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Hindusthani Shistachar
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हिन्दुस्थानी शिष्टाचार
A-RS
लेखक
कामताप्रसाद गुरु
प्रकाशक
रामनरायन लाल
पब्लिशर और बुकसेलर
इलाहाबाद
१९२७
मूल्य ॥
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भूमिका इस विषय की एक दो पुरानी तथा अप्रचलित पुस्तकों को दोड़ अयान्य उपयुक्त पुस्तकों का प्रभाव देखकर हमने इस पुस्तक को लिखने का साहस किया है। समाज की सभ्यता की बढ़ती के साथ साथ उसमे शिष्टाचार की सूक्ष्मता की भी वृद्धि होती है, इसलिए यह आवश्यक है कि उसके शिष्टाचार के नियम व्यव स्था पूवक सगृहीत किये जाएँ । यह पुस्तक इसी उद्देश्य से लिसी गई है और आशा है कि जब तक इससे अधिक उपयुक्त सग्रह का अभा है तब तक पाठक-गण इसे उदारता की दृष्टि से देखेंगे। इम पुस्तक में इसके नाम के अनुसार हिदुस्थानी समाज के शिष्टाचार का विवेचन किया गया है। "हिन्दुस्थानी" श द से बहुधा हिन्दी भाषा भापी तथा उस समाज की व्याप्ति का अभिप्राय है जिसका नाम भौगोलिक "हिन्दुस्थान 'श द से व्युत्पन्न हुआ है। यद्यपि हिन्दुस्थानी शिष्टाचार के नियम "हि दुस्थान" के प्राय मभी भागो में एक ही हैं, तथापि स्थान भेद से थोडा बहुत अन्तर पहने की मभावना है। ऐसी अवस्था मे पाठक लोग यह समझ लेने की कृपा करे कि अमुक एक रीति किसी न किसी हिदी भाषी अवश्य प्रचलित है । ये नियम सभवत दूसरे प्रदेशो में भी प्रचलित हो। शिष्टाचार के जो नियम इस पुस्तक मे लिखे गये हैं उनमे से थोड़े-बहुत मुसलमानी तथा अंगरेजी शिष्टाचार के अनुकरण के फल-स्वरूप हैं। तो भी पिछले दोनों शिष्टाचारों को अस्वाभाविक चरम सीमा से ये नियम मुक्त हैं- अर्थात् इनमे अपने को स्थान में
.
"कम तरीन' कहना ओर पिता को "धन्यवाद" देना नहीं बताया
गया है।
शिष्टाचार के जितने स्थान और अवसर हैं उन सबका ऐसा
पूर्ण और निश्चित विवेचन करना कि कोई वात छूटने न पाये,
प्रथम प्रयास मे-विशेष कर हमारे लिए कठिन है । तथापि जो
कुछ अगले पृष्ठो मे लिखा गया है उससे साधारणतया व्यवहारी
काम-काज सन्तोप-पूराक चल सकता है और शिष्टाचार की महत्ता
तथा आवश्यकता श्चित हो सकती है।
इस सग्रह मे कहीं-कहीं पुनरुक्ति दोष आगया है जिसका
कारण यह है कि किसी एक व्यवहार का काम अनेक अवसरो पर
पड़ता है और उस प्रसग पर उसका उल्लेख करना आवश्यक
होता है। आशा है, हिन्दुस्थानी समाज की वर्तमान परम्पर-उदा-
सीन परिस्थिति में इस पुस्तक से लोगों में कुछ मेल-जोल बढ़ेगा।
कामताप्रसाद गुरु
।
विषय-सूची - पृष्ट १ ४ ५ १० विपय प्रथम अध्याय-गिटाचार का स्वरूप- [.] शिष्टाचार का लक्षण प्रारमहत्य [0] शिष्टाचार और सदाचार [3] शिष्टाचार और चापलूसी [शिष्टाचार और स्वाधीनता [] शिष्टाचार और सत्यता [+] शिष्टाचार के साधन दूसरा अध्याय-प्राचीन आर्य शिष्टाचार- [१] नैदिक काल में [२]रामायण काल में [३] महाभारत काल में [४] स्मृति-काज में [५) पौराणिक काल में तीसरा अध्याय -अाधुनिक हिदुस्थानी शिष्टाचार के भेद- [१] सामाजिक शिष्टाचार [•व्यक्तिगत शिष्टाचार [३] विशेष शिष्टाचार चौथा अध्याय-सामाजिक शिष्टाचार- [२] समाओं और पाठशालाओं में [7] भीड़ मेलों तथा रास्तो मे २३ २३ २५ २८ पृष्ट ३१ ३३ ३७ ४२ विषय [3] मन्दिरो में [४] भोजों में [५] उत्सवों में [:] व्यवसाय में [७] वेश-भूषा मे [८] प्रवास में [6] श्मशान यात्रा में [१०] जातीय व्यवहार मे [११] पचायत मे पाँचौं अध्याय-व्यक्तिगत शिष्टाचार- [१] सम्भाषण में [२] पत्र च्यवहार में [३] भेंट-मुलाकात मे [४] परस्पर-व्यवहार में [५] गुण-कथन में [1] पहुनई और अतिथि सत्कार में [७] शारीरिक शुद्धि मे [-] शारीरिक क्रियायो में [६] स्वाभाविक क्रियायों में छठा अध्याय-विशेष-शिणचार- [१] त्रियों के प्रति [२] बड़ी और बूदा के प्रति [3]ोटो के प्रति [४] दोनो और रोगियों के प्रति [५] मित्रों के प्रति ६ १०० १०२ १०७ विषय [ ] विद्वानों और साधुमा के प्रति [७] राजा और अधिकारियों के प्रति [८] पड़ोमी के प्रति FE सेयको के प्रति [२०] अनी के प्रति ["माथियों के प्रति [२२] सम्पादकीय [१३] सावजनिक [४] पाल शिणाचार मातयाँ अध्याय- [१] विदेशी बाल डाल [-] विदेशी भाषा [3] विदेशा धर्म १०० ૧૨૨ १२४ १२६ १३० १३३ १३८ १४१ १४५
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हिन्दुस्थानी शिष्टाचार प्रथम अध्याय शिष्टाचार का स्वरूप (१) शिष्टाचार का लक्षण और महत्व 'शिष्टाचार' शद का अर्थ 'शिष्ट (मभ्य ) लोगो का वर्ताव' है। गिटाचार में उन सर आचरणों का समावेश होता है जो शिक्षित जनो के योग्य समझे जाते हैं और जिनके व्यवहार से किसी समाज वा व्यक्ति को अपना काम-काज स्वतनता पूर्वक करने का सुभीता रहता है और उसके मन को सन्तोप तथा प्रानद प्राप्त होता है । इस लक्षण के अनुसार दूसरे को अपने काम में सुभीता और मतोप पहुँचाना ही शिष्टाचार का मुख्य उद्देश है। यदि कोई समाज या यकि ऐसा काम करता हो जिसे अधिकाश लोग अनुचित समझते हैं तो केवल शिष्टाचार के अनुरोध से अन्य समाज वा व्यक्ति उस अनुचित कार्य मे हस्तक्षेप नहीं कर सकता । ऐसे अनुचित कार्यों के रोकने के लिए व्यकि, समाज अथना सरकार को अपने अन्य कर्त्तयों या अधिकारो का उपयोग करना आवश्यक होता है । यद्यपि इन कर्त्तव्यो और अधिकारों का विवेचन करना इस पुस्तक का उद्देश्य नहीं है, तो भी इस विषय मे शिष्टाचार का यह उपयोग हो सकता है कि अनुचित कार्य करने वाले के साथ वातचीत और व्यवहार करने में दूसरा मनुष्य ऐसा बर्ताव करे जिससे उस व्यक्ति को बिना कारण मानसिक वा शारीरिक कष्टन " २ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार पहुंचे, पर परोक्षरूप से उसे अपनी दुष्कृति पर थोड़ा-बहुत पश्चात्ताप अवश्य हो । शिष्टाचार गिष्ट लोगों का प्राचार है, अतएव इस विषय के साथ बहुधा "ठ प्रति शाट्य अथवा “काटे के बदले फूल" की नीति का विचार नहीं किया जा सकता । सभ्य व्यवहार किसी को दण्ड देने वा उससे बदला लेने से विशेष सम्बन्ध नहीं रखता । नीति के व्यावहारिक उपयोग के समान शिष्टाचार का मुख्य उद्देश यही है कि मनुष्य दूसरे के साथ वैसा ही वत्ताय करे जैसा वह उससे अपने साथ कराना चाहता है। आजकल शिष्टाचार का एक भ्रामक अर्थ प्रचलित है, अथात् शिष्टाचार को लोग इन दिनो चापलूसी अथवा ऊपरी कपट-पूर्ण नम्रता समझने लगे हैं। "सत्य हरिश्चन्द्र" और "मुद्राराक्षस' नाटको में यह शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । 'गुर', महात्मा, चतुर आदि शब्दों के समान 'शिष्टाचार' भी काल-चक्रानुसार अर्थ दोष से दूषित हो गया है। परन्तु प्रस्तुत ग्रन्थ में 'शिशवार' शब्द का प्रयोग बहुधा वान्यार्थ हो में हुआ है, अतएव विना किसी विशेष कारण के इसका दूसरा कोई अर्थ ग्रहण करना अनुचित होगा। कभी कभी शिष्टाचार से विनय और नम्रता की उस चरमावस्था का भी अर्थ लिया जाता है जो मुसलमानी तकल्लुफ' शब्द मे सूचित होती है, जिसके कारण यह कहावत प्रचलित हुई है कि "आप आप करने में गाड़ी चल दी"* इस अर्थ में भी यहाँ * लखनऊ के स्टेशन पर दो चार शिक्षित मुसलमान महोदय रेल से प्रवास करने के लिए सहे थे।जय गादी स्टेशन पर पाई तरवे लोग 'तकर लुफ' की उमग में एक दूसरे से कहने लगे कि कियला, श्राप पहले बैठिये, हजरत, श्राप पहले सवार हूजिये। अशिष्ट कहलाने के भय से किमीने मी गाडी में पहले सवार होना ठीक नहीं समझा और उन लोगों में कुछ समय तक इसी प्रकार शिष्टाचार का व्यवहार होता रहा। इतने में गाड़ी चल दी और वे लोग वहीं खडे रह गये ।
प्रथम अध्याय शिराचार का विचार किया जायगा। शिष्टाचार का मूल मर्य जो निष्ठा का ध्याचार है उसो को दृष्टि से हम इस विषय का पिचन करने का प्रया करेंगे। शिवार धन के समान (और उसी के अन्तर्गत) मनुष्यय का एक विशेष चिड है। इस गुणा से मनुष्य को शिक्षा, सुगधि मार सभ्यता का परिचय मिलता है। निनचारा व्यक्ति अपने कुल जाति और देश का एक गोमा है। निशवार मे अधिकार म मनुष्य के स्यमाप को भी जांच हो जाती है। इस गुगण का पालन करने वाले के प्रति लोगों को श्रद्धा, विश्वास प्रोर प्रादर होता है और यह अपने गुणा से दूसरो में भी यही गुण उत्पन्न करने को क्षमता रखता है। विजय और नम्रता में ऐसा प्रभाय है कि यदि मनुष्य इनका उपयोग अपने प्रात्म-गौरय के साथ साथ करे तो एक घार उसका शनु भो पूष-सस्कार दोड़कर उसके गुणों पर मुग्ध हा सकता है। विनयी व्यक्ति के साथ अशिष्ट मनुष्य भी सहसा अशिष्टता का यवहार करने का साहस नहीं कर सकता। शिष्ट व्यवहार मनुष्य के अस्थिर चित्त कोशात कर उसे विचार करने का प्रथमर देता है और उससे अपनी भूलों पर सहर्ष पश्चात्ताप भी करा सकता है। मायश यह है कि शिशाचार शील के ममान मनुष्य का एक भूषण है। जो शिष्टाचार सोमा से अधिक हो जाता है उससे बहुधा दोनों और हानि होनी है । इस अवस्था में मनुष्य या तो सकोच के कारण स्वय अड़चन में पड़ता है अथवा अति शिष्टाचार से यह अपने व्यवहारी को प्रसन्न कर देता है । अतएव अनि शिष्टाचार की अयस्या से बचने को सदैव चेश करनी चाहिये और यदि इस विष मावस्था से किसी समय विशेष हानि होने की संभावना हो तो उस समय शिष्टाचार का थोड़ा-बहुत अपकर्ष क्षमा के योग्य है। इस ४ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार विपय को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट करना आवश्यक जान पड़ता है। मान लीजिए कि यदि आप अपने मिनके यहाँ किसी आवश्यक कार्य के अनुरोध से ऐसे समय जा पहें. जब वह स्नानभोजन आदि के विचार में हो, तो उस समय आपको उससे कट के लिए क्षमा मांगकर तुरन्त यह स्पष्ट कह देना चाहिये कि हम विवश होकर प्रापको इस समय कर दे रहे हैं । पश्चात् शीत हो अपना काम निपटाकर उसके पास से चले आना चाहिये । यदि आप स्वार्थ वश कुछ अधिक समय तक वहाँ ठहरकर अपने मित्र के कार्य में अड़चन उत्पन्न करेंगे तो सम्भव है कि आपका मित्र सकोच को त्याग कर आपके जाने के लिए कुछ ऐसा सफेल कर देवे जिससे आपको खेद हो और आप दानों के मनो मे थोड़ा-बहुत बेमनस्य हो जाय । फिर यदि आपका मित्र प्रतिशिष्टाचार के अनुरोध से आपके आगमन को अपना अहोभाग्य प्रगट करे तो उस दशा में भी आपको तुरा लगेगा। (२) शिष्टाचार और सदाचार शिष्टाचार सदाचार का एक अग है और एक से दूसरे का अभ्यास तथा वृद्धि होती है । तथापि इन दोनो विपयो में बहुत-कुछ अन्तर है । सदाचार का धर्म से प्रत्यक्ष सम्बन्ध है और उसको अवहेलना करना पाप समझा जाता है, परन्तु शिष्टाचार का सम्बन्ध बहुधा समाज अथवा व्यक्ति के सुभीते तथा सन्तोष से है और उसकी अवज्ञा पाप के समान गर्हित नहीं मानी जाती, यद्यपि उससे दूसरे लाग सहज मे अप्रसन्न हो सकते हैं । सदाचार सर्वन और सर्वदा अटल है, परन्तु शिक्षचार मे देश, काल और पान के अनु. सार परिवर्तन हो सकता है । इसके अतिरिक्त सदाचार का अभ्यास एक कठिन काय है, पर शिष्टाचार के अभ्यास में विशेष कठिनाई नहीं है। सदाचार की अवहेलना से भयकर आत्मिक परिणाम उप- प्रथम अध्याय ५ स्थित हो सकते हैं, पर शिशचार के अभाव मे सहसा घेसा भविष्य नहीं हो मकना । सदाचार के अभाव में लोग बहुधा एक-दूसरे के विरुद्ध नहीं हो जाते, पर शिष्टाचार के अभाव में ऐसा प्रायः होता है । सदाचार मन, वचन और कर्म को एकता के रूप मे देखा और पाला जाता है, परतु शिष्टाचार बहुधा वचन प्रोर किया ही से सम्बन्ध रसता है। यदि शिरावार में मन को शुद्ध प्रेरणा भी मिल जाय तो सोने मे सुगध की कहावत पूरो पूरी घट सकती है और उस समय शिष्टाचार निरा शिष्टाचार नही रहता, किन्तु पूरा सदाचार हो जाता है। हमारे इस कथन से फिसो का यह न समझ लेना चाहिये कि हम सदाचार को परस्पर जीवन के लिए श्रावश्यक नहीं समझते प्रथा शिष्टाचार को केवल कुछ दिखाऊ नियमो का ही पालन करना मानते हैं । हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि जिस मनुष्य को सदाचार का पालन करना मन से कठिन जान पड़ता है वह सच्चा सदाचारी नहीं हो सकता, परन्तु शिष्टाचार का पालन मन के विना अथवा सदाचार के अभाव में भी हो सकता है, और जहाँ सदाचार का अभाव है वहाँ उमको पूर्ति अधिकाश में शिष्टाचार के पालन से हो जाती है । सदाचार के पालन में अनेक कठिनाइयों पाती हैं पर उनका बहुत ही थोड़ा अंश शिष्टाचार के पालन में पाया जाता है । ससार मे थोडे मनुष्य सदाचारी हो सकते हैं, पर शिष्टाचारी मनुष्य बहुनायन से धन मकते हैं । झूठे और चार मनुष्य भी शिष्टाचार का पालन कर सकते हैं और करते हैं। इन सब विचारो के कारण शिष्टाचार और सदाचार के अतर में मन की शुद्ध प्रेरणा की विशेषता मानी जाती है। (३) शिष्टाचार और चापलूसी दूसरों को प्रसन्न करने के लिए अत्यत और अनावश्यक मिथ्या प्रशसा अथवा नीच कार्य करना चापलूसी है, पर प्रसग पड़ने पर ६ हिन्दुस्थानी गिष्टाचार उचित रीति से दूसरों की थोड़ी-बहुत आवश्यक प्रशंसा वा सेवा करना शिष्टाचार है । चापलूसी और शिष्टाचार के इस सूक्ष्म भेद पर ध्यान न देने ही से लोगों में शिष्टाचार का अर्थ चापलूसी प्रचलित हो गया है । चापलूमी बहुधा अनुचित स्वार्थसाधन के लिए प्रारम-गोरव को त्यागकर मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति अथवा अभ्यास के आधार पर की जाती है, परन्तु शिष्टाचार स्वार्थ-साधन से विशेष सम्बन्ध नहीं रखता और उसमें प्रात्म-गौरव का दुर्लक्ष्य भी नहीं होता । यद्यपि गिमाचार की प्रवृति भी थोड़ी-बहुत स्वा. भाविक रहती है, तथापि चापलूसी के समान वह युटेर का रूप धारण नहीं करती । यदि चापलूसी करने वाले मनुष्य के शिचरों और कार्यों में कोई हस्तक्षेप न करे तो वह प्रत्यक्ष रूप से, किसी दिन, दिन को रात और रात को दिन कहने के लिए भी तैयार हो जाता है, पर शिष्टाचारी मनुप्य असत्य को भी अपना गोरव रख. कर प्रगट करेगा। विना सोचे विचारे और विना उचित आवश्यकता के किसी की "हाँ में हो" और "नहीं में नहीं मिलाना चापलूसी चा चाटुकारिना है। परन्तु प्रत्यक्ष रूप से किसी का जी दुसाये विना, सोच-समझकर अपनी उचित सम्मति देना अथया आवश्यकता होने पर मौन धारण करना शिष्टाचार वा सभ्यता है। दूसरों को सदा प्रसन रसना बहुत कठिन है, पर व्यवहार में उचित उपायों से दूमरों को प्रसन्न रमने को होती है और इसके लिए शिष्टाचार ही माधन है, नहीं। जर शिष्टाचार अपनी सीमा, 1. चाटुकारिता का रूप धारण कर निन्दनीय है। इस प्रकार का नि दोन रियो के लिए दुखदायी होता है लोग भी उसे सिद्धान्त की दृष्टि से । उस प्रथम अध्याय ७ में ये उसे पैसा न समझते हों, परतु उचित शिवाचार को प्राय' सभी लोग सिद्धात और प्रयोग में प्रादर और गुण प्राहकता की द्वटि से देखते हैं। सायश मे हम इस भेद को ऐसा भी मान सकते हैं कि उचित चापलूमो मिटावार है, और अनुविन मिशवार चापलूमी है। चापलूमोको अावश्यकता सदैव और सर्वत्र नहीं होती, पर मनु यो के परस्पर व्यवहार मे गिटाचार का काम पग पग पर पड़ता है। हम लोग चापलूसी का अवसर टाल भी दे सकते हैं। पर गिटाचार टाला नहीं जा सकता। कभी कभी चापनूसी हृदय को एक ऐसो दूषित अवस्था मे मो उपम होती है जिसमे सदैव स्वार्थ-माधन को विशेष लालसा नहीं रहनो, कि तु दूसरी का प्रसन्न करने की एक प्रकार की स्वाभाविक प्रवृति हो दिखाई देती है। इस प्रकार को चापचूसो सर्वथा निदनीय है, क्योकि यह दासता के उन भावों मे उत्पन्न होती है जो पराधीनता के कारण किसी भी समाज के प्रभाव में सम्मिलित हो जाते हैं। (४) शिष्टाचार और स्वाधीनता याधा नवयुवकों के मन में स्वाधीनता की एक विचित्र ही कल्पना रहती है। वे समझते हैं कि मनमाना काम करना हो सच्ची स्वाधीनता है, चाहे उसमे दूसरो की अथवा स्वय उन्हा की कैसी ही हानि क्यो न हो । इस दृष्टि से वे शिष्टाचार को स्वाधीनता का पाधक समझते हैं, क्योकि उनके मतानुसार उसके अनुरोध से लोगो को कई काम केवल दूसरों के मुभीते के विचार से करने पड़ते हैं । अनेक तत्ववेत्ताओ ने स्वाधीनना का लक्षण बताने का प्रयत्न किया है, परतु उन्होने स्पेन्टाचार को स्वाधीनता कभी नही माना । यथार्थ मे जब तक मनुष्य सामाजिक प्राणी है तब तक वह स्वेच्छाचार का पालन सदा और सर्वत्र नहीं कर सकता, क्योकि ऐसा करने में उसे पद पद पर स्वाभाविक तथा कृत्रिम ur 410 हिन्दुस्थानी शिष्टाचार उचित रीति से दूसरो की थोडी-बहुत आवश्यक प्रशसा वा सेवा करना शिष्टाचार है । चापलूसी और शिष्टाचार के इस सूक्ष्म भेद पर ध्यान न देने ही से लोगों में शिष्टाचार का अर्थ चापलूसी प्रचलित हो गया है । चापलूसी बहुधा अनुचित स्वार्थसाधन के लिए श्रात्म-गोरव को त्यागकर मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति अथवा अभ्याम के आधार पर की जाती है, परन्तु शिष्टाचार स्वार्थ-साधन से विशेष सम्बन्ध नहीं रसता और उसमें प्रात्म-गौरव का दुर्लक्ष्य भी नहीं होता । यद्यपि शिष्टाचार की प्रवृति भी थोड़ी-बहुत स्वा भाषिक रहती है, तथापि चापलूसी के समान वह कुटेव का रूप धारण नहीं करती । यदि चापलूसी करने वाले मनुष्य के शिचरो और कार्यों में कोई हस्तक्षेप न करे तो वह प्रयक्ष रूप से, किसी दिन, दिन को रात और रात को दिन कहने के लिए भी तैयार हो जाता है, पर शिष्टाचारी मनुष्य असत्य को भी अपना गोरव रख कर प्रगट करेगा । विना सोचे विचारे और विना उचित आवश्यकता के किसी की "हाँ मे हाँ" और "नहीं में नहीं" मिलाना चापलूसी वा चाटुकारिना है, परन्तु प्रत्यक्ष रूप से किसी का जी दुखाये विना, सोच-समझकर अपनी उचित सम्मति देना अथवा आवश्यकता होने पर मौन धारण करना शिष्टाचार वा सभ्यता है। दूसरो को सदा प्रसन्न रखना बहुत कठिन है, पर मसारी व्यवहार में उचित उपायों से दूसरों को प्रसन्न रसने की आवश्यकता होती है और इसके लिए शिष्टाचार ही उपयुक्त माधन है, चापलूसी नहीं । जन शिष्टाचार अपनी सीमा से बाहर हो जाता है तब वह चाटुकारिता का रूप धारण कर लेता है और उस समय वह निदनीय है । इस प्रकार का मिथ्या शिष्टाचार बहुधा दोनो व्यपहा- रियों के लिए दुखदायी होता है। चापलूसी को मान देने वाले प्रथम अध्याय ७ में घे उसे वैसा न समझते हो, परतु उचित शिष्टाचार को प्राय सभी लोग सिद्धात और प्रयोग में आदर और गुण प्राहकता की दृष्टि से देखते हैं। साराश मे हम इस भेद को ऐसा भी मान सकते हैं कि उचित चापलूसो शिष्टाचार है, और अनुत्रित शिष्टाचार चापलूसी है। चापलूसीको आवश्यकता सदैव और सर्वत्र नहीं होती, पर मनुष्यों के परस्पर व्यवहार में शिराचार का काम पग पग पर पड़ता है। हम लोग चापनूसो का अवसर टाल भी दे सकते हैं, पर शिष्टाचार टाला नहीं जा सकना । कभी कभी चापलूसी हृदय को एक ऐसो दूषित अवस्था से भो उत्पन्न होती है जिसमे सदैव स्वाथ-साधन को विशेष लालसा नहीं रहनो, किन्तु दूसरो को प्रसन्न करने को एक प्रकार की स्वाभाविक प्रवृति ही दिखाई देती है। इस प्रकार को चापलूसो सवथा निदनीय है, क्योकि यह दासता के उन भावो से उत्पन्न होती है जो पराधीनता के कारण किसी भी समाज के स्वभाव में सम्मिलित हो जाते हैं। (४) शिष्टाचार और स्वाधीनता बहुधा नरयुवकों के मन में स्वाधीनता की एक विचित्र ही कल्पना रहती है। समझते हैं कि मनमाना काम करना हो सच्ची स्वाधीनता है, चाहे उसमे दूसरों को अथवा स्वय उहीं की कैसी हो हानि क्यों न हो। इस दृष्टि से वे शिष्टाचार को स्वाधीनता का चाधक समझत हैं, क्योकि उनके मतानुसार उसके अनुरोध से लोगो को कई काम केवल दूसरो के सुभीते के विचार से करने पड़ते हैं। अनेक तत्ववेत्ताओ ने स्वाधीनता का लक्षण बताने का प्रयत्न किया है, परन्तु उन्होने स्पेन्टाचार को स्वाधीनता कभी नहीं माना । यथार्थ में जब तक मनुष्य सामाजिक प्राणी है तर तक वह स्वेच्छाचार का पालन सदा और सर्वत्र नहीं कर सकता, क्योकि ऐसा करने में उसे पद पद पर स्वाभाविक तथा त्रिम हिन्दुस्थानी शिष्टाचार रकावटो का सामना करना पड़ता है जो उसके कार्यों की सफलता में विघ्न डालती हैं। मनुष्य ससार से विरक्त होकर वन मे रहने पर भी स्वाधीनता प्राप्त नहीं कर सकता, क्योकि वहाँ भी कई बातो के लिए उसे दूसरों पर अवलवित होना पड़ेगा। इसलिए एक विद्वान ने स्वाधीनता का यह लक्षण कहा है कि "दूसरो को किसी तरह की हानि न पहुँचाकर और अपने हित के लिए किये गये दुसरे के यन में वाया न डालकर, जिस तरह से हो उस तरह, अपने स्वार्थ साधन की स्वतन्त्रता का नाम स्वाधीनता है"। यदि दूसरो को स्वतन्त्रता का विचार न किया जाय तो मानवी और पाशविक स्वतन्त्रता में कोई अन्तर न रहे । अतएव शिष्टाचार स्वाधीनता का वाधक नहीं हो सकता, वरन वह इसका साधक होता है । नियमानुसार काम होने पर प्रत्येक मनुष्य को अपना काम निर्विन रीति से सम्पन्न करने का अवसर प्राप्त होता है और यही सुभीता यथार्थ मे सन्ची स्वतन्त्रता है। यदि हम मनमाना काम करके दूसरों के कार्यों में वा विचारो मे वाधा डालेंगे तो यह कर सम्भव है कि दूसरे लोग हमारे कार्यों वा विचारो में बाधा न डालें अथवा हम अपने इस आचरण से स्वय अपनी ही स्वतन्नता स्थिर रख सकें दूसरो की बातो में हस्तक्षेप करने में हम स्वयं अपनी अनुचित प्रकृतियों के दास बन जाते हैं । तब हमारी ययार्थ वा कल्पित सच्ची स्वतन्नता कहाँ रही? इस दृष्टि से आज्ञापालन, मनोदमन, मधुर भाषण प्रादि गुणों को स्वाधीनता का साधक मानना पड़ेगा। समाज में रहकर यदि हम उसके साथ उचित व्यवहार न करेंगे तो समाज हमारो रक्षा न करेगा अथवा हमसे "शाप पा चाप" के द्वारा उचित चर्ताव करावेगा। यदि हम समाज की प्राक्षा न मानेंगे तो समाज के काम-काज में गड़बड़ होगी और उस अन्यघस्या का फल हमें भी भोगना पडेगा ।
प्रथम अध्याय यह कभी नहीं हो सकता कि हम एक समाज को छोड़कर किमी दूसरे समाज में न जाये, क्योकि समाज में रहना एक स्वाभाविक स्मृत्ति है । तर हम नियमपूर्वक चलकर ही अपनी तथा अपने समाज को स्वतन्त्रता को रक्षित रस सकते हैं। विद्वानो ने कहा है कि "नियम स्वतन्त्रता का प्राण है"। (५) शिष्टाचार और सत्यता पुछ लोगों की यह धारणा है कि शिष्टाचार एक मिथ्या व्यवहार ई पोर शिणाचारी व्यक्ति परात रूप से सत्यता का तिरस्कार करता है। इस में सन्देह नहीं कि शिष्टाचार मे वहुधा अप्रिय और अनारश्यक सयता प्रगट नहीं की जाती, तथापि सय का यह लोप मूठ बोलने अथवा धोखा देने की प्रवृत्ति से नहीं किया जाता। शिटाचार का प्रधान उद्देश्य दूसरो का सुभीता और सतोप देना है, प्रतएव जिस समय सत्यतासे किसी कोव्यर्थ हानि प्रयचा अप्रसन्नता प्राप्त होने की सभावना हो, उस समय सत्यता को प्रकट करने की आवश्यकता नहीं है। ऐसी अवस्था में मनुष्य उदासीनता (मोन) धारण करके ही मूर्स अथवा अशिष्ट होने से बच सकता है। नीति और धर्म की रिसे भी प्रयेक अवसर पर सत्यता को प्रगट करने की आवश्यकता नहीं मानी जाती। यदि किसी सत्य को प्रगट करने से व्यकि-गत आक्षेप अथवा किसी का अपमान होने को सभावना हो तो सत्य यात प्रगट करना अनुचित है। इसी प्रकार यदि उससे प्रयत्त रूप में हानि अधिक और लाभ कम होने का भय हो तो उसे प्रगट करना मूखता है। इसके सिवा अधिकाश लोग सय को एकी सत्य नहीं मानते, क्योकि वे साधारण व्यवहार में बहुधा असत्य, अतिशयोक्ति और अर्ध-सत्य सुना करते हैं। अतएव शिटाचार को दुटि मे सय को बिना सोचे विचारे अथवा निर्भय होकर प्रगट करने में जासिम है। कभी कभी सदाचार और हिन्दुस्थानी शिष्टाचार तो किसो के दोष से सम्बन्ध रखने वाली सत्यता को अकारण हो प्रगट कर देने से मनु य पर अभियोग प्रारोपित कर दिया जाता है। शिटाचार ऐसो सपना को प्राट होने से नहीं रोक सकता जो सर से अधिक लोगो को सर में अधिक लाभ पहुँचाती है अर्थात् नोति और सदाचार को उच्चतम प्रेरणा से जो सत्य प्रगट किया जाता है वह शिटाचार को सोमा के बाहर है । इसी प्रकार साय को खोज मे जो वादविवाद अथवा आन्दोलन होता है उसमे भी शिष्टाचार के म य की अवहेलना की जा सकती है। यदि शियाचार के अनुरोध से इस प्रकार के अटल स य का प्रचार न हो तोसत्य ज्ञान को उन्नति होना असम्भव हो जाय और लोगो को शिटाचार में अतर समझने की योग्यता हो न रहे । सारांश यह है कि शिष्टाचार मे स य के प्रति कोई अनास्था नहीं दिखाई जाती और न जानबूझकर किसी को हानि पहुँचाने प्रयमा धोखा देने के लिए समयानुकल असय का प्रयोग किया जाना है। उसमे सत्य को केवल कठोरता को कुछ कोमल कर देते हैं। (६) शिष्टाचार के साधन साधारणतया शिष्टाचार के प्रमुख साधन मन, वचन और कर्म है, पर, जेसा पहले कहा जा चुका है, उसके पालन मे मन की विशेष प्रेरणा नहीं होती, यद्यपि उसमें मनुष्य के स्वभाव का प्रभाव अवश्य पड़ता है । शिष्टाचारी व्यक्ति को शान्त स्वभाव और विवेक को बड़ी आवश्यकता है, क्योंकि इनके विना वह उचित अथवा अनुचित कार्यों के विषय मे ठीक ठोक विचार नहीं कर सकता। शिष्टाचार में विचार और कर्म के साथ कुछ हृदय के मेल की भो आवश्यकता है और इसके साथ उसमे बुद्धि और स्मरण का भो काम पड़ता है , इमलिए शिपचार के साधनों में वचन और किया के साथ की अंशो में मन को भी आवश्यकता होती है।
प्रथम अध्याय निशानार का दूसरा माधा पगा। हम यूमरों के माय पेसे पचन घोलना चाहिए जो प्रिय हो और यथा-समय सत्य भी हो। यदि किसी समय माय पालने का प्रयोजन न हो तो हम मर धारण फर लेना चाहिए प्रयया पेमे पचन घोलना चापि जिसे धोना फा थोडा-यदुत समाधान हो जाय और उमसी कोई हानि न हो। सदाचार की दरि से भी अप्रिय मय का पेध है। पर जान-यूझ- कर धावा देने के लिए प्रथया हानि पहुँचाने के लिए मूठ बोलना दोनों प्रकार मे निन्दनीय है। गिटाचार-समधी क्रियाओं के प्रतर्गत येमा कार्य हैं जिनका परोत पा प्रयत सम्बध दूमरो मे है । शिष्टाचार में उ7 मर नियामो को त्याज्य मारते हैं जिसे दूसरा को असुविधा प्रथया असनोप होता है । मान लीजिए कि किसी मनुष्य को बहुत हँसने में प्रानन्द मिलता है और यह सड़क के पक किनारे पग होकर जहां किसी की कोई हानि होने कीमम्भावना नहीं है जोर जोर से इंसता है । यद्यपि उम मनुष्य को इस काम मे रोपने का अधिकार किसी को नहीं है, तो भी यह स्थय इस बात का विचार कर सकता है कि मड़क पर आने जाने वाले लोगों को मेरे इस काम मे कोई असुविधा प्रथया अस तोप तो नहीं होता । यदि ऐसा हो तो उसे शिगवार की दूटि मे अपनी दिया धन्द कर देनी चाहिए । मनुष्य की ऐसी क्रियाएँ अनेक हैं जिनमे बहुधा दूसरों को सतोष और सुभीते का सम्बन्ध रहता है, इसलिए उसे अपने परस्पर जीवन-सम्बधी कार्यों में शिष्टाचार का ध्यान रसना परम प्रापश्यक है। शिष्टाचार की थोड़ी-बहुत प्रकृति सभी लोगो में स्वाभाविक होती है। जो लोग शिष्टाचार के नाम से नाक-भों मिकोदते हैं और उसे अनावश्यक नियमो का सत्रह समझते हैं वे भी बहुधा दूसरो १२ हिन्दुस्थानी गिणचार के द्वारा किये गये व्यवहार की अनुकूल अथरा प्रतिकूल प्रालोचना करते हैं जिससे इस विषय की उपयोगिता पूर्णतया सिद्ध होती है। यथार्थ में शिष्टाचार की उत्पत्ति मभ्य समाज में प्रायश्यकता और अनुकरण मे आप हो श्राप होती है। हाँ, यह बात अवश्य है कि कोई सामाज कम और को अधिक शिष्टाचारी होता है। पर इससे इस विषय को कोई होनता सूचित नहीं हाती । गिटाचार को प्रवृति आवश्यकता और अनुकरण के अतिरिक्त पुस्तकावलोकन, प्रवास और सामाजिक तथा सार्यजनिक जीवन से भी वृद्धि पाती है । स्वय प्रशसा पाने और दूसरों को उचित रोति से प्रसन्न करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति से भी शिष्टाचार के भायो की उन्नति होती है।
दूसरा अध्याय प्राचीन आर्य शिष्टाचार (१) वैदिक काल में वैदिक काल में प्रचलित शिष्टाचार का पता हमे पार्यों की प्राचीन सभ्यता से लग सकता है। हमारे पूर्वजो ने कई सहस्र वर्ष पहले अनेक विद्याओ पोर कलाओ में विशेष उन्नति कर ली थी, इसलिए यह सम्भव नहीं कि समाज मे उपयोगी होनेवाले शिष्टाचार सरोखे गुण का उनमे अभाव रहा हो । जो जाति शेष ससार की बाल्यावस्था के समय धातुओ का उपयोग जानती थी, सोने-चाँदी के गहने और युद्ध के अस्त्र शस्त्र तैयार कर सकती थी, तत्वज्ञान के गूढ़ विषयो पर सम्मति दे सकती थी और हजारो खभा के "भवन" बना सकती थी, वह अशिष्ट से रह सकती थी। वेद-कालीन साहित्य से जाना जाता है कि उस समय केवल पुरुष ही नहीं, कितु स्त्रियां भो शिक्षित होतो थीं। वेदो के अनेक मन्त्रो की रचना स्त्रियों ने की है । यज्ञ-कार्य मे पुरुषो के साथ स्त्रियाँ सम्मिलित होती थीं और ये विशेष आदर की दर से देसी जाती थी। उस समय परदे को प्रणाली प्रचलित नहीं थी और कन्याएँ उपवर होने पर स्वयवर को रोति से विवाही जाती या* सभ्यता की इस अवस्था में शिष्टाचार की अवहेलना नहीं हो सकती थो । विवाह के समय वर-कन्या एक-दूसरे को जो वचन देते ये उनसे वेदिक-काल के शिष्टाचार का बहुत-कुछ ज्ञान हो * "भारत की प्राचीन सभ्यता का इतिहास"।
हिन्दुस्थानी शिष्टाचार सकता है। वे वचन ये हैं-(वर अोर कन्या को उपदेश) "तुम दोनो यहाँ मिले हुए रहो, कमो अलग मत होनी । नाना प्रकार के भोजनो का उपभोग करो, अपने ही घर मे रहो, और अपने पुन पौत्रो के साथ रहकर सुख भोगो।" (वर कन्या कहते हैं ) प्रजापति हमे सन्तान देखें और अर्यमन् हमे वृद्धावस्था पर्यन्त मिला हुआ रखें"। (कन्या का उपदेश) "हे काये, मगल शकुना के साथ तुम अपने पति के गृह में प्रवेश करो। हमारे दाम-दासियो पोर पशुओ को लाभ पहुँचाओ" । "तुम्हारे नेत्र क्रोध से मुक्त रहें । तुम अपने पति का सुख साधन करो और हमारे पशुप्रो को लाभ पहुंचानो। तुम्हारा चित्त प्रसन्न और तुम्हारी छति सुन्दर रहे । तुम वीर पुनो की माता होमो ओर देवों की भक्ति करो। इन मात्रों से ज्ञात होता है कि आर्य लोग दास-दासियो के प्रति भी सद्-व्यवहार करते थे। क्रोध के परिहार और वित्त की प्रसन्नता पर उनकी विशेष हरि रहती थी जो शिष्टाचार के पालन के लिए बहुत आवश्यक हैं । वधू के सुख-चैन का विचार करना भी उनके सदाचार का परिचय देता है। ब्राह्मणो के लिए नियत किये गये चार प्राथमो को सस्था से भी हम सहज ही अनुमान कर सकते हैं कि प्रायों को सदाचार और शिष्टाचार का कितना अधिक ध्यान था।बड़ो का आदर करना, सत्य बालना और प्रतिज्ञा पालना हमारे पूर्वजो के मुख्य कर्तव्य थे। ब्राह्मणों को अपने जीवन में शासन के कड़े नियम पालने पडते थे और किसी भीअपस्या में उन्हें भोग-विलास में रहने की माझा नहीं थी। प्राचीन काल में अतिथि-सत्कार की जो उच्च प्रथा थी उसमें शिष्टाचार का अधिकाश समावेश होता था। सामाजिक कार्यों के ग००-१०, ८१, ४२-१७ 1 दूसरा अध्याय लिए नियम बनाना और उनका पालन करना आर्य-जाति का एक प्रधान लक्षण था । राजा ओर प्रजा तन मन-धन से मृपियो का सत्कार करते थे और प्रजा राजा को ईश्वर का आश मानती थी। राजा तोग भी प्रजा के प्रेम की प्राप्ति के लिए सतत उद्योग करते थे। पेदिक काल के शिष्टाचार का स्पष्ट भोर पूर्ण विवरण सरलता से उपल ध न होने के कारण केरल पूर्वोक्त सक्षिप्त विवेचन ही लिसा जा सका है। यदि वैसा विवरण उपलब्ध भी होता, तो भी वह यहाँ विस्तार-पूर्वक न लिखा जा सकता, क्योकि इस पुस्तक का मुरय उद्देश्य केवल आधुनिक शिष्टाचार का वर्णन करना (२) रामायण-काल में वैदिक काल की अपेक्षा इस काल मे शिष्टाचार पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा, क्योंकि इस समय समाज का सगठन अधिक हद हो गया था और जाति भेद की प्रथा प्रचलित हो गई थी। धर्म-सस्कार और यज्ञ-यगादि भी इस समय विशेष प्राडम्बर से किये जाने लगे और प्रचीन प्रकृति-पूजा के बदले प्रकृति के देवताभो की पूजा होने लगी। रामायण काल में सामाजिक सदाचार की ओर विशेष प्रवृत्ति होने के कारण शिष्टावार को भी परीक्षा की जाती थी। केवल वाल्मीकि रामायण ही से तत्कालीन सभ्यता और शिष्टाचार की अनेक बातें जानी जा सकती हैं। यहां इस विषय की कुछ बातें हम सक्षेप में लिखते हैं। उस समय अपने वचन का पालन करना और धर्म-सकट उपस्थित होने पर कर्तव्य का निश्चय तथा अनुसरण करना प्राय प्रत्येक व्यकि अपना ध्येय समझता था। माता पिता की प्राज्ञा मानना और छोटे-बड़ो के साथ शिष्ट व्यवहार करना भी उस काल हिन्दुस्थानी शिष्टाचार किया जाता था और पितरो तथा अतिथियो को अन्न का भाग न दिया जाता था । रसेड करने-याला पविनता न रसता था और तैयार किया हुआ भोजन भली भांति ढक-मूंद कर न रखा जाता था। चे लाग साने के पदायों को श्राप खा जाते थे, बच्ची तथा नोकरी को उनका हिस्सा न देते थे । इस प्रकार का पोर भी बहुत धर्णन पूर्वाक प्रथ में पाया जाता है जिसमें सूचित हाता है कि महाभारत काल में सभ्य व्यवहार की वारीक बातो पर भी बहुत ध्यान दिया जाता था। रामायण काल में जिस प्रकार रामचन्द्र प्रादर्श पुरुप हो गये हैं उसी प्रकार महाभारत-काल में श्रीरप्ण पाद-पुरुष थे। पाप मे देयो और मानवो दोनों प्रकार के गुण थे। वाल-सपाओ के प्रति आप का अनुराग जैसा प्रसिद्ध है वैसा ही आप का किया हुआ भारतीय युद्ध का सगठन लोक विख्यात है। (४) स्मृति-काल में स्मृति-काल में जो अनुमान से विक्रम-सवत् के प्रारभ के आसपास माना जाता है, शिष्टाचार विषयक विवेचन अधिकता से किया हुआ पाया जाता है, क्योकि इस काल में कई धर्म शास्त्रों ओर स्मृतियो कोरचना हुई थी। इन पुस्तकों मे विशेष-कर धार्मिक जोवन से सम्बन्ध रखने वाले नियम पाये जाते हैं, परतु यत्र-तत्र इनमे शिरावार-सम्बन्धी वातें भी मिलती हैं। स्मृतियाँ कई मृपियो ने लिखी है जिनमे मनु-स्मृति सन से अधिक प्रसिद्ध है। मिन भिन्न स्मृतियों में गिटाचार-सम्बन्धी जो नियम मिलते हैं उनमे में कुछ सक्षेपत यहाँ लिसे जाते हैं- (१) राई करने पर भी गुर के सामने न वोले पोर गुरु के धमकाने पर भी कहीं चला न जाना चाहिये।
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दूसरा अध्याय
(0) कभी किसी को चुराई न करनी चाहिये, झूठ कभी न
बोलना चाहिये और दिये हुर दान की प्रसिद्धि कभी न करनी
चाहिये।
(३) लागो को वही चोज सिलानी चाहिये जिनको विद्वान
पसद करें और जो गीत पवने वाली हो ।
(४) शरीर के अंग तथा नावून बजाना नहीं चाहिए, दाँतों
से नावून काटना बुरा है। अनुनो से पानो पोना बुरा है। पांव
या हाय से जल का पोटना या ताडना न चाहिए ।
(५ वेठने के लिए प्रासन, ठहरने के लिए जगह, पीने के
लिए पानो और मोठी बातें, ये चार चोजें भले आदमियों के यहाँ
मदा बनी रहती हैं, कभी कम नहीं होती।
(६) अगहोन या अधिक अगवाले, मूख, बूढ़े,
और जाति से हान पुरयो को कभी ताना न दे।
(७) सूने मकान म अकेला न सेवे, अपने से बड़े को सोते से
न जगावे।
(५) पौराणिक काल में
पौराणिक काल अनुमानतः सन् ३०० ईसवी से सन् १०००६०
तक माना जाता है। इस काल मे चोद्ध-धर्म का पराभव करने के
लिए हि धर्म को जागृति हुई और कई धर्म प्रय लिखे गये जिनमे
१८ पुराण प्रमित हे । पुराणों मे विशेषत देवताओ को कथाएँ हैं।
पर उनन अनेक सदाचार सम्म को नियम और उपदेश भी पाये
जाते हैं। अटादश पुराण। म विगु पुराण अधिक प्रसिद्ध है।
इसमे सदाचार और शिटाचार सम्पधी जो नियम पाये जाते है
उनमें से कुछ ये हैं-
कुरूप, निर्धन
२०
हिन्दुस्थानी शिष्याचार
(१) जो लोग किसी की बुराई नहीं करते, किसी को कष्ट
नहीं देते उनपर भगवान प्रसन्न हो जाते हैं ।
(२) जव कोई दीन भिखारी गृहस्थ के द्वार पर भीख मांगने
आवे तब इसे उसका बडे प्रेम से आदर करना चाहिये, उसको
साने के लिए भोजन और पीने के लिए पानी देना चाहिए ।
(३) जब कभी कोई सन्यासी किसी गाँव में जाय, तब वहाँ
एक रात से अधिक न बसे, ओर किसी बडे शहर में पांच रात में
अधिक न ठहरे।
(४) जो लोग गर्भिणी स्त्री, वृद्ध पुरप, बालक और रोगी
को विना भोजन कराये आप भोजन करते हैं ये पापी हैं।
(५) दुष्टो का साथ कभी न करे, क्योकि बुरे आदमियो की
थोडी भी सगति बुराई उत्पन्न करती है।
(६) जहाँ तक हो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर
से अपनी बुद्धि को दूर हटाना चाहिए ।
(७) जो लोग वधिम-धर्म का पालन नहीं करते उन पर
ईश्वर प्रसन नहीं हो सकते।
तीसरा अध्याय आधुनिक हिन्दुस्थानी शिष्टाचार के भेद शिष्टाचार का विषय इतना व्यापक है अर्थात् इस गुण का प्रयोग करने के स्थल और अवसर इतने बहुत हैं-कि सर अवस्थाओं के लिए पूरे पूरे नियम बनाना बहुत कठिन कार्य है । यद्यपि इस विषय के प्रयोग का सम्बन्ध मनोविज्ञान, नीति-शास्त्र और समाज शास्त्र मे है, तोभी यह स्वय कोई शास्त्र नहीं है, क्योंकि इसमें हम कोई सिद्धात अथवा अटल नियम स्थापित नही कर सकते। अपने से बड़े को प्रणाम करने को प्रवृत्ति किसी स्वाभाविक प्रेरणा से अवश्य उत्पन्न होती है, पर वह सब अवस्थायो में एकसो नहीं रहती और किसी विशेष अवस्था में मिट भो जाती है । शिग्रवार केवल एक प्रकार को ललित कला है जिसका उद्देश्य दूसरे को सुभीता और स तोप देना है और जो बहुधा अभ्यास मे पाती है। ऐसी अवस्था में इस विषय का विवन सिद्धा तो के आधार पर तथा पूर्णता से करना कठिन है। तो भी इस विषय के मुख्य मुख्य रूपो का वर्णन अधिकाश मे क्रम-पूर्वक और स्पटना से किया जा सकता है। शिशचार को दम तोन विभाग में वोट मकने हैं-(२) सामा- जिक (२) व्यक्तिगत (3) विशेष । (१) सामाजिक शिष्टाचार जो शिग्रवार किलोसमाज विरोर म प्रतित है और जिसे उस समाज के व्यक्ति के निर समान के प्रति करना उचित प्रार आवश्यक है उसे सामाजिक गिटाचार कहते हैं। किसी बाहरी ૨૨ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार समाज के प्रति अवसर पड़ने पर उस समाज का शिष्टाचार-पालन भी सामाजिक शिष्टाचार का एक अंग है। परन्तु इस पुस्तक में उस शिष्टाचार का विचार न किया जायगा, क्योंकि उसके अनेक भेद हो सकते हैं और प्रत्येक भेद के लिए एक अलग पुस्तक की पाव- श्यकता है । इस ग्रन्य का उद्देश्य तो केवल आधुनिक हिन्दुस्थानी समाज के शिष्टाचार का वर्णन करना है। 'समाज' शब्द भी बहुत व्यापक है और अभी तक उसकी कोई निश्चित परिभाषा नहीं बनाई गई, प्रतएव इस पुस्तक में समाज उन व्यक्तियों का समूह माना गया है जो विशेष काल वा स्थान से सम्बन्ध रसते हैं और जिनके रीति रिवाज, सभ्यता और नेतिक तथा पादार्थिक अवस्था में बहुत कुछ सादृश्य रहता है । हिन्दुस्थानी समाज उस समाज का नाम है जो अधिकाश मे मध्य-देश का निवासी और हिन्दी भाषा-भाषी है । आधुनिक शब्द से गत और प्रचलित शतान्दि की लगभग उतनी अवधि का अभिप्राय है जिसके भीतर हमारे समाज की "भाषा, भोजन, मेप, भाव भोर भावी" में समधि-रूप से विशेष परिवर्तन नहीं हुआ और न होगा। समाज के पूर्वोक्त विहों में किसी समय विशेष हेरफेर भी हो जाय, तो भी व्यक्तियों के सम्बन्ध से उनम सादृश्य रहता ही है । यदि ऐसा न होता तो यह जानना कठिन हो जाता कि कान व्यक्ति किस समाज का है। आधुनिक हिदुस्थानी शिष्टाचार के वर्णन में माय उन्हीं सब रीति रिवाजो का वर्णन रहेगा जिनसे अधिकाश में हिन्दुस्थानी समाज की पहचान होती है। प्राचीन काल के मध्य देश को आज-क्ल हिन्दुस्थान कहते हैं जो 'दक्षिण' का विरोधायी है । इस देश के निवासी हिन्दुस्थानी कहलाते है जिनकी भाषा हिन्दी (पा हिन्दुस्थानी ) है और धम वैदिक है । 1 तोसरा अन्याय २३ (२) व्यक्तिगत शिष्टाचार सामाजिक शिष्टाचार में हमें एक ही समय एक से अधिक व्यक्तियों के साथ सद-व्यवहार करना पड़ता है, पर व्यक्तिगत शिष्टाचार में हमारा सम्पूर्ण ध्यान किसी एक ही व्यक्ति की प्राव- भगत में लगा रहता है । यद्यपि मामाजिक शिष्टाचार में भी व्यक्ति- गत गिराचार का भाव मिला रहता है, तोभी अनेक अवसर ऐसे आते हैं जिनमे न्यति हो की प्रधानता रहती है । यदि किसी समय फेवल यति को प्रधानता हो, जेसे मभा में सभापति को और विदाई में अतिथि की होती है तो उस समय हमें व्यक्तिगत शिष्टाचार का विशेष ध्यान रसना चाहिए, पर साधारण रोति से सामाजिक गिशवार के अवसर पर किसी एक व्यक्ति के प्रति विशेष शिष्टाचार का प्रयोग करने से अन्यान्य व्यक्तियो को अपमान प्रतीत हो सकता है। यद्यपि सामाजिक शिष्टाचार में ऊँच-नीच का भेद मानना प्राय अनुचित है, तो भी शिष्टाचार पान की योग्यता के अनुसार घट-बढ़ हो सकता है। व्यक्तिगत तथा सामाजिक शिष्टाचार में जो व्यवहारी समष्टि-रूप से अपना दृष्टिकोण स्थिर रखता है वही अधिक शिष्ट अोर सभ्य समझा जाता है। (३) रिशेप शिष्टाचार इस विभाग में उन सब व्यक्तियो के प्रति होनेवाले शिष्ट व्यवहार का समावेश होता है जिनमे साथ किसी का व्यकि-गत अथवा विशेष सम्बर होता है अथा जो किसी विशेष अवस्था के कारण विशेष रूप में शिष्टाचार के पात्र माने जाते हैं। यद्यपि इस विषय के नियम अन्यान्य प्रकार के शिष्टाचार के नियमो मे अधिकाश में भिन्न नहीं है, तथापि इसकी कई बातो में विशेषता है जिसके कारण इस विषय का एक अलग विभाग किया गया है। उदाहरणार्थ, स्त्रियों की अथवा २४ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार बूदों की बातो का उत्तर देने में नम्रता को मात्रा साधारण से कुछ अधिक होनी चाहिए । समाज मे सर को एक ही दृष्टि से देखना ओर उनके साथ एक हो सा व्यवहार करना इष्ट होने पर भी मर्वदा शक्य नहीं है। अतएव देश-काल-पात्र के अनुसार शिष्टाचार में कुछ भेद करना ही पड़ता है, पर उसमे इस बात का ध्यान अवश्य रक्ता जावे कि वैसे न्यवहार से अन्याय लोगो को प्रसन्तोप का अवसर प्राप्त न हो।
चौथा अध्याय सामानिक गिटाचार (१) सभाओं और पाठशालाओं में सभायो में प्रयेक व्यक्ति को कम से कम तीन धातो का ध्यान अवश्य रसना चाहिये-(१) बैठक (0) बातचीत (३) शारीरिक किया । जहाँ हम बैठे है। यहां हमे यह देखना चाहिए कि हमार बैठने से किसी को कोई अड़चन तो नहीं होती। यदि हम अपने पाम बैठने-बालो मे यह पूछ लें कि उन लोगा को हमारे बैठने से कोई कर तो नहीं है तो यह अनुचित न होगा । दूसरे के दृष्टिपथ को रोककर अथवा दूसरे में विल सटकर बैठना अशिर है । इसी प्रकार हाथ पांव फैलाकर और केवल अपने ही पाराम का ध्यान रखकर वेठना भी निय समझा जाता है। जहाँ मभानो में खड़े रहने का प्रयोजन पड़ जाता है यहाँ भी इस विषय का विचार रग्नना मावश्यक है। जिस समय ममा मेव्यारवान होता है अथवा सर लोग मौन धारण क्यि किसी विषय पर विचार करते हैं उस समय आपस में जोर जोर से बातचीत करना अनुचित है । सभा मे जिसे बालने का अधिकार है वही सभापति को प्राज्ञा अथवा अनुमति से बोल सकता है। यदि अनधिकारी व्यक्ति को बोलने को इच्छा अथवा आवश्यकता हो तो वह सभा के कार्य म विन डाले बिना सभापति को आज्ञा से बोले । शारीरिक क्रियानो के सम्बध में यह जान लेना प्रायश्यक है कि जोर से हंसना, सॉमना, नाक साफ करना, बार-बार पासन पदलना आदि कार्यों से प्राय सभी को .
