाल्प) भवेददिक्षागद्य ज्याचापयोर्योगो यदि नवत्यशाल्पो भवे- तदा मध्यच्छाया याम्या (दक्षिणा) भवेत् । अन्यथा (धु ज्याचापाक्षाशयोोगो यदि नवत्य शाधिस्तदेतराभा उत्तरच्छाया) भवेत् । तन्त्रिभविवर (यु ज्याचापा- क्षाशयोगनवत्यसयोर-तर) नताशा स्युरिति ।।४।। चेत् (यदि) लम्यक्रान्त्योयोगस्तिभाधिक (नवत्यशाधिक ) तदा धु खण्डमा (मध्यच्छाया) याम्या(दक्षिणा) भवेत् । अन्यथा (लम्वक्रान्त्योर्योगस्य विभाऽल्पत्वे) मध्यच्छाया सौम्या (उत्तरा) भवेत् । विभोन (लम्बकान्त्योर्योगस्त्रिभोन ) तथा नतभागा (नताशा ) स्युरिति ।।५।। अत्रोपपत्ति । प्रक्षामन्य दिक् सवदा दक्षिणा, नाडी वृत्ताद्यस्या दिशि रविस्तद्दिश्येव क्रान्तिदिव् खस्वस्तिकादुत्तरे यदा रविस्तदा रवितो निरक्षखस्वस्तिक यावदुत्तरा कान्ति 1 खस्वस्तिवनिरक्षखस्वस्तिकयोरन्तरेऽक्षाशा । अत्रोत्तरकारक्षाशाधिवत्वात् निनभाधिकारः तत्र (उत्तरकान्तौ) अक्षाशस्य शोधनेन खस्वस्तिकाद्रवि यावन्नताशा भवन्ति, यस्वस्तिकाद्रवेत्तरे स्थितत्वात् छायायाश्च रवितो विरद्धदिशि स्थितन्याच्च भूपृष्ठ- स्थितगडोरधिरेपानण्डरूपत्वेन तदीया छाया दक्षिणा भवेत् । यदि वस्व. स्तिकतिरक्षमस्वस्तिकायोरन्तरे रविस्तदोतरा क्रान्ते रक्षाशाल्पत्पादक्षाशे कान्तेः शोधनेन नतायो भवन्ति, परमन खम्वस्तिकाद् दक्षिणदिशिरविन्त, शङ्क,च्छाया (मध्यच्छाया)उत्तरा भवति । यदि च ज्याचापाक्षागयोर्योगो नवत्यशास्पस्तदाऽप्ये. वमेव (मध्यच्छाया दक्षिणा) स्थिनिर्भवति । यथा, शु चाप-+ अक्षाश इति यदि नव- त्यशाल्पस्तदा नवत्यशे तच्छोधनेन ६o-(धु चाप-+अक्षाश). =80- चार-प्रक्षामन्त्रान्ति-अक्षाग एत- दर्शनेन पूर्वोक्तम् "उत्तरकान्तेरक्षाशाधिके छाया दक्षिणा' एव सिद्धपति, यदि च धु चाप+अक्षाश नवत्यशाधिकनिया नस्त्यशयोयनेन ध चाप+अक्षांश-६०%s, अक्षाश-(20-छुचा)-अक्षाश-कान्तिनताश, एतस्थिती पूर्वमेव मध्य- छायोत्तरा सिद्धा तेन धु चाप + अक्षाग अस्य नवत्यशाधिक्त्वे मध्यच्छायोत्तरा भवेत् । एव यदि लम्बास+जान्ति नवत्यशाधिवम्तदाऽपि छाया दक्षिणा भवेद्यथा लम्बाश+क्रान्ति नवत्यशयोधनेन लम्बाश+मान्ति-६० कान्ति- (६०-तम्याश) कान्ति--प्रदाश--ननाश तदा पूर्वोत्याग्न स्थिती दक्षिाव- च्छाया भवति । लम्बारा+क्रान्ति एतम्य नवत्यगात्पत्ये मध्यच्छायोत्तरा भवति । लम्बाम- कान्ति इति यदि नवत्यशानाम्नदतम्य नवत्यो शोधन १० -(लम्बारा +का)--80-जम्बाश-का-अक्षाग-ना- नताश पनस्थिती मध्यच्छायो- तरा पूर्वसिद्धवेत्याचार्योक्न मर्य युक्तियुक्तमिति ॥ ५॥ हिमा - उत्तरा क्रान्ति म अक्षाश अल्प हो ता मध्यच्छाया दणि दिशा यी होती है अन्यथा (प्रवास म उनरामानि ये अल्प होन ग) मध्यन्याया उनार होती है । यदि धु ज्या चाप म अक्षाम जाने मे नीन राशि (नवस्या) में प्रग हो ता भी म यच्या दणि हाती है, प्रत्यथा (ध ज्याचाप म अग जाग्न म नपत्या म पचिर र775 मायच्याया उनर होती है । ( ज्याचाप और ये योग और नपत्यमा या अन्नर मध्यनताग होता है । सम्याग और प्रालि रे योग यदि नवत्याधिप हा ता भी मध्याय दक्षिण होती है । अन्यथा (लम्बामा और प्रान्ती गाग यदि नवाया हाती) छाया उार होतो हे ॥३-५॥ उपरति प्रशासकी दिशा वरावर दक्षिण होती है, नागेत ने निग दिशा में रवि रहते है पर प्रान्ति की दिशासिता में यदि रवि उता है तो में निरनिरव यो उत्तरा प्रालि गम्परिता और निरम पनि । अन्तर में पाग है, पहा उनग प्रान्ति प्रशाम में अधिक है इसलिय प्रालि में प्रक्षाप पटाने म गम्यता में रविता 1
वटेश्वर-सिद्धान्ते
स्तिके लगति । निरक्षखम्वस्तिकाच्च राग्रद्वयवद्धमूत्रोपरितम्बो निरक्षार्धापरमूत्रमैव
भूकेन्द्रान्निरक्षसस्वस्तिक यावनिग्याऽस्ति, भूकेन्द्राञ्चरायद्वयवद्धमूत्रपर्यन्न निरक्षो.
धिरमूखण्ड चरज्याऽतस्त्रिज्याया चरज्याया योजनेन निरक्षराम्वस्तिवाचराग्र-
द्वयबद्धमूनपर्यन्त लम्बम्पा रेखान्याम्पादक्षिणगोले त्वेन हिलोमा स्थितिनिति ॥७॥
अव दिनाचं हृति और दिनान्त्यिा के माधन वर्त है :
हि भा-दक्षिण गोल में ज्या मे कुज्या वा घटाने मे और उत्तर गोन मे जोडने
से मध्यहृति होती है । एव दक्षिरणगोल म त्रिज्या म चरज्या तो घटाने मे और उत्तर गोल
में जोनने में मध्यान्त्या होती है ॥७॥
उपपत्ति।
दक्षिणगोल म निरयोदयास्त मूत्र मे स्वोदयास्त मूत्र के उपर रहने के कारण दोनों
मूत्रो के अन्तगत कुज्या को यदि याम्यातराहोरात्रवृन वे मम्मान में निरक्षो.
दयास्त मूत्र के ऊपर लम्बम्प द्युमा म घटा दने है तो याम्योत्तराहोरानवृत वे सम्पात
मे स्वादयाम्त सूत्र के ऊपर लम्वरूप हृति प्रमाण होना है। उत्तर गोल म छुज्या म कुज्या
का जोगने से हृति होती है। तथा उनरगाल म भितिज नागरवृत्त मम्पानोपरिगत प्रव
प्रोतवृत्त नादीवृत्त म पूर्व स्वस्तिक से परान्त पर नीचे लगता है उम विन्दु मे पूर्वापर मूत्र ये
ममानान्तर मूत्र कर दिये उभवा नाम चरानद्वयं वद्धमूत्र है । ग्रहोपरिगनत्र व प्रोतवृत्त नाटी
वृत्त के सम्पान विन्दु से चरानद्वय बद्ध मूत्र + उपर जो लम्ब बरते है वह अन्या है
मध्यान्ह काल मे ग्रहोपरिगत ध्र व प्रोत वृत्त याम्योतर वृत्त ही होता है वह नारीवृत्त म
निररसस्तम्निक विन्दु म लगता है । उम विन्दु म (निरक्षरास्वस्तिक म) चरानद्वयवर सूत्र
के ऊपर लम्ब निरक्षाधिर मून है अर्थात् भूकेन्द्र से निरक्ष वस्वस्तिक तर त्रिज्या है, और
भूनेन्द्र से चरागद्वप बद्धसूत्र तर निरक्षो घिर मूत्र खण्ड चरज्या है, निया में चरज्या को
जोड देने में मध्यान्त्या होती है, दक्षिणगोल म पूर्वापर मून म चराग्रहय बद्ध सूत्र के उपर
रहने के कारण त्रिज्या म चरज्या को घटाने में मध्यान्त्या होती है, मूर्यमिद्धान्त में भी,
'विज्योदक चरजायुना याम्याया तद्विवजिता' इत्यादि में तथा मिद्धान्तशिरोमणि मे,
"क्षितिज्ययैव शुगरणश्व मा हृति ' इत्यादि से इसी विषय को वहा है ॥७॥
इदानी गइमायनान्याह ।
लम्बज्या पमजीवा समनरसूर्येषति. पृथग्गुरिणताः।
विज्यागा तति पलभंक्ता नराः क्रमश १॥
धुज्यानस्ययोश्च धातो गदितैर्गुणकारकैः पृथगुरिणतः ।
निज्यागुणितहरैविभाजथेच्छङ्कयो वा स्युः ॥६॥
वि मा-धृति (हृति ) लम्बज्या पमजीवा समनरमूर्य लम्वज्याक्रान्ति-
ज्या समगकुद्वादशभि ) पृथगुणिता विज्याना तद्धृनिपलवणः (नियाग्रा पल-
वर्ण) अमगो भक्तास्तदा नरा (मरव) म्यु ॥८॥
५५७ - लम्बज्या हृति - %3D पलक निप्रश्नाविकार वा द्यु ज्यान्त्ययोर्घातो गदितै (पूर्वकथितैलंम्बज्यापमजीवेत्यादिभि ) गुणकारक (गुणका) पृथग्गुणित , त्रिज्यागुणित हरै (पूर्वकथितहरे ) विभा- जयेत्तदा शक्व स्युरिति ॥६॥ अनोपपत्ति । प्रक्षक्षेत्रानुपातेन काज्या. हृति =शकु -शकु। नि স্মথ समश हति तथा। =श कु१२ हति=श कु तति अथ द्यु ज्याऽन्त्ययोश्च घात इत्यादिश्लोकोक्त्या धु अन्त्या लज्या _हति लज्या ध अन्त्या प्राज्या =श कु। नि.नि नि नि अग्रा हृति प्राज्या द्य अन्त्या समश _हति समश =गड कु अग्रा तदति ध.अन्त्या. १२ हृति. १२ = शड वु एतेनाचार्योक्तमुपपन्नम् ।।८- ॥ नि. पलक पलक अव शद कु के यानयन प्रकारो को वहते हैं। हि भा -हति का लम्वज्या, क्रान्निज्या, समराड कु और द्वादश से पृथक पृथक् गुरगवर मग त्रिज्या, अग्रा, तभूति और पलकर्ण से भाग दन म ड प्रमागा हाने हैं ।। अथवा | ज्या और अन्त्या के घात का पूर्व कथित गुणकाट्दो न गुणर विज्या गुणित पूव. हरो से भाग देने से गर कु होते है ॥ ८६ ।। उपपत्ति =-शड छ। नितद्धति %3- . लज्या हुति - भाज्या हृति = गद्बु। प्रमा डबु। प्रक्षक्षेत्र के अनुपात स =पाइनु, गड समरा हृति १०४हुति तथा 'दाद तद्धति पलक "शु ज्यान्त्ययोरच घात" इत्यादि सेशु अन्त्या लज्या_हनि लज्या नि त्रि तथा- धु अन्त्या काज्या_हति व्राज्या गडक। त्रि अग्रा द्य.अन्त्या समा हृति ममम तथा त्रि तहति हति १२ = दाइ । इनमे प्राचार्योक्त पद्य उपपन्न हुए। ८.६॥ त्रि.पलव पलव - तहनि धु प्ररया १२- वटवलसद्धान्त : %3D पुन: संक्वानयनान्याह। घातस्त्रिज्याहृत-हरगुरणकान्तर-सड गुरास्त्रिगुणनिघ्नः । छेदैर्भक्त फलवियुतघातस्त्रिज्यया हृत. शङ्कवो वा स्युः ।।१०।। वि भा.-घात (द्य ज्यान्त्ययोघात) विज्याहृतहरगुणकान्तरसङ्गणः (त्रिज्यागुरिणत हरगुणकान्तर गुणित ) त्रिगुणनिध्न (निज्यागुरिणतः) छेदैः (पूर्वकथितहर) भक्त (विभाजितः) फलवियुतघातः (लघिहित द्यु ज्यान्त्ययो- पति ) त्रिज्यया हृत (विज्याभक्ता ) वा (अथवा) शङ्कव स्युरिति ।।१०।। अनोपपत्ति श्लोकोक्त्या द्य. अन्त्या. नि (त्रि-लज्या) = फलम् अनेन रहितधातः नि.वि धु. अन्त्या त्रि (त्रि-ल ज्या) द्य. ग्रन्त्या त्रि.नि धु, अन्त्या. त्रि.नि-ध.अन्त्या. वि. त्रि-+द्य.. अन्त्या. नि. लज्या त्रि.वि ___ा . ग्रन्त्या. त्रि. ल ज्या त्रिज्यया भक्त. यु. अन्त्या. लज्या वि. त्रि हृति. लंज्या = दाइ कुः। घात =द्यु प्रत्या नि धु . अन्त्या. त्रि. (अग्ना-माज्या) एवं = फलम् अनेन रहितघात. नि. अग्रा द्यु, अन्त्या. त्रि (अग्रा-काज्या) अन्त्या- नि. अना __ा . अग्रा. नि. अग्रा-ध अन्त्या घि. अग्रा+ य . अन्त्या. नि. क्रांज्या नि. अग्रा घ. अन्त्या नि.प्राज्या निग्या भक्त. अन्त्या.काज्या नि प्रना त्रि. अग्रा _हति. माज्या गड कु । एवमेवान्योऽपि प्रकारो ज्ञ य इति ।।१०॥ ग्रा पुन गडक साधन बहने हैं । हि.भा- ज्या और मन्न्या के पान को त्रिज्या गुरिणत हर और गुणक के अन्तर से गुणकर विग्यागुणित हरो रो भाग देने पर जो फल हो उन्हे घात मे ( ज्या भोर अन्त्या रे गुणनफल मे) घटा कर निग्या मे भाग देने से प्रवारान्तर से राइ कु के मान होने हैं ।।१०॥ त्रित्र द्य विप्रश्नाधिकारः %3D में श्लोकोक्ति के अनुसार HD इसी तरह उपपत्ति धु, अन्त्या. त्रि (त्रि-लंज्या). =फल इमको पात त्रि. त्रि घटाने से शु. अन्त्या- द्य. अन्त्या. त्रि (त्रि-लज्या) त्रि. त्रि यु. अन्त्या. त्रि. त्रि- द्य. अन्त्या. त्रि. त्रि + यु. अन्त्या. त्रि ज्या त्रि. त्रि धु. अन्त्या. नि. ल ज्या त्रिज्या से भाग देने से त्रि. त्रि __य. अन्त्या. स ज्या_हुति. ल ज्या = शड कु । घात = शु. अन्रया त्रि. त्रि त्रि द्यु. अन्त्या. त्रि (अग्रा-काज्या), = फल, इसको पात में घटाने में वि अग्रा धे . अन्त्या-घु अन्या. त्रि (अग्रा-काज्या) वि. अग्रा द्य. अन्त्या. वि. अग्रा -धु अन्त्या. वि. अना + धु. अन्त्या. त्रि. प्राज्या त्रि प्रमा द्य. अन्त्या. त्रि. काज्या त्रिज्या में भाग देने मे त्रि. ग्रा द्यु. अत्या. माज्या_हृति काज्या वि.प्रपा -शडकु । इसी तरह प्रागे के प्रकार भी अग्रा समझना चाहिए ॥१०॥ पुनः शडक्वानयनान्याह । वतद्गुणहारान्तरनिहताऽन्त्या हृता पृथग हारः। फलरहिताऽन्त्या युज्यागुरिणता त्रिज्याहृता नराः क्रमशः ॥११॥ वि. मा -वा (अथवा) अन्त्या एतद्गुणहारान्तरनिहताः (पूर्वकथितगुण- हारान्तरगुणिताः ) पृथग्-हारः (पूर्वकथितभाजकः ) हताः (भक्ताः) फलरहिता- ऽन्त्याः (फलोनाऽन्त्याः) | ज्यागुरिणताः विज्याहृताः (त्रिज्याभक्ता.) सदा क्रमशो नराः (शङ्कवः) स्युरिति ॥११॥ अग्रोपपत्तिः इलोकोक्त्या अन्त्या (नि-लज्या), -फलम् अनेन रहितान्त्या तदा अन्त्यां (मि-लज्या)_पन्त्या.त्रि-अन्त्या.त्रि+मन्या. लंज्या प्रन्त्या- त्रि % 3D श्रि.
'५६० वटेश्वर-सिद्धान्ते अन्त्याल ज्या नि अन्त्या. लज्या द्य ज्या धुज्यया गुरिणता त्रिज्याभक्ता तदा नि नि ल ज्या इति =शड यु। D नि अन्त्या (अग्रा -बाज्या) एव फ्लम्, अनन रहिताऽन्त्या तदा अग्रा अन्या (अग्रा-नाज्या)_अन्त्या अग्रा-अन्त्या अग्रा+अन्त्या भाज्या अन्या- अग्रा अग्रा ग्रन्त्या वाज्या प्रन्या वाज्या द्य घु ज्या गुणिता निज्या भक्ता तदा अग्रा अगा नि हति काज्या. =सइकु । एवमग्नेऽपोति ॥११॥ अना पुन सडक माधन करते हैं। हि भा --अथवा अन्त्या को पूर्व पथित गुगणक और हर के अन्तर स गुणाकर पृथर पृथक् पूर्व यथित हा स भाग दकर जो फल हो उन्ह अन्त्या मे घटा कर द्य ज्या से गुणकर त्रिज्या म भाग दन स क्रम मे बाइकु वे मान हात हैं ।।१।। उपपत्ति दलावोक्ति म अन्त्या (वि-ल ज्या), त्रि -पल । इसको अन्त्या में घटाने से अन्त्या (नि-ल ज्या) अन्या वि --प्रत्या त्रि+अन्त्या ल ज्या त्रि त्रि अरगा ल ज्या इमको धज्या मे गुणावर ग्रिज्या से भाग दन से त्रि प्रन्यासत्या द्य हृति ल ज्या त्रि --शडक । इसी तरह प्रन्या (अग्रा-कान्या) पल, । इस्लो मच्या पक्षले से मन्त्या- अग्रा अन्न्या (अग्रा-माग्या) अन्त्या %3D प्ररया अग्रा-ग्रन्त्या अंग्रा+अन्त्या झाज्या अग्रा अग्रा मन्या बाग इसको द्यज्या से गुग्गावर त्रिज्या स भाग देने से प्रपा मन्या प्राज्या ध हति जाग्या शा। इमी तरह प्राग ये प्रवार भी प्रग्रा राममने चाहिए ॥११॥ पि प्रमा निप्रश्नाधिकारः -शङ्क- पुन याक्वानयनप्रकारान्तराण्याह । वाऽन्त्यागुरिगतैग रंगकता ग्रुजीवा पृथक्-पृथक् क्रमशः । भक्ताऽनन्तरहारैरा घुजीवाः पृथागुरिणताः ।।१२।। वोक्तगुणहारविवरभक्ताश्छेदेहि लब्धफलसमेता । शुज्या गुणके हारान्महति विहीनाऽल्पके शेषाः ॥१३॥ अन्त्या गरिएता भक्ता त्रिभज्यया शङ्कव' क्रमशः ॥१३॥ वि. भावा (अथवा) द्यु जीवा (ध ज्या) पृथक पृथक् अन्त्यागुणित- गुणवं (अन्त्यागुम्गित पूर्वकथितगुणक) हता (गुणिता) अनन्त रहार (पूर्वा- नीतहार ) भक्ता तदा नग (शङ्कव) स्यु । मा छ जो। (छ ज्या ) उक्तगुरणहार- विवर (पूर्वकथितगुणवहारान्तरे ) पृथ: गुणिता छौ पूर्वमा तिहार ) भक्ता लब्धफलसमेता (लब्धपलेन युना) | ज्या कार्या, हागद् गुणये महति सक्ति, हागद्गुणकेऽ पके लब्धफलेन विहीना ज्या कार्या शेपा अन्या गुणितास्त्रिभज्यया भक्तास्तदा मश शङ्कव स्युरिति ॥१२ १३॥ अनोपपत्ति । श्लोकोक्त्या ग्रन्त्या लज्या द्य_हति. लज्या । एवमेव विनि नि अन्त्या भाज्या छ - हृति प्राज्या नि अग्रा -शङ्क, । एवमग्रंऽपिज्ञेयम् । एतेन वाऽन्त्यागृणितरित्यादर्भक्तानन्तम्हारैग्त्यिन्तमुपपन्नम् । अथावशेपार्थ श्लोकोत्येव द्य (नि-ज्या) द्य विद्यु. लग्या नि नि अन गुरगकाद ल ज्या। हर =नि परन्तु नि > लज्या अर्थात् हर>गुणक अत छु ज्या- द्य ज्या त्रि-यु. ल ज्या T-लब्धफल - ज्या- त्रि ज्या. नि-धुज्या वि+धु ज्या. लज्या व ज्या ल ज्या, 'अन्यागुरियता निज्या नि नि धु ज्या. ल ज्या अ.या_हति. ल ज्या त्रि.नि नि गई। एवमेव गुज्या (अग्ना-ज्या) = ध ज्या. अग्रा-च ज्या. माज्या अत्रापि गुणकाङ्करहर यत गुणमादःप्राज्या। हर अग्रा। अग्रानाग्या -(धुज्या अना-- ज्या. बाज्या) भक्ता तदा - अग्रा. अग्रा. अत. ध ज्या- वटेश्वर-सिद्धान्ते %3D धे ज्या. गग्रा-धु ज्या अग्रा+धु ज्या. माज्या_युज्या. भाज्या अग्रा अग्रा इदमन्त्यया गुरिणत त्रिज्याभक्त तदा घु ज्या ऋाज्या अन्त्या _हुनि. क्राज्या अग्रा वि अग्रा =श कु । एवमेवानेऽपि वाध्यमिति । एतेन 'धु जीवा पृथग्गुणिता' इत्यारभ्य "शकव क्रमश" इत्यन्तमुपपन्नम् ॥१२-१३३॥ पुन शकु के साधन कहते हैं। हि भा-अथवा धुज्या को अलग अलग अन्त्यागुणित पूव गुणकों स गुणाकर पूर्वानीतहारो से भाग देन स श प्रमाण होते हैं। अथवा द्यु ज्या का पूर्वकथिन गुणिन और हार व अन्नर स गुणाकर पूर्वपिन हारो से भाग देने से जो फल हो उह द्यु ज्या म जोड देना । यदि हर गुणक अधिक हो, यदि हर से गुणक अल्प हा तो लब्ध पल बा | ज्या म घटा दना, जो शेप रह उह अन्त्या स गुणा- कर त्रिज्या मे भाग देने स क्रम मे शकुमान होत हैं ॥१२ १३३।। उपपति। श्लोकोक्ति के अन्त्या लज्या द्यु ज्या_हति ल ज्या अनुसार त्रि त्रि वि इसी तरह प्रत्या काज्या धु ज्या_हुति भाज्या शक । इसी तरह आगे भी समझना चाहिये । इममे वारत्यागुणिन इत्यादि म भत्तानन्तरहार यहा तक उपपल हुमा ।। अव शेप के लिए श्लोकोक्ति के अनुसार- -ल ज्या)_धु त्रि-यु ल ज्या त्रि यहा गुणकल ज्या । हर-गि परन्तु नि>ल ज्या अर्थात हर>गुग्क इसलिए द्यु - लब्धफ्त =द्यु- -(धु त्रि-धु, ल ज्या) त्रि घ, त्रि-धु नि+छु ल ज्या द्यु लज्या त्रि इमको अन्त्या से गुणकर त्रिज्या से भाग देने से यु लज्या अन्त्या_हति लज्या त्रि त्रि त्रिशंकु । इसी तरह धु (अग्रा-काज्या) त्रि प्रमा प्रया त्रि अप्रा द्यमग्रा-धु काज्या लब्धपल यहा भी हर>गुण अग्राहर, भाज्या = प्रमा गुगक परन्तु मना> काज्या इमलिए द्यु-लब्धफ्ल-यु- (, अग्रा-द्यु, प्राज्या) घु. प्रमा- अग्रा+द्य प्राज्या_घु जाग्या इसको अन्त्या मे गुणाकर विज्या से भाग मप्रा प्रमा प्रमा त्रिप्रश्नाधिकार: देने से घु. क्राज्या, अन्त्या हति क्राज्या यग्रा वि = शत्रु । इसी तरह आगे भी समझना चाहिए। त्रि इससे "धुजीवा, पृथगुरिणता." यहा से लेकर "शक्य क्रमश." यहाँ तक उपपन्न हुमा ।।१२-१३३।। पुन. राइक्वानयनप्रकारान्नराण्याह । अपनोत्क्रमग एनिहता पूर्वगुणाश्वगुरणकविवरेण ।।१४ । त्रिगुणाहतेन युक्ता विवराण्येतहतान्या । भक्तानन्तरहारैः फलरहितान्त्यैव शङ्कव क्रमश ॥१५॥ वि. मा.--पूर्वगुणाः (पूर्वकथिता लम्बज्यापमजीवा समनरसूर्यरित्या धुक्ता.) अपमोत्क्रमगुणनिहता (क्रान्त्युत्क्रमज्यागुरिणताः) त्रिगुरणाहतेन (त्रिज्या- गुणितेन) छेदगुणकविवरेण (हारगुणकान्तरेण) युक्तास्तदा विवराणि (अन्त. राणि) स्युः । एतैः (विवरः) अर्धान्त्या (अन्त्या) हता (गुरिणता) अनन्तरहार, (पूर्वकथिनहारैः) भक्ता फलरहिताऽन्त्येव (फलोनाऽन्त्येव) क्रमशः शङ्कवः स्युरिति ॥ १४-१५ ॥ अत्रोपपत्तिः । क्रान्त्युत्क्रमज्या-त्रि-क्रान्तिकोटिज्या-त्रि-द्यु श्लोकोक्त्यनुसारेण लज्या (त्रि.)+नि (त्रि--लज्या) त्रिहरः, = लेज.त्रि-लज्या ध+त्रि त्रि-त्रि लज्या लज्या=गुण =त्रि.वि-लज्या द्यु = अन्तरम् =विवरम् । एतेन गुणिताऽन्त्या (त्रि त्रि-लज्या धु) अन्त्या= वि नि अन्त्या-लज्या द्य, अन्त्यापूर्वकथित- हारेण भक्ता त्रिवि अन्त्या-लज्या द्य, अन्त्या एतद्रहितान्त्या मित्रि (नित्रि अन्त्या-~लज्या | अन्त्या) अन्या- मिनि अन्त्या.मि त्रि-भि नि अन्त्या लज्या धु, अन्त्या लज्या...अन्त्या निमि मिनि हृति ल ज्या = शइकु । एवमेव नि क्रांज्या (त्रि-यु)+पि (अग्रा-ज्यिा)| अब हर:= प्रमा गुणः- मांज्या -कांज्या.त्रि-प्रांज्या. j+नि.ग्रा-वि.प्रांज्या -त्रि. अग्ना-भाज्या. वियर - अन्तरम् एतेन गुणितान्या प्रि.ग्रा.अन्त्या-क्राज्या, अन्या पूर्वकथितहारेण भक्ता बटेश्वर-मिद्धान्ते विअन्ना अन्गा-प्राज्या धु अन्त्या एतद्रहितान्त्यिा निग्रा (श्रि अग्रा अन्त्या-ताज्या द्य, प्रत्या ताज्या द्यग्रन्या अन्त्या- यात्रा वि अग्रा अग्रा हृति काज्या =गड्छ एवमग्रेऽपि बोध्यम् । एतेन “प्रपमोक्रमगुग्गनिहता" इत्यादि सर्वमुपपतम् ॥१४-१५॥ फिर पक, क ग्रानयन परत है। हि भा-पूर्वकथित गुणवा को प्रान्ति के उमज्या म गुणकर विज्यागुणित हर के पन्तर योजोद दन मकिपर (अन्तर) मज्ञक होता है। हमन अन्या दो गुणकर पूर्वकथित हारो से भाग देवर जा फन हो उन्ह अन्त्या म घटान में क्रम में पाई, के मान होत है।। १४-१५ ॥ और गुणक उपपत्ति । श्लोकोक्ति के अनुसार लज्या (त्रि-ध.) +त्रि ( निल ज्या) | त्रि-द्यु = सान्त्युत् मज्या नि=हर । ल ज्या- गुण ==ज्या यि-ल ज्या शु+त्रि मि-निल ज्या =त्रि त्रि-ल ज्या द्य =विपरमज्ञक - अतर इमम अन्त्या का गुणन म (त्रिवि अन्त्याल ज्या छ प्रत्या) पूवपिनहार स भाग दने में त्रिवि अन्त्या--ल ज्या ध अन्त्या इमा अन्न्या मघटानस त्रित्रि त्रिवि पन्त्याल ज्याध अन्त्या) प्रत्या- नित्रि लज्या धन्या त्रिनि अन्त्या त्रिवि-निनि ग्रन्त्याल ज्या द्य प्रत्या विवि हृति ल ज्या 'गई । इसी तरह माज्या (विद्य)+नि (अग्ना-भाज्या) यहा अग्रा-हर। काज्या=गुणा =काज्या वि-काज्या द्य+त्रि अना-त्रि ज्या =यि अग्रा-काज्या द्य=विवरसज्ञक । इमम अन्त्या को गुरणने से त्रिमग्रा अन्त्या-ज्या धु अन्त्या पूर्व कथित हार से भाग देने मे त्रि प्रमा प्रत्या--काज्या धु अन्या इमको प्रत्त्या म घटाने से विप्रमा निप्रग्नाधिकारः श्रि अग्रा ग्रन्या-काग्या छ अन्त्या अन्त्या- निग्रा %3DC । अन्त्या विमा-विग्ना अन्त्या+माज्या व अत्या ज्या द्यपन्या त्रिअग्रा निमग्रा .हनि प्राग्या. । इसी तरह ग्रागे भी मगझना चाहिए । इममे "अपमो. रक्रमगुणनिहता ॥” इत्यादि अपन हुया ।। १४०-१५ ।। पुनस्तदानपनान्याह। पलगुणपलमा कुज्याऽग्राभिवृति पृथागुणिता। निज्माक्षश्रवसापोह ति भक्ता च नृतलानि ।। १६ ।। अथवा त्यान्त्यायै कथितगुरणः प्रोक्तहारकै प्राग्वत् । नृतलानि तत्कृतिवियुग्धृतिवर्गान्मूलमथवा ते । १७] सिमा ति (हति ) पृथक् पलगुणपलभाज्याऽग्रामि (अक्षज्या- पलभा कु ज्या ग्राभि ) गुग्गिला, त्रिज्याथवरणाग्रोद्वतिभक्ता ( विज्यापलवप्रात. द्धतिभिर्भता) तदा नृतलानि ( शकुतलानि ) भवन्ति । अथवा कथितगुणं (पूर्व- कथितगुणकं ) प्रोक्तहार (कथितहारमान )सधित त्यान्त्याचे (तत्यन्त्याचे ) नृतलानि (शकुनानानि भवन्ति । तस्कृतिवियुग्धतिवर्गात (मनलवर्गोनहनिवर्गात) मूल तदा ते मकुव स्युरिति ॥ १६-१७ ।। अयोपपत्ति । अक्षक्षेत्रानुपातेन अज्या हुति नि शकुतले । 'कुनल। राना हति = गतल । गतल । तन इति शकुतत ==ः । धृत्यान्त्याद्य थितगूगौरियादि स्पप्टमेव ।। १६-१७ ।। फिर गावे प्रानयन करते हैं। हिमा -हनि को अलग अलग प्रक्षग्या, पतमा, युज्या और प्रोर मना में गुणा वर विज्या, पनाग, अग्रा और तति में भाग देने मे शानल होते हैं । अथवा पूर्वरपित गुग्गव और हरो के द्वारा माधिन हुनि- अन्त्या प्रादि म मातन ये मान पाते है । हतिवर्ग म युवा वर्ग को पटायर मूत्र लेने से मनुमान हैं ।। १६-१७ ।। उपपत्ति। मशन भन्या हृति पमा हृति अनुपात भगत। पव कुज्या हति तति =मन पत्र गतल! ५६६ वटेश्वर सिद्धान्त कुज्या हृति अग्रा हृति =शतन तव हृति -पातल =ग । प्रपा तइति घृत्यान्त्यायै कधितगुरणे इत्यादि की उपपत्ति स्पष्ट ही है ।। १६ १७ ।। इदानी दिनाधानयनमा । त्रिज्या धृतिविशेषोऽक्षश्न तिनिहतो विभाजितो धृत्या। फलवियुगुदा समेताऽक्षश्रुतिरितरधुदलकर्ण ॥१८॥ वि भा --त्रिज्यातिविशेष (त्रिज्याहृतिषियोग) अक्षश्रुतिनिहत (पलकर्णगुणित ) धृत्या विभाजित (हतिभक्त ) फलवियुकसमेताऽक्षश्रुति (फलरहितयुत पलकर्ण) तदेरतद्युदलकरण (भिन्नमध्यकर्ण) भवेदिति। अनोपपत्ति । अत्र ग्रन्थे धृतिशब्देन सर्वन व हत्ति ह्या । श्लोकोत्या पक + (नि-हुति)पक_पक हृति+पक त्रि-पक हति ह ह पक त्रि. पक गि १२ श. हु १२४श श न्तरपक्षेऽपि ज्ञेयमिति ॥१८॥ हिमा -त्रिज्या और हृति व अलर को पलवण से गुणकर हृति से भाग देना ज फा हो उसे दक्षिणोत्तर क्रम से पलकण म जोन्ने प्रौर घटाने से दूसरा मध्यवरण होता है मर्षात् प्रकारात मे मध्यवरा होता है ॥१८॥ हृति पर निx१२४ह-नि १२-.-मछा एवम - - %3- उपपत्ति दलोकोनि के अनुमार पव+ (त्रि हृति) पक पक हति+पक त्रि-पक ह ह पर त्रि पर निx१२X7 त्रि) १२Xह मध्यच्छाक ह X२९XT हृX १२XT ग इसी तरह मन्तर पक्ष म भी समझना चाहिये ।।१८।। त्रि १२ - इमानी पुनमध्यवरानयनमाह । त्रिज्याऽक्षकरणंगुरिगता स्वतिभक्ता वा दलकर्ण । धु ज्यान्त्याघातहृदक्षश्रवरात्रिगुणकृतिघातो वा ॥१६॥ विभा-त्रिज्या अक्षवर्णगुणिता (पतक्रागुणिता) स्वधृतिभत्ता (तिविभता) वा (प्रथवा) शुदलवणं (मध्यण ) भवतीति ।।
