Sanmati Library
Shrawak Pratikraman - Sar
Front matter
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गुरुभकपरायणा
श्रीमती फुलकोरवेन, मुंबई.
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आद्य-वक्तव्य फिमत्र चित्रं यत्सतः परानुग्रहतत्पराः । न हि स्वदेशैत्याय जायते चन्दनद्रुमाः ॥ सुभा०॥ महापुरुषोंका जीवन केवल दूसरों के उपकारके लिए ही हुआ फरता है, क्यों कि चंदन वृक्षोंका जन्म अपने देहके शैत्यके लिए नहीं अपितु प्राणियों के सुग्यफ लिए थे पैदा होते हैं। जिन गदर्शियोका रात्रिंदिन यह भावना रहती है कि इस संसार परिभ्रमणगे पडकर दुश्व उठानेवाले प्राणियोंकी मलाई किस प्रकार दो, उनका उद्धार किस प्रकार हो, मैं आमराज्यको कैसे प्राप्त करूं, लोको शाति सुखकी स्थापना किस प्रकार हो, प्राणियोंका अज्ञाम किस प्रकार दूर हो, समस्त साधर्मी सज्जन प्रेम व घासल्यसे किस प्रकार रहें, ये महर्षि धन्य है । जिनका अनुदिनका अनुष्ठान केवळ परानुपरके डिएदी हुआ करता है, जिनके जपमें, तपमें, ध्यानमें व उपदेशगें किसी भी प्रकारका स्वार्थ नहीं, दूसरोंके अपकार करनेपर गी अपनी कृतिमे उपकार ही करते रहते हैं, इतना ही नहीं, जिनके हृदयों स्वप्न में भी दूसरों को अपकार करनेकी भावना नहीं होती है, साधु सत धन्य है। परमपूज्य प्रातःस्मरणीय, विश्वयंध, विद्वच्छिरोमणि आचार्य श्री कुगुप्सागरजी महाराज आजके युगमें धर्मफे अलौकिक उधौत करने- पाले परमशान थीतरागी विद्वान् तपस्वी है। आचार्यसंघका विहार नहा जादो रहा है या २ चिरस्मरणीय धर्मप्रभावना हो रही है। जनधर्म भादर्श व मदत्यको जनेतर साधारण बहुत उच्चदृष्टि से देग्य रहे है । कई वर्षोंसे आचार्यश्रीका विहार गुजरात प्रतिमें हो रहा है । वदा भनेक राजधानीफे शाप्तफ आपके पूज्य चरणोंफे परमभक्त ये (२) बन गये हैं । सुदासना, टीवा, भलुवा, माणिकपुरा, मोहनपुरा, वडासन, पेथापुर, ओरान, देलबाडा, विजयनगर बादि छोटे को संस्थाओंकि भविपति आपके परम भक है । ऐतिहासिककालीन जैनधर्म व जैन साधुनोंका स्मरण एकदम भाचार्यश्रीक दर्शनसे होता है। अनेक संस्थानाधिपति आपके चरणोंके दर्शन के लिए लालायित रहते हैं। पिछले दिन बढोदा राज्यके न्यायमंदिरमें बडोदा के दीवान सा. सर कृष्णमाचारीकी उपस्थितिमें पूज्यश्रीका परमप्रभावक भाषण हुआ, जिसे सुनने के लिए कई हजार तर श्रोता उपस्थित थे। वह इतिहासमें सुवर्णाक्षरों में लिखने लायफ हुया है। बहुत से राजा- ओने आपके उपदेशसे प्रेरित होकर अपने राज्यम अहिंसा दिन पालनेकी प्रतिज्ञा ली है। गुजरातमें बड़े पढे राजा महाराजाओं के द्वारा आपका स्वागत हुआ और हो रहा है। भापके उपदेशामृत पान करने के लिए बड़े २ राजा महाराजा लालायित रहते हैं। आपके द्वारा अभूतपूर्व धर्मप्रभावना हो रही है। आपकी विद्वत्ता, वक्तृत्व, गंभीरता आदि बातें अन्यदृढभ हैं। आपने वक्तृत्वकालमें जिस प्रकार कुशलता प्राप्त की है, उसी प्रकार काव्यनिर्माणकार्य में भी अधिकार जमा लिया है। मापने अभीतक अपनी प्रगाढ विद्वत्तासे बोधामृतसार, ज्ञानामृत- सार, चतुर्विशातीजनस्तुति, शातिसागरचरित्र, निजामशुद्धिभावना, मोक्षमार्गप्रदीप, श्रावकप्रतिक्रमण, नरेशधर्मदर्पण, स्वरूपदर्शनसूर्य आदि करीब ३३ प्रथोंकी रचना कर भव्यों के लिये अनंत उपकार किया है । यह श्रावकप्रतिक्रमणसार भी आपकी परम निमेंट विद्वत्तासे निर्मित अमृत | इस प्रथमें सचमुचमें जैसा नाम वैसा ही आत्मविशुद्धिका साधन कूटकूटफार भरा हुआ है । जिन्हे है (३) भामराज्यको पाकर भमर बनना होवे इस अमृतफा अवश्य पान करें। श्रावकोंको अपने प्रतिनित्यके भारंभ जनित कार्यमें प्रमादयश अनेक प्रकारमे पापासव होते हैं। मुनिगण अपने प्रत्येक कार्यमें सावधान रहते है। प्रमाद नहीं करते । इसलिए उनको फोका आता अत्यत मदररूपसे होता है, तथापि वे उन फर्मोको दूर काने लिए आलोचना व प्रतिक्रमण कर भात्मविशुद्धि करते हैं, गयोंको तो पदद पर अपराध करनेका अवसर आता है, सानिमित्तसे धावक क्रोधी होते , मानी होते हैं, मायाचार फरसे , लोभकर अनेक पाप कमाते हैं। इसके अलावा बनेकद्वारसे कर्ममंचय किया जाता है। यदि उन कर्याका विशोधन नहीं किया जाय तो कर्मपर्वत ही एकात्रिन हो जाय एव यह मान्मा दर्घिसंसा बन जाय । इसलिए पाययक कि अपने किये हुए पापोंका पश्चाताप करें एष उन अर्जित कोको दटका बना, श्रायकोंको अपने आत्मविशोधन करनेके लिए ५६ प्रथ अयंत उपयुक्त बनाया है। अपने आत्मकल्याण करनेकी उग्छा रखनेवाले भन्योंको इसका पठन व मनन सदा करना चाहिये । मुंबई के प्रसिद्ध धर्मामा सेट पालुभाईने गुरुभक्तिसे प्रेरित होकर इमे अपना भगिनी श्रीमती फुलकोरवेनसे प्रकाशित कराया है, अतः पं दोनों धन्यवादका पात्र हैं। इस प्रथसे असल्यात भन्योंके परिणाममें विशुद्ध होगी। और उनका आत्मकल्याण होगा। - ....* . श्रीमती धर्मनिष्ठ फुलकोर बेनका संक्षिप्त परिचय इस शास्त्र को जब कि परमपूज्य आचार्य कुंथुसागरजी महाराज वीर संवत् २४६६ में रचना करने के लिए प्रारंभ कर ही रहे थे, उस असमें श्रीमती पुलकोर बेन अपने भाई श्रीमान् सेठ बालभाई नेमचंदके साथ पावागढ सिद्धक्षेत्रकी वंदनाफे लिए व आचार्यश्री दर्शन के लिए गई थी। उस समय अपने भाई चालुभाईकी संमतिसे इसे प्रकाशित करनेकी मारना दर्शाई थी जिससे अनेक जन-जनेतर भावुक लाभ लेकर अपना भात्मकल्याण करें। श्रीमती फुल्कोर ग्रेनका जन्म मुंबई में दि. जैन नृसिंहपुरा जातीमें प्रसिद्ध श्री. सेठ सौभागचंद मेघराजफे कुटुंवमें संवत् १९४७ को आषाढ सुदी १५ के गज हुआ। उनकी माता श्री. महतवेन पुलकोरबेनको ४ महीने के वयमें छोडकर परलोक यात्रा कर गई, परंतु पिताश्री सेठ नेगचंदजी सोभागचदजीने अत्यन प्रेमके साथ पुत्रीका लालन पालन किया एवं धार्मिक शिक्षण देकर उनका जीवन सुसस्कृत किया । करीब १४ वर्ष की अवस्था में उन्होंने अपनी कन्याका विवाह केरवाडा (ता. आमोद ) शा. नाथालाल मुलजी भाईके पुत्र चुनीलाल के साथ किया परन्तु दुःख है कि कर्मके योगसे संवत् १९८८ के वर्षमें शेठ चुनीलालजीका स्वर्गवास हुआ। तदनंतर संसारकी स्थितिको अनुभव करते हुए श्री फुलकोर बेनका चित धर्मकी ओर और भी अधिक सुदृढ होगया। अब उनका अधिकतर समय वार्मिक क्रियावोंका पालन, स्वाध्याय, जपस्तोत्र देवपूजादिमें व्यतीत होता है। उन्होंने प्रायः सभी तीर्थोकी वदना कई बार की है, अनेक धार्मिक सस्थात्राको दान भी देती रहती हैं। वर्तमानमे उनका जीवन हमारी बहिनोंको अनुकरणीय है।
२ سہ पंचोटियजाँघोकं दुःश्व विषयानुक्रमणिका पिप श्लोक संख्या १ मंगलाचरण २ सारी जीशका स्वरूप ३ संसारके दुग्गे कारण ५ जन्म मरणको सस्या ४-५ ५ उदाहरणपूर्वक जन्म मरणकी सत्पा ६-७ ६ असपर्यायका परिभ्रमण १०-११ ८ मनुष्यका कर्तव्य १२-१३ ० परिप्रहकी तृष्णाको हटानका उपदेश १५-१५ १० मृत्यु के जीतनेका उपदेश १६-१७ १. अंट गुरुको पाकर प्रमाद न करनेका उपदेश १८-१९ १२ मिध्याय परनिन्दा प्रशंसाका निषेध २०-२१ १३ भभक्ष्य भक्षणके त्यागका उपदेश २२-२३ ११ तो दोप लगने का प्रायश्चित्त २४-२५ १५ कुगुरुभीक मबध के त्यागका उपदेश २६-२७ १६ किमीका अपराध करनेपर क्षमा मागका उपदेश २८-२९ १७ म्यायर जीवोंकी हिंसाको भाळाचना ३०-३१ १८ विना छने पानीको मालोचना ३२-३३ १९ फर पुपातिक विराधनाकी आलोचना ३४-३५ २० अशुभ कार्य करने की निंदा ३६-३७ २. कंदमूल मक्षणकी आलोचना ३८-३९ २२ दानधर्म भादि न करने की आलोचना १०-४१ २३ सावध भारभ कार्यों की मालोचना ४२-४३ २१ त्रिकाल दोपॉफी भालोचना १४-४५ ( २ ). २५ अरहंतादिककी निन्दा करनेको भालोचना १६-१७ जिनधर्मादिको न माननेकी मालोचना १८-१९ २७ श्रुतज्ञानकी निन्दाकी आलोचना २८ किसांको दुख पहुंचानेकी मालोचना ५२-५३ २९ .मुनिनिन्दाकी आलोचना ५१-५५ ३० . श्रावक निन्दाकी मालोचना ५६-५७ ३१ प्राणिवोंको दुःख पहुंचानको आलोचना ५८-५६ १२ अन्य, कुकर्म करनेकी आलोचना ६०-६१ अन्नपान धन हरण करनेकी आलोचना ६२-६३ ३१ आरंमादिक एफसी भाठ पापोंकी मालोचना ६४-६५-६६ ३५ कुगुरु कुशावकी स्तुतिको बाठोचना ६७-६८ प्रातःकालका चिन्तवन ६९-७० ३७ मिध्यात्व तथा आर्तरौद्रके त्यागका उपदेश ७१-७२ ३८ एकत्व मापनाका चिन्तवन ७३-७१ ३९ रत्नत्रयको धारण करनेका उपदेश ७५-७६ आत्माके शुद्ध स्वरूपका चिन्तयन ७७-७८-७९ ४१ गुरुका उपकार और प्रन्यकी महिमा ८०-८४ १२ लघुपतिक्रमणकी प्रतिज्ञा ४३ लघुप्रतिक्रमणकमें समता ८६ ४४ लघुप्रतिक्रमणमें बदना ८. १५ लघुप्रतिक्रमणमें स्तुति ८८ ४६ प्रतिक्रमण ८९ प्रत्याख्यान व्युत्सर्ग ४९ प्रशस्ति ९१ ५. कल्लोलप्ते चतुर्विध संघका विहार ९२-९६ ९७-११३ ucc
श्री वीतरागाय नमः।
श्रीमदाचार्य श्रीकुंथुसागरजी विरचित-
श्री श्रावकप्रतिक्रमणसार।
मूल
|| महराचरण ॥
चतुर्विशति तीर्थेशान् नत्वा सकलसद्गुरून् ।
सत्प्रतिक्रमणं वक्ष्ये गृहिणां भावशुद्धये ॥ १॥
भीम भवाब्धी भ्रमना त्वया हि, कालो धनंतच वृथा व्यतीतः
प्रगादमिथ्यात्ववशालयह, बोधिन उधा भवभीतिहीं ॥२॥
चिनासमादयन त्वया हुनेन, नाराधितः माँग्न्यमयः स्वधर्मः ।
नती दासचं मनसाप्पचिन्त्य, दृग्वं च भुक्तं सहसादिनात्तम् ।।३।।
लोहामा वमना त्वयेति, जन्मादि-मृत्यु. कतिधारमेव ।
कवच नेपां गदि समस्या, शक्रोऽपि गतान सहसजिद ।
सामान्य नन्नाश्च कयान्ति काऽत्र, जात्वीन मोई प्रविहाय मायाम्।
कुर्वन्तु शुद्धिं वरात्मनों को, यथा पुनः म्यान च जन्ममृत्युः।।
एकामिन दुपदे वसिष्टादशवारमेव को ।
जन्ममृत्यू त्वया नित्यं कुर्वता ममयो बहु ॥ ६ ॥
नलिकमद्रतल्पेन गतीनः श्लेशदे भवे ।
त्परत्वा जापनि तद्वत् मृत्युनं स्यात्तथा कुरु ॥ ७ ॥
२ द्वितीन्द्रियादिपर्याये, कर्मपरवगात्सदा । अन्योन्यभक्ष्यमणस्त्वं, मृतः पादादिपर्दनात् ॥ ८ ॥ स्वयं दुःखी दरिद्री सन्, कष्ट स्वायुय॑नीतवान् । ततस्त्यक्त्वेति तद्वेतुं, बस त्वं स्वपदेऽमके ॥ ९ ॥ पंचाक्षपर्यायचये प्रमूढो, दीनो दरिद्री विकलांगधारी । क्रोधी प्रमादी व्यसनी विकारी, सन्नेव पाप्माऽखिकदुःखपात्रः॥ व्यतीतवांस्त्वं समयं धनंतं, तथापि कब्धो न निजस्वभावः' ज्ञात्वेति तत्यागविधिविधेयः, स्पान्नाक्षपर्यायमतिर्यनस्ते ॥११॥ मिथः सदा वैरविरोधयोगाद्धन्ता स्वयं सन् भुचि इन्यमानः तद्.दुखभीत' समयेऽसमर्थस्ततो रुदन्नव च यत्र तत्र ||१२|| व्यतीतवान् इन्त वृथा निजायुर्ज्ञात्वति तत्वादिकृतेर्निरूपम् । त्यक्त्वा पियो वैरविरोधभाव, सबैश्च सार्ध कुरु मध्यभावम्॥१३॥ पिता मियश्चैव मखापि बंधुर्मातापि मान्या भगिनी मुशीला। भार्या मनोज्ञा स्वजनोऽपि शत्रुर्दासी च दास. सचिवोऽपि सैन्यः गजाश्वदम्य मणिरत्नराज्यं, न याति सार्ध किमपि त्वयाऽन्मन्! झात्वेति तेषां प्रविहाय चिन्ता, कुरु स्वशुद्धिं हि भवेत्स्वसिद्धिः॥ धर्म विना मृत्युमुखात् त्रिलोके. इन्द्रोऽपि चन्द्रो ह्यगदः खगेंद्रः। मन्त्रोऽपि मंत्री न च यत्रतंत्र, राजापि राज्यं वरदा च यक्षी॥१६॥ शक्तो न च स्यादवितु फणीन्द्रो, ज्ञात्वेति मृत्योर्यततां जयार्थम्। न स्यायतस्ते मरणस्य चिन्ता, हे वत्स! चैव मम सम्मतोऽस्ति। जन्म लब्ध्वा स्वविवेकद वा, सुदुर्लभं श्रेष्ठगुरुं कृपाब्धिम् । कदापि चित्ते कुरु मा ममाद, क्षमस्व लोकस्थितसर्वजीवान्॥१८॥ बधामृन यच्छ विषपदात्रे, दुःखमदाने स्वसुखं सदैव । - मणमार- ३ MAn न - पना भवन निगराध्यक्ष्मीदमीच भवत्याऽग्विककार्यकर्ती ।। प्रशाननः पक्षविमृदनी दि. मलत्यतले बरतत्वमेव । 'घोरं न पापं नवान किलात्मन, निमप्रशंसा परमीपनिंदाम्।। नत्यापशान्य न ननो विरुद्धं कुरु प्रमोद प्रविहाय निघम् । मनापगम्य गनी विनाम : सनत्तलाम मुखदो भवत्त ॥२१॥ बिहामनीमान्मधुमधाम, घृणाम्पद धर्मविनाशकं हि । निश मना की च्यमनं व्यया, वसंगतः सविनवान अमक्ष्यम्।। भाम्पमतमन्नं गमनम्वरूपं, नितामलोभाद्धि भवां स्वहानिम् । मान्वनि सुस्ता रु चान्मशुदि, यनस्नवात्मा प्रभवत्पीवत्र.।२३। गरूपकटामिळमं की, प्रत गृहीत्वा मुग्वदं पवित्र । प्रपाट्यांगादि भनिन नत, दीपीकृत मोहवशात त्या वा॥२४॥ नन्दियेन विधिना हि कृत्वा, पुनर्बनं पालय तद्विमुक्त । पना भने कनत्य जन्म, दं, मनोऽपि व्रतशीलधर्म ॥२५॥ भ्रांनिषद नगर निगांद, श्वभ्र चपाद कगरी. प्रसंगात् । नियंगना निधनर कयौनी, प्रतिक्षणं माणहरे भयान्धी ॥२६॥ हामगिक श्रमिनो विनाऽसि मात्वनिमुक्त्वा कृगुरोः प्रसंग पर पग मृगग. पायर्यत बराजग हि तवाश्रय स्यात् ।। चतुर्गन द ग्वमय भने बाऽशानन नित्य भ्रमना त्वया ये । विनिन्दिता भ्रीधनजिताय, कृतास्नथा प्राणिविजिताश्च२८ विगामा मार्यवशादि जीवाः, समां च याचस्व ततश्च तेभ्यः चनम्ननामगि भवद्विशुद्धः, स्थिरमदास्त्रात्मरस हि तृप्तः॥२९॥ पंचम कागान नापगधा, पिराधिनाः स्थावरजीवकायाः । म्वापानियागातिनियन, दुःखीचना की पावो हताश्च ॥
श्रावक- ४ स्वयेत्यभाग्येन निरंकुशेन, ततश्च तद्दोषविनाशनार्थम् । कुर्वात्मनिंदां हि परप्रशंसां, विद्यालयस्थापनवर्द्धनादिम् ॥३१॥ अगालिनेनैव जलेन नित्यं, सूक्ष्मादिजन्तोश्च कळेवरेण । स्नानं सदा त्व कृतवान् विगाह, इतात्मवुद्धिः खलु निर्दयो वा नस्माच जीवा बहवो मृताश्च छिन्ना बभूवुर्विपुलाश्च भिन्नाः ॥ तेभ्यः क्षमा प्रार्थय पापशान्त्य, स्वर्मोक्षद त्वं कूरु दानधर्म॥३३॥ शाखासमूहैः सुफलादिपुष्पैर्विभूषिताः को तरवा सजीवाः । अन्पे मया स्थूलतराश्च सूक्ष्माः पृथ्व्यादिकायाश्च विराधिता वै । अज्ञानतः स्वार्थवशाद्धि हा हा, त्वया ह्यभाग्येन निजात्महन्त्रा। मिथ्या यतः स्यादि कृतापराधास्तेभ्यः क्षमा प्रार्थय शुद्धबुद्धया व्रतोपवासः सुखदं तपो न, कृत तथाकारितमेव नान्यः । स्वर्मोक्षदं संयमशीकरत्न, न रक्षितं प्रेरितमेव नान्यम् ॥३६॥ त्वया प्रमोहान विविधं हि किन्तु, कृत व्यथादं विषम कुकर्म । तच्छातिदेतो. कुरु चिसशुद्धिं, यतो भवेत्ते सफल नृजन्म॥३७॥ कन्दादिमूलं च निगोदपिण्ड, ह्यन्नं सचित्त भवदं प्रभुक्तम् । सूक्ष्म पियो वे हरितांकुरादिस्त्वया मनोज्ञश्च विराधितो वा तदोषसंख्यां गदितुं न शक्तः, शक' परेषां हि कथैव काऽस्ति । नथापि ते स्यात् कृतकर्मनाशो, भक्त्या सुधर्म भुवि चेत्करोषि ॥ कुटुम्बमोहादिवशात् त्वया कौ, तथान्यकार्यादिवशाद्धि हाहा । शिवपदो नार्चनदानधर्मः, कृती कृतो वांच्छितदो न भक्त्या । नतस्तवात्मा खलु निंदनीयो, बभूव दीनश्च पदे पदे हि । ज्ञात्वेति दानादिविधिर्विघयो, यतः प्रपूज्योऽपि भवेत्सुखीह ॥ स्वया प्रमूढेन मुनिर्दयेन धारभकार्याण्यनुनाशकानि । .
प्रतिक्रमणमार- ५ संसारमूला निकपायदानि, सावधयुक्तानि सदा कृतानि॥४२॥ सावध कार्य भवदं च मुक्त्वा, कुरु क्षमादं निरवद्यकार्यम् । यतस्तवात्मा प्रभवेत्कृतार्थी, प्रशंसनीयो हि नरामरेन्द्रः ॥४॥ अतीतकाले वरवर्तमाने, ह्यनागते वा विफलो व्यथादः । ममत्तयोगाद्विपमस्त्वया हा, दांप कृत. कारित एव निध॥४४॥ कृतस्य दोपस्य ततो विनाशो भवेत् त्रिकाळेऽपि तथान दोषः। वाहर विधानं सुखदं कुरु त्वं, म्यात्ते त्रिलोकोपि सदा स्वदासः।। जगत्पभोरचार्डन एव हा हा, सिद्धस्य शुद्धस्य शिवमदस्य । स्वाँसदस्येति जिनागमस्य, सावद्यहर्तर्जिनमदिरस्य ॥ १६ ॥ कुसंगतोऽज्ञानत एव निंदा, घनादरादिश्च त्वया दुरात्मन् । कृतः प्रदीप कुटिलस्ततस्त्व, तत्पादसेवा कुरु तत्पशान्त्यै॥४७॥ जिनद्रवमतिमादिकानां, सम्पूर्णजन्तो. परितारकाणां । श्रीवर्द्धिनांनद्वचसां कदाचिदपान्यता बाविनयः कृतश्चेत्।।४८॥ त्वया भाग्येन महापराधस्तत्पापशान्त्यै हि पुनः पुनश्च । कुर्वात्मनिंदा प्रतिपादिपूजा, यनस्तवात्मा प्रभवेत्प्रपूज्यः ॥४९॥ मिथ्यात्वहतः सुमतिश्रुतादिज्ञानस्य चानंदपदमदस्य । हटाच्छठत्वात्कुपातिथुनादिवशात्कृतो चाऽविनयः प्रणिन्दा॥५०॥ वदोपहान्य कुपतिश्रुतादिज्ञानं हि मुक्त्वा भवद भवाब्धौ । गृहाण भक्त्या सुपतिश्रुतादिशान यत स्यात्सफलं नृजन्म॥५१॥ मदामढेन त्वया खलन, दीना दरिद्राः कुळहीनजीया । पपीहिना को अपमानिताच, तपां हठाद्वापहृत धनादि ॥५२॥ तत्पापशान्य विनयेन कार्य, दत्वा धन तन्मनसश्च तोषम् । पतो मिथ: स्यात्स्वान' पचित्र, स्याद्वाऽचिर चे फलदानिशांति.॥
-श्रावक- ६ , महाव्रती स्वात्मरती दयालुः, स्वात्मानुरागी च भवाद्विरागी। त्रिरत्नधारी च महातपस्वी, क्षमाकरोऽकारणवधुरेच ॥ ५४ ॥ एतादृशः साधुरपीइ चास्ति, तस्य प्रमादाभवरोगहतुः । ' यदि पणिन्दाऽविनयः कृतश्चेत्, तत्पापशान्त्यै नमताद्विशुद्धया देशवती शीळशिखामाणिश्च, धर्मानुरागी द्यसुरक्षकश्च । पूजासुदानव्रतमौनधारी, सन्तोपकारी स्वपरोपकारी ॥ ५६ ॥ पूर्वोक्तधर्मेण युनाः सुथाद्धाः, सन्त्यत्र तेषां हि कृता कदाचित्। निंदा कुरु त्वं विनयादिसवां, यतस्तवात्मेति सुखी कुनी स्यात्।। चतुर्भवे दुःखमये विचित्रे, विपत्मकाणे भ्रमता त्वयैव । देवा प्रलोभान्मनुजाश्च पानाद्, भयंकरानारकिनः प्रकोपात्॥ हा मायया वा पशवो ह्यदोषाः, विदारिवा' प्राणहताश्च नग्धाः। तत्पापांत्य कुरु तान् स्वकीयान् .नश्येत् प्रकोपोऽपि यतश्च तेषाम्॥ संसारसतापविर्द्धकानां. भूत्वा वश क्रोधचतप्रयानां । हेयं प्रणिन्य कृतवान् कुकर्म, तथान्यलोके विषय व्यथादम् ॥ तत्पापशान्त्यै च कषायकांडं, त्यक्त्वा तथा मोडपिशाचसंगम् । स्वानंदसिन्धौ सुरमस्व चात्पन्, यतः प्रिया स्यात्तव मोक्षलक्ष्मी। निर्दोषजन्तोरपि दुष्टबुध्या, त्वयात्मनाऽखिळपापकी बखान्नवस्तूनि यशोधनानि गनाइव हाणि विभूपणानि ॥ मुनिर्दयोदापहृतानि यस्मात् , सत्यापशान्त्य चसनादि दत्वा । कुरुष्व तेषां हदि वात्मशांति, यत्तस्तवात्मा प्रभवेद्वरिष्ठः ॥६३॥ पचनक्रियाया वा कृष्यादिवृत्तियोगतः । संरंभादिकपायाद्वा कायकृतादिभेदतः ॥ ६५ ॥ अष्टोतरशन पापं प्रतिनित्य प्रजायते ।
प्रतिक्रमणसार- - . तत्तापक्षालनार्थ हि भक्त्या देवार्चनादिकम् ॥ ६५ ॥ अष्टोत्तरशतं जाप्यं सत्यतिक्रमणादिकम् । निजात्मचिंतनं नित्यं क्रियते धर्मद्योतनम् ॥ ६६ ॥ सरागमूर्तेः कुगरी कुनीतः, स्तुतिः प्रशंसा गुरुदेवबुद्धया। त्वया प्रलोभाद्धि नति कृता चेत् , तवात्मशुद्धयै कुरु तद्वियोगम्। जिनक्तिशास्त्रस्य गुग कृपाब्धेः, संयोगमेवं कुरु चित्तशुद्धया । अन्वेपणीय च यथार्थवस्तु, मोक्षो भवेत् प्राप्य नृजन्म येन ॥ बन्धुश्च मे कोऽस्त्यमेव तस्य,को कोऽस्मि धर्मोऽपि मम प्रदेशः। काहन्हि कृत्यं करणीयमास्ति, तया परेपां हितचिन्तनं वा ।।६९॥ एवं विचारः मुखदश्च कार्यः, प्रातस्त्वयोत्याय च चित्तशुद्धया। यतः स्वयं त्वं हि भवः पवित्र', आबालवृद्धस्य मुखमचारी ॥ रौद्रार्तभाव भवबन्धमूलं, मिथ्याविषं प्राणहरं विमुच्य । ध्यानं च धर्मभ्य समाधिमूलं, सेवां मुनीनां कुरु मोक्षदां वा ।। सामायिक शांतिकरं संदेव, मपस्तसंतापविनाशकं यत् । स्थातु स्वध हि तथा यतस्व, यतस्तवात्मा प्रभवेजिनेन्द्रः ॥ स्वात्मा सदैको म्रियतेऽसहाय', को जायते कर्मचशात्सदैकः। करोति पापं विपमं सदको, भुक्तं तदेक' समयं च लब्ध्वा ।। मांसं प्रशाति खयमेव चको, मोक्षे सदा तिष्ठति वापि चकः । आत्मा नया नात्मनि तिटनीत्थं तावद्विचारः सुखदश्च कार्यः। दृग्बांधचारित्रसुखस्वरूपी, स्वात्मा सदा तेऽस्ति यथार्यदृष्टया। वयाप्यवोधादिति नद्विरुद्ध, मत्वा व्यथादं कृतवान् कुकर्मा७५ ॥ ज्ञात्वेति नकर्ग विनाशनार्थ, इग्बोधचारित्रसुख स्वरूपः । स्वात्मेति यत्वा कुरु चित्तशुद्धिं, स्याचे स्वसिद्धिनिजराज्यदात्री ।।
-थावक- ८ स्पर्शादिवणात्मकपुद्गलेन, मुक्तस्तवात्माखिळभोगसंगात् । दुःखमदाहन्धुकलत्रसंगाद्दुरोऽस्ति मिथ्यात्वकषायकाण्डात् ॥ खानंदसाम्राज्यपदे नियुक्तः, तुष्टस्तवात्मा स्वचतुष्टयेन । मिष्टे निजानदरसंऽस्ति पुष्टी, निजेऽपि पिष्टो भुवन गरिष्ठ॥७८॥ एव विचारः सुखद' सदैच, हे वत्स! कार्यो हि त्वया प्रशान्त्यै । आचार्यवर्येण सुखाथिनेन, श्रीकुन्थुनाम्नेति सदाप्रणीतम्॥७९॥ दीक्षागुरोपे सुखशान्तिसिंघोरज्ञानहर्तुश्च सुधर्मसिंघोः । विद्यागुरोरेव कृपापसादात, ग्रन्थो मयाऽयं रचितः पचित्रः॥८०॥ रुवर्मोक्षदं वांछित्तदं ततो ये, ग्रन्धं ह्य, शुद्धिकरं जनानाम् । पठति भक्त्यैव नप्रति नित्य, स्वर्गापवर्ग भुवि ते कभन्त॥८॥ ख्यात्यादिहतो रचितो मयाय, ग्रन्थो न किंतु स्वपरार्थशान्त्यै। आबालवृद्धादिहितार्थपंच, सन्तापही वरमुरिणति ॥ ८२ ॥ ग्रन्थ ह्ययं वांच्छितद हि भक्त्या, पठति ये केऽपि सदैव तेभ्यः। स्वर्मोक्षलक्ष्मी वृषभादिवीरा , शांति क्रियासुरमृरयोऽपि॥८३॥ श्रीकुन्युनान्न सुखशान्तिमूर्तेग्रन्थः सदाय वितनोतु सौख्यम् । दुःख प्रजान हिरतु क्षणापेअभिप्राय एव फिल ग्रन्थकर्तुः॥८४॥ - 71 रामाय नम श्रीपदाचार्यचर्य श्रीकुन्धुमागर सिरचित श्रीश्रावक-प्रतिक्रमण-सार, धर्मरत्न पं. लामागम शाखांकन भावाटीका सहित मगराचरण चतुर्विशतितीर्थशान् नवा सकलसद्गुरुन् । सत्प्रतिक्रमणं वध्ये गृहिणां भावशुद्धये ॥ अर्थ-म ग्रंथ मारममें में सबसे पहले भगवान पम- देवम फर श्रीमहावापर्यंत चावामा तीर्थकराँको नमस्कार सना ? । इस प्रकार अपने विघ्नोंको प्रतिक लिए नरमष्ठी भगवान नमस्कार करनेरुप मगलाचरण करके गृहस्पकि भाव शुद्ध बनेके लिए गृहस्पकि श्रेष्ठ प्रतिक्रमण पानिम्पण करता। भावार्थ-पगलाचरण करनका प्रपोजन विघ्नोंको शांत साना । विनाफा होना पापकर्षक उदय होता तया पंगलया अर्थी पापांका नाश करनेवाला है। मंशलफा भयं पाप और गर शब्दका अर्थ गळानवाला या नाश करनेवाला जो पापांका नाश कर उसीको मंगळ काते है। भगवान पचपरमेष्ट्री सर्वपज्य सर्वोत्तम है इसलिए इस - यावक- संसारमें वे ही मंगळरूप हैं। इसलिए आचार्यने सबसे पहले पंचपरमेष्ठीको नमस्कार किया है। आग इस संसारी जीवको समझाने हुए इसका स्वरूप दिखलाने हैं- भीमे भवाब्धौ भ्रमता त्वया हि कालो ह्यनन्तश्च वृथा व्यतीतः। प्रगाढ़मिथ्यात्ववशात्तथेह । बोधिन लब्धा भवभीतिही ॥ २ ॥ अर्थ-हे आत्मन् ! तू अनादिकाळसे अत्यंत भयंकर इस संसाररूपी महासागरमें परिभ्रमण कर रहा है और इस प्रकार परिभ्रमण करते करते अनतकाल व्यर्थ ही व्यतीत हो गया है। इस अनतकाळमें भी तेरे तीव्र मिथ्यात्वकर्मका उदय रहा है और इसी लिए तुझे आज तक इस संसारके जन्ममरणरूप भयको हरण करनेवाला रत्नत्रय आज तक प्राप्त नहीं हुआ है। भावार्थ-मोक्षका साक्षात् कारण रत्नत्रय है। वह रत्नत्रय शुद्धात्मस्वरूप है तथा उस शुद्धात्मखरूपको रोक नेवाला मिथ्यात्व कर्म है। इसीलिए इस संसारमें मिथ्यात्वके समान अन्य कोई भी पाप नहीं बतलाया है। यही मिथ्यात्व रूप महापाप आत्माके शुद्ध स्वरूपको प्रगट नहीं होने देता। इसलिए हे आत्पन् । यदि तू मोक्ष महलके अनंत सुख प्राप्त करना चाहता है तो मिथ्यात्वका त्याग कर और रत्नत्र- यको धारण कर। है प्रतिमामणगार- ३ आगे मंमाके दावोंका कारण बतलाते हैं। चित्ताक्षसोन्यन त्वया हतेन नाराधितः सात्यमयः स्वधर्मः । ततो ह्यसां मनसाप्यचिन्त्यं दुःग्वं च भुकं सहसादिजातम् ॥ ३ ॥ अर्थ---- आपन ! तु आजतक इन्द्रिय और पनके सुखाम ही लगा आ रहा है तथा इन काल्पनिक और झूठे मुखोंमें लंग रहने के कारण ही तने आजतक अन. तमुख देनेवालं आत्माके स्वभावरूप धर्मका आराधन नहीं किया है। हे आत्मन ! इसीलिए जिनको हम लोग कभी मनमे भी चितवन नहीं कर सकते ऐम अकस्मात् होनेवाले वा अन्य अनेक प्रकार के असह्य दुःख तुझे भोगने पड़े हैं। भावार्थ -यह आत्मा गत-दिन इन्द्रियोंको तृप्त करनेमें लगा रहता है। उसके लिए यह आत्मा अनेक प्रकारके हिमाहिक पाप उत्पन्न करता रहता है तथा उन पापोंक कर- नमें यहानक तल्लीन हो जाता है कि फिर आत्माके स्वभाव- रूप वर्मको मर्वया भूल जाता है । इस प्रकार यह आत्मा पापांका उत्पन्न करता रहता परन्तु करनेवाले वर्षको कभी धारण नहीं करता । इसीलिए यह आन्पा उन पाशंका उदय होनपर अनेक प्रकारक असाद्य दुख भोगना रहता है । वास्तवमं देखा जाय तो इन्द्रियाँका मुख मुग्व नहीं है । कल्पनाग उस झूठे मुग्वको मुख मान है पापोंको नाश - - 'श्रावक- 임 लेवा है । देखो किसी पुरुपको अधिक पिरचे वा अधिक खटाई खानेमें आनन्द होता है परन्तु अन्य कितने ही मनु- प्याको मिरच वा खटाईसे अत्यन्त अरुचि होती है यदि खटाई वा मिरचके खानेमें मुख होता है तो सबको होना चाहिये परन्तु सबको नहीं होता । जो पुरुप खटाई वा मिर- चके खानेमे सुखकी कल्पना कर लेता है वही पुरुष उसमें मुख मान लेता है। इससे सावित होता है कि वह मुख काल्पनिक है और इसीलिए मिथ्या है । वास्तविक मुख तो आत्मजन्य सुख है जो कभी नष्ट नहीं होता। अतएव हे आत्मन् । तू इन्द्रियों के पिथ्यासुखोंका त्याग कर जिससे कि ससारके समस्त दुःश्व छुट जाय और मोक्षके अनन्त सुखकी प्राप्ति हो जाय। आगे जन्म-मरणकी संख्या बतलाते है- लोके ह्यसारे वसता स्वयेति जन्मारिमृत्युः कतिपारमेव । कृतश्च तेषां गदितुं सुसंख्यां शक्रोपि शक्तो न सहस्त्रजिह्वः ॥ ४ ॥ सामान्यजन्तोश्च कथास्ति कान ज्ञात्वेति मोहं प्रविहाय सायाम् । कुर्वन्तु शुद्धिं स्वपरात्मनां को यतः पुनः स्यान्न च जन्ममृत्युः ॥ ५॥ ।
प्रतिक्रमणमा ५ अर्थ-डे आत्मन ! म असार ससारमं निवास करते तूने कितनी बार जन्म-मरण किया है। यदि उनकी संख्या गिननेके लिए हजार जिहाआंत्र धारण करनेवाले इन्द्रम भी कहा जाय तो वह भी उनकी सख्या नहीं कर सकता फिर भला माधारण मनुष्य की नो कथा हो क्या ? यही समझ कर ह आत्मन ! तू मोह और मायाका सर्वथा त्याग कर तथा अपने आत्माको सर्वथा शुद्ध कर । इस प्रकार अपने आत्माको शुद्ध कर लें पर संमारक अन्य जांचोको शुद्ध कर मा करनेस फिर तुझे जन्म-मरणके दग्व कभी नहीं भोगने पडंग। भावार्य हे आत्मन् ! तुन अनन्तानन्त काल तो नित्य निगोदमें व्यतीत किया, जिसमें एक-एक श्वाममे अठारह- अठारह बार जन्म-मरण धारण किया। यदि इन जन्म- मरणोंकी गिनती की जाय तो अनन्तानन्त ही होती है। यदि किसी पुण्य कर्मके उदयसे वहांस निकला तो पृथ्वीका यिक जलकायिक वायुकायिक अग्निकायिक वनस्पतिकायिक आदि स्थावर कायमें परिभ्रमण करता रहा। यदि किसी विशेष पुण्य कर्मके उदयमे त्रसकायमं जन्म लिया तो दोडन्द्रिय तेइन्द्रिय चौइन्द्रिय आदि विकलत्रयमें परिभ्रमण करता रहा । यदि पांचों इन्द्रियां प्राप्त हुई तो असैनी होकर परिभ्रमण करता रहा। भी प्राप्त हुआ तो उस मनसे अनेक प्रकारके पाप उत्पन्न कर नरकगति, निर्यचगति, मनुष्पगति और देवगति इन चारों - यदि मन - ६ श्रावक- गतियोंमें परिभ्रमण करता रहा। हे आत्मन् ! उन सर प्रकारके परिभ्रमण करनेमें जो जन्म-मरण धारण करने पहुं हैं उनकी संख्या इन्द्रिाटिकदेव भी नहीं कह सकते फिर भळा सामान्य मनुष्पकी तो बात ही क्या है ? इसलिए है आत्मन् ! यदि तू इन अनन्नानन्त जन्म-मरणांसे छूटना चाहता है तो सबसे पहले मोह और माका त्याग कर। क्यों कि इस मोह और मायाचारीमै ही इस संसारमै परिम- मण करना पडना है । मोह और मायाचारीके छूटनपर या वेरा आत्मा शुद्ध हो जायगा और आत्माके शुद्ध हो जानेसे फिर जन्म मरण कभी प्राप्त नहीं होगा। जन्म परणका प्राप्त न होना ही अनन्नसुख है और इमीको मोक्ष कहते हैं। आगे इसी घातको उदाहरण देकर बतलाते हैं- एकस्मिन् दुःखदे श्वासेऽष्टादशवारमेव को । जन्म मृत्युं त्वया नित्यं कुर्वता समयो वहुः ॥६॥ तैलिकमद्रतुल्येन व्यतीतः क्लेशदे भवे । त्यस्त्वा ज्ञात्वेति तद्धेतुं मृत्युन स्यात्तथा कुरु॥७॥ अर्थ-हे आत्मन् ! तूने इम संसारमे महादृरख दें- वाले एक-एक श्वासमें अठारह अटारह बार जन्म मरण किया है और इस प्रकार जन्म मरण करते हुए तून अनंतानंत काळ व्यतीत किया है । तैलिकमद्रके समान तेरा भी अनंतकाळ महादु खोमें ही व्यतीत हुआ है । यही समझकर हे आत्मन् उन गन्म मरणके कारणभन ह मिथ्यात्व और इंद्रियों के प्रतिक्रमणमार मुखाका त्याग कर जिससे कि फिर कभी भी जन्म मरणका महादःख न भोगना पडे। भावार्य-जिसप्रकार तेलीका ळ खॉ पट्टी बांध- कर घानीके चारों ओर घूमा करता है उसी प्रकार यह संसार्ग जीव भी मिथ्यात्व और मोहकी पट्टी बांधकर उस समारमें घूमा करता है । तेलीका बैल कोल्ह वा घानांके नागे ओर घूमता है और यह जीव चारों गतियोंमें घूमता है। अथवा जिस प्रकार तेलीका बैल घानीके चारों ओर घूमता हुआ ही अपनी आयु पूरी कर देता है, उसी प्रकार यह निगोदिया जीव भी एक-एक श्वासय अठारह-अठारह चार जन्म मरण करता हुआ अनतकाळ व्यतीत कर देता है। आंखोंपर पट्टी बांधनेमे जिम प्रकार उस तेलीक चळको कुछ दिग्वाई नहीं पडना उसी प्रकार तीन मिथ्यात्वके कारण इस जीवको भी अपने आत्माका हित दिखाई नहीं पड़ता। इस प्रकार हम जीवकी गनि ठीक तलीक बलक समान हो रही है। अन्नर कंवल इतना ही है कि बैल तो इस प्रकार दम वीस वर्ष ही घूमता है परंतु यह जीव अनतानं- तकाल नक बराबर वृपता रहना है । इसलिए है आत्मन् ! यदि न इस प्रकार नेलांका बैन नहीं बनना चाहता अथवा जन्म मरणसे छटना वा बचना चाहता है तो मोह और मिथ्यात्वका त्याग कर । पोह और मिथ्यात्वका त्याग कर देनमे ही यह जीव सदाके लिए जन्म-परणसे छूट जाता है। श्रागं त्रस पर्यायके परिभ्रमणको कहते हैं।
-श्रावक- --- ८ वित्रीन्द्रियादिपर्याये कर्मपरवशात्सदा । अन्योन्यभक्ष्यमाणस्त्वं मृत पादादिमर्दनात्।।८।। स्वयं दुःखी दरिद्री सन् कष्टं स्वायुर्व्यतीतवान् । ततस्त्यक्त्वेति तहेतुं वस त्वं स्वपदेऽमले ॥९॥ अर्थ-इसीप्रकार है आत्मन् ! तू कर्मक पराधीन होकर दो इद्रिय पर्याय उत्पन्न हुआ वहांपर तूने अनेक जीवोंको भक्षण किया अथवा अनेक जीवोंके द्वारा अनेक बार भक्षण किया गया नया कभी किसी के परके नीचं दबकर मर गया । फिर कितने ही काळके वाद चींटी चींटा आदि तडद्रिय पर्याय में उत्पन्न हुआ । वहापर भी अनक जीवाको भक्षण करता रहा अथवा अनेक जीवों द्वारा भक्षण किया गया तथा कभी किसीक परके नीचे दबकर अथवा अन्य किसी तरहसे यर गया । तदनंतर कितने ही काळक बाद मौरा, मक्खी आदि चौइद्रिय पर्यायमें उत्पन्न हुआ, वहां भी अनेक जीवोंको भक्षण करता रहा । अथवा अनेक जावों द्वारा भक्षण किया गया अथवा अन्य किसी तरहसे मारा गया। इन मव पर्यायाम जवतक जीवित रहा तपतक महादुःखी और सदा दरिद्री ही बना रहा तथा वडे दुःखोंसे अपनी आयु व्यतीत करना रहा। इसलिए हे आत्मन् ! यदि तू इन सब दुःखास वचना चाहता है तो इन पर्यायोंमें जन्म देनेवाले कारणोंका त्याग कर अपने आत्माके शुद्ध स्वरूपमें निवास कर । - प्रतिक्रमणसार- ९ भावार्थ-द्विइंद्रिय, तेइंद्रिय, चौइंद्रिय इन जीवोंको विकळत्रय कहते हैं। विकळत्रयकी अनेक योनियां हैं। इन सरप यह जीव बहुत कारतक परिभ्रमण करता है तथा अनेक प्रकारके पाप उत्पन्न करता रहता है । कमी अनेक जीवोंका घात करवाई, कभी अनेक जीवोंको खा जाता है और कभी अनेक जीवांक द्वारा खाया जाता है वा मारा जाता है। कभी कभी पानीमें बहकर मर जाता है, कभी अग्निमें जलकर मर जाता है, कभी चढे पशुओंके पैर के तले दवकर मर जाता है, कभी मिट्टीके ढेर में दवकर मर जाता है और कभी ईट पत्थरकी चोटसे मर जाता है । कहांतक कहा जाय, इन पर्यायों में यह जीव कभी सुखी नहीं रहता सदाकाळ जन्म-मरण के दुःख ही भोगा करता है । इसके सिवाय अपने जीवन में भी सदा- काळ भयभीत रहता है, सदाकाल दुखी-दरिद्री बना रहता है । आत्मज्ञान न होनेसे कभी भी अपना कल्याण नहीं कर सकता । यह आत्मज्ञान मनुष्य पर्यायमें प्राप्त हो सकता है। इसलिए हे आत्मन् ! अब तू मनुष्य-जन्म पाकर अपने आत्माकी शुद्ध पर्यायमें तल्लीन हो जिससे कि इन पर्यायों के समस्त दुःख छूट जाय और मोक्षका अनन्तमुख प्राप्त हो जाय। आगे पंचन्द्रिय जीवों के दुःख बतलाते हैं- पंचाक्षपर्यायचये प्रमूढो दीनो दरिद्री विकलांगधारी।
१० -भावकma क्रोधी प्रमादी व्यसनी विकारी सन्नेव पाप्माऽखिलदुखपात्रः ॥ १० ॥ व्यतीतवांस्त्वं समय ह्यनन्तं तथापि लब्धो न निजस्वभावः । ज्ञात्वेति तत्त्यागविधिविधेयः स्यान्नाक्षपर्यायमतिर्यतस्ते ॥ ११ ॥ अर्थ-जब किसी विशेष पुण्यकर्मका उदय होता है तब इस जीवको विकलत्रयकी पर्याय छूट कर पंचेन्द्रियकी पर्याय माप्त होती है । पचेन्द्रिय पर्यायको पाकर भी यह जीव अत्यन्त मूर्ख होता है, दीन होता है, दरिद्री होता है, अग उपांगोंसे रहित होता है, अत्यत क्रोधी होता है, प्रमादी वा आकसी होता है, अनेक व्यसनोको सेवन करनेवाला होता है, मोह, मद, माया, काम आदि अनेक विकारोंको धारण करनेवाला होता है, महापापी होता है और समस्त दुखौंको भोगनेवाला होता है। इस प्रकार हे आत्मन् ! तूने अनन्त- काल व्यतीत किया, तथापि तुझे अपना निज स्वभाव प्राप्त नहीं हुआ। इन सब बातोंको समझ कर हे आत्मन ! तू इस प्रकार त्याग कर जिससे कि तेरी बुद्धि इन्द्रिय पर्यायरूप न हो। भावार्थ-यह जीव जिस पर्यायमें जाता है उसी पर्यायको अपना स्वरूप मान लेता है। मनुष्य पाकर भी कभी-कभी तो यह अज्ञानी, जीव यह भी नहीं समझता कि मैं मनुष्य हूं। मुझे मनुष्योचित कार्य ही करने पर्यायको प्रतिक्रमणसार- ११ चाहिए । इन सब बातोंको न जानकर वह अपनी समस्त पर्यायमें पशुओं के समान ही अन्याय और अभक्ष्य-भक्षण करता हुआ अपना जीवन व्यतीत करता है । यदि शुभ कर्मके उदयसे अच्छे निमित्त मिल जाते हैं और वह पढ लिख कर अपने मनुष्य जीवनको समझने लगता है तो विना आत्मज्ञानके केवल ऐहिक कार्यों में ही फंसा रहता है। आत्मज्ञान के विना इसकी बुद्धि विपरीतरूप परिणत हो जाती है तथा विपरीव बुद्धि हो जानेके कारण यह जीव अपने स्वार्थमें अंधा हो जाता है । केवल इन्द्रियोंके मुखके वशीभूत हो जाता है, उन इन्द्रियोंके मुखोंकी प्राप्तिके लिए अनेक प्रकारके अन्याय करता है, निर्वक प्राणियोंका नाश करता है, उनका धन लूट लेता है, उनका देश लूट लेता है और उनको और अधिक निर्वक बनाकर उनका नाश कर देता है । यदि कारणवश उस विपरीत बुद्धिमें तीव्रता वा चंचलता प्राप्त हो जाती है तो फिर वह उसका प्रयोग जीवोंके संहार कार्योंमें ही करता रहता है। उसके लिए अनेक प्रकारके यंत्र-तंत्र बनाता है। इस प्रकार आत्म- ज्ञानके विना यह जीव अपना समस्त जीवन पापकार्यों में ही व्यतीत करता रहता है और उन पापोंके फलसे नरक निगोदके दुःख भोगता रहता है । इन सब दुःखोंका कारण अपने आत्माके स्वरूपका ज्ञान न होना तथा पर्यायमें ही आत्माका स्वरूप मान लेना है। इसलिए है आत्मन् ! यदि तू इन दुःखोसे बचकर आत्मजन्य अनंतमुखोंमें लीन होना चाहता है तो -धावक- -- १२ पर्याय-बुद्धिका त्याग कर तथा अपने आत्माके स्वरूपको समझा आत्माका स्वरूप समझ केनेसे आत्माके क्रोध, मान, माया, लोम आदि कर्मजन्य विकार सब छूट जाते हैं तथा इन विकारोंके छूट जानेसे फिर यह आत्मा पापोंमें कभी लिस नहीं होता । इस प्रकार पापोंसे छूटकर यह आत्मा अपने आत्माका स्वरूप चितवन कर शुद्धामस्वरूप परमात्मा धन जाता है और समस्त कौंको नष्ट कर मोक्ष प्राप्त कर लेता है। आगे फिर भी इस मनुष्यका कर्तव्य बतलाते हैं- मिथः सदा वैरविरोधयोगा- इन्ता स्वयं सन् भुवि हन्यमानः । दुःखं च सोढुं समयेऽसमर्थ- स्ततो रुदन्नेव च यत्र तत्र ॥ १२ ॥ व्यतीतवान् हन्त वृथा निजायु- ख़त्वेति तत्त्वाद्विकृतेर्विरूपम् । त्यक्त्वा मिथो वैरविरोधभावं सर्वैश्च सार्द्धं कुरु मैत्रिभावम् ॥ १३ ॥ अर्थ-हे आत्मन् ! देख, इस संसारमं परस्पर एक दूसरेके साथ वैर विरोध रखनेसे कभी तो यह स्वयं दूसरे जीवोंको मार देता है क्या कभी दूसरों के द्वारा स्वप मारा जाता है। इस वैर विरोधके कारण जो दुःख भोगना पडता है अथवा वैर विरोध या मारपीट के कारण बंधे हुए प्रतिक्रमणसार- १३ कोंके उदयसे जो दुःख भोगना पडता है उसमें असमर्थ होकर यह जीव इधर उधर रोता हुआ बडे कष्टसे अपनी आयु व्यतीत करता है । हे आत्मन ! इस प्रकार वैर विरोध- रूप विकारके अशुभरूपका यथार्थस्वरूप समझ लेना चाहिये और फिर परस्परके वैर विरोधका सर्वथा त्याग कर सव जीवोंके साथ मित्रता धारण करना चाहिये । भावार्थ-वैर वा विरोध दो प्रकारका होता है। एक जन्मसे होनेवाला वैर विरोध और दूसरा निमित्त कारणोंसे होनेवाला वैर विरोध । चिल्ली कुत्ताका वा विल्ली चूहोंका जो वैर है वह जन्मसे ही होनेवाला वैर है। यह जन्मसे होने- वाला वैर विरोध पहले जन्मोंके संस्कारसे ही होता है । जब कभी दो मनुष्य वा पशु किसी वातपर लटते-लढते मर जाते हैं तब चे दोनों ही भिन्न भिन्न ऐसी योनियों में उत्पन्न होने जिनमें कि परस्पर जन्मसे ही वैर विरोध होता है। जो वैर विरोध एक बार बंध जाता है उसका संस्कार अनेक जन्मांतक विद्यमान रहता है । देखो! कमठने स्वयं अन्याय किया था, अपने भाईकी स्त्रीके साथ दुर्व्यवहार किया था तथा प्रगट होनेपर राजाने उसको देश निकालेका दंड दिया या । यद्यपि उसके भाईके हृदय में बदला लेने की कोई इच्छा नहीं थी और न उसने बदला लेनेका मयल ही किया था। वह तो उल्टा उससे क्षमा प्रार्थना करने गया था, परंतु कम- के हृदयमें भाईके प्रति दुर्भावना भर रही थी वह समझता था कि इसने ही राजासे कहकर मुझे दंडित कराया है । इस -धावक- १४ लिए वह सदा अपना बदला लेने की धुनमें रहता था। इसी धुनमें उसने अपने माण छोडे थे और उस परके सरकार के कारण कई जन्मतक अपने भाईके जीवको मारता रहा था। इससे सिद्ध होता है कि इस वैर विरोधका संस्कार अनेक जन्मांतक पना रहता है । उस संस्कारके कारण इस जीवके परिणाम सदा मलिन और पापरूप ही बने रहते हैं। इस मकार पापोंकी परम्परा बनी रहने के कारण यह जीव अनन्त काशनरकादिक महादःख भोगता रहता है। हे आत्मन् ! यदि तुइनबहादुःखोंस बचना चाहता है तो किसीके साथ भी और विरोध मत कर, सबके साथ मित्रता धारण कर "झसे किसी जीवको भी किसी प्रकारका दुःख न पहुंच" इस प्रकारके परिणामोंको मित्रता कहते हैं। यह मित्रताका भाव सर्वोत्कृष्ट भाव कहलाता है । इस मित्रताके भावको धारण करनेवाला कोई भी जीव किसी प्रकारकी हिंसा नहीं कर सकता, न किसीके साथ झूठ बोल सकता है, न किसीकी चोरी कर सकता है, न परस्त्री-सेवन वा वेश्या-सेवन कर सकता है और न अधिक परिग्रहकी तृष्णा धारण कर सकता है। इस प्रकार एक मित्रताके धारण करनेसे यह जीव समस्त पापोंसे बच जाता है। अतएव सर प्रकारके वैर-विरोधका त्याग कर समस्त जीवोंके साथ मित्रता धारण करना प्रत्येक श्रावकाका कर्तव्य है। आगे परिग्रहको तृष्णाको हटानेका उपदेश देते हैं- पिता प्रियश्चैष सखापि बन्धु-- मातापि मान्या भगिनी सुशीला ।
प्रतिक्रमणसार- १५ भार्या मनोज्ञा खजनोऽपि शत्रु- दासी च दासः सचिवोऽपि सैन्यः ॥१४॥ गजाश्वहम्य मणिरत्नराज्यं न याति सार्द्ध किमपि त्वया हि। ज्ञात्वेति तेषां प्रविहाय चिन्तां कुरु स्वशुद्धिं हि भवेत्स्वसिद्धिः ॥ १५ ॥ अर्थ है आत्मन् ! देख, तेरा पिता तुझपर बहुत प्रेम करता है, यह तेरा भाई तुझपर प्रेम करता है, तेरी यह माननीय माता तेरा सबसे अधिक उपकार करती है, तेरी यह सुशीला बहिन सदाकाक तेरा भला चाहती राती है, तेरी यह सुन्दरी श्री सदाकाल तुझपर न्योछावर हुमा करती है, यह तेरे परिवारके ढांग मदा तेरा उपकार करते रहते हैं, यह तेरा शत्रु, यह तेरा दास या दासी, यह तेरी बडी विशाल सेना, ये तेरे मंत्री, ये तेरे हाथी, घोडे, महल, मणियां, रत्न, राज्य आदि जितनी विभूति हैं वे सब तरी शोभा बढा रही हैं परन्तु जब तेरी आयु पूर्ण हो जाती है और जब तु परलोकके लिए गमन करने लगता है तब इनमेंसे कोई भी पदार्थ तेरे साथ नहीं जाता। लाख प्रयत्न करनेपर भी कोई भी तेरे साथ नहीं जा सकता। यही सब समझकर हे आत्मन् ! तू इस सब प्रकारके परिग्रहकी चिंताका त्याग कर दे तथा परिग्रहके चिंताका त्याग कर -श्रावक- १६ अपने आत्माको शुद्ध कर जिससे कि तेरे आत्माकी शुदि प्राप्त हो और मोक्षकी प्राप्ति हो । भावार्थ:-इस ससारमे गृहस्थावस्था एक प्रकारका जेलखाना है। जिस प्रकार जेलखाना चारों ओरसे घिरा रहता है उसी प्रकार चारों ओरसे घिरा हुआ घर ही जेल- खाना है, सुन्दर स्त्री पविमे पडी हुई वेडियोंके समान है। जिसमकार घेही पड जानेसे कैदी भाग नहीं सकता उसी प्रकार स्त्रीके रहते हुए प्रत्येक गृहस्थ घरको नहीं छोड सकता । जिसप्रकार कोई-कोई शूरवीर मनुष्य उन बेडियोको तोडकर भाग जाता है उसी प्रकार विरला शूर-वीर पुरुष ही स्त्रीका मोह छोडकर जिनदीक्षा धारण कर लेता है । जिस प्रकार जेलखानेमें पहरेदार लोग पहरा लगाया करते हैं जिससे कि कोई कैदी भाग न सके, उसी प्रकार गृहस्था- वस्थामें भी कुटुम्बके लोग सब पहरेदार हैं। जिस प्रकार पहरेदार समय पूरा होनेपर बदल जाते हैं उसी प्रकार सम- यानुसार पहरा देनेके लिए पिताके स्थानपर पुत्र-पौत्र आ जाते हैं। इस प्रकार गृहस्थावस्था महा दुःखका कारण है तथापि जिस प्रकार पुराना कैदी उसी जेलखानेमें आनंद मानता है उसी प्रकार ये ससारी जीव अनादि. काळस इसी ओळखानेमें पड़े रहने के कारण इसीमें आनन्द मान रहे हैं। जब वे पुराने कैदी अपना स्वरूप समझते और उन्हें अपने घरकी याद आती है तब वे कैदी वहांसे भागनेका प्रयत्न करते हैं । इसी प्रकार जब यह आत्मा
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प्रतिक्रमणसार-
अपने आत्माका स्वरूप समझ लेता है और जब इसे अपने
मोक्षमहलकी याद आती है तभी यह जीव इस संसारसे
निकलने का प्रयत्न करता है। जिस प्रकार किसी कैदीको
जब दूसरे जेलखानेमें ले जाते हैं तब न तो जेब्खाना साथ
जाता है और न पहरेदार ही साथ जाते हैं। उसी प्रकार
जब यह जीव दूसरी पर्यायमे जाता है तब न तो घर, देश,
रत्न आदि विभूति साथ जाती हैं और न कुटुम्बके कोग
साथ जाते हैं। यही सब समझकर हे आत्मन् ! जिस प्रकार
कैदी उस जेकखानेकी वा पहरेदारोंकी चिंता नहीं करता
उसी प्रकार तू भी कुटुंब वा विभूतिकी चिंता मत कर।
सबकी चिंता छोड़कर अपने आत्माका स्वरूप चितवन कर ।
यही अपनी आत्माकी विभूतिका तथा अनंत सुखका
साधन है । इसीसे मोक्षकी प्राप्ति होती है।
आगे मृत्युको जीतने के लिए कहते हैं-
धर्म विना मृत्युमुखात्रिलोक
इन्द्रोपि चन्द्रो ह्यगदः खगेन्द्रः ।
मन्त्रोपि मन्त्री न च यन्त्रतन्त्रं,
राजापि राज्यं वरदा च यक्षी ॥ १६ ॥
शको न च स्यादवितुं फणीन्द्रो
ज्ञात्वेति मृत्योर्यततां जयार्थम् !
न स्याद्यतस्ते मरणस्य चिन्ता
हे, वत्स चैवं मम.सम्मतोस्ति ॥१७॥
,
१८
अर्थ-जब यह जीव मरने कगता है तब इसको मृत्युके
मुखसे न तो इद्र बचा सकता है न चन्द्रमा वचा सकता है,न
महावैध बचा सकता है, न कोई विद्याधर बचा सकता है, न
मंत्र बचा सकता है, न मत्रको जाननेवाला बचा सकता है,
न यंत्र तंत्र वचा सकते है, न राजा बचा सकता है, न राज्य
बचा सकता है, न वर देनेवाली यक्षिणी बचा सकती।
और न नागेंद्र बचा सकता है । धर्मके सिवाय तीनों लोकोंमें
ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जो मृत्युके मुख से इस जीवको बचा
सके । एक धर्म ही ऐसा पदार्थ है जो इस जीवको मृत्युके
मुखसे बचा सकता है। यही समझकर हे वत्स 1 हे प्रिय
शिष्य ! इस मृत्युको जीतनेका प्रयत्न कर जिससे तुझे फिर
मरनेकी चिंता न रहे । हे पुत्र ! यही मेरा उपदेश है ।
भावार्थ-आयुकर्मके उदय होनेको जन्म कहते है और
उस आयुफर्मके पूर्ण होनेको मरण कहते हैं। इस शरीरकी
स्थिति आयुकर्मके आधीन है। जब तक आयुकर्म रहता है
तब तक ही यह शरीर बना रहता है, आयुकर्मके पूर्ण होनेपर
यह शरीर नष्ट हो जाता है । जिस समयमें आयकर्मका वर्ष
होता है उसी समयमे उस आयुकर्मकी स्थिति भी बंध जाती
है । वह स्थिति कभी भी किसी अवस्थामें भी बढ नहीं
सकती। हां, निमित्त मिलनेसे घट सकती है वा घट जाती
है । इससे यह पात सहज रीतिसे समझमें आ जाती है कि
जब इस जीवका आयुकर्म पूर्ण हो जाता है अर्थात् यह जीन
जब मरने लगता है तब इस जीवका कोई नहीं बचा सकता
प्रतिक्रमणसार- १९ कोई भी इन्द्र, देवेन्द्र, चक्रवर्ती, अरहंत, सिद्ध वा अन्य कोई परमेष्ठी इस जीवको मरनेसे नहीं बचा सकता । औरोकी तो बात ही क्या, ये इंद्र, देवेंद, चक्रवर्ती आदि भी अपनी आयु भी नहीं बढ़ा सकते | यदि इन तीनो लोकोंमें इस जीवको मरनेसे बचा सकता है तो एक धर्म ही बचा सकता है। धर्म सेवन करनेसे वा रत्नत्रयका पालन करनेसे अथवा तपश्चरण वा ध्यान करनेसे यह जीप समस्त कर्मोंको नष्ट कर सिद्ध वा परमात्मा बन सकता है। इस प्रकार समस्त कर्मों के साथ साथ आयुकर्म भी नष्ट हो जाता है और उसके सर्वथा नष्ट होनेसे फिर कभी भी उसका बंध नहीं हो सकता। इसका भी कारण यह है कि कोंकी स्थिति कषायोंके निमित्तसे होती है तथा तपश्चरण वा ध्यान करनेसे कषायोंका सर्वथा. नाश हो जाता है । अथवा यो कहना चाहिए कि कपायोंका नाश होना ही धर्म है । कपायोंके अभावको ही वीतराग अवस्था होनेपर फिर किसी भी कर्मकी स्थिति नहीं बंध सकती । इसमकार धर्मके धारण करनेसे अनुक्रमसे सिद्ध अवस्था प्राप्त होनी है और सिद्ध अवस्था प्राप्त होने पर फिर कभी भी जन्म-मरण नहीं हो सकता। इसलिए मृत्युको जीतने के लिए धर्म धारण करना ही इस जीवका एक मात्र कर्तव्य है। आगे श्रेष्ठ गुरुको पाकर कभी प्रमाद नहीं करना चाहिए ऐसा दिखलाते है- 5 -भावक- २० नृजन्म लब्ध्वा स्वविवेकदं वा, सुदुर्लभं श्रेष्टगुरुं कृपाब्धिम् । कदापि चित्ते, कुरु मा प्रमाद, क्षमस्व लोकस्थितसर्वजीवान् ॥१८॥ तथामृते यक्ष विषप्रदाने, दुःखप्रदात्रे स्वसुखं सदैव । यतो भवेत्ते निजराज्यलक्ष्मी- दासीव भक्त्याऽखिलकार्यकीं ॥ १९ ॥ अर्थ-इस संसारमें मनुष्य जन्मकी प्राप्ति होना अत्यन्त कठिन है। यदि किसी विशेष पुण्यकर्मके उदयसे उस मनुष्य जन्मकी प्राप्ति हो जाय और फिर उसी मनुष्य जन्ममें अपने आत्मज्ञानको देनेवाले, अत्यन्त दुर्लभ और कृपाके सागर ऐसे श्रेष्ठ निग्रंय गुरुकी प्राप्ति हो जाय तो फिर इस मनुष्यको अपने हृदयमें कभी प्रमाद नही करना चाहिए। तीनों लोकोमें जितने जीव हैं उन सबको क्षमा कर देना चाहिए। जो तेरे लिए विष देता हो उसे अमृत देना चाहिए और जो तुझे दुःख देवा हो उसे सदा आत्मजन्य सुख देते रहना चाहिए । यदि तु ऐसे ही कार्य करता रहेगा तो समस्व कार्योको सिद्ध करनेवाली स्वराज्यरूप मोक्षलक्ष्मी दासीके समान भक्ति- पूर्वक तेरे समीप आजायगी। भावार्थ-इस संसारमें यह जीव अनेक पयायोंमें परिभ्र- । प्रतिक्रमणसार- २१ मण करता रहता है। परन्तु उन सब पर्यायोंमें मनुष्य पर्याय ही एक ऐसी है जिसमें यह जीव अपना कल्याण कर सकता है। शेष किसी पर्याय में यह जीव अपना कल्याण नहीं कर सकता । देखो ! निगीदमें तो एक अक्षरका अनन्तवा भाग मात्र ज्ञान रहता है उससे वह कुछ कर नहीं सकता। पृथ्वी- कायिक, जककायिक, वायुकायिक, अग्निकायिक, वनस्पति- कायिक जीवोंमें भी ज्ञानकी मात्रा बहुत ही कम रहती है, इसलिए वहां भी यह जीव अपना कल्याण नहीं कर सकना। दीन्द्रिय तेइन्द्रिय चौइन्द्रिय पर्यायमें भी ज्ञानकी मात्रा बहुत कम है, इसलिए वहां भी यह जीव अपना कल्याण नहीं कर सकता । असैनी पंचेन्द्रियमें मन न होनेसे यह जीव अपने कल्याणका विचार भी नहीं कर सकता। सैनी पंचेन्द्रियों में पशु पक्षी कुछ कर ही नहीं सकते, नारकी कुछ कर नहीं सकते, देव लोक सम्यक्त्व प्राप्त कर सकते हैं परन्तु चारित्र धारण नहीं कर सकते । इस प्रकार विचार करनेसे सिद्ध होता है कि सिवाय मनुष्यके और कोई भी अपना कल्याण नहीं कर सकता तथा यह भी निश्चित सिद्धांत है कि मनुष्य पर्याय बढी कठिनतासे प्राप्त होती है । ऐसी कठिनतासे प्राप्त होनेवाली मनुष्यपर्याय प्राप्त कर लेनेपर भी वीसराग निय गुरुओं का समागम बहुत ही बडे शुभ कर्मके उदयसे होता है। ऐसे निग्रंथ गुरुभोंके समागमको भी जो मनुष्य प्रमाद करता है, अपने आत्माका कल्याण नहीं करता वह . भपने मनुष्य जन्मको व्यर्थ ही खो देता है। एक बार खोया r 1 ।
- . -थाचक- २२ हुआ मनुष्य जन्म फिर बार-बार नहीं मिलता। इसलिए मनुष्य जन्म पाकरकं प्रत्येक श्रावकको समस्त जीवापर दया भाव धारण करना चाहिये, सबको क्षमा कर देना चाहिए सवको सुखी बनानेका प्रयत्न करना चाहिये और सबको श्रेष्ठ उपदेशरूपी अमृतका दान करते रहना चाहिए तथा अंतमें गृहस्थावस्थाका त्याग कर ध्यान तपश्चरणके द्वारा समस्त कर्मोंका नाश करना चाहिए और इस प्रकार मोक्ष प्राप्त कर लेना चाहिए । मनुष्य पर्याय प्राप्त करनेकी यही सफलता है। आगे कृतयोंके मानने, अपनी प्रशंसा करने और पर- निन्दा करनेका निषेध करते हैं। अज्ञानतः पक्षविमूढतो हि। मत्वेत्यतत्त्वे वरतत्त्वमेव ॥ घोरं च पापं कृतवान् किलात्मन् । निजप्रशंसां परजीवनिन्दाम् ॥ २० ॥ तत्यापशान्त्यै च ततो विरुद्धं । कुरु प्रमोहं प्रविहाय निंद्यम् ॥ कृतापराधस्य यतो विनाशः। सुतत्त्वलाभः सुखदो भवेत्ते ॥ २१ ॥ अर्थ-हे आत्मन् ! तूने अपने ज्ञानके कारण अथवा किसी पक्षपातमें फस जानेके कारण कुतत्वोंको ही श्रेष्ठ प्रतिक्रमणसार- २३ तत्त्व माना तथा कुतत्वोंको श्रेष्ठ तत्व मानकर अनेक प्रकारके घोर पाप किए, अपनी प्रशसाकी और दूसरोंकी निंदा की । इन सब पापोंको नाश करने के लिए हे वत्स! अत्यन्त निंदनीय ऐसे मोहका त्याग कर तथा कुतत्त्वोंके माननेका त्याग कर, अपनी निंदा कर और दूसरोकी प्रशंसा कर । हे शिष्य ! ऐसा करनेसे ही तेरे किए हुए पापोंका नाश होगा और सुख देनेवाले श्रेष्ठ तत्वोंका काम होगा। भावार्थ-इस ससारमें तत्व दो प्रकारके है, एक जीप तत्व और दूसरा अजीव तत्व । इन दोनोंमें जीव तत्व मुख्य है, अजीव तत्व गौण है । जीव तत्व उपादेय वा ग्रहण करने योग्य है और अजीव तत्व हेय वा त्याग करने योग्य है। इस प्रकार तत्वोंके स्वरूपको जानना सम्यग्ज्ञान कहलाता है तथा इससे विपरीत मानना अथवा आत्मतत्वका नहीं मानना केवक भौतिक पदार्थों को ही मानना मिथ्याज्ञान वा अज्ञान कहलाता है। देखो जो अपने स्वरूपको प्रकाशित करता हुआ अन्य पदार्थोको प्रकाशित करता है उसको दीपक कहते हैं। उसी प्रकार जो अपने आत्माके स्वरूपको जानता हुआ अन्य पदार्थों स्वरूपको जानता है वही ज्ञान कहलाता है । जो ज्ञान अपने आत्माके स्वरूपको नहीं जानता वह अन्य पदार्थोंके स्यरूपको यथार्थ रीतिसे नहीं जान सकता । यही कारण है कि आत्मज्ञानके विना जितना ज्ञान है वह सब मिथ्या-ज्ञान वा अज्ञान कहलाता है । जहाँ ऐसा अज्ञान होता है वहींपर अनेक ' प्रकारके पक्षपात thor २४ होते हैं तथा वहींपर कुतत्वोंको ही तत्व मान लिया जाता है। जहां कुतत्वांको ही तत्व मान लिया जाता है, वहापर अपनी प्रशसा करना और दूस- रोंकी निंदा करना तो छोटीसी बात है तथा इन सब कारि करनेसे महापाप उत्पन्न होता ही है । वह महापाप उत्पमा न हो इसके लिए हे आत्मन् | तू आत्मतत्वको ही उपादेय तत्व मान, इसीफे यथार्थ स्वरूपका श्रद्धान कर तथा उसीके स्वभावरूप आचरण कर । ऐसा करनेसे पाक किए हुए पाप भी सब नष्ट हो जाते हैं, अपनी प्रशंसा और परनिंदा भी छूट जाती है और अत्यंत निंदनीय यह मोह भी छूट जाता है । इस प्रकार मोहके छुट जानेसे आत्माके यथार्थ स्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है और आत्माके यथार्थ स्वरूपकी प्राप्ति होनेसे अनंत सुस्वरूप मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। आगे अमक्ष्यभक्षणके त्यागको कहते है- जिह्वाप्रलोभान्मधुमद्यमांसं । घृणास्पदं धर्मविनाशकं हि ॥ नियं सदा को व्यसनं व्यथादं । कुसंगतः सेवितवान् ह्यभक्ष्यम् ॥ २२ ॥ आत्मन्नतस्त्वं व्यसनस्वरूपं । जिलाप्रलोभाद्धि भवां स्वहानिम् ।।
प्रतिक्रमणसार- २५ ज्ञात्वेति मुक्त्वा कुरु चात्मशुद्धिं । यतस्तवात्मेति भवेत्पवित्रः ॥ २३ ॥ अर्थ-हे आत्मन् ! देख ! तून जिहा इंद्रियके स्वाद के लोभसे अत्यंत घृणित और धर्मको नाश करनेवाले मा पांस और मधु वा शहतका संवन किया। यह मद्य पांम मधुका सेवन करना एक प्रकारका व्यसन है जो कि अत्यंत निंद्य है, अभक्ष्य है और महादःख देनेवाला है। यह पद्य मांस मधुका सेवन करनरूप व्यसन तूंन नीच लोगोंकी मग- तिस किया । अतएव है आत्पन ! तु मम पहले व्यमनोका स्वरूप समझ फिर जिहाक स्वादक लोभस होनेवाली हानि- को देख । इन दोनोंका त्याग कर तथा इनके सपान अन्य विकारांका भी त्याग कर, अपने आत्माको शुद्ध बना जिससे कि तेग आत्मा अत्यत पवित्र हा जाय । भावार्थ-आत्माको शुद्ध करनेवाले आत्माकं शुद्ध भाव हैं। जिस आत्माका शरीर शुद्ध होता है उसके भाव भी शुद्ध होते हैं तथा जिसका शरीर अशुद्ध होता है उसके भाव भी अशुद्ध होते हैं । इस शरीरके बनने और बढनमें यदि कारण मायग्री अशुद्ध होती है तो वह शरांर भी अशुद्ध होता है तथा शरीरकं चनने वा बढनके साधन यदि शुद्ध होते हैं ना गर्गर भी शुद्ध ही होता है । शरीरके पननेके साधन माना पिताका रजो वीर्य है। यदि माता पिताका रजो वीर्य शुद्ध होता है तो शरीर भी शुद्ध चनता है । जिन माता पिताके कुकर्म परंपरासे सदाचार चला आता है उन धावक- - २६ माता पिपाका रजो बीर्य शुद्ध कहलाता है नया जिन माता पिताओंके कुलमें परंपरासे व्यभिचार वा घरेजा होता है उनका रजोवीर्य अशुद्ध गिना जाता है। इसी प्रकार हम लोग जो भोजन करते हैं वह भी शरीरकं चढनका कारण है। यदि हम लोग शुद्ध भोजन करते हैं यहां तक कि शूद्रक हायका जल तक ग्रहण नहीं करते तो समझना चाहिए कि उस शुद्ध रजो वीर्यसे बना हआ शुद्ध शरीर उस शब्द भोज- नसे वढनपर भी शुद्ध ही बना रहेगा । यदि हम लोग मय मांसादिकका सेवन करने है नो गद्ध रजो वीर्यम उत्पन्न हआ शुद्ध शरीर भी उन मद्य पांसादिक अशुद्ध पदाथोंक सेवन करनेसे अवश्य ही अशुद्ध हो जाता है | जहां शरीरकी अशुद्धता होती है वहांपर परिणामोपे अशुद्धता होना स्वाभा- चिक है। इसीलिए इन पद्य यांसादिक सननको धर्मका नाश करनेवाला बतलाया है। इसके मिवाय ये पदार्थ अत्यत घृणित हैं. देवने योग्य भी नहीं हैं अनेक जीवोंका घान करनेसे उत्पन्न होते है। इनके सेवन करनेसे क्षणभरक लिए जिहाका स्वाद भले ही पिल जाय परतु वह क्षणभरका म्बाद अनन दावोको देनेवाला होता है। इपलिए हे आत्मन | तू उनके मेवन करनेका सर्वथा त्याग कर । इनका त्याग करनेसे शरीर पवित्र होता है और शरीरक पवित्र होनेसे आत्मा पवित्र होता है। आगे व्रतोप दोप लगनेपर क्या करना चाहिए मो दिखलाते हैं प्रांतामणमार- गुरूपकंठादतिदुर्लभं को, वनं गृहीत्वा सुखदं पवित्रम् । प्रमादयोगाद्यदि भजितं चेत् टोपीकृतं मोहवशात् त्वया वा ॥ २४ ॥ तच्छ्रुहिमवं विधिना हि कृत्वा पुनर्वतं पालय तद्विमुक्तम्। यतो भवेने कृतकृत्यजन्म, दृढं मनोपि वनशीलधमें ॥ २५ ॥ अर्थ-इम मंमार व्रतोंका पालन करना अत्यन्त दुर्लभ है । यदि ने व्रत नीतगग निय गम्मे धारण किए जाय तो उनकी पहिया और भी बह जानी है । एमे व्रत सदाकाक मृग्व देनेवाले और पवित्र होने हैं । म अत्यंत पवित्र और मुग्व देनवाल नया अत्यंत दर्लभ व्रताको वीतगग निग्रंथ गम्मे धारण करके यी पदि हे आत्मन ! तूने प्रमादक वशी भृत होकर उनका भग किया हो अथवा मोहके वशीभूत होकर उनमें कोई दोष लगाया हो तो हे शिष्य ! त धमकी शुद्धि विधिपूर्वक कर और उन व्रतांको फिरसे धारण कर, निर्दोष गतीम पाटन कर । ऐसा करनेसे ही तंग यह जन्म कृतकृत्य वा कृतार्थ हो जागगा और तरा पन भी वन शीळ और घपके पालन करने में अत्यत दृढ हो जायगा । भावार्य-प्रथम नो श्रेष्ठ गुरूओंका ममागम मिलना ही -श्रावक- २८ अत्यंत कठिन है, किमी श्रेष्ठ शुभ कर्मके उदयसे ही गुरुओंका समागम मिळता है। एसा गुरुओका समागम मिळनेपर तथा उनमे निर्मल व्रत ग्रहण कर ग्रहण कर लेनेपर फिर उन तोको यह प्रयत्नसे पालन करना चाहिये । शास्त्राय लिखा है " विपर्य व्रतपादेयमात् पाल्यं प्रयत्नतः " अर्थात् व्रतोंको विचारपूर्वक धारण करना चाहिए । ग्रहण किये हुए ब्रोंको प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिए । इसका अभिपाय या है कि जो व्रत धागण करते है उनसे आत्माका कल्याण होता है वा नही । संसारमें व्रतकं नामसे बहुतसे ऐसे व्रत प्रचलित हैं जिनको धारण करनेपर भी लोग कन्द मूळादि- कका भक्षण करते हैं । ऐसे व्रतोंके पालन करनेसे कर्मोका नाश नहीं होता किन्तु कन्दमूलादिकका भक्षण करनेसे कर्मोंका ही बंध होता है। इसलिए ऐसे व्रतोंस कोई लाभ नहीं होता । व्रत उन्हींको कहते हैं जिनमें हिंसादिक पापोंका त्याग हो जाय और राग द्वेषादिक विकारोंका त्याग हो नाय । हिंसादिक पापा त्याग हो जानेसे पा राग द्वेपादि- कका त्याग हो जानेसे ही कौंका नाश होता है। ऐसे व्रत वीतराग निग्रंथ गुरु ही दे सकते हैं। अन्य सरागी, परिग्र- हको धारण करनेवाळे गुरु न तो ऐस व्रत पालन कर सकते हैं और न दूसरोंको दे सकते हैं। इसलिए वीतराग श्रेष्ठ गुरु- ओसे ही व्रत धारण करने चाहिए तथा ऐसे गुरुओंसे धारण किए हुए व्रतोंको प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिए। उनमें न तो किसी प्रकारका दोष लगाना चाहिए और न उनको प्रतिक्रमणसार भंग करना चाहिए । यदि कदाचित किसी-प्रमादसे वा मोहसे किसी वतयं दोष लग जाय वा कोड व्रत भग हो-जाय तो सानधान होकर विधिपूर्वक उसका प्रायश्चित्त लेना चाहिए तथा मायश्चित्त लकर फिर वतीको दोषरहित पालन करते रहना चाहिए। इस प्रकार निदोष व्रता पालव करनेसे ही श्रावकका जन्म कृतार्थ गिना जाना है तथा इस प्रकार व्रतोंक पालन करनेसे मन भी उन व्रता नथा धर्म वा शोळ पालन फग्नप अत्यन्न दृढ हो जाता है। अगे कुगुरुओंके मम्बन्धकं त्यागको कहते हैं- भ्रांतिप्रदे क्लेशकरे निगोटे श्रभ्र व्यथादे कुगुरोः प्रसंगात् । तिर्यग्गतो निंद्यतरे कुयोनी प्रतिक्षण प्राणहर भवाब्धी ॥ २६ ॥ हा मद्गुरोस्त्वं भ्रमितो विनासि ज्ञात्वति मुक्त्वा कुगुरो: प्रसंगम् । कुरु प्रसंगं सुगुरोः कृपाब्धे- र्यतः स्वराज्यं हि तवाश्रयं स्यात् ॥ २७ ॥ अर्थ-हे आत्पन् ! देव, कुगुरुओं की सेवा करनेस ही तूने आजतक अत्यन्त क्लंग उत्पन्न करनवाले और सदाकाल भ्रांति उत्पन्न करनेवाले निगोदमें परिभ्रमण किया है, . - - ---द्रावक- यहादुर देनेवाले प्रानिक्षण माणॉकी हरण करनेवाचे और अत्यन्न निंदनीय ऐसे नरकमें परिभ्रमण किया है और अत्पन्न निकृष्ट योनि कहलानेवाली तिर्यंचगनिमें परिभ्रपम किया है। है शिष्य ! इसमकार तूने वीतराग निIय गुरुको सेवा न करने में नया कारुको सेवा करनेसे अनन्तकाल तक मंसाररूपी महामागग्य परिभ्रमण किया है। अतएर हे शिष्य ! अब तू कुगुरुश्रीको मेवा करनेका सर्वथा त्याग कर दे और पाकं मागर समस्त जीवापर दया धारण करनेवाले वीतगग निथ गुस्ओंकी मेवा करनेसे ही मोक्ष- रूपी स्वराज्य तेरे अधीन हो जायगा। भावार्य-जिनको विषय लालसा सर्वथा नष्ट हो है जो ग्वती बाडो, गेटो, पानी आदि किसी प्रकारका आरम्भ नहीं करते हैं, वस्त्रादिक किमी प्रकारका परिया धारण नहीं करते हैं और जो पठन-पाठनमें वा तपथरण वा ध्यानमें सदाकाल लीन रहते हैं उनको श्रेष्ठ बीतगग निग्रंथ गुरु कहते हैं । जो साधु साधु होकर भी इससे विपरीत वृत्ति धारण करते हैं बन रखने है, खेती-वाही करते हैं, झोपडी बनाकर रहते हैं, रोटी करते हैं, पानी भरते हैं, जो दिनभर मांगते रहते हैं तथा जिनकी विषय तृष्णा अत्यन्त बढी हुई है, जो चाहे जैसी बी भी रख लेते हैं, भांग चरस, गांजा, शराब आदि अत्यन्त निषिद्ध और घृणित पदायाँका येवन करते हैं उनको कुगुरु कहते हैं, ऐसे कुगुरु पत्थरको नाव के समान होते हैं, आप भी दृवत्ते है और अपने सेव- प्रतिफमणमार-- फको भी ले ट्यते हैं। इसलिए ऐमे कुगुरुओंसे सदाकाळ धचनं रहना चाहिए । जो स्वयं चरस गांजा पति हैं उनसे मोक्षमार्गका उपदंश कभी नहीं मिल सकना । उनसे तो वही चरम गनिका उपदेश मिळेगा। इसलिए है आत्मन् ! तू ऐम कुगरुका सम्बन्ध छोड और ममम्त जीवापर दया करनेवाले निग्रंय गुरुओंफी मंबा कर । निर्गय गुरु सदाकाळ मोममार्गमें लगे रहते हैं तथा शिष्योंको भी उसी मोक्षमार्गमें लगाते रहते हैं। इसलिए ऐसे श्रेष्ठ गुरुओंकी सेवा करनेसे इस जीवको शीघ्र ही मालकी प्राप्ति हो जाती । आगे किसीका अपराध होनेपर उससे क्षमा प्रार्थनाके लिए कहते हैं- चतुर्गते?ःखमये भवे वाऽ- ज्ञानेव नित्यं भ्रमता त्वया य। विनिन्दताः स्त्रीधनवर्जिताच, कृतास्तथा प्राणविवर्जिता ये ॥२८॥ विराधिताः स्वार्थवशाद्धि जीवाः, क्षमां च याचस्व ततश्च तेभ्यः। यतस्तयात्मति भवेद्विशुद्धः स्थिरः सदा स्वात्मरसे हि तृप्तः ।। २९ ॥ अर्थ-हे आत्मन् ! तू अपने अज्ञानके कारण चारों गलियोंके दुःखासे भरे हुए इस संसारमें सदाकाल परिन- 'थावक- - ३२ पण करना रहना इमपकार पग्भ्रिमण करते हुए तून अनेक जीवांकी निंदी की है. अंक जीका बांगडत किया है. अनक जीवोंको प्राणरहित किया नया अपन मार्थक वर्णाभूत होकर अनेक 'जांबीको विराधना की है। आत्मन् ! अंच तू उन मयम क्षमा पांग। अपने किए हम पापोंका पीलाप कर नया उनमा प्रार्थना कानम यह नेरा आत्मी शुद्ध को जागगा नया अपने शुद्ध आत्माके रस सदोंके लिए स्थिर और तृप्त हो जायगा । भाग-कए हुए अपराधका पात्ताप करना और जिसकी अपराध किगार उपमं सपा मांगना प्रायश्रित कहलाता है। यह ठीक है I पाताप फग्नम अयग उममें क्षमा मांग लनेस जिमका अपगध किया, उसका बिगडा हा काय नहीं सुधर मकना। निमका पन हरण किया है उसका धन नही पल मकता, जिमक प्राण हरण किए हैं उसके प्राण वापिस नही आ सका तथा जिमको विगना की है वह फिर उमी रूपमे नही हो सकता। तथापि जब यह प्राणो उन पापांस डरता है, पापांस भय. भीन होता है और फिर उन पापोंकी, करनको इच्छा नहीं करता, वही पुरुष उन किए हुए पापोंका पश्चात्ताप कर । संकता है तथा वही क्षमा मांग सकता है। इसीलिए भाचा याने किए हुए पापोंका पशात्ताप करने और क्षमा मांगनेको प्रायश्चित्त कहा है। प्रायः शन्दका अर्थ पाप है और चित्त शब्दका पर्य शुद्धि है जिसके फरनेसे पापोंको शुद्धि हो
प्रतिक्रमणमार-
जाय, पाप नष्ट हो जाय उसको मायाश्चत कहते हैं। प्राय-
श्चित्त कैनेसे पापांकी शांति अवश्य होती है। क्यों कि पापोंसे
भयभीत होने के कारण प्रायश्चित्त केनेवाळेके परिणाम ही
बदल जाते है तथा शुभरूप परिणत हो जाते हैं। यह सब
श्रेष्ठ गुरुओंके समागमका फल है। श्रेष्ठ गुरुओंके दर्षनसे
तथा उनके उपदंशसे अवश्य ही आत्मा पवित्र होता है।
अतएव श्रावकोंका कर्तव्य है कि वे प्रतिदिन सामायिक
और प्रतिक्रमण करें तथा प्रतिक्रमणमें अपने सब अपराधोंकी
आलोचना करते हुए पश्चाताप करे और जिनका अपराध
किया है उनसे क्षमा मांगे तथा फिर ऐसा अपराध न कर-
नेका नियम के । ये सब आत्माको पवित्र करनेके साधन हैं।
आगे स्यावर जीवोंकी हिंसाकी आलोचना करते हैं-
पंचप्रकाराश्च गतापराधा,
विराधिताः स्थावरकायजीवाः।
स्वार्थाभिवृद्ध्यै ह्यतिनिर्दयेन,
दुःखीकृता को वहवो हताश्च ॥ ३ ॥
स्वयेत्यभाग्येन निरंकुशेन,
ततश्च तद्दोषविनाशनार्थम् ।
कुर्वात्मनिन्दा हि परप्रशंसां,
विद्यालयस्थापनवर्द्धनादिम् ॥ ३१ ॥
३५ भकार न जाने कितनी बार भोजन बनानेके लिये अग्नि अर्थ-हे आत्मन् ! भाग्यहीन तुने अपने स्वार्थकी सिद्धिक लिए निर्दय होकर पांचों प्रकारके अपराधरहित स्थावरकायिक जीवीकी विराधना की है तथा पांचों प्रचार के स्थावरकायिक जीवीको दुःखी किया है और उनका नाश किया है। इसलिए है यात्मन् ! उन समस्त दोषीके दूर करने के लिए तू अपनी निदा कर, जो हिंसादिक पाप नहीं करते उनकी प्रशंसा कर और इस प्रकारके आत्मना- नकी शिक्षा देनेवाले विद्यालयोंको स्थापन कर तथा धना. दिकके द्वारा उनकी वृद्धि कर । भावार्थ-गृहस्थावस्था में स्थावरकायिक जीवॉकी हिंसा होती ही है। पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिका वायुकायिक और चनस्पतिकायिक ये पांच प्रकारके स्थावर- कायिक कहलाते हैं। ये पांचों प्रकारके जीव किसीका कुछ अपराध नहीं करते, वे स्वयं इतने निर्वल है कि न कुछके समान है फिर भका वे दूसरोंका अपराध कैसे कर सकते है। तथापि हे आत्मन् ! तूने न जाने कितनी पृथ्वी खुदवाई कितने खेत जुतवाये हैं और उससे न जाने कितने पृथ्वीकायिक जीवोंकी हिंसा की है । गृहस्यावस्थामें न जाने कितना पानी फैलाया है, न जाने कितनी बार नदियोंमें वा कूबा बावडियौमें स्नान किया है, न जाने कितना पानी पिया है, न जाने कितने पानीस वस्त्र घोये हैं। इन सबमें नजाने कितने जळकायिक जीवोंकी हिंसा की है। इसी प्रतिक्रमणसार- ३५ मलाई है, न जाने कितनी बार तापने के लिये अग्नि जलाई है, न जाने कितनी चार खंत वा जंगल जलाये हैं और न माने कितनी बार अग्नि चुझाई है। इन सब कामोंमें न जाने कितने अग्निकायिक जीवोंका घात किया है। गर्मी के दिनोंमें न जाने कितनी बार पखा चलाया है और खरियानोंमें न जाने कितनी बार वायुके झकोरोंसे भूसा उडाया है। इन सर कामोंम न जाने कितने वायुकायिक जीवोंका घात किया है। वनस्पतिकायिक जीवोंमें न जाने कितने शाक, भाजी खा डाले हैं, न जाने कितने फळ खा डाले हैं, न जाने कितनी शाखाएं तोडी है, न जाने कितने वृक्ष कट- पाये है, न जाने कितने खेत कटवाये हैं और न जाने कितनी घास खुदवाई है। इन सब कामों में न जाने कितने बनस्पतिकायिक जीवोंका घात किया है। हे आत्मन् ! अब तू इन मब कोकी निंदा कर पश्चाताप कर और उन सब पापोंको शान्त करनेके लिए आत्मज्ञानको बढानेवाले वा पापोंका त्याग करानेवाले शास्त्रोंका पठन-पाठन कर। ऐसे शास्त्रोंके पढनके साधन विद्यालय रथापन कर और सब प्रकारसे उनकी पृद्धि वा रक्षा कर । ऐसा करनेसे पाप शांत होंगे और भागेके लिए पुण्यकर्म नधा रत्नत्रयकी प्राप्ति होगी। मागे विनाछना पानी का में लानेकी आलोचना कहते हैं- अगालितेनैव जलेन नित्यं सूक्ष्मादिजन्तोश्च कलेवरेण।
३६ स्नानं सदा त्वं कृतवानगाह्यः, हतात्मबुद्धिः खल्लु निर्दयो वा ॥ ३२ ॥ तत्कारणादेव बहुश्च जीवो, मृतो हि छिन्नोपि वभृव भिन्नः। तेभ्यः क्षमा याचय पापशान्त्य, स्वोक्षदं त्वं कुरु दानधर्मम् ॥ ३३ ॥ अर्थ-हे आत्मन् । देख विना छना हुआ जळ अनेक सूक्ष्म जीवोंका कलेचर है परतु फिर भी तुने अपनी श्रेष्ठ पुदि खोकर और निर्दय होकर उसी विना छने नदी' वा सरोवरोंके जळमे डुबकी लगाकर स्नान किया, जिससे बहुतसे जीव मर गए, बहुतसे जीव छिद गए और बहुतसे जीप भिद गए । हे आत्मन् ! अब तू उन अपने पापोंको शांत करनेके लिए उन समस्त जीवोंसे क्षमा मांग । स्वर्ग मोक्ष देनेवाला पात्रदान कर और रत्नत्रयरूप धर्मको धारण भावार्य-विना छने पानीकी एक बूंदमें भी असंख्यात जीव होते हैं, फिर भला बहुतसे जलमें न जाने कितने जीव होंगे इसका अनुमान लगाना भी कठिन है । जो जीव पहु- तसे जळमें कूचकर स्नान करते हैं वा तैरते हैं व जलक्रीडा करते हैं वे न जाने कितने त्रसजीवोंका घात करते है और न जाने कितने जीवोंका छेदन-भेदन करते हैं। हे आत्मन् ।
प्रतिक्रमणसार- ३७ तूने भी न जाने कितनीवार जलक्रीडा की हैं और न जाने कितने पानी में तेरा है। इन सब कामोम तूने महापाप उत्पन्न किया है। इसलिए उन पापोंको शांत करनेके लिए उन सब जीवासे भमा मांग, उन पापोंका पश्चाताप कर और आगे ऐमें पाप न करने के लिए नियम है। इसके सिवाय । आत्मन त उन पापाको शांत करनेके लिए पात्रदान कर नया धर्म धारण कर। आगे फळ पुप्प वा शाखा आदिके चिरापनेकी आलोचना किवते हैं- शाखासमूह: सुफलादिपुष्पे- विभूषिताः को तरवः सजीवाः। वान्ये तथा स्थूलतराश्च सूक्ष्माः, पृथ्व्यादिकायाश्च विराधिता ये ॥ ३४ ॥ अज्ञानतः स्वार्थवशाद्धि हा हा, त्वया ह्यभाग्येन निजात्महन्त्रा। मिथ्या यतः स्याद्धि कृतापराधा, तेभ्यः क्षमा याचय शुद्धबुद्ध्या ॥ ३५॥ अर्थ-ई मात्मन् । देख, इस ससारमें अनेक प्रकारके स्थूळ वा मुक्ष्म सजीव घृक्ष अपनी शाखाओंसे तथा फल पुष्पोंसे मुशोभित हो रहे है। इनके सिवाय पर्वत वा नदि-
योंके पृथ्वीकाय वा जळकाय आदि जीव भी अपनी त्रोमा
बढ़ा रहे हैं। परन्तु हे आत्मन् ! अपने ही आत्माका पाव
करनेवाले तूने अपने अशुभ कर्मके उदयसै अपने अज्ञान वा
अपने खार्थके वशीभूत होकर उन सबकी विराधना की है।
उन सब जीवोंकी विराधनासे होनेवाला तेरा पाप मिथ्या
हो इसके लिए हे आत्मन् ! तू अपने शुद्ध हृदयसे उन
सबसे क्षमा मांग।
भावार्थ-इस संसारमें जितने पदार्थ हैं वे सब इस
संसारकी शोभा बढाने के लिए हैं। देखो, जंगलों में चा
पनों में बड़े बड़े वृक्ष होते हैं और वे बडे सुन्दर लगते हैं,
परन्तु हमलोग अपने स्वार्थके वशीभूत होकर अपने कामके
लिए उनको कटवा डालते हैं, अथवा किसीकी शाखाए
कटवा डालते हैं, किसीकी छाल कटवा लेते हैं और किसीके
पत्ते तुडवा लेते हैं। छोटे छोटे पौधाको शाक-भाजीके लिये
उखडवा लेते हैं वा उनके फूल तुडवा लेते हैं वा फर तुटवा
लेते हैं। इन सबको तुडवा लेना उनका घात करना है तथा
साथमें अपने आत्मामें कलुषता तृष्णा वा लोभ होनेके
कारण अपने आत्माका भी घात करना है। इसमकार अपने
योडेसे स्वार्थ के लिए अपने आत्माका भी घात करते हैं
और अन्य अनेक जीवोंका भी घात करते हैं। इसीमकार
पर्वतोंको तोड डालते हैं, उनके पत्थर फोड केते हैं नदियोंका
जक काममें लाते हैं यह सब पृथ्वीकायिक तथा जलकायिक
जीवोंका घाव करना है। इन सबके घाव करने में हिंसाजन्य
-- m तिकमणसार- ३९ हापाप उत्पन्न होता है। हे आत्मन् ! तूने भी सब पाप किए हैं इसलिए अब तू उस पापके लिए पश्चाताप कर, सबकी आलोचना कर, सवसं क्षमा मांग और अब मागेके लिए सबको क्षमा कर । ऐसा करनस तेरा पहलेका पाप शांत होगा और आगेके लिए अशुभ कर्मोका बंध रुक जायगा। आग व्रतादिक न करने और अशुभ कायोंके करनेकी निंदा करते हुए उनके त्यागको कहते हैं- व्रतोपवासः सुखदं तपो न, कृतं तथा कारितमेव नान्यैः । स्वमोक्षदं संयमशीलरत्नं, न रक्षितं प्रेरितमेव नान्यम् ॥ ३६ ॥ त्वया प्रमोहाद् विविधं हि किंतु, कृतं व्यथादं विषयं कुकर्म। तच्छांतिहेतोः कुरु चित्तशुद्धि, यतो भवेत्ते सफलं नृजन्म ॥ ३७ ॥ अर्थ-ई आत्मन् । देख, तूंन न तो आजतक कोई व्रत पालन किया है, न उपवास किए, न मुख देनेवाला तपश्चरण धारण किया और न ये सब काम दूसरोंसे कराये हैं। इसी प्रकार स्वर्ग और मोक्ष देनेवाळे संयम और शीलरूपी रलोकी --
रक्षा न तो तून स्वय की है और न उनकी रक्षा करने
लिए किसी इसरंसे मेरणा की है। इसके विपरीत मोह जान
में फसकर तूने यहादुःख देनेवाळे अनेक प्रकारक कुकर्म किए
हैं और उनसे महापाप उत्पम किए हैं। हे मात्मन् । आ
उन समस्त पापोको शांत करनेके लिए अपने हृदयको शुर
कर जिससे कि तेरा मनुष्य-जन्म सफल हो जाय ।
भावार्थ-व्रत उपवास करना चा तपश्चरण करना
आत्माके कल्याणका कारण है, क्योकि इन सब कायों
करनेसे विषयोंकी तृष्णा घटती है, क्रोधादिक कषायोंका
अभाव होता है, इन्द्रियांका निग्रह होता है और समस्त
जीवोंकी रक्षा होती है । विषयोंकी तृष्णा और कपापोंका
अभाव होनेस अशुभ काँका बंध नहीं होता त्या इंद्रियाँका
निग्रह करनेसे और जीवोंकी रक्षा करनेसे शुभ कर्मोंका बंध
होता है । तपशरणके करनेस पहले के इकट्ठे किए हुए समस्त
काँका नाश हो जाता है। इसी प्रकार संयम और शीलकी
रक्षा करनेसे भी कौका आनव रुक जाता है और संचित
काँका नाश हो जाता है । हे आत्मन् ! यदि तून ये व्रत
उपवास वा तपश्चरण आदि किए होते तो तुझे अवश्य ही
रत्नत्रय वा मोक्षकी प्राप्ति हो गई होती अथवा तेरे परिणामोंमें
अनन्त शुद्धता आ गई होती। परंतु हे आत्मन् ! तु जो आजवक
मोह जालमें ही फंस रहा है और उसी मोह जाळमें फसे
रहनेके कारण अनेक प्रकारके कुकर्म करता रहता है । जिस
किसी धनी पुरुषके पुत्र नहीं होता उसके पास पदि कोई
-
प्रतिमासार-
४१
उसके समीपी पंधुका लडका कुछ मांगने आता है तो वह
धनी उमको एक पैसा भी नहीं देता, क्यों कि वह धनी उस
लडकको अपना नहीं समझता । परन्तु समय और कारण
पाकर जब वही घनी उसी लडकको अपनी गोदी विठा लेता
है तब वह उनके लिए मव कुछ दे डालता है । यदि वह
माना हुआ पुत्र बीमार हो जाय तो वह घनी उसे देख
देखकर बहुन दुःखी होता है तथा उसके लिए सब तरहके
पाप और सब कुछ करने को तैयार हो जाता है । क्या यह
पोह मिथ्या नहीं है! उस लडकेको केवळ • अपना' मान
लन में ही सब तरहक पाप करने पड़ते हैं। इसी प्रकार संसार
के अन्य पदार्थों को भी अपना मान लेनेसे ही महापाप उत्पन्न
काने पडस है । वास्तवमें देखा जाय तो सिवाय आत्मा
और कोई भी पदार्थ अपना नहीं है । आत्माके सिवाय अन्य
किमी भी पदार्थको अपना मान लेना मोह है, और यही
नरक निगोनादिकका कारण है। इसलिए हे आत्मन् ! तू
इस पोहका न्याग कर । पोहका त्याग करनेसे ही हृदयकी
शुद्धि तथा आत्माकी शुद्धि होती है और इसीसे मनुष्य-
जन्मकी मफलता सिद्ध होकर अनन्तमुखकी प्राप्ति होती है।
आगे कन्द-मूलादिक भक्षण करने की आलोचना करते हैं-
कन्दादिमूलं च निगोदाडि
ह्यन्नं सचित्तं भवदं प्रभुक्तम् ।
सूक्ष्मः प्रियो वै हरितांकुरादिः
वया मनोजश्च विराधितो वा ॥ ३० ॥
श्रायक- ४२ तद्दोपसंख्यां गदितुं न शक्तः, शक्रः परेषां हि कथैव कास्ति । तथापि ते स्यात्कृतकर्मनाशो, भक्त्येव धर्म यदि त्वदरोपि ॥ ३९ ॥ अर्थ-हे पात्मन् ! तृने निगांदराशिका पिंड सरूप ऐसे अनेक कन्द-मूलाटिकका भक्षण किया है, जन्म-पर- णरूप संसारको पढानेवाले सचित्त अन्नका भक्षण किया। अथवा बहुत पिय और बहुत मनोहर ऐसे म्हम हरे अंकरों की विराधना की है। हे भात्पन ! उन सय कार्योंक करनेमें जो पाप वा दोष उत्पन्न हुए हैं उनकी सख्या कहनेके लिए इन्द्र भी समर्थ नहीं है । हे आत्मन ! अब भी गदि तू भक्ति पूर्वक धर्मका संवन करेगा तो इतनं बंद पापोंसे उत्पन्न होन- वाले कर्म भी अवश्य नष्ट हो जायेंगे । भावार्थ-कन्द मूल सब अनन्नानन्न जीवोंका पिंड होता है और वह इसप्रकार होता है । जिसमकार जम्बुद्वीपमें भरतादि क्षेत्र हैं, भरतक्षेत्रमें कौशलादिदेश है, कौशलदेशमें साकेतादिनगर है और सांकतनगरमें घर है उसीप्रकार एक-एक स्कधमे असख्यात लोकप्रमाण अडर है, एक-एक अदरमें असख्यात कोकममाण आवास है और एक-एक आवासमें असंख्यात लोकप्रमाण पुलची है। एक-एक पुलवीमें अनन्तानन्त जीव है । इसमकार एक-एक स्कंध अनन्तानन्त जीव होते हैं। एक-एक वादर निगोद शरीरमें' - प्रतिक्रमणसार- जो अनंतानन्त जीव होते हैं उनमेंसे जब एक श्वास लेता है तब सब श्वास लेते हैं, जब एक आहार लेता है तब सब आहार लेते हैं, जब एक मरता है तब सब मर जाते हैं और जब एक जन्म लेता है तब सब जन्म लेते हैं। इस प्रकारकी । निगोदराशि गाजर, मूली, अरवी, सूरण, कंद आदि सबमें । हैं, गन्नेकी गांठमें भी ऐसी ही निगोद राशि है। जो छिन्न । भिन्न करनेपर भी उत्पन्न हो जाय ऐसी डालको वा मूलकों सबको निगोदराशि समझना चाहिए । ककडी जब उत्पन्न होती है तब वह साधारण निगोदराशिमें गिनी जाती है, उसपर जो सफेदी रहती है तथा रेखायें उत्पन्न नहीं होती और हायसे तोडनेपर वरावर एकसे (चाकूसे काटनेके समान ) दो भाग हो जाने हैं ऐसी काही साधारण निगोद- राशिप शामिल है, वही ककडी जब बढ जाती है उसमें रेखायें उत्पन्न हो जाती है और हाथसे तोडनेपर दो टुकडे समान नहीं होते, दोनों टुकडोंमें नोंके निकली रहती हैं ऐसी ककही फिर साधारण नहीं रहती फिर वह प्रत्येक हो जाती है। इसी प्रकार गवारपाठा साधारण निगोदराशि है, घरग- दकी छाळ भी निगोदराशिरूप है तथा बहुतसे फल पत्ते निगोदराशिरूप हैं। माया प्रथम ही उत्पन्न होनेवाले अंकूरे तथा प्रथम ही उत्पन्न होनेवाळ फळ साधारण निगोदराशि- रूप हैं । आत्मन् ! तूने भी अनेक बार इनका सेवन किया है और अनंतानत जीवोंका घात किया है इसलिए अब तू क्षपा पांग अपने हृदयमें पश्चात्ताप कर और धर्मका सेवन , १ बावक- कर तथा आगे कभी भी इनके सवनं न करनेका नियम है। हे आत्मन ! ऐसा करनेसे ही मेरे पापीकी शांति होगी और म्वर्ग पोक्षादिकके मुखौंकी प्राप्ति होगी। आगे दान धर्म आदि न करनेकी आलोचना दिखलाते है। कुटुम्वमोहादिवशात्त्वया को। तथान्यकार्यादिवशाद्धि हा हा ॥ शिवप्रदो नार्चनदानधर्मः । कृती कृतो वांच्छितदो न भक्त्या ॥ १० ॥ ततस्तवात्मा खलु निन्दनीयो । वभूव दीनश्च पदे पदे हि ॥ ज्ञात्वेति दानादिविधिविधेयो यतः प्रपूज्योपि भवेत्सुखीह ॥ ४१ ॥ अर्थ-ई आत्मन ! कुटुम्बी लोगोंक मोहमें फमकर अथवा अन्य अनेक कार्योंमें फंसे रहने के कारण तूने समस्त इच्छाभोंको पूर्ण करनेवाला अत्यन्त कृतार्य और मोक्षको देनेवाग दान पूजा आदि वर्म भक्तिपूर्वक पालन नहीं किया। है प्रात्मन् ! इसीलिए तू अत्यन्त निंदनीय होगया है और पद-पद पर दीन बनता रहा है । हे आत्मन् ! यही समझकर अब तू दान पूजा आदि श्रेष्ठ धर्मको धारण कर जिससे कि तू तीनों लोकोंके द्वारा पूज्य हो जाय और अनन्तमुखी हो जाय । भावार्थ - या मनुष्य सग्मे शामतक दा गततक प्रतिक्रमणसार- ४५ --- कपाने खाने में लगा रहता है तथा उस कमाने खानेके कामोंमें अनेक प्रकारके पाप उत्पन्न किया करता है यह बात ठीक है कि संसारमै आकर कमाना खाना पड़ता है और उसके लिए पत्र काम करने पड़ते हैं । परन्तु चे सब काम विचारपूर्वक निर्दीप रीतिसे करने चाहिये, जिससे अधिक पाप न लग मक तथा जो कुछ थोडा बहुत पाप लगता है उसको दूर करने के लिए दान देना चाहिए । सर्वोत्तम पात्रदान देना चाहिए और प्रतिदिन मातःकाल भगवान् जिनेंद्रदेवकी पूजा करनी चाहिए । ये दोनों काम उन आरंभ और परिग्रहसे उत्पन्न होनेवाले पापोंको नाश करनेवाळं हैं। मुनि लोग अपने नपश्चग्ण और ध्यान द्वारा अपने कर्मोको नाश करते हैं परतु, उप तपश्चरण और ध्यानमें गृहस्थोंका दिया आहार मी साधन है। इसलिए जो गृहस्थ प्रतिदिन मुनियाँको पाहारदान देना है वह उस ध्यान और तपश्चरणकी वृद्धिका साधन होने में महापुण्य उपार्जन करता है। इसलिए प्रत्येक गृहस्थको प्रति दिन आहारदान देनेका संकल्प करना गहिए । इसी प्रकार भगवान जिनेंद्रदेवकी पूजा भी प्रति दिन पान काल उठकर करनी चाहिए। भगवानकी पूजा करनेमें भावोंकी अत्यंत निर्मलता होती है। देखो, मेढक एक कमळका दल लेकर पूजा करने जा रहा था और मार्गमें हाथी परफे नीचे दबकर पर गया परंतु पूजाके सकलासे उसके परिणामोंकी विशुद्धि बढ गई थी और इसीलिए वह मरफर उत्तम देव हुआ था तथा तुरत ही भगवान महावीर
धावक
४६
खामीफी पंदना करने समवसरणमें पहुच गया था। मग
वानकी पूजाभा माहात्म्य बहुत ही विचित्र और बहुत ही
ऊंचा है। इसलिए मयंक श्रावकको अपने सब काम छोर.
