Natya Sodh Sansthan, Kolkata

Dil Farosh Natak

Shakespeare, William · 2005/01/10

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बगत्यसिद्ध नाटककार शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक मरचन्ट माफ वेनिस का प्लाट दिलफरोश नाटक। बम्बई की पारसी नाटक कम्पनियों का एक मशहूर खेल) जिसे शास्थ, उपन्यासबहार आफिल के मालिक बाबू जयरामदास- प्रले नाटक-प्रेमियों के विनावार्थी, वहुत व्यय और परिश्रम के उपरांत, अपने मित्र मुन्शी जलालअहमद शाह लेट प्राधर, दि टाइम्स थियोटिकल कंपनी प्राफ कलकला, वर्तमान प्राथर दि न्यु पारसी थिये- दिकल कम्पनी श्राफ बम्बई से प्राप्त कर नागराक्षरों में सम्पादित और प्रकाशित किया। [ All rights reserved ] काशी। हिमालयन प्रेस के प्रोप्राइटर बाबू माधवप्रसाद रेगमो द्वारा मुद्रित । द्वितीयवार १०००] .फरवरी सन् १९१६ [ मूल्य ।

N.S.B.
Aco. No, 1988400
Date 24.5.88
Item No. 59
Don. by A's Mala

खुलासा तमाशा।
,
ना
पहिला एक्ट---पहिला सीन
कासिम अपने बड़े भाई महमूद के जुल्म व सितम पर
अफसोस करता है। क्योंकि उससे कह दिया जाता है कि, बाप
और मां की मिलकीयत पर बावजूद एक सत्रादतमन्द औलाद
होने पर भी तुम्हारा कोई हक नहीं है । लेकिन नमकहलाल
मसऊद नामी हबशी गुलाम तसल्ली और सल्लाह देता है कि,
वह अदालत में उसपर नालिश कर दे; नहीं तोएक मरतबा और
बड़े भाई के पास जाये। दूसरा सीन -महमूद जिन्दगी और
नौजवानी का मजा लेता रहता है ठीक उसी बलकासिम आखिरी
रहम के लिये प्राता है। मगर उसकी तमाम गुजारिश हिर्स
की आग से जलादोजाती है और वह धक्के देकर बाहर निका-
न दिया जाता है। इस अरसा में महमूद को मिश्र का एक इश्ति-
हार हाथ आता है, जिसमें बतौर वसीयत के यह तहरीर था
कि. तिलस्मी सन्दूकों में मशहूर महजबीन शोरी की तस्वीर
है, जो शरूप सब से पहिले लसबोर वाली सन्दूक को पहिचा-
न लेगा, उसी से शोरी की शादी की जावेगी। महमूद इली गरज
से मसऊद को साथ लेकर मिश्र के लिये रवाना होता है।
तीसरा सीन-दिल दुखे कासिम का अपने दोस्त ज़ार नामी
सौदागर से अपनी मुसीवत सुनाना और अपना मंशा मिन्न
बाने और शीरी से मिलने का बयान करके सफर रजर्व से
तईदस्तो दिखलागा। ज़ार का उसे ज़ालिम शायलाक यादी
से छः हज़ार रुपये अपनी जमानत पर कर्ज दिलवाने का
बादा करना । चौथा सीन-शायलाक यहूदी की खूबसूरत
बेटी तिला, जो एक मुहसिन नामी शाल से मुहब्बत

- ( २ ) रखती है, फिराके यार में बेक़रार नज़र आती है। इस प्रसना में सुहासिन आता है और खुशी से तिलहा का दिल बागवान हा जाता है। पाँचवाँ सीन-जार व कासिम कर्ज लेने के लिये शायलाक यहूदीके पास श्राते हैं, मगर चूंकि ज़ालिम शायलान को मुसलमानों से पुराना कीना और नफरत है, इस लिये यह शर्त लिखवाता है कि अगर मुकर्ररह मियाद पर रकम मय सूद अदा न की गयी, तो जामिनदार के सीने का आध सेर गोश्त काटकर ले लेने का हकदार होंगे। छठवां सीन-खौफनाक डाकू खुशियाँ मनाते रहते हैं कि, सरदार की बीवी दो मुसाफिरों के सरॉय में आने की इत्तला देकर उनको अपने साथ ले जाती 'है। सातवाँ सीन-महमूद मय मसऊद के सराय में आता है श्रोर बेफिक्री से शराबी कवाव में मशगूल हो जाता है । श्राठवाँ सीन-मसऊद का खतरे और खौफ से परेशान होना और महमूद को सराँय के मालिक डाकुओं की तरफसे प्रागाह करना; मगर महमूद का नाच रङ्ग के आगे इधर मुतलक ध्यान न देना। श्राखीर मसऊद का सबको नशे में चूर देखकर सराय में भाग लगा देना और खुद जान बचाकर भाग जाना । ड्राप । दूसरा एक्ट; पहिला सीन-शीरी का फिराक कासिम में बेकरार नज़र आनाः सरॉय से भागे हुए मसऊद का पहिले मिश्र में दाखिल होना और शाहाना लिबास में शीरी के मकान पर जाकर शादी का पैगाम देना । मगर शोरी की तेज गुफ्तार और शोख सहेली सलीमा ले मुडभेड़ होते ही घबरा जाना और शोरी के ऐवज सलीमा पर ही दिल खो बैठना । आश- नाय गुफ्तगू में उसके मुँह से कासिम का नाम सुनकर शीरीं का मुतहेयर होना और उससे कासिम को लाने के लिये कहना। मसऊद का इस शर्त पर कासिम को लाने का वादा करना कि ( ३ ) उसकी शादी सलीमा से कर दी जाय । दूसरा सोन-दर्द मु हब्बत की सतायी तिलहा, मुहसिन के फिराक में वेचैन नज़र आती है और उसका सस्त दिल बाप उसकी मुहब्बत पर सात नफरत जाहिर करता है। और बेटी के माकूल जवाबात से गजवनाक होकर उसे घर में कैद कर देता है। तीसरा सीन- आवारागर्द महमूद शीरी के पास शादी के लिये श्राता है। मगर शोरी उसके अचानक आमद से घबरा सी जाती है और मस- रूद की बतायो हुई तदरि से शराब पिलवा कर उसे अक्ल से खारिज बनवा देती है। जिसका नतीजा यह होता है कि मह- मूद सन्दूक के इन्तखाब में चूक जाता है । चौथा सोन–मह- मूद का अपनी नादानी और बेवकूफी पर सख्त अफसोस करते नजर आना । पाँचवा सोन-मसऊद का नजूमी बनकर का- सिम और मुहसिन के पास पाना और उनको खूब बनाना । बाद को यह वादा करना कि तिलहा को नजूमी बनकर शाय- लाक़ के घर से उड़ा लायेगा। छठवाँ सीन-शातिर मसऊद का नजूमो बनकर शायलाक को सरूत धोखा देना और उससे तिलहा के जुनूं के इलाज में यह तदवीर बतलाना कि एक शव को वह तिलहा को अकेले मंदिर में छोड़ आये। बेवकूफ बाप का इस हिमाकत पर राजी हो जाना । सातवाँ सीन-शायलाक का मय एक नौकर के तिलहा को मंदिर में छोड़ पाना और थोड़ी देर बाद मुहसिन वगैरह का पाकर उसे भगा ले जाना। इसके बाद शायलाक का मंदिर में जाना और सफाचट मैदान पाना । आँठवाँ सीन-रास्ते में शराब के नशे में जहाज के खलासियों का गाना । नवाँ सीन-शायलाक का खबर पाकर उस वक्त बन्दरगाह में पहुँचना, जिस वक्त मुहसिन और का- सिम का जहाज लँगर उठा चुका था। ड्राप । तीसरा एक्ट पहिला सीन-कासिम का शोरी के पास आना और सन्दूकों ने ( ४ ) के इन्तखाब में वाली जीत ले जाना । दुसरासीन-कासिम के वक्त पर रुपया न अदा करने से जार का गिरफ्तार हो जाना । तीसरा सीन-कासिम का ज़ार के गिरफ्तारीकी खबर पाकर उसकी रिहाई के लिये मिश्र से रवाना होना। इसके बाद शीरौं का भी वकील बनकर मय अपनी सहेलो सलीमा के जाना। चौथा सीन-जार की जिल्लत पर शायलाक का खुश होना मगर दफतन यह खबर सुनकर परेशान हो जाना कि कासिम अहालत लत से जमानत पर उसे छुड़ा लिया है। पाँचवाँ सीन- नार व कासिम का अफसोस करते नजर आना। छठवासीन- कोर्ट में मुकदमे की सुनवाई; शायलाक का बावजूद वकील और जज के समझाने पर भी अपनी वहशियाना शर्त पर बड़े रहना और गोश्त तराशन पर जिद करना । शीरी व सलीमा का वकील व मुहर्रिर के लिबास मे भाना; सुकदमे की दोबारा पेशी, शीरी की बहल और आखिर कानुनी गिरफ्त और माकूल उजरात का आगा लगाकर जार को उस भाफत से बचाना और उलटे शायलाक को जुर्म के जाल में फंसाना। बाद बुग- दाद के कानून के मुताबिक उसकी कुल जायदाद का मालिक मुहासिन को बनाने पर मजबूर करना । सातवा सीन-तलवाने में शीरीं का कासिम से और सलीमा का मसऊद से अंगूठी ले लेना। आठवाँ सीन-शोरीका कासिमसे पहिले मिश्रम पहुँचना और अंगूठी के लिये अजीब जरांफाना छेड़छाड़ और जोड़- तोड़ की बाते हो कर मुअम्मे का हल होना और आखिरी जश्न शादी पर तमाशे का एखतेताम पाना ।

दिलफरोश।
अंक पहिला । सीन पहिला ।
( कासिम का खुदाकी हम्द करते हुए दिखाई देना । )
गाना।
कासिम-तोहें जप जप के सदा करीम शाद होवें ! जानो
माल हमरो तुझ पै निसार सब ऐ खालिक,
तोहें ध्यान अगर जर पर करे, भाई यार सदा
हासिद बने । दुःखी हो सबका मन, समझ
कातिल अकारिव को। करो तुम करम ऐ खालिक।।
तोहें०
था इलाही ! बाग दहर में यह कैसी बादे मुखालिफ़ चली है,
जिससे हर गुल को बेकलो है। हाय ! बड़े भाई की यह कज़-
प्रवाई, अपने छोटे भाई से बेवफ़ाई; वालिद मरहूम की
कुल जायदाद पर अपना कब्ज़ा कर खिया; मेरा हिस्सा तक
बोन लियाः-
जिसको हम समझे थे अपना, वह है सरका दुश्मन ।
जिसमें
चाहत थी,
वह खून
जिगरका दुश्मन ॥
है

दिलफरोश।
-
चैन दमभर नहीं देता है बशर का दुश्मन ।
घरमें रहने नहीं देता कभी घर का दुश्मन ।।
(मसऊदका दाखिल होना)
मसऊद-आदाब अर्ज दुजूर!
कासिम-बस चुप हो; मुझे न सतामो, यह तमससुर
के अलफाज़ न सुनाओ
हुजूर वह है जो रखता है दिल कसाई का।
हुजूर वह है जो जब्त करे माल भाई का ॥
मसऊदगो श्राप भाई की नज़र से दूर हैं; मगर मेरे
लिखे हुजूर नज़दीक हैं:-
भरा वफा व कुदूरतसे जिस्का सीना है ।
हुजूर सच्चे हैं, वेशक वही कमीना है ।।
मगर आप क्यों करते हैं मुरव्वत; क्या बंद हो गई हाकिम
की अदालत । बस, नालिश कर दीजिये; अपना निस्फ हिस्सा
ले लीजिये।
कासिम नहीं, यहतो मुझसे हरगिज़ न होगा:-
रलता नहीं हरगिज़ कभी तकदीर का लिखा ।
तदबीर से किस्मत की बुराई नहीं जाती ॥
बिगड़े हुए जो काम हैं, बन जाते हैं अकसर ।
बिगड़ी हुई तकदीर बनाई नहीं जाती ।
अब यहां रहना नहीं गवारा है; कहीं सफर का इरादा है

दिलफरोश।
३
बरसरे
मसऊद-इस इरादे के लिये फिर नक्दे जर भी चाहिये।
कुछ सफर के वास्ते जादे सफर भी चाहिये ।
आप मेरी अर्ज़ समाश्रत फरमा, एक मरतबा और भाई
के पास जावें । शायद वह कुछ रहम हो जावे।
कासिम-उस नाहक़शनास से उम्मीद तो नहीं । मगर
मेरी राव को आज़माता हूँ एक मर्तबा और जाता हूँ:-
मोके रहते हैं बराफरोख्ता खातिर उनसे ।
किस्सा ग़म का सुनाने को हैं हाज़िर उनसे ॥
क्या अजब तर्ज वफा होबे, जो सादिर उनसे ।
करते हम अपनी परेशानी हैं ज़ाहिर उनसे ।।
कहने जाते तो हैं, पर देखिये क्या कहते हैं।
कुछ करम करते हैं या देखके चुप रहते हैं ।
(कासिमका जाना।)
मसऊद क्या जहाँसे एकलख्त ईमान्दारी उठ गई ।
उठ गई अब मुन्सफी दुनिया से सारी उठ गई।
है बिरादर को विरादर से दगा यह हाल
एक कलम दुनियांसे रस्में दोस्तदारी उठ गई ।
तौबा है, मेरे रौशन दिलो में यह मलामत कि भाई को
भाई से नफ़रत ! अहा, किसीने सच कहा है:-
छोड़ो इन बुर्दाफ़रोशों को, कहां के भाई ।
बैंच ही डालें जो यूसुफ़सा बिरादर होवे ॥
है
-
-

दिलफरोश । खैर, अगर मैं ज़िंदा रहा तो मैं मियां महमूद को इस हफ- सलफ़ी का मज़ा चखाऊंगा । सशे को सच्चा और झूठे को झूठा कर दिखाऊंगा। ( मसऊद का जाना) अंक पहिला । सीन दूसरा। सजा हुमा महल । ( महमूदका शराब पीते हुए नजर अाना; सहेलियोंका नाचना और गाना ।) आई बहार, बहार मजे उड़ाओ, हां मै ख्वारो, नाचो मोहनियाँ, गाओ सजनियाँ, प्यारी सोहनियाँ, न्यारी कामिनीयाँ, सरदारी पर निसारी, बारी बारी, वारी वारी, बलेहारी, सारी हैं निसारजान, प्यारी प्यारी, जान मान शानसे, मैं वारी आन वान, सूरतान ज्ञानसे । में वारी बारी आन बान सूर तान ज्ञान से । तत्त थई, तत्त थई, तत्त धा किट, धमकिट ताल, छम छम छम समगत चाल, इशरत बरसत हर हर बार ।। आई आई बहार- ( मसऊद का आना।) मसऊद-(भापही प्राप) दौलत पातही फूल गया; ऐशो निशात में यह सब को भूल गया। यह मियां महमूद के पारेमुगाँ का मकान, मालीशान, शराब की दूकान:- -

दिलफरोश।
५
हमेशा है जाम हाथ में,
और बगल में बोतल शराब की है।
हमारे भी साथ. तुमने साहेब,
गरज के मिट्टी खराब की है।
है रोजे शब दौरे सागरमये,
अजब यह हालत जनाबकी है।
न खोफे दोज़ख, न फिके जन्नत,
न फिके रोजे हिसाव की है।
महमूद है फिक्र रोजे हिसाब किस्को,
गुनाहका यह हिसाब कैसा ।
कहां की दोज़ख, कहां की जन्नत,
अजाब कैसा, सवाब कैसा ॥
चढ़ा लिया जब कि सागर भय,
तो फिर ख्याले अजाब कैसा ।
कहाँ का मरना, कहाँ का जीना,
सवाल कैसा जवाब कैसा ॥
(महमूद का शराब पीना )
मसऊद-हत्त तेरे की, यह तो और भीगटागट उडाने लगा।
( कासिम का प्राना)
कासिम-गुलशनमें हरे होके, शज़र लाये समर भी ।
ऐ अब्रे करम, हां कोई छींटा तो इधर भी ॥

६
दिलफरोश।
गैरों से है बातें भी मोहन्त भी नजर भी।
गुल फेंके हैं औरोंकी तरफ वन्के समर भी
ऐ खाने बरअन्दाज़ चमन, कुछतो इधर भी ॥
महमूद-यह कम्बख्त गुल में खार, शराब में कफे मार,
फिर आन पहुँचा नाहज़ार :-
बेइज्जती अब भी तेरी जाती नहीं कम्बख्त ।
कुछ शरमो हया दिलमें समाती नहीं कम्बख्त ॥
किस्मत भी गला तुझसे छुड़ाती नहीं कम्बख्त ।
क्या मौत भी दुनियाँ से उठाती नहीं कम्बख्त ॥
कालिम-भाई, हम और आप एक ही खून से पैदा हुए हैं।
एक पेट में पले और एक ही जगह परवरिश पाई और फिर
यह कज़दाई ?
महमूद-अरे श्रो कम्बख्त, तूने वालदैन की याद दिला-
कर मेरे भूले हुए गम को फिर ताजा कर दिया । हाय !
मैं ऐसे मुश्फिक वालदैन कहा पाऊँगा। (शराब पीता है )
कासिम-बेशक, मुझसे बड़ा कुसूर हुआ। वालदैन का
ग्रम आपको न होगा तो और किसे होगा :-
आपकी नजरों में अब हमतो समाते भी नहीं।
अब वह रिश्ता भी नहीं और वह नाते भी नहीं।
होके बेरहम यतीमों को सताते भी नहीं ।
बल्कि सायल को तो यों दर से हटाते भी नहीं ।
महमूद-होश उड़े आते हैं; जिगर के टुकडे हुए जाते हैं।
(शराब पीना)

