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Srisampradaya Mimamsa

Dharand-iidhagachaayr^yo · 2004/11/4

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श्रीः
श्रीमवेरामानुजायनमः।
DOO
MOREOS
पाटलिपुत्र “पटना" मण्डलान्तर्गन आपतिपुर निवासि
श्रीरामशरणात्मज श्रीस्वामि धरणीधराचाय विरचिंता
श्रीबालसूर्यप्रभादीकया सहिता विषमस्थल टिप्पण्या च
समुद्भाषिता।
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श्रीरामभदायमीमांसा
{ ia: ....रा.प.
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प्रकाशक,
श्रीमान् बाबूकल्लर सिह डाक्टर
९० लालपुरमौरीमेनटाले
पा० कलुगडी जि० दरभंगा

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श्री. * श्रीमद्वेङ्कटेश्वरो विजयतेतराम के पाटलिपुत्र “पटना" मण्डपान्तर्गत श्रीपतिपुरानेवासि श्रीरामशरणात्मज श्रोस्वामिधरणीधराय्यविरचिता श्रीवालमूर्य प्रभा टीकया संहिता विषमस्थल टिप्पण्या च समुद्भाषिता श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा। selseastsethalaated delicatestantestastestradaily प्रकाशक- श्रीमान् - बाबू-कल्लरसिंहस्य डांकदरः मु० लालपुर गौरी मैरनटोले पोष्ट कलुआही ज़िला दरभङ्गा। मुद्रक बो० डी० शास्त्री रमेशआर्ट प्रेस, अयोध्या। सर्वाधिकार स्वरक्षित। श्रावण कृष्ण संवत् २००० श्रीविक्रमीय संवत् ९०७६ श्रीरामानुजीय प्रथमबार १०००] मूल्यं रू० ) । ता० ११-८-४३ ६० । 450 उद्देश्य त्यज दुर्जन संसर्ग भज साधु समागमम् । कुरु पुण्य महोरात्रं स्मर नित्यमनित्यताम् ॥२६॥ इति गरुडपुराण पूर्वखण्ड अध्याय १० अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः। नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥१९॥ प्राणनाशस्तु कर्त्तव्यो यः कृतार्थो न समृतः । अकृतार्थस्तु यो मृत्यु प्राप्तः खर समो हिं सः । २५॥ इति व्यासस्मृति अध्याय ४॥ अर्थ-दुष्टों का संग छोड़ साधु सज्जनों की संगति करना चाहिये, तथा प्रहरहः पुण्यकार्यों का सम्पादन करते हुए संसार की अनित्यता का स्मरण करते रहना चाहिए २६। शरीर निरंतर नहीं रहता धनादि विभव भी सदैव नहीं रहता और मृत्यु नित्य समीप ही रहती है १९ । एक दिन मरण अवश्य होगा परन्तु कृतार्थ मनुष्य मरने पर भी जीवित के तुल्य और अकृतार्थ रह कर ही जिसकी मृत्यु होगई वह खर "गधा” के सदृश है २५ । स्वयमाचरति शिष्याना चारे स्थापयेत्तु यः । आचिनोति हि शास्त्राणि तमाचार्य प्रचक्षते । अर्थ-जो पुरुष स्वयं आचारशील हो शिष्यों को आच- रणयुक बनावें तथा शास्त्रों का संग्रह करें उन्हीं को श्राचार्य कहा जाता है। विनीत, सं० २००० श्री विक्रमीय स्वाम्युपनायकधरणीधराचार्य, विभीषणकुण्ड, उत्तरताताद्रिमठ ।

श्रीमतेरामानुजायनमः । अनुबन्ध चतुष्टय। रामानुजार्य चरणं हृदि संस्थाप्य सादरम् । लिखाम्यज्ञ प्रचोधार्थ अनुबन्ध चतुष्टयम् । हमको इस ' श्रीसम्प्रदायमीमांसा" ग्रन्थ में केवल चार अनुवन्ध दिखाना है जो पाठकों को पढ़ने से स्पष्ट समझ में आजायगा । अनुबंध (उपक्रम) कहते हैं प्रकरण को, वह प्रकरण चार हैं-विषय १ प्रयोजन २ सम्बन्ध ३ और अधिकारी ४। श्रीसम्प्रदाय" नामक जो पुस्तिका छपी थी उसीकी इसमें मीमांसा है। इसीवास्ते इस पुस्तिका का नाम "श्रीसम्प्रदाय- मीमांसा" है। जिस वक्त लेखक क्रिसीभी विषय के ग्रन्थ को लिखने के वास्ते बैठता है तो उसके हृदयकमल में चार अनुवन्ध आकर अपना डेरा डाल लेते हैं। विषय १-संसार में जितनी सम्प्रदायें हैं उनमें यही श्री सम्प्रदाय शुभ्र है किन्तु अन्य सम्प्रदायों को तरफ न देखकर इसी पर नजर फेंकी। तीता उत्तम और मीठे फल को ही काटता है, इसी प्रकार जो दूसरे की विभूति आचार के आनन्द को न सहनेवाले मत्सरी हैं उनकी श्रात्मा सहन न कर सकी और का इसपर मुकही तो गए। अब इस श्रीसम्प्रदाय से उत्तम शब्द कहाँ इसवास्ते हेडिंग पर सिम्प्रदाय ही रखा और इस पुस्तिका , ( ख ) के गर्भभाग में शास्त्र अविदित कचरा वातों को भरकर अपने भी श्रीसम्प्रदाय के भीतर घुसने का विचार करने लगे, परन्तु शास्त्र- अविहित कोंके करनेवाले इस श्रीसम्प्रदाय के भीतर कैसे अपना कदम रख सकते हैं, क्योंकि जो मनुष्य शारू. की विधि को छोड़ कर मनमाना काम करते हैं वह न ता सिद्धि को प्राप्त होते न सुख को ? और न गति को प्राप्त होते (गोता १६०२३-२४)। अतएव जी द्वारे अखाड़े खालसे इत्यादि "श्रीसम्प्रदाय' नामक पुस्तिका में लिख दिए हैं वो शास्त्र अविहित होने के कारण श्रीसम्प्रदाय में कचरा हैं । इस वास्ते ऐसे व्यक्तियोंको श्री.संप्रदाय की शरण नहीं मिल सकती। बस ! इस "श्रीसम्प्रदायमीमांसा" पुस्तिका में यही विषय है। प्रयोजन २-जो "श्रीसम्प्रदाय" पुस्तिका में अप्रामाणिक बातों को लिखकर अपना प्रयोजन सिद्ध करना चाहते हैं ऐसी बे हाथ पैर की अनरगल बानों को हट ना, सच्छीसप्रदाय का प्रकाश करना और धोखावाज व्यक्तियों से मुमुक्षियों को बचाना इस 'श्रीसम्प्रदाय मीमांसा"ग्रन्थ का प्रयोजन है। सम्बन्ध ३-सब सम्प्रदायों से श्रेष्ठ जो श्रीसम्प्रदाय है कि जिसे श्रीरामनुज सम्प्रदाय कहते हैं, जिससे बढ़कर आचार अविद्या वा सविद्या वा ब्राह्मणो मामकी तनुः ।।३८।। इति गर्गसंहिता अश्वमेधखंड अध्याय ६०.। अर्थ-ब्राह्मण मूर्ख हो या पण्डित हा श्रीकृष्णजी का आदेश है कि मेरा शरीर है । महात्माा ? ध्यान पूर्वक विचारें श्रीरामानुज स्वामी के अपमान करके किस लोकको जांयने ।

( ग )
किसी सम्प्रदाय में नहीं है, ऐमे श्राचार सम्मिलित श्रीसम्प्रदाय
से यह छोटीसी "श्रीसम्प्रदाय मीमांसा" पुस्तिका संबंध रखती है।
अधिकारी ४-जितने जीवमात्र हैं और जितने तत्व हैं
सबकी श्रीमनारायण से उत्पत्ति है वही श्रीमन्नारायण समयपाकर
रामकृष्णादि अवतारों को धारण कर अपने प्रपन्नों को आनन्द
देते हैं। संसार के जोवों का उदर यही भरते हैं अन्य को अधि-
कार नहीं है। इन्हीं के बिना प्रपन्नता के जीव दुखी हैं और
श्रीमन्नागयण ही प्रादि हैं, श्रीमन्नारायण से और जीवों से पिता
पुत्रं की समानता है इसवास्ते इस पुस्तिका में श्रीमन्नारायण का
विषय है इससे इस "श्रीसम्प्रदाय मीमांसा" पुस्तिका के अधि.
कारी सी हैं।
१
स्वाम्युपनामकधरणीधराचार्य,
श्रावण कृष्ण १२ बुधवार ! उत्तरतोताद्रिमठ 'श्रीवेङ्कटेशमन्दिर'
संवत् २००० श्रीविक्रमीय
श्रीविभीषणकुंड, अयोध्या
संवत ९०६ श्रीरामानुजीय
जिला फैजाबाद (संयुक्त प्रदेश)
ॐ प्रेमोपहार
..
श्रीमान्
विनीत

भूमिका इस ग्रन्थ के पूर्व एक पुरतक प्रकाशित हो चुकी है, मीवरवं गीय सत्रियमातेण्ड नाम की जिसमें पंचगौड़ और पंचद्रविड़ ब्राह्मणों की उत्पत्ति और उनके गोत्र प्रवर वेद उपवंद शाखा सूत्र छन्द देवता आदि षोडश संस्कोगदि बताये गये हैं बथा सूर्यवंशीय और चन्द्रवंशीय क्षत्रियों के इतिहास और सब धर्मों के उपदेश आदि सप्रमाण निरूपण हैं। पुस्तक मिलने का पता, मन्त्री श्रीश्रवधवंशीय क्षत्रियसभा या श्रीबाबूगमपालसिंह भी राजापुर , पो० नयागाँव जिला सारण (छपरा)। दूमरी पुस्तक वर्णव्यवस्थादिग्दर्शन यह छप गई है। यह तीसरा ग्रन्थ श्रीसन्प्रदाय मीमांसा नामक है इसमें नूतन परम्परावाले महालाओं के सम्बन्ध में प्रमाण पूर्वक विचार किया गया है क्योंकि नूनन परम्परावाले लोगों का विचार है कि श्रीवालानन्दस्वामी के समय से हम सब बैरागी जाति होगये हैं तभी से काठिया १ मंजिया २ लोहलंगड़ी ३ खानी ४ तपस्वी ५ जटाधारी ६ पञ्चकेशी ७ रसिक ८ नागा ९ अतीत १० श्रादि३२ अनेक भेद बन गये हैं परञ्च रामानुजमत में यह सब एक भी नहीं है इस कारण निकृष्ट शूद्र प्रवर्तित पथ में रामानुज मत और उक्त हेतुओं से हम सब श्रीसम्प्रदायाचार्य हैं। उक्त वैरार्ग:जाति के सम्बन्ध में एक छोटी पुस्तिका है २४ पृष्ठ की "श्रीसम्प्रदाय" नाम की खींचखांच कर निर्माणकरके नूतनपरम्परावाले लोगों के प्राचीन अभिलाषा को पूर्ण कर दिया है । पुस्तक आदि का लिखना और प्रकाश करना साहित्यसंसार के हेतु बहुत ही गौरव की वस्तु है परन्तु किसी सम्प्रदाय पर कटुवचनों के साथ आक्षेप करना यह सभ्यता से बिल्कुल विरुद्ध है, यदि शूद्र अपने को ब्राह्मण और ब्राह्मणं अपने को शूद्र कहै तों इसमें दूसरे की कोई हानि नहीं चाहे कोई माने या न माने किन्तु किसी सम्प्रदाय पर कठुवचनों के साथ श्राक्षेप करना मह कहां तक उचित है। समाचार पत्रों के लेख स्थायी नहीं होते हैं किन्तु जो लेख पुस्तकरूप में लिखे और प्रकाशित किये जाते हैं वह स्थायी होते हैं चाहे वह सत्य हों अथवा असत्य । साहित्यसमाज का कर्तव्य है कि प्रा। लेखोंका श्रादर और अप्रमाणिक लेखों का निरादर करते हुए अग्रसर होने का प्रयत्न करता रहे तथा सत्य का प्रकाश संसार के अर्थ करता रहे जिसमें कि मनुष्योंकों सार वस्तुओं का ज्ञान होजावे कारण कि उपेक्षा करने से धर्मों के लाप होजाने का भय रहता है। समाज सम्बन्धी विषयों का संग्रह मैं जहां और जिस देश में रहा सदा करता रहा किन्तु उन सबसे मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं हुई कारण किं जिन विदन्तियों को जहाँ सुना उनसवों को आर्षप्रन्थों के विरुद्ध ही पाया इसलिए मेरा सिद्धान्त है कि बिना आर्ष प्रमाण के किसी विपय पर कुछ लिखना व्यर्थ है। अन्तमें एक बात और कहना है कि मेरे पुराने ढंग की हिन्दी पर चतुर पाठक ध्यान न देवें। स्वाम्युपनामकधरणीधराचार्य ।

( च )
धन्यवादाः मूर्य "अवधवंशीय” श्रीवाबू कल्लरसिंहाय ।
इक्ष्वाकुवंश प्रभवं वेद वेद्यं सनातनम् ।
सर्व क्षेम प्रदं सेव्यं श्रीरामं समुपास्महे ॥१॥
चिरात्कृत समुत्साहः कार्यव्यप्रोपि साम्प्रतम् ।
"श्रीसम्प्रदाय मीमांसा' प्रकाशयितुमारभे ।।२।।
महत्कायौव सक्तोपि लव्धकालः कथंचन ।
अवश्य कृत्यमेतद्धि पुरा लिख्यैव धारितम् ॥३॥
द्रब्याभावेन लेख्यन्तत्स्थूलाकारं न मुद्रितम् ।
सहसा थाद्यतत्पूर्ति: श्रीमता धन्यधीमता ।।४।।
महत्प्रताप युक्तेन नय धर्मयुतेन च ।
सूर्यवंशावतंसेन लोकसेवा रतेनच ॥५॥
'दभंगा' मण्डलस्थेन श्री 'लालपुर' वासिना।
श्रीमन्पुहुप नारायणरायो भूरिभाग्यवान् ।।६।।
भूतो भुविततस्तस्य पुत्रो जातस्तु तत्समः ।
कीति नारायणो ऽस्यापि लीलानाथोह्यभूत्सुतः ॥७॥
लीलानाथस्य च सुतो दुःखिनारायणो ऽभवत् ।
अस्यैव पुत्रो वीरश्च श्रद्धावान् धर्म कर्म वित् ।
जातः कल्लरसिंहाख्यो दयालुदीनतत्परः ।।८।।
सूर्यवंशोज्वलांकीति प्रकाशार्थ अनेनतु ।
मान्य कल्लरसिंहेन सोत्साहं मुद्रणेऽस्यच ॥९॥
भारं सर्व प्रसह्याद्य प्रकासितमिदं मुदा ।
अविघ्नच्चाधुना कृत्यं सम्पूर्णम्पूर्णताङ्गतम् ॥१०॥

( छ ) अतएवाद्यतं धीरं वरंदानपरं परम् । धरणीधरवर्या ऽई धन्यवादं मुदार्पयै ॥११॥ तथा कीतिश्च दिवेषां ततालोके सदोज्वला। भवेदिति मुदा ऽभीक्षणं प्रार्थये परमात्मनः ॥१२॥ अथापि सह जातीयाः पाठकाः सर्वदावयम् । श्रेष्ठ कल्लरसिंहस्य ऋणिनो भूतले सदा ।।१३।। अतो नारायणदेवं प्रार्थयामः समृद्धये । सदा लोके सुयशप्तः श्चिरस्थाताः सुधर्मिणः ॥१४॥ धन धान्य कुटुम्बोदः सह। सौख्य युता सुदा। चिराय पुत्र पौत्रादि बृद्धियुक्ता भवन्तुते ॥१५!। सु श्री: कल्लरसिंहस्य धर्म बुद्धिश्च वान्धवाः । भवेयुभक्ति भावाश्च भगवद्भानुशाजे ।।१।। क सूर्य प्रभवा वंशः क चाल्पविषया मतिः । तितीर्घदुस्तरं मोहादुडुपेनास्गि सागरम् ।।१७।। जिस प्रकार सूर्यवंश में सब राजा मनु, इक्ष्वाकु आदि जिस सनातनधर्म के पालन करते है उसी प्रकार सनातनधर्म के श्रीबाबू कलरसिंहजी सर्वदेश में बाजार्य के तद्वत प्रकाश कर रहे हैं और "अवध वंशीय क्षत्रियो” के तो कर्णधार ही हैं । इत्य भी युक्तै अभिधीयते । AL

"वंशवृक्ष" -
श्रीमान् पुण्यनारायण जी
१ श्रीकीर्तीनारायणजी
२ श्री छोटकनजी
३ श्रीकाशीनाथजी
१ श्रीलीलानाथ जी
१ श्रीगुदरजी २ श्रीवचीजी
।
१श्रीगोविन्दजी२श्रोपलटजी३श्रीबुटनजी४श्रीमंगलजी
१श्रीरामलालजी २श्रीदुःखीनारायणजी
हकरू
लक्ष्मी लखन जदु
श्रीमतीसूरमादेवीजी
श्रीहृदयनारायगाजी श्रीननूजी श्रीहीरारायजी
श्रीचन्द्रदेवजी १ श्रीवासुदेवजी २ राजदेवसिंह १ श्रीडा० कलरसिंहजी २ इन्द्रदेवसिंहजी
0-

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जए,
जए
जय
जन्म - संवत् १९६७ विक्रमीय
धर्मशील मतिवान अति, बाबू कल्लरसिंह ।
बैठे हैं सुख शांति में, ये पुरुषों में सिंह १
श्रीमान बाबू कल्लरसिंह जी डाक्टर, गौरीमेरन टोले
लालपुर, पो० कलुभाही, जि० दरभंगा (बिहार)
चित्र - संवत् २००१ विक्रमीय
S

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4- - अथ समर्पण पत्रम् श्रीमान् श्रीराघवेन्द्रस्य वंश जन्मा प्रतापवान् । न्याययुको धर्मधीरो भानुवंशावतंशकः ॥१॥ लोकमान्यतथा लोके गुणित्रज प्रशंशितः । धर्मावलम्बी राजेन्द्रः सर्वशास्त्रार्थ तत्ववित् ।।२।। सदाचार परः सर्व धर्म मर्मज्ञ एव श्रीमन्पुहुप नारायण रायो भूरि भाग्यवान् ।।३।। भूतो भुविततस्तस्य पुत्रोजातस्तु तत्समः । कीति नारायणो ऽस्यापि लीलानाथोलभूलुन:! ४|| लोलानाथस्य च सुतो दुःखिनारायणोऽभवत् । अस्यैव पुत्रो वीरश्च श्रद्धावान धर्म कर्म वित् ।।५।। जातः कल्लरसिंहाख्यो दयालु र्दानतत्तरः। सूर्यवंशोज्वलां कीति प्रकाशार्थ सतोऽस्यतु ।।६।। मातुः कल्लरसिंहस्य सुरमायाः कराम्बुजे । धरणीधराचार्य को ग्रन्थनिर्माण तत्परः ॥७॥ "श्रीसम्प्रदायमीमांसा" श्रद्धयाहं समर्पये। सेदा सार्धायतुं बृद्धिं कृतं कर्म कलायितुम् ।।८।। स्वाम्युपनायकधरणीधराचार्य, उत्तरतानाति, बैंकटेशमन्दिर, अयोध्या। विभीष कुण्ड, हमारे दो शब्द । -:-:- - अखिल कोटि ब्रह्माण्डनायक श्रियः पिता भगवान् परमा- नन्द ब्रजनन्दन गिरिधारी गोपाल को कोटिशः धन्यवाद है कि जिनकी असीम अनुकम्पा से धर्मोद्धारक श्रीस्वामीजी ने अनेक विघ्न यःमा आनन्द पूर्वक सम्न करने हुए बड़ीही योग्यतो से इस परम कल्याण कारक ग्रन्थ रत्न का संग्रह किया है। इसमें साम्प्रदायिक सिद्धान्त बूट-फूटकर भरे हैं अत: हम परमात्मा सच्चिदानन्द बाजधान श्री कन्या के पद पद्म-पराग रज से हादिक प्रार्थना करते है कि यह ग्रन्थ गुणग्राही महानु- भावों के करकमलों को सुशोभित करते हुए कराभरणवत् परम- प्रिय हो तथा ऐसे परोपकारी ग्रन्थ एवं ग्रन्थकर्ता दोनों ही दीर्घायु हो । भगवान् ऐ में ग्रन्थकताओं को आनन्ददायक आरोग्य अमर काय प्रदान करें। बिना मूल्य वितरण धर्मप्रचारार्थ । नम्र निवेदक, डाक्टर कल्लरसिंह लालपुर, दरभंगा मिथिला) श्रीसम्पदायमीमांसा में जिनरग्रन्थों के नाम आये हैं उनके नाम १ वेदग्रन्थ-ऋग्वेद १ यजुर्वेद २. सामवेद ३ यजुषिकाठके ४ निघंटु । २ उपनिषद्ग्रन्थ-तैत्तीगोपनिषद् ६ दि.दि. महानाराय- गोपनिषद ७ ॥ ३ दर्शनग्रन्थ-जागदीशीसिद्धान्त लक्षण । ४ सूत्रग्रन्थ-मूत्रगोभिलगृह ९। ५ व्याकरणग्रन्थ-सिद्धान्तकौमुदी १० सामनीय शिक्षा १० । ६ धर्मशान ११ याज्ञवल्क्यस्मृति १२ व्यास- स्मृति १२ हारीतस्मृति १२ । ७ संहिताग्रन्थ-बृहद्ब्रह्मसंहिता १३ अहिर्बुध्नसंहिता १४ श्रा- दित्यसंविता १५ गर्यसंहिता १६ अगस्त्यसंहिता १६ भरद्वाजसंहिता १६ वायवीयसंहिता १७ । ८ इतिहासत्रन्थ-महाभारत १७ बाल्मीकीयरामायण १८ तुलसी कृत रामायण १९ गीतावली २० हनुमान- चालीसा २१ शारीरकमीमांसा भाष्य २२ विद्वद् बृत्तम २३ सम्प्रदायबृत्तम् २४ टोडराजस्थान २५ श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर २५ श्रीरामाचैनपद्धतिः६ विश्वगुणादर्शचम्पू: २७ श्रीहरीभक्ति सिन्धुजा- बेला २८ निजगुरु २४ श्रीसम्प्रदायदिक दर्शन३० श्रीगमकबीर की पञ्चमात्रा ३१ गतिवोध ; ३२ श्रीवैष्णवनस्थान ३३ श्रीवचनभूषण ३४ भक्त माल ३५ वैष्णवधर्मरत्नाकर ३६ । ९ पुराणपन्थ-ब्रह्मवैवर्तपुगण ३७ स्कन्दपुराण३८ पद्मपुराण३९ आग्नेयपुगण ४० भागवत ४१ ब्रह्माण्डपुगण४२ मत्स्यपुगण ४३ भार्गवोपपुगण ४४ भारत- निर्माता ४५ कल्याणसंतांक ४६। १०काव्यप्रन्थ - शिशुपालबध४७ ११ कोष-अनरकोष ४८ विश्वकोष ४९ ।

- विशिष्टा द्वैत सिद्धान्त अथ विशिष्टाद्वःतसिद्धान्त शब्दस्य कोऽर्थः १ कथमस्व यतोन्द्रमतस्य तस्यतच्छब्दे वाच्यत्वम् १ इति चेत् अत्र किं चि- दुच्यते सिद्धान्त शब्दः प्रामाणिक तया परिगृहीतार्थवाचि, तदुक्त न्यायपरिशुद्ध "अथसिद्धान्त: प्रामाणिक इत्यभ्युपगतोऽर्थः" इति न्यायसारे चं "प्रमाणिकतयाभीष्टस्सिद्धान्तः त्रिधा मतः" इति। सएवमत शब्दाभीलप्यः । तत्रद्धयोर्भावः द्वितैव तम्" भेदइत्यर्थः न द्वैतमद्वैतम् अभेदः । विशिष्टस्यावतं विशिष्टाद्व- तं स्वव्यतिरिक्तसमस्त चेतनाचेनविशिष्टं सब कमेव तत्वमिति प्रतिपादनात् रामानुजीयसम्प्रदायविशिष्टाद्वैतसिद्धान्त इति व्यप- दिश्यते एतेनेदमपि प्रत्युक्तम् यदुत सूक्ष्मचिदचिद्विशिष्ट ब्रह्मणः स्थूलचिदचिद्विशिष्टब्रह्मणश्चाभेदस्य सिद्धान्तसिद्धतया विशिष्टा द्वैत शब्दस्या विशिष्टयोरद्वैतमिति व्युत्पत्त्यातासार्थबोधकत्वम्- इति चेतनाचेतनयोश्शरीरो । ततश्वबोधायनेन मुनिता वृत्तिप्रन्ये. न विस्तृतः । अथ व टङ्कमिडादिभिः'द्रभिडभाष्यादिषु संक्षिप्तः । "यस्यात्मा शरीरम्" यस्यपृथिवी शरीम , यात्मनि ति- ष्ठन् इत्यादिकाघटकश्रुतिः । याने जीवात्मा और पृथिवी भगवा न.के शरीर है इसहेतु से विशिष्टा द्वैतसिद्धान्तहुआ। विसेष- जानना होतो यतीन्द्रमत दिपीका दे खे। निन्दन्तुनीति निपुणा यदि वास्तुवन्तु लक्ष्मीसमाविशतु गच्छ तु वा यथेष्टम् । अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा न्यायात्पथःप्र. विरलन्ति पदे न धीराः। स्वाम्युषनामकधरणीधराचार्य । .

