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Dravyanuyogatarkarna

Madhojkavi · 2012/08

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ओं नमः सिद्धेभ्यः। उपोढातः। विदितमस्तु समस्तवस्तुवेदकवीतरागचरणशरणमासेदुपामाप्तोदित विश्वासजुषां हेयोपादेयविदुषां विदुषां प्रति संप्रति यद्धि समीचीनतायाः प्राचीनतायाश्च निदर्शने जैनदर्शने सम्यग्दर्शनशानचा. रित्रमयरत्नमयसमुदयमेव निखिलकर्मनिर्मोक्षणलक्षणस मोक्षस कारणं विश्रुतमिति । तत्रापि च तत्वा- थेनद्धानं सम्यग्दर्शनमिति महाशास्त्रतत्त्वार्थाधिगमसूत्रानुकूलं जीवाजीवास्रवबन्धसंवरनिर्जरामो- क्षाख्यानां सप्ततत्वानां स्वरूपानुरूपश्रद्धानलक्षणं सम्यग्दर्शनं प्रकृष्टतरं, तेन विना शानस सचान- मन्तरा चारित्रस्यासमीचीनत्वाच । उक्तेषु सततत्त्वेषु जीवाजीवौ मुख्यतमी-अपराणि वनयोः संयोगजनितानीति च । एतयोजीवस्त्येक एच, अजीयः पुनर्धर्माधर्माकाशकालपुद्गलभेदात्पश्चधा । एवमेकेन जीवेन सार्द्धमजीवस्य पञ्चप्रकाराणां मेलने कृते निष्पन्ना या पटसंख्या मैव पदव्यत्वेन प्रपन्ना सर्वज्ञः । द्रव्यलक्षणं चाखिलमतविलक्षणं गुणपर्ययवत्वमतः कृत्वा गुणपर्यायसमन्वितानां पण्णा द्रव्याणां परिज्ञानमेव मोक्षं प्रत्यत्यन्तोपयोगीति पर्ययसन्नम् ॥ अत एव च विहितात्तरौद्रदुर्ध्यानद्वयवियोगानां श्रेयोविनियोगानां प्रथमकरणचरणद्रव्याभिख्य- चतुरनयोगाना मध्ये साद्वादभानुप्रखरकरप्रकरदूरीकृतकान्तध्वान्तं शुद्धबुद्धकखभावपरमात्मस्वरूप- निरूपणसुधासंधूतमिथ्यात्वमलमलिनमव्यजनस्वान्तं नितान्तनिचितपरमशुद्धोपयोगं चरमद्व्यानुयोगं विशेषेण समनुमनन्ति परिशीलयन्ति चात्मज्ञानप्रसेदिवासी विद्वांसः । दुःषमारजनिजनितप्रतिसमयविवर्द्धमाननिबिडान्धकारप्रचारसंजातैजनतामतिमान्यप्रमादानिष्टजनदौ- प्यादिकारणजातैनष्टे नष्टप्राये जीणितेऽनवधारितसत्त्वे च कटाकलापालयनिखिलनिलिम्पपत्याटापसं- स्तुतसर्यशकल्पानल्पयतिपतिपरिकलितैतद्विपयकसिद्धान्तसंपाते संतिष्ठन्ते फिलाधुनापि मुकृतिगां मुस्- दिगम्बरधेताम्बराख्ययोरुभयोरेव संप्रदाययोर्मध्ये शतशो ग्रन्था इति संतोपास्पदमिदम् । तेषु चेपा यथार्थनामा द्रव्यानुयोगतर्कणाप्यन्यतमा । अस्या विधाता तपोगन्छगगनमास्करश्रीविनी- तसागरप्रियागशिष्यो द्रव्यविज्ञाननागरः सगुणसागरः श्रीमोजसागरः स्वजनुपा कतमं वसुधामण्डलं मण्डयामासेति निर्णेतुं नो शनुमः । समयश्वास्य दुरिमारमदमर्दकश्रीहेमचन्द्रसूरीश्वरविनिर्मितायाः स्याद्वादपरिच्छेदिकाया अन्ययोगव्यवच्छेदद्वात्रिंशिकाया निरयद्यपद्यानां स्वप्रबन्धे विनियोजनातू- थीमद्यशोविजयोपाध्यायमतल्लिकाविहितद्रव्यगुणपर्यायभाषाविवरणोदितार्थमनुमृत्यैतद्न्यसंकट, नाच विक्रमार्कपञ्चदशशताव्द्युत्तरमेव भवेदित्यनुमीयते । विशजनसंस्तुतेऽस्मिन् प्रस्तुते ग्रन्थे गुणपर्ययवद्रव्यमितिसूत्रोदितलक्षणानुकूलं जीवानीवादि- पद्माणां तद्वर्तिनां गुणपर्यायाणां च सरूप मन्दमतिमनुजावबोधनार्थमनतिविस्तरेग सरलसं. स्कृतेन सशाराप्रमाणे सयौक्तिकं च प्रदर्शितं अन्यकी प्रसंगाचानेकान्तमतजीवनप्रायाणां स्यादति.

८ स्यानास्तीत्यादिरूपाणां सप्तभङ्गानां दिगम्बराचार्यवर्यश्रीदेवसेनपादविनिर्मितनयचकाधारतया नयो- पनयमूलनयालामन्येषामपि बहूनां विषयाणां निरूपणं कृतमस्तीपेतासर्वमने विषयसूचीतो शातं भविष्यति । सर्वहितविहितप्रयत्नस्य चारय शाखरवस्य दुप्पाप्यत्वात्सर्वजनसौकर्याय श्रीपरमभुतप्रभावक- मण्डलसत्त्वाधिकारिभी रायचन्द्रजैनशास्त्रमालाद्वारा मुद्रापणे मनोरथं व्यधायि । उक्तमण्डलव्यय- स्थापकेन श्रीरेवाशंकर जगजीवनाभिधेन श्रेष्टिवरेण व्याकरणाचार्यपण्डितठाकुरप्रसादशमद्विवैदि- भिरनुवादं कारयित्वा सरस्वपि बहुरत्नायां वसुन्धरायां मत्तोऽप्यधिकविद्वत्सु मय्येवाप्यारोपितोऽस सं. शोधनभारः । प्रेषिते चोभे पुस्तके । एकं च प्रायः गुदं पुस्तकं जयपुरस्थसंवेगिसाधुपवरश्रीशि- वरामजिदनुग्रहेण लब्धं मया । एवं समुपगते पुस्तकत्रये तदनुसारं यथामति सावधानतया नाति- शीघ्रतया च संशोधनमकारि । यत्र तत्र शहास्थलेषु च साधुश्रीशिवरामजीप्रभृतिभिरपि साहाय्य. मवापि । तथापि संप्रति 'सर्वः सर्व न जानाति सर्वजो नास्ति कश्चन' इति न्यायन केयलिश्रुतफेवलि- नमन्तरा सर्वेषामेवागाधागमवाधी प्रस्खलनसमयान्मदीयप्रमादाज्ञानार्मुद्रणकालीनरपरैश्च कारण. कलापैमूले यात्रुटयो भवेयुस्तासां शोधनं कृत्वा तद्विपयकसूचनया मागनुगृतीयुस्तनभवन्तः सजन- विद्वद्वराः येन द्विरावृत्ती ता न स्युः क्षन्तव्यथाज्ञानादिजनितो ममापराध इति महर्मुहुः प्रार्थयेह- निति दिए । संशोधको निरेदकर विज्ञानुचरो जयपुरम्यः मादित्यशागीरयुपाधिधारी जवाहरलालो दिगम्बरीयजनः ।

श्री परमात्मने नमः। प्रस्तावना. .... विदित हो कि अनादिकालीन सर्वोत्तम जैन धर्म सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र रूप रत्ननयक समुदायको मोक्षकी प्राप्तिके प्रति कारणता है। इसमें भी सम्यग्दर्शन प्रधान है । क्योंकि, उसके बिना ज्ञानको और सम्यग्ज्ञान के विना चारित्रको सम्यक् पदकी प्राप्ति नहीं होती है। वह सम्यग्दर्शन जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश तथा काल इन पट् द्रयोंके यथार्थ स्वरूपको जान- कर उसमें श्रद्धान (विश्वास) करनेसे होता है । अतः सिद्ध हुआ कि मोक्षाभिलाषी जनोंको सर्वतः प्रथम घट् द्रयोंका ज्ञान करना अत्यन्त आवश्यक है । वह ज्ञान अन्तिम द्रव्यानुयोगसे होता है । इसी कारण पूज्य पुरुषोंने द्रव्यानुयोगके ज्ञानकी प्रशंसा मुक्तकंठ होकर की है और इसके अभ्यास करनेवालोंको उत्तम कहा है ॥ प्राचीन आचार्यों और बुद्धिमान् गृहस्थरलोंने अपरिमित आपतियों और परिश्चमोंको सहन करके परोपकारबुद्धिसे इस विषयके सहस्रों ग्रन्थोंकी रचना की थी। परन्तु विकराल कलिकालके प्रभावसे जीवोंके आयु, वल, बुद्धि तथा सद्धर्मकी श्रद्धा आदिमें प्रति समय होती हुई मंदता, प्रमाद और वि- पयामिलापिताकी वृद्धि एवं दुष्टोंकी दुष्टता आदिसे अनके ग्रन्थ तो निरादरपूर्वक नष्ट होगये और बहुतसे तल्लाकोंदार कुफल और मूखों के अधिकारमें रहनेसे जीर्ण हो रहे हैं, जिनका कि सूचीके बिना पता भी नहीं लगता । यह अत्यन्त खेदका विषय है। तथापि दिगम्बर सप्रदायमें समयसार, प्रवचनसार, पंचालिकाय, परमात्मप्रकाश, राजवार्तिक, लोकवार्तिक, प्रमेयकमलमार्तण्ड, न्यायकुमुदचन्द्रोदय, अष्टसहस्री, आतपरीक्षा, पंचाध्यायी सटीक, द्रव्यसंग्रह, नयचक्र, सप्तभंगतरंगिणी आदि और श्वेताम्बर संप्रदायमें समितितर्क, पोडशक, साद्वाद- रत्नाकरावतारिका, साद्वादमंजरी, तत्त्वार्थाधिगमभाष्य आदि अनेक ग्रन्थ जो प्रचारमें आरहे हैं, उनसे संतोष है। श्वेताम्बर संप्रदायके उक्त ग्रन्थों में यथार्थ नामका धारक यह " द्रव्यानुयोगतर्कणा" नामक शास्त्र भी एक है । इसके कर्ता तपोगच्छगगनमण्डलमार्तण्ड श्रीविनीतसागरजीके मुख्य शिप्य द्रव्यविज्ञाननागर सकलगुणसागर श्रीभोजसागरजी है। उक्त महात्माने अपने अवतारमे किस यसुधामंडलको मंडित किया यह शंघतार्ने निश्चित न होसका । समयके विषयमें वाचकमुख्य श्रीयशोविजयोपाध्यायजीविरचित्त द्रव्यगुणपर्याय भाषाविचरणके अनुसार इस प्रकृत शास्त्रका संकलन करनेमे अनुमान किया जाता है कि विक्रम सं० १५०० के पीछे किसी समय इन्होंने यह ग्रन्थ रचा है। (1) श्वेताम्बर मंप्रदाय के प्रचलित प्रन्योक विशेष नाम उपस्थित नहीं थे, इस लिये थोडेसेही नाम दि. सलाये गये है। (३) तपोगच्छकी एक दो पत्रोरी पदावी देशी, उसमें भी इनका तथा इनके गुरुजनो का वर्णन नहीं मिला। (३) इनके नामकै मरणार्थ कासीमे एक विशाल श्वेनाम्बरपाटशाला है।

. ६ उक्त ग्रन्थमें शास्त्रकार महोदयने सुगमतासे मन्दबुद्धि जीवोंको द्रव्यज्ञान होनेक अर्थ " गुणप. र्ययवद्रव्यम्" इस महाशास्त्र तत्त्वार्थसूत्रके अनुकूल द्रव्य, गुण और पर्यायोंका ही विशेष वर्णन किया है और प्रसंगवश सादस्ति ' 'सान्नास्ति' आदि सप्त भंगोंका और दिगम्बराचार्यवर्य श्रीदेवसेना स्वामीविरचित नयचक्रके आधारसे नय, उपनय तथा मूलनयोंका भी विस्तारसे वर्णन किया है। जो कि विषयसूचीसे विदित होगा। वर्तमान संस्कृतानभिज्ञ बुद्धिमान् जीवोंको अतिशय ज्ञानप्रद इस अन्यद्वारा तेरह लाख जैनि- यों में से प्रायः तेरह जैनियोंको भी परिपूर्ण लाभ नहीं मिलता हुआ देखकर यथार्थ नामधारक "श्रीपर- मश्रुतप्रभावकमंडल वंबई" के प्रबन्धक चतुर महाशयोंने इस शासको व्याकरणाचार्य श्रीठाकुर- प्रसादजीशर्मा द्विवेदीके हस्तमें अनुवाद करनेके अर्थ प्रदान किया और उक्त पंडितजीने भी इसका अनुवाद करके उनके मनोरथको सफल कर दिया। परन्तु अनुवादक महाशयके स्थानान्तर होजानेसे इसके संशोधनका भार मंडल के व्यवस्थापक महाशयने मुझको दिया, जो कि मैंने यथाशक्ति किया है । इसमें यदि कोई भूल हुई हो तो पाठकगण क्षमा करें। इस शास्रके संशोधनमें जयपुरस्थ संवेगी साधुवर श्रीशिवरामजी महाराजने अनेक प्रकारको स. हायता दी है, अतः मैं उनका कृतश हूं। अन्तमें परमश्रुतप्रभावकमंडलके सभासदों और व्यवस्थापक शा० रेवाशंकरजी जगजीवनजी जोहरीको धन्यवाद देता हूं कि जो इस सच्चे धर्मकार्यमें परिश्रम कर जगत्का उपकार कर रहे हैं । इत्यलम् । स्थान जयपुर शुभमिति संशोधक और निवेदक विनयावनत कार्तिक वदि १२ रविवार पं. जवाहरलाल साहित्यशास्त्री दि. जैन. सं. १९६३ विक्रम.

श्राः। अथ विषयसूची। ... उनका वर्णन. वि०संख्या. विषय, प्रा०पृष्टाङ्क प्रा०लो । वि.संख्या. विपय. प्रा०पृष्ठाई. प्रा.लो. १ टीकामहलावरण. १ २३ जिम द्रव्यके भेद है उमौके रुपान्तरको २ सूत्रमङ्गलाचरण. २ १ प्राप्त होनेपर अभेद हो जाता है ३ द्रव्यानुयोगकी प्रशसा. ३ २ और इमरीतिसे सैकड़ो नयों ४ उपसंहार और प्रथमाध्यायशी समाप्ति १० उदय होता है, इस प्रकार निरूपण, ४९ ५द्रव्यका लक्षण, १ २४ क्षेत्र आदिसे सप्तमगोंकी उत्पत्ति और ६ गुण तथा पयायका संक्षिप्त लक्षण. १२ २ ७ द्रव्यके साथ गुण और पयायका भेद. १४ ३ १५ उपसंहार और चतुर्थ अध्यायकी ८ सामान्यका निरूपण. समाप्ति. ५४ १४ ९ शक्तिरूप गुणका निषेध. २० १० २६ प्रमाण और नयके विषयका निरूपण. ५७ १० गुण और पर्यायकी एकता. २१ २७ द्रव्याथिकनयके विपयका वर्णन, २ १९पर्यायसे भिन्न गुण मानने वालोंके प्रति २८ पर्यायाधिक नयके विषयका निरूपण. ६० ३ दूपण, २२ १२ २९ दोनो नय मुख्यता तथा गणितासे भेद ११ पर्यायका कारण गुणको माननेवालोंके और अभेदका निरूपण करते हैं, ४ ... .. प्रति दूपण. .. यह वर्णन, । ८ प्रति दूषण, ... ... ... ८ १३ एकानेकखरूपतथा आधागधेयभाव से भेद कल्पना. १४ाधाराधेयभावका दृष्टान्त. २६ १५ उपसंहार और द्वितीयाध्यायकी समाप्ति. १६ व्यादिकमें सर्वथा भेद माननेवालों के २८ १७ यदि कार्योत्पत्ति के पहले कारणमें कार्य है तो कार्य क्यों नहीं दौरा पडता' मशकाका समाधान. ३५ १८ नैयायिकका मत और उसका सडन. ३६ १९ ज्ञान में सर्वथा अविद्यमान अथवा भान माननेवालों के प्रति दूषण. २. उपसंहार भार तृतीयाध्यायरी समाप्ति- ४१ २. "एक द्रव्यमें परस्पर विरोधी भद और अभेद ये दोनों धर्म नहीं रहमकवे"? इग सकाका निराकरण. २२ जहाँ भेद है, या अभेद नहीं रहता; का निराकरण.... ३० एक नय एकही विषयको कहता है, ऐमा माननेवालोंके प्रति दूषण. ६२ १५. ३१ दिगम्बरमत जानने के लिये उनके मतके अनुसार नया और १६ उपनयों के कयनकी प्रतिज्ञा.... ६४ । ३२ नय, उपनय और मूलनयों की संख्या. ६५ ., ३३ दव्याथिकनयके दश १० भेदोंका वर्णन.६६ ३४ ज्ञान की प्रशमा और पचमाध्यायकी ममामि. ३५ दिगम्बरमनमे भी मलका ग्रहण करना चाहिये, यह वर्णन. ३६ पयायाधिक नयके भेदोश निरूपण.७९ नगमनयके ३ भेदोका कथन.... ३८ संग्रह नयके दो भेदोका वर्णन. ८९ १५' ३९ व्यवहारनय के दो भेटका कयन. ४० ऋजुमूत्रनयके दो भेदोका निरूपण, ९३ ४१ शम्दनय और समभिल्दनयका वर्णन.९४ १'४२ एवभून नयका वर्णन और नव नयाँके भाग संत्या. ६४३ उपसंहार और पटाघ्यायकी समाप्ति. ९७ ९ ७८ १ २ १५ ... ... १७ २ विषय. ... سه ४ ... ८ १ १० ... ३ ... १ ... ८ ७ १ ... वि०संख्या. विषय. प्रा०पृष्टा. प्रा०लोवि०संख्या. श०पृष्टाक.ग्रा.लो. ४४ सद्भूत व्यवहार उपनयका निरूपण. ९८ १.६८ पट् द्रव्योंके नाम. ४५ असद्भूत व्यवहार उपनयका कथन. १०० ४६९ धर्म द्रव्यका वर्णन. ४६ उपचरित असद्भूत उपनयका वर्णन. १०८ १३.७० अधर्म द्रव्यका कथन. ४७ उपसंहार और ससमाध्यायकी ७१ धर्म द्रव्यमें प्रमाण. ६ समाप्ति. ११० १६/७२ अधर्म द्रव्यमें प्रमाण.... ४८ दो मूलनयों में प्रथम निश्चयनयका ७३ आकाश द्रव्यका निरूपण. १५० कथन.... १११ ७४ काल द्रव्यका वर्णन. ४९ द्वितीय व्यवहारनयका निरूपण. १७३ ११२ ७५ पुद्गल और जीव द्रव्यका वर्णन. १८२ ५० इन नय, उपनय और मूलनयोंका ७६ उपसंहार और देशमाध्यायकी वर्णन दिगम्बरीय नय-चक्रमें समाप्ति. देवसेनजीने इसीप्रकार किया है, १८३ ७७ गुणनिरूपणकी प्रतिज्ञा. १८४ यह कथन.... ११५ ७८ दश सामान्य गुणोंका निरूपण. १८५ २ ५१ इस नय विचार, दिगम्बर और श्वेताम्ब- ७९ विशेष गुणों का वर्णन.... १८९ सके अर्थभेद नहीं, यह वर्णन. ११६ ९ ८० एकादश सामान्य स्वभावका कथन.१९३ १३ ५२ दिगम्बर नय नय मानते हैं, इसका ८१ उपसंहार और ११वें अध्यायकी ११७ समाप्ति- २०२ २७ ५३ व्यार्थिकके दश भेद उपलक्षण ८२ दश विशेय स्वभावका वर्णन. २०४ मात्र है, यह वर्णन. १२७ २० ८३ किम २ द्रव्य में कितने २ खभाव है, ५४ उपनय भी व्यवहारमें ही अन्तर्गत हो यह कथन जाते है. २१ ८४ उपसंहार और अध्यायी ५५ निश्चय और व्यवहारमें जय एककी २१२ मुल्यता रहती है, तब दूसरेकी ८५ बौन २ से सभार किस २ गयके मीणता रहती है; यह निरूपण. २२ मतसे है, यह वर्णन. २१३ ५६ निश्चय तत्वार्थको और व्यवहार लोको. ८६ गुण और पर्यायका लक्षण, किको कहता है. २२१ १३. ८७ उपसंहार और १३ वे अध्यायकी ५७ निश्चयका विषय. २४ समाप्ति. ५८ व्यवहारका विषय. ५९ उक्त कथनका संक्षेप... ८८ पर्यायका निरूपण. १३३ २६ १० अमाध्यायकी समाप्ति. १३४ २७/८९ गुणके विकार ही पर्याय है,इस मनरा ६१ एकही पदार्थ उत्पाद, व्यय और २३२ १५ धौव्य इन तीन लक्षणों सहित है, ९. उपसंहार और १४ अध्यायको यह निकापण. समाप्ति. ६२ उत्पादका वर्णन. १५४ १९९१ द्रव्यविचार करने का फल, ६३ नाशका वर्णन. १५९ २५ ९२ द्रव्यानुयोगका प्रकाश मैंने किया. २३४ २ ६४ ध्रौव्या निरूपग. २८/९३ च्यानुयोग के अभ्यासी उत्तम है. ३ ६५ उपसंहार और नयमाप्यायकी समाप्ति २९९४ ज्ञानकी प्रशंमा. ६६व्यका निरूपण करनेवीप्रतिज्ञा. ९५ प्रशस्ति. द्रव्यपरिक्षानसे सम्यस्वकी शुद्धि २१९६ ग्रंथी समामि. २३ इति विश्यमूली समामः। .. समाप्ति.... १५ १ ... ... ... ... ... १ ... संडन. ... ९ .... ... १ ... ४ १ ... ." ...

अथ द्रव्यानुयोगतर्कणायाः शुद्धिपत्रम् पृष्ठ. १ पंक्ति. १० २।३ २ " " ३ " जिनस्रयीतनुः रत्नत्रयरूप शरीरके धारक श्रीजिनेन्द्र जयवन्त है श्री (लक्ष्मी) से आदि जाणति + + चित्तकी तत्परता आवश्यकादि आवश्यकभादिरूप जो भ्रमत गीतार्थ तथा गीतार्थ निश्चय इन दोनोंके सिवाय किसी तीसरेको श्रीजिनेन्द्र ने साधु नहीं कहा है ४ १८ ५ ६ अशुद्. जिनत्रयीतनः जिन भगवानकी तीन अवयवमयी मूर्ति सर्वोपरि विजयकारी है श्रीलक्ष्मीसे (आदिज्ञान) याणंति पृच्छानुवाद है बाह्यव्यवहारप्राधान्यम् । (चितके प्रणिधान चित्तकी तत्परता) अवश्यादिक आवश्यक भ्रमतः तर्कशास्त्रीके अध्ययनद्वारा सिद्धान्त-रहस्यमें जिसने विहार किया है, अथवा सामान न्यरूपसे इसमें प्रेम होनेसे जो सिद्धा. न्तरहस्य में निष्ठ है, इनहीको जिन - टोने साधु कहे हैं, न कि अन्यत्र तृतीय स्थान विहार करनेवाले तार कियारहितः तखवयवा आपेक्षिक जातं सलैवेति १७ N २६ ९३१॥३२॥ ताजियारहितः २२ तन्ववयवा ११ २१ भापेक्षिक जात सर्तव्यैवेति इसी प्रकार सर्व व्य, गुण तथा पर्याय परम्पर भिन्न मी है, अभित्र भी है, तीन प्रकारके है और त्रिलक्षणमाहित है। ११ २०१९५१ इसी प्रकार " तीन लक्षणयुक्त द्रव्य गुण तथा पर्यायसे निविध (तीन प्रकारके हैं और ये तीनों कथंचि मिन और कचित् अभिन भी है। छहाँ त्रिविध ध्रोव्य उहाँ द्रव्य " त्रिविध है और त्रिरम ध्रीय " ﷲ ޝަދ ސޯރޗް ތަ ޒަޢީ x श्वेत दिभ्यश्च मनुभवन् कता " 4 २ द्रव्यानुयोगतर्कणायाः । पृष्ट पक्ति. १४ ३० शुद्ध. परोऽग्रेतनो तदा द्रव्यमापद्यत इति गामिना '८ " " २४ २५ . " २८ २० २८ २२ " " २३ ४ १२ " " अशुद्ध. परोग्रेऽतनो तदि दव्यमापद्यतेति .. गाभिका (उचित वा योग्य) तथा परिणमिता परम्परकारण परियोमु कार्यकरणों के ম गोन दौरिध तदि बदन्ते किमिति- श्रयनाम होना चाहिये पर्यायाऽनेके गुण है सो सहभावी पर्याय सोमभावी संज्ञा गुणना निःप्रकम्पो क्योकि जैसे पुनरभेद भावास्कन्धा मान्यायगुस्खमाननान् परिणमयत्येव भापते यह एक रूप उससेही है अर्थात आगातः लापोऽस्ति अविद्यामान मन्वप बाधमान तथाहि परिणता परम्पराकारण परिवहेमु कार्यकारणोके भण्णा गौन दोग्धि तहि वदन्ति किमिति प्रयोनाम होने चाहिये पर्याया अनेके हो सो सहभावी गुण है हो सो क्रममावी पर्याय है संज्ञा गुणन निष्प्रकम्पो क्योकि पुनर्भेद भाधात्स्कन्धा मान्योत्कृष्टगुरुवमानना परिणमत्येव भापसे २५ ३ १८ ६ २५ " " " २५ २८ ३१ १ " ३ ३१ ये एकरूप ही है इससे ११ आगतः राघवमस्ति अविद्यमान मन्वय थाप्यमान " " शुद्धिपत्रम् । ऐसा कहना पीताकर दृढयन्नाह ज्ञापयितु- प्राकारकी .८ " भदे नय २४ १९ १५ " १६ १८ " २३ ४६ ऐसा न कहना पीताशर द्रढयन्नाह झापयिनु प्रकारकी भेदनयं तथा यह है ऐसा पूछते हो सो अहो, प्रसाशके भेदसे पर्याय जम्माई भेदा जीवाजीवा स्यादस्त्येव स्यादवाच्य एवं चौथा पर्यायार्थ तब "स्यात् ( बोध) का तीनोंमें तथा भेदको दुर्नय- विमुखत्वेन " ४८ २० ५१ क्योंकि ऐसा है अहो प्रकाशका भेद ययाय जम्भाई भील्या जीवा जीवा स्यादवाच्य एवं चार पर्याय "तब स्यात् ( बोध) तिनाम अर्थ अभेदको दुर्णय- विमुख्यत्वेन २ २९ १ ५ ६. १७ ६३ ३ प्युक्तः संमता युक्तः संमिता भरणा ८ अणुपण दुर्नय- दुणे- " . " तदा भासतां " ११ सम शुताः दुर्णयाः जिसके हुए तदाभासता सम्मश्रुताः दुर्नयाः जिराके कहे हुए का जो अभिप्राय तथा बहुवचन मी लगाटेना चाहिये स्वीधर शामान हमारे समानही है इसलिये उसके के अभिप्रायसे जो बहुवचन लगाकर सीकार शालामें वो हमारे समानही होनेसे उन नयाँके " ६५ " द्रव्यानुयोगतर्कणायाः एम पति. १९ २६ " ६७ ७ अशुद्ध. उनका चाध्यात्माऽपि दश भेद दिखाकर उन दछ भब्द कोपाधि दोश्च । पा. ४॥३॥१६॥ बाह्यकारेण अन्तरविद्य- विष्णेया। अविभावको कहलाते (द्रव्यप्राण और भावप्राण) दोनो प्राण जिनके है ये प्राणी हैं ऐसे जो संसारी मुख्यनये " ६८ " . उन नयोंका बाध्यात्ममपि + दव्वं भव्य कोपाधि द्रोध । पा. ४१३१६॥ याह्याकारण अन्तर्विद्य विष्णेया आविभावको पहलाते हैं द्रव्य तथा भाव ये दोनों प्राण जिनके है ये प्राणी है संसारी ऐसे जो मुख्यनयः करते भव्यालयः भवं घातिया कमाके " २७ " २९/३० कहते २६ ३ २६ " " भाव्यालयः नव पातीया कमौके शुक्र विधिवलीवान् -मुपाधिकानों दृष्टान्त- उपाधिक गापेक्षिक ८. ८२ १३ विधिलवान् -मापाधिकानां दृष्टान्तं. आपाधिर सापेक्ष " " ८३ . " १४-१५ ܕܙ-rܝ " " १८ " ८४ ७ यापयोर्वर्तमानाः सापेक्षिक -तस्मिन्तदयारोप- धर्मके गोग्राम पाचिये संगम गारप्राधार पचमेदा- बारामा पित परिये उनी ਨ व्याधयो यतमानाः सारेक्षक - तसिंसरण्यारोप- धर्मी गोनम, नामकर्म चाहिये संपन्येने भायपागाधबारः पम भेदा- पाशलक्षण विर " " 2 " . ५ शुद्धिपत्रम् ।. ५ पृष्ट. पंक्ति, १२ अशुद्ध. संप्रति जीव और दय लावो वा द्रव्याविवक्षासे क्योंकि शब्दके घटभेदसे और कुंभके " शुद्ध. समस्त जीव और अजीव द्रव्य लाभो इत्यादि विवक्षासे इसलिये शब्दके भेदसे " " ३. १५ १६ तथा तीन ३ १२ " " १९ " १३ १०२ १०३ १०४ १०५ ६ " " १५ १२ समूह समूहो दिहि- भासद्भुत- लेप, जन्यो यथाभवेत् गोर- गुणाचारो प्रतिज्ञान शरीरे गुणः गुणः पटेनेत्येवं सद्धृतव्यवहारो किश्चमति- और सुसर्गसिद्ध धर्मके मतिहीन भागिक सम्बधीकी सबम्धकी स्याद्वादशैलीसे पूर्वात निश्चयो नामा आत्माय शुद्ध नयोऽप्यशुद्ध गुणिनि दर्शनात् परत्वस्थ तदनुपाधिकगुणगुणिनोर्मेदाभित्रो मेद तथा वक्ष्यमाण तीन संग्रह संग्रहो दिहि- अथासद- श्लेप,-जन्यो यथा भवेत् गौरत्व- गुणचारो मतिज्ञान शरीर गुणाः गुणाः पटेनेत्येवमसद्धृतव्यवहारो किञ्च मति. अर्थात् संसर्गसिद्ध जाति धर्मसे मति ज्ञान भोगिक सम्बन्धीकी सम्बन्धी की स्याद्वादशैलीके पूर्वोक्त निश्चयनामा आत्माप्यशुद्ध नयोऽशुद्धः। गुणिनिदर्शनात् परन्त्वस्थ तदानुपाविकगुणगुणिनामेंदाद् मिन्नो भेद १०६ " ९ " १८ १०९ ११० २ " " १९ " १११ ९ " " " " ६ द्रव्यानुयोगतर्कणायाः । अशुद्ध. पृष्ट. ११४ द्वि:प्रकारः केवलादिगुणके तदपि कल्पितत्वाईपचरितम् संवन्धमिव समादिष्टं कषितम् । द्विप्रकारः केवलादिगुणसे सोऽपि कल्पितवादुपचरितः सम्बन्ध इव समादिष्टाः कथिताः पक्ति. ५ ६ ३ 3 ११६ ३ " समानतंत्र कन्वान्तरतमना "देवसेनजीसे (अन्य २ अधेकै कस्य ११८ १५ " २२ १३ १२. १२२ " १२३ " समानतंत्रता कृत्वान्तरात्मना देवसेनजीसे "अन्य अथैकैकस्य पर्यायार्थ प्रतिव्यक्ति- वैसादृश्य- समभिरुढ उज्जुमयस्स वादियो द्रव्याधिक कोटिप्रकारैरप्यर्पितानर्पित समभिरूद विशेष संप्रहाद् व्यवहाराच इत्यादि । पृथिवीशयिकादि. स्वप्रक्रिया नियोजन जीवा. अजीवश्चती भासवः पइने चाहिये थायव आदि थाना आदिक शुभ अशुभ पथके कारण पुण्य पापको पणता मुख्याधिक खप्रम्यश्व सूत्र १२४ पर्यायाधि प्रति व्यक्ति- वैसदृश्य- समभिरूड उज्जमुयस्य वादीयोंका द्रव्याधिक कोटिप्रकारैरपि तानर्पित समभिरूड विशेष संमहाव्यवहाराच इत्यादि पृथिवी कथिकादि- खप्रक्रिया नियोजनजीवा अजीवश्चती आश्रयः कहिये भात्रय धादि मात्रय आदिक शुम पंपके कारण पुण्यको पणाता मुताधिक मसम्पत्क सूधमें क्षेन १६ १८ १२५ ७ " १३ " " १२६ .. " " ३ " " " " १२७ U सूप्रे व्यवहारलक्षणे- सरियायो व्यवहारः" इति " रेमिकमाय" " ७ शुद्धिपत्रम् । प्रेक्ति. अशुद्ध. मात्रेण २८ १३ " १३१ १३२ २३ १८ १३३ " शुद्ध. मानव द्वन्द्वन नरनैरयकादि x पुण्डरीकाध्ययनार्थ विधाः झरती प्यधिकान् इत्याद्यनेक- सत्येऽलीके देवसेनो भद्रा धुवे इवा निर्णाशैः निर्णाश- विरोधनाश- जगह नियततासे प्रस्तुत त्रिविध लक्षणका " " नरतरयकादि गौणतासे उस नयकी अर्थवोधनशक्ति तथा पुण्डरीकाध्ययनार्थ विद्याः करती है ध्यधिकान् इत्यादि अनेक- सत्केलीके देससेनः भादा ध्रुचे इवा नि शैः निशि- विरोधनाश जेगह नियत्ततासे विविधलक्षणप्रस्तुताका " १३५ " १३६ 1 ३ " १७ " २८ " " १३८ १ ध्रुव ही है ध्रुव ही नहीं है ८ " १५ मीले ध्रौव्यं गृहण भानाम निष्टम् मौलेनौंव्य ग्रहण भाणामनिष्टम् १३९ १४० ७ " ૨૧ " प्रमाणसिद्धप. आदर्तव्याः ध्रौव्याणि अभिन्नरूप थानसे लाधवप्रिय नैयायिक १४२ १४३ ७ " ८ " १२ प्रमाणसिद्ध- आइतव्याः -धोव्यानि अमिनरूप प्यानसे लाघवप्रिय (१) नैयायिक नाश पुसः गौरवसत्वेन मक्षणत्रय अवतारण घटेति समती ३ " नाश पुनः गोरसत्वेन लक्षणत्रय अवतारणा " १४४ २ घट इति संभवती १४६ ८ द्रव्यानुयोगतर्कणायाः पृष्ठ. पंक्ति. अशुद्ध नशधातो तया नाशके २८ " १४८ " १४९ १९ २८ १५२ १५३ २४ " १९ " " २२ " १५४ ८ १५ " कालकी भवद अपक्षासे सैव विशेश नाशको अभवका द्रव्याना- नियमा नियमकता दविपस्स बहुयाविहोति उप्पापाः । उपापसमाविगमाठिइपस्मुगाओ (तथा उत्पत्तियुक्त) आद्यो विशुद्धो अपरिशुद्धो परिगत: उत्पत्तिसे संयोगे है पर्यायतः पर्यव परमाणुना- समिती समयप्रमाणमस्ति अन्तयानुगम लक्षीकृतम् गुणपर्यायो द्रव्यादीनि मोक्त्वफलाओ प्रवर्तन कर्मधर्मको आरछा प्रदेशास्त स्यास्तिकायात्वं झ्यारित्तकिरियाय नश्धातो नाशके कालके भवेदने अपेक्षासे स एवं विसेस नाशकी अभावका द्रव्याणा- नियता नियामकता दवियस्सबहुयावि होंति उपाया। उप्पायसमा विगमा ठिइयउस्मुगाओ तथा उत्पत्तियुफ आद्योऽविशुद्धो अपरिसुदो परिणतः उत्पत्ति एकत्व संयोग है पर्ययतः पर्यय परमाणूना- संमती समयप्रमाणोऽस्ति अन्वयानुगम लक्ष्यीकृतम् गुणपर्याय द्रव्यादीनां मोक्खफलाओ प्रवर्तमानः धर्मकर्मको अच्छा प्रदेशास्तैः स्वास्तिकायवं एयसित्तकिरियाय जीवद्रव्य देवने १५५ १५७ १५८ २२ " " १६. १६१ २३ १९ २१ " २५ " २७ " " २८ " १ ५ " जीव द्रव्य " " " शुद्धिपत्रम् । पृष्ठ. पंक्ति. ६ १६७ ११ १७ १६८ " ३१ शुद्ध. अपवेसा + अपेक्षाकारण आगेका काशत्वेनैव अन्यच्च निवन्धनो नियामिका (क्ष्यणुकादिद्रव्य) की सिद्धि -नन्त एवं -मनन्त- मधानन्त सुधीराणां २९ अशुद्ध- अपदेशा असर्व तत्त्व और प्रदेशत्व अपेक्षा कारण आगोका काशात्वेनैव अस्य निवधनो नियामाका (व्यणुकादिद्रव्य) -नन्तमेव- -मन्तन्त- मथा नन्त মুম্বাণা भगवानाहा गोतम वृद्धिके प्राधा- भगवतोग भंते संग्रहिण्या २५ १७२ ८ १७३१७-१८ १८ १७४ १३ भगवानाह । गोतम " २२ २४ बुद्धिके प्राव- भगवत्यंग भंवे संग्रहण्यां " " १ " " ६ " " १७८ २ बत्तणाई संग्रहणी दुदाहृतम् व्यवहारो प्यणवो मपीटमस्ति तावन्तः प्रकल्प्य तस्य समुद्रक झया मनुष्य- ६ १८. ३१ वत्तणाई संग्रहिणी दुदाहृतम् व्यवहारे त्यणवो मयीटमस्ति तावन्त प्रकल्पितस्य समक शेयः मनुष्य च मरूपमगन्धं अषण्ण चेपणा दिसंठाण लिंगसे अनिदिष्ट सत्यायते " १८२ ७ " " १८३ ३ ४ मस्वमगधं भवणं चेयणा दिसंठाण लिंगप्रहणसे भनिर्दिष्ट संख्यावतो " १७ " २०

१०
द्रव्यानुयोगतर्कणायाः
पृष्ठ.
पक्ति.
१८४
२८
"
१८६
८
अशुद्ध.
सम्यक्ति
श्रीनामेय
व्याया-
समनितल
सईधकार उजोया प्रमायावा
प्रभा,
यत्खभावा:
करते
१८८
१९२
१९३
.
"
सभ्यक्ति
श्रीनामेय
व्याप्त्य-
रामनियतत्व
सद्दधकार उज्जोया पभा छाया
प्रभा, छाया,
ये खभावाः
कहते
मृन्न घट
पैसे
विभावखभाव
मूर्ततेति
व्यवहारो
करते हैं
इति ।
१९४
२५
मृमघट
३
। और
७
विभावस्खमाव
मूर्तेति
व्यवहारी
२७
२३१
२३५
आवश्यक सूचना।
त्रुटि पृ० १२८, पं० २८ के आगेका यह व्याख्यार्थ है.
व्याख्यार्थ:-ऐसा होनेपर नयभेदोंको यदि उपनयकरके मानते हो तो 'स्वपर-
व्यवसायि ज्ञानं प्रमाणम्' अर्थात् 'स्वपरका व्यवसाय ( निश्चय ) करनेवाला ज्ञान प्रमाण
कहलाता है। इस लक्षणसे लक्षित ज्ञानरूप प्रमाणका भी एकदेश मतिज्ञानादि, अथवा
मतिज्ञानका एकदेश जो अवग्रहादि वह भी उपप्रमाणरूपसे भिन्न हो जायगा । इससे
नयोपनयप्रक्रिया शिष्योंकी बुद्धिका द्वन्द्वन (विकल्प) मात्र करनेके लिये समझनी चा-
हिये ॥ २१॥

करता रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् रके उदरमें वर्तमान कुवादसे उत्पन्न छायाका समूह दूर होता है, और द्रव्यादि पदार्थोंका यथार्थ, स्वरूप भी प्रकाशित होता है ऐसे सबके खामी जिन भगवानकी तीन अवयव ( सम्य- रज्ञान, दर्शन, तथा चारित्र ) मयी, मूर्ति (शरीर ) सर्वोपरि विजयकारी है ॥२॥ श्रीमहावीरखामासे आदि लेके संपूर्ण तीर्थंकरोंकी पंक्तिरूप आकाशके सूर्य, श्रीलक्ष्मीसे सेवित तथा गाम्भीर्य, "दया दाक्षिण्य" आदि गुणोंकी पंक्तियोंसे अति शोभायमान. रत्नों- के समूहके रत्नाकर तथा शास्त्र, देव, और पुरोहितके प्रतिनिधि (स्थानापन्न ) श्रीमत्तपा- गच्छके नायक श्रीदयाविजय नाम गणधरजीको मै नमस्कार करता हूं ॥ ३ ॥ और श्रीविनीतसागरजी तथा श्रीभावसागरजी नाम . विद्यागुरुको नमस्कार करके उन्ही, महाऽनुभावकी कृपासे इस द्रव्याऽनुयोगतर्कणा नाम प्रबन्धकी कुछ व्याख्या ई ॥ ४ ॥ समीचीन (उत्तम ) भार्योसे संयुक्त, श्रीमान् सुविनीत गुरुजीको परमरमणीय भक्तिभावसे प्रणाम करके सूत्रोंकी वृत्तिका विस्तार मैं करता हूं ॥५॥ चिकीर्पितग्रन्थस्य निर्विघ्नपरिसमाप्त्यर्थमिष्टदेवतानमस्कारादिरूपं मगलं प्रन्थादी आचरन् अनुवन्धचतुष्टयं दर्शयन्नेव चिकीर्पितं प्रतिजानीते । रचनेको अभीष्ट ग्रन्थकी निर्विघ्न समाप्तिकी इच्छासे अपने इष्ट देवका नमस्काररूप मङ्गलाचरण करतेहुए तथा ग्रन्थके अनुबन्धचतुष्टयको दर्शातेहुए ग्रन्थकार निजचिकी- र्पित ( करनेको इष्ट.) विपयकी प्रतिज्ञा करते हैं। , अथ सूत्रम्-श्रीयुगादिजिनं नत्वा कृत्वा श्रीगुरुवन्दनम् । आत्मोपकृतये कुर्वे द्रव्यानुयोगतर्कणाम् ॥ १॥ सूत्रभावार्थ-युगके आदिमे आविर्भूत श्रीमादिजिन भगवान् ( श्रीआदिनाथ ऋपभदेवजी ) को नमस्कार करके, तथा श्रीगुरुदेवको वन्दना करके आत्माके उपकारके अर्थ, अर्थात् जीव अजीव आदि द्रव्योंको जानकर संसारसागरसे जीवके उद्धारके लिये इस द्रव्याऽनुयोगतर्कणा नाम ग्रन्थको मैं रचता हूं ॥१॥ व्याख्या । तत्र प्रथममिष्टदेवतानमस्करणेन .सप्रयोजनाभिधेयो दर्शितः । आद्यपदद्वयन मगलाचरणं नमस्कारकरणं च । १ । आरमार्थिन इहाधिकारिणः । २ । नेपामर्थयोधो भविष्यतीति उपकाररूपं प्रयोजनम् । ३ । द्रव्याणामंनुयोगोऽनाधिकारः । ४ । अथ द्रव्या. नुयोग इति कः शब्दार्थः । अनुयोगो हि सूत्रार्थयोारयानं तस्य चत्वारो भेदासत्र प्रथम श्वरणानुयोग आचारवचनमाचारागादिसूत्राणि । द्वितीयो गणितानुयोगः संख्याशास्त्रं चन्द्रप्र. मत्यादिमूत्राणि । सृतीयो धर्मकथानुयोग माख्यायिकावचनं शाता धर्मकयांगादिसूनाणि ॥३॥ चतुर्थो द्रव्यानुयोगः पदव्यविचारः सूत्रकृतागादिसूत्राणि सम्मतितत्यार्थप्रमुखप्रकरणानि च महाशाम्माणि । ततोऽन्यभेदविचारणामहं फुव । घ्याख्यार्थ --प्रथम सूत्रमें अभीष्ट परमदेव जिन भगवानको नमस्कार करनेसे -प्रयोजनसहित निजग्रन्थमें अभिधेय अर्थात् कथन करनेके योग्य पदार्थ दर्शाया है.

द्रव्यानुयोगतर्कणा। तात्पर्य यह है कि द्रव्यादि पदार्थोके ज्ञानसे आत्मज्ञानपूर्वक श्रीजिन भगवान्का ज्ञान तथा उनकी नमस्कार आदिरूप भक्ति ही इस ग्रन्थका अभिधेय और प्रयोजन है। सूत्रके प्रथम दो पादोंसे श्रीजिन देवको तथा श्रीगुरु देवको नमस्कार करके आस्तिक मतके अनुसार मद्गलाचरण तथा नमस्कार प्रदर्शित किया गया है ॥१॥ और "आत्मोपकृतये कुर्वे" इस तृतीय पादसे यह अभिप्राय दर्शाया है कि आत्माके अभिलापी जन इस ग्रन्थके अधि- कारी. हैं ॥ २॥ उन अधिकारी जीवोंको पदार्थोंका ज्ञान होगा इस उपकाररूप ग्रन्थका प्रयोजन है ॥ ३ ॥ और द्रव्याऽनुयोग इस ग्रन्थका अधिकृत विषय है ॥ ४ ॥ ये ही ४ अभिधेय, प्रयोजन, संबन्ध तथा अधिकारी ग्रन्यकी आदिमें अनुबन्धचतुष्टय कहे जाते हैं । अब "द्रव्याऽनुयोग" इस शब्दका क्या अर्थ है इस विषयमें विचार कर- ते हैं। सूत्र और अर्थके व्याख्यानको अनुयोग कहते हैं । उस अनुयोगके चार भेद हैं। उनमें प्रथम चरणानुयोग है, जिसमें आचारके वचन हैं, जैसे आचारांगादिसूत्र ॥ १ ॥ द्वितीय गणितानुयोग . अर्थात् संख्याशास्त्र है, जैसे चन्द्रप्रज्ञप्ति ( आदि ज्ञान ) के सूत्र ॥ २ ॥ तृतीय धर्मकथानुयोग अर्थात् कथा शास्त्र है. इसमें ज्ञाताधर्म कथा आदि सूत्र हैं ॥ ३ ॥ और चतुर्थ द्रव्याऽनुयोग अर्थात् जीव आदि पट् द्रव्योंका विचार है. इसमें सूत्रकृतांगादिसूत्र, संमतिप्रकरण, तत्त्वार्थप्रकरण आदि अनेक महाशास्त्र हैं ॥ ४ ॥ अत एव अतिउपयोगी होनेसे अन्तिम भेद जो द्रव्यानुयोग है उसीका विचार मैं करता हूं ॥१॥ सूत्रम् । विना द्रव्यानुयोगोई चरणकरणाख्ययोः । सारं नेति कृतिप्रेष्ठं निर्दिष्टं सम्मता स्फुटम् ॥२॥ सूत्रभावार्थ:-- द्रव्याऽनुयोगके विचारके विना द्रव्य तथा गुणपर्यायोंका ज्ञान नहीं होता अत एव चरणाऽनुयोग तथा करणाऽनुयोगमे द्रव्याऽनुयोगके ज्ञानके विना कुछ तत्व नहीं है, और द्रव्याऽनुयोगके ज्ञानको ही चरणाऽनुयोग तथा करणाऽनुयोगका : सार और पण्डित जनोंको अतिप्रिय संमति ग्रन्थमें स्पष्ट रीतिसे दर्शाया है ।।२।। व्याख्या । द्रव्यानुयोगोहं द्रव्यगुणपर्यायविचारं विना चरणकरणयोः सारं न । चरण- सप्तत्याः करणसप्तत्याश्च सारं केवलं द्रव्यानुयोग.एव । इत्ययं निष्कर्षः । सम्मतिमन्ये स्फुटं प्रकटं कृतिप्रेष्ठं बुधजनवल्लभ निर्दिष्ट कथित चुधा एव जानते न तु पाह्यदृष्टयः । यतः "चरणकरणप्पहाणाससमयपरसमयमुक्कवावारा।चरणकरणस्स सारं णिचयसुद्ध न याति" इतीयं गाथा सम्मती कथिता । अतश्चरणकरणानुयोगमूल इहोपायो द्रव्यानुयोग एव उता। व्याख्यार्थः-द्रव्यानुयोग जिसमें जीवआदि संपूर्ण द्रव्य, गुण तथा संपूर्ण पर्यायोंका पूर्णपसे वर्णन है उसके (द्रव्याऽनुयोगके ) ज्ञानके विना चरण तथा करणाऽनुयोगमें पृच्छानुवाद है.

४ । रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् कुछ सार नहीं है, अर्थात् चरणसप्तति और करणसप्ततिका सार केवल द्रव्याऽनुयोग ही है, और वही पण्डितजनों ( सम्यग्दर्शन आदि सहित जनों )को प्रिय है. क्योंकि, आत्म- ज्ञानद्वारा मोक्षका कारण द्रव्याऽनुयोग ही है, उसीसे स्वमतका स्थापन तथा परमतका खण्डन होता है, यह वार्ता संमति ग्रन्थमैं स्पष्ट रीतिसे दर्शाई गई है । "चरणाऽनुयोग तथा करणाऽनुयोगके ज्ञानसे संपन्न भी जन अपने तथा अन्यके शास्त्रीय सिद्धान्त ज्ञानके व्यापारसे सर्वथा वर्जित रहते हैं, क्योंकि वे चरणानुयोग तथा करणाऽनुयोगके सारभूत निश्चय शुद्ध द्रव्याऽनुयोगको नहीं जानते" ॥ १ ॥ यह गाथा सम्मति ग्रन्थमें कही गई है। इसी हेतुसे चरणाऽनुयोग और करणाऽनुयोगका मूल (मुख्य सिद्धान्त ) जान- नेका उपाय द्रव्यानुयोग ही यहांपर कहा गया है ॥ २ ॥ सूत्रम् । शुद्धान्नादिस्तनुर्योगो महान् द्रव्यानुयोगंजः। इत्थं पोडशकाज्ज्ञात्वा विधीत शुभादरम् ॥३॥ सूत्रभावार्थ:--शुद्ध आहारआदिका ग्रहण करना, अर्थात् चरण करणाऽनुयोग- रूप योग लघु है और द्रव्याऽनुयोगनामक योग महान् है, इस प्रकार पोडशक नामके उपदेशनन्यसे जानकर शुभ मार्ग में आदर करना उचित है ॥ ३ ॥ व्याख्या । शुद्धान्नादिः शुद्धाहारग्रहणमर्थात् चरणकरणानुयोगाख्यो योगो द्विचत्वारिंशरूप- णरहितपिण्डग्रहणो योगस्तनुर्लघुः कथितः । तथा द्रव्यानुयोगः । स्वसमयपरसंमयपरिज्ञानं तदाख्यो योगोद्रव्यानुयोगजो योगोमहान महत्तरः कथितः।अत्रसाक्षित्वमुपदेशपदादिपु ग्रन्थेपु वर्तते । ततो ज्ञात्वा शुभे पथि प्रवर्ततां वाह्यव्यवहारप्राधान्यम् । बाह्यव्यवहारप्राधान्यं ज्ञानस्य गौणता यत्र भवति सोऽशुममार्गः । १ । ज्ञानस्य प्राधान्यं व्यवहारस्य गौणता यत्र स उत्तममार्गः । २ । अत एव ज्ञानादिगुणहेतुगुरुकुलवासरहितस्य शुद्धाहारादियन्नवतोऽपि महान् दोपश्चारित्रहानिश्च जायते । यदुक्तम् । पोडशके गुरुदोपारम्भितया लव्धकरणम् ।। यनतो निपुणधीभिः सन्निन्दादेश्व तथा ज्ञायते यन्नियोगेन । ३ । व्याख्यार्थ: शुद्ध शोधित आहारसेवन, अर्थात् शास्त्रोक्त ४२ दोपोंसे वर्जित मोजनग्रहणादिरूप जो चरण तथा करणाऽनुयोगरूप योग है वह लघु है और स्य , तथा परसमयके ज्ञानरूप जो द्रव्याऽनुयोगरूप योग है वह अतिमहान् कहा गया है। इसी विषयकी साक्षिता उपदेशपदआदि ग्रन्थों में विद्यमान है। उन ग्रन्थोंसे द्रव्याऽनुयोगको श्रेष्ठतर जानके शुभ मार्गमें ही आदरसे प्रवृत्त होना चाहिये । जहां लौकिक व्यवहारों की प्रधानता हो और ज्ञानकी गौणता हो वह अशुभ मार्ग है ॥१॥ और जहां ज्ञानक्री प्रधा. नता तथा लौकिक व्यवहारकी गौणता है वह उत्तम या गुम मार्ग है .॥ २ ॥ इसी कारणसे ज्ञानआदि गुणोंका हेतुभूत जो गुरुकुलों निवास है उससे रहित पुरुष चाहे शुद्ध , . की -- . द्रव्यानुयोगतर्कणा। आहारआदि करनेमे प्रयत्न भी करे, परन्तु वह ज्ञानसे रहित होनेसे महान् दोपभागी होता है तथा उसके चारित्रकी भी हानि होती है । इस विषयमें ऐसा कहा भी है,-उप- देशके ग्रन्थों में यह निरूपित है कि द्रव्यानुयोगके ज्ञानविना शुद्ध आहारादिके ग्रहणमें महान् दोषोंके आरम्भ होनेकी संभावना है इस हेतुसे तथा ज्ञानरहित होनेसे सज्जनोंकी निन्दादिसे चरणकरणानुयोग द्रव्यानुयोगकी अपेक्षासे लघु है, उस लघु चरणकरणानुयोगके दोपोंको कुशलवुद्धि जन यत्नपूर्वक द्रव्यानुयोगद्वारा : जानते हैं ॥ ३ ॥ सूत्रम् । सति द्रव्यानुयोगेऽस्मिन्नाध्यकर्मादिदूपणम् । इत्युक्तं पञ्चकल्पाख्ये भाष्ये यत्तद्गुरोः श्रुतम् ॥ ४॥ सूत्रभावार्थ:-इंस द्रव्याऽनुयोगके ज्ञान होनेहीसे आधाकर्मादि ( पाकादि कर्म अध्यवपूरकान्त) दूपण जाने जाते हैं, यह पञ्चकल्प नाम ग्रन्थमें तथा भाप्यमे कहा है और गुरुमुखसे भी ऐसा सुना है ॥ ४ ॥ व्याख्या । अस्मिन् द्रव्यानुयोगविचाररूपे ज्ञानयोगे सति आध्यकर्मादिदूपणम् । आधा- कर्मादयोऽध्यवपूरकान्ताः पोडशपिण्डोमविषया दोषास्तत्र आधानम् । आधा साधुनिमित्तं चेत. सःप्रणिधानं यथा अमुकस्य साधोः हेतोर्मया भक्तादि पचनीयमिति आधया कर्मपाकादिक्रियया आधाकर्म तद्योगाद्भक्ताद्यप्याधाकर्म तदादिउँपां तेषां दृपणं गुरुसमुदायान्तर्निवसतो ज्ञाना- भ्यामवसतो मुनेन भवति ॥ एवं पञ्चकल्पभाप्ये यदुक्तम् तन्मया गुरोः सकाशात् श्रुतं क- ल्पाकल्पविचारस्तु अनेकान्तशालेणोक्तो यतो गाथाः। “आहा गुडाई भुंजंति । अणमणो सक- म्मुणा ॥ उवलित्ते वियाणिज्जा अणुवलित्ते विवा पुणो । १। एदे हिंदोहि ठाणेहिं ववहा- रोण विजई । एदे हिंदोहिं ठाणेहिं अणायारंतुजाणए । २" द्वितीयाङ्गस्य प्रथमाध्ययने । किञ्चिच्छुद्ध कल्पमकल्पं स्यात् स्यादकल्पमपि कल्पं पिण्डः । शय्या वस्खं भेपजाद्यं वा देश · कालं पुरुपमवस्थामुपयोगशुद्धपरिणामान् प्रसमीक्ष्य भवति कल्पं नैकान्तात्कल्पने कल्पम्।। इति प्रशमरतो॥४॥ व्याख्यार्थ: --सब पदार्थों के ज्ञान करानेवाले इस द्रव्यानुयोग विचाररूप ज्ञानयोगके होनेपर ही आधाकर्म आदि दूंपण, अर्थात् आधाकर्मसे आदि लेके अध्यवपूरकान्त पो- डश ( १६ ) दोष आहार ग्रहण करनेसे उत्पन्न होते है, उन सोलह दोषोंमेंसे साधुके पाकादिनिमित्त (चित्तके प्रणिधान चित्तकी तत्परता)को आधाकर्म कहते हैं. जैसे-अमुक साधुके लिये मुझे भात पकाना है । यहां "आधया पाकादिक्रियया कर्म इति आधाकर्म" पाक आदि क्रियासे जो कर्म किया जाता है उसको आधाकर्म कहते हैं. उस आधा कि- 1. याके योगसे भक्त ( भात ) आदि अन्न सिद्ध किया जाता है, उसको भी आधाकर्म कह- ते हैं. उस आधाकर्मआदिके दोप गुरुओंके समुदायमें निवास करतेहुए. मुनिको ज्ञानके द्रव्यानुयोगतर्कणा। इनहीको जिनश्रेष्ठोंने साधु कहे हैं ! नकि अन्यत्र तृतीय स्थान विहार करनेवाले ॥ १॥ इसमें इतनी विशेषता है कि जो निशीथकल्प (अर्द्धरात्रिके तुल्य अन्धकारमय) व्यवहारके अध्ययनसे चरणकरणाऽनुयोगदृष्टि उत्पन्न होती है वह जघन्य अर्थात् निकृष्ट दृष्टि है, जो दृष्टिवाद शास्त्रके अध्ययनसे उत्पन्न होती है वह मध्यमा दृष्टि है, और समस्त शास्त्रोंके तत्त्वज्ञानसे उत्पन्न जो दृष्टि है वह उत्कृष्ट अर्थात् उत्तम दृष्टि है ॥ ३ ॥ इस प्रकार जघन्य मध्यम तथा उत्तम भेदसे तीन प्रकारकी दृष्टियें हैं, और उन २ दृष्टियोंके विशेपसे गीतार्थ' भी तीन ही प्रकारके हैं। इनमें संमति आदि तर्क शास्त्रोंमें पारीणता (तर्कशास्त्रमें पारगामिता) नामवाली जो द्रव्यानुयोगरूप दृष्टि है वह उत्तम है, और उस. तर्कशास्त्रको निश्चय करनेवाली द्वितीया दृष्टि है, इन दोनों दृष्टियोंमें परायण दोनों प्रकारके ही पुरुष निम्रन्थ साधु हैं, इनसे भिन्न कोई साधु नहीं है, यही पूर्वोक्त वाक्यका, अभिप्राय है ॥ ७ ॥ अथ द्रव्यानुयोगप्रत्याया निजस्यात्मनः कृतकृत्यतां दर्शयन्नाह । अब द्रव्यानुयोगकी प्राप्तिसे अपने आत्माको कृतार्थ दिखाते हुये कहते हैं । सूत्रम् । तस्माद्गुरुपदाधीनो लीनचास्मिन्प्रतिक्षणम् । साधयामि क्रियां यां मे महत्याधारता हि सा ।। ८ ।। सूत्रभावार्थ:--द्रव्याऽनुयोगके भी बलवत्त्वके हेतु गुरु हैं इस हेतुसे गुरूके चरणोंके आश्रित होके, तथा प्रतिक्षण इस द्रव्यानुयोगरूप योगमें लीन होके जिस क्रिया- को मैं सिद्ध करता हूं उसमें वही मेरी बड़ी आधारता है ।। ८ ॥ व्याख्या । तस्मादिति । तत. कारणात् द्रव्यानुयोगबलवत्ताहेतुर्गुरुस्तस्य पदयोश्चरणयोरा. धीनः । शुश्रूपापरो विनयादिप्रसन्नो गुरुर्बानमेव दत्त इति । पुनः अस्मिन् द्रव्यानुयोगे प्रतिक्षण- मनुसमयं लीनो यां चरणकरणानुयोगरूपां क्रियां साधयामि सा एव मे महवी महीयसी आधारता। एतावता ताइक् क्रियारहितः परं गुरुसेवी ज्ञानप्रिय इच्छायोगाधिकारी भवति । यतः "कर्तुमिच्छोः श्रुतार्थस्य ज्ञानिनोपि प्रमादिन: 1 विकलो धर्मयोगो य इच्छायोग उदाहतः"११ । ललितविसरादौ । ८॥ व्याख्यार्थः-द्रव्यानुयोगजनित ज्ञानके सर्वोत्कृष्ट तत्त्व सिद्ध करनेमें दयालु गुरु ही " मुख्य कारण हैं, इस कारणसे श्रीगुरुमहाराजके चरणकमलोंके आधीन अर्थात् उनकी शुश्रूषा विनय आदिमें ही सदा तत्पर होके (क्योंकि विनय आदिसे प्रसन्न गुरु ज्ञान देतेहैं) फिर इस द्रव्यानुयोगमें प्रतिक्षण लीन होके जिस चरणकरणाऽनुयोगरूप क्रियाको मैं सिद्ध करता हूं वह क्रियाही मेरेलिये महान् आश्रय है, इतने कथनसे यह सिद्ध हुआ कि उस क्रियासे रहित, केवल गुरुसेवी, तथा ज्ञानप्रिय जन इच्छायोगका अधिकारी होता है । क्योंकि-शास्त्रीय अर्थक सिद्ध करनेकी इच्छावाले ज्ञानी ऐसे भी । रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् प्रमादी पुरुषका जो विकल धर्मयोग है वही इच्छायोग कहा गया है ॥ १॥ ऐसा वचन ललितविस्तर आदि ग्रन्थमें है ॥ ८ ॥ एवं इच्छायोगे स्थितानां परोपकारार्थ द्रव्यानुयोगविचारं कथयामः । पुनरेतावतैव संतुष्टिर्न कर्तव्या । विशेषार्थिना गुरुसेवा न मोक्तव्या । एवं हितशिक्षा कथयन्नाह । इस प्रकार जो इच्छायोगमें स्थित हैं उनके परोपकारार्थ द्रव्यानुयोगका विचार कहते है, क्योंकि इच्छायोगमे स्थितिमात्रसे प्राणीको सन्तोप नहीं करना चाहिये, किन्तु विशेष अर्थक अभिलापी जनको गुरुसेवा कदापि न त्यागनी चाहिये, इस प्रकारकी हितकारिणी शिक्षाको कहतेहुये ग्रन्थकार कहते है:-- सूत्रम् । तत्त्वार्थसंमतिमुखेपु महाश्रुतेषु द्रव्यानुयोगमहिमा कथिता विशेषात् । तल्लेशमात्रमिह पश्यत सत्मबंधे सर्वारेण किल तिष्ठत तीर्थवाक्ये ॥९॥ इति श्रीद्रव्यानुयोगतर्फणायां प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥ सूत्रभावार्थ:--तत्त्वार्थसंमति आदि महा शास्त्रोंमें द्रव्यानुयोगकी महिमा विशेष रूपसे वर्णन की गई है, अतः हे बुधजन.! इस लघु प्रबन्धमें अर्थात् इस द्रव्याऽनुयो- गतर्कणा नाम ग्रन्थमे उनका यत्किंचित् लेश मात्र तुम लोग देखो, और सर्वथा आदर तथा विश्वासपूर्वक तीर्थ (शास्त्रवक्ता गुरु )के वाक्यमे स्थित रहो ॥ ९॥ द्रव्यानुयोग तर्कणामें प्रथम अध्याय पूर्ण हुआ. व्याख्या । तत्त्वार्थसंमतिप्रधानेपु 'महाश्रुतेपु' महाशास्त्रेषु द्रव्यानुयोगमहिमा 'कथितः' । विशेपाद्विस्तरेण वेपु ग्रंथेपु प्रकाशितः । तेषां ग्रंथोक्तानां वाक्यानां लेशमात्रमल्पमात्रम् । 'इहैतस्मिन्वक्ष्यमाणे सत्प्रयंधे द्रव्यानुयोगतर्कणायां पश्यत' विलोकयत । 'किल' निश्चयेन तीर्थ- वाक्ये, तीर्थो गुरुस्तस्य वाक्यं द्रव्यादिपदसमूहस्तस्मिन् तीर्थवाक्ये 'सर्यादरेण' सर्वप्रयत्नेन "तिष्ठत' आदरं कुरुत । परंतु परमार्थतो गुरुवाक्ये स्थातव्यम् अल्पमति ज्ञात्वा अहंकारो न • कर्तव्यः । यथा अधनेन धनं प्राप्तं तृणवन्मन्यते जगत् इति दृष्टांतात् । अत एव उपरितना• श्चत्वारो नया अतिगंभीरार्था यस्य कस्यापि स्मृतिविपयं न यान्ति । तेन सिद्धांते प्रथमं न दार्शितास्तथा रहस्यं च गुरुभक्तायैव देयमित्युक्तत्वात् ॥ इति श्रीद्रव्यानुयोगतर्कणायां कृतिभोजविनिर्मितायां प्रथमोध्यायः सूचनार्थमुपदर्शितः । व्याख्यार्थः हे वुधजन तत्त्वार्थसंमति आदि प्रधान महाशास्त्रोंमें विस्तारसे द्रव्यानुयोगकी महिमा प्रकाशित है, किन्तु उन ग्रन्थों में कथित वाक्योंका अति अल्प लेशमात्र इस वक्ष्यमाण लघु सत्प्रवन्ध अर्थात् द्रव्यानुयोगतर्कणा नामक ग्रन्थमे, तुम लोग देखो, और निश्चयसे तीर्थरूप जो गुरु हैं, उनके वाक्यरूप जो द्रव्यआदि पदोंका समूह - ..

द्रव्यानुयोगतकंणा। है उसमें सर्व आदर अर्थात् संपूर्ण प्रयनमे आदर करो, परंतु परमार्थसे गुरुके वाक्यमें स्थित रहना चाहिये, तथा अपनी अल्पबुद्धिको जानकर अहंकार न करना चाहिये और "निर्धन पुरुप धनको पाकर संसारको तृणके समान समझता है" यह जो दृष्टान्त है वह तुमारे ऊपर न घटे । इसीसे ऊपरके चारों नय अति गंभीर अर्थसहित है और जिस किसी साधारण मनुष्यके स्मरण विपयमें नहीं आते इसी कारणसे सिद्धान्तमें ये प्रथम नहीं देखाये गये क्योंकि उनका रहस्य परम गुरुभक्तको ही देना उचित है, ऐसा शास्त्रकारोंने कहा है । इति द्रव्यानुयोगतकणायो कृतिभोजविनिर्मितायामाचाप्योपाधिधारिद्विवेयुपनामकरण्डित. ठाकुरप्रसादशास्त्रीप्रीतभापाटीकासमलवृतायां प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥ अथ द्रव्यस्वरूपमाह । अब व्यके स्वरूपका निरूपण करते हैं। सूत्रम्। गुणपर्याययोः स्थानमेकरूपं सदापि यत् । स्वजाला द्रव्यमाख्यातं मध्ये भेदोन तस्य चे ॥१॥ सूत्रभावार्थ:-जो गुण और पर्यायोंका स्थान है । जो निजस्वरूपसे सदा एकरूप रहता है, और जिसके निजरूपका मध्यमें कुछ भेद नहीं है, वह द्रव्य कहा गया है ।। १॥ प्याख्या । गुणपर्याययोर्भाजनं कालपये एकरूपं द्रव्यम म्यज्ञात्या निजत्वेन एफस्वरूप भवति । परं पर्यायचन् न परावृत्तिं लभते तद्रव्यगुच्यते । यथा सानादिगुणपर्यायभाजनं जीवद्रव्यम् । रूपादिगुणपर्यायभाजनं पुगलद्रव्यम् । सर्वरमत्यादिपटत्यादिगुणपर्यायभा. जनं मृद्रव्यम् ।' यथा वा संतवः पटापेक्षया द्रव्यम । पुनसंतयोऽश्ययापेनया पर्यायाः । फयं ! यतः पटविचाले पटावस्थाविचाले च तंतूनां भेदो नाति । तत्त्वंवयवावस्थायाम. न्वयत्वरूपो भेदोस्ति । तम्मान् पुगलस्कंधमध्ये द्रव्यपर्यायत्वमापेक्षिक योध्यम् । अप फघिदवं कविष्यति । द्रव्यत्वं तु स्वाभाविकं न जातम् । आपेनिफजातं । तदा ते ममा. पते । भो तार्किक शृणु । यत्सकलवस्तूनां व्यवहारोपनयैव जायते । न तु समावेन । सम्मान न कधिरोषः । ये प ममवायिकारणप्रमुपद्रव्यलक्षणं मन्यते । नेपामपि अो. क्षामनुमटीवति । गुणपयायपदन्यमिति तत्वाधे । विसरस्नु द्रव्यागामुगलमार्गक्षा- मिलवानि । अतस्ततोऽयमेयः ।। व्याख्यार्थ:-जो गुण और पप्यायमा आप्रय हो, निजसससे कालश्यमी एक. रूप हो, न कि-पप्याक सदृश परिवर्तनको प्राप्त हो रसको ट्रय कहते हैं | जमे शान आदि गुणपर्यायका भागी जीवद्रव्य है, और रूप आदि गुणांयका मानी पुहल प्रय है । नीमकार रक्तव आदि गुण तथा घटत्य आदि पर्यावरा मागी मृत्तिकाल द्रव्यानुयोगतर्कणा। पुद्गलस्य रूपरसस्पर्शादिपर्यायाः । धर्मस्य व्यंजनार्थपर्यायौ । अधर्मस्य व्यंजनार्थपर्यायो । कालस्य व्यंजनार्थपर्यायौ । आकाशस्य व्यंजनार्थपर्यायौ ! एवं द्रव्याणां संख्याकृतो भेदः । लक्षणादिकृतो भेदः । प्रदेशादिविभागतविविधाः । उपचारेण नवविधाः । एकैकस्य त्रैविध्यान् । तथापि लक्षणादुत्पादव्ययध्रौव्ययुक्ताः । इत्थं पडपि जैनप्रमाणप्राप्तानि द्रव्याणि इमे । इति द्रव्यगुणपर्यायाः प्रत्येकं परस्परं भिन्ना अभिन्नास्त्रिविधानिलक्षणयुताः संतीति व्याख्येयम् ।। व्याख्यार्थः-द्रव्यके सहभावी अर्थात् द्रव्यके साथही साथ होनेवाला, तथा याव- द्रव्यभावी अर्थात् उस द्रव्यमात्रमें रहनेवाला जो धर्म है उसीको गुण कहते हैं; जैसे जीव द्रव्यका उपयोग नाम गुण है, पुद्गल द्रब्यका ग्रहण गुण है, धर्मास्तिकाय(धर्मद्रव्य)का गंतिहेतुता गुण है, अधर्मान्तिकाय (अधर्मद्रव्य) का स्थितिकी कारणतारूप गुण है, और ऐसेही कालद्रव्यका तना हेतु लक्षण गुण है । जिस समय जो द्रव्य उत्पन्न होता है उसी समानकालमें उस द्रव्यके गुणभी उत्पन्न होते हैं, इस हेतुसे द्रव्य तथा उसके गुणोंका पौर्वापर्यभाव, अर्थात् पूर्व कालमें द्रव्य है पश्चात उस द्रव्यके गुण है यह वाती नहीं है । दक्षिण तथा वाम भागके पशुके शृंगोंके सदृश द्रव्य तथा गुण ये दोनों समान सामग्रीसे जन्य होनेसे एकही कालमें है। अनादि अनन्त द्रव्य गुणोंकी उत्पत्ति संसारके व्यवहारसे एकही कालमें देखी गई है, जैसे कृष्णघट । अब क्रममावी, अथवा अया- वद्रव्यभाधी अर्थात् उस संपूर्ण द्रव्यमात्रमें जो न रहै किन्तु किसी दशामें रहै उसको पर्याय कहते है । जैसे जीव द्रव्यके नरकआदि पर्याय; पुद्गलद्रव्यके रूप रस स्पर्शादि पाय, धर्म- द्रव्यके व्यंजन तथा अर्थपर्याय, अधर्मद्रव्यके भी व्यंजन तथा अर्थपर्याय, कालद्रव्यक व्यंजन तथा अर्थपाय, और आकाशद्रव्यके भी व्यंजन तथा अर्थपर्याय हैं। इसी प्रकार द्रव्योंके संख्याकृत, भेद लक्षणादि कृतभेद, प्रदेश विभाग कृतभेद है, इसरीतिसे तीन प्रकारके है, और उपचारसे नवविध हैं, क्योंकि एक २ के तीन २ भेद है, तथापि लक्षणसे संपूर्ण द्रव्य उत्पाद, व्यय और ध्रौव्ययुक्त हैं। इस प्रकार जीव १ पुद्गल २ धर्म, ३ अधर्म ४ आकाश, ५ तथा काल, ६ ये छहों जैनप्रमाणसे प्राप्त (सिद्ध ) है; और ये द्रव्य, गुण, पर्याय परस्पर भिन्नभी हैं और अभिन्न भी, तथा त्रिविध लक्षण, अर्थात् उत्पत्ति, व्यय और धोव्ययुक्त है। ऐसा सूत्रका व्याख्यान करना चाहिये ॥२॥ अथ द्रव्येण सह गुणपर्यावयादं दपनाह । अव इसके अनन्तर द्रव्यकेसाथ गुण और पर्यायका भेद दर्शातेहुये अग्रिम सूत्र कहते है। (१) परन्तु एकही देशमें जीव तथा ज्ञानादिकी उपलब्धी होने से जीवपर्याय अभिन भी है चतुर्विध दर्शन तथा अष्टविध ज्ञानको उपयोग कहते है। (२) अमुक पदार्थ इनने समयमें है इस प्रकार सब पदायोंके वनेके लक्षगरप काल है। (३) प्रत्येक पदार्थकी गतिमें सहकारिकारणता धर्म द्रव्य है।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् सूत्रम् । मुक्ताभ्यः श्वेततादिभ्यो मुक्तादाम यथा पृथक् । गुणपर्याययोर्व्यक्तद्रव्यशक्तिस्तथाश्रिता ॥३॥ सूत्रभावार्थ:-जैसे मोतियोंसे तथा श्वेतता आदि गुणोंसे मोतीकी माला भिन्न है, ऐसेही गुणपर्यायकी व्यक्तिसे द्रव्यशक्ति पृथक् होकर भी एक प्रदेशमें आश्रित होनेसे अभिन्नरूप है ॥ ३॥ व्याख्या। यथा मुक्ताभ्यो, मौक्तिकानां श्वेतादिभ्यश्च मौक्तिकमाला भिन्ना वर्तते। तथैव द्रव्य- शक्तिर्गुणपर्यायव्यक्तिभ्याम्।तथात्र समाधिः । गुणपर्याययोव्यक्तः सकाशात् पृथगपि द्रव्यश- तिरेकप्रदेशसंबंधेनाश्रिता अभिन्ना अपृथगित्यर्थः । श्वेततादयो मौक्तिकानां गुणस्थानिनः, मौ. क्तिकाः पर्यायस्थानिनः। एतद्द्वयं भिन्नमपि द्रव्यस्थाने मुक्तादाग्नि संगतमभिन्नं सत् मुक्कादामेति व्यवहारो जायते । इति दृष्टांतयोजना । अथ च घटादिद्रव्यं प्रत्यक्षप्रमाणेन सामान्यवि- शेषरूपमनुभवन सामान्योपयोगेन मृत्तिकादिसामान्य भासते विशेषोपयोगेन घटादिविशेष च भासते । तत्र यत्सामान्यभानं तद्रव्यरूपम् । यश्च विशेपः स गुणपोयरूपो ज्ञेयः । ३ । व्याख्यार्थः—मौक्तिक (मोतीकी ) माला, मोतीसे तथा मोतीमें रहनेवाले श्वेतता आदि गुणोंसे जैसे भिन्न भासती है, ऐसे ही गुणव्यक्ति तथा पर्यायव्यक्तिसे द्रव्यशक्ति भिन्न भासनेपर भी एकप्रदेशसंबन्धमें आश्रित होनेसे अभिन्न है, यह अभिप्राय सूत्रका है। श्वेतआदि गुण जो हैं वे मोतियोंके गुणस्थानी हैं, और मोती पर्यायस्थानी हैं; ये दोनों (गुणपर्याय) भिन्न हो कर भी, मोतीकी मालारूप द्रव्यस्थानमें मिले हुए अभिन्न हैं इस ही से मोतीकी माला यह व्यवहार होता है ऐसे सूत्रके दृष्टान्तकी योजना है। और जो घट मादिरूप द्रव्य प्रत्यक्ष प्रमाणसे सामान्य और विशेषरूपको अनुभव करता हुआ सामान्य उपयोगरूपसे मृत्तिका आदि सामान्यरूप भासता है, और विशेष उपयोगसे घट आदि विशेषरूप मासता है; इसमें जो सामान्य भान है वह तो द्रव्यरूप और जो विशेषका भान है उसको गुणप-यरूप जानना चाहिये ॥ ३ ॥ भय सामान्यं द्विप्रकारं दर्शयन्नाह । अब दो प्रकारके सामान्यको दिखाते हुए सूत्र कहते है । सूत्रम् । अर्यतादि सामान्यं पूर्वापरगुणोदयम् । पिंडस्वादिकसंस्थानानुगता मृयथा स्थिता ॥४॥ मूत्रभावार्थ:--पूर्वोक्त गुणपर्यायोंके उदयका कारण, तथा पूर्वोत्तर पर्यायोंकी त्रिकाल दशामें पिंड कुमूल अनेक आकारों में जो एक अनुगतरूपमे स्थित है उसको ऊर्ध्वता मामान्य कहते हैं ॥ ४ ॥ व्याख्या । पूर्वः प्रथमोऽपरोप्रेऽननो यो गुणो विगेपनयोगदयं कारणं पूर्वा परगणोदयं पूर्वापरपर्याययोरनुगतमकं द्रव्यं त्रिकालानुयायी' यो यस्वंगर्ष- तासामान्यमित्यभिधीयते । निदर्शनमुत्तानमेव । यथा । पिंहो मसिडः अस्थि: गुमूल. .

द्रव्यानुयोगतर्कणा। इत्यादयोऽनेके संस्थाना आकृतयस्तासु अनुगता पूर्वापरसाधारणपरिणामद्रव्यरूपा मृत्तिका तथाकारा स्थिता । एतदूर्ध्वतासामान्यं कथ्यते । यदि च पिंडकुसूलादिपर्यायेषु अनुगसमकं मृद्व्यं न कथ्यते । तदि घटादिपर्यायेषु अनुगतं घटादिद्यमपि न कथ्यते । तथा च सर्व विशेषरूपं भवति । क्षणिकवादियौद्धमतमायाति । अथवा सर्वद्रव्येषु एकमेव द्रव्यमागच्चती- ति । ततः । घटादिद्रव्ये अथ च तदंतर्वतिसामान्यमृदादिद्रव्ये चानुभवानुमारेण परापरो- चंतासामान्यमवश्यमंगीकर्तव्यम् । घटादिद्रव्याणि लोकपर्यायव्यापीनि पुनर्मदादिद्रव्याणि बहुपर्यायव्यापीनि संति । इत्यं नरनारकादिद्रव्याणां विशेषो ज्ञातव्यः । एतत्सर्वमपि नैगम- नयमतम् । तथा शुद्धसंगहनयमते तु सदद्वैतवादेन एकमेव द्रव्यमापद्यतेतिज्ञेयम् ।४। व्याख्यार्थ:-पहिले और अगले विशेशके उदयका जो कारण सो पूर्वापर गुणोदय अर्थात् पूर्व और उत्तर पर्यायोंमें निकाल अनुयायी पदार्थका अंश है उसको उर्द्धता नामक प्रथम सामान्य कहते हैं । दृष्टान्त यह है कि जैसे मृत्तिकाका पिड, कुसूल इत्यादि आकृ. तियोंमें अनुगत अर्थात् पूर्वोत्तर साधारण परिणामरूप द्रव्यरूप जो मृत्तिका है वह उसही आकारसें स्थित है। इसहीको उद्धता सामान्य कहते हैं । और यदि पिंड कुसूल आदि यावत् पायों में अनुगत एक मृत्तिकारूप द्रव्य न कहै तो घट आदि पर्यायोंमें अनुगत घट आदि द्रव्य भी नहीं कह सकते; और इस प्रकारसे सय विशेषरूप होनेसे क्षणिकवादी बौद्धका मत आके प्राप्त होता है । अथवा संपूर्ण द्रव्योंमें एकही द्रव्य आता है, इस लिये घटआदि द्रव्यमें और उसके अन्तर्गत सामान्य मृतिका आदि द्रव्यमें भी अनुभवके अनुसार पूर्वापरदशासाधारण ऊर्ध्वता सामान्य अवश्य अङ्गीकर्तव्य है। इनमें घटआदि द्रव्य तो अल्प पर्याय व्यापी है और मृत्तिका आदि द्रव्य बहुत पर्याय व्यापी है । इसी प्रकार नर तथा नारक आदि द्रव्योंकाभी विशेष समझना चाहिये । यह मव द्रव्य गुण तथा पर्यायका भेद और अभेद तथा ऊर्ध्वता सामान्यकी व्यवस्थादि नैगमनयमतके अनुमार वर्णन किया गया है, और शुद्धसंग्रहनयमतके अनुमार तो सद् अद्वैतवादसे एक ही द्रव्य प्राप्त होता है ऐसा जानना चाहिये ॥ ४ ॥ पूर्वापरसाधारणं परिणामद्रव्यमूर्खता कदककंकगायनुगामिकां न वदत्तीति तत्स्वरूपमु. क्वाय तिर्यक्सामान्यलक्ष्णमाह । पूर्वापरपयायोंमें साधारण परिणामरूप द्रव्य ऊर्ध्यता मामान्य है, वह कुंडल, कटक (फडे ) कंकण आदि पर्यायोंमें अनुगामी पनेको नहीं कहता है यातें ऊर्ध्वता सामा- न्यका सरूप कहके अब नियंर सामान्यका लक्षण कहते हैं । सूत्रम् । तुल्या परिणतिर्भिन्नव्यक्तिपु यत्तदुच्यते । तिर्यक्सामान्यमित्येव घटत्वं तु घटेप्पिय ॥५॥ सूत्रभावार्थ:--भिन्न २ प्रदेशों में स्थित जो अनेक व्यक्तिये हैं उन सबमें सदृश परिणामरूप जो द्रव्यशक्ति है उमको तिर्यक् मामान्य कहते हैं जैसे कि घटोंमें घटस ॥५॥ ।

रायचन्द्रजैनशास्रमालायाम्
घ्याख्या । यत् मिन्नव्यक्तिषु भिन्नप्रदेशविशेषपु तुल्या समाना एकरूपा । एकाकारा
द्रव्यशक्तिस्तत्तिर्यक्सामान्यमुच्यते तु । यथा । घटेपु घटत्वं, गोषु शाबलेयादिपु मोत्वम्,
अश्वेपु अश्वत्वं, तिष्ठति सामान्यभूतम् । तथा । अनेकाकारघटसहस्रेष्वपि घटत्वमेवेति तिर्य-
क्सामान्यमिति । अत्र कश्चिदाह । यद्घटादिभिन्नव्यक्तिषु यथा घटत्वादिकं सामान्यमेक-
मेवास्ति । तथा पिंडकुसूलादिभिन्नव्यक्तिपु मृदादिसामान्यमेकमेवास्ति । ताई तिर्यक्सामा-
न्योलतासामान्ययोः को विशेषस्तनाह । यत्र देशभेदेन या एकाकारा प्रतीतिरुत्पद्यते । तत्र
तिर्यक् सामान्यमभिधीयते । यत्र पुनः कालभेदेन अनुगताकारप्रतीतिरुत्पद्यते । तत्र ऊर्ध्व-
तासामान्यमभिधीयते इति । एवं सति दिगंवरानुसारी कश्चिद्वक्ति । पण्णां द्रव्याणां फाल-
पर्यायरूप ऊर्ध्वताप्रचयः । कालं विना पंचद्रव्याणामवयवसंघातरूपतिर्यक्प्रचयश्चालि ।
एवं वदतां तेषां मते तिर्यक्प्रचयस्साधारो घटादिस्तिर्यक्सामान्यं भवति । तथा परमाणुरूप
प्रचयपर्यायाणामाधारो भिन्न एव युज्यते । तस्मात् पंचद्रव्याणाम् । स्कंध १ देश २ प्रदेश
भावेन एकानेकव्यवहार उत्पादनीयः । परंतु तिर्यक्प्रचय इति नामांतरमप्रयोजकं घालुका-
पेपयत् । इति नियमः १४।५।
व्याख्यार्थ:-जो भिन्न २ प्रदेशोंवाले विशेषों में समान अर्थात् एकआकारवाली
द्रव्यशक्ति है उसको तिर्यक् सामान्य कहते हैं जैसे संपूर्ण घट व्यक्तियों में घटत्व, शावलेय
आदि समस्त गो व्यक्तियों में गोत्व, एवमेव अश्व (घोड़े) में अश्वपना सामान्यभूत रहता
है वैसेही अनेक आकारवाले हजारों घटोंमेंभी घटत्वही रहता है ऐसा तिर्यक् सामान्य है ।।
अय यहांपर कोई शंका करता है कि जैसे घट आदि भिन्न भिन्न व्यक्तियोंमें घटत्य
आदि सामान्य एक ही है ऐसे ही पिंड, कुसूल, आदि भिन्न व्यक्तियों में मृत्तिका आदि
सामान्य भी एक ही रूप है. तो तिर्यक् सामान्य तथा ऊर्ध्वता सामान्य इन दोनों में क्या
विशेष है ? इम शंकाका उत्तर देते हैं-जहांपर एक जातिके पदार्थों में केवल देशभेदसे
जो सब उस प्रकारकी व्यक्तियोंमें एकाकार प्रतीति होती है वहांपर उस (एकाकार प्रतीति
वा भान) को तिर्यक् सामान्य कहते हैं; और जहां पुनः कालभेदसे सब पायोंमें अनु-
गत एकाकार प्रतीति होती है उसको ऊर्ध्वता सामान्य कहते हैं; येही दोनोंमें भेद है।
इस प्रकार मानने पर कोई दिगम्बर जैनमताऽनुयायी कहते हैं कि जीर्व, पुल, धर्म,
अधर्म, आकाश तथा काल इन छहों द्रव्योंका काल पर्यायरूपमें तो ऊर्ध्वता प्रचय है;
और कालको छोडके शेष पंच द्रव्योंका अवयव संघातरूप तिर्यक् प्रचय है । इस प्रकार
कहनेवाले दिगम्बरियोंके मतमें तिर्यक् प्रचयका आधार पटआदि तिर्यक् मामान्य
होता है और उमी रीति परमाणुरूप प्रचय पर्याओंका आधार उनसे कोई भिन्न होना
योग्य है!! इस हेतुसे पञ्चद्रव्योंका स्कंध १देश २ तथा प्रदेश भावसे एक तथा
अनेक व्यवहार प्रतिपादन करना चाहिये; परन्तु तिर्यक् प्रचय ऐमा अन्य नाम तो व्यर्यही
है जैसे याद (रैनी ) का चूर्ण वश यही नियम है ॥ ५ ॥

१७ द्रव्यानुयोगतर्कणा। अथोलतासामान्यश दद्वयं दर्शयन्नाह । इसके पश्चात् उद्धृता सामान्य शक्तिके दो भेद दर्शाते हैं; सूत्रम् । गुणपर्याययोः शक्तिमात्रमोघोद्भवादिमा । आसन्नकार्ययोग्यत्वाच्छक्तिः समुचिता परा ॥६॥ सूत्रभावार्थ:--द्रव्योंके गुण तथा पर्यायमें शक्तिमात्र है उसके दो भेद हैं, उनसे जो प्रथम शक्ति है उसको ओघोद्भवा कहते हैं, और समीपवर्ती कार्यके योग्य होनेसे तथा व्यवहारके उपयुक्त होनेसे द्वितीय शक्तिको समुचिता शक्ति कहते हैं ॥ ६ ॥ व्याख्या । सर्वेषां द्रव्याणां निजनिजगुणपर्याययोः शक्तिमात्रम् । ओपोद्भवा ओघशक्तिः आदिमा प्रथमभेदरूपा कथ्यते । पुनः आसन्नं निकटं शीघ्रभावि वा यत्कार्य तस्य योग्यत्वात् व्यवहारयोग्यत्वात् समुचिता शक्तिरपरा द्वितीया समुचितशक्तिरुच्यत इति । ६ । च्याख्यार्थ:--सम्पूर्ण द्रव्योंके गुण तथा पर्यायमें जो शक्तिमान है उसके दो भेद हैं, प्रथम अथवा आदि शक्ति जो ओघसे अर्थात् समूहसे उत्पन्न होती है उसको ओघशक्ति कहते हैं; और पुनः समीपवर्ती शीघ्रभावी जो कार्य है उसके योग्य होनेसे तथा व्यवहारके उपयोगी होनेसे द्वितीय शक्तिको समुचित ( उचित वा योग्य ) शक्ति कहते हैं ।। ६ ।। अथैतद्भेदद्वयं दृष्टान्तेन द्रढयन्नाह । अब इन दोनो भेदोंको दृष्टान्तसे दृढ़ करते हुए अग्रिम सूत्र कहते हैं । सूत्रम् । ज्ञायमाना तृणत्वेनाज्यशक्तिरनुमानतः । किं च दुग्धादिभावेन प्रोक्ता लोकसुखपदा ॥७॥ सूत्रार्थ:-यद्यपि धृतकी शक्ति तृणपनेकर अनुमानसे जानी जाती है तथापि दुग्धभावसे कही हुई लोकमें सुख देनेवाली होती है ।। ७ ।। व्याख्या । यथा आज्यशक्तिघृतशक्तिः तृणखेन तृणभावेन अनुमानप्रमाणतो ज्ञायमानापि लोकानामप्रतः कथयितुं न शक्यते । यदि तृणपुद्गलेपु धृतशक्तिर्नास्ति तदा तृणाहारेण धेनुः दुग्धं कथं दत्ते । तदुग्धान्तभूता घृतशक्तिः कुत आगता । इत्थमनुमीयमाना तृणभावेन धृत- शक्तिीनापि लोकानां पुरतः प्रकाशयितुमशक्या। तस्मात् तृणभावेन या शक्तिः सा ओघश- क्तिरित्येकदृष्टान्तः । किं चानुमीयमानौधशक्तिराद्या पुनर्व्यवहारादेश लमते । तथाह । तृणज- न्यदुग्धादिभावेन दुग्धंदध्यादिभावेन परिणमिता घृतशक्तिः प्रकाश्यमाना लोकमुखप्रदा लोकचित्तगम्या भवेत् । नतः सा शक्तिद्वितीया समुचितशक्तिः कथ्यते । अत्रायं विवेकः । अनन्तरकारणमध्ये समुचितशक्तिः, परम्परकारणमध्ये ओघशक्तिरिति । ओघशक्तौ तु तृणानि धेनुरआति, पुष्टा सती दुग्ध दत्ते, दुग्धेन दधि जायते, दन्नः कारणकलापेन घृतमेवमोयेन घृतशक्तिः स्फुटीभवति । तथान्यत्र दुग्धध्यादेर्पतमेवेति व्यवहारयोग्यत्वं लोकमसिद्ध वैति । अथ च ओघशक्तिसमुचितशत्योरन्यकारणता, प्रयोजनवेतिनामान्तरद्वयमपि ग्रन्था- न्तरात्कथितमिति ज्ञेयम् । ७ । १स पुस्तके नास्ति. ३ १८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् व्याख्यार्थः-जैसे घृतशक्ति तृणवरूपसे अनुमानप्रमाण - द्वारा जानी जाती ह तो भी मनुष्योंके आगे कही नहीं जा सकती । यदि तृणरूप पुद्गलोंमें धृतशक्ति नहीं होती तो तृणका भोजन करनेसे गौ दुग्ध कैसे देती ! और उस दुग्धके भीतर भी जो घृत शक्ति है वह कहांसे आती ! इसप्रकार अनुमान की हुई घृतशक्ति तृणभावसे जानली गई है तो भी मनुष्यों के आगे वह प्रकट नहीं की जा सकी। इसी हेतु तृणभा. से ज्ञात जो धृतशक्ति है वह पहली ओघशक्ति है । . यह एक दृष्टान्त हुआ । किश्च अनुमान प्रमाण सिद्ध जो वह आदिम ओघशक्ति है सो फिर व्यवहारके आदेश को प्राप्त "होती है । सो ही कहते हैं कि तृणके भोजनसे उत्पन्न हुए दुग्ध आदि भावसे परिणामको प्राप्त हुई घृतशक्ति जो लोकमें प्रकाशित की जाती है वह लोंगोंको सुख देनेवाली अर्थात् रमणीय होती है । तात्पर्य यह कि यदि लोकमें कहो कि घृत तृणसे उत्पन्न होता है तो लोगोंको अच्छा नहीं लगेगा और दुग्धसे घृत उत्पन्न होता है ऐसा कहना सबको अच्छा लगेगा क्योंकि घृत साक्षात् दुग्ध व दधि (दही) से उत्पन्न होता है इसकारण वह दूसरी शक्ति समुचिता शक्ति कहलाती है । यहांपर ऐमा विवेक करना चाहिये कि व्यवधानरहित कारणके मध्यमें जो शक्ति है वह समुचित शक्ति है अर्थात् दुग्ध तथा दधिरूप कारण और घृतकार्यके मध्यमें कोई व्यवधान नहीं है इसलिये घृतकार्यके अव्यवहित पूर्व दुग्ध या दधिरूप कारणमें जो शक्ति है यह समुचित शक्ति है । परं- परा कारणके मध्यमें जो शक्ति है वह ओघशक्ति है । इस ओघशक्तिमें परंपरा इसम- कार है कि गौ पहले तृणोंको साती है, फिर उससे रस आदिका जो परिणमन होता है उससे जब पुष्ट होती है तय दुग्ध देती है, पुनः दुग्धसे दधि होता है, इसरीतिसे तृणसे दधिपर्यन्त जो कारणों का समूह है उससे घृत होता है, ऐसे ओघसे घृतशक्ति प्रकट होती है । और अन्यत्र दूध दही आदि घृतरूप है यह व्यवहार लोकमें प्रसिद्ध ही है। तथा ओघशक्ति और समुचित शक्तिके भन्य ग्रंथों में कहे हुए समुचित कारणता तथा प्रयोजनता ये दो दूसरे नाम भी जानने चाहिये । अथ आत्मद्रव्यमध्ये एनच्यक्तिद्वयं विवक्ति। अनीव द्रव्यमें दोनों शक्तियों का निरूपण फरके अप आत्मद्रव्यमें ओपशक्ति तपा समुचितराचिनी मित्रचना करते हैं- सन्नम्। प्राक पुद्गलपरावर्त धर्मशक्तिर्ययोयजा। अन्यावर्ते तथा स्याता शक्तिः समुचितानिनाम् ॥८॥ मृवार्थ:-जैसे भव्य जीवकि प्रथम पुद्गलोंके परावर्तनाम ओप (समूह)मे उत्पन हुई धर्मशक्ति थी वैसे ही अन्तरे पुल परावर्तनमें ममुचिना नाममे प्रसिद्ध धर्म- सकिद ॥ ८॥ - न :--अनन्त द्रव्यानुयोगतर्कणा। १९ व्याख्या । यथा अङ्गिनां प्राणिनां भव्यानां प्राक् पुद्गलपरावर्ते प्रथमद्रलपरावर्ते जाये- कवचनम् । अर्थात् अनन्तेषु पुद्गलपरावतपु प्रथमं व्यतीतेपु सत्सु ओघजा सामान्यरूपा धर्म- शक्तिस्तदनुगता आसीत् । यद्येवं न भवेत्ताह अन्त्यपुद्गलपरावर्ते सा कुतः प्राप्स्यते । यतः नासतो विद्यते भाव इत्यादिवचनात् । तथा पुनरन्त्यावर्ते चरमपुद्गलपरावर्ते धर्मशक्तिः समु- चिता ख्याता । अत एवाचरमपुद्गलपरावर्तकालो भववाल्यकालः पुनरन्त्यपुद्गलपरावर्तकालो धर्मयौवनकालश्च कथ्यते । उक्तं च । अचरमपरियट्टेसु कालो भवबालकालगो भणिओ। चरमोउ धम्मजुवणकालो नह वन्नभेउत्ति। १ । एतद्विशत्यां पठितमिति ॥ ८॥ च्याख्यार्थ:-जैसे भव्य जीवोंके प्रथम पुद्गलोंके परावर्तनों में, पाक्युद्गल- परावर्ते " यहां जातिकी अपेक्षा से एक वचनका प्रयोग किया गया है भावार्थः- परावर्तमान अर्थात् एकके पीछे निरन्तर गमनागमन शील जो पुद्गल प्रथम व्यतीत होते चले आये हैं उनमें ओघसे उत्पन्न तथा उनके सब पर्यायोंमें अनुगत सामान्य रूपको धारण करनेवाली धर्मशक्ति विद्यमान थी। क्योंकि यदि ऐसा न माना जाय तो अन्तिम पुद्गल परावर्तनमें उन पुद्गलोंको पर्यायोंमें चलानेवाली धर्मशक्ति कहांसे प्राप्त हो सक्ती है ? क्योंकि असत् पदार्थका भाव अर्थात् विद्यमानपना नहीं हो सक्ता इत्यादि वचन है, इससे यह सिद्ध हुआ कि प्रथम पुद्गलोंके परावर्तनोंमें सामान्य- रूप ओघसे उत्पन्न धर्मशक्ति अवश्य थी । तथा अन्तिम पुद्गलोंके परावर्तनों में जो विद्यमान धर्मशक्ति है उसका समुचिता नाम है । इसी कारणसे प्रथम पुद्गलोंका जो परावर्तन काल वह भवका वाल्य काल है, और जो अन्तके पुद्गलोंका परावर्तन काल है वह धर्मका यौवनकाल कहा जाता है । इस विषयमें यह वचन भी कहा गया है कि- प्रथम पुद्गलोंके परावर्तनोंका काल भवका बाल्यकाल कहलाता है, तथा अन्तके पुद्गलोंका परावर्तन काल धर्मयौवनकाल कहलाता है । १। यह गाथा विंशति- नामक ग्रंथमें पठित है।॥ ८॥ अथ द्रव्यशक्ति व्यवहारनिश्चयनयाभ्यां दर्शयन्नाह । अत्र द्रव्यकी शक्तिको व्यवहार तथा निश्चयनयसे दर्शाते हुए अग्रिम सूत्र कहते है। सूत्रम् । कार्यभेदाच्छक्तिभेदो व्यवहारेण दृश्यते । युनिश्चयनयादेकमनेकै कार्यकारणैः ॥९॥ सूनार्यः--व्यवहारनयकी अपेक्षासे कार्योके भेदसे शक्तिभेद भी देख पडता है, तथा निधयनयकी अपेक्षासे तो अनेक कार्य्य तथा कारणोंसे युक्त होने पर भी निजशक्ति- खभाल एकही द्रव्य है ॥९॥ व्याख्या । एवं पूर्वोक्तप्रकारेण एकैकस्य कार्यस्य ओघशक्तिसमुचितक्तिरुपाः शक्तयोऽने. कश एकद्रव्यस्य प्राप्यन्ते । ताः पुनर्व्यवहारनयेन व्यवहताः समः कार्यकारणभेदं सूचयन्ति ।

रायचन्द्रजैनशामालायाम् कथं व्यवहारनयो हि कार्यकारणभेदमेव मनुते । निश्चयनयो हि अनेककार्यकारणैर्युगपि द्रव्यमेकमेव स्वशक्तिस्वभावमस्तीत्यवधारयति । कदापि इत्थं नावधार्यते । तदा स्वभाव भेदागव्यभेदोऽपि संपद्येत । तस्मात्तत्तद्देशकालादिकापेक्षया एकस्यानेककार्यकारणस्वभावमङ्गी. कुर्वतां न कोपि दोपपोपः । कारणान्तरापेक्षापि स्वभावान्तर्भूता एवास्ति । तेन तस्यापि वैफल्यं न जायते । तथा शुद्धनिश्चयमताङ्गीकारे तु कार्यकारणकल्पनैव मिथ्या। यत: --आदावन्तेच यन्नाति वर्तमानेऽपि तत्तथेति वचनात् । कार्यकारणकल्पनाविरहितं शुद्धमविकलमचलितस्व- रूपं द्रव्यमस्तीति शेयम् । ९। व्याख्यार्थः-पूर्व प्रसंगमें कही हुई रीतिसे एक एक कार्यकी ओघशक्ति तथा समुचित शक्तिरूप जो शक्तियं हैं वे एक द्रव्यके अनेक प्राप्त होती हैं, और व्यवहार- नयसे व्यवहृत ( व्यवहार वा उपयोगमें प्राप्त) होनेसे वे ही शक्तिये कार्य तथा कारणका भेद सूचित करती है। क्योंकि व्यवहार नय कार्यकारणका भेद ही मानता है; और निश्चय (शुद्ध) नय तो अनेक कार्य्य तथा कारणोंसे युक्त होनेपर भी द्रव्य एक निज- शक्ति स्वभाववाला है ऐसा निश्चय कराता है, और ऐसा निश्चय कभी भी नहीं कराता कि कार्यकरणों के भेदसे अनेक स्वभावयुक्त द्रव्य होता है, क्योंकि जब ऐसा माना जा- यगा तब स्वभाव भेदसे द्रव्य भेद भी प्राप्त हो जायगर । इसलिये उस उस देश उस उस काल आदिकी अपेक्षासे एक द्रव्यका अनेक कार्य कारण स्वभाव अंगीकार करने- वालोंको कोई भी दोपका लेश नहीं है, और कारणान्तरकी अपेक्षा जो है वह भी द्रव्यके खभावके अन्तर्गत ही है, इसलिये उसको भी निष्फलता नहीं होती और शुद्ध निश्चय नयके मतको स्वीकार करने पर तो कार्यकारणकी कल्पना ही मिथ्या है । क्योंकि "जो धर्म अथवा स्वभाव अर्थात् द्रव्यका अनेक स्वरूप आदि अन्तमे नहीं है वह वर्त- मानमें भी वैसा ही है अर्थात् नहीं है ऐसा वचन है; इससे कार्यकारणकी कल्पनासे शून्य, अखंडित, तथा अविचलित स्वरूप एक ही द्रव्य है ऐसा जानना चाहिये ॥९॥ पूर्वत्र शक्तिस्वरूपं द्रव्यं व्याख्यातम् । अथ च व्यक्तिरूपौ गुणपर्यायौ वर्णयन्नाह । पूर्व प्रकरणमें शक्तिस्वरूप द्रव्यका वर्णन किया गया, अब व्यक्तिरूप गुण तथा पर्या- यका वर्णन करते हुए अग्रिम सूत्र कहते हैं. सूत्रम् । स्वस्खजात्यादिभूयस्यो गुणपर्यायव्यक्तयः । शक्तिरूपो गुणः केपांचिन्मते तन्मृपागमे ॥१०॥ सूत्रार्थः-सहमावी अथवा क्रममावी कल्पनासे किये हुए निजस्वभावसे वर्तमान गुण तथा पर्यायोंकी व्यक्ति अनेक प्रकारकी है; और किन्हींके अर्थात् दिगम्बरमतानु- सारियोंके मतसे गुण जो है वह शक्तिरूप ही है परंतु यह शास्त्रीय सिद्धान्तोंसे मिथ्या है ॥ १० ॥ । “व्याख्या । स्वखजात्या सहभाविक्रमभाविविकल्पनाकृन्निजस्वभावन वर्तमाना गुणपर्याय- २१ द्रव्यानुयोगतर्कणा। व्यक्तयो भूयस्यो बहुप्रकाराः सन्तीति । अत्र कश्चिद्दिगम्बरानुसारी शक्तिरूपो गुण इति फथयन्नाह । यतो द्रव्यपर्यायकारणं द्रव्यम् । गुणपर्यायकारणं गुणः द्रव्यपर्याययोव्यस्या- न्यथाभावः । यथा नरनारकादयो यथा वा व्यणुकत्र्यणुकादयः । पुनर्गुणपर्याययोर्गुणस्या न्यथाभावः । यथा मतिश्रुतादिविशेषः । अथवा भवस्थसिद्धादिविशेषः । एतौ द्रव्यगुणौ स्वस्ख. जात्या शाश्वतौ पर्यायेण चाशाश्वती इत्थं संगिरन्ते । परमार्थतस्तु आगमयुक्त्या एतत्सर्व मृपा असत्कल्पनमित्यवधार्य प्रमाणाभावात् । १० । व्याख्यायः-द्रव्योंके अपने २ स्वभावसे सहभावी अर्थात् द्रव्यके साथ ही होने- वाले गुणोंकी व्यक्तियां, तथा द्रव्योंके निज २ स्वभावसे क्रमभावी पर्यायोंकी व्यक्तियाँ अनेक प्रकारकी हैं । यहां कोई दिगम्बरमतके अनुयायी शक्तिरूप हो गुण है ऐसा कहते हुए कहते हैं कि द्रव्यपव्यका कारण तो द्रव्य है, और गुणपर्यायका कारण गुण है, तथा द्रव्य और पर्यायोंमें भी द्रव्यका अन्यथा भाव है, जीवद्रव्यके नर तथा नारकादि विदोप, पुद्गल व्यके द्वयणुक, व्यणुक आदि विशेष, और गुणपर्यायोंमें, गुणका अन्यथामाव अर्थात् गुणकी रूपान्तरसे स्थितिरूप ही है । जैसे ज्ञानगुणके मति- श्रुत आदि विशेष, अथवा भवस्थ सिद्ध आदिक विशेष । फिर यह दव्य गुण निज निज स्वभावसे तो नित्य है, और पर्यायरूपसे अनित्य है, ऐसा दिगम्बर जैनी कहते है । परन्तु यथार्थमें शास्त्रीय युक्तिसे यह सब मिथ्या है अर्थात् यह कल्पना उनकी असद्रूप है । क्योंकि इस कल्पनामें कोई प्रमाण नहीं है ॥१०॥ अथ गुणपर्याययोरक्यं प्रदर्शयन्नाह । अब गुण तथा पर्यायकी एकता दर्शाते हुए यह सूत्र कहते हैं। सूत्रम् । पर्यायान्न गुणो भिन्नः सम्मतिग्रन्थसम्मतः। यस्य भेदो विवक्षातः स कथं कथ्यते पृथक् ॥ ११ ॥ सूत्रार्थ:-संमतिग्रन्थको यह सम्मत है कि पर्यायसे गुण भिन्न नहीं है क्योंकि जिसका भेद वक्ताकी इच्छा अथवा किसी अपेक्षाके आधीन है वह पदार्थ भिन्न कैसे कहा जा सकता है ॥ ११ ॥ व्याख्या । पर्यायाद्गुणो भिन्नः पृथक् न किं तु पयाय एव गुण इत्यर्थः । कीदृशो गुणःसम्म- तिप्रन्थमम्मतः। सम्मतिप्रन्थे श्रीमसिद्धसेनैराचार्यैर्व्यक्तवाचा समुन्धारितस्तथा च तद्वन्थः । परिगमणं पजाओ अणेगकरणे गुणत्ति तुलट्ठा । तहवि न गुणत्ति भण्णई पजवणयदेसणं जम्मा ।१। इति यथाक्रमभावित्वं पर्यायलक्षणम् । तथैवानककरणमपि पर्यायस्य लक्षणान्तरमेवाति । द्रव्यं तु एकमेवाले ज्ञानदर्शनादिभेदकार्यपि पर्याय एव परं गुणो न कथ्यते । यस्मात् द्रव्य- पर्याययोर्भगवतो देशना वर्तते । परन्तु गुणपर्याययोर्देशना न विद्यते । अयं गाथार्थः । एवं सति गुणः पर्यायादिन्नो न तर्हि द्रव्यम् १ गुणः २ पर्याय ३ श्चेति नामजयं पृथक् कथं सङ्कलितम् । इत्थं केचन व्याचक्षते तानाह । यस्य गुणस्य विवक्षाकृतो भेदो विवक्षा हि २२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् नयस्य कल्पना । यथा तैलस्य धारा । अत्र तैलात् धारा भिन्ना प्रदर्शिता । तथापि भिन्ना नास्ति । तथैव सहभावी गुणः क्रमभावी पर्याय इति भिन्नत्वं विवक्षितं परं परमार्थदशा भिन्नत्वं नास्ति । तस्माद्यस्य भेद उपचरितो भवेत् । स कथं भिन्नत्वेन व्यपदिश्यते । यथा उपचरितगुणे दृष्टान्तवचनं "गौर्दोग्धि" इत्यत्र गोर्न दौग्धि तद्वत् उपचरितगुणोऽपि शक्तित्वं न धत्त इति । ११ । व्याख्यार्थ:-पर्यायसे गुण भिन्नरूप नहीं है किन्तु पर्याय ही गुण है, कैसा गुण ? इस आकांक्षापर विशेषण कहते हैं कि सम्मतिग्रंथके सम्मत अर्थात् सम्मतिग्रन्थमें श्रीसिद्धसेन आचार्यद्वारा स्पष्ट वाणीसे कहा गया ऐसा । उनके ग्रन्थकी गाथा यह है कि द्रव्यमें जो क्रमसे गमन करै अर्थात् क्रमसे हो वह पर्याय है तथा एकको अनेक करना यह गुण है और दोनों समान हैं तथापि गुण नहीं कहा जाता है क्योंकि शास्त्रोंमें पर्याय- नयका ही कथन है । १। तात्पर्य-गाथाका यह है कि जैसे कभभावीपना पर्यायका लक्षण है, उस ही प्रकार एकको अनेक करना.भी पर्यायका दूसरा लक्षण ही है, द्रव्य तो सदा एक रूप ही रहता है, तथा ज्ञान दर्शन आदिकके भेदका करनेवाला भी पर्याय ही कहा जाता है न कि गुण. क्योंकि गुण, भेद करनेवाला नहीं है इसीसे श्रीभगवान्का उपदेश भी द्रव्य तथा पर्यायमें ही है । परंतु गुण और पर्याय उपदेश नहीं । यदि पूर्वोक्त प्रकार गुण पर्यायसे भिन्न नहीं है तो द्रव्य, गुण तथा पयीय यह तीन नाम जुदे कैसे गिने गये इस प्रकार जो कितने ही कहते है उनका समाधान करनेके लिये उत्तरार्द्धसे कहते है कि जिस गुणका विवक्षासे किया हुआ भेद है वह भिन्नपनेसे कैसे कहा जाय ? भावार्थ-नयोंकी जो कल्पना है वह विवक्षा कहलाती है, जैसे "तैलकी धारा" इस वाक्यमें तैलसे धारा जुवी दिखाई गई है; तो भी यथार्थमें धारा तैलसे भिन्न वस्तु नही है, वैसे ही सहभावी साथ होनेवाला गुण, तथा क्रममावी ( क्रमसे होनेवाला) पर्याय, ऐसे गुण पर्यायका भेद केवल विवक्षासे है, परंतु परमार्थदृष्टि से भेद नहीं है। इसकारण जिसका भेद उपचा- रसे माना गया हो, वह यथार्थमें भिन्नरूपसे कैसे कहा जा सकता है । और गुण उप- चारसे है इसमें दृष्टान्त यह है कि जैसे 'गौ दुहती है' यहां गौ नहीं दुहती है । यहांपर दोहनकापना उपचारसे गायमें है न कि यथार्थमें । ऐसे ही उपचारको प्राप्त हुआ गुण भी शक्तिको नही धारण करता है ॥ ११ ॥ अथ ये च गुणः पर्यायाद्भिन्न इति प्रमाणयन्ति तान् दूपयन्नाह । अब गुण पर्यायसे भिन्न पदार्थ है, ऐसा जो प्रमाण करते हैं उनको दूषण देते हुए आगेका सूत्र कहते हैं । सूत्रम् । गुणो द्रव्यं तृतीयं चेत्तृतीयोऽपि नयस्तदा । सिद्धान्ते द्रव्यपर्यायार्थिकभेदान्नयद्वयम् ॥ १२ ॥ ।

द्रव्यानुयोगतर्कणा। सूत्रार्थ: :-द्रव्य तथा पर्यायको मानकर सिद्धान्तमें द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक भेदसे दो ही नय कहे गये हैं। यदि गुण भी तृतीय द्रव्य होता तो तीसरा नय भी कहते ॥ १२ ॥ व्याख्या । यदि गुणस्तृतीयः पदार्थो द्रव्यपर्यायागिन्नोन्यः पदार्थों भावो भवेत् । तदि तृतीयो नयोऽपि लभ्यते । सूत्रे तु द्रव्यार्थिकपर्यायार्थिक इति नयद्वयमेव कथितम् । नयान्तरं यद्यभविष्यत्तदाद्रक्ष्यत् । अतो नयद्वयादपरो नय एव न । उक्तं च सम्मतौ--- दोऊ णया भगवया दव्वट्ठियपज्जवट्टियाणियया । जइ पुण गुणोवि हुतो गुणद्वियणयोवि जुजतो ॥ १ ॥ जं च पुण भगवया ते सुत्तेसु मुत्तेसु गोयमाईणं । पजवसण्णा णियया बागरिया तेण पजाया ॥२॥ रूपादीनां गुणसंज्ञा सूत्रे न भापिता परन्तु "घण्णपजवा गंधपजवा इत्यादिपाठः पर्यायशब्देन पठितस्तथापि गुणो न कथ्यते । अन्यञ्च । एगगुणकालएइत्यादिस्थानेष्वपि गुणशब्दो यश्च दृश्यते सोपि गणितशास्त्रसिद्धपर्यायविशेषः संख्यावाचको शेयः । परन्तु गुणास्तिकनयविपयवाचको न । उक्तं च । सम्मतिप्रन्थमध्ये- जंपति अस्थिसमए एगं गुणो दशगुणो अणंतगुणो। ख्वाईपरिणामा भन्नइ तम्हा गुणविसेसा ॥ १ ॥ गुणसद्दमंतरेणावि तणुपजवविसेससंखाण । सिन्झइण वरं संखा णसत्थधम्मो एव गुणोति ॥२॥ जह दसम दसगुणमि य एगंमि दसतणं समत्ते च । अयिं वि गुणसद्दे तहेव एयंमि व्वर्ट ।। ३ ॥ एवं गुणः पर्यायात् परमार्थदृशा भिन्नो नास्ति । तस्माद्र्व्यमिव शक्तिरूपता कथं स्यादि- त्यभिप्रायः । १२॥ व्याख्याः-यदि गुण तीसरा पदार्थ अर्थात् द्रव्य और पर्यायसे भिन्न पदार्थ होता तो तीसरा नय भी प्राप्त होता अर्थात् सूत्रमें तो द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक ऐसे दो नय ही कहे गये हैं यदि तीसरा होता तो देख पड़ता । इससे यह सिद्ध हुआ कि इन क- धित दो नयाँसे अन्य कोई नय ही नहीं है । संमतिग्रन्थमें कहा भी है। गाथार्थ-श्री भगवान्ने द्रव्यार्थिक तथा पर्यायार्थिक ये दो ही नय कहे हैं, फिर यदि द्रव्यपर्यायमे भिन्न गुण भी होता तो गुणार्थिक नय भी कहना योग्य था ॥१॥ और भगवान्ने जो गोतमादिकको सूत्र कहे हैं उनमें पज्जव संज्ञा कही है इसलिये गुण पर्याय ही कहलाते हैं ॥ २ ॥ रूपादिककी सूत्रमें गुणसंज्ञा नही कही गई है.परंतु 'वण्णपज्जवा, 'गन्ध पजवा' इत्यादि पाठ पर्यायशब्दसे ही कहा है अर्थात् वर्णपर्याय, गुणपर्याय ऐसा ही कहा गया है, और गुण शब्द वहांपर नहीं कहा ॥ और भी 'एग गुणकाल ए' एक गुणकालमें इत्यादि स्था- . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् नोंमें जो गुण शब्द देख पड़ता है, वह गुणशब्द भी गणितशास्त्रमें सिद्ध पर्यायविशेषका ही नाम है, इसलिये उसको संख्याका याचक ही समझना चाहिये और गुणास्तिक नयके विषय का वाचक नहीं । संमतिग्रन्थमें कहा भी है। "गाथार्थः---आर्थिक समय में ऐसा कहते हैं कि एक गुण, दशगुण, तथा अनन्त- गुण रूपादि परिणाम कहे गये हैं, इस कारण • गुणशब्द संख्याविशेषवाचक है ॥ १ ॥ और गुणशब्दके विना भी संख्याओंके विषयमें तनुपर्यायविशेष ऐसा प्रयोग किया है, इस हेतुसे एक गुण यह समूहका धर्म संख्यापरक है न कि शक्तिपरक ॥ २.॥ जैसे दशसंख्याओंमें दशगुण है, ऐसे ही एकमें एक गुण, दातमे शतगुण हैं, इसी प्रकार समस्त संख्याओंमें गुण शब्दका प्रयोग है ऐसे एक गुण द्रव्यस्थ गुण नहीं है'॥ ३ ॥ इस रीतिसे परमार्थ दृष्टिसे पर्यायसे भिन्न कोई पदार्थ नहीं है, इस कारण से द्रव्य के सहश शक्तिरूपता गुणकी कैसे होसकती है ॥ १२ ॥ ! अथ. केचन पयीयस्य दलं गुण इति वदन्ते । गुणं शक्तिरूपमेव मन्वानश्च विवदन्ते तान् दूपयन्नाह । अब वादीगण गुणको पर्यायका कारण मानते हैं, और गुणको स्वतत्त्वशक्तिरूप मानते हुए परस्पर विरुद्ध विवाद करते हैं उनको दूपण देते हुए यह सूत्र कहते हैं । सूत्रम् । पर्यायस्य दलं यहि गुणो द्रव्येण किन्तदा । गुणपर्याय एवेयं गुणपरिणामकल्पना ।। १३ ।। सूत्रार्थ:-और यदि पर्याय का कारण ( उपादान कारण) गुण हो तो पुनः द्रव्यका क्या प्रयोजन है ? । और गुणपर्याय यह जो कथन है सो तो गुणकी ही परिणामरूप कल्पना है न कि अन्य कुछ ॥ १३ ॥ । व्याख्या। यहि गुणः पर्यायस्य दलं उपादानकारणं भवति । तदा द्रव्येण किमिति- कि प्रयोजनं द्रव्यप्रयोजनं गुणेनैव सिद्धमित्यर्थात् गुणपर्यायावेव पदार्थों उपदिश्यतां तृती- यस्यासम्भवात् इति नियमः । पुनरत्र कश्चित्कथयिष्यति । द्रव्यपर्याय १ गुणपर्याय २ रूपे कार्ये भिन्ने स्तसतश्च द्रव्य १ गुणरूप २ कारणे अपि भिन्न स्तः । इति कल्पनया वादी असत्यः । कथं कार्य कारणोपचारात् कार्यमध्ये कारणशब्दप्रवेशो जायते । तथा कारणभेदे कार्यभेदः सिद्धयति । अथ च कार्यभेदसिद्धौ कारणभेदसिद्धिरित्यन्योन्याश्रयनाम दूपणमुत्पद्यते । तस्मात् गुणपर्यायस्तु गुणपरिणामस्यैव पटान्तरभेदकल्पनारूपः । तत एव केवलं सम्भावना परन्तु परमार्थतो न हि । अथ च द्रव्यादि नामवयमपि भेदोपचारेणैव शेयम् । १३ ॥ व्याख्यार्थः- यदि गुण पर्यायका उपादान कारण हो तो द्रव्यसे क्या प्रयोजन है? अर्थात् द्रव्यका प्रयोजन गुणसे ही चल जायगा तब अन्य पदार्थ मानने की क्या आ- वश्यकता है ? और द्रव्यका कार्य गुणसे हो गया तो गुण, तथा पर्याय, इन्ही दोनों पदार्थोंका उपदेश करना चाहिये, क्योंकि तृतीयका असंभव है ऐसा नियम होना चाहिये .

* द्रव्यानुयोगतर्कणा। २६ अब इस विषयमें यदि कोई ऐसा कहै कि द्रव्यपर्याय तथा गुणपर्याय ये दोनों कार्य भिन्न २ रूपके हैं, इसलिये द्रव्य तथा गुण ये कारण भी भिन्न २ रूपके होना चाहिये । इस प्रकार कल्पनावादी भी मिथ्या हैं। क्योंकि कार्यमें ही उपचारसे कारण की कल्पना होती है इसलिये कार्यमें कारण शब्दका प्रवेश होता है। और भी प्रथम कारणका भेद सिद्ध होने पर कार्यका मेद सिद्ध होता है, और ऐसे ही कार्यका भेद सिद्ध हो जाये तब कारणका भेद सिद्ध हो सकता है। इस प्रकार कारणके भेद सिद्ध होनेमें कार्यभेद सिद्ध कारण होगा, तथा कार्यके भेद सिद्ध होनेमें कारणका भेद सिद्ध होना कारण होगा, इस रीतिसे तुम्हारे मतमें अन्योन्याश्रय नामका दूषण भी आता है । इसलिये गुणपर्याय यह जो कथन है सो तो गुणकी ही परिणामरूपसे क- ल्पना है क्योंकि कल्पनामात्रसे ही पर्यायसे गुणके भेदका संभव है, और परमार्थदृष्टि से तो गुणका पर्यायसे भेद है ही नहीं, किन्तु परमार्थमें द्रव्य गुण तथा पर्याय ये तीनों नाम भी भेदके उपचारसे ही कल्पित किये हैं. ऐसा जानना चाहिये ।। १३ ॥ सूत्रम्। एकानेकत्ररूपेण भेदा एवं परस्परम् । आधाराधेयभावेन कल्पनां च विभावय ॥ १४ ॥ सूत्रार्थ:-इस पूर्वोक्त प्रकारसे द्रव्य एक ही है, गुण पर्याय अनेक हैं, इस री- तिसे परस्पर अर्थात् एक दूसरेकी अपेक्षासे भेदकी कल्पना मात्र जानो, और इसी पूर्वोक्त रीतिसे आधाराधेयभावकी कल्पना भी निश्चय करो ॥ १४ ॥ व्याख्या । एवममुना प्रकारेण द्रव्यमेक, गुणपर्यायाऽनेके, इत्थं भावना कार्या। परस्परम न्योन्यं भेदभावकल्पना कर्तव्येत्यर्थः । च पुनः अनयैव दिशा आधाराधेयभावेन कल्पना विभावय | आधाराधेयप्रमुखभावानामपि स्थभावेन मेदान् विचार्य मनसि ज्ञेयम् । यतः- परस्परावृत्तिधर्माणः परस्परभेदान ज्ञापयन्तीति भावः । १४ । व्याख्यार्थ: :-इस पूर्वोक्त रीतिसे कल्पना मात्रसे गुण, पर्यायकी सिद्धि होनेसे यह सिद्ध हुआ कि द्रव्य एक है कल्पना अथवा विवक्षासे गुण पर्याय अनेक हैं। इस प्रकार द्रव्य, गुण तथा पर्यायके परस्पर कल्पित स्वरूपसे भेदकी भावना करनी चा- हिये । और इसी रीतिसे आधार, आधेय आदि भावसे भी कल्पना को जानो अर्थात् कल्पित स्वभावके ही भेदसे आधार, आधेय इत्यादि भावोंके भी स्थायीभावसे भेदोंको विचार कर मनमें निश्चय करो, क्योंकि परस्पर आवृत्तिशील धर्म, अर्थात् एक पदार्थ से दूसरे में आनेवाले धर्म ही परस्परके भेद को ज्ञापित करते हैं यह तात्पर्य है ॥ १४ ॥ अथ आधाराधेयभावयोदृष्टान्तेन उपदिशन्नाह । अब आधार आधेय भावके विषयमें दृष्टान्तद्वारा उपदेश देते हुए यह सूत्र कहते हैं । .

२६ . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् सूत्रम् । . घटादिद्रव्यमाधार आधेयौ तु गुणादिको। एकाक्षलक्ष्यारूपाद्या यक्षगम्यं घटादिकम् ॥१५॥ सूत्रार्थः-घट आदि द्रव्य तो आधार हैं और गुण आदि आधेय है। इनमें आधेय रूप आदि तो एक इंद्रियके विषय हैं, और घट आदि द्रव्य दो इन्द्रियोंके विषय हैं॥१५॥ व्याख्या । घटादिद्रव्यमाधारः द्रव्यं घटादिकमाधारो रूपादीनां । तथा हि-घटे रूपाद्या आधृतास्तिष्ठन्तीति । अथ : गुणपर्यायरूपरसादयो नीलपीतादयश्चाधेयाः द्रव्ये स्थिताः । एवमाधाराधेयभावेन द्रव्यात् गुणपर्यायौ भेदेन स्थितौ । तथा रूपादयो गुणपर्याया एकेन्द्रियगोचरा एकेन्द्रियविपया इत्यर्थः । यथा रूपं चक्षुरिन्द्रियगोचरं चक्षुर्मानमाह्यगुण- त्वात् । रसो हि रसनाविपयो रसनामात्रमाह्यगुणत्वादित्यादि । अथ घटादि द्रव्यं तु द्वीन्द्रिय- विपयं चक्षुःस्पर्शाभ्यां घटो गृह्यते द्रव्यत्वात्। एतन्नैयायिकाभिमतं । स्वमते तु गन्धादिपर्याय- द्वारा प्राणेन्द्रियादिकेनापि द्रव्यप्रत्यक्षमस्ति । न हि चेत् कुसुमं वापयामीत्यादिज्ञाने भ्रान्तित्वं जायते । एवमनेकेन्द्रियप्राह्यद्रव्यात् गुणपर्याययोमेंदो ज्ञातव्यः । गुणपर्याययोरन्योन्यं भेदस्तु सहभावी क्रमभावी च कल्पनीयः । सहभावी गुणः क्रमभावी पर्याय इति । अन्यच्च पर्यायो द्विविधः । सहभावी क्रममावी च । सहभावी गुण इत्यभिधीयते । पर्यायशब्देन तु पर्यायसामान्यस्य स्वव्यक्तिव्यापिनोऽभिधानान्न दोप इति । तत्र सहभाविनः पर्यायाः गुणाः । यथात्मनो विज्ञानव्यक्तिशक्त्यादयः । क्रमभाविनः पर्यायास्त्वात्मनो यथा सुखदुःखशो- कहर्षादयः । इति भेदकल्पनम् । १५ । व्याख्यार्थ: :-घट आदि द्रव्यरूप पदार्थ आधार हैं, क्योंकि घट आदिमें रूप आदि रहते हैं। इसलिये रूपादिक रहनेका स्थान ' घट आदि द्रव्य आधार अर्थात् रूपादिका धारण करनेवाला है; और रूप, रस आदि गुण तथा नीलपीतादि पर्याय ये सब आधेये हैं, अर्थात् घट आदि द्रव्यमें रूपादि गुण रहते हैं, इसलिये आधेय हैं, अर्थात् द्रव्यमें ये गुणपर्याय स्थित हैं । इसप्रकार आधार आधेयभावसे द्रव्यसे गुण पर्याय भिन्नरूपसे स्थित हैं; और रूपादि गुणपर्याय एक इन्द्रियसे ग्राह्य हैं, अर्थात् ये एक २ इन्द्रियसे जाने जाते हैं । जैसे रूप नेत्र इन्द्रियका विषय है, क्योंकि केवल नेत्र इन्द्रियमात्रसे जो ग्राह्य गुण हो उसको रूप कहते हैं; तथा रस जिव्हा इन्द्रियका विषय है, क्योंकि जिव्हा इन्द्रियमात्रसे ग्रहण करने योग्य गुण है । और घट आदि द्रव्य तो दो इन्द्रियके विषय है, क्योंकि घट नेत्र तथा स्पर्शन (त्वक् ) इन दोनों इन्द्रियोंसे जाना जाता है, क्योंकि वह द्रव्य है । यह कथन नैयायिकमतके अनुसार है, और निज अर्थात् जैनमतमें तो १ चटाई पर देवदत्त है, स्थालीमें पकाता है, विलमें तैल है, घटमें रूप है. यहां चटाई, स्थाली, तिल तया घट आधार है। २ जो वस्तु उनमें वा उनपर है वह आधेय है। चटाईरूप आधारका आधेय देवदत्त, स्थालीका चांवल, तिलका तैल और घटका रूप आधेय है।

२७
द्रव्यानुयोगतर्कणा।
गन्ध आदि द्रव्यके पर्यायद्वारा घाण आदि इन्द्रियोंसे भी द्रव्यका प्रत्यक्ष होता है । यदि
ऐसा न मानो, तो "पुष्पं प्रापयामि, मैं तुमको फूल सुंधाता हूं, इत्यादि ज्ञानमें भ्रम
होगा । इसप्रकार अनेक इन्द्रियग्राह्य ' (जानने योग्य) द्रव्यसे एक इन्द्रियमाह्य गुण-
पर्यायका भेद जानना चाहिये । और गुण तथा पर्यायका परस्पर भेद तो सहभावी
तथा क्रमभावी कल्पनासे समझ लेना चाहिये । सह अर्थात् द्रव्यके साथ २ भावी
होनेवाला जो गुण है, सो सहभावी. जैसे पुद्गलमें रूपादि और जीवमे ज्ञान आदि
उपयोग । और क्रम अर्थात् बारी २ से भावी होनेवाला जो पर्याय, सो क्रममावी.
जैसे अजीब मृत्तिका द्रव्यमें पिंड कुसूल आदि, सुवर्णमें कटक कुंडल आदि, और जीव
द्रव्यमें नर नारक तथा सिद्धादि पर्याय समझना । और भी पर्यायके दो भेद हैं; एक तो
सहभावी (साथ होनेवाला) पर्याय और दूसरा क्रममावी अर्थात् क्रमसे होनेवाला
पर्याय । इनमेसे साथ होनेवाले पर्यायको ही गुण कहते हैं । यहांपर पर्यायशब्दसे
पर्याय सामान्यका ग्रहण है, अर्थात् निज आधारभूत व्यक्तिमात्रमें व्यापक होके
रहनेवाला पर्याय गुणशब्दसे कहा जाता है, इसलिये ऐसा कहनेसे कोई दोप
नहीं है । उनमें सहभावी पर्याय गुण है, जैसे आत्माके विज्ञान व्यक्तिकी शक्ति
आदि, और क्रमभावी पर्याय हैं, जैसे आत्माके सुख दुःख हर्ष तथा शोक आदि
इस रीतिसे गुणपर्यायके परस्पर भेद कल्पना करनी चाहिये ॥ १५ ॥
सूत्रम्। सज्ञासङ्ख्यालक्षणेभ्यो विभाग
द्रव्यादीनां यो विदित्वा मिथोऽत्र ।
राडान्ते श्रीतीर्थनाथप्रणीते
श्रद्धां कुर्यान्निश्चलस्तस्य बोधः ॥ १६ ॥
सूत्रार्थ:--संज्ञा ( वस्तुके नाम ) संख्या (पदार्थ गणना ) तथा असाधारण धर्म वचन
आदि लक्षणद्वारा जो द्रव्य आदिके विभागको परस्पर जानकर श्रीभगवान् तीर्थनाथ-
रचित सिद्धान्तमें श्रद्धा करेगा, उस भव्य जीवके अचल बोध होगा ॥ १६ ॥
इति श्रीभोजविनिर्मितायां द्रव्यानुयोगतर्कणायां द्वितीयोऽध्यायः
व्याख्या । संज्ञा नाम तत्कृतो विभागो यथा--द्रव्यनाम १ गुणनाम २ पर्यायनाम ३
चेति । सङ्ख्या गणना तस्कृतो विभागो यथा द्रव्याणि पद, गुणा अनेके, पर्याया
अनेके । लक्षणं त्वसाधारणधर्मवचनं तत्कृतो विभागो यथा द्रवति तांस्तान्पर्यायानागच्छतीति
द्रव्यम् । गुणनामेकस्मादन्यस्य भिन्नकरणं गुणः । परिगमनं सर्वतो व्याप्तिः पर्यायः । एव-
मेतेपो द्रव्यगुणपर्यायाणां परस्परं भेदोऽस्ति। एवं सज्ञासङ्घयालक्षणभ्यो विभागंभेदं विदित्वा
द्रव्यादीनां यो मिथः परस्परम् अत्र राधान्ने सिद्धान्ते श्रीतीर्थनाथप्रणीते श्रीभगवद्भापिने श्रद्धा-
मास्यां कुर्यात् । तस्य भव्यस्य निश्चलो निःप्रकम्पो योधः सम्यच्वं लभत इति ज्ञेयम् ।१६ ॥
इति श्रीद्रव्यानुयोगतर्कणायां भेदप्रदर्शनो द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

R૮ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् व्याख्यार्थः-संज्ञा अर्थात् वस्तुओंका नाम उस नामकृत विभाग जैसे द्रव्य नाम १ गुण नाम २ तथा पर्याय नाम इत्यादिसे । संख्या अर्थात् गणना उस गणनाजनित विमागसे, जैसे जीव, पुद्गल, धर्म आदि छह द्रव्य हैं. गुण अनेक हैं, तथा पर्याय भी अनेक हैं, इस विभागसे और असाधारण धर्म वचन लक्षण है अर्थात् लक्ष्य पदार्थका ऐसा धर्म वर्णन करै, कि वह धर्म अन्य पदार्थोंमें न मिले; वह ही असाधारणधर्मको कहनेवाला लक्षण है । उसकर किया हुआ विभाग जैसे “उन उन पदार्थोंको जो प्राप्त हो वह द्रव्य है" यह द्रव्यका लक्षण है । "एक समूह वा एक जातिके पदार्थों से जो एक किसीको पृथक करै वह गुण है" यह गुणका लक्षण है, ऐसे ही "जो सर्वत्र व्याप्त हो, जो सर्वत्र गमन करै यह पर्याय है। यह पर्यायका लक्षण है । इसप्रकार संज्ञा, संख्या, तथा लक्षणके द्वारा द्रव्य, गुण तथा पर्यायका परस्पर भेद है । इस रीतिसे संज्ञा संख्या और लक्षणोंसे द्रव्य आदिके परस्पर भेदको जानकर श्रीमगवान् तीर्थनाथ द्वारा भापित इस स्याद्वादरूपी सिद्धान्तमें जो श्रद्धा करै उस मनुष्यके निश्चल (अकंपायमान् ) बोध (सम्यक्त्व)की प्राप्ति होती है, ऐसा जानना चाहिये ।। १६ ॥ इति श्रीद्रव्यानुयोगतर्कणाव्याख्यायामाचार्योपाधिधारिपण्डितठाकुरप्रसाद शर्माप्रणीतभापाटीकासमलकृतायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ अथ तृतीयाध्याये ये तीधिका द्रव्यादीनां भेदमङ्गीकुर्वन्ति । अभेदपक्षमाश्रित्य वान् दूषयन्नाह । अब जो शास्त्रकार द्रव्यादिका सर्वथा भेद ही अंगीकार करते हैं उनके मतको अभेद पक्षका आश्रय करके इस तृतीय अध्यायमें दृपित करते हैं । सूत्रम् एकान्तेनोच्यते भेदो द्रव्यादीनां मियो यदा । स्थाद्गुणगुणिनोरेव भावोच्छेदोऽन्यद्रव्यवत् ॥१॥ सूत्रार्थ: यदि एकान्ततः अर्थात् सर्वथा द्रव्य, गुण, तथा पर्यायोंका परस्पर भेद ही कहते हो, तो अन्य द्रव्यके तुल्य गुणगुणी भावका उच्छेद (अभाव) हो जावेगा। च्याप्या। यदा द्रव्यादीनां द्रव्यगुणपर्यायाणामेकान्तेन एकान्तपक्षेण मियः परस्पर भेद उच्यते । तदा अन्यद्रव्ययत् परदन्येणेव सन्यविषयेऽपि गुणगुणिनोरेव मायोच्छेदो गुणगुणिमावस्य व्युच्छित्तिर्भवेत् । यया जीवद्रव्यस्स गुणा ज्ञानादयस्तेषां गुणी जीवद्रव्यम्, पुद्रलद्रव्यस्स गुणा रूपादयतेषां गुणी पुदलद्रव्यमिति । एवं व्यवस्था शाखमसिद्धा भेदागीकारेण पिलुप्यते । जीवद्रव्यस्स यया पुद्गलद्रव्यास गुणेभ्यो भेदोऽस्ति । तथा निजगुः पेभ्यो सानादिभ्योऽपि भेदोऽस्ति । तदन् अयमस्य गुणी। एतस्य एते गुणान्ययं व्यवदारोऽपि विलुप्येत । वरमान् कारणान् द्रव्यपर्यायाणामभेद एव सम्मति । एतादृशोभिदनम्पिारो गुरोरुपदेशाम् भव्यागिनो धारयन्ति ।।

। - . ३०' रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् कारण होता है। क्योंकि जैसे तुम्हारे मतमें गुण तथा गुणी जैसे भिन्न २ लक्षित होते हैं उनके तुल्य समवाय भी तो सबसे पृथक् भासता है । और जैसे गुण, · गुणी द्रव्यमें सम- वाय संबंधसे रहते हैं ऐसे ही समवाय संबंध भी उनमें किस संबंधसे रहैगा इससे उस समवायका भी अन्य संबंध मानना योग्य है । और फिर उस समवाय संबंधका भी अन्य संबंध कल्पना करना चाहिये, इसप्रकार कल्पना करते हुए तुम्हारी स्थिति कहीं भी न होगी। इसप्रकार भेदकी कल्पनासे अत्यंत अनवस्थाका प्रबंध और अस्थिति युक्तिका प्रसंग होता है । इसकारण यदि समवायका अन्यसंबंध न मानकर अभेदसे स्व- रूपसंबंध ही अङ्गीकार किया हो तो गुण तथा गुणीके स्वरूपसंबंध स्वीकार करनेवालोंको क्या दोप है ? और तुम्हारा इसमे क्या विगाड़ होता है जो नवीन समवाय संबंध स्वी- काररूप कल्पनाका गौरव करते हो ? अन्यत्र कहा भी है "जिस पक्षमें प्रक्रियाका गौरव है उस पक्षको हम नहीं सहते हैं, और जिस पक्षमें प्रक्रियाका लाघव है उस पक्षको प्रसन्नतासे स्वीकार करते हैं" । क्योंकि जो अर्थ सरल मार्गसे सिद्ध होता है उस अ- र्थको वक्रमार्गसे साधना योग्य नहीं है । और समवायके जुदा स्वरूप संबंध करनेमें तथा गुणगुणीके स्वरूप संबंध स्वीकार करनेमें क्या विशेष (फर्क) है? और व्यर्थ नवीन संबंधके प्रकट करनेमें गौरख होता है (अर्थात् गुण और गुणीका भेद मानना और उनका समवायसंबंध मानना पुनः अनवस्थादोपसे भयभीत होके समवायका संव-. न्धांतर न मानकर उसका स्वरूपसंबंध ही स्वीकार करना इसकी अपेक्षा गुणगुणीके केवल स्वरूपसंबंधके माननेमें ही लाघव है क्योंकि सरूपसंबंध तो तुमको भी मानना पड़ता ही है) इस प्रकार संक्षेपसे सर्वथा गुणगुणीके भेद माननेवालेके मतमें दूपण दर्शाया है ॥२॥ पुनरभेदपक्षिणो दूपयन्नाह । अव भेदवादीके पक्षको दोप देते हुए अग्रिम सूत्र कहते हैं। सूत्रम् । सण कुण्डलतां प्रासं घटो रसत्वमीयिवान् । इति व्यवहतिर्न स्याद्यपदो भवेन्न हि ॥ ३ ॥ सूत्रार्थ:-यदि द्रव्य, गुण तथा पर्यानका अभेद न होता तो "सुवर्णद्रव्य कुण्डल- दशाको प्राप्त हुआ और घट रक्तत्व (गुणशा) को प्राप्त हुआ" यह व्यवहार लोकमें नहीं हो सका ॥ ३ ॥ व्याख्या । स्वर्ण फुण्डलतां कुण्डलभावं प्रातं । फनके कुण्टलाकारवां गतेपि नामान्तरण जाति व्यक्तिका, गुण गुगीम, भवया अवयवीमा, किया कियारान्छा तथा निलद्रव्य विशेषका, भेर नैयायिक मानते है और इनका समवायसंध भी नैयायिक मानते है उनके मनमें यह दोष है।

द्रव्यानुयोगतर्कणा। न भेदापत्तिः । तथा च घटो रक्तत्वमीयिवान् । पूर्वावस्थया घटः श्यामवर्णः पुनरनिपाका. द्रतत्वं प्राप्तस्तथापि श्यामे घटे रक्ततां प्राप्तेऽपि घटान्तरता न जाता । वर्णाख्यगुणभेदा- द्रव्यभेदो न जात इति व्यवहारो लोकप्रसिद्धिरूप आचारो न घटते । यद्यभेदस्वभाव- व्यवहारो द्रव्यादीनां न भवेत् । अतो द्रव्यादयत्रयोऽभिन्ना एव प्रकल्पन्ते नामान्तरेण न शहनीयमिति भावः । ३। च्याख्यार्थ:-सुवर्ण कुण्डल अर्थात् कर्णके आभूषणपनेको प्राप्त हुआ, यहां सुवर्ण कुंडलके आकारको प्राप्त होगया है तो भी कुंडल इस नाममात्रसे सुवर्ण और कुंडलका भेद नहीं होता, तथा घट रक्तत्तदशाको प्राप्त हुआ, यहां पूर्व अपकदशामें घट इयाम वर्णका था और अग्निके द्वारा पकनेसे रक्तपनेको प्राप्त हुआ, तो भी अर्थात् श्यामघटके रक्तता प्राप्त होनेपर भी वह घट अन्यपट वा अन्य पदार्थताको नहीं प्राप्त हुआ अर्थात् वर्णनामा गुणके भेदसे द्रव्यका भेद नहीं हुआ और यदि अभेदखभावसे द्रव्यगुण- पर्यायोंका व्यवहार न हो तो पूर्वकथित सुवर्ण घट आदिमें यह व्यवहार अर्थात् लोक प्रसिद्ध आचार नहीं घट सकता है । इसलिये द्रव्य आदि तीनों पदार्थ अर्थात् द्रव्य, गुण और पर्याय ये अभिन्नरूप ही कल्पित किये जाते हैं इनके जुदे २ तीन नाम होनेसे यह शंका न करनी चाहिये कि यह भिन्न हैं यह भाव है ॥ ३ ॥ पुनधिकं कथयति । फिर अभेद वादीके मतमें बाधकका कथन करते हैं । सूत्रम् । स्यात् स्कन्धदेशयोर्भेदात्स्कन्धेऽपि द्विगुणात्मता। प्रदेशगुरुताभावास्कन्धाभेदप्रयन्धता ॥४॥ सूत्रार्थः स्कंध तथा देशके भेदसे स्कंधमें द्विगुणता होनी चाहिये परंतु देशसे स्कंधमें अधिक गुरुता नहीं है, इस हेतुसे देशसे स्कंधका अभेदरूप ही प्रबन्ध है ॥ ४ ॥ 'व्याया। स्कन्धदेशयोर्भेदात् स्कन्धविपयेऽपि द्विगुणात्मता द्विगुणभायरोपो भवेत् । स्कन्धोऽवयवी, देशोऽवयवः अनयोभैदकल्पनया द्विगुणोभारः स्कन्धमध्ये भवन द्विघ्नःस्कन्धों भवेन् । यतः-शततन्तुपटे शततन्तुपु यावान् भारोऽस्ति तावानेव हि पटे भारो युज्यते तन्तुपटयोरभेदात् । भेदविचारे पटोऽन्यः तन्तवोऽन्ये एवमनयोर्भेदस्तस्मिन्सति द्विगुणगुरुतापि युक्ता । अथ च कश्चिन्नैयायिको नर्वीन एवं यदि कथयति । यतः-अवयवभारात् अवयवि- भारोऽत्यन्तं लघीयानति । तस्मात् तन्मते द्विप्रदेशादिस्कन्धमध्ये कुत्रापि उत्कृष्टगुरुत्वं नो भवितुर्महति द्विप्रदेशादिस्कन्ध एकप्रदेशाद्यपेक्षया अवयविधर्मत्वात् । अन्यच परमाणुमध्ये मान्योष्टगुरुत्वमाननात् रूपादिकविशेपोऽपि परमाणुमध्ये मान्यः स्यात् । द्विप्रदेशादिकमध्ये न मान्यः स्यात् । अभेदेन यस्य बन्धो यदा मन्यते सदा प्रदेशस्य यो भारः स एवं स्कन्धस्य भारत्वेन परिणमयत्येव । यथा नन्तुरूपं पटरूपतया परिणमति । तदा गुरुताया वृद्धश्च दोपः कथ्यमानोपि न लगेदिति भावः । ४।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् व्याख्यार्थ:-स्कंघ (अवयवी) तथा देश (अवयव ) का यथार्थमें भेद होनेसे स्कं- धके विषयमें द्विगुणरूपता होगी अर्थात् स्कंधमें दूना बोझ प्राप्त होगा यहाँपर सूत्रमें स्कंध- शब्दसे अवयवीरूप अर्थका ग्रहण है। और देशशब्दसे अवयवका इन दोनो अवयवी तथा अवयवोंकी भेदकल्पनासे अवयवीमें दूना बोझ होनेसे वह अवयवी अवयवोंकी अपेक्षा दूना बोझल होजावेगा क्योंकि सो तंतु (सूत) से चुने हुए वस्त्रमें उतना ही भार युक्त है, जितना कि उन सो तन्तुओंमें है। क्योंकि तंतु और पटके अभेद है, और यदि तंतु और पटके मेद विचारें, तो पट अन्य है तंतु अन्य हैं । इसप्रकार इन दोनोंका भेद होते हुए अवयवी पटमें दूना भारीपन भी होना उचित है। अब यहांपर यदि कोई नवीन नैया- यिक ऐसा कहता है, कि अवयवके भारसे अवयवीका भार बहुत हलका है, तो इस हेतुसे उसके मतमें दोप्रदेश युक्त अवयवीमें कहीं भी अवयवकी अपेक्षासे अधिक भारीपन न होना चाहिये, क्योंकि दोप्रदेश आदियुक्त स्कंधमें एक प्रदेश आदिकी अपेक्षासे अवयवी धर्मपना है, और एक प्रदेशवाले परमाणुमें दृष्टगुरुत्वकी अपेक्षा अधिक गुरुत्व माननेसे परमाणुमें रूपा- दिकी अधिकता भी मानी जायगी। और द्विप्रदेशादि स्कंधमें न मानी जायगी। और जब जिसका संबंध अभेदसे मानते हैं तो प्रदेश (अवयव )का जो भार है वह स्कंध (अवयवी )के भी भारपनेसे परिणत होता ही है । जैसे-तंतुका रूप पटरूपतासे परिणमनको प्राप्त होता है, अर्थात् जो तंतुका रूप है वह ही पटका रूप होता है; तब इसप्रकारसे गुरुता अथवा प्रदेश वृद्धिका जो दोष कहा हुआ है सो भी नहीं लग सका है। यह सूत्रका तात्पर्य है ॥ ४ ॥ अव जो द्रव्यादिकोके डॉभेद मानते हैं उनको उपालंभ देते हुए कहते हैं । सूत्रम् । चेगिन्नद्रव्यपर्यायमेकरूपं गृहादिकम् । भापसे न कथं द्रव्यं गुणपर्यायवत्तदा ॥५॥ सूत्रार्थः–यदि भिन्न द्रव्योंके पर्याय गृहादिकको एक रूप कहते हो तो द्रव्य गुण पर्यायोंवाला है ऐसा क्यों नहीं कहते १ ॥५॥ व्याख्यार्थ:-यदि भिन्न २ द्रव्योंके पर्याय रूप अर्थात् पापाण, काष्ट जल आदि जो भिन्न २ बहुतसे द्रव्य हैं, उनके पर्यायभूत गृह (घर) आदिको “यह घर एक रूप है" इमप्रकारकी युद्धिसे एक ही कहता है, तो द्रव्यको गुणपर्यायवाला क्यों नहीं कहता है अर्थात् एक द्रव्यमें गुण तया पर्यायका अभेद होय; ऐसा विवेक क्यों नहीं कहता है। क्योंकि जो आत्मा द्रव्य है वह ही आत्मारा ज्ञान आदि गुण है, और तापर्य यह है कि भवय मिसके अवयवी बनना है तो वह भायों से भिन्न इसमें अपनी सपा भपयकोरी पुरता (मारीन) मिला ला गया ।

द्रव्यानुयोगतर्कणा। देव नर आदि पर्याय हैं यह अनादि सिद्ध व्यवहार है जो द्रव्यादिकोंका अभेदभाव अंगी- कार तुम नहीं करते तो वह ठीक नहीं क्योंकि द्रव्योंमे अभेदता अवश्य ही है । यद्यपि द्रव्य, गुण और पर्याय ऐसे नाम पृथक् २ होनेके कारण द्रव्ये भिन्न है गुण भिन्न है, और पर्याय भी भिन्न ही है इस युक्तिसे भिन्नताका भान लक्षित (प्रतीत) होता है, तथापि द्रव्य घट है और गुणसे शुक्ल घट, नील घट रक्त घट या श्याम घर है तथा पर्यायसे विशाल आकारमें परिणत शंसके तुल्य ग्रीवासहित और महान् उदरवाला यह घद है इत्यादि गुण तथा पयायोंसे घट भिन्न नहीं है ॥ ५ ॥ अर्थ द्रव्यादीनामभेदं येऽङ्गीकुर्वन्ति तान् उपालम्भं ददन्नाह । व्याख्या । यद्यपि भिन्नद्रव्यपर्यायं पापाणकाप्टजलादिकानि द्रव्याणि बहूनि तेषां पयायं गृहादिकं भवनादिकमेकरूपमेतगृहमित्याकारिकया बुद्ध्या एकमेव भापते तर्हि द्रव्यं कथं गुणपर्यायवन्न भापते । एकस्मिन् द्रव्ये गुणपर्याययोरभेदो भवेत् । एतादृशं विवेक कथं न कथयसि । यत आत्मद्रव्यं यदसि स एवात्मगुणः स एवात्मपर्यायश्चेतीदृशव्यवहारोनादि- सिद्धो वर्तते । यस्माद्रव्यादीनामभेदभावं नाङ्गीकुरुपे तदसत् । एतेपामभेदता एव वर्तते । यद्यपि द्रव्यं भिन्नं गुणो भिन्नः पर्यायोपि भिन्न एव द्रव्यगुणपर्यायनामत्वात् इति युक्त्या भिन्नताभानं लक्ष्यते तथापि द्रव्यं घटः गुणेन शुल्ठो घटो नीलो घटो रत्तो पटः । श्यामो वा पर्यायेण पृथुबुनाशकारपरिणतः कम्बुप्रीवः पेटोदरः द्रव्यादिगुणपर्यायाभ्यां घटो भिन्नो नास्ति ॥५॥ सत्रम्। नियतव्यवहारं यद्रव्यं तद्नयोः सतोः । परिणयेकरूपत्वाचन वैकप्रकारकाः॥६॥ सूत्रभावार्थ:-जो द्रव्य यह नियतव्यवहार होता है वह इन दोनोंके विद्यमान होनेपर होता है, तथा परिणाममें तीनोंकी एकरूपता होनेसे द्रव्य, गुण और पर्याय तीनों एक ही प्रकार के अर्थात् एक ही हैं ॥ ६॥ प्याश्या । यजीवद्रग्रमजीवद्रव्यमित्यादिनियतव्यवहारं द्रव्य व्यवस्थासहितव्यबहारो भवति । तद्गुणपर्याययोरभेदात् सनोविद्यमानयोरनयोर्मवेन् । यथा ज्ञानादिगुणपर्यायेभ्यो- ऽभिन्नो जीवः । रूपादिगुणपर्यायेभ्योऽमिन्नोऽजीवति यदित्यं न स्यात्तदा द्रव्यात्सा. मान्यान् विशेपसंज्ञा न भवेत् । अतः कारणात् द्रव्य १ गुण २ पर्यायाः ३ इति नामत्रयम्। परन्तु स्वजासाहोकत्वव्यवहार एव त्रिपु तिष्ठति परिणत्येकरूपत्वान् परिगमनं यथात्मद्रव्ये तस्य च ज्ञानादिगुणाः परिणामिवस्तुपु तेषां पर्याया एनत्सर्वमपि एकमेति यतो रनं १ वर कान्तिः २ ज्वरापहारलक्षणा सच्छक्तिः ३ एतश्यमपिपरिणत्येकरूपत्वम् । वथैव द्रव्य १ गुण २पर्याय ३ इत्येकरूपत्वमेव तस्मात्परिणत्येकरूपत्वात् द्रव्यादय एकप्रकारकास्त्रयः।।६।। घ्याख्यार्थः-जो जीव द्रव्य, अजीव द्रव्य, इत्यादि नियत व्यवहार अर्थात् द्रव्य, १ यह पाठ भापायी पी कमी भूतमे दिया गग है। पाठा पानने पर, ३४ रायचन्दजैनशास्त्रमालायाम् इस प्रकार व्यवस्थासहित व्यवहार होता है, वह गुण और पर्यायोंके अभेदसे है इस कारण इन गुण पर्ययोंके विद्यमान होनेपर ही होते हैं। जैसे ज्ञानादि गुण पर्यायोंसे अभिन्न जीव है और रूपादि गुण पर्यायोंसे अभिन्न अजीव द्रव्य है । यदि ऐसा न होवे तो गुण पर्यायोंसे रहित सामान्य द्रव्यसे मनुष्य जीव, देवजीव, मुक्तजीव, तथा रक्त घट पीत घट इत्यादि विशेषसंज्ञा न होवें । इस कारणसे द्रव्य, गुण, पर्याय यह तीन नाम है, परन्तु व स्वभाव आदि एकपनेका व्यवहार ही तीनोंमें रहता है क्योंकि परिणतिमें एकरूप है । परिणमन जैसे आत्मा द्रव्य है उसके ज्ञानादि गुण परिणाम है यहां ज्ञानादि गुणसहित द्रव्यमें ही आत्मा यह व्यवहार होता है और ऐसे ही परिणामी वस्तुओंमें उनके जो पर्याय हैं उन पयायोंसे युक्त द्रव्य व्यवहार होता है, यह सब एक ही है । क्योंकि रन, उसकी कान्ति तथा ज्वरको नाश करनेवाली उसकी शक्ति यह तीनों भी परिणतिमें एक रूप है । उस ही प्रकार द्रव्य गुण तथा पर्याय यह एकरूप उससे ही हैं अर्थात् परिणतिमें. एक रूप होनेसे द्रव्यादिक तीनों एक प्रकारवाले हैं ॥ ६ ॥ पुनरभेदं नागीकुर्वन्ति । तेषु एवं दोपसम्भवमाह । फिर भी जो अभेदको नहीं मानते हैं उनमें ही दोपकी उत्पत्तिको कहते हैं । सूत्रम् । न घेतेपां यदाभेदस्तदा कार्य कुतो भवेत् । नोत्पद्यते यसबस्तु शशारंगवदुचकैः । सूत्रभावार्थ:-~-यदि इन द्रव्यादिकोंका भभेद नहीं है तो इनसे कार्य कैसे होता है क्योंकि जैसे सुसेके (खाँशके) सांग उत्पन्न नहीं होता है वैसे असत् पदार्थ उत्पन्न नहीं होना चाहिये ॥ ७॥ घ्यास्या । यदि एतेषां द्रव्यादीनामभेदो न तदा कार्य पुनो भवेत् । अपि तु द्रव्यगुण. पर्यायाणामभेदो नाम्नि । तदा फारणकार्ययोगपि अभेदोन भवन् । गदा च मृत्तिका. दिकारणेभ्यो घटादिकार्य कथं निजलने कारणे कार्यशको गत्यामय कार्यात्पत्तिनिया. मकत्वगसविरामानं यस्तु न निप्पयते निधन राशगवन् । यया दाराविषाणमिय. सद्वस्तु असत्परिणतितत्त्वान् फार्थ निप्पत्त्यभाव एव दृश्यते अयमत्र मारः। यदि कारण. मध्ये फार्यसत्ताङ्गीक्रियते । तदा अभेदः सहजमेर आगातः ॥ ७ ॥ च्याख्यार्य:-यदि इन द्रव्य, गुण तथा पर्यायों का अभेद नहीं है तो कार्य कसे उत्पन होता है अर्थात् अमेदके पिना कारणसे कार्य नहीं हो सकता, और यदि द्रण गुण तया पर्यापोंका भेद नहीं है, तो कारण कार्यका भी अभेद न होना चाहिये । और जय कारण कार्यका अभान हुआ तो गृत्तिकादिरूा फारणोंमे पट आदि कार्य से उत्तर होंगे क्योंकि कारणमें कार्य गतिकी गता ही कार्यकी उसतिमें नियानिकायोंकि जो पदार्य जी गनियमान है वहांगे या पदाधं कदापि उत्पन्न नहीं हो सकता द्रव्यानुयोगतर्कणा। निश्चय है । शशशृंगके समान । जैसे शश (सर्गोश)का सींग यह असत् (अविद्यमान) वस्तु है क्योंकि असत् परिणतिपना है, अर्थात् शशरूप कारणमें सींगरूप कार्यकी शक्ति नहीं है । इससे शशसींगरूप कार्यकी उत्पत्तिका अभाव ही देखा जाता है । यहांपर आशय यह है कि यदि कारणमें कार्यकी विद्यमानता स्वीकार करते हो तब तो कार्य- कारणका अभेद सहजमें ही प्राप्त हुआ अर्थात् कार्य अपने प्रकट होनेके पूर्व कारणरूपसे ही था और उत्पन्न होनेपर भी केवल उस द्रव्यका पर्यायमात्र होगया, यथार्थमे वह कार- णसे अभिन्नरूप ही है । जैसे घट आदि कार्य मृत्तिकासे उत्पन्न होते हैं तो भी मृत्ति- कासे भिन्न नहीं है ॥ ७॥ कारणे कार्योत्पत्तिक्षणात्पूर्वमेव यदि कार्यसत्तास्ति । तदा कार्यदर्शनं कथं न जायते । इत्थं शङ्का समुत्पन्ना तदुपरि कथयति । अब यदि कारणमें कार्यके उत्पत्तिक्षणके पूर्व भी कार्य विद्यमान है, तो मृत्तिका आदि कारणमे घट आदि कार्य क्यों नहीं दीख पडते। ऐसी शंका वादीके उत्पन्न हुई उसपर यह आगेका सूत्र कहते हैं- शङ्कापनोदं करोति । अय अग्रिम काव्यसे शकाको दूर करते हैं। सूत्रम् । द्रव्यरूपा तिरोभावाच्छक्तिः कार्यस्य या सती। गुणपर्याययोराविर्भावात्सा व्यक्तितां ब्रजेत् ॥ ८॥ सूत्रभावार्थ:-कार्यके कारणमें तिरोभावसे जो द्रव्यरूप शक्ति विद्यमान रहती है वह गुण और पर्यायके आविर्भावसे प्रकटताको प्राप्त होती है ॥ ८ ॥ व्याख्या । कार्य यावन्नोत्पन्नं तावत्कारणे कार्यस्य द्रव्यरूपा तिरोभावादन्तर्गतत्वाद्याच कार्यत्वेनालक्ष्या शक्तिः सती विद्यमाना तिष्ठति । सा च शक्तिः सालसामग्रीसान्निभ्यो. पगता गुणपर्याययोगविर्भावात्प्रकटनाद्वयक्तितामाविर्भावतां व्रजेत् । तस्मादत्र कार्य दृश्यते । तिरोभावाविर्भावावपि नियामको कार्यपयायो विशेषत्वेन नयाः । तेनाविर्भावस्य मदसद्वि- कल्पदूपणं न लगति । परन्त्यनुभवानुसारित्वेन पर्यायकल्पना । अथ च कार्यस्य घटव तिरोभावाददर्शनाद्रव्यरूपा मृत्पिण्डरूपा या शक्तिः सती विद्यमाना विष्ठति सा सामान्य- शक्तिराविर्भावात्कारणकलापाद्गुणपर्याययोः रक्तत्वष्टधुदुन्नत्वकम्युप्रीवत्यादिकयोः । रक्तोऽयं घटो योऽयं मृत्पिण्डात्समुत्पन्न इति कार्यादेशेन रको घट इति जावः । कारणे कार्या. पचारादित्यर्थः ।। ८॥ व्याख्यार्थ:-कार्य जबतक उत्पन्न नहीं हुआ तबतक कारणमें कार्यके छिप रहनेसे 1 यद्यपि पारण में कार्य है तथापि दिन पायोने पर प्रश्न होता है उनके पिना उप पटना नही होती इस कारण मृतिमा पिग्द, घटपी द्रव्यरूपताकी विधमानता होनेपर भी उभार, चार आदि गाम प्राधि प्रदता नहीं होती. २"य"दीपा मम्मी.

। रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् जो कार्यपने करके नहीं देखने में आती हुई द्रव्यरूप शक्ति विद्यमान रहती है वह ही शक्ति जब सम्पूर्ण सामग्रीकी समीपताको प्राप्त होती है तब गुण और पर्यायके प्रकट होनेसे स्वयं भी प्रकाशित होती है उससे यहां कार्य देखा जाता है यहांपर तिरोभाव तथा आविर्भा- वोंको भी कार्य के पर्यायकी समानतासे नियामक समझने चाहिये क्योंकि इस प्रकार आ. विर्मावके सत् तथा असत्पक्षके विकलोंसे जो दूपण लगता है वह नहीं लगता परन्तु आविर्भाव तथा तिरोभावमें अनुभवके अनुसार पर्यायकी कल्पना की गई है । भावार्थ- घट रूप कार्यके न देख पडनेसे द्रव्यरूप अर्थात् मृत्तिकाके पिण्डरूप जो शक्ति विद्यमान रहती है वह ही सामान्यशक्ति कुंभकार चाक दण्ड चीवर (चाकपरसे घटके उतारनेका धागा) आदि कारणों के समूहसे रकत्व आदि गुण और पृथुयुध्नत्व, कम्युग्रीवत्वादि पर्या- योंमें प्रकट होती है तब यह घट रक (लाल) है जो कि मृत्तिकाके पिण्डसे उत्पत हुआ है इस प्रकार कार्यके आदेशसे रक्त घट है ऐसा व्यवहार हुभा क्योंकि कोरणमें कार्यका उपचार है ॥ ८॥ अथ शोकद्वयन नैयायिकमतं प्रकटयित्या समाधत्ते । भर दो लोकोंके द्वारा नैयायिकका मत प्रकट करके उसका समाधान करते हैं। रत्रम् । नैयायिकोऽसतो ज्ञानमतीतविपयं भवेत् । यथा तथाऽसतः कार्यमपि निप्पद्यते ध्रुवम् ॥१॥ इत्यमाह मृपा तचासद्भूतयिषयं न हि । पर्यायातयानित्यं नित्यं द्रव्यार्थिफेनयत् ॥ १० ॥ युग्मम् सूत्रभावार्थ:-जैसे अरान (अविधमान ) घट आदिका ज्ञान अतीत मार्थात् भूत- पदार्थ के विषयवाला होता है उस ही प्रकार अविधमान पटआदि कार्य भी निश्चय करके उत्पन्न होता है ॥ ९॥ ऐसा जो नैयायिक कहना है यह मिया विपयघटादि असन् नहीं है क्योंकि जो पर्यायार्षिक नपसे अनित्य है वह यायिक नयस नित्य॥१०॥ युग्मम् । क्योंकि भूत.

द्रव्यानुयोगतर्कणा। ३७ चक्षुरादि तन गौरवं न घटते ॥९॥ नैयायिकोऽसतो द्रव्यात् उत्पत्तिरित्थमाह । तदसन् । किं ताहि । अतीतविपयो घटादिः सर्वथासन्न विद्यते । तच. पर्यायार्थतो घटो नालि तत्र द्रव्यार्थतो नित्योऽस्ति । नष्टो घटोऽपि मृत्तिकारूपोऽस्ति । यदि सर्वथा न भवेत्ताह शशश. द्गमाधयं लभेत् । तथा च-सर्वथासन्नों जाने भासते यः स कथं सद्रूपतां यातीति विरोधापत्तेः । तम्मायत्किञ्चिनविषयमस्ति तदसन्नास्ति । किन्तु सन्नेव प्रवर्तते । तत्रेयं योजना यद्वस्तु नित्यं द्रव्याधिकन वर्तते । तत् पर्यायार्थतया कृत्यभावेनानियं भासते। परमार्थतस्तु द्रव्यसमवायि भूतविषय वस्तु कारणोदयेन कार्यतामापन्नं लक्ष्यं जायते । अतः सत एवोत्पतिनासतो भावस्येति नियम इति ॥ १० ॥ व्याख्यार्थ:-जैसे असत् अर्थात् अविद्यमान घटादि पदार्थोंका ज्ञान अतीत विषय अर्थात् भूत पदार्यके विषयवाला होता है वैसे ही असत् अर्थात् कारणमें अविद्यमान ही घट आदि कार्य मृत्तिका तथा कुम्भकार आदिक सामग्रीके समूहसे उत्पन्न होता है क्योंकि जब असत् पदार्थका ज्ञान होता है तो अविद्यमान पदार्थकी उत्पत्ति कैसे नहीं होती है अर्थात् होती ही है और जो हम दण्ड आदिकको घटका कारण कहते हैं इसमें लाघर है और आप जैनियों के मतमें दण्ड आदिक ही घटकी प्रकटताका कारण है उसमें गौरव होता है और घटकी प्रकटताका कारण तो नेत्र आदिक इन्द्रिय है परंतु दण्ड आदिक नहीं । इसलिये कारणसे कार्यका भेद जो हम मानते है सो ही सत्य है तथा द्रव्यरूप घटकी अभिव्यक्तिका कारण दण्डका अभाव है न कि दण्ड, और घटके प्रकट होनेमें नेत्र आदिकको जो कारण माना है सो गौरवको नहीं घटित करता है ।। ९ ।। नैया- यिक असत् घट आदि कार्यकी द्रव्यसे उत्पत्ति कहता है वह असत्य है । तो सत्य क्या है इस जिज्ञासामें कहते है कि अतीत विषयवाला घट आदि सर्वथा असत् नहीं क्योंकि वह अतीत विषयवाला पट पर्यायार्थनयसे नहीं है परन्तु द्रव्यार्थिक नयसे उसमें नित्य है भावार्थ घट नष्ट होगया है तोभी मृत्तिकारूपसे विद्यमान है यदि यह घट सर्वथा न होये तो सुस्सेके सींगकी समताको प्राप्त होजाय और जो सांधा अविद्यामान पदार्थ ज्ञानमें मासता है वह पदार्थ विद्यमानताको कैसे प्राप्त होता है क्योंकि इस प्रकार माननेमें विरोध आता है इसलिये जो कुछ भूत विषय है वह सर्वथा असत् नहीं है किन्तु सद्रूप होकर ही प्रवर्तता है यहां पर यह योजना करनी चाहिये की जो वस्तु द्रव्याधिक नयसे नित्य वर्तती है उस वस्तु में ‘आकारका अभाव होनेसे पर्यायार्थनयसे अनिल्पना भासता है और परमार्थसे तो द्रव्यमे समवायी भूतविपय पदार्थ है सो कारणके उदय होनेसे कार्यपनेको प्राप्त होकर देखनेमे आता है इस कारण सत् पदार्थकी ही उत्पत्ति १ दइ आदिके न होनेपर भी घट आदि पदार्थोकी अभिव्यक्ति होती है इसलियै दण्टके अभावको अभि. व्यक्ति कारण बहा है, , ३८ रायचन्द्रजेनशासमालायाम होती है और अविद्यमान पदार्थकी नहीं होती ऐसा नियम है ॥ १० ॥ इस प्रकारका युग्म श्लोकोंका अर्थ है। अथ सर्वथा अविद्यमानोऽथों ज्ञानविपये भासत इतीत्थं ये कथयन्ति। तेषां वाधकं दर्शयति। अब जो ऐसा कहते हैं कि सर्वथा अविद्यमान पदार्थ ही ज्ञानमें भासता है उनके म. तमें बाधक दिखाते हैं सूत्रम् । अर्थासन भासते ज्ञातुस्तदाज्ञानमयं जगत् । स्वभावेन भवेत्सर्व योगाचारमतं भवेत् ॥११॥ सूत्रभावार्थ:- :-जब असत् पदार्थ ज्ञाताके ज्ञानमें भासता है तो सम्पूर्ण जगत् स्व. भावसे ज्ञानरूप ही हो जाय और तर तृतीय वौद्ध योगाचारका मत सिद्ध होनावे ॥११॥ घ्याल्या । यदि ज्ञानविषयेऽसन्नर्थोऽतीतप्रमुखो भासत इतीहशमङ्गीकुरुपे । तदा सर्व जगज्ज्ञानाकारमेवास्ति । याह्याकारा अनाद्यविद्यावासनया असन्त एवावभासन्ते । यथा सप्नेऽ- सत्पदार्थभासनवत् । वाह्याकाररहितं शुद्धं ज्ञानन्तु युद्धस्यैव भवति । एवं यदि कथयसि तहि योगाचारनामा तृतीयो बुद्ध उत्तिष्ठते । तस्मादेवं वितर्कय । असतो ज्ञानं न भवेत्सत एव वस्तुनतिरोभावशत्यन्तरितस्य कारणकलापाविर्भावव्यक्तेश्याकारत्वं जायते । इति सर्व- वस्तु द्रव्यात्मना नोत्पद्यते विपद्यते या परिस्फुटमन्यपदर्शनान् । सुनपुनर्जावनखादि- प्वन्वयदर्शनेन व्यभिचार इति न वाच्यम् । प्रमाणेन पाह्यमानस्यान्वयस्यापरिस्फुटत्वात् । न च वस्तुतोऽन्वयः प्रमाणविरुद्धः सत्यप्रत्यभिज्ञानसिद्धत्वात् । ततो द्रव्यात्मना स्थितिरेव सर्वस्य वस्तुनः । पर्यायात्मना तु सर्व वस्तूत्पाते विपद्यते चारसलितपर्यायानुभवसायान् । न चैवं शु श पीतादिपर्यायानुभवेन व्यभिचारसस्य स्सलनरूपत्वान् न सन्तु सोऽस्स. लनरूपो येन पूर्वाधारविनाशाजहदवृत्तीत्तराफारोत्पादाविष्कर्तुमशक्यत्वात् । नश्वरस्य नागे तद्धेतूनां वैयय न हि स्वहेतुः स एवामवान् । सभावे भाके भावान्तरल्यापारः फलवास्तदनु. परेतिप्रसक्तः ॥ ११ ॥ व्याख्यार्य:-यदि भूतकालविषयक पदार्थ ज्ञानमें असत् भासताहै इस प्रकार तू गा- नता है तो सब जगत् ज्ञानाकार ही होगा क्योंकि अनादिकालरो चली जाती हुई भविद्याकी वासनासे पाह्यके आकार जो जैसे खममें असत् पदार्थका भासन होता है वैसे ही जागृत दशामें भी अविद्यमान ही भासते हैं परन्तु वाद्य आकारसे शून्य गुद्धशान तो बुद्धके मतम ही है इसलिये ऐसा जो तुम कहते हो तो वौद्धमतके ४ भेदोंमें तीसरा जो योगाचार नामक भेद है उसका मत सडा होता है इस कारण ऐमा विनारो कि असन् पदार्थका भान नहीं होता किन्तु तिरोभाव शक्तिसे छिपे हुए सन् पदार्थकी कारणों के समूहमे प्रकटना होनेके कारण देसनेमें आनेयोग्य आकारपना उत्पन होता है। इन कारण द्रव्यरसमे १मिति पुभामेर पारः ।

द्रव्यानुयोगतर्कणा।
न तो सब पदार्थ उत्पन्न होते और न नाशको प्राप्त होते हैं क्योंकि प्रत्येक पर्यायमें द्रव्यका
अन्वय (संबंध) स्पष्टरीति से देखा जाता है और काटेहुए तथा फिर उत्पन्नहुए नख
आदिम जो असत् पदार्थका अन्वय देखते हैं उससे आपके मतमें व्यभिचार होगा
ऐसा कहना चाहिये क्योंकि जो अन्यय प्रमाणसे बाधित है वह अस्पष्ट है और वास्तवमें
अन्वय प्रमाणके विरुद्ध नहीं है क्योंकि सस्य प्रत्यभिज्ञानसे सिद्ध है इस कारण द्रव्यरूपसे
सब वस्तुकी विद्यमानता ही है न कि उत्पत्ति अथवा नाश तथा पर्यायरूपसे तो सब पदार्थ
उत्पन्न होता है और नाशको प्राप्त होता है क्योंकि जो पर्याय जिस द्रव्यमें सरूपसे
विद्यमान है उस पर्यायका ही अस्खलित (निश्चल)रूपसे अनुभव होताहै और ऐसे शुक्ल
शंखमें जो पीत आदि पर्यायोंका कामल आदि नेत्रके रोगोंके वशसे अनुभव होजाताहै
उससे व्यभिचार नहीं होता क्योंकि वह अनुभव स्खलनरूप (चलायमान) है भावार्थ ने-
के रोगसे शुक्लशंखमें पीत (पीले) वर्णका जो अनुभव होता है यह नेत्र रोगके दूर होने
पर आप ही चलायमान (नष्ट) होजाता है और शंखमें जो पीतादि पर्यायका अनुभव
है यह तो अस्खलन (अविचल ) रूप नहीं है अर्थात् विचलरूप है क्योंकि शंखमें
निर्दीप दशाम जो शुक्लाकार भासता है उसका विनाश तथा नेत्रके दोप दशामे
जो पीताकर भासता है उसकी उत्पत्ति आदि नहीं कर सकता, किन्तु दोष निवृत्त
होनेसे वह स्वयं नष्ट होजाता है और उसके नाशमे उसके हेतुओंकी व्यर्थता नहीं है,
क्योंकि जो कृत्रिम स्वभाव यस्तुमें प्राप्त है उसमें दूसरे पदार्थका व्यापार फलवान् नहीं
होता किन्तु जिस कारण (दोपादि)से वह उत्पन्न हुआ है उसकी निवृत्तिसे वह पर्याय
नष्ट होता है अन्यथा अनुपपत्ति है ॥ ११ ॥
अथ दृष्टान्तेन दृढयन्नाह ।
अब दृष्टान्तसे उक्त कथनको दृढ करते हुए कहते हैं ।
सत्रम् । ज्ञातोऽधुना मया कुम्भ इत्यतीतार्थता हि या।
वर्तमानस्य पर्यायात्सा भवेदर्तमानता ॥१२॥
सन्नभावार्थ: इस समय मैने भूत घटको जाना इस प्रकार जो अतीतार्थता हुई
है वह वर्तमानकी पर्यायसे वर्तमानता होती है ॥ १२ ॥
व्याख्या । यदि असतो ज्ञानं भवेत्तर्हि अधुना मया अतीतो घटो ज्ञात इत्याकारिका
प्रतीतिः कथं जायते । तत्र हि-अतीतो घटो मया सांप्रतं ज्ञात एवं यो बोधो जायते । तत्र
द्रव्यात्सतोऽतीतघटस्य विपये वर्तमानज्ञेयाकाररूपपर्यायादधुनातीतघटो ज्ञात इति ज्ञान-
भानतास्ति । अथवा भैगमनयादतीतार्थविषये वर्तमानार्थारोपः क्रियते । तस्मात्सर्वश्रासतो
वस्तुनो ज्ञानं न भवति । अधुना मया कुम्भो ज्ञान इत्यतीतार्थता हि यासीन् मातीतार्थवा
वर्तमानस्य पर्यायाद्वर्तमानता भवेत् ॥ १२॥

रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् . व्याख्यार्थ:-यदि सर्वथा असत् पदार्थका ज्ञान होवे तो इस समय मैने अतीत घट- को जाना इस आकारकी प्रतीति कैसे होती है। क्योंकि उस समयमें अतीत घटको मैने इस समय जाना इस प्रकार जो बोध होता है उसमें द्रव्यमे विद्यमान अतीत घटके विषयमें वर्तमान ज्ञेयके आकाररूप पर्यायसे इस समयभूत घटको जाना ऐसा ज्ञानका भान है। अथवा नैगमनयकी अपेक्षासे भूतपदार्थके विषयमें वर्तमान पदार्थका आरोप किया जाता है। इस कारण यह सिद्ध हुआ कि असत् पदार्थका ज्ञान सर्वथा नहीं होता है क्योंकि इस कालमें घटको मैने जाना ऐसे जो घटकी भूत पदार्थरूपता थी वह अतीतार्थता वर्त. मान द्रव्यका पर्याय होनेसे वर्तमानता होती है ॥ १२ ॥ फिर भेदभावना कहते हैं। सूत्रम् । घेद्धर्मेणासता धर्मी कालेऽप्यसति रोचते । तदा सदा शशशृङ्ख किन्न ज्ञापयसि द्रुतम् ॥१३॥ सूत्रार्थः यदि अतीत कालमें भूत घटरूप धर्मी अविद्यमान नाकारसे भासता है ऐसा तुमको रुचता है तो तुम सदा निःशङ्क (माङ्कारहित ) होकर मुस्सेके सींगको भी क्यों नहीं जनाते ॥ १३ ॥ प्यारया। धर्मी अतीतो घटोऽसता धर्मेणाविद्यमानाकारण अमति काले अतीते फाले पटा- भावकालऽपि सदिति भासते । अथवा धर्मी अतीतो घटः असता धर्मेण याकारण अमति फाले भासते । इत्थं यदि सब चेतसि रोचते वत्सर्वमतीतानागतवर्तमानकाले निर्भय- मष्टशद्वारहितं यथा भवति तया शशशुगमपि कथं न शापयसि । एतदेव शापयतु- मिष्टमेवेति ॥ १३ ॥ च्याख्या:-धर्मी अर्थात् भूतकालका घट असत् धर्म भर्यान् भविद्यमान आकार रूपसे असत् काल अर्थात् पटाभावकालमें (विद्यमानरुपसे) भामता है । अथवा धी भूतपट भसन् धर्म अर्थात् अविद्यमान शेय आकारसे अविद्यमान कालमें भासता है ऐसा पक्ष यदि तुमरे चित्तमें रुचता है तो तुम निर्भय भर्यान नहीं देसनेमें भाते हुए पदार्थको हम कैसे जनाते हैं इस प्राकारकी शंकरहित जैसे होय से गदा मात् भूत भविष्यत् वर्तमानकालमें मविधमान मुसके मांगको भी क्यों नही जगाते हो क्योंकि जय तुमने मृत्तिकामे असत् घटफी उत्सरि तथा भूतकालके भगन् पटका मान मान लिया है तो भान् रामभंगको भी मिद करके जनादेना तुम्हारे एसी ॥ १३ ॥ यनम् । ततोऽसतो हिना चोधी नव जन्म न जायते। कार्यकारणयोरप द्रव्यादीनामपि अय ॥ १४ ॥ गुम्राट:-दस पूर्योल हेतुगे अमिपमान पदार्थमा ज्ञान नहीं rial, और ग उत्सति ही होता है इस कारण नुन कार्य, पारसी सभा बम, गुण, पाय एका सोमीनीवारकरी ॥११॥ F द्रव्यानुयोगतर्फणा। व्याख्या । हि निश्चितमसतोऽविद्यमानस्यार्थस्य नो बोधः । च पुनर्जन्माप्युत्पत्तिरपि न भवति । सत एव ज्ञानं सत एवोत्पत्तिरित्याशयः । एवमपि निश्चयेन कार्यकारणयोरभे. दोऽस्ति । तदृष्टान्तेन द्रव्यगुणपर्यायादीनामप्यभेदं श्रयाङ्गीकुरु ॥ १४ ॥ व्याख्यार्थ:- इस पूर्वोक्त कथनसे निश्चय कर अविद्यमान पदार्थका ज्ञान नहीं होता और अविद्यमान पदार्थकी उत्पत्ति भी नहीं होती अर्थात् विद्यमान पदार्थका ही ज्ञान और उसकी ही उत्पत्ति होती है, यह आशय है । इस प्रकार भी निश्चयसे कार्य और कारणका अभेद है। उसी दृष्टान्तसे तुम द्रव्य गुण तथा पर्याय आदिके भी अभेदको स्वीकार करो सूत्रम् । नैयायिको भेदनयं प्रकाशते । साड योऽप्यभेदं प्रकटीकरोति वै॥ विस्तारयन् जैनवरो द्वयं स्वयं । प्राप्नोति सर्वत्र जयं सुनिर्भयम् ॥ १५॥ सूत्रार्थ:-नैयायिक द्रव्य आदिके सर्वथा भेदको प्रकाशित करता है, और सांख्य- चादी निश्चयकर अभेदको प्रकट करता है और जैनियोंमें श्रेष्ठ पुरुप अथवा श्रेष्ठ जैनमत तो अपेक्षासे भेद तथा अभेदको स्वयं निर्भय होके विस्तारता हुआ सब वादियोमें जयको प्राप्त होता है ।। १५॥ व्याख्या । नैयायिको द्रव्यादीनां भेदमगीकुरते । यत उत्पन्नं द्रव्यं क्षणमगुणं तिष्ठनीति क्षणेन गुणानां पृथगुत्पादात्। द्रव्यं हि तावनिर्गुणमुत्पद्यते, पश्चात्तत्समवेता गुणा उत्पद्यन्ते, समकालोत्पत्तौ तु गुणगुणिनोः समानसामग्रीकत्वा दो न स्यात्कारणभेदस्य कार्यभेदनिय- तत्वादिति भेदे नयं नैयायिको वक्ति । साङ्घयोऽपि द्रव्यादीनामभेदमङ्गीकरोति । यवो गुण- गुणिनोः समानकालीनं जन्म सव्येतरविषाणवत्पौर्वापर्याभावात् । न हि स एव तस्यैव पूर्वभावी पश्चाद्भावी च भवति । अतो यदैव द्रव्यं जायते तदैव तद्गतरूपादयोऽपि जायन्त इति द्रव्यादीनां साक्ष्यमतेऽभेदता । जैनस्तु, द्रव्यादीनां भेदमपि द्रव्यगुणपर्यायत्वाद- भेदमपि । द्रव्यं तदेव गुणस्तदेव पर्यायः यथा घटः द्रव्येण मृद्गुणेन रफैः, पर्यायेण कम्यु- ग्रीवः, इत्यभेद इत्येतद्वयमप्यङ्गीकुर्वाणः सर्वत्र जयं प्रामोति । उक्तं च--- अन्योऽन्यपक्षप्रतिपक्षभावाद्यथा परे मत्सरिणः प्रवादाः । नयानशेपानविशेपमिच्छन्न पक्षपाती समयस्तथा ते ॥ १ ॥ . तथा य एव दोपाः किल नित्यवादे विनाशवादेऽपि समास्त एन । परस्परध्वंसिपु कण्टकेपु जयत्यधृष्य जिनशासनं ते ।।२।। तस्माद्भेदनयपक्षस्याभिमानमभेदनयोऽपाकरोति । अथ नयद्वयवामिनं निर्दिशति ।बल- कार्य दृश्यत इति नैयायिकाभिमतम् । सदिति सांख्याभिमतम् । सदसदिति नलिर पक्षपातरहिवामिति ।। १५ ।। इति श्रीमोजविनिर्मितायां द्रध्यानुयोगसणायां तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ ६ A ४२. रायचन्द्रजैनशास्रमालायाम् : व्याख्यार्थः- नैयायिक द्रव्यादिक (द्रव्य, गुण, पर्याय) का भेद मानता है, क्योंकि " उत्पन्न हुभा द्रव्य क्षणभर गुणरहित रहता है" इस नैयायिकके कथनसे गुणोंकी उत्पत्ति भिन्न क्षणमें होती है। भावार्थ-नैयायिक ऐसा कहता है कि द्रव्य प्रथम निर्गुण उत्पन्न होता है फिर उसमें समवाय,सम्बन्धसे रहनेवाले गुण उत्पन्न होते है, समान काल (एक ही समय) में द्रव्य तथा गुणकी उत्पत्ति होनेपर तो समान सामग्रीके होनेसे गुण और गुणी (द्रव्य) का भेद न होवे क्योंकि कारणका भेद कार्यके भेदका नियामक होता है । अर्थात् कारणका भेद होनेसे कार्यका भेद अवश्य होता है यदि कारणका भेद न हो तो कार्यका भी भेद नहीं होता इसलिये जब गुण और गुणीकी सामग्री ही एक है तो उनका भेद न होगा । और सांख्य द्रव्य आदिका अभेद मानता है क्योंकि यह इसके पहले उत्पन्न हुआ यह इसके पीछे उत्पन्न हुआ इस प्रकारके पूर्वापरभावका अभाव होनेसे पशुके दक्षिण तथा वाम- साँगकी भांति गुण और गुणीकी उत्पत्ति एक समयमें होती है, और वह ही द्रव्य उसहीके पूर्वभावी तथा पश्चाद्भावी नहीं होता है । इसलिये जब द्रव्य उत्पन्न होता है तब ही उसमें प्राप्त रूपादिक • गुण भी उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार द्रव्य आदिकी सांख्यमतमे अभेदता है और जैन तो द्रव्य गुण तथा पर्यायपनेसे द्रव्य आदिके भेदको भी और अ-. भेदको भी मानते है और जो द्रव्य है वही गुण है, वही पर्याय है, जैसे कि घडा द्रव्यसे मृत्तिका है, गुणसे लालरंगका है, पर्यायसे शङ्खकीसी ग्रीवाका धारक है, इस प्रकार अभेद मानते हैं । ऐसे भेद अभेद इन दोनोंको स्वीकार करते हुए जैन तो सब जगह विजयको प्राप्त होते हैं। सो ही कहा है कि- हे जिनेंद्र जैसे अन्यमतावलम्बियोंके प्रवाद परस्पर 'पक्ष तथा प्रतिपक्षपनेसे ईके धारक हैं उस प्रकार सब मतोंको समानतासे चाहता हुआ आपका जिनशासन पक्षपाती नहीं है ॥१॥ (भावार्थ:--कोई सर्वथा भेद मानता है, कोई सर्वथा अभेद मानता है इस कारण दोनोंके सिद्धान्त परस्पर पीके धारक हैं। और अपेक्षासे भेद तथा अभेद इन. दोनोंको स्वीकार करनेवाला जैनसिद्धान्त दोनों वादियों को समान देखता है । किसीसे ईर्पा नहीं करता.) तथा और मी कहा है कि- जो दोष सर्वथा नित्यवादमें हैं वे ही सर्वथा एकान्त रूपसे भनित्यवादमें भी हैं, इसलिये परस्पर एक दूसरेके ध्वंस करनेवाले कंटक (कंटक तुल्यमतों) में अनेकान्तवादी होनेसे प्रबल भापका जिनशासन विजयको प्राप्त होता है। इसलिये सर्वथा भेदनय पक्षके अभिमानको अभेद नय दूर करता है । अब भेद तथा अभेदमतके सामीका नाम दिस. लाते हैं । कार्य असत् ( अविद्यमान ) दीसनेमें आता है और कार्य कारण तथा गुण- - + : द्रव्यानुयोगतर्कणा। '४३ गुणीका परस्पर भेद है, यह तो नैयायिकको इष्ट है । सत् कार्य देखनेमें आता है और कार्य कारण तथा गुणगुणीका सर्वथा अभेद है, यह सांख्यवादीको अभीष्ट है। और क- थंचित् सत् एवं कयंचित् असत् कार्य देखनेमें आता है तथा कार्य कारण और गुण गुणीका कथंचित् अभेद है, यह पक्षपात रहित मत जैनको अभीष्ट है ॥ १५ ॥ इति द्विवेद्युपनामकपण्डितठाकुरप्रसादवैयाकरणाचार्यप्रणीतभाष्यानुवादसमलङ्घतायां द्रव्यानुयोगतर्कणायां तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ व्या--अथ परवादी यक्ति द्रव्यादीनां भेदाभेदी द्वौ कथं मान्यौ स्त इत्याशतिते प्रत्यु- त्तरयन्नाह । अर्थ:-~अब अन्यमतावलम्बी वादी कहता है कि द्रव्यआदिकोंके भेद अभेद ये दोनों धर्म किस प्रकारसे मान्य है ऐसे आशङ्काके प्राप्त होनेपर वादीको प्रत्युत्तर देते हुए कहते है। सूत्रम् । भेदाभेदी कथं मान्यौ परस्परविरोधिनी कुत्राप्येकत्र न स्यातामन्धकारातपौ यथा ॥१॥ इस्थमाशङ्कितं शिष्यं गुरुराह जिनोक्तिभिः सर्वत्राप्यविरोधेन धमौ दावेकसंश्रयो ॥२॥ सूत्रार्थ:--हे गुरो ! जैसे कहीं भी अन्धकार और प्रकाश एक अधिकरणमे नहीं रहते है वैसे ही परस्पर विरोधके धारक भेद और अभेद ये दोनों एक वस्तुमें कैसे मान्य हो सकते हैं ॥ १॥ इस प्रकार आशङ्काको प्राप्त हुए शिप्यके प्रति श्रीगुरु महाराज श्रीजिनभगवानकी उक्तियों द्वारा कहते है कि हे शिष्य ! सब ही स्थान तथा वस्तुओमें एक द्रव्यमे रहनेवाले दोनो धर्म विरोधरहित है ॥२॥ व्याख्या । अहो भेदाभेदी कथं फेन प्रकारेण मान्यौ कीदृशौ नौ ,परस्परविरोधिनौ । यत्र भेदः स्यात्तत्राभेदो न यत्राभेदखत्र भेदो न इत्थमनयोरन्योऽन्यं विरोधोऽस्ति । द्वावेका न तिष्ठतः । यथान्धकारातपावप्येकत्र स्थायिनी कदापि न भवतस्तथैवैतावपीत्यर्थः । तथा चोकमाचाराने "वितिगित्थ समावनेणं अप्पाणणं न लभते समाहिंवि" तदर्थ शङ्कितं शिष्य गुरुः प्रवचनविच्छीस्याद्वादवाणीभिः कथयति स्म । अहो शिष्य यर्टस्य घटामावस्य च यद्यप्यन्योऽन्यं विरोधः सम्भाव्यते। परन्त्वनयोभेदाभेदयोः परस्पर विरोधो नास्ति । यतः कारणात्सर्वत्र स्थानेषु वस्तुपु च भेदाभेदलक्षण धर्मारविरोधेन विरोधाभावेन काश्रय- वृत्त्याश्रयायिभावेन च दृश्यते । अत उक्तमेकसंश्रयावकस्मिन्द्रव्ये संश्रय आधारो ययो- सावेकमंश्रयाविति । सत्सं तुल्यौ द्वौ सथाप्यभेदाख्यः स्वाभाविकस्सत्यः, पुनभेद उपाधिकोड- सत्यश्चत्थं शशितः कश्चित्कथयिष्यति तदा तदप्यसम्भवमनुभवगोचरं च न तत्कथ व्यवहारेण परापेक्षत्वं द्वयोरपि । गुणादीनां भेदः गुणादीनामभेदश्चेति वचनादविरोध एव भेदाभेदयो. रकन समाश्रितयोतिव्य इति ध्येयम् ।।

४४ - 1 रायचन्द्रजनशास्त्रमालायाम् व्याख्यार्थ:--परस्पर विरोधधारक भेद और अभेद ये दोनो धर्म द्रव्यादिको किस प्रकारसे मानने योग्य होवें क्योंकि जहां भेद हो वहां अभेद नहीं रहता है, ऐसे ही जहां जिस बस्तुका अभेद हो वहां भेद नहीं रहता है, इस प्रकार आपसमें विरोध है । इसलिये भेद और अभेद ये दोनो एक ही द्रव्यादिकमें नहीं रहते हैं । अर्थात् जैसे अन्धकार और प्रकाश एक जगह रहनेवाले कभी भी नहीं होते है वैसे ही ये भेद अभेद भी एक स्थल. में रहनेवाले नहीं हैं । और, वैसे ही आचाराङ्गमें कहा है कि "वितिगित्य समावनेणं अप्पाणेणं न लभते समाहिति" इस प्रकार शङ्काको प्राप्त हुए शिष्यको गुरु अर्थात् प्रवचनके ज्ञाता पुरुष श्रीस्याद्वादके वचनों द्वारा कहते भये कि अहो शिष्य ! यद्यपि घट और घटामावका परस्पर विरोध संभावित होता है । परन्तु इन भेद तथा अभेद रूप दोनो धोका परस्पर विरोध नहीं है। क्योंकि सब स्थानों में तथा वस्तुओं में भेद अभेदरूप दोनो धर्म विरोधरहिततासे तथा आश्रयायिभावसे देख पडते हैं। इस ही कारण मूल सूत्रमें "एकसंश्रयो" यह पद दिया है अर्थात् एक द्रव्यमें है संजय (आधार) जिनका ऐसे भेद और अभेद सर्वत्र विना किती विरोधके रहते हैं। "यह यद्यपि सत्य है कि भेद तथा अभेद ये दोनो तुल्य हैं,तथापि अभेद स्वाभाविक और सत्य है और भेद औपाधिक तथा असत्य है" इस प्रकार शङ्कित होके कोई कहेगा तो वह उसका कथन भी असम्भव है और अनुभवके गोचर नहीं है। सो कैसे कि व्यवहारसे दोनो ही परकी अपेक्षा करनेवाले हैं । उससे गुणादिकका भेद तथा गुणादिकका अभेद है इस वचनसे एक आश्रयमें रहनेवाले भेद तथा अभेदका अविरोध ही जानना चाहिये । ऐसा भाव है ॥२॥ व्या०-पुनर्विरोधमपाकुर्वन्नाह । अर्थ:-फिर भेद, अभेदके विरोधको दूर करते हुए कहते हैं । सूत्रम् ! एकत्र जनतारूढ्या यत्मत्यक्षेण लभ्यते । रूपादीनामिवतेषां भेदादि तत्कथं भ्रमः ॥ ३॥ . सूत्रार्थ: -जब एक घटादि द्रव्यमें लोकपिदित व्यवहारसे जो प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा- रूपादिकका भेद अभेद प्राप्त होता है तब इन द्रव्यआदिका भेद अभेद है, इसके माननेमें भ्रम कैसे होता है अर्थात् निरोध क्यों करते हो ॥ ३ ॥ व्याख्या। एकस्मिन् स्थाने घटादिद्रव्यविपये जनतारूया सर्वलोकविदितव्यवहारेण लोकसाक्षित्वेन या प्रत्यक्षप्रमाणेन रक्तत्वादिगुणपर्यायाणां यदाभेदत्वं लभ्यते तत्कयं भ्रम साभाविक अर्थात् सयविद तात्पर्य यह है कि मृतिका और पटमें अभेदतो सर्वसिद्ध है क्योंकि पट दशामें तथा उमके आगे पीछे भी गतिराही है मिलिये अभेद सामानि सर है। २ पटल उपारिसे उत्पन्न भेद औपाधिस (बनावटी) है मरिये अगर है। .

१५ दव्यानुयोगतर्कणा। इति । तेपो रूपादीनामिवैतेपां द्रव्यादीनामपि भेदादि वर्तते । तत्र विरोधः किमर्थ क्रियते । यथा रूपरसादीनामेकाश्रयवृत्तित्वानुभवाद्विरोधो न कथ्यते । तथैव द्रध्यादीनामपि भेदा- भेदयोरपि विरोधो न भवेत् । निश्चयेन ज्ञानं चक्षुपा विशृष्टं मुस्थमेव जायते । उक्त च-न हि प्रत्यक्षदृष्टेऽर्थे विरोधो नाम जायते। तथा प्रत्यक्षदृष्टार्थे दृष्टान्तस्याप्यमावतः उक्तंच-फेदमन्यत्र 'दृष्टत्वमहो निपुणता तव । दृष्टान्तं पठसे यत्त्वं प्रत्यक्षेऽप्यनुमानवत् ।। १ ॥ इति ॥ ३ ॥ व्याख्यार्थ:--एक स्थानमें अर्थात् घटादि द्रव्य विषे जनसमूहकी रूढिसे अर्थात् सब लोकके विदित व्यवहारसे अथवा सब लोकोकी'साक्षीसे प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा जब घटआदि द्रव्यमें रक्तवादि गुण पर्यायोंका भेद और अभेद उपलब्ध होता है, तब उनके विरोधके विषयमें भ्रम कैसे होता है । जैसे रूपआदिके भेद आदि हैं ऐसे ही इन द्रव्यगुणपर्यायके भी भेद अभेद हैं इसमें विरोध क्यों करते हो, जैसे एक घट अथवा भानके फल आदि अधिकरणमें अनुभवसिद्ध रूप रसआदिका भेद अभेद है वहांपर तुम विरोध नहीं कहते हो ऐसे ही द्रव्यपर्याय आदिके भेद अभेदका कोई विरोध नहीं हो सकता क्योंकि निश्चयकर नेत्रद्वारा विचाराहुआ अर्थात् देखा हुआ ज्ञान सत्य ही होता है ऐसा कहा भी है कि प्रत्यक्षसे देखेहुए पदार्थमे विरोध नहीं होता, और प्रत्यक्षसे दृष्टवस्तुमें दृष्टान्तका भी अभाव है क्योंकि ऐसा अन्यत्र कहां देखा है अहो, यह तुह्मारी निपुणता है कि प्रत्यक्षमें भी अनुमानकी भांति दृष्टान्तको मी पढते हो अर्थात् प्रत्यक्षरूपसे जो भेदाभेद दृष्ट है उस अनुभवको अनुमानके समान अन्धकार नया प्रकाशका दृष्टान्तद्वारा छिपाते हो ॥ ३ ॥ व्या०--अथ भेदाभेदयोः प्रत्यक्षस्याभिलापं पुगलद्रव्येण दर्शयन्नाह । अर्थ:--अब भेद अभेदके प्रत्यक्षका अमिलाप पुद्गल द्रव्यसे दर्शाते हुए कहते है। सूत्रम् । पूर्व इयामो घटः पश्चाझेदागक्तो भवन्स्वयम् । घटत्वेन विरोधित्वं नैव वक्ति कदाचन ॥४॥ सूत्रार्थ:-जो घट पूर्व अवस्था में श्याम पर्यायवाला है वही पश्चात् भेद स्वयं पर्याय युक्त होता हुभा घटत्वके साथ कभी विरोधपनेको नहीं कहता है ॥ ४ ॥ ध्याया। यो हि घटः पूर्वावस्थायां श्यामभावोऽति स एव घटः पश्यात्साकादिपरिणनः सन् स्वयमात्मना रक्तो रक्तवर्णो भवन् सन् भिन्नत्वेन व्यपदेश लमन्नपि पदत्वेन कालद्वये- ऽपि पूर्वावस्याश्यामरूपेण परावस्थारकरूपेण १ घटभावेन भेदाभेदी न कथयतीति । अतो घदत्वेन किनधित्वं पूर्व श्यामो य सब घटः पश्चाद्रकोजातः स पटो न इति विरोधिमान यक्ति । अर्थात् श्यामोऽपि घटः रत्तोऽपि घटा,,पटत्वेनाविरोप एव । कदाचन पूर्वपरपर्याय- गुणादानविभक्तोऽपि घटस्तु घट एव । एवं श्यामायस्थायां रफारस्यायामवस्याकृतभेदाट. मदो न जावनदात्र द्रव्यादीनां परस्परं भेदाभेदो मावधारय । घटदृष्टान्तन द्रव्यादीनामध्य- न्योन्यमक्यं विद्धि न कदापि भिन्नभायभानं जानीहि ॥ ४ ॥ रक्त - ४८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् और रक्त घट श्याम नहीं है इस प्रकार श्यामत्व तयारक्तत्व धर्मका भेद ज्ञानमें भासता है परन्तु श्यामत्व तथा रक्तत्वं दोनों दशामें वर्तमान धर्मी घटकी भिन्नता नहीं भासती ऐसा यदितुम प्रतिपादन करते हो अर्थात् धर्मके भेदसे धर्मीका भेद नहीं मानते हो तो जड और चेतन जो भिन्न धर्म हैं उनका धर्मी एक द्रव्य निश्चयसे होजायगा । कदाचित् कहो कि जड चेतनका जो भेद भासता है वहां जडत्व और चेतनस्व इन दोनों धर्मोका ही भेद है परन्तुं जड, चेतन द्रव्योंका भेद नहीं है इस प्रकार अवस्थासे धर्मीका प्रतियोगीरूपसे (अर्थात् जड चेतन नहीं है और चेतन जड नहीं है ) उल्लेख (कथन) करनेपर भी जड चेतन तथा श्याम और रक्त घट भी सदृश हैं और प्रत्यक्ष सिद्ध अर्थमें कोई वाधकका- प्रसंग भी नहीं होता क्योंकि अनुपलब्ध अर्थात् अनुभव प्रमाणसे अप्राप्तं वस्तु में न्याय . नहीं प्रवृत्त होता किन्तु संदिग्ध वस्तुमें न्यायकी प्रवृत्ति होती है ऐसा कहा है इस रीतिसे धर्मका भेद आपके अनुभवमे भासता है धर्मीका भेद तुम नहीं कहते हो तो भिन्न धर्मके धारक जड़ और चेतनका एक धर्मी प्राप्त होता है यह ही कारिकाका आशय है ।। ६॥ सूत्रम् । भेदाभेदी च तत्रापि दिशन् जैनो जयत्यलम् । रूपान्तरात्पृथग्रूपेऽप्यभेदो भुवि संभवेत् ॥७॥ सूत्रार्थ:-वहां भी भेद तथा अभेदका उपदेश करता हुआ जैनमत अतिशय करके सर्वोत्कृष्ट वर्तता है क्योंकि रूपान्तर अर्थात् द्रव्यरूपसे पृथक् जो जीवादि भासते है वहां भी संसारमें अभेदका संभव है ॥ ७ ॥ घ्याख्या। च पुनसजडचंतनयोर्मध्ये भेदाभेदी कथयन् जैन एव अलमत्यर्थ जयति सर्वोत्कृष्टत्वेन प्रवर्तते । कयं तद्यतो भिन्नरूपा ये जीवा जीवादयस्तेषु रूपान्तरद्रव्यत्वपदार्थ- त्वादिभ्यश्चाभेदोऽपि जगत्यायाति । एतावता. भेदाभेदयोः सर्वत्र व्यापकन्वं कथितम् । रूपान्तराद्रव्यत्वपदार्थत्वलक्षणाद्भिन्नरूपे जीवाजीवादिकेऽपि व्यापकत्वादभेदोऽपि भुवि जगत्यां संभवेदित्यर्थः ॥७॥ व्याख्यार्थ:--फिर जहां जड चेतनमें नैयायिक भेदमान कहता है वहां भी जड तथा चेतनके मध्य में भेद अभेद दोनोंको कहता हुआ जैनमत ही अतिशयकर सर्वोत्कृष्ट- पनेसे पता है सो कैसे कि मिल रूप से जीम अलीन मादिक हैं उनमें रूपान्तर द्रव्यत्व पदार्थत्व आदिसे भभेद मी जगत्में आता है इस कथनसे भेद अभेदके, सब जगह जब श्याम तथा रकइन अवस्थानोंच कयन होता है तर वहां "श्यामपटो रफो नाति" यामघट रक नहीं है और रफ होनेपर "रको परः श्यामो नाति" रफ पा श्याम नहीं है ऐया प्रतियोगीम्पसे धमा पटका भी मान होता है यह नयायिय आशय १ नेयाविरुध अभिप्राय यह है कि जर धर्मा मैद तय पमीका भेद अश्य है क्योंरि धमाके भदाई हो ममरा भेद है। - 1 month द्रव्यानुयोगतर्कणा। व्यापकत्व कहा अर्थात् तुम्हारे मतसे भिन्नरूप जीव पदार्थ है उनमें भी रूपान्तर अर्थात् द्रव्यत्व, पदार्थत्व लक्षणसे व्यापकता होनेके कारण जगत्में अभेद भी संभव होता है ऐसा अर्थ है भावार्थ-तुमने सर्वत्र धर्मभेदसे भेदको ही व्यापक कहा है परन्तु जीव और अजीव दोनों द्रव्य होनेसे द्रव्यत्वरूपसे हमारे मतमें जड चेतनमें भी अभेद व्यापक होनेसे विद्य- मान है यद्यपि जडत्व तथा चेतनत्व पर्यायरूपसे भिन्न है परन्तु उन ही दोनों में व्यापक द्रव्यत्वसे अभेद भी जगत्में संभव है ॥ ७ ॥ सूत्रम् । यस्यभेदोऽप्यभेदोऽपि रूपान्तरमुपेयुपः। एवं रूपान्तरोत्पन्नभेदाच्छतनयोद्यः ॥ ८॥ सूत्रभावार्थ:-जिस वस्तुका भेद भासता है उसी वस्तुका रूपान्तरको प्राप्त होते हुए अर्थात् भेदयुक्त वस्तु जब दूसरे स्वरूपमें परिवर्तित हो जाता है तब, उसीका अभेद भी हो जाता है एवं रूपान्तरसे अन्य रूपान्तरमें उत्पन्न भेद तथा पुनः उससे भी रूपान्तरमें अभेद इस रीतिसे अन्य अन्य उत्पन्न गुणपर्यायद्वारा जो भेदसे अभेद है उस- हीसे सैंकडों नयोंका उदय है ॥ ८॥ व्याख्या । यस्य वस्तुनो भेदस्तस्यैव रूपान्तरमुपेयुपः रूपान्तरसहितस्याभेदोऽपि भवे. यथा स्थासकोशकुशूलादयो घटस्य भेदाः सन्ति पुनस्त एव स्थासादयो मृद्रव्यविशिष्टानवि- स्वपर्याया अभेदा रूपान्तरसंयुक्तत्वादभेदाः, तेपामेव रूपान्तराद्भेदो भवेत् । यथा स्थास- कोशशूलादिपर्यायविशिष्टमृद्दव्यत्वेन तस्यैव भेदः। एवमस्य भेदस्याभेदोऽस्ति यः स एव शतसंख्यमूलनयाना हेतुरस्ति । यत्तु सप्तनयानां ये सप्तशतसंख्यामिता भेदा जायन्ते ते पानयैव रीत्या द्रव्यपर्यायस्यार्पणयानर्पणया च शतारनयचक्राध्ययनमध्यगताः पुरासन् । ते चाधुना द्वादशारनयचक्रमध्ये विधिधिर्विधिरित्यादिरीत्या एककस्मिन्नयान्तरे द्वादश द्वादश भेदाः समुद्भवन्ति । अतः सम्यगुरुपाठपठितपरिकलनाप्रसिद्धिमवधार्य भङ्गयोजना विधेये- त्यर्थः । यस्य भेदोऽस्ति तस्यैव रूपान्तरेणाभेदोऽप्यस्ति तस्यैव भेदःपुनस्तस्याभेद एवं शतनया- . वतारः॥८॥ च्याख्यार्य:-जिस वस्तुका तुमको वर्तमान पर्यायको लेके भेद भासता है वही वस्तु जय रूपान्तर सहित होजाती है तब उसका अभेद भी होजाता है जैसे निज निज पर्या- यसे योजित स्थास, फोश, तथा कुशूलआदि सब घटके भेद है पुनः वे ही स्थास कोश कुशूलआदि जच अपने २ पर्यायसे न योजित किये जाय अर्थात् पर्यायकी विवज्ञा न की जाय तो मृत्तिकारूप द्रव्यसहित होनेसे अथवा केवल मृत्तिकारूपकी विवक्षा १ पीयरूपसे शूल घटादिश भेद रहते मी व्यतरूप रायग्र अनुगत होनेसे कि दुशूलादिमें भेद नहीं है, नैयायिक भी पृथिवी जलादिके परस्पर भेद रइसे भी नी (.) दव्योगें द्रन्थत एक ही मानते हैं और प्रमेववादि भर्मगे तो पदार्यका अभेद मानते है।

. रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् करनेसे अमिन्नरूप हैं अर्थात् उनका भेद नहीं है क्योंकि अब रूपान्तरसंयुक्त होगये अब पुनः उनहीका रूपान्तर होनेसे पुनः भेद भी हो जाता है जैसे स्थास कोश कुशूल आदि पर्यायसहित मृत्तिकादव्यत्वसे उसीका भेद है इस प्रकार इस भेदका जो अभेद है वह ही अभेद शतसंख्याक (सौ १००) मूल नयोंका कारण है । और जो नैगम सङ्ग्रह आदि सात नयोंके सातसो (७००) भेद होते हैं वह सब भेद भी इसी रीतिसे द्रव्य पर्या- यके अर्पण तथा अनर्पणसे अर्थात् कदाचित् द्रव्यार्थिक योजनासे और कदाचित् उसकी मविवक्षा करके पर्यायकी योजनासे शतारनयचक्राध्ययनके मध्यगत पूर्वकालमें थे वे ही अब द्वादशारनयचक्रके मध्यमें "विधिविधिर्विधिः" इत्यादि रीतिसे एक एक नयके वीचमें बारह बारह भेद होते हैं इसलिये सम्यक् प्रफारसे कथित पाठमें पड़ी हुई संख्याफी प्रसिद्धिको अवधारण कर भंगोंकी योजना करनी चाहिये तात्पर्य यह कि जिसका पर्याय आदिकी अपेक्षासे भेद है उसका पुनः रूपान्तरमें प्राप्त होनेसे , अभेद और पुनः उस भेदका अभेद एवं शत (१००) नयका अवतार होता है ॥ ८ ॥ व्याख्या । अथ ते नयभेदाश्चिकीर्पिता अतस्तानेव दर्शयन्नाह । व्याख्यार्थ:-यहां उन नयोंके भेद करनेकी इच्छा करी इसलिये अब उन ही भेदोंको दर्शाते हुए अग्रिम सूत्र कहते हैं । सूत्रम्। तथा क्षेत्रादिभिः समभङ्गीकोटिः प्रजायते । संक्षेपादिह योधाय सप्तभङ्गी प्रतायते ॥९॥ सूत्रभावार्थ:-उसी प्रकार सप्तभंग भी क्षेत्र कालादिकी अपेक्षासे अवान्तर भेद प्रभेद आदिके निरूपणसे कोटि (करोड) भंग होजाते हैं परन्तु यहां संक्षेपसे घोष होनेकेलिये केवल सप्तमीका विस्तार करते हैं ॥ ९॥ व्याख्या । यथा द्रव्यादिविशेपेण भंगा जायन्ते तथैव क्षेत्रादिविशेषेणापि भंगा अनेके संभवन्ति । यतः स्वतो विवक्षितो घटो द्रव्यमस्यापेक्षया क्षेत्रादिषटः परदन्यमिति । एवं प्रत्येकं प्रत्येक सप्तभन्योऽपि कोटिशो निप्पद्यन्ते । तथापि लोकप्रसिद्ध्या यः कम्युग्रीवादि. पर्यायोपेतो घटो द्रव्यं वर्तते तस्यैव स्वतस्त्वमगीकृत्य स्वरूपेणासित्वं पररूपेण नास्तित्व. मित्यवधार्य सप्तमही व्याकुरुते । तथा हि स्वद्रव्यक्षेत्रकालभावापेझया पटोऽस्त्येव । १ । परद्रव्यक्षेत्रकालमावापेक्षया घटो नास्त्येव । २. एकदा युगपदुभवविवक्षया घटोऽवाच्य एव एकशब्देन पर्यायद्वयं मुख्यरूपेण वक्तुमशक्यत्वात् ।३। एकोऽनः स्वरूपेण विव- क्ष्यतेऽपरोऽशः पररूपेण विवक्ष्यते तदा अस्ति नास्ति घटः।४। एकोनः स्वरूपेणापरोऽशो युगपदुभयरूपेण विवक्ष्यते तदा घटोलि परमवाच्य इति ।५। एफॉश: पररूपणाप- रोऽशो युगपदुमयरूपेण विवश्यते तदा घटो नाम्यवाच्य इति । ६। एकोऽशः सरूपेणे. फाऽभाः पररूपेणैश्यांशो युगपदुमयरूपेण विवदयते तदा घटोऽनि नाम्न्यपान्य इति ॥ ७ ॥ १ यह "पान्तरयुज" इस पदमे दूसरे भागरमें परिणत होने ताप है। *- द्रव्यानुयोगतर्कणा। घटः स्यादस्त्येव । १ । स्थानास्त्येव । २ । स्यादवाच्य एव । ३ । स्वादस्त्येव स्यान्नास्त्येव ।४। स्यादवाच्य एव । ५ । स्थानास्त्येव स्यादवक्तव्य एव । ६। स्यादस्त्येव स्यान्नास्त्येव स्याद- वक्तव्य एवेति । ७ । इति प्रयोगः इति ॥९॥ व्याख्यार्थ:-जैसे द्रव्य पर्याय आदि विशेषसे भङ्ग होते हैं वैसे ही क्षेत्र काल आदि विशेषसे भी अनेक भङ्गोका संभव है क्योंकि स्वतः विवक्षित घट द्रव्य है इसी द्रव्य घटकी अपेक्षासे क्षेत्रआदिका घट परद्रव्य है ऐसे ही प्रत्येक प्रत्येक अर्थात् हर एकके प्रति सप्तभंगिये भी किरोडों सिद्ध होती हैं तथापि लोककी प्रसिद्धिसे जो कम्युग्रीवादि पर्यायसहित घटद्रव्य है उसी घटका खतस्त्व अर्थात् निजस्वरूप कालादि अङ्गीकार करके स्वरूपसे घटका अस्तित्व और पररूपसे घटका नास्तित्व है ऐसा निश्चय करके सप्तभंगोंका व्याख्यान करते हैं जैसे कि-अपने द्रव्य क्षेत्र काल भावकी अपेक्षासे "घटः अस्त्येव" घट है ही । १ । परके द्रव्य क्षेत्र काल तथा भावकी अपेक्षासे “घटः नास्ति एव" घट है ही नहीं । २ । और एक कालमें ही अस्ति तथा नास्ति की विवक्षासे घट अवाच्य ही है क्योंकि एक शब्दसे अस्ति नास्ति रूप दोनों पर्याय एक कालमें प्रधानतासे नहीं कहे जा सकते । ३ । तथा घटका एक अंश तो उसके निज स्वरूपआदिसे विवक्षित करते हैं और दूसरा अंश पररूपसे विवक्षित करते हैं तब "अस्ति नास्ति घट" अर्थात् घट है भी और नहीं भी है ऐसा चतुर्थ भंग होता है। ४ । तथा घटका एक अंश तो उसके सरूपसे विवक्षित करते हैं और अन्य अंश एक ही कालमें उभयरूपसे विवक्षित करते है तो "घटः अस्ति परन्तु अवाच्यः" अर्थात् घट है परन्तु वह अवाच्य है। इस पंचम भंगकी प्रवृत्ति होती है । ५। तथा एक अंश तो पररूपसे और एक अंश उभयरूपसे एक कालमें विवक्षित करते हैं "तो घटोनास्ति अवाच्यः" घट नहीं है और अवाच्य है इस छठे भंगकी प्रवृत्ति होती है । ६। और जब एक अंश तो घटका स्वरूपसे विवक्षित करते हैं और एक अंश पररूपसे विवक्षित करते हैं तथा एक अंश एककालमें अस्ति नास्ति इस उभयरूपसे विवक्षित करते है तब “घर्टः अस्ति नास्ति अवाच्या घट है नहीं है अवाच्य है यह सप्तम भंग होता है (७) अब सप्तभंगीका प्रयोग इस प्रकार है कि कथंचित् घट है ही।१ । कथंचित् (किसी अपेक्षासे) घट नहीं ही है। २ । किसी अपेक्षासे घट मवाच्य ही है । ३। किसी अपेक्षासे घट है ही १ अपने द्रव्य क्षेत्र काल भावसे। २ परके द्रव्य क्षेत्र काल भावसे। ३ कमन वा निरूपण करने के अयोग्य। एक वस्तुकी एक कालहीमें खरूपसे सत्ता और पररूपसे असत्ता प्रधानतासे कहनेको असमर्थ हैं इसलिये वह भवाच्य है। ४ खरूपसे अस्तित्व अस और पररूपसे नास्तित्व अंश कहने से यह चार भंग होता है। ५कहने के इष्ट । ६ निजरूपसे सत्ता मानकर भी अस्ति नास्ति इस उभयरूपसे अवाच्य है। ७ अन्य द्रव्य क्षेत्रादिसे पटका मसत्त्व और उभयरूपसे अवाच्य है इसलिये “स्यानास्ति अवाच्या" यह छठा भग है। निजद्रव्य क्षेत्रादिसे घटका सत्त्व परद्रव्य क्षेत्रादिसे असत्त्व तथा अस्ति नास्ति उभयरूपसे अवाच्य इस अभिप्लायसे यह सातवामग है।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् किसी अपेक्षासे नहीं ही है । ४ । कथंचित् घट है ही कथंचित् घट अवक्तव्य ही है । ५ । कथंचित् घट नहीं ही है कथंचित् अवक्तव्य ही है। ६ । तथा किसी अपेक्षासे घट है ही किसी अपेक्षासे है ही नहीं और कीसी अपेक्षासे अवक्तव्य ही है । ७ । ॥ ९ ॥ अथास्याः सप्तभङ्गया भेदाभेदी योजयति । अब इस सप्तभङ्गीके भेद तथा अभेदकी योजना करते हैं । सूत्रम् । पर्यायार्थनयाद्भिन्नं वस्तु द्रव्यार्थतोऽपृथक् । क्रमार्पितनयनन्दाद्भिन्नं चाभिन्नमेव तत् ॥१०॥ सूत्रार्थः-पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षासे संपूर्ण वस्तु भिन्न २ हैं और व्यार्थिक नयकी अपेक्षासे अभिन्न हैं तथा क्रमसे पर्यायार्थिक और द्रव्यार्थिक इन दोनों नयोंकी योजनासे कथंचित् भिन्न और कथंचित् अभिन्न ही हैं ॥ १० ॥ व्याख्या । पर्यायाथिकनयात्सर्व वस्तु द्रव्यगुणपर्यायलक्षणैः कथंचिद्भिन्नमसि । १ । द्रव्यार्थिकनयात्कथंचिदभिन्नमेव । गुणपर्यायौ हि द्रव्यस्यैवाविर्भावतिरोभावरूपावित्युक्त त्वात् । २ । अनुक्रमेण यदि द्रव्याधिकपर्यायाधिकयोरपणं क्रियते तदा कथंचिद्भिनं कथंचि. दभिन्नं च कथ्यते । ३॥ १०॥ व्याख्यार्यः-पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षासे द्रव्य गुण तथा पर्यायरूपसे संपूर्ण पदार्थ भिन्न हैं। १ । और द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षासे कथंचित् सत्र पदार्थ अभिन्न ही हैं क्योंकि गुण और पर्याय तो द्रव्य ही के आविर्भाव तथा तिरोभावरूप हैं ऐसा प्रथम कह चुके हैं । २ । और अनुक्रमसे यदि पर्यायार्थिक तथा द्रव्यार्थिक दोनों नयोंकी योजना करते हैं तो कथंचित् भिन्न अर्थात् पर्यायसे भिन्न और द्रव्यार्थिकरूपसे अभिन्न कहे जाते हैं ।। ३ ॥१०॥ सूत्रम् । यद्येकदोभयादानं तदावाच्यं भवेच तत् । एकदैवैकशब्देन नार्थदयप्रकाशनात् ।। ११ ॥ सूत्रार्थ:-और यदि एक समयमें ही पर्यायार्थिक तथा द्रव्यार्थिक दोनों नयोंका ग्रहण करें तो भवाच्य होता है क्योंकि एक शब्दसे एक ही क्षणमें दो विरुद्ध भयोंका प्रकाश नहीं हो सकता ॥ ११ ॥ व्याख्या । यद्येकवेलं नयद्वयार्थविवक्षा जायते । तदा त्ववाच्यमेव लभते । यत एकेन शब्देनकस्मिन् क्षणेऽर्थद्वयकथनासंभवान् । सांकेतिकदाब्देनकमेव संकेतरूपं निरूपणीयं स्यात्परन्तु रूपद्वयशब्दं फययितुमशक्य एव । पुप्पदन्तादिशब्दा अप्येकोक्या चन्द्रसूर्ययो- Wकिं वदन्ति परन्तु मिन्नोक्त्या फयितुमशक्या इह तूभयनयार्थी मुख्यतया भिग्नोक्त्या १ राप्तानां यास्यविशेगणां समाहार पति यातभनी अर्थात् सात प्रकारके भार अांत पापयोंका जो एकत्र समावेश है उस नाम सप्तमही है।

द्रव्यानुयोगतर्कणा। ५३ उच्चारयितुं योग्यौ तद्योग्यत्वं तु यत्नेनापि न भवति । तस्मादेकदा नयद्वयार्यविवक्ष्यावाच्य इति।४।॥ ११ ॥ व्याख्यार्थः यदि एक कालमें ही दोनो नयोंसे दोनों अर्थोकी विवक्षा उत्पन्न हो अर्थात् एक समयमें पर्यायार्थिक तथा द्रव्यार्षिक इन दोनों नयोंसे पर्याय तथा द्रव्य रूप दोनो अर्थोके कथनकी इच्छा हो तब तो पदार्थ अवक्तव्य दशाको ही प्राप्त होता है; क्योंकि एक शब्दसे एक ही क्षणमें द्रव्य पर्याय अथवा स्वरूप पररूपादि अर्थका कथन असंभव है सांकेतिक शब्दसे जो संकेतरूप एक अर्थ है वह ही उस शब्दसे निरूपणीय (कथनयोग्य ) होता है परन्तु दो अर्थरूप शब्दका तो कथन करनेको वह शब्द असमर्थ ही है और पुष्पदन्त आदि शब्द भी एक ही उक्तिसे अर्थात् समूहालम्बन ज्ञानसे सूर्य चन्द्रकी व्यक्तिको कहते हैं परन्तु मिन्न २ अर्थात् पृथक् २ सूर्य तथा चन्द्रादिरूप अर्थ कहनेको असमर्थ हैं अर्थात् पृथक् २ दो अर्थ एक शब्दसे एक ही क्षणमें कहनेको अशक्य हैं और यहां तो उभय अर्थात् पर्या- यार्थिक तथा द्रव्यार्थिक दोनों नयोंके प्रतिपाद्य पर्याय तथा द्रव्यरूप अर्थ मुख्यता (प्रधानता ) से भिन्न २ उक्तिसे उच्चारण करनेके योग्य हैं और एक ही कालमें उन दोनों अर्थोके उच्चारण करनेकी योग्यता तो यत्नसे भी नहीं होती इस कारणसे एक कालमें एक शब्दसे दो नयके अर्थकी विवक्षासे अवाच्य ही है। ४ । ॥ ११ ॥ अथ यश्चमभङ्गोलेसं करोति । अब पश्चम भंगका प्रतिपादन करते हैं। सूत्रम् । पर्यायार्थिकसंकल्पात्पश्चाद्वयधिवक्षितात् । भिन्नमवाच्यं वस्त्वेतत्स्यात्कारपदलाञ्छितम् ।। १२ ।। सूत्रभावार्थ: -~-प्रथम पर्यायार्थिक नयके संकल्प ( विवक्षा) करके पश्चात् दो- नोंकी विवक्षा होनेसे यह पदार्थ स्यात् कार इस पदसे चिन्हित अर्थात् स्यात् भिन्न है और स्यात् अभिन्न है अवाच्य है तात्पर्य यह कि प्रथम पर्यायार्थिक नयकी विवक्षा की और पश्चात् द्रव्यार्थिक पर्यायार्थिक इन दोनों नयोंकी विवक्षा की तब वह वस्तु पर्यायकी अपेक्षासे कथंचित् भिन्न है और उभय नयकी अपेक्षासे कथंचित् अवाच्य - प्यास्या । प्रथमं पर्यायार्थकल्पना तत एकदोभयनयार्पणं क्रियते तदा भिन्नमवक्तव्यमिति स्थात्कथंचिद्भिन्नमवक्तव्यमिति पञ्चमभदोल्लेखः ॥ १२ ॥ व्याख्यार्थ:-प्रथमतो पर्याय नयकी कल्पना की और उसके धनन्तर द्रव्यार्थिक 1 यह "स्यात्" शब्द संभावनार्धक पथचित् वाचक अव्यय है जिगके पूर्व यह लगाया जाता है उस यस्तुको किसी अपेक्षासे कहता है।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् तथा पर्यायार्थिक एतत् उभय नयकी विवक्षा की "तव स्यात् भिन्नं स्यात् अवक्तव्यं च" अर्थात् वस्तु कथंचित् भिन्न कथंचित् अवक्तव्य है यह पञ्चम भंगका वर्णन हुआ।५।।१२ अथ पाष्टमङ्गोल्लेखः। अव पष्ठ ६ भंगका प्रतिपादन करते हैं। सूत्रम् । . द्रव्यार्थेनोभयादानादभिन्नं तद्वाच्यकम् । युगपन्नयद्वयादानाद्भिन्नमभिन्नमवाच्यम् ॥ १३ ॥ सूत्रभावार्थ: :-प्रथम द्रव्यार्थिक नयकी कल्पना करके उसके साथ पश्चात् उभय नयकी योजना की "तब स्यात् अभिन्नः स्यात् अवक्तव्यः' अर्थात् कथंचित् अभिन्न और कथंचित् अवक्तव्य इस पष्ठ भंगकी प्रवृत्ति हुई और पुनः क्रमसे उभय नयकी विवक्षा की पश्चात् एक कालमें ही उभय नयकी विवक्षा की तब कथंचित् भिन्न, अभिन्न अवक्तव्य इस सप्तम भंगकी सिद्धि हुई ॥ १३ ॥ व्याख्या । तत्रादौ द्रव्यार्थिकनयकल्पना । तत एकदोभयनयार्पणं क्रियते । तदा कथं- चिनिन्नमवक्तव्यमिति कथ्यते । इति पष्ठः । पुनरनुक्रमेण प्रथमं द्रव्यार्थिकपर्यायाधिकेति नयद्वयकल्पना विधीयते । ततश्चैकदोभयनयार्पणं क्रियते तदा कथंचिदिन्नमभिन्नमव- कव्यमिति भंगः सप्तमः समुत्पद्यत इति ॥ ७ ॥१३॥ व्याख्यार्थ:- :--पष्ठ ६ भेगमें आदिमें केवल द्रव्यार्थिक नयकी विवक्षा की और उसके पश्चात् एक कालमें ही पर्यायार्थिक तथा द्रव्यार्थिक इन दोनों नयोंकी विवक्षा की तब कथंचित् अभिन्न तथा अवक्तव्य यह पष्ठ नय सिद्ध हुआ और प्रथम अनुक्रमसे पर्या- यार्थिक नयकी और उसके पश्चात् द्रव्यार्थिक नयकी विवक्षा की और पुनः एक समयमे ही द्रव्यार्थिक तथा पर्यायार्थिक दस उभय नयकी योजना की तव "स्यात् भिन्नम् अभिन्नम् भवक्तव्यं च" अर्थात् कथंचित् भिन्न कथंचित् अभिन्न और कथंचित् अवक्तव्य इस सप्तम भंगकी उत्पत्ति हुई । ७ ।। १३ ॥ सूत्रम् । इमां सप्तभङ्गी दृढाभ्यासयुक्तः सदा योऽभ्यसेत्तत्त्यदृष्ट्या विचार्य। क्रमाम्भोजसेवामवाप्याहती स भवेन्मुक्तियोग्योऽचिराद्भव्यजन्मा ॥ १४ ॥ सूत्रभावार्थ:-इस सप्तभंगी नयका जो मनुष्य दृढ भन्यासमें तत्पर होकर तत्त्व- दृष्टि से विचार करके सदा अभ्यास करेगा वह भव्य जन्मधारी प्राणी श्रीजिनभगवान्के चरणकमलकी सेवा भक्तिको पाकर शीघ्र मुक्तिके योग्य होगा ॥ १४ ॥ प्याख्या । एवमेका भेदपर्यायेऽभेदपोये च सप्तमगीयोजना फता पुनरित्यमेव सर्वत्र योजयितव्या । अथ शिष्यः प्रभयवि । यतः स्वामिन् यत्र नयद्वयविषयस्यैव विधारणा भवेत्तकस्य मुत्यभावेनापास गौणमायण सामग्री समुत्पद्यताम् परन्तु या प्रदेशप्रायका ।

५५ द्रव्यानुयोगतर्कणा। दिविचारेण सप्त ७ पट ६ पञ्च ५ प्रमुखनयानां भिन्न २ विचारा भवन्ति तत्र त्वधिकभङ्गा एव जायन्ते तदा सप्तभङ्गया नियमः कुत्र स्थिरो भवति । सप्तभङ्गीनियमस्त्वत एव निया- मको न दृश्यते । इति पृष्टो गुरुराह । भो शिष्य भवदुक्तं सत्यं परमार्थतस्तु । एवं यत्त्वया गौणमुख्यव्यवहारो दर्शितस्तत्र त्वेकस्यैव नयार्थस्य मुख्यतया विधिरन्येषां तु सर्वेपामेव निपेधः । एवं विधिनिषेधौ गृहीत्वाऽनेके भङ्गाः क्रियन्ते । अस्माभिस्तु इत्थं ज्ञायते । उक्तं च सकलनयार्थप्रतिपादकतापर्यायाधिकरणं वाक्यं प्रमाणवाक्यमिति । एतल्लक्षणत्वात्तादृशे स्थाने स्यात्कारपदलाञ्छितसकलनयार्थसमूहालम्बनमेकस्मिन् भङ्गेऽपि निपिद्धं नास्ति तस्माब्यवनपर्यायस्य स्थाने २ भङ्गतार्थसिद्धिः संमतिग्रन्थविपये दर्शितास्ति । तथा च त- इन्थगाथा एवं सत्तवियप्पो वयणपहोहोइ अस्थ पजाए । चंजणपजाए पुण सविअप्पो निम्विअप्पोय । १ । अस्यार्थः । एवं पूर्वोक्तप्रकारेण सप्तविकल्पः सप्तप्रकारपचनमेव सप्तभंगीरूपवचनपन्थाः स चार्थपर्यायो योऽस्ति नास्तित्वादिविषय एव भवति । पुनर्व्यञ्चनपर्यायो घटकुम्भादिशब्द- वाच्यता तत्र विपये सविकल्पविधिरूपनिर्विकल्पकविधिरूपे द्वे एव भङ्गे स्तः । परन्तु वक्तव्या- दिमङ्गो न भवति । यस्मात्कारणादवक्तव्यशब्दविषयं ध्रुवतां विरोधोत्पत्तिः । अथवा स- विकल्पकशब्दसमभिरूढनयमते भवति । अपि च निर्विकल्पकशन्दैवभूतनयमते वित्थं भगद्वयं ज्ञातव्यम् । अर्थनयाः प्रथमे चत्वारस्तु व्यवनपर्यायमेव नानुजानन्ति तस्मात्कार- णात्तेपां नयानामिह प्रवृत्तिनास्ति । अत्राधिक्यन्त्वनेकान्तव्यवस्थातो ज्ञातव्यम् । तदेयमेकत्र विपये प्रतिस्वमनेकनयविप्रतिपत्तिस्थले स्यात्कारपदलाञ्छिततावनयार्थप्रकारकसप्तधालम्बन- बोधजनक एक एव भङ्ग एप्टव्यो । व्यवनपर्यायस्थले भगद्वयम् । यदि च सर्वत्र सप्तमही. नियम एवाश्वासलदा चालनीयन्यायेन तावन्नयार्थनिषेधबोधको द्वितीयोऽपि भगस्तन्मूलका- श्वान्ये तावत्कोटिकाः पञ्चभङ्गाश्च कल्पनीयाः। इत्थमेव निराकाइसकलभङ्गानिपत्तिनि. हादिति युक्तं पश्यामः । अयं विचारः स्याद्वादपण्डिवेन सूक्ष्मबुद्धिमता चेतसि धार्यः । अथ फलितार्थ कथयति । इमां व्यावय॑मानां सप्तभङ्गी तत्त्वदृष्टया विमृश्यातिप्रौढियुक्तो यो भन्योऽभ्यासीकुर्यात्स आहती जैनी चरणपङ्कजभक्तिं प्राप्याचिरात्स्तोककालेन कतिपयभव- प्रणेन मोक्षं गच्छेत् ।। १४ ।। इति श्रीमोजविनिर्मितायां द्रव्यानुयोगतर्कणायां चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ व्याख्यार्थ:-इस रीतिसे एक वस्तुमे भेद पर्याय तथा अभेद पायमें एक सप्त- भगीकी योजना की, और इस ही प्रकार सर्वत्र योजना करनी चाहिये अब शिष्य गुरुसे प्रश्न करता है कि हे स्वामिन् जहांपर केवल दो ही नयोंके विषयका विचार हो वहांपर एककी प्रधानतासे और दूसरेकी गौणतासे सप्तभट्टी उत्पन्न हो परन्तु जहांपर प्रदेश, प्रस्थ, (अवयय, अवयवी) आदिके विचारसे सप्तम पष्ठ तथा पंचम आदि नयोंके मिन भिन्न विचार होते है वहां पर तो अधिक ही मन होंगे इस समय सप्तभंगीका अर्थात् सात ही मंग हैं यह नियम कहां स्थिर होगा और इसी हेतुसे रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् सप्तभंगीको नियम नियामक नहीं देख पड़ता इस प्रकार पूछे हुए श्रीगुरुमहाराज कहते हैं की हे शिष्य, परमार्थसे तेरा कहना सत्य है क्योंकि जो तुमने गौण मुख्य व्यवहारका प्रदर्शन किया है वहां तो एक ही नयके अर्थकी मुख्यतासे विधि है और अन्य सब ही नयोंका निपेध है और इस प्रकारसे विधि और निषेधको मूलभागमें ग्रहण करके पुनः अनेक भंग किये जाते हैं ऐसी हमारी सम्मति है और ऐसा कहा भी है कि "संपूर्णनयों के अर्थकी प्रतिपादकताके अर्थात् जिसकेद्वारा संपूर्ण नयोंके अर्थका कथन कियाजाय उसके पर्यायाधिकरण वाक्यको प्रमाणवाक्य कहते हैं। इस प्रकारके लक्षणसे जहां संपूर्ण पदार्थोंका विवेचन होता है वहां स्याद्वादसे चिन्हित अर्थात् स्यात् शब्दसे युक्त सम्पूर्ण नोंके अर्थों के समूहका धारण करना एक भंगमें भी निषिद्ध नहीं हैं इस कारणसे व्यंजनपर्यायके स्थानमें तो केवल दो भंगोंसे अर्थकी सिद्धि होती है ऐसा सम्मतिग्रंथमें दर्शाया है और उस ग्रन्थकी गाथा यह है इस प्रकार सप्तविकल्पसहित वचन (नय)का मार्ग अर्थ पर्यायमें होता है और व्यञ्जन पर्यायमें तो सविकल्प विधिरूप तथा निर्विकल्प विधिरूप दो ही भंग होते हैं इसका विशेष विवरण यों है कि इस प्रकार पूर्वोक्त रीतिसे सप्त विकल्प अर्थात् सप्त (सात) प्रकारके भेदसहित जो वचन है सो ही सप्तमगीरूप वचनका मार्ग है वह अर्थ पर्यायमें अर्थात् अस्तित्व नास्तित्व आदिके विपयमें ही होता है और व्यञ्जनपर्याय जो घट कुम्भ आदि शब्दोंकी वाच्यता है वहांपर सविक- कैल्प विधिरूप तथा निर्विकल्प विधिरूप दो ही भंग होते हैं परन्तु अवक्तव्यत्व आदि भंग यहां नहीं होता क्योंकि भवक्तव्य शब्दविषयको कहनेवालोंके विरोधकी उत्पत्ति होती है अथवा सविकल्पक शब्द समभिरुढ नयके मतमें अवतन्यत्व आदि भंग होता है और निर्विकल्पक शब्द एवंभूत नयमें तो इस प्रकार दो ही भंग जानने चाहिये और पहले चार जो अर्थनय हैं वे तो व्यञ्जन पर्यायको ही नहीं जानते हैं इसलिये उन नयोंकी यहां प्रवृत्ति नहीं है यहांपर विशेष वर्णन अनेकान्त व्यवस्थासे जानना चाहिये इस कारण पूर्वोक प्रकारसे एक विषयमें प्रतिवस्तुमें जहां अनेक नयोंकी विप्रतिपत्ति हो वहांपर स्यात्कार (स्यात्) पदसे लांछित उतने नयार्थका प्रकारवाला सात प्रकारका आलम्बनरूप जो दोष उस योधको उत्पन्न करनेवाला अर्थात् सात प्रकारके नयाोंके प्रकारतः विशेषता वा अनुयोगिता सम्बन्धसे अपनेमें रसनेवाला जो ज्ञान उस ज्ञानका भेदसहित अर्थात् पायरूप भेदयुत। २ भेदशून्य द्रव्य नयसे मय भेदशून्य है। ३ अनेक प्रकार के अयोध करने और शुक्नेसे समभिः नय पहलाता है जरी परमधयुज होनेगे इन्द्र समर्थ होनेसे शक और शत्रुके नगरको विदीर्ण करनेसे पुरन्दर कहलाते हैं ऐसे ही उन उन पध्याय स्पताको प्राप्त होनेसे द्रव्य विविधस्प संयुक होने पर्याय इलादि। ४ जिरा रूपरे है उससे बोध करार यह एवंभूत नय हे असे भयंयुक्त हो पही इन्द्र, समर्थ होनेने शा ऐसे ही पयायोंमें जावे यह भय भनेक थाारमुक्त होने पर समझना चाहिये।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् हापि मुख्यत्वेनामुख्यत्वेन पानन्वधर्मात्मकवस्तुज्ञापनायैकस्य नयशब्दस्य वृत्तिद्वयमद्गी- वतां विरोघो नास्ति । अथवा नयात्मकशास्त्रस्य क्रमेण वाक्यद्वयेनाप्यों ज्ञायते । अथवा एकशब्दयोधशब्देनैकबोधार्थः एवमनेके भंगा ज्ञेयाः ॥१॥ व्याख्यार्थ: :-एक पदार्थ घट पटआदि अथवा जीव अजीवआदि तीन प्रकारका अर्थात् तीन रूपसंयुक्त होता है; 'प्रत्येक वस्तुको त्रिरूपसहित जानना चाहिये, और त्रिरूपता द्रव्य, गुण और पर्यायसे है जैसे घटआदि वस्तु मृत्तिकारूपसे द्रव्य हैं १ घटा- दिके रूप रसादिसे विवक्षा करो अर्थात् यह श्याम है, यह रक्त है, यह पीत है इस रीतिसे वे गुणरूप हैं २, और घटआदिरूप सजातीय द्रव्यत्वरूपसे विवक्षा करनेपर वे पर्याय हैं ३ । इस प्रकार घटादिके तीन रूप होगये और ऐसे ही जीवादिकोंको भी जानना चा- हिये अर्थात् जीव आत्मरूपसे द्रव्य है १, ज्ञान दर्शनादिकी विवक्षासे गुण है २ और देव मनुष्यादि पर्यायकी विवक्षासे पर्यायरूप है ३, अब वह एक पदार्थका निरूप कैसा है कि-सत्प्रमाणसे अवलोकित ( दृष्ट ) है अर्थात् समीचीन (उत्तम) स्याद्वादरूप प्रमा- णसे विचारित होनेसे पदार्थकी त्रिरूपता स्पष्टतासे भासती है, क्योंकि सप्तभंगीरूप जो प्राण है, उससे वस्तुकी त्रिरूपता मुख्यवृत्तिसे जानी जाती है, और नयवादी अर्थात् एकअंशवादी जो है वह मुख्यवृत्ति तथा उपचारसे भी एक पदार्थमें त्रिरूपताको जान- ता है । यद्यपि नयवादी एक अंशको कहनेवाले वचनसे शक्तिरूप एक ही अर्थको कहता है, तथापि उपचारसे अर्थात् लक्षणाशक्तिसे अनेक अर्थोंको भी वह जानलेता है । यद्यपि एक कालमें ही दो वृत्ति अर्थात् अभिधा और लक्षणाशक्ति नहीं होसकती परन्तु यह सिद्धान्त निश्चित नहीं है क्योंकि "गङ्गायां मत्स्यघोपौ" गंगामें मत्स्य तथा अहीरोंका ग्राम है, इत्यादि स्थलके तुल्य अन्यत्र भी एक कालमही दो शक्ति (अभिधा तथा लक्षणा) मान्य हैं । उसी प्रकारसे यहां भी मुख्यता तथा गौणतासे अनन्त धर्मस्वरूप यन्तुको जनानेके १ संपूर्णरूपसे पदार्थ के खस्पको जो सिद्ध करे वह सम्यगमानरूप सप्तमगी नय यही प्रमाण पदसे विवक्षित है क्योंकि " सकलादेशः प्रमाणाधीनः " संपूर्ण आदेश प्रमाणके आधीन है. २ वस्तुके सरूपके किसी अंशके प्रतिपादनको नय कहते हैं क्योंकि "विकलादेशो नयाधीनः" रोड, आदेश नयके, आधीन होता है ।। ३ जो अर्थको मुख्यपृत्तिसे प्रकाश करे वह अभिधा, लक्षणा तथा व्यंजना ये तीन प्रकारको सन्दर्भ सालि और वाच्य, लक्ष्य, तथा व्यार, ये अर्थ भी तीन ही प्रकारके है, इसके अनुरोपसे शब्द भी पाचक लक्षक और बंजक इन भेदोंसे तीन प्रकारके है। ४ तापयंत्री मनुपपत्तिसे लक्षणाशचिसे वाक्यार्थ होता है " गहायां पोषः" गड़ा नाम अभिया शाक्ति प्रवाहका है उसमें प्राम नहीं रदसकता है, इसलिये गगापदको गगानट में लक्षणा की. सप गंगा शन्द लक्षणाक्सेि गंगातटका बोधक हुआ तय अन्वय यनगया क्योंकि गंगातटमें पदीरोंग माम रह सकता है। ऐसे ही लक्षगारो एक नय अन्यायंका भी बोध करायेगा तो पायी विपनाका योधर हो जायगा । ५ यहां मत्सरेलिये तो गगामें मापाताशति और घोपरेलिये लक्षणा। । ।

द्रव्यानुयोगतर्कणा। लिये एक ही नयशब्दकी दो वृत्ति स्वीकार करनेवालोंको कोई विरोध नहीं है । अथवा नयप्रतिपादक शास्रके कमसे दो वाक्योंसे भी अर्थ जान सकते हैं । अथवा एकार्थबो- धक एक शब्दसे एक अर्थका बोध होता है और अन्य अर्थका अन्य शब्दसे, इस रीतिसे भनेक भंग भी समझलेने चाहिये ॥१॥ अयोक्तमेवार्थ शब्दत्वेन ज्ञापयन्नाह । अब पूर्वोक्त विषयको ही सूत्रद्वारा प्रकाशित करते हैं। सूत्रम् । द्रव्यार्थिकनयो मुख्यवृत्त्याभेदं वदंत्रिपु। अन्योन्यमुपचारेण तेयु भेदं दिशत्यलम् ॥ २॥ मूत्रभावार्थ:-द्रय्यार्थिकनय मुख्यवृत्ति अर्थात् वाचकता शक्तिसे द्रव्य, गुण, पर्याय तीनोंमें मृत्तिकारूपसे अभेद प्रकाश करता हुआ लक्षणाशक्तिसे उन तीनों में परस्पर भेद भी पूर्णरूपसे दर्शाता है ॥२॥ व्या०-द्रव्यार्थिकनयो मुख्यवृत्त्या मुख्या प्रधाना शब्दार्थकथनपरा वृत्तियापारो यस्य स तस्य भावसत्ता तया शब्दार्थादेशकत्वेन त्रिपु द्रव्यगुणपर्यायेवभेदं भेदाभावं वदन् कथयन् सन् यतो गुणपर्यायाभ्यां भिन्नस्य मृद्रव्यस्य विपये घटादिपदस्य शक्तिरस्तीत्येतेषाम- न्योन्यमभेदं प्रकटयन्पुनः स एव व्याथिकनयस्नेषु द्रव्यगुणपर्यायेषु चान्योन्यं परस्पर- मुपचारेण लक्षणया भेदं भेदत्वमलमत्यर्थ दिशति । यतो द्रव्यं भिन्नं कम्बुप्रीवादिपर्यायेषु च तस्य घटादिपदस्य लक्षणावगम्यते । किं च मुख्यार्थवाधे तथैव मुख्यार्थसंवन्धे च सति न. थाविधव्यवहारप्रयोजनेऽनुस्त्य तत्र लक्षणा प्रवर्ततेऽदुर्घटत्वात् । उक्त च-मुख्यार्थवाधे तद्योगे रूढितोऽर्थप्रयोजनात् । अन्योऽर्थो लक्ष्यते यत्सा लक्षणारोपितक्रिया।२ । इति ॥२॥ व्याख्यार्थ:-द्रव्यार्थिक नय मुख्यवृत्तिसे अर्थात् शब्दार्थके फ़थनमें तत्पर व्यापार वाली अभिधाशक्तिसे शब्दके भोंका प्रकाश करनेसे द्रव्य, गुण तथा पर्याय इन तीनोंमें अभेद (भेदाभाव )को कहता हुआ अर्थात् गुण और पर्यायसे भिन्न मृत्तिका रूप द्रव्यके कथनमें घटादि पदकी शक्ति है इस रीतिसे इन तिनों में परस्पर अभेद प्रकाश करता हुमा पुनः वही द्रव्यार्थिक नय उन ही द्रव्य, गुण तथा पर्यायोंमें उपचार (लक्षणाशक्ति)से भेदको भी पूर्ण रीतिसे प्रकट करता है, क्योंकि द्रव्य भिन्न है और कम्युग्रीवत्वआदि पर्यायोंमें उस घटआदि पदको लक्षणाशक्ति निश्चित होती है। और मुख्य अर्थ के बाध तथा मुख्य अर्थक संबन्ध रहते उसी प्रकारके व्यवहार तथा प्रयोजनका अनुसरण करके लक्षणाशक्ति प्रवृत्त होती है अन्यथा लक्षणाशक्तिकी प्रवृत्ति दुर्घट है। और ऐसा कहा भी है-मुख्यार्थके वाध होनेपर उस मुख्य अर्थसे संबन्ध रखनेवाले अर्थमे ही रूढिसे अर्थ प्रयोजनसे १ प्रयोजनवश लक्षणाके अनेक भेद है परन्तु मुख्यत. एक प्रयोजनवती और दूसरी निरुता लक्षणा है. प्रथममें गगाशब्दका गगातट रूप अर्थ करनेसे यह प्रयोजन है कि-अहीरोंका ग्राम अतिपवित्र तथा से त्यादि धर्मयुक्त है । दूसरी निरूढा लक्षणा कुशलआदि शब्दोंमें समझनी चाहिये अर्थान् कुशलका अर्थ कु. शलानेवाला है परन्तु ढिसे वह चतुरके अर्थमें वर्तता है यही निहटा लक्षणा है। . - ६० रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् जहां अन्य अर्थ लक्षित हो उस आरोपित क्रियाको लेके प्रवृत्त होनेवाली शक्तिको लक्षणाशक्ति कहते हैं जैसे कहा भी है कि-"मुख्यार्थवाघे तद्योगे रुढितोऽर्थमयोजनात्॥ अन्योर्थो लक्ष्यते यत्सा लक्षणारोपितक्रिया ॥११॥ भावार्थः-मुख्य अर्थका बाध होनेपर तथा उसका योग होनेपर अर्थ प्रयोजनसे जिससे रूढीसे भिन्न अर्थ लक्षित हो वह लक्षणा होती है ॥ १ ॥ जैसे " गङ्गायां घोषः " यहां गंगाका मुख्य अर्थ प्रवाह है परन्तु उस मुख्य अर्थमें घोप ( अहीरोंके ग्राम ) की अधिकरणता ( आधारता)का बाध है इसलिये गंगासे संबन्ध रखनेवाले अन्य अर्थ गंगातटमें गंगाशब्दकी लक्षणा हुई तब "गं. गायाम्" इस पदका अर्थ "गंगातटे" ( गंगाजीके तटपर) “धोपः" ग्राम है यह अन्वय बनगया ऐसे ही यहां भी समझलेना ॥२॥ अथोक्तमेव द्रढयन्ना । अब पूर्वोक्त अर्थको ही दृढ करते हुए कहते हैं। सूत्रम् । पर्यायार्थिक एवापि मुख्यवृत्त्यांन भेदताम् । उपचारानुभूतिभ्यां मनुतेऽभेदतां त्रिषु ॥३॥ सूत्रभावार्य:-और पर्यायार्थिक नय भी यहां मुख्यवृत्तिसे तो भेद भाव ही मानता है, परन्तु उपचार तथा अनुभवसे तीनोंमें अभेद मानता है ॥३॥ व्याख्या । पर्यायाथिकनय एवापि एवमेव प्रकारेणोक्तलक्षणेन मुख्यवृत्त्या प्रधानन्या- पारेणात्र द्रव्यगुणपर्यायेपु भेदतां भेदभावं ज्ञापयति । यत एतस्य नयस्य मते मृदादिपदस्थ द्रव्यमित्यर्थः । १ । रूपादिपदस्य गुण इत्यर्थः । २ । घटादिपदस्य कम्वुप्रीवपृथुवुधादिपर्याय इत्यर्थः ।३। इत्थं त्रयाणामपि मिथो नामान्तरकल्पना भिन्ना भिन्ना प्रदर्शिता । अतो द्रव्यगुण- पर्यायाणां प्राधान्येन भेदोऽस्तीति ध्येयम् । तथा पुनरुपचारानुभूतिभ्यामुपचारो लक्षणा, अ. नुभूतिरनुभवः, उपचारश्चानुभूतिश्च ताभ्यां पर्यायार्थिकनयोऽप्यभेदतामभेदभावं द्रव्यादिषु विषु मनुते । यतो घटादि मृद्रव्याघभिन्नमेवास्ति लक्षणया ज्ञानेन चेति । इमां प्रतीति प. टादिपदानां मृदादिद्रव्येषु लक्षणाप्रवृत्त्याङ्गोकुर्वतां न कदापि क्षतिरिति भावार्थः ॥३॥ व्याख्यार्थ:-पर्यायार्थिक नय भी इस ही पूर्वोक्त प्रकारसे अर्थात् मुख्यवृत्ति (प्रधान व्यापार ) से इन द्रव्यादि तीनोंमें अर्थात् द्रव्य गुण पर्यायोंमें भेदभाव ही ज्ञापित करता है । क्योंकि इस नयके मनसे मृत् (मृत्तिका) आदि पदका द्रव्य यह अर्थ है । १। श्याम रक्त तथा पीतादि पदोंका गुण यह अर्थ है । २ । और घटआदि पदका कंबुग्रीव (शंखके तुल्य गहित ) तथा विशाल उदर सहितआदि पर्याय अर्थ है । ३ । इस प्रकार द्रव्य, गुण और पर्याय तीनोंकी नामान्तरकल्पना परस्पर भिन्न २ प्रदर्शित की गई है, इससे यह सिद्ध हुआ कि-पर्यायार्थिक नयके अनुसार द्रव्य, गुण, पर्याय प्रधानतासे भिन २ है ऐसा निश्चय करना चाहिये । और पुनः उपचार तथा अनुभवसे पर्यायार्थिक द्रव्यानुयोगतर्कणा। नय भी द्रव्यादि तीनों पदार्थोंमें अभेद अर्थात् भेदाभाव ही मानता है । क्योंकि मृत्तिका के विना घट अनुपपन्न है, इसलिये लक्षणा तथा ज्ञानसे घटआदि पदार्थ मृत्तिकारूप द्रव्यसे अभिन्न ही है । घटआदि पदोंकी मृत्तिकाआदि द्रव्योंमें इस प्रतीतिको लक्षणा प्रवृत्तिसे माननेवालोंके कोई भी दोप नहीं है, यह सूत्रका तात्पर्य है ॥ ३ ॥ अथ पुनर्भेदमेव दर्शयन्नाह । भव पुनः भेदको ही दर्शाते हुए कहते हैं ! सूत्रम् । गृह्णाति यो नयो धौं मुख्यामुख्यतया तथा। तस्यानुसारतस्तेपां वृत्त्योपचारकल्पनम् ॥ ४ ॥ सूत्रभावार्थ:-जो नय मुख्यता तथा गौणतासे भेदं अभेदरूप धर्मोको ग्रहण करता है वहां उसीके अनुसार द्रव्य, गुण, पर्यायोंकी वृत्तिसे उस उपचारकल्पनाका वि. धान होता है ।। ४ ।। व्याख्या । यो हि नयो द्रव्याधिकोऽथवा पर्यायार्थिकः धर्मी भेदाभेदात्मको प्राधान्यगौण- तया गृह्णाति उहाख्यप्रमाणेन धारयति । तस्य नयस्य द्रव्यार्थिकस्य या पर्यायार्थकस्य मु. ख्यतया साक्षात्सङ्केतेन तथा वा व्यवहितसङ्केतेन चानुसृत्य तेषां द्रव्यगुणपर्यायाणां वृत्त्या सदुपचारकल्पनं विधीयते । यथा गङ्गापदस्य साक्षात्सङ्केत: प्रवाहरूपार्थविपयेऽस्ति तस्मात्प्र- वाहेण शक्तिः । तथा "गङ्गातीरे घोपः" गङ्गासङ्केतव्यवहितसङ्केतोऽस्ति । ततश्च यथोप. चारस्तथा द्रव्याथिकनयस्य साक्षात्सङ्केतोऽभेदे नास्ति । तत्र शक्तिभेदेन व्यवहितसङ्केतोऽस्ति ततश्योपचरितत्वं तु पर्यायार्थिकनयस्यापि शक्त्योपचारं गृहीत्वा भेदाभेदनयविपयेऽपि यो. जनीयम ।।४॥ व्याख्यार्थ:-जो नय द्रव्यार्थिक हो अथवा पर्यायार्थिक हो भेद तथा अभेद स्वरूप धर्मको प्रधानता अथवा गौणतासे ग्रहण करता है अर्थात् जहां ऊहा नामक ( कल्पना स्वरूप ) प्रमाणसे धारण करता है वहांपर उसी द्रव्यार्थिक वा पर्यायार्थिक नयकी मु. ख्यता अर्थात् साक्षात्संकेत तथा गौणता अर्थात् व्यवहितसंकेतके अनुसार द्रव्य, गुण पर्या- योंकी वृत्ति (शक्ति )से उपचार कल्पनाका विधान होता है । तात्पर्य यह कि द्रव्या- थिकनय प्रधानता ( साक्षात् सङ्केत )से अभेदको प्रतिपादन करता है परन्तु वह गौणता ( व्यवहित संकेत )से अभेदको भी कहेगा, ऐसे ही पर्यायार्थिक नय प्रधानता (साक्षात्सं- केत )से भेदको और गौणता ( व्यवहित संकेत )से अभेदरूप धर्मको कहता है। जैसे गंगापदका प्रधानतासे साक्षात्संकेत प्रवाह ( जलकी धारा )रूप अर्थमें है, इसलिये मुख्यतासे तो प्रवाहरूपसे ही शक्ति है तथा गंगातीरमें घोप है यहां तीररूप अर्थमें गंगा- संकेतसे व्यवहित सकेत है, इसलिये गंगापदसे गंगातीर साक्षात्ररूप अर्थ उपचारसे हु- मा । अब ऐसे ही द्रव्यार्थिक नयका संकेत तो अभेदरूप अर्थमे है, और उस नयकी + 4 रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् •भिन्न शक्ति (लक्षणा शक्ति )से व्यवहित संकेत अर्थात् भेदरूप अर्थमें वृत्ति है, इस लिये भेदरूप अर्थ प्रतिपादनके अर्थ द्रव्यार्थिकनयकी उपचारसे प्रवृत्ति हुई। ऐसे ही प- र्यायार्थिक नयकी भी मुख्य शक्ति तथा उपचार शक्तिको ग्रहण करके भेदाऽभेद नय वि- पयमें योजना करलेनी चाहिये, अर्थात् पर्यायार्थिक नय मुख्यवृत्ति अर्थात् वाचकता श: क्तिसे भेदरूप अर्थको कहता है और उपचार अर्थात् लक्षणा शक्तिसे अभेदरूप अर्थ- को भी कहता है ॥ ४॥ कश्चित्कथयति एको नय एकमेव विषयं गृह्णाति तद्रूपयति । कोई प्रतिवादी कहता है कि एक नय एक ही विषय ( भेद अथवा अभेदमें किसी एक अर्थ )को ग्रहण करता है । उस सिद्धान्तको अग्रिम श्लोकसे दूपित करते हैं । सूत्रम् । यो भिन्नविषयो ज्ञाने सर्वथा नेति चेन्नयः । तदा स्वतनभावेन स स्यान्मिथ्यात्विगोचरः॥५॥ सूत्रभावार्थ:-जो नय है वह ज्ञानमें निजसे भिन्न नयके विषयको गौणतासे भी स. वथा नहीं कह सकता ऐसा यदि मानो तो वह नय स्वतंत्रतासे मिथ्यात्त्वियोंके गोचर होगा ॥५॥ व्याख्या । यो नयः ज्ञाने ज्ञानविपये भिन्नविषयो नयान्तरस्य मुख्यार्थः सर्वथा अमुख्य- त्वेनापि न भासते । तदा स नयः स्वतन्त्रभावेन सर्वथा नयान्तरविमुखत्वेन मिथ्यात्विगो- घरो मिथ्यादृष्टिभिविवेचनीयः कुदृष्टिपरिगृहीतः स्यात् । एतावता दुर्णय एव भवति । प- रन्तु सुनयो न भवति । एवं ज्ञेयम् । अनुभवेन विचार्यमाणः कश्चिन्नयः भिन्नविषयत्वान्नया- न्तरमुख्यार्थत्वात्सर्वथा अमुख्यत्वादपि न भासते । तदा खतनत्वेन (नयान्तरविमुख्यत्वेन) च मिथ्यात्विना पार्श्वे स नयो निरन्तरं तिष्ठतीति भावः ॥ ५॥ व्याख्यार्थ:-जो नय है वह ज्ञानमें भिन्नविषय अर्थात् अपनेसे भिन्न दूसरे नयके मुख्य अर्थको सर्वथा गौणतासे भी नहीं भासित करता है ऐसा मानोगे तो वह नय खतं- त्रतासे सर्वथा अर्थात् अन्य नयोंसे विमुख होनेसे मिथ्यादृष्टियोंद्वारा विवेचन करने योग्य होवे अर्थात् मिथ्यादृष्टियोंसे ग्रहण कियाहुआ होवे भावार्थ-दुनय ही होवे और सुनय नहीं, ऐसा समझना चाहिये । भावार्थ यह है कि-अनुभवसे विचाराहुआ कोई नय भिन्न विषय- को अर्थात् अन्य नयके मुख्य अर्थको गौणतासे भी सर्वथा नहीं कहता है तो वह नय स्व.. १ अनेकान्तवादमें वस्तुका खरूप ही अनेकान्त है तब नयस्वरूप भनेकार्थक क्यों न होगा क्योंकि प्रमाण और नयसे ही तो वस्तुको विवेचना होती है, यदि वह नय भेद अभेदादि भनेकार्थप्रतिपादक उपचारसे- भी न रहा किन्तु किसी एक ही अर्थका प्रतिपादक रहा तव वह नय कुदृष्टियोंकाअर्थात् जैनमतसे भिन्न मता. नुयायो जनोंका ही विषय रहा, और कुदृष्टियोंमे गृहीत होने के कारण वह दुष्ट नय होगया न कि मुनय अथात् स्थाद्वादके अनुकूल वह उत्तम नय नहीं होसकता।

द्रव्यानुयोगतर्कणा। तंत्रभावसे अर्थात् अन्य नयसे विमुख होनेसे मिथ्यादृष्टियोंके ही निकट निरन्तर रहता है। न कि स्याद्वादियों के निकट ॥ ५ ॥ सूत्रम् । विशेपावश्यकेऽयुक्तः संमितावर्थ एप च ॥ भेदाभेदोपचाराद्याः संभवन्ति नयादिह ॥ ६॥ सूत्रभावार्थ:--भेद, अभेदमादिक उपचारआदि स्याद्वादमें नयसे ही होते हैं; यही अर्थ अर्थात् यही अभिप्राय विशेषावश्यक तथा संमतिग्रन्थमें कहा है ॥ ६ ॥ व्याख्या । अयमों विशेपावश्यक तथा संमतिप्रन्थमध्य उक्तोऽस्ति । तथा च तद्गाथा- "दोहि विणयेहिं णीयं सत्यं मूलण्ण तहवि मिच्छत्तं । जस्स विसय प्पहाणं तणेणं अणुण्णा- निरवेक्खं । १।" " सार्थनाही इतरांशाप्रतिक्षेपी मुनय" इति सुनयलक्षणम् । "स्वार्थ- प्राही इतरांशप्रतिक्षेपी दुर्णय" इति दुर्णयलक्षणम् । एवं नयानयविचाराच भेदाभेदप्रा. ह्यव्यवहारः संभवति । तथा नयसङ्केतविशेपाबाहकवृत्तिविशेपरूप उपचारोऽपि संभवेत् । तस्माद्भेदाभेदयोर्मुख्यत्वेन प्रत्येकनयविषयो मुख्यामुख्यत्वेनोभयनयविपयरूप उपचारश्च मुख्यवृत्तिवनयपरिकरो भवेत् परन्तु नविषयो न भवति । अयं च सरलः पन्थाः श्वेता- म्बरप्रमाणशास्त्रसिद्धो ज्ञेयः । नीयते येन श्रुताख्यप्रमाणविपयीकृतस्यार्थस्यांशस्तदितरांशौदा- सीन्यतः स प्रतिपत्तुरभिप्रायेण विशेपो नय इति । अनैकवचनमतनं तेनांशावंशा वा येन प. रामर्शविशेषण श्रुतप्रमाणप्रतिपन्नवस्तुनो विषयीक्रियते तदितरांशौदासीन्यापेक्षया स नयो- भिधीयते । तदितरांशप्रतिक्षेपे तु तदा भासतां भणिप्यते । प्रत्यपादयाम च स्तुतिद्वात्रिंशतिके "अहो चित्रं चित्रं तव चरितमेतन्मुनिपते, स्वकीयानामेपां विपमविपयव्याप्तिवशिनाम् । वि. पक्षापेक्षाणां कथयसि नयानां सुनयतां, विपक्षक्षेप्तॄणां पुनरिह विभो दुष्टनयताम् । १।" प. श्वाशतिके च-"निश्शेषांशजुपां प्रमाणविषयीभूयं समासेदुपां, वस्तूनां नियतांशकल्पनपराः सप्तश्रुताः सङ्गिनः । औदासीन्यपरायणास्तदपरे चांशे भवेयुर्नया, श्वेदेकांशकलङ्कपङ्ककलुपास्ते स्युः सदा दुर्णयाः। १।" इति ॥ ६ ॥ व्याख्यार्थ:-यह अभिप्राय विशेषावश्यकनामक ग्रन्थ और सम्मति अन्थमे कहा है और उस ग्रन्थकी गाथाका अभिप्राय यह है कि "यद्यपि द्रव्याधिक और पर्यायाथिक इन दोनों मूल नयोंसे शास्त्र जानाजाता है तथापि जो नय अपना ही विषय प्रधान रखता है और परस्परकी अपेक्षा नहीं रखता अर्थात् दूसरे नयके मुख्य अर्थकों गौणतासे भी नहीं कहता उसको मिथ्यात्व (दुर्नय) जानना चाहिये । १ । तथा स्वार्थका ग्राही हो और अन्य अर्थ- का निषेधक न हो वह सुनय है अर्थात् निज प्रधानशक्ति जो अपने अर्थको कहे उसको तो ग्रहण करे और अन्य नयके अर्थका तिरस्कार न करे किंतु उपचारसे उस दूसरे नय- के मर्थका भी कथन करे वह.सुनय है । यही सुनयका लक्षण है । और जो केवल स्वार्थ- मात्रका ग्राही हो और अन्य अर्थका निषेधक हो वह दुर्नप है। यह दुर्नयका लक्षण है। इस प्रकार नय अर्थात् नयके विचारसे द्रव्य, गुण, पर्यायोंमें भेद तथा अभेदको ग्रहण . रायचन्द्रजनशास्त्रमालायाम् करने योग्य व्यवहारका संभव है । और नयके संकेत विशेपसे ग्राहक जो शक्तिविशेष है उसरूप उपचारका भी संभव है । इसलिये भेद तथा अभेदमें मुख्यतासे प्रत्येक नयका विषय है अर्थात् एक अर्थकी प्रतिपादकता प्रत्येक नयमें है । और मुख्यता तथा अमुल. ख्यता--(गौणता )से द्रव्यार्थिक तथा पर्यायाधिक इन दोनों नयोंके विपयरूप जो उपचार है यह मुख्य वृत्तिके सदृश नयका परिकर होता है परन्तु नयका विषय नहीं होता. यह सरल मार्ग श्वेताम्बर मतके प्रमाण (न्याय ) शास्रसे सिद्ध है ऐसा जानना चाहिये क्योंकि श्रुतनामक प्रमाणसे विषयमें कियेहुए पदार्थका अंश जिसके हुए अन्य अंशकी उदासीनतासे प्राप्त किया जाय वह प्रतिपत्ता (बोद्धा )के अभिप्रायसे जो विशेष है सो नय कहलाता है । 'श्रुताख्यप्रमाणविषयीकृतस्पार्थस्यांशः' यहां पर "अंशः" यह जो एक वचन दिया गया है वह स्वाधीन नहीं है इस कारण 'शौ अंशाः वा' इस प्रकार द्वि- वचन बहुवचन लगाकार जिस परामर्श (ज्ञान ) विशेपसे श्रुत प्रमाणद्वारा ग्रहण किए. हुए पदार्थका एक अंश दो अंश अथवा बहुतसे अंश विषयगोचर किये जायें और उससे भिन्न अंश का अंशोंको उदासीनतासे विषयी किये जाय यह नय कहाजाता है । और जो वस्तुके विवक्षित अंशसे भिन्न अंश वा अंशोका प्रतिक्षेप अर्थात् निषेध करे उसको भागे नयाभास कहेंगे । और स्तुति द्वात्रिंशतिकामें प्रतिपादित भी किया है कि हे मुनीन्द्र हे विभो श्रीजिनेन्द्र ! मापका यह चरित अत्यन्त विस्मयको उत्पन्न करता है वह परित क्या है कि आप अपने इन विषम विषयव्याप्तिके वशीभूत हुए जो नय विपक्षकी अर्थात् अपने स्वीकृत अर्थसे विमुख भन्यनयोंसे विवक्षित अर्थकी अपेक्षा रखते हैं अर्थात् गौण- तासे उनका भी कथन करते हैं उन नयोंके सुनयता कहते हो और जो अन्य नयद्वारा स्वी- कृत अर्थ है उसको निषेध करनेवाले जो नय हैं उनको दुष्ट नय (दुर्नय ) कहतेहो॥१॥ और पञ्चाशतिक नामक ग्रन्थमें भी प्रतिपादित किया है कि संपूर्ण अंशीको अर्थात् अ. नन्त धर्माको धारण करनेवाले भीर प्रमागकी विषयीभूतताको प्राप्तहुए पदार्थोके नियत अंश (धर्म) कल्पना करनेमें तत्पर सात सही हैं उनमें जो अपने कल्पित मंशसे मिल अंशमें उदासीनताको धारण करते हैं वे नय होते हैं और जो एक भपने ही अंशकी' कल्पनारूप कलङ्क पड़ (दोपमय कर्दम)से मलीन हो अर्थात् एफ ही अपने फलित अर्थ को तो सीकार करें और अन्य अंगोका निषेध करें तो ये सातों सदा दुर्नय होते हैं ॥२॥६॥ पुनर्भावं फथयमाह। पुनः नयके भावको कहते हुए यह सूध कहते हैं। सनम् । ये माग सरलं त्यक्त्योपनयान्कल्पयन्ति ये। तत्मपश्यं धियोधाय तेपां जल्पः प्रतायते ॥ ७॥ एग्रभावाप:-जो इस सरल श्वेताम्बरमठानुसारी नयमार्गको त्यागकर उपनयों- . द्रव्यानुयोगतर्कणा। की कल्पना करते हैं। उनका प्रपञ्च केवल शिष्योंकी बुद्धिको विवादिनी करनेवाला है। तथापि ज्ञानके अर्थ उन उपनयोंके कथनका विस्तार करते हैं ॥ ७ ॥ व्याख्या । ये च केचन कल्पकाः सरलं सममेतदुक्तलक्षणं मार्ग नयनिगमपन्थानं त्यक्त्वा विमुच्य उपचारादि महीतुमिच्छयोपनयानयानां समीप उपनयास्तान कल्पयन्ति । दिगम्बर- शास्त्रे हि द्रव्याधिकः १ पर्यायार्थिकः २ नैगमः३सद्हः४व्यवहारः५मजुसूत्रम् ६ शब्दः ७ समभिरूढः ८ एवंभूतः ९ इति नव नयाः स्मृता उपनयाश्च कथ्यन्ते नयानां समीपमुपनयाः सद्भूतव्यवहारः १ असद्भूतव्यवहारः २ उपचरितसद्भूतव्यवहार--३ श्वेत्युपनयावेधा इति । वत्तपञ्च तद्विस्तारं शिष्यबुद्धिद्वन्द्वनमात्रमेवास्ति । तथापि विबोधाय समानतत्रत्वेन परिज्ञा- नाय तेपां नयानां जल्प उल्लापः प्रतायते स्वप्रक्रियया उच्यत इत्यर्थः ॥ ७॥ व्याख्यार्थः -जो कोई कल्पक ( कल्पना करनेवाले ) इस पूर्वोक्त सरल न्यनि- गममार्गको त्यागकर उपचारआदिक ग्रहण करनेकी अभिलापासे उपनयोंकी अर्थात् नयोंके समीप होनेवाले जो उपनय हैं, उनकी कल्पना करते हैं; भावार्थ-दिगम्बरोंके न्याय- शास्त्रामें द्रव्यार्थिक १ पर्यायार्थिक २ नैगम ३ संग्रह ४ व्यवहार ५ ऋजुसूत्र ६'शब्द ७ समभिरूढ ८ और एवंभूत ९ ये नौ (९)नय मानेगये हैं; और सद्भूतव्यवहार १ असद्भूतव्यय- हार २ तथा उपचरितसद्भूतव्यवहार ये तीन (३) प्रकारके उपनयं (उपनयका अर्थ है; न- यके समीप रहनेवाले क्योंकि- उप अव्ययका समीप अर्थ है; इसलिये उपका नय शब्दके साथ अव्ययीभाव समास है) कहेगये है । उनका विस्तार केवल शियोंकी घुद्धिको वि- वादशील करनेवाला है। तथापि दिगम्वरशास्त्रको हमारे समान ही होनेसे उन नयोंके ज्ञान- केलिये उनका जल्प ( कथन ) करते हैं; अर्थात् इन नय तथा उपनयोंका निरूपण हम हमारी प्रक्रियाके अनुसार करते हैं; इस प्रकार श्लोकका अर्थ है ॥ ७ ॥ सूत्रम् । नया न्यायानुसारेण नव चोपनयास्त्रयः । निश्चयव्यवहारी हितध्यात्ममतानुगौ॥८॥ सूत्रभावार्थ:-ज्यायके अनुसार नय नौ (९) है; और उपनय तीन हैं; तथा एक अध्यात्मनामक मत है; उसके अनुसार निश्चय और व्यवहार ये दो हो नय हैं ॥ ८॥ व्याख्या । न्यायानुसारेण तन्मतीयअन्धगताभिप्रायेण नया नव सन्ति पूर्वोक्ता ज्ञेयाः। तथोपनयास्रय एव सन्ति । तेप्युपनयाः सतव्यवहारादयत्रय इति । तथा चाध्यात्माऽपिन 'मतभेदः कश्चिदस्ति । तत्र च नध्यात्ममतानुगौ तच्छैलीपरिशीलिनी नयौ निश्चयेन द्वाव फथितौ तत्रैको निश्चयोऽपरो व्यवहारनयश्चेति द्वावेव नाधिकौ । अभेदानुपचारतंया वस्तु निश्चीयत इति निश्चयः । यथा “जीयः शिवः शिवो जीवो नान्तरं शिवजीवयो"रिति । भेदोप- पारतया यस्तु व्यवहियत इति व्यवहारः । यथा “कर्मयो भवेनीवः कर्ममुक्तसदा शिव इति ॥ ८॥ ६ . रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् व्याख्यार्थः-न्यायके अनुसार अर्थात् दिगम्बरमतके ग्रन्थोंमे प्राप्त अभिप्रायसे,नय संख्याक (गिनतिमें नौ) (९) नय है । इनके नाम पूर्वश्लोकमें गिना चुके हैं; वहांसे जानने चाहिये । तथा उपनय तीन ही है, वे उपनय मी पूर्वकथित सद्भूतव्यवहारादि तीन समझने चाहिये । और अध्यात्मनामक कोई मतभेद है। उनमेंसे उस अध्यात्ममतकी शैलीके अनुसार निश्चयसे दो ही नय कहेगये हैं। उनमें एक तो निश्चयनय और दूसरा व्यवहारनय है। इनसे अधिक नहीं; अभेद तथा अनुपचारसे जिसके द्वारा वस्तु निश्चय करी जाती है; वह निश्चयनय है । जैसे-"जीवः शिवः शिवो जीवो नान्तरं शिवजीवयोः ।१" जीव शिव( सिद्ध )रूप ही है; शिव जीवरूप ही है; शिव और जीव इन दोनोंमें कोई भेद नहीं है;" इस वचनमें अनुपचारसे जीव और शिवका अभेद दर्शाया गया है । और भेद तथा उपचारसे जिसकेद्वारा घस्तुका व्यवहार हो उसको व्यवहार नय कहते हैं । जैसे "कर्मबद्धो भवेजीवः फर्ममुक्तस्तदा शिवः । १ । “ कर्मोसे जो बंधा हुआ होता है; वह जीव है; और जब वह जीव कोंसे मुक्त होता है; तब शिवरूप है;" इस वाक्यमें कर्मयन्धनद्वारा जीव और शिवका भेद दर्शाया है ॥ ८॥ अथ नवसु नयेषु प्रथमो द्रव्यार्थिकनय उक्कोऽतस्तस्य भेदा दश तेषु प्रथमभेदं विव. रिपुराह । अब पूर्वोक्त जो नौ (९) नय हैं; उनमें द्रव्यार्थिक नय सबसे प्रथम कहागया है। इसलिये उसके दश भेद दिखाकर उन १० भेदोंमें से प्रथम भेदका विवरण करनेकी इच्छावाले आचार्य अग्रिम श्लोक कहते हैं। सूत्रम् । द्रव्यार्थिकनयस्त्वाद्यो दशधा समुदाहृतः । शुद्धद्रव्यार्थिकस्तत्र यकर्मोपाधितो भवेत् ॥९॥ • सूत्रभावार्थ:--नयोमेसे प्रथम द्रव्याधिकमय जो है; वह दस प्रकारका कहागया है, उन दसों मेदोंमें कर्मकृत उपाधियोंसे रहित शुद्ध द्रव्यार्थिकनय प्रथम (पहला) है॥९॥ घ्याख्या । द्रव्याधिकपर्यायाधिकादिक्रमेण नया नव वर्तन्ते.तेषु भायः प्रथमो द्रव्याधि. फनय आयो दशधा दंशाप्रकारः समुदाहृतः । चत्र च प्रथमो द्रव्याधिकनयः शुदद्रव्याधिक इति अफमोपाधितः कर्मणामुपाधितो रहितः शुद्धद्रव्यापिकः कथ्यते । सद्रव्यम् । लक्षणंत्वि.. पम्-सीदति स्वकीयान् गुणपर्यायान् व्याप्नोतीति सन् उत्पादृव्ययभोव्ययुधं सग, अर्थ: मियाकारि प सन् । यदेवार्थफियाकारि सदेव परमार्थसम् । यत्र नार्थक्रियाकारिषदेव परतो. ऽप्यसदिति निज २ प्रदेशममूहररण्डचात्यभावषिमावपर्यायादयति, दोयति, अदुनुय. दिति इम्यम् । गुणपर्यायवद्रव्यम, गुणाश्रयो द्रव्यं या । यदुवं विशेषापश्यफगृती-दपए दूरए दोरवयको विकारो गुणाण संदायो दयं मन्नं भायरस भूबमायं घ जं जोग।१।- . .

६७ । द्रव्यानुयोगतर्कणा। यति तासापर्यायान प्राप्नोति मुञ्चति वा । २ । दूयते स्वपर्यायैरेव प्राप्यते मुश्वते वा । २ । दुःसत्ता तस्या एवावयवो विकारो वेति द्रव्यम् । ३।४ ।अवान्तरसत्तारूपाणि द्रव्याणि म. हासत्ताया अवयवो विकारो भवत्येवेति भावः ॥ गुणा रूपरसादयस्तेषां संद्रावः समूहो घटा- दिलंपो द्रव्यम् । ५ । तथा भवनं भावस्सत्तिर्मविष्यतीति मावस्तस्य भाविनः पर्यायस्य योग्य यद्भव्यं तदपि द्रव्यम्, राजपर्यायाईकुमारवत् । ६। तथा भूतं हि पश्चात्कृतो भावः पयायो यस्य तदपि द्रव्यमिति दिक् । तदेव द्रव्यमर्थः प्रयोजनं यस्यासौ द्रव्याधियः । अस्त्यर्थे प्रत्ययः । शुद्धः काँपाधिरहितचासौ द्रव्याधिकश्च शुद्धद्रव्याधिक इति ॥ ९॥ व्याख्यार्थ:-द्रव्यार्थिक, पर्यायाधिकादि क्रमसे जो नय कहेगये हैं। उनमेंसे प्रथम नय द्रव्यार्थिक नय है; उसके दश भेद हैं, उनमें कमोफी उपाधिसे शून्य प्रथम द्रव्यार्थिकनय शुद्धद्रव्यार्थिकनय कहाजाता है । यहांपर " सद्रव्यम् " जो सत् है; वह द्रव्य है। जो अपने गुण पर्यायोंको व्याप्त करे सो सत् है, उत्पाद (उत्पत्ति ) व्यय ( नाश )ध्रौव्य (ध्रुवता वा नित्यता )से जो युक्त हो उसको सत् कहते हैं। क्योंकि-उत्पादव्यय- . धौव्ययुक्तं सद, यह तत्त्वार्थ शास्त्रका सूत्र है। जो अर्थ क्रियाका करनेवाला है। वह सत् कहलाता है; क्योंकि जो पदार्थ अर्थक्रियाकारक (प्रयोजनसिद्ध करनेवाला) है; वही परमार्थमें सत् है. । और जो पदार्थ अर्थक्रिया नहीं करता वह परसे भी असत् है। 'ये सब सत्के लक्षण हैं ॥ जो निज २ प्रदेशसमूहोंकेद्वारा अखण्डवृत्त स्वभाव तथा । विभाव पर्यायसे द्रवता है; द्रवेगा अथवा द्रवागया सो द्रव्य है । जो गुण तथा पर्याय- चाला है। उसको द्रव्य कहते हैं; अथवा जो गुणोंका आश्रय है; वह द्रव्य कहलाता है । यही विषय विशेषावश्यक सूत्रकी वृत्तिमें कहा है कि जो द्रवाता है, अथवा द्रवा जाता है, सत्ताका अवयव है, सचाका विकार है, गुणोंका संद्राव ( समूह ) है; जो भावका भ- व्य है जिसका पर्याय पहले कियागया है; सो सब द्रव्य है; अर्थात् ये सब पृथक् २ द्र व्यके लक्षण हैं; ( यह तो गाथाका भावार्थ है; और आगे इस ही गाथाकी व्याख्या करते हैं ) जो उन उन पर्यायों को प्राप्त हो अथवा त्यागे सो द्रव्य है। १ । जो अपने पर्यायोंसे प्राप्त किया जाय या छोडा जाय वह द्रव्य कहलाता है। २।नाम सताका है; उसहीका जो अवयव हो सो द्रव्य है । ३ । अथवा सत्ताहीका जो विकार हो उसको द्रव्य कहते हैं। १ । भावार्थ-अवान्तर ( मध्यमें होनेवाले ) जो सचारूप द्रव्य है ये महासत्ताके अवयव अथवा विकार होते ही हैं । गुण जो रूप रसआदि हैं। उनका जो संद्राव ( संमेलन वा समूह ) घटादिरूप पदार्थ है; वह भी द्रव्य है । ५ । जो हो- गा सो भाव है; उस भावी पर्यायके योग्य जो पदार्थ है; वह भी द्रव्य है ।. जैसे राजकुमारमें , 7 "दुका अर्थ सत्ता धातुवाको अनेधार्थक मानके किया है तव ४ शन्दसे । तस्य विकारः-पा.३३ इस अधिकारम" दोघ । पा० ३१६२। इस सूत्रसे यत् . प्रलय होनेमे x = दो x 1 = द्रव्यम् । ऐसेन्य शब्द सिद्ध हुआ।

। . . रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् राजापर्याय की योग्यता है; अतः यह राजकुमार राजारूप पर्यायका द्रव्य है । ६। और ऐसे ही जिसका भाव (पर्याय ) पूर्वकालम कियागया है; वह भी द्रव्य है । ७ । ये सब द्रव्यके लक्षण हैं । यही पूर्व अनेक प्रकारसे व्याख्यात द्रव्य ही है। प्रयोजन जिसका उ. ''सको द्रव्यार्थिकनय कहते हैं । द्रव्यार्थिक इस शब्दमें व्याकरणकी रीतिसे प्रयोजन है। इस अर्थमें “ टक " प्रत्यय, है, और उसको इक आदेश होनेसे द्रव्यार्थ + इक - होकर द्रव्यार्थिक ऐसा शब्द सिद्ध होता है । शुद्ध अर्थात् कर्मोकी उपाधिसे रहित ऐसा जो द्रव्यार्थिकनय है; उसको शुद्ध द्रव्यार्थिकनय कहते हैं ।। ९ ।। अथ तस्य द्रव्यार्थिकस्य शुद्धताया विषयं दर्शयन्नाहं । अव उस द्रव्यार्थिकनयकी शुद्धताका विषय दर्शाते हुए यह सूत्र कहते है । . सूत्रम् ।। यथा संसारिणः सन्ति प्राणिनः सिद्धसन्निभाः। शुद्धात्मानं पुरस्कृत्य भवपर्यायतां विना ॥१०॥ सूत्रभावार्थ:-जो संसारकी पर्यायताको ग्रहण करके अन्तरङ्गमें विद्यमान शुद्ध आत्माको आगे करके कथन करता है; वह शुद्धद्रव्यार्थिकनय है; जैसे संसारके प्राणी सिद्धोंके समान है ॥ १० ॥ '. व्याख्या । प्राणा द्रव्यभावभिन्नाः सन्ति एषां ते प्राणिनः । संसारो गतिचतुष्काविर्भावः । सोऽलि येषां ते संसारिणः । यथा येन प्रकारेण शुद्धात्मत्वादिलक्षणेन सिद्धसन्निभा अष्टक मनिर्मुक्तजीवनिभा, विद्यन्ते । किं कृत्या सन्ति शुद्धात्मानं मूलभावं तथा सहजभावं शुद्धा. त्मनः स्वरूपं पुरस्कृत्याने कृत्या कथं विना केन विना भवपर्यायतां भवः संसारतस्य पर्यायो भावसत्ता भवपर्यायता तां विना । एतावता या चानादिकालिकी जीवस्य संसारावस्था वर्स- ते सा प्रस्तुतापि न गण्यते । अविद्यमानोऽपि वाह्यकारेण सिद्धाकारस्तथापि गृह्यतेऽन्तरवि- द्यमानत्वात् । तदायमात्मा शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन सिद्धसम एवास्तीति भावः । अत्र भावमात्र. परा द्रव्यसङ्ग्रहगाथा । मग्गणगुणठाणेहिं चउदशाह हवंति तह अशुद्धणया । विष्णेया । सं- सारी सब्ये सुद्धाहु सुद्ध णया । १ ॥ १० ॥ व्याख्यार्थ:-जैसे भव जो संसार उसका जो पर्याय अर्थात् भाव उसका जो भाव है, उसके विना अर्थात् संसारकी पर्यायताके विना शुद्ध आत्माको अर्थात् मूल भाव अथवा सहजभावरूप शुद्ध आत्माके खरूंपको भागे करके, नरक, तिर्यक्, म- नुष्य और देव इन चारों गतियों के अविर्भावको संसार कहते हैं; यह संसार जिनके होय अर्थात् जिन जीवोंके पूर्वोक्त नरकमादि चार गतियों से किसी एक गतिका आविर्भाव ' • (प्रकटता) है; वे संसारी कहलाते (द्रव्यप्राण और भावप्राणरूप दोनों प्राण जिनके हैं; वे प्राणी हैं;) ऐसे जो संसारी प्राणी वे सिद्धोंके समान है; अर्थात् ज्ञानावरणमादि १ व्याख्या सण्डान्वयसे है परन्तु व्याख्यार्थ अच्छी प्रकारसे अर्थका बोध होनेकेलिये 'दण्डान्वयके र लिखा गया है। -- द्रव्यानुयोगतर्कणा। ६९ भाठों कोसे रहित जीवोंके समान विद्यमान है । तात्पर्य यह कि-जब जीवके जो अना. दिकालसे संसारकी अवस्था विद्यमान है; उसकी तो प्रस्तुतकी भी गणना (गिणती ) न की जाय और बाह्य आकारसे अविद्यमान जो सिद्ध स्वरूप है; उसको अभ्यन्तरमें विद्य- मान होनेसे ग्रहण करें तब यह आत्मा शुद्ध द्रव्यार्थिकनयसे सिद्धोंके समान ही है; यही पर भावमानसे शुद्ध आत्माका बोध करनेमें तत्पर द्रव्यसङ्ग्रहकी गाथा भी है उसका भा- वार्थ यह है; कि-चतुर्दश १४ गुणस्थान तथा चतुर्दश मार्गणस्थानके भेदसे चतुर्दश १४ प्रकारके संसारी जीव अशुद्धनयकी विवक्षासे होते हैं और शुद्धनयकी विवक्षा भावमानके ग्रहण करनेसे तो सर जीव शुद्ध ही समझने चाहिये । १।॥ १० ॥ अथ द्वितीयभेदमुपदिशन्नाह । अब दूसरे उपदेश करते हुए कहते हैं। सूत्रम् । उत्पादव्यययोगौणे सत्तामुख्यतया परः। शुद्धद्रव्याधिको भेदो ज्ञेयो द्रव्यस्य नित्यवत् ॥ ११ ॥ सूत्रभावार्थ:-उत्पाद ( उत्पत्ति ) और व्यय ( नाश ) इनकी गौणता माननेसे तथा सत्ता (ध्रुव अथवा नित्यरूप )की मुख्यता माननेसे. सत्ताग्राहक' शुद्ध द्रव्यार्थिक नय द्रव्यकी नित्यताके समान समझना चाहिये ॥ ११ ॥ व्याख्या । उत्पादस्य व्ययस्य च गौणतायां तथा सचाया ध्रुवात्मकतायाश्च मुख्यतायामपर इति द्वितीयो भेदः शुद्धद्रव्यार्थिकस्य ज्ञेयः । यत उत्पादव्यययोगौणत्वेन सत्ताप्राहकः शुद्धं- "द्रव्याथिको नाम द्वितीयो भेदः । २ । अस्य मते द्रव्यं निसं गृह्यते।निसं तु कालनयेऽप्यवि- चलितस्वरूपं सत्तामादायैवेदं युज्यते । कथं पायाणां प्रतिक्षणं ध्वंसिनां परिणामित्वेनानि- त्यत्योपलव्धेः । परन्तु जीवपुद्गलादिद्रव्याणां सत्ता अव्यभिचारिणी नित्यभावमवलंब्य त्रिकालाभिचालितस्वरूपावतिष्ठते । ततो द्रव्यस्य नित्यवदिति द्रव्यस्य नित्यत्वेन द्वितीयो भेदः ॥ ११ ॥ व्याख्यार्थ:--पर्यायादिके उत्पाद और व्ययकी गौणतासे विवक्षा करनेपर तथा ध्रुव (नित्य )स्वरूप सत्ताकी मुख्यतासे विवक्षा करनेपर अपर अर्थात् शुद्ध द्रव्यार्थिक नयका दूसरा भेद जानना चाहिये । क्योंकि जब उत्पत्ति और नाश गौण हुए तब केवल सत्तामात्रका ग्राहक वह नय रहा इसलिये यह द्रव्यार्थिकनयका सत्ताग्राहक शुद्ध द्रव्यार्थिक नामवाला दूसरा भेद है । इस नयके मतमें द्रव्यका नित्य स्वरूपसे ग्रहण होता है । और नित्य जो है; सो भूत, भविष्यत् वर्तमान इन तीनों कालोमे अविचलितवरूप है। और यह त्रिकालमें अविचलितस्वरूप नित्य सत्ताको ग्रहण करके ही ठीक होता है। क्योंकि-क्षण क्षणमें विनाशशील पर्यायोंके परिणामीपना है; अतः उन पर्यायोंमें अनित्य- ताकी उपलब्धि होती है; परन्तु जीवं पुद्गलआदि द्रव्योंकी जो सत्ता है; वह सदा अ- । -- ७० - रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् व्यभिचारिणी है अर्थात् नित्यभावका आश्रय करके तीन , कालमें अविचलितस्वरूप ( अटलरूप ) रहती है । इसलिये द्रव्यके नित्यपनेसे यह सत्ताग्राहक शुद्धद्रव्यार्थिक नामक द्रव्यार्थिकनयका द्वितीय मेद सिद्ध होगया ॥ ११ ॥ अथ तृतीयभेदमुपदिशन्नाह । अब तृतीय भेदको दर्शाते हुए कहते हैं। सूत्रम् । कल्पनारहितो भेदः शुद्धद्रव्यार्थिकाभिधः । तृतीयो गुणपर्यायादभिन्नः कथ्यते ध्रुवम् ॥ १२ ॥ सूत्रभावार्थ:-जो गुण तथा पर्यायसे अभिन्न है वह भेदकी कल्पनासे रहित शुद्ध द्रव्यार्थिक नामवाला द्रव्यार्थिकनयका तीसरा भेद कहा जाता है ॥ १२ ।। व्याख्या । भेदकल्पनया रहितः कल्पनारहितस्तृतीयो भेदः शुद्धद्रव्यार्थिकनामास्ति । ३ यथा जीवद्रव्यं पुद्गलादिद्रव्यं च निजनिजगुणपर्यायेभ्यश्चाभिन्नमस्ति । यद्यपि भेदो वर्त्तते द्रव्यादीनां गुणपर्यायेभ्यस्तथापि भिन्नविषयिण्यर्पणा न कृता । अभेदात्यैवार्पणा कृता अतःकारणाद्यद्रव्यं तत्तद्रव्यजन्यगुणपर्यायाभिन्नं तिष्ठति यदेव द्रव्यं तदेव गुणो यदेव द्रव्य तदेव पर्यायो महापदजन्यखण्डपटवत्चदात्मकत्वात् । अत्र हि विवक्षावशानिन्नाभिन्नत्वं ज्ञेयमिति ॥ १२॥ व्याख्यार्य:-भेदकी कल्पनासे रहित होनेसे कल्पनारहित तृतीय भेद शुद्धद्रव्या- र्थिक नामक है; अर्थात् द्रव्यार्थिकनयके तीसरे भेदका नाम कल्पनारहित शुद्धद्रव्या- र्थिक है । जैसे जीव द्रव्य तथा पुद्गलआदि द्रव्य अपने अपने गुण तथा पर्यायोंसे अभिन्न है, यद्यपि द्रव्यआदिके गुण तथा पर्यायोंसे भेद भासता है; तथापि भेदके विषययाली भ. पणा नहीं की, अभेदनामक ही अर्पणा की। इस हेतुसे जो द्रव्य है; वह उस द्रव्यसे उ- त्पन्न होने योग्य गुण और पर्यायोंसे अभिन्नरूप स्थित है, क्योंकि जो द्रव्य है; वही गुण जो द्रव्य है; वही पर्याय है; तदात्मकपनेसे, जैसे कि-महापट ( बढे वस्त्र )से उत्पन ख- ण्ड पट (छोटा वस्त्र) भावार्थ-एक बडे वस्त्रको फाड़कर उसमेसे छोटा वस्त्र निकालें तो वा- लवमें वह छोटे वस्त्ररूप पर्याय बडे वखरूप द्रव्यसे अभिन्न ही है; क्योंकि वह छोटा वस्त्र बड़े वस्त्रवरूप ही है। ऐसे ही जितने गुण और पर्याय हैं; वे तदात्मकतासे द्रव्यरूप ही हैं। यहां द्रव्य और पर्यायका भेद तथा भभेद विवक्षाके यशसे जानना चाहिये अर्थात् जब द्रव्यस्वरूपसे विवक्षा करेंगे तब तो द्रव्यपनेसे सब गुण, पर्याय अभिन्न हैं; और जय प- यरूपसे विवक्षा करेंगे तब सब गुण पर्याय द्रव्यसे मिन्न हैं ।। १२ ।। अथ चतुर्थभेदमाह । अब चतुर्थभेदका कथन करते हैं। सनम् । कर्मोपाधेरशुद्धाख्यश्चतुर्थो भेद ईरितः।. कर्मभावमयस्त्वात्मा फ्रोधी मानी तदुद्भवात् ॥ १३ ॥ है ;

दाव्यते न तु . द्रव्यानुयोगतर्कणा। सूत्रभावार्थ:-कर्मोंकी उपाधिके कारण अशुद्धद्रव्यार्थिक चतुर्थ भेद कहागया है क्योंकि-कर्मोकी प्रकृतिमय होनेसे क्रोधादिकी उत्पत्तिद्वारा आत्मा, क्रोधी · मानी इ. त्यादि व्यवहारयुक्त होता है ॥ १३ ॥ व्याख्या । कर्मोपाधेः सकाशात् कर्ममिश्रजीवद्रव्यस्थाशुद्धत्व जायते । ततः कोपाधेर शुद्धद्रव्यार्थिकश्चतुर्थो भेदः कथितः । यतः कोपाधिसापेक्षोऽशुद्धद्रव्यार्थिक इति भेदः । अस्य च लक्षणं कथयति । यथा कर्मभावमयः कर्मणां ज्ञानावरणादीनां भावाः प्रकृतयस्ते म. चुरा यत्रेति कर्मभावमय आत्मा तादृग्रूपो लक्ष्यते। येन येन कर्मणा आगत्यात्मा निरुद्ध्यते तदा तत्तत्कर्मस्वभावतुल्यपरिणतः सन् व्यवहियते । यतः क्रोधोदयाजीत्रः क्रोधीति व्यपदिश्यते मानकर्मोदयाजीवो मानीति व्यपदिश्यते । एवं यदा,यद्रव्यं येन भावेन परिणमति तदा चगव्यं तन्मयं कृत्वा शेयम् । यथा लोहोऽमिना परिणतो यदा काले प्राप्यते तदा अमिरूप रूपः । एवमात्मापि मोहनीयकर्मोदयेन यदा क्रोधादिपरिणतः स्यात्त- दा क्रोधादिरूप एव योद्धन्यः । अत एवाष्टावात्मनो भेदाः सिद्धान्ते व्याख्याता इति ॥१३॥ व्याख्यार्थ:-कोकी उपाधिसे अर्थात् आत्मा जब कर्मोंको ग्रहण करता है तब वह कर्मोपाधिसहित कहाता है; और कर्मोंसे मिलित होनेसे जीवद्रव्यके अशुद्धता उ. त्पन्न होती है, इस कारण कर्मरूप उपाधिसे भशुद्ध चोथा भेद द्रव्यार्थिक कहागया है; क्योंकि-कर्मोपाधिको अपेक्षा रखनेसे इस चतुर्थ भेदका नाम अशुद्धद्रव्यार्थिक है । इस- का लक्षण कहते हैं; कि-जैसे कर्मभावमय जब आत्मा होता है, अर्थात् कर्म जो ज्ञानाव- रण दर्शनावरणआदि हैं; उनकी जो प्रकृतियें है; वे जब आत्मप्रदेशमें प्रचुर ( अधिक ) रूपसे एकत्र हो जाती हैं; उस समय आत्मा है; वह ताइवरूप अर्थात् कर्मस्वरूप ल- क्षित होता है; अर्थात् जो जो कर्म आकर आत्माको रोकते हैं; अर्थात् आत्मा जिस २ कर्मरूपी बंधनसे बद्ध होता है तब उस उस कर्मके स्वभावके तुल्य व्यवहारमें लाया जा- ता है; क्योंकि-क्रोधके उदयसे जीवको क्रोधी कहते हैं; एवं मानकर्मके उदयसे जीव मानी कहाजाता है । इसी प्रकार जवजो द्रव्य जिस भावसे परिणत होता है तब उस- को उस भावरूप करके जानना चाहिये । जैसे अग्निमें गिराहुआ लोह जब अग्निखरूपसे परिणत हुभा मिलता है; अर्थात् साक्षात् अग्निके समान बन जाता है; तब उसको अग्नि- रूप ही कहते हैं; नकि-लोहरूप । ऐसे ही आत्मारूप द्रव्य भी मोहनीयआदि को- के उद्यसे जब क्रोधादिरूपसे परिणत होवे तब उस आत्माको क्रोधादिरूप ही जानना चाहिये । इस ही कारणसे जैनसिद्धान्तमें आत्माके आठ भेद वर्णन किये गये हैं अर्थात् इस अशुद्धद्रव्यार्थिकनयकी अपेक्षासे आठ कर्मोकी उपाधियश जीवके आठ ८ भेद शासमें कह गये हैं ॥ १३ ॥ १ जब आत्माके क्रोधादि कर्मका उदय आता है; तब भात्मा उनका लरूप ही बनजाता है; उनसे अपने स्वरूपको अलग नहीं करसकता किन्तु तन्मय हो जाता है; इसीसे क्रोधीआदि शब्दोंद्वारा व्यवहन होता है।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् अथ पंचमभेदमाह । अब पंचम (पांचवें) भेदका निरूपण करते हैं। सूत्रम् । उत्पादव्ययसापेक्षोऽशुद्धद्रव्यार्थिकोऽग्रिमः । एकस्मिन्समये द्रव्यमुत्पाद्व्ययधौव्ययुक ॥ १४ ॥ सूत्रभावार्थ:-उत्पत्ति और नाशकी अपेक्षासहित होनेसे अशुद्ध द्रव्यार्थिक पं- चम (पांचवां) भेद कहाँगया है; क्योंकि-एक ही समयमें द्रव्य उत्पत्ति, नाश तथा धीव्य (नित्यता)से संयुक्त है ॥ १४ ॥ :: व्याख्या । उत्पादययसापेक्षः पञ्चमो भेदोऽशुद्धद्रव्याधिको ज्ञेयः । यस उत्पादव्ययसापे- क्षः सत्ताप्राहकोऽशुद्धद्रव्यार्थिकः पञ्चम इति । ५। यथा एकस्मिन्समये द्रव्यमुत्पाव्य- यधौव्यरूपं कथ्यते । कथं तद्यः कटकाद्युत्पादसमयः स एव केयूरादिविनाशसमयः । पर- न्तु कनकसत्ता कटककेयूरयोः परिणामिन्यावर्जनीयैव । एवं सति त्रैलक्षण्यमाहकत्वेनेदं प्रमाणवचनमेव स्यान्न तु नयवचनामिति चेन्न । मुख्यगौणभावनैवानन नयेन त्रैलक्षण्यप्रह- णान्मुख्यनये स्वस्वार्थप्रहणे नयानां सप्तमङ्गीमुखेनैव व्यापारात् ॥ १४ ॥ व्याख्यार्थ:--उत्पत्ति तथा नाशके सापेक्ष अर्थात् उत्पत्ति और.नाशकी अपेक्षा रख- नेवाला अशुद्धद्रव्याधिक पांचवां भेद नानना चाहिये क्योंकि-उत्पत्ति और व्ययके सापेक्ष तथा सत्ताका ग्राहक जो है; उसको अशुद्धद्रव्याधिक पांचवां भेद मानागया है । ५ । जैसे एक कालमें द्रव्य उत्पाद ( उत्पत्ति ) व्यय ( नाश ) तथा धौव्य (नित्य ) स्वरूप कहा जाता है । यदि यह कहो कि-ये तीनो ( उत्पाद, व्यय तथा ध्रौव्य स्वरूप एक ही कालमें तथा एक ही पदार्थ, कैसे होते हैं तो उसकी व्यवस्था इस प्रकार है। कि-जैसे सु. वर्ण द्रव्यमें जो समय कटक ( कड़ा )आदिरूप पर्यायकी उत्पत्तिका है। वही समय के यूर (बाजू )आदि पूर्व पर्यायके विनाशका भी है; परन्तु कटक और केयूर दोनोंमें जो मुवर्णकी सत्ता है यह परिणामिनी नहीं है, किन्तु सुवर्णरूपता पूर्व पर पर्यायोमें एक भुव (नित्य )स्वरूपसे विद्यमान है; अब कदाचित् ऐसी शंका करो कि-उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यरूपका ग्राहक होनेसे यह प्रमाणवचन हुमा न कि-नयवचन! सो नहीं कह सकते; क्योंकि-मुस्य तथा गौण भावसे ही इस पंचम नयकेद्वारा उत्पाद व्यय प्रौय्यरूप तीन लक्षणोंका ग्रहण होनेसे अपने अपने अर्थ ग्रहणमें मुख्य नय है; और पर अर्थमें नहीं क्योंकि-सय नोंका सप्तभंगीनयके द्वारा ही व्यापार होता है ॥१४॥ १ संपूर्णपसे अनुचे गिर करनेवाला प्रमाग कहलाता है। अतः यही परमयी तीनों सम्मान कपन परदिया तो यह प्रमागहै। २नय वस्तु के एक ही शो गुमनामे करना है। प्रास नय भी यस्तुरी भनेमन्तमस्मता ददानि रिये मतमागारही नाम होता है। + .

. दव्यानुयोगतर्कणा अथ पष्ठभेदमाह। अब द्रव्यार्थिकनयका पष्ठ (छठा ) भेद कहते हैं । सूत्रम् ।' भेदस्य कल्पनां गृहन्नशुद्धः पष्ठ इष्यते । यथात्मनो हि ज्ञानादिगुणः शुद्धः प्रकल्पनात् ॥ १५ ॥ सूत्रभावार्थ:-भेदकी कल्पनाको ग्रहण कहते हुए अशुद्ध द्रव्याधिकनामा छटा ६ भेद माना जाता है, जैसे आत्माके ज्ञानादि शुद्ध गुणोंकी कल्पना भेदको कहती है १५ व्याया। अशुद्धद्रव्याधिकः पष्ठो भेदो भेदस्य भेदभावस्य कल्पनां गृहन् सन् जायते । यथा हि जानादयो गुणाः शुद्धा आत्मनः कथ्यन्त इत्यत्र पष्ठीविभक्तिभेदं कथयति। भिक्षोः पा. अमितिवत् । परमार्थतस्तु गुणगुणिनोर्भेद एव नास्ति । तस्मात्कल्पितो भेदोऽन शेयो न तु साहजिकः॥ १५॥ व्याख्यार्थ:-~-भेदभावकी कल्पनाको ग्रहण करता हुआ अशुद्धद्रव्यार्थिक छटा ६ भेद उत्पन्न होता है; जैसे कि-आत्माके शुद्ध ज्ञानादि गुण फहेजाते हैं; "आत्मनः गुणाः" (आत्माके गुण ) यहांपर पष्ठी विभक्ति भेदको कहती है; जैसे कि-"भिक्षोः पात्रम् " भिक्षुका पात्र यहाँपर भिक्षुकसे पात्रको जुदा दिखलाती है; परन्तु यथार्थमें भिक्षुकके पा. प्रके समान ज्ञानादि गुण तथा गुणी आत्माके मेद नहीं है, इसलिये यहां कल्पित भेद समझना चाहिये न कि स्वाभाविक क्योंकि-गुण और गुणी कहीं जुदे २ नहीं मिलते ॥ १५॥ अथ सप्तमभेदं कथयति। अब सप्तम (सात) भेदको कहते हैं। सूत्रम् । अन्वयी ससमश्चैकस्वभायः समुदाहृतः । द्रव्यमेक यथा मोक्तं गुणपर्यायभावितम् ॥१६॥ सूत्रभावार्थ:--अन्वयी द्रव्यार्थिक सप्तम भेद कहा गया है, जैसे कि-गुण तथा पर्यायोंसे युक्त द्रव्य एक ही स्वभाव कहा है ॥ १६ ॥ व्या०-अन्ययद्रव्यार्षिक: सप्रमो भेद एकस्वभाव उपः । यथा द्रव्यं धैक गुणैः पयर्या- यैश्च भावितं वर्तते द्रव्यमेकं गुणपर्यायसभावमति। गुणेषु रूपादिपु पर्यायेषु कम्युमीवादिषु द्रव्यस्य परस्पान्वयोऽस्ति । यतस्तत्सरचे तत्सत्त्वमन्वयः । अथया सनि सद्भायोऽन्ययो यथा सति दण्डे पटोत्पत्तिः ।अत एक यदा द्रव्यं ज्ञायते सदा द्रव्यादिशेन तदनुगतसर्वगुगपयांया अपि शायन्ते । यथा सामान्यप्रसासत्या परस्य सर्वा व्यष्टिरप्ययगन्तत्र्या । व्यापारि शेयमित्यन्ययद्रव्याधिः समम इति ॥ १६॥ व्याख्या:--अन्वपद्रव्याधिक नामबाला सप्तम भेद एकस्वभाव कहा गया है, जैसे एक ही द्रव्यं गुण और पर्यायोंसे युक्त है। अर्थात् एक इण्य गुणपर्यापसमात्र है। भादिक गुणोमें और कंयुग्रीवभादि पर्यायोमें द्रव्य जो घट है। यमका अन्यय है; क्योंकि- ।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् जिसके होते जिसकी विद्यमानता हो अर्थात् गुण पर्यायोंके रहनेपर घटआदि द्रव्यका. जो अवश्य रहना है; वह अन्वय कहलाता है; अथवा जिसके रहते जिसकी उत्पत्ति हो 'वह अन्वय है; जैसे दंडकी सत्तामें घटकी उत्पत्ति होती है; "अर्थात् दण्ड कारण होय तत्र ही तो घट (कार्य) उत्पन्न हो अन्यथा नहीं" यह भी मन्वय कहा जाता है । द्रव्यस्व: रूपका संपूर्ण गुण पर्यायोंमें अन्वय है; इसी कारण जब द्रव्यस्वरूप ज्ञात होता है तब द्रव्यार्थके आदेशसे उस द्रव्यके साथ अनुगत जितने गुण और पर्याय है; वे भी जाने जाते हैं । जिस प्रकारसे कि-सामान्यकी प्रत्यासत्तिसे किसी एक घटआदि व्यक्तिका ज्ञान होने. से उस जातिसहित संपूर्ण व्यक्तिये जानी जाती हैं । ऐसे ही यहां भी एक स्वभावके अन्वयसे यह अन्वय द्रव्यार्थिक सप्तम नय भी जानलेना चाहिये ॥ १६॥ अथाष्टमभेदोत्कीर्तनमाह । भव अष्टम भेदके कीर्तनको कहते हैं। सूत्रम् । स्वद्रव्यादिकंसवाही घष्टमो भेद आहितः। स्वद्व्यादिचतुष्केभ्यः सन्नों दृश्यते यथा ॥१७॥ सूत्रभावार्थ:-स्वकीय द्रव्य क्षेत्रादिका ग्राहक होनेसे स्वव्यादिग्राहक द्रव्यार्थिक यह अष्टम भेद कहागया है; जैसे स्वद्रव्यादि चतुष्टयकी अपेक्षासे घटआदि पदार्थ सद्पसे ही दृष्ट होता है ॥ १७ ॥ व्याख्या-स्वद्रव्यादिग्राहको द्रव्यार्थिकोऽष्टमो भेद: कथितः । यथार्थो घटादिः स्वद्रव्यतः वक्षेत्रतः स्वकालतः स्वभावतः सन्नेव प्रवर्तते । स्वदव्यावदः काञ्चनो मृन्मयो वा ॥१॥ स्वक्षेत्रावटः पाटलिपुत्रो माथुरो वा । २ । वकालाद्धटो वासन्तिको प्रेमो वा ।३ । स्वभावा- द्धदः श्यामो रक्तो वा । ४ । एवं चतुर्वपि घटद्रव्यस्य सत्ता प्रमाणसिद्धवास्ति । स्वद्रव्यादि- प्राहको द्रव्यार्थिकोऽष्टमो भेद इति ज्ञेयम् ॥ १७!! व्याख्यार्थ:-अपने द्रव्यआदिको ग्रहण करनेवाला अष्टम द्रव्यार्थिक भेद कहा गया है। जैसे घटआदि पदार्थ अपने द्रव्यसे १, अपने क्षेत्रसे २, अपने कालसे ३, तथा अपने स्वभावसे सत् ( विद्यमान )रूप ही प्रवृत्त होताहै । स्व( निज )द्रव्यसे घट सुवर्ण- का बनाहुआ है; अथवा मृतिकासे बनाहुना है; १, अपने क्षेत्रसे घट पटनेका वा मधुराका है; २, अपने कालसे घट वसन्त ऋतुका अथवा ग्रीष्म ऋतुका है।३, अपने भावसे घट श्याम वा रक है। ४, ऐसे स्वकीय द्रव्य, क्षेत्र, काल, और भाव इन चारोमें घटव्यकी सत्ता प्रमाणसे सिद्ध है। इसलिये "स्वद्रव्यादिग्राहक व्यार्थिकनय" यह अष्टम भेद जानना चाहिये ॥ १७ ॥ १ सवपर रहनेवाला सामान्य धर्म, तद्प प्रसासत्ति अर्थात् एक प्रकारकी व्यक्ति अर्थात् जैसे एक प्रकारकी घटआदि व्यक्तियोंपर रहनेवाले तिर्यक् सामान्य से सर्व व्यक्तियों का बोध होता है; ऐसे ही द्रव्यरुपके अन्द. यसे सब गुण पर्यायोंका ज्ञान होता है ।

दव्यानुयोगतर्कषा। अथ नवमभेदमाह । अब नवम भेदको कहते हैं। सूत्रम् । परद्रव्यादिकग्राही नवमो भेद उच्यते । परद्रव्यादिकेभ्योऽसन्नर्थः संभाव्यते यथा ॥१८॥ सूत्रभावार्थ:-परद्रव्यआदिका ग्रहण करनेवाला नवम ९ भेद कहा जाता है, जैसे परद्रव्यआदिकी अपेक्षासे पदार्थ (घट), असत्रूपसे संभावित होता है ॥ १८ ॥ घ्याख्यातेपु द्रव्यार्थादिषु परद्रव्यादिपाहको द्रव्यार्थिको नवमः (९) यथार्थों घटादिः परद्रव्यादिचतुष्टयेभ्योऽसन् वर्तते । घटापेक्षया परद्रव्यं पटोऽतस्तन्त्वादिभ्यो घटोऽसन्न- स्ति । १ । परक्षेत्राद्यथा घटो माथुरो वर्चते न काशीजः किन्तु घटक्षेत्रं मथुरा तदपेक्षया फाशीभिन्ना अत एव परक्षेत्रात्काशीलक्षणादसन् घटः ।२। परकालाद्यथा घटो वसन्ते निप्प- नोऽतो वासन्तिको घटः, वसन्तापेक्ष्या गैप्मो भिन्नस्ततो ग्रीष्मकालजाद्वासन्तिको घटोऽसन् । ३ । परभावाद्विवक्षितश्यामादिभावापेक्षया रक्तो घटोऽसन्वर्त्तते । ४ । एवं परद्रव्यादि- प्राहको द्रव्यार्थिको नवमः । ९॥ १८ ॥ व्याख्यार्थ:- :-उन द्रव्यार्थआदिमें परद्रव्यआदिका ग्राहक होनेसे परद्रव्यादिग्राहक । द्रव्यार्थिकनामक नवम भेद है । जैसे घटादि पदार्थ परद्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव- रूप चतुष्टयकी अपेक्षासे असत् (अविद्यमान)रूप ही वर्तता है । घटकी अपेक्षासे परद्रव्य पट है, इस हेतुमे तन्तु (सूत)आदिसे घट असत् है, अर्थात् पटादिरूपसे घेट नहीं है ।। इसी रीतिसे परक्षेत्रकी अपेक्षासे भी जैसे घट मधुरामें बना हुआ है; न कि-काशीम उत्पन्न हुआ और घटका क्षेत्र(स्थान)ज़ो मथुरा है, उसकी अपेक्षा काशी भिन्न है। इस ही कारण काशीरूप जो परक्षेत्र है; उसकी अपेक्षासे घट नहीं है ।। परकालकी अपेक्षासे जैसे घट वसन्तकालमें उत्पन्न हुआ इसकारण घट वासन्तिक हुआ और इस वसन्त ऋतुकी अपे- क्षासे ग्रीष्म ऋतु भिन्न है। अतः ग्रीटम(गर्मी)के–कालमें उत्पन्न हुए घटसे बसन्त समयमें उत्पन हुआ घंट असत् है ।३। ऐसे ही परभावसे भी विवक्षित श्यामआदि भावकी अपे. ‘क्षासे रक्त घट असत् है ।४। ऐसे परद्रव्यादिका ग्राहक नवमां द्रव्यार्थिकनय है ॥१८॥ अथ दशमभेदोत्कीर्तनमाह । अब दशम भेदका कथन करते हैं। १ सप्त भगोमें स्यादति और सानास्तिका निरूपण प्रथम करचुके हैं, उसका यदी अभिप्राय है; कि स. कीय द्रव्यादिकी अपेक्षासे तो घट है; परन्तु परकीय द्रव्यादिकी अपेक्षासे घट नहीं है; अर्थात् पदार्थके स्वस्पसे जैसे अस्तित्व पदार्थका खरूप भासता है। ऐसे ही परकीयरूप द्रव्यादिको अपेक्षासे नास्तित्व भी पदार्थका खरूप ही है, यही स्याद्वादका रहस्य है। २ जैसे पदव्यरूपसे घटकी असत्ताका भान होता है; ऐसे परकाल जो प्रीष्म है; उसकी अपेक्षासे घट नहीं । है, अर्थातू घटकी अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावसे तो सत्ता है; और परद्रव्यादि चतुष्टयसे असत्ता है । . ܫܚܘ ७७ . द्रव्यानुयोगतर्कणा! कौद्दङ्मकरन्दमईक्रमाम्भोजभवमहतां श्रीतीर्थफराणां क्रमाश्चरणास्त एवाम्भोजानि कम- लानि तेभ्यो भव उत्पत्तिर्यस्य तदर्हत्क्रमाम्भोजभवं जिनेश्वरचरणपङ्कजसंभवम् । पुनः कीहक् सुगन्धं शोभनो गन्धः आमोदो यस्य तत्सुगन्धमिति पद्यार्थः। यथालयोऽम्भोजनवं सुगन्धमिएं मकरन्द निपीय सौहित्यमवाप्नुवन्ति । तथा भव्या एतद्झानाख्यं परमभावमिष्टं निपीय स्वभावमवानुवन्ति । अन्यद्विशेपणैस्तुल्यत्वं ज्ञेयम् । भव्यानामलिसादृश्यं ज्ञानस्य च मकरन्दसादृश्यं च युक्तोपमात्वं, जिनक्रमे कमलोपमानञ्च साधर्म्यतया चेत्यपि. बोध्यम् । आसन्नसिद्धिकाः, परमरुचिपरा इहामुत्रफलविरागा, इन्द्रियमात्रविपयायशा, नित्यसंवेग- शान्तहृदया, विपाकलब्यनिसर्गबोधोदयेन परमभावेन ज्ञानेनाशेषकलुपकर्मसन्ताननिर्नाशन- प्रकटितशुद्धशुष्ठध्याननैर्मल्यविधूतशेपकर्मप्रकृतिशुभतयोत्कर्माणो, निजभावमनन्तचतुष्टयात्म- कसौहित्यसंपूरितमनसं शिवावासमासादयन्तीति भावः ॥ २० ॥ इति श्रीकृतिभोजविनिर्मिवायां द्रव्यानुयोगतर्कणायां पञ्चमोऽध्यायः । व्याख्यार्थः :-गया है भय जिमका वह वीतभय अर्थात् रात्रि दिन आकस्मिक भयसे रहित भव्यालि अर्थात् मोक्षके अधिकारी भव्यजनरूपी भमर, इष्ट (प्यारा) अर्थात् भवकी विपाक- तासे उत्कृष्ट रुचिका देनेवाला, और श्रीजिनेन्द्रके चरणरूपी कमलों से जिसकी उत्पत्ति है; ऐसा तथा श्रेष्ठ गन्धके धारक इस उत्कृष्ट ज्ञाननामक मकरन्द(पुप्परंस)को पीकर अपने आस्माका जो परमभावरूप सौहित्य (तृप्ति) है; उसको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार पद्यका अर्थ है; तात्पर्य इसका यह है कि अमर जैसे कमलसे उत्पन्न इष्ट मकरन्दको पान- करके परमतृप्तिको पाते हैं। ऐसे ही भव्य जन इस ज्ञाननामक इष्ट परममावको पीकर स्वभा- वको प्राप्त होते हैं । अन्य सब विशेषणोंसे ज्ञान तथा मकरन्दकी तुल्यता समझ लेनी चा- हिये । और भयोंके भ्रमरका सादृश्य और ज्ञानको मकरन्दका सादृश्य जो दिया है। यह उपमाके योग्य ही है। तथा जिन भगवान्के चरणोंके कमलकी जो उपमा दी है, सो भी साधर्म्यसे ही है; यह भी जानना चाहिये । समीप है। मुक्ति जिनकी ऐसे तथा ज्ञानकी प्राप्तिमें परम प्रीतिके धारक, इस लोक और पर लोकसम्बंधी स्वर्गादिकोंके सुखरूप फ- लोमें रागरहित, पांचों इन्द्रियोंके विषयों की आधीनतासे मुक्त, निरन्तर संवेगसे शान्त. हृदयके धारक, विपाकसे प्राप्त स्वाभाविक ज्ञानके उदयरूप परम भाव जो ज्ञान है; उस- करके संपूर्ण मलिन कर्मोके घाती या कर्मोके नाश करनेसे प्रकट हुवा जो शुद्ध शुक्रध्यान उसकी निर्मलतासे नष्ट करी है; याकिके कर्मोकी अर्थात् चार अघाती या कर्मोंकी प्रकृति- रूप शुभश्रेणी जिन्होंने और अत एव कर्मरहित ऐसे भव्यजन अपने भावको अर्थात् अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत सुख, अनन्त वीर्यरूप अनन्तचतुष्टयलक्षणतृप्तिसे भरेहुए, अंतरहित ऐसे मोक्षस्थानको प्राप्त होते है; यह भाव है ॥ २० ॥ . इति श्रीपण्डितठाकुरप्रसादशास्त्रिविरचितभाषाटीकासमलढतायां द्रव्यानुयोगतर्कणायां पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ .

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्
अथ पठाध्याय पर्यायाथिकनयं विवृणोति । तत्रादौ पर्यायाधिकः पड्डियोऽतस्तमेव की..
यन्नाह । तत्रापि नमस्कारगर्भितं जिनवाक्यस्वरूपं प्ररूपयति ।
अब षष्ठ(छठे) अध्यायमें पर्यायार्थिकनयका विवरण करते हैं उसमें आरंभमें पर्यायार्थिकके
६ भेद हैं; उनको ही दिखाते हैं, उसमें भी नमस्कार गर्भित जिनेश्वरकी वाणीके स्वरूपका
निरूपण करते हैं।
सूत्रम् । एकाप्यनाद्याखिलतत्त्वरूपा, जिनेशगीर्विस्तरमाप तकः ।
तत्राप्यसत्यं त्यज सत्यमङ्गी,कुरु स्वयं खीयहिताभिलापिन् ।
मूत्रभावार्थ:-यद्यपि अनादि तथा संपूर्ण तत्त्वोंको धारण करनेवाली जिनवाणी एक
ही है; तथापि तोंसे विस्तारको प्राप्त होगई अर्थात् अनेकरूप धारण करलिये हैं; अतः
हे निज आत्माके हितको चाहनेवाले भव्य ! उस दिगम्बर मतमें भी जो असत्य है; उ.
सका तो त्याग कर और जो सत्य है; उसको स्वीकार कर ॥१॥
व्याख्या-एकापि जिनेशगीरहद्वाणी अर्हन्मुखानिर्गच्छमाना अद्वितीया यथाभापितं
' तथा श्रूयमाणा तथा अनाद्या आदिरहिता एकेन तीर्थकृता यदुपदिष्टं तदनेकेषां पूर्वपूर्वतर-
तीर्थकृतामपि तथैव निरूप्यमाणसादादिरहिता । पुनः कीदृशी अखिलतत्त्वरूपा' समस्त-
तत्त्वमयी तविचारैर्वहुभेदता प्राप बहुप्रकारैर्वहुधा विस्तृता । यतो दिग्वाससां मतमपि
जिनमतं धृत्वैतादृशनयानामनेकाकारतां प्रवर्त्तयति । अतसन्मतेऽपि यद्विमृश्यमानं सत्यं
जायते तदेवागीकुरु, यचासत्यं तत्सर्वमपि यज स्वयमात्मना हे स्वीयहिताभिलापिन् ! निज-
हितकाविन् ! शब्दान्तरत्वेन तन्मवमपि न द्वेषविषयीकर्तव्यम् । सर्वमप्ययकत्वविवक्षया
समखसमेवेति ॥१॥
च्याख्यार्थ:-श्रीजिनेश अर्थात् महत् भगवान्के मुखारविन्दसे निःसृत वाणी एक
(अद्वितीय)रूप ही है; अर्थात् जिस प्रकार श्रीजिनेश्वर भगवान्ने भाषण किया उसीप्रका-
रसे श्रूयमाण (सुननेमें) चली आती है; तथा अनादि अर्थात् आदिरहित है; क्योंकि एक
तीर्थकरने जो उपदेश किया है, वह ही अनेक पूर्व पूर्व काल के जिनेश्वरोंने भी निरूपण
किया है । पुनः वह जिनेशवाणी कैसी है; कि संपूर्ण तत्त्वमयी है; अर्थात् उसमें सब त.
त्त्वोंका निरूपण है; तथापि अनेक प्रकारके तर्को (विचारों)से अनेक भेदोंको प्राप्त हुई है।
अर्थात् अनेक प्रकारके तकोंसे अनेक रूपोंसे विस्तारको प्राप्त हुई है। क्योंकि-दिगम्बरियोंका
जो मत है; वह भी जिनमतको धारण करके इन द्रव्यार्थिकादि नयाँको अनेक नाकारताको ।
प्रवृत्त करता है। इस कारण हे निजहिताभिलापी भव्यजनो ! उनके मतमें भी जो विषय
विचाराहुआ सत्य हो अर्थात् विचार करनेपर जो तुमको सत्य प्रतीत हो उसीको
स्वयं अर्थात् अपने आत्मासे स्वीकार करो और जो उनके मतमें असत्य है; उस सबको
त्यागो । शब्दमेद होनेसे दिगम्बरोंके मतसे मी द्वेष न करना चाहिये क्योंकि-अर्थके
एकत्यकी विवक्षासे तो उनका भी सब कथन युक्त ही है ॥ १॥

. दव्यानुयोगतर्कणा। *७९ अथ पर्यायार्थिकपड्भेदानाह । अब पर्यायाथिकनयके ६ भेदोंको कहते हैं। सूत्रम् । पर्यायार्थिकपड्भेदस्तत्राद्योऽनादिनित्यकः। पुद्गलानान्तु पर्यायो मेरुशैल इवाचलः ॥२॥ सूत्रभावार्थ:-- पर्यायार्थिक नय ६ भेदों सहित है; उनमें पर्यायार्थिकका प्रथम भेद अनादिनित्यशुद्धपर्यायार्थिक है; जैसे पुद्गलोंका पर्याय मेरु पर्वतकी तरह अचल (अ- नादि नित्य )है ॥२॥ व्याख्या। पर्यायार्थिकथासौ पड्भेश्च पर्यायार्थिकपभेदः पर्यायार्थिको नयः पट् प्रकार इत्यर्थः तत्र तेषु पसु भेदेषु प्रथमो भेदोऽनादिनित्यशुद्धपर्यायार्थकः कथ्यते । न विद्यत आदिर्यस्यानादिः पूर्वकल्पनारहितः, उत्पत्त्यभावान्नित्य एव नित्यकः, " स्वार्थे कः” सदैक- खभावोऽनश्वरत्वात् । अनादिश्च नित्यकश्चेति द्वन्द्वः । अयं च शुद्धपर्यायाधिकः प्रथमः । क इवाचलो मेरुरिव । यथा मेरुः पुद्गलपर्यायेण प्रवाहतोऽनादिनित्यकोऽस्ति, असंख्यातकाले अन्योन्यपुद्गलसंक्रमेणापि संस्थानतः स एव मेरुवर्तते । एवं रत्नप्रभादीनामपि पृथ्वीपर्याया ज्ञातव्या इति ।॥२॥ व्याख्यार्थः-~-पर्यायार्थिकरूप जो पड्भेद इस प्रकारसे यहांपर कर्मधारय तत्पुरुष समास है; भावार्थ-पर्यायार्थिकनय पद् (छ) भेद सहित है । उन पट् भेदोमेसे प्रथम भेद अनादि नित्य शुद्धपर्यायाधिक कहा जाता है; नहीं है आदि जिसका उसको अनादि कहते हैं। पूर्व कल्पनाशून्य होनेसे यह अनादि कहागया है; तथा उत्पत्तिके अभावसे यह नित्य कहागया है; नित्य ही जो है, उसको नित्यक कहते हैं; "नित्य एव नित्यकः" यहांपर स्वार्थ( नित्य शब्दके अर्थ )में क प्रत्यय है, अर्थात् अविनाशी होनेसे जो सदा एक खभाव है, वह नित्यक है; अनादि और नित्यक जो होय सो अनादिनित्यक है; यहांपर द्वन्द्व समास है । यह शुद्ध पर्यायाधिक प्रथम भेद है। किसके समान है कि मेरु पर्वतके समान, जैसे मेरु पर्वत पुद्गलपर्यायसे प्रवाहद्वारा अनादि और नित्य है, अर्थात् असंख्यात कालमें परस्पर पुद्गलोका संक्रम होनेपर भी संस्थानसे वह ही मेरु है; न कि अन्य । इसी प्रकार रत्नप्रभा भूमिआदि पर्याय भी नित्य तथा अनादि समझने चाहियें ॥२॥ अथ द्वितीयो भेदः पर्योयार्थिकस्य कथ्यते । भव पर्यायार्थिकका द्वितीय भेद कहते है। सूत्रम् । पर्यायार्थिकः सादिनित्यः सिद्धखरूपवत् । मूत्रभावार्थः सिद्धवरूपके तुल्य "सादिनित्यपर्यायार्थिक'' यह पर्यायार्थिकनयका द्वितीय भेद है। व्याख्या। पर्यायार्थिको द्वितीयः सादिरादिसहितः पुनर्नित्यःकिवन् सिद्धस्वरूपवन् । यथा ३ रायचन्द्र जैनशासमालायाम् सिद्धस्य पर्यायः सादिरस्त्युत्पत्तिमत्त्वात् । सर्वकर्मक्षयासिद्धपर्याय उत्पन्नः यस्तु नित्योऽवि. नश्वरत्वात् । सिद्धपर्यायः सदाकालावस्थितो लभ्यते । राजपर्यायसमें सिद्धपर्यायद्रव्य भावनीयम् । व्याख्यार्थ:-द्वितीय पर्यायार्थिक सादि अर्थात् आदिसहित है; और सिद्धस्वरूपके समान नित्य है, जैसे उत्पत्तिमान् होनेसे सिद्धका पर्याय सादि है; यद्यपि संपूर्ण कोके • क्षयसे सिद्ध पर्याय उत्पन्न हुआ है; तथापि वह अविनाशी होनेसे नित्य है। क्योंकि-सिद्ध पर्याय सदा कालमें अवस्थितरूप मिलता है, इसलिये राज पर्यायके समान सिद्धपर्याय द्रव्यकी भी भावना करनी चाहिये । अथ तृतीयपर्यायार्थिकः श्लोकार्थेन पुनरमेतनश्लोकानाह । भव तृतीय श्लोकके उत्तरार्द्धसे तथा चतुर्थश्लोकके पूर्वार्द्धसे पर्यायार्थिकका तृतीय भेद कहते हैं। सूत्रम् । सत्तागौणतयोत्पादव्यययुक् सदनित्यकः ॥३॥ एकस्मिन्समये यदत्पर्यायो नश्वरो भवेत् । सूत्रभावार्थ:-सत्ताको गौण माननेसे उत्पत्ति नाशसहित अनित्यशुद्धपर्यायार्थिक यह तृतीय भेद है ।। ३ ।। जैसे एक समयमें जिस पर्यायकी उत्पत्ति होती है; उसका स- मयान्तरमें नाश भी होता है; अर्थात् एक समयमें पर्याय नाशशील भी है। व्याख्या । सत्तागौणतया ध्रुवत्वेनोत्पादव्ययग्राहकः सदनित्यकः मंचासायनित्यकश्या- नित्यशुद्धपर्यायार्थिकः कथ्यते । सच्छब्देन शुद्धमित्यर्थस्तदा अनित्यशुद्धपर्यायार्थिको भवति । कीदृश उत्पादव्यययुक् उत्पादश्च व्ययश्चोत्पादव्ययौ ताभ्यां युक् सहितः ।सनो हि वस्तुन उत्पादव्ययी पर्यायेण भवतस्तस्मात्सत्तागौणतया सत्ताया अप्राधान्येन, उत्पाद्व्यययोः प्राधान्येन " अनित्यशुद्धपर्यायार्थिकः ॥ ॥३॥ तत्र दृष्टान्तमाह ॥ यथैकस्मिन्समये पर्या- यो नश्वरः पर्यायो विनाशी भवेत् । यद्वच्छब्दः यथा पर्यायवाचकः । अत्र हि नाशं कथयवः पर्यायस्योत्पादोऽप्यागतः परं ध्रौव्यं तु गौगत्वेन न दर्शितम् । प्राधान्याप्राधान्ययोः प्राधान्य. विधिवलीवान् । तस्माद्यस्य प्रधानत्वं तस्यैवोत्पत्तिनाशयोः समावेशः । सत्ता हि ध्रुवे नाशे च विचरन्त्यात्मनो गौणत्वव्यपदेशिवर्तमानत्वमुभयत्र निक्षिपतीति । पाल्पा: -मजाको गौण, मानकर अर्थात् अवल्बका आरोप करके. दत्णाद तथा व्यय (उत्पत्ति और नाश)का ग्राहक सदनित्य अर्थात् अनित्यशुद्धपर्यायार्थिक तृतीय भेद कहाजाता है; “सदनित्य'''यहांपर जो सत् शब्द है; उसका शुद्ध यह अर्थ करते हैं; और नित्य अर्थ नहीं करते हैं; तब अनित्यशुद्धपर्यायार्थिक' यह अर्थ हुआ । कैसा है; यह उत्पाद और व्यय इन दोनों करके सहित है। क्योंकि-विद्यमान वस्तुका उत्पाद तथा नाश पर्यायसे होता है; इसलिये सत्ताकी अप्रधानतासे और उत्पाद,तथा व्ययकी प्रधानतासे अनित्यशुद्धपर्यायार्थिक यह तृतीय भेद कहा गया ॥ ३ ॥ इसी विषयमें अग्रिम श्लोकके . - ८२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् शुद्ध स्वरूप सत्ता है; वह सत्ता जय ग्रहण की जाती है, तब नित्य अशुद्ध पर्यायार्थिक यह चतुर्थ भेद सिद्ध होता है । यहांपर सत्ताका जो दर्शन है; सो ही अशुद्ध है; इस 'लिये यह नित्य अशुद्ध पर्यायार्थिक नय कहलाया ! अथ पञ्चमभेदोत्कीर्तनं करोति । अब पंचम भेदका वर्णन करते है। ऽथातः पर्यायार्थिकपञ्चमः ॥५॥ कर्मोपाधिविनिर्मुक्तो नित्यः शुद्धः प्रकीर्तितः। यथा सिद्धस्य पर्यायैः समो जन्तुर्भवी शुचिः ॥ ६॥ सूत्रभावार्थ:- अब इसके आगे पर्यायार्थिकका पंचम भेद ॥ ५॥ नित्यशुद्ध पर्यायाथिक । कहागया है । कैसा है; यह नय कर्मजनित उपाधियोंसे रहित है । जैसे संसारी जीव सिद्ध के पर्यायोंके समान पवित्र है ॥ ६ ॥ व्याख्या । अथातः परं पर्यायाधिकपञ्चमो ज्ञेयः ॥५॥ नित्यशुद्धपर्यायार्थिकोऽस्ति । कीदृशः कर्मोपाधिविनिर्मुक्तः कर्मणामुपाधिकानामन्यद्रयाणां कुतश्चित्सङ्गतानामुपाधिः साह- चर्य नेन विनिर्मुक्तो रहितः कर्मोपाधिविनिर्मुक्तः । यथेति-यथाशब्देन दृष्टान्तविपयीकरोति । यथा भवी भवः संसारोऽस्तीति भवी संसारी जन्तुः प्राणी सिद्धस्य कर्मोपाधिविनिर्मुक्तस्य सिद्धस्य पर्यायैः समः शुचिनिर्मलः । संसारे संसरलः प्राणिनोऽष्टावपि कर्माणि सन्ति तानि च विचार्यमाणान्युपाधिरूपाणि वर्तन्ते । यद्वदग्नः शुद्धद्रव्यस्याइँन्धनसंयोगजनितो धूम उपा. धिक एव संभाव्यते । तद्वदिहापि विद्यमानान्यपि कर्माण्यनात्मगुणत्वेनौपाधिकानि सन्ति । अतस्तेभ्यों युक्तोऽप्ययुक्ततया विचिन्यमानः प्राणो सिद्ध एवेति कर्मोपाधिभावः सन्नपि न विवक्षणीयः । अथ च ज्ञानदर्शनचारित्राणि छन्नान्यपि बहिः प्रकटतया विवक्षितानि । ततो नित्यशुद्धपर्यायार्थिकभेदस्य भावना संपद्यते ।। ६ ।। व्याख्यार्थ: :--अब इस चतुर्थभेदके पश्चात् पर्यायार्थिकका पञ्चम भेद जानना चाहिये ॥ ५ ॥ यह पंचमभेद नामसे "नित्यशुद्धपर्यायार्थिक" है। वह कैसा है; कि- कर्मोपाधिविनिर्मुक्त है; अर्थात् कर्म जो किसी कारणवशसे संगत उपाधिक अन्य द्रव्य हैं। उनकी जो उपाधि (साहप अर्थात् भान्माली साश महार है, उससे रहित है। जैसे भय (संसार )को धारण करनेवाला जो भवी अर्थात् संसारी जीव है; 'वह कोंकी उपाधिसे रहित ऐसे जो सिद्ध है; उनके समान शुचि अर्थात् निर्मल है । भावार्थ संसारमें भ्रमण करनेवाले प्राणीके आठ कर्म हैं । और वे विचारे जाते है, तो उपाधि- रूप हैं; जैसे शुद्ध अमिरूप द्रव्यका आई ( गीले ) इन्धनसे उत्पन्न धूम उपाधि- रूप ही संभावित है; ऐसे ही सहन शुद्धस्वभाव आत्मामें सब कर्म मारमाके निजगुण होनेसे उपाधिजनित ही हैं, इसलिये यद्यपि संसारी आत्मा उन कोसे युक्त है। । .

द्रव्यानुयोगतर्कणा। तथापि उसको जय उन कर्मोंसे अयुक्त (रहित) विचारा जाता है तो वह सिद्ध ही है; तात्पर्य यह कि-संसारी जीवके कर्मरूप उपाधिभाव है; वह विद्यमान होते भी विवक्षित न किया जाय और उन कर्मोसे ढके हुए भी जो ज्ञान, दर्शन चारित्ररूप सहजस्वभाव हैं; उनको वाह्यमें प्रकट रूपपनेसे कहें तब नित्य शुद्ध पर्यायार्थिक नामक पंचम भेदकी भावना सिद्ध होती है ॥ ६ ॥ अथ पर्यायाधिकस्य पष्ठभेदोपकीर्तनमाह । अब पर्यायार्थिक नयके पष्ठ (छठे ) भेदके निरूपणार्थ यह सूत्र कहते हैं। सूत्रम् । अशुद्धश्च तथानित्यपर्यायार्थिकोऽन्तिमः । यथा संसारिणः कर्मोपाधिसापेक्षिकं जनुः ॥७॥ सूत्रक्षावार्थ: –तथा अशुद्ध और अनित्य अंतिम पर्यायाधिक है; जैसे संसारी प्राणीका जन्म इस संसारमें कर्मरूप उपाधिकी अपेक्षा रखता है ॥ ७ ॥ व्याख्या । कर्मोपाधिसापेक्षोऽशुद्धो विनश्वरत्वादनित्यः । एवमनित्यमादौ कृत्वा अशुद्धं ततो योजयित्वा पर्यायाधिकपदेन समुज्ञार्यते तदा पप्ठोऽन्तिमोभेदोऽनित्याशुद्धपर्यायार्थिको निष्प. द्यते । अथ तस्योदाहरणमाह । यथा संसारिणः संसारवासिजनस्य जनुर्जन्म कर्मोपाधिसा. पेक्षिकं प्रवर्तते । जन्ममरणव्याधयोर्वर्तमाना: पर्याया अनित्या उत्पत्तिविनाशशालिवान पुनरशुद्धा कर्मसंयोगजनितत्वात् । भवस्थितानां प्राणिनां भवन्तीति । अत एव मोक्षार्थिनो जीवा जन्मादिपर्यायाणां विनाशाय ज्ञानादिना मोक्षे यतन्ते । तस्मात्कर्माण्यनित्यान्यशुद्धानि तैः सापेक्षिकं, जन्माद्यन्यनित्यमशुद्धं चेत्थं योजनया निष्पन्नो नयोऽपि “अनित्याशुद्धपर्या- यार्थिक" कथ्यत इत्यर्थः ॥७॥ व्याख्यार्थ:---कर्मरूप उपाधिके सापेक्ष होनेसे अशुद्ध, विनाशी होनेसे अनित्य यह नय है, इस प्रकार प्रथम अनित्यशब्दकी तथा पुनः अशुद्ध शब्दकी योजना करके पश्चात् पर्यायार्थिक शब्दके साथ उच्चारण करनेसे यह अन्तिम भेद अनित्य अशुद्ध पर्यायार्थिक सिद्ध होता है । इसमें उदाहरण देते हैं; कि-जैसे संसारी जीवका जन्म कर्मरूप उपाधिके सापेक्ष है । भावार्थ-संसारी जीवोंके जन्म मरणरूप जो व्याधिये हैं; उनमें वर्तमान जो पर्याय हैं; वे अनित्य है; क्योंकि-इन पर्यायों का स्वभाव उत्पन्न तथा विनाश होनेका है; और कर्मोके संयोगसे उत्पन्न होते हैं। इस कारण वे पर्याय भशुद्ध भी हैं । इसीसे मोक्षार्थी जीव जन्म मरणआदि पर्यायोंका नाश करनेके अर्थ ज्ञान आदि द्वारा मोक्षके विषयमें प्रयत्न करते है। इस कारणसे कर्म भनित्य तथा अशुद्ध है; और उन कोंकी अपेक्षा रखनेवाले जन्मआदि भी अशुद्ध हैं; और इस प्रकारकी (अनित्य तथा अशुद्धकी) योजनासे सिद्ध हुआ जो नय है; वह भी अनित्य अशुद्ध पर्यायार्थिक कहा जाता है ।। ७ ॥

। . रायचन्द्रजैवशास्त्रमालायाम् अथ नैगमादिनयानां भेदानाइ । द्रव्यार्थिक तथा पर्यायार्थिक नयोंके भेदोंको निरूपण करके अब नैगमसंग्रहादि "नयों के भेदोंको कहते हैं। सूत्रम् । नैगमो पहुमानः स्यात्तस्य भेदास्त्रयस्तथा । वर्तमानारोपकृते भूतार्थेषु च तत्परः ॥९॥ सत्रभावार्थ:-नैगमनय बहुमान अर्थात् सामान्य विशेषआदि अनेकरूपका ग्राही है; और उसके तीन भेद हैं। उनमें भूतार्थके विषयमें जो वर्तमानका आरोप करनेके. लिये तत्पर है। वह नैगमनयंका प्रथम भेद है ॥ ९ ॥ व्याख्या । नैगमो नयो बहुमानः सामान्यविशेषादिवहुरूपज्ञानस्य प्राही कथ्यते । नैकै- मार्गम्यते मीयत इति नैकगमः ककारलोपानगम इति व्युत्पत्तिः । तस्य नैगमनयस्य भेदाः प्रकारास्त्रयः । ततश्च तत्र च त्रिपु भेदेषु प्रथमो भेदोऽयं भूतार्थेषु तत्परः भूतार्थविषयेषु वर्तमानारोपकृते वर्तमानरोपकरणाय तत्परो लीन ईदृशो नैगमो भूतादिनैगमः प्रथमो शेयः॥९॥ व्याख्यार्थ: :---सामान्य तथा विशेपआदि बहुतरूप ज्ञानका ग्राही होनेसे यह नैगमनय बहुमान कहा जाता है । इस नैगम शब्दकी सिद्धि यों मानी है; किन एकगम-नैकगम, पुनः ककारका लोप करनेसे नैगम ऐसा हो गया; नहीं जो एक अर्थात् अनेक प्रकारसे 'जिसका मान किया जाय वह नैगम है । इस प्रकार इसकी व्युत्पत्ति है; इस नैगमनयके तीन ( भूतनैगम, भावीनैगम तथा भावीवर्तमाननैगम) भेद हैं; और उन तीनों भेदों से जो प्रथम भेद है; वह भूतपदार्थमें वर्तमानका भारोप करनेमें तत्पर है; ऐसा भूतादि नैगम, नैगमनयका प्रथम भेद जानना चाहिये ॥ ९ ॥ अथास्योदाहरणमाह । अब इस प्रथम भेदका उदाहरण कहते हैं। सूत्रम् । भूतादिनैगमस्त्वाद्यो यथा वीरजिनेश्वरः। दीपोत्सवदिने चास्मिन्गतो मोक्षं निरामयः ॥१०॥ सूत्रभावार्थ:--भूतादिनैगम प्रथम मेद है, जैसे इसी दीपमालिकाके दिन सब विफारशून्य भगवान् श्रीवीर (वर्द्धमान) जिनेश्वर मोक्षको गये हैं ॥ १० ॥ व्याख्या । यथा श्रीवीरजिनेश्वरोऽस्मिन्दीपोत्सवदिने निरामयः कर्मप्रपञ्चरहितो मोक्षं गतः । अत्र ह्यतीतायां दीपमालायां प्रभोमोक्षकल्याणकं जातम्, परन्त्वस्मिन्निति पदेनाद्यानु- भवत्वं कल्पितम्, अतीतदीपमालायां वर्तमानदीपमालाया आरोपः कृतः । वर्तमानदिन- विषये भूतदिनस्यारोपस्तु तत्कालीनदिने देवागमनादिकमहाकल्याणकभाजनेऽसत्युद्भूतदिने देवागमनादिमहाकल्याणकभाजने सति पातस्मिन्तदूध्यारोप भारोपः, असर्पभूतायां रजौ ८५ द्रव्यानुयोगतर्कणा। सपारोपवत् । अन्यश्चारजप्तभूवायां शुक्तौ रजतारोपवदित्यारोपरख द्रव्यविषयी, अतोऽन्न प्रगुणोऽपि नानुसन्धेयः । किञ्च कालावच्छेदेन विचार्यमाणः पदार्थः कालान्तरेण प्रदर्शनी- यस्तेनात्र भूतकालो हि तत्सदृशनामवर्तमानकालमुपलक्ष्य स्मयतेऽतो भूते वर्तमानारोपप्र.. तीतिरुत्पद्यते । अथवातीतदीपोत्सवे वर्तमानदीपोत्सवस्यारोपं कुर्वन्ति, पुनश्च वर्चमानदिने भूतदिनस्यारोपं कुर्वन्ति, कस्मैचित्कायांय, तत्कार्यन्त्विदम्-यदा भगवतो निर्वाणं जातम् , तदानेकसुरसम्पातो जातः, सुराद्यागमनमहामहोत्सवादिविरचनेन च तद्दिनप्रतीतिर्जातां अतः प्रतीतिप्रयोजनाय भूते वर्तमानारोपः । यथा “गङ्गायां घोषः" अत्र गहायामिति पदेन गगा- 'तटे गङ्गाया आरोपः क्रियते । तत्तु शैत्यपावनत्वादिप्रत्यायनप्रयोजनाय । तद्वदिहापि षष्टमान- 'मस्ति । यदि वीरस्य सिद्धिगमनेनान्वयानुभावकत्वात्प्रकर्षभक्तिलाभाय प्रतीतिविचिन्त्यते, तहि तत्तदिनसमुदितप्रतीतियुक्तं वर्चमानदिनमप्यन्वयेनारोप्यते "तत्सत्त्वे तत्सत्त्वमन्वय" इति वचनन्यायाभ्यां समन्वेतव्यम् । वस्तुतस्तु "वर्तमानारोपकृते" वर्तमानारोपाय "भूतार्थे पु" भूतविषयेषु तत्परो लीनो भूतनैगमः प्रथमः । यथा दीपोत्सवदिनमयं वर्तते, अन्न वीरेण शिवं प्राप्तमित्यतीतदिनलक्षितवीरनिर्वाणकल्याणकत्वं वर्तमानतन्नामदिनप्राप्ता- वारोपितं महाकल्याणकप्रतीतिप्रयोजनायेति दिक् । अलङ्कारनिपुणैरत्रार्थेऽलकारमन्योऽपि F द्रष्टव्यः॥१०॥ . व्याख्यार्थ:-जैसे संपूर्ण रोगोंसे अर्थात् फर्मरूप प्रपंचोंसे रहित होकर श्रीमहा- वोर जिनेश्वर इस दीपोत्सव(दीपमालिका)के दिनमें मोक्षको गये हैं । यहांपर महावीर भगवान्का मोक्ष कल्याणक अतीत दीपमालिका अर्थात् कई दीपमालिकाके पूर्व जो दीपमालिकाका दिन है। उसमें हुआ है, परन्तु "अस्मिन्" इस पदसे आजके ही दिनका अनुभव कल्पित किया गया है। इसलिये अतीत दीपमालिकामें वर्तमान दीपमालि- काका आरोप किया, और वर्तमान दिनके विषयमें भूत दिनका आरोप तो उस दिन (वर्तमान दीपमालिकाके दिन)को देवताओंके आगमनरूप महाकल्याणकका माजन न होनेपर और भूत दिन (जिस दिन श्रीवीरभगवान् मोक्षको गये उस दिन)को देवताओं के आगमनका भाजन होनेपर भर्थात् वर्तमान दिनमें तो देवमादि आके प्रभुके मोक्ष सम्बन्धी महाकल्याणक नहीं करते और भूत दिन (जिस दिन मोक्ष गये उस दिन) देवोंने आके महाकल्याणक किया था ऐसा व्यवहार दृष्ट होता है। इस लिये आरोप होता है, अर्थात् वर्तमानमें ही भूतका आरोप होता है; क्योंकि जो यह नहीं है, उसमें उसका जो धारण करना है; उसको भारोप कहते है; इसलिये यहां वर्तमान दीपमालिकामें भूत दीपमालिकाका महाकल्याणक नहीं है; तथापि इसमें उसको धारण करलिया अतः यह आरोप हुआ और जिस रजु(डोर)में सर्प नहीं है; अर्थात् जो रज्जू सर्परूप नहीं है, उसमें सर्पका आरोप करलेना अर्थात् उस रजुको भ्रमसे सर्प मान लेना अथवा नो सीप चांदीरूप नहीं है, उसमें चांदीका आरोप सयचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् करना इस प्रकारका जो आरोप है; वह तो द्रव्यके विषयमें है । इसलिये यहांपर प्रगुणका अनुसंधान भी नहीं करना चाहिये. किन्तु जिस पदार्थका कालावच्छेदसे विचार कियाजाय तो उसको अन्य दूसरे कालसे ही दिखलाना चाहिये । इस कारण यहांपर भूत काल जो है। उसके सदृश नामके धारक वर्तमानकालको पाकर उस भूतकालका स्मरण किया जाता है । इस कारण भूतमें वर्तमानकालके आरोपकी प्रतीति उत्पन्न होती है । अथवा अतीत (गये हुए) दीपोत्सवमें वर्तमान दीपोत्सवका आरोप इस नैगमनयसे करते हैं । और वर्तमान दिनमें भूत दिनका आरोप करते हैं । और यह आरोप किसी कार्यकेलिये किया जाता है। और वह कार्य यह है कि- जिस समय भगवान्का निर्वाण हुआ उस समय अनेक देवताओंका यहांपर समागमन हुआ और उस दिन जो देव आदिका आगमन हुआ तथा उन्होंने आके जो महा- महोत्सव आदिकी रचना की जिससे उस दिनकी प्रतीति उत्पन्न हुई । इसलिये प्रतीति. रूप प्रयोजनकेलिये भूतमें वर्तमानत्वका आरोप कियागया है । जैसे कि-"गंगामें घोष (अहोरोंका ग्राम) है" यहांपर गंगाजीके तदमें गंगारूप अर्थका आरोप किया जाता है; और वह आरोप शत्य ( ठंडापन ) पावनत्व ( पवित्रपना ) धर्मके अधिकता योतनरूप प्रयोजनकेलिये किया गया है, इसी प्रकार यहां भी प्रयोजन संघटित हो सकता है । यदि श्रीमहावीरखामीके मुक्तिमें जानेसे उसके अन्नयको प्रीतिआदिके विषयमें अनुभवका हेतु होनेसे अधिक भक्तिके लाभार्थ प्रतीतिका विचार किया जाय तो उस दिनमें सम्यक् प्रकारसे उदयको प्राप्त प्रतीतियुक्त वर्तमान दिवस भी अन्वयसे आरोपित किया जाता है । और उस कल्याण दिनकी सत्ताहीसे भक्तिआदि लाभकी जो सत्ता है; सो ही अन्वय है । क्योंकि "तत्सत्त्वे तत्सत्त्वमन्वयः" अर्थात् "उसके होनेपर उसकी सत्ता अर्थात् कारणके रहनेपर कार्यकी सत्ता" इत्यादि वचन तथा न्यायसे यहां आरोपका अन्वय करना चाहिये । और यथार्थमें तो भूत पदाथोंमें वर्तमानके आरोपकेलिये जो तत्पर है; वही भूतनैगम प्रथम भेद है । जैसे आज दीपोत्सव दिन है; इसी दिन श्रीमहावीरस्वामीने मोक्षको प्राप्त किया है। यहां भूत दिनसे उपलक्षित श्रीधरिका मोक्ष कल्याणकको पास होना वर्तमानमें उसी (दीपोत्सयों नामक दिनको प्राप्त होनेपर महाकल्याणककी प्रतीतिक प्रयोजनकेलिये आरोपित है। यह संक्षेपसे भूतनगमनयका मार्ग दर्शायागया है। और अलंकारशास्त्रमें प्रवीण जनोंको इस अर्थमें अलंकारका ग्रंथ भी देखना उचित है ॥ ९ ॥ अय नैगमस्य द्वितीयभेदमुदाहरति । भय नैगमनयके द्वितीय भेदका उदाहरण कहते हैं।

८७ द्रव्यानुयोगतर्कणा। सूत्रम् । भूतवन्नैगमो भावी जिनः सिद्धो यथोच्यते। केवली सिवदर्तमाननैगमभापणे ॥ १० ॥ सूत्रभावार्थ:-भूतके साथ भावीनैगम द्वितीय भेद है। जैसे जिन भगवान् सिद्ध हैं, तथा वर्तमान नैगमके कथनमे सिद्धवत् आरोपसे केवली सिद्ध हैं । ऐसा भी व्यवहार होता है ॥ १० ॥ व्याख्या। भावी नैगमो भूतयुक्तो ज्ञेयः । माविनि भूतवदुपचारो । यथा हि जिनः फेवली सिद्धः सिद्धव ज्ञायते तदा भावी नैगमो भवति । असिद्धोऽपि जिन: सिद्धवजी- र्णज्वलितरनुप्रायाघातिकर्मचतुष्टयसद्भावेऽपि शीघ्रभावितक्षयोपस्थितावसिद्धोऽपि सिद्ध एवेति शेयम् । अथ तृतीयभेदमाह । अनिष्पन्नमपि निष्पन्नतया व्यपदिश्यमानं भावि वर्तमान- मिवान्वेषणीयमिति । यथा हि केवली केवलज्ञानकलितो भगवान् त्रयोदशगुणस्थानस्थितः सिद्धः कर्मदोपपोपविकल: संभाव्यते । वर्तमानदशायां हि जिनावस्था वर्तते, कियत्काला- नन्तरं भाविनी सिद्धावस्थानुदिताप्यारोपवलादयं केवली सिद्ध इति भाविविपयो वर्तमान- विषयतया गृहीतस्तस्मात् भाविनैगमः । अत्र हि किञ्चित्सिद्धमुत किश्चिदसिद्धमेतदुभयमपि जिनः सिद्धवर्तमान नैगमाद् ज्ञेय इति ॥१०॥ व्याख्यार्थ: :--अब भावी नेगमको भूत संयुक्त समझना चाहिये अर्थात् भावीमें भूतके समान उपचार होता है । जैसे "जिन भगवान् जो केवली है; सो सिद्ध हैं; अर्थात् सिद्धकी तरह जाने जाते हैं। ऐसे व्यवहारमें भावीनैगम होता है । असिद्ध भी जिन सिद्धके समान हैं। अर्थात् जीर्ण (पुरानी या जूनी) तथा अग्निसे प्रज्वलित रज्जु( रस्सी)- के सदृश जब अघातिया चार कर्मोंका अर्थात् आयुकर्म, गोत्रकर्म, - और वेदनी इन भधातियाकर्मचतुष्टयके सद्भाव( विद्यमानता)मे भी शीघ्रतासे .उन कर्मोंके नाशको उपस्थित होनेसे असिद्ध भी सिद्ध ही है । ऐसा समझना चाहिये । अब तृतीय भेदका वर्णन करते हैं-असिद्ध भी सिद्धि निकट होनेसे जब सिद्धतासे कहाजाता है, तब भावी भी वर्तमानके सदृश जानना चाचिये; जैसे केवली अर्थात् त्रयोदश १३ वें. सयोगकेवली । नामक गुणस्थानमें विराजमान केवलज्ञानके धारक श्रीजिनेन्द्र भगवान् सिद्ध अर्थात् ! कर्मरूप दोषोंकी जो पुष्टि है, उससे रहित संभावित होता है। भावार्थ-वर्तमान दशामें जिन भवस्था विद्यमान है, कुछ कालके पश्चात् सिद्ध अवस्था होनेवाली है; वह सिद्धावस्था . इस वर्तमान जिन अवस्थामे उदयको प्राप्त नहीं हुई है। तथापि आरोपके बलमे यह केवली (श्रीजिनेन्द्र ) सिद्ध हैं। इस प्रकार भावी जो सिद्ध अवस्थारूप विषय है, वह वर्तमान विषयपनेसे ग्रहण कियागया इस कारण यह मावी नैगमनामक नैगमनयका तृतीय भेद है । यहांपर श्रीजिनेन्द्र किसी अंशमें तो सिद्ध और किसी अंशमें असिद्ध ऐसे सिद्धासिद्धरुप हैं; तो भी वर्तमान नैगमसे उनको सिद्धके समान जानना चाहिये ॥१०॥ । - .

रायचन्दजैनशालमालायाम् अर्थतस्यैवोदाहरणं पक्षान्तरव्युदासाय प्रकटीकरोति । अब अन्य पक्षोंके निरासार्थ इसी नैगमका पुनः उदाहरण देते है। सूत्रम्। आरोपावर्त्तमानश्च यथाभक्तं पचत्यसो । अत्र भूतक्रियां लात्वा भूतवाक्यं विलुप्यते ॥ ११ ॥ सूत्रभावार्थ:-आरोपसे भूत तथा भविष्यत् भी वर्तमानके तुल्य ही होते हैं; जैसे यह भात पकाता है; यहाँपर भूत क्रियाको वर्चमानरूपसे ग्रहण करके भूतकालिक वाक्यका प्रयोग नहीं करते ।। १.१ ॥. व्याख्या। आरोपाद्वर्तमानो भवति यथा असौ देवदत्तो भक्तं पयतीति वर्तमानता परमत्र भक्तस्य कियन्तोऽवयवाः सिद्धाः सन्ति, अथ च कियन्तश्चावयवाः सिद्ध्य- मानाः सन्ति । परन्तु पूर्वापरभूतावयवक्रियायाः सन्तानो छेकबुख्यारोप्यमाणो वर्तमाना. 'रोपोऽस्तीति । कथयति अन हि कश्चित् । आरोपसाममीमहिना अवयवानां भूतक्रियां लात्वा पचतीति स्थाने अपाक्षीदिति प्रयोग न करोति यतस्तदुक्तिः । नैयायिकस्तु परमकि- याध्वंसः पाक इत्यत्रातीतप्रत्ययविषयता तन्मते किश्चित्पकम् , किश्चिदपफम् पच्यत इति प्रयोगान भवितुमर्हति तस्मादन्न वर्तमानारोपनगम एव भेदो ज्ञातव्यः । तेनैवात्र भूत- क्रिया लात्वा भूतवाक्यं विलुप्यते तदसमक्षसमेवेति ॥ ११ ॥ व्याख्यार्य:-आरोपसे भूत तथा भावी भी वर्तमान हो जाता है। जैसे यह देव- दत्त भात पकाता है। यहांपर भातकी वर्तमानदशा प्रतीत होती है । परन्तु पाक- कालमे भातके कुछ अवयव तो सिद्ध (सीझे ) हैं; और कितने ही अवयव सिद्ध होने (पकने वाले हैं, ' तथापि पूर्व अपर अवयवभूत क्रियासमूहको एक बुद्धिमें आरोप करनेसे 'पचति' (पकाता है) यह वर्तमानत्यका आरोप है। ऐसा यहांपर कोई कहता है। और वह आरोपसामग्रीकी महिमासे अवयवोंकी भूतक्रियाको करके 'पति' पकाता है इसके स्थानमे 'अपाक्षीत्' (पकाया) ऐसा प्रयोग नहीं करता है। इसीलिये उसका यह पूर्वोक्त कथन है । और नैयायिक तो अन्तिम क्रियाके नारको पाक कहते हैं। अर्थात् तंडुलोंको चूल्हेपर रखनेसे आदिलेके जब तक अन्तिम क्रिया चांवलों के सब अवयवोंको पकाकर नष्ट न होजाय तर तक पाक मानते हैं। इसलिये 'पाक' यहांपर भूतकालकी विपयता है। उनके मतमें चांवलका कुछ अंश पक्क है; और कुछ अंश अपक. है इस दशामें "देवदत्तेन ओदनः . पच्यते" देवदत्त चावल पकाता है। यह प्रयोग देसनेमें आता है; सो नहीं हो सकता । क्योंकि अभी तक अन्तकी क्रियाका नाश तो हुआ ही नहीं, इस हेतुसे पचति इस स्थलमें मावि नैगमसे वर्तमानका भारो- १"वर्तमाने लद" इस पाणिनीय ३२।१२३॥ सूत्रसे बसमान कालमें लद सकार होता है और भूत. फालमें ला होता है। वर्तमानमें "पचति" भूतमे "अपाक्षीद" रूम होता है।

द्रव्यानुयोगतर्कणा। पही उत्तम जानना चाहिये इसीसे यहां भूतक्रियाको लाकर जो भूतवाक्यका लोप किया जाता है; वह असमंजस ही है ॥ ११ ॥ अथ सद्ब्रह्मयं विवृणोति । अब संग्रहनयका विवरण करते हैं । सूत्रम् । सङ्घहो विविधो ज्ञेयः सामान्याच विशेषतः । द्रव्याणि चाविरोधीनि यथा जीवाः समे समाः ।। १२ ।। सूत्रभावार्थ:-सामान्य तथा विशेपसे संग्रहनयके दो (२)भेद हैं; जैसे द्रव्य सब अविरुद्ध स्वभाव हैं, और सब जीव समान हैं ॥ १२ ॥ व्याख्या । सङ्ग्रहातीति सङ्ग्रहः, अथवा सङ्गृह्यतेऽनेन सामान्यविशेषाविति सङ्ग्रहः । स च द्विविधः द्विप्रकारः । तयोरेकः सामान्यौपात् सामान्यसहदः १ द्वितीयो विशेपाब्यक्त- विशेपसनहः २ इत्थं द्विभेदः । अथानयोः प्रत्येकमुदाहरणे द्रव्याणि धर्मास्तिकायादीन्य- विरोधीनि परस्परविरोधरहितानीत्यर्थः । एकद्रव्यसनावे द्रव्यपटुमेव प्राप्यत इति प्रथ- मोदाहरणम् ॥ १॥ यथा च जीवाः सर्वेऽविरोधिनो जीवा हि संमृतिविपयिणः सिद्धिवि- पयिणधानन्ता वर्तन्ते तेषां निरुक्ति:-जीवति चैतन्यादिति जीवः । अथ च जीवप्राणधा- रणे तत्र प्राणा द्विधा द्रव्यभावभेदाचन च द्रव्यप्राणा दुश, भावप्राणश्चत्वारः । मोक्षप्राप्ती यद्यपि द्रव्यप्राणानां कर्मजन्यानां सर्वथा क्षयस्तथापि जीवनलक्षणा जीवस्य भावप्राणाः सहचारिणः फर्मासद्भावेऽपि भवन्ति सिद्धानामपि जीवत्वाद्भावप्राणा भवन्त्यतो मुक्ताः संसारिणश्च जीवाः । मुक्ताः पुनः पञ्चदशभेदाः, संसारिणो देवनारकतिर्यड्मनुष्यभेदाधतुर्धा तत्रान्तिमभेदयोः पञ्चभेदास्तत्रापि मनुष्यस्य पञ्चाशलक्षण एक एय भेदः, तिरश्च एक. स्मादारभ्य पञ्च यावत् । अक्षभेदादेकाक्षब्यक्षत्र्यक्षचतुरक्षपञ्चाक्षभेदात्पश्च भवन्ति । एवं भेदतोऽपि जीवाः सर्वेऽविरोधिनः सद्हाद्विशेपसहभेदः ॥ २ ॥ अथ च सहस्वरूपमु. पवर्णयन्ति । सामान्यमावग्राही परामर्शः सरह इति, सामान्यमात्रमशेपविशेषरहितम् । स तु द्रव्यत्वादिकं गृह्णातीत्येवं शीलः । समेकीभावेन विशेपराशिं गृहातीति सङ्गहः । अय- मर्थः स्वजातेईष्टेष्टाभ्यामविरोधेन विशेषाणामेकरूपतया यगणं स सबह इति । अनुभे- दानादर्शयन्ति । अयमुभयविकल्पः परोऽपरश्चेति । तत्र परसब्रहमाहुः । अशेपविशेपेवी- दासीन्यं भजमानः शुद्धद्रव्यं सन्मानमभिमन्यमानः परसबह इति परामर्श इति । अमे- सनेऽपि योजनीयमुदाहरति । विश्वमेकं सदविशेपादिति यथेति । अस्मिन्ननुक्ते हि सदिति ज्ञानाभिधानानुवृत्तिलिङ्गानुमितिसत्ताकत्वेनैकत्वमशेपार्थानां संगृह्यते ॥ १२ ॥ व्याख्यार्थ:-जो संग्रह करे अथवा जिसके द्वारा सामान्य तथा विशेप संग्रह किये जावें उसको संग्रहह्नय कहते हैं । वह दो प्रकारका है । उनमें प्रथम तो सामान्य ओघसे सामान्यसंग्रहनामक भेद है; और द्वितीय विशेपसे व्यक्तिका संग्रह करनेसे विशेषसंग्रह भेद है। इस रीतिसे सामान्य संग्रह और विसेषं संग्रह यह दो (२)भेद संग्रहनयके हुवे । अब इन दोनोंमेसे प्रत्येकके उदाहरण यह है, जैसे धर्मालिकायआदि सब द्रव्य अति- .. . १२ ९० । . रांयचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् रोधी अर्थात् परस्पर विरोधरहित हैं। क्योंकि-एक द्रव्यके सद्भावमें छहों द्रव्योंकी प्राप्ति होती है । यह प्रथम सामान्यसंग्रहका उदाहरण है। तथा जैसे संपूर्ण जीव अविरोधी हैं। और संसृतिविषयी (संसारी ) तथा सिद्धिविषयी (मुक्त ) जीव अनन्त हैं । और उनकी निरुक्ति( व्युत्पत्ति )अर्थात् जीव शब्दका अर्थ यह है कि जो चैतन्यसे जीता है; उसको जीव कहते है । अथवा जीव धातुका अर्थ है; प्राण धारण करना और यह प्राण द्रव्य तथा भाव भेदसे दो प्रकारके हैं। उनमें भी द्रव्यमाण तो दश १० हैं; और भाव प्राण चार ४ हैं । और जव जीवके मोक्षकी प्राप्ति होती है; तब यद्यपि कर्मसे उत्पन्न हो- नेवाले जो दश १० द्रव्यप्राण हैं. उनका सर्वथा नाश हो जाता है; तथापि जीवके सह- चारी जीवनरूप चारों ४ भावप्राण कर्मों के अभावमें भी जीवके होते हैं; अर्थात् सिद्धोंके भी जीवत्व होनेसे इसलिये उनके भाव प्राण हैं; इसलिये जीव मुक्त तथा संसारी ऐसे दो प्रकारके है। फिर मुक्त जीयोंके भी पन्द्रह १५ भेद हैं। और देव नारक तिर्यच और मनुष्य इन भेदोंसे संसारी भी ४ प्रकारके हैं। उनमें भी अन्तके दो भेदोंके अर्थात् तिर्यञ्च और मनुष्योंके पांच भेद हैं, उनमे भी मनुष्यका पञ्चेन्द्रियत्वरूप एक ही भेद है, तिर्यञ्च एकसे लेकर पांच तक हैं; अर्थात् इन्द्रियजनित भेदसे अर्थात् एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय - श्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, और पञ्चेन्द्रिय इन भेदोंसे पांच प्रकारके होते हैं । इस रीतिसे यद्यपि जीव भेदसहित हैं; तथापि सब जीय अविरोधी है; अर्थात् जीवन धारण करनेमें किसी जीवका विरोध नहीं है । जीव द्रव्यविशेपका संग्रह करनेसे यह दूसरा भेद विशेष संग्रहनामक है ।२ । अब संग्रहमयके खरूपका वर्णन करते हैं । सामान्यमानका म- हण करानेवाला जो ज्ञान सो संग्रह है; संपूर्ण विशेषोंसे जो रहित है; उसको सामान्यमान कहते हैं, और वह द्रव्यत्यादिको ग्रहण करनेवाले स्वभावका धारक है। तथा सम् अर्थात् ऐकीभावसे पिण्डीभूत विशेष राशिको जो ग्रहण करे वह संग्रह है। तात्पर्य यह कि-स्वकीय जातिसे जो दृष्ट तथा इष्ट हैं; उनके द्वारा संपूर्ण विशेपोंको जो एक ही रूपसे ग्रहण करे वह संग्रह है। अब इस संग्रहनयके भेदोको दिखाते हैं। यह संग्रह दो वि. कल्पोंका धारक है । अर्थात् इसके दो भेद हैं । एक तो परसंग्रह और दूसरा अपरसंग्रह उनमें संपूर्ण विशेषोंमें उदासीन रहे और सत्तामात्रको शुद्ध द्रव्य माने ऐसा जो ज्ञान है। उसको परसंग्रह कहते हैं । आगे इसमें युक्त करने योग्य उदाहरण देते हैं। जैसे यह संसार सद्रूपसे एक है; अर्थात् सब संसार एक है, क्योंकि-सब संसारमें सत्पना एक ही है। उसमें कोई विशेप नहीं । और "विश्व एक है सत्में विशेष न होनेसे" ऐसा नभी कहें तो भी सत्तारूप ज्ञान सब पदार्थमे है, उस सत्स्वरूप ज्ञान तथा सत् शब्दके कथनकी । १ पन्द्रह फर्म भूमियोंम उत्पन होके मुरु होनेको अपेक्षाने मुफ जीरो पन्द्रह १५ भद।

द्रव्यानुयोगतर्कणा। सर्वत्र अनुत्तिरूप लिंगसे अनुमानसिद्ध जो सर्वत्र सत्तारूप एकत्व है; उस सत्त्वरूप एकत्वसे संपूर्ण पदार्थोंका संग्रह होता है । तात्पर्य यह कि-इस परसंग्रहमें एक सवरूपसे । संपूर्ण वस्तुमात्रका ग्रहण होता है । इसीसे इस संग्रहनयके अनुसार यह कह सकते हैं, कि-यह संपूर्ण विश्व सत्स्वरूपसे एक है ॥ १२ ॥ अथ संमहनयभेदं दर्शयन्नाह । अब इस पूर्वोक्त संग्रहनयके भेदक व्यवहारनयको दर्शाते हुए कहते हैं । सूत्रम् । सहभेदकव्यवहारोऽपि विविधः स्मृतः। जीवाजीची यथा द्रव्यं जीयाः संसारिणः शिवाः ॥१३॥ सूत्रभावार्थ:-संग्रहनयका भेदक जो विषय है; उसका दर्शक व्यवहारनय है; वह भी दो प्रकारका है। अर्थात् पूर्ववत् सामान्यसंग्रहभेदक व्यवहार और विशेषसंग्रह भेदक व्यवहार इस भांतिसे व्यवहारके दो भेद हैं; क्रमसे दोनोंके उदाहरण यह हैं; कि-जैसे जीव और अजीव ये दोनों द्रव्य हैं । जीव दो प्रकारके है; संसारीजीव और मुक्तजीव इन भेदोंसे ॥ १३ ॥ व्याख्या । सद्भहस्य नयस्य यो भेदको विषयस्तस्य दर्शकः स व्यवहारनयः कथ्यते । व्यवव्हियते सङ्गविषयोऽनेनेति व्यवहारः । सोऽपि द्विविधः द्विप्रकारः स्मृतः कथितः । तस्यैव पूर्योदितस्य सङ्ग्रहनयस्य भेदवदस्यापि भेदभावना कर्तव्या । यत एकः सामा- न्यसद्गहभेदकव्यवहारः १ द्वितीयो विशेषसद्भेदकव्यवहारः २ एवं भेदद्वयम् । अथ तयो- रदाहरणे । तत्राद्यस्योदाहतिर्यथान्जीवाजीवौ द्रव्यम् । अन्न जीवस्य चेतनस्याजीवस्याचे- तनस्य सनहसामान्यविषयत्वाद्र्व्यमित्येकैव संज्ञा, कर्थ-द्रवति तांस्तान्पर्यायान्गच्छतीति निकालानुयायी यो वस्त्वंशस्तव्यमिति व्युत्पत्त्या स्वगुणपर्यायवत्त्वेनोभयोरपि जीवाजीव. योव्यपदं साधारणमित्यर्थाजीवद्रव्यमजीवद्रव्यमिति सामान्यसग्रहभेदकव्यवहारः । १। अथ जीवाः' संसारिणः सिद्धाश्चात्र जीवानामनन्तानां चैतन्यवतां संसारित्वं सिद्धत्वं च विशेषव्यवहारोऽतो द्वितीयभेदो विशेपसमभेदकव्यवहारः ।२। एवमुत्तरोत्तरविवक्षया '. सामान्यविशेपत्वं भावनीयम् ।। १३ ।। व्याख्यार्थः-इस संग्रहनयका जो भेदक विषय है; उसके दर्शकको व्यवहारनय कहते हैं । संग्रलयके विषयका व्यवहार जिसके द्वारा हो वह व्यवहारनय है, यह व्य- वहार शब्दकी व्युत्पत्ती है । वह व्यवहारनय भी दो प्रकारका कहा गया है, तात्पर्य यह है; कि-उसी पूर्वकथित संग्रहनयके भेदके समान इसकी भी भेदभावना करनी चाहिये क्योंकि-एक सामान्यसंग्रहनयका भेदक व्यवहारमय है और द्वितीय विशेपसंग्रहका भेदक (विशेषसंग्रहके विषयको भिन्नरूपसे व्यवहार करनेवाला ) व्यवहारनय है। इस प्रकार सामान्यसंग्रहभेदक व्यवहारनय तथा विशेषसंग्रहभेदक व्यवहारनय ये दो भेद १ घट सत्, पट सत्, जीव सत्, है; तथा पुद्गल सत् है; इस प्रकारसे सत्की अनुत्ति सर्वत्र है। उस अनुवृत्तिरूप लिंग हेतुसे सत् सर्वत्र है; ऐसा ज्ञान होता है। 1 . - रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् हुये। २ । अव इन दोनों भेदोंके उदाहरण कहते हैं। उनमें सामान्यसंग्रहभेदक व्य- पहारनयका उदाहरण यह है कि-जैसे जीव और अजीव दोनों द्रव्य हैं, यहांपर चेतन जीव तथा अचेतन अजीव, इन दोनोंके संग्रहका सामान्य विषय होनेसे दोनों द्रव्य हैं। यह व्यवहार होता है । यदि यह कहो कि-चेतन तथा अचेतन दोनोंके विरुद्ध धर्म होनेसे एक द्रव्य संज्ञा कैसे हुई ? तो इस रीतिसे है; कि-दुधातुका गमन अर्थ है; उससे यत् प्रत्यय कर्नेसे T + य = द्रो+ य = द्रव्य शब्द सिद्ध होता है। जो उनसे अनेक प. व्योंमें प्राप्त हो वह द्रव्य है; अर्थात् संप्रति पर्यायोंमें निकालमें अनुगामी जो वस्तुका अंश है; वह सर्वन अनुगत होनेसे द्रव्य है। इस व्युत्पत्तिसे अपने गुण पायोंसे युक्त होनेसे जीव अजीव दोनोंका द्रव्य इंस साधारण पंदसे महण होता है, क्योंकि-जीव द्रव्य भी देव, मनुष्य, तथा सिद्ध, पर्यायोंको प्राप्त होता है। परन्तु चेतन जीवरूपता सब पायोंमें अनुगत है, अजीव मृत्तिका सुवर्णादि द्रव्य भी घट शराव तथा कुंडल क- टकआदि पर्यायोंमें प्राप्त होता है; किन्तु मृत्तिका तथा सुवर्ण अंश सर्वत्र अनुगत है, इसलिये द्रव्य यह पद दोनों केलिये सामान्यसंग्रह है। उसमें जीवद्रव्य तथा अजीव द्रव्य यह सामान्यभेदक व्यवहारनय है; ( अर्थात् द्रव्य सामान्यमें जीव और इस व्य. वहारकेलिये इस नयने भेद कर दिया, इसी हेतुसे यह सामान्यसंग्रहभेदक व्यवहार नय प्रथम भेद है) और जीव संसारी तथा सिद्ध ( मुक्त ) दो प्रकारके होते हैं, इस क. थनमें चेतनत्वधर्मयुक्त जीव जो अनन्त संख्यायुक्त हैं, उनका संसारित्व तथा सिद्धत्व यह विशेष व्यवहार है, तात्पर्य यह है; कि-द्रव्य सामान्यमें जो विशेष द्रव्य जीव है; उस जीव सामान्य द्रव्यमें भी संसारित्व तथा सिद्धत्व यह विशेषव्यवहार हुभा, इस हेतुमें यह विशेषसंग्रहभेदक व्यवहारनय द्वितीय भेद है । इसी प्रकार उत्तरोत्तर विवक्षाके अनुसार सामान्यविशेषकी भावना करते चला जाना चाहिये जहांतक व्यवहारका मन्त नहीं है। वहां तक बराबर सामान्यविशेषभाव लगा है । जैसे संसारी तथा सिद्ध ये दो भेद होनेपर भी पुनः संसारीको सामान्य मानकर उनके देव मनुष्य नारक तथा तियेच- भनेक भेद है, पुनः सामान्य देवोंके वैमानिक, व्यन्तर भवनवासीआदि अनेक भेद हैं, पुनः चैमानिकआदिके भी अनेक भेद हैं । ऐसे ही मनुष्यमादिके भेद, अवान्तर भेदका व्यवहार करते चले जायो । इस व्यवहार नयका यह प्रयोजन है, कि सामान्य सं. महसे व्यवहार नहीं चलता क्योंकि केवल द्रव्य कहनेसे लोक व्यवहार नहीं चलता, द्रव्य लावो या ऐसा कहनेसे यह आकांक्षा अवश्य होती है। कौन द्रव्य, जीव वा अनीय व्यशामान्यकी अपेक्षाये तो औषद्रव्य विशेष है, परन्तु सब प्रकार जीय जैसे मनुष्य जीव देव जीप द्रव्याविवक्षासे जीव भी सामान्य है। इसलिये सर जीपी अपेक्षासे जीव सामान्य सपा विशेष - पेक्षाभेद हैं।

द्रव्यानुयोगतर्कणा। ९३ उस जीवआदि द्रव्यमें भी कौन जीव संसारी अथवा सिद्ध, संसारीमें भी कौन मनुष्य मनुष्योंमें भी कौन मनुष्य जैन अथवा वैष्णव इत्यादि रीतसे सर्वत्र सामान्य विशेपभाव की व्यवस्था समझ लेना ॥ १३ ॥ अथ मजुसूत्रनयस भेदमाह । अब ऋजुसूत्रनामक चतुर्थ नयके भेदको कहते हैं। सूत्रम्। स्वानुकूलं वर्तमान ऋजुसूत्रो हि भापते । तत्र क्षणिकपर्यायं सूक्ष्मा स्थूलो नरादिकम् ॥ १४ ॥ सूत्रभावार्थ:--अपने अनुकूल केवल वर्तमान कालवत्ती विषयको ऋजुसूत्र नय कहता है; उसमें भी सूक्ष्म क्षणिकपर्यायको और स्थूल मनुष्यआदिको कहता है ॥१४॥ व्याख्या । हि निश्चितं जुसूत्रो भयो वर्तमानं फेवलमतीवानागतकालरहितं मापते मनुते । तदपि कीदृशं स्वानुकूलं स्वस्थात्मनोऽनुकूलं कार्यप्रत्ययं मनुते परन्तु परप्रत्ययं न मनुते । सोऽपि मजुसूत्रो द्विभेदो द्विप्रकार एफ: सूक्ष्मऋजुसूत्रा, अपरः स्थूलमजुसूत्रः ! तत्र सूक्ष्मस्तु क्षणिकपर्यायं मनुते, क्षणिकाः पर्यायाः परतोऽवस्थान्तरभेदात्पर्यायाणां स्ववर्तमानतायां क्षणावस्थायित्वमेवोचितमिति । स्थूलस्तु मनुष्यादिपर्यायं वर्तमान मनुतेs- तीतानागतादिनारकादिपर्यायं न मनुते । यो हि व्यवहारनयः कालत्रयवर्तिपर्यायमाहक- तस्मात्स्थूलबाजुसूत्रो व्यवहारनयेन संफरत्वं न लभते । अथ च मजुवर्तमानक्षणस्थायि- पर्यायमात्रप्राधान्यतः सूत्रयन्नभिप्राय घरजुसूत्रनय इत्यतीतानागतकाललक्षणकौटिल्यवैक- ल्यात्मालमिति ।। १४ ।। व्याख्यार्थ:--निश्चयरूपसे ऋजुसूत्रनय भूत भविष्यसे रहित केवल वर्तमान काल- को स्वीकार करता है, और यह भी अपने मात्माके अनुकूल कार्यके प्रत्ययको मानता है; न कि--पर प्रत्ययको । यह ऋजुसूत्र नय भी दो प्रकारका है; एक सूक्ष्म ऋजुसूत्र और दू- सरा स्थूलकजुसूत्र | उनमेसे सूक्ष्मऋजुसूत्र क्षणिक पर्यायको मानता है; क्योंकि-इस न. यकी अपेक्षासे सब पर्याय क्षणिक है; अन्यकी अपेक्षासे अवस्थान्तरका भेद होनेसे पर्यायो- की निजवर्तमानतामें क्षणिकस्थायिताका मानना ही उचित है । और स्थूलऋजसूत्र व- समान मनुप्यादि पर्यायको मानता है; और भतीत तथा भनागत ( भविष्य) नारक आदि पर्यायको नहीं मानता है। जो व्यवहार नय है। वह त्रिकालवी पर्यायोंका ग्राहक है। इस कारण उस व्यवहारनयके साथ स्थूलऋजुसूत्र संकर दोपताको नहीं प्राप्त होता क्योंकि भूतभविष्यरूप कुटिलता दोपसे रहित ऋजु ( सरल ) केवल वर्तमानक्षणस्था- यी पर्यायमात्रको सूचित (ग्रहण) करनेरूप जिस नयका प्रधानतासे मभिप्राय है; उस को मजुसून कहते हैं।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् अथ शब्दनयमाह। अब शब्दनयको कहते हैं। सूत्रम् । शाब्दिको मनुते शब्दं सिद्धं धात्वादिभिस्तथा । भिन्नं समभिरूढाख्यः शब्दमर्थ तथैव च ॥१५॥ सूत्रभावार्थ:-शब्दनय धातुआदिसे सिद्ध शब्दोंको स्वीकार करता है। परन्तु लिंगवचनादिद्वारा शब्दभेदसे अर्थका भेद मानता है और ऐसे ही समभिरूढनय अर्थ भेद होनेसे शब्दभेद अवश्य मानता है |॥ १५ ॥ व्याख्या । शाब्दिकः शब्दनयो धात्वादिभिः प्रकृतिप्रत्ययादिविभागेन व्युत्पन्नं शब्दं सिद्ध मनुते परन्तु लिङ्गवचनादिभेदेनार्थस्य भेदं मनुवे । यथा-तटा, तटी, सटमिति लिङ्गनयभे. दादर्थभेदः, तथा आपो जलमित्यन्न बहुवचनैकवचनभेदादर्थभेद इति । अयं हि शब्दनयः भाजुसूत्रनयं प्रवीदं वक्ति यत्कालभेदेन त्वमर्थभेदं मनुपे तर्हि लिङ्गादिभेदेनार्थभेदं प्रस्तुतमपि फर्य न मनुप इति । अथ समभिरूढनयमाह 1 समभिरूढाख्यो नयः शन्दं भिन्न पुनश्वार्थमपि भिन्नं मनुते । शब्दभेदेऽर्थभेद इति त्रुवन्नसौ शब्दनयं प्रतिक्षिपति । तथा हि-यदि भवाल्लिङ्गादिभेदेनार्थभेदमगीकरोति तदा शब्दभेदेनार्थभेदमपि कथं नाहीकरोति तस्माद् घटो भिन्नार्थः, कुम्भो भिन्नार्थः, शब्दभेदादर्थभेद इति। शब्दार्थयोरैक्यं यदस्ति तत्त शब्दादिनयानां वासनया वर्तते शब्दनयस्यैव भेद इति शेय इति । अथ च पर्यायशब्देपु निरुक्तिभेदेन भिन्नमर्थ समभिरोहन समभिरूढ इति । शब्दनयो हि पर्यायाभेदेऽप्यर्थभेदम. भिप्रैति, समभिरूढस्तु पर्यायभेदे मिन्नानानभिमन्यते । अभेदं त्वर्थगतं पर्यायशब्दानामु. येक्ष्यत इति ॥ १५ ॥ व्याख्यार्थः-शब्दनय धातु, प्रकृति तथा प्रत्ययआदिके विभागसे व्युत्पन्न शब्द- को सिद्ध मानता है; परन्तु लिंग, वचन, तथा धातुआदिके भेदसे अर्थका भेद मानता है । जैसे तटः यह पुलिंग, तटी यह स्त्रीलिंग तथा तटम् यह नपुंसकलिंगमें रूप होता है। यहां तीनों लिंगों में शब्दके स्वरूपमें भेद होनेसे अर्थका भेद मानता है । और आपः तथा जलम् ये दोनों शब्द यद्यपि पर्याय (एकार्थवाचक ) है; तथापि अप् शब्द नित्य ची लिंग ही है; और बहुवचन है; और जल शब्द नपुंसकलिंग तथा एकवचन है। इस हेतुसे (बहुवचन तथा एकवचनके भेदसे ) अर्थ भेद है । और यह शब्दनय ऋजुसूत्र नय. के प्रति यह कहता है कि यदि तुम कालके भेदसे पदार्थका भेद मानते हो तो लिंग, वचनादिके भेदसे उपस्थित जो पदार्थभेद है; उसको भी क्यों नहीं मानते ? अब सम. मिरूढनामक नय शब्दको भिन्न और अर्थको भिन्न मानता है। क्योंकि-शब्दका मेद हो. नेपर अर्थका भेद है। ऐसा कहता हुआ यह नय शब्दनयके प्रति आक्षप करता है। सो हो दिखाते हैं। कि-यदि आप लिंगादिके भेदसे अर्थ भेद मानते हो तो शब्दके भेदसे अर्थक भेदको भी क्यों नहीं अङ्गीकार करते ! शब्दभेदसे अर्थभेद अवश्य है। इसलिये घर ।

द्रव्यानुयोगतर्कणा। शब्द मिन्न अर्थवाचक है; और कुम्भशब्द भिन्नार्थवाचक है; क्यों कि-शब्दके घटभेदसे और कुम्भके अर्थमें भेद है; और शब्द तथा अर्थकी जो एकता है; वह तो शब्दादि नयकी वासनासे है, अर्थात् वह एकता शब्दनयका ही भेद है; ऐसा समझना चाहिये और पर्याय शब्दोंमे व्युत्पत्तिके भेदसे अर्थके भेदको जो आरूढ करै वह समभिरूढ कह- लाता है; यह इसका लक्षण है; जैसे-समर्थ होनेसे शक्र ( शकनात् शक्रः) अनेक प्र- कारके ऐश्चयोंसे संयुक्त होनेसे इन्द्र (इन्दति ऐश्वर्य प्रामोतीति इन्द्रः) शत्रुवोंके नगरों- को विदारण करनेसे पुरंदर (पू: दारयतीति पुरन्दरः) इत्यादि समभिरुढ नयके उदाह- रण समझने चाहिये । शब्दनय तो पर्यायके अभेदमें भी लिंग वचनआदिके निमित्तसे अर्थभेद मानता है; और समभिरूढनय तो पर्यायोंके भेदमें भिन्न २ अर्थोको स्वीकार करता है। जैसा कि-पूर्व उदाहरणोंसे दर्शा चुके हैं । और जो अर्थनिष्ट अभेद पर्यायवा- चक शब्दोंका है; वह तो अर्थात् ( अर्थसे ) प्राप्त होगा जैसे शक्र, इन्द्रादि शब्दोंका उन उन कार्योंसे भेद रहते भी उसी शचीके पतिरूप अर्थको सब कहते हैं ॥ १५॥ अथैवंभूतनयं प्रकाशयन्ति । भव एवंभूतनयका प्रकाश करते हैं। सूत्रम् । क्रियापरिणतार्थ चेदेवंभूतो नयो वदेत् । नवानां च नयानां स्युर्भेदाः सिद्धिदृगुन्मिताः ॥ १६॥ सूत्रभावार्थ:-क्रियाके परिणाम कालमें जो अर्थ हो उसको एवंभूत सप्तम नय कहता है; इस प्रकारसे द्रव्यार्थिकआदि नव ९ नयोंके भेद सिद्धि ८ और दृक् ( दृष्टि ) २ " अकानां वामतो गतिः" इस न्यायसे २ और ८ अर्थात् अट्ठाईस भेद हैं ॥ १६॥ प्यारया । यथा-एवंभूतो नयः शब्दानां प्रवृत्तिनिमित्तभूतक्रियाविष्टमर्थ वाच्यत्वेना- भ्युपगच्छन्नेवंभूत इति । समभिरूढनयो हीन्दनादिक्रियायां सत्यामसयां च पासवादेरर्यस्ये- न्द्रादिव्यपदेशमभिति, पशुविशेपस गमनक्रियायां सत्यामसत्यां वा गोव्यपदेशयत्तथा रूढः सद्भावात् । एवंभूतः पुनरिन्दनादिक्रियापरिणतमर्थ वक्रियाकालं इन्द्रादिव्यपदेशमा- जमभिमन्यते । न हि कश्चिदक्रियाशब्दोऽस्यास्ति । गौरश्व इत्यादिजातिशब्दाभिमतानामपि कियाशब्दत्वाद्गच्छतीति गौः, आशुगामित्वादश्वः, इति क्रियापरिणतार्थ क्रियया परिणतमर्थ वदेत् नियासमय एव मनुते । परन्तु क्रियासमयमुलधर न मनुत इति भावार्थः यथा राजा इति सभायां सत्यां छन्ने शिरसि ध्रियमाणे चामराभ्यां च वीग्यमाने सत्वेव व्यपदेश लभते । अन्यत्र लानादिवेलायां समाछत्रचामरादिभिलचिरसड़ी राजापि नातीति । अथ प गुणशब्दा अपि गुष्ठों नील इत्यादयो गुणशब्दाभिमताः शब्दाः किया एव, शुचिभवनाच्छुट्टो नीलनानील इति । देवदत्तो यमदत्त इनि यदृच्छारान्दाभिमता अपि कियाशब्दादेव एनं देयादिति । संयोगिद्रव्यगन्दाः समवायिद्रव्यशब्दावामिमता: किया- - रायचन्द्रजैनशासमालायाम् शब्दा एव "दण्डोऽस्यास्तीति दण्डी", विषाणमस्यासीति विपाणीत्यत्र क्रियाप्रधानत्वात् । पञ्चतयी तु शब्दानां व्यवहारमात्रा न निश्चयादित्ययं नयः स्वीकुरुते । उदाहरन्ति यथेन्दनमनुभवन्निन्द्रः, शकनक्रियापरिणतः शक्रः, पूरणप्रवृत्तः पुरन्दर इत्युच्यते ॥ १६ ॥ व्याख्यार्थ:-जैसे एवंभूतनय शब्दोंको प्रवृत्तिनिमित्त भूतक्रियासे आविष्ट (युक्त) अर्थको ही वाच्यत्वरूपसे स्वीकार करता है। इसलिये यह एवंभूतनामक है; अर्थात् जि- स क्रियारूपमें परिणत अर्थ है; यही वाच्य है । और समभिरूढनय तो इन्दनादि क्रिया अर्थात् ऐश्वर्य साहित्य हो या न हो बासत्रआदि शब्दोंकी इन्द्रआदि शब्द वा- च्यताको अंगीकार करता है। जैसे पशुविशेष( गो )में गमनआदि क्रिया हो या न हो गो व्यपदेश ( कथन ) होता है; क्योंकि-ऐसे ही रूढिका सद्भाव होता है; और एवंभूत नय तो इन्दन अर्थात् ऐश्वर्यादिके साहित्यरूप क्रिया परिणत जब अर्थ है; उस क्रियाके कालमें ही इन्द्रादि नामको मानता है। और इस एवंभूतनयकी अपेक्षासे कोई अक्रियाशब्द अर्थात् क्रियावाचक न हो ऐसा शब्द नहीं है; क्योंकि-इस नयके अनुसार गो, अश्वभादि शब्द जो जातिवाचक्ररूपसे इष्ट हैं; वे भी क्रियावाचक हैं; जैसे गमन क्रिया करनेसे गौ, और शीघ्र गमन करनेसे अश्व इस प्रकारसे क्रियापरिणत अर्थको क- हता है और उस अर्थको भी क्रियाके समयमें ही मानता है; और क्रियाके समयको उलं- घन करके उस अर्थको नहीं मानता तात्पर्य यह है कि-जैसे " राजते ( शोभते ) इति राजा" अर्थात् छत्र चामरभादिसे जो शोभित हो वह राजा है; यहांपर राजन् शब्दकी पूर्व कथित व्युत्पत्तिसे जब कोई मनुष्य सभामें स्थित होगा और उसके मस्तकपर छत्र धरा हुआ होगा और दो चमरोंसे झूल रहा (वीजित ) होगा तभी वह राजा इस व्य- पदेशको प्राप्त होता है और सानआदिके समयमे जब कि-सभा छत्र, चामरआदि रा- जाके चिन्ह नहीं हैं; उस समय वही मनुष्य राजा नहीं है; और शुक्र, नील इत्यादिक शब्द गुणवाचकरूपसे अभीष्ट हैं; वे भी इस नयके अनुसार क्रियाशब्द ही हैं; जैसे शुचि होनेसे शुक, नील रंग करनेसे नीलआदि भी क्रियाशब्द ही हैं। देवदत्त, यज्ञदत्त आदि जो यदृच्छा (संज्ञा वा नामवाचक ) शब्दरूपसे अभीष्ट हैं; वह भी क्रियाशब्द ही है। जैसे देव इसको देवे, इत्यादि क्रियारूपता इनमें भी विद्यमान है; तथा संयोगी द्रव्य- पाचक शब्द तथा समवायी द्रव्यवाचक शब्द अर्थात् संयोग संबन्धसे द्रव्यवाचक और समवाय संवन्धसे द्रव्यवाचकवरूपसे जो इष्ट हैं, वह भी इस नयके अनुसार क्रियाशब्द ही हैं। जैसे-दंड है। जिसके वह दंडी तथा जिसके विपाण( शृंग )पींग है। वह विपाणी इत्यादि शब्दोंमें भी कियाकी प्रधानता है | और जाति, गुण, संज्ञा, द्रव्य, तथा क्रिया इन पांच प्रकारसे जो शब्दोंकी प्रवृत्ति कही गई है; वह तो केवल व्यवहारनयसे है। न कि- निश्चयनयसे ऐसा यह नय मानता है; और इसी व्यवस्थासे अर्थात् संपूर्ण शब्दोंकी .

९७ द्रव्यानुयोगतर्कणा। क्रियावाचकताके अनुसार ही प्रवृत्ति है; ऐसा उदाहरण भी देता है; जैसे इन्द्र संज्ञा तभी हो सकती है; जब वह इन्दन (ऐश्वर्यको ) अनुभव करता हो ऐसे ही शकन (सामर्थ्य संपादनरूप) नियामें जब परिणत है; तभी शक और इसी रीतिसे पुर (शत्रुके) दारण- में जब प्रवृत्त है; तभी पुरन्दर कहा जाता है ॥ १६ ॥ अथ व्याख्यासमाप्तिनयानां कृता तथैवाह । अब जो नौ नयोंकी व्याख्याकी समाप्ति की है; उसीको कहते हैं। सूत्रम् । नया नवते कथितास्तथोपनयास्त्रयः सारतमाः श्रुतस्य। विज्ञाय तानेव युधाःश्रयन्तां जिनक्रमाम्भोजयुगाअयं सत् १७ सूत्रभावार्थ:--यह शास्त्रके सारभूत नव ९ नय तथा तीन ३ उपनय कहे गये हैं; बुद्धिमान् उन्हींको पूर्णरूपसे जानकर सद्रूप ( सर्वरूपसे समर्थ) श्रीजिनदेवके चरण कमलयुगलका आश्रय ग्रहण करें ॥ १७॥ व्याख्या । नवानां नवसङ्ख्या कानां नयानां द्रव्यार्थिक १ पर्यायार्थिक २ नैगम ३ समूह ४ व्यवहार ५ ऋजुसूत्र ६ शब्द ७ समभिरुढ ८ एवंभूत ९ मुखानां भेदाः प्रकाराः सिद्धि- गुन्मिताः २८ प्रमिताः सर्व स्युभवन्ति । तत्र द्रव्यार्थिको दशभेदः, पर्यायार्थिकः पङ्गेदः, नैगमस्त्रिभेदः, समूहो द्विभेदः, व्यवहारो द्विभेदः, अजुसूत्रो द्विभेदः, शब्द एकभेदः, समभिरूढ एकभेद एवमेतेपां भेदा अष्टाविंशतिः । अथान्यनमस्कारं प्रकृतग्ररूपणं नामो- कीर्तनमायाह । एने पूर्वव्यावय॑माना नया नव संख्यया, तथा तेन प्रकारेणैवोपनया- खयोऽग्रे वक्ष्यमाणाश्च श्रुतस्य श्रीवीतरागदेवप्रणीतागमस्य सारतमा अतिशयेन प्रधानाः सारतमा वर्तन्ते । तदुक्तमावश्यके निर्युक्तौ । एएहिं दिट्ठिवाए पावणा सुत्त अत्थ कहणाय। इह पुण अपुणब्भवगमो अहिगारो तीहिं उत्सुन्नं । १। इति तानेव नयान विज्ञाय ज्ञात्वा बुधाः सुधियः सत्सर्वतः समर्थ जिनक्रमाम्भोजयुगाश्रयं श्रयन्तामित्यर्थः ।। १७ ॥ इति श्रीकृतिमोजसागरनिर्मितायां द्रव्यानुयोगतर्कणायां पाठोभ्यायः । ६ । व्याख्यार्थ:-द्रव्याथिक १ पर्यायाधिक २ नैगम ३ सङ्ग्रह ६ व्यवहार ५ ऋजुसूत्र ६ शब्द ७ समभिरूढ ८ तथा एवंभूत इन मुख्य नौ नयोंके दृक् (दृष्टि) तथा सिद्धि परि- मित अर्थात् अट्ठाईस २८ सब अवान्तर भेद है; उनमे द्रव्यार्थिकके दश १० भेद, पर्याया. र्थिकके पद् (छ) ६ भेद, नैगमके तीन ३ भेद, संग्रहके दो २ भेद, व्यवहारके दो २ भेद, ऋजुसूत्रके दो २ भेद, शब्दका एक १ भेद, समभिरूढका एक १ भेद और एवंभूतनयका भी एक १ भेद है। इस प्रकार यह सब मिलकर अट्ठाईस २८ भेद हैं। अब भन्तमें श्रीजिनदेवके चरणोंका आश्रयरूप नमस्कार तथा प्रकृतप्ररूपण और श्लेपसे अपने नामका भी कथन करते है । यह पूर्व प्रसंगमें व्याख्यात संख्यासे नौ ९ नय तथा जिनका कथन आगे करेंगे ऐसे तीन ३ उपनय यह सब श्रुतके अर्थात् श्रीचीतरांग जिन- देवपणीत शास्त्र के अत्यन्त प्रधान विषय हैं; अर्थात् अतिउपयोगी है: सो हो यावश्यक -- ।

१ . ९८ ! रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् नियुक्तिमें कहा है; कि-दृष्टिवादनामक अंगमे सूत्र और अर्थके कथनकेलियेइनसे हो प्ररूपण है; और यहां मोक्षका अधिकार है; इसलिये अत्यन्तोपयोगी अर्थात् सारभूत हैं ॥ १॥ इस कारण इन नयोंको ही पूर्णरूपसे जान कर बुद्धिमान् प्राणी सब प्रकारसे समर्थ श्रीजिनदेवके चरणकमलयुगलका आश्रय करें ।। १७ ॥ इतिश्रीठाकुरप्रसादशातिप्रणीतभापाटीकासमलङ्कतायां द्रव्यानुयोगतर्कणायां पष्ठोऽध्यायः ॥६॥ अथोपनयानां प्रकारमाह । अव उपनयोंके भेद कहते हैं। सूत्रम् । यश्चोपनयास्तत्र प्रथमो धर्मधर्मिणोः । भेदाच्छुद्धस्तथाशुद्धः सद्भूतव्यवहारवान् ॥ १ ॥ सूत्रभावार्थ:-तीन ३ उपनय हैं; उनमें प्रथम उपनय सबूतव्यवहारं है; यह धर्म और धर्माके भेदसे शुद्धसद्भूतव्यवहार तथा अशुद्धसद्भूतव्यवहार इन भेदोंसे दो प्रका- रका है ॥१॥ व्याख्या। तत्रत्यधिकारसूचकविपयसप्तमीयम् । नयानां समीपमुपनयाखयंखिसंख्याकाः । तेपु त्रिपु प्रथम आद्यो धर्मश्च धर्मा च तयोमैदस्तस्मात् । धर्मधर्मिणोरसाधारणं कारणं धर्मः, स च धर्मोऽस्यास्तीति धर्मी तयोरितिद्वन्द्वसमासेन भेदान् द्विधा द्विप्रकारः । एतावता यः प्रथमोभेदो धर्मघमिभेदाजातः सोऽपि द्विविधो नेय एकः शुद्धोऽपरो द्वितीयोऽशुद्धः । कयंभूतः शुद्धस्तथाशुद्धश्च सद्भूतव्यवहारयान सद्भूयतेऽनेनेति सद्भुतः, व्यवहियत इति व्यवहारः, सद्भूतश्च व्यवहारश्च सद्धृतव्यवहारौ। शुद्धाशुद्धौ तौ विद्यतेऽस्येतिसद्भूतव्यवहारवान् । शुद्धयोधर्मधर्मिणोर्भेदाच्छुद्धसद्भूतव्यवहारः ।। १॥ अशुद्धधर्मधर्मिणो दादशुद्धसदतव्यव. हारः ॥ २ ॥ सद्भूतस्त्वेकं द्रव्यमेवाति भिन्नद्रव्यसंयोगापेक्षा नासि । व्यवहारस्तु भेदा. पेक्षयेत्येवं निरूक्तिः ॥ १॥ व्याख्यार्थ:-तत्र (उसमें ) यह जो सप्तमी विभक्ति है; यह अधिकारके ज्ञापन (मनाने ) केलिये है; अर्थात् अब उपनयोंका अधिकार है । नयोंके समीपवर्ती जो हों वह उपनय है; वह तीन अर्थात् तीन तल्यायुक्त है, उन तीनोमेसे प्रथम भेद धर्म तथा धमांक भेदसे है; धर्म और धर्मा इन दोनोमें जो अमाधारण कारण है उसको धर्म कहते है यह असाधारण कारणरूप धर्म जिसके है; उमको धर्मों कहते है । धर्म तथा धर्मिन् शब्दका द्वन्द्व समास फरनेसे "धर्मधर्मिणोः" ऐसा पाठ बना है । इन धर्म धर्माके भेदसे. उत्पन्न हुआ प्रथम भेद दो प्रकारका है । अर्थात् धर्म धर्मीके भेदसे जो प्रथम भेद हुमा है। यह भी दो प्रकारका जानना चाहिये। एक शुद्ध और दुसरा अशुद्ध । वह शुद्ध और अशुद्ध कसा है; कि-सद्भूतगबहारगे युग है । सह जिसके द्वारा हो उसको सबूत . । . . .

। द्रव्यानुयोगतर्कणा। कहते हैं। जिसके द्वारा व्यवहार किया जाय वह व्यवहार कहलाता है । सद्भूत तथा व्यवहार इन दोनों शब्दोंका द्वन्द्वसमास करके सद्भूतव्यवहार यह एक शब्द बना । यह शुद्ध तथा , अशुद्ध सद्भूतव्यवहार जिसके हैं; वह सद्भूतव्यवहारवान् है । इनमेंसे शुद्ध धर्म धर्मीके भेदसे तो उत्पन्न शुद्धसद्भूतव्यवहार और अशुद्ध धर्म धर्मीके भेदसे उत्पन्न अशुद्धसद्भूतव्यवहारनामक सद्भूतव्यवहारका भेद है। सद्भूत तो एक द्रव्य ही है; उससे भिन्न द्रव्यके संयोगकी अपेक्षा नहीं है । और जो व्यवहार है; वह भिन्न द्रव्यके संयोगकी अपे- क्षासे होता है । इस प्रकार सद्भूतव्यवहारशब्दकी व्युत्पत्ति (अर्थ) है ।। १ ।। उदाहरणमाह ।। अब शुद्धसद्भतव्यवहारका उदाहरण देते हैं। मूत्रम् । ज्ञानं यथात्मनो विश्व केवलं गुण इप्यते । • मतिज्ञानादयोऽप्येते तथैवात्मगुणा भुवि ॥२॥ सूत्रभावार्थ:-जैसे इस संसारमें आत्माका केवलज्ञान गुण है; वैसे ही मति ज्ञान आदि भी पृथ्वीपर आत्माके ही गुण हैं ॥२॥ व्याख्या । यथा विश्वे जगत्यात्मनः फेवलं ज्ञानं गुण इति पष्ठीप्रयोगः । इदमात्मद्र- व्यस्य ज्ञानमिति । तथा मतिज्ञानादयोऽधात्मद्रव्यस्य गुणा इति व्यवलियते । केवलज्ञानं यद्वर्तते स एव शुद्ध आत्मास्ति मंत्सादयो ज्ञानानि केवलावरणविज्ञपिता व्ययहारा अशुद्धा लक्ष्यन्त इति ।। ३॥ व्याख्यार्थ:- जैसे इस संसारमें आत्माका केवलज्ञान गुण है, "आत्मनः" यह पष्ठी विभक्तिका प्रयोग सूत्रमें किया है, अर्थात् यह केवलज्ञान आत्मद्रव्यका गुण है; इसी प्रकार मति ज्ञानआदि भी आत्मद्रव्यके ही गुण हैं; ऐसा व्यवहार लोकमे होता है । केवलज्ञान जो है; सो ही शुद्ध आत्मा है; केवलावरण विशिष्ट जो मति ज्ञानादि है; वह व्यवहाररूप हैं; अतः अशुद्ध आत्मगुण हैं ।। २ ॥ मनम्। गुणो गुणी च पर्यायः पर्यायी च स्वभावका ! स्वभावी कारकस्तहानेकद्रव्यांनुगा विधाः ॥३॥ सूत्रभावार्थ:--गुण, गुणी १ पर्याय, पर्यायी २ स्वभाव, स्वभावी ३ कारक तथा कारकवान् ४ ये सब भेद एक द्रव्यकेही अनुगामी है ॥ ३ ॥ व्याख्या । गुणो रूपादिः, गुणी घटः १ पर्यायः मुद्राकुण्डलादिः, पर्यायी कनकम् २ खभावो झानम, खभावी जीवः ३ कारकश्चऋदण्डादिः, कारकी कुलालः ४ अथवा गुणगुणि- जो १ क्रियाक्रियावन्ती २ जातिव्यक्ती ३ नित्यद्रव्यविशेषौ चेति ४ एवं एकद्रव्यानुगत- भेदा उच्यन्ते । ते सर्वेऽप्युपनयस्यार्था ज्ञातव्याः । अवयवावयविनाविति । अवयवादयो हि यथाक्रममवयव्याद्यामिता एव तिष्ठन्नेऽविनश्यन्तो, विनश्यवस्थास्त्वनाश्रिता एय तिष्ठन्त । इत्यादि ।।३।। .

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् व्याख्यार्थ:--रूपआदि गुण हैं, घटआदि गुणी है; १ मुद्रा तथा कटक, कुंडल आदि पर्याय हैं, पर्यायी सुवर्ण है, जिसमें कि--कटक, कुंडलआदि पर्याय रहते हैं; २ ज्ञान खभाव है, और उम ज्ञानखभावका धारक जीव स्वभावी है; ३ चक्र (चाक) दंडआदि . कारक है; और कारकवान् या कारकी कुंभकार (कुंभार) है; ४ अथवा दूसरी रीतिसे गुण, गुणी १ क्रिया, क्रियावान् २ जाति, व्यक्ति ३ तथा नित्यद्रव्य और उनके विशेष ऐसे ४ यह सब एक द्रव्यमें मनुगत भेद कहे जाते है । और उन सब गुण गुणीआदिको उपनयका अर्थ जानना चाहिये । अवयवआदि यथा क्रमसे अवयवीआदिके आश्रय रहते हैं, परन्तु जबतक नाशको प्राप्त नहीं होते तभीतक अवयव अवयवीआदि माश्रय आश्रयीभावसे स्थित रहते हैं। और विनाशको प्राप्त होते हुए तो अनाभित ही रहते हैं ॥३॥ अथासद्भुतव्यवहारं निरूपयति । अब असद्भूतव्यवहारका निरूपण करते है। सूत्रम् । असद्भूतव्यवहारो द्रव्यादेपंचारतः। परपरिणतिश्लेप, जन्यो भेदो नवात्मकः ।। ४ ।। सूत्रभावार्थ:--द्रव्यादिके उपचारसे परवस्तुके पारणमनके संसर्गसे उत्पन्न असद्भुत, व्यवहार है और वह नंब ९ प्रकारका है ॥ ४ ॥ व्याख्या । असद्भूतव्यवहारः स कथ्यते यः परद्रव्यस्य परिणत्यामिश्रितः, अर्थात् द्रव्यादे- धर्माधर्मादेरुपचारत उपचंरणात्परपरिणतिश्पजन्यः परस्य 'वस्तुनः परिणतिः परिणमनं तस्य लेपः संसर्गस्तेन जन्यः परपरिणतिश्लेपजन्योऽसद्भूतव्यवहारः कथ्यते । अत्र हि शुद्ध- स्फटिकसंकाशजीवभावस्य परशब्देन कर्म तस्य परिणतिः पञ्चवर्णादिरौद्रारिमका तस्याः शेपो- जीवप्रदेशः कर्मप्रदेशसंसर्गस्लेन जन्य उत्पन्नः परपरिणतिश्शेषजन्योऽसद्भूतव्यवहाराख्यो द्वित्तीयो भेदः कथ्यते । स नवधा. नवप्रकारो भवति । तथा हि-द्रव्ये द्रव्योपचारः१ गुणे गुणोपचारः २ पर्याये पर्यायोपचारः ३ द्रव्ये गुणोपचारः ४ द्रव्ये पर्यायोपचारः५ गुणे द्रव्योप- पारःगुणे पर्यायोपचारः ७ पर्याये द्रव्योपचारः पर्याय गुणोपचारः ९ ॥ इति सर्वोऽप्य- सद्भूतव्यवहारस्याओं द्रष्टव्यः । अत एवोपचारः पृथग्नयो न भवति । मुख्याभावे सति प्रयो- जिने निमित्ते चोपचारः प्रवर्तते । सोऽपि संवन्धाविनाभावः श्लेषः संवन्धः । परिणाम- परिणामिसंवन्धः; श्रद्धाश्रद्धेयसंवन्धः, ज्ञानज्ञेयसंबन्धश्चेति । भेदोपचारतया वस्तु व्यव- द्वियत इति व्यवहारः । गुणगुणिनोर्द्रव्यपर्याययोः संज्ञासंझिनोः स्वभावतद्वतोः कारकत- द्वत्तोः क्रियातद्वतोर्मेदादभेदकः सद्भूतव्यवहारः । शुद्धगुणगुणिनोः शुद्धद्रव्यपर्याययो- भेदकथनं शुद्धसद्भूतव्यवहारः । तत्र ,उपचरितसद्भूतव्यवहारः सोपाधिकगुणगुणि-'' नोर्भेदविषय उपचरितसद्भूतव्यवहारो यथा जीवस्य मतिज्ञानादयो गुणाः । निरुपाधिकगुण- गुणिनो दुकोऽनुपचारी सद्भूतव्यवहारो यथा जीवस्य केवलगानादयो गुणाः ३. शुद्धगुण. गुणिनोरमुद्धद्रव्यपर्याययोर्भेदकथनममुद्धसद्भूनव्यवहारः ४ इत्यादिप्रयोगवशाज्ञेयमिति ॥४॥ व्याख्यार्थ:-असद्भूतव्यवहार उसको कहते हैं कि-जो परवस्तु के परिणामसे मिश्रित . .

द्रव्यानुयोगतर्कणा। १०१ रहता है। अर्थात् धर्म अधर्मआदि जो द्रव्य है; उनके उपचारसे जो परवस्तुका परिणाम है; उस परिणामके संसर्गसे उत्पन्न असद्भूतव्यवहार कहा जाता है। यहांपर शुद्ध स्फटिकमणिके समान जीवभावका ग्रहण है । उस जीवभावका परवस्तु कर्म है; उसकी परिणति पंचवर्णादि रौद्रात्मिका है; उस पंचवर्णादि रौद्रस्वरूप परिणतिका संबन्ध जीव- प्रदेशोंके साथ कर्मप्रदेशोंका संसर्ग होना है, उस परपरिणतिसे जन्य अर्थात् उत्पन्न असद्भूतव्यवहारनामक द्वितीय भेद कहा गया है । और वह असद्भूतव्यवहार नौ ९:. प्रकारका है। जैसे द्रव्यमें द्रव्यका उपचार १ गुणमें गुणका उपचार २ पर्यायमें पर्यायका उपचार ३ द्रव्यमें गुणका उपचार ४ द्रव्यमें पर्यायका उपचार ५ गुणमे द्रव्यका उप- चार ६ गुणमें पर्यायका उपचार ७ पर्यायमें द्रव्यका उपचार ८ तथा पर्यायमें गुणका उपचार यह नौ ९ भेद असद्भूतव्यवहारके हैं । इस प्रकार इन सब भेदोंको असद्भूत- व्यवहारका ही अर्थ समझना चाहिये । असद्भूतमें अन्तर्भाव होनेसे ही उपचार प्रथग् नय नहीं होता है; क्योंकि-मुख्यके अभावमें प्रयोजन तथा निमित्तमें उपचारकी प्रवृत्ति होती है । और वह उपचार भी एक अविनाभाव( व्याप्ति )रूपसंबंध ही है। जैसे कि-परिणामपरि- .णामिभावसंवन्ध, श्रद्धाश्रद्धेयभावसंवन्ध, तथा ज्ञानज्ञेयभावसंवन्ध । जिससे भेदके उपचारसे वस्तुका व्यवहार किया जाय सो व्यवहार है । जैसे गुण गुणीका, संज्ञा संज्ञी (नाम नामी )का, स्वभाव स्वभाववान्का, कारक कारकवान् तथा क्रिया और क्रियावान्के भेद रहनेपर भी जो अभेदक है। अर्थात् अभेद दर्शाता है; वह सद्भूतव्यवहार है । और शुद्ध गुण गुणी, तथा शुद्ध द्रव्य और पर्यायका जो भेदका कथन है; वह शुद्धसद्भूतव्यवहार है। उसमें भी उपाधिसहित गुण गुणीके भेदविषयक जो है; वह उपचरितसद्भूतव्यवहार है, जैसे जीवके मति ज्ञानआदि गुण हैं । और उपाधिरहित गुण गुणीके भेदका कथन करनेवाला अनुपचरित सद्भूतव्यवहार है; जैसे जीवके केवलज्ञानआदि गुण हैं । यहां पूर्वमें तो जीव कर्मभादि उपाधिसहित है; उसका तथा उसके मति ज्ञानआदि गुणोंका भेद दर्शाया गया है, और अन्तके उदाहरणमें जीव कर्मादि उपाधियोंसे रहित विवक्षित, है। अत एव उपाधिरहित जीव गुणी तथा केवलज्ञानआदि उसके गुणों का भेद अनुपच- रितसद्भूत उपनयसे दर्शाया गया है । तथा शुद्ध गुण गुणी और अशुद्ध द्रव्य पर्यायके जो भेदका कथन है; वह अशुद्धसद्भूतव्यवहार है ॥ इत्यादि अन्य भी प्रयोगके अनुसार समझ लेना ॥४॥ अथ नवभेदानसद्भूतव्यवहारजन्यान्विवृणोति । अब जो असद्भुतव्यवहारसे उत्पन्न नौ ९ भेद है। उनका विवरण करते हैं। सूत्रम् । द्रव्ये द्रव्योपचारो हि यथापुद्गलजीक्योः । गुणे गुणोपचारश्च भावद्रव्याख्यलेश्ययोः॥५॥ । - . - -~- तथा मैं द्रव्यानुयोगतर्कणा। स्कन्धाः कथ्यन्ते । ते चात्मपर्यायस्योपरि पुद्गलपर्यायस्योपचरणात्स्कन्धा व्यपदिश्यन्ते व्यवहारात् ॥ ६॥ व्याख्यार्थ:--पर्यायमें अर्थात् आत्मद्रव्यके मनुष्यआदि पर्यायमें मनुष्यादि पर्यायका ही उपचार जो है; यह पर्यायमे पर्यायका उपचार कहलाता है । जैसे आत्म- द्रव्यपर्यायके हस्ती (हाथी) अश्व(घोडा)आदि पर्यायस्कन्ध उपचारसे आत्माके समानजातीय (तुल्य ) जो द्रव्य पर्याय हैं; उनके स्कन्ध (प्रदेश) कहे जाते हैं । और वह भात्माके पर्यायके ऊपर पुद्गलके पर्यायका उपचार करनेसे व्यवहारको अपेक्षासे स्कन्ध- रूपसे व्यपदेशित होते हैं । ३ ।।.६ ॥ अथ द्रव्ये गुणोपचारः। अव द्रव्यमें गुणका उपचार दिखाते है । सूत्रम् । · द्रव्ये गुणोपचारश्च गौरोऽहमिति द्रव्यके । पर्यायस्योपचारश्च ह्यहं देहीति निर्णयः॥७॥ सूत्रभावार्थ:-और मैं गौर हूँ यह तो आत्मद्रव्यमें गुणका उपचार देही हूं यह आत्माद्रव्यमें पर्यायका उपचार है ।। ७ ॥ व्याया। यथाहं गौर इति भुक्तामहमित्यात्मद्रव्यम्, तत्र गौर इति पुद्गलस्योज्ज्वल. ताख्यो गुण उपचरितः । ४ । अथ द्रध्ये पर्यायोपचारः । अथवा “अहं देहीति निर्णयः" इत्यत्राहमित्यात्मद्रव्यम, तत्रात्मद्रव्यविपये देहीति देहमस्यास्तीति देही । देह मिति ' पुद्गल- द्रव्यस्य समानजातीयद्रव्यपर्याय उपचरितः । ५ ।।॥ ७ ॥ व्याख्यार्थ:-जैसे में गौरवर्ण हूं ऐसा कहनेवालोंकेलिये यहांपर "अहम्" यह आत्म- द्रिव्य है। उसमें गौर इस पुद्गलके उज्ज्वल नाम गुणका उपचार किया गया है । अब द्रव्यमें पर्यायके उपचारका उदाहरण कहते हैं । जैसे कि-मैं देही हूं अर्थात् मैं शरीर- गवान् ऐसा निर्णय करना यहां "अहं देही" (मैं देह्याला हूं) इस वाक्यमे "अहम्" पदसे' आत्मद्रव्य विवक्षित है; उस आत्मारूप द्रव्यमें देही अर्थात् जिसके देह है; तो देह नसहित होना यह पुद्गलद्रव्यके पर्यायका उपचार हुआ है,॥ ७ ॥ सूत्रम् । गुणे द्रव्योपचारश्च पर्यायेऽपि तथैव च । गौर आत्मा देहमात्मा दृष्टान्तौ हि क्रमात्तयोः॥८॥ सूत्रभावार्थ:-गुणमें द्रव्यका उपचार यह पष्ठ और पर्यायमें गुणका उपचार यह 'सप्तम असतव्यवहार उपनयके भेद हैं। "आत्मा गौर है" यह पष्ठ नयका और देह आत्मा है; यह सप्तमका क्रमसे दृष्टान्त है ॥ ८ ॥ ध्याच्या गुणे द्रव्योपचारश्च तथा पर्याये गुणोपचारश्चैवं, द्वावुपनयासद्भूतव्यवहारस्य भेदी । अथ तयोरेवानुक्रमेण दृष्टान्तौ । यथा 'अयं गौरो दृश्यते स चात्मा" अन गौरी मुद्दिश्यात्मनो विधानं क्रियते यत्तदिह गौरतारूपपुद्गलगुणोपर्यात्मद्रव्यसोपचार . . मा - . १०४ रायचन्द्रजैनशासमालायाम् मिति । पर्याय द्रव्योपचारों यथा "देहमित्यात्मा" अन हि देहमिति देहाकारपरिणतानां पुद- लानां पर्यायेषु विषयभूतेषु चारमद्रव्यस्योपचारः कृतः । देहमेवात्मा देहरूपपुद्गलपर्याय- विपय आत्मद्रव्यस्यापौद्गलिकस्योपचार: कृत इति सप्तमो भेदः । "अति सातत्येन गच्छति सांस्तान्पर्यायानित्यात्मा" अत्र पर्यायाणां द्रव्यभावभेदितानां गमनप्रयोगो यद्यपीष्टस्तथाप्य. सद्भूतव्यवहारविवक्षावलेनोपचारधर्मस्यैव प्राधान्याहिः पर्यायावलम्बनेन कर्मजशुभाशुभ- पुदलपरिणतगौराख्यवर्णोऽपि लक्षित आत्मा भासते तदा गौर आत्मेति प्रतीतिजीयते । अन्यथात्मनः शुद्धस्याकर्मणः कुतो गौरत्वध्वनिरत एवोपचारधर्म: देहमात्मेत्यत्र त्यौदारिकादिः पुदलप्रणीतं देहमौयिकेनांश्रित आत्मा उपलभ्यते तदा देहमात्मेत्युपचारध्यानः ।। ८ ॥ व्याख्यार्थ:--गुणमें द्रव्यका उपचार, और पर्यायम द्रव्यका उपचार यह दोनो कमसे पष्ठ तथा सप्तम असतव्यवहार उपनयके भेद है, अब इन दोनोंके क्रमसे उदाहरण यह हैं। जैसे "यह जो गौर देखनेमें आता है; वह आत्मा ही है" इस वाक्यमें गौरको उद्देश्य करके आत्मारूप द्रव्यका जो विधान किया जाता है; वह गौरतारूप पुल द्रव्यके गुणके ऊपर आत्मद्रव्यका उपचारपठन है। अब पर्यायमें द्रव्यका उपचार जैसे यह देह आत्मा है; इस वाक्यमे "देहम्" देह आत्मा है; ऐसा कहने में विषयभूत जो देहके आकार पुगलोंके पर्याय हैं; उनमें आत्मद्रव्यका उपचार किया गया है। भावार्थ देह ही पात्मा है; यहाँ देहरूप पुद्गल पर्यायके विषयमें अपोद्गलिक अर्थात् पुद्गलभिन्न जो आत्मद्रव्य है। उसका उपचार किया गया है। ऐसा पर्यायमें द्रव्यका उपचाररूप सप्तम भेद है । ७ । अब आत्मा शब्द, निरन्तरगमनार्थक अत् धातुसे मन् प्रत्यय लगानेसे बनता है; इसलिये उन २ पर्यायोंमें जो निरन्तर गमन करे वह आत्मा है । यहापर द्रव्यभावसे भेदको प्राप्त पर्यायोंका ययपि गमनरूपसे प्रयोग इष्ट है; तथापि असत. घ्यवहार उपनयकी विवक्षाके यलसे उपचार धर्मकी ही प्रधानता है, इसलिये वाबदेशमें पर्यायोंका अवलम्बन करनेसे कर्मोसे उत्पन्न शुभ तथा अशुभ पुद्गलोंके परिणागरूप जो गौर( उज्ज्वल )नामा वर्ण है; यह भी देखा हुआ जब आस्मा भासता है; तब यह गौर जात्मा है; ऐसी प्रतीति उत्पन्न होती है, अन्यथा परमार्थमें शुद्ध तथा कर्मरहित मारमाके गौरसनेका कथन कहांसे हो सकता है | इसीलिये उपचार धर्म है और "देहमात्मा, देह आत्मा है; यहाँपर आदारिकआदि शरीरसम्बन्धी पुट्टलोंसे शरीरकी जौदायिकभावसे आश्रित आत्मा प्राप्त होता है तब यह देह आत्मा है; ऐसे उपचारकी ध्वनि होती है ॥ ८ ॥ अयाटमभेदोत्कीर्तनमाह। भय अष्टम भेदका निरूपण करते हैं। सत्रम् । गुणे पर्यायचारय मतिनानं यथा तनुः। पर्याप गुणाचारोऽपि शरीरं भनिरिप्यते ॥४॥ । .

द्रव्यानुयोगतर्कणा। १०५ सूनभावार्थ:-गुणमें पर्यायका उपचार जैसे मतिज्ञान शरीर है, तथा पर्यायमें गुणका उपचार जैसे शरीर मतिज्ञान है |॥ ९॥ व्याख्या 1 गुणे पर्यायोपचारः पर्यायचार इत्युपचारो वाच्यो भीमो भीमसेन इति यत् । यथा मतिज्ञानं तदेव शरीरं शरीरजन्यं वर्तते सतः कारणात प्रतिज्ञानरूपात्मकगुणविषये के शरीररूपपुद्गलपर्यायस्योपचारः कृतः । ८॥ अथ नवमभेदोत्कीर्तनमाह । पर्याये गुणोप- चारः । यथा हि पूर्वप्रयोगजमन्यथा क्रियते । यतः शरीरे तदेव मतिज्ञानरूपो गुणोऽस्ति । अत्र हि शरीररूपपर्यायविपये मतिज्ञानरूपाख्यस्य गुणस्योपचारः क्रियते । शरीरमिति पर्यायस्तरिमन्विपये मतिज्ञानाख्यो गुणस्तस्य चोपचारः कृतः । अत्र चाष्टमनवमविकल्पयोः समविपमकरणेनोपचारो विहितस्तत्रापि सहभागिनो गुणः, क्रमभाविनः पर्यायाः, । सहभा. वित्वं च द्रव्येण क्रमभारित्वमपि द्रव्येणैव ज्ञेयमतो द्रव्यस्यैव गुणः, पर्याया अपि द्रव्यस्यैव। गुणपर्याययोः पर्यायगुणयोश्च परस्परमुपचारव्यवहारः कृतः । यत्रोपचारतत्र निदर्शन- मानमेव विसशर्मित्वेन धर्मारोपवत् । किश्चमविज्ञानमात्मनः कश्चिदुद्धटितो गुणः । शरीरे च पुद्गलद्रव्यस्य समवायिकारणम् । यथा मृत्पिण्डे घटस्य समवायिकारणमितिवत् । एवं सत्युपचारो जायते परेण परस्योपचारात् स्वेन खेनोपचारासम्भवः । यथा मृत्पिण्डस्य घटेन, तन्तूनां पटेनेत्येवं सद्भूतव्यवहारो नवधोपदिष्टः । उपचारबलेन नवधोपचाराः कृताः॥९॥ व्याख्यार्थः- यहां गुणमें पर्यायका चार "गुणे पर्यायचारः" इस पदसे पर्यायके उपचारसे तात्पर्य है; जैसे भीम और भीमसेन दोनोंसे एक ही अर्थ होता है; अर्थात् जैसे भीमके कथनसे भीमसेनका बोध होता है; ऐसे ही यहां भी चार इस कथनसे उपचार अर्थसे तात्पर्य है; गुणमें पर्यायके उपचारका उदाहरण जैसे जो मतिज्ञान है; वही शरीर है; अर्थात् शरीरजन्य है। इसलिये यहां मतिज्ञानरूप गुणके विषयमें शरीररूप पुदल पर्यायका उपचार किया गया है । ८ । अब नवम भेदका कथन करते हैं; पर्यायमें गुणका उपचार जैसे पूर्व प्रयोग जो मतिज्ञान है; वही शरीर है। इसको विपरीत कर देनेसे जो शरीर- ', है, वही मतिज्ञानरूप गुण है। यहां शरीररूप पर्यायके विषय मतिज्ञानरूप गुणका उप. चार है। क्योंकि शरीर तो पर्याय है। उस शरीरके विषयमें मतिज्ञाननामक गुणका उप- चार किया गया है । इन अष्टम, नवम, असद्भूतव्यवहारउपनयके भेदोंमे सम विषम कर- : नेसे उपचार कियागया है। इनमें भी सहभावी जो है; वह गुण हैं; और जो क्रममावी हैं; वह 'पर्याय हैं। और सहभावित्व अर्थात् साथ होना भी द्रव्यसे ही है; तथा क्रमभाविन्व अर्थात क्रमसे होना यह भी द्रव्यसे ही है, इस कारण द्रव्यके हो गुण हैं; और द्रव्यके ही पर्याय है। गुण तथा पर्यायका और पर्याय तथा गुणका परस्पर उपचार व्यवहार कियागया है । जिमने जिसका उपचार होता है; उसमें उसका विसदृशधर्मीके धर्मके आरोपके सदृश दृष्टान्तमात्र दर्शाया जाता है। और मतिज्ञान जो है; वह आत्माका कोई उत्पन्न हुआ गुण है, क्या शरीर 1 +- । १४ . द्रव्यानुयोगतर्कणा। मूर्त कथितं तत् मूर्तविपयलोकमनस्कारादिकेभ्य उत्पन्नं तस्मान्मूर्त वस्तुतस्तु मतिज्ञान- मात्मगुणस्तस्य चापौद्गलिकस्य मूर्तिमत्सुद्गलगुणोपचारः कृतः । स तु विजात्या असद्भूत- व्यवहारः॥ ११॥ व्याख्यार्थ:-जैसे वही असद्भूतव्यवहार विजाति अर्थात् अन्यजातिसे भी है । जैसे मति मूर्तिमती है; अर्थात् मतिज्ञान मूर्त ( आकारसंयुक्त ) कहा गया है । यह मूर्त विषय लोक तथा मनस्कारादिसे उत्पन्न हुआ है। इस कारण मूर्त है । यथार्थमें तो मतिज्ञान आत्माका गुण है; अतः वह अपौद्गलिक है; अर्थात् पुद्गलसे उत्पन्न हुआ नहीं है; उस अपौद्गलिक मतिज्ञानके मूर्तिमान् पुद्गलगुणका उपचार किया गया है; और यह उपचार चेतन धर्मके विजातीय मूर्तिमान् पुद्गल गुण है; इस कारण विजातिसे असद्भूत व्यवहार है ॥ ११॥ अथ तृतीयमाह । अब असद्भूतव्यवहारका तृतीय भेद कहते है। सूत्रम् । स्वजात्या च विजात्यापि, असद्भूतस्तृतीयकः । जीवाजीवमयं ज्ञानं व्यवहाराद्यथोदितम् ॥ १२ ॥ सूत्रभावार्थ:-स्वजातिसे तथा विजातिसे तृतीय असद्भराव्यवहार प्रवृत्त होता है । जैसे व्यवहारसे जीव तथा अजीवमय ज्ञान कहा गया है ॥ १२ ॥ व्याख्या । स एव पुनरसद्भूतव्यवहारः स्वजात्या विजात्या च संबन्धितः कथितः । यथा जीवाजीवविषयं मतिर्ज्ञानम् । अत्र हि जीवो मतिज्ञानस्य स्वजातिरस्त्यात्मनो ज्ञानमयत्वान् , अजीवो मतिज्ञानस्य विजातिरस्ति । यद्यपि मतिज्ञानस्य विजातिरस्ति । यद्यपि मतिज्ञानादि- विषयोभूतघटोऽयमिति ज्ञानम् । तथापि विजातिर्जडचेतनसंवन्धात् । अनयो वयोर्विषय- विषयिभावनामा उपचरिनसंवन्धोऽस्ति । स हि खजातिविजात्यसद्धृतव्यवहारोऽस्ति तद्धा- नमेव ज्ञेयम् । स्वजात्यंशे किन्नायं सद्भूत इति चेद्विजात्यंशे विषयतासंबन्धस्योपचरितस्यै- वानुभवादिति गृहाणेति । व्यवहाराद्यथोदितं तथा विचारयेति पद्यार्थः ॥ १२ ॥ व्याख्यार्थ:--स्व (निज) जाति तथा विज्ञाति( परजाति )से संवन्धयुक्त होनेसे तृतीय असतव्यवहार कहा गया है । जैसे "मतिज्ञान जीव अजीव विषयक है। इस वाक्यमें जीव तो मतिज्ञानका स्वजाति है, क्योंकि-आत्मा ज्ञानस्वरूप ही है। और अजीव मतिज्ञानका विजाति है । यद्यपि "अयं घट;", यह घट है; यह ज्ञान मतिज्ञानादिका विषयभूत है; तथापि यह विजाति है, क्योंकि इस ज्ञानमें जड तथा चेतनका संबन्ध है। इन जीव तथा अजीवका विषयविषयीभावनामक उपचरित संबन्ध है; और वही सजातिविजातिसंबन्धी असद्भूतव्यवहार है । इसलिये असद्भुतका ही भान होता है; ऐसा समझना चाहिये । यदि ऐसा कहो कि-खजात्यंशम यह सद्भूत क्यों नहीं है तो यह ।

द्रव्यानुयोगतर्कणा। पुत्रादिः' मैं ही पुत्रआदि हूं, यह संबन्धं कल्पना है । पुनः यह पुत्र, मित्र; स्त्रीआदि सब मेरे हैं; अर्थात् यह सब मेरेसे ही संबन्ध रखनेवाले ( मेरे संवन्धी ) हैं; अब यहां पुत्र आदिके विषयमें "अहम्" मैं और "मम" मेरे यह जो कथन है; सो उपचरितसे उप- चार किया गया है, सो कैसे कि-निज वोर्यके परिणाम होनेसे पुत्रआदि अपने आत्मा- के ही भेद है; इसलिये पुत्रादिमें भेद होते हुए भी परंपराके हेतुसे अभेद संवन्धका उपचार कियागया और पुत्रादि निजशरीरकी पर्यायरूपतासे तो अपनी जाति है; परन्तु कल्पनामात्रसे ही मैं तथा मेरे यह व्यवहार होता है। यदि ऐसा न हो (यदि पुत्रादिमें अपना अंशमानना कल्पना मान न हो) तो अपने शरीरकी योजनासे जो पुत्रादिकका सम्बन्ध कहा गया है, उसी प्रकार मत्कुण (खटमल ) आदिसे भी शरीरका संबन्ध है; उनमें पुत्रादि व्यवहारका कथन क्यों नहीं करते ॥ १४ ॥ अथ विजात्यासद्भुतव्यवहारः । अब विजातिसे असद्भूतव्यवहारका निरूपण करते है। सूत्रम् । विजात्या किल तं वित्थ योऽहं वनादिरद्भुतः। वस्त्रादीनि ममैतानि वप्रदेशाधो द्विधा ॥ १५ ॥ सूत्रभावार्थ:--उसको विजातिसे उपचरित असद्भूतव्यवहार जानो कि-जो मैं वस्त्र आदि हूं, और वस्त्रआदि मेरे हैं। ऐसा मानता है। तथा वन (पर्वतोंपर क्रीडाका स्थान) प्रदेशमादि मैं हूं; तथा वप्र प्रदेशआदि मेरे हैं; इत्यादि मानता है; सो खजातिवि- जात्युपचरितासद्भूतव्यवहार है ॥ १५ ॥ व्याख्या । विजात्युपचरितासतव्यवहारं प्रकटयति । किल इति सत्ये, तमसवव्य- वहारं विजात्योपचरितं विजानीत । यश्चाई वस्त्रादिः, अमिति सम्बन्धिवचनं वस्त्रादिरिति. सम्बन्धवयनमहं वस्त्रादिरित्युपचरितम् । सर्वोऽपि व्यतिकरोऽसद्भूतव्यवहारः सम्वन्धस- 'म्बन्धिकल्पनत्वात् । अथ चैतानि वखादीनि मम सन्ति “अत्र हि वस्रादीनि पुद्गलपर्यायाणि ममेति सम्बन्धयोजनया भोज्यभोजकभोगभोगिकोपचारकल्पनमानपराणि भवन्तीति निष्कर्षः । अन्यथा वल्कलादीनां वानेयानां पुद्गलानां शरीराच्छादनसमर्थानामपि मम घनाणीत्युपचारसम्बन्धकल्पनं कथं न कथ्यने । वस्रादीनि हि विजातिषु स्वसम्बन्धोपच. रितानि सन्तीति भावः । पुनः वप्रदेशादयो द्विधेति" वप्रादिरहम्, वप्रदेशादयो ममेति कथ- यता स्वजातिविजात्युपचरितासद्भूतव्यवहारो भवेत् । कथं वप्रदेशादयो हि जीवाजीवात्मको. भयसमुदायरूपाः सन्ति ।। १५॥ व्याख्यार्थः-विजातिसे उपचरित असतव्यवहारको प्रकट करते हैं। सूत्रों जो "किल" पद है; वह सत्य अर्थका वाचक है। इसलिये सत्य प्रकारसे उसको विज्ञा तिसे उपचरित असद्भूतव्यवहार जानो । जो 'भई वस्त्रादि' मैं वस्त्रादि हूं; यहां पर अहं यह जो पद है; यह सम्बधीका वाचक है; भौर पनादि यह सम्बंध वाचक । । -- . ११० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् है; और वस्त्रभादि मैं हूं यह उपचारसे कथन है, अर्थात् वस्त्रादिमें मत्त्व (आत्मत्व) उपचारसे माना गया है । सम्बंध तथा सम्बधीको कल्पना होनेसे यह सब व्यतिकर (जंडमें आत्मबुद्धि तथा आत्मामें वनादि उलटा ज्ञान ) असद्भूतव्यवहारका विषय है; और यह वस्त्रआदि सब मेरे हैं; यहांपर वस्त्रआदि पुद्गल पर्याय हैं; उनमें मेरे हैं; इस सबन्धकी योजनासे भोज्य भोजक वा भोग भोगीके उपचारकी कल्पना मात्रमें तत्पर हैं, अर्थात् वस्त्रआदि भोज्य हैं; और आत्मा उनका भोग करनेवाला है। इस कल्पनाके विधायक हैं। यदि ऐसा न हो तो वृक्षोंके वल्कल (छाल) वा उनके अन्य पत्रादि जो शरीरके आच्छादनमें समर्थ हैं तो भी उनमें ये मेरे वन हैं; अथवा ये मैं हूं इत्यादि उपचार सबन्धकी कल्पना क्यों नहीं कहते । अतः जिन वस्त्रोंमे भोज्य भोजक भाव है; वह ही वस्त्रआदि विजातीय आत्माआदिमें निज संबन्धसे उपचरित हैं; यह तात्पर्य है । अब 'वप्रदेशादयो द्विधा' इस वाक्यकी व्याख्या करते है । वमआदि मैं हूं और वप्रआदि देश मेरे हैं, ऐसा कहनेवालोंको स्वजातीय तथा विजातीय उपचारसे असद्भूतव्यवहार है, क्योंकि-वप्र, देशादि जीव तथा अजीव इन दोनोंके समुदाय- रूप है ।॥ १५॥ अथ संक्षेपमाह। भय संक्षेपसे नय तथा उपनयके विषयका उपसंहार करते हैं । सूत्रम् । इत्थं समे चोपनयाः प्रदिष्टाः स्यादादमुद्रोपनिषत्स्वरूपाः । विज्ञायतान शुद्धधिया अयंतां जिनक्रमाम्भोजयुगं महीयः१६ सूत्रभावार्थ:-इस रीतिसे स्याद्वादशैलीसे रहस्यभूत नय तथा उपनय दोनोंका समानरूपसे उपदेश किया है। शुद्धबुद्धिके धारक उनको जान कर सर्वपूजनीय जिन भगवान्के चरणकमलका आश्रय लें ॥ १६ ॥ व्याख्या । इत्थमनया दिशा समे नयाश्च पुनः उपनयाः प्रदिष्टाः कथिताः । कीरशास्ते स्याद्वादस्य श्रीजिनागमस्य या मुद्रा शैली तस्या उपनिपत्स्वरूपा रहस्यरूपाः सन्ति । तान् सर्वानपि विज्ञाय ज्ञात्वा शुद्धधियः निर्मलवुद्धयः अयन्तामङ्गीकुर्वनां कि जिनक्रमाम्भोजयुगं वीतरागचरणकमलं श्रयन्तामित्यर्थः ॥ १६ ॥ इति श्रीकृतिभोजसागरविनिर्मितायां द्रव्यानुयोगतर्कणायां सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ व्याख्यार्थ: :-इस पूक्ति दिशासे अर्थात् पूर्वकथित रीतिके अनुसार समानरूपसे नय तथा उपनय दोनोंका निरूपण किया है, वह नय तथा उपनय कैसे हैं; कि-श्रीजि. नदेव प्रणीत स्याद्वादकी जो मुद्रा अर्थात् शैली है; उसके रहस्य (सार) भूत हैं। इस हेतुसे निर्मलबुद्धि जन उन सब नय तथा उपनयोंको भेद प्रभेदसहित जानकर सर्व पूज- नीय श्रीजिन भगवान्के चरणकमलोंका आश्रय ग्रहण करें यही सूत्रका तात्पर्य है॥१६॥ इति श्रीआचार्योपाधिधारक पं० ठाकुरप्रसादप्रणीतभापाटीकासमलतायाँ द्रव्यानुयोगतर्कणाव्याख्यायां सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ +

यह
द्रव्यानुयोगतर्कणा।
अथाष्टमाध्यायं विवृणोति ।
अब अष्टम अध्यायका विवरण करते हैं।
सूत्रम् । निश्चयव्यवहारी हि दौ च मूलनया स्मृती।
निश्चयो दिविधस्तत्र शुद्धाशुद्धविभेदतः ॥ १॥
सत्रभावार्थ:--निश्चय तथा व्यवहार यह दो ही मूल नय हैं, इनमें शुद्ध अशुद्धके
भेदसे निश्चयनय दो प्रकारका है, अर्थात् शुद्धनिश्चयनय, और अशुद्धनिश्चयनय,
निश्चयनयके दो भेद हैं ॥ १ ॥
व्याख्या । हि निश्चितमध्यात्मभापायां मूलनयो द्वौ स्मृतौ तौ च निश्चयव्यवहारौ
निश्चिनोति तत्त्वमिति निश्चयः १ व्यवहियत इति व्यवहारः २ तत्रापि निश्चयो नामा
द्विविधो द्विप्रकारः । एकः शुद्धनिश्चयनयः, द्वितीयोऽशुद्धनिश्चयनयः । एवं द्विप्रकारो
ज्ञेयः॥१॥
व्याख्यार्थ:--सूत्रमें जो 'हि' शब्द है; उसका अर्थ निश्चय है, इसलिये निश्चय
रूपसे अध्यात्मभापाके अनुसार मूलभूत नय निश्चय तथा व्यवहार यह दो ही है
इनमें तत्त्वका जो निश्चय करै उसको निश्चय कहते है, तथा जो व्यवहार कियाजाय वह
व्यवहारनय है, उनमे भी निश्चयनामक नय दो प्रकारका है; एक तो शुद्धनिश्चयनय है;
और दूसरा अशुद्धनिश्चयनय है, इस रीतिसे निश्चयनय दो प्रकारका है ॥ १ ॥
सूत्रम् । यथा केवलज्ञानादिरूपो जीवोऽनुपाधिकः ।
शुद्धो मत्यादिकस्त्यात्माशुद्धः सोपाधिका स्मृतः ॥ २ ॥
सूत्रभावार्थ:-जैसे उपाधिरहित जीव केवलज्ञानादिरूप है, यह शुद्धनिश्चय
नय है, और उपाधिसहित जीव मतिज्ञानादिरूप है; यह अशुद्धनिश्चयनय है ॥ २ ॥
व्याख्या । यथा हि केवलज्ञानादिरूपो जीवोऽनुपाधिक उपाधिः कर्मजन्यस्तेन विही-
नोऽनुपाधिका शुद्ध इति शुद्धनिश्चयभेदेन प्रथमः । अन्न हि केवलज्ञानमासाद्य शुद्धगुणमया-
स्मकरूपेण जीवस्याभेदो दर्शितः । तथा च मतिज्ञानादिक आत्मा अशुद्धनिश्वयभेदेन
द्वितीयः । अन ह्यात्मनः सोपाधिकम्यावरणक्षयजनितज्ञानविकल्पेनात्मा मतिज्ञानी अशुद्ध
उपलक्ष्यते सोपाधिकल्यात् केवलज्ञानाख्यो गुणः शुद्धगुणस्तटुपेत आत्मापि शुद्धस्तन्नामनयो-
दयाच्छुद्धनिश्चयनयः । मतिज्ञानादिगुणोऽशुद्धस्तदुपेत आत्मायर्या शुद्धस्तदाख्यया नयोप्यशुद्ध-
निश्चयशब्द आत्ममात्रप शुद्धशब्दः कर्मावरणविशिष्टः । आवरणक्षये शुद्धः सति तस्मि-
व्याख्यार्थः-जैसे केवलज्ञानादिरूप अर्थात् केवलज्ञानमय जीव अनुपाधिक है,
अर्थात् कोसे उत्पन्न हुई जो उपाधि है उससे रहित है; भावार्थ शुद्ध है। यह शुद्ध
निश्चयके भेदसे प्रथम भेद दर्शाया गया है । और मतिज्ञानादिक आत्मा है, यह
मशुद्धः ॥२॥

. ११२ रायचन्द्रनशास्त्रमालायाम् अशुद्धनिश्चयके भेदसे द्वितीय नय है । इस भेदमें उपाधिसहित भात्माके मतिज्ञाना- वरणीय कर्मके क्षयसे उत्पन्न जो ज्ञान है; उसके भेदसे आत्मा मतिज्ञानी है; अर्थात् मतिज्ञान जीव है, ऐसे अशुद्ध उपलक्षित होता है; क्योंकि-यह मतिज्ञान सोपाधिक है, अर्थात् कर्मजन्य है । भावार्थ-केवलज्ञाननामक जो गुण है; वह शुद्ध गुण है, इसलिये उस शुद्ध गुणसे युक्त आत्मा भी शुद्ध है; और शुद्धनामक नयके उदयसे शुद्ध निश्चय नय है । मतिज्ञानआदि जो गुण है। वह अशुद्ध गुण है, इस कारण उस अशुद्ध गुणसे युक्त आत्मा भी अशुद्ध है; और उस नामसे नय भी अशुद्ध निश्चय है । निश्चय शब्द आत्मामात्रमें तत्पर है; और शुद्ध शब्द कर्मके आवरणविशिष्ट है; अर्थात् कर्मक आवरणका क्षय होनेपर शुद्ध है; और उस आवरणकी विद्यमानतामें अशुद्ध है; यह शुद्ध और अशुद्ध शब्दका विवेचन हुआ और शुद्ध अशुद्ध इन दोनोंके साथ निश्चय शब्द इसलिये लगा है; कि केवलज्ञान भी आत्माका गुण है; और मतिज्ञान भी आत्माहीका गुण है। इस कारण शुद्ध भी निश्चयनय है; और उपाधिकी सत्तासे अशुद्ध भी निश्चयनय है ॥ २॥ अथ व्यवहारस्य भेदं दर्शयति । अब व्यवहारनयके भेदको दर्शाते हैं। सूत्रम् । सद्भूतश्चाप्यसद्भूतो व्यवहारो द्विधा भवेत् । तत्रैकविपयस्त्वाधः परः परगतो मतः ।। ३ ।। सूनभावार्थ:--सद्भूत और असद्भूत इन दो भेदोंसे व्यवहार भी दो प्रकारका होता है, अर्थात् एक सद्भूतव्यवहारनय और दूसरा असद्भूतव्यवहारनय । उनमें प्रथम तो एक द्रव्यके आश्रित सद्भूतव्यवहार है और दूसरा असद्भूतव्यवहार परद्रव्याश्रित है ।।१।। व्याख्या । व्यवहारोऽपि सद्भूतः पुनरसद्भूत इति भेदाभ्यां द्विधा द्विप्रकारः तत्र आद्यः प्रथम एकविषय एकद्रव्याश्रितः सद्भूतव्यवहारः । अपरः परविषयः परद्रव्याश्रितो सद्भूतव्यवहार इति ॥ ३॥ व्याख्यार्थ:--व्यवहारनय भी नियश्चयके सदृश सद्भूत तथा असद्भूत इन दोनों भेदोसे दो प्रकारका है । उनमें प्रथम सद्भूतव्यवहार तो एक द्रव्यविषयक है, अर्धा एक द्रव्यके आश्रयसे रहता है । और द्वितीय असमूतव्यवहार परद्रव्यके आश्रयस रहता है ॥३॥ सूत्रम् । उपचरितसद्भुतानुपचरितभेदतः। आद्यो दिधा च सोपाधिगुणगुणिनि दर्शनात् ।। ४ ।। १ त्रिरि पुस्तकेष्वयमेव पाटो विद्यते पररवस स्थाने "असनव्यपहारः” इस पाटः सम्यगाभाति । .

दव्यानुयोगतर्कणा। सूत्रभावार्थ:-उपचरितसद्भूत और अनुपरितसद्भूत इन दोनों भेदोंका कारण प्रथम जो सद्भूतव्यवहार है; वह भी दो प्रकारका है; उनमें सोपाधिक गुण गुणीके भेदसे प्रथम भेद होता है ॥ ४॥ व्याख्या । उपचरितसद्भूतभेदेनानुपचरितसद्भूतभेदेन चाद्य एकद्रव्याश्रितसतव्यव- 'हारो द्विधा द्विप्रकारः । तत्र च सोपाधिकगुणगुणिभेदात्मथमो भेदो भवति ॥ ४॥ ". व्याख्यार्थ:--उपचरितसद्भूतभेदसे तथा अनुपचरितसद्भूतभेदसे आदि जो एक द्रव्यके आश्रित सद्भूतव्यवहार है। वह दो प्रकारका है, उनमेंसे,उपाधिसहित गुण और गुणीके भेदसे प्रथम भेद अर्थात् उपचरितसद्भूतव्यवहारनय होता है ॥ ४ ॥ सूत्रम् । यथोपचारतो लोके जीवस्य मतिरुच्यते । अनुपचरितसद्भूतोऽनुपाधिगुणतद्वतोः॥५॥ सूत्रभावार्थ:-जैसे. लोकमें उपचारसे यह कहा जाता है; कि-जीवका मति- ज्ञान है । और अनुपचरितसद्भूतव्यवहार वह है; जो उपाधिरहित गुण गुणीको प्रदर्शन करे ॥ ५॥ व्याख्या । यथा जीवस्य मतिज्ञानम् । अत्र हि मतिरुपाधिः कर्मावरणकलुपितात्मनः सकलज्ञानवेन शानमिति कल्पनं सोपाधिकमुपधारतो जातमिदम् । अथ द्विनीयभेदमाह । उपाधिरहितेन गुणेनानुपाधिक.आत्मा यदा संपद्यते तदनुपाधिकगुणगुणिनोर्मेदाभिन्नोऽनुप- चरितसद्भूतोऽपि द्वितीयो भेदः समुत्पद्यत इति ॥५॥ व्याख्यार्थ:-उपचरितसद्भूतका उदाहरण-जैसे जीवका मतिज्ञान इत्यादि लो.. को व्यवहार होता है; इस व्यवहारमें उपधिरूप कर्मके आवरणसे कलुषित भात्माका म. लसहित. ज्ञान होनेसे जीवका मतिज्ञान यह उपाधिसहित कल्पना उपचारसे हुई है, इस लिये सोपाधिक होनेसे यह उपचरित सद्भूतव्यवहारनामक प्रथम भेद है । अव द्वि- तीय भेदको कहते हैं । उपाधिरहित गुणके साथ उपाधिशून्य आत्मा जन संपन्न होता है। तब अनुपाधिक ( उपाधिसे वर्जित ) गुण गुणीके भेदसे भिन्न ( भेदको प्राप्त हुआ) अनुपचरितसद्भूतनामक व्यवहारनयका दूसरा मेद भी सिद्ध होता है ॥ ५॥ अथास्योदाहरणमाह । अन इस अनुपचरितसद्भूतव्यवहारका उदाहरण कहते हैं । सूत्रम् । केवलादिगुणोपेतो गुण्यात्मा निरुपाधिका । असद्भूतव्यवहारो दिधैवं परिकीर्तितः॥६॥ सूत्रभावार्थ:-केवलज्ञानमादिगुणसहित गुणी मात्मा उपाधिरहित है। और असतव्यवहार भी पूर्वोक्त सद्भूतथ्यवहारेकी भांति दो प्रकारका कहा गया है ॥६॥ व्याख्या । केवलादिगुणोपेतः फेवलज्ञानसहितः कर्मक्षयाविर्भूतप्रभूतानुमवभावात्मको जीवो निरुपाधिकगुणोपेतो निरुपाधिक गुणी भवति । आत्मा हि संसारावस्थायामष्टकम . 14

११४ ।
रायचन्द्रजैनशाखमालायाम्
जनितावरणपरिस्फुटप्रभावभावितः सोपाधिकगुणैर्मत्यादिमितद्वानिति सोराधिक आत्मेति
व्यपदेशमाग्भवति । अत्र तु तदभावे बदभावानिरुपाधिक गुणगुणिभेदभावनासमुत्पादादनु।।
: पचरितसद्भूतभेदोऽपि समुत्पन्नः केवलादिरिति केवलस्यकत्वादादिरिति तदुत्थानन्तगुणो.
दयाकेवलादिरिति कयनम् । अथासद्भूतव्यवहारस्थापीत्यमेव भेदद्वयं प्रकटयन्नाह । अस-
द्भूतव्यवहारोऽप्येवं पूर्वोक्तसद्भूतबहिषा द्वि:प्रकार परिकीर्तितः कथित इति ॥ ६॥ .
व्याख्या:-जैसे केवलादिगुणके युक्त ( केवलज्ञानरूप गुणसे सहित ) भारमा
अर्थात् कोंके क्षयसे उत्पन्न जो प्रभूत ( महा ) अनुभव है; उस महानुभवखरूप भार
मय जो जीव है; वही उपाधिरहित केवलज्ञानसे संयुक्त निरुपाधिक आत्मा है । क्यों कि-
मात्मा संसारमयी अवस्थामें अष्ट प्रकारके जो कर्म हैं। उन कोसे उत्पन्न आवरणों के अप्र-
फट प्रभावसे सहित हुआ उपाधिसहित गुण जो मतिआदिक ज्ञान हैं; उनसे मतिज्ञानी
अर्थात् उपाधिसहित आत्मा इस नामका भागी होता है। और यहांपर कारणके अभा.
पसे कार्यका भी अभाव होता है। इस न्यायसे उपाधिसहित मंतिज्ञानादि गुणोंके अमा.
वसे उपाधिसहित गुणी आस्मा भी नहीं रहता इसलिये उपाधिसे वर्जित गुण गुणीके
भेदकी भावनाकी सम्यक् प्रकारसे उत्पत्तिसे "अनुपरितसमूत" यह नयका भेद सिद्ध
होता है । और सूत्रमें जो " केवलादिगुणसहित गुपी आत्मा निरुपाधिक है "
बास्यमें "केवल" पदके भागे "भादि" पद दिया है, यह कैसे संगत होसकता है; क्यों
कि केवलज्ञान तो एक है ? इसका उत्तर यह है कि यद्यपि केवलज्ञान एक ही है; तथापि
केवलज्ञानसे उत्पन्न जो अनन्त मुख, अनन्त वीर्यमादि गुण है; उन गुणोंकी बिरसाते ।
" केवलादि " यहाँपर आदि पद दिया है। अर्थात् केवलज्ञानके सहचारी अनन्त गुण
सहित निरुपाधिक आस्मा यह अभिप्राय "भादि" इस पदका है ॥ गय असन्तव्य
वहारके भी इसी प्रकार दो भेदोंको प्रकट करते हुए कहते हैं ॥ भसद्भूत व्यवहार नय भी
पूर्वोक्त सद्भूतनयके समान दो हो प्रकारका कहा गया है ॥६॥
अर्थतस्यासद्भूतव्यवहारस्य भेदद्वयं सोदाहरणपूर्वकं प्रकटयनाद ।।
भब इस मसद्भूतय्यवहारके उदाहरणसहित दोनों भेदोंको प्रकट करते हुए भा.
'. पार्य इस अमिम सूत्रको कहते हैं ।।.
सूत्रम् । असंश्लेपितयोगेऽऽपो देवदत्तधनं यथा ।
स्वारसंश्लेपितयोगेऽन्यो यथास्ते देहमात्मनः ॥ ७॥
सूत्रभावार्थ:-असमिलित योग, जहां संबन्धकी कल्पना होती है। यहांयर प्रथम
भेद अर्थात् उपपरिवमसतव्यवहार होता है। जैसे देवदत्तका धन । और समिटित
(मिले हुए) योग, जहां संबन्धकी करना होती है। यहां द्वितीय भेद अर्यात् अनुपचरित
असमूतव्ययहारनप होता है; जसे भारमाके देव स्थित है ॥७॥

. 4 १ विपरीतभावता अर्थात् जो भावना देवदत और उसके धनके.विषयमें हैं; उससे उलटी भावनासे यह सम्बन्ध रचा गया है. द्रव्यानुयोगतर्कणा। व्याख्या अन्नद्वयोरपि भेदयोर्मध्ये अश्यः अग्रेभवोऽत्र्यो मुख्यः प्रथमः असंश्लेषितयोगे “कल्पितसम्बन्धविपर्य उपचरितासद्भूतव्यवहारो भवेत् । यथा देवदत्तधनम्, इह घनेन देवदत्तस्य संवन्धः स्वखामिभावरूपश्च जायते तदपि कल्पितत्वादुपचरितम् । यतो देवदत्ता पुनर्धन चैकद्रव्यं न हि तस्माद्भिन्नद्रव्यत्वादसद्भूतभावनाकरणेनासद्भूतव्यवहार, इति । तथा .द्वितीयोऽन्यः संश्लेपितयोगे कर्मजसंबन्धे भवति । यथा आत्मनो जीवस्य देहमित्यास्ते सिष्ठति । अत्र ह्यात्मदेहयोः संवन्धे देवदत्तधनसंबन्धमिव कल्पनं नास्ति विपरीतभा.. वना निवर्त्यत्वाद्यायजीवस्थायित्वादनुपचरितं तथा भिन्नविषयत्वादसद्भूतव्यवहार इति ।।।। व्याख्यार्थः- यहां इन दोनों भेदोंके ,अर्थात् उपचरितअसद्भूतव्यवहार तथा, अनु; पचरितअसद्भूतव्यवहारके मध्यमें अग्र्य, आगे (प्रथम) होनेवाला मुख्य भेद अर्थात् पहिला भेद संश्लेप( संबन्ध )का योग न होनेपर अर्थात् कल्पित संवन्ध माननेपर उपच- रितभसतव्यवहार होता है; जैसे "देवदत्तका धन" यहाँपर देवदत्तका धनके साथ स्व. स्वामिभायरूपसे संबन्ध माना गया है, वह भी कल्पित होनेसे उपचरित ( उपचारसे सिद्ध) है। क्योंकि देवदत्त और धन यह दोनों एक द्रव्य नहीं हैं, इस हेतुसे अर्थात् भिन्न द्रव्य होनेसे देवदत्त तथा धनमें सद्भूतर यथार्थ ) संबन्ध नहीं है, अत एव असतभा- । यना करनेसे उपचरितअसद्भूतव्यवहार है । और अन्य (द्वितीय) भेद जी मिलित' योग है; अर्थात् कर्मजनितसंबन्ध है; वहां होता है । जैसे "जीवके देह स्थित है" यहापर आत्मा तथा देहका संबंन्ध देवदत्त तथा उसके धनके संबन्धके तुल्य कल्पित संबन्ध नहीं है, क्योंकि--विपरीतंभावनासे निवर्तनीय यहांपर यह यायजीव स्थायी होनेसे अनुपचरित है। तथा जीव और देहके मिन विषयपनेसे असद्भूतव्यवहार है ।। ७ ॥ अथोक्तविपयस्वामित्वमाह। अब उक्तविषयके खामित्वका वर्णन करते हैं। सूत्रम् । नयाश्चोपनयाश्चैते तथामूलनयावपि । इत्यमेव समादिष्टा नयचक्रेऽपि तत्कृता ॥ ८॥ सूत्रभावार्थ:-नय, उपनय तथा मूलनय जैसे हमने इस अन्यमें निरूपण किये है, इसी प्रकारसे नयचक्रनामक ग्रंथमें नयचऋकारने भी वर्णन किये हैं ॥ ८॥. व्याख्या । एते नया उक्तलक्षणाश्च पुनरुपनयास्तथैव द्वो मूलनयावपि निश्चयेनेत्यममुना प्रकारेणैव नयचकेऽपि दिगम्बरदेवसेनकृते शास्त्रे नयचक्रेऽपि तस्कृता वस्यं नयचय कृता, उत्पादकेन समादिष्टं कथितम् । एतावता दिगम्बरमतानुगतनयचक्रमन्यपाठपठित- नयोपनयमूलनयादिकं सर्वमपि सर्वशप्रणीतसदागमोक्तयुक्तियोजनासमानतभ्रत्वमेवासे न किमपि विसंवादितयासीति ॥ ८॥ " .

। . -- ११६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् व्याख्यार्थ:-यह पूर्वकथित लक्षणसहित नय; उपनय तथा दो मूलनय जैसे हमने निरूपण किये हैं, निश्चयरूपसे ऐसे ही दिगम्बर श्रीदेवसेन आचार्यकृत नयचक्र शास्त्रमें भी उस नयचक्रके उत्पादक (कर्ता) भर्थात् दिगम्बर देवसेनाचार्यजीने कहा है। इससे यह वार्ता सिद्ध हुई कि-दिगम्बरमतके अनुगत (अनुसार) नयचक्रनामक ग्रन्थमें पठित नय, उपनय तथा मूलनयमादिक सब ही श्रीसर्वज्ञप्रणीत सत्शास्त्रकथित युक्तिकी योजनाओं से समानंतन्त्र अर्थात् हमारे सिद्धान्तके समान ही है, उसमें किंचित् भी विसंवाद- पनसे कथन नहीं है ।। ८ ॥ अथ पुनरपि श्वेताम्बरदिगम्बरयोः समानतप्रत्यमुपदिशन्नाह । भब फिर भी श्वेताम्बरों तथा दिगम्बरोंके मतमें समानतंत्र (अविरुद्धशास्त्रता) है। इस वातका उपदेश देते हुवे कहते हैं। सूत्रम् । यद्यपीहार्थभेदो न तस्यास्माकमपि स्फुटम् । तथाप्युत्क्रमशैल्यासौ दह्यते चान्तरात्मना ।। ९॥ सूत्रभावार्थः। यद्यपि हमारे तथा श्रीदेवसेनजी दिगम्बरके कथनमें कुछ भी अर्थ- का भेद नहीं है । तथापि पाठकी शैलीको विपरीतरूपसे करने रचनेसे यह देवसेनजी इ. युक्त अन्तरात्मासे संतप्त हो रहे हैं ।। ९ ।। व्यापया। यद्यपि तस्य देवसेनस्य दिग्वाससोऽपि धयामा श्वेवभिक्षण स्फुट प्रकटं यथा स्यात्तथेह द्रव्यादिपरिज्ञानोपयोगिनि नयविचारेऽर्थभेदो विषयभेदो नास्ति । उभयोरप्य- देशे विपयाभेदत्वमेव शब्दादेशे किमपि पाठान्तरत्वान किमपि दोपः। यथा हि-अर्थे प्रयो- जनवन्तस्तार्फिका: शब्दस्याप्रयोजकत्वात् । तथाप्यसौ देवसेनो दिगम्बर उत्क्रमशैल्या विपरी- तपरिमापयार्यस्य तादृशत्वेन शब्दस्यातादृशत्वेन चोकमशैल्या फुत्वान्तरतमनान्तरङ्गपरिणा:: 1-71 मेनेालुत्वाइझते खिद्यते । ईलियो घन्तरुपतापपरा एव भवन्ति निष्कारणमेवेति । यवो "यद्यपि न भवति हानिः परकीयां परति रासभो द्राक्षाम् । असमन्जसं तु दृष्ट्वा तथापि परिखि. यते घेवः।१।" इति वचनाद्यथोकभागवतसिद्धान्तमुद्धपरिमापां त्यक्त्वा स्यकपोलकॅस्पिससं. स्कृतभापया श्रीवीतरागोकार्यविपयमगीकस नवीनपन्यं विरपथ्य प्रमावं ख्यापयती. त्यर्थः॥९॥ व्याख्याःयद्यपि उस दिगम्बर देवसेन तथा हम श्वेतमिक्षुओं(श्वेताम्बरों के प्र. कंट जैसे होय तैसे अर्थात् स्पष्टरूपसे इस द्रव्यार्थिपदार्थोके ज्ञान में उपयोगी नपके विचा- रमें अर्थका अर्थात् विषयका भेद नहीं है । अर्थात् श्वेताम्बर, दिगम्बर दोनों के ही अर्थके भादेवा में विषयका भभेदही है, शब्दादेशमें (शब्दकी रचनामें) कुछ पाठभेद है। उस पाठ- भेदसे कुछ भी दोष नहीं है, क्योंकि-नैयायिकों का प्रयोजन अर्थमें ही है, शब्दती नैयायि. को फेलिये भयोजक है । तयारि यह दिगम्बर देवसेनजी उत्तमोली (विपरीत प. रिमाया) अर्थात् अर्थकी समानता और सन्दकी असमानतामा उत्क्रमोलीसे अन्तरं- . F . द्रव्यानुयोगतर्कणा। गपरिणामसे ईर्ष्यायुक्त होनेके कारण संतप्त है, क्योंकि-जो ईर्ष्यायुक्त होते हैं, यह आम्यन्त. में विना कारण ही संतापमें परायण होते हैं। और हमारा चित्ततो "देवसेनजीसे (अन्यके खेतकी दाख जब गधा चरता है, तब हमारी कोई हानि नहीं होती है; तथापि अयोग्य देखकर चित्त खेदित होता है" इस, वचन(न्याय )के अनुसार दुःखित होता है। क्योंकि-देवसेनजी यथोक्त श्रीजिनभगवान्के सिद्धान्तंसे सिद्ध जो शुद्धपरिभाषा है; उ. सको त्यागकर निज कपोलकल्पित संस्कृतभापासे श्रीवीतरागकथित अर्थक विषयको ही अङ्गीकार करके और नयचक्रनामक नवीन ग्रन्थ( शास्त्र)को रचके अपना प्रभाव (प्रभुल),प्रसिद्ध करते हैं । यह इस श्लोक का अर्थ है ॥९॥ अथ वोटिकमतामिमतविपरीतपरिभाषां दर्शयन्नाह । अब वोटिकमतके अभिमत जो विपरीत परिभाषा है। उसको दर्शाते हुए कहते हैं। सूत्रम् । , तत्वार्थेऽपि नयाः सस पश्चादेशान्तरेऽपि वा। अन्तर्भूतौ समुद्दत्य नवेति किमु कल्पते ॥१॥ सूत्रभावार्थ:-तत्वार्थसूत्रमें भी सप्त (सात) ही नय कहे हैं; और मतान्तरमें भी ऋजुसूत्र और एवंभूतका शब्दनयमें अन्तर्भाव मानकर पांच ही नय माने हैं; और देवसेन- जी इन सातमें अन्तर्भूत जो द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक हैं; उनको उनमेसे अलगकर नव ९ नय कैसे कल्पते हैं ॥१०॥ , ध्याण्या। तत्त्वार्थसूने नयाः सप्त उक्ताः पुनरादेशान्तरे मतान्तरे तत्रैव नयाः पञ्च प्रति- पादिताः । तथा च तत्सूत्रम् सप्त मूलनयाः पश्चेत्यादेशान्तर"मिति शब्दः समभिरूढः, एवंभूतेति नयनिक शब्दनय इति नाम्ना संगृहीतानां त्रयाणामेवैकं नाम शब्दनय इति जा- यते । ततः प्रथमे चत्वारोऽतस्तैः सह पश्चनया इति । अथेकैकस्य भेदानां शतमस्ति । तत्र. च सप्तशतं तथा पञ्चशवमेवं मतद्वयेऽपि भेदकल्पनम् । तथोक्तमावश्यके "इकिकोय सह- विहो सत्तणयसया हवंति एमेवे । अण्णोविहु आएसो पंचेमे सयाण यागंतु ॥१॥" एता-. 'दशी शाखपरिभाषां त्यक्त्वा द्रव्याधिकपर्यायाधिकनामानावेष्वन्त विवावेवोदृत्य दूरे कृत्वा नव नयाः कथिता इति किमु कल्पते । देवसेनेन कः प्रपञ्चः क्रियते ॥१०॥ ब्यापार्यउत्कर्षसूत्र में भी सरन ही तय कहे हैं और वहां ही स्वस्तरकांवनय प्रतिपादन किये हैं। और पंचनयप्रतिपादक उनका सूत्र भी यह है "सप्त मूलनयाः पधे- त्यादेशान्तरम्" अर्थात् मूलनय सात हैं; और मतान्तरमें पांच नय हैं । शब्द, सममि- रूढ तथा एवंभूत यह जो तीन नय कहे हैं। इन तीनोंका संग्रह, करनेसे शब्दनयरूप एक ही नाम होता है । इस कारण नैगम; संग्रह, व्यवहार, और ऋजुसूत्र यह पहिले चार तथा इन तीनों ( शब्द, समभिरूड, एवं भूत ) का एक शब्दनय ऐसे मिलकर पांच नय होते हैं। और एक एक नयके सौ १०० मेद हैं; उनमें जिस मतमें सात नय हैं; वहांपर सातसो " .

. + ११८. रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् ७०० भेद और जिस मतमें पांच नय माने हैं, उसमें ५०० पांचसो भेदोंकी कल्पना है। यही विषय आवश्यकनामक ग्रन्थमें भी कहा है। उसकी गाथाका भाव यह है. एक २ नय सौ सौ भेदसहित है। इस प्रकार सप्त नय सातसो हो जाते हैं, और अन्य मतके "अनुसार भी पांच नय पांच सौ हो जाते हैं ॥ १ ॥" इस प्रकारकी शास्त्रीयपरिभाषाको त्यागकर दव्यार्थिक तथा पर्यायाधिकं नाम दो नयोंको जिनका कि-इन्ही सप्त या पंच भेदों. में अन्तर्भाव है उनको उन सात या पांचों से दूर करके देवसेनजीने नव नय कहे हैं; सो इस प्रकार देवसेनजी क्या प्रपंच करते हैं .. १०॥ पुनश्चची कथयन्नाह। और भी इस विषयमें विशेष चर्चा ( विवाद ) कहते हुए इस सूत्रको कहते हैं । सूत्रम् । यदि पर्यायव्यार्थनयौ भिन्नौ विलोकिती। अर्पितानर्पिताभ्यां तु स्युकादश तत्कथम् ॥ ११॥ सूत्रभावार्थ:-यदि द्रव्यार्षिक तथा पर्यायार्थिकनय सप्त भेदोंसे भिन्न (जुदे) देखे गये हैं; तो भर्पित तथा भनर्पित इन दोनों भेदोसे एकादश ११ (ग्यारह )नये क्यों नहीं मानते ॥११॥ व्याख्या । यदि पर्यायार्थिद्रव्यार्थनयौ भिन्नौ विलोकितौ पृथक् दृष्टौ तत्तस्मान्नव नया इति , कथितम् । तत्तस्मादप्तिानर्पिताभ्यां सहैकादश नया इति कयं न स्युरपि तु स्युः । भावार्थ- स्त्वयं नैगमसनव्यवहारभेदाद्यो द्रव्याधिकविधा, पर्यायार्थिकश्चतुर्धा-कसुसूत्रं, शब्दा, समभिरूद, एवंभूतश्चेति । अर्पितानर्पितभेदावपि सामान्यविशेपपर्यायौ तौ च द्रव्यपाययो- श्वेति । तथा हि सामान्यं द्विप्रकारमूर्खतासामान्य तिर्यक्सामान्यं च । तत्रोर्वतासामान्य द्रव्यमेव, तिर्यक्सामान्यं तु प्रति व्यक्तिसदृशपरिणतिलक्षणं व्यवनपर्याय एव स्थूला:' कालान्तरस्थायिनः शब्दानां सङ्केतविषया व्यअनपर्याया इति :प्रावनिकप्रसिद्धः । विशे- .पोऽपि वैसदृश्यविवलक्षणः पर्याय एवान्तर्भवतीति नैताभ्यामधिकनयावकाशः ॥ ११ ॥ : व्याख्यार्थ:-यदि द्रव्यार्थिक तथा पर्यायार्थिक नय भिन्नरूपसे अर्थात् पृथक्तासे' देखे गये हैं; और उसी कारणसे नव ९ नयका तुमने कथन किया है; तो आर्पित और मन- पित भेदोको साथ मिलाके एकादश ११ नय क्यों नहीं होवेंगे किन्तु अवश्य होवेंगे।। भावार्थ यह है; कि-नैगम, संग्रह, तथा व्यवहार इन भेदोंसे प्रथमजो द्रव्यार्थिक नय है; वह तीन प्रकारका है; और ऋजुसूत्र,शब्द,समभिरूढ तथा एवंभूत इन भेदोंसे पर्यायाधिक चार १. प्रकारका है । और अर्पित तथा अनर्पितरूप जो दो भेद हैं; यह भी सामान्य और वि- शेषके पर्याय है; और द्रव्य तथा पर्यायमें रहते हैं । सोही कहते हैं; कि-सामान्य दो प्रकार- का है; एक ऊर्ध्वतासामान्य और दूसरा तिर्यक्सामांन्य, इनमेंसे ऊर्ध्वतासामान्य तो द्रव्य- ५ रूप ही है। क्योंकि वह सब पर्यायोंमें साधारणरूपसे रहता है। और तिर्यफसामान्य मति द्रव्यानुयोगतर्कणा।- ९१९ व्यक्ति (घट पटआदि व्यक्ति) सहश परिणाम लक्षण : व्यंजन पर्यायमें ही रहता है; क्यों कि-स्थूलरूपसे कालान्तरमें ठहरनेवाले और शब्दोंके संकेत गोचर व्यंजन पर्याय हैं; ऐसी प्रावचनिकोंकी प्रसिद्धि है । और वैसादृश्यरूप विवर्त लक्षणसहित विशेष है, सो भी पर्यायमें ही अन्तर्गत होता है; इसलिये सामान्य विशेषसे अधिक नयका अवकाश' नहीं. है.॥ ११॥ सूत्रम् । संग्रहे व्यवहारे च यदीमौ युङ्कथ केवलम् । तदाद्यन्तनयस्तोके किं न युड्यर्थ हि तावपि ॥ १२ ॥ सूत्रभावार्थ:--यदि संग्रह तथा व्यवहारनयमें भर्पित तथा अनर्षित युक्त होते हैं; अर्थात् अन्तर्भूत होते हैं, तो द्रव्यार्थिक पर्यायार्थिक यह दोनों आदिके तीन नय और अन्तके चार नय समूहमें क्यों नहीं योजित करते ! ॥ १२ ॥ ध्याख्या । अथ सद्गहे च पुनर्व्यवहारे यदीमावर्पितानर्पितो युक्थ ताद्यन्तनयस्तोके सावपि किं न युक्थ इति । यद्येवं कथयथ अर्पितानर्पितसिद्धरित्यादिसूत्रेष्वर्पिता विशेषा अनर्पिताः सामान्या तत्रार्पिता व्यवहारादिविशेषनयेप्वन्तर्भवन्ति, अनर्पिताः साहेऽन्तर्भव: न्ति तदा भायेपु प्रथमेष्वन्त्येपु पाश्चात्येषु नयस्तोकेविमौ द्रव्यपर्यायो कयं म युसीत सप्त- नयसम्बन्धसिद्धेरिति विचारणीयम् । सिद्धान्ते श्रीजिनवाणी सप्तनयावतारिका एवास्ति न 'न्यूनाधिका । यतः सेंकितं नए सत्तमूलनया पण्णत्ता तं जहाणेगमे, संगहे, ववहारे, उज्जु- मुए, सद्दे, समभिरूढे, एवंभूए। इत्यादिसूत्रपाठोऽपि ज्ञेयोऽतस्तत्सूत्रमार्ग त्यक्त्वा "नया नय" इत्यधिकयोजना न साधीयसी । अथान्तर्भूतानां पृथकरणमपि पिष्टपेपणमेवेति ॥ १२ ॥ व्याख्यार्य:-यदि इस अर्पित और अनर्पितको संग्रह तथा व्यवहारनयमें संमिलित करते हो तो उस व्यार्थिक तथा पर्यायार्थिक नयको भी क्रमसे आदिके तीन नयस्तोकमै और अन्तके चार नय समुदायमें क्यों नहीं संमिलित, करते । यदि आप ऐसा कहें कि- "अर्पितानर्पितसिद्धेः" इत्यादि सूत्रोंमें अर्पित विशेषरूप हैं; और जो अनर्पित हैं; पह,.. सामान्य हैं । इसलिये इन दोनों से अर्पित तो.व्यवहारमादि विशेषनयोंमे अंतर्भूत होते हैं, और अनर्पित सवहनयमें अन्तर्गत (शामिल ) होते है तो आदिके तीन और अन्त- के चार नयोंके जो समुदाय हैं, उनमें इन द्रव्यार्थिक तथा पर्यायार्थिकको क्यों नहीं युक्त (शामिल ) करते हो? क्योंकि-सात नयोंका जो संबन्ध है; उसकी सिद्धि होती है। ऐसा विचार करना चाहिये । अर्थात् सिद्धान्त शास्त्र )में श्रीजिनवाणी सात नोंका ही भ. यतार करती है। सातसे न्यून ( कम.) अथवा अधिक नयोंका अवतार नहीं करती उसकी भी सिद्धि होजायगी क्योंकि-"सिद्धान्तमें सात मूलनय कहे गये है; वह जैसे नैगम १ संग्रह २ व्यवहार ३ ऋजुसूत्र १ शब्द ५ समभिरूढ ६ और एवंभूत । इत्यादिरूपसे .सूत्रका पाठ भी जानना चाहिये । इसलिये उस सूत्रके मार्गको त्यागकर में नय नव हैं" - . १२०. रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ऐसा कह कर जो अधिक नयोंकी योजना करते हो सो अच्छी नहीं है । तथा द्रव्यार्थिक और पर्यायाधिक जो क्रमसे प्रथम तीन और अन्तके चार नयोंके स्तोकमें अन्तर्भूत हैं; इ. मको उनसे जुदे करना है; सो भी पिष्टपेषण ही है ॥ १२ ॥ • •अथ नयसप्लकें द्रव्यपर्यायौ यथान्तर्भवतस्तदर्शयति । अब जिस प्रकारसे सात नोंमें द्रव्य तथा पर्यायका अर्थात् द्रव्यायिक और पर्याया- थिक नयोंका अन्तर्भाव होता है, उस प्रकारको दर्शाते हैं । सूत्रम् । पर्यायाधिकनामानो नयाः स्युरन्तिमात्रयः । द्रव्यार्थिकनयास्तचत्वारः प्रथमे पुनः ॥१३॥ सूत्रभावार्थ:--अन्तके तीन नय पर्यायाधिक नामके धारक हैं । और इसी प्रकार पहिले चार ४ नय द्रव्यार्थिक नय हैं ।। १३ ।। - व्याख्या । अन्तिमाषयः शब्दसमभिरूद्वैवंभूताख्यास्त्रयः पर्यायाधिकाः फध्यन्ते । तथा प्रथमे चत्वारो नैगमसहव्यवहारर्जुसूत्राख्या द्रव्याधिकनया इति ॥ १३ ॥ व्याख्यार्थ:--अन्तके तीन अर्थात् शब्द, समभिरूड और एवंभूत यह तीन नय पर्या- याधिक कहे जाते हैं । तथा आदिके नैगम, संग्रह, व्यवहार और ऋजुसूत्रनामक यह चार द्रव्यार्थिक नय हैं ।॥ १३ ॥ अथ य आचायी नयावतारं कुर्वन्ति तेषां नामान्याह । अब जो आचार्य नयोंका अवतार करते हैं। उनके नामोंको कहते हैं । सूत्रम् । इत्याह च महाभाष्ये क्षमाश्रमणपुङ्गवः । जिनभद्रगणिः सर्वसिद्धान्तमतपारगः ।। १४ ।। सूत्रभावार्थ:-अन्तके तीन नय पर्यायाधिक हैं; तथा आदिके चार ४ नय द्रव्या: र्थिक हैं; इस पूर्वोक्त कथनको महाभाष्यमें क्षमाश्रमणपुङ्गव तथा सब सिद्धान्तमतके पा- रंगत श्रीजिनभद्रगणि कहते हैं ॥ १४ ॥ व्याख्या । तत्र महाभाष्ये विशेषावश्यके क्षमाश्रमणपुङ्गवः क्षमाश्रमणप्रधानः श्रीजिनम- द्रगणिराचार्य इत्याह । इतीति किं पूर्ववद्य आधाश्चत्वारो नया द्रव्याथिका, अन्तिमात्रयो नया: पर्यायाथिका इत्याह ॥ १४ ॥ व्याख्यार्थ:- :--उस महाभाप्यअर्थात् विशेषावश्यकनामग्रंथमें क्षमाश्रमणपुङ्गव - र्थात् क्षमागुणधारी मुनियों में श्रेष्ठ तथा संपूर्णसिद्धान्तमतके पारंगत अर्थात् सब सिद्धा- तोंके वेत्ता श्रीजिनभवनामक गणि 'आचार्य: आदिके चार नय तो द्रव्यार्थिक है; तथा अन्तके तीन नय पर्यायार्थिक हैं। यह जो पूर्व श्लोकमें कहा है। ऐसा ही कहते हैं ॥ १४ ॥ . 11 .

द्रव्यानुयोगतर्कणा। १२१. सूत्रम्। इत्याह सिद्धसेनोऽपि आद्या द्रव्यनयात्रयः। द्रव्यावश्यकलीनस्तहजुसूत्रो न संभवेत् ॥१५॥ सूत्रभावार्थ:--और सिद्धसेनजी भी आदिके तीन नयोंको द्रव्याथिकनय कहते हैं; और शेष चारोंको पर्यायार्थिक कहते हैं; क्योंकि- द्रव्यके वर्चमानमात्र पर्यायके कहनेसे ऋजुसूत्र द्रव्यार्थिकनय नहीं संभव हो सकता ॥ १५ ॥ व्याख्या । पुनः सिद्धसेनोऽपि सिद्धसेनदिवाकरो मल्लवादी तार्किकः प्रथमे त्रयो नैगम १ सद्ग्रह २ व्यवहारलक्षणाः द्रव्यनया अन्तिमाश्चत्वारो नया ऋजुसूत्र १ शन्द २ सममि. रूढ ३ एवंभूताख्याः पर्यायार्थिकनया इत्याह । एवमवरेऽपि सिद्धान्तवेदिन आचार्या एन- मेवार्थमाहुरिति । आद्या द्रव्यनयात्रय इत्यत्र सूत्र १ शब्द २ समभिरूढ ३ एवंभूतव- जिंता इति । तथा च "द्रव्यार्थिकमते सर्व पर्यायाः खलु कल्पिता: पतत्येष्वन्वयि द्रव्यं कुण्डलादिपु हेमवत् ॥ १॥ पर्यायार्थमते द्रव्यं पर्यायेभ्योऽस्ति नो पृथक् । यत्तरर्थक्रिया दृष्टा नियं कुत्रोपयुज्यते ॥ २ ॥ इति द्रव्यार्थपर्यायार्थनयलक्षणादतीवानागतपर्यायप्रतिक्षेपी जुसूत्रः शुद्धमर्थपर्याय मन्यमानः कथं द्रव्यार्थिकः स्यादियेतेपामाशयः । इति तेपामाचार्याणां मत प्रजुसूत्रनयो द्रव्यावश्यकविपये लीनो न संभवति । तथा च " उज्जुसुयस्स एगे अणुव उत्तेएग दबाव- स्सयं पुहुत्तणन्थि ।" इत्यनुयोगद्वारसूत्रविरोधः । अथ च वर्तमानपर्यायाधारस्वद्रव्या. शपूर्वापरपरिणामसाधारणमूर्ध्वतासामान्यं द्रव्यांशः सादृश्यास्तित्वरूपतिर्यक्सामा- न्यं द्रव्यांशः । एषु चैकमपि पर्यायनयो न मनुते तदा ऋजुसूत्रं, पर्याय इति कथयत एत- सूत्रं कथं मिलति । ततः कारणात्क्षणिकद्रव्यवादी सूक्ष्मणुसूत्रम्, 'तत्तद्वर्त्तमानपर्यायापन्न-1 द्रव्यवादी स्थूलर्जुसूत्रं द्रव्यनय इति कथनीयमिति सिद्धान्तवादिनां मतम् । अनुपयोगद्र- व्यांशमेव सूत्रपरिभाषितमादायोत्सूत्रतार्किकमते नोपर्यायपदमप्युपपद्यत इत्यस्मदेकपरि.. 'शीलितं यथेति ।। १५ ।। व्याख्यार्थ: :-पुनः मल्लवादी और तार्किक जो सिद्धसेनजी दिवाकर है; वह प्रथमके नैगम १ संग्रह २ तथा व्यवहार ३ रूप तीनों नयोंको द्रव्यार्थिकनय कहते हैं; और अ. न्तके ऋजुसूत्र १ शब्द २ समभिरूढ ३ तथा एवंभूत ४ इन चार ४ नयोंको पर्यायाधि- कनय कहते हैं । और इसी अर्थको सिद्धान्तके जाननेवाले अन्य आचार्य भी कहते हैं; अर्थात् सिद्धसेनजी और उनके अनुगामी अन्य भाचार्योंके मतमे भी ऋजुसूत्र १ शब्द २ समभिरूट' ३ और एवंभूत ४ इन चार नयोंसे वर्जित आदिके तीन नय द्रव्यार्थिक है। और "द्रव्यार्थिकनयके मतमे सब पर्याय निश्चयरूपसे कल्पित हैं, क्योंकि- :-सब पर्यायोंमें अन्वयी (अनुगामी) द्रव्य समाविष्ट होता है, जैसे कुण्डलआदिपर्यायोंमें सुवर्ण द्रव्य ॥१॥ १ .. .

+ १२२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम - और पर्यायार्थिकके मतमें द्रव्य पर्यायोंसे भिन्न नहीं है । क्योंकि पर्यायोंसे जो अर्थक्रिया दृढ है; उस अर्थक्रियाका नित्य उपयोग कहां होता है । अर्थात् सुवर्णके कुण्डलमादि तथा मृत्तिकाकै घटआदि पर्यायोंसे जो आभूपण तथा जलधारणादिरूप अर्थक्रिया दृद्ध है; वह नित्य नहीं है क्योंकि-पर्यायोंके नष्ट होने के पश्चात् वही सुवर्ण तथा मृत्तिका रूपद्रव्य शेष रहता है ॥ २ ॥" यह द्रव्यार्थिक तथा पर्यायार्थिकनयका लक्षण है। इस लिये अतीत (भूत) तथा अनागत (भविष्य) पर्यायोंका प्रतिक्षेपी (दूर फेंकनेवाला) शुद्ध मर्थ पर्यायको मानता हुआ ऋजुसूत्रनय द्रव्यार्थिक किस रीतिसे होवे. ऐसा इन . साधायाँका अभिप्राय है । इस कारण उन पाचायोंके मतमें ऋजुसूत्रनय द्रव्यावश्यक विषयमें लीन नहीं होता है; और उस प्रकार "उज्जुस्यस्य एगे अणुव उत्ते एगं दबा- स्सयं पुहुत्त पन्धि" इस अनुयोगद्वारसूत्रका विरोध होगा। और वर्तमान पर्यायका मा- धारभूत तथा निजद्रव्यके पूर्वापरपरिणाममें साधारण ऊर्द्धतासामान्य द्रव्यांश है । १ । सादृश्य सय व्यक्तियों में समानताके अस्तित्त्वरूप तिर्यसामान्य भी द्रव्यांश ही है । २ । और इनमेंसे एकको भी पर्यायनय नहीं मानता तब ऋजुसूत्र पर्यायार्थिक है; ऐसा कहने- घालोंके यह सूत्र कैसे संगत होता है । इस कारण क्षणिक द्रव्यको कहनेवाला तो सूक्ष्म ऋजुसूत्र है; और उस उस वर्तमानपर्यायको प्राप्त हुए द्रव्यको कहनेवाला स्थूलत्रानु- सूत्र है। ऐसे ऋजुसूत्रको द्रव्याथिकनय कहना चाहिये यह सिद्धान्तवादीयोंका मत है। और सूत्रपरिभाषित (सूत्रोक्त) अनुपयोग द्रव्यांशको लेके सूत्रविरुद्ध चलनेवाले तार्किक (नैयायिक )के मतसे नोपर्यायपद भी सिद्ध होता है । यह हमारा मुख्यरपसे निर्धारित सिद्धान्त है ॥१५॥ सूत्रम् । एवमन्तर्गतानां स्थादुपदेशः कथं पृथक् । पञ्चभ्यो हि यथा सप्तस्वर्थभेदो मनाङ् न हि ॥ १६ ॥' सूत्रभावार्थ:-इस प्रकारसे अन्तर्भूत दण्यार्थिक और पर्यायाधिकनयोंका पृथक् रूपसे उपदेश कैसे हो सकता है ! और यदि ऐसा कहो कि--- मतान्तरमें पांच नय है, उनमें दो मिलाकर जैसे सात नय मानते हैं, उसी प्रकार हमारे इन नयों का भी भिन्न उप- देश होगा तो नहीं क्योरिदम जो पांस मित्र दो मानते हैं या विषयभेद शोर तुलारे दो नयोंमें किंचित् भी विषयभेद नहीं अतः भिन्न उपदेश नहीं हो सकता ॥१६॥ व्याख्या । एवमन्तर्गतानामन्ताविवानां द्रव्यापिकपर्यायाधिकानां नयानां पृथग्मिा उपदेशः कथं कृतः म्यान् । यर्व फययत मतान्तरं पक्ष नयाः सन्ति संपु द्वारिमा मिश्रितों सन्नी नपसमिति व्यवहारो जायते तेन द्वयोः पृथगुपदेशनवदम्मामपि द्रव्याधिक पर्यायायियोः पृथगुपदेशो भविष्यतीति पेन यहम्यम् । मन्दमममिस्टयंभूतानां यथा विषयभेदोऽनि पधेर न्यायिकपर्यायाबिफयोरपि समनयेभ्यो भिमविषयत्वं दर्शयत ।

द्रव्यानुयोगतर्कणा। १२३ किश्च त्रयाणां नयानामेकां संज्ञा समृह्य नयपश्चकं कथितमस्ति परन्तु विपयो भिन्नो वर्तते अन तु विपयो भिन्नो न वर्तते । पुनयें द्रव्यार्थिकनयस्य दश १० भेदा दर्शितास्ते सर्वेऽपि शुद्धाशुद्धसंग्रहादिप्वन्तर्भवन्ति, ये च पझेदाः पर्यायाधिकनयस दर्शितास्ते सर्वेऽप्युपचरितानु पचरितव्यवहारशुद्धाशुद्धर्जुसूत्रादिष्वन्तर्भवन्ति । गोषलीवदन्यायेन विषयभेदे मिन्ननयत्वं कथ्यते सार्ह स्यादस्त्येव, स्यानास्त्येव, इत्यादिसप्तमङ्गोमध्ये कोटिप्रकारैरपि वानपिवसत्त्वास- वप्राहकनयभेदेन भिन्नभिन्ननयवादेन च सप्तमूलनयप्रक्रिया बम्भज्यते । एतत्सुधी- भिर्विमृश्यम् ॥ १६ ॥ व्याख्यार्थ:--पूर्वोक्त रीतिसे सात अथवा मत भेदसे पांच नयों में अन्तर्भाव किये गये ऐसे द्रव्याथक तथा पर्यायाधिक नोंका भिन्नरूपसे उपदेश (निरूपण) कैसे किया जाये ? अर्थात् सप्त या पंच नयसे भिन्न इनका कथन अयुक्त है, क्योंकि - उन्हीं नैगम, संग्रहआदिमें इनका अन्तर्भाव है। कदाचित् ऐसा कहो कि--- अन्यमतमें पांच ही नय हैं; उन पांच में समभिरुढ और एवंभूत इन दोनोंको मिला देनेसे "सात नय" ऐसा व्यवहार होता है। जिससे समभिरूढ और एवंभूतका पृथक् उपदेश किया गया है। एसे ही हमारे भी द्रव्यार्थिक तथा पर्यायार्थिक इन दोनों नयोंका भिन्नरूपतासे उपदेश होगा। सो ऐसा नहीं कहना चाहिये क्योंकि-जैसे शब्द समभिरूढ और एवंभूत नयोंके विषयभेद है ऐ- से ही आप भी द्रव्यार्थिक तथा पर्यायार्थिकके सातों नयोंसे विषयका भेद दिखलाओ? और शब्द, समभिरुड तथा एवंभूत इन तीनों की एक संज्ञाका संग्रह करके पंच नयका कथन किया है। परन्तु विषय, भिन्न २ है; और द्रव्यार्थिक तथा पर्यायार्थिकका विषय सप्त नयसे भिन्न नहीं है; अर्थात् अभिन्न ही है । और शब्दआदिक नय तो भिन्नविषयक हैं; और. जो द्रव्याथिकनयके दश१० भेद कहे गये हैं; वह सब भी शुद्धसंग्रह अशुद्धसंग्रहमादि- में अन्तर्गत हो जाते हैं तथा जो पर्यायाथिकनयक पद् ६ भेद दर्शाये गये हैं, वह भी सय उपचरितव्यवहार और अनुपचरितव्यवहार तथा शुद्ध और अशुद्ध ऋजुसूत्रनयमें अन्तर्भूत हो जाते हैं; और यदि " गोवलीबर्दन्याय (जो गो है; वही वलीपर्द (बैल) है। इस 'न्याय )से भिन्न विषय मानकर भिन्न नय कहते हो तो " स्यादत्येव " कथंचित् है ही " स्यानास्त्येव " कथंचित् नहीं ही है; इत्यादि सप्तभंगीके मध्यमें कोटि (किरोडो) कारोंसे अर्पित, अर्पित, सत्त्व तथा असत्त्वको ग्रहण करनेवाले नयोंके भेदोंसे और मि. न २ नयके वाद( कथन से जो सप्त मूलनय माने गये हैं; उनकी प्रक्रियाका सर्वथा भंग हो जायगा अर्थात् मूलनय सात हैं। यह सिद्धान्त न रहेगा यह विषय बुद्धिमानोंको विचारना चाहिये। तात्पर्य यह कि.---गतार्य विषयको भी यदि भिन्न मानकर नपके भेदकी कल्पना करते हो तो मूल नय सात ७ ही हैं। यह प्रक्रिया सर्वथा टूट जायगी ॥ १६ ॥ अथ यदि विषयभेदेन नयभेदमाशीकरिष्यथ वदा । सामान्यनेगमसाहमध्ये, विशेष १२४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् नैगमव्यवहारमध्ये, योजयतां युप्माकं पढेव नया निष्पत्स्यन्त इत्येतादृशी पक्षक राशङ्की. स्फोटयितुं श्लोकमाह। अब यदि विषयके भेदसे ही नयके भेदको अङ्गीकार करते हो तो सामान्य नैगमको संग्रहके मध्यमें और विशेष नैगमको व्यवहारनयके मध्यमें योजित करनेवाले तुह्यारे मतमें पटू ६ ही नय सिद्ध होते हैं। अर्थात् नैगमके सामान्य और विशेष यह दोनों भेद जब क्र- मशः संग्रह तथा व्यवहारमें अन्तर्भूत हो जायगे तब नैगमनयका अभाव हो जानेसे छ (६) ही नय रह जायगे इस प्रकार पक्षक की शंकाको दूर करनेकेलिये यह अमिम श्लोक कहते हैं। सूत्रम् । सङ्घहाद्व्यवहाराच नैगमोऽपि पृथक्फचित्। तस्मादलग्नकस्ताभ्यां स एतौ तु पृथक हि ॥ १७ ॥ सूत्रभावार्थ:--संग्रह और व्यवहारनयसे तो नैगमनय कहीं भिन्न भी देखा जाता है; इसलिये संग्रह तथा व्यवहारसे असंलग्न विषयको धारण करनेवाला नैगम इन दो- नोंसे पृथक् है; और द्रव्यार्षिक तथा पर्यायाधिक यह दोनों सप्त नयसे सर्वथा कहीं भी भिन्नविषयक नहीं है ॥ १७ ॥ ध्याख्या। सद्देति- पद्यपि सद्हनये व्यवहारनये च नैगमनयस्य सामान्य विशेपर. र्यायावन्तर्भवतलथापि सङ्ग्रहाव्यवहाराच कचित्प्रदेशादिदृष्टान्तस्थाने नैगमो भिन्नोऽपि भवति उक्तं च-छह वह पंचण्हं पंचविहं तहय होइ भयाणिजो। तम्मिय सोयण्णसो सोपेव पायव सत्तहं । १ । इत्यादि तस्मात् कापि भिन्नविषयत्वाम्गमनयोऽपि साभ्यां भित्रः प्रतिपा- दितः । तु पुनः एतो द्वौ द्रव्याधिकपर्यायार्थिको पृथक् भिन्नौ स्थितौ नैगमादिनयेभ्यो न दि संभवतः । अभिन्न विषयत्वात् तेभ्यो वियोज्य नवभेदादेशान्तरः किमु कथ्यत इति ।। १७।। व्याख्यार्थ:-यद्यपि संग्रहनय तथा व्यवहारनयमें नैगमके सामान्य और विशेष यंद दोनों पर्याय अन्तर्भूत हो जाते हैं; तथापि कहीं कहीं प्रदेशादि दृष्टान्त स्थानमें संग्रह तथा व्यवहार नयसे नैगम भिन्नविषयक भी होता है । ऐमा कहा भी है ।। इस कारणसे कहीं भिन्न विषय होनेसे नैगमनयका भी उन दोनों संग्रह और व्यव- हारनयोंसे भिन्न प्रतिपादन किया गया है। और यह द्रव्याथिक तथा पर्यायाधिक तो नै- गमसंग्रहआदि नयोंसे भिन्न विषयके धारक नहीं संभव होते क्योंकि यह सप्त नयोंसे अ. भिन्नविषय हैं। अतः उन सातोसे भिन्न करके सप्त नय भेदके स्थानमें नयोंके नो, भेद है। ऐसा भिन्न आदेश कैसे कहते हो ॥ १७ ॥ पुनरेनमर्थ प्रसिदिशन्नाइ। अब पुनः इस अर्थका उपदेश करते हुए कहते हैं। * .

द्रव्यानुयोगतर्कणा। १२५ सूत्रम् । कुर्वन्नेवं समामोति विभक्तस्य विभाजनम् । जीवादिवन्न चैवात्र प्रयोजननियोजनम् ॥ १८॥ सूत्रभावार्थ:-इस प्रकारसे विभाग किये हुए पदार्थका पुनः विभाग प्राप्त होता है; परन्तु यहां जीवभादिके सदृश विभागके प्रयोजनकी नियोजना नहीं है ॥ १८ ॥ प्याख्या । एवमनया रीत्या नव ९ नयान फुर्वन् रचयन् विभक्तस्य विभागीकृतस्य वि. भाजन विभागकरणं समानोति । विभक्तानां विभागो जायत इत्यर्थः । सदा जीवादिवत् जी. या द्विधा संसारिणो मुत्ताध संसारिणः पृथिवीकधिकादिपभेदाः, सिद्धाः पञ्चदशभेदा एतद्वप्नया अपि द्विधा द्रव्याधिकपर्यायाधिकभेदा द्रव्याधिकनिधा नैगमादिभेदान्, - जुसूत्रादिभेदाचतुर्धा पर्यायाधिकाः, इत्यं कथयितुं युकं परन्तु नव नया इत्येकवाक्यतायां विभागो विहितः स तु सर्वथापि मिथ्या ज्ञातव्यः। अन्यथा तु जीवाः संसारिणः सिद्धा इत्यादि विभागवाक्यमपि भवितुमर्हति । तथैव द्रव्याधिकपर्यायाधिको नयावित्यपि कथयतां अ. न्ये नया आगवाः स्युसथापि वयं स्वप्न क्रियानयेन नव नया इति कथयिष्यामः इतीत्थं या दिनामेवं प्रतिपादनीयम् यथा-अत्र प्रयोजननियोजनजीवाजीवादियन्नाति भिन्नानि भि- मानि तत्त्वानि व्यवहारमात्रेण माध्यानि वानि प तथैव संभवन्ति अत्र वितरव्याधुचिसा- ध्यानि तत्र पहेतुकोटिना अनपेक्षितभेदप्रवेशेन वैयर्य दोपो जायते तत्त्वप्रमियया इदं प्र. योजनमस्ति जीवस्तथा अजीवधेतौ द्वौ मुल्यो शेयौ पदार्थों कयनीयो यन्धमोझी मुख्यतया हेयोपादेयो प फयनीयौ सरमाइन्धफारणतः हेय आश्रयः, नया मोक्षो मुण्यपदार्थोऽसि । ववस्तस्य प द्वे कारणे संवरनिर्जरास्ये कथनीये इति सप्ततत्त्वकपनमयोजनप्रक्रिया । पुण्य- पापरूपशुभाशुभयन्धभेदव्यक्ति दूरे त्या अनयैव प्रक्रियया नवतत्त्वानीति ध्येयम् । अत्र तु द्रव्याधिकनयेन भिन्नोपदेशस्य किमपि प्रयोजनं नास्तीति ॥ १८ ॥ घ्याख्यार्थ:-इस पूर्वोक्त रीतिसे नत्र ९ नोंकी रचना करते हुए. भापकों विभक्त अर्थात् एक यार विभाग कियेये पदायोंका पुनः विभाग करना प्राप्त होता है; तर जीवा- दिके सदृश अर्थात् जैसे प्रथम द्रव्य के जीव तथा अजीर इस प्रकार दो निमाग करके.. पुनः जीवके संसारी और मुक ऐसे दो भेद किये और फिर संसारी पृथिवीकायिकमादि छ भेदके धारक तथा मिद पन्दरह भेदयाले घोषित किये इसी प्रकारसे यह मी दया. विक और पर्यायाधिक भेदसे दो प्रकारके हैं। उनमें नंगमभादि भेदोसे दयायिक सीन मकारका है और मजुराधभादि भेदोंगे चार प्रकारफा पायाधिक है। ऐसा करना योग्य है। परन्तु नय नर हैं। इस प्रकार जो एकापताने दिमाग किया है। यह दिमाग सोस. पंधा मिथ्या जानना चाहिये । और यदि ऐना हो दिमाग को तय तो जीव, समारी लिद इत्यादि रीति से भी विभागयात्य हो सकता है। अर्थात् असे प्रत्याधिक पर्यायाधिक दोमें द्रष्यार्षिक पर्यापार्थिकको मिलाकर नर नोंका कपन रिया इसी प्रकार जीप नारी और गुफ इन दोनों भेदोंने बीरको भी योनित करके जीर, संगारी, सिद ऐसे . . रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् तीन भेद कहिये " जैसे जीव और अजीवके कहनेसे आश्रयमादि तत्त्वाका ग्रहण सिद्ध है; वैसे ही द्रव्यार्थिक और पर्यायाधिक इन दोनोंके कथनसे अन्य नैगमादि सब नयोंका ग्रहण हो जावे परन्तु तो भी जैसे आश्रयआदिक भिन्न कहे हैं, उसी प्रकार हम हमारी नय प्रक्रियासे नय नव ९ हैं ऐसा कहेंगे" इस प्रकार कहनेवालों के प्रति ऐसा कहना चाहिये कि---यहांपर जीव अजीवभादिके समान तुबारे प्रयोजनकी नियोजना नहीं है। क्यों कि--व्यवहारमात्रसे भिन्न २ तत्त्व साध्य होते हैं; और जो भाश्रवादिक भिन्न तत्व कहे गये हैं; वह भी व्यवहारमात्रसे ही कहे हैं; और नयके विषयमें तो एक नयसे दूसरेका किसी प्रकार भेद सिद्ध हो तब भिन्न नयकी सिद्धि हो उसमें यदि हेतुकोटिसे अनपेक्षित भेदका प्रवेश हो तो वैयर्थ्य दोष होता है; तात्पर्य यह कि- जिस भेदमें प्रबल हेतु न दिया जाय तो वह भेद व्यर्थ ही है; और तत्वप्रक्रियामें जो जीव, अजीव इन दोनोंमें ही सत्र तत्वोंके गतार्थ होनेपर जो सप्त तत्त्व निरूपण किये हैं; उनमें तो यह निम्नलिखित प्रयो- जन है; कि-जीव और अजीव यह दो ही मुख्य द्रव्य हैं; अर्थात् इन्ही दोनोंको मुख्य पदार्थ कहना तथा समझना चाहिये और बन्धको हेय ( त्याग करने योग्य ) तथा मोक्षको उ. पादेय( ग्रहण करने योग्य )रूपसे कहना चाहिये और माश्य है; सो बन्धका कारण है। इसलिये आश्रवको भी हेयरूपसे कहना चाहिये और मोक्ष मुख्य पदार्थ है; क्योंकि उ. सीकेलिये सब पदार्थोंका निरूपण है; और वही उपादेय है। इस कारण उस मोक्षके संबर और निर्जरा इन दोनों कारणोंका कथन करना चाहिये इस रीतिसे जीव अजीव आश्व बंध संघर निर्जरा और मोक्ष इन सप्ततत्त्वोंके कथनकी प्रयोजनवाली प्रक्रिया है, और इसी प्रक्रियासे शुभ बंधके कारण पुण्यको भी भिन्न करके कहनेसे नव तत्त्व हो जाते हैं; ऐसा समझना चाहिये । और यहां द्रव्यार्थिक तथा पर्यायाधिक नयसे नैगमआदिको भिन्न उपदेश करनेका कोई भी प्रयोजन नहीं है ।। १८.॥ सूत्रम्। अभिन्नकारणाः सूत्रे नयाः ससव कीर्तिताः। उच्यते तत्कथं वाक्यमधिकं सूत्रवर्जितम् ॥ १९ ॥ सूत्रभावार्थ:-सूत्रमें अभिन्न कारण सात ही नय दर्शये गये हैं। इसलिये तुम 'सूत्रवर्जित अधिक वाक्य कैसे कहते हो ॥ १९ ॥ व्याख्या । तस्मात्कारणात्सूत्रे नया अभिन्नकारणाः सप्तैव कथिताः तद्यथा सूत्रम् “ सत्र मूल नया पणात्ता" एतादशसूत्रे कथितमस्ति तद्वाक्य सूत्रसदृशमुलवाधिकं नव नया इति वाक्यं कथमुच्यते स्वसूत्रपरिरक्षणार्थ यथोक्तमेव न्याय्यम् । इत्थं परिचित्य केपांचिद्वाक्यस- कलनामनादृत्य श्रीवीवरागभापितवचनरचनापवित्रे सूत्रे बुद्धिरारोपणीया स्वसम्पत्कशुद्धि- संसिद्धियुद्धये ।। १९ ॥ व्याख्यार्थ: इस कारण भिन्नकारणशून्य सात ही नय सूत्र में कहे गये हैं। वह द्रव्यानुयोगतर्कणा। १२७ सूत्र यह है; जैसे " मूलनय सात ही हैं " इस प्रकार सूत्रमें स्पष्टरूपसे कहा गया है। सो उस सूत्रमें जैसे वाक्यका उल्लंघन करके सप्तसे अधिक अर्थात् नय नव हैं; ऐसा वाक्य कैसे अथवा किस भाधारसे कहते हो । इसलिये अपने सूत्रकी रक्षाकेलिये यथोक्त ('सप्तनय )का ही कथन करना योग्य है; ऐसा विचार करके जिस किसीकी वाक्य रच- नाका अनादर कर बुद्धिमान् पुरुषोंको अपने शुद्ध सम्यक्त्वकी सिद्धिके अर्थ अथवा सम्य- फ्त्वकी वृद्धिकेलिये श्रीवीतरागभापित वचनोंकी रचनासे पवित्र ऐसा जो सूत्र है; उसीमें बुद्धिको लगाना चाहिये ॥१९॥ अथ साक्षिणं दर्शयति । अब साक्षीको दिखलाते हैं। सूत्रम् । दश भेदादिकाश्चात्र सन्ति युक्तोपलक्षणाः। न चेदन्तर्भवेत्कुन प्रदेशार्थनयो वद ॥२०॥ सूत्रभावार्थ:-और द्रव्यार्थिकआदिके जो दश भेद वगैरह देवसेनजीने कहे हैं। वह भी उपलक्षणमात्र हैं । यदि उपलक्षणमात्र न मानें तो कहो प्रदेशार्थनयका किसमें 'अन्तर्भाव होवे ॥२०॥ व्याख्या । अत्र देवसेनरचितनयचक्रप्रन्थे द्रव्यार्थिकादिदश१०भेदा उपदिष्टास्ते चो. पलक्षणत्वेन ज्ञातव्याः । यद्येवं न क्रियते तर्हि प्रदेशार्थनयः कस्मिन् स्थाने चरितार्थो भवे. दित्थं विचारणीयम् । दशभेदादिका अत्र देवसेनीये ग्रन्थे युक्तोपलक्षणा, उपलक्षणमानपराः सन्ति चेद्यद्येवं ते कुत्र न तर्हि प्रदेशार्थनयोऽपि कुत्रान्तर्भवेदिति धद । उक्तं च सूत्रे "ट-, प्टियाए पदेसट्टियाए दव्वट्ठय पदेसट्टय" इत्यादि । तथा कर्मोपाधिसापेक्षजीवभावाहक- द्रव्यार्थिको यथोपदिष्टस्तथा जीवसंयोगसापेक्षपुद्गगलभाषप्राहकनयोऽपि भिन्नतया कथयितुं योग्य एव । एवं सत्यनेके भेदा भवन्ति तथा प्रस्थकादिदृष्टान्तेन नैगमादीनाम: शुद्ध १ अशुद्धतर २ अशुद्धतम ३ शुद्ध ४ शुद्धतर ५ शुद्धतमादिभेदा भवन्ति ते भेदाः कुन संगृह्यन्ते । तेषां सङ्ग्रहार्थमुपचारो विहितस्तत उपचारेण ते उपनया भवन्तीसि यदि कथ्यते तदापसिद्धान्तो भवेत् । अनुयोगद्वारे ते नयभेदाः प्रदर्शिताः सन्ति तत एतदेव दृढीक्रि- यते उपनयाः कथिता ये सन्ति तेन व्यवहारनैगमादिभ्यः पृथग् न सन्ति उक्कं च तत्त्वार्थ-. सूत्रे " उपचारबहुलो विस्तृतार्थो लौकिकमायः ॥ २०॥ व्याख्यार्थ: --इस देवसेनजीरचित नयचक्रनामक गन्थमें जो द्रव्यार्थिकआदि दश भेद द्रव्यार्थिक नयके कहे हैं। उनको उपलक्षणपनेसे जानने चाहिये अर्थात् यह भेद १ निजका तथा निजके समीपस्थ तथा अपने संवन्धीका भी बोध करनेवाला शब्द, जैसे "काकेभ्यो दक्षिर क्षताम् " यहाँपर काकपद दधिके उपघातक (नाश करनेवाले ) श्वान मारिआदिवा उपलक्षण है कि यह कि काकोंसे दधिकी रक्षाकरो और विल्ली कुत्ते आ तो साने दो।

. . १२८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् दिग्दर्शनमात्र हैं; इनसे अधिक और भी भेद होते हैं । और यदि उन दशको उपलक्षणमात्र नहीं करें तो प्रदेशार्थनय किस स्थानमें चरितार्थ (अन्तर्भूत) हो यह विचारना चाहिये तथा यदि इस देवसेनजीके ग्रन्थमें दश भेद उपलक्षणसहित न हो तो भदेशार्थनयका किस नयमें अन्तर्भाव होता है; यह कहो । पुनः इस प्रदेशार्थनयका वर्णन सूत्रमें भी है; जैसे " द्रव्याधिकप्रदेशार्थनय" इत्यादि । तथा जैसे कर्मरूप उपाधि- की अपेक्षा रखनेवाले जीयमारको ग्रहण करानेवाला द्रध्याथिकनयका उपदेश किया है। इसी रीति से जीवके संयोगको अपेक्षाका धारक जो पुद्गलभाव है; उसका ग्रहण कराने. वाला नय भी भिन्नरूपतासे कथन करनेके योग्य ही है और जब जीवसंयोगापेक्षपुद्गल भावग्राहक नय माना जायगा तब इसी प्रकार अन्य मी अनेक नय होंगे । और प्रस्थकमादि हटांतसे मैगमआदि नयोंके अशुद्ध १ अशुद्धतर २ अशुद्धतम ३ शुद्ध ४ शुद्धतर ५ और शुद्धतमआदि जो अनेक भेद होते हैं; उन भेदोंका संग्रह कहां कि. या जायगा अर्थात् तुमको उपलक्षणमान ही इन दश भेदोंको मानना चाहिये अन्यथा पूर्वी क भेदोंका संग्रह न होगा। अब यदि ऐसा कहो कि-"इन पूर्वोक्त भेदोंके संग्रहके अर्थ हमने उपचार किया है और इसी कारण उपचारसे यह उपनय होते हैं" तो अपसिद्धान्त , होगा अर्थात् सिद्धान्तकी हानि होगी । क्योंकि अनुयोगद्वारमें उनको नयोंके भेद दिख. लाये गये हैं। इसलिये यही पक्ष दृड किया जाता है कि जो उपनय कहे गये हैं। वह नहीं है। अर्थात् व्यवहार नैगमआदि नोंसे जुदे नहीं हैं; और तत्वार्थसूत्र में व्यवहारका लक्षण भी यही कहा है कि-जो बहुधा उपचारसे पूर्ण हो अर्थात् जिसमें उपचार अधिक "हो वह तथा संक्षिप्त अक्षरों में विस्तारसहित अर्थका धारक हो और प्रायः लौकिक हो वह व्यवहार है ॥ २०॥ सूत्रम् । व्यवहारे समायान्ति तथैवोपनया अपि । न घेत्प्रमाणमप्यम्रोपप्रमाणत्वमाश्रयेत् ॥ २१ ॥ सूत्रभावार्थ:-और यह उपनय भी व्यवहारमें ही गर्भित हो जाते हैं। यदि ऐसा नहो तो प्रमाण भी उपप्रमाणताका माश्रय करे ॥ २१ ॥ व्यापया । एवं सति नयभेदान् यापनयान कस्वा मनुने तहि म्यपरव्यवमायिज्ञानं प्र. माणमित्तलमणेन लभितर शानरूपमाणस्याप्येकदेशो मत्यादिश्यमा प्रयोऽवप्रहादिः सोऽप्युपरमाणमिति पृथग्भेदो भविष्यति । तम्मानयोपनयप्रक्रिया मिष्याणां बुद्धिन्दन मायण मावच्या ॥ २१ ॥ सनम् । निश्चयाध्ययाहारेण फोपरारविशेषता। मुश्पत्तिपदकस्य तदान्यस्योपचारता ।।२२।। r अतति द्रव्यानुयोगतर्कणा। १२९ सूत्रभावार्थ:-निश्चयनयसे व्यवहारनयमें उपचारकी विशेषता क्या है ? इसका उत्तर यह है कि जब एककी मुख्यता होती है, तब अन्य( दूसरे )की उपचारता होती है ॥ २२ ॥ व्यास्या । निश्चयान् निश्चयनयात् व्यवहारेण सहोपचारविशेषता कास्ति । व्यवहार- विपय उपचारोऽस्ति निश्चय उपचारो नास्त्येतावद्विशेषता । यदेकनयस्य. मुख्यपृत्तिर्गृह्यते तदा परनयस्योपचारवृत्तिरायाति । रत्नाकरवाक्ये स्याद्वादरनाकरे च प्रसिद्धमस्ति "स्व. स्यार्थसत्यत्वस्याभिमानोऽखिलनयानामन्योन्यं वर्तते फलारसत्यत्वं तु सम्यग्दर्शनयोग ए.' वास्ति"। एवं च प्रकृतमर्थ व्याख्यायते । निश्चयनयाद् व्यवहारनयेन सहोपचारविशेषता काति योपचारविशेपता वर्तते तां दर्शयति । यदैकस्य कस्यचिन्नयस्य मुख्यता मुख्यभावो वर्तते वदान्यस्यान्यनयस्य उपचारता गौणत्वं भवतीति ज्ञेयम् । यथा हि निश्चयनात्मेति शब्द एतस्य निश्चयार्थस्तु " असंख्यातप्रदेशी निरचनोऽनन्तज्ञानादिगुणोपेतो नित्यो विभुः कर्मदो. पैरसङ्गतः सिद्ध इव देह उपलभ्यते” ददास्य व्यवहारेणीपाधिकस्य जडशरीरादेः सद्भातस्यौ. दयिकादिभावोपगतनरतैरयकादिभावस्पर्शवोऽपि, गौणत्वं भासते । -अथ च सातत्येन गच्छति तांस्तान्पर्यायानित्यात्मा" संसारस्थो देहादिसङ्गतो जन्ममरणजरायौवनादि- हेशमनुभवमानः प्रत्यक्षप्रमाणेन व्यवहारादेशाद्देवो मनुष्यो नारकस्तियङ् च कथ्यते तत्र सिद्धत्वस्य गौणत्वम् ।। २२॥ व्याख्यार्थ:--निश्चयनयसे व्यवहारनय के साथ उपचारकी विशेषता क्या है ? इस जि- ज्ञासा( जाननेकी इच्छा )मे कहते हैं; कि व्यवहारनयके विपे उपचार है; और निश्चयन- यमें उपचार नहीं है; इतनी ही विशेषता है। अर्थात् जब एक नयकी मुख्य अर्थमें शक्ति रहती है; तब अन्य नयकी उपचारवृत्ति(गौणता )से उस नयकी अर्थबोधनशक्ति स्वयं आती है। और यह वार्ता रलाकरवाक्यमे तथा स्याद्वादरलाकरमे प्रसिद्ध है। जैसे "अ- पने २ अर्थकी सत्यताका अभिमान सब नयोंके परस्पर रहता है; और उन नयोंके फलसे सत्यता तो सम्यग्दर्शनके संयोगके होनेपर ही होती है;" जब ऐसा सिद्धान्त है; तब इस प्र. कृत अर्थका इस प्रकार व्याख्यान होता है; कि-"निश्चयनयसे व्यवहारनयके साथ उप- चारविशेपत्ता क्या है ? जो उपचारविशेषपना है; उसको दिखाते हैं । जब किसी एक नयको मुख्यता रहती है; तव अन्य (दूसरे) नयकी उपचारता रहती है; तात्पर्य यह कि- एक नय प्रधानभावसे जब रहेगा तब अन्य नय गौणत्व(अप्रधानपने)रूपसे आप ही रहेगा, यह गौणत्ववृत्ति होना ही उपचारता है; ऐसा समझना चाहिये । उदाहरणकेलिये जैसे निश्चयनयसे “ आत्मा" यह शब्द है। तब इस आत्माका निश्चयनयसे अर्थ असंख्यातप्र- देशोंका धारक, निरंजन, अनंत ज्ञानआदि गुणोंसे सहित, नित्य, विभु (व्यापक) और कर्मोंसे उत्पन्न जो दोप हैं; उनसे रहित सिद्धके सदृश आत्मा ही देहमें जाना जाता है। उस निश्चयार्थदशामें यद्यपि व्यवहारसे औपाधिक जो जड पदार्थ शरीरभादि है; उनके १७ . रायचन्द्रजैनशासमालायाम् सहित तथा औदयिकआदि भावोंसें प्राप्त जो नर नारकी, और तिर्यश्चमादिपना है। उसको स्पर्शताहुआ भी जो मात्मा है; उसका गौणत्व भासता है । और जब "अतति इति आत्मा" अर्थात् जो निरन्तर उन उन पर्यायोंके प्रति गमन करता है; अथवा निरन्तर उन उन पर्यायोंको प्राप्त होता है; वह आत्मा है; ऐसा व्यवहारसे अर्थ करते हैं। तब यह आत्मा संसारी है, देहादिकसे सहित है, जन्म, मरण, वृद्धावस्था, और यौवनआदिक ' दशाओंमें जो दुःख होता है; उसको प्रत्यक्ष प्रमाणसे 'अनुभवकरताहुआ देव है, म. नुष्य है, नारको है; और तिर्यञ्च हैं; इत्यादिरूपसे कहा जाता है । उस व्यवहारदशामें इसका निश्चयोक्त अनन्त गुणादिसहित जो सिद्धपना है, उसकी गौणता भासती है ॥२२॥ अथ पुनस्तदेव प्रतिपादयति । अब फिर उसी विषयका प्रतिपादन करते है। सूत्रम् । तेनेदं भाष्यसंदिष्टं गृहीतव्यं विनिश्चयम् । तत्त्वार्थ निश्चयो वक्ति व्यवहारो जनोदितम् ॥ २३ ॥ सूत्रभावार्थ:-इस कारण भाष्यमें कहाहुआ जो यह विनिश्चय है; कि-"निश्चय- नय तत्त्वार्थको कहता है; और व्यवहारनय केवल मनुष्योंसे कहेहुएको हो कहता है" इसको स्वीकार करना चाहिये ॥ २३॥ प्यारया। तेन कारणेनेदं विनिश्चयं निश्चयव्यवहारयोर्लक्षणं भाष्यसंदिष्टं विशेषावश्यक निरूपितं गृहीतव्यमवधारणीयम् । अथ निश्चयव्यवहारयोर्लक्षणमाह । निश्चयो निश्चयनयः तत्त्वार्थ युक्तिसिद्धमर्थ वक्ति कथयति। पुनर्व्यवहारो व्यवहारनयो जनोदितं लोकाभिप्राहित्वं वक्ति यतो लोकाभिमतमेव व्यवहारस्तस्य माहकं प्रमाण नभवति।प्रमाणं तु तत्वार्थग्राहकमेवास्ति तथापि प्रमाणस्य सकलंतत्वार्थपाही निश्चयनयः, एकदेशतत्त्वार्थमाही व्यवहारश्चायं विवेकः । निश्चयनयस्य विषयत्वमथ च व्यवहारनयस्य विषयत्वमनुभवसिद्धं भिन्नमेवाले । असता न निष्ठेति । यथा सविकल्पकज्ञानं नष्टप्रकारतादिकमन्यवादिनो भिन्नमेवामनन्तीति हृदये विमर्शनीयम् ॥ २३॥ . व्याख्यार्थ:-- इस कारणसे भाष्य अर्थात् विशेषावश्यकमें कहाहुआ जो यह विनि- श्चय अर्थात् निश्चय और व्यवहारका लक्षण है; उसको निश्चित करना चाहिये । अब जो निश्चय और व्यवहारका लक्षण भाष्यमें कहाहुआ है, उसका कथन करते हैं; कि-निश्चय नय जो है; वह तो तत्त्वार्थ अर्थात् युक्तिसे सिद्ध मर्थको कहता है; और व्यवहारनय जो है; वह जनोदित अर्थात् लोकके इस जो ग्रहण है; उसको कहता है, क्योंकि लोकके ही जो अभिमत होता है; वह व्यवहार है । इसलिये उस व्यवहारका जो ग्राहक (प्रण करनेवाला) है; वह प्रमाण नहीं होता, किन्तु जो तत्वार्थका ग्राहक होता है। यही प्रमाण होता है; तथापि प्रमाणके संपूर्ण तत्त्वार्थको ग्रहण करानेवाला निश्चयनय है; और प्रमा- 1 । -- द्रव्यानुयोगतर्कणा। णके एकदेश तत्त्वार्थको जो ग्रहण करता है; वह व्यवहार कहलाता है। यह निश्चय औरं व्यवहार इन दोनों नयोंका विवेक है। और निश्चयनयका विषय तथा व्यवहारनयका विषय तो भिन्न ही है, यह अनुभवसे सिद्ध है । और व्यवहारमाहक प्रमाण असत् है; इ.. ससे उसकी निष्ठा (उत्पत्ति ) नहीं है, ऐसा नहीं क्योंकि-जैसे अन्यवादी सविकल्पक ज्ञा. नको और निर्विकल्पकको भिन्न ही मानते हैं; उसी प्रकार निश्चय और व्यवहार है; ऐसा हृदयमें विचारना चाहिये ॥ २३ ॥ अथोपचारं निर्दिशति । अब उपचारका निर्देश करते हैं । सूत्रम् । बाह्यस्याभ्यन्तरत्वं यहहुव्यक्तरभेदता । यच द्रव्यस्य नैर्मल्यमिति निश्चयगोचराः ॥ २४ ॥ सूत्रभावार्थ:-जो वाह्य पदार्थका अन्तरंगत्व है, जो अनेकव्यक्तिगत अभेदता है; और जो द्रव्यकी निर्मलता है; सो सब निश्चयनयका विषय है ॥ २४ ॥ घ्याख्या । यद्वाह्यस्य वाह्यार्थस्याभ्यन्तरत्वमन्तरगत्वं वर्तते तदतिगोचरं निश्चयविषयमि- त्यर्थः यथा “ समाधिर्नन्दनं धैर्यो दंभोलिः समता सभा । ज्ञान महाविमानं चं वासरश्रीरियं पुनः ॥ १॥" इत्यादि पुण्डरीकाध्ययनाद्यर्थोऽप्येवं भावनीयः । अथ पुनर्वहुव्यक्तेरनेकविशे- पस्याभेदता भेदराहित्यं तदपि निश्चयविपयं यथा " एगे आया" इत्यादिसूत्रम्, तथा वेदान्त- दर्शनमपि शुद्धसङ्ग्रनयादेशरूपः शुद्धनिश्चयनयार्थः संमतिप्रन्थे कथितः । तथा पुनद्र- व्यस्य पदार्थस्य नैर्मल्यं तदपि निश्चयविपयम् । नैमल्यं तु विमलपरिणतिर्बाह्यनिरपेक्षपरि- णामस्सोऽपि निश्चयनयार्थो बोद्धव्यः । यथा “ यासामाइए आयासामाइयस्स अट्टे" एव- . मेतेऽभ्यन्तरत्वादयो निश्चयगोचरा एव यथा यया रीत्या लोकातिकान्तोऽर्थोऽवाप्यते तथा त- या रीत्या निश्चयनयस्य भेदा भवन्ति तस्माच लोकोत्तरार्थभावना समायातीति ज्ञेयम् ॥२४॥ व्याख्यार्थ:-जो बाह्य पदार्थका आभ्यन्तरत्व अर्थात् अन्तरंगपना है; वह निश्चय नयका विषय है; जैसे समाधि, नंदनवन, दंभोलि (वज) समता सभाज्ञान महाविमान और वासरश्री अर्थात् दिनकी शोभा । १ । इत्यादि तथा पुण्डरीकाध्ययनार्थ भी इसी प्रकार विचारना चाहिये । और बहुव्यक्तिगत जो अनेक विशेष हैं; उनकी अभेदता (भेद- रहितपना) जो है; वह भी निश्चयनयका विषय है, जैसे “एगे आया" इत्यादि सूत्र है। इसी प्रकार वेदान्तदर्शन भी शुद्धसङ्घहनयका आदेशरूप होनेसे शुद्धनिश्चयनय- का अर्थरूप संमति ग्रन्थमें कहा है। और जो द्रव्य अर्थात् पदार्थकी निर्मलता है; वह भी निश्चयनयका विषय है; यहांपर नैर्मल्य शब्दका अर्थ निर्मल परिणाम अर्थात् बाह्य विषयक अपेक्षा न रखनेवाला जो द्रव्यका परिणाम है; वह भी निश्चयनयका ही अर्थ (विषय ) समझना चाहिये; जैसे “ आयां सामाइय आया सामाइयस्स अट्टे " इत्यादि । इस यह - * । १३२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् • प्रकार यह पूर्वोक्त अभ्यन्तरत्वआदि निश्चयनयके ही विषय हैं । और जिस रीतिसे लो। 'कोत्तर अर्थ प्राप्त होता है, उसी प्रकारसे निश्चयनयके भेद होते हैं; और इस हेतुसे लो- ". कोत्तर अर्थकी भावना प्राप्त होती है। ऐसा जानना चाहिये ॥ २४ ॥ अथ व्यवहारविपयं दर्शयति । अब व्यवहारनयके विषयको दर्शाते हैं । सूत्रम् । यो हि भेदो भवेवयक्तर्यश्चैवोत्कटपर्यवः । कार्यकारणयोरैक्यमिति व्यवहृतेर्विधाः ॥ २५ ॥ और कारणकी एकता है; सो सब व्यवहारके भेद हैं ॥ २५ ॥ व्याख्या । हि निश्चितं यो भेदो व्यक्तर्भवेत् स च व्यवहारभेदो शेयः । यथा अनेकानि द्रव्याणि, अनेके जीवाः, इत्यादि प्रकारण व्यवहारनयार्थः । तया च पुनरेव निश्चयनय उत्कटपर्यवः उद्धवपर्यायः सोऽपि व्यवहारनयस्य भेदः । अत एव " निछयणगं पंचवणे भमरे ववहारणएण कालवणे" इत्यादिसिद्धान्ते प्रसिद्ध उत्कटपर्यायोऽपि व्यवहारः। तथा घ कार्यकारणयोनिमित्ती निमित्तश्य एतयोरथैक्यं यजवति नदेवापि व्यवहारविषयम् । यथा हि आयुघृतमित्यादि, यथा वा गिरिर्दयते, यथा वा कुण्डिका स्रवति, मच्चा: मोशन्ति, छुन्ताः प्रविशन्ति, गङ्गायां घोप इत्यादिव्यवहारमापा अनेकरूपा वर्तते । सा च सर्वापि व्यवहार नयविपयिणी ज्ञेया। इति किं यो व्यक्तछंदः, यः पुनरुत्कटपर्यवः यदपि कार्यकारणयोरक्य- म्, इत्यादि व्यवहृतेर्व्यवहारस्य विद्याः प्रकारां इत्यर्थः ।। २५ ।। व्याख्यायः-जो, व्यक्तिका भेद होता है; उसको निश्चयरूपसे व्यवहारका भेद जा. नना चाहिये, जैसे अनेक द्रव्य हैं, भनेक जीव है, इत्यादि रीतिसे व्यवहारनयका अर्थ है। और फिर जो निश्चयनयमें उद्धत पर्याय है; सो भी व्यवहारनयका भेद है। इसी हेतुसे ऐसा कहा भी है; कि-निश्चयनयसे भ्रमर (भवरा) पंचवर्ण अर्थात् पांच रंगका है। और 'व्यवहारनपसे केवल कृष्णवर्ण (काले रंगका )ही है; इत्यादि रीतिसे सिद्धान्तमें प्रसिद्ध जो उत्कट पर्याय है; वह भी व्यवहारनयका भेद है। और फिर कार्य कारण अर्थात् निमि- ची और निमित्तकी जो एकता है; वह भी व्यवहारनयका विषय है; जसे आयु घृत है; यहाँ पृतरूप जो भायुका कारण है। उसमें आयुरूपता मानी है; अथवा जैसे पर्वत जलता है। ' कुंडी करती है। मंच (मांचे ) शब्द करते हैं । 'भाले घुसते हैं। गंगामें घोष (भ. होरोका ग्राम ) है' इत्यादि जो अनेकरूप व्यवहारभाषा (व्यवहारमें कहनेकी परिपाटी) है; वह सब व्ययहारनय के विषयको धारण करनेवाली ही जाननी चाहिये। तात्पर्य यह है। कि-जो व्यकिका भेद है, और जो उत्कट पर्याय है तथा जो कार्य कारणही एकया है इत्यादि यह सब व्यवहारनयके भेद है ।। २५।। A .

शिक्षणआदि अनेकार्थका याची. है; इसलिये सूत्रमें जो अवबोधन शब्द है। उसका यहां चमन्यके यनानेवाले देवसेनजीने श्रीवीतरागके सिद्धान्तसे रहित इस पूर्वात प्रसंचन अ- -- . ऐसी अधिकता करके मंदबुद्धियोंको वंचनेकेलिये अवयोधन शन्द मतारण वंचन तथा "सूत्र में जो किल शब्द है; वह सत्य, झूठ, संभावना और निश्चय इन चार अथामें वर्चता है; इस कारण यहां झूटरूप अर्थका ग्रहण कियागया है" दिगम्बरमतके अग्रेसर नय द्रव्यानुयोगतर्कणा'। १३३ • अथ प्रपञ्चितस्य संक्षेपमाह । अब जो पूर्वोक्त प्रपंच है; उसको संक्षेपसे कहते हैं। सूत्रम् । इत्याद्यनेकविपयांश्च नयान्विहाय संक्षिप्य तांश्च घचसाध्यधिकान्विधाय । पालावयोधनकृते किल देवसेन- स्तत्मपञ्चनमचीकरदातशुन्यम् ॥२६॥ सूत्रभावार्थ:-इत्यादि अनेक विपयोंको धारण करनेवाले निश्चय व्यवहारादि नयोंको त्यागकर और फिर उनको ही उपचारसे संक्षिप्तकर और सूत्रवाक्यसे भी अधिक नयोंको अपनी बुद्धिसे करके मंदबुद्धियोंको वंचने( उगने )केलिये देवसेनजीने माप्त- शून्य इस प्रपंचको किया है ॥ २६ ॥ व्याख्या । इत्यादि अनेकविषयान् अनेके भूयांसो विपया गोचरा अर्था वा एपान्तेऽनेकवि. प्रयास्ताननेकविषयान् नया न्यायान् निश्चयव्यवहारात्मकान् विहाय त्यक्त्वा च पुनस्तानेव नयान संक्षिप्य संक्षेपं कृत्वा उपचारपदेन संकोचयित्वा अपि पुनर्वचसा वचनान्तरेण अधि- कान् अतिरेकान् विधाय रचयित्वा सूत्रे सप्त नया आदेशान्तरेण पञ्च नयास्तत्र च नव नया' इत्याधिक्यं कृत्वा वालाववोधनकृते बालानां मन्दमतीनामवयोधनं प्रतारणं " वयोधनं प्रतारणे वंचने शिक्षणे चेत्यनेकार्थात् " मंदमतिवचनकृते प्रतारणार्थाय किल इत्य- सत्ये " सत्केलीके भावनायां निश्चयऽपि किल स्मृतमिति" देससेनः नयचक्रग्रन्थनिर्मायको दिगम्बरमतामणीः एतत् प्रागुक्तं प्रपञ्चनं नयविस्तारणं अचीकरत् चकार । फीगचीकर आनशून्यं आप्तोवीतरागतस्य वाक्यं सिद्धान्तस्तेन शून्यं वर्जितम्, आप्तशून्यमिति मध्यमपद लोपी समासः आप्तवाक्येन शून्यमातशून्यं स्वमत्या असंभावितं विरचय्य लोके ग्रन्थगौरवो दर्शित इति ।। २६ ।। व्याख्यार्थ:-इत्यादि बहुतसे गोचर अथवा अर्थोके धारक निश्चय और व्यवहार स्वरूप नयोंको छोडकर और फिर उन्ही नयोंका संक्षेप करके अर्थात् उपचारपदसे सं. कोच करके पुनः वचनान्तरसे अधिक नयोंकी रचना करके अर्थात् सूत्रमें सप्त नय है; और. • मतांतरसे पांच नय है; वहाँपर अर्थात् सात तथा पांच नयोंके स्थानमें "न्य नव हैं। . पंचनरूप अर्थ लियागया है " इसलिये उन मंदयुद्धियों को धोखा देनेके अर्थ मिथ्या हो - + 8 १३४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् र्थात् नयके विस्तारको किया तात्पर्य यह कि-देवसेनजीने अपनी बुद्धिसे सर्वज्ञमतके वि. रुद्ध असंभावितको रचकर लोकमें ग्रन्थका गौरव दिखाया है ॥२६॥ सूत्रम् । इत्थं नयानां पहुंभङ्गजालैरे पदार्थ च त्रिधा परीक्ष्य । अहत्क्रमाम्भोजयुगोपयोगिचेत कुरुष्वात्मसुखंलभस्व२७ सूत्रभावार्थ:--हे भव्य ! इस प्रकार नैगम संग्रहादि नयोंके भनेक भेद समूहों के द्वारा एक पदार्थको द्रव्य, गुण पर्यायरूप निश्चय करके श्रीजिनेन्द्रके चरणकमलयुगलमें लीन चित्तको कर और आत्मसुखको प्राप्त हो ॥ २७ ॥ व्याख्या। इत्यं अमुना प्रकारेण श्रीजिनदेवभापितसूत्रपक्रमेण नयानां नैगमादीनां सप्ता- नां तथापि पञ्चानां पहुभगजालैः वह्वोऽनेके भागा भेदास्तेपां जालैः समूहै: एक कमपि स्खे. सिवं पदार्थ जीवादिपदार्थ निघा द्रव्यगुणपर्यायरूप परीक्ष्य निश्चित्य अर्हत्कमाम्भोजयु. गोपयोगि अहंतां वीतरागाणां क्रमाश्चरणात एवाम्भोजानि कमलानि तेषु उपयोगि लीनं एतादृशं चेतः चित्तं कुरुष्व भोभव्य ! त्वमित्यध्याहारादित्यन्वयः पुनर्भो भव्यप्राणिन् ? त्वमा० , • त्मसुखमात्मनो जीवस्य सुखं निरायाधानुभवं लभस्य, प्राप्नुहि । नयज्ञानाजीवादीपरीक्ष्यं फ मभ्य आत्मानं वियोज्यानन्तसुसभाग्भवेत्यर्थः ।। २७ ॥ इति श्रीकृतिभोजसागरनिर्मितायां द्रव्यानुयोगतर्कणायामष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ व्याख्या:--इस प्रकार श्रीजिनदेवभापित सूत्रोंके क्रमसे नैगमआदि सप्त नय अ. थवा पंच नयोंके अनेक भेद समूहोंसे 'इच्छानुसार किसी भी एक जीवआदिक पदार्थको गव्य, गुण तथा पर्यायरूप निश्चित करके श्रीयीतरागोंके चरण कमलों में आसक्त ऐसे चि. तको कर " हेमव्य ? तू यह मध्याहारसे लगा लेना चाहिये " गौर हेमव्यजीव ? तू जी- वका जो वाधारहित अनुभवस्वरूप मुख है; उसको प्राप्त हो । तात्पर्य यह है कि-भो भव्य ? नोंके ज्ञानसे जीवादि पदार्थका निश्चय कर कर्मोंसे भात्माको भिन्न कर अनंत सुखका भागी हो ॥ २७ ॥ इति श्रीमाचार्योपाधिधारिद्विवेदिषण्डितठाकुरप्रसादविरचितमापाटीकासमलत- द्रव्यानुयोगतर्कमायामएमोऽध्यायः ॥ ८॥ , अध नवमाध्याये द्रव्यगुणपर्यायाणामेकं स्वरूपं फयपनाह । अब नयम अध्यायमें द्रव्य, गुण तथा पर्यायोंकी एकरूपता कहते हुए यह सूत्र कहते हैं। सूत्रम् । लक्षणेनिभिरेकोऽर्थः सहितः कथ्यते जिनः। यथार्थार्थमन्विच्छन्मामोति सकलेप्सितम् ।।१।।

द्रव्यानुयोगतर्कणा।
सूत्रभावार्थ:-जैसे श्रीजिनभगवान् एक पदार्थको तीन लक्षणों से युक्त कहते हैं;
उसी रीतिसे पदार्थको चाहताहुआ भव्य सब अभिलपित वस्तुको प्राप्त होता है ॥ १ ॥
व्याख्या । एकोऽद्वितीयोऽर्थो जीवपुद्गलादिर्घटपटादिवा यया येन प्रकारेण सिभिलक्षणे
रत्पादन्ययध्रौव्याख्यैः सहितो युक्तः श्रीजिनैः परमेश्वरैः कथ्यते भण्यते वाक्यप्रबन्धेन ।
यत:--"उत्पन्ने इवा १ ध्रुवे इवा २ विगमे इवा ३ इति त्रिपदीमूलात्पदार्यः सर्वोऽपि विवि-
ध इत्यर्थः । तथेति उत्तप्रकारेण अर्थ पदार्थमन्विच्छन् वाञ्छन् धारयन् सकलेप्सितं सर्ववा.
ञ्छितं सम्यक्त्वादिसिद्धिपर्यन्तं काम.प्राप्नोति भव्य इति पद्यार्थः । भावार्थस्त्वयम्-एतस्या
विपद्यां सर्वेपामर्थानां व्यापकत्वमवधारणीयम् । जिनमते केचित्पदार्थी नित्याः, केचिदनिया
इत्यं नैयायिकादयः कथयन्ति तद्वन्नास्ति । नित्यै फान्तानियकान्तपक्षयोरपि लोकयुक्तयापि
विरोधो दृश्यते । ततो दीपादारभ्याकाशपर्यन्तमुत्पादव्ययधौव्यलक्षणं प्रमाणयितव्यम् । तदु-
कं श्रीहेमाचार्यैः-"आदीपमाव्योम समखभावं स्याद्वादमुद्रानतिभेदिवस्तु । तन्नित्यमेवैकमनि-
यमन्यदिति स्वदाक्षाद्विपतां प्रलापः ॥१॥
व्याख्यार्थः-एक अर्थात् दूसरेसे रहित केवल एक जीव पुद्गलआदि तथा घट
पटभादि पदार्थ जिस रीति से उत्पत्ति, नाश और ध्रौव्यरूप तीनों लक्षणोंसे संयुक्त श्री-
'जिन परमेश्वर वाक्यप्रबंधसे कहते हैं। अर्थात् कथंचित् उत्पन्न होता है; कथंचित् नष्ट होता
है; और कथंचित् प्रौव्य है। इस प्रकार जो तीन पदोंका मूलसूत्र है; उससे सब पदार्य
तीन प्रकारका है। उसी श्रीजिनेन्द्रके कहेहुए प्रकारसे पदार्थको चाहताहुआ अर्थात्
अन्तःकरणमें धारण करताहुआ भव्यराणी संपूर्ण अभीष्टको अर्थात् सम्यग्दर्शनको आ-
• दिले मुक्तिपर्यन्त कामनाको प्राप्त होता है; बस यही श्लोकका अर्थ है । भाशय तो यह
है कि-इस त्रिपदीमें संपूर्ण पदार्थोकी व्यापकताका निश्चय करना चाहिये । क्योंकि कोई
पदार्थ नित्य है; कोई पदार्थ अनित्य है; ऐसा जो नैयायिकआदि कहते हैं; उसके समान
जिन मतमे कोई पदार्य नहीं है । और नैयायिकआदिके अभिमत जो एकान्त नित्य तथा
एकान्त अनित्य पक्ष हैं; इन दोनों में ही लोकयुक्तिसे भी विरोध देखा जाता है। इसलिये
दीपसे लेके आकाशपर्यन्त संपूर्ण पदार्थ पूर्वोक्त उत्पाद, व्यय तथा प्रीव्यरूप विविध
लक्षणसहित प्रमाणभूत करना चाहिये । वहीं विपय श्रीहेमाचार्यजीने कहा है कि-दी-
पकसे लेके आकाशपर्यन्त समस्त पदार्थ एक स्वभावके धारक हैं; और स्वादादमुद्राका
सघन नहीं करते हैं। इसलिये उनमें एक नित्य ही है; दूसरा भनित्य ही है। इस प्रकार
जो कथन है सो भापकी आज्ञासे विरोध रसनेवालोंका प्रलाप है ॥१॥
अथैनमेवार्थ विगृत्य कस्यमाह।
अर इसी प्रिविधलक्षणताप अर्यका विवरण करके निरुपण करते हैं।
सूत्रम् । उत्पादधुपनि शैः परिणामः क्षणे क्षणे।
द्रव्याणामपिरोयाय प्रत्यक्षादिर दृदयते ॥२॥

रायचन्द्रजेनशाहमालायाम् सूत्रभावार्थ:-उत्पाद धौव्य तथा नाशरूप त्रिविध लक्षणोंसे द्रव्यों का परिणाम क्षण क्षणमें परस्पर विरोधरहितपनेसे और प्रत्यक्षसे दीख पडता है ॥२॥ व्याख्या । उत्पादव्ययनिनाशैर्लक्षणैखिभिव्यस्य क्षणे क्षणे समय समये परिणामोऽस्ति । अत्र कश्चिदाह । यत्रोत्पाव्ययौ भवतस्तत्र प्रौव्यं नास्ति यत्रं च प्रौव्यं तत्रोत्पादव्ययों न ': स्यातामिति विरोधस्तिष्ठति तदा एकत्र लक्षणत्रयं कथं संभवेत् । यथा-छायातपावेका न स्यातां तद्वदेतायेकन न भवेतां चेति । तत्रोनर-यथोष्णाशीतस्पशौं क्रमेणानलजलयोः परस्परपरिहारेण दृष्टी तयोरेका स्थान उपसंहारेण विरोधोऽप्यस्ति । परमन तु सर्वलक्षणा- न्येकत्र प्रत्यक्षं विलोक्यन्ते । परस्परपरिहारेण कुत्रापि प्रत्यक्षसिद्धत्वं नास्ति । तदा कथमेत. द्विरोधस्थानं भवेत् । अनादिकालीनैकान्तवासनया मोहिताः प्राणिन एतेषां विरोध पश्यन्ति, परंतु परमार्थतो विचार्यमाणो विरोधो न हस्ति । समयनयत्येन प्रत्यय एव विरोधनाश हेतुरिति ।। २॥ व्याख्यार्थ:- उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य' इन तीनों लक्षणोंसे संसारके' द्रव्यों का परिणाम (परिवर्तन ) क्षण क्षण ('समय २ ) में होता है । अब यहांपर कोई कहता है; कि-जहाँपर उत्पाद तथा नाश है; वहांपर ध्रौव्य नहीं है, और इसी प्रकार जहांपर धौव्य है; वहां उत्पत्ति तथा नाश नहीं रह सकते । इस प्रकार विरोध रहता है; तव एक वस्तुमें : उत्पाद व्यय ध्रौव्यरूप तीनों लक्षण कैसे संभव होते है । जैसे छाया और आतप (धूप) यह दोनों एक जेगह नहीं रह सकते वैसे ही उत्पाद व्यय और धौव्य यह दोनों भी एक • पदार्थमें नहीं रह सकते हैं ? अब इस शंकाका उत्तर कहते हैं; कि-जैसे उष्ण और शीत स्पर्श परस्परके परिहारसे क्रमसे अमि तथा जलमें दृष्ट हैं; अर्थात् परस्परके परिहारसे उष्णस्पर्श अग्निम और शीतस्पर्श जलमें देखाजाता है और उन दोनों स्पशीका किसी एक स्थानमें अर्थात् केवल अग्नि अथवा जलमें उपसंहार ( ग्रहण )करो तो विरोध भी है; परन्तुं यहां तो सब लक्षण (उत्पाद व्यय ध्रौव्यरूप तीनों लक्षण ) एक वस्तु में प्रत्यक्ष रूपसे देख पड़ते हैं; और परस्परके परिहारसे अर्थात् एक दूसरेको दूर करके (उत्पादके विना व्यय, व्ययके विना उत्पाद) कही भी प्रत्यक्षसे सिद्ध नहीं हैं; अर्थात् किसी एक भी पदार्थमें केवल उत्पाद व्यय अथवा भौव्य प्रत्यक्ष प्रमाणसे नहीं देखा जाता है तब यह विरोधका स्थान कैसे है ? अनादि कालकी जो एकान्तकी वासना है; उससे मोहित हो- कर प्राणी इनके परस्परविरोध देखते है; परन्तु परमार्थसे 'विचार किया जावे तो कोई विरोध नहीं है, क्योंकि-समयकी नियत्ततासे जो विश्वास हुआ वही विरोधके नाश कर- नेमें कारण है ।। २॥ पुनस्तदेव कथयन्नाह । पुनः उसी त्रिविध लक्षण प्रस्तुताका विलार करते हैं; . - -- द्रव्यानुयोगतर्कणा। सूत्रम् ।। कुम्भमौलिसुवर्णेषु व्ययोत्पत्तिस्थिरात्मसु । दुःखहर्षोपयुक्तेपु हेमत्वं निश्चलं त्रिपु ॥३॥ सूत्रभावार्थ:---नाश, उत्पत्ति तथा स्थिरतायुक्त और दुःख तथा हर्पसे उपयुक्त सुवर्णमयघट सुवर्णमयमुकुट तथा सुवर्ण इन तीनोंमें सुवर्णरूपता स्थिरतासे है ।। ३ ।। व्याख्या । कुम्भो घटो हेमघटहेममौलिहेमसु नाशोत्पत्तिध्रुवरूपेषु दुःखहर्पाभ्यामुप- युक्तेपु हेमत्वं सुवर्णत्यं तिष्ठति । द्रव्ये चैकस्मिन्नेव घटाकारनाशान्मुकुटाकारोत्पत्तिः, पुनहें- • माकारेण स्थिरत्वमित्येतल्लक्षणत्रयं प्रकटाकारेण दृश्यते । तस्माडेमघट मङ्गत्वा हेममुकुट नि- प्पाद्यते उभयन हेमत्वं स्थिरम् । हेमघटार्थी दुःखवान् भवति घटाकारहेमव्ययसत्त्वात् । हेममुकुटार्थी हर्षवानस्ति हेममुकुटाकारेण सत्यत्वात्। पुनर्हेममात्रार्थस्तु तदा दुःखवानपि मुख- वानपि न, स्थितिपरिणामेन विद्यमानत्वात्, ध्रुवत्याञ्च । तस्माद्धेमसामान्यस्थितिः सत्या इति । एवं सर्वत्रोत्पादव्ययधौव्यपर्याया द्रव्यरूपेण ज्ञेयाः। अत्रोत्पादव्ययभार भिनं द्रव्यं तथा स्थितिभाक् द्रव्यं भिन्नं किमपि न दृश्यते ततो. घटमुकुटाद्याकारस्पशिहेमैव फेवलं द्रव्यम् । न हि यद्धवं भवेत् ध्रुवत्वस्य प्रतीतिरप्यसि ततश्च "तद्भावाव्ययं नित्यं" इति. लक्षणेन परिणामेन च ध्रुवमपरमधुवमपि । सर्वमपीत्थं भावनीयम् ॥ ३ ॥ व्याख्यार्थ: - नाश उत्पत्ति तथा ध्रुवतारूप लक्षणसंयुक्त और दुःख तथा हसे उपयुक्त सुवर्णके घर, सुवर्णके मुकुट सुवर्ण इन तीनों में सुवर्णपना स्थिर है; अर्थात् सुव- भत्य सबमें है; जैसे एक ही सुवर्णरूप द्रव्यमें घटके आकारका नाश मुकुटके भाकारकी . उत्पत्ति और सुवर्णरूप आकारकी स्थिति है । और सुवर्णरूप द्रव्यमें घटके आकारके - नाशसे मुकुटके आकारकी उत्पत्ति होती है; और सुवर्ण आकारसे उसमें स्थिरता (प्रौव्य) है। इस प्रकार यह तीनों लक्षण एक ही द्रव्यमें प्रकटतासे दीखते हैं। इस कारण सुवर्णके. घटको तोडकर सुवर्णका मुकुट बनाया जाता है । और सुवर्णपना घट तथा मुकुट इन दोनों में स्थिर है । अब जिस समय सुवर्णघटको तोडकर उसका मुकुट बनता है; तर सुवर्णके घटको चाहनेवाला पुरुष दुःखी होता है; क्योंकि-घटके आकारका जो सुवर्ण था उसका व्यय (नाश) होता है; और जो पुरुष हेमके मुकुटको चाहनेवाला है; वह प्रसन्न है; क्योंकि वह सुवर्ण हेम मुकुटके आकारसे विद्यमान है; और जो केवल सुवर्णको ही चाहनेवाला है; वह उस समयमें न दुःखी है; और न मुखी है; क्योंकि स्थितिरुप परि- णामसे जो सुवर्ण घटमें था वही मुकुटमें भी विद्यमान है; और नित्य है । इसलिये सुव.. की सामान्यस्थिति सत्य है । इस प्रकार सर्वत्र उत्पाद व्यय तथा धौव्य पर्याय द्रव्य- रूपसे जानने चाहिये । यहांपर उत्पाद और व्ययको धारण करनेवाला द्रव्य भिन्न है। तथा स्थिति (नित्यता )का भागी द्रव्य भिन्न है। ऐसा कुछ भी नहीं दीख पडता है; अर्थात् उत्पाद व्यय और स्थितिका धारक एक ही द्रव्य है । इस कारण घट मुकुट १८.

१३८ रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् इत्यादि आकारको धारण करनेवाला सुवर्ण ही केवल द्रव्य है। और वह केवल ध्रुव ही है; किन्तु उसमें ध्रुवताकी प्रतीति भी है। इसीलिये “उसके भावका जो नाश न होना सो नित्य है।" इस प्रकारके लक्षणसे द्रव्यरूप ध्रुव है; और अन्य सब पर्यायआदि अध्रुव हैं। इसी प्रकार सब ही विचारने चाहियें अर्थात् सर्वत्र ऐसा ही विचार करना चाहिये ॥३॥ अथोत्पादव्ययधौव्यानामभेदसंबद्धं भेदं च दर्शयन्नाह । अब उत्पाद व्यय तथा प्रौव्य इन तीनोंका अभेद संबद्ध भेदको भी दिखाते हुवे सूत्र कहते हैं। सूत्रम् ।, घटव्ययो हि सोत्पत्तिमौलेधौव्यं च भर्मणः। इत्येकस्मिन्दलेऽनेका युगपत्कार्यशक्तयः ॥ ४ ॥ सूत्रभावार्थ:-घटका जो नाश है; वही मुकुटकी उत्पत्ति है; और सुवर्णकी नि- त्यता है। इसी प्रकार एक पदार्थमें एक ही कालमें अनेक कार्योंकी शक्तियें हैं ॥ ४ ॥ व्याख्या । यो हि हेमघटव्ययः सा च मौलमुकुटस्योत्पत्तिः, एककारणजन्यत्वात् । यतो यद्व्यं यद्रव्यध्वंसजन्य तत्तदुपादानोपादेयमिति । ततो विभागपर्यायोत्पत्तिसन्तानादेव घटेनाशव्यवहारोऽपि संभवेत् , उत्तरपर्यायोत्पत्तेश्च पूर्वपर्यायनाशोऽपि संभाग्यश्च । काञ्च-, नस्य प्रौव्यमपि तथैव भावनीयम्, प्रतीत्य पर्यायोत्पादेनैकसन्तानत्वं तदेव द्रव्यस्स लक्ष- णतो धौव्यमस्ति । इत्येकस्मिन्निति--लक्षणत्रयात्मके एकस्मिन् दले एतल्लक्षणत्रयमेकदा य- द्यपि वर्तते तथापि शोकप्रमोदमाध्यस्थरूपा अनेकाः कार्यशक्तयो दृश्यन्त इत्यनेकत्वेन घं भिन्नत्वमपि ज्ञेयम् । सामान्यरूपेण प्रौव्यं विशेषरूपेणोत्पादव्ययौ चेत्थं प्रमाणयतां विरो- धोऽपि नास्ति । व्यवहारतः सर्वत्र स्यादर्थानुप्रवेशेनैव स्यात्, विशेषपरतापि व्युत्पत्तिविगे- पेण स्यात् । अत एव स्यादुत्पद्यते, स्यान्नश्यति, स्याद् ध्रुवम्, इत्थमेव वाक्यप्रयोगोऽपि । "उत्पन्नेइ वा" इत्यादौ वा शब्दो व्यवस्थायां स च स्याच्छब्दसमानार्थः । अत एव "कृष्णाः सर्पः" एतलौकिकवाक्यमपि स्यान्द्रब्दं गृहीत्वैवास्ति । ततः सर्पस्य पृष्ठावच्छेदेन श्यामवं वर्तते परन्तु उदरावच्छेदेन नास्ति । तथैव सर्पमात्रेणापि कृष्णवं न दृश्यते शेपाख्यो नागः शुक्ल एवास्ति । तस्माद्विशेषणविशेष्यनियमार्थो यदि स्वाच्छन्दप्रयोगोऽस्ति तदा त्रिपदीमहा- वाक्यमपि स्यात्कारमंजनया संभवेदिति ॥४॥ व्याख्यार्थ:-जो सुवर्णघटका व्यय है; वही सुवर्णमुकुट की उत्पत्ति है; क्योंकि- टका नाश और मुकुटकी उत्पत्ति यह दोनों कार्य एक ही कारणसे जन्य है । कारण कि- न्यायका सिद्धान्त है; कि---जो द्रव्य जिस द्रव्यके नाशसे उत्पन्न होता है; वह उसी (नश्य- मान ) द्रव्यके उपादान कारणसे उपादेय है; भावार्थ-जैसे यहां सुवर्णघटके नाशसे मुकुट उत्पन्न हुआ है; तो घटद्रव्य नांशका जो उपादान कारण सुवर्ण है; वही मुकुट का भी उपादान कारण है; इस रीतिसे घटका नाश तथा मुकुटकी उत्पत्ति एक ही सुवर्ण- रूप कारणसे जन्य (पैदा हुई ) है । और इसीसे विभाग पर्याय ( मुकुट पर्याय )की । . .

द्रव्यानुयोगतर्कणा।
उत्पत्तिके संतानसे ही घटके नाशरूप व्यवहारकी संभावना होती है । और उत्तर पर्याय
जो यहांपर मुकुटरूप पर्याय है; उसकी उत्पत्तिसे पूर्व घटरूप पर्यायका नाश भी विचारने
योग्य है। और उसी प्रकारसे सुवर्णका ध्रौव्य भी विचारना चाहिये क्योंकि जिसको नि-
मित्त मानकर पूर्वपर्यायका नाश और उत्तरपर्यायकी उत्पत्ति है उसका निरवच्छिन्नं एक
संतानत्व (सुवर्णका स्थिरत्व ) जो है; वही द्रव्यके लक्षणसे उसका ध्रौव्य है। इस प्रकार
विविधलक्षणसहित एक दल( वस्तु)में यद्यपि तीनों ही लक्षण एक समयमें हैं; तथापि
शोक, प्रमोद और माध्यस्थरूप अनेक कार्योंकी शक्तियें दीख पडती हैं; इस रीतिसे अने-
कत्व होनेसे भिन्नता भी समझनी चाहिये । इस प्रकार सामान्यरूपस तो ध्रौव्य तथा
विशेषरूपसे उत्पाद और व्ययको प्रत्येक वस्तुमे प्रमाणीभूत न करनेवालोंके कोई विरोध
भी नहीं है; क्योंकि-व्यवहारसे सर्वत्र स्यात् .(कथंचित्) इस अर्थ अनुप्रवेशसे
सामान्यपरता भी है; और व्युत्पत्तिविशेपसे विशेषपरता भी है। इसी कारणसे स्यात्
उत्पन्न होता है; स्यात् नष्ट होता है; स्यात् (कथंचित् ) ध्रुव है; ऐसे वाक्यका प्रयोग भी
होता है । और उप्पन्नेइ वा इत्यादिक मूलपाठमें जो वा शब्द है; वह व्यवस्था अर्थमें
है; और वह अर्थ स्यात् इस शब्दके समान है । इसी कारण 'कृष्णसर्प' (काला सांप)
यह लौकिकवाक्य भी 'स्यात्' इस शब्दको गृहण करके ही वर्तता है; क्योंकि सर्पके
पृष्ठ (पीठ) देशमें श्यामता (कालापन ) है; परन्तु उसके उदर देशमें. (पेटमें) नहीं
है। और वैसे ही सर्पमात्रमें भी श्यामता नहीं है; क्योंकि 'शेप'---इस नामका धारक जो
नाग है; वह शुक्ल (सफेद) ही है । इसलिये विशेषण विशेष्यके नियमार्थ 'स्यात्"श-
ब्दका प्रयोग है; तो त्रिपदीमहावाक्य भी स्यात्कारका भागी हो सकता है ।। ४ ।।
सूत्रम्। द्रव्यस्वभाव आख्यातो पहुकार्यककारणः ।
सदा ऋते हेतुभेदात्कार्यभेदः कथं भवेत् ॥५॥
सूत्रभावार्थ:--पूर्व प्रसंगमें "एक कारणरूप अनेक कार्योका जनक द्रव्य है। यह
द्रव्यका समाव वर्णन किया है, तब हेतु ( कारण )के भेदके विना कार्योंका भेद कैसे
हो सकता है ॥५॥
व्याख्या । अथ यद्येवं कथ्यते द्रव्यस्वभावो बहुकायककारणोऽसि । यथा हेमव्यमेवा-
विकृतमस्ति विकारो मिभ्यास्ति । शोकादिकार्यत्रयजननैकशक्तिस्वभावं यत्तदेव द्रव्यं ततो
द्रव्याच्छोकादिकार्यनयं जायते तदा कारणभेदं विना कार्यस्य भेदः कथं भवेन् । श्रेयः
साधनं यत्तत्प्रमोदजनकम् , अनिष्टसाधनं यत्तन्छोकजनकम् , तदुभयाभिन्नं माध्यस्थजनक
मित्येतधिविधं कार्यमेकरमादेकरूपात्कथं भवेत् । शक्तिरपि दृष्टान्तानुसारिण्येव कल्पनीया ।
न घेदेवं वह मिसामीप्याजलं दाहजनकखमावमित्यादिकं प्रकल्पनमप्यनिवार्यम् । तस्मा
क्तिभेदः कारणं भेदः कार्यभेदानुसारेणावश्यमनुसर्तव्यः । अनेकजननशक्ति दाद एवं
एकत्त्वानेकत्वस्वाद्वादं सूचयवीयर्थः ॥ ५ ॥

१४० 1 . , रायचन्दजैनशास्त्रमालायाम् व्याख्यार्थः -अब यदि ऐसा कहते हो कि-एक कारणरूप अनेक कार्योंका जनक 'यही द्रव्यका स्वभाव है। जैसे सुवर्णद्रव्य एक ही अविकृतरूप है; मुकुटआदि जो उ- सका. विकार है; वह मिथ्या है । शोक, प्रमोद और माध्यस्थरूप तीन कार्योंको उत्पन्न करनेवाला जो शक्तिस्वभाव है; वही द्रव्य है। उस द्रव्यसे शोकादिरूप तीन कार्य होते हैं, तब कारणके भेदके विना कार्यभेद कैसे हो सकता है । क्योंकि जो कल्याणका साधन है; वह प्रमोदका जनक है, जो अनिष्टका साधन है; वह शोक (खेद )को उत्पन्न करनेवाला है, और दोनोंसे भिन्न अर्थात् श्रेयस्त्व तथा अनिष्टतासे भिन्न जो साधन है; वह न हर्पको उत्पन्न करता है; और न खेदको, इसलिये यह तीन प्रकारके कार्य एकरूप कारणद्रव्यसे कैसे उत्पन्न होते है। कार्यगत दृष्टान्तके अनुसार ही कारणगत शक्तिकी भी कल्पना करनी चाहिये । यदि ऐसा न मानो तो "अग्निकी समीपतासे जल है; सोदाहको उत्पन्न करनेवाले स्वभावका धारक है" इत्यादि कल्पना भी अनिरिणीय होगी । इसलिये शक्तिभेदरूंप जो कारण है; उसका भेद कार्यभेदके अनुसार अवश्य अनुसरण करना चाहिये अर्थात् कार्यभेद होनेपर कारणका भेद अवश्य मानना पडेगा । और अनेक कार्योंको उत्पन्न करनेवाली शक्ति हैं; यह शब्द ही एकत्व अनेकत्वरूप स्याद्वादको सूचित करता है। यह श्लोकका अर्थ है ॥५॥ अथ चौद्धमतमाह। अब इस विषयमें बौद्धका मत कहते हैं। सूत्रम् । शोकादिजननं लोकवासनाभेदतो भवेत् । वस्तुभेदो नेति बौद्धो निनिमित्तोऽशुचिं स्मयी ॥६॥ सूत्रभावार्थ:-द्रव्यमें शोकादिका जो उत्पाद है; वह लोकवासनाके भेदसे होता है; और शोकादिके जननमे कोई वस्तुका भेद नहीं है । ऐसा कहनेवाला चौद्ध. निमित्त. शून्य है; और अपवित्र तथा स्मयी है॥६॥ व्याख्या यत्तुलानमनोन्नमनवदुत्पादव्ययावेकदा भवतः क्षणिकस्खलक्षणस्य प्रौव्यं नास्त्येव वच्छोकादिकार्यजननमपि भिन्नभिन्नलोकवासनातो भिन्नभिन्नभेदोपकारकमस्ति । यत एकं किमपि वस्तु वासनाभेदात् कस्यापीष्टं कस्याप्यनिष्टं स्यात्, यथेच मनुष्याणामिष्टम्; कर. भानामनिष्टम्, परन्तु तत्रेक्षुभेदो नास्येव । तद्वदिहापि वोध्यमिति वदन बौद्धो निनिमित्तो निमित्तभेदं विना वासनारूपमनस्कारस्य भिन्नत्वं कथं जहाति । अत एवाशुचिः कलुपचित्तः पुनः स्वीकारेण स्मयीति । वस्तुतस्तु शोकादिकानामुपादानं यथा भिन्नं तथा निमित्तमपि भिन्नमवश्यं गंतव्यम् । एकस्य वस्तुनः अमातृभेदेनेष्टानिष्टत्वमसि तत्राप्येकस्य द्रव्यस्येप्टा- निष्टशानजननशक्तिरूपाः पर्यायभेदा अप्यनुसरणीया एवेति ॥ ६॥ व्याख्यार्थ:-जैसे तुला (तराजू) एक कालमें ऊंची नीची हो जाती है। उसी . * द्रव्यानुयोगतर्कणां। प्रकार वस्तुके उत्पाद तथा नाश एक कालमें ही होते हैं। क्योंकि-क्षणिकस्वरूप अपने लक्षणको धारण करनेवाला जो पदार्थ है; उसके ध्रुवता (नित्यपना) है; ही नहीं । इस- लिये शोकआदिका उत्पाद है; सो भी भिन्न भिन्न लोककी वासनासे होता है। और भिन्न भिन्न भेदका उपकार करता है। क्योंकि एक ही कोई भी वस्तु वासनाके भेदसे किसीको इष्ट है और किसीको अनिष्ट है जैसे-~-इक्षु (ऊख का ईस अथवा गन्ना) मनुष्योंको इष्ट (प्यारा ) है; और ऊंटोंको अनिष्ट है; परन्तु यहांपर ईखका भेद नहीं है। अर्थात् वही इक्षु। परंतु मनुष्योंके इए और ऊंटोंके अनिष्ट है। ऐसे ही यहां घट मुकुटआदिमें भी जा." नना चाहिये ऐसा कहताहुमा वौद्ध निमित्त ( कारण )के भेदके विना वासनारूप मन- स्कार (मनके व्यापार से जो चित्तकी सुरसादि परकतारूप भेद है; उसको कैसे छोड़ता है। इंसी कथनसे अशुचि अर्थात् मलिनचित्र है, पुनः इस मतके स्वीकारसे गर्वयुक्त भी है । यथार्थमें तो जैसे शोकआदिके उपादान भिन्न भिन्न हैं। वैसे ही उनके निमित्त भी अवश्य ही भिन्न २ मानने चाहिये। जहां प्रमाता (इष्ट भनिष्टको अनुभव कर- नेवाले )के भेदसे एक पदार्थके.इष्टता तथा अनिष्टता है। वहां भी एक द्रव्यका इष्ट तथा अनिष्ट ज्ञानको पैदा करनेमें शक्तिरूप ऐसे पर्याय मेदोका ही अनुसरण करना चाहिये अर्थात् उस पदार्थमें ऐसे शक्तिभेद हैं; कि-जो किसीके इष्ट ज्ञानजनक हैं; और किसीके अनिष्ट ज्ञानके जनक हैं ॥ ६ ॥ सूत्रम्। चेनिमित्तं विना ज्ञानाच्छक्तिसंकल्पकल्पना। तदा बहिर्वस्तुलोपाद् घटते न घटादिकम् ॥ ७ ॥ सूत्रभावार्थ:--यदि निमित्तके विना ही वासनाविशेषरूप ज्ञानसे शक्तिरूप संक- ल्पकी कल्पना होती है, तो वाह्य वस्तुके लोपसे घटादि आकारकी कल्पना केवल ' वासनासे क्यों नहीं होती ॥ ७ ॥ व्याख्या । अथ चेद्यदि निमित्तं निमित्तभेदं विना ज्ञानात् वासनाविरोपजनितज्ञानस्व. भावाच्छक्तिसंकल्पकल्पना भवति । शोकप्रमोदादिकसंकल्पविकल्पना जायते तदा वहिर्वस्तु- लोपाद्वासनाविशेषेण घटपटादिनिमित्तं विनैव वासनाविशेपेण घटपटायाकारज्ञानं भवेत् । • वाह्यवस्तु सर्व विलुप्यत इत्यर्थः । अथ च निष्कारण तत्तदाकारज्ञानमपि न संभवेत् , अन्तहिराकारविरोधेन बाहाकारो मिथ्याप्रजल्पमानचित्रवस्तुविपयनीलपीताद्याकारज्ञान- मपि मिथ्यैव जायते । तथा उपाद्याकारनीलाद्याकारावपि विरुद्धायेव भवतः । तदा सर्वशू. न्यवादिनो माध्यमिकयौद्धस्य मतमायाति । उक्तं च-किं स्यात्सा चेन तैः किं स्थान स्यात्त. स्मान्मवावपि । यदिदं स्वयमर्थानां रोचते तत्र के वयम् ॥ १ ॥ शून्यवादोऽपि प्रमाणसिद्ध- सिद्धिभ्यां व्याहतोऽस्ति । ततः सर्वे नयाः शुद्धस्याद्वादवीतरागप्रणीता आवृत्तव्याः ।। ७ ।। व्याख्या अब यदि निमित्त ( कारण ) भेदके बिना ही वासनाविशेषसे उत्पन्न 4 । १४२ रायचन्द्रजनशास्त्रमालायाम् जो ज्ञान स्वभाव है; उससे शक्ति अर्थात् शोक प्रमोदआदिके संकल्पकी कल्पना होती है। ऐसा कहो तो वाह्य वस्तुका नाश हो जानेसे घट पटआदि निमित्तके - विना केवल वासनाविशेषसे घंट पटआदि आकाररूप परिणाम नही उत्पन्न होता है और घट- पटादि निमित्त विना ही वासनाविशेषसे घटपटादिके आकारका ज्ञान होवे तो समस्त बाह्य वस्तुका नाश हो जायगा । यह तात्पर्य है; और कारणके विना घटपटआदिके आकारका ज्ञान भी नहीं होसकता है तथा आन्तरंगिक और बाह्य आकारके विरोधसे , वाह्य आकारको मिथ्या कहनेवाले बौद्धके मतसे चित्र (चिनाम)के पदार्थ (तसबीर) वगैरह )में रहनेवाला नील, पीत (पीला )आदि वर्गों के आकारका ज्ञान भी मिथ्या ही होता है । एवं उपा (दिन )आदि आकार तथा नीलआदिका आकार भी विरुद्ध ही होता है । तब अर्थात् वासनाके ही विशेषसे आकारका परिणाम तथा आकारका ज्ञानं . होता है; बाह्य निमित्तकी उसमें कोई आवश्यकता नहीं है। ऐसा माननेसे सबको शून्य कहनेवाला जो माध्यमिक बौद्ध है; उसका मत आता है; क्षणिकवादीका मत नहीं रहता। और कहा है; कि-यदि वासना है; तो क्या नहीं होगा अर्थात् सब कुछ हो जायगा और जो बाह्य पदार्थ तो है; और वासना नहीं है तो उन वाह्य पदार्थोसे क्या हो सकता है। अर्थात् कुछ भी नहीं हो सकता। क्योंकि-वासनाके विना वह वाह्य पदार्थ बुद्धिमे ही नहीं आसकते हैं। इसलिये जो वासना पदार्थों को खयं रुचं रही है, उसको दूर करनेवाले हम कौन हैं ॥ १ ॥ और शुन्यवाद भी प्रमाणकी सिद्धि तथा असिद्धिरूप जो दो पक्ष हैं; उनसे खंडित है । इस कारण सर्वज्ञवीतरागप्रणीत शुद्धस्याद्वादके धारक संपूर्ण नयोंका आदर करना चाहिये ।। ७ ॥ पुनस्तदेव कारणमिति । पुनः "कारण" इत्यादि सूत्रसे उसी विषयको कहते हैं । : सूत्रम् । कारणं घटनाशस्य मौल्युत्पत्तेर्घटः स्वयम् । एकान्तवासनां तत्र दत्ते नैयायिका कथम् ॥ ८॥ 'सूत्रभावार्थ:-घटके नाश तथा मुकुटकी उत्पत्तिमें खयम् घट ही कारण है, जब ऐसा है; तब नाश तथा उत्पत्तिमें एकान्त (सर्वथा )भेदकी वासना नैयायिक कैसे देता है; अर्थात् उत्पत्ति और नाशका सर्वथा भेद क्यों मानता है।॥ ८ ॥ व्याख्या एवं शोकादिकार्यत्रयस्य भेदेनोत्पादव्ययधौव्यानि साधितानि, अत एव घट- नाशस्य हेमघटनाशस्य हेममुकुटोत्पत्तेश्च कारणं हेतुरेकः स्वयं घट एव । हेमघटनाशाभि- अहेममुकुटोत्पत्तिविषये हेमघटावयविभागादिको हेतुरेव । अत एव महापटनाशाभिन्नसण्ड- पटोत्पत्तिविषयेऽप्येकादिनन्तुसंयोगापगमहेसुरेवास्ति । "सण्टपटे महापटनाशस्य हेतुताम: T .

. 1 द्रव्यामुयोगतर्कणा। १४३ कल्पना महागौरवाय स्यात्" इत्थं जाननपि लाघवप्रियो नैयायिको नाशोत्पत्तिकस्यैका. न्तभेदवासना कथं दत्ते । तथा च तन्मतम्-'कल्पनागौरवं यत्र तं पक्षं न सहामहे । कल्प: नालाघवं यत्र तं पक्षं तु सहामहे १ ॥ ८॥ व्याख्यार्थः-इस प्रकार शोकादि कार्यत्रयके भेदसे उत्पाद व्यय तया भोव्य लक्षण सिद्ध कियेगये, इसीसे ( लक्षणत्रययुक्त होनेसे ) सुवर्णघटके नाशका तथा मुवर्णके मुकुटकी उत्पत्तिका कारण केवल स्वयं घट द्रव्य ही है । क्योंकि-सुवर्णघटके नाशसे अमिन्नरूप सुवर्णमुकुटकी उत्पत्तिके विषयमें सुवर्णघटके अवयवोंके विभागमादि हेतु ही हैं । इसी कारणसे महापटके नाशसे अभिन्न खण्डपट (बडे प्यानसे छोटे टुकडे टुकडे होने)की उत्पत्तिके विपयमें भी एक दोआदि तन्तुओंके संयोगका नाश ही कारण है; और खंडपटकी उत्पत्तिके विषयमें महापटका नाश कारण है; यह कल्पना तो अति गौरवकेलिये होगी इस प्रकार जानताहुआ भी लाघवप्रिय (१) एकको आदि लेके जितने तन्तुओंके संयोगके नाशसे वह खंडपट उत्पन्न है; उन सव तंतुवोंके नैयायिक नाश और उत्पत्तिके सर्वथा भेदवासना कैसे देता है। क्योंकि उस नैयायिकके मतका यह वचन है, कि "जिस पक्षमें कल्पनाका गौरव है; उसको हम नहीं सहन करते (मानते) और जिस पक्षमें कल्पनाका लाघव है; उसको सहन करते हैं ॥ ८ ॥ पुनस्तदेव कथयन्नाह । पुसः उसी विषयका प्रतिपादन करते हैं। सूत्रम् । पयोव्रतो न दध्यद्यान्नैव दुग्धं दधिवतः । अगोरसवतो नोभे तेन स्याल्लक्षणत्रयम् ॥ ९॥ सूम्रभावार्थ:-- केवल दुग्धको खानेवाला दही नहीं खा सकता और दहीमा- त्रको खानेवाला दूध नहीं पीता तथा जो गोरसमात्रका त्यागी है; वह दुग्ध तथा दही . इन दोनोंको नहीं खाता है। इस रीतीसे भी उत्पत्तिमादि विविधलक्षणयुक्त वसु सिद्ध होता है ॥८॥ व्याख्या । पयोव्रतो दुग्धावादी दुग्धमेव प्रवनीयं भोक्तव्यमिति प्रतिज्ञापरः स पयोगत सच्यते । ततः पयोतो दधि नाद्यादपि न मुझे, दधिग्रतः पुनर्दुग्धं नाद्यान, तस्य दधिमक्षण एव प्रतिक्षारूपो धर्म एवासि । वस्तुतस्तु "दुग्धपरिणाम्येव दप्यति' इत्यं यद्यभेदकता फप्यते तदा तु पयोप्रतस्य दभ्यदनेऽपि प्रतमद्गो न जातः पुनश दुग्धं दधि न भवति परि णामिद्रव्यत्त्वागिन्नद्रव्यमेव । अभेदविवशया दुग्धमास्वादयत: दधिमतमगो न जायते, दधि मुखानस्य दुग्धप्रतभगोऽपि नैव संपद्यत इति । अयं गौरवसत्वेन द्वयोरप्पभेदोऽसि । अत्र दधित्वेनोत्पत्तिः दुग्यत्वेन नाशो गोरसत्येन ध्रुवत्वं प प्रत्यक्षम् । एतदृष्टान्तन सर्व जगदर्तिभावाना लणत्रययुक्त्वं फयनीयम् । उक्तं प “पयोगतो न दथ्यत्ति न पयोति 7 .

१४४ रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् दधिनतः।अगोरसतो नोभे तस्माद्वस्तुत्रयात्मकम् ॥१॥ अन्वयव्यतिरेकाभ्यां द्रव्यपर्यायो सि- द्धान्ताविरोधिनी सर्वत्रावतारणीयाविति । भक्षणत्रयं कथनीयम् । केचन भावा अन्वयिनः, केचन भावा व्यतिरेकिणः, एवमन्यदर्शनिनः कथयन्ति, नत्र त्यन्येपामपि भावानां निदर्शनं - स्याद्वादव्युपत्त्या समञ्जसं स्यादिति । अन्यच्च वस्तुतः सत्ता विलक्षणरूपैवाति "उत्पादव्य- यध्रौव्ययुक्त सत्" इति तत्त्वार्थसूत्रवचनात् । ततः सत्ताप्रत्यक्षं तदेव त्रिलक्षणं साक्षादस्ति । तथारूपेण सद्व्यवहारसाध्यानुमानादिकप्रमाणान्यप्यनुष्ठीयन्ते ॥ ९॥ व्याख्यार्थः-दूध ही सेवन करना चाहिये इस प्रकारकी प्रतिज्ञामें- जो तत्पर हो उसे पयोव्रत कहते हैं; वह पयोव्रत अर्थात् दूधको खानेवाला ' पुरुष दही नहीं खाता है; और जो दहीको ही सेवन करनेवाला है; वह दुग्ध नहीं पीता है क्योंकि उसको दहीका खाना ही प्रतिज्ञारूप धर्म है । अब यहां "परमार्थ तो दूधका परिणामरूप ही दही है" इस प्रकार यदि दुग्ध दधिका अभेद कहते हो अर्थात् दूध दुही एक ही है। ऐसा मानते हो तब तो दूध पीनेवालेके दहीके खानेसे भी व्रतको भंग नहीं होगा । और यदि परि- णामी द्रव्य होनेसे दही दूध नही हो सकता ऐसा कहो तो इस भेद विवक्षासे दही दूधसे भिन्न द्रव्य है । भावार्थ-अभेदविवक्षासे दूध पीतेहुयेके दहीके व्रतका भंग नहीं होता है; और दही खातेहुए मनुष्यके दुग्धके प्रतका नाश भी नहीं होता है। और गोरसपनेसे दूध और दही इन दोनोंमे अभेद ही है। इसलिये जिसके गोरसका त्याग है; वह दूध और दही दोनोंका सेवन नहीं करता है। यहाँपर दहीपनेसे उत्पत्ति (उ. त्पाद) है और दुग्धत्वरूपसे नाश है; तथा गोरसत्वरूपसे ध्रुवत्व प्रत्यक्षसे सिद्ध है। इसी प्रकार इस दृष्टान्तसे संपूर्ण संसारके पदामि उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यस्वरूप विलक्षण सहितता कहनी चाहिये। ऐसा कहा भी है; "पयोत्रत दधिंका भोजन नहीं करता, दधि- मव दुग्धका भोजन नहीं करता और गौरसका त्यागी दुग्ध दधि इन दोनोंको नहीं खाता इसलिये समस्त वस्तु तीन लक्षणोंका धारक है ॥ १॥ और अन्वय तथा व्यति. रेकसे सिद्धान्तके अविरोधी द्रव्य तया पर्यायकी अवतारण सर्वत्र करनी चाहिये इसलिये जहा या पर्याय है, वहां इत्मविआदि तीनों लक्षपा कहने चाहिये । कितने ही पदार्थ भन्वयी है और कितने ही पदार्थ व्यतिरेकके धारक है। ऐसा अन्य दर्शनवाले कहते हैं। और इस सिद्धान्तमे तो अन्य भी पदार्थोका दृष्टान्त स्थाद्वादकी व्युत्पत्तिसे ठीक हो सकता है । और वस्तुकी सत्ता भी विलक्षण रूप ही है क्योंकि-उत्पाद व्यय तथा धौव्यसे सहित जो होय सो सत् है ऐसा तत्त्वार्धसूत्रका वचन है; इसलिये जो सत्ताका प्रत्यक्ष है। वहीं साक्षात् उत्पाद, व्यय और प्रौव्यरूप विलक्षण है। ऐसी दशामें सद् इस व्यवहारसे साध्य अनुमानआदिक प्रमाणोंका भी अनुष्ठान किया जाता है ॥९॥ . - 1 .

. द्रव्यानुयोगतर्कणा। १४५ सूत्रम् । उत्पन्नकलशे स्वार्थस्योत्पत्तिविगमौ कथम् । शृपवाद्यौ मिश्रितौ धौव्ये शक्या चानुगमाख्यया ॥१०॥ सूत्रभावार्थ:- :-उत्पन्न घटमें निजद्रव्यसंवन्धकी उत्पत्ति तथा नाश कैसे हो सकते हैं? इस प्रश्नका उत्तर सुनो कि-उत्पत्ति तथा नाश यह दोनों एकतासपशक्तिसे ध्रौव्यमें मिले हैं ॥ १० ॥ घ्याख्या । उत्पत्तिांता यस्येत्युत्पन्नो घटस्तस्मिन्नुत्पन्नघटे द्वितीयादिक्षणे स्वार्थस्य सद- व्यसंबद्धस्योत्पत्तिनाशो कथं भवतो यतो हेतोः प्रथमक्षणसंवन्धरूपोत्तरपर्यायोत्पत्तिरस्ति से- व पूर्वपर्यायनाशता इत्थं युष्माभिः पुरा स्थापितमस्ति ? इत्येतत्प्रमः शिष्येण कृतस्तदा गुरुः कथयति । हे शिष्य? शृणु । तद्यथा-प्रथमक्षणे जातावुत्पत्तिविनाशौ ध्रौव्ये मिश्रिती मिलि- सावनुगमाख्यया शक्त्यैकतालक्षणया शक्त्या नित्यो स्तः । असत्यप्याद्ये क्षण उपलक्षणीभूय आगामिनि क्षणे द्रव्यरूपेण तत्संवन्धतामनुभवतः । उत्पन्नो घटो, नष्टो घट इति सर्वप्रयो- गान् । अथ चेदानीमुत्पन्नो नष्ट इयेवं प्रविपाद्यते तदा त्वेवरक्षणविशिष्टता उत्पत्तिनाशयो- रेवास्ति तच द्वितीयादिक्षणे नास्ति । अतो द्वितीयादिक्षण इदमुत्पन्नमियादिप्रयोगोऽपि न स्यात् । घटेति शब्देनेह द्रव्यादेशेन मृद्रव्यं माह्यम् । नत उत्पत्तिनाशाधारता सामान्यरू- पेण तत्मतियोगिता विशेषरूपेण च कथनीयेति भावः ॥१०॥ व्याख्यार्थ:-जिसकी उत्पत्ति होगई है; ऐसा जो घट है; उस उत्पन्न घटमें उत्प. तिके द्वितीयआदि क्षणमे स्वार्थके अर्थात् निजघटरूप द्रव्यके संबन्धके उत्पत्ति नाश कैसे होते हैं। क्योंकि-प्रथमक्षणसंबन्धरूप उत्तर पर्यायकी जो उत्पत्ति है; वही पूर्वपर्या- यकी नाशता है ऐसा भाप पूर्व प्रसंगमें स्थापित कर चुके हैं? ऐसा प्रश्न शिष्यने किया उसपर गुरु उत्तर देते हैं; कि-हेशिष्य ! उत्तर सुनो-वह उत्तर इस प्रकार है कि-प्रथम क्षणमें जो उत्पत्ति विनाश हुये हैं; वह अनुगमानामिका अर्थात् एकतास्वरूप शक्तिसे प्रौव्यमें मिले हुये हैं; और नित्य हैं, तथा प्रथम क्षणके न होनेपर भी उत्पत्ति और नाश दोको उपलक्षणीभूत होकर आगामी क्षणमें द्रव्यरूपसे उसकी संवन्धताका अनुभव करते हैं। क्योंकि-"उत्पन्नो घटा, नष्टो घट" "घट उत्पन्न हुआ, घट नष्ट हुआ" इत्यादि प्रयोग सर्वत्र देखा जाता है । और यदि ऐसा कहते हो कि-'इस समय घट उत्पन्न हुआ, इस समय नष्ट हुआ तब तो उत्पत्ति और नाशके इस (प्रथम) क्षणकी विशि- एता ही होगई क्योंकि वह उत्पत्ति नाशकी विशिष्टता द्वितीयादि क्षणमें नहीं है। इसलिये द्वितीयआदि क्षणमें "यह उत्पन्न हुआ" इत्यादि प्रयोग भी न होगा. तथा घर इस शब्दसे यहांपर द्रव्यार्थके आदेशसे मृत्तिकारूप द्रव्यका ग्रहण करना योग्य है। इससे मृत्तिका सामान्यरूपसे घटको उत्पत्ति तथा नाका आधार है; और विशेष (घट रूपसे उत्पन हुआ तथा नष्ट हुआ ऐसा प्रयोग भी होता है, ऐसा कयन करना . . योग्य है ॥१०॥ १५ .. १४४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् दधिव्रतः।अगोरसमतो नोभे तस्माद्वस्तुत्रयात्मकम् ॥१॥ अन्वयव्यविरेकाभ्यां द्रव्यपर्यायो सि. द्धान्ताविरोधिनी सर्वत्रावतारणीयाविति । भक्षणत्रयं कथनीयम् । फेचन - भावा अन्वयिनः, केचन भावा व्यतिरेकिणः, एवमन्यदर्शनिनः कथयन्ति, नत्र त्वन्येपामपि भावानां निदर्शनं स्याद्वादव्युपत्त्या समससं स्यादिति । अन्यथ वस्तुतः सत्ता विलक्षणरूपैयास्ति "उत्पादव्य- यौव्ययुक्तं सत्" इति तत्त्वार्थसूत्रवचनात् । ततः सत्ताप्रत्यक्षं तदेव निलक्षणं साक्षादस्ति । तथारूपेण सद्यवहारसाध्यानुमानादिकप्रमाणान्यप्यनुष्ठीयन्ते ॥ ९॥ व्याख्यार्थः-दू, ही सेवन करना चाहिये इस प्रकारकी प्रतिज्ञामें जो तत्पर हो उसे पयोव्रत कहते हैं। वह पयोव्रत अर्थात् दूधको सानेवाला · पुरुप दही नहीं खाता है; और जो दहीको ही सेवन करनेवाला है। वह दुग्ध नहीं पीता है क्योंकि उसको दहीका खाना ही प्रतिज्ञारूप धर्म है। अब यहां "परमार्थमें तो दूधका परिणामरूप ही दही है" इस प्रकार यदि दुग्ध दधिका अभेद कहते हो अर्थात् दूध दहीं एक ही है। ऐसा मानते हो तब तो दूध पीनेवालेके दहीके खानेसे भी प्रतका भंग नहीं होगा । और यदि परि- 'णामी द्रव्य होनेसे दही दूध नहीं हो सकता ऐसा कहो तो इस भेद विवक्षासे दही दूधसे भिन्न द्रव्य है । भावार्थ-~~-अभेदविवक्षासे दूध पीतेहुयेके दहीके प्रतका भंग नहीं होता है; और दही खातेहुए मनुप्यके दुग्धके व्रतका नाश भी नहीं होता है। और गोरसपनेसे दूध और दही इन दोनों में अभेद ही है। इसलिये जिसके गोरसका त्याग है; वह दूध और दही दोनोंका सेवन नहीं करता है। यहांपर दहीपनेसे उत्पत्ति ( साद) है और दुग्धत्वरूपसे नारा है; तथा ' गोरसत्वरूपसे भुवत्व प्रत्यक्षसे सिद्ध है। इसी प्रकार इरा दृष्टान्तसे संपूर्ण संसारके पदामि उत्पाद, व्यय, धौव्यस्वरूप विलक्षण सहितता कहनी चाहिये। ऐसा कहा भी है; "पयोयत दधिका भोजन नहीं करता, दधि- ' प्रत दुग्धका भोजन नहीं करता और गोरसका त्यागी दुग्ध दधि इन दोनोंको नहीं साता इसलिये समस्त वस्तु तीन लक्षणोंका धारक है ॥ १०॥ भौर अन्वय सया व्यति. रेकसे सिद्धान्तके अविरोधी द्रव्य तया पर्यायकी अवतारण सय करनी चाहिये इसलिये जहाँ द्रव्य पर्याय है; वहां उत्पचिभादि तीनों रक्षण करने चाहियें। कितने ही पदार्य भन्ययी है; और कितने ही पदार्थ व्यतिरेकके धारक । ऐसा अन्य दर्शनवाले कहते हैं। भोर इस सिद्धान्त में तो अन्य भी पदार्योका दृष्टान्त स्याद्वादशी व्युत्पत्तिसे ठीक हो सकता है। भीर वस्तुपी सता भी मिलक्षण रूपही है, क्योंकि-दसाद चयतया धीर सहित जो होय सो मन् है ऐसा तत्वार्यसूत्रका वचन है। इसलिये जो रातारा प्रत्यक्ष है वही साक्षात् उत्पाद, य्यय और प्रीव्यरूप मिलक्षण है। ऐसी दशामें मन हा पदारसी साध्य अनुगानमादिक प्रमाणों का भी अनुष्ठान किया जाता है ॥२॥ .

द्रव्यानुयोगतर्कणा। सूत्रम् । उत्पन्नकलशे स्वार्थस्योत्पत्तिविगमौ कथम् ।. शृण्वाद्यौ मिश्रितौ धौव्ये शत्या चानुगमाख्यया ॥१०॥ सूत्रभावार्थ:-उत्पन्न घटमें निजद्रव्यसंवन्धकी उत्पत्ति तथा नाश कैसे हो सकते हैं ? इस प्रश्नका उत्तर सुनो कि-उत्पत्ति तथा नाश यह दोनों एकतारूपशक्तिसे भौव्यमें मिले हैं ॥ १० ॥ : घ्याख्या । उत्पत्तिर्जाता यस्येत्युत्पन्नो घटस्तस्मिन्नुत्पन्नघटे द्वितीयादिक्षणे स्वार्थस्य स्यद्र- व्यसंवद्धस्योत्पत्तिनाशी कथं भवतो यतो हेतोः प्रथमक्षणसंवन्धरूपोत्तरपर्यायोत्पत्तिरस्ति सै. व पूर्वपर्यायनाशता इत्थं युप्माभिः पुरा स्थापितमस्ति ? इत्येतत्प्रश्नः शिष्येण कृतस्तदा गुरुः फथयति । हे शिष्य? शृणु । तद्यथा-प्रथमक्षणे जातायुत्पत्तिविनाशौ ध्रौव्ये मिश्रिती मिलि- तावनुगमाख्यया शत्यैकतालक्षणया शक्त्या नित्यौ स्तः । असत्यप्याद्ये क्षण उपलक्षणीभूय आगामिनि क्षणे द्रव्यरूपेण तत्संबन्धतामनुभवतः । उत्पन्नो घटो नष्टो घट इति सर्वप्रयो- गात् । अथ चेदानीमुत्पन्नो नष्ट इत्येवं प्रतिपाद्यते तदा त्येतत्क्षणविशिष्टना उत्पत्तिनाशयो- रेवास्ति तथ द्वितीयादिक्षणे नास्ति । अतो द्वितीयादिक्षण इदमुत्पन्नमित्यादिप्रयोगोऽपि न स्यात् । घटेति शब्देनेह द्रव्यार्थादेशेन मृद्रव्यं प्रायम् । तत उत्पत्तिनाशाधारता सामान्यरू- पेण तत्प्रतियोगिता विशेपरूपेण च कथनीयेति भावः ॥ १०॥ व्याख्यार्थ:-जिसकी उत्पत्ति होगई है, ऐसा जो घट है; उस उत्पन्न घटमें उत्प- तिके द्वितीयआदि क्षणमें स्वार्थके अर्थात् निजघटरूप द्रव्यके संबन्धके उत्पत्ति नाश कैसे होते हैं, क्योंकि-प्रथमक्षणसंबन्धरूप उत्तर पर्यायकी जो उत्पत्ति है; वही पूर्वपर्या- यकी नाशता है; ऐसा आप पूर्व प्रसंगमै स्थापित कर चुके है ? ऐसा प्रश्न शिष्यने किया उसपर गुरु उत्तर देते हैं; कि हेशिष्य ! उत्तर सुनो-वह उत्तर इस प्रकार है कि-प्रथम क्षणमे जो उत्पत्ति विनाश हुये हैं; वह अनुगमानामिका अर्थात् एकतास्वरूप शक्तिसे भौव्यमें मिले हुये हैं; और नित्य हैं, तथा प्रथम क्षणके न होनेपर भी उत्पत्ति और नाश दोको उपलक्षणीभूत होकर आगामी क्षणमें द्रव्यरूपसे उसकी संबन्धताका अनुभव करते हैं। क्योंकि-"उत्पन्नो घटः, नष्टो घट" "घट उत्पन्न हुआ, घट नष्ट हुआ" इत्यादि प्रयोग सर्वत्र देखा जाता है । और यदि ऐसा कहते हो कि-'इस समय घट उत्पन्न हुआ, इस समय नष्ट हुआ तब तो उत्पत्ति और नाशके इस (प्रथम) क्षणकी विशि- टता ही होगई क्योंकि वह उत्पत्ति नाशकी विशिष्टता द्वितीयादि क्षणमें नहीं है; इसलिये द्वितीयआदि क्षणमें "यह उत्पन्न हुआ" इत्यादि प्रयोग भी न होगा. तथा घट इस शब्दसे यहाँपर द्रव्यार्थके आदेशसे मृत्तिकारूप द्रव्यका ग्रहण करना योग्य है । इससे मृत्तिका सामान्यरूपसे घटकी उत्पत्ति तथा नाका आधार है; और विशेष (घट )रूपसे उत्पन्न हुआ तथा नष्ट हुआ ऐसा प्रयोग भी होता है, ऐसा कथन करना योग्य है ॥ १०॥ 1 । । .

१४६
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्
सूत्रम् । उत्पत्तरपि नाशस्यानुगमे पर्ययार्थतः।
भूतादिप्रत्ययोद्भानं घटते समयममम् ॥ ११ ॥
सूत्रभावार्थ:-उत्पत्ति तथा नाशकी ऋजुसूत्रादि पर्यायार्थिकनयसे एकता मान-
नेपर भूतआदि प्रत्ययका भान समयप्रमाण निश्चयनयसे घटित होता है ॥ ११ ॥
व्याख्या । उत्पत्तेरपि पुन शस्य चानुगमे एकतायां पर्ययार्थतः ऋजुसूत्रादेः सकाशाद्
भूतादिप्रत्ययोद्भानं समयप्रमं घटत इति यतो निश्चयनयात् "कजमाणेकडे" एतद्वचनमनु-
मृत्योत्पद्यमान उत्पन्न एवं यदि कथ्यते परन्तु व्यवहारनयादुत्पद्यते, उत्पन्नः, उत्पत्स्यते,
नश्यति, नष्टं, नहधति । एतद्विभक्त्या कालत्रयप्रयोगोऽस्ति । स प्रतिक्षणपर्यायोत्पत्तिना-
शनयवादी ऋजुसूत्रनयतेनानुगृहीतो यो व्यवहारनयस्तमनुगृह्य कथ्यते । कथं तहजुसूत्र-
नयस्तु समयप्रमाणं वस्तु मनुते तत्र यो पर्यायस्य वर्तमानावुत्पत्तिनाशौ विवक्षितौ तावेव
गृहीत्वोत्पद्यते नश्यतीति कथनीयम् । वर्तमाने यदतीतत्वं तद्गृहीत्योत्पन्ननष्ट इति कथ्यते ।
अत्रैव तदतीतं तद्नागतमिव विचिन्त्योत्पत्स्यते नङ्यत्येवं कथ्यते । इतीयमनागवे व्यवस्था
सर्वापि स्याच्छब्दप्रयोगेण संभवेदिति ॥ ११ ॥
व्याख्यार्थ:--उत्पत्ति तथा नाश इन दोनोंकी एकतामें पर्यायार्थिक जो ऋजुसूत्र
आदि नय हैं; उनसे भूतआदि प्रतीतिका ज्ञान समयप्रमाण घटता है। क्योंकि-निश्चय-
नयसे "कज्जमाणे कड़े" (जो भविष्यत्में कट भर्थात् चटाई बनेगी उसमें) इस वच-
नका अनुसरण करके उत्पन्न होनेवाले घटमें उत्पन्न हुआ ऐसा यद्यपि कहा जाता है;
परन्तु व्यवहारनयसे “उत्पन्न होता है; उत्पन्न हुभा और उत्पन्न होगा तथा नष्ट होता
है, नष्ट हुमा और नष्ट होगा इस विभकिसे जो कालप्रय( तीनकाल )का प्रयोग है।
वह प्रयोग प्रतिक्षणमें पर्यायोंकी उत्पत्ति तथा नाशरूप मतको कहनेवाला जो ऋजुसूत्र
नय है; उससे अनुगृहीत (प्राप्त ) जो व्यवहार है; उस व्यवहारनयको ग्रहण करके कहा
जाता है; यह कैसे कि-ऋजुसूत्रनय तो समय प्रमाण यस्तुको मानता है; उसमें जो
पर्यायके वर्तमान उत्पत्ति तथा नाश विवक्षित हैं; उन्हींको लेके उत्पन्न होता है; नष्ट
होता है। ऐसा कथन करना योग्य है । और वर्तमान पर्यायमें जो भूतत्व है; उसको लेके
उत्पन्न हुमा नष्ट हुआ ऐसा कथन होता है; और उसीमें जो भूतत्व है; उसको भनागत
(भविष्य )की तरह विचार कर उत्पन्न होगा नष्ट होगा ऐसा कथन किया जाता है;
तात्पर्य यह कि वर्तमानकाल ही भूतकी अपेक्षासे भविष्य है; भागामी कालकी अपेक्षासे
वही भूत है; और वर्तमान तो वह स्वयं है; एवं एक काल में ही सर्वत्र तीनों कालका भी
व्यवहार हो सकता है। इसी प्रकारसे अनागत कालमें भी यह मत्र व्यवस्था स्यात्
शब्दके प्रयोगसे संमती है; अर्थात् कथंचित् (किसी अपेक्षासे) भूतकाल इत्यादि कथन
युक्त है, क्योंकि सभी काटमें सर काठका व्यवहार हो सकता है ॥ ११ ॥

द्रव्यानुयोगतर्कणा। सूत्रम्। यद्युत्पत्तिविशिष्टस्य व्यवहारो व्ययस्य चेत् । नाशनिष्ठोद्वं तत्र व्यवहारेऽप्युरीकुरु ॥१२॥ सूत्रभावार्थ:- यदि उत्पत्तिसहीत नाशका व्यवहार होता है; तो उस व्यवहारमें नाशनिष्ठ उत्पत्ति होती है। ऐसा मानो ॥ १२ ॥ व्याख्या । यात्पत्तिविशिष्टस्य व्ययस्य व्यवहारोऽति चेत्तदा व्यवहारेऽपि तत्र नाशनि- सोनवमसद्विशिष्टमुत्पत्तित्वमुरीकुरु इति । भावार्थस्त्वयं यद्युत्पत्तिधारानाशविषये भूतादि. प्रत्ययो न कथ्यते अथ च नराधातोरणे नाशोत्पत्तिद्वयं गृहीत्वा तदुत्पत्तिकालत्रयस्यान्वयसं. भवश्व कथ्यते । एवं च कथयतां नश्यत्समयेन नष्ट इत्ययं प्रयोगो नो जायवे तत्कथं सस्मिन्काले नाशोत्पत्योरतीतत्वं नास्तीत्येवं समर्थता व्यवहारस्य यदि क्रियते भवद्भिसदा व्यवहार उत्पत्तिक्षणसंबंधमानमेव कथयत । तन्न प्रागंभावध्वंसताकालत्रयरूपात् कालत्रय.. स्यान्वयसमर्थनं कुरुत । अथ च यद्येवं विचारयिष्यथ घटस्य वर्तमानत्वादिफेऽपि नाशवर्त- मानत्यादिकऽपि नाशवर्त्तमानादि व्यवहारो न जायते । किश्च क्रियानिष्ठापरिणामरूप- वर्तमानत्वमतीतं गृहीत्वा नश्यति नष्ट उत्पद्यत उत्पन्न एतद्विभक्तिव्यवहारसमर्थनं करणी- यम् । अत एव क्रियाकालयोगपद्यविवक्षया उत्पद्यमान उत्पन्न: विगच्छद्विगतमित्यनया दिशा सैद्धान्तिकप्रयोगः संभवेन् । परमते लिदानी ध्वस्तो घट इति आघक्षणो व्यवहारः सर्वथा न घटमाटीकते, नयभेदे तु संभवेन्, यथात्रास्माकं संमतिः । स्याधिकरणक्षणव- ध्यापकस्साधिकरणक्षणध्वंसाधिकरणादिकत्वमनुत्पन्नत्वम् , "उपजमाणकालं उपण्णंति वि. गयं विगच्छं। भेदवियं पन्नवंतो तिकालविसयं विससेइ ॥ १२॥ व्याख्यार्थ:-यदि उत्पत्तिसहित नाशका व्यवहार होता है, तो उसी व्यवहारमें नाशनिष्ठ जो उद्भव (उत्पत्ति) है; अर्थात् असद्विशिष्ट जो उत्पत्ति है; उसको स्वीकार करो । भावार्थ यह है कि-उत्पत्ति धारारूप नाशविषयमें भूतकालादि प्रत्यय (अनुभव) नहीं कहते हो और नश धातुके अर्थमे नाश तथा उत्पत्ति दोनोंका ग्रहण करके उस नाशकी उत्पत्ति कालत्रयके साथ अन्वय( सत्व)का संभव कहते हो तब ऐसा कहने. वालोको नाश होतेहुये समयके साथ नष्ट हुआ ऐसा प्रयोग नहीं होता । क्योंकि- उस कालमें नाश तथा उत्पत्तिकी अतीतकालता नहीं है; ऐसी समर्थता यदि आप व्यवहारकी करते हो तो व्यवहार में उत्पत्ति क्षणकी संयन्ममात्रा ही कहो । तर यहांपर प्रागभावध्वंसता कालत्रयरूपसे कालत्रयके अन्वय( सत्व )का समर्थन करते हो। और यदि ऐसा विचार करते हो फि-घटके वर्तमानत्यादिमें तया नाशके वर्चमानत्यादिका व्यवहार नहीं होता किन्तु क्रियानिष्ठ जो अपरिणामरूप वर्तमानत्व तया अतीतत्व है उसको लेके नष्ट होता है, नष्ट हुआ, तथा उत्पन्न होता है, उत्पन्न हुआ इस रीतिसे इस नस धातुके आगे वर्तमानके तथा भूत कालके प्रत्ययोंको व्यवहारका समर्थन करना चाहिये । इसीसे अर्थात् एक कालमें दूसरे कालकी अपेक्षासे भूतकालादि मान कर १४८ रायचन्द्रजैवशाखमालायाम् ही क्रिया में कालकी एक ही समयमें विवक्षासे उत्पन्न हो रहा है, उत्पन्न हुआ, नष्ट हो रहा है; तथा नष्ट हुआ इत्यादि व्यवहार है; इसी पूर्वोक्त रीतिसे सिद्धान्त मतमे भूतकालादि प्रयोगकी संभावना हो सकती है । और अन्यके मतमें तो इस समय यह घट नष्ट हुआ यह व्यवहार प्रथम क्षणमे सर्वथा नहीं हो सकता क्योंकि-अभी (प्रथम क्षणमें) नश्यमान क्रिया हो रही है। तब उस नाशानुकूल क्रियाका भूतकाल कैसे बोधित हो सकता है । और नयका भेद माननेसे तो हो सकता है; अर्थात् भविष्य कालकी अपे- क्षासे उसीमें भूतत्वके आरोपसे नश धातुके भूतकालके प्रयोगमें कोई अनुपपत्ति नहीं है । यहाँपर हमारी संमति ऐसी है, कि-स्वकीय अधिकरणीभूत जो क्षण उस क्षणका व्यापक तथा स्वके अधिकरणमें जो ध्वंसक्षणकी अधिकरणता तादृश अधिकरणत्वरूप ही अनुत्पन्नत्व है । यहांपर स्वशब्दसे नश्यमानानुकूल क्रियाका ग्रहण है; अतः जिस समयमें नश्यमानरूप क्रिया हो रही है। उस क्षणकी तो अनुत्पत्तिव्यापिका है; और उसी क्रियाका अधिकरणीभूत जो ध्वंस है; उसके अधिकरणका भी क्षण है, क्योंकि उसी क्षणमें ध्वंसा- 'नुकूल क्रिया भी हो रही है। अत एवं साधिकरणक्षणत्वव्यापक तथा स्वाधिकरणीभूत ध्वंसाधिकरणव खरूपता अनुत्पन्नत्वमे चली गई । यही विषय इस गाथामें कहां है; जैसे उत्सद्यमान कालमें उत्पन्न होता है; उत्पन्न हुभा नष्ट होता है; ऐसे दो भेद कहे हुए त्रिकाल विषयको विशेषित करते हैं ।। १२ ।। सूत्रम्। उत्पत्तिर्न भवदने तदोत्पन्नं च तयेत् । यथा नाशं विना नष्टं प्रथमं किं न रोचते ॥ १३ ॥ सूत्रभावार्थ:- :-प्रथम द्वितीयआदि क्षणमें उत्पत्ति नहीं हुई और उत्पन्न हुआ ऐसा व्यवहार यदि तुम भविष्यकी अपेक्षासे मानते हो तो नाराके बिना भी नष्ट हुआ यह व्यवहार तुमको क्यों नहीं रुचता ॥ १३ ॥ व्याख्या । उत्पचीवि-यदा अमे द्वितीयादिक्षणे उत्पत्तिन भवेत्तदा नवटादिकं द्वितीया. दिक्षणेऽनुत्पन्नत्वं भवेन् । यया च प्रथमध्वंसेन नाशेन विना अनष्टमविनष्टं यदि कथ्यते । इत्ययं तलब किं न रोचते । यस्मात्प्रतिक्षणोत्पादनाशी परिणामद्वारा माननीयो । अय प द्रव्यादेशेन द्वितीयादिक्षणे यत्पत्तिव्यवहारः कथ्यते तदा नाराव्यवहारोऽपि तथा भवितुं युज्यते । तया पक्षणान्तर्भावेन द्वितीयादिक्षण उत्पत्तिरपि प्रापयितुं युक्ता भयेन् , अकल्पिता अनुत्पन्नता न भवेत् । तथापि प्रतिक्षणमुत्पत्ति विना परमार्थतोऽनुत्पन्नतार्थता युज्यत इत्यर्थः ॥ १३॥ च्याख्यार्थ:-यदि द्वितीयादि क्षणमें उत्सत्ति नहीं होती तो यह घटमादि उस द्वितीयआदि क्षणमें अनुत्तन्न होते हैं, और जैसे नाशके निना अनष्ट हुभा ऐमा यदि कहा जाय तो यह तर्क तुमको क्यो नहीं रुवता । क्योंकि-प्रतिक्षणमें उत्पाद नाश परि.

द्रव्यानुयोगतर्कणा।
णामके द्वारा मानने योग्य है । और यदि द्वितीयादि क्षणमें द्रव्यार्थादेशकी अपेक्षासे
उत्पत्तिके बिना ही उत्पत्तिका व्यवहार तुम कहते हो तब नाशके पिना नाश व्यवहार
भी होना योग्य है; और उसी रीतिसे क्षणके अन्तर्भावसे द्वितीयआदि क्षणमें उत्पत्ति भी
प्राप्त करने योग्य है; और कल्पनारहित अनुत्पन्नता भी नहीं हो सकती । यद्यपि यह
कल्पनासे अनुत्पत्तिदशामें भी क्षणकी अपक्षासे उत्पन्नता मानी है । तथापि प्रतिक्षण
उत्पत्तिके बिना परमार्थमें तो अनुत्पन्नता ही युक्त है ॥ १३ ॥
सूत्रम् । संमतौ संहननादि भवभावाच केवलम् ।
प्रयाति सिद्ध्यतो ज्ञानं मोक्षसंपासिजे क्षणे ॥१४॥
सूनभावार्थ:-संमति ग्रन्थमें भी यही उपदेश है; कि-संहननआदिमवस्य भावसे
अष्ट कोका नाश करते हुए जीवके मोक्ष प्राप्त होनेके समयमें केवलज्ञान चला जाता
है; अर्थात् भवस्थ केवलपर्यायसे केवलका नाश हो जाता है ॥ १४ ॥
व्याख्या। एवं परिणामतः सर्वद्रव्याणां विलक्षणयोगः समर्थित इत्यनेनैवामिप्रायेण
संमविप्रन्थमध्येऽयं भाव उपदिष्टः, यतः संहननादिभवभावात् सिद्धयतः कर्माष्टक क्षपयतो
जन्तोमाँझसमये केवलज्ञानं प्रयाति भयस्थकेवलपर्यायेण केवलस्य नाशः स्यात् । अयमर्थे
मानस्तस्मिन् सिद्धत्वे सिद्धकेवलज्ञानत्व उत्पद्यते सैव केवलज्ञानत्वे ध्रुवोऽस्ति भावः ।
यतो मोक्षगमनसमयेऽपि ये व्ययोत्पत्ती जायते तत्परिणतसिद्धद्रव्यानुगमतः शिवेऽपि
लक्षणयमाविर्भवति । तथा च तस्य मावस भावार्थज्ञानाय गाथामाह । “तसं घपणाईया
भवच्छकेवलविशेशपनाया। ते सिजमाणसमयेण होइ विगयंतउ होइ । १। सिद्धत्तणेणय
पुणो उप्पण्णा एस अस्थपञ्जाओ । केवलमावं तु पडुचकेवलदाइयं सुत्ते । २।” एतद्भावा-
पेक्षयैव "केवलनाणे पुवि हे पन्नचे भवच्छकेवलनाणेय सिद्धकेवलनाणेय” इत्यादिसूत्र उ.
पदेशोऽस्ति । इत्यं च स्थूलव्यवहारनयेन सिद्धविपयेऽप्यागतम् , परन्तु सूक्ष्मनयेन नागतं
यतः कारणात् सूक्ष्मनया ऋजुसूत्रादयः समय समयमुत्पादृव्ययशालिनः सन्ति तवस्तान
गृहीत्वा तथा द्रव्यार्थादेशस्यानुगमं च गृहीत्वा यत्सिद्धकेवलज्ञानमध्ये त्रैलक्षण्यं समस्ति
तदेव सूक्ष्मं ज्ञेयमित्येवं विचार्य पक्षान्तरं द्योतयति किं ताई मोक्षे निलक्षणता भवति या सा
सिद्धद्रव्यानुगमान्, यकैवल्यं पुरा भवस्थभावेस्थितं तदेव सिद्धत्वे कैवल्यमसि भवस्य-
पर्यायव्ययतत्सन्निधानान्मोसंजोत्पत्तिरुभवत्र कर्मवियोगजन्यं केवलं ध्रुवम् , एतुल्लामाणसं
मोक्षेऽपि शेयमिति । भावार्थस्त्वयम्-ये च संहननादयो भवस्यकेवलविशेषपर्यायास्ते च
पर्यायाः सिद्धयो भगक्तस्तत्समये सिद्धधमानसमये न भवन्त्यतस्तेपां विगमे व्ययो भवति।
तथा पुनः सिद्धत्वेन यो मोक्षलक्षणोऽर्थपर्याय उत्पन्नोऽतस्तदुत्पत्चौ सत्यामुत्सचिर्भवति ।
पुनश्व केवलभावं प्रतीयोभयत्र ध्रुवलमव्याहतम् । कथं वद्भवस्थजन्तोः घातिकर्मापगमे
केवलज्ञानमुत्पन्नं तस्मिंश्च सति सिद्धयतः संहननादि विगतं तदपेशो व्ययः, सिद्धत्वमुत्पन्नं
तदपेक्षोत्पत्तिः, पूर्वप्रसूतफेवलपर्यायस्य धुवत्वाद् ध्रौव्यम् । इत्यं लक्षणत्रयं मोक्षेऽपि सम-
स्तीति ॥१४॥

द्रव्यानुयोगतर्कणा। १५१ है; और दोनों दशामें केवल ज्ञानपना प्रतीत होता है; इसलिये ध्रुवत्व अव्याहत है । वह किस प्रकारसे ? कि-मोक्षके पूर्वमवस्थ जीवके चार घातिया कोका नाश होनेपर जो केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है; उससे उत्पन्न होनेपर सिद्ध दशाको प्राप्त हुये जीवके संह- ननादिका अभाव होगया उसकी अपेक्षा तो व्यंय है; और सिद्धत्व उत्पन्न हुआ उसकी अपेक्षासे उत्पाद है; तथा पूर्व संसारदशामें उत्पन्न जो केवल पर्याय है; उसका नाश न होनेसे भौव्य है । इस प्रकार उत्पाद, व्यय, और प्रौव्यस्वरूप तीनों लक्षण मोक्षदशा- में भी पूर्णतया हैं ।। १४ ॥ तदुपरि शोकमाह। इसी विषयको आगेके श्लोकसे सिद्ध करते हैं। सूत्रम् । तत्सिद्धत्वे पुनश्चेति कैवल्यं यत्पुरास्थितम् । व्ययोत्पत्यैकतो नित्यं पक्षे स्याल्लक्षणत्रयम् ॥ १५ ॥ सूत्रभावार्थ:-पूर्व भवमें जो कैवल्य स्थित था वह पूर्वभवस्थ पर्यायकी अपेक्षासे सिद्ध अवस्था में भी होता है; इसलिये व्यय तथा उत्पाद है; और व्ययोत्पत्तिकी एकतासे नित्य है। ऐसे मोक्षमें तीन लक्षण होते हैं ॥ १५ ॥ व्याख्या । यसुरास्थितं कैवल्यं भवस्थपर्यायापेक्षि तसिद्धत्वेऽपि सिद्धावस्थायामपि । क्षीणे भवस्थ उत्पन्ने सिद्धत्वे व्ययोत्पत्ती स्याताम् । पुनर्नित्यं प्रौव्यं कुतो व्ययोत्पत्त्यैकतो व्ययश्चोत्पत्तिश्च व्ययोत्पत्ती तयोरैक्यं ध्रौव्यं तस्मात्ययोत्पत्त्यैकतो नित्यं प्रौव्यं केवलम् । एवं मोक्षे लक्षणत्रयं स्यात्काल्पनिकमेवेदं भावानां विमर्शना बहुप्रकारा । अत एव "उप्पन्ने वा विगमे वा ध्रुवे वा इति योजना ॥ १५ ॥ व्याख्यार्थ:--जो भवस्थपर्यायकी अपेक्षाका धारक केवलज्ञान पहले. मवस्थ दशामें स्थित था वह सिद्धावस्थामें भी होता है । यहां भवस्थके क्षीण होनेपर तथा सिद्ध- त्वके उत्पन्न होनेपर व्यय तथा उत्पाद होता है ! और नित्य अर्थात् ध्रुवपना कहांसे हुआ? इसका उत्तर यह है; कि-व्यय और उत्पत्ति इन दोनोंकी जो एकता है; उससे केवल ज्ञान ध्रुव है; इस रीतिसे मोक्षमें लक्षणत्रय संगत होते हैं; परन्तु यह लक्षणत्रय काल्प- निक ही है। क्योंकि-पदार्थोंके विचार करनेके अनेक प्रकार हैं । इसी कारण "उप्पन्ने वा, विगमे वा ध्रुचे वा" कथंचित् उत्पन्न होता है, कथंचित् नष्ट होता है; और कथं चित् ध्रुव है; इत्यादि वाक्योंकी योजना होती है; अर्थात् यह उत्पादआदि किसी अपेक्षासे निरूपित होते हैं ॥ १५॥ सूत्रम्। ज्ञानाद्या निजपर्याया ज्ञेयाकारण ये स्थिताः। व्यतिरेकेण ते चैवं सिद्धस्य स्युस्त्रिलक्षणाः ॥ १६ ॥ सूत्रभावार्थ:-जो केवलज्ञान केवलदर्शनआदि निजपर्याय ज्ञेयके आकारसे - १५२ रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् स्थित हैं; वह प्रतिक्षण सिद्धके अन्य अन्य होते रहते हैं। इस हेतुसे तीन लक्षणों के धारक हैं ॥ १६॥ ध्यास्या। ज्ञानाद्याः केवलज्ञानकेवलदर्शनादयो निजपर्याया ज्ञेयाकारेण वर्तमानादिवि- पंयाकारेण स्थिताः परिणताः सन्ति । ते च निजपर्याया व्यतिरेकेण प्रतिक्षणमन्योन्यत्वेन सिद्धस्य मुक्तस्य एवमनया दिशापि विलक्षणा लक्षणत्रयवन्तः स्युर्भवन्ति । तद्यथा, प्रथमा- दिसमयेषु वर्तमानाकारेण सन्ति ये पर्यायास्तेषां पुनर्द्वितीयादिसमयेषु नाशः पुनरतीता- कारणोत्पादाकारभावो भवेदिति । पुनः केवलज्ञानदर्शनभावेनाधवा केवलमानभायेन ध्रुव- त्वमित्थं भावनयभावना कर्तव्या । इत्यमेव ज्ञेयदृश्याकारसंबन्धेन केवलस्य लक्षण्यं फथितम ।। १६ ॥ व्याख्यार्थः-जो केवलज्ञान केवलदर्शनादि निजपर्याय ज्ञेयाफारसे अर्थात् वर्तमानआदि विषयों के आकारसे परिणत हैं; यह निजपर्याय व्यतिरेकसे अर्थात् प्रतिक्षणों अन्य २ पनेसे सिद्ध अर्थात् मुक्त जीवके हैं। इस प्रकारसे भी वह ज्ञानादि पर्याय सीन लक्षणों के धारक हैं; वह इस प्रकार कि प्रथमआदि क्षणमें जो पर्याय वर्तमान भाकारसे स्थित हैं, उनका फिर द्वितीयआदि क्षणोंमें नाश होगा और भूत भाकारसे उत्पादका भाकारत्व होगा। और केवलज्ञान तथा केवलदर्शनरूपसे अथवा केवलमात्र भावसे उनमें ध्रुवत्व है। इस प्रकार केवलज्ञानादि पर्यायों में उत्पाद, य्यय, धोव्य इन तीनों भायोंका विचार करना चाहिये । ऐसे ज्ञेय (जानने योग्य पदार्थ) और दृश्य (देखने योग्य पदार्थ )के आकारके संबंधसे केवलके विलक्षणताका कथन किया है ॥ १६ ॥ क्या सिद्धादिशुद्धद्रव्यस्य कालसंबंधात्रैलक्षण्यं कथयन्नाह । अब इसी प्रकार सिद्धआदि शुद्ध द्रव्यके भी कालके. संबन्धसे प्रिविधलक्षणता दर्शाते हुए यह सूत्र कहते है ।। सूत्रम् । एवं ये क्षणसंपन्धे वर्तयन्ति पदार्थकाः । तेभ्यस्त्रिलक्षणत्वं च, अन्यथा स्युरभावकाः ॥ १७ ॥ सूत्रभावार्थ:--ऐसे ही जो पदार्थ क्षणके संबंधसे पयायों को प्रवर्तित करते हैं; वह उन्ही भावोंसे विविधलक्षणयुक्त है। यदि ऐसा न माना जाय तो यह अभावरूप ही होंगे ॥ १७ ॥ प्यारया। एवं ये पदार्थका मावाः क्षणसंवन्धेऽपि पर्यायतो वयन्ति परिणामयन्ति । सेभ्यो भावभ्यनिलमणत्व संभवेत् । मन्यथा वैपरीयेन अभवका अमावाः स्युरित्ययः । यया हि द्वितीयक्षणे इति भावे इति । आरक्षणे संबंधपरिणामनाशो प्रातः, द्वितीयक्षणसंय. न्धेन परिणामादुत्पन्नः, अपसंयन्धमारेण धवनतः फालसंयन्धाभ्रलमण्यामंमय एलान पेदेवं महि यस्तु अयस्नु मयेन् । उत्पादय्ययनोव्ययोगनमावलनगममि तद्राहिये मशपि. पाणादिवभावरूपतामासादयेत् ।। १७ } + दव्यानुयोगतर्कणा। १५३ व्याख्यार्थ:-इस प्रकारसे जो पदार्थ अर्थात् भाव क्षणके संबन्धमें भी पर्यायसे परिणमनको प्राप्त होते हैं, वह उन्हीं भावोंसे त्रिविधलक्षणसहित संभवें हैं। और यदि इसके विपरीत मानो अर्थात् उक्त सिद्धादि भावोंको त्रिविधलक्षणसंपन्न न मानो तो वह मभावस्वरूप ही हो जायेंगे । यह श्लोकका अक्षरार्थ है । अब इसका विशेष निरूपण इस प्रकार है; जैसे श्लोकमें क्षण यह जो पद है; उससे द्वितीयआदि क्षणका ग्रहण है। प्रथम क्षणमें भावोंके साथ संबन्धसे परिणामका नाश प्राप्त हुआ और द्वितीय क्षणके संबन्धसे परिणाम उत्पन्न हुआ और दोनों क्षणके संबंधमात्रसे ध्रुवत्व है । इस प्रकार कालके संबंधसे विविधलक्षणका संभव कहा गया । और यदि ऐसा न हो तो वस्तु (पदार्थ) अवस्तु हो जायगा; क्योंकि-उत्पाद व्यय और धौव्य संबन्धजन्यता ही भाव (पदार्थ )का लक्षण है; और उस त्रिविधलक्षण संबंधके अभावमें तो पदार्थ शशवि- पाण( खरगोशके सींग)आदिके समान अभावरूपताको प्राप्त होगा ॥ १७ ॥ सूत्रम् । एकदा निजपर्याये पहुसंबंधरूपता । उत्पत्तिनाशयोरेवं संभवेनियता ध्रुवे ॥१८॥ सूत्रभावार्थ:-एक कालमें निजपर्यायमें उत्पत्ति, नाश तथा ध्रुवके विषयमें अनेक संबन्धाकारता निश्चित रूपसे संभवती है ।। १८ ॥ व्याख्या । एकस्मिन्काल एवमनया दिशा निजपर्याय जीवपुद्गलयोस्तथा परपर्याये आका- शधर्मास्तिकायाधर्मास्तिकायानामेतेषां द्रव्यानामुत्पत्तिनाशयोधुवे बहुसंबन्धरूपता अनेक- योगाकारता नियता निश्चिता संभवेत् । यतश्च यावन्तो निजपर्यायाः स्वपर्यायास्तावन्त उत्प- तिनाशाश्च जायन्ते । ततश्च नियता नियमकतो ध्रुवे प्रौव्यखरूपे यावन्तो पयस्वभावास्ता- वन्तो नियताकाराः सन्ति । तथा च पूर्वापरपर्यायानुगत आधारांशस्तावन्मान एव भवेत् । तस्मादन्न संमतिः । तथा च तद्द्वाधा-एगसमयंमि एगो दविपरस बहुयाविहोति उप्पापाः । उप्पापसमाविगमा ठिइपउस्सुगाओ नियमा। १ । एकस्मिन्समये एकैकस्य द्रव्यस्य बहवोs- नेके उत्पादा उत्पत्तयो भवन्ति । तथा पुनरुत्पादसमानास्तत्तुल्यानाशपर्याया अपि शेयाः । इति व्यवहारमार्गः । उत्सर्गतो विशेषभावतः स्थितिः स्थैर्य नियमा निश्चिता अस्ति । ध्रुवत्वं नियतमित्यर्थः । उन्मजननिमजनभावशालिनो जलकल्लोला बहवो भवन्ति जलं तु तावन्मिताकारस्थित्या परिणमति । तत एव तेषां संभवादाविर्मावतिरोभावता भवतीति शेयम् ।। १८॥ व्याख्यार्थ: -एक कालमें इसी पूर्वोक्त मार्गसे निजपर्याय अर्थात् जीव पुदलके तथा परपर्याय अर्थात् भाकाश, धर्मालिकाय और अधर्मास्तिकाय इनके ऐसे इन पांचों द्रव्यों के उत्पत्ति नाश तथा धौव्यके विषयमें अनेक प्रकारके संबंध के आकार निश्चित रूपसे संभवते हैं । क्योंकि-जितने अपने पर्याय है। उतने ही उत्पत्ति तथा नाश भी होते - 4 ।

१५४ . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् हैं; और उत्पत्ति विनाशमें अनेकाकार होनेसे ध्रौव्यमें भी वही नियत है, अर्थात् जितने ध्रुव स्वभाव हैं, उतने ही उनके आकार नियत हैं । और पूर्वपरपर्यायोंमें अनुगत जो आधा- रांश है; वह भी उतना ही होगा जितने कि-उत्पत्ति तथा नाश है। इसीलिये यहांपर संमतिग्रंथका प्रमाण है । और ग्रंथकी गाथा यह है; गाथार्थ-एक समयमें एक एक द्रव्यके अनेक उत्पाद होते हैं; और उत्पादके तुल्य ही उनके नाश पर्याय भी जानने चाहिये यह कथन व्यवहारमार्गसे है । और उत्सर्गमार्ग अर्थात् विशेषतासे स्थिरता निश्चित है; अर्थात् ध्रुवत्व नियत है । भावार्थ-उन्मजन निमज्जन भावशाली (क्षण क्षण) विनाश (तथा उत्पत्तियुक्त ) जलके कल्लोल (तरंग) अनेक होते हैं, और जल उसी अपने परिमित आकारकी स्थितिसे परिणत है। उसीसे उन (जलकल्लो- लों )के संभवसे उनकी प्रकटता तथा अप्रकटता होती रहती है। ऐसा जानना चाहिये ॥ १८॥ अथोत्पादस्य भेदान्कथयन्नाह । अब उत्पादके भेदोंका कथन करते हुवे कहते हैं । सूत्रम् । · प्रयोगविश्रसाभ्यां स्यादुत्पादो दिविधस्तयोः । आद्यो विशुद्धो नियमात्समुदायविवादजः ॥१९॥ सूत्रभावार्थ:-नैमित्तिक तथा स्वाभाविक भेदसे उत्पाद दो प्रकारका होता है; उनमेंसे प्रथम प्रयोगजनित नैमित्तिक उत्पाद अविशुद्ध होता है। क्योंकि नियमसे वह समुदाय विवादसे उत्पन्न होता है ॥ १९ ॥ व्याख्या । उत्पादो द्विविधो द्विप्रकारोऽस्ति, काभ्यां द्विविधः प्रयोगविश्रसाभ्यां, एकः प्रयोगजनित उत्पादः । १ । अपरो विश्रसाजनित उत्पादः ।२। पुनस्तयोयोमध्ये आधो- ऽविशुद्धो व्यवहारोत्पन्नत्वान् । स च निर्धारणनियमात्समुदायवादजनितो यत्नेन कृत्वा अव. यवसंयोगेन सिद्धः फथितः । तथा चात्र संमतिगाथा-उप्पाओ दुवियप्पो पओगजणिओ य वीससाचेव । तत्थयपओगजणिओ समुदयवाओ अपरिशुद्धो। १ । उत्पादो द्विविकल्पो द्विवि. धस्तत्राद्यः प्रयोगजनितोऽपरो विश्रसाजनितस्तत्र च प्रयोगजनितः समुदायवादादपरिशुद्धः कथितो व्यावहारिकत्वात् ॥ १९॥' व्याख्यार्थः-उत्पाद दो प्रकारका है; किनसे दो प्रकारका है ! प्रयोग और विश्रसासे अर्थात् एक तो प्रयोग( निमित्त )जनित उत्पाद है; और दूसरा (विश्रसा) समाव जनित उत्पाद है, और उन दोनोंके मध्यमें प्रथम प्रयोगजनित उत्साद व्यवहारसे उत्पन्न होनेसे अविशुद्ध है तथा यह निर्धारित नियमसे समुदायके विवादसे उत्पन्न होता है। अत एव यनसे अवयोंके संयोगसे सिद्ध कहा गया है। और इस विषयमें संमतिग्रंथकी गाथा भी है; गाथार्थ-"उत्पादके दो विकल्प अर्थात् दो भेद हैं; एक प्रयोगजनित + द्रव्यानुयोगतर्कणा। १५५ दूसरा विश्रसाजनित उनमेसे प्रयोगजनित उत्पाद समुदायवादसे व्यावहारिक होनेसे अपरिशुद्ध कहा गया है ॥ १ ॥ ॥ १९ ॥ अधोत्पादस्य द्वितीयभेदं कथयन्नाह । अब उत्पादके द्वितीय भेदको कहते हैं । सूत्रम् । विसा हि विना यत्नं जायते द्विविधः स च । तत्राद्यचेतनस्कंधजन्यः समुदयोऽग्रिमः ॥२०॥ सूत्रभावार्थ:-विश्रसाजनित उत्पाद वह है; जो विना यत्न उत्पन्न होता है, वह विधसाजनित उत्पाद भी दो प्रकारका है; उनमेंसे प्रथम अचेतन स्कंधसे उत्पन्न समुदय नामसे कहा गया हैं ।। २० ॥ व्याख्या । विनसाख्यो द्वितीय उत्पादः, विश्रसाशब्दस्य कोऽर्थः, सहजं विना यनमुत्प. द्यते यः स विश्रसोत्पादः सोऽपि पुनर्द्विविधो द्विप्रकारः, एकस्तत्र समुदयजनितः, द्वितीय एकत्यिकः । उक्तं च साहाविओवि समुदयकउभ्यणुणत्ति ओत्यहोजाहि । तत्रापि तयोर्द्व- योर्मध्य आद्यः समुयजनितो विश्रसोत्पादः अचेतनस्कंधजन्यः समुदयः कथितः । अभ्रादीनां समुदयपुद्गलानां यथोत्पादः ।। २० ॥ व्याख्यार्थ:-विश्रसानामक द्वितीय उत्पादका भेद है । "विश्रसा" इस शब्दका अर्थ क्या है ? जो विना यतके सहज स्वभावसे उत्पन्न हो वह विश्रसाउत्पाद है। यह भी दो प्रकारका है। एक समुदयजनित है; द्वितीय एकत्विक है । ऐसा ही गाथामें कहा है कि-"विश्रसाउत्पाद भी समुदय तथा एकत्विक भेदसे दो प्रकारका है" उन दोनोमसे अचेतन स्कंधसे उत्पन्न समुदयज प्रथम विश्रसाउत्पाद है । जैसे अचेतन मेघादिके समुदय पुद्गलोका उत्पाद होता है ।। २० ॥ सूत्रम् । सचित्तमिश्रजश्चान्यः स्यादेकत्वप्रकारक। शरीराणां च वर्णादिसुनिर्धारो भवत्यतः ।। २१ ।। सूनभावार्थ:--सचित्त मिश्रसे उत्पन्न, दूसरा एकत्विक विश्रसोत्पाद है । शरीरके वर्णादिकोंका मुनिर्धार इसीसे होता है ॥ २१ ॥ व्याख्या । तथा पुनर्वितीयः मचित्तमिश्रनः शरीरवर्णादिकानां निर्यारो शेयः । सचिताः पुद्गला वर्णादीनां तथा तयाफारवर्णाविपुद्गलानां परिणत्या परिणतानामेकत्वमकारक एकता- रूपेण परिगतः अनेकेषां वर्णादीनां संगतानां परस्परमुत्पादधारया पिण्डीभूतानामवयवा- नामषयविधर्मत्वेन देहदृश्याकारभूतानामणूनां शरीरादिमुनिर्धारो भवति । देहादिपिण्डानां "मु" अतिशयेन निर्धारो वपुरूपावस्थत्वं संपद्यते । तथा च प्रज्ञापनायां स्थानाच- विविहा पुगलापन्नत्ता, तं जहा पतोगपरिणता १ मीससापरिणता २ वीससापरिणता ३ सप प्रथम प्रयोगपरिणताः पुद्गला ये भवन्ति वे जीवप्रयोगेण संयुक्ताः शरीरादयः . .

.
१५६
रायचन्द्रजैनशासमालायाम्
सचित्ताः १ तथा मिश्रपरिणताश्च ते ये जीवेन पुद्गला मुक्ताः फलेवरादयः २ पुनश्च विश्रसा-
परिणताः स्वभावेन परिणताः । यथाभ्रेन्द्रधनुरादयः ३ एवं च सत्यन विप्रसाख्यस्य भेदस्य
स्वभावजनितस्य द्वैविध्यं प्रदर्शितम् । अचेतनस्कन्धजन्यसमुदायाख्यः प्रथमतत्र मचित्त-
मिश्रजन्यैकत्वमकारकशरीरादिवर्णादिसुनिर्धारसंज्ञो द्वितीयः । अत्रायं विशेष: स्वाभाविक
परिणमनेऽचित्तपुद्गलैरेवायनसाध्यव्यवहार उपदिष्ट इह तु द्वयमपि ॥ २१ ।।
व्याख्यार्थ:-दूसरा सचित्तमिश्रसे उत्पन हुआ विभ्रसाउत्पाद है। शरीरवर्णादिका
निर्धार इसीसे समझना चाहिये । वर्णादिकोंके जो पुद्गल हैं; वह सचिच हैं। परिणतिसे
परिणमनको प्राप्त हुए उन उन कारके वर्णादिरूप पुद्गलों का एकत्त्व प्रकार अर्थात्
एकतारूपसहित सुनिर्धार होता है; अर्थात् अनेक प्रकारके वर्णमादिरूप मिले हुए
• तथा उत्पादकी धारासे परस्पर पिण्डरूप हुए अवयव स्वरूप और अवयवीके धर्मसे देह
रूप देखनेमें आने योग्य आकारके धारक परमाणयोंके, जो शरीरआदि पिण्डों का
अतिशयरूपसे निर्धार अर्थात् शरीरके रूपकी मस्या होती है; सो सवित्तमिश्रसे उत्पन्न
एकत्व प्रकारक दूसरा विश्रसाउत्पाद है । यही विषय प्रज्ञापना और स्थाना शास्त्र में
फहा गया है। यह पुद्गल तीन प्रकारसे परिणत है; जैसे-प्रयोगपरिणत १ मिश्रपरिणत
२ विश्रसापरिणत ३ इन तीनों में प्रथम जो प्रयोगपरिणत पुदल हैं; यह जीयके प्रयोगसे
अर्थात् जीवके व्यापारसे संयुक्त शरीरादि सचित्त है । मिश्रपरिणत यह हैं; कि-जो पहल
जीवसे मुक्त हैं; जैसे कलेवरमादि । और विश्रसा परिणत पुद्गल यह है; जो स्वभावसे ही
परिणत है, जैसे इन्द्रके धनुपादि । इस प्रकारका सिद्धान्त होनेसे यहॉपर समावसे
उत्पन्न होनेवाला जो विनसानामक भेद है; उसके दो प्रकार दिसाये । उनमें अचेतन
स्कंध(अचेतन पुदलोंके समुदाय )से उत्पा समुदयनामक तो प्रथम भेद है और
सचित्तमिश्रसे उत्पन्न अर्थात् चेतनसहित पुद्गलोंसे मिलेहुए पुद्गलोंसे उसन एकत्य
प्रकारका धारक शरीरमादिके वर्णमादिका निर्धारसंशक द्वितीय भेद है। इन दो-
में यह विशेषता है कि स्वाभाविक परिणमनमें अवित्त (चेतनरहित) पुदलों से ही
भयनसाध्य व्यवहारका उपदेश किया गया है, और एकत्यिक विभप्सोसादमें सगिता
मंपित्त दोनों प्रकार के पुदलोंसे साध्य व्यवहारका उपदेश है ॥ २१ ॥
पुनर्भदं दर्शयमाह।
फिर भी उत्पादके ही भेदको दिखाते हुए अग्रिम रस कहते हैं।
सूत्रम् । यत्संयोगं विनफत्यन्तद्रव्यांशेन सिद्धता।
पथा स्कन्धयिभागाणीः सिरस्थावरणक्षये ॥२२॥
गूप्रभावार्थ:-जो संयोगके पिना ही विप्रसारलाद ; यह एकरय है और
उको दागने दलाद जानना चाहिये । जगे विप्रदेशभर विभाग मशुका
उसाद होता है, सोर कमेकि दिमागमे जी मिद्धता रसस होगी। ॥ २२ ॥

द्रव्यानुयोगतर्कणा। १५७ व्याख्या । संयोग विना विश्रसोत्पादो यद्भवेत्तदेकत्वं ज्ञेयम् । तदेवकत्वं द्रव्यांशेन द्रव्यविभागेन सिद्धता नाम उत्पन्नत्वं ज्ञेयम् । यथा द्विप्रदेशादिस्कन्धविभागेनाणोः परमाणो- द्रव्यस्योत्पादः, तथा आवरणक्षये कर्मविभागे जाते सति सिद्धस्य सिद्धपर्यायस्योत्पाद इति । "अययक्संयोगेनैव द्रव्यस्योत्पत्तिर्भवति परन्तु विभागेन द्रव्यस्योत्पत्तिर्न भवति" इत्थमेके.. नैयायिकादयः कथयन्ति । तेषां मत एकतन्त्वादिविभागेन खण्डपटोत्पत्तिः कथं जापटीति प्रतिवन्धककालभावस्यांवस्थितावयवसंयोगस्य हेतुताकल्पने महागौरवान् । तस्मात् फुत्रचित्सं. योगात् कुत्रचिद्विभागाद्रव्योत्पादकता मन्तव्या। तदा विभागजपरमाणूत्पादोऽप्यर्थतः सिद्धः स्यात् । संमतिशास्त्र इत्थं सूचितमस्ति । तदुक्तम् “दव्यंतरसंयोगादि केईदवियस्यविति उप्पा- यथा । कुशलविभागजायण इच्छंति अणुहुणुएहिं दब्बे आ। १ । द्वेत्ति अणुयत्ति दविए मोततो असुणविभत्तो । तं पिहु विभागजाणिओ अणुत्तिजाओ अणू होइ । २ " आभ्यां गाथाभ्यां भावार्थोऽवधार्यः । यथा परमाणोरुत्पाद एकत्वजन्यस्तथा येन संयोगेन स्कन्धो न निप्पद्यते एतादृशो धर्मास्तिकायादीनां जीवपुद्गलयोस्संयोगस्तद्वारा यश्च संयुक्तद्रव्योत्पादोऽ. संयुक्तावस्यविनाशपूर्वकः, तथा ऋजुसूत्रनयाभिमतो यश्च क्षणिकपर्यायप्रथमद्विवीयसमया- दिव्यवहारहेतुस्तहारा यश्चोत्पादश्च तत्सर्वमेकत्वं ज्ञेयम् ॥ २२ ॥ व्याख्यार्थ:-संयोगके विना जो विश्रसानामक उत्पाद है; वही एकत्व है। और उसी एकत्रको द्रव्यांशसे अर्थात् द्रव्यके विभागसे सिद्धता अर्थात् उत्पन्नत्व जानना चाहिये । जैसे दो प्रदेशमादि स्कंधक विभागसे परमाणु द्रव्यका उत्पाद है; तथा आवरणक्षय अर्थात् कमोंका विभाग (नाश ) हो जानेपर सिद्ध पर्यायका उत्पाद है। अवयवोंके संयोगसे ही द्रव्यकी उत्पत्ति होती है; परन्तु विभागसे उत्पत्ति नहीं होती" इस प्रकार कोई कोई नैयायिकआदि कहते हैं। उनके मतमें एक तंतुआदिके विभा- गसे खंडपटकी उत्पत्ति कैसे घटित हो सकती है । प्रतिबंधक काल भावको अथवा शेष अवस्थित अवयवसयोगको कारणता माननेसे अतिगौरव है। इसलिये कहीं संयोगको कहीं विभागको द्रव्यकी उत्पत्तिमें कारणता माननी चाहिये । इससे विभागसे परमाणुकी उत्पत्ति भी अर्थसे सिद्ध हो गई । और संमतिशास्त्रमें भी इसी प्रकार सूचित किया है; जैसे "कोई कोई द्रव्यान्तरके संयोगसे ही द्रव्यकी उत्पत्ति मानते हैं, और तर्कमें कुशल विद्वान् तो विमागसे भी द्रव्यकी उत्पत्ति चाहते हैं । १ । क्योंकि अणु तथा द्वयणुक द्रव्योंसे भी अणु द्रव्योंमें उत्पत्ति मानी गई है । अत एव द्विपदेश अणु स्कंधक विभागसे अणुपरिमाण द्रव्यकी उत्पत्ति होनेसे अणुजन्य अणु होता है । २" इन दोनों गायाभोसे यह भावार्य मनमें धारण करना योग्य है कि जैसे परमाणुकी उत्पत्तिसे अर्थात् द्विप्रदेश स्कंधके विभागसे जन्य है, वैसे ही जिस संयोगसे स्कंध नहीं सिद्ध होता है; ऐसा जो धर्मास्तिकायादिकोका और जीव तथा पुद्गलका संयोग है; और उसके द्वारा जो संयुक्त द्रव्यकी उत्पत्ति है। वह असंयुक्त अवस्थाके विनाशपूर्वक । तथा ऋजुसूत्र १५८ रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् नयके भभिमत जो क्षणिक पर्याय प्रथम द्वितीय समयआदिके व्यवहारका कारण है। उसके द्वारा जो उत्पाद है; वह सब एकत्वउत्पाद समझना चाहिये ।। २२ ॥ अत्र न किंचिद्विवादस्तत्र शोकमाह। यहां कुछ विवाद नहीं है। इस विषयमें श्लोक कहते हैं । सूत्रम् । स्कन्धहेतुं विना योगः परयोगेण चोद्भवः । क्षणे क्षणे च पर्यायाधस्तदैकत्वमुच्यते ॥ २३ ॥ सूत्रभावार्थ:-स्कंध हेतुके विना जो संयोगे है, परके योगसे जो उत्पत्ति है; तथा क्षणिक पर्यायसे जो उत्पाद है; वह सब एकत्वउत्पाद है ।। २३ ।। व्याख्या । स्कन्धहेतुं विना यः संयोगः, परयोगेन धर्मालिफायादिना यश्चोत्पादः, 'तथा च क्षणिकपर्याये प्रथमद्वितीयादिद्रव्यव्यवहारहेतवसद्वारा य उत्पादः, तत्सर्वमेफत्वं कप्यते वन न कोऽपि विसंवाद इति ॥ २३ ॥ व्याख्यार्य:- स्कंधकी हेतुताके विना जो संयोग है, परयोग जो धर्मास्तिकाय भा- दिक हैं; उनसे जो उत्पाद है, तथा प्रथम द्वितीयादि द्रव्य व्यवहारके कारण जो क्षणिक पर्याय हैं। उनके द्वारा जो उत्पाद है; वह सब विश्रसाका भेदरूप एकत्वउत्पाद कहा जाता है । इसमें किसी प्रकारका विवाद नहीं है ।। २३ ।। पुनर्भेदं कथयन्नाह । फिर उत्पादके ही भेदको कहते हुए अग्रिम सूत्र कहते हैं । सूत्रम् । उत्पादो ननु धर्मादेः परमत्ययतो भवेत् । निजप्रत्ययतो वापि ज्ञात्वान्तर्नययोजनाम् ॥ २४ ॥ सूम्रभावार्थ:-धर्मास्तिकायआदिकी उत्पत्ति परप्रत्ययसे होती है; अथवा आन्तरिक नययोजनाको जानके निजप्रत्ययसे भी होती है ।। २४ ॥ ध्यास्या । ननु धर्मादरुत्पादः परप्रत्ययो भवे, अपि पुनर्निजप्रत्ययाइवेदन्तर्नययोजनां तात्या इति । भावार्यस्त्वयम्-धर्मास्तिकायादीनामुत्पादो नियमेन परमत्ययः खोपष्टम्य- गत्यादिपरिणवजीवपुद्गलादिनिमित्त उकः । य उमयजनिवस्स चैफजनितोऽपि भवेत् । त- सस्य निजप्रत्ययतापि फययितुं युसा निश्चयव्यवहारावधारणात् । अयमयः "मागासाइयाणं तिण्इं पापओ नियया" इति मंमतिगायायामकारप्रटेपणया यपनान्तरेण छोऽसि वृत्तिकारण तमर्थमनुस्मत्येदापि लिसितोऽसि । तग्मादमालिकायादीनामुत्पादो नियमाप. रमत्यय एव । सोऽपि स्पष्टम्पगत्यादिपरिणतजीवपदलादिनिमिशः, उभयनिमोऽप्येक जनितोऽपि सात् । सस्य निमरत्ययताप्यन्तर्नयवादेनोक्तासि भावना पत्थं शेया॥२४॥ प्याख्या:-धर्मालिकायआदिकी उत्पत्ति परप्रत्ययसे होती है; और माम्यन्तरिक (मन्दरोनी) नप योजनाको समाके निज प्रत्ययमे होती है। भावार्य यह किधर्मा- - द्रव्यानुयोगतर्कणा। १५९ स्तिकाय(धर्मद्रव्य )आदिकी उत्पत्ति नियमसे परप्रत्ययसे अर्थात् धर्मास्तिकायआदिके आधारभूत गमनआदिमें परिणत जो जीव पुद्गल हैं; उनके निमित्तसे होती है। ऐसा कथन किया गया है; और जो उभय(स्वप्रत्यय तथा परप्रत्यय)से जन्य होता है; वह एक जन्य भी होता है। इस वाक्यसे उस धर्मास्तिकायादिके उत्पादके निजप्रत्ययसे जन्यता भी कहनी योग्य है क्योंकि-निश्चय तथा व्यवहारनयसे यह निश्चय होता है। “आकाशास्तिकाय, धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय इन तीनोंके नियमसे परप्रत्ययजन्य उत्पाद है" इस संमतिग्रंथकी गाथामें वृत्तिकारने यह पूर्वोक्त अर्थ आकार प्रश्लेषण करके वचनान्तरसे किया है । उस अर्थका ही अनुसरण करके यहां भी लिखा गया है । इसलिये धर्मास्ति- कायभादिका उत्पाद नियमसे परप्रत्यय जन्य ही है। और वह भी अपने आधारभूत गतिआदिमें परिणत जीव पुद्गलआदिके निमित्तसे है। और जो उभयजनित है; वह एकजनित भी होता है। और इसके जो निजप्रत्ययता कही है; वह भन्तर्नयबादसे कही है। ऐसी भावना समझनी चाहिये ॥ २४ ॥ अथ नाशस्वरूपमा । अब नाश( व्यय )का स्वरूप कहते है। सूत्रम् । नाशोऽपि द्विविधो ज्ञेयो रूपान्तरविगोचरः। अर्थान्तरगतिश्चैव द्वितीयः परिकीर्तितः ॥ २५ ॥ सूत्रभावार्थ:-उत्पादके समान नाश भी दो प्रकारका है; उनमें एक रूपान्तर विगोचर और दूसरा अर्थान्तरगति नामसे कहा गया है ॥ २५ ॥ व्याख्या । नाशोऽपि द्विविधो ज्ञातव्यः । एकस्तत्र रूपान्तरविगोचरः रूपान्तरपरिणामः । द्वितीयस्तु अर्थान्तरगतिरर्थान्तरभावगमनं चेति। भावार्थस्त्वयम् "परिणामो ह्यर्थान्तर, गमनं न च सर्वथा व्यवस्थानं न च सर्वथा विनाशः, परिणामस्तद्विदामिष्टः । १। सत्पर्यायेण विनाशः, प्रादुर्भावोऽसता व पर्यायतः । द्रव्याणां परिणामः, प्रोक्तः खलु पर्यवनयस्य । २ । एतद्वचनं संमतिप्रज्ञापनावृत्तिविषयी । कथंचित्सद्रूपान्तरं प्राप्नोति सर्वथा न विनश्यति यत्तद्रव्यार्थिकनयस्य परिणामत्वं कथितम् । पूर्व सत्सर्यायेण विनश्यति, उत्तरासत्पर्याये- णोत्पद्यते यत्तत्पर्यायाथिकनयस्य परिणामत्वं कथितम् । एतदभिप्रायं विचारयतामेकर- पान्तरपरिणामविनाशः, एकश्वार्थान्तरगमनविनाशः, इत्थं विनाशस्यापि भेदद्वयं संप- नम् ॥ २५ ॥ व्याख्यार्थ:- :-नाश भी दो प्रकारका जानना चाह्येि । उनमेंसे प्रथम रूपान्तर विगोचर अर्थात् एक रूपसे रूपान्तर (दूसरे रूपमें ) परिणाम है। और द्वितीय मर्या. न्तरगति अर्थात् एक पदार्थसे दूसरा पदार्थ हो जाता है । भावार्थ यह है । एक पदा- थसे अन्य पदार्थतामें गमन हो जाता है; सो परिणाम है; और सर्वथा विद्यमानता अथवा - रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् नाश होना यह परिणामका स्वरूप परिणामके जाननेवालोंके इष्ट नहीं है ॥१॥ और सत् ( विद्यमान) पर्यायसे नाश तथा अविद्यमान पर्यायसे उत्पाद जो है; सो पर्या. यार्थिकन्यकी विवक्षाते द्रव्योंका परिणाम कहा गया है ।२। यह वचन संमतिप्रज्ञा- पना वृत्तिका है; उसका अभिप्राय यह है कि जो सत् . ( विद्यमान) पर्याय कथंचित् रूपान्तरको प्राप्त होता है; और सर्वथा नष्ट नहीं होता वह द्रव्यार्थिकनयका परिणाम कहा गया है । और पूर्व सत् पर्यायसे तो नष्ट हो और उत्तर जो अविद्यमान पर्याय है; उससे उत्पन्न होता हो वह पर्यायार्थिकनयका परिणाम कहा गया है । इस अभिप्रा. यको विचारनेवालोंके मतमें एक तो रूपान्तर परिणाम विनाश है; और एक अर्थान्तर गमन विनाश है; ऐसे विनाशके भी दो भेद सिद्ध हुए ॥ २५ ॥ पुनराह। पुनः दो प्रकारके नाशोंका खरूप दिखाते हैं । सूत्रम् । तत्रान्धतमसस्तेजो, रूपान्तरस्य संक्रमः । अणोरण्वन्तरापातो ह्यान्तरगमश्च सः ॥ २६ ॥ सूत्रभावार्थ: :-इन दोनोंमेंसे अतिघनीभूत अंधकारका प्रकाशरूपमें जो संक्रमण है; वह परिणामरूप नाश है । और अणुसे जो अन्य अणुके साथ संयोग होता है। अर्थात् अणुसे जो घणुक स्कन्धरूप प्राप्ति है; वह अर्थान्तरगमनरूप नाश है ॥ २६ ॥ व्याख्या । तन नाशेऽन्धतमसोऽन्धकारस्य तेजोरूपान्तरस्य संक्रम उद्योततावस्थित. द्रव्यस्य रूपान्तरपरिणामरूपनाशो ज्ञेयः । च पुनरणोः परमाणोरण्वन्तरापादोणोरण्वन्तर- संक्रमो द्विप्रदेशादिभावमनुभवन पूर्वपरमाणुत्वं विगतमित्यनेनार्यातरगमः स्कंधपर्याय उत्प- नस्तेन कृत्वार्थान्तरगतिरूपनाशस्य स्थितिर्भवति । निष्कर्पस्त्वयम्-यत्राकारस्तत्रापि तदा- कारपरमाणुप्रचययोनिरन्धतमः समस्ति तत्रैव पुनरुद्योवपरमाणुप्रचयसंचारनिरस्तान्धका- रपरमाणुस्वतत्स्थानतत्तत्परमाणुसंक्रमिततेजः परमाणुत्वलक्षणः रूपान्तरसंक्रमो जात:- यथा अवयवानां परमाणुनामवयविस्कन्धत्वसंक्रमेणार्थान्तरवोद्भावनयार्थान्तरगतिलक्षणो नाशः समुत्पन्न इति ॥ २६॥ व्याख्यार्थ: :--उस नाशमें अंधकाररूप द्रव्यका तेजोरूपमें जो संक्रमण (मिलता) है; अर्थात् भन्धकारसे प्रकाशरूप द्रव्यमें जो परिवर्तन (बदलना) है; उसको रूपांतर परिणामरूप नाश जानना चाहिये और अणु( परमाणु )का दूसरे परमाणुके साथ जो संयोग है; अर्थात् द्विप्रदेशादिभावको अनुभव करते हुए पूर्व परमाणुस्वरूपका नाश हो जाता है। इस कारणसे अर्थान्तरगमन हुआ अर्थात् अणुपर्यायसे स्कंधपर्याय उत्पन्न हुआ इससे अर्थान्तरगतिरूप नाशका स्थिरत्व (ठहराव ) होता है । भावार्थ तो यह है; कि-जहां आकार (काला रंग) है; वहां भी उस आकारके धारक परमाणवोंके समूहसे द्रव्यानुयोगतर्कणा। उत्पन्न हुआ अन्धतम (गहरा अंधेरा ) है और फिर वहां ही ( जहाँपर अंधकार था उसी जगह ) प्रकाशके परमाणवोंके समूहका संचार हुआ तब अंधकारके परमाणु तथा उन परमाणवोंका स्थान दूर हुआ और वह अंधकारके परमाणु उन तेज(प्रकाश )के पर- माणवों में मिलगये बस यही रूपान्तरसंक्रम (अंधकारके परमाणवोंका तेजके परमाणु- वोंमें मिलजाना) है; इसीको रूपान्तरविगोचरनाश कहते हैं । और अवयवरूप परमाणुओंका अवयवी स्कंधरूपमें जो संक्रम है; उससे जो भर्थान्तरका उद्धार है; उसीसे अर्थान्तरगतिरूप नाशका द्वितीय भेद सिद्ध होताहै ॥ २६ ॥ पुनराहा पुनः उसी विषयको कहते हैं । सूत्रम् । रूपान्तराणुसंबन्धात्स्कन्धत्वं यद्यणोरपि । तत्संयोगविभागाभ्यामपि भेदप्रयन्धता ॥ २७ ॥ सूत्रभावार्थ: - रूपान्तर अणुके संबन्धसे यद्यपि स्कंधता होती है; तथापि संयोग और विभागसे ही भेदकी प्रबंधता होती है ॥ २७ ॥ व्याख्या । यद्यप्यणो रूपान्तरपरमाणुसंबन्धात्स्कन्धत्वमणुसंवन्धस्कन्धतास्ति । तदिति तथापि संयोगविभागाभ्यां कृत्वा द्रव्योत्पादनाशाभ्यां द्विप्रकाराभ्यामेवं भेदप्रबन्धता द्रव्य विनाशद्वैविध्यमेव ज्ञेयम्, एतदुपलक्षणं ज्ञेयम् । यतो द्रव्योत्पादविभागेन यथा पर्यायोत्पा- विभागस्तथा द्रव्यनाशविभागेनैव पर्यायनाशविभागो भवेदिति । ततः समुदयविभाग- स्तथार्थान्तरगमनं चेति द्वयमेव व्यवतियते । तत्र प्रथमस्तन्तुपर्यन्तपटनाशः, द्वितीयो घटोत्पत्तिपर्यन्तमृत्पिण्डादिनाशश्च ज्ञेयः । उक्तं च समिती-विगमस्सविएसविहा समुदयजणि मिसोउ दुविपरयो । समुदयविभागमित्तं अत्यंतरभावगमणं च । १।" इत्यादिगाश्रया शेयम् ॥ २७ ॥ व्याख्यार्थ:-यद्यपि एक परमाणुके अन्य परमाणुके संबंधसे अणुसंबंधस्कन्धता है; तथापि संयोग और विभागसे अर्थात् द्रव्यके उत्पाद और नाशरूप जो दो प्रकार हैं; इनसे ही भेदप्रबंधता अर्थात् द्रव्यके नाशके दो प्रकार समझने चाहिये । यह उपलक्ष- गसे जानना चाहिये क्योंकि द्रव्यके उत्सादरुप विभागसे जैसे पर्यायका उत्पादरूप विभाग होता है, वैसे ही द्रव्यके नाशरूप विभाग( भेद )से पर्यायका नाशरूप विभाग होगा। इसी हेतुसे समुदयविभाग तथा अर्थान्तरगमन ऐसे दो ही व्यवहारसे लाये जाते हैं । उनमें तन्तुपर्यायके भन्ततक जो पटका नाश है; वह प्रथम समुदयविभाग है; तथा घटकी उत्पत्तितक जो मृत्तिकापिंडआदिका नाश होता है; वह द्वितीय अर्थान्तरगमन है । और संमितिमें कहा भी है । इसी प्रकार नाश भी समुदयजनित तथा मिश्र ऐसे दो प्रकारका है। इससे समुदयविभाग तथा अर्थान्तरगमन ऐसे दो प्रकारका नाश और रायचन्द्रजैनशासमालायाम् (व्यय) होता है । इत्यादि गाथासे संयोग विभाग इन दोनोंसे भेदकी कल्पना समझनी चाहिये ॥ २७॥ सूत्रम्। धौव्यं स्थूलर्जुसूत्रस्य पर्यायः समयादिकः । संग्रहस्य निजद्रव्यजात्या कालत्रयात्मकः ॥ २८॥ सूत्रभावार्थ:-स्थूलऋजुसूत्रनयका भुवभाव समयआदिक (समय प्रमाण) पर्याय है । और संग्रहनयका निजद्रव्यजातिसे त्रिकालात्मक ध्रुवत्व है ।। २८ ।। व्याख्या । धौव्यं ध्रुवस्वभावोऽपि स्थूल सूत्रस्य ऋजुमूत्रं द्विधा स्थूलसूक्ष्मभेदात्तत्र स्थूल सूत्रस्य पर्यायो मनुष्यादिकः समयप्रमाणमलि । प्रथमः स्थूल ऋजुसूत्रनयतदनु सारण मनुष्यादिपर्यायाणां समयमानं शेयमिति भावः । पुनद्वितीयः संग्रहह्मयस्स सम्मको निजद्रव्यजात्या जीवपुलादिनिजद्रव्यजात्या फालत्रयात्मकनिकालव्यापको सेय इति । किं व आत्मद्रव्येण गुणपर्याययोरात्मद्रव्यं समानाधिकरणत्वेन अन्वयानुगम एवं प्रीव्य- मिति । पुद्गलद्रव्येण गुणपर्याययोः पुद्गलद्रव्यानुगम एव भौव्यमिति । एवं निजनिजजात्या निर्धारो क्षेय इति ॥२८॥ व्याख्यार्थ:-स्थूल सूक्ष्म इन भेदोंसे ऋजुसूत्रनय दो प्रकारका है। उनमें स्थूल ऋजुसूत्रके मतमें समयप्रमाण जो मनुष्यादिक पर्याय है; सो सुखभाव है; भावार्थ यह है कि-प्रथम जो स्थूल माजुसूत्रनय है; उसके अनुसार मनुष्यमादि पर्यायका जो समय है; उस प्रमाण (उतना) धौव्य है; जैसे कोई जीव मनुष्यपर्यायमें पचास वर्ष रहा तो स्थूल ऋजुसूत्रके मतमें मनुष्यपर्यायके पचास वर्ष ही प्रीव्य है । और दूसरा संपहनयके संमत निजद्रव्यजाति से अर्थात् जीवपुद्गलआदि निजद्रव्यफी जातिसे निकाल में व्यापक प्रौष्य जानना चाहिये । तया आत्मद्रव्यसे गुण और पर्यायमें आत्मद्रष्यसमानाधिकरण- ताका जो अन्तयानुगम है सो ही धीष्य है । पुनलद्रव्यसे गुण और पर्यायमें पदलद्रव्यमा अनुगम है, वही भोव्य है । इस प्रकार अपनी अपनी जातिसे भाष्यका निर्धार (निश्चय) समझना चाहिये अर्थात् मात्मद्रव्य गुणपर्यायो भागदेव्यकी और पुरसय्यके गुण पायोंग पुद्गलद्रव्यका धीष्य रहेगा और इनकी अनन्तर जातिमें भी यही व्यवस्था समझनी चाहिये जैसे मृत्तिकाके गुणपर्यायो( घटादिक )में मृतिका द्रव्यका भाग रहता है।॥२८॥ रानम् । अर्थाः समर्थाः समये निकला इत्यं निपालक्षणयन्त आसा सम्पन्धिया तान्परिभाव्य मल्या आईक्रमाम्मोजयुग ग्रपन्ताम् ॥२७॥ मत्रभावार्थ:-हे भव्य जीवो इस पूगेछ रीनाले स्थायं वरमो माननेगल साथ- फोने गाय में शशि भार धर्म अधर्मादि पद द्रव्य नॉन प्रकारके सोमदिन - - . द्रव्यानुयोगतर्कणा। निरूपित किये हैं। उनको बुद्धिसे भली भांति विचारके श्रीअर्हन् देवके चरणकम- लोंका आश्रय ग्रहण करो ॥ २९॥ व्याख्या । अर्थाः पद पदार्थाः धर्माधर्माकाशपुद्गलकालजीवाः समर्थाः शाश्वतपरिणाम भाजः शक्तियुक्ताः समये सिद्धान्ते निरुक्ताः कथिता आतैर्यथार्थतत्त्ववेदिभिस्तीर्थकृद्धिः। ते कीदृशा इत्थं पूर्वोक्तवर्णनरूपेण विधालक्षणवन्तो लक्षणत्रयविराजमानाः । भावार्थस्त्वयम्- सिद्धान्ते सर्वेऽर्थाः विविधप्रकारेण विलक्षणाः कध्यन्ते । लक्षणत्रयं तूत्पादव्ययध्रौव्यात्मक तच्छीलं तत्स्वभावं च भापितमिति । भव्या भवाय अर्हा भव्यास्तान अर्थान पडपि लक्षण- प्रयभावनया सम्यग्बुद्ध्या परिभाव्य पर्यालोच्याहत्क्रमाम्भोजयुगं जिनधरणपङ्कजद्वयं अय. न्तामाद्रियन्तामिति । तज्ज्ञाने सति तच्चरणमुक्त्युत्पत्तिफलं लक्षीकृतम् । भोजेति सेपेण प्रन्थकर्तुनर्नाम सङ्केतश्चेति । यथा च ये पुरुषाखिलक्षणभावनया विस्ताररुचिविशेपेण सम्य- क्त्वमवगाह्यान्तरङ्गसुखानुभवामिलापपरा भवन्तु । पुनस्तथैव सम्यक्त्वपूर्वकमुक्तिप्राप्तिः सुलभेदि ध्येयम् ॥ २९॥ इति श्रीकृतिमोजसागरविनिर्मिवायां द्रव्यानुयोगतर्कणायां सप्तनयमितपड्- द्रव्याणां त्रिलक्षणवर्णनाख्यो नवमोऽध्यायः परिकल्पितः ॥९॥ व्याख्यार्थः-धर्म, अधर्म, आकाश, काल, पुद्गल और जीव यह पट् पदार्थ जो कि- निरन्तर परिणामके भागी तथा शक्तियुक्त हैं, उनको यथार्थ तत्त्वोंके वेत्ता (जाननेवाले ) तीर्थंकरोंने सिद्धान्तमें पूर्वोक्त उत्पाद, व्यय और प्रौव्यस्वरूप तीन लक्षणोंसे विराजमान वर्णन किये हैं । भावार्थ यह कि जैनसिद्धांतमें सम्पूर्ण पदार्थ अनेक प्रकारसे त्रिविध लक्षणसहित कहे जाते हैं; और लक्षणत्रय यह है; जैसे उत्पाद, व्यय और धौव्य अर्थात् संपूर्ण पदार्थ उत्पाद, व्यय, धौव्यरूप शील अथवा स्वभावके धारक हैं; ऐसा कहा गया है । इस हेतुसे हे भवके योग्य जीवो ? उन पट् पदार्थोंको लक्षणत्रयकी भावनासे सम्यक प्रकार बुद्धिद्वारा जानकर अर्थात् पूर्णरीतिसे विचार करके श्रीअर्हत् भगवान्के चरण कमलयुगलका सेवन करो अर्थात् आदर करो । तात्पर्य यह कि-पट् पदार्थोंका ज्ञान होनेपर श्री जिनदेवके चरणोंमें भक्तिका उत्पन्न होना यही मुख्य फल है । और लोकमें जो "क्रमांभोज' यह पद है। उसमें श्लेषसे "भोज" इस प्रकार ग्रंधक के नामका भी संकेत है । और जो भव्य जीव है; वह इस प्रकार पदार्थमें विलक्षणताके विचारसे उत्पन्न हुई जो विस्तारीच उससे सम्यक्त्वका अवगाहन करके अंतरंगमुय( मोक्षसुख ) अनुमवकी अभिलाषामें तत्पर होवे और उनको इसी प्रकारसे पहले सम्यक्त्व होकर तत्पश्चात् मुक्तिकी प्राति सुगम होगी ऐसा विचार करना चाहिये ॥ २९ ॥ इति श्रीआचार्योपाधिधारक पं० टाकुरप्रसादविरचितमापाटीकासमलढतायां द्रव्यानुयोगतर्कणाव्याख्यायां नबमोऽध्यायः ॥ ९॥ । ।

. । १६४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् अथ दशमाध्याये द्रव्यगुणपर्यायाणां भेदान् वितत्य विवृणोति । अब इस दशम (१०) अध्यायमें द्रव्य गुण तथा पर्यायोंके भेदोंको पृथक पृथक् करके . विवरण करते हैं। सूत्रम् । भिन्नाभिन्नत्रिधाद्यर्थं निरूप्याथ स्वरूपतः । द्रव्यादीनि प्रवक्ष्यामि भेदानागमसंमतान् ॥१॥ना सूत्रभावार्थ:-कथंचित् भिन्न, कथंचित् अभिन्न तथा त्रिविध लक्षणयुक्त द्रव्य- गुण पर्यायादि अर्थका निरूपण करके अनन्तर सिद्धान्तके संमत द्रव्यादिके भेदोंको इस दशम (१०) अध्यायमें कहंगा ॥ १ ॥ व्याख्यां । द्रव्यं गुणाः पर्याया भिन्नाः पुनरभिन्नाः पुनस्त्रिविधाः पुनखिलक्षणवन्तः अर्थाः । भिन्नान्यभिन्नानि च विधा पत्रिलक्षणानि चेति द्वन्द्वः । आदिशब्दाद् भवभावादीनि तेपामर्थः प्रतिपादनं तद्भिन्नाभिन्नत्रिधाद्यर्थ निरूप्य कथयित्वा । अथेति । पुनः स्वरूपतः स्वरसात् द्रव्यादीनी भेदानागमसंमतान्सिद्धान्तोक्तान्प्रवक्ष्यामि कथयिष्ये ॥ १॥ व्याख्यार्थ:- :-द्रव्य गुण तथा पर्याय भिन्न भी हैं; और अभिन्न भी है; और त्रिविध लक्षणयुक्त हैं । भिन्न अभिन्न और त्रिधा इनका यहां द्वंद्व समास है; और "विधाभादि" यहां आदि शब्दसे भव, भावआदिका ग्रहण है; उनका जो अर्थ अर्थात् प्रतिपादन सो भिन्नाभिन्नत्रिधाद्यर्थ है; उसको अर्थात् भिन्न अभिन्न तथा विधालक्षणयुक्त द्रव्य. गुण, पर्याय, भव और भावआदिके अर्थको वर्णन करके तदनन्तर शास्त्रमें कहे हुए जो स्वभावसे द्रव्यआदिके भेद हैं; उनको कहूंगा ॥ १ ॥ सूत्रम् । सम्यक्त्वं हि दयादानक्रियामूलं प्रकीर्तितम् । विना तत्संचरन्धर्म जात्यन्ध इव खिद्यति ॥ २॥ सूत्रभावार्थ: -इन द्रव्यादिके ज्ञानसे जो सम्यक्त्व होता है; वह दया 'दान और क्रिया इन सबका मूल कारण कहा गया है । इस सम्यग्दर्शनके विना धर्मरूप मार्गमें प्रवृत्त हुआ पुरुष जन्मांधके सदृश दुःखको पाता है ॥ २॥ व्याख्या । अथैतेषां विज्ञानानिश्चितं सम्यक्त्वं प्रकीर्तितम् । कीदृशं दया जीवरक्षा, 'दानमभयादि पञ्चधा, क्रिया कर्तव्यानि एता मूलं यस्य तत् । यदुक्तं-जीवाइ, नवपइत्थे जो जाणइ तस्य होइ सम्मत्तं" पुनार्वशिकायां "दाणाइआ ओ एमं मि घेवसहलाओहुंति' किरियाओ। एयाओ विहु जम्हा मोक्त्वफलाओ पराओ अण ॥ १॥ इति वचनान् । तत्स- म्यक्त्वं विना धर्म धर्ममार्गे संचरन् प्रवर्तन खिद्यति क्लिश्यति क इव जात्यन्ध इव । यथा जात्यन्धो जन्मान्धः पुमान्मार्गे पथि संचरन् खिद्यति गर्चापातादिदुःखमनुभवति तथैव सम्य- क्त्वहीनोऽपि भवकूपनिपाती स्यात् । ततः सम्यक्त्वं विना येऽगीतास्तथागीतार्थनिश्रिताः स्वस्वाभिनिवेशेन हठमार्गे पतिताः सन्तः सर्व एते जात्यन्धमाया ज्ञातव्याः । भव्यं ज्ञात्वा . .

. द्रव्यानुयोगतर्कणा। फुर्वन्ति तदपि तेपां निष्फलमेव भवेन् । उक्तं च "सुंदर बुद्धी इकयं बहुयं पिण मुंदरं होई" ततो द्रव्यगुणपर्यायभेदपरिज्ञानाच्छुद्धं सम्यक्त्वं आदर्वघ्यम् ॥२॥ व्याख्यार्थ:-इन द्रव्यआदिके ज्ञानसे निश्चित सम्यक्त्व कहागया है, वह सम्यक्त्व कैसा है; सो कहते हैं; समस्त जीवोंकी रक्षारूप दया, अभयमादि भेदसे पांच प्रकारका दान, और क्रिया अर्थात् शास्त्रोक कर्त्तव्य यह जिसके मूल हैं । इस विषयमें अन्यत्र कहा भी है; कि-"जो जीवआदि नव ९ पदार्थोंको जानता है; उसीके सम्य- ग्दर्शन होता है । पुनः विशिकानामक ग्रंथमें ऐसा वचन है; कि-एक सम्यक्त्वके होने- पर दानादिक समस्त क्रिया सफल होती हैं; और इसीसे यह मोक्षफला अर्थात् मोक्ष- रूप फलको देनेवाली हैं; और सम्यक्त्वके विना जो क्रिया हैं; वह मोक्षरूप फलको देने- वाली नहीं हैं । इसलिये सम्यक्त्वके विना धर्मरूप मार्गमें प्रवृत्तहुआ मनुष्य ऐसे दुःखोंको पाता है; जैसे मार्गमें चलता हुआ जन्मान्ध । तात्पर्य यह कि-जैसे जन्मसे ही अंधा जीव मार्गमें चलताहुआ खड्डमें गिरनेआदिरूप दुःखका अनुभवन करता है; वैसे ही सम्यक्त्वसे जो हीन है; वह भी संसाररूपी कूपमें गिरनेवाला होता है। इस हेतुसे सम्यक्त्वके बिना जो अगीतार्थ है; अथवा अगीतार्थनिश्रित हैं; वह सब अपने अपने दुराग्रहके क्शसे हठरूप मार्ग में गीरे हुए हैं। इसलिये इन सबोंको जन्मान्धोंके सदृश समझने चाहिये । और वह लोग जिस कर्म धर्मको आच्छा समझके करते है; वह भी उनके निष्फल ही होता है । ऐसा कहा भी है "सुन्दर बुद्धिसे अर्थात् उत्तम परि णामोंसे कियाहुआ उत्तम काम भी सम्यक्त्वके विना सुन्दर नहीं होता" इसलिये द्रव्यगुण तथा पर्यायोंके जाननेसे जो शुद्ध सम्यक्त्व होता है। उसका आदर करना चाहिये अर्थात् द्रव्यादिके ज्ञानसे सम्यक्त्वको शुद्ध करके उसका ग्रहण करना चाहिये ॥२॥ अथ नामतः पग्णां द्रव्याणां कीर्तनमाह । अब नामसे समाननीय पट् द्रव्योंका कथन करते हैं। सूत्रम् । धर्माधौ नभाकालौ पुद्गलो जीव इत्यमी । अर्थाः पंह समये ख्याता जिनैराद्यन्तवर्जिताः ॥३॥ सूत्रभावार्थ:-धर्म, अधर्म, आकाश, काल, पुद्गल और जीव इस प्रकार इन भादि अन्तवर्जित छे द्रव्योंको श्रीजिनेन्द्रोंने जिनागममे कहा है ॥ ३ ॥ व्याख्या । धर्मश्चाधर्मच धर्माधर्मी धर्मास्तिकायाधर्मास्तिकायौ । 'तथा नभःकाली नभश्च कालच नभःकालावामाशासिकायकालौ । पुद्गलः पुद्गलद्रव्यम्, जीवो जीवद्र. व्यम्, इत्यमी पद । न न्यूना नाधिकाः । अर्थाः पदार्थाः समये श्रीजिनप्रणीताग़मे ख्याताः फयिताः श्रीमिनः श्रीवीतरागः । कीदृशा आद्यन्तवर्जिता अनाद्यनिधना इयर्थः । एतेपो पण्णा फालं पयित्वा पञ्चास्तिकायाः अस्तयः प्रदेशासै फायन्ते शब्दायन्त इति पश्चा- . रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् स्तिकायाः । कालस्यास्तिकायात्वं कथं नास्ति तत्राह । "अपएसिए काले" कालद्रव्यस्य प्रदेशसंघातो न विद्यते, यतः-एकः समयोऽन्यस्मात्समयान्न प्रलिप्यत एवमन्येपामपि । तथा हि "धर्माधर्माकाशादावकैकमतः परं त्रिकमनन्तम् । कालं विनास्तिकाया जीवमृते चाप्यकर्वणि ॥१॥ इत्यादि साधर्म्यवैधादिभेदपरिज्ञापनाय प्रशमरत्यादिप्रन्था विलो- कनीयाः । पुनरेतेपां भेदाः 'परिणामजीवमुत्ता सपएसाइयारित्तकिरियाय । निश्चं कारण- कत्ता सब्बगदइयर अपदेशा ॥१॥ ३ ॥ व्याख्यार्थः-धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, काल, पुदगलद्रव्य और जीवद्रुव्य यह पद पदार्थ न इनसे न्यून (कम ) और न अधिक श्रीवीतरागदेवेने अथवा आचार्योंने श्रीजिनविरचित आगममें कहे हैं । फैसे हैं; यह छ पदार्थ ? कि-आदि अन्त शून्य हैं; अर्थात् न तो कभी इनकी आदि हुई और न कभी इनका अन्त होगा। इन छहों पदार्थोमेसे कालको छोड़कर वाकीके पांच अस्तिकाय हैं । अति प्रदेशका नाम है; अतः प्रदेशोंसे जो कायन्ते "कहे जाय" यह अस्तिकाय कहलाते हैं । भव कालके अस्तिकायता क्यों नहीं है। इस विषयमें कहते है कि-काल अप्रदेशी है; अर्थात् कालद्रव्यके प्रदेशोंका संघात नहीं है, क्योंकि-एक समय दूसरे समयसे भेदको प्राप्त नही होता है। इस प्रकार अन्य घटिकाआदिका भी भेद नहीं हो सकता है। और धर्म, अधर्म, तथा आकाश यह तीनो एक एक हैं; और इनके आगेके तीन अर्थात् काल पुदगल और जीव ये तीनों द्रव्य अनन्त हैं। तथा कालको छोड़के सब अस्तिकाय हैं; और जीवके सिवाय सब अकर्ता हैं । इत्यादि साधर्म्य, वैधर्म्यआदि भेदोंके जाननेके लिये प्रशमरतिभादि ग्रन्थ देखने चाहिये । और इन छहों द्रव्योंके समस्त भेद यह हैं. परिणामित्व, जीयत्त्व, मूर्चस्व, सप्रदेशत्व, एकत्य, क्षेत्रत्व क्रियावत्त्व नित्यत्व कारण- वत्व कर्तृत्व सर्वगतत्व असर्वतत्त्व और प्रदेशत्व । इन भेदोंसे साधर्म्य वैधर्म्यका ज्ञान करना चाहिये अर्थात् जो धर्म जीवमे और पुदगलमें दोनोंमें एकमे हों उनमे तो जीव पुद्गलके साधर्म्य है; और जो भिन्न २ हों उनमें वैधर्म्य है; ऐसे सबमें समझना ॥ ३ ॥ अथ धर्मास्तिकायस्य लक्षणमाह । अब धर्मास्तिकायका लक्षण कहते हैं सूत्रम् । परिणामी गतेधो भवेत्पुद्गलजीवयोः । अपेक्षाकारणाल्लोके मीनस्येव जलं सदा ॥ ४॥ सूत्रभावार्थ:-लोकमें अपेक्षा कारण होनेसे पुद्गल तथा जीवके गमनका परि- णामी धर्मास्तिकाय है; जैसे मीनके संदा गतिपरिणामी जल है ॥ ४ ॥ व्याख्या । गर्गमनस्य परिणामी अर्थादतिपरिणामी पुद्गलजीवयोधर्मो धर्मास्तिकायो भवेत् । कस्मालोके चतुर्दशरज्वात्मकाकाशखण्डे अपेक्षाकारणात् परिणामव्यापाररहि- तात्, अधिकरणरूपौदासीन्यहेतोश्च तत्र दृष्टान्तमाह । मीनस्येव जलं सदति सदा निर. ।

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द्रव्यानुयोगतर्कणा।
१६७
न्वरं जलं यथा मीनस्य मत्स्यस्य गतिपरिणामि अस्ति अपेक्षाकारणात् । गमनागमनादि-
क्रियापरिणतस्य मत्स्यस्य जलं अपेक्षाकारणमस्ति तथैव धर्मद्रव्यमपिज्ञेयम् । निष्कर्पस्त्वयम्-
स्थले झपक्रियाव्याकुलतया चेष्टा हेत्विच्छाभावादेव न भवति । न तु जलाभावादिति गत्य-
पेक्षाकारणे मानाभाव इति चेन्न । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां लोकसिद्धव्यवहारादेवः तद्धेतुत्वसि-
धेरन्यथान्त्यकारणेनेतराखिलकारणासिद्धिप्रसंगादिति दिक् ॥ ४॥
व्याख्यार्थ:-जीव तथा पुद्गलके गति अर्थात् गमनमें परिणामी धर्मास्तिकाय द्रव्य होता
है; क्योंकि वह धर्म द्रव्य लोकमें अर्थात् चतुर्दश (चोदह १४) रज्जुप्रमाण जो आकाशखंड
है उसमें यह धर्म द्रव्य अपेक्षा कारण है; और गमनरूप अथवा गमनकरानेरूप व्यापारसे
रहित अधिकरणस्वरूप उदासीन कारण है। इस विषयमें दृष्टान्त कहते हैं । जैसे जल मीन
(मत्स्य )की गतिमें सदा परिणामी है क्योंकी-वह जल अपेक्षा कारण है; अर्थात् गमन
तथा आगमनआदि क्रियामें परिणत मत्स्यके जल अपेक्षा . कारण है । उसी प्रकार
गमनमें परिणत जीव पुदगलके धर्मद्रव्य भी अपेक्षा है; ऐसा जानना चाहिये । भावार्थ
तो यह है कि वह मीन स्थलमें अपनी गमनक्रियामें व्याकुलित होता है; और उस-
व्याकुलतासे जो गमनकी चेष्टाकी कारणभूत इच्छा है; वह इच्छा ही नहीं होती
इसीसे वह मीन स्थलमें गमन नहीं करता है । वहां कोई शंका करता है; कि-मीन-
स्थलमें जो गमन नहीं करता है, सो जलके अभावसे नहीं करता है; और तुम जो
जलको गतिमें अपेक्षा कारण मानते हो इसमे कोई प्रमाण नहीं है ? उसका समाधान
यह है कि यह ठीक नहीं क्योंकि-अन्वय और व्यतिरेकसे जो लोकमें प्रसिद्ध व्यवहार
है; उसीसे उस जलमें गमनकी कारणता सिद्ध होती है। अर्थात् जिसके होनेपर कार्य.
हो और न होनेपर न हो यही अन्वयव्यतिरेक है; और जिसमें अन्वयव्यतिरेक घट जाय
वही लोकमें कारण माना जाता है। इस प्रसिद्ध व्यवहारसे जल भी मीनकी गतिमें
कारण है; क्योंकि-जलके होनेपर मीन गमन करता है; और जलके अभावमें नहीं
इसलिये जल गमनमें कारण है । यदि ऐसा न मानोगे तो अन्तके कारणसे अन्य सब
कारणोंकी असिद्धिका प्रसंग होगा । यह संक्षेपसे धर्मद्रव्यका लक्षण हुआ ॥ ४ ॥
अथाधर्मास्तिकायस्य लक्षणं कथयन्नह ।
अब अधर्मास्तिकायका लक्षण कहते हैं ।
सूत्रम् । स्थितिहेतुरधर्मः स्यात्परिणामी तयोः स्थितः ।
सर्वसाधारणो धर्मों गत्यादिव्ययोर्दयोः ॥५॥
सूत्रभावार्थ:-जीव तथा पुद्गलकी स्थितिका परिणामी और स्थितिका हेतु
अधर्मद्रव्य है। और यह गति तथा स्थितिरूप अखिल साधारण धर्म इन धर्म अधर्म-
रूप दो ही द्रव्योंमें है ॥ ५॥

. व्यानुयोगतर्कणा । व्याख्यार्थ:--स्वभावसे ऊर्ध्वगामी सिद्ध जीवका यदि धर्मास्तिकाय द्रव्यके प्रतिबन्ध विना अनन्त अर्थात् अतट (अपार) तथा लोक और अलोक दोनोंमें व्याप्त ऐसे '. आकाशमें परिभ्रमण जो है सो नहीं रुक सक्ता है । और यदि गमनमें धर्मास्तिकाय- द्रव्यका प्रतिबन्धकत्व न हो तो एक समयमें लोकके अग्रभागमें जानेवाले और जैसे लोकमें गमन किया उसी प्रकार अलोकमें गमन करनेवाले तथा स्वभावसे ऊर्ध्वगमन- कारक ऐसे सिद्धोंके ऊर्ध्वगमनरूप जो गमन है; उसकी निवृत्ति ( रहितता ) अबतक भी न हो क्योंकि-अनन्तलोकांशप्रमाण अलोकाकाश है, अर्थात् लोकसे अनन्त गुणा अलोक है । "लोकाकाश गतिमें हेतु है; इसलिये अलोकमें सिद्धोंका गमन नहीं है" ऐसा नहीं कह सकते क्योंकि-धर्मास्तिकायके विना लोकाकाशकी व्यवस्था ही नहीं हो सकती है। क्योंकि-धर्मास्तिकायविशिष्ट (सहित) जो आकाश है; वह ही लोका- काश है; और उस लोकाकाशको ही यदि गमनका कारण मानें तो घट आदिमे भी दण्डविशिष्ट जो आकाश है; वह हेतु हो जावे । इसलिये लोकाकाशको गतिमें कारण मानना यह पक्ष अकिंचित्कर ( अयुक्त) है। और भी अन्यस्वभावयुक्तत्वरूपसे जो कल्पित आकाश है; उसके अन्य स्वभावकी कल्पना करना यह भी अयुक्त है; अर्थात् गतिहेतुता धर्मद्रव्यका खभाव है; उस गतिहेतुतासे युक्त जो आकाश उसकी लोकाकाश यह कल्पना की गई है। तब उस कल्पित लोकाकाशमें धर्मद्रव्यके स्वभा- वकी कल्पना अयोग्य ही है । इसलिये धर्मास्तिकायको गतिका हेतु अवश्य प्रमाणमें लाना चाहिये अर्थात् मानना चाहिये । और "धर्मद्रव्य पुद्गल और जीवोंको गमन करानेरूप स्वभावका धारक है" इत्यादि कहा हुआ जो सिद्धान्तका प्रमाण उसका भी यहां विचार करना चाहिये ॥६॥ अथ धर्मास्तिकाये प्रमाणमाह । अब अधर्मास्तिकायद्गव्यके विषयमें प्रमाण कहते है। सूत्रम् । स्थितिहेतुर्यदा धर्मो नोच्यते फापि चेद्वयोः । तदा नित्या स्थितिः स्थाने कुत्रापि न गतिर्भवेत् ॥ ७॥ सूत्रभावार्य:-अब यदि जीव पुद्गलकी कही भी स्थितिका हेतुभूत अधर्म द्रव्य नहीं कहोगे तो पुद्गल और जीवकी नित्य स्थिति ही होगी कहीं भी उनकी गति नहीं हो सकेगी ॥७॥ व्याख्या । यदा द्वयोः पुद्गलजीवयोः कापि स्थितिहेतुरवस्थानकारणमधर्मास्तिकायो नो- च्यते तदा स्थाने सर्वत्र स्थाने नियता नियामका स्थितिरेव स्यात्, न कुत्रापि गविर्भवे. दिति । यदि च सर्वजीवपुद्गलसाधारणस्थितिहेतुत्वमधर्मद्रव्यं न कथ्य। किन्तु धर्मा- . F २२ १७० रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् स्तिकायाभावप्रयुक्तगत्समावेनालोके स्थित्यभाव एवं निगदतामलोकाकाशेऽपि कस्मिंश्चिदपि स्थानके गति विना पुद्गलजीवद्रव्ययोर्नित्यस्थितिः प्रापयितव्या स्यात् । इत्थमिव द्वितीयं गतिस्थितिस्वातश्यपर्यायरूपं चास्ति । यथा गुरुत्वलघुत्वयोरेकस्यैकाभावरूपाद्विशेपमाहक- प्रमाणात् । तस्मात्तथेति । ततः कार्यभेदेऽपेक्षाकारणद्रव्यभेदोऽवश्यं मन्तव्यः । धर्मास्तिका- याभावप्रयुक्तस्थित्यभावेन गतिभावकथनाद्धर्मास्तिकायस्थाप्यपलापो भवेत् , निरन्तरगति- स्वभावेन वा द्रव्यमकर्तु वा शक्यं तहि निरन्तरस्थितिस्वभावेनापि कथं क्रियते । तस्माच्छ्री- जिनवाणीनिष्कर्षमासाद्य धर्मास्तिकायाधर्मास्तिकायेति द्रव्यद्वयमसंकीर्णस्वभावेन भावनी. यमिति ॥७॥ व्याख्यार्थ:-~-यदि जीव तथा पुद्गलद्रव्यको कहीं भी स्थितिका कारण अधर्म द्रव्य नहीं मानोगे तो सब जगह नियतरूपसे जीय पुद्गलकी स्थिति ही सिद्ध होगी। कहीं भी गति न होगी तात्पर्य यह कि-यदि सब जीव तथा गलके प्रति साधारण रूपसे स्थितिका हेतुभूत अधर्मद्रव्यको नहीं कहते हो किन्तु धर्मास्तिकायके अभाव. प्रयुक्त जो गतिका अभाव है; उसीसे भलोकमें स्थितिका अभाव है; ऐसा कहते हो तो इस प्रकार कहनेवाले तुमारे मतमें अलोकाकाशमें भी किसी भी स्थानमें गतिके विना पुद्गल और जीवद्रव्यकी नित्य स्थिति प्राप्त करनी होगी यदि अलोकमें धर्म द्रव्य के न होनेसे गति नहीं होती ऐसा कहो तब तो अन्वय व्यतिरेकसे जैसे धर्म- द्रव्यको गतिमें कारणता है। ऐसे ही स्थितिमें अधर्मद्रव्यको कारण मानना पडेगा इस प्रकार, गतिकी स्थिति एक स्वतन पर्याय है; और उसका कारण अधर्मद्रव्य है; न कि- गतिका अभाव स्थिति और धर्मका अभाव अधर्म है; जैसे विशेषसत्ताग्राहक प्रमाण होनेसे गुरुत्व लघुत्वमें एकका एक अमावरूप है; ऐसे ही धर्म अधर्म भी भावरूप हैं। क्योंकि-एक(धर्म)का कार्य गति; और दूसरे( अधर्म)का कार्य स्थिति है; ‘तव कार्यके भेदसे अपेक्षाकारण द्रव्यका भी भेद अवश्य मंतव्य है; और धर्मास्तिकायके. अभावप्रयुकस्थितिके अभावसे गतिभावका कथन होनेसे धर्मास्तिकाय द्रव्यका भी अपलाप (अभाव) हो जायगा यदि यह कहो कि-निरन्तर गतिस्वभावसे दव्य (द्वयणुकादिद्रव्य) कैसे कर सक्ते हैं; तो निरन्तर स्थितिशीलतासे भी द्रव्यकी सिद्धि कैसे कर सक्ते है क्योंकि-जीव पुद्गलों में गति क्रिया विना कुछ भी नहीं होसक्ता इस कारणसे श्रीजिनदेवकी बाणीसे तत्त्वको ग्रहण करके धर्मास्तिकाय तथा अधर्मास्तिकाय यह दोनों द्रव्य भसंकीर्ण( भिन्नभिन्न )खमाव हैं; ऐसी भावना अवश्य करनी चाहिये॥७॥ अथाकाशद्रव्यस्य लक्षणमाविष्करोति। अब आकाशद्रव्यके लक्षणको प्रकट करते हैं। सूत्रम् । यो दत्ते सर्वद्रव्याणां साधारणावगाहनम् । लोकालोकमकारेण द्रव्याफाशः स उच्यते ॥ ८॥ .

द्रव्यानुयोगतर्कणा। सूग्रभावार्थ:-जो साधारणरूपसे सब द्रव्योंको अवगाहन कार्यात् रहनेको देता है। वह भाकाशद्रव्य है और लोक तथा अलोक इन दो प्रकारोंसे कहा जाता है।८॥ व्याख्या । य आकाशास्तिकायः सर्वव्याणां साधारणावगाहनं सामान्यावकाशं दचे. स द्रव्याकाशो लोकालोकप्रकारेणोच्यत इति । यतः सर्वद्रव्याणां यः सर्वदा साधारणा- बकाशदाता सोऽनुगत एक आकाशास्तिकायः फथितः सर्वापार इति) यया पाक्षिणां गगनमिवति व्यवहारनयदेशभेदेन भवेत् । तद्देशीयानुगत आकाश एव पर्यवसन्नः स्यात् । तथा प तत्तद्देशोर्श्वभागावच्छिन्नमूर्तीभावादिना वव्यवहारोपपत्तिरिति वर्धमानाशुकं नान- पद्यम् । तस्याभावादिनिधत्वेनानुभूयमानद्रव्याधारांशापलापप्रसंगात्, वावद्गतिसंघानेऽपि लोकव्यवहारेणाकाशदेशप्रतिसंधयोक्तव्यवहाराच । आकाशस्तु लोकाकाशादिभेदेन द्विधोकः । ल्ला, यतः सूत्रम् "दुविहे आगासे पण लोयागासेय अलोयागासेय" एतदद्वयम् ॥ ८॥ व्याख्यार्थ:-जो सब द्रव्योंको साधारण( सामान्य रूपसे अवकाश देता है; वह माकाशास्तिकाय लोक और मलोक इन भेदोंसे आकाशद्रव्य कहलाता है। क्योंकि- जो सब द्रव्योंको सदा अवकाश देनेवाला है। वह अवकाशदातृतारूप एक ही आका- शास्तिकाय सर्वाधार कहा गया है । जैसे कि-पक्षियोंका आधार गगन (माकाश) है; यद्यपि यह व्यवहार नयदेशभेदसे होता है। परन्तु उन २ देशोंमें अनुगत जो एक भाकाश है; उसीकी इस व्यवहारसे सिद्धि होती है । और उन उन मदेशोंमें ऊर्द्रदेशा- वच्छेदसे मूर्तिमत्ताके अभावआदिसे अवकाशदातृत्वरूपसे आकाशके व्यवहारकी उप.. पत्ति होती है। ऐसा जो वर्धमानआदिका कथन है; सो अयुक्त या दुष्ट नहीं है। क्योंकि- आकाश अभाव( शून्य )रूपताकी प्रतीति है; तया सर्वदा अनुभूयमान जो संपूर्ण द्रव्योंकी- भाधारताका भंश है उसके अपलाप (नाश ) होनेका प्रसंग है; और जहांतक गतिका संधान है; वहांतक भी लोकव्यवहारसे आकाशदेशप्रतिसंधयोक्त व्यवहार है । और आकाश लोकाकाश, और अलोकाकाश इन भेदोंसे दो प्रकारका कहा गया है क्योंकि-"आकाश दो प्रकारके कहे गये हैं; एक ठोकाकाश और दूसरा अलौकाकाश" ऐसा सूत्र है ॥ ८॥ अथैनमेवार्थ मीमांसपनाह । अब इसी मका विचार करते हुये कहते हैं। सूत्रम् ।' धर्मादिसंयुतो लोको ऽलोकस्तेपां पियोगतः। निरवधिः स्वयं तस्यावधित्वं तु निरर्थकम् ।। ९ ।। सूत्रभावार्थ:-धर्मादि द्रव्योसहित जो भाकाश है; वह लोकाकाश है; और जो धर्मादि द्रव्योंसे अन्य है। वह भटोकाकारा है । और वह स्वयं भवधिरहित है। उसकी । माधिका मानना निरर्थक ही है ॥९॥ .

. ९७२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् व्याख्या। धर्मास्तिकायादिसंयुक्त आकाशो लोकस्तदितरस्वलोकः । स च पुनर्निरव- धिरपारोऽलोकतस्यालोकस्य स्वयमात्मना अवधित्वमन्तर्गडु इति । कश्चिदाहान यथा लो- कस पार्श्वेऽलोकस्यापि पारोऽस्ति तथैवाऽपि द्वितीयतटे पारोभविष्यतीति ब्रुवाणमुत्तरयति। लोकस्तु भावरूपोऽस्ति तस्यावधित्वं घटते परन्त्यग्रेऽलोकस्य केवलमभावात्मकस्यावधित्वं कथं कल्पते शशशृङ्गवन् । यथा असदविद्यमानं शशशृङ्गं न कुत्रापि निरीक्ष्यमाणं विद्यमानव- दाभाति, तथैवैवस्याप्यलोकस्य अविद्यमानस्यावधित्वं न घटामाटीकवे । अथ च भावरूपा- त्मकत्वमङ्गीक्रियते तदा तु पडतिरिक्तमन्यद्रव्यं नास्तीति व्यवहारादाकाशदेशरूपस्य तु तद्- न्तवं कथयतां बुद्ध्याघातो जायते । तस्मादलोकाकाशस्त्वनन्तमेव मन्तव्य इति । आकाशो यथा सान्तः शंसितो धर्माधर्मानुभावात् तस्य भावस्तदभावात्तदभावः । अलोकाकाशोऽपि सान्तो धर्माधर्मानुभावी भवन्नतिरिक्तद्रव्यत्वमापत्स्यते । तस्माद्यथोक्तमेव न्याय्यम् । यावता आकाशेन धर्माधौं व्याप्य स्थिती तावता तत्परिणामशालिना आकाशेनापि भवितव्यम् । तयोरभावात्तस्याप्यभावः सुपरिशीलनीय इति ।। ९॥ व्याख्यार्थ:-धर्मास्तिकायआदि द्रव्योंसे संयुक्त जो आकाश है; वह लोकाकाश है; और उन द्रव्योंसे जो असंयुक्त है; वह अलोकाकाश है; और वह अलोक निरवधि अर्थात् अपार (अन्तरहित) है; क्योंकि-उस अलोकके अपने खरूपसे अवधित्व कहना यह निरर्थक है; अर्थात् अलोकाकाश अवधिसहित है; यह कहना व्यर्थ है । अब यहां कोई शंका करता है; कि:-"जैसे लोकाकाशके पासमें भलोकाकाशका पार होता है। ऐसे ही आगे भी अर्थात् दूसरे तटमें भी उसका पार अवश्य होगा" ? इस प्रकारकी शंका करनेवालेको उत्तर देते हुये कहते हैं; कि-लोकाकाश तो धर्मादिद्रव्योंका अधिकरण होनेसे भावरूप है; इसवास्ते उसका तो अन्त - घटित होता है; परन्तु उसके आगे धर्मादि द्रव्योंसे शून्य केवल अभावस्वरूप जो सुस्सेके सींगके समान अलोकाकाश है; उसके अवधिसहितता कैसे कल्पित हो सकती है । जैसे अविद्यमान जो सुस्सेका सींग है; उसको देखो तो वह कहीं भी विद्यमान पदार्थके समान देखनेमें नहीं आता है। ऐसे ही अविद्यमान जो अलोक है; इसके भी मर्यादाका कथन करना है; सो संगत नहीं है । और यदि इस अलोकाकाशको भावस्वरूप अङ्गीकार करो तो छ व्यसे अतिरिक्त (सिवाय ) कोई अन्य द्रव्य नहीं है; इस व्यवहारसे आकाशदेशस्वरूप जो अलोकाकाश है; उसके सान्तता कहनेवालोंकी वृद्धिका धात होता है । इसलिये अलोकाकाशको तो अनन्त (अपार ) ही मानना चाहिये । आकाश अर्थात् लोकाका- शको जो सान्त- कहा है; सो धर्म और अधर्मद्रव्यको सामर्थ्यसे कहा गया है और इसीसे वह भावरूप है; और धर्मादिके अभावसे अलोकाकाश अमावरूप है । यदि अलोकाकाशको भी सान्त मानोगे तो वह अलोकाकाश धर्म अधर्मका अनुभावी (सामर्थ्ययुक्त) होताहुआ छ द्रव्योंसे मिन्न द्रव्यताको प्राप्त हो जायगा । इसलिये ।

द्रव्यानुयोगतर्कणा। अलोकाकाशके विषयमें पूर्वकथित जो अवधिरहितता (अनन्तपना) है; सो ही युक्ति- युक्त है । तात्पर्य यह है; कि-जितने आकाशदेशमें धर्म अधर्म व्याप्त होकर स्थित हैं; उतने ही परिमाणसहित आकाशको भी होना चाहिये और जहां धर्म अधर्म इन दोनोंका अभाव है; वहां आकाशका भी अभाव ही समझना चाहिये अर्थात् अलोका- काश अनन्त है न कि सान्त ॥ ९॥ अथ कालभेदानाह। अव कालके भेदोंको कहते है। सूत्रम् । वर्तनालक्षणः कालः पर्यवद्रव्यमिष्यते । द्रव्यभेदात्तदानन्त्यं सूत्रे ख्यातं सविस्तरम् ।। १० ।। सूनभावार्थ:-वर्तनालक्षण जो काल है; वह पर्यवद्रव्य माना गया है। और द्रव्यके भेदसे उस कालका अनन्तपना उत्तराध्ययनसूत्रमें विस्तारसे कहा गया है ॥ १० ॥ व्याख्या । कालस्तु परमार्थतो द्रव्यं नास्तीति शङ्कमानं निराकुरुते । वर्त्तनेति-सर्वेषां द्रव्याणां वर्तनालक्षणो नवीनजीर्णकरणलक्षणः कालः पर्यायव्यं इप्यते । तत्कालपर्याये. प्वनादिकालीनद्रव्योपचारमनुसृत्य कालद्रव्यमुच्यते । अत एव पर्यायेण द्रव्यभेदात्तस्य कालद्रव्यस्यानन्त्यम् । अनन्तकालद्रव्यभावनं सूत्रे उत्तराध्ययने सविस्तरं ख्यातम्, तथा च तत्सूत्रम्--"धम्मो अधम्मो आगासं व्यमिक्किकमाहियं । अणंवाणि य दुव्बाणि कालो . पुग्गल जंतवो"। १ । एतदुपजीव्यान्यत्राप्युक्तम् । धर्माधर्माकाशादेकैकमतः परं त्रिकम- न्तन्तमिति । ततो जीवद्रव्यमप्यनन्तं तस्य च वर्तमानपर्यायस्वार्थ कालद्रव्यमथा नन्तमि- त्युक्तमागमे । विस्तरस्तु ततोऽवधारणीयः ॥ १०॥ व्याख्यार्थ:--परमार्थमें कालद्रव्य नहीं है? ऐसी शंका करनेवालेको "वर्तना" इत्यादि सूत्रसे निराकृत करते हैं । सब द्रव्योंका वर्तनालक्षण काल है; अर्थात् द्रव्योंको नवीन (नये) और जीर्ण (पुराने ) करनेवाला जो है; वही काल है; और यह पर्यायव्य माना गया है। उन कालके पर्यायोंमें अनादि कालसे द्रव्यके औपचरिक व्यवहारका अनुसरण करके "कालद्रव्य" यह कहा जाता है । इसीलिये पर्यायके द्वारा द्रव्यका भेद होनेसे उस कालव्यकी भी अनन्तता है । कालद्रव्य अनन्त है; इसकी सिद्धि उत्तराध्ययन- सूत्रमें विस्तारसहित कही गई है । और उस उत्तराध्ययनका सूत्र यह है; "धर्म, अधर्म, तथा आकाशं यह एक एक कहेगये हैं; और काल पुद्गल तथा जीव यद्द अन्तके तीनों द्रव्य अनन्त हैं ॥ १ ॥" इसी सूत्रके आधारसे अन्यत्र भी कहा है कि-धर्म, अधर्म, तथा आकाश यह तीनों एक एक हैं; और इनसे आगेके तीनों द्रव्य अर्थात् काल, पुद्गल और जीव यह अनन्त हैं । इस हेतुसे जीवद्रव्य भी अनन्त है; और उस अनन्त जीव द्रव्यके वर्तमान जो अनन्त पर्याय हैं, उनकेलिये कालद्रव्य भी अनन्त है, ऐसा आगममें । - . १७४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् कहा है। और इस कालद्रव्यका विस्तारसे वर्णन भी उन्हीं आगमोंसे अवधारण करना चाहिये ॥ १०॥ अथ कण्ठतोऽपि सूत्रे जीवाजीवाभ्यामतीतकाल: कथितोऽतस्तमेव,तथैव सूत्रयन्नाह । अब कंठसे भी सूत्रमें जीव और अजीवसे अतीत काल कहागया है। इसलिये उस कालको उसी प्रकार सूत्रित करते हुये कहते हैं। सूत्रम् । जीवाजीवमयः कालः समये न पृथकृतः । इत्येके संगिरन्तेऽत्र धारयन्तः शुभां मतिम् ॥ ११॥ सूत्रभावार्थ:-कितने ही शुभ बुद्धिको धारण करते हुये आचार्य इस विषयमें यह कहते हैं; कि-सिद्धान्तमें कालको जीव, अजीवरूप ही माना गया है; जुदा नहीं किया गया ॥ ११ ॥ व्याख्या। "समये सिद्धान्ते जीवाजीवमयो जीवाजीवरूपः कालः कथितः पृथग मिना, स्ताभ्यां न कृतस्ततो भिन्नः कथं कथ्यवे" इति पूर्वोत्तमेक आचार्याः संगिरन्ते भाषन्ते अत्र । किं कुर्वन्तः शुभां विशुद्धां मर्ति बुद्धिं धारयन्तः शुद्धबुद्धिमतां सुधाराणां यथोक्तश्री. जिनप्रणीततत्त्ववेत्तृणां प्राणिनां सम्यक्त्यावाप्तिः सुलभा भवतीति ध्येयम् । तथा च गौत. मेन भद्रकपरिणामशालिना भगवान् पृष्टः । तदाहेति भगवन् किमयं कालो जीवस्तथा जीवश्चेति प्रभे भगवान्नाह । गौतम जीवोऽपि कालः, अजीवोऽपि कालः तदुभयं काल एव जीवाजीवयोः कालेनोपजीव्योपजीवकमावसंवन्धः संतिष्ठत इति ।। ११ ॥ व्याख्यार्थ:- :-समय अर्थात् जिनसिद्धान्तमें जीव तथा अजीवमय अर्थात् जीव और अजीवरूप काल कहागया है तात्पर्य यह कि-कालको जीव और अजीव इन दोनोंसे भिन्न नहीं किया इस कारण इस कालद्रव्यको तुम जीव अजीवसे भिन्न कैसे करते हो अर्थात् जीव अजीवसे जुदा कालद्रव्य क्यों मानते हो । इस प्रकार यह पूर्वोक सिद्धान्त विशुद्ध वृद्धिके धारक एक आचार्य कहते हैं । इस कयनसे शुद्ध वुद्धिके धारक उत्तम धारणावाले और श्रीमिनेन्द्र देवने जैसे कहे वैसे ही तत्त्वोंके ज्ञाता भव्यजीवोंके सम्यक्त्वकी प्राति सुलभ होती है। यह विचार करना चाहिये। सोही दिसाते हैं। कि-मद्र परिणामोंके धारक गौतमखामीने एक समय श्रीमहावीरस्वामीसे पूछा कि-हेभगवन् । यह काल जीव है; या मजीव है। इस प्रकार प्रश्न करनेपर श्रीमगवान् बोले कि-हे गौतम! जीव भी काल है; और अजीव भी काल है; इसलिये जीव तथा अनीव दोनों काल ही हैं, क्योंकि-जीव तथा अजीवका कालके साथ उपजीथटपजीवकमार सम्बन्ध पूर्णरूपसे स्थित है । ऐसा भगवान्का वचन है। इसलिये यह काल जीव मजीवरूप ही है, इनसे भिन्न नहीं ॥ ११ ॥ . ।

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द्रव्यानुयोगतर्कणा।
१७५
पुनस्तदेवाह ।
पुनः उसी कालव्यके विषयमें कहते हैं।
सूत्रम् । आहुरन्ये भचक्रस्य विश्वेचारेण या स्थितिः।
कालोऽपेक्षाकारणं च द्रव्यमित्यपि पञ्चमे ॥ १२॥
सूत्रभावार्थ:-और अन्य आचार्य कहते हैं; कि-संसारमें ज्योतिश्चक्रके संचारसे
जो स्थिति है; वह.काल है और कितने ही कालको अपेक्षाकारण कहते हैं; तथा कितने
ही कालको द्रव्य कहते हैं ॥ १२ ॥
व्याख्या। अन्ये आचार्या एवं कथितवन्तो भचक्रस्य ज्योतिश्चक्रस्प पारेण या विश्वे
स्थितिरवस्थाविशेषः स काल इत्यभिधीयते । तथा च वर्तुलाकारं ज्योतिश्चकं तस्य धारण
परत्वापरत्वनवपुराणादिभावस्थितिहेतुः तस्यापेक्षाकारणं मनुष्यलोके हार्थस्य सूर्यक्रियोपना-
यकद्रव्यचारक्षेत्रप्रमाणमेवोपकल्पनं घटते । तद एतादृशं फालद्रव्यं कथ्यते । वत एव
भगवसङ्गे "कईणं भंते दुव्या पन्नचा । गोयमाहव्वं पण्णत्ता । तं जहा धमच्छिकाए जाव
अद्धासमये ।" एतद्वचनमस्ति तस्य निरुपचरितव्याख्यानं घटते । तथा च वर्तनापर्यायस्य
साधारणापेक्षा न कथ्यते तदा तु गतिस्थित्यवगाहनापेक्षासाधारणकारणलेन धर्माधर्मास्ति-
कायो सिद्धौ जातो तत्राप्यनाश्वास आयाति । अथ च "अर्थयुच्या माहामस्ति तस्मात्केवल-
माज्ञयेव माह्यालि परन्तु कथं संतोपघृती भवेताम् ॥ १२ ॥
व्याख्यार्थ: ----अन्य आचार्योंने इस प्रकार निरूपण किया है। कि-ज्योतिश्चक्रके संचा-
रसे जो संसारमें स्थिति अर्थात् अवस्थाविशेष है; वही काठ इस प्रकार कहा जाता है।
सो ही स्पष्ट करके दिखाते हैं; कि-गोलाकार जो ज्योतिश्चक है; उसके संचारसे परत्व
अपरत्व तथा नवीन पुराणआदिरूप जो पदार्थोंकी स्थिति है; उसका हेतु अर्थात् अपेक्षा
कारण काल है । क्योंकि मनुष्यलोकमें सूर्यकी जो गतिरूपा क्रिया है, वहीं पदार्थोकी
उपनायिका है; मर्थात् उन २ पर्यायोंमें पदार्थोको प्राप्त करनेवाली सूर्यकी क्रिया है और
यह कल्पना जहांतक द्रव्योंका संचार क्षेत्र है; अर्थात् जहांतक द्रव्योंका संचरण होता है;
वहांतक कालद्रव्यकी कल्पना.घटित होती है । अत एव श्रीभगवतांगसूत्रमें भी यह
वचन है । "कईणं दंते दन्यापमत्ता गोयमाददव्यं पणचा तं नहा धमत्थिकाए जाव
अद्धासमये" अर्थात् हे भगवन् । द्रव्य के हैं, तब स्वामीने कहा कि-हे गौतम
वह जैसे धर्मस्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाश, जीव पुद्गल और काल । उसका यह
निरुपचरित व्याख्यान संगत होता है । और यदि वर्तनापर्यायके साधारण अपेक्षा न
कहें तो गति और स्थितिके अवगाहनमें अपेक्षारूप साधारण कारणतासे धर्मास्तिकाय .
तथा अधर्मास्तिकाय सिद्ध होजांय परन्तु वहां भी अविश्वास होता है; और यह बात
अर्थयुक्तिसे ग्राह्य है । उससे केवल आज्ञासे ही ग्रहण करने योग्य है; परन्तु संतोष और
ग
द्रव्य हैं।
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धैर्य कैसे होवें ॥ १२ ॥

. . १७६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । सूत्रम् । एतन्मतद्वयं धर्मसंग्रहिण्यां च भाष्यके। अनपेक्षितद्रव्यार्थिकमते तस्य योजना ॥ १३ ॥ सूत्रभावार्थ:-कालके विषयमें यह दोनों मत धर्मसंग्रहणीमें तथा भाप्यमें प्रतिपा- दित हैं; और अनपेक्षित द्रव्यार्थिकनयके मतमें इसकी योजना होती है ।। १३ ॥ घ्याख्या । एतन्मतद्वयं धर्मसंग्रहिण्यां श्रीहरिभद्रसूरिणा व्याख्यातम् । तथा च तद्गाथा "जं वत्तणाई रूवो कालो दबस्स चेव पन्जाओ । सो चेव तवो धम्मो कालरसवजस्स जोण लोएत्ति । १।" एवमेतन्मतद्वयमलं श्रीहरिभद्रसूरिसंमतधर्मसंग्रहिणीसूबोकं ज्ञेयम् । तथा च एतन्मतद्वयं भाष्यके श्रीवत्त्वार्थभाष्येऽपि वाचकैस्तथैव प्रणीतमस्ति । तथा च तद्वन्यः-- "कालश्चेत्येके" इति वचनाहितीयमतं श्रीतत्त्वार्थव्याख्याने समर्थितम् । पुनस्तस्य • कालस्या- नपेक्षितद्रव्याधिकनयम योजना युक्तिश्च भवति । तथा हि स्थूललोकव्यवहारसिद्धोऽयं कालोऽपेक्षारहितश्च ज्ञेयः । अन्यथा वर्चनापेक्षाकारणत्वेन यत्कालद्रव्यं साधितं तत्पूर्वाप- रादिव्यवहारविलक्षणपरत्वापरत्वादिनियामकत्वेन दिग्द्रव्यमपि सिद्धं स्यादिति । अथ च "आकाशमवगाहाय तदनन्या दिगन्यथा । तावप्येवमनुच्छेदात्ताभ्यां चान्यदुदाहृतम् । १ ।" इति सिद्धसेनदिवाकरकृतनिश्चयद्वात्रिंशिकार्थ विमृश्याकाशादेव दिकार्य प्रसिद्व्यतीति । इत्थमगीकुर्वतां कालद्रव्यं कार्यमपि कथंचिचत एवोपपत्तिः स्यात् । तस्मात्कालश्चेत्येके इति सूत्रमनपेक्षिवद्रव्यार्थिफनयेनैवेति सूक्ष्मदृष्टया विभावनीयम् ।। १३ ॥ व्याख्यार्थ: :-यह दोनों मत श्रीहरिभद्रसूरीके मान्य जो'धर्मसंग्रहणी सूत्र है; उसमें कहे हुये जानने । उस धर्मसंग्रहणीसूत्रकी गाथा यह है; "ज' वत्तणाई रूवो कालो. दबस चेव पन्जाओ । सो चेव तवो घम्मो कालस्सव जस्स जोण लोएत्ति । १ । और यह ही दोनों मत श्रीतत्त्वार्थाधिगमभाष्यमें श्रीसिद्धसेनजीनें भी इसी प्रकार कहे हैं। और तत्त्वार्थसूत्र यह है "कालश्चेत्येके" (काल मी द्रव्य है; ऐसा एक भाचार्य कहते हैं) इस सूत्रमें एके इस पदमें दूसरा मत इस सूत्रके व्याख्यानमें समर्थित कियागया है । और उस कालकी योजना अनपेक्षित द्रव्याथिकनयके मतमें होती है। सोही दिखाते हैं कि यह काल स्थूल (मोटा) जो लोकव्यवहार है; उससे सिद्ध है; और अपेक्षारहित है । यदि ऐसा न हो तो जैसे वर्तनाका अपेक्षारूप कारण होनेसे काल द्रव्यको सिद्ध किया उसी प्रकार काल जिस पूर्वापरको साधता है, उससे विलक्षण (भिन्न) परत्व अपरत्वभादि व्यवहारका नियामक होनेसे दिशानामक द्रव्य भी सिद्ध हो जाय । और "आकाश अवगाहन होनेके लिये है। और दिशा उस भाकाशसे भिन्न नहीं है। यदि ऐसा न हो और काल तथा आकाशसे भिन्न विद्यारुप द्रव्यंका उदा. हरण दें तो काल और भाकाश इन दोनोंके अनुच्छेदसे अर्थात् काल भी रहेगा भाकाश भी रहेगा और यह दिशा एक और हो जायगी ऐसे पृथक् द्रव्य सिद्ध होगा । इस (इस गाथाका भावार्य समामें नहीं आया। 4 द्रव्यानुयोगतर्कणा। १७७ प्रकार सिद्धसेनजीकृत निश्चयद्वात्रिंशिकाके अर्थको विचारके आकाशसे ही दिशाका काम सिद्ध होता है। ऐसा जानना । और इस प्रकारके सिद्धान्तको स्वीकार करनेवालोंके कालद्रव्य कथंचित् कार्य ही है अर्थात् मानना ही चाहिये ऐसा विचार होगा और इसीसे परत्व अपरत्वकी सिद्धि होगी। इसलिये "कालश्चेत्येके" यह सूत्र. अनपेक्षित द्रव्याधिक नयसे ही कहागया है। इस प्रकार सूक्ष्म दृष्टिसे विचारलेना चाहिये ॥ १३ ॥ अथ कालद्रव्याधिकारं दिगम्बरप्रक्रिययोपन्यसन्नाह । अव कालद्रव्यका अधिकार दिगंबरमतकी प्रक्रियासे उपन्यसित करते हुये कहते हैं । सूत्रम्। मन्दगत्याप्यणुर्यावत्पदेशे नभसः स्थितौ । याति तत्समयस्यैव स्थानं कालागुरुच्यते ॥ १४ ॥ सूत्रभावार्थ:-आकाशके प्रदेशके स्थानमें मंदंगतिसे परमाणु जितने समयमें गमन करता है; उस समय अर्थात् उस समयप्रमाण जो काल है। उसके स्थानमें कालाणु ..यह व्यवहार होता है ॥ १४ ॥ घ्यास्या । मन्दगत्या मन्दगमनेनाणुः परमाणुर्नभस आकाशस्य प्रदेशे स्थिती स्थाने यावदिति यायता कालेन गच्छति तत्समयस्य तत्कालपरिमितस्य कालस्य स्थानं कालाणुरिति • व्यवहारे जायत इति । एकस्य नभसः स्थाने मन्दगतिरणुावता कालेन सञ्चरति तत्पर्या- येण समय उच्यते तदनुरूपश्च य: स कालः पर्यायसमयस्य भाजनं फालाणुरिति । स चैकस्मिन्नाकाशप्रदेश एकैक एवं कुर्वतां समस्तलोकाकाशप्रदेशप्रमाणाः कालाणवो जायन्द इति । इत्थं कश्चिदपरो वदन् जैनाभासो दिगम्बर एवास्ति । उक्तं च द्रव्यसनहे "रयणाणं । रासी इव ते कालाणु असंखदब्याणि" इति 11 १४ ॥ व्याख्यार्थ:-आकाशके प्रदेश स्थानमें जितने कालमें मन्दगतिसे परमाणु जाता है। उतने समयपरिमाण जो काल है; उस कालके स्थानमे "कालाणु" यह व्यवहार होता है। और एक आकाशके स्थानमें मन्दगमनफा धारक परमाणु जितने कालमें जाता है; उसी कालको पर्यायरूपसे समय कहते है । और समयरूप जो काल है वह पर्यायरूप समयका भाजन कालाणु है । और वह कालागु एक आकाशके प्रदेश में एक है। एक आकाश प्रदेशमें एक है। इस प्रकार जब करते हैं; तंत्र लोकाकामाके समस्त प्रदेशोंके समान कालाणु होते हैं । अर्थात् लोकाकाशके असंख्यात प्रदेश हैं; और एक एक प्रदेश एक एक कालाणु है। इस प्रकार असंख्यात ही कालाणु होते हैं । सोही द्रव्य संग्रह कहा है; कि-"रनोंकी राशिकी तरह वह कालाण असंख्यात दब १५॥ - । * . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् सूत्रम् । योगशास्त्रान्तर श्लोके मतमेतदपि श्रुतम् । लोकप्रदेशेऽत्यणवो भिन्ना भिन्नास्तद्ग्रता ॥१५॥ सूत्रभावार्थ:-योगशास्त्रके अन्तर्गत श्लोकमें हमने यह भी सुना है; कि-लोकाकाश प्रदेशमें जो भिन्न भिन्न कालाणु स्थित हैं; वह भिन्न स्थिति कालद्रव्यकी प्रधानता है १५॥ व्याख्या ।,योगशास्त्रान्तरलोक एतदपि मतं श्रुतं दिगम्बरमतेऽपि अन्तरश्लोकव्याख्या- नमयीष्टमस्ति । यतो-लोकप्रदेशेऽपि अणकः भिन्ना भिन्नाः अणवस्तन्मुख्यत्वमापादयन्ति । लोकप्रदेशे भिन्ना भिन्नाः कालाणवस्त एव मुख्यकाल इति व्यवहारः । तथा च तत्पाठः "लोकाकाशप्रदेशस्था: भिन्नाः कालाणवस्तु ये । भावानां परिवर्ताय मुख्यः कालः स उच्यते ।१॥ इति" अस्य भावार्थ:-लोकाकाशे यावन्तः प्रदेशास्तेषु तिष्ठन्तीति लोकाकाशप्रदेशस्था भिन्नाः पृथक् पृथक् एकनभोदेशे एक इत्थं सर्वत्र सर्वे ये कालाणवः सन्ति त एव तावन्त कालाणव इति । तु पुनर्भावानों परिवर्ताय "नूतनं कृत्वा जीर्ण करोति जीर्ण कृत्वा नूतनं फरोनि" एवं भावानां परिवर्चाय वर्त्तते स एव मुख्यः सर्वप्रधानपदार्थः काल उच्यत इत्यर्थः ॥ १५॥ व्याख्यार्थः—योगशास्त्रके अन्तर्गत श्लोकमें यह भी मत सुना है; और दिगम्बर-. मतमें इस योगशास्त्रान्तरश्लोकका व्याख्यान भी इष्ट है; क्योंकि योगशास्त्रमें यह श्रवण किया कि लोकाकाशके प्रदेशमें जो पृथक् (भिन्न भिन्न) कालाणु स्थित हैं; वह कालाणु कालद्रव्यकी मुख्यताका प्रतिपादन करते हैं; अर्थात् लोकप्रदेशमें जो भिन्न भिन्न कालाणु हैं; वह ही मुख्यकाल हैं; ऐसा व्यवहार है। सो ही उस योगशास्त्रका पाठ है; कि-"लोकाफाश प्रदेशस्था भिन्नाः कालाणवस्तु ये । भावानां परिवतीय मुख्यः कालः स उच्यते ॥१॥" भावार्थ इसका यह है कि लोकाकाशके जितने प्रदेश हैं। उन सब प्रदेशोंमें जो रहते हैं। उनको लोकाकाशप्रदेशस्य कहते हैं; लोककाशप्रदेशस्थ जो भिन्न भिन्न अर्थात् एक आकाशके प्रदेशमें एक इस प्रकार सब लोकाकाशके प्रदेशोंमें जो सब कालाणु है; वह उतने ही हैं। जितने कि-आकाशके प्रदेश है । और जो भावों (पदार्थों) के परिवर्तनके लिये अर्थात् पदार्थको नूतन (नया) करके जीर्ण, (पुराना) करता है; और जीर्ण करके नूतन करता है" इस प्रकारका जो पदार्थोका परिवर्तन है; उसकेलिये जो वर्तना है; वही मुख्य अर्थात् सर्वप्रधान पदार्थ काल कहागया है। इस प्रकार अर्थ है ॥ १५॥ पुनरवदेव चर्चयन्नाह। फिर उसी कालकी चर्चा करते हुए कहते है । सूत्रम् । प्रत्योर्ध्वत्यमेतस्य द्वयोः पर्याययोर्भवेत् । तिर्यक्प्रचयता नास्य प्रदेशत्वं विना कचित् ।।१६।। सूत्रभावार्थ:- :-इस कालद्रव्यक पूर्वापर दो पर्यायों में ऊर्धतामचय होता है और प्रदेशरहितपनेसे तिर्यक्प्रचय कहीं भी नहीं होता ॥ १६ ॥ . .

द्रव्यानुयोगतर्कणा! व्याख्या । एतस्य कालाणुद्रव्यस्य प्रथयोत्वमूर्ध्वतापचयो द्वयोः पर्याययोः पूर्वापरयोभ- वेत् । यतो यथा मृद्रव्यस्य स्थासकोशकुशूलादिपूर्वापरपर्यायाः सन्ति तथैतस्य कालस्य समयावलीमुहूर्तादयः पूर्वापरपर्याया, वर्त्तन्ते । परन्तु स्कंधस्य प्रदेशसमुदायः कालस्य नास्ति तस्माद्धमास्तिकायादीनामिव तिर्यकाचयता नसंभवति, एतावता तिर्यक्प्रचयत्वं नास्ति । तेनैव कालद्रव्यमसिकाय इति नोच्यते । परमाणुपुद्गलस्येव पुनस्तियाचयता नास्ति । तस्मादुपचा- रेणापि कालद्रव्यस्यास्तिकायता न कथनीया इति ॥१६॥ व्याख्यार्थ:-इस कालव्यके पूर्वापर दो पर्यायोंका ऊर्खतापचय होता है; क्योंकि- जैसे मृत्तिकारूस द्रव्यके स्थास कोश कुशूलआदि पूर्व अपर पर्याय होते है। ऐसे ही इस- कालद्रव्यके भी समय, आवली, और मुहूर्तआदि पूर्व अपर पर्याय विद्यमान हैं । परन्तु स्कन्धका प्रदेश समुदाय कालके नहीं है इसलिये धर्मास्तिकायआदिके समान तिर्यक्प्र- चयताका संभव नहीं है। अर्थात् कालके तिर्यक्प्रचयपना नहीं है। इसी कारणसे इस कालद्रव्यको अस्तिकाय नहीं कहते हैं । और परमाणु पुद्गलके तुल्य भी इसकी तिर्यक्प्र- चयता नहीं है। इसलिये उपचारसे भी कालद्रव्यके तिर्यक्मचयता नहीं कहने योग्य है॥१६॥ अर्थतद्दिगम्बरमतं वादेन दूपयन्नाह । अब इस दिगम्बर मतको वादसे दूपित करते हुए कहते हैं । सूत्रम् । एवमणुगतेलात्वा हेतुं धर्माणवस्तदा । साधारणत्यमेकस्य समयस्कन्धतापि च ॥ १७ ॥ सूत्रभावार्थ: :-इस प्रकार कालाणुके माननेसे परमाणुके गमनका हेतु मानकर धर्मद्रव्यके भी भणुसिद्ध हो जायगे और तब एक पदार्थकी साधारणताको ग्रहण करनेसे समयस्कन्धता भी सिद्ध हो जायगी ॥ १७॥ व्याख्या । एवमनया रीत्या यद्यणुगतेः परमाणुगमनस हेतुमिति हेतुत्वं लात्या गृहीत्वा धर्माणवो धर्मद्रव्याणवो भवन्ति । तदैकस्य कस्यचित्पदार्थस्य साधारणत्वं गृहीत्या समयस्क. धता स्यादिति । अथ योजना-एवं यदि मन्दाणुगतिकार्यहेतुपर्यायसमयभाजनं द्रव्यसमयाणुः कल्पते तदा मन्दाणुगतिहेतुतारूपगुणभाजनं धर्मास्तिकायोऽपि सिद्ध्यति । एवमधर्मास्तिका- यस्याप्यणुप्रसङ्गना स्यात् । अथ च सर्वसाधारणगतिहेतुतादिकं गृहीत्वा धर्मास्तिकायाकस्क- न्धरूपं द्रव्य कल्पते तदा देशप्रदेशादिकल्पनापि तस्य व्यवहारानुरोधेन पश्चात्कर्तव्या स्थाना यदि च सर्वजीवाजीवद्रव्यसाधारणवर्तनाहेतुतागुणं गृहीत्वा कालद्रव्यमपि लोकनमार्ण कल्पयितुं युध्यते । धर्मास्तिकायादीनामधिकारेण साधारणगतिहेतुतायुपस्थितिरेवास्ति । अस्याः कल्पनायास्त्वभिनिवेशं विना द्वितीयं किमपि कारणं नास्ति ।। १७ ।। व्याख्यार्थ:- :-इस रोतीसे परमाणुके गमनरूप हेतुताके ग्रहणसे धर्मद्रव्यके भी अणु होसकते हैं, तब एक किसी पदार्थकी साधारणताके ग्रहणसे समयस्कंधता मी सिद्ध हो. जायगी । अब इस श्लोककी योजना इस भांति है; कि इस प्रकार यदि मन्द अणुगतिका .

1 १८० रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् र्यका अर्थात् अणुवोंका मन्द गमनरूप जो कार्य है; उसका हेतु जो पर्यायसमयभाजन है; उसको द्रव्य समयाणु कल्पन करते हो तो मन्द अणुगतिमें हेतुतारूप गुणका धारक धर्मास्तिकाय द्रव्य भी सिद्ध होता है। और इसी प्रकार अधर्मास्तिकाय दव्यको भी अणुका प्रसंग होय । अब कदाचित् यह कहो कि-सर्वसाधारणगति हेतुताआदिका ग्रहण कर धर्मास्तिकायआदि एक स्कंधरूप द्रव्यकी • कल्पना करते हैं। तो देश प्रदेशआदिकी कल्पना भी उस स्कंधके व्यवहारके अनुरोधसे पीछे करनी पड़ेगी। और जो सब जीव अजीव द्रव्योंमें साधारण ऐसा जो वर्तना हेतुरूप गुण है; उस गुणको ग्रहण करके काल- द्रव्यकी भी लोकप्रमाण कल्पना करना युक्त है; ऐसा कहो तो धर्मास्तिकायआदि द्रव्यके अधिकारसे साधारणगति हेतुता(साधारण गतिरूप कार्यकी कारणता)आदिकी उप- स्थिति है; उसीकी कल्पना हो सकती है । और इसपर भी कालद्रव्यकी कल्पना करनेवाले मतमें मन्द भणुकी वर्तनारूप हेतुकी ही उपस्थिति है। और इस कल्पनाका आग्रहके सिवाय दूसरा कोई भी कारण नहीं है ।। १७ ॥ अथ पुनस्तदेव। अब फिर भी उसीका वर्णन करते हैं। सूत्रम् । अप्रदेशत्वमासूख्य यदि कालाणवस्तदा । पर्यायवचनोयुक्तं सर्वमेवौपचारिकम् ॥ १८ ॥ सूत्रभावार्थ:-यदि कालको अप्रदेशी सूत्रित करके और उस कालके अणु कहते हो तब यह सब उपचारसे पर्यायवचनमें योजित होता है ।। १८ ।। ध्याख्या। अप्रदेशत्वं प्रदेशरहितत्वं यद्यासून्य प्रकल्पितस्य कालस्य अणवः फध्यन्ते तदा पर्यायव योजितं क्रियते सर्वमप्युपचारेणेदमिति । तथा च यदेवं फथयत सूत्रे कालोऽ- प्रदेशी कथितस्तस्यानुसारेण फालांगवः कथ्यन्ते तदा तु सर्वमपि जीवाजीवपर्यायरूपमेव फाल इवि कथितमस्ति तत्र विरोधो नास्ति द्रव्यकालोऽपि कथं कथ्यते । ततसदनुसारेण कालस्यापि द्रव्यत्ववचनम् । तया लोकाकाशप्रदेशप्रमाणानुवचनादीनि सर्वाण्युपचारेण योज्यानि । मुख्यपृत्त्या स पर्यायरूपः काल एव सूत्रसंमतोऽस्ति । अत एव "कालश्चेत्येके" . अत्रकवचनेन सर्वसंमतत्वाभावः सूचयामासेति । तेनाप्यत्राप्रदेशत्वं प्रदेशाभावं सूत्रेणानुसत्य तस्य कालस्याणुः कथ्यते तदा सर्वमन्येतदुपचारेण पर्यायवचनादिकेभ्यो युज्यमानं पारिमा- णमवतीति । अय च परमाणुमयो विभागोऽवयवस्तदिवरस्तु प्रदेश इति वचनाम्योमाद्यपरि.. माणजतया सप्रदेशं स्यान्न तु सावयवमित्याचक्षीयास्तथापि "दोपोल्लासवराप्रमृत्वरतमस्काण्डे विदेदीपया, मासनोऽदयवप्रदेशविषयो भेदस्त्वया दीपकः । अस्माभिः परमाणुतां प्रकटवामा- नेप्यमाणं पुरो दुवारल्यभिसारदीर्घरसनं निध्याय विध्वंसिवः ।श ननु पूर्व तापदम्यरादेवि भागाः परमाणुमया एव सन्ति न सलु कन्जलचूर्णपूर्णसमृद्कयनिरन्तरपुदलपूरिसे लोके स द्रव्यानुयोगतर्कणा। १८१ फश्चिन्नमसो विभागोऽस्ति यो निर्भरं न पिमरांबभूवेश्णुभिस्तत्कथं न हेतुरेप व्यभिचरिष्णु- रिति ॥ १८॥ . व्याख्यार्थ:-यदि कालको प्रदेशरहित निरूपण करके उस कल्पित कालके अणु कहते हो तब यह सब उपचारसे पर्याय वचनमें योजित किया जाता है । इसका स्पष्टी- करण करते हैं; कि-यदि आप यह कहो कि-सूत्रमें काल प्रदेशरहित कहा गया है। उसके अनुसार हम कालाणु कहते हैं। तब तो संपूर्ण जीव अजीव पर्यायरूप ही काल है; ऐसा कहा हुभा है; उसमें विरोध नहीं है । कालद्रव्य कैसे कहा जाता है। इस शंकाका समाधान यह है; कि-उसीके अनुसार कालको भी द्रव्य कहा गया है । और लोकाकाश प्रदेशों के प्रमाण, काल है; ऐसे जो वचन हैं; वह भी सब उपचारसे युक्त करने योग्य हैं। मुख्यवृत्तिसे अर्थात् मुख्य शक्तिसे तो वह पर्यायरूप काल है; सो ही सूत्रसंमत है। अत एव "काल- थेत्येके" (काल भी द्रव्य है; ऐसा एक आचार्य कहते हैं) इस सूत्रमें “एके" इस पदसे यही सूचित किया है; कि-काल सर्वसंमत द्रव्य नहीं है। इससे भी प्रदेशका अभाव सूत्रके अनुसार मानकर जो कालके अणुपनेका कथन करते हो तब भी यह सब उपचारसे पर्याय वचनादिके साथ नियुज्यमान (युक्त हुआ) ही चारुता(रमणीयता)को प्राप्त होता है। यदि "परमाणुमयरूप जो विभाग है; सो अवयव है और इससे भिन्न अर्थात् जो परमाणुरूप विभाग नहीं है, वह प्रदेश है" इस वचनसे आकाशादिक अपरिमाणज होनेसे सप्रदेश हैं; सावयव नहीं ऐसा कहो तो भी "दोपोंकी अधिकताके वशसे फैलते हुये अंधकारके समूहमें जो तुमने हमारे भागे अवयव और प्रदेशमें भेद है" इस कथनस्वरूप दीपक जाज्वल्य- मान किया उस दीपकका हमने परमाणुताको प्रकटमें लाकर दुःखसे निवारण करने योग्य व्यभिचार दोपरूपी सर्पको आगे रखके बुझा डाला अर्थात् परमाणुताकी सिद्धिसे यह भेद न ठहरेगा: पहले तो आकाशआदिके विभाग भी परमाणुरूप ही हैं। क्योंकि- काजलके चूर्णसे पूर्ण पिटारीके समान निरन्तर पुद्गलोंसे भरे हुए जगत्में वह कोई भी आकाशका प्रदेश नहीं है; जो परमाणुवोंसे खूब न भरा हुआ हो इस कारण यह जो तुमने हेतु दिया है; वह व्यभिचारी कैसे नहीं ! अर्थात् है; ही ॥ १८ ॥ अथोपचारप्रकारमेव दर्शयन्नाह । अब उपचारका प्रकार ही दिखाते हुए यह सूत्र कहते हैं । सूत्रम् । पर्यायेण च द्रव्यस्य छुपचारो यथोदितः। अप्रदेशत्वयोगेन तथाणूनां विगोचरः ॥ १९ ॥ सूत्रभावार्थ:--जैसे पर्यायरूपसे कालद्रव्यको पर्यायरूपता उपचारसे कही है। ऐसे ही अप्रदेशत्वके योगसे कालकी अणुताके विपयमें उपचार ही शरण है ॥ १९ ॥ .

१८२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् व्याख्या। पडेव द्रव्याणीति संख्यापूरणार्थ यथा पर्यायेण पर्यायरूपेण द्रव्यस्य कालद्र- व्यस्य एतावता पर्यायरूपकालद्रव्यविषये हि निश्चितं द्रव्यस्योपचारो यथा उदितः द्रव्यत्वो. पचारकल्पना विहिता भगवत्यादिसूत्रविषये कृता तथैव सूत्रे कालद्रव्यस्याय्यप्रदेशत्वयोगेन कालाणूनां विगोचरो विषयता ज्ञेयः । एतावता सूत्रे कालस्यात्र प्रदेशता सूनिता तथैव काला. णुतापि सूत्रितासि तद्योजनया लोकाकाशप्रदेशस्थपुद्गलाणूनां विषय एव योगशास्त्रान्तरलो- केपु कालाणूनामुपचारो विहितः । मुख्यकाल इत्यस्य चानादिकालीनाप्रदेशत्वव्यवहारनिया- मकोपचारविषय इत्यर्थ अत एव मनुष्यक्षेत्रमात्रवृत्तिकालद्रव्यं ये वर्णयन्ति तेपामपि मनुष्य क्षेत्रावच्छिन्नाकाशादौ कालद्रव्योपचार एव शरणमिति दिङ्मात्रमेतत् ॥ १९ ॥ व्याख्यार्थ:-जिनसिद्धान्तमें पद (६) ही द्रव्य है। इस संख्याकी पूर्तिकेलिये जैसे पर्यायरूपसे कालद्रव्यका अर्थात् पर्यायरूप कालद्रव्यके विषयमें द्रव्यत्यके उपचारकी कल्पना भगवतीआदि सूत्रमें की गई है, उसी प्रकार सूत्रमें कालव्यके जो अप्रदेशताका योग है; उससे कालाणुके विषयमे भी उपचार जानना । तात्पर्य यह कि-सूत्रमे कालको प्रदेशरहित कहा है; उसी प्रकार कालाणुता भी सूत्रित की है। उसकी योजनासे लोकाका- शके प्रदेशमें स्थित पुद्गल परमाणुवोंके विषयमें ही योगशास्त्रान्तर श्लोकोंमें कालाणुवाका उपचार किया गया है । और "लोकाकाशप्रदेशस्था" इत्यादि श्लोकमें जो कालके विषयमें "मुख्यः कालः स उच्यते" इस प्रकार मुख्य कालरूपसे व्यवहार किया है। इसका यह अभिप्राय है; कि-अनादि कालसे अप्रदेशत्व व्यवहारका नियामक उपचारकी विषय. तासे वह काल मुख्य है । इसी कारणसे जो मनुष्य क्षेत्रमात्रवृत्ति अर्थात् मनुष्य क्षेत्रमा- में रहनेवाला कालद्रव्य है; ऐसा जो कहते हैं; उनको भी मनुष्यक्षेत्रावच्छिन्न जो भाका- शादि हैं। उनमें कालद्रव्यंका उपचार ही शरण है । यह दिग्दर्शनमान हमने कथन किया है ॥ १९॥ अथ पुदलजीवयोः संक्षेपेण स्वरूपमाह । अव पुद्गल तथा जीवद्रव्यका स्वरूप संक्षेपसे कहते हैं। सूत्रम् । वर्णादिकगुणैर्भेदो ज्ञायते पुद्गलस्य च । निसर्गचेतनायुक्तो जीवोरूपी घचेदकः ॥२०॥ सूत्रभावार्थः वर्ण गंध तथा रसादि गुणोंसे पुद्गलद्रव्यका धर्मास्तिकायआदिसे भेद जाना जाता है । और स्वाभाविक चेतनाका धारक, रूपरहित तथा वेदरहित जीव पदार्थ है ॥ २०॥ व्याख्या । वर्णगन्धरसस्पर्शादिकगुणैः पुद्गलद्रव्यस्यान्यभ्यो धर्मादिद्रव्येभ्यो भेदो ज्ञायते । वर्णाः पञ्च शुष्ठपौतहरितरक्तप्णभेदान्, गन्धौ द्वो मुरभ्यमुरभी पति, रसाः पद् तिक्तकटुककपायाम्लमधुरलवणभेदात, स्पर्शा अष्टौ शीतोष्णे, सरमृदू, लघुमहती निग्ध- पम्पे घेति । सर्वमप्येतत्पुट्रलमेदाद्भियते । च पुनरर्थे निसर्गा सहजा या चतना तया युफो द्रव्यानुयोगतर्कणा। १८३ निसर्गचेतनायुक्तः सर्वभ्योऽचेतनेभ्यो भिन्नो जीवो व्यवहारनयेन रूपवेदसहितोऽपि निश्च- यनयेन रूपरहितो रूपात्यन्ताभावयुक्तः, वेदरहितो वेदासन्ताभाववान्, सत्तामात्रं निर्गुणो निर्विकारो.जीवः । उक्तं च-अरसमरूपमगन्धं अवण्णं पेपणागुणमसदं । जाणअलिंगग्गहणं जीवमणिदिसंठाणं ।। इत्युक्तेः जीवविशेषणानि ज्ञेयानि ॥२०॥ व्याख्यार्थः--यण, गंध, रस तथा स्पर्शमादि गुणोंसे युक्त होनेसे पुद्गलद्रव्यका अन्य धर्मास्तिकायआदि द्रयोंसे भेद जाना जाता है । शुक्ल (सफेद) पीत (पीला) हरित (हरा) रक्त (लाल) तथा कृष्ण (काला) इन भेदोंसे वर्ण (रूप) पांच हैं । सुगंध, दुर्गंध, भेदसे गंध दो प्रकारका है । तिक्त, (तीखा) कटुक (कड़वा) कपाय (कसापला) आम्ल (खट्टा) मधुर (मीठा) और लवण (खारा) इन भेदोंसे रस छ(६)प्रकारका है। शीत (ठंडा) उष्ण (गरम) खर (कठोर) मृदु (कोमल) लघु (हलका) महत् (भारी) स्निग्ध चिकना. परुप (रूखा) इन मेदोंसे स्पर्श आठ प्रकारका है । यह सब पुद्गलके भेदसे भेदको प्राप्त होते हैं। सूत्रमें जो "च" शब्द है; सो पुनः के अर्थमें है, अतः और निसर्ग अर्थात् स्वभावसे उत्पन्न जो चेतना उस करिके युक्त होनेसे सन अचेतन द्रव्यों से जीव भिन्न है और व्यवहारनयसे रूप तथा वेदका धारक है तो भी निश्चयनयसे जीव रूपरहित अर्थात् रूपके अत्यंत अभावसे युक्त और वेदरहित अर्थात् वेदके अत्यंताभावसे संयुक्त है। क्योंकि यह जीव सत्तामात्र, निर्गुण तथा विकाररहित है । ऐसा अन्यत्र कहा भी है। "रूपरहित, रसरहित, गंधरहित, वर्णरहित, चेतनायुक्त, शब्दरहित लिंगसे रहित और भनिदिष्ट संस्थान ऐसा जीव जानना" इत्यादि कथनसे यह रूपरहितआदि सब जीवके विशेषण है; ऐसा जानो ॥ २० ॥ अथाध्यायपरिसमाप्तिकाम आह । अब अध्यायको समाप्त करनेकी इच्छासे अग्रिम काव्य कहते हैं। सूत्रम्। एवं समासेन पडेव भेदान्द्रव्यस्य विस्तारतयागमेभ्यः । श्रुत्वा समभ्यस्य च भव्यलोका अहत्क्रमाम्भोजयुगं श्रयन्तु ॥ २१ ॥ सूत्रभावार्थ:-हे भव्य जीवो ? इस प्रकार संक्षेपसे द्रव्यके छ ६ ही भेद हैं; उनको विस्तारसे शास्त्रोंसे श्रवण करके तथा पूर्णरूपसे अभ्यस्त करके श्रीजिनदेवके चरणकम- लोके युगलका सेवन करो ॥ २१॥ व्यारया । एवं पूर्वोक्तप्रकारेण समासेन सक्षेपेण च पडेव षट् संख्यायते जीवधर्माध- माकाशकालपुद्गलभेदान्द्रव्यस्य पदार्थस्य पण्णामपि द्रव्यशब्दः पृथग्युक्तः सन् पद्व्यत्वमा- पादयति । अतो द्रव्यस्य पडेव भेदान्सूत्रोक्तान् श्रुत्वा विस्तारतया विस्तारयुक्त्या आगमेभ्यः स्थाद्वादिसमुपदिष्टेभ्य आकर्ण्य श्रवणविषयीकरणं श्रवणं तत्र विस्तारेणैव श्रुतानामवगमो १८४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् जायतेऽतो विस्तारतया श्रुत्वा च पुनः समभ्यस्य वाचा उद्घोषणद्वारा कण्ठे कृत्वा मनसि. निदिध्यास्य भो भव्यलोकाः सम्यतिपाणिनः ? अर्हत्क्रमाम्भोजयुगं श्रीजिनचरणभजनस्थैर्य भजन्तु । श्रुत्वा स्मृत्वा च श्रीप्रभुस्मृतिरेव साधीयसी तत्कृत्वा तत्करणं श्रेयोनिबन्धनमिति । तथा भोजेति सङ्केतेन सन्दर्भकर्तुनामनिदर्शनमिति । अत्राध्याये सम्यक्त्वदाया॑य सर्वभेदा. ख्यानमिति प्रयोजनं चेति ॥ २१॥ इति श्रीकृतिभोजसागरविनिर्मितायो द्रव्यानुयोगतर्कणान्याख्यायो दशमोऽध्यायः। व्याख्यार्थ:-इस पूर्वकथित रीतिसे संक्षेपसे द्रव्यके सूत्रमें कहे हुए छ ६ संख्याके धारक जीव, धर्म, अधर्म, आकाश, काल और पुद्गल इन मेदोंको अर्थात् यहांपर जीव आदि छहोंके साथ जुदा २ द्रव्यशब्द लगानेसे पद्रव्यता सिद्ध होती है। इस कारण द्रव्यके छ हों ही भेदोंको स्याद्वादियोंसे उपदिष्ट ऐसे आगमोंसे. अर्थात् जैनशास्त्रोंसे विस्तारपूर्वक अनेक युक्तियों द्वारा श्रवण करके "कर्णके विषयमें प्राप्त जो करना है; सो श्रवण है उसमे विस्तारसे सुने हुए पदार्थोका ही ज्ञान होता है; इसलिये विस्तारसे श्रवण करके" और वचनसे घोषणद्वारा कण्ट करके और मनमें धारण, करके भो भव्य जीवो। अर्थात् सिद्ध होने योग्य प्राणियों! श्रीजिनेन्द्र के चरणोंकी सेवामें स्थिरताको धारण करो। इस द्रव्योंके स्वरूपको सुनकर ,तथा स्मरण करके श्रीजिनेन्द्रकी भक्ति ही साधने योग्य है। इसलिये द्रव्यके स्वरूपका सुनना और धारण करना कल्याणका कारण है। यहांपर भोज इस संकेतसे टीकाकारने अपना नाम भी दिखाया है। और इस अध्यायमें सम्यक्त्वको पुष्ट (ड) करनेकेलिये सर द्रव्योंके भेदोंका कथन करना है; सोही प्रयोजन है ॥ २१ ॥ इति श्री पं० ठाकुरप्रसादशास्त्रिविरचितभापाटीकासमलढतायां द्रव्यानुयोगतर्कणायां दशमोऽध्यायः॥ अथैकादशाध्याये गुणभेदान् व्याचिख्यासुराह । अब इस एकादशवें अध्यायमें गुणके भेदोंके वर्णनकी इच्छासे यह सूत्र कहते हैं। सूत्रम् । श्रीनाभेयजिनं नत्वा गुणदेष्टगुरुं तथा । गुणभेदानहं यक्ष्ये क्रमप्राप्तान्यथामति ॥१॥ मूत्रभावार्थ:--मैं श्रीनाभिराजके पुत्र श्रीपभदेवजी तीर्थकरको तथा वाणीके गु- गोंके उपदेशक गुरुजीको नमस्कार करके अब क्रमप्राप्त गुणोंके भेदोंको इस एकाद- *शवें अध्यायमें निजमतिके अनुसार कहूंगा ॥ १॥ घ्याख्या । नाभेरपत्यं नामेयः श्रीयुको नाभेयः स पासी जिनम श्रीनामेयजिनसं श्री. नाभेयजिनं श्रीमपभनायं नत्वा नमस्कृत्य क्या तेनेय प्रकारेण गुणदेष्ट्रगुरु गुगा वाणीगुणास्तान् दिशतीति गुणदेष्टा स घासौ गुमश्च गुणदेवगुरुतं नत्वा नमस्त्येति । निविनसमात्रिकामाय मामिति । अहं गुणभेदान् ऋमनामान् द्रव्य यावर्णनानन्तरं ।

द्रव्यानुयोगतर्कणा।
प्रस्तुतान् यथामति यथा स्याचथा पूर्वप्रणेतृणां विस्तारदुर्योधत्वेन स्वमतिविषयी . यथा
स्यात्तथा वक्ष्ये कीर्चयिष्यामीति ॥१॥
व्याख्यार्थः-नाभिराजाके जो पुत्र हैं उनको नाभेय कहते हैं; अनेक प्रकारकी लक्ष्मीसे
जो युक्त हों उनको श्रीनाभेय कहते है श्रीनाभेय ऐसे जो जिन, सो श्रीनाभेय जिन हैं; उनको
भर्थात् श्रीऋषभनाथ तीर्थंकरजीको नमस्कार करके तथा गुण जो वाणीके गुण उनका उपदेश
करनेवाले जो श्रीगुरु हैं; उनको नमस्कार करके अर्थात् निर्विघ्न समाप्तिकी इच्छासे इष्ट देव
तथा गुरुको प्रणामरूप मंगलाचरण करके मैं द्रव्योंके विवरणके पश्चात् प्रस्तुत ऐसे गुणों के
भेदोंको निजबुद्धिके अनुसार अर्थात् पूर्वाचार्यप्रणीत ग्रन्थोंमें विस्तारसे वर्णन है; तथा कष्टसे
उनका ज्ञान होता है। इस कारण अपनी बुद्धिके गोचर जैसे हो तैसे कहूंगा ॥१॥
अथात्र गुणभेदान्समानतत्रप्रक्रियया प्रतिपादयन्नाह ।
अब यहां समानतंत्रप्रक्रियासे गुणके भेदोका प्रतिपादन करते हुए कहते हैं।
सूत्रम् । तत्रास्तित्वं परिज्ञेयं सद्भूतत्वगुणं पुनः ।
वस्तुत्वं च तथा जातिव्यक्तिरूपत्वमुच्यते ॥२॥
सूत्रभावार्थ:-उनमें सद्भुतत्व जो गुण है; उसको अस्तित्व जानना चाहिये और
जाति ( सामान्य ) व्यक्ति(विशेष)रूप जो है; उसको दूसरा वस्तुव गुण कहते हैं ॥ २ ॥
व्याख्या । अस्तित्वं । तत्रेदं परिज्ञेयं सत्तातो यो गुणो भवति तस्मात्सद्भूतताया व्यव-
हारो जायते स चास्तित्वगुणः । १ । वस्तुत्वं च जातिव्यक्तिरूपत्वम् । जातिः सामान्य
यथा-घटे घटत्वं । व्यक्तिविशेपो यथा-घटः सौवर्णः, पाटलिपुत्रः, वासन्तिकः, कम्युग्रीव
इत्यादि । अत एवावग्रहेण सर्वत्र सामान्यरूपं भासते, अपा वा )येन विशेषरूपाभासो.
जायते । पूर्णोपयोगेन संपूर्णवस्तुमहो जायते, इत्थं वस्तुत्वं द्वितीयो गुणः ॥ २ ॥
व्याख्यार्थ:-उनमें सत्तासे जो गुण होता है; और जिससे लोकमें सद्भूतताका
व्यवहार होता है; वह अस्तित्व प्रथम गुण है; इसीको अस्तित्व जानना चाहिये । और
जातिव्यक्तिरूप जो हो सो घस्तुत्व है। जाति सामान्यको कहते हैं, जैसे घट घटत्व,
व्यक्ति विशेषका नाम है; जैसे यह घट द्रव्यसे सुवर्णका है, क्षेत्रसे पटना नगरका है,
कालसे वसन्त ऋतु उत्पन्न हुआ है, और कंबुग्रीवआदि आकारका धारक है; इत्यादि।
इसी कारणसे भयग्रहनामक मतिज्ञानके प्रथम भेदरूप ज्ञानसे सव स्थानों में सामान्य-
रूपका ही भान होता है; और मतिज्ञानका तृतीय भेद जो अपाय अथवा अवाय है; उसके
द्वारा विशेषरूपका ज्ञान होता है । तथा परिपूर्ण ज्ञानसे सामान्य तथा विशेष दोनों रूप
वस्तुका ग्रहण होता है । ऐसे वस्तुत्वनामक दूसरा गुण है ॥ २ ॥
सूत्रम् । द्रव्यत्वं द्रव्यभावत्वं पर्यायाधारतोन्नयः ।
प्रमाणेन परिच्छेद्यं प्रमेयं प्रणिगद्यते ॥३॥

. और उस १८६ . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् सूत्रभावार्थः- पर्यायके आधारसे जाननेमें आता हुआ जो द्रव्यभाव है; उसको द्र- व्यत्वनामा तृतीय गुण कहते हैं । और जो प्रमाणसे • जाननेमें आता है; वह प्रमेयत्व नामक चतुर्थ गुण है ॥ ३ ॥ व्याख्या । द्रव्यं द्रवति तांस्तान्पर्यायानगच्छतीति द्रव्यं तस्य भावस्तत्त्वम् । द्रव्यभावो हि पर्यायाधारताऽभिव्यङ्ग्यजातिविशेपः । । "द्रव्यत्व जाविरूपत्वाद् गुणो न भवति" इंग नैयायिकादिवासनया आशङ्का न कर्तव्या । यतः सहभाविनो गुणाः, क्रमभुवः पर्यायाः, ईदृश्येय जैनशासने व्यवस्थास्तीति । द्रव्यत्वं चेद्रुणः स्याद्रूपादिषदुत्कर्षाप- कपभागि स्यादिति तु कुचोद्यमेकत्वादिसंख्यायाः परमतेऽपि व्यभिचारेण तथा व्याप्त्या. भावादेव निरसनीयम् । ३ । प्रमाणेन प्रत्यक्षादिना परिच्छेद्यं यद्रूपं प्रमाणविषयत्वं प्रमे. यत्वं तदित्युच्यते । तदपि । कथंचिदनुगतसर्वसाधारणं गुणोऽस्ति । परम्परासंवन्धेन प्रमात्वज्ञानेनापि प्रमेयव्यवहारो जायते । ततः प्रमेयत्त्वं गुणस्वरूपादनुगतमस्तीति ॥ ४॥३॥ व्याख्यार्थ:-जो उन उन पर्यायोंको प्राप्त हो उसे द्रव्य कहते हैं। . द्रव्यका जो भाव है; उसको द्रव्यत्व कहते हैं । तथा द्रव्यका जो भाव है; वह पर्यायरूप आधारतासे अभिव्यंग्य ( जानने योग्य ) जातिविशेष है। " द्रव्यत्व यह जातिरूप है; इसलिये गुण नहीं होता है" इस प्रकारकी आशंका नैयायिकोंकी वासनासे न करनी चाहिये । क्योंकि-सहभावी गुण हैं और क्रमसे भावी ( होनेवाले.) पर्याय हैं; ऐसी ही व्यवस्था जैनशास्त्रमें कीगई है। और द्रव्यत्वमें जो गुण मानोगे तो रूपादिके समान उत्कर्ष तथा अपकर्षका भागी द्रव्यत्व होगा अर्थात् द्रव्यत्व जन गुण होगा तब रूपमादि • गुणोंमें जैसे हीनता अधिकता रहती है। वैसे द्रव्यत्वमें भी रहेगी इत्यादि कुचोका तो "परमतमें जो एकत्वआदि संख्याको गुण माना है। इसलिये व्यभिचारसे और नित्य परमाणुभादिगत एकत्वको नित्य माना है। इसलिये जहां गुणत्व है वहां उत्कर्ष . ( अ. धिक ) अपकर्ष( हीन )की भागिता है; ऐसी व्याप्तिका अभाव होनेसे ही तिरस्कार करना चाहिये ॥ ३ ॥ प्रत्यक्षादिरूप 'प्रमाणसे जो परिच्छेद्य ( जाना जाय) ऐसा जो प्रमाणका विषय उसको प्रमेयत्व गुण कहते हैं । वह प्रमेयत्व भी कथंचित् सर्व प्रमेयों में अनुगत गुण है। और परम्परासंबंधसे प्रमालरूप ज्ञानसे भी प्रमेयका व्यवहार होता “है। इसलिये प्रमेयत्वगुण स्वरूपसे अनुगंत है । ऐसे प्रमेयत्वनामक चतुर्थे गुण है।४। ॥ ३॥ सूत्रम् । अगुरुलघुता सूक्ष्मा वाग्गोचरविवर्जिता। प्रदेशत्वमविभागी पुद्गलः स्वाश्रयावधि ॥४॥ सूत्रभावार्थ:-याणीका अविषय तथा सूक्ष्म अगुरुलघुता नाम पंचम गुण है। तथा विभागरहित पुलके अधिकरणमात्र अवधिसहित प्रदेशत्व यह प3 गुण है ॥ ४ ॥ .

: द्रव्यानुयोगतर्कणा। १८७ व्याख्या । अगुरुलघुता अगुरुलघुर्नाम गुणः सा कीदृशी मूक्ष्मा आज्ञाप्राह्यत्वात् , यतः "सूक्ष्मं जिनोदितं तत्त्वं हेतुभि व हन्यते । आज्ञासिद्धं तु तद्ग्राह्यं नान्यथावादिनो जिनाः 1११" पुनः कीदृशी वाग्गोचरविवर्जिता वचनद्वारा वक्तुमशक्या । यतः-"अगुरुलधुपर्याया सूक्ष्मा अवाग्गोचराः" इति अगुरुलघुनाना पञ्चमो गुणोऽगुरुलघुत्वमिति ध्येयम् । अथ "प्रदेशत्वमयिभागी पुद्गलः स्वाश्रयावधि" इति । अविभागी पुद्गल इति यावत् क्षेने तिष्ठ- तीति तावन् क्षेत्रव्यापिष्णुत्वं प्रदेशत्वगुणः । यस्य विभागो न जायते विभक्तव्यवहा. रता न स्यात् पुनर्यावत् क्षेत्रमास्थाय तिष्ठति स्थिती तावत्क्षेत्रावगाहित्वं प्रदेशत्वम्। पुनः की. दृशं स्वाश्रयावधि स्वशब्देन्गत्मा पुद्गलात्मकस्तस्य य आधारः आश्रयः स एवावधिर्मयादा यस्य तत्स्वाश्रयावधि । एतावता नदेवार्थत्वं स्वेन यावत्क्षेत्र स्थितं तावति क्षेत्र आश्रयावधि- त्वमप्यस्तीति ज्ञेयम् । इति पष्ठो गुणः । ६ ॥४॥ व्याख्यार्थ:- अगुरुलघुता अगुरुलघुनामा गुण है; वह अतिसूक्ष्म है; अत एव जिनशास्त्रकी आज्ञासे ग्रहण करने योग्य है। क्योंकि-"जिन भगवान्से कहाहुआ जो सूक्ष्म तत्त्व है; वह हेतुओंसे खण्डित नहीं होता अतः सूक्ष्मतत्त्वोंको उनकी आज्ञासे. ही मानलेना चाहिये क्योंकि-जिनेन्द्र देव मिथ्यावादी नहीं हैं। १ ।" ऐसा कहा है। पुनः यह अगुरुलघुतारूप गुण कैसा है; कि-वाणीकी गोचरतासे वर्जित है; अर्थात् उसका कथन वाणीसे नहीं होसकता क्योंकि-"मगुरुलघुपर्याय सूक्ष्म है; वचनके अगोचर है" ऐसा वचन है । ऐसे अगुरुलघु नामसे जो पंचम गुण है; उसको अगुरुलघुत्व समझना चाहिये । ५ । अब “प्रदेशत्यमविभागी पुद्गलः स्वाश्रयावधि", इस उत्तरार्धका व्याख्यान करते हैं । विभागरहित पुद्गल जितने क्षेत्रमें स्थित रहता है; उस क्षेत्रमें व्यापनशील प्रदेशत्व गुण है । तात्पर्य यह कि जिस पुद्गलका विभाग नहीं' होता अर्थात् विभकव्यवहारता नहीं हो सकती और ऐसा वह अविभाग पुद्गल परमाणु जितने क्षेत्रमें रहे उतने ही क्षेत्रका अपनी स्थितिमे अवगाहन करनेवाला जो है; वह प्र- देशत्व है । पुनः वह प्रदेशस्त्र कैसा है; कि-खाश्रयावधि है । यहां स्वशब्दसे अपना ग्रहण है इससे अविमागी पुद्गलात्मक .अपना आधार (अधिकरण ) ही जिसकी मर्यादा है; इससे यह सिद्ध हुमा कि वह जितने क्षेत्रमें स्थित है; उतने ही. क्षेत्रमें आश्रयावधित्व भी है ऐसा जानना। यह प्रदेशस्यनामक पष्ठ गुण है । ६ । ॥ ४ ॥ सूत्रम् । चेतनत्वमनुभूतिरचेतनमजीवता। : रूपादियुक्त्वमूतत्वममूर्तत्वं विपर्ययात् ॥५॥ सूत्रभावार्थ: :-आत्माका जो अनुभव है वह वेतनत्व सप्तम गुण है । जीवरहितता स्वरूप अचेतनत्व अष्टम गुण है,। रूपादिसहित मूर्त्तत्वनामक नवम गुण है । इसके विपर्ययसे अर्थात् रूपादिरहित अमूर्त्तवनामा दशम गुण है ॥ ५ ॥ 'व्यारया । चेतनत्वमात्मनोऽनुभूतिरित्यनुभवरूपगुणः कथ्यते । योऽहं सुखदुःखादि . - १८८ . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् चेतये, अहं सुखी, अहं दुःखी इति चेतनाव्यवहार । ततो जातिवृद्धिभनक्षतसंरोहणादि- जीवनधर्मा भवन्तीति चैतन्यं सप्तमो गुणः । ७ । एनस्माद्विपरीतमचैतन्यमजीवमात्रम- जीवता जडत्वाचेतनावैकल्यमित्यचेतनत्वं गुणः । ८ । रूपादियुक् मूर्तत्वं मूर्तता, गुणः । रूपादिसन्निवेशाभिव्यङ्गयपुद्गलद्रव्यंमात्रवृत्तित्वम् । ९ । अमूर्त्तत्वं गुणो मूर्तत्वाभाव- समनितत्वमिति । १० । इति दशैव । अनाचेतनत्वामूर्तत्वयोश्चेतनत्यमूर्तत्वाभावरूपत्वान्न गुणत्वमिति नाशङ्कनीयम् । अचेतनामूद्रव्यं वृत्तिकार्यजनकतावच्छेदकत्वेन व्यवहार विशेषनियामकत्वेन च तयोरपि पृथग् गुणत्वात् तन्न पर्युदासार्थकत्वात्तत्र गर्भपदवाच्य- वाश्चानुप्णाशीतस्पर्श इत्यादी व्यभिचारेण परेपामप्यभावत्वानियामकत्वाद्भावान्तरम् । अभावोऽहि कयाचित्तु व्यपेक्षया इति नयाश्रयणेन दोपाभावाचेति ॥ ५ ॥ व्याख्यार्थ:--आत्माका जो अनुभवरूप गुण है; वह चेतनत्व है । अर्थात् यह मैं मुख तथा दुःखआदिका अनुभव करता हूं, अथवा मैं सुखी हूँ मैं दुःखी हूं यह जो व्यवहार होता है; सो चेतनत्वगुणसे ही होता है; और. इस चेतनत्वेसे ही उत्पन्न होके बड़ा होना, छिदै हुए कटे हुएका उत्पन्न होना व उगनामादि जीवनधर्म, होते हैं। इस लिये चेतनत्व यह सप्तम गुण है । और इस चैतन्यसे विपरीत अचेतनत्व गुण है; वह अजीवमात्रमें है। यह जड़ है इसलिये चेतनासे रहित है। ऐसे अचेतनत्वनामक अष्टम गुण है । रूपआदिका धारक . मूर्तत्वनामक नवम गुण है । यह मूर्तत्व गुणरूप रस आदिकी स्थितिसे जानने योग्य है; और पुद्गल द्रव्यमें ही रहता है । और मूतत्व के अ- मायके साथ समनियत अमूर्तत्वनामा दशम गुण है । ऐसे ये सब मिलके दश गुण हुए । यहांपर अचेतनत्व तथा अमूर्तत्व ये दोनो चेतनत्व तथा मूर्तत्यके अभावरूप हैं; अर्थात् चेतनत्वका अभाव अचेतनत्व है; और मूर्तत्वका अभाव अमूर्तत्व है; इसलिये भचेतनत्व तथा अमूर्तत्व पृथक् गुण नहीं हैं; ऐसी शंका न करनी चाहिये, क्योंकि-अचेतन (चेतनधर्मरहित जड पदार्थ) तथा अमूर्त ( धर्म जीवआदि ) द्रव्यवृत्ति जो कार्य उस कार्यके जनकतावच्छेदकत्वरूपसे विशेष.व्यवहार अर्थात् अचेतन तथा अमूर्तरूप व्यवहार- विशेषके नियामक कारणतारच्छेदक होनेसे अचेतनत्य और अमूर्तत्वको भी एयर गुणत्व है; और अचेतनत्व तथा अमूर्तत्व इन दोनो पदोंमें नन् समास जो है सो पर्यंदा- सार्थमें है। इसलिये यहां अचेतनका अर्थ "चेतनसे भिन्न चेतनसहश कोई द्रव्य और अमूर्तका अर्थ मूर्तसे भिन्न मूर्तसदृश द्रव्य" है । उन अचेतन तया अमूर्त द्रव्यों में रहनेवाला जो धर्म वही अचेतनत्व तथा अमूर्त्तव है क्योंकि-चेतनभिन्न तथा चे. तनसदृश अचेतनत्वमें समासगर्भ वाच्यताका ही अंगीकार है । और मनुष्णाशीतस्पर्श (१)नम् दो प्रकारका एक पयुदा और दूसरा प्रमुग्य, इनमें पहुंदाग तो ससा माही होता है। जसे" अग्रावग लाओ" यहां मानमभिन्न ब्राशगर हमी मनुष्यको लाशे ऐसा at: धीर प्रसज्य निषभर जैसे “मन्य" से दयामावा प्रहा होता है। 1 -- द्रव्यानुयोगतर्कणा। अर्थात् शीत तथा उष्णसे भिन्न स्पर्श इत्यादि पदोंमें व्यभिचार होनेसे नैयायिकको भी नको अभावनियामकंता सर्वत्र — नहीं है; इसलिये अमूर्त इससे मूर्तके अभावका नहीं किन्तु मूर्तसे भिन्न भावका ग्रहण करना चाहिये । अभाव तो किसी अपेक्षासे है। और इस नयके भाश्रयसे कोई दोप नहीं ॥ ५॥ : सूत्रम् । सामान्येन समाख्याता गुणा दश समुचिताः । परस्परपरीहारात प्रत्येकमष्ट चाप्ट च ॥ ६॥ सूत्रभावार्थ:--सामान्यरूपसे ये दश १० गुण संपूर्ण द्रव्योंको मिलाके कहे गये हैं। इनमें परस्परके परिहारसे अर्थात् परस्परविरोधी चेतनत्व अचेतनत्वआदिको छोड़के शेप प्रत्येक द्रव्यमें आठ आठ गुण रहते हैं ॥ ६ ॥ व्याख्या । एते दश गुणाः सामान्यगुणाः समुच्चिताः सर्वेषां द्रव्याणां समुधयेन कथिताः । तत्र मूर्त्तत्वममूर्तत्वम्, चैतनत्वमचेतनत्वं चेति चत्वारो गुणाः परस्परपरिहारेण वि- छन्ति । तत एकैकस्मिन्द्रव्ये प्रत्येकं प्रत्येकमष्टौ प्राप्यते । तत्कथं, यत्र चेतनत्वं तत्रा- चेतनत्वं नास्ति, यन्त्र च मूर्तत्वं तत्र चामूर्तत्वं नास्ति, एवं द्वयोरपसरणाच्छेपमष्टकमेय तिहति । तेन प्रतिद्रव्यमष्टैव गुणाः सामान्याः सन्तीति ध्येयम् ॥६॥ व्याख्यार्थः--ये पूर्वोक्त दश गुण सामान्यरूपसे सब द्रव्योंके मिलाके कहे गये हैं। इनमें से मूर्त्तव, अमूर्तत्व, चेतनत्य, तथा अचेतनत्व ये चार गुण, परस्परके परिहारसे द्रव्यमें रहते है । इससे यह सिद्ध हुआ कि-एक एक द्रव्यमें आठ आठ गुण होते हैं, यह इस प्रकारसे है; कि-जहां चेतनत्व है; वहां सचेतनत्व नहीं है, ऐसे ही जहां मुर्तत्व है। वहां अमूर्त्तत्व नहीं रहता है । इस रीतिसे दोनोंके निकाललेनेसे शेप आठ गुण प्रत्येक द्रव्यमें रहते हैं, इस कारणसे प्रत्येक द्रव्यमें आठ ही सामान्य गुण हैं; ऐसा जानना चाहिये ॥६॥ अथ विशेषगुणान् व्याचिख्यासुराह । अब विशेषगुणोंका वर्णन करनेकी इच्छासे कहते हैं । सूत्रम् । ज्ञानं दृष्टिः सुखं वीर्य स्पर्शगन्धी रसेक्षणे । गतिस्थित्यवगाहत्वयना हेतुनापराः॥७॥ सूत्रभावार्थ:-ज्ञान, दर्शन, सुख, तथा वीर्य ये चार आत्माके विशेष गुण है; तथा. रस, गन्ध, पन तथा वर्ग ये चार पुद्गलके विशेष गुण हैं। तया गति, स्थिति, भवगा- हन, और वर्तना ये धर्मादि द्रव्योंके हेतुतापरक गुण हैं ॥ ७ ॥ व्याख्या । ज्ञानगुणः, दृष्टिदर्शनगुणः मुरामिति मुग्गुणः, वीर्यमिति वीर्यगुणः, एते चत्वार आत्मनो विशेषगुणाः । पुनः पर्शगन्धौ स्पर्शगुगः गन्यगुणः, रसेक्षणे रसगुणः . १९०. रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् ईक्षणं वर्णगुणः, गते चत्वारः पुद्गलस्य विशेषगुणाः शुद्धद्रव्ये अविकृतरूपा एतेऽविशिष्टाति. टन्ति तत एते गुणाः कथिताः, विकृतस्वरूपास्ते पर्यायपु.मिलन्ति, इत्येवं विशेषोऽन्न ज्ञेयः । तथा पुन: गत्यादयो गुणा हेतुतापरा एतावता गतिहेतुता, स्थितिहेतुता, अवगाहहेतुता . वर्तनाहेतुता, एते चत्वारो गुणाः प्रत्येक धर्मास्तिकायाधर्मास्तिकायाकाशास्तिकायकाल- द्रव्यरणां क्रमेण सन्ति विशेषगुणाश्चत्वारः १ ७ ११ व्याख्यार्थ:-ज्ञानगुण १ दर्शनगुण २ मुखगुण ३ तथा वीर्यगुण ४ ये चारों मात्माके विशेष. गुण हैं । और स्पर्शगुण १ गन्धगुण . २ रसगुण ३ तथा वर्णगुण ४ ये चारों पुद्गलके विशेष गुण हैं । ये गुण शुद्ध द्रव्यमें अविकृतरूपसे रहते हैं। और विकृत (विकारसहित ) होनेसे वे पर्यायोंमें मिलते हैं, यह विशेषता जाननी चाहिये । और गति आदि गुण हेतुतापरक हैं; इससे यह सिद्ध हुआ कि-गतिहेतुता, स्थितिहेतुता, अवगाह- हेतुता, तथा वर्तनाहेतुता ये चारों गुण एक एक धर्मास्तिकाय आदिके हैं, अर्थात् गतिहेतुता धर्मास्तिकायका, स्थितिहेतुता अधर्मालिकायका, अवगाहनहेतुता आका- .शास्तिकायका, तथा वर्तनाहेतुता कालद्रव्यका, विशेषगुण है । इस प्रकार ये गति- हेतुताआदि चारों धर्मास्तिकायआदि चारों द्रव्योंके क्रमसे विशेप गुण हैं ।। ७.॥ सूत्रम्। चैतन्यादिचतुर्भिस्तु युक्ताः पोडशसंख्यया। 'विशेषेण गुणास्तत्राप्यात्मनः पुद्गलस्य पद ॥८॥ सूत्रभावार्थ:-चैतन्यआदि चारों गुणों के साथ पूक्ति द्वादश गुण मिलके सोलह गुण होते हैं, उनमेंसे भात्मा तथा पुद्गलके छः छः गुण होते हैं ॥ ८॥ व्याख्या । अधेतेषां द्वादशगुणानां पैतन्यादिचतुर्मियुक्ताश्चेतनत्वाचेतनत्वमूत्वादिभिश- तुभिः सहिताः सन्तः पोडश गुणा भवन्ति । सेषु. गुणेषु मुहलद्रव्यस्य वर्णगन्धरसस्पर्शमूर्त- स्वाचेतनत्यानि पट् सन्ति । आत्मद्रव्यस्य ज्ञानदर्शनमुसवीर्यामूर्तत्यचेतनत्वानीनि पद् गुणा भवन्ति । अथान्येपां द्रव्याणां समुदायेन जय एव गुणा भवन्ति, एको निजगुणः, अचेतन- त्यम्, अमूर्तत्वम्, इति विमृश्य धार्यम् ।।८. न्याख्यार्थ:--अब इन द्वादश गुणोंके जब चेतनत्वमादि चारों गुणों का योग होता है, अर्थात् ये पूर्वोक्त द्वादश गुण जब चेतनत्य, अचमतत्व, मूतत्व, और अमूर्तव्य इन चारों गुणों सहित होजाते हैं, तब सोलह विशेष गुण होजाते हैं। उन सोलह गुणोंमसे पुद्गलद्रव्यके वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, मूर्तत्व और अचेतनत्व ये छः विशेषगुण होते हैं। और आत्म(जीव)दव्यके ज्ञान, दर्शन, सुस, वीर्य, अमूर्तत्व तथा चेतनत्व ये पद विशेष गुण है। और अन्य द्रय समुदायसे तीन ही गुण होते हैं। उनमेंसे एक निजगुण तथा अचेतनत्य और अमूर्तत्व ऐसे दो ये, इस प्रकार विचारक निश्चय करना चाहिये ॥८॥ 4 .१९१ . द्रव्यानुयोगतर्कणा। सूत्रम् । अन्येषां चैव द्रव्याणां त्रीणि त्रीणि पृथक् पृथक् । खजात्या चेतनत्वाद्याश्चत्वारोऽनुगता गुणाः॥९॥ सूत्रभावार्थ:-अन्य द्रव्योंके पृथक् पृथक् तीन. तीन गुण होते हैं । और निज जातिकी अपेक्षासे चेतनत्वआदि चार गुण अनुगत हैं ॥९॥ व्याख्या । अन्येषां द्रव्याणां पृथक् पृथक् वयः २. गुणाः । यथा धर्मास्तिकायस्य गतिहेतु. तागुणः, अचेतनत्वगुणः, अमूर्तत्वगुणः । एवं त्रयोऽधर्मास्तिकायस्य स्थितिहेतुत्वाचेतनत्वा- मूर्त्तत्वादयः । आकाशास्तिकायस्यावगाहहेतुताचेतनत्वामूर्त्तत्यादयः । कालस्य वर्तनाहेतुत्वा- चेतनत्वामूर्त्तत्वादयः । इत्यादि ज्ञेयम् । अथ चेतनाद्याश्चत्वारः सामान्यगुणाः । चेतनत्वाचे. तनत्वमूर्त्तत्वामूर्त्तत्वानि सामान्यगुणेष्वपि सन्ति विशेषगुणेषु च सन्ति । तत्र किं कारणं चेतनत्वाद्याश्चत्वारः सामान्यगुणाः स्वजात्यपेक्षया अनुगतव्यवहारफारः सन्ति तस्मात्सा- मान्यगुणाः कथ्यन्ते ॥९॥ व्याख्यार्थ: -अन्य अर्थात् पुद्गल तथा जीवसे भिन्न द्रव्योंके पृथक् २ तीन २ विशेष गुण हैं । जैसे धर्मास्तिकायके गतिहेतुता, अचेतनत्व और अमूर्त्तत्य ये तीन विशेषगुण हैं, ऐसे ही अधर्मास्तिकायके स्थितिहेतुता, अचेतनत्व तथा अमूर्त्तत्व ये तीन विशेषगुण हैं । आकाशास्तिकायके अवगाहनत्व, अचेतनत्व, और अमूर्त्तत्व ये तीन विशेपगुण हैं। कालके वर्तनाहेतुत्व, अचेतनत्व तथा अमूर्तत्व ये तीन विशेषगुण हैं । इत्यादि जानना चाहिये । और चेतनत्वआदि अर्थात् चेतनत्व, अचेतनत्व, मूर्त्तत्व, और अमूर्तत्व ये चार सामान्यगुण हैं । चेतनत्व, अचेतनत्व, मूत्व तथा अमूर्तत्व ये चार सामान्यगुणोंमें भी हैं;.और विशेषगुणोंमें भी हैं। इसमे क्या कारण है ? ऐसा पूछो तो उत्तर यह है कि-चेत- नत्वादि चार सामान्यगुण निज आश्रयीभूत जातिकी अपेक्षासे अनुगत व्यवहारके करनेवाले हैं, इसलिये ये सामान्यगुण कहे जाते हैं ॥९॥ सूत्रम् । एत एव विशेषेण गुणा अपि जिनेश्वरैः । परजातेरपेक्षया ग्रहणेन परस्परम् ॥ १०॥ सूत्रभावार्थ:--और परजातिकी अपेक्षासे परस्पर ग्रहण करनेसे इन्हीं चारों गुणोंको श्रीजिनेवरोंने विशेषगुण भी कहा है ॥ १० ॥ व्याख्या। परजात्यपेक्षया घेतनत्वादयोऽचेतनत्वादिकेभ्यः स्वाश्रयव्यावृत्तिकराः सन्ति वतो विशेषगुणाः परापरसामान्यवत्सामान्यविशेषगुणत्वमेपामिति भावः । एत एव बिग ति सष्टम् ॥ १० ॥ व्याख्याः-चेतनकी अपेक्षा अचेतन पर है। इस परजातिकी अपेक्षासे चेतनत्वआदि भचेतनत्वमादिकसे निन आश्रयमें व्यावृत्तिकर हैं; इसलिये विशेषगुण है।

. रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् भावार्थ-जैसे द्रव्यत्व सामान्य पृथिवोत्वआदिकी अपेक्षासे पर है और दिव्य, गुण, तथा कर्मके ऊपर रहनेवाली सत्ता जातिकी अपेक्षासे अपर भी है ऐसे परापर सामान्यकी भांति चेतनस्वभादि गुणों के सामान्यगुणता तथा विशेषगुणता ये दोनों हैं । 'एत एव विशेषेण' इत्यादि पूर्वार्द्धका अर्थ तो स्पष्ट ही है, इसलिये व्याख्या नहीं की ॥ १० ॥ सूत्रम् । विशेपेण गुणाः सन्ति बहुस्वभावकाश्रयाः। अर्थेन ते कथं गुण्याः स्थूलव्यवहृतिस्त्वियम् ॥ ११ ॥ सूत्रभावार्थ:-अनेक स्वभावयुक्त पदार्थोंमें रहनेवाले विशेषगुण अनन्त हैं। उन सबकी पदार्थके साथ कैसे गुणना हो सकती है; इसलिये पुद्गलके विशेषगुण हैं; इत्यादि जो पूर्व कथन किया है। सो स्थूल व्यवहारसे जानना चाहिये ॥ ११ ॥ • व्याख्या । ज्ञानदर्शनसुखंबीया एत मात्मनो विशेषगुणाः, पारसगन्धवर्ण एते पुद्गलस्य विशेषगुणाः, इत्येतद्यत्कथितं तदियं स्थूलव्यवहृतिः स्थूलव्यवहारः । यतश्चाष्टौ सिद्धगुणाः, • एकत्रिशसिद्धगुणाः, एकगुणकालकाद्यः, पुद्गला अनन्ता, इत्यादिविचारणया विशेषगुणाना- मानन्त्योत्पत्तिः । सा च छद्मस्थज्ञानगोचरा नास्ति । अतोऽर्थेन ते कथं गुण्यास्तस्माद्धर्मास्ति- कायादीनां गतिस्थित्यवगाहनावर्तनाहेतुत्वोपयोगप्रणाख्याः पडेशस्तित्वादयः । सामान्यगु- णास्तु विवक्षया अपरिमिता इत्येवं न्याय्यम् । पपणां लक्षणवतां लक्षणानि पडेवेति हि को न श्रद्दधाति । गाथा 'नाणं च दंसणं घेव चरितं च तवो तहा। वीरियं उन ओगोय एवं जीवस्स लक्षणं ।। सद्वंधकारउजोया प्रभायावातहेव य । वण्णरसगंधफासा पुग्गलाणं तु लक्षणं ।' इत्यादि तु स्वभावविभावलक्षणयोरन्योन्येनान्तरीयकत्वप्रतिपादनायेत्यादि पण्डितैर्विचार. णीयम् ॥ ११॥ व्याख्यार्थ:- :-ज्ञान, दर्शन, सुख तथा वीर्य ये मात्माके विशेषगुण हैं; तथा स्पर्श, रस, गन्ध और वर्ण ये पुद्गलके विशेषगुण हैं। इस प्रकार जो कथन किया गया है। सो स्थूल व्यवहारसे है। ऐसा समझना चाहिये। क्योंकि-सिद्धोंके आठ गुण है, पुनः प्रकारान्त. रसे सिद्धोंके इकतीस ३१ गुण हैं, कालआदि एक गुणके धारक हैं, पुद्गल भनन्त हैं। इसलिये उनके गुण भी अनन्त हैं; इत्यादि विचारके करनेसे विशेपगुणों के अनन्तताकी उत्पत्ति होती है और वह छद्मस्थ ज्ञानके गोचर नहीं है । इस कारणसे पदार्थ के साथ उन सब विशेषगुणोंकी गणना कैसे हो सकती है; अर्थात् अल्पज्ञानावस्था में उन सब विशेषगुणोंका जानना तथा उनकी गणना करना दोनों ही असंभव है। इस कारणसे धर्मास्तिकायआदिके गति, स्थिति, अवगाहन, वर्तनाहेतुता, उपयोग तथा ग्रहणरूप फ्ट प्रकारके ही गुण समझने चाहिये । और अस्तित्वादि सामान्यगुण तो विवक्षासे अपरिमित (अपरिमाण) हैं; यही न्याय है, क्योंकि-पट् लक्षणवालोंके.अर्थात् द्रव्योंके लक्षण भी ६ ही है। इस विषयमें कौन नहीं श्रद्धान करेगा और "ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप, द्रव्यानुयोगतर्कणा। वीर्य तथा उपयोग ये पट जीवके लक्षण हैं । १ । शब्द, अंधकार, उद्योत, प्रभा, वर्ण, रस, गंध, तथा स्पर्श ये पुद्गलोंके लक्षण हैं।॥ २॥" इत्यादि जो कथन है; सो तो स्वभाव तथा विभाव लक्षणोंसे परस्परके भेदको प्रतिपादन करनेके लिये है; ऐसा पंडि- तोको विचार लेना चाहिये ॥ ११ ॥ सूत्रम् । स्वभावगुणतो भिन्ना धर्ममात्रविवक्षया । स्वस्वरूपस्य मुख्यत्वं गृहीत्वा समुदाहृताः॥ १२ ॥ सूत्रभावार्थ:-स्वभावगुणसे तथा धर्ममात्र विवक्षासे ये भिन्न हैं; परन्तु निज निज स्वरूपकी मुख्यताका ग्रहण करके ये गुण कहे गये हैं ॥ १२ ॥ व्याख्या । स्वभावगुणतो निजत्वव्यवहारेणधर्ममात्र विवक्षया अनुवृत्तिसंवन्धेन चैते भिन्नाः पृथक् २ सन्ति न कोऽपि कञ्चिन्मिश्रीभवति । परन्तु स्वस्वरूपस्य निजनिजरूपस्य मुख्यत्वं प्राधान्यं गृहीत्वा अनुवृत्तिसंवन्धमात्रमनुसृत्य समुदाहृताः यत्स्वभावाः सन्ति त एव गुणी: कृत्य दर्शिताः । तत इदमत्र योध्यम्-धर्मापेक्षया अत्रैते गुणात्मकाः पदार्थाः पृथक्स्वभावगुणतो भिन्ना उक्तास्तत्तु निजकीयनिजकीयरूपमुख्यतां गृहीत्वैव स्वभावगुणीकृत्योपदिष्टा इत्यर्थः । तस्मादत्र गुणविभागं कथयित्वा अप्रे प्रतिपाद्यमानपद्ये स्वभावविभावयोः कथनमुदाहरिष्य- वीति ध्येयम् ।। १२॥ व्याख्यार्थ:-स्वभावगुणसे अर्थात् निजत्व वा आत्मीयत्व व्यवहारसे और धर्म- मात्रकी विवक्षासे अर्थात् अनुवृत्तिसंबन्धसे ये सब गुण पृथक् २ हैं; कोई किसीसे नहीं मिलता । परन्तु अपने अपने स्वरूपकी मुख्यता(प्रधानता)को ग्रहण करके अर्थात् अनुवृत्ति संबन्धमात्रका अनुसरण करके जो स्वभाव है, वे ही भिन्न करके दर्शायें हैं। इसलिये यहांपर ऐसा जानना चाहिये कि-धर्मकी अपेक्षासे जो ये गुणरूप पदार्थ पृथक पृथक् स्वभाववाले गुणसे भिन्न भिन्न कहे गये है; वे निज निज रूपकी मुख्यताको ग्रहण करके ही उस प्रकारके स्वभावके गुण करके उपदेश किये गये हैं, यह तात्पर्य है। इसलिये यहाँपर प्रथम गुणका विभाग कहकर, आगे कहे जानेवाले श्लोकमें स्वभाव तथा विभावके कथनका उदाहरण दिया जायगा ऐसा समझना चाहिये ॥ १२ ॥ सूत्रम् । अस्तिस्वभाव एपोऽत्र स्वरूपेणार्थरूपता । स्वभावपरभावाभ्यामस्तिनास्तित्वकीर्तनात् ॥ १३ ॥ सूत्रभावार्थ:--यहांपर पदार्थके निजस्वरूपसे जो अर्थरूपता है; वह अस्तिस्वभाव है। क्योंकि-स्व(अपने)भावसे अस्तित्व और परभावसे नास्तित्वका कथन होता है ॥१३॥ व्याख्या । अत्रेति गुणप्रस्तावनायां प्रथममस्तिस्वभावस्तु एषः स्वरूपेण निजकीयरूपेणा- यरूपता द्रव्ययाथात्म्यं वद्रव्यस्वक्षेत्रस्वकालस्वभावैश्य भावरूपतैव शेया । कस्मारस्वभावप. रभाषाभ्यामस्तिनास्तित्वकीर्तनात् । यथा स्वभावेनास्तित्वं स्वभावोऽस्ति तथैव परभावन नास्तित्वं स्वभावोऽप्यस्ति । ततोऽत्रास्तिस्वभावः कारणी वर्त्तते कथं तदस्तिस्वभावो हित 4 २५ रायचन्द्र जैनशाखमालायाम् निजरूपेण भावरूपतास्ति । यथा परस्वभावेव नास्तिस्वभावानुभवनं तथा निजभावेन स्वमा- वानुभवनमपि जायते । अत उभयत्र कार्यरूपोऽस्तिस्वभाव इति ॥ १३ ॥ व्याख्यार्थ:-यहां अर्थात् गुणके प्रस्ताव(प्रसंग)में प्रथम अस्तिस्वभाव यह है कि-- वस्तुमें स्वरूपसे अर्थात् अपने रूपसे जो अर्थरूपता अर्थात् द्रव्यको यथार्थता है; बुद्दी खद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल, और स्वमावसे भावरूपता है; ऐसा जानना चाहिये । क्योंकि- खभावसे अस्तित्व तथा परभावसे नास्तित्वका कथन है। भावार्थ-जैसे अपने भावसे अलिख खमाव है। ऐसे ही परके भावसे नास्तित्वसमाव मी वस्तुमें है। इसलिये यहां असिसमाव कारणीभूत है । वह किस प्रकारसे है। फि-समाव ही वहां निजरूपसे भावरूपता है। जैसे परके भावसे नास्तिस्वभावका अनुभव होता है, वैसे ही निजभावसे समावफा भी अनुमवन होता है। इस हेतुसे अस्तित्व तथा नास्तित्व इन दोनों में कार्यरूप अस्ति स्वभाव है ।। १३॥ सूत्रम् । न चेदित्थं तदा शून्य सर्वमेय भवेदिदम् । परभावेन सत्त्वे तु सर्वमेकमयं भवेत् ।। १४ ।। सूत्रभावार्थ:-यदि ऐसा न हो अर्थात् अपने भावसे अस्तित्व न माना जाये तो यह संपूर्ण जगत् शून्य होजाय, और परमायसे यदि सत्त्व अङ्गीकार करें तो सब एकमप अर्थात् एकरूप ही होजाय ॥ १४ ॥ न्यारया । घेद्यदि मसिस्वमायो नाङ्गीकियते परभावापेक्षया यया नास्तित्वं तया स्वभा- वापेक्षयापि नास्तित्वावलम्यने सति सर्व जगदिदं प्रपषयमानव्यविफरमपि शून्यं भवेत् । तस्मात्स्वद्रव्यापेक्षया अस्तिस्यमाचः सर्वथैवाङ्गीकरणीयः । परभावन परद्रय्यारापेक्षयापि नासित्वसभावोऽप्यवश्यमगीकर्तव्य इत्यर्थः। तया प परभावनापि सत्तामम्निस्वभायमनी. मुर्वतां सर्वस्वरूपेणास्तित्वे जायमाने प जगदेफरूपं भवेत् । पसु सकलशात्रव्यवहारविरुद्ध मस्ति । वस्मात्परापेक्ष्या नास्तिस्वमाय एव समस्ति । अय मत्ता तु स्वभावेन यानुविषय शापयति, अतः सति सत्यमसि । अससा तु स्वशानेन परमुरनिरीक्षण पुरवे सतः कल्प- नया शानविपयत्वेन प असत्तेससत्यमति । इत्यं योद्धानां मतं यतो ॥ १४ ॥ व्याख्यार्थ:-यदि असिसभावको नहीं करते हो तो असे परमापकी अपेक्षासे नासिय से ही स्वभावकी अपेक्षासे नास्तित्वका प्रहण होजानसे यह सब जगत् अर्थात् प्रपंध्यमान पतिकर भी शून्य होजायगा । इस कारणसे स्वीय द्रष्य, क्षेत्रमादिकी अपेक्षा अलि- समावको अवश्यमेव मानना चाहिये, और हमी प्रकार परमायमै भर्यान् परदम्यादिकी अपेक्षासे नासिस्वभाव भी भवाय सीकृत करना पादिपे पर तासर्य है । और परभावी भीत् मन्यके द्रण क्षेत्रमादिकी अपेशारो भतिसमारठी स्वीकार करनेगर मतगे सर्व स्वमायसे नित्य सिद्ध होजानेपर संपूर्ण जगत् एफरप ही होगायगा, और माया मगत जगल्फा एफरस हो जाना सय ग्रासोग विरुद्ध है, इसलिये परकी अशा . द्रव्यानुयोगतर्कणा। नास्तिस्वभाव ही समीचीन है । “अब सत्ता तो अपने अस्तिखभावसे वस्तुविषयताको ज्ञापित ' करती है; अर्थात् वस्तुको जताती है; इसलिये सत्ता यह सत्य है, और असत्ता अपने असत्विषयक ज्ञानसे केवल परके मुखकी ओर ताकती है, इसलिये केवल कल्पनासे ज्ञानका विषय होनेसे अर्थात् कल्पनामात्रसे ज्ञानमें भासनेसे असत्ता असत्य (मिथ्या) है" ऐसा बौद्धोंका मत है ॥ १४ ॥ तदेव खण्डयन्नाह । अब इसी असत्ताको मिथ्या कहनेवाले बौद्धोंके मतका खंडन करते हुए कहते हैं। सूत्रम्। यत्सत्तावदसत्ता तु न स्फुरेद् व्यञ्जकं विना । तत्सन् शरावगन्धोऽपि विना नीरं न संभवेत् ॥ १५ ॥ सूत्रभावार्थ:-जैसे सत्ता तत्क्षण स्फुरायमान होती है; वैसे जो असत्ता नहीं स्फुरायमान होती है, तो इसमें व्यंजकका नहीं मिलना कारण है. क्योंकि-शरावमें विद्यमान शरावका गंध भी जलके विना नहीं जाना जाता है ॥ १५॥ व्याख्या। यत्सत्तावत् तत्क्षणमेवासत्ता तु न स्फुरेत, तत्तु व्यसकं विना व्यंजकस्यामि- लनवशतः।परन्तु शून्यत्वेन, अथ चतुच्छत्वेन नास्ति । तत्र दृष्टान्तमाह । तदिति उदाहरण- सन् विद्यमानः शरावे वर्तमानः शरावगन्धोऽपि नीरं विना नीरस्पर्शनमन्तरेण न संभवेत् न ज्ञायते । एतावता गन्धापेक्षा असत्या नास्ति किन्तु केपांचिद्वस्तूनां गुणाः स्वभावनानुभू- यन्ते, केपांचिच्च प्रतिनियतव्य लकव्यङ्गया एव सन्तीत्येतद्वस्तुवैचित्र्यमस्ति । परन्त्वेकस्यैव कस्यचिद्धर्मस्य न्यूनत्वकथने बहुव्यवहारविलुप्तिर्जायते । उक्तं च श्रीमद्यशोविजयोपाध्यायै- र्भापारहस्यप्रकरणे " हुंति परावेक्खा वंजयमुहदसिणोऽवि णयतुच्छा । दिमिणं वेयित्वं सरावकप्पूरगंधाणं" ॥ १५ ॥ व्याख्या:-जो सत्ताकी भांति असत्ता उसी क्षण स्फुरित (प्रकट ) नहीं होती है सो व्यंजकके विना अर्थात् व्यंजकके न मिलनेसे तत्काल स्फुरित नहीं होती । परन्तु असत्ता शून्य है, अथवा तुच्छ है, इसवास्ते स्फुरित नहीं होती यह बात नहीं है । इस विषयमें दृष्टान्त कहते हैं। सूत्रमें तत् शब्द जो है सो उदाहरणका प्रदर्शन करता है इस लिये उदाहरण यह है कि शराव अर्थात् सरवा (मृत्तिकाका बना हुआ कोरा पात्र) जो है उसमें विद्यमान जो उस शरावका गंध है वह भी जलके स्पर्शविना नहीं जाना जाता। इससे तात्पर्य यह है कि शरावमें विद्यमान गंध असत्य नहीं है किन्तु सत्य ही है। परन्तु वह जो जलस्पर्शके विना नहीं जाना जाता है इसमें वस्तुकी विचित्रताही कारण है। कितनेही पदार्थोके गुण खभावसेही अनुभूत होते हैं और कितनेही पदार्थोके गुण प्रतिनियत जो व्यंजक हैं उनसेही जाने जाते हैं यह वस्तुस्वभावकी विचित्रता है । परन्तु वस्तुमें तत्क्षणे वह धर्म स्फुरित न हो तो उसकी न्यूनता (कमी) कह देनेसे बहुत से व्यवहारोंका लोप हो जाता है। और इस विषयमें श्रीयशोविजयजी उपाध्यायने "भापा.

१९६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् रहस्यप्रकरण में कहा भी है कि "नास्तिस्वभाव परकी अपेक्षा रखते हैं और तुच्छ. नयके विषय हैं और व्यंजकका मुख देखा करते हैं । यह वस्तुका वैचित्र्य शराव तथा- कपूरके गंधमें देखा हुआ है अर्थात् जैसे शराव तथा कपूरका गंध व्यंजक विना प्रकट नहीं होता वैसे नास्तिस्वभाव भी व्यंजककी अपेक्षा रखता है ।। १५ ।। सूत्रम् । यत्खखानेकपर्यायैर्भिन्नं द्रव्यं तदेव हि । नित्यानित्यवभावेन पर्यायपरिणामता ॥ १६ ॥ सूत्रभावार्थ:-जो निज निज अनेक पर्यायोंसे भिन्न अर्थात् भेदक द्रव्य है वहीं नित्य तथा अनित्य खभावसे पर्यायकी परिणामता है ॥ १६ ॥ व्याख्या । यत्स्वस्वानेकपर्यायैर्निजनिजक्रममाविभिः श्यामत्वरक्तत्वादिभिभिन्नं भेदक द्रव्यं वर्तते परन्तु तदेव हि निश्चितं द्रव्यं तदेव यत्पूर्वमनुभूतमभविष्यदित्येतत्तत्त्वज्ञानं यस्माजायते तन्नित्यस्वभावत्वं कथ्यते "तद्भावाव्ययं नित्यमिति" सूत्रम् । प्रध्वंसाप्रतियोगित्वं नित्यत्वमित्यस्थाप्यत्रैव पर्यवसानं केनचिद्रूपेणैव तल्लक्षणव्यवस्थितः । अनित्यखभावपर्याय रिणतिर्येन प्राप्यते, येन च रूपेणोत्पाव्ययौ स्तः, तेन रूपेणानित्यस्वभावोऽस्ति । ततो नित्या- नित्यस्वभावेन पर्यायपरिणामता ज्ञेया ॥ १६ ॥ व्याख्यार्थः--जो अपने अपने क्रममावी श्यामल तथा रक्तत्व आदि पर्यायोंसे भिन्न अर्थात् भेदक द्रव्य है परन्तु निश्चय करके वही द्रव्य है जो पहले अनुभवमें आया हुआ है और आगे अनुभवमें आवेगा, ऐसा तत्त्वज्ञान जिसके द्वारा होता है उसको नित्यस्व- भाव कहते हैं। क्योंकि "तगावाव्ययं नित्यम्" "जिसके खमावका नाश न हो वही नित्य है" ऐसा सूत्र है । और 'जो ध्वंसाभावका अप्रतियोगी है वह नित्य है' इस लक्षणका भी यहां ही समावेश है; क्योंकि चाहे जैसा लक्षण करो अविनाशीखरूपकी स्थितिमें तात्पर्य है । और अनित्य स्वभावरूप पर्यायोंका परिणाम जिसके द्वारा प्राप्त होता है तथा. जिस रूपसे उत्पत्ति और नाश होता है उस रूपसे अनित्यस्वभाव है। इस कारणसे नित्य और अनित्य स्वभावसे पर्यायोंका परिणाम जानना चाहिये ।। १६ ॥ सूत्रम् । सदस्तु नाशयन् रूपान्तरेणाभाति यद्विधा । सत्सामान्यविशेषाभ्यां स्थूलार्थान्तरनाशता ॥ १७ ॥ सूत्रभावार्थ:--विद्यमान वस्तुको रूपान्तरसे नष्ट करता हुआ जो द्रव्य दो प्रकारका भासता है सो सत् सामान्य .और विशेषसे स्थूल अर्थान्तरकी नाशता होती है ॥ १७ ॥ व्याख्या । सद्वस्तु विद्यमानं वस्तु रूपान्तरेण पर्यायविशेषेण नाशयन्नवस्थान्तरमापादयन् गद्न्यं द्विधा विभेदमेतद्रूपेण निसमेतद्रूपेणानित्यं चेति वैचित्र्यमाभाति । यथा च सत्सामा न्यविशेषाभ्यां स्थूलार्थान्तरनाशतेति विशेषस्य सामान्यरूपत्वादनित्यत्वं, यथा घटनाशेऽपि .

पसे स्थूल हुए तथा अनुत्पन्न कारणसे कार्य सिद्ध होता है ऐसा कथन करोगे तो कार्यकारणभावका द्रव्यानुयोगतर्कणा। १९७ मृद्रव्यानुवृत्तेः। तथा पुनः सामान्यस्यापि स्थूलार्थान्तरघटादिनाशेऽनित्यत्वं, घटनाशे मृन्नघट इति प्रतीतेः॥ १७ ॥ व्याख्यार्थ:-विद्यमानवस्तुको रूपान्तरसे अर्थात् पर्यायविशेषसे एक अवस्थासे दूसरी अवस्था प्राप्त करते हुए जो द्रव्य दो भेदयुक्त अर्थात् इस रूपसे नित्य है और इस रूपसे अनित्य है इस प्रकार विचित्रतासे भासता है; वहां सरसामान्य तथा विशे- अर्थान्तरकी नाशता है. जैसे-विशेषके सामान्यरूपसे अनित्यता है। दृष्टान्त- घटके नाश होनेपर भी मृत्तिकारूपकी अनुवृत्ति अन्य पर्यायोंमें होती है । और सामान्यके भी स्थूल पदार्थांतर घट आदिका नाश होनेपर अनित्यता है। क्योंकि घटरूपसे जो मृत्तिका है वह घट नहीं है ऐसी प्रतीति होती है ॥ १७ ॥ सूत्रम् । नित्यत्वं नास्ति चेत्तत्र कार्य नैवान्वयं विना। कार्यकालेऽप्यसन हेतुः परिणति विगोपयेत् ॥ १८ ॥ सूत्रभावार्थ:-यदि पदार्थकी नित्यता नहीं मानोगे तो अन्वयके विना कार्य- की उत्पत्तिही न होगी । और कार्यकालमें भी अविद्यमान हेतु परिणामको नहीं होने देगा ॥१८॥ व्याख्या । चेद्यदि नित्यत्वं नास्त्यथ चैकान्तक्षणिकमेव स्खलक्षणमस्ति । तत्र त्वन्वयं विना कार्य नो निप्पद्यते । यतः कारणक्षण कार्यक्षणोत्पत्तिकाले च निर्हेतुकनाशमनुभवन्नसन्नेवास्ति। तथ कार्यक्षणपरिणतिं कथं कुर्यात्, असत्कारणक्षणः कार्यक्षणं करोति तदा विनष्टकारणाद- थवानुत्पन्नकारणात्कार्य निष्पन्नं युज्यते, तदा तु कार्यकारणभावस्य विडम्बना जायते । भवहित एव यः कारणक्षणः कार्यक्षणं च कुरुत एवं यदोच्यते तदापि रूपालोकमनस्कारादि- क्षणरूपादीनां विषय उपादानालोकादिकविषये च निश्चितमिति व्यवस्था कथं घटते । यतोऽन्वयं विना शक्तिमात्रविषय उपादाननिमित्तविषयेऽपि कथयितुर्व्यवहारो न स्यात् , तस्मादुपादानमित्यन्वयित्वेन मन्तव्यम् । अथान्वयित्वं च तदेव नित्यस्वभावत्वं मन्तव्य मित्यर्थः ॥१८॥ व्याख्यार्थ:-यदि पदार्थकी नित्यता नहीं है किन्तु सर्वथा क्षणिक रूपही पदार्थका लक्षण है ऐसा मानते हो तो इस माननेमें कारणके अन्यय अर्थात् किसी स्वभावकी अनुवृत्ति विना कार्य नहीं सिद्ध हो सकता । क्योंकि कारणका क्षण कार्यक्षणके उत्पत्ति कालमें भी हेतुरहित होकर नाशका अनुभव करता हुआ असत्रूप ही है और वह असत् कारणक्षण कार्यक्षणका परिणाम कैसे करेगा क्योंकि जब असत् कारणक्षण ही कार्य क्षणकी उत्पत्तिको करेगा तब विनष्ट कारणसें कार्य उत्पन्न होता है अथवा अनुत्पन्न (नहीं पैदा हुए)कारणसे कार्य उत्पन्न होता है ऐसा कथन करना टीक होता है। और नट मानना यह विडम्यनाही है । भावार्थ-नष्ट तथा अनुत्पन्न कारण कार्यको से - २ १९८ रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् सकता है ?.अपि तु नहीं कर सकता । भव यदि यह कहो कि अवहित जो कारणक्षण है वही कार्यक्षणको भी करता है तब भी रूपका देखना तथा मनका व्यापार करना इत्यादि- के क्षणसहित रूपादिके विषयमें तथा उपादानकारण जो मालोकादि हैं उनके विषय में कारणक्षण निश्चित है यह व्यवस्था कैसे घटित हो सकती है ? क्योंकि, अन्वयके विना शक्तिमात्रके विषयों और उपादान निमित्तके विषयमें भी कथन करनेवालेका व्यवहार नहीं हो सकता। क्योंकि, वह उपादानता तो क्षणिक होनेसे उसी क्षणमें नष्ट होगयी फिर कार्यदशामें ( घटरूप अवस्थामें ) उपादान कारण ( मृत्तिका ) है यह व्यवहार कैसे हो सकता है ? । इस लिये उपादान कारणकी कार्यदशामें अनुवृत्ति रहती है यह वार्ता अवश्य मन्तव्य है। जो अन्वयपना है वही नित्य स्वभावत्व है ऐसा मानना चाहिये यह अर्थ है ॥ १८॥ सूत्रम् । सर्वथा नित्यता नास्ति न स्यादर्थक्रिया तदा। दलस्य कार्यरूपत्वानुत्पन्नत्वं विपीदति ॥ १९॥ सूत्रभावार्थ:--और सर्वथा कारणरूपकी नित्यता भी नहीं है क्योंकि सर्वथा नित्यता माननेमें अर्थक्रिया न होगी; क्योंकि . कारणके सर्वथा नित्यपनेमें कार्यरूपसे उत्पत्ति नहीं घटित होती है ॥ १९ ॥ व्याख्या । यदि सर्वथा नित्यस्वभावो मन्तव्यः अथाप्यनित्यता अनित्यतास्वभावः सर्वथा नास्त्येवमङ्गीकारेऽर्थक्रिया न स्यादर्थक्रिया न घटते । यतो दलस्य कारणस्य कार्यरूपत्वानु- त्पन्नत्वं विपीदति, कारणस्य कार्यरूपता परिणतिः कथंचिदुत्पन्नत्वमेवागतम्, सर्वथा अनु. त्पन्नत्वं तु विपीदति विघटितं भवतीति । अपरं च यद्येवं कथ्यते कारणं तु नित्यमेव तद्वृत्ति कार्य त्वनित्यमेव । तदा कार्यकारणयोरभेदसंवन्धः कया युक्त्या घटते । भेदसंबन्धाङ्गीकारे सत्संयन्धान्तरादिगवेषणया अनवस्था भवेत् । ततः कथंचिदनित्यस्वभावोऽपि माननीयः । इति भावार्थः ॥ १९॥ व्याख्यार्थ:- यदि सर्वथा (एकान्तरूपसे) नित्य स्वभावही माना जाय और अनित्य स्वभाव सर्वथा नहीं है ऐसा माना जाय तो अर्थक्रिया नहीं हो सकती । कारण कि कारणके कार्यरूप अनुत्पन्नता विघटती है अर्थात् कारणकी जो कार्यरूपमें परिणति है उससे कथंचित् उत्पन्नता ही आई और अनुत्पन्नता तो सर्वथा संगत नहीं होती है । और यदि ऐसा कहते हो कि कारण तो नित्यही है और उसमें रहनेवाला कार्य अनित्य ही है तब कार्य और कारणका जो अभेदसंबन्ध माना गया है वह किस युक्तिसे सिद्ध होगा ? क्योंकि नित्यता तथा अनित्यताका अभेदसंबन्ध नहीं हो सकता । तथा यदि कार्य और कारणका भेदसंबन्ध मानो तो वह संबन्ध किस संबन्धसे रहता है। जो संवन्ध उसमें रहता है वह किस संबन्धसे है ?

+ द्रव्यानुयोगतर्कणा। इत्यादि संबन्धोंके खोज करनेसे अनवस्था दोष हो जायगा । इस लिये कथंचित् भनित्य स्वभाव भी अवश्य माननेके योग्य है। इस प्रकार श्लोकका तात्पर्य है।॥ १९ ॥ सूत्रम् । खभावकाश्रयत्वे त्वेकखभावविलासता। अनेकार्थप्रवाहणानेकखभावसंभवः ॥२०॥ सूत्रभावार्थ:--स्वभावोंका एकाश्रय स्वीकार करनेपर एक स्वभावकी विलासता है तथा अनेक स्वभावयुक्त पदार्थके प्रवाहसे अनेक स्वभावका भी संभव है ॥ २० ॥ व्याख्या 1 स्वभावैकाश्रये स्वभावो हि सहभावी धर्मस्तस्याधारत्वे स्वभावकाश्रयत्वे त्वेक- स्वभावो यथा रूपरसगन्धस्पर्शानामाधारो घटादिरेकः कथ्यते । नानाधर्माधारत्व एकस्वभा- यता नानाक्षणानुगमनत्वे नित्यस्वभावता इत्ययं विशेषो ज्ञेयः। मृदादिद्रव्यस्य स्थासकोशकुसू- लादिका अनेके द्रव्यप्रवाहाः सन्ति तेनानेकस्वभावप्रकाशे पर्यायत्वेनादिष्टं द्रव्यं क्रियते, तदा आकाशादिद्रव्येष्वपि घटाकाशादिभेदेनैतत्स्वभावदुर्लभता नास्ति । एवमनेकार्थप्रवाहेणानेक- स्वभावसंभव इति ॥२०॥ व्याख्यार्थ: :-स्वभावका अर्थ है द्रव्यके साथ होनेवाला धर्म, उसके आधारको एक माननेसे एक स्वभाव होगा । जैसे-रूप, रस, गंध तथा स्पर्शका आधार (मआश्रय) घट आदि पदार्थ एक कहा जाता है। और नानाप्रकारके धमाका आधार होनेपर एकस्वभावता अर्थात् नानाक्षणमें वही मृत्तिकारूप द्रव्यका जो अनुगमन (अनुवृत्ति) है वह नित्यख- भावता है, यह विशेष जानना चाहिये । और मृत्तिका आदि द्रव्यके पिंड, कोश, कुसूल आदि अनेक द्रव्यप्रवाह होते रहते हैं इससे अनेकखभावयुक्त भी पर्याय रूपसे द्रव्य होता है । और जब ऐसा हुआ तब आकाश आदि द्रव्योंमें भी घट आकाश, मठ आकाश, भादि भेदोंसे नानाखभावता (अनेक स्वभावपना) दुर्लभ नहीं है । इस प्रकारसे नाना- प्रकारके स्वभावयुक्त द्रव्यका प्रवाह होनेसे द्रव्य नानास्वभावका धारक है, यह भी पक्ष संभव है ॥ २० ॥ सूत्रम् । विनैकत्वं विशेपो न सामान्यानावतो लभेत् । अनेकत्वं विना सत्ता विशेपाभावतो नहि ॥ २१ ॥ सूत्रभावार्थ:-एक स्वभावके अभावमे सामान्यके विना विशेषकी प्राप्ति नहीं होती और अनेक स्वभावके विना विशेषका अभाव होनेसे सत्ता (सामान्य) की प्राप्ति नहीं होती है ॥२१॥ व्याख्या । एकत्वं विना एकस्वभावं विना सामान्याभावेन विशेषो न प्राप्यते । तथा अनेकत्वं विना अनेकस्वभावमन्तरेण सत्ता अपि न घटते । तत एकानेकेसि स्वभावय- मङ्गीक योग्यम् । तथैव विशेषाभावतो नहीति, विशेषमन्तरा सामान्यं न, सामान्यमन्तरा विशेपो नेति। एक विना अनेकचा न, अनेकं विना नैकत्वमिति ॥ २१ ॥ ।

२०० रायचन्दजैनशास्त्रमालायाम् व्याख्यार्थ:--एकस्वभावके विना सामान्यका अभाव हो जायेगा और सामान्य के अमावसे विशेषकी प्राप्ति नहीं होती, ऐसेही अनेक स्वभावके बिना सर्ववर्तिनी सत्ता भी नहीं घटित होती । इस लिये एक तथा अनेक ये दोनों खभाव वस्तु के अंगीकार करने चाहिये । ऐसेही विशेषके विना सामान्यस्वरूप नहीं । अर्थात् विशेपके विना सा. मान्य और सामान्यके विना विशेष नहीं है। एफके विना अनेकता नहीं है और भने- कके विना एकत्व नहीं है ॥ २१ ॥ सूत्रम्। संज्ञासङ्ख्यादिभेदेन मेदखभावता द्वयोः। अभेदवृत्तिलक्षणं यत्तदेवाभेदभावनम् ॥ २२॥ सूत्रभावार्थ:--संज्ञा तथा संख्या मादिके भेदसे गुण गुणी आदिके भेद स्वभाव है। और अभेदत्ति जो लक्षण है यही अभेद-भावना है ॥ २२ ॥ घ्याप्या । द्वयोरिति गुणगुणिनोः पर्यायपर्यायिणोः फारफकारफिनोः संज्ञासंण्यादिभेदेन छत्वा भेदस्वभावता ज्ञातव्या । यदभेदत्तिलक्षणं भेदरहितवृत्तलक्षणवत्त्वं तदेवाभेदस्वभावो. ऽभेदभावनं ज्ञेयम् ।। २२॥ व्याख्यार्थ:--सूत्रमें "दयोः" यह जो पद है इससे गुण गुणी, पर्याय पर्यायी, तथा कारक और कारकी (जिसमें कारकका व्यवहार होता है उसे कारकी कहते हैं) इन दो दोके संज्ञा, संख्या आदिके द्वारा भेद स्वभावपना जानना चाहिये । भोर भेदवृत्तिसे रहित जो लक्षण है उस लक्षणसहितको ही अभेदखभाव जानना चाहिये ॥ २२ ॥ सूत्रम्। भेदं विनकतामीपां ततो व्यवहतिक्षयः। अनभेदात्कथं योधी हानाधारयतोर्दयोः ।। २३ ।। सूत्रभावार्थ:-भेदस्वभावके बिना इन सब द्रव्य, गुण तथा पर्यायोको एकताको जायगी, भीर सबकी एकता होनेसे व्यवहारका अभाव होगा तथा अभेदके बिना आधार- शून्य दोनों गुणपर्यायोंका बोध भी कैसे होगा ॥ २३ ॥ व्याख्या । भेदं विना भेदस्वभावं विना अमीयां सर्पद्रव्यगुणपर्यायाणामेकता ऐक्यं स्यात् । तेन त्वा इदं द्रव्यम्, अयं गुणः, अयं पर्यायः, इति व्यवहारम्य विरोधो जायन । भन्सामेश्वभरको यदि ३ ध्यंत सदा अनाभारयोनिराधारयोदयो म प ध । आधाराधेययोरमदं विना द्वितीयः संयन्धो न पटते । अत्र प्राचनमारगाया "एपिभरापद। सतं पुधत्तमिदि सामनं हि वीरस्म । मममसमायो ण सग भरदि फपमेगं "RE | व्याख्या:--भेद स्वभावकै विना इन सय द्रव्य, गुण तथा पर्यायोटी एकता होना- यगी और सपकी एकता होने यह द्रव्य है, यह गुण है, तया यह पर्याय है इत्यादि गवहारका विरोध होता है और यदि अभेद समान नहीं कहते हैं तो भाधाररदिन दोनोंका योध भी कैसे होवे क्योंकि आधार गया मायके अभेद रिना दूसरा संबन्ध - यानुयोगतर्कणा। २०१ घटित नहीं होता है । इस विषयमें प्रवचनसारकी गाथा भी है। उसका भाव यह है कि प्रविभक्तप्रदेशता है वही पृथक्त्व है ऐसा श्रीवीरभगवानका उपदेश है और जो अन्यत्व है वह अतद्भाव है अर्थात् उसका खभाव नहीं है। क्योंकि वह उसमें नहीं होता इसलिये दोनों एक नहीं है अर्थात् गुण गुणी रूपतासे एकता नहीं है ॥ २३ ॥ सूत्रम् । अवस्थितात्मरूपस्याविर्भावाव्यमिप्यते। सदाश्रयन्परं भावमभवनितरः स्वतः॥ २४॥ सत्रभावार्थ:-अवस्थित द्रव्यभावके आविर्भावसे भव्यस्वभाव है तथा सदा परभा- वका आश्रय करता है वह समावसे इतर (भिन्न) अर्थात् अभव्य स्वभाव है ॥ २४ ॥ घ्याख्या । अवस्थितात्मभावस्पानेककार्यकारणशक्तिकं यद्वस्थितद्रव्यं तम्यावस्थित द्रवस्याविर्भावात्क्रमिकं विशेषान्ताविर्भावाभिव्यङ्ग्यं भव्य भन्यस्वभावमिप्यते । अथ सदा त्रिकालं परं भावं परद्रव्यानुगतिवं श्रयन्परस्वभावेन परिणमन्यः स्यात्तत्स्वतः स्वभावत इतरोऽभव्यस्वभाव इति कथ्यते ।१०। 'अण्णोण्णं पविसंता दिता ओगासअण्णमण्णस्स । मेलं, ताविय णिचं सगसगभावं ण विजहति ।। इति भावस्वभावार्थो शेयः ॥ २४ ॥ व्याख्यार्थ:--अनेक कार्यकारणकी शक्तियुक जो भवस्थित द्रव्य है उस अवस्थित (विद्यमान) द्रव्यके क्रमसे जो आविर्भाव उससे जानने योग्य भव्यस्वभाव माना गया है ।९। और सदा (त्रिकालमें) जो परखंभावसे परिणमन करता है वह स (अपने) भावसे भिन्न अर्थात् अभव्य स्वभाव कहा जाता है ।१०। और परस्पर एक दूसरेके प्रदेशमें प्रवेश करते हुए तथा परस्पर अवकाशको देते हुए एवं नित्य मिलते हुए भी द्रव्य अपने अपने भावको नहीं छोड़ते हैं । यह भावस्वभावका अर्थ जानना चाहिये ॥ २४ ॥ सूत्रम् । शून्यत्वं कूटकार्येण भव्यभावं विना भवेत् । अभव्यत्वं पिना द्रव्यान्तरता द्रव्ययोगतः ॥२५॥ खूनभावार्थ:-भष्यसमावके विना असत्यकार्यके साथ योग होनेसे शून्यवत्ता होती है। और अभव्य सभावके बिना द्रष्यके संयोगसे अन्य द्रव्यकी उत्पत्ति होती है ॥ २५ ॥ व्याख्या । भव्यभावं विना भव्यसमावमन्तरेण फटकार्येणासत्यकार्येण योगे शून्य शून्यवत्त्वं भवेत् । किन्तु परभावे भवेन्नहि स्वभावे घ भवेत्तदा भव्यत्वं स्यादिति। अथ पुनः स्मन्यत्वं विना अभव्यस्वभावानगीकारे द्रव्ययोगतः व्यस्य संयोगाव्यान्तरवा द्रव्यान्यत्वं जायते । यम्माधर्माधर्मादीनी जीवपुद्गलयोरेकायगाहनावगाढकारणेन कार्यसंकरोऽभव्यम्य- भावेनैव न भवेदिति । तत्तद्रव्यागां तत्तत्कार्य हेतुताकल्पनमप्यभव्यत्वस्यमावगर्भितमेवाते। आत्मादेः स्ववृत्त्यनन्तकार्यजननशक्त्या मव्यः, तत्तासहफारिसमवधानेन तत्तत्कार्योपधाय साशक्तिश्च तया भव्यतेति । तथा भव्यतयैवानविप्रसद् इति तु हरिभद्रापार्यः ।।२५।। व्याख्यार्थ:-मव्यखभायके बिना अमत्यकार्यका योग होनेसे शून्यवान्पना हो।' तात्पर्य यह कि परमावमें नहीं होवे और स्वमायने हो तब भव्य भाव होता है और समय २०२ रायचन्द्रजैनशास्तमालायाम् स्वभावके न अंगीकार करनेपर द्रव्यके संयोगसे अन्यद्रव्यता होती है । इससे धर्म अधर्म आदि द्रव्योंके तथा जीव और पुद्गलके एक प्रदेशमें अवगाहना रूप अवांढ कारणसे जो कार्यसंकरता नहीं होती है सो अभव्यखभावसेही नहीं होती है । और उन उन द्रव्योंके उन उन द्रव्योंके कार्योंका हेतुरूपसे जो कल्पन है वह भी इस अभव्यस्खभायमें ही गर्मित है । तासर्य यह कि आत्मा आदि द्रव्योंके अपनेमें रहनेवाले अनन्त कार्योंको उत्पन्न करनेकी जो शक्ति है उस शक्तिसे तो भव्यभाव है और उन उन सहकारी कारणोंके. सन्निधानसे उन उन कार्योंकी उत्पादक जो शक्ति है वह अभव्य भाव है। और ऐसा । माननेसे भव्यभावके साथ अंतिव्याप्ति नहीं होती है। यह हरिभद्राचार्यजी कहते है ॥२५॥ सूत्रम् । पारिणामिकस्वभावः परमभाव आहितः। विनैनं मुख्यता द्रव्ये प्रसिद्ध्या दीयते कथम् ॥ २६ ॥ सत्र भावार्थ:--पारिणामिकस्वभाव जो है उसको परमभाव कहते हैं। इस परमभावके विना द्रव्यमे प्रधानता प्रसिद्धरूपसे कैसे दी जावे ? ॥ २६ ॥ व्याख्या । स्वलक्षणीभूतपारिणामिकभावप्रधानतया परमभाव आहितः। यथा ज्ञानस्वरूप 'आत्मा । परिणामे भवः पारिणामिकः स चासौ स्वभावश्च पारिणामिकस्वभावः । परं प्रकृष्टं ज्ञानादि परमं तच्च भावः परमभाव इत्यनेनात्मा ध्वन्यते । यदि हि परमभावः स्वभावो न कथ्यते तदा द्रव्यविपये प्रसिद्धतया प्रसिद्धरूपं कथं दीयते । अनन्त- धर्मात्मकवस्तुन एकधर्मपुरस्कारेणालाप्यते यत्तदेव परमताया लक्षणं ज्ञेयमिति । एते एका- दश स्वभावा सर्वेषां द्रव्याणां धारणीयाः । एनं परमभावं विना द्रव्ये द्रव्यविपये मुख्यता प्राधान्यं प्रसिद्ध्या प्रसिद्धरूपेण कथं दीयत इत्येवमिति ॥ २६ ॥ व्याख्यार्थ:-अपने निजलक्षणभूत पारिणामिक भावकी प्रधानतासे परम भाव कहा गया है। जैसे-आत्मा ज्ञानखरूप है । परिणाममें जो हो उसे पारिणामिक कहते हैं। पारि- णामिक ऐसा जो स्वभाव वह पारिणामिक स्वभाव है । उत्कृष्ट जो ज्ञान आदि सो परम हैं । परम जो भाव वह परम भाव है और इससे आत्मा ध्वनित होता है। ११। यदि परम भावको खभाव नहीं कहै तो द्रव्यमे प्रसिद्धरुप कैसे दिया जाये ? क्योंकि, अनन्तधर्मवाले द्रव्यको जो एक धर्मको मुख्य करके उससे कहा जावे वही परम भावका लक्षण है, ऐसा जानना चाहिये । ये पूर्वोक्त एकादश (ग्यारह) स्वभाव छहों द्रव्योंके विषयमें ही धारण करने चाहिये । इस अंतिम परमभावके विना द्रव्यके विष- यमें प्रधानता प्रसिद्ध रूपसे कैसे योजित कर सकते हो ? । इस रीतिसे अस्तित्व आदि सब भावोंकी भावश्यकता दर्शायी गई है ॥ २७ ॥ सूत्रम् । इत्थं, च सामान्यतया स्वभावा एकादशामी कधिताः श्रुतोक्ताः।

द्रव्यानुयोगतर्कणा। २०३ आप्तोक्तिमभ्यस्य निरस्य जाड्य- महत्क्रमाम्भोजरता भवन्तु ॥ २७ ॥ सूत्रभावार्थ:-इस प्रकार ये शास्त्रोक्त सामान्यरूपसे द्रव्योंके एकादश समाव कहे गये हैं । भव्यजीवोंको उचित है कि वे इनका पूर्णरूपसे अभ्यास करके और अपनी अज्ञानताको दूर करके श्रीजिनदेवोंके चरणकमलोंकी सेवामें तत्पर होवें ॥ २७ ॥ व्याख्या । इत्थं च पूर्वोकप्रकारेण सामान्यतया सामान्यस्वभावसर्वद्रव्याधारतया स्वभा. * वाः द्रव्याणां प्रकृतयः अमी प्रत्यक्षप्रमाणविपयीकृताः कथिताः कण्ठतोऽर्थवश्योकाः श्रुतोकाः श्रुते शास्त्र उक्ताः प्रतिपादितास्तान्स्वभावान्सम्यक् स्वबुद्धचा अभ्यस्य अभ्यासीकृत्य जाइयं मौख्य निरस्य दूरीकन्याहत्क्रमाम्भोजरता अईतां तीर्थकृतां क्रमाः पादास्त एवाम्भोजानि कम- लानि तन्त्र रक्ता आसक्ताः सादरा भवन्तु । श्रुतबोधस्वतन्माहात्म्यं श्रीजिनभजनसादरव- मेवेति ध्येयम् । अत्र श्लेपेण भोजेति सन्दर्भक र्नामसङ्केतश्चेति । अथान्यान्याधिकारः । अस्तित्वम् १ वस्तुत्वम् २ द्रव्यत्वम् ३ प्रमेयत्वम् ४ अगुरुलघुत्वम् ५ प्रदेशस्वम् ६ घेतनत्वम् ७ अचेतनत्यम् ८ मूतत्वम् ९ अमूर्तत्वम् १० द्रव्याणां दश सामान्यगुणाः । प्रत्येकमष्टावष्टौ । सर्वेषां दशसामान्यगुणानां मध्ये पदं सामान्यगुणाः, चत्वारः सामान्यविशेषगुणाः, शानदर्शन- मुखवीर्याणि, स्पर्शरसगन्धवर्णाः, गतिहेतुत्वम्, स्थितिहेतुत्वम् , अवगाहनाहेतुत्वम्, वर्तना. हेतुत्वम्, चेतनत्वम् , अचेतनत्वम्, मूतत्वम्, अमूर्त्तत्वम्, द्रव्याणां पोडश विशेषगुणाः, प्रत्येक जीवपुद्गलयोः, इतरेषां प्रत्येक प्रयो गुणाः, अन्तस्थाश्चत्वारो गुणाः स्वजात्यपेक्षया सा- मान्यगुणाः, विजात्यपेक्षया त एव विशेषगुणाः । इति गुणाधिकारः ।। २७ ।। इति द्रव्यानुयोगतर्कणायां कृतिभोजसागरविनिर्मितायामेकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ व्याख्या: :-भव्य जीव इस पूर्वोक्त प्रकारसे सामान्य स्वभाव संपूर्ण द्रव्योंके आधारसे प्रत्यक्ष प्रमाणके विषयमें लाये हुए शास्त्रमें कहे हुए द्रव्योंके एकादश ११ भेद जो कंटसे तथा अर्थसे कहे है, उन स्वभावोंको पूर्ण रीतिसे अभ्यासगोचर करके तथा उनके अभ्यासद्वारा मूर्खताको दूर करके श्रीतीर्थकरोंके चरणरूपी कमलों में विनयसहित आसक्त (तत्पर) होवें। क्योंकि शास्त्रज्ञानका यही माहात्म्य है कि श्रीजिनेन्द्रकी सेवाम भादर करे, यह समझना चाहिये । यहाँ पसे भोज यह ग्रन्थकारके नामका संकेत है । अव भन्य ग्रन्थका अधिकार करते हैं ! अलिव १ वस्तुत्व २ दव्यत्व ३ प्रमेयत्व ४ अगुरुलघुत्व ५ प्रदेशत्व ६ चेतनत्व ७ अचेतनत्व ८ मूर्तत्व तथा अमूर्तत्त्व १० ये दश द्रव्धों के सामान्य गुण है । सामान्य गुण प्रत्येक द्रव्यमें आट आठ रहते हैं। इन सब सामान्य गुणोंमें छ तो सामान्य गुण हैं और अन्तके चार सामान्य गुण भी है और विदे। गुण भी है। ज्ञान १ दर्शन र सुस ३ वीर्य १ स्पर्श ५ रस ६ गंध ७ वर्ण ८ गो हेतुता ९ स्थितिहेतुता १० अवगाहनहेतुता ११ वर्तनाहेतुता १२ चेतनत्व १३ अर्थतनत्व १४ मूर्तत्व १६ अमूर्तत्व १६ ये द्रव्योंके सोटह विशेष २०४ रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् गुण हैं । इन सोलह विशेष गुणोंमें जीवके छः छः गुण हैं, पुद्गलके भी छः छः गुण हैं, और अन्य धर्मादि चारों द्रव्यों में प्रत्येकके तीन तीन गुण हैं । अतके चेतनत्व आदि चार गुण अपनी जातिकी अपेक्षासे सामान्य गुण हैं और परजातिकी अपेक्षासे विशेष गुण हैं । इस प्रकार गुणोंका अधिकार है ॥ २७ ॥ इति श्रीभाचार्योपाधिधारक-पं० ठाकुरप्रसादप्रणीत-भाषाटीकासमलंकृतायां द्रव्यानुयोगतर्कणाव्याख्यायामेकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ क 29 + . अथ स्वभावाध्याय व्याचिख्यासुराह । भब इस द्वादश (बारहवें) अध्यायमें स्वभावोंका निरूपण करनेकी इच्छासे यह श्लोक कहते हैं। सूत्रम् । चैतन्यं चेतना ख्याता त्वचैतन्यमचेतना। चेतनत्वं विना जन्तोः कर्माभावो भवेटुवम् ॥१॥ सूत्रभावार्थ:-चैतन्य चेतनाका नाम है और अचैतन्य अचेतनाका नाम है । इस चैतन्य नामक गुणके विना जीवके निश्चय करके कर्मोंका अभाव हो जावे ।। १ ।। व्याख्या । चित्ती संज्ञाने चेतति चेतयते वा चेतनस्तस्य भावश्चैतन्यं चेतनाव्यवहारश्चे- तनस्वभावः १ तद्विपरीतमचैतन्यमचेतनस्वभावः २ चेतनत्वं विना जन्तोर्जीवस्य कर्माभावो भवदिति रागद्वेषरूपं कारणं चेतना ज्ञानावरणादिकर्मणोऽभावः । यतः "नेहाभ्यक्तशरी- रस्य रेणुनाश्लिष्यते यथा गात्रम् । रागद्वेपक्किन्नस्य फर्मबन्यो भवत्येवम् । १।" एवं यदि जीवस्य सर्वथा अचेतनस्वभावः कर्माभाव एवेति ॥१॥ व्याख्यार्थ:-चिती' धातुका संज्ञान अर्थात् जानना अर्थ है । जो स्वयं चेतै वो, दूसरोंको चितावै उसको चेतन कहते हैं । उस चेतनका जो भाव (धर्म) है उसको चैतन्य कहते है । और चेतनाका जो व्यवहार है मोही चेतनस्वभाव है । १ । तथा चेतनस्वभावसे जो विपरीत है वह अचैतन्य वा अचेतन स्वभाव है । २ । इनमें चेतन 'स्वभावके विना अर्थात् चेतनस्वभाव न माननेपर जीवके कर्मोंका अभाव होगा, क्योंकि कर्मबन्धमें जो राग तथा द्वेपरूप कारण है वह चेतना , अर्थात् ज्ञानावरणादि कर्माका अभाव है अर्थात् चेतनासे ही कोका बन्ध होता है । क्योंकि जैसे तैल आदिसे लिप्त शरीरवाले जीवका शरीर धूलसे लिप्त हो जाता है, ऐसेही राग तथा द्वेपसे आर्दीभूत (गीले हुए) जीवके ही कमाका बन्धन होता है । इस कथनके अनु- सार यदि जीवके चेतन खभाव न मानकर, सर्वथा अचेतन स्वभावही माने तो कमोंका अभावही होगा ॥१॥ । H 4 . द्रव्यानुयोगतर्कणा। २०५ सूत्रम् । अचैतन्यं विना जीवे चैतन्यं केवलं यदि। ध्यानध्येयेष्टशिष्याणां का गतिर्जायते तदा ॥२॥ सूत्रभावार्थ:-यदि अचेतन स्वभावसे रहित केवल चेतन स्वभावही जीवमे मानो तो ध्यान, ध्येय (जिसका ध्यान किया जाता है उसे ध्येय कहते है), गुरु और शिष्य इनकी क्या गति होगी? ॥२॥ व्याख्या । अचैतन्यं वर्जयित्वा केवलं चैतन्यं जीवे कथ्यते तदा अचेतनकर्मद्रव्योपश्शे- पजनितचेतनाविकाराहते शुद्धसिद्धसादृश्यं भवेदिति निश्चयः । तदा ध्यानध्येयगुरुशि- : प्याणां का गतिर्न कापि गतिः । ध्यानं किं ध्यायते, ध्येयश्च को भवति, को गुरु, शिष्यो. ऽपि क इति व्यवस्थाभगः स्यान्, सर्वशास्त्रव्यवहारश्चान्यथा स्यात् । शुद्धस्याविद्याया वृश्यापि क उपकारो भवति। तस्मादलवणा यवागूरितिवदचेतन आत्मा इदमपि कथंचित्कथं न धर्मों जायते ॥२॥ व्याख्यार्थ:-यदि अचेतन स्वभावको छोडकर, केवल चेतन स्वभावही जीवमे कहा जावे तो अचेतन जो कर्मद्रव्य है उसके संपन्धसे उत्पन्न जो चेतनामे विकार है उसका अभाव हो जानेसे सब जीवोंमें शुद्ध जो सिद्ध जीव है उनकी समानता हो जाय अर्थात् अचेतन कोंके अभावसे सब जीव सिद्धसमान हो जावें ऐसा निश्चय है । और संब जीवोंके सिद्धता होनेपर ध्यान, ध्येय, गुरु और शिप्य इनकी क्या गति ( व्यवस्था) हो? अपि तु कुछ भी गति नहीं. अर्थात् ध्यान किसको ध्यावे ? ध्यान करने योग्य कौन हो, गुरु कौन रहै और शिष्य भी कौन रहै? अर्थात् कोई न रहै। क्योंकि, सब जीव समान हो गये इसलिये ध्यान, ध्येय, गुरु और शिष्यफी व्यवस्थाका नाश हो जाय और समस्त शास्त्रोंमे जो ध्यान आदिका व्यवहार होता है वह शास्त्रीय व्यवहार भी मिथ्या हो जाय । शुद्ध द्रव्यके अविद्याकी वृत्ति माननेसे भी क्या उपकार होता है ? इसलिये लपणरहित यवागू ( लपसी )के सदृश अचेतन आत्मा है यह भी धर्म फयचित् कैसे नहीं होता है ? अर्थात् होता ही है ॥ २ ॥ सूत्रम्। मूत्ति दधाति मूर्त्तत्यममूर्त्तत्यं विपर्ययात् । जीवस्य यदि मूर्तत्वं न तदा संसृतिक्षयः ॥३॥ सूत्रभावार्थ:-मूर्तिको धारण करता है इसलिये मूर्तत गुण है और जो मूर्तिको नहीं धारण करै वह अमूर्तत्व गुण है । यदि जीवके मूर्चत गुण न मानो तो संसारका क्षय (नाश) हो जावे ॥३॥ व्याख्या । मूर्तिः रूपरसगन्धपर्शादिसन्निवेशता तस्या धरणस्यभायो मूर्नत्यं मूर्त- स्वभावः । तस्मायद्विपरीतं तदमूर्तत्वममूर्तसभाव. । यदि जीवस्य मयंपिन्मूलवासभायो न भत्तदा शरीरादिसंबन्ध विना गत्यन्तरसंक्रमो न भवति, गत्यन्तरसंक्रम, विना रस्थाभावो भवेदिति भावः ॥३॥ १ २०६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् व्याख्यार्थ:--रूप, रस, गंध, स्पर्श आदिका जो एक स्थानमें सन्निवेश (स्थिति वा रचना ) है वह मूर्ति है, उस मूर्तिको धारण करनेका जो स्वभाव है वह मूर्त स्वभाव है । और मूर्तसे जो विपरीत (विरुद्ध) अर्थात् मूर्तिको न धारण करनेका जो स्वभाव है वह अमूर्त स्वभाव है । यदि जीवके कथंचित् मूर्त स्वभाव न हो तो संसारका अभाव हो जायगा। क्योंकि जीवके शरीर आदिके संबन्ध विना एक गतिसे दूसरी गतिमें गमन नहीं होता । और शरीर आदि मूर्त हैं । मूर्तका अभाव जीवमें माननेसे शरीर आदिके संबन्धका अभाव माना गया और शरीरादि संबन्धके अभावमें अन्य गतिमें गमनका अभाव हुआ और जब अन्य गतिमें गमनका अभाव हुआ तो संसारका अभाव हुआ। अर्थात् जीवके एक गतिसे दूसरी गतिमें जो जाना है वही संसार है, अतः गत्यन्तरका अभाव हुआ तो संसारका नाश हुआ ही ।। ३ ।। सूत्रम् । अमूर्तत्वं विना मोक्षः सर्वथा घटते न हि । एकप्रदेशता चेहाखण्डबन्धनिवासता ॥४॥ सूत्रभावार्थ:-यदि आत्माके सर्वथा मूर्त स्वभावही माना जावे तो आत्माको मोक्ष' कदापि नहीं हो सकता । और अखण्डबन्धनिवासताको एकप्रदेशस्वभाव कहते हैं ।। ४ ।। व्याख्या । अथ यदि लोकदृष्टव्यवहारेण मूर्तस्वभाव एव आत्मा अङ्गीक्रियते तदा मूर्त्तत्वं हेतुसहरप्यमूर्त्तत्वं न भवेत् । एवं सति मोक्षो न घटामाटीकते । तस्मान्मूतत्य- संवलितस्य जीवस्याप्यन्तरङ्गंतया अमूर्तस्वभाव एव मन्तव्य इति । अथैकप्रदेशस्वभाव एकप्रदेशता सा चेहैकत्वपरिणतिरखण्डाकारबन्धस्य सन्निवेशस्तस्य निवासता भाजनत्व ज्ञातव्यम् । निष्कर्पस्त्वयम्-अखण्डतया आकृतीनां सन्निवेशः परिणमनव्यवहारस्तस्य भाज- नमाधाराधेयत्वमेकप्रदेशतोच्यत इति ॥ ४ ॥ व्याख्यार्थ:- :-अब लोकके दृष्ट (देखे हुए) व्यवहारसे यदि आत्मा सर्वथा मूर्त खभावही है ऐसा मानते हो तब तो मूर्त स्वभावके हजारों हेतुओं (युक्तियों से भी अमूर्तता नहीं होगी और जब आत्मा कभी अमूर्त न होगा तो मूर्त स्वभावके अभावके विना जीवके मोक्ष कदापि घटित नहीं हो सकता क्योंकि मूर्त शरीर आदिका संबन्ध जब नित्य बना हुआ है तब मोक्ष कैसे हो सकता है ? इसलिये मूर्त स्वभावसे मिले हुए जीवके अंतरंगपनेसे अमूर्त स्वभाव भी मानना चाहिये । और एक प्रदेश स्वभाव जो है वही एक प्रदेशता है । उस एकत्व परिणतिको यहां अखंडाकार बन्धके सनिवेशका भाजनं जानना चाहिये । तात्पर्य यह कि अखंड रूपसे जो आकारोंका सन्निवेश अर्थात् परिणमन व्यवहार है उसका जो भाजन अर्थात् आधाराधेयपना है उसको एकप्रदेशता कहते है ॥ ४ ॥ सूत्रम् । भिन्नप्रदेशता सैवानेकप्रदेशता हि या। न चेदेकप्रदेशत्वं भेदोऽपि पहुधा भवेत् ॥ ५॥ ४ । 3 4 इसलिये सकंप तथा निष्कंप दोनों व्यवहार हो सकते हैं तो अवयवी (घट आदि) प । यह कहो कि एक प्रदेशस्वभाव अवयवके कंपसहित होनेपर भी अवयवी निष्कंप है द्रव्यानुयोगतर्कणा। २०७ सूत्रभावार्थ:-और जो अनेकप्रदेशता है उसीका नाम मिन्नप्रदेशता है । अब यदि एकप्रदेशता न मानो तो भेद भी अनेक प्रकारका हो जायगा ॥ ५॥ व्याख्या । भिन्नप्रदेशता सैवानेकप्रदेशस्वभावता । भिन्नप्रदेशयोगेन तथा भिन्नप्रदेश- कल्पनया अनेकप्रदेशव्यवहारकारणयोग्यत्वमुच्यते । यद्येक प्रदेशस्वभावो न स्यात्तदा असंख्यातप्रदेशादियोगेन बहुवचनवृत्त्यैकस्य धर्मास्तिकायस्यैक इति व्यवहारासम्भवः स्यान, बहुधा वहयो धर्मास्तिकाया इत्यादिव्यवहारापत्तिः स्यादिति ।। ५ । व्याख्यार्थः-जो भिन्न प्रदेशता है . वही अनेकप्रदेशस्वभावता है। तात्पर्य यह कि भिन्न प्रदेशके योगसे तथा भिन्न प्रदेशकी कल्पनासे अनेक प्रदेशके व्यवहारकारण- योग्यता कही जाती है । अब यदि एक प्रदेश स्वभाव न हो तो असंख्यात प्रदेश आ- दिके योगसे बहुवचनकी प्रवृत्ति होनेसे एक जो धर्मास्तिकाय द्रव्य माना गया है उसके एक इस व्यवहारकी असंभवता हो जायगी और धर्मास्तिकाय बहुत हैं इत्यादि व्यव- हारकी आपत्ति होगी. भावार्थ-असंख्यात प्रदेशोंके धारक धर्मास्तिकायको जो एक द्रव्य माना है वह एकप्रदेशत्वके न माननेसे एक न रहैगा ॥५॥ सूत्रम् । निष्कम्पत्वं सकम्पत्वं विनानेकप्रदेशताम् । कथं च घटतेऽणूनां सङ्गतिः सर्वदेशजा ॥ ६॥ सूत्रभावार्थ:- :-तथा अनेक प्रदेश खमावके विना निष्कंपत्व और सकंपत्व व्यव- हार नहीं हो सकता और आकाशादि द्रव्यके अणुओंका सर्वज तथा देशज संयोग भी किस प्रकार घट सकता है ॥ ६ ॥ व्याख्या । अनेकप्रदेशस्वभावो द्रव्यस्य यदि न कथ्यते तदा घटाद्यवयविनो देशतः सकम्पा देशतो निष्कम्पा दृश्यन्ते ते च कथं संभवन्ति । अथावयवकम्पेऽप्यवयवी निष्कम्प इति कथ्यते तदा चलतीति प्रयोगासंभव एव भवेत् । देशवृत्तिकम्पस्य यथा परम्परासंबन्धोऽस्ति . तद्वद्देशवृत्तिकम्पाभावस्यापि परम्परासंवन्धोऽस्ति । तस्माद्देशतश्च- लता देशतोऽचलता चेत्यस्खलितव्यवहारेणानेकप्रदेशस्वभावो मन्तव्यः । तथा चानक- प्रदेशस्वभावो नाङ्गीक्रियते तदा आकाशादिद्रव्यस्याणुसङ्गतिः परमाणुसंयोगः कथं घटते । सर्वजो देशज इति ॥६॥ व्याख्यार्थः :-अब यदि द्रव्यका अनेक प्रदेश स्वभाव नही कहते हो तो घट आदि अवयवी किसी देशमें कंपन (संचलन ) सहित है और किसी देशमे कंपनरहित हैं ऐसे देख पड़ते हैं. सो वे कंपसे सहित • तथा रहित कैसे हो सकते है । क्योंकि यदि एकही प्रदेश है तो वह या तो सकम्प ही होगा या निष्कंप ही होगा । अब कदाचित . . . चलता है यह जो प्रयोग है सो होही नहीं सकेगा । क्योंकि, जैसे एकदेश अवयववृत्ति । . २०८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् कंपनका तुम परम्परासंबन्ध, मानकर, उससे अवयवीको सकंप कहते हो उसी प्रकार एकदेशवृत्ति जो निष्कंप है उसके परंपरासंबंधसे अवयवीमें निष्कंप भी कहोगे । इसलिये एकदेशसे अवयवी चलता है और एक प्रदेशसे अवयवी नहीं चलता यह जो अखंडित 'व्यवहार है इससे द्रव्यका अनेक प्रदेश स्वभाव है ऐसा मानना योग्य है । और यदि द्रव्यका इसी प्रकार अनेक प्रदेश स्वभाव अंगीकार नहीं करते हो तो आकाश भादि द्रव्यका सर्वज तथा देशज परमाणु संयोग कैसे बन सकता है? । अब देशज तथा सर्वज संयोग क्या है ? इसको अग्रिम श्लोकसे स्पष्ट करते हैं ॥ ६ ॥ सूत्रम् । देशसफल भेदाभ्यां द्विधा दृष्टा जगत्स्थितिः। प्रत्येकं दूपणं तत्र ते वृत्तिश्व संमतेः॥७॥ सूत्रभावार्थ:-देश तथा सर्वके भेदसे जगतकी स्थिति दो प्रकारकी देखी गई है। इनमसे एक किसी पक्षके माननेसे संमति ग्रंथकी वृत्ति दूपण देती है ॥ ७ ॥ व्यास्या । एफा वृत्तिर्देशतोऽसि यथा फुण्डलेनेन्द्रस्य, द्वितीया सर्वतोऽस्ति यथा समा- नवनद्वयस्य, तत्र प्रत्येकं दूपणं संमतिवृत्तौ कथितम् । यतः परमाणोराकाशादेव देश- त्तिमगीकुर्वतामाकाशादिकानां प्रदेशानद्गीकारेऽप्यागच्छति । अथ च सर्वतोवृत्तिमङ्गीकुर्ववां परमाणुराकाशादिप्रमाणत्वं लभते । उभयाभावे तु परमाणोरवृत्तित्वं भवेत् । यावद्विशेषा- भावस्य सामान्याभावनियतत्वादित्यादि ॥७॥ व्याख्यार्थः-एक वृत्ति तो देशसे (एक देशसे संबंध रखनेवाली) है जैसे कुण्ड- लके साथ इन्द्रकी और दूसरी सर्व देशसे है जैसे समान फारवाले दो बत्रोंके । उनमें प्रत्येक पक्षमें संमति ग्रंथकी वृत्तिमें दूषण कहा गया है । क्योंकि परमाणु और आकाश आदिके एकदेशवृत्ति स्वीकार करनेवालोंके जो संयोग है वह यदि आकाश भादिके प्रदेश न माने जावे तो भी हो सकता है। और सर्व देशसे वृत्ति स्वीकार करनेवालोंके मतसे परमाणु आकाश आदिकी प्रमाणताको प्राप्त होता है अर्थात् जितना बड़ा आकाश है. उतनाही वड़ा परमाणु भी होगा । और एकदेश तथा सर्वदेश दोनोही वृत्तियोंको न मानें तो परमाणुकी अवृत्ति ही होगी। एकदेश व सर्वदेश कोई वृत्ति न रहनेसे सामान्य वृत्तिका अभाव हो जायगा | क्योंकि समस्त विशेपाभाव सामान्यके अभावके समनियत है इत्यादि ॥ ७ ॥ सूत्रम् । स्वभावादन्यथाभावो विभावोऽपि मद्वयया । नानादेशादिकर्मोपाधिर्यतो घटते कथम् ॥ ८॥ सूनभावार्थ:-स्वभावसे अन्यया भावरूप विमाव भी महायथारूप है । क्योकि इस विभाय स्वभावके बिना जीयके नाना देशकाल मादिसे उत्पन्न कर्मोपाधि कसे घटित हो सकती है? अर्थात् नहीं घटित हो सकती ॥ ८ ॥ . Mar -- द्रव्यानुयोगतर्कणा। २०९ घ्याख्या । स्वभावाद् योऽन्यथाभावः स विभावस्वभावः कथ्यते । इति तु महद्वयथारूपं लगति । एतच विभावस्वभावस्याङ्गीकरणं विना जीवस्य नानादेशादिकमांपाधिः कथं घटते । नानादेशाद्यनियतदेशकालादिविपाकिकर्मोपाधि वस्यालमा युज्यते । तत उपाधिसंबन्धयो- ग्यानादिविभावस्वभाव इति ॥८॥ व्याख्यार्थः-निजस्वभावसे जो द्रव्यका अन्यथाभाव है उसको विभावस्वमाव कहते हैं । सो यह तो महाव्याधिरूप लगता है। और इस विभावस्वभावके अंगीकार न करनेसे जीवके नानादेशादि कर्मोपाधि कैसे बन सकती है ? तात्पर्य यह कि विभाव स्वभावके स्वीकार विना अनियत देश और काल आदिके संबन्धसे विपाकीभूत फल देनेमें अभिमुख) जो कर्म हैं उन कर्मोंरूप जो उपाधि है वह जीवके साथ नहीं लग सकती। इस कारणसे उपाधिसंयोगके योग्य अनादि विभाव-स्वभाव भी मानना योग्य है ॥ ८॥ सूत्रम् । शुद्धो भावः केवलमन्यश्चोपाधिकः स्मृतः। शुद्ध विना न मुक्तिश्च विनाऽशुद्धं न लेपता ॥९॥ सूनभावार्थ:-केवल निजस्वरूप मात्रसे जो स्थिति है वह शुद्धभाव है और उपाधिसे उत्पन्न हुआ अशुद्ध भाव है । शुद्ध भावके विना मुक्ति नहीं होती और अशुद्ध भावके बिना जीवके कर्मोंका बन्धन नहीं होता है ॥ ९॥ व्याख्या । केवलत्वं शुद्धो भावः, उपाधिभावरहितान्त वपरिणतत्वं शुद्धस्वभावत्वम् । अन्योऽशुद्धभाव औपाधिकः, उपाधिजनितबहिर्भावपरिणमनयोग्यता ह्यशुद्धस्वभावता । यदि शुद्धभावागीकारत्वं न क्रियते तदा मुक्तिन घटते, पुनश्चाशुद्धभावाङ्गीकारत्वं न क्रियते तदा कर्मलेपो न घटते । अतएव शुद्धस्वभावस्य कदाप्यशुद्धता न स्यादशुद्धस्वभा- वस्यापि पश्चाच्छुद्धता न स्यात् । एवमेकान्तादिमतं निरस्योभयखभावाङ्गीकरणे न किमपि दूपणं भवेत् ।। ९॥ व्याख्या: केवलपना जो है वह शुद्धभाव है अर्थात् उपाधिभावसे रहित केवल द्रव्यके अन्तर्गत भावका जो परिणाम है वह शुद्ध स्वभाव है । और इससे अन्य अशुद्ध भाव है । यह उपाधिसे उत्पन्न होता है । अर्थात् उपाधिसे उत्पन्न जो वाह्यभाव है उस वाह्य भावके परिणमनरूप जो योग्यता है वही अशुद्ध खभाव है। अब यदि शुद्ध , भावका स्वीकार न करें तो मुक्ति नहीं हो सकती है और यदि अशुद्ध स्वभावको नहीं माने तो जीवके कर्मोका संबन्ध नहीं बनता है । इसी कारणसे शुद्ध स्वभावके तो कभी अशुद्धता नहीं होती है और अशुद्ध , स्वभावके कभी शुद्धता नहीं होती । इस प्रकार एकान्तवाद आदिका खंडन करके शुद्ध और अशुद्ध इन दोनों स्वभावोंके मानने कोई दूषण नहीं है ॥९॥ . * । २५ . २१० रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् सूत्रम् । एकत्र निश्चितो भावः परत्र चोपचर्यते । उपचरितभावः स विनैनं नो परज्ञता ॥१०॥ सूत्रभावार्थ:- 1:--एक स्थानमें निश्चित जो भाव है वह दूसरे स्थानमें उपचारमें, लाया जाता है । इसीको उपचरित भाव कहते हैं । इसके विना,परका ज्ञान नहीं हो सकता ॥ १०॥ व्याख्या । एकत्र निश्चितो भावः नियमितैकस्थानस्य भावस्य परस्थानोपचरणेनोपचरित. स्वभावता जायते । स उपचरितस्वभावो यदा नाङ्गीक्रियते तदा स्वपरव्यवसायिज्ञानवा-, नात्मा किमु कथ्यते । ततो ज्ञानस्य स्वविषयत्वं त्वनुपचरितमेवास्ते । अथ परविपयत्वं तु परापेक्षया प्रतीयमानत्वं, तथा परनिरूपितसंवन्धत्वेनोपचरितमस्ति । इत्थमुपचरितखभावता द्विप्रकारास्ति ॥१०॥ व्याख्यार्थ:-जो भाव एक स्थानमें निश्चित है अर्थात् जिस स्वभावकी सत्ता एक पदार्थमें नियमसे है उस खभावका जव अन्य स्थानमें उपचार ( आरोप ) करते हैं तब उसको उपचरित-स्वभावता हो जाती है । उस उपचरित स्वभावको यदि नहीं स्वीकार कर तो आत्मा अपने और परके (दोनोंके) विपयमें व्यवसायात्मक ज्ञानका धारक है यह कैसे कहा जावे ? । इस कारणसे यह सिद्ध हुआ कि ज्ञानके स्वविषयत्व अर्थात् अपना जो ज्ञान है वह तो अनुपचरित (उपचाररहित) ही है और परकी 'अपेक्षासे जो जानता है वह परनिरूपित संबन्धसे उपचरित है । और इस प्रकार जो उपचरित खभाव है वह दो प्रकारका है। यही आगेके श्लोकमें कहते है ॥ १० ॥ सूत्रम् । कर्मजः सहजश्चैतौ मूर्तीचेतनभावयोः। जन्तोराद्यो द्वितीयोऽपि सिद्धस्य विमलात्मनः ॥११॥ सूत्रभावार्थ:-एक कर्मजनित उपचरितभाव है और दूसरा सहज उपचरित- भाव है । ये दोनों मूर्त तथा अचेतन भावमें होते हैं । और प्रथम भेद तो संसारी जीवके होता है और दूसरा निर्मल आत्माके धारक सिद्ध जीवों के होता है ॥ ११ ॥ व्याख्या । कर्मज एकः सहजो द्वितीय एतौ द्वौ भेदी मूर्तीचेतनभावयोः स्तः । तत्र पुगलसंबद्धस्य प्राणिनो मूतत्वमस्ति । अथ चाचेतनत्वमप्यस्ति तत्तु यजीवस्य कथ्यते प्रथमं तत्र तु गौर्वाहीक इति न्यायानुसरणेनोपचरितोऽस्ति कर्मजनितत्वान् । तस्मादन यत्कर्मजनितोपचरितस्वभावत्वं तजन्तोर्द्वितीयोऽपि सहजोपचरितस्वभावोऽपि सिद्धस्य निर्म- लस्य । परक्षत्वं तु तत्र किमपि कमांपाधिजमस्ति तन्न स्यात् । तदुक्तमाचारसूत्रे "अकम्मरस ववहारो ण विजइ कम्मुणा उवाहि जायत्तिति" एवमेते दश स्वभावा नियतद्रव्यवृत्तयः सन्तीति ।। ११ ॥ व्याख्यार्थ: --प्रथम उपचरित स्वभाव कमसे उत्पन्न होता है और द्वितीय उपच- रितभाव सहज (स्वाभाविक ) है । ये दोनों उपचरित भावके भेद मूर्त और अचेतनके - . .

. द्रव्यानुयोगतर्कणा। २११ विषयमें होते हैं ! उनमे पुद्गलसे संबद्ध प्राणीके मूर्त्तत्व है और अचेतनत्व भी है और इसीलिये प्रथम उपचरित भाव जीवके है । और यह कर्मजनित होनेसे "गोर्वाहीका" 'यह वोझा ढोनेवाला गौ (पशु) है" इस न्यायके अनुसार उपचरित है । इसलिये यहाँ, जो कर्मजनित उपचरित स्वभावता है सो जीवके कही गई है । और दूसरा जो सह- जोपचरित स्वभाव है वह निर्मल (कर्मरहित ) सिद्ध जीवके है। सिद्धोंमें परका जो जानना है वह किसी कर्मकी उपाधिसे है ऐसा जो कहो तो वह ठीक नहीं है। क्योंकि आचासन सूत्रमें, कहा है कि, "कर्मरहित जीवके व्यवहार नहीं रहता है। क्योंकि उपाधि जो है सो कर्मसे होती है। इस प्रकार ये दश १० सभाव पूर्वोक्त चेतनत्व आदि नियत द्रव्यवृत्ति हैं ॥ ११ ॥ सूत्रम् । अमी दश विशेपेण स्वभावाश्चैकविंशतिः। सर्व पुद्गलजीवानां पञ्चदशाप्यनेहसः ॥१२॥ सूत्रभावार्थ:-ये दश स्वभाव और पूर्वकथित सत्तादि एकादश ये सब मिलके २१ भाव पुद्गल और जीवके हैं और कालके पन्दरह १५ स्वभाव है ॥ १२ ॥ व्याख्या । अमी दश स्वभावाः पूर्वोक्ता एकादश स्वभावा उभये मिलित्ता एकविशति- संख्या जायन्ते । तत्र पुद्गलानां जीवानां च प्रत्येकमेकविशतिः स्वभावा भवन्ति । तथा अनेहसः कालद्रव्यस्य पश्चदश भावा भवन्ति । मूलत एकविंशतिभावाः सन्ति । तेभ्यः पट् निष्कास्यन्ते तदा पंचदश अवशिष्यन्ते । तानेवाग्रतनपद्येन व्याकरोति ।। १२ ।। व्याख्यार्थ:-चेतनत्व आदि ये दश स्वभाव तथा सत्ता आदि पूर्वकथित एकादश खभाव, दोनों मिलके इक्कीस २१ होते है । इनमे पुद्गलके इक्कीस भाव हैं और जीवके भी एकविंशति २१ भाव ही है । और कालके पन्दरह स्वभाव है। आरंभसे जो इक्कीस भाव हैं उनमेंसे छः भाव जब निकाले जाते हैं तो पन्दरह वाकी बचते हैं । अब आगेके श्लोकमें उन्हीका निरूपण करते हैं ॥ १२ ॥ सूत्रम् । प्रदेशानेकता चित्ता मूर्तता च विभावता। शुद्धताऽशुद्धता चेति पह हीनाः कालगोचराः ॥ १३॥ सूत्रभावार्थ:-यहुप्रदेशत्व, चेतनत्व, मूर्तत्व, विभावत्व, शुद्धत्व और अशुद्धत्व इन छे स्वभावोंसे रहित शेष पन्दरह स्वभाव कालके हैं ॥ १३ ॥ व्यारया । बहुप्रदेशस्वभाधः १ चित्तेति चेतनस्यभाषः । तेति मूर्तस्वभावः ३ विभावता विभावस्वभावः ४ शुद्धता शुद्धस्वभावः ५ अशुद्धता अशुद्धस्वभावः ६ एते पडे कविंशतिभ्यो निष्कास्यन्ते तदा पञ्चदश मा कालखभाषा: !! १३ ॥ व्याख्यार्थः-बहुप्रदेशसभाव, चेतनस्वभाव, मूर्तस्त्रमाव, विभावस्वभाव, शुद्ध- स्वभाव और अशुद्ध स्वभाव ये छे मात्र जब इससमेसे निकालते हैं तो पन्दरह रहते है। ये सब पन्दरह स्वभाव कालके हैं ॥ १७ ॥ .

है। तात्पर्य यह कि उत्पाद तथा व्ययकी अप्रधानता होनेपर सत्ताप्राहक दृष्यायिक नयके मतमे नित्य स्वभाव है और सत्ताग्राहक द्रव्यार्थिक नयकी अग्रधानता उत्पत्ति तथा नाशका ग्राहक जो पर्यायार्थिक नय है इसके मतसे चौथा अनित्य-सभाप द्रव्यानुयोगतर्कणा। २१३ अथात्र स्वभावानां निदर्शनमाह । अब इस त्रयोदश अध्यायमें स्वभावोंका दृष्टान्त कहते हैं- सूत्रम् । अस्तिस्वभाव आम्नातः स्वद्रव्यादिग्रहे नये । ग्राहकत्वेऽन्यद्रव्याणां नास्तिस्वभाव ईरितः॥१॥ सूत्रभावार्थ:-स्वद्रव्यादिग्राहक द्रव्यार्थिक नयसे अस्तिस्वभाव कहा गया है और परद्रव्यादिनाहक द्रव्यार्थिक नयसे नास्तिस्वभाव कहा है ॥ १ ॥ व्याख्या । वद्व्यादिग्रहे नये द्रव्यार्थिकनयमते द्रव्याणामस्तिस्वभाव आनातः कथितः । १। तथा द्वितीयो नास्तिखभावोऽस्ति, अन्यद्रव्याणां प्राहकत्वे परद्रव्यादि- माहकद्रव्यार्थिकनये ईरितः कथितः । २ । उक्तं च "सर्वमस्तिस्वरूपेण परद्रव्येण नास्ति च" इति वचनात् ॥१॥ व्याख्यार्थ:--अपने द्रव्य क्षेत्र आदिको ग्रहण करनेवाले द्रव्यार्थिक नयके मतमें द्रव्योंका अस्तिस्वभाव कहा गया है १ तथा अन्य द्रव्योंको ग्रहण करनेवाले परद्रव्यादि- ग्राहक द्रव्यार्थिकनयके मतसे द्रव्योंके दूसरा नास्तिस्वमाव कहा गया है । ऐसा अन्यत्र वचन भी कहा हुआ है कि "अपने रूपसे सब है और परद्रव्यसे सब नास्ति (नहीं) है." ॥ १॥ सूत्रम् । उत्पादव्ययगौणत्ये नित्यः सत्तासमाश्रितः। पर्यायाधिक कोऽपि ज्ञेयोऽनित्यस्वभावकः ॥२॥ सूत्रभावार्थ:- :-उत्पाद और व्ययकी गौणतामे सत्ता ग्राहक द्रव्यार्थिकगयराधिरा नित्यस्वभाव है और उत्पाद तथा व्ययके ग्राहकपर्यायार्थिक नयमें अनित्य समाय है। ऐसा जानना चाहिये ॥२॥ व्याख्या । तथा सत्तासमाश्रितः सत्ताग्राहकद्रव्याधिकनययुक्तो निलो नित्यग्यगायः कथितः । कस्मिन्सत्युत्पादव्ययगौणत्वे कश्चित्तृतीयः । पर्यायार्थिकनय उत्पादध्ययमादको भवति तन्मतेऽनित्यस्वभावः, कश्चित्पर्यायार्थिकनय उत्पाद्व्ययग्राहको भवननित्यस्यमा स्यादिति ॥२॥ व्याख्या:-और उत्पाद तथा व्ययकी गौणता होनेपर ससाका ग्राहक को द्रव्यार्थिक नय है उससे युक्त नित्यखभाव तीसरा कहा गया है । ३ । राया गया थिक नय उत्पाद और व्ययका ग्राहक होता है इसलिये उसके मतमें अनित्य समा होता है ॥ २ ॥ (१) त्रिष्वपि पुस्तकेष्वयमेव पाटः ।

दीनि नोकर्माणि मनोरंचनकापारमानि तनो बन्दुम्नयोरेव पिननम्ममाकः । दार होता है और परमभावग्राहक नयनें उस कर्म नोकमंजनित चेतन समावके प्यारया । असद्भूतव्ययदारादसनव्यवहारनयात्मनोरमगोः यानि शानावरणा- द्रव्यानुयोगतर्कणा। २१५ वसाना निरूढा लक्षणासे यह प्रकार भेद है। और प्रयोजनवती सारोपा तथा साध्यवसाना लक्षणा तो यदृच्छानिमित्तसे स्वभावभेदसाधक है । यह यहांपर भावार्थ है ।। ४ ॥ सूत्रम् । परमभावग्राहके तु भव्याभव्यौ च पर्ययो। शुद्धाशुद्धी ततश्चोक्तौ चैतन्यमात्मनः स्मृतम् ॥५॥ सूत्रभावार्थ:-परमभावग्राहक नयके मतमें भव्य तथा अभव्य स्वभाव है और शुद्ध स्वभाव तथा अशुद्ध स्वभाव भी परमभाव ग्राहक नयके मतसे ही है तथा चेतन खभाव आत्माके माना गया है ॥ ५॥ व्याख्या । भव्याभव्यौ च स्वभावो परमभावप्राहके नये मन्तव्यो । भव्यतास्यभायो निरूपित्तोऽस्ति, अभव्यतास्वभाव उत्पन्नस्वभावस्य तथा परमभावस्य साधारण्यमस्ति। ततोऽत्रास्तिनास्तिस्वभावाविव स्वपरद्रव्यादिग्राहकनययोः प्रवृत्तिनं भवेत् । तथा शुद्धा. शुद्धस्वभावौ सूक्तौ ज्ञेयो । यथा पूर्वत्र परमभावप्राहकनये तद्वद् याविति । तथा चैतन्यं चेतनस्वभाव आत्मन आत्मारामस्य स्मृतं नान्येषाम्, आत्मा संसारस्थः पवन इति ।९।१०।११।१२।१३॥५॥ व्याख्यार्थः 1:-परमभाव ग्राहक नयकी अपेक्षा भव्य स्वभाव तथा अभव्य स्वभाव मा. नने योग्य हैं । भव्यता स्वभाव पूर्व प्रकरणमें कह आये है और अभव्यता स्वभाव उत्पन्न खभाव तथा परम भावकी साधारणतामें है। इसलिये यहापर अस्ति नास्ति स्वमा समान स्वकीय तया परकीय द्रव्यादि ग्राहक नयोंकी प्रवृत्ति नहीं होती है अर्थात् जैसे अलि स्वभाव स्वद्रव्यादिग्राहक नयसे और नास्तिस्वभाव परद्रव्यादिग्राहक नयकी अपेक्षासे माना गया है, यह बात यहां नहीं है । और शुद्ध तथा अशुद्ध स्वभाव जैसे पूर्व प्रकरणने कह आये हैं वैसे यहां भी समझने चाहिये । और चेतन स्वभाव केवल जीवके ही है, अन्य द्रव्योंके नहीं। क्योंकि जो संसारी जीव है यह चेतन है । इस प्रकार इस श्लोकमें भव्य ९ अभव्य १० शुद्ध ११ अशुद्ध १२ और चेतन १३ इन ५ मावोंका वर्णन किया गया है ।।५।। अय चैतन्यादिस्वरूपं कथयन्नाद । अव चेतनता आदिका स्वरूप कहते हुए लोक पड़ते हैं । स्त्रम् । असद्भूतव्यवहारात्कर्मनोकर्मचेतना । परमभावग्राहके तस्याचेतनधर्मतां ॥६॥ सूत्रभावार्थ:-असतय्यबहार नयसे कर्म तथा नोकममें ही चेतना या अचेतन धर्मपना है ॥६॥ म्यान्न पंत- २१६ रायचन्द्रजैनशासमालायाम् नसंयोगकृत्पर्यायस्तत्राति । तव इदं शरीरमावश्यकं जानामीत्यादिव्यवहारोऽत एव भवति मृतं दहतीतिवन् । पुनः परममावग्राहकनये तस्य कर्मनोकर्मजनिवचेतनस्समावस्वाचवन. धर्मता अचेतनस्वभावत्वं, यथा पृतमनुष्यमित्यादिवन् ॥ ६॥ व्याख्यार्थः-असद्भूतव्यवहार नयसे ज्ञानावरण आदि कर्म और मन, वचन, कायरूप नोकर्म इन दोनोंमें चेतन स्वमाव है; क्योंकि कर्म और नोकर्म इन दोनों में चेतनके संयोगसे किया हुआ पर्याय है । इसी कारण उस चेतनसंयोगकृत्पर्यायसे 'मृतकको भल करता है। इस व्यवहारकी मांति इस शरीरको मैं आवश्यक (जरुरी) जानता हूं. इत्यादि व्यवहार होता है । और परमभावग्राहक नयके मतमें तो उस फर्म तथा नोकमसे उत्पन्न चेतन भावके अचेतन स्वभावपना है, जैसे 'अनुष्ण (टेढा) इत्यादिकी भांति ॥ ६॥ सूत्रम् । असद्भूतव्यवहारे जीवाचेतनधर्मता। परममायग्राहके मूर्त्तनोकर्मकर्मता ॥७॥ मृत्रभावार्थ:-असद्भूतव्यवहार नयसे जीवमें अचेतनखभावता है और परम- भावग्राहक नयमें नोकर्म तथा कर्म मूर्त हैं ॥ ७ ॥ ध्याण्या । असद्भूतन्यवहारनये जीवतीति जीवसम्याचेतनधर्मसम्य भागो जीवाचे. सनधर्मतास्ति । अतएव बडोऽयमचंतनोऽयमित्यादिव्यवहारोऽनि । एतेनानुमिनोमि जानामीवि प्रतीत्या विलक्षणाशानसिद्धिर्वेदान्तिनामपास्ता, सद्भूतव्यवहारनयमावेगाचे- सनस्वभावेनैव सदुपपत्तः । अय परममावमाकनये मृतां नोकर्मकर्मता मूर्तनोकर्म- फर्मता वर्तते । फर्मनोकर्मणोमूर्तस्वभावोऽम्नीत्यर्थः ॥ ७॥ व्याख्यार्थः-असदुद्भूतथ्यवहार नयके मतसे जो प्राण धारण करता है यह जीव है। टसके अचेतनधर्मपना जो जीवाचेतनधर्मता यह है अर्थात् जीव भवेतन समारफा धारक है । इस अचेतन समायके माननेसे ही यह जीव अचेतन है, जड है इत्यादि पर- हार होता है। इससे "मैं अनुमान करता हूं, जानता हूं, इत्यादि प्रीति (अनुभव से दिलक्षण (मनिर्वचनीय ) अज्ञानकी सिद्धि होती है" इस पेदान्तियोंक. फथनफा संग हुआ, क्योंकि भसद्भूतयरदार नयने ग्रहण करनेयोग्य जो अचेतन सभार म अचेतन समायस ही उस अज्ञानती मिद्धि हो जाती है । और परममारग्राहक नयगे मूर्त ऐसी नोकनकर्मता वर्मती है अर्थात् कर्म तथा नोकर्मी म्पमा ३ ॥ ७ ॥ सूत्रम् । असनव्यवहारे जीयमूर्तव्यमिप्यते। परम पुद्गलं हित्या हव्यातत्यमाहितम् ॥ ८॥ गग्रभावार्थ:-समभूतम्यादारनयर मत जाय मूर्त प्रभार मीधारक भौर परमभापमारक नपर्ने पुलको सहकर सर माने अमनमाना पारित की गई १८॥

द्रव्यानुयोगतर्कणा। व्याख्या । असद्भूतव्यवहारे जीवमूर्चत्वमपि जीवस्य मूर्तत्वं जीवमूर्तस्वभाव इष्यत । अतएव अयमात्मा दृश्यते, अमुमात्मानं पश्यामीति व्यवहारोऽस्ति । तथानेन स्वभावेन "रक्तौ च पद्मप्रभवासुपूज्यौ" इत्यादि वचनानि सन्ति । अथ च परमभावग्राहकनये पुद्गल. द्रव्यं विना द्रव्याणाममूर्तत्वं द्रव्यामूर्तत्वमाहितं स्थापितम् । अन्यानि सर्वाण्यपि द्रव्याण्य- मूर्त्तम्वभाववन्तीत्यर्थः ॥ ८॥ व्याख्यार्थ:-असद्भूतव्यवहार नयके मतमें जीवका भी मूर्त स्वभाव माना गया है । इसीसे 'यह आत्मा देख पड़ता है, इस आत्माको में देखता हूं' इत्यादि व्यवहार होता है; और "श्रीपद्मप्रभ तथा श्रीवासुपूज्य ये दोनों तीर्थंकर रक्त (लाल) वर्णके धारक हैं" इत्यादि वचन है। तथा परमभावग्राहक नयकी अपेक्षासे पुद्गलद्रव्यके विना द्रव्योंके अमूर्तस्वभाव रक्खा गया है अर्थात् पुद्गलद्रव्यके सिवाय अन्य सब द्रव्य अमूर्त स्वभावके धारक हैं। यह अर्थ है ॥ ८॥ सूत्रम्। उपचारात्पुद्गलेऽपि नास्त्यमूर्तस्वभाधता । व्यवहियतेऽनुगमात्तदेव चोपचर्यते ॥९॥ सूत्रभावार्थ:-पुद्गलमें उपचारसे भी अमूर्तस्वभावता नहीं है; क्योंकि अनुगमसे जिसका व्यवहार होता है उसी भावका उपचार भी होता है ॥९॥ व्याख्या । इपचारात्पुद्गलद्रव्येऽमूर्तस्वभावता नास्ति । यतश्चेतनसंयोगेन देहादी यथा चेतनत्यमुपचर्यते तथैवामूर्तलं नोपचर्यते । तस्मादसद्धृतव्यवहारादपि पुगलस्यामूर्त- स्वभावो न कथनीयः । प्रत्यासत्तिदोपेणामूर्तत्वं तत्र कथं नोपचरितव्यमिति तदेवोपपाद- यन्नाह । व्यवह्रियतेऽनुगमाद्यदेवानुगमादेकसंवन्धदोपाद्भावत्वं व्यवहियते तदेवोपचर्यते परन्तु सर्वधर्मस्योपचारो न स्यात्तथाचारोपे सति निमित्तानुसरणमनु निमित्तमनुसृत्यारोप इति न्यायो नाश्रयणीय इति भावः ॥९॥ व्याख्यार्थ:-उपचारद्वारा भी पुद्गलः द्रव्यमें अमूर्तस्वभावता नहीं है। इसीसे चेतनके संयोगसे जैसे देह आदिमें चेतनताका उपचार किया जाता है उसी प्रकार अमूर्नके संयोगसे देहमे अमूर्तका उपचार नहीं होता है । इस कारणसे असद्भूतव्यवहार- नयसे भी पुद्गल द्रव्यका अमूर्त स्वभाव है ऐसा कथन नहीं करना चाहिये । अब प्रत्या- सत्ति दोपसे वहांपर अमूर्तताका उपचार क्यों नहीं करना चाहिये इसीका उपपादन करते हुए "व्यवहियतेऽनुगमात्" इत्यादि उत्तरार्द्धसे कहते है कि अनुगम अर्थात् एकसंबंध- दोपसे जिस भावका व्यवहार होता है उसी भावका उपचार भी होता है परन्तु सर्वथा सर्व धर्मके अभावमें सब धर्मका उपचार नहीं होता । और इससे यह सिद्ध हुमा कि जहां आरोप करना हो वहां आरोपके निमित्तका अनुसरण करना चाहिये । और आरोप करके पश्चात् निमित्तका अनुसरण करना इस न्यायको नहीं धारण करना चाहिये । यह भाव है ॥९॥ २८ वैसेही इनका २१८ रायचन्द्रजैनशासमालायाम् सूत्रम् । अशेषोऽनुगतथार्थः संमतौ हि प्रकाशितः। यथाम्बुपयसो दो न यावदन्त्यचैशिष्ट्यम् ॥१०॥ सूत्रभावार्थ:- यह संपूर्ण जीव पुद्गलका 'अनुगत संबन्ध संमतिमें प्रकाशित है. क्योंकि जैसे दुग्ध और जलका अन्त्य विशेष विना भेद नहीं हो सकता, भी भेद नहीं हो सकता ॥ १०॥ व्याख्या । हीति निश्चितम् । अयमभिप्रायः अनुगतात्यन्तसंबन्धः सर्वोऽप्यर्थः संमतौ प्रकाशितः । यथा स्वनुगतत्वे दृष्टान्तमाह । अम्बुपयसोः क्षीरनीरयो दो विभजना पृथक्त्व. मिति तावन्नास्ति यावदन्त्यवैशिष्टयमन्यविशेपपर्यन्तं यावत् । अन्त्यविशेपे शुद्धपुद्गला जीवल- क्षणेन पृथक क्रियन्ते । यथा औदारिकादिवर्गणानिप्पन्नाच्छरीरादेर्शानघनासंख्येयप्रदेश आत्मा भिन्न इति । अत्र गाथा "अणुण्णाणुगयाणं इमयतं वन्निविभयणमजुत्तं । जह दुद्धपाणियाणं जावंत विसेस पजाया । १।" इत्थं कथयतां यदि मूर्तता पुद्गलद्रव्यविभाजकान्त्यविशेपोऽ- स्ति तदा तस्या उपचार आत्मद्रव्येण कथं भवेत् । अथ च यद्यत्र विशेपोनास्ति सदान्योन्या- 'नुगमनेनामूर्तताया उपचारः पुद्गलद्रव्येण कथं न भवेदित्याशङ्का केपांचिद्भवति । तां शङ्का निरा. चिकीर्षुः प्रतिपादयन्नाह ॥ १० ॥ व्याख्यार्थ:-अभिप्राय यह है कि निश्चयरूपसे अनुगत अर्थात् अत्यन्त संवन्धरूप सब अर्थ संमतिमें प्रकाशित किया गया है । अव यथा इत्यादि उत्तरार्द्धसे अनुगततामें दृष्टान्त कहते हैं । जैसे मिले हुए जल और दूधका विभाग (भेद) जबतक अंतिम विशेष नहीं होता तबतक नहीं होता है, इसी प्रकार अन्तके विशेपमें ही शुद्ध पुद्गल जीवलक्षणसे पृथक् किये जाते हैं । भाव यह है कि जैसे जलका तथा दूधका विभाग अंतिम दाह क्रियारूप विशेष अथवा पदार्थविज्ञान विशेषसे होता है, ऐसेही जीवकी मुक्तिदशारूप विशेपमें पुद्गलका जीवसे विभाग होता है । जैसे कि औदारिक आदि वर्गणाओंसे सिद्ध शरीर आदिसे ज्ञानघन असंख्यात प्रदेशोंका धारक आत्मा भिन्न है। इस विषयमें अन्यत्र गाथा कही है कि "जैसे दूध और पानीका अन्त्यविशेष पर्याय तक भेद नहीं होता उसी प्रकार परस्पर अनुगत पदार्थोंका भेद नहीं होता है, यह कहना अयुक्त है." इस प्रकार कहनेवालोंके यदि मूर्तपना पुद्गल द्रव्यको जुदा करनेवाला मन्तका विशेष है तो उसका उपचार आत्मद्रव्यके साथ कैसे होवे । और यदि अन्त्य विशेप नहीं है तो जीव पुद्गलका परस्पर अनुगम होनेसे जैसे मूर्तताका उपचार भात्मद्रव्यके साथ होता है ऐसे ही अमूर्तताका उपचार पुद्गल द्रव्यके साथ क्यों न होगा! ऐसी आशंका किन्हींकी होती है, इस लिये उस शंकाको दूर करनेके लिये कहते हैं ॥१०॥ मुत्रम्। मूर्तिर्यवानभिभूता नास्ति तत्राप्यमूर्त्तता। यत्राभिभूतामूर्तित्वं मूर्त्यनन्त्यं हि तेषु च ॥११॥ - - द्रव्यानुयोगतर्कणा। सूत्रभावार्थ:-जहांपर मूर्त स्वभाव तिरोहित नहीं है, वहाँपर अमूर्त सभाव है ही नहीं; और जहां आत्मद्रव्यमें कर्म है, वहां अमूर्तता तिरोहित नहीं है; किन्तु, वहांपर मूर्त- ता अन्त्यरहित अनुगमसे है ॥ ११ ॥ व्याख्या । यत्र पुद्गलद्रव्यस्य मूर्तिमूर्तता अभिभूता नास्ति किन्तूद्भूताऽसि तत्रामूर्तताख. भावो न भवति । अमूर्तता हापुद्गलद्रव्यस्यान्यविशेषः । अथ च यत्रात्मद्रव्ये कर्म भवति न तत्रामूर्तताभिभूतास्ति । तत्र चामूर्तता अनन्त्यानुगमजनितसाधारणधर्मरूपा भवति । तथा चान्योन्यानुगमाविशेपेऽपि कचिदेव किञ्चित्केनचित्कथंचिदभिभूयत इति यथागमव्यवहार- माश्रयणीयम् ॥११॥ व्याख्यार्थ:-जहां पुद्गलद्रव्यका मूर्त स्वभाव अभिभूत (छिपा हुआ) नहीं है किन्तु उद्भूत (प्रकट) है वहां अमूर्तता स्वभाव नहीं होता है। क्योंकि अमूर्तता पुद्गलसे भिन्न द्रव्यका अन्त्य विशेष है। और जहां आत्मद्रव्यमें कर्म होता है वहां भी अमूर्तता अभि- भूत नहीं है। क्योंकि वहांपर अमूर्तता अन्त्यसे भिन्न अनुगमसे उत्पन्न साधारण धर्मरूप है । इस प्रकार पुद्गल तथा जीवद्रव्यके अनुगममें विशेषता न होनेपर भी कहीं कोई भाव किसीसे किसी प्रकारसे अभिभूत होता है इस प्रकार शास्त्रके व्यवहारके अनुसार अंगीकार करना चाहिये ॥ ११ ॥ सूत्रम्। अन्त्यो भावः पुद्गलस्थापीत्थमत्र विलुप्यते । असद्भूतनये तेन परोक्षोऽणुरमूर्त्तकः ॥१२॥ सूत्रभावार्थ:-पुद्गलका अन्त्य भाव भी इसी प्रकार यहां लुप्त हो जाता है; इसीसे असद्भूतनयके मतमें परोक्ष परमाणु अमूर्त माना गया है ॥ १२ ॥ व्याख्या । उपचारेणाप्यमूर्तस्वभावः पुगलस्य न स्यादिति कथयतां मतेऽन्त्यो भाव एक- विशतितमः स्वभावः पुद्गलस्य विलुमो भवति तदा पुनः “एकविंशतिभावाः स्युर्जीवपुद्गलयो. मताः' इत्येतद्वचनव्याघातादपसिद्धान्तोऽपि जायते । अथ तच्छापनोदायाह असद्भूतव्य. वहारनये तेन फारणेन यः परोक्षः पुद्गलपरमाणुरति तस्यामूर्तता कथिता । व्यावहारिकप्रत्य- क्षागोचरत्वममूर्त्तत्वं प्रमाणोपचरितं भक्तं स्वीक्रियत इत्यर्थः ।। १२ । व्याख्यार्थः-उपचारसे भी पुद्गलके अमूर्तस्वभाव नहीं होता ऐसा कहनेवालोंक मतमें पुद्गलका अन्तका भाव अर्थात् इक्कीसवां स्वभाव नष्ट हो जायगा और पुद्गलका जब अमूर्तस्वभाव नही रहेगा तब पूर्व प्रसंगमें जो ऐसा कहा है कि " पुद्गल तथा जीव इन दोनोंमें प्रत्येकके एकविंशति २१ भाव हैं" इस वचनका व्याघात होनेसे सिद्धान्तकी भी हानि होती है। क्योंकि जब ईवीसमेसे एक अमूर्त स्वभाव निकल जायगा तब तो पुद्गलके चीस स्वभाव ही रहेगे । इस प्रकारकी शंकाको दूर करनेके लिये कहते हैं कि इसी कारणसे असत व्यवहार नयमें जो परोक्ष पुद्गल परमाणु है उसके अमूर्तता कही --

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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्
गई है । तात्पर्य यह कि व्यवहारिक प्रत्यक्षके अगोचर रूप अमूर्त्तखभाव प्रमाणसिद्ध
उपचरित भक्त (कथंचित् ) स्वीकार किया जाता है ॥ १२ ॥
सूत्रम् । पुद्गलाणोश्च कालाणोरेकदेशस्वभावता ।
परमे परद्रव्यस्य भेदकल्पनवर्जितः॥ १३ ॥
सूत्रभावार्थ: :-परम भाव ग्राहक नयके मतसे कालाणु तथा पुद्गल परमाणुकी
एक-प्रदेश-स्वभावता है । और अन्य द्रव्यका भी भेदकल्पनावर्जित शुद्धद्रव्यार्थिक एक
स्वभाव कहलाता है ॥ १३ ॥
व्याख्या । पुद्गलपरमाणोस्तथा कालाणोः परमे परमभावग्राहकनय एकप्रदेशसभावता
कथ्यते । तथा परद्रव्यस्य कालपुद्गलवर्जितान्यद्रव्यस्य भेदकल्पनवर्जितः शुद्धद्रव्यार्थिक
एकप्रदेशस्वभावः कथ्यते ॥ १३ ॥
व्याख्यार्थ: -परम भाव ग्राहक नयमें पुद्गल परमाणु तथा कालके अणुकी एकप्रदे-
शस्वभावता कही गई है । तथा भेदकी कल्पनासे वर्जित शुद्ध द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षासे
काल और पुद्गलसे रहित अन्यद्रव्यके भी एकप्रदेशस्वभाव कहा गया है ॥ १३ ॥
सूत्रम्। शुद्धद्रव्यार्थिकेऽनेकप्रदेशत्वं विनाणुकम् ।
पुद्गलाणोः स्वभावत्वमुपचारेण तत्पुनः ॥ १४ ॥
सूत्रभावार्थ:-शुद्ध द्रव्याथिकनयसे परमाणुको छोड़कर, संपूर्ण द्रव्योंका अनेक-
प्रदेशस्यमाव है । और पुद्गलके अणुके तो अनेकप्रदेशसभावता उपचारसे है ॥ १४ ॥
व्याख्या । शुद्धद्रव्यार्थिक भेदकल्पनासापेक्षशुद्धद्रव्यार्थिकनयेऽणुकं परमाणु विना स.
वैपां द्रव्याणामनेकप्रदेशत्वमनेकप्रदेशस्वभावः कथ्यते । अन्यच पुद्गलाणोः पुद्गलपरमाणो.
स्तदनेकप्रदेशस्वभावलं भवितुं योग्यतास्ति । ततः उपचारेणानेकस्वभावत्वं कथ्यते । काला.
णोश्योपचारकारणता नास्ति ततस्तस्य सर्वथापि स्वभावो नास्ति ॥ १४ ॥
व्याख्यार्थः-भेदकल्पनासापेक्ष शुद्ध द्रव्यार्थिकनयसे परमाणुके सिवाय अन्य सब
व्योंका अनेकप्रदेशस्वभाव कहा गया है । और पुद्गलके परमाणुके उस अनेकप्रदेश-
स्वभाव होनेकी योग्यता है अर्थात् वह पुद्गलपरमाणु अनेकप्रदेशस्वभाव हो सकता है
इस कारण उपचारसे उसके अनेकप्रदेशस्वभावताका कथन किया गया है । और
कालके अणुमें कोई उपचारंकारणता नहीं है इस हेतुसे उसके यह अनेकप्रदेशस्वमात्र
सर्वथा नहीं है ॥ १४ ॥
सूत्रम् । शुद्धाशुहार्थिक विद्धि विभायाख्यस्वभावकान् ।
शुद्ध शुद्धसभायाः स्युरशुद्ध शुद्धवर्जिताः॥१५॥
सूत्रभावार्थ:-हे शिष्य, शुद्धाशुद्ध द्रव्याधिकनयमें विभाव नामक स्वभावोंका
वोध करो । शुद्ध द्रव्यार्थिक नयम शुद्ध स्वभावोंकी और अशुद्ध द्रव्यार्थिक नयम अशुद्ध
स्वभावोंकी स्थिति है।॥ १५॥

२२२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् क्योंकि गुण सहभावी हैं, इस लिये उनमें उपचार नहीं होता है । तात्पर्य यह कि कोई स्वभाव गुण पर्यायोंसे भिन्न नहीं है इस लिये जो अनुपचरित भाव है वही गुण और जो उपचरित भाव है वही पर्याय कहा जाता है । और इसी कारणसे केवल द्रव्यके आश्रय जो हैं वे गुण हैं; और द्रव्य, गुण दोनोंके आश्रय जो हैं वे पर्याय हैं । इस विषयमें उत्तराध्ययनसूत्रमें गाथाद्वारा कहा है कि "गुणोंका आश्रय द्रव्य है अतएव द्रव्या- श्रितल गुणोंका लक्षण है; और दोनोंके आश्रय रहना, यह पर्यायोंका लक्षण है."॥१७॥ सूत्रम् । एवं स्वभावोपगता गुणास्तु भेदेन सम्यकथिताश्च योग्या। अहत्क्रमाम्भोजसमाश्रितानां भव्यात्मनांज्ञानगुणार्धमत्र। सूत्रभावार्थ:--इस प्रकार इस अध्यायमें श्रीजिनेन्द्रके चरणकमलोंके आश्रित भव्य जीवोंको ज्ञानगुणकी प्राप्तिके लिये हमने शास्त्रोक्त योग्य खभावसे प्राप्त गुण अच्छी रीतिसे भेद करके कहे हैं ॥ १८ ॥ इति द्रव्यानुयोगतर्कणायां त्रयोदशोऽध्यायः । ध्यारया । यदि च वद्रव्यादिमाकेणास्तिस्वभावः, परद्रव्यादिप्राहकेण नास्तिस्वभावः, इत्यादि स्वभावोपगता गुणाः स्वभावसहिता इत्युपगम्यते । तदोभयोरपि द्रव्यार्थिकविषयत्वा- त्सप्तमङ्गयामाद्यद्वितीययोर्भङ्गयोर्द्रव्यार्थिकपर्यायार्थिकाश्रयेण प्रक्रिया भज्येतेत्याद्यत्र बहु विचा. रणीयम् । एवमनया रीत्या स्वभावाः स्वभावयुक्ता गुणाश्च भेदेन प्रकारकथनेन सम्यक्शा- स्रोक्तरीत्या कथिताः प्रकाशिताः । श्रीमद्वाचकमुख्ययशोविजयपाठकमतल्लिकारचितप्राकृतपाठ- दृष्टा लिखिवा इत्यर्थः । किमर्थमन्त्र कस्मै कार्याय कथिता इति प्रयोजनपदं शानगुणार्थ केपाम- हतावीतरागाणां क्रमाश्चरणास्तएवाम्भोजानि कमलानितत्र समाश्रितानां शरणीभूतानां भव्या- स्मनां भव्यलोकानां ज्ञानगुणार्थ मया कथिता इत्यर्थः ।। १८ ॥ इति श्रीकृतिभोजसागरनिर्मितायां द्रव्यानुयोगतर्कणान्याख्यायां त्रयोदशोऽध्यायः। व्याख्यार्थः-यदि अपने द्रव्य क्षेत्र आदिका ग्राहक होनेसे अस्तिस्वमान और पर- कीय द्रव्यक्षेत्रादिका ग्राहक होनेसे नास्तिस्वभाव है; इत्यादि खभावसे उपगत गुण हैं ऐसा स्वीकार करते हो तब तो दोनोंके द्रव्यार्थिक नयका ही विषयपना होनेसे सप्तभंगीमें प्रथम- भंग (स्यादस्त्येव) कथंचित् है ही और द्वितीयभंग (स्यान्नास्त्येव) कथंचित् है ही नहीं इन दोनों भंगोमें द्रव्याधिक तथा पर्यायाधिकके आश्रय जो प्रक्रिया है उसका भंग होगा; इत्यादि बहुत कुछ यहांपर विचारणीय है । इस पूर्वोद रीतिसे स्वभाव तथा समाव- सहित गुण प्रकारोंके कथनद्वारा शास्त्रोक्त रीतिसे प्रकाशित किये हैं अर्थात् श्रीमान् वाचक मुख्य यशोविजयजी उपाध्यायद्वारा विरचित प्राकृतपाटमें देखे हुए लिसे हैं। किस - द्रव्यानुयोगतर्कणा। २२३ प्रयोजनके लिये कहे हैं? कि श्रीजिनेन्द्रके चरणरूपी कमलोंके शरणको प्राप्त जो भव्यजन हैं, उनको ज्ञानगुणकी प्राप्ति हो इस लिये मैने कहे हैं। यह तात्पर्य है ॥ १८ ॥ इति श्रीपण्डितठाकुरप्रसादशमविरचितभापाटीकासमलङ्कृतायां द्रव्यानुयोगत. कणायां त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ अथ पर्यायभेदानाह । अव पर्यायके भेदोंको कहते हैं। सूत्रम् । नत्वा जिनं प्रवक्ष्यामि पर्यायोत्कीर्तनं मुदा । व्यञ्जनार्थविभेदेन तविभेदं समासतः ॥१॥ मूत्रभावार्थ:-श्रीजिनेन्द्रको नमस्कार कर, आनन्दपूर्वक इस अध्यायमें पर्या- योंका वर्णन करूंगा । वह पर्यायोंका वर्णन समास(संक्षेप)से व्यंजन और अर्थक भेदसे दो प्रकारका है ॥ १॥ व्याख्या । जिनं वीतरागं नत्वा नमस्कृत्य पर्यायोत्कीर्तनं पर्यायाणामुत्कीर्तनं पर्यायोत्की- तनं मुदा हर्पण प्रवक्ष्यामि । यदित्युत्तरापेक्षायां तत्पर्यायोत्कीर्तनं समासतः संक्षेपाद व्यस नार्थविभेदेन व्यसनं चार्थश्च तयोर्वभेदः प्रत्येकं योजना व्यवनभेदेनार्थभेदेन तत्कीर्तन पर्यायस्य द्विभेदं द्विप्रकारकमित्यर्थः ।। १ ।। व्याख्यार्थ:-श्रीवीतरागको नमस्कार करके, हर्षसे पर्यायोंका उत्कीर्तन (निरूपण) इस चतुर्दश १४ अध्यायमें कहूंगा । 'यत्' यह आगेके कथनकी अपेक्षामें है. जो पर्यायका निरूपण संक्षेपसे व्यंजन और भर्थके भेदसे अर्थात् व्यंजनके भेदसे तथा अर्थके भेदसे दो प्रकारका है ॥१॥ सूत्रम् । तत्र व्यञ्चनपर्यायस्त्रिकालस्पर्शनो मतः। द्वितीयथार्थपर्यायो वर्तमानाणुगोचरः ॥२॥ सूत्रभावार्थ:--उन दोनों भेदोमेसे प्रथम व्यंजन पर्याय त्रिकालस्पर्गी कहा गया है; .और दूसरा अर्थ पर्याय वर्तमान सूक्ष्मकालवी माना गया है ॥ २ ॥ व्याख्या । तत्र तयोयोरुत्कीर्तनयोर्मध्य आयो व्यवनपर्यायविकालस्पर्शनो मनोऽनु. गतकालकलितः कथितः । यस्य हि त्रिकालस्पर्शनः पीयःम च व्यवनपर्यायः। ययाहि-पटा- दीनां मृदादिपर्यायो व्यसनपर्यायो मृन्मयः सुवर्णादिधातुमयो वा घटः कालत्रयेपि मृदादिः पर्यायत्वं व्यश्चयति; तथा द्वितीयोभेदोऽर्थपर्यायः वर्तमानाणुगोचरः मूक्ष्मवर्तमानकालवी अर्थपर्यायः यथाहि-घटादेतत्तत्क्षणवत्ती पर्यायः यस्मिन्काले वर्तमानवया स्थितसत्तत्वा. लापेक्षाकृतविद्यमानत्वेनार्थपर्याय उच्यत इत्यर्थः॥२॥ व्याख्यार्य: :-उन दोनो उत्कीर्तनों में प्रथम जो व्यंजन पर्याय है वह विकाठमी है अर्थात् पूर्वापर अनुगत सब कालके साथ वह पर्याय स्पर्श करता है । तात्पर्य यह जिसका स्पर्श भूत, भविष्य तया वर्तमान इन तीनों कालोंमें होता है वह व्यसन पर्याय है। - १२२१ रायचन्द्रजैनशासमालायाम् जैसे-घटादिका मृत्तिका आदि पर्याय व्यञ्जन पर्याय है अर्थात् मृन्मय अथवा सुवर्णादिमय घट तीनो कालोंमे पर्यायत्य अर्थात् मृत्तिका आदि पर्यायको प्रकाश करता है । और द्वितीय भेद अर्थपर्याय है । यह अर्थपर्याय वर्तमान अणुका विषय है अर्थात् सूक्ष्म वर्तमान कालवी अर्थ पर्याय है । जैसे घट आदिका उस उस क्षणमें रहनेवाला पर्याय जिस कालके क्षणमें वर्तमानतासे स्थित है उस उस कालकी अपेक्षासे उत्पत्तिद्वारा विद्यमान होनेसे वह अर्थपर्याय कहा जाता है । भाव यह है कि जिस क्षणमें घट विद्यमान है उसी क्षणकी विद्यमानतासे वह घट अर्थपर्याय है ॥२॥ अथ वयोः प्रत्येक द्वैविध्यं दर्शयन्नाह । अब उन दोनों पर्यायोंमें प्रत्येकके दो २ भेद दिखाते हुए कहते हैं। सूत्रम् । द्रव्यतो गुणतो देधा शुद्धृतोऽशुद्धतस्तथा । शुद्धद्रव्यव्यञ्जनाख्यश्चेतनों सिद्धता यथा ॥ ३ ॥ सूत्रभावार्थ: -उन पर्यायोंके द्रव्यसे तथा गुणसे दो भेद हैं और शुद्ध तथा अशु- के द्वारा भी दो भेद हैं । शुद्ध द्रव्यव्यंजननामा शुद्ध द्रव्यव्यंजन पर्याय जैसे चेतनमें सिद्धता पर्याय है ॥ ३॥ व्याख्या। द्रव्यतो द्रव्यपर्यायो भवति तथा गुणतो गुणपर्यायोऽपि भवति, एवं द्वेधा द्वि. प्रकारः स्यात् । तथाहि द्रव्यव्यसनपर्यायो गुणव्यवनपर्याय इति । तया पुनलेनैव प्रकारेण शुद्धतः शुद्धद्रव्यव्यसनपर्यायः, अशुद्धतोऽशुद्धद्रव्यव्यवनपर्यायश्च द्विप्रकारः । तत्र से भेदेषु शुद्धद्रव्यव्यसनाख्यः शुद्धद्रव्यव्यवनपर्यायः कस्मिन्भवति घेतने यथा सिद्धता पेवनद्रव्यस्य यथा सिद्धपर्यायः । अयं हि फेवलभावाोयः ॥३॥ व्याख्या:-द्रव्यसे तो द्रव्यपर्याय होता है और गुणसे गुण पर्याय होता है, इस प्रकार दो भेद होते है । जैसे द्रव्यव्यंजन पर्याय तथा गुणय्यंजन पर्याय होता है। और उसी प्रकारसे शुद्धसे शुद्ध द्रव्ययंजन पर्याय होता है तथा अशुद्धसै अशुद्ध द्रव्यप्यंजन पर्याय होता है ऐसे दो भेद है । अब उन भेदों से शुद्ध द्रव्यव्यंजन नामक शुद्ध द्रव्यव्यं- जन पर्याय किसमें होता है, जैसे चेतनमें सिद्धता अर्थात् चेतनद्रव्यका सिद्ध पर्याय है। यह शुद्ध द्रव्यव्यंजन पर्याय केवल मावसे जानना चाहिये ॥ ३ ॥ पुन दोपदेनमा । फिर भेदका उपदेश करते हैं। मृत्रम् । अशुद्रव्यव्यसनो नरादिर्यष्ट्रयामतः । गुणतोऽपीत्यमेवात्र फैयल्यमतिचिन्मुखः ॥४॥ मृग्रभावार्थ:-अशुद्ध द्रव्यव्यंजन पर्याय मनुस्य देव भादि अनेक प्रकारका माना गया है और इसी प्रकार गुणसे भी नागने अर्थात् शुद्ध गुणयंजन पर्याय तथा भगुन गुपयनन पर्याय में दो भेट गुमसे हैं । इनमें प्रयग भेदमें केवलज्ञान आदि और दमरे भेदमें मतिमानादिपर्याय ॥४॥ ।

द्रव्यानुयोगतर्कणा। २२५ व्याख्या। अशुद्धद्रव्यव्यञ्जनपर्यायोऽशुद्धद्रव्यव्यञ्जनो नरादिरादिशब्दाद्देवनारकतिर्यगा- दयो बहुधा मतासदपेक्षया नरादिर्वहुधा मतः। अत्र हि द्रव्यभेदः पुगलसंयोगजनितोऽस्ति । मनुष्यादिभेदेनैवं भेदः। गुणतोऽपीत्थमेव । गुणव्यसनपर्यायो द्विप्रकारः । तत्र प्रथम शुद्धगुणव्यञ्जनपर्यायः कैवल्यं केवलज्ञानादिरूपः, द्वितीयोऽप्यशुद्धगुणव्यवनपर्यायो मतिचिन्मुखः । मतिश्रुतावधिमनःपर्ययरूप इति ॥ ४ ॥ व्याख्यार्थ:- :--अशुद्ध द्रव्यव्यंजन पर्याय मनुष्य, देव, नारक और तिर्यञ्च आदि रूपसे अनेक प्रकारका माना गया है. इसीकी अपेक्षासे "नरादिर्बहुधा मतः" यह सूत्रमें पाठ है। यहाँपर द्रव्यका भेद पुद्गल संयोगसे उत्पन्न है, अतः मनुष्य आदिके भेदसे यह भेद होता है । गुणसे भी इसी प्रकार है अर्थात् गुणव्यंजन पर्याय भी दो प्रकारका है। उनमें प्रथम शुद्ध गुणव्यंजन पर्याय जो है, वह तो केवलज्ञान आदि रूप पर्याय है।और दूसरा अशुद्ध गुण व्यंजन पर्याय मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान तथा मनःपर्यय ज्ञान आदि स्वरूप है॥४॥ पुनः कथयति । फिर भी पर्यायका भेद कहते हैं। सूत्रम् । ऋजुसूत्रमतेनार्थपर्यायः क्षणवृत्तिमान् । आभ्यन्तरः शुद्ध इति तदन्योऽशुद्ध ईरितः ॥५॥ सूत्रभावार्थ:-ऋजुसूत्र नयके मतसे अर्थपर्याय क्षणवृत्तिवाला है । आभ्य- न्तर तो शुद्ध अर्थपर्याय है और उससे अन्य अशुद्ध अर्थपर्याय कहा गया है ॥ ५ ॥ ध्याख्या । अरजुसूत्रमतेन सूत्रादेशेनार्थपर्यायः, आभ्यन्तरः शुद्धार्थपर्यायः क्षणवृत्तिमान क्षणपरिणतः । तदन्यस्तदतिरिक्तोऽशुद्ध ईरितः । यो यस्मादल्पकालवी पर्यायः सच तस्मादल्पत्वविवक्षया अशुद्धार्थपर्यायः कथ्यते ॥५॥ व्याख्यार्थ:-ऋजुसूत्रनयके आदेशसे आभ्यन्तर (अन्तरंग)का जो है वह शुद्ध अर्थपर्याय है और क्षणमात्रवृत्ति है अर्थात् शुद्धार्थपर्याय क्षणक्षणमें परिणामको प्राप्त होता है । और उससे अन्य अशुद्ध अर्थपर्याय कहा गया है । तात्पर्य यह कि जो जिस पर्यायसे अल्पकालवी पर्याय है वह पर्याय उस अधिक कालवी पर्यायसे अल्पसकी अपेक्षासे अशुद्ध अर्थपर्याय कहा जाता है ॥ ५॥ अत्र वृद्धवचनसंमति दर्शयति । इस विषयमें वृद्धोंके वचनरूप संमति दर्शाते हैं। सूत्रम् । नरो हि नरशब्दस्य यथा व्यञ्जनपर्ययः। यालादिकोऽर्थपर्यायः संमती भणितस्त्वयम् ॥६॥ सूत्रभावार्थ:-जैसे नर शब्दका नर पर्याय व्यंजनपर्याय कहा गया है, वैसे ही संमति ग्रन्थमें याल आदि अर्थपर्याय कहा गया है ॥६॥ -

२२६
रायचन्द्रजैनशाखमालायाम्
व्याख्या । नरो हि नरशब्दस्य यथा व्यवनपर्यय इति । यथा पुरुपवाच्यजन्ममरणका.
लपर्यन्त एकोऽनुगतनगत्वपर्यायः स च पुरुषस्य व्यवनपर्यायोऽस्ति, संमतिविषये वालादि-
कस्तु पुनरर्थपर्यायः कथितः । अयमिति इदमः प्रत्यक्षत्वे साक्षात्संमतिदृष्ट इति । अन गाथा
"पुरिसंमि पुरिससद्दो जम्माइ मरणकालपनंतो । तस्सओ वालाईया पञ्जयभेया यहु विगप्पा।।
॥१॥६॥
व्याख्यार्थ:-जैसे नरशब्दका नर व्यंजनपर्याय है. तात्पर्य यह कि पुरुष शब्दसे
वाच्य पुरुषपर्याय जन्मसे आदि लेके मरणकालपर्यन्त एक अनुगत रूपसे नरत्व पर्याय
है और वह पुरुषका व्यंजन पर्याय है और बाल भादिक अर्थपर्याय हैं ऐसा संमति ग्रंथमें
कहा है, अर्थात् यह विषय साक्षात् संमतिमें देखा हुआ है । यहां संमतिकी गाथा है कि
"जैसे पुरुपमें पुरुष यह शब्द जन्मसे मरणतक रहता है यह व्यंजन पर्याय है और उस
पुरुपमें बाल, युवा, इत्यादि जो भेद हैं ये सव अर्थपर्याय है ॥ ६ ॥
अथ केवलज्ञानादिकः शुद्धगुणव्यञ्जनपर्याय एव भवति, तत्रार्थपर्यायो नास्तीत्येता.
दृशी कस्यचिद्दिक्पटाभासस्पाशङ्कालि तां निराकरोति ।
अब "केवल ज्ञान आदि शुद्ध गुणव्यञ्जन पर्याय ही हैं, उनमें अर्थपर्याय नहीं है."
ऐसी किसी दिगम्बराभासकी शंका है, उसको दूर करते हैं।
सूत्रम्। पड्गुणहानिवृद्धिभ्यां यथाऽगुरुलघुस्तथा।
पर्यायः क्षणभेदाच केवलाख्योऽपि संमतः॥७॥
सूत्रभावार्थ:-जैसे पड्गुणी हानिवृद्धिसे अगुरुलघु पर्याय माना है, उसी प्रकार
क्षणके भेदसे केवलाख्य गुण पर्यायके भी अर्थ पर्याय माना गया है ॥ ७ ॥
ध्याच्या पद्गुणहानिद्धिभ्यामगुरुलघुपर्याया यथा कथिताः पड्गुणहानिवृद्धिलक्षणा
अगुरुलघुपर्यायाः सूक्ष्मार्थपर्याया इतिवत्पर्यायः क्षणभेदात्केवलाख्योऽपि संमतः क्षणमेदा-
केवलहानपर्यायोऽपि भिन्नो भिन्न एय दर्शितः । यतः "पढमसमये योगभवत्थकेवलनाणे"
अपढमसमये सजोगिभवत्यफेवलनाणे" इत्यादिवचनात्तहजुसूत्रादेशेन शुद्धगुणस्पाप्यर्थपर्याया
मन्तव्याः॥७॥
व्याख्यार्थ:-जैसे पड्गुणी हानि वृद्धिसे भगुरुलघु पर्याय कहे हैं अर्थात् जैसे
पद्गुणी हानि वृद्धिलक्षण अगुरुलघु पर्याय अर्थात् सूक्ष्मार्थ पर्याय हैं ऐसेही क्षणके भेदसे
केवल ज्ञान नामक पर्याय भी भिन्न २ ही देसा गया है. क्योंकि, प्रथम समयगे योग-
भवस्थ केवलज्ञानमें, द्वितीयसमय सयोगी भवस्थ केवलज्ञानमें" इत्यादिवचन है. इस लिये
ऋजुसूत्रनयके भादेशसे शुद्ध गुणके मी अर्थपर्याय मानने चाहिये ॥ ७॥
सूत्रम् । सद्रव्यव्यञ्जनोऽणुश्वाशुद्धपुद्गलपर्यवः ।
दयणुकाद्या गुणाः स्वीयगुणपर्यायसंयुताः ॥ ८॥

द्रव्यानुयोगतर्कणा।
२२७
सूत्रभावार्थ:-शुद्ध द्रव्यव्यंजन परमाणु जो है वह शुद्ध पुद्गल पर्याय है और
द्वचणुकादि अशुद्ध द्रव्य व्यंजन पर्याय हैं । ये अपने २ गुण पर्यायों सहित हैं ॥ ८॥
व्याख्या । सद्व्यव्यञ्जनोऽणुः शुद्धद्रव्यव्यञ्जनपरमाणुः शुद्धपुद्गलपर्यवस्तस्य नाशो नास्ति।
वथा व्यणुकादिका अशुद्धद्रव्यव्यञ्जनपर्यायाः संयोगजनितत्वात् । कीदृशाः स्वीयगुणपर्यायसं.
युताः पुद्रलद्रव्यस्य शुद्धगुणव्यञ्जनपर्यायाः अशुद्धगुणव्यअनपर्यायास्ते निज २ गुणानिता
मन्तव्याः । यतः परमाणुगुणो यः स च शुद्धगुणव्यवनपर्यायस्तथा द्विप्रदेशादिगुणो यः स
चाशुद्धगुणव्य अनपर्यायः ॥८॥
व्याख्यार्थः-शुद्ध द्रव्यव्यंजन परमाणु जो है वह शुद्ध पुद्गल पर्याय है । क्योंकि,
उसका नाश नहीं होता है । और व्यणुक आदि अशुद्ध द्रव्यव्यंजन पर्याय है। क्योंकि,
संयोगसे उत्पन्न होनेके कारण नाशवान् हैं । ये कैसे हैं कि अपने गुण तथा पर्याय करके
सहित हैं । अर्थात् पुद्गल द्रव्यके जो शुद्ध गुणव्यंजन पर्याय और अशुद्ध गुणव्यंजन पर्याय
हैं, ये अपने २ गुणके आश्रित मानने चाहिये । क्योंकि, जो परमाणुका गुण है यह
तो शुद्ध गुणव्यंजन पर्याय है; और जो द्विप्रदेश भादिका गुण है वह अशुद्ध गुणव्यंजन
पर्याय है ॥ ८॥
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सूत्रम् । सूक्ष्मार्थपर्यवाः सन्ति धर्मादीनामितीव ये।
कथयन्ति न किं तेऽमुं जानन्त्यात्मपरार्थतः ॥९॥
सूत्रभावार्थ:-धर्मादि द्रव्यके सूक्ष्म अर्थपर्याय है ऐमा जो दिगम्बर कहते हैं सो
क्या वे खपरबोधसे इस क्षणपरिणामरूप अर्थपर्यायको नहीं जानते ॥ ९ ॥
व्याख्या । धर्मादीनां धर्मास्तिकायादीनां सूक्ष्मार्थपर्यवाः शुद्धद्रव्यव्यंजनपर्यायाः सन्ति,
इतीव ये कथयन्त्येतादशहठं कुर्वन्ति ते जना हठं त्यक्त्वा आत्मपरार्थतः निजपरप्रत्ययादृजुः
सूत्रादेशेन चामुं क्षणपरिणतिरूपं पूर्वोकमर्थपर्यायमपि केवलज्ञानादिवन्न किं किमिति फयं न
जानन्ति हठं त्यक्त्वा कयं नागीकुर्वन्ति । किं च तेषु धर्मास्तिकायादिप्वपेक्षया अशुद्धपर्या-
योऽपि भवति न घेत्तदा परमाणुपर्यन्तविश्रामः पुदलद्रव्येऽपि न भवति, इत्यभिप्रायेण कय.
यन्नाह॥९॥
व्याख्यार्थ:-धर्मास्तिकाय आदि द्रव्योंके सूक्ष्म अर्थ पर्याय अर्थात् शुद्ध द्रव्यव्यंजन
पर्याय हैं, ऐसा जो हठ करते हैं, ये हठ करनेवाले मनुष्य हठको छोड़कर, अपने प्रत्ययसे
अथवा परके प्रत्ययसे और ऋजुसूघनयके आदेशसे इस क्षणपरिणाम रूप पूर्वकथित अर्थ
पर्यायको भी केवल ज्ञान आदिकी मांति क्यों नहीं जानते! अर्थात् अपने हलको छोड़कर,
क्यों नहीं स्वीकार करते । यह आक्षेप है । और भी, उन धर्मालिकाय आदिमें अपेक्षा
अशुद्ध पर्याय भी होता है, यदि ऐगा न हो तो पुद्गल द्रव्यमें भी परमाणु तक विश्राम नहीं
होता है। इस भमिनायसे लोक कहते हैं ॥ ९॥

२२८ रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् सूत्रम् । यथाऽऽकृतिश्च धर्मादेः शुद्धो व्यंजनपर्यवः । लोकस्य द्रव्यसंयोगादशुद्धोऽपि तथा भवेत् ॥१०॥ सूत्रभावार्थ:-जैसे धर्म आदि द्रव्यके लोकाकाश प्रमाणसे शुद्ध व्यंजन पर्याय है, ऐसेही लोकमें रहनेवाले द्रव्योंके संयोगसे अशुद्ध व्यंजन पर्याय क्यों न हो ! अर्थात् होनाही चाहिये ॥ १० ॥ व्याख्या । धर्मास्तिकायादेराकृतिौंकाकाशमानसंस्थानरूपा यथा वर्तते तथा शुद्धोव्यंज- नपर्यवः शुद्धद्रव्यव्यंजनपर्यायः कथ्यते परनिरपेक्षत्वेनेति । तथा लोकस्य द्रव्यसंयोगालो. कवी द्रव्यसंयोगरूपोऽशुद्धद्रव्यव्यंजनपर्यायोऽपि तस्य लोकस्य द्रव्यसंयोगानिरपेक्षत्वं कथयन्विरोधं नोत्पादयति । विरोधः कोऽपि नास्तीत्यर्थः ॥१०॥ व्याख्यार्थ:-जैसे धर्मास्तिकाय मादि द्रव्यका आकार लोकाकाश प्रमाण स्थिति- रूप है, इस लिये परद्रव्यकी निरपेक्षासे वह शुद्ध द्रव्यव्यंजन पर्याय है ऐसा कथन होता है; ऐसेही लोकके द्रव्योंके संयोगसे अर्थात् लोकमें रहनेवाले जो द्रव्य हैं उन द्रव्योंका धर्मादि द्रव्यके साथ संयोगरूप अशुद्ध द्रव्यव्यंजन पर्याय भी है; और उस लोकके द्रव्य संयोगसे निरपेक्षक होनेसे किसी विरोधको भी नहीं उत्पन्न करता; अर्थात् कोई विरोध नहीं है॥ १० ॥ अथाकृतिः पर्यायो भविष्यति, संयोगः पर्यायो न भविष्यतीत्यारावां परिहरन्नाह । अब आकृति पर्याय हो सकती है और संयोग नहीं इस आशंकाको दूर करते हुए कहते हैं। रसूत्रम् । आकृतेरिव संयोगः पर्यवः कथ्यते यतः। उत्तराध्ययनेऽप्युक्तं पर्यायस्य हि लक्षणम् ॥ ११ ॥ सूत्रभावार्थ:-आकृतिके समान संयोग भी पर्याय कहलाता है । क्योंकि, उत्तरा- ध्ययन सूत्रमें भी पर्यायका लक्षण कहा है ॥ ११ ॥ घ्याख्या । संयोगोऽप्याश्तेरिवाकृतिवत्पर्यायः कथ्यते । यवो हेतोः पर्यायस्य लक्षणं हीति निश्चितमुत्तराध्ययनेऽप्युक्तं कथितम् । ततोऽस्य लक्षणं सभेदमपि श्रीउत्तराध्ययनादेवावसेय. मिति ॥ ११ ॥ व्याख्यार्थ:-संयोग भी भाकृति (आकार) के समान पर्याय कहा जाता है। क्योंकि, निश्चय रूपसे पर्यायका लक्षण उत्तराध्ययन सूत्र में भी कहा है । इसलिये भेदसहित पर्यायका लक्षण श्रीउत्तराध्ययन सूत्रसे ही जानना चाहिये ॥ ११ ॥ पुनम्नदेवाह। फिर पर्याय के विषयमें ही कहते हैं।

२२९ द्रव्यानुयोगतर्कणा। सूत्रम् । एकत्वं च पृथक्त्वं च संख्या संस्थानमेव च । संयोगश्च विभागश्तीत्थं मनसि चिन्तय ॥ १२ ॥ सूत्रभावार्थ:-एकत्व, पृथक्त्व, संख्या, संस्थान, संयोग तथा विभाग इन सबको पर्याय रूपसे मनमें विचारो ॥ १२ ॥ घ्याख्या। एकत्वं १ पृथक्त्वम् २ एतद्दयं तथा पुनः संख्या १ संस्थानम् २ एतद्वयं च पुनः संयोगः १ विभागः २ एतद्द्वयं चेत्यादि पढें द्वित्वपरिणतं मनसि चिन्तय । स्वचेतोगोच- रीकुरप्वेत्यर्थः । तथा च तत्र गाथा-"एगत्तं च पुहुत्तं च संख्या संठाणमेव च । संयोगोय विभागो य पजवाणं तु लक्षणं ।१।" इत्येतद्गाथोकपर्यायभेदभावना भावयितव्या ॥ १२ ॥ व्याख्यार्थ:- :--एकत्व १ पृथक्त्व २ ये दोनों, संख्या १ संस्थान २ (आकृति वा अवयव. रचना) ये दोनों, पुनः संयोग १ तथा विभाग २ ये दोनों, इन तीन द्वन्द्व अर्थात् छहको मनमें पर्याय रूप विचारो । अर्थात् अपने चित्तमें इनको पर्यायके भेद समझो । ऐसी ही यहांपर उत्तराध्ययनकी गाथा है-"एकत्व १ पृथक्त्व २ संख्या ३ संस्थान ४ संयोग ५ और विभाग ६ ये पर्यायके लक्षण हैं । इस गाथामें जो (एकत्व आदि) कहे हैं, उनमें पर्यायके भेदकी भावना करनी चाहिये । भावार्थ-उत्तराध्ययनमें संयोगको भी पर्याय माना है ।॥ १२ ॥ पुनः प्रकृतमेवार्थमाह। फिर उसी पर्याय विषयको कहते हैं । सूत्रम् । उपचारी न वाऽशुद्धो यद्यप्यन्याश्रितो भवेत् । असद्भूता मनुष्याद्यास्तदा नाशुद्धयोगकाः ॥१३॥ सूत्रभावार्थ:-जो उपचरित है यह यद्यपि परद्रव्याश्रित हो परन्तु अशुद्ध नहीं हो सकता । यदि ऐसा मानते हो, तब तो असद्भूत मनुष्य आदि भी अशुद्धपर्याययोगी नहीं होंगे ॥ १३ ॥ व्याख्या। उपचारी न भवत्यशुद्धो यद्यप्यन्याश्रितो भवेत्परद्रव्यसंयोगी स्यात्तथाप्युप- पारी अशुद्धतां नाप्नोति । अथ प योवं कथयिष्यय यदि घ धर्मास्तिकायादीनां परद्रव्यसं. योगोऽसि सदुपरितपर्याय इति कथ्यते, परन्त्यशुद्धपर्याय इति न कथ्यते, द्रव्यातयाखहे. तुम्वेवाशुद्धत्वव्यवहारोऽसीति, तत्तरमाद् मनुष्यादिपर्यायोऽध्यशुद्ध इति न कथयत, असहत व्यवहारनयमाह्यत्वेनासद्भूत इति कथयत । तद्धि तन्त्वादिपर्याययदेकद्रव्यजनकावयस पातस्यैवाशुद्धद्रव्यव्यंजनपर्यायत्वं प कथयतां पतुरनं लगेदिति । तस्मादपेशानपेक्षाभ्या शुद्धाशुद्धानेकान्तव्यापकलमेव श्रेय इति । तदेवामेवने पये प्रतिपादयिष्यति। स्त्वेवम् । असता मनुष्यायालदा अमुदयोगका नेवि ।। १३ ।। व्याख्यार्य--उपचारवान् यद्यपि परद्रव्यका संयोगी होवे तथापि वह नहीं प्राप्त होता है । अब यदि ऐसा कहते हो कि, धर्मास्तिकाप भादि. .

२३० रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् साथ संयोग है; इसीसे उनको उपचरित पर्याय कहते हैं परन्तु अशुद्ध पर्याय नहीं कहते । क्योंकि द्रव्यके अतथाभावके (अन्यपनेके) हेतुओंमें ही अशुद्धताका व्यवहार है, इस का- रण, मनुष्य आदि पर्याय भी अशुद्ध है; ऐसा न कहो। किन्तु असद्भूत व्यवहार नयसे ग्राह्य होनेसे असद्भूत है, ऐसा कहो। क्योंकि वह तन्तु आदि पर्यायकी तरह एकद्रव्यजनक जो अवयवसंघात (अवयवों का समूह) उसीको अशुद्ध द्रव्यव्यंजनपर्यायता कहनेवा- लोके चतुरस्र लगेगा । इसलिये अपेक्षासे शुद्ध और अपेक्षारहिततासे अशुद्ध इस प्रकार अनेकान्त व्यापकता ही श्रेष्ठ है। और इसीको आगेके श्लोकमें प्रतिपादित करेंगे। अक्षरोंका अर्थ तो यह है कि, यदि उपचारी अशुद्धताको नहीं प्राप्त होता; तो मनुष्य आदि भी अशुद्ध पर्यायके योगी नहीं हैं ॥ १३ ॥ पुनः कथयति । पुनः उसी विषयको कहते हैं। सूत्रम् । धर्मादेरन्पपर्यायेणात्मपर्यायतोऽन्यथा। अशुद्धताविशेपो न जीवपुदलयोर्यथा ॥१४॥ सूत्रभावार्थ:-धर्मास्तिकाय आदिके परपर्यायसे तथा अपने पर्यायसे विलक्षणता है; और जैसे जीव, पुद्गलमें अशुद्धताका विशेप नहीं है, वैसे इनमें भी नहीं है ॥ १४ ॥ व्याख्या । धर्मादेर्धर्मास्तिकायादेरन्यपर्यायेण परपर्यायेणात्मपर्यायेणात्मपर्यायतः स्वपर्या- यादन्यथा विपमत्वं विलक्षणत्वं ज्ञातव्यम् । यतः कारणादशुद्धताया विशेपो नास्ति यथा जीव पुद्गलयोर्विपये अशुद्धताविशेषो नास्ति ॥ १४ ॥ व्याख्यार्थः-धर्मास्तिकाय आदिके परपर्याय तथा आत्मपर्यायसे विलक्षणता जाननी चाहिये। क्योंकि, जैसे जीव और पुद्गलके विषयमें अशुद्धता विशेप नहीं है। वैसे यहां भी अशुद्धताका विशेष नहीं है ॥ १४ ॥ अथ प्रकारान्तरेण चतुर्विधपर्याया नयचक्रे कथितास्तानेव दर्शयन्नाह । अव नयचक्रमें अन्य प्रकारसे पर्यायोंके जो चार भेद कहे हैं; उन्हीं मेदोंको दर्शते हुए आगेका श्लोक कहते हैं। सूत्रम् । स्वजातेश्च विजातेश्च पर्याया इत्यमर्धके । खभावाच विभावाच गुणे चत्वार एव च ॥१५॥ सूत्रभावार्थ:-द्रव्यके विषयमें इसी प्रकार स्वजातीयसे तथा विजातीयसे पर्याय होते हैं । ऐसेही गुणके विषयमें भी स्वभाव गुणसे तथा विभाव गुणसे पर्याय होते हैं। इस प्रकार पर्यायके चार भेद हुए ॥ १५ ॥ व्याख्या । इत्यममुना प्रकारेण स्वजातेः पर्यायाः सजातीयद्रव्यपर्यायाः, विजातेः पर्याया द्रव्ये द्रव्यविपये भवन्ति । स्वभावाध पुनर्विभावादिति स्वभाव- द्रव्यानुयोगतर्कणा। गणपर्यायाः, विभावगुणपर्यायाः इत्यं चत्वारो भेदा द्रव्यगुणभेदात्पर्यायाणां कथनीयाः । स्वजातीयद्रव्यपर्यायः, विजातीयद्रव्यपर्यायः, स्वभावगुणपर्यायः, विभावगुणपर्यायः, इति चत्वारो द्रव्यगुणयोर्मेंदा भावनीया इति ॥ १५ ॥ व्याख्यार्थ:- :-इस प्रकारसे स्वकीय जातिसे जो पर्याय होते हैं वे सजातीय पर्याय कहलाते हैं, तथा परजातिसे जो पर्याय होते हैं वे विजातीय पर्याय कहलाते हैं । और खभावसे तथा विभावसे गुणमें पर्याय होते हैं। अर्थात् स्वभाव गुणपर्याय, और विभाव गुण- पर्याय दो भेद ये । ऐसे द्रव्य और गुणके भेदसे पर्यायोंके चार भेद कहने चाहिये । अर्थात् सजातीय द्रव्यपर्याय १ विजातीय द्रव्यपर्याय २ स्वभाव गुणपर्याय ३ तथा विभाव गुण- पर्याय ४. इस प्रकार दो भेद द्रव्यके तथा दो भेद गुणके इन दोनोंको मिलाके, चार भेद द्रव्य गुण दोनों के विचारने चाहिये ॥ १५ ॥ अत्र पूर्वोक्तानां भेदानामुदाहरणमा । अब पूर्वोक्त सजातीय द्रव्यपर्याय आदि भेदोंके उदाहरण कहते हैं । सूत्रम् । द्वयणुकं च मनुप्याश्च केवलं मतिचिन्मुखाः। दृष्टान्ता प्रायिकास्तेषु नाणुरन्तर्भवेत्कचित् ॥१६॥ सूत्रभावार्थ:-दुघणुक सजातीय द्रव्यपर्याय हैं, मनुष्य आदि विजातीय द्रव्यपर्याय हैं तथा केवल ज्ञान सभाय गुणपर्याय है और मतिज्ञान आदि विभाव गुणपर्याय हैं । ये दृष्टांत प्रायिक है । क्योंकि, इनमें कहीं भी अणुका अन्तर्भाव नहीं होता है ॥ १६ ॥ व्याख्या । द्वषणुकं चेति द्विप्रदेशादिस्कन्धः स च सजातीयद्रव्यपर्यायः, कथं तत् । द्वयोः परमाण्योः संयोगे सति द्वषणुकमेतावता द्रव्यद्वयं संगत्यैकद्रव्यं भवतीति सजातीयद्रव्यप- र्यायः१ । मनुष्याश्च मनुजादिपर्याया विजातीयद्रव्यपर्याय इति, जीवपुद्गलयोोंगे सति मनु- प्यत्वव्यवहारी जायते, एतावता विजातीयद्रव्यद्वयं संगत्यैकद्रव्यं निष्पन्नमिति विजातीयद्र- व्यपर्यायः २ । अथ केवलमिति केवलज्ञानं स्वभावगुणपर्यायः कथ्यते, कथं तत्-कर्मणां संयोगरहितत्वात्स्वभावगुणपर्यायः ३ । अथ मतिचिन्मुखा मतिज्ञानादयः पर्यायाः विभावगु- णपर्यायाः कथ्यन्ते । कथं तन् कर्मणां परतत्रत्वाद्विभावगुणपर्याय ४ । इति। एते हि चत्वारो दृष्टान्ता: प्रायिका ज्ञातव्याः । परमार्थतस्तु परमाणुरूपद्रव्यपर्याय एषु चतुर्यु नान्तर्भवितुम- ईवि विभागजनितपर्यायत्वात् । तदुक्तं संमतौ-“अणुएहिं दव्व आरद्धति अणंति वयसाण सात्ततो । अपुणविभत्तो अणुत्तिजाओ अणू होइ ।" इत्यादिकं सर्व विमृश्य विज्ञेयमिति । आरब्धद्रव्यपर्यायेऽणुद्वयसंयोगे सति द्वयणुक निष्पद्यते, त्रिभिद्वर्यणुकैरुयणुकं जायते, विभि- रुयणुकैश्चतुरणुकमुत्पद्यते । एवं महती पृथ्वी, महत्यभापो, महान्दो वायव इत्यादि नैयायिका प्रणीतत्वात् ।।१६॥ व्याख्यार्थः-जो द्विप्रदेश आदि स्कंध हैं वे सनातीय द्रव्यपर्याय हैं। सो कैसे कि, दो परमाणुओंका संयोग होनेपर द्यणुक होता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि एक जातिक । २३२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् दो द्रव्य परस्पर मिलके जो एक द्रव्य होता है वह सजातीय द्रव्यपर्याय है १। और मनुष्य आदि जो पर्याय हैं वे विजातीय द्रव्यपर्याय हैं। क्योंकि, जीव और पुद्गलका पर- स्पर संयोग होनेपर मनुष्य यह व्यवहार होता है । इससे यह सिद्धान्त हुआ कि भिन्न २ जातिके दो द्रव्य मिलकर, जो एक द्रव्य होता है; यह विजातीय द्रव्य पर्याय कहलाता है । केवल ज्ञान जो है वह स्वभाव गुणपर्याय कहा जाता है । सो कैसे कि-वह कर्मोके संयोगसे रहित है इसलिये खभाव गुणपर्याय है ३१ तथा मतिज्ञान आदि पर्याय विभाव गुणपर्याय कहलाते हैं। सो कैसे कि, ये कर्मोके सम्बन्धसे होते हैं। इसलिये विभाव गुणपर्याय हैं । इन चारों दृष्टान्तोंको प्रायिक समझना चाहिये, अर्थात् ये सर्वत्र रहनेवाले नहीं हैं। परमार्थसे तो परमाणु रूप द्रव्यपर्याय इन चारोंमें अन्तर्गत होने योग्य नहीं है । क्योंकि, वह परमाणु द्रव्यविभागसे उत्पन्न पर्याय है न कि संयोगसे उत्पन्न । सोही संमतिमें कहा है कि-"दो तीन भादि अणुओंसे अनन्त द्रव्योंका आरंभ निरन्तर होता है । और जिसका फिर विभाग न हो वह अणु है । यह द्वयणुकसे विभाग करके होता है ।।" इत्यादि सव विचारके जानना चाहिये । और "आरंभ किये हुए द्रव्यके पर्यायमें दो अणु- ओंके संयोगसे द्वयणुक उत्पन्न होता है, ऐसेही तीन द्वयणुकोंसे व्यणुक और चार त्र्यणु- कोंसे चतुरणुक उत्पन्न होता है और इसी प्रकार महापृथिवी, महाजल तथा महावायु आदि होते हैं" इत्यादि रूपसे नैयायिकोंने भी कहा है ॥ १६ ॥ पुनः प्रतिपिपादयिपुराह । उसी कथनकी इच्छासे पुनः इस श्लोकको कहते हैं.। सूत्रम् । गुणानां हि विकाराः स्युः पर्याया द्रव्यपर्यवाः । इत्यादि कथयन्देवसेनो जानाति किं हदि ॥१७॥ सूत्रभावार्थ:-गुणोंके विकारही पर्याय हैं यह, पहिले कहके फिर द्रव्यपर्याय तथा गुणपर्याय कहते हुए देवसेनजी अपने मनमें क्या जानते हैं ? ॥ १७ ॥ व्याख्या । गुणविकाराः पर्याया एवं कथयित्वा तेषां भेदाधिकारे पर्याया द्विविधा द्रव्य. पर्याया गुणपर्यायाश्चेति कथयंश्च देवसेनो दिगम्बराचार्यों नयचक्रपन्थकर्ता हृदि चित्ते कि मानाति अपि तु सम्भावित न किमपि जानाहीत्यर्थः । पूर्वापरविरुद्धमापणादरस्त्याय एवे- दमित्यभिप्रायः । किश्च द्रव्यपर्याया एव कथनीयाः परन्तु गुणपर्याया इति पृथग्भेदोत्कीर्तनं न कर्त्तव्यं द्रव्ये गुणत्वाधिरोपाद्गुणे च गुणत्वाभावादिवि निष्कर्षः ॥ १७ ॥ व्याख्यार्थःगुणोंके विकार पर्याय हैं ऐसा कहके पुनः पर्यायोंके भेदके अधिकार में पर्याय दो प्रकारके हैं-द्रव्यपर्याय तथा गुणपर्याय इस प्रकार नपचक्र अन्यके कर्ता दिग- म्बराचार्य देवसेनजी अपने चित्तमें क्या जानते हैं ? अर्थात् कुछ नहीं जानते हैं । अर्थात् पर्वापर विरुद्ध भापण करनेसे यह झूठा है यह अभिप्राय है । और द्रव्यपर्याय ही कहने द्रव्यानुयोगतर्कणा। २३३ चाहिये भौर गुणपर्याय ऐसा दूसरा भेद न करना चाहिये । क्योंकि, द्रव्यमें गुणत्वका अध्यारोप है और गुणमें गुणताका अभाव है । यही तात्पर्य है ॥ १७ ॥ पुनस्तदेवाह । फिर उसीको कहते हैं। सूत्रम् । इत्थं पदार्थाः प्रणिधाय मूर्ति परीक्षिता ज्ञानगुरोः सदाज्ञाम् । तुच्छोक्तिमुत्सृज्य धिमोहमूलामर्हत्क्रमाम्भोजरतेन सर्वे॥१८॥ सूत्रभावार्थ:-ज्ञानके दाता श्रीगुरुकी उत्तम आज्ञाको मस्तकपर धारण करके, जिनेन्द्र के चरणकमलमें तत्पर मैने विमोहके मूलभूत अज्ञप्रणीत वचनको त्यागकर, इस मकार सन पदार्थोंकी परीक्षा की ॥ १८ ॥ इति श्रीयशोविजयोपाध्यायप्रणीतद्रव्यगुणपर्यायभापाविवरणोक्तार्थसंदर्भितश्लोक- रूप-द्रव्यानुयोगतर्कणायां चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४ ॥ व्याख्या । इत्थमनया रीत्या पदार्था द्रव्यगुणपर्यायाः परीक्षिताः स्वरूपलक्षणभेदादिकथ- नेन विशदीकृताः । किं कृत्वा ज्ञानगुरोः परम्परागतश्रुताचार्यस्य सदाज्ञां सत्यनिदेशं मूर्ध्नि म. स्तके निधाय संस्थाप्यापुनः किं कृत्वा विमोहमूलां भ्रमनिवन्धना तुच्छोक्तिं तुच्छबुद्धिप्रणीत. वचनमुत्सृज्यापाकृत्य। कीदृशेन मया अहत्क्रमाम्भोजरतेन वीतरागचरणकमलसेवनरसिकेन। सर्वे पदार्था मया परीक्षिता इयर्थः । भोजेति नामनिरूपणं चेति ॥ १८ ॥ इति श्रीवाचकमुख्य-श्रीयशोविजयविदर्भितद्रव्यगुणपर्यायभापाविवरणतदुक्तिसङ्क. लितायां कृतिभोजसागरविर्निमितायां द्रव्यानुयोगतर्कणायां चतुर्दशोऽध्यायः ॥ व्याख्यार्थ:--परंपरागत श्रुताचार्यकी समीचीन आज्ञाको मस्तकपर धर करके और भ्रमसे उत्पन्न हुए ऐसे मन्दबुद्धियोंके रचे हुए वचनको दूर करके श्रीजिनेन्द्रके चरणकम- लौकी सेवा करनेमें रसिक ऐसे मैने इस प्रकार सब द्रव्य, गुण, पर्यायोंकी परीक्षा की; अर्थात् खरूप, लक्षण तथा भेद आदिका कथन करके स्पष्ट रीतिसे पदार्थोका निरूपण किया। श्लेषसे "क्रमाम्भोज" इस पदमे "भोज" यह अपने नामका निरूपण भी आचार्यने किया है ॥ १८ ॥ इति श्रीआचार्योपाविधारिपण्डितठाकुरप्रसादशमद्विवेदिप्रणीतभापानुवादसमलङ्क. तायां द्रव्यानुयोगतर्कणायां चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ सूत्रम् । द्रव्यादिकानांतु विचारमेयं विभावयिष्यन्ति सुमेधसोये। प्राप्स्यन्ति ते सन्ति यशांसि लक्ष्म्यः सौख्यानि सर्वाणि च वान्छितानि सूत्रभावार्थ:---जो बुद्धिमान इस प्रकार द्रव्य आदिका विचार करेंगे; वे उत्तम यश, लक्ष्मी तथा संपूर्ण अभिलषित मुखोंको प्राप्त होंगे ॥ १॥ ३० . २३४ रायचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम् व्याख्या । एवमनया रीत्या द्रव्यादिकानां विचारं ये सुबुद्धयो विभावयिष्यन्ति ते सुमेधस इह सन्ति शोभनानि यशांसि। पुनः लक्ष्म्यः परत्र सर्वाणि वाञ्छितानि सुखानि प्राप्स्यन्तीति भावः ॥१॥ व्याख्यार्थ:-इस पूर्वोक्त प्रकारसे जो उत्तम वुद्धिके धारक भव्य जीव द्रव्यादि पदार्थोके विचारकी विभावना करेंगे वे सम्यक् ज्ञानधारी जीव अच्छे यश, और लक्ष्मि- यों को प्राप्त करेंगे तथा परलोकमें सव वाञ्छित सुखोंको प्राप्त करेंगे ॥१॥ सूत्रम् । गुरोः श्रुतेश्चानुभवात्प्रकाशितः परो हि द्रव्याद्यनुयोग आन्तरः । जिनेशवाणीजलधौ सुधाकरः सदा शिवश्रीपरिभोगनागरः॥२॥ सूत्रभावार्थ:-सर्वोत्तम, आन्तरिक ज्ञानस्वरूप, श्रीजिनेन्द्रके वचनरूपी समुद्र में चन्द्रमाके समान तथा निरन्तर मुक्तिलक्ष्मीके सेवनमें नागर ऐसा यह द्रव्यानुयोग मैने गुरुके सिद्धान्तसे तथा अपने अनुभवसे प्रकाशित किया ॥२॥ व्याख्या । गुरोानगुरोः श्रुतेः सिद्धान्तादनुभवात्स्वानुभूवेरान्तरोऽन्तर्ज्ञानमयः परः प्रकृष्टो द्रव्यानुयोगः प्रकाशितः । कीदृशो वीतरागवचनसमुद्रे चन्द्र इव चन्द्रः, निरन्तरं शिव- लक्ष्मीविलासे नायक इव नागर इनि ॥२॥ सत्रम्।येचालकास्ते किल लिङ्गदर्शिनो ये मध्यमास्ते तु पहिनियारता। द्रव्यानुयोगाभ्यसने य उत्तमाः कृतादराः सत्पथसङ्गिनस्ते ॥ ३॥ सूत्रभावार्थ:-जो बालक (मूर्ख) हैं वे केवल लिनके दर्शक हैं, जो मध्यम (कुछ ज्ञानके धारक) हैं वे वाह्यक्रियामें तत्पर हैं। इसलिये जो द्रव्यानुयोगके अभ्यासमे भादर करनेवाले हैं वेही उत्तम (विशेष ज्ञानके धारक) हैं और सन्मार्गके सही हैं ॥ ३ ॥ व्याख्या । ये पालका इति सुगमम् । पोडशकवचन-घालः पश्यति लिहूं मध्यमबुद्धि- विचारयति वृत्तिम् । आगमतत्त्वं तु युधः परीक्षते सर्वयनेन ।।" इति ॥ ३ ॥ व्याख्यार्थः-'ये बालकाः' इत्यादि श्लोकका अर्थ सुगम है। इस लोकार्थक विषयमें पोडशकका भी वचन है-"वालक (मन्दबुद्धिजन) लिगको देखता है, मध्यम युद्धिके धारक वृत्तिका विचार करते हैं और जो ज्ञानी (उत्तम) है वे सर्व प्रकारसे शायोक्त तत्त्वकी परीक्षा करते हैं ॥ ३ ॥ सूत्रम् । मिया प्रिया नैव विमुच्य संविदं न ज्ञानमानन्दकरं पिनाक्रियाम्। समुचये योगदृशां निरूपितं यदखद्योतवदन्तरं महत् ॥ ४॥ सूत्रभावार्थ:-ज्ञानके विना क्रिया प्यारी नहीं होती है और क्रियाके बिना ज्ञान भी आनन्दका कर्त्ता नहीं होता है। और योगदृष्टिसमुख्य नामक ग्रंयमें तो सूर्यमें भोर सयोत (जुगुन) में जितना अन्तर (फरक) है उतना पड़ा भेद ही शान भीर क्रिया में निरूपण किया है। अर्थात् ज्ञान तो सूर्यके समान है और किया खद्योतके तुल्य है॥४॥ (इस व्यासाचा अर्थ सूसभावार्थ से ही गमत लेना चाहिये। क्योंकि इसमें विशेषगा नहीं है।

व्याख्या । अथ मिथ्यात्वेति । ज्ञानं हि सम्यग्दर्शनसहितमेवायाति तत्प्राप्तीच कदाचिदपि "धंधेण न बोलइ कयावीति"वचनान् । एतदभिप्रायेण नन्दिपेणाधिकार महानिशीथसूत्रे ज्ञानगु. णोऽप्रतिपाती कथितः । उत्तराध्ययनेऽपि यथोक "सूई जहा समुत्ता ण णस्सई फयवरम्मि द्रव्यानुयोगतर्कणा। २३५ सूत्रम् । खद्योतप्रतिमा क्रिया तु कथिता ज्ञानं तु भानूपम- मित्येतन्महदन्तरं कलियुगे कश्चिद्धो विन्दति । याह्याभ्यासविनिर्मितो हि दुरितक्षेपो भवेद्द१र- क्षुषणक्षोदकणोपमः किमपरं वाक्यं धुधा महे ॥५॥ सूत्रभावार्थ:-क्रिया तो खद्योतके तुल्य कही गई है और ज्ञान सूर्यके समान है, इस प्रकार ज्ञान और क्रियामें बड़ा भेद है । इस भेदको कलियुग (पंचमकाल)में कोईही विद्वान् जानता है । और बाह्यके अभ्याससे उत्पन्न हुआ जो पापका नाश है, वह दर्दुर (मेडक) के द्वारा खोदे हुए मिट्टीके कणके बराबर है । बुधजनो ! इससे अधिक क्रिया तथा ज्ञानके भेदके विषयमें आपसे और क्या कहैं ? ॥ ५॥ व्याख्या । क्रियेति स्पष्टम् । यदुक्तं योगदृष्टिसमुच्चये "तात्कालिकः पक्षपातो भावशून्या च या क्रिया । अनयोरन्तरं ज्ञेयं भानुखद्योतयोरिव ।२।" "मंडूकचुन्नकप्पो कियाइ जाणिओ को किलेसाणं । तद्दहुरचुन्नकप्पो नाणको तं च आणाए ॥ १ ॥ ५॥" व्याख्या:-"क्रिया प्रिया" इत्यादि चतुर्थ तथा पंचम लोकका अर्थ स्पष्टही है इसलिये व्याख्या नहीं की। यही विषय योगदृष्टिसमुच्चयमें कहा है कि तत्काल अर्थात् उसी क्षणमें होनेवाले अपने पक्षपातको प्रकटकर्ता ज्ञानमे और भावशून्य जो क्रिया है उसमें सूर्य और खद्योतके बराबर भेद जानो।१।" इस विषयमे यह गाथा भी है "क्रिया आदिसे मेंडकके खोदे हुए मिट्टीके कणके बराबर पापोंका नाश होता है और ज्ञानसे मेंडकके समान पापका नाश होता है, यह सर्वज्ञकी आज्ञासे सिद्ध है ।१॥४॥५॥ सूत्रम् । मिथ्याखमूलाष्टककर्मसंस्था न कोटिकोटेरधिकोपदिष्टा। समागते ज्ञानगुणेऽत्र पुंसो महानिशीथोक्तमिति प्रमाणम्द सूत्रभावार्थ:-मनुष्यको ज्ञान गुण प्राप्त होनेपर मिथ्यात्व है मूल जिनका ऐसे आठों कर्मोंकी स्थिति कोटिकोटि सागरसे अधिक नहीं है. यह प्रमाण महानिशीथ ग्रंथमें कहा हुआ है ॥ ६॥ सूत्रम् । जानाति तत्त्वानि यथार्थम) ब्रूते परान्यो दुरितं निहन्ति । अनन्तकायस्थमपाकरोति यो भाप्य उक्तः स तु केवली ज्ञः॥७॥ सूत्रभावार्थ:-जो संपूर्ण तत्त्वोंको जानते है, जो भव्यजीवोंको यथार्थ पदार्थका कथन करते हैं, जो अनन्तकायस्थको दूर ये है वे भाष्यमें केवली कहे गये हैं ॥ ७॥ मिथ्यात्यमध्यगतो भवेत्तथापि जीवः कोटाकोटिसागरप्रमितिकालाधिक फर्मवन्धं न करोत .

रायचन्द्र जैनशाखमालायाम् पडियाई । इय जीवोवि ससुत्तो ण णस्सइ गओपि संसारे।१।। अत्र वृहत्कल्पगाथा चेयम् "गीयत्थे केवली चतुब्यिहे पन्नत्ते तं जहा जाणणेय १ कहणेय २ उह्मरागद्दोसे ३ अणंतका. यस्स वजणेण य ४॥" गाथा-पीयत्थरस वयणेणं विसं हालाहलं पिवे। अगीयत्थरस वयणेणं अमयंपि न घुट्टए।१। अगीयस्थ कुसीलेहिं संग तिविहेण वोसिरे । मुक्खमग्गस ते विग्धं पहमि तेणगे जह ।२।" "कर्तुमिच्छोः श्रुतार्थस्य ज्ञानिनोऽपि प्रमादिनः । कलादिविकलो योग इतीच्छायोगलक्षणम् ।।" इति वचनं ललितविस्तरादौ मन्थे । दृढकरणवाक्यमाले- यम् । अनावश्यकगाथा-"दसणपक्खो सावय चरित्तनठेय संदधम्मे य । दसणचरित्तपक्खो समणे परलोग खंमि " "मणेरिवाभिजातस्य क्षीणवृत्तेरसंशयम् । तात्स्थ्यात्तदअनत्वाच समापत्तिः प्रकीर्तिता ॥१॥६॥७॥" व्याख्यार्थ:-"मिथ्यात्वमूलाष्टक" इस छट्टे तथा "जानाति तत्त्वानि" इस सातवें इन दोनों श्लोकोंको मिलाके व्याख्या करते हैं । ज्ञान गुण जब आता है तब सम्यग्दर्शन सहित ही आता है और उस ज्ञानके प्राप्त होनेपर जीव कदाचित् मिथ्यात्वके बीचमें आजाय तो भी कोटाकोटि सागर प्रमाण कालसे अधिक कर्मबन्धन वह जीव नहीं करता है, क्योंकि-"जो ज्ञानी है वह कर्मबन्धसे संसारमें कभी नहीं डूबता" ऐसा वचन है । इसी अभिप्रायसे महानिशीथ सूत्रमें नन्दिपेण अधिकारमें ज्ञान गुण अप्रति. पाती कहा है अर्थात् ज्ञान गुण हुए पीछे पुनः उसका प्रतिपात (अधःपतन) नहीं होता है । और उत्तराध्ययनमें ऐसा कहा है कि "जैसे सूत्र (तागे) सहित सुई नष्ट नहीं होती किन्तु वस्त्र आदिमें प्रवेश करके पुनः निकल आती है, इसी प्रकार सूत्र (ज्ञान) सहित जीव भी संसारमें गया हुमा नष्ट नहीं होता है ।१।" यहां यह बृहत्कल्पकी गाथा भी है-"गीतार्थ केवली जाननेवाले, कहनेवाले, रागद्वेपरहित, और अनन्तकायवर्जक इन भेदोंसे चार प्रकारके कहे गये हैं।" "गीतार्थके वचनोंसे हाला- हल विषको पीना चाहिये और अगीतार्थके वचनोंसे अमृत भी नहीं पीना चाहिये ।।" "अगीतार्थकुशीलोंका संसर्ग मन, वचन, कायसे छोड़ना चाहिये । क्योंकि, जैसे रास्तेमें चोर विपकर्ता होते हैं वैसे वे भी मोक्षमार्गमें विघ्नके कर्ता हैं ॥ १॥" "शास्त्रके अर्थको करनेकी इच्छावाले प्रमादी ज्ञानीके जो कला आदिसे रहित योग है वही इच्छायोग कहलाता है, यह इच्छायोगका लक्षण है । १।" ऐसा वचन ललितविस्तर आदि ग्रंथों में है। यह पूर्वोक्त जो वाक्यसमूह यहां दिया गया है सो इस विषयको पुष्ट करनेके लिये है। यहां आवश्यक गाथा भी है कि-"दर्शनपक्षको धारण करनेवाला श्रावक है। यह चारित्रसे नष्ट है, परन्तु धर्मसे आई है। और मुनि दर्शन तथा चारिन दोनोंके पक्षको धारण करते हैं और परलोक अर्थात् अग्रिम भवोंका नाश करते हैं अर्थात् उसी भवसे मोक्ष जाते हैं । १" "शुद्धरत्नकी तरह क्षीणवृत्ति जीवके उसमें रहनेपनेसे तथा उसके अंजनपनेसे समापत्ति कही गई है. यह कथन निस्सन्देह है ॥ १६॥" ।

भव्याम्भोरुहभासने सुविपुलं ज्ञानाऽस्रभारं वहन् । शोभावविदधन्पभूय विजयाट्रीमत्क्षमाधीश्वरः॥१२॥ २३७ द्रव्यानुयोगतर्कणा। सूत्रम् । ज्ञानं हि जीवस्य गुणो विशेषो ज्ञानं भवाब्धेस्तरणे सुपोतः। ज्ञानं हि मिथ्यात्वतमोविनाशे भानुः कृशानुः पृथुकर्मकक्षे ८ सूनभावार्थ:-ज्ञान जो है वह जीवका विशेष गुण है, ज्ञान संसाररूपी समुद्रके तिरनेमें उत्तम नौका (अच्छा जहाज ) है । ज्ञान मिथ्यात्वरूपी अंधकारको नष्ट करनेमें सूर्यके समान है । ज्ञान विशाल कर्मरूपी काष्ठके भस्म करनेमें अग्निके समान है॥८॥ सूत्रम् । ज्ञानं निधानं परमं प्रधानं ज्ञानं समानं न पहुक्रियाभिः। ज्ञानं महानन्दसं रहस्यं ज्ञानं परं ब्रह्म जयत्यनन्तम् ॥९॥ सूत्रभावार्थ:-ज्ञान सर्वोत्तम खजाना है, ज्ञानही सवमें प्रधान है, ज्ञान अनेक क्रियामोंके समान नहीं है अर्थात् अनेक प्रकारके आचरणोंसे भी विशिष्ट ज्ञानही है, ज्ञानही महा आनन्दरूप सुखका देनेवाला रस है, ज्ञानही परमात्माका रहस्य है और अन्तरहित है, ऐसा ज्ञान सर्वोत्कर्षता करके वर्त्तता है ॥ ९॥ सूत्रम् । पाह्याचारपराश्च योधरहिता इच्छाख्ययोगोद्धताः ये केऽपि प्रतिसेचनाविधुरितास्ते निन्दिताः शासने । ये तु खच्छमतुच्छवाड्मयकलाकौशल्यमायिभ्रति सार्वोक्तामृतपानसादरधियस्तेभ्यो मुनिभ्यो नमः॥१०॥ सूत्रभावार्थ:-जो वाडकी क्रियाओंमें तत्पर हैं, ज्ञानकरके रहित हैं, इच्छायो- गसे उद्धत हैं और ज्ञानादिकी सेवनासे रहित हैं; वे जीव जिनमतमें निन्दित समझे जाते हैं. और जो भतिनिर्मल तथा विशाल ज्ञानकलाके कौशल्यको धारण करते हैं और सर्वज्ञके वचनरूपी अमृतके पीनेमें आदरपूर्वक बुद्धिको धारण करनेवाले हैं, उन मुनि- योंको मेरा नमस्कार है ॥ १० ॥ H अध प्रशस्तिः। , श्लोकः। श्रीवीरपाधिपतिर्यभूय सरिः सुरवादिजयो यशस्त्री। यस्मिन्समुद्रे विविशुः सममा विद्यासुनद्यथ चतुर्दशापि११ अब ग्रंथकार प्रशलि लिखते हैं। लोकार्थः-श्रीवीरके पट्टके स्वामी, तथा यशके धारक श्रीरनविनपनी सूरि हुए, जिन रनविनयजी सूरिरूप समुद्रमें समस्त चौदह विद्याररूप उत्तम २ नदिये प्रविष्ट की अर्थात् सब विद्याभोंके धारक रनविजयजी सूरि हुए ॥ ११ ॥ श्लोकः । तत्पद्योदयशैलसङ्गतरपिर्मिध्यातमनासने फुमारग्रहतारतारकमिलहोपापिलं पुष्कर २३८ रायचन्द्रजैनशासमालायाम् लोकार्थ:--उन रत्नविजयसूरिजीके पट्टरूपी उदयाचलके समागमसे सूर्यके समान, और मिथ्यात्वरूपी अंधकारको दूर करनेके लिये तथा भव्यरूपी कमलोंको प्रफुल्लित्त करनेके लिये ज्ञानरूपी किरणोंके समूहको धारण करनेवाले और ·खोटे सिद्धान्तको ग्रहण करनेवाले अच्छे वादीरूप तारोंके संगमसे रात्रिपूर्ण आकाशको शोभायुक्त करने वाले ऐसे श्रीक्षमाविजयजी सूरि हुए ॥ १२ ॥ श्लोकः । मदनो निहतः स्वरूपतस्तरसा येन जितः सुराचलः । महसासहसा सहस्रग्विजितः सौम्यतया सुधाकरः ॥१३॥ वचसा वचसामधीशिता कविताभिः कविरीशक्त्तया । हरिरेव जितो यशखिना विदुपा केन स चोपमीयते ॥१४॥ युग्मम् । श्लोकार्थः- यशके धारक जिन्होंने अपने रूपसे कामदेवको हराया, गुरुतासे सुमे- रुको जीता, स्वभावसे उत्पन्न तेजसे सूर्यको जीता और सौम्यतासे चंद्रमाको जीता|॥१३॥ बचनसे बृहस्पतिपनेको, कवितासे शुक्रको और ऐश्वर्यसे इन्द्रको जीता. ऐसे उन आचा- योको विद्वान् किसकी उपमा देवें अर्थात् जो उपमा देने योग्य पदार्थ थे उनको तो उन्होंने अपने गुणोंसे ही जीत लिया, अब उनको किसकी उपमा दी जावे ॥ १४ ॥ इन दोनों लोकोंको मिलाके अर्थ किया गया है, इस लिये युग्म है । श्लोकः । सरस्वती यस्य मुखान्निरन्तरा प्रकाशमासादयति प्रभाविनी । हिमाद्रिपद्मद्रहतो निरत्यया सरिदरेवामरलोकपूजिता॥१५॥ लोकार्थ:-जैसे हिमाचलके पद्मद्रहसे देव तथा मनुष्योंसे पूजित गंगानदी निरन्तर निकलती हैं, उसी प्रकार जिनके मुखसे प्रभावकी धारक सरखती सदा प्रकट होती रहती हैं ॥ १५॥ श्लोकः । यदीयकीर्तिचलेष्टमूर्ति खिलोकसंपूर्तिमियति नित्यम् । अनादिगङ्व जडखभावं विहाय वैशयमुरीचकार ।। १६॥ श्लोकार्थ:- -उज्वल इष्ट आकारको धारण करनेवाली जिनकी कीर्ति सदा तीन लोकको पूर्ण ( व्याप्त) कर रही है सो यह कीर्ति ऐसी सोहती है, मानो अनादि गंगाने अपने जड़, (जल) स्वभावको छोड़कर, सचेतनता (निर्मलता) को ही खीकार करलिया है ।। १६॥ श्लोकः। अहो यदीयेन गुणोचयेन विहाय संख्यां ववृधे यथासम् । अतःकणादोक्तगुणेपु दक्षा गुणत्वजातिं न तथा वदन्ति ॥१७॥ लोकार्थः-आश्चर्य है कि जिनके गुणों का समूह संख्याको छोड़कर, इच्छानुसार

२३९
द्रव्यानुयोगतर्कणा।
पृद्धिको प्राप्त हो गये । इसी लिये कणादके कहे हुए गुणोंमें चतुर जन गुणत्व जातिको
वेसी नहीं कहते हैं ॥ १७ ॥
।
श्लोकः। यत्कीर्तिकान्ता व्यभिचारिणीय समुत्सुकैका त्रिदिवंजगाम
तत्रामरस्पर्श विशीर्णहारा तस्तार तारोपममौक्तिकैः खम्१८
श्लोकार्थ:-जिनकी कीर्तिरूपी स्त्री व्यभिचारिणी स्त्रीकी नाई समुत्सुक होकर,
एकलीही वर्गमें चली गई. वहांपर देवोंके संसर्गसे टूटे हारवाली होकर, तारोंके समान
जो मोती हैं उनसे आकाशको आच्छादित करती हुई। भावार्थ-ये आकाशमें तारे नहीं
हैं, किन्तु उन आचार्योंकी कीर्तिरूप स्त्रीके हारमेंसे टूटे हुए मोती हैं ॥ १८ ॥
श्लोकः । अहीनो नोऽहीनो यपि वपुषा भूभरजुपा
तथाप्यास्ये वाणी हसति तच्छैपीति भणनात्।
अतस्त्वादेवानीभणननियमश्वेतसि कृत-
स्त्रिकालस्त्रैलोक्यस्त्रिपद्मयसन्दर्भविततः॥१९॥
श्लोकार्थः-यद्यपि वे पृथ्वीको धारण करने रूपगुणसे शोभायमान शरीरसे महीन
'अर्थात् उत्तम थे, तथापि अहि+इन अहीन अर्थात् शेषनागजी नही थे, और उनके
मुखमें जो बाणी है वह शेषी इस नामके कहनेसे शब्द करती है, इसी लिये उन्होंने
अपने मनमें तीन काल, तीन लोक और तीन रखोंको रचनासे प्रसिद्ध ओंकाररूप आदिकी
प्रससंबन्धी वाणीके कथन करनेका नियम किया ॥ १९ ॥
श्लोकः । स एप गच्छाधिपतिर्विभाति सूरीश्वरः श्रीविजयायाख्यः।
यस्य प्रभावेण च पञ्चमेऽपि चतुर्थभावं समवाप धर्मः ॥२०॥
श्लोकार्थः-वे उपरोक्त गुणोंके धारक ये गच्छके स्वामी श्रीदयाविजयजी नामक
सूरीश्वरजी सर्वोत्तम रूपसे प्रकाशमान हो रहे है, जिनके प्रभावसे पंचमकालमें भी धर्म
चतुर्थकालपनेको प्राप्त हुआ अर्थात् पंचमकालमें भी चतुर्थकाल जैसी धर्मोन्नति
हुई ॥ २० ॥
लोकः । तैरनुग्रहधिया विधिरेप दर्शितो मपि च शास्त्रसमुत्थः ।
तत्कृते च मयका रचितोऽयं ग्रन्थ
श्लोकार्थ:--उन श्रीदयाविजयजी सूरीश्वरजीने ही कृपायुद्धिसे मुझमें शास्त्रका ज्ञान
दर्शाया है (प्रकट किया है ) और इस लिये उन्हींकी प्रसन्नताके लिये प्राचीन सिद्धा-
न्तोंके पदोंसे यह (द्रव्यानुयोगतर्कणा नामक ) ग्रन्थ मैने रचा है ॥ २१ ॥
स्लोकः । तद्गच्छपुष्करदिवाकररश्मितुल्याः
श्रीभावसागर इति प्रधिताभिधानाः ।
आगमपदैश्च पुराणैः॥२॥

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् तदन्तिपच्छ्रीविनितादिवारां निधीश्वराः शास्त्रविचारदक्षाः ॥ २२ ॥ श्लोकार्थः ---उस गच्छरूपी कमलको सूर्यको किरणके समान, श्रीभावसागरजी इस नामसे प्रसिद्ध सूरि हुए और उनके शिष्य शास्त्रविचारमें चतुर श्रीविनीतमार्ग रजी हुए ॥ २२ ॥ श्लोकः । तेषां विनेयलेशेन भोजेन रचितोक्तिभिः । परस्त्रात्मप्रबोधार्थ द्रव्यानुयोगतर्कणा ॥ २३ ॥ इति श्रीद्रव्यानुयोगतर्कणायां कृतिमोजविनिर्मितायां समाप्तिसन्दर्भाध्यायः पञ्चदशः । श्लोकार्थ: --उन श्रीविनीतसागरजीके तुच्छ शिप्य मुझ भोजसागरने परके तथा निजके प्रबोधके लिये वचनोंसे इस द्रव्यानुयोगतर्कणाको निर्मित किया ॥ २३ ॥ श्लोकः। श्रीगुरोश्चरणद्वन्दसरसीरुहसेवया । ठाकुरप्रसादविदुपा ग्रन्थोऽयं समनूदितः ॥१॥ इति श्रीपण्डितठाकुरप्रसादप्रणीतभापानुवादसमलवतायां द्रव्यानुयोगत. कणायां पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ . शं भूयात्।

Dravyanuyogatarkarna

Author
Madhojkavi
Title
Dravyanuyogatarkarna
File name
Dravyanuyogatarkarna
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2012/08
Publisher
Mumbai.,shri Paramshrot Prabhavak Mandal
Language
Sanskrit
Pages
239
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313183
Barcode
99999990321896.00
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Banasthali University
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