दिलफरोश।
मसऊद-( तुद से ) वाह वे, क्या मकार है, कैसा वाल
देन की याद में बेजार है।
कासिम हमेशा मुफ्लिसों को फैज़ ज़रदारों से मिलते हैं।
शुनाए शम्स से ज़रें बहुत तारों से मिलते हैं।
चमनमें एक जा गुल किस तरह खारोंसे मिलते हैं।
मसीहा भी कभी तो अपने बीमारों से मिलते हैं।
महमूद-भला जरदार कप दुनिया में नादारोंसे मिलते हैं।
चमकते हैं बहुत ज़र्रे पै कब तारों से मिलते हैं ।
गुलोंको फायदे किस दिन, भला खारोंसे मिलते हैं ।
मसीहा खुदहै, दीवाने ! जो बीमारोंसे मिलते हैं।
(गाना)
कासिम-हमसे खफा क्यों हो,
गमके जो मारे को जो दुश्मन जाना
दिल में जरा सोचो, हमसे खफा क्यों हो ।
हम से सुन मन्शा, तेरे पैरों पर्दू भाई,
कर न उदास निराश विचारे को ।। हमसे.
(गाना)
महमूद-चल चल नटखट झट हट जा, यां खट पर मन
कर, तू बरजा । दूर दूर मूजी वेइज्जत तू न कर
न कर मत शोर शरजा । चल जा पाजी, हट जा
पाजी, चल जा चल जा चल हट हट जा। दूर हो
है।
-

दिलफरोश।
-
ऐ बद लगाम, छुपा सूरत हराम, यह तेरा बेहया
रूस्याह अब मुझे न दिखा । चल चल०-
कासिम-वफाशनार तरीके वफा को भूल गये ।
सुरूर ऐश में खौफेज़ज़ा को भूल गये ॥
नशेमें मैं के फिर आखिर कज़ा को भूल गये।
खुदा की शान है वन्दे खुदा को भूल गये ।।
महमूद-कुछ न बस अब चला त्योबरी बदल कर रह गया।
और न जब कुछ हाथ आया, हाथ मलकर रह गया।
दिलही दिलमें किस लिये अपने मचलकर रह गया।
चल निकल किस वास्ते दो गाम चलकर रह गया।
कासिम-जमाने में किसीके काम जो आये वह कम निकले।
जिन्हें समझ थे हम अपना वही तो पुरसितम निकले।
जो तेरे मैकदे को छोड़कर हम बाअलम निकले ।
दोबारा तेरे घर आनेकी फिर खाकर कसम निकले।
आदम का सुनते आये हैं लेकिन।
बहुत बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले ॥
(कासिम का जाना)
मसऊद-मुस्तभार वफाये जिंदगी पर बशर किस कदर
सरशार है; वह जर्रह दौलत का कैसा खुमार है। भाई का
हक छोना, देखा दुश्मनी का कीना; खैर, मैं कभी समझ लूंगा;
इस बेईमानी का एवज दूंगा।
निकलना खुल्द
से
-

दिलफरोश। महमूद-अरे मसऊद, उधर क्या खड़ा है ? मसऊद-ओहो ! क्या धर्मसे काम लेता है । अच्छा, देशा जायगा। (महमूद से ) क्या हुक्म है, हुजूर महसूद-( इश्तेहार दिखाकर ) देखो, यह इश्तेहार पुर- यहार इसमें मिश्रके सौदागर की शर्त है प्राशकार । यानी वह यो लिखता है कि, दुनिया में हर चीज फिना होने वाली हैं। फक्त जातबारी हवादिस से खाली है । मेरी उम्र का जाम लबरेज हुअा: फर्ज जिंदगीराहे अदमकी तरफ तेज हुश्रा। अपने दुख्तर के ब्याहने की हसरत लिये जाता है सिर्फ खुदा के भरोसे पर अपनी तमन्नाओं का सहारा लिये जाता हु। मेरे बनाये हुए तिलस्मी संदूकों में, मेरी दुल्तर की तसवीर है, मो कोई इसके इन्तखाब में कामयाब हो, वही उसका शौहर लाजवाब हो। मसऊद-तो आपको हिमाकत ने घेरा है। अजी जनाव, होश में श्राइये; अभी सवेरा है। कहीं जाना प्राना नहीं; बेव- इफ लोगों का वहां ठिकाना नहीं । गये तो बेभाव की मरम्मत में नदामत होगी। महमूद-तुझ सी भी किसी में जेहालत होगी । मैंने तुझे अपने इरादे से खबरदार किया, या नसीहत करने का अस्ति- थार दिया। मसऊद-भला क्यों, अगर वह संदूक मैंने छाँरा तो श्राप की नजरों में हो जाऊंगा कांटा। महमूद-वह परी, तू देवका बच्चा, जोड़ा तो मिला अच्छा। बह काली काली सूरत और इश्कबाजी, क्यों बे! यह जुबान- दारजी। होगी; मुफ्त

दिलफरोश।
मसऊद-मजी साहब, सुफेद कपड़े पर तो फौरन् धब्बा
पड़ जाता है; लेकिन काले का क्या जाता है:-
गोरा नहीं है रंग तो कुछ इसका ग़म नहीं ।
पर तुमसे नाक नक्शे में मसऊद कम नहीं ।
महमूद-अच्छा जल्द सामान सफर की तय्यारी, कर
अवाहिर पोशाक भारी भारी ॥
(महमूद का और सहेलियोंका जाना मसऊदका रोक कर छेड़ना)
मसऊद-अरे ठेरो ठैरो, तुम सब कहां जाती हो, इधर
आओ, पहिले मेरे पाँव दबाओ, फिर जाओ।
सहेली पहिली-वाहरे मये, क्या कुछ शामत भाई है ?
सहेली दूसरी शामत नहीं; मलामत पाई है।
सहेली तीसरी-मलामत नहीं; कयामत पाई है।
मसऊद-वाहरे पुतलियां बनाने वाले कारीगर की उस्ता-
दी; एक ने कका सब ने सदा दी।
सहेली चौथी-अरे, हम तो कुदरती पुतलियां है, रश्क
हूरो परी, हुश्नमें नजाकत भरी, जरा अपना मुंह तो देख।
सहेली पहिली-मुए का पेट तो देखो, जैसे फटा हुआ डोल।
सहेली दूसरी-और सूरत
तो देखो, जैसे भरा हुआ
सारकोल ।
सहेली तीसरी-पेट तो देखो, जैसे घास का गट्ठा ।
सहेलो चौथो-और जिस्म तो देखो, जैसे भाबनूसका लट्ठा।
सहेली पहिली-और दांत तो देखो, जैसे इमली का चपटन।
सहेली दूसरी-और आँख तो देखो, जैसे देवली का टूटन ।
मसऊद-और मुँह तो देखो, जैसे चाँद का टुकड़ा ।
,
.
'
.

दिलफरोश। गाना। सहेलियां दूर दूर मूजी को निकल निकल निकल निकल जा। मचल संचल निकल जा । खलल न कर संभल जा। जाके मर जाना खाक में । कर न खिजल दूर हो जा। मसऊद-भटक मटक चटक पटक सटक अटकलटक जा। सहेलियां-श्रो गुलाम बेलगाम खाम, अलग सरक जा । मसऊद-तौबा, तौवा, ताँबा । करो न बतियां; जार की घतियाः चचल चपल कटन छतियां । सहेलियां-हमसे दम न चलत चलत । मसऊद-तुमसे हारा हारा ख्वाहमखाह ।। दूर दूर- महमूद-तुम मेरी तारीफ क्यों करते हो । जाओ, जानो, तुममें से मुझे एक भी पसंद नहीं । तू बहुत मोटी है; तू बिल- (सहेलियों का जाना) मसऊद अब मैं सफर की तैयारी करने जाता है । ( शराब को पेटारी लाकर) यह हमारे जनाब का सामान सफर है । पड़े किस शराबी के पाले; बोतल के काग को खोलते खोलते हाथों में पड़ गये छाले । कुल छोटी है। गाना। यह इंग्लिश बरांडी शिराजी अगरी, यह है बीयर तासीरदार । मोहइया है पूरा मयखाना पैमाना उड़ाना ज़माना खुमार । शीरी खुशगवार, बिसियार, मिकदार, तैयार-यह देसी, यह रासी, यह बासी, यह मीठी, यह . - दिलफरोश। कड़वी दिखाती बहार बराबर है । यह द्विस्की महुए की उम्दा जौहर है। इसमें के जर हो निसार । यह बन्दर के मानिन्द तुमको नचाये, हो पीते ही खर जिसके मुँह में यह जाये । शिताबी, हो नाजिल खराबी हजार लाचार अन्जामकार । हाँ, शराबी हो आलम में ख्वार। है यह इंग्लिश- ( महमूद का श्राना) महमूद-क्यों मसऊद, सामान सफर दुरुस्त है। मसऊद जी जनाब, दुरुस्त है; बन्दा भी चुस्त है। महमूद-भला सब सामान कहां कहां रखा है, और क्या क्या चीज है? मसऊद-वह देखिये, सामने धरा है । (दोनों का जाना) - अंक पहिला । सीन तीसरा । रास्ता। ( कासिम का पाना बहालते मायूसी) गाना। न करे दोस्त येगानों का भरोसा कोई सच है, मुश्किल में किसी का नहीं होता कोई । बेवफाई से अजीज़ोंके खुला यह उकदा; हम हैं दुनियां में किसी के, न हमारा कोई । दुशमने जाँ सब ज़माना हो गयाः अपना जो था वह भी बेगाना हो गया। "

दिलफरोश।
न दम गम का हरदम, बरहम, दरहम, बन हर खमका,
वतन अन धनका दुश्मन बन,निसदिन पल छिन पुर गमदमका
सारे जाहिर नेक बनकर, यार गार ज़र के,
जो यार है मक्कार है ऐय्यार है गद्दार बना ॥
कता।
.
हाय, भाई ने मुझे हाले बतर छोड़ दिया ।
रूह ने जिस्म को और खून ने जिगर छोड़ दिया ।
घर से धक्के दिये और खाक बसर छोड़ दिया।
चश्म उलफत ने भी अब पासे नज़र छोड़ दिया ।
हाय ! वालदैन का फौत होना मेरे लिये अज़ाबे मौत
होना, बराबर हुअा । जो बरसरे जौरौ सितम मुझसे बिरादर
हुश्रा। तमाम मिलकियत अपने कब्जे में लाया; साथ मेरा
हिस्सा भी दबाया । जो रात दिन आप शराबो कवाव में
मशगूल है; और छोटा भाई इफलास में गिरफ्तार व मलूल है :
काम दौरे चर्व में, बिगड़े हुए अकसर बने ।
बनकर जब विगड़े जाये, तो फिर क्योंकर बने ।
(ज़ार का श्राना)
ज़ार-अच्छे रहे जनाब ? कहो, खैरोत्राफियत। कैसा है
इजतराब, कहो खैरोबाफियत । (कासिम से जवाब न पाकर)
शायद आपने अभी तक मुझे न पहिचाना ?
कासिम-जी हां; बन्दे ने श्रापको अभी तक न जाना ।
ज़ार-अज़ीज दोस्त शरीके अलमको भूल गये ।
सहे ये रंज कि अब आप हमको भूल गये ।

दिलफरोश।
कासिम नशे में माल के और के ग़म को भूल गये ।
मिला जो जाम तो अन्जामे जम को भूल गये ।।
जो भाई अपने हकीकी करम को भूल गये ।
हम उनको भूल गये और वह हम को भूल गये ।
जार-क्यो, बहकी बातें करते हो; मैं वही दोस्त जार
जॉनिसार हूँ।
कासिम-अहा, (गले मिलना) ऐ यार गमगुसार,
यकोन करता हूँ कि आप मेरी परेशानी का बाइस समझ
गये होंगे।
मैं
गाना।
मलाल किसके
से
जार-दिलपर कुछ गम के आसार है प्यारे ।
क्यो होके गुलेतर, है उदास नरगिस तरसे ।
हसरत बरसे, कर बयान कुछ हसरत हाल,
दम
॥ दिल..
मालदार तुम, जीवकार तुम, आशकार तुम |
आला बरतर से, हमदम हरदम जम जम कर गम ।
बरहम करसे दम ओ हमसे । हमसा यार तन मन
निसार कर डाले घर दर जर सर पुरखम सर के ॥
दिल पर कुछ०-
कासिम-ऐ मेहरबान, नेकशान, क्या पूछता है। मुझे कुछ
नहीं सूझता है:-
फोगा मे, आह मे, फरियाद मे, सेवन मे,नालो मे
सुनाऊ दर्द दिल ताकत, अगर हो सुनने वालो मे ।

दिलफरोश। गाना। सुन दोस्त ज़रा तो बलायें मेरी, हां रे जान सही यह जफायें मेरी । सुन बड़े भाई सदा आराम करें; इफलास में हम दिन रात मरें। दुनिया में भरोसा किसपर करें; जब अपनीही जान सताये मेरी । सुन०- मेरा ऐशो आराम हराम हुआ, माल बापका जप्त तमाम हुआ। मुझे छोड़ दिया नाकाम हुआ, कैसी नागहां है यह सजायें मेरी ॥ सुन० (शेर) दिल से मर कर भी न इश्क बुते नादां निकला; हस्र के रोज भी मैं चाक गरेबां निकला। क्या हुजूमे गमो हसरत है तेरी फरकत मे, नालां भी सीने से निकला, तो परेशां निकला । मुनहसर मर्ग पैहै, अपनी तमन्ना अहसन, दम निकल जाये तो हम समझे कि अरमां निकला। ज़ार-हा, यह तो मैंने सुना है कि,तुम अपने बापकी जाय- दाद पाने से महरूम रहे । मगर तुम्हारे बहुत यार गमगुसार थे; बल्कि पूरे पूरे मददगार थे। कासिम-भाई, वह दस्तरखान को मक्खियां उड़ गई; खालो हड्डियों को तो कुत्ता भी नहीं चूसता , , - दिलफरोश। एक झोंके ही में सारे उड़ गये मिस्ले मगस जो कि शामिल हाल थे हिर्सी पोलावो नान के ॥ जार-बेशक, यह कलाम बरतर है। मगर क्या मखलूक खालिक के सब बराबर है ? :- न हरजन जनअस्त व न हर मर्द मर्द खुदा पन्ज अगुश्त एकसा न कर्द । श्राजमा लीजिये बन्दा भी गो नहीफ जार है; मगर एक कदीम दोस्त का तावेदार है। अगर कोई मतलब मुझसे निकल सके तो बशरोचश्म हाजिर हूँ। कासिम--मुझको न मालोजर की कोशिश है; न हवस दुनिया की ख्वाहिश है। मगर एक और किनार- जार-कहिये, कहिये; कहे जाइये । वह ऐसी क्या बात है? कासिम-मिस्र में जो कुंवारी औरत है, पाबन्द वसीयत है। शायद उसके वालिद का दिया हुआ इश्तिहार देखा होगा । ज़ार-हाँ, एक इश्तिहार तो मेरी नज़र से गुज़रा किसी जईलउम्र सौदागर ने मुश्तहर किया है। कासिम-वही जो सन्दूको मे तसवीर बेनजीर का जिक्र लिखा है। जार-अच्छा फरमाइये, फिर आपका क्या इरादा है ? कासिम-जब मैं मिश्रमे बराये तिजारत गया था, तो उस- की बाकी बाकी चितवनो ने मुझे मोहब्बत का पैगाम दिया था। इससे मुझे पूरी पूरी उम्मीद है, अगर तकदीर ने बरहमी न की और जमाने ने दुश्मनी न की । लेहाजा सामान सफर दुरुस्त .