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जन्म - संवत् १६४७ विक्रमीय
पंडित कलानिधान, धरणीधर आचार्य ये।
अवध गती की खान, बैठे सरयूतोर में १।
चित्र - संवत् १६६३ विक्रमीय

TEOSESSOUCOSSOSUSUCESSO CORDEDEOSETTER "ग्रन्थक स्वरूप प्रकाशः” श्रीकाश्यपान्वयमहोत्सलवाल सूर्य । श्रीवानयोगि चरणाम्वुजभृङ्गराजम् ॥ श्रीमद्यतीन्द्रवर योगि कृपैक पात्रं वन्दे सदावुधवरं धरणीधारायंम।।१।। तृतीया भरणीतारे चैत्रशुक्लेकृतोद्भवः जीयात धरणीधर "श्रीमान्" सूर्यवंश दिवाकरः२ अद्रिवेदा४१९भू१ वर्षे चत्रेशुक्लेकृतोद् भवः । तृनीयाभरणीयुक्त जीयाद् धरणीधरसदा ।।३।। अद्रि श्वेदा४९भू१ वर्ष चैत्रेयाम्ययुनेसिते । धरणीधर संज्ञोऽसौजीयात् सूर्यान्वयोदभवः ॥४॥ पूर्वादिशांवज्रधरोदक्षिणंपातु ते यमः । वरूणः पश्चिमामालां धनेशस्तूत्तगं दिशम् ॥५॥ ऐन्द्रीमिन्द्रस्तु ते पातु कौवेरी तु कुवेरकः । पारुणीं वरुण: पातु याम्यं पातु सदा यमः ॥६॥ त्रिशिखोऽमिंदिशं पातु नेत्राः पातुनैऋतम् । त्रिगतिवायवीं रक्ष देशानींतु त्रिनेत्रधृक् ॥७॥ स्वस्ति प्रजाभ्य परिपालयन्ताम् । न्यायैन मागंण मही मही शाः ॥ गो ब्राह्मणेभ्यः सुखमन्तु नित्यम् लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु ॥ श्रांवमा शुक्तल ७ । पं. श्रीनिवासाचार्य मो० सर्वजित नाम संवत्सर हसनपुग पो० फुलवारी COOSEEOCCOURSSBEES BOOOOOOOOOOOGOOCOOO 1८1 " विषय सूचि मंगला चरण मुमुक्षु जन पञ्चसंस्कारयुक्त मन्त्र ले । ११ कश्यापादिऋषि दिलीप आदिराजा हनुमानजीचक्रांकितथे ।४। अजनी के पुत्र हनुमानजी ब्रह्मा के राममन्त्रनदीये आनन्दभाष्य शिगड़ा के महन्त के लिखा है भगवताचार्य केलेख १३ श्रीशको द्विज "विप्रकुल उत्सन्न हूएथे ।१६। पुरूषोतमाचार्य के वोधायनऋषि कहना सर्वथानिर्मूल है २० श्रीरामानन्दस्वामी के जीवन चरित्र बह तपस्वी थे ।२२ श्रीरामानुज सम्प्रदाय में स्वामी और आचार्य योगरूढ़ है २४ बीर वैरागीजाति और रविदासपकविर२कुवा३नाभाजीठकावर्णन३१ भीरामानन्दस्वामि श्रीगमानुज सम्प्रदाय के शिष्यपरम्परामें है।३७॥ वैरागीजाति में श्रीरामजी के निन्दा पृष्ट २५,३८,३९ ४० देखे । श्रीहनुमानजी के ब्रह्मा के गुरुकह अपमान करते है ४१ । श्रीरामानुज सम्प्रदाय में हनुमान रामजी के पुजाहोता है।४०। जीन के नारायण से मन्त्र परम्परा न ही है वह आधुनीक पंथाई है ।४२ । श्रीशब्द का सीता शब्द पर्याय कहना सर्वथा निर्मूल है ।४६॥ श्रीरामानुजसम्प्रदाय में "प्रपन्नामृत" सवर्था अमान्य हैं ४८ । सूर्य वंश में अनेक भेद है उसीप्रकार रामानुजसम्प्रदाय में ५६॥ अनेकभेद है, "अवधवंशीय क्षत्रियों के गोत्रादिवर्ण" है ६० श्रीशठकोपस्वामीजी शुद्ध ब्राह्मणकुल में उत्पन्नहुऐ है । ६७ श्रीरामानुजसम्प्रदाय में है अयोध्या के सवमहन्यो के दसंकत ७२ चारोमदाय के प्रवर्तका चार्या के नाम श्रीरामानुज श्रीनारायण ने लक्ष्मीजी के, नारायणमन्त्र औराममंत्रउपदे शकिय ।७३॥ सवधर्मों में आचार धर्म नेष्ठ है आचार हीननिन्दित है।०७। कुम्भमहापर्व योग, पण्डित शब्दार्थ, धर्म न जानने वाले मनुष्य७८ श्री: श्रीमवेंकटेश्वरो विजयतेतराम् । श्रीसम्प्रदायमीमांसा श्रीवालमूर्यप्रभाटीकया सहिता। लक्ष्मीनाथसमारम्भां नाथयामुनमध्यमाम् । अस्मदाचार्यपर्यन्तां वन्दे गुरुपरम्पराम् ॥१॥ ध्यायन्नारायणं देवं स्नानादिषु च कर्मसु । ब्रह्मलोकमवाप्नोति न चेहा वर्त्तते पुनः ॥२॥ श्रावणे कृष्णपक्षे च द्वादश्यां बुधवासरे। सम्वत्सरे हेमलम्वे खं खाम्वरं करात्मको ॥शा मृगशिराख्ये शुभे मे योगे सर्वार्थसिद्धिदे । धरणीधरवर्योऽहं श्रीसाकेतपुरीस्थितः ॥४॥ श्रीसम्प्रदायमीमांसां ब्यरचम् शास्त्ररीतितः । निर्मत्सराः सज्जना ये तेषां सन्तोषदास्त्वियम् ॥५॥ धनान्धकारोपयुते हि लोके जना महामोहविमोहनाप्ताः । अधीत्य तूर्णं सुखमेधमाना ब्रजन्तु नूनं परमे सुधाम्नि ॥६॥ श्रुतिस्मृत्युदितं धर्म बर्णानामनुपूर्वशः । कुरुते बिदुषां प्रीत्यै ग्रन्थानालोच्य यत्नतः ।।७।। “अर्थ-अनेक आर्षप्रन्थोंके आधारपर प्रति और स्मृतियों में कहे हुए धर्मो को मनुष्यों के निमित्त कहता हूँ । मुमुक्षुजनों (२) श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा को भगवत् शरणागति पञ्चसँस्कारयुक्त मन्त्र लेना चाहिए, तथा तप्तमुद्राविजयान्तर्गत श्रीशास्त्र का वचन है कि:- तापः पुण्ड्रस्तथा नाम मन्त्रो यागश्च पञ्चमः । अमी पञ्चैव संस्काराः परमैकान्तिनो मताः॥ *अङ्कन चोद्ध पुण्डञ्च मंत्रो नामविधारणम् । पञ्चमो याग इत्युक्ताः संस्काराः पूर्वसूरिभिः ॥१९॥ इति पद्मपुराण पातालखण्ड अध्याय २ । प्रथम ताप याने भुजों में तप्त शंख चक्र की छाप संस्कार द्वितीय पुण्ड्र याने उर्ध्व पुण्ड्र तिलक संस्कार, तृतीय भगवन्नाम संस्कार चतुर्थ मन्त्र संस्कार पञ्चम भगवद्भागवताचार्य सेवा सपदेश संस्कार। पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्य ते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः । अतप्ततनून तदामो श्नुते शृता स इद्वहन्त तस्तत्समा शतम् । इति ऋग्वेद संहिता अष्टक ७ अध्याय ३ वर्ग । पवित्रमित्यग्निः अग्निः सहस्रारः । सहस्रारो नेमिः नेमिना तप्ततनूः ब्रह्मणः सायुज्यं सलोकतामाप्नोति ॥ इति सामवेदमैत्रायणीय शाखागत अति । यजुर्वेद तैत्तिरीयारण्य के प्रश्न १ अनुवाक ११। साम्नि पूर्वाचिके * शङ्ख चक्र प्रधानं हि सर्वमन्यद् गदादिकम् । अंकितः शङ्खचक्राभ्यां सर्वैरङ्कित एव वा ॥६६॥ इति श्रीभरद्वाजसंहितायां न्यासोपदेशे अध्याय ३॥

श्रीबालसूर्यप्रभाटीकया सहितः (३)
प्रपाठक २ मन्त्र १६ यजुषि काठके प्रश्न ३ अनुवाक ३ में शङ्ख
चक्र धारण विधि है, अहिर्बुध्न्य संहिता अ० ३१ । उत्तरार्द्धम् ।
पवित्र शब्द का अर्थ सुदर्शनचक्र है यथा-
"सुदर्शने च दर्भे च पवित्रं चणसूत्र के ।
सुदर्शनं सहस्रारं पवित्रं चरणं पविः।
सुदर्शनं हरेश्चक्र पवित्रं चरणं पविः।"
इति वेदनिघण्टु ।
ततो दिव्यं च हारिद्रं सहेमतुलसीदलम् ।
मंत्रेण धारयेच्चूर्ण ललाटे मस्तके तथा ७८ ।
इति भरद्वाजसंहिता अध्याय ३॥
ये कंठलमतुलसीनलिनाक्षमालाः
ये वाहुमूलपरिचिह्नितशंखचक्राः
ये बा ललाटफलके लसदूर्ध्वपुण्ड्राः ।
ते वैष्णवा भुवनमाशु पवित्रयंति ७० ।
इति पद्मपुराण उत्तरखंड अध्याय २२४॥
सूतके प्रेतकार्ये च तैलाभ्यंगे च भोजने ।
शयने तुलसीमालामधृत्वैव समाचरेत् ५२ ।
इति बृहद् ब्रह्मसंहिता पाद २ अध्याय ७।
सूतक में १ प्रेत कार्य में २ तेल लगाने में ३ और भोजन
करते समय ४ शयन ५ "सुतने" मे तुलसी की माला न धारण
करे।
नोट-पञ्चसंस्कार में माला विभान नहीं है इसी कारण
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(४)
श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा
श्रीरामानुजसम्प्रदाय में तुलसी सब काल धारण नहीं की जाती
है, यह तत्त्व है।
कश्यपादि ऋषि नारायण के ही उपासक थे क्योंकि नारद
पञ्चरात्र और वाल्मीकीयादि ग्रन्थों से पता लगता है यथा-
धारयिष्ये भुजे दिव्यं वह्निपूतं सुदर्शनम् ।
वटुको वामनो
भूत्वा
मेखलाजिनदंडधृत १०२।
कश्यपादयित्वा ऽङ्ग करिष्ये देवरक्षणम् ।
वशिष्ठमुनिशार्दूला दिलीपप्रमुखा नृपाः १०३ ।
धारयिष्यन्ति भूलोके महाशस्त्र सुदर्शनम् ।
रामो राजीवपत्राक्षो भूत्वा दशरथात्मजः १०४ ।
धृत्वा तप्तायसी मुद्रां देवकार्य करिष्यति ।
परमैकान्तिकं धर्म वायुपुत्रो महाबलः १०५॥
इति नारदपञ्चरात्रे बृहद्ब्रह्मसंहिता पाद २ अध्याय ७।
अर्थ-दिब्य सुदर्शनचक्र को अग्नि में तपा कर भुजाओं
में धारण करै, कि जिसको मेखला "कर्धनी' अजिन "मृगछाला"
और दण्ड "हाथ में गहने की छड़ो" धारण करनेवाले बटुक
"वामन" ने धारण किया है १०२।
सुदर्शनचक्र को कश्यपादि ऋषियों ने अपनी भुजाओं में
धारण कर देवताओं की रक्षा की पुनः मुनियों में सिंह के तद्वत्
वशिष्ठमुनि और महाराज दिलीप ऐसे प्रमुख
"प्रधान” २ राजा
चक्रांकित थे १०३।
राजीवलोचन दशरथ महाराज के पुत्र श्रीरामचन्द्रजी ने

자 श्रीबालसूर्यप्रभाटीकया सहितः (५) इस पृथ्वी के ऊपर महाशस्त्र सुदर्शनचक्र को धारण किया “यहाँ पर तप्त चक्र का ही प्रसङ्ग है" १०४। महाबली हनुमानजी ने भी तप्त चक्रमुद्रा को धारण कर देवताओं का कार्य किया सुदर्शनचक्र की तप्त चक्र मुद्रा को धारण करना श्रेष्ठ धर्म है १०५ । श्रीमद्भागवत स्कन्द ९ अध्याय १ के अनुसार नांगयण से वाल्मीकिजी के मतसे विष्वकसेन उनसे १ मरीचि २ कश्यप ३ कश्यप के पुत्र वामन, और वामन को कश्यपजी ने यज्ञोपवीत के समय पञ्चसंस्कार युक्त चक्रांकित किया फिर नारायणमन्त्र उपदेश किया। महर्षि वशिष्ठ जी से दिलीपमहाराज ने कहा कि सब- धर्मो में श्रेष्ठधर्म कौन है वह आप कृपाकर यह कहिये मुझे यह सुनने की इच्छाहुई है यथा- सर्वेषामेव मन्त्राणां मन्त्ररत्नं शुभावहम् । सकृत्स्मरणमात्रेण ददाति परमं पदमा२२।। मन्त्ररत्नं द्वयं न्यासं प्रतिः शरणागतिः । लक्ष्मीनारायणन्ह्यति मन्त्रः मफलप्रदः।।२३। तस्मात्त्वमपि राजर्षे ! विष्णुसायुज्यमिच्छसि । दीक्षामार्गविधानेन धारयित्वा सुदर्शनम् ॥७२।। तत्त्वं नारायणोX विष्णु र्वायुदेवः सनातनः। X नारायण शब्द का पर्याय- विष्णुर्नारायणः कृष्णो वैकुण्ठो विष्टरश्रवाः । दामोदरो हृषीकेशः केशवो माधवः स्वभूः ३५ ।

(६) श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा परमात्मा परब्रह्म परज्योतिः परात्परः ॥१५॥ इति पद्मपुराणे उत्तरखण्डे अध्याय २२३ और २२४-२२५ । अर्थ-सम्पूर्ण पगंलौकिक पथ एवं दिव्यधाम तथा भगवान् को प्राप्त करानेवाले मंत्रों में शुभकरने वाले मंत्रों में परम श्रेष्ठ यह नारायण मन्त्र एक वार के ही स्मरण करने से मोक्ष स्थान देने वाला है। २२ । जो इसमन्त्र राजको द्वयमन्त्र को शरणागति होकर प्राप्त करता है वह परमप्राप्य श्रीलक्ष्मीनागयणजी को प्राम होता है क्योकि यह मन्त्र समस्त फल को देता है २३ । इसलिये हे गजऋषे तुमभी विष्णु भगवान् की प्राप्ति चाहते हो अतः दीक्षा लेकर गुरुद्वारा शंखचक्र धारण कर श्रीवैष्णव हो औ॥ २ ॥ दैत्यारि: पुण्डरीकाक्षा गोविन्दो गरुड़ध्वजः। पीताम्बरो ऽच्युन: शार्डी विष्वक्सेनो जनार्दनः ३६ । उपेन्द्र इनावर जश्क्रपारिणश्चतुर्भुजः । पद्मनाभो मधुरिपुगिने व सिविक्रम: ३७ । देवकीनन्दनः शौरिः श्रीपति: पुरुषोत्तमः । बनमाली बलिध्वंसी कंसारातिरधोक्षजः ३८ । विश्वंभर: कैटभजिद्विधुः श्रीवत्सलाञ्छनः। पुराणपुरुषो यज्ञपुरुषो नरकान्तकः ३९। जलशायी विश्वरूपो मुकुन्दो मुरमर्दनः । वसुदेवोऽस्य जनकः स एवानकदुन्दुभिः ४० । इति अमरकोषे काण्डे १ स्वर्गवर्ग । और महाभारत अनु- शासन पर्व अध्याय १४९ में नारायण के हजार नाम जो कि विष्णुसहस्रनाम कहा जाता है। - r श्रीबालसूर्यप्रभाटीकया सहितः (७) वह परब्रह्म परमात्मा श्रीमन्नारायण ही परतत्व है विष्णु है वायु. देव.सनातन वो परज्याति व सबसे परे है परमात्मा है समस्त देवाधिदेव है इसीकी शरण से सर्वष्ठ होता है ।।१५।। इसी प्रकार पशिष्ठमुनि सब सूर्यवंशीय राजाओंको यज्ञो- पवीत के समय ही पञ्चसंस्कारयुक्त चक्रांकित और नारायण मन्त्रोपदेश करते थे, यह वंशपरम्परा से चला आता है और अपने अनुचरों को भी चक्रांकित कराते थे श्रीरामचन्द्रजी नारा- यण के उपासक थे यथाः- गते पुरोहिते रामः स्नातो नियतमानसः । सह पल्या१ विशालाक्ष्या नारायण२ मुपागतः१। प्रगृह्य शिरसा पात्रं हविषो विधिवत्ततः। महते दैवतायाज्यं जुहाव ज्वलितानले २। शेषं च हविषस्तस्य प्राश्य शस्यात्मनः प्रियम् । ध्यायन्नारायणं देवं स्वास्तीर्णे कुशसंस्तरे ३॥ वाग्यतः सह वैदेह्या भूत्वा नियतमानसः । श्रीमत्यायतने विष्णोः शिश्य नरवरात्मजः ४। इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे सर्ग ६। इति स्कन्दपुराणे रेणुकामाहात्म्ये सह्याद्रिखण्डे अध्याय ३। १ श्राद्ध यज्ञे विवाहेच पत्नी दक्षिणतः सदा १३७ इति धर्म- शास्त्र अत्रिस्मृति । अर्थ-श्राद्ध यज्ञ तथा विवाहके समयपत्नी सदा पति के दाहिने तरफ बैठती है १३७ । रामस्य दक्षिणे पार्वे पया श्रीः समुपाश्रिता ६। सर्वेषु शुभ कार्येषु पत्नी तिष्ठति दक्षिणे। इति वाल्मीकीयरामायणे उच्चरक.रडे सर्ग १०८ ॥

(८) श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा अर्थ-पुरोहित के जाने पर श्रीरामचन्द्रजीने सावधान चित्त से स्नान किया और विशालाक्षी स्वपत्नी श्रीजानकीजी के सहित नारायण के समीप गये १ । प्रथम खीर के पात्र को नमस्कार कर विधि पूर्वक महान् देव नारायण के लिए प्रज्वलित अग्नि में आहुति देने लगे २। जब थोड़ी सी खार रह गई तो उसे भोजन कर श्रीनामा देव को ध्यान करते हुए कुशाशन पर मौनव्रत धारण किया श्रीजानकीजी के साथ नियत मन से श्रीविष्णु भगवान् के मन्दिर में श्रीदशरथराजकुमार रामचन्द्रजी ने शयन किया४। ग्यारह हजार वर्ष तक, इस लोक में रहकर फिर श्रीराम- चन्द्रजी नारायणरूपमें मिल गये और श्रीहनुमानजी गमचरित्र सुनने के लिए इस मृत्युलोक में रह गए, यह वाल्मीकीयादि ग्रन्थों से पता चलता है। नं० १ प्रथम तो श्रीरामचन्द्रजी ने हनुमानजी को शिष्य करने की आज्ञा नहीं दी, यदि देते तो नारायणमन्त्र देने की आज्ञा देते क्योंकि वह नारायण उपासक थे। नं० २ हनुमानजी का तिर्यक्योनि में उत्पत्ति होने से ब्राह्मणादि मनुष्यों को शिष्य करने का अधिकार ही नहीं है। नं० ३ हनुमानजी कहीं पर केसरीनन्दन, कहीं पर शंकर सुवन और कहीं पर मारुतात्मज कहाते हैं यह कौन वर्ण कहायेंगे इस विषम समस्या को हल कर देना परमावश्यक है। उदाहरण द्वारा बता देना परमावश्यक है यथा-जय हनुमान ज्ञान गुण सागर । शङ्कर सुवन केशरी नन्दन । श्रीहनुमानचालीसा १ ।

श्रीबालसूर्यप्रभाटीकया सहिता (९)
एवं ब्रुवंतं धर्मात्मा हनुमंतं स लक्ष्मणः ।
प्रतिपूज्य यथान्यायमिदं प्रोवाच राघवम् ३० ।
कपिः कथयते हृष्टो यथा ऽयं मारुतात्मजः ।
इति श्रीवाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकांडे सर्ग ४।
तां तु रामकथां श्रुत्वा वैदेही वानरर्षभात् ।
क ते रामेण ससर्गः कथं जानासि लक्ष्मणम् २ ।
एवमुक्तस्तु वैदेह्या हनुमान्मारुतात्मजः ।
ततो रामं यथा तत्त्वमाख्यातुमुपचक्रमे ५।
इति श्रीवाल्मीकीय रामायणे सुंदरकांडे सर्गः ३५ ।
यह सिद्ध होगया कि श्रीहनुमानजी नित्य कोटि में नहीं
हैं। श्रीहनुमानजी के आदेश पर ध्यान देवें यथा--
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम । मा० रा० दो०६।
कहहु कवन मैं परम कुलीना । कपि चंचल सवही विधि हीना ।।
प्रात लेइ जो नाम हमारा । तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।
असमैं अधम सखा सुनु माहूँ पर रघुवीर ।
कीन्ही कृपा सुमिरिगुन भरे विलोचननीर ७॥
इति-रामचरितमानस सुन्दरकांड ।
विज्ञापाठक सब ध्यान देकर विचार करें, तत्त्व क्या है ?
नूतन परम्परावालेमहात्मा सीताजीका शिष्य हनुमानजीको बताते
हैं, सीताजी कहती हैं कि तुम कौन हो रामजीको तुमने कैसे जाना
मैं तुम्हें नहीं जानती हूँ अब बिचारै, न कोई गुरु न कोई चेला।
श्रीहनुमानजी का स्वरूप और रूपवर्णन-श्रीगोस्वमीजी का

(१०.) श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा आदेश, "जेहि सरीर रति रामसों सोइआदरै सुजान । रुद्रदेहतजि नेहवस वानर भे हनुमान” १४२ इति दोहावली श्रीतुलसादासका आदेश है कि श्रीहनुमानजी रुद्रदेहत्याग कर वानर रूप को धारण किया, बानररूप त्याग करेंगे तब कारणरूप जो रुद्र है उनमें लीन हायँगे, यह तत्व है। यथा-रुद्र का स्वरुप वर्णन नारायणादेकाश रुद्राश्च जायते । नारायणात्सर्वेदेवाश्चजायन्ते ६०॥ इति त्रिपाद्विभूति महानारायणोपनिषद् अध्याय २ पंक्ति ६३ अर्थ-नारायण से ग्यारह रुद्र पैदा होते हैं नारायण से सब देवता पैदा होते हैं ६० । अशुद्धा ब्रह्मरुद्राद्या जीवा विष्णोविभूतयः १८ । इति भारद्वाजसंहिता परिशिष्ट अध्याय १ । श्रीहनुमानजी श्रीरामजीकी श्राज्ञाके बिना यह अनर्थ कदापि नहीं कर सकते हैं क्योंकि धर्म एव हसो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः । तस्माद्धर्मों न हन्तब्यो मानौधर्मो हतोऽवधीत १५ । इति-मनुस्मृति अध्याय ८॥ अर्थ-नाश किया हुआ धर्म नाश करता है और रक्षा किया हुआ धर्मरक्षा करते हैं। नष्टधर्म हमको नष्ट न कर इस कारण धर्म को कभी नष्ट नहीं करना चाहिये, यह मनुमहाराजका आदेश है ? नं० ४ चक्रकादिप्रसंगइति । संसर्गामावत्वघटितनिरुक्तव्या- तिघटितजन्यतापटितत्व रूपापादकेन स्वस्मिन स्वभिन्नत्वापादानप्र- संग इत्यर्थः, तथा चोक्त प्राचीनै: "स्वाज्ञानसापेक्ष, ज्ञानसापेक्ष, , श्रीबालसूर्यप्रभाटीकया सहिता (११) ज्ञानसापेक्ष, ज्ञानविषयत्वेन स्वभिन्नत्वापादनं चक्रकप्रसंग" । इति जागदीशी सिद्धान्तलक्षणम् १०७ पृष्ठः । राममन्त्रस्य वशिष्ठज्ञानसापेक्षत्वेन तस्य च ब्रह्मादिद्वारा रामज्ञानस्यापेक्षतया आत्माश्रयान्योन्याश्रय चक्रकादि दोषाः यथासंभवं दुर्बाराःस्युः । वशिष्ठस्य रामगुरुत्वे बहुशास्त्रप्रमाणतया अन्यथात्वेन शास्त्रवाधप्रसंगः । याने श्रीरामजी ने वशिष्ठजी से राममंत्र की अपेक्षा की, वशिष्ठजी ने ब्रह्माजी से राममंत्र की अपेक्षा की, ब्रह्माजो ने हनू- मानजी से राममंत्र की अपेक्षा की, हनूमानजी ने श्रीसीताजी से राममंत्र की अपेक्षा की, श्रीसीताजी ने श्रीरामजी से राममंत्र की अपेक्षा की और फिर श्रीरामजीने वशिष्ठजीसे राममंत्र की अपेक्षा की, इसीको चक्रकदोष कहते हैं । क्या साक्षर का राक्षसा नहीं हो सकता। वेद लोकादि में अनेक प्रमाण हैं कि माधुर्य अर्थात् लीला- विभूति में श्रीरामजी के गुरु वशिष्ठली हैं अत एव चक्रकदोष है। यदि ऐश्वर्य (त्रियाद्विभूति ) विभूति में गुरु शिष्य का संबंध कहेंगे तो वहां तो भोगमात्र है कर्म नहीं है वहां कौन किसका ॐ जगद्व्यापारवर्ज प्रकरणाइसन्निहितत्वाच !४!४।१७। जगद्व्यापार:-निखिलचेतनाचेतनस्वरूपस्थिति प्रवृत्तिभेद निय- मनम् । तदर्ज निरस्तनिखिलतिरोधानस्य निर्व्याजब्रह्मानुभवरूप मुक्तस्यैश्वर्यम् कुन: ? प्रकारणात्-निखिलजगन्नियमनं हि पर ब्रह्म प्रकृत्याम्नायते यता वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जाता- (१२) श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा गुरु वा चेला है। माधुर्यमें ही मंत्रजाप पूजा या पाठ जो होता है वहीं के वास्ते । यदि श्रीरामजी को वशिष्ठजीने मंत्र दिया तो ब्रह्म जी रामजी के दादागुरु हुए और वशिष्टजी के पिता ब्रह्माजी हैं ही अतएव यह जो वैरागियोंने विना सोचे विचारे नकली गुरु परंपरा बनाई है वह अनरगल है। जबतक कि मनुष्य विद्यातप और विचार से युक्त न होगा तबतक धर्म क्या है इसको जानना कठिन है । अब हनूमान्जी ने ब्रह्माजी को मंत्र दिया फिर इनकी सूची बुद्धि उल्टी होगई, जबतक मनुष्य के ज्ञानकी ओर वे नहीं होती तवनक उल्टे को सीधा मानता है। वेद शास्त्र का विचार ही ज्ञान है, यदि दोनोंका विचार नहीं है तो अंधा है और एकका विचार है तो काना है अतएव अंधा वा काना साधु वृत्तिका नहीं होसक्ता नीति में भी ऐसाही लिखा है कि-क्वचित्काणा भवेत्साधुः कचित गानवती सती । कचिदंतालकोमूर्खः कचिल्खल्वाट निर्धनः ॥ काने खोरै कूवरे कुटिल कुजाति जान १४ इति तुलसीकृतरामायण कैकई मंथरा संवाद अयोध्याकांड । नि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद्विजिज्ञासतद्ब्रह्म-२ तैः भृगु० १-अनु॥ "सदेव सोम्येदन आसीदेकमेवाद्वितीयं तदेतत'वस्या प्रमा- येयति तत्तेजोऽस जत” ३, छा, ६-२-१। इति श्रीशारीरकमीमांसा भाष्ये जगद्व्यापारवर्जाधिकरणम् अध्याय ४ पाद ४ सूत्र १७ । xश्रुतिस्मृति च विप्राणां चक्षुषी देवनिर्मिते । काणस्तत्रै- कया हीनो द्वाभ्यामन्धः प्रकोतितः२५इति हारीतस्मृतिअध्याय ॥

श्रीबालसूय्यप्रभाटीकया सहिता (१३) यह जो १९७७ विक्रमीय संवत् से आज नूतन रामानन्द सम्प्रदार निर्मित हुआ है वह वन्ध्यापुत्र 'सरीखा बुद्धिस्थ है। इनके प्रवर्तक कोई हनुमान् नामक बन्दर हो या मनुष्य कल्पना किया हो, इसी प्रकार ब्रह्मा, वशिष्ठ,आदि सब नाममात्र है, यह सर्वथा निर्मूल है, इस पर बहुत विचार करना आवश्यक नहीं है। सम्पादक स्वामी श्रीभगवदाचार्य के तत्त्वदर्शी विशेषांक वर्ष ८ अङ्क ८.९ में पृष्ट ३८ से ४९ तक में, आनन्दभाष्य का खण्डन है । लेखक पण्डित श्रीरावचरणशरणमी शास्त्री हैं । पृष्ठ ४३ में लिखा है कि श्रीभाष्य लिखा जा चुका था । अन्य सैकड़ों ग्रन्थ विशिष्टाद्वैत समर्थन के लिए उस समय उपस्थित थे। सैकड़ों विद्वान् इस मत के समर्थक थे। श्रीरामानुज सम्प्रदाय ने जिस विशिष्टाद्वैन का प्रचार किया है वह तो दक्षिण प्रदेश में भी है और उत्तर भारत में भी है। पृष्ठ ४९ में लिखा है कि- आप जिस आनन्दभाष्य की बात करते हैं वह तो वस्तुतः उसी जानकीभाष्य और श्रीभाष्य की चोरी करके आपका लिखा हुआ है । यह रघुवरदास वेदान्ती को कहता है, प्रकरण देखो- "रामानन्दी परमहंस जाली दसजी अपने बनाये गतिवोध उत्तरार्द्ध जो प्रथमबार छपा है, पृष्ठ २०१ पंक्ति १५ से लिखते हैं कि, रामानुजस्वामी के श्रीभाष्य को खंडन कर ब्रह्मसूत्र पर रामानन्दभाष्य और जानकीभाष्य झूठे ही रच कर छपा दिया जो इस वक्त दोनों. भाष्य चालू हैं और इस वक्त रामानन्दभाष्य - १ . (१४) श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा आपस में तकरार होने से खंडन भी कर दिया गया। इसी रामानन्दभाष्य का नाम आनन्दभाष्य है। सम्पादक स्वामी श्री भगवदाचार्य अपने तत्वदर्शी विशेषांक जो वर्ष ८ अङ्क ८-९ के पृष्ठ ५४ पटली दूसरी के (३) नंबर में लिखते हैं कि, “मैं कथित आनन्दभाष्य का कर्ता हूँ इस प्रकार से शिंगड़ा के महन्तजी का जो पत्र मेरे पास उपस्थित है उसमें लिखा है"। उक्त दो प्रमाणों से पता लगता है कि आनन्दभाष्य रघुवरदास शिंगड़ा के महान्त का लिखा है यहां बहां से लेकर । इससे जो नकली परम्परा बनानेवाले हैं उनसे कैसे किसीको विश्वास होगा। हा सोच है कि पन्थाई चर लोग भी स्वतन्त्र श्रीसम्प्रदा- याचार्य बनने के लिए अनेक प्रयत्न कर रहे हैं। श्रीरामानन्दस्वामीजी तो श्रीरामानुजसम्प्रदाय में हैं हीं इसमें कई ग्रन्थ प्रमाण में हैं बहुत स्थलों में लिखा है। मेरठ से प्रकाशित "संकीर्तन" वर्ष ७ के अवताराङ्क के पृष्ठ २८४ में कल्पित त्रिदगडीचित्र श्रीरामानन्दस्वामीजी का दिया है, उसीके नीचे छपा है कि "शब्दात सम्प्रदायाचार्य। श्रीभाष्य और श्रीरामानुजस्वामी का चित्र श्रीरामानुज सन्प्रदाय में तो मान्य है ही सव सम्प्रदायवाले मानते हैं, किसीने अवतक विरोध नहीं किया है । महामहोपाध्याय श्रीयुक्तानन्तकृष्ण शास्त्रीजी ने श्रीगमानुजस्वामी के श्रीभाष्य को माना है । इसपर उन्होंने विचार भी किया है। "श्रीसम्प्रदाय' पुस्तक पृष्ठ १ और २५ में लिखा है कि - श्रीबालसूर्यप्रभाटीका सहिता (१५) ४३ दिन कलियुग के बीतने पर शठकोपादिक निकृष्ट शूद्रजाति परिगृहीत होने से नारायणमन्त्रोपासकोंके पन्थ को सम्प्रदाय कहना तो दूर और महाभूल की बात है, उसे ता सनातनधर्म में स्थान भी नहीं दिया जा सकता है। महासयजी । आप के मत से तुल्सीकृत रामायण चण्डाल परिगृहीत होनेसे राममन्त्रो “मंत्रराजो" पासको के सनातन धर्ममें स्थान भी नहीदिया जा सकता है, क्योकि- संभु कीन्ह यह चरित सुहावा । बहुरि कृपाकरि उमहि सुनावा । सोइ सिव कागभुसुंडि दीन्हा राम भगत अधिकारी चीन्हा । तेहिसन जागबलिकपुनिपावा । तिन्ही पुनि भारद्वाज प्रति गावा ३० बायसइव सबही तेडरही । सपदिहोहि पच्छा चंडाला ११२ । राम बसहु तिन्ह के मन मामी । मंत्रराजु नित चपहि तुम्हारा"|| इति-रामचरितमानस वा कागड दा० ३०।उत्तरकाण्ड दो० ११२। अयोध्याकाण्ड दो० १२९ याने सिवजी ने कागभुसुंडि "चंडालपच्छी” की 'रामायण और “राममन्त्र" को उपदेसकिया कागभुमुंडि जी ने जागबलिकजी * जीव तीन प्रकार के होते है-वद्ध, मुक्त, नित्य । अतएव श्रीशठकोपस्वामी नित्य जीव हैं। १-शंभुरीशः पशुपतिः शिवः शूली महेश्वरः ५९।इतिश्रम- रकोष काण्ड १ याने यह “राममन्त्रराज" शूलि सेचला वह कागभुसुंडि द्वारा प्रचलितहुआ। इसहेतु से “ श्रीसम्प्रदाय" के ग्रन्थकरता हास में आजावे नं. १ एक ता शूली सम्प्रदाय में है, नं० २ चंडालग्राहय मंत्र होने से, इने श्रीसम्प्रदाय में मानना उप- हास्य है।

(१६) श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा को रामायण राममन्त्र उपदेस किया। जागबलिकजी ने भारद्वाजजी की "रामायण राममन्त्र को उपदेस किया। इस प्रकार राममंन्त्र की परम्परावलि है। विज्ञपाठगण ध्यानदे विचारे तत्वक्या है। श्रीतुलसीदासजी श्री रामानन्दस्वामी की सिष्य पर सिष्य में है और श्रीरामानन्द स्वामीजी श्रीरामानुज सम्प्रदाय की सिष्य पर- मंपरा में हैं । इस हेतु से आप ने सवोंपर एकहीवार धावावोलदि- या। यहाप'हीके सोभादेता है। क्योंकि आपने अपना के वैरागी जाति कवुल करलिया है। इसका उत्तर सप्रमाण, उदाहरण द्वारा प्रकाश करते हैं सावधान हो विचार करेंगे। यह श्रीसम्प्रदाय श्रीनारायण द्वारा श्रीजीको तथा उनके द्वारा विष्वकसेनजी को नारायणमन्त्र मिला, विष्वकसेनजी नित्यकोटि में हैं, भगवान् की इच्छानुकूल अवतार धारण करते हैं यथा- १ "विष्वकसेनादिभिर्भक्तैः शठारि प्रमुखैद्विजैः” इत्यादि पञ्चरात्रे बृहद्ब्रह्मसंहिता पाद २ अध्याय ७ । आंजनेयपंथ वालों श्रीवैष्णव-प्रस्थान १ लेखक-श्री १००८ आचार्यपीठाधिपति श्रीराधवाचार्य स्वामीजी महाराज, प्रथम संस्करण "१९४४ ई०” पृष्ठ है से उधृत। द्रविड़वेद-निम्नलिखित दिव्य आत्माओं द्वारा यह वेद प्रकट हुआ है। मेरो सम्पूर्ण गुरुपरम्परा । नारायण १ महालक्ष्मी २

श्रीबालसूर्यप्रभाटीकया सहिता (१७)
का कहना है कि
सत्ययुग
से कलि तक दो आचार्यों का नाम है
और तो है नहीं, यहां पर इन्हें “तुष्यतु दुर्जनन्याय" के अनुसार
समाधान कर देते हैं नं०१
उदाहरण,
श्रीचक्रवर्ती श्रीदशरथजी
महाराज के ६०००० साठहजार वर्ष बीतने पर श्रीरामचन्द्रजी का
जन्म हुआ था, इससे आप सरीखे बालक प्रश्न करें कि साले,
साल पर श्रीदशरथ जी के पुत्र क्यों न होते थे; यह आप ही को
विश्वक्सेन ३ मरीचि ४ कश्यप ५ वामन ६ वशिष्ठजी से दो
शाखायें चली उन्हीं के द्वारा सूर्यवंश में, महाराजमनु, इक्ष्वाकु,
दिलीप, श्रीरामचन्द्र इत्यादि सब राजा नारायण के उपासक थे,
ब्रह्मऋषियों में वशिष्ठ, व्यास, बोधायन इत्यादि हुए यहां पर
सबका नाम नहीं दिया जाता है केवल कर्म दिखाया गया है।
विशेष जानना हो तो बृहद्ब्रह्मसंहिता आदि ग्रन्थ देखें सर्वत्र
मिलेगा। और वाल्मीकीय रामायण अयोध्याकांड सर्ग ६ और
सर्ग २० । स्कन्दपुराण रेणुका माहात्म्यै सह्याद्रि खण्ड अध्याय ३
.
देखो।
१ श्री सरोयोगी ५ श्रीमधुरकवि ९ श्रीगोदर
२ श्री भूतयोगी
६ श्रीशठकोप
१० श्रीभक्तांघ्रिरेणु
३ श्री महायोगी ७ श्रीकुलशेखर ११ श्रीमुनिवाहन
४ श्री भक्तिसार ८ श्रीविष्णुचित्त १२ श्रीपरकाल
इनका अवतारकाल कलियुग के पूर्व लगभग एकहजार वर्ष
से लेकर कलियुग के लगभग चारसौ वर्ष बीतने तक है। इनकी
अवतार स्थल की महिमा श्रीमद्भागवत पुराण में है।

।
(१८)
श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा
शंका हो सकती है। विष्वक्सेनजी अनेक रूप से एक काल में
रहते हैं, उदाहरण जैसे-
नं०२-सौभरी ऋषि ने एक ही कालमें पचासरूपधारमा
कर लिए थे। उसी रूप से सततकाल पचासों रूपों में रहते थे।
श्रीविष्वक्सेनजी अभी हैं और सततकाल में रहेंगे, तब
कैसे कलि से पंथ कहा जायगा। इससे आपकी कल्पना निर्मल
होगयी और श्रीसम्प्रदाय अनादि सिद्ध होगयी।
गीताप्रेस गोरखपुर, कल्याण, संत अंक श्रावण १९९४ का
छपा पृष्ठ ४२० । लेखक बी० आर० रामचन्द्र दीक्षित एम० ए०
लिखते हैं कि-शठकोपके पिता का नाम, कास्मिारन था ये पांड्य
देश के राजा के यहां किसी ऊँचे पद पर थे "ऊँचा पद मन्त्रीको
ही होता है, और आगे चलकर कुरूगनाडुनाम के छोटे राज्य के
राजा होगये हैं वो पाण्ड्यदेश के ही आधीन थे। शास्त्र में
लिखा है कि मन्त्री पद का अधिकर ब्राह्मण हीका हैं, उदाहरण
द्वारा बतायेदेते हैं, ध्यान देवें।
एनद्देशप्रसूतस्य सकाशादप्रजन्मनः
वस्वं चरित्रं शिक्षरेन्पृथिव्यां सर्वमानवा: २०॥
कली खलु भविष्यन्ति नारायणपरायणः ।
कचित् कचित् महाराज द्रविडेषु च भूरिशः ३८ ।
इति श्रीमद्भागवत स्कन्द ११ अध्याय ५१
पृष्ठ १५ में लिखा है कि श्रीरामानन्द के शिष्य परम्परा-
गत श्रीवैष्णवगा श्रीरामानुजसम्प्रदाय में अपना स्वतन्त्र स्थान
रखते हैं।

श्रीबालसूरसंप्रभाटोकया सहिता (१९)
सर्वेषांतु विशिष्टेन ब्राह्मणेन विपश्चिता।
मंत्रयेत्परमं मंत्रं राजा षाड्गुण्यसंयुतम् ५८।
इति-मनुस्मृति अध्याय २ और
सर्व लक्षणलक्षण्यो मंत्री राज्ञस्तथा भवेत् ।
ब्रामणो वेदतत्त्वज्ञो विनीतः प्रियदर्शनः ४ ।
इति-विष्णुधर्मोत्तरे
मंत्रिभिः सह धर्मात्मा सर्वैरपि कृतात्मभिः ।
सुयज्ञं वामदेवं च जाचालिमथ काश्यपम् ६ ।
इति-वाल्मीकीय रामायण वालकाण्ड सर्ग है
करे कलियुगे प्राप्त नास्तिकैः कलुषी कृते ।
विष्णोरंशात्स सम्भूता वेदवेदान्ततत्त्ववित् ।
स्वोत्रं वेदमयं कर्तुं द्राविडस्य च भाषया ।
उत्पत्स्यनि सतां श्रेष्ठो लोकानां हितकाम्यया ।
मद्भक्तः शठकोपार्यो भविष्यति मदिच्छया ।
ताम्रपर्णानदीतीरे यत्र धात्रार्चितोस्म्यहम ३।
सत्र विप्रकुले कश्चिद् विष्णोरंशात्ससम्भवः ।
शठकोप इति ख्यातो महायोगी भविष्यप्ति ४।
इति -पद्मपुराण २-४ और ब्रह्माण्डपुराल ।
बृषभे तुविशाखायां कुरूकापुरिकारिजम् ।
पांडदेशे कलेरादौ शठारिं सैन्यपं भजे, १७॥
इति वार्तामाला नारायण प्रेस प्रथमवार संवत् १९९४।
क्षमा दया च विज्ञानं सत्यञ्च वादमः समः ।,
अध्यात्मनिरत : ज्ञानमेतद् ब्राह्मणलक्षणम् २७ !
इलि-कूर्म पुगण उत्तराद्ध अध्याय २५ ।

(२०)
श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा
सर्वेप्रत्यक्ष धर्माणो जितक्रोधजितेन्द्रियाः
दयास्थिताश्च सर्वे ते हिंयाभेदविवक्षिताः ।
इति-महाभारत आश्वमेधिक पर्व अध्याय ९२ ।
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शिनः २९ ।
इति-श्रीमद्भगवतगीता अध्याय ६।
तपोधनं ब्राह्मणानां
इति- ब्रह्मवैवर्तपुराण गणपति खंड अध्याय ३५ ॥
सर्वमात्मनिसंपश्येत्सच्चासच्च समाहितः ।
सर्व ह्यात्मनि संपश्यन्धर्मे कुरुते मनः ११८
इति-मनुस्मृति अध्याय १२ ॥
ब्रह्मचर्य तपः शौचं संतोषो भूतसौहृदम् ४३ ।
इति-भागवतस्कन्द ११ अध्याय १९ ।
तपस्वी तापसः पारिकांक्षी वाचंयमो मुनिः ४२ ।
इति-अमर कोष, ब्रह्मवर्ग, कांड २
श्रीसम्प्रदाय के ग्रन्थकर्ता का उद्देश है कि बोधायनही
पुरुषोत्तमाचार्य नाम से प्रसिद्ध हैं यह उनकी कल्पना निर्मूल है
क्योंकि वोधायन और पुरूषोत्तम में राशि भेदात् गगन सुमना
दिवत् उदाहरण x भवदेव १ सम्प्रदायी नाम भगवदास २
x १ मातृ देवो भव, पितृ देवोभव, आचार्य देवोभव इति तैत्तिरी
योपनिषद अनुवाक ११ मंत्रर २ । नोपिता नामरखता है उसके
आदि अक्षर रहता है

श्रीबालसूर्गप्रभाटीका सहिता (२१) इत्यादि, श्रीसम्प्रदाय में दीक्षादेते समय राशि, नाम के साथ ही दिया जाता है। श्रीअयोध्याधाम से "संस्कृतम्" नामक पत्र के सम्पादक श्रीकालीप्रसाद शास्त्री जी ने “विद्वबृत्तम्" नामक ग्रन्थ में भाग १ और २ में लिखा है भाग १ पृष्ठ १८११ दूसराभाग पृष्ठ १७४६ १३९।१९० में ५ पुरूषोत्तमाचार्य लिखा है, कि नं०१-उक्त पुस्तक पृष्ठ १८१ में अयं ख्रिस्तस्य द्वादश्या शताब्द्यामुत्पन्नः। अस्य ग्रन्थो वेदान्तमज षा प्राप्यते । अयं द्वैतसम्प्रदाय उक्तः। नं० २ पृष्ठ १७ स्त्रिस्त के १२ बारहवें शताब्दि में उत्पन्न हुआ था यह नदिया के राजालक्ष्मणसिंह की सभाका पंडित था और इसने पाणिनीय कृत अष्टाध्यायी के सूत्रोंपर वृत्ति लिखी थी। नं० ३ पृष्ठ ४६ कलिङ्गदेश का राजा क्षत्रिय था जिसकी राजधानी कटक थी इसने "विष्णुभक्तिकल्पलता" नामक ग्रन्थ लिखा था। नं०४ पृष्ठ १३९ बल्लंभमतावलम्बी बिट्ठलनाथदीक्षित के पुत्र बालकृष्ण की चौथी पीढ़ी में ख्रिस्त के अठारहवें शतक में पुरुषोत्तमाचार्य उत्पन्न हुआ था इसने असुभाष्य की टीका भाष्य- प्रकाश, बिट्ठलनाथकृत विद्वन्मण्डन की टीका स्ववर्णसूत्र और प्रस्थान इलाकर बनाया था। नं० ५ पृष्ठ १९० यह पुरुषोत्तमाचार्य १९८२ विक्रमाब्द में १ (२२) श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा रहा। यह पांचों ८०० वर्ष के भीतर ही हैं। अब "बोधान" ऋषिजी के विषय में सप्रमाण दिग्दर्शन कराते हैं सावधान हो पढ़ेंगे नं० ६ “विद्वद्धृतम्" भाग १ पृष्ठ ३४-३५ श्रूयते ब्रह्म- समागासुपरि बृत्तिरासीदस्य यस्या उद्धारो रामानुजाचार्येण कृतः, वेदान्तशंकरभाष्यानुवादभूमिकायां, डा० थीवो महाशयस्याप्ययं विचारः । इयं बोधायनवृत्तिः, कृतकोटिनाम्न्यासीदिति प्रपञ्च हृदये । श्रीरामानुजाब्द ९७६ बीत रहा है "सं० २०००"। नं० ७ कल्याण-पृष्ठ ४३३ संतांक में लिखा है कि प्रथम भीरामानुजाचार्य १ श्रीमभ्वाचार्य २ श्रीनिम्बार्काचार्य ३ श्रीवल्लभा- चार्य ४ की गणना की है, और चार सम्प्रदाय के साथ श्रीरामा- नन्दस्वामीजी की गणना नहीं की । फिर भी इसी पुस्तक के पृष्ठ ४४४ में श्रीरामानन्दस्वामीजी की और श्रीकबीरजी की एक साथ गणना की है, इसपर महानुभाव विचार करें क्या तत्व है। नं. ८ "सम्प्रदायबृत्तम्" प्रथमखण्ड: श्रीकालीप्रसादशास्त्री जी संस्कृत के सम्पादक सम्वत् १९९६ में लिखा है कि श्रीसम्प्र- दायः अस्य सम्प्रदायस्य प्रवर्तको रामानुजाचार्यस्वामी । अयं १०७४ विक्रमाब्दे किम्वा ख्रिस्ताव्दे चङ्गलपट्टनमण्डलान्तर्गते पेनमतूरे “भूतपुर्याम्" अस्य पिता केशवाचार्यो माताच कांतिमती वा भूमिदेवी अष्टवर्षावस्थायां पित्राविहितोपवीतसंस्कारो ऽयं । नं० ९ वैष्णवधर्मरत्नाकर लेखक बावलीग्रामनिवासी श्रीमान् भोपालदान की कृत संवत् १९८९ शके १८५४ । "श्रीवैष्णवधर्म- - कौन हो तुम्हारा । श्रीबालसूर्यप्रभाटीकया सहिता (२३) रत्नाकर" रामानन्दोय सम्प्रदायबृत्तान्त, पृष्ठ ८३ से १०० तक प्रश्नोत्तर द्वारा । श्रीमाभवामन्दनी प्रश्न किए तुम कौन मत है, तुन्हारा कौन सम्प्रदाय है और तुम्हारा क्या नाम है ? रामानन्दजी बोले कि हमारा शैवसम्प्रदाय है मैं सन्यासी हूँ मेरा नाम रामभारती हैं । पूर्व दिशा में गोवर्धनमठ है । दक्षिण में शृंगेरीमठ है २ पश्चिम में शारदामठ है ३ उत्तर में ज्योतिर्मठ है ४॥ गोवर्धनमठ के बन १ अरस्य २ शृंगेरीमठ के सरस्वति १ भारती २ पुरी ३ शारदामठ के तीर्थ १ आश्रम २ ज्योतिर्मठ के गिरि १ पर्वत २ सागर ३ यह शंकराचार्य के स्थापित ४ मठ हैं राघवानन्दजी कहते हैं कि हे रामभारते, तुम्हारा आयुष्य भी पूग हो चुका है, गुरू से कहो तब रामभारती गुरू से पूछे, गुरू बोले कि इस काल से हम तुमको नहीं बचा सकते हैं जो राघवा- नन्दजी बचा सकें तो उनकी सेवा करो। तव राघवानन्दजी के चरणों में साष्टाङ्ग कर बोले कि- त्राहि त्राहि महायोगिन् रक्ष'मां शरणागतम्। त्वां विनान्यो दयासिंधो मम रक्षाकरो नहि ॥२५॥ अर्थ-हे दयासिंधो, आपके बिना इस काल के मुख से मेरा रक्षण करनेवाला दूसरा कोई भी नहीं है, हे महायोगिन् आप मेरी रक्षा कीजिये आपके मैं शरणांगत हूँ २५ । ऐसा सुन राघवानन्दजी, रामभारती, को विष्णु मंदिर में लेआये उनका देह शुद्धि प्रायश्चित्त और मुंडन कराकर विधि से होम पूर्वक, ताप, और पुडु संस्कार कर के पीछे भारतीनाम का त्यागकराय, और. रामानन्ददास नाम को धारण कराया ।

(२४) श्रीसम्प्रदाय मीमांसा आपने गुरू श्रीराघवानन्दजी को आज्ञा ले कर काशीपुरी में निवास किया पूर्व अभ्यासानुकूल तपस्वीजटाविभूति धारण करने लगे आजभी उनके अनुयाई तपस्वी जटाविभू तिधारण कर रहे हैं। यहलोह लंगड़ी आदि ३२ भेद रामानन्द स्वामी कृत नही है। श्रीसम्प्रदाय ग्रन्थ करता ने स्वामी और आचार्य शब्द का आस्पद लगाया है वहवन्ध्या पुत्र के सदृश वुद्धिस्थ है, क्योकि वैरागिजातित्वात् अजागलास्तनवत् इन की वंश परम्परा में किसी ने आचार्य शब्द का प्रास्पद नही लगाया है, उदाहरण द्वारा बता देना परमावश्यक है पुस्तक महापुरूष स्मृति प्रकार में सवनाम में दासान्तर नाम हो है श्रीरामानुजसम्प्रदाय में आचार्य और स्वामी शब्द योग- रूढ़ है पंकजशब्दवत् उदाहरण द्वारा बतलाते हैं देखें जिस प्रकार पंकज शब्द कमल में ही योगरूढ़ है और शर्मा शब्द ब्राह्मण ही में योगरूढ है उसी प्रकार आचार्य और स्वामी शब्द आचारियों में ही योगरूढ है यथा- यस्तु मन्त्रद्वयं सम्यक अध्यापयति वैष्णवः। सच आचर्यम्तु विज्ञेयो भयबन्धविनाशकः ॥१८॥ तप्तमुद्रांकितं कृत्वा मृतं वैष्णबसंमतम् । तथैवाष्टाक्षरं मंत्रं परं चोपदिदेश सः ॥५४॥ इति स्कन्दपुराणसह्याद्रिखण्ड उत्तररहस्य अध्याय ७ ॥ "प्रास्पदं प्रतिष्ठायाम्" अध्याय ६ पाद १ सूत्र ४६ ।

श्रीबालसूर्यप्रभाटीकया सहिता प्राचारः परमो धर्मः श्रुत्युक्तः सनातनः। सर्वस्य तपसो मूलमाचारं जगृहुः परम् ॥११०॥ इति मनुस्मृति अध्याय १॥ "तत्वदर्शी पत्र वर्ष ७ अंक १२ पृष्ठ ६ में लिखा है कि श्री रामानन्द सम्प्रदाय में मैं ही सर्व प्रथम आदमी हूँ जिसने आचा- Uन्तनाम की प्रथा जारी की है, प्राचार्यान्त नाम की प्रथा के मूल में यह एक प्रधान आशय निविष्ट था कि श्रीनारानुनीच बन्धुओं के हाथों से प्राचार्य नाम की सार्वभौम सत्ता को छीन लिया जाय । मेरे सम्प्रदाय में आने से पहले इस सम्प्रदाय की यह दशा थी कि शिंगड़ा के महान्तजी जैसे विद्वान् भी श्रीतोताद्रि स्वामीजी के समाश्रित थे। रामायणनायको दाशरथिः श्रीरामो न श्रीसम्प्रदायस्यैष्ट देव इति त्वस्माभिर्वहुभ्यो वर्षेभ्यः प्रागेव निरधारि । परं मा भूच्छी वैष्णवानां शास्त्ररहस्यज्ञानविधीनां हृदये परिताप इति यावद्रामायणरचना न सम्पन्ना सावन्न केनापि ज्ञातं रामः परमे- श्वरावतार इति । श्रीवाल्मीकीयरामायणे वाल्मीकिः रामविष्णो रर्धभागमुक्तवान् । यत्र विष्णुत्वस्यापि नास्ति पूर्णता कथं तत्रो- पास्यदेवताबुद्धिः श्रीसम्प्रदायिनामिति ज्ञानं दुःशकमेव । श्रीसंप्र- दाये रामभक्तेषु च प्रवर्ततामिति बुद्धया यदस्माभिलिखितं तत् "भगवदाचार्योपास्यदेवश्रीगांधिप्रवति'तान्त्यजोद्धारविरुद्धता जच- रिता इत्यादि विलिख्य हास्यास्पदं नीतम् । परन्तु तैविश्वासः कर्तव्यः शतेषु हृदयध्वस्मदीयोक्ति बद्धमूला ऽभवदिति ।

(२६) श्रीसम्प्रदाय -मीमांसा श्रीवैष्णव महात्माश्रो सत्य और धर्म पूर्वक सभा में विचारें। यत्र वर्मो झधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च । हन्यते प्रेक्षमायानां हतास्तत्र सभासदः ॥१४॥ इति मनुस्मृति अध्याय ८॥ अर्थ-जिस सभा में अधर्म से धर्म का और असत्य से सत्य का नाश होता है उसके सम्पूर्ण सभासद् नष्ट हो जाते हैं। बह महाराज मनु का आदेश है। नं०१-श्रीरामानुज सम्प्रदाय में परम्परागत भगवान् न्यास का शिष्य महर्षि जैमिनि और उनका शिष्य महर्षि वोधा- यन हैं । इस वचन की पुष्टि में सबसे बड़ा प्रमाण भगवान् बोधा यन की वृत्तियाँ हैं। इन महर्षि बोधायन का श्रीरामानुज- सम्प्रदाय में उच्चतम आदर है, इस हेतु से श्रीरामानुज सम्प्रदाय में उनकी नाथमुनि नाम से प्रसिद्धि है, अर्थात् हमारे वंश के नाथ हैं । इसको उदाहरण द्वारा बताये देते हैं, श्रीरामा- नुजस्वामीजी ने शारीरक मीमांसाभाष्य में अथातो ब्रह्मजिज्ञासा सूत्र के अध्याय १ पाद १ के श्रादि में लिखा है कि "भमवद्- योधाचन कृतां विस्तीर्णा ब्रह्मसूत्रवृत्तिं पूर्वाचार्यास्सञ्चिक्षिपुः तन्मतानुसारेण सूत्राक्षराणि व्याख्यास्यन्ते- नं०२-हिन्दी विश्वकोषकार ने र० रै० प्रकरण १९ में भगवान् वोधायन को रामानुज सम्प्रदाय को पूर्वा चार्य माना । है। -- नं.३ कल्याण के वेदान्ताङ्क में लिखा है कि रामनुज 53 श्रीवालसूर्यप्रभाटोक्या सहिता २७) - सम्प्रदाय के तीन प्रमुख आचार्य हैं "ध्यास १ जैमिनी २ कोशा •यन' ३। जिनमें बोधायन महर्षि की वृत्ति बहुत प्रसिद्ध है। नं० ४-श्रीरामानुजस्वामी कृत "वेदार्थसंग्रह" अन्य में लिखा है कि, श्रियैनमः श्रीपतयेनमः पूर्वाचार्येभ्योनमः नमोवेदान्त विशदीकरणदीक्षाय परमगुरवे बोधायनमहर्षय । उक्त विषय पर विचार करते समय हमारा ध्यान पहले जिस विषय पर है, वह कमला प्रेस से प्रकाशित एक छोटी पुतिको "श्रीसम्प्रदाय" नामक २४ पृष्ठ की है इसके रचयिता 'लेखक' देवेन्द्राचार्य महात्मा हैं। यत्कंठे तुलसी नास्ति से नरा मूढमानसाः । अन्नं विष्टा जलं मूत्र पीयूयं रुधिरं भवेत् ॥ याने जोकंठी नहीबांधे है वहमूढ़ है वजोह अन्न खाते है वह विष्टाखाते है जलपीते है वह रुधिर और मूत्रनीले है यह अापके श्लोकके अर्थ है ।। श्राज सनातनधर्मावलम्बी ब्राह्मण क्षात्रेय और वैश्य बड़े बड़े ओहदेवाले जज १ कलटर श्रोत्रिय ३ वैदिक ४ नैयाइक ५ मीमांसक ६ आचार्य ७ इत्यादि कोइ भी कटो नहीं वांधेरहते है तो आपके वैरागी जातिके सिद्धान्तसे बदसवमूत्र और रुधिरपीते है, यह आपके मुखले शोभादेता है क्यो कि आप ने सनातनधर्म वर्णाश्रम त्यागकर वैरागी जाति कबूल किया है। २२-वैरागी शब्द-जिस प्रकार शंकर सम्प्रदाय के दश नामीसाधु व्यवहारिक भाषा में गोसाईशब्द से व्यवहत होते हैं, :

(२) श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा उसी प्रकार श्री रामानन्द सम्प्रदाय के सहित वैष्णव चतुः सम्प्र- दाय के साधु वैरागी शब्द से अभिहितकिये जाते है, यह आप- का सिद्धान्त हैं। आपके उदाहरण द्वारा उत्तरदेताहूँ श्रीसम्प्रदाय में पञ्च- संस्कार में कंठीबांधने का कोई विधाननहीं है, देखे पद्मपुराण पाताल खरड अध्याय ८२। आपसव कर्म धर्म त्यागकर अपना वंशसहित वैरागी जाति होगये है, मैं आपको दोष क्यों देवे जाति परिवर्तन होने से स्वाभाविक बुद्धी वदलजाती है । श्रीरामानन्द स्वामी जीतो श्रीरामानुज सम्प्रदाय के थे ही, आप के द्वारा वैरागी जाति परिवर्तन हो गई है, अव आप श्रीरामानुज,सम्प्रदायपर आघात कररहे है हा शोक है जैसे गौ के योनीदेशसे यवनादि उत्पन्नहुए है अब वह गौपर आघात कर रहे है उदाहरणद्वारा बतादेते है ध्यानदे योनिदेशाश्च यवनाः शकृदेशच्छकाः स्मृताः रोमकूपेषु म्लेच्छाश्च हारीता: सकिरातका: इति श्री वात्मीकीय रामायणे वालकाण्डे सर्गपू५। अर्थ-योनि से यवन हुआ शकृत देश से सकहुआ और रोम कूप से म्लेच्छहुआ और हरीत हुआ, यहलोग गौके नास करने मेंतत्पर रहते है उसीप्रकर आप महात्माओं ने श्रीरामानुज सम्प्रदाय करने के वास्ते नत्पर होरहे है श्रीरामानुज सम्प्रदाय आप का कल्याण ही चाहता है क्यो कि इन ही से आप के उत्पत्ति हुआ है लिखा है कि विषवृक्षोऽपि संवर्ध्यः स्वयं छेन्तु के नाश श्रीवालसूर्यप्रभाटीकया सहिता न साम्प्रतम् । इति स्कन्दपुराण आदिरहस्य सामादि खण्ड अध्याय २८॥ नं०१-पुस्तिकापृष्ट १५ में लिखा है कि रामानुजीय मिथ्याभि मान और कृतघ्नतावश स्वमूलभूत विरक्त श्रीरामानन्द मम्प्रदा- य को आचार्यत्वेन स्वीकारनहीं करते। उत्तर- महाशयजी आप वैरागी जातीहोगये है इसकारण आपके बुद्धिवदलगई है आप कर्तव्य और अर्कतव्यविमूढ होरहे है आप के विक्तर और गृहस्थ का ज्ञान हीनही रहगया है आप खालसा और लोह लंगड़ी आदि विषय ३२ गठरि मस्तकपर लेकेनृत्य कर रहे हैं, आप के सहशतो मल १ मल २ निछिल ३ नट ४ आदि- जाति वांश सिरकी लियै भैसापर लादे गांव २ घुम के नृत्य करते फिरते है वहसव ही अपने को विरक्त वैरागी जाति ही कहते है तो श्रीरामानुज सम्प्रदाय के श्रीवैष्णव किसको २ 'आचार्यत्वेन स्वीकार करें ध्यानदेवे- अंज्ञो हि विषयासक्तः परं नास्तिकवद्भवेत् । ज्ञानवान् विषयासक्त आस्तिको नास्तिको यथा १९५ इहांपरविरक्त का स्वरूप बतादेत है जिस से भापके वोधहो। अवध राज सुर राजुसिहाई । दसरथ धन सुनि धनद लजाई। सेहि पुर बसत भरत विनुगगा । चंचरीक जिमि चंपक बागा।। रमा विलासु राम अनुगेगी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी इति-रामचरित मानस अयोध्याकाण्ड दोहा ३२४ । परमात्मनि यो रक्तः स्वामिनो विषये मनः । दृष्ट्वा श्रुस्वातत्राहुः प्रसाणं पाशुरादयः १००।

(३०) श्रीसम्पदाब-मीमांसा इयं विरक्तिः षांधिल्मौदणैव जायते। ... केषांचित्कृपया तद्वदाचारेण क्वचिद्भवेत् १०७। .... इति-श्रीवचन भूषण व्याख्या। नं० २-पृष्ठ १९ में लिखा है कि जिस प्रकार शंकरसंप्र- दाय के दशनामी साधु व्यावहारिक भाषा में हैं, गुसाई शब्द से व्याख्यात होते हैं उसी प्रकार भारत की वीर जातियों में वैरागी प्रमुख घीर + जाति मानी जाती है। 1. अर्थ- + बीर जातियों का स्वरूप बताने पर सर्वसाधारण संजम रूप होगा। झल्ला मल्ला नटाश्चैव पुरुषाः शस्त्र वृत्तयः । धूतपानप्रसक्ताच जघन्या राजसीगतिः ॥४५॥ इति मनुस्मृति अध्याय १२ ॥ -ब्रात्य क्षत्रिय से सवर्ण स्त्री में उत्पन्न अध्याय १० प्रसंग में कहे हुए मल्ल, मल्ला, उनमें लाठी धारण करनेवाले, छन्डीवरदार और मल्ल वाहों से युद्ध करनेवाले और रंगभूमी में उतरनेवाले, नट और शस्त्रों से जीविका करने वाले और जुवा खेल तथा मद्य के पीनेवाले पुरुषों की अधम राजसी गति जानजी चाहिये जिनका निरूपण पुन: किया जाता है। तत्र भल्ला नटा झल्ला सूता वैतालिकास्तथा । उपतम्भुमहात्मानं . धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ।।७।। इति महाभारत सभापर्व अध्याय ४॥

भौचालसूर्यप्रभाटीका सहिता (३१० किन्तु रामानुजीय अपने को बैरागी न कहाये आचारी शब्द से प्रसिद्ध हैं। मं०३-पृष्ठ १९ में काठिया आदि भेद चतुः सप्रदाय में काठिण १ मूजिया २ लोहलंगड़ी ३ खाकी ४ तपस्वी जटाधारी पंचकेशी ७ रसिक ८ नागा ९ अतीत १० भादि अनेक भेद हैं, यह सव रामानुजमत में एक भी नहीं है। नं४-पृष्ट २२ में लिखा है कि बस्तुतः रामानुजमत की बास्तविकस्थिति इसप्रकार है जैसे उत्तर भारत में पलटु दादू, जगजीवन, राधास्वामीइत्यादि । उपर्युक्त पुस्तक पृष्ठ १३ में चारों महाभारत सभा पर्वमहाराज युधिष्ठिर की सभा में मछ- लोग, सूतलोग, वैतालिक, लोग उन की सेवामें अपना २ गुण दिखाया करतेथे ७ इस मनु और महाभारत के प्रमाणों से विदित है कि यह लोग अब, क्षत्रिय लोग राजारहेतवये लोग खेल तमासादि दिखा के अपनी जीविका वृत्ती करते रहे अव वह वाते है नहीं, तों सब मिल कर एक वैरागी जाति होगये, और नट लोग बड़ी चतुरता कलावाजी दिखाकर के सब लोगों को मोहलेते हैं यह लोग प्रसिद्ध है। अब यह लोग चाहते हैं की श्रीरामनुज सम्प्र. दाय के श्रीवैष्णवों से लड़ झगड़ के तथा धमका के श्रीवैष्णव धनजावें बलातकार उन के साथ भोजन करें करावें अन्धका का यह गूढ़ अभि प्राय है, एक लम्जा परित्यज्य सर्वत्र विजयी भवेत् ।

श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा सम्प्रदाय में १२ वावन द्वारा है इस में ३६ द्वारा श्रीरमानन्दीय के इस में एकद्वारा श्रीरामकबीर का है। मुन्सीनवलकिशोर यन्त्रालय में छपी भक्तमाल फरवरी सन् १८८४ इस्वी में, पृष्ट २५९ में लिखा है की श्रीरामानन्द स्वामी के शिष्य, कबीरजी होगये तिलक माला शरण किया मुसलमानों ने उनको बहुत कष्टदिया कि तूम काफिर, हिन्दू हो तव वह बैरागी जाति होगयै शिद्धपरमाचार्य होगये उनके द्वारे के शिष्य परशिष्य प्राजभी बहुत संख्या में हैं बहुत स्थान धारी है उसी पुस्तक पृष्ट २३० में लिखा है की वैरागियों की छोटी जाति है। श्रीनामाजी कृतभक्तमाल नवल किशोर प्रेस में सन् १९४० ई० में छपा पुस्तक पृष्ट १४३ में लिखा है कि कवीरजी अपने को मलेच्छ जातिवताये हैं, वर्णाश्नमनही रखे हैं, पृष्ठ १३८ में लिखा है कि रैदास जू चमार थे श्रारामानन्दजी के शिष्य हो. गये, पृष्ड ३०२ में लिखा है कि श्रीकूवाजी कुम्हार जातिके थे। यहसव कूवाजी की परम्परा कलयुगी है। - x श्रुतिस्मृति विरोधपरिहार- "श्रुतिस्मृति पुराणानां विरोधो यत्रश्यते तत्र श्रोत्रं प्रमाणं तु तयो द्वैधे स्मृतिर्वरा४ वैश्यासुविनक्षत्रभ्यां ततः शूदासु शूदवत् अधमादुत्तमायां तु जातः शूद्राधमास्मृतः।

श्रीबालसूर्यप्रभाटीकया सहिता (३३)
नाभाजी की पूर्वकथा पृष्ट १५ में लिखी है कि "हनूमान
वंश में जन्मप्रसिद्ध जाके" ५ पांचवर्ष की उमर में आंख रहित
होगये थे, श्रीअयस्वामीजी ने उनको शिष्य करलिया आशीर्वाद
से नेत्र होगये । भक्तमाल रचना करके वैरागीजाति में आचार्य
ब्राह्मण्यां शूदजनितश्च डालोधर्मवर्जितः।
कुमारीसंभवस्त्वेकः सगोत्रायां द्वितीयकः ९ ।
ब्राह्मण्यां शूद्रजनितश्च डालविविधः स्मृतः ।
चकि पिता गोप आशायः कुंभकारकः १०॥
वणिक्किरातकायस्थ मालाकारकुटुंबिनाः ।
वरटा मद चंडालदासश्वपचकोलकाः ११ ।
एतें त्यजाः समाख्याता ये चान्ये च गवाशनाः।
एषां संभाषणात्स्नानंदर्शनादर्कवीक्षणम् १२ ।
इति-व्यासस्मृति अध्याय १३
युगे युगे अल्पकान धर्मान् निरीक्ष्यमधुसूदनः ।
वेदव्यासस्वरूपेण वेदभागं करोति वै १७ ।
वेदव्यासनुनिः साक्षात् नारायण इति द्विजाः
निस्ताराय तु लोकानां स्वयंनारायणःप्रभुः १८॥
व्यासरूपेण कृतवान् पुराणानि महीतले १९ ।
इति नारदीयपुराण पूर्वभागअध्याय १ शब्दकल्पद्रुम ।
चाटतस्करदुर्वृत्तमहासाहसिकादिभिः ।
पीड्यमानां प्रजां रक्षेत्कायस्थैश्च बिशेसतः ३३६।.
इतियाज्ञवल्क्यस्मृति अध्याय ११

(३४)
श्रीसम्प्रदाय मीमांसा
संज्ञा होगई, पृष्ट १६ में "मालि संतशीतसो अनन्त प्रीति
जानिरसरीति तातेहृदय रंगछायो है"। भावार्थ, श्रीनाभाजी महा-
राज महात्माओं के चरण धोकर नित्य प्रति पीते थे, इससे सिद्ध
होगये और "शीतप्रसाद जूठा" संतो का खाते थे इससे बड़ा
प्रभाव बढ़ गाया “आजभी नूतन परम्परावाले महात्माओं में वह
चाल प्रसिद्ध है।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भाजनं तामसप्रियम् ।
उर्व गच्छन्ति सत्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति गजसा १८
यःशास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
नससिद्धर्मवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् २३
इति श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय १
वैश्योऽजीवन स्वधर्मेण शूद्रबृत्यापि वर्तयेत् ।
आचरन्न कार्याणि निवत च शक्तिमान् ९८ ॥
इति-मनुस्मृति अध्याय १०॥
अर्थ वैश्य आदि अपने बृत्ति से असमर्थ हो तो ब्राह्मण
क्षत्रिय, और अपनी जाति की सेवावृत्तो कर के निर्वाह करै किन्तु
उनके उाच्छष्ट जूठा कौन खाय और आपत्ति के दूरहो जाने पर
शूद बृत्ति से निवृत्त हो जाये ९८॥
प्रश्न-जिप्स समाज में परम्परागत उच्छिष्ट "जूठा" भोजन
की चाल चल रही है उनके वास्ते अधर्म क्या है । जूठा खाना
सब सम्प्रदाय में वर्जित है। नूननपरम्परावाले महात्माओं में,
आचााभिलषित है। चतुः सम्प्रदाय के वैष्णवि इस पर विचार
करें।

श्रीबालसूर्यप्रभाटोकया सहिता (३५) भारतनिर्माता लेखक कृष्णवल्लभद्विवेदी, संपादक हिन्दी विश्व भारत पृष्ठ ७२ पंक्ति पांच में लिखा है कि रामानुज की यह उदार भावना आगे चल कर उनकी शिष्य परंपरा के सुप्रसिद्ध स्वामी रामानन्द के नेतृत्व में उत्तरी भारत में विशेष रूप से पुष्पित और पल्लवित हुई रामानुज का जन्म १००१ ईस्वो में और मृत्यु ११३७ ईस्वी में हुई। नं०१-पृष्ठ ७९ में लिखा है कि, रामानन्दने श्रीसंम्प्रदाय से पृथक् होकर अपना एक स्वतंत्र संप्रदाय स्थापित किया जिसका नाम "रामावत" संम्प्रदाय पड़गया। नं०२-पृष्ठ ८० में लिखा है कि रामानन्द के बारह प्रधान शिष्य थे "रैदास" या रविदास चमार १ कबीर । जूलाहा, २॥ धनांजाट ३ सेनानाई ४।पीपाराजपूत ५ भवानन्द ६॥ सुखानन्द ७ आशानन्द ८ा सुरासुरानन्द ९। परमानन्द १०। महानन्द ११॥ और श्रीआनन्द १२ । [ दादू पंथी, निराकारी, रामस्नेही, हिजरी पंथ] नं०३-रामानन्द और कबीरके ही पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए क्रमशः दादूदयाल १ सुन्दरदास २ रज्जव ३ धरणीदास चरणदाप ४ भीखा ५ दरियासाइव ६ मलूकदास ७ पलटूदास ८ देवराज ९ अदि कई उच्चकोटि के संत उत्तर भारत में जिनमें दादू १५४४-१६०३ ई० में सब से बड़े चेला थे । श्रीरामानन्दस्वामी के १२ शिष्य थे उनमें ब्राह्मण और क्षत्रिय का नाम भी नहीं आता है।

- है श्रीसम्प्रदाय-मोमानः राजपूत तो आते हैं, यह क्षत्रिय से भिन्न हैं, यथा- क्षत्रात् करणकन्यायां राजपुत्रो वभूव ह ११० इति ब्रह्मवैर्वतपुराण ब्रह्मखण्ड अध्याय १०॥ अर्थ-क्षत्रिय से करण की कन्या में राजपुत्र जाति उत्पन्न हुई हैं ११०। करण किस वर्ण में है इसको वतादेना परमावश्यक शूद्राविस्तु करणे १८ इति ब्रह्मवैवर्त पुराण ब्रह्मखण्ड अध्याय १०॥ शूद्रायां करणे ३ इति गरुडपुराणपूर्वखण्ड अभ्याय ९६॥ अमर कोष काण्ड २ शूद्रवर्गश्लोक २ में देखा श्रीरामानन्दस्वामीजी के प्रधान शिष्य श्रीकवीर थे रामराम जप करते २ सिद्ध होगये,राम- मय होनेसे रामकवीर ऐसी आख्या हुई उनका द्वारा आदि चलने लगा, उदाहरण सूरदासजी श्याम २ जपते २ श्याम सूर ऐसी आख्याहुई भजनका ऐसा प्रभाव है,आपने "प्रपन्नामृत' पुस्तक- के आधारपर श्रीरामानुज स्वामीजी का और उनके पूर्वाचाय्य का अपमानकिया है, वह ग्रन्थ "श्रीसम्प्रदाय" में मान्य नहीं है, तथापि आपके सिद्धान्त से तो वह सव आचार्य हिन्दु जाति में हैं ही गोरक्षक थे ही, आप अपने आचाप्यों को कौन सन्दूक में बन्दकरके किस समुद्र में डुबाकर, स्वतन्त्र श्रीसम्प्रदायाचार्य बनेगें ध्यान दे। * मैंने एकपुस्तक श्रीअवधवंशीय क्षत्रियमार्तण्ड में एक संग्रह पुस्तक से श्लोक लिखा है उसमें "प्रपन्नामृत" नाम लिखा रहा, वही मैंने भी लिख दिया है उसका मैं पायवन्द नहीं हू ।

श्रीबालसूर्यप्रभाटीका सहिता (३७) श्रीरामानन्दीय भक्तशिरोमणी श्रीनाभाजी के आदेस पर ध्यान देवे। है श्रीरामानुज उदार सुधानिधि अवनि कल्पतरु । विष्णुस्वामी वोहित सिंधु संसार पार कर ॥ मध्वाचार्य मेध भक्ति सर ऊसर भरिया। निवादित्य प्रादित्य कुहर अज्ञान जु हरिया ।। जनम करम भगवत धरम संप्रदाय थापी अघट। *चौबीस प्रथम हरि वपु धरे त्यों चतुर्ग्रह कलियुग प्रगट ॥२८॥ देवाचारज द्वितीय महा महिमा हरियानन्द । तस्य राघवानन्द भये भक्तन को मानद ।। पत्रावलंव पृथिवी करि स्थाई। चारि वरण आश्रम सबही को भक्ति दृढ़ाई ।। * भागवत, स्कन्ध १ अध्याय ३ में २४ अवतार श्रीमन्ना. रायण से ही लिखा है यथा-पूर्णावतार १ अंशावतार २ श्रावे. शावतार भेद से- ब्रह्माजी १, पुरुषावतार २, सनतकुमार ३, वागह ४, नारद ५, नर नारायण ६, कपिल ७, दत्तात्रेय ८, यज्ञ ९ ऋषभ- देव परमहंस १०, पृथु ११, मत्स्य १२, कच्छर १३, मोहिनो १४, धन्वन्तरि १५, नरसिंह १६, वामन १७, परशुराम १८, व्यास १९, श्रीगमचन्द्र २०, बलदेव २१, श्रीकृष्ण २२, बुद्ध २३, और कल्की २४ । इसीप्रकार चारव्यूह कलियुग प्रगटहुआ २८ । इन चारो के अंतर गत नहीं है वह आधुनिक पंथाई है यह निश्चय होगया। - (३८) श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा तिनके रामनन्द प्रगट, विश्वमंगल जिहिं वपु धरयो। ४ श्रीरामानुज पद्धति प्रताप अवनि अमृत व्है अनुसरायो ।३५॥ अनंतानंद कबीर सुखा सुरसुरा पद्मावत नरहरि । पीपा भावानंद रैदास धना सेन सुरसुरकी घर हरि । औरो शिष्य प्रशिष्य एकते एक उजागर इत्यादि ३६॥ वर्णाश्रम अभिमान तजि, पदरज वंदहिं जासुकी। संदेह प्रथ खंडन निपुण, वाणी विमल रैदासकी ।।५९|| हिंदु तुरक प्रमाण रमेंनो सबदी साखी । पक्षपात नहिं वचन सबन के हित की भाखी ॥ कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रम षटदर्शनी ६०। नाभाजी अपना पूर्वाचार्य रैदास और कबीर की विमल वाणीका उपदेश लिया। पदरज की वंदना किया । यथा बृद्धस्य च पूजायाम पाणिनीय सूत्र ६२ अ० २ पाद २॥ श्रीरामतापनीयोगनिषद् । श्रीमद्हरिदास कृत भाष्योतेता भीसंवत् १९८४ वैक्रमीय में छपा पृष्ठ ५२ में लिखा है कि "नाग- यणशब्दस्य मत्स्यादि जलगन्तुषि, तरतिव्याप्तिः अतोन परस्वरूप: वाध्यक" "रामनवरत्न" पृष्ठ १८ में लिखा है कि मत्तो नारायणो विष्णुरात्मानं कतिधा सृजत् । तेषु तातविशिष्टाय अवताराहरेर्दश२८ xजे सठ गुरु मन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं। ब्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्मभरि पावहिं पीरा।। इति रामचरित मानस उत्तर काण्ड दोहा १०७[क] श्रीबालसूर्यप्रभाटीकया सहिता (३९) मच्छक्त्या प्रतिरुद्धानां मत्स्यादिनां हि पार्थिव, जन्मकार्यान्तर प्राप्ति स्वरूपं जायते ३६ । अर्थ-जानकी जी ने जनक जी से कहा कि हमसे नारा- यण, विष्णु अपने अनेक अवतार करते हैं उन अवतारों में राम कृष्ण आदि दश अवतार श्रेष्ठ हैं। हमारी शक्ति से मत्स्य कर्मादि अवतारों का जन्म स्वरूप और रावण कंस वधादि रूप कार्यान्तर की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार, श्रीमहारामायण में लिखा है। और श्रीरामसारसंग्रह में भी लिखा है। यह वाममार्गियों के सिद्धान्त है। आज काल इन्ही नूतन परम्परा वाले मे से एक हिजड़ी पंथ निकाला है "वहकहता है कि मैं श्रीरामानन्दीय वैष्णव हूं जो कि लड़कों को रामजी बना के उनके साथ दुराचार करता और कराता है और परब्रह्म परमात्मा श्रीरामजी पर दुराचार का दोष आरोपन करता है, । इसको उदाहरण द्वारा बता देना परमा वश्यक है जिससे जनता संभलजावें "श्रीराम बर::- नाम रचयिता-रामायणी ओरामावातारदासगी । प्रकाशिका श्रीमतीमुन्नी कुमारीजी महोद- या प्राम रोठेरा, पो० भुइली, जि० मिर्जापुर १९८१ वि० पृष्ट ५५ नं० १३, १४-१५ तरंग ७७, ७८, ७९ । मे लिखा है यथा। हमारे पिया ठाढ़े सरयू तीर। देखि सखी यह रूप मनोहर, उठीकरजे पीर १ छोडि लाज मैं जाय मिली जहँ खड़े लखन केबीर। मृदु मुसुकाय पकरि कर मेरा, बैंचि लियौ तल चीर २१ (४०) श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा झाऊ बृन की झाड़ी भीतर, करन लगे रति धीर । राम सखो वह कंज मनोहर, जहँ वोलत रहे कीर ३॥ कर सों कमर, माथसों माथो, होंठौं से होठ मिलाय रहीरे ४। श्रीरामचन्द्रजी साक्षात्नारायण है यथा। भविता हि तदा रामो नरो नारायणः प्रभूः २१ । तस्य पत्नी महाभागा लक्ष्मीः सीतेति विश्रुता दुहिता जनकस्यैषा उत्थिता वसुधातलात् २३॥ न सीतायाः परं भार्या व स रघुनंदनः । यज्ञ यज्ञेच पल्यर्थ जानकी कांचनी भवत् ७ इति श्रीवल्मीकीयरामायण उत्तरकाण्डसर्ग ३० ३प्रक्षिप्तसर्ग१०० । तदुपरान्त श्रीमान्नारायण भगवन ही साक्षात मनुष्यका रूप "श्रीराम" धारणकर अवतार लेगें ।२१। और उनकी पत्नी महा भाग्यवती साक्षात् लक्ष्मी ही साथ में सीता रूपसे अवतरित होंगी यह हमने सुना है । यह श्रीसीतामहारानीजी सर्वेश्वरी ही पृथ्वी से प्रकट होकर जनकनृपति की कन्या कहलावेंगी ॥२३॥ पश्चात् भगवान् रामचन्द्रजी सीताजी को ही अपनी सर्वतो भावन पत्नी रूपसे ग्रहण करेंगे। यहां तक कि सीताजी के कारण वश अनुपस्थिति में भी आवश्यक कार्य यज्ञा दिकों में भी जहां कि परनो का माथ आवश्यक है पत्नी की जगह सुवर्ण निर्मित जानकी से ही यज्ञादिको साधन करेगें ।। न रामः कर्कशस्तात नाविद्वान्नाजितेंद्रियः अनृतं न श्रुतं चैव नैव त्वं वक्तुमर्हसि।।१२॥

श्रीबालसूर्यप्रभाटीकया सहिता रामो विग्रहवान्धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः। राजा सर्वस्य लोकस्य देवानामिव वासवः॥१३॥ इति श्रीवाल्मीकीय रामायणे अरण्य काण्डे सर्ग ३७॥ अर्थ-मारीच ने कहा हे भाई रावण जी तुमने श्रीरामचन्द्र जी के दोष वताये हैं सो सब तुम्हारी बड़ी भूल है क्यों कि श्रीरामचन्द्रजी कठोर स्वभाववाले नहीं हैं एवं बड़े विद्वान् तथा सर्वदा सर्वथा जितेन्द्रिय हैं इसलिये हे रावण आप को बिना सुने देखे इस प्रकार झूठ नहीं बोलना चाहिये । श्रीरामचन्द्र महाराज साक्षात् धर्मकी मूर्ति हैं सम्पूर्ण संसार के राजाधिराज हैं जिन प्रकार स्वर्ग लोक में देवताओं के भी ऊपर इन्द्र शासन करते हैं उसी प्रकार ये भी मनुष्य स्थावर जंगम देव गन्धर्व अदि सभी के ऊपर शासन करनेवाले हैं ॥१२॥१॥ श्रीरामानुज सम्प्रदाय में कोई भी प्राचार्य राम कृष्ण कीनिन्दा किसी प्रकार नहीं की क्योंकि वह सब अवतार पूजनीय हैं उदाहरण द्वारा बताते हैं कि, अयोध्याजी में गोलाघाट पर श्रीअम्बाजी के स्थान 'दिव्यदेस' में श्रीरामलक्ष्मण जानकी हनुमान के सहित पूजेजाते हैं विभीषणकुण्ड श्रीवलरामाचार्यस्वामीजी के स्थानमें श्रीविजयराघव श्रीराम लक्ष्मण जानकी हनुमानजी पूजे जाते हैं दन्तधावनकुण्ड "उत्तर अहोवलमठ" श्रीमहाराज जयकृष्णा चार्यजी के स्थान में श्रीरामलक्ष्मण जानको हनुमान पूजे जाते हैं, श्रीहनुमानकुण्ड वड़ाखटला में श्रीगोशालाचारस्वामीजो के स्थान में श्रीरामलक्ष्मम जानकी भक्तराज हनुमानजी पूजे जाते है (४२) श्रीसम्प्रदाय मीमांसा इत्यादि और भी बहुतस्थान हैं । नूतन परम्परावाले रामजी के निन्दा कर ते हैं कईएक स्थलों में बताया है । और हनुमानजी की चतुर्मुख ब्रह्मा के गुरु कह अपमान करते हैं हनुमानजी से और रामजी से प्रथम किष्किन्धामें मुलाकात हुई थी रामजो के दास होने से पूजे जाते हैं यह सब शास्त्र के सम्मत है। यःसहाञ्चति सध्यछ स स तिर्थङ यस्तिरोऽञ्चति २०९३। इति अमरकोष विशेष्यविघ्नवर्ग कांड ३॥ पुस्तक पृष्ट ८ से पृष्ट १३ । तक देखे । अवशिष्ट प्रकरण देखे। x"आत्मा वा इदमेकएवागआसीत् नान्यत्किंचन मिषत सई- क्षत लोकान्नु सृजा इति स इमान लोकानसृजत"२ "एको ह वैना- रायण आसीन ब्रह्मानेशानो नेमे द्यावापृथिवीं न नक्षत्राणि नापो नाग्निर्न सोमो न सूर्यः स एकाकी नर मेत तस्य ध्यानान्तस्थस्यैका कन्यादशेन्द्रियाणि" इत्यादिषु । “यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरः” इत्यारभ्य ४ “य आत्मनि तिष्ठन्" श्रात्यादिषु च । इति श्रीशारीरकमीमांसाभाष्य जगद्व्यापार वर्जाधिकारणम अध्याय ४ पाद ४ सूत्र २० । यहां पर विचार यह है कि सब अवतार नारायण से ही होते हैं। और जगत् की उत्पत्ति नारायण से ही होती है। प्रजापतिश्चरति गर्भ अन्तर जायमानो वहुधाभिजायेत् । तस्य योनिम् परि पश्यन्तिधीरास्तस्मिहतस्थुर्भुवनानि विश्वा ।। x ऐत १-१-२, महो,१३-१॥-३, बु, ५- ३ ॥---४, शतपथ, १४-५-३०॥ -

धौबालसूर्यप्रभाटीया सहिता (४३)
इति यजुर्वेद अध्याय ३१ मन्त्र १९ और ऋग्वेद मण्डल ६
अध्याय ४सूक्त ४७ मन्त्र १८ ।
अर्थ-प्रजापति ब्रह्मा जिस नारायण के गर्भ में सृष्टि रचते
। प्राणो मात्र के अन्तर रहते हुए अन्तयांनी रूप से अनेक
प्रकार के अवतार लेते हैं।
प्राणीमात्र के अन्तर रहते हुए अन्तर्यामी रूप से अनेक
प्रकार के अवतार लेते हैं। उनके दिव्य शरीर को धीर भत ही
देखते हैं उस ईश्वर में समस्त भुवन स्थित है।
"आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नर शूनवः ।
ता यदस्या यनं पूर्व तेन नारायण स्मृत: १० ।
यत्तत्त् कारणमव्यक्त नित्यं सद्सदात्मकं ।
तद्विशिष्टः सपुरुषा लोके ब्रह्मति कोय॑ते १२ ॥
इति-मनुस्मृति अध्याय १॥
अर्थ-जल नर से उत्पन्न है इससे जल का नाम नार है
वही नार इस परमात्मा का प्रथम श्राश्रय अर्थात् निवास स्थान है
तिससे इस परमात्मा का नाम नारायण हुआ १०. यों वह लोक
वेद आदि सब में प्रसिद्ध है परमात्मा से सब उत्पन्न होवालों
का कारण और अव्यक्त अर्थात् वाहरी इन्द्रियों करके नहीं ग्रहण
करने योग्य और उत्त्पत्ति विनाश रहित और सत्सत का आत्म
भूत है उस करके उन्न किया हुश्रा पुरुष ब्रह्म इस नाम से
कहाता है ११॥

यथा-
(१४)
श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा
अवताराह्यसंख्यायाः हरेः सत्यनिधेद्विजाः।
यथाऽविदालिनः कुल्या सरसः स्युसहस्रशः २६॥
नरदेवत्त्वमापन्नः सुरकार्यचिकीर्षया।
समुद्रनिग्रहादीनि चक्र बीर्याण्यतः परम् २७॥
इति श्रीमद्भागवत् स्कन्ध १ अध्याय ३॥
अर्थ-हेसत्यनि धे जिस प्रकार महाह्रद से सहस्रों नदियाँ
निकलती हैं, वहहद समुद्रवत परिपूर्ण बना रहता है उसी प्रकार
नारायण से असंख्य अवतार होता है। नारायण पूर्णरूप से
बने रहते हैं २६ श्रीराम श्रीकृष्ण पूर्णावतार हैं,
एवं चतुविधा देवि मम पुयौं भवन्ति हि ।
माथुरे मथुरा पुण्या तत्र बृन्दावनं वनम १
अयोध्या कोशले देशे सरयू पुलिनेस्थित ।
तत्र राजीवपत्राक्षो रामो दशरथात्मजः २।
परमात्मा संभवं च जानकी रूपया त्वया ।
बोलीनुसंवारन्गुनिवनि सद्गतिः ३
इति-नारद पंचरात्रगत बृहद्ब्रह्मसंहिता पाद २ अध्याय ।
ततो नारायणो देवो नियुक्तः सुरसत्तमैः ।
जानन्नपि सुरानेवं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत् १॥
पुत्रत्वं तु गते विष्णौ राज्ञस्तस्य महात्मनः ।
उवाच देवताः सर्वाः स्वयंभूभंगवानिदम् १॥
ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नवमीके तिथौ।
प्रोयमानो जगन्नाथं सर्वलोक नमस्कृतम् १०॥

श्रीबालसूर्यप्रभाटीका सहिता (४५) कौसल्या जनयद्रामं दिव्यलक्षण .संयुतम् । विष्णोरर्ध महाभागं पुत्र मिक्ष्वाकुनन्दनम् १० साक्षाद्विष्णोश्चतुर्भाग सर्वैः समुदितोगुणैः । भरतो नाम कैकैयाज्जज्ञे सत्य पराक्रमः १३ । अथ लक्ष्मण सत्रुन्नौ सुमित्राजनत्सुतौ १४ । इति-वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे सर्ग १६ से १८ तक कदाचिदवतीर्योयं मंदं भक्तानुकम्पया । क्षीराब्धौ देव देवेसौ लक्ष्मीनरायणोमुवि ८ । स शेषःशंख चक्राभ्यां देवैब्रह्मादिभिः सह। त्रेता युगे दाशरथीभूत्वा नारायणा वभौ ९। शेषोऽभूत् लक्ष्मणो लक्ष्मी: जानकी शंखचक्रके। जातौ भरत शत्रुनो देवाः सर्वेपि वानराः १० वभूवुरेवं सर्वेपि देवर्षि भय शांतये । तत्रनारायणोदेवः श्रीराम इति विश्रुतः ११ । इति-अगस्त संहिता परम रहस्य अध्याय ३॥ ध्यात्वा वीरं परंब्रह्म राघवम् नियतव्रतः । चतुर्भुजं शंख चक्र गदापद्म धरंविभुम् ॥ इति-अगस्त संहिता परमरहस्य अध्याय १५॥२५॥ पितामह वचः श्रुत्वा विनिश्चित्य महामतिः । विवेश वैष्णवतेजः स शरीरः सहानुजः १२। इति-वाल्मीकीयरामायण उत्तरकाण्ड सर्ग ११॥

१
(४६) श्रीसम्प्रदाय-मोमांस
चतुर्भुनमुदारागं श्यामं पद्म निभेक्षणम्
श्रीभूमि नीला सहितं चिन्तयेच्च सदा हृदि ।
इति भरद्वाज संहितायाम् न्यासोपदेश अध्याय ३॥
श्री के पर्यायवाची नाम यथा-
"राघवत्वे भवत्सीता रूक्मिणी कृष्णजन्मनि।
अन्यषु अवतारेषु लक्ष्मी एवनायनि ॥
इति बिष्णु पुराणात् शिशुपाल वद्ध सर्ग १ श्रि कमल
वासिन्या रमणोऽयंमहाविभुः। तस्माच्छी रामइत्यस्यनाम सिद्ध
पुरातनम
इति-पद्मपुराण लक्ष्मीपमालया पद्मा कमला श्री:हरि-
प्रिया इन्दिरा लोक माता मा क्षीरोद तनया ग्मा २८
इति-अमरकेश काण्ड ? स्वर्ग वर्ग।
"श्रीसम्प्रदाय” पुस्तक पृष्ठ १२५० पांच में लिखा है कि
॥श्रीश्चते लक्ष्मीश्वपत्न्यौ” इस वाक्य में श्री का स्पष्ट उल्लेख हुआ
है "श्री" सीता हैं। यह कल्पना सर्वथा निर्मूल है क्योंकि सीता
रूप अनित्य है, यह रूप कार्यवश रहता है, नर नाट्य है, पुनः
लक्ष्मी रूप में लीन हो जाता है । सीताका पर्यायवाची शब्द यथा
अथ में कृषतः क्षेत्रलांगलादुत्थिता तत: ।
क्षेत्रं शोधयाता लब्धा नाम्ना सातेति विश्रुत्य १३॥
इति-वाल्मीकीय रामायण वालकांड सर्ग ६६ ।
गोदारणं च सीऽथ शम्यास्त्रीयुग कोलकः
ईषा लाङ्गलदण्डःस्यात्सीतालाङ्गल पद्धति
१४।
सीता का पात्र शन्द अमरकोप कागड २ वैश्यवर्गसे

श्रीबालसूर्यप्रभाटीकया सहिता संपत्तिः श्रीश्च, लक्ष्मीश्च, अमरकोश क्षत्रियवर्ग कांड २ । श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहो रात्रे। इति शुक्लयजुर्वेद अध्याय ३१ मंत्र २२ । ऋषिरादित्यं श्रुत्वा प्रार्थयते । आदित्यं स्तुत्वा प्रार्थयते । "आदित्य अंतरयामि नारायण के ऋषि प्रार्थना करते हैं" यथा महीधरभाष्य । हे आदित्य । श्रीः लक्ष्मोश्चते तव पल्यौ । जाया- स्थानीय त्वद्देश्य इत्यर्थः । यया सर्वजनाणीयो भवति सा श्रीः श्रीयते ऽनया श्रीः सम्पादित्यर्थः । यया लक्ष्यते दृश्यते जनैः सा लक्ष्मीः सौन्दर्यमित्यर्थः । “एवं पुरुष-शब्दस्य नारायणपरत्वं निश्चीयते।" । नारायण परब्रह्म नारायण परंतपः। नारायण परं चेदं सर्व नासमत-मकर ॥१०॥ इति महाभारत शांतिपर्व भीष्म युधिष्ठिर संवाद । मुनिवेषा यथा प्राप्ता वयमेते नृपस्तथा । तवांशो नृपतिश्चार्य रामचन्द्रः प्रतापवान् ।।४।। इति पद्मपुराण पतालखंड अध्याय १०५। इसीसे जिनकी नारायणसे परम्परा नहीं है वह आधुनिक पंथाइ कहे जाते हैं, यह इसका तत्त्व है। नं०१-बृहद्ब्रह्मसंहिता में लिखा है कि नारायणने ब्रह्मा को राममन्त्र का उपदेश किया है इसीसे ब्रह्मसम्प्रदाय कहा जाता है।

(४) श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा नं० २-नारायण श्रीः जी को नारायणमन्त्र और द्वय- मन्त्रादि दिया इसीसे यह श्रीसम्प्रदाय कही जाती है, इसीका नामान्तर "रामानुजसम्प्रदाय" कहा जाता है। नं. ३-नारायणने हंसरूप से सनकादिक को मन्त्र दिया इसीसे सनक सम्प्रदाय कही जाती है। नं०४-नारायणने रुद्र को मन्त्र दिया इसीसे यह रुद्र- सम्प्रदाय कही जाती है। यह चारों सम्प्रदाय की परम्परा नारा- यण से ही चली है। नं०५--श्रीशंकराचार्यजी की परम्परा, नारायण से ही चली है। अष्टोत्तरशतोपनिषद् की भूमिका में शंकराचार्यजी को परम्परा लिखी है। नूतनपरम्परावाले लोग "प्रपन्नामृत" पुस्तक देख प्रायः पागल से हो गये हैं, इससे उन्हें क्षोभ हो गया है, महाशयजी जिस "प्रपन्नामृत" पुस्तक के बल पर आपने श्रीरामानुजस्वामीको और उनके पूर्वाचार्यों का अपमान किया है, उसका प्रायश्चित कर लेवें क्योंकि वह "प्रपन्नामृत" कौन ने बनाया वह कहां का था किस जाति का था कुछ भी पता नहीं, ऐसा कौन मनुष्य नो ग्रन्थ लिखे और अपने पिता का नाम न लिखे, पुस्तक पृष्ठ२० देखें टिप्पणी देखें, हां बिना पिता के पुत्र किसके अपना पिता कहे या क्या लिखें, हमें संतोष है कि आपने 'वैरागीजाति" अपने को कबूल कर लिया है संभव है कि प्रपन्नामृत किसी वैरागी का लिखा है।

श्रीबालसूर्यप्रभाटीकया सहिता (४९) श्रीकाचीप्रतिवादि भयङ्कर सिंहासनाधीश्वराः श्रीमदन्ता- चार्य स्वामीजी 'तत्ववोधनामक पुस्तकमें लिखते हैं कि 'प्रपन्नामृत' तो निपट आधुनिक पुस्तक है अत: उसकी पावन्दी आँधार्यों के सिद्धान्त एवं व्यवहार पर कैसे होगी ? स्मृति पुराण संहिता के जो अनुकूल होगा वही माना जायगा, इसके विरुद्ध त्याज्य है। श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में "प्रपन्नामृत' ग्रन्थ की कुछ भी मान्यता नहीं है । दिव्य सूरिचरित 'भार्गवोपपुराण' गुरुपरम्पराप्रभाव यतीन्द्र प्रवणप्रभाव श्रीरामानुज दिव्य चरित इत्यादि प्राचीन ग्रन्थ ही माने जाते हैं । द्राविड़देश में प्रपन्नामृन नाम को ही बहुत कम मनुष्य जानते हैं। श्रीरामानुजम्नदान में श्रीरामानन्दस्वामी हैं इसका क्या प्रमाण है। यहां पर शास्त्र और लोक व्यवहार द्वारा बताते हैं यथा- अब भागवत, स्कन्द ९, अध्याय १ से १३ अध्याय के अनुसार, सूर्यवंश का क्रमशः श्रीरामचन्द्रपर्यन्त परम्परा वर्णन करते हैं यथा- राजोवाच । ये भूता थे। ये भविष्याश्च भवन्त्यद्यत्तनाश्च तेषां नः पुण्य कीर्तीनां सर्वेषां वद विक्रमान् ।।५।। अर्थ-इस वंश में जो पुरुष हो गये हैं जो होंगे और जो वर्तमान हैं उन सबकी कीर्ति पुण्य-प्रद है। अतः उनके पराक्रम युक्त कर्मों को कहिए ।

(५०) श्रीसन्नर-नीमा श्रीशुक उवाच। श्रूयतो मानवो वंशः प्राचुर्येण परंतप । न शक्यते विस्तरतो वक्तुं बर्ष शतैरपि ॥७॥ परावरेषां भूतानामात्मा यः पुरुषः परः । स एवासीदिदं विश्वं कल्पान्तेऽन्यन्न कश्चन ॥८॥ तस्यनाः समभवत्पद्मकोशो हिरण्मयः । तस्मिञ्जज्ञे महाराज स्वयंभूश्चतुराननः ॥९॥ मरीचिमनसस्तस्य जज्ञे तस्यापि कश्यपः । दाक्षायण्यां ततोऽदित्यां विवश्वानभवरसुतः ॥१०॥ इति भा० स्क० ९ अ० १ । वाल्मीकीयरामायण बा० सर्ग ७०। खट्वाङ्गादीर्घबाहुश्च रघुस्तस्मात्पृथुश्रवाः । अजस्ततो महागजस्तस्माद्दशरथो ऽभवत् ॥१॥ तस्यापि भगवानेष साक्षाद्ब्रह्ममयो हरिः । अंशांशेन चतुर्धा ऽगाप्पुत्रत्वं प्रार्थितःसुरैः ॥२॥ रामलक्ष्मण भरतशत्रुघ्ना इति संज्ञया । तस्यानु चरितं राजन्नृषिभिस्तत्वदर्शिभिः ॥३॥ श्रुतं हि वर्णित भूरि त्वया सीतापतेर्मुहुः । इति भागवत स्कन्द ९ अध्याय १०॥ अर्थ- श्रीशुकदेवजी कहने लगे कि हे परंतप ! मनुके वंश की अधिकता को सुनो । यदि यह वंश विस्तार पूर्वक कहा जाय तो सैकड़ों वर्ष में भी नहीं कहा जा सकता । जो परमपुरुष नाना प्रकार के इन सब जीवों का अात्मा श्रीबालसूर्यप्रभाटीकया सहिता (५१) है, केवल वही इस दृश्य संसार के स्थान में था और उसके अति रिक्त कोई वस्तु न थी ८ ! हे महागज उसी परमपुरुष के नाभि से सुवर्ण का कमल उत्पन्न हुआ, उससे चारसुख बाले ब्रह्मा उत्पन्न हुए ९ उस ब्रह्मा के मन से मरीचि उत्पन्न हुए, मरीचि से कश्यप हुए और कश्यप के अदिति नामक दक्ष की कन्या में विवश्वान (सूर्य) पुत्र हुए १० ! भागवत स्कन्द ९ अध्याय १ । खट्वाङ्ग से दीर्घबाहु, दीर्घबाहु से बड़े यशस्वी रघु, रघु से अज, अज से महाराज दशरथजी हुए थे १ । देवताओं के प्रार्थना करने पर ब्रह्ममय साक्षात् भगवान् विष्णु अपने अंश के अंश द्वारा चार रूप करके इन्हीं दशरथ के पुत्र हुए २ । इन चारों के नाम राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुध्न था हे राजन् ! इन सीता- के बहुत बड़े चरित्र को यथार्थवेत्ता ऋषियों ने भली भांति वर्णन किया है, जिसे तुमने कितने ही बार सुना है. ३ । पति राम ४५ दिलीप ४७ श्रुतला २९ हर्यश्व. ५१ ऋतुपर्ण ९.अनेना ३१ निवन्ध १० पृथु (५२) श्रीमान-शोमांटा नीचे क्रम से सूर्यवंश की परम्परा लिखते हैं यथा- परमपुरुष (नारायण) १ ब्रह्माजी २३ युवनाश्व २ मरीचि २४त्रसद्दम्यु(चक्रवर्ती)४६ भगीरथ ३ कश्यप २५ मानवाता ४ विवश्वान (सूर्य) २६ पुरुकुत्स ४८ नाम ५ मनु (श्राद्धदेव) २७ त्रसदस्यु ४९ सिन्धुदीप ६ इक्ष्वाकु २८ अनरण्य ५० अयुतायू ७ विकुक्षि ८ पुरज्जय(ककुस्थ)३० अरुण ५२ सर्वकाम ५३ सुदास ३२ सत्य (त्रिशंकु) ५४ सौदास ११ विस्वरन्धि ३३ हरिश्चन्द्र ५५ अम्वक १२ चन्द्र ३४ रोहित ५६ मुलक १३ युवनाश्व ३. हरित १४शावस्त ३६ चम्य ५८ विश्वसह १५ बृहश्व ३७ सुदेव ५९ खट्वाङ्ग १६ कुवल्याश्वक (धुन्धुमार) ६० दीर्घबाहु (दिलीप) १७ इंढाश्व ३९ भरुक १८ हर्यश्व ६. अज १९ निकुंभ ६३ महाराज दशरथ २० वर्हणाश्व ४२ सगर ६४ श्रीरामचन्द्र २१ कृशाश्व ४३ असमञ्जस ६५ लक्ष्मण २२ सेनाजित् ४४ अंशुमान ६६ भरत ५७ ऐडविड ३८ विजय ६१ रघु ४० बृक ४१ वाहुक ६७ शत्रुहन * श्रीरामचन्द्रजी के राशी का नाम हिरण्यनाम है यथा- श्रीबालसूर्यप्रभाटीका सहिता (५३) सूर्यवंशान्तर्गत निमिवंशीय क्षत्रियों का वर्णन करते हैं यथा- निमि रिक्ष्वाकु तनयो वशिष्ठमबृतविजम् । प्रारब्ध सत्रंसोऽप्याह शक्रण प्राग्वृतो स्मिभोः ।।१।। ततः सीरध्वजो जज्ञे यज्ञार्थं कर्षतो महीम् । सीता सीरामतो जाता तस्मात्सीरध्वजः स्मृतः ॥१८॥ एते वै मैथिला राजन्नात्मविद्या विशारद । योगेश्वर प्रसादेन द्वन्द्व मुक्ता गृहेष्वपि ॥२७॥ इति भागवत स्कन्द ९ अध्याय १३ । अर्थ-इक्ष्वाकुपुत्र निमि ने वशिष्ठजी को यज्ञ करने के लिए बुलाया, किन्तु वशिष्ठ जी इन्द्र का यज्ञ प्रारम्भ कर चुके थे इससे उन्होंने कहा कि मेरा वरण तो इन्द्र पहिले ही कर चुके हैं १। उसी समय से सतानन्दजी पुगेहित हुए हर्वरोमा के पुत्र क्षिप्रं मामपि कैकेयी प्रस्थापयितुमर्हति । हिरण्यनाभो यत्रास्ते सुतो मे सुमहायशाः ॥१३॥ इति वाल्मीकीयरामायण अयोध्याकांड सर्ग ७५ ॥ अर्थ-मुझे भी कैकेयी शीघ्र ही बन में भेज देना चाहती है जहां मेरा हिरण्यनाभ और यशस्वी पुत्र अर्थात् लक्ष्मण है १३ नोट-श्रीरामचन्द्रजी का जन्म पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरणमें हुआ था, चन्द्रमा कर्क राशि पर ३.२० तृतीय अंश बीसकला का अन्तर था इसलिए राशिनाम हिरण्यनाभहै . २९ सतद्युम्न (५४) श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा सीरध्वज थे, यज्ञ के लिए पृथ्वी जोत रहे थे तब हल के अम भाग से सीताजी उत्पन्न हुई थीं, इससे इनका नाम सीता है। ये- मिथिला के वंश सब राजा आत्मज्ञानी और घर में रहकर भी द्वन्द्व से मुक्त रहे हैं २७ । महाराज इक्ष्वाकु से दो वंश होगया, एक सूर्यवंश, दूसरा मिथिलवंश, कहने मात्र का भेद है, उदाहरण, श्रीरामानुजसंप्रदाय में श्रीरामानन्द ( रामावत ) इनमें मी अनेक भेद हैं। कहने मात्र है, सबके मूल रामानुज स्वामी हैं। १ इक्ष्वाकु १५ कृतिरथ २ निमि १६ देमीढ़ ३० शुचि ३ जनक,वि०,मि० १७ विश्रुत ३१ सनद्वाज १८ महाकृति ३२ ऊर्ध्वकेतु ५ नन्दिवर्धन १९ कृतिरात ३३ अयय ६ सुकेतु २० महारोमा ३४ पुरुजित ७ देवरात २१ स्वर्णरोमा ३५ अरिष्टनेमी ८ बृहद्रथ २२ ह्रस्वरोमा ९ महावीर्य २३ सीरध्वज (सोता) ३७ सुपश्वक १० सुवृति २४ कुसध्वज ३८ चित्ररथ ११ धृष्टकेतु २५ धर्मध्वज ३९ मिथिल २६ कृतध्वज ४० क्षेमधि १३ मरु २७ केशिध्वज ४ समरथ १४ प्रतीक २८ भानुमान ४२ सत्यरथ ४ उदावसु ३६ श्रुतायु १२ हर्यश्व ४५ अग्नि ५० विजय ५१ त्रिक श्रीव वास्तूर्यप्रभाटीका सहिता। (५५) ४३ उपगुरु ४८ सुभाषण ५३ चितव्य ४४ उपगुप्त ४९ जय ५४ द्युति ५५ बहुलाश्व ४६ वस्वनन्त ५६ कृति ४७ युसुधान ५२ शुनक ५७ महावसी कुशवंश का वर्णन भागवत स्कन्द ९ अध्याय १२ के अनुसार कुशवंश और उसकी स्थिति कहते हैं । जब कलितुग के अन्तमें सूर्यवंश का नाश होता हुआ महाराज मरु देखेंगे तब ये फिर उसकी रक्षा करेंगे। मरु योग सिद्धि करके अपने आधीन जीवन रक्खे हैं। सूर्यवंश कलि के अंतमें सुमित्र तक जायगा फिर मरु । इसके बाद मरुवंश की स्थिति होगी। कलेरते सूर्यवंशं नष्टं भावयिता पुनः ॥६॥ इक्ष्वाकूणागयं दंशस्सुमित्रांतो भविष्यति । यतस्तं प्राप्य राजानं संस्थां प्राप्स्यति वै कलौ ॥१५॥ - - meg (५६) श्रीसम्प्रदायमीमांसा नीचे क्रम से कुशवंश की परम्परा लिखते हैं यथा- १ कुश १५ विधृति २९ तक्षक २ अतिथि १६ हिरण्यनाभ ३० बृवल म०केबाद ३ निषिध १७ पुष्य ३१ बृहद्रण ४ नभ (नल) १८ ध्रुव वसंधि ३२ उरुक्रिय ५ पुण्डरीक १९ सुदर्शन ३३ वत्सबृद्ध ६ क्षेमधन्वा २० अग्निवर्ण ३४ प्रतिव्योम ७ देबनीक २१ शीघ्र ८ अनीह (अहिन)२२ मरु ३६ दिवाक ९ पारियात्र पारिपात्र,२३ प्रसुश्रुत ३७ सहदेव २४ संतानसंधि ३८ वीरवृहदश्व २५ अमर्षण ३९ भानुमान १२ अर्क (औक) २६ रुहुस्वान ४० प्रतिकाश्व १३ वज्रनाभ २७ विश्वसाह ४१ सुप्रतीक १४ खगण(श्वपन) २८ प्रसेनजित ४२ मरुदेव ३५ भानु १० दल ११ वल * सूर्य से लेकर इक्ष्वाकु, निमि फुश आदि राजाओं के अनेक प्रकार के वंश परम्परा चला है कितने ही क्रम व्यक्तिक्रम भी देखा जाता है बहुत दिन हाने पर कुछ छुट भी जाता है। इसी प्रकार, नारायण, लक्ष्मी, विष्वकसन, नाथमुनि, रामानुज- स्वानी, रामानन्दस्वामी, बालानन्दजी. रामप्रसादजी, तन तुलसी- दास आदि अनेक प्रकार हो जाने पर भी मूल पर विचार करेंगे तो रामानुजस्वामी के ही कहना पड़ेगा।

५५ प्रसेनजित
५८ सुरथ
४८ बहि धर्म
श्रीबालसूर्यप्रभाटीकया सहिता (५७)
४३ सुनक्षत्र
४९ कृतञ्जय
४४ पुष्कर (अंतरिक्ष)५० रणजय
४५ सुतपा (सुपर्ण) ५१ संजय ५७ रणक (क्षुलिक)
४६ अमित्रजित
५२ शाक्य
४७वृहद्राज ५३ शुद्धद ५९ सुमित्र
५४ लागल [राहुल]
अयोध्यानाम नगरी तत्रातीलोक विभुता ।
मनुनामानवेन्द्रेण यापुरी निमितास्वयम् ।।७।।
इति वाल्मीकीय रामाषण बालकाण्ड सर्ग ५ ॥
अर्थ -उस कोशलप्रान्त में लोक प्रसिद्ध अयोध्या 'अवध'
नाम की एक नगरी थी जिस नगरी को मानव श्रेष्ठ मनुमहाराजने
स्वयं बसाई थी ७ । भगवान् पाणिनीय ऋषि के मतानुसार वंश
शब्द का अर्थ व्याकरण से "अवधवंशीय" शब्द की सिद्धि
करते हैं।
"अवधस्यराज्ञो वंशः अवधश तस्मिन्जायन्ते ये ते अवध
वंशीयाः *" इति शब्दार्थः ।
क वह सूर्यवंश अर्थात् अवधवंशीय क्षत्रियों के गोत्रादि का
वर्णन करते हैं। गोत्रकश्यप । प्रवरत्रिक "कश्यप,वत्सार,नैरध्रुवाः"
वेद शुक्ल यजुर्वेद । उपवेद धनुर्वेद । शाखा माध्यंदिनी । सूत्रगोभिल
गृहसूत्र। देवता शिव "कल्यण:" शिखा दक्षिण शिस्त्रा । गुण
राजसगुण पाद दक्षिणपाइ पुर कोशलपुर ।
इति ब्राह्मणोत्पत्तिमार्तण्डा।

५८) "अथ शिक्षा प्रवक्ष्यामि पाणिनीयं मतं यथा । शाबानुपूर्व तद्विद्याद् यथोक्त लोकवेद्योः ।।९।। प्रसिद्धमपि शब्दार्थमविज्ञातम बुद्धिभिः । इति पाणिनीयशिक्षा। अर्थ--अब हम यहाँ पर पाणिनीय के मत के अनुसार शिक्षा देते हैं। पहले भी यह शास्त्रों में देखा गया है कि लोक और वेद भी जिसको कथन करते हैं और शब्दों के अर्थ प्रसिद्ध भी हैं परन्तु मूर्ख न जाने तो इसकी क्या दवा है। उक्त गोत्रादि का अर्थ वर्णन करते हैं। गोत्र में जो श्रेष्ठ ऋषि हुए हैं उनकी संज्ञा का प्रवर कहते हैं वेद वह हैं कि जिसके लिखे अनुसार वर्णाश्रमी स्वकर्म धर्म करते हैं। एक वेद में अनेक शाखायें होती हैं, उसमें वंशानुसार शाखायें बटी रहती हैं ऋग्वेद की २१ शाखाएँ, यजुर्वेद की १०९ शाखाएँ, सामवेद के १००० शाखाएँ और अथर्वणवेद की ५० शाखाएँ हैं। सूत्र एक पुस्तक का नाम है, जिसमें वेदानुकूल जन्मा संस्कार होते हैं ब्राह्मणादिकों के षोडश संस्कारादि सूत्रों से है किए जाते हैं चारों वेदों के चार सूत्र अलग अलग हैं। देवर वह हैं कि जिसको इस गोत्र में उत्पन्न हुए ऋषि पूजते आते हैं शिखा यज्ञादि कर्मों में दक्षिणवर्त्ति घुमा कर ग्रन्थी लगावै । पा यज्ञादि में दक्षिणपाद, पांव उठाने की विधि है । पुर पूर्व "इक्ष्वाकुवंशजों" का निवास स्थानको पुर कहते हैं देवता यज्ञा शुभं कर्मों में जिसके जो देवता हैं वे उनको मुल ऋचाओं, मं:

श्रीबालसूर्यप्रभाटीकया संहिता अन्धः पस्यति चारेण शास्त्र होनो न पश्यति ।।१९।। इति गरुडपुगण पूर्वखण्ड अध्याय १०॥ अर्थ-अन्धा दूसरे के सहारे देख भी सकता है परन्तु शास्त्र हीन किसी प्रकार नहीं देख सकता १९ । से स्वस्त्ययन वाचन करते हैं। मंत्र ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेन सहज पुरस्तात् । आयुष्यमय प्रतिमुश्च यज्ञोपवीतं वलमस्तुतेजः !! इति ब्रह्मापनिषद् । ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् । सूर्यवंश का उपास्यदेव नागयण है पृष्ट १सं८ तक देखे । इति गायत्रीमन्त्रः । टाड राजस्थान, प्रथमखण्ड "पहले आठ प्रकरण में" खड्गबिलास प्रेस बाँकीपुर से प्रकाशित १९१३ में प्रथमबारमुद्रित के प्रकरण पहिले पृष्ठ ११ में लिखा है कि सूयपुत्र वैवश्वत के सन्तान पूर्व में सिन्धु और गंगा के बिनारे तक प्रायै, और कोशल में अपनी पहिलो वस्ति अर्थात् राजधानी अयोध्या वा अवध की नीव डाली थी। टाड उक्त पुस्तक के प्रकरण सातवाँ पृष्ठ २३३ में लिखा है कि दो शाखार का शल "देश" से "सूर्य वंश की" निकली सान न हो 'प्रारा से पूर्व और पटनासे पश्चिम" के किनारे राहतात को स्थापित किया। इस समय सूर्यवंशीय क्षत्रिय अवघवंशीय क्षत्रिय के नाम से पटना आदि के एक जिला में बहुत पाये जाते हैं और दूसरी लाहोर के पास कोहारी के दरों में जा बसी।

(६०) श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा अवधीय शब्द "अवधवंशीय" शब्द को व्याकरणसे मिद्ध करते हैं देखिये, अवधस्य राज्ञोपत्यं श्रावधः, श्रावधम्यायं श्राव- धीयः तस्यापत्यं ४।१।९२ अण, तद्धिते प्वचामादेः ७।२।११७ । बृद्धिः । बृद्धाच्छः ४२.११४ इति छ प्रत्ययः। प्रायनेयीनीयियः फढ खच्छघां प्रत्ययादीनां ७१२ इय: । इति भावधीय सिद्धम् । "शक्ति प्रहं व्याकरणोपमान कोशाप्त वाक्याद् ब्यवहार तश्च धातु प्रकृति प्रत्यादीनां शक्ति ग्रहो व्याकरणद्भवति इति" सिद्धान्तमुक्तावली शब्द खण्डकारिका ८१ के अंतर्गत । व्याकरण १ उपमान 'सद्दश्य' २ कोश ३ आप्तवाक्य मनुस्मृत्यादि ४ व्यव- हार ५ इत्यादि प्रमाण माने जाते हैं। आदिवंश विशुद्धानां राज्ञां परमधमिणम् । इक्ष्वाकुकुल जातानां वीराणां सत्यवादिनाम् ॥४४॥ अचिन्त्यान्यप्रमेयाणि कुलानि नपुंगव । इक्ष्वाकूणां विदेहानां नैषां तुल्यै ऽस्ति कश्चन ॥२॥ इति वाल्मीकीयरामायणे बालकांड सर्ग ७०/७२ अर्थ-यह सूर्यबंश "अवधवंश" आदि से ही विशुद्ध है धर्मात्मा है वीर है सत्यवादी है और इक्ष्वाकुकुल है ४४ । आपका कुल बड़ा ही श्रेष्ठ बड़ा ही पवित्र है इक्ष्वाकु और विदेह की तुलना में दूसरा कुल नहीं है २। आ ब्रह्म शुद्ध वंशानां मातापित्रोः कुलेचये । न स्त्रियो व्यभिचारिण्यः पुरुषाश्चैवधार्मिकाः ॥१६॥ इति अगस्त्यसंहिता परमरहस्य अध्याय २५ । * महायोगिनः शठकोपस्योत्पतिः कथिता । तत्र ब्रह्मकुने में उत्पन्न हुआ श्रीबालसूर्यप्रभाटीका सहिता (६१) धर्मशीलः, त्रि, धर्मधर्माचारेण शीलं स्वभावो यस्य सः धार्मिकाः। कश्चिद्विष्णोरंशाशसंभवः। शठकाप इति ख्यातो नहायागी भवि- ध्यति । इनि ब्रह्माण्डपुराण क्षेत्र वैभव खंड | यह मदरास हाता तंजावर गजकीय संस्कृत पुस्तकालय में है । सहस्र शाखां श्रीशठ- कोप स्वामीने सामवेद की गान किया उसीका नाम सहनी है पुस्तक पृष्ठ १९ देखे। चक्रास्ति कुरुकापुरी शुचिनि ताम्रपर्णी तटे। विरक्ति परिपवित्रमत्रियुगभक्ति भिष्णवैः ।। दृढवत शठार्युरोवकुलसंपतब्दम्भर- ध्वनिद्विगुण जम्भरण द्राविड़ वेद घोषज्वला ॥४८|| अत्रत्यानां धर्मनिरतानां हरिभृतानामित्थमनुसंधताम् । परिद्दष्ठ वते सहस्रशाखां परमां द्रविड़ संहितांनं ॥२०६|| गुरवे करवामनित्यमम्मै शठकोप महर्षय प्रणामान् ॥४८९॥ इति महाकवि श्रीमद्वेङ्कटाध्वरि विरचिता, विश्वगुणादर्श चम्पू:, कुरुकानगर श्रीशठकोपमुनि वर्णनम् ४१ । अर्थ-शुचि ( पवित्र ) ताम्रपर्णी नदी के तट पर दृढव्रत श्रीशठकोप के हृदय में बकुलामाला में संप्राप्त भ्रमर उनकी ध्वनि से द्विगुण ध्वनि द्रविड़वेद की घोस से उज्ज्वलकांति युक्त कुरु का पुरी और विरक्त विषयों से ऐसे तीनों गुणों मे विष्णु भक्तियुक्त वैष्णवों करके प्रकाशित है ४८८ | इस कुरु का पुरी के निवासी धर्मनिरत पुण्यकर्मपरायण हरिभक्तसेवकों का यह उप-

(१२)
श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा
ब्रह्मा से लेके शुद्धवंश माता पिता और कुल ये तीनों
व्यभिचार से रहित हों अर्थात धर्मात्मा ही धार्मिक कहाता है।
महर्षि श्रादित्यकृत आदित्यसंहिता से भी विदित होता है
'कि राजाजनकजी आदित्य ऋषि से कहते हैं कि मैंने श्रीरामचन्द्र
पर्यन्त सूर्यवंश की कथा सुनी, जिसे सुन
के
महा आनन्द हुआ,
अब आप कृपा कर यह कहिये कि कुश का वंश कबतक चलेगा,
मुझे यह सुनने की इच्छा हुई है यथा-
रोक्त प्रकार से नित्यानुसंधान है २०६। चतुःसहस्र शाखामय
परम (महान) द्रविड़भाषामयी संहिता हम वैष्णवों के हित करने
घाली तपस्या करके साक्षात उत्पन्न किया जिन्होंने, ऐसे परमगुरु
इन श्रीशठकोप महर्षि के लिए नित्य (कोटिशः) प्रणामों को करते
हैं ४८९ । (वेद्घोषोज्वला ४८८) जब श्रीशठकोपस्वामी और अन्य
भगवद्भक्तों के पास वेदध्वनि होती थी तो इससे मालूम हुआ कि
ये द्विज ( ब्राह्मण ) थे और निम्म ग्रन्थों से भी पता लगता है,
नारदपञ्चरात्रान्तर्गत बृहद्ब्रह्मसंहिता पाद २ अध्याय ७ श्लोक ७१
यथा-
शकाब्दा १८४ में निर्णय सागर प्रेस बंबई में पंचसाबृति
छपा यह पुस्तक श्रानंदाश्रम प्रेस पुना में छपी है वहीं से प्राप्त
होती है।
पंचरात्रस्य कृत्स्जस्य वक्ता नारायण स्वयम्।
यथागर्म यथान्यायं निष्ठा नारायण प्रभुः।
इति भार, शा, भा, ३५०,६७, ६- २०॥
-

श्रीमान प्रभाटकासहिता।
आदित्य उवाच-
ते धन्यः सुखिनश्चैव वंशवृद्धि ब्रजंति च ।
दिर्घायुष्यं धनं धान्यं धर्मबृद्धिं ब्रजंतिहि ।
राज्ञां पुण्यवतां कीर्ति श्रुत्वा पापौघनाशिनीम् ॥७०॥
इति श्रादित्यसंहिता अध्याय ९८ !
अर्थ-वे लोग धन्य एवं सुखी हैं पाप समूह को नाश
करनेवाली पुण्यवान् राजाओं की कीति को सुनकर चिरायुष्मान
एवं धनधान्य सम्पन्न तथा धर्मबुद्धि को प्राप्त करते हैं
जनकउबाच-
श्रुता मे सूर्यवंशस्य रामचन्द्रावधि कथा ।
यनजातो महानन्दो वचसामप्यगोचरः ॥शा
इदानीं मुनि शार्दूल कथ्यतां कृपया प्रभो
कुशवंशस्य यावधि श्रोतुमिच्छा प्रवतते ।।२।।
आदित्य उवाच-
कथ्यते वै महाराज कुशवंशस्य या विधिः ।
श्रयतां त्वया मनसा गृहीतेन शुभे न वै॥३॥
कुशवंशे महागज मनुजाः धर्मस्थापकाः ।
अनेके वै भविष्यन्ति क्षत्रिया वै धनुर्धराः॥४॥
अतिथिनिषिधश्चैव क्षेमधन्वा जनाधिपः ।
वज्रनाभो ध्रुवस्संधिः सुदर्शनामहाबलः ॥५||
अग्निवर्णादि भूपालः
धर्मशीलः प्रतापवान् ।
रक्षिता पृथिवी येन कृत्वा धर्मस्य निग्रहम् ॥६॥

श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा अवधवंशीय संज्ञाः क्षत्रिया अग्नि वर्णजाः । कलौखलु भविष्यति भारत मध्यवर्तिनः ॥७॥ इति आदित्यसंहिता अध्याय ९९ । अर्थ-हे मुनि शार्दूल । मैंने रामचन्द्रपर्यन्त सूर्यवंश की कथा सुनी कि जिसको सुनके महाअानन्द हुआ अब आप कृपा करके यह कहिए कि कुश का वंश कबतक चलेगा, मुझे यह सुन ने की इच्छा हुई है १-२ । ऋषि बोले कि हे महाराज आप शुभ * उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षे तद्धारतं नाम नव साहस विस्तृतम् ॥१॥ कर्मभूमिरियं स्वगेमपवर्गञ्च गञ्छताम् ॥२॥ इति आग्नेयपुराण अध्याय ११८ । आसमुंद्रातु बै पूर्वादसमुद्रात्तु पश्चिमात् । तयोरेवान्तरे गिर्यो आर्यावर्त विदुर्बुधाः ।।२२।। इति मनुस्मृति अध्याय २॥ भगवान् पाखनीय, आदिरन्त्येन सहेता १११११७१ अन्त्येनेता सहित आदिमध्यगानां स्वस्य च संज्ञास्यात् । इति सिद्धान्तकौमुदी संज्ञाप्रकरणे । हिन्दूशब्दार्थ-हीनं दूपयतीति हिन्दू अर्थात् कोई दूषण जिसमें न हो उसे हिन्दू कहते हैं। इति शब्दकल्पद्रुम कोषे । हीनञ्च दूषयत्येव हिन्दूरित्युच्यते। मेरुतन्त्रप्रकाश। हिनस्ति- तपसा पापं दण्डेन दुष्टमानवान् । हन्तिशत्रु गामीनश्च सिद्धि हिन्दुविधीयते।

श्रीबालसूर्यप्रभाटीका सहिता (६२ नाम से कुश के वंश की अवधि सुनिये मैं कहता हूँ ३। कुश के वंश में धर्म के स्थापन करनेवाले धनुषधारी अनेक क्षत्रिय होंगेष्ठ अतिथि, निषिध, क्षेमवन्वा, वज्रनाभ, ध्रुवसंधि और सुदर्शन महावली होंगे ५ । अग्निवर्णादि राजा धर्मशील ऋतावान पृथिवी की रक्षा करनेवाले और अधर्म के रोकनेवाले होंगे ६ । अग्निवर्ण का वंश निश्चय करके कलियुग में चलेगा और भारतवर्ष में भवधवंशीय क्षत्रिय कहावैगे ७ । और मत्स्यपुराण के ११ अध्याय के आदि भाग और १२ अध्याय के ५५ श्लोक से ५७ श्लोक तक देखने से ज्ञात होता है कि महाभारत में कुशवंश के राजा वे, महाभारत समाप्त होने पर नज, वीरसेन, नैपधादि कुश के वंश हुए । इन्हीं का वंश कलियुग में चला और महाभारत कलि के शुरू में हुआ है । इसी प्रकार इक्ष्वाकुवंश का परमपरा चला यथा विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवे ऽब्रवीत् । एवं परम्परा प्राप्तमिमं राजर्षयोविदुः ॥२॥ इति श्रीमद्भागवतगीता अध्याय ४। में दूसरा उदाहरण द्राविढाश्चैव तैलङ्गा कर्नाटा मध्यदेशगाः । गुर्जराश्चैव पञ्चैते द्रविदा परिकीर्तिताः ॥२॥ सारस्वताः कान्यकुब्जा उत्कला मैथिलाश्चये। गौडाश्च पञ्चधाश्चैव दशविप्रा प्रकीर्तिताः ॥शा इति स्कन्दपुराण उत्तरार्ध सह्याद्रिखण्ड अध्याय १॥ अर्थ-द्रविढ़ १ तैलंग २ करनाठक ३ मध्यदेशग ४ और

में
400
(६६)
श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा
गुजराती ५ ये पञ्चद्रविड़ हैं। सारस्वत १ कान्यकुब्ज २ उत्कल ३
मैथिल ४ और गौढ़ हैं ५ ये पञ्चगौड़ हैं दोनों मिल के दश हैं।
इनमें भी अनेक भेद हैं, विशेष जानना हो तो “वर्णव्यवस्था-
दिग्दर्शन" देखे । इसी प्रकार श्रीरामानुजसम्प्रदाय में श्रीरामानन्द
स्वामीजी हुए हैं उस समय तक सब ब्यवस्था एक रहा बाद
अनेक हो गया प्राचार्य सब भ्रमण करने में सिथिलता कर दिये
इसके परिनाम उलाटा होगया कुछ व्यक्तियों ने अपने को बैगगी
जाति कबूल करलिया । उदाहरण यथा-
शनकैस्तु क्रिया लोपादि मा क्षत्रिय जातयः ।
बृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणा दर्शने न च ।।४।।
इति मनुस्मृति अध्याय १०॥
अर्थ -ब्राह्मण के प्रभाव से क्षत्रिय और वैश्य यज्ञोपवीत
आदि क्रिया के लोप हो जाने से धीरे २ लोक में शुद्रता को प्राप्त
होगये जैसे नूतन परम्परा वाले साओं का अपने आचार्यों
को त्याग देने से यथा-
गुरोरपन्हवाच्यागात्साम्यद्वि स्मरणादपि ।
लोभमोहादि भिश्चान्यैरपचारैविनश्यति ।
इति भरद्वाजसंहिता अध्याय ४।
अर्थ-गुरू से छल कपट या गुरू का त्याग करने से
की बरोबरी करने से या गुरू को भुला देने से तथा नाना प्रकार
के संसारिक लोभ काम क्रोध मोहो से एवं भाँति २. के.अपराधों

श्रीवालसूर्यप्रभाटीकासहिता! (६७) से यह जीव अधम गति को प्राप्त होकर विनष्टप्राय हो जाता है । ऐतिहासिक पृष्ठों में श्रीरामानन्दियों का विस्तृत विवरण १४ वीं शताब्दी के अन्त से प्रारम्भ होता है। ये लोग बगवर भीनामानुज सम्प्रदाय की गुरुपरम्परा प्रधानमठ श्रीतोताद्री को अपनो गादी मानते आये हैं। और इनके प्रन्थों एवं ऐतिहासिक प्रकरणों में भी श्रीरामानुज सम्प्रदाय की गुरुपरम्परामें ही इनकी स्थिति का पूर्ण वर्णन सिद्धान्त है । और तोताद्रिमठ के प्राचीन लेखों से भी पूरा २ पता चलता है कि इनके पूर्वज महापुरुष सिद्ध सन्तों जो दक्षिण यात्रा करते हुर ताताद्रिमठ गये उन्होंने अपनी गुरुपरम्परानुगत मूल गुरुओं की गद्दी यही है, इस निश्चित सिद्धान्तानुसार उक्त गद्दी की साष्टाङ्ग कर भेंट पूजा दे अपने आपको उक्त गद्दी का अनुयायी घोषित किया इसी प्रकार यह सिद्धान्त श्रीसम्वत् १९७२ पर्यन्त दृढ रहा इसी कारण श्री १००८ श्रीतोताद्रिस्वामीजी महाराजके समस्त श्रीगभानन्दियों ने सं० १९७२ में अपने प्राचार्य मूल गुमगद्दीस्थ आये जानकर के ही लोकोत्तर स्वागत किया था बहु संख्यक श्रीरामानन्दीय श्रीवैष्णवगण आज भी उक्त गद्दी को अपनी मूल गुरु गद्दी मानते हैं। उदाहरण द्वारा बताते हैं- नं०१-श्रीसम्प्रदाय दिक्प्रदर्शन नागफ पुग्तक विक्रम सम्वतसर १९४९ । ईसवीय वत्सर १९२३ में छपा। सम्पादक श्रीमदयोध्या श्रीबृहत्स्थानाधिपतिभिः वैष्णवभूषण महन्त श्रीराम- मनोहरप्रसाद शुभाह्वयैः जिज्ञासु वैष्णवजनोपकाराय। निवेदनम्

(६८)
श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा
हमारे श्रीरामानन्दस्वामीजीकृत श्रीवैष्णवमताजभास्कर और
श्रीरामार्जनपद्धति ये दोनों ग्रन्थ अन्दाज से छ: सौ वर्ष पहले के
हैं आजतक उपलब्ध हैं । इन ग्रन्थों के आदिमें श्रीरामानुजस्वामी
जी का मंगलाचरण होने से हम सब श्रीरामानन्दीय वैष्णव
श्रीरामानुजसम्प्रदाय के अन्तर्गत हैं। श्रीरामानुजसम्प्रदाय का
श्रीसम्प्रदाय नामान्तर होने से हम सब लोग भी श्रीसम्प्रदायी हैं।
नं०२- श्रीरामानन्दस्वामीजी के गुरुमहाराज श्रीराघवा-
नन्दजी के बारे में श्रीरामानन्दजी के शिष्य श्रीअनन्तानन्दस्वामी
जी कृत "श्रीहरीभक्तिसिन्धुजा बेला" नामक पुस्तक का मन्त्र
प्रकरण की ४ तरङ्गमें कहा है कि-
बन्दे श्रीराघवाचार्य रामानुज कुलोद्भवम ।
याभ्यामुत्तरमागत्य राममंत्र प्रचारकम् ।।२।।
नं० ३-इसी प्रकार श्रीअवध में वड़ी जगह के श्रीमान्
श्रीरघुनाथप्रसादजी विरचित "निजगुरु" नामक पुस्तक के तीसरे
अध्याय में लिखा है कि-
शृणुवत्स प्रवक्ष्यामि गुरुवर्य परम्पराम् ।
रामानुजान्वये जातो रामानन्दः प्रतापवान् ।।
नं०४-विज्ञापनपत्रम, विक्रमीय सम्वत् १९७७ फाल्गुन
कृष्ण ८ । हमसब श्रीरामानुजीयान्तर्गत श्रीरामानन्दस्वामीजी की
गुरुपरम्परा में हैं १ 'हस्ताक्षर महन्त रमामनोहरप्रसाद अयोध्या
महन्त रामदास राजगोपाल २ महन्तसरयूदास ३ हरद्वारीपट्टी
-

१
श्रीबालसूर्यप्रभाटीकया सहिता
हनुमानगढ़ी महन्त कमलदास खुइ गढ़ी ४ महन्त राधवदास
पट्टीउज्जैनिया ५ । गढ़ी, महन्त गिरधारीदासजी ६ । राघोजीका
मन्दिर रामघाट । जन्मस्थान महन्त रामकिशोरदास ७ महंत
नारायणदास रतनसिंहासन । ह. मोहनदास अधिकारी निर्मोही,
जन्मभूमि ९ । ह० कुञ्जबिहारीदास, अमरदास स्थान १० }
रामकोट, हक हितनारायणदास अधिकारी नरहनमन्दिर ११ !
ह० रामपदारथदास सीढ़ीपुर का मन्दिर १२॥ ह० पं० रामनारा-
यणदान शृङ्गारभवन रामकोट, निवेदक पं. रामनारायणदास
राजगोपाल पाठशाला के अध्यापक : हरीसिंह प्रेस, फैजाबाद ।
नं०५-श्रीरामकवीरजी की पञ्चमात्रा में लिखा है कि
गोरखनाथने प्रश्न किया है कि-
कौन तुम्हारा आदि मूल है, कौन तुम्हारी शाखा ।
कौन ध्यान में रमता योगो कौन पुरुष ने भाषा ॥
उत्तर-आदि नारायण मूल हमारा रामानुज की शाखा ।
र रंकार में रमता योगी श्रीगुरुरामानन्दजी भाषा ।।
नं० ६-प्रयाग के श्रीकृष्णानन्द बाघम्बरीजी ने 'श्रीवै-
डणवाचार प्रदीप” नामक ग्रन्थमें भी लिखा है कि, श्रीरामानंदेयों
की उत्पत्ति श्रीरामानुज सम्प्रदाय से ही हुई है।
नं० ७--जयपुर गजमभा के प्रधान पं० श्रीदुर्गाप्रसादजी
नागयणात्सरा दवा नास्ति मुक्तिप्रदो नृणाम ७९ ।
इति पद्मपुराण उत्तरखण्ड अध्याय २५१ । आनन्दप्रेस पुना
.

१ (७०) श्रीसम्प्रदायमीमांसा एवं पं० श्रीकल्याण बल्लभशास्त्रीजी ने "चतुर्वर्ण्यशिक्षा २ के भिक्षुशिक्षा प्रकरण में लिखा है कि “अथ श्रीरामानुजाय इष श्रीरामानन्दायोऽपि” अर्थात् श्रीरामानुजस्वामीजी के शिष्य पर- स्परा में श्रीरामानन्दजी हैं। इस विषय में मिथिला प्रान्तीय तथा अपर प्रान्तीय विद्वानों का भी हस्ताक्षर २४३ के सम्मति, महन्त सीतारामदासस्य साधुपाठशाला दुर्गाकुंड काशी। नं०८-श्रीसीतारामस्तोत्र १ श्रीभगवत्पूजन २ चतुर्दश- रहस्य ३ ज्ञानरसिकावली ४ श्रीरामानन्दस्वामी लिखित "गुरु- परम्परा" ५ श्रीवैष्णवधर्मनिर्णय ६ द्वारकामाहात्म्य ७ श्रीवैष्णव मत नोतर्य लघुज्ञानप्रकाश ९ भोवैष्णवसिद्धान्तसार १० पाखण्डदलन ११ श्रीरामस्तवरा जटीका १२ श्रीसोतारामानुजचतु- देशनिकेनन १३ दिव्यतत्वकौमुदी १४ श्रीवैष्णवधर्मसंदर्भ १५ भारतीयचरिताम्बुनिधि १६ कार्यविवरण १७ निर्णयपञ्चकसंग्रह।८ तुलसीग्रन्थावली १९ सत्यार्थप्रकाश २१ समुलास २० श्रीभारत चरितचन्द्रिका २१ भारतवर्षीय आसकसम्प्रदाय २२ भक्तउर- वसी २३ भक्तमाल २४ श्रीभागवताचरितामृतसार २५ श्रीहरी- भक्तसहस्रनाम २६ इतनी पुस्तकों में श्रीरामानुजस्वामी की पर- भ्रा में श्रीरामानन्दस्वामीजी हैं विशेष जानना हो तो पं० श्री रामटहलदासजी सम्पादित वैष्णवमताब्जभास्कर और परिशिष्ट भाग देखें पं० श्रीवलभद्रदासजी सम्पादित वैष्णवमताजभास्कर और प्रस्तुत प्रसंगसिद्धी यह दोनों ग्रन्थ देखे । नं०९--भोवैरान श्रीटोलास्वाभिना वंशोद्भव परमहंस श्रीबाजसूर्यप्रभाटीकासहिता जानकीवल्लभदासजी ने श्रीविक्रमीय संवत् १९८३ में "गतिबोध" नामक पुस्तक लिखी है जो दो भाग में है उसमें अपनी संप्रदाय बतायी है कि मेरी सम्प्रदाय श्री “शेष, रामानुज, विष्णु" श्रीराम- चन्ग्रजी, श्रीजानकीजी, हनुमानजी, ब्रह्माजी, वशिष्टजी, इत्यादि गुरुपरम्परा बनी है "इसका संचालक भगवतदास है" हनुमानजी ने ब्रह्मा को मन्त्र कैसे दिया ये तो अजनी नाम की वानरी से पैदा हुए हैं और सब शरीर ब्रह्मा के बनाये हैं ब्रह्माके गुरू कदापि नहीं हो सकते हैं, क्योंकि वह रुद्रावतार हैं यथा वज्रदेहेतिचोक्ता हे रुद्रावतार पदं तथा १२ । इति अरस्त्यसंहिता अध्याय ३२ । महाराजिक साध्याश्च रुद्राश्च गणदेवता २०॥ इति अमरकोष स्वर्गवर्गः प्रतिकल्प में ब्रह्मा से रुद्र की उत्पत्ति होती है ३४ । इति शिवपुगण बायुसंहिता पूर्वखंड अध्याय १४ ! और सब कल्स में रुद्रावतार हनुकानजी के होता है। भागवत १०।१४।१३ में लिखा है कि "नारायण की नाभी ककल से ब्रह्मा पैदा हुए" । भाग्वत ३१२१८ से २१ तक देखो। "विष्णु से कमल कमल से ब्रह्मा और ब्रह्मा से शिवादि ऋषि हुए" भागवत ५५॥ २३ "शिव 'रुद्र' ब्रह्मा के बीर्य से पैदा हुए" विज्ञ पाठक विचारें यदि हनुमानजी रुद्रावतार हैं तब ब्रह्मा हनु- मानजी के पिता हुए, नूतनपरम्परावाले महात्माओं ब्रह्मा के गुरु कहके नीहनुमानजी के गारि दे रहे हैं इनके कवन गति होगी। भगवान इने सुबुद्धी देवे। ar - श्रीबालसूर्यप्रभाटीकासहिता। (७३) एते कलौयुगे भाव्याः सन्प्रदाय प्रवर्तकाः। सम्वत्सरे विक्रमस्य चत्वारः क्षिति पावना ॥२५॥ इति गर्गसंहिता अश्वमेधखण्ड अध्याय ६१ । याने कलियुग में विक्रमीय संवत्सर के अन्तर्गत वैष्णव सम्प्रदाय के चलानेवाले चारआचार्य होंगे, वामनभगवान् के अंश से विष्णुस्वामी होंगे, ब्रह्मा के अंश से माध्वाचार्य स्वामी होंगे, शेष भगवान् के अंश से रामानुजस्वामी होंगे, और सनक के अंश से निम्बार्कस्वामी होंगे, यह चारो प्राचार्य वैष्णवधर्म को चलाकर पृथ्वी को पवित्र करेंगे। यथा- रामांङ्ग ऽन्तो वह्निपूर्वो नमो ऽन्तः स्यात्षडक्षरः । तारको मन्त्रराजो ऽयं संसार विनिवर्तकः ॥५॥ इति बृहद्ब्रह्मसंहिता पाद २ अध्याय ७॥ अतः कान्ते त्वयाकार्या श्रद्धामच्च धारणे । संधारय मुमुक्षूणां प्रपन्नानां ममाज्ञाया ॥१२॥ ओमित्युबाम सा देवी चक्रशङ्खौ भुजद्वय । प्रयोजनान्तरंहित्वा मन्त्रराज मयोदधौ ॥१२२॥ इति बृहद्ब्रह्मसंहिता पाद १ अध्याय ३ । हे कान्ते (प्रिय) शङ्ख चक्र और अष्टाक्षर नारायण, मन्त्र- राज को धारण करो और मुमुक्षु और प्रपन्न जनों को धारण कराओ। यह कहने पर श्रीजी ने उक्त सभी को धारण करलिया। देव्यानु बोधित्त: श्रीमान् विष्णुः सर्व जनेश्वरः। प्राहयामास तां देवीं तारकं ब्रह्मवाचकम् ॥७२।।

(७४) श्रीसम्प्रदायमीमांसा कृतकृत्या तदा लक्ष्मी लग्भ्वा मन्त्रं षडक्षरम् । ददौ प्रीत्या ततो देवी विष्वक्सेनाय तारकम् ॥७३” इति सदाशिव संहिता अध्याय ९/ अर्थ-श्रीमनारायण ने लक्ष्मीजी को राममन्त्र और अष्टाचर नारायणमन्त्र दोनों दिये, लक्ष्मीजी ने विष्वकसेनजी को दोनों मन्त्र दिए, क्रमशः प्रचार हुआ। कालेन 5एच्छादितो धर्मो मदीयो ऽयं वरानने । तदा मया प्रवृत्तोयं तत्कालोचित मूति नाः ॥७०|| विश्वक्सेनादि भिर्भक्तैः शठारि प्रमुखैद्विजैः । रामानुजे न मुनिना कलौ संस्था मुपेष्यति ॥७१।। इति बृहब्रह्मसंहिता पाद २ अध्याय ७ अर्थ-विष्णुभगवान लक्ष्मीजी से कहते हैं कि हे बगनने काल करके धर्म आच्छादित हो जायगा तब मैं तत्काल उचित मूर्ति धारण करूंगा विष्वक्सेनादि शठारि प्रमुख द्विज होंगे "द्वाभ्यां संस्काराभ्यां द्विजः जायते इति" रामानुज नाम के मुनि कलियुग में धर्म का स्थापन करेंगे वैष्णवधर्म के प्रवर्तकाचार्य नाम से प्रसिद्ध होंगे। तैलङ्गा द्राविड़ाश्चैव दयावन्तो जनाभुवि । पञ्चक्रोशेतु विविधा श्राचार विविधास्थिता ॥४॥ एवं भक्ति विचारश्च नान्यस्य च विचारणा। केचित्तु वैष्णवा भक्ता शिवभक्ताश्च केचन ॥४॥ इति स्कन्दपुगणे उत्तररहस्य सह्याद्रिखरडे अध्याय ४।

के श्रीबालसूर्यप्रभाटीकया सहिता (७५) कृतादिषु प्रजा राजन् कलाविच्छन्ति सम्भवम् । कलौ खखु भविष्यन्ति नारायण परागण: ॥३८.! कचिच्वचित् महाराज द्राविड़ेषु च भूरिशः । ताम्रपर्णी नदी यत्र कृतमाला पयश्विनी ॥३९॥ कावेरी च महापुण्या प्रतीची च महानदी। ये पिवन्ति जलं तासां मनुजा मनुजेश्वरः । प्रायोभक्ता भविष्यन्ति वासुदेवे ऽमलाशया ।।४०॥ इति श्रीमद्भागवत् स्कन्द ११ अध्याय ५। अर्थ-सत्ययुग, त्रेता, द्वापर, मनुष्य भी इस कलियुग में जन्म लेना चाहते हैं, हे राजन् इस कलियुग में कितने ही भगवद्भक्त महापुरुष जहाँ तहाँ जन्म लेंगे उनमें से अधिकतर द्रविड़ देश में होंगे जहाँ कि ताम्रपर्णी कृतमाला, पयश्विनी, महा पवित्र कावेरी प्रतीची और महानदी आदि नदियाँ बहती हैं, हे गजन् नो लोग इन नदियों का जल पीते हैं वे प्रायः शुद्धचित्त होकर भगवान् वासुदेव के भक्त हो जाते हैं। द्राविड़ेषु महापुण्यं श्रीरङ्गाख्यनिकेतनम क्षशिलारूपेण तिष्ठामि यत्राहं कमलाप्रिये ॥६३॥ * गवां सर्वाङ्गजं क्षीरं स्रवेत् स्तनमुखाद् यथा । तथा सर्वगतो देवः प्रतिमादिषु राजते । इति कुलार्णवतन्त्र । शैली दारुमयी लौही लेप्या लेख्या च सैकती। मनोमयी मणिमयी प्रतिमाष्टविधा स्मृता ॥१२॥ इति श्रीमद्भागवते स्कन्द ११ अध्याय २७ ।

। (७६) श्रीसम्प्रदायमीमांसा कावेरी तोयरूपेण मामवेहि निरन्तरम् । यत्तोय पानादनघे निष्पापो जायते नरः । ६४॥ द्वापरान्त कलेरादौ पाषण्ड प्रचुरे जने । रामानुजेति भविता विष्णु धर्म प्रवर्तकः ॥६५!! श्रीरङ्गेशदयायानं विद्धिगमानुजमुनिम् । येन संदर्शितः पन्था वैकुण्ठाख्यस्यसप्त्मनः ॥६॥ इति बृहद्ब्रह्म संहिता पद २ अध्याय ७ श्लोक १ से २१ तक देखे अर्थ-विष्णुभगवान् लक्ष्मीजी से कहते हैं कि हेकमल प्रिये "लक्ष्मी” मैं महापुण्य द्रविड़देश में श्रीरंगमन्दिर में शिला- मूर्ति रूपमें विराजूगा ६३ । वहां पर जो कावेरीनदी है उसमें जलरूप होकर रहूँगा हे अनघे "पापरहितलक्ष्मी" जो मनुष्य उस जल का पान करेंगे वह पापोंसे रहित हो जायँगे ६४ । और जिस समय द्वापर के अंतमें और कलियुग में पाखंडी मनुष्य पैदा होंगे और वह पाखंडी वैष्णवधर्म का लोप करने का प्रयत्न करेंगे। तब गमानुज नाम से विष्णुधर्म "वैष्णवधर्म" के चलाने वाले प्रकट होगे और उन श्रीरामानुजमुनि को तुम श्रीरंगभगवान् का दयापात्र जानो और यही वैकुण्ठ का रास्ता बतायेंगे ६७।६८। श्रीरामानुज पुनि श्रीरामतारक मंत्र के उपदेष्टा उपदेश करनेवाले होंगे इसी काम में यह संसार भर में प्रसिद्ध होजायँगे। अर्थ-अष्टधातु १ काष्ठ २ लोहा ३ लिपो हुआ ४ चित्र ५ बालु के मूति ६ मानसिक ध्यान में मूति ७ पाषाणविग्रमर पुजा करना चाहिये । ८ के प्रारम्भ (७७१ श्रीबालसूयप्रभाटीका सहिता सम्प्रदाय विहीनायै मन्त्रास्ते निष्फलाप्मृताः । तस्माच्च गमनं ह्यस्ति सम्प्रदायै नरैरपि ॥२६॥ इति गर्गसंहिता अश्वमेधखरड अध्याय ६१ । अर्थ-जो मनुष्य सम्प्रदाय विहीन है उनका सब मन्त्र "याने मन्त्रजाप” निष्फल हो जाता है, इससे सब मनुष्यों को सम्प्रदाय के ही मार्ग पर चलना चाहिए २६ । और समदाय शब्द की व्युत्पत्ति भी ऐसी ही होती है, देखिये "सम् दाय" पुं-सं+प्र+दा+ य+घय, आतोयुक् चिण कृनोः ७:३६३३ इति युक, गुरुपरम्परा गत सदुपदेशः । "आचारः परमोधर्मः आचारः परमं धमम् । आचारः परमाविद्या प्राचार: परमागतिः ॥५५।। आचारः हीनः पुरुषो लोके भबति निन्दितः। परत्र सुखीनस्यात्तस्मादाचारवान्भवेत् ॥५६॥ इनि शिवपुराण वायवीयसंहिता उत्तरखंड अध्याय १४ नोंट-मनुस्मृति अध्याय १ श्लोक १०७ से ११० तक भी देखें। प्रथमोऽनन्तरूपश्च द्वितीयो लक्ष्मणस्तथा तृतीयो बलरामश्च कलौ रामानुजोमुनिः । इति श्रीशारीरकमीमासा श्रीभाष्य भूमिका । सर्वमङ्गल माङ्गल्यं सर्वोपद्रव नाशनम् । वन्दे रामानुजा पुर्यस्य नित्यं पादम्बु जद्वयम् । हरिः ओं नगयणेति तत्सत् । इति श्रीस्वाम्युपनामक धरणीधराचार्य विरचिते श्रीसम्प्रदाय मीमांसा श्रीबालमूर्यप्रभाटीका सहितः सगाप्तम् ।

(७८) श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा ॐ परिशिष्ट भाग शतेषु जायते शूरः सहस्रषु च पण्डितः। बक्ता शत सहस्रषु दाता भवति वा न वा ॥५॥ न रणे विजयाच्छूरो ऽध्यनान्न च पण्डितः । न वक्ता वाक् पदत्वेन न दाता चार्थ दानतः ॥५९॥ इन्द्रियाणां जयेशूगे धर्म चरति पण्डितः । हित प्रायोक्ति भिवक्ता दाता सन्मान दानतः ॥६॥ इति व्यासस्मृति अध्याय ४। अर्थ-सौ में एक शूरवीर, हजार में एक पण्डित, और लाख में एक वक्ता होता है, किन्तु दाता हो या न हो, रण में जतने ही से शूर नहीं होता, पढ़ने ही से पण्डित नहीं होता। इन्द्रियों को जीतनेवाला शूरवीर होता है, शास्त्रोक्त धर्म करने वाला परिडत होता है, हित का उपदेश करनेवाला वक्ता होता है और सम्मान पूर्वक दान देनेवाला दाता होता है ५८ से ६० तक । दश धर्म न जानन्ति धृतराष्ट्र ! निवोधताम् । मत्तः प्रमत्तः उन्मत्तः श्रांत: क्रु द्धो बुभुक्षितः ॥१०॥ त्वरमाणश्च लुब्धश्च भीतः कामी च ते दश । तस्मादेतेषु सर्वेषु न प्रसज्जन्ति पंडिताः ॥१०२।। इति महाभारत उद्योगपर्व अध्याय ३३ ।

भीमा समूयप्रभाटीकासहित (७९)
वेदोऽखिलस्य धर्ममूलं स्मृति शीले च तद्विदाम् ।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥६॥
इति याज्ञवल्क्यस्मृति अध्याय १ श्लोक में भी देखो।
कुम्भमहापर्वयोग।
पुरा प्रवृत्ते देवानां दैत्यैः सह महारणे ।
समुद्रमथनात्गप्तं सुधाकुम्भं महीतले ॥१॥
तम्माकुम्भासमत्क्षिप्त: सुवाविन्दुमहीतले ।
यत्र यत्रापृतत्तत्र कुम्भपर्व प्रकल्पितम् ।।२।।
विष्णुद्वारे तीर्थराजे विन्त्यां गोदावरीतटे ।
सुधाविन्दु विनिक्षेपात्कुम्भपर्वेति विश्रुतम् ।।३।।
अर्थ-प्राचीनकाल में देवता और दैत्यों से जब घोर
युद्ध हो रहा था उसी समय देवता और दैत्यों ने मिलकर समुद्र
का मथन किया, समुद्रमथन से, एक अमृत का कुंभ "घड़ा"
प्राप्त हुआ। उम कुंभ को देवताओं ने लेकर भागा तो उनके
भागने से अमृत का विन्दु घड़े में से पृथ्वी के ऊपर जिस जिस
स्थान पर गिरा. उस उस स्थान पर पूर्णवार्यो ने कुम्भपर्व
कल्पना किये । पहिला पर्वम्थान हरिद्वार में १ दूसग पर्वस्थान
प्रयागराज में २ तीसरा पर्वस्थान गोदावरीनदी के तट पर
"नासिक में ३ चौथा पर्वस्थान उज्जैननगरमेंकल्पना किये १।२।३
हरिद्वार मे कुम्भपर्वयोग।
पद्मिनी नायको मेष कुंभगतिं गता गुरुः ।
गंगाद्वारे भवेद्योगः कुम्भनामा तदात्तमः ॥१॥

(८०) श्रीसम्प्रदाय-मीमांसा कुम्भराशिं गते जीवे यहिने मेषजे रवौ । हरिद्वारे कृतं स्नानं पुनर्जन्म न जायते ॥२॥ लोके कुंभ इतिख्यातो जानीयात् सर्वकामदः । गङ्गागः स्नानमाहात्म्यं नालं वक्तुं चतुर्मखः ॥३॥ अर्थ-हरिद्वार में कुम्भपर्वयोग तब होता है जब कि कुंभ राशि पर बृहस्पति हों और मेष राशि के सूर्य जिस दिन हों उस दिन लोक में विख्यात कुम्भपर्व हरिद्वार में होता है जिस पर्व के माहात्म्य को ब्रह्मा अपने चारों मुखों से वर्णन करने में असमर्थ हैं।१२।३ प्रयागराज में कुम्भपर्वयोगः। मकरे च दिवानाथे वृषाशि थिते गुरौ। प्रयागे कुम्भयोगो वै माघ मासे विधुक्षये ।।१।। माघे वृषगते जीवे मकरे चन्द्र भास्करौ। अमावस्यां तदा योगः कुम्भाख्यस्तीर्थ नायको ॥२॥ अर्थ-जिस समय बृष राशि पर बृहस्पति जावें और मकर राशि पर चन्द्रमा तथा सूर्य हों उस समय अमावस्या दिन माघ महीने में द्रयागराज में कुम्भपर्व होता है ।१।२। उज्जैन में कुम्भपर्वयोगः। सिंहे गुरु रविौषे कुह्वां दामोदरे तिथौ । उज्जयिन्याँ तदा कुम्भो जायते लोक मुक्तिदः। अर्थ-जिस समय सिंह राशि में बृहस्पति हों और मेष राशि के सूर्य हों तो द्वादशी तथा अमावस्या इन तिथियों में उज्जैन में कुम्भनाम पर्व होता है वह मुक्ति देनेवाला होता है । नोट-स्थानाभाव से गोंदावरी कुम्भ का वर्णन शेष रह गया।

* श्रीमते रामानुजायनमः * लोकस्मृति। रामानुजमह वंदे सहस्रास्यं जगद्गुरुम् । तद्भकिर्यत्रित: कुचें स्वसिद्धान्त विनिश्चयम् ॥१॥ नायं जनो मे सुखदुःखहेतुर्न देवताऽऽत्माग्रहकर्मकालाः । मनः परं कारणमामनन्ति संचारचक्र परिवर्तयेद्यत् ॥२ इति भागवतस्कंध ११ अध्याय। अर्थ-"दुष्टलोगों से पीडितहोनेपर एक ब्राह्मण धैर्यपूर्वक स्थिर रह. कर इस गाथा को गायाकरता था "ये स्वजन देवग: आत्मा ग्रह कर्म और कालादि कोई भी मेरे सुखदुःख के कारण नहीं है। इसका कारण तो एक. मात्र मनको ही बतलाया जाता है जो कि इस संसार चक को निरन्तरचला. या करता है । ॥४३॥ मैं जीवात्मा जिस वक्त इस शरीर से पहिले शरीर मे था उसकी मु. में कोई स्मृति नहीं है। परन्तु इस शरीर की स्मृति जहाँ से मुझे है वहां से स्वचरित्र इस पुस्तक में उल्लेख करता हूँ। मेरा जन्म विहारप्रदेश, जि० पटना, पो० नंदलालावाद, मौजा श्रीपति : मे श्री अवधवंशीयक्षत्रिय के घर मे विक्रमीयसंवत १९४७ चैत्र शुक्ल तीया भरणी नक्षत्र मेषराशि मे हुआ। राशि का नामभी "लेखराज"वर्मा गया। परन्तु चालूनाम "धनराजसिंह" वर्मा के नाम विख्यात था। रे पिता का नाम श्री१०८श्री श्रीरामशरणसिंहवर्मा" था और पिता तीनभाई थे, श्रीमिनलालसिंहवर्मा, श्रीमहारविन श्रीराम शरणसिं- लोकस्मृति मह का नाम श्रीकाशिनाथवरना था माता का नाम "ममीयादेवी या मातामही कानाम श्रीरूक्मिणी देवी था मातामह का नाम श्रीस्नेहीसिंहवर्मा था बड़े भाईका नाम श्रीसूवासिंहवर्मा या छोटेभाईकानाम श्रीनन्दलाल सिह बाथा में १४ वर्षकीउमरतक तो कुछ हिन्दी पढता और खेल तारहा, कि न्तु बीचश्मे मेरा मन वैराग्यकीतरफ विजली सा कौंधकर फिरशान्होजाता था। श्रीसंवत १६६१ मे मेरीशादीकरने को लोग तैयारहुऐ और फलदाना दि भी पहुँचगया, सुनतेही मेरे चित्त ने वैराग्यवाट पर नजर फेकी परन्तु मन विचारने चित्तको वाटपकड़ने मे वाधा पहुंचाई। मूठीवात झूठीही है। सचीवात सधी ही है। जब मनुष्यको रस्सीमें सर्पकाभ्रम मिट जाता है सफिर रस्सीतो है ही। चटपट घंटे मे जिसप्रकार सुयोग्यवैद्य के दवा- देने पर रोमी का रोग हटता जाता है संसार से मन हटता जाता था और २८ घंटे मे अपने ज्ञाति के लोगों का साथ छोड़ बाहिर निकल खड़ाहुका। अपने सुखार्थ मनुष्य को ऐसा ही करना चाहिये क्योंकि यहसंसार केला के खम्भ के समान साररहित है। यह मनुष्य जीवन जल मे उठे हुऐ बुलबुले के समान है यह सब आँख ही से देख रहे है। और शास्त्र भी यही कहता - मनुष्ये कदलीस्तम्भनि:बारे सारमार्गणम् । करोति यः स सम्मूढो जले बुद्दपन्निभे ॥८॥ इति याज्ञवल्क्यस्मृति धर्मशास्त्र अध्याय और गर्गसंहिता विश्वजीवखण्ड अध्याय अखिनभुवनजन्मस्थेमभशादिलोले। লিলিবিয়ন্সৱৰীৱ ।

लोकस्मृति ध्रुतिशिरसि विदिप्ते ब्रह्मणि श्रीनिवाखे । भवतु मम परस्मिशमुषी भक्तिरूपा ।। इति शरीरकनीमांसा रामानुजमाण्य मालाचरण अब मैं घर से बाहिर निकल पड़ा और मैं ान में खड़ा हुमा तो यह सोचने लगा कि किपरको जाऊँ, यह भी मन में डर लगता था कोई मनुष्यमुझे पाकर पकड न ले । उस वक्त मेरे पास सात रुपया था हार में यही पाया कि सीतामढ़ी चलना चाहिये। पटना से दीघाघाद ॥ संसा पार होकर रेल से सीतामढ़ी पहुँचा और वहाँ से फिर पैदल के । सीतामढीखे १४ कोस पर एक नागा बाबा जटाधारी मिले उन के पर मास तक ठहर गया । बाबाजी के पास मुझे यह चिन्ता सदैव रहती थी कि मेरे घर के मनुष्व मुझे ढूढते २ न पाये और पकड़ ले लो सब मेंहनत मेरी निरर्थक | जो कुछ बाबा जी शिक्षा देते वह मैं सुनता रहता था, बाद फिर क धुओं के साथ नेपाल चला गया और नेपाल से मुक्तिनारायण चला । वहां कुछदिन रह कर मैं दामोदर कुण्ड चला गया, वहाँ से तुरंत कर तानसेन पहाड़ से नीचे उतर बुटबल होते गंगासागर चलागया । गर से जगन्नाथपुरी गया हो पर एक पण्डित श्रावैष्णव श्री श्री रा. मा जी की कि शिक्षासे व्याकरण की नीव डालदी "वह पण्डिः वदी " पीतामढी से यहाँ तक मैं ३ वर्षमें पहुचा । अमरकोप और सिद्धा. दी व्याकरण थोड़ा सा समझा जगदीश में मास विता कर श्री 'दासजीमहाराज के जमात के साथ प्रयाग के चढ़ाव का चला गया। एक मास बिताकर चित्रकूट सला गया। वहाँ से इक्ष्वाकु पालिख पना जनपद देर श्रीमंयोध्याजी को चला गया। वहापर श्रोता लोकस्मृति स्वी जी की छावनी में निवासकरनेलगा, सर्वतिन्त्र स्वतन्त्र व्याकरणाचार्य पंडित श्री सरयूदासजी से व्याकरण पढ़ कर न्यायादि अनेक प्रन्थ पढे । वहाँ कुछ काल वीतने पर विक्रमीय संवत् १६७२ में श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीमद्वेदमार्ग प्रतिष्ठापनाचार्योभयवेदान्तप्रवर्तकाचा रर्य श्रीरामानुजः संप्रदाय के प्रधानाचार्य श्री १००८ श्री तोतादि रामानुज स्वामीजी महाराज श्रीअयोध्याजी में पधारे और माघमास से श्रीरा. मनवमीतक वहां पर रहे । आप नित्य श्रीकनकभवन में अनेक प्रकार के धर्मोपदेश करते थे वह समय मंगलमय बीतता था। श्रीस्वामी जी के रोज २ दर्शन करते २ मेरा चित्त शुद्ध हो गया और मन में यही पाया कि अव शरणागति का ऐसा मौका न मिलेगा पंचसंस्कारयुक्त मन्त्र ले लेना चाहिये और ऐसा ही किया। मुमुक्षु जनो को भगवत शरणागति पंचसंस्क रयुक्त मंत्र लेना चाहिये, अङ्कन चोद्ध पुराञ्च मन्त्रो नामविधारणम् । पञ्चमो याग इत्युक्ताः सस्कारा: पूर्वसूरिभिः १२॥ इति-पद्मपुराण पाताल खंड अध्याय ८२॥ याने प्रवम ताप "भुजों में तप्त शंख चक्र को छाप" संस्कार द्वितीय पुण्ड्र "उर्ध्वपुण्ड्रतिलक" संस्कार । तृतीय भागवत् संवन्धी नाम संस्कार चतुर्थ मंत्र संस्कार पञ्चमः भगवत् भागवताचार्य सेवा उपदेश संस्कार । श्रीस्वामीजी महाराज , श्रीरामनवमी करके दक्षिण देश चले गये और ६० श्रीसरयूदासजी महाराज चित्रकूट चले गये । तब शृङ्गारभवन के पं. स्वामी श्रीरामकिशोरदाससे मनोरामादि कई एक प्रन्थ पढे । और अवत- क के वस्त्रादि की सहायता भी करते थे। मैने विचारत कि कुछ जोतिषशास्त्र लोकस्मृति भी पढ़ लेना चाहिये, अयोध्याजी में मत्तगयंद के पास ही पंडित श्रीवालगो विन्द द्विवेदी जी से ज्यौतिष के कईएक प्रन्थ पढा उस समय विक्रमीय संवत् १९७७ में श्रीरामानंदीय वैष्णवों में गुरु परंपरा पर बहुत कोलाहला । कुछ व्यक्कि "टूटेफूटे अङ्गभंग" ने श्रीरामानुज स्वामी का संबंध छोड अपनी अशास्त्रीय गुरुपरम्परा वनालिया, और अपनी चति पर कुछ ध्यान नही दिया। इन के कर्तव्यों को देख मेरा मन उदास होगया और अयोध्या से उज्जन चलागया। कुछ दिन बाद वहाँ से लौट अयोध्या होते प्रयाग की यात्रा की । जव मैं प्रयाग से उठा तो गया होते जगन्नाथपुरी को चलागया, वहाँ से श्रीकूमसिम्हाचल नरसिंह और पन्नानरसिंह होते श्री वेंकटेशजी गया वहाँ से श्रीरामानुज स्वामीजी के जन्मस्थान भूतपुरी गया वहां से गोविन्दराज भग- वान् का दर्शन करते श्रीकुम और इक्ष्वाकु पूजित श्रीरंग जो गया और वहाँपर एकमास ठहर गया। फिर सेतुबन्ध होते हुए श्रीतोताद्रि गया, धोस्वामीजी का कैकये कर के किष्किंधा पंपासर गया। फिर वहाँ से सोलापुर, बंबई और डाकोर होते हुए द्वारिकापुरी गया। फिर वहाँ से वींद सरोवर होते मथुरा वृन्दावन और हरिद्वार होते श्रीबद्रीनारायण चलागया, पुन: वहाँ से श्रीअयोध्याजी श्राया। अयोध्याजी में विचार किया कि जहाँ किसी प्रकार विवाद न हो वहाँ पर रहना चाहिये यह विचार करते ही रहे कि एक दिन वेदान्त पाठशाला के पंडित श्रीरामा- नुजदास जी ने कहा कि ज्ञानबृद्ध, बयोबृद्ध उत्तरतोताद्रिमठ श्रीबेंकटेशजी का मन्दिर विभीषण कुएड में श्री १००८ श्रीश्री बलभद्रस्वामीजी महाराज उन के यहाँ किसी प्रकार विवाद न होगा। यह कह कर वह मुझे साथ मे लेकर श्रीस्वामीजी के पास आये और उन से मेरे रहने को प्रार्थ शोकस्मृति यह विक्रमीय सवत् १९५० को बात है, तब श्रीस्वामी जी महाराज ने श्रादरपूर्वक मुझे एक कोठरी स्वतन्त्र रहने को देदी और मैं उस को उरी में रहने लगा। श्रीस्वामीजीमहाराज अपने स्थान में विशेषविद्यार्थियों को रखते अत एवं विद्यार्थियों की फिकर खेश्राप स्थान में बहुत कम रहते थे। परमा पुरुष शारीरिक सुख के ऊपर ध्यान नहीं देते श्री स्वामीजी महाराज ऐसे योगो सत्पुरुष तपस्बो अब होना असम्भव सा प्रतीत होता उक्त श्री स्वामीजी महाराज के स्थान में विलासपुर निवासी श्री मरसिंहाचार्यजी अधिकारी बन के रहते थे । और कामकाजको बड़ीसा बधानी से करते थे विद्यार्थी भी स्थान मे सुयोग्य रहते थे पं. रामदुलारेजी शास्त्री ६० सुदर्शनाचार्यजी माधवाचार्यजी पं० भन्युतप्रपन्नाचार्पजी पाडत मुरलीधरशास्त्री पंक्तिलक्ष्मण्याचार्यजी इत्यादि बहुतविद्यार्थीरहते थे सत्रका नाम लिखाजाये तो एक पुस्तक हो जायगा । मेरे मन मे यह उत्साह था कि मैं श्रीअवधवंशीयक्षत्रियों का कुछ चरित्र एवं होनहार प्रणाली लिख्। इस विषय को मैने विक्रमीय संवत् १६८२ में शुरू कर दिया और विक्रमीय संवत् १९८६ में खतम हो गया पुस्तक तैयार होनेपर मैने निम्न महाशयों को गोचर किया श्रीरामदुलारी. शरण रामायणी जी श्रीवावूरामपालसिंहजी, पं० धर्मनाथपांडेजी महन्थ श्री इन्मान रारपणजी, पं. श्रीधनुषधारीशरण जी और पुजारी श्रीविदेहनन्दिनी शरणजी वाद मैं पी० एम० चतुर्वेदी भारतवासी प्रेस इलाहाबाद मे छपा दी गई । जो कि श्रीबाबूरामपाल सिंहजी म. राजापुर, पो० नयामाय लोहस्मृति सारण छपरा में मिलती है। पुस्तक का नाम "श्रीअवधर्वशीय. क्षत्रिय मार्तण्ड" है। जब पुस्तकछपचुकी तो प्रति नेपाली पं० श्रीचन्ताचारीजी के द्वारा श्रीतोता दिमट में भेज दी । जब श्रीमान की पूजा में पहुँचगई तो आपकी दवा भरीदृष्टि ने उन पुस्तकों को अपना लिया और और मुझे कृतार्थ किया। अयोध्या संस्कृतपत्र के संपादक श्री कालीप्रसाद- शास्त्रीजी में इस प्रन्थ की समालोचनाभी कर दी। मैने शारीरक मीमांसा भाष्यादि विशिष्टाद्वैत के ग्रन्थ शास्त्री विद्यारत्न तर्क भूषण श्री १०८ श्रीरामप्रपन्नाचार्यजी महाराज श्रीविजय राघवजी के मंदिर विभीषणकुंड अयोध्या से अध्यन किया प्रारब्धवश मेरा शरीर प्रक्लव्याधि से ग्रसित होगया एक मास तक अस्पताल में भी रहना पड़ा और वहाँ पर कान्यकुब्ज ब्राह्मण पं० राजारामशर्माजी ने मेरा पालन पोषण किया जिस प्रकार माता अपने बच्चे को करती है। और उस अमय में जिला गोरखपुर भेडिया प्राम निवासी शाली पं० श्रीरमाकांत शर्माजी ने मेरा बहुत उपचार किया जो कि उसके बदले में कुछ भी नहीं दे सतका और इस शरीर से मुझे ऋषी ही बनना पड़ेगा। विक्रमीय संवत १९६० में श्री १००८श्रीवलभद्रस्वामीजी महाराज का परमपद होगया। अबउनके उत्तर तोतादिमठ श्री वेंकटेशजी का मंदिर विभोषणाकुंड अयोध्या में सर्वतंत्रस्वतन्त्र सार्वभौमस्वामी श्री१०८श्री रामप्रपन्नाचार्यजी गद्दीपर विराजमान थे। उस समय भी सुयोग्यविद्यार्थी हहते थे, अर्चक पं० मनमा गोरखपुर के रहते थे अधिकारी ६ लीबारसाचार्य जी रहते थे कामबहुत सुन्दरहोता था उक्त स्वामीजीके . लोकस्मृति परमपद हो जानेपर वेदान्ती श्री स्वामीश्री१०८श्रीसुदर्शनाचार्यजी गद्दी पर विराजमान है', अचर्क पं० रामकुमारशर्मा पाण्डेयजी हैं। अधिकारी श्री स्वामी रामानुजानार्यजी है कामसुन्दरता से चलाते हैं समयानुसार वि. थार्थी भी रहते हैं । वर्णव्यवस्थादिग्दर्शन, और श्रीसम्प्रदायमीमांसा पु. स्तक मे पर्वतीय पं० व्याकरणाचार्य श्रीखेमानन्दशर्माजी और पं० श्री देवनायकशर्माशास्त्रीजी ने उक्त दोनो पुस्तक मे वहुत सहायता की है । इन्हें कोटिशः धन्यवाद है, परमात्मा सदा मङ्गलमय इनका समय वितावें । नागौद मण्डलान्तर्गत महकोना ग्राम निवासी पं० श्रीरामस्नेहि. त्रिपाठ्यङ्गज श्रीराजारामाचार्य शास्त्रीजीने उक्त पुस्तकोंमे वहुत सहायता की हे परमात्मा सदा उनका मङ्गलमयसमय व्यतीत करे । -श्रीस्वाम्युपनामक धरणीधराचार्य।

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EEKREETEORAGEEEEER शुद्धिपत्र अशुद्ध. श्रति १६ ससर्ग CBSEEINDISODECE श्रुति संसर्ग वहुश्यां wr १८ वश्यां १२ १३ ८ राव १५ १२ नधमे नऽधमें कर्तब्य विरक्त कतब्य पितकर २९ २९ ८ SASSALOMOUSCODUOCOSSWOTE30 भाजन २ शमुख प्रमुख भोजन ३१ कर्म कुर्म कंज १८८ पुनि मुनि अद्रि अद्रि पुस्तक मिलने का पता:- (१) बाबू कल्लरसिंहजी डाक्टर, मु० लालपुरगौरिमेरन, पो० कल्लाही, जि० दरभंगा (बिहार) (२) कनकभवन उत्तरद्वार लक्ष्मीनिवासवानाद्रिमठ, पिपर के नीचे श्रीस्वामि रामानुजाचार्य, मु० रामकोट, अयोध्या, जि० फैजाबाद (यू. पी. - 國國慶圖

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Srisampradaya Mimamsa

Author
Dharand-iidhagachaayr^yo
Title
Shriisampradaayamiimaan'saa
File name
Srisampradaya Mimamsa
Text
OCR done
Citation
1943
Published
2004/11/4
Publisher
Babu Klahar Simha P B Kaluadhi Dist, Darbang
Language
Sanskrit
Pages
114
Library
Asr,melkote
Classification
Hinduism Narrowly
Keywords
Philosophical of God
DLI number
383238
Barcode
1990020047525.00
Scanning centre
ASR, Melkote
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
In Public Domain
VMLT id
m7yD34v5B9W
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