कर भगकानकी पूजा करनी चाहिए। जो लोग साधन
मिलनेपर भी भगवान की पूजा नहीं करते हैं का पात्रदान
नहीं देते हैं वे अवश्य ही निंदनीय और दीन होते है, इसमें
किमी मकारका सन्देह नहीं है। इसलिए है आत्मन् ! यदि
तू दीन और दरिद्री नहीं होना चाहता है तो प्रतिदिन भग
चानकी पूजन कर और प्रतिदिन पात्रदान दें, जिससे कि
स्वर्गादिकके सुग्व भोगकर गिद्ध अवस्था प्राप्त हो जाय ।
आगे सावध वा पापपूर्वक होनेवाले आरभ कार्योंकी
आलोचना करते हैं-
त्वया प्रमुढेन सुनिर्दयेन,
ह्यारम्भकार्याण्यसुनाशकानि।
संसारमूलानि कषायदानि,
सावधयुक्तानि सदा कृतानि ॥४२॥
सावधकार्य भवदं प्रमुक्त्वा,
कुरु क्षमादं निरवद्यकार्यम् ।
यतस्तवारमापि भवेत्कृतार्थी,
प्रसंसनीयो हि नरामरेन्द्रैः ॥१३॥
प्रतिक्रमणसार- A . अर्थ-हे आत्मन् ! तु अत्यन्त मूर्ख और अत्यन्त निर्दय होकर जन्म-मरणरूप संसारको रहानेवाले, कोच मान माया लोभ आदि कपायांको बढाने- चाके, अनेक प्रकारके पाप उत्पन्न करनेवाळे और अनेक प्राणियों का नाश करनेवाले आरम्भ कार्य सदाकाळसे वा अनंत कालसे करता रहा है। इसलिए है आत्मन् ! अब तो तू संसारको बढानेगल इन पापोंका त्याग कर और क्षमा पार्दव आदि आत्माक गुण पक्षानेवाले पाप रहित कार्योंको करत रही, जिससे कि तेरा आत्मा कृत-कृत्य हो जाय और इन्द्र नरेन्द्रों द्वारा भी प्रशसनीय हो जाय । भावार्थ-खती करना,व्यापार करना. सेवा करना,मुनीमी कग्ना आदि प्रारम्भकार्य कहलाते हैं। इनमेंस बहुतसे कार्य ऐम हैं जिनमें नायकी हिसा बहुत थोडी होती है। गृहस्थावस्था में रहकर आरम्भ कार्य करने पड़ते हैं परन्तु वे इस प्रकार करने चाहिए जिम जीवोंकी हिंसा न हो या बहुत थोडी हो : जिन कार्याक करने में हिंसा अधिक हो ऐसे कार्य श्रावकोंको कभी नहीं करने चाहिये । क्यों कि जितनी हिंसा अधिक होगी उतना ही पाप अधिक लगेगा तथा जितना पाप अधिक ळगंगा उतना ही संसारमें अधिक परिभ्रमण करना पटंगा और उनना अधिक महादुःख भोगना पडेगा । इसलिए हे आत्मन् ! अब पाप युक्त कार्योंका त्याग कर और पात्रदान वा गिनपूजन आदि पापरहित कार्यों में ही अपना ४८ मन लगा । इन कार्यों के करनेसे तेरा आत्मा पवित्र हो जायगा, पूज्य हो जायगा और फिर इन्द्र चक्रवर्ती आदि महापुरुष भी तेरी प्रशंसा करते रहेंगे। आगे भूत भविष्यत् और वर्तमान इन तीनों का में होनेवाले दोषोंकी आलोचना करते हैं- अतीतकाले वरवर्तमाने, ह्यनागते वा विफलो व्यथादः। प्रमत्तयोगाद्विषमस्त्वया हा, दोषः कृतः कारित एव निंद्यः ॥४४॥ कृतस्य दोषस्य ततो विनाशो, भवेत् त्रिकालेपि तथा न दोषः । ताहग विधानं सुखदं कुरु त्वं, स्यात्ते त्रिलोकोपि सदा स्वदासः ॥४५॥ अर्थ- हे आत्मन् ! तूने अपने प्रमादसे अतीत अनागत और वर्तमान कालमें कुछ भी फल न देनेवाले तथा महादुःख देनेवाले, अत्यन्त विषम और महा निन्दनीय दोष किए हैं तथा दूसरोंसे कराये हैं। हे आत्मन् ! अब तू सुख देनेवाला ऐसा कार्य कर जिससे किए हए दोपोंका नाश हो जाय तथा वीनों कालोंमें फिर कोई दोष उत्पन्न न हो और यह तीनों लोक तेरा दास बन जाय । भावार्थ--यह जीव व्यतीत हुए अनन्त काळमें महा- - प्रतिक्रमणसार- १९ - पाप उत्पन्न करता रहा है। यदि अतीत काळमें महापाप उत्पम न करता तो अब तक सिद्ध अवस्था माप्त कर लेता। अब तक जो इस जीवकी सिद अरस्था माप्त नहीं हुई है इसीसे साबित होता है कि इस जीवने अवीतकाळमें महापाप उत्पन्न किये हैं। तथा वर्तमानकाळमें कर ही रहा है, यह प्रत्यक्ष है । तया अभी पापोंका त्याग नहीं किया है इससे सिद्ध होना है कि यह जीव आगेके भविष्यत्काळमें भी पाप करता रहेगा। इसमकार इस जीवके भूत, भविष्यत् और वर्तमान तानों काळीमें दोष वा पाप उत्पन्न होते रहते हैं, जिनसे कि यह जीव महादुःख भोगता रहता है। हे आत्मन् ! पदि त अब उन पापसि तथा उन पापोंसे उत्पन्न होनेवाले महादःखोंसे भयभीत हो रहा है तो ऐसा जप तप कर जिसमे पहले के सब पाप नष्ट हो जाय और आग भी कमी पाप उत्पन्न न हो। इस संसारमें जप तप वा ध्यान ही एक ऐसा विधान है जिससे पहळेके सब कर्म नष्ट हो जाते हैं और आगेके लिए काँका पध नहीं होता काँक न हो जाने से इस जीवको मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है, अनन्तसुखकी प्राप्ति हो जाती है और फिर तीनों लोक उसका दास हो जाता है वा उसकी पूजा किया करता है। आग अरहत सिद्ध मिनागम, जिनालय आदिकी निंदा कर- नेकी आलोचना करते हैं। जगत्प्रभोश्चाहत एव हा हा । सिद्धस्य शुद्धस्य शिवप्रदस्य ॥
स्वक्षिदस्येति जिनागमस्य । सावद्यहतुर्जिनमंदिरस्य ॥ ४६॥ कुसंगतोऽज्ञानत एव निंदा। छनादरादिश्च त्वया दुरात्मन् ॥ कृतः प्रदोषः कुटिलस्ततस्त्वं ! तत्पादसेवां कुरु तत्प्रशान्त्यै ॥ ४७ ॥ अर्थ-हे दुरात्मन् वा दृष्ट! तुने अपनी कुसंगतिमे अथवा अपने अझानसे तीनों लोकोंके स्वामी भगवान् अर- हंतदेवकी निंदा की है वा उनका अनादर किया है, इसके लिए तुझे धिक्कार है । इसी प्रकार मोक्ष देनेवाले और अत्यत शुद्ध ऐसे परमेष्ठीकी निंदा की है या उनमा अनादर किया है, इसके लिए भी तुझे धिक्कार है स्वर्ग मोक्षको देनेवाके जिनागमको निंदा की है वा उसका अनादर किया है उसके लिए भी तुझे धिक्कार है और अनेक महापापोंका नाश करनेवाले जिनालयकी निंदा की ह वा उसका अनादर किया है इसके लिए भी तुझे धिक्कार है । इ आत्मन् ! तूने इन सबकी निंदा वा अनादर करके महाबाटिल दोष वा महापाप किया है और यह महापाप अब उन्होंक चरणकम- कॉकी सेवा करनेसे शांत होगा। इसलिए हे आत्मन् ! उन सब पापीको शांत करने के लिए का नाश करनेके लिए उन्हीक चरण-कालॉकी सेवा कर ।
. प्रतिनामणसार- ५१ भावार्थ-अरहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्ठी ये पांच परमेष्ठी कहलाते हैं। ये पांचों परमेष्ठी नथा जिनागम जिनालय जिनमतिमा और जिनधर्म ये नौ देवता वा महादेवता कहलाते है । ये नौ देवता संसारका उद्धार करनेवाले, मोक्षमाप्तिके कारण है और इसलिए जगत्वंद्य हैं । इन्द्रादिक देव भी इनकी सदा सेवा किया करते हैं । इसलिए उनकी निंदा करनेसे वा इनका अनादर करनेसे महापाप उत्पन्न होता है । अशुभ वा पापरूप कौमें सबसे प्रचल पापकर्म दर्शनमोहनीय कर्म है, उस दर्शनमोहनीय कर्म का आरब इन्हीं देवताभोकी निंदा वा अनादर करनेसे होता है। इससे सिद्ध होता है कि इनकी निंदा वा अनादर करनेसे मरस प्रबल महापाप उत्पन्न होता है, इसको वज्रपाप कहते हैं वानीन पिथ्यात्व करते हैं। यह पाप तीन नरक निगोदका कारण है। जिन जीवोंको आत्मज्ञान नहीं है अथवा आत्माके उत्कृष्ट गुणमि अनुगग नहीं है वही नीव इनका अनादर कर सका है। जो जीव आत्माके गुणोंसे कुछ भी अनुराग रखता है वह कभी भी इनसा अनादर नहीं कर सकता । इसलिए किसी भी जीवको उनका अनादर नहीं करना चाहिए। ये नौ देवता परम पूज्य है । इनकी पूजा करनेसे यह जान मालमार्ग में लग जाता है। मोक्षपार्गमें चलने के लिए मत्रम उत्तम उपाय यही है । अतएव हे आत्मन् । यदि तू पहलंक. सर पापोंका नाश करना चाहता है और मोसके अनन मुख प्राप्त करना चाहमा है तो इन नौ देवताओके ।
धावक- ५२ चरण-कमलों की सेवा कर, इनकी पूजा कर, इनकी भक्ति कर और अपने हदयमें इनके गुण धारण कर । आगे जिनधर्म, जिनपतिमा और जिनवचनोंकी अपा- न्यताकी मालोचना करते हैं- जिनेन्द्रधर्मप्रतिमादिकानां, सम्पूर्णजन्तोः परितारकाणाम् । श्रीवर्द्धिनां तद्वचसा कदाचि- दमान्यता वाविनयः कृतश्चेत् ॥४८॥ त्वया ह्यभाग्येन महापराध- स्तत्पापशान्त्यै हि पुन: पुनश्च । कुर्वात्मनिन्दां प्रतिमादिपूजां, यतस्तवात्मा च भवेत्प्रपूज्यः ॥४९॥ अर्थ-हे आत्मन् ! जिनधर्म जिनमतिमा और जिन- वचन ये तीनो ही इस ससारमें समस्त जीवोंको पारकर देनेवाले हैं और सब प्रकारकी लक्ष्मीको बढानेवाले हैं। इस- लिए हे आत्मन् ! तूने अपने अशुभकर्मफे उदयसे कदाचिद अमान्यता की हो अथवा अविनय किया हो तो समझ लेना चाहिए कि तूने यह महा अपराध किया है। उस पापको शान्त करने के लिए तू बार-बार अपनी निंदा कर और जिनप्रतिमा जिनधर्म वा जिनवचनोंकी पूजा कर। ऐसा करनेसे ही यह तेरा आत्मा तीनों लोकोंम पूज्य बन जायगा। ।
प्रतिक्रमणसार- ५३ भावार्य-इस संसारमें जिनधर्म सर्वोत्कृष्ट धर्म है, क्यों कि इस संसारमें यही एक धर्म अहिंसा व दयामय है। आत्माका सर्वोत्कृष्ट कल्याण इसी जिनवचनोंसे जाना जाता है। वर्तमानकालमें तीर्थकरों के साक्षात् दर्शन नहीं होते इसलिए उनके समान ही उनके वचनोंसे जीवोंका कल्याण होता है तथा जिनमतिमा साक्षात् तीर्थकरके समान सुशोभित होती है। जिस प्रकार समवसरणमें श्रीतार्यकर परमदेव विरा- जमान होते है उसी प्रकार जिनालयमें श्रीनार्थकर परमदेवकी पनिमा विराजमान रहती है। दिव्यध्वनिक खिरनेके सम- यको छोडकर बाकी के समय भगवान् तीर्थकर परमदेव जिस प्रकार समवसरणमें निथल पद्मासन विराजमान रहते है उसी प्रकार उनकी प्रतिमा भी निश्चळ और पद्मासन विरा- जमान रही है। इसलिए नर्थिकरपरमदेव और उनकी पनिमामें कोई किसी प्रकारका अंतर नहीं माना जा सकता। आत्माक कल्याण करनेवाला जी उपदेश दिव्यध्वनिसे प्राप्त होता है। वहीं उपदेश उनके वचनोस वा शास्त्रोंसे माप्त होता है। इसलिए कहना चाहिए कि भगवान्की वचन वा जिन- शास्त्र भगवानशी दिगध्धानिक ही समान है। भगवान् गणवर देवान भगवान की दिव्यध्वनिको समझ कर ही द्वादशांगरूप शास्त्रोंकी रचना की है। जो उनकी दिव्यध्व- निमें है वही सब शास्त्रोंमें है। इसलिए कहना चाहिए कि लोग शास्त्रोंको नहीं मानते हैं अथवा उसका कुछ भाग नद है और शछ पाग, नहीं मानते वे भगवान् तीर्थकर ---
---श्रावक-
परमदेवको ही नहीं मानते। जिनवचनोंकी अवज्ञा करना
वा जिनमतिमाकी अवज्ञा करना भगवान् जिनेन्द्रदेवकी ही
अवज्ञा करना है । इसलिए है आत्मन् । यदि तूने किसी
अशुभकर्मके उदयस जिनप्रतिमा, जिनधर्म और जिनपचनोंकी
निन्दा कर पहा अपराध किया हो तो तू उस पापको शांत
फरने के लिए बार-बार अपनी निन्दा कर और चार-चार
उनकी पूजा कर । क्यों कि अपनी निन्दा और पश्चाचाप
करनेसे कर्माका विपाक कम हो जाता है तथा उनकी पूना
फरनेस अशुभकर्मों का नाश होता है और शुभकर्मोका यंध
होता है तथा परम्पराम पोक्षकी प्राप्ति होती है और मोक्ष
माप्त होने में यह आत्मा जगत्पूज्य बन जाता है।
आगे श्रुतज्ञानकी निन्दाकी ओळांचना दिग्वलाते है-
मिथ्यात्वहर्तुः सुमतिश्रुतादि--
ज्ञानस्य वानन्दपदप्रदस्य ।
हठाच्छठत्वात्कुमातिश्रुतादि-
वशात्कृतो वाऽविनयः प्रणिन्दा ॥५०॥
नदोषशान्त्यै कुमतिश्रुतादि-
ज्ञानंच मुक्त्वा भवदं भवाब्धौ ।
गृहाण भक्त्या सुमतिश्रुतादि-
ज्ञानं यत: स्थारसफलं नृजन्म ॥५१॥
प्रतिमनमार- ५५ अर्य- आत्मन् । यदि तूने अपने उसे अथवा अपनी दुष्टतासे अथवा कुमतिज्ञान और कुश्रुतज्ञानके वशी. भूत होकर महापापरूप मिथ्यात्वका नाश करनेवाल और आनन्दपद वा मोक्षको दनवाळे मुपतिज्ञान वा श्रेष्ठ शुनज्ञानकी निन्दा की हो पा इन दोनों ज्ञानाका अविनय किया हो तो उस महादीपको दूर करनके लिए तू इस मसाररूपी महासागरमें जन्म-मरणरूपी ससारको बढानेवाले कुपतिनान और कचनशानका त्याग कर और भक्तिपूर्वक सम्पग्दर्शनसे मुशोभित होनेवाले श्रेष्ठ पतिझान श्रुतज्ञानको धारण कर । एमा करनेसे ही तेरा यह मनुष्यजन्म सफळ हो सकता है। भाई-शुनज्ञानकी निंदा करना वा उसका अविनय फाना महारापका कारण है । क्यों कि जीवादिक पदार्थोंका मरूप श्रुनज्ञान मे ही जाना जाता है, पंचपरमेष्ठीका स्वरूप श्रुतज्ञानमे ही जाना जाना है, तीर्थकर परमदेवका उपदेश शुनज्ञानस ही जाना जाता है और आत्माका यथार्थ शुद्ध मरूप श्रुतज्ञान में ही जाना जाता है। इस संसारमें जवाको कल्याण जितना शुनज्ञान से होता है उतना और किसीसे नहीं होना । तीर्थकरपरमदेव ती अपने जीवनतक ही जीवीका कल्याण करते हैं परन्तु उनकी दिव्यध्वनिरूप थतमान बननकालतक जीवोंका कल्पाण करता रहता है। इस प्रकार सर्वोत्कृष्टरीतिसे अनन्तकाल तक अनन्त भावांका कल्याण करनेवाले श्रुतज्ञानका अविनय करना वा ५६ -भाषक- उसकी निन्दा करना महापापका कारण है। नी लोग इस श्रुतशानकी निन्दा करते हैं वे या तो हठसे करते हैं या अपनी दुष्टतासे करते है अथवा कुथुनज्ञानके चंगुळमें फंस जानेके कारण करते हैं। कुश्रुतज्ञानसे उत्पन्न होनेवाला मिथ्यात्व गृहीतगिध्यात्व कहलाता है तथा गृहीनामिथ्यात अनंत संसारका कारण कहलाता है। ई आत्मन् । यदि तु इस अनन्त संसारमैं परिभ्रपण करनेसे पचना चाहता है तो सबसे पहले इस गृहीतमिथ्यात्त वा कुश्तज्ञानका त्याग कर, तुझे आज तक जो महादुःख माप्त हुए हैं वे सब इस कन- झानसे ही हुए हैं। इसलिए अब तू सबसे पहले मिथ्यात्वका त्याग कर तथा सम्यग्दर्शनको धारण कर। सम्पग्दर्शन धारण करने के अनन्तर श्रुतज्ञानका अभ्यास कर उसके द्वारा पंच परमेष्ठीका स्वरूप समझ अपने आत्माका स्वरूप समय और मोक्ष वा मोक्षमार्गका स्वरूप समझ तथा मोक्ष प्राप्त करने के लिए रत्नत्रय धारण कर । ये सब काम इस मनुष्य जन्पमें ही हो सकते हैं क्यों कि ईय और उपादेय समझनेकी शक्ति मनुष्यपर्यायमें ही होती है तथा चारित्र धारण करने की शक्ति मनुष्य जन्म ही होता है । इस प्रकार श्रुतज्ञानका अभ्यास करनेसे ही मनुष्य जन्मकी सफलता सिद्ध होती है। जो मनुष्यजन्म पाकर भी कुश्रुतज्ञानके अभ्यासमें लगा रहता है वह अपना अमूल्य मनुष्यजन्म व्यर्थ ही खो देता है। इसलिए श्रुतज्ञानका अभ्यास कर आत्मकल्याण अवश्य कर लेना चाहिए।
प्रतिकमणसार-- आगे किसको दुःख पहुचानेकी आलोचना करते हैं- मदाष्टढेन त्वया खलेन, दीना दरिद्राः कुलहीनजीवाः। प्रपीडिताः को छपमानिताश्च, तेषां हठाद्वापहृतो धनादिः ॥५२॥ तत्पापशान्त्यै विनयेन कार्य, दत्त्वा धनं तन्मनसश्च तोषम् । यता मिथ: स्यात्स्वमनः पवित्रं, स्याद्वा चिरं वै कलहाग्निशातिः ॥५॥ अर्थ है आत्मन् ! यदि तूने अपनी दृष्टनासे अथवा धन, कुळ, विद्या, राज्य, वैभव आदिसे उत्पन्न होनेवाळी उन्पचताके कारण किसी दीन दरिद्री जीवको दुःख दिया हो अथवा किसी नीच फळ लोगोंको दुःख दिया हो अथवा इस ससारमें किसीका अपमान किया हो वा हठ पूर्वक किसीका धन हरण कर रिया हो वा और कुछ हरण कर लिया हो तो उस पारको शांत करने के लिए तू विनय पूर्वक उनको धन दे और इस प्रकार उनके मनको सतुष्ट कर । ऐसा करने से तुम दोनोंका मन पवित्र होगा और तुम दोनों होनेवाली कळारूपी अग्नि बहुत शीघ्र शांत हो जायगी।
. धावक- ५८ भावार्थ - किसीको अपने ज्ञानका मद होता है, किसीको अपने बडप्पनका पद होता है, किसीको अपने कुछका पद होता है, किसीको अपनी जातिका मद होता है, किसीको बळका मद होता है, किसीको अपनी विभूतिका भद होता है, किसीको तपका पद होता है और अपने भरी- रकी सुन्दरताका मद हाग है । इनमें से किसी मदमे उन्मत्त होकर यह जीव जब किसीको दुःख पहुंचाता है वा किसीका धनादिक छीन लेता है तब जिसका धन छाना गया है या जिसको दुःख पहुंचा है उसके परिणाम बहुत ही संक्लंशरूप होते हैं। वह हीनशक्ति होने के कारण कुछ कर नहीं सकता तथापि संक्तशरूप परिणाम होनसे वह अशुभकाँका पष करता है। साध उसके परिणामों में धन छीननेवालंक साथ विरोध करनेका तीन सस्कार बैठ जाता है जिसके कारण वह भवान्तरमें उसको तीव्र दुःख पहुंचाता है तथा वह विरोधका संस्कार कितने ही जन्मों तक रहता है। वह संस्कार अगले जन्मों तक न जाय इसका एकमात्र उपाय यही है कि जिसको दुख पहुंचाया है वा जिसका धन छीना है उसको किसी न किसी तरह संतुष्ट करना चाहिए, उसका विनय करना चाहिए तथा उसका दुःख दूर करना चाहिए और उसको धनादिक देकर सब प्रकारसे संतुष्ट करना चाहिए। ऐसा करनेसे उसके परिणामों जो विरोधका तीन संस्कार जमा रहता है वह निकल जाता है और इस पकार दोनों का विरोध सदाके लिए मिट जाता है। विशेषक ।
प्रातमणमा ५९ पिट जाने से दोनोंका मन पवित्र हो जाता है तथा मनके पवित्र होने में फिर वे दोनों जीव धर्म-ध्यान में कग जाते हैं और धीरे धीरे मांसपा बस्ने हुए पोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। सांळए पात्मन् ! तृ भी ऐमा ही कर । आगे किसी मुनिराजकी निन्दा वा अविनय करनेकी मागंचना महन - महावती स्वात्मरतो दयालु स्वात्मानुगगी च भवाद्विरागः। त्रिरत्नधारी च महातपस्वी, क्षमाकरोऽकारणबंधुरेव ॥५४॥ एतादृशः साधुरपीह चास्ति, तस्य प्रमादाद्भवरोगहर्तुः। यदि प्रणिन्दाऽविनयः कृतश्चेत् । तत्रापास्ये नमतात् त्रिशुद्धया ॥५५॥ अर्थ-इम असार संमारमें वीतराग निग्रंथ साधु महावती होते हैं, अपनी आत्मामे लीन रहते हैं. जांवोंपर दया धारण करते है, केवल अपने आत्माकं शुद्ध स्वरूपमें ही अनुराग रखते हैं, इस असार मसारसे विरक्त रहते हैं, रत्नत्रयको धारण करते १ -श्रावक- है, घोर तपश्चरण करते रहते हैं. क्षमाकी खानि होते, विना कारण ही सब जीवोंका कल्याण करनेवाले यंधु होतो और ससारकै जन्ममरणरूप रोगको नाश करनेवाले होते हैं। हे आत्मन् ! यदि ऐस साधुओंकी भी तूने अपने प्रमादक कारण निंदा की हो वा उनका अविनय किया हो वो उस पापको शांत करने के लिए तू अपने मन वचन कायकी शुद्ध चापूर्वक उनको नमस्कार कर । भावार्थ-इस संसारमै जिनने जीव है वे सब अपने अपने साथमें लगे हुए हैं। कुटुंबी लोग जिससे स्वार्थ सिद्ध होता दिखाई देता है उसीकी सेवा करते है, जिससे अपना स्वार्थ बंद हो जाता है फिर उससे बात तक नहीं करते। ऐसे इस स्वार्थपूर्ण संसारमें एक नियसाधु की समस्त जीवोंके चीना कारण बंधु होत हैं । वे साधु वीतराग और निस्पृह होने के कारण किमी भो पदार्थको वांच्छा नहीं करते। यहां तक कि भिक्षावृत्ति धारण करते हुए भी किसीसे आहारकी भी चाँच्छा नहीं करते । आहार भी जहां शुद्धतापूर्वक पिल जाता है वहींपर जो मिलता है उसे ग्रहण कर लेते हैं तथा उस आहारके सहारे घोर तपश्चरण करते हुए अपने आत्माका तथा अन्यजीवोंका कल्याण करते रहते हैं। ऐसे मुनियोंकी निंदा करना वा उनका अविनय करना महापापका कारण है तथा वह महापाप उन्हींकी पूना वंदनासे दूर हो सकता है । यद्यपि वे साधु अपनी निंदा वा अपने अविनय से किसीस द्वेष नहीं करते और न पूजा वंदना भा
प्रतिामणसार -
६१
करनेवासे अनुराग रखते हैं। वे तो वीतराग होनेके कारण
दोनोंको समान ममग्नने और समय पढनपर दोनोंको
मपान कल्पाणकारी उपदेश देते है तथापि जिस प्रकार
दर्पण मामने अन्डा बुरा जसा पदार्य रखा जाता है वैसा
ही पदार्य उसमें दिखाई पड़ता है उसी प्रकार दर्पणक समान
निर्मल आमाको धारण करनेवालं साधुओंके साय जैसा
व्यवहार किया जाता है वमा ही अच्छा वा बुरा उसका
फल मिलता है यह स्वाभाविक पान है। इसलिए वीतराग
माधुओंकी निंदा वा अविनय कभी नहीं करना चाहिए।
ई आत्मन् ! यदि तृन एमे साधुओंकी निंदा की हवा उनका
अनिनय किया हो तो न उमका पानाप कर, तथा उस
पापको नाम करने के लिए त उनके चरणकपलोंकी पूजा
कर । पेमा करने में नंग प्रात्मा पवित्र होगा और रत्नत्रयकी
प्राप्ति होगी और गांव ही मोक्षरूप अनंतरवकी प्राप्ति हो
नायगा।
आगे उत्तम मध्यम जयन्य थावकोकी निंदा करनेकी
पालोचना कहन है।
देशवती शीलशिखामणिच,
धर्मानुरागी ह्यसुरक्षकश्च ।
पूजासुदानव्रतमौनधारी,
सन्तोपकारी स्वपरोपकारी ॥५६॥
६२ पूर्वोक्तधर्मेण युताः सुश्राद्धाः सन्त्यत्र तेषां हि कृता कदाचित् ! निंदा कुरु त्वं विनयादिसेवा यतस्तवात्मेति सुखी कृता स्यात् ॥५७॥ अर्थ-भगवान् गिनेंद्रदेव के कई चारित्रको धारण करनेवाले श्रावक कहलाते हैं, वे श्रावक अणुव्रत, गुणवत, शिक्षावत इन बारह व्रोको पालन करते है शीलपालन करनेमें सर्वोत्कृष्ट होते हैं, रत्नत्रयरूप धर्ममें अनुराग रखते हैं, समस्त जीवों के प्राणोकी रक्षा करवं हैं, प्रतिदिन भगवान् जितेंद्रदेवको पूजा करते हैं, प्रतिदिन पागदान देते हैं, प्रतिदिन व्रत पालन करते हैं और मतिदिन शास्त्रोक्त कार्योंमें पौन धारण करते हैं। इसके सिवाय वे श्रावक सबको संतुष्ट रखने है, अपने भात्माका कल्याण करते रहते हैं और अन्य जीवोंका कल्याण करते रहते हैं। इन समस्त धोको पालन करनेवाळे जितने श्रावक इस मंसारमें हैं उनकी वा उनमें से 'किसीकी तूने कदाचित् निंदा की हो तो आत्मन् । अब तू उनकी सेवा कर जिससे कि तेरा आत्मा कृतार्थ और मुखी हो जाय। भावार्थ-श्रावोंके तीन भेद हैं प्रारब्ध, घटमान और नैष्ठिक । जो मूलगुण पालन करते हैं उनको प्रारब्ध कहते है। जो अभ्यासरूपसे पारह व्रतोंको पालन करते हैं उनको
३
प्रतिक्रमणसार
६३
घटपान कहते है और जो ग्यारह प्रतिमाओंको पालन करते
है उनकी नैष्ठिक कहते हैं। नैष्ठिक यावफ तीन प्रकारक होते
उत्तप, मध्यम और जघन्य । पाली प्रतिमासे कर छठी
पनिमा तक पालन करनेवाले श्रावक जघन्य नैष्ठिकश्रावक
कहलाते हैं, जो सात आठ नी प्रतिमाओंको पालन करते हैं
उन्हें मध्यमनष्ठिकश्रावक कहते हैं और जो दशवों याग्यारहरी
पतिपाओंको पाटन करते है उनको उत्तमनष्ठिकश्रावक
कहते हैं। रे मय श्रावक सुपाप्रदान और जिनपूजन
करने सदा वत्ता रहने हैं। छठी प्रतिमा तकके श्रावक
न्यायपूर्वक धन कमाते हैं, पापोंसे सदा डरते रहते है,
धर्मका कभी घात नहीं करत, धर्मसाधन करनेके श्रेष्ठ
स्थानों में रहने है, अपने योग्य आहार विहार करते हैं,
सज्जन धर्मात्मा पुरूषोंकी संगतिमें रहते हैं। ऐसे श्रावक
जिनधर्म माण व रसक कहलाते हैं। विना ऐसे श्रावकोंके
मुनिमार्गका चलना भी असंभव हो जाता है क्यों कि मुनि-
याँ भरीको स्थिति श्रावकों के ही आश्रित है। इसलिए
ऐसे धर्मात्मा धावकोंका अविनय करना अथवा उनकी निंदा
करना महापाएका कारण है। हे आत्मन् ! यदि तूने ऐसे
आरकोंकी निंदा की हो वा उनका अविनय किया हो तो तु
उसका पक्षाचाप कर उनसे क्षमा मांग और उनकी सेवा
मुथपा कर ! ऐसा करनेमे तेरे पाप शांत होंगे, तेरा आत्मा
मुग्वी होगा और.कतार्थ समझा जायगा तथा आत्मा सरलता
बाजानेमे पपगसे मोक्ष प्राप्त कर अनंतसुखी हो सकेगा।
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-धायक- ६४ आगे चारों गतियों पाणियोंको दुःख देनेकी आलो. चना करते हैं- चतुर्भवे दुःखमय विचित्रे । विपत्प्रकीर्णे भ्रमता स्वयैव ।। देवा प्रलोभान्मनुजाश्च मानाद् । भयंकरान्नाराकनः प्रकोपात् ॥ ५८ ॥ हा मायया वा पशवो ह्यदोषा । विदारिताः प्राणहृताश्च दग्धाः ।। तत्पापशांत्यै कुरु तान् स्वकीयान् । नश्येत्प्रकोपोऽपि यतश्च तेषाम् ॥ ५५ ॥ अर्थ-चारों गतियोंके भेदसे यह संसार चार प्रकारका है । यह चारों प्रकारका संसार अत्यंत दुःखमय है, अत्यंत विचित्र है और अनेक प्रकारकी विपत्तियोंसे भरा हुआ है। इसमें तीव्र लोभके कारण देवगति प्राप्त होती है, मान कषा- यकी तीव्रतासे मनुष्यगति प्राप्त होती है, क्रोधकी तीव्रतासे नरकगति प्राप्त होती और मायाचारी करनेसे तिर्यंचगति प्राप्त होती है । हे आत्मन् ! तूने भी इन चारों गलियारूप ससारमें सदाकाळसे परिभ्रमण किया है और इन चारों कषायोंके निमित्तसे ही परिभ्रमण किया है । इस प्रकार परिभ्रपण -- प्रतिकमणसार- ६५ करते हुए तने यदि कोई पशु वा मनुष्य विदीर्ण किया हो ना जगया हो अथवा किसीके प्राण हरण किए हों तो तू उन सर पापोंको शांत करने के लिए उन मवको अपना बना। क्यों कि ऐमा करने में उन सबका क्रोध शांत वा नष्ट हो जायगा। भावार्य-गति भी चार है और पाय भी चार हैं। निम प्रकार धन इकट्ठा करनका लोभ होता है उसी प्रकार जिनप्जन वा सुपात्रदान देकर अधिक पुण्योपार्जन करनेका भी लोम होता है। ऐसे पुण्योपार्जन करनेके लोभसे यह नीच उत्तमदेव होना है तथा घनादिकके लोभसे नाच देव होता है । इसी प्रकार मैं उनमश्रावक हु, श्रावक होकर मुझे पापकार्य वा निंद्य कार्य नहीं करने चाहिए । पापकार्य वा निंद्य कार्य करना नीच लोगोंका काम है, इस प्रकारके स्वात्माभिमानमे उत्तमपनुष्य होता है तथा अभिमान कर- नंसे माधारण वा नीच मनुष्य होता है । मायाचारी करनेसे पशु हाना है और क्रोधकषायसे नारकी होता है। इस प्रकार क्रोध मान माया लाभ इन चारों कपार्यों में परिभ्रमण करना है । हे आत्मन् ! तृने भी इन चारों गतियोंमें परिभ्रमण किया है और कर रहा है। हे आत्मन् । यदि तूने इन नशिंगम किमी जीवको सताया हो, दुख दिया हो, विदीर्ण फिया हो वा जलाया हो वा किसीकी इंद्रियां नष्ट की हो वा किमी के प्राण हरण किए हों तो तू उनसे क्षमा मांग, अपने हृदयमे पश्चात्ताप कर और जिस प्रकार हो सके उस प्रकार धावक- ६६ उसके क्रोधको शांत कर ऐसा करनेसे तेरा आत्मा पवित्र हो जायगा तथा आत्मा और मनके पचित्र होनेसे पापकाँका नाश होगा और पुण्यकर्मका बंध होगा तथा समयानुसार रत्नत्रयकी प्राप्ति होकर अनंत मुखकी प्राप्ति होगी। आगे अन्य कुकर्म करनेकी आलोचना करते है- संसारसंतापविवर्द्धकानां। भूत्वां वशं क्रोधचतुष्टयानां हमें प्रणिन्यं कृतवान् कुकर्म । तथान्यलोके विषमं व्यथादम् ॥ ६० ॥ तत्पापांत्यै च कषायकाण्ड । त्यक्त्वा तथा मोहविशाचसंगम् ॥ स्वानंदसिंधौ च रमस्व चात्मन् । यतः प्रिया स्यात्तव मोक्षलक्ष्मीः ॥ ६ ॥ अर्य-हे पात्मन् ! देख क्रोध, मान, माया, लोभ ये चारों कषायें जन्म-मरणरूप संसारको बढानेवाली हैं। इन्हीं चारों कषायोंके वशीभूत होकर तूने सर्वथा त्याग करने योग्य अत्यन्त निन्दनीय और परलोकमें भी विषम दुःख देनेवाले कुकर्म किए हैं। हे आत्मन् ! अन तू उन पापोंको नाश कर- के किए चारों कषायोंका त्याग कर तथा योहरूपी दिशा- प्रतिक्रमणसार- १ का त्याग कर और आत्मजन्य अनुपम आनन्दके समुद्रमें कीराकर । हे आत्मन् ! ऐसा करनंस ही मोक्षरूपी लक्ष्मी तुझसे अनुगग करने लगेगी। भावार्थ-ई आत्मन् ! क्रांध निमित्तमे तूने न जाने कितने जीवोका पान किया है, न जाने कितने जीवाका धन हरण किया है, न जाने कितने जांघोंको दुःख पहुंचाया है रा चोट पहुंचाई है और न जाने कितते नीवोंको स्थानभ्रष्ट पिया है। पान पायक निमित्तम न जाने कितने गरीगेको मनाया है और न जाने कितने पूज्य पुरुपोंका अनादर किया है।मायाचारी करके न जाने कितने घर नष्ट किए है. न जान कितनी विगोंका चील हरण किया है, न जाने कितने जीवोंको । चोर आपत्ति फंसा दिया है और न जाने कितने जीवोंका सर्वस्व हरण कर लिया है। इसी प्रकार लोभ कपायक निमित्तमे न जाने कितने निंदनीय कार्य किए हैं, न जाने किननं घपकायाय परिवर्तन किया है और न जाने कितने धर्मात्मा ओंको धर्म करने का है। इस लोभक ही निमि- चसे दान मुपादान नहीं दिया और न कभी जिनपूजन की। कहानक कहा नाय इस लोभके ही कारण आजतक मन्दिरमनिष्ठा, सपदान आदि कोई भी पुण्यकार्य नहीं किया। आत्मन् । उनी मन कारणांस भाजतक चागें गतियों परिभ्रमण करना रहा है। प्रात्मन् ! अब तू यदि अपने यात्माका कल्याण करना चाहता है नो इन चारों कपायोंका साग कर तथा पार्टीको उत्पन्न करनेवाले मोहका सर्वथा --भाषफ- ॥ त्याग कर और अपने आत्माके शुद्ध स्वरूप क्रीडा कर । के आत्मन् ! ऐसा करनेसे ही मोक्षरूपी लक्ष्मी तुझपर प्रसम होगी और सदाकाल रहनेशला अनन्त सुख देगी। आगे किसीका यश धन वा अन्नपानके हरण करनेकी मालोचना करते हैं- निर्दोषजन्तोरपि दुष्टबुद्धया। त्वयात्महंत्राऽखिलपापकर्ता । वस्त्रान्नवस्तूनि यशोधनानि । गजाश्वहाणि विभूषणानि ॥ ६२ ॥ सुनिर्दयाद्वापहृतानि यस्मात् । तत्पापशांत्य वसनं च दत्वा ।। कुरुष्व तेषां हृदि वात्मशांति। थतस्तवात्मेति भवेद्वरिष्ठः ॥ ६३ ॥ अर्थ-हे आत्मन् ! तीव्र कषायोके द्वारा अपने आत्माका घात करनेवाले और सब प्रकारके पाप करनेवाले तूने अपनी दुष्ट वुद्धिसे निर्दय होकर निर्दोषनीवोंके अन्न, पान, वस्त्र, यश, धन, हाथी घोडे, मकान और आभूषण आदि हरण किए हैं । इसलिए हे आत्मन् ! उन पापोंको शांत करनके लिए वस्त्रादिक देकर उनके हृदयको अत्यन्त शांत कर । आत्मन् ! ऐसा करनेसे ही तेरा यह भात्मा सर्वोत्कृष्ट हो जायगा।
प्रतिकमणसार- ६९ भावार्थ.-कलापोंके निमित्तमे यह आत्मा दमरोंके पदायाको हरण करना है। जिम समय यह आत्मा शिमीका मा अपहरण करने लिए तीन पाय उत्पम रना एम ममय हम पायसं अपने आत्माका पान करना है । दम धनातिकका अपहरण हो पा न हो पान काय उपमहान उमकी आत्माया घात अवश्य हो जाता है। नपा पात्मनात पग्ना मपमे पटा पाप कह- गतान प्रान्मन ! गदि तु इस पहापापसे पचना पानानी अपने मामा भी पाय उत्पम न होने दे। अपने मामा कपाय उत्तम न होने से फिर दमरोके धना- दिन भरण करने परिणाम नी होगं और इस प्रकार या आत्मा म पागमें रन नायगा तथा ई पात्मन् ! अब तक नोनने अनेक निदॉप प्राणियोंका धनादिफ अपहरण किया उमपि पाधाप कर उनसे क्षमा मांग और उनको मन त मनष्ट कर । इस प्रकार पापोंके नष्ट राने में और आत्मा निर्ममता जाने में यह आत्मा उत्कृष्ट और प्रशमनीय हो जाता है! भागे प्रारम्भादिकम होनेवाटे एकसौ आठ पापोंकी आन्हांचना करते हैं। पंचसूनक्रियाया वा कृप्यादिवृत्तियोगतः। संरंभादिकपायाद्वा का यकृतादिभेदतः॥६॥ अष्टोत्तरशतं पापं प्रतिनित्यं प्रजायते । नत्यारक्षालनार्थ हि भक्त्या देवार्चनादिकमा६५।
"श्रावक- अष्टोत्तरशतं जाप्यं सत्प्रतिक्रमणादिकम् । निजात्मचिन्तनं नित्यं क्रियते धर्मद्योतनम्॥६६ अर्थ-इस संसार प्रत्येक गृहस्थके घर चक्की पीसी जाती है, उखलीमें धान्य कूटा जाता है, चूल्हा जलाना पडता है, बुहारी देनी पडती है और पानी भरा जाता है । इन सब कामोंमें थोड़ी बहुत हिंसा अवश्य होती है इसीलिये इनको पंचसून वा पंचपाप कहते हैं। इसके सिवाय प्रत्येक गृहस्थके घर कमाने खाने के लिए जीविका करनी पड़ती है। उसके लिए या तो खेती की जाती है या व्यापार किया जाता है अथवा देशकी रक्षाके लिए सेनामें रहा जाता है चा किसीकी मुनीमी करनी पड़ती है वा किसीकी सेवा करनी पडती है अथवा कोई कारीगरीका काम करना पडता है। इस प्रकार आजीविकाके लिए इन छह कार्योमसे कोई भी कार्य करना पडता है। इन कार्योंको कोई क्रोधसे करता है, कोई मानसे करता है, कोई मायासे करता है और कोई लोभसे करता है। तथा कोई स्वयं करता है कोई कराता है और कोई अनुमोदना करता है। कोई मनसे करता कराता है कोई वचनसे करता फराता है और कोई कायसे करता कराता है। कोई संरंभरूप हो करता है, कोई समारंभरूप करता है और कोई आरंभरूप करता है वा कोई संरभ समारंभ आरंभ तीनों रूप करता है। इस प्रकार प्रत्येक गृहस्थाको प्रतिदिन इन सबसे होनेवाले एक सौ आठ प्रकारके प्रतिक्रमणसार- पाप अवश्य लगते हैं। इन सब पापोंको नाश करनेके लिए प्रतिदिन देव-पूजा करनी चाहिये, अपने आत्माका चितवन करना चाहिये, धर्मका उद्योत करना चाहिये और एक सौ आठ बार भगवान् अरहतदेवका जप करना चाहिये। भावार्थ-किसी कार्यको करने के लिए चितवन करना संरंभ कहलाता है, उसकी करण सामग्री इफही करना सपा- रंभ कहलाता है और उस कार्यको प्रारभ करना आरंभ कहलाता है। ये तीन क्रोध मान माया लोभ इन चारों पायांसे मन वचन काय द्वारा सयं किये जाते हैं कराये जाते है और उनकी अनुपांदना की जाती है। इस प्रकार इसके सब भेद एकसो आठ हो जाते हैं और नाँच लिख अनुमार स्पष्ट रीतिसं समझ आजाते हैं। फोध कोम मान माया २ ३ ४ कृन कारित . काययोग वचनयोग १२ समाम ३६ अनुमोदना ८ मनयोग २४ भारंभ ७२ मरंभ संरभ समारम आरमका लक्षण ऊपर लिख चुके हैं। क्रोध मान माया लोभ ये चार कषाय हैं, कृत स्वयं करनेको कहते हैं, कारित करानेको काहते हैं और अनुमोदना भला भावक- D ७२ मानने वा सम्मति देनको कहते हैं। शरीरसे करनेको कार- योग कहते हैं, वचनसे कहनेको वचनयोग कहते हैं और मनसे करनेको मनोयोग कहते हैं। अब इनके एकसौ आठ भंद दिखलाते हैं। क्रोधकृतकायसंरंभ, १ मानकृतकायसंरंभ २ मायाकृष्कायसंरंभ ३ लोपहतकायसंरंभ ४ अर्थात क्रोध मन माया वा लोभसे शरीरसे स्वयं किया हुआ संरंभ तथा क्रोधारित कायसंरंथ ५, मानकारित कायसंरंभ ६, माया. कारित कायसंरंभ, लोभकारित कायसंरंभ ८ अर्यात् क्रोध पान, माया, लोभसे शुगरके द्वारा कराया हुआ संरंभ तया क्रोधानुमतकायरिंभ ९, मानानुमनकायसंरंभ १०, माया- नुमत कायसंरंभ ११, कोभानुमत कायसंरभ १२ । अर्थात् क्रोष मान माया लोभसे शरीरके द्वारा अनुमोदना किया हुआ संरंभ । इस प्रकार शरीरसे होनेवाले संरंभके पारद भेद होते हैं। इसी प्रकार वचनसे होनेवाले संरंभके भी धारह भेद होते हैं यथा क्रोधकृतवचनसंरंभ, मानकृतवचन संरंभ मायाकृतवचनसंरंभ, लोभकृतवचनसंरंभ. क्रोधकारि- ववचनसंरंभ, मानकारितवचनसंरंभ, मायाकारितवचनसंरंभ, लोभकारितवचनसंरंभ । क्रोधअनुपतवचनसरंभ, मानानुमत- बचनसंरंभ, मायानुपतवचनसंरंभ, लोभानुमतवचनसंरंभ । आगे मनसे होनेबाळे चारह प्रकारके संरंभको बतळाते हैं। क्रोधकृतमनःसंरंभ, मानकृतमन मरंभ. पायाकृतमन सरंभ लोभकृतपनःसंरंभ,क्रोधकारितपनःसंरंभ,मानकारितमनःसंरंभ मायाकारितमनःसरंभ, लोयकारितमनःसरंभ, कोधानुमतमनः प्रतिक्रमणसार- ७३ सरंभ मानानुमतमनःसरंभ मायानुमतमनःसंरंभ और लोभानु- मतमनःसरंभ । इस प्रकार शरीरसे पारइ प्रकारका सरंभ होता है, वचनसे बारह प्रकारका सरंभ होता है और मनसे शरह प्रकारका संरभ होता है। इस प्रकार संरभके छत्तीस भंद होते हैं। इसी प्रकार समारंभके छत्तीस भेद होते हैं और आरंभके भी छत्तीस भेद होते हैं। सब मिलकर एकसौ आठ भंद होते हैं। इनमसे यदि बीचकी संख्या निकालनी हो तो कोष्टक दिये हुए अंकोंको जोड लेना चाहिए जहां दो वा तीनमें मंल्पा मिल जाय तो शेष शून्य संख्याका कोष्टक सपझना चाहिए। जैस किसीने पूछा कि वनीसवीं संख्या कौनसी ई नी पहली पक्तिका चार दूसरी पक्तिका चार और तीसरी पक्तिका चौवीस मिलकर बचीस हो जाते हैं इसलिए पकी पंक्तिकी शून्य संख्या समझनी चाहिए और इस प्रकार लोभ कारिनमनःसरम्भ नामका बत्तीसवां भेद होता है। इसी प्रकार यदि कोई पूछे कि मायाकारित मन समारम्भ नापका कौनसा मंद है तो इन नामोंकी तीन, चार, चौवीस और छतीस संख्या जोड लेनेसे सदसठ संख्या होती है। इसलिए मायाकारितमन समारम्भ नामका भेद सदसठवां सपनना चाहिए । इमी प्रकार संख्यासे नाम और नामसे संख्या निकाल लेनी चाहिए । ये एकसौ आठ पाप आने के साधन है, उनके द्वारा प्रतिदिन न जाने कितनचार पाप आते रहते है। इसलिए ही आचार्योंने इन समस्त पापोंको नांन करने लिए एकसौ आठ दानकी माला जपनेका उप-
७४
भाषक-
देश दिया है । यह माला प्रतिदिन तीन बार जपनी चाहिये ।
यदि कदाचित् तीनधार न जप सके तो मात:काल और
सायंकाल दोबार तो गृहस्थोंको अवश्य जपनी चाहिए।
जपमें पंच परमेष्टीका नाम होना चाहिए । पंच नमस्कार मंत्रका
जप करना सर्वोत्कृष्ट है तथा इसका माहात्म्य भी सर्वोत्कृष्ट
है। इसके सिवाय दोनो समय अपने शुद्ध आत्माका चितवन
करना चाहिए, प्रतिदिन दोनों समय प्रतिक्रमण करना
चाहिए । प्रतिदिन भगवान् जिनेन्द्रदेवका पूजन करना चाहिए
और स्थोत्सव वा विम्बप्रतिष्ठा आदिक द्वारा जिनधर्मकी
प्रभावना करनी चाहिए। ऐसा करनेसे पहले के पाप सब नष्ट
हो जाते हैं और आगेके लिए स्वर्गादिक मुखौंकी प्राप्ति होती
है तथा परंपरासे मोक्षकी प्राप्ति होती है।
आगे कगुरु तथा कुशास्त्रकी स्मृति प्रशंसाकी आलो-
चना करते है-
सरागमूर्तेः कुगुरोः कुनीते,
स्तुतिः प्रशंसा गुरुदेवबुद्धया।
त्वया प्रलोभाद्धि नतिः कृता चेत्
तवात्मशुद्धयै कुरु तद्वियोगम् ॥६७॥
जिनोक्तशास्त्रस्य गुरोः कृपाब्धेः ,
संयोगमेवं कुरु चित्तशुद्धया।
अन्वेषणीय च यथार्थवस्तु,
मोक्षो यतः प्राप्य भवेन्नृजन्म ॥६॥
प्रतिक्रमणसार- ७५ अर्थ-ई आत्मन् ! यदि तूने गुरु समझकर रागद्वेषको धारण करनेवाले कुगुरुओकी स्तुति की हो वा उनकी प्रशंसा की हो अथवा किसी लोभक कारण उनको नमस्कार किया हो अथवा कुनीतिको कहनेवाले कुशास्त्रकी स्तुति की हो वा प्रशंसा की हो वा किमी लोभस उमको नमस्कार किया हो तो हे आत्मन् ! तू अपने आत्माको शुद्ध करने के लिये उनका त्याग कर क्या अपने हृदयकी शुद्धतापूर्वक भगवान् जिनेन्द्र- देवके कई हुए शास्त्रोंका पठन-पाठन कर और कृपा सागर ऐसे निग्रंथ गुरुको मान । हे आत्मन् | तू सदा यथार्थ देव शान गुरुका अन्वेषण कर जिससे कि मनुष्पजन्म माप्त होकर तुझे शीघ्र ही मोक्षकी प्राप्ति हो । भावार्य-हे आत्मन ! देख इस संसारमे कुगुरु और फुशास्त्रका सम्बन्ध महादुःख देनेवाला है। नरकादिफके दुःख कुगुरु और कुशास्त्रों के ही सम्बन्धस मिलते हैं। राग द्वेषको धारण करनेवाले, सब तरहके आरम्भ करनेवाले वा खती घाटी करनेवाल अथग कुटी बनाकर रहनेवाले, चरस भांग गांजा आदि पानवाले जितने साधु हैं वे सब कुगुरु कहलाते हैं । एमे कगुरु पत्थरकी नाव होते हैं, जो स्वय इवते हैं और अपने शिष्यका ले इनते हैं । इसी प्रकार कुशास्त्र वा मिथ्या शास्त्र इनसे भी अधिक पाप उत्पन्न कराते रहते हैं। अनन्त संसार परिभ्रमण करानवाला गृहीतपिथ्यात्व कुशास्त्रों के पठन पाठनसे वा सुनने से ही होता है। ये दोनो ही इस जीवको नरकादिक के दुःख देनेवाले । इसलिए हे भात्मन् ! 1 भावक- ७६ यदि तू अपने आत्माका कल्याण करना चाहता है नो सबसे पहले इनका त्याग कर । विना इनका त्याग किए तेरे आत्माका कल्याण कभी नहीं हो सकता । जो साधु वीतराग हो किसी प्रकारका परिग्रह न रखते हो, किसी प्रकारका आरम्भ, न करते हो और जो काम, क्रोध, मान, माया, लोभ, तृष्णा, काळसा आदि सब प्रकारके विकारोंसे रहित हों ऐसे गुरु स्वयं पार होने हैं और शिष्योंको भी पार कर देते हैं। इसी प्रकार वीतराग और सर्वज्ञदेवका कहा हुआ शास्त्र ही पथार्थ शास्र हो सकता है । इस संसारमें जो वीतराग होता है वही पक्षपातरहित होता है तथा वही यथार्थ उपदेश दे सकता है तथा सर्वज्ञ होनेसे वह स्थूल सूक्ष्म पदार्थोंका वा दरवर्ती पदार्थोंको भी यथार्थरीतिसे निरूपण कर सकता है। जो वीतराग और सर्वज्ञ है उसके लिए मिथ्या उपदेश देनेका कोई कारण ही नहीं है । जो सर्वज्ञ नहीं है अर्थात् जो समस्त पदार्थों को नहीं जानता है वही सूक्ष्म वा दूरवर्ती पदार्थों को यथार्थरीतिसे नहीं कह सकता अथवा जो चीतराग नहीं होता, राग द्वेष धारण करता है वह भी किसी पक्षपा- तके वशीभूत होकर मिथ्याभाषण कर सकता है। भगवान् जिनेन्द्रदेव सर्वज्ञ भी है और वीतराग भी हैं इसलिए उनके कहे हुए शास्त्रोंमें कभी कोई वात मिथ्या नहीं हो सकती अत एव आत्माका कल्याण करने के लिए हे आत्मन् ! तुझे भगवान् जिनेन्द्रदेवके कई हुए शास्त्रोंकी ही शरण लेनी चाहिए, उन्हींका पठन-पाठन करना चाहिए। वर्तमान सम- प्रतिफमणसार- ७७ यमें इस जैनधर्मको धारण करनेवाळे कितने ही विद्वान् जी विजातीय विवाह या स्पर्शस्पर्श लोप अथवा विधवाविवा- हको मानते हैं वद सब कुगानोंके पठन-पाठन करनेका फल है। ऐसे पुरुषों के लिखे हुए अथ अथवा कहा हुआ उपदेश कभी मान्य नहीं हो सकता। इसलिए हे आत्मन् । तू भी आपना कल्याण करने के लिए भगवान् जिनेन्द्रदेवके कई हुए शास्त्रांका तथा निग्रंथ गुरुत्रांका शरण ले। इसीसे तू संसा- ररूपी समुद्रस पार हो जायगा। आगे मातःकाळके चितवनको कहते हैं- बंधुश्च मे कोऽस्त्यहमेव तस्य । को कोऽस्मि धर्मोऽपि मम प्रदेशः ॥ कीग हि कृत्यं करणीयमस्ति । तथा परेषां हितचिंतनं वा ॥ ६९ ॥ एवं विचारः सुखदश्च कार्यः! प्रातस्त्वयोत्थाय च चितशुद्ध्या ॥ यतः स्वयं त्वं हि भवेः पवित्रः। आबालवृद्धस्य सुखप्रचारी ॥ ७० ॥ हे आत्मन् ! यदि तू अपने आत्माको पवित्र करना चाहता है और चाकक वृद्ध युवा सबको मुख पहुचाना चाहता है तो प्रातःकाल उठकर ही अपने चित्तकी शुद्धता पूर्वक मुख देनेवाला इस प्रकारका विचार वा चिन्तवन कर -श्रावक- कि इस संसारमें मैं कौन हूं, मेरा हित करनेवाला यधु कौन है, मेरा धर्म क्या है, मेरे आत्माके प्रदेश कैसे है, मुझे क्या क्या कार्य करने चाहिए और अन्य जीवोंका हित किस प्रकार हो सकता है। भावार्थ-भातःकाक जो चितवन किया जाता है वह दिनभर बना रहता है । इसलिए है आत्मन् ! तू भी प्रातः काळ उठकर प्रतिदिन यही चिन्तवन कर कि मैं कौन हूं अर्थात् मैंने किस पर्यायमे जन्म लिया है, पहले किन किन पर्यायोंमें परिभ्रमण किया है, किस पुण्यकर्मके उदयसे मनुष्य पर्यायमें उत्पन्न हुआ है ! इस पर्यायमे मेरे आत्माका कल्याण करनेवाला पंधु कौन है ' क्या कुटुबी लोगोसे मेरे आत्माका कल्याण हो सकता है ? मेरे आत्माका स्वभाव वा धर्म क्या : है, क्या मैं अपने आत्माके धर्मके अनुसार चलता हूं! अथवा उसके विपरीत चकता हूं ! मेरे आत्माके प्रदेश मलिन अथवा निर्मल हैं यदि मलिन है तो उन्हें किस प्रकार निर्मल करना चाहिये ऐसे कौनसे कार्य करने चाहिये जिनसे यह मेरा आत्मा निर्मल हो जाय तथा इस मेरे आत्मासे किस प्रकार अन्यजीवोका कल्याण हो सकता है। हे आत्मन् ! यदि तू प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर इस प्रकार चितवन करता रहेगा तो अवश्य ही मोक्षमार्गमें लग जायगा तथा अपने आत्माको पवित्र बनाकर अन्य जीवोंका भी कल्याण करता रहेगा। आगे मिथ्यात्व और आतंरौद्र ध्यानको छोड़नेके लिए तथा जिनेंद्र होने के लिए कहते हैं- 7 प्रतिक्रमणसार- ७९ रौद्रातभावं भवबंधमूलं मिथ्याविषं प्राणहरं विमुच्य । ध्यानं च धर्मस्य समाधिमूलं सेवां मुनीनां कुरु मोक्षदां वा ॥ ७१ ॥ सामायिकं शांतिकरं सदैव समस्तसन्तापविनाशकं यत् । स्थातुं स्वधर्मे हि तथा यतस्व यतस्तवात्मा प्रभवजिनेंद्रः ॥ ७२ ॥ अर्थ--हे आत्मन् ! यदि तू अपने आत्माको भगवान् जिनेंद्रदेवके समान ही जिनेन्द्रदेव बनाना चाहता है तो जन्म- मरणरूप संसारके बंध होनेके मूळ कारण ऐसे आर्तध्यान तथा रौद्रध्यानका सर्वथा त्याग कर और समस्त जीवोंके पाणीको हरण करनेवाले मिथ्यात्वरूपी विषयका सर्वथा त्याग कर । इन दोनोंका सर्वथा त्याग कर समाधिमरणका मूल कारण ऐसे धर्मपानको धारण कर, मोक्ष देनेवाली मुनियों की सेवा कर, समस्त सन्तापको नाश करनेवाले और आत्मामें सदाकाळ शांति स्थापन करनेवाले सामायिक को सदाकाल कर और अपने आत्माके शुद्ध स्वरूपमें स्थिर रहने के लिए इस प्रकार प्रयत्न कर कि जिससे यह तेरा आत्मा स्वय जिनराज पदपर विराजमान हो जाय । भावार्थ-ध्यानके चार भेद हैं आध्यान, रोध्यान, थावका ८० धर्पध्यान और शुक्लध्यान। आर्तध्यान के चार भेद हैं-किसी पुत्र पौत्रादिक इष्ट पदाथोक वियोग होनेपर उसके संयोग लिए बार-बार चितवन करना, शत्रु आदि किसी अनिष्ट पदार्थक संयोग होनेपर उसके वियोगकं लिए बार-बार चिन्तवन करना, किसी रोग होनेपर उसके दूर होने के लिए बार-बार चिन्तवन करना और आगामीकालके लिए वा आगेके जन्म के लिए भोगोंकी इन्छा करना ये चार आत- ध्यानके भेद है । हिंसामें आनन्द मानकर उसका वार-बार चितवन करना, मिथ्याभापण करनेमें आनन्द मानकर उसके लिए वार-चार चितवन करना, चोरी आनन्द मान- कर उसके लिए बार-बार चितवन करना और परिग्रहमें आनन्द मानकर उसके संग्रह के लिए चार-चार चिन्तवन करना ये चार रौद्रध्यानके भेद है । इनमेसे रौदध्यान नर- कका कारण हैं और आर्तध्यान तिचादिक गतिका कारण है । ये दोनों ध्यान जन्ममरणरूप ससारको बढानेवाले हैं। धर्मके स्वरूपका चिन्तवन करना धर्षयान है। उसके भी चार भेद है। भगवान् जिनेन्द्रदेवकी आज्ञा मानना, उसके प्रसारके लिए प्रयत्न करला, आज्ञात्रिचय नामका पहला धर्मध्यान है। इस संसारमें जो जीव पिथ्यादृष्टी ई वा दुखी है उनका मिथ्यात्व वा दुःख किस प्रकार छूट सकता है, इस प्रकार वार चार चिन्तवन करना अपायविचय नापका दूसरा धर्मध्यान है। इस संसारमें जो सुख दुख मिलता है वह काँके उदयसे ही पिलता है। दूसरे लोग तो उसमें निमित्त ।
1 प्रसमसार ८१ कारण हैं यही समझकर मुख दुःख दोनाम समता धारण करना और कर्मफ उदयका चितवन करना विपाकविचय नामका धर्मपान है। इसी प्रकार लोकाशके स्वरूपका वा उसमें भरे हुए समस्त पदार्याका तथा मुख्यतया आत्माके शुद्ध स्वरूपका चितवन करना संस्थानविचय नामका धर्यध्यान इस प्रकार ये चारी यान परम्परासे मोसके कारण है। पृपक्ववितक, एकत्ववितक, मूक्ष्मक्रियामतिपाता और व्युप- रतक्रियानिवृत्ति ये चार शुक्ल-यानके भेद हैं। जिसमें तीनों यांगोंके द्वारा अंनक पदायाँका चितवन किया जाय उसको पृथक्त्ववितर्क कहते है । किसी एक योगके द्वारा किसी एक ही पदार्थ का चितवन किया जाय अर्थात् जिसमें किसी प्रकार का विचार न हो, अर्थात् जिस चितवनमें न तो पदार्थोंका संक्रमण हां, न शब्दोका संक्रमण हो और न योगांका संक्र- मण हो उसको एकत्ववितर्फ शुक्रव्यान कहते हैं। संक्रमणका अर्य पदळना है, चितवन करते करत एक पदार्थको छोडकर दुसरे पदार्थको चितवन करने लगना चा एक शब्द को छांटकर दूसरे शब्दस चितवन करने कगना अथवा किसी एक योगस चितवन करते हुए किसी दूसरे योगस चितवन करने लगना वीचार वा संक्रमण कहलाता है । यह विचार पहले शुक्ल-यानमें होता है इसमें नहीं। ये दोनों प्रकारक शुक्लध्यान शृतकंवलियोंक होते है । जो आत्मचितवन केवल काययोगस किया जाता है और जिसमे क्रियाका सम्पर्क अत्यंत सूक्ष्मरीतिसे होता है उसको सूक्ष्मक्रियापतिपाती ८२ नामका तीसरा शुक्लध्यान कहते हैं । यह ध्यान कंवली भगवान् के तेरहवें गुणस्थान होता है। जो ध्यान बिना किसी योग केवळ आत्मा द्वारा होता है जिसमें क्रियाका संबंध सर्वथा छूट जाता है ऐसा चौदहवं गुणस्थानमें सने- वाला ध्यान चौथा व्युपरतक्रियानिवृत्ति नामका शुक्ल- ध्यान कहलाता है । ये चारों शुक्लध्यान साक्षात् मोक्षके कारण हैं । हे आत्मन् ! यदि तू मोक्षक सुख चाहता है तो आर्तध्यान और रौद्रव्यान दोनोंका सर्वथा त्याग कर और धर्मध्यानको धारण कर । प्रतिदिन सामायिक कर, उसमें धर्मध्यानका चितवन कर तथा मनियोंकी सेवा कर, उनको आहारदान दे, उनको वैयावृत्ति कर और उनकी आवानुसार चळ । हे आत्मन् ! ऐसा करनेस ही तेरे आत्माका शीघ्र कल्याण होगा। आत्मा शुद्ध स्वरूपमें लीन होनेसे तू शीघ्र ही भगवान् जिनेद्रदेवका पद प्राप्त कर लेगा। प्रतिदिन सामायिक करने से समस्न संताप दूर हो जाते है, मन शांत हो जाता है और शांत होकर आत्माके शुद्ध स्वरूपमे कीन हो जाता है। आगे एकत्वभावनाका चितवन करते हैं- स्वात्मा सदैको म्रियतेऽसहायः । को जायते कर्मवशात्सदैकः ॥ करोति पापं विषमं सदैको । भुक्ते तदेकः समयं सुलब्ध्वा ॥ ७३ ॥ man प्रतिकमणसार ८३ मोक्षं प्रयाति स्वयमेव चैको । मोक्षे सदा तिष्ठति वापि चेकः ॥ आत्मा तथा नात्मनि तिष्टतीत्थं । तावद्विचार सुखदश्च कार्यः ॥ ७४ ॥ अर्थ-हे आत्मन् ! देख. यह आत्मा सदा अकेला ही मरता है, उस समय इसका कोई सहायक नहीं होता तथा इस ससारमें अपने कर्मक उदयसे सदा अकेला ही जन्म देता है। यह आत्मा अकेला ही सदाकाळ महापाप उत्पम करता रहता है और समय पाकर अकेला ही उन काँक उदयसे उत्पन्न होनेवाले पहादुःखोंको भोगता रहता है । इसी प्रकार अकेला ही मोक्ष जाता है और अकेला ही सदाकाल सिद्ध अवस्था में विराजमान बना रहता है । हे आत्मन् ! जर तक तेग आत्मा इस प्रकार मोक्षमें पहुंचकर अपने आत्मा कीन न हो जाय तब तक तु इस सुख देनेवाली मात्माकी एकत्वभावनाका ही चितवन करता रह । भावार्थ-यह भात्मा जब तक इस एकत्व भावनाका चितवन नहीं करता तब तक ही इस संसारमें पडा पडा दुःख भोगा करताई । एकत्वभावनाका चितवन करनेसे या आत्मा परपदायक ममत्वको छोड देना है, कुटुम्बमे ममत्व छोट देता है और अकेले आत्माका चितवन करता हुआ उसीम लीन हो जाता है । इस प्रकार एकत्वभावनाका चितवन करना मोक्षका कारण है। इसलिए हे भान्मन् । तू श्रविक ८४ . भी सदाकाळ इस एकत्वभावनाका चितवन कर इसके चितवन करनेसे अवश्य ही तेरे आत्माका कल्याण होगा। आगे रत्नत्रयको धारण करने के लिए कहते है- दृग्बोधचारित्रसुखस्वरूपी स्वात्मा सदा तेऽस्ति यथार्थदृष्ट्या । तथाप्यबोधादिति तद्विरुद्धं मत्वा व्यथादं कृतवान् कुकर्म ॥७५॥ : ज्ञात्वेति तत्कर्मविनाशनार्थ दृग्बोधचारित्रसुखस्वरूपः। स्वात्मेति मत्वा कुरु चित्तशुद्धिं स्यात्ते स्वसिद्धिर्निजराज्यदात्री ॥ ७६ ॥ अर्थ-है आत्मन् ! देख, यदि यथार्थरीतिसे देखा जाय तो यह तेरा आत्मा सदाकाल सम्यग्दर्शनमय है, सम्यग्ज्ञानमय है। सम्यक्चारित्रमय है और अनंतसुखस्वरूप है । तथापि हे आत्मन् ! तूने अपने अज्ञान के कारण उसे अपने स्वरूपसे विरुद्ध समझा है और इसीलिए तूने महादुःख देनेवाले अनेक कुकर्म किए हैं। हे आत्मन ! अब त उन कर्मोंको नाश करने के लिए अपने आत्माको सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्- चारित्र और अनंतसुखमय समझ और ऐसा समझकर अपने चित्तको शुद्ध कर । हे आत्मन् । ऐसा करनेसे ही आत्माकी शुद्धतारूप स्वराज्यको देनेवाली तेरे आस्थाकी सिद्धि हो जायगी ।
प्रतिकमणसार- ८५ भावार्थ-सम्यग्दर्शन सम्पग्नान और सम्पकचारित्रको रत्नत्रय कहने हैं । यह रत्नत्रय आमाका निज स्वरूप है और इसीलिए यह मोक्षका कारण है । यह आत्मा अनादि- कास कोंके वशीभून हो रहा है और उन कमाने ही इस आत्मांक यया म्वरूपको ढक रखा है। मोहनीयकर्मने आत्माके सम्यग्दर्शन गुणको ढक रखा है। जब वह दर्श- नमोहनीयकर्म नथा अनन्तानुबंधी चारित्रमोहनीयकर्म नष्ट हो नावा ई वा ननका उपशम हो जाना है तब आत्माका सम्य. ग्दर्भन गुण मगट हो जाता है । यह आत्माका गुण एक मकारके मफाशके मगान है। जैसे प्रकाश होनेपर अपने परायेका यथार्थ ज्ञान हो जाता है उसी प्रकार सम्यग्दर्शन के प्रगट होते ही अपने आत्मा यथार्थ स्वरुपका और परपदा- धोका प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है। इस अनुभवकं द्वारा या आत्मा परपदाधीका त्याग कर देता है और आत्माके मरूपको उपादेय समझकर उसमें गन होने का प्रयत्न करता है । उस सम्यग्दर्शन रूप प्रकाशक साथ जो आत्माके यथार्थ म्वरूपका अनुभव होता है उसीको सम्यग्ज्ञान कहते है तथा उस मम्पशान होनेपर जो परसदायाँको हेय समझकर उनका सर्वथा त्याग कर देना है उसीको सापाचारित्र पाहते है । यह आत्मा परपदाचा संयोगसे हवा उनको अपना मानकर ही दुखी हो रहा है । जब परपदाचीका संयोग हट जाता है नव यह आत्मा अपने आप मुखी हो जाता है। हे आन्मन् । गदि तू भी इसी प्रकार यावक- LATEST ८६ सुखी होना चाहता है तो सबसे पहले सपस्त पापोंका त्याग कर आत्माको शुद्ध पना, अपने आत्माको शुद बनाना ही अपने आत्माकी सिद्धि कहलाती है। आगे आत्माके शुदस्वरूपको चितवन करनेके लिए कहते हैं। स्पर्शादिवर्णात्मकपुरलेन मुक्तस्तवात्माखिलभोगसंगात् । दुःखप्रदान बंधुकलत्रसंगाद् दूरोऽस्ति मिथ्यात्वकषायकाण्डात् ॥ ७७ ॥ स्वनन्दसाम्राज्यपदे प्रयुक्तः तुष्टस्तवारमा स्वचतुष्टयेन। मिष्टे निजानंदरसेऽस्ति पुष्टो निजेऽपि निष्ठो भुक्ने गरिष्ठः ॥ ७० ॥ एवं विचारः सुखदः सदैव हे वत्स ! कार्यों हि त्वया प्रशान्त्यै । आचार्यवर्येण सुखाश्रितेन श्रीकुंथुनाम्नेति सदा प्रणीतम् ॥ ७९ ॥ अर्थ- आत्मन् ! देख तेरा यह आत्मा स्पर्श रस गंध वर्णमय पुद्गलों के विकारसे सर्वथा रहित है तथा सब प्रकारके भोगोंसे रहित है। इसी प्रकार सर्वदा दुःख देनेवाले प्रतिकर्मणसार- ! स्त्री पुत्र भाई पंथु आदिक समागमस सदा रहित है। और पिथ्यात्य वा कपायोंके समूहसे सर्वथा रहित है । इन सबसे सर्वथा रहित होकर अपने आत्म-जन्य आनन्दके साम्रा- ज्पके सिंहासनपर विराजमान है। अनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन, अनन्तमुख और अनन्तवार्य इन अनन्तचतुष्टयोंसे सदा संतुष्ट रहनेवाला ई, अत्पन्न स्वादिष्ट वा मिष्ट ऐसे निजानन्दरसमें लीन होने के कारण सदा पुष्ट रहनेवाला है, अपने आत्मा ही सदा लीन रहनेवाला है और तीनों लोकों पूज्य वा सर्वोत्तम माना जाता है । हे आत्मन ! तुझे अपने परिणामों को सदा शान्त रखने के लिए ऊपर लिखे अनुसार सुख देनेवाला विचार सदा करते रहना चाहिये । ऐसा आत्म-मुख लीन रहनेवाले आचार्य श्री कुंथसागर स्वामीन निरूपण किया है। भाग- स्पर्श, रस, गध और वर्ण ये सब पुद्गलद्रव्यके गुण हैं। आत्मामें ये गुण सर्वथा नहीं है, आत्मा पुद्गलोंके विकारस सर्वथा रहित है। कोई भी ससारी जीव जब मर जाता है नव शरीर यहीं पडा रह जाता है और ज्ञानमय आत्मा इसमेंस निकलकर अन्यत्र शरीर धारण करने के लिए चला जाता है। इससे भी सिद्ध हो जाता है कि इस शरीरमें आत्मा पिन्न है और शरीर भिन्न है । शरीर पुद्गलमय है और आत्मा ज्ञानमय है। इसी प्रकार भौगोपभोगोंसे भी आत्मा भिन्न है। क्यों कि संसारमै जितने भौगोपभोगकी सामग्री है वह सब पुद्गळमय है तथा पुद्गलमय सामग्रीका । ८८ भीषक- भांग पुद्गलमय शरीर ही कर सकता है। पुद्गलामय सामग्री- का भोग अमूर्त आत्मा कभी नहीं कर सकता। इससे भी सिद्ध होता है। भोगोपभागोंका भाक्ता शरीर है आत्मा नहीं है। इसी प्रकार स्त्री पुत्र, मित्र, भाई बंधु आदिका सम्बन्ध भी शरीरकं साथ है । आत्माके साथ किसीका कुछ सम्बन्ध है ही नहीं । पुत्र पित्रादिक सब अपने कर्मकं उदयस उत्पन्न होते है और कर्षकै उदयकं अनुसार ही उनका संयांग वियोग होता रहता है । इसलिए इ आत्मन् ! तू अपने आत्माको इन सबसे भिन्न ही समझ । इसी प्रकार मोहनीयकर्मके उद- यसे मिथ्यात्व होता है और मोहनीयकर्मके उदयसे ही कषाय होते हैं। कर्म सब पौद्गलिक है इसलिए मिथ्यात्व कपायरूप होनेवाला उनका उदय भी पदिकिक ही है। इस प्रकार विचार करनेस मिथ्यात्व और कषाय भी आत्मासे सर्वथा भिन्न ही सिद्ध होते हैं। इस प्रकार इन सबसे सर्वथा भिन्न रहनेत्राला यह आत्मा अनन्तचतुष्टयमय है । अनन्त चतुष्टय इसके स्वाभाविक धर्म है। इसलिए वे सदा आत्माके ही साथ रहते हैं। हम कोगोंके जो कर्मों का आवरण पड़ा हुआ है वह उसे ढक रहा है । उस आवरणके हटते ही वह अनन्त चतुष्टय अपने आप प्रगट हो जाता है । यह तेरा आत्मा अनन्त चतुष्टयमय होनेके कारण ही अनन्तमुखरूपी साम्राज्यमे कीन रहता है और उसी अनंतसुखस सदाकाळ पुष्ट बना रहता है । इस प्रकार अपने आत्माके शुद्ध स्वरूपमें सदाकाल लीन रहनेवाला यह आत्मा प्रतिकमणसार- ८९ P . तीनों कोकॉमें सर्वोत्कृष्ट और पूज्य माना जाता है। हे आत्मन् ! तेरा यह आत्मा ऐसे सर्वोत्कृष्ट स्वरूपको धारण करनेवाला है। इस प्रकार विचार करता हुआ तू पुद्गलोंके समस्त विकारोंसे अपना ममत्व छोड, बाह्य विभूतिसे ममत्व छोडकर उसका त्याग कर, कुटम्ब वा परिग्रहका ममत्स छोडकर उसका भी सर्वथा त्याग कर तथा मिथ्यात्व और काम, क्रोध, मान, माया, लोभ, तृष्णा आदि विकारोंका भी, सर्वया त्याग कर । इन सबका त्याग करनेस तेग आत्मा गद्ध सम्यग्दर्शनको धारण करेगा और शुद्ध सम्यक्चारित्र को धारण करेगा। इस प्रकार रत्नत्रयको धारण करनेसे काँका नाश होगा और अपने आप अनन्तचतुष्टय प्रगट होकर सिद्ध अवस्था प्राप्त हो जायगी तथा फिर वह सिद्ध अवस्था अनंतानंतकाल तक बनी रहेगी। फिर उसमें कभी भी किसी प्रकारका परिवर्तन नहीं हो सकेगा। इस संसार जीवोंकी अवस्था जो परिवर्तन होता है वह कर्म और कषा- योंके निमित्त होता है । सिद्ध अवस्था में कर्म और कषायों का सर्वथा अभाव हो जाता है, इस लिए उन सिद्धोंमें फिर कभी भी परिवर्तन नहीं हो सकता । हे आत्मन् ! इस मकार स्तिवन करता हुआ तू अपने परिणामोंको निर्मक कर तया बहुत शीघ्र सिद्ध अवस्था माप्त करने का प्रयत्न कर। ऐसा आचार्यचर्य श्रीकुंथुसागर महाराजका उपदेश है । यही उपदेश आत्मा लिए कल्याणकारी है। आगे आचार्य गुरुका उपकार मानते हुए प्रयकी महिमा पतला है।
९० -भावक- दीक्षागुरोमें मुखशांतिसिंधो-। रज्ञानहर्तुश्च सुधर्मसिंधोः ॥ विद्यागुरोरेव कृपाप्रसादाद ग्रंथो मयाऽयं रचितः पवित्रः ॥ ८०॥ स्वर्मोक्षदं वांछिनदं ततो ये। ग्रंथं ह्यमुं शुद्धिकरं जनानाम् ॥ पठन्ति भक्त्यैव नमंति नित्यं । स्वर्गापवर्ग भुवि ते लभन्ते ॥ ८१ ॥ अर्थ-मेरी आत्माका कल्याण करनेवाले और मुझे नैनेश्वरी दीक्षा देने वाले मेरे दीक्षागुरु सुख और शांतिके माग ऐसे आचार्यवर्य श्री शांनिसामरजी महाराज है तथा मेरे अज्ञानको दूर करनेवाले मेरे विद्यागुरु आचार्य मृधर्म- सागरजी महाराज हैं । इन दोनों गुरुओंको अमीम कृपाके प्रमादस ही में इम पवित्र ग्रथकी रचना कर सका हूं। यह पवित्रग्रंथ स्वर्गमोक्षको देनेवाला है और समस्त जीवोंकी आत्माओंको शुद्ध करनेवाला है । इस प्रकारके ऐसे उस ग्रंघको जो लोग भक्तिपूर्वक पहने हैं और उसे सदा नमस्कार करते है वे पुरुष इस ससारमें शीघ्र ही स्वर्गमोक्षको प्राप्त कर लेते हैं। भावार्थ-जिस प्रकार सामायिक और प्रतिक्रमण आदिक करनेसे आत्मा पवित्र होता है उसी प्रकार उस प्रतिक्रमणसार प्रतिक्रमणसार- ९.१ अथको पढनमे आत्मा पवित्र हो जाता है तथा भात्माक पवित्र होनस टी स्वर्ग मोक्षको प्राप्ति होती है। रख्यात्यादिहेतो रचितो मयायं । ग्रन्थो न किन्तु स्वपरात्मशान्त्यै ॥ आवालवृन्दादिहितार्थमेव । सन्तापहर्ता वरसूरिणेति ॥ ८२॥ अर्थ-समम्त जीवोंका संनाप दूर करनेवाले और श्रेष्ठ आचार्य ऐसे मुझ कूधसागरने यह अथ अपनी प्रसिदिके लिए नहीं बनाया है किंतु अपने आत्माको शान्ति पहुंचाने के लिए तथा अन्य ममम्न जीनोंको शान्ति पहुंचानेके लिए ही बनाया है । अथवा बालक वृद्ध युवा आदि समस्त स्त्री पुरु- पांका दिन करने के लिए ही इस ग्रयकी रचना की है। ग्रथं ह्यमुं वांच्छितदं हि भक्त्या । पटंति ये केपि सदेव तेभ्यः ॥ स्वर्माक्षलक्ष्मी वृपभादिवीरा । ददन्तु शांति वरसूरयोऽपि । ॥ ८३ ॥ अर्थ-जा भव्य पुरुप इच्छानुसार फळ देवाले इस ग्रंथको भरिपूर्वक पढते हैं वा पढाने हैं उनके लिए भगवान पमदनसे संकर श्री महावीरस्तापी पर्यंत चौगीसो तीर्थकर तथा कृदकदादिक समस्त आचार्य शांति प्रदान करें तथा अनुकपस स्वर्गमीक्षकी लक्ष्मी प्रदान करे ।
"अविक- श्रीकुंथुनाम्नः सुखशांतिमूते-- ग्रंथः सदायं वरसूरिणोऽस्ति । दुःखं प्रजानां हरतु क्षणान्मे-5 भिप्राय एवं विदधातु सौख्यम् ।।८४॥ अर्थ-मुख और शांतिकी उत्कृष्टमूर्ति ऐसे सर्वश्रेष्ठ आचार्य श्रीकुंथुसागर महारानका बनाया हुआ यह ग्रंथ सदाकाल समस्त प्रजाका दुःख दूर करो और समस्त जीवोंको क्षणभरमें परम सुखकी प्राप्ति करो। यही मुझ कुंथुसागरका अभिप्राय है। भावार्थ- आचार्यवर्य श्रीकुंथुसागर कहते हैं कि इस ग्रंथके पठन-पाठनसे समस्त जीवोंका दुःख दूर हो तथा समस्त जीवोंको सुखकी प्राप्ति हो, यही मेरी भावना है और उसी भावनाको लेकर मैंने इस पवित्र ग्रंथकी रचना इस प्रकार आचार्यवर्य श्रीकुन्थुसागर विरचित तथा लालाराम शाखी 'धर्मरन' कृत भाषाटीका सहित यह प्रतिक्रमणसार नामका ग्रंथ समा हुभा -x- प्रतिकमणसा- आगे मोपस निश्चय घुमतिक्रमण किरखते हैं- संक्षेपसामायिककर्तुरर्थ । संक्षेपरीत्या सुखदं विधानम् ॥ सामायिकादः प्रतिशत हि । नत्वा जिन वांच्छिनदं सदा मे ॥८५॥ -----भाग में मदाहाल प्रच्छानुमार फळ देनेवाद भगवान जिनंददेवको नमस्कार करता हैं और फिर जो पुष मसंपनिगं मामायिक वा प्रतिक्रमण करना चाहते हैं जनके लिए अत्यन्त सक्षेपस ही मामायिक आदिकी सुख देनेवाली विधिका निरूपण करता है। स्वात्मवाह्ये पदार्थ यो नित्येऽनित्ये प्रियेऽप्रिये । साग्यं दृष्टवा स्थितो ह्यासाच्चिदानंदे हि नौमि मर्थ --उस समारमें अपने प्रात्मास भित्र जो पुदला. दिक पदार्थ चांद व नित्य हो, चाह भनित्य हो, चाहे प्रिय हो और चाट अप्रिय हों उन सबकी जो समान दृष्टिसे देखक्षा और भी स्वय चिदानदस्वरूप अपने शुद्ध आत्यामें विरा- नमान रहता है ऐसे महापुरुष लिप मैं नमस्कार करता हूं। भावार्थ-इसम सपता धारण करनेवालोंको नमस्कार किया ! समना धारण करना ससारको नाश करनेका, वा माक्ष प्राप्त करनका मूळकारण है । क्यों कि जहां राग द्वेष दोनीका मर्वधा अभाव धागा यहां ही समता धारण शी सकेगी । समता धारण करनेवाला महापुरुष तम्।
-श्राध
नाम और अलाप दोनों में समान परिणाम रखता है तथा
मुख और दसवम भी समान परिणाम रखता है। सपता
धारण करनेवाला पुरुष अपन आत्माको छोडकर अन्य
समस्त पदार्थोंको हेय समझता है इसलिये वह गम होनेपर
वा सुख मिलनेपर हर्षित नहीं होता और अलाभ होनेपर वा
दुःशव मिलनेपर अपने परिणाम सलोशना धारण नहीं
करता । व महापुरुष केवल अपने आत्माको ही उपादेय
समझता है इसलिए वह उसमें सदा कीन बना रहता है।
इस प्रकार वह वीतराग पहासाधु निश्चयरीतसे सदाकाळ
प्रनिक्रपण करता रहता है। ऐसे महापुरुषकं लिए मैं नमस्कार
करता है। ऐसा महापुरुष शीघ्र ही मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
इस प्रकार सपताका स्वरूप चितवन करना लघुपतिक्रमण है।
आगे बन्दनागुणको कहत है।
अर्हसिद्धादिपूज्यानां त्रिकाले भक्तिवन्दनाम् ।
कुर्वन् यो निजराज्येऽभूरिस्थरस्तं नौमि मोक्ष।।८७॥
अर्थ-भगवान अरहनधेव, भगवान् सिद्धपरमष्ठी व
आचार्य उपाध्याय साधु ये पच परमेष्ठी सदाफाळ पूज्य हैं।
मो पुरुष इन पांचो परमेष्ठियोकी प्रात काळ मध्याह्नकाल,
सायकाळ तीनों कालोम भक्तिपूर्वक वदना करता है और
अपने प्रात्माकी शुद्धतारूप स्वराज्यमें सदाकाळ स्थिर रहता
है, ऐसे मोक्ष प्राप्त करानेवाले महासाधुको मैं नमस्कार
करता हूं।
-------- -- प्रतिक्रमणसार- ०५ भावार्य--उममें वंदना करनेवालेको नमस्कार किया है। वदना किसी एक तीर्थकरकी की जाती है अथवा किसी एक मिटपरमेष्टीकी की जानी है अथवा किसी एक साधुकी की नाती है। यह वन्दना हाथ नोटकर गम्तक झुकाकर क्रियापूर्वक करनी चाहिए । अथवा किमी एक नर्षिकरकी वा एक सिद्धपरमेष्ठीकी वा किमी एक प्राचार्य उपाध्याय साधुकी स्तुनि करना भी बन्दना कहलाती है। जो पुरुप इस विधिक अनुमार वन्दना करता हुआ अपने शुद्ध प्रात्या लीन रहता है वह पहामाधु महा- पुरुप कहळाना है। पंच परमेष्टियोंमें बह गाढभक्ति रखता है और अपने आत्माको नामय बना देता है इसीलिए उसका भामा अपंत निर्मल हो जाता है और वह सवक द्वारा पृज्य व नमस्कार करने योग्य हो जाता है । ऐमें पुरुषको नमस्कार करना और तन्मय होना निश्चय कघुपतिक्रमण है । आग म्तृतिका म्वरूप कहते हैं- वृषभादिजिनानां यः कुर्वन् गुणस्तवादिकम् । मनोवाकायशुझ्या हि स्तौमि तं तृप्तमात्मनि॥८८|| अर्थ-महापुरुष अपने मन वचन कायकी शुद्धतापूर्वक भगवान वृषभदेवको आदि ळकर महावीर स्वामीपर्यंत चौधीमो नार्थकगेके गुणोंकी स्तुति करता है और अपने आत्माफ शुद्ध रूपमें सदा तृप्त रहना है ऐसे महापुरुपकी मैं भी स्तुनि करता है। भावार्थ-इसमें स्तुति करनेवाळेको नमस्कार किया है।
धायक- भगवान जिनेन्द्रदेवके समस्त गुणोंका वर्णन करना अथवा भगवान जिनेन्द्रदेवक एक हजार आठ नामोंकी व्युप्तत्ति पूर्वक पूजन करना अथवा चौबीसों तीर्थंकरोंकी स्तुति करना स्तुति कहलाती है। जो पुरुष भक्तिपूर्वक स्तुति करता है वह उस पूज्य पुरुषके गुणोंमें तन्मय हो जाता है। उस समय यह समस्त पापकर्मोंको नाश करता हुआ आगामी काँसे पंचता हा अनन्नकोंकी निर्जरा करता रहता है । इस प्रकार यह अपने आत्माको निर्मल बनाना हुआ तीर्थकरा- दिकीक समस्त गुणांको प्राप्त कर लेता है । ऐसा महापुरुष अपने आत्माक शुद्ध मरूप ही सदा बस रहता है और अन्य समस्तपदार्थोंसे अपने आत्माको हटा लेता है। ऐसे महापुरुषकी स्तुति करना वा उनकी वंदना करना भी निश्चयपतिक्रमण है । क्यों कि ऐसे पुरुष को वंदना करनेसे उसके गुणों में अनुराग पढता है तथा अनु- राग होने से उन गुणोंको धारण करना हुआ तन्मय हो जाता है इसीलिए इस स्तुतिको भी पतिक्रमण कहा है। भागे प्रतिकपणको कहते हैं । द्रव्यक्षेत्रादिभावेषु कृतदोषादिवर्जनम् । यः प्रतिक्रमणं कुर्वन् स्वं वेत्ति स्तौमि तं मुदा । अर्थ-जो पुरुष द्रव्य, क्षेत्र, काल, माव मादिमें लगे हुए दोषोंका पश्चाताप करता हुआ उनका त्याग करता है और इस प्रकार मतिक्रमण करता हुआ आत्माके म्वरूपको भागमा है ऐसे महापुरुषको मैं प्रसन्नतापूर्वक नमस्कार करता ह ।
प्रतिफमणसार- ९७ भावार्थ-इस प्रतिक्रमण करनेवाळेको नमस्कार किया है। द्रव्य क्षेत्र काल भावामें अपना किसी प्रकारका अपराध वा दोष हो जाय तो अपने आत्माकी निदा करके वा अपने अपने आत्माको धिक्कार देकर मन, वचन, कायके द्वारा उस अपराध वा दोषको शुद्ध करना, मायश्चित्त लेना और आगेक किए उस दोषका सर्वथा त्याग कर देना अतिक्रमण कहलाता है । प्रतिक्रमण करनेवाला पुरुष प्रथम तो दोषोंको लगाता ही नहीं है। यदि कारणवश कोई दोप लग भी जाता है तो पह अपने आत्माकी निंदा वा गर्दा करके वा पश्चाताप करके उम दोपको दूर करता है। इस प्रकार अपने आत्माको निर्दोष बनाता हुआ वह पुरुष अपने आत्माके शुद्ध स्वरूपमें लीन रहनेका प्रयत्न करता है तथा इस प्रकार समस्त पापोंसे रहित होकर और सपस्त कोंको नाश कर शीघ्र ही मुक्त हो जाता है। ऐसे महापुरुपकी स्तुति करना और उसके गुणों को धारण करना निश्चयपतिक्रमण कहलाता है। आगे प्रत्याख्यानको कहते है- सावद्यद्रव्यभावानां प्रत्याख्यानं विधाय यः। निरवद्येषु भावेषु यतते नौमि तं स्थिरम् ॥९॥ अर्थ-जो महापुरुष पाप सहित द्रव्यभावादिकोंका त्याग करके निर्दोप वा पापरहित भावों में स्थिर होनेका प्रयत्न करता है ऐसे महापुरुषको मैं नमस्कार करता हूं। भावार्थ--इसमें प्रत्याख्यान करनेवालको नमस्कार किया है। जिस नामक लेनेसे पाप लगता है, जिस स्थाप.
१८ धापक- . नाके करनेमे वा पूजा आदि करनेमें पाप लगता है, जिस व्यको काममें लानेमें पाप लगता है, जिस क्षेत्रके जानेमे पाप लगता है, जो काळ अशुभ गिना जाना है और जो भाव अशुभ वा पापरूप कहलाते हैं, उन सबका भो त्याग कर देता है और जिस नामके लेनेसे पुण्य होता हो या पाप नष्ट होते हो, जिस स्थापनाके करनेमे पुण्य होता हो वा पाप नष्ट होते हो, जिस द्रव्य के सेवन करनेमे पाप नष्ट होते हों, जिस क्षेत्रमें पाप नष्ट होते हों, जिस काळमे पाप नष्ट होते हों और जिन भावोंसे पाप नष्ट हाते हों, उन द्रव्य क्षेत्र काळ भावोंको जो धारण करनेका प्रयत्न करता है और जो अपने आत्मामे ही स्थिर बने रहनका प्रयत्न करता है, वह पुरुष महापुरुष कहलाता है और ऐसे पुरुषको नमस्कार करना निश्चय प्रतिक्रमण कहलाता है। भगवान् अरहन्त देवका चा चौबीस तीर्थकरोका नाम कैसे पापोंका नाश होता है, भगवान् अरहनदेव चा पच परमेष्ठीकी स्थापना करना पापोंका नाश करनेवाला है। जिन प्रतिमा, जिनालय, शास्त्र, धर्षके उपकरण आदि पापोंके नाश करनेवाले द्रव्य है, सम्मेदशिखर, गिरनार, पावापुर, चम्पापुर आदि पुण्यक्षेत्र पाप नाश करनेवाले क्षेत्र है, तीर्थकरोंके कल्याणकोके सपय पुण्यकाल वा पापोका नाश करनेवाला काळ कहलाता है और आत्माके शृद्धभाव पापीके नाश करनेवाले भाव कह- लाते हैं। जिस पापी मनुष्यका नाम लेनेसे पाप लगता हो वह अशुभ नाम है जिस क्षेत्रमें जानेसे रत्नत्रयका नाश होता प्रतियामणसार- हो वह अशुभ क्षेत्र है, जिस स्थापनाके करनेसे मिथ्यात्वकी वा कपायोंकी वृद्धि होती हो वह अशुभ स्थापना है जिस दव्यसे पुण्योपार्जन नहीं होता वह अशुभ द्रव्य है। ग्रहणकाल, उल्कापातकाल आदि अशुभ काल हैं। और जिन भावोंसे पाप कर्मों का आस्रव होता हो वह अशुभ भाव हैं। इस प्रकार अशुभ द्रव्यादिक वा शुभ द्रव्यादिकका स्वरूप समझ कर अशुभ द्रव्यादिकका सर्वथा त्याग कर आत्मामें लीन होना निश्चय प्रतिक्रमण है। तथा ऐसे प्रतिक्रमण करनेवालेको नमस्कार करना भी निश्चय प्रतिक्रमण है। आगे व्युत्सर्गका स्वरूप कहते हैं- स्वात्मा चिन्मयमात्रोऽस्ति मम ज्ञात्वेति चिह्नतः। तन्वादेनिमम सन् यो लीन:स्वात्मनि नौमि ॥९॥ अर्थ- यह मेरा आत्मा शुद्ध चैतन्यरूप है इस प्रकार उसके चैनन्यगुणसे जानकर शरीर आदि परद्रव्योंसे जो पमन्वका मर्वथा त्याग कर देता है और अपने आत्माके शुद्ध स्वरूपमें लीन बना रहता है ऐसे महापुरुषको मैं नम कार करता हूं। भावार्थ-इसमें व्युत्सर्गगुणको धारण करनेवाले के लिए नमस्कार किया है। स्तुति वदना आदि कार्यों में शरीर से यमन्त्रका त्याग कर देना तथा अतरंग पहिरंग लक्ष्मीसे सुशोभित रहनेवाले पच परमेष्ठियोंका स्मरण करना अथवा शाखा लिखी हुई विधिके अनुसार कुम्भक, पूरक, रेचक के द्वारा श्वासोवासको रोक कर पंच परमेष्ठीका जप --श्रावक- फरना कायोत्सर्ग वा व्युत्सर्ग कहलाता है। व्युत्सर्ग करने- पाला पुरुष अपने शरीरसे ममत्वका सर्वथा त्याग कर देता है और अपने आत्मा शुद्ध भावों में वा शुद्ध स्वरूपमें लीन रहता है। इस प्रकार वह महात्मा बहुत शघ्रि कर्मोंको नाश फर सिद्ध अवस्था माप्त कर लेता है। ऐसे महापुरुका नम- स्कार करना, उसके गुणोंमें अनुराग रखना वा उसका तथा उसके गुणोंका पूजन करना आदि सब मिश्चय व्युत्सर्ग कह- कावा है और इसीको निश्चयप्रतिक्रमण का हैं। इस प्रकार निश्चयलघुपतिक्रमणका स्वरूप कहा। इस प्रकार भाचार्यवर्य श्रीकुन्थुसागर विरचित तथा धर्मरत्न पं. लालाराम शात्री कृत भाषाटीका सहित यह निश्चयलघुप्रतिक्रमण प्रमाप्त हुभा।
- - प्रतिक्रमणसार- १०१ अथ प्रशस्तिः मोक्षं गते महावीरे स्वमोक्षसौख्यदायके । चतुर्विंशतिसंख्याते कौ षट्पष्टयधिके शते॥१२॥ प्रतापसिंहभूपस्य धर्मनीतिदयायुजः । धनरत्नसमाकीणे वडोदानगरे वरे ॥ ९३ ॥ मार्गशीर्षसिते पक्षेऽष्टम्यां मंगलवासरे । ध्वजादिभूषित स्थित्वा वृपभेशजिनालये॥९॥ स्वानंदसौख्यतुष्टेन दिग्वस्त्रधारिणा सता। शांतिसागरशिष्येण कुंथुसागरसूरिणा ॥ ९५ ॥ ग्रंथोऽयं शांतिदः श्राद्धप्रतिक्रमणसारकः । लिखितः कामदः सन् को भूयादाचन्द्रतारकम् ॥ अर्थ-वर्ग पालक मुख देनेवाले भगवान् महावीर स्वापीक मोक्ष चले जानेके चौवीसमौ च्यासठवं वर्षमें धर्म- नानि और दयाक पालन करनेवाले महाराज प्रतापसिंहके धन और रत्नास परिपूर्ण श्रेष्ठ बडोदा नगरमें घना तारण आदिम सुशोभित होनेवालं भगवान् पपदव के जिनालयमें विराजमान होकर मार्गशीर्ष शुक्ला अपृमी पगळवारके दिन अपने आत्मजन्य आनन्द और सुखसे मदा संतुष्ट रहनवाले तथा दिशाओका ही वस्त्र धारण करनेवाले और आचार्यवर्य श्रीशांतिसागरक शिष्य आचार्य फुधुसागरने यह सब प्रकारकी शांति देनेवाला श्रावकमति-
-श्रावक-
१०२
क्रमणसार नामका ग्रंथ लिखा है । इस संसारमें जवतक मूर्य
चंद्रपा रहे तबतक यह ग्रंथ समस्त जीवोंकी इच्छाओंको पूर्ण
करता रहे । इति शम् ।
कल्लोलसे चतुर्विध संघका विहार
जीवनलालः पझेशो गुरुभक्तः प्रभावकः ।
कस्तूरचन्द्रः पूतात्मा वाडीलालो विचक्षणः ॥९७॥
स्वयंसेवककार्यार्थी कांतिलालः कलानिधिः ।
श्रीमान् छगनलालश्च केशवलाल धार्मिकः ॥९८॥
चेत्रशुद्धचतुर्दश्यामाचार्य कुंथुसागरम् ।
तारंगातीर्थयात्रार्थ कृतवन्तः सुप्रार्थनाम् ॥ ९९ ॥
अर्थ-संघपति तीर्थभक्त समाजभूपण सेठ जीवनलालजी
गोपालदास बखारिया, सेठ कांतिलाल गोपालदासजी वखा-
रिया, सठ वाडीलाल जगजीवनदासजी, सेठ कस्तूरचन्द
ईश्वरलालनी, सेठ केशवाळ जगजीवनदासजी तथा कांती
लालजी भावनगरवाला मेठ छगनलालजी खारिया सेठ
जयसिंह भाई आदि धर्मकी प्रभावना करनेवाले तथा गुरुभक्त
कल्लोळ निवासी सदगृहस्थ श्रावकोंने चैत्रशुक्ला चतुर्दशीक
दिन आचार्य कुथुसागर महाराजसे ताग्गा तीर्थकी यात्रा
करने के लिए तथा संघके साथ चलने के लिए प्रार्थना की।
स्वीकृत्य प्रार्थनां तेषां पूर्वोक्तश्राववरैः ।
श्राविकाभिः समं भव्यैः वायघोषसमन्वितैः॥१०॥
प्रातमामणसार- ॥ वडोदा पोलिसेर्वर्गः कामदाज्जिनमन्दिरात् । शुभे दिनेऽचलन्मार्गे भव्यान् संवोधयन् सदा॥१०१॥ अर्थ-उन सन श्रावकोंकी मार्थनाको स्वीकार करके समस्त भव्य जीवोंको मदाफाल श्रेष्ठ उपदेश देते हुए वे अनार्य श्री कुशुमागरजी महाराज उन सब भव्य श्रावकोंक माथ, अनेक श्राविकाथा साथ, चंडवा के साथ, घडोदाकी पालम माध, समस्न उच्छाओको पूर्ण करनेवाले गिनाळयम किमी शुभ दिनको देखकर चलने लगे। पंथापुरनृपर्भक्त्या स्वागतं स्वामिनः कृतम् ॥ नत्र संवोध्य भूपादीन् चचालाग्रे कृपानिधिः॥१०२॥ भर्ग--पंथापुर पहुचनेपर वहांफ राजा साहव श्री फत- हामिदनी महारानने भक्तिपूर्वक पूज्य आचार्य महाराजका नागत किया। कृपाफ सागर आचार्य महाराजने वहाँक पहाराजको तथा अन्य सपरत लोगोको श्रेष्ठ उपदेश दिया बार फिर संघ सहित वहांसे आगे चळ ।। सावरमतितीरस्थः श्रावकैरलुवानृपः । स्वागन सूरिवर्यस्य कृतं दानार्चनादिकम् ॥१०३॥ अर्थ-आगे चलन हुए सावरमतिके किनारके श्रावकोंने नया अलुवा नरेश महाराज अर्जुनसिंहजीने आचार्य महाराज का स्वागन किया तथा उनकी पूजा की और इच्छानुसार दानधर्म किया।
-भावक-
R
१०५
सूरिवयोंऽपि तत्रत्यान् संवोध्यैव ततोऽचलत् ।
मार्गे ध्यानं तपः कुर्वन् सन् माणिकपुरंगतः॥१०४॥
अर्थ--आचार्य श्रीकंथसागरजीने वहाँके सब लोगोंको
सदपदेश दिया और फिर वे वहाँसे चलकर मार्गमें ध्यान
और तपश्चरण करते हुए माणिकपुर नामक नगरमें पहुंचे।
प्रवीणसिंहभूपैश्च तत्रत्यैः सर्वधार्मिकैः ।
अन_रत्नमेवं हि स्वागतं भक्तितः कृतम्॥१०५॥
अर्थ-वहांपर वहांके महाराज प्रवीणसिंहजीने तथा
वहाँक समस्त धर्मात्मा बंधुओन आचार्यचर्य श्रीकुथुसागरको
अमूल्य रत्न समझकर भाक्तपूर्वक उनका स्वागत किया।
तत्र संबोध्य भूपादीस्ततः प्राप वलासणम् ।
नृपैर्नागरिक सर्वैः स्वागतं शांतिदं कृतम्॥१०६॥
अर्थ-वापर भी भाचार्य पहागजने वहांक महारा-
नया वहाँक भन्यजीवाको धर्मका उपदेश दिया । तदनन्तर वे
भाचार्य वहस चलकर बवासणा स्टेटमं पहरं । बहाक महा-
गाज शिवसिंहजीने तथा नगरक समस्त लोगोंने आचार्य
महाराजका महाशांति उत्पन्न करनेवाला स्वागत किया ।
भव्यान् संबोध्य तत्रत्यान् तारंगामेदिनीं गतः ।
मोक्षं गते महावीरें स्वर्मोक्षसौख्यदायके ॥ १०७॥
चतुर्विंशतिसंख्याते पंचषष्टयधिके शते ।
वैशाखशुक्लपक्ष हि मानस्तम्भमहोत्सवम् ॥१०॥
प्रतिभामणसार... १०५ दृष्ट्वात्मशान्तये तत्र स्थितवान कतिचिद्दिनम् । ततोऽचलत्तपः कुर्वन पावागढं सुखप्रदम् ॥१०९ ॥ अर्थ-आचार्य महाराजने वहां समस्त भन्यजीवोंको श्रेष्ठ उपदेश दिया और फिर वे वहाँसे चळकर तारंगा पर्व- तकी भूमिपर पहुंचे । भगवान् महावीर स्वामीके मोक्ष जानेके अनंतर चौवीससी पंसठवें वर्ष में माख शुक्ला तृतीयाके दिन उन आचार्य महाराजने वहांकी मानस्तम्भ प्रतिष्ठा देखी और फिर व अगने आत्माको शांति पहुचाने के लिए कुछ दिन वहां रह । नदनन्तर वे वहांसे चले और मार्गमें तपश्च- रण करत हा सुग्वपद पावागढ पर्वतकी भूमिपर पहुंचे। वर्षायोगं सुखं तत्र व्यतीत्यापि ततोऽचलत् । वडोदरां प्रति स्वामी कुर्वन्मार्गे प्रभावनाम् ॥११०॥ अर्थ-आचार्य पहागजने वहांपर वर्षायोग धारण किया और सुखपूर्वक वयोगको समाप्त कर वे वहाँसे चळे वधा मार्गमें धर्मको प्रभावना करते हुए वे आचार्य महाराज वडोदा नगरमें पहुंचे। सपत्नीभिः समं भक्त्या कालेसावमहोदयः । वडोदानृपराज्येऽपि सर्वत्र स्वागतं कृतम् ॥१११॥ अर्थ--धागोडिया महल वही वारदाई साहब धर्मनिष्ठ धर्मपरायण श्री एफ. एस. काळे साहब तथा उनकी धर्मपत्नी विदुपी सुशीला बहिनने बडोदा राज्यमें भी भक्तिपूर्वक प्राचार्य महाराजका स्वागत किया। तथा- श्रावक बडोदावासिभिः श्राद्धैः सद्राज्यपुरुषैस्तथा । नानावाचैमनोज्ञैश्च ध्वजचामरतोरणैः ॥११२।। जयध्वनि प्रकुर्वद्भिः स्वामिनः खागतं कृतम् । सूरिवर्थोऽपि तत्रत्यान् संबोध्यैव ततोऽचलत्॥११३॥ अथ-जब पहाराज बडोदा नगर पहुंचे थे तब वहाँके रहनेवाले समस्त श्रावकोंन तथा वयोवृद्ध विद्वान् न्यायनीति परायण बडोदा ग्टंटक नेक नामदार दीवानसाहव सर कृष्ण माचार्य सी. आई ई ने और अन्य समस्त राज-कर्मचारि- याने अनेक प्रकारके मनोहर बाजोंक साथ तथा अनेक प्रका रकी ध्वजा चपर तोरण आदि उपकरणोंके साथ जय जयकार करते हुए आचार्य महाराजका श्रेष्ठ स्वागत किया। आचार्य महाराजने भी वापर कुछ दिन रहकर वहां के जीवोंको मोक्ष- मार्गका उपदेश दिया और फिर वहांसे आगे विहार किया। . समाप्त my
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