दिलफरोश । करने के लिये छः हजार रुपये की जरूरत है। अगर हो सके तो इनायत है। जार-छः हजार रुपये की क्या हकीकत है; जान तक हाजिर खिदमत है । मगर श्राप जानते है कि, मेरे कुल जहाज इस वक्त समुद्र की सफर मे है, वरना नक़द जिन्स मेरे पास कौनसी चीज है, जो तुमसे अजीज है । खैर, अंदेशा न करो, मेरी जमानत पर कही से रुपया मिले तो ले लो। कासिम-श्रापकी जमानत पर रुपया मिलना कुछ . दुश्वार नहीं। जार-तो मुझे जमानत देने से भी कुछ इन्कार नही । कासिम-शायलाक यहूदी सौदागर अापका हमपेशा है; वह सूद पर रुपया देता है। अगर उससे कहा जाय तो जरूर मकसद बर पाये। जार-यहूदी ! यहूदी ! मै इस कौम से नफरत करता हूँ। यह लोग हमारे दुश्मन हैं । शायलाक़ सूदखार, बेईमान, काफिर है। उसके पास में रुपया लेने जाऊँगा? नहीं, नही, हरगिज नहीं। कासिम-फिर आपको किससे रुपया मिलने की उम्मीद है ? जार-यह । (सोचकर ) मगर खैर, मै तुम्हारे वास्त उसके यहा भी जाने को हाजिर हूँ । जहाँतक हो सकेगा मैं कोशिश करने में कोई दकीका न उठा रखूगा। अब आप शायलाक़ के पास जावें और उससे दरियाफ्त फरमावे कि, मेरी जमानत उसे मन्जूर है। कासिम-तो आपसे फिर मुलाकात कहा होगी? जार-दो घटे बाद जौहरीबाजार मे होगी। कासिम-फी अमानअल्ला तो सञ्च है

दिलफरोश।
जार-खुदा हाफिज । ( दोनो का दो तरफ जाना)
अंक पहिला। सीन चौथा ।
महल तिलहा।
(तिलहा का गाते
हुए आना)
दिले नादा को हम समझाये जायँगे ।
हिज मे जिनके जान चली है,
न वह अहले सितम बुलवाये आयेंगे । दिले नादां०
सख्त पत्थर से ज्यादा है, तेरा दिल कातिल ।
हुई आसान न जाँबाज कि मुश्किल कातिल ॥
उफ़े बेदर्दो सितम, पेशो जाहिल कातिल ।
न किया जिबह, गया छोडके बिसमिल कातिल ॥
दहने जख्म पुकारा किया कातिल कातिल ।
किसी जखमी जिगरके यह चरके दिखाये जायेंगे॥दिले.
गुलशन को भेजे हुए बहुत देर गुजर गई; मगर अब तक
न पाई ? खुदा जाने किधर गई । (गुलशन को आते देखकर )
अहा ! श्राई आई, आई गुलशन, क्या खुशखबरी लाई गुलशन।
क्यों इतनी देर लगाई गुलशन, खत मेरा दे पाई गुलशन ?
गुलशन-बीबी साहेबा क्या सुनाऊँ वारी जाऊँ :-
थक गई हू मै बहुत, होशमे आऊँ तो कहूँ ;
सोच लू बात जरा, होश संभालू तो कहूं ।
ठेरिये बैठिये, आराम जो पालूं तो कहूं ॥
,

दिलफरोश।
तिलहा-वाह ! क्या खूब ! तू आराम जो पाये तो केह ।
इमको जब आतिश हिजरा से जलाले तो कहे ॥
क्या यही फर्ज है कि कासिद के पयाम दिलबर ।
जब कि आशिकको पयामे अज़ल आये तो कहे ।
गुलशन-श्रापके आशिक का पता लगाना, क्या आसान
काम जाना?
गाना।
वाकी खबरिया न पाई मोरी गोइयां ।
मै हारीमै वारी मैं हारी, हाय जान जान । वाकी खबरिया०
देखा भाला जादू डाला मेरी जान;
दूढा सारा नदी नाला हूँ हैरान ।
इधर उधर डगर डगर नजर करत हूँ हलकान ।
दुशवार था दुशवार था दुशवार था मेहरबान॥
बनके जासूस की तलाश उसे घर दर में ।
पर कही उसका पता न पाया दुनिया भरमे ॥
जानिसार वेशुमार है न जार कदरदान ॥ वाकी
तिलहा-उस माहरू का नामा जो लाया है, इसी लिये
पहुँचा है, नामवर का दिमाग आसमान पर ।
क्या तू अब भी न बतायेगी, या तू हमे बातों ही में उड़ा-
येगी या कुछ पता भी बतायेगीः-
क्या कहा, पाया भी उस बानिये रुसवाई को।
खत दिया याकि नहीं दिलबरे रानाई को ॥
गुलशन-अच्छा अच्छा, समाश्रत फरमाइये न घबराइय।
.

२०
दिलफरोश ।
.
जब में मुहसिन को तलाश करते करते उनके पास पहुंची, तो
क्या देखती हू, आपके चाहनेवाले निराले, मतवाले, दरिया के
किनारे बैठे मौजे मार रहे है । मैने आपका खत दे दिया और
साथ ही यह जवाब भी लिया। (तिलहा कोखत देना। तिलहा
का खत खोलकर देखना)
तिलहा अहा ! खत मे पाठ बजे का वादा लिखा है;
मगर अब तक न आने की क्या वजह है:-
मेहनतें वह मेरी बरवाद किया करते हैं ।
झूठे वादों से ही दिलशाद किया करते है ।
गुलशन-लोजिये, यादश बखैर । अापके चाहने वाले,
निराले, मतवाले, वह पा रहे है । अब मै जाती है।
(गुलशन का जाना; मुहसिन का श्राना)
मुहसिन-प्यारी, कैसा इजतेराव है, कैसा पेचोताब है:-
तसव्वर में मा आके देती है बोसे हमें;
प्यारी प्यारी यह सूरत किसी की।
तिलहा-खबरदार, हाथ न लगाना जोनहार ।
मुहसिन-ऐ दिलदार, गुले रुखसार ।
(गाना )
तिलहा-जानी नूरानी, लासानी सुरतियां ।
प्यारी दिलदारी की सारी हैं बतियां ।
है आँखों में प्यारी,
पलकों ने मारी कटारी जान ॥
मुहसिन हलके हलके मनमें तनमें ॥ जानी लासानी०-
आशिकों का दिल जलाना क्या यही मुनासिब था ?
जादूसा डारा

दिलफरोश।
.
,
तिलहा-हटो जी, वहीं जाओ। चले क्यों नहीं जाते।
यहां क्यों हो पाते जी । मुझको सताते, जली को जलाते, चले
क्यों नहीं जाते।
मुहसिन-अल्लाह रे जानी, यह लनतरानी, है बदगुमानी
झूठी कहानी।
तिलहा-ज्या बात है, क्या घात है ?
मुहसिन-सूरत है, सौगात है।
तिलहा-कौन सी चीज मेरे पास जाना, ओ यहां तक आप
का हुश्रा आना । जाइये, जाइये, अपना इलाज करवाइये।
मुहासिन-प्यारी, हमारा इलाज तो है तुम्हारे पास ।
तिलहा-मेरे पास कौनसा नुस्खा है जाना।
मुहसिन-शरबते दोदार का पिलाना ।
तिलहा-क्या जरूर तरसना तरसाना । यह मेरा मकान है
या दवाईखाना?
मुहसिन-अजी दवाखाना क्या, बलकि सिफाखाना ।
तिलहा-तकलीफ बरतरफ । बलकि पागलखाना ।
मुहसिन-ऐ महज़बीन, दिलनशीन, कौन मजनू है इस
मकान का मुकीम।
तिलहा-एक छोड़, दो तीन । एक मैं, दूसरापाप, तीसरा
मेरा बाप ।
मुहसिन-बाप तो तुम्हारा वाक़ई पागल है । उसके दिलमें
यह खफ्त समाया है कि मुसलमान मेरी दौलत उड़ा ले जायगे
या मुझे किसी श्राफत में फँसायेंगे ।
तिलहा-आखिर तुम भी हो मुसलमान, सादिक दिलो-
जान । गारत गर दोनों ईमान । रात को चोरी चोरी आते हो,
माल उड़ा ले जाने की घातें लगाते हो। उसकी लड़की को जुल
दिया और दिल लूट लिया।

२२ दिलफरोश। मुह-हुस्नकी दौलतवालेने बेदिल मुफलिसको लूट लिया कौन कहे दिलसे अपने, तुमने है जिसको लूट लिया। तेरे निगहे कातिलने दिलोजां मुहसिनका लूट लिया। हाय, बुतों ने एक मुसलमान मोमिन को लूट लिया। तिलहा-भोले नन्हे थे विचारे, हमने जिसको लूट लिया यह तो नहीं कहते कि एक लड़की कमसिनको लूट लिया। मुहसिन खैर,योंही सही; मैंने ही तुमको लूटलिया। मग जो, माल लूट में हाथ आता है, उसे लूटने वाला ही पाता है तो बस, अब चलिये मेरे साथ । तिलहा-जाइये जाइये; यह फ़िकरा किसी और को सुनाइये मुहसिन-जानां के घर से जाना; बस जान से है जाना जब तुमने कहा जाना, लाजिम हुअा न श्राना ॥ (लौटना ) तिलहा-अजो ठेरो, ठेरो, साहेब ! इतनी जल्दी न करो मुहसिन-अजो छोड़ो जी, छोड़ो। (पकड़ लेना।) तिलहा-ऐ रश्कमाह, मिलाइये निगाह । अब किसे ताबी तवां बाकी है, और मान बाकी है। फकत एक जान बाकी है। मुहसिन–क्यों ऐ प्यारी! कब तक रहेगी बेकरारी; इन्त- जारी, बेकरारी। तिलहा-मेरा बाप है मुसलमानों का दुश्मन जानीः लेकिन हो जायगी श्रासानी। अब जाओ मेरी जान। कहीं पान जाये वह मूजी बेईमान। मुहसिन-मगर भूल न जाना जान, अपना अहदो पैमान । तिलहा-जलदी बरायेगी अरमान, तुम हो मेरीजान । ( गाना।) मुहसिन-प्यार मोहनियाँ निभाना होगा।

दिलफरोश।
२३
तिलहा ---ग़म जो होगा उठाना होगा।
मुहलिन-आशिक को बोसा शीरी लबों का; देना
हुँगा दिलाना होगा । प्यार०-
तिलहा-भर भर के जामें शराबे मोहब्बत, पीना होगा
बिलाना होगा । प्यार०-
मुहसिन—चरचे तो उलफत के येही रहेंगे, हम
होंगे जमाना होगा । प्यार०-
(दोनो का गाते गाते चले जाना.)
अंक पहिला । सीन पाँचवाँ ।
अगला महल ।
(शायलाक का आना)
शायलाक़-आजकल मुसलमान सौदागरों ने बगैर सूद
रुपया दे दे कर मेरा ब्यापार बिगाड़ दिया है। यह मेरी
सरासर अब्तरी और
नुकसानरेज़ी का तौर निकाला है ।
गर अब वह मेरे फन्दे में फँसने वाले हैं; मैंने भी उनके लिये
जब दांव निकाले हैं। बुग्ज, मकर, कीना, हीला, जद, फितरत,
रत, यह सब मेरे अशयार हैं। मुसलमानों से दगा करना
मेरा कार है। मैं मजहबी तपास्सुब के सवब उनसे
बदज़न हूँ,
इनकी जानो माल का दुश्मन हूँ । सुना है कि, कासिम मेरे
अस कुछ कर्ज लेने आवेगा, उसके साथ दूसरा भी मेरे कब्जे
फस जावेगा।
(कासिमका पाना)
कासिम-प्रादाब अर्ज, जनाबमन!
शायलाक-आदाब, आदाब, जनाब ! आज गरीबखाने

२४ दिलफरोश। - पर बड़ा करम फरमाया । (अलग होकर ) कम्बस्त, अपनी गर्ज को पाया। कासिम-शायलाक ! मुझे छः हजार रुपये की जरूरत है दस्तावेज में तीन माह की मुदत होगी और तुम्हारे इतमिनान के लिये मेरे दोस्त ज़ार की जमानत होगी। शायलाक-(खुद से) अच्छा मौका है। उसी कम्बख्त से तो मुझे मतलब है। (कासिम से) मियाँ कासिम ! घर आपका है, ज़र आपका है, सर आपका है, दुकान आपकी है। बल्कि मेरी जान आपकी है । जार आदमी तो अच्छा है, इन्तखाब है; मगर उस्के जहाज समुंद्री सफर में होने से उसकी हालत जरा खराब है। कासिम-इससे आपको क्यों इजतेरावं है। लीजिये, वह खुद आ गये। (ज़ार का प्राकर कासिम से इशारे मे गुफ्तगू करना) शायलाक-(अलग होकर ) इन दुश्मनों के पके पुलाव में जेरखाक, सीने को इनके खंजरे कीने से करूं हलाक । और किस्सा मुख्तसर यह है कि, किस्सा करूँ मैं पाक । बदला मैं इनसे लूँ तो मेरा नाम शायलाक। जार-शायलाक, तुम खूब जानते हो कि मैं सूदी रुपयों का लेन देन नहीं करता । लेकिन मैं अपने वफादार दोस्त के लिये उस पर भी राजी हूँ। इसलिये मुझे छः हजार रुपयों की जरूरत है। (ज़ार का फिर कासिम से मुखातिब होना) शायलाक-(अलग होकर ) अब यह मेरे फन्दे मे फँस गया मैं इससे बदला लिये बगैर कब छोड़ता हूँ। यह नफरत मेरी कौम से करता है, मेरे हममज़हब लोगों को हिकारत से देखता है। लानत है, मेरी कौम पर, जो मैं इससे बदला लिये बगैर छोड़ हूँ।

दिलफरोश।
२५
जार-शायलाक ! किस ख्याल में हो; कुछ सुना भी
ने क्या कहा?
शायलाक-क्या कहा जनाब, क्या कहा?
ज़ार-मुझे छः हजार रुपये की जरूरत है।
शायलाक़-जनाब, क्या आप वह दिन भूल गये । जब सरे
राजार मुझे खफोफ किया करते थे। मेरी शान में कुत्ते का
गज इस्तेमाल किया करते थे। मेरे पाक लिबास पर थूका करते
। लेकिन यह सब मैंने तहम्मुल के साथ बरदाश्त किया;
सा कि हमारी कौम का खासा है। अब आप अपनी गरज से
रे पास आये हैं और कहते हैं कि इस वक्त मुझे छः हजार
पये की जरूरत है । एक कुत्ते से भला आप क्या उम्मीद कर
सकते हैं कि क्या एक कुत्ता आपको इस कदर रुपया दे सकता
है ? अापने कौनसा सलूको एहसान मेरे साथ किया है, जो मैं
स कदर रुपया कर्जदूं।
ज़ार-जिस तरह मैं पहले तुम्हारे साथ पेश आता था,
यही बर्ताव अब भी रखता हूं। मैं तुम्हें उन्हीं हिकारत की
नजरों से देखता हूं, जैसे कि पहिले देखता था। अगर तुम मुझे
हपया कर्ज दोगे, तो कुछ दोस्त समझ के न दोगे। बल्कि एक
दुश्मन समझ के दोगे। बहुत जल्द मुझे इसका जवाब दो कि छः
हजार रुपया कर्ज दोगे या नहीं?
शायलाक-इस कदर गुस्सा न कीजिये । श्राप तो मेरे
मुश्रजज्ज हमपेशा हैं । भला मैं श्रापको रुपया न दूंगा तो और
किसे दूंगा? बल्कि हमपेशा होने की वजह से मैं सूद भी न
लूंगा। रुपया देने में जो कुछ ताम्मुल था,वह यही कि आप लोग
जरा-(रुक जाना)
ज़ार-बस खामोश: हम ऐसे कर्ज़ख्वाह नहीं हैं कि, रुपया
.

दिलफरोश। लेने को गर्ज से अपनी आबरू गवायें। शायलाक-(अलग होकर ) बात तो बिगड़ चली। (ज़ार- से) वाह, सौदागर साहब ! वाह । आप तो बुरा मान गये :- वाह वा खूब समझे क्या कहा मैंने, आप क्या समझे। ज़ार-वादे पर अपनी जान तक देने से दरेग नहीं करते। शायलाफ-विलफर्ज, अगर मियाद गुजर जाय ? ज़ार-तुम जो कहो वह। शायलान-फिर पैदा न कोई हो फितूर । जार- -अरे तुम तो हो बेशऊर। शायलाक-श्राप खफा न हो,हजूर ! अच्छा,अगर मिश्राद गुजर जाय तो आध सेर गोश्त अपने जिश्म का तराश दीजियेगा। जार-बेशक ! बेशक! शायलाक-आप यह शर्त दस्तावेज में लिख दीजियेगा ? जार-हां हां, जरूर लिख दूंगा। का०-गजब क्या जान पर अपनी, यह तुम ऐ जार करते हो। कि नाहक जान अपनी मुरीदे अाज़ार करते हो । शायलाक-(खुद से) यह कैसा बेवकूफ है, जो मेरे बने बनाये खेल को चौपट करता है । (जाहिर ):- है दिन्लगी के वास्ते, बस शर्त यह लिखी । विलफर्ज हो, जो वादे की मियाद मन्कजी ॥ ऐसा भी इस जहां में बेदर्द है कोई । नाहक किसी का खून भी करता है भला कोई । क्या गर्न है किसी को बशर को जो खू करे ।

दिलफरोश।
२७
-
पापोश भी यह मेरी न कारे जबूं करे ॥
ज़ार-हां हां; आप सच कहते हैं।
शायलाक-अच्छा, आप लोग चलिये; दस्तावेज तय्यार
रखिये। मैं रुपया लेकर प्राता हूँ।
ज़ार-बेहतर है।
(ज़ार और कासिम का जाना)
शायलाक-ओ शायलाक, आज खूब शिकार फांसा;
अच्छा दिया झांसा । मैं इस शहर में सबसे ज्यादा मालदार हूँ
लेकिन यह मुसलमान मुझे हिकारत की नजर से देखते थे। श्री-
र एक मुसलमान तो मेरी लड़की का है दिलदादा; उसे भगा ले
माने का रखता है इरादा । खैर, उसे भी समझ लूंगा।
(शायलाक का जाना)।
अंक पहिला। सीन छठवां ।
जङ्गल अगला।
(डाकुओं का आना ।)
(गाना)
डाक्-डाकू हैं सारे, है चोरी पेशा रात दिन ।
राहगीरों को मारे, हजारों वारे न्यारे ।
सितमगरी पै इम कमर को बांधेगे तेग से ।
कलय करें वहम, ये सरको लूटें मारे बारे ॥ डाकू०
सरदार हम कौन है ? सुनहरी टोली के भाई, रुपहली
टीली वाले । यह लोग जो शहर और गली में लूटते हैं, और
हम भूले भटके मुसाफिरों पर टूटते हैं । यह तो एक के दो
बनाते हैं, और हम एक के चार, दम में करते हैं तय्यार ।
,
३