२६ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार असुविधा होती है, इसलिए ये कार्य अधिकाश मे वर्य हैं। सभाओ में बीडीअादि पीना भी निन्ध है। व्याख्याता को इतने जोर से बोलना चाहिए, जिसमें सर श्रोता उसका भाषण सुन सकें और ऐसो भाषा का व्यवहार करना चाहिए जिसे अधिकाश श्रोता समझ सकें। बोलने में शीघ्रना न की जावे और शन्दो तथा अक्षरो का उच्चारण स्परता से किया जावे । यथा-सम्भव भाषा मे प्रान्तीयता को दूर रखना चाहिए । भाषण में व्यक्तिगत आक्षेप करना अथवा ऐसे टूटान्न देना जिनसे श्रोताओ के हृदय पर आघात पहुंच सकता है असभ्यता का लक्षण है। वक्ता को अपने विषय के भीतर ही बोलना उचित है और उसे अपना व्याख्यान इतना न बढ़ाना चाहिए कि वह श्रोताओं को अरनिकर हो जाय । व्याख्यान में अधिक हँसाना या रुलाना भी अनुचित समझा जाता है। सभामओ के प्रबन्धो को यह देखना चाहिए कि मर लोगो के धैठने तथा हवा और उजेले का ठीक प्रबन्ध है या नहीं । निमनित तथा प्रतिष्ठित व्यक्तियों के स्वागत का और अन्यान्य लोगो को सभा-स्थान का मार्ग दिनाने का भी प्रकार होना चाहिए । जहाँ तक हो सभाओ में म्वय सेवो की उपस्थिति अपेतित है। इन कार्यकर्ताओं को अपने सद्व्यवहार में अपने कर्तव्य की शोभा बढ़ानी चाहिए जो काम इन्हें सौंपा गया हो अथवा जिस उद्देश्य से इनकी नियुक्ति की गई हो उसमें सफलता प्राप्त करने के लिए रहें प्रयत करना चाहिए । सभा-कार्य में प्रायवस्था होने पर प्रवन्धको के साथ साथ स्वयसेवक लोग भी दोषी ठहराये जा सकते हैं। इन लोगों में वचन माधुरी और क्रिया चातुरी अवश्य होनी चाहिए । ममानो के विषय के साथ साथ यही पाठशालामओ के शिराचार का भी विचार करना उपयुक्त होगा । यद्यपि पाठशाला में चोथा अध्याय २७ शिष्टाचार के अधिकाश नियम शासन के नियमों में रहते हैं जिनका पालन आशा की कठोरता के साथ कराया जाता है, तथापि ये (पिछले) नियम पेमे नहीं हैं कि इनमें सदैव प्राशा की ही प्राव- श्यकता हो और इनका पालन दराट के भय से ही किया जाय। यदि विद्यार्थी ( और शिक्षक भी) शिष्टाचार के मूल सिद्धान्त पर विचार करें तो उहे ज्ञान हो जायगा कि कक्षा मे शान्ति रग्वना और पक ही व्यक्ति का बालना केवल श्राशा और दण्ड के विषय नहीं हैं, कितु विवेक के भी हैं । कक्षा में निस समय शिक्षक पाठ पढ़ा रहा हो उस समय यातचीत करना अथवा अनुमति के विना प्रश्न प्रचना अनुचित है। यदि किसी विद्यार्थी को कोई शका उत्पन्न हो तो यह पाठ का एक सड समाप्त होने पर अपना हाथ उठाकर शिक्षक का ध्यान अपनी ओर पारुष्ट करे और उसकी आज्ञा से अपनी शफा खड़े होकर प्रगट करे । कंचल असामयिक बाद विवाद की दृष्टि से शका उपस्थित करना अनुचित है। यदि शिक्षक किसी विद्यार्थी की शका को साधारण या अनुचित समझकर उसका समाधान न करे तो विद्यार्थी शिक्षक के कार्य में अधिक विन्न न डालकर किसी अन्य उपयुकअवसर पर अपनी शका का समाधान करा लेवे । शिक्षक और शिष्य के बीच में सदैव नम्रता का व्यवहार होना चाहिए, पर यदि किसी समय शिक्षक की ओर से कोई अनुचित कठोरता हो जाय तो कम से कम शिष्टाचार के अनुरोध हो से विद्यार्थी को वह व्यवहार सहन कर लेना चाहिए । विद्यार्थी चार बार कक्षा के वाहर न जावे। यदि विशेष प्राव श्यकना हो तो यह शिक्षक से अनुमति लेकर कुछ समय तक बाहर ही रहे । कार्य के समय विना शिक्षक को अनुमति के बाहर से कक्षा के भीतर पाना भी अशिष्टता है। पाठशाला में आने के और घर जाने के समय शासन के अनुमार विद्यार्थियों को पाठक से प्रणाम २८ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार करना चाहिए जिसका प्रेम-पूर्वक उत्तर देना पाठक का कर्त य है। पाठशाला के बाहर भेट होने पर भी प्रणाम और उत्तर के नियम में वाधा न आनी चाहिए । जो बाते विद्यार्थियो के विषय में कहो गई हैं वहीं थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ शिक्षको के विषय में भी कही जा सकती हैं । जहाँ तक हो सके शिक्षक को अपना पाठ पद्धति पूर्वक और खड़े रहकर पढ़ाना चाहिए । पाठक लोग कभी कमो कुरसी और मेज का सुभीता पाकर मेज पर पर फैला देते हैं । यह अनुचित है। विद्या- थियों के प्रश्न करने पर उन्हें उसका उत्तर शाति और प्रेम-पूर्वक देना चाहिए । शिक्षक को विद्यार्थियों के प्रति न तो पत्थर सा कड़ा और न मासन सा कोमल होना चाहिए, क्योंकि दोनो हो अव स्थाओ मे मृदु मति वालको पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। उसे मध्य भाव से अपना व्यवहार करना चाहिए । (२) भीड़-मेलों तथा रास्तों में भोड-मेला में सेना के शासन के समान अथवा कल की एक- रूपता को तरह पूर्ण व्यवस्था होनी कठिन है, क्योकि सभी लोग सभी स्थानो मे और सभी समय पर शिष्टाचार का विचार नहीं रस सकते । इसलिए ऐसे अवसर पर प्रबन्ध के लिए स्सय सेवकों और पुलिस को आवश्यकता होता है । तथापि लोगो को सदिच्छा पार विवेकशुद्धि से बहुत से अनुत्रित व्यवहार रोके जा सकते हैं । भीड़ मेलो मे स्त्रियां और पुरुष बहुधा अपने साथियों के साथ जाते हैं और जहाँ तक होता है प्रत्येक अपना माथ बनाये रसता है । ऐसी अवस्था में लोगो का यह कर्त्तन्य है कि अपने साथ- वालों का ध्यान रखें। यदि कहीं कोई साथी छूट जाय तो दूसरे साथियों को उसे खोजना चाहिए अथवा उसके लिए ठहरना चौथा अध्याय २६ चाहिए । जहाँ सड़क चौड़ी तो यहाँ मड़क के किनारे से चलना ठोक है निममे सवारियों के प्राने जाने में कोई दुघटना होने का डर न रहे । मुडवाले लोग पक कतार में न चलें, कि तु एक दूसरे के आगे पीछे और बीच रास्ते में सड़े न रह | प्राय ऐसे ही नियम सवारियों के लिए भी हैं। इनका वेग नियमित होना चाहिए और इन्हें माने जाने वाले को सभ्यता प्रयक मचेत कर देना चाहिए । पैदलो पर सवारो को एक दूसरे के सुभीते का ध्यान अवश्य रहे। इमो मानि पुरुपा को स्त्रिया के तथा स्त्रियों को पुरपा के सुभीते का ध्यान रखना चाहिए । जिस प्रोर में अधिकाश स्त्रियाँ जाती हो उस ओर मे पुरुष न जावें । इसी तरह स्त्रियाँ भी पुरुषों के मार्ग से न चले । स्त्रिया के मार्ग कोगककर सड़े होना अथवा किसी पास के स्थान पर ठहरफर उनको प्रोर टकटकी लगाकर देखना, ठट्ठा करना या अनुवित गीत गाना नीयता 1 यदि किसी मेले के स्थान पर स्त्रियो ओर पुरुषों के ठहरने, नहाने आदि के लिए अलग अलग स्यानो का प्राव हो तो प्रत्येक वग को अपो ही निर्दिष्ट स्थान का उपयोग करना चाहिए । अधिक भीड़ होने पर भी स्त्रियो को हटाकर जाना पुरुपा के लिए उचित नहीं है । जिस धर्म के लोगो का मेला हो उनकी सम्मति से विता अय धर्मवाले को उसमे विशेष-कर पूजा के स्थान और समय पर सम्मिलित न होना चाहिए। यदि भीड़ में कोई चालक, स्त्री अथवा अशक्त मनुष्य किमी प्रकार के सकट में हो तो बलवान् और धनी लोगो को अपनी योग्यता के अनुसार उसकी सहायता करना चाहिए । दर्शक-गण और भक्त जन भी मेलो और तमागो मे बहुधा स्वार्थ और मनोर- अन के लिये जाते हैं, इसलिए उन्हें असहायो को सहायता देने का बहुत कम ध्यान होता है। परन्तु यथार्थ उपकार करने का अवसर ३० " " हिन्दुस्थानी शिष्टाचार ऐसे ही स्थाना में मिलता है । क्या ही अन्दा हो यदि कुछ उपकारी सज्जन मेला मे देवताओं और साधुओ के दर्शन करने के पश्चात् कुछ ऐसे असहाय लोगेा के भो दर्शन करें जिनका उस समय केवल ईश्वर हो रक्षक रहता है। स्वय-सेवको को भी अपने कर्तव्य का पूरा ध्यान रखना चाहिए । लागे मे सभ्यता पूर्वक बात बोत करना और आवश्य कता पड़ने पर उनको उचित सहायता करना प्रत्येक स्वय-सेवक का कर्तव्य हाना चाहिए। किसी का पक्ष पात अथवा अपमान करना उनके लिए कजक को बात है। स्वयं सेवक मन में यह धारणा न रसे फि में गिना वेतन के काम करता है, इसलिए मुझे सर के साथ मनमाना व्यवहार करने को स्वननता अथवा योग्यता है। उसे अपने नाम सेवक के अर्थ पर सदैव द्वधि रखना चाहिए। इसो सम्बन्ध मे दो-चार शब्द पुलिस के लिए भी कह देना अनुचित न होगा । यद्यपि पुलिस वाले अपने को विशेष अधिकारी समझने के कारण बहुधा शिष्टाचार का नाम तक नहीं जानते, तथापि मनुष्यता की दृष्टि से वे अपने अधिकार के उपयोग म भी शिष्टाचार का पालन कर सकते हैं। हिन्दुस्थान का एक मामूलो कानिस्टविल भी कोई बात पूछने पर टर्यता है जिसका विशेष कारण अज्ञान और परायोन प्रकृति है, पर विलायन को पुलिस के विषय में लिखा है कि वह नोच से नोच अभियुक्त के माथ भो अशिष्ट व्यवहार नहीं करती। पुलिस को सदैव इस बात का व्यान रखना चाहिए कि नम्रता-पूर्वक किये गये प्रश्न का उत्तर नम्रता हो के साथ दिया जाना चाहिए। उसे लोगो को कठिनाइयो को और उन्हें दूर करने के उपायों को खोज करनी चाहिए और जहाँ केवल उँगली उठाने से काम चल सकता है वहां लहन चलाना चाहिए । . - धावा अध्याय । मानन्द की यात है कि पुर दिनो से कहा कहा पुलिस अपने को प्रज्ञा का सेयक समझो लगो है। मेलो और तमाम का ताग विगेप-कर गुहं भाई उपद्रय करने दो को इष्टि में जाते है । एसे लागा मे मिटाचार की प्राशा फरना पृथा है। पर ऐसे लागो के अत्याचारा को रोकना प्रत्येक शतिगाली नागरिक पार पुलिम का प्रधाा कर्तव्य है । यदुधा तम्या शिक्षित लोग भी उपद्रवियों का अनुकरण करने लगते हैं मोर युर समय के लिए अपनी शिता, अपने पुल और अपने फत्तव्य को भूल जाते हैं। जिस देश म ऐसे नीच लोग होते हैं उसकी मनिठा को ये दुर सहज ही मानेते हैं । (३) मन्दिरों में ऊपर जो पुत्र मेलो के विषय म कहा गया उसका अधिकाश मदिराम पाने जाने वाले शिष्टाचार के सम्मघम भी कहा जा सकता है। कई लोग मदिरा म भक्ति के कारण नहीं, किन्तु लोक- लज्जा ये वीभूत होकर आते हैं। ऐसे लोगो को भी पूजा स्थान में प्रचलित निष्टाचार का पाला करना चाहिए । पाते जाते समय पुजारी को प्रणाम करना और उससे एक-दो घात कर लेना शिष्टता के चिट हे। देव-दशन के समय ऐसे म्यान म खड़े होना या बैठना चाहिए जिसमें पीछे वाले व्यक्ति का दृष्टि पथ न सके । प्राथना इतने जार से न की जावे कि दूसरे को किसी प्रकार की असुविधा हो। पूजा करने म इतना अधिक समय न लगाया जाय जिसम दूसरो को पूजा का असर न मिले । यदि प्रजा लिए स्त्रियाँ भी हो तो उड़ इस काम के लिए पहले अवसर देना चाहिए । प्राथना और पूजा के आगे पोरे तुरत हो मसारी काम-काज की वार्ते न छेड़नी चाहिए । जो मनुष्य किसी देवता के ध्यान में मग्न हो अथवा किसी ३४ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार शिष्टता पूर्वक कोई उचित दिखनेवाली कठिनाई का कारण बताकर निमनण अस्वीकृत कर दे, पर निमनण स्वीकार कर उसे अपने पचन का पालन अवश्य करना चाहिए। कम से कम उसे निमनक के घर तक तो जाना ही चाहिए और यदि आवश्यक हो तो भोजन न करने के कारण अपनी कोई एक कठिनाई बताकर गृह-स्वामो से क्षमा मांग लेना चाहिए । निमन्त्रण स्वीकार कर अपने बदले मे लड़को को अथवा किसी निकट सम्बन्धी को भेजना बहुधा अनुचित नहीं माना जाता। जाति-सम्बन्धी भाजो में जिसको निमत्रण दिया जाता है उसके यहाँ यदि कोई ऐसा आदमी ठहरा हो जिससे निमत्रणकारी का परिचय अथषा सम्बन्ध है तो उसको भी निमत्रण दिया जाय । भोजन के लिए कम से कम दो बार चुलावा भेजना चाहिए- एक बार सूचना के रूप में और दूसरी बार जेवनार प्रारम्भ होने के पूर्व । यदि लिखा हुआ निमत्रण दिया गया है तो दूसरा बुलाया भेजना अावश्यक नहीं है, क्योकि निमत्रण-पन मे बहुधा समय और स्थान दिया रहता है। समय का पालन सानेवाले ओर खिलानेवाले दोनो को करना चाहिए। ऐसा न हो कि नेवतेवालो को भोजन के लिए कई घटो तक ठहरना पड़े अथवा किसी एक व्यक्ति के आगमन की प्रतीक्षा में समय पर पगत ही न वेट मके। दोनो ओर को अधिक से अधिक एक घटे का समय दिया जा सकता, है, पर जिन्हें कोई और आवश्यक कार्य करना है उनके भोजन का प्रबन्ध समय पर होना चाहिए । साधारण स्थिति के लोगेा के प्रति पाहुनो को कुछ अधिक उदारता दिसानी चाहिए । भोजन में बैठक का नाम निश्चित करने में बड़ी सावधानी की आवश्यकता है। यदि किसी विशेष व्यक्ति के उपलक्ष्य में भाज दिया गया है, जैसे घरात मे दुलह के अथवा विदाई में किसी पाहुने चौथा अध्याय ३५ फे, तो उसे भमुस स्थान दिया जाने । उसके पास ही ये लोग बैठाये जायें जो उसके निकट सम्बधी प्रथया गाढ़े मित्र हो । यदि जाति- सम्मपी भोज हा तो जाति के मुखियों और मान्य लोगों को पॉम में प्रारभीय स्थान दिया जाना चाहिए । जहाँ इन सर बातो का विचार नहीं है और जाति पाति का पेड़ा नही है यहाँ प्रमुग्न ठोर पर धान-गृद्ध, यया-यूच नया प्रतिष्ठित लोगो को ठिाना चाहिए । बैठक के ग्राम का बहुत ही सूक्ष्म निणय नहीं हो सकता, तथापि जहाँ तक हो इस बात का विचार रखना चाहिए कि किसी का किसी प्रकार अपमान न हो । यदि किसी को किसी के पास बैठकर भोजन करने में आपत्ति हो (पर गृह-स्वामी के मान के विचार मे ऐसा होना न चाहिए), तो प्रवधक का कत्तय है कि वह उसे किसी और उचित स्थान पर बेठाले प्रथया उसके लिए पास ही किमो अलग और उपयुक्त स्थान का प्रबंध कर दें। पाहुनो के लिए जो म्याद युना जावे यह जहाँ तक हो स्वन्छ तथा दुगध से मुक्त हो। हम लोगो के प्रॉगनो के व्यासपास हो बहुधा निस्तार की जगह रहती हैं जिनके पास दुर्गध निकलती है। भोजन का स्थान ऐसी जगहा से इतनी दूर हो कि यहाँ दुर्गध न पहुँचे। जिन घरो म अय उपयुक्त स्थान हा उनमे दुर्गध मय स्थानों के आसपास को जगह भी काम मन लाई जावे। यदि निमनित व्यक्तियो की सस्या स्थान के मान से अधिक है (बहुधा लोग अपनी प्रतिष्ठा के लिए अपवा विवश होकर अनेक लोगों को निमनित करते हैं ), तो उनकी दो टोलियाँ करके उह अलग अलग दो पगतो में सिलाना उत्रित होगा। एक पगत के उठ जाने पर स्थान फिर से साफ किया जाय । भोजन-स्थान में जहाँ तहाँ धूपपत्तियाँ जलाई जॉय और यहाँ से अनावश्यक कपड़े-लत्ते, वासन-चर्तन प्रादि सर हटा लिये जायें। - ३६ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार मोजन योर पात्रावली की स्वन्छता पर भी विशेष ध्यान दिया जाय । किसी भी प्रकार की और किमी भी वस्तु की अस्वन्छता से अमृत रूपी व्यसन भी विप मय हो सकता है और उसे साने पालो के जी बिगड जा सकते हैं। किसी किसी भोज मे तो यहाँ तक देसा और सुना गया है कि भोजन के पश्चात् ही अधिकाश लोग बीमार हो गये और कई पको को प्राण तक दे देने पड़े। पक्ति में बैठकर अपने साथियों की अपेक्षा जल्दी भोजन समाप्त कर लेना अनुचित और अशिष्ट है। यदि किसी का आहार दूसरो से कम है प्रोर यह बात स्वाभाविक है तो उसे धीरे धीरे (थोडा थोड़ा) भोजन करना चाहिए। भोजन करने वालो को इस बात का भी ध्याा रसना चाहिए कि पत्तल में न ता बहुत सी सामग्री छोडना चाहिए और न पत्तल को बिलकुल साली रखना चाहिए । पर ये बातें अधि- काश में परोसने वाले की चतुराई पर निर्भर हैं । परासने मे साधारण से कुछ अधिक आग्रह की आवश्यकता अवश्य है, पर ऐसा कभी न होना चाहिए कि अनेक घार नाही करने पर भी किसी के प्रागे बहुत सी सामग्री पटक दी जाय । इससे भोजन करने वाले को प्रसन्नता के बदले समोच और रोद होता है, और माथ ही बहुत सी सामग्री व्यर्थ जाती है। भोजन के उपरान्त पाहुनो को गृह-म्वामी के यहाँ कुछ समय तक वेटना चाहिए और उस समय गृह-स्वामी को पान-सुपारी से उनका आदर करना चाहिए । फिर उन्हें चुने हुए शब्दो में गृह- स्वामी के प्रबन्ध को मासा करके तथा उमकी कठिनाइया के प्रति समवेदना प्रगट करके उसमे विदा लेनी चाहिए।
चोथा अध्याय ३७ (५) उत्सवों में उत्सव दो प्रकार के होते हैं-(१) घर-सम्बन्धी (0)जाति- सम्बन्धी । पुत्र-जम, विवाह प्रादि पहले प्रकार के उत्सव हैं और दशहरा, फाग, रामनवमी प्रादि दूसरे प्रकार के हैं। पहले प्रकार के उत्सवो मे गृही का प्रथम कत्तन्य यह है कि वह पाहुनो के निवास, भोजन आदि का उचित प्रबन्ध करने मे कोई वार उठा न स्खे। इधर पाहुनो का भी यह कत्तय है कि वे पर वाले के ऊपर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यथ दवाय न टालें । परू उन्मयों में जिस आग्रह से निमत्रण दिया जाय उसी के अनुसार उसका पालन किया जाना चाहिए। यदि निमत्रण केवल शिष्टाचार की दृष्टि से दिया गया है तो उसका पालन भी उसी दृष्टि से किया जावे । ऐसी अवस्था में केवल उत्सव-सम्बन्धी व्यवहार ही भेज देने की आवश्यकता है, उसमे पाहुना बनकर सम्मिलित होने की आवश्यकता नही है । इस विषय मे कोई कोई गृह-स्वामी यहाँ तक चालाकी करते हैं कि यवहारियो को बहुत पीछे निमनण देते हैं जिसमे वे उत्सव में सम्मिलित न हो सकें और साथ ही यह भी न कह सके कि हमे निमत्रण नहीं मिला । इस प्रकार के निमत्रण को कोई मान नहीं दिया जा सकता । हा, शिष्टाचार की दृष्टि से लोग उसका यही उत्तर दे सकते हैं कि किमी अडचन के कारण हम उत्सव में शामिल नहीं हो सकते । विवाह के उत्सव में बहुधा बीचवालो के कारण समधिया में अनबन हो जाती है। कभी कभी तो यथार्थ अथवा कल्पित मान- रक्षा के प्रयत्न मे पूर्वक्ति दोनो सजनो की भूलो ही से वसेडे सड़े हो जाते हैं और इनके कारण पाहुनो को व्यर्थ हो शारीरिक और मानसिक कष्ट उठाना पड़ता है। उन्हें बहुधा समय पर भोजन नहीं हिन्दुस्थानी शिष्टाचार मिलता और कभी कभी अपमान भी महना पड़ता है। यद्यपि ये बाते बहुधा अशिक्षा और दुराग्रह के कारण उत्पन्न होती हैं, तथापि कई पक शितित भोर प्रतिष्ठित सजन भी अपनी विद्वत्ता और प्रतिष्ठा का प्रदान करने के लिए विवाहादि उत्सवो में छोटी-छोटी बातों पर ही विन्न सड़ा कर देते हैं । ये लोग शिष्टाचार का यहाँ तक उरलधन कर बैठते है कि किसी ऐसे सञ्जन को जिससे वे अपने किसी निज कारण से अप्रसन्न रहते हैं कोई न कोई बहाना हेंढकर दूसरे के उत्सव में हटवाने का प्रयत करते हैं। यदि हो सके तो ऐसे उपद्रवी लोगो से उत्सव का पवित्र पार मुक्त ही ही रखना चाहिए, चाहे वे लोग घहिप्सत होने पर बाहर से अपनी दुष्टता भले हो करते रहे। बरानी में बहुधा झगड़े हो जाते हैं । जाति-सम्बन्धी अन्यान्य कारणों के साथ साथ वरातवालो की उहडता और स्वागत-कारियो की कृपणता अथवा वचनभग से भी ये झगड़ें उत्पन्न होते हैं। कोई कोई लड़को वाले बहुधा ऊपरी दिखावे के कामों में बहुत सा अपव्यय कर डालते हैं, पर रात के निवास और भोजनादि का उचित प्रबन्ध करना अनावश्यक समझते हैं। इधर बरात-वाले लड़की गले की प्रवृत्ति देखकर उसे आवश्यकता से अधिक दबाते हे और दोनो अवस्याओ का परिणाम वहुपा शोचनीय हो जाता है । नाई-ढीमरा के जासूसी समाचारो से भी कभी कभी बड़े अनर्थ हो जाते हैं, इसलिए इनकी गवाही बदी सावधानी से स्वीकृत की जानी चाहिए । दोनो पक्ष वालो को इस बात पर भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी एक के कारण दूसरे को व्यर्थ ही सरचे मै न पड़ना पड़े, और किसी प्रकार का अपमान न सहना पड़े। हर्ष का विषय है कि शिक्षित समाजों में इन विवादों के अवसर धीरे धीरे कम होते जाते हैं।
चौथा अध्याय विवादो में प्रश्लील गोता और चालो का प्रचार रोकने की पड़ो ध्यावश्यकता है. क्योकि इन पातों मे येवल झगड़े ही नहीं यहते, किन्तु जाति के लोगो पर, विशेषकर नई पयपालो पर, बड़ा पुरा प्रभाव पड़ता है। साथ ही अन्यान्य जातियों के आगे जिनम ये पुरोनियां नहीं हैं प्रथया जिन्दाने अपनी शिता मे इनका यहिष्कार फर दिया है इन बाता की समथक जाति हीन और घृणित समझी जाती है। पेश्याम्रो का रय कराना भी आर अशिष्ट समझा जाने लगा है। जो लोग उत्सों में भाग लेते हैं उनकी यिदा भादर पूर्वक की जारे । पाहुने की योग्यता र जानि-सम्बध के अनुसार उसे भेट दी जाने पार दो चार चुने शब्दा म उसमे ध्रुटियो के लिए तमा मांगी जारे । पाहुने के साथ कुछ दूर तक जाना भी प्राश्यक है। सार यह है कि पादुनो का यथोचित आदर करने में कोई गात उठा न रक्सो जाये। ऊपर जो बातें विवाहोत्सय के प्रसग मे कही गई हैं वही थोड़े हेरफेर से अन्यान्य घर उत्सो के सम्बन्ध म भी कही जा सकती है। इन सर अवसरो पर उसी उपयोगी नियम का पालन करा चाहिए जिसका उल्लेस पुस्तक के प्रारम्भ में किया गया है, अर्थात् मनुष्य दूसरे के साथ वेसा ही व्यवहार करे जसा यह दूसरे में अपने साथ कराना चाहता है। जिन घर-सम्बधी उत्सयो म चल स्त्रियां ही भाग लेती हैं, जैसे सुहागिलो आदि में, उनमे शिष्टाचार का उत्तरदायिव स्त्रियों पर ही है। रियो म मान्म प्रशसा की प्रवृत्ति बहुधा पुरुषों की अपेक्षा पुछ अधिक रहती है, इसलिए उन्ह इस प्रवृत्ति को कम करना चाहिए । सदा अपने ही विषय की प्रथषा अपनी वस्तुप्रो (गहना, वस्त्रो प्रादि) की चर्चा करना शिष्टता के विरुद्ध है । पुरुषो के समान ४० हिन्दुस्थानी शिष्टाचार स्त्रियों को भी अपनी पाहुनियो का आदर-सत्कार करने में कमी न करनी चाहिए और जहाँ तक हो सभी स्त्रियो के साथ एकमा बर्ताव करना आवश्यक है। विधवाओं और वृद्धाश्री के प्रति विशेष प्रादर-भाव व्यक्त करने की आवश्यकता है। यथा-सम्भव चाप- लूसी करने का कोई अमर न लाया जाय । वात वात में हँसी करने अथवा अपश दो के प्रयोग की प्रवृत्ति को भी रोकने की आवश्यकता है। स्त्रियों को ऐसी स्त्रियों के साथ व्यवहार न बढ़ाना चाहिए जिनकी सगति को चार जने दूपित ममझते है । आदर-सत्कार में प्रथमता का निर्णय वधा पान की आयु के अनुसार किया जाय जिसमें किसी को अप्रसन्न होने अथवा आक्षेप करने का अपमर न मिले। जाति-सम्बन्धी उत्सवो में परस्पर व्यवहार पालने को बड़ी अवश्यकता है। इन अवसरों पर हमें केवल जाति-चालो ही के यहाँ नहीं, कितु अन्य जाति वाले मित्रों के यहाँ भी आना जाना चाहिए । जिन उत्सना में सार्वजनिक सभा करने की प्रथा है उनमे हमे उस सभा में सम्मिलित होना चाहिए और यदि आवश्यक हो तो एक दूसरे के यहाँ जाकर भेट व्यवहार करना चाहिए । खेद है कि हिन्दुओ में और विशेषकर हिन्दुस्थानी लोगो में जाति-सम्बधी अथवा सामाजिक उत्सव भी बहुधा घरू उत्सव का रूप धारण करते हैं जिसमे रामनवमी सरीखे महत्व पूर्ण और धार्मिक उत्सव में भी न लोग एक-दूसरे से मिलते हैं और न कोई सार्वजनिक सभा ही होती है। इस उदासीनता का यह परिणाम होता है कि हि दुनो के अनेक महत्व पूर्ण सामाजिक उत्सव जाने भी नहीं जाते और जाति में एकता तथा दुसरे उच्च भाव उत्पन्न करने का साधन सहज ही हाथ से निकल जाता है । स्थानाभाव ने यहाँ अन्यान्य जातीय उत्मनो के विषय में कुछ न कहकर केवल चौथा अध्याय दशहरे के उसय मे मम्मथ रसने-याले शिष्टाचार की पुर यात लिखते हैं। दशहरे फेरित, राम के रापण को जीतने के उपलक्ष्य मे, हिन्दू लोग पान द मनाते हैं। इस दिन हिंदुस्थानी लोग अपने मित्रों, व्यबहारियो तथा जतिपालो के यहाँ दशहरे फा पान खाने के लिए जाते हैं और भंट में उने 'मोना' (शमी पत्र ) देते हैं । इस अप मर पर लोग पहुधा उन लागा के यहाँ भी जाते हैं जिनसे वर्ष में भीतर कभी लड़ाई भगदा हा गया हो अथात् इम महोत्सव के उपलक्ष्य म लोग प्रापमी खेप भूल जाते हैं। ऐसा करना सामाजिक उत्कर्ष के लिए बहुत प्रापश्यक है । गहरे की भेंट के समय छोटे बड़ा का चरण स्पश प्रथया उनसे प्रशाम करते हैं। गृह-स्वामी पागत सज्जनां का पान आदि मे उचित आदर करते हैं । यदि समयाभाव या पार किमी अड़चन से कोई किसी के यहाँ दशहरे के दिन नहीं जा सकता तो यह दूसरे दिन जाता है। कोई कोई बड़े लोग दूसरो के यहां नहीं जाते पर उनका यह प्रावरणा अनु- करणीय नहीं है और दूसरे लोग भी असन्ताप के कारण उनके यहाँ जाना रद कर देते हैं। दशहरे के दिन सध्या के समय लोग अन्के कपड़ पहिनकर नीलकट के दर्शनों के लिए वस्ती से बाहर जाते हैं और यही से शमी पर लाते हैं। कई लोग नगर के बाहर कभी कभी ऐसे लोगो से अपना व्यवहार निवटा लेते हैं जिनसे साधारण परिचय रहता है और जिनके यहाँ उन्हें जाने का सुभीता नहीं होता। यद्यपि यह महात्सव सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी भारतवर्ष और हिन्दू जाति के लिए बड़े महत्व का है तथापि रजराड़ो को छोड़ अय स्थानो मे इसका पालन बहुधा उदासीनता के साथ होता है। यदि हम लोग चाहे तो इस अवसर दे० हिन्दुस्थानी शिष्टाचार स्त्रियों को भी अपनी पाहुनियो का आदर-सत्कार करने में कमी न करनी चाहिए और जहाँ तक हो सभी स्त्रियों के साथ एकसा बर्ताव करना आवश्यक है । विधवाओ पोर वृद्धाश्रो के प्रति विशेष आदर-भाव व्यक्त करने की आवश्यकता है । यथा-सम्भव चाप- लूसी करने का कोई अवमर न लाया जाय। बात बात म हॅसी करने अथवा अपश दो के प्रयोग की प्रवृत्ति को भी रोकने की आवश्यकता है। रियो को ऐसी स्त्रियों के साथ व्यवहार न बढ़ाना चाहिए जिनकी सगति को चार जने दूषित समझते हैं । आदर-सत्कार में प्रथमता का निर्णय बहुधा पान की प्रायु के अनुमार किया जाय जिसमे किसी को अप्रसन्न होने अथवा प्राक्षेप करने का अवसर न मिले। जाति-सम्बधी उत्सवो में परस्पर न्यवहार पालने की बड़ी अवश्यकता है । इन अवसर पर हम केवल जाति वालो ही के यहाँ नही, किन्तु अन्य जाति वाले मित्रों के यहाँ भी पाना जाना चाहिए । जिन उत्सवा में सार्वजनिक सभा करने की प्रथा है उनमे हमे उस सभा में सम्मिलित होना चाहिए और यदि आवश्यक हो तो एक दूसरे के यहाँ जाकर भेटल्यवहार करना चाहिए । खेद है कि हिन्दुओं में और विशेषकर हिन्दुस्थानी लोगो में जाति-सम्बधी अथवा सामाजिक उत्सव भी बहुधा घरू उत्सवो का रूप धारण करते हैं जिससे रामनवमी सरीखे महत्व पूर्ण और धार्मिक उत्मय मे भी न लोग एक-दूसरे से मिलते हैं और कोई सार्वजनिक सभा ही होती है। इस उदासीनता का यह परिणाम होता है कि हि दुनो के अनेक महत्व पूर्ण सामाजिक उत्सव जाने भी नहीं जाते और जाति में एकता तथा दूसरे उच्च भाव उत्पन्न करने का साधन सहन ही हाथ से निकल जाता है। स्थानामाव मे हम यहाँ अन्यान्य जातीय उत्सगो के विषय में कुछ न कहकर केवल चौथा अध्याय दशहरे के उत्सव से सम्बन्ध रखने वाले शिष्टाचार की कुछ बातें लिखते हैं। दशहरे के दिन, राम के रावण को जीतने के उपलक्ष्य मे, हिंदू लोग आनन्द मनाते हैं । इस दिन हिन्दुस्थानी लोग अपने मित्रों, न्यवहाग्यिो तथा जतिवालो के यहाँ दशहरे का पान साने के लिए जाते हैं और भेंट में उन्हें 'सोना' (शमी पत्र ) देते हैं । इस अव. मर पर लोग बहुधा उन लोगो के यहाँ भी जाते हैं जिनसे वर्ष के भीतर कभी लड़ाई झगड़ा हो गया हो-अथात् इस महोत्सव के उपलक्ष्य में लोग आपमी द्वेप भूल जाते हैं। ऐसा करना सामाजिक उत्कर्ष के लिए बहुन आवश्यक है। दशहरे की भेंट के समय छोटे बड़ो का चरण-स्पर्श अश्वा उनसे प्रणाम करते हैं। गृह-स्वामी प्रागत सज्जनो का पात आदि से उचित आदर करत हैं । यदि ममयाभाव या ओर किसी अड़चन से कोई किसी के यहाँ दशहरे के दिन नहीं जा सकता तो वह दूसरे दिन जाता है । कोइ कोड बडे लोग दूसरो के यहाँ नहीं जाते, पर उनका यह आचरण अनु- करणीय नहीं है और दूसरे लोग भी अस तोप के कारण उनके यहाँ जाना बद कर देते हैं। दशहरे के दिन सध्या के समय लोग अन्वे कपड़े पहिनकर नीलकठ के दर्शनो के लिए बस्ती से बाहर जाते हैं पार यहीं से शमी पत्र लाते हैं। कई लोग नगर के बाहर कभी कभी ऐसे लोगो से अपना व्यवहार निवटा लेते हैं जिनसे साधारण परिचय रहता है और जिनके यहां उन्हें जाने का सुभीता नहीं होता। यद्यपि यह महोत्सव सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी भारतवर्ष और हिन्दू जाति के लिए बड़े महत्व का है तथापि रजवाड़ा को छोड़ अय स्थाना में इसका पालन बहुधा उदासीनता के साथ होता है। यदि हम लोग चाहें तो इस अवसर ।
हिन्दुस्थानी शिष्टाचार को उसी प्रकार "जातीय" बना सकते हैं जिस प्रकार "ईद" और "बड़ा दिन" बनाये जाते हैं। राजाश्रय प्राप्त होने के कारण रजवाडी में यह तेवहार बड़ी धूमधाम से हाता है । यहाँ इसका पालन नियम-पूर्वक होता है जिससे लोगों के नेनो के आगे प्राचीन दृश्य एक बार फिर मुलने लगता है । इस उत्सव मे सम्बन्ध रसनेगले शिष्टाचार का पालन रजगड़ा में चडी मावधानी से किया जाता है। स्थानाभाव से रजवाड़ो के इस उत्सव का व्यारेवार वर्णन करना कठिन है, तथापि इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अमयादित होने पर भी रजवाहो का शिष्टाचार अय स्थान के लागेा के लिए अनुकरण का विषय है । यदि हमारे हिन्दू राजा-महाराजा अनिक कर्तव्य शील, सदाचारी और वास्तविक शिष्टाचार के अनुरागी हो जाये, तो हमारी सामाजिक अवस्था भी अनुकरणीय हो जाय । (६) व्यवमाय व्यवसाय में गिटाचार के यथोचित पालन में अनेक लाभ हैं। इसमे ग्राहक और परिचयवाले हो प्रसन्न नहीं होते, किन्तु व्यवसायी की साख और प्राय भी बढ़ती है। जो व्यापारी उदासीनता से अथवा अहभाव से किसी ग्राहक के साथ रूखा अथवा असभ्य व्यवहार करता है उसके यहाँ लोग केवल विवशता के समय जाते हैं। इसे दूकानदार को उचित मूल्य देना भी ग्राहक को भारी जान पड़ता है, पर शिष्टाचारी व्यापारी को कुछ अधिक देना भी नहीं प्रसरता। व्यवसायी के शिष्टाचार मे यथासभव सत्य-मापण भी सम्मिलित है। यह गुण उसमें विशेषकर इसलिए आवश्यक है जिसमें ग्राहको का विश्वास उसपर बना रहे और वे उसे मभ्य और सजन समझे । झूठ बोलना केवल सदाचार ही के विरद्ध नहीं है, किन्तु चौथा अध्याय ४३ शिष्टाचार ये भी विपरीत है और व्यवसाय में तो उसके द्वारा, परोक्ष रूप से, पडी झाल होती है। व्यवसायी को उचित है कि बाद ग्राहक की स्थिति, शिक्षा, यय प्रादि का विचार कर उसे प्रापश्यक पस्तुएँ दिखाने में प्रागा पोदा न करे । यह उसके प्रश्नो का उत्तर पूर्णतया प्रोर सभ्यतापूधक देरे तथा काय म किसी प्रकार अपनी अड़चन अथवा अधीरता न प्रगट होने दे। जल्दी जल्दी विविध प्रकार को अथवा आवश्यकता से अधिक मूल्य को घस्तुएँ दिखाकर उसे प्राइक को सोत्र में न डालना चाहिए । साथ ही यह अपनी घस्तु की मिथ्या प्रशसा न करे और न उनके दृने चौगुने दाम बतलाये । व्यापार म धोखा देना भी (जो यथार्थ में एक प्रकार का प्रनय भाषण है ) अशिष्ट समझा जाता है। शहर के चालाक व्यापारी बहुधा अपढ़ ग्रामीण ग्राहफो को मूंड़ने का प्रयत किया करते हैं, पर यह रोति परम निंदनीय है । यस्तुओं की नापतोल मभी कमी म की जाने, बरन निश्चित परिमाण से कुछ अधिक दे दिया जाने। इधर ग्राहक को भी उचित है कि यह एसी वस्तुएँ देखने को इच्छा न करे जो उसे लेना नहीं है अथवा जिनका मूल्य उसकी शक्ति के बाहर है। किसी वस्तु को देखत समय उसे इस यात का ध्यान रखना चाहिए कि वह जाँच के कारण विगड़ न जाय और व्यापारी को कोइ हानि न हो । यदि ग्राहक बहुत समय तक अनेक प्रकार की वस्तुएँ देख कर भी कोई वस्तु मोल लेने का निश्चय न कर मरे तो उसे उचित है कि यह अत्यन्त साधारण मूल्य की कोई वस्तु अवश्य मोल लेरे जिसमे यापारी का कुछ समाधान हो जाय और ग्राहक अशिष्टता के अपराध से बच जाय। न्यापारी और ग्राहक को लेन-देन के समय इतने धीरज और गौरव के साथ परस्पर वार करना चाहिए जिसमे किसी ओर से हिन्दुस्थानी शिष्टाचार भी कड़ीवातचीत अथवा अनुचित क्रिया करने का अवसर न आवे । मिश्यामिमान अथवा कोरी पेंट की प्रवृत्ति से दोनो को हानि होने की सभावना रहती है। (७) वेश-भूपा में अाजकल जन कोट, टोप, कालर, नेकटाई और अर्द्ध-पतलून का माम्राज्य है तब किसी को यह बतलाना प्राय व्यर्थ ही है कि उसे अपने देश, कान ओर पात्र के अनुसार कपडे पहिनना चाहिए । इन दिनों सर्वसाधारण की ओर विशेषकर सकारी नौकरें को यह धारणा है कि प्रतिष्ठा और पद की प्रामि अंगरेजी पोशाक पर निर्भर है। यह धारणा मिथ्या नहीं है, क्योकि उच्च सरकारी नौकरी के लिए विदेशी पोशाक बहुधा एक आवश्यक गुण माना जाता है और कई लोग तो केवल पोशाक को प्रभुता हो से प्रतिष्ठित नदी पर स्थापित हो गये हैं। प्राय ऐसे ही कई कारणो से देशी जोग भी अपने देशी पहिनावे का विशेष प्रादर नहीं करते । यद्यपि मनुष्य की योग्यता बहुधा पोशाक मे जानी जाती है, तथापि उसके लप विलायती पोशाक पहिनना अनिवार्य नहीं है। आज भी हिन्दुस्थानी समाज मे आधे से अधिक लोग अपना पहिनाया नदिनते हैं, चाहे वह नगर का हो अथवा ग्राम का । श्रीमान नालघीयजी सदृश सज्जन आज भी अपनी पोशाक पहनकर उच्च प्रतिष्ठा मोर पद के पात्र हैं। अंगरेजी पोशाक का प्रचार ससार में प्राय सर्वत्र बढ़ रहा है। रेमो सास्था में जिन हिन्दुस्थानी लोगो ने इस विदेशी पहिनाने को ग्रहण कर लिया है, उनसे उसे छुड़वाना साध्य नहीं है, तथापि इतना अवश्य हो सकता है कि वे इस पोशाक के साथ भी अपनी जातीयता का कोई चिह सुरक्षित रख सकते हैं । नेकटाई अंगरेजो का निजी धार्मिक विह है जिसमे ईसा मसीह के जूस का गोध चोया अध्याय ४५ होता है, प्रतएपहिन्दुस्थानी हिदुओ को उसे त्याग देना चाहिए। उसके त्याग देने मेगा वेताम सभवत कोई कमीन होगी और न ये ऊँचे पद मे वञ्चित रफ्रो जायेंगे। साथ ही ये, समय पड़ने पर, अंगरेजा और इमाइया से, जिनम नेकटाई का विशेष प्रचार है अलग समझे जासकेंगे। पराधानावस्था में भी कुछ म्वाधीनता रस लना गौरव का चिद्ध है । नेकटाई के सिवा उन्ह टाप लगाना भी छोड़ देना चाहिए। उसके बदले साफा बांधने अथवा टापी लगाने से घे अपनी जातीयता का कम से कम एक चिह्न स्थिर रख सकेंगे। लाला लाजपतराय सरोखे सज्जनो को उनके साफेही के कारण हम लोग "अपना" समझ सकते हैं और समझ रहे हैं। ऐसे स्थान म पढ़ें- चने पर जहाँ हमारा कोई न हा, हम चल अपनी भाषण सुनकर र अपना भेष देखकर ही घुछ ढाढस प्राप्त कर सकते हैं। यदि हम यहां इन दोनो चिह्नो मे से एक ही चिढ मिल जाने तो भी हमारे प्रबोध कीसीमा न रहे। अतएव जातीयता ओर जाति प्रेम की दष्टि से हैट पोर नेकटाई धारण करने वाले हिदुस्थानियो का यह प्रधान कर्त्तय है कि वे अपनी वश भूषा में उनके बदले अपने एक-दो चिट्ठ अवश्य रक्स। धार्मिक र सामाजिक उत्सया मे हम लागो को अपना ही पहिनावा पहिनना चाहिए । यदि कोइ हिदुस्थानी हाफ-पेण्ट पहिन कर मदिर म पूजा करेगा अथवा विवाह म कन्या दान देगा ते लोग उसकी दासता को धिकारेंगे और उसके म्वांग पर तालियाँ पीटेंगे। घर मे भी हमें बहुधा अपनी पोशाक मे रहना चाहिए। आजकल गालियों का अनुकरण कर हम लोगेा म से कई एको ने सुले सिर रहना स्वीकार कर लिया है, पर हिदुस्थानी समाज मे यह रोति अशिष्ट और अशुभ समझी जाती है। घर से थाड़ी दूर तक इस अवस्था म जाने से विशेष हानि नहीं है, पर हिन्दुस्थानी शिष्टाचार मी कदीवातचीत अथवा अनुचित किया करने का अवसर न आये । मिथ्याभिमान अथवा कोरी पेंट की प्रवृत्ति से दोनो को हानि होने की सभावना रहती है। (७) वेश-भूषा में अाजकल जब कोट, टोप, कालर, नेकटाई और अर्द्ध पतलून का माम्राज्य है तब किसी को यह बतलाना प्राय व्यर्थ ही है कि उसे अपने देश, कारत और पात्र के अनुसार कपड़े पहिनना चाहिए। इस दिनों सर्वसाधारण की और विशेषकर मकारी नौकरों की यह धारणा है कि प्रतिष्ठा और पद की प्राप्तिअंगरेजी पोशाक पर निर्भर है। यह धारणा मिथ्या नहीं है, क्योकि उन्च सरकारी नौकरी के लिए विदेशी पोशाक बहुधा एक आवश्यक गुण माना जाता है और कई लोग तो केवल पोशाक की प्रभुता ही से प्रतिष्ठित पदो पर स्थापित हो गये हैं। प्राय ऐसे हो कई कारणो से देशो जोग भी अपने देशी पहिनाने का विशेष श्रादर नहीं करते । यद्यपि मनुष्य की योग्यता बहुधा पोशाक से जानी जाती है, तथापि उसके लिए विलायती पोशाक पहिनना अनिवार्य नहीं है। आज भी हिन्दुस्थानी समाज में प्राधे मे अधिक लोग अपना पहिनावा पक्षिनते है, चाहे वह नगर का हो अथवा ग्राम का । श्रीमान मालवीयजी सदृश सज्जन आज भी अपनी पोशाक पहनकर उच्च प्रतिष्ठा ओर पद के पात्र हैं। अंगरेजी पोशाक का प्रचार संसार में प्राय सर्वन बह रहा है। ऐसी अवस्था मे जिन हिन्दुस्थानी लोगो ने इस विदेशी पहिनावे को ग्रहण कर लिया है, उनसे उसे छड़वाना साध्य नहीं है, तथापि इतना अवश्य हो सकता है कि वे इस पोशाक के साथ भी अपनी जातीयता का काई चिह्न सुरक्षित रस सकते हैं । नेकटाई अंगरेजों का निजी धार्मिक चिढ़ है जिससे ईसा मसीह के क्रूस का बोध चौथा अध्याय को यह मालूम हुआ कि मरत सजन केरल दरूरी है तब उहे इन सजन को अपनी अदालत से दूसरी जगह बदलया देना पड़ा। इसके निगद्ध यह भी न होना चाहिये कि कोई उन्ध थेणी का मनुष्य साधारण लोगो के से पस्त्र धारण करे । याजारी लोगो और गुडो को एक प्रकार की विशेष पोशाक होती है जिसमे वे तुरत पहचान लिये जाते हैं । इस प्रकार के परिधान मे गयेक गितित प्रोर सभ्य यक्ति को चना चाहिए। यह पेश भूग निन्दनीय समझी जाती है भार इसे धारण करने- घाले यति की मार से लागो की श्रद्धा हट जाती है। का सरकारी विभागो में कर्मचारियों की एक विशेप रूप की पोशाक रहती है जिसे 'पदी' या 'दरेस' कहते हैं। इस पोशाक के अधिकारियों को निजी कामा पार अवसरो पर अपनी जाति सम्पपी पोशाक पहिनना चाहिए । इस वेशभूपा का अनुकरण फेल शिष्टाचार ही को दृष्टि से नहीं, कितु कानूनी दृष्टि से भी औरो के लिए पर्य है। घना को उपयुक्ता जितनी आरश्यक है उतनी ही उनकी स्वच्छता प्रार्थनीय है । बहुमूल्य घन भो स्वच्छता के अमाव म शोभा की मामग्री नहीं हो सकते । फेवल स्वास्थ्य ही को दृष्टि से नहीं, कितु शिष्टाचार की दृष्टि से भी स्मन्छ घर धारण करना कर्त्तव्य है । मैले वस्त्र पहिनना धार्मिक दृष्टि से भी निन्दनीय है, क्योकि घे अशुभ समझे जाते हैं। जि हे सामर्थ्य हो उह कम से कम चार जोड़ी कपड़े अवश्य रखना चाहिए जिसमें वे उन्हें प्रति सप्ताह बदल सकें। एक ही जोड़ी कपड़े को बार बार धुलाकर पहनना दरिद्रता का सूचक है। जो लोग दिन में चार बार कपड़े बदलते हैं ये तो शिष्टाचार को पराकाष्ठा तक पहुँचा देते हैं, पर जो सजन एक ही कपड़े को हिन्दुस्थानी शिष्टाचार बाजारो मे अथवा दूसरे मुहरलों में इस तरह फिरना या जाना अनुचित है । बड़ी अवस्था के लोगेा को केवल कुरता पहिनकर जाना भी योग्य नहीं है। जहाँ तक हो सके पोशाक देशो कपड़े को हो । आजकल विदेशी कपड़े का व्यवहार शिष्टाचार के विरुद्ध समझा जाता है। यदि देशी सूत का कपडा न मिले तो कम से कम देशी पुतलीघरो का कपड़ा काम में लाया जाय । देशो पोशाक के समान, धार्मिक और सामाजिक कृत्यो में देशी कपड़े का उपयोग आवश्यक और उचित है। कपड़ों को बनावट देग वाल के अनुसार और उपयुक्त हो, पर उसमे वेल लूटे श्रादि न रह । चमकीले तथा मड़कीले कपड़ो का उपयोग बहुत कम किया जाय । रगो की चुनाई में भी ध्यान रसना चाहिए कि ये गहरे न हा । मूल रगो की गहराई और भी वर्जनीय है। कपड़ो के उपयोग में उपयोगिता और शोभा का ध्यान तो रहता ही है, पर इस बात का भी विचार रखना चाहिए कि गरीर के श्रावश्यक प्रग के रहें । पान की अवस्था के अनुसार पोशाक होनी चाहिए । कोई कोई बूढ़े लोग नम्ण पुरुषों के से सटे हुए और कोई कोई तरुण पुरुप बूढे लोगो अथवा बालको के से ढीले कपडे पहनते हैं । ऐसा पहनावा भदेस दिखाई देता है। साधारणा स्थिति के लोगो को धनाटयो अथवा उच्च पदाधिकारियों के समान पोशाक करना उचित नहीं। एक बार कचहरी में एक महाशय ऊँचे दरजे की पाशाक करके एक नये आये हुए न्यायाधीश से मिलने गये। न्यायाधीग ने उनसे हाथ मिलाया और उन्हें अपनी घरावरी से कुरसी देकर उनका उचित सत्कार किया। पीछे जव न्यायाधीश चौथा अध्याय ४७ को यह मालूम हुआ कि सत्कृत सजन केवल दसरी हैं तब उन्ह इन सजन को अपनी अदालत से दूसरी जगह बदलवा देना पड़ा। इसके विरुद्ध यह भी न होना चाहिये कि कोई उच्च श्रेणी का मनुष्य साधारण लोगो के से वस्त्र धारण करे। याजागे लोगो और गुडो की एक प्रकार की विशेष पोशाक होती है जिससे वे तुरन्त पहचान लिये जाते हैं । इस प्रकार के परिधान से प्रत्येक शिक्षित और सभ्य व्यक्ति को बचना चाहिए । यह वेश-भूपा निन्दनीय समझी जाती है और इसे धारण करने- वाले व्यक्ति की ओर से लोगो की श्रद्धा हट जाती है। का सरकारी विभागों में कर्मचारियों की एक विशेष रूप की पोशाक रहती है जिसे 'वी' या 'दरेस' कहते हैं। इस पोशाक के अधिकारियो को निजी कामो प्रोर अवसरों पर अपनी जाति सम्बधी पोशाक पहिनना चाहिए । इस वेशभूपा का अनुकरण केवल शिष्टाचार ही को दृष्टि से नहीं, कितु कानूनी दृष्टि से भी औरो के लिए वर्य है। धनो की उपयुक्तता जितनी आवश्यक है उतनी ही उनकी स्वच्छता प्रार्थनीय है । बहुमूल्य वस्त्र भी स्वच्छता के अभाव मे शोभा की सामग्री नहीं हो सकते । केवल स्वास्थ्य ही की दृष्टि से नहीं, कितु शिष्टाचार की दृष्टि से भी स्वच्छ वस्र धारण करना कर्तव्य है । मैले वस्त्र पहिनना धार्मिक दृष्टि से भी निदनीय है, क्योकि वे अशुभ समझे जाते हैं। जिहे सामर्थ्य हो उन्हें कम से कम चार जोड़ी कपडे अवश्य रखना चाहिए जिसमें वे उहें प्रति सप्ताह बदल सकें । एक ही जोड़ी कपड़े को बार बार धुलाकर पहनना दरिद्रता का सूचक है। जो लोग दिन में चार चार कपडे बदलते हैं ये तो शिष्टाचार को पराकाष्टा तक पहुंचा देते हैं, पर जो सजन एक ही कपड़े को हिन्दुस्थानी शिष्याचार महीनो पहिने रहते हैं वे शिष्टाचार को बढ़ने ही नहीं दते । विशेष अवमरो पर विशेष प्रकार को पाशाक पहिनना शिष्ट समझा जाता है। यदि इस समय लोग प्रतिदिन को पोशाक पहिनते हैं तो दूसरे का इस बात से अस तोप होता है। विशेष आदरणीय स्थान में प्रश्रवा विशेष प्रादरणीय पुरुष के पास साधारण परिधान में जाना उस स्थान और पुरुप का निरादर करना है। पोशाक में प्रमगति न होनो चाहिए । धोती पहिनकर टोप लगाना अथवा कोट-पतलून पर अलवान प्रादना असगत है । इसी प्रकार अंगरखे के माथ पतलून शोभा नहीं देती। साही पोशाक के साथ दिल्ली के पतले जूने भो अच्छे नहीं लग । कोई कोई लोग दोनों पक्षो का समर्थन करते हुए धोती के ऊपर पनलून पहनते हैं और पीछे एक पाटलो मी बाँधे फिरते हैं। यह रोति अशिष्ट समझी जातो है । मोजो के रिना पतनून के साथ जूते भो शोभा नहीं देते। इमी भांति अन्यान्य अनमिल पाहनावे भी शिष्टाचार के विरुद्ध साझ जाते हैं। काई कोई साहवा पोशाक के प्रेमी सज्जन दिन हो का नाइट-केप (रात को टोपी) लगाकर असगति का परिचय देते हैं। कपडो के साथ साथ केश कलाप का प्रश्न भी विचार के योग्य है । आजकल प्राय सर्वत्र अंगरेजो के अनुकरया पर छोटे वाल रखने को प्रथा प्रचलित है । ऐसी अवस्था में पुराने समय के नमूने के बड़े बड़े बाल रसना भदेस समझा जाता है । हाँ, जो लोग धर्म की प्रेरणा से डाढ़ी, मूंछ और मिर के बाल कटाना अनुचित समझते हैं उनके केश-कलाप को कोई नाम नहीं रखता । जो हो, वालो के रसने में सगति अवश्य होनी चाहिए। ऐसा न हो कि सिर पर एक मो वाल न रहे और डाढ़ी लम्बी फहरावे अथवा सामने पोसले के ममान बड़े बड़े पाल रखकर सिर के शेप भाग चौथा अध्याय मेवारीक वाल रसे जायें। पिछले प्रकार के पालो का प्रचार नीच जानिया में देखा जाता है। लोग मूंदो के साथ भो बधा प्रयाय फरते हैं । अंगरेजी चाल के अनुकरण पर कई लोग आधी आधी मैं रस लेते हैं । इस फेशन से केवल जातीय चिह्न ही नष्ट नहीं होता, कितु चेहरे के रूप में कुरूपता भी आ जाती है। कई एक सजा मॅनो का ऊपर-नीचे से बनाकर उन्हें एक पिन्दु में मिलने- वाली दो पतली रेसानो का रूप दे देते हैं। यह भी देखने में अच्छा नहीं लगता। जिन लोगो में मने मुड्याने को चाल नहीं है घे भी कभी-कमा उह वाम समझकर अथवा सय विद्वान समझे जाने की दृष्टि से उहे मुड़या डालते हैं। ऐसा करना ठीक नहीं समझा जाता । म पुरुषत्य का विद्ध है, इसलिये इन्ह सरलता से निकाल देना मानो अपने पापपुरपत्व का रूप नष्ट करना है। यह बात सयासियों के लिए लागू नहीं हो सकती जो धमांनुसार भोहा को छोड़कर सिर और मुख पर बाल नही रख सकते । सिर के पुल भाग में पाल रखना और अन्य भाग में बिलकुल वनवा देना भी अशिष्टता का चिढ़ है। हिंदुओं को फैशन के फेर में पड़कर अपनी चोटीन कटा देना चाहिए, क्योकि यही एक ऐसा चिह है जिससे हिन्दू को पहिचान सरलता पूर्वक हो सकती है । जातीय झगड़ो में शिसा-नष्ट लोगो को बड़ी दुर्दशा होती है और ये अपनी समाज मे भी तिरस्कृत किये जाते हैं। सारांश यह है कि परिधान और केश-कलाप में अनुचित नवीनता अथवा विचित्रता का समावेश न किया जाये। (८) प्रवास में प्रवास मनुष्य को शिक्षा का एक अंग है, इसलिये उसे देश- देशातये म अपने सामर्थ्य के अनुसार प्रवास अवश्य करना चाहिए, चाहे वह शिक्षित हो चाहे प्रशिक्षित । ऐसी सभ्य समाज हि०शि०-४ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार में जहाँ देश-विदेश की चर्चा होती है, उस मनुष्य के मत को बहुत कम मान दिया जाता है, जिसने थोड़ा बहुत प्रवास नहीं किया। आजकल प्रवास के साधनो की बहुतायत होने से शिक्षित मनुष्यो में कोई विरला हो होगा जो अपने गांव या शहर से बाहर न गया हो। प्रयास मे या तो पूर्व प्रबन्ध से अथवा देवयोग से कुछ लोगो का साथ हो जाता है और कभी कभी यह सगति मिनता का रूप धारण कर लेती है। प्रवास के समय इन साथियो से हमारा व्यव- हार इस प्रकार का होना चाहिये कि उन्हें हमारी ओर से कोई कष्ट न पहुंचे प्रोर यदि हो सके तो हम से उन्हें उचित सहायता प्राप्त हो । इस सद्-यवहार के बदले बहुत सभव है कि हमारे वे साथी हम से भी वैसी ही सभ्यता का व्यवहार करेंगे। प्रवासी मनुष्य को अपने साथ इतना स्पया, भोजन-सामग्री और कपड़े-लत्ते रखना चाहिए जिसमे वह किसी वस्तु के लिए दूसरो का आश्रित (मुहताज) न हो । यद्यपि प्रवास में कभी कभी दूसरा से कोई एक आवश्यक वस्तु माँगने का प्रयोजन पड़ जाता है तथापि किसी से कोई वस्तु बार चार अथवा कई वस्तुएँ माँगना निन्दनीय समझा जाता है। अपने साथियों से बात चीत करते समय मुंह से ऐसी कोई बात न निकाली जाये जिससे उन्हें सेद हो अथवा आपस में झगड़े का अवसर उपस्थित हो जाय । यद्यपि प्रत्येक प्रवासी को अपने और अपने साथिया के लेन-देन का ठीक लेखा रसना उचित है, तथापि उन्हें एक दूसरे के लिए थोड़ी-बहुत आर्थिक हानि सहने का धीरज होना चाहिए । यदि हमारा कोई प्रवासी भाई किसी जगह अचानक बीमार हो जाय अथवा किसी विपत्ति में पड़ जाय तो उस समय हमे प्रग के अनुसार उसे सहायता देना TAM R और पुछ सा प चोथा अध्याय ५१ उसके माय रहना चाहिए । यदि कोई मनुष्य किसी विशेष व्यक्ति के भगसे अथवा प्रासर, प्रयास म प्राया हो तो इसे सर अवस्थानों में उसकी सहायता करना चाहिए । सवारियो में बैठने के समय शिष्टाचार को बड़ी आवश्यकता है। लोगो को इस प्रकार न घेठना चाहिए जिसमे दूसरो को बैठने के लिए प्रयवा समान रखने के स्थान न मिले । स्वार्थ के वश होकर लोग बहुधा दूसरो को वेठने के लिए स्थान हो नहीं देते और रेल मे तो बहुधा उन्हें अपने डधे मे ही नहीं आने देते । इस प्रकार की उद्दडताप्रोसे कभी-कभी यानियो म परस्पर मार पीट तक हो जाती है जो असभ्यता का एक बड़ा भारोपिड है । रेन गाड़ियों के अन- बध के कारण लोगो को कभी कमो एक दूसरे को परवाह न कर पशुओ की तरह भागना पड़ता है और अपने हो सुमोते को और पूरा ध्यान देने को आवश्यकता पड़ती है। ऐसी अवस्था में भी यदि लोग स्वार्थ की मात्रा कम करके धीरज और उदारता से काम लें तो गाड़ियो मे मब को उचित स्थान मिल सकता है और लोग व्यर्थ की धक्का मुक्की से बच सकते हैं । यहाँ हम रेल के कर्म- चारियों से अनुरोध करते हैं कि वे अधिक सभ्यता और शिष्टाचार से यानियो के साथ वीव करें जिससे इन्हें गॅवारो करने का कोई अवसर ही न मिले । यदि किसी धनी अथवा प्रतिष्ठित प्रादमी के पास कोई माधारण अथवा गरीष यात्री पाकर बेठ जावे तो उसे अपने अहभाव में इस मनुष्य का तिरस्कार न करना चाहिए । हाँ, यदि कोई दुष्ट मनुष्य गॅवारी का व्यवहार करे तो उसे उसकी दुष्टता का बदला अवश्य दिया जाये। यदि प्रवास में स्त्रियों का साथ हो तो पुरुषो का कत्तव्य है कि ये उनके सुभीते का पूरा ध्यान रखें। स्त्रियों के आवश्यक कार्य समाप्त हो जाने पर ही पुरुष अपने कामो को निबटाने का उद्योग हिन्दुस्थानी शिष्टाचार करें । ऐसा न हो कि स्त्रियों की आवश्यकताओं को रोककर पुरुष बल-पूर्वक अपने कार्य साधे । अवलाओं को सकर में पड़े हुए अथवा पड़ते हुए देखकर पुरुपो को तन-मन-धन से उनकी रक्षा करना चाहिए। यदि उनके सतीत्य की रक्षा करने में पुरुषों को अपने प्राण भी देना पड़े तो कोई बड़ी बात नहीं है । जो मनुष्य इतने ऊँचे विचारों से प्रेरित होगा यह कम से कम ऐमा कमी नहीं कर सकेगा कि पानीलेने के लिए रियो को खटी रसकर स्वय कुप की पाट पर वेटकर प्रानन्द मे घटो स्नान करे और कपड़े धावे । जो व्यवहार खियो के प्रति कहा गया है वही चूदो, बालकों ओर अपाहिजा के साथ किया जाय । विदेश में पहुंचकर वहां के लोगो मे बातचीत करने में उनकी भाषा, भेप, भोजन और रीति की ती. आलोचना करना उचित नहीं, चाहे ये सब बातें किसी को अनौसीअथवा अनुचित क्यो न मालूम पड़ें। साथ ही यह भी अनुचित है कि मनुष्य अपने देश की इन सब बातो की यावश्यकता से अधिक प्रशमा करे, चाहे उसका कहना सब प्रकार से भले ही सत्य हो । दूसरे देश के हीन लोगो से भी सभ्यता और सहानुभूति का व्यवहार होना चाहिए। (९) श्मशान-यात्रा में हिन्दुस्थानी लोगो मे छुआछूत और जाति-भेद का विचार होने के कारण लोग बहुधा अन्य जाति-वालो को श्मशान-यात्रा में सम्मिलित नहीं होते, यद्यपि यह प्रथा दूपित है। हम लोगो में यह भी कुप्रथा है कि बहुधा चुने हुए मिनो और नातेदारो को ही मृत्यु की सूचना दी जाती है, इसलिये जिन लोगो के पास ऐसी सूचना नहीं पहुँचती, घे अन्य स्थान से समाचार पा लेने पर भी कभी- कभी सोच-वश अपने साथियों की प्ररथी के साथ नहीं जाते। अवस्था में भी जब-तक कोई विशेष कारण न हो तर तक चौथा अध्याय ५३ हम लोगो को अपने धर्म वाले किसो सम्जन को मृत्यु का समाचार किसी भी प्रकार मिलने पर उसको श्मशान याना में जाना उचित है। कई लोग केवल बडे आदमियों की लकडी में जाना प्रावश्यक और उचित समझते हैं, परन्तु इससे अधिक पुण्य उन लोगो की लकड़ी में शामिल होने से मिलता है जिनके न कोई मिन हैं न सहा- यक और न नातेदार हैं । इस विषय में हिदुस्थानियों को अन्य धर्म- वालो से बहुत कुछ सीखना है। हम लोग अपनो विवार सकोर्णता से सार्वजनिक कार्यक्त्तायो अयना नेताओ का भी पूरा-पूरा अन्तिम श्रादर नहीं कर सकते । लोगा के पतित और ईपी पूर्ण विचारो के कारण उन्हें नीति और शिष्टाचार का कुछ भी ध्यान नहीं रहता। जहाँ तक हो श्मशान याना मे हम लोगो को हिन्दू धर्म के अनुसार नगे पाँव जाना चाहिए । यदि किसी कारण से इस नियम का पालन न हो सके तो कम से कम अरयो मे कमा देने के समय अवश्य हो जूते उतार दिये जाय । अरयो को ले जाते समय जदो- जल्दी चलना अनुचित है । लाग ससारो काम काजेो को इतना महत्व देते हैं कि वे उतावली मे मृतक को अ येटि क्रिया भी बहुधा पूर्णता से नहीं करते । श्मशान याना मे लोगा को जोर-जोर से बातें न करना चाहिए और हँसना हो चाहिए । इस अवसर पर यह भीमावश्यक है कि सन लाग जहाँ तक हो इकहे अरयो के साथ चलें, अलग-अलग टुकड़ियों न बनावें । इस यात्रा में पान खाना और तमानू पीना भी असभ्यता है । श्मशान में तब तक ठहरना चाहिए जब तक लाश पूरी न जल जाने। इस अवधि में लोग साधारण वात वोन करके अपना समय काट सकते हैं और पान जाडो भी खा पी सकते हैं, पर उन्हें कोई मनोरञ्जन का काम न करना चाहिर। एक बार कुर लागों ने हिन्दुस्थानी शिष्टाचार यह समय ताश खेलकर बिताया था, पर ऐसा करना परम निन्दनीय है। किसी किसी शिक्षित जाति मे यह वाल है कि शव को चिता पर रखने के पूर्व उपस्थित मन्जनो मे से कोई एक महाशय मृत व्यक्ति के गुण-कथन पर व्याख्यान देते हैं और उसके कुटुम्बिया और उत्तराधिकारियों के साथ अपनी सहानुभूति प्रकट करते हैं। प्रति- टित व्यक्तियो के सम्बन्ध से तो यह व्याख्यान बहुत ही आवश्यक समझा जाता है, पर इस प्रथा से शिष्टाचार का इतना घना सम्बन्ध है कि मेरी समझ में इसका प्रचार सर्वत्र होना चाहिए । सायश यह है कि हम मृत प्राणो के शरीर और आत्मा का जितना ही अधिक मादर करेगे उतनी ही हमारो उदारता सिद्ध होगी। श्मशान से लौटकर विना स्नान किये मृतक के घर अथवा अपने घर नहीं आना चाहिए । श्मशान से लोटते समय मार्ग के किसी जलाशय में स्नान करके मृतक के घर को ओर फिर अपने घर को पाना उचित है। मार्ग मे उसी गभीरता का अवलम्ब करना चाहिए जिसका उल्लेस पहिले हो चुका है। यदि हो सके तो मृतक के सम्बन्धियो से सहानुभूति प्रकट करने के लिए उनके यहाँ दूसरे दिन फिर जाना उचित है। जो लोग किसी की लकड़ी में जाते हैं वे बहुधा तेरही के दिन भोजन के लिए निमत्रित किये जाते हैं। इन लोगो को यदि कोई सामाजिक अथवा धार्मिक बन्धन न हो तो उस भोज में अवश्य ही सम्मिलित होना चाहिए जिसमे मृतक के सम्बधियो को परम अनुरह के ऋण से कुछ अंश में मुक्त हो जाने का अवसर मिल जावे। (१०)जातीय व्यवहार में जाति-चालो और सम्बग्रियो के माय शिष्टाचार का पूरा पालन न करने से बहुधा आपस में वैमनस्य हो जाता है, चाया अध्याय इसनिये लोगो के माय उचित व्यवहार परने म यही दूरदर्शिता भार सायधानी की प्रायश्यकता है। लोगो यो चाहिम कि जहाँ तक हो अपने जातियालो भार सम्माधियो मधा, पदयो पोर विद्या के कारण उँचाइ निवाइ का विशेष अन्तर न मानें, और मय माय ययासभव प्राय एक ही सा प्रेम पूर्ण व्ययाार फर । जाति कोमाधारण मे साधारण मनुष्य को भी इस यात का धानहाने पाये कि जाति का दूसरा मगुप्य मेरी हीनता के कारण मुरे तुन्छ मममता है। जातीय मभाओम भी, जहां-तक हा, गरीय प्रशिक्षित तथा साधारण स्थिति-याल व्यनियो को भी जान-यूमकर, नीचा स्थान न Pिया जाय । जाति के घड़े लागा का यह कत्तव्य है कि ये अपने साधारण स्थिति-याल भाइयो को, सुख दुप में उनके घर जाकर अपने प्रेम का परिचय देयें । यदि ऐसा न किया जायगा तो जाति-धन हद नहीं रह सकता। जाति-यालो के यहाँ से किमो प्रावश्यक कार्य का निमगा माने पर उनका पालन अयश्य किया जाय । यदि किसी विशेष कारण मे निमन्त्रण स्थीरत करना इष्ट न हो तो इस यात की सूचना नम्रता पूर्वक दे देनी चाहिए। किसी के यहां भोजन करते समय अथवा उसके पश्चात् रमाई के विषय म को कटात करना उचित नहीं, चाहे पह भोजन तुम्हारी गधि के अनुरुल 7 हो । धनादर लोगो को साधारण स्थिति के लोगो के यहाँ रपये पेमे फा व्यवहार देने म सदा इस यात का ध्यान रखना चाहिए कि व्यवहार का परिमाण दूसरे मनुष्य की स्थिति के अनुसार हो जिसमे उसे यह न जान पड़े कि मुझ पर धन का व्यय दबाव डाला जाता है । उमका दिये जाने-याले वस्त्र और दूसरे पदार्थ इतने बहुमूल्य न हा कि यह साधारण मनुष्य उनको धनवान के धन की प्रदगिनी समझे । यातचीत में भी ऐमा कोई भेद भाव न दिखाई दे हिन्दुस्थानी शिष्टाचार जिससे किसो को अपनो होनना का अनुभव होने लगे और उससे मन म सेद उत्पन्न हो । जानि-बानो के यहाँ कम से कम दो एक महीने में एक बार अवश्य जाना चाहिए । उस मनुष्य के यहाँ हमें विशेषकर जाना आवश्यक है जो हमारे यहाँ बहुधा पाया करता हा । यद्यपि किसी के यहाँ बार-बार जाना अशिष्ट समझा जाता है, तथापि उसके यहा कमो न जाना और भी अशिष्ट है। जाति वालों के यहां गमो में एक दो बार अवश्य जाना चाहिए और उनसे सहानुभूति सूचक वातीलाप करना चाहिए । यदि उनके यहाँ स्त्रियों के भी माने-जाने का सम्बन्ध हो तो ऐसे अवसर पर स्त्रियों का जाना भो आवश्यक । इस अवसर पर किसी के यहाँ सधारो में येठकर जाना उचित नहीं पर यदि सवारी के बिना काम न चल सके तो उसे उस स्थान से कुछ दूरी पर छोड़ देना चाहिए और यहाँ से उसके यहाँ पैदल पाना चाहिए । सारांश यह है कि ऐसा काम न किया जाय जिसमे बनावट या दिसावट दिखाई देवे। तेवहारा के अवसर पर जाति-धालो के यहाँ जाना बहुत आवश्यक है । ऐसे समय में इस बात को बाट न देखना चाहिए कि जब कोई हमारे यहाँ प्रायगा तब हम उसके यहाँ जायेंगे। यदि दोनो पक्षों के मन में ऐसे हो विवार एक ही समय उत्पन्न हो तो उनका मिलना कभी सम्भव नहीं हो सकता । तेवहारा में जाति- वालों को भोजन कराना भी बहुत उपयुक्त है, विशेष कर बड़े लोगो का इन अवसरो पर छाटों को निमत्रित करना चाहिए । इस प्रकार के सम्मेलन में जाति के मुखिया जाति वालों को आवश्यक उपदेश भी दे सकते हैं जिससे उनमें प्रचलित कुरीतियों का परिहार हो सके। यदि जाति में किसी मनुष्य पर सकट उपस्थित हो जाये तो जाति-वाले प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह अपनी H चौथा अध्याय के अनुसार तन मन धन मे उसको सहायता करें। इस उपाय से अकाल, रोग, विलय, रामदयह श्रादि के समय किसी भी जाति के लोग रता पा सकते हैं पार समानियो का पुण्य का भागी धना सकते हैं। यद्यपि जातीय पतपात पुछ सोमा तक उवित पार शिष्ट समझा जाता है तथापि सीमा के बाहर इसका प्रचार त्याज्य है। कोई कोई लोग यहाँ तक जातीय पतपात करते हैं, कि यदि उन्हें कोई पद या अधिकार प्राप्त हो जाता है ता घे अपने ही जानि वालो को नौकरियां दिलाते हैं । इस पतपात से फेयन अनीति ही उत्पन नहीं होती, कितु दूसरे लोगो का हक मारा जाता है और बहुधा योग्य व्यक्तियों के बदले अयोग्य लागो का नियुक्ति हो जाती है। इस प्रकार के पनपात के कारण का लागा का हानि उठानी पड़ी है। जाति-याला और सम्बधियो के यहां जाने के समय छोटे लड़को के लिए कुछ मिठाई, खिलाने प्रथम कपड़े श्रादि ले जाना आवश्यक है। पूज्य नातेदारों का रपये को भेट करना चाहिए । जहाँ बड़े लोगों के चरण छूने की चाल है यहां इस प्रथा का पालन किया जाय । यदि नातेदार के यहाँ उत्सव के अवसर पर जाने में कोई अड़चन आ जाये तो उसके यहां किसी उपाय से व्यवहार का रुपया और कपडा अवश्य भिजवा दिया जाय । भूतु फे अनुसार, सम्बधियो के यहाँ फल, मेवा प्रादि भेजना भी शिराचार का लक्षण है । यदि धनाढ्य लाग अपने निर्धन जाति- पालो प्रोर सम्बधियो की क यात्रा का विवाह और चालकों का यज्ञापवीत करा दिया करें प्रयवा इनकी शिता में उचित सहायता दिया करें तो ये काम केयज शिरावार हो के नहीं, कि तु परम पुण्य के प्रकाशक होगे।
५८ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार यदि कोई जातिमाला अथवा सम्बन्धी किसी कठिन रोग में ग्रस्त हो जाय तो उसकी खबर पूलने और चिकित्सा में यथा-शक्ति- सहायता देने के लिए दो-चार वार जाना आवश्यक है। ये वार्ते केवल शिष्टाचार की हैं, इसलिये जो लोग किसी दुखित व्यकि के साथ अधिक भलाई करना चाहते, उनका यह काम पुराय, परोपकार और नीति का होगा। (११) पचायत में पचायत में प्रत्येक दल के मुसियो को अपना मत प्रकट करने के लिए पूरा अवसर दिया जावे । जब-तक कोई आदमी अपने पक्ष की युक्तियाँ उपस्थित करता रहे तब तक दूसरे पक्षवाले को उन्हें काटने का अधिकार न देना चाहिए । एक पक्ष का कथन समास होने पर विरुद्ध पक्ष वाले को बोलने का अधिकार दिया जावे । सिरपच का यह कर्तव्य है कि वह प्रत्येक पक्ष के भाषण के लिए उचित और उपयुक्त समय देवे । पचायतों में बहुधा एक ही समय कई लोग घोलते हैं और कभी कभी तो उनमे दस-दस पाँच पाँच प्रादमी मिलकर और अपनी अलग-अलग टोलियाँ बनाकर आपस में वाद-विवाद करते रहते हैं । इस प्रथा से समय और विपय का व्यर्थ ही नाश होता है। पचायत में जो प्रार्थी आते हैं उनके साथ धन, पदवी आदि के कारण पत्तपात न किया जावे । पचायत के अध्यक्ष को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वाद विवाद मे कोई व्यक्तिगत आक्षेप न आने पावे और न विवादियो का आपसी झगड़ा बढ़ने पावे । अनावश्यक बातें करने वाले व्यक्तिको बातचीत कुछ कम कर दी जावे । स्त्री प्रार्थियो से सब के सामने इस प्रकार के कोई प्रश्न न किये जायें जिनका उत्तर देने में उन्हें सकोच होवे । जहाँ तक हो चौथा अध्याय नारालिग लड़कों को गयाही पर पिसी झगड़े का निपटारा न किया जाये। पचायत का कार्य आवश्यकता से अधिक न बहाया जावे और रात-रात भर बैठकर पचायत में की जारे । सिरपच को निष्पक्ष रहना चाहिए और अपने उत्तरदायिय का पूरा विचार करके अपना अंतिम निर्णय मुनाना चाहिए । जो अध्यक्ष कान का कया हो और किसी बात का स्य निणय करने को शनिन रसना हा उसे ममा का प्रधान न बनना चाहिए। वेवल प्रतिष्ठा पाने के लोभ में पड़कर उसे दूसरों का हानि पहुंचाना उचित नहीं। झूठा निर्णय करा अथवा किसी दल प्रति अत्याचार करना फेवल सदाचार ही के विरुद्ध नहीं, किन्तु शिष्टाचार के भी विरुद्ध है । जो मनुष्य प्रमुख, चतुर प्रार प्रभावशाली समभा जाता हो उसके लिए यह निन्दा की बात है कि यह प्रगट रूप से प्रसङ्गत याते करें और अपने पक्ष का समथन करने में दूसरे पक्ष की नातो का युछ भी विचार न करे । प्रपची पचो के विषय में किसी कवि ने ठीक कहा है कि "नर्क परे तिनके पुरसा, जे प्रपच करें अरु पच फहा। पचायत के मभामदों को इस उपालम्भ से मदेव चचना चाहिए। पचायत में जो लोग गुलाए जाय उनके मत पर ध्यान देना और उस पर विचार करना बहुत आवश्यक है । ऐसा न होना चाहिए कि जो मनुप्य पचायत में बुलाया जाये उससे काई सम्मति न ली जाय । पुराने विचार वालो को नये विचार वालो मत को घृणा की दृष्टि से न देखना चाहिए और न नये विचार वालो को पुराने लोगों की प्रत्येक बात का पगडन करना चाहिये । यदि कोई छोटी उमर-वाला आदमी कोई उचित प्रस्ताव करे अथवा न्याय पूर्ण सम्मति देवे तो उसका भी प्रादर करना उचित और आवश्यक है।
हिन्दुस्थानी शिष्टाचार पंचायत के लिए ऐसा स्थान चुनना चाहिये जहाँ सब दलों के लोग सुभोते से पहुँच सकें और जहाँ किसी विशेष व्यकि अथवा दल को कोई विशेष अधिकार प्राप्त न हो सके। कम से कम वादी अथवा प्रतिवादी के घर पचायत करना अनुचित है, क्योंकि कोई भी आदमी किसी के घर जाकर विशेष रूप से उसका विरोध नहीं कर सकता । पचायत के निश्चित समय पर ध्यान रखने की बड़ी आवश्यकता है। किसी को यह उचित नहीं है कि वह किसी काम में समय पर न जाकर दूसरे लोगो को व्यर्थ ही बहुत समय तक वैठा रखे और उनके काम मे वाधा टाले ।
. पांचवा अध्याय व्यकिगत शिष्टाचार (१) सम्भाषण में मनुष्य की विद्या, बुद्धि और स्वभाव का पता उसकी पात- चीत से लग जाता है, इसलिये उसे अपने विचार प्रकट करने के लिए बात-चीत में बड़ी सावधानी रखना चाहिये । सम्भाषण में सावधानी की आवश्यकता इसलिये भी है कि बहुभा बात ही बात में कर्प घढ़ आती है। यथार्थ में मनुष्य की बात-चीत ही उसके कार्यों की सफलता अथवा असफलता का कारण होती है । किसी कवि ने कहा है, "कहें कृपाराम सब सोसिवा निकाम, एक बोलियो नसीखो, सर सीखो गयो धूर में"। जिसकी बात-चीत में सभ्यता चा शिष्टाचार का प्रभाव रहता है उसमे लोग बातचीत करना नही चाहते। सम्भाषण करते समय श्रोता की मर्यादा (हैसियत) के अनुरूप 'तुम', 'आप' अथवा 'श्रीमान' का उपयोग करना चाहिये । इनमे मे आप शब्द इतना व्यापक है कि यह 'तुम' और 'श्रीमान' का भी स्थान ग्रहण कर सकता है । 'तुम' का उपयोग अत्यन्त साधारण स्थिति के लोगो के लिए, और 'श्रीमान' का उपयोग अयन्त प्रतिष्ठित महानुभावो के लिए किया जाये । वहुत ही छोटे लड़को को छोड़कर और किसी के लिए 'त' का उपयोग करना उचित नहीं। किसी के प्रश्न का उत्तर देने मे 'हाँ या 'नहीं' के लिए केवल सिर हिलाना असभ्यना है। उसके लिए 'जी हो या 'जी नहीं' कहने की बड़ी आवश्यकता है। पात चीत इस प्रकार स्करककर हिन्दुस्थानी शिष्टाचार न की जाने जिसमे श्रोता को उकताहट मालूम होने लगे । वात- चीत करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि बोलने. वाला बहुत देर तक अपनी हो बात न सुनाता रहे जिससे दूसरों को बोलने का अवसर न मिले और वे बोलने वाले को बक-चक से ऊब जावं । बात चीत बहुधा सवाद के रूप में होना चाहिए जिससे श्रोता और वक्ता का अनुराग सम्भापण के विषय मे बना रहे। . सभ्य वातालाप में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि किसी के जी को दुखाने वाली कोई बात न कहो जाय । सम्भापण को, जहाँ तक हो सके, कटाक्ष, आतप, व्यङ्ग, उपालम्भ और अश्लीलता से मुक्त रसना चाहिये । अधिकार की अहम्मन्यता में भी किसी के लिए कटु शब्द का प्रयोग करना अपने को असभ्य सिद्ध करना है। किसी किसी को बोलते समय बीच-बीच में क्या कहते हैं, 'इसका क्या नाम', 'जो है करके', 'राम आप का भला करे', आदि कहने का अभ्यास रहता है। ऐसे लोगो को अपनी आदत सुधारना चाहिये, पर दूसरो को उचित नहीं है कि वे उनके इन दोपो पर हँसें । कोई लोग बात चीत में किसी बात की सयता सिद्ध करने के लिए सौगध खाया करते हैं । शिक्षित लोगो में यह दोप न होना चाहिये। यदि वे भी गुंडा के समान-'जवानी की कसम' या 'ईमान में कहेंगे तो उनका हत्कापन प्रकट होगा। किसी नये व्यक्ति के विषय मे परिचय प्राप्त करने के लिए बात- चीत में उत्सुकता प्रकट न की जावे और जब तक बड़ी आवश्यकता न हो तब तक किसी की जाति, वेतन, वशावलि, घय आदि न पूछी जावे । किसी से कुछ पूलते समय प्रश्नों को झड़ी लगाना उचित नहीं । यदि कोई सजन तुम्हारा प्रश्न सुनकर भी उत्तर न दे तो फिर उससे उसके लिये अधिक प्राग्रह न करना चाहिए । यदि ऐसा पाँचर्चा अध्याय जान पड़े कि वह उत्तर देना भूल गया है तो अवश्य ही उससे दूमरी वार नम्रता पूर्वक प्रश्न किया जावे। वात-चीत में प्रात्म प्रशसा को यथा-सम्भव दूर रखना चाहिये। साथ ही बात-चीत का ढंग भी ऐसा न हो कि सुनने-वाले को उसमें अपने अपमान की झलक दिखाई देवे । यात-चीत म विनोद बहुत हो प्रानन्द लाता है, परतु सदेव हो हँसो ठट्ठा करने को टेव वक्ता भोर श्रोता दाना के लिए हानिकारक है । सम्भापण में उपमा भार रूपक का प्रयोग भी बड़ी सावधानी से किया जाने, क्योकि इसमे बहुधा अर्य का अनर्थ हो जाने का डर रहता है। यदि पाता लाप करते समय कवियो के छोटे छोटे पद्यो और कहावतो का उपयोग किया जाये तो इनसे बोल-चाल म सरसता और प्रामा- णिकता आजाती है, तथापि अति सर की बुरी होती है। यदि कोई दोचार सजन इकडे किसी विषय पर बात-चीत कर रहे हो तो अचानक उनके बीच मे जाना अथवा उनकी बात सुनना अशिष्टता है । ऐसे अवसर पर लोगो के पास जाकर बिना पूछे ही कुछ बात-चीत करना और भी अनुचित है । कभी-कभी किमी मनुष्य को चुपचाप देखकर लोग उससे कुछ कहने का प्राग्रह करते हैं। ऐसी अवस्था में उस मनुष्य का कर्तव्य है कि वह कोई मनोरजक बात या विषय छेड़कर उनकी इच्छा पूर्ति करे। जव कोइ वात-चीत करता हो उस समय बीच में बोलना अथवा वका की बात काटना असभ्यता है । यदि किसी को दूसरे की बात के विरद्ध कहना हो तो बोलने वाले की बान समाप्त होने पर अथवा बात-चीत मे उसके कुछ ठहर जाने पर ही उसे कुछ कहना चाहिये । कभी-कभी बोलने वाला लगातार बोलता ही जाता है और दूसरे को कुछ कहने का अवसर ही नहीं देता। ऐसी अव- स्था मे, नम्रता पूर्वक, बोलने वाले से अपने बोलने को अनुमति हिन्दुस्थानी शिष्टाचार लेना चाहिये । कुछ हल्के हृदय वाले लोग किसी के मुंह से अशुद्ध उन्चारण सुनकर हॅस देते हैं, पर यह प्रयत्न असभ्यता है। किसी की असम्भव बातें सुनकर भी हाँ में हाँ मिलाना चाप- लुसी है और न्यायसगत पातें सुनकर भी उनका खडन करना दुरा- ग्रह है। लोगो को इन दोषो से बचना चाहिये । यद्यपि वार्तालाप में दूसरे के मत का सम्मान करने में अथवा उसको प्रशसा के दो- चार श-द कहने में चापलूमी का कुछ अभाम रहता है, तथापि इतनी चापलूसी के बिना सभापण नीरस और अप्रिय हो जाता है। इसी प्रकार अपने मत के समर्थन में और दूसरे के मत काखडन करने में कुछ न पुल दुराग्रह दिखाई देता है, तो भी इतना दुराग्रह सभ्य भोर शिक्षित समाज में ततव्य है । किसी अनुपस्थित सजन को अका- रण निन्दा करना शिष्टता के विरुद्ध है। यदि वात-चीत में ऐसे महागय का उल्लेख हो तो उसके नाम के पूर्व या पीके किसी श्रादर सूचक शब्द का प्रयोग करना चाहिये । विद्वानो को समाज में मत-भेद होने के अनेक कारण उपस्थित होते हैं, इसलिये जर किसी के मत का सडन करने का अवसर श्रावे तब उस मत का खडन नम्रता-पूर्वक क्षमा प्रार्थना करके और ऐसी चतुराई से करना चाहिये जिसमे विरुद्ध मत-वाले को बुरा न लगे । वात-चीत में कोध के प्राधेश को रोकना चाहिये और यदि यह न हो सके तो उस समय मौन ही वारण करना उचित है। व्यग्य वचनों का उत्तर व्यम्य ही से देना नोति की दृष्टि से अनुचित नहीं है, तथापि शिष्टा- चार उन्हें कम से कम एक बार सहन करने का परामर्श देता है। जिमसे बात-चीत की जाती है उसकी योग्यता का विचार करके वर्णनात्मक अथवा विचारात्मक विषय पर सम्भापण किया जावे । नव-युवको से चेदान्त को चर्चा करना और वयोवृद्ध लोगो को गार रस की विशेषताएँ वताना शिष्टाचार के विरुद्ध है।
पांचयाँ अध्याय सड़क पर पड़े होकर अथवा चलते हुए दूसरे घर की किसी स्त्री से यान चार करना प्रशिए समझा जाता है। यदि काई मनुष्य किसी विचारात्मक काय में लगा हो तो उसके पास ही जोर जोर से बात न करना चाहिये । रोगी मनुप्य मे अधिक समय तक रात-चीत फरना उसके लिये हानिकारक है पार उममे रोग को भयकरता का उल्लेख करना भयानक है । यदि तुम से कोई तुम्हारे अनुप- स्थित मित्र या समधी को निन्दा करे ता तुम्ह उसे नम्रता पूर्वक इस कार्य से विरत कर देना चाहिय और यदि इतने पर भी यह न माने तो तुम्हे क्सिी मिस मे उस समय उसके पास से चले आना चाहिये । सम्भन है कि इससे उसे तुम्हारी अप्रसन्नता और अपनी मूसता का पुत्र प्राभास हो जायगा । जो मनुष्य स्वय किसी दूसरे को अकारण निन्दा नहीं करता, उसके पास पेमी निदा करने का औरो को भी बहुथा साहस नहीं होता । पर निदक को सभ्य तथा शिक्षित लोग बहुधा अनादर को दृष्टि से देखते हैं। किसी ममा या जमाव म अपने मिन अथवा परिचित व्यक्ति से ऐसी भाषा का अथवा ऐसे शन्दो का उपयोग न करना चाहिये जिसे दूसरे लोग न समझ सकें अथवा जो उनको विचित्र जान पड़े। ऐसे अवसर पर किसी विशेष विषय की प्रथा अपने ही धधे की या अपनी ही नौकरी की बातें करने से दूसरे लोगो को अरुचि उत्पन्न हो सकती है। यदि किसी विशेष अथवा गहन विषय पर बहुत समय तक सभाषण करने की आवश्यकता न हो, तो थोड़े थोड़े समय के अन्तर पर विषय को बदल देना उचित होगा। सभाषण में थोड़ा-बहुत रिनोद प्रानद देता है, पर उसकी अधिकता से बात-चीतम फीकापन पा जाता है। किसी को लक्ष्य बनाकर विनोद करना अशिष्ट अरि हानिकारक है। वात-चीत म व्यक्तिगत आक्षेप न पाना चाहिये । वात-चीत करते समय भाषा हि०शि०-* हिन्दुस्थानी शिष्टाचार स की उपयोगिता पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। कई लो साधारण पढ़े-लिखे लोगों के साथ बात-चीत करने में विचार-स्व तय', 'व्यक्तिगत आक्षेप', 'वैयक्तिक धारणा' आदि श-दो का उपयो करते हैं, पर ये शद साधारण पढ़े-लिखे लोगो की समझ में न आ सकते । इसी प्रकार पडितो की समाज में मनुष्य के लिए मानस पिता के लिए बाप, माता के लिए महतारी, और भोजन के लि साना कहना असगत है । हिन्दी भापो लोग बहुधा 'घ', 'श', 'य और 'क्ष' के अशुद्ध उच्चारण के लिए प्रसिद्ध हैं । इसलिये शिति लोगो को इस उच्चारण दोष से बचना चाहिये । कई उर्दूदा सजन अपनी बात-चीत मे 'सिर' को 'सर', 'पागन' को 'सहन', 'बजाज को 'वज्जाज' और 'झलम' को 'कलम, कहकर अपनी भाषा-विज्ञत का परिचय देते हैं जो शिक्षित हिन्दी भाषी समाज में उपहास योग समझा जाता है । हमारे कई एक हिन्दी भाषी भाई उर्दू उच्चारण को शुद्धता के मोह मे पडकर उस भाषा के 'ज' वाले शब्दो में 'ज का अशुद्ध उच्चारण करते हैं और कदाचित यह समझते हैं कि इससे उनकी 'उर्दू-दानी' प्रकट होती है। हमने उर्दू न जानने वाले एक वकील महाशय को 'जायदद', 'मजबूर', 'हर्ज' और 'ताज़ कहते सुना है, पर शिष्टाचार के अनुरोध से और उनके अप्रसन्न होने के भय से हमने उनको उनकी भूल नही बताई । हिन्दी के 'फ अत्तर को भी कई लोग भूल से 'फ' कहते हैं, जैसे फल, फूत और फन्दा । शिष्ट भाषण में इन सब दोपा से बचने को बड़ी आवश्यक ता है । विना उर्दू पढ़े, उस भाषा के ज, फ, स, और ग का उच्चारण करने का किसी को साहस न करना चाहिये, क्योकि इससे शितित समाज में और विशेष कर शिक्षित मुसलमानो मे हमी होती है। ये लोग अपने शुद्ध उच्चारण पर बड़ा गर्व करते हैं और दूसरी जाति के अशुद्ध उच्चारण की बहुधा हॅसी उड़ाया करते हैं। इसके लिए सब पांचयाँ अध्याय से उत्तम उपाय यही है कि इनके उर्दू शब्दो का उच्चारण हिदी के प्रचलित अत्तरो मे किया जाये। हिदो लिपि में उर्दू भतरो के प्रति- निधि दिदो अतरा के नीचे चिन्दो लगाने को जो अनिष्ट प्रथा है उसमे उच्चारण-सम्म धो ये मन भूलें होती हैं । बिना किसी विशेष कारग के मातृ भाषा को दोड़ अय भाषा में बात चीत करना शिष्टाचार के विरुद्ध है। मातृ-भाषा म बात चीत करते समय बीच-बीच में अंगरेजी र बालने को जो दूपिन प्रया है उसका याग सवथा उचित है। इसी प्रकार मातृ भाषा के पेमे प्रान्तीय शद भी काम में न लाये जावें जो या तो अत्यत भदेस हो या जिन्हें दूसरे प्रान्तवाले न समझ सर्क। (२) पन-व्यवहार में पत्रव्यवहार भो एक प्रकार का बान चोत है, परन्तु वह इस- को अपेक्षा अधिक स्थायी होता है । बात चीत म यदि कोई भूल हो जावे तो यह क्षमा के योग्य है, क्याकि उसमें मनुष्य को सोच विवार के लिए पूरा समय नहीं मिलता, परतु यदि पर लिखने में किसी कारण से जल्दी न को जाये तो लेखक को साच मोचकर बातें लिसने का अधिक सुभोता रहता है। ऐसी अवस्था में यदि पन में कोई अनुचित पात लिखी जावे तो उससे बात चीत की अपेक्षा अधिक हानि होती है । सुनी हुई बात को मनुष्य कुछ समय के पश्चात् भूल सकता है, परन्तु लिखी हुई बात का प्रभाव पत्र देसने पर चार-चार पड़ सकता है। बात-चीत की अपेक्षा पन व्यवहार में आदर-सूवक शादी का प्रयोग अधिकता से किया जाता है। पत्र-व्यवहार के समय म कई बातें ऐसी हैं जिनका मम्बधा वात-चीत से भी है। जिस प्रकार बातचीत में ऐसी कोई बात नहीं कही जाती जिससे सुनने वाले के मन में सेद होवे अथवा उसको हिन्दुस्थानी शिष्टाचार व्यर्य ही सोच में पडना पड़े, उसी भांति परन्यवहार में भी ऐमी कोई बात न लिग्वना चाहिये जिमसे पढ़ने वाले को मानसिक कष्ट हो अथवा उम पर व्यर्थ ही दगाव पडे । फिर जिस प्रकार वान-चीत मे श्रोता की योग्यता के अनुरूप शदों का प्रयोग किया जाता है, उसी तरह पन-यवहार में ऐसी भाषा काम में लाना चाहिये जिसे पढ़ने वाला समझ सके। हिन्दी में पनालिसने की आज कल दोरीतियों प्रचलित हैं-एक पुरानी, दूसरी नयी। पुराने विचार के लोगों को पुरानी रीति से और नये विचार-वालो को नयी रीति से पत्र लिखना चाहिये । दानी रीनियों का मिश्रण अनुचित और अशिष्ट समझा जाता है। विवा- हादि उत्सवो के निमत्रण पत्र बहुधा पुरानी पदति से ही लिखे जाते हैं। सरकारी काम-काज के लिए जो प्रार्थना-पत्र लिखे जाते हैं उनका रूप और उनको भाषा बहुधा निश्चित रहती है, इसलिये उनमे कोई अनावश्यक परिवर्तन न किया जावे। पत्र में तिथि भार स्थान लिसना कभी न भूलना चाहिये । जहाँ तक हो अंगरेजी ईसवी सन के बदले विक्रमीय सवत का प्रयोग किया जाये। पत्र की लिपि सुपाच्य और सुडोल हो, शन्दो और लकीरो के बीच में कुछ अन्तर रहे और लेस में विराम चिह्नों का साधारण उपयोग किया जाय । विशेष रूप से विराम विन्हो का प्रयोग करना पाडित्य का प्रदर्शन समझा जाता है । कुछ लोगो की यह धारणा है कि घसीट-लिपि लिपने से लेसक विद्वान माना जाता है, पर पेसा मानना निमूल है। घसीट-लिपि लिसने से पढ़ने वाले को उसके पढ़ने में बहुधा कर होता है और कभी-कमी लेखक का अभिप्राय ही उसको समझ में नहीं पाता । इसलिये शिष्टाचार और सुविधा के अनुरोध से पत्र की लिपि पेसी होनी चाहिये कि वह सरलता से पढ़ी जा सके। कई लोग अक्षरो की नाक इतनी लम्बी चौड़ी फट- पांचवाँ अध्याय कारते हैं कि उनके कारण दूसरे अक्षरो तक का रूप लुप्त हो जाता है। यह चित्रकारी शिष्टाचार के विरुद्ध है । लिपि में अक्षरा का सिरा याँधना सुन्दरता का साधन है । पत्र में काटा-कृटी बहुत कम हो । आजकल अगरेजो शिक्षा के प्रभाव में हिन्दुस्थानी (हिन्दी- भाषी) अनेक सज्जन अपने मित्रो को ही नहीं, कितु अपने परिवार वाला को भाअगरेजी म पत्र लिखते हैं। ऐसा करना केयल अशिष्ट ही नहीं है, रन जातीयता का विद्यातक है। जिस जाति में अपनी भाषा के प्रति प्रादर-युद्धि नहा वह जाति विना पेदी का घड़ा है। हाँ, यदि विद्याथिया की अँगरेजी योग्यता की जांच करना अभीष्ट हा तो अवश्य ही उहे उस भाषा में पनलिसा जाय और उसका उत्तर उसी भापा म देने के लिये उनसे आग्रह किया जाय । पन में किसी बात को बहुत बढ़ाफर लिखना अनुचित है। अपना प्रागय स्पष्ट और सक्षिप्त रीति में प्रकट करना चाहिये । हो, जिस बात को विशेष रूप से समझाने की आवश्यकता हो उसे कुछ विस्तार पूर्वक लिग्वने म हानि नहीं । पन मे यदि किसी मनुष्य के विरुद्ध कुछ लिसने की आवश्यकता आ पड़े तो यह केरल सकेत-रूप से लिसी जाये जिसम आगे पीछे पर किसी दूसरे के हाथ में पड़ने पर मान-हानि के अभियाग को आशका न रहे। कई एक ऐसे भी गूद विषय होते हैं जो वहुधा पत्रम नहीं लिखे जाते और उनकीवचा मेंट होने पर ही अपने मामने हो सकती है, पर जो गूढ़ बात किसो मुकद्दमे से सम्बन्ध रखती हैं ये आवश्यकता पड़ने पर यकोल या मुरत्यार को सावधानी से लिसी जा सकती हैं। जो बातें पत्रम लिसी जाती हैं वे एक प्रकार से स्थायी हो जाती हैं मोर अदालत में गवाही के तौर पर उपस्थित की जा सकती हैं, इसलिये कलम को कागज पर चलाने के पहिले लेखक को प्रत्येक नात दो-चार सोच लेना चाहिये। पत्र की भाषा, हिन्दुस्थानी शिष्टाचार जहाँ तक हो, सहज और अलकार-रहित हो । उसमे बड़े-बड़े शन्दो और वास्यों का प्रयोग न किया जाय । बार-बार एक ही शन्द अथवा वास्य को दुहराना अनुचित है । जहाँ तक हो पन में विदेशी शटो का उपयोग न किया जावे । निमत्रण पत्रो की भाषा शुद्ध हिन्दी होना चाहिये । विद्वानो को जो पत्र लिखे जाते हैं उनमें थोडे बहुत कठिन शब्द पा सकते हैं, परन्तु साधारण लोगो को पत्र लिखने में कठिन, अप्रचलित और नये शादी का प्रयोग करना ठीक नहीं। शिक्षित लोगो की भाषा व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध होनी चाहिये । यदि ऐसा न होगा तो शिक्षित समाज मे लेखक का उपहास होगा। जब किसी के पन का उत्तर देना हो तब उस पत्र में लिसी हुई प्रयेक बात का उचित उत्तर देना चाहिये । यदि कोई बात ऐसी हो जिसका उत्तर 'हाँ' या 'नहीं' में देने से अनर्थ होने की सम्भावना है तो उमका उत्तर न दिया जावे, पर ऐसा अवसर कम प्राता है। निकट सम्बधियो और घनिष्ठ मित्रो के पत्रो में दोनो ओर के कुशल-समाचार की शुभ कामना, बडो को प्रणाम ओर छोटो को प्यार अवश्य लिखा जाये । साधारणत निजी पत्रो मे और और बातो के माथ आव-हया, रोग, फसल अादि का भी कभी कभी उल्लेख रहता है। यदि फिसी पत्र का उत्तर पाने की विशेष आवश्यकता हो तो अपने पत्र में इस बात की प्रार्थना कर देना अनुचित न होगा। छोटों बहो और बराबरी-वालो को पत्र लिखने के लिए जो उपयुक्त शब्द प्रचलित हैं उनको सावधानी से काम में लाना चाहिये । यदि पन में किसी दूसरे मनुष्य का उल्लेख हो तो जाति के अनुसार उसके पूर्व 'पडित', 'ठाकुर', 'घावू अथवा 'लाला' शब्द का प्रयोग करना आवश्यक है। यदि शीन ही किसी और उपपद पाँचवाँ अध्याय ७१ का निश्चय न हो सके तो 'श्रीयुत' शब्द का ही उपयोग किया जावे । नाम के साथ 'जी' शब्द लगा देने से भी बहुधा आदर प्रकट हो जाता है। प्रतिष्ठित लोगो के साथ "श्रीमान्" जोड़ना और साधारण व्यकि के नाम में "श्रीयुत" लगाना चाहिए। स्त्रियों के नाम के पूर्व "श्रीमती" शब्द की ओर पीछे 'देवी" की योजना की जावे । स्त्री का प्रास्पद पति के प्रास्पद के अनुरूप होता है। पन किसी का भी हो, जब तक विशेष कारण न हो, उसका उत्तर देना आवश्यक है, क्योकि लोग बहुधा उसी को पन लिखते हैं जिससे उन्हें कुछ प्राशा होती है और कभी-कभी पत्र ऐसे लोगो के पास भी लिखने का अवसर प्रा पडता है जिनसे पहिले कभी पत्र-न्यवहार नहीं हुआ। ऐसी अवस्था मे पत्र का उत्तर न देने का प्रश्न भली भाति विचार लेना चाहिये । यदि कोई किसी के पत्र का उत्तर नहीं देता है तो पन लिखने वाला उसे अपना अपमान समझता है और उत्तर न देने वाले की ओर बहुधा बुरी धारणा कर लेता है। यदि पन-व्यवहार बहुत दिनो से चल रहा हो अथवा समय-समय पर होता रहा हो तो एक-आध पत्र का उत्तर न देने से विशेष हानि नही । पर मिलने के दूसरे या तीसरे दिन उसका उत्तर भेज देना आवश्यक है, क्योकि लोग अपना पन भेजने के एक सप्ताह के भीतर ही उसका उत्तर पाने की प्राशा करते हैं। यदि दो-चार दिन को देरी हो जावे तो वह तमा के योग्य है, परन्तु पखवारो या महीनोम उत्तर देना असभ्यता है। प्रायश्यक पत्रों का उत्तर विना विलम्ब के भेजना चाहिये। आजकल शिक्षा के प्रभाव से पत्रो का पता बहुधा अँगरेजी ढंग से लिसा जाता है। इस रीति में यह लाभ है कि चिट्टी पाने- चाले का पता लगाने में चिट्ठी रसा को विशेप कठिनाई नहीं पड़ती। पुराने ढंग का पता एक लम्बे वाक्य के रूप में रहता है जिसमें से हिन्दुस्थानी शिष्टाचार मतलर की बातें डाकघर को खोजकर निकालनी पड़ती है और उससे समय की बहुत हानि होती है। पते में पाने वाले का नाम आदर-सूचक उपपदों के साथ लिखा जावे । उसको जो उपाधियाँ प्राप्त हो ये भी नाम के साथ लिसी जावें । निजी पत्रों में विद्या सम्बन्धी उपाधियाँ बहुधा छोड़ दी जाती हैं। गूढ़ विषय का पत्र कभी कार्ड पर न लिसना चाहिये। श्राज- कल डाक महमूल दूना हो जाने के कारण लोग कार्टी का अधिक व्यवहार करने लगे हैं, परन्तु जहाँ तक हो प्रतिष्ठित लोगो को कार्ड के पदले लिफाफा ही भेजना उचित है। शिष्टाचार का एक साधारण नियम यह भी है कि कार्ड का उत्तर कार्ड में दिया जाय । यद्यपि रजिस्ट्री चिट्ठी विशेष कर मुकद्दमो के सम्बध मे भेजी जाती है तो भी बहुत ही श्रावश्यक निजी पत्र भी रजिस्ट्री करके भेजे जाते हैं। उनकी आवश्यकता तभी होती है जब चिट्ठी के सो जाने का प्रथना देर से मिलने का भय हो। वेरग पन कभी किसी को न भेजना चाहिये। यदि समय पर टिकट कार्ट या लिफाफा न मिल सके तो इस प्रकार का पत्र भेजा जा सकता है। जहाँ तक हो शिक्षित लोगो को पत्र अपने हाथ से लिसा जावे। यदि अस्वस्थता की अवस्था हो अथवा कार्य की अधिकता हो, तो दूसरे में पत्र लिसाकर उस पर हस्ताक्षर कर देने से काम चल जाता है, तो भी इस बात का स्मरण रखना चाहिये कि माधारण अवस्था में दूसरे के हाथ में लिखाये हुए पन से पाने वाले को असतोप होता है और वह पर-प्रेरक को कुछ अभिमानी समझने लगता है। उपे हुए साधारण और निमत्रण पत्र को भी लोग असतोप की दृष्टि से देखते हैं, इसलिये यदि पत्र-भेजने वाला पर पाने वाले की विशेष सहानुभूति प्राप्त करना चाहे तो छपे पाँचवाँ अध्याय ७३ . पत्रो मे उसे अपने हाथ मे दो चार अनुरोध-सूचक शम्द लिख देना चाहिये जिससे पन-पाने-बाले पर नैतिक प्रभाव पड़े। (३) भेंट-मुलाकात में लोग भेट या मुलाकात के लिए उन्हीं के पास जाते हैं, जिनसे किसी प्रकार का सम्बन्ध स्नेह अथवा काम-काज होता है। कभी- कभी परिचित व्यक्ति के द्वारा अपरिचित, परन्तु प्रतिष्ठित लोगो से भी भेंट की जाती है । गोसाई जी ने कहा है, इहि मन हठि करि- है। पहचानी। साधु ते होइ न कारज हानी ।। जिसके घर भेंट करने यो जाते हैं उसके सुभीते पर भेंट करने- वाले को अवश्य ध्यान रखना चाहिये। किसी के यहाँ ऐसे समय पर नजाना चाहिये जर उसे किसी से मिलने का अवकाश वा सुभीतान हो । घनिष्ट मित्र एक दूसरे से बिना किसी सकोच के दिन में कई चार मिलते हैं, पर इस अवस्था में भी शिष्टाचार पालने की आवश्य- क्ता है। किसी के यहाँ बिना किसी आवश्यक कार्य के दिन निकलते ही अथवा भोजन के समय या ठीक दोपहरी में जाना अनुचित है। अधिक रात को भी साधारण अवस्था में किसी के यहाँ न जाना चाहिये । काम-काजी लोगो को समय का बहुत सकोच रहता है, इसलिये किसी के यहाँ प्राय आधे घटे से अधिक बेठना उचित नहीं है । यदि इस अवधि में महत्व पूर्ण वातचीत पूर्ण हो सके तो बहुत अच्छी बात है । जिस समय किसी मनुष्य की बात-चीत मे उदा मीनता, शिथिलता अथवा उफताहट दिस पडे उस समय समझ लेना चाहिये कि उसे मिलने का अधिक सुभीता नहीं है। इसलिये ऐसे सकेत को सूचना समझकर उसके यहाँ से चले आने का उपक्रम करना चाहिये। यदि यह जाने वाले व्यक्ति के प्रस्ताव को सुनकर कुछ अधिक वेठने का अनुरोध करे तो यह अनुरोध मान लिया जावे और कुछ समय के पश्चात् उससे विदा ग्रहण की ७४ , हिन्दुस्थानी शिष्टाचार जावे । भंट के लिए आये हुए सज्जन से उसकी जाति और पर्व अनुसार प्रणाम', 'नमस्कार', 'राम-राम' अथवा 'पदगी' कहक उसका अभिवादन करना चाहिये । परिचित लोगो को इस बात के लिए न ठहरना चाहिये कि जब दूसरा अभिवादन करेगा त- हम उसका उत्तर देंगे । भेंट होने पर एक दूसरे का मुंह देखते रहना और कुछ न कहना बड़ी असभ्यता है। इसलिए मुख्य प्रयोजन अथवा और किसी उपयुक्त विषय पर चर्चा छेड़ देनी चाहिए यदि दिन में एक से अधिक बार मेंट हो तो प्रत्येक वार मिलने पर भी अभि करने में कोई हानि नहीं है। जहाँ तक हो अभिवादन के पश्चात् थोड़ी-बहुत बातचीत अवश्य कर ली जावे यदि और कुछ न हो तो केवल कुशज-प्रश्न से ही काम चल्न सकता है। किसी के यहां जाकर उसके कागज-पत्र, पुस्तके अथवा दूसरे पदार्थ उठाना-धरना अथवा उन्हें बड़े ध्यान से देखना अनुविन है भेंट करने वाले को उसी कोठे में बैठना चाहिए जो वैठक के लिए- नियत हो और उस स्थान मे तमोप्रवेश करना चाहिए जब गृह-स्वामी अथवा कोई अन्य पुरुष वहाँ उपस्थित हो । पुरषो को अनुपस्थिति में किसी के यहाँ जाना सदेह की दृष्टि से देख इसलिये सभ्य लोगो को इस दोष से बचना चाहिये ।। - पर्दै का पांचयाँ अध्याय ७५ कि कदापित् प्रापाज सुनकर कोई धार सोलने को और पुछ सूचना देने को मारे। गृह-स्वामी को उत्रित है कि यह अपने यहां प्राने-याने सज्जन फा उसकी योग्यता के अनुमार स्वागत करे ओर उमे प्रादर पूर्वक निठाये । युशल प्रश्न के पश्चात् उममे कुछ ऐसी यात करना चाहिये जो उसकी चि के अनुकूल हो प्रयया उसरे काम-काज मे सम्बर रपती हा । उसरे आने का कारण पृरने की उतायली कभी न की जाये । यह पात-चीत में पदुमा पाप ही प्रकट हो जाता है प्रथया कुछ समय के पश्चात् चतुराई से पृदा जा सकता है । यदि तुम्ह अधिक समय न हो और बैठने वाले के कारण तुम्हारे क्सिी आवश्यक कार्य मे हानि होने की सम्भावना हो तो तुम्हे अपनी कठिनाई नम्रता पूर्वक प्रोर चतुराई से जता देना चाहिये । पने अरमर पर शिष्टाचार का अधिक पालन करने से लाभ के नदले हानि होगी। मिलने-याले को भी उचित है कि यह गृह- स्वामी के सुभीते का पूरा ध्यान रम्ये ओर उसरे कुछ कहने से अप्रसन्न न हो । यदि किसी मुलाकाती को हमारे यहाँ बैठने में अधिक समय लग जाये तो हमारा कर्त्तय यह है कि हम उससे पुक जल पान करने के लिए निवेदन करें और यदि उसके अस्वीरत करने पर भी हम यह अनुमान हो कि प्राग्रह करने पर उसे आपत्ति न होगी तो हम चाय, पज अथवा मिष्टान से उसकी तृप्ति करना चाहिये। अथवा सड़क पर उचित नहीं। करात ।
हिन्दुस्थानी शिष्टाचार जावे। मेंट के लिए आये हुए सजन से उमको जाति और पदके अनुसार प्रणाम', 'नमस्कार', 'राम-राम' अयवा 'पदगी' कहकर उसका अभिवादन करना चाहिये । परिचित लोगो को इस बात के लिए न ठहरना चाहिये कि जब दूसरा अभिवादन करेगा तर हम उसका उत्तर देंगे । भेंट होने पर एक दूसरे का मुंह देखते रहना और कुछ न कहना बड़ी सभ्यता है । इसलिए मुख्य प्रयोजन अथवा ओर किसी उपयुक्त विषय पर चर्चा रेड देनी चाहिए । यदि दिन में एक से अधिक बार भेंट हो तो प्रयेक पार मिलने पर भी अभिवादन करने में कोई हानि नहीं है। जहाँ तक हो अभिवादन के पश्चात् थोड़ी-बहुत-बातचीत अवश्य कर ली जावे । यदि ओर कुछ न हो तो केवल कुशज-प्रश्न मे ही काम चल सकता है किसी के यहाँ जाकर उसके कागज-पत्र, पुस्तकें अथवा दूसरे पदार्थ उठाना धरना अथवा उन्हें बड़े ध्यान से देखना अनुचित है। भेंट करने वाले को उसी कोठे में बैठना चाहिए जो वैठक के लिए नियत हो और उस स्थान में तभोप्रवेश करना चाहिए जब गृह-स्वामी अथवा कोई अन्य पुरप वहाँ उपस्थित हो । पुरपो की अनुपस्थिति में किसी के यहा जाना सदेह की दृष्टि से देखा जाता है, इसलिये सभ्य लोगो को इस दोष से बचना चाहिये। जिन लोगो मे पर्दे का विशेष प्रचार नहीं है उनके पास अनुमति मिलने पर स्त्रियों के उप- स्थित रहते हुए भी जा सकते हैं । यद्यपि पश्चिमीय देशो में दरवाजा चद रहने पर बाहर से पुकारने के लिए सांकल खदसटाना अथवा किवाड़ भड़कना अनुचित नही पमझा जाता, तथापि हमारे देश मे इन कार्यों को अनुवित समझते हैं। किसी के दरवाजे जाकर जोर जोर से और लगातार पुकारना भी अनुचित है। दो एक बार पुकारने पर मिलने वाले को यह देखने के लिए ठहर जाना चाहिये पांचवा अध्याय कि कदाचित् आयाज सुनकर कोई द्वार खोलने को और कुछ सूचना देने को आवे। गृह स्वामी को उचित है कि वह अपने यहाँ प्राने-वाले सज्जन का उसकी योग्यता के अनुसार स्वागत करे और उसे आदर पूर्वक ठिावे । कुशल प्रश्न के पश्चात् उससे कुछ ऐसी बात करना चाहिये जो उसकी रचि के अनुकूल हो अथवा उसके काम-काज से सम्बध रखती हो । उसके आने का कारण प्रवने की उतावली कभी न की जावे । यह बात-चीत में बहुधा आप ही प्रकट हो जाता है अथवा कुछ समय के पश्चात् चतुराई से पूछा जा सकता है । यदि तुम्ह अधिक समय न हो और वेठने वाले के कारण तुम्हारे किसी आवश्यक कार्य मे हानि होने की सम्भावना हो तो तुम्हें अपनी कठिनाइ नम्रता-पूर्वक और चतुराई से जता देना चाहिये। ऐसे अवसर पर शिष्टाचार का अधिक पालन करने से लाभ के बदले हानि होगी। मिलने वाले को भी उचित है कि वह गृह- स्वामी के सुभीने का पूरा ध्यान रखे और उसके कुछ कहने से अप्रसन्न न हो । यदि किसी मुलाकाती को हमारे यहाँ बैठने मे अधिक समय लग जावे तो हमारा कर्त्तय यह है कि हम उससे कुछ जल पान करने के लिए निवेदन करें और यदि उसके अस्वीरत करने पर भी हमे यह अनुमान हो कि प्राग्रह करने पर उसे आपत्ति न होगी तो हमे चाय, फल अथवा मिष्ठान्न से उसकी तृप्ति करना चाहिये। यदि किसी मित्र या परिचित व्यक्ति से बाहर अथवा सड़क पर भेंट हो तो वहाँ घण्टो सड़े रहकर पात-चीत करना उचित नहीं। यदि विषय लम्बा हो तो कुछ दूर तक साथ-साथ चल कर वात- चीत कर ली जाने, पर ऐसा न हो कि किसी को दूसरे की पात सुनने के लिए विवश होकर कई जरीब जाना पड़े।
हिन्दुस्थानी शिष्टाचार यदि किसी बड़े आदमी के यहां मिलने की जाना हो तो उनके अवकाश का पूरा पता लगा लेना चाहिये ओर जाकर किसी के द्वारा अपने प्राने की सूचना भिजवा देना चाहिये। उन सज्जन के पास पहुँचने पर उपयुक्त प्रासन ग्रहण करना उचित है और मक्षेप में उन्हें भेंट का तात्पर्य ता देना चाहिये । कार्य हो जाने पर कुछ समय और बेठना अनुचित न होगा। इसके पश्चात् पूर्वोक्त महाशय को आशा लेकर चले पाना योग्य है। किसी के यहाँ कभी न जाना जसा अनुचित है उसी प्रकार घार-बार जाना अयोग्य है। यदि किसी के यहां जाने से जाने वाले को ऐसा जान पड़े कि उसके जाने से गृह-मामी को खेद होता है तो ऐसे मनुष्य के यहाँ उसे कभी न जाना चाहिये । कहा भी है- वचनन मे नहिं मधुरता, नेनन मे न सनेह । तहाँ न कहे जाइये, कचन घरपे मेह ॥ पक दूसरे के यहाँ आने-जाने से परस्पर मेल-मिलाप बढ़ता है, इसलिये यदि कोई परिचित व्यक्ति अथवा मित्र, जिसके साथ आवागमन का सम्बन्ध है, बहुत समय तक किसी के यहाँ न जावे, तो दूसरे मनुष्य को उसके यहाँ उपयुक्त अवसर पर जाना अनुचित न होगा। इससे इस बात का भी निर्णय हो जायगा कि यह मनुप्य जाने वाले से किसी प्रकार अप्रसन्न तो नहीं है। बहुधा उच्च स्थिति के महानुभाव निम्न-स्थिति के लोगों के यहाँ मिलने नहीं पाते । यदि उन्हीं का काम हो तो भी वे इन्हें बुलाने को सवारी भेज देते हैं। दो चार वार ऐसे महानुभावो की इच्छा-पूर्ति सकती है, पर उनके बढ़ते हुए दुराग्रह को कम करने की आवश्यकता है। ये लोग निमन्त्रण पाकर भी अपने से छोटे लोगों के यहाँ आने की कृपा नहीं करते जिससे शिष्टाचार की बड़ी अव- हेलना होती है। ऐसी अवस्था में सज्जनो का यह कर्तव्य है कि ।
पांचों अध्याय ७७ घे मदाचारी कगाल के यहां भले ही चले जायें, पर दुराचारी महा जन के द्वार पर न मांक। मुलाकाती के जाने के पूर्व हम पान, सुपारी, इलायचो आदि से उसका आदर करना चाहिये। जिस समय यह जाने लगे उमकी योग्यता के अनुसार सड़े होकर या द्वार तक जाफर अथवा दम कदम पाहर चलकर उसे अभिवादन-महित विदा टेना चाहिये। (४) परस्पर व्यवहार में समाज में कुछ पसे व्यवहार हाते हैं जो बदले के रूप में फेरल उन्हीं व्यक्तियो के सार किये जाते हैं जिन्होने सा व्यवहार दूमरा के साथ किया है। कभी-कभी पये व्यवहार इस आशा से भी प्रारम्भ किये जाते हैं कि आगे इन ययहारा का बदला मिलेगा और कुछ परिचय बढ़ेगा। दूसरे के यहाँ बेठने को जाना इसी प्रकार का यरहार है जिसमे व्यवहार करने वाला मनुष्य इस बात की प्राशा करता है कि हम निसके यहाँ जाते हैं यह भी कभी हमारे यहाँ आवे । यदि व्यवहार एक ही और से कुछ समय तक होता रहे मोर दूसरी पार से प्रति-ध्यपहार न किया जाय ता पेसा व्यवहार बहुत दिन तक नहीं चल सकता । इसी प्रकार यदि कोई मनुष्य किसी को योमारी की अवस्था म प्रथया मकट के समय उसके यहाँ जावे, तो उसका भी कर्तव्य है कि ऐसे अवसर पर यह उसके यहाँ प्रवश्य जाध। यदि किसी के यहाँ से हमारे यहाँ म्पये-पैसे के रूप म प्रथा घर प्रादि के रूप में व्यवहार माने तो हमे उसका हिसाब रसना चाहिये और उसके यहाँ वेसा ही कोई अवसर प्राने पर उतना ही व्यवहार करना चाहिये। यदि हम किसी अनिवार्य कारण से उस अवसर पर स्यय उपस्थित न हो सके तो हमे दूसरे के द्वारा अथवा डाकासे व्यवहार भिजपा देना चाहिये।
हिन्दुस्थानी शिष्टाचार भोजन के सम्बन्ध मे भी परस्पर व्यवहार पालने की आवश्यकता है। जो व्यवहारी मनुष्य हमारे यहाँ भोजन करने को प्रावे उसके यहाँ हमे भी अवश्य जाना चाहिये । सान-पान के सम्बन्ध में जहाँ तक हो जाति-धन की रक्षा करते हुए इसी प्रकार का व्यवहार पालने को आवश्यकता है। विवाह तथा दूसरे उत्सवों में जो लोग हमारी जैसी सहायता करते हैं उनके साथ हमे वेसा हा व्यवहार करने को आवश्यकता है । यदि कोई हमारे साथ बरात में जाता है तो हम भी समय निकालकर उसके साथ ऐसे अवसर पर जाना आवश्यक है। गमी में प्रति व्यवहार पालने को अत्यन्त आवश्यकता है। यह पेसा अवसर है कि इस समय किये गये उपकारो को लोग शीघ्र नहीं भूलते और सदैव इस बात के लिए तत्पर रहते हैं कि हम अपने उपकारी के सकट मे महायक होवें । जहाँ स्त्रियों में भी पेसा व्यवहार प्रचलित है यहाँ स्त्रियो का भी कर्तव्य है कि वे अपनी सकट-ग्रस्त सखियो के यहाँ सहानुभूति प्रकट करने को जावें। यदि हमें किसी उत्सव के अवसर पर दूसरे के यहाँ से पहिले- पहल निमन्त्रण आवे तो जब तक कोई विशेष कारण न हो तब तक हमें उस निमन्नण का पालन करना चाहिये। इसी प्रकार यदि किसी नये स्थान से पहिले पहिल व्यवहार आये तो हमे उसे स्वीकार कर लेना चाहिये और स्मरण रसके उसे किसी उपयुक्त अवसर पर नियम पूर्वक लौटा देना चाहिये। ऐसे अनेक व्यवहार हैं जो किसी न किसी और से पहिले पहिल प्रारम्भ किये जाते हैं और उनमें यह नहीं देखा जाता कि दूसरी ओर से यह व्यवहार कभी हुआ है या नहीं । गमी में इस प्रकार का एक पक्षीय विचार कभी न करना चाहिये, क्योंकि यह पुण्य का कार्य है।
पांचया अध्याय पोलोग ऐसे भी होते हैं जो यह चाहते हैं कि हमरे जोग हमारे यहाँ पापी पर हम डायदोन जाना पड़े। इस प्रकार के लोगो को माचा चाहिये किये सर व्यवहार परस्पर में और रिना प्रादारा प्रदान के बाद ममय म यद दो ज्ञात है। कई लोगो काखा है जो दूसरे के यहाँ उमर मरो पर भी नहीं जाते। प्राचाय नहीं किसर लोग भी उनके साथ एसा ही प्ययाहार फरें। किसी कपि ने कराई, मुष अपनेसे, उसमें मुफ आइये । सस प्रपोम, उसमे रुक जाइये। (५) गुण-कथन में ससारा काम-काज म अनेक अवसर पमे प्राते हैं कि जर हमें फिमी पे गुणा या प्रकट करने की प्रायश्यकता होती है । नाकरी प्राति के लिए जो सिफारिश की जाती है यह भी एक प्रकार का गुण-क्या है । यद्यपि लागों की दृष्टि म और म्यभाप में भी यात पम पमे मनुष्य है जो सयथा निदोष हो तथापि गुण-कथन म हम जहाँ तक हो किमी व्यक्ति पे साधारण दापी पो दिपाकर उसके गुणों का ही परिचय देना चाहिए । हाँ, यदि दोपों को दिपाने में विशेष हानि होने की सम्भावना हो तो गुण-कयन म विशेष विस्तार न किया जाय। यदि कमी किसी के दोष प्रकट करने का अयसर मा जाय तो चे निदा ये रूप म अथवा घृणा के साथ कभी न प्रकट किय जायें। किसी ये दोष प्रकट करने का अपगध तभी किया जा सकता है जब उममे सुराने-याला को विशेष लाभ प्रथया चेतावनी प्राप्त हो सके। फेवल इसी प्रेरण के आधार पर देष प्रकट करने-याला मान हानि के अभियोग से रक्षा पासकता है। क्योकि यह अपराध राज नियम के अनुसार दण्डनीय है। शिष्टाचार की दृष्टि से प्रार ८० हिन्दुस्थाना शिष्टाचार राजकीय नियमा से भी चार को चार बार पेश्या को घेश्या कहना दण्डनीय अपराध है । यदि कोई विशेष प्रयोजन न हो तो किसी के दोष प्रकट करके मनुष्य को स्वय हल्का होना उचित नहीं। अपने जाति-वालो और कुटुम्ब वालो के दोष बताना तो और भी निन्दनीय ममझा जाता है। किसी को प्रशसा बहुत बढ़ाकर करना उचित नहीं, क्योकि उसमे लोगो को मिथ्यापन का सन्देह होने लगता है। जिस समय जिसके जितने गुणो को प्रकट करने की आवश्यकता हो उस समय उसके उतने ही गुण प्रकट किये जायें। यदि कोई किसी का साधा. रण परिचय ही पूरे तो उस समय उसकी गुणावली पर विस्तृत व्याख्यान देना अनावश्यक और अनुचित है । गुण-गान इस साव धानी से किया जावे कि उस से व्यग्य को धनि न निकले पोरसुनने- वाले को ऐसा न जान पड़े कि वक्ता अपनो इन्टा के विरुद्ध गुण- गान कर रहा है। यदि हमारे दा भले शद कह देने से किसी का महत्व पूर्ण कार्य सिद्ध होता है तो हमें अपनी इन्दा के विरुद्ध भी उन शब्दों के कहने में आनाकानी न करना चाहिये । यदि हम से कोई प्रशमा-पन मांगे और हम उस व्यक्ति के पाचरण से पूरा सतोप न हो तो उस समय हमारा यह कर्त्तय है कि या तो हम किमी उचित उपाय से प्रशसा पत्र देने के अवसर को टाल देचे अथवा ऐसा प्रशसा-पन लिस दे जिस में प्रशसा की मात्रा साधारण हो। किसी भी अवस्था म ऐसा प्रशसा पत्र न दिया जावे और न ऐसा गुण-कथन किया जावे जिसमे स्पष्ट मिथ्यापन हो । चार-चार लोगो की सिफारिश करने अथवा उसे प्रशसा पत्र देने से उस गुण-कथन का मूल्य घट जाता है, इसलिप लोगो की बहुत सावधानी से दूसरो को प्रशसा करनी चाहिये।
। पांचयाँ प्रायाय १ विपादादि कार्यो म पहुधा ऐसा अपसर भाजाता है कि लोग किसी व्यकि के गुणा फोन पृथकर उसके दोष पूदते हैं । ऐसी प्रायस्था में उत्तर देने वाले को उरित है कि यह साधारण रोति से इतनी ही सूचना दे देये कि प्रमुर मगुप्य के माथ सम्बध होना ठौक है या नहीं। यदि प्रश्न पूदने याला मनुप्य चतुर होगा तो यह उत्तर-दने पाले मनुष्य के इतने हो सकेत से यहुत-युर समझ जायगा और उसे किसी व्यक्ति के दोष प्रकट करने के लिए बाध्य न करेगा। लोगों को विदाई देने के लिए जो ममायें की जाती हैं उनमें चल गुण-गान ही किया जाता है। कोई-कोई स्पष्ट-यत्ता ऐसे अयसर पर भी कभी-कभी दोषी या पुछ समेत कर देते हैं, पर ऐसा सफेत केवल इसीलिये किया जाय कि उससे प्रगमित सजन का प्रागे पुलाम हो । यदि सार्पजनिक सभाम्रो में किसी सजन की सार्य जनिक कार्यवाही को मालोचना करना हो तो उसमे गुणो और दोपा का उचित मिया अनुचित नहीं समझा जाता । मृत-पुरुपो को निंदा करना अत्यत निन्दनीय है, क्योंकि जिस पुरुष को विदा की जाती है यह उसका उत्तर दो को प्रा ही नहीं सकता । यथार्थ मे मृत पुगप को निन्दा करने वाले व्यक्ति को पूरा कायर कहना चाहिये, क्योकि जिस स्वत नता से पह मरे मनुष्य को युराई कर सकता है उस प्रकार यह उससे जीवा-काल में निन्दा न कर सफनानि स्वर्गयामी सजनो के लिए शोक-सभायें की जाती है, उनमें उनरे यल-गुण-गान की आवश्यकता है पोर उसी से समा के सचालको की उदारता प्रकट हो सकती है तथा उपस्थित जनता को मताप पय उपदेश प्राप्त हो सकता है। शोक-सभाग्री के प्रस्तामो की नफन मृत-पुरुष के किसो मुग्न्य-सरधी के पास अवश्य भेजी जावे । सार्वजनिक कार्य-कानो और प्रसिद्ध हि०शि०-६ है ૨ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार पुरुषो की मृत्यु पर शोक-सभा करना जनता का एक प्रधान कर्तव्य है। कभी-कभी लोगो को अपने किसो घनिष्ठ मित्र के नाम किसी व्यक्ति को परिचय-पन देना पड़ता है। यह परिचय पत्र तव तकन दिया जावे जर-तक लिखने वाले को यह मालूम न हो कि जिस व्यक्ति को परिचय पन दिया जाता है उससे लेखक का घनिष्ठ मित्र अप्रसन्न तो नहीं है। साथ ही पत्र देने वाले को यह भी जान लेना चाहिये कि अनुगृहीत व्यक्ति परिचय पत्र का पात्र है या नहीं। गुण-कथन और चापलूसी के अन्तर पर ध्यान रखने की आवश्यकता है। यद्यपि असाधारण गुण कयन में चापलूसी का थोड़ा-बहुत अाभास अवश्य रहता है, तथापि उसमें स्वार्थ सिद्ध करने की नीच और कपट-मय प्रवृत्ति नहीं रहती। नीति की सूक्ष्म दृष्टि से माधारण गुण-कथन में भी चापलूसी दिखती है, तथापि शिष्टाचार के विचार से उसकी प्रत्प मात्रा तमा के योग्य है। (६) पहुनई और अतिथि सत्कार में लोगो को अपने ऐसे मित्रो और नातेदारों के यहाँ कभी-कभी जाकर कुछ दिन रहने का काम पड़ता है, जो किसी दूसरे स्थान में रहते हैं। कभी तो पहुनई करने का अवसर हो जाता है और कभी यह अवकाश के समय इन्छा से की जाती है । मित्र और नाते दारो के यहाँ से बहुधा पहुनई के लिए निमन्त्रण भी आ जाता है। जो कुछ हो, पहुनई में जाने के पूर्व इस बात का मन में विश्वास अवश्य कर लेना चाहिए कि जिनके यहां पहुनई में जाना है उनकी इसके लिए हार्दिक इन्छा है या नहीं, क्योकि कभी कभी पहुनई के लिए केवल शिष्टाचार की ऊपरी दृष्टि से अनुरोध किया जाता है। जिसके यहाँ पहुाई में जाना है उसकी आर्थिक और कौटुम्बिक परिस्थिति पर ध्यान अवश्य रखना चाहिये। यदि उसकी स्थिति पांचवां अध्याय साधारण हो अथवा उसके यहाँ कुटुम्ब की अधिकता के कारण अथवा और किसी कारण से रसोई बनाने की कुछ अड़चन है तो उसके यहाँ चार दिन से अधिक न ठहरना चाहिये । मित्र के यहाँ पहुँचने पर पाहुने को किसी न किसी तरह यह वात प्रगट कर देना चाहिये कि वह कितने दिन तक ठहरने वाला है, जिससे गृह स्वामी को उसके आदर स कार का प्रबंध करने के लिए अवसर मिल जावे । पाटने को अपनी प्रस्तावित अवधि से अधिक न ठहरना चाहिये, जब तक इसके लिए गृह-स्वामी को ओर से विशेष श्राग्रह न हो । प्रातियेय के यहाँ रहते हुए, पाहुने को भोजन के निश्चित समय पर उपस्थित रहना आवश्यक है जिसमें घर- वालों को उसके लिए अनावश्यक प्रतीक्षा न करनी पडे । दूसरे के यहाँ जो भोजन बने उसे सतोप पूर्वक पाना चाहिये, चाहे वहा पाहुने को रवि के अनुकूल न हो । यदि तुम्ह किसो वस्तु विशेष से. अरचि हो अथवा विकार होने का सभावना हो तो रसोइ करने- वाले के पास तुम्हे इस बात को सूचना नत्रता पूर्वक पहुँचा देना चाहिये । इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिये कि भोजन परि- माण से अधिक न पाया जावे और न कम भी किया जावे। जिसके यहां पहुनई में जाना हो उसके लड़के-बन्चो के लिए मिठाई, खिलोने अथवा टोपी, रूमाल प्रादि ले जाना बहुत आवश्यक है। पहुनई समाप्त कर घर को लौटते समय लड़के बच्चो को योग्यतानुसार दो एक रुपये दे देना किसी प्रकार अनुचित नहीं है । गृह-स्वामी के नौकर-चाकरों और रसोइये को भी कुछ मामूली रकम पुरस्कार में दी जावे । पहुनई को अवधि में मनुष्य को इस वात को सावधानी रखना चाहिये कि उसका ऊपरी सर्च गृह-स्वामी को न देना पड़े। पाहुने को यह भी उचित नहीं है कि वह किती बाहरी आदमी को अपने साथ गृह-स्वामी के यहाँ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार भोजन करने के लिए लाये । यदि पहुनई की अवधि में कोई दूर मिन पाहुने का निमन्त्रण करे तो उसे यह निमत्रण स्वीकार क के पूर्व गृह-स्वामी से इस काम के लिए अनुमति ले लेना चाहि ओर यदि इसमे उसको कुछ सेद हो तो पाहुने को वह निमन उस समय स्वाकृत नहीं करना चाहिये । कभी-कभी ऐसा होता कि गृह-स्वामी किसी दूसरी जगह निमनित किया जाता है म उसके साथ शिप्राचार-यश पाहुने को भी निमन्त्रण दिया जाता ऐसी अवस्था मे पाहुने को अधिकार है कि वह उस निमन्त्रण स्वीकार करे अथवा न करे। तो भी अस्वीरति इस प्रकार जावे कि निमन्त्रण देने वाले को बुरा न लगे। कभी-कभी पहुनई कुटुम्ब सहित की जाती है । इस अवस्था पाहुने के घर के लोगो को रसोई-कार्य में गृह-स्वामिनी की सहायता करना चाहिये । पाहुनी को गृह-स्वामिनी के साथ पे चर्चा चलाना उचित नहीं जिसमें परस्पर मन मुटाव हो जाने प्राशका हो । गृह-स्वामिनी की अवस्था और सम्बध के विचार पाहुनी को आते और जाते समय उसका भेंट आदि से उनि सत्कार करना चाहिये । यदि गृह स्वामिनी किसी भले घर में स्त्रियो के यहाँ वेठने जाने और पाहुनी से भी साथ चलने के लि प्राग्रह करे तो कोई विषेप कारण न होने पर उसे गृह-स्वामिनी साथ जाना चाहिये । इसी प्रकार पाहुना भी गृह-स्वामी के स उसके मित्रो के यहाँ वेटने को जा सकता है। जितने समय तक पाहुना अपने मिन या सम्मपी के घर रहे उतने समय तक उसे बहुधा उसी कोटे या स्थान में रह चाहिये जो उसके लिए नियत किया गया हो । यदि उसका सम्म ऐसा हो कि यह स्त्रियों के पास भी पा जा सकता हो तो सूचन देकर यह घर के भीतर भी अपना कुछ समय बिता सकता है । यो पांचवां अध्याय पेसा न हो, तो उसे आवश्यकता पड़ने पर और सूचना देने पर ही घर के भीतरी भाग में जाना चाहिये । आते जाते समय सभ्यता- पूर्वक थोड़ा-बहुत खाँस देने से स्त्रियो को पुरुषो को उपस्थिति की सूचना मिल सकती है । इस सक्त का उपयोग उस समय भी किया जा सकता है जब स्त्रियों घर के किसी भीतरी भाग में भी वेठी हो । स्त्रियों के बीच में अचानक पहुंच जाना और उनको अपनी मर्यादा का पालन करने के लिए अवसर न देना असभ्यता के चिह्न हैं। यदि प्रातियेय को अपने काम-काज के लिए अधिक समय तक बाहर रहने की आवश्यकता पड़ती हो और घर में एक-दो स्त्रियों को छोड़ कोई बडे लड़के या पुस्प न हो, तो पाहुने को उचित है कि घह गृह स्वामी के घर लौटने के समय तक वस्ती में किसी दूसरे मित्र के पास अथवा दर्शनीय स्थान देखने में अपना समय बितावे, क्योकि पर्दा करने वाला स्त्रियों के पास पुस्पो की अनुपस्थिति में रहना सन्देह को दृष्टि से देखा जाता है । यदि पाहुने के ठहरने का स्थान पेसा हा कि उसका सर निस्तार याहरी कोठे में ही हो सकता है ना वह पुरुषो को अनुपस्थिति में अपने स्थान ही में रह सकता है। पाहो का उचित सत्कार करने की अोर गृह-स्वामी को विशेष ध्यान देना चाहिये । यथा सम्भव वह पाहुने के साथ बैठकर भोजन करे और यदि पाहुना बाहर गया हो ता भोजन के लिए उसकी प्रतीक्षा करे । मुरय भोजनों के पूर्व पाहने के लिए जल-पान का प्रबध कराना भी आवश्यक है। भोजन समय-समय पर हेरफेर के साथ तैयार कराया जावे और जहाँ तक हो वह पाहुने की स्थिति के अनुरूप हो । भोजन स्वन्त्र पानों में और उचित परिमाण मे परखा जावे। पाहुने से, भोजन करते समय, कुछ अधिक भोजन हिन्दुस्थानी शिष्टाचार के लिए थोड़ा-बहुत अनुरोध करना अनुचित नहीं है, पर परिमाण से अधिक परसना अथवा खिलाना निन्दनीय है। पाहुने के आगमन के समय उसका पादर-सहित स्वागत कर चाहिये और यदि उसके आने के निश्चित समय को सूचना मि जावे तो उसे स्टेशन में अथवा घर से बाहर कुछ दूरी पर लेने लिए जाना चाहिये । इसी प्रकार पाहुने की विदाई के समय उसके साथ कुछ दूर जाकर प्रादर-सत्कार की त्रुटियो के लि क्षमा माँगना चाहिये। पाहुने को उचित है कि वह अपने घर पहुँचने पर प्रातियेय अपनी क्षम-कुशल का पत्र भेजे और कुछ समय तक पत्र-व्यवह जारी रस्खे जिसमें गृह-स्वामी की ओर उसकी - कृतज्ञता प्रा हो । उसे यह भी उचित है कि आगे चलकर किसी उपयुक्त सम पर वह अपने उस मित्र को अपने घर उसी प्रकार प्रहुनई करने लिए निमन्त्रण दे जिस प्रकार उसने उसे दिया था। (७) शारीरिक शुद्धि में शारीरिक शुद्धि केवल स्वास्थ्य की दृष्टि से ही नहीं, कि शिष्टाचार की दृष्टि से भी प्रावश्यक है। याजकल पढ़े लिखे लो में बहुत सी ऐसी बातो का विचार किया जाता है जिन पर अप लोग विशेष ध्यान नहीं देते। उदाहरणार्थ, वाल बनवाने के ही प्रा को नीजिये । अपढ़ लोग बहुधा एक पखवाड़े तक हजामत न धनवाते, परन्तु शितित लोग सप्ताह में कम से कम दोबार अवा घालाबनवाते हैं। जेटल मैनों के बाल तो प्राय प्रति-दिन बना जाते है और यदि नाई न मिले तो वे अपने,ही हाथ से हजामत = लेते हैं। इसी प्रकार लोगो को नख कटवाने का प्रयघा अपने हा मे काटने का ध्यान रखना चाहिये नसघाद जाने पर उनके सि परमैला का जो कालापन आ जाता है ग्रह धषित दिखाई देता है पांचों अध्याय नपो को दानों से कभी न काटना चाहिये और दूमरो के सामने तो यद काम कभी न किया जाये । नाक के मोतर के याज भी समय समय पर करवा लिये जायें जिसमे ये अपनी घाद से पुडौलपन को पड़ती न करें। जो लोग सिर के बाल बड़े-बड़े रखना पसद नहीं करते उन्हें समय-समय पर अपने बाल दोटे फरा लेना चाहिये। दांत और जीभ तथा प्रांतो और कानो की स्वच्छता पर भी विशेष ध्यान दिया जावे । जो लोग लहसुन और प्याज साते हैं अथवा जिहे तमासू साने, घोड़ी पीने अथवा और किसी दुर्गध- कारो व्यसन को पादत हो उहे दूसरों से बातचीत करने के पूर्व लौंग, इलायची, जायपत्री अथवा कावचिनी मे अपने मुख की दुर्गध दूर कर लेना चाहिये। यदि किसी समय ये साधन उपलब्ध न हों तो केवल फुल्ने हो से काम चला लिया जाय। किसी किसी की यह आदत होती है कि ये बहुधा मुँहासे फोड़ा करते हैं अथवा यार-बार नाक में प्रगुती डालकर उसे साफ करते रहते हैं। ये काम स्यय घृणित है और दूसरे लोगो के सामने इनकी घृणा और भी बढ़ जाती है। लोगों को चाहिये कि हाथों को सदैव शुद्ध रक्सें। यह बात उस समय भोर मी प्रायश्यक है जब किसी मे हाथ मिलाने फा अपया किसी को डूंने का काम पड़े। कुछ लोग कागज, पुस्तक के पने अथवा ताग सरकाने के लिए अंगुली को मुस-रस से अपपिन करते हैं और उसमे अपविन की हुई वस्तु दूसरे को दे देते हैं। • यह क्रिया बहुत ही अनुचित है। कई लोग डाक टिक्ट को भी जीम से गीला करके चिपकाते हैं। यह कार्य और दृश्य बहुत ही घृणित हैं। यदि इन कामों के लिए समय पर पानी न मिले तो सिर के पसीने से काम लिया जा सकता है जो उस घृणित द्रव पदार्थ से कहीं अच्छा है।
हिन्दुस्थानी शिष्टाचार समझा जाता है । बड़े लोगों के सामने अनुवित हॅसी को रोकना बहुत आवश्यक है। जहाँ तक हो पुरुषों को कठिन में कठिन दुख में भी रोना अथवा बहुत विलाप करना उचित नहीं है । यद्यपि हदय का दुख कभी-कभी बिना रोये शान्त नहीं होता, तथापि पुरुषों को अत्यन्त धैर्य धारण करना चाहिये । किसी किसी जाति मे स्त्रियाँ अपने सम्बन्धियो से मिलने पर भेंट करती हुई जोर जोर से रोती हैं, पर ऐसा करना उचित नहीं । स्त्रियो को बाजार में या सड़क पर अपनी नातेदारिनों से भेंट करते समय कभी न रोना चाहिये। कई लोग बहुधा धन, पदवी अथवा विद्या के यभिमान में हाथ जोड़कर किये गये प्रणाम का उत्तर केवल सिर हिलाकर या एक हाथ उठाकर देते हैं। ऐसा करना शिष्टाचार के विरुद्ध है। कोई- कोई लोग केवल मुख से ही प्रणाम का उत्तर दे दते हैं और हाथ से कुछ भी सकेत नहीं करते। कुछ लोग हाथ न जोड़कर केवल मुँह से ही प्रणाम या नमस्कार कहते हैं । ऐसे लोगों को उन्हीं की रीति के अनुसार उत्तर देना अनुचित नहीं है। कुछ लोग ऐसे भी पाये जाते हैं जो अंगरेजो की नकल करके केवल एक अंगुली उठाकर प्रणाम का उत्तर देते हैं, ऐसा करना भी अशिष्टता है। कई लोग मुसलमानों को देखा-देसी आवश्यकता से अधिक मुककर और हाथ को कई बार माथे तक ले जाकर प्रणाम करते हैं। यह क्रिया हिन्दुस्थानी शिष्टाचार की गम्भीरता के विरुद्ध और बनावटी ममझी जाती है । ऊचे पदाधिकारियो से अवश्य ही उनकी मर्यादा के अनुसार नम्रता पूर्वक प्रणाम करना चाहिये । जर तक विशेष परिचय अथवा प्रेम-भाव न हो तब तक किसी से बहुत दूरी पर रहकर प्रणाम न किया जावे। जो लोग मूक प्रणाम करते हैं उन्हें उसी रीति से उत्तर देना आवश्यक है। - पांचया अध्याय कसरती लोग बहुधा अकरकर या झूमकर चलते हैं, पर उनका यह कार्य शिष्टाचार के अनुफज नहीं माना जा सकता। दुबले पतले और बूढ़े भादमियों का इस प्रकार चलना तो उपहास के योग्य है। करलोग हाय पाय फटकारकर ऐसी विचित्र चाल चलते हैं जिसे देखकर लोगों को हंसी आजाती है। यहुधा किसी एक चाल मे चलने का अभ्यास कुछ समय में पेसा पक्का हो जाता है कि यह कठिनाई से छूटता है, इसलिए किसी को भी यनावटो चाल चलने की आदत न डालनी चाहिये। जहाँ तक हो चलने की रोति न रिलगुल धीमी हो और न बिलकुल सपाटे की। लोगों को सदैव अपो योये हाय को ओर चलना चाहिये और अपने को दूसरे के तथा दूसरो को अपने धक्के से बचाना चाहिये। जहां चार आदमी बैठे हो यहाँ पैर फैलाकर अथवा दूसरी की मोर पैर करके बैठना उचित नहीं । युसी पर दोनो या पक पेर रसकर वेठना अथवा पैरो को नीचे रसकर उन्हें हिलाते रहना प्रशिष्ट समझा जाता है। अधिक प्रतिष्ठित लोगो की बरावरी से बिना उनका इन्छा के न बैठना चाहिये। फर्श पर जूता पहिने अथवा मैले पाँव मे वेटना ठीक नहीं। किसी को और लगातार टकटकी लगाकर देखना अनुचित है।चलते समय लोट-लौटकर पोछे देसना या चार गार दौर्य- याय देसना उचित नहीं है। बातचीत करते समय सुननेवाले की मोर देखकर बातचीत करना चाहिये और उसकी बात सुनते समय भी वैसी हो दृष्टि रखना चाहिये । जब कोई मनुष्य स्नान अथवा भोजन करता हो या कपड़े पहिनता हो, तव जहाँ तक हो सके, उसकी पोर आवश्यकता से अधिक दृष्टि न डाली जाय । कभी कभी लोग परिचित लोगो से भी कारण वशात् असि पचाकर निकल जाते हैं, पर ऐसा यहुधा न किया जावे । किसी की ओर ।
हिन्दुस्थानी शिष्टाचार तिरछी दृष्टि से पोर यथा-सम्भव, क्रोध भरे नेयो से देखना उचित नहीं है । जिन लोगेा की दृष्टि मद होती हे ये कभी कभी दूसरों की ओर देखते हुए भी यथार्थ में उनको कुछ दूरी पर देख नहीं सकते इसलिये यदि ऐसे लोग ऑखें मिलाने पर भी कुछ न बालें तो इसे उनका दोप न समझना चाहिये और स्स्य उनसे बात-चीत प्रारम्भ कर देना चाहिये। (९) स्वाभाविक क्रियाओं में जुभाई लेते समय मुँह को हाथ से ढक लेना चाहिये जिसमे दूसरो को बाये हुए मुंह का विचित्र दृश्य न देस पड़े और उस पर इस क्रिया का प्रभाव भी न पड़े। बड़े लोगो के जंभाई लेने पर चापलूस लोग बहुधा चुटकियां बजाते है । यद्यपि बड़े लोगो के सम्बन्ध से यह काम निन्दनीय समझा जाता है तथापि छोटे बच्चों के जंभाई लेने पर चुटकियाँ बजाना बहुत आवश्यक है। क्योंकि इससे उनका ध्यान दूमरी ओर आकर्षित होने पर जॅभाई के पश्चात् उनके जर यथा-स्थान मिल जाते हैं और वे दुर्घटना से रक्षा पा लेते हैं । जॅभाई के समय मुँह को हथेली के द्वारा बद करने से बड़ी उमर के लोग भी उस दुर्घटना से बच सकते हैं । छींक पाने पर लोगो को आस पास बैठे हुए मनुष्यों से कुछ दूर हट जाना चाहिये अथवा अपना मुँह एक ओर फेर लेना चाहिये जिससे दूसरो पर अपवित्र छींटे न पड़ें। लगातार छोक माने पर तो रुकनेवाले को अपने स्थान से उठ जाना अत्यन्त आवश्यक है । वीक चुकने के पश्चात् उसे अपना मुंह अच्छी तरह पोछ लेना चाहिये । शिष्टाचार के फेर में पड़कर छौंक को रोकना उचित नहीं, क्योंकि इससे स्वास्थ्य सम्बन्धी हानि होने की सम्भा- बना है। यदि शंक आने पर नाक के आम पास रूमाल लगा लिया जावे तो उससे दूसरी का बहुत कुछ बचाव हो सकता है।
पांचा अध्याय ६३ अंगरेजो में दूसरे लोगों के सामने डकार लेना परम पृगित समझा जाता है। यद्यपि हिन्दुस्थानी समाज में इस क्रिया को उतनी घृणा को दृष्टि से नही देखते तथापि इसे थोड़ा यात अशिष्ट प्रयश्य समझते हैं । स्यय डकार युरो वस्तु नहीं है और उससे डकार लेने याले को स्वास्य समधी लाभ भी होता है, पर उससे जो दुर्गध सी फेलती है यह दूसरो के लिए हानिकारक है । जॅमाई के समान डकार लेने में भी हाय का उपयोग किया जा सकता है और उससे दुर्गध का निधारण हो सकता है। जो पात डकार के सम्मघ म कही गई है यही कुछ हेर फर के साथ हिवकी के समय में भी कही जा सकती है। खांसते समय मुंह पर हाथ लगा लेना चाहिये जिससे पास बैठे हुए लोगो को किसी प्रकार असुविधा न हो । सभा-समाज में यदि खांसी पुल उप-रूप धारण करे और साधारण से अधिक समय तक चले तो सांसने-याले को वहां से उठ पाना चाहिये जिसमे हमरा के कार्य में विमान हो । सांसी बहुधा ऐसा रोग है कि किसी एक का सांसना सुनकर आसपास बैठे हुए लोग भी सांसने लगते हैं और इस सम्मिलित कोलाहल से दूसरे लोगो के काम- काज में प्रथया सभा-समाजो के कार्य में बाधा आ जाती है, इस. लिये जिसे सांसी की कुछ भी शिकायत हो उसे ऐसे अवसर पर मुँजी हुई लोगो का उपयोग करना चाहिये निससे खांसी कुछ शान्त हो जाती है। इनके अतिरिक्त युर स्वाभाविक क्रियाएँ ऐसी हैं जिनको सदय दूसरो को दृष्टि बचाकर करना चाहिये । इन क्रियानो के पश्चात् और दूसरो के समीप पाने अथवा उन्हें छूने के पूर्व, हाथ पॉव और मुख की शुद्धि कर लेना परम आवश्यक है जिसमे दूसरे को कोई म्लानि न हो । यदि इनमें से कोई एक क्रिया मनुष्य की विर- हिन्दुस्थानी शिष्टाचार शता के कारण दूसरे के सामने हो जाय तो उन्हें उसके प्रति उप- हास, घृणा अथवा तिरस्कार प्रकट न करना चाहिये, वरन सहानु- भूति का व्यवहार करना उचित है। सामरिक क्रियानो मे सदैव इस वात का ध्यान रखना चाहिए कि किसी के सामने जो निगाडने वाली कोई किया न की जावे । साने वाले को सोने के पूर्व इस बात की सावधानी रख लेना चाहिए कि मोते समय कोई गुप्त अग उधर न जाय । सोते हुए मनुष्य को किसी विशेष आवश्यकता के बिना जगाना उचित नहीं, पर यदि उसके कुछ अग खुल जाये तो उसे धीरज-पूर्वक सचेत कर देना चाहिए । जिम स्थान में कोई व्यकि सोता हो उसके पास हल्ला अथवा जोर से बातचीत करना अनुचित है।
छटा अध्याय विशेष शिष्टाचार (१) स्त्रियों के प्रति हिदुस्थानी समाज में त्रियो और पुरुषों का घटुधा येसा स्वतत्र और परस्पर व्ययहार नहीं होता जैसा अंगरेजो के समाज में प्रथा पर्दा प्रणाली का पालन न करनेपाली अन्य भारतीय समाजों में होता है। हम लोगो के समाज में जहाँ तक होता है पुरुष स्त्रियों के किसी भी काम-काज प्रथया सम्मेलन में शामिल नहीं होते, इसलिये हिदुस्थानी लोगो को इस बात का ध्यान रसना चाहिये कि ये विना प्राशा, अनुमति अथवा सूचना के स्त्रियों की मण्डली में न जाधै। परिचित स्त्री से भी बिना विशेष कारण के अधिक बातचीत करना अनुचित है । यदि बड़ी आवश्यकता हो और उस स्त्री के साथ कोई वयोवृद्ध सगनी हो तो प्रावश्यक यात चीत कर ली जा सकती है। एकान्त स्थान में किसी अकेली तरण सी के पास उचित कारण के पिना ठहरना अथवा उससे यात- चीत करना अनुचित है। त्रियो से सड़क पर सम्भवत' कभी यात- चोत न की जावे। रियो के सामने स्त्रियो अथवा पुरुषों से सम्बध रखने वाले विशेष रोगों की चर्चा करना प्रथया उनके लक्षण घताना अशिष्टता है। महिला मण्डली में प्रश्लील अथवा प्रेम के गीत गाना या प्रमभ्य हँसी करना शिष्टाचार के विरुद्ध है। किसी तरुण स्त्री से उसकी उमर न पूछी जाये और न उमर के सम्बन्ध में कोई और प्रश्न किया जाये । अदालत तक में किसी स्त्री से बहुधा उस विषय हिन्दुस्थानी शिष्टाचार के प्रश्न नहीं पूछे जाते । किसी पिता से उसकी बड़ी अवस्था-याली लड़कियों की अवस्था न पूछना चाहिये। यदि आवश्यकता हो तो इस प्रकार के प्रश्न परोक्ष रूप से अथवा दूसरी बातो के सम्बन्ध से पूछे जा सकते हैं । जो स्त्रियाँ सभा-ममाजो मे पाती हैं और पर्दे का पालन नहीं करतों उनसे भी बातचीत करने में बड़ी सावधानी की आवश्यकता है। यदि किसी सभा में कोई स्त्री भाषण देती हो तो उसकी ओर टकटकी लगाकर न देखना चाहिये। सभा में आई हुई स्त्रियों को हार पहिनाने की आवश्यकता हो तो यह काम सोलह वर्ष तक की श्रयस्था-वाले लड़की से कराया जाय अथवा हार स्त्रियों के हाथ में दे दिया जावे। सकट में पड़ी हुई लियो को बचाना केरल शिष्टाचार ही का कार्य नहीं, किन्तु वीरता (सदाचार) का भी कार्य है। यदि कोई बच्चा या गुडा किसी सभ्य स्त्री के साथ छेड़-छाड़ करता हो तो मनुष्य कहलाने वाले प्रत्येक मनुष्य का धर्म है कि यह शक्ति-भर उसे घचाने और अत्याचारी को दण्ड देने या दिलवाने का प्रयत फरे । राजपूतकाल मे तो वोर लोग त्रियो की रक्षा के लिए प्राण तक दे देते थे, पर दुर्भाग्य-वश अब वह समय दिखाई नहीं देता। स्त्रिया से जहाँ तक हो नम्रता का व्यवहार किया जावे । उनके प्रति क्रोध प्रगट करना अथवा दिल दुखाने वाला कोई बात कहना अनुचित है। उनकी भूलें धीरता से सुधार दी जाये और भागे-पीछे बिना किसी विशेष कारण के उन भूलो का उल्लेस न किया जावे । उनकी उचित सम्मति को मान देना चाहिये और महत्व-पूर्ण विपयो में उनकी सम्मति लेना चाहिये । जहाँ तक ही घर का भीतरी पार स्त्रिया ही को साप दिया जाये और उनके कार्यों में व्यर्थ हस्तक्षेप न किया जाये।
छठा अध्याय जिन स्त्रियों से हँसी करने का सम्बन्ध होता है उनसे कभी कभी केवल सभ्यता पूर्ण फुल विनोद किया जाये । भौजाई में हंसी करना शिष्ट नहीं जान पड़ता और उसमे पैर पड़याना तो और भी असभ्य है। यथार्थ म भौनाई का स्थान माता के जगमग है, इस लिये देवर का कर्त्तव्य है कि यह भोजाई मे नम्रता और आदर का व्यवहार करे । ये विचार या ऊँची जातियो से ही सम्बधरसते हैं, क्योकि अन्य जातिया में तो भाई के मरने पर भौजाई के माय पुनर्विवाह कर लेने की प्रथा पाई जाती है। बूढ़ी और जेठी स्त्रियो के साथ विशेष नम्रता का व्यवहार आवश्यक है। उनके प्रमसन होने पर भी उन्हें उत्तर देना उचित नहीं है, घरन उनसे बार-बार क्षमा मांगने की आवश्यकता रहती है। उनको अपने काम-काज में सदा सहायता दी जाये और उनकी आशा का सदा पालन किया जाये। बहुधा तरुण महिलाएँ यूही स्त्रियो का अनादर करती है अथवा उनको हंसी उड़ाती हैं, यह बहुत ही अनुचित प्रथा है। हिदुस्थानी समाज में जिस पाजी का आदर उसके नाती रानी के समान करते हैं, उसकी ओर भी घर की तरण स्त्रियों अथवा लड़- कियां कभी कभी अनुचित व्यवहार करने लगती हैं। यह वर्ताव बहुत ही निन्दनीय है। यदि मार्ग में कोई स्त्री सामने से आती हो तो उसके लिए मार्ग छोड़ देना उचित है । अनजान स्त्रियो के पीछे पीछे अथवा उनकी घरातरी से चलना भी अनुचित है। किमो प्रमुख स्थान में वैठकर रास्ते में प्राने जानेवाली स्त्रियों की ओर देखते रहना प्रशिता है। जिन मेलो म बहुधा स्त्रियों ही जाती हैं उनम पुरपो को बिना किसी रिशेष आवश्यकता के न जाना चाहिए। इसी प्रकार जिस घाट पर स्त्रियों नहाती हो वहाँ जाना अथवा एक अोर सड़े होकर उनकी तरफ देखना पुरुषो के लिए अनुवित है। सवारियो हि०शि०-७ - हिन्दुस्थानी शिष्टाचार के प्रश्न नहीं पूछे जाते । किसी पिता मे उसकी बड़ो अवस्था बाली लड़कियो की अवस्था न पूछना चाहिये । यदि आवश्यकता हो तो इस प्रकार के प्रश्न परोक्ष रूप से अथवा दूसरी बातो के सम्बन्ध से पूछे जा सकते हैं । जो स्त्रियाँ समा-समाजो में प्राती है और पर्दे का पालन नहीं करती उनसे भी वात-चीत करने मे बड़ी सावधानी की आवश्यकता है। यदि किमी सभा में कोई स्त्री भाषण देती हो तो उसकी ओर टकटकी लगाकर न देखना चाहिये। सभा में आई हुई स्त्रियों को हार पहिनाने की आवश्यकता हो तो यह काम सोलह वर्ष तक की अवस्था वाले लड़को से कराया जाय अथवा हार स्त्रियों के हाथ में दे दिया जाये। सकट मे पड़ी हुई स्त्रियों को बचाना केरल शिष्टाचार ही का कार्य नहीं, किन्तु वीरता (सदाचार) का भी कार्य है। यदि कोई बच्चा या गुडा किसी सभ्य स्त्री के साथ छेड़-छाड़ करता हो तो मनुष्य कहलाने घाले प्रत्येक मनुष्य का धर्म है कि वह शक्ति भर उसे घचाने और अत्याचारी को दगड देने या दिलवाने का प्रयत्न करे । राजपूतकाल में तो वीर लोग स्त्रियों की रक्षा के लिए प्राण तक दे देते थे, पर दुर्भाग्य-वश अब यह समय दिखाई नहीं देता। स्त्रियो से जहाँ तक हो नम्रता का व्यवहार किया जावे। उनके प्रति क्रोध प्रगट करना अथवा दिल दुखाने वाला कोई बात कहना अनुचित है। उनकी भूलें धीरता से सुधार दी जावे और आगे पीछे बिना किसी विशेष कारण के उन भूलो का उल्लेख न किया जावे। उनको उचित सम्मति को मान देना चाहिये और महत्व पूर्ण विषयो में उनकी सम्मति लेना चाहिये । जहाँ तक हो पर का भीतरी प्राध स्त्रियो ही को सौप दिया जाये और उनके कार्यों में व्यर्थ हस्तक्षेप न किया जाये। ।
छठा अध्याय जिन स्त्रियो से हँसी करने का सम्बध होता है उनसे कभी कभी फेल सभ्यता पूर्ण पुर विनोद किया जाये । भौजाई से हंसी करना शिष्ट नहा जान पदता और उससे पैर पड़पाना तो और भी असभ्य है। यथार्थ में भौजाई का स्थान माता के लगभग है, इस लिये देवर का कर्त्तय है कि यह भौजाई से नम्रता और आदर का व्यवहार करे। ये विचार बहुधा ऊँची जातियो से ही सम्बधरसते हैं, फ्योकि अन्य जातियों में तो भाई के मरने पर भोजाई के साथ पुनर्विवाह कर लेने की प्रथा पाइ जाती है । बूढी और जेठी स्त्रियो के साथ विशेष नम्रता का व्यवहार आवश्यक है। उनके अप्रसन्न होने पर भी उह उत्तर देना उचित नहा है, घरा उनसे चार-बार क्षमा माँगने की आवश्यकता रहती है । उनको अपने काम-काज में सदा सहायता दी जाये और उनकी आज्ञा का सदा पालन किया जाये। घट्धा तगण महिलाएँ ही स्त्रिया का अनादर करती हैं अथवा उनकी हँसी उड़ाती हैं, यह बहुत ही अनुचित प्रथा है। हिन्दुस्थानी समाज म जिस पाजो का आदर उसके नाती रानी के समान करते हैं, उसकी ओर भी घर की तरुण स्त्रियों अथवा लड़ कियां कभी-कभी अनुचित व्यवहार करने लगती हैं। यह बर्ताव बहुत ही निन्दनीय है। यदि मार्ग में कोई स्त्री सामने से आती हो तो उसके लिए मार्ग छोड़ देना उचित है । अनजान खियो के पीछे पीछे अथवा उनकी बराबरी से चलना भी अनुचित है। किसी प्रमुख स्थान में वैठकर रास्ते में आने जानेपाली स्त्रियो को और देखते रहा प्रशिष्टता है। जिन मेलो में बहुधा स्त्रियाँ ही जाती हैं उनमें पुस्पो फो जिना किसी विशेष आवश्यकता के न जाना चाहिए। इसोप्रकार जिस घाट पर स्त्रियाँ नहाती हो वहाँ जाना अथवा एक ओर खड़े होकर उनकी तरफ देखना पुरुषो के लिए अनुचित है। सवारियो हि०शि०-७ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार के प्रश्न नहीं पूछे जाते । किसी पिता से उसकी बड़ी अवन्या-पाली लड़कियो की अवस्था न पूछना चाहिये। यदि आवश्यकता हो तो इस प्रकार के प्रश्न परोक्ष रूप से अथवा दूसरी बातो के सम्बर से पूछे जा सकते हैं । जो स्त्रियाँ सभा-समाजो मे पाती हैं और पर्दे का पालन नहीं करती उनसे भी वात-चीत करने में बड़ी सावधानी की आवश्यकता है। यदि किसी सभा में कोई स्त्री भाषण देती हो तो उसकी ओर टकटकी लगाकर न देखना चाहिये । सभा में आई हुई स्त्रियों को हार पहिनाने की आवश्यकता हो तो यह काम सोलह वर्ष तक की अवस्था-वाले लड़को से कराया जाय अथवा हार स्त्रियो के हाथ में दे दिया जाये। सकट में पड़ी हुई स्त्रियों को बचाना केवल शिष्टाचार ही का कार्य नहीं, किन्तु वीरता (सदाचार) का भी कार्य है। यदि कोई लुच्चा या गुडा किसी सभ्य स्त्री के साथ छेड़-छाड़ करता हो तो मनुष्य कहलाने वाले प्रत्येक मनुप्य का धर्म है कि वह शक्ति-भर उसे बचाने और अत्याचारी को दण्ड देने या दिलवाने का प्रयन करे । राजपूतकाल में तो वोर लोग त्रियो की रक्षा के लिए प्राण तक दे देते थे, पर दुभाग्य-वश अब वह समय दिखाई नहीं देता। स्त्रिया मे जहाँ तक हो नम्रता का व्यवहार किया जावे । उनके प्रति क्रोध प्रगट करना अथवा दिल दुखाने वाला कोई बात कहना अनुचित है। उनकी भूलें धीरता से सुधार दी जायें और आगे-पीने बिना किसी विशेष कारण के उन भूलो का उल्लेख न किया जाये। उनकी उचित सम्मति को मान देना चाहिये और महत्व पूर्ण विषयो में उनकी सम्मति लेना चाहिये । जहाँ तक हो घर का भीतरी प्राय स्त्रियों ही को सौप दिया जावे और उनके कार्यों में व्यर्थ हस्तक्षेप न किया जाये।
छठा अध्याय बड़ी उमरवालो के सामने छोटी के लिए पद पदकर गते करना प्रथया गप्प होकना उचित नहीं है। उनसे पात-चीन करते समय स्थिति के अशुमार "आप"गद का उपयोग किया जाय । बदी पार हा के उविन रोनि में प्रसन्न होने पर नोटोरो अपनी उदगडता में उन्ह और भी अपमान न करना चाहिए। उन लागा से अपने अपराधो के लिए तमा मांगन म कोई लजा की बात नही है। बूढ़े लोगों का फभी उपहास न किया जाय । फोई फाई मूर्ख लड़के वड़ा पार यूहा को विदाने में अपना गरिव मा समझते हैं, पर ये यह नहीं जानते कि एक दिन उनकी भी वैसी ही दशा होगी मार दूसरे लोग उहं चिदायेंगे । लोगेा की असभ्यना से कर पाकर ही यूहे लोग कुन चिड़ बिड़े हो जाने हैं। बड़ा और बूढ़ों में मुँह जारी करना भी अशिष्टता का चिद्ध है। भोड़ मेला में घूढ़ा की रक्षा करना तरुण पुरुषों का कत्तय है। यदि कोइ दो के प्रति अगुपित वताय करता हो ता दुसरो को उचित है कि ये उम उपद्रवी का दमन करें। यदि प्रावश्यकता हो ता बूढ़ों को हाथ पकड़कर मार्ग दिखाना चाहिए और उनका सामान प्रादि ले जाने में भी सहायता देना चाहिए । बड़ो और दो से पाद रियाद करना उचित नहीं समझा जाता। यदि उनकी कही हुई वात मुनने गले को स्वीटत प्रथा प्रिय न हा तो उसे चुप हो जाना उचित है। यदि कोई विशेष हानि न हो तो बूढ़े लोगों के मत का खण्डन न किया जाये। यदि इसका प्रसङ्ग पाजावे तो बहुत ही नम्रता पूर्वक खण्डन किया जाये। कभी कभी बूढ़े मनुप्य ही आपस मे अनुचित व्यवहार करते हैं और अवस्था के गुण के कारण एक दूमरे कीबात मानने में अपनी हीनता समझते हैं । ऐसी अवस्था में किसी योग्य वरण पुरुष को बीच में ह हिन्दुस्थानी शिष्टाचार में भी पुरुषो का यह कर्त्तय है कि जहाँ तक हो मके वे स्त्रियों के लिए आवश्यकता पड़ने पर जगह पाली कर दें। (२)पये और चूहो के प्रति छोटो का कर्तन्य है कि वे अपने में यह और बूढ़े लोगो की उचित प्राक्षा का पालन करें,चाहे ये किसी भी जाति अथवा स्थिति के क्यो न हो । यदि वे लोग सभ्यता पूर्वक किसी कार्य में छोटों से सहायता मांगे तो इन्हें यथा सम्भव उनकी सहायता करनी चाहिये। बड़े ओर पूढे लोगो का उचित आदर किया जाय और उनसे प्राव श्यक कार्या में सम्मति लो जावे। अपने से अधिक उमर-वाले परिचित लोगो से भेंट होने पर प्रणाम करना चाहिए और यदि वे फुत्र पूर्व तो सभ्यतापूर्वक उनकी बात का उत्तर देना चाहिये । गुरु के प्रति विद्यार्थी को सटेच नम्रता और श्रादर का भाव प्रकट करना चाहिए । जर तक को सदिग्ध अवस्था उपस्थित न हो, तब तक गुरु की आज्ञा टालना अनुचित है। गुरु से जितने बार भेंट हो, उतने हो बार श्रादर पूर्वक प्रणाम करने में कोई हानि नहीं है। गुर से व्यर्थ वाद-विवाद अथवा मुँह-जोरी करना विद्यार्थी के लिए निदा का विषय है । पाठशाला सम्बधी कार्यों में गुर की आज्ञा न मानना अपने कर्त्तय को भूलना है। विद्यार्थी बहुधा पाठ शाला मे दिया हुआ शिक्षा सम्बन्धी कार्य न करने पर भूल जाने का बहाना करते हैं, पर यह काम सममदार विद्यार्थियों के लिए बहुत ही अनुचित है। गुरु के सामने पोशाफ अथवा यातचीत में असाधारणता दिसलाना उचित नहीं । कई एक विद्यार्थी दूसरे विद्यार्थियों के मामने शिक्षक की कई-प बातो की नकल करके विनोद किया करते हैं, पर यह काम अशिष्टता का है । जहाँ तक हो विद्यार्थी का कर्तव्य है कि वह आवश्यकता पड़ने पर अपने शिक्षक को शकि-भर उचित सहायता देने में कमी न करे।
छठा अध्याय यदि किमी परिचित व्यक्ति का लड़का कुछ अनुचित कार्य करता हुआ पाया जाये तो उसे इस पाशा पर ही रोकना चाहिये कि उसका पिता दूसरे के हस्तक्षेप करने से अप्रसन न होगा । यद्यपि कोई भी विचारवान मनुष्य किसी नवयुवक को गढे में गिरते देख- कर चुप नहा रह सकता, तथापि उसे बिना सोचे विचारे, दूसरे के कार्य में हस्तक्षेप करना उचित नहीं, क्योकि कई एक पिता दूसरे के द्वारा की गई अपने लडको की नि दा सुनना पसद नहीं करते। ऐसी अवस्था में छोटे लडको की शिकायत उनके पिताश्रो से करने मे भी बड़ी सावधानी रखना चाहिये । रमा लरके भी इस प्रकार निन्दा करने वाले से अप्रसन हो जाते हैं और उसे अपना द्रोही समझने लगते हैं, इसलिये लडको की नि दा को भी पर निन्दा के समान त्याग देना चाहिये । सेद की बात है कि बड़े लोगो की उदा- सीनता से कई एक नवयुवकों का जीवन भ्रष्ट हो जाता है। छोटे लड़के बहुधा सिलौनो और मिठाई के लिए इच्छा और हठ किया करते हैं । यद्यपि उनको इच्छा और हठ को सदैव मान देना अनुचित है, तथापि समय-समय पर इन वस्तुप्रो से उनका मनोरञ्जन करने की आवश्यकता है। माता पिता तथा पडे भाई- बहिनो को घर के छोटे छोटे लड़को के साथ कभी-कभी उनके सेलो मे भी शामिल होना चाहिये जिसमे उन्हें अपने बडो को सहानुभूति का अवसर मिले और अपने उचित कार्यों मे साहस प्राप्त हो । कई लोग दूसरो के लड़को के सामने बहुधा उनके माता पिता अथवा अन्य निकट सम्बधियो की निदा किया करते हैं । पेसा करने से वे आगे पीछे उन लड़को की दृष्टि मे हेय समझे जाते हैं और उनके माता-पिता भी उन निन्दको को तिरस्करणीय समझने लगते हैं। जो लड़के गम्भीर नहीं होते वे उस अपमान का ध्यान रखकर भविष्य में समर्थ होने पर उसका बदला लेने का प्रयत्न १०० हिन्दुस्थानी शिष्टाचार पड़कर उनका समझोता करा देने की आवश्यकता है। बूढ़े मनुष्य अपने अपमान को सहसा भूलते नहीं हैं और समय पड़ने पर बहुधा उसका बदला लेने का प्रयत करते हैं, इसलिए बूढ़े मनुष्यो को अपने समवयस्क सजन के साथ भलमनसाहत का व्यवहार करना चाहिये । यथार्थ में दो बूढे लोगो का आपस में कुछ कहना सुनना निन्दनीय विषय है। ( 3 ) छोटा के प्रति छोटी अवस्था वालो के प्रति वड़ों का यवहार महानुभूति पूर्ण होना चाहिये । जब तक छोटे, परन्तु समझदार लोग जान बूझकर कोई अपराध न करें तब तक बड़ो को उन्हे शान्ति पूर्वक क्षमाकर देना चाहिए । विना किसी शेिष कारण के बडे लोगो को छोटों के प्रति क्रोध अथवा तिरस्कार प्रगट करना उचित नहीं है। छोटो के कार्या में बडो को सदैव सहायता देने के लिए तैयार रहना चाहिये । छोटों के प्रणाम का उत्तर प्रेम-पूर्वक और उचित रीति से दिया जावे । छोटी उमर-बाले प्रार्थना अथवा परामर्श के रूप में जो कुछ कहना चाह उसे उदारता-पूर्वक सुनना उचित है। यदि छोटे लोग किसी कुसग में पड़े हो अथवा किसी युकर्म में प्रवृत हो तो बड़ा का यह काम है कि वे लोग उन्हें बिगड़ने से बचाने का उपाय करें। ऐसे लोगो को एकान्त मे परामर्श देना उचित है। नव-युवक बहुधा यात चीत, पोशाक और चाल-ढाल में कुछ वनावट प्रकट करते हैं। कुछ सीमा तक यह प्रवृत्ति उचित है, परन्तु अधिक होने पर उसे रोकने की आवश्यकता है । जिस समय छोटी उमर-वाले किसी आवेश में आकर कुछ अनुचित बातचीत करने लगे उम समय उनको किसी न किसी प्रकार से शान्त करना आव. श्यक है और फिर किसी दूसरे समय उनसे अनुचित यात-चीत के सम्बध में थोड़ा-बहुत असंतोष प्रकट करना चाहिये।
छठा प्रभ्याय यदि कोई दोन दुरपी भिक्षा मांगने प्राय प्ररि यह दानका पात्र हा तो उसे अपश्य कुदन पुर भित्ता में देना चाहिये । उसमें किसी प्रकार के कटु शन्द फहना या उसे धुतकारा यडप्पन के विपरीत है। महाजनो को भी उचित है कि य दोन दुगियों को ऋण पटाने के लिए अनुचित कर न देय पार उनका अपमान न करें। यदि कोइ मनुष्य किसी शारीरिक अपयव से हीन हो तो उसकी हँसी उड़ाना प्रयया गिना कारण के उसकी उस अषयष-होनता का उल्लेरा करना प्रसभ्यता है । अपाङ्ग मनुप्या का तिरस्कार करना अथया किसी अवयय की ही के कारण उनका घेमा नाम रसना अनुचित है। शरीर के अप्रिय रश के कारण भी किसी का अपमान न किया जाये । धनाभाव के कारण जो लोग स्थन्छ यस नहीं पहिन सकते अथना याला को स्वाव नहीं रख सकते उनसे भी घृणा न की जावे । गरीव प्रादमियो के लड़के पन्चो को और भी घृणा भाव न दिसाया जाये । दरिद्रता ऐसा पाप नहीं है कि उसने कारण मनुष्य हमरे लोगो के साथ न बैठ सके । घर पर पाये हुए दीन मनुष्य को भी उसके अनुरूप आदर के साथ बिठाना चाहिये और उसमे महानुभूति पूर्ण पात-चीन करना चाहिये । जो धनवान लोग किसी विषम सङ्कट म प्रसित हो जाते हैं ये भी एक प्रकार के दीन मनुष्य हैं । उनके सकट ग्रस्त होने पर उई किसी प्रकार का उपालम्भ देना अथवा उनके सङ्कट को भोर उदा- सीनता दिसाना उचित नहीं है । यदि किसी सन्चे मनुष्य ने हमारा कोई अपराध किया हो और यह सन्चे हृदय से दीन होकर हमसे तमा की प्रार्थना करे तो हमे सहर्ष उसे नमा प्रदान करना चाहिए। यदि उसका व्यवहार आगे सतोष-दायक रहे तो हमे किसी भी समय उसके पूर्व अपराध की चर्चा न चलाना चाहिये । किसी दीन पर किये गये उपकार का भी कभी उल्लेख न किया जावे।
हिन्दुस्थानी शिष्टाचार करते हैं, इसलिये पर-निन्दकों को कम से कम लडको के मामने उनके सम्बधियों की निन्दा मे विरत रहना चाहिये। यहाँ विद्यार्थियों के प्रति शिक्षको की और से होने वाले व्यवहार पर भी विचार कर लेना उचित होगा । वहुधा शिक्षक विद्यार्थियो से ।। अपने घर का काम-काज कराते हैं जिसके विरुद्ध शिष्य-गण सोच घश युव नहीं कह सकते । कमी-कभी वे अपने कुछ विद्यार्थियों को इसलिये दराड देते हैं कि ऐसा करने से उन्हें लड़कों को घर पर पढ़ाने का अवसर मिल जाय । इस प्रकार के कार्य अत्यन्त निन्द- नीय है। कोध में पाकर अथवा वालको की किसी भूल से अचा- नक अप्रसन्न होकर उन्ह अनुचित दण्ड देना अशिष्टता है । वालको को उचित जिज्ञासा का उत्तर न देना अथवा अपने अज्ञान को कपट से छिपार कुछ का कुछ बता देना शिक्षक के लिए बड़ी ही निन्दा की बात है। विद्यार्थियों को उनको मूर्सता के कारण चार- वार लजित करना अथवा उनसे व्यङ्ग-पूर्वक बोलना असभ्यता का चिढ़ है। लड़का से उनके घर की बातें न पूछी जाये प्रोर न उनके द्वारा किसी प्रकार का अस्पष्ट मदेशा भेजा जावे । पाठशाला के मुरय अध्यापक का यह कर्तव्य है कि वह इन सर दोपो को दूर करने का प्रयत करे। (४ । दीनों और रोगियों के मति दोनों को सताना केवल शिष्टाचार ही के विरुद्ध नहीं, किन्तु धर्म और नीति में भी विरुद्ध है। ऐसे मनुष्य को पीडा पहुँचाना, जो किसी प्रकार बद ना नहीं ले सकता मनुष्यता के विपरीत है। दीन मनुष्य के सामने ऐसा कोई काम करना अथना वात निकालना जिसमे उसे अपनी हीनावस्या पर मार्मिक सेद होने लगे, धनवानो के लिए उचित नहीं है। दीनो को तिरस्कार की दृष्टि से देखना अथवा जान-बूझकर उनका अपमान करना असभ्यता का चिह्न है।
छठा अध्याय १०५ कर्तव्य है । लोग बहुधा ऐसे समय मे उन लोगों के यहां नहीं जाते जिनसे किसी प्रकार का परिचय नहीं है, तथापि अवसर मिलने पर ऐसे लोगो के यहाँ जाने में कोई सकोच न करना चाहिये। किसीकी बीमारी की दशा मे जो परिचित अथवा अपरिचित व्यक्ति यावे, उसके यहाँ रोगी मनुष्य को स्वास्थ्य-लाभ करने पर मिलने के लिए एक बार अवश्य जाना चाहिये । उसको चोमारी अथवा किसी अन्य सङ्कट की अवस्था म भी उसके यहाँ एक-दो बार जाना आवश्यक है । बीमार मनुष्य को लेगो के प्राने से बहुधा पीरज वॅधता है, इसलिये जब तक वैद्य न रोके, तर तक इस अवसर पर उसके पास एक दो बार जाने को आवश्यकता है। रोगी के पास जाकर ऐसी वात न निकालना चाहिये, अथवा ऐसे प्रश्न न पूछना चाहिये जिसमे उसे अधिक बोलना पडे । यदि कोई रोगी अपनी इच्छा ही से अधिक बात चीत करे तो भी उसे अधिक बोलने से धीरज पूर्वक रोक देना उवित है । रोगी को कभी चीमारी की भयङ्करता न यताई जावे और न उसके सामने श्रावश्य कना होने पर भी उस वैद्य की निदा की जावे जो उस समय उसका इलाज कर रहा हो । यदि किसी को यह जान पड़े कि अमुक वैद्य की चिकित्सा विगेपतया हानिकारक है तो वह पूर्व सोच समझकर अपना मत रोगी के किसी हितैषी को प्रकट कर देवे । सोते हुप रोगी को जगाना बढी अशिष्टता है। रोगी के पास बैठकर उसके सामने किसी तरह की काना फसो न की जावे और न उसके रोग के सम्बध में विवाद उपस्थित किया जाने । यदि तुम्हारे जाने के समय रोगी के पास चैद्य उपस्थित हो तो वैद्य में भी रोग के सम्बध मे कोई विशेष पूछ-ताछ करना अनुचित है । रोगीकोधीरज धाना बहुत आवश्यक है। उसे सदैव यह आशा दिलाई जावे कि रोग कुछ समय मे अच्छा हो जावेगा। तो भी उससे ।
१०४ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार लूले, लॅगड़े और अन्रे लोगों को सड़क पर मार्ग दिखाने की आवश्यकता हो, तो इस काम में उनकी सहायता करना प्रत्येक सभ्य और शिक्षित व्यक्ति का कन्य है। सवारी में जाने वाले लोगो को इस बात पर शिशेष ध्यान रखना चाहिये कि उनके वाहनों से रास्ते में आने-जाने वाले दीन-दुखियो को कष्ट न पहुँचे । किसी को अपने सुभीते के लिये ऐसे लोगो को अपने स्थान से हटाना उचित नहीं । कई लोग अपनी प्रभुता मे मत्त होकर दीन-दुखियों के साथ निर्दयी व्यवहार करते हैं, परन्तु ऐमा करना महान् नीचता है। जो दीन-दुखी किसी के यहाँ काम-काज के लिए नौकर रखे जायें उनके साथ भी उदारता और शिष्टता का व्यवहार किया जावे। धनवान् लोगो का यह कर्तव्य है कि वे अपने नगर अथवा ग्राम के दीन दुखियो की जीविका के लिए अपनी शक्ति के अनुसार कुछ प्रग्ध अवश्य करें । जो बेकार लोग शरीर से सशक्त हैं उनको कुछ काम देना धनाढयों का कर्तव्य है। इन्हें अनाथ बच्चो के पालन- पोषण का प्रबंध भी करना चाहिये और जहाँ तक हो सके उनके लिए अनाथालय सोलना चाहिये। जो कुछ यहाँ दीन-दुखियों के विषय मे कहा गया है वही कुछ घटा-चढ़ाकर ग्रामीणों के विषय मे भी कहा जा सकता है। नगर के रहने वाले गाँव वालों को बहुधा विलकुल मूर्ख समझकर उनकी हंसी उड़ाते और उनका तिरस्कार करते हैं। शहर वाले कभी-कभी यहाँ तक नीचता करते हैं कि वे ग्रामीण स्त्रिया तक को हँसी उड़ाते हैं। हम लोग दूमरी जाति के लोगो के असभ्य व्यवहार की शिका- यत करते हैं, पर यह नहीं सोचते कि हम लोग खुद अपने ही जाति-वालो के साथ इससे भी अधिक असभ्य व्यवहार कर रहे हैं। परिचित प्रथा अपरिचित रोगियों के यहाँ कभी-कभी जाना या उनकी सेवा शुश्रुषा मे सहायता देना प्रत्येक सभ्य व्यक्ति का - छठा अध्याय १०५ कर्तव्य है। लोग यदुधा ऐसे समय म उन लोगो के यहाँ नहीं जाते जिनसे किसी प्रकार का परिचय नहीं है, तथापि अवसर मिलने पर ऐसे लोगो के यहाँ जाने म कोई सकोच न करना चाहिये। किसीकी सीमारी की दशा में जो परिचित अथवा अपरिचित व्यक्ति आये, उसके यहाँ रोगी मनुष्य को स्वास्थ्य-लाभ करने पर मिलने के लिए पर वार अवश्य जाना चाहिये । उसको योमारी प्रथया किसी अन्य सङ्कट की अवस्था म भी उसके यहाँ एक दा चार जाना आवश्यक है । बीमार मनुष्य से लोगेा के प्राने मे यहुधा धीरज वेधता है, इसलिये जन तक पेद्य न रोके, तब तक इस अवसर पर उसके पास एक दो बार जाने को पारश्यकता है। रोगी के पास जाकर ऐसी रात न निकालना चाहिये, अथवा पेसे प्रशन पटना चाहिये जिसमे उसे अधिक बोलना पड़े। यदि कोई रोगी अपनी इन्श ही से अधिक वात-चीत करे तो भी उसे अधिक बोलने से धीरज पूवक रोक देना उवित है । रोगी को कभी बीमारी की भयङ्करता न बताई जाये और न उसके सामने प्रावश्य का होने पर भी उस वेद्य की निदा की जावे जो उस समय उसका इलाज कर रहा हो । यदि किसी को यह जान पड़े कि अमुक वेद्य की चिकित्सा विशेषतया हानिकारक है तो यह यूर सोच समझकर अपना मत रोगी के किसी हिनैपी को प्रकट कर देवे। सोते हुए रोगी को जगाना बड़ी अशिष्टता है। रोगी के पास बेठकर उसके सामने किसी तरह की काना मो न की जावे और न उसके रोग के सम्बध में विवाद उपस्थित किया जाने । यदि तुम्हारे जाने के समय रोगी के पास वैद्य उपस्थित हो तो चैध से भी रोग के सम्बध में कोई विशेष पूछ ताछ करना अनुचित है। रोगीको धीरज धाना बहुत आवश्यक है। उसे सदैव यह प्राशा दिलाई जावे कि रोग कुछ समय में अच्छा हो जावेगा। तो भी उससे १०४ हिन्दुस्थानी शिप्राचार लूले, लँगड़े और अन्ये लोगो को सड़क पर मार्ग दिसाने की आवश्यकता हो, तो इस काम में उनकी सहायता करना प्रयेक सभ्य और शिक्षित व्यक्ति का कर्त्तय है। सवारी में जाने वाले लोगो को इस बात पर विशेष ध्यान रखना चाहिये कि उनके वाहनों से रास्ते में आने-जाने वाले दीन-दुखियों को कष्ट न पहुँचे । किसी को अपने मुभीते के लिये ऐसे लोगो को अपने स्थान से हटाना उचित नहीं । कई लोग अपनी प्रभुना मे मत्त होकर दोन-दुखियों के साथ निर्दयी व्यवहार करते हैं, परन्तु ऐसा करना महान् नीचता है। जो दीन-दुखी किसी के यहाँ काम काज के लिए नौकर रखे जावें उनके माथ भी उदारता और शिष्टता का व्यवहार किया जावे। धनवान् लोगो का यह क य है कि वे अपने नगर अथवा ग्राम के दीन-दुखियों की जीविका के लिए अपनी गति के अनुमार युछ प्रग्ध अवश्य करें । जो बेकार लोग शरीर से सशक्त है उनको कुछ काम देना धनाढयों का कर्तव्य है। इन्हें अनाथ बच्चो के पालन पोषण का प्रबध भी करना चाहिये और जहाँ तक हो सके उनके लिए अनाथालय सोलना चाहिये। जो कुछ यहाँ दीन-दुसियो के विषय में कहा गया है वही कुछ घटा-बढ़ाकर ग्रामीणों के विषय में भी कहा जा मकता है। नगर के रहने वाले गांव वालो को बहुधा विलकुल मूर्ख समझकर उनकी हँसी उड़ाते चोर उनका तिरस्कार करते हैं। शहर-वाने कभी-कभी यहाँ तक नीचता करते हैं कि वे ग्रामीण स्त्रिया तक को हँसी उड़ाते हैं। हम लोग दूसरी जाति के लोगो के असभ्य व्यवहार की शिका- यत करते हैं, पर यह नहीं सोचते कि हम लोग खुद अपने ही जाति-यालो के साथ इससे भी अधिक असभ्य व्यवहार कर रहे हैं। परिचित अथवा अपरिचित रोगियों के यहां कमी-कभी जाना या उनको सेवा शुश्रुषा मे सहायता देना प्रत्येक सभ्य व्यक्ति का ।
छठा अध्याय १०५ कर्णय है। लोग बहुधा ऐसे समय मे उन लोगो के यहाँ नहीं जाते जिनसे किसी प्रकार का परिचय नहीं है, तथापि अवसर मिलने पर ऐसे लोगो के यहाँ जाने में कोई सकोच न करना चाहिये । किसीकी गीमारी की दशा में जो परिवित अथवा अपरिचित व्यक्ति प्राने, उसके यहाँ रोगी मनुष्य को स्वास्थ्य-लाभ करने पर मिलने के लिए एक बार अवश्य जाना चाहिये । उसको शोमारी अथवा किसी अन्य सङ्कट की अवस्था में भी उसके यहां एक दो पार जाना आवश्यक है। बीमार मनुप्य को लेाग के प्रारो से पहुधा धीरज पॅधता है, इसलिये जन तक पेद्य न राके, तर तक इस अवसर पर उसके पास एक दो चार जाने को आवश्यकता है। रोगी के पास जाकर ऐसी बात न निकालना चाहिये, अथवा ऐसे प्रश्न न पूछना चाहिये जिसमे उसे अधिक बोलना पड़े। यदि कोई रोगी अपनी इच्छा ही से अधिक बात चीत करे तो भी उसे अधिक बोलने से धीरज पूर्वक रोक देना उचित है । रोगी का कभी बीमारी की भयङ्करता न बताई जाये और न उसके सामने प्रावश्य का होने पर भी उस वैद्य की निदा की जावे जो उस समय उसका इलाज कर रहा हो । यदि किसी को यह जान पड़े फिअमुक वेद्य की चिकित्सा विशेषतया हानिकारक है तो वह यूर सोच- समझकर अपना मत रोगी के किसी हितैषी को प्रकट कर देवे । सोते हुए रोगी को जगाना बढी अशिष्टता है। रोगी के पास बैठकर उसके सामने किसी तरह की काना फ़सो न की जावे और न उसके रोग के सम्बध मे विवाद उपस्थित किया जाने । यदि तुम्हारे जाने के समय रोगी के पास चैद्य उपस्थित हो तो वैद्य से भी रोग के सम्बन्ध में कोई विशेष पूछ ताछ करना अनुचित है। रोगीको धीरज बॅधाना बहुत प्रावश्यक है। उसे सदैव यह नाशा दिलाई जावे कि रोग कुछ समय मे अच्छा हो जावेगा। तो भी उससे हिन्दुस्थानी शिष्टाचार पथ्य में सावधानी रखने के लिए अनुरोध करना अनुचित नहीं है। रोगी के पास जोर-जोर से बात करना ठीक नहीं । यहाँ किसी ऐसे विषय पर भी बात-चीत न की जावे जो रोगी को अप्रिय जान पड़े। राग के सम्बन्ध में वात-चीत करते समय सच होने पर भी यह कभी न कहा जाने कि अमुक मनुष्य इस रोग से मर गया। गेगो के पास केवल उसी समय तक बैठना चाहिये जर तक उसके दवाई पीने का अथवा भोजन करने का समय न पाये । यदि कोई परिचित रोगो किसी सार्वजनिक औषधालय में हो तो वहाँ भीउसकीखबर पूछने के लिए जाना उचित है। यदि आवश्यक हो तो उसके लिए दवाई लाने अथवा वेद्य को बुला लाने में सहा- यता देना चाहिये । रोगी मनुष्य को उटने वैठने अथवा करवट बदलने में सहायता देना प्रशसनीय कार्य है। अशक्त रोगी की नीच मे नीच सेवा भी उच शिष्टाचार का लक्षण है। जहाँ तक हो परिचित रोगी के पास रोग की अवस्था मे एक बार से अधिक जाना आवश्यक है जिससे यह कार्य निरा शिष्टा चार न समझा जावे । कोई-कोई लोग सहानुभूति की प्रेरणा से नहीं, कितु निरे शिष्टाचार के अनुरोध से किसी रोगी को देखने जाते हैं और एक बार जाकर ही अपने फर्त्तव्य की इति-श्री मान लेते हैं । इस प्रकार की उदासीनता शिष्टाचार और नीति दोनो के विरुद्ध है। रोगी के पास जाफर पेमे स्थान मे न वैठना चाहिये कि जहाँ से हवा का आवागमन रुक जावे अथवा रोगी के कोटे मे अँधेरा हो जाये । ऐसे स्थान मे भी वेठना उचित नहीं, जहाँ रोगी सरलता से अपनी दृष्टि न डाल सके । पुशल पूछने के लिए जाने वाले सजनो को सदेव इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनकी किसी भी क्रिया अथवा व्यवहार से रोगी को कष्ट न पहुँचे ।
छठा अध्याय १०७ वैद्यो या डाक्टरों को रोगी ये साथ बहुत ही शिष्ट व्यवहार करना चाहिये, क्योंकि उस पर उनको प्रयेक यात का घड़ा असर परता है। कई और अनिश्चित दाम लेनेवाले वैद्य के भापी दिल के स्मरण मात्र से ही साधारण स्थिति के रोगी का रोग दिन में कई वार बढ़ जाता है। इस पर उसकी उतावली अोर धमकियां तो प्रलय उत्पन्न कर देती हैं। केवल धन पींचने की आशा से ओपधि की योजना करना और एक पैसे की पुड़िया के लिए चार पाने का विल देना मनुष्यत्व के विपरीत है। रोगी को प्राश्वासन देना, सच्चे मन से उसकी चिकिसा करना अोर आवश्यकता के समय उसकी दशा स्वय रखना सभ्य वैद्य का कत्तव्य है। कई वेध घोर डायटर तो ऐसे हैं कि वे अपने ही किसी मरते हुए रोगी को पिना फीस के नही देखते और मरे हुए रोगी को भी देखने की फीस ले लेते हैं । रोगी से पर-वशता के कारण कइ भूलें हो जाती हैं, इसलिये क्रोध म 'प्राकर उसे मझ- धार में छोड़ देना सभ्य वेद्य के लिए उचित नहीं है। अनेक रोगियो को मृत्यु पीड़ा देखने से वैद्यो का हृदय बहुत कुछ कठोर हो जाता है। इसलिए उन्हे उसमे कुछ दया का सचार करना चाहिए । (५) मित्रों के प्रति मित्रता धीमी बाढ़ का पोधा है, इसलिये उसका पालन करने में बड़ी सावधानी की आवश्यकता है । यद्यपि सच्ची मित्रता मे शिष्टाचार के प्रभाव से बहुधा कोई विन नहीं पड़ता और उसके उपयोग से रूखापन समझा जाता है, तथापि मभ्यता की पराकाष्ठा से उतनी हानि नहीं है जितनी असभ्यता की लाया- मान से है। आज-कल विशेष परिचयवाले सज्जन भी मित्र कह- लाते हैं, इसलिये साधारण रीति से सभी प्रकार के मित्रों के साथ उचित शिष्टाचार के पालन की अवश्यकता है । यद्यपि गहरी मित्रता १०८ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार मे शिष्टाचार की छोटी-छोटी भूलों से बहुधा बाधा नहीं पहुँचती, तथापि यही बाटो छोटी वाने एकत्र होकर कभी-कभी बड़ा परि माण प्राप्त कर लेती है और मित्रता-रूपी बन्धन को ढीला करके तोड़ देती है। मित्र के साथ यवहार करने में उसे ऐसा न जान पडे कि उसके साथ भिन्नता का व्यवहार किया जाता है। मित्र के अनजाने किये हुए दापी पर उदारता को दूर रखी जावे और उसको अप्रसन्न करने का अवसर सदैव टाला जावे। जहाँ तक हा सन्चे मित्र के माय सगे भाई का सा व्यवहार करना चाहिये । मित्र के घुटुम्बियो को मित्र ही के समान प्रादर और प्रेम का पात्र समझना चाहिये । मित्र से जहाँ तक हो छल-कपट का व्यवहार न किया जावे और न उस पर किसी प्रकार का अनुचित दवाय डाला जाये। मित्रता-रूपी पेधेि को सदैव मदाचार-रूपी जल से सींचने की आवश्यकता है । मित्र मे कभी अनुचित हमी न की जावे प्रोर न उसे नीचा दिसाने का अवसर लाया जावे । यदि मित्रता भिन्न- भिन्न स्थिति के लागो मे हो तो उन्हें आपस में ऐसा व्यवहार करना चाहिये जिससे उनकी स्थिति को भिन्नता के कारण भेद-भाव उप- स्थित न हो। मित्र के साथ अनावश्यक पाद विवाद करना भी अनुचित है, क्योकि मत-मिन्नता के कारण बहुधा गादी से गादी मित्रता भी इट जाती है। ससार में विद्या और ज्ञान की कोई सीमा नहीं है, इसलिये बड़े से बड़े विद्वान को भी अपनी विद्वत्ता पर अभिमान न करना चाहिये। क्योंकि इससे अल्पज्ञान वाले मिनी पर घुरा प्रभाव पड़ता है। मित्र के साथ अनुचित विनोद करना भी हानिकारक है । यद्यपि इसी मजाक साधारण बात है, तथापि इससे बहुधा भयङ्कर परि- छठा अध्याय १०६ - णाम उपस्थित होते हैं। कोई भी प्रादमी, चाहे यह गादा मित्र क्यो न हो, इसी के द्वारा किया गया अपना प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष अप- मान महन नहीं कर सकता और जर यह उसका बदला लेने का प्रयत करता है तर परस्पर की सीचा-तानी मे अवस्था भयकर हो जाती है, इसलिये हँसी दिल्लगी यो जिसमे बहुधा व्यक्तिगत आक्षेप रहता ही है मर्पया त्याज्य समझना चाहिये । कहा भी है- "हँसी लडाई को जड़ है" । हँसी मजाक का दोप बहुधा तरुण मित्रो में पाया जाता है, परतु कभी-कभी यही उमर-याले और सयाने लोग भी इस दुर्गुण के दास हो जाते हैं। मित्र के कामो को कभी सन्देह की दृष्टि से न देखना चाहिये। यदि तुम्हारा मित्र मच्चा है तो तुम्हारे साथ कभी कपट न करेगा। मित्र के कपट का एक-दो बार परिचय मिलने पर समझना चाहिये कि यह व्यक्ति मित्रता के योग्य नहीं है। ऐसे मनुष्य से धीरे-धीरे और परी चतुराई के साथ घनिष्टता का सम्बध कम करना चाहिये, जिससे कुछ समय के पश्चात् उससे केवल शिष्टाचार का सम्बध रह जावे अोर वह प्रत्यक्ष रूप से तुम्हारा शत्रु न बने । ससार मे पिना कारण के किसी को शनु बना लेना मूर्खता का कार्य है । यदि मित्र की ओर से किसी प्रकार का सन्देह हो तो उसे मन में छिपाकर रखने के बदले किसी अवसर पर प्रकट कर देना और उसकी सफाई कर लेना अधिक चतुराई की बात है ! यदि सन्देह मन मे भरा रहे प्रार अय मिथ्या कारणो से उसकी वृद्धि हो जावे तो परस्पर चुरे भाव उत्पन्न होंगे जिसका परिणाम दोनो ओर हानिकारक होगा। यदि मिन में ऐसे दोष हों जिनसे मित्रता की वृद्धि में बाधा पहुँचती हो, तो मनुष्य का कर्त्तय है कि वह अपने मित्र के इन दोपो को धीरज और बुद्धिमानी से दूर करने का प्रयत्न करे । यदि हिन्दुस्थानी शिष्टाचार मित्र को दोपों की सूचना से धुराई जान पड़ तो इस विषय में उसका समाधान करना आवश्यक है। समझदार मनुष्य अपने मित्र की बताई हुई सूचनाओं को अपने लिए लाभदायक समझकर उनका पालन करेगा। जन किमी भो उपाय से मित्र के दोष दूर न हो म ओर उनमे पड़ी भारी हानि होने की सम्भावना हो तव अ.न में इस बात का रिचार करना आवश्यक है कि ऐसे मनुष्य से मिनता स्थिर रमसा जाये या नहीं। यदि दोष साधारण है और मित्रता म विन्न पन्ने को कोई सम्भावना नहीं है, ना उसे क्षमा की दृष्टि से देखना चाहिये। जन तक काई बदी यावश्यकता न हो तब तक मनुष्य को किसी के माथ अपनी मित्रता का विषय मर्व साधारण में प्रकाशित न करना चाहिये । दोभादमियो के परस्पर व्यवहार और सम्भाषण की रीति हो से बाहरी लोगो को इस बात का पता लग सकता है कि उन दोना मे कैसा भाव है। सभी बातो में और सभी कही अपने मित्र का अन्ध पक्षपान करके दूसरे लोगो को मित्रता की घनिएता न बताई जाने । अपने मित्र की भलाई के लिए सब कुछ किया जावे, परन्तु उसके लिए प्रात्म-गोरव न साया जावे और दूसरे को बुराई न की जावे। सकट के समय मित्र की सेवा तन मन-धन से की जावे। यह एक बड़ा भारी अवसर है जिस पर लोग अपने मित्रों से बहुत कुछ प्राशा करते हैं और यदि ऐसे समय मे शक्तिशाली होने पर भी कोई मनुष्य अपने मित्र की सहायता न करेगा तो उनकी मित्रता बहुत दिन नहीं चल सकती। यथार्थ में सहानुभूति ही मिनता का प्रधान लक्षण है और यदि मित्रता में इसी गुण का प्रयोग न किया जावेगा तो यह मित्रता कैसे रहेगी? इसी सहानुभूति से मित्र की और उदारता का भाव उत्पन्न होता है।
छठा अध्याय मित्र के विरुद्ध चुगली करने वाले लोगो की बातो पर सहसा विश्वास कर लेना उचित नहीं, क्योकि कुछ लोग ऐसे हैं कि उनके मन को दो मनुष्यों के बीच मे गाढ़ी मित्रता देखकर ईर्षा होती है। जब तक अनेक उदाहरणे से चुगली में कहे गये अपरामो का कोई परका प्रमाण न मिले तब तक मित्र की ओर किसी प्रकार का स देह न करना चाहिये । अधिकाश चुगलियों झूठ निकलती हैं और उन पर सहसा विश्वास करके कोई धृष्टता कर डालने मे बुरा परिणाम होता है। चुगल खोर केवल मित्रता को शत्रता बनाकर ही सन्तुष्ट नहीं होते, कि तु शनुता को घोर घृणा में परिणत कर ते हैं। (६) विद्वानों और साधुओं के प्रति प्राचीन काल से विद्वान पुरप प्रादर के पान होते आये हैं । जो विद्वान् अनभिमानी और शान्त स्वभाव वाले होते हैं उनका आदर विशेष रूप से किया जाता है। विद्वानों के आदर का प्रधान कारण यह जान पडता है कि उनके पास प्राय सभी प्रकार की विद्यायो और ज्ञान का वह कोष रहता है जिसकी आवश्यकता औरो को पढ़ती है। उनकी आदरणीयता का एक और कारण यह समझ पड़ता है कि उनके समक्ष और मानसिक प्रभाव के कारण अल्प विद्या वाले मनुष्य अपना अल्पज्ञान सननना पूर्वक प्रदर्शित करने को धृष्टता नहीं कर सकते । इतना होने पर भी विद्वानो का यथार्थ मान बहुत कम होता है और इसका एक मुरय कारण यह है कि अधिकाश विद्वान धनहीन होते हैं। विद्वानो का मान करने मे अवस्था पर विशेष ध्यान न देना चाहिये। जिसम विद्या के साथ अवस्था और स्थिति की श्रेष्ठता हो, वह तो सर्वमान्य है ही, परन्तु जहाँ पिछले दोगुण न हो वहाँ विद्या को ही उचित आदर देना चाहिये । विद्वान के आगे बढ़-चढ़कर बातें करना । ११२ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार किसी के लिए भी शोभा-प्रद नहीं है। विद्वानों के मत को थोयी युक्तियो के आधार पर सण्डित करने का प्रयत करना उपहास-जनक है। थोडी विद्या-वाले को विद्वान के साथ वाद-विवाद करना भी शोभा नहीं देता। यदि किमो विद्वान से उच्चारण अथवा तर्क की कोई भूल हो जाने, तो उसके कारण विद्वान मनुष्य की हँसी उड़ाना अथवा भूल पर अनुचित कटात करना श्रमभ्यता है। विद्वान की गति विद्वान ही जानसकता है, मूर्स नहीं, इसलिये यदि कोई मूर्ख किसी विद्वान का अनादर कर दे तो उससे किसी शिक्षित व्यक्ति को प्रसन्न होने के बदले दुखित होना चाहिये । जो लोग विद्वानों का अनादर करते हैं वे शिक्षित समाज मे निन्दनीय समझे जाते हैं । यदि कोई मनुष्य स्वय विद्वान होकर अथवा अपने को विद्वान समझकर दूसरे विद्वान को अवहेलना, अनादर अथवा घृणा की दृष्टि से देखे तो उसकी विद्वत्ता को निनकोटि की समझना चाहिये। कभी कभी कुछ लोग अपनी प्रभुता बढ़ाने के विचार से विद्वानो की समता अथवा अवहेलना करते हैं । ये लोग ऐसा समझते है कि विद्वानो का तिरस्कार करने से दूसरे लोग हमे विद्वानो से श्रेष्ठ समझेंगे, पर यह उनकी भूल है । जो मनुष्य सचा गुण-ग्राहक है और जिसम मची मबुद्धि है, यह विद्वानो के अपमानकारी को तुच्छ हो समझेगा, चाहे वह अपनी विद्वत्ता का कैसा ही दिढोरा पीटे । ऐसे ही प्रात्म-प्रशसा के लोभ में कुछ अत्पज्ञ लोग घटुहो के मनका खपउन करने की ढिठाई करते हैं। ये समझते हैं कि विद्वानो से भिड़ने पर जीते भी जीत है और हारे भी जीत है, पर यह समझना अल्पज्ञों को बड़ी भारी भूल है । कितना ही प्रयत्न किया जाये, तो भी मनुष्य की अपक्षता विप नहीं सकती और विद्वान के सामने वात-चात पर उसे अपने प्रत्पज्ञान के कारण मोन धारण करना पड़ता है। किसी ने ठीक कहा है, ।
૨૨૩. छठा अध्याय विद्या-भय हैं प्रकट अति, चतुर, यहुश्रुत, विज्ञ । पर घर्ण-नाम से निपट, निकल पड़े अनभिज्ञ । विद्वानों के साथ अथवा विशेषज्ञो के साथ याद विवाद करने- गलों को इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि फेल तर्क और युक्ति ही से काम नहीं चल सकता, उसके लिए शास्त्र ज्ञान की भी आवश्यकता है। विना पूर्ण ज्ञान के, विद्वानों से भिड़ना बड़ी मूर्खता है । रहीम कवि ने कहा है, करत निपुनई गुन चिना, रहिमन निपुन हजूर । मानो टेरत विटप चढ़ि, इहि प्रकार हम फर ॥ कोई-कोई साधु महात्मा बड़े विद्वान होते हैं । उनका आदर- सकार विद्वानो से अधिक करना उचित है, क्योकि उनमे विद्वानो से एक अधिक गुण (ससारत्याग ) रहता है। प्राज-कल मूर्ख और कपटी सापुत्रो की अधिकता है। इसलिये इन लोगों में सावधान रहना चाहिये । यद्यपि इन धूर्तों के साथ आदर-सत्कार करने के व्यवहार का अवसर बहुत कम आता है, तथापि इनका प्रकट रूप से अनादर करना आवश्यक नहीं है। इनके साथ अवसर प्राने पर उदासीनता का व्यवहार किया जावे। सच्चे साधु महात्माओ से बिना किसी विशेष प्रयोजन के उनकी पूर्व जाति, वृत्ति अथवा वैराग्य का कारण प्रचना असभ्यता है। पर सदिग्ध अवस्था मे साधु-वेप धारी लोगो से जांच के लिए ये सर पातें पूछी जा सकती हैं। साधुओ के निश्चित कार्यक्रम में बाधा डालना ठीक नहीं है। उन्हें नियम के विरुद्ध अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजन कराना अथवा सुख-चैन में रखना उचित नहीं है। उनके सामने गृहस्थाश्रम के सुखो की चर्चा करना भी प्रशिता है।
११४ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार (७) राजा और अधिकारियों के प्रति यद्यपि अनेक राजा और अधिकारी लोग अपनी प्रभुता के अभिमान में साधारण लेगा को अत्यन्त तुच्छ समझते हैं, तथापि जय तक इन लोगों का व्यवहार मनुष्यता के अनुरूप है, तब तक लोगेा को इन महानुभावों का उचित और नियमानुकूल प्रादर करना आवश्यक है । राजाओं और अधिकारियों के सामने जाकर जहाँ प्रौर जैसे खड़े होने अथवा वैठने को रोति हो, यहाँ वैमे हो सड़े होना अथवा घेठना चाहिये । इन लोगों को प्रणाम भी निश्चित रोति से किया जावे। कोई कोई राज्याधिकारी अपने अधीन कर्म चारी और प्रार्थियों को वेठने तक के लिए प्रासन नही देते और उन्हें खड़ा रखने में अपना गौरय समझते हैं। आवश्यकता के कारण इस अपमान को सहना ही भाग्य है क्योकि शक्तिशाली महापुरुषों को उदण्डता के लिए कोई सहज और सभ्य प्रतिकार नहीं है। कोई-कोई अधिकारी प्रणाम का उत्तर केरल अभिमान पूर्वक सिर हिलाकर देते हैं। यह भी एक अत्याचार है जिसके रोकने के लिए प्रातरिक घृणा के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं दीखता। पूर्वोक्त महानुभावों से मिलने और बातचीत करने के सम्बन्ध में सावधानी की आवश्यकता है। उनसे फेवल नियत समय पर मिलना और निश्चित बातचीत करना चाहिये । जहाँ तक हो वात चीत में किसी दूसरे मनुष्य की निदान की जाय और न अपनी घड़ाई प्रकट की जाय । राज्याधिकारियो के पास उतने ही समय तक ठहरना चाहिये जितने समय तक कार्य को प्रावश्यकता हो । चात-चीत सक्षेप मे परन्तु स्पष्ट-रीति से करना चाहिये जिसमें । कहनेवाले का उद्देश्य सिद्ध हो और सुननेवाले को यथार्थ व्यवस्था सरलता से प्रकट हो जावे । समोच के घश कुछ न कहना और . ठा प्रध्याय धृष्टता के घश प्रापश्यकता से अधिक कह डालना, ये दोनों ही अवस्था त्याज्य हैं। राज्य की उचित प्राक्षाओं का पालन करना प्रत्येक नागरिक का क्त्तव्य है । आवश्यकता पड़ने पर प्रजा के प्रत्येक मनुष्य को शासन के कार्य में सहायता देना चाहिये और अपने राजा तथा देश के लिए तन मन, धन प्रपण करने में भी सोच न करना चाहिये। प्रयेक उत्तरदायी नागरिक का यह कर्तव्य है कि यह प्रजा पर होने वाले अत्याचारो को सूचना राजा अथवा दूसरे अधिकारियों को देने में किसी प्रकार का सकोच न करे । यदि हो सके तो उसे राज्य की मार से की गई किसी भारी भूल की सूचना भी उपयुक्त अधिकारी के पास पहुँचा देना चाहिये । राज्य की ओर से जिन लोगो को सम्मान अथवा उन्च पद प्राप्त हुआ हा उनके प्रति भी हमे प्रादर प्रकट करना चाहिये । जन तक असतोप का कोई कारण उपस्थित न हो, तब तक राज्याधि- कारियों के प्रति सदैव प्रादर और सभ्यता का व्यवहार किया जावे। किसी लोक प्रिय राज्याधिकारी का स्थाना तर होने पर छोटा मोटा उत्सव कर देना भी शिष्टाचार की सीमा के भीतर है। प्रजा हितैपी राजा के किसी स्थान में पधारने पर वहां के निवासियो को अपनी राज भक्ति का पूरा परिचय देना चाहिये । राजा चाहे छोटी अवस्था का हो अथवा युवराज ही हो, पर उसके आदर-सत्कार में किसी प्रकार की त्रुटि न की जावे । राज परिवार के लोगों के साथ भी, उनमें राजोषित सभ्यता है, प्रादर और. शिष्टाचार का न्यवहार किया जाये। उन्च राज-कर्मचारियो से बात चीत करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि जब तक उनके साथ घनिष्ठता का न हो तब तक उनसे विनोद पूर्ण सम्भाषण न किया जाय जब AM हिन्दुस्थानी शिष्टाचार पता होने पर भी विनोद की मात्रा सभ्यता-पूर्ण रहे। किसी विषय पर निवेदन करते समय दूसरे लोगो के विरुद्ध अथवा अपने पक्ष मे केवल उतनी ही बात कही जा जिनसे उम विषय का सम्बन्ध हो। इससे अधिक प्रात्म प्रशसाअथवा पर-निन्दा के लिए शिष्टाचार में स्थान नहीं है। यद्यपि अधिकांश राजकीय कार्य पन-व्यवहार ही से निप्पन्न करना उचित और आवश्यक है तथापि कई-पक वाते प्रापसी मेंट मुलाकात में सरलता पूर्वक निश्चित हो सकती हैं। इसलिये राजकर्मचारियों से कभी-कभी मिलने की आवश्यकता होती है । अधिकारियों के पास उचित पोशाक पहिनकर जाना चाहिये। यदि किसी दरवार में जाने का प्रयोजन हो तो दरवार के नियमो के अनुसार विशेष प्रकार के वस्त्र धारण करने की आवश्यकता है। विशेष करके विद्वानों के लिए सर्वसम्मति से जो पोशाक निश्चित की गई हो वही उनको धारण करना चाहिये। न्यायालय में जो कुछ पूछा जाने उसका उत्तर स्पष्ट रीति से और सभ्यता-पूर्वक देना चाहिये । न्यायाधीश की निष्पक्ष प्राशा मानना परम आवश्यक है, इसलिये जिस समय यह किसी से शान्त होने को कहे तो उस समय उसे शान्त हो जाना चाहिये । न्यायालय मे किसी उत्तर-दायी कर्मचारी की आज्ञा के बिना कोई कागज पर पढ़ना अथवा उठाना-धरना चिल शिशाचार के ही विरुद्ध नहीं, कि तु कानून के भी खिलाफ है। न्यायाधीश को अपमान जनक उत्तर देना भी एक अपराध है, इसलिये उसके अपमान होने पर भी उसे वैसी ही ध्यप्रसन्नता से उत्तर न देना चाहिये । यदि किसी न्यायाधीश के न्याय से किसी को असन्तोष हो तो उसके लिए उचित न्याय के निमित्त दूसरा बड़ा न्यायालय खुला रहता है। अधिकाश राज-कर्मचारी दोड़े पर जाकर देहातो में बड़ा ही अनुचित व्यवहार करते हैं। ये लोग गरीब ग्रामीणों से केवल वेगार ।
छठा अध्याय हो ही कराते, कि तु प्रारमो को प्रसार के अनुवित काम लेते हैं। यदि ये लोग सम्यता का व्यवहार करें तो गाय के निवासी अपनी मान मयादा भूजर इनके मोटे झेटे काम भी प्रसामना पूर्वक कर मकने । पर ये कर्म चारो यडया अपनो प्रभुना के अभिमान में पदे लिसे लोगामे भो कमो कमो ऐसा काम करने को कहते हैं जो पेवन प्रबह नौकर के करने योग्य होता है । पेमा प्रयाश में गाय के प्रनिहित, नितिन और उत्तरदायो मानने का यह काम है कि ये राज कपनगरिया को अनुचित का सदेव मयता पूर्वक प्रतियाद करें और अपने उनको किमो पैसो मेया में न लगा जिममे गाय के यात्म सम्मान म फज लगे। यदि कोई कर्मचारी अपने अगिर व्यवहार को दान करे तो उसको रिपोर्ट उ मर्म- चारियों के पास को जाये. अयया उसके माय उदासीनता का ऐसा ध्यपहार किया जाये जिसमें उसे अपनी मून पर पछताना पड़े। (८) पड़ोसो के प्रति पड़ोसी के साथ प्रेम भाय रखना फेवल शिष्टाचार हो को दृष्टि से नदी, रितु उपयोगिता और सहयोग को दृष्टि से भी आवश्यक है। नोति रे शिवार से भी पड़ोसी के प्रति सद्भाव प्रगट करना उचित है। पड़ोसो चाहे ऊँची जाति का हो अथवा नीची जाति का, धनवान हो या कहाल, विद्वान हो अथवा प्रशिक्षित, उसके साथ सदेव शिष्ट यरहार किया जाये। कई लेग प्रभुना पाकर बहुधा पड़ोमियो को पीड़ित करने में अपना गौरव समझते हैं, परतु उनका यह व्यवहार सर्वथा निदनीय है । यदि किसी कारण से पड़ोसी के साथ मित्र भाव स्थापित हो सके तो ऐमी दशा में शिष्ट उदासी नता का व्यवहार करना उचित होगा। घर वनाने अथवा निस्तार करने में मनुष्य को इस बात की सावधानी रखनी चाहिये कि पड़ोसो को उससे कोई अड़चन अथवा हिन्दुस्थानी शिष्टाचार खेद न हो । कई महानुभाव छल-कपट से अथवा अधिकार के चल पर पड़ोसियों की जमीन दवाने, उनका निस्तार रोकने और अपने निरङ्कश व्यवहार से उन्हें तन करने का प्रयत्न करते रहते हैं जिसका, परिणाम यह होता है कि बहुपा दोनो मे कई पीढ़ियों तक शत्रुता चली जाती है। ये सब कार्य मनुष्य की जगली अवस्था के चिह्न हैं। उचित तो यह है कि यदि कोई पड़ोसो सभ्य और शान्त स्वभार- वाला है तो उसकी सब प्रकार से सहायता को जावे । यदि पड़ोसी का मकान नीचा हो तो अपने मकानसे उसके घर की ओर झांकना प्रथया उसे अड़चन देने वाला कोई निस्तार करना अशिष्ट है। पड़ोसी के मकान की ओर उज्जे, सिडकियाँ अथवा नालियों निकालना किसी भी अवस्था मे उचित नहीं है। पड़ोसी के लड़को बन्चो पर प्राय अपने ही बच्चो के समान प्रेम-यवहार करना चाहिये और पड़ोसी को माँ रहिनों को अपनी माँ-बहिनो के समान मानना चाहिये । ममय-समय पर पटोमी के यहाँ आना-जाना और उसके उत्सर आदि कार्यों में योग देना शिष्टता का चिह्न है। यदि हो सके तो कभी कभी उसे मोज- नादि के लिए भी निमत्रित करना चाहिये । यदि पडोसी गरीब हो तो मनुष्य को पड़ोसी के आगे अपने धन श्रादि का ऐसा वैभव न दिखाना चाहिए जिससे उसे प्रान्तरिक वेदना हो। पड़ोसी के लडको-चन्चो की उपस्थिति में कोई मनुष्य अपने चन्नो को खाने- पीने की ऐसी चीजें न देचे जिन्हें यह दूसरे बन्चों को न दे सके। पड़ोसी की बीमारी की दशा में उसकी महायना करना चाहिये और समय-समय पर उसका समाचार लेना चाहिये। पड़ोस की खियो की बीमारी में सपर के लिए खियो का जाना उचित है। यदि पड़ोसी के यहाँ गमी हो जाय तो उसमे भी सम्मलित होना श्रावश्यक है। निर्धन पड़ोसी की बीमारी अयचा विपत्ति की छठा प्रत्याय अवस्था में आर्थिक सहायता देना शिष्टता और नीति का कर्तव्य है। प्रावश्यकता पड़ने पर पड़ोसी को उचित सलाह देना चाहिये और उसके किसी भी गुप्त भेद को प्रगट करने अथवा जानने की इन्चा न करना चाहिए । यदि पड़ोसी को प्रोर से दो-एक पार माधारण अपराध हो जाय तो उन्हे क्षमा की दृष्टि मे देसना चाहिये । जहाँ तक हो सके पड़ोसी से लड़ाई झगडा करने का अवमर न लाया जावे, क्योंकि पडोसी की शत्रुता सन अवस्थाओ में हानि- कारक होती है। कोई मनुष्य बार-बार शत्रु को देखने अथवा उसकी बातो का स्मरण करने से चित्त की शाति स्थिर नही रस मकता, इसलिये, पडोसी से बिगाड़ होने का अवसर सदैव टाल दिया जावे । यद्यपि दुष्ट का सग नरक के पास से भी बुरी कहा गया है, तथापि यह बात सम्भव है कि किसी के शिष्ट व्यवहार से दुष्ट मनुष्य भी अपना व्यवहार सुधार सकता है। बहुधा दुष्ट मनुष्य भी अधिकाश मे अपने पड़ोसी के साथ दुष्टता का व्यवहार नहीं करते । पड़ोसी की सहायता यहाँ तक लाभकारी होती है कि लोग बहुधा उसके भरोसे अपना घर द्वार और लडके बच्चे छोड़ जाते हैं। यदि पडोसी के यहाँ की स्त्रियों में पर्दे की चाल हो तो उनके मिलने पर पुरुषो को अपनी दृष्टि इस भाँति फेर लेना चाहिये जिसमे उन्हें कोई अड़चन न हो ओर अपने पर्दे का पालन करने के लिए प्रव सर मिल जाने। पटासी के घर के भीतरी भाग मे पिना आवश्यकता के अथवा विना सूचना दिये जाना उचित नहीं। जन तक कोई प्रावश्यक कार्य न हो तब तक अपने घर के भीतरी भाग से अथवा ऊपरी कोठे से पडोसी को बुलाना अथवा उससे बात-चीत करना अशिष्टता का चिह्न है । स्त्रियाँ बहुधा इस नियम का उल्लङ्घन कर देती हैं, पर उनका यह कार्य नियम विरुद्ध ही है।
१२० हिन्दुस्थानी शिष्टाचार पड़ोसी का महत्त्व इमी एक बात से सिद्ध हो सकता है कि लोग किसी भी दुर अथवा अभिमानी व्यकि के पड़ोस में रहना पसद नहीं करते। (९) सेवकों के प्रति सेवको के साथ शिष्टाचार का व्यवहार करना कई कारणो से आवश्यक है । एक मुख्य कारण तो यह है कि हम अपने शिष्टाचार से सेवको को स्वाभाविक अशिष्टता को सुधार सकते हैं । नीति की दृष्टि से तो सेवकों का पालन पोषण करना स्वामी का एक प्रधान कर्त्तय है । वन को जाते समय रामचन्द्र जी ने अपने दास और दासियो को बुलाकर तथा उन्हें गुरु को सौपकर कहा था कि सब कर सार-सॅमार गुसाई । करहु जनक जननी की नाई ॥" जहाँ तक हो नौकरी के प्रति कड़ा व्यवहार न किया जावे। उन्हें काम में बार-बार टाकना या उन पर सदा क्रोध करते रहना केवल शिष्टाचार हो की दृष्टि से नहीं, कितु उपयोगिता की दृष्टि से भी हानिकारक है। मालिक की रात-दिन की खट-खट से ऊवकर नोकर काम छोड़ देने के लिए तैयार हो जाता है और जिसके यहाँ नोकर बहुधा वदलते रहते हैं उसके विषय में लोग निन्दा करने लगते हैं। ऐसी अवस्था मे उचित यही है कि नौकरो के साथ न्याय और दया का बर्ताव किया जावे । इस बात का प्रयत करना आवश्यक है कि नौकर अपना काम मन लगाकर फरे, इसके लिए उपयुक्त अवसर पर उसे कुछ पुरस्कार दिया जावे। नौकर की बीमारी और विपत्ति की दशा में भी उसके साथ सहानुभूति प्रकट करने की आवश्यकता है । जहाँ तक हो बीमारी या साधारण गेर-हाजिरी में उसकी तनखाह न काटी जाने । नौकर पर क्रमश विश्वास बढ़ाना चाहिये जिसमे घह अपना काम अधिक सचाई से करने का उद्योग करता रहे।
छठा प्राध्याय - नाकर के द्वारा मान मॅगाई गई वस्तुओं को सायधानी में देखना और उनका मूल्य जांचना बहुत प्रावश्यक है, पर प्राने दो पाने के अतर पर उमे सहसा झूठा बनाना उचित नहीं। कई नाकर स्वभाव ही मे दुर चौर और चालाक होने हैं। इमलिये ऐसे नोकरों को गिना पूरा विश्वाम किये काम में लगाना ठीक नहीं । यदि भूल से ऐसे नोकर काम म लगा लिये जाय, तो भूल मालूम होने पर उन्ह चतुराई से जवाब दे देना 'चाहिये। किसी मो अवस्था में ऐसा अवसर कभी न लाया जाय कि मालिक और नौकर के घोव में गुल्नम-सुरता कहा मुनी या गाली-गलोज होने लगे। यदि प्रादमी अग्ला हो तो उसे तण स्त्रियों को नौकर न रसना चाहिये, क्योंकि इसम नि तया हानि होने की सम्भावना रहती है। नौकरो से यहुधा उतना ही काम लिया जाय जितना चेतन उन्हें दिया जाता है। ज्यादा काम के लिए ज्यादा दाम देना याजिन प्ररि जरूरी है। नौकर मे कभी ऐसा काम न कराया जाये जो उसके गारव के विपद हो । यदि लाभ के पशीभूत होकर कोई नोकर अपनी प्रतिष्ठा के विरुद्ध कोई काम करना स्वीकार कर ले तो उसका यह भेद मा में प्रकट न किया जाये पोर न सर के सामने उससे सा काम करने को कहा जाये । इस प्रकार के अपमान-कारी काम का एक उदाहरण यह है लोग कमी कभी ढोमरों से जूते साफ करवाते हैं जिसको ये लोग बहुधा अपनी जाति के विचार से स्वीकार नहीं करने । नोकर से कभी ऐसा गूद कार्य न कराया जाय जिसे वह किसी समय नौकरी छोड़ने पर प्रगट कर दे । उसो आगे दूसरो को नि दा करना भी उचित नहीं । बहुत पुराने नोकर के साथ कई बातो का अनुग्रह करने की आवश्यकना है।
१२० हिन्दुस्थानी शिष्टाचार (१०) अछुतो के पति अछूतो को पास निकालने अथवा मदिरो में जाने देने के लिए अभी बहुत समय लगेगा, पर उनसे सभ्यता और दयालुता का व्यवहार किसी भी समय किया जा सकता है। अछून ज्ञानियों म विशेषकर घमोर, भगी, चमार, डोम, प्रादि सम्मलित हैं । यद्यपि पोर भी कई जातियां ऐसी है जो इनसे पविनता या शुद्धता में किसी प्रकार बढ़कर नहीं है तथापि लोग उन्हें अछूत नहीं मानते । प्राय सभी लोग इन जातियो के गरीब प्रादमियो से अनादर-पूर्वक बोलते हैं और यदि भीड़ में बोरसे से भी इन लोगों का छुपा लग जाय तो दूसरी जाति वाले इन्हें डॉटते हैं। यह सन स्वार्थ और असभ्यता का व्यवहार है। हां, इतना अवश्य है कि इन जातियों के लोग शरीर योर कपड़ों की शुद्धता पर पूरा ध्यान नहीं देते जिससे दूसरे लोगो को इनके पास वेठने म घृणा होतो है अछूत जातियो से दया पूर्वक वर्ताव करना उचित है और यदि किसी को धोखे से इन लोगो का छुपा लग जाय तो उसको इन्हें डॉटना अनुचित है। इन लोगो से जो काम कराया जाय उसकी मजूरी पूर्ग देना चाहिये । कई लोग इन्हें थोड़े हो अपराध पर गाली देने को तैयार हो जाते हैं, पर गाली देनेवाले लोग यह नहीं सोचते कि जो काम अछूत लोग करते हैं वह ऊँची जातिवालों से नहीं बन सकता। जब हम इन लोगो पर इतना अवलम्बित रहना पड़ता है तर हमारे लिए यह उचित नहीं है कि हम इनका तिरस्कार करें। ममय ने पलटा खाया है, इसलिये अव अन्न जातियां भी अपने अपमान का प्रतिवाद करने लगी हैं। ऐसी अवस्था में एक ब्राह्मण को किसी अछूत मनुष्य से झगड़ा करते देस किसको दुख न होगा ? कह पक अभिमानी लोग अछूत जाति की स्त्रिया में भी अशिएता का स्वहार करते हैं। यह भी दुस का विषय है।
छठा अध्याय १२३ हम लोगो की सामाजिक प्रथाएँ इतनी दूपित हैं कि अछूत जातियां किसी प्रकार अपनी उन्नति कर ही नहीं सस्ती । ये लोग पाठशालाओं में पढ़ने नहीं पाते, किसी के दरराजे के भीतर पैर नहीं रख सकते और न रेल आदि सवारियों में स्वतन्त्रता से वेठने के अधिकारी हो सकते हैं। ऐसी अवस्था में यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि ये लोग अपने पाराम के लिए पूर्वजो का धर्म छोडकर दूसरे धर्म में चले जाते हैं। हिन्दुस्थानी लोगेा को उचित है कि वे इन जातियो को यथा शक्ति सुधारने का प्रयत करें। यद्यपि शहरों में इन लोगो के साथ असभ्य वर्ताव किया जाता है ता भी गांव के लोग इहे अछूत मानकर भी इनसे एक प्रकार का कल्पित पारिवारिक सम्बध मानते हैं। जब गाँव की कोई स्त्री किसी चमार को दादा या भैया कहकर पुकारती है तर क्षण भर के लिए मनुप्य के हृदय की उदारता का विन आँसो के सामने प्रा जाता है। जहाँ तक हो अछूत जानियो से सहानुभूति का भी व्यवहार किया जाये। यदि उन्च जाति के लोग इनके दुस-सुस मे शामिल हो और समय पड़ने पर इन्हें उचित परामर्श देखें तो ऊँची जाति- वालो को कदाचित् कोई नाम न धरेगा और न जाति से निकालेगा। हमे इस विषय में ईसाइयो का अनुकरण करना चाहिये जो इन लोगो के घर जाकर इन्हें पढ़ना लिसना और अपना धर्म सिखाते हैं। पर लोग ऐसा अनुमान करते हैं कि नीच जातियों को उत्तेजन देने से वे पागे उद्दण्डता का व्यवहार करने लगेंगी। इस प्राशका को दूर करने का सबसे उत्तम उपाय इन लोगो को शिक्षा है जिससे इनका हृदय विस्तृत और बुद्धि उन्नत हो सकती है। यदि हमारे कुछ उत्साही सहधर्मी अछूत जातियों की शिक्षा का भार अपने ऊपर ले लेयें और दूसरो के पातेपो का विचार न कर अपना - १२५ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार कर्तव्य पालते जावें, तो अछूतोद्धार की समस्या बहुत कुछ हल हो सकती है। (११) मार्थियों के प्रति अदालतो में प्रार्थियों की प्राय घड़ी दुर्दशा होती है । वहाँ चप- रासी से लेकर न्यायाधीश तक और वकील के मुन्शी से लेकर स्वय वकील साहव तक प्रार्थियों की ओर बहुधा अशिष्टता का व्यवहार करते हैं। किसी किसी न्यायाधीश के विषय में तो यहाँ तक सुना गया है कि वे प्रार्थिनी स्त्रियों तक को गालियां देते हैं । कचहरी के अधिकांश कर्मचारियों को अशिष्टता का एक कारण यह जान पडता है कि वे लोग प्रार्थियो से बहुधा वात वात पर पेसे खींचना चाहते हैं और जब वे इस काम में सफल नहीं होते तब बहुधा अशिएता का व्यवहार करने लगते हैं। बहुत दिन के अभ्यास से इन कर्मचारियों का, जिनमे बहुतसे शितित भी होते हैं, स्वभाव बहुधा इतना निगड जाता है कि वे छोटी-छोटी बातो पर भी वडी ऐंठ दिखाते हैं । भले से भले आदमी को मूर्स बना देना इनके लिए एक साधारण घात है । यद्यपि कचहरी के प्रशिट कर्मचारियों को अपनी एंट की सफलता पर आनन्द होता है, तथापि शिक्षिन और 'सभ्य समाज में इन्हें सद्या प्रादर प्राप्त नहीं हो सकता। अशिष्ट न्यायाधीश को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यदि वह किसी अपराधी को शिर वचन कहकर दण्ड देगा तो अपराधी दण्ड पाकर भो उस न्यायाधीश की प्रशसा करेगा। इसके विरुद्ध जो न्यायाधीश कठोर वचन कहकर अपराधी को दण्ड प्राक्षा सुनाएगा, यह अपराधी को दृष्टि मे दुहरा कठोर समझा जायगा और सम्भव है कि अपराधी आगे पोरे उससे बदला लेरे । यदि कोई न्यायाधीश किसी केटी को फांसी का हुकुम सुनाने के पश्चात् उससे यह कहे कि " मुझे तुम्हारे प्राणा पर दठा अध्याय यहुत दया पाती है और म यहुत चाहता कि तुम्हें इस दण्ड मे मुक कर दूँ। परतु पद है, म न्याय के कारण यिषण होकर तुम यह सर मे कठिन दण्ड देता हूँ", तो उस न्याया- धोग के प्रति मरते मरते भो अपराधी के मन में अन्दा माय रहेगा। प्रशिष्टता ये सर मे युरे उदाहरण अधिकांगम मूख पुलिसयाले प्रकट करते हैं। इन लोगो की दृष्टि म क्सिीसे सभ्यता पूर्वक बात करना कदाचित् प्रपा रार नो देना है । ये लोग बहुधा सोधे यात करना जानते हो नहीं और अपराध स्वीकार कराने में तो भावी अपराधी का कभी-कभी प्राणात कट दे डालते हैं। पुलिसवालों के लड़के चन्चे तक अपने पिताओं की प्रत्ति का अनुकरण कर बहुधा दूसरे लड़को पर अपना अधिकार जमाना चाहते हैं । पुलिमयालो फी अनुचित प्रति प्रोर असभ्य व्यवहार के कारण लोग घया इनके पड़ोस में रहना पसद नहीं करते । यद्यपि हिदुस्थान की पुलिस को इतनी निन्दा होती है तो भी गिलेड की पुलिस के विषय मे फेवल प्रशसा ही सुनी जाती है। हिन्दुस्थान मे मा अनेक पुलिसवाले बड़े होसभ्य देखे और सुने गये हैं पर ऐसे लोग अपने विभाग में बहुधा सफल नहीं समझे जाते। प्राथियो के प्रति अशिष्टाचार प्राय ऐसे स्थानो में भी देखा जाता है जहाँ इसके लिए कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं दिखाई देता। यदि कोई नोकर किसी महाजन के यहां जाकर नौकरी के लिए प्राथना करता है तो महाजन उस नोकर को कभी कभी धुतकार देता है। यदि कोई किसी से उपयोग के लिए कोई वस्तु मांगता है तो उस घस्तु का स्वामी बहुधा उद्दण्डता पूर्वक यह उत्तर देता है कि "यह चीज यहाँ कहाँ रखी है।"
२६ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार दारो के कई एक बड़े बाबू तो अपने पद का इतना गर्व करते कि वे उम्मेदवारों को अपने कमरे के भीतर ही नहीं आने देते थवा उनकी एक भी घात का निश्चित उत्तर नहीं देते। कई 'ग प्रार्थियों को चार-चार भटकाते हैं और अन्त में उनकी शर्थना निर्दयना-पूर्वक अस्वीकृत कर देते हैं । सभ्यता पूर्वक सूचित को ई अस्वीकृति प्राधियों को उतना कट नहीं पहुंचातो जितना अधि- कारियो की अहमन्यता और असभ्यता । कई एक वकीलो की यह रोति है कि वे बहुधा प्रासामियों से पया तो भर-पर ले लेते हैं, पर मुकदमे को तैयागे नहीं करते और शी पर हाजिर नहीं होते । यदि मुवक्लि उनसे कुछ कहना है तो वे दुत गरम होते हैं और मुकदमा छोड़ देने की धमकी दे देते हैं । चारा आमामी यह अत्याचार उन लोगों के हाथो सहता है जो श के नेता बनने का दम भरते हैं । गामाई जो ने ठोक कहा है के “पर उपदेश कुशल बहुतेरे"। (१२) सम्पादकीय सम्पादकीय शिराचार में सम्पादक, लेखक, प्रकाशक ओर ठको का परस्पर शिष्ट व्यवहार सम्मलित है। प्रकाशक को पत्र की छपाई पुराने पिसे टाइपो से न करानी चाहिये और यदि पत्र का मूल्य महेंगा हो तो उसे अन्के कागज पर छपाना चाहिये। IT में अश्लील विज्ञापन न छापे जायें और जहाँ तक हो धृर्ती के ज्ञापन प्रकाशित न किये जायें । सम्पादको को ऐसे लेख न शपना चाहिये जिनमे किसी एक रस को पराकाष्ठा हो । उसे प्रायः तभी रमे के उचित परिमाण पाले लेख छापना उचित है । मासिक ग्मो मे पद्य का भी उचिन समावेश होवे। किसी पुस्तक की समालोचना करते समय पुस्तक हो की समालोचना करना उचित है, उसके लेखक के विषय में व्यक्तिगत छठा अध्याय १२७ रूपसे अनधिकार चर्चा करना उचित नहीं । कोई कोई सम्पादक किसो लेखक से कारण वशात् अप्रसन्न होने के कारण विरुद्ध समालोचना कर बैठते हैं, यह कार्य अशिष्टता-मय है। जो सम्पादक जिस विषय को न जनता हो-सभी सम्पादक सर्वज्ञ नहीं होते-उसे उस विषय मे अपनी सम्मत्ति देने की धृरता न करनी चाहिये । इसके लिए उचित उपाय यही है कि सम्पादक उस विषय की ममालोचना किसी विशेषज्ञ से कराने और उसकेसाथ समालोचक का नाम लिस देवे । यदि समालोचक चाहे तो उसके यथार्थ नाम के बदल कोई करिपत नाम छाप दिया जावे । कई एक सम्पादक समालोचना के लिए भेजो गई उपयुक्त पुस्तको को प्राप्ति भी स्वीकृत नहीं करते और स्वार्थ वश कभी कभी उनकी समालोचना नहीं छापते । यह व्यवहार निन्दनीय है। किसी-किसी मासिक पन में ऐसे ऐसे समालोचको के नाम छापे जाते हैं निन्हें पत्रों के विद्वान पाठक समालोचना करने के योग्य नहीं समझते। ऐसे ममालोचको से समालोचना कराकर और उसके साथ उनका नाम पाकर सम्पादक लोग प्रत्यक्ष रूप से अपने पनो की प्रतिष्ठा घटाते हैं और परोक्ष रूप से योग्य लेसको का अपमान करते हैं। साथ हो वे पत्र के पाठको पर भी एक प्रकार का मानसिक अत्याचार करते हैं। कई एक सम्पादक ऐसे देखे जाने हैं जो स्वय पुस्तक प्रकाशक, पुस्तक विक्रेता और साय हा सम्पादक तथा विज्ञापक भी हैं। ऐसे लोग भला दूसरो की पुस्तकों की उचित समालोचना कर कर सकते हैं? कई समाला- चक प्रश्लीलता तक का उपयोग कर बैठते हैं और अपनी विचार- गेलो से गुगडेा के पद को भी पार कर जाते हैं । लेसको को ऐसे विषय पर लेखनी चलाना उचित नहीं जिनका उई अन्ठा ज्ञान न हो । प्राज-कन हिदी मे कई एक लेसक इसी १२६ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार दसरो के कई एक बड़े बाबू तो अपने पद का इतना गर्व करते हैं कि ये उम्मेदवारों को अपने कमरे के भीतर ही नहीं आने देते अथवा उनकी एक भी बात का निश्चित उत्तर नहीं देते। कई लोग प्रार्थियों को बार-बार भटताते हैं और अन्त मे उनकी शयना को निर्दयता पूर्वक अस्वीकृत कर देते हैं । सभ्यता-पूर्वक सूचित को हुई अस्वीकृति प्रार्थियों को उतना कट नहीं पहुँचाती जितना अधि- कारियो की अमन्यता और असभ्यता । कई एक वकीलो की यह रोति है कि वे बहुधा प्रासामिया मे रुपया तो भर पूर ले लेते हैं, पर मुकदमे को तैयारी नहीं करते और पेशी पर हाजिर नहीं होते। यदि मुवफिल उनसे कुछ कहता है तो वे वहुत गरम होते हैं और मुकदमा छोड़ देने की धमकी दे देते हैं । बेचारा प्रासामी यह अत्याचार उन लोगों के हाथो सहता है जो देश के नेता बनने का दम भरते हैं । गोसाई जी ने ठोक कहा है कि " पर उपदेश कुशल बहुतेरे"। (१२) सम्पादकीय सम्पादकीय शिटाचार में सम्पादक, लेखक, प्रकाशक पार पाठको का परस्पर शिष्ट व्यवहार सम्मलित है । प्रकाशक को पत्र की पाई पुराने पिसे टाइपो से न करानी चाहिये और यदि पन्न का मूल्य महगा हो तो उसे अच्छे कागज पर छपाना चाहिये । पत्र मे अश्लील विज्ञापन न छापे जायें प्रोर जहाँ तक हो चूर्तों के विज्ञापन प्रकाशित न किये जायें । सम्पादको को ऐसे लेस न छापना चाहिये जिनमे किसी एक रस को पराकाष्टा हो । उसे प्राय सभी रमा के उचित परिमाण वाले लेख दापना उचित है । मामिक पों में पद्य का भी उचित समावेश होवे। किसी पुस्तक की समालोचना करते समय पुस्तक हो की समालोचना करना उचित है, उसके लेखक के विषय में व्यक्तिगत छठा अध्याय रूपसे अनधिकारच करना उचित नहीं। कोई कोई सम्पादक किसो लेखक से कारण वशात् अप्रसन्न होने के कारण विरुद्ध समालोचना कर बैठते हैं, यह कार्य अशिष्टता मय है। जो सम्पादक जिस विषय को न जनता हो-सभी सम्पादक सर्वज्ञ नहीं होते---उसे उस विषय में अपनी सम्मत्ति देने की धृटता न करनी चाहिये। इसके लिए उचित उपाय यही है कि सम्पादक उस विषय की समालोचना किसी विशेषज्ञ से कराये और उसके साथ समालोचक का नाम जिस देवे । यदि समालोचक चाहे तो उसके यथाथ नाम के बदले कोई करिपत नाम वाप दिया जावे । कई एक सम्पादक समालोचना के लिए भेजो गई उपयुक्त पुस्तको को प्राप्ति भी स्वीकृत नहीं करते और स्वाथ वश कभी कभी उनकी समालोचना नहीं छापते। यह व्यवहार निदनीय है। किसी किती मासिक पन में एसे ऐसे समालोचको के नाम छापे जाते हैं जिन्हें पत्रों के विद्वान पाठक समालोचना करने के योग्य नहीं समझते। ऐसे ममालोचको से समालोचना कराकर और उसके साथ उनका नाम पाकर सम्पादक लोग प्रत्यक्ष रूप से अपने पनो को प्रतिष्ठा घटाते हैं और परोक्ष रूप से योग्य लेखको का अपमान करते हैं। साथ हो वे पन के पाठको पर भी एक प्रकार का मानसिक अत्याचार करते हैं। कई एक सम्पादक ऐसे देखे जाते हैं जो स्वय पुस्तक प्रकाशक, पुस्तक विक्रेता और साथ हा सम्पादक तथा विज्ञापक भी हैं। ऐसे लोग भला दूसरो की पुस्तको की उचित समालोचना कब कर सकते हैं ? कई समालो- चक अश्लीलता तक का उपयोग कर वेठते हैं और अपनी विचार- शैलो से गुगडे के पद को भी पार कर जाते हैं । लेससे को ऐसे विषय पर लेखनी चलाना उचित नहीं जिनका उन्हें अन्ना ज्ञान न हो । आज-क्ल हिदी में कई एक लेखक इसी १२८ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार कोटि के पाये जाते हैं । ये लोग बहुधा दूसरी भापायो का व्यावसा- यिक ज्ञान प्राप्त करके उनके उच्च कोटि के लेखो का अनुवाद करते हैं और मूल लेस का उल्लेख न कर स्वय ही उस लेस के लेखक धन बैठते हैं ! इसी प्रकार कई एक लेखक रिना किमी कृतक्षता के दुसरो पुस्तको से पृष्ठ के पृष्ट नकल करके अन्य नैयार कर लेते हैं। समय-समय पर ऐसे लेसको की पोल खोली जाती है, पर लोगो के पाक्षेप बहुधा उन्हें अपने स्वार्थ-मार्ग से नहीं हटा सकते। कई एक पुराने लेखकों की कृतियों से इस समय यह पता लगा है कि उनके जो प्रन्य कुछ समय तक युगान्तर उपस्थित करते रहे चे यथार्थ में दूसरी भाषा की पुस्तको के अनुवाद मात्र थे। पेसो प्रशिष्ट कृतियो से प्रशसा नहीं हो सकती। सम्पादक लोग बहु का दूसरो के लेरो मे बे-हिसार काट-छाँट फरने की उद्दण्डता भी कर टालते हैं। यद्यपि कई लेसक अपने लेसो की उमङ्ग में कभी-कभी वे सिर पैर को बातें लिख मारते हैं तो भी सम्पादक को उचित है कि वह किसी भी लेस में अस्पतम परिवर्तन फरे । हो , जो लेख निलकुल हो बदलने के योग्य हो, परतु जिसमे महत्त्व पूर्ण विवेचन किया गया हो, उसे लेखक की प्राज्ञा लेकर पूरा यदल देना अनुचित नहीं है। किसी लेखक से लेस प्राप्त होने पर उसकी सूचना देना चाहिये और यदि लेस छपने योग्य हो तो उसे उपयुक्त अवधि में आप देना चाहिये । जहाँ तक हो सके अस्पोरत लेख नम्रता पूर्वक कारण समझाकर लेखक को लौटा दिये जायँ । पेसा न हो कि लेस प्राप्त होने पर उसकी पहुँच न लिसी जायें और लेखक के पूछने पर उसे कुछ उत्तर न दिया जाय। सम्पादयो को अपने पत्रों में दूसरे पत्रों का उल्लेख बहुत कम करना चाहिये । यद्यपि पत्रों की परस्पर मुठभेड़ में अधिकांश पाठको का मनोरञ्जन होता है और जिस पत्र के उत्तर फुड अधिक
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१३० हिन्दुस्थानी शिष्टाचार पत्रों में धड़ाधड़ उर्दू को गजलें उपवा रहे हैं। कुछ लेखक ऐसे भी हैं जो शेक्सपियर प्रोर मिल्टन की दुहाई दिये विना और हिन्दी अनुगद के साथ उनके विचार अंगरेजी मे उद्धृत किये बिना अपने को धन्य नहीं मान सकते । किसी किसी लेख म उर्दू शन्दो की इतनी प्रधानता रहती है कि यह लेस लेखक की उर्दू विक्षता प्रकट करने के सिवा प्राय ओर कोई वात प्रकट नहीं करता । कई- एक लेखक ऐसे विचिन हैं कि उनका एक वाक्य एक पृष्ठ में और एक पैरा तीन पृष्टो में पूरा होता है । यदि ऐसे लेखको और सम्पादको को केवल हिन्दी जाननेवाले पाठक अनुभव हीन और अयोग्य समझ तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। (१३) सार्वजनिक जिन स्थानो पर सर्व साधारण का निस्तार होता है, उन पर दूसरो का निस्तार रोकना और केवल अपना ही निस्तार करना अनुचित है। आम सड़क के बीच में अथवा उस पर चलने वाले लोगो के मार्ग में खड़ा होना अशिष्टता है। लोग बहुधा सड़को पर अपनी दूकाने बढ़ा लेते हैं अथवा चबूतरे बनाकर उनपर अपना हो निस्तार करते हैं । ये कार्य भी अनुवित हैं । कहीं कहीं लोग आवागमन के मार्ग मे गाड़ियां खड़ी कर देते हैं अथवा अपने सामान या माल का ढेर लगाते हैं । कोई-कोई लोग तो अपने उत्सवो के कारण सड़को पर पूरा अधिकार करके कुछ समय के लिए लागो का आवागमन ही बद कर देते हैं । यद्यपि ये सब अपराध कानून से दण्डनीय हैं तथापि इनमे शिष्टाचार का भी उनघन होता है। सडको पर बांधा ऐसी चीजें न फेकना चाहिये जो घृणित हो अथवा जिनसे दूसरो के स्वास्थ्य में विघ्न पड़ने का भय हो । घरो के निकट इस प्रकार के निस्तार भी न किये जा जो स्वच्छता की दृष्टि मे निषिद्ध हैं। सड़को की और पाखानो के दरवाजे न खोले जायें ।
छठा अध्याय १३१ और न उनमे सडी-गली चीजें जमा की जाय । लोग बहुधा रोगियो के स्नान का पानी अथवा उसके शरीर से निकली हुई दूसरी चीजें सड़क पर इस विश्वास से फेक दिया करते हैं कि ऐसा करने से रोगी अन्श हो जायगा और उसका रोग सड़क पर चलनेवालों को लग जायगा ! ये टोटके नीचता से परिपूर्ण हैं । सडको पर पत्थर या काटे न डाले जायें और यदि किसी को ये चीजें वहाँ मिल जाँय तो वह कृपा कर इहें सडक से अलग कर देवे । जहाँ तक हो ऐसे धधेवाले लोगो को जिनके धन्यो म दुर्गंध पूर्ण वस्तुयो का उपयोग होता है अपना काम-काज बस्ती से दूर करना चाहिये। किसी सार्वजिनक स्थान को हानि पहुँचाना अथवा 'अपवित्र करना अथवा उसमे जाकर असभ्य व्यवहार करना शिष्टता के विरुद्ध हे । कुएँ, तालाब अथवा नदी के जल को बिगाड़ना अथवा उनका उपयोग करने में किसी को रोकना कानून और शिष्टाचार दोनो के विरुद्ध है। जिन धर्म शालामो या सराया में लोगो को ठहरने के लिए बिना भाड़े के स्थान मिलता है उन्हें अपने उपयोग के पश्चात् स्वच्छ करके अथवा कराके छोडना चाहिये। सावजनिक स्थानो म कोई नशा करना, अश्लील गीत गाना अथवा किसी धर्म की निदा करना प्रमभ्यता है । पुस्तकालयो मे पुस्तको प्रोर मासिक- पत्रो को पढ़ने के पश्चात् यथा-स्यान रस देना चाहिये। उन्हें किसी प्रकार मोड़ना या फाइना न चाहिये। खेल-तमाशा में म्यान तोड़कर बार पार आना जाना, हल्ला करना, किसी के दृष्टि पथ को रोकना और न्यर्थ दगा करना अनु- चित है। जो स्थान स्त्रियो के लिए नियत हों उनमे पुरुषों को न जाना चाहिये और न उस मार्ग से निकलना चाहिये जहाँ से लिया प्राती जाती हों । नाटक वालों को ऐसे सेल न दिसाना चाहिये निनसे दशको की सुगवि पर आघात पहुँचे या स्त्रियों की स्वाभा- १३२ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार विक लज्जा पर बुरा प्रभाव पड़े। नाटो मे रंग मञ्च पर मृत्यु अथवा शृगार-रस की पराकाष्ठा न दिग्पाई जाने और न करणा- स की अधिकता से दर्शको के चित्त में अत्यत व्याकुलता उत्पन्न की जावे। सडको पर या गलियों में अश्लील गीत गाते हुए निकलना प्रमभ्यता है । जुलूस के अवसर को छोड़कर किसी दूसरे समय में अकेले यक्ति अथवा कुछ लोगे के समूह के लिए सक पर या गलियों में गाते हुए चलना अनुचित है । फकीर अथवा साधु लोग सड़को और गलियो मे गाते हुए निकलते हैं, पर उनके पक्ष में पेसा करना अशिष्ट नहीं समझा जाता । बस्ती के रास्तो में जोर-जोर से बातें करते हुए निकलना भी अनुचित है। कई एक महात्मा नग्ना- वस्था में स्त्री-पुरुपो को भीड़ के साथ सदसे पर फिरते हैं । इन महात्मायो को ब्रह्म-ज्ञान के साथ-साथ कुछ शिष्टाचार-झान भी होना श्रावश्यक है । प्रयेक मनुप्य को सड़क पर अपने वायें हाथ की ओर चलना चाहिये जिससे सवारियो और दूसरे लोगों को पाने- जाने में सुभीता हो । व्याख्यातायो को अथवा उत्सव मनाने वालों को अपना काम सड़क के ऐसे भाग में न करना चाहिये जहाँ लोगो का आवागमन होता है। ऐसे कार्यालयों में जहाँ कई लोगो का काम रहता है, लोगो को समय के क्रम से अपना काम कराना चाहिये । कार्यालय के कर्म- चारी को भी उचित है कि वह पहले आये हुए व्यक्ति का कार्य पहले करे, चाहे वह किसी भी स्थिति का क्यो न हो। शिष्टाचार का पालन न करने से बहुधा अदालतो, डाफारा और स्टेशनो में अपना-अपना काम शीन निकालने की इन्का के कारण पढ़े-लिखे लोगो मे भी परस्पर धक्का-मुक्की हो जाती है। कभी-कभी बल- यान और प्रतिष्ठित लोग दुसरो की आवश्यकता पर कुछ भी ध्यान छठा अध्याय १३३ न देकर अपना काम पहले कराने के लिए सब प्रकार के उचित और अनुचित उपाय करते हैं। हम लोगो में स्वार्थ-साधन की उत्सुकता और दूसरे के सुभोते की अवहेलना इतनी प्रबल है कि कभी कभी बलवान या धनवान लोग रेल गडियो में आराम से लेटे रहते हैं और निर्बल, पालक, वृद्ध और स्त्रियां उनके सामने घटों खड़ी रहती हैं। जिन मार्गों से मनुष्यो का आवागमन अधिकता से होता है उनमे से पशुत्रों को निकालना अथवा गाडिया या घोडो का बड़े वेग से दोड़ाना उचित नहीं । सड़क के किनारे रहने-वालो को इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि वे अपने छोटे-छोटे बच्चो को सड़क पर खेलने या फिरने न देवें, क्योंकि ऐसा करने से दुर्घटनामो की सम्भावना रहती है। कई एक गाड़ीवान इतने मूर्ख होते हैं कि वे परिणाम का कुछ भी ध्यान न कर अपनी गाड़ी को दूसरे को गाड़ी से आगे निकालने के लिए उसे किसी भी तरफ बड़े जोर से चलाते हैं । ये लोग बहुधा अशितित होने के कारण पैदल लोगो को एक तरफ हटने के लिए सूचना देने में सभ्यता पूर्वक बोलना हो नहीं जानते। (१४) बाल-शिष्टाचार लड़को मे बहुधा आपसी झगड़े हो जाते जिनका एक मुख्य कारण उन लोगों में शिष्टाचार को शिक्षा का साधारण प्रभाव यद्यपि पाठ-शालाओं में शिष्टाचार की थोड़ी-बहुत शिक्षा प्रत्यत पोर परोक्ष रूप से दी जाती है तथापि विद्यार्थी अपनी अवस्था के प्रभाव में पड़कर बहुधा व्यवहार में उस शिक्षा को भूल जाते हैं। कई विद्वानों का ऐसा मत है कि लड़को को शिष्टाचार की शिक्षा देना मानो उन्हें बधन में डालना है , पर अनुभव से इस बात की ।
१३४ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार आवश्यकता जानी जाती है कि लड़की को शिष्टाचार की में मोटी बातें बताई जावें और उनके अनुसार उनसे कार्य कर जाने। लड़को के बहुतसे आपसी झगडे व्यक्तिगत मिथ्या अभिम से उत्पन्न होते हैं। कोई लड़का अपने को औरों से अधिक बल समझकर उनका अनादर करता है, कोई पढ़ने लिखने में है अधिक चञ्चल होने के कारण दूसरो को मूर्स समझता है प्र कोई सीधे स्वभाव वाला विद्यार्थी उपद्रवी लड़की से मन ही वृणा करता है। इन अवस्थाओं में सुधा अनान हो जाती है , लड़के एक दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयत करते हैं। कोई- लडके अपने पिता के धन या उच्च पद के अभिमान में दूर लड़की के सामने दून की हॉकते हैं और यदि कोई लड़का उन बात का सराडन कर देता है तो वे उससे बदला लेने की धात रहते हैं। किसी क्सिी विद्यार्थी का स्वभाव ही ऐसा दूषित हो है कि वह अपने मिथ्या महत्व के आगे किसी भी लटके का मह सहन ही नहीं कर सकता । कई-पको में अपनी पोशाक ही है ऐसा अभिमान होता है कि वे दूसरे लड़को से सीधे बात ही न करते पार नम्र से नम्र प्रश्न का उत्तर बड़ी ऐंठ के साथ देते है यहाँ कदाचित् यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि इन दुर्गु से केवल लड़को की ही नहीं, किन्तु उनके माता-पिता की बड़ी निन्दा होती है। लड़को और विद्याथियो मे कुसगति से बड़े बड़े दोप उत्पन्न जाते हैं, इसलिये माता-पिता को यह बात अवश्य देखना चाहि कि लड़का किन लोगो को सगति में रहता है। कभी कभी और नीच लोग भी स्वार्थ-वश अथवा अपनी दुष्पति के कार कम उमर के लड़को को दुराचरण सिखाने हैं। ऐसे लोगो की सग ।
छठा अध्याय से भी छोटे छोटे लड़कों को पचाना चाहिये। फोमल मति होने के कारण दुधा लड़के उचित और अनुचित का शीव निर्णय नहीं कर सकने और सरलता से गड्ढे में गिर जाते हैं। ऐसी अवस्था मे उई कम से कम शिष्टाचार की शिक्षा तो अवश्य दी जाये जिसमे लड़के युरे आचरण वाले साथियो और लोगों से अपने को पचा सकें। लड़को को अनबन का एक प्रमुख कारण एक दूसरे को चिढ़ाना अथवा आपस में अनुवित हंसी-ठट्टा करना है, इसलिये प्रयेक समझदार विद्यार्थी का यह कत्तय है कि वह दूसरे से यर्थ हमी-ठट्टा न करे । दूसरे को चिढ़ाने या उसकी हंसी उड़ाने में जो मिथ्या प्रानद प्राप्त हाना है उसकी प्रेरणा से लहले तो क्या, बद्री उमर याले भी कभी कभी नहीं बच सकते । ऐसी अवस्था में यह वात बटुन आवश्यक है कि लड़ो की यह दूपित प्रति यया. सम्भव कम की आरे । यदि लड़के स्वय इस बात को मार्च कि जिसको ये चिढ़ाते हैं उसके मन में कितना सेद न होता होगा तो ये स्वप दूसरे के मन को व्यय दुखाने मे अवश्य पीछे हटेंगे। तुलसी- दास जी ने कहा है कि "परहित सरिस धर्म नहि भाई। पर पीड़ा सम नहिं अरमाई ॥" जो लड़का दूसरे को न चिढ़ावेगा उमे सम्भवत दूसरे लड़के कभी न चिढ़ायेंगे। लदो को चाहिये कि वे मिलकर एसे व्यकि के दोषो को रोके जो दूसरो के साथ व्यर्थ हंसी मजाक करता है या उनमे अश्लीलता सिखाता है। लड़को के मिथ्याभिमान से भी बड़े-बड़े अनथ होते हैं। लड़के बहुधा अपनी बड़ाई और दूसरे की निन्दा करने मे दा पानद मानते हैं । गरीब लडके तो इन मिथ्याभिमानी लडको की दुटि में किसी प्रकार योग्य ही नहीं ठहरते। विद्या-समधी मिथ्याभिमान के वशीभूत होकर लडके बहुधा व्यर्थ वाद विवाद में प्रवृत्त हो जाते हिन्दुस्थानी शिष्टाचार आवश्यकता जानी जाती है कि लड़कों को शिष्याचार की माय मोटी बातें बताई जावें और उनके अनुसार उनसे कार्य कराय जावे। लड़को के बहुतसे प्रापसी झगडे व्यक्तिगत मिथ्या अभिमा से उत्पन्न होते हैं। कोई लड़का अपने को औरों से अधिक बलमा समझकर उनका अनादर करता है, कोई पढ़ने-लिखने में कुछ अधिक चञ्चल होने के कारण दूसरों को मूर्ख समझता है प्रो कोई सीने स्वभाव वाला विद्यार्थी उपद्रवी लडको से मन ही मन घृणा करता है । इन अवस्थामों में बहुधा अनबन हो जाती है और लड़के एक दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयत करते हैं। कोई-को लडके अपने पिता के धन या उच्च पद के अभिमान में दूस लड़यो के सामने दून की हाँकते हैं और यदि कोई लड़का उनक बात का सराडन कर देता है तो वे उससे बदला लेने की घात में रहते हैं। किसी क्सिी विद्यार्थी का स्वभाव ही ऐसा दुपित होत है कि वह अपने मिथ्या महत्व के आगे किसी भी लड़के का महत्व सहन ही नहीं कर सकता। कई-पको में अपनी पोशाक ही का पेसा अभिमान होता है कि वे दूसरे लडकी से सीधे बात ही नही करते और नम्र से नम्र प्रश्न का उत्तर बड़ी ऐंठ के साथ उते हैं यहाँ कदाचित् यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि इन दुर्गुण से केवल लड़को की ही नहीं, किन्तु उनके माता-पिता की भी घड़ी निन्दा होती है। लड़को और विद्याथियो में युसर्गात से बड़े-बड़े दोष उत्पन हे जाते हैं , इमलिये माता पिता को यह बात अवश्य देखना चाहिये कि लड़का किन लोगो को सगति में रहता है। कभी-कभी दुष्ट और नीच लोग भी स्वार्थ-वश अथवा अपनी दुष्परति के कारण कम उमर के लड़को को दुरावरण सिखाते हैं। ऐसे लोगा की सगति । छठा अध्याय १३५ से भी छोटे छोटे लडकों को पचाना चाहिये। कोमल मति होने के कारण बहुधा लड़के उचित और अनुचित का शोत निर्णय नहीं कर सकने अरि सरलता से गड्ढे मे गिर जाते हैं। ऐमी अवस्था में उई कम से कम शिष्टाचार की शिक्षा तो आश्य दी जावे जिससे लडके बुरे प्राचरण वाले साथियो और लोगों से अपने को बचा सके। लडको को अननन का एक प्रमुख कारण एक दूसरे को चिढ़ाना अथवा आपस मे अनुचित हसी ठट्ठा करना है, इसलिये प्रत्येक समझदार विद्यार्थी का यह कर्तव्य है कि वह दूसरे से यर्थ हंसी ठट्ठा न करे । दूसरे को चिढ़ाने या उसकी हँसी उड़ाने में जो मिश्या प्रान द प्राप्त होता है उसकी प्रेरणा से लड़के नो फ्या, बड़ी उमर-वाले भी कभी-कभी नही रच सकते । ऐसी अवस्था में यह धात बहुत आवश्यक है कि लड़को की यह दूषित प्रवृत्ति यथा- सम्भव कम की जावे । यदि लड़के स्वय इस बात को सोचें कि जिसको ने चिढ़ाते हैं उसके मन में कितना खेद न होता होगा तो वे स्वय दूसरे के मन को व्यथ दुखाने से अवश्य पीछे हटेंगे। तुलसी- दास जी ने कहा है कि "परहित मरिस धर्म नहि भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥" जो लड़का दूसरे को न चिढावेगा उसे सम्भवत दूसरे लड़के कभी न चिढ़ापेंगे। लडको को चाहिये कि ये मिलकर ऐसे व्यक्ति के दोषो को रोकें जो दूसरो के साथ व्यर्थ हंसी मजाक करता है या उनसे अश्लीलता सिखाता है। लड़को के मिथ्याभिमान से भी बडे-बड़े अनर्थ होते हैं। लके बहुधा अपनी बड़ाई और दूसरे की निन्दा करने में रहा मानद मानते हैं । गरीब लड़के तो इन मिथ्यामिमानी लडको की दृष्टि में किसी प्रकार योग्य ही नहीं ठहरते। विद्या-सम्बधी मिथ्याभिमान के वशीभूत होकर लडके बहुधा व्यर्थ वाद विवाद में प्रवृत्त हो जाते वहस और हिन्दुस्थानी शिष्टाचार हैं और एक दूसरे को वात हठ पूर्वक काटने लगते हैं। कभी-कभी ये लोग ऐसी सम्मनियाँ प्रकट करते हैं जो कल वडी उमर-चाले अथवा अनुभवी लोग ही प्रगट कर सकते हैं । इतना ही नहीं, ये लोग कभी-कभी अपने से अधिक ज्ञान वाले तरण पुरुपों से भी हुजत करने लगते हैं। इन दोपो से बचने के लिए विद्यार्थियों को चाहिये कि वे ऐसी बातो में बहुत सोच-समझकर भाग लेवें। कई-एफ उद्दड लडके दूसरे लडको को व्यर्थ हो दबाते हैं और कभी-कभी उनसे कुछ खींच भी लेते हैं। दूसरे लडको को चाहिये कि ऐसे दुष्ट लड़कों के साथ कभी घनिष्ठता न वदावें ओर केवल ऊपरी मेल-जोल रम्सें । कोई कोई लडके तो यहाँ तक नीच होते हैं कि आप तो पढ़ने मे मन लगाते नहीं और ईपी-चश दूसरे लहकों का मन पढ़ने से हटाने का उपाय करते हैं। कोई-कोई बड़े श्राद- मियो के मद बुद्धि लडके गरीब प्रादमियों के तीन-बुद्धि लड़को से मन ही मन ईपी रखते हैं और उनके कामो में विघ्न डालते हैं। लड़के बहुधा छोटी-छोटी बातों में एक दूसरे से अप्रसन्न हो जाते है और अपनी इच्छा की पूर्ति को मान-भग समझकर परस्पर लड़ वेठते हैं । इसलिये उन्ह उचित है कि वे किसी से अप्रसन्न होने के पहले कम से कम एक बार इतना अवश्य सेाच लिया करे कि उनका ऐसा करना उचित है या नहीं। लड़को में बहुधा स्वार्थ की इतनी अधिक मात्रा रहती है कि वे प्रायः प्रत्येक बात में अपनी ही टेक चलाते हैं और दूसरे के हानि-लाम अथवा सुस दुस का बहुत कम विचार करते हैं । यदि कोई उनसे उन्ही के लाम की बात कहे तो उसमें भी ये विश्वास नहीं करते। यही कारण है कि कुसङ्ग में पड़े हुए लड़के कठिनाई से सुधरते हैं। जड़को की वृद्धि कच्ची होने के कारण ये बहुत दूर तक विचार छठा अध्याय नहीं कर सकते जिसके कारण वे बहुधा धूर्त लोगो के फुसलावे में प्राजाते हैं। यदि लडके शिष्टाचार की बात स्वय नहीं समझ सकते तो उनके माता पिता का कर्त य है कि वे सतान को सभ्य- आचरण की शिक्षा देखें।
सातवॉ अध्याय (१) विदेशो चाल-ढाल जो जाति अरिक सभ्य अथवा प्रभावशाली समझी जाती है उसकी चाल-ढाल का अनुकरण बहुधा दूसरी जाति-वाले करने लगते हैं । यह अनुकरण विशेष करके पोशाक, केश-कलाप, गार और रहन-सहन में देखा जाता है । इस दुर्गुण में बहुधा पुरुष ही नहीं, किन्तु स्त्रियां भी प्रमित हो जाती हैं। प्राय देखा जाता है कि अधिकांश हिन्दुस्थानी लोग खुले सिर रहने लगे हैं। यह चाल वगालियों से सीसी गई है, क्योकि ये लोग किसी समय अपनी विद्या और पद के कारण बहुत प्रतिष्ठित माने जाते थे । यद्यपि खुले सिर रहना बगालियो में एक सामाजिक रीति है, यहाँ तक कि एक देहाती और गरीब गाली भी सिर सुला रसता है, तो भी हिन्दु- स्थानी लोगों में सुला मिर शोक का चिह्न समझा जाता है प्रार साधारण रीति से लोग इन वनावटी वानुनो को कुन तिरस्कार को दृष्टि से देखते हैं । सेठो और मारवाड़ी लोगेा में तो गुला सिर रखना असभ्य और अशुभ माना जाता है। इसी प्रकार बहुधा यह भी देखा जाता है कि कोई-कोई हिदुस्थानी स्त्रियों महाराष्ट्र महिलामो का अनुकरण कर उनकी तरह साडी पहिनने लगती हैं । ऐसी स्त्रियों को भी उनकी जाति-चाले एक प्रकार से असभ्य समझते हैं। यदि कोई जाति को जाति विदेशी श्रेष्ठता अथवा शासन के प्रभाव में पड़कर विदेशी चाल-ढाल सीस ले तो उस अवस्था में देशी चाल-ढाल का पुनरुद्धार करना कठिन है, पर यदि किसी . .
- सातवां अध्याय जाति के थोडे ही लोगो ने ऐसा अनुचित अनुकरण करना प्रारम्भ किया हो तो प्रारम्भ ही में उसका विरोध करना आवश्यक है। यदि पुराने रहन-सहन मे समय के फेर से कठिनाइयों उपस्थित होने लगें, तो उसमे आवश्यक परिवर्तन भले ही कर लिया जाय, पर पुराने रीति रिवाज में आमूल परिवर्तन करना उचित नहीं है। विदेशी चाल-ढाल के अनुकरण से एक तो लोग अपनी प्राचीनता का गौरव नट करते हैं और दूसरे अपनी स्वाधीनता के भाव भी एक प्रकार से खो देते हैं । इसके मिया हम जिा लोगेा की चाल- ढाल का अनुकरण करते हैं वे भी हम लोगो को विशेष प्रादर की दृष्टि से नहीं देखते और प्राय चापलूस समझते हैं। एक विलायन प्रयासो हिदुस्थानी सज्जन ने लिखा है कि जब म देशी पहिनावा पहिनकर किसी महाशय से मिलने जाता था तब वे मुझसे अधिक स्नेह-भाव से मिलते थे। विदेशी पोशाक का पूरा अनुकरण करना कठिन है, इसलिये इसकी छोटी सी भूल भी वड़ पहाम का कारण होती है। पूरी विलायती पोशाक पहिनने पर भी जो लोग कम से कम सिर पर टोपी, साफा या पगडीलगाते हैं वे टोपवालो की अपेक्षा पुत्र अधिक गौरववान समझे जाते हैं । इन सब कारणो पर विचार करने से यहो तात्पर्य निकलता है कि मनुष्य को अपनी चाल-ढाल में भी अपनापन (आत्म गौरव) रसना चाहिये। कई हिन्दुस्थानी लोग मुसलमानो की तरह ढीला पायजामा पहि- नते हैं अथवा कुलाह पर साफा बांधते हैं और इन पोशाको गोरव अथवा नवीनता का कारण समझते हैं, परवे यह नहीं समझते कि उनको छोड़कर दूसरे लोग उन्हें क्या समझते हैं । क्या कभी शितित मुसलमान धोती पहनते हैं ? अाजकल, अोर प्राचीन समय से भो, अलग अलग जाति को अलग अलग पोशाक है जिससे ?
१४० हिन्दुस्थानी शिष्टाचार उस जाति की पहचान होती है। हम पोशाक देखकर ही यह जान सकते हैं कि अमुक मनुष्य मारवाड़ी है, अमुक मनुष्य सिन्धी है और अमुक मनुष्य गुजराती है। इसी प्रकार बालों को रचना से से भी हम अनुमान कर लेते हैं कि यह मनुष्य मद्रासी है और यह पजावी है। पारसी लोगो को हम उनके कोट, पतलून और टोपी से तुरन्त पहचान सकते हैं। ऐसी अवस्था में जो लोग दूसरो की चाल-ढाल का अनुकरण करते हैं, वे मानो बगुला बनकर हसा की समाज में मिलते हैं और अपना अपमान कराते हैं। विदेशी वालो का अनुकरण करने वाले हिन्दुस्थानी सज्जनों को कम से कम इस बात पर अवश्य ध्यान रखना चाहिये कि वे अपनी चोटी न कटाया करें। आज कल पक हिन्दुस्थानी जाति ही ऐसी अभागिनी है कि वह बहुतसी बातो मे मुसलमानो से मिलती- जुलती है । ऐसी अवस्था में यदि हिन्दुस्थानी लोग चोटी न रखेंगे तो उनके मुसलमान समझे आने मे कोई मन्देह न रह जायगा। जातीय झगड़ो में उनके सजातीय ही उन्हें शिखा-नष्ट समझकर अपने कोप का पान बना लेंगे और उनको दशा चमगीदड़ की सी हो जायगी। आज कल छोटे-छोटे बाज रसना सर्वन सभ्य समझा जाता है, इसलिये जो लोग वड वाल रसते हैं उन्हें लोग घुछ असभ्य श्रथवा शोकीन समझते हैं। ऐसी अवस्था में भी बालों के सम्बन्ध मे दूसरी जाति का अनुकरण करना अशिष्ट माना जाता है। अलग-अलग जातियो में भोजन करने को रीति अलग-अलग है । जो आदमी किसी दूसरी जाति के यहाँ भोजन करने जाता है उसके बैटने और भोजन करने की रीति से तुरत पता लग जाता है कि यह मनुष्य किस जाति का है। यद्यपि स्वादिष्ट भोजन बनाने की रीति किसी दूसरी जाति से सीखना और उसके अनुसार भोजन बनाना अनुचित नहीं है, तथापि जातीय जेवनारो में इस सातयां अध्याय नवीनता का समावेश करना अनुचित है । किसी जाति में प्रचलित विशेष प्रकार के पानों का उपयोग करना भी अशिष्ट समझा जाता है। यद्यपि मुसलमानो के टोटीदार लोटे के समान पात्र से जल पीने में अधिक मुभीता है, तथापि हिदुस्थानियो के लिए ऐसे पात्र का उपयोग करना उपहास का कारण और अशिष्टता का बिह होगा। हम लोग हंसते हैं कि मुसलमान लोग अपने पूर्वजो को चाल-ढाल की रक्षा करने में ऐसी रहन-सहन का उपयोग करते हैं जो हिदो को दूष्टि से विरुद्ध समझी जाती है । उदाहर- णार्थ हम लोग कुहना से शुरू करके पजो तक हाथ धोते हैं, परन्तु मुसलमान लोग इसके विपरीत पो से प्रारभ करके कुहनो तक हाथ धोने को रीति पालते हैं। इन क्रियात्रा में स्वय कोई विशेषता नहीं है, वरन मुसलमानो का रोति मे वहुधा पहिने हुए कपडे भोग जाते हैं, तो भी एक जाति दुपरी जाति को हाथ धोने की राति को केवल इसीलिये अनुचित समझती है कि वह विदेशो रोति है। इसी प्रकार उठने बेठने, चलने फिरने अभिवादन करने और मिलने नुलने को रोति में एक जाति दूमरी जाति से बहुधा भिन्न होती है और जो लेग जानकर अथवा अनजाने भी दूसरी जाति के चाल-न्यवहार का यर्थ अनुकरण करते हैं वे मभ्यता की श्रेणी वहुन नोचा स्थान प्राप्त करते हैं। (0) विदेशी-मापा लोगो के मन पर विदेशो-भाषा का बड़ा प्रभाव पड़ता है जो कभी लाभदायक और कभी हानिकारक होता है। जब विदेशी- भाषा के प्रभाव में पडकर लोग उसे ज्ञान की प्राति और सय की खोन के लिए पढ़ते हैं तय यह प्रभाव लाभकारी होता है, परन्तु ૨૪૨ हिन्दुस्थानी शिष्टाचार जर विदेशी भाषा पडिताई बधारने अथवा मातृ-भाषा की अवहे. लना के निमित्त पढ़ी जाता है तब उसका प्रभाव हानिकारक होता है। विदेशी भाषा का प्रभाव अथवा अनुराग लोगो मे स्वभाव ही से इतना प्रबल होता है कि जो लोग उस भाषा के दो-चार हो शब्द सीरा लेते हैं वे उनका जहाँ तहाँ उपयोग किया करते हैं। विदेशी-भाषा जानने वाला मनुष्य बहुधा भावुकता के कारण श्रोताओं की दृष्टि में असाधारण विद्वान समझा जाता है । इस कारण लोग उस भाषा का टूटा फूटा ज्ञान प्राप्त करके मी प्रशसा के पान बनने की इच्छा करते हैं। हमी लोगो मे जो मनुष्य सस्थत, पाली अथवा प्रारत का ज्ञान रसता है वह केवल हिदी जानने-वाला की अपेक्षा अधिक प्रतिष्ठा का पान समझा जाता है, चाहे उसे अपनी मातृ-भाषा का अधूरा ही ज्ञान हो । इसी प्रकार फारसी अथवा अरवी जानने वाले लोग भी असाधारण पादर के योग्य माने जाते हैं। जो लोग केवल इमी प्रगमा-प्राप्ति के उद्देश्य से विदेशी-भाषाएँ सीसते हैं उनके सम्बन्ध से भी समझना चाहिये कि उन पर विदेशी भाषा का हानिकारक प्रभाव पड़ा है। श्राज- कल अँगरेजी के ज्ञान का यह मान नहीं है जो तीस वर्ष पूर्व था। तथापि अब भी लोग अँगरेजी के ज्ञान को केवल जीवित का ही नहीं किन्तु प्रतिष्ठा का भी साधन मानते हैं। विदेशी भाषा का ज्ञान अनावश्यक नहीं है । प्राज-कल लोगो को पृथ्वी के कई भागो व्यापार के लिए आना जाना पड़ता है। ऐसी अवस्या में किसी एक या अनेक विदेशी भाषाओं के ज्ञान के बिना फाम नहीं चल सकता । अनेक प्रकार की विद्याओं का ज्ञान प्राप्त करने के लिए भी उन्नत विदेशी भाषाओं को सीखना आवश्यक है। इसके सिवा राज काज का अनुभव प्राप्त करने के लिए भी विदेशी भाषाओ का ज्ञान आवश्यक है, श्रतएप कोई भी प्रावश्यक ।
साताँ अध्याय १४३ विदेशी भाषा सीखना प्रत्येक विद्वान और व्यवसायी का फर्त्तन्य है। शाद शासियों के लिए तो अनेक भाषामा का ज्ञान अनिवार्य है। कई हिन्दुस्थानी लोग उर्दू भाषा बहुधा इसलिये पढ़ते हैं कि घे उर्दू की प्रेम मयी (प्राशिगना) गजल गावें और मुसलमानों के साथ लन्देदार बातचीत करें। यह प्रवृत्ति निन्दनीय है। हाँ, जो लोग इस विचार से उ८ का अध्ययन करें कि हम उद और हिन्दी का यथार्थ अन्तर ममझ, अपने विषय में मुसलमान-लेखको का मत जाने अथवा उस भाषा की सुन्दर रचनाओं को अपनी मातृ. भाषा में अनुवादित करें, उनका यह प्रयत अवश्य सराहनीय है। तथापि जो लोग विदेशी भाषा के प्रति प्रादर पोर मातृ भाषा की ओर उदा-सोनता प्रगट करते हैं उनका यह विचार केवल शिष्टाचार हो के विरुद्ध नहीं, कितु नीति, समाजादश और राष्ट्र निम्माण की दृष्टि से भी निन्दनीय है। जहाँ अपनी मातृ भाषा वालने से काम चल सकता है वहाँ विदेशी भापा चालना अशिष्टता है । सम्भापण मे अनावश्यक विदेषी शब्दो को बीच बीच में घालना भी एक प्रकार को प्रशिष्टता है। कई एफ हिन्दुस्थानी अफसर अपने सहायक कर्मचारियो के साथ अंगरेजी में अनावश्यक पात-चीत करना अपना गोरव समझते हैं, पर यह उनकी भूल है । कभी-कभी तो ऐसा विचिन दृश्य देखा जाता है कि एक मनुष्य हिदी मे बात करता है और दूसरा उसको अंगरेजी में उत्तर देता है। कई एक अँगरेजी पढे उच कर्म- चारी थोड़ी अगरेजी जानने वाले अपने हिदुस्थानी भाई के साथ अगरेजी में बात करके उस अल्पज्ञ सज्जन को व्यर्थ हो सकोच में डालते हैं जिससे उसे विवश होकर टूटी फूटी विदेशी भाषा बोलनी पड़ती है। जो मनुष्य किसो विदेशी भाषा को शोम्रता पूर्वक न बोल । हिन्दुस्थानी शिष्टाचार कई पीढ़ियों मे सञ्चित होती है और मनुष्य के जीवन में अनेक वर्षों तक बढ़ती है। यथार्थ में धर्म का सम्बन्ध जितना मनुष्य की बुद्धि से नहीं है उतना उसको भावुकता से है। यदि हृदय में ईश्वर के प्रति मन्त्री प्रीति है और उसके प्राणियों की ओर सच्ची दया है तो इस बात की कोई चिन्ता नहीं है कि मनुष्य हिन्दू कहलावे अथवा मुसलमान । इतना होने पर भी यह परम पावश्यक है कि मनुष्य सहमा अपने कुल के धर्म से कभी बाहर न हो । कई लोग अपने धर्म की बड़ाई और दूसरे के धर्म की निन्दा किया करते हैं । ये दोनो बातें शिष्टाचार के विरुद्ध हैं । अनेक धर्मान्ध पोर मकोर्ण हृदय-वाले लोग तो यहां तक समझते हैं कि केवल उन्हीं का धर्म मसार में श्रेष्ठ है और दूसरे के धर्म में कोई सार ही नहीं । उनकी समझ में जो लोग पूर्व को मुस करके ईश्वर की प्रार्थना करते हैं वे पापी और प्रशिक्षित हैं। ऐसे मूर्ख तो यहां तक ममझते हैं कि उनका ईश्वर और है और दूसरों का और । असभ्य लोग तो एक दूमरे के ईश्वर को गालियां तक सुना देते हैं। ये मूर्स केवल अपनी ही नहीं, किन्तु अपने धर्म की भी निन्दा कराते हैं। ईश्वर का ज्ञान और उसकी भकि ऐसे विषय नहीं है जो किसी एक जाति के ठेके में पाये हों। ऐसी अवस्था में मनुष्यों को एक दूसरे के धर्म की ओर अनादर-भाव कभी न प्रकट करना चाहिये । यद्यपि धर्म के अनेक नियम और सिद्धान्त शास्त्रार्थ तथा वाद. विवाद से सरलता-पूर्वक जाँचे जा सकते हैं और विद्वानो को इस प्रकार की जांच अवश्य करना चाहिये, तथापि चिना प्रयोजन के धर्म-सम्बन्धी विषयो में वाद-विवाद उपस्थित करना अनुवित है। हम लोग पाद विवाद करके किसी से भी ऐसा धर्म स्वीकार नहीं करा सकते जिसमें उसकी श्रद्धा न हो और जिसमें केवल वल का प्रयोग किया जावे । यदि कोई मनुष्य किसी से बल पूर्वक कोई सातयाँ अध्याय धर्म स्वीकार करावा ती अवसर आने पर प्रथवा अधिक ज्ञान प्राप्त होने पर वह ऐसे निर्दयी धर्म को छोड़ देगा। धर्म बदलने से लोगों को अनेक हानिया हैं। इसमे केवल पूर्वजा की ओर उनकी ही निदा नहीं होती, कितु आगे लड़ो बन्चा को अनेक कठिनाइयों का मामना करना पड़ता है, इसलिये किसी भी मनुप्य को धर्म परिवर्तन करके अपनी समाज और स तान को सकटावस्था में न डालना चाहिये । राजनीतिक कारणों से भी धर्म- परिपतन दूषित समझा जाता है । हमारे देश के कई राजा लोग इतने असभ्य और प्रशिष्ट हैं कि वे अपनी प्रजा के धर्म को जिसके ये प्रतिनिधि हैं पूर्ण रूप से नहीं मानते । यथाथ मे प्रजा की अपेक्षा राजा को अपने धर्म का प्रधिक पालन करना चाहिये। ये लोग बहुधा अपनी निरङ्कुशता के कारण प्रजा की प्रादर दृष्टि मे गिर जाते हैं । विनायत में राजा को उसी धर्म का अनुयायी होना पड़ता है जिसके मानने वालो की सरया अधिक रहती है प्रोर यदि वह किसी दूसरे धर्म में चला जाय तो उसका राज्याधिकार दिन जाता है। मनुष्य को विदेशी धर्म के प्राक्रमण से अपने धर्म को सदैय उचाना चाहिये और इस बात की चिता रसना चाहिये कि उसके सहधर्मी लोग दूसरे के धर्म की भोर प्रवृत्त तो नहीं हो रहे हैं ? यदि काई भयभीत होकर दूसरे के धर्म का स्वीकार करने के लिए तेयार हो जाये, तो मा को उस व्यक्ति की रक्षा करना चाहिये । केवल नवीनता के विचार से अथवा दूसरे धर्म वालो की सेवा- शुश्रूषा से भी अपना धर्म कोड़ देना असभ्यता है। बहुधा विदेशी धर्मवाले अपने धर्म का प्रचार करने के लिए अनेक प्रकार के मनोहर उपाय करते हैं जिनसे घश मे होकर कभी कभी हमारे नव- युवक भाई भटक जाते हैं पर उन्हें वहुधा पीछे पछताना पड़ता है। धम की व्यवस्था देने वालो का कर्तव्य है कि वे ऐसे भटके २४८ हिन्दुस्तानी शिष्टाचार हुए लागो को फिर अपने धर्म में मिला लेवें । विदेशी धर्म की पुस्तक भले ही पढ़ी जावे, पर उनमें लिखी हुई ऐसी बातें कभी ग्रहण न का जावें जो पढ़ने वाले के धर्म के प्रतिकुल हो । अपने धर्म को पालना, दूसरे के धर्म से उसका बचाना, और धर्म के लिए आवश्यकता पड़ने पर तन मन-धन अर्पण करना प्रयेक सभ्य और शिष्ट व्यक्ति का कर्तव्य है। कोई-कोई मनुष्य कुछ वाने एक धर्म की और कुछ बातें दूसरे धर्म को मानते हैं । यद्यपि यह प्रवृत्ति नीति, स्वतन्नता और ज्ञान की दृष्टि से उचित मानी जा सकती है तथापि शिवाचार को दृष्टि से ऐसा करना उपहास-योग्य समझा जाता है। हाँ, यदि किसी महात्मा ने किसी ऐसे धर्म की स्थापना की हो जिसमें कई धर्मों के सिद्धातो का समावेश किया गया हो तो उसके अनुयायी का कर्तव्य है कि वह अपने धर्म को उसी रूप में माने । कोई कोई विद्वान लोग यथार्थ में नास्तिक हो जाते हैं अथवा अपने को नास्तिक कहने में अपना गोरव मानते हैं । इन नास्तिकों की देसा-देसी बहुधा नव-युवक लोग भी जिनको ससार का अथवा किसी एक धर्म का बहुत कम अनुभव रहता है अपने को नास्तिक कहने लगते हैं और ईश्वर के विषय में बहुधा पुरानी और थायी युक्तियाँ उपस्थित करते हैं। ऐसे लोगो को सोचना चाहिये कि ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध करना अथवा सण्डित करना घड़ी विद्वत्ता का काम है, इसलिये उन्हें ऐसी अनर्गल वात करना उचित नहीं । उन लोगों को सदैव इस बात का स्मरण रखना चाहिये कि जिस धर्म में ईश्वर की पूजा के लिए स्थान नहीं है यह धर्म मिथ्या है। ॥ इति ॥ I rioted by RAZA ALI SHA! at the latlonal I ress, Allahabad
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