Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Dandak Prakaran
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म्यपरमम्पारावारपारोग-शासनममाट-नीक्षिारय-t- कापितकरण-तपोगच्छाधिगज-पुरिगानमनि- जना म..... आचार्य श्री विजयनेमिमगशः दाम, १५४५ गणिपट में, ५. . कार्तिक । सुम्पिद म. १०६ . घटन ५ १ --Teम... -: पद३ गए गुट
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पृष्पाद मिहानमाणम्पनि ग्यापविशारद निय
आचार्य महाराजाधिराज
श्रीमान विजयोदयमूरिः
जन्म सं. १९४४ दक्षिा स. १९६२ पंन्यासपद सं. १९६९
पाप शु १२
पेशाग्य शु. ६
अपाहशु. ९
महोपाध्यायपद सं. १९७२
आचार्यपद स. १९७९
वैशाख घद २
मागशर बद३
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• अहम ॥ ': ॥ परमोपकारि एयपाद सद्गुरु श्रीमद्विजय-:' नेमिसूरीश्वरेभ्यो नमोनमः ॥ ॥ श्रीदण्डक विस्तरार्थः॥ प्रस्तावना (शार्दूलविक्रीडित छद.) जेनो उत्तम वोध शोध करतो तत्वार्थना तत्वनी, एकी साथ प्रशंसना मतिधनो जेना करे. सत्वनी; पाम्यो हुं श्रुतबोध योग विधिने जेना प्रसादे करी, वटुं श्रीगुरु नेमिसरि' चरणे ते उपकारो स्मरी ॥१॥ सर्वज्ञ शमनरसिक मियधुभो ? निष्कारण जगबंधु- भावारुणासिंधु-आसनोपकारि-श्री महावीरमानी-मनीत मावि मनपान समस्तमीपनिना पचनने अमुमरनार--अवल सिद्धान ए फरमापेले के-संसारि जीवोने कोनो बंध गा मोक्ष पोमानी अध्यवसायपरिणनिने आधीन छ.- मारपर्प ए .- प्राम अध्ययमायोना योगे फर्मोनो बंध अने नेपी रिपरीम अमनिपानि उत्तर अध्ययसापोना योगे मोक्ष पाप. एक रास्यने प्रकार करता पूज्यपाद महोपाध्याय न्यायाचा प्रोमोदिजाजी म. दाराज प्रतिपादन करेठे के 'मन पर मनुप्याणकारण पर मोपोना मारनो विशिष्ट कर्मरर पण पद गुणगा. नको पकी दशमा मृत्पपायगुणाधानक सुधील दोषो. पातु मेषी भान उपशान मोरादि चार गुणाधानकोप में मंत्री ४ नथी. कारण ते स्थले कपायोदयनो अभाव छे. एथी ए मिद्ध ययु के- कपायोदय अवस्थामा विद्यमान आत्मपरिणति विशिष्ट कर्म- बंधमां हेतु यह शके. एज रहस्य पञ्चम कर्मग्रन्थनी टीकामां अध्य- वसायनी व्याख्या करतां श्री देवेन्द्रसूरिमहाराजाए: जणाच्युं छे के "अध्यवसामान्यध्यवसायाः, ते चेह- कषायजनिता जीवपरिणामविशेपाः ॥ यद्यपि . उपशांतमोहादि त्रण गु. जस्थानकोमा शातावेदनीयनों बंध वर्ते छे, तो पण तेने (ते बंधने ] अध्यवसानिमित्तक स्वीकारेल नथी. कारणके श्री. पंचसंग्रहादिमां तेनी द्विसमय मात्र अल्पस्थिति प्रतिपादन फरेल छे, बंधपरते करेल आ संक्षिप्त विवेचन एन जणावेछे के- जीवानीवादि नवतयो पंकी पांचमा आश्रय तत्व अने आठमा वंश तस्वना फलरुप ममारिजीवो शुभाश्रवद्रारा करेल शुभ कर्मवं- धना मनापे शृभ दंडकोषां एटले देव मनुष्यना दंडकोपां अने अ. शुभाभयद्वारा करेल अशुभ कर्मवंचना मनापे नरकतिर्यचोना अशुभ दंशकोमा उत्तन थापछे. ज्यां उत्पन्न धया पछी विशिष्टमंज्ञावाला ने ते देवादि जीरोने प्रश्नो प्रादुर्भये छे, जे- आत्माए चोवीश दंडको पंकी कया कया दंडकोमा कयाकया हेतुओथी केवी देवी स्थिति अनुभवी ? अनुत्तरदेवो पण जेनी निरंतर अभि. बापा करी रक्षा के. अने जे निर्वाणपदन पाम साधन छे, एवा मनुष्यमान रूप उच्च कोटीवें स्थान विद्यमान छतां पण कया कया हेतृ भोपी भाजीद ने स्थान मेल्यवामां मंदमान्य थयो?,कदाच पा- पो. नोपा उ.या क्या माशल्य प्रतिबंध हेतृोधी यथार्थवाभ में- जबहा असमर्थ एबी : भने निगोदादिमां अनात काचमुधी उद्यो? व पची एका क्या काया तामायनो मेवा जोहये? के जयी श्री मुवी अनुभव विक दायपय स्थिनिने न पाये ? इ. यानि नो नो मीकालनी दमाने हानि करवामा . पल ममान भा'श्रीदकस्सितरा नामो बार ५ राम आईवसिदानना रास्पना' अभिमानाने मंग जणाइ पापशे. ते उपदमा ग्रंथ . सम्पनि भोमसा- ना पांच साधनो की उपशम १. संग.२. निद ३. मा प्रण गुणोनो भाविर्भार करनामा दमन परंपराए मोक्ष प्राणिमा पण असाधारण कारण छे. आटलान रिपेषन परथी' नाव पछी दंफपारणतुं अध्ययन करवामांशु प्रयोजन ? ए मानना समानदारा प्रस्तुम प्रकरणर्नु । मुद्रण प्रपोजन पण सहन सम. जायं तेम छे. यद्यपि प्रस्तृत प्रकरण सामान्यतः शन्दार्यरूपे अनेक संस्थांमोद्वारा प्रकट यएल.के, तो पण तेवा सामान्य संक्षेपमात्रयी. साकिंफ-तस्त्रनिझामुमोने संपूर्ण भयंलामजन्य संतोप पीलकुल प्राप्त यनोज नयी. कारण के-ज्यारे तेश्रो ते ते मदिन प्रहरणना अर्थने जाणे, त्यारे तेभोना हृदयमा स्वभा- पेज आ प्रमाणे वधेणि.प्रादुर्मवे . जे दंडक ए फयो पदार्थ के ?. २-अधिक वान्पून न स्वीफारवा चोवीश ज दंडको मानवानुY कारण ?..३-मुवनपतिना दश दंडकोनी, माफक सान नारकीयोना साम दंडफो न मानवामां शु.प्रयोजन ?. ४- अमुफ दंडकना अमुकजीवोने कद्देल शरीरादिथी अधिक शरीरादि केम न होइ शके ?. ५-देवोए उत्तरबैंक्रिय रूपे बनायेल छनां औ. दारिफ जेवरा देखाना सिंहादि औदारिक केम न कहेवाय १.६- वनस्पतिनी साधिक सहस्र योजननी अवगाहना फइ अपेक्षाये ?. ७-तेईद्रिय जीवोनी प्रण गाउनी अवगाहना फया जोवनी अपे. क्षाए घटे ?.८-अवगाहनाद्वारमा वर्णयेल अवगाहना कया क्षेत्रमा कया काले संभवे?.५-कया फया देवादि फया कया हेतुपी सत्तरक्रिय पनाये १. १०-देवोए बनावेल उत्तरक्रियनी स्थिनि अर्धमासपी अधिक होप के नहि?. नैनस काययोग नहि स्वीकारवानुY फार- २ १. ११-ज्यारे नहीं देखोने संघयण न होय एम की सो पछी श्री जीवाभिगमादिमां मयप संघयण मान्यतेनु शु समाधान ?. १२-लेक्ष्या कयो पदार्थ १. १३-शु चारे गतिना नीयाने एक सर- खोज लेश्या होय ?. १४-छद्मस्थनी अने सर्पज्ञनी शुक्ल लेल्या स्थितिनी अपेक्षाए एक सरखीज होय ?. १५-समुद्यान शुंपदार्थ ?. १६-तेने करवानु शु कारण १.१७-फया कया जीवो कया फया समये कइ कइ समुद्घात करे ? १८-एक काले एकथी वधारे समुद्घात होय के नहि ?. १९-एक ठेकाणे स्थावरोने .मि- ध्यादृष्टि कीधा त्यारे अन्यत्र सास्वादन दर्शन मान्यु तेनु | कारण ?. २०-पर्याप्तावस्थामां विफलेन्द्रिय सम्यग्दृष्टि के मि. थ्यादृष्टि ?. २१-विग्रहगतिमां पण अचक्षुदर्शन होय के नहि ?. २२-चक्षुदर्शननो व्यापार क्यारे होय ?. २३-शरुआतथीज प- रमाधार्मिको सम्यग्दृष्टि होय के नहि ?. २४-विभगज्ञानिने अव- घिदर्शन होय के नहि ?. २५-सियचपंचेन्द्रियने अपर्याप्तावस्थामा अवधिज्ञान वा विभंगज्ञान होय के नहि?.२६-स्थावरोमां ज्ञान अने अज्ञान पैकी वे मतभेद कई अपेक्षाए थे ?.२७-सास्वादनदर्शनकाले ज्ञान के अज्ञान ?. २८-समकाले एक जीवने ज्ञानलब्धि केटली होय ?. २९-अमुक दंडके कहेल योगो करतां अधिक योगो नहि होवार्नु कारण ?. ३०-उत्तर वैक्रिय अने . आहारकना मारम्भे अनुक्रमे चै क्रियमिश्र अने आहारकमिश्र योग होय के औदारिकमि- श्रयोग होय?. ते वखते-अमुकज योग होय तेमांशू कारण?.३१- शुवधाए वायुजीवोने वैक्रियहोय ?. ३२-प्रत्येक मनुष्यादिने लब्धिरुपे केटला उपयोग केवी रीते होय ?. ३३-अमुक दंडकना जीवने कहेल उपयोगोथी अधिक उपयोग केम न होय ?.३४- कहेल आयुःस्थिनि कया जीवनी अपेक्ष'ए घटे ?. ३५-शु सर्व देवलोकोमा देवीयोनो सद्भाव होय ?. ३६-इन्द्रोनुं आयुष्य ज.
. घन्य भांग के उत्कृष्ट भांगे होय ?, ३७-फया देवलोक मुयी इन्द्रा दि व्यवस्था होय १..३८-सर्वज्ञोने संज्ञा न होप नेनुY. कारण ? ३९-भन्यदर्शनकारी भवान्तर, विपयफ गस्यागवि 'इन्वरेच्छा, अने वेनी. रणाथी माने छे त्यारे जैनो फर्मद्वारा माने छे. सेतु समा- धान ?. ४०-देवोने श्रीभगवतीसून अने श्रीविचारसप्ततिमा ५ पर्याप्तिो अने श्री नवनपव भाप्यादिमां ६ पर्याप्सियो फीधी तेनु| कारण ?. ४१-अनुत्तरविमानवासि देवोने शब्दोच्चारना अभावे पचनयोग कैम घटे ? जो ते न होय वो भाषापर्याप्ति केवी- रीते घटे ?. इत्यादि । जो तेभोना ते व्याजची सोनू पण समधान दीर्घकाल मुधी न थाय वो ए पण वर्को चिरस्थायि यक्षां तेओर्नु सम्यग्दर्शन पोतानी पूर्वस्थिति साची शफशे नहि ? कारणके जिन्नासाजन्य भर्फ पण कालान्तर एवा संशपरूपे परिणमे छ, के जेतर्फ-प्रदाने पण अंगे. अंशे घटाहनार नीवडे छे. मामाव- वर्तमान जमानाना अनेफ दृष्टान्नोद्वारा अनुभवगोचर यह शक तेम छे. तेमन पदार्थ वाचोनो संगीन पोष पण प्रकट पयेल सौना समाशननेज आधीन छे, जेयो तार्किक भव्पसमामने सानन्द समाधान मलबा पूर्वक संगीनांध संपादन फरवितो. एपण आ प्रस्तुम अफरणने पीजु पदण प्रयोजन के. हुये---!-प्रस्तृत प्रकरणने पीमा कोइपण शब्दपी म भोळखाव दंष्टक शम्दपी ओखानु कारण १,२. कईए मा प्रकरणने स्तुनिग्रन्यनी मारक तंत्र पदनिए ग्ग्युमे के सिद्धान्तपतिए ? नो सिखान्नपद्धलिए मो फया मिसान्तोने मागीने रपंत से मिदानोमा दरको म रिस्वरवर्णन मां पृएक रसना पोरन ? मा प्रभानु सपापान कर पामबी - संक्षेप या प्रमाणे- पण ३. १ जीवने स्वकर्मजन्य फलानुभव योग्य कया कया स्थानको छे ? ए जणाववा माटे प्रस्तुत. प्रकरणने दंडक पदथी ओळखावेल छे. २ आ दंडकोनु मुख्यत्वे करी आपणा परमपूज्यतम 'पञ्चमांग श्री. व्याख्याप्राप्ति ( श्री भगवती ) सूत्र तथा चतुर्थोपांग श्री प्रज्ञापना सूत्रमा सविस्तर वर्णन करेल छे. जेथी अहीं संज्ञाकमादि पण प्रायः तदनुसारेज राखेल छे. तेओर्नु सार्वजनिक अध्ययन नहि होवामां बे प्रयोजनो. छे. जे १ मूल प्राकृतभाषानो अपरिचय तथा वृत्तिग्रन्थोनी संस्कृत भाषानुं काठिन्य. २ जिनाज्ञाधारि. सा- धुओने पण . अध्ययननिमित्ते योगोदहन क्रियानी आवश्यकता. तेथी सार्वजनिक उपकार करवा माटे. कर्ताए. आ मूल प्रकरण बनावेल ले.. सज्जनो ! जाणमांज: हशे के "परिचय ए प्रवृत्तिनुं कारण छे" तेथी आ श्रीदंडकविस्तरार्थ केटला भागमां केवी रीते व्हेंचा. येल छे ? आ बावत पण टुंक परिचय कराववो व्याजवीज छे. त्रण विभागे व्हेंचाएल आ ग्रन्थना कर्ताए- १. प्रथमविभागे-मंगलाचरणादि करवापूर्वक चोवीश दंडकोना नामो, नथा भेद प्रभेदतुं सविस्तरवर्णन, तेमां उपयोगी प्रश्नोत्तरो, चौबीशे द्वारोनुं सविस्तर स्वतंत्रवर्णन करवा पूर्वक चोवीशे दंड. कोमा ते द्वारो समजावी, पर्यन्ते श्री परमात्मापासे स्तुतिद्वारा मोक्ष- पदनी प्रार्थना करी तथा स्वपरिचय करावी ग्रन्थसमाप्ति करेल छे. २.द्वितीय विभागे-दंडकार्थ विषयक वे स्तवनो तेमां-- ?--प्रथम स्तवन श्रीउत्तमविजयजी महाराजना शिष्य पण्डिन श्रीपद्मविजयजीगणिएभावनगरमां रचेल है. जेमा २४ दंडकोमा २९ द्वारो टुंकमां समजावंल छे. तेमां २४ द्वारो उपरांत ? नामदार जेमा २४ दंडकोना नामो दविल छे.र संपदादार.जेमा १४ चक्रवर्तिना रत्नो नथा तीर्थंकरादि . सर्वपली २३ संपत्तियो कहल. ३ -- -
धमंबार-मां क दंडकमा हिरमिनी विचारमा दपिज
२. ४ नोवयोनिबार-मां दरेक दंगना जीपने करती टली
योनियो रोय प भाव जगालो.कुवार-पां दरेक टपना
जीवने करली वरली इलकोटीयो होप, एभयं मनिषादन करेल.
. एप पाच दारो वधारं नगायेल.
२. पीजुसवन-श्रीविनपाइपनावरूना शिष्य श्री
धर्मचन्द्रमुनिए मरमेरमां. १७२९ नी सालमा दीवालीपना
दिवस पनापेल. जेपां श्री पार्षनायमगवाननी स्तुति फरया द्वारा
गत्यागविना ये मारो विस्तारयी वर्णयेल.
1-तीय विभागर्मा- मूल प्रकरण नया 'ते उपर स्वोपन
अरणि ऐ, प्रकरणकार जिनसमुदरिना पट्टमनिटिन मिनहसा.
नीचरना राज्यमा वर्तमान-श्रीधवठचन्द्रगणिना शिष्प गनमा.
रगणि ऐ. तमगे आ जिनविज्ञप्तिरूप दंडक प्रकरण ने तेमनाथी
पूर्वममयमा पत्र उपर पन्त्ररूपे लखेल हतं. ते गुगमताने माटे एटले
पालनीयो अल्पशन्दोमां अर्थलाम लइ शके, ए हेतुथी . पाटणमा
विक्रम संयत् १५७२ नी 'सालमा सूत्ररूपे गुंध्यु. तेमणे
भवचूर्णियां मूल एपनो आशय संक्षेपमा सारी रीते समनायेल ले
जेमांना फेटलाएफ फंठस्थ करणीय क्षेयमुष्ठामो. ए के जे-
१ स्वकीय क्षायोपामिक ज्ञानद्वारा रागादिभाव आधुओने हठावनामां
यथाशक्ति प्रचिपरायण सम्यग्दृष्टि 'जीवने दृष्टिवादोपदेशकी
.
ममा होय.
२ लन्धिद्वारा उत्तरवैक्रियकारक जीव ते शरीरमा अन्तर्मुहत.
फालयी वधु अवस्थान न करी शके. कारण तेटलो काल वीत्या पाद
ते जीव औदारिक शरीरमा स्वस्थ बनेछे.
३ काग्रन्धिक मते देवोने तथा नारफोने संहनननो प्रतिरोध
तथा महान्निकम नेनो मद्भाव होय.
सामान्यथी ६-लेश्याभो कही. विशेपथी भुगनपति तथा व्य. १० १० संज्ञाओ उपरांत केटलाएक मनुष्योने.श्री आचारांग सूत्रमा कहेल १ मोक्ष २ धर्म में सुख ४ दुःख ५ जुगुप्सा ६ शोक ए ६ संज्ञाभो पण होय छे. परन्तु तेवा जीवो अल्प हो- वाथी मूलसूत्रमा आ अधिकार ग्रहण करेल. नथी. ५ वायु विगेरेना ध्वजादि संस्थानो श्रीभगवतोसूत्रना आधारे दर्शवेल छे. ६ सम्वे वि चउक्कसाया' आ वचन प्रथमना अगीआर गुण- स्थानकोना जीवोने उद्देशीने कहेल छे.७ सामान्यथी सात नरक- स्थानकोमा त्रण लेण्याओ कही. विशेपथी दरेक नरकस्थाने एकन अवस्थित लेश्या होय ते आ प्रमाणे, पहेलो बोनी नरकमां का. पोतलेश्या, त्रोजी नरकमा उपरना प्रस्तटोमां कातलेश्या, नीचेंना प्रस्तटोमां नीललेश्या, चोथी नरकमां नीललेश्या, पांच: मोमां उपरना मस्तटोमां नीललेश्या, नीचेना प्रस्तटोमां कृष्णलेश्या. छट्ठी सातमी नरकमां कृष्णलेश्या अने तेवी रीते देवलोकमों पण न्तरोमा पहेली-४-लेश्याओ तथा ज्योतिपि तथा सौधर्मशान देवलोकमां तेजोलेश्या, ३-४-५मा देवलोकपां पद्मलेश्या होय. आगळ अनुत्तरविमानसुधीना देवस्थानोमां शुक्ललेश्या होय. ८ पृथ्वी-जल-वनस्पतिमां कामयन्धिकपते बे अज्ञान अने सैडा- न्तिकमते औपशमिकदर्शनने वमतां तथा ते त्रण दंडकोमा उत्पन्न थतां-ईशानसुधीनां देवोने स्वीकारेल सास्वादनदर्शनना योगे अन्तर्मुहुर्त काल मृधी अपर्याप्त अवस्थामां बे ज्ञान पण होय. तथा अवचूर्णिकारना समयथी पश्चाद्भाविसमयमा विद्यमान वृत्तिकार श्रीरूपचन्द्रजी महाराज-ज-श्री हीरसूरिजी महारा- जना शिष्य उपाध्याय भानुचन्द्रगणिना शिष्य उदयचंद्रजोना शिष्य हता.तेमणे विक्रम संवत् १६७५ना जेठ सुद ६ गुरुवारे ५३६ श्लोक प्रमाण-अवणिने अनुसरनारे आवृत्ति वनावी.एम प्रशस्ति- . .
माकोडाग प्रशायरे यांना रात्री मा प्रमाणे--अपना मायामोनी गिने. मा रोमाहगामी नि-श्रीमाने .. महाभोवती एक पण मनाtter. जन्य सहामो . सायोपनिमारमाने पर अने अनुत्तरिमानगमिसी पन प्रयोजनका अभार वनानिप रपना न करे. -दंगे भाकिय शरीर-माइमा परंगुलीन सापोमन, कारण-भी अभीनयी पार ग. सम्पष्ट गो. मा मनुप्पो मेरा नहितोपानी नार अंगुन अपिक टापोनन ममाण उत्तरपे क्रिपरपना करे.-मनावर-बापु भारो. ने एक ममिप शरीरम होप एक भी अनुपोगदार वृत्तिमा कोल ९६ संमूर्णिम पनेन्द्रियतिपने संसरान्तियामते सेवासिंहनन भने फार्मपन्धिापने ए संघपण होय. -परमापाकि देवोंने एफ कृष्ण लेश्यान होप, ८ श्रवण नेत्रने कामेडा शेपरणने भोगेच्छा. ९-ज्या केरल मनुप्पोन उत्सम पर पक्के एवा माननादि देव लोकना देवी एफसमपमा संख्याताज प्पय नया उपजे, कारण- तीनी उत्पति संग्याता एका गर्भन मनुप्पोमांस होइ शके छे. १०-फर्मनायोगे श्रीवाभोने पदाप पोप न थाय शोपण अनुग्रह युद्धिपी उपदेशकने पणी निर्जरा थापन. अनन्तर जणाल पार्भनन्धिक भने संसान्तिफना ये मतभे- दपकी अमुकन मत साचो छ,एवो निर्णय उद्मस्य जीवो न फरी शके. फारण-ए मतभेद वाचनामेदजन्य छे. वाचना भेद पवार्नु फार 1-क्षयिकज्ञानवाला पूज्यपाद त्रिकालभावि सफलनीर्थपति भरागानाभोनो नो मूलथी एकजमन . कारण-अलीच अनन्त मीधरोमांना एक पण श्रीमान नीर्थंकरमहाराजाए अर्थदेशनाद्वारा एवो शन्दमयोग नथी कर्यो जे आ- परमाणु आदि पदार्थना . . - स्वरूपने हुँ पोतेज प्रतिपादन करु छु परन्तु एज प्रतिपादन कर्युछे के-जेम अतीत अनंता तीयकए जे पदार्थ भाव जेवारूपे प्ररूप्यो अने भावि अनन्ता. तीर्थंकरो. जे पदार्थमायने जेवारूपे प्ररूपशे; तेनेज अनुसरीने हु.आ विवक्षितपरमाणु आदि पदार्थना स्वरूपने निरूपण करूंछु. अने तेज हेतुथी अविच्छिन्न प्रमावशालि-त्रिका- लावाधित भवोभव चाहना करवालायक- जैनेन्द्रशासननी लो. कोत्तरता.सिद्ध थायछे जेमा त्रिकालभावि सर्वधर्मोपदेशकोमा.प्र. रूपणा भेद होइ शकन नहि. एज प्रणालिकाना विरहथी अन्यद- शनकारोने निरुपाये कहे, पडद्यु के- श्रुतिविभिन्ना स्मृतयो विभिन्ना, नको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणं । (मतं न भिन्नमित्यप्यन्यत्र) 'धर्मस्प तवं निहितं गुहायां, महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥ १ ॥ '. कालान्तर मूत्रार्थविषयक विस्मृनि आदि हेतु ओना संनिधानथी वाचनाभेदथयो.आ भाव टुंकामां श्रीजंबुद्वीप प्रज्ञप्ति टीकामां वर्णवेल छे. तेमन परोपकारधुरीण आचार्य श्रीपलयगिरि महा- राजाए पण श्री ज्योतिप्करण्डक नामना प्रकीर्णकनी वृत्तिमा कायले के-जनेन्द्रशासनमावि श्री स्कन्दिलाचायना समयमा पांचमा दुःपा आराना प्रनापे दुर्भिक्षकाल प्रवयों. जेथी साधुनो. मां सिहान्नवाचनादि अनि मंद थवा लागी. दुःकाल बीत्या याद मुभिक्षकाल समये १-बलभीपुर [ वळ! ) २-पथुरा एम स्थले भव भगो भयो. मां मुत्रार्थनी संयोननाना ममये अनीन- दुष्कालना वा मुत्रार्यनी विस्मृति थपली होवायी-वाचना- भेद ५ो. ने अदमः ममाग्मां अनन्तकाल मृधी भ्रमणकरा. बनानासाननाथी भय पामनार-कदाग्रहरहिन-नया अव.
. -- । ध्यादि प्रत्यक्ष ज्ञानरहित-अने तेज हेतुपी अमुक वाचनापाठ सत्य है.एवो निक्षय करचो अशक्य जाणनार संघनायक पूण्यपाद-श्री देवलिंगणि समाश्रमण महाराजा विगेरे । आचार्य महाराजाभोए. ते ते वाचनामोना पाठो परस्पर भविसंवादपणे स्मरणने अनुसारे. अवस्थन पुस्तकारून कर्या, जेपी आन मुश्री पण,तेज परनि तदवस्यमा दृष्टिगोचर थापछे जेमा अवमाने आ चे अर्थमां सत्य अर्थ कयो ? ते के लिगम्य छे एको उल्लेख देखायछे. आ श्रीदंडकपकरणनो अनुवाद-छ्या शब्दार्थ. मास्तर. चंदुलाल नानचंदे लखेल छे. अने : प्रकरणना विषमस्य- लोने सैद्धान्तिक सरलशैलीए स्पष्ट विवेचन टिप्पणी यत्रादि साये समजारनार-मारा परमोपकारिशिरोमणि- चारित्रादि- गुणोने वृद्धि पमाडनार- उत्तम ब्रह्मचर्यादि लोकोत्तर सद्गुणोने धारण करनार-जंगमकल्पतरू-फलिकाले श्री गौ. नम गुरुसमान-श्री जैनेन्द्रशासनतीर्थरक्षणपरायण-परोपकार- शोल-भावकरुणाजलनिधि-पूज्यपाद-मातःस्मरणीय-भावाचार्य पुरंदर-श्रीग्यानांगोक्त पश्चातिशयधारफ-तपोगच्छाचार्य श्रीपरम गुरुवय श्रीमद्विजयनेमिसूरीश्वरभगवत्पहार्याचलनमोमणि- सदाचारशीलवैराग्यगुरुभक्तिपरायण, चासीचंदननी माफक भव्य जीवोने श्रुनादिना अध्यापनादिद्वारा कनार्थी बनावनार-मारा भ्रमादिपाठक, मछनिमांनिध्यकारफ-गरपोपकारी गोनार्थ मुख्य- मिदान्नवाचस्पति-न्यापविशारद पूज्यपादश्रीमटिजपोदयमरिजी महाराज से. जेधी नेपोधीनी आ अनहद आभार अनाग्रही- गुणग्राही माघरसिक मायनीरीने अविस्मरणीय है, पयन्त मन्य. जीरो आ मंधना अध्यपन-अध्यापन-मनन-भने निदिध्याम. नक्षराईटफोनु या मरूप मममी. शुम देटकोने मुवर्णनी येटी रुपान, अने मापदंरकीने लोहनी पेटी समान गणी, पोनाना -
मानो नी. दादा भारनाना पानरूप पानना .
आधी नादाने हटाती-पोताना अव्यापार निस्पारि
महानन्द ने पारगे अने ते द्वारा लोकालोनी
kart करना मकिपद पाये, एम हाकि
इ, मामाने गजेगी श. कारण
ft Tो गोला लोकोतर
Fry को लीन का
*** ** ? ने IIT मोना
NEER , भावतः ॥
REAK: जापानाः || १ ॥
HP का दीपजन्य
१ . ar, नेने मायो
: मानी, लोभीभी
ना भूयादम
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भी नशामा किंकर-----
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-
ॐ
.. नमः
॥स्परसमयपारीण-विधीपकारधुरीण-धागनारित्र-सपोगाधिपति
आचार्यश्रीविजयनेमिमृरिमगुमायो नमः ।।
॥ अथदंडकविस्तरार्थः॥
॥ यंत्रादिविभूपितः ॥
नत्या श्रीमन्महावीर, नेमिसरि गुरं तथा ।
दण्डकारयस्य शास्त्रस्य, विस्तरार्थ तनोम्यहम् ॥ १॥
अवतरण [-आहेली गाथामां मंगलाचरण करया पूर्वक
दंडकम्प पदवडे श्रीऋषभदेव वगैरे २४ भगवाननी स्तुति स्वरूप
दंडकमकरण अपरनाम विचारछत्रीशी अथवा लघुसंग्रहणि अन्य
सांभळ्यामां भव्याने सावधान करे है.?
नमिडं चउवीसजिगो-तस्सुत्तवियारलेसदेसणओ ।
दंडगपएहि ते चिय-योसामि सुणेह भोभव्वा ? ॥१॥
( सम्मृतानुवादः)
नन्या चतुर्विगतिजिनान नमूत्रविचारलेगदंगनतः ।
दंडकपः नांधव. म्नोग्यामि श्रृणुध्वं भी भव्याः ? ॥१॥
(२) ।। दंडकविस्तरार्थः ॥ ॥ शब्दार्थः॥ नमि-नमस्कार करीने. दंडगपरहि-दंडकनां पदोवडे. चवीस-चोवीश- ते-तेओने (-श्रीजिनेश्वरोने) जिणे-जिनेश्वरोने चिय-निश्चय. तस्मुत्त-तेमनासिद्धांतनो. थोसामि स्तचीश- वियार-विचार-स्वरूप. सुणेह-सांभको. लेस-लेशमात्र-किंचित भो-हे. देसणी-दविवाथी भव्वा-भव्यजनो! गावार्थ:-चोवीशं जिनेश्वरोने नमस्कार करीने तेमना सि- द्धान्तनुं स्वरूप लेशमात्र देखाडवा पूर्वक (२४) दंडक+पदोवडे (-दंडकनां स्थानवडे ) निश्चय तेमनी (-जिनेश्वरोनी) स्तुति क- रीश ते हे भव्यो सामळो ! विस्तरार्थः-आ ग्रंथमा अभिधेय (-विषय )२४ प्रभुनी स्तुति करवाना छ, हवे ते स्तुति प्रभुना गुणने वर्णन-प्रभुनी का- यन वर्णन-प्रभुनां वचनोनुं वर्णन इत्यादि द्वारा अनेक प्रकारे प्रभु स्तुति घडू शके छे, त्यां आ.ग्रंथकर्ता 'गजसार मुनि' आ ठे. काणे सिद्धान्तरूप प्रभुनां वचनोना वर्णनरूपे प्रभु स्तुति करे छे, माटे मूळ गाथामां का छे के " तस्मुत्तवियारलेसदेसणी-ते- मना सिद्धान्तनु स्वरूप लेश मात्र देखाडवा पूर्वक (चोवीश दं- डकपदोवडे ) हुं तेमने स्तवीश. " बनो ए प्रमाणे जे स्तवना क- रवी ते पण हेला नमस्कार कर्या बाद थाय छे माटे प्रथममा भयमे " चोवीश जिनेश्वरने नमस्कार करीने " एम कयु छे. चालु पहति पण एज ले के भगवानने प्रथम नमस्कार कर्या बाद तेम- नी स्तुति बोलाय छे एज पहति आ गाथामां दर्शावी छे. हवे नेमना सिद्धान्त नो विचार लेश मात्र देखाडवाने जे स्तवना कर- , ॥ पतुर्विशतिदंडकवर्णनमः ।। वीरे, ते सिद्धान्तनो विचार तो नयवर्णनधी-निक्षेपवर्णनथी- द्रव्यानुयोगना, वर्णनधी-गणितानुयोगना वर्णनयी इत्यादि अनेक प्रकारे थइ शके छे तो अहि कया प्रकारनो विचार दर्शवी स्तव- ना करवी है? ते जणाववाने माटे कहे छ के-'दंडगपरहि'-दंडकनां २४ स्थान ते वडे स्तवना करवानी छ. अहिं जेटला भगवाननी स्तुति करवी छे तेटलांन दंडफनां स्थानोवडे सिद्धान्तनुं पण कि- चित् स्वरूप दर्शववानुं छे. माटे हे भन्यो तमे सामळो. अर्थात् आ दंडक भकरण ते २४ जिनेश्वरनी स्तुतिरूपे. र. चायल छ, अने ते स्तुति प्रभुना गुण वगैरेनी नहिं पण प्रभुना । सिडरान्तगत वचनोनी छे. भरन भने अरक्तक्षेत्रमा प्रति उत्सर्पिणी भवसपिणीमां २४-२४ ज तीर्थंकरो याय छ माटे चोवीशनी म्तवनापी अतीत अनागस वर्तमान तमाम चोयीसीओ (अनन्त चोवीशीओ) नी स्तवना था ! आ प्रकरणमा करेली स्तुति ते नमस्कार आशीः.इ. त्यादि स्वरूप कोइ नही पण विनापनारूप, जे माटे प्रकरणने अन्ते पोनेन ग्रन्यकार 'गजसार मुनि' ते आगय व्यक्त करे ले. "दंतिय विग मलई, मई, मम दिन मुबग्नपयं. " ॥ प्रथम गाथा तात्पर्याध. ॥ मंगलाचरण, देदकपदे फरी अभिधेय, भषा पपदे फरी भव्य- जीव अधिकारी. मंबन्ध नया फल अर्थपनियी मुगच्या छ. (१) भववरण-भा गाथामां प्रकरण वक्तव्यनानी च करवा २४दंरकनां नाम दरि. नेरइया अदुराई, पुटयाइ पेन्दियादओ चेय। गाभयतिग्यिमणुस्मा, यंतर जोसिय माणी ॥२॥ 4
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(१), - ॥ तृनिनिसकानमः॥ नुका सम्मायनो मे.) दि.१५ 'परमार्मिसी अमाप्रसार निकापना . नया 'पुस्याई गणीकाय निगरे ५दशक नां नाम -गवीकाय, अपकाय, अनिकाय, वायुकाय, ने गनसविकाग नया 'दियादो-दीन्द्रियादि ३ दंडक सेना नाम-दीदिप, श्री. न्द्रिय, ने परिन्द्रिय ए ३ विफलेन्द्रिय पण काय . तपा 'ग. म्भपतिरिया-गर्भन निर्यवनोदंरफ, तेमज (गन्भय) 'मशुस्मा'- गर्भन मनुप्पनी र दंडक, नया घ्पनर ८ प्रकारना अपना १६ प्रकारना अथवा २०५मकारना तेनां नाम-भूत-पिशाच-पा --राक्षस-किमर-किंपुरुष- महोरग-ने गंधर्व ए आठ मूळरगन्तर है, तथा व्यन्तरनी पीनी वाणन्यन्तर नामनी नातिना पण ८ भेद के तेनां नाम-भणपग्नि--पणपग्नि-ऋपिवादि-भूनवादि--दिन-- महादिन-कोईर-ने पतंग ए ममाणे ८ मही १६ प्रकारका व्यन्नर कया, अने प सर्वना उत्तरभेद पळीने १०५ मझारना व्य- न्नर देवो तेनां नाम- १० किमर. १० किंपुरुष. १० महोरग. १ किन्नर १ पुरुप १ भुजग १हारा २. किंपुरुप २ सदपम्प २ भोगशाली । ३ किंपुरपौत्तम ३ महापुरुष ३ महाकाय ३ तरह ४ किमरोनम ४ पुरुपटपम । ४ भनिकाय । नारद ५ हृदयंगम ५ पुरुषोत्तम ५ स्कंधगाली ५ ऋपिवादिक ६ म्पशाली ६ अतिपुम्प ६ मनोरम भूतवादिक ७ भनिन्दिन । ७ मन्देव ७ महावेग ७ काय ८ मनोरम ८ महेप्यक्ष ८ महाकादेव १. व अंबरीप-शयल श्याम-गंद्र-उपरौद्र-अमिपत्र-धनु- कुंभ-महाकाल-काल-यतरणी पालक-महाधोप-परस्पर-मा- मना १५ पग्माधामियदयो अमुरकुमार निकायना . १२ गांधर्व ८माल (६) ॥ दंडकविस्तरार्थः ।। ७राक्षस.. १ भीम २ सुरूप १ रतिप्रिय ९. मेरुपम ९ मेरुकान्त ९ रैवत ২০. নিগড় १० यशस्वत् १० भास्वन्त १० विश्वावसु ११ गीतरति १२ गीतयश १३ यक्ष. २६ 'पिशाच १ पूर्णभद्र १ कुष्मांड २ माणिभद्र २ महाभीम २ प्रतिरूप २.पटक नभद्र ३ अतिरूप परिभद्र १ विनायक ४ भूनोत्तम ४ आन्हक ५ मुमनामद ५. जळराक्षस . स्कदिक . ५काळ ६ च्यनिशति- ६ राक्षसराक्षम ६ पहात्कंदिक ६ महाकाळ कमद्र ७ ब्रह्मराक्षस ७ पदायेग ७ चोक्ष ८ प्रतिच्छन्न ८ अचोक्ष सर्वतोभट ९ आकाराग २. तालापशाच १० मुखरपिशाच १८. वनाधिपनि १ अघातारक ३ विघ्न . ३ जोप १७ भट्ट दह 4 -- महादह १ः यसोनम १४ महाविदह १. तृष्णिक १६ बनपिनाच नया १० निगाभा, नामना व्यन्नर- नादिना देव ने नेना नाम-अनजभक-पाननं भव.- वचभक--ये- रमभदायानं भर.--मनभव.--फर भा--पुष्पलनमक-वि- पामा ने अपनाशक १० प्रमाना देवो नीच्यांकमा मदर टेर -7 में विटावक, १ ETTER: श्रीयाद मम देने महानि. Fr" a कम ॥ चतुर्विशतिदंडकवर्णनमः॥ चित्र-विचित्र-यमक-समक-कंचनगिरि-वैतादय वक्षस्कार दि. गैरे वतीमां बसे छे अने अमआदि.पदार्थोमा रसादिकनी. हीनाधि- फता फरवानी भना-पेष्टवाळा होवाथी तिर्यग्जृमक कहेवाय छ. ए प्रमाणे (१०-१०-१०-१२-१३-७-०९-१६-१०) उत्तरभेदी ९७ तथा ८ मूळभेदो मळी १०५ प्रकारना व्यन्तर देवो कया.' तथा ५ प्रकारना अथवा १० प्रकारना 'ज्योति- पी देवो छ तेनां नाम-नंद्र-सूर्य-प्रह-नक्षत्र-ने तारा ए' ५. मूळ ज्योतिषी देवो , ते पण दरेक २॥ द्वीपमा चर-चालता छ, ने २॥ द्वीप बहार स्थिर मा चर अने स्थिर ए ये मेदवडे गुणतां १० मेट थया. दरेक चंद्र इन्द्रनीः आज्ञामा रहेनार अने पाछळ पाछळ चालनार भयमा साथै रहेनार दरेक चंद्रना ८८ प्रह-२८ नक्षत्र-ने ६६९७५ कोटा कोडि सारा छे, अने सर्व चंद्र तथा सर्व मूर्य भगंग्य असंख्य . छतां जानिर्भदै ५ अगया १० गणाय से. पुनः ए.८ ग्रह विगैरे जे चंद्रनो परिवार को तेज मूर्यनो परि. पार पण थे, परन्तु मूर्य इन्द्रनी परिवार जुदो नथी, अर्यात् एकः मातना परिवार उपर ये इन्द्रोनी आना छ, अथवा ये इन्द्रोनो भगो पकान परिवार छे. तेमां पण मूर्य इन्द्र फरनां चन्द्र न्द्र मोटो महडिकने पुन्यवान पळयान् गणाय , माटे मामान्य रीने ग्रहादि नन्दनो परिवार के एम विशेष प्रसिद्धि. . . नया 'पाणी'-वैमानिक देवीना मूळ फला धने नातीन एम में मंदी, उनम्मंदी २६ भयरा ३८ मंट-तमा का ने १. गलागीन देवी पत्रोदनां नाम- १२ कल्पः १ सौधर्मः २ ईशान. ३ सनत्कुमार ४ माहेन्द्र ।। दंडकविस्तरार्थः ।। १४ कल्पातीत. १ मुदर्शन २ सुप्रतिवह. ३ मनोरम. ४ सर्वभद्र. ५ विशाल. ६ सुमन. ७ सौमनस. ( आ ९ अवेयक देवो कहे- वाय छे) ५ ब्रह्म. ६ लांतक. ८ मियंकर.. १ आदित्य. ९ आनत. १० माणत. ११ आरण. १२ अच्युत. १ विजय. २ वैजयंत. ३ जयन्त. ४ अपराजित. ५ सर्वार्थसिद्ध. (मापांच अनुत्तर विमा A. नवासीदेवो कहेवायछे.) नया ब्रह्मदेवलोकने अन्ते रहेनार ९ लोकान्तिक देवो छे नया इ किल्लिपिक देवो है, ते आ प्रमाणे- ९. लोकान्तिक. ३ किल्विपिक. 2 सारस्वन. १ सौधर्म अने ईशान- , लीज्ञानिकना मर्य देवा २२४ ने मतान्तरे २२२३७७ में नई एकावतारी अथवा मतान्तरे ७-८ अवतारी ग्रह्म- देवलोकना पीजा पाथर्ट आठ कृष्णगजीना मध्यमा रहेला मन विमानामा माग . uch ॥अतिनिदानपा कन्सनी नीने ऐनारा. .२ आदिस्प. ३ पनि ४ अरुण. ५ गर्दनोप, ६ तुपित. ७ अय्याराप. २.सनत्कभार भने माइंग कसनी नीने रहेनारा. ९ अरिष्ट. ३ लांतक फलानी नीचे रहेनार. एममाणे २६ भने १२ मळीने वैमानिकना ३८ मेद पण थाप छे. सर्व देव संख्या. १. भुवनपति १५ परमाधामी पप्रमाणे "श्रीदत्यलोकमकाशमा"देव- १०५ पन्तर ना भेद १७८ गणाव्या छे ते प्रमाणे नहीं १० ज्योतिपी पण गणाव्या. ३८ वैमानिक १७८ (इनि चतुर्विशनि दंदकदमभेदवंगनम.) शंका-भा २४ देरकोमा ७ नारकीनो मेगोर देहक ग- पो भने १० भुवनपतिना जदा जुदा १० दंडक गण्या तेनु कार• न ? मया सम्मूर्णिम निच भने मम्मूरिछम मनुष्यनो देशक कम न गयो ? उत्तर-भा दंडकमकरणना रचनार ग्रन्धकार दंटकनी मं. च्या सिद्धान्नने अनुसार रावी छ, भने सिध्यान्नोमा सर्वत्र पू. वात रीतेन संख्या गणाची छे, ते यथार्थ कारण श्री पहुश्रुत- गम्प छ, परन्तु प्रायः एम समजाय छे के मंख्या पांघवी ए वता. नी इच्छाने आधीन छ माटे सान नारकीनो एफज ने १० भुक्न (१०) ": ॥ देव विस्तरार्थः।। ना १० दंडकनी संख्या राखी अने सम्म तिर्यंच तथा सम्मू० म- नुष्यने कंइक वखतः तिर्यंच-तथा मनुष्यना दंडकमां अंतर्गत करेल छे. छतां दरेक द्वार वर्णन प्रसंगे हुए धमे भेदमां गण स्पष्ट समजाय तेवी रीते जुदो बारावतार करीश. तथा जेने विपे जीव स्वकृतकर्मनो दंड पामे ते 'दंडक कहे- १ एकार्थक सरखो पाठ जेनी अंदर आवे ते दंडक क. हेवाय छे. जेम : उख, नख, णख, वख, मंख इत्यादि गती' ए दंडक धातु कहेवाय छे. तेम प्रायः साते नरकमां सरखा पाठ आळावा ' नेरइया शब्दे करी सिद्धान्तीमा घणुं करी देखाय छे. माटे ते एक दण्डक जाणघो अने दश भुवनपति- ओमा घणुं करी ' असुरकुमारा ' 'जाव थणियकुमारा' इत्यादि शब्दो घडे अलग अलग आलावाओ सूचव्या छे. माटे ते दश- दण्डको समजाय छे. तेज रीते एकेन्द्रियना अधिकारमा धणे भागे पुढविकाइया ' इत्यादि शटदो वडे अलग अलग आ- लावाओ आवे छे. माटे तेना पांच दण्डको अलग जणाय छे. वळी गुरुसम्प्रदायथी ए पण एक हेतु समजाय छे जे रत्नप्रभा तथा शर्फराप्रभानी वच्चे तेमा आधार भूत घनोदधि-धनधात-तनुवात आकाशनुं अन्तर छे पण असुरकुमार अने नागकुमारनी पच्च जेम नरकना पाथडान अने नारकी जीयोनुं अन्तर छे तेवू को अन्तर नथी तेवीज रीते साते नरकमां पण एक बीजांनी बच्चे बीजं कांइ अन्तर नथी माटे ते साते नारकीना जीवी अव्य- वहित गणाय छे. जेथी तेओनी एक दण्डक छे. अने भुधनप. तिमां एक बीजामी बच्चे नरकना पाथडानुं अन्तर होवाथी दरकना अलग अलग मळी दश दण्डको जाणघा. आज कार. णधी व्यन्तरांना अनेक प्रकारी होवा छतां पण तेमां एक बी- जाने अन्तर नही होवार्थी एफज दण्डक छे.. तमज वैमानिकी- ना कल्प-कल्पातीत-लोकान्तिक किल्पिषिक इत्यादि अनेक भेदो होबा छतां पण अन्तरनी अभाव होवाथी ते वैमानिक प.काज दडक कहयाय है. ( स. च. से. इ. उ. ग.)
॥ चतुर्विशतिदंरकेपतृविंशतिबारवर्णनम् ॥ वाय, अथवा दंडक शब्द ते ते जीवोनो समुदायमाण करवा माटे है (एम श्रीदंदकवृत्तिमां कडं .) पुनः आ प्रकरणमा सूक्ष्म अने अपर्याप्त जीवोनो अधिकार पण मायः नधी-(श्रीदंडक दृचिः) '. - , अवतरण--आ वे गाथाओमां (२४,दंदक उपर उतारवा) माटे २४ द्वारना नाम कहेवाय के. संखित्तयरी उ इमा, सरीरमोगाहणा य संघयणा । सन्ना संठाण कसाय, लेसिन्दिय दुसमुग्घाया ॥३॥ दिट्ठी दंसणनाणे, जोगुवओगोववाय चवणठिई। पज्जत्ति किमाहारे, सन्निगइ आगई वेए ॥४॥ (मंस्कृतानुवादः) संक्षिप्तमरा वियं, शरीरमवगाहना व संहननानि । संझामस्थानकपाय-लेम्पेन्द्रियहिगमुद्यानाः ॥ ३ ॥ रदिर्शन ज्ञान, योग उपयोग उपपान यवनं स्थितिः। पर्याप्तिः किमाः, गमिर्गनिगगनिषेदः ॥ ४ ॥ ॥ शन्दायः॥ गग्विनपरी-भनि मरेपराठी. : मंपपण-मंघषण (६) उ-पी. । समा-1 (४) मा-भा(शाररूपमप्राणी.) मंदाग-मम्यान () सीर-नगर (५) कमाय-याप (1) मंग-रेपा (६) भीगाना- अरमाना. 4 (१२) ॥ दंडकविस्तरार्थः ॥ गइ-गति. आगइ-आगति. इंद्रिय-इन्द्रिय (५). चवण-च्यवन-(मरण). दुसमुग्धाया-समुद्घात. ठिई-स्थिति-(आयुष्य) दिहि-दृष्टि (३) पज्जत्ति-पर्याप्ति (६) देसण-दर्शन (४) किमाहारे-कइ दिशिनो आहार ? नाणे-ज्ञान (८) सन्नि-संज्ञा (३) जोग-योग (१५) उपभोग-उपयोग (१२) उवाय-उपपात-(जन्म). ए-वेद (३) गाथार्थ:-अति संक्षेपवाळी ( २४ द्वाररूप संग्रहणी.) आ (प्रमाणे हे.)-शरीर-अवगाहना--संघयण--संज्ञा--संस्थान--क- पाय--लेल्या- इन्द्रिय--ये समुद्घात-वृष्टि-दर्शन-ज्ञान-'अज्ञान--- योग--उपयोग--उपपात--जन्म-मरण--आयुष्य-पर्याप्ति-वइ दिशि- नो आहार-संशिपणु-~-(संज्ञा)--गति--आगति---अने बंद ( ए २४ द्वार है.) विस्तरार्धः-२४ दंडकोमा २४ द्वारोनो अवतार मात्र ४४ गाथापांज करेलो होवाथी 'सखित्तयरी उ इमा'-आ २४ द्वा- रूप मंग्रहणी--( मंग्रहनु स्त्रीलिंग संग्रहणी ) अति संक्षिप्त छे. ते २४ हागेनुं किंचिन् न्दरूप कहवाय छे. || १ शरीरहार.॥ जीने-दिनाना पाम ने गागर पांच कानां है. ते आ प्रमा- उदार- ( विगार-प्रधान ) गृणावाला एवा श्री नी- कर-पर--सर्वद-गर्व विति- चक्रवर्ति- वामदेव--प्रतिवामुदन मायामां शानदार कर नयी कारणा, शानद्वा. मार लगन गालन अनगन मानहारन - ।। प्रथमशरीरदारपर्णनमः ॥ -देव-इत्यादिने प्राप्त गर्नु रोगामी, अषया मोहन दारण अथरा अनंत लम्धिरूप उदारगुण शरीर परेम माम तो हो. भाषी अपमा उदार एटले स्थूल पुदगलौन पनेलं निर्यर-अने म. गुप्योर्नु परीर औदारक कवाय से.. २ तथा विशिषपकारनी क्रियाभोपाई पटले एक होने अनेक थाय, अनेक होइने एक पाय, भूमिचर होइने आकाशपारी थाय, आकाशचारी होइने भूमिचारी थाय, नाना' होइने मोटा थाय, मोटा होइने नाना याय, हलकुं होइने भारी याय, ने मारी होइने हलकुं याय, दृश्य होइने अदृष्य थाय, अने अदृश्य होइने स्य थाय इत्यादि अनेक प्रकारनी क्रियावाळ अथवा शक्तिवा जे शरीर ते वैमियशरीर सर्व देव-सर्वनारक-फेटलाएक गर्मजम- नुष्य- कैटलाएक गर्भनतिर्यच अने केटलाएफ यादरपर्याप्ता वायु- फायने होय . २ ३ आमपापधि आदि लम्धिवाला १४ पूर्वधर मुनि महारा- न श्रीजिनेश्वरनी ऋधि देखवाने अथवा सूक्ष्मशंकानुं निराकरण परवाने १ हाय प्रमाण नई शरीर यनावी श्री विहरमान तीर्थंकर पास मोकले ते 'आहारक शरीर कहेवाय.शरीरना परमाणुओ वैत्रिय शरीरना परमाणुओथी तद्दन भिन्न तथा सूक्ष्म होचायी अने केटलाएक गुण वै० शरीरथी जुदा होवाथी ए शरीर वैनिया- तर्गन न गणाय. ४ आहार पचाववामां, तेजोलेल्या मूफवामां, ने शीतलेल्या आमा भयमा धर्ततां चारयार आहारक शरीर बना. , एक भघमा उत्कृष्ट ग्रे यारज बनाये. आहारक शरीपनी जघन्य चिरकाल , ममय, दाट छ माम अश्या मनातर প্রথম দ্বি, १ ॥ दंडकविस्तरार्थः॥ मूकवामां जे कारणरूप शरीर ते तैजस शरीर सर्व संसारी जी- बने होय..४. ५. कर्मपुद्गलोथी बनेल ते कामण शरीर, केटलाएक आठ कर्म परमाणुओना समुदायरूप-( १५८ प्रकृतियोना समुदाय)ने कहे छे. पण ते उचित समजातुं नथी. कारण कार्मण शरीर नाम कर्मना भेदरूप, बोरने कुंडानी जेम सर्व कर्मनो आधार छे. ते का- मण शरीर पण सर्व संसारी जीवने होय छे.. आ. शरीर. जीवने परभवमां- लइ जनार होय छे. ५ ॥इति प्रथमं शरीरद्वारम्॥१॥ ॥ २ अवगाहनाहार. ॥ कया जीवन शरीर केटलं मोटुं होय, एम कहेवू ते अवगाह- नाद्वार कहेवाय. ॥ इति द्वितीयमवगाहनावारम् ॥ २ ॥ ॥३ संघयणहार. ॥ हाहकाना समृहनुं बंधारण ते संहनन कहेवाय. तेना ६ भेद आ प्रमाण-१ संधिने स्थाने हाडना ये छेडा एक पीजाने प- रस्पर आंटी मारीने वांदरीना बच्चानी ठे वळगी रहेला होय, ने ते पन्ने छेडा उपर मध्यमां हाटकाना पाटा वाटायळो होय, अने ते उपरयी चारे अंगने एटले प्रथम पाटाने, तेनी नीचे संधि- गतहाइने, नेनी नीचे संविगत चीना हारने, ने तेनी नीचे पाटाने मर्याग्निी उत्पभिमां. भवान्तर जवामां. प्रथम म. मयं आहार पुत्री देवा विगमा कारणरूप छ.
माननदारवर्षनरी (पचाग्ने ) महीने बानी नीली भारसार नीकी रोग, 'ए। सारनी गधीनाकानी करवा नाय वामगारान (-ज-पीनी, पम-पारी, नागन-मकर) संहनन पांनाए.१ कानी खीची पियागपर कोनी भिगनानी मा. में जेपासपम-पट्टी, ने नाराष-मटर पनपने कपभनाराच मानन काय.. ३ पूर्वोतरीने पकली पर्फरपंप होप में नाराम संहनन. १ ४ पूर्वांना मफटबंध हारपानां पन्ने राना परस्पर तो गैप नदी पार एप रो पीना छटाने मटप नेि पळ. गेलो होप ने बीजो मंदो सीधी होय, नपा तेना मध्यमांगी डा. द ग्वीली पण भारपार यह होय तो नेवी मंघि रचनानुं नाम अर्थ नाराय यहचाय. ५ नया दारना.ये मेरा एक उपर एफ. सीश पदेला होय ने वचमा खीली आरपार यह होय सो क्षेत्री संधिरचनानु नाम कालिका मंहनन कडेवाप.५ ६ नया हारनो एक छेटो ग्योभण (-रहंज खाडा) पाळी शेय अने तमांसाहनी धीनो ही अटकीने रोहेलो होय, नेवी मंधिर धनानुं नाम नेदपृष्ठ संहनन कहेयाय, मा संहननां वे छेदा सा- मासामी आवीने स्पॉला होय पण एफ पीनापर चरेला होना नगी, अने खीली होनी नयी माटे कोइ हाडने खंती खोमण- मांधी बहार नीकळी जनां " हाकुं उतरी गयु " कवाय अने हाटकाने एका प्रकारनो आंचको लागतां खोभणमांयी नीक- की एक बीजापर चही जाय त्यारे " हार चढी गयुं " कहवाय. नया नलादि मसन्यारूप मेया बडे आत एटले पीडायलं (- यह नार) होवाथी पर्नु बीउँ नाम सेवार्म पण छ.६"संह- (१६) ... देडकनिस्तरार्थः ।। . न्यन्ते-दृढीक्रियन्ते शरीरपुद्गला येन तत् अथवा संहन्यन्ते संहति (शक्ति) विशेष प्राप्यन्ते शरीरावस्यावयवा येस्तानि संहननानि" (--जेनावडें शरीर पुद्गलो संहन्यन्ते एटले दृढ कराय अथवा जेना वडे शरीरमा रहेला अवयवो शक्ति विशेष पामे ते संहनन एवो व्युत्पत्यर्ध छे.) ॥ इति तृतीयं संहननद्वारम् ॥३॥ ॥ ४ संज्ञाद्वारम.॥ A जेना वडे 'संजानाति' एटले जाणे छे ते संज्ञा ते ज्ञानरूप अने अनुभवरूप एम चे प्रकारनी छे त्यां मति-श्रुत-इत्यादि आठ जा. नरूप संज्ञा छे, अने बीजी अशाता वेदनीयादिकमना उदयधी उ- स्पन्न थयेली आहारादिकनी अभिलापात्मक अनुभवरूप संज्ञा ४-१०-ने १६ प्रकारनी छे. ते आ प्रमाणे- ; ? क्षुधारूप अशाता वेदनीयकर्मना उदयथी आहार ग्रहणनी ने इच्छा ते आहारसंज्ञा. २ भयमोहनीय कर्मना उदयथी उत्पन्न थयेल त्रास उपजवा. रू.५ ते भयसंज्ञा. ३ वेद मोहनीयना उदयथी उत्पन्न थयेल विषयाभिलाप ते मैथुनसंज्ञा- ४ लोभ मोहनीयना उदयथी उत्पन्न धयेल तृष्णा ते परिग्रहसंज्ञा. ए चारे संज्ञाओ सर्व संज्ञि जीवोने प्रगट अनुभवरूप छे अने एकेन्द्रियादि सर्व असंज्ञि भीवोने अस्पष्ट अनुभवरूप छे. तथा ए चार संज्ञाओमा चार कपायरूप ४ संज्ञाओ अने लोक तथा ओघ -- . ॥ चतुर्धर्मशाहारवर्णनमः ॥ (१७) संज्ञा मेळवतां १० संज्ञाओ पण कद्दी .. त्यां मतिज्ञानापरणना क्षयोपशमयी शन्द अने अर्थना विषपवाळी सामान्य, अवयोधरूप क्रिया ते ओघसंज्ञा १ अने शब्द तया अर्थनो विशेपारबोधक्रि- या ते लोकसंज्ञा, २ (इति प३० सारो० वृत्ति. अयवा दर्शनो- पंयोग ने ओघसंज्ञा अने ज्ञानोपयांग ते लोकसंज्ञा (इति गांग वृत्तिः) अथवा वल्लीनुं जमीन छोडीने भीत वंडी या वृक्ष इत्यादि पर नहयु इत्यादि ओघमंज्ञा, अने पुपरहितने सद्गति न होय, कृतरा ने यक्ष के, घामण ते देव छ, कागडा ते पूर्वज छे, मयूरीने मोरनी पांखना,वायुधी अथवा मयूरना आंमु . घाटवाथी गर्भ रहे इत्यादि लोफोए स्वच्छंदमति कल्पनापी उपनायेली कल्पना. भो ने लोकसंज्ञा (इति आचारांग त्ति). ए १० संज्ञामो फही. नश मोह-धर्म-मुख-दुःख-जुगुप्सा-ने प्रोफ प ६ संज्ञाभो श्री आचारांगजीमां कहली होयायी पूर्वोक्त १० साथे मेळवतां १६ मंज्ञाभी पण यापं. 'जीर जे संज्ञी अयया असंझी फवाय नेप-१० या १६ संक्षाओवटे नहिं, पण भागळ फहवानी. दीर्घकालिफी आदि संताओरड संजि अमंजिपणु कडयाय . एवं न्द्रिय नीयोमां पादर प्रत्येकवनम्पनिने भंग १० मंशाभी लिंगरूप नीचे प्रमाणे कदी- , वृक्षने जनो आहा होय छे पाटे परन्द्रिपने आहारमंता. • माटु नामनी यनम्पनिने हार अहादरा नाप नी में. पांचार जाप से माटे परन्टियने मगमा. ली पीनाना ओवर वृक्षने वींटी ने पीने पर. सिने परिग्रहम्जा. + गुरुपस नामनुं स भीना आणिगन फलीभून याय भाने मपनमना.
(१८) । दंडकविस्तरार्थः ॥ कोकनद नामनो कैद हुंकारो करे छे माटे क्रोधसंज्ञा. ६ रुदंती वेलना रसना स्पर्शयी सुवर्णसिद्धि, थाय छे, अने ते वेलमाथी रसना टपकां झरतां रहे छे, जे परथी मानसंज्ञान अनुमान थाय छे. अर्थात् हुँ होते छते जगत्मां गरीबाइ. केम होय? एवा अभिमानथी आंसु. टपकाये छे. ए हेतुथी मानसंज्ञान अनु: मान थयेल छे. ७ वेलडी पोतानां कळोने ढांकी देछे माटे मायासंज्ञा. ८बीली अथवा धोळो खाखर प्रायः दाटेला निधान उपर उगे छे अने पोतानां मूळ ते निधानपर फेलावी वींटी लेछ माटे लोभसंज्ञा ९ कमळो रात्रे संकोच पामे छै माटे लोकसंज्ञा. १० वेलही जमीनमार्ग छोडीने भींत या वृक्षपर उर्ध्व चडे छे. माटे ओघसंज्ञा- ए प्रमाणे वादर वनस्पतिने १० संज्ञाओनां लक्षण कयां, अने ते प्रमाणे बीजा दरेक जीवोमा कोइमां स्पष्ट तो कोइमां अ- स्पष्ट पण ए संज्ञाओ रहेली छे. (४) ॥इतिचतुर्थ संज्ञाद्वारम्॥४॥ .. ॥ ५ संस्थानद्वारम् ॥ सामुद्रिकशास्त्रोक्त प्रमाणसहित वा प्रमाणरहित अवयवोनी रचनायी थयेलो शरीरनो शुभाशुभ आकार ते संस्थान कहेवाय. ! ते ६ प्रकारनां छे, तेनुं स्वरूप आ प्रमाणे- १ शरीरना सर्व अवयवो प्रमाणसर होय ने समचतुरस्र सं- 44 . . -- ॥ पनपसस्थानद्वारवर्णनमः ।। (१९)" स्थान कहेवाय. आ संस्थानयानो मनुप्य पर्यकासने बेठेल होयतो तेना हा दींचणयी जमणा खभा सुधीर्नु माप, जमणा दींचणयी डाग खभानु, अने पर्वकासनना मध्ययी नासिकाग्रसुधीमाप एक सरख होय छे माटे सम-सरखा छे. चतु:-(ये खभाने में टीवणरूप)चारे अस म्यूणा ते जमां ने समचतुरम संस्थान कहेवाय. २ तथा न्यग्रोध एटले वडनी पंठे नाभिधी उपरना अवयवो प्रमाणसर होय ने नाभियी नीचेना अवयवो प्रमाणथी न्यूनाधिक होय ने न्यग्रोध संम्यान. ३ नया आदि एटले पगना तळीयायी नाभि सुधीना प्रथम भंगाधना अवययो प्रमाणसर होय ने उपरना अवयवो ममाण र- हिन होय ते सादि संस्थान (अहि केटलाएक.आ संस्थानने सा- चि एटले शाल्मली क्ष सरखा आकारवाल एम पण फहे छे.) ४ मस्तक-ग्रीवा-हाथ-ने पग ए ४ अंग प्रमाण सर होप अने शेप अवयवो प्रमाण विनाना होय ते चामनसंस्थान. ५ मस्तक-ग्रीवा-हाय-ने पग ए ४ अंग प्रमाणरहित होय अने पीना अवयवो (मायः) प्रमाण सर छोयनो कुजसंस्थान. ६ प्रायः सर्व अवयव प्रमाण रहित होय ने टुंडफमस्थान ।। इति पञ्चमं मंस्थानदारम. ॥५॥ . ----- ॥ कपायहारम. ॥ फाप पटले ममाग्ना आय पटले लाम जनावर गाय ने क- पाय यवाप, ने नार-मान-माया-ने लोभ प चार प्रसारना.
(२०) ॥ देवसविस्तरार्थः। बीजा पण १६ अथवा ६४ प्रकार ग्रन्पान्तरगी । पष्ट कपागद्वारम् ॥६॥ ॥ ७ लेश्याहारम. । -- "मिप्यते कर्मणा सह जीव आभिरिति मी कवडे शिष्यते-संबंधवाळो थाय ते ट्रव्यथी अने भावथी एम ये भेद छे, रूप हेतुथी प्राप्त यतां अमुक ट्रव्यलेश्यारूप ए बन्ने एम ६ प्रकारनी: णामरूप छे, अने छ, पुनः अशुभ णामवाली, न पोतलेच्या तेथी तेजोलेश्या . ' दिवाळी, अने तेथी कृष्णलेश्या ( आत्म परिणाम )मां निविशुद्ध तेथी चीनी मागो अनुक्रमे अधिक तथा कापोतलेश्याना "धिक विशुद्ध जाणा
॥ समयोगाद्वारगर्णनमः॥
नेपाना शृद्ध अपर०नी अपेक्षाए अमन गणापो. मातेसो
आदि प्रणे गुमलेल्या पण भमन्य अध्गरमागो अनुकले -
शिक अधिक विशर मागवा.
नपा मधमनी (दम्प)लेयामोनो मण-गंध-स-पन भ.
भो, ने उपरनी व्याप्याभोनी वर्ण-गंध-रस-कप गुमले.
मया मनुष्य भने नियंचनी द्रव्यलेम्यामो दरेक भन्नमहर्ने
पदन्याया करे ऐ, अर्थात् कृष्णलेग्यानां पुद्गली ने भन्म पाद
नीलादि ५ मांधी कोइपण लेन्यारूप पर जाप , पन प्रमाणे
नीग्दादि सर्व नेत्यांना पुद्गलोनो वर्ण-ध-रस-पर्म अन्न,
शाद अन्य लेण्याना वर्णादिरूपे यह जाप के. मार्ट पनु तिनी
लेण्याभो वस समान कही, कारण वखने रममा बोलना जेम
सद रंगमप यह जाय रे, तेमां कृष्णद्रव्यो ते 'नीलदत्यना संघ
पी नीलरूप ११ जाप छे. पुनः देव अने नारकनी द्रव्यलेश्याओ
स्फरिकवत् कही, कारण स्फटिक जेम भिमवर्णना पुष्पादिफना
संयोगयी साश स्वरूप त्याग कर्गा विना ते रंगवालु देखाप,
पण स्वरूपनो स्याग नधी करतुं. माटे देवनारकोनी द्रव्यलेश्या
भवस्थित . पुनः भावलेल्याओ तो चार गतिवालाने अन्नमू०
पाद बदलाया फर छ, चालु दंध्य प्रकरणना अधिकारमा द्रव्य.
लेण्यानोन अधिकार है. ॥इति सप्तमलेण्यादारम्. १७||
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॥ ८ इन्द्रियहारम्.॥
द एटलं भामा तेनु ने चिन्ह ने इन्द्रिय, भयमा इन्द्र
पटने मामाने जान थवान जे द्वार ते इन्द्रिय ते स्पर्शन-रसना--
वाण-च-गे भीत्र एम पांच मकारनी ऐ, त्यां मनादि ५
(२२) ॥ दंडकविस्तरार्थः ॥ इन्द्रियो द्रव्येन्द्रिय अने. भावेन्द्रियरूप वे प्रकारे छे, तेमां पण स्पर्श- न-सिवायनी रसनादि ४ द्रव्य इन्द्रियो अभ्यन्तरनिति अने वाह्यनिति-( अंतरंग आकार ने वहार देखातो. आकार ) एम ये पकारनी छे, त्यां जीव्हा-नाक इत्यादि जे दृष्टिगोचर थाय छे ते वाह्य निति छे, अने ए बाह्य आकारोनी अंदर विषय ग्रहण क- खानी शक्तिवाळां, अने दृष्टिथी नहिं देखी शकाय एवां सूक्ष्म प- रिणामी पुद्गलो कदंवपुष्पादि आकारे गोठवायलां छे ते अभ्य- न्तरनिति कहेवाय छे. तथा ए वन्ने द्रव्येन्द्रियोमा स्वस्वकार्य करवारूप रहेली जे शक्ति ते अभ्यन्तर तथा बाह्य उपकरणन्द्रिय कहवाय छे, ए प्रसिद्ध सिद्धान्त छे, अने आचारांगजीमां तो इ. न्द्रियस्थाने गोठवायला स्वच्छतर. आत्मपदेशो ते अभ्यन्तरनि- ईति, अने विषयग्रहण शक्तिवानां स्वच्छतर सूक्ष्मपुद्गलो के जे कदयपुप्पादि आकारवाला छे ते बाह्यनिति कहेल छ, अर्थात् प्रज्ञापनादिमां जेने अभ्यन्तरनिति मानी छे तेने श्रीआचारांगजी वृत्तिमा चाह्यनिति मानी छे, ए प्रमाणे द्रव्येन्द्रियना भेद कहा. हवे भावन्द्रिय आ प्रमाणे- लन्धि अने उपयोग एम भावेन्द्रिय चे प्रकारनी छे, त्यां मतिज्ञानावरणादिना क्षयोपशमथी इन्द्रियद्वारा विषय ग्रहण कर- वानी जे आत्मशक्ति ते लब्धि भावेन्द्रिय दरेक जीवमात्रने सम- काळे पांचे इन्द्रियरूप होय छे, अने प्राप्त थयेली अभ्यन्तरनिई- निरूप द्रव्येन्द्रियद्वारा विषय ग्रहणमा प्रवर्तते उपयोग भावे- न्द्रिय ते एक भवमां कोई जीवने एक, कोइने ये यावत् कोइने पनि जुद जुदे वखने होय छे. जीव एकेन्द्रिय दोन्द्रिय इत्यादि कवाय छ, ने द्रव्येन्द्रिय प्रागिनी अपेक्षाए, नतिर लब्धिम्प भावन्दियनी अपेक्षाए गर्व -- । ।। ८-९ इन्द्रियसाधावारवर्णनम् ॥ (२३) ‘जीव पंचेन्द्रिय, भने उपयोगरूप भावन्दियनी अपेक्षाए सर्वे जीव एकेन्द्रिय गणाय. इत्यादि इन्द्रिय संबंधि घणु विषेचन नवतत्त- विस्तरायमां करेल होनापी अहि लखायु नथी. ॥ इत्यष्टममि-' न्द्रियहारम् ॥ ८॥ . ॥ ९ समुद्घातद्वारम् ॥' : सम्-एकी भावे-(एकदम-धीन) उतू-मबळतावडे(आ- स्माना अतिमयत्नबहे ). घात-कर्मपरमाणुओनो विनाश करवों ते समुद्घात, वेदना-कपाय-मरण-वैक्रिय-तेजस-आहारक- अने कंवलिफ ए ममाणे ७ 'कारनी छे. ते दरेकर्नु किचित् स्वरूप आ प्रकारे-(१) समुद्घातस्वरूप-- १ अत्यन्त पंदनावर व्याकुळ थयेलो मात्मा तीय मपत्नंथी -- १ गाया दु गमुम्माया-ये समुद्धात ते एक जोय स. गुदूपात ने योजी अजीव समुदधात, ए अमापी अहि जीवनी -अधिकार चालती होपायो मात्र जीवनोज ७ समुश्याताने. जन पर्यु रे, अने अंचित महास्कंध नागनी पहल पर्गणानी एक धनपा विध विधमा-( म्याभाषिक) प्रयोग अपया विधमा परिणाम परिणत था एना जागत कंटयागी कंप. लिममुनुपातमा पनि प्रथम समये दंड, पीजे ममय कतार, ची समय मंधान, चोप ममये मंधानाम्मरपति की लापमा म व्यापी था पांच में समये अन्ना मंहरण, राह समय में. पान मंहरण. मानमे मम करार महरन न आटमें ये दर महल करी म्यभारम्भ भंगृपनी अगंप्यानमा मानी अपमानापाटो भाय, प अधिन महाध पंधि अजीरा. मुहमानन अंपारन माह होपाधी प्रसंग को नशी.
(२४) ॥ दलकवित्तरार्थः॥ पोताना केटलाएक आत्म प्रदेशोने शरीर बहार काही मुम्बादिकनां विवर अने खभादिकनां अन्नर पूरी शरीरनी उंचाई ने जाडाइ जेटलो एक सरखो दंडाकार रची अशातावेदनीयनां घणां कर्म पु. द्रलोनी उदीरणा करणवडे उदयावलिकामा लावी घात करे--(नि- जरे ने वेदना समुद्घात. २ अत्यन्त कपायवडे व्याकुळ थयेलो आत्मा केटलाएक आ- मप्रदेशोने शरीर बहार काही मुखादिकनां पोलाण अने खभादि- कनां अंतर पूरी पूर्वोक्त रीते स्वदेहप्रमाण आत्मप्रदेशोनो दंडाकार रची कपायमाहनीयकर्मनां घणां कर्म पुद्गलाने उदीरणा करणवडे उदयांवलिकामां लावी घात करे--( भोगवीने निर्जर ) ते कपा- यं समुद्घात. ३. मरणना अन्त अवसरे मरणथी व्याकुळ थयेलो आत्मा भरणथी अन्तर्मु० हेलो पोताना आत्म प्रदेशोने शरीर बहार काढी ज्या उत्पन्न थवानो छे ते स्थान सुधी आत्म प्रदेशोने लं- वावी स्वदेह प्रमाण स्थूळ ने उत्पत्तिस्थान सुधी (उ० असंख्य- योजन ) दीर्घ दंडाकार रची अन्तर्मु० सुधी तेवीज अवस्थाए रही आयुष्यकर्मनां चणा पुद्गलोनो उदीरणा करणवडे उदयावलि- कामां लावी घात करे ते मरण समुद्घात. ४ वैक्रिय लब्धिवाळो आत्मा पोताना आत्मप्रदेशोने शरीर वहार काढी जे स्थाने वैक्रिय नवु रूप रचवानुं छे ते स्थानधी उ. थी संख्यातयोजन प्रमाण दीर्घ अने स्वदेह प्रमाण स्थूळ दंडाफार रची पूर्वे बांधेला वैक्रियनामकर्मनां पुद्गलोने पूर्वोक्त रीते उदयमा लावया साथे वैक्रिय शरीर वर्गणानां पुद्गलो ग्रहण करतो जाय ने उत्तरदेहनी रचना करे ते वैक्रियसमुद्घात. ५ तेजोलेश्यानी लब्धिवाळो आत्मा पोताना आत्मप्रदेशोने मारियानमः ॥ (२५) मुगार पाटी गाने मोवाया (प्री) मृपावानी ने मान भी (3. भी मंगारपोजन ) मी भने पर ममान टपरी देशातार ग्नी पूर्वीपाति र पर- पापभानी पनि गत पान फरणा र नौला (मपया भीतलेगा) मोने मेजम समुत्पात ६ माहारक नगियाला गोधर मुनि श्रीनिधरनी কি ন স ম নিন শা িগান্ধী स्वारीर प्रमाण स्थल भने उत्तयी संगयात पोगन दीर्घ दंद परी पूर्योपार्जित आहारफ नामफामना. पहली पूर्वोक्ती निर्म रवा पूर्वपः भाहारक दंयोग्य पुनलो ग्राण. फरी मादारफारीर रवे ते आहारकमनुश्यात. ७ जे फेरलिने नाम-गोप-भने पेदनीय ए प्रण फर्मनी थि- ति पानाना भायुप्पनी स्थितिथी अधिक रही होय तो ते प्रणनी स्थितिने आयुष्यसिनि जेटली सरखी फरया माटे अन्तर्मु० देना जेणे आवकिरण फयु होय उनां कर्मस्थिति अधिक रही जाग नो ने समीकरण फरला माटे जेओनु अन्तम जेटलं आयुष्य चाकी रघु होय एया केवलि भगवान् पोताना आत्ममदेशोने शरीर यहार काढी प्रथम समय लोकना नीनेना रेडायी उपरनां झंडा मृधी दीर्य, ने बदेममाण स्थळ दंडाकार करी, पीजे ममपे ते दं- सकारमाथी भान्मपदेशाने स्वदेश प्रमाण जााद कायम गयी इ. तर दक्षिण व्यावी कपाट-(कमाट) आकारं रची. वीजे समय पूर्व पश्चिम लंबाची मंधान-( वयानो ) प्राकार रची, चोथे मये चार आंतरा पूरी समग्र लोकमां व्याप्त थाय, नदनंतर पांचमे समये भातामा रहला भात्ममदेगी मंहगे पयानरूप करो, छठे समयं मंधानाकार मंहगे कपाटकार करी, सातमे समये कपाटकार गरी दंडाकार कगे, भाटमे समये दंड संहरी देहस्य थाय. ते के- लि समुदयात.
ल्य (२६) ॥ दंडकविस्तरार्थः ॥ आ आठ समयना प्रयत्नथी त्रणे कर्मोनी स्थिति आयुष्य तु- थाय, अने ते साथे दरेक समये रसघात पण थाय छे; एमां त्रीजे चोथे ने पांच समये अनाहारक तथा कार्मण काययोगी होय, प्हेलेने आठमें समये औदा० योगी होय.अने वीजे छ ने सातमें औदा० मिश्र योगी होय. (१) काळनियम-केलि समु० ८ समय प्रमाण, अने सर्व अन्तर्मु प्रमाण छे.. (२) ग्रहणवर्जननियम-वेदनीय मरणने केवलि समु० मां कर्मपरमाणुओनो विनाश छ, पण नवु ग्रहण नथी, कपाय स- मु०मां कपायमोहनीय कर्मपुद्गलोनो विनाश, अने तेथी बीजा अ. धिक कपाय पुद्गलोनु ग्रहण पण थाय छे, ने जो तेम न थाय तो सर्वथा कर्मनो अभाव थवाथी चीतरागपणुं प्राप्त थवानो प्रसंग आवे. तया वै०-० ने आहा० समु०मां ते ते नामकर्मनां पुदू- गलोनो विनाश , ने ते ते देह वर्गणाना पुद्गलोर्नु ग्रहण छे. (३) आभोगानाभोगनियम-वेदनाकपाय-ने मरण ए ३ समुद्रात स्वाभाविक थाय छे, पण जीव जाणी जोइने करवा जाय तोज बने एम नथी माटे अनाभोगिक, अने शेप चारे समुद्- धान जीवना विचार पूर्वक थाय छे माटे आभोगिक, तथा दरेक समुद्घातमां आत्मप्रदेशो शरीरथी ने वहार नीकळे ले ते सर्व प्रदेशो बहार नीकळता नधो पण केटलाएक प्रदेशो शरीरमां पण होय ने चीजा केटलाएक वहार नीकले छे, जेथी शरीर आत्मप्रदेश रहित थाय नहि. इत्यादि समुन्नु विशेष स्वरूप सिद्धान्तधी जाणवू. ॥इति नवमं समुद्घातद्वारम् ॥
'11 इष्टिद्वारवर्णनम् । ॥ १० दृष्टिद्वारमः ॥ । । दृश्यते अर्धानां सदसरस्वरूपमनेनेति दर्शन-पदार्थोन सत वा असद वरूप जनावडे देवाय (गाय)ते दर्शन अथवा दृष्टिं सम्यग-असम्यक ने मिश्र एम प्रण प्रकार होवाथी सम्यक्त्व-मि- ध्याव-ने मिश्र एम.३ प्रकारनी दृष्टि छे. त्या पदार्थन सत् स्व. रूप कदी सरूपे ने फदी असरूपे जाणे, असत् स्वरूपने कदी असवरूपे ने कदी सतरूपे जाणे ए रीते पदार्थना स्वरूपने य. धार्थ न जाणे ते मिथ्याष्टि, पदार्थना सत् स्वरूपने सव स्वरूप जाणे अने अमत् म्वरूपने अंसद स्वरूपं जाणे एम वस्तु स्वरूपने यथार्थ जाणे, ते सम्यग्दृष्टि, अने पदार्थना सत् स्वरूप पा अस व स्वरूपने समकाले केटलेक अंशे यथार्यने केटलेय अंशे 'अयपार्य, जाणे ते मिश्रष्टि एका दृष्टिना उत्तर भेद आ ममाणे- १ सम्यकत्व-आत्मानो पदार्थने यथार्थपणे माणयारूप सम्य- फत्वगुण रोकनार ३ दर्शन मोहनीय भने ४ अनंतानुबंधि ए.७मति- यो उपधान्न थनां-(उदयपी रोकानां) आत्माने जे श्रद्धागण. 'प्रगट थाय ते उपशम सम्यकत्व, अन्तर्मुहर्व काट मात्र टके छ. तया भाखा भव चममा पांचवारज, अने एक भवमा बारमात गायले. , अभांग म मदिरा पीयाधी पियापिकर याला जीप माने मा या अनं मी पण ह. नीनं ती फटे में मोन मा पण बाहे, पाने निधन होय एन नपान यो.. ने निधन पण कोप प्रमाणे माय ने अगम्य गनर गाय नापया मिफागवायी गस्य * पण अमन्य भने भ्रम गजाय. नम मियादति मनु ने पती मन पानी अमा जारी Mi अमन FIR राय. . मानाचारामायमा ). में गणरम्यान (२८) देडकविम्तरार्थः ।। नया ए७ मऋनियोनो सर्वथा क्षय भवाथी आत्माने जे श्र- डागण प्रगट थाय ते क्षायिकसम्यकत्व, आखा भवचक्रमां अ. पवा एक भवमा एकवार माप्त थाय छे. अने अनंतकाळ सुधी रहे- है, पण कोइ का विनाश पाम नथी. नया ए ७ प्रकृनियोपा ३ नो क्षयोपशम (वा प्रदेशोदय मात्र) भने सम्पयन गोगनीयनो विपाकोदय वर्ततां आत्माने जे श्रद्धा- गुण प्रगट धाय ने क्षयोपशमसम्यकःय, आखा भवचक्रमां अ- मंग्यात यार, अने एकमयमा घणी हजारवार-(मायः ९००० यार ) माम पाय से नवा जघन्यमां नयन्य अन्तर्युः अने बधुमां वधु । श्रद्धाराग.६६ सागरोपमयी पण अधिकमाल केले. नया उपसम सम्यक्त्वयी पटतां मिथ्याले न पहोचे तेटलो. चमांनी कार ? समय ने उ.६ आवलिका. प्रमाण जे अहान गुण होय ते पनिन थतो अद्धागु । सास्वादनसम्यकत्व, पण भाम्बा भवनक्रमांवारन भने एक भवमां बेवार मात याय. १० मागे ५ प्रकार सम्यकन्द जाणवू अथवा बीनी रीते पर :-२-6-2 ने ५ प्रकार सम्यक्त्व लेने आ प्रमाणे- श्री पदीय बहेला नच उपर प्रतीनि राखवी ते तयश्र- जान सर, मान मध्यकल कडेवाय, सुवादिकना देवादि प्रयत्न विना स्वाभाविक रीते नर्म- यो पिना सम्बयाम प्रगटे ते नैसर्गिकसन्या, ने दिया आदेश आदि मारम. मयन्नमी बयेलं सम्यकन्य TERR८३ प्रकारे श्यामायनी कन्नी देय- विटामिन कमायन्याने उत्पन्न करवामां सबदामायने नाटियामानादि- .: अभिप्रायान बने मन्य Meenavard. है ॥ दृष्टिद्वारवर्णनम् ॥ एप माने पण परमार्थ न जाणे नेने द्रव्यसम्प०,१ अने परमार्थ जाणरा पूर्वक श्रीसर्वशनु वचन सत्य माने तेने भावसम्य०,२ एम पे प्रकारे अथवा सम्यक्त्वमोहनीय पुद्गलना उदयधी प्राप्त ययेलं क्षयोप० सम्य० पौद्गलिक होवार्थी द्रक्ष्यसम्य०,१ ने उपशम त. था क्षायिक सम्य० भावपरिणतिरूप अपोद्गलिक होवाथी भा- वनम्य०२ एम वे मकारे, ए ममाणे वे प्रकारचं सम्यकल, प्रण अथवा चार आ रीते छे. ३ श्री सर्वज्ञोक्त सम्यक्त्वनी करणीओ देवदर्शन-देव-पूजा- यात्रा-शासनमभावना इत्यादि करवाथी कारकसम्य:,१ क्रियां फंड पण न करे छवां सर्वज्ञोक्त तत्वपर प्रेम भाव होय ते रोचक- सम्य०,२ ने पोताने श्रद्धा न होय छतां देशना लब्धि इत्यादिवडे पीना जीवने सम्यक्त्व पपाडे ते दीपकसम्य.३ अभविने पण होय, ए प्रमाणे ३ प्रकारचें सम्यक्त्व है. अथवा उपशम-क्षयो- पशम ने क्षायिक एम ३ प्रकारनुं सम्य० प्रयमन कयुं . ४ तथा उपशमादि ३ मां सास्वादन गणतां ४ प्रकारचें म. म्य०,५ अने क्षयोपगमसम्यगद्रष्टिने सायिक सम्यक मान यतांश- योपशमना अन्य समय चंदक मम्यान्न होय ते गणनां ५ प्रका- रनु पण मम्यान्व थाय. २निध्याय--अमत्य छनां श्रसलथी एशन चाली भावी मार सत्य एम मानj ने अभिग्रह मिश्यान्व, मधर्म मन्य है, कोदने मारो ग्योटो न कहवाय एम मान ने अनभिग्रह मिथ्यान्य, में जे वान मानी नंन मत्य अथरा ने गायन के एम मान ने अ. भिनिवेशिवामिथ्या-- फटाग्रही मिथ्यान्च),३ मतान बच- नमा मंद करवा-( जैम का नमन . पीजी गैने न्यादि) ने 'मांगगिकमिया,४ अने अमंदिनीन- ही पदार्गमा हावनी EिRIमरें भार.
(३०) ॥ दंडक विस्तरार्थः ।। स्पष्ट मिथ्यात्व हे ते. अध्यक्तभिथ्या० अथवा अनाभोगमि- या०५ ए प्रमाणे मिथ्यात्व-(मिथ्यादृष्टिपणुं.) पांच प्रकार के ३मिश्र-जे पदार्थ जोयो-सांभळयो-के अनुभच्यो नथी ते पदार्थ उपर रुचि के अरुचि भाव न होय तेम सर्वज्ञोक्त तत्वपर में रुचि अने अरुचि वन्ने न होय ते मिश्रदृष्टिपणे १ ज प्रकारनुं छे. आ मिश्र फक्त अन्तर्मुजः रहे छे, त्याबाद जीव . मिथ्यात्वे वा सम्यक्त्व जाय छे. ॥ इति दशमं दृष्टिद्वारम् ॥१०॥ ॥ ११ दर्शनहारम.॥ दहन एटले सामान्य उपयोग. अर्थात् घटादि पदार्थनो "आ कांड , " एवो प्रधम जे सामान्यवोध थाय ते दर्शन, चक्षु-- अचक्ष-अवधि-ने केवळ एम ४ प्रकारर्नु छे ते आ प्रमाणे- १ चा इन्द्रियद्वारा देखेला पदार्थनो जे सामान्य बोध ते च- क्षुदर्शन. २. चक्षु इन्द्रिय सिवाय शेष ४ इन्द्रिय अने मनथी यतो सामा- न्यवोध ते अचक्षुदर्शन, अधवा इन्द्रिय अने मन विना पण जी- बनी जे दर्शनलब्धि छे ते पण अचक्षुदर्शन, (आ बीजो अर्थ ग्रन्थोमां के सिद्धान्तमा स्पष्ट उपलब्ध नथी परन्तु जीवने पूर्वभ- वमांधी आवतां मार्गमा अने अपर्याप्नावस्थामा इन्द्रिय-मन विना पण इचत प्रकारचें अचन दर्शन गणेलं हे, माटे अहिं नेवा प्रकार- वीमा अर्थ पण लख्यो .) - दाय न कहे वाय, कारक नई, तथा मंशय. शंका एवं न... नई जितामार. अने मंदाय ने अविश्वास पडे.
नमानदारवर्णनमः॥ ३ अपिलानीने अवधिताना प्रथम सामानगोप गाय से अवपिदर्शन. सिद्धान्तमा विभंगमानिने पग हाप से. काठमानवडे प्रथम विशेष उपयोग पया पाद ने सामान्य उपयोग धाय ते याबळदर्शन. दरेश पदार्थमा सामान्य अने विशेष पये धर्मों रहेला , त्यां आमानो उपयोग गुण जे समये पदाना मापान्य घर्ष उपर प्रतितो होय ने समये भात्मा दर्शन उपयोगवाठो गणाय अने विशेष धर्म उपर भवर्ततो होप त्यारे ज्ञानोपयोग फडेराय, ने मानद्वारमा कहेवाशे पुनः घट पदार्थमां घटत्व-भने वर्णलए सामान्य धर्म, अने अमुक स्थाननो, अमुकनो यनावेली, अमुक घ. नो, अमुक उपयोगमा आवनारो इत्यादि अनेक विशेष धर्मों के. तथा मा दर्शन- पीजु नाम निराकार उपयोग पण छ. lr. त्येकादश दर्शनद्वारम्. ११ ॥ १२ ज्ञानहारम.॥ आत्मानी पदार्थ प्रत्ये जे विशेष उपयोग ने ज्ञान, अथवा द- रंक पदार्थमा मामान्य धर्म अने विशेषधर्म ए ये धर्मों छे. त्यां मा- मानो उपयोग जे ममये पदार्थना विशेष धर्म प्रत्ये प्रवते ते समय आत्मा ज्ञान उपयागालो कहवाय. तेमां व्यस्थ जीवने प्रथम अन्न मुवी मामान्य उपयोग ने त्यारवाद अन्न. ज्ञानोपयो- ग, भने श्री मशिने केवमान उत्पत्तिसमये केवळज्ञान अने बीजे समय कवन बीजे ममय केवळमान ४ थे समय केवळदर्शन ५ प्रमाणे एक ममयने अन्तरं दर्शनोपयोगने ज्ञानोपयोग परावर्ग- मान थया कर पुन: अहिं जान ते मम्यगनान ग्रहण कर । (३२) ।। दकविस्तरार्थः ।। पण विपरीतज्ञान नहि कारणके विपरीत--अयथार्थ ज्ञान माटे तो १३ मुं अज्ञानदार आगलन कहो, त्या सर्वज्ञोक्त तत्व उपर प्रती- तिपूर्वक सम्यग्दृष्टिनुं जे ज्ञान में ज्ञान कवाय ते पांच प्रकारने या प्रमाणे - ? मन अने इन्द्रियोद्वारा यतं अक्षरोपलब्धि रहित जे यथार्थ झान ते मतिज्ञान. २ मन अने इन्द्रियोद्वारा यतुं अक्षरोपलब्धिरूप (अथवा अर्थ- वाचक) यथार्थज्ञान श्रुतज्ञान, मन अने इन्द्रियोनी अपेक्षाविना आत्मसाक्षात् थतु रूपी प- दार्थy यथार्थज्ञान ते अवधिज्ञान. ४ मन अने इन्द्रियो विनाआत्मसाक्षात् मनःपणे परिणमेला पु द्गलोर्नु ज्ञान ते मनःपर्यवज्ञान ( आ ज्ञान यथार्थ ज होय छे.) ५ मन अने इन्द्रियो विना सर्व द्रव्य अने सर्व पर्यायनु एक समयमा जे ज्ञान थर्बु ते केवळज्ञान. ए पांच ज्ञानमा प्रथम मतिज्ञानी द्रव्यमां सर्व द्रव्यने सा. मान्यथी जाणे छे, क्षेत्रथी लोक अने अलोक सर्व क्षेत्र (मां रहे. ला पदार्थोने ) सामान्यथी जाणे छे. काळथी चणे कालने सामा- न्यथी जाणे, अने भावथी अनंतमा भाग जेटला अनन्त पर्याय जाणे. श्रुतज्ञानी द्रव्यथी अभिलाप्य-( वचनगोचर ) द्रव्योने जाणे, अने देखे, क्षेत्रथी लोकालोक सर्व क्षेत्रने, काळथी त्रणे काळने, अने भारथी अभिलाप्य पर्यायो जे अनंतमा भाग जेटला अनंत छे ते सर्व जाणे--देखे ( अथवा कर्मग्रंथटीका वगैरेमा सर्व द्रव्य-सर्वक्षेत्र--सर्वकाळ-ने सर्व भाव जाणे देखे एम पण का छे.) अवधिज्ञानी द्रव्यथी सनरूपीद्रव्य, क्षेत्रथी असंख्य लोक ॥ अमानद्वारपर्णनम.॥ मभाग, काळयी असंस्यकाळ,.ने भाषयी अननमा माग जेटमा अन्न पर्यायाने जाणे मने देरे, । .- - ॥ १३ अज्ञानहारम् ॥ अज्ञान पटले माननी अभाय एको अर्थ नयी.पण अ परने अयथार्थ-निपरी ज्ञानतं अज्ञान ए शान मिथ्याटिजीवने मानेल है. कारण मिथ्यारष्टि मीर कोइपण पदार्थना स्वरूपने सर्वोक्त वचनानुसारे जाणतो अथवा ओळखतो नथी पण. स्वकल्पनावडे निर्णय फरेला स्वरूपे ओरसे छ, अने पोते सर्वश नयी माटे कोर पदार्थमा फोइ वरूप उलट रीरी पण' स्वीकाराय अने कोइ रख- रूप सम्यग् रोते पण स्वीकाराय उतां स्वकल्पितस्वरूप होवायी बन्नेस्वरूपे स्वीकार फरवो ते अयथार्थ छ माटे मिथ्याटिन झान ते भान छे. जेम नाडी परीक्षामा अनुभव विनानो वैध रोग- : नी.यथार्थ चिफिरसा करी के नहि. तेम स्वकल्पित स्वरूपवढे प. , दार्थनु पथार्थ ज्ञान याय नहिं, ते.अशान ३ प्रकारच्छे ते आप्रमाणे- ? मन भने इन्द्रियोवडे यतुं (अक्षरोपलन्धि विनानु.) अय-: थार्थ ज्ञान ते मति अज्ञान. २ मन अने इन्द्रियोबडे यतुं अक्षरोपलब्धिरूप अयथार्यज्ञान ते श्रुतअज्ञान. ३ मन अने इन्द्रियो विना आत्म साक्षावरूपी पदार्थनु अपयार्य: ज्ञान ते विभंगज्ञान. अहिं पूर्वाचार्यो विभंगने अशान शब्द नहि जोहतां ज्ञान शब्द जोडे छे तेनुं कारण विमंग शब्दन अयपार्य । दनो वाचक छे, अर्थात् विभंग एटले उलट भांगावाछं एटले अयथार्थ एवं (अवधि) ज्ञान ने विभंगज्ञान आ ज्ञान स्वरूपे अवधि अशान है. .
। देशकविस्तरार्थः॥ -- 'अहिं अज्ञानी जीव घट पदार्थने देखी पट कहे अथवा ओ. लखे छे एम नधी पण घट पदार्थमा जेटला सत् धर्मो अने जेटला असत् धर्मा के तेला सर्व धर्माए करीने युक्त नथी मानतो पण केटलाफ धर्माने माने छे, बळी केटलाक धर्म माने तेमां ने धर्म जे रूपे रहेलोछे ते रूपज माने एवो पण नियम नथी. माटे घटने घट माने तोपण मिथ्याष्टिन ज्ञान अज्ञान गणाय छे. आ ३ अज्ञान- नो द्रव्य-क्षेत्र-काळ-ने भाव ए चार प्रकारनो विपय अज्ञानमां ग्रहण थयेला द्रव्यादि जेटली अनियमित प्रमाणे जाणवो. ॥ इति त्र- योदशमज्ञानद्वारम् ॥ १३ ॥ ।। १. योगहारम् ॥ योग एटले आत्मानो पौद्भलिक व्यापार. ते ४ मनयोग ४ वचनयोग अने ७ काययोग मळी १५ प्रकारनो छे, त्यां सत्य- असत्य-मिश्र-ने व्यवहार ए नामे ४ मनयोग तथा ४ वचनयोग छे, अने औदा०-औदा०मिश्र-क्रिय-क्रियमिश्र-आहारक-- आहारकमिथ अने तैजसकार्मण ए नामे ७ प्रकारनो काययोग छे. तेनु स्वरूप आ प्रमाणे- काययोगद्वारा मनोवर्गणानां पुद्गलो ग्रहण करी मन (चिंत- वन)पणे परिणमावी अवलंबीने विसर्जन करवां ते मनोयोग. एमां मन ते पुद्गल द्रव्यनो समुदाय छे, अने ते पुद्गल समुदाय छे, अने ते पुद्गल समुदायने काययोगथी ग्रहण- परिणमन-अवलंबन-ने विसर्जनरूप व्यापार ते काययोग विशेषतुं नाम मनोयोग छे. काययोगवडे भाषा वर्गणानां पुद्गलो ग्रहण करी भाषापणे परिणमादी-अवलंबीने विसर्जन करवारूप आत्मानो व्यापार ते योगद्वारपणनम् ।। . वचनयोग. आ पण काययोग विशेपन छे.. औदारिकादि शरीरना आलंचनवडे आत्मानो जे व्यापार ते काययोग. (मनोयोगना ४ प्रकार) १ मोक्षमार्गने अनुकूळ एवो मनोव्यापार से सत्य मनयोग, २ मोक्षमार्गने प्रतिकूल एवो मनोव्यापार ते असत्य मनोयोग, ३कंइक सत्य अने कंइक असत्य एवो मनोव्यापार ते मिश्र.मनो- योग, ४अने मोक्षमार्गने अनुकूळ नहि, तेम मनिकुळ पण नहिं प- वो, अथवा जेमां चितवनना वस्तु स्वरूपनो निर्णयभाव न होय- (अमुक आ रीने छ, अथवा आ रीते नथी एवा: निर्णय विनानु चितवन ) ते असत्याऽमृपा अधया व्यवहार मनोयोग छे. ए प्रमाणे चारे अर्थ वचनयोगना संबंधमा उचार फरवा पूर्वक विचारवा.(१)हिं सत्यमनोयोग अने गत्य वचनयोगना १०-२० भेद छ तेनु स्वरूप वचनयोगद्वारा (मुगम ,समजार्नु होवायी) दावाय रे- जणवय सम्मय ठवणा, नामे म्ये पहुंच मच्चे अ. घवहार भाव जोगे, दसमे ओवम्ममल्ने अ॥१॥ अर्थ:-जनपदसत्प, सम्मनसत्य, म्यापनासत्य, नाममत्प, रूपसत्य, प्रतीत्यसरय, व्यवहारसन्य, भावगाय, योगसत्य, अने १० में उपमासत्य.त्यां जै देशमा जे भारावोगाती होय ने दामां से भापायी बोलायलो शब्द मन्य कवाय, जेम गुजगतमा पाणी- ने पाणी प.हे थे, अने पीना कोड देशमां पापीने पिच्च को, तो ने पाणीने भोचपापनार पिच्च गन्द भमन्य नयी पण जन- पद-(देश) सत्य है. २ अनेक वस्नुपां नेवा गुण होरा छनां पण पहिलजनोप अमु- फनुन नाम अमुग उगल्यं होप दे "क" पटा कादमा ॥ दंडक विस्तरार्थः ।। than "ज" पटले जन्मेली घास विगैरे अनेक वस्तु छतां कमळनेज़ - का नामयी ओळखवानो व्यवहार ठराव्यो ले ते सम्मतमत्य. ३ अमुक वस्तु सरस्था वितरेला अथवा कोतरेला आकारवाळी श्रीजी यम्तने पण ते वस्नु कहवी. जेम चितरेला अथवा कोतरेला सिंहना आकारवाला काष्टदिने आ सिंह " एम कहे ते मापनासत्या स्थापना सत्य अतदाकार वस्तुमा पण होइ को जेम गोमानो आकार नहिं छतां नाना पाळको लाकडीने आमागे धोटो" म कहे ते पण स्थापना सत्य छ, पण असत्य नाहि. १ का गुण नदि दोवा छतांधीनी वस्तुने नेवा नामथी बोला- वी, म मिदनी चाकर नहिं छनां सिंहदास नाम पाइधुं, निध- न छनां बनीया नाम करवू इत्यादि नानसन्य छे. ५ देश गुनवाली नदि छतां येय उपरथी नया नाम बोलावधी जन साधुना गुण नदि छां माधुनो के पहरेलाने आ साधु "एम कई ने मपनत्य. ६ जे कथन अमृानी अपेक्षाद कंडेयं. जे अनामिका आंगळी कनिथी मोटी अने मध्यमाथी नानी छतां मोटी या नानी कोई एक भार कसीदे पनीन्यमान्य. लोग, मटि नमाने दो ने जेप बामणमांधी पाणी द्वारका जना शासनम. पवार यापदच्या छतां पर्वत बजे, ने कन्या. मेट होता मांग नया वाग्यान अशा अनुदा दम: . ८ का बनवाना पद नाम- का नाम रोगन होग " योगदारवर्णनम् ॥ (i) नोपण छत्री, देह धारण करनारनी पांसे दंड होय न होय तोपण देडी कडेवो इत्यादि योगसत्य कहवायं. १ बाहुल्यतानी अपेक्षाए कई जेमके पोपटमा पाने वर्ग- (भाव-वर्णादिपर्याय) छे छतां लीलो कहयो. भ्रमर पांचे वर्ण- 'युक्त छे छतां कालो कहयो इत्यादि अल्पत्वनी अविवक्षाए भावसत्य १०कटलाएक सरखा धर्मवाली वस्तु साये वीनी वस्तुनी सरखा- मणी करवी. जेम मोटा तळायने समुद्र जेवहूं कहें, चंद्रमा सरखा कंडक गोळ अने कान्तिवाला मनुष्यना मुखने चंद्रमुख कहे इ. त्यादि उपमासत्य. ए प्रमाणे १० प्रकारनां सत्य कयां. (२) तथा? क्रोघरमान३माया४लोभ प्रेमवहास्पभय-अनेटद्वेषयी उत्पन्न थयेली असत्यभापा ते क्रोध नियत, माननिःसृत इत्या- दि फहवाय.अने बनावटी कायावार्ताओ फरवारूप भापा 'कथा- नियत,१०अने खोटुं कलंक आपवारूप उपधातनि:सत ए रीते १० प्रकारना असत्ययोग छे. ३. पुनः मिश्रयोग १० प्रकारनो ते आ प्रमाणे-१ "आजें आ नगरमां दशेक याळक जन्म्या छे." इत्यादि उत्पचिनी अनिधित संख्या कहेवी ते उत्पन्न मिश्रित २ दर्शक मरण पाम्या छे इत्यादि विनाश संख्या कहेवी ते विगतमिश्रित, ३ दशेक जन्म्या, अने दशेक मरण पाम्या. इत्यादि उभयसंख्या कद्देवी ते उत्पन्नविगत मिश्रित, ४ शंखादि घणा जीवता अने थोडा मरेला देवी सर्व स. मुदायमां"आ जीव राशि छे."एम फहेवू जीयमिश्रित,५ घणा मर- लोअने धोटा जीवता देखी जीवराशि"कहे ते अजीवमिश्रित, ६आ राशिमां आटला जीयता ? ने आटला मरण पाम्पा छ एम आसरे संख्या कहे ते जीवाजीयमिश्रित, मत्येक जीवमिश्रित साधारण वनस्पनिमीवराशिने माधारणराशि कहे जे ते साधारण .
(३८.) ॥ दंडक विस्तरार्थ..॥ मिश्रित,८अनंतकायमिश्रित प्रत्येक जीवराशिने "आ प्रत्येक जी- वराशि " एप कहे ते प्रत्येकमिश्रित,९रात्री छतां शीघ्रता :माटे कहेQ के 'जलदी उठ सूर्य उग्यो” इत्यादि अडामिश्रित,१०उ- तावळने अंगे दिवस वा रात्रिना एक भागने वीजो भाग कही। जेम रात्रिनो प्रथम प्रहर छतांमध्यरात थइ कहे ते अद्धाहामिश्रित. (४)तथा असत्याऽमृपा एटले व्यवहार वचन योगना पण १२ भेद छे ते आ प्रमाणे-१'हे देवदत्त ! " इत्यादि अन्यने बोला- ववा रूप आमंत्रणी, २"तुं आ कर ” इत्यादि आज्ञा करवा रूप आज्ञापनी३"अमुक आप ” इत्यादि मांगणी करवा रूप याच- नी,४प्रश्न करवो ते पृच्छिकी,५उपदेश आपवा रूप. प्रज्ञापनी; कोइ कार्यथी निवृत्त (प्रतिपेध) करवा रूप प्रत्याख्यानी,७अ- नुमति (मत-अभिप्राय ) जापवा रूप इच्छानुकूलिका,८कोइए अभिप्राय पूछयाथी " तने जे ठीक लागे ते” इत्यादि कहेषु ते अनंभिगृहिता.९अमुकंज करवू, ने अमुक न कर इत्यादि नि- र्णयात्मक सलाह आपवी ते अभिगृहिता. १०ट्यर्थी वा अनेक अर्थी वचन वोलवू के जेथी निर्णयात्मक भावार्थ न नीकळे ते सांशयिक,११प्रगट रीते जेनो अर्थ समजी शकाय तेवी अथवा स्पष्ट अक्षरो वाळी (पण अर्थ शून्य ) भापा वोलवी ते व्याकृत (-व्यक्त)१२अने गंभीर अर्थवाली अथवा अस्पष्ट अक्षरवाळी भा- पा ते अव्याकृत, आ छेल्ली भाषा दीन्द्रियादि जीवोने होय छे अनेर-लोल-लाल इत्यादि कविताना अलंकारी अर्थ विनाना शब्दो तथा पारj झुलावतां इत्यादि कार्यमां पथ हललल इत्या- दि अर्थ विनाना बोलाता शब्दो तो व्याकृत वचन योग ए प्रमाणे सत्यना १०. असत्यना १०, मिश्रना १०, व्यवहार- ना.२ भेद मली ४२ मनोयोग ने १२ वचनयोग याय छे.
. ॥ योगदारवर्णनमः ॥ तथा कायाना योग ने आ प्रमाणे-पूर्व भत्रमाथी परमव- मां जगाने कार्मण शरीर कारण भूत, ने कार्मण शरीरनी साये तेजस शरीर सदाकाल रहेलं होय माटे फार्मण शरीरनी सहाय थी. ( पूर्वभवयी परभवमां.जवारूप) आत्मानो ने व्यापार ते का. मंण काययोग, अथवा भवधारणीय शरीरव्यापारना अमाये बा- जसकार्पण कायाद्वारा आत्मानो परभरगमन-परभवोत्पति मथमसमये आहारग्रहण-तथा केवलिसमुद्यातना ३-४-५ समये मवर्तन रूप ले व्यापार ते कार्मण काययोग अथवा तैजस का. मंण काययोग. प्रश्न:-तेजस समुद्घात वखते, आहार पचन समये तैजस कायनो व्यापार मगट , ने कार्मणकायनो व्यापार के नहि तो ते वरखते एकलो तेजसयोग कम न कहेवाय ? उत्तर-जे वखते तै० समुद्घातमां, अने आहार पचन व्यापारमा जीव वर्ते छे ते वखते आत्मानुं औदा. शरीर संपूर्ण रचायलं होवाथी औदा० शरीरना आलंबनधी तैजस परमाणुओ वडे पूर्वोक्त कार्य करे , माटे प्रयत्नमा औदारिक काय मुख्य थे, प्रश्न:-फेवळी समु० ना ३-४-५ समये ते० का० काय- योग वडे आत्मा शुं करे ? नथी परभवमा जतो, नथी आहार पचन करतो, के नधी आहार ग्रहण करतो, त्यार तैजस वा का- मण दारा आत्मा ते पखते कइ जातनो व्यापार करे छे ? के जेथीते यखते ते. फा. फाययोग कही शकाय. ? उत्तर-सयोगी आत्मा सदाकाळ योग प्रत्ति वालो,, स्पांजे घखते जे शरीरनुं साधन मले ते वखते से शरीरद्वारा • योग प्रतिवाळो होय, अहि समु० वखते औदा० शरीस्थी घणे अंशे एटो पदी गयेलो आत्मा जस कार्मण वडे सर्वांग व्याप्त होवा- . .
(४०.) ।। विस्तगी। भी योग प्रतिमा बनेने शरीरज जालंबन पसे, पाटे प काययोगतो से बने सभी के आने से योग कह जाननो म्या- पार करे मंन्यां तो जरामजाग के कार्यण शरीर ना बालबनथी आन्मा स्वदेशोनी विचननामा गर्ने ले, भने ने निचलता च कर्मप्रदेशोन ग्रहण कर थे, अथवा ने चे शरीरना आलंबन बडे ज ते यया मंगनारण---अन्तरति-अन्ना संदर- णे रूप व्यापार करने ॥ इति चतुर्दा योगदारम् ॥ १४ ॥ ॥ १५ उपयोगहारम.॥ उप एटले समीपमा युजयते-जोडाय ते उपयोग, अर्थात् विपयदेशमा प्राप्त थयेला पदार्थीनी परिछितिमा (-यस्तु स्वरू- पावलोकनमां ) जोडाय एवो आत्मानो गुण ते उपयोग. ते ने मकारनो छे, सामान्य उपयोग एटले दर्शन, अने विशेष उपयोग ते ज्ञान. त्यां दर्शनोपयोग चक्षुदर्शन-अचक्षुदर्शन- अवधिदर्शन- ने केवळदर्शन एम ४ प्रकार छे, तथा ज्ञानोपयोग पण बे प्रकारे है. यथार्थ ज्ञानोपयोग अने अयथार्थ ज्ञानोपयोग. त्यां यथार्थज्ञा- नोपयोगनी पूर्वपिओए ज्ञान एवी संज्ञा राखी छे, अने अयथा-. थं ज्ञानोपयोगनी अज्ञान एवी संज्ञा राखी छे. त्यां ज्ञानना ५ प्रकार मतिज्ञान-श्रुतज्ञान-अवधिज्ञान-मनःपर्यवज्ञान-ने केवळज्ञा.. न ए प्रमाणे छे, अने मतिअज्ञान-श्रुतअज्ञान-ने विभंगज्ञान (-व- स्तुतः अवधिअज्ञान ) ए प्रमाणे अज्ञान ३ प्रकारे छ, मनःपर्यव .. ज्ञान सम्यग्दृष्टिनेज (मुनिने ज) होय छे माटे मनः पर्यव अज्ञान होतुं नथी, अने केवळ ज्ञानीने तो अज्ञान न होय ए स्वभाविक जछे..
॥ उपयोगदारवर्णनम् ॥ मारे ज्ञान पांच अने शान, ३., ए.प्रमाणे ५ ज्ञान-३ अमान- ने ४ दर्जन मलीने १२ उपयोग के तेमा अवपिदिक-पनः पर्यव -विभंग ने केवळधिक ए ६ उपयोगमा आत्मा-इन्द्रिय अने. मन- नी सहाय पिना स्वतंत्र रोते प्रवर्ते है, मारे प्रत्यक्ष अथवा साक्षात् उपयोग ६. अहि-प्रत्यक्षमा प्रति-समीपे अने अक्ष-जीव ए. वो अर्थ होवाथी प्रत्यक्ष एटले आत्मसाक्षात् कवाय छे, अने आत्मसाक्षात् नहि ते परोक्ष उपपोग मति २-श्रुत २-चक्षुद०- अचक्षुद० ए प्रमाणे ६ प्रकारे . ए ६ सयोगमा आत्माने इन्द्रिय मननी सहाय अवश्य लेवी पडे थे भने इन्द्रियोदाराज नाणी देखी शके थे, माटे ए ६ उपयोग आत्माने सापान मा नथी. जेम निरोग पशुवाको पुरुप ययदि पदार्थने सगट रोने अन्य साधननी महाय पिना देखी शक है, अने हीनतेनववालो पुरुष घरमा विगैरे अन्य सापनी घटादि पदार्य देखी के नम आत्मा इन्द्रियो भने मननी सहापपी देखी नाणी के दो ते उपयोग परोक्ष उपयोग फांचाप, अने इन्दिपमननी सहाय रिता स्वतंत्र देवी प्राणीक तो ते उपयोग प्रत्यक्ष उपयोग पवाप. ए वास्तविक रीन पडी, पण व्यवहार नदीमां मो इन्द्रियोथी अनुमान घटादि स्वरूपने R. स्पा शान-( उपयोग ) कई ऐ. अने अनुशानादिमागी निर्णय फरेन्या स्वरूपने फन, मनोविपपिक मानने परासमान काप ग्यवहार (मन्याने) पण नाममां ध्यायन्याना नापपीपी. कारल. भने अनुमानगदिगो बन्ने गर्ने पर्गन है. यदि १२ उपयोगर्नु मरूप मथम दंगनामां मानतामा राइगपार पुनः पराश न. ॥नि पवदामुपयोगटारम. ॥१॥ ।
(४२) ॥.दंडकविस्तरार्थः ।। ।। १६ उपपातहारमः ।। कया दंडके एक समयमा केटली जीव संख्या उत्पन्न थाय एम कहेवू ते उपपतिद्वार, अनेकया दंडकमां केटलाकाल सुधी कोइपण जीव आवी उत्पन्न थाय नहिं ? एम कहे ते उपपातविरह कहेवाय. ॥१७ च्यवनहारम् ॥ कया दंडके एक समयमां केटला जीव मरण पामेतेनी संख्यानो नियम कहेवो ते च्यवनदार, अने कया दंडकमां केटला काळसुधी. कोइपण जीव मरण न पामे ते संबंधि काळ नियम दर्शाववो ते. च्यवनविरह कहनायः॥ ॥ १८ स्थितिहारम् ॥ कया दंरके जीवोनु केटलं आयुष्य होय ते आयुष्यकाळनो नियम दविवो ते स्थितिद्वार. ॥ १९ पर्याप्तिहारम. ॥ . पर्यामि एटले जीवनी आहार ग्रहण करवादिकनी शक्ति, अथवा ते शक्तिनी ममाप्ति ते पर्याप्ति कहेवाय, ते पर्याप्ति आहा- २-शरीर-इन्द्रिय-अच्दवास-मापा ने मन ए प्रमाणे ६ प्रकारनी , नेनुं मंभित खरूप आ प्रमाण- - । पयामिरवर्णनमः॥ - । आहारपोसि-आहार ग्रहण करी औदारपणे परिणमानी खल-रस जुदा करवानी शक्तिआहारपयोति आ पर्याति उत्पत्ति स्थाने आपला जीवने प्रथम समय जमगर याय, अहिं ग्रहण करेल भाहारनी फेटलोक माग हपणे परिणगे नहि एवों होय तेनो त्याग करे , अने दहपणे परिणमवा योग्य आहारने देरपणे' परिणमा थे, त्यां देहपणे परिणाम न पामे एवा आहारने खलरूप-(कूचारुप) कही शकाय, अने शेप आहारने, रसरूप कही भकाय, अन्यथा म- ल-मूत्रनेज सलरस मानीये तो बैंक्रिय अने आहारकनी पर्याप्तिमा खलरस पृथक्करणनो असंभय थे, तो तमां ए आहार पर्याप्तिनो अर्थ कम समीचीन पाय ? पुनः आ पर्याप्ति एकन ममयमां समाप्त थाय ने शरीर पर्याप्सि-ग्रहण करेला आहारने शरीरपणे परिण- माववानी शक्ति ते दरेक गीवने अन्तर्मुहूतकाळे प्रगेट थाय . इन्द्रियपर्याप्ति-प्रहण करेला आहारमाथी इन्द्रिय योग्य पुद्गलोने अभ्यन्तर निदृषि इन्द्रियपणे परिणमावी इन्द्रिपद्वारा वि- पय जाणवानो शक्ति प्राप्त थाय ते औदा० शरीरीने अन्तर्मु०काळे अने आहा० तथा वै. शरीरीने एक समय मगट थाय छ.. उच्च्याम पर्याप्ति-वासोश्वास योग्य पुद्गलो ग्रहण करी, श्वासोच्छ्वासपणे परिणमायी, भवलंबीने विसर्जन करवानी - नि.ने औदा० शरीरने अन्नमहर्ने अने आहा० ०शरीरीने १ समय प्रगट याय है. मापापर्याप्ति-भापायोग्य पुद्गलो ग्रहण करी, भापापणे. परिणमाची-( भापारूप यनात्री) अवलंबोने विसर्जन करवानी श. कि तेनो काळ इन्द्रिय पर्याप्ति.
(४४) ॥ दंडकविस्तरार्थः ।। - मनापर्याप्ति-मन योग्य पुद्गलो ग्रहण करी, मनपणे परिणमा- वी अवलंबीने विसर्जन करवानी शक्ति तेनो काळ इन्द्रिय पर्याप्तिवत् ए ६ पर्याप्तियोमा जे जीवने जेटली पर्याप्तियो पूर्ण करवा योग्य होय छे, तेटली पर्याप्तियो ते जीव उत्पत्तिसमये समकाळे प्रारंभे छे, पण पूर्ण अनुक्रमे करे , कारणके प्रथमसमयगृहीत आहारना उपष्टभधी-(आलंबनधी) जीवने आहारपर्याप्तिरूप श- क्ति सर्वांशे प्रगट थइ, अने शरीरपर्याप्न्यादिरूप शक्तियो देशांशे प्रगट थइ छे, ए प्रमाणे प्रारंभ समकाळे अने समाप्ति अनुक्रमे होय. तथा जे जीवने जेटली पर्याप्तियो छे, ते जीव तेटली पर्या- प्तियो पूर्ण करे ज एवी लब्धिवाळो जीव लब्धिपर्याप्त कहेवाय. ते लब्धिपर्याप्तपणुं भवना प्रथम समयथी भवना अन्त्यसमयपर्यन्त होय. एनुं आयु उ० ३३ सागर होय. तथा जे जीवने जेटली पर्याप्तियो छे ते जीव तेटली पर्याप्ति- यो पूर्ण नहिज करे एवी लब्धिवाळा जीवो लब्धिअपर्याप्त कहेवाय, ए लब्धि अपर्या०पणुं पण भवना प्रथम समयथी भवना अन्त्य स- मय सुधी होय छे. आ जीवोर्नु आयु उत्कृष्ट अन्तर्मु० होय. तथा जे जीवने जेटली पर्याप्तियो छे, ते जीवे तेटली पर्या- प्तियो ज्यां सुधी पूर्ण नथी करी पण करशे एवो जीव करणअ- पर्याप्त, अने पूर्ण कर्या बाद करणपर्याप्त कहेवाय. त्यां करण अपर्याप्तपणुं भवना प्रथम समयथी अन्तर्मु० पर्यन्त, अने करणपर्या- प्तपणुं अन्तर्मुन्यून स्वस्वपर्याप्तायुप्य जेटला काळवाळं छे. पर्या- प्ति संबंधि विशेष वर्णन प्रथम. नवतत्त्व विस्तरार्थमा विस्तार पूर्वक करेल होवाथी अहिं विशेप वर्णन कयु नथी.
(४) ॥ किमाहारबारवर्णनम् ॥ ॥ किमाहारहारमः॥ किम् एटले काइ दिशिनो (दिनिधी आपेलो) आहार पटले आहार होय १ ते संपंधि जे निर्णय काँचो ने किमाहार कहवाय, त्या लोकने अन्ने (किनारे) रहेलामूक्ष्म अपर्याप्त पृथ्व्यादि ५ तथा मूक्ष्मपर्याप्त पृथ्व्यादि ५ तथा पादरपर्याप्नवायु अने बादरअपर्याण- वायु ए १२ जीवभेदने ३-४-५दिशिनो आहार होय, अने ए १२ महिन म जीवमेदो जे लोफनी अंदरना भागमां-(लोफनो दो दिशाए फरतो अन्त्य किनारो छोटीने अंदरना सर्व भागमां) रहेला तेओने सर्वने छ ए दिशियी आयेलो आहार होय छे. शंका:-जीव ले आफाश प्रदेशोमां अवगायो छ तेन आ- फाश प्रदेशमा रहेला आहारने ग्रहण करे छे तो उए दिशायी आ- चलो आहार ग्रहण करे ने केवी रीते ? उत्तरः-ए यान सत्य है, परन्तु जीव जे आकाश प्रदेशोमां अवगायो , ते आकाश मदेशमा आहार ग्रहण समये ६ ए दिशि- थी आवता पुद्गलोने ग्रहण करे थे, मारे ६ दिशियी आयेला पुद्- गलो ग्रहण करे एम फही शकाय. प आहार ग्रहण व्याघातभावी अने निर्याघातभावी एम प्रकारर्नु छे, त्यां अलोकाकाशवडे आधार पुद्गलोने आवतां जे स्खलना थाय अर्थात् न आवी शक ते व्याघात कहेवाय अने ते ध्याघानना कारणधी जीव सर्व दिशियी आहार न ग्रहण करो शक पण ओली दिशियी आहार ग्रहण करे ते ध्याधातभावीआ. हार कवाय, प्रथम जे ३-४-ने ५ दिगिधी जे आहार ग्रहण फर्य ने व्यायानभावी आहार ग्रहण जाण. अने तेवा व्याघातना अभाव मटिशियी एदले छए दिशियी जे भाहारनुं ग्रहण धाय ते नियांधातभावीआहार यहवाय. .
(४६) .. ॥ दंडकविस्तरार्थः॥ प्रश्न: --दिशाओ १० छतां ६ दिशियी आहार ग्रहण केम का? उत्तरः-विदिशाने पडखे रहेली दिशामा अन्तर्गत गणतां ६.दिशा पण कही शकाय, माटे अत्रे ६ दिशिथी आहार ग्रहण कहा, पुनः वास्तविक रीते क्षेत्रविदिशा एकेक आकाश मदेशनी थे- णिरूप होवायी आहार्य पुद्गल स्कंध एक प्रदेशात्मक श्रेणिमां अ: वगाद, नहिं पण जयन्यमा जघन्यथी अंगुलना असंख्यातमा भाग जेटला क्षेत्रमा अवगाहे छे, अने नेटला अवगाहमां विदिशि प्रदेशो करनां दिशि प्रदेशो असंख्यगुणा संभवे छे, माटे विदिशिने दि- शिमां अंतर्गत गणवापूर्वक ६ दिशिनो आहार कह्यो. प्रश्न:-आ किमाहारद्वारमा आहार्य पुद्गलो कई वर्गणानां अंगीकार करवां? उत्तर:-जम अने कामण वर्गणा वर्जीने शेप औदा०- वैक्रिय-ने आहारक ए भवधारणीय शरीर वर्गणाना पुद्गल स्कंधोनो अहिं आहार अंगीकार करखो, अने कामण पुद्ग- लनो भाहार नो जीवने सांगिपणा मुधी प्रति समय होय छे, माटे आ किमाहार प्रसंग ने ले. का० नो आहार अंगिकार न क- रखो. ए आहार्य पुद्गर कंध पण कमीमा कमी अभव्यधी अनंत गृप परमाणुभोनो बनेलो होय छे, कारण तेथी कमी परमाणुशो- बारा रथो जीव ग्रहण करी गकती नथी. पुनः ग्रहण कराता आहामाया अमंब्यानमा भाग जेटलो आहार आहारपणे परिण है. ने बीजो मई माहार गाये ग्रहण करेला घाममांधी जय मंट- कोयाम पटी माय नेम नन ममये विनाम पामी नाय आहापणिता माहामांनी अनमो भाग जीवना पा- माना है. मंदावार जीवन भाम्नादनमा पाल्या - । किमाहारदारवर्णनमा (४७) । मिनाज दहने-इन्द्रियपणे परिणयी जाय है. नली आ -आहार स. चित-भचिन ने मित्र-पम ३ प्रकारनो, तथा भोन 'अमे लोग पम ये मकारनी है, (अहिं कवलाारने दिशिमाहार मापे योग्य संबंध नहिं होगाथी कवलाहारने दिशिमाहारमा गयो.नपी अने ए संबंधि शासमा उल्लेख नयी.) पुनः आभागिकने अना- भोगिक एप भेद पण, ते भेदो मंधि विशेप वर्णन , ग्रन्यान्न- रयी जाणवः तया ममंगे निराहारीपणु जीवने क्यारे होय छे ? ते पण कईवाय . त्यां परमवमा वक्रगतिए जतां वे प्रण चार ने पांच समय लागे ते वरखते प्हेलो ने ऐल्लो समय वर्जी मध्यं समयोमा अनाहारीपणुं होय छे, माटे वे समयनी एक चक्रगतिमां अनाहा- रीपणुं नयी पण ऋण समयात्मक द्विवक्रगतिमा, 'चार सम. यात्मक त्रिवक्रगतिमा, ने पांच समयात्मक चतुर्वगतिमां अनुक्रमे १-२-३ समग निराहार छे, ने केवलि समुद्घात वखते ३-४-५ नयरवाला समयोमा अनाहारीपणु है, ने अयोगी तथा सिद्धजीवो सदाकाळ अनाहारी . ' इति फिमाहारबारम् . ॥२०॥ ॥ २१ संज्ञाहारम् ॥ सं-मम्या प्रकार ज्ञान-जाणवू ने मंज्ञा. ३ मकारनी छे, त्यां प्रथम हेतु-कारण-निमिन एटले र अने अनिष्टनी प्राप्तिपरिहार पकारणना उपदेश-कथनवाळी. ते हेतृपदेशिकी संज्ञा. मा मंत्रा व्या (या बुद्धिपूर्वक-अभिसंधिन) अने अव्यक्त (वा अन- भिसंधिन) एम चे प्रकारनी , पां एकेन्द्रिगोने अनमिसधिन हनुपदेशिकोगमा , कारण नेओनी आहारादिकमां मत्ति स्पष्ट . (४८.). ॥ दंडकविस्तरार्थः जीवोनी कंडक बुद्धिपूर्वक इष्टमा प्रवृत्ति अने. अनिष्टयी निति हो- वाथी ए: जीवो अभिसंधिज़: हेतूपदेशिकी संज्ञावाला छे, पण मनः पर्याप्तियुक्त नहिं होवाथी संजीवत् अति स्पष्ट बुद्धिपूर्वक प्रवृत्ति निवृत्तिवाला नथी छतां पण हेतूपदेशिकी संज्ञावडे द्वीन्द्रियादि जी. वो संज्ञी अथवा मनवाला गणायछे, ने एकेन्द्रियो ( हेतु०वडे ) अ: संज्ञि-मनविनाना गणायः छे. परन्तु शास्त्रव्यवहारमांतो हेतूप० संज्ञावडे संज्ञी एवा द्वीन्द्रियादिकोने पण विशिष्ट मनोविज्ञानमा कारणरूप मनःपर्याप्तिना अभावे असंज्ञिज गया छे. पुनः ए हेतू- प० संज्ञा. वर्तमानकाळ विषयिक छे, पणः भूत भविष्यना विचारयी विकल-(रहित )छे, ते कारणथी- जेम हेतूप० संज्ञावडे संज्ञिः छतां पण अल्पधनवाळो धनवान् न कहवाय, अने अल्परूपवाळो रुप- वान् न कहेवाय तेम द्वीन्द्रियादि. जीवो हेतूप० संज्ञावडे अल्प वि. चारवाळा छतां संशि.न: कहेवाय. तथा मनःपर्याप्तिद्वाराः मनोवर्गणा ग्रहणे करी मनपणे परिण- माव्याथी विशिष्ट मनोविज्ञान लब्धिवडे अतिव्यक्त अने त्रणे का- ननी विचारशक्ति ते दीर्घकालिकी संज्ञा मन:पर्याप्त जीवने एटले गर्भज पर्या० तिर्यंच गर्भज पर्या० मनुष्य सर्व देव अने सर्व नारक ने होय छे. शास्त्रमा संज्ञि असंक्षिपणानो व्यवहार आ दीर्घकालि- की संज्ञाने अगेन प्रवर्ते छे, कारणके जे जीवो दीर्घका० संज्ञावाला होय ते संज्ञि अने दीर्घका० संज्ञा विनानां जे जीवो होय ते सर्व असंज्ञि कहेवाय छे. तथा दृष्टि-सम्यक्दर्शनादि संबंधि वाद-कथन तेना उप- देश-अपेक्षावडे जे संज्ञा ते दृष्टिवादोपदेश संज्ञा. अर्थात् दृष्टि- वादना एटले श्रुतज्ञानना उपदेशवडे-क्षयोपशमवडे जे सम्यगज्ञान ते दृष्टिवादोपदेश संज्ञा. तात्पर्य एछे के क्षयोपशमजन्य सम्यगज्ञान . ।। संगाद्वारपर्णनप.।। युक्त एलो सम्पष्टिजीव रहिवादोप० संझावालो गणाय मे, पण विशिष्ट शुनजानना पोपशमरहिन एवा नारक-देव-मनुष्याने. ठिपैचो सम्यगृष्टि- एतां पण दिपादसंबाबाळा - गणाय नहि.. कारण जो के फैटलाएक देवोमा भने तीर्थकर यनारा नारकोमा भने कचित् ग० निर्यचौमां विशिष्ट श्रुनशान सभापे रष्टिवादो १० मंझा हो छतां ते ज्ञान विशेषतः हितमां मति अने अहिन- मा निसिवा नदि दोबाथी तेओने अहिं - इष्टिवादी संज्ञान: गणी होय तेम संभव है, (केटलोफ भावार्थ श्रीनंदिसूधमांगी: करो.) ने इनूप० संज्ञा छेतेने दीर्यका ने दृष्टिवादो० संज्ञा नवी, नेने दीर्घका संज्ञा से तेने हेतू० संज्ञा नयी, अने दृष्टिपादो० संज्ञा होय ने.न. पण होय. अने जेने दृष्टिवादो० संज्ञा छे तेने हेतू नयी पण दीर्घ० संशा अवश्य छे. श्रीसर्वशने ए प्रणमांनी फोइपण संज्ञा . न होय. ॥ इति.मंज्ञासवेधः ॥ ॥ २२ गतिहारमः॥ अमुक दंडफमांनो जीव मरण पामीने फया गया दंडकमा जाय-(पजे) ए मंबंध कहेवो ते गति. ॥ इति गतियारम् ॥ ॥ २३ आगतिहारम.॥ अमुक दंडफां फया फया दंडकना जीयो .परण पामी - घोने उत्पन्न थाय ए संबंध फवो ते आगनि.इत्यागतिदारम्।। हि गनि-भागनिने प्रमंगे जीयोने परभव गमननी विधि (५०) ।। दंडक विस्तरार्थः ।। कहेवाय छे.-जीवो. परभवमा जंतांचे प्रकारनी गति करे छे, त्या रंमण समुद्घातपूर्वक उपजनार, जीवनी इलिकागति होय छे; कारणके येळ जेम शरीरंना अग्रभागने आगळ कथा बाद शरीर- ना पश्चात् भागने उपाडी आगळं फेंके छे, तेम मरण समुद्घातने प्राप्त थयेलो जीव उत्पत्ति स्थाने आत्मप्रदेशो कथा बाद अन्तर्मु० काळे पूर्वभवसंबंधि शरीरमांथी आत्मप्रदेशो संकोची लई उत्पत्ति स्थाने लावी मूके छे, आ. इलिकागति वा मरणसमुद्घात ऋजु- गतिए अने चक्रगतिए पण होय छे, त्यां जीवर्नु उत्पत्तिक्षेत्र सम- श्रेणिए होय त्यारे ऋजुगति थाय छे, अने विषम श्रेणिए होयः त्यारे वक्रगति थाय छे, तथा दडो अथवा तोपमांथी छुटेलो गोळो जेम सर्वपिंडात्मकरूपे चाल्यों जाय छे तेम शरीरमांथी छुटेलो आ- स्मा पिडितरूपे-(दीर्घ श्रेणिरूपे नहि.) परभवमा चाल्यो जाय ते कंदुक-(दडासरखी) गति कहेवायं. आ कंदुक गति प्रायः ऋ- जुगतिमा संभवे छे. ने वक्रगतिमा होय छे के नहि ते श्री बहु- श्रुतथी जाणवू. तथा मस्तक भागमांथी निकळेलो आत्मा देवलोकमां जाय, उदरथी निफळेलो आत्मा मनुष्यगतिमां जाय, पगथी निकळेलो आत्मा नरकगतिमां जाय, अने सर्वांगथी निकलेलो आत्मा मोक्षे जाय. ॥ २४ वेदद्वारम् ।। वेद एरले नोकपायमोहनीयकर्मना उदयधी उत्पन्न थयेल विपयामिलाप ते पुरुपवेदादि भेदे ३ प्रकारनो छे. त्यां इरुपनी (स्त्रीप्रत्ये) विषयामिलाप ते पुरुषवेद, स्त्रीनो ( पुरुषप्रत्ये) जे विषयामिलाप ने स्त्रीवेद, तथा नपुर.कनो ( स्त्री ने पुरुष उभय प्रत्ये ) विपयाभिलाप ते नपुंसक वेद बहेवाय. एमां पूरुषः पणु -- है . ॥ यातिदारवर्णनमः॥ बीपणुं ने नपुं० गणु निईत्यादि मैदे प्रण प्रण मकारतुं मे, ने मा; प्रमाणे लिंग-दादी-मृछ इत्यादि पुक्त देहाकतिमाको नितिपुरुष (आकार पुरुष); योनि-वन इत्यादि युक्त देशकृति पाळी- निति स्त्री, भने पुरुषाकारनां वेटलांक लक्षण होय ने केटलांक न होय तपन बी.पणानां पण केटलाफ लक्षण होय ने फेटलांक लक्षण न होय.ए प्रमाणे उक्त लक्षणोना भागामार युक्न देहाति वामन जीवो निति नपुंमक फहवाय. नया वीउपर विपयामि- लापो जीव घेद पुरुप, पुरुष मत्ये विपपाभिलापी जीव वेद स्त्री ने उभपाभिलापी जीव घेद नपुंसक फडेवाय. : तपा.पुरूप नहि छतां येणे पुरुपनो थेप पहेयों होम ते नेपथ्य पुरुष, स्त्री नहि छता स्त्रीनो थप पहेयों होय ते नेपथ्य स्री. अने नपुंसक नहि.छ. नां नपुंसक नो (-हीझदा वगेरे सरखो)- पेप पहेयों होते नेप- ध्य नपुसंक कहवायं. ए प्रमाणे ९ मेद के. तया पुरुषादि पाकतिनो द्रव्य वेद अने विपयामिलापने भाषवेद तरीके गणाय छे. पुनः एक जीवने एफन भवमा पुरु- पने ३ द्रव्य पैद अने ३ भाववेद यह शके, नपुंसफने एफज भवमा नपुं ने श्री ए ये वेद द्रव्यने २ भावयेद होय, में स्त्रीने पाखा भ. व सुधी १ द्रव्ययेदने १ भाववेद होय ए वात न्यवेदायि भाववे- द गणवानी पद्धतिए कही, भने द्रव्यवेदना आश्रय विना केवळ भाववेद गणनां प्री-पुरुपने नमकने दरेकने ३-३ भावयेद अ- 'नमहत अन्नमुहर्ने पराति पाम्या फरे हैं. पुरुप येद घासना अग्नि सपान , कारण यासनो अग्नि पकदम भटको थर तुर्त समी जाय छे, नेग पुरुषवेद एकदम जागृत यह स्त्रीना संगमधी तुर्न शमी नाय , नया बोयेद करीनी लीं- टीपोना अग्नि साम्यो , कारण के यारीनी लीडीयोनो अग्नि , (५२) ॥ देडकविस्तरार्थः ।। सळग्या बाद एकदम होलवाय नहिं तेम स्त्रीवेद पण जागृत यता पुरुपना संगमथों पण शीघ्र उपशमे नहि. तथा नपुंसकवेद नगर दाहना अग्नि सरखो.छे कारणके द्वारिका नगरीनो दाह जेम ६ मास मुधी शान्त न थयो तेम नपुंसकोद संगमथी शान्त न थाय अथवा नपुंसकपणाथी संगम थइ शके नहिं ने तेथी विषयेच्छा जागृत ने जागृत रहे छ. ए नपुंसक वेदना १६ भेद छे तेनो विस्ता- र नवतत्व विस्तरार्थमां कह्यो छे. त्यांची जाणवों. अवतरण हवे चोवीश दंडके २४ द्वार उतारतां प्रथम २४ दंडके शरीर दार उताराय छे. ॥ मूळ गाथा ५ मी,॥ चउ गम्भतिरियवाउसु, मणुआणं पंच सेस ति सरीरा। थावरचउगें दुहओ. अंगुल असंखभागतणू ॥ ५ ॥ ॥ संस्कृतानुवादः॥ चत्वारि गर्भतिर्यग्वायुपु, मनुष्याणां पंच शेषेषु त्रीणि शरीराणि । स्थावरचतुएके द्विधा, अंगुलासंख्येयभागतनुः ॥ ५ ॥ ॥ शब्दार्थ ॥ सरीरा-शरीर छे. गम्भतिरिय-गर्भजतिर्यंच थावरचउगे-४ स्थावरमां (ने) वाउस-वायुकायमां (ने) दुहओ-बन्ने प्रकारे मणुआण-मनुष्योने अंगुल-अंगुलनो पंच-पांच (शरीर) असंख-असंख्यातमो शेप-वाकीना दंडकोमा भाग-भाग नण-शरीर . चउ-चार ति-त्रण - ॥ किमाहारहारवर्णनमः॥ गाथा:-गर्भननियन अने वायुकायने ४रीर छ, मनु- प्योने ५,भीर छ, भने पाकीना (२२) दंडके त्रण प्रण शरीर छ । चार स्थावर शरीर अंगुलनो असंख्यानमो भाग है. विस्तरार्थ:-अहिं २४ दंडकमा प्रथम शरीर द्वार उतार- नां गर्भगतियच अने घायुकायने औदा०-०-० ने कार्मण ए ४ शरीर होय , ए सामान्ययी फयु अने विशेषतः 'आ प्रमाणे- एक ग० तिर्यंचने २-३-के ४ शरीर होय हे, त्यां पूर्व भ- वमांथी भावता ग० ति० ने रस्तामां नैना तया कामण एवेश- रीर होय, पार पाद उत्पति स्थाने उत्पन्न यवाना प्रथम समयधी- न औक्ष० शरीर नामनो उदय होवायी औदा० शरीर सहित ३ शरीर होय अने कोइ लब्धिपर्याप्त गर्भन तियेचे तप आदि करवा. थी वै० लन्धि उत्पन्न करी होय ने वैक्रिय शरीरनी रचना करे तो ते वरखते वधुमां वधु ४ मुहूर्त मुधी ३० शरीर सहित ४ शरीर होय, पण आहा० शरीर तो फक्त चौदपूर्वधर लन्धिवंत मुनि मा- अने न होवायो गर्भन वि० ने ए शरीर कोइपण काळे न होय पुनः युगलिक निर्यचने रस्तामां आवतां ये अने उत्पत्ति स्थाने आव्यावाद प्रण शरीर होय पण तेओने व्रत तप आदिना अभा- ये वै० लब्धिना अभावथी ० शरीर न होय तथा दंडक प्रकरण- मां अनधिकारी एवा समू० निर्यच पंचेन्द्रियने पण रस्तामा २, अने स्वस्थाने औदा० शरीर सहित ३ शरीर होय. तथा वायुकायमां पण सर्व जीवने चार शरीर न होय प- ण रस्नामां आवनाने ० का० ए थे, स्वस्थाने औदा० सहित ३, ने केटलाएक लन्धि पर्याप्त पादर वायुकानेन विना प्रतादिके .प- ण तथा स्वभाव वक्रिय शरीर मदिन अन्नर्मु० फाल मुधी ४ शरी- प होय ने न्यार बाद पुनः भरीर वालोज होय, ने वै० ल.
. ५४ ॥ दंडकत्रिस्तरार्थः ब्धि बाळाः ल० पर्या०, वा सिवायना. सर्व वायुकायी जीवोने र. सामां के अने. स्वस्थाने औदा० सहित ३ शरीर ज होय, :.::. तधा गर्भजमनुष्यमां पणः रस्तामां आवनारने तै० ने का- मण ए के शरीर अने स्वस्थाने ३ शरीर तो दरेक गर्भज. मनुष्यने अने दंटफमां अनधिकारी संम० मनुष्यने पण होय. तथा केटला- एक गर्भज ल० पर्या० मनुष्य के जेओ ए व्रत तप आदि वडे वै० शरीर रचना बरखते ४ मुहूर्त मुधो एकज जीव आश्रयि ४ शरीर होय अथवा जेनी पचौदपूर्वनो अभ्यास करी आहा० लब्धि मात करी होय तेओने आहा० शरीर रचना वखते अन्तर्मु० काळ मुधी ४ शरीर एक मनुष्य आश्रयि होय छे. पण एक मनुष्य आ- भूपि शरीरनो संभव नथी. कारणके ये अने आहा० शरीर समकार होय नहि, माटे मनुष्यमा एक मनुष्य आश्रयि समकाळ २-३ ने ४ शरीर होय अने सर्व अनुप्य आयि तथा एक म. नुष्यने भिन्नकाळ आधयि ५ शरीर होय. तया देव अने नारक संबन्धि १४ दंडकने विषे एक जीव आश्रपि रस्तामा भावनां ने० ने का. एवे, अने स्वस्थाने . सागर होय , वली ए जीवो उत्तर वै० पण रचे ले ते पण चक्रि- यत्र नाम वाडे होवाथी एक जीवने समकावे. ४ शरीर न गणाय. भने । जीवाने औदा० ' नगर तथा आदा० शरीर कोरपण सटे गभव नी. नया नेप ७ दंडकोने विग दोक, वा मर्व जीव आयि गम्ना मां व भने स्वस्य ने औदा० महित ३ गरीर होय, इतिशरीरडारम दयो तर बिय करती बबने मिह मनुष्य आदि मकान मानां पर पण ते शगर आदारिद में रिय मानेदा: माी दंगावधाळी
॥ उपपोगदारवर्णनमः॥
एवं बीजं अवगाहनाबार कहे के ते आ प्रमाणे पावरच-
जगे-एटले पश्चि-अप-अग्नि-ने वायु ए चार स्पावर ( ना दरेक
भेद )नां भरीर दुहओ पटले जपन्यपी भने उत्कएपी पम पन्ने
प्रकारे अंगुलअभावभागतणु पटले अंगुलमा असंख्यातमा भा।
गर्नु भरीर होय. ए प्रमाणे सामान्यथी चारेनुं अंगुलनो अम०मो
भाग शरीर कयुं नोपण परस्पर नानु मोटुं छे छतां अंगुलना अ.
सं०मा भागधी पधीने संख्यामा भाग जेवई नथी, त्यां शरीरनी
अवगाहनानो परस्पर तफावत आ ममाणे.
मममा.
यादरमां.
सू० वनस्पतिर्नु
बादरवायु
अंसं०गुण
पादरतन
'असं०
मूतनमर्नु
यादरअंपर्नु
मू० अप०,
चादरपृथ्वीनुं
सू० पृथ्वीन
बादरनिगोदमुं
यादरमत्रो०वन०
अल्प
अल्प
.
सू० वायु
"
"
"
अवतरण-अहिंधी ६-७-८-५-१० गाथाभी सुधीमा
दंडकमां अवगाहनाद्वार कहेयाय के.
सव्वसिपि जहन्ना, साहाविय अंगुलस्सऽसंखेसो ।
उकोस पणसयधण, नेरइया सत्तहत्य सुरा ॥ ६ ॥
(संस्कनानुवादः)
मपामपि जपाया म्वाभाविकोऽगुलस्यासंख्येयांशः।
उत्कर्पतः पंचशतरपि, नरपिकाणां सप्तहस्तसुराः ॥६॥
॥ दंडकविस्तरार्थः॥ ॥ शब्दार्थः ॥ सच्चेसि-सर्व दंडकोने. उक्कोस-उत्कृष्ट (अवगाहना): ऽपि-पण.. पूर्णसंय-पांचसें. जहन्ना-जघन्यः (अवगाहना) धणू-धनुष्य.. साहाविय-स्वाभाविक-(मूळ : नेरइया-नारकजीवो(नी), शरीरनी): सत्तहत्थ-सात. हाथ... अंगुलस्स-अंगुलनो, मुरा-देवो(नी). ऽसंखसो-असंख्यातमो भाग, गाथार्थ:-सर्वे पण दंडकोना स्वाभाविक:- (मूळ शरीरनी जघन्य (अवगाहना ) अंगुलनो असंख्यातमो भाग छे, अने ना- रकजीवोनी उत्कृष्ट अवगाहना ५०० धनुष्य तथा देवोनी ७ हाय प्रमाण छे. ( अहिं अवगाहना एटले शरीरनी उंचाइ अथवा लं. वाइ जाणवी.) विस्तरार्थः-पूर्व गाथामां पृथ्व्यादि चार जीवोनुं जय० अने उ० शरीर का, ने हवे आ गाथामां शेष सब्वेसिंपि-सर्वे दंडकर्नु मात्र जहन्ना एटले जघ० साहाविय-मूळ शरीर अं- गुलस्सऽसवंसो एटले अंगुलना असंख्यातमा भागर्नु छे अने उत्कृष्ट शरीर दरेक दंडकर्मा भिन्न भिन्न छे ते कहे छे. नरइया एटले नारक जीवोनुं शरीर उकोसा-उत्कृष्टधी पणसयधण-५०० धनुप्य है. अहिं धनुप्यनु प्रमाण ४ हाधनु है. माटे नारकनु शरीर २००० हाथ एटले । कोश जेटलं उचुं है. ए पण सामान्यथी कही अने विशेषतः आ प्रमाणे- नागकनु. जवा शरीर. उ० शरीर रत्नमभामां. घ.६ अंगुल. गप्रभामां. ७२.३ १५॥ १० १२० ॥शीग्वारननग. ५०० पनु०' पादुकापमा १५॥ १० १२० ३१०१० कममा. ३११० ६२।। १० धूमममा. ६२॥ ५० नमःप्रभा २५०० 'तमःतमामभा. २५० १०॥ मत्तहस्पसुरा-एटले देवोर्नु मूळ भरीर उन्कएयी ७ हा न होय से, एटलं शरीर भवनपनि-यन्तर योनिपी-नया सीध बने इशान कल्पना दरेक देव अने देवीन सर्वन जाण. ए. कोइपण देव के देवी ७हाययी नानां होपन नहि. त्यांची में गळना देवों→ शरीर आ प्रमाणे. देवोनु, जय०१० भर. - । ३-४ कल्प ७ हाय. ४ ५ हा. हाय. " ५हाथ, ४हाध. : " ४ हा २ ३ ३ १० ३ . ३ हा. ३० ३० " ३० ॥ देडकविस्तरार्थः । तिर्यःपंचेन्नु ३० शरीर. गर्भज जळचरर्नु-१००० योग समु० जळ०नु-१००० यो गर्भज स्थळचरनु-६ गाउ. समुं० स्थळ०-२ थी ९ गाउ गर्भज खेचरनु-२ थी ९.धनु० समु:खेचर०-२ थी ९ गाउ गर्भज उरपरिसर्पन-१००० यो० समुउरप०-२ थी. ९ यो० गर्भजभुजपरि०नु-२ थी ९ गाउ समु०भुजप०-२ थी ९.ध. वणस्सइ अहियजोयणसहस्सं एटले वनस्पति १००० योजनथी कंइक अधिक होय छे. एटली मोटी अवगाहनावाळी बादर प्रत्येक वनस्पतिकाय कमळ अने लता-( वल्लि) वि- गेरे १००० योज० उडा. समुद्रोमा अने मानसरोवरादि जळाशयो मां होय छे, अने बीजी वादर वनस्पतियोना अंग विगेरेनी अ- वगाहना विस्तारवाळी होवाथी अहिं लखी नधी पण ग्रन्थान्तरथी जाणवी. तथा अहिं जे कंइक अधिकता कही ते पाणीनी सपाटी- थी कमळ विगेरे जेटलं उपर वधीने आवेल होय तेटली अधिकता जाणवी. पुनः ए अवगाहना कमळादिना स्कंधनी ( नान्नी) छे छे पण मूळ पत्र-पुष्पादिकनी अवगाहना नहि, तेओनी अवगाह- ना शास्त्रमा जुदी जुदी कही छ ते त्यांधी जाणवी. नर तेइंदि तिगाउ एटले मनुष्य अने त्रीन्द्रिय ३ गाउ ना प्रमाणवाला छ, त्यां दरेक मनुष्य अथवा दरेक त्रीन्द्रिय गाउ प्रमाणना नथी पण भिन्न भिन्न प्रमाणवाळा के ते आ प्रमाणे- १ समुद्रादि जळाशयोनी उंडाइ उत्सेधांगुलने हिसावे हजार जोजनथी घणी अधिक के, अने जीवोनी उंचाइ उत्से. भांगुलने हिसावे छे माटे उतार तथा चढायवाला जलाशयमां ज्यां उत्सेधांगुल प्रमाणे १००० योजन उडाइ आये त्यांनी क. मळनाळ-टतादि. १००० योजनवाळां बनस्पतिरूप जाणवां, अने वधु उंडारमा रहेलां कमळ लतादि पृथ्विकायरूप जाणवां. ..
॥ श्रीरापमानाहारवर्णनप. ॥ ... मनुपर्नु. जपवरीर. उ० भरीर. देवा बने उत्तरकक्षेत्रना यु- अंशुलनी असंख्या- गलिकनु सदाकान, तया भरतमो भाग (अपर्याः ने औरवत क्षेत्रमा पुगलिकोनु सा मरण पाम ने ३.गार अवसपिणीना हेले आरे भने अपेक्षाप.) . उत्सर्पिणीना ६ आर. हरिवप अने रम्यकक्षेत्रनायु गलिकोनुं सदाफाळ अने मरत -भैरवतता युगलिकोनु अव- २गाउ. साना वीजा रे अने उत्स० ना पांच आरं. हिमवन-हिरण्ययंतक्षेत्रना यु- गलिकोन सदाफाळ अने भर- तैरव्रत्तना युगलिकोनुं अवस० ना जे आरे भने प्रत्सना ना ४ पे भारे. । १ गांड, " . अन्तर्धापना युगलिफोनु स- दाफाल अने भरत-अवतना युग०मनुप्पोन भवना : जे ने उस्म० ना? आर. घनुप्य. " ॥ दंडकविस्तरार्थः ॥ ५०० धनुष सर्व महाविदेहमां सदाकाळ अने भरतैर बत्तमा अव० ना ३-४ ने उत्सना ४-३ आरे. भरत-औरवतमां अव०ना ५ में अने उत्सना ६ आरे. ७द्दाथ. भानु-अरवतमां अव०ना घटे अने उत्सना १ ले आरे. तथा दंडकमां अनधिकारी समुष्मनुप्यनु जघ०. शरीर उ- त्पति समये अंगुलनो नानो असं०मो भाग, अने उ० शरीर अंगु० नो मोटो असं०मा भाग जाणवो कारणके ए जीवो अपर्या० अ. वस्थामांज मरण पामे छे. अथवा मरण पामती वखते पण अनेक जीवों आश्रयि कोइ नानी अवगाहनाए मरण पामे तो कोई मोटी अवगाहनाए मरण पामें एम मरण बखते पण अवगाहनानी विप- मतानो भपक्षाप जय० या ३० शरीर संभवे छे. नथा त्रीन्द्रिय जीवोमां पर्या० श्रीन्द्रियनीज अने नेमां पण कानबाजुरा विगैरे कोड़कनीन माउनी लंबाद बहारना द्वीप- मद्रोमां जाणवी. वीजा कीडीआदि श्रीन्दियोनी एवढी मोटी अवगाहना संभव नहि. गाम्नमां कोइम्याने एकला कानखजुरानी अने भन्न-वनमा अयाना ३ ना आसमां बटलांक गर्ग नवी उमाना ४ था भागमां मंटन्ट वर्ग पही समलिक न ने मिवाय नाय, 7 ॥ शरीरावगाहनाहारवर्णनमः ।। कोरस्थाने कानखजुरा विगैरेनी नंगाइ ३ गाउ कही है. इंदिय जोपणे पार पटले हीन्द्रियजीवोनी लैपाइ१२ गो. 'जन छे, त्यां पर्या० द्वीन्द्रिय अने तेषां पण शेष निगेरेनी बार १२ योजन के पण दरेक दीन्द्रियनी नहि. एवा मोटा शंख विगैरे स्वयंभरमणादि महासमुद्रोमां पेदा थाप हे पण भा मनु० क्षेत्रमा नदि. अवतरण-पूर्व गायावत् ( गाथाना ३ जा चरणथी उत्त र ० देहनी अवगाहना कोवाय छे.) जोयणमेगं चउरिदि-देहमुच्चत्तणं सुए भणियं । बेउवियदेह पुण, अंगुलसंखसमारंभ।॥ ८॥ ॥ संस्कृतानुवादः ॥ योजनमेकं चतुरिन्द्रिय देहोगत्वं श्रुते भणितं । वैफियदेहः पुनरंगुलमंग्व्येषांश आरंभे ॥ ८ ॥ ॥ शब्दार्थः॥ जोयणं-योजन भणियं-कधु के. बेउब्धिय-बैंप्रिय (उत्तरक्रिय) चरिदि-चतुरिन्द्रियना देह-शरीर देह-शरीग्नी अंगुल-एक अंगुलनो उत्तणं-चार गग्वम-संन्यानमो भाग मृप-श्रुनने विष भाम्भ-माग्भमां आर्यममाज ममना प्राचार्य मंग्यामी दयानंद सरस्वति आ म्याने ज पण त्रीन्द्रिय हायापी जनानी मश्करी को छ ... गार घडी मोटी बनी जनांना माथामांश पद्दती दशे" पण कृथानी देशको ममुनी यात जाणे ! अंगाल तेमा तभी. नी शापनी अनभिज्ञाना-पाटना पन्दिता ज मुचये है. एग-एक .simar (६४.) । देशविस्तारायः ।। गाधार्थ:-- चतुरिन्द्रियजीवोना शरीरनी उचाइ सिन्हातमा? योजन (-४ गाई ) कही छे, अने उत्तर वैकिय देह मारंभरोनाए (. वायु विना सर्वने)अंगुलनो संख्यातमो भाग होय छे. विस्तरार्थ:-चतुमिन्द्रियनु शरीर १ योजननु कही त्यां प- ० भमरा विगेरे १ योजन अवगाहना बाना बहारना द्वीप समुद्रोमां पंदा थाय छे.. तथा उत्तरवैक्रिय शरीर मारंभती येलाए अंगुलनो संख्यात- मो भाग होय एम कयुं ते वायुकाय सिवायना ग० मनु०-गर्भ ति०-देव-अने नारकने अंगे जाणवू, कारणके: वायुकायनु शरीर अंगुलना असं० मा भागधी अधिक होतुं नथी, माटे वायुकाय जी- व ज्यारे वैक्रिय प्रारंभे त्यारे ते उ. वैक्रिय शरीर अंगुलना अंस- ख्यातमा भाग जेटलं जाणवू. अने देव नारकनु मूळ वैक्रिय आरं- भमा अगुलनो असंख्यातमो भाग होय, तैमज आहारक देहना से- वन्धमां कंइपण का नथी छतां आहा० शरीर पण प्रारंभवेन्नाए अं. गुलनो संख्यातमो भागज संभवे, कारण के ए पण उत्तर देह छे, अवतरण-आगाथामां उत्तर वै० नी उत्कृष्ट अवगाहना कहेवाय छे. देवनर अहियलक्खं, तिरियाणं नव य जोयण सयाई। दुगुणं तु नारयाणं, भणियं वेउव्विय सरीरं ॥ ९ ॥ ॥ संस्कृतानुवादः ॥ देवनराणामधिकलक्षं तिरश्चां नव च योजनशतानि । द्विगुणं तु नारकाणां, भणितं वैक्रियशरीरं ॥९ ॥ ॥ शब्दार्थः ।। देव-देव सयाई-सो नर-मनुष्य दुगुणं- गणु Matरधारवर्णनमः । (१५) भदिय-याइक अधिक सपल-१ लाख (पोनन) नारयाण-नारकलीनोनुः निरियाण-तियनोन' भणिय-कांटे, नव-नव घेउविय-उत्तरक्रिय प-वळी मरीरं-श्ररीर जोपण-पोजन गावार्थ:-देव अन मनुष्यन, (उत्तरवैफियशरीर ) इक अधिक (-४ अंगुल अधिक) १ लाख योजन, नियंचोन ९०० पोज़न, भने नारफोर्नु उत्तरवैक्रिय शरीर मणुं फथु छ, विस्तरायः देवनर अहिय लक्खं एटले देवर्नु उत्तरवै० शरीर १ लाख योजन, अने मनुष्यन वै० शरीरे १ लाख योजन- थी फरक अधिक कयु छ त्यो अधिकता ४ अंगुल जेटली जाणवी पारणके ' देव भूमियी ४ अंगुलं अधर रहे थे, पण भूमि उपर प- गरांखना नयी अने १ लाख योजननु वीजु शरीर रचै छे, अने मनुप्य तो भूमि पर उभी रही देवना शीर्पनी ( मस्तकनी) स- पाटीए सरखा आवी रहे तेटलं उत्तर शरीर० रचे छ माटे मनुपर्नु उ० ३० शरीर १ लाग्य योजन ने ४ अंगुल अधिक होय छे. आबई मोटुं उनर क्रिय शरीर पनचक्रवर्तिना पापी अने मुनिभोने व- पीकाठमां पण देशनिकाल थवानो हुकम फरमावनार तथा मु. निओए यह सपनाव्या छतां पग उडनाइ दर्शाती ३ पगला जे- टलीज जमीनमा रहेवानी रजा आपनार दुष्ट नमुचिने शिक्षा क- रवा माटे आचार्य पोनाना ये शिप्योमारा मेरुपर्वनपरथी योला निय रुप घिर्षनाग देयो अच्युतकल्पमुधीना जाणवा, अने प्रययक तथा २ अनुकरना देयो यक्रिय गिफ- काला नमी.
- 1. दंडक विस्तरार्थः॥ चला, अने चैक्रियादि अनेक लब्धिवाला विष्णुकुमार मुनिए रची वे पगलां जंबूद्वीपने ये छेडे मूकी चीज़ा पगलानी जमीन मा- गता नहिं आफ्नार नमुचिनी छातीपर त्रीजु पगलु मृकी संवने उपजेलो उपद्रव शान्त करी शासन प्रभावना करी. 'तिरियाणं नव य जोयणसयाई' एटले तिर्यचोर्नु उत्कृष्ट ३० शरीर ९०० योजन जेटलं होय छे. अने 'दुगुणं तु नारया- ग' एटले नारकलीवोनुं 5० उत्तरवैक्रिय शरीर पोताना मूळ वै- क्रिय शरीर करतां घमणु होय छे, जेमके ७ मी नारकीना नारकर्नु गृळ चै० शरीर ५०० धनु० छे, तो तेओ १००० धनुष्यनु उ० व० गरीर रची शके, तथा वायुकायना उ० उत्तर वै० शरीरनी अवगाहना अहिं क. ही नवी नोपण अंगु० ना असं० मा भाग जेटली जाणवी. ए प्र. माणे 'भणियं वेडब्विय मरीरं-उत्तर वैक्रिय शरीरनुं प्रमाण कहाँ अहि उत्तरव० शरीर रचवान प्रयोजन आ प्रमाणे-देवो नीर्थंकर भगवानना कल्याणक आदि वसते मनुष्य क्षेत्रमा आव- वाने, परजीवना उपकार माटे अथवा अपकार माटे, स्वऋडिदश- नार्थ, विषम सेवनार्थ इत्यादि अनेक कारणे ३० शरीर रचे छ. न. या मनुष्यो उपकार भने भपकार करवादि अनेक कारणे. नारको स.न. बाजा नारकने दुन्द देवाने कुंथ आदि रूप विकुर्वे छ, वायु. काय स्वभावधी बिदु है, अने नियंच पंचे ने : दारीर रचना- र नयाविर विविध कारण समजई अवनर-मा मायामां इनर वक्रिय गरी कला का. गरी नेवाय. ।। मल नाया ? नमुन निः मुहत्त चनारि तिरिय मणुपम । दे अदनामी. उन विव्यणाकालो ॥१०॥ मी.॥
।। ।। उत्तरवैवियकालपर्णनमः ॥ ॥ संस्कृतानुवादः ॥ अन्तर्मुहन नरयिके, मुहर्ताभ्रत्वारि तिर्यग्मनुजेषु । देवेवर्षमास, उत्कृष्टो विकर्षणाकालः ॥ १० ॥ ॥ गन्दार्थः ॥ अंतमुरस-भतहिन पा-देवोमां निरए-नारकजीवोमा अद्धमासो अर्थमास महत्त-मुहर्न ( २ घडी) उकोस-उत्कृष्ट चशारि-चार विउच्चणा-गिर्वणानो(-उत्त- विरिय-तिर्यंच (अने) र वै० शरीरनो) मणुरमु-मनुप्पोमां कालो-काळ गाथार्थ:-नारकजीवोमां (० २० उ० नो फाळ) अ. न्तर्मु, नियंच भने मनुष्योमा । मुहर्न (-८ घडी), अने दे- पोमां. मास उत्तर वै० शरीरलो उत्कए काळ कामो छे. विस्तरार्थ:-गम विशेष ए के देवकन वै० शरीरनो काळ ६ मास पण कयो हे. कारण के परमाधामीकृत पर्वतनी ६ मास स्थिति श्री सूयगडोंग सूत्रपां कही . अवतरण- [~-आ गाथामा २४ दंडके संययण कहे . ॥ मूळ गाथा ११ मी.॥ थावरतुरनेरइया, अस्संघयणा य विगल ठेवता। संघयणगं गाभय, नरतिरिएसु वि मुणेयन्वं ॥१९॥ ॥ संम्नानुपादः॥ स्थायरसुरनरयिका असंहननाश्च पिकलाः मेवातः । मंहननपटक गर्भजनरनिरयोऽपि ज्ञातन्यं ॥ ११ ॥ .
(६८) ॥ दंडकविस्तरार्थः ॥ ॥ शब्दार्थः ।। थावर-रधावर छेवट्ठा सेवा संघयण वाळा सुर-देव संघयण-संघयण. नेरइया-नारक छगं-छ असंघयणा-संघयण रहित. गमय-गर्भग य-भने नर-मनुष्य विगल-विकलेन्द्रियो विरिएम-तिर्यंचमां मुणेयन-जाणवां गाथार्थः-स्थावर-देव-अने नारको संघयण रहित छे, अ. ने विकलेन्द्रियो सेवा संघयणवाळा छे, अने गर्भज मनुष्य तथा तियचोने छ ए संघयण जाणवां विस्तरार्थ:-हवे आ गाथामा २४ दंडके संघयणद्वार कहेवाय छे. थावरसुरनेरड्या असंघषणा--स्थावरना ५ दंडक, देवना १३ दंडक, अने नारकनो १ दंडक ए प्रमाणे १९ दंडक संघयण विनाना छे, कारणके देवोने नारकोने अने स्थावरोने हा- डको होय नहो, अने हाडकां न होय तो हाडकांनी रचनारूप सं- घयण पण क्याथी'होय? य विगलछेवट्ठा--वळी विकलेन्द्रियो छेदस्पृष्ठ संघयण- वाळा होय छे, अहिं द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-ने चतुरिन्द्रिय जीवोमां के- टलाएकने हाडकांनो संभव छे, जेमके शंख-कोडा चंदनक इत्या- दि द्वीन्द्रियोनुं शरीर हाड अने मांसयुक्त छे, शेप अळसीयां वि- १ श्री जीयाभिगममां देवोने पण वर्षभसंघयणवाळा. अने एकेन्द्रियोंने छेदस्पृष्ट संघयणयाला फह्या छे ते शक्तिनी अपेक्षाए पण हाड रचनानी अपेक्षाए नहि. अने त्यांज नार. पाने अमंघयणी कद्या नं.
- यणदारवर्णनम.॥ गैरे दीन्द्रिगोनु मरीर साह विनार्नु में, नया कंटलाएक त्रीन्द्रियोने तथा फेटलाएक चतुरिन्द्रिय नीयोने हाइनो संभव है, पण सष्टरीते मोटरसानां नहिं होतापी नाम भापवां मशक्य रे, पाटे ए प्रमाणे -जे जे विकलेन्द्रियोने हाड होय ते ते विकलेन्द्रियोने संघपण होय, ने पीनाने न होप, मां पण ए जीवोने मात्र स्पष्ट संघयणन होय है, कारण नेभोना हाडना से अंडा संधिस्पाने मन्टेला होय रे, अथवा मोने एफज भासु हाइकू पण फकडा न होय वो प- (सेवा बडे करीने पीटापलु ए अर्थने अनुसारे ) सेवान संघ- यण ज होय (अहिं छेदस्पृष्ट अने सेवात्तै बन्ने नाम ऐवट्ठा संघ- यणनां छे.) संघयण - छग गम्भयनरतिरिएम वि मुणेपब्व-नामंग मनुष्यने अने निर्यचोने ६ संघयण होयं परन्तु एक जीवने एक- ज संघयण होय छे. माटे अनेक गर्भन मनुप्य वा तिर्यचनी अ- पक्षाए ६ संघयण होइ शके. अहिं कोइपण गर्भ० मनुष्य को कोई पण गर्भन तियेच संघयण विनानो होय नहिं, तथा दंडकमा अनधिकारी सम्म निर्यच अने सम्मुमनुप्यने दरेक- ने सेवान मंघयण श्री जीवाभिगमनीमां का छे. अवतरण-भा गाधाना हेला चरणमा सर्व दंडकोने कि संझा कडेवाय छ, भने शेप त्रण चरणमा संस्थान कहेवाय है. ॥ मूळ गाथा १२ मी॥ सव्वेर्सि चउ दह वा, सन्ना सव्वे सुरा य चउरंसा । नरतिरि छ स्संटाणा, हुंडा विगलिंदि नेरइया ॥१२॥ ॥ संस्कृतानुवादः ॥ सर्वपांपत्यारि दश वा संजाः सर्वे सुराश्च चतुरन्नाः (रंगाः) नरनिरः पर मंधाना इंटकाः विकलेन्द्रियनेरयिकाः||१३ (६८) ॥ दंडक विस्तरार्थः॥ ॥शब्दार्थः ॥ धावर-स्थावर छेवट्ठा सेवा संघयण वाला गुर-देव संघयण-संचयंण नेरइया-नारक छगं-छ असंवयणा-संघयण रहित गमय-गर्भज य-अने नर-मनुण्य विगल-विकलेन्द्रियो निरिएम-तिर्यंचा मुणेयव्यं-जाणवां गाथार्थ:-स्थावर-देव-अने नारको संघयण रहित छे, अ- ने विकलेन्द्रियो सेवा संचयणवाला छे, अने गर्भन मनुष्य तथा तिर्यंचाने छ ए संघयण जाणवां विस्तरार्थ:-हवे आ गाथामा २४ दंडके संघयणद्वार पवाय है. धावरसुरनेरड्या असंघयणा--स्थावरना ५ दंडक, देवना १३ दंडक, अने नारकनो १ दंडक ए प्रमाणे १९ दंडक मरयण विनाना छे, कारणके देखोने नारकोने अने स्थावरोने हा- टकां होय नही, अने हाटकां न होय तो हाडकांनी रचनारूप से- पण पण श्यांधी' होय? य विगलछेवट्टा--बळी विकलेन्द्रियो छेदस्पृष्ठ संघयण- बाळा होय है, अहिं द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-ने चतुरिन्द्रिय जीवोमां के टलाने हाटकांनी गंभव छे, जेमके यंग्य-कोडा चंदनक इत्या- दिहीन्टियो, दागर हाड अने मांसयुक्त है, पर असीयां वि- श्री जीवाभिगममा देवीने मा यजभिनयावाला. ने देन्द्रियाने दम्ट मंचयावाला कना, नं प्राचिननी शार ९ग हाट निनानी अपेक्षा नदि ने व्यान नाम ॥ संघयणदारवर्णनम्। (६९) मेरे द्वीन्द्रियोनुं शरीर हाड विनानुं थे, तथा केटलाएक त्रीन्द्रियोने • तथा केटलाएक चतुरिन्द्रिय जीवोने हाडनो संभव छ, पण स्पष्ट रीते ओळखाना नहि होवाधी नाम आपां अशक्य , मारे ए प्रमाणे जे जे विकलेन्द्रियोने दाट होय ने ते विकलेन्द्रियोने संघयण होय, ने धीमाने न होय, तेमां पण ए जीवोने मात्र छेदस्पष्ट संघयणज होय छे, कारण तेओना हाइना पे छेडा संधिस्थाने मळेला होय थे, अथवा जेओने एफज आलुं हाडकुं पण फकडा न होय तो प- ण (सेवा वडे करीने पीडायल ए अर्थने अनुसार) सेवा संघ- यण न होय ( अहिं छेदस्पृष्ट अने सेवान बन्ने नाम छेवहा संघ- यणनां छे.) संघयण गं गाभयनरतिरिएम वि मुणेपव्यं-गर्भन मनुष्यने भने तिर्यंचोने ६ संघयण होयं परन्तु एफ जीवने एफ- ज संघयण होय छे. माटे अनेक गर्भन मनुष्य का तिर्यंचनी अ. पैसाए ६ संघयण होइ धके. अहिं फोइपण गर्भ० मनुष्य या फोइ पण गर्भज विर्यच संघपण विनानो होय नदि, नया दंडफमां अनधिकारी सम्म नियंच अने सम्म०मनुष्यने दरेफ- ने मेवात संघयण श्री जीवाभिगमनीमां कायु रे. अवतरण -आ गायाना हेला चरणमा मर्य दंडकोने पिी संज्ञा प.देवाय , भने शेप प्रण चरणमा मम्यान पंचाप है. ॥ मूळ गाथा १२मी।। सध्यसि चउ दह वा, सन्ना सन्चे सुरा य चउरसा । नरतिरि छ संठाणा, हुंडा विगलिदि नेरइया ॥१२॥ । भग्नानुनादः ॥ मर्यपापागारि दादा महाग मुराध गराः (REE) नरनिन पर सम्पाना ईटका मिलेन्द्रिनिगगि .. 1- (७०) ॥ दंडकविस्तरार्थः॥ ॥ शब्दार्थः ॥ सव्वेसिं-सर्वे दंडकोने चउरंसा-समचतुरस्र संस्थानवाना चउ-चार नर-मनुष्य दह-दुश तिरि-तिर्यच बा-अंथवा छ-छ (६) सन्ना-संज्ञाओ संठाणा-संस्थानवाळा सव्वे-सर्व हुंडा-हुंडक संस्थानवाळा सुरा-देव विगलिंदि-विकलेन्द्रिय य--अने नेरइया-नारको गाथार्यः-सर्वे दंढकने (-जीवोने ) ४ अथवा १० संज्ञा होय छे, अने सर्व देवो समचतुरस्र संस्थानवाला छे. मनुष्य अने तिर्यंचो ६ संस्थान वाला, अने विकलेन्द्रिय तथा नारको हुंडक संस्थान वाला छे. विस्तरार्थः--आ गाथामां संज्ञाद्वार तथा संस्थान दार कहेवाय छे. सब्वेसिं चउ दह वा सन्ना-सर्व दंडकोमा चार अथवा १० संज्ञा होय छे. अहिं गर्भन मनुष्य सिवाय २३ दंडकमां आ. वेला सर्व संसारी जीव मात्रने ४ के १० संज्ञा होय छे, पण गर्भ- ज मनुष्यमा दरेक गर्भन मनुष्यने ज्यां सुधी मोहनीय कर्मनो उदय छे, त्यां सुधी सर्व दशे संज्ञाभो होय, अने मोहनीयनो उपशम वा क्षय धनां वीतरागी जीवने फक्त वेदनीयजन्य, अथवा सर्वज्ञ- ने आहारसंज्ञा पण न होय आहारसंज्ञा होय. सम्वे सुरा य चउरंसा-सर्वे देवो समचतुरस्त्र संस्थानवा- का छे, ए मूळ वैक्रिय शरी नी अपेक्षाए तेमज उत्तर वैक्रियनी - पेक्षाए पण समचतु० कर्मनो उदय होवाथी अन्य संस्थानवाळे - ॥ संस्थानद्वारवर्णनम् ॥ (७१) शरीर विद्या जां ने देवने समचतु० संस्थानन कडेवाय, अपवा देखबानी अपेक्षाए उत्तर वैक्रिय देव ६ गस्थानी गणाप पण नेवा ध्यपदेशनी प्राधान्यता नथी. नरतिरिग उमंठाणा-गर्भन मनुष्य अने गर्भन निर्यच .६-ए भस्थान पाना होय, एम सामान्ययी का अने विशेषतः भा प्रमाणे सर्व युगलिफ मनुष्यो युगलिफ नियनो सर्व तीर्थकर- सई पक्रयति-सर्व चामुदेव-सर्व पळदेव-सर्वमनियामुदेव-इत्यादि उत्तम पुरुषो समचतुरस्र संस्थान वाळा , सामान्य फेवलि विगैरे तथा सामान्य मनुप्यो ६ ए संस्थानवाला छे. तेप युगलिक सिवा- यना निर्यच पंचेन्द्रियो पण ६ ए संस्थानवाला छे, अहिं एक जीवने एक संस्थान भवपर्यन्न होय. वथा दंडकमां अनधिकारी सामू० ' निर्यच अने सम्भू० मनु प्पने श्री जीवाभिगममा हुँइक संस्थानी कह्या छ, हुंडा विगले दिनरइया-सर्व विकलेन्द्रियो अने सर्व नार- फो हुँटक संस्थान बाळा छ. एमां नारफोनुं हुंडफसंस्थान तो पां खो रखेडी लीपेला पक्षी सरखं अत्यंत कुत्सित का छे, अवतरण-पा गाधामां पण पृथ्व्यादि पांच स्थायरना - स्थान बवाय . ॥ मूळ गाथा १५ मी.॥ नाणाविह धय सूई, चुचुय वण वाउ तेउ अपकाया । पुटवी मसूर चंदा-कारा संठाणओ भर्णिया ॥ १३ ॥ । संस्कृतानुवादः ॥ मामः नियंचन सा फर्मग्रंथगा अभिप्रायधी भी पृ. हदग्रहणीनमा ६ स्थानी कहा -ति घ्यायक:
आकार वाळी (७२), ॥ दंडक विस्तरार्थः ॥ नानाविधाध्वजसूचीबुवुदाश्च वनवायुतजसपूकायिकाः पृथ्विमसूरचंद्राकाराः संस्थानतो भणिताः ॥ १३ ॥ ॥ शब्दार्थः ॥ नाणाविह-नाना प्रकारचें अपकाया-अपकायर्नु (-अनेकमकारर्नु)पुढची-पृथ्विकाय धय-ध्वज़ना आकारनु ममुर-मसूरनी दाल सूई-सोयना आकारतुं चंदाकारा-अर्धचंद्रना बुबुय-परपोटाना आकार वण-वनस्पतिकायन संठाणओ-संस्थानथी वाउ-वायुकायर्नु (-आकारथी) तेज- अग्निकायन भणिया-कही छे. गाथार्थ:-वनस्पति कायन (संस्थान) अनेक प्रकारचं, वायुकायतु ध्वजाने आकारे, अग्निकाय सोयने आकारे, अपकाय पाणीना परपोटाने आकारे, अने पृथ्विकाय आकार वडे मसूरनी दाळ अथवा अर्धचंद्रना आकारे कहेली छे. विस्तरार्थ:--आ गाथामां पृश्चिकायादि ५ स्थावरोर्नु सं- स्थान कहे छे ते आ प्रमाणे--- वण वाउ तेउ अपकाया-वनस्पति-वायुकाय-अग्निकाय -ने जळकायन संस्थान अनुक्रमे नाणाविह धय सूइ बबुय-भः नेक प्रकारच्-ध्वमा सर, सोय सरखु, ने परपोटा सर छे, अर्थात् वनस्पनिनुं शरीर अनित्थंस्थ (-अमुक प्रकारनु छ एम नहिं माटे अनियत ) आकारवाळं श्री तत्वार्थवृत्तिमां कहेल छे. कारण के कोइ वनस्पति केवा आकारनी ने कोइ वनस्पति केवा आकारनो होय छे माटे वनस्पनिन संस्थान अनेक आकारर्नु कहेल छ, नथा वायु संस्थान एटले वायुकायी एक जीवना औ- -.
॥ संस्थानद्वारवर्णनम् ॥ दा० भरीरनो आकार ध्वना-पताका सरखो छ, भने उत्तरवैरिक- प शरीर से ते पण मूळ शरीरना आकारेज ('एटले पताकाने आकारज) रचे छ, क्या अग्निकायी एक जीवना औदा० शरीर- नो आकार सोय सरखो है, अने जलायी एक जीवना औदा. शरीरलो आकार परपोटा सरसो अर्ध पहल है. पुढवीमसूरचंदाकारा मंठाणओ भणिया भाकारवडे पृषी मयूर अने चंद्र आकारनी कही छ. अर्थात् पृथ्विकापी ए- १. जीवना औदारिक एक शरीरनो आकार मगरनी दाळ अथवा अर्धचंद्रना आकार वालो . ए प्रमाणे ग्राममा जे संस्थानो पद्यां छ, ते एकेक शरीरने आययि जाणयां, अने ने एकर शरीर दृष्टि- गोचर नहिं होवाथी ने संस्थानो पण दृष्टिगोचर यतां नयी, फ. यन वनस्पति नीव महामायावालो होवाथी तेनुं अनेकविध सं. स्थान मो मत्यक्ष थे. पुनः ए संस्थानो पादरस्थावरनी अशाए है, भने सक्ष्म भीयोमा पूक्ष्म वनस्पनि संस्थान स्तियुफ आफारन एटले भागः पन गोळाकार ऐ. बीना मूक्ष्मजीवोनी आकार पादरवत् छ के शन गोलाकार ने मारा जाणवामां नयी इति मंधानबारम् अवतरण-श्रा गायाना दन्या चरणमा गर्व दराने पाहा. पगला होय, भने दीप प्रण परणयां समा रेकारा होय : पांगा. । मृन गाथा सच्चे विघउमाया, संस उगं गम्मतिरिरमाणम् । नाग्य नइ बाड, रिगला मागि पनि नेगा 2n (७४).. ॥ दंडकविस्तरार्थः । इवि-पण ॥ संस्कृतानुवादः ॥ सर्वेऽपि चतुष्कपाया लेश्याषटक गर्भजतियग्मनुजयोः नारकतेजोवायुविकला वैमानिकाच निलेश्याः ॥ १४ ॥ ॥ शब्दार्थः ॥ सञ्च-सर्व नारय-नारक तेज-अग्निकाय चांऊ-वायुकाय कसाया-पायवाला विगला-विकलेन्द्रियो लेंस-लेश्या माणिय-वैमानिकदेवो छग-६ (5) ति-प्रण गभतिरिय-गर्भनतिर्यच लेसा-लेश्यावाळा मणुएम-मनुप्योमा गाधार्थ:--मर्द जीवो चारे कपायवाला है, गर्भन तिर्यंच अने मनुष्योमा ६ लेदया, अने नारक-अग्निकाय-वायुकाय-वि- कलेन्द्रिय-तथा वैमानिक देवीने ३ लेश्या के. विस्तरार्ध:-हवे आ गाथामां कपाय तथा लेश्यादार कहे थे. सम्ववि चउकसाया -सर्वे दंडको चार कपायवाळा है, न्यां साने नारसना नारकोने एक वीनापर वैरभाव होवाथी को. भवाळा. नेमन मान-माया-भने दोभ पायी पण हे. नथा दे- बोमा पप परम्पर वैरभाव छ. एक. वीनानो माये युद्ध करे छे, कोट कोहनी देवांगनामो उपाही नाय छे, इन्द्रो परम्पर विमा- मोना नामबाट युद्ध करे है. न वीजानी प्रभुना मदन करता न. पाट देवमां पण ना कपाय हला, नेमा प्रवेषक अने ने दानां पर ५ अनु नावामी देवोनी कपाय अतिमंद छे, त्यां र युद्ध-बहार-गदा-दार्थ-अभिमान के नाहिं, पान्त अ- ॥ उत्तरक्रियकालवर्णनमः ।। से पाय थे, पुनः अनुत्तरविमानवासी देवो. अति वैराग्यवान, देवलोकने केदखाना तुल्य समनी मनुस्यमां आवो मोक्ष जवानी आकांक्षा वान भने सदाकाळ द्रव्यानुयोगना चितवनमा अनुर- क्त थे, तथा अति मंदकपायी छे, तथा गर्मज तिर्यचौने तो कपाय प्रत्यक्ष देखीए छीए, तथा गर्भन मनुष्योमा वीतराग सिवायना सर्वे कपायवाला है, परन्तु युगलिक नियचो, बहु अल्प.फपायवा- छाछे, नया उत्तरोत्तर गुणधिने प्राप्त धयेला एवा अवीतरागी पनिमहात्माओ पण अल्पकपायवाळा ले. युगलिक तिर्यचोमां-सिं- हादि हिंसक प्राणी मी पण अति दयाई चित्तथी मृगनां बचांनी साथै पारसल्य भावयाला छे, पोनानां मात पिता साथे पण अ- स राग धारण फरनार है तो युगलिक मनुप्पोनी तो ,चा: सनशी? तथा स्थावरो अने विकलेन्द्रियो पण अस्पष्ट अथवा स्पष्ट कपायवाला छ. नेमन सम्मू० नियेच अने सम्म० मनुष्यो पण चारे यपायवाला है. ॥ इति कषायद्यारम् ॥ लेमगं गभतिरियमणुपम-गर्भननिर्यच अने म. नुष्य एये दंडकपा ६९ लेश्या होप छे, त्यां एक नि० या मनु.. ने मनमः ' मुरी एका लेश्या होय पण एकजीवन समकाले ये लेश्या न होय, नया मनुप्पमा अनपचने ३ शुभ मेश्या, अने श्रे- जिमननया गाने केवळ भूषल लेण्या के. मारव जयायिगला मागिय निलेमा-नारस-भ. ग्नि-वायु-विकले -पानिक-मां प्रण लपाछपम सामान्ययी प. अने निगेरता आ माने-' माने गए किया एवं सभी दीय माटे में मिपायना गारमा म नियंग मनुष्मान प्रा. १ एज नियम.
(७८) -11 दंडक विस्तराधः ॥ श्या नहिं पणे स्वाभाविक लेश्या त्रण जछे, परन्तु तेजोलेश्या ए मरणपामेलो इशानसुधीमांनो कोइ. देव बादर पृथ्वीपणे बादर ज- ळ पणे अथवा वादर प्रत्येक वनस्पति पणे उत्पन्न थाय तो उत्पन्न थती वखते ज अपर्याप्त अवस्थामा अन्तर्मुः सुधी ते पृथ्व्यादिने तेजोलेश्या होय छे, ने त्यारयाद ते जीवने आखाभव सुधी ३ ले- श्याओ ज जुदे जुदै अन्तर्मुहूर्त प्राप्त थाय छे, परन्तु तेजोलेश्या क- दी पण प्राप्त थती. नथी. अने शेष सूक्ष्म पृथ्व्यादि भेदोमां देवनो जीव आवी शकतो नथी माटे तेओने चोथी तेजो.लेश्यानो कदी पण संभव नथी. तथा १० भुवनपतिमां. असुरकुमार निकायना जे १५ परमा- धार्मिक देवो छे तेओने फक्त कृष्णलेश्या छ, ने वाकीना असुर कुमारनिकायी देवोभा केटलाएक देव कृष्णलेश्यावाला, केटलाएक नीललेश्यावाला केटलाएक कापोतवाला ने केटलाएक तेजोलेश्या- वाळा पण छे, ए रीते चार प्रकारना असुरकुमार निकायी देवो छ. पण एक देवने जुदे जुदे वखते चारे लेश्या छ एम नहि, कारणके देवोनी लेश्या अवस्थित छे. तथा जेम असुरकुमार निकायी देवो ४ लेश्यावाळा कह्या तेवी ज रीते शेप ९ भुवनपति अने व्यन्तरनी पण सर्व (१६) निकायोगां चार चार लेश्या जाणवी. तथा दंडकमां अनधिकारी सम्पू० तिर्यच अने सम्मू० मनुष्यने पण प्रथमनी लेश्याओ जाणवी ॥ इति लेण्याद्वारम् ॥ हवे इद्रियद्वारने दंडकमां अवतारतां ग्रन्थकर्ता कहे छे के इंदियदारं सुगम--इन्द्रियद्वार सुगम छे माटे तेनु विवेचन क- . रातुं नधी, छनां विशेष समज आ प्रमाणे- नरकनो ?-सुवनपविना १०-गर्भननियंच १-गर्भजमनुष्य ?-व्यन्तम्-ज्योनिपी-ने वैमानिक ए १६ दंडकमां सर्व जीवने ५ १ ॥ इन्द्रिय-समुद्घातबारवर्णनम् ॥ (७) इन्द्रियो छे, पृथ्विकायादि ५ स्थावरने कंपळ स्पर्श इन्द्रिय , दी- न्दिपने स्पर्श-तथा रसनेन्द्रिय, श्रीन्द्रियने स्पर्शन-सना-प्रोपर- न्द्रिय, ने चतुरिन्द्रियने श्रोत्रेन्द्रिय सिवायनी ४ इन्द्रियो के.ए संख्या द्रव्यइन्द्रियोनी अपेक्षाए जाणवी. अन्यथा लन्धिरूप भाव- इन्द्रिय तो दरेक जीवमात्रने पांच पान . सर्वा सिवायना सर्व जीवोने इन्द्रियद्वारा तथा मनद्वारा गान' या शके छ, ने सर्वच भं- गवानने इन्द्रियो छ, पण ज्ञानप्राप्तिमा फारण पणे प्रवर्तती नपी, फारणके ऐन्द्रियज्ञान अन्नहर्च फाळे थाप छ, ने सर्वशने तो ए फज समयमां सर्वज्ञान याय, माटे ज श्री सर्वशने १० माण- माथी ५ माण गणाप. पुनः दरेफ नीयने इन्द्रिय पर्याप्ति पूर्ण क- पी पाद इन्द्रियद्वारा ज्ञानमाप्ति होइ शके ॥ इति इंद्रियहा।। । हये दरेक दंडके ममुद्धातद्वार अपनाराय छ, त्यो प्रथम मणुयाणं सत्त समुग्घाया-मनुष्योने '७ सावधान हो। प, तेमां बेदनाकपाप ने मरण ए १ स. सर्व मनुष्य. ने होय, पै० समु० ३० लब्धिवाला कोइफ गर्भन मनुष्पने, ते- नस समु. पण नेमलन्धिवाला कोइफ मनुप्यने, आहा० समु० फोदक चौद पूर्वधर मुनिने भने केवलिसमुद्रात पेटलाएक फेव- लिभगवानने होप पण म कलिने नहि, फारणा अन्नम थी ६ माम एपी, आपुष्प शेप रहतां कवनमान पामला जीयों नि- अय समुपान कर भने पीमा ६ मामयी समयादि अधिक आयु- माफी दशां पतरज्ञान पाना नीरो ममृद्घार को अया न पण करे पप र थी भार निर्मा) सुरे. अथवा दरेफरे. धरिने नीपादि ३ भापति कार्पनी स्थिति भाष्य करना रि. ६ पो नियप नहिं राधी पण कोर बनली मम , ॥ दंडकविस्तरार्थः॥ . :- को न कोई न ' कर. (0) अवतरणा-या गाथामा ७ समुद्घातनां नाम कहे छे. ॥ मूळ गाथा १६ मी॥ यण कसाय मरणे, वेउब्धिय तेयए य आहारे । केवलि य समुग्घाया, सत्त इमे हुंति सन्नीण ॥१६॥ । मंस्कृतानुवादः ॥ बंदना कपायो मरण, बंक्रियस्तैजसश्चाहारकः । रोवलि (केयलिका) समुद्घाताः, सप्तते भवंति संजिनाम् ब्दार्थः ।। केवलि (य)-केवलसम्मु० ( के- माय-पाय मम बलिक समु०) यमुपाय-समुद्यात विन-शिवम दमे- पूर्वपित इंनि- मनी-मजी जीवोन रण-वंदना समुद्यान मा-मा मः सुन-सान या-जममा महार-मादारक सामु गुरन विमान मियन बैं--:-- ....... : है. दया :- न ५ समयाने " म.३ मा श्रियोग न अनि में- ཙ - ། ཡཱ་ཡ། ཝཱ ར :: ཡ་ པy ༢༣ :: पु. १ मा ममः .: :: :: धलि मम: ::
- -निव-पाहारगमनमः। गावार्थ: -मा-कगाय-भरण-प्रिय नेत्ररा-माधारक-मने- गलिक ए ७ महद्यान मंदिनीशेने हो, (-महि मनुष्योने ई.) विस्तरा:-दरवर्णनां जुभो. . अवतरण-मा गापामा फया दंडक मेटली समयान होय! ते कहे . . ॥ मूळ गाथा १७ मी.॥ एगिदियाण केवल, तेऊ आहारगविणा उ चत्तारि। ते वेउब्धिय वजा, विगला सन्नीण ते चेव ॥ १७ ॥ ॥ संस्कृतानुवादः॥ एकेन्द्रियाणां केवलतेजसाहारकान् विना तु चत्वारि । ते वैकिपवर्ता विफलाः, संज्ञिनां ते चैव ॥ १७ ॥ ॥ शब्दार्थः ॥ पगिदियाण-एकेन्द्रियजीवोने ते-ते (४ समु०) मांधी पेन्विय-क्रिय समु० वजा-रहित आहारग-आहारफसमु० विगला-विफलेन्द्रियोने विणा-विना सन्नीण-संशिजीवोने उ-चळी-अने ते-ते [ साते समु.] पचारि-चार चैय-निश्चय गाथार्थ:-एकेन्द्रिय जीवोने केवलि-नस-आहारक सिवायनी ४ समुद्यात छे, पिकलेन्द्रियो चैक्रिय समु० सिवाय ते ( चार स- सा माथी प्रण) समपातमाला 2. भने संमिनीबोने ( मनुष्यनी भमाये) निप (सा) सापांतो, केवल- केवल समुद्यात तेज-तैनस समु० (८२) देडकविस्तरार्थः 'विस्तरार्थ:-एगिदियाण इत्यादि-एकेन्द्रिय जीवोने के बलि-तैजस-ने आहारक सिवायनी ४. समुद् होय, तेमां पण प्रसनाडीमा रहेला पृथ्वी-अप- अग्नि-ने वनस्पतिना सर्व भेदोमां दरेक जीवने ३ समुद्घात प्रथमनी. होय, अने फक्त केटलाएक (-संख्यातमा भागना) बादरं लब्धिपर्याप्त वायुकायने ज वै- क्रियसहित ४ समु० होय, ने शेष वायुना सर्वभेदोमां दरेक जीवने ३-३ समु० होय. तथा त्रस नाडी बहार लोकना निष्कुट- मा रहेला पांचे एकेद्रियोने वेदनासमुद्घात होय नहि, तेमज क पायसमुद्घात पण एकेन्द्रियोने पूर्वभवानुवृत्तिए थे; पण त्रस जी- वोनी पेठे अत्यंत तीव्राध्यवसायनो अभाव होवाथी कपाय समुद्- घात. प्रायः मनायलो छ, नेमरणसमुद्घात पण दरेकने होय ए- वो नियम नथी. पण दरेक दंडकमांना केटलाएक जीवोनेज होय 'ते उच्चियवन्जा' इत्यादि-ते एटले एकेन्द्रिय संबंधि ४ समु० मांथी वैक्रिय समु० सिवायना ३ समु० विकले० ने होय छे, अनेसंज्ञि जीवोंने आहारक शरीरि-केवली आदि मनुष्योनी अपे- साये सर्व सोते समुद्घाती होयछे. अवतरण--आ.गाथाना पूर्वार्धमां वाकी रहेला दंडके समुद्वातं अने उत्तरार्धथी दंडकोमा दृष्टिद्वार कहे छे. ॥ मूळगाथा १९ मी.॥ पण गम्भतिरिसुरेसु, नारयवाउसु चउर तिय सेसे विगल दुदिट्ठी थावर, मिच्छत्ति सेस तियदिछी॥१९॥ ॥ संस्कृतानुवादः ॥ पंच गर्भजतिर्थक्सुरयो रकवायोश्चत्वारि प्रीणि शेपेपु विकले वेटो स्थावरे मिति शेतित्रो दृष्टयः ॥१८॥ :
॥दर दर्शनद्वारवर्णनम् ॥ अवतरण-आ गाथामा सर्वे दंडके दर्शनबार कहे है। ॥ मूळगाथा १९ मी ॥ थावरबितिसु अचरकू, चउरि दिसु तदुर्गसुए भणिय मणुआ चउदंसणिणो, सेसेसु तिगं तिगंभणियं ॥१९॥ । संस्कृतानुवादः ॥ स्थावरदिनिप्वचक्षुश्चतुरिन्द्रियेपु तद्धिकं श्रुते भणित। मनुजाचतुर्दशैनिना, शेषेपु ग्रिक त्रिक भणितं ॥ १९ ॥" ॥ शब्दार्थः॥ थावर-स्थावरजीवोने भणियं-कहेल छे, वि-दीन्द्रियने मणुआ-मनुष्यो तिम्-त्रीन्द्रियने चउदंसगिणी-४ दर्शनवाया अचर-अचरदर्शन सेसेसु-चाकीना. दंदके चरिदिनु-चतुरिन्द्रियने निग तिगं-त्रणेत्रण .. नपुग-ते थे (दर्शन) भणियं-कहां थे, मुए-सिद्धान्तमा मायार्थ:-स्थावर-दीन्द्रियने त्रीन्दियने अचक्षुदर्शन अने चतुरिन्द्रि यने ये दर्शन (चा सहित) शुनने विपे कयां छे' ममुप्यो ४ दर्श- नवाळा , भने पाकीना दंडकोपांत्रण प्रण दर्शन कमांछे, विस्तरार्थ:-यावर थितिम अपरसाधरना ५ दंडक नया दीन्दिप ने श्रीन्द्रिय ए ७ दंकमां अचदर्शन है, त्यां अचसुदर्शन परीन्द्रिय-रसनेन्द्रिय-नाणेन्द्रिय-प्रोत्रंन्द्रिय- ने मन संबंधी एम ५ मकारनु , नेमन इन्द्रिय अने मन सिवा. यस्वाभाविक लब्धिरूप दर्शनगुणने पण अवशुदर्शन मानवां ६ प्रकार पण अचादर्शन गणाय, तेमा पूर्वभवपापी आना . 7 (4) . दिने दसनवारपर्गनमः॥ अवतरण-आ गाथामा सर्वे दंडके दर्शनद्वार कहे थे. ॥ मूळगाथा १९ मी ॥ थावरवितिसु अचरकू, चउरिंदिसु . तदुगंसुए भणियं मणुआ चउदंसपिणो, सेसेसु तिगं तिगंभणियं ॥१९॥ । संस्कृतानुवादः॥ स्थावरवित्रिष्वचक्षुश्चतुरिन्द्रियेषु तद्धिकं श्रुते भणित। मनुजाश्चतुर्दर्श निना, शेपेपु त्रिकं त्रिकं भणितं ॥१९॥ ॥शब्दार्थः ॥ . थावर-स्थावरजीवोने भणिय-कल छे. वि-दीन्दियने मणुषा-मनुप्पो तिमु-त्रीन्द्रियने चउदंसगिणी-४ दर्शनवाला.. अचर-अचक्षुदर्शन सेसेस:याकीना दंडके, चरिदिसु-चतुरिन्द्रियने निग तिगं-त्रणंत्रण नथुग-ते ये (ये दर्शन) भणियंकडं थे, मुए-सिद्धान्तमा गावार्थ:-स्थावर-द्वीन्द्रियने त्रीन्द्रियने अचक्षुदर्शन अने चतुरिन्द्रि यने वे दर्शन (चक्षु सहित) श्रुवने विप कमां के मनुप्पो ४ दर्य- नवाला , अन वाकीना दंहकोमा प्रण त्रण दर्शन कमांछे, विस्तरार्थ:- :-धावर यितिसु अचस्कू-सावरना ५ दंडक तथा द्वीन्द्रिय ने त्रीन्द्रिय ए ७ दंडकमां अचक्षुदर्शन, त्यां अचक्षुदर्शन स्पन्द्रिय-रसनेन्द्रिप-प्राणेन्द्रिय-श्रोत्रन्दिप ने मन संबंधी एम ५ प्रकारच्छे, तेमन इन्द्रिय अने मन सिवा- य स्वाभाविक लन्धिरूप दर्शनगुणने पण अचक्षुदर्शन मानवां ६ फारर्नु पण अचक्षुदर्शन गणाय, मां पूर्वभवमाथी आक्ता
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॥ पैर दर्शनशासनम् ॥ । (24) अवतरण-आ गाथामा सर्वे दंडके दर्शनवार को ॥ मूळगाया १९ मी ॥ धावरबितिसु अवरकू, चउरि दिसु तदुगंसुए भणियं मणुआ चउदंसणिणो, सेसेसु तिगं तिगंभणियं ॥१९॥ ॥ संस्कृतानुवादः॥ स्थावरदित्रिप्वचक्षुश्चतुरिन्द्रियेषु तद्धिकं श्रुते भणित। मनुजाश्चतुर्दर्शनिनः, शेपेषु किं त्रिक भणितं ॥ १९ ॥ ॥ शब्दार्थः॥. थावर-स्थावरजीवोने भणिय-कहेल छे, वि-दीन्द्रियने मणुआ-मनुष्यो- तिमु-त्रीन्द्रियने चउदंसगिणो-४ दर्शनवाला. अचर-अचक्षुदर्शन सेसेस:याकीना. दंडके चरिदिन-चतुरिन्द्रियने विगतिगं-त्रण प्रण नपुग-तेचे (चे दर्शन) भणियं-फयु , गुए-सिद्धान्तमा गाथा स्थावर-दीन्द्रियने त्रीन्द्रियने अचक्षुदर्शन अने चतुरिन्द्रि यने में दर्शन (पशु सहित) श्रुाने विणे कलां छ' मनुप्यो ४ दर्श नवाळा , अने पाकीना दंडकोमा त्रण प्रण दर्शन कमांछे, विस्तरार्धः-धावर यितिसु अवस्कू-साधरना ५ दंडक तथा दीन्द्रिय ने श्रीन्दिप ए ७ दंडकमां अचाहदर्शन के, त्यां अनक्षुदर्शन पन्द्रिय-रसनेन्द्रिय-नाणेन्द्रिय-श्रोत्रंन्द्रिप- ने मन संबंधी एम ५ कारन में, वेमन इन्द्रिय अने मन सिवा. य साभाविक लन्धिरूप दर्शनगुणने पण अच दर्शन मानतां ६ कारन पण अवक्षुदर्शन गणाय, मां पूसंभवमापी आता -- til सावरलीवाने दकने रस्तामा तया उत्पत्तिस्थाने उत्पम ययाः बाद इन्दिरपयोनि समाप्त न याय त्यां सुधी लधिरूप अवध दर्शन, ने इन्दिर पालिए पर्याप्त यालाने स्पर्शनेन्द्रियरूप अचक्षु मन ना हीन्द्रियने पण पूर्वभवमांधी भावनां मार्गमा भने उत्प- निपान इन्द्रियातीनि समाप्त न पाय त्या मुधी लब्धि स अादन, मो इन्द्रिय पानि पूर्ण या बाद स्पर्शनेन्द्रिय तया मन्दिा गजी प्रकार अगदर्शन है, तेम त्रीन्द्रिय जीर- में दीपिका पादान नाम पण विशेष के इन्द्रिय पय: पूरी को पार न मान-सनासंबंषि ने नाणेन्द्रिय संधि र ३ का प्रदर्शन जागा. ५ सिदिसलग-मिन्द्रिय जीवने ने वे पटले व भने अपना नामां. त्या पनि गर्न मान्द्रियान् सबिना नहाना अचान है, भने सयोग ग. यो या बाद चाप्लाम्बामा चयन कंधु, ५ मावा. सुदनविय-निशाना, नाभा ६ महिना-मनुम्यो । दानवाटा छ, नेपाली सामान्य बन्नुपाने प्रदान गया चीन चतुरिन्द्रिगलन - १. नेत्रुयो के जान बक्सिान भने नन्द ने इ. कनेका भन्दा माने । वन दोनो को पनपन TT ४. :--- न मम करने रडू ४.५१ 11 । ॥ इन्द्रिय समुत्पादासनम् ॥ (७) अपर्याप्त गर्भन मनुष्यने मात्र अचनु दर्शनन होय माटे स. सकाळ १ मकार, अथवा श्री रामने फक्त केवळदनन होय माटे र प्रकारचें दर्शन है, तथा अवधितान अने फेवळझानरहित एक ग मनुप्पने समकाले पशु ने अचक्षुदर्शन लगि होय माटे के प्रकारे, अने अवधिमानी मनुष्यने प्रणे दर्शन सन्धि होय, एम. माणे १-२-३ दर्शनकन्धि समकाळे होय पण ४ लधि न होय, . क्या एक समये एकज दर्शनोपयोग तो दरेक जीव मात्रने जाणवो.. सेसेसु तिगं तिगं भणियं-शेप १५ दंडकमां प्रण प्रण दर्शन कहां थे, त्यां देवना १३ दंडक अने नारफनो १ दंडक ए १४ दंडका वो दरेक देवने अने दरेक नारफने अपर्याप्तपणामां अचक्षु अने अवधिदर्शन वे होय भने पर्याप्तपणामां दरेक देव नारकने प्रणे दर्शनलन्धि छे, परंतु अहिं एटलो अपवाद छे के पूर्व भवमांथो सम्मच्छिम तिर्यंच पंचेन्द्रिय जो देवपणे उत्पन्न थयो होय. तो ते देवने अपर्या० अवस्थामां अवधिज्ञान न होय माटे अवधि.. दर्शनं पण न होय.एम जाण. तथा गर्भज विर्यचमा अचक्षुदर्शन ने चक्षुदर्शन तो चतुरि- न्द्रियवर अने अवधिदर्शन ग० मनुष्यपत कोइकनेज जाणवू.. तथा दंडफमां अनधिकारी सम्मू० तिर्यंच पंचेन्द्रियने अचक्षु वया चक्षुदर्शन चतुरिन्द्रियवत् जाणवू, अने सम्मू० मनुष्यने मात्र, - अपक्षुदर्शनन होय छे कारण के ए जीवो अपर्याप्त अवस्थामांन ॥ इति दर्शनवारम् ॥ अवतरण-आ गायामां सर्व दंडके ज्ञानद्वार कहे छे. ॥ मूळ गाया २०॥ अनाणनाणतियतिया सुरतिरिनिरए थिरे अनाण दुगं । मरण पामे छे.
(८८) । दैठक विस्तरार्थः ।। दु-वे नाणन्नाण दु विगले, मणुए पण नाण तिअनाणा २० ॥ संस्कृतानुवादः ॥ अज्ञानज्ञानत्रिकं त्रिकं, सुरतिर्यग्नैरयिकेषु स्थिरेऽज्ञानदिक। ज्ञानाज्ञानद्विकं विकले, मनुजे पंच ज्ञानानि श्रीण्यज्ञानानि॥ ॥ शब्दार्थः ।। अन्नाण-अज्ञान दुर्ग-चे नाण-ज्ञान नाण-ज्ञान तिय तिय-त्रण त्रण अन्नाण-अज्ञान सुर-देवने तिरि-तिर्यंचने विगले-विकलेन्द्रियोने निरए-नारकने मणुए-मनुष्यने धिरे-स्थावरने पण नाण-५ज्ञान अनाण-अज्ञान ति अनाणा-३ अज्ञान गाथार्थ:-देव तिर्यंच अने नारकने ३ अज्ञान ने ३ ज्ञान छ, स्थावरोने वे अज्ञान छे, विकलेन्द्रियोने के ज्ञान तथा वे अज्ञान छे, अने मनुष्यने ५ ज्ञान अने ३ अज्ञान छे (अहिं ज्ञान तथा अज्ञान ए वे दार कहेवायां). विस्तरार्थ:--अन्नाणनाणतियतिय सुरतिरिनिरए -देवना १३ दंडक, ग० तिर्यंचनो १ दंडक, अने नारकनो १ दंडक ए १५ दंडकमांत्रण ज्ञान ३ अज्ञान छे, एम सामान्यथी कयु, अने विशेषतः आ प्रमाणे- सर्व इन्द्र-दरेक विमानना अधिपति देवो-प्रायः सर्व लोका- न्तिक. ५ अनुत्तरना सर्व देवो ए सर्व सम्पगवष्टि होकायों में- पु. ARART , १५ ARTIf भकिलित - ॥ श्यामन्दिर-मवाना. रिफ देखोने पण सम्पत्ता दोबाधीशान जने मिपानोपा थी ३ मान होय, त्या परसाशमीने पूतनी सोमवार देखना उपदेशादि प्रयत्नपी सम्माता पाप , परन्तु प्रयाधीन सम्पन्न होरानो संभन नपी, गेर नपत्यादि देती उत्सम यतां अने उत्तम गया बाद पण मम्यत्तत्र पुक्क परायी ज्ञानमाला होग अने मि. ध्यारष्टि भवनपत्यादि देवोने ३ अडान होय. ए ममाणे देनोमा ३ सान भने ३ महान कया राद व तियनोमां. कई के, नियंचमां पण ३ शानने ३ अज्ञान . अहिं मियन सामान्य फदेल के वो पण गर्भननिर्यच पंन्दियो न जाणवा, तभोने पर्या- ज भने अपर्याप्त अवस्थामां पण सम्यक्त्तव होचायी३ शान होय अने मिथ्यादृष्टिीने : अज्ञान होप छे. अहिं. नियंचने अपर्याप्त अवस्थापां पण मनुष्यवत परभवथी साथ ला अवधि भने वि. भंगशान होवु केटलाएक मानेछे. अने केटलाएक नहि मानता होवाथी ये मत . परन्तु विशेषतः नो तिर्यचोने गुणप्रत्यपिक होवाथी बन नपर्यादि गुणधी पर्याप्त अवस्थामा अवधि अने विभंग उत्पन्न धाप छ. ए प्रमाणे गर्भन तिर्यंचपंचेन्द्रियमा ३ ज्ञान अज्ञान कयां नारकोमा सातमी पृथ्वीना अपर्याप्त नारक सिवायना १३ नारकोमां सम्यक्त्व होवाथी ३ ज्ञान अने मथ्यात्व होवाथी ३ अज्ञान थे, अने सातमी पृथ्वीना अपर्याप्त नारकने तो केवळ मि. च्यात्यज होवाथी ३ अज्ञान होय पण ज्ञान न होय. नारकोने भ- वमन्यायिक अवधि अने विभंग होवाथी त्यां उत्पन्न यती वखते ए ज्ञान पामे. धिर अनागदुर्ग-स्थावरने २ अज्ञान न छ, भहि सिद्धान्नने मते अल्प पण सम्यक्त्वांश नही होवाथी २ अज्ञान जाणवां, अने फर्मग्रंधकारनेमते पण जेभो पूर्वभवमांधी उपशम सम्पत्यवमतां कि- (९०) ॥ दंडकविस्तराथः । चित् सास्वादन सम्यक्त्व वाकी रह्ये काळ करी एकेन्द्रिय थएला लब्धिपर्याप्त बादर पृथ्वीकाय-अपकाय-अने वनस्पतिकायने अ- पर्याप्तावस्थामां अल्पकाळ पर्यन्त. सास्वादन सम्यक्त्व होते छते पण सास्वादन भावमां कार्मग्रंथिकमते ज्ञान मानेलं नही होवाथी सर्व एकेन्द्रियोने अज्ञानज़ होय छे, नाणन्नाणदुविगले-सिद्धान्तकारमते सास्वादन सम्यक्त्वे ज्ञान मान्यु छे अने केटलाक विकलेन्द्रियोने अपर्याप्तावस्थामां सा- स्वादन सम्यक्त्व मानेलं होवाथी सम्यक्त्ववाळाने २ ज्ञान अने वाकीनाओने २ अज्ञान होय छे. अने कर्मग्रन्थकारने मते सास्वादन सम्यक्त्व छतां पण अज्ञानज कह्यु छे.. मणुए पण नाण ति अनाणा-गर्भज मनुष्योमा ५ ज्ञा. न अने ३ अज्ञान छे ते आ प्रमाणे- एक जीवने समकाले १-२-3 ने ४ ज्ञानलब्धि होय छे, त्यां जे ग. मनुष्यने अवधि-मनः प०-ने केवळज्ञान न होय तेवा सम्यग्द्रष्टिओने मतिज्ञान अने श्रुतज्ञान छे, तथा अवधिज्ञान अथवा मनःपर्यवज्ञान बेमांथी कोइपण एक ज्ञान उत्पन्न थयु होय तो एक जीवने म०-श्रु०-अव० अथवा म०--श्रु-मनः० एम बे रीते ३ ज्ञान होय, ने जेने अवधि अने मनःप० चन्ने उत्पन्न थयां होय तो एक ग० मनुष्यने समकाळे चार ज्ञान होय, ने सबै केवलि भगवानने एकज केवब्ज्ञान होय पण मत्यादि ४ ज्ञान न होय. तथा मिथ्यादृष्टि ग० मनुष्योने विभंगज्ञानरहितने वे अज्ञान अने विभंगज्ञान सहितने ३ अज्ञान, ए प्रमाणे एक ग. मनु०ने सम. काले ५ अथवा ३ अज्ञान छे, इति ज्ञानाज्ञानदारद्धयं, अवतरण-आ गाथामा १५ योगनां नाम कहे छे.
P4 इस-एस. ॥ इन्द्रिय- सतनारस.॥ ।। मृध गापा २१दी.॥ 'सच्चारमीत यसच्च मोस मणवय विउनिहारे उर मोसा कम्मण, इस जोगा देसिपा समप||२॥ संमानानुसार सम्यारमिनासस्पमृपा मनो पोसि पक्रिय भागारक: भोदारिको मियाः फार्मणः पते जगावेशिताः समय॥२६॥ ॥दा:- परलं--भीदारियोग. इयर-भसस्प. पीसा-पपंग मिश्रपोग. मीस-मिभ. फम्मग-कामंगयोगः भसचमोस-भसत्याप्पा. पण-मनोग. नौगा-योग. घप-बनगोग. दसिया-पताम्या के. पेनिफिययोग, समर-सिम्पान्तमां- भाहार-माहारकयोग. मायार्थ:-सत्य-असत्य-मिथ-ने असल्यामृपा (एचार ) मनपोग सपा (ए पारे ) पचनयोग (नपा) क्रिपफाय- योगर-माहारककाययोगर-भौदारिककाययोग३-ने (पत्रणे) मिश्र तथा कार्यगमाययोगश सर्वपली१५योग सिद्धान्तमा कपाडे. विस्तराधा-दारवर्गन प्रसंगे को डे त्यांची जाणवो. अवतरग--ा गायामां सर्वदंडके योगद्वार कहे थे, ॥ मूळगाथा २२ मी;॥ इकारस सुरनिरप, तिरिएसु तेर पनर मणुएसु । विगले चउ पण वाए, जोगतियं (ग) धावरे होइ २२ (१२) ॥ देवा विस्तगः ॥ । संस्कृतानुवादः॥ एकादश सुरनरविकयोस्तिच प्रयोदश पंचदश मनुजे पु विफलेषु चत्वारि पंच वायुपु, योगनिक स्थावरे भवति २२ ॥ शन्दागः ॥ इक्कारस-भगीभार, विगले-विमलेन्द्रिगोने, मुर-देवने १३-४ योग; निरए-नारकने, पण-५ योग, तिरिएम-तिर्थनीने वाए-वायुकायने, तेर-१३ योग, जोग-योगः पनर-१५ योग, तिगं-त्रणः मणुपसु-मनुप्योने थावरे-स्थावरने, होर-छे, गाथार्थ:-देव अने नारकने ११ योग, तिर्यंचने १३ योग मनुष्यने १५ योग, विकलेन्द्रियने ४ योग, वायुने ५ योग, अने स्थावरने ३ योग छे, विस्तरार्थः--इकारस सुरनिरए-देव अने नारकने ११ योग होय ते आ प्रमाणे- पूर्वभवमांथो आवता देवने मार्गमां तथा उत्पत्तिना प्रथम स. मये तैजस कामेण योग, उत्पत्ति स्थाने प्राप्त थयेला देवने द्वितीय समयथा अन्तर्मु० सुधी शरीरपर्याप्ति समाप्त थाय त्यां सुधी अथ- वा वीजे मते अपर्याप्त अवस्था सुधी तैजस कार्मण सहित वै० काययोग होवाथी चैक्रिय मिश्रकाय योग, अथवा उत्तरवैक्रिय रचनार देवने रचनाना प्रारंभमां अने अन्ते वै०मिश्रकाययोग, तदनंतर शरीरपर्याप्ति समाप्त थया वाद अथवा पर्याप्त थया बाद ॥ ए. दानदारखननम् ॥ ४ मनना-बननना ने कियकारयोग एप ९ योग होय मागे सामान्यपणे ११ योग जेम देसमा फया तेम नारकमां पण शिवाला... - 1- . - . . . तिरिपसु तर नियंचनें पूर्वोक्त ११ मां औदानि- अ अने औदाल मरना १३ योग यार ते भा.प्रमाणे- .. मार्गयां मारताने भने उत्पतिना प्रथम समय त, का०, उत्पचिना दिनीय समयपी शरीरापर्याप्नपणा मुधी अपया अपयों तपणा सुधी भोदा. मिश्रा, शरीर पर्याप्तने अथवा पर्याप्पने औदा, पर्याप्तने ४ मनना ने ४ वचनना, फोहक . लन्धिर्वन निर्यच वैक्रिय रचना करे तो रचनाना मारंभमां ने अन्ते 40 मि- श्र, भने २० शरीर संबंधि शरीर पर्याप्ति वा सर्वपर्याप्ति समान घया याद वैफिय काययोग ए प्रमाणे १३ योग होय अहीं वैकि- प रचनाना प्रारंभमां जे क्रिय मिश्रयोग करो छ, ते सिद्धान्नका. रना मते जाणवु अने फर्मग्रन्धकारने मते प्रारंभमांतो औदा०मिश्र मा- न्योछे पण अन्ते पटलेके क्रियशरीर छोडती वखतेन वैफियमिश्रयोग मान्यों है. तिथंचमां जे निचो पोपट विगैरे स्पट भापा चोली श- के तेभोने वचनना चारे योग छ, भने अस्पष्ट भाषा बोलनार ति. यचो पण मनसंज्ञा पूर्वक सत्यादिक सूचाना होपाधी अस्पष्ट भा- पकोने पण ४ भापायोग मानी शकाय, अन्यथा तो सम्मू. निय- चवत् १ व्यय वचनयोग होय, पनर मणुपसु-गर्भन मनुष्योने १५ योग होय. तेमां १ नय प्रबयफ देयाने उत्तर पक्रिय संबंधि वै मिथ ने १० : फाययोग न होय, अने अनुनर घासो देयोने शब्दोच्चारना अभाये प्रवृत्ति का वचनांग पण न होय.
(९४). ॥ दंडकविस्तरार्थः॥ १३ योग तो ग० तियेचवत् ' जाणवा अने शेष वे योग आ म. माणे-आहारक. शरीर रचनार चौद पूर्वधर मुनिने सिद्धान्तका- रने मते रचनाना प्रारंभे अने अन्ते अने कर्मग्रन्थकारने मते प्रारंभ- गांतो औदारिक मिश्र मान्यो छे पण अन्ते एटले के आहारक श- रीर छोडती वखते आहा. मिश्र, अने आहारक शरीरपर्याप्ति पूर्णथया बाद अथवा ६ पर्याप्ति पूर्ण, यया वाद आहा०. योग हो- य ए प्रमाणे अनेक जीव आश्रयि मनुष्यने १५ योग कह्या, विगले चऊ-विकलेन्द्रियोने ४ योग होय ते आ प्रमाणे- पूर्वभवथी ओवतां मार्गमा अने उत्पत्तिना प्रथम समये तै०का०, उत्पत्तिना वीजा समयथी. शरीरापर्याप्तावस्था अथवा अपर्याप्ता: वस्था सुधी ओदा०मिश्र, अने पर्याप्तावस्थामां आखो भवपर्य- त ओदा. अने व्यवहार वनयोग ए वे योग के ए प्रमाणे विकलेन्द्रियना ४ योग. पण वाए--वायुकायने ५ योग छे तेमां ते का०-औदा. -ने औदा०मिश्र ए ३ योग विकलेन्द्रियवत् जाणवा अने वै- मिश्र तथा वै०काययोग गर्भनतिर्यंचवत जाणवा, वायुकायने व- धनयोग होय नहि. जोगतिगं थावरे होइ-वायुकाय सिवायना ४ रथादरीने तेका०-औदा० मिश्र-अने औदा० ए ३ योग छे ते दिव.ले. न्द्रियवत् जाणवा. अहि तै० का० काययोग जो के पर्याप्त अवस्थामा पण होय उतां भवधारणीय शरीरनी मुख्यता छोपाथी भवधारणीय शरीर- १ परन्तु विशेष ए छ फे-श्री सर्वशने समुद्घात समये भाठ समयमां घीजे छठे ने सातमे समये औदा. मिश्र तथा श्रीजे चौथे ने पांचमे नये कार्मण योग होय छे, ॥ उत्तरसक्रियकालवनमः ॥ . बोन पोग गणाप, मथा एक जीवने ममकाले उपयोग पूर्वकनी १ज योग के, परन्तु उपयोग रहिन चेप्टामानने योग गणीए नो बधुपां पधु : मननी १ वचननी अने प्रौदा. साये पाहायला आहा०मिश्र वा वै० या वे०मिय ए ये फाययोग भयवा मूळचे. माये वै०मिश्र एम पांच रोते ये कापयोग मळी ४ योग होय कार- के आदा. अने वैक्रिय ए ये शरीर सपकाळे एक जीवने न होय. वया दंडकमां अनधिकारी समुतियच पन० अने समु० म. नुप्पने पूर्वोक्न पहनिए ने फा० औ मिश्र ने औदा० ५३योग कायाना भने व्यवहारभापारूप १ वचनयोग मळी ४ योग विकले- दियवत् होय छे. ॥ इति योगद्वारम् ॥ . । अवतरण -आ.गाधामा १२ उपयोगनां नाम कहे के. ॥ मूळ गाधा २३ मी.॥ ति'अनाण नाण पण चड, दंसण चार जिअ लक्खणु वयोगा इय वारस उवओगा, भणिया तेलुक्क दंसीहि ॥२३॥ ॥ संस्कृतानुबादः ॥ योगज्ञानानि ज्ञानानि पंच, चत्वारि दर्शनानि बादश जीवलक्षणोपयोगा। एते द्वादश उपगोगा मणितान्त्रिं लोक दशिभिः॥ २३ ॥ ॥ शब्दार्थ: ॥ नि- लखण-लक्षण रूप उपभोगा-उपयोग -त्रण अनाण--अज्ञान - (९८) ॥ दंडकविस्तरार्थः ।। पुनः आ मनापर्यत्र ज्ञान जो के अध्यवसायनी निर्मलताथी यायचे. पण नवाप्रकारनी. जगतमर्यादाए ए अध्यवसायो द्रव्यभावमुनिलिंग, धारीनेज आवी फेछ माटे ए ज्ञान मुनिवेष सिवाय वीजा गृहस्यादि वेपमां होतुं नधी माटे तिर्यचादि १५ दंडकमाँ मुनिलिंगपूर्वक अध्यः सायनी नयाप्रकारनी निर्मलताना अभाव अप्रमत्तादिपणानो अ. भाव होवाधी चारित्रप्रत्यायिक मनापर्यवज्ञान होतुं नथी, अने भाव- चारित्रना अभाये केवलज्ञाननो अभाव होवाथी केवळज्ञान अने पळदर्शन पण होय नहि माटे तिर्यचादि १५ दंडकमां. ए उप- योगनो पण अभाव छ तथा ए९ उपयोग पण अनेकतिर्थचपंचेन्द्रिय भनेक देव भने भनेक नारकनी अपेक्षाए कह्या छे. पण दरेक तिय- चन्द्रियादिने लधिभाव समकाळे न होय माटे एकातिर्थचने या दरने वा ? नारकने केदला उपयोग होय ते. पूर्वोक्त पद्धतिए स्वयं विचारवा. विगलदुर्ग. पण--विकलाद्विक एटले द्वीन्द्रियने तया वीन्द्रियने मतिज्ञान मनिज्ञान-शुतज्ञान-श्रुतअज्ञान-ने अचक्षुद- धन प ५ उपयोग छ नेमा पूर्वभव उपशम सम्यकत्व वमीने सास्वादन सम्बकल किचिन शेप रहेतां मरण पामी दीन्द्रिय त्रीन्द्रियपणे उ. FA बेला जीवाने अपय अवस्थामा अन्त, मात्र ने ज्ञान ने अचा. द. महिन । उपयोग होय नेत्यारवाद ते नया अन्य सा दीन्दिय त्रीन्द्रिय जीवोन सदाकाळ वे अज्ञान ने भचक्षुदर्शनरूप उपयोग होय. उपवं. चारिदिनुचरिन्द्रियजीवोने शुदर्शनमदिन उपयोग होय मवभावना दीन्द्रिययन जाणवी. यावर वियांशाहाना देकपा मतियान अनवान - मदान र वन, कमान्य काम गरे मानापार- ॥ उपपात-न्यवनहारवर्णनमः ॥ द्वारपां वर्णच्या प्रमाणे जाणवू तथा दंडकमा अनधिकारी पवा सम्मू० तिर्यचपं० नया स- म्म० मनुष्यने पण स्थारखत ३ उपयोग जाणवा, ॥ इति उपयोगदारं ॥ अवतरण--भागाधामां दरेक दंडके उपपातद्वार अने च्यवन द्वार ए वे द्वार कहे . संखमसंखा समए, गभतिरिविगलनारयसुरा य । मणुया नियमा संखा, वणणंता थावर असंखा ॥२५॥ संस्कृतानुवादः संख्या असंख्येयाः समये गमजतिपराधिकलनारकमुराक्ष मनुजा नियमान संख्येया बना अनंता:स्थायरा असंख्येपाः२५ ॥ शब्दार्थः॥ संघ-संख्याता मणुभा-मनुप्पो असंखा-असंखगाता नियमा-निधयधी समए-एक समयमा मंखा-संख्याता गम्भनिरि-गर्भननियची वण-वनस्पति निगल-विकलेन्द्रियो अणता-अनन नरय-नारको थावर-स्थानरो मुरा-देवो अमखा-भगग्न्याना प-भनी गापा:-मननियंत्र-विमलेन्दिप-नाएक-अंने देवो एक समयमा मल्पात अथवा अमंल्यान (उपने भने घर) मनुष्यो निधय मापाताज, बनम्नतिकापजीयो भत, अने म्याधरो भ. मंग्यान ( उपजे भने चर) (१००) । दंडकविस्तरार्थः। विस्तरार्थः-आ गाथामां या दंडकना जीवो एक समय- मां एटले समकाळे केटला उपजे ! अने मरण पामे ? तेनी संख्या नो नियम जणाक्वा माटे कहे छे के--संखमसखा समए-गन- तिरिविगलनारयसुरा य-गर्भनतिर्यंच-द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-च- तुरिन्द्रिय-नारक-ने देवना १३ ए प्रमाणे १८ दंडकना जीवो १ समयमा जघन्यथी संख्यात एटले कमीमां कमी. १--२--३ यावत् उत्कृष्ट संख्याता उत्पन्न थाय, अने उत्कृष्टथी असंख्याना उत्पन्न थाय, पण अनंत न उपजे, कारणके ए१८दंडकमांदरेक दंड कनी अंदर त्रणे काळमां तपासीए तो सर्व जीयो पण ' असंख्यज छे. पुनः मरण पण एटला ज जीवो पामे ए प्रमाणे आगळ सर्वत्र उत्पत्तिवत् मरणसंख्या जाणवी, तथा-मणुआ नियमा संखा--गर्भजमनुष्यो निश्चयथी. सं- ख्यातज छे. अने ते पण बेनी संख्यानो ६ वार वर्ग करी ५ मा. वर्ग साथे गुणाकार करे तेटली अथवा१ने९६वखत ठाण वमणा क- रे तेटला ग० मनुष्यो छे. ते सर्व संख्या ७९२२८१६२५१४२६- ४३३७५९३५४३९५०३३६ ए प्रमाणे २९ आंकडानी संख्याए गर्भजमनुष्य होय छे, अने मनुष्यना अशुचि १४ स्थानकोमा उ. पजता सम्मूच्छिमः मनुष्यो असंख्याता ज होय छे तेथी बेउ (ग सं०) मनुष्योनी संख्या असंख्यात प्रमाण थाय, पण कोइक का. लविशेषमां सम्मूच्छिमनो २४ मुहूर्तनो विरहकाल पडे थे, ते व- खते पूर्वना उत्पन्न थयेला अन्तमुहूर्तनु आयुष्य होवाथी अन्तर्मुह- ते चवी जाय छे. ते वखते साधिक २३ मुहूर्त सुधी एकला गर्भज मनुष्यो ज होय छे तेनी संख्या उपर लख्या प्रमाणे जाणवी, वैमानिकदंडकमां सर्वार्थ सिद्धमांज मात्र संख्यात देवो छ, शेष सर्व देवलोकमा असंख्य देवोते, 1 - - + ।। दंडका दर्शनद्वारवर्णनम् ॥ वणता-वनस्पति काय रूप? दंडकमां एक समय अनंत जीवो उत्पन्न याय, अने मरण पाम . त्या प्रत्येक वन- स्पतिजीतो असंख्यात ज होवाथी एक समयमा असंख्य उपजे अने अमेस्य मरण पामे, अने सूक्ष्म साधारणवनस्पति तथा यादरसा- धारणवनस्पति र पत्रमा प्रतिसमय एक निगोदगत जीवरा- शियी असंख्यानमा भाग जेटला जीवो उत्पन्न यायळे अने गरण पामे है, कारण बने वनस्पतिजीयो जगत्मा अनंत अनंत छ, थावर असंखा-वनस्पति सिवाय पृथ्वीकायादि ४ दंदकना जीवो एकसमयमां असंख्यात उपजे अने असंख्यान मरण पामे कारण पृथ्वीकायादि चारे जीवो असंख्य असंख्य छ, पण भ- नन्न नधी वळी एमां कोइ पण समये संख्यात जीवो न उपजे. अवतरण-आ गाथाना पूधिमां बाकी रहेला दंडके. उप- पान अने च्ययन द्वार अने उत्तरार्धधी दरेक दंडके आयुप्पद्वार कदे. मूळ गाथा २६ मी. ॥ असन्नि नर यसंखा, जह उववाए तहेव चवणे वि। वावीस सग ति दस यास--सहस्स उकिह पुढवाइ. २६ ॥ संस्कृतानुवादः ॥ असंज्ञिनरा असंख्येया, यथोपपातस्तथैव च्यवनमपि । द्वाविंशत्सप्तत्रिदशवर्ष-सहसा उत्कृष्टं पृच्यादयः॥२६॥ ॥ शब्दार्थः ॥ भसन्नि -असंलि (मम्मृच्छिम )[ अवाए- उपपानद्वारमा नव-नगरी रीतन असंम्बा- अमंदयान चवणेऽवि- यवनहारमा पण जाहीरीने चावीस यावीम ii नर--मनुष्य (१०२) ।। दंडकाविस्तरार्थः ॥ ति--त्रण सग-सात सहस्स- हजार उकिट--उत्कृष्ट दस दश पुढ़वाइ--पृथ्वीकायादि वास--वर्ष गावार्थ:-सम्मूच्छिम मनुष्यो ( एक समयमां) असंख्यात (उपजे ने चचे ) ए प्रमाणे जेवीरीते उपपातद्वारमा ( कह्यु ) तेवा रीते ज च्यवनदारमां पण (कहेवू). पृथ्वीकायादिजीवोर्नु उत्कृष्ट आयुष्य २२००० वर्ष--७००० वर्ष-३००० वर्च ने १०००० वर्ष ( अनुक्रमे जाणवू) विस्तराधः-असन्नी नर असंखा-असंज्ञिमनुष्यो एक समयमा असंख्यात उपजेछे. ने चवे छे, अहिं दंडकमा अनधिकृत एवा सम्मू० मनुष्योनी संख्या पण कही. पुनः जे रीते उपपातदारमा छे. तेज रीते च्यवनद्वारमा पण छ, (के जे उपपातनी साये सार्थ च्यवन द्वार पण कवायु छ,) एवी रीते उपपात--च्यवनदार समय संख्याए कडं पण ते उपपातनो अभाव कया दंडकमां केटला काळ मुधी होय ते " उपपातविरह" अने कया दंडकमां केटला काळ मुधी कोइपण जोव मरण जन पाम ने "च्यवनविरह" पण प्रसंगी कहेवाय छे- उत्पत्तिच्यवननो विरह काल. दंडकोमा माने नरकमां १२ मुहूर्त कलनामा २१. मुहर्न ७ दिवा जयः १ ममय ल ॥ देशलिस्तरा॥ १५ मा मास २मास ६मास २४ मुहूर्त " " " वालुकामभाषां पंकरभाषा भूपसभामा नमःमभामा तपस्नपामभापां पारेनिकायना देवीमा भवनपतिमा व्यन्तर ज्योनिपी सौधर्म इनान सनत्कुमारमा माहेन्द्रमा ब्रह्मलोकमां लांनकमा भूमामां सहवारमा माननमा प्राणतमां भारणमा अच्युनमा " ७ " " ९ दिवस-२० मुह •२ दि०-१० मुह २२॥ दि. ४५ दि० ८०.दि. १०० दि० संख्यातमास (१० मास) "(११ मास) संख्यवर्प (१००वर्षे नी अंदर छे.) " " (१०४) || देडफविस्तरा॥ AMM M प्रथम त्रण वैयके -- संख्गात १०७ वर्ग (-१००० नी अंदर संख्यात १००० वर्ष -१ लाखनी अंदर Ramniwali वीगां प्रण ग्रेयेयके mananews NRN- बीजाग्रेवयक सख्यान लक्षवर्ष hotomomen - ४ अनुत्तरे (--२ कोडनी अंदर पल्योपमनोअसे ख्यातमो भाग पल्योनोसंख्यातमो भाग १२ मुहूर्त A सर्वार्थसिद्ध - " " २४ मुहूर्त अन्तर्मु० " गर्भजतियेचमा गर्भज मनुष्यमां सम्मू०मनुष्य दीन्द्रियमां त्रीन्द्रियमां चतुरि०मां असनिपंचे० पृथ्वीकाय अपकाय अग्निकाय अन्तर्मु० विरह नथी | विरह नथी वायुकाय घनस्प० " ॥ देना उपपाल-क्यानबारवर्णनम् ।। र प्रमाणे ज्यां जेटलो रिहा क्योसानेटमा पाल मुधी कोरपण जीव नको उपने नहि, तेप कोई परे पण नर्षि, नपा दंडकमा अनधिकन सम्मृ० मनुष्योनी एक समयमा उ- सत्ति च्यवन गल्या नो अंधकार गायामांन कहो भने सम्मू०५- दिय तियन एक समयमा निश्रय असंख्यात न अपने भने असं- ख्यात मरण पामे, पण संन्यात नहि, ।। इति उपपात-पवनबारयुगलम् ॥ . - हये दरेक दंडकमां भायुप्पद्वार कहवाना प्रारंभमां पाषीस सग ति दस वास सहस्सुफिट पुढवाई-पृथ्विकायादि पां- चनुं अनुक्रमे २२००० वर्ष-७००० वर्ष-३००० वर्प-२०००० वर्ष-उत्कृष्ट आयुष्य छ एम सामान्यतः का, अने विशेषतः आ प्रमाणे- पृथिवकायमां हीरा-पन्ना विगैरे अनिनकर पृथ्विनुं २२००० वर्ष आयुष्य हे, कांकरा-इडताल-मुरमादिक- २८००० वर्ष आ- युप्य. मणसिल विगैरेनु १६००० वर्ष, रनिनुं १४००० वर्ष, गो. पीचंदन कुमारमाटी विगैरेनु १२००० वर्ष भने मुंहाळी माटीनुं १००० वर्ष आयुष्य छे. शेप पृथ्वीभोनुं आयुष्य श्री सर्वज्ञप्टिए जे होय ते जाण', ते उत्कृष्ट आयुप्य निर्याघात स्थानमा रहेला र. त्नादिफन नाणवू, अन्यथा नघ० आयुष्य दरेकर्नु अन्तर्मुख छे. नधा निर्व्याघात स्थळे रहेला घनोदध्यादि जळनु, अग्निनु, वायुनुं वनस्पतिनु उत्कृष्ट आयुष्य केटलाक जीवोनुन होइ शकेले. पुनः बनस्पनिमां फक्त यादर मत्येक वनस्सनुन उत्कृष्ट आयुष्य
(१०८)
॥ दंडकविस्तरार्थः॥
अवश्य उत्कृष्ट आयुष्य होय अने प्रजा देव-देवीयोर्नु (ज्योतिषी
सिवाय ) सर्व प्रप्रकारे आयु. होय,
अवतरण-आ गाथामां पण (भुवनपति-ने विकलेन्द्रियो-
मुं) आयुष्य कहेवाय छे,
मूळ गाथा २८ मी,
असुराण अहिय अयरं, देसूणदुपल्लयं नव निकाए
बारस वासुणपणदिण, छम्मासुक्किक विगलाऊ ॥२८
॥ संस्कृतानुवादः॥
असुराणामधिकमतरं, देशोनद्विपल्यं नव निकायेषु ।
द्वादशवर्षोंनपंचाशदिनषण्मासा उत्कृष्टं विकलायुः २८॥
॥ शब्दार्थः॥
असुराण-असुरकुमारोनु
वास वर्ष
अहिय-कंइक अधिक
अयरं-१ सागरोपम
देमूण-कंइक न्यून
दिण-दिवस
दुपल्लं-ये पल्योपम
छम्मास-६ मास
नव-नव (९)
उकिट्ट उत्कृष्ट
निकाए-निकायमां (भेदमां) विगल-विकलेन्द्रियोनु
आऊ-आयुष्य
गाथार्थ: :-असुरकुमार ( निकाय) नु कंइक अधिक १
सागरोपम ( उत्तर आयुष्य ) छे, अने ( शेप )नव निकायोनु
उण-२ न्यून }- ४९
पण-पचास
वारस-चार
॥ दंडकेषु आयुरिवर्णनम् ।। (१०९) आयुः) इक न्यून २ पल्पोपम छ, तथा विकलेन्द्रियोनु उलए आयुष्य (अनुक्रमे ) १२ वर्ष-४९-दिवस ने ६ मास (जेटल) है, . विस्तरार्थ:-सुगम छ, विशेष आगळ ओपेला यन्त्र जुभो, - । . अवतरण --आ गापामां (पृथ्व्यादि १०. पदोनुं तथा भव- न० नारक ने पन्तरोनु जय० आयुष्य कहेवाय के, मुळ गाथा २९ मी. पुढवाइ दस पयाण, अन्तमुहुत्तं जहन्न, आउठिई। दस सहस वरसठिइआ, भवणाहिव निरयवंतरिया २९ संस्कृतानुवादः पृथ्व्यादिदशपदाना- मन्तमुहर्तजघन्यमायुःस्थितिः । दशसहस्रवर्पस्थितिका, भवनाधिपनरपिकव्यन्तराः॥२९॥ शब्दार्यः पुरवाइ-पृथ्विकाय विगैरे दससहस-दश हजार दस-दश (१०) परिस-वर्ष पयाणं-पदोनु-दटकोनुं हिमा-आयुष्यवाळा अन्तमुहुर्च-अन्तर्मुहर्त भरणादिव-भवनपनि जन-जपन्य-अति अल्स निरय नारफ आठिइ-आयुष्यनी स्थिनि वन्नरिया-म्पन्नरो गायाधं-निकाय वगैरे १० दंडकोनी नपन्य भास्थि- नि भन्नहि , अने भवनपनि-नारफ ने व्यन्नरो (जर० यी) १०००० वर्पना आयुप्यराग, विस्तराधः-गुगम , विशेष भागळ भारेली पर जुभो.
(११०) ॥ दंडनिस्तरार्थः ।। ॥ देवोनुं वायुष्य ॥ देवोर्नु जघ उत्कृष्ट १० हजार वर्ष १ सागरो० ३|| पल्यो० साधिक १ सागरो ४|| पल्यो० २॥ पल्यो ०। पल्यो० " देशूण २ पल्यो० द० अमुर० देवोर्नु द० " देवीन उ० " देवन उ०" देवीनुं द० ९ निकायदेवर्नु दः " देवीनुं उ० " देवर्नु उ० " देवीनुं व्यन्तर देवर्नु व्यन्तर देवीनुं चन्द्र इन्द्रनु चन्द्रनी प्रजादेवनुं सूर्य इन्द्रनुं सूर्यना प्रजादेवोर्नु " १ पल्यो० १ पल्यो० ॥ पल्यो० १ लाखव वर्षाधिक १ पल्योपम १० हजार वर्ष १००० वर्षाधिक १ पल्यो० १०००० वर्ष (११२) ॥ दंडकेषु आयुरिवर्णनम् ॥ १ पल्यो. ग्रह अधिपतिर्नु ग्रह देवोर्नु १०००० वर्ष ॥पल्यो • पल्यो १०००० वर्ष " साधिक | पल्यो. " १००००० वर्ष सूर्यथी अर्थ 1 १०००० वर्ष नक्षम अधिपतिनुं नक्षत्र देयोनुं नारा अधिपतिर्नु तारा देवोर्नु मूर्यनी इन्द्राणीनुं मूर्य 'देवीयोर्नु चन्दनी इन्द्राणीनु चन्द्र देवीयोन ग्रहाधिपति देविन ग्रह देवीयोन नक्षत्राधिपति देवीनु नक्षत्र देवीयोन नाराधिपति देवीन चन्द्रयी अर्ध १० हजार वर्ष ग्रहमी अर्ध १०००० वर्ष नक्षत्रयी अर्थ १०००० वप वाराथी अर्थ , अहि दगीगी मजा योयो जाणधी.
(११२) ॥ दंडकविस्तरार्थः ॥ marzoma-m २०००० वर्ष " १ पल्यो ३ पल्योपम तारा देवीयोन अधो किलिविपिकनुं सीधर्म देवोर्नु ईशान देवोर्नु १ पल्पो० २ सागरो० साधिक १ पल्यो० साधिक २ सांगरो० २ सागरो० सौध० इन्द्रनु ईशान इन्द्रन साधिक २ सागरो० ७ पल्यो ५० पल्यो सौध० परिगृहीता १ पल्यो० देवीनुं सौधर्म अपरिगृहीता देवीयोनुं ईशाने परिगृहीता | साधिक १ पल्यो देवीयोन ईशाने अपरिगृहीता देवीयोन मध्य किल्लिपिकोनुं ९ पल्यो . " ५५ पल्यो० २ सागरो० ३ सागरो० ७ सागरो० सनत् कुमारेन्द्र सनत कु० देवोर्नु " २ सागरो० १ अहिंथी आगळ देवीओनी उत्पत्ति नथी माटे आयुष्य पण कधु' नथी.
॥ दंडका उपपाव-पानशासनम् ।।
८
माहेन्द्र'देवोन साधिक २ साग | साधिक सागरी
मन देवोन
७सागरो १. सागरी
९ लोकांतिन
उकिल्विपिकोन १०॥
लांतफ देवोर्नु
१० सागरो.
शुक्र देवोन
१४ सागरो०
सहस्रार देवोर्नु १७ सागरो०
आनन. देवोर्नु
पाणत देवोर्नु
आरण देवोर्नु
अच्युत 'देवोर्नु
२२ "
१ ली ग्रेवयानु
१८"
२०"
२२ "
२ जी"
२३ "
३ जी"
२४"
२५ "
* विचार सप्ततिका ग्रन्थ,
१-२ ए नए दयलीफना इन्द्रोनुमात्र उत्कृष्ट भायुष्यज छ.
३ अद्विथी आगळ मर्यत्र दयाज छ पण इन्द्रादि भेद नथी
(११४)
॥ दंडकविस्तरार्थः ॥
२५ "
२६ "
४ थी"
२७ "
५ मी,
२६
२८ "
२७"
६ ही"
२९
२८"
७ मी"
८ मी"
३० "
२९ "
४
३०
३
९ मी"
३१ "
३३ "
४ अनुत्तरे
सर्वार्थसिडे
॥ दंडका आयुवर्णनम् ॥
॥ नारकर्नु आयुष्य ॥
पृश्चिमा
जघन
30
१.०००० वर्ष
१, सागरी
१ सागरो.
रत्नप्रभामा
राप्रभामा
वालुकामभामा
पंफमभामां
धूममभामा
७'"
१० "
.
२७ "
तमामभामा
२२ "
तमस्तमःप्रभाषां
२२."
ए प्रमाणे वैमानिक देवो उत्कृष्ट भायुष्य सर्वथी परना मत.
रमां जाण अने नारफोनु उ० आयुष्य सर्वथी नीचेना प्रतरमा
जाण३, अने ज्या १ ज प्रतर होय त्यां केटलाएकनु नप० ने के.
टलाएकनु उत्कृष्ट जाण, शेप मनरोमां केटलं आयुष्य ले तेनो .
विस्तार सिद्धान्नादिकधी जाणवो.
(११८)
॥ दंडकाविस्तरार्थः ॥
पूर्वकोडवर्ग
गर्भग उसपरिसपर्नु
'गर्भज भुजपरिसपर्ने
गर्भज खेचरनु
संस० स्थलचरनुं.
संमु० जळचरनुं
संमु० उरस्परिन्न
संमु० भुजपरिनु
संमु० खेचरनुं
अपर्या० तियेच नुं
पल्योनोअसंख्यातमो
भाग
८४००० व
पूर्वकोड वर्ष
५३००० वर्ष
४२००० वर्ष
७३००० वर्ष
अन्तर्मुख
- ॥ दंढा भागुरिवर्णनम ॥ अवतरण-आ गापाना पूर्णिमा चाकी रहेला देशकोन न.. १. आयुष्य भने उनापी दंघकोमा पतिवार कवाय .. ।। मूळ गाथा १० मी.॥ वेमाणिअजोइसिया, पालतयट्ठसआउया हुंति । सुरनरतिरिनिरासु, उपजत्तो थावरे चउगं ॥३०॥ ॥ संकतानुवादः॥ वैमानिकम्पोतिप्का: पल्पतदष्टांशायुप्फा भवन्ति । गुरनरतिर्यग्रपिकपु, पद पर्याप्तयः स्थावरे चतुष्कं ॥३०॥ ॥शन्दा चैमाणिय-मानिकदेवो नर-मनुष्योने जोइसिया-ज्योतिपोदेवो निरि-नियंचोने पल्ल-१ पल्योगम निरएम-नारकोने नयटुंस-तनो(पल्योनो) आठमा भाग) पजत्ती-पर्याप्तियो आउधा-आयुष्यवाळा थावरे-स्थायरोने चगं- पर्याप्तियो सुर-देवोने गाथार्थ:-वैमानिक देवो (जघ. धी) १ पल्पोपमना,' अने ज्योतिषी देवो ( जय० थी) पल्योपमना आठमा भाग - टला आयुप्यपाला , देव-मनुष्य-तिर्यच भने नारकोने ६ पर्या- जि. अने स्थायरोने ४ पर्याप्लियो छ, चिस्तराधः-येमाणिय जोइसिया परल तपसभा. उआ हुन्ति मानिफनु नप० आयुष्य १ पल्योपम ने सौधर्म . देवटोफना देवोने आश्रपि जाण. अने ज्योनिपीन आयुष्य प- स्पोपमनो आठमी भाग ले ते ताराना विमानवामी देवोनी अपे.
(१२०) ॥ दंडविस्तरार्थः ॥ क्षाए जाणवू, शेप देवोने एथी अधिक आयुष्य छे ते संबन्धि वि- शेपता यन्त्रमा कही छे, सुरनरतिरिनिरएमु छ पजत्ति-देवोने, गर्भज मनुष्योने -गर्भन तिर्यंचोने अने नारकोने ए सर्व जो लब्धि पर्याप्ता दोय तो तेओने ६ पर्याप्तियो होय छे, थावरे चउगं.---लब्धिपर्याप्त स्थावरोने आहाने--शरीर--इ- न्द्रिय अने उच्छवास ए ४ पर्याप्ति होय छे, अवतरण-आ गाथामां विकलेन्द्रियोने पर्याप्ति तथा सर्व दंडके कइ दिशिनो आहार होर ? ते कहेवाय छे, ॥मूळ गाथा ३१ मी.॥ विगले पंच पजत्ती, छदिसि आहार होइ सव्वेसि पणगाइपएभयणा, यह सन्नतियं भणिस्सामि ॥३१॥ |संस्कृतानुवादः॥ विकले पंच पर्याप्तयः पदिगाहारो भवति सर्वेषां । पनकादिपदे भजना, अथ संज्ञात्रिकं भणियामि ॥ ३१ ॥ ॥शब्दार्थः।। १. देवीने सिद्धान्तमा (~श्री भगवती जी मां) ५ पर्या- प्तिया पण काही छे, परन्तु भाषा अने मन पाप्ति एक स. मयमां समकाळ उम्पन थवाधी ए ये पर्याप्तिने पक गणा छ, माटे बन्नुतः तो देवने ६ पयांप्तिज कवाय, पुनः अनुतर. बानी देवात शब्दोच्चार करवा जकर नहिं होवायी शब्दा. चार करता नयी परन्तु शक्तिरूप ववन पर्याप्ति है. नया श्री विचारताततिकामां देवन नामकने वन्न ने. मूळ वैतिर नया उत्तर वैक्रिय मधि उपरोक्त बात -५ यांग्लियो कही है.
अह-हवे ॥ दंडका आहारबारम् ॥ (१२१) विगले-विकलेन्द्रियोने [अथवा मूवनस्पत्यादि। पंच-पांच पदे-स्थानंकमा पज्जत्ती-पर्याप्ति : भयणा-भजना-विकल्प उद्दिसि-7 दिशाओधी आहार-आहार सन-संज्ञा होइ-2.. तियंत्रण सन्वेसिं-सर्वदंडकोने भणिस्सामि कहोश पगगाइ-पांच दिशि इत्यादिक .' गाधार्थ:-विकलेन्द्रियोंने पांच पर्याप्ति में. ६ दिशिथी आवलो आहार सर्व जीवोने होय छ पण पांच दिशि इत्यादि (च. ण) पदमां (-५ दिशि-४ दिशि-ने ३ दिशि ए ३ पदमां) वि. कल्पे छ, चीजो अर्थ-सर्व जीवोने ६ दिशिधी आवेलो आहार होय छे, पण मू० वनस्पत्यादि (पांच) स्थानकोमा विकल्प छे, हये घण संज्ञाओगें मार कहीश. विस्तराध:--विगले पंचपज्जत्ती विस्लेन्द्रियोने आहार - शरीर--इन्द्रिय-- उखामने भाषा ए पांच पर्याप्ति , कारण ए जीवोने जीहाइन्द्रिय अने मुस होवायी अव्यक उच्चार क. री शक , अने सम्मृच्छिम होवादी मननो अभाव छ पाटे मनः- पनि होय नहि. नपा दंटकमा अनधिकृत सम्मृ०मनुष्य आदार-शरीर- इ. न्द्रिय ए ३ पर्याप्निया होय, भने मम्म निर्गय पंने० ने विरुले. वन् ५ पर्यानियो होय. ॥ इति पर्याप्तिहारम् ।। " (१२२) ॥ दंडविस्तरार्थः ॥ हवे दिशि आहारद्वारमा प्रथम छदिसिआहार होइ. सव्वे- सिं-सर्व दंडकमां छए दिशिथी आवेलो ओज आहार अने लोम आहार होय, कारणके सर्वे दंडकना जीवो लोकनी अंदरना भा. गमा रह्या छे, परन्तु विशेष ए छे के पणगाइ पए-पनक एटले सूक्ष्म वनस्पति इत्यादि पांच पदमां (-मू० वन० बन्ने वायु--सू अग्नि--सू० अपने मू० पृथ्विने ) भयणा--भजना एटले विक- ल्पे, अर्थात् छ दिशिनोज आहार होय एवो नियम नहिं परन्तु ६-५--४--ने ३ दिशिनो आहार पण होइ शके, कारणके, ए जी वो लोकनी अंदरना भागमा अने लोकने अन्ते--किनारे पण रहे- ला छे. त्यां ६-.५--४--३ दिशिनो आहार केवी रीते होय ? ते दर्शावाय छे- लोकना सर्वथी नीचेना छेल्ला प्रतरोमां निष्कुट स्थाने खूणे रहेला एकेन्द्रिय जीव नीचे अलोकाकाशनो व्याघात होवाथी पु- द्गल द्रव्यना अभावे अधो दिशिनो आहार न ग्रहण करे, अने दिशिमां पण अलोकाकाशना व्याघाते पुद्गलागमन नहिं होवा- थी खूणानी बे पासनी थे दिशाओमांथी पण आहार न मेळवी शके माटे लोकनी नीचे छेडे रहेला जीवने ३ दिशानोज आहार मळी शके, अने एज प्रमाणे लोकना सर्वोपरि अन्ते निष्कुटस्थाने खूणामां वर्तनो एकेन्द्रिय जीव बे दिशीथी अने ऊर्ध्व दिशीधी आहार न मेळवी शके माटे बे रीते ३ दिशिनो आहार एकेन्द्रि योने ज होय. लोकना सर्वथी नीचेना छेल्ला प्रतरोमां निष्कुट स्थाने दि- १ एकेन्द्रियोना २२ भेदमांथी वायु ने प्रत्ये० वन- सि- वायना ४ बादरो नहिं होवाथो १२ भेद लोकने अन्ते रयाछे पम श्री भगवती जीमां क छे.ह्यु
irriगली दिसली नोने बने कमाविमामा मो.
काकानवापी मानी मारीदि
गिनी श्रार कर.५प्रमाणे Riftaat Tutrit
श्री एक नीतिनिधी साना Art
मोबा.
समापीमा पकाने मां int
मोकने भन्ने दिमागी मानी.
माए भगोकनी Anी कामना करी .
सामादिभिआयो भाrani
भोपानी ना भाग गधा पनि हो
विचार मानी पानिमागी र शिविमापी
भारती ति माहारबारम || सपा सम्म
गि ने सम्म पनुपने ६ दिग्मिी भार य भने नीना
निराहारीपणानां मम भासारना वर्णन in क्यों,
॥ इति माहारवारम् ॥
मपEAR या सापरितन प्रनमालोमा तान्ति
भाग पनि अदरमा भागमा रहेको एके. जीध पण सय था
अपामांधी कीपण एक दिशिमो आहार म मंधी शमता ५
रोत पण पारिशामो आहार संभये परम्नु सिवा-
तामां उपर प्रमाणन शंत यतायी हाथायी अदी से.
माणे सख्यु, ताप पलिमहाराज जाणे.
२ भदी पिदिशाओ एक प्रदेश प्रणिकप होपायी मटका
तक प्रदेशाप भागमा आहार होह शक नहिं कारण एक मरे।
श स्थित द्रव्य जोयगाव होय नही, आहारवेशमा आयो
विदिशानी एक प्रदेश बहुतम देशवालो दिशाओमाज गणार
जतां होयाथी १० दिशानो आहार कहेयाय नही.
(१२४) ॥ दंडकविस्तरार्थः॥ अहसनितियं भणिस्सामि-हवे हुं हेतुवादोपदेशिकी- दीर्घकालिकी-ने दृष्टिवादोपदेशिकी ए त्रण संज्ञाओमांनी कये दंडके केटली संज्ञाओ होय ते कहीश. अवतरण-आ गाथामा दंडकाने विषे. संज्ञाहार कई . ॥मूळ गाथा ३२ मी.॥ चउविहसुरतिरिएसु, निरएसु य दीहकालिगी सन्ना विगले हेउवएसा, सन्नारहिया थिरा सव्वे ॥३२॥ ॥संस्कृतानुवादः॥ चतुर्विधसुरतिर्यक्षु, नैरयिकेषु च दीर्घकालिकी संज्ञा । विकले हेतूपदेशिकी, संज्ञारहिताः स्थिराः सर्वे ॥३२॥ । शब्दार्थः। चरविह-चार प्रकारना विगले-विकलेन्द्रियोमा मुर-देव हेउवएसा-हेतुवादोपदेशिकी तिरिपमु-तियचोमां संज्ञा निरएमु-नारकोमा सनारहिया-संज्ञारहित थिरा-स्थावरो दीहकालिगी-दीर्घकालिकी सव्ये-सर्व संज्ञा गाथार्थः-चार प्रकारना देवो-तिर्यंचो-अने नारकोमा दीर्घकालिकी संज्ञा छे, विकलेन्द्रियोमा हेतुवादोपदेशिकी संज्ञा छे. अने सर्व स्थावरो संज्ञारहित छे, विस्तराध:-सुगम छे. यअने ॥ दंडकेषु संझादारवम् ॥ 'अवतरण- गाथाना पूर्वाधमां बाकी रहला दंडकोए संज्ञा, अने उसराधमांयी आगति तथा गतिद्वार कोबानां भार.. भमां प्रथम देवमा आगतिद्वार कहे , ।।मूळ गाथा ३३ पी॥ मणुआण दीहकालिय, दिट्ठीवाओवएसिया केवि। 'पज्जपणतिरिमणुअच्चिय,चउविह देवेसुगच्छंति॥३३॥ ॥संस्कृतानुवादः।। मनुष्याणां दीर्घकालिकी, दृष्टिवादोपदेशिका केपि । पर्याप्तपंचेन्द्रिपतिर्यग्मनुजा एव चतुर्विधदेवेषु गच्छति ।३३ ॥शब्दार्थः॥ मणुभाण-मनुष्योने पण-पंचेन्द्रिय दीहकालिय-दीर्घकालिकोसंज्ञा तिरि-तिर्यंचने दिहीवाओवएसिया-दृष्टि मणुअ--मनुष्य वादोपदेशिकी संज्ञा चिभ-निश्चय के-केटलाएक चउविह-चारप्रकारना वि-पण वळी- देवेसु-देवोमां गच्छति-जायछे गाधार्ध:--पनुप्पोने दीर्घकालिकी संज्ञा छे. अने फेटलाएक (मनुप्यो )ने तो दृष्टिवादोपदेशकी संज्ञा पण होय छे, पर्याप्त पंचेन्द्रिय नियंच, अने पर्या० मनुष्यो ज चारे प्रकारना देवोमा जाय छे, १. चांथी गाधामा मारोनो जे अनुक्रम दर्शय्यो छ, ते मां प्रथम गतिद्वार अने बोनुं आगतिवार का छ, ने दि. ढकामा अयतारना प्रथम आगतिहार भने स्यारयाद गतिहार कहेयाशे ५ कमशिर्षय यक्सानी विपक्षाने आधार होर छ. - पन-पर्याप्त ॥
' - (१२६) ॥ दंडकविस्तरार्थः ॥ विस्तरार्थ:-मनुष्योने दीर्घका० संज्ञा कही पण ते सर्व गर्भज मनुष्यने छ, अने सम्मू० मनुष्यो तो मनरहित होवाथी है- तुवादो० संज्ञावालाज छे, पुनः केटलाएक मनुष्योने जे दृष्टिवादो० संज्ञा कही ते संवन्धद्वार प्रसंगे कहयो छे, दृष्टिवादो० संज्ञा सम्य- ग्रदृष्टिने ज होय.छे, तथा पर्या. पंचे० ति० अने मनुष्यज चारे प्रकारना देवोमां जाय. ए देवोमा आगति सामान्यथी कही, ने विशेषयी आ प्र- माणे--१० भवन, १६ व्य०, १५ परमाधामी, १० भक, ए ५१ देवोमा १०१ प्रकारना लब्धिपर्याप्त मनुष्यो तथा युगलिक चतुष्पद सहित ५ गर्भज तिर्यंच लब्धिपर्याप्ता ने ५ सम्मू० तिर्य- च लब्धिपर्याप्त एटला जीवो (ए ५१ देवोमां) आवी उपजे. अने १० ज्योतिपी तथा सौधर्मकल्पमा अन्तीप विना ४५ क्षेत्र, ना मनुष्यो ने ५ गर्भ० तिर्यंच ए ५० जीवो आवी उपजे छे, ई- शानमां पूर्वोक्त ५० माथी ५ हिमवन्त ने ५ हिरण्यवन्त क्षेत्रना युगलिक मनुष्य अने युगलिक तिर्यच सिवायना ४० जीवो आवी उपजे, अधो किल्विपिकमां १५ कर्मभूमिना संख्येय वर्षायुष्क ( वधुमां वधु पूर्वक्रोड वर्षायुष्क ) पर्या० ग० मनुष्यो, ५ देवकुरु ने ५ उत्तरकुरु क्षेत्रना युगलिक तिर्यंच अने युगलिक मनुष्यो तथा संख्येयायुष्क ५ गर्भज तिर्यच लब्धिपर्याप्ता ए ३० जीवो आवी उपजे, तथा ३ जा थी ८ मा कल्पमुधीमां संख्येयायुष्क लब्धिप- प्ति १५ कर्मभूमिना गर्भज मनुष्यो अने एज विशेषणवाळा ५ गर्भ० तिर्यचो मलो २० जीवो उपजे,ने आननयी सर्वाथ मुधीमां- उक्त विशेषणवाळा १५ कर्मभूमि मनुष्यो आवी उपजे. अवतरण-आ गाधामां देवनुं गतिद्वार (-देवो मरण पामी ने क्या उपजे ? ते ) कहे छे, ॥दायादारत ।। ॥ मुळ गावा ३॥ संखाउपजपणिपि, तिरियनरमु तहत पजते । भूदगपनेयवणे, गएमु धिय मुरागमणं ॥ ३४॥ सिस्कृमानुपादा संज्यपायुष्काप्तिपन्द्रिय-तिपन्नरेषु तव पर्याप्त। भूदकपत्येकयनंपु, पतंप्येष सुरागमनं ॥ ४ ॥ सन्दा भरखाउ-गानवर्षना आयु. भू-गनीकाप प्पामा दग-भफाय पन्न-पर्याप्त पत्तेपरणे-प्रत्येक वन फापमा पणिदि-पनेन्द्रिय पएसु-५ ५ दंडफोमा निरिय-नियंचमा चिय-निथप नरमु-मनुप्पमा मुर-देवन नव-तपन-तथा आगमण-भावयु (-गति) पजने-पर्याप्तमा गाधार्थ:-संख्यातवर्पना आयुप्यकाळा पर्याप्त पंचेन्द्रिय निर्यचपा भने ( संख्या० पर्या० पंचे०) मनुष्यमां, तेमन पर्या- प्त पृथ्वीकाय--अपफाय--अने प्रत्येकवनस्प० कायमा ए ५ दंड. कामां ज देवोर्नु आवj ( उपन) थाय छ, विस्तराधः-संख्यात आयुदयवाळा एटले कर्मभूमिमां उत्प- न धयेला, वधुमां वधु फोडपूर्व वर्पना आयुष्यचाळा लब्धिपर्याप्त पंचेन्द्रिय गर्भन निर्यचोमां, कर्मभूमामां उत्पन्न धयेला वधुपां वधु कोहपूर्व वर्णना आयुष्यशाळा लन्धिपर्याप्त गर्भन मनुष्योमा, स- (१२८) ॥ दंडक विस्तरार्थः॥ चत्र उत्पन्न थती लग्धिपर्या० बादर पृथ्वी, लब्धिपर्या० वा० अप, अने ल० पर्या० वा० .प्रत्येक वनस्पतिमां ज देवोर्नु आगमन( गति. -उत्पत्ति ) छे. कारणके देवो मरण पामीने अपर्याप्ता यता नथी, ते. मज देवोच्यवीवमां अने नारकमां पण न जाय अने विकलेन्द्रि- यमा तथा अग्नि वायुमा उत्पन्न थतां नथी, ए प्रमाणे देव ( ना १३) दंडक नी गति सामान्यथी कही, अने विशेष एज छ के भु- वनपति--व्यन्तर--ज्योतिपि--सौधर्म- ने ईशान एटला देवलोकना देवोज पूर्वोक्त ५ स्थाने जाय छे, सनत् कुमारथी सहस्रार सुधी देवो संख्येयायुष्क ल० पर्या० ग० तिर्यंच अने एज विशेषणवा. ला ग० मनुष्योमां जाय छे आनतादिथी सर्वार्थ सुधीना देवो फक्त कर्मभूमिमां संख्यात आयुष्यवाळा पर्याप्त गर्भज मनुष्यो. मांज जाय छे, पुनः प्रत्येक वनस्पतिमा जे देवो उत्पन्न थाय छे, ते पण अमुकज उत्पन्न थाय छे ते संबन्धि विशेष विगत श्री भग- वतीजीमा अथवा द्रव्यलोकप्रकाशमां छे त्यांची जाणवी. पुनः केटलाएक देवोने जेओ प्रथमथी जाणे छे के मारे अमु- क वृक्षमां उत्पत्न थवानुं छे तो ते देवो मान दशाना वशथी ते - क्षनो दैविक चमत्कार दर्शावी लोकोमां पूजनीक करे छे, ने ते . क्षनो महिमा बधारे छे, अवतरण-आ गाथामां नारक जीवोनी आगति तथा गति (-कया कया जीवो नारकगतिमां आये. अने नारको मरण पामीने कइ कइ गतिमां जाय ते ) कहे छे.
॥ दंदनेषु गत्यागनिमारम् ॥ '(१२९) ॥ मूळ गाया. ३० मी.॥ पजत्तसंखगम्भय, तिरियनरा निरयसत्तगे जन्ति । निरय उवहा एएसु, उववजति न सेसेसु ॥ ३५॥ ॥ संस्कृतानुवादः॥ पर्याप्तसंख्येयापुर्गर्भजतिर्यग्नरा नरकसप्तके यान्ति । नरकोत्ता पतेप्पपद्यन्ते न शेपेषु ॥ ३५ ॥ ॥शब्दार्थः॥ पजत्त-पर्याप्त जन्ति-जाय छे, संख-संख्यात आयुष्यवाळा निरय-नरकमांची गभय-गमन उबट्टा-नीफळेला जीवो विरिय-तिर्यंच एएम-ए पन्नेमा नरा-मनुष्यो उववजन्ति-पजे छे निरय-नरफमां न-नयी उपजना सत्संग-सात (मां) सेसेमु-चाकीना दंडफोमा गाधार्थ:-पर्याप्त संख्यात आयुष्यवाळा गर्भन तिर्यच अने पर्या० संख्यायुष्यवाळा गर्भन मनुप्यो साते नरफमां गाय छ, ए नारकनी आगति कही, भने नरकमांधी निकळेला (अर्याद) नारको ए मां ज उपने छे पण वाकीना (२२) दंडकोमा उप- जना नथी ए नारकनी गति कही, विस्तराधा-पर्याण संख्यान आयुष्यवाळा गर्भन नियंचो अने पज विशेषणाला ग० मनुष्यो सात नरकमां जाप ए नार- फमा आगति सामान्यपी कही, अने विशेषधी भा प्रमाणे- रत्नप्रभामां-१५ फर्म० मनुः-५ ग. नि०-५ समु०
(१३०)
॥ दंडकविस्तरार्थः॥
ति०-ए २५ लब्धिपर्याप्ता आवे, युगलिक मनुष्य वा विर्यचोनी
अवश्य देवगति होवाथी तेभो नरकमां उपजता नथी.
शर्कराप्रभामां-१५ कर्म० मनु०-ने ५ ग० ति०-२०
चालुकाप्रभामां-१५ कर्म० मनु०, ने भुजपरि० विना ४
गर्भज तिर्यंच ए १९ लब्धिपर्या० जीवो आवे.
पंकप्रभामां-१५ कर्म० मनु०, ग० जल०-० थल० ने
ग० उर० ए १८ ल० पर्याः जीवो आवे,
धूमप्रभामा--१५ कर्म० मनु० ग० जल०-ग० थल०-१७
तमप्रभामां-१५ कर्म० मनु०-ग० जल० २६
तमतमप्रभामां-स्त्रीविना १५ कर्म । मनु०-गजल०-१६
ए प्रमाणे नारकजीवोमा आगति कहीने हवे नारक जीवो
क्यां उत्पन्न थाय? ते नारकनी गति कहे छ,
रत्नप्रभादि ६ नी--लब्धिपर्याप्त संख्येयायुष्क गर्भ० म-
नुष्यो १५ कर्मभूमिना, अने एज विशेषणवाळा गर्भ० तिर्यंच पं
चेन्द्रिय पांच ए २०: भेदमां : जाय, नारको मरण पामीने लब्धि
अपर्या न थाय.
॥ इति नारकगत्यागंतिः ॥
...
अवतरण-आ गाथामां पृथ्वि-अप-अने वनस्पतिनी (मां
कइ कइ गतिना जीव आये ते ) आगति कहे छे.
॥मूळ गाथा ३१ मी.॥
पुढवी थाउवणस्सइ--मज्झे नारयविवजिया जीवा ।
सव्वे उववजंति, नियनियकम्माणुमाणेणं ॥ ३६ ॥
|संस्कृतानुवादः॥
पृथव्यवनस्पतिमध्ये नारकविवनिता जीवाः ।
सर्व उपपद्यन्ते निजनिजकर्मानुमानेन ॥ ६ ॥
॥ संपु गत्यारिद्वारम् ॥ धन्दामा पुत्री-पत्रिकाय जीवा-मोती आऊ-भकाय सगे-सा जीनो वणस्सा-वनस्पतिकाप उन्नति-उत्सम पाय, मन-मध्य-मां निपनिय-पोनपोगाना नारप-नारक कम्माणुपाणेग-कमने अनुसार चिनिया-वीन-सिवायना गाधाधिः-पश्विमाप-अपकाप-ने वनस्पति मध्ये नारक सिपायना सर्वे जीवो पोत पोताला फर्मने अनुसार उत्पन्न घाय: के, (ए पृथ्व्यादि ३ मां आगति कही.) विस्तरार्थ:-भा गायामां पृथ्व्यादि ३ दंडकमां. आगति सामान्यपी कहीन विशेपथी आ प्रमाणे-- ५० पृश्चि-अप-ने.प्र. वनस्पतिमां-४८ तिर्यंच-१. ०१ सम्मू० मनुप्य फर्मभूमिना पर्या० अपर्या० मली ३० मनुष्य- १५ परमाधामी-१० भवनपति-१६ व्यन्तर-१० मुंभक-१० ज्योतिपी-सौधर्म-ईशान-अधो फिल्लिपिक ए प्रमाणे २४३ जी- वो ए ३ लब्धिपर्याप्तमा भावी उपजे. अपर्या० १० अप-प्र० यन तथा सर्व साधा. वनस्प. तिमा ४८ निचो नधा ३० कर्म० मनुष्यो,१०१सम्मू. मनुष्यो आवी उपजे थे, ए प्रमाणे ए ३ दंडकमा पूर्वोक्त दंडकना जीव- भेदो पोत पोताना मने अनुसारे (-कर्मना वशथी ) उत्पन्न था- य छे, ए चोया चरणमां जीवोने परभव जवामां ईश्वरप्रेणा- ना लौकिक मतनुं निवारण कथु नाणवू. १ कर्मने अनुमारे कहेवायी जे केटलाक पादीभो ईश्वरेच्छा अथधा श्विप्रेरणाथी गन्यागति करे छे तेम कोई तन मंडन फयु कारण इच्छा अथवा प्रेरणा सकर्मजीयर्नु कार्य ठे, अने कर्म रहित थया बिना ईश्वर कही शफाय नही +ANML -- "putlant- ॥ दंचविस्तरार्थः॥ अवतरण-~~~आ गायाना पूर्वाधमां पृथ्वी-अपू-ने वनस्पति भीलो मरण पामोने का गतिमां उपजे ? (५ अगनी गति ) ते अने उत्तराधमां तेउकाय-कापुकायमा कया श्रीगो भाये ? (प बेनी आगति ) कवाय छे, 1मूळ गाथा ३७ मी॥ पुढवाइदसपपतु, पुढवीआऊवणस्सई जन्ति । पुढवाइदसपएहि य, तेउवाऊसु उववाओ ॥ ३७॥ । संस्कृतानुवादः॥ पृथ्ष्यादिदशपदेपु पृथ्व्यापी वनस्पतयो यान्ति पृथ्व्यादिदशपदेभ्यश तेजोवारयोरुषपातः ॥ ३७॥ ॥ शब्दार्थः ॥ पुढवाइ-पृश्चिकाय विगेरे पुढवाइ-पृषिकाय विगेरे दस-दश दस-दश पएसु-पदोमां-स्थानमा पएहि--पदमांधी-स्थानमांथी पुढवी-पृथ्विकाय य--वळी आऊ- अपकाय तेउ. अग्निकाय वणस्सइ- वनस्पतिकाय वाअसु-वायुकायमां- जन्ति--जाय छे. | उववाओ--उपजवं-उत्पत्ति-आगति गाथार्थः-पृथ्विकाय विगेरे १० स्थानमां पृथ्वि-अप- अने वनस्पतिकाय जाय छे, अग्निकाय अने वायुकायमां पृथ्वि- काय विगेरे १० स्थानकथी (जीवोनु) उपजq ( आवq ) धाय छे - विस्तरार्थः-पृथ्वि-अप-ने वनस्पतिजीवो पृथ्वि-अप- अग्नि-वायु-वनस्पति-दीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रिय-ग० तिर्य- ॥ दंडकेषु गत्यागतिवारम् ॥ च-ने ग. मनुष्य ए १० स्थानमां जाय है, परन्तु विशेष ए के के-ए ३ जीवो कर्मभूमिना ३० मनुष्यभेदोमा १०१ सम्मु० मनु०मां, ने. ४८ वियंचमां मली १७९ जीवभेदमां उत्पन्न 'थाय के, पण युगलिकोमा जता नथी. पृथ्यादि ३ नी गति कही; हषे अग्नि अने वायुमा आगति कहे के के पृथ्व्यादि १० पदमांधी नीकळीने जीवो अग्नि अने वायुमा उपजे छे, त्यां १०१ सम्म्० मनुष्य, ३० कर्म० मनुष्य, ने ४८ वियव ए १७९ जीव भेद अग्नि-- वायुमा आवी शक के, पण युगलिको आवता नयी, ॥ इति अग्निवायुमा आगति ॥ अवतरण-आ गाथाना पूर्वाधमां अग्नि अने वायु मरण पामीने क्यों नाप ? (-अग्नि-वायुनी गति ते ), भने उत्तरार्धमा विकलेन्द्रियांनी आगवि तथा गति कईवाय के. मूळ गाथा ३८ मी॥ तेउवाऊगमणं, पुढवीपमुहंमि होइ पयनवगे। पुढवाइठाणदसगा, विगलाइतियं तहिं जन्ति ॥३८॥ ॥ संस्हवानुवादः॥ तेजोवायुगमनं, पृथ्वीप्रमुख भवति पदनवके । यादिस्थानदनकाद् विफलत्रिकं तत्र यान्ति ॥ १८ ॥ ॥ सदार्थः॥ तेज-अग्निसाप पुढली पविकाय वाऊ वायुरापन पमुम्मि-बगरमा गण-गनि-नई
(१३४)
॥ दंडकविस्तरार्थः॥
: पयनवगे-नवः स्थाने
विगलाइ-विकलादि
पुढवाइ--पृथ्विकाप विगेरे तिय-त्रिक
ठाण--स्थान-पद
तहि-त्यां (पृथ्व्यादि१०स्थानमा)
दसगा--दशमांथी
जति-जाय छे,
गाथार्थ-अग्निकाय अने वायुकायनी गति पृथ्विकाय वि-
गेरे नव स्थानकमां होय छ, विकलेन्द्रियो पृथ्विकाय विगेरे १०
स्थानमांथी आवे छे, अंने ( पुनः) त्यांज (पृथ्व्यादि. १० स्था-
नमां) जाय छे.
विस्तरार्थः-अग्नि ने वायुनी गति पृथ्व्यादि ९ पदमां
(--४८ तिर्यंचमां),
तथा विकलेन्द्रियमा आगति-पृथ्व्यादि १० पदथी क-
ही ते पृथ्व्यादि ३ दंडकवत् १७९ जीवभेदथी जाणवी. तथा वि-
कले० नी गति पण तेवीज रीते १७९ जीवभेदोमां जाणवी.
गाथामां पुढवाइठाणदसगा विगलाइ तियं एटलां पदथी वि-
कलेन्द्रियोनी आगति कहे छे, अने विगलाइतियं तहिं जंति
ए पदयी विकले० नी गति कही छे. त्यां विगलाइतियं ए पद
डमरुकमणि न्यायथी बन्ने वाजु लागी शके छे.
अवतरण-आ गाथाना पूर्वाधमां गर्भनतिर्यंचोनी आगति
तथा गति, अने उत्तरार्धमां गर्भज मनुष्योनी आगति तथा गति
कहे छे,
॥मुळ गाथा ३९ मी.।।
गमणागमणं गव्भय-तिरियाणं सयलजीवठाणेसु ।
सव्यत्य जन्ति मणुया, तेऊवाऊहि नो जन्ति ॥३९॥
। । दंडकेषु गत्यागतिद्वारम् ॥ संस्कृतानुवादः गमनागमनं गर्भजतिरवा सकलजीवस्थानेषु, सर्वत्र यान्ति मनुजास्तेजोवायुभ्यां नो यान्ति ।। ३९ ॥ ॥शब्दार्थ गपण-गति- अयु सन्चत्य-सर्व स्थानके आगमण-आवg जति माय छे. गलमय-गर्भन मणुभा-मनुष्यो विरियाण-तिर्यंचोर्नु तेउ-अग्निकायमांधी सयल-सकल-सर्व वाऊईि-वायुकायमांधी जीवटासु जीवस्यानोमा नो-नधी (जीवभेदोमां) नि-जाया, गाथा:-गर्भन निर्यचौनी गति आगति सा जीवभेदोमा होय है, (ग. निर्यची सर्व जीरभेदोमां जाय छे ), मनुष्यो सर्व जोवभेदोपां जाप, ( अने सर्व जीवभेदोमांधी आग परन्तु ) अग्नि भने वायुमांधी जवा (आता) नयी. विस्तरार्ध:-भंज निपंचोनी गनि ने भागति सी जीव स्थानोमा के पटसे गर्भग नियनो मर दंडफां उपजे है, अने ग. नि.मां पण सर्व दटकना जीव आची उपजे. मोपण विशेष जीरभदने प्राथयि ग. तियधनी गति आ प्रमाण- पर्या-ग. जलचर -भानवादिदेवलोक सिरायनार२७ भीवमेदवां उत्पन्न पाय रे. प० ग० परिमला दरलोक नपा ६-७ : जीना नाप मिराय ५२३ मंदसां.
(२३६)
॥ दंडकविस्तरार्थः ॥
गर्भ० पर्या. चतुप्पद-फर्ध्व १८ देव०, तथा ५-६-७ पृ.
थ्वि सिवाय ५२१ भेदमा
ग० पर्या० खेचर-ऊर्ध्व १८ देव०- तथा ४.५-६-७ पृथिव
सिवाय ५१९ भेदमा
ग० पर्या० भुजपरि०-ऊर्ध्व १८ देव०-तथा ३-४-५-६
-७ पृथ्वि सिवाय ५१७ भेदमां,
सम्मू० पर्या० तिर्यंच पं० ५-ज्यो० ० सिवाय ५१
देवमां, ५६ अन्तर्वीपमा, रत्नप्र० मां, ३० कर्मभूमि मनु० . मां,
२०१ सम्मू० मनु० मां ने ४८ तिर्यंचमां पर्याप्त पणे ने अपर्या:
प्तपणे पण उपजे
तथा ए १० अपर्याप्त तिर्यंच पंचेन्द्रियो ३० कर्म० मनुष्योमा
१०१ सम्मू० मनु०मां, ने ४८ तिर्यंचमां उपजे ए प्रमाणे २० ति-
बैंच पंचेन्द्रियोनी गति कहीने हवे २० ति० पंचे. नी आगति
कहेवाय छे,
५ पर्या० ग. तिथंचमां-१०१ सम्मू० मनु०, ३० क.
म० मनु०, ४८ ति, १५ परमा०, १० भुव०, १६ व्य०, १००,
१० ज्योतिपी, ३ किल्बि०, ९ लोकां, ८ कल्प, ने ७ नारकना
जीवो आवी उपजे,
५ अप० ग० तिर्यंचमां-१०१ सम्मू० मनु०, ३० कर्म०
मनु०, ४८ ति०, एटला जीवो आवी उपजे.
१० सम्मू० तिथंच पंचे. मां-१०१ सम्मू० मनु०, ३०
कर्म०
० मनु०, ने ४८ तिर्यचो आवी उपजे.
ए प्रमाणे तिर्यंचोनी गत्यागति कहीने हवे ग० मनुष्योनी
गत्यागतिमां प्रथम ग० मनु० नी आगति ने त्यारवाद गति
कहेवाय छे.
-
.
॥रा गत्यागनिवास ॥
१५० पर्या० कम मनु०-५६३ जीवमंदमां नाप,
३० पर्या० भकर्म मनु०-१० १६.०० १५.
रमा०, १०, १.यो१ अशोकिल्लिा, सो, ने रंभान
ए ६४ स्थाने जाय.
५६ पर्या० भन्ताप मनु:--२१ देवीमा
१०१ अपयो०.ग० मनु० १४८ निर्यच, ३० कर्ममनुष्प,ने
१०१ सम्मू मनु०
६१०१ सम्म० मनुष्योपां उपजे.
ए ममाणे मनुष्योनी गति फही ने हवे आगति कई है,
१५ ग० पर्या कम मनु० मां-१५ कर्मभू० मनु०, अग्निने
वायु विना सर्व सूक्ष्मवादर एकैन्द्रिय,३ विझले०, सर्वमकारना ति.
पं०, १०१ सम्मू० मनुष्य,..९९ देव, अने' प्रधम ६ पृथ्विना
नारक आवी उपजे.
३० अकर्म मनु० मां-१५ कर्मक पर्या०
मनु०,
ने ५०
पर्या. नि० ए २००
५६ अन्ती मनु० मां-२५ कर्म० पर्या० मनु०,
१०पर्याप्त वि० पं० ए २५.
शेप सब मनुप्यमां--२०१ सम्मू०, मनु०,
तेउ
ना शेप सर्व तिर्य, ने १५ फर्म० मनुष्य आधी उपजे.
। इति गत्यागतिहारम् ॥
वायु वि-
अवतरण-मा गापामां सर्व दंडकने विपे वेदवार
कवाय .
(१३८) ॥ दंडकविस्तरायः॥ - ॥ मूळ गाथा ३४॥ वेयतिय तिरिनरेसु, इथि पुरिसो य चउविहसुरेसु । थिरविगल नारएसु, नपुंसवेथो हवइ एगो ॥४०॥ ॥संस्कृतानुवादः।। वेदत्रिकं तिर्यग्नरयोः स्त्री पुरुपश्च चतुर्विधसुरेषु स्थिरविकलनारकेपु, नपुंसकवेदो भवत्येकः ॥४०॥ शब्दार्थः॥ वेय-घेद थिरस्थावर तिय-त्रण विगल-विकलेन्द्रिय तिरिनरेसु-तिर्यंचमनुष्योमा नारएम-नारकोमां (ने) इत्थी-स्त्रीवेद नपुंसवेओ-नपुंसक वेद पुरिसो-पुरुपवेद य-अने चउविह-चारप्रकारना एगो-एक सुरेसु-देवोमां (देवोने) गाथार्थ:-तिर्यंच अने मनुष्योमांत्रण वेद छे, चार प्रका- रना देवोमां स्त्रीवेद अने पुरुपवेद छे, अने स्थावर ( एकेन्द्रिय ) --विकलेन्द्रिय-तथा नारकोमा एक नपुंसकवेद ज छे. विस्तरार्थ:----तिर्यच तथा मनु०मां ३ वेद कह्या त्यां स- सम्मू०मनुष्य तथा सम्मू तिर्यंच पञ्चन्द्रियने फक्त एक नपुंसक- होय, अने गर्भज जीवोमां केटलाएक पुरुषवेदी केटलाएक स्त्री- वेदी ने केटलाएक जीवो नपुंसकवेदी पण होय छे, तथा चारे प्रकारना देवोमां नपुंसकवेद नहिं होवाथी मात्र स्त्रीवंद अने पुरुपवेदज छे, शेष व्याख्या सुगम छे. हवइ-छे स . . ॥ दंदकेषु अल्पबहुत्सद्वारम् ॥ (२३९) अवतरण---हवे आ गाथायी २४ दंडकमांथी कया दंडकना जीवो अल्म अने कया दंडकना जीवी अधिक छे, ? ते कहे जे. i, - ।। मूळ गाया ४० मोगा पज्जमणु वायरगी, वेमाणियभवणनिरयवंतरिया। जोइसचउ. पण तिरिया, वेइंदि तेइंदि:भूआऊ॥४०॥ ::| संस्कृतानुवाद:":.:: पर्याप्तमनुजयादराग्निवैमानिकभवनपतिनैरयिक- व्यन्तरकाः। ज्योतिश्रतुष्कपञ्चेन्द्रियतियचो दीन्द्रियत्रीन्द्रियभ्वापः ॥४०॥ शन्दरायः पज-पर्याप्त नोइस-ज्योनिपीदेव मणु-मनुष्य पउ-चतुरिन्द्रिय वायर-चादर पण-पञ्चेन्द्रिय अग्गी-भग्नी निरिया-निर्यची वैमाणिय-वैमानिक वेइंदि-दीन्द्रिय भरण-भवनपति । तेइंदि-त्रोन्द्रिय निरय-नारक भू-पृधिकाप वंतरीया-नरी श्राऊ-अपका गापाय:- पर्याप्तमनुष्य--दर भग्नि-मानिक-भवनपनि •नारक-यार-योविपी-चरिन्द्रिय-पनेन्द्रियनियंच-दीन्द्रिय न्धीन्द्रिप-पश्विमाय भएकाय (संपन्ध आगनी गाया माये.) । आग लप अन्य मुजी. " (१४०) ॥ दंडकविस्तरायः॥ विस्तरार्थ:-सुगम से. पण आगळ लघु अने महात्सबहुता जुओ अवतरण--मा गायामां पण बाकी रहेला दंडकोनुं अल्पबहुत्व कयु.के. ।मूळ गाया ३८ मी॥ वाउ वणस्सइ चिय, अहिया अहिया कमेण मे हुंति। सव्वेवि इमे भावा, जिणा मए गंतसो पत्ता ॥ ४२॥ ॥ संस्कृतानुवादः ॥ वायुर्वनस्पतिश्चैव अधिका अधिका क्रमेणेमे भवन्ति । सर्वेऽपि इमे भावाः, हे जिना मया ऽनन्तशः प्राप्ताः ४२॥ || शब्दार्थः ॥ वाउ--वायुकाय हुँति--2. वणस्सइ--वनस्पतिकाय सवेवि--सर्वे पण चिय-निश्चय इमे--ए पूर्वोक्त(पर्या०मनुध्यादि) अहिया अहिय--अधिक भावा--भाव अधिक जिणा-हे जिनेश्वरो कमेण--अनुक्रमे इमे--ए पूर्वोक्त ( पर्याप्त अणंतसो-अनंतवार मनुष्यादि ) पत्ता--प्राप्त कर्या गाथार्थ:----वायुकाय अने वनस्पतिकाय निश्चय ए पूर्वोक्त (पर्या० मनुष्यादि ) अनुक्रमे अधिक अधिक छे. हे जिनेश्वरी ए सर्व । पर्या०मनुष्यत्वादि ) भावो में अनंतवार प्राप्त कर्या के. ( माटे हवे एकवार प्राप्त थनारं मोक्ष पद आपो ..-ए दंडक रूप स्तुतिनुं तात्पर्य आगळनी गाथा साथे संवन्धवाळ छे. मए- में ॥ दाने मलासमारम् ॥ विसराय- अत्सवात संपन्धि वने गायामामा जीरो मामान्यता अधिक अधिक या पाकेटमा अधिक ! ये का नयी पारे ने पटरी दर्शवपके.... ॥ २४ दंडकअल्पपहत्व ।। .. सबंधी मल्प असंख्य गुण असंख्य गुण असंख्य गुण असंख्य गुण असंख्य गुण संख्य गुण संख्य गुण. १ पर्याप्त मनुष्ग १ नादर अग्नि १ पानिक भवनपनि नारक व्यन्तर ज्योतिपी 'चरिन्द्रिय १ पञ्चे निर्यच १ दीन्द्रिय श्रीन्द्रिय पत्रिकाय अपकाय वायुकाप वनस्पतिकाय ? १ १ १ १ विशेपाधिक विशेषाधिक असख्य गुण. २ असंरुप, गुण असंख्य गुण अनंत गुण : *हिं पर्याप्त जीयाथयि मा अल्पपहुच का .
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॥ दंडके मल्परहुत्वद्वारम् ॥ (२४५) " ७० पर्याप्त सू० अपकाय ७१ पर्या० सू० वायु ७२ भपर्या० मू० निगोद ७५ पर्या०० निगोद ७४ अभव्य ७५ पनितसम्पकली १ असंख्यात गुण संख्यात गुण अनंत गुण ७५ सिद्ध ७७ पर्या०या० वन ७८ चादर पर्याप्त ७९ अपर्या० या. बन० ८० वा० अपर्याप्त विशेषाधिक असंख्य गुण विशेषाधिक "" ८१ चादर " " ८२ मू० अपर्याप्त वन ८३ मू० अपर्याप्त ८४ पा० न० वनस्पति ८५ मू० पर्याप्त संख्यगुण विशेषाधिक ८मा 1 " " ८८ निगोद ८९ बनपनि २० एन्द्रियो ९१ निधन ९२ मिथ्याधि ९३ अविरत ५४ गापापि " " (मने गजसारमुनिने) ण दंडना त्याग करवाधी सहजे प्राप्त (१४६) ॥ दंडक विस्तरार्थः॥ ९५ छद्मस्थ ९६ सयोगि ९७ संसारीजीव ९८ सर्वजीव अवतरण-आ दंडकरूप स्तुति करवानुं फळ ग्रंथकार श्री जिनेश्वरोनी पासे मागे छे. संपइ तुम्ह भत्तस्स, दंडगपयभमणभग्गहिययस्स दंडतियविरयसलह, लहु मम दितु मुक्खपय॥४३॥ । संस्कृतानुवादः ॥ संप्रति तव भक्तस्य, दंडकपभ्रमणभग्नहृदयस्य दंडत्रिकविरतसुलभ, लघु मम ददतु मोक्षपदम् ॥४३॥ ॥ शब्दार्थः ॥ संपइ-हमणां-हवे दंडतिय-३ दंड (मन-वचन- तुम्ह-आपना कायाना अशुभव्यपार भत्तस्स-भक्तनुं चिरस्स-विरतिबडे त्यागवडे] दंहगपय-दंडकस्थानमा सुलभं-सहजे प्राप्तयनार भमण-भ्रमणकरवाथी भग्ग-भग्न-उदासीन दितु-आपो शुक्खपयं-मोक्षपद ए सर्व भावो अनंतवार प्राप्त कर्या छ. ). दंदकस्यानोमा भ्रमण करवायी उदासीन मनवाळा आफ्ना भक्तन लघु-शीघ्र मम---मने हिययस्स-हृदयवाळा (न) -मनवाळा गाथाः हर धनार एवं मोक्ष पद भी आपो.
. अवतरण ।।दंदकमणेतुः प्रभुनीमार्थना ॥ (१४७) विस्तरार्थ:-धीगजसोरमुनि श्रीवीरमभुने मार्थना करे छ के ए पूर्वोक्त २४ दंडकमां अनादि काळ्यी परिभ्रमण करवा वडे क- रीने इये मारुं हृदय बहु खेदवाळु उद्विग्न ( उदासीन) ययेलं छे माटे मनने अशुभ विकल्पमा प्रवविवारूप मनदंड,मोक्षमार्गने म- निकूळ वचनो चौलचा रूप वचनदंड, अने मुक्तिमार्गने मतिकूळ क्रियामां फायाने प्रवविवा रूप कायदंड, ए ३ दंडना त्यागथी सहजे मलनार मोक्षपद मने शीघ्र आपो ए दंडकपकरणरूप श्री महावीर स्वामीनी स्तुतिनो अन्तिम परमार्थ (सार) जणान्यो. -आ गाथामा श्री ग्रंधकारनी प्रशस्ति छे. सिरिजिणहंसमुणीसर -रजे सिरिधवलचंदसीसेण गजसारेण लिहिया, एसा विन्नत्ति अप्पहिया ॥४४॥ ॥ संस्कृतानुवाद ॥ श्रीजिनहंसमुनीश्वरराज्ये, श्रीधवलचंद्रशिष्येण । गनसारेण लिग्विना:एपा, विज्ञप्ति रात्महिता॥४४॥ ॥ शन्दाः ।। सिरि-श्री मीसण-शिप्पे निणहंस-जिनहंसनापना गनसारंण-गनमारमुनीए मुणीसर-आचार्यना लिदिया-लखी रज्जे-गज्यमां एसा-मा मिरि-श्री विमत्ति-विज्ञप्ति धवलचंद-घरलचंद्र : अपहिया-भान्यहितकारी गाधा:-श्री जिनदंसनामे आचार्यना राज्यमा (शास- नमा श्री धवलचंदनिना शिष्य गनसार भूरि प्रा सिणि भात्म हिनमारी लखीर
(१५८) ॥ दंडकविस्तरार्थः ॥
विस्तरार्थ:-जसारमुनि १६ मासकानी शरुआतमा य
दला तम तेमना हायना बनायेलो जंबुद्धीपनो नकशो (पट) जं
वामां आव्यो के. ते उपरथी जणाय छे. आ प्रकरण तेओर्थ
परोपकारार्थ बनावेल तां आत्महितने माटे लख्यु तेम लखी पार
ना मात्मानी लता भावी छे.
pune
-
श्री
दण्डक विस्तरार्थः
सम्पूर्णः
ॐ ॥ श्री महावीरप्रभुस्तुतिगर्भित परमकारुणिक पं० पद्मविजगणिप्रणितं ॥ विविधरागपद्ध, एकोनविंशतिद्वारेषु चतुर्विंशति दरक समवताररूपं स्तवनम, . .. (दुहा) मणमी सरसति भगवति, तीम जिनवर चोवीश, गौतम प्रमुख भूरि तथा, गुरु उत्तम मुजगी। ॥ १॥ चोवीरा दंडफने विप, द्वार अछे गुणविश; विपरी कहिं तेहने, जिम भारठ्या जगदीच नाम १ लेश्या २ चीजें ननु, ३ अवगाहना ४ संघेण, संझा, ६ आकनि सानमुं, ७ संपराय ८ मुणो संग ॥३॥ ९इन्दिरममुद्यानरष्टिी२दर्शन, १ नाण१४-१५जोगोपयोग: १६उपपात नेरवचन १८स्थिति१९पजति२०आहारनी भोगा २४गनि आगति २२वेद २३भवननो, चोविसमा २४माणदार; २५संपदा-धर्म-जीरायोनि,२८० २९भत्सबहुत विचार ॥५॥ - . ? - (१५०) ॥ दंडकस्तवनम् ॥ (द्वारे १ लु)-धमा, वंशा सेला, अंजना रिटा नाम; मघा, माधवति सातमी, ए साते दुःख खाण १असुर २नाग ३सुवर्ण, ४विद्युत ने ५अग्निकुमार; दीव७उदधि ८दिशि ९वायु, १०स्तनित ए दश श्रीकार॥७.! सात ११नर कनुं एक छे, एकादश दंडक एम; थावर १६ पांच तथा १९ त्रण, विगलेंद्रिय गणिए तेम ॥८॥ २० पंचेन्द्रितिर्यच २१ मनुज ने, २२व्यंतर ने २३जोतिप; २४ वैमानिक चोवीश ए, नाम द्वार मुण शिष्य ' ॥ ९॥ (द्वार २)-नरक, तेउ, वाउ, विगलेन्द्रिय, अपज्ज लेश्या तीन; पंचेंद्रिय तीर्यच मनुपने, पट् लेश्या होय पीन ॥१०॥ भवनपति दश व्यंनर, पृथ्वी अप् वण काय; ए चउद दंडकमांहि, आगली चार कहाय ॥११॥ ज्योतिपि सोहम इशान, एक तेजो होय; पंचम देवलोक लगे पद्म, उपरे शुक्ल जोय ॥१॥ (द्वार ३)--नारकी देवता सर्वने, वैक्रिय तेजस कर्म, वायु तिर्यंच पंचेन्द्रिय, आहारक विनु ए मर्म वायु विना चउ थावर, विगलने त्रण शरीर; औदारिक तेजस कर्म, मनुजने पण कहे वीर ॥१४॥ ॥ ढाळ ?-राग मारु.॥ (द्वारे ४) नरक गते शत पंच धनुप् अवगाहना समुच्चे उत्कृष्ट भाखीरे (२) साखि पन्नवणाअछेरे ॥१३॥ १२४ दंडकोना नाम, २ कृष्ण, नील, कपोत, तेजः, पण शुक्ल, ए ६ लेश्याओ छे, ३ औदारिक, वैक्रिय, आहारक, ते जस, कार्मण, ए पांच शरीर छे, ४ शरीर प्रमाण, - ॥ पं०पावि गणि प्रणीतम्।। (१५२) पुणा भाठ धनुए पटू अंगुल देहडीरे; धमा उत्तए, गरे (२) हाथ जयन्य शरीर के रे. ||२|| सादापंदर धनुष ने धार अंगुल लहीरे; त्रीचे सवाएकत्रीश पंकरे (२) साहीवासठ धनुनीरे सवासो धनुनी धूमप्रभे लहीरे; पयामा अढीशत, धनुष्य (२) शत पंच गुरु सातमी रे ॥४॥ ए उत्कृष्ट कही म्हें साने नरकनी रे, पूवनी, उत्कृष्ट, उत्तरे (२) उत्तरनी ते जघन्यधी रे भुवनपति र्वण ज्योतिपीने सात हाथनी रे, तिम सोहम इशान, बीजेरे (२) तीजे चोथे पद् तणी रे ॥६॥ पांचमे छठे पांच, चार सातमे आठमेरे; चार लगे तिन हाथ, हायरे (२) नाथ भाखे प्रण लोफनोरे ॥७॥ नव अवेयक वे कर, अनुत्तरे एक छे.रे; भू नल अग्नि ने वाय, तेइनीरे (२) अंगुल असंख्यम भाग छ रे ८ लाख गोजननी उत्तरवैक्रिय देवतारे, वनस्पति प्रत्येफ. झाझीरे [२] जोयण सहस उत्कृष्टधीरे ॥९॥ अंगुल असंख्यमे भाग जघन्ययी जाणीयेरे; येईद्रिय जोजन बार कोशरे (२) त्रण चउतिचौरिंद्रियरे ॥१०॥ तिन कोश दनुजनी सहस जोयण तणीरे; निरि पंचेन्द्रिय देह, वैक्रियरे(२)लाख गोयण नव शत तयारे ॥११॥ (द्वार ५)--पट संघयण मनुन तिरि पवेन्द्रि लहारे; विगलेन्द्रिय वट्ट, माणोरे (२) शेप संघयणि अमरे प्रथम प्रथम नरफना उत्कृष्ट भयगाहना ते आगल आ. जागयी. ६ व्यंतर, ७ नथम, दशमे, भगीयारमे, यामे दंघलोके, ८ पर्गभनाराम, अपभमाराम, नाराव, अर्ध नागन, कादिका मंगानं प १ मंथयण में, ॥१२॥ गन्द जघन्य 1.दंडकस्तवनम् ॥ (द्वारे ६)--आहारादिक चउवीशे दंडके लहारे; (द्वार ७).-देवने समचउरंस, आगेरे(२)पद् नरतिरि पंचेंद्रिनेरे॥१३॥ *(द्वार ८) नारक थावर विगल समुहिम मनुष्यनेरे; एक हुँडक संठाण, होयरे (२) चार कपाय सवि दंडकरे ॥ १४ ॥ ॥ ढाळ २ जी. पियु पियु करतां नाम जपु दिन रातीयां--ए देशी. (द्वार ९). देव नारक नर तिरिपंचेन्द्रिय पणइन्द्रि, थावर वि ति चउरीदि इग पि ति चउ बदि (हार १०)-नारक वायुने चार समुद्घात आगला, देव तिर्यंच पंचेन्द्रियने पण(५) आदिला ॥२॥ थावर घउ विगलेन्द्रियने पहेला तिन कया, मनुजने सात समुद्घात पावणाए लया; (द्वारे ११)-नारक नर च तिरि पंचेन्द्रि तिष्टि छ, धावर पंचने एक मिथ्यात्व ते इष्ट छ ॥२॥ विगलेन्द्रियने समकित मिथ्या प दोय छे. एणीपेरे द्वार एकादश दृष्टि होय छे; (द्वार १२) देव नारक तिरि पंचेन्दियने केवल बिना, चरिदिने चक्षु भवाचे दर्शना ९ आदारनंशा, भयनशा, मथुनतंझा, परिग्रदशा, चार मंशा छ, समचतुरन, न्यमोध, सादि, वामन रजा झुंडक, ए ६ संस्थान छ, मोभ, मान, लोन ए काय है, ११ माशे, रसना, बाण, चक्षुः, श्रोत्र १ ५ इन्द्रिय, १२ वेदना, काय मरा, वकिल, जल, आशा. र, के नमुवात है. मियान्य न्याय मि. मटि , चवीन है. अबदः, अधिद, ॥ पं०पाधिकाणि प्रणीतम् ।। एक अचक्षु यावर वि ति इंद्रिय नणे,. चतु भवक्षु मोहि केवल चउ मनुनने; (झार १३)-पण मान अज्ञान नरक देव नियंचने, पावरने मति शुन अज्ञान ए विहं भणे ॥४॥ विगलेन्द्रियने शान अशान दुधा भडूं, पनुनने शान पंच अमान ने रण गj (झार १४)-औदारिक आहारक दुग विणु मुणो, योग अध्यार नारक देव दंडके भरि मुशो औदारिक दुग फर्म भृ जल वन्दि वण मते, वैक्रिय दुग युन पंचयोग वायु मते; औदारिक दुग फर्म नोयो बार योग ए विगलेन्द्रियने पार योगनो भोग निरिपंचेन्द्रिने पाहार दूग विण जाणीए, पनर योग मनुप्यने मवि मन धागोपः (मार १५)-ण जान भज्ञान दर्शन देश नरस विगि, मान अमान दो एक अनावे निििदर ज्ञान अशान न दीय एस परिदिने, मह र अशान अवसु यावर परदिने १६ मनिशान. धुमान मिसान, मन.पान. 2UR. ए पांच सान तथा मान या शिर प. विन (अमम्याग, मन मान. मात, प. पहार, चार जना पत पार पनका ही शद ग. ससा ओगया और: Ram raff ण अशान छ, मन, मान 14 ht :
॥ दंडकस्तवनम् ॥ an -- बार उपयोग मनुरूपने लहिए इस गुणों, नाण अमाण दर्शन पण ति चउ क्रम युणो ॥८॥ (द्वार १६-१७ -नारक देव तिच पंनेन्द्रि विगल तया, उपपात धवन कई भवि भगवति कहे यथा; एक थे त्रण जघन्यथी संख्य असंख्याता, उत्कृष्टा उपपात वचन समे विख्याता एक समे असंख्याता थावर प्राणिया, उपजे चवे अनंता साधारण जाणिया; एक आदि देइ जार संख्य मनुष्य लहो, समुर्छिम नरमांहि असंख्याता सद्दहो ॥१०॥ ॥९॥ ॥ ढाळ ३ जी. ॥ हवे कुमर इस्यु मन चिंतवे, ए राग. (द्वार १८)-रत्नप्रभाए जघन्यथी, दस सहस बरसना आयोरे; सागर एक उत्कृष्टो लहो, पीजे त्रण सागर थायोरे. जिनवर भाखे इम वयणडां ॥२॥ वालुपमा नरके सातवें, पंके दश सत्तर ते धूने रे; ऊदधी धावीश तम नरकमां, मागर तेत्रिश तमतमेरे. जि० ॥२॥ आदि उत्कृष्टी जे कही, उनरनी तेह जघन्यरे; १८ अमुक दंडकमां एक समये केटला जीवो जवन्यथी या उत्कृष्टयो उपजे ! एम कहे ते उपपातद्वार अने अमुक दंडकना एका समयमा केरला जीवो जव० थी धा उत्कृ० थी मरण पामे एन कहे ते च्यवनप्रार,१९ करा दंडके केटलु ज. घन्य आयुष्य अने उत्कृष्ट आयुष्य हाय एम कहेवू ते आयुष्यन्तार,
॥पं०पविगणि प्रणीनम ||
जि. ॥८॥
तेर प्रतर पहेली नरफमां, तस उत्कृष्ट मुणो देइ कर्णरे. जि० ॥३॥
नेउ सास तया, नेउ लक्ष छ, पुरव कोदि श्रीजे जाणोरे;
एक सागरना दश भागमां, एक भाग चौथै मन आणोरे, नि०॥४॥
.एम भाग एकेक वधारतां, तैरमे धाय दश भागरे,
सागर एफ पुरु धइ रहे, हवे जघन्यनी मुणों वागरे, जि. ॥५॥
दश सहस तथा दश लक्ष छ, नेवं लाख ने पूरव कोड़ी रे,
एवं गलीनु उत्कए जे, उत्तर जघन्ये जोडी रे.. जि०॥६॥
एकादश नव सत पण तथा, णं एक अनुक्रम धारोरे:
एचे पतरे गणवानो कहूं, आमनाय ते एक उदारोरे. जि० ॥७॥
ने नरकनी स्थिति उत्कृष्ट छे, तस कीजे जघन्य ते चादीरे;
मनर जेटळा ते नरकना, कीजे भाग प्रतरे साधीरे.
दस सहस वरस ते जघन्यथी, आयु भवनपति तणु होय.रे;
उत्कृष्ट चमरतुं सागरतणु, वलि इन्दनुं अधिकुं जोयरे. जि० ॥९॥
साहा त्रण तथा साहा चार छे, तस देवी तणु अनुक्रमे रे;
हवं नव निकाय दक्षिणतणु, आउखु दोढ पल्योपमरे, जि० ॥१०॥
पल्य दोय देशोन उत्तरनणु, नस देवीनुं अद्ध एकोरे;
वे उण पल्योपम कां, क्रमे गणीए धरी विवेकोरे. जि० ॥११॥
सन्ना शृद्धा त्रिजी वालुका, चोथी मणशिला नाम रे;
शर्करा खर पूढवी जाणीर, अनुक्रमे मुणो आयु ठामरे. जि॥१२॥
एक पार चउद सोल तेम वली, अष्टादश ने बावीसोरे;
सास शब्द ते नीहा नोटीए, आउखं भाव जगदीशोरे नि०॥१३॥
सात महस बग्स अपकायनु, वासर प्रण भग्नि- आयुरे;
वण सहम यग्म वायुकाय. दव माम बरस वणकायरे.नि०॥१४॥
पेहन्दिन वर वगमन, नेइन्द्रिनुं ओगणपनाम दिनरं;
पट मामनुं चौन्द्रिनणु, अयन्य मुहर्न होय भिन्नरे. 'नि० ॥१०॥
(१५६) ॥ दंडकस्तवनम् ।। जसपर गर्भज समुर्छिम तथा, गर्भज उरभूजपरिसप्परे; पूरन कोडी वरसर्नु आउखु, भिन्नमुहूर्त सप्पन भल्परे. जि० ॥१६॥ यसवर गर्भन प्रण पल्यन, समूर्छिम वर्प सहस चोरासीरे, भाग पल्योपम असंख्यातमो, गर्भज खेघरखें खासीरे. जि० ॥१७॥ खेचरनुं वहोंतेर सहसनु, उरपरिनुं त्रेपन हमार रे; भूजपरिनु बेतालीश सहसनु, ए त्रण सम्मूर्छिम धाररे. जि०॥१८॥ गर्भज नरनुं त्रण पल्यनु, जघन्यथी भिन्नमुहूत रे, दश सहस वरस व्यन्तरतणुं उत्कृष्ट पल्यन इतरे. जि०१९॥ भई पल्यन तस देवी तणु, लाख वरस ने पल्य शशिकेरुरे; सहस वरस ने पल्योपमतणु, सूर्यनु ग्रहनु पल्य धारुं. रे. जि० ॥२०॥ चंद्र मूर्य ने ग्रह देवीत. निज आयु अरब करी दीयोरे; अर्ध पल्य तथा पा. पल्यनू, नभत्र तारानुं लहीयोरे. जि० ॥२१॥ चोथो आठमो भाग झाझेरडो पल्यनो देवीनो मान रे; बे सागर सोहम जाणीए, वे उदधि झाझेरां इशान रे. जि० ॥२२॥ एक.पल्य तथा अधिकरहुँ, जघन्य आउखु सारो रे; सात सागर अथ झाझेरडं, त्रीजे ने चोथे उदारोरे. जि० ॥२३॥ बे सागर अधीकरडु, आयु जयन्य का तासरे हवे उत्कृष्ट अनुक्रमे कहुँ, मुणनो ते धरी उल्लासरे, जि० ॥२४॥ दश चउद सत्तर भष्टादश. सागरनुं अनुक्रमे जाणीरे; आगळे एकेक वधारीए, एकत्रीश ग्रेवेक लगे आणीर. जि० ॥२५॥ नेत्रीश सागर विजयादिके, चारने एकत्रिश जघन्यरे; आगळने उत्कृष्ट जवन्य ते, उत्तरतुं धागे सजनरे. जि० ॥२६॥ ॥ ढाल ४ थी.॥ देशी एकत्रीशानी.
- ॥ पविभाणि प्रीतम (१५) (बार-१०) थायर पननेरे, नार पर्याणि मगली, गिलेन्द्रियनेरे, दाळी पन एक टेली; पनर, पद पर्यानि बारे भणी, (हार-२०) दार वीसरे, भात र त्रिभुवनधणी [छुटक] मनुष्य निरि गिलेन्द्रि पण एक प्रम मार ए शेपने करल आहार टाली दोय आहार निरधार ए; (धार-२१) तिरि पन्दि मनुनाहि नारफी नाइ सहि, आये पण ए बिहुमांयी पाय वेदना बहुतही ॥२॥ ( दाळ ) व्यंतर ज्योतिपिरे, भुवनंपति बळी जाणाए, सोहम श्वानरे, पांच दंइफमांहि आणोए; पृथ्वी भरें, वण तिरि पन्द्रिय मनु, उपजे विहारे, तिरि पंचेन्द्रि मनुन ननु (पुटफ) श्रीनाथी सहसार जावत गत्यागति मनु नीरितणी; नवमाथी सर्वार्थसिद्ध मनुजनी जिनवरे भणी; नोविशमाह मनुज जाए, भाय तेउ वाउ पिणु, चोवीशमाह गत्यागनि कर तिरि पंचेन्द्रिय घणुं ॥४॥ (दाळ) गति आगतिर. विगलेन्द्रिने दश दंडके, निरि पंचेन्द्रिरे, थावर विगल मनुज जीके; भू भप वणनेरे, एहीज दशनी गति कही, प्रवीशमारे, नारक विणु आगति लही (घुटक) नवनी गनि आगति दशनी तेउ वाउने तदा, २० आहार पर्याप्त, शरीरप०, इन्धिय प. उच्छ्यास प०, भाषा पर्याः) मनः पर्या० ५ ६ पर्याप्ति हुँ, २१ आजम्आहार, लोमआहार, प्रक्षपाहार ( कवलाहार ), ए ३ आहार छ, २२ अमुफ दंडफना जीय फया फया दंडफमां जा उपजे ते गति, अमुक दंडकमां कया कया दंरपना जीयों आयी उपजे ते आगति,
गत्यागति सवि दूर थाय पामीए सुख शाश्वता॥६॥ .
(१५८)
॥ दंडकस्तवनम् ॥
यावर विगल तिरि पणेन्द्रि मनुज सहि करो जदा;
श्री वीरजिनवर तणा पदयुगपद्मने अवलंबता,
.
॥ ढाळ ६ मी.॥
।। चोपाइनी देशी, ॥
(द्वार-२२) नारक थावर विगल नपुं वेद, देवने पुंन्त्रि वेद मन येद;
तिरि पंचेन्द्रि मनुज बण जाण, ये भुवन द्वार मन आण ॥१॥
सात नरकना अनुक्रमे मुणी, त्रीश पचवीश पनर दश त्रीणि;
लाख शब्द संयले जोडीए, छठीए लखमां पण छोडीए . ॥२॥
सातमीए पण नरकावास, चोराशी लख सनि वास;
चौविश चोयालिश (४४)भडनीश, नवमी निकाय विना चालिश३
नवमीने पचास. उदार, लक्ष शब्द सघळे विस्तार;
दक्षिण दिशे दश इन्द्रना एह, चउ कोडि पद लख सर्व गुणेह
हवे उत्तर दश इन्दना कहुँ, उणा प्रत्येके चउ लख लहु;
सात कोदि ने बहोतेर लाख, सर्व थइ ए जिनवर भाख ॥५॥
एक लाख अंशी सहा जोजन, स्नप्रभा पिंड भाखे जिन
सहस जोजन उपरि अध टाल, वचपां भुवनानिने भाळ ॥६॥
संख्य असंख्यात गोजन मान, भवन कया छ तेहने थान;
लोकव्यापी मुहम थावरा, पादर देवो कहे जिनवरा ॥७॥
वादर अग्नि मुनुज ए दोय, अढा द्वीपमा कदीर सोय:
उपरी सक्ष्स जोजनमा थकी, उपरी अघ गत जोजन मुकी ॥८॥
नगर अख्याना निहां कलां, नाना भरत जेवडा लगा;
महाविदेह साम मध्यम जाण, मांटा जबद्रीपरमाण
२३ जावेद, पुनरावेदन. महयेद, ए ३ बंद है,
॥२॥
-।
,
॥ देरकरणेतुः प्रभुनीमार्थना ॥ (१५५).
संभूतल पृथ्वी मर्याद, सातों ने जोजन संवाद
तारापी दश जोजन रवि. अंशी जोजन तिहांथो शशि मनि॥१०॥
- नक्षत्र घुध जोजन चार चार, शुक्र गुरु मंगल शनि त्रण धार;
ज्योतिपीना के असंख्य विमान, हपे देवलोकनी संख्या जाणा१२॥
वत्रीश अदवीश घार अह चार, लाख शन्द जोडीए उदार;:
पचास चालिश ने छ हजार, आनत प्राणते घउ शत धार ॥२२॥
भारण अचुते प्रणशे रखा, ए मान' विमान संख्यामां लगा
प्रथम प्रोके एकसो अग्यार, बीजे एफसो सात विचार ॥१॥
। श्रीजे सो ने उपरि पंच, अनुत्तरमा पण पुण्यनो संच;
चार जोनन उंची सिद्धशिका, द्वार२४माण कहुं ये दा माहीला१४
फरस इन्द्री तनु पळ श्वासोचास, आउखु 'ए पावर होय वास;
रस इन्द्री ने वधन सहित, बेइन्दियने पद ए रीत;
नारक सहित इन्दिने सात चौरन्द्रिने चक्षु अवदात;
मन ने श्रोत्र इन्द्रिय ए युन, शेप दंदकने दा ए उत्त ॥१॥
॥ डाळ६ही.॥
राग वेलावल.
(मारे २५) नवनिधान चोद खन ए, भारपा भागने
चक, छत्र, ४, भसि बलि, फोगणी, धर्म मणि,
ने नमिपे निनरापने ॥2॥
सात फेंद्रिय रतन ए, गापापनि, सेनापति
पुरोहित, वार्षिफ, अन्ध, गन, ब्री संपनि.
तीकर, चपी, पळ, वास, कालि, माधु, पार;
ममकिनि, मालिक मलि, सनि बीच मा. . ||३||
समय बागा कमाने. २५ पौर परविना
एन ने नारादि मग २३ मतितार.
दे० ॥२॥
HO- (१६०) ॥ दंडकस्तवनम् ॥ पहेली नरकनो नीकळ्यो, सोळ संपदा पामे; सात एकेन्द्रिय टाळीने, गुणज्यो इणे ठामे. ॥४॥ वीजीनो पंदर चक्री विना, बीजीनो तेर; वल वासुदेव ए टाळजो, चोथीनो वार. तीर्थंकर विणु पांचमीनो, पामे अगीआर; केवली विणु दश छठ्ठीनो, साधु विणु निरधार. ते० ॥६॥ अश्व गज समकीत त्रण, सातमीनो जाण; भवनपति वण जोतिषी, एकवीश लहे ठाण. ते० ॥७॥ तीर्थकर वासुदेव विना, भू अप् वण नर तिरीनो; तीर्थकर चक्री वल वासु, विणु ओगणीश कीनो. ते० .८॥ तेउ वाउनो नीकल्यो, अश्व गज ए दोय; सान एकेन्द्रि इम नव, पामे जीव कोय. ते० ॥९॥ विगल अहार संपद लहे, तीर्थंकर चक्री बल वासु; केवली ए पांच टालजो, सोहम इशाने ते वीशु. ते० ॥१०॥ पहेली नरक परे जाणजो, सोल संपद इहां; जीजाथी आठमा लगे, नवमाथी चौद जिहां. ते० ॥१२॥ एकन्द्रि अश्व गज टाळजो, अनुत्तरना कहीए; * आठ निवान वासुदेव विना, द्वार संपदा लहिए. ते०॥१२॥ (द्वार-२६) करणीरूप धर्म मनु तथा, तिरि पंचंद्रिमांदि; वावीश दंडके ते नहि, धनं दार ए त्यांहि. ते०॥१३॥ (द्वार-२७) भु अप तेउ वाउ सत, दश लाख प्रत्येक साधारण वण मनु चौद, चउ चउ लख तिरि नरक ते० १४ * तीर्थकरादि आठ पदवीओ प्रत्येकवनस्पति २१ दंडके अविरतिनो उदय छे. २६ विरतिरूपधर्म. २७ ८३ लाख जीवा- योनिद्वार, ॥६० परिक पगी ॥ लाख माल दो दो विगदिमां, देखने उस चार; इम पोराशीस नीनापोनिमां, नव नव भत्तार ॥१५॥ (र-२८) पीन पीस पार मान, अग सान भहरीश सान आट नव चार लास, कोटि नगी ने ॥२६॥ गादीवार दश पारदर, नर नारस उनकोटि, नागफ र भनुमान, पांच यारर नोटि, ते॥१७॥ विनि नौरंद्रि अनुफमे, मनुन जलचर पलचर; खेचर उपरि भुनरि, अनुमा सपि निस्तर. ने ॥१८॥ (सार-२९) गर्भन नर थोडा सर्पथी, पद गुण असंख्याता; यादर भनि मानिक, भुवनपनि आख्याना. ते ॥१९॥ नारक यंतर ज्यातिपि, संख्य गुण चरिंदिः पण विशेषाधिक लहो. पंचेंदि यि तिइंदि. ते ॥२०॥ वण अमख्यातगुण फरो, पृथ्वी अपकाय; चौदमे चोल वनस्पति, अनंत गुण थाय. ते० ॥२१॥ उत्तम विजय गुरुतणा, साधु फहेवाय; भावनगरमां वीरना, पविजय गुण गाय. ते ॥२२॥ इनि श्री वीरजिनस्तु निगर्भित चोवीश दंडक स्तवन. चोविश दंडकनुं स्तवन. ( गनि भागविनु स्वरूप.) दाळ ? ली. आदर जीव क्षमा गुण आदर, ए देशी. पुर मनोरथ पास जिनेश्वर, एह फर्द भरदासजी; तारण तरण विरुद तुज सांगळी, आयो नाहरी पासनी. पुरे ॥१॥ एणे संसार समुद्र अयागे, भमीयो भाजलमाहिनी; गोलगीलीयो जीप आयो गीलना, साहेब हाथे साहीजी, पुरे० ॥२॥ 1 (१६२) ॥ दंडकस्तवनम् ॥ तुं ज्ञानी तो पण तुज आगळ, बीनक कहीए वातजी; चोवीशे दंडके हुँ फरीओ, वर्ण, एह विख्यातजी. पुरे० ॥३॥ साते नरकतणो एक दंडक, असुरादिक दश जाणजी; पांच थावर ने त्रण विकलंद्रिय, ओगणीश गणतां आणजी. पुरे० ॥४|| पंचेंद्रिय निर्यच ने मानव, एह थया एकवीशजी; व्यंतर ज्योतिषी ने वैमानिक, एम दंडक चोवीशनी. पुरे० ॥५॥ पंचेंद्रिय नियंच ने मानव, पर्याता जे होयजी; ए सबळा देवमाहे उपजे, एम देव आगति दोयनी. पुरे० ॥६॥ असंग्ख्यान आयुपे नर नीरि, निश्चे देवन थायजी: निन आयुग सग के पोछे, पण अधिक नव जायजी. पुरे० ॥७॥ भुवनपनि ने व्यंतरमोद. संमुछि तियवजी; स्वर्ग भाउने तांइ युहने, गर्भन मुहत संचजी पुरे० ॥८॥ आयु संख्याते जे गर्भन, नर नियंच विवेकनी; बाहर पृथ्वी ने बळी पागो, बनस्पनि प्रत्येकगी. पुरे० ॥९॥ पर्यावा एमे पांचे दामे, आवो उपजे देवगी; एणे पांच माही पण आगे, अधिकाइ कहुं देवनी. पुरे० ॥१०॥ जीजा सावकी मांडीने मुर, एकेंद्रिय नवी यायनी; भादमाथी उगला सरळा, मानवमादि जायजी. पुरे ? दाल २ जी. आज नहीं जोरे दीले नाहलो, ए देशी. मायाको नि भागनि दणी , जीव भोरे मसार; दोष पति ने दाव भागनि जानकी विशेष विचार. नरक !!१!! संध्यो भाइ पर्यादा दिय नियन सिमाजमा, जापान, नर }२ दानाप अमिनोयो, मोहमद नोमवायः ॥१० परिकमगी। TAH गौ ममुख खोत्रीनी लगे, पिहनुस बोयो नाग. नर || पचिपी नाक सीमा पानी, ही लगे तो जाय%; सातमी नाक पापस मान, जे गर्भन भाग. नरका मरकको प्राय बोई दंडक, नोर्गन के नर याय: पण गर्भन ने पiar, मंहगातेन गुरुय. नरफ० ॥५॥ नारकिगाने नाप निफव्या, जे फळ मानि होग; उमर भागे फरी ने कहुँ, पण नियनी कोय. नरफ० ॥६॥ मयम नरमपसी पनी कति होगे, बीनी दरी यदेव; चीनी लगे नीमकर पद लंद, गोधीए केवल हेय. नरक०७|| पांवमा नरफनो सर्वरिति लं, छठीए देशविरना सानको नरमयकी समझोत लदे, न हा अधीक निमिच. न०॥८॥ दाल ३ जी. करम परीक्षा करण कुमर चल्यो रे, ए देशी. मानव गति रिण मुक्ति होये नहिरे, पहनो पह अधिकार; आयु संख्यात नर महु दंढरे, आधी लहे अवतार. मानव ॥१॥ तेउ चाउ दंडक के नजीरे. पीजा ने पारीश विहांधी आज्या थाये मानवीरे. मुख दुःख पुन्य गरिष्ट. मा० ॥२॥ नर तिर्यच असंख्ये आयुगेरे, सातमी नरसना तैम; निहांधी चवीने मनुन हाले नदिरे, अरिहने भाग्यो एम. मा० ॥३॥ वासुदेव वलदेव तथा वली रे, चकनि भरिहेन, स्वा नरकना आया ते होवे रे, नर नियंच न होन. मा० ॥ चौयिह देव यकी चको उपजेरे, चक्रवर्ति ने वलदेव चामुदेव तीर्थकर ने हो रे, पैमानिकधी इ. मा० ॥५॥ .
(१६४) ।। दंडकस्तवनम् ॥ ढाळ ४ थी. हेम घडो रत्ने जड़यो रे, ए देशी. हचे तिर्यंच तणी गति, आगति कहीए अशेष, जीव भी एणी परे, भवमांहि कर्म विशेष; आयु संख्याते जे, नर तिर्यंच विचार. ते सघला तिर्यंच, मांहे लहे अवतार. ॥ १ ॥ जिणे तिर्यंचमांहे, आवै नारक देव, ते कह्यो पहेले, तिण कारण न कहुं हेच; पंचेंद्रिय तिर्यच, संख्याते आयुषे जेह, ते मरी चउगति मांहे, जावे इहां न संदेह. ॥ २ ॥ थावर पंच त्रण, विगलेंद्रिय आठे कहावे, तिहाथी आयु संख्याते, नर तिर्यंचमां आवे: विकल चवी लहे सर्व विरति, ते पण मोक्ष न पावे, तेउ पाउथी आयो, तेहने समकित नावे. नारक वर्जीने, सबला ए जीव संसार, पृथ्वी आउ वनस्पति, माहे लहे अवतार, ए त्रण इहांथी चवी, ते आवे दश ठामे, थावर विगल नीरि, नरमांह उत्पत्ति पामे. ॥४॥ पृथ्वीकाय आदे, लइ दश दंडक एह, तेउ वाउ मांहे, आची उपजे तेह; मनुष्यविना नब माहे, तेउ बाउ बे जावे, विगलेंद्रिय ते दशमांही, जावे पाछाही आवे. एम अनादि तणो ए, मिथ्या जीव एकंत, बनस्पति माह तिहां, रहिओ काल अनंत: - ॥ दंडकमकरणं सटीकम् ॥ (१६५) । पृथवि पाणी अग्नि, अने चोयो पलि वाय, कालचक्र असंख्याता, त्यांइ जीव रहाय. घेइंद्रिय वेइंद्रियने, वली चौरेंद्रि मझार, संख्यावा वरसा लगे, भमीयो फर्म मकार; साव आउ भव लगे, नर तिर्यंचमें रहियो, मानव भव लहिने, साधुनो थेप में ग्रहियो. ॥७॥ राग देष छुटे नहि, किम याये छुटफवार, पीण के साध्य मन माहरे, तुंहीज एक आधार; सारण तरण में त्रिकरण, गुद्धे अरिहन्त लाधो, हपे संसारतणा भवमें, भमया पुद्गल आयो ॥८॥ तुं मनोवांछित पूरण, आपदाचूरण स्वामी, ताहरी सेव लहिने में, इये नव निधि पामी, भवर काइने इच्छे नहि, इण भव तुहिन देव, हमने एक ताहरी, होजो भव भव सेय. , इम सकळ मुखफर नगर जैसलमेर महीपा दिने दिन संवत सत्तर ओगणत्रीशे, दिवम दिवाली वणे; यरू विमळचंद समान पाचक,विनयापं मुशिष्य ए, थी पापना गुण हम गारे, धर्मचंद्र मुनगीगए. ॥ इति पोपीय दंडपतरन ।
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॥ोह नमः ॥ स्वपरसमपपारावारपारीणेभ्यः परिगणसापभोमेभ्यः तपोगच्छाचार्य- श्रीविजयनेमिरिभगवद्भपो नमः । स्वोपक्षावपूर्णि-धीरूपचन्द्रमुनिविनिर्मितविकृत्यलकर्न श्रीगजसारमुनिप्रणीतं- ॥ दण्डकप्रकरणम् ॥ (अ२०) श्रीधाम महिमामय, प्रणिधाय पालधीगम्यम् । स्वोपर्श कुऽ, पिचारपत्रिंशिफासूत्रम् ॥ १॥ १६ चतुर्विशनिदण्डके प्रत्येक संक्षिप्नसंपदणी २४ पदाना- पपवारण चिकोर्पितम, तचाई विज्ञप्तिद्वारा प्रफटयमाइ सूत्रकद- नमिउंचउवीसजिणे, तस्सुचवियारलेसदेसणओ। वण्डगपएहिं ते चिय,थोसामि सुह भी भव्वा!॥१॥ (अत्र०)नस्या मनोवाक्कायैः महीभूय,कान,चतुविशतिजिनान्, भत्र भरते माम्मतीनाऽवसर्पिणीयाभिन्य, अन्यपाऽनीवानागतका- काञ्चदसकर्मभूमीय प्रवीत्य जिनयहुलाप । अई तानेर जिनान, सोप्पे। कुती,पां सूत्रमागमो जिनागमस्तवह सरीरपोगाणा य संपपणा सणेत्यादिरूप तस्प विचारो विचारणं नस्य लेगस्तस्य देनतः कपनतः । कैः सह!, भीभगवत्यादिगापायमनिषद्धदण्टक- ॥ सावभूणिक सटीकं ॥ সষ স্বরলিয়নিয়া মাথায় শারীশিমা- संखित्तयरी उ इमा, सरीरमोगाहणा य सङ्घयणा । सनासंठाणकसाय, लेसिन्दियदुसमुग्धाया ॥३॥ दिछीदसणनाणे, जोगुवथोगोववायचवणठिई। पज्जत्तिकिमाहारे, सन्निगइयागई वेए ॥ ४ ॥ (अव०)गाथा लघुसंग्रहणीसत्कामिह पामेव पदानां विचारणी : यत्वात् पर्तिशिकायां लिखितम्, व्याख्यालेभय यथा-स्वाभाविक- शरीरं च पत्रधा,औदारिक क्रियाहारकतैजसकार्मणभेदात् ।। एषां चावगाहनोच्छ्यमानं जघन्यमध्यमोत्कृष्टभेदाद त्रिधा ।। कामपन्थि- काभिप्रायेण अस्थिरचनाविशेषः संहनन तच पोहा-बचऋपभना. राच १ ऋषभनाराच : २ नाराचार्धनाराच. ४ कीलिका ५ से- चात ६ भेदात, संहननादिलक्षणं तल्लक्षणशास्त्रादवसेयम् ।३. संज्ञा चतरा--आहार-भय-परिग्रह-मैथुनलक्षणाः, दश वा एतास्ते च चतुष्कपायसंज्ञा ४ लोकसंज्ञा १ ओघसंज्ञा २ क्षेपात् ।४। सम- चतुरस्र १ न्यग्रोध २ सादि ३ वामन ४ कुज ५ हुंडक ६ भेदा- नि संस्थानानि ।। कपायाश्चत्वारः । ६। लेश्याः घट्-कृष्ण १ नील २ कापोत ३ तैजस ४ पद्म ५ शुक्ल ६ रूपाः परमत्र ता द्र- व्यरूपा अवस्थिता विचार्याः. न भावरूपाः ।७। इन्द्रियाणि पञ्च ।८। द्वौ समुद्घातौ-समवहननमात्मप्रदेशविकरणं समुद्घातः स चानी- वविषयोऽचित्तमहास्कन्धरूपः, नोजीवविपयः सप्तधा, "वेयण १ क- साय २ मरणे ३, वेउबिय ४ तेउए य ५ आहारे ६ । केवलिए चेव भवे,जीवमणुस्साण सत्तेव ॥१॥'त्तिा९। दृष्टिस्त्रिधा-मिथ्यात्वसास्वा. दनमिश्रभेदात् १० दर्शन-चक्षुरचक्षुरवधिकेवलभेदाच्चतुर्विधम्॥११॥ज्ञान ॥ दशकमकरणम् ॥ पविधुतारधिमनःपर्यायकवलदान पत्रधा ।१२अत्र शनसाह दिनुक्तमयमा नाम । नव विधा, मत्यशानं सुवाशन विभ- मानरूपम् । १३ । योगा: पचास, मनोयोगश्चतुर्श वाग्योगनर्धा. 'भोदारिको १ दारिकमिश्र २ किय ३ वैझियमिश्रा हारका- ।५ रकपिथ६ तनसकार्मणरूप ७ सप्तधा फाययोगभेदेन १४॥ उपयोगो द्विधा, नत्र मानाशानभेदाष्टकरूपः साकारोपयोगा, चतुर्भेददर्शनरूपोऽनाकारोपयोगः,संयोग द्वादश ११६॥ एफसमये उ. पथमानानां यवमानानां सङ्ख्येनि दारव्यं ।१६।।१७ स्थिति- रायुपो जघन्योलमान ।१८आहारादिग्रहणशकपः पर्याप्तय- स्वाथप आहार १ शरीरे २ न्द्रिय ३ वासोवास ४ भाषा ५ मनः ६ स्वरूपाः १९ के जीवाः कतिभ्यो दिग्भ्य आगतमाहारद- व्पमाहारयन्वीति फिमाहारद्वार ।२०विशिष्टाः संझास्तितः । य- गा त्रिकालम जानाति सा दीर्घकालिकी संज्ञा मनस्कानामेव १, पश्च देहपालनातोरिष्टवस्तुपु प्रवर्तते अहिवाच्च निवर्तते वर्च. मानकालविपपं च चिन्तनं यस्य तस्य हेतुवादोपदेशसंप्ता द्वीन्द्रि- यादीनामेव २, यश्च सम्पादृष्टिः सायोपशमिसमानयुक्तो यथाशक्ति रागादिनिप्रापरस्तस्य दृप्टिवादोपदेशिकी संज्ञा ३१२१ गतिभा- नरगमनं २रा आगनिः परभवान. १२३१ घेदश्व सीनपुंसकमे- दात् ॥२४ ॥३-१।। अयेतानि द्वाराणि २५ दंदकेऽववारयति- (दीका)--ससित दिली. गाधामयस्य व्याख्यान सुफरम- 'विनु पुनः किमपि फियते-मयेति कपदै पहिर्गम्य । 'संक्षि- 'ततरा तु संग्रहणी इयं शरीरादिधपितिद्वारामिका शरीराणि पच औदारिकारी नि । शीर्यते इति शरीर पिना. कारियात (पिनावित्यात ) । पुंक्लोपरि . अधगाहम्ने Aate जोधा अस्पामिति अवगाहना । संहन्याते पुदीकि- - सावर्णिक सटीकं च ।। यन्ते शरीरपुद्गला येन तत्, अथया संहन्यन्ते संहति- विशेष:प्राप्यन्ते शरीरावस्थावयचा. यस्तानि संहननानि । तानि (च) वर्षभनाराचादिभेदात् षोढा । संस्थान द्वेधा, जीवानां अंजीवानां च । संतिष्ठन्ते प्राणिनोऽनेनाकारविशेषेणेति संस्था सच पोढा समचतुरस्रन्यग्रोधसादिवामनकुब्जहुंडभेदः संस्था- नानि भवन्ति । द्वितीय तु अजीवानां रूपिणां पञ्चधा संस्थान यथा,-परिमण्डलं वृत्त त्र्यनं चतुसमायतं च । इह तु जीवाना संस्थाने (न (न.) म प्रयोजनमित्यर्थः । संज्ञाश्चतुर्धा दशधा या भ- घन्ति । चत्वारः प्रकारा यासांताः । अथवा दश प्रकारा या- ताः । यथा-आहारभयपरिग्रहमैथुनभेदाचतुर्धा । (पूर्वोक्त- भेदचतुष्क) क्रोधमानमायालोभओघलोंकभेदाच्चेति दश संशाः स्युरित्यर्थः । तथा ग्रन्थान्तरोक्ताः सुखदुःखमोहधर्मरूपातनः एतास्वेवान्तर्भवन्ति इत्यर्थः (अनया) संजानातीति संज्ञा । कष्यन्ते हिंस्यन्ते प्राणिनोऽस्मिन्निति कपः संसारस्तस्यायो लाभो येभ्यस्ते कपायाः क्रोधादयश्चत्वारोऽप्यनन्तानुबन्ध्यादिभे- देन षोडश: भयन्ति । लेश्याः कृष्णाद्याः पोढा स्युः । लिश्यते -लिप्यते कर्मणा सह जीयः आभिरिति लेश्याः । यदुक्तं- "कृष्णादिद्रव्यसाचिव्यात्, परिणामो. य आत्मनः । स्फटिक- स्येव तम्रायं, लेश्याशब्दः प्रवर्तते " ॥ १. ॥ कृष्णानीलफापो. ततेजःपद्मशुक्लरूपाः,परमत्र ता द्रव्यरूपा अवस्थिता विचार्या न भावरूपाः । इन्द्रियं श्रोत्रादिभेदात् पञ्चधा । दुसमुग्घायेति हो समुद्घातो जीवाजीवसम्बन्धिनौ भवतः । तत्राय जीवसमु. रातमाह-तथाहि-सम्यक् आत्मनी वेदनादिभिरेकीभावन उ. प्रावल्येन घातः समुद्घातः । स च सप्तधा, यथा-वेदनाक- पायमरणवैक्रियेत्यादि । वेदनादीनां पण्णां मानमन्तर्मुहूर्त स्यात् सप्तमस्तु केवलिसमुद्घातो दण्डादिना लीकव्यापी, दण्डादि क्रमेण सकललोकस्य पूरणात्, कालतोऽटप्सामयिकः । द्वितीयम्तु समुद्घातोऽचित्तमहास्कन्धरूपः; स च केवलिसमुद्घातयत् अ. सामयिकः परमिहानधिकारान्नोक्तं । दिट्टी• दुशिविधा, यथा सम्यादधिः १, मिथ्यावृष्टिः २: सम्यग्मिध्यावृष्टिः ३ ( च )। .
tiya maitr , anfre; aरंशन नाममा विwitutix () पालिरानाAIRt. 1 पाहाताने कॉR RITAM । अगर माना। पाकि Aafnा पनि पान मनमानीव Amar स्वा मम्मलिता I wif.भनिrry आपक, यथा-प्राय माSun, भारत मादामुपयांग. । अभियान मिrt- भारतातिरभा (गुण. १)प.मनपm na (m) मस्यि. F:मिमापिपारि मनपिपुलमलिक माना. पर wala । पहामि जगपातिसम्ममुरागसमुपान स. • पिit | MARRIETपांदवाय(जानुकमपि विधा. जान पा-RANTH HAIN विभागाने I. Hोपममुनान पापन विभा पक्षपति मिरीनामेय चोपयशानानि भाति । नागम्य । पायां मनमा शाप्रती थ. एमाण मारोप पनुषा ( पयारी ) योगाः। तचा कायानां योगा: (मत सामीलना दश योगाः स्यूरिया उपयोगी तिचा-तत्र सानासानदारका: साकारोपयोगाः (.rat.) पयार:, यथा- बर्शनापर्दर्शनारधिदर्शनकष- लदर्शनम्या । योगे एवं मादश उपयोगाः स्युरित्यर्थः । उत्प. पर ( पतिः ) उपपाता। स्यपाते घेति (युतिः) ययन । जीयानां उपपातस्यपनयारिहापि सम्याधादुपपातध्ययन विषय योपिरहकाललक्षण - अपारतराळकालळक्षणमेकसमपसङ्ख्या चेति गवते याहार: । तिन्ति नरकादिभव शङ्खलापमा पर्ष अन्तयः पाप(पुण्य)कर्मपरिणत्या स्थितिरायु वितमित्येका 'पन्चतिति' आहारादीनामत्र निवृत्तिनिष्पत्तियतो दलिफा-दल- भूतात्पुलसमुहाद भवति नस्य दलिफस्य तामेघाहाराघभिनि- ति स्पस्वविषयपरिणमनरूपा प्रति यत् करणं जीवसम्बन्धि शक्तिरूप सा पर्याप्तिः । ताथ पोदा आह:, यथा-आधारशरी. रेन्द्रियश्वासोडावासभायाममास्यरूपा । किमाहारति किमा- हारकोनाहारका था जीपः । यता farm. चित्तादि- (८) || सावर्णिकं सटीक ॥ आधारकः । न वा शरीरेणाद्वारोऽस्येति किमाहारः? । आइ- र आहार | सनीतिक विशिष्टा संशस्तितः । यया निकाल. शियम शानाति साधिकालिकी (क्ये)वतमनस्कानामेमा या भय देशपाटनदेनोरियस्तुपु प्रवर्तते अहिताच निवर्तते वर्तमान वाम नेतनं शानं या तस्य हेतुसादोपदेशिकीसंसा धानियादीनामेय। पा सम्याष्टिः क्षायोपशामिकनगुतो मानियापादियानतपरस्त हिमादोपदेशिकीसंसार छ. म्यशामे कति मजकमलमन्तव्यं । गमन गतिः । 'KARAति: ! अब यमागतः बीपेदा नपुंसकयेदः मादिषु विस्तारिता अाः ततः संक्षिप्य खम्ते' शनिपानियोग यास्यामिति प्रदरणिरित्योणादिक #f डोमपये 4 मोति नि । संक्षेपतो प्रार. माया थापा कतमिया: । चकार: सगया; * बधिनियाका विशतिधाराणि निरूपया --- चउ गम्भतिरिपबाउमु, माणुयाण पंच सेस तिसरीरा। थावर चउमे दुहयो, अंगुलअसंखभागत ॥ ५ ॥ ई - } दुनयाने बहुदा मिनि प्रातलमान गर- विसायोपचार भीगाम सम्वन्नि, सम्भवयन गा. मनि, एवं वापि देयम् । माहारस्यान कोशि- कारिन बनुमा मामयः, मनुष्याग पत्रापि । अंपा का मोहारिक धान्यां नमामाज्या है। २६.६ मिनोगका 'दुहनोनि' या सामन्या - या अन्ला मध्यमानानि अगागि, पयपि शान सामयिका धन वियोलामाध्यय.
-- (९) हारः । - 1॥ दंडकमकरणम् ॥ (टोका)-चगम्भेत्तिः गर्भजतियग्याम्बोधस्यारि' औदारिका । 'पैनियतजसकामणलक्षणानि शरीराणि भवन्ति: भधरतीयध्या. दुव्ययणे यहुंषयणमिति मांकृत लक्षणेन (नित्येऽपि यहुयचन') गमजतियग्यासमोश्चत्वारि । शरीराणि सम्भवन्ति, संभव पधं न निधयेन-। आहारकत्यागन क्रियफरणेन च. चतु.. पणां संभवः मणुआणं पञ्चेति०' मनुष्याणां पश, औदारिकव.. वियआहारकतेजस कार्मणलक्षणाः शरीराः स्युः । सेसेतिः शेपेषु दण्डका श्रीणि शरीगणि भयन्ति, तान दण्डकान घिस्तरेणा- प्रयोदश देशनां सप्तपृथिवीभेदेनका नायिकाणां मीलनेन चरर्दश दण्डकाः जातास्तेषु प्रयो वैफियतजसकामणलक्षणाः शरीग भवन्ति । तथा पृथिव्यप्तेजोवनस्पतीनां चत्वार पमो. बोन्द्रियाणां पष्ठस्त्रीन्द्रियाणां सर्वमोलनेन सप्स : दण्डका जाता.. स्तेपु धीणि औषारिफतजसकर्मिणलक्षणानि भयन्ति । संघमील. ने वितिर्दण्डका जातास्तेषु त्रीणि शरीराणि भयनित इत्ययं भाषा । प्रथम शरीरमार व्याख्यात ।.. अथाषगानाद्वारमाह- पापरतिपनम्पत्ति मुत्या स्थायरचतुष्क.पु शरीरं निधा, यथा, जघन्यतः उस्कृष्टतघाइगुलासहश्येयभागप्रमाणं शरीरं स्याद, अगुलासंख्यातभागमानं स्यादिश्यर्थः, परं पायापेक्षया उन्टमसइख्येयगुणमित्यर्थः ॥ ५ ॥ सम्वेसिपि जहन्ना, साहाविये यंगुलस्ससंखंसो। उकोस पणसयधणु, नेरइया सत्तहस्थ मुरा ॥६॥ (अर०)पाणां सर्वेषां विशनिदण्डकानीवानां स्वाभाविफस्य मोलाय: सरीस्य जघन्यारगाहना अनुलस्यामख्यातो भागः । उत्कृष्टता पश्चातधनुरुवा नरयिकाः, मुराः सप्लास्तोचाः ॥ ६॥ (का)-समिपि पति वियोगसून स्यापर. धनुफान सय बिहाय संपामपि विशनिदण्टकोन FAI पनी जाया गुदाममयातभागमन पात् । मनियर कमान म्यादिग्य । अy परमानमार उस पर (१०) ॥ सावचूर्णिक सटीकं च ॥ सप्तम्यां माघयत्याख्यायां नरकपृथिव्यां धनुःपञ्चशतप्रमाणवपुपः पञ्चशतकोदण्डशरीरमानाः नरयिकाः जीयाः स्युः, स्युरित्यध्या- हारः । ततोऽो()ना शेया रत्नप्रभा यावत् । सौधर्मे- शानयोर्दवानां तथा भषनपतिव्यन्तरभ्योतिप्काणां तूच्चत्वं यपु:- प्रमाण उत्कृष्टतः सप्त दस्ताः याः; सप्त रत्नयो भवन्ति इत्यर्थः, "बद्धमुरिटरसौ. रनिः"इति वचनात् ॥ ६ ॥ गम्भतिरि सहसजोयण,वणस्सई.अहियजोयणसहस्सं । नरतेइंदि तिगाऊ, बेइंदिय जोयणे वार ॥७॥ जोयणमेगं चउरिं-दिदेहमुच्चत्तणं सुए भणिों । वेजवियदेहं पुण, अंगुलसंख समारंभे ॥८॥ (अव०) गर्भजतिरश्चां मत्स्यादीनां योजनसहन, वनस्पतेः साधिकयोजनसहस्रं तदूर्वं तु पृथ्वीविकारः । नराखीन्द्रियाच त्रि- गव्यूतोच्चाः । श्रीन्द्रिया 'जोयणे वारत्ति' द्वादशयोजनोच्छ्याः। चतुरिन्द्रियदेहमुच्चस्वेन योजनमेकं । श्रुते प्रज्ञापनादौ भणितमुक्तं प्रस्तावादाह-चैक्रियदेहं पुनः प्रारम्भेऽङ्गुलसख्यातभागमान उत्क- ष्टं देवनरअहियलक्रांति ' २६० ॥ ८ ॥ (टीका)-गब्भतिरिसहसे ति० मत्स्योरगादयो गर्भजास्तिर्यञ्चः सहनयोजनमानाः सहस्रयोजनप्रमाणा भवन्ति भवन्तीत्यध्याहारः । वणस्सेति. प्रत्येकवनस्पतीनां सागरादिगतपमानालादीनां श. रीरं देहमान किञ्चिदधिकं योजनसहस्रमुच्चत्वं स्यात् । ननु शरीरमानं उत्सेधांगुलेन समुद्रपद्मइदादीनां प्रमाणांगुलयोजन- योजनसहस्रावगाहत्वात् तद्वतपद्मनालादीनां तु उत्सेधांगुलापेक्ष- यात्यन्तदैर्घ्यं स्यात् ? अत आह- उत्सेधांगुलयोजनसहनमाने जलाशये गोतीर्थादिस्थाने वनस्पतेः साधिक योजनसहन, तह- व.तु पृथिवीविकार इत्यर्थः । नरतेइन्ति. श्रुते सिद्धान्ते नरा. जो मनुष्याणां प्रीन्द्रियाणा कर्णमृगालिकादीनां झोधिक देहो. - ॥ कर ॥ पाय भगित कमिन अति पदं । गस्तित्रयमुभा शरी: रमानन नापीड़ियो म प पीनियल• कोरियाणा बामप्रभुतीनां समप्रमाग होस् यगुमांत गालियः ॥७॥ जीपति मरिद्रियाणां मक्षिकाभमरदवाकर्षशारिश. भाभिकप्रमुखाणामुको पोजगमे देहमानगुन भ. णित कधित । अअ पण्डाम्पो नेपः, गाथायनायगाइनास्थर प्पागणतं | अथ पुनमियागाहनामाह-पेन्धियेशि न किय देवस्य प्रारम्भ सपन्यतोऽगुलस्य मंगयांश: संख्येयमाग पु- यति उत्तरयमियशरीरापेक्षया । भधारणीयं तु गुरुसिंगयेय. भाग प्रारम्भ ॥ ८॥ अयोरटी मियागादमामाह- देवनर अहियलयख, तिरियाणं नव य.जोपणसयाई। दुगुणं तु नारयाणं, भणियं येजवियसरीरं ॥ ९ ॥ (अव०) लग्धिक्रियशरीरिणो जीयतोऽन्तर्मुहूर्तात् सपरो न वैक्रियशरीरेऽवस्थानमस्ति । पुनरौदारिकशरीरस्य अवश्यं प्रतिप- तरिति ॥९॥ (टोका) देषनरेति. असुरफुमारादिव्यातरज्योतिफसीधा धर्मास्युताषसानदेयानां च उत्कृष्टतः सहजशरीरमरणोत्तर. कालं फार्यमाभित्य विविधा फियत इति उत्तरक्रिया च पुन. धानां उत्तरयपियतनोयोजनानां फिशिदधिक दक्ष । नराणां पक्रियशरीरं फिश्चिदधिकं योजनलक्ष भणितं कथित । धेयकानुत्तरेषु देशानामुत्तरक्रियतनुनास्ति, सामध्ये सवि कार्याभायातदकरणमित्यर्थः । तिरियेति०, अत्र सुशव्यः पुनरथै तिरमा उत्पा प्रियतनुनपयोजनशतप्रमाण भणिता। तु पुन: नगयिकाणां स्थस्याभाषिकदेहादुत्तरपनियशरीरं शिगुणं शेयं, तथा
(१४.)
॥ सावचूर्णिकं सटीकं च ॥
.
टीका-सव्वेसि यउ दहेति० सर्वेषां चतुर्विशतिदण्डकजी-
घानां आहारभयमैथुनपरिग्रहलक्षणाचतन्नः संज्ञाः स्युः । अथवा
दश संशाः स्युः यथा-- पूर्वोत्तारतम्नः शोधमानमायालीभीक-
आघलक्षणाः (णाश्चेति) संक्षाः दश भवन्ति, भवन्तीत्यध्याहार।
चतुर्थ संझाद्वारं व्याख्यातं । अथ पश्चमं संस्थानद्वार प्रोच्यते ।
सवे सुरेति. भवनपत्यादिवैमानिकान्ता देवाः सर्वऽपि सम-
चतुरस्र संस्थानाः स्युः, समाश्चतस्रोऽनयातुर्दिग्यिभागोपल सिताः
शरीरावयवाः यत्र समा वा चत्वारोऽना: कोणाः यत्र ते (तत)
समचतुरस्राः(सं) गर्भजनरा गर्भजातयंञ्चश्च तयोः समचतुरन.
न्यग्रोधपरिमण्डल सादिकुटज वामन हुण्डाख्यानि पडपि संस्था.
नानि . भवन्ति । हुंडा वीति० विकलेन्द्रियाणां नरयिकाणां
. स्थावराणां च हुण्डाख्यसंस्थानं स्यात् । हुण्डस्य किं लक्षणं
स्यात् ? तदुच्यते । यथा- सवियर्वयु अलक्षणं स्यात, शुभा-
काररहित हुण्डं भवति इत्यर्थ ।ननु चतुविशतिदण्डकानां पडपि
संस्थानानि प्रोक्तानि, यदि स्थावराणां नानाविधध्वजसूचियुदधु-
दार्धमस्रा(आ)कारा वर्तन्ते तर्हि बहूनि संस्थानानि भवन्ति !
प्रोच्यते, अमी भेदा हुण्डान्तर्गता भवन्ति इत्यर्थः ॥ १२ ॥
हुण्डस्य भेदनाह-
नाणाविह धयसूइ, बुब्बुय वणवाउतेउअपकाया ।
पुढवामसूरचंदा-कारा संठाणओ भणिआ ॥१३॥
(अव०) नानाविधं, १ ध्वजः पताका, २ सूची, ३ बुख़ुदा-
काराणि क्रमेण वनस्पतिवायुतेजोऽकायशरीराणि । पृथ्वी अर्द्ध-
मसुराकारा भणिता भगवत्यादौ ॥ १३ ॥ पप्ठं कपायद्वारमाह-
टीका-नाणाविहेति. वनस्पतयो नानाविधसंस्थाना विचि.
घसंस्थानाः भणिताः। च पुनः वायवो ध्वजसंस्थाना गणिताः ।
अग्नयः सूचिकलापसंस्थानाः भणिताः प्रोक्ताः | आप: स्ति-
कबिन्दुसंस्थानाः बुदबुदाकारा: भणिताः कथिताः पंपोटा इति
लोकोक्तिः । पृथिव्यो मसूर वन्द्राकारा अधमराकारा इत्यर्थः
T॥ १३ ॥
. ॥ दण्डकपकरणं ।' सम्वेवि चउकसाया, लेसरगं गम्भतिरियमणुपसुं। नारयतेकवाक, विगला वेमाणिय तिलेसा॥१॥ (अव०) सर्वपि जीवाः चतुष्कपायवन्तः । निकायाश्च कंचन, मनुष्येपु । सप्तमं लेश्याबारमाह- लेल्यापटक गर्भजतिर्यन्मनु- ध्येतु, नारकतेनोवायुविकला वैमानिकाच निलेश्याः प्रथपद्विती- योः पृथियोः कापोवा । हतीयस्यामुपरि कापोता अधो नीला । एंकायां नीला धूमायां नीला कृष्णा चः। पप्टीससम्योः कृष्णा एव । वषा'. सौधर्मशानयोस्तेना कल्पत्रये पमा लान्तकादि, शुक्ला एवि...१४॥ पञ्चमं संस्थानहार संहरन् पटकपाया प्रति ।। टोका- सव्येषि प3. इतिः कषलिसिद्धजीपान मुफ्त्या चतु. विंशतिदरकानां जीया पत्यार फगायाः भवन्ति । पटकपा । यहार गित । अथ सम लेदयामार . यिोति । लेसेलि.' गर्भजतिथम्मनुष्ययोलेश्याः परप्याः । व पुन: नारयति नर. यिकाना तेजसा पायूनां विकलेन्द्रियाणा परशासियो पया भवन्ति । मानिधामा दंषाना तयापास्तियो मेरो भवन्ति, मातीत्यभ्याहारः ॥१५॥ जोइसिय तेउलेसा, सेसा सव्येवि हुति चउलेसा। इंदियदारं मुगर्म, मणुयाणं सच समुपाया ॥१५॥ (A) योनिकाः केवलोपान्त पा माथिम्प पतिमानपनियन्तरामया पनि । तोरेयाला पा. निशान भूजष्यने दाव हिमालं नस्दयासम्मः | निमार गुणा 1८। नई पदमनारमाह- मनुष्य सम HAMINER समाधावानां नारापा- * - ܀ ܀ *% ܙ * ܀ * ܀ -' ***«: . ܀ ܙܟܟ ، ܝܼ .܀i- .-.;:܀ ܕܲ܆ ܕܐܶ -:- ܀ ܀ ܀ ܀ .H' 4. & ! x . ; f ' . q: $$ :; -.- ܪ ܨܲܥܲܕ݂ ܐܶܬ݁ ܕ݂ .4 -܂:; ܀: ܀ ܀ ܀ ܃ ܃ ܊ ܃ ܃ ܀ 4,4.f!?: ܘܪ ܨ ܃ : ;- ܀ ܀ ܀܆܇܇܆ ܇ ܇ ܀ 3 : ; ܂ ܞ ܚܪ. -.'. ' ܐܺܝ.ܐ 1-x: ܊ ܝܐܳ܂W. , u ܕܙ| ܂ ܆ ܀܃ ܃ x:, ,, ?: ܀. ܕ ܨ ܙܐ ܪܶ,.:܀ ' &£;;. ܠ ܐ ܗܿ܆܆܃ ;: : : : :-.;.." ܐ --" *, z.ܐ: ܀ ! !*ܬܬ݀ ܕ܀܀. .:,1:, ܝܺ܂ ܕ݂ ܫܺ ܝܺܗܽ... ܐ... ܞ. ܂ ܀ ' ܀ ܓܰ !&-ܪ ܐܳܝܪܺܢܐ ... ܬܐ ܚܰܕ݂ ܀. * ' . -.. & ܐ ,܃ ܃ .. .܀ ܇ܬ ܕ݁ܺܝ ܃ ܃ ܂ܪ܆ ܕܰܬ݁ܙܶ ܕܬ݂ܝܺ - ܀ ، ، ܕ ܃ :::2܀. : ܇ ܀ ܕܶܪܵ܃ ܐ ،ܐܰܐܶ.3 ,: ܝܺ ܝܝܶܫܬ݁ܺܙܳ 11 : 1 .ܬ *4 ܝܺܕ݂ܰܝܺ ܙ ܟܪ ܝܛܙܟ7ܝܕܕ ;? turܕ݂
।
सिरिय प्रियाणां सम्तो विचार: प्रपचनसारोद्वार.
तितो भाषनीयः । अयममिन्द्रियवार ध्याख्यात । अथ नषभ
। दमकर॥
स्यान, योजनापुलामास्वादयनारपर्यः । पया इग्तलि.
निसरीरमालक्षारादोन दिशा. मुम जले समति इति टा.
को य: सपा प्रियस्य मपयोजनानि यायत विषपो
भानि, mait प्रारभ्य भयोमनप्रारत यावत् पुनलार्य
पद्रियो गृणाति हत्य: । गुमरेगां पञ्चानां विषयमदं
विमोति- धोत्रयोराकन-भर विधा भपति, गया- शुभः
अशुभः मिश | अपंपा जोगव्योमोनियादिभ्यः अंजीवेभ्यः
पारिभ्यो मिधेभ्यो भेपादिया शम्दानामुगनानां). कर्णक
पोरान विविध स्यात् ।। पुनः बभुपोषिलोकनभेदाः प.
चशा भवन्ति,पथा-वक्षुषा पञ्च शुक्लपीतरकनील कृष्णा या
मृगम्त, पमपर्णा दृष्टिगोधरा भपरित एयर्थः । तथा प्राणे:
रिद्रयस्प की मुगग्धदुर्गन्धविषयभेदी भषतः, घ्राणेत्रियं सुगन्ध
दुर्गन्धे गृहाति इत्पर्यः, प्राणविषये समभ्येत स्पः। रसना.
बा पथ कदुकादिविषयदा भवन्ति । केऽपि परप्याः, यथा
कदकतितकपायाम्टमधुरक्षारभेदात् ।' पण्णामपि रसानां स्वाद
जिहा जानाति हत्यर्थः । तथा स्पर्शरिद्रयस्यायौ । सुकुमालादि.
विषय वा भयन्ति, यथा- सुषमाटफर्कशगुरुलघुशीतोष्ण-
स्निग्धमेवात. - स्पन्द्रियः” स्पर्शन' स्पर्श ‘जानाति
रत्यर्थः । पञ्चेरिप्रयाणां सर्पऽगि प्रयोपिशनिर्षिपयभेदा जाता
त्यर्थः । अथ षणादीनामवगाहनांमार-चना कर्णधची.
परसनामामगुलासंख्येयभागावगाहना भवति । य पुनः स्पर्श.
द्रियस्य स्यदेप्रमाणावगाहना शांतल्या ।' अथ केंपामिन्द्रिया.
MEभोगछा भवति तरुलक्षणमाह-श्रवणचक्षुषोः कामेच्छा
भवति, प पुन. प्राणरसमास्पर्शविगणा भोगच्छा भवति,
आयो' कामिनी शेयो त्रयः प्राप्ताः भोगिनी झेया इत्यर्थः ।
अथवा पञ्चेन्द्रियाणां पुनरपकरण किं स्यातवाह-कन्द्रि
माना निजनिजविषयमहणशनि यथा घनदासस्य छेदनश-
.
ममुरघातमा प्ररूपात-मणुएस इति. मनुष्ये सप्त समु-
rrer vaति ॥ १६॥
३ (१८), ॥ सावचूर्णिकं सटीकं च ॥ वेयणकसायमरणे, वेउविय तेथए य.आहारे। केवलिय समुग्धाया, सत्त इमे हुँति सन्नीणं ॥१६॥ टीका-वेयणकसायेति० संझिमनुष्याणाममी सप्त वैदनाक- पायमरणादि(द्याः)समुद्घाता भवन्ति, भवन्तीत्यध्याहारः॥१६|| एगिदियाण केवल- तेउयाहारंग विणा उचत्तारि । ते विउवियवजा, विगला सन्नीण ते चेव ॥१७॥ टोका--एगिन्दियाणेति. एकेन्द्रियाणां केवलजमआहारकान विना- वर्जयित्वा :चत्वारो · वेदनाकपायमरण क्रियलक्षणा: समुदघाता भवन्ति ।.तु पुनः वैक्रियवस्तेि पूवैज्ञाः ( काः ).. फे ते ? केवलतैजस आहारक क्रियसमुदनातवा पिकला भव. न्ति, विकलानां त्रयोः वेदनाकपायमरणरूपाः समुदाता भवन न्तीत्यर्थः । संझिनां ते सप्त समुद्घाता: भवन्ति । तुः पुनरर्थे । एवं निश्वयार्थ: । चः समुच्चयार्थे ।। १७ ॥ : पण गभतिरिसुरेसु, नारयवाउसु चउर तिय सेसे । विगल दुदिही थावर, पिच्छत्ति सेस तिय दिही॥१८॥ (अव०) गर्भनतिर्यकसुरयोः पञ्च, नारकवाय्वोश्चन्चारः । शेष स्थावरे विकले च त्रयः समुद्घाताः सर्वत्रानुक्रमेण ।९ दशमं दृष्टि द्वारमाह- विकलेपु दृष्टिद्विकं सम्यक्त्वमिथ्यात्वरूपं,स्थावरा मिथ्या- स्विनः । शेपास्तिर्यकसरनारकनरास्त्रिदृष्टयः सम्यमिथ्यात्वमिश्र सहिता भवन्ति १० ॥ १८ ॥ अथैकादशदर्शनद्वारमाह- टीका-पणगभेति, गर्भजतियनु भन्ननपत्यादिवैमानिकान्तेषु देवेषु दाद्याः पञ्च समुद्याता भवन्ति । तत्राहारककेवलि समु- दुधासाभारात् । नारयेति. नरयिकवाय्वोरायश्चित्वारः समुद्घा.
विषालरूपाणि शमान भगिनानीय: मेममुनिग गि. ति• द चि कि जितम् । अपनप. ।। दंडकमकरणं ।। (१९), ला भवन्ति । सियसेते इति, शेषेषु धयः समुद्याता भवन्ति । वकारात चतुर्ग, पृथिव्यप्तेजीधनस्पति विकलेन्द्रियेषु चा- पात्रयः समुद्घाता भवन्ति । अर्थात् सप्तदण्डक प्रयः समुदः : धाता, भवतीत्यर्थः ! नवम समुदधातद्वारं व्याख्यातं । अय द. शर्म दृष्टिमारं कथ्यते । विगलेति. पिकलेघु रित्रिचतुरिन्द्रि-- या में पुष्टी भयतः, सम्यग्दृष्टिमिथ्यावृष्टिधेत्यर्थः । स्थायरा- गामेका मिथ्यावृष्टिः स्यात् । सेसति शेषेषु दण्डका तिम्रो दृष्टया भवन्ति । 'सविस्तरेणाह-नरयिकाणां' भघनपत्यादिव- मानिफान्तानां देवानां मनुष्याणां गंभंजतिरक्षां च तिम्रो पुष्ट- यः प्राप्यन्ते । कोऽर्थः ? पोहशदण्डकेषु तिम्रो दृष्टयो भवन्ती. त्यर्थः । दशमं दुष्टिनारं व्याख्यातं.। चा समुच्चयार्थः ॥ १८ ॥ अथ एकादशं दर्शनद्वारमा चउरिदिसु तदुगं सुए भणियं मणुआ चउदंसणिणो, सेसेसु तिग तिगंभणिों ॥१९॥ (अव) स्थावरतीन्द्रियश्रीन्द्रियेषु केवलमचक्षुर्दशन, चतुरि. न्द्रियेषु नद् शिकं चक्षुरचरूपं अते फर्मग्रन्यादी गित,मनुष्याय- तुर्दशनिनः। शेपेषु मुरनारकतिर्य पिकं विक दर्शनस्प पधुरपशुख- विरूपं १२॥ ॥ ९॥ बारदयं समफमाह- टोपा-थायरवितिसुतिः पञ्चम क्यापरेशानियेन्द्रि ये व अपुर्दनिमेषं भयित शोम ते । धनुरिन्द्रिये तर. भणितं तपोध परशुदर्शनयोकि नपिन मनुष्याः पर्दशनिको भयन्ति, मनुप्ये वारि भुरभुरण थावरवितिसु.यचक्र, धादिमानियामापु नि मापारि विमान HARI) धि पानि ननि भा. Kare | नारं मनदीसिम : १..
(२०) ॥ सावर्णिक सटीक ॥ NA A अथ द्वादशं शानद्वारं व्याख्यानयति- अन्नाण नाण तिय तिय, सुरतिरिनिरए थिरे यनाणदुर्ग नाणनाणदु विगले, मणुए पण नाण ति थनाणार (अव०) बन्दैकवद्भावात् मुरतिर्यग्निरये ज्ञान त्रिक भवति सम्यत्तवमाप्तौ स्थिरे ज्ञान ट्रिक,यद्यपि भूदकवनेषु कपतेन सम्यत्तवं वमतां देवानां ते पूपादे सास्वादनम- मती भवतः, परं नेहाधिकृते विकले ज्ञानाज्ञानयोटिक ज्ञानानि त्रीप्यज्ञानानि भवन्ति ॥ २० ॥ चतुर्दश तियक्षु टीका~अन्नाणनाणेति. ज्ञानधिकं भवति, तीत्यर्थः । च' पुनः थति, मतिज्ञानश्रतज्ञाने ज्ञानानि भवन्ति, मतिज्ञ लज्ञानरूपाणि भवन्तीत्यर्थः गाथान्तभूत प्रयोदशमज्ञान नरयिकेषु श्रीणि मत्यज्ञानथत भधन्ति । च पुनः स्थावरेघु . ताज्ञानं च स्यादित्यर्थः । पुनः मत्यज्ञानं श्रृताज्ञानं च स्यादिर ज्ञानविभज्ञानरूपाणि श्री य । नदारमन्तभूतं तच्च प्रादुष्कृतं । २ अज्ञानमारं संहरन्नथ चतुर्दशं य सच्चेअरमीसअसच्च-मोस म । उरलं मासा कम्मण, इय ज ॥ दंडकरकरणम् ॥ (२१) 7 टीका-भरेति प्रसमा गम्यममायोगः नगेशिती. योऽसत्यमनोयोगः २ : नृतीयो मिधमनोयोगः ३ 1. तुम. त्यामुगामनायोगः । तपंच समस्यापि'नाचारो गोगा जया नयम औदास्कियोगः १ दशम औदारिकमियोमा १० पकादशी पवि.पयोगः १५ मादको फियमिप्रयोगः १२ । प्रयोदश भाहारक.योगः १३ । चतुर्दश आहारकमिधयोगः १५ । प्रयाणामीवारिकादीमा प्रत्येक मिशरदः प्रयोज्य पशवशम्तु सफार्मणयोगः १५ । हो, भायः ? मनोययनयोरटी योगाः कायस्य संयोगाच स्युः, सर्व पदश योगा शेयापत्यर्थः । समये सिद्धान्ते भगवना इति योगा इशिताः, आगम योगा: कयिता इत्ययः । कथमितीति किं. ते पूर्वोक्ता पवेत्यर्थः . ॥२१॥ कंपा फियतो योगा भवन्ति तवाद इक्कारस सुरनिरए, तिरिएसुं तेर पनर मणुएसुं । विगले चउ पण वाएं, जोगतियं थावरे होइ ॥२२॥ (०) औदारिकदिकाहारकद्विकामावात्मरनिरययोर्विपये एकादश योगाः। तिर्या प्रयोदश कांचि क्रियळन्धिसम्भवेन तद्विकमम्भवात् । पञ्चदश मनुष्येपु, विकले औदारिकदिकफार्मणा- न्तिमभावारूपं योगचतु, पश्च वाते औदारिकद्विक क्रियद्विक- कार्मणरूपं योगत्रिकं स्थावरचतुष्के भवति ॥ २२ ॥ पञ्चदशमुप. योगद्वारमाह- टीका-झारेति० भवनपन्यादिवैमानिकान्तेषु नरयिका मौदारिकोंदारिफमिनाहारफादार कमिश्रधा एकादश योगा भ. यन्ति । ते १ मनोवघयोरटी कायस्य प्रयो यप्रियवैफिय. मिथतजमकामणरूपाः योगाः स्युः । तथा तिर्यक्ष आहारकाहा. रकमियों विहाय अन्य प्रयोदश योगा भवन्ति । च पुनः मनु. प्येषु पथदश क्लिा योगा भवन्ति । च पुनः विफलेपु विनि
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। ॥ दंडकपकरणम् ॥ (२१) टीका-सअरेतिः प्रथमः सत्यमनोयोगः । इतरो द्विती. योऽसत्यमनोयोगः २.1 तृतीयो मिश्रमनोयोगः ३ चमोऽस. त्यामृपामनायोगः ४ । तथष पचनस्यापि चत्वारो गोगा ज्ञयाः । नयम औदारिफयोगः ९ । दशम औदारिकमिश्रयोगः १० । :पकादशो मिययोगः ११ । बादशोपनियमिश्रयोगः १२ । प्रयोदश भाहारफयोगः १३ । चतुर्दश भाद्वारकमिथयोगः १४ ॥ प्रयाणामांदारियादीमा प्रत्येक मिश्रशदः प्रयोऽयः। पञ्चदशस्तु तेजसफार्मणयोगः १५ । को, भाष: ? मनोधचनयोरटी योगाः कायस्य स योगाचं स्युः, सर्व पदश योगा या इत्ययः । समये सिद्धान्ते भगवता इति योगा दर्शिताः, आगमै योगा: कथिता इत्ययः । पयमितीति कि ते पूक्किा पयेत्यर्थः ।।२।। पां फियस्तो योगा भवन्ति तदाद- इकारस सुरनिरए, तिरिएसुं तेर पनर मणुपसु । विगले चउ. पण वाए, जोगतियं थावरे होइ. ।।२२।। (०) औदारिफदिकाहारकदिकामाचासुरनिरयपोपिये एकादश योगाः। विर्य प्रयोदश कानिटरियधिसम्भवन व टिकसम्भवान् । पञ्चदश मनुष्येष, विकले यौदारिफदिकफायणा. निमभावारूपं योगद, पक्ष वाते औदारिकरिवरितिक फार्मणरूपं योगतिर्फ स्थावरच भवति ॥ २२ ॥ पश्रदाम्प. योगद्वारमाह- टीका-हमारेतिर भवनम्यादिवमानिने नायिक मौदारिकादारिमिभारमियोमा माता ! मनोमानी कायस्प यो किरविय. निर्ममा योगा ! नया नियंध बाहारा रकमका पिहार भन्ने प्रयदरा गा मन्तिम पुनः मन. पद inा मा भनि । यमः शि.
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(२४)
"|| सावचूर्णिकं सटीकं च ॥
टीका- गर्भजतियञ्चो विकला द्वित्रिचतुरिन्द्रिया नैरयिका,
भवनपत्यादिवैमानिकान्ताचैकस्मिन् समये जघन्यत एको हो
प्रयो वा उत्कृष्टतः संख्याता असंख्याता वोपपाते तथैव च्यवने
च भवन्ति ! को भावः ? एकस्मिन् समये उत्कृष्टतः संख्याता
असंख्याताश्च गर्भजतिर्यगादयः उत्पद्यन्ते च्यवन्ते चेत्यर्थः ।
विशेपमाह-केवलं सहनारादूर्व सर्वध देवाः संख्याता उत्पद्यन्ते
च्यवन्ते च, यतस्तत्र मनुष्या पव यान्ति, आनतादिच्युता
देवाश्च नरेष्वागच्छन्ति अयं विशेषः । तथा एकस्मिन् समये
एका दिसंख्यानां चीपपाते तथैव च्यवने क्षेया, अथया नियमेति
पदं सर्वत्र योज्यम् । सम्मूच्छिममनुष्या असंख्येया उत्पद्यन्ते
च्यवन्ते च । च पुनः घनस्पतिकायिका जीवाः स्वस्थानतः
प्रतिप्समयमनन्ता एवीत्पधन्ते । तथैव च्यवरते, यद्यस्मात् कार-
णात् एकैकस्मादपि निगोदात् तदसंख्येयभागोऽनन्तजीवात्मको
नित्यं च्यवते उद्वर्तते पति चोत्पद्यते । यदा तु परस्थानत उ-
त्पद्यमानाश्चिन्त्यन्ते तदा संख्याता असंख्याता पवेत्यर्थः । अथ
स्थावराः पृथिव्याधाः एकेन्द्रियाः स्वस्थानतः परस्थानतो वेत्य-
नपेक्ष्य सामान्यतः उत्पत्तौ चिन्त्यमानाः प्रत्येकमनुसमयमसं.
ख्याता भवन्त्युत्पधन्ते तथ्य असंख्याता एव च्यवन्ते, न पुनः
समयावन्तरेण नाप्येकाधा: संख्याताः॥ २ ॥
यसंन्निनर असंखा, जह उववाए तहेव चवणे वि
वावीससगतिदसवास-सहस्स उकिट्ठ पुढवाई ॥२६॥
(अव) असंजिनो नरा उत्पद्यपाना असख्याता लभ्यन्ते ।
अवातिदेशमाह- यथोपपातद्वारं सङ्ख्यामाश्रित्य व्याख्यातमेवं
ध्ययनद्वारमप्यवसातव्यम, समानत्वादुपपातच्यवनयोः । अष्टादर्श
आयुरिमाद-- अग्रेस्थितमप्यायुरिति पद सर्वत्रानुवर्तनीयम, तेन
पृथिव्याः द्वाविचतिवर्ष सहसाण्युत्कृष्टमायुरिति सर्वत्र योज्यम् । एवं
उदकस्य सप्त वायोत्रीणि, बनस्पतेर्दशवपंसहस्राणि ॥ २६॥
।। म .2777 ॥हदकरकरणम् ॥ (२५) सोया-अप्रिति अमिनो मिध्यामा सिभिरप. [aa विधा नरा मसंख्याता मानुर्भवति यानयाता पथ ययान प्रियाते पीपणा, उपपाती भवति तपस्यम. मपि संयमियधः पिEः समुनपाधिका उपपात ध्यानमा रमभिधाप अशा स्थितिमारमार- यापीस निपृथिवी- कापजीमान पिसिसघाउ थिति यान । भ. थाकाय स्थितिमाद- अफायस्य , सप्तपसापा.. उत्कृष्ट आ. शुस्थितिभपति । अथ वायुकायस्प स्थितिमा- यापुकायस्य यो साया उश स्थितिः स्यात् । अप मनस्पतियाय. पोत्कृष्ट स्थितिमाह- पनस्पतीनां तहगणानां उस्का दशमर्प- सहसा स्थितिभपति ॥ २९॥ ३० तिदिगि तिपल्लाज, नरतिरिसुरनिरयसांगरांततीसा वंतरपल्लं जोइस; वरसलवखाहियं पलियं ॥ २७ ॥ (अपं०) अग्ने त्रीणि दिनान्यायुः । गर्भजनिययनरा, त्रिप- स्पायुपो देव दिपु सरनारकाणां प्रयस्त्रिंशसागरोपमाणि ध्य- न्तराणां पल्पोपमम, ज्योतिपां. वपलक्षाधिक पल्पोपमम् ॥ २७ ।। अमुराणामायुःस्थितिमाह- टीका-तिविणगीति तेजस्कायस्य उत्कृष्ट्रा. मितिः त्रीणि दिनानि भवन्ति । स्थावराणां स्थिति रूप्यायः मरतिरक्षा 'स्थितिमाह-तिपालेतिनरतिरबोलीणि पस्योपमानि रिति. भवति । अथ सुरनरयिकानां स्थितिमाह-सुरंगरयियात्रयविं. शासागराणि उत्कृष्टा स्थिति यति । अय व्यस्तरापां स्थिति- माह-यातति० ध्यातरदेवदेवीनां दशवर्षसहस्राणि जपाया स्थिति: स्यात । अथ उत्कृष्ट स्थितिमाह- स्यातादे पाना.प. योपमं ध्यातरटे घानां तु पल्याई इयोतिष्याणां हिन. सत्राणां च धर्षाणां रक्षणाधिक पक्योपमाटमायुरवातध्यमा पमा किचिद्विषरणमाद-चन्त्राणां लक्षणाधिकं पायोपममायस्ततो पण aniri सम्राधिकं पक्ष्यापमं ततो महानां पायोपमं -- (२६) ॥ सावर्णिकं सटीक च॥ ततो नक्षत्राणां पल्योपमाई ततस्तारकागां पल्यस्य चतुर्थी भा. . गः। पां देवीनां स्थितिमाद-चन्द्रविमानवासिदेयीनां पञ्चाश- वर्षसहस्राधिक पल्या तत: सूर्यदेवीनां पञ्चशतवांधिकं प- ल्याई ततो ग्रहदेयोना पल्याचमेय नक्षदेयीनां विशेषाधिकः - पल्यस्य चतुर्थी भागः ततस्तारकदेयोनां किञ्चिदधिकः, पल्य- स्याष्टमो भागः । अथ ज्योतिष्काणां जघन्यां स्थितिमाद-चन्द्रा दिदेव देवीरूपाणां चतुणाः युगलानां पल्यस्य चतुर्थी भागः प चमके युगले तारकदेवदेवोरूपे पत्याष्टमो भागः ॥२७॥ - असुराणां स्थितिमाह - असुराण अहियथयरं, देसूणदुपल्लयं नवनिकाए । वारस वासुणपणदिण, छम्मासुकि विगलाज ॥२८॥ (अव) असुराणां.चमरादीनां फियताप्यधिकमतरं सागरोपम- शेषे निकायनवके देशोनपल्योपमद्विक दक्षिणदिशमाश्रित्य यधप. ल्योपमं उत्तरस्यां तु द्वे देशोनपल्योपमे । द्वीन्द्रियाणां द्वादशवर्षाणि - श्रीन्द्रियाणामेकोनपञ्चाशद्दिनानि । चतुरिन्द्रियाणां षण्मासा उ. 'स्कृष्टामायुः । २८ । उक्तोत्कृष्टा स्थितिः । अथ जघन्यान्तामेवाह- टीका-असुराण अहियेति० असुराणां किञ्चिदधिकमेकमतर- मेकं सागरोपममित्यर्थः। तत्र दाक्षिणात्यानामसुराणामेकमतर- मौत्तराणां साधिकमतरमित्यर्थः । दाक्षिणात्यानां धरणेन्द्रादीनां नवनिकायानां द्वितीयमई यस्य (द्वितीयस्याध यन्त्र ) तद् -उचई सार्द्धपत्योपमा स्थितिर्भवति इत्यर्थः । तथा उत्तर दि. ग्वतिनां नवनिकायानां देशोने किञ्चिदने वे एल्योपमे भवतः। तरीतुमशक्यं प्रभूतकालतरणीयत्वादतरं सागरोपमं । असुगणां स्थिति प्ररूप्य अथ विकलानां स्थिति प्ररूपयति । बारसेति. विकलानां-द्वीन्द्रियाणां घीन्द्रियाणां चतुरिन्द्रियाणां च दादश वर्षाणि एकोनपञ्चाशदिनानि पण्मासाथ प्र.मेणोत्कृष्टा स्थिति- झया ज्ञातव्या इत्यर्थः ॥ २८ ॥ - " 1 ॥ देडकमकरणं ॥ (२७) पृषिभ्यादिवशपदानां जघन्यो स्थितिमाह- पुढवाइदसपयाण; अंतमुत्तं जहन्नथाउठिई । दससहसवरिसठिइआ, भवणाहिवनिरयवंतरिया॥२९॥ (अव०) स्थावरपंच कविकलत्रिकतिर्यनराणामतर्मुहत्त जघन्या- युःस्थितिः । भवनाधिपनरकव्यंतरा जघन्यतो दशसहसस्थितिका "2: भवति:::,२९॥ अथ वैमानिकानामायुःस्थितिमाह ।' टीका-पुढयाइदसेति०, पञ्च, स्थापराप्रयो पिषलेनिया को मनुष्यतियश्ची सर्वाणि मीलितानि पृथिव्यादीनि दश पदानि जातानि । एतयां पृथिव्यादिवशपदानामग्तर्मुहले जघन्यमायुभ- पति । अथ भवनाधिपाना अपाय स्थितिमाह-'ससह ति. भषनाधिपाना नायिकाणां व्यांतराणां सदयसिंघाणि प. ::न्या स्थितिया ॥ २९ ॥ अपमानिकानां स्थितिमाह- वेमाणियजोइसिया, पालतयउंसआउआ हुंतिः। सुरनरतिरिनिरएसु, छ पज्जची थायरे चउगं ॥ ३०॥ (अव० ) वैमानिका ज्योतिपिकाध मपन्यतः कोण एक- पस्योपमाभागायुपो भवन्ति । अफोनविंशतितमं पणिमामार । सुरनरनिय निरयेपु पर्याप्पे पर्याप्तयो भवन्ति। पार आहारशीइंदिपश्चामोवासरूपं पर्यापि, सपना बार जीचा पर्यालि समाप्य प्रितं ना ॥३॥ रोका-मायोति मानिधान मान ज्योतिबा RIN KER FREE HD सापा: EKIII) यो को (२८) ॥ सावचूर्णिकं सटीक च ॥ PAN . • . त्यर्थः । उत्कृष्टजघन्ययोः स्थितिमभिधाय अर्थकोनविंशतितम पर्याप्तिमारमाह-सुरनरेति० भयनपत्यादिवैमानिकान्तेषु सुरेषु नरेषु नायियेषुः तिर्यक्षु च पडपि पर्याप्तयो भवन्ति । पञ्चसु स्थायरेषु आहारशरीरेंन्द्रियश्वासोच्छ्यासभेदात् चतस्रः पर्या- तयो भवन्ति ।। ३० ॥ अथ विकलानां पर्याप्तिमाह- विगले पंच पजत्ती, छहिसि आहार होइ सव्वेसिं । पणगाइपए भयणा, अह सन्नतियं भणिस्सामि ॥३१॥ (अव०.) पूर्वोक्तं पर्याप्तिचतुष्क भाषापर्याप्त्यधिक विकले पर्याप्तिपञ्चकम । अथ विंशतितममाहारद्वारमाह । सर्वेषां जीवानां पट्टदिक्क आहारो भवति । सर्वे जीवा दिषट्कस्थानाहारपुद्गलान् गृहन्तीतिभावः । पञ्चदिक्कादिके आहारे भजना। यथा लोका- न्तर्वसिजीवानां पञ्चदिक्कः । लोकनिष्कूटस्थानां त्रिचतुर्दिक्कः । एकविंशं संज्ञाहारमाह । अथ संज्ञात्रिकं भणिष्यामि ॥ ३१ ॥ टीका-विगले पञ्चेति विकलानां द्वित्रिचतुरिन्द्रियाणामा. हारशरोरेन्द्रियश्वासोच्छ्वासभाषाभेदात् पञ्च पर्याप्तया भव- न्ति । पर्याप्तिद्वारं व्याख्यातं । अर्थ विंशतितममाहारद्वारं वि. वृणोति । छद्दिसित्ति० षटूसु दिक्षु सर्वेषां संसारिणां जीवानां गत आहारो भवति । पइभ्यो दिग्भ्यो जीवा आहारं गृति इत्यर्थः । लोकान्ते लोकप्रान्ते च पुन: . लोककोणे लोकाले ये जीवासंति तेषां जीधानां पञ्चसु अथवा चतसृषु तिसृषु यथा संभवमाहारो भवति, पञ्चकादिपदेषु भजना कोऽर्थः ? केचन जीयाः पञ्चसु दिक्षु गतान पुद्गलान् केचन चतसृघु दिक्षु गतान् पुगलान केचन तिसृषु दिनु गतान् पुद्रलान् आहारयन्ति इति भायः । किमाहारद्वारं व्याख्यातं । अथैकविंशतितमं संशावारं व्याख्यानयति । अहे ति० अथ संझात्रिकं भणियामि भणामी. त्यर्थः ।। ३१ ॥ ...
- । मकर: पउपिणसुरतिरिएस, निरपसु य दीहकालिगी सन्ना। विगले हेउवएसा, सन्नारहिया. घिरा सवे ॥३२॥ (१०) परिभमुरनिर्ग निरपेषु न दीर्घकालिकी संहा। दीपोंजीवनामाविषयः कालो शेयो माया इति भ्युतः, रिक पदेषिकी समा। किभिमनोशानसहिता यामानविषया मशरयः । विशिष्टतापरदिवाः सवें स्थिरा नेयाः ॥३२॥ रीका-विरति धनुर्विधरंण तिच नरयिफेषु च.दी. मंकालिकोमा भवति । अवकास समुशयायः भवतीत्य म्यादा यांपुरपः दीपमपि काले विषयमनीतमः स्मरति : मषिप्पर घस्तु चिन्तयति । कथं नु नाम गया. कर्तव्यमिति त दीर्घकालिक्युपदेशन युषः । यिकलेपु विकलेंटिनयेषु देतूपदेशि. की संश स्पात -। यस्तु संवियेशानिटे छायापादिषस्तुपु हरदेवपाळनइंतोः प्रवृत्तिनिवृत्ती विधत्ते 8 हेतूपयादोपदेशेन गुफः । सर्प स्थापरा: संहारहिता भयन्ति । स्थाघरेषु संधान भयम्तीत्यर्थः ॥ ३२ ॥ फे केयु काः मंशा भवन्ति १ ता भाह- मणुयाण दीहकालिय, दिट्ठीवाजवइसिया केवि । पण पजतिरिमणुअच्चिय, चउविहदेवेसु गच्छंति ॥३३॥ (अ३० ) मनुनानां दीर्घकालिकी संज्ञा । दृष्टिवादोपदेशिकी क्षायोपमिकादिसम्यक्तसहिनाः केपि । पञ्चेन्द्रियनिर्यचोऽप्येत संज्ञायुक्ता भवन्ति । केचित् परमसत्वान्न विनक्षिताः, द्वाविशं ग. विदारं प्रयोविशमामनिद्वार चाह । पर्याप्ताः पञ्चन्द्रियाय तिर्यको मनुजाचतुर्विधदेव' गच्छन्ति । न शेषनीवाः । इति देवानामागति द्वारम ॥ ३३ ॥ अथ देवानां गविहारमाह- :
(३०) ॥ सावर्णिकं सटीकं च ॥ .... टीका-मणुआणेति० मनुष्यानां सामान्यतः दीर्घकालिकोसंहा भवति, विशेषस्तु केऽपि मनुजाः दृष्टिवादोपदेशिकाः स्युः यस्तु सम्यग्दृटिहतोयथाशक्ति रागद्वेषादिरिपून पराभवति जयतीत्यर्थः, स दृष्टिवादोपदेशिक्या सम्यग्दृष्टिरेवेत्यर्थः । केऽ. पि पञ्चेन्द्रियतियशोऽपि एतत्संज्ञायुक्ता अपि, परमल्पस्वान विवक्षिता: | सुखावबोधाय: स्यामितया संझात्रयं योजगति, यथा-दीन्द्रियादीनां अर्थात् सम्मूच्छिमपञ्चेन्द्रियाणां च हेतू पदेशिकीतंजा, गर्भजतिर्यग्नरसुरनारकाणां दीर्वकालिकोसंझा, छमस्थसम्यग्दशां मनुष्याणां केपाश्चित् तिरयां च दृष्टिवादाप देशिकी संशा, तु पुनः मनुष्याणां दीर्घकालिकीसंज्ञा स्यात, अतो मनुष्येषु दृष्टी भवत इत्यर्थः । पृथिव्यायेकेन्द्रियाणां पल्ल्यारोहणाधभिप्रायरूपा. ओघसंहवेत्यर्थः । संज्ञाद्वारं प्ररूपितं । अथ द्वाविंशतितमं गतिद्वारमाह- पणपजेति. चतुविधदेये घु पर्याप्तिभिः पूर्णाः गर्भजपञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चो मनुष्याच गच्छन्ति- यान्तीत्यर्थः । चतुर्विधदेवेषु संख्यातायुपो मनुष्यास्तेषां गमनं अन्न गमनं प्राप्तिः स्यायादो भयतीत्ययसेयम् । देवानां गति- द्वारं समाप्तम् ॥ ३३ ॥ अब देवानामागतिवारमाह- संखाउ पजपणिंदि, तिरियनरेसु तहेब पजते । भूदगपत्तेयवणे, एएसुच्चिय सुरागमणं ॥३४॥ ( अव० ) संख्यातायुपयांप्नपञ्चेन्दिय तिर्यग्न रेषु । तथैव प. प्तिाभदकान्येकवने एतेष्वेव मुराणामागमनमुत्पादो भनि । इति मुरेषु गत्यागती नारकाणां गत्यागती आह ॥ ३४ ।' टोका-संखार पजेतिः संख्यातायुष्यु पर्याप्तेपु पञ्चेन्द्रिय तिच तथा मनुध्येषु च तथैव पयांप्तयोमुंदकयो जलयोः प्रदेवनस्पती व पतंवेव पञ्चस्ववेत्यर्थः, मुराणामागतिराग- मनं भनि । मुरागामनिद्रा व्याख्यातं ॥ २४ ॥ .
" स्थाने असपर्ममागमस्याने ॥ १६ ॥ एपाजगदिदाता "देडकमकरणम् ॥ (३१) पजत्तसंखगम्भय, तिरियनरा निरयसत्तंगेजति । निरयउवटा एएसु) उप्पजति न सेसेसु ॥३५॥ (अव) पर्याप्त संख्यातायुपो : गर्भजतिर्यगनराः नरकसप्तके यांति 'असन्नि खलु ची यावर्धाति । पर An Ingli Anti- वा एतालक्षणेषु एतेष्वेव तियनेरपून्पयते ने शेपेषु जीयेपु. 1 इति नारजगत्यागवी ॥३६॥ अय पृथ्व्यवनस्पतीनां गत्यागती आइ- टीका- पन्नतिः पर्याप्ताः संख्यातायुगो गभूजतियचास. 'ग्यातायुषो नरोश' सप्तसु निरयेषु यान्ति-गच्छन्ति । "अमनी बलु पदम" इति वचनात् असमिनोऽपि प्रथमां पृथियों गायत | यान्ति, परतेपा हानधिकृतस्यात् 'नोक। नरपिकगतिवार ध्याख्यातं । अथ नायिकागतिवारं गयाख्यानपतिः। निरसिं. तथा निरयानरकात उभृतास्युमा सीधा पनेप्येष ममगाता. 'युगिभगतिर्यग्मनुध्यध्यप्युम्पपन्ते आयातीरया, शेयो विशतितारेभ्यो नरयिका जीवा न भवन्ति, पते मी. पाते नायान्तोत्ययः । नेरयिकागतिहार प्रापितं ॥ ५॥ अंथ पृथिव्यध्यनस्पतिपु जीवानां गतिमारमा-... पुढवीआउवणस्सइ, मज्झे नारयविवजिया जाना। सव्वे उववनंति, नियनियकम्माणुमाणेणं ॥३६॥ (भव० पृथिम्पन्ननस्पतिकायमध्ये नारकदिवनिता मरे योनि विदंडकस्था जीवा उत्पी । निजनित्रपपाहताग्निानुमोदिक्षा फर्मणामनुपानेन । निननिवेतिरदना मृदा स्वयं से अन्पो न परतमित्यादिनम् । कानुमानेनेति मनवा - : । ।
(३२). ॥ सावर्णिकं सटीकं च ॥ टीका. पुढयीति० पृथिव्यठवनस्पतीनां मध्ये. नारकविवजिता इति, काऽर्थः-निरयजीवान विहाय अन्ये सर्व प्रयोविंशतिद- गनकस जीया निजनिजकर्मानुमानेन-निजशुभाशुभकर्मानुसारे- जात्पद्या प्रादुर्भयन्तीत्यर्थः । गतिद्वारं विवर्णितम् ॥ ३६. ॥ .. अब पृथिव्यध्यनस्पतीनां त्रयाणामागतिहारमाह- पुढवाइ दसपएसुं, पुढवीआऊवणस्सई जंति । पुढवाइदसपएहि य, तेजवाउसु उववायो ॥३७॥ (अव)तस्यैव दंडकत्रयस्य जीवानां गतिवारमाह । पृथिव्यादिदश- पदेषु अनुक्रमस्थितिषु पृयिव्यबनस्पतिजीवा यांति । न मारक- मुरेनित्यर्थः।इति पृथ्व्यवनस्पतीनां गत्यागती। तेजोवायवोरागति- हारमा । तेनोवायोपिये पृथिव्यादिदशपदेभ्य एव. उत्पद्यन्ते जीवाः ॥३७॥ अथ तेजोवावोर्गतिमाह टीका-पुडवाइत्तिः पृथिव्यादिदशपदेयु-स्थायर विकलेन्द्रिय तिर्यग्मनुष्येषु पृथिव्यवनस्पतयः- पृथिव्यवनस्पतिसत्कजीवा यान्ति गच्छम्तीत्यर्थः । पृथिव्यादिभ्यः, दशपदेन्यः जीवानां तेजोवारयोरपान उत्पतिर्भवति इत्यर्थ: । त्रयाणां पृथिव्यव- नस्पतीनामापतिद्वारं व्याख्यातम् ॥ २७ ॥ जय जोधास्वोर्गतिद्वारमाह- तेउवागमणं, पुढवीपमुहमि होइ पपनवगे। पुडवाइटाणदसगं, विगलाइतिय तहिं जंती ॥३८॥ (10) जीवावोरागमनं पृथिवीपमुखे पदनयत भवति इदिनीयुगल्यामती । विकन्द्रिया पृयिव्यादिददास्यानेभ्य ए- सय मत्वा च नर यांति नान्यत्र । इति विकलगत्यागती ... ३८ .. 4 मजतियगमनुष्यानां नत्यागती पाह।
॥ दशरणम ॥ का-यात सोयागनिमनं भिव्यादिनापु farनियमितापायूजीशानामुपगतः म्यान्, म्या शिवस्याहारस्यादिदमम्बन्धिना )जोत्रापे)(30) मातim: ERATA यिनं न स्मात पकाचन यावय। मान. ini), पणेनीमाधोगतिवारं फयितम् । अध पि. कन्टामा गनिarमाह-वाताजनि. सिलेखियेशु थिध्या. विस्थामा जीपा गान्ति पापरमिफले त्रितियगमनुष्या गानि यः । विकलानां गतिमार याम्यातम् । अथ वि. कलामामागतिवारमाह-पु पिण्यादिस्मानदशपु विमलेति.. दियधीग्निपरिग्निधिक याति पिकलेम्ब्रियास्त भय.. ग्गीय विकटानामागतिवारं विवणितम् !!:३८ ॥ --.... अथ गर्भजतिर गम्यागतिहारमाह- गमणागमणं गम्भय-तिरिआणं सयलंजीवठाणेसुं। सव्वस्थ जति मणआ, तेउवाउहि नो जंति ॥३९॥ ( अव० ) गर्भनतियचो मृला चतुर्विशतिदंडकेपु यानि । चवृशिविदंदकभ्यथोत्पते । इति गर्भननिर्यग्गत्यागती। मनु- जा मनुष्याः सर्वत्र यांति । सर्वतियचनबलात् चतुर्वि शनिदंड- कजीयेषु फालक्षेत्रसंहननसद्भावे च सिद्धावपि यांनि । आयांतच मनुजास्तेजोवायुवर्जिनि-यो द्वाविंशनिदंडकेभ्यः समायादि । इति मर्थित सविस्तर गत्यागतिद्वारे । अथ चतुर्विशं पदद्वारमाह । टीका-गमणेति. सफलजीयस्थानेषु चतुर्विशतिदण्डकेषु गर्भ जतिरश्चां गमनागमने-गत्यागती भवतः । अथ. मनुष्याणां ग. तिमाह-सर्वत्र चयिशनिदण्डकेषु मनुष्या यान्ति गमछन्ति । अथ मनुष्याणां गतिद्वार प्रोड्यते- दार्विशतिदण्डकेभ्यो उधृ. तारच्युता जीया मनुष्या भवन्ति, तेजोवायुभ्याम् च्युता जीया मनुष्यत्वेन नोत्पान्ते, न मनुष्या भयन्तीत्यर्थः । सूत्रपाठयात पापि व्यस्तं प्रतिपादित, अनुक्रमेण नोक्तमित्ययः । गम्यागतिवारे पियर्णिने ॥ ३९ ॥ - ॥ सावर्णिकं सटीकं च ॥ मथ चतुविशतितमं घेदवारमाह- यतिय तिरिनरेसु, इत्थी पुरिसो य चउविहसुरेसु। धिरविगलनारएसुं, नपुंसवेओ हवइ एगो ॥४०॥ (अब०) वेदत्रिक तिर्यङ्नापु, स्त्रीदः पुरुषवेदश्च चतुर्विधसु. रंपु, स्थिरविकलनारकेपु नपुंसकवेद एक एव भवति । अय संक्षि. तसमहणीगाथादयानुक्तमपि, सोपयोगित्वात्किचिजीवाल्पबहुल दर्यते ॥ ४० ॥ टीका-अनियेति तिर्यग्नरेषु पुरुषत्रीनपुंसकलक्षणा घेदा भवन्ति । तथा चतुर्यिधसुरेषु श्रीपुरुषलक्षणी वेदी भवतः । च पुनः स्थावरविकलेन्द्रियनैरयिकेध्येको नपुंसकलक्षणो वेदो भवति | अपकारः समुच्चयायः । तत्र येन त्रियं प्रति अभिलाषः स्यात् स नरवेदः तृणदाहतुल्यः । येन पुरुषं प्रति अभिलाषः स्पात् म खीवेदः करीपदादतुल्यः । येन पुंखीवियये अभिलाप: स्यात् स नपुंसकवेदः नगरदाहतुल्यः । वेदद्वारं प्ररूपितम् ॥१०॥ अब गाथाहयेनाल्पवहुत्वद्वारमाह- पजमणु वायरग्गी, वेमाणियभवणनिरयवंतरिया । जोइस चउपणतिरिया, वेइंदि तेइंदि भू आउ ॥४॥ वाऊ वणस्सइच्चिय, अहिआ अहिया कमेणिमे हुंति सब्वेवि इमे भावा, जिणा! मएऽणंतसो पत्ता ॥४२॥ { २०) पन्जचिपदं वायरनिपदं च बदनः मूवकतोऽय- मारयः, यदई पर्याप्जबादरनीवविषयमेवाल्पवढचं वदिष्यामिनो पाजामविषयमिति। इइ संसारे स्तोकाः पर्याप्तमनुष्याः 14. नुवेन्यो बादग्निजीवाः असंख्यातागुणाः । एभ्यो वैमानिका भ.
में पानपrat #धि अधिनि, याxिn. ॥ दण्डकपकरणम्॥ (३५) संख्यातगुणा । एभ्यो भवनपतयोऽमंख्यातगुणाः । एभ्यो नारका असंख्यातगुणाः । एभ्यो व्यंतरा असंख्यातगुणाः । एभ्यो ज्यो- विष्काः संख्यातगुणाः । एभ्यरिद्रियां संख्यातगुणाः । एभ्यो पंचेन्द्रियास्तिपैचो विशेषाधिकाः । एभ्यो द्रिया विशेषाधिकाः एभ्यस्त्रीन्द्रिया विशेषाधिकाः । एभ्यः पृथ्वीकाया विशेषाधिकाः । मनोऽपुकाया विशेषाधिकाः। अप्कायिकेभ्यो वायुकायिका असंख्या- सगुणाः । नतो वनस्पतयोऽनन्तगुणाः । संख्यानगुणेन असंख्यात. गुणेन,अनन्तगुणेन च यथासम्भवमिम जीरा मेणाधिका भवन्ति । अथ ग्रन्धकारो जिनान स्वानि । सर्वेऽपि : च. से . पूर्वोक्ता भाषा: वेपु तेषु जीवस्थानकेषु गमनागमनरूपा हे निनाः मया भये भ्रमता अनन्तशः अनन्त कृत्वा प्राप्ताः यथा मया मपाऽन्यरपि जीवः । पोन स्वामिनः पुरः.स्वदुःखं. निपेदितम् | अंय नदिमोचनलक्षणां प्रार्थ- रोका- पजमणुति पसि यायाति पदं पता तो. বিনায়ক-য বাদামঘথিবমাথায় বিশ্ব मि नापर्यापसूक्ष्मषिपमिति । ममारे मत्रीच्या मरतो. फा. गर्भजमनुष्यास्तेभ्योपादाग्नयः पर्याना अमोगुमाधि फास्तेभ्यो चमानिका देवा अमस्येयगुताधिशम्पो भवन सिमो दवा अमरुयेय गुणाधिकारनेच्या नापिया धमक्येय गु. णाधिकास्तायोध्यम्तरा अमस्येय गुणाधिकातिभ्यो योनि मस्येय गुणाधिका-यधनुरिप्रिया धिकाम्भ्यः मतिन पद्रिया विवाधिनतोही. मिया विशेषाधिकास्नीxि विपाvिari.r: Tी. कायिका जाग असागुणाvिardभ्यो यदि अस्यगुणाधिकाया बालिका गुणाधिकारनं.पो पनपनिan in नामाहा. vinा. पगुना. TREQ.
(३८) ॥ सावचूर्णिकं सटीकं च ॥ टीका- सिरिजिणेति० हे जिनाः ! जिनहंसमुनीश्वरराज्ये गजसारेण एषा विचारषत्रिंशिकाकरणरूपा विज्ञप्तिलिखिता। किंभूतेन गजसारेण १-श्रीधयलचन्द्रशिष्येण श्रिया युक्तो धवल- चन्द्रः श्रीधयलचन्द्रस्तस्य शिष्यः श्रीधवलचन्द्रशिष्यस्तेन श्रीध- वलचन्द्रशिष्येण, किंभूता विज्ञप्तिः ?-आत्महिता आत्मने हिता आत्महिता, परेषां बोधो भवतु वा मा भवतु परं वक्तुर्वाधो भवति, यदुक्तं-अस्तु वा माऽस्तु वा बोधः, परेषां कर्मयोगतः । तथापि वक्तुमहती, निर्जरा गदिता जिनैः ॥ १ ॥ ४४ ॥ अथ. टीकाकारप्रशस्तिः- 5.(आर्या) श्रीहीरविजयसूरीश्वरा बभूवुर्जगत्त्रयोविदिताः तनाचका महोदयराजः श्रीभानुचन्द्राह्वाः ॥ १ ॥ जयन्तु ते याचकभानुचन्द्रा, अभ्यस्तसयाङ्मयवीततन्द्राः । ' ये मानसे हंसतया बभूवुरकटबरक्षोणिपतेस्तु भूतेः ॥ २ ॥ : श्रीभानुचन्द्रामलपट्टचारुप्रासादमार्जुनकुम्भकल्पाः । ते सन्तु चारुदयचन्द्रसन्तः, सुखापनोः सूरिकलालप्सन्तः ॥३॥ सार्थसार्याकृतिकामधेन्वाः, यस्य प्रासादाद गुणचक्रधाम्नः। पद्विशिकायाः किल रूपचन्द्रो,वृत्तिं चकारोदयचन्द्रशिष्यः ४ संवत्शरयशनिशेश १६७५ वर्षे, ज्येष्ठस्य कृष्णेतरचारपक्षे । पष्ठयां तिथौ याक्पतियर्यवारे,स्वस्यावबोधाय विनिर्मितेयम् ५ अनुष्टुभ-ग्रन्थाग्रगणितं सर्य, संख्ययाऽत्र विनिश्चितम् । पत्रिंशदधिकं पञ्च, शतं जातमनुष्टुभाम् ॥ ६ ॥ - ।। श्रीरूपचन्द्रमुनिप्रणिता वृत्ति: समाप्ता ॥ PAPERESENTATHease .
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श्री जैन ग्रन्थप्रकाशकसभा पुस्तक प्रसिद्धि खार
जैनधर्मना महान तत्त्वज्ञानथी भरपूर
मूल्य रु, १-८.०
५-०-०
१ संवोधप्रकरण,
२ न्यायालोकवृत्ति (तत्त्वप्रभा)
३ स्याहादविन्दु.
४ जेनतत्त्वपरिक्षा
५ स्तोत्रभानु.
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२-०-०
०-६०
हालमा ज बहार पडयो छे.
६ नवतत्त्वविस्तरार्थः ५० फरमानु डेपीसाइझमा ३-०.०
७ दण्डकविस्तरार्थः २५ फरमानु डेपीसाइझमां १-८-०
मयानु टेकाणु:-
श्रीजनप्रन्यप्रकाशक सभा.
थीकांटा, शेट जेमींगमाइनी बाहीमा
जैन एडवोकेट प्रेस-अमदाबाद.