२८
दिलफरोश।
सकू दूसरा-कारवां आया जो यां, आराम पाने के लिये ।
बस हस्र तक सोता रहा आराम पाने के लिये ॥
सरदार-लेकिन मेरी जोरू भी बड़ी चालाक है ।
मुसाफिरों को फांसकर लानेमें बेबाक है ॥
डाकू तीसरा-अजी, हम भी चालाक हैं;
लूट मार करते हैं, गजब के बेबाक हैं।
औरत-(अन्दर से ) इधर चलो, भाई ! इधर से।
सरदार-खामोश। ऐ बहादुरो ! मेरी औरत वह आती है
और अपने इमराह दो शिकार भी लाती है। बस, जाकर तुम
सब आड़ में छिप जानो; जब मैं बुलाऊँ, तब हाजिर होना।
(सबका जाना।)
,
.
अंक पहिला । सीन सातवां ।
सराय।
(डाकू की औरत के हमराह महमूद व मसऊद का पाना)
औरत--सरकार ! देखिये, यही मुसाफिरों का मुकामे
कयाम है। यहां सब तरह से राहतो पाराम है।
मसऊद-क्यों बड़ी बी! यहां का कुल सामान औरतो ही
के है हवाले, या कोई मर्द भी हैं इन्तजाम करने वाले ?
औरत-ऐ हजूर! खुदा उसको मेरे सर पर सलामत रखे।
पांच सौ बरस की उमर वाले हिनोज मेरा खाविंद मौजूद है।
वही मुसाफिरों की खिदमत करता है।
महमूद-तुम्हारा खाविंद कहां है,और क्या काम करता
'औरत-हुजूर, पहिले तो वह भटियारे की दुकान लगाते
थे। मगर कुछ दिनों से याद इलाही के अज़हद भारजूमन्द
नमाज व रोजा के पाबन्द हैं।

दिलफरोश।
२६
मसऊद-( अलग होकर ) भटियारा जो नमानी है:
तो ज़रूर दगाबाज़ी है । और यह बुढ़िया दलाला की खाला
ज़ाहिरा नेक निराली है। मगर ज़रूर कुछ प्राफ़त लाने वाली है।
औरत-आप लोग यहां बैठिये, हाथ मुँह धोइये; मैं जाती
इं और अपने खाविंद को बुला लाती हूं। (औरत का आना)
मसऊद--मुँह क्या धोयें, हमतो अपनी जान ही से हाथ
धो बैठे हैं । (सरदार को प्राते देखकर ) यह लो, वह शैतान
मुजस्सम खुद भा गया। (डाकू सरदार का पाना)
सरदार-सुभानअल्ला! सुभानअल्ला ! सुभानला!
मसऊद-(महमूद से ) समझै आप, यह क्या कहता है।
सुभानअल्ला! अच्छा उल्लू का पट्ठा फंसा है। सुभानअल्ला!
सुभानअल्ला ! सुभानअल्ला!
सरदार-अलहम्दुल्लिलाह!अलहम्दुलिल्लाह अलहम्दुलिल्लाह!
मसऊद-(महमूद से) यह कहता है कि, अलाम्दुलिल्लाह!
बहुत सा माल व असबाब है; किस्मत कामयाब है । अलहम्दु-
लिल्लाह ! अलहम्दुलिल्लाह ! अलहम्दुलिलाह !
महमूद-अबे, तू ये बुजुर्ग की शान में क्या कहता है खुदा
से नहीं डरता है?
मसऊद यह ऐसे बुजुर्ग हैं कि एक मुक्की के दांव में
तुम्हारी सब दौलत उड़ा लेंगे।
सरदार-माशाअल्ला! माशाअल्ला ! माशाअल्ला!
मसऊद-बड़े मियां, मशाल लाने की क्या जरूरत है। लूटो
न तुम्हारे बाबा का तो ही माल है । लूटो! लूटो!
सरदार-क्यों मियां, अल्लावालों से भी ठट्ठा।
मसऊद-अबे, चुप बेचुप मैं जानता हूं तेरे माथेका घट्ठा।
सरदार-हुजूर! क्या यह आपका नौकर है?
महमूद-नौकर नहीं; बल्के मेरा महरमेराज है।
-

३० दिलफरोश। B सरदार-मगर बड़ा जुबानदराज़ है । महमूद-बड़े मियां, आपका नाम और काम ? सरदार-मेरा नाम है करामत: करता हूं रात दिन खदा को इबादत या आप लोगों की खिदमत । और मैं इस सराय का मालिक हूं। मसऊद-सराय के मालिक काहे को आप तो हमारी जान के मालिक हैं। सरदार-प्रये, तू बड़ा बहूदा है। मसऊद-(महमूद से ) जब ही तो यहां पान कूदा है। महमूद-बड़े मियां, मुझे बावगोले की है बीमारी: हकीम इसका इलाज बतलाते हैं शराबरूवारी । सरदार-हा हा हा हा-थू थू थूः लाहौलबिला; थू थू थू: मसऊद-अरे क्या करता जाता है यूथ क्या जहर पी गया हतू। सरदार-लाहौलबिलावत ! ऐसी हराम चीज़ छूने को कहता है? महमूद-बड़े मियां, हाथ लगाने की क्या ज़रूरत इसकी तो एक और सूरत सरदार-वह क्या सूरत है ? महमूद-लीजिये, यह पाँच रुपया । लाइये एक बोतल शराब और गजक लाजवाब । बोतल रूमाल से बाँधकर लट- काये हुए लाइये; हाथ क्यों लगाइये ? मसऊद-(अलग होकर ) अब इसकी पारसाई का इमतिहान हुअा चाहता है। सरदार-खैर, आप लोगों की खातिर से यह भी मंजूर है। अच्छा, आप दूसरे कमरे में तशरीफ ले चलिये; वहाँ सब सामान मोहइय्या है। (सब का जाना) that दिलफरोश। ३१ . अंक पहिला। सीन भाठवाँ । महल अगला। ( पहिले महमूद का पाना; बाद मसऊद का दाखिल होना) महमूक क्यों मसऊद, क्या खड़ा सोचता है? मसऊद-मुझे मालूम होता है, यह सब धोखा है। महमूद-क्या धोखा मालूम होता है ? तू तो बड़ा डर- पोक बना जाता है। क्या ऐसा अन्धेर है ? मसऊद -बस, अन्धेर होने में थोड़ी देर है। महमूद-तू तो याही बके जायगा। मसऊद तो मेरे बाप का क्या जायगा? महमूद-क्यों मरा जाता है; नाहक घबराता है। क्या कोई घोल के पी लेगा: किस तरह जी लेगा। मसऊद-जी, हम तो किसी तरह जान बचाकर निकल जायगे लेकिन आप जरूर किसी श्राफत में प्रायेंगेः- तब लों अलम पास हमारे न मालो ज़र । हमसे खिलाफ होके करेगा ज़माना क्या ॥ (डाकू को श्राते देखकर) अरे, बाहरे बगुला भगत ! (डाकूका शराब की बोतल एक लाठीमें बांधकर लटकाये हुए श्राना) सरदार-तौबा तौबा! लाहौलबिलालूवत ! जो काम अब तक नहीं किया था: प्राज मेहमानों की खातिर से करना पड़ा। (महमूद से) लीजिये, यह शराब की बोतल और गज़क (महमूदका लाठीसे बोतल खोलना और डाकू का लाठी जमीन पर पटकना) मसऊद-अरे लाठी क्यों पटकता है; क्या खटमल मारता है? लाजवाब।

३२ दिलफरोश। - - - A (महमूदका शराबनोशी करना; डाकूका ललच कर पूछना) सरदार-क्यों जनाब, इसका मजा कैसा है ? मसऊद-लीजिये, प्राइये । ( अलग होकर ) बुड्ढे के मुंह में भी पानी भर पाया। महमूद-यह वह माशूक कमसिन है। जिसकी तारीफो नौसीफ गैरमुमकिन है । जवान को लड़का बनाती हैं: बुड्ढों को जवानी का मजा चखाती है:- लिया जब हाथ में सागर शराबे अरगवानी का। तो बूढ़ों को मजा आने लगा फस्ले जवानी का ॥ सरदार-जब तो जरा मुझे भी दीजिये। जो यो तासीरखज है। ( महमूद से शराब लेकर पीना) तौबा ! तौबा! इसकी बू कैसी तेज है । ( मुँह बिगाड़ना ।) मसऊद-कमबख्त ने जैसे कभी पी ही नहीं ? सरदार-तौबा तौबा तौबा! मसऊद-हत्तेरी! तौबा तौबा ! तौबा ! सरदार-क्यों मियां मसऊद, तुम क्यों खामोश हो; एक जाम तुम भी पी लो। मसऊद-अजी जनाब, यह कालापानी तो मेरे मजहब में हराम है। सरदार-जयां करती नहीं, कुछ शराब थोड़ी सीः बहुत नहीं, अजी लीजिये जनाब थोड़ी सी । महमूद-बशर का जीस्त है मिस्ले हवाब थोड़ी सी मज़ा इसी में है पीले शराब थोड़ी सी । मसऊद-मज़ा दिखाती है पहले शराब थोड़ी सी बहुत ये करती है आखिर खराब थोड़ी सी ।

दिलफरोश। ३३ .r महमूद-( मसऊद से) अवे; यह ले, पी ले । खौफ क्या दिल से मेरा जाता रहा ? मसऊद-दुत, रुतबा सब प्रापका जाता रहा। महमूद-(मसऊद के करीब पाकर) ले, तुझे पीना होगा। (मसऊद का महमूद को तमांचा मारना; महमूद का डरकर अलग होना) मसऊद-चल, झूठा कहीं का? सरदार-आप बैठ जांय, मैं इसे पिलाता हूं। देखें, कैसे नहीं पीता । (शराब लेकर) अबे, यह ले, गुलाब पी ले। मसऊद-(महमूद की तरफ) ले; यह जुलाब पी ले। काहे को गुलाब पी ले। क्या तेरे बापका नौकर हूं? सरदार-अबे, हम तेरी जान के मालिक हैं। मसऊद-चल झूठा कहीं का; क्या बकता है। सरदार-क्यों, तू नहीं पीयेगा? मसऊद कभी नहीं, हरगिज नहीं। (डाकू का खंजर निकाल कर मसऊद को दिखाना) सरदार-क्यों, अब भी नहीं पायेगा? मसऊद-(अलग होकर ) यह तो मैं पहिले ही कहता था कि, दसवें नम्बर का बदमाश है। लेकिन शराब तो कभी नहीं पोऊंगा । (डाकू से ) अहा, क्या आप सच्च सभझे थे कि मैं न पीऊंगा:- लाइये, पीने से कब इसके मुझे इनकार है। आप भी हैं हमको कोई पारसा समझे हुए। महमूद-पीयेगा: पीयेगा। ( मसऊद का शराब लेकर पार में जाना) सरदार-अब, वहां क्यों जाता है। मसऊद में रोक से पीता हूँ; रोक से । r

दिलफरोश।
,
.
सरदार-अच्छा, पी ले।
(मसऊद का शराब लेकर अलग फेंक देना और
झूठा नशा जाहिर करना)
मसऊद-फिकरे पै मौज दामने, दरिया कतर गई
किश्तये बादबां मुझपर याक तर गई ।
ओहो ! पोहो! रेलगाड़ी पर कबरिस्तान होकर भागा। लेना.
दौड़ना, पकड़ना, तू तू तू
(उछलना गिरना)
सरदार-लोजिये, वह तायफा भी पा गयी।
मसऊद-क्या तायफा पा गयी?
(श्राना तवायफका)
महमूद-हां हां,गाओ गानो, कोई दिल लुभाने का नाच
दिखाओ।
गाना।
तवायफ-जग ठग मग पर तक तक पग धर ।
जाल फासे पर धर ध्यान, चोर डाकू सरपर जान ॥ जग.
मुल का काम, जुलका दाम फँसे खबरे कर ।
रहबर मेतहर दुश्मन बदज़न खुद सर मान । जग०-
साकी शराब आबे मये नाब डाल जाम ।
भरके जाम, जरका काम, कर तमाम, शर मुदाम ।। जग०--
मसऊद-क्यों रीमाई ! तू यहां नाचने गाने पाई है, तो
खंजर क्यों साथ लाई है?
तवायफ-थोड़ी देर में हम इनका करतब दिखायेंगे, तो
ईनाम पायेंगे।
मसऊद-(खुदसे) जब तो जहर हलाल किये जायेंगे।
-
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दिलफरोश।
३५
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कोई बहाना करके सटक जाना चाहिये । और जाते जाते सराय
को भाग लगाना चाहिये। (डाकूसे) जनाब, मुझे प्यास लगाहै।
सरदार-वह सामने मटका धरा है। जा पानी पीले।
(मसऊद का जाना)
(तवायफो का नाचना-नाच खतम होने पर एक ब एक
अन्दर से गुल होना।)
आग लगी!भाग लगी! आग लगी!
(सबका घबराकर भागना: परदे का उठना; सराय का जलते
हुए नज़र आना; सरकारी बंबेका अाकर आग बुझाना)
ड्राप सीन।
अंक दूसरा । सीन पहिला।
महल सजा हुआ।
(शीरीं कायाद कासिम में बैठे हुए नज़र आना
सहेलियों का नाचते हुए श्राना)
गाना।
रंगीलो पात्रो आयो नये रंग ढंग लाओ।
आओ जानो लुभानो लुभायो ।
प्यारी खुश हाली, निराली मचाओ ॥ रंगीलो०-
मुरादें पायें, खुशियां मनायें, आप ये सदा ।
सुख ओ शादी चाह ग़म भूल जायें,
रैन रहें दिलदार जेबाई रेनाई एकताई।
बेदार हो शहा ऐश पात्रो ॥ रंगीलो०-

दिलफरोश।
शारी-हाय रे फिराक में यह जाय रे हमारी जान
हाय हाय क्या करूं।
गोइयां, देखत नहीं सइयां,
तरसइयां रुलइयां जिया हो जलइयां ।
हायरे प्यारी जानसे वारी सारी ये जरयां
प्यारी मानोरी लेव हम तोरी पइयां पढ़ें।
तोरी गोरी पइयां-
नहीं नहीं, निस दिन कलियां तन मन जलियां।
सलीमा-कर भलियाँ रंग रेलियां छल बलियां हरदम
प्यारी बेगम साहिबा ! दुश्मनों का क्या हाल है। इस
क्रदर क्यों रंजो मलाल है :-
आरिज़ जो फूल से थे, वे कुम्हलाये जाते हैं
आसार हमें नेक नहीं पाये जाते हैं।
शोरी-( खुदसे ) हाय ! इस मर्ज का छिपाना भी नह
बेहतर । मगर बयान भी करूं तो क्योंकर :-
इलाजे दर्ददिल तुमसे मसीहा हो नहीं सकता।
तुम अच्छा कर नहीं सकते, मैं अच्छा हो नहीं सकता
सलोमा--प्यारी ! आखिर वह कौन है, उसका कुर
नामो निशान नहीं।
शोरी-जबां से जब कभी उस बेवफा का नाम लेती हूं:
पहिले दोनों हाथोंसे कलेजा थाम लेती हूँ।
कुछ दिन हुए कि बुगदाद का एक सौदागर आया था