स्पष्टाधिकारः अथवा अक्षश्रवणत्रिगुणकृतिघातः (पलकर्णत्रिज्यावर्गवधः) द्यु ज्यान्त्या घातहत् (धु ज्यान्त्या घातभक्तः) तदा मध्यकर्णो भवेदिति ॥१६॥ अत्रोपपत्तिः । १२४ हृति = शङ्क त्रि.१२=मध्यकर्ण । परन्तु. त्रि.१२.पक = त्रि १२ 1 पक पक.मि' प्रथ शकु तत उत्थापनेन त्रि.पक =मध्यकर्ण एतेन १२ हृति १२ हृति हृति पक प्रथमप्रकार उपपद्यते ।। अथ ा ज्यान्त्याघातहदित्यादिश्लोकोक्त्या पक प्रि' 'द्य ज्या.अन्त्या द्यु हृति.नि धु पक.त्रि पक त्रि. १२श पक.नि.१२ शं त्रि १२४ हृति हृति.त्रि हृति त्रि.१२ श हृ.१२४श हृति श त्रि १२ मध्यकर्ण एतेन द्वितीयप्रकार उपपद्यत इति ।। श अथवा १०हति त्रि.१२ =मध्यकर्ण । पर शकु शक, अत उत्थापनेनत्रि १२ विपक-मकर्ण । यत अन्त्याःद्य :- विपक दिपक पक १२४ हृति पक मि४१२४पक -हुति १२ हृति हृति त्रि यि पक नि अतो हृतेरुत्थापनेन = मध्यकर्ण अन्त्या द्य अन्त्याधु अन्त्याःद्यु नि प्रत उपपन्नमाचार्योंक्त मध्यकर्णानयनमिति ॥१६॥ हि. भा ---वा विज्या से पलवर्ण से गुणकर हृति मे भाग देने गे मध्यपणं होता है। अथवा पलकणं मोर त्रिज्यावर्ग के पात को घुज्या पोर मन्या ये पात मे भाग देने से मध्यकर्ण होता है ॥ १६॥ उपपत्ति । . १२ इति = गनु गगे मप्यपणं वे स्यम्प में गंतु पर त्रि.१२=मध्यकर्ण । परन्तु सार त्रि.१२ से उत्थापन देने में १२४इति त्रि १२.पर हति D जि.स हम मापन दगगे प्रथम प्रगर उपनामा॥
वटेश्वर-मिद्धान्ते द्वितीय प्रकार के लिय उपपत्ति । त्रि १२ मध्यवर्ग । परन्तु १२ हृनि गा इसमे उत्थापन देने पक विपर अन्या शबु नि १२ १२ हनि पक पि१२ पक १२ हृति -मवर्ग । यन MEXY = हति हनि विपक इममे मध्यवर्ण स्वम्प मे हृति का उत्यापन देन में दिपक मि प्रत्याधु अन्त्या द्य नि त्रि पर अन्त्या द्यु = मध्यक्ग्ग इसमें प्राचायावत मध्यक्रनयन उपपन हुना ॥१६॥ इदानी मध्यच्छायानयनमा । दृाज्याऽक्षश्रुतिगुणिता तद्वतिभक्ता द्य दलमा स्यात् । भावृत्ते स्वाग्रा याऽत्रश्रवणहता धृतिविभक्ता ॥२०॥ तत्पलभा विवरंक्य द्युदलाभा सोम्ययाम्ययोर्वा स्यात् ॥२०॥ मि भा -हग्ज्या प्रक्षश्रुतिगुरिंगता (पकलरगंगुणा) तहतिभक्ता (हृति- विभक्ता) तदा द्य दलभा (मध्यच्छाया) म्यादिनि ॥ २०-२० ।। वा (अथवा) स्वाना (निज्या गोलीयाना) या सा-क्षश्रवणता (पलकर्ण- गुणा) धृतिविभक्ता (हनिभक्ता) तदा भावृत्त (छायावृत्त) अग्ना भवेत् । सौम्य- याम्ययोगोल (उत्तरदक्षिणयोगों7) तत्पतभा विवरैक्य (छायाणगौलीयाना पलभयोरन्तरवय) तदा द्य दलभा (ध्यच्चाया) भवेदिति ॥२०-२०२॥ अनोपपत्ति । हग्ज्या १२ मछाया । परन्तु शकु ग तत उत्थापनेन दृग्ज्या १२ हाज्या १२ पक १२ हति पर एतेन प्रथमप्रकार उपपद्यते । अथ छायाकर्णगोलीयाना= अग्रा छावरण नि परन्तु धावर्ण हति तत उत्थापनेन अग्रानि पर अनापक हृति -छायावर्गगोलीयाना। अग्रागकुतल-भुज, पर छायावर्णगाने पभा-शत्तत छायावणे अग्रा पलभा छायावर्णगोले मध्यभुज - मध्यछाया प्रथ हग्ज्यापक =मछा १२ हति 2 निपक निहनि
the
१२.हति -
%3-
2
जोड़ना तय मध्यच्चामा होती है या पण्डित लोग हममेमन्य प्रारीयोभी समझे ॥२१॥ ।
स्पष्टाधिकार:
एतेन भावृत्ते स्वाग्रा याऽक्षयवरणहतेत्याधुपपद्यत इति ।।२०-२०३।।
हि.भा.दृग्ज्या को पलकणं से गुणा कर हृति से भाग देने से मध्यछाया होती
। अथवा अग्रा को पलकर्ण से गुणाकर हृति से भाग देने से भावृत्तीय (छायाकर्णगोलीय)
प्रया होती है । उत्तर और दक्षिण गोल कम से उसके (छायाकरणंगोलीयाग्रा के) और पलभा
के अन्तर और योग करने से मध्यच्छाया होती है ।।२०.२०॥
उपपत्ति।
हाज्या.१२
'=मध्यच्छाया। परन्तु
शंतु इससे उत्यापन करने से
पक
दरम्या.१२ हग्गा १२.पक
दृाज्यापक
मध्यच्याया।
१२.हृति १२.हृति हृति
इससे प्रथम प्रकार उपपत्न हुमा ॥ २०-२० ।
छायाकर्णगोलीयाना-
अगा.छायाक
त्रि.पक
'=छायाएं
मि
इससे छायाकर्ण गोलीयाना के स्वरूप में छायाकणं को उत्थापन करने से
प्रग्ना त्रिपक प्रग्रा.पक
छायारण गोलीयामा
हृति
भग्राभांकुतल = भुज । परन्तु छायाकर्ण गोल मे शकुतलपलमा इमलिये छाया-
पणंगोलीयाना पलभा-पायागोभुज ==मछाया इसमे भावृत्ते स्वाना याक्षश्रवणहता
इत्यादि आचार्योत मध्यच्छायानयन उपपन्न हुमा ।। २०-२०३।।
पुनमध्यच्छायानयनमाह
भावृत्तानोनयुते पलभे दिनाघमेस्तोऽथवा गोले।
सौम्ये याम्ये झेयाः सुधियाऽज्ये या प्रकाराश्च ॥२१॥
पि. भा.- अथवा सौम्ये याम्ये गोले (उत्तरदक्षिणगोले) भावृत्तानोनयुते
पलभे (छायावृत्तोयाग्रा रहितराहिते पलभे) दिनाथंभे (मध्यच्यापे) स्तः (भवतः)
पा मुधियाऽन्ये प्रकाराश्य ज्ञेया इति ॥२१॥
अयोपपतिः।
अस्योपपत्तिः पूर्वश्लोकोपात्त्येव स्फुटेति ॥ २१ ॥
हि. मा.-प्रथया उत्तर दक्षिण गोल में छापावृत्तीयामा को पसभा में पटाना, मौर
1 परन्तु
हति
नि. हृति
उपपति।
इनकी उपपत्ति पहले तो मी उत्पत्ति में स्पष्ट है ॥२१॥
५७०
यटेश्वर सिद्धान्ते
इदानी धुज्यानत्ययोरानयनमाह ।
पलकण्हतत्रिगुरणकृतिः कर्णप्रयुज्ययाताया।
फर्णाऽन्त्याघातहृता लब्धा घुज्या ततो भवति ॥२२॥
वि मा --पलकर्णहतत्रिगुणवृतिः (पलफणं गुरिणतत्रिज्यावर्ग.) कर्णन-
धुज्ययाऽता (छायावर्णगुणिताज्यया भक्ता) तदाऽन्त्या भवति । पलकणंहत-
त्रिगुणकृति. कर्णान्त्याघातहृता (छायाकर्णान्त्याघात भक्ता) लब्धा ततोऽन्त्यातो
य ज्या भवतीति ॥२२॥
अत्रोपपत्तिः ।
अथ द्यु ज्यान्त्या घातहृदक्षथवरणनिगुणकृतिघात इत्यादिना
त्रि' पक
नि' पक
==मकर्ण.
-अन्त्या
धु अन्त्या
धु मकर्ण
नि' पक
त्रि' पक
वा
=अन्त्या यु..
-धु । अत उपपद्यते प्राचार्यो-
मक
मक.अन्त्या
क्तमिति ॥२२॥
हि भा -पलक्रांगुणित विज्यावर्ग मे छायावर्ण गुरिणत | ज्या से भाग देने से
अन्त्या होती है । पलकर्णगुरिणत त्रिज्यावर्ग में छायाएं और अन्त्या के घात से भाग देने
से युज्या होती है ॥२२॥
उपपत्ति।
शुज्यान्याघातहृदक्षयवरात्रिगुणकृतिवात" इत्यादि से
त्रिपक
त्रि' पक
=मध्यकर्ण। :.
अन्त्या।
ध.मक
धु प्रन्या
वि.पक
त्रिपक
वा
-प्रन्या उ..
=धु ।
.
मक प्रत्या
'इमसे प्राचार्योक्त उपपन्न हुना ॥२२॥
इदानी हत्यानयनमाह ।
धु गएत्रिगुणान्तरगणितान्त्या त्रिज्याहित्फलोनिता च धृतिः।
चाकुगुरण चरगुरणान्तरगुरिणताऽन्त्या चरगुणहत्फलोनिताच धृतिः॥२३॥
वि. भा.- अन्त्या-द्य गुणत्रिगुणान्तरगुणिता (द्य ज्यात्रिज्यान्तरगुरणा)
त्रिज्याहत (विज्याभला) फलोनिता (फलरहिता) अन्त्या, वृतिः (हृति )
भवेत् । वा, अन्त्या कुगुणचरगुणान्तरगुणिता(कुज्याचरज्यान्तरगुरणा) चरगुरणहृत्
(चरज्याभक्ता) फलोनिता (फलरहिता) अन्त्या-धृतिः (हृति ) भवेदिति ॥२३॥
त्रिप्रश्नाधिकारः ७. %3- %3D . अत्रोपपत्ति.! अन्त्या (त्रि-द्य) अन्त्या त्रि-अन्त्या.त्रि+अन्त्या. धु श्लोकोक्त्या अन्त्या- त्रि त्रि अन्त्या. द्य (चरज्या-कुज्या) अन्त्या =हतिः । एवमेव अन्त्या- नि चरज्या अन्त्या. चज्या-ग्रन्त्या. चज्या+अन्त्या. कुज्या अन्त्या. कुज्या चज्या चरज्या अन्त्या. द्य हृति । अत प्राचार्योक्त युक्तियुक्तमिति ॥२३॥ त्रि इति वटेश्वरसिद्धान्ते त्रिप्रश्नाधिकारे द्यु दलभादिविधिर्नवमोऽध्यायः ॥ हि. भा -अन्त्या को रिज्या और धुज्या के अन्तर से गुणकर त्रिज्या से भाग देने से जो फल हो उसे अत्न्या में घटाने से हृति होती है । वा अन्त्या को कुज्या और चरज्या के अन्तर से गुणकर चरज्या से भाग देने जो फल हो उसे अन्या मे घटाने से हृति होती है ॥२२॥ उपपत्ति श्लोकोक्ति के अनुसार अन्रया- अन्त्या (त्रि-धु)_अन्त्या. त्रि-अन्त्या. त्रि+अन्त्या. घु नि দি अन्त्या द्यु =हृति । इसी तरह त्रि (चरज्या-कुज्या) अन्त्या अन्त्या चज्या-प्रत्या. चज्या+कुज्या. अन्त्या अन्त्या- चज्या चज्या कुज्या अत्या-द्यु. प्रन्त्या -हृति । अत: प्राचार्योक्त युक्तियुक्त है ॥२३॥ चज्या त्रि इति वटेश्वरसिद्धान्त के विप्रश्नाधिकारमे द्यु दलमादिविधि. नामक नवम अध्याय समाप्त हुआ। %3D- दशमोऽध्यायः प्रथेप्टच्छायाविधि. तत्र कर्णवृत्ताग्रावशेन छायानयनमाह । भावृत्ताग्राक्षज्याघात कुज्याहतो द्युतिश्रवणः । भावृत्ताना लम्बज्याघात. क्रान्तिज्ययाप्तो वा ॥१॥ भावृत्ताना त्रिज्यावघोऽथवा भाजितोऽपया भवति ।।१३।। वि भा-भावृत्ताग्राक्षज्याघात (छायाकर्णगोलीयाग्राऽक्षज्यावध ) कुज्या हृत (बुज्याभाजित ) फल धुतिश्रवण (छायाकर्ण ) भवेत् । वा भावृत्ताग्रालम्ब याघात (छायाकर्णगोलीयाग्रा लम्वज्यावध ) क्रान्तिज्ययाऽप्त (क्रान्तिज्यया भक्त फल छायाकों भवेत् ।। अयवा भावृत्ताग्रा त्रिज्यावध (छायाकर्णगोलीयाना निज्याघात ) अग्रया भाजित फल छायाकर्णो भवति ॥११॥ %3DC अनोपपत्ति । शोकोक्त्या छायाकर्णगोलीयाना अमज्या. अग्रा छायापर्ण अक्षज्या कुज्या वि कु त्रिx छायाकर्ण -छायाकर्ग । यत अग्रा छाकर्ण =छायाकणंगो अग्रा त्रि त्रि प्रणा अक्षज्या =त्रि कुज्या प्रत सिद्धम् । छायाकर्णगोनमा अक्षज्या. अक्षज्या लज्या तथा छायापर्ण । पर बुज्या भाज्या छायाकर्णगोग्रग्रा लज्या छायार्ण। प्रांज्या छायावर्णगोअग्रा लि अत्रा छायाकरणं नि छायाकर्ण । वि अग्रा एतेन सर्व सिद्धमिति ॥१-१३। - ज्या : तथा प्रमा - %3D %3- नि. ज्या श्लोकोक्याछायाकरणंगोअग्रा. हग्ज्या_अप्रा. ठानागाहमा हि भा-छायावृत्तीयाग्रा और हाज्या ईद मागे भागगराया विप्रनाधिकारः हि.भा.-छायावृतीय प्रणा और प्रक्षज्या के घात को कुण्या से भाग देने से घाया- वर्ण होता है । वा छायावृत्तीय प्रणा मौर लम्बग्या के घात यो क्रान्तिज्या से भाग देने से छायारणं होता है । पयवा छायावृत्तीय प्रणा और विज्या के पात को प्रग्रा रो भाग देने छायापर्ण होता है ॥११॥ उपपत्ति। दलोकोक्ति के अनुसार छायावरणं गोममा माज्या बुग्या अग्रा घायारणं. पक्षज्या_नि घायापर्ण, भग्रा. छाक छायाक. यत. = छायावगोपना नि पग्रा.प्रक्षज्या % 3D -त्रि पुग्या :. सिद्ध हुमा ।।१-१६॥ दायावर्णगोप्रपा अक्षज्या भाज्या संज्या =छायाकणं । लेक्नि युज्या प्राज्या पुण्या इसलिए छायावर्णगोपग्रा लग्या छायारणं । प्राज्या छायावर्णगोपना त्रि_भग्रा. छायापणं त्रि अग्रा :. सिद्ध हो गया ॥१-१३॥ इदानी कर्णवृत्तासावशेन छायानयनमाह । भावृत्ताना दृग्ज्यावधेऽप्रया भाजिते भवेच्छाया ॥२॥ वि. मा-भावृत्ताग्रा दृग्ज्यावये (छायाकणंगोलीयाग्रा दुम्मा अग्रया भाजिते (अग्राभक्त) तदा छाया भवेदिति ॥२॥ अयोपपत्ति । छायावर्ण. दृज्या = छाया :: सिद्धम् ॥२॥ त्रि होती है ॥२॥ तथा -- छायारणं तथा मना अग्रा त्रि.मा
वटेश्वर-सिद्धान्ते
उपपत्ति
प्रया छाकणं दृग्या
E-
सोकोक्ति के
दायापर्णगोप्रना हग्ज्या
अनुसार
मग्रा
त्रि प्रमा
छाकर्ण हग्ज्या
= छाया । मत प्राचार्योक्त युक्तियुक्त है ॥२॥
त्रि
इदानी शक्वानयनमा ।
त्रिज्याऽम्यिस्ता कर्णहृता सर्वदा भवेच्छवः।
दृग्ज्या सूर्याभ्यस्ता प्रभा हता वा भवेच्छङ्कः ॥३॥
वि भा -त्रिज्या-अर्काभ्यस्ता (द्वादशगुणिता) कर्णहता (छायाकर्ण-
भक्ता) सदा सर्वदा शकुभवेत् । वा दृग्ज्या सूर्याभ्यस्ता (द्वादगगुरिगता) प्रभाहृता
(छायाभक्ता) तदा शकुर्भवेदिति ॥३॥
अनोपपत्ति ।
त्रि १२
छायाक्षेनानुपातेन
छायाकर्ण
=शकु
दृाज्या १२
त्रि
दृग्ज्या
तथा
शकु। यत
छाया
छाकर्ण छाया
:: युक्तियुक्तमेवोक्तमाचार्यगेति ॥३॥
हि भा-त्रिज्या को बारह से गुणकर पायारणं से भाग देने से दाकु होता है ।
वा ज्या को बारह से गुणकर छाया से भाग देने से शक होता है ।।३।।
उपपत्ति ।
छायाक्षेत्र के अनुपात से
त्रि. १२
त्रि
=कुरा तथा
हाज्या
छाया
छावण
दाकण
त्रि १२
इसलिये
राज्या १२ मा । : आचार्योक्त युक्तियुक्न है ॥३॥
छावणं दाया
पुनस्तत्मांधनान्याह ।
समनुकान्त्यवलम्बग्या सूर्यहि ताडित नृतलम् ।
क्रमशोऽप्रा फुग्यासगुपपलमाहतं नरा. स्युर्वा in
वि भावा नृतल (शङ्कतल) समन्नान्त्यवलम्वज्या मूर्य (ममाङ्क-
प्रान्तिग्यालम्बज्याद्वादशमि ) ताडित (गुणित) प्रमश प्रग्राज्याऽक्षगुणपल
हत (प्रमायुज्याऽक्षज्यापलभाभिभक्त) तदा नरा (गढ़व ) स्युरिनि ॥४॥
५७५ त्रिप्रश्नाधिकार अग्रा लज्या शङ्कतल -शङ्का अनोपपत्ति । अक्षक्षेनानुपातेन समश शङ्कतल =शङ्क। काज्या शङ्क तल शङ्क। कुज्या १२Xशङ्कतल.. 'श कु । अत प्राचार्योक्तपद्य अक्षज्या पभा मुपपन्नम् ॥४॥ हि भा-अथवा शकुतन को समश कु क्रान्तिज्या, लम्वज्या और द्वादश से अलग अलग गुणवर क्रम से अग्रा, कुज्या, अक्षज्या और पलभा से भाग देने से श कु प्रमाण होते हैं ॥४॥ उपपत्ति। सप्रश शकुतल =शङ्क काज्या शङ्क तल कुज्या =श कु। अक्षक्षेत्र के अनुपात से अग्रा इससे आचार्योक्त पद लज्या शकुतल अक्षज्या १२ शङ्कतल =श कु। तथा- पलभा उपपन हुमा ॥४॥ प्रथेष्टशक्वानयने। स्वधृतिस्वान्त्ये गुणिते धुदलनरेण क्रमाद्विभक्त च। धृत्यान्त्याभ्या लब्धावभीष्टकालोद्भवौ शङ्क ॥५॥ वि भा -स्वधृतिस्वान्त्ये (इष्टहृतीष्टात्ये) द्युदलनरेण (दिनाधशकुना गुणिते, क्रमात् (क्रमश ) धृत्यान्त्याभ्या (हृतिमध्यान्त्याभ्या ) विभक्त (भाजिते) लब्धौ अभीष्टकालोद्भवौ शकू (इष्टकालिको शकू) भवेतामिति ॥ मध्यान्त्यपा. त्या कथ्यते सवति ॥५॥ अत्रोपपत्ति । अक्षक्षेत्रानुपातेन श कुXइह -इप्टश कु । श कुमध्यश च । ६% अन्त्या मध्यहृति । परन्तु चुह अत उत्थापनेन शकु.४ इद्द - त्रि अन्त्या द्य वि श कुx इह त्रि_श कु इअन्त्या --इप्टश कु । अत उपपनमाचार्वोच्च ॥2॥ अन्त्या धु हि मा-इष्टहृति और इष्टान्या को दिनाधान, म गुणकर कार का प्रत्या से भाग देने से इशक होते हैं । यहा दो प्रकार मे इष्णद, कमim -- अन्त्या वटेश्वर-सिद्धान्ते उपपत्ति अत्रक्षेत्र के अनुपात मे शङ्क, इद्द = इष्टराष्ट्र, हति मध्यहृति परन्तु अन्त्या द्य =ह इप्टशक वे स्वरूप में इति को उत्थापन देने से सका. इद्द ह मन्या घु पि राष्ट्र इह त्रि शक, इप्टान्त्या -इप्टाई। अन्त्या इससे प्राचार्योक्त उपपन हुआ ॥५॥ %- मन्त्या धु पुन प्रकारान्तराम्या तदानयनगाह । स्वधतिविजिता धृत्या नतोत्क्रमज्यया वा हतो द्युदलशङ्क। घृत्याऽन्त्याम्या भक्त फलोनित संव चेष्टनर ॥६॥ वि मा-धुदलश कु (मध्यश कु) स्वधृतिविवर्जिताधृत्या (इष्टहृति- रहितहत्या) वा नतोत्क्रमज्यया (नतकालोत्तमज्यया) हत (गुरिणत ) धृत्याऽन्त्या- भ्या (हृत्यन्ताभ्या) भक्त (भाजित ) फलोनित (फलरहित ) स एव (धुदलश वु रेव) तदेप्टश कुर्भवेदिति ॥६॥ अत्रोपपत्ति । अक्षक्षेत्रानुपातेन च इह -इश श इह. - इष्टश कु, एतस्य श को विशोधनेन ह ॥ इह श है-श इहु._श (ह- इह) ह ह इद शक्वन्तर(शकु)अस्माद्विशोध्य तदेष्टशकु श-शक्वन्तर= इष्टश- ह -इ अन्त्या श इह श इअन्त्या प्रथ अन्त्या अन्त्या ==इशकु । एतस्या( सत्र ह प्रन्त्या विशोधनेन श- श इअन्त्या_श ग्रन्त्या-श इ अन्त्या अन्त्या अत्रया श (अन्त्या-इष्टान्त्या)_श नतोक्रमज्या, शक्वन्तर अन्त्या अन्त्या -श-अन्तर- श. इअन्त्या -इश कु । प्रत उपपन्नमाचार्योक्तम् ॥६॥ अन्त्या हि भा.-इष्टश कु को इप्ट रहित इति से वा नतकाल की उत्क्रमज्या से क्रमश गुणाकर, हृति और मत्या से भाग देने से इष्टशक होते हैं ।।६।।
मिप्रश्नाधिकार ५७७ उपपत्ति प्रक्षक्षेत्र के अनुपात से ही इह - इ स इसको (श) मे घटाने से श - है - = शक्यन्तर, इम राबवतर यो (श) इसने घटाने मे ह श इह %E- ' पठाने मेश अन्या इप्टाक। ह श इप्रन्त्या ह 'इश इमरो (स) इसमे ह इप्रत्या स प्रत्या--- इअन्त्य श (मन्त्या-- इमल्या) अन्रया प्रत्या अन्त्या श नतोक्रमज्या गववन्तर, श दावतर-इरानुन अन्त्या मत प्राचार्योस्त उपपन्न हुमा ॥६॥ इदानी पुनरिष्टश क्यानयनमाह । क्रात्पुत्क्रमगुणरविहतिरक्षश्रु तिहत्पलोकमज्या च । युग्विवर तत्स्वान्त्यम्न त्रिज्याहृत्फलवियुक्तासेष्टनर ॥७॥ विमा-~-कान्त्युत्क्रमगुणविहति (कान्त्युत्क्रमज्या द्वादशपात | अक्ष थुतिहत् (पलकहत) पलोकमन्या (प्रक्षायोत्क्रमज्या) युक् (युता) विवर (विवरसज्ञकम्) तत्स्वान्त्यन्न (इप्टान्त्यया गुणित ) त्रिज्याहृत् (त्रिज्याभक्त) फलवियुक्ता सा (कलरहिता सेप्टान्त्या) इष्टनर (इष्टश कु )भवेदिति ॥७॥ अयोपपत्ति इलोकोक्त्या १२४ान्युकमज्या पक पक १२ ति_१२ द्यु लज्या-१२ यु अताक्षाशोत्क्रमज्या योजनेन लज्या- % पक पक पक पर्व १२x+अक्षाशोत्क्रमज्या त्रि-१२ धु-विवरसज्ञकम् इष्टमिष्टान्त्यज्यया इअन्त्या गुणित त्रिज्याभक्त तदान (त्रि-१३) त्रि -इन्स्या- १२यू इअन्त्या १२ इह इअन्त्या-(इअन्या-इशकु)-इष्टशकु । अत प्राचार्योक्त युक्तियुक्तमिति ।।७।। -इसन्त्या- -अन्त्या- इस पक त्रि पक ५७८ वटेश्वर-सिद्धान्ते हि भा-प्रान्ति की उत्तमभ्या और बारह वे घात में पलवणं से भाग देकर फ्ल म अक्षाश की उत्क्रमज्या जोडकर जो हो उसका नाम विवर रखना, उसको (विवर को) इटान्त्या से गुण कर त्रिज्या से भाग देने से जो हो उसको रवान्या (एटा त्या) में घटाने से इष्टशकु होते हैं ।। ७ ॥ उपपत्ति। १२ धु श्लोकोक्ति के अनुमार १२ क्राउज्या पक १२ (त्रि-) = १२ वि पक पक पक लज्या- १२ धु इसमे अक्षाश की उत्क्रमज्या जोडने से पक लज्या- १२ धु पक +अक्षागोरक्रमज्या:-त्रि- १२ धु -विवर। पर १२ घुइमन्त्या इमको इप्टान्त्या स गुणकर त्रिज्या से भाग दने से इअन्त्या- पर त्रि -इशान्त्या- १२ इह -इशन्त्या-इदा इसको इप्टान्त्या म घटाने से इएशकु पक होते हैं ॥७॥ इदानीं मध्यशकुतोऽभीष्टकोरानयनमाह । विवरोनत्रिज्याना स्वान्त्योनाऽन्त्या विभज्यया भक्ता। फलविपुतो मध्यनरोऽभीष्टनरो युतो मध्य. ॥८॥ वि भा - स्वान्त्योनाऽन्त्या (दष्टान्त्या रहिताऽन्त्या) विवरोनत्रिज्यामा पूर्वानीतविवररहितत्रिज्यागुरिणता) विभज्यया भक्ता (विज्याभक्ता) फलवियुत (फलरहित ) मध्यनर (दिनार्धाकु ) अभीष्टनर (इश ) भवेत् । फलयुतो- भीष्टनरो मध्य (मध्य) भवेदिति ॥८॥ अयोपपत्ति । पूर्वानीतविवरस्वम्पम् =प्रि- १२ यु अनेन रहिता त्रिज्या गि- (त्रि- १२१)-नि--वि+ २६ - १२ यु अगेन (अन्त्या--इष्टान्त्या) गुरिणता विग्यया भाजिता तदा १२ (पन्त्या---ग्रन्त्या)-- १२ द्यु अन्त्या १२ धुइअत्या पर त्रि पनि पक ५७६ स्पष्टाधिकार =दि : शकु~-इशकु अनेन रहितो दिनार्यशकुरिष्टशकुर्भवेद्यदि चान वेष्ट दाकुर्योज्यते तदा दिनार्धशकुर्भवेदिति it हि भा - इप्टात्या रहित प्रत्याको विवर रहित त्रिज्या से भाग देने से जो फल हो उसको दिनार्ध शकु म घटाने से इशक होता है और फ्ल म इष्टशकु को जोडने से दिनाशक होता है | उपपत्ति । पक १२ धु. पक पक १२ । प्रत्या १२ घुइमत्या पकत्रि श्लोकोक्ति के अनुसार क्रिया करते हैं। पूर्वानीत विवर का स्वरूप = प्रि--१२ धु इसको त्रिज्या मे घटाने से त्रि- (नि- १२३)=ft--त्रि+ १२ धु इससे (अत्या- इस त्या) इसको गुणकर त्रिज्या से भाग देने से १२ धु-(अन्त्या-इअन्त्या)- पकनि पक वि दि : शकु--इष्टशफल, दिई श~फल=दि : श-~ -( दिश-इश) -इस वा फल+इ-दि-इश+इश = दि ३१ प्राचार्योक्त क्थन युक्तियुक्त है 1१८॥ इदानीमुमतकालानयनमा । धृति कुज्योनसमेता सौम्येतरयोर्भवेद् गुण्य । त्रिज्या चरजीवाभ्यो गुरिणतो गुण्यो गुरएकुगुणभक्त ॥६॥ तदनुरूनसमेत चरासुभि स्यात्समुन्नतकम् ॥ वि भा - सौम्येतरयोगोले (उत्तरदक्षिणयोगोले) धृति (हनि ) कुज्योन- समेता (कुज्यया रहिता सहिता च) तदा गुण्य (कला) भवति । गुण्य (कला) पृथक त्रिज्याचरजीवाभ्या (त्रिज्याचरज्याभ्या) गुणित क्रमश धुगुणकुगुणभक्त (धुज्या कुज्याभ्या भाजित ) तद्धनु (तचाप) चरासुभिर्गोलक्रमेयोनसमेत तदा समुन्नत (उनतकाल ) भवेदिति ॥ ६ ॥ अमोपपत्ति । ग्रहात्स्वोदयास्तसूत्रोपरि कृतो लम्बो हृति (धृति ), तथा ग्रहादेव निरक्षो- दयास्तसूत्रीपरिलम्ब कला (गुण्य ) ! अथोत्तर दक्षिणगोलक्रमेण हृतिककुज्या= कला-गुण्यस्वोदयास्तनिरक्षोदयास्तसूत्रयोरन्तरम् -कुज्या । अयरविविम्बके द्रगत ध्रुवप्रोतवृत्तनाडोवृतसममातात्पूर्वस्वस्तिक यावत्सूत्रचापम् । एतज्ज्यामून अथ भूकेन्द्रादविविम्बकेन्द्रगतध्रुवप्रोतवृत्तनाडीवृत्तसम्पात ज्ञातत्यम्। यावदानीत त्रिज्यासूत्र कण । सूत्र भुज । सूत्रमूना केन्द्र यावत्पूर्वापरसने कोटि - % 3D सज्ञ %3- . ५८० वटेश्वर सिद्धान्त रिति कर्णभुजकोटिभिरुत्पन्नमेकं त्रिभुजम् । तथाऽहोरात्रवृत्तगर्भकेन्द्राविविम्बकेन्द्रा- वधि धुज्याकरणं. । कला (गुण्य.) भुजः । निरक्षोदयासूत्रे कोटिरिति वर्णभुजकोटि- भिरुत्पन्न द्वितीय विभुजम् । एतयोस्त्रिभुजयोस्त्रिज्यायुज्ये समानान्तरे तथा कोटिरेखे अपि समानान्तरेतेनैकादशाध्याययुक्त्या कोटिकाभ्यामुत्पन्नकोणमाने समाने निष्पन्न, एकैक: कोणः समकोणत्वात्समान एवातस्तृतीयकोरायोरपि समत्वादुक्तत्रिभुजयोः साजात्यानुपात. गुण्य त्रि_ कला . नि कला .चज्या द्यु धु कुज्या = सूत्र एतच्चाप रवि- बिम्बकेन्द्रगतध्रुवप्रोतवृत्तमाडीवृत्तसम्पातात्पूर्वस्वस्तिकावधिनाडीवृत्ते सूत्रचापम् क्षितिजाहो रानवृत्तसम्पातगतभुवप्रोतवृत्तनाडीवृत्तसम्पातात्पूर्वस्वस्तिकावधिनाढीवृत्ते चरम् । एतच्चर गोलक्रमेण सूत्रचापे रहित सहितं च तदा रविबिम्बकेन्द्रो- परिगतध्रुवप्रोतवृत्तनाडीवृत्तसम्पाताद्रषिविम्बीयाहोरात्रवृत्तक्षितिजवृत्त सम्पातगत ध्रुवप्रोतवृत्त नाड़ीवृत्तसम्पात यावन्नाडीवृत्ते-उन्नतकालमानं भवेदिति ॥६॥ हि. भा.-उत्तर गोल मे और दक्षिण गोल मे हृति (धृति) में कुज्या को घटाने से और जोडने से गुण्य (क्ला) होता है । गुण्य (कला) को अलग अलग त्रिज्या और चरज्या मे गुण कर क्रम से युज्या पोर कुज्या से भाग देने से जो फल हो उसके चाप में चरासु को गोल कम से हीन और युत करने से उन्नत काल होता है ।। ६६ ॥ उपपत्ति । ग्रह से स्वोदयास्त सूत्र के ऊपर जो लम्ब होता है उसे हृति(धृति)कहते है । ग्रह से निर- क्षोदयास्त मूग ऊपर जो लम्ब होता है उसे कला (गुण्य) कहते हैं । स्वोदयास्त सूत्र मोर निरक्षोदयास्त सूत्र के अन्दर कुज्या है प्रत उत्तर दक्षिण गोल क्रम से हृति+कुज्या कला =गुण्य । रविबिम्ब केन्द्रगत ध्र वनोतवृत्त नाडीवृत्त के सम्पात से पूर्व स्वस्तिकपर्यन्त नाडी. वृत्त मे सूत्र चाप है । इसको ज्या सूत्र है । भूकेन्द्र से रविविम्ब केन्द्रगत प्रवप्रोतवृत नाडी- वृत्त सम्पातगत रेखा त्रिज्या सूत्रकर्ण, सूत्रभुज, सूत्रमूल से भूकेन्द्रपर्यन्त पूर्वापर सूत्र में कोटि, इन कर्ण, भुज मोर कोटि से उत्पन्न एकजात्य त्रिमुज है। और महोरात्रवृत्तगर्भ केन्द्र से रविबिम्ब केन्द्रावधि ाज्या कर्ण, गुण्य (क्ला) भुज भोर निरक्षोदयास्त मूत्र में कोटि, इन कणं, भुज पोर कोटि से उत्पन्न द्वितीय जात्यत्रिभुज है । इन दोनो त्रिभुजो गे त्रिज्या मोर धुज्या समानान्तर है, तथा कोटि रेखा भी समानान्तर है इसलिए एकादगाध्याय थी युक्ति से कोटि और कर्ण से उत्पन्न कोण दोनो त्रिभुज मे वरावर हुए। दोनो त्रिभुचों मै एक-एक कोण समकोण है इसलिए अवशिष्ट तृतीय कोण भी तुल्य होगा, अत. दोनो कला चरज्या त्रिभुजो के सजातीय होने से अनुपात करते है गुण्य त्रि-क्ला त्रि कुंज्या इस चाय करने से रविविम्ब केन्द्रगत ध्रुवप्रोत वृत्त नाडीवृत्त के सम्पात से पूर्व स्वस्तिक पर्यन्त नाडीवृत्त मे मूत्रचाप हुमा । क्षितिजाहोरात्रवृत्त सम्पातगत ध्रवप्रोतवृत्त नाडीवृत्तसम्पात से पूर्वस्वस्तिक पर्यन्त नाडीवृत मे चरामु है । गोलक्रम में सूत्रचाप मे चरासु को घटाने मे और जोडने से रविविम्ब केन्द्रोपरिगत ध्र व प्रोतवृत्त नाडीवृत्त के सम्पात में द्यु 24 और दक्षिण गोल मे चरामु को घटाने और जोडने से उन्नत वालमान होता है ॥१०॥ स्पष्टाधिकार ५८१ रविबिम्बीयाहोरात्रवृत्त क्षितिजवृत के सम्पातगल प्रवप्रोतवृत्त नाडीवृत्त के सम्पात पर्यन्त नाडीवृत्त में उन्नत कालमान होता है ।। ६३ ॥ इदानी प्रकारान्तरेणोन्नतवालानयनमाह । धु दतश्रवणहताऽन्या स्वेष्टयवरणोद्ध ता फलस्य धनुः । घरामुभिरूनयुतं वा समुन्नतं सौम्यदक्षिणयोः ॥१०॥ विभा-अन्त्या (मध्यान्त्या) द्युदलश्रवणहता (मध्यकर्णगुणा) स्वेष्ट श्रवणोद्धृता (स्वेष्टच्छायावर्णोनभक्ता) फलमिष्टान्त्या स्यात्, तद्धनु (तच्चाप) सौम्यदक्षिणयो (उत्तरदक्षिणयोगोंले) स्वचरासुभि म्नयुत तदा समुन्नत (उन्नतकालमान) भवेदिति ॥१०॥ अग्रोपपत्ति । इहृति नि =इष्टान्त्या। पर -इहृति इष्टान्त्यास्वरूपे इटहृतेरु. अन्त्या इश हृति नि इप्टान्त्या। यत धु दिश अन्त्या इश ४१२xनि अन्त्याxइश xदि छाकर्ण दिश १२ त्रि १२ नि अन्यादि : छाकर्ण अन्त्या दि : छावर्ण -इष्टान्त्या १२xनि इछाकर्ण हृति इश स्थापनेन हुति इश नि - अन्त्या %3D -- %D अस्याश्चापमुत्तरदक्षिणयोगोलक्रमेण चरासुभिहीन युत तदोन्नतकालो भवेदिति ॥१०॥ इहति वि हि भा ~वा अन्त्या को दिनार्धकर्ण से गुणकर इष्टच्छायावर्ण भाग देकर जो फल हो उसका चाप करना उसको उत्तर गोल और दक्षिण गोल कम से अपनी चरामु करके घटाना और जोडना तव उन्नतकाल होता है ।। १० ॥ उपपति । हृति इस 'इष्टान्त्या, यत -इहृति धु दिश अन्त्या इश हृति इश त्रि हृति वि इसलिये -इष्टान्या:- यत धु दिश ध अन्त्या इश १२ त्रि हरभाज्यो नि १२ गुरिणती तदा दिश १२ त्रि १२ त्रि अन्त्या दि छाक अन्त्या दिई छाक - इष्टान्त्या इसके चाप में उत्तरगोल इछाक . दिई श प्रन्या अन्त्या इश दिइछाक १२ त्रि ५८२ वटेश्वर-सिद्धान्त इदानीमुन्नतकालादिष्टान्त्यानयनमाह । चरदलवियुतसमेतात्सौम्ययाभ्यगोलयोर्जीवाः । उन्नतजीवा जेया यया कलाभ्यस्तथाऽसुभ्यः ॥११॥ रिभा-सौम्ययाम्यगोलयो. (उत्तरदक्षिगगोलयो) चरदलवियुतसमे. तात् (चरासुरहितायुताच्च) उन्नतकालाद्याज्या सोन्नतकालज्या (मूत्रसज्ञिका) ज्ञेया इति कलाभ्यो यथा भवन्ति तथवाऽसुभ्योऽपि भवन्तीति ॥११॥ अस्योपपत्ति । अथोत्तरगोलक्षितिजाहोरात्रवृत्तयो. सम्पातोपरिगत ध्रवप्रोतवृत्त पूर्वस्व. स्तिकादपए नाडीवृत्त लगनि तद्धृवप्रोतवृत्त नाडीवृत्ते यत्र लग्न तत पूर्वस्वस्तिक यावन्नाडीवृत्ते चरासव । तथा तस्मादेव विन्दो (क्षितिजाहोरात्रवृत्तमम्पातो- परिगत ध्रुवप्रोतवृत्तनाडीवृत्तसम्पातात्) ग्रहोपरिगत ध्रुवप्रोतवृत्त नाडीवृत्तसम्पात यानाडीवृत्ते उन्नतकालोऽतोऽत्रोन्नतकाले यदि चरासुमान शोध्यते तदा पूर्वस्वस्ति- काद्ग्रहोपरि ध्रुवप्रोतवृत्त नाडीवृत्तसम्पात यावन्नाडीवृत्ते मूत्रचाप भवति, चाप- स्यास्यज्यासूत्रसज्ञकम् । दक्षिणगोले विपरीतस्थिति?ध्येति ॥११॥ हि भा -उत्तर गोल मे उन्नतासु मे चरामु को घटाने से और दक्षिणगोल मे ओडने से जो चाप होता है उसकी ज्या उन्ननज्या (मूत्र) होती है । यह उन्नतासु और चरासु से जैसे होती है उसी तरह उन्नतकला और चरक्ला से होती है ॥ ११ ॥ उपपत्तिा उत्तरगोल में शितिज और ग्रहोरात्रवृत्त के सम्पात के ऊपर जो ध्र व प्रोतवृत्त करते हैं वह नाडीवृत्त मे पूर्व स्वप्निक से नीचो लगता है जहा लगता है वहा से ग्रहोपरि। गत ध्र वप्रोतवृत्तनाडीवृत्त के सम्पात तक उन्नतकाल है तथा उसी बिन्दु (क्षितिज पोर अहोरात्रवृत्त के सम्पातोपरिगत ध्रुव प्रोतवृत्त नाडीवृत्त के सम्पात विन्दु) से पूर्वस्वस्तिक तक घरासु है. प्रत उन्ननकाल मे चरासु को घटाने से पूर्वस्वस्तिक से ग्रहोपरिगत ध्रवप्रोत- वृत्त नाडीवृत्त के सम्पात तक सूपचाप रहता है इसकी ज्या उन्नतज्या (मूत्र) होती है ॥ ११ ॥ सा चरदलगुरपयुक्ता सौम्ये याम्ये विजिता स्वान्त्या। प्रन्त्यानतोक्रमज्या विवजिता सा भवेत्स्वान्त्या ।। १२।। वि. मा --सौम्ये (उत्तरगोले) सा (उन्नतज्या) चरदलगुणयुक्ता (चरज्या. युता) याम्ये (दक्षिणगोले) विजिता (हीना) तदेष्टान्त्या स्यात् । नतोकमज्या विजिता (नतवालोलमज्यया रहिता) अन्त्या (मध्यान्त्या) सा स्वान्त्या (इष्टान्त्या) भवेदिति ।। १२॥
हता (गुरिणता) धुगुणकुगुणाभ्या (धुज्याकुज्याभ्या) पृथक् हृत् (भक्ता) तदा। ऽन्त्या भवेत् । सा चाऽन्त्या गोलक्रमेण चरदलवियुक्समेता ( उत्तरगोले चररहिता, स्पष्टाधिकार ५८३ अनोपपत्ति.। उत्तरगोले क्षितिजाहोरात्रवृत्त सम्पातोपरिगत ध्रुव प्रोतवृत्तसम्पातात्पूर्वापर रेखाया समानान्तरा रेखा कार्या सा च पूर्वापररेसातोऽध एव भवेत्तदुपरीष्टग्रहो परिगतध्र वप्रोतवृत्तनाडीवृत्तसम्पाताल्लम्ब कार्य संवेष्टान्त्या, इष्टग्रहोपरि ध्र व- प्रोतवृत्तनाडीवृत्तयो सम्पात्पूर्वापररेखोपरि यो लम्प सोन्नतरालज्या (सून) भवति । समानान्तररेखा पूर्वापररेखयो सर्वत्र चरज्या तुल्यमेवान्तरमत उन्नत- ज्या +चरज्याः इट'न्त्या । दक्षिणगोले विपरीतस्थिति । मध्यान्हकाले ग्रहस्य याम्योत्तरवृत्ते स्थितत्वात्तदुपरिगत ध्रवप्रोतवृत्त याम्योत्तरवृत्तमेव तन्नाडीवृत्त निरक्षखस्वस्तिके लगति निरक्षरास्वस्तिकात्पूर्वापरसूत्रोपरिलम्बो निरक्षोर्ध्वाधर- सून तेनेदमेव समानान्तररेखोपर्यपि लम्बो भवेत्तेन भूकेन्द्रान्निरक्षखस्तिक यावत् = निअन यदि चरज्या (पूर्वापररेखा समानान्तररेखयोरन्तररूपा) योज्यते निरक्ष- खस्वस्तिकात्समानान्तरेखा यावत्मध्यान्त्या (अन्त्या) भवेत् । दक्षिणगोले विपरीत- स्पिति । अन्त्याया यदीष्टान्त्यामान शोध्यते तदा नतकालोत्क्रमज्या भवति यदि नतकालोत्क्रमज्या मानमन्त्याया शोधयेत्तदेष्टान्त्या भवेदेवेति ॥८॥ हि भा-उत्तरगोल म उन्नतकालज्या म चरज्या को जोडने से और दक्षिणगोल म उन्नत कालज्या म चरज्या को घटाने से इष्टात्या होती है वा अत्या (मध्यान्त्या) में नतकाल की उत्क्रमज्या को घटाने से इष्टात्या होती है ॥१२॥ उपपत्ति । उत्तरगोल म क्षितिज और अहोरात्रवृत्त के सम्पात के ऊपर ध्र वप्रोतवृत्त नाडीवृत्त मे पूर्व स्वस्तिक से नीचा लगता है जहा लगता है उस विदु से पूर्वा पर रेखा के समानात. रेखा पूर्वापर सूत्र से नीचा होगा इसके ऊपर इष्टग्रह के ऊपर ध्र वप्रोतवृत्त नाडीवृन के सम्पात बिन्दु से जो लम्व होता है वही इष्टान्त्या है इग्रह के उपर ध्र वप्रोतवृत्त और नाडी वृत्त के सम्पाते पूर्वापर रेखा के ऊपर जो लम्ब होता है वह उन्नतकालज्या (मूत्र) है पूर्वा पर रेखा और समानान्तर रेखा के अन्तर हर जगह चरज्या के बराबर है अत ज्या+चरज्या इप्टान्त्या । दक्षिणगोल मे विपरीत स्थिति होती है । अत्या-इष्टान्त्या = नतकालोत्क्रमज्या वा अत्या-तकालोकमज्या=इष्टान्त्या गोल के ऊपर ये सब बातें स्पष्ट देखने में आती हैं ॥१२॥ उन्नत पुनरुन्नतकालानयनमाह । त्रिगुणचरगुणाम्या हता धृति युगुणकुगुणाभ्या हृदया। चरदलवियुक् समेता धनुश्च प्राग्वत्समुन्नतकम् ॥१३॥ वि भा-धृति (हृति ) पृथक् त्रिगुण चरगुणाभ्या (त्रिज्याचरज्याभ्या) ५८४ वटेश्वर-सिद्धान्ते दक्षिणगोले चरज्यायुक्ता) तदा यद्भवेत्तद्धनु. (चाप) प्राग्वत् (पूर्ववत्) समुन्न- तक (उन्नतकालो) भवेदिति ॥ १३ ॥ अत्रोपपत्तिः । त्रि अथ इति.त्रि चरज्या '%D अन्त्या। यत. =प्रतउत्थापनेन द्यु धु कुज्या इह.चरज्या -इअन्त्या। कुज्या उत्तरगोले इअन्त्या--चरज्या= सूत्रउन्नतकालज्या, अस्याश्चाप तदोन्नतकाल: दक्षिणगोले इअन्त्या+चरज्या-उन्नत कालज्या, अस्याश्चापमुन्नतकाल. । :: सिद्धम् ।।१३॥ हि भा -इष्टहति को अलग अलग त्रिज्या और चरज्या से गुणकर यु ज्या और कुज्या से भाग देने से इष्टान्त्या होती है उत्तरगोल मे उसमे चरज्या घटाने से दक्षिण गोल मे चरज्या जोडने से जो हो उसके चाप उन्नतकाल होता है ॥१३॥ उपपत्ति । इति त्रि इहति चरज्या, त्रि चरज्या '-इप्टान्त्या- द्यु कुज्या कुज्या तत पूर्ववत् इष्टान्त्या-चरज्या उन्नतकालज्या, उत्तरगोल मे दक्षिण गोल मे इष्टान्त्या+चरज्या उन्नतकालज्या इसके पाप करने से उन्लतरकाल होता है ॥१३॥ हदानी विशेषमाह । अन्त्याश्चराधजीवा न विशुद्धयति चे द्विशेष चापेन । होनं घराधमथवा दिनगत शेषोन्नतः कालः ॥ १४ ॥ पि. भा.-अन्त्याश्चराधजीवा चेन्न विशुद्धयति (यद्यन्त्यातश्चरार्धज्या न विशुद्धयति) तदातयोविशेषचापेन (द्वयोरन्तर चादेनार्या द्विलोमशोधनेन यदवशिष्ट तचापेनेत्यर्थः) चराध होन कार्य तदा शेष मुन्नकालः स्यादिति ॥१४ ।। अत्रोपपत्तिरतिसुगममेवेति ।। १४ ॥ इति वटेश्वरसिद्धान्ते त्रिप्रश्नाधिकारे इप्टच्छायाविधिनामको दशमोऽध्याय. समाप्तः। हि.मा.- यदि अन्त्या मे जरार्धज्या घटाने से न घटे तव विलोम शोधन करने से जो हो उसके चाप को परार्ध में घटाने से उन्नतकाल होता है ।। १४ ॥ इमको उपपत्ति प्रति सरल है ॥ १४॥ इति वटेश्यरसिद्धान्त के विप्रनाधिकार में इष्टच्छायाविधि नामक दाम अध्याय समाप्त हुमा।।
एकादशोऽध्यायः अथ सममण्डलप्रवेशविधि तपादो कोणा यवानयनमाह समदृड मण्डलविवरे क्षितिजे जीवा निगद्यते दिग्ज्या। दिग्ज्याकृतिरना कृत्या होना कृतशक्रताडिता निहता ॥१॥ त्रिज्याकृरया प्रथमोऽग्रा रव्यक्षभाहता निज्या। निज्यागुरिणता ह्यपरो विभक्तौ तौ च स्फुटौ स्याताम् ॥२॥ दिग्ज्याऽ घातकृत्यक्षामा विज्यावधवयोगेन । अन्ययगंयुतादासा मूल युतोनित चान्नेन ॥३॥ सौम्येतरयोोलयोदिशि विदिड नर सूर्ये । उत्तरयाम्बस्थे समवृत्तादुदप्रवौ पदेन युक्तञ्च ॥४॥ समदक्षिणगे रवावग्रा यन भवेन्न दिग्ज्योता। दिग्ज्या वर्गानाऽग्रा कृतिवशेन तन चाऽद्योऽन्य ||५|| ग्राद्योनादन्यवर्गतो यत्पद तेन होनस्तापन शड कु । एवमेव हि कोणानामन्याना ना सुखेन ससाध्य ॥६॥ विमा-महड मण्डलविवरे क्षितिजे जीवा ( सममण्डल दृड मण्डलयो क्षितिजे यदन्तर पूर्व स्वस्तिकादृग्वृत्तक्षितिजवृत्तयो सम्पात यावद्दिगशचाप तज्ज्या) द्विज्या क्थ्यते । दिग्ज्यावृति (दिग्यावग ) अग्राकृत्याहीना (अग्रावर्ग रहिता) कृतशकताडिता (द्वादशवर्गगुणिता) प्रिज्याकृत्या निहता (त्रिज्यावर्गगुणित ) प्रथम (प्रथमसज्ञक ), अनारव्यक्षभाहता त्रिज्या (अग्रा द्वादशपलभागुरिणता निज्या) त्रिज्या गुणिता अपर (परसज्ञक ) द्विग्ज्याप्वर्कघात कृत्यक्षाभा निज्या- वधवर्गयागेन (दिग्ज्या द्वादशघातवर्गस्य पलभा त्रिज्याघातवर्गस्य च योगेन) तौ प्रथमपरौ विभक्तो तदा स्फुटौ (विशिष्टी) प्रथमपरौ (प्राद्यान्यो) स्याताम् । अन्य- वर्गयुतादाद्यात् (विशिष्टान्यवर्गयुताद्विशिष्टादाद्यात्) मूत यत्तदन्येन (विशिष्टपरेण) सूर्ये सौम्येतरगोलयो (उत्तरगोलदक्षिणगोलयोश्च स्थिते रवी) युतोनित विदिड नर (कोणशड कु ) भवेत् । शेष स्पष्टमिति ॥१-६॥
५८६ वटेश्वर सिद्धान (अ अनोपपत्ति अत्र कोरणशड कुप्रमाणम् = य द्विज्या छा तदा छायागोले भुज । तथा अनाडकुतल-भुज त्रि एतस्य भुजस्य छायाकर्ण छाक छार पभा य गोले परिणामनेन अग्रा+रातल अवा नि त्रि -छायावरण गोले भुज । एतयोरछाया गोलीयभुजयो समीकरणम् छाक पभा य दृज्या छाक अग्ना- पर -छाअत उत्थापनेन नि मि १२ घि दिज्या दृग्ज्या छाक छाक पभा य दिज्या ज्या अग्रा. श्रम पि १२ त्रि पाय =ग्रा+ वर्गकरणेन १२ दिज्या ज्या घि पभा य =अग्रा' + पभा य' दिज्या' (मि'--') १२ १२ दिज्या' प्रि-दि या' य' छेदगमेन १२ दिज्या छा भा. य) %3 1) 2 अग्रा' १२ मि २ पभा य त्रि' १२+पभा' य' वि' =दिज्या' नि' १२--दिज्या' य" १२ गमशोधनन पभा' य' नि'+दिज्या' य' १२ पभा य गि' १२ =दिज्या' वि १२'-प्रमा' १० घि = य' (पफा' नि'+दिल्या' १२) पभा य त्रि'. १२ १२. वि' (दिग्या'-प्रया')प्रथम प्राध अत्र प्रणा पभा १२ नि'पर-अन्य तदा य' (पभा'वि'-दिग्या' ११:२५ अन्य-प्रथम-प्राद्य पक्षी पभा' त्रि+दिग्या' १२'भक्तो तदा य अन्य य' पभा' प्रि+द्विज्या पमा विहिग्या १२ -वन्य प्रन्य'मा पभयो 'प्र' योजनेन नाद्य ५८७ मिप्रश्नाधिकारः य' २य अन्य+अन्या+अन्य' मूलेन य-अन्यग्रा+अन्य य-/ग्रा+अन्य + अन्य एवमाचार्योक्तमुपपनम् । यदा ५ दिग्ज्या <अग्रा तदाऽपि पूर्ववदेवोपपत्ति कार्येति ॥१६॥ हि भा-पूर्वापर वृत्त और दृग्वृत्त के अन्तर (पूर्वस्वस्तिक से दृग्वृत्त क्षितिजवृत्त पे सम्पात तर) मे शितिनवृत्तीय पाप दिगराचाप है इसकी जीया (ज्या) दिग्ज्या कहलाती है । दिग्ज्या वग मे अग्रावर्ग को घटापर एक सौ चवालीस या द्वादश वर्ग और त्रिज्यावर्ग से गुणा करने स जो होता है उसका नाम प्रयम (प्राय) है । अग्रा वारह पलभा और त्रिज्या यगं मे पात का नाम अपर (पर-मन्य) है । दिग्ग्या और यारह वे पात वर्ग म त्रिज्या और जनमा ये पात वग जोड वरखे जो है उससे प्रथम और अन्य को भाग देने से विशिष्ट प्रथम (प्राय) तथा विशिष्ट पर (अन्य) होता है । प्राद्य म मन्यवर्ग जोड पर मूल जो हो उसको गूयं पे उत्तर गान और दक्षिण गोल में रहने से अन्य करवे रहित और सहित वरने से कोण दाड हाता है । शेप वा स्पष्ट है ॥१-६॥ - उपपत्ति यहा योण सड्बु वे मान =य दिज्या छा तर छायारण गोल मे भुज%3 त्रि । तथा अग्रा+शतल-भुज इसको पभामा १२ टायापण गोल म परिणामन भरने गे शाक (प्रया में सत- शा ( यात्र अग्रा पभा अग्रा १२ 2 ) अत छायावरण गोलीय दोनो भुजा ये समीकरण करने से दिज्या छा परन्तु नि %- छाव वि १२ दिज्या दृज्या ग्रा' दृग्ज्या छाक -छा उत्थापन देने से पि पभा अग्रान हग्ज्या छाक दिज्या त्रि त्रि पभा य दृज्या. दिज्या अग्रा वर्ग करने से १२ त्रि २५ पभा य पभा' या + १२ दिज्या' (त्रि-य) दिज्या त्रि-दिज्या पर छेदगम करने से त्रि त्रि अ* १२२ ६ पभा य १२ त्रि+पभाय' त्रि- दिज्या त्रि२ १२२-दिज्या' य१२ समशोधन से य (पभा २ वि+दिज्या १२२) २म पभा१२२ त्रिय% दिज्या २ १२२ त्रि:- १२२ नि' =१२२ नि(दिज्या-') - ५८८ वटेश्वर-सिद्धान्ते यहा १२२ त्रि' (दिग्या--')=१४४ विदिज्या-अग्रा')=प्रथम प्राध तथा प पभा १२ विपर=अन्य तब य (पमा. त्रि+ दिज्या १२२)+२प. अन्य प्राय दोनो पक्षो मे पभा'. वि +दिग्या १२२ २य अन्य प्राध इससे भाग देने में पभा त्रि+दिग्या १२२ पभा त्रिदिज्या १२१ -य--२य अन्य प्राय दोनो पक्षो म मन्य' जोड़ने से य+रय अन्य+अन्य ग्राद्य+अन्य मूल लेने से य+ अन्य' = मायकमन्यप्रत य=Vा+अन्य +अन्य' इससे प्राचार्योक्न उपपन्न हुमा । यदि दिज्या(अनातो भी पूर्वोपपत्ति के अनुसार उपपत्ति करनी चाहिए ॥१-६॥ इदानी समशडसाधनान्याह त्रिज्या क्रान्तिगुरगना पलज्यया भाजिता समना। पलकहिता वापमजोवाऽक्षमाहृता समना ॥७॥ वाऽग्राफ्रान्तिज्याहतिरुवीयोद्धता सम शङ्क:। वा स्वधृतिनापमजोवा नृतलहता समनरो भवति । लम्बज्याप्राचातात्पलज्यया भाजितात्समनरो वा। द्वादशगुरिंगता वाऽग्रा विषुवच्छामोद्ध ता समना l इप्टनराम्यस्ताऽग्रा नृतलविभक्ताऽथवा समःशङ्क। उद्धृत्याग्राकृत्योविशेषमूल समनरो वा स्यात् ॥१०॥ वि. भा-त्रिज्या क्रन्तिगुरगना (कान्तिज्या गुरिगना) पलज्यया भाजिता (प्रक्षज्याभक्ता) तदा ममना (समराक,) भवेत् । या अपमजीवा (क्रान्ति न्या) पलवर्णहता (पलकर्णगिता) अक्षमा हृता (पलभा भक्ता) तदा समना(ममरा) भवेत् ।। या अग्रान्तिज्याति (ग्रग्राकान्तिज्याघार ) उ/जीवोद्धता (पुज्या- भक्ता) सम शङ्कर्मवेत् । वा अपमजीवा (शान्तिज्या) स्वधृतिना (हनिगुरिणता) नृतलहता (गवततभक्ता) तदा समनर (समराङ्क.) भवति ।। वा लम्बज्यामा- घातात् पलज्यया (अक्षज्यया) भाजितात् समनर (समराङ्क.) भवेत् । वा अग्ना द्वादशगुणिता-विषुवच्चायोद्धता (पलभाभक्ता) तदा समना (समराङ्क ) भवेत् ।। वा अग्ना इष्टन राभ्यस्ता (इश्शङ्क.गुणिता) नृतलविभत्ता (साइतलभक्ता) तदा सम शबू भवेत् । वा उद्धृत्याग्रात्योविरोपमूलतिद्धत्यनावर्गान्तरमूल) समशङ्क, भवेदिति ॥७-१०॥
५८६
निप्रश्नाधिकारः
%3
D
पक
पभा
लज्या. अग्रा-समशकु=
%3-
%3-
शतल
अयोपपत्तिः।
त्रि. क्रांज्या
पलक. क्रांज्या
अक्षक्षेत्रानुपातेन
= समराङ्क
। यतः
अक्षज्या
पभा
मि
ग्रा.काज्या
हृति प्राज्या
।यतः
=समशङ्क
तथा
अक्षज्या
कुज्या
शकुतल
अग्रा
हृति
१२X अग्रा
तथाच
यतः
कुज्या हातल
प्रक्षज्या
पभा
लज्या १२
इशंकु. अग्रा.
अथवा
=समशकु । तथाच
प्रज्या
पभा
Vतद्धृति'--अग्रा' =समशकु। :: सर्व सिद्धम् ॥७-१०॥
मान
हि. भा,-त्रिज्या को क्रान्तिज्या से गुणर प्रमज्या से भाग देने से समशङ्क,
होता है । वा क्रान्तिज्या को पलक र्ग से गुणकर पलभा से भाग देने से समशन होता है ।।
वा अग्रा और क्रान्तिज्या के घात मे कुज्या से भाग देने से समशङ्क, होता है । वा क्रान्ति-
ज्या को हृति से गुणकर शङ्कतल से भाग देने से समशङ्क, होता है । वा लम्बग्या और
गुणकर
अग्रा के घात मे प्रक्षज्या से भाग देने से समसङ्क, होता है । वा प्रग्ना को बारह
पलभा से भाग तेने समशङ्क, होता है ॥ अथवा इप्टशङ्क, और अग्रा के घात मे शङ्क तल
से भाग से समशङ्क, होता है। वातद्धति और अना के वर्गान्तर मूल समशद्ध होता है ॥७-१०॥
उपपत्ति।
-समशक:
पक क्राज्या
पभा
त्रि क्राज्या
प्रक्षज्या
अक्षज्या
अक्षक्षेत्र के अनुपात
अग्रा
বনল
पक
हृति. काज्या
शतल
=समशङ्क
कुज्या
D
प्रया क्राज्या
तथा
पुज्या
पभा
प्रथवा
लज्या
अक्षज्या
--
-समशंः
पभा
१२ अग्रा
पभा
%D
लज्या प्रमा
प्रक्षज्या
तथा
इशङ्क.
अग्रा
शतल
-=-समश । तथा / तद्धति'-- अग्रा = समशङ्क ॥
:. सिद्ध हो गया १७-१०॥
पुनस्तदानयनान्याह
पलकर्णाऽर्ककुगुरणहतिरक्षभाकृतिहृता समः शङ्कः।
वा लम्वत्रिगुरणकुगुणहतिरक्षभाकृतिहृता समना ॥११॥
नरतिकुगुणाभ्यासो नृतलकृतिहृतोऽथवा समः शङ्कः।
धृतिकुगुणार्कवधो वाऽक्षाभा नृतलघातहल्समना ॥१२॥
५६० बटेश्वर-सिद्धान्ते वि. भा.-पलकर्णानंयुगुणहतिः (पलवर्णद्वादशकुज्यावातः) अक्षभाकृति- हता (पलभावर्गभक्ता) तदा समः श कुर्भवेत् । वा लम्बविंगुणवुगुणहतिः (लम्ब- ज्यात्रिज्या कुज्यापातः) अक्षभाकृतिहता (पलभावर्गभक्ता) तदा समना (समगंकुः) भवेत् ॥ अथवा नरधृतिकुगुणाभ्यास: (शकुहृतिकुज्याघातः) नृतलकृतिहृतः (श कुतलवर्गभक्त) सम शकुर्भवेत् । वा घृतिकुगुणाकवयः (हृतिकुज्या द्वादम- घात:) अक्षभानृतलघातहत् (पलभाग कुतलघानभक्त:) तदा समना (मममकु.) : + भवेदिति ॥१२ अनोपपत्ति.। १२. अग्रा %3D %D पक. कुज्या -अग्रा तत उत्थापनेन =सग कु । परन्तु पभा पभा १२४पक कुज्या १२ पक कुज्या =समश = लज्या. त्रि. कुज्या पभा पभा पभाग पभा श कुXअग्रा ह. कुज्या वा समापरन्तु -= अग्रा तत उत्थापनेन श कुतल शतल राकु हुति कुज्या = दाकु हृति-कुज्या =समशकु दातशत शत १२४ हृति कुज्या।। यत. कु पभा शतत शतल पभा :. सिद्धम् ॥११-१२॥ . हि भा -पलवर्ण द्वादश और कुज्या के घात में पलभावर्ग मे भाग देने से मम- शंकु होता है । वा लम्बज्या त्रिज्या और कुज्या पात मै पलभावर्ग से भाग देने से समग कु होता है । मथवा दा कुहुति और कुज्याघात में संकुतलवर्ग से भाग देने में समग कु होना है । वा हृतिकुग्या और द्वादश के घात मे पलभा और श कुतल के घान से भाग देने से सम- शकु होता है ॥११.१२॥ उपपत्ति १२. प्रता -=समा कु। परन्तु पक कुग्या पभा पभा प्रणा उत्यापन देने से कुरया =ममग कु ६२४पक. कल्या १२. पर पभा पभा पभा' साक भना वा --समाकु लेकिन लग्या त्रि. ज्या पभा हति दुग्या दातल -प्रमा उत्यापन देने से विप्रभाधिकारः शवलपभा युज्या बाप हतिपुरा समा १२*हुनि X कुज्या शतलतल ::सिद्ध हुमा ।।११-१२॥ इदानी समरनपनान्याह । द्वादशगणिताक्षज्या क्रान्तिज्या भाजिता समश्रवणः । लम्बज्याक्षभयान्ता क्रान्तिज्याहृत्सम. कर्णः ॥१३॥ विज्याऽक्षमयाऽभ्यस्ता वाऽग्रा भाता समभुतिर्भवति । त्रिज्याक्षश्रुतिवातात्तवृत्याप्सात्मम. श्रवणः ॥१४॥ त्रिगुणपलभाकृतिहतिरक्षश्रुतिकुगुराधातहत्कर्षः । वाऽक्षामानाऽक्षज्या कुत्र्याभक्ता सम.श्रयः ॥१५॥ वि.मा.-अक्षज्या द्वादशारिणता क्रान्तिज्याभाजिता (कान्तिज्याभक्ता) तदा समयवण (समपर्ण) भवेत् । लम्बज्या, अक्षभयाना (पलभषा गुणिता) क्रान्तिज्याहृत् (शानियाभक्ता) तदा समः कर्णो भवेत् । वा त्रिज्या, अक्षभयाऽभ्य- स्ता (पलभया गुणिता) अप्रा भक्ता तदा समश्रुतिः (समकर्ण ) भवति । विज्याऽक्ष- श्रुतिधातात (विज्यापलरुवधात्) तदृत्यामात् (तद्धतिभक्तान) सम श्रवण: (समकम् ) भवेत् । विगुरणपलभातिहतिः (विज्यापलभावहति ) सक्षश्रुति- कुमुरघातहुन् (पल कर्ण कुज्याघातभक्ता) तदा समकणों भवेत् 1 वा अक्षज्या अक्षाभाना (पलभागुगिना) कुज्या भक्ता नदा सम. श्रवण (समकणं) अत्रोपपत्ति नि १२ अक्षज्या १२. अक्षज्या निकाच्या निकाज्या भवेदिति ॥१३-१५॥ त्रि १२ नि १२ =समकर्ण- মহা बाज्या प्रज्या अक्षज्या पभा १२४ अक्षज्या-पमा लज्मा : १२ अज्या सध्या १२ काज्या पभा लज्या -सकर्ण यत'- लंज्या नि पमा ल ज्या पभा त्रि. काज्या काज्या अग्रा काज्या अग्रा पमा तदृति पभा त्रिपक पक अग्रा पकतद्धति पभा तद्धति .. पभा सि पभावि कर्ण । यतः त्रिपक -सकरणं। तति पभावि ---समकर्ण प्रया पभा त्रि प्रथ %3D पभा निभा त्रि पभा एक कुख्या पर कुख्या पक कुज्या पभा ५६२ वटेश्वर-सिद्धान्त पमा अक्षज्या एतावता सर्व सिद्धम् ॥१३-१शा कुज्या इति वटेश्वरसिद्धान्ते त्रिप्रश्नाधिकारे मममण्डल- प्रवेशविधिरेकादशोऽध्यायः । हि भा-यक्षज्या वो दारद से गएर क्रान्तिज्या में भाग देन से समारा होना है । लम्दज्या को पलभा मे गुणवर क्रान्तिज्या स भाग देन से समवर्ण होता है। वा त्रिज्या को पलमा से गुणवर अग्रा से भाग देने से ममार्ण होता है। निन्दा और पलक के धात मे तदति (तभूति) से भाग देन से नमवणं होता है । त्रिज्या और पलनावर्ग के पाद को पलकरां और कुज्या के बाद से भाग देने में समर्ण होता है। वा प्रक्षग्या को पलमा से गुणवर बुज्या से भाग देने से समर्ण होता है ।।१३-१।। त्रि १२ समर. .- समवयं- उपपत्ति। त्रि १२ वि १२ प्रया १२ प्रक्षज्या त्रि व्राज्या नि. क्राग्या क्राज्या प्रक्षज्या १२ प्रधज्या पनालज्या अक्षग्या १२ =पमा लज्यो: क्राज्या साग्या प्रक्षज्या पमा १२ लग्या पभी लज्या पमा त्रि -ममक यन' लज्या प्राज्या समरएं प्रपा पमा तहनि या पतर नि पक पभा वि पमा वि भग्रा -मप्रा D D समक पभा तदृति तनि पभा त्रि पमा त्रि पमा मय %3D प्रपा पभा नि समक=- पा ज्या पना त्रि पभा पक कुख्या पर ज्या पभा अक्षग्या पासमवर्ण : निद्ध हुमा ।।१२-१४।। क्ज्या इति वटेश्वरसिद्धान्त में विपरताधिकार में सममण्डलप्रवेशविधि नामा एकादश अध्याय समाप्त हुप्रा ।।
द्वादशोऽध्यायः प्रय कोरणशकुविधि तत्रादौ कोएशक्वानयनमाह । विज्याकृतिदलमग्राकृतिवियुगिनकृतिहत मवेदाध । अन्योऽकंपलभाया वधोऽक्षभाकृतियुतद्विनग ॥ १॥ भक्तावाद्यस्यान्यकृतियुतस्य पद युतमुदग्यियुग्याम्ये अन्येन कोणनास्याद्वियुगुदपि लघु पदान्नाऽन्य ॥२॥ वि. भा -त्रिज्याकृतिदल (त्रिज्यावध) अप्राकृतिवियु (अग्रावगहीन) इनवृतिहत (द्वादशवर्गगुणित) आधसज्ञक । अर्कपलभानावध (द्वादशपलभाना घात ) अन्य (अन्यसज्ञक ) अक्षभाकृतियुत (पलभावगयुत ) द्विनगै (द्विसप्तभि ) तो (प्राद्यान्यो) भक्तो तदा विशिष्टावाद्यान्यौ भवत । अन्यकृतियुतस्य (अन्यवगयुतस्य) श्राद्यस्य पद (मूल) अन्येनोदग्गोले (उत्तरगोले) युत याम्ये (दक्षिणगोले) वियूक (रहित) तदा कोणना (कोणशकु ) भवेत् ॥ यदाऽन्य पदालधुन भवेत्तदोदगपि उत्तरगालेऽपि) वियुक् हीन तदा कोणशकुरिति ॥१२॥ अत्रोपपत्ति । कोणवृत्तस्थरवे क्षितिजोपरियोलम्ब स एव कोणशकु । तन्मूलारपूर्वापररे- खोपरि यो लम्ब सभुज । तन्मूला(कोणशकुमूला)देवयाम्योत्तररेखोपरिकृतो लम्ब कोटि । कोणशकुमूलस्य काणहक्मूत्रे गतत्वादन भुजे कोटिसमे भवन । तेनान भुजवर्गो द्विगुण शकुमूला भूकेन्द्र यावद्दृग्ज्याया वर्गसम । अनक्लप्यते कोणश कुप्रमाणम्-यतदाऽक्षक्षेत्रानुपातेन श कुतलम् १२ पभा य तत उत्तरदक्षिणगोलयो क्रमेण भुजमानम् =+ १२ पभा य २९ -~-दृग्ज्यात्रियश्य-२ (अन- पभा य -अंग्रा । परमत्र अ- अपभाय पभाय १४४अ+२ पभा यx१२+पभायर ७२ -दृग्ज्या'नियर छेद १२ ५६४ वटेश्वर-सिद्धान्ते गमेन १४४य' अपमा य १२+पमा यनि-श्य समयाजनादिना पभा'x'+७२य' २अ पभा य १२८७नि'-१४४५' = १४८ (३'-) ='(पभा'+७२+२म पभा य १२ )-१४ (--) अन १४४ -प्राधसज्ञक । अXपमा १२-अन्यसनवः ग्राद्य तदा य य अन्य तदा य' (पमा'-७२)+न्य अन्य =आद्य पक्षी पभा+७२ भक्तो = यो+अन्य प्राध' वर्गपूर्तिकरणेन पभा' +७२ पमा+६२ य'श्य अन्य + अन्य ग्राद्य+अन्य' मूलेन य+अन्य= माद्य-अन्य' य:/ग्राद्य'अन्य'अन्य' अत उपपनमावार्योक्तम् । अत्र यदा निज्यावर्गातो यावर्गोऽधिकरतदोत्तरगोले प्राद्यस्य करणत्वात् कोणाङ्क चतुष्टयमुत्पद्यते । दक्षिणगोले तु कोणशकोरभाव इति । एतत्वोगगका- नयनप्रकारानुरूपमेय सिद्धान्तशेखरे धीपतिवृत कोणशकोरानयन यथा तदुक्त प्रकार। अग्राकृत्या विहीन त्रिगुणतिदल वेदशवन्नमाद्य सूर्यानाक्षप्रमाणामभिनिरपगे भक्तयोरक्षभाया । कृत्याद्ववद्रचा ढयया तो परकृतिसहितादाद्यतो यत्पद स्या- दन्येनाढय विहीन धनमयमककुगोलयो कोणश कु ॥ उत्तरेतरत्रिदिडनशे भवेदुत्तरेतु पदहीनयुक्पर दक्षिणेन सममण्डलात्ततो भाथुनीष्टटिकाश्व पूर्ववत् । ब्रह्मगुप्तप्रकारस्य वाऽनुरूप श्रीपतिकृत कोरगरा कोरानयन ब्रह्मगुप्तप्रकारच- अर्काग्रावर्गोन त्रिज्यावधिमककृतिगुणितम् । प्राद्योऽन्योऽग्राद्वादविषुवच्छायावधो हतयो ॥१॥ विपक्च्छायाकृत्या द्वयगरसयुतयाऽन्यकृतियुतादाद्यात् । पदमन्युतविहीन सौम्येतरगोलयो शकु ॥२॥ विदिशो सौम्येतरयोरुत्तरगोले पदोनयुत्तोऽन्य । सममण्डलदक्षिणगे न च्छापानाडीका प्राग्वत् ॥३॥ मूपमिद्धान्नपि 'विज्यावर्गापताऽग्राज्यावर्गोनात् द्वादशाहतादि" त्यादिना- ऽयमेव कारणमकानयनप्रकार उक्त । भास्कराचार्येण "अप्राकृति द्विगुणिता निगुणस्य - ५६५ सिप्रश्नाधिकार वर्गा" दित्यादिना विदिताऽग्रावशेनाऽसकृत्कर्मणा कोणशकोरानयन सिद्धान्तशिरो- मणौ कृत तद्व्यभिचारश्योत्तरगोले "युग्माश्चोनाऽक्षप्रभावर्गनिनी वाणाध्यशज्या- टिकाश्वविभक्ता । अक्षच्छायावर्गयुक्त फलाच्च दना न्यूना स्याखिल सौम्यगोले" एतेन प्रकारेण म म सुधाकरद्विवेदिना प्रदर्शित । दक्षिणगोले तद्वयभिचारश्च सिद्धान्तशिरोमणेष्टिप्पण्या सशोधकेन (म म वापूदेवशास्त्रिरणा) प्रदर्शित । यदि च भुज >ज्या४५ तदा पूर्वोक्त श्रीपत्यादिप्रकाराणा व्यभिचार इति सुधिया सम्यग्विचार्य ज्ञेयम्। पूर्वं मया लिखित यदा निज्यावर्धितोऽग्रावर्गोऽधिकस्तदोत्तरगोले कोणशकु- चतुष्टयमुत्पद्यते परमेव कस्मिन् देशे भवति तदर्थ विचार्यते । यन देशे परमाना= ज्या४५ तद्देशीयपलभामानम्-य तदा य+१२% पलक पक' त्रिज्या -परमाग्री १२ (य'+१२') जिज्या = ज्या ४५ छेदगमेन य' जिज्या+१२ जिज्या ज्या'४५ १२ ४१२' समशोधनेन यो जिज्या ज्या ४५४ १२-१२ जिज्या' १२(ज्या ४५-जिज्या') यर १२(ज्या'४५-- -जिज्या') 'मूलेन १२ ज्या ४५--जिज्या' जिज्या ==१७।५।२२ जिज्या' अन परमाया प्रमाण पञ्चचत्वारिंशज्ज्यासम स्वीकृत्य यदि पलभामान साध्यते तदा १७०२२ भवति तेन सिद्ध यद्यन देशे पलभ ·१७।५।२२” तत्तुल्य भवेत्तन देशेऽना=ज्या४५, इतोऽधिके पलभादेशे अना>ज्या४५ वा अग्रा'>ज्या ४५ वा अना'> वियव भवति नत्रदेशे दक्षिणगोले कोणशको- रभाव उत्तरगोले कोणश कुचतुष्टयमुत्पद्यत इति पूर्वोक्त युक्तियुक्तमिति ॥ १-२॥ हि भा-त्रिज्यावर्गाध मे अग्रावर्ग घटा कर बारह के वर्ग से गुणा करने से जो हो उसका नाम आद्य है पलभा, अग्रा, और वारह के घात का नाम अय है। प्राद्य और अन्य को पलभावर्ग और बहत्तर के योग मे भाग देने से विशिष्ट प्राद्य और अन्य हाते हैं । ग्राद्य में जयवर्ग जोड कर मूल लेने से जो हो उसमे अय को युत और हीन करने से उत्तरगोल पौर दक्षिणगोल मे शकु कोणाकु होता है ।। १-२ ॥
वटेश्वर-सिद्धान्त उपपत्ति कोणवृत्ताहोरात्रवृत्त के ममात से क्षितिज धरावल के कपर जो लम्ब होता है उने कोणगा रहते हैं । उस मूल से पूर रेखा के सर जो लम्ब होता है वह भुन है । तथा वोणमा ही के मूल मे याम्योतररेखा के ऊपर जो लम्ब होता है वह कोटि है, यहा पर कोपराकुमूल के कोणमून के उपर पतित होने में मुत्र और वोटि बराबर होती है इसलिए मु+को'--२ मुहाज्या' =भूकेन्द्र मे वोणमा मूल तर यहा कल्पना करते हैं याएश मानन्यनद भक्षक्षेत्र वे अनुपान से साइतम अत उत्तर और दक्षिण १२ गोल कम से भुज-मन पभा य १२ प्रशउल-मुज लेकिन यहां २मु=दृग्ग्यात्रिय' २म. पभा. य पभा. इनलिए '२ १२ पमा य प्र-ग्रा (प्रभा)-२ (प'= प. पमा. य+ १४४+२अपमा. यx१२+पमा य' -=हाज्या'-त्रि-छेदगम से ७२ १४४२म पभा. य. १२+भा' य'--७रवि-रय समयोजनादि से पमा'. ३+७२-२म पना घ १२-७२त्रि'-१४४=१४४ ('-म') =म' (भा'+७२)=२भ पमा य १२= १ ('-') यहा १४४ (-) । पभाकर'२य मन्य' प्राय' वर्गपूर्ति करने से आग्रा पम'. १२-प्रन्य तब य(पमा +२)+रय अन्य प्राय दोनो पक्षो को पमा ७२ इसमे भार २५ प्रन्य देने से म+ पभा'+७२ यस पश्य -या+पन्य' पूर रेले से प+अन्य' = /माद्य+न्य :-/प्राद्य'+'न्य अन्य' इससे माचार्योक्त उपपन्न हा॥ यहा जब विज्यावधि से अग्रावर्ग अधिक होगा तब पाठ के ऋण होने के कारण उत्तर गोल मे चार कोपराक् उतन होते हैं और दक्षिणगोल में कोणाक का प्रभाव होता है । इस कोरामकु के प्रानयन के सहम हो सिद्धानशेखर मे श्रीपति ने कोणगा का प्रानयन दिया है । जैसे उनके प्रकार अधोलिखित है- "मग्राकृत्याविहीन त्रिगुरिणतिदल वेदशनम्नमाध।" इत्यादि ।
त्रिप्रश्नाधिकारः ५९७ या, ब्रह्मगुप्त प्रकार के अनुरूप ही श्रीपति प्रकार को कह सकते। ब्रह्मगुप्तप्रकार देखिये- "अर्काग्रावर्गोन त्रिज्यावर्गामवृतिगुणितम् ।" इत्यादि । सूर्यसिद्धान्त में भी "त्रिज्यावर्गातोऽग्राज्यावर्गोनात्" इत्यादि से यही कोणशंकु के आनयन प्रकार कहा गया है । भास्कराचार्य "अग्राकृति द्विगुणिता त्रिगुणस्य वर्गात्" इत्यादि से विदित अग्रावश करके असकृत्प्रकार से सिद्धान्तशिरोमणि मे कोणाकु का प्रानयन किया है उसका व्यभिचार उत्तरगोल में- "युग्माश्वोनाक्षप्रभावर्गनिघ्नी वाणाध्यशज्या द्विकाव विभक्ता। अक्षच्छायावर्गयुमै फलाचे दग्रा न्यूना स्याखिल सौम्यगोले।" इस प्रकार से म म सुधाकर द्विवेदी ने दिखलाये हैं । दक्षिणगोल मे उसका व्यभिचार सिद्धान्तशिरोमणि की टिप्पणी मे सशोधक (म म बापूदेवशास्त्री) ने दिखलाया है ? यदि भुज>ज्या ४५ तब पूर्वोक्त श्रीपत्यादि प्रकारो के व्यभिचार होता है ! पहले हमने लिखा है कि जब विज्यावर्गा से अग्रावर्ग अधिक होता है तव उत्तरगोल में चार कोणशङ्क, उत्पन्न होते है लेकिन किस देश म ऐसी स्थिति होती है उसके लिए विच र करते हैं। जिस देश मे परमाना ज्या ४५उस देश के पतभामान=य मानते हैं । पका जिज्या' (य+१२)जिज्या तब य+१२=पका --परमाना'- १२ १२१ ज्या ४५ छेदगम से या जिज्या+१२२ जिज्या ज्या ४५X १२२ समशोधन में य' जिज्या ज्या ४५X १२-१२ जिज्या==१२ (ज्या ४५--जिज्या) १२२/ज्या४५-जिज्या') १२ Vा ४५--ज्या' त्रिज्या य मूल लेने से त्रिज्या =१७।५।२२ वा जिस यहा परमाना का मान पैतालीस अशकी ज्या के वरावर मानकर यदि पलभा मान साधन कहते है तो १७१५२२ इतना होता है इसलिए इससे सिद्ध हाता है कि देश मे पलभा के मान (१७।५।२२) इतना होगा उस देश में अग्रा=ज्या४५ इससे अधिक पलभा जिस देश म होगी उम देश में अग्रा>ज्या४५ वा अग्रा'>ज्या ४५ त्रि जहा पर ऐसा होता है वहा उत्तरगोल मे २ चार कोणशकु उत्पन्न होते हैं और दक्षिणगोल मे कोणशकु से प्रभाव होता है । ये सब बातें गोल पर स्पष्ट है ।।१-२॥ इष्टानान्तरकृत्या द्विगुणितयोदग्वियुक् त्रिगुणवर्गात् । मूलकोण नरो वा पलभानोऽर्कविहृदिष्टमसकृदेवम् ॥३॥ वा अग्रा - रव्यग्रामा ५६८ वटेश्वर सिद्धान्ते दक्षिणगोले चेष्टनाग्रयोक्तविधिना विदिग्ना स्यात् । तस्मादृग्ज्या कर्णच्छाया ससाधयेत्नाग्वत् ॥ ४॥ वि भा-उतरगोले द्विगुणितया इप्टाग्रान्तरकृया (इप्टोनाग्राकृत्या) त्रिगुणवर्गात् (त्रिज्यावर्गात्)वियुक-मूल वा कोपनर (कोणश कु.) भवेत् । दक्षिणगोले चेष्टयुजाग्रया पूर्वोक्त्या कोणशकु स्यात् । स (कोणश कु) पलभान (पलभागुरिणत ) अर्वविह्त (द्वादशभक्त) तदेष्ट स्यादेवमसकृस्त्रिया कार्या तदा वास्तव कोणश कुर्भवेत् । तस्माच्छको पूर्ववत् दृग्ज्या वर्णच्छाया साध्या इति ॥ अनंतदुक्त भवति याम्योतरगोलयो मेरोष्टशब्देन स्वच्छाकल्पित शक्वन कथ्यते। तेनेप्टेनानाया किञ्चिदूने नाधिकेन वायुतोनिता या द्विगुणितया विज्यावर्गाच्छोधितयाऽवशिष्टमूल कोणराड भवेत। पूर्व यदिच्छानु- रूपमिप्ट कल्पित तदानेतु 'पलभाघ्नोऽर्वविदिति, कोणशङ्क पलभागुरिणतो द्वादशभक्त फलमिष्टसज्ञ भवेत् । ततस्तेनेप्टेन दक्षिणोत्तरगोलयोयु तोनिताया अग्नाया वर्ग द्विगुणिते विज्यावर्गाच्छोधितेऽवशिष्टस्य मूल कोणशङ्क, । अस्मात्सुन- रिष्ट साध्य तेन युतोनितयाऽग्रया द्विगुरिणतया पूर्वोक्ता कोणशङ्क. साध्य । एव- मसकृत्कर्म तावत्कार्य यावत्साधित कोणशकु स्थिरो भवेदिति । दृग्ज्या १२ एतत्कोरणश बुवशेन /नि'-कोश कु'=दृग्ज्या तत कोश कोछाया। एतेनोपपतमाचार्योक्तम् ॥३४॥ अनोपपत्तिर्भाष्येनैव स्पष्टेति ॥ एतप्रकारानुरूपमेव सिद्धान्तशेखरे श्रीपतिकृत कोणशकोरानयनम् । यथा- इनाऽग्रकाया सहितोनिताया इण्टेन याम्योत्तरगोलगेऽर्के । वर्गे द्विनिने कृतितत्रिमौर्यास्त्यक्ते पद यत्स हि कोणश कु ॥ पलप्रभान्नेऽपंहृते च तस्मिन्-इष्ट भवेत्तेन तत प्रसाध्य । विदिड नर पूर्ववदग्रकाया यावस्थिर स्यादसद्विधानात् ।। ३ ४ ।। हि भा -उत्तरगोलम त्रिग्यावग मे इष्ट पौर पना दे भतर बग को द्विगु गित कर घटा देने से जो शेष रहे उसका मूल कोणाकु होता है । दणि गोन म बिग्या वर्ग मे इप्ट युत प्रपा के दग रो द्विगुणित करने में जो हो उसको जोडकर मूल लेने में कोण- राकु होता है । कोणाकु को पलभा से गुणकर यारह में भाग देने से इप्टसज्ञक होता है इस तरह असवृत्तम करने वास्तव कोणाबु होता है। इस राकु से पूर्ववत् हाज्या छापा पएं मोर छाया वा माधन करना चाहिए । इए शम्द से अपनी इच्छा से कल्पित शपवन है, उत्तरगोलम इप्टरहित मनायग को द्विगुणित मर विग्यावग म घटाकर मूल लेने में कोण ग होता है, दक्षिणगोल म दृष्टयुत D होता है। तवा वृत्वा भास्वति चानुपातविधिना लिप्तामयोऽसो भवेत् । निप्रश्नाधिकार ५६६ अग्रावगं वो द्विगुणित कर त्रिज्यावर्ग म घटाकर मूल लेने से वोगशकु होता है । अब पहले जो इच्छानुरूप इष्ट मान कर कोरणश कु का पानयन किया है उसी इप्ट का साधन करते हैं, कोणशकु को पलमा से गुरणकर बारह से भाग देने स जो फ्ल होता है वह इष्टसज्ञक है । इम इप्ट पर से पुन उत्तर और दक्षिण गोल म पूर्वोक्त रीति से कोणश कु प्रमाण होता है । इस पर से पुन पूर्वनियम से इप्ट साधन करना, इसको उत्तर और दक्षिण गाल क्रम स अना म हीन और युत करके कोणश कु साधन करना चाहिए। इस तरह असकृत्कम तव तक करना चाहिए जव तक कोणश कु स्थिर हो, इस तरह कोणश कु का वास्तव ज्ञान नि'-कोरण २==दृग्ज्या इस पर से "दृग्ज्या त्रिजीवे रविसङ्गणे ते शबूद्धृते भाश्रवणो भवेताम्" इत्यादि छाया और छायावर्ण का ज्ञान हो जायेगा ॥३-४।। इसकी उपपति भाप्य देखने से स्पष्ट हैं ॥३४॥ सिद्धान्तशेखर मे श्रीपति ने इस प्रकार के अनुरूप ही कोरणश कु का साधन किया है। जसे "इनाऽग्रवाया सहितोनिताया इप्टेन याम्योत्तरगोलगेऽ।" इत्यादि ॥३४॥ इदानी पुनरपि कोणशकोरानयनमाह । विज्यायाऽक्षश्रुत्येष्टोनयुतयाऽनायोटया प्राग्वत् । साध्यौ विदिड नरौ वा सौम्येतरगोलयोरसकृत् ॥५॥ वि भावा सौम्येतरगोलयो ( उत्तरदक्षिणगोलयो ) अक्षश्रुत्या निज्यया (पलकर्णतुल्यनिज्यया) त्रिज्यया-इष्टयाऽग्रया (पलकर्ण व्यासार्धपरिण तयाऽग्रया) इष्टोनयुतया प्राग्वत् (इप्टाग्रान्तरकृत्या द्विगुणितयेत्यादिवत्) अस- कृतिदिड नरौ (कोणश कू) साध्यावर्थात्प्रथम रव्यग्रामानमानीय त पलकर्णव्या- सार्धवृत्त समानीय तदग्रावदशेनेष्टाग्रान्तरकृत्या द्विगुरिणतयेत्यादि पूर्वोक्त्याऽसकृत् कर्मणा गोलयो कोश कू भवेता पलकर्णव्यासार्धवृतीयाग्रावशेन पलकर्णरूप- त्रिज्यावशेन च प्रथमकोणशक्वानयनप्रकारेण 'निज्याकृतिदलमग्राकृतिवियुगि" त्यादिना वा कोरणश क्वानयन भवितुमर्हति परन्त्वाचार्येणाऽन प्रदर्शितप्रथम- प्रकारेणैव तदानयन कृतमिति ॥५॥ अत्रोपपत्तिर्भाष्यावलोकनेनैव स्पष्ट ति ॥५॥ सिद्धान्तशेखरे श्रीपतिनाऽग्रा पलकर्णव्यासार्धवृत्ते परिणता कृत्वा तदग्रा- वशेन कोणशक्वानयन कृत तदेतदनुरूपमेव तदानयन च । सेप्टाया पलकर्णमण्डलभुवोऽनाया कृति द्वयाहता त्यक्त्वाऽक्षश्रुतिवर्गत पदमसौ कोणोद्भव स्यान्नर । प्राग्वञ्चासकृदिष्टमिष्टरहितान्यग्राङ्ग लान्युत्तरे ६०० वटेश्वर सिद्धान्ते तथाच पलकर्णवृत्ताग्रावशेन "अनाकृत्याविहीनमि"त्यादिना कोणश क्वा- नयन कृतमस्ति तदेतदाचार्योक्तप्रथमप्रकारोयकोरणशक्वानयन प्रकारेणाऽपि तथैव भवितुमर्हतीति। हि भा-वा उत्तरगोल और दक्षिण गोल मे पलवणतुल्य निग्या से और दृष्टाना (पलवर्ण व्यासाधवृत्त परिणत अग्रा) म इष्ट घटाकर और जोडपर जो होंगे उन पर से इष्टाग्रा तरकृत्या द्विगुणितयेत्यादि की तरह प्रसद्विधि से कोणगा साधन करना अर्थात् पहले अग्ना की पलकण व्यासाधवृत्त म परिणत कर उन यग्रा पर से इष्टानान्तरवृत्या इत्यादि प्रकार के तरह असकृत्कम करने से दोनो गोला म कोणश कु होते हैं । वा पलवर्ण च्यासाध वृत्तीयाग्रावश से और पलवर्ण रूप निज्या से प्रथम कोएस दु के पानयन प्रकार त्रिज्याकृतिदल मना कृतिवियुगि त्यादि से कोरणश कु के साधन ही हो सकते है, परन्तु यहा पर प्राचार्य ने उपरिलिखित प्रथम प्रकार ही में कोरणश कु का साधन किया है ।।५॥ इसको उपपत्ति व्याख्या ही स स्पष्ट है ॥५॥ मिक्षातशेखर मे श्रीपति न अग्रा को पलकण तुल्य त्रिज्यावृत्त म पतिणत कर उम पर परिणत अमा पर से कोणश क का माध किया है वह इस प्रकार के अनुरूप ही है। उनका साधन इस प्रकार है। सेटाया पलकरण मण्डपभुवोऽग्राय वृति द्वधात्तम् । इयादि तथा पलकण वृत्तीयानावश से ' अग्राकृत्या विहीनम् इत्यादि प्रकार से क ण कु के माधन सिद्धातशेखर म श्रीपति ने दिया है। वह घटेश्वराचार्यकृत प्रथम प्रवारीय कोण शकु साधन से भी उसी तरह होता है । इदानी पुन कोणाकुमाधना याह । इष्टनवरणाभ्यस्ता अग्रास्त्रिज्योढ़ता लघुका । तरपि विदिड नरो वा गिज्यामिश्रुतिं कृत्वा ॥६॥ इटभुजा वियुजा वा साध्यौ लघ्वग्रया पिदिड नारी । असकृयाम्योतरयोस्त्रिज्याह्वयेनेटकोन ॥७॥ विभा-वा इष्टश्रुति (इप्टरर्ण) विज्या कृत्वाऽर्थादिप्टवरण विज्या मत्वाध्या इष्टश्रवणाभ्यस्ता (इष्टकणं गुरिणता) विज्याभक्तास्तदा लधुवा (इप्टकणं तुल्यनिज्यावृत्तपरिणता अग्रा) तैरपि पूर्ववत 'त्रिज्याकृतिदलमग्नी- वृतिवियुगि त्यादिप्रकारेण विदिड नर (कोरणशक ) भवेत् ॥६॥ वा त्रिज्या ह्वपेनेप्टपर्णेन (इष्टर्णन मिज्यासज्ञकेन) याम्योत्तरयो (दक्षिणोत्तरयो) गोले लघ्वनया (इष्टकर्णत्रिज्याच्यापरिणतयाऽग्रया) प्रस कृत्वमणा विदिड नारौ (कोरणशकू) साध्याविति ॥७।।
त्रिप्रश्नाधिकार ६०१ अयोपपत्तिः इष्टकरणं व्यासार्धवृत्तपरिणताऽग्रया लघुकसज्ञिकया "विज्याकृतिदल- मग्राकृतिवियुगि' त्यादिप्रकारेण कोणशकुसाधन स्पष्टमेव तथा चेष्टार्णव्यासार्ध- वृत्तपरिणतयाऽग्रया लघ्वग्रासंज्ञिकया दक्षिणोत्तरगोलयो. 'इष्टनान्तरकृत्या द्विगुरिणतये' त्यादिप्रकारेणासकृत्कर्मणा कोणशकू भवेतामेवेति दिक् ॥६-७॥ हिमा.-- .--वा इप्टकर्ण को त्रिज्या मानकर अग्रा को इष्टकणं से गुणाकर त्रिज्या से भाग देने से फल लघुक या लध्वग्रा सज्ञक होता है इस पर से पूर्ववत् "त्रिज्याकृतिदलमग्रा. कृतिवियुग्'ि इत्यादि प्रकार से कोणश कु होता है । वा इष्टकर्णत्रिज्या से दक्षिणगोल और उत्तरगोल में लध्वग्रा 'इष्टकर्णव्यासाधं वृत्त परिणत प्रया' से असकृत्प्रकार द्वारा कोण- शंकु होते हैं ॥६.७॥ उपपत्ति इष्टकर्ण व्यासार्धवृत्त परिणत अग्रा (लघुसज्ञक अग्रा) पर से "त्रिज्याकृतिदलमग्रा. कृतियुम्" इत्यादि प्रकार से कोणशकु का साधन स्पष्ट है। वा इष्टकर्णव्यासार्थ वृत्त परिणत अग्रा पर से दक्षिणगोल और उत्तरगोल में "इष्टाग्रान्तरकृत्या द्विगुरिणतया" इत्यादि प्रकार द्वारा असकृत्कर्म से कोणशकु होते हैं ॥६-७॥ इदानी पुनरपि कोणशकुसाधनमाह । धृतिगुरिणतास्त्रिगुणहृता अग्रा धृतिवृत्तिगा भवन्ति लघुकाः । तैः प्राग्वत्कोपनरः साध्यस्त्रिज्यां प्रकल्प्य वृतिम् ।। वाऽग्रास्तद्व तिगुणितास्त्रिज्याभक्ता भवन्ति तहतिगाः । लघुका हि विदिड नारस्तैः प्राग्वस्त्रिज्याह्वयोद्ध त्या ॥६॥ इप्टयुतयोनया वा तयाऽनया कोणना पूर्ववत्साध्यः । याम्योत्तरयोरसकृत्रिज्याह्वयतद्धति कृत्वा ॥१०॥ विभा-वृति (हृति) त्रिज्या प्रकल्प्याग्रा हृति (धृति) गुणास्त्रिज्याभक्ता- स्तदा लध्वग्रा (हृतिव्यासार्थ वृत्तपरिणताग्रा) भवन्ति, तं. (लध्वग्राप्रमाणेः) प्राग्वत् (पूर्ववत्) कोणनरः (कोणश कु) साध्य ॥ वा अग्रास्तद्वृतिगुरिणताः (तद्धतिगुरिणताः) त्रिज्याभक्तास्तदा तद्वतिव्यासार्घवृत्तपरिणता अग्राः (लघ्वग्रा.) तैः (लनग्राप्रमाणः) विज्यायोद्धत्या (त्रिज्यासज्ञकतद्धृत्या) पूर्ववद्विदिड नारः (कोणशंकुः) भवेदिति । वा विज्याहयत ति (त्रिज्यासज्ञकतद्धति) वृत्वा याम्योतरयोर्गोले इप्टयुतया तयाऽग्रया वेप्टोनया नयाऽग्रयाऽमहत्पूर्ववत्कोणना (कोण कुः) भवेदिति ॥८-१०।। पूर्वोपपत्तिपालोचनयंव स्फुटेति ॥१०॥ इति वटेश्वरमिद्धान्ते विप्रश्नाधिकारे योणांबु विधिदिशोध्यायः ।
६०२ वटेश्वर सिद्धान्ते हिमा हति को त्रिज्या मानकर अग्रा को हृति से गुणावर त्रिग्या से भाग देने से लघ्वग्रा (हतिष्पासा वृत्तपरिणताग्रा) होती है, इस पर स पूर्ववत् 'विज्या कृति- दलमप्राकृतियुग्' इत्यादि स कोण कु होता है । वा अपा को तदृति (तनि) से गुणकर त्रिज्या से भाग देने से लघ्वप्रा (तद्धृतिव्यासावृत्तपरिणताग्रा) होती है । इसमें तथा त्रिज्यासनक तति से पूर्ववत् कोणश कु होता है । वा तति को त्रिज्या मानकर दक्षिण गोल तथा उत्तरगोल में इप्टयुन तथा इप्टरहित अग्रा पर से अमकृत्वम से पूर्ववत्कोगदा कु होता है ।।८-१०॥ इसकी उपपत्ति पूर्वोपपत्ति देखने से स्पष्ट है ॥८-१०॥ इति वरेश्वरसिद्धान्त म त्रिप्रश्नाधिकार म कापशकुविधि नामक चारह्वा अध्याय समाप्त हुमा।
उद्धतिरक्षग्याना मियनान्ताध्योदता वा स्यात् ।।२।। त्रयोदशोऽध्यायः अथ छायातोऽनियनविधिः तत्रादी रविक्रान्त्यानयनमाह । धुदलद्य तेरुपचय कुलीरराशेम गादपचय स्यात् । खाक्षाऽक्षान्तरयोगः सामान्य ककुमोरिनक्रान्ति.॥१॥ वि भा --कुलीराशे (कर्यादित) द्युदलाते (दिनाधंच्छायाया ) उपचय (वृद्धि ) भवेत् मृगात् (मकरादे ) दिनार्धच्छायाया अपचय (हानि ) भवेत् । समान्यककुभो (तुल्यभिन्नदिशो) खाक्षाक्षान्तरयोग (नताशाक्षाशयोरन्तर- योग ) कायस्तदेनक्रान्ति (सूर्यक्रान्ति ) भवेदिति ॥१॥ अत्रोपपत्ति । छाया त्रि मध्यच्छाया ज्ञानेन/छाया+१२'छायाकरर्ण, तत छायाकर्ण ग्ज्या अस्याश्चाप मध्यनताशा भवेयु । ततोऽक्षाशनताशयो समदिश्यन्तरेण भिन्नदिशि योगेन क्रान्तिर्भवेदिति ॥१॥ हि भा -पर्यादि से मध्यच्छाया की वृद्धि होती है और मकरादि से अपचय (हासता) होता है। एक दिशा म अक्षारा और नताश के अन्तर करने से, भिन्न दिशा मे दोनो के योग करने से रवि की क्रान्ति होती है ॥१॥ उपपत्ति . छाया त्रि छायावरण यहा मध्यच्छाया ज्ञान से /छाया+१२'छायाएं, तव = ज्या इसके चाप करने म नताश होता है । प्रवास और नताश के एक दिशा मे अतर करने से तथा भिन्न दिशा में योग करने मे रवि की क्रान्नि होती है ॥१॥ इदानी सममण्डलगढमानेन रविज्ञानमाह । मक्षज्याघ्न समना जिनाशजीवाहतोऽकंवाहुज्या।
६०४ त्रि. प्राज्या चटेश्वर-सिद्धान्ते वि. भा-समना (समश कु ) अक्षज्याघ्ना (अक्षम्यागुणित ) जिनाराजीवा- हृत (जिनाशज्याभक्ता) तदाऽर्कवाहुज्या (रविभुजज्या) भवेत् । उद्धति (तद्धति ) अक्षज्याना (अक्षज्यागुरिणता) मिथुनान्ताऽनोद ता (मिथुनान्ताऽग्रा. भक्ता) तदा रविभुजज्या भवेत् ।।२।। अत्रोपपत्ति । यदि त्रिज्ययाऽक्षज्या लभ्यते तदा समश कुना केतिजाता जान्तिज्या= ज्या सश ततोऽनुपातो यदि जिनज्यया त्रिज्या लभ्यते तदा कान्तिज्यया केति समा- त्रि गता रविभुजज्या -अन क्रान्तिज्याया उत्थापनेन । जिज्या त्रि अक्षया सश अक्षज्या सदा जिज्या. त्रि रविभुजज्या । जिज्या अथवा समग काज्या तद्धति , पर मिथुनान्ते क्राज्या-जिज्या प्रक्षज्या सश अश्या जिज्या तद्धति जिज्या जिज्या मिथुनान्ताना -रभुज्या मिथुनान्ताना एतावताऽचार्योक्तमुपपन्नम् ॥२॥ हि भा-समश कु को प्रक्षज्या से गुणकर जिनज्या से भाग देने से रविभुउज्या होती है वा उद्धति (तद्धति) को मक्षज्या से गुणकर मिथुनान्ताग्रा से भाग देने से रवि- भुजज्या होती ।।२। -- अग्रा प्रज्या. तद्धति उपपत्ति यदि त्रिज्या म प्रक्षज्या पाते है तो समशकु मे क्या इस अनुपात से क्रान्तिज्या माती है। मन्या सरा त्रि त्रि काज्या .त्रि प्रज्या सग तथा जिज्या त्रि जिज्या - प्रज्या जिज्या =रविभुजज्या वा सश- क्रान्तिा तहति परन्तु मियुनान्त मे ज्या-जिज्या भप्रा मक्षज्या सश जिज्या रविभुजज्या D इसमे समा कु के उत्यापन देने से प्रक्षज्या जिज्या तद्धति जिज्या मिथुनान्ताना = रविभुजग्या, इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुआ ।।२।। मज्या तद्धति मिघुनान्ताना %3D त्रिप्रश्नाधिकारः ६०५ पुना रविभुजज्यानयनमाह । लम्बज्या तद्व तिवधान्मिथुनान्तसमनहृतदिनभुजज्या । तद्ध तिपलगुरपघातोऽर्कघ्नोऽक्षश्रुतिजिनज्यकोवधहतो वा ॥३॥ वि भा -लम्बज्या तद्ध तिघातात् मिथुनान्तसमनृहृतात् (मिथुनान्तसम- श कुभक्तात्) फलमिनभुजन्या (रविभुजज्या) स्यात् । वा तद्ध तिपलगुणघात (तद्ध त्यक्षज्यावध ) अर्कघ्न (द्वादशगुरिणतः) अक्षश्रु तिजिनज्यकावधहृत (पल कर्णजिनज्याघातभक्त ) तदा रविभुजज्या भवेदिति ॥३॥ अयोपपत्ति । अक्षज्या तद्धति अज्या मिथुनान्त सश = रविभुजज्या। परन्तु अथ मियुनान्ताग्रा ल ज्या मिथुनान्ताग्रा तत उत्थापनेन रविभुजज्याः अक्षज्या तद्धति अज्या मिथुनान्त सश लज्या तद्धति लज्या मिथुनान्त समश -रविभुज्या। वा मिथुनान्ताग्रा यक जिज्या =मिथुनान्ताग्रा तत उत्थापनेन अज्या तद्धति १२ पक जिज्या १२ अक्षज्या तद्धति १२ रविभुजज्या । जिज्या एतावताऽऽचार्योक्तमुपपद्यते ॥३॥ हि.भा -लम्बधा और तमृति के घात को मियुनान्त समश कु से भाग देने से रविभुजज्या होती है । वा तद्ध ति और प्रक्षज्या के घात को बारह से गुणकर पलकर्ण और जिनज्या के घात से भाग देने से रविभुजज्या होती है ॥३॥ उपपत्ति अज्या मिथुनान्ताग्रास प्रक्षज्या तद्धति = रविभुजज्या। परन्तु =मिथुनान्नामा मिथुनान्ताना अज्या तद्धति तद्धति ल ज्या प्रत मिघुनान्ताग्रा को उत्थापन देने से अज्या मियुनान्तसश मिथुनान्त सग अज्या तद्ध. = रविभुजज्या यत पक लज्या - ल ज्या %D मिथुनान्ताग्रा प्रज्या तद्धति = रविभुज्या। पर पर जिज्या मिथुनान्ताना रविभुजज्या । वा वटेश्वर मिद्धान्त मज्या तद्धति_अज्या तदति १२. उत्यापन देने स मिथुनान्तामा =रभुज्या पक जिया पा जिज्या %3D इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुआ ॥३।। इदानी वर्णवृत्ताग्रातो रविज्ञानमाह । भावृत्तामा त्रिज्या लम्बज्या सहतिर्भक्ता । भाकर्णाऽन्त्यापमण्यावपेन लव्य भुजज्या वा ॥४॥ वि भा-भावृत्तामा त्रिज्या लम्वज्या सहति (छायार्णवृत्ताग्रा विज्या लम्बज्याघात) भाकरणान्त्यापमज्यावधेन (छायावर्णपरममान्तिज्याघातेन) भक्ता, लब्ध (फल) वा भुजज्या (रविभुजज्या) स्यादिति ।। ४ ।। अनोपपत्ति । लज्या ग्रा निभाज्या अक्षक्षेत्रानुपानेन नि काज्या, तत रविभुजज्या जिज्या लज्या अनात्रि = रविभुज्या। पर अग्रा- त्रि जिज्या छाक अतो रविभुजज्यास्वस्पेऽग्राया उत्थापनेन लज्या छाकवृपया नि नि लज्या छावृनना त्रि. त्रि जिज्या छाक जिज्या छाव रविभुज्या। एतावताऽचार्योक्तमुपपन्नम्। सूर्यसिद्धान्तेऽपि 'इष्टाप्रानो तु लम्बज्या' इत्यादिनैवमानयन रविभुज ज्याया इति ॥४॥ हि मा-या छायापर्ण वृत्तीय मग्रा, विज्या और लम्बज्या के पातम छायारणं पौर परम क्रान्तिज्या (जिनज्या) के पात से भाग देने से रविमुजज्या होती है ॥४॥ उपपति। छाकवृअग्रा नि सज्या प्रमा विक्राज्या मक्षक्षेत्र में अनुपात में -काज्या, = रविमुजज्या जिज्या रविमुजन्या के स्वरूप में क्रान्निग्या को उत्थापन देन स लग्या मग्रा नि लज्या प्रमा = रविभुज्या । निजिज्या जिज्या परन्तु ममा- छावृत्तीयाग्रा त्रि छावण ६०७ निप्रश्नाधिकारः इसलिये रवि भुजज्या वे स्वरूप मे क्रान्तिज्या को उत्थापन देने से लज्या घायाकणं वृत्तीयाना त्रि-रविमुजज्या । जिज्या छावणे इससे प्राचार्योक्त उपपन्न हुप्रा । सूर्यसिद्धान्त में भी "इप्टानाघ्नी तु लम्बज्या" इत्यादि से इसी तरह रविभुजज्या का मानयन है ॥४॥ पुना रविभुजज्यानयनमाह । विज्याऽग्रानृहतिर्वा धृतिजिनलवगुणवधोद्ध ता दोा । सवितुस्तच्चाप चाय प्रथमपदे भास्करस्तदेव किल ।।५।। भार्धाच्च्युतंद्वितीये सभाधमपरे ततश्च्युतं चान्त्ये। एवमपरः प्रकारः कुर्याद्दिनमरिगसाधन गरणकः ॥६॥ विभा--वा निज्या ग्रानुहति (त्रिज्याऽग्राश कुधात ) धृतिजिनलवगुणवधो- बता (हृतिजिनज्याघातभक्ता) तदा सवितु (सूर्यस्य) दोा (भुजज्या) भवति । तच्चाप रविभुजाशा भवन्ति । अय समागतो भास्कर (सूर्य) प्रथमपदे (मेपादि- राशिनये) भवति । तदेव चाप भार्धाच्च्युत (राश्पिट्केभ्य शोधित) तदा द्वितीये पदे (कर्यादिराशिवये) रविर्भवेत् । तदेव सभाध (राशिषट्कसहित) नदाऽपरे तृतीये पदे रविभवेत् । तदेव भगणतश्च्युत तदाऽन्त्ये पदे (चतुर्थे पदे) रविर्भवेच्छेप . स्पष्टमिति ॥६॥ अत्रोपपत्ति । शxअग्रा नि क्राज्या = रविभुजज्या, अत्र क्रातिज्याया -क्राज्या। तत ह जिज्या नि श अग्रा = रविभुजज्या, अस्याश्चाप रविभुजाशा भवन्ति शेष उत्यापनेन ह जिज्या -पष्टमिति ॥५-६॥ इति वटेश्वरसिद्धाते निप्रश्नाधिकारे छायातोऽनियन- विधिस्त्रयोदशोऽध्याय ॥ हि भा -वा त्रिज्या, प्रना, और शकु के घात मे हृति और जिनज्या के घात से भाग देने से रवि की भुजज्या होती है, उसके चाप रवि भुजाश होते हैं, यह रवि प्रथम पद मे होते हैं, चाप को छ राशि (१८०') मे घटाने से द्वितीय पद मे होने हैं, उस चाप मे छ राशि जोडने से तृतीय पद मे रवि होते हैं । और भगण (१२ राशि) मे घटाने से चतुर्थ पद मे रवि होते हैं ।। ५६॥
वटेश्वर-सिद्धान्ते गेनान मत्स्यद्वय भवति, मत्स्यद्वयमुखपुच्छगतयो रेखयोयंत्र योगस्तस्माच्छायाग्र- पर्यन्त यदेखाप्रमाण, तद्वृत्तमुत्पद्यते तदेव नाभ्रमवृत्त तस्मिन्न व वृत्ते तद्दिने सदा छायाग्र भ्रमतीति। एव शेषविन्दुभि श कुभ्रमवृत्तमालेख्यम् । अनंतदुक्त भवति छायानमणरे- खानिरूपणार्थ यादृग्रूपेण भुजद्वययोर्मध्यच्छायायाश्च सस्थारन ततो विपरीतदिक्- सस्थापनात्पूर्वरोत्यैव श कुभ्रमवृत्त भवत्यर्थाद्भुजाङ्गलानि स्वदिगि प्रसार्य छायावृत्तपरिधी सन्यस्थ तर यद्विन्दुद्वय तथा मध्यभुजाङ्गलानि दिमध्यविन्दुतोद- क्षिणोत्तररेखाया स्वदिशि प्रसार्य तद्रग्ने यो विन्दुर तद्विन्दुत्रयगत यवृत्त मैव श कुममरेखा स्यादिति ।।१-६॥ अनोपत्ति छायानयाग्रविन्दुपु गत वृत्त छायाभ्रमवृत्तम् (भाभ्रमरेखा) इति प्राचीनाना मतम् । विन्दुत्रयोपरिगतवृतस्य केन्द्रज्ञानार्थ मध्यद्वय मुत्पाद्य मत्स्यद्वयान्तरसूनयु- ति कृता । रेखार्धविन्दुतस्तदुपरि लम्वकरणार्थ मत्स्योत्पादन कृतम् । साम्प्रत रेखाबिन्दुतसदुपरिलम्वकरण च सुगममेव । छायानयाग्रबिन्दुपु परस्परकृताभी रेखाभिरेक त्रिभुज मुत्पद्यते रेखागणितचतुर्थाध्याय चतुर्यक्षेनवलेन तदुपरिगत वृत्त कार्य तदेव प्राचीनोक्तच्छायाभ्रमणमार्गस्वरूपम् वस्तुतश्छाया भ्रमण वृत्त सदा न भवति, भास्कराचार्येण प्राचीनोक्तच्छायाभ्रमणवृत्तस्य खण्डन “भानितयाद् भाभ्र- भण न स" दित्यादिना कृत खण्डन समीचीनमेवेति दिक् ॥१-६।। हि भाजल समीकृत भूमि म दिइ मध्य को केन्द्र मानकर इप्टकालिक द्वादमाग:: लशङ्क, छायाङ्गल तुरय वर्कट से जो वृत्त होता है वह छायावृत्त है केन्द्र (दिमध्यविन्दु) से मध्यच्छाया स्थापन करना उस छायावृत्त म विपरीत दिशा में स्थापित भुजद्वय पर से तथा उत्तर न्छायानविन्दु से दो मस्य (मछली के प्राकार) बनाना, दक्षिणगोल और उत्तर- गोल मे मुख और पुच्छ मै गतसूत्रद्वय को बाध कर उन दोनो के योगविन्दु में वर्कट के अग्र को रखकर तीनो बिन्दुमा म गतवृत्त बनाना चाहिय । यहा यह कहा गया है कि दिडमध्य बिन्दु केन्द्र से छायाङ्गल तुल्य कर्कट से लिखित वृत्त मे (छायावृत्त मे) विपरीत प्रवस्थान कम से दोनो भुजौ को स्थापन करना तथा मध्यवेन्द्र स दक्षिणोत्तर रेखा म मध्यछाया को स्थापन करना । इस तरह करने से छायावृत्त मे पूव सस्थापित विपरीत दिशा वे भुजदय के मप्रविन्दुद्य तथा मध्यछायाबिन्दु ये तीन बिन्दु है । इन तीनो विदुधो स जो दो मत्स्य वनते हैं उनम मुख और पुच्छगत रखाद्वय का जहा योग होता है वहा से छायाग्रपन्त जो रेखा है उस व्यासाधं से जो वृत्त बनता है वही भाभ्रमवृत्त होता है । उस वृत्त मे उस दिन सदा घाया प्रमण वरती है। इस तरह शेष विन्दुप्रो से शङ्कभ्रमवृत्त लिखना चाहिए । छायाधमरेखा निरूपण के लिए जिस तरह भुजद्वय वा तया मध्यच्छाया का स्थापन दिया गया है उससे विपरीत दिशा म सस्थापन से पूरीति के अनुसार ही दशकुभ्रमवृत्त होता है अर्थात् भुजाङ्गन को अपनी दिशा म फेला पर छायावृत्त परिधि म स्थापन कर वहा जो दो विन्दु होते हैं मौर ६११ विप्रश्नाधिकारः दिड्मध्य बिन्दु से मध्यमुजाङ्गल को दक्षिणोत्तर रेखा में अपनी दिशा मे फैला कर उसके अग्र मे जो विन्दु होता है । इन तीनो विन्दुयो मे गये हुए वृत्त को शकुममवृत्त कहते हैं ॥१-६ । उपपत्ति । तीन छायामो के अप्रविन्दु मे गये हुए वृत्त को छायाभ्रमवृत्त (भाभ्रमरेखा) प्रानीना चार्य कहते हैं । तीन विन्दुप्रो के ऊपर गये हुए वृत्त ये वेन्द्रज्ञान के लिए दो मत्स्य (मछलिया)वना कर दोनो मत्स्यो के अन्तर मूत्र की युति की। रेखाध विन्दु से उसके (रेखा के) ऊपर लम्ब करने के लिए मत्स्योत्पादन रिये । इस समय मे रेखाघ विन्दु से उसके ऊपर लम्ब करना सरल ही है। तीनो छायानो के अग्रविन्दुओ में परस्पर रेसा करने मे एक त्रिभुज बनता है रेखागणित चतुर्याध्याय के चतुर्य क्षेत्र के बल से उसके ऊपर वृत्त करना वही प्राचीनोक्त घायाभ्रमण मार्ग होता है । वस्तुत छायाभ्रमण के आकार वरापर वृत्ताकार नहीं होता है प्र चीनोक्त छायाभ्रमण निरूपण का सण्डन भास्कर ने किया है, वह युक्तियुक्त है ।।१६॥ इदानी भाभ्रमवशेन दिज्ज्ञानमाह । भाभ्रममण्डलपरिधिनाऽत्र ज्ञेया दिशा लेखाः ॥७॥ तच्छ क्वन्तरमाभाः प्राच्यपरेऽर्के समवलयगे वा। कोरपगते कोणाभाः याम्योत्तरवृत्तगादिना वा या ॥८॥ वि मा -अत्र भाभ्रममण्डलपरिधिना (छायाभ्रमणवृत्तपरिधिसम्बन्धेन दिशालेखा (पूर्वापरादिदिशा गणना ) ज्ञेया । तच्छक्वन्तर (तत्तस्य छाया- भ्रमणवृत्तस्य शको श कुमूलस्य यदन्तर) आभा (दिनमध्यच्छाया) भवन्त्यन श कुशब्देन तन्मूल गृह्यते। प्राच्यपरेऽक समवलयगे इत्यादिना तत्तत्स्थानभेदेन तत्तन्नाम्नी छाया भवतीति ॥७-८|| अत्रोपपत्ति जलसमीकृतभूमाविष्टशकु स्थापयेत् ततो यस्मिन् कपाले सूर्यो भवेत्ततो भिन्ने कपाले छायाप्रय गृहीत्वा प्रथमच्छायाग्रविन्दु केन्द्र मत्वेष्टेन कर्कटकेन वृत्त विलेख्य तेनैव कर्कटकेन द्वितीयच्छायाग्रविन्दुकेन्द्रतो वृत्त लेख्यम् । एवमेव तृतीयच्छायाग्रविन्दुकेन्द्रवशेनापि वृत्त भवेत् । एतेपा नयाणा वृत्ताना मध्ये प्रथम- द्वितीयतृतीयवृत्तयो सम्पातद्वयेन च मत्स्यद्वयमुत्पद्यते तयोर्मत्स्यूयोर्यद्दिश्यन्तर महत्स्यात्त मुखे यद्दिश्यन्तरमल्प ते पुच्छे तन्मुखगतौ सूक्ष्मकीलको सस्थाप्य तयो सूने बद्ध वा पुच्छगते नि सार्य तयो सूत्रयोर्मुखपुच्छानुसारेण यत्र योग सा दक्षिण- दिग्भवति यदि रवि श कुमूलादुतर या दिश्यर्थादुत्तरगोले भवेत् । दक्षिणगोल स्थे रवी तन्मध्यसूत्रयोर्योग श वुमूलत प्रारभ्योत्तरदिग्भवति । उत्तरगोले छायाया दक्षिणाभिमुखत्वाद्दक्षिणगोले च छायाया उत्तराभिमुखत्वाच्च । ततो मध्यविन्दुत सूनयोगविन्दुगतसूत्र वर्धयेत्सव दक्षिणोत्तरा दिग्भवति । एवमेव दक्षिणोत्तर- ६१० वटेश्वर-सिद्धान्ते गेनात्र मत्स्यद्वय भवति, मत्स्यद्वयमुसपुच्छगतयो रेखयोयंत्र योगस्तस्माच्छायान- पर्यन्त यदेखाप्रमाण, तद्वृत्तमुत्पद्यते तदेव भानमवृत्त तस्मिन्नेव वृत्ते तद्दिने सदा छायान भ्रमतीति । एव शेविन्दुभि शवुभ्रमवृत्तमालेस्यम् । अत्रेतदुक्त भवति छायाभ्रमणरे- खानिरूपणार्थ यादृग्रूपेण भुजद्वययोमध्यच्छायायाश्च सस्थापन ततो विपरीतदिक्- सस्थापनात्पूर्वरोत्यैव श कुभ्रमवृत्त भवत्यर्थाद्भुजाङ्गलानि स्वदिशि प्रसार्य छायावृत्तपरिधी सन्यस्य तर यद्विन्दुद्वय तथा मध्यभुजाङ्गलानि दिङ्मध्यबिन्दुतोद- क्षिणोत्तररेखाया स्वदिशि प्रसार्य तद्रग्रे यो विन्दुरेतद्विन्दुनयगत यद्वृत्त सेव श कुभ्रमरेखा स्यादिति ॥१६॥ अनोपपत्ति छायात्रयाग्रविन्दुपु गत वृत्त छायानमवृतम् (भाभ्रमरेखा) इति प्राचीनाना मतम् । विन्दुनोपरिगतवृतस्य केन्द्रज्ञानार्थ मध्यद्वयमुत्पाद्य मत्स्यद्वयान्तरसूत्रयु. ति कृता । रेखार्धविन्दुतस्तदुपरि लम्बकरणार्थ मत्स्योत्पादन वृतम् । साम्प्रत रेखाविन्दुतस्तदुपरिलम्वकरण च सुगममेव । छायात्रपाग्रविन्दुपु परस्परकृताभी रेखाभिरेक निभुजमुत्पद्यते रेखागणित चतुर्याध्याय चतुर्यक्षेत्रवलेन तदुपरिगत वृत्त कार्य तदेव प्राचीनोक्तच्छायानमणमार्गस्वरूपम् वस्तुतम्छायाभ्रमण वृत्ते सदा न भवति, भास्कराचार्येण प्राचीनोक्तच्छायाभ्रमणवृत्तम्य खण्डन "भावितयाद् भान. मण न स" दित्यादिना कृत खण्डन समीचीनमेवेति दिक् ।।१-६।। हि भा --जल समीकन भूमि म दिङ्मध्य को केन्द्र मानवर इष्टवालिक द्वादमाग सरावाच्छायाङ्ग ल तुत्य कर्कट से जो वृत होता है वह छायावृत्त है केन्द्र (दिमध्यबिन्दु) से मध्यच्चाया स्थापन करना उस चायावृत्त मे विपरीत दिशा में स्थापित भुजद्वय पर से तथा उत्तर छायाप्रविन्दु से दो मरस्य (मछली के प्राकार) बनाना, दक्षिणगोल और उत्तर- गोल मे मुल और पुच्छ में गतसूत्रद्वय को वाघ कर उन दोनो के योगविन्दु मे कंट के अप को रखकर तीनो विन्दुनो म गतवृत्त बनाना चाहिये । यहा यह कहा गया है कि दिमध्य बिन्दु केन्द्र से छायाङ्ग ल तुल्य वकंट से लिखित वृत्त म (छायावृत्त मे) विपरीत अवस्थान क्रम मे दोनो भुजो को स्थापन करना तया मध्यकेन्द्र से दक्षिणोत्तर रेखा में मध्यछाया को स्थापन करना । इस तरह करने से छायावृत्त म पूर्व सस्थापित विपरीत दिशा के भुजदय प्रविन्दुद्वय तथा मध्यछायाविन्दु ये तीन बिन्दु हैं । इन तीनो विन्दुनो मे जो दो मत्स्य वनते हैं उनम मुख और पुच्छगत रेखाद्वय का जड़ा योग होता है वहा से छायानपर्यन्त जो रेखा है उस व्यासाधं मे जो वृत्त बनता है वही भग्भ्रमवृत्त होता है । उम वृत्त में उस दिन सदा छाया ग्रमण करती है । इस तरह शेष विन्दुप्रो मे पाइभ्रमवृत्त लिखना चाहिए । बायाभ्रमरेसा निरूपण के लिए जिस तरह मुजदय का नया मध्यच्छाया का स्थापन किया गया है उससे विपरीत दिशा में सस्थापन से पूवरीति के अनुसार ही शभ्रमवृत होता है अर्थात् भुजाङ्गल को अपनी दिशा में फैला वर छायावृत्त परिधि मे स्थापन कर वहा जो दो विन्दु होते हैं मोर के निप्रश्नाधिकारः दिङ्मध्य बिन्दु से मध्यमुजाङ्गल को दक्षिणोत्तर रेखा में अपनी दिशा मे फैला कर उसके अग्र मे जो विन्दु होता है । इन तीनो विन्दुओ मे गये हुए वृत को शंकुभ्रमवृत्त कहते हैं ॥१-६ । उपपत्ति । तीन छापामोरे अग्रविन्दु मे गये हुए वृत्त को छायाभ्रमवृत्त (भाभ्रमरेखा) प्राचीना- चार्य कहते हैं । तीन विन्दुप्रो के ऊपर गये हुए वृत्त के केन्द्रज्ञान के लिए दो मत्स्य (मछलिया)वना कर दोनो मत्स्यो के अन्तर सूत्र की युति की। रेसाधं विन्दु से उसके (रेखा के) ऊपर लम्ब करने के लिए मत्स्योत्पादन किये । इस समय मे रेसा विन्दु से उसके ऊपर लम्ब करना सरल ही है । तीनो छायानो के अग्रविन्दुप्रो मे परस्पर रेखा करने से एक त्रिभुज बनता है रेखागणित चतुर्याध्याय के चतुर्थ दोत्र के वल से उसके ऊपर वृत्त करना वही प्राचीनोक्त छायाभ्रमण मार्ग होता है । वस्तुत. छायाभ्रमण के प्राकार बरावर वृत्ताकार नहीं होता है प्र चीनोक्त छायाभ्रमण निरूपण का खण्डन भास्कर ने किया है, वह युक्तियुक्त है ॥१-६॥ इदानी भाभ्रमवशेन दिज्ज्ञानमाह । भाभ्रममण्डलपरिधिनाऽत्र ज्ञेया दिशा लेखाः ॥७॥ तच्छ क्वन्तरमाभाः प्राच्यपरेऽर्के समवलयगे वा। कोणगते कोणाभाः याम्योत्तरवृत्तगादिना वा या ॥८॥ वि मा प्रत्र भाभ्रममण्डलपरिधिना (छायाभ्रमणवृत्तपरिधिसम्बन्धेन दिशालेखा (पूर्वापरादिदिशा गणना ) ज्ञेया । तच्छक्वन्तर (तत्तस्य छाया- भ्रमणवृत्तस्य शको श कुमूलस्य यदन्तर) अाभा (दिनमध्यच्छाया ) भवन्त्यत्र श कुशब्देन तन्मूल गृह्यते। प्राच्यपरेऽक समवलयगे इत्यादिना तत्तत्स्थानभेदेन तत्तन्नाम्नी छाया भवतीति ॥७-८।। अत्रोपपत्ति जलसमीकृतभूमाविष्टशकु स्थापयेत् ततो यस्मिन् कपाले सूर्यो भवेत्ततो भिन्ने कपाले छायाग्रय गृहीत्वा प्रथमच्छायाग्रविन्दु केन्द्र मत्वेष्टेन कर्कटकेन वृत्त विलेख्य तेनैव कर्कटकेन द्वितीयच्छायाग्रविन्दुकेन्द्रतो वृत्त लेख्यम् । एवमेव तृतीयच्छायाग्रविन्दुकेन्द्रवशेनापि वृत्त भवेत् । एतेषा त्रयाणा वृत्ताना मध्ये प्रथम- द्वितीयतृतीयवृत्तयो सम्पातद्वयेन च मत्स्यद्वयमुत्पद्यने तयोर्मत्स्ययोर्यद्दिश्यन्तर महत्स्यात्ते मुखे यद्दिश्यन्तरमल्प ते पुच्छे, तन्मुखगतौ सूक्ष्मकीलको सस्थाप्य तयो सूत्रे बद्ध वा पुच्छगते नि सार्य तयो सूत्रयोर्मुखपुच्छानुसारेण यत्र योग सा दक्षिण- दिग्भवति यदि रवि श कुमूलादुत्तर.या दिश्यदुत्तरगोले भवेत् । दक्षिणगोल स्थे रवी तन्मध्यसूत्रयोर्योग श वुमूलत प्रारभ्योत्तरदिग्भवति । उत्तरगोले छायाया दक्षिणाभिमुखत्वाद्दक्षिणगोले च छायाया उत्तराभिमुखत्वाच्च । ततो मध्यविन्दुत सूनयोगविन्दुगतसूत्रं वर्धयेत्सैव दक्षिणोत्तरा दिग्भवति । एवमेव दक्षिणोत्तर- वटेश्वर-सिद्धान्ते सूत्राप्रविन्दुभ्या श कुमूलविन्दुना च वृत्तत्रयं पूर्व वत्कृत्वा तेभ्यो मत्स्यद्वयमुत्पाद्य पूर्ववन्मुखपुच्छगता रेखा पूर्वापरा भवेदिति । भिन्नपालजेष्वपि विन्दुप्रयेषु पूर्व- वदेव वृत्तनय लिखेत्-पूर्ववदेवावशेप वोध्यम् ॥ एव भामवृत्तसम्बन्धेन दिम्ज्ञान भवति । श कुमूलस्यच्छायाभ्रमणवृत्तस्य च यद्दक्षिणोत्तरमन्तर तन्म- ध्यान्हकालिकच्छायाभ्रमण भवतीति 11७-८ll हि भा–छायाभ्रमण वृत्त के सम्बन्ध से दिशाम्रो का ज्ञान समभना चाहिए। छायाभ्रमण वृत्त और शकुमूल का अन्तरच्छाया प्रमाण होता है 11७.८11 उपपत्ति जल से समान की हुई पृथ्वी मे इष्टशकु को स्थापन करना । जिस कपाल मे मूर्य हैं उमसे भिन्न कपात में तीन छायानो के अग्र बिन्दु ग्रहणकर प्रथमच्छायाप्रविन्दु को केन्द्र मान कर इष्टव्यासाध से वृत्त बनाना। इसी तरह द्वितीयच्छामाग्र बिन्दु और तृतीयच्छायाग्र बिन्दु को केन्द्र मानकर उसी व्यामा मे वृत्तद्वय बनाना। तब प्रथम और द्वितीय वृत्त के जो सम्पातद्वय हैं तथा द्वितीय और तृतीय वृत के जो सम्पातद्वय (दो सम्पातविन्दु) हैं इन से दो मरस्प (मछली का आकार) बनता है उन दोनो मत्स्पो के जिस दिशा में अन्तर बडा है वे दोनो मुख और जिस दिशा में अन्तर छोटा है के दोनो पुच्छ, उन दोनों मुखो में दो थील रख कर उन दोनो मे सूत्र बाँध कर पुच्छगत रेखा को बढा देना चाहिए उन दोनो मूत्रो का चहा पर सम्मात होता है वह दक्षिण दिशा है यदि शकुमूल से रवि उत्तर गोल मे हो तब मदि रविदक्षिणगोल में है तव उन दोनो सूत्रो के योग श कु मूल से लेकर उत्तर दिशा होती है । मध्यबिदु और सूत्रद्वययोग विन्दु गत रेखा को बढाने से दक्षिणोत्तर रेखा होती है । इसी तरह दक्षिणोत्तर सूत्र के अग्नविन्दुद्वय से जो दो वृत्त होंगे तथा शकुमूल बिन्दु को केन्द्र मानकर जो वृत्त होगा इन तीनो वृत्तो से पूर्ववत् मत्स्यद्वय बनाकर उसके मुख और पुच्छगत मूत्र पूर्वापर रेखा होती है । यदि छायात्रय बिदु भिन मिन कपाल मे हो तथापि पूर्ववत् ही सब बातें समझनी चाहिए। कुछ भी विशेषता नहीं होती है। इस तरह भाभ्रम वृत्त द्वारा दिशाम्रो का ज्ञान होता है। शकुमूल और छाया भ्रमण वृत्तपरिधि वा अन्तर जो है वह मध्यच्चाया होती है ।।७-८॥ इदानी गृहपटलाभ्यन्तरे सूर्यावलोपनविधिमाह । गृहमध्यगपरिलेखाकर्णस्थित्या विधीय गृहपटलम् । दिग्योगस्थितदृष्टया पश्यति सूर्यग्रहं विष्टम् ॥ तैलेऽथ द वा जलेऽथवा शङ्कमार्गविन्यस्ते । शंक्वग्रस्थितदृष्टया दिनमपि पश्येनमन्वमादिस्यम् ॥१०॥ केन्द्रगप्रभाग्रहशा विलोकयेच्छङ्क मार्गग परम् । भाशङ्कच्छिद्रं पश्यति तद्विद्धमिव सूर्यम् ॥११॥ -दिग्योगस्थित (दिक्मूत्राणा योगविन्दुस्थदृष्टया ) दोष स्पष्टम् ।।६-१३॥ के वि. भा- -- त कर्ण, ल व निप्रश्नाधिकार अग्रोपपत्ति । एकस्मिन्नेव समये दृक् म्ने यत्र तत्र स्थापितशकोश्छाया सर्वत्र तुल्या वि. भवन्ति, कथमिति प्रदश्यते । लम = हक सूत्रम्, विग्रहविवकेन्द्रम् । पवरश-शकु, पच-छा, रम%= छा। वच-छायाकरण,शम छाया अथ ग्रहविम्वस्यातिदूरे स्थितत्वाद्यदि स्वल्पान्तरतो विच, विम रेखे समानान्तरे तदा <म% प में <च, <प%<र-६०, तथा पव = रश=श कु , अत पवच, रशम विभुज समाने (रे १अ २६ क्षे युक्त्या) ते पचरम- छाछा, पूर्वोक्त सिद्धम् । अथ रम=पूपिर रेखा, स%3 दिक सूनसम्पातविन्दु, स विन्दुस्थ श कु च्छाया सज यदि पूर्वयुक्तित सज =सप-पव,तदा प बिन्दुगतश को श्छायान स बिन्दी भवेदतस्तच्छक्व. ग्रात् स विन्दुगता रेखा ग्रहविम्व. केन्द्रगता भवितुमर्ह ति, तेन शकु- ग्रस्थ दृष्टया ग्रहदर्शन भवेदेव, विन्दी शको स्थापिते छायान प विन्दुगत भवेत्तन तत्रस्थे जले, तैले दर्पणे वा ग्रहप्रतिविम्ब भवति, परा- वर्तित किरणसूत्र सविन्दौ पूर्व श क तुल्यस्थापितशक्वग्रगत भवति (पतित परावर्तितकोणयो समत्वात् ) तेन प विन्दुत स विन्दुस्थापितश क्वग्रगतरेखा मार्गेण शक्वग्रस्थाऽधोदृष्टया प बिन्दुगतजलादौ ग्रहदर्शन भवेदेवेति । भास्करादिभिराचार्नलकयन्त्रद्वारा ग्रहावलोकनप्रकारोऽभिहितो भास्करस्य सिद्धान्तशिरोमणी- विधाय बिन्दु समभूमिभागे ज्ञात्वा दिश कोटिरत प्रदेया। प्रत्यड मुखी पूर्वकपालसस्थे पूर्वामुखी पश्चिमगे ग्रहे सा॥ कोट्यग्रतो दोरपि याम्यसौम्यौ विन्दोश्च भाभारभुजाग्रयोगात् । सूत्र च विन्दुस्थनराग्रसक्त प्रसाय कर्णाकृतिसूत्रगत्या ।। हगुच्चमूल नलक निवेश्य वशद्वयाधारगथास्यरन्ध्रे । विलोकयेत्खे खचर किलव जले विलोम तदपि प्रवेक्ष्ये ॥ स म व ज यथा एतादृश एव प्रकारो मानायस्य श्रीपतेश्चापि- बाम: वटेश्वर-सिद्धान्ते यद्यपि वटेश्वराचार्यरण नलक्यन्नस्य चर्चा न नियने किन्तु भड ग्यन्तरेण श कुद्वारंव भास्करादिवत्सवं क्थ्यत इति ।।९-१०॥ हि भा --दिमत्रो का मोगविन्दुस्थितदृष्टिवश यायं वरना । मेष वानें स्पष्ट है ॥६-११॥ उपात्ति। एक ही समय मे हमूत्र मे कहीं पर शकु स्थापन करने से उसकी छाया सच जगह वरावर होती है, इसको सिद्ध करने के लिये युक्ति दिखलाते हैं, सस्कृत उपपति में जो क्षेत्र है उसको देखिये। लमकसूत्र, वि-महाविम्ब केन्द्र, पव=रमा-शकु । पच-छाया-घा, रम- छाया, -छा, क्ष-छायारणं, = छायावरण प्रहाविम्ब के प्रतिदूर रहने के कारण यदि स्वल्पान्तर से विच और बिम रेखा को समानान्तर मान लें तो रेखागणित से <=<च, <प=<९० =र तथा पवारसा-याकु इसलिए पवच और राम ये दोनो त्रिभुज वरावर ए तव पच== रम छाम्छा, इससे पूर्वोक्त सिद्ध हुमा, भव मान लीजिये रम-पूर्वापर रेखा, स=दिक्मूत्र सम्पात विन्दु स्थित गच्छाया = सज यदि पूर्व युक्ति से सज =सप-पव तव प विन्दुगत श क के छायाय स विन्दु में होना है इसलिए उस शवप्र से स विन्दुगत रेखा ग्रह दिम्ब केन्द्रगत होती है अत शक्का. स्थित दृष्टि से ग्रह दर्शन होगा ही, व विन्दु म पाकु स्थापन करने से छायान प विन्दुगत होता है इसलिए वहा जल, वा तेल या दर्पण देखने मे उनम पहदिम्ब प्रतिविम्बित होता है, और परावत्तित किरण मूत्र स विन्दु मे पूर्व दश कु के वरावर स्थापित श क के अग्रगत होता है (पतित कोण और परावर्तित कोण के तुल्य होने के कारण) इसलिए प विन्दु म स्थापित का कु के अग्रगत रेखा मार्ग द्वारा शकु के अग्र म स्थित अघोष्टि से प विन्दुगत जलादि में महविम्व दशा होता ही है ॥ भास्कर प्रादि प्राचार्यों ने नलक यन्त्र द्वारा ग्रह देखने के लिये प्रकार कहा है । सिद्धान्तशिरोमरिग मे भास्कराचार्य का मत है- "विषाय विन्दु ममभूमिभागे ज्ञास्वा दिश कोटिरत प्रदेया।" इत्यादि इसी तरह लल्लाचार्य और श्रीपति के भी क्यन हैं । यद्यपि वटेश्वराचा नलक यत्रको चर्चा नहीं करते हैं किन्तु दूसरी तरह सक ही दे द्वारा भारकरादि प्राचार्य की तरह सब कुछ कहते हैं ।।६-११॥ इदानीमिष्टच्दायावृत्ते पतभासस्थिनिमा । दद्याद जवदिनाना तदप्रयोस्तूदयास्तमनसूनम् । छायावृत्ते तन्नरान्तरमक्षच्छाधाकुलानि स्युः ॥१२॥ मि भा-भुजवत् इनाया (मूर्याना) छायावृत्ते दद्यात् । अर्थाच्दायावृत्तीय यदुदयास्तमूत्र (सूर्यापया यदि तदीयमुदयास्तस्त्र तदा छायाऽग्रया किमित्यनुपातेन यह मूर्याना से साधित भास्कर कथित उदयास्त सून प्रसिद्ध ही है। शङ्क मूल से त्रिप्रश्नाधिकारः समागत) तदुभयदिशि (पूर्वदिशि पश्चिमदिशि च ) छायावृत्ते छायावृत्तीयानांश- दानेन यो विन्दू तन्मध्यगतसूत्रमेत्र छायावृत्ते उदयास्तसूत्रम् । अस्योदयास्तसूत्रस्य शंकुमूलस्य च यदन्तरं संव पलभा भवति छायावृत्त, तर शकुतलपलभयोस्तु- ल्यत्वात् ॥१२॥ अनोपपत्ति । धमाजे धुरात्रसममण्डलमध्यभागजीवाऽग्रका भवति पूर्वपराशयो. सा। अग्रानयो. प्रगुणमत्र निवद्धसूत्रं यत्तद्वदन्ति गणका उदयास्तसूत्रम् ।। इति भास्करोक्तोदयास्तस्वरूपं सूर्यानया साधितप्रसिद्धमेव, श कुमूलात्त. दुदयास्तसूत्रोपरिकृतो लम्वः शकुतलम् । एतच्छंक तल छायावृत्ते परिणामित पलभातुल्यमेव भवति । छायावृत्तं परिणतं शंकुतल पलभातुल्य कथ भवति तत्प्रदर्श्यते । अक्षाक्षक्षेत्रानुपातेन- पलभा श कु = शकुतलम्, इद छायाकर्णवृत्ते परि. १२ णाम्यते तदा पलभा श कु छाकर्ण = छायावृत्ते श कुतलम् । परन्तु १२. त्रि १२ त्रि -पलभा-छाया- =श कु अतोऽत्र स्वरूपे श कोरुत्थापनेन पलभा १२ त्रि छाक १२ वि छाक कर्णगोलीयश क तलम् । अत सिद्धम् ।।१२।। हि.भा ~भुज की तरह मूर्य की अग्रा को देना चाहिए अर्थात् सूर्य को अग्ना मे यदि उदयास्त मूत्र पाते हैं तो छायाग्रा मे क्या इस अनुपात से घायावृत्तीय उदयास्त सूत्र योता है । यही उदयास्त मूत्र “छायावृत्त से पूर्व तरफ और पश्चिम तरफ छायावृत्तीयाग्र दान देकर तदग्रगत रेखा करने से होता है इम उदयास्त सूत्र और शङ्क मूल का अन्तर जो है वही पलभा होती है क्योकि छायावृत्त मे परिणत श कुतल और पलभा होती है ।।१२।। उपपत्ति । छायाक वरावर क्ष्माजे धुरात्र सममण्डलमध्यभागजीवाऽयका भवति पूर्वपराशयो सा। अनाग्रयो प्रगुणमत्र निवद्धमून यत्तद्वदन्ति गणका उदयास्तसूत्रम् ।। ग्यास्त सूत्र के ऊपर जो लम्ब करते है वह शङ्कतल है । इस शङ्कतल को छायावृत्त में रणामन करने से पलभा के बरादर होता है। छायावृत्त मे परिणतशङ्क, तल पलभा के बरा क्यों होता है तदर्थ युक्ति ।
वटेश्वर-सिद्धान्ते 35 १२ त्रि पमा गाई, प्रक्षक्षेत्र के अनुपात से राइ तल । इमको छायावरणवृत्त में परिणत १२ करते हैं पभा राक, छाक १२ त्रि %Dछायावृत्त में श कुतल । परन्तु -शकु छारणं पभा १२ वि द्वार प्रत शव को उत्थापन देने से --पभा = छायावर्ण गोलोय स कुतल १२ वि छाक अन सिद्ध हो गया ।।१२।। इदानी छायापरिलेखमाह । तच्छङ्क मस्तकान्तरमक्षश्रवणोऽक्षमा न्यसेत्केन्द्रम् । गाम्योत्तराक्षे केन्द्र तस्मादत्तं लिखेद्विमलम् ॥१३।। सिद्धाश घटिकाडूं खटिका लेखाश्च केन्द्रगाः कार्याः । तशतो भाभ्रमण तद्वद्वा भ्रमणमविरतम् ॥१४॥ यस्माद्विमले वृत्ते शकुच्छापा भ्रमौ स्फुटौ भवतः । तात्कालिकाच सूर्यात्क्रान्त्याद्य साधितं स्पष्टम् ॥१|| स्पष्टगतियुधराणां ग्रहोच्चपातविना न सम्यगतः। कार्यावसितास्तेषां स्वायुषि भगवाः कृता पाना ।।१६।। वि भा–तच्छकुमस्तकान्तर (पलभानश क्वोरन्तर) अक्षधवग. (पलकर्ण) अक्षमा न्यसेत् (पलभा स्थापयेत् तदा केन्द्र (छायावृत्तकेन्द्र) स्या- दर्थाच्छायावृत्तीयपलभास्थापनवशेन छायावृत्तवेन्द्रज्ञान भवेत् । केन्द्र याम्यो- तराक्षे (दक्षिणोतररेखाया) भवति, तस्मात् (केन्द्रविन्दुत.) विमल वृरा (छाया- वृत्त) लिसेच्छेप स्पष्टमिति ॥१३ १६॥ इति वटेश्वरसिद्धान्ते त्रिप्रश्नाधिकारे छायापरिलेखविधिश्चतुर्दशोध्याप । हि भा-पलभान और शक्कन का अन्तर पलवर्ण होता है । पलभा वो स्थापन करना तब वेन्द्र (छायावृत्त के केन्द्र) का ज्ञान होता है अर्थान् पलभा स्थापन वश से छाया- वृत्त केन्द्रज्ञान होता है, वह केन्द्र दष्टिगोचर रेखा में होता है, इस केन्द्रविन्दु से सामान लिखना चाहिये, प्रागे की बातें स्पष्ट हैं ।।१३-१६।। इति वटेश्वरसिद्धान्त मे त्रिप्रनाधिकार में छायापरिलेखविधि नामक चौदहवा अध्याय समाप्त हुप्रा ॥
पञ्चदशोऽध्याय
अथ प्रश्नाध्यायविधिः
तत्रादौ तदारम्भप्रयोजनमाह ।
त्रिप्रश्ने प्रश्नसंख्यां कथमपि गएकः शक्यते नावगन्तुम्,
मानाठ्यज्याविधीनामत इह लघुक स्पष्टशब्दार्थमूचे।
प्रश्नाध्याय विधास्ये नृपसदसि समाकर्ण्य यद्गोलवाह्या,
ग्लानि संयान्त्यबोधादतिमलयतरोर्दोलनेन प्रपत्रम् ॥१॥
वि भा -गणक (ज्योतिविभि) क्थमपि (केनाप्युपायेन) निप्रश्ने
(नयारणा दिग्देशकालाना प्रश्ना यन तस्मिन्नधिकारे निप्रश्नाधिकारे इत्यर्थ ) प्रश्न-
सख्या (तत्सम्बन्धिप्रश्नगणना) अवगन्तु (ज्ञातु ) न शक्यते (न पार्यते) अत
(अस्मात्कारणात्) इह (निप्रश्नाधिकारे) मानाढयज्याविधीना (मानयुक्तज्या.
रीतीनामज्ज्यात्मवपदार्थ मानज्ञानार्थ रीतीना) लघुक (गणितलाघवार्थ तन्ना-
मक) स्पष्टशब्दार्थ (स्पष्ट शब्दार्थो यस्य त) ऊचे (कथितवान्) अर्थाद् यथा बहुत्र
स्थले गरिणतलाघवार्थ माद्यान्यसज्ञके रक्ष्येते तथैवात्राधिकारे कोणशक्वादि साध-
नेपु लघुक नाम रक्षितम्)। गत् (यस्मात्कारणात्) नृपसदसि (राजसभाया)
गोलवाह्या (गोलज्ञानशून्या ) प्रश्नाध्याय (प्रश्नप्रकरण) समाकर्ण्य (श्रुत्वा)
ग्लानि (लज्जा मनोदु ख वा) सयान्ति (प्राप्नुवन्ति) अबोधात् (तत्प्रश्नज्ञानरहि-
तात्), मतिमलयतरोर्दोलनेन प्रपन (अतिशयमलयाचलस्थवृक्षदोलनेन यथा
तत्पन पतित तथ व राजसभाया गोलज्ञानशून्यत्वात्प्रश्नश्रवणेन तत्पतन भव-
तीत्यर्थः) प्रत प्रश्नाध्याय, विधास्ये (करवाणि) ॥१॥
हि भा--ज्योतिषी लोग किसी तरह भी त्रिप्रश्न (दिशा, देश और काल सम्वन्धी
प्रश्न जिसमे उस त्रिप्रश्नाधिकार) मे तत्सम्बन्धी प्रश्नो की गणना को समर्थ नहीं होते हैं
इसलिए इस त्रिप्रश्नाधिकार म ज्यात्मक पदार्थ के मानज्ञानार्थ परिपाटी के लिए लघुक जिस
का शब्दार्थ स्पष्ट है अर्थात् छोटा उसको कहा है अर्थात् जैसे बहुत स्थलो मे गणित लाघव
के लिए प्राद्य, अन्य आदि नाम रखते है वैसे ही इस अधिकार मे कोणशक्वादि सापनो मे
लघुक नाम रक्खा गया है, जिस कारण से आज सभा मे गोलज्ञान रहित व्यक्ति प्रबोध के
कारण प्रश्नाध्याय को सुन कर हास्यास्पद को पाते है, जैसे प्रतिगय मलय पर्वत के ऊपर
वृक्षो के डोलने से पत्ते गिरते है उसी तरह राजसभा मे वे लोग गिरते हैं । इसलिए प्रश्ना-
ध्याय को करता हूँ ॥१॥
वटेश्वर-सिद्धान्त तत्र प्रश्नानाह। भाप्रवेशनविधि गमनाद्यो भात्रयेण ककुभः कथयेदा। एवमपक्रमपलश्च विना यो भाभ्रम प्रकययेद् गरणक, सः ॥२॥ विमा यो भागमनात् (छायानिर्गमनतः) भाप्रवेशनविधिम् (छायाप्रवेश- पद्धति) वा भात्रयेण (छायारितयेन) ककुभ कथयेत् (दिज्ज्ञान कययेत) एवं अपक्रम पलेविना (कान्त्यक्षार्शविना) भानम (छायानमरण) प्रकथयेत्स गणको- ऽस्तीति ॥२॥ पत्र प्रश्नत्रय पत्तते । तन प्रथम प्रश्नोत्तरार्थ विवार्यते। समाया भूमाविष्टच्छायार्णव्यासान वृत्त विलिस्य तद्वत्तकेन्द्र स्था- पितस्य शकोश्छायाग्र पूर्वान्हे यन विशति स पश्चिमबिन्दु । अपरान्हे च यत्र निर्गच्छति स पूर्वविन्दु । एतद्विन्दुद्वयगता रेखा स्थूला पूर्वापरा रेखा वास्तव- पूर्वापररेखाया असमानान्तरा । यद्येकस्मिन दिने रविकान्ति स्थिरा कल्प्येत तदा छाया प्रवेशनिर्गमकान्त्यो समत्वात्तदप्रयोरपि समत्व तेन निर्गमकालिकामतुल्य वास्तवपश्चिमबिन्दुतोऽग्रागदानेन यो विन्दु स एव च्छायाप्रवेशविन्दुरिति । परमकस्मिन् दिने रविक्रान्ति स्थिरा न तेन पूर्वोक्तरीत्या छायाप्रवेशविन्दुज्ञान सम्यक् न जातमतस्तद्वास्तवज्ञानार्थमुपाय छायाप्रवेशकालिक्क्रान्ति का ? छायाप्रवेशकालिकाना=अना छायानिगमकालिक्क्रान्ति =ना' छायानिगतकालिकाना=अग्रा अथाऽग्रान्तरमानीयते यथा त्रिज्या नि अग्रा' अक्षक्षेत्रानुपातेन -अ'ग्रा लज्या लज्या छायाकरर्णवृत्त परिणाम्यते त्रि जाग्याथ्यापर्ण लज्या त्रि छायवर्णवृत्तं प्रवेशकालिकाना= प्राज्या छाक लज्या नि.माज्या छावण त्रिज्या छायावर्णवृत्त निर्गमकालिकाना माज्या छाक लज्या एतयोरन्तरम् दाय माज्या ताज्या)-छायार्णवृत्तोयानान्तर-छायापर्णवृत्ते भुजा- न्तर एतावत्येवान्तरे प्रवेशविन्दु रव्यायनवशा सचालयेत् । यदि रविरत्तरायो तदो- सरतो दक्षिणायने रवो दक्षिणातवालयेत्तदा चालितपूर्वविन्दुपश्चिमविन्द्वोर्गता रेखा वास्तवपूर्वापररेखाया ममानान्तरा भवेत् । परमत्र निर्गमविन्दु (पूर्वबिन्दु)- -अग्रा। तथा लज्या निप्रभाधिकारः वशेन प्रवेशविन्दुज्ञानमपेक्षितमत पूर्वोक्ताऽग्रान्तरस्य निर्गमच्छायाप्रविन्दुतो दानेन प्रवेशविन्दुज्ञान भवेदेवेति । श्रीपतिभास्करप्रभतिभिराचार्य पूर्वोक्तरीत्याऽग्रान्तर भुजान्तर वा ससाध्य तद्वशेन वास्तवपूर्वापररेखाया समानान्तर रेखाज्ञान कृत पूर्वोक्तमग्रान्तर भुजा- न्तर वा रेखात्मक तस्य वृत्तपरिधौ दानानौचित्यात्तद्रीत्या न वास्तवदिज्ज्ञान भवति । दिड मीमासायां म म श्रीमुधाकरद्विवेदिना पूर्वसाधितछायावृत्तीय मुजान्तरवशेन स्फुट दिज्ज्ञान कृतमिति ॥ २॥ द्विनीयतृतीयप्रश्नयोरुत्तरार्थम एतत्प्रश्नद्वयोत्तारार्थयुक्तिश्छायापरिलेखविधौ ७-८ श्लोकयोयुक्त्यवलोकनेन स्पप्टेति ॥२॥ हि भा-जो व्यक्ति छाया निर्गमन से छायाप्रवेशविधि को और तीन कालिक छाया से दिशाज्ञान को तथा क्रान्ति और अक्षाश के विना छायाभ्रमण को कहे वह ज्यो- तिषी है ॥२॥ यहाँ तीन प्रश्न है । यहा प्रथम प्रश्न के उत्तर के लिए विचार करते है । उपपत्ति । समान पृथ्वी मे इष्टच्छाया कर्णव्यासाध से वृत्त लिखकर उसके केन्द्र मे शकु को स्थापन करने से उसकी छाया पूर्वान्ह मे जहा प्रवेश करती है वह पश्चिम बिन्दु है। अप- रान्ह मे उसी शकु की छाया जहा निर्गत होती है वह स्थूल पूर्व बिन्दु है । इन दोनो बिन्दुप्रो में लगी जो रेखा होती है वह स्थूल पूर्वापर रेखा है, जो कि वास्तव पूर्वापर रेखा की असमानान्तर है। यदि छायाप्रवेशकालिक अना और निगमकालिक अग्रा बराबर रहती तब तो वह रेखा वास्तव पूर्वापररेखा को समानान्तर रेखा ही होती पर दोनो कालिक अग्रा तब ही बरावर हो सकती है जबकि एक दिन मे रवि की क्रान्ति स्थिर मानी जाय पर यह मानना प्रसङ्गत है । अत वास्तविक पूर्वापर दिशा ज्ञान के लिये विचार करते हैं । यहा कल्पना करते हैं छायाप्रवेशकालिक क्रान्तिका छायाप्रवेशकालिक अग्रा= अग्रा छायानिर्गमकालिकक्रान्ति = का' छायानिर्गमकालिक अग्राना त्रि क्राज्या त्रिका'ज्या अक्षक्षेत्रानुपात से ---प्रवेशका अग्रा। लज्या लज्या छायाकर्ण वृत्त में परिणामन करने से त्रि क्राज्या छाकरण काज्या छाक ==छायाकर्ण वृत्तीयाग्रा लज्या त्रि लज्या क्राज्या छाक एव 'निर्गमका छायाकरर्ण वृतीया लज्या निर्गमका अ'ग्रा वटेश्वर-सिद्धान्ते दोनो के अन्तर रमै से छाक लज्या -- (माज्या -काज्या)=छायावर्णवृत्तीयाग्रान्तर= छापारण वृत्तीयमुनान्तर इतने ही अन्तर पर रवि के अयन वश करके प्रवेश विन्दु को चलाना चाहिये । यदि रवि उत्तरायण में हो तो उत्तर से रवि १ दक्षिणायन में रहने से दक्षिण से चाला देने में चालिन पूर्वबिन्दु और पश्चिम विन्दुगतरेखा वास्तव पूर्वापर रेखा की समानान्तर रेखा होती है । लेकिन यहा निर्गम विन्दु से प्रदेश विन्दुज्ञान अपेक्षित है इमलिये पूर्वसाधित मग्ना- न्तर या भुजान्तर तुल्य निर्गम विन्दु से दान देने से प्रवेदा विन्दुज्ञान ोगा । श्रीपति तथा भास्कर आदि आचार्य ने पूर्वरीति से अप्रान्तर साधन करके तत्तुल्य पूर्व- बिन्दु को चालित कर वास्तव पूर्वापर रेखा को समानान्तर रेखा का ज्ञान किया है। पूर्वोक्त अग्रान्तर या भुजान्तर रेखात्मक है उमको वृत्तपरिधि मे दान देना अनुचित है इसलिए उन लोगो के दिकज्ञान ठीक नहीं है । म म श्री सुराकर द्विवेदी ने दिड मोमासा में पूर्वसाधित छायावृत्तीय भुजान्तरवश में वास्तव दिक्ज्ञान किया है ।।२।। द्वितीय और तृतीय प्रश्न के उत्तर के लिए युक्ति "छायापरिलेसविधि" के ७-८ श्लोको की मुक्ति देखने से स्पष्ट है ॥२॥ इदानीमन्या प्रश्नानाह । वेति दिशोऽपमनाशपतों द्युदलद्युति धुतिभ्रमादुत वृत्तात् । मध्यदिनातितोऽकमवैत्य स्वाक्षजभा कुरुते गएकः स ॥३॥ वि भा-योऽपमजांशपले (कान्त्यक्षाशै ) दिशो वेति (दिज्ज्ञान जानाति) उत घतिभ्रमादत्तात् (छायानमणवृत्तात्) धुदलद्युति (मध्यच्छाया) जानाति, तथा धुदलद्युतित (मध्यच्छायात) अ (रवि) अवैत्य (ज्ञात्वा) स्वाक्षजभा (पलभा) कुरुते, सो गणकोऽस्तीति । गतेषामुत्तरार्थमुपपत्तय । अत्र प्रश्नचतुष्टय वर्तते तत्र प्रथमप्रश्नस्योत्तरार्थ विचार । क्रान्त्यक्षा. शयोर्ज्ञानात्प्रश्नाध्यायस्य द्वितीयश्लोकोपपत्तिदर्शनात् "तत्कालापमजीवयोस्तु विवरादि" त्यादि भास्वरोक्त न वा तदुत्तर सुलभमेवेति ।। द्वितीयप्रश्नोत्तरार्थ विचार । छायाभ्रमणवृत्तान्मध्यच्छायाज्ञान छायापरिलेखविधी ७० दलोकयोरुप. पतिदर्शनेन स्फुटमेवेति ॥
७८ निप्रश्नाधिकार! ६२१ तृतीयप्रश्नोत्तरार्थ विवार । मध्यच्छायातो रवेज्ञानम्। मध्यच्छायाज्ञानेन/छाया+१२-छायावरण । तत छायानि --हग्ज्या।अस्या छायाक श्वाप दिनार्धे नताशा भवेयु । ततो दिनार्धनताशयो सस्कारेण कान्तिज्ञान भवेत्तत त्रि काज्या रविभुजज्या। अस्याश्चाप रविभुजाशा भवन्तीति ।। जिज्या हि मा-जो व्यक्ति-विशेष क्रान्ति और अक्षाश को जानकर दिशा को जानते है, छायाभ्रमरणवृत्त से मध्यच्छाया को जानते हैं, वा मध्यच्छाया से रवि को जानकर पलभा को जानते हैं वे ज्योतिषी है ॥ इन प्रश्नो के उत्तर के लिए उपपत्ति यहा चार प्रश्न हैं, उनमे 'प्रथम प्रश्न के उत्तर के लिए विचार करते हैं। क्रान्ति और अक्षाश के ज्ञान से प्रश्नाध्याय के द्वितीयश्लोक की उपपत्ति देखने से या "तत्कालापम- जीवयोस्तु विवरात्" इत्यादि भास्करोक्त दिवज्ञान से सुलभ ही से दिक्ज्ञान हो जायगा ॥ द्वितीय प्रश्न के उत्तर के लिए विचार। छायाभ्रमण वृत्त परिधि से मध्यच्छाया ज्ञान के लिए छायापरिलेखविधि के श्लोको को उपपत्ति देखनी चाहिये ।। तृतीय प्रश्न के उत्तर का विचार स्पष्टार्थ है ।।३।। इदानीमन्यान् प्रश्नानाह। वीक्ष्य रवेरुदय रविविद्यो यष्टिविधेनिखिलोमिति च । वेत्ति पल पलभां गणितज्ञ गोलजातविपयज्ञवरिष्ठ. ॥४॥ वि भा -यो रविवित् (रविपरिचित ) रवेरुदय वीक्ष्य (दृष्ट्वा) यष्टिविधे (यष्टियन्त्रविधित ) निखिलोर्ध्वमिति (निखिलाना सम्पूर्णानामूर्ध्वस्थिताना मान ) पल पलभा च (अक्षाशपलभा च) वेत्ति (जानाति) स गोलजातविषयज्ञ- वरिष्ठ (गोलीयविषयपण्डितेषु श्रेष्ठ ) स्यादिति ॥४॥ एतदुत्तरार्थ विचार्यते। पत्र प्रथम रवेरपाया नतोन्नताशज्ययोश्च स्वरूप प्रदर्य तत्साधन च क्रियते। समाया भूमौ सरलशलाका रूपयेष्टयष्ट्या लिखिते वृत्ते दिक्साधनद्वारा दिवसाधन कृत्वा चक्राशाङ्कित कार्य प्रतिभागेषु षष्टि कला अशाश्च तदा बटेश्वर-सिद्धान्ते पूर्वापररेखातो यावत्यंशान्तरे रविर्भवति तदंशज्या तस्मिन् दिने रवेरमा ज्ञातव्या । वृत्तकेन्द्र वृत्तन्यासार्धरूपा नष्टच्छायेष्टयष्टियथा भवेत्तथा तिर्यक् रविकेन्द्र- गामिसूत्राकाराऽवद्धलम्बा धार्या । वृत्तकेन्द्राधरङ्ग लेलंम्बपातोऽर्थाद्यल्लम्बस्प- सरलशलाका बद्धा पूर्वयष्टिधूता तन्निपातो भवति तदङ्ग लमान एव यष्टिव्या- सार्थोत्पन्नवृत्त नताशज्या (दृग्ज्या) भवति । लम्बाशलाङ्गुलप्रमाणमुन्नता शज्या (शकु ) भवतीति ।। अत्र यष्टिासार्ध (त्रिज्या) रूपा, एतद्वयासा|त्पन्नवृत्तं क्षितिजवृत्तम् । अत्र वृत्त पर्वबिन्दुत प्रौदयिक रवि यावदना चापाशाः । अग्नाग्ने उदितो रविर्यथा यथोपरिगच्छति तथा तथा केन्द्र स्थापितयष्टिन प्टद्युति. स्यात् । नष्टद्युतेर्यप्टे- रग्राद्यावान् लम्वम्तावानेव तस्मिन् काले शकुः तथा लम्बमूलविन्दोतकेन्द्रपर्यन्तं नताराज्या (दृाज्या) भवति । एतयोस्त्रिज्या वृत्ते परिणाम्यते, यदि यष्टयानीते यष्टिव्यासाधंवृत्तीये नताशोन्नताक्षज्ये लभ्येते तदा विज्ययाके इत्यनुपातेन त्रिज्यावृत्तीये नताशोन्नताशज्ये समागते । पूर्वलिखितवृत्ते मध्यान्हकाल एव वृत्तकेन्द्रादुत्तरदिशि दक्षिण दिशि च शकुपतन भवितुमर्हति तेनोत्तरगोले मध्यान्हकाले वृत्तकेन्द्रादुतरदिशि शकुमूल- पत्तने तन्मूलत पूर्वापरमूगोपरि यो लम्ब. स भुजः । एतेन भुजेन रहिता रव्यग्रा राबुतल भवेत् । वृत्तकेन्द्राक्षिणे शकुमूले भुजेन युताना शकुतल भवेत् । ततोऽनु- पातो यदि मध्यान्हशको श कुतल लभ्यते तदा द्वादशागुलशको का समागच्छति पलभा । अथ / मध्यश '+श कुर्तल' हत्ति तदा साकुरत्रि -लम्बज्या।तथा श कुन्तल नि -अक्षज्या। हृति हृति मध्यान्हतो भिन्नसमये पलभाज्ञानार्थ उपरिलिखितोपपत्तो मध्यनतज्योन्नतज्ये (ग्ज्याश कू) यदा ज्ञाते भवतस्तदा =छा ../छा+१२= छायाकणं तदा यत , छायाकर्णगोले पभा शकुतल :छायाकरण गोलीयाना भुज-छायाकणंगोले दश कुनल-पलभा भास्कराचार्यपापि यष्टियानेणाग्राक्षाशादिज्ञान सिद्धान्तशिरोमणी कृतं यथा च तत्पद्यानि । "त्रिज्या विषम्भाधं वृत्त कृत्वा दिगड़ित तत्र । दत्वाऽना प्राक् पश्चाद् धुज्या वृत्त च तन्मध्ये ।। तत्परिधौ पप्टपक यष्टिर्नप्टद्युतिस्तत: केन्द्र । विज्याङ्ग ला निधेया यष्टयग्रानान्तर यावत् ।। हज्या४१२.
विप्रश्नाधिकारः ६२३ तावत्या मौव्यां यद् द्वितीय वृत्ते धनुर्भवेत्तत्र । दिनगतशेषा नाड्य प्रापश्चात् स्यु क्रमेणवम् ॥ यष्टयग्राल्लम्बो ना ज्ञेया दृग्ज्या नृकेन्द्रयोर्मध्ये । उदयेऽस्ते यप्टयनप्राच्यपरा मध्यमग्रा स्यात् ॥ श कूदयास्तसूत्रान्तरमर्कगुण नरोद्ध त पलभा ॥” इति ॥४॥ हि भा-जो रविज्ञाता रवि के उदय को देखकर यष्टियन्त्र विधि से सम्पूर्ण पदार्थों के मान और अक्षाश तथा पलभा के मान को जानते है वह गणित के पण्डित गोलीयविपय के पण्डितो में श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥ इनवे उत्तर के लिए विचार करते है । यहां पहले रवि को अग्रा के तया नताशज्या और उन्नताशज्या के स्वरूप को दिखा- कर उनके साधन करते हैं । समान पृथ्वी मे सरलशलाका का रूप इप्टयप्टि को त्रिज्या मान कर वृत्त बनाना, वह क्षितिज दृत है । दिक्साधन नियम से इस वृत्त मे पूर्वापररेखा और दक्षिणोत्तररेखा का ज्ञान कर लेना, इस वृत्त मे पूर्वविन्दु से जितने अन्तर पर रवि है उसकी ज्या अग्रा है । अग्रान मे उदित रवि ज्यो ज्यो ऊपर जाते हैं त्यो त्यो केन्द्र मे स्थापित यष्टि नप्टद्युति होती है । नष्टद्युति यष्टि के अग्र से जो लम्ब होता है वह श कु है, लम्बमूलविन्दु से वृत्त केन्द्र पर्यन्त नताशज्या (हग्ज्या) होती है । इन दोनो को त्रिज्यावृत्त में परिणामन करते हैं यदि यष्टि व्यासार्ध मे यष्टि व्यासा?त्पन्न नताशज्या और उन्नताराज्या पाते हैं तो त्रिज्या में क्या इस अनुपात से त्रिज्यावृत्तीय नताशज्या और उन्नताशज्या पाती है, पूर्व- लिखितवृत मे मध्यान्हकाल ही मे वृत्त केन्द्र से उत्तर दिशा मे और दक्षिण दिशा मे शकुमूल गिरता है इसलिये उत्तर गोल में मध्यान्हकाल मे वृत्तकेन्द्र से उत्तर तरफ शकुमूल गिरने पर शकुमूल से पूर्वापर सूत्र के ऊपर जो लम्ब करते हैं वह भुज है । रवि की अना में इस भू को घटाने से शकुतल होता है । वृत्तकेन्द्र से दक्षिण तरफ शकुमूल गिरने पर रवि की अग्रा मे भुज को जोडने से शकुतल होता है । तब अनुपात करते है यदि मध्यशकु मे शकुतल पाते हैं तो द्वादशाङ्ग ल शकु मे क्या इस अनुपात से पलभा पाती है। / मशकु'+ शकुतल' = हृति । तव शकुतलX१२ -अक्षज्या हुति इस पर से पलभाज्ञान सुलभ ही है । मध्यान्ह से भिन्न समय मे पलभाज्ञान के लिए पूर्वलिखित उपपत्ति से जब मध्यान्ह दृग्ज्या.१२ काल मे दृग्ज्या और शकु विदित हुआ है तो =छा। /छा+१२-छारगं, शकु इस छायाकणं ध्यासार्धवृत्त मे पलभा शकुतल होता है इसलिए छायाका वृनीय प्रया भुज छायाकर्णवृत्तीय शकुतल पलभा इस तरह पलमा ज्ञान होता है । माकरा- % 3D ६२४ वटेश्वर-सिद्धान्त चार्य ने भी यष्टियन्त्र के द्वारा दिनगत पटिवादिशान, अपा, प्रक्षाशादिना ज्ञान सिद्धान्त. शिरोमरिण म दिया है, जैसे उनके पद्य हैं- "त्रिज्या विवाभाचं वृत्त हत्या दिगङ्कित तत्र" इत्यादि ॥४॥ इप्टभा च सममण्डलभा च कोणमा च बहुधा समीक्ष्य य । शीघ्रमेव बहुधाऽर्कमानयेत्कालमियमयवा स तन्त्रवित् ॥५॥ विभा-य इपभा (इष्टच्छाया) सममण्टलच्छाया-कोणच्छाया च समीक्ष्य (इष्ट वा) शीघ्रमेव वहुधा (रवि) प्रानयेदथवेष्टकालमानयेत्स तन्नवित् (ज्योतिर्वित्) स्यादिति ॥१॥ एतदुत्तरार्थ विचार्यते । प्रथमद्वितीयप्रश्नोत्तरायं विचार । १२ त्रि सक सममण्डलच्छायाज्ञानेन /सहा + १२=सममण्डलकम् । तत -=सश कु अथ निज्यया यदि अक्षज्या लभ्यते तदा समश कुना केतिजाता क्रान्ति- अज्या सश नि अन समश कोरुत्थापनेत अज्या १२ नि सर वि ज्या अज्या १२ - क्रान्तिज्या । सक अज्या १२ सक अज्या १२ ल ज्या सकल ज्या पभाल ज्या सक प्रान्तिज्या तत त्रि काज्या .= अस्याश्चाप तदा रविभुजाशा भवेयुरिति । सममण्डलकर्णज्ञानेन रवानयनप्रकार सिद्धान्तशेखरे श्रीपतिनाऽप्येवमेव कृतोऽस्ति । यथा च तदीय श्लोक । सूर्याक्षभान्ने पललम्बजीवे कर्णेन भक्ते समश कुजेन । क्रमाद् भवेतामपमज्य के ते विकर्तन प्राक्तनकर्मणात ॥ अथवा समश कुज्ञानेन रव्यानयनप्रकार । अथ निज्ययाऽक्षज्या लभ्यते तदा सममण्डलश कुकर्णेन केति जाता क्रान्ति- अज्या सश ततो जिनज्यया त्रिज्या लभ्यते तदा मान्तिज्यया केति जाता नि त्रि प्राज्या अज्या सश त्रि रविभुजज्या अज्या सश जिज्या अस्या- त्रि जिज्या जिज्या श्वाप तदा रविभवेदिति ॥५॥ ज्या % 3D %3- निप्रश्नाधिकार ६२५ अथ तृतीयप्रश्नोत्तरार्थं विचार । कोणच्छायातो रवेर्ज्ञानम् । कोणवृत्तस्थिते रखौ कोणवृत्तपूर्वापरवृत्ताभ्यामुत्पन्नकोण = ४५ । तथा कोणव त्तयाम्योत्तरवृत्ताभ्यामुत्पन्नकोणश्च = ४५ तेनाऽत्र कोरणश क - मूलात्पूर्वापरसूत्रीपरिलम्बो भुज =कोणश क मूलाधाम्योतरसूत्रोपरिलम्व कोटि- सज्ञक । कोणश क मूलाद्भूकेन्द्र यावदृग्ज्या, तदा भुजकोटिहग्ज्याभिरुत्पननिभुजे कोणानुपातेन त्रिज्यया यदि हग्ज्या लभ्यते भूकेन्द्रलग्नकोणज्यया पश्चचत्वारिंश ज्ज्यया केत्यनुपातेन समागतो भुज = दृग्ज्या ज्या ४५ , अथ कोणवृत्तस्थ रव्यु नि परिगतध्र वप्रोतवृत्तनाडीवृत्तसम्पातान्निरक्षोधिरसूत्रोपरिलम्ब =विज्यावृत्तीय- नतकालज्या इय धुज्यावृत्तपरिणता याम्योत्तरवृत्तधरातलोपरिकोणश कोरग्रा- ल्लम्बरुपा रेखा नतकालज्या भवति सा च पूर्वानीतकोट्या समाना । तत द्यज्या-नतकालज्या दृग्ज्या ज्या ४५ नि त्रि नि त्रि नतकाज्या दृग्ज्या ज्या ४५ = धुज्या, त्रिज्यावर्गे विशोध्य मूल ग्राह्य तदा क्रान्तिज्या भवेत्त- नतकाज्या तो रविज्ञान सुगममेव ।। प्रथमप्रश्नोत्तर सुगममेवेति ॥५॥ हि भा-इष्टच्छाया सममण्डलच्छाया तथा कोणच्छाया को जानकर जो व्यक्ति रवि को लाते है अथवा इप्टकाल को लाते है वे ज्योतिषिक है ॥५॥ इनके उत्तर के लिये विचार करते हैं । पहले दूसरे प्रश्न के उतर के लिए विचार । सममण्डलच्छाया ज्ञान से /सछा+१२ = सममण्डल कर्ण तव ...१२४ त्रि =सश कु । यदि त्रिज्या मे अक्षज्या पाते है तव समशकु मे क्या इस अनुपात से दृग्ज्या-ज्या४५ 3D सक अज्या सश त्रि क्रान्तिज्या । राहा ममशकु को उत्थापन करने से क्रान्तिज्या आती है। पभा लज्या सक अज्या १२ त्रि अज्या १२ ---क्राज्या- अज्याX१२ लज्या सक सकलज्या त्रि सक मि. क्राज्या तव जिज्या =रभुजज्या, इसके पाप करने मे रवि भुजाश होता है । सममण्डल कर्ण- ज्ञान से रवि के प्रानयन प्रकार सिद्धान्तशेखर मे श्रीपति ने भी इसी तरह किया है। जैसे- सूर्याक्षभाघ्ने पलरम्बजीवे कर्णेन भक्त समशङ्क, जेन । क्रमाद् भवेतामपमज्यवेते विवर्तन प्राक्तनकर्मणान , । ६२६ वटेश्वर-सिद्धा ते अथवा समाकु ज्ञान से रवि का प्रानयन प्रकार । त्रिज्या मे यदि अक्षज्या पाते हैं तो समझडू. मे क्या इस अनुपात से क्रान्तिज्या प्राती काज्या । तब जिनज्या में यदि त्रिज्या पाते हैं तो क्रान्तिज्या में क्या इम वि प्रज्या सश त्रि क्राज्या जिज्या % 32 अनुपात से रवि की भुजज्या प्राती है, र ज्या यहा शान्तिज्या को उत्थापन देने से प्रज्या सश त्रि नि.जिज्या रविमुज्या प्रज्या सश = रभुज्या । इसके चाप करने मे रवि भुजाश होता है ।।५।। जिज्या तीसरे प्रश्न के उत्तर के लिए विचार । कोण छाया से रवि का ज्ञान । कोरावृत्त मे रवि के रहने से कोणवृत्त और पूर्वापर वृत्त से उत्पन्न कोण:४५ तथा कोणवृत्त और याम्योत्तर वृत्त से उत्पन्नकोण=४५ इसलिए कोण माकुमूल से पूर्वापर सूत्र के ऊपर लम्ब = भु कोणश कुभूल से याम्योत्तर रेखा के ऊपर लम्ब= कोटि कोरएश कुमूल से भूकेन्द्र पर्यन्त = हग्ज्या, तव भुज, कोटि और दृाज्या इन भुजकोटि और कर्ण से उत्पन्न त्रिभुज मे कोरणानुपात करते हैं । यदि त्रिज्या में हग्या पाते हैं तो पैतालीस मश की ज्या मे क्या इम अनुपात से कोटि प्रमाण आता है । दृाज्या ज्या ४५ D D हम्ज्या ज्या ४५ -कोटि । कोणवृत्तस्थ रवि के ऊपर ध्र वप्रोतवृत्त पोर नाडीवृत्त , त्रि के सम्पात बिन्दु से निरक्षोर्ध्वाधर सूत्र के ऊपर लम्बनतकालज्या, यह नतकालज्या विज्यावृत्तीय है इसको द्युग्यावृत्त में परिणत करने से कोणश तु के अग्र से याम्योत्तरवृत्त धरातल के ऊपर लम्बरेखा-धुज्यावृत्तीय नतकालज्या पूर्वानोतकोटि नतकाज्या धुज्या हरज्या ज्या ४५ त्रि नि त्रि -धुज्या त्रिनतकाज्या हग्ज्या ज्या ४५ इसके वर्ग को विज्यावर्ग मे घटाकर मूल लेने से क्रान्तिज्या नतकाज्या होती है /त्रि'- कान्तिज्या तब रवि भुजज्या इसके चाप करने से रवि का भुजांश होता है ।। प्रथम प्रश्न का उत्तर मुगम ही है ।।५।। पुन प्रश्नाना। चरखण्डपलशिविद्रवि कुर्यादिष्टचरासुतोऽक्षमाम् । दपलद्युतितश्चराधकं विप्रइनोक्तमवति स स्फुटम् ॥६|| विक्राज्या जिज्या निप्रश्नाधिकार तदा तदा वि. भा.--यश्वरखण्डपलाशवित् (चरार्धाक्षाशज्ञाता) रवि कुर्यात् (रवि सापयेत्) तथेष्टचरासुत. (इष्टचराधंज्ञानात्) अक्षभा (पलभा) साधयेत् । स्वपल- धुतित (स्वपलभात) चराधक साधयेत्स स्फुट विप्रश्नोक्त विधि जानातीति ।।६।। अन प्रश्नत्रयमस्ति तत्र प्रथमप्रश्नोतरार्थमुपपति । अक्षाशज्ञानेन पलमाज्ञान सुलभमेव : ६०-अक्षाश लम्वाश अज्या १२-- पलभा तदा कल्प्यते क्रान्तिज्याप्रमाणम्य लज्या पभाय पभाय '-कुज्या, वर्गकरणेन अथ क्रान्तिज्यावोंनस्त्रि- १२ चज्या द्य ज्यावों धुज्यावर्ग, नि-य तदा चज्या द्यु =कुज्यावगैरण त्रि नि कुज्यावर्गयो. समीकरणम् पभा' य' चज्या धु' चज्या (त्रि'-य') छेदगमेन १२ त्रि त्रि.य.पभा'=१२४ चज्या (त्रि'-य')= चज्या १२ त्रि-१२ चज्या'4' समयोजनेन वियपभा'+१२ चज्या' य-चज्या' १२ त्रि' =य' (त्रि' पभा+१२-चज्या')=-चज्या १२ त्रि' चज्या १२ त्रि' त्रि त्रिभा+१२ चज्या ज्या १२ -कुज्या =-य-3 निपभा'+१२.चज्यामलेन य मान भवेद । ततो रविज्ञान सुगकमिति ॥ सिद्धान्तशेखरे श्रीपतिनैवमेव क्रान्तिज्ञान कृतम् । यथा-- सूर्यनी चरगिञ्जिनीकृतकृतिस्तद्युक्तभक्ता सती। त्रिज्याऽक्षप्रभयोधस्य करणी छेदस्त्रिभज्या कृते ॥ लब्धेलमिनापमस्य हि गुणस्तस्मादपि प्रोक्तवत् । तिग्माशुविषुवात्प्रभावरदलज्ञानादसौ जायते ॥ मगुप्तोक्तप्रकारसदृश एव श्रीपतिप्रकार । ब्रह्मगुप्तप्रकारश्च- अर्काज्ञाने ज्ञाने विषुवच्छाया चरासूनाम् । इष्टचराधस्य ज्याक्षयवृद्धिज्या तदर्ध वधकृत्या ।। त्रिज्या विपुवच्छाया वधवर्गो युतहतश्छेद ।
%3- ६२८ वटेश्वर-सिद्धान्ते व्यासार्धकृतेर्मूल क्रान्तिज्या व्यासदलगुणा भक्ता । जिनभागजीवया लब्धचाफमर्क, पदैः प्राग्वत् ॥ चज्या'.१२.त्रि' चज्या'.१२ अथ य -मूलेन त्रिपमा+१२.चज्या पभा'.+१२.चज्या त्रि चज्या १२ = य एतेन "चरज्यवाऽर्काभिहतिस्त्रिमा /पभा+१२.चज्या त्रि भक्ता" इत्यादि भास्करोक्त समुपद्यते ।।६।। हि. भा.-चरखण्ड और अक्षाश जानकर रवि को जो लाते हैं तथा इष्टचरासु पर पलभा लाते हैं और स्वपलमा से जो चराध लाते हैं वह स्पष्ट रूप से त्रिप्रश्नोक्तविधि को जानते है ॥२॥ यहा तीन प्रश्न हैं उनमे प्रथम प्रश्न के उत्तर । प्रज्या १२ प्रक्षाशज्ञान से लम्बागज्ञान होगा तव- '-पभा, लज्या क्रान्तिज्या का मान =य । पभाय पभा या चज्या.य =कुज्या : =कुज्या ।त्रि-य- धु'.. 3-कुज्य १२ पभायर चज्या'.धु छेदगम करने से पभा य.त्रि-चज्या.यु.१२२ १२२ वि तब =चज्या'.१२२(त्रि'-य') = चज्या' १२२वि-चज्या'.१२२.१-पभा य.त्रि समयोजन से चग्या'.१२२ विपभा यत्रि+चज्या'.१२.५% य (पभा'.त्रि+चज्या.१२) चज्या'.१२२.विर = "(१) पभा'.त्रिज्या १२५ त्रि पभा .त्रिज्या .१२२ मूल लेने से य मान होता है इस पर से रवि. चज्या'.१२ ज्ञान सुगम ही है । = सिद्धान्तशेखर मे श्रीपरि ने इसी तरह क्रान्तिज्ञान दिया है । यया-- "सूर्य नी चरमिजिनीकृतकृतिस्तद्युक्तभक्ता सती" इत्यादि । थोपति का यह प्रबार भी ब्रह्मगुप्तप्रकारमहा ही है । जैसे ब्रह्मगुप्त प्रकार यह है- "भक्षिाने ज्ञाने विपुवच्छाया चरासूनाम्" । इत्यादि निप्रश्नाधिकारः ६२६ (१) यहा हर और भाज्य मे नि भाग देने से चज्या'.१२० पमा+१२२.चज्यार मूल लेने से - 'चज्या उत्क्रमनिष्पत्या च'ज्या_प'भा, चज्या १२ Vपभा + १२२.ज्या व्य इससे "चरज्यकाकाभिहतिस्त्रिमौर्या भक्ता" त्रि इत्यादि भास्करोक्त उपपन्न होता है ॥६॥ इदानी द्वितीयप्रश्नस्योत्तरार्थ विधिः । एककान्ती द्वयोर्देशयोश्चरे च, च' तथा द्वयोर्देशयोः पलभे पभा, पभा' पभा कांज्या त्रि तदा पभा'क्रांज्या त्रि -चज्या ।तथा =च ज्या १२ धु १२.धु चज्या पभा अत्र यदिच-स्वदेशचर पभा चज्या पभा च' इष्टदेशचरम् पभाच'ज्या तदा -q'भा यदि स्वदेशचराधज्यया स्वदेशीयपलभा लभ्यते चज्या तदेप्टदेशचरार्धज्यया केति तदिष्टदेशपलमा भवत्येतद्विलोमेन स्वपलभा भवतीति । ब्रह्मगुप्तोत्तस्य "विपुवच्छायाभक्ता स्वचराधज्येष्ठयाऽन्यया गुरिणता । लब्धस्य चापमिष्टच्छायायाश्चरदलप्राणा:"। अस्य प्रकारस्य वैपरीत्येनोपरिलिखितोपपत्ति सिद्धयति । अथवा "स्वदेशजाक्षद्युतिरिष्टदेशचरार्धजीवा गुरिंगता विभक्ता । स्वपत्तनोद्भूतचराधमौर्व्या प्रजायतेऽसौ पलभाऽन्यदेशे॥" पूर्वप्रदर्शितोपपत्ति श्रीपत्युक्तश्लोकस्यैवोपपत्तिर्वोध्येति ॥६॥ द्वितीय प्रश्न के उत्तर के लिये विचार । एक क्रान्ति में दो देशो.के चर-च, च' दोनों देशो की पलभा पभा, समा पभा.काज्या त्रि पभाक्राज्यात्रि तब. 'चज्या। १२ १२. च'ज्यापमा -पमा', यहा यदि व-स्वदेश चरा, पमा स्वदेश पलमा -च'ज्या:. चज्या चज्या पना तब चज्या तव सिद्ध हुअा कि स्वदेश चराधज्या मे यदि स्वदेश पलभा पाते हैं तो पर पंज्या मे क्या इष्टदेश की पलमा माती है । इसके विलोम क्रिया से स्वदेश पदमा हुंद्री है।
IA . वटेश्वर-सिद्धान्ते ब्रह्मगुप्तोक्त-"विषुवच्छाया भत्ता स्वचराधज्येप्ठयाऽन्यया गुणिता" । इत्यादि इस प्रकार के उल्टी रिया से पूर्वोक्त उपपत्ति सिद्ध होती है। अथवा "स्वदेशजामद्युतिरिष्देशचराधजीवा मुरिगता विभत्ता । इत्यादि पूर्व प्रदर्शित उपपत्ति श्रीपति वे इस श्लोक की उपपत्ति समझनी चाहिये ।।६।। तृतीयप्रश्नोतरार्थ विधिः। प'भा पूर्वप्रदर्शितद्वितीयप्रश्नोपपत्ती च'ज्या सिद्धमस्ति तदा चज्या पभा पभा'चज्या च'ज्या =पभा । वा विलोमेन पभा च ज्या च'ज्या। चज्या सिद्धान्तशेखरे "अन्यदेशपतभा समाहता स्वीयपत्तन-चराध-शिजिनी। भाजिता पलभया स्वया ततश्चापमन्य विषये चरासवः ।।" श्रीपतिनाऽनेन इलोकेन स्पष्टमेव तृतीयप्रश्नोत्तरं कथ्यते यदुपपत्तिर्मया प्रदर्शितेति ॥६॥ तीसरे प्रश्न के उत्तर के लिए विपि । च'ज्या प'भा पूर्व प्रदर्शित द्वितीयपश्नोत्तरोपपत्ति में यह स्वरूप सिद्ध है पभा पभा'चज्या पभा च ज्या तब 'पभा । इसके विलोम से च'ज्या चज्या सिद्धान्तशेखर में "मन्यदेवापलभा समाहता स्वीयपत्तनचराशिन्जिनी । इत्यादि इस श्लोक से श्रीपति स्पष्ट ही तृतीय प्रश्न के उत्तर कहते हैं जिसको उपपत्ति हमने दिखलाई है ॥६॥ इदानीमन्यप्रश्नानाह। स्वविषयोदयमन्तरा यो वेत्ति लग्नरविमध्यनाडिकाम् । उन्नतं नतमहर्दले कुजान्नुतदिनपति स तात्रवित १७॥ वि मा.-य स्वविपयोदयमन्तरा (स्वदेशीय राश्युदयविना) लग्नरविमध्य. नाडिकाम् (लग्नब्योरन्तरपटिका वेत्ति (जानाति) स तन्त्रवित् (ज्योतिवित्) प्रस्तौति प्रथम प्रश्न. । महर्दले (मध्यान्हे) वुजात् (क्षितिजात्) उन्नतं (उन्नतांश मान) नत (नताशमान) च यो वेत्ति स तन्त्रविदस्तीति द्वितीय.प्रश्न । नुः (शको) | ते. (छायात ) दिनपति (सूर्य) यो वेत्ति स तन्त्रविदिति तृतीय प्रश्न इति ॥७॥ अथ प्रथमप्रश्नोत्तर प्रदर्श्यते। रविलग्नयोश्चरार्थोपपत्ति स्वानावृत्तयो. प्रदर्या मृगकर्कादौ च तयोरन्तर- योगो क्रियेते यत. प्रथमचतुर्थों मान्तिवृत्तपादौ चराधरहितावुदय भच्छतः । तथा चज्या अस्याश्चापनतांशा भवेयु । यद्युत्तरछायान तदा दक्षिणाः। यदि दक्षिण तदो- रास्तदाऽक्षाशैर्युताः सन्तःक्रान्त्यशा भवन्ति ततो यदि जिनज्यया त्रिज्यालभ्यते तदा क्रान्तिज्यया किमित्यनुपातेन समागच्छन्ति रविभुजज्यास्तस्वरूपम् जिन्या विप्रश्नाधिकारः द्वितीयतृतीयपादौ चरार्धयुतावुदयं गच्छतः। रविलग्नयोश्च कालकलाः प्रथमे पदे तावत्य एव युज्यन्ते मेषादित्वाद्राशीना भोग्योत्पन्नत्वाद्राशिपटककलाभ्यो विशो- धयितु युज्यते । एवं कालगती रविलग्नभुक्ती भवत । अधिकत्वाच्च लग्नस्य ततो रविकलाः शोध्यन्ते तदा शेपाः कलास्तयोरन्तरासवः। यदि रविकलाभ्यो लग्न- कलाः शोध्यन्ते तथापि रव्युदयाद्वैपरीत्येन काल उपपद्यते ॥ अतः प्रश्नोतर- सिद्धिर्जातेति ॥७॥ हि.भा.-अपने देश के राशियो के उदयमान के विना रवि और लग्न के अन्तर घटो को जो जानता है वह ज्योतिषी है यह प्रथम प्रश्न है । क्षितिज से उन्नताश मोर नताश को मध्यान्हकाल में जो जानता है वह ज्योतिषी है यह दूसरा प्रश्न है । तथा मध्यच्छाया से रवि को जो जानता है वह ज्योतिपी है यह तीसरा प्रश्न है ॥ प्रथम प्रश्न का उत्तर। रवि पौर लग्न की चरखण्डोपपत्ति अपनी अनावृत्त मे देखनी चाहिए मकरादि और कर्कादि केन्द्र मे उन दोनो के अन्तर और योग करते हैं क्योकि क्रान्तिवृत्त के प्रथम और चतुर्थ पाद चरार्ध रहित होकर उदय को प्राप्त होते हैं और द्वितीय तथा तृतीय पाद चरार्धयुत होकर उदय को प्राप्त होते हैं । रवि और लग्न की कालकला उतनी ही युक्त है मेषादित्व से राशियो के भोग्योत्पन्नत्व के कारण छ राशिकलाप्रो मे घटाने के लिए युक्त है इस तरह कालगति रवि और लग्न की भुक्ति होती है । लग्न के अधिकत्व से उसमे रवि. कलानो को घटाते हैं शेषकला उन दोनो की अन्तरासु होती है । यदि रविकला में लग्न- क्लानो को घटाते हैं तो भी रवि के उदय से विपरीत क्रिया से काल होता है ।। अथ द्वितीयप्रश्नोत्तरार्थ विधि । "पलावलम्बावपमेन सस्कृती नतोन्नते ते भवत" इत्यादिना तद्वासना स्पष्ट- वास्तीति ।। द्वितीय प्रश्न के उत्तर के लिए विधि । "पलावलम्बावपमेन सस्कृतौ नतोन्नते ते भवत" इत्यादि से नतोन्नत साधन की उपपत्ति स्पष्ट ही है । अत्र तृतीयप्रश्नोत्तरार्थमुच्यते । छाया.त्रि मध्यच्छायाज्ञानेन/छा+१२-छायाकर्ण ततः छायाम -दृग्ज्या, त्रि.काज्या % 3D = रविभुजज्या एतच्चाप रविभुजांशा भवेयुरिति ।
६३२ वटेश्वर सिद्धान परमय रवि कस्मिन् पदे समागत इत्येतदर्थ विचार्यते । जिनाधिकाक्षाशदेशे प्रथमपदे तूत्तरोत्तर कान्तरुपचयादक्षाशे तद्विशोधनेनो- त्तरोत्तर नताशा अल्पा भवन्ति । परन्तु तेऽक्षाशन्यूना अतएव "पलभाऽल्पिका छायाऽपचयिनी भवति" द्वितीयपदे प्रान्तेरुत्तरोत्तरमुपचयादुत्तरोत्तर नताशा अधिका भवन्ति तेन तद्वशतश्छायाप्युत्तरोत्तरमुपचयिनी (वृद्धिमती) भवति किन्तु पलभाऽल्पा, यतो हि नताशा अक्षाशाल्पा पदान्त यावद् भवन्ति । तृतीयपदे उत्तरोत्तर क्रान्तेरपचयात्तस्या अक्षाशस्य च योगकरणेन नताशा भवन्ति ते चाऽक्षाशाधिका उत्तरोत्तरमधिकाश्च भवन्ति, पदान्त गावदेव स्थितिस्तेन तत्र पलभाऽधिका छायोत्तरोत्तर वृद्धिमती भवति । चतुर्थ पदे च प्रान्तेरत्तरोत्तरमपचयत्वात्तस्या अक्षाशस्य च योगकर- णेनोत्तरोत्तरमपचयीभूता अक्षाशाधिका नताशा भवन्ति तेन छाया तत्रोत्तरोत्तर पलभाऽधिका क्षीयमारणा चेति ॥ जिना ल्पाक्षाश देशे तु पूर्ववदेय तृतीयचतुर्थ पदयो स्थिति । परन्तु जिनाधिकाक्षाशदेशे रवे खस्वस्तिकाद्दक्षिणे स्थितत्वात् । जिनाऽल्पाक्षाशदेशे खस्वस्तिकाद्भागद्वये रवेर्गतत्वात्तनियमेन न कार्यसिद्धि । तत्रापि कान्त्यशाऽक्षाशयोस्तुत्यत्वे शून्यसमाछाया तदल्पे पूर्व नियमानुसारस्थि- तिरेव । तथाऽक्षाशाधिककान्तौ खस्वस्तिकयोरवेत्तरगतत्वात्तन प्रथमपदे उत्त- रोत्तरमुत्तरनताशवृद्धेर्दक्षिणाभिमुखी वृद्धिमती च छाया भवति । द्वितीयपदे मान्ते रपचयान्नताशापचयत्व तेन तत्र दक्षिणाभिमुखी अपचयिनी छाया भवतीति ।। सिद्धान्ततत्त्वविवेके कमलाकरेण पदज्ञानाय स्वप्रकारो लिखितस्तदुपपत्ति- रेव गया लिखिता तत्प्रकारश्च-- आद्य पदेप्रचयिनी पलभाऽल्पिका स्यात् छायाल्पिका भवति वृद्धिमती द्वितीये। छायाऽधिका भवति वृद्धिमती तृतीये तुर्ये पुन क्षयवती सदनल्पिका च ।। वृद्धि वजन्ती यदि दक्षिणाग्रच्छाया तथाऽपि प्रथम पद स्यात् । हास प्रयान्तीमथ ता विलोक्य रवेविजानीहि पद द्वितीयम् ।। सिद्धान्तशेखरे श्रीपतिकथितश्लोकद्वये सर्व कमलाक्रोक्तसदृशमेव केवल "छायाधिका भवति वृद्धिमती तृतीये" इति स्थले "अक्षा ते समधिकोपचिता तृताये" इति भागे दृश्यते, प्रथमश्लोकेन जिनाऽधिकाक्षाशदेशे द्वितीयश्लोकेन जिना- ऽल्पाक्षाशदेशे रविपदज्ञानामुपायो वणित । एतदतिरिक्त करप्याचार्य पद- ज्ञानाय नैवेदशी व्यवस्था कुत्रापि लिखिता । पूर्व सर्वे जानन्ति स्म यदेतत्कमला- करोक्तमेवास्तिं परन्तु सिद्धान्तोखरे उपरिलिखित श्लोकद्वय दृष्ट वा 'श्रीपत्युक्तप्रकार एव कमलाकरेण स्वग्रन्थे निवेशित अन न कोऽपि सन्देह कस्यापि मनसि भविष्यतीति ।। तृतीय प्रश्न के उत्तर के लिए विचार करते हैं। मध्यदाया ज्ञान से Vछा+१२= छायाकणं तब- छाया मि जहाज्या, इसके चाप छायाक विप्रश्नाधिकार नि क्राज्या करने मे ननाम होता है, छायान के उत्तर रहने से दक्षिण नताश होता है, छायान के दक्षिण रहने मे उत्तर नताश होता है, इस तरह दिनार्ध मे जो नताश होता है वह यदि दक्षिण है तो उसमे अक्षांश घटाने से क्रान्ति होती है, यदि नताश उत्तर है तो उसमे अक्षाश जोडने से क्रान्ति होती है तब अनुपात करते है कि यदि जिनज्या मे त्रिज्या पाते है नो क्रान्तिज्या में क्या इस अनुपात से रवि की भुजज्या प्राती है जिज्या -रवि भुजज्या, इसके चाप करने से रवि के भुजाश होते हैं । लेकिन यह रवि किस पद मे पाये इसके लिए विचार करते हैं । जिनाधिधोग देश में प्रथम पद में उत्तरोत्तर क्रान्ति के बढ़ने के कारण अक्षाश मे उसको घटाने से शेप तुल्य हताश उतरोतर अल्प होता है। लेकिन वह अक्षाश से न्यून है इसलिए "पसभा से अल्पच्छाया अपचयिनी (ह्रासाभिमुख) होती है। द्वितीयपद में क्रान्ति के उत्तरोत्तराधिक होने के कारण मताश उत्तरोत्तर अधिक होता है उसके वश से छाया भी उत्तरोत्तर उपचयिनी (वृद्धि की तरफ) होती हैं लेकिन वह छाया पलभा से अल्प है क्योकि पदान्त तक नतारा अक्षाशाल्प होते है । तृतीयपद मे उत्तरोत्तर क्रान्ति के उपचय (वृद्धि की तरफ) के कारण अक्षाश में जोडने जो नताश होता है वह अक्षाशाधिक होता है और उत्तरोतर अधिक होता है । पदान्त तक ऐसी ही स्थिति रहती है इसलिए वहा छाया पलभा से अधिक और उत्तरोत्तर वृद्धिमती होती है। चतुर्थ पद मे क्रान्ति के उत्तरोतर अपचयत्व से (क्षीयमाण होने से) अक्षाश के साथ योग करने से जो नताश होता है वह अक्षाश से अधिक होता है इसलिए वहा छाया उत्त- रोत्तर क्षीपमाण और पलमा से अधिक होती है । जिनाऽल्पाक्षाश देश मे तृतीय और चतुर्थ पद की स्थिति पूर्ववत् ही होती है । लेकिन जिनाधिकाक्षाश देश में रवि को खस्वस्तिक से दक्षिण दिशा में रहने के कारण जिना- पाक्षाश देश में खस्वस्तिक से दोनो तरफ रवि के जाने के कारण पूर्वोक्त नियम से कार्य सिद्धि नहीं होती है वहा भी क्रान्त्यश और अक्षाश के तुल्य रहने से छाया शून्य होती है, अल्पता मे पहले नियम के अनुसार ही स्थिति होती है। अक्षाशाधिक क्रान्ति मे खस्वस्तिक से रवि के उत्तर तरफ जाने के कारण वहा प्रथम पद में उत्तर नताश के उत्तरोत्तर वृद्धि से दक्षिणाभिमुखो और वृद्धिमती छाया होती है। द्वितीय पद में क्रान्ति के अपचय से नताश का भी अपचयत्व होता है इसलिए वहा दक्षि. णाभिमुखी और अपचयिनी छाया होती है । सिद्धान्ततत्वविवेक मे पदज्ञान के लिए अपने प्रकार लिखे हैं हमने उसकी उपपत्ति लिखी है । उनका प्रकार यह है-~- आये पदेशचयिनी पलभाऽल्पिका स्यात् छापारिपका भवति वृद्धिमती द्वितीये। छायाधिका भवति वृद्धिमती तृतीये तुयें पुनः क्षयवती तदनल्पिका च ॥ इत्यादि ।
वटेश्वर-सिद्धान्ते
सिद्धान्तोसर में श्रीपतिकथित श्लोवद्वय (दोनो दलोको) में सब कुछ कमलावर
वयित के समान ही है केवल "छायाधिका भवति वृद्धिमती भृतीये" इम जगह "अक्षद्यते
समधिकोपचिता तृतीये" यह पा० देसने हैं. प्रथम श्लोक मे शिनायिकाक्षास देश में द्वितीय
श्लोद से "जिनामाक्षाम देश म" रवि पदज्ञान के लिए उपाय दिखलाया गया है। इनके
अतिरिक्त कोई प्राचीनाचार्य ने पदज्ञान के लिए इस तरह की व्यवस्या वही नही लिखी है,
पहले सब जानते थे जो कि यह प्रकार कमलाकर ही का है लेकिन सिद्धान्तशेखर में पूर्वोक्त
श्लोकद्वय को देखकर "श्रीपनि के लिखे हुए प्रकार ही कमलागर अपने ग्रन्थ मे लिए दिये
है" इसम किसी के मन में कुछ भी सन्देह नहीं होगा ।।७।।
इदानीमन्यप्रश्नानाह ।
बाहुकोटिदिवसाधभाग लैरिटमालिखितमण्डले पुमान् ।
शंकु भाभ्रममवति यो हि सोऽतीव प्रौढगरणकोऽस्ति भाभ्रमे ॥८॥
विभा-य पुमान् (पुरुष) इष्टभालिखितमण्डले (इष्टकालिकद्वादशा-
जलच्यायाङ्ग लप्रमाणेन कटकेन दिड मध्यविन्दुतो लिखिते छायावृत्त) वाहु-
कोनिदिवमाभाग लै (भुजकोटिदिनार्धच्छायाङ्ग लप्रमाणे ) शकुभाभ्रम
(शभ्रममार्ग छायाभ्रममार्ग च जानाति) सौ भाभ्रमे (छायाभ्रमणविपये) अतीव
प्रौढगणक (अतीवनिष्णातज्योतिषिक ) अस्तीति ॥ ८ ॥
अस्योतरार्थभुच्यते ।
पूर्व छाया भ्रमरेखानिस्परणार्थं शकु भ्रमरेखानिस्परणार्थ योपपत्तिरभिहिता
तहानेनवैतदुतर स्फुट भवतीति ।
हि भा -जो मनुष्य इप्टकालिक द्वादमागल दाछायाङ्ग ल प्रमारण कर्कट से
दिड मध्य बिन्दु से बनाये हुए छायावृत्त मे भुजकोटि और मध्यच्छायाङ्ग लो से 'शकुभ्रम
मार्ग
पौर छायाभ्रममार्ग को जानता है वह छायाभ्रम विषय में अतिशय प्रौढ (निपुण )
ज्योतिषी है ॥ ८ ॥
इसके उत्तर के लिए कहते हैं।
पहले छायाभ्रमरेमा निरूपण के लिए तथा शकुभ्रमरेखा निरूपण के लिये जो उप.
पत्ति कही गई है उसने देखने ही से इन प्रश्नो के उत्तर स्पष्ट हैं ॥८॥
इदानीमन्यप्रश्नमा ।
प्रभ्रवेदप्रमिता नतासवस्तिम्मो हि सममण्डलस्थिते ।
प्रक्षभा नवमिता. क्लि यर 5 हि तत्र नियतं दिवाकरम् ।।
विभा-तिग्मगो (सूर्य) सममण्डलस्थिते (समवृत्तप्रवेशे) यत्राऽभ्रवेद-
प्रमिता (चत्वारिशत्) नतासव । अक्षभा (पना) नव मितास्तन नियत
(निश्चित) दिवाकर (सूर्य) बहि (क्थय) ॥६॥
निप्रश्नाधिकार एतदुत्तरार्थमुच्यत। अत्र समप्रवेशकालिा नतमालपलभयोर्ज्ञानेन र पानयनप्रकारार्थ प्रश्न इति । समप्रवेशे रवी लम्बाशा कोटि । मममण्डलनताशा भुज । सममण्डलधुज्या चापाशा कर्ण इत्येभि वोटिभुजवण रुत्पन्नचापीयजात्ये चापीयत्रिकोणमित्या- विनकोज्यास्पका स्पल-- निमाज्या मिलज्या अत्र भुज ममुम्ब द्यु अज्या कोण नतकाल मिनकोज्या त्रि नकोज्या विनकोज्या अज्या प्रत स्पना स्पल गि लज्या विलज्या अज्या नकोज्या अज्या. नकोज्या पभा अज्या पभा ।यत तत लज्या १२ लज्या १२ नकोज्यापभा त्रि १२+ नकोज्या पभा त्रि+स्प'क्रा-छे'कानि+ १२ १२ त्रिस्पना तताऽनुपातेन क्रान्तिज्या % 3D - %D छेका -२ निनकोज्या' पभा १२ विनकोज्या पभा हरभाज्यो(त्रि') वि'१२+नकोज्या पभात्रि १२'+नकोज्या पभा १२ नकोज्या' पभा' काज्या (१) मूलेन १२+नकोज्या पभा भक्तो तदा नकोज्या पभा विक्राज्या बाज्यातित जिज्या 'रभुज्या, अस्या- १२+नकोज्या पभा नि श्वाप रवे भुजागा भवेयु । एतेन तदा नतज्या त्रिभजीवयोरि त्यादि भास्करोक्त- मुपपद्यते । तथा (१) अनेन त्रिज्यादिनार्धसममण्डलान्तरासुज्ययो कृतिविशेप । स्वविषयविषुवच्छायावर्गेण गुणो द्विधा प्रथम ॥१॥ व्यासार्धवर्गभक्तो लब्ध द्वादशजवर्गसयुक्तम् । छेदो द्वितीयराशेर्लब्ध पद क्रान्तिरर्कोऽत ॥२॥ ब्रह्मगुप्तोक्तमित्युपपद्यते तथाऽस्यैव श्लोकान्तरमान श्रीपत्युक्तम् - समनरनतकालज्या त्रिमौर्वीकरण्योर्विवरमभिहत तद्वैपुवत्याश्च कृत्या
वटेश्वर-सिद्धान्त
पृथगय पदजीवा वर्गसभक्तमाद्य पामिननियुक्त भाजक सोऽन्यराशे. ।।
फ्लस्य यत्पदं भवेदपत्र मस्य गिजिनी । स्फुट ततश्च पूर्ववत्प्रसानयेद्दिवाकरम् ।।
इत्युपपद्यते ॥६॥
हिमा-मूर्य के सममण्डल में रहने से जहा पर चालीस नतवाल हैं, और पनमा
नौ (९) है वहा मूर्य प्रमाण वहीं ॥६॥
इसर्व उत्तर के लिए विचार।
यहा सम प्रवाकाल म पसभा और नतवाल जानवर सूर्यानयन प्रकार के लिए प्रश्न
है । रवि के सम प्रवेश म रहने मे युज्यारण, सम्वासकोटि, नताममुज इन मकोटि और
मुज से जो चापीय त्रिभुज बनता है सममे भुजम मुखवाग-नतकाल, तव चापीय विकोण
मिति से-
स्पल
निनवाज्या
त्रिज्या
त्रि नकोग्या-पका स्पल 'स्पा परन्तु
ज्या
निनकोज्या त्रिनकोग्या नोज्या प्रज्या
स्पत
त्रिलज्या
लज्या
अज्या
नवोज्या पभा.
'-स्पना । तथा विपना-ऐका
१२
नकोज्यापमा
त्रि+
-छे'का-
नि १२+नकोज्या पभा'
१२१
अनुपात से.
निका
कान्तिज्या
छका
विनकोज्या पभा
त्रि १२+नकोज्या मारे
नकोज्यापभा
१२+नकोज्या पभा
वि
हर और भाज्य को (निर) इससे भाग देने से
काज्या' (१) मूल लेने मे शान्ति ज्या होती है
इस पर मे सूर्य ज्ञान सुलभ ही है ।
(१) इससे "त्रिज्यादिनाधसममण्डलान्तरामुज्ययो कृतिविशेप ।" इत्यादि ।
यह ब्रह्मगुप्तोक्त उपपन्न होता है 1 इन्ही के श्लोकान्तर रूप म श्रीपरयुक्त प्रवार
"समनरनतकालज्या ग्रिमोर्वोकरण्योविवरमभिहत तद्वं पुवत्याश्च कृत्या ।" इत्यादि ।
इसीके सदृश 'तदानतम्या त्रिभजोवयोर्यत्" इत्यादि भास्करोक्न भी है ॥६॥
निप्रश्नाधिकारः इदानीमन्यप्रस्नानाह। पत्र शून्पतुरंगी पलाशकाः नोदय व्रजति तत्र भानुमान् । केन मास्तमुपयाति मेहसा फोदृशश्च सविता निगद्यताम् ॥ १०॥ वि. भा.-यत्र देशे मून्यतुरगाः (सप्ततिः) पलाशकाः (अक्षांशाः) सन्ति तत्र भानुमान (सूर्यः) न उदय प्रजति (उदय गच्छति) कैन नेहसा (कालेन) अस्त न समुपयाति, तम सविता (सूर्यः) कोदृश इति कथ्यताम् ॥१०॥ अस्योत्तरार्थमुच्यते। यत्र देशेऽक्षज्या धुज्या समा वा लम्याशा. क्रान्तितुल्यास्तस्मिन् देशे. मेपा- दिपु--कायेषु च त्रिपु राशिपु सूर्यो नास्त गच्द्रत्यर्थादेतावधिपर्यन्त सर्वदैव दृश्य एव तिष्ठति । तथा वृश्चिकादिपु-मकरादिषु च विपु राशिपु नोदयति, यदा मेपादिगतस्य रवेः कान्तिज्या तुल्या लम्बज्या भवेयुस्तदा यो मध्यमार्कस्तथा कर्कादिगतस्य रवेर्यदा क्रान्तिज्या तुल्या लम्बज्यास्तदा यो मध्यमार्कस्तयोरन्तरे या कलास्ता रविमध्यमगतिभक्तास्तदा दिनानि भवन्ति तावद्दिनपर्यन्तमुत्तरकान्तेर्लवांशाधि- रत्वाद्रवेरनस्तमयः। दक्षिणकान्तेलंम्बाशाधिकत्वातत्र तावद्दिनपर्यन्त रवे- रनुदय इति ।। १० ॥ यत्र देशे पट्पष्टि ६६ वा भागाधिका अक्षाशास्तत्र यावत्काल रवेरुत्तरा कान्तिलम्बाशाधिका भवति तावत्काल सर्वदादिनमेव । दक्षिणकान्तिर्यावत्काल लम्बाशाधिका तावत्सर्वदा रात्रिरेव भवेत् अनुदयानस्तमययो रव्योरन्तराद्रविमध्य- मगत्याऽनुपातेन तदन्तरदिनानयन सुलभमेवेति ॥१०॥ हि. भा --जिस देश मे अक्षाश सत्तर है वहा सूर्य नहीं उदित होते हैं और कितने समय में सूर्य अनस्तमय होते हैं । और वहा मूर्य किस तरह के है सो कहो ॥१०॥ इसके उत्तर के लिए विचार । जिस देश में प्रक्षज्या पौर शु ज्या वरावर है या लम्वास और क्रान्ति बराबर है उस देश में मेपादि तीन राशियो में और कदि तीन राशियो में सूर्य अस्तगत नहीं होते हैं अर्थात् इस अवधि मे रवि वरावर दृश्य ही होते है । नथा वृश्चिकादि तीन राशियो में और मकरादि तीन राशियों मे रवि उदित नहीं होते हैं । जब मेषादिगत रवि को क्रान्ति- ज्या तुल्य लम्बज्या होगी तब जो मध्यम रवि होंगे तथा कर्कादि मत रवि की क्रान्तिज्या तुल्य लम्बज्या जव हो तब जो मध्यम रवि होगे उन दोनो मध्यम रवियो के अन्तर में जो कला है उनमे रवि मध्यमगति से भाग देने से दिन होते हैं उतने दिन तक उत्तर क्रान्ति के लम्बाशाधिक होने के कारण रवि के अनस्तमय होता है । दक्षिण क्रान्ति के लम्बागाधिक होने के कारण उतने दिन रवि के अनुदय होता है । वा जिस देश में ६६ अंश से अधिक अक्षाश है उस देश में जब तक रवि की उत्तरा- -
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वटेश्वर सिद्धान्ने
क्रान्ति लम्बागाधित होती है तावत्तापर्यन्त घरावर दिन होना है, दक्षिणकान्ति जव
तक लम्बाधिक होती है तावत्वालपर्यन्त वरावर रानि ही हाती है। अनुदय अनस्तम
रवि के अतर से तथा रवि मध्यम गति स अनुपात द्वारा उन दोनों व अन्तर सम्बन्धिदिना
नयन बहुत मुलभ ही स होता है ॥१०॥
अथान्य प्रश्नमाह।
पट्कृति ३६ पललवा समवृत्ते तिग्मगोविषयवर्गमिता भा।
यत्र तन नलनीवनबन्धु ब्रूहि तेऽत्र यदि कौशलमस्ति ॥११॥
पि भायन देशे पट्कृति (पत्रिंशत्) पललवा (अक्षाशा) सन्ति,
तिमगो (सूर्य) समवृत्त (मममण्डल प्रवेशे) विषयवर्ग २५ ममिता (पञ्चवर्गतुल्या)
भा (छाया) अस्ति तत्र नलनीवनवन्धु (सूर्य) ब्रूहि (क्थय) यदि ते (तब) अत्र
गणिते कौशलमस्ति (नंपुष्पमस्ति) तदा कथयेति ॥१६॥
एतदुनगर्यमुच्यते ।
यद्यप्यस्य प्रश्नस्योत्तर मया पूर्व लिखित तथ को पी। सममण्डलच्छाया
१५xx
ज्ञाताऽस्ति तदा/छा +१२२= समकरणं । तत
याक्षज्या लभ्यते तदा ममशकुना केत्यनुपातेन समागता क्रान्तिज्या तत्स्वरूपम् =
अत्र समगकोम्त्यापनन
अज्या १२ नि_अज्या १२ कान्तिज्या ।
त्रि
निकाज्या
रविमुज्या अस्याश्वाप रविभुजाशा भवेयुरिति ॥११॥
जिज्या
= सशकु । तदा त्रिज्य-
सक
अक्षज्यास
मक वि
सर
तत
हि भा-जिस दश में छत्तीम प्रधाश है सूर्य के मममण्डल म रहन से पच्चीस छाया
होती है तब मय के प्रमाण को कहो यदि इस गरिन म तुम्ह निपुणता है तो कहो ॥११॥
इसके उत्तर क लिए विचार करते हैं।
यद्यपि इस प्रश्न के उत्तर हम पहो एष जगह लिस नुक हैं तथापि यहा जिसने हैं ।
महा मममपलम्चाया विदित है नव /छा+१२% मम तय
१२xत्रि
सक
=समा । विज्या म यदि प्रमज्या पान हैं तो यमग म क्या इस अनुपात से क्रान्तिज्या
पाती है, -=का ज्या यहा ममा के वा उत्यापन देने
पि
मु
प्रज्यामग
प्रख्या १२त्रि
सात्रि
भग्या १२
त्रिकाम्या
माज्या इममे
= रविभुग्या, इसके चाप वरने मे रवि वे
सब
जिज्या
मुजाहाते हैं ॥११॥
विपदनाधिकारः
इदानीमन्य प्रश्नमा ।
यन वेददहना पलांशकास्तिग्मगो चामियुनान्तसंस्थिते ।
चन्हिपूर्वदिशि मध्यगे तथा तत्र शंकुमिति मुच्यतां बुधाः ॥१२॥
वि.मा.-यत्र देगे वेददहना: (चतुस्त्रिशत्) पलाशका. (अक्षाशा.) सन्ति;
वन्हिपूर्वदिशि मध्यगे (आग्नेयपूर्वदिश्योमध्ये) मिघुनान्तस स्थिते तिग्मगौ (मिथु-
नान्तस्थिते मूर्ये) सति तत्र देशे हे . बुधा. शकुमिति (श कुमान) उच्यता.
मिति ॥ १२॥
,
एतदुत्तरार्थमुच्यते ।
अग्राक्षांशज्ञानेन सूर्ये प्राग्नेयपूर्व दिशोमंध्ये मिथुनान्तस्थिते तदीयः शकुः
(कोरणश कु.) को भवतीति विचारार्थम् अक्षाशज्ञानेन पलभाज्ञान
तथा रविमि-
थुनान्तेऽस्ति तेन तत्क्रान्ति जिनाशः ततो
त्रि.जिज्या
अग्रा । तदायापलभयो-
लज्या
नेिन. "त्रिज्याकृतिदलमम्राकृतिवियुगि' त्यादिना सुखेन विदिक्कोणेश कुज्ञान
भवेत
f२॥
हि. भा --जिस देश मे चौंतीस अक्षादा है और आग्नेय तथा पूर्व दिशा के मध्य में
मिथुनान्त में रवि के रहने पर उस देश में श कुमान (कोणश कु) को कहो ॥ १२ ॥
इसके उत्तर के लिए विचार करते है।
पहा अक्षाश ज्ञान से तथा आग्नेय और पूर्व दिशाप्रो के मध्य मे गिथुनान्त में रवि के
रहनेसे शकु (कोणमा)मान क्या होता है इसके विचार के लिये प्रक्षाशज्ञान से पलमा का ज्ञान
होगा, रवि भियुनान्त में है इसलिए क्रानिया =जिनज्या तब
जिज्या
इस तरह अमा के ज्ञान होने से "कोणशकानयनविधि" द्वारा कोणशङ्का ज्ञान होजायगा ।। १२ ।।
त्रि क्राज्या
स्ना
इदानीमन्य प्रभमाह।
वल्लकीमृदवसानमागतः कुङ्क मारुणरुचिर्गभस्तिमान् ।
नाऽस्तमेति पलशिञ्जिनीं जनाः कीर्तयन्ति कियती वदाचिरात् ॥१३॥
वि भा -कुन मारुणरुचि (कुड्स मसदृशरक्तकान्ति ) गभस्तिमान (सूर्य.)
वल्लकोभृदवसान (वलकी वीणा वित्ति धारयति बल्लकोभृद्धनुस्तदवसानमन्त)
प्रागत
नास्तमेत्यर्थाद्धनुरन्तमागत. सूर्यो नारत गच्छति, तत्र जना (लोका.
कियती पलशिञ्जिनी (अक्षज्या) कीर्तयन्ति (गायन्ति) इत्यचिरात् (शीघ्र) वद
(कथय) अर्थात्सूर्यः धनुरन्त प्राप्तो नास्त गच्छति स कीदृशो देशस्तदक्षाशमान कथ-
येति प्रश्नः॥१३॥
६४० वटेश्वर सिद्धान्ते विप्रभाधिकार । अनोपपत्ति । घनुरन्तकान्ति =२', एतत्तुल्यलम्बाशेऽक्षाशा = ६६, एतस्मादधिकक्षागे ऽद्धिनुरन्तकान्तितोऽल्पे लम्बाशे धनुमकरी सर्वदाऽदृश्यावेव भवत । लम्बाधिका बा. लिरुदम् च यावताद्दिन सन्ततमेव तन । यावच्च याम्या सतत तमिस्रा इत्याधुक्तर्याम्य- गोलीयधनुरन्तकान्तेर्लम्बाशस्यारूपत्वात्सर्वदा तददृश्यता भवेदेव तनाक्षाशमान शट्पष्टितोऽधिकमिति दिक् ॥ १३ ॥ इति वटेश्वरसिद्धान्ते विप्रनाधिकारे स्फुट. प्रश्नाध्याय पञ्चदश । इति आनन्दपुरीय भट्टमहदत्तसुतवटेश्वरराचार्यविरचिते वटेश्वरसिद्धान्ते त्रिप्रश्नाधिकारस्तृतीयोऽधिकार समाप्तिमगमदिति । हि ना - कुड्कम वी तरह लाल कानि वाले मूय वल्लयोभृत् (धनु) उसके अन (धनुरन्त) मे आकर अस्तगत नही होते हैं किस देश में यह स्थिति होती है उस देश के प्रभार को कहो ।। १३॥ उपपत्ति धनुरन्तकान्तिः = २४ , इतने लम्वाश देश म अक्षाश६६, इससे अधिक अक्षा मे अर्थात् धनुरन्त क्राति से अल्पलम्वाश मे घनु और मकर सर्वदा अदृश्य ही रहते हैं "लम्बाधिका क्रान्तिरुदक च यावत्तावद्दिन सन्ततमेव सत्र । यावच याम्य सतत तमिसा" इस उक्ति से दक्षिण गोलीय धनुरतकात को लम्बा गाधिक होने से सर्वदा उसको अदृश्यता होती है वहा प्रक्षा मान ६६ छियासठ भश से अधिक होता है । इति ॥ १३ ॥ इति घटेश्वरसिद्धात में विप्रश्नाधिकार में स्फुटप्रश्नाच्याविधि नामक पद्रहवा अध्याय समाप्त हुमा ।। इति आनन्दपुरीय भट्ट महदत्त के पुत्र वटेश्वराचाय विरचित वटेश्वरसिद्धान्त म त्रिप्रनाधिकार नामक तृतीय अधिकार समाप्त हुआ।