दिल फरमेशः। स गिरां नुमायां हमराह लाया था । उसके इश्क में बेक- है: हर वक्त पाहो जारी है:- हिज में अपने मुझे वे बेकरारी दे गये ले गये आरामो राहत अश्कबारी दे गये । चमन-लो बुबा; मैं तो समझ गई; वह जो मुल्के हुस्न का किम है। शायद उसका नाम कासिम है। शीरी-हाय, कासिम! कासिम ! अब मैं तुझे किस तरह ऊंगो या योहो पातशे हिजरां में जली जाऊँगो:- चश्म पुर आब हैं, और उसपै ज़िगर जलता है। क्या कयामत है कि, बरसात में घर जलता है । गाना। री-दिलजानी मेरी, मेरी तूने कदर भी न जानी॥दिल ब आओ सइयां, न सताश्रो सइयां, न जलाओ सइयां । दलजानी दिलबर जानी मेरी०- | चमन से गुजरे तो ऐ सबा, तू यह कहना बुलबुले जारसे । खिजां के दिन भी हैं सामने, न लगाना दिलको बहारसे ।। दल जानी०-- तरीका अन्दर जाना; मसऊदका प्राकर दरवाजे पर पुकारना) मसऊद-खोलो, दरवाजा खोलो? सलामा-अरे, तुम कौन हो; जरा मुँह से तो बोलो ? मसऊद-अजी में शर्त से गुज़रने प्रायां हूं; शीरी से शादी ने आया हूँ। सलोमा-यह कोई बड़ा अमीरजादा है। (दरवाजा खोलना) ३ दिलफरोश। तुम कौन हो? मसऊद-मैं मुल्के हब्श का शहजादा हूं: शीरी का दिक दादा हूँ। मंगवानो, मंगवानो, वह संदूक मंगवानो; देर लगाओ। . गाना। वह बक्स कहां मंगवाना यहां. करो शर्त यहां । करो जल्द अयां, नहीं रखो नेहां, मेरी जाती है जां । मैं हूँ बाँका जवान, बड़ा आलीशान, मेहमान हूँ । करो मान, चलो शादी करो अब देर है क्या । मैं राजी बदिल मेरा राजी, खुदा कहो काजी को यहां लाओ बुला ॥ है. सलीमा-बेशक बेशक; चेहरेकी स्याही, देती है गवाह सज़ावार सिपाहीः- कसरत से है गुनाह के स्याह रंग दुनिया में इसलिये है बदोंका स्याह रंग । मसऊद-वाह तुम्हारा बातों में उड़ाना; स्याह रं में कौनसा ऐब जाना। दांतों में प्राब, जैसे गौहरे नायाब कैसो बिजली की ताब, है स्याही लाजबाब । सदने मेरे जान है, खालिक की शान है, परियों की हिज़ में होठोप जान है । देखो सुरमा गो.काला है, मगर औरों को रोशनी दे वाला है। गो हमारी रंगत स्याह है, मगर आन बान शा अमीराना बालाजाह है:- कहदो यह खबर जाननेवालों के सामने चलता नहीं चिराग है काल के सामने । रे . . - दिलफरोश। - सलीमा-वह भी एक मूजी है और डसने वाला है। यिद अजाब के लिये रंग उसका काला है। मसऊद-क्या जो काले हैं वह अजाब में मुबतिला होने ले हैं ? नहीं, नहीं, काले ही तो निराले हैं; सबके सिरों की नि पाने वाले हैं। क्योंकि सर के बाल काले हैं। सलामा- तो क्या वह नहीं सुफेद होने वाले हैं ? मसऊद हां, जब तक सरके बाल काले हैं। नौजवान मत- ले हैं । जब सुफेद हुए तो गोर के हवाले हैं । देखो आसमान नारंग प्रासोद है; मगर सब पर साया किए हुए है। इसलिये तबे में जबर है। सलीमा-अहा ! तो शायद तुम कोई आसमान के कड़े हो? मसऊद-बेशका अब तो आपको भी मेरी कदर करनी वाहिये । चलिये, मंगाइये, मंगाइये, वह सन्दुक लाइये। सलीमा-जरा विलायती साबुन से मुंह धो भाइये! मसऊद क्यों क्यों, ऐ हर पैकर, हम गुलफामजादो से एह कलाम बरतर? सलीमा-चल चल, प्रो जुलमात के जानवर, बोहते इजूर के बन्दर, गारिये के पत्थर । मसऊद-तू औरत है तुझे दूंगा जवाब खंजर से । वर्ना देता गला तेरा दाब खंजरसे ॥ सलीमा-क्या बुज़दिलों को पड़ता है काम खंजर से । दिखाई देते हैं हमको तो आप बन्दर से ।। मसऊद-बस, अब ज्यादा तुम मेरी शान में बेअदबीन दिखाओ; जल्द वह सन्दूक मंगवानो। .

दिलफरोश।
?
सलीमा-पहिले अपना हस्बो नस्व तो बतलाश्रो।
मसऊद-तुम्हें कैसे होगा यकीने दिलपज़ीर, कि मैं है
कहीं का अमीरो कबीर।
सलीमा—यह तो कुछ मुश्किल नहीं । बातें रहने दीजिये
अपना शज़रा पेश कीजिये।
मसऊद-शज़रा, अब कहाँ से लाऊँ ? शज़रा तो चूहों
ने काटा, दीमक ने चाटा, वह गलके हो गया प्रांटा।
सलीमा-चल बेश्रो गुलाम ! बदलग्राम, क्या हम नहीं
जानते कि है हब्शी फाम?
मसऊद-( कहक़हा मारकर ) अरे, तू क्या सचमुच
समझती थी कि मैं कहीं का अमीरो वजीर हूँ। मैं तो तुम्हें सताता
था, प्राज़माता था। मैं नौकरी के उम्मीद पर पाया हूँ।
सलीमा-वाह शाबाश ! बादशाह से वज़ोर, वज़ीर से
अमीर, अाखिर को नौकरी की तदबीर । चल निकल, हमें नौकर
की कोई जरूरत नहीं।
मसऊद-तुम्हें नहीं जरूरत है, पर मुझे तो जरूरत है।
सलीमा-क्या कुछ जबरदस्ती है ?
मसऊद-हां; हमारी तो यह मर्जी है। बल्कि मेरी नज़र में
कुछ और ही फबती है?
सलीमा- वाह! क्या बड़ी खबसी है।
गाना।
मसऊद-रंगत चमकत कुदरत मुजरत ।
दरशन बरसन निरखत अँखियां।
रङ्ग काला, ढङ्ग आला,
रात काली, जुल्फ काली।
है निराली तू मेरी जान ।

दिलफरोश।
४१
सलीमा-जा रे रिजाले, तू कब्बे से काले,
काले हब्शी गुलाम ।
मसऊद-काले को पाऊँ तो शादी रचाऊँन खोलो जबान ।
सलीमा-जारे जारे ओ आवारे, एंडी चोटी पर
वारूं जां। रंगत चमकत०
दूर निगोड़े, चल निकल यहांसे, मैं तुझसे बेजार हूँ।
मसऊद-अजो,मैं ता पहिले ही से तुम्हारा पाशिकेजार हूं।
सलीमा-अरे तू तो बहुत बहका जाता है । तूने मुझे ब
दखा, जो पाशिक हो गया।
मसऊद-जिस वक्त मेरा प्राका कासिम यहां आया था।
मैंने तुझे देखा था
(शीरी का श्राकर सुनना)
शीरी-अहा कासिम ! कासिम! तूने अभी जिसका नाम
लिया यह कौन कासिम ?
मसऊद-अलग होकर) अरे, यह कोई और गुल खिला?
अब मेरे मज़े हैं। (शीरी से) क्या फरमाया हुजूर
शारी-अभी जिस्का नाम लिया, यह कौन कासिम है ?
मसऊद तो इससे आपको क्या ? बन्दा उसका नौकर
वह बगदाद का सौदागर है।
शीरी-तो अब वह कहां है ?
मसऊद-मैं जानता हूँ, वह जहां है।
शीरी-कुछ हमें भी पता दे ?
मसऊद-किसको गरज जो बता दे । क्या मैं तुम्हारा
नौकर हूं?
शारी-अगर तू हमारा नौकर होगा तो बतावेगा?
मसऊद-जब बनूंगा तब देखा जायगा।
?

दिलफरोश।
शारी-तू हमारा नौकर प्यारा है।
( गाना)
मसऊद-तुम्हें दूंगा मैं वाकी खबरियाँ जान ।
मुझे दे दो यह प्यारी सुंदरिया जान ॥
(सलीमा को बताकर )
प्यारी चंचल है न्यारी न्यारी छलबल ।
सलीमा-अरे जारे मुए चल चल, मैं गुलाम का काम लूं ।
तुम्हें दूंगा
मसऊद-अक्सर काम करूंगाः खश अन्जाम करूंगा।
सलामा-बस कुछ काम नहीं जा, चल चल चोरं कहीं का
शीरी-जानो नांदा कहीं; कर बदनाम नहीं तू।
मसऊद है नौकर बरतर अफसर तुझ पर ।
सलीमा-चरतर अख्तर इमपर अफसर। तुम्हें दूंगा
मसऊद-(सलीमा से) क्यों अब तो वस्ल गंवारा है ?
सलामा-बीबी; यह फिकरा सारा है।
शोरी-चुप; तू बड़ी आवारा है।
मसऊद-यह तहरीरका इशारा है। अच्छा जी, होने दो
होने दो।
शोरी-अब तू सामान सफर कर और जल्द खुश खबरी
सुना बगदाद से प्रानकर ।
मसऊद-हुजूर, खुशखबरीच्या सुनाऊं. साथ ही कासिम
को लाऊं और सहा आशिक अापका दिखाऊं।
सलीमा-मुत्रा, कितना मुंहजोर हो गया है । मञ्च है.
कमीनों को मुंह न लगाना चाहिये; पाँव की जूती पैरों से ही
दुवानी चाहिये।
(शीरी का जाना।

दिलफरोश।
गाना ।
मसऊद-गोरी तोरा दूल्हा बनूं मैं साँवरिया ।
ऐसी गोरी गोरी नारी का मैं काला काला बनूं पिया।
सलीमा-ऐसे मैं निसारूं वारूं हज़ारों पिया ।
दिया न बुझाओ जलाप्रो न जाओ जिया ।
मसऊद-लचक मचक तोरी कमर सुंदरिया,
दिलवर अनवर दूल्हा बनें खुश्तर ।
सलीमा-जायगा तू आने यहाँ न पायगा ।
मसऊद-तो मैं मर जाऊंगा न घर अब जाऊँगा।
गाते गाते चले जाना)
अंक दूसरा । सीन दूसरा।
महल अगला।
(तिलहा का अन्दर से गाते हुए दाखिल होना )
गाना।
मोहे बिरहा सतावे जी जलावे मोरे सइयां,
मैं लागू तोरी पइयां जो आवे मोरे धाम ॥ मोहें०-
इन्तज़ारी में गुजारी रात सारी बेकरारी ।
हाय मैं वारी, राम, प्यारा तू, प्यारा हमारा;
दुबारा नजारा दिखा दे मोरे शाम ।
हाय हाय ! हाय हाय ! हाय
बहुत हम तो लगाना दिलका।
सख्त मुश्किल हुआ अब आप में आना दिलका ॥
सहल समझे थे

४४
दिलफरोश।
-
हाय ! हाय ! हाय !!! मोहें-
मुसद्दस।
पहलू में जब मेरे वह मेरा दिल नशीं नहीं ।
होती है जाने ज़ार को तसकी कहीं नहीं ॥
राहत शवे फिराक में जिसके नहीं नहीं।
क्या मेहर इसमें मेरे लिये दिल हजी नहीं ।
यारा है हिजू मुझमें न ताबे फिराक है ।
गर है तो इसका ही फक्त इश्तियाक है ।
शायलाक-(श्राकर ) अरे श्री आवारा नाकारा, तूने
एक अदने मुसल्मान से बेसरासामान दिल लगाकर हमारी
कौम को धब्बा लगाया; मेरा जाहो मरतबा खाक में मिलाया।
तिलहा-ऐ वालिद मेहरबान! उसेन कहो बे सरोसामान,
वह मेरा चाहने वाला है; हुस्न की दौलत से निराला है ।
शायलाक-मुहसिन का हुस्न क्या तुझे प्यारा नज़र पड़ा।
क्या आसमाने हुस्न का तारा नज़र पड़ा ॥
तिलहा तारा न कहो माह मुनव्वर नज़र आया;
खूबी में महो मेहर से बेहतर नज़र आया ।
बागे जहां में मुझ को गुलेतर नज़र आया;
मूसा को कोहे तूर जो नूरे नज़र आया ।
शायलाक-क्या ऐसी दोस्ती में कुछ मुहब्बत भी होती है ?
तिलहा-क्या मुहब्बत अदावत में होती है ?
शायलाक-एक गैर से यों दिलका लगाना नहीं अच्छा।
तिलहा-दो दिल जो मिले उनका छुड़ाना नहीं अच्छा ॥

दिलफरोश। शायलाक-तुमको होगी अपनी उल्फत के तसलसुल से गरज । पर हमें है अपने मज़हब के तजम्मुल से गरज॥ अरे ओ नादान, पशेमान, तू तो है अन्जान, मुसल्मान तो होते हैं बड़े सख्त दिल इन्सान । तिलहा-सुनिये वालिद मैं, कहे देती हूँ इस दम साफ साफ; एक जुमला भी न कहियेगा मुसलमां के खिलाफ । गर मुखालिफ इसके मैं पाऊं ज़रा भी आपको आपने बेटी को छोड़ा और मैंने बापको । शायलाक-अच्छा अच्छा, मैं तेरा इलाज़ करता हूँ; कैद- खाने में मुहताज करता हूँ। तिलहा-जो कुछ श्राप फरमावे मंजूर बसरोचश्म है; मगर जब दिल में नूरो सुरूर है, तो किसीका क्या मकदूर है। शायलाक-अच्छा अच्छा, ज्यादा बकबक करके न मचलः- मिटादी आवरू मेरी तेरा कैसा चलनं विगड़ा। सुखुन पहिले तो बिगड़े थे मगर अब तो दहन बिगड़ा । (जाना शायलाक का।) तिलहा-सस्तियाँ झेलूंगी, जान पर खेलूंगी; मगर मुह- सिन को तार मोहब्बत को न तोडूंगी; कशिशे बर्क का असर न छोडूंगी:- भला कब रह सक्ते हैं, आपमें बारफ्तये उल्फत । कहीं आया हुआ दिल भी संभाले से सँभलता है ।।

४६
दिलफरोश।
अंक दूसरा। सीन तीसरा ।
शीरी का सजा हुआ महल ।
मसऊद-सुभानअल्लाह ! क्या सजा सजाया मकान है;
तमाम ऐशो निशात का मोहइया सामान है। मगर बन्दे को तो
बुगदाद जाने का फरमान है । अच्छा, यह भी सही; क्योंकि प्यारी
सलीमा से शादी का अरमान है। (सलीमा का प्राना)
सलीमा-क्यों रेश्रो कलमूंहे, यह तूने क्या श्राफत मचाई?
मसऊद-हां हां, क्या श्राफत मचा रखी है ?
सलीमा--भला, कल बेगम से तूने क्या कहा था ?
मसऊद-मैंने तो बेगम से इतना ही कहा था कि, सलीमा
मुझे अकेला पाती है, तो बहुत कुछ सताती है। यानी खफा न
हो मेरी जान; अब शादी का करो सामान ।
सलामा-मुझसे शादीका अब पयाम हुआ ।
मेंडकी को भी लो जुकाम हुआ ॥
,
गाना।
मसऊद-गोरी कैसा हूँ प्यारा प्यारा संवरिया रे,
भौंरी कारी फूलों में प्यारे प्यारे हैं।
मतवारे न्यारे कारे नैन । गोरी०-
कालेमें डराने को विष उगे हर बार ।
ऐसों से डरना सदा, है डसने को तय्यार ॥
काली है रैन प्यारी, है नैन प्यारी,
काले हैं नहीं प्यारे काले काले गेसू सुन्दरियारे।। गो.
सलीमा-दूर मूर्य निगोड़े, मुझे माफ कर; मैं तेरी बातो..
से परेशान होती हूँ। क्यों इतनी ज़बानदराज़ी करता है ?

दिलफरोश ।
सलीमा-तू
मसऊद-परेशान किस लिये होती हैं ? मैं तुमसे पयामे
शादी करता हूँ।
-तू यों न मानेगा ? ठैर, ठैर, मैं अभी ठीक किये
देती हूँ।
(सलीमा का मसऊद को जूतियों से मारना; छिपकर चमन
का देखना।)
सलीमा-ले भूये ले, शादी का मजा (मारना)
मसऊद-बस बस, प्यारी ! कहीं जूतियाँ न टूट जायें
तुम्हारी । (मार खाकर) वाहरे मेरे दिलदार, कैसी की फूलों
की बौछार।
सलीमा-मुआ मार खाता है और उसे फूलोंकी बौछार
बताता ह।
(चमनका जाहिर होना)
चमन-चाहरी छोटी, तेरे इश्क की बू फूटी।
सलीमा यारों से बात करे इशारों में फँस गई ।
चमन-क्या तूने सोचा समझा, कैसे रास्ता चलते
अँटकी।
सलोमा-ऊँचा नीचा कैसे देखा नाले पर नाले कैसे
भटकी।
चमन कहके बात मुकरने वाली, तौबा तिला करने
वाली, घरका पानी भरने वाली।
सलीमा-कैसी हँसतीभोली भाली: छिपकर आँख लड़ाने
वाली; मुशटन्डो पर मरने वाली।
चमन-वाहरी बीबी गम्माज!
सलीमा-बाज न पायेगी गलादराज।
(दोनों का लड़ना; मसऊद का बीच बचाव करना; दोनोंका
मसऊद को मारना)
मसऊद-देखो देखो, घोड़े घोड़े लड़ें और मोची की

दिलफरोश।
अंक दूसरा। सीन तीसरा ।
शीरी का सजा हुआ महल ।
मसऊद-सुभानअल्लाह ! क्या सजा सजाया मकान है;
तमाम ऐशो निशात का मोहइया सामान है। मगर बन्दे को तो
बुगदाद जाने का फरमान है। अच्छा, यह भी सही; क्योंकि प्यारी
सलीमा से शादी का अरमान है। (सलीमा का अाना)
सलीमा-क्यों रेश्रो कलमूंहे, यह तूने क्या श्राफत मचाई ?
मसऊद-हां हां, क्या श्राफत मचा रखी है ?
सलीमा--भला, कल बेगम से तूने क्या कहा था ?
मसऊद-मैंने तो बेगम से इतना ही कहा था कि, सलीमा
मुझे अकेला पाती है, तो बहुत कुछ सताती है। यानी खफा न
हो मेरी जान; अब शादी का करो सामान ।
सलामा मुझसे शादीका अब पयाम हुआ ।
मेंडकी को भी लो जुकाम हुआ ।
.
गाना।
ससऊद-गोरी कैसा हूँ प्यारा प्यारा संवरिया रे,
भौंरी कारी फूलों में प्यारे प्यारे हैं।
मतवारे न्यारे कारे नैन । गोरी-
कालेमें डराने को बिष उगे हर बार ।
ऐसों से डरना सदा, है डसने को तय्यार ।।
काली है रैन प्यारी, है नैन प्यारी,
काले हैं नहीं प्यारे काले काले गेमं सुन्दरियारे॥ गो.
सलीमा-दूर सूर्य निगोड़े, मुझे माफ कर; मैं तेरी बातो.
से परेशान होती हूँ। क्यों इतनी ज़बानदराज़ी करता है ?

दिलफरोश।
७
मसऊद-परेशान किस लिये होती हैं ? मैं तुमसे पयामे
शादी करता हूँ।
सलीमा-तू यो न मानेगा ??र, ठैर, मैं अभी ठीक किये
देती हूँ।
( सलीमा का मसऊद को जूतियों से मारना; छिपकर चमन
का देखना।)
सलीमा-ले मूये ले, शादी का मजा! (मारना)
मसऊद-बस बस, प्यारी ! कहीं जूतियाँ न टूट जायें
तुम्हारी । (मार खाकर) वाहरे मेरे दिलदार, कैसी की फूलों
की बौछार।
सलीमा-मुआ मार खाता है और उसे फूलोंकी बौछार
(चमनका जाहिर होना)
चमन-वाहरी छोटी, तेरे इश्क की बू फूटी।
सलीमा-यारों से बात करे इशारों में फंस गई ।
चमन-क्या तूने सोचा समझा, कैसे रास्ता चलते
बताता ह।
अँटकी।
सलीमा-ऊँचा नीचा कैसे देखा नाले पर नाले कैसे
भटकी।
चमन-कहके बात मुकरने वाली, तौबा तिल्ला करने
वाली, घरका पानी भरने वाली।
सलोमा-कैसी हसतीभोली भाली: छिपकर आँख लड़ाने
वाली; मुशटन्डो पर मरने वाली।
चमन-चाहरी बीबी गम्माज!
सलीमा-बाज न पायेगी गलादराज।
(दोनों का लड़ना; मसऊद का बीच बचाव करना; दोनोंका
मसऊद को मारना)
मसऊद-देखो देखो, घोड़े घोड़े लड़ें और मोची की

दिलफरोश। . जीन टूटे । (दोनो से) चुप रहो, ओ दिवानी मस्तानियों ! दोनो मुझपर मरने वाली । तू भी मुझपर मरनेवाली, तूभी मुझपर मरने वाली। चमन-मूये कलूटा, तू क्यो बोलता है ? सलीमा-बेहूदा, तू जबान खोलता है। (ोनो का मसऊद को मारकर गिराना और ऊपर चढ़ जाना) शीरी-(पाकर) छोड़ो छोड़ो! इसको छोड़ो; इसपर कहर न तोड़ो। (मसऊद को छुड़ाना।) मसऊद छोड़ा तो क्या छोड़ा ? कमर को तोड़ा, पीठ को कर दिया पक्का फोड़ा। शीरी-अच्छा हुआ, तेरी बदजुबानी की यही सजा है। मसऊद-बानूं साहेबा! आप क्या जाने, इन्हीं बातों में तो मजा है। (अन्दर से महमूद का पुकारना।) महमूद-कोई इस घर में है, जरा दरवाजे पर प्रायो? सलीमा-तुम कौन हो, अपना नामो निशां बताओ? महमूद-अजी, हम वसीयते इश्तेहार सुनकर आये हैं ? शीरी-किसको शर्त वसीयत ने उभाड़ा है; बेहूदा कोशिश ने पुकारा है। (शीरी का सलीमा को इशारा करना कि दरवाज़ा खोले सलीमाका दरवाजे पर जाना; महमूद का आना) महमूद-अस्सलामअलेकुम ! (जवाब न पानेपर, दूसरी तरफ फिरकर ) वलेकुमस्सलाम ! मसऊद-अरे श्रो शराबी ! सूरत हराम ! क्या डाकु- ओं ने तुझे योही छोड़ दिया; न तमाम किया ? महमृद-कौन है, मसऊद ? मसऊद-हाँ बे मरदूद। महमूद-अबे, तू यहां है? - दिलफरोश। ४ , पेशा है, मसऊद अबे, तू यहां कहां? महमूद-क्यों बे, तू मक्कारी न छोड़ेगा ? मसऊद-क्यों बे, तू शराबरूवारी न छोड़ेगा ? सलीमा-( महमूद से ) अज़ी, आप शरीफ़ होकर कमीनेपन की बातें कर रहे हैं ? मसऊद-शरीफ़, अजी यह बड़े जातेशरीफ़ हैं ! महमूद-अच्छा, तो लाइये; वह संदूक दिखलाइये । सलीमा-पहले अपना हसबो नसब तो बतलाइये? महमूद-मैं बुगदाद का रहने वाला हूँ; सौदागरी मेरा शराफ़त मेरे चेहरे से हवेदा है। मसऊद-(शीरी से) हुजूर ने इसे पहचाना? यह कासिम का है बड़ा भाई । नासजाये कम्बख्त ने भाई की कुल दौलत शराबरूवारी में उड़ाई। अब जो शर्त वसीयत सुन पाई तो यहाँ दौड़े आये मियाँ सौदाई कस्साई। महमूद-चुप बेहूदा, क्या तेरी शामत आई है ? (सलीमा से ) बस,अब वह संन्दूक मँगवाइये; देर न लगाइये। सलीमा-सुनिये साहब, संदूक मंगवाने से पेश्तर एक और शर्त है। महमूद-बयान कीजिये, वह राज़ काविले गौर है। सलीमा-आप अगर सन्दूक के इन्तखाब में नाकामयाबी पायेंगे और इस राज़ को जबां पर लायेंगे तोमुत्रकलाते तिलस्मात श्रापका गला दबायेंगे। महमूद-मुझे आपकी हर शर्त मंजूर है। शीरीं-क्यों मसऊद, अगर इसने असली सन्दूक पसन्द किया? मसऊद-मैं ने तो अभी इसका नाका बन्द किया। यह मियां मल्लू तो हो जायेंगे एक चिल्लू में उल्लू ।

५० दिलफराशे। सलीमा-लीजिये, होशियार हो जाइए । ऐ मुअक्कलां तिलस्मात, दिखाओ अपनी करामात। (जमीन पर पाँव मारना; महल का गायब होना; डरावनी- शक्लो का निकलना; तीन सन्दूकों का नमूदार होना) महमूद-हां बताओ, जल्द बताओ, तसबीर किस संदूक में है? सलीमा-यह हम क्योंकर बता सक्ती हैं । यह तो श्रापही को बताना होगा और संदूक छांटना होगा। महमूद-लो मैंने यह सन्दूक छांटा। सलीमा-अच्छा छांटा। महमूद-और शादी भी हुई। मसऊद-साथ ही बरबादी भी हुई। महमूद- -फिर तो कल मकान, खजाना, गाड़ी-घोड़ा, हाथी गदहा... मसऊद-(बात काटकर) खच्चर-मञ्चर, कुत्ता-बिल्ला चूंसी बिल्ली, मुर्ग बत्तख- महमूद-(बात काटकर) वगैरह वगैरह का मालिक बन जाऊँगा; फिर खूब मजे उड़ाऊँगा और जहाज भर भरके शराब मँगाऊँगा। मसऊद इसकी जरूरत क्या है। आपके वास्ते मैं यहीं बैठा बैठा बनाऊँगा और उसमें आपको खड़े खड़े छलकाऊँगा। महमूद-तुझको मैं खड़े खड़े निकलवाऊँगा। मसऊद-अबे, मैं तो इस घर का मुख्तार हूं; मैं तुझे निकलवा दूंगा। महमूद-वस बस, अब मैं तुझे रहने नहीं देता। चल, चल निकल। मसऊद-चल चल, झूठा कहीं का ? पहिले तू सन्दूक

दिलफरोश।
तो छांट।
महमूद-देख मैंने छांटा।
मसऊद-मगर यह लीजिये, शराब तो नोश कीजिये!
(महसूद को शराब देना)
महमृद-क्या शराब?
मसऊद-जी हां, जनाव?
महमूद-और अब आदाब। (महमूद का शराब पीना)
मसऊद-लो, अब यह दीवाना हुआ पूरा; इस शराब में
मिला है धतूरा।
महमूद-मुझे इस वक्त कुछ अन्धेरा सा मालूम होता है।
मसऊद-तो एकशा नम्बरों की ऐनक लगानो?
महमूद--(सोने के संदूक को छूकर) इसमें तसबीर है ?
नहीं, नहीं; (चांदी के संदूक को छूकर ) इसमें तसबीर है ।
(लोहे के ) बस बस, इसमें तसबीर है। यह लोहेका संदूक है
और इस पर इबारत लिखी है कि, जो मुझे पसंद करेगा,
वह खुदको खतरे में डालेगा। भला कौम ऐसा बेवकूफ है जो
खुदको खतरे में डालेगा। यह चांदी का संदूक है, और इसपर
लिखा है कि, जो शख्स इसको पसंद करेगा; वह ऐसी चीज़
पायेगा, जिसके वह लायक है। बस, मैं इसके लायक हूं कि,
प्यारी शीरी को पाऊँ। (सोने के संदूक को देखकर) इसपर यह
तहरीर है कि, इसको जो शख्स पसंद करेगा, वह उसको
पायेगा जिसके कि, सब शायक हैं। वह तो प्यारी शीरीं है,
जिसके सब शायक हैं। बस तसबीर इसी में है, इसको खोलिये ?
सलीमा-यह अख्तियार प्रापको है। जिसको पसंद
कीजिये; उसकी कुंजी लीजिये।
महमूद-सोने के संदूक की कुंजी दीजिये ?
सलीमा--यह लीजिये।

दिलफरोश।
(सलीमा का कुंजी देना; सन्दूक खोलना । उसमें इन्सान की
खोपड़ी निकलना, सब का हैरान होना, परदे का गिरना;
महमूद का वही खोपड़ी लेकर बाजार में जाना)
अंक दूसरा | सीन चौथा।
रास्ता ।
महमूद- हाय, मेरी किस्मत का यही लिखा था ! यह
किसी इन्सान की खोपड़ी है। (खोपड़ी की आँख के गड़हे में से
कागज़ निकाल कर ) यह सुनहरे हफों में लिखा है:-
चमकने वाली जो हैं अशिया;
नहीं उसमेंसे सब होती हैं सोना ।
चमक जो जाहरी मुझमें है पैदाः
इसी पर लोग हो जाते हैं शैदा ॥
हाय, शराब! तेरा खाना खराब । ऐ बाइसे तंग खान्दानी,
तेरे सबब कैसी उठाई जिल्लत पशेमानी :-
शराबी का आखिर नतीजा है बदः
न हो नेक उकबा से दुनिया है बद ।
तरीके हवस मालोज़र का है बद
किया मैंने दोनों का शेवा है बद ।
हुआ मुझ से आमाल क्या क्या है बद ॥
हैफ ! सद हैफ ! मैं अपने छोटे भाई की कुल दौलत अपने
तसर्राफ में लाया; जिसका नतीजा यह पाया। अब मेरे त्रामाल
मुझे जहन्नुम का रास्ता दिखा रहे हैं
,
.
-

दिलफरोश।
५३
.
कोई नफरत से भी मुझ पर न नज़र करता है ।
अब तो नाम से मेरे जहन्नुम भी उजर करता है ।।
बस, इस नहिस शराब से इज़तनाब करूं, और तौबा व
इस्तेज़ाब करूं । बाकी उम्र यादे इलाही में सर्फ करूं और खुदा
से अपनी
नजात
की
दुश्रा मांगूं:-
हक से माफ़ी चाहूंगा अपने गुनाह
शायद हो मुस्तेज़ाब दुआ रूसियाह की ॥
की।
गाना।
यह दुआ खुदाया मेरी हो मुस्तेजाव;
ख्वार ज़ार मैं तो यारब हो गया ।
पायेगा ज़िल्लत पीयेगा जो शराब
है बेअसर यह पुर हज़र करो इजतेनाब ।
छोड़ो बदकार हो नेकता कहीं;
याद हक रात दिन रहें कहीं।
होगा दो जहां में फिर न कुछ अजाब;
हो गर वह खुशगवार है नेक इन्तेख्वाब ॥
में
अंक दूसरा । सीन पांचवां ।
महल अगला।
(कासम व मुहसिन का बैठे हुए दिखाई देना)
कासिम-भाई मुहसिन ! दरजी अभी तक नहीं पाये।
मैंने पहिले ही कहा था कि, यह लोग बड़े वादा खिलाफ
होते हैं।

दिलफरोश। , . ? मुहसिन-सच तो यह है कि सुनार, दरजी और मोची को लोग वादा खिलाफ कहते हैं। मगर मियां, ज्यादातर काम भी उन्हीं से रहते हैं। कासिम-से लोग कुछ झूठ तो नहीं कहते हैं। देखो, सुनार के पास जाओ तो कहेगा अभी खटाई में रखे हैं। मोची को कहोः झट जवाब देगा कि, फकत् ऍड़ी ही तराशना है। दरज़ी से जब मांगो तो साफ जवाब देगा कि,एक तुकमा और धुंडिया बाकी हैं। मुहसिन लीजिये, वह कारीगर आ गये। (दरज़ियों का आना; साथही एक बुड्ढे दरजी के लिबास में मसऊद का भी आना। कासिम-क्यों खलीफा जी! आपने गरम कपड़े तैयार किये ? ( दूसरे से ) और आपने कुरते पायजामे तो सी लिये होंगे? पहला दरजी-हुजूर, सब तैयार है; फक्त एक कोट में इश्तरी कर देना है। कासिम-और श्राप? दूसरा दरजी-जनाब, कपड़े तो कुल तैयार हैं; मशीन की कल बिगड़ गई थी, इसलिये कुछ बखिया करनी बाकी है। कासिम-और बड़े मियां, आप तो वह मिसरी लिबास लेते आये होंगे? तीसरा-हुजूर, मैंने तो अभी हाथ ही नहीं लगाया; अब इरादा किया था कि आपने बुलवाया। कासिम-हां, पिनक में पड़े होंगे। आपने भी चान्डू पी पी कर अपनी जिन्दगी बरबाद कर दी। तीसरा-हुजूर, चुनियां बेगम के जेठ ने वह चिस्का दिया कि, हमारा दम तो चान्डू ही के दम के साथ है। कासिम-यह बड़ी वाहियात बात है। कल तो मिस्र का .

दिलफरोश।
,
,
सफर करूंगा और कपड़े अबतक तैयार नहीं ?
तीसरा-हुजूर, तो मैं गिरता, पड़ता, नशापानी करता,
कल तक जरूर लाऊंगा।
कासिम-(दोनो से) और श्राप?
दोनो–आज ही शाम तक।
कासिम-अच्छा जाग्रो, जरूर ले आयो।
(दर्जियों का जाना)
मुहसिन मेहरबान, अापका तो सामाने सफर दुरुस्त हो
गया। बल्कि अपने काम में भी कामयाब हो गये। मगर मेरा
काम अबतक कुछ न बना।
कासिम-सच है, अगर इस वक्त मसऊद होता, तो यह
काम कुछ मुश्किल न था।
मसऊद -(खुद से ) हां, यहां भी मेरे दम का जहूरा है।
गाना।
मुहसिन—क्यों खून बहादे बहाना किसीका,
शबे वस्ल मेंहदी लगाना किसीका ।
तमाशाये शाने नजाकत तो देखो,
मेरी आँख में है ठिकाना किसीका।
करेगा खजिल तुझको, ऐ तेग कातिल,
हथेली में सर रख के लाना किसीका।
गिरी बिजालियां दिल पर गरो के क्या क्या,
मजा दे गया मुस्कुराना किसीका ।
उठे जेर गर, भी कितने हजारों,
गजब का है जोबन पर आना किसीका ।

५६
दिलफरोश।
ऊदू का गला बज्म में घोंटना है,
वह जानूं से जानूं दवाना किसीका ।
हुआ जेर तजवीज क्या कत्ल अहसन,
जो मकतल में है आना जाना किसीका।
गाना।
,
-
मसऊद-सांई देना नाम रब के भीख लामो बाबा,
अररररर भूका मर गया, लाओ भीख ।
पैसा पैसा, कौड़ी कौड़ी देना बाबा ।।
अल्लाह के नाम पर दिलवानो बाबा । फकीर का सवाल है,
सवाल कर चला।
कासिम-लाई,यहां कौन सी चीज है जो तुमसे अजीज है।
मसऊद-बच्चा, हमसे क्या छिपाता है। कल तो तेरा सफर
का इरादा है। ले वह तोशे का खाना सांई को खिलवानो।
कासिम-(मुहसिन से ) क्यों भाई, यह शाह साहब तो
बड़े पहुँचे हुए मालूम होते हैं।
मसऊद-(खुद से) बड़े पहुंचे हुए हैं ? बड़े पहुंचे हुए हैं।
कासिम-क्यों शाह साहेब, आपको कैसे मालूम हुआ कि,
कल हम सफर को जानेवाले हैं।
मसऊद-बाबा,फकीरों से भी कोई बात छिपी रहती है ?
सब के दिल की बात जाननेवाले हैं।
मुहासिन-अच्छा, बतलाइये तो मेरे दिल में क्या है ?
मसऊद-ऐ छोकरे, फकीरों का इम्तेहान करता है। तू
पफ गैर कौम की लड़की पर मरता है।
मुहसिन-श्रापतो कोई बड़े फकीर मालूम होते हैं ।
मसऊद-बञ्चा, काहे को हमतो पेट के कुत्ते हैं।

दिलफरोश। , मुहसिन-ऐ मुर्शिद,करम फरमाइये कोई तदबीर बतलाइये? मसऊद-अरे ओ नादान, कहां हैं तेरे औसान; क्या बुरा नहीं है यह काम, जिस्का करते हो ध्यान? किसी की बहू बेटी पर मरना, क्या नहीं है फेल बद करना ? ऐ ओ नाप्राक़बत अन्देश! चाह कन्दरा चाह दरवेश । जो लोग जवानी के जाम में दूसरों से आँख लड़ाते हैं, आखिर वही बात उनपर भी पान पड़ती है। एक दिन उनकी बहू बेटी भी दूसरों से आँख लड़ाती हैं, तब कलई खुल जाती है। जो आज तेरे साथभागनेको तैयार है, कल औरों के गले का हार होगी। मुहसिन-ऐ मुर्शिद मेहरबान, श्रापकी नसीहत मेरे सर- आँखों पर; मगर अब यह बात गैरमुमकिन है। मैं दिल दे चुका हूँ। मसऊद-इस बातका होना कुछ आसान नहीं है। हां, एक शख्स जिस्का कि मसऊद है नाम, उसी से होने वाला है यह काम । ( उंगलियों पर गिन कर ) लेकिन वह यहां से बहुत दूर है; इसलिये बन्दा मज़बूर है। कासिम-वह यहां क्योंकर पा सकता है ? मसऊद-फकीर अपनी करामात से बुला सकता है। मुहसिन-फिर कोई तदबीर बतलाइये, उसे यहां बुलाइये? मसऊद-अच्छा, पहिले एक सौ रुपये की थैली मुवक्किलों के लिये मँगवाइये। मुहसिन-सौ रुपया? बन्दा अभी मौजूद करता है। (जाना मुहसिन का) मसऊद-(खुद से) तो आपका काम भी मसऊद करता है। कासिम-साईजी, श्रापका दौलतखाना कहां है? मसऊद-बाबा, फकीरोंके गरीबखानों का क्या ठिकाना है। जहां पर पाबो दाना है; वहीं आसन जमाना है। (मुहसिन का रुपया लाना) ५८ दिलफरोश। . - मुहासिन-शाह शाहब, लीजिये ये रुपये हाजिर हैं। मसऊद-हटाओ हटाओ, फकीरों को रुपयेसे नफरत है। (पाँवसे अपनी तरफ खींचना) अच्छा, अब तुम आँखें बन्द कर लो और जो जो मैं कहूं, वह कहते रहो? कासिम, मुहसिन-बहुत अच्छा; लो आँखें बन्द की ? मसऊद-कहो कि या अल्लाह, हम दोनों को अन्धा कर दे। दोनों का आँखें खोल देना) कासिम चाह शाह साहेब, यह तो हम न कहेगें। मुहसिन-शाहजी, ऐसा क्यों कहलवाते हो? मसऊद-जात्रो जाओ, बड़े कहींके रुपया देने वाले पाये। अभी मेरे मुवक्किल खफा हो जायंगे, तो सारा बना बनाया खेल बिगड़ जावेगा। खबरदार, अब जो अांखें खोली तो दोनों को काना बना दूंगा। कासिम, मुहसिन अच्छा अब न खोलेंगे। ( दोनोंको फिर आंखें बन्द करना ) मसऊद कहो कि या अल्लाह हम दोनोंको अन्धा कर दे। का०, मु०-या अल्लाह, हम दोनों को अन्धाकर दे। मसऊद-कहो तौबा तिल्ला। का०, मु०-तौबा तिल्ला। मसऊद-कहो बागड़ बिल्ला । का०, मु०-बागड़ बिल्ला । मसऊद-कहो दालमें पिल्ला। का०, मु०-दालमे पिल्ला। मसऊद-कहो मां कुतिया बाप बिल्ला ( का० और मु० का चुप रहना) देखो, नहीं कहते हो तो मियां मसऊद श्राधे रास्ते से वापस चले । देखिये, यह चले । (ठहरकर) अच्छा . . 11

दिलफरोश।
-
,
कहो कि जनाब, मेहरबान, कदरदान, जीशान, आलीशान,
साहबेहिम्मत वजूद मियां मसऊद भाइये, पाइये, हम सबपर
करम फरमाइये।
का०, मु०-जनाब, मेहरबान, कदरदान, हम सब पर
करम फरमाइये।
मसऊद-जनाब, मसऊदके पानेमें अभी कुछ देर है, एक
दफा और कह जाइये?
का०, मु०-जनाव, मेहरबान, कदरदान, हम सबपर करम
फरमाइये!
(इस असें में मसऊद का लिबास बदलकर असली
सूरत बना लेना)
मसऊद-बस, अब आँखें खोल दो।
कासिम-अहा! मसऊद तो यह खड़ा है, पर शाह साहेब
कहाँ गये?
मसऊद-क्या कहा जनाब, क्या कहा?
कासिम-शाहसाहेब कहाँ गये ?
मसऊद-कहांके शाह साहेब और कहां के फकीरसाहेब,
कामिल यह मसऊद ही है इस अमल का आमिल ।
कासिम-कम्बख्त शरीर । जब तो तूने बड़ा धोका दिया
और इतनी देर हमें न बताया।
मसऊद-लेकिन बन्दे ने मिस्र में भी आपका सव काम
बनाया।
कासिम-अच्छा कह दे वह हमारे कान में।
(मसऊद का कासिम के कान में कहना)
मसऊद-प्राया भी कुछ अल के दरमियान में ?
कासिम-बेशक, तू काबिले ईनाम है। लेकिन भाई महमूद
को कहां छोड़ा? कहीं कयाम है ?

६०
दिलफरोश।
मसऊद-ओह ! वह किस्सा मैं फिर सुनाऊँगा।
मुहसिन-लेकिन मेरे लिये भी कोई तदबीर होगी:-
गले से है दिलबर लगाने के काबिल ।
है सोने की चिड़ियां उड़ाने के काविल ॥
मसऊद-अगर काम है यह बनाने के काबिल ।
तो बन्दा है ईनाम पाने के काबिल ॥
पहिले एक सौ रुपये का कौल दीजिये; फिर मेरा काम
देख लीजिये।
मुहसिन-मैंने तुझे कौल दिया।
मसऊद-तो मैंने भी जोतिशो का प लिया और इस
काम को फौरन किया।
कासिम-जल्द आना।
मुहसिन-साथ ही खुशखबरी लाना।
मसऊद-क्यों घबराये जाता है, तू तो दीवाना है।
(सबका जाना)
अंक दूसरा। सीन छठवां ।
खिड़कीवाला महल ।
यायलाक-अफसोस मेरी लड़की को कैसा जुनूं हुआ
ज्यों ज्यों दवाकी मर्ज उसका फुजू हुआ।
हाय हाय ! क्या यह घर मेरे कारे जहुआ;
मुहसिन का इश्क वास्ते उसके जुनूं हुआ।
कुछ टोटका करूं कोई आमिल जो पाऊँ मैं
तावीज गंडा नक्श गलेमें बँधाऊँ मैं |
(शायलाक का जाना तिलहा का साना)

दिलफरोश।
NANDININDIA
गाना।
मिलेगा वह प्यारा, मेरा माहपारा;
मिटा, मिटा, दाग़ दिलका ।
हरमन, मोहन, समन बदन, चलन, फबन ,
मगन मगन चमन चमन है,मन सजन मिलन का॥मि०-
(शायलाक का आना)
शायलाक-इश्क को जब तक तू नहीं भूलती;
देखेगी खुद को न फलती फूलती।
तिलहा-इश्क है मज़हब मेरा, इश्क है मिल्लत मेरा,
मसहफे रूये सनम दौरे तिलावत मेरा ।
दीन है इश्क तो ईमान है मोहब्बत मेरा
हिज्र दोजख है मेरा, वस्ल है जिन्नत मेरा ।
(तिलहा का जाना)
शायलाक-ओहो, गज़ब का जुनूं है, किसी सख्त जिन्न
का अफसू है। (बाहर से मसऊद का पुकारना)
मसऊद-है जोतिशवाला, रँग निराला, ढंग पाला। झाड़
उतारू, मन्तर मारूं, और कर्क निसयान को मारूं भूत या शैतान
हो जो। जोतिश वाला-
शायलाक-अबे, तू कौन है, शोर मचानेवाला!
मसऊद-देख उल्लू ने झट मुंह से निकाला। अरे
जोतिशवाला है, जोतिशवाला।
शायलाक-क्यों, पूरा जवाब नहीं देता नाकारा ?
मसऊद-क्या गली रास्ते में है किसी के बापका इजारा!
मोतिशवाला है, जोतिशधाला।

६२
दिलफरोश।
शायलाक-क्या आप नजूमी हैं, नजूमी ?
मसऊद-हां नजूमी हूं। मेरे इल्म की सारे जहां में है
धूमः एक क्या सैकड़ों ही किस्मकी मैं जानता हूं नजूम।
शायलाक-जब तो ऐ मेहरबान ! भाइये मकान के
दरमियान ।
मसऊद यह लो प्राया, क्या है फरमान?
शायलाक-आइये आइये, ऐ नेक नाम! मुझे आपसे है
एककामा
मसऊद-मैं समझ गया हूँ तेरा काम।
शायलाक-कुछ मैं भी तो सुनूं।
मसऊद-(उंगलियों पर गिनके) तेरी लड़की को है जुनूं।
शायलाक-कामिल हैं अपने इल्म में जी शान; आप
अपने वक्त के लुकमान।
मसऊद-यह मेरी करामात की अदनी सी बात है; बन्दे
कोजानिये कि बड़ा नेकज़ात है।
शायलाक-जब तो ऐरौशन ज़मीर! कोई कीजिये तदबीर।
मसऊद-पहिले अपनी लड़की को बुलाइये, वह कैसा जुन
है, हमें भी दिखाइये?
शायलाक-बहुत अच्छा, मैं अभी बुलाये लाता हूँ।
(शायलाक का जाना)
मसऊद-बचा मसऊद, अब संभल कर काम करना ।
अगर ज़रा भी चूके, तो पड़ेंगे जूते ।
शायलाक-(तिलहा को लाकर) लीजिये, नजूमीसाहेब!
यही मेरी बेटी है तकदीर की हेटी है। अगर ऐसी औलाद होते
ही मर जाती तो मेरी दादी को ऐब न लगाती।
मसऊद-इसमें इस बिचारी का क्या कुसूर है; यह सब
उस मुसलमानका फतूर है। प्रदे, चेहरे की रंगत से ज्यादा

दिलफरोश।
शत बरसती है।भयानक शक्ल है एक अजीब हसरत बरसती है।
शायलाक-हां, तो ऐ मेहरबान; मुश्किल कीजिये आसान।
मसऊद-आपरखिये इत्मिनान; मैं करता हूंअभी सफा-
चट मैदान । अच्छा, थोड़ा सा लोबान और अगर की बत्तियां
मैंगवाइये।
शायलाक-अभी लाया हुजूर। (शायलाक का जाना)
मसऊद-अरे बाहरे लंमूर (तिलहा से) अरी प्रो
लड़की दीवानी, मस्तानी, होश में आ जा बराय मेहरबानी।
वरना बाज़ार में बेचकर कर लूंगा नशा पानी:-
अगर न अब भी तुझे होश बेहिजाब भाया ।
तो जान ले मैं तेरी जानको अज़ाब आया।।
तिलहा-जरा हिजाब न तुझको ऐ बेहिजाब आया;
बगल में दाब के मोटी सी त किताब भाया।
तुझे सितारा सनासी का क्या हिसाब आया।
न कोई बात का सीधा तुझे जवाब आया ।
कहीं से ताड़ी तू पीकर है या शराब आया ।।
मसऊद-नाम बताये तो होश उड़ जाये, रंगफक हो जाये।
तिलहा-बक रहा है बड़ी देर से चल दूर भी हो;
कौन सुनता है तेरी बात जो मगरूर भी हो।
मसऊद-सुनले, मैं कहता हूं तेरे कान में।
तिलहा-सुनती हूं कह दे जो ध्यान में हो। (तिलहा के
कान में कुछ कहना ) क्या तू सच कहता है ?
मसऊद नहीं तो तुमने क्या समझा है ?
तिलहा-तू मुझे धोखा तो नहीं देता है ?
-

दिलफरोश।
.
मसऊद-अरे, तुझे क्या तेरे बापको धोखा देता है
तिलहा तो मुझे कैसे यकीन हो।
मसऊद-तो सुन मेरा नाम मसऊद है।
तिलहा-अहा, क्या तू मसऊद है ?
मसऊद-अब जो कुछ मैं कहता हूं वही करना । अच्छा
अलग हो जानो, देख तेरा बाप आता है; बन्दा भी ढंग
लाता है । ( शायलाक का आना ) गुनगन्दुम, भबूकदानम,
भूत उतारम् अंतरझाइम् भसमम् भस्मा।
शायलाक-नजूमी साहब ! यह भाग और लोबान
मौजूद है।
मसऊद-तो बन्दा भी मसऊद है। (मसऊद का दो
बानं बैठकर अपनी जूती एक हलके में रखना और उंगलियों
पर कुछ मंतर पढ़कर जूती निकाल कर शायलाक को देना)
तुम इस जूती को माथे से लगायो ? (शायलाक का जूती को
लगाना) अब तीन बार इसको सलाम करो। (शायनाक
का सलाम करना)
मीन, मेष, मिथुन, कन्या वृश्चिक, तुला, मकर, धन ।
अहा हा !! क्या अच्छी फाल निकली है।
शायलाक-मेरी समझ में नहीं भाई भापकी जबान । में
गवार या आप हैं देहाती।
मसऊद-देखिये, एक श्लोक में सारी दास्तान करता
हूं बयान :-
श्लोक।
पियांजी खूसट जेहिजू मुहसिन दिलशजनां बेकरार गरदं,
लगाके तुमको कलंकका टीका यह दुख्तर एक दिन फरार गरदूं।
अगरचे सद साल भी नसीहत कुनी सोकस असरन बाशद
.

दिलफरोश।
जो हमराह दोस्त रवाना बाशद, तो शहर भर में पुकार गरदूं ।
अगरबजंजीर कस बजकड़ो तो जब भी घर में कभी न मानद
शवद इमरोज ई उड़नछू, तो कैसी वेटा बहार गरदं ।
कहो, क्या समझे ?
शायलाक-समझे क्या खाक ? कह दिया कि यह जवान
मैं नहीं जानता।
मसऊद-देखिये, दूसरे; श्लोक में सब मालूम हो जायगा:-
श्लोक।
मिसाले दीवाना हाय फिर तो उठाव चून्हा शवदये चम्पत ।
न सर पर तेरे कुलाह वाशद न टाँग में ही इजार गरदं ॥
शायलाक क्यों नजूमी साहेब ! यह कौन जबान है ?
मसऊद-सुनिये, इसका नाम है गड़बड़ झाला; फारसी
की नानी, संस्कृत की खाला । इसको बड़े शामिल ने निकाला
है। देखिये, लड़की मकर निकली है, मगर अपना असर जरूर
दिखावेगी।
शायलाक-मेरी कौन सी रास है ?
मसऊद-तुम्हारी रास सत्यानाश है।
शायलाक-अरे, यह तो बुरी बात है।
मसऊद-वह सत्यानाशी और यह सत्यानाश चौपट
स्थान है। इसमें तो आगे चलकर बड़ा बड़ा सफाचट मैदान है।
शायलाक-अरेमेहरबान, कब होगा वह सफाचट मैदान!
मसऊद-एक रात होगी यह हलाकान; बस, सुबह को
सफाचट मैदान । अब जैसा मैं कहूं वैसा तुम करो।
शायलाक-बहुत अच्छा, ऐ रौशन जमीर ! कहिये, वह
सफाचट मैदानवाली तदवीर ।
.

दिलफरोश।
मसऊद-देखो, वह उत्तर की तरफ पहाड़के ऊपर एक मन्दर
बड़ो करामात उसके अन्दर है। आज रात इसे वहां ले जाइये
और मन्दिर में तनहा छोड़ आइये, फिर देवी की करामात
माजमाइये।
शायलाक-बहुत खूब ऐ ज़ीशान !
मसऊद-बस, सुबह को सफाचट मैदान ।
(मसऊद का जाना चाहना)
तिलहा-नजूमी साहेब ! आपके जाने से मेरा दम
छूटता है।
मसऊद-देखो २ मुवकिलों ने अभी से ज़ोर बाँधा।
आप जरा मुंह फेर ले में कुछ दम करता हूँ।
शायलाक-बहुत अच्छा। (शायलाक का मुंह फेरना)
मसऊद-अरी श्री लड़की जो मैं कहता हूं वही करना।
मरा मत डरना। रात को हम पावेंगे तुझे मन्दिर से भगा खे
जायँगे।
तिलहा-(आहिस्ता से) बहुत अच्छा (जोर से) अच्छी
तो हो जाऊँगी!
मसऊद-बिलकुल । (मन्तर) इश्क धाड़ी, पन्जवाड़ी,
पूजाधाड़े, मन्तर मारे, झाड़ उतारे, पदम पदमा। देखिये साहेब
अब में जाता हूं।
शायलाक-फिर आप यहाँ कब प्राइयेगा?
मसऊद-अब तू मेरी हवा भी काहे को पायेगा।
(दोनों का जाना)
गाना।
तिलहा-मिलेगा वह प्यारा मेरा माह पारा,
मिटा मिटा दाग दिल का।

दिलफरोश।
६७
सोहन मोहन सजन बदन सम चलन फबन,
मगन मगन चमन चमन है मनसजन मिलनकामि०
अंक दूसरा। सीन सातवां ।
मान्दिर जंगल।
(शायलाक का मय दो नौकरों व तिलहा के पाना)
नौकर-देखिये, उस देवी का यही मन्दिर है।
शायलाक-अबतो मन्दिरमें इसे छोड़ जाना चाहिये।
हमको देबी की करामात को आजमाना चाहिये।
(शायलाक का तिलहाको मन्दिर में छोड़ जाना;मसऊद
का कासिम व मुहसिन के हमराह अाना।)
मसऊद-देखिये, वह यही मंदिर है; तिलहा जिसके
अन्दर है । जाइये स्थान पर सर फोड़िये ।
(मुहसिन का मंदिर के करीब जाना; कासिम का
भी जाना चाहना।)
मसऊद-तुम कहां चले। इसकी तो औरत है। श्रापको क्या
निसवत है । वाह भई वाह ! बड़े मज़े में आ गये, अभी से
घबरा गये?
सुहसिन-जुल्म की हो चुकी हद और न बेदाद करो
दिल में अरमान हैं भरे, इनको न बरबाद करो।
अपने मुहसिन पै न अब कुछ सितम ईजाद करो
खुल गया राज गमे हिजू से आजाद करो।
माके मिल जाओ गले वस्ल से दिल शाद करो।

दिलफरोश।
(तिलहा का निकल कर मुहसिन से मिलना; मसऊद
का कासिमसे चिमट जानां)
मसऊद-लाहौलबिलाक्वत श्राप हैं ? मैं समझा कि
कोई औरत खड़ी है।
कासिम-कम्बस्त, बड़ा पाजी है।
मुहसिन-अजब गुल चमन में खिला देखते हैं।
हम आँखों से अपने यह क्या देखते हैं ।
तिलहा-बुतों में जो पहिले ज़फा देखते हैं।
वह आखिर उन्हींमें वफा देखते हैं।
मसऊद-यह उल्लू वफा ओ जफा देखते हैं ।
हम इस नोट को बारहा देखते हैं ।
लाइये जनाब, इनाम दिलवाइये।
मुहसिन-अच्छा अच्छा, फिर मिल जायगा।
मसऊद-बातें न बनाइये, फिर विर मैं नहीं जानता हूं।
क्यों भाई, आप ही इन्साफ कीजिये नहीं तो अपने जेवर
उतार दीजिये।
मुहसिन-उल्लू.
जेवर लेकर क्या करेगा?
मसऊद-जब मिल जावेगा, तब देखा जावेगा।
(तिलहा का अपने गले से हार उतार कर मसऊदको देना)
तिलहाले, यह जेवर मेरा, खैरात के लिये।
मसऊद-तुम सलामत रहो खैरात के देने वाले।
(तिलहा और मुहसिन का गाना)
जानी मिले दोनों जानी मिले मुराद दिली पाई।
जवानी दीवानी सनम बुत शासानी ।

-
दिलफरोश।
मुहसिन-तुम बिन दिलबर घर दर तजकर,
मुज़तर दिलबर गम का गुज़र था।
तिलहा-तन मन जलकर जोबन ढलफर,
मन बेकल कर टुकड़े जिगर था ।
मुहसिन-घरसे निकलकर, बन बन चलकर,
मिले अब खुश्तर ।
तिलहा-चलत फिरत में जानी मिले ॥ जानी०
मसऊद-कुल दास्तान क्या यहीं करोगे बयान ?
कासिम-हां हां, अब घर चलना चाहिये, वहीं चलकर
इतमिनान से गुफ्तगू होगी।
मसऊद-देखिये, वह खाँ साहेब घबराये क्यों आ रहे हैं।
(आना खाँ साहेब का)
खाँ साहेब-जनाब, जल्द चलिये । हवा माफिक होनेकी
वजह से नासुदा ने बाबान उठा दिया है; जहाज जल्द खुलने
वाला है।
कासिम-भाई मुहसिन, अब जल्द चलो।
(मसऊद व कासिम का जाना, शायलाक का
नौकरों को लेकर प्राना)
शायलाक-जुनूंकी भी अच्छी दवा हो गई। बस, अब दूर
इसको बला हो गई।
नौकर १ ला-हुजूर, अब उसे बाहर निकालना चाहिये।
शायलाक-हां हां, तुम लोग जाओ, उसे बाहरले आओ।
(नौकरों का मन्दिर में जाना)
उसकी तबीयत खूब संभल गई होगी और वह नहसत भी
निकल गई होगी। (नौकरों का मन्दिर से बाहर प्राना)

दिलफरोश।
जानो,
नौकर १ बा-अजी जनाब, वहाँ तो है सफाचट मैदान
शायलाक-तो बस मुश्किल हो गई आसान ।
यही तो मैं चाहता था सफाचट मैदान ।
उसे
बाहर तो लामो?
नौ० १ ला-जनाब, अबतो आप ही जाइये।
शायलाक-अच्छा अब मैं खुद ही जाता हूं।
(शायलाक का मन्दिर में जाना)
मौ० १ ला-आ गये बराती न खुश्का न चपाती।
२रा-लस्त जिगर है न नूरे नजर है।
यह बुढ्ढे के सिरमें जुनूं का गुजर है।
शायलाक-(पाकर) दगा ! फरेब! मकर ! धोका! ऐ
मजूमी दगाबाज़ ! तेरा खाना खराब ! हाय, गई मेरी दौलत।
गये मेरे जेवर, गये मेरे पैसे, अब उन्हें पाऊँगा कैसे ?
नौ०१ला-उठके चलिये घर, यहाँ पर अब बहुत कुछ
,
ऐचुके।
शायलाक-न मुसलमानों के हाथों हम तो ठण्डे हो चुके।
(जाना सब का)
अंक दूसरा। सीन आठवां।
रास्ता।
(खलासियों का गाना)
खखासी-झटपट जाओ जहाज पर चालये,
हुई देर नहीं खबर करो, चलनेकी तैयारी ।
हो हो हो झट०-
०२-हम करवे नौकरी सोहरी, मेहनत भी खूब करी,

दिलफरोश।
७१
सारंग करते सरदारी हो हो हो झट०-
ख० ३ रा-कप्तान की दहशत बड़ी, डैमफूल कहमारे छड़ी,
सुनो अपनी हकीकत सारी । हो हो हो झट०-
ख० १ ला-हमें आज जो छुट्टी दिया, खूब बेवड़ा बरांडी पिया
फिर आये हैं दुनिया सारी । हो हो हो झट०-
यारो आज खूब मजा उड़ाया, बेवड़ा बरांडी
चढ़ाया; जब पैसे तमाम हुए तो जरीकी सदरी
और टोपी के दाम हुए । हो हो हो झट०-
और मैं सिंगापूर से साढ़ेसात रुपये का बूट लाया।
वह एक बनिये की दुकान पर गिरवी मार खाया।
स० २ रा तो मैंने भी क्या कम किया, दो पौंड पर सिलवर
वाच लिया और पांच रुपये पर बेंच दिया।
खलासी १ ला-पर अबतो टाइम भी हो गया है। पात्रो
बोवाको शराब बची है चढ़ायो।
( सबका बैठकर शराब पीना, सारंग का श्राना)
सारंग-प्रो यू बदमाश लोग, छाकटा लोग, तुम इधर
बेवड़ा पीता है; उधर जहाज खुलता है।
२रा खलासी-सारंग साहेब, चलो हम भी आता है।
सारंग-क्या प्राता
है;
तुम
तो
इधर
ड्रिंक बनाता है।
चलो, नहीं तो हम हन्टर जमाता है। (हन्टर चलाना)
खलासी ३ रा-अरे, तुम मारता काहेको है हम चलता
है, चलता है।
(सवका जाना शायनाक का माना

दिलफरोशी
शायलाक-मेरी बेटी को कोई मल्लू भगा कर ले गया ।
बागसे बुलबुल को एक उल्लू उड़ाकर ले गया ।
(एक आदमी का पाना)
आदमी-जनाब! आप यहां क्या राग गाते हैं आपकी
लड़की को मुसलमान
भगाये लिये जाते हैं।
शायलाक-( तमांचा मारकर ) नो मूज़ी शैतान ! कहां
हैं वह सब, जल्द बता वर्ना तेरी जान लूंगा।
आदमी-तू मुझको क्यों मारता है; उनको जाके ढूँढ़ता
क्यों नहीं।
शायलाक-श्रो नादान, तू भी तो है मुसलमान ?
आदमी--हां, मुसलमान तो हूँ, पर तेरी लड़की को तो
नहीं ले भागा।
शायलाक-(गरदन दाबकर) अगर मैंने उनको पाया तो
इसी तरह उनकी जान लूंगा, वर्ना तुझे मारूंगा।
भादमी-अच्छा मुझे छोड़ में चलता हूँ। (जाना)
अंक दूसरा । . सीन नवां।
दरिया।
(जहाजों का बन्दरगाह पर खड़े दिखलाई देना; खलासियों
का काम करना)
कप्तान--वेल सारंग! जहाज़ अबतक नहीं चला।
सारंग-हजूर, चार कैविन कासिम ने रिज़र्व कराये हैं,
उसका इन्तज़ार है।
कप्तान-वेल, हम टाइम के बरखिलाफ किसी का इन्तः
खार नहीं करेगा। तुम जहाज़ खोलो।

दिलफरोश। ७३ - - सारंग-लीजिये, वह आ गये। (कासिम, मुहसिन, मसऊद व तिलहा का प्राना) कप्तान-वेल कासिम! तुमलोग इतना देर क्यों लगाया? कासिम-जो हां, कुछ ऐसी ही ज़रूरत आन पड़ी जिससे देर हो गई। कप्तान-वेल, इट इज़ नाट गुड। तुम लोग काला आदमी कभी टाइम को नहीं देखता है । युरोपियन लोग कभी टाइम को नहीं छोड़ता है। मसऊद-तो क्या काला प्रादमी किसी के बाप का नौकर है; जब जी चाहेगा तब चला आयेगा। कप्तान-प्रो यू काला श्रादमी, इफ यू विल स्पीक ऐनी.. मोर, भाई विल ब्रेक योर हेड । (कप्तान का मसऊद को मारना; मसऊद का बेग से रोकना) सारंग- ओ यू काला प्रादमी । मसऊद-देखो देखो, यह गोरा आदमी है; अभी लंडन से पारसल होकर आया है। कासिम-यह एक बेवकूफ आदमी है; इसकी तरफसे में माफी चाहता हूं। क०-वेल नेवर माइन्ड ! तुम लोग जल्दी जहाज पर बलो। सारंग! इन लोगों का सामान लाम्रो । (कप्तान का जहाज पर जाना।) मसऊद क्या यह गोरा साहब मिर्च खा गया है, जो छेड़ते ही काटने को दौड़ा। कासिम-चुप क्यों बके जाता है। सारंग-अब जल्दी करो। कासिम मसऊद, सामान उठा। मसगद--(हाथ लगा कर)मुझसे यह सामान नहीं उठेगा।

दिलफरोश।
मुहसिन-क्यों मरा जाता है; कहीं एक गधे का भी पूरा
बोझ तो नहीं है।
मसऊद-एक क्या बल्कि दो गधों का बोझ है। खैर
चलिये, क्यों भाई सारंग, तुम्हारे जहाज में कोई लम्बी दादी
वाला भटियारा तो नहीं है । जो हमें सराय में मिला था।
सारंग-नेवर माइन्ड, नेवर माइन्ड ।
मसऊद-अबे, सीधी विलायती बोल; मैं उर्दू नहीं
समझता।
(मसऊदका सारंग को चाँटा लगाना; सारंगकादौड़कर जहाज
पर जाना । जहाज का चल पड़ना; शायलाक का पाना।)
शायलाक-जहाज को रोको ! जहाज को रोको ! उसमें
मेरी लड़की भागी जाती है।
मसऊद-लो, वह बूढ़ा खब्बीस भी आ गया।
शायलाक-रोको रोको, प्रो कप्तान, ओ बेइमान कप्तान !
नहीं सुनता शैतान?
मसऊद-अबे; सर क्या धुनता है, दरयामें कूद पड़े।
(जहाज का चले जाना; शायलाक का सिर पीटते रहना)
.
ड्राप सीन।
अंक तीसरा । सीन पहिला।
सज़ा हुआ महल।
(शोरी का गाना।)
मोरा सइयां, मिलत नहीं गोइयां,
दरस दिखलइयां, तरस गई जान ।
अरे, सइयांने मोहे तरसइयां, जियरा कलपइयां, न
कीनो मेरा ध्यान।

दिलफरोश। तड़प तड़प रैन दिन चैन पड़त नाहीं। बरस बरस तकत दरस मिलत नाहीं। क्या करूं गोइयां कलियां जोबन मुरझइयां झुलस गयी शान ॥ मोरा०- सलीमा-बिगड़े हुए जो काम हैं अकसर बन आयेंगे। जब आयेंगे तो आप के दिलबर बनायेंगे । शीरी-मत छेड़खानी कर, तू सलीमा जरा तो खदा से डर। मैं इंतेज़ार करते हुए जाऊंगी गुज़र ॥ सलीमा-मत बेक़रार हो ऐ मेरी जान सब कर । यह कौन आ रहा है कलूटा मुआ इधर ॥ (मसऊद को आते हुए देखकर) यह निगोड़ा है वही मस- ऊद गप्पी। खैर। (मसऊद का आना) शीरी-मसऊद ! अहा हा ! आया तोलाया भी खुशखबर? मसऊद-तशरीफ लाये देखिये वह खुद हैं नामवर । (आना कासिम का) शीरी है शक लाख शुक्र खुदावन्द दादगर । यह शक्ल प्यारी प्यारी जो आई हमें नज़र ॥ कासिम-जलवये दीद का मुश्ताक कब से कोई। दर्द हिज्र से दिले शाक है, कब से कोई ॥ मसऊद-मुन्तजिर लायक इनाम है कबसे कोई । खुश अन्जाम का आगाज है, कब से कोई ॥ शीरी-ऐ किसी के दिल पर कबज़ा करनेवाले, खौफ खुदा से न डरनेवाले- मुझ पै ज़ालिम तेरी बातों का असर है कि नहीं।' मर रहा है कोई फुरकत में, खबर है कि नहीं ॥ कासिम-जो सितम मैंने सहा वह कोई क्या जानता है। ६ है ७६ दिलफरोश। . दिल मेरा जानता है याकि खुदा जानता है। सलीमा-मेहरबानमन, तशरीफ रखिये। कासिम-तकलीफ न फरमाइये; अब वह संदूक मंगाइये; मेरी किस्मत आज़माइये। शीरी-ऐसी तामीब न फरमाइये; ठैर जाइये। दो चार रोज मेहमानी से न इजतेनाब कीजिये; फिर शौक से सन्दूक इन्लखाब कीजिये । काश मेरी किस्मत ने मुझे नाकाम ही रखा तो:- जिन्दगी का मेरे फिर कोई सहारा न रहा। तुम रहे गैर के और कोई हमारा न रहा । कासिम-दो चार रोज़ की मेहमानी से क्या खाक लुत्फ़ उठायेंगे। बस, अब वह सन्दूक ही मंगाइये; देर न लगाइये। अगर फज़ले खुदा शामिल हाल है, तो हमेशा के लिये तुम्हारा विसाल है। शीरी-मगरऐदिलदार, गमवार, ज़रा होशियारी इसका माल है; यह संदूक नहीं; हमारे तुम्हारे मुकद्दर की फाल है । कासिम-कुछ गम न कीजिये; खुदा कादिर व जल्लो जलाल है। सलीमा-सन्दूक मंगवाने से पहिले हम आपको एक शर्त समझाते हैं कि, दर सूरत नाकामयाबी अगर आप इस राज़ को लवान पर लायेंगे, तो मुशाफिजात तिलस्मात आपका गला दबायेंगे। कासिम-मुझे सब कुछ मन्जूर है; यह बात अक्ल से कब दूर है। शीरी-अच्छा होशियार, ऐ प्यारे दिलदार ! ऐ मुन्ध- किलां अजायबात, दिखला:अपनी करामात । (शीरी का जमीन पर पाँव मारना; महल का गायब होना;

दिलफरोश। डरावनी शक्लों का नमूदार होना;सन्दूकों काज़मीन से निकलना) कासिम--खैर, इलाही खैर, खैर । गाना । यह मकान कारस्तान, हर जमात परेशान । सुखद गम है मारी, अजब सेहरकारी, मिले गुल ।। यह म०- जहांदार तू लाचार का हो यार मददगार ॥ यह०- मनशा हुई पूरी कर मेहर दिखादे शबीह दिलजान ॥ यह म०- ऐ खालिक दो जहां ! मालिके कानो मकां, अगर तू मदद- गार है, तो बेड़ा पार है:- किश्तिये नूह को दरिया से निकाला तूने । चश्मे याकूब को बख्शा है उजाला तूने ॥ मैं भी एक बन्दए नाचीज हू बन्दा तेरा। गो गुनहगार हूं, रखता हूं भरोसा तेरा ॥ ( संदूक के करीब जाकर के) यह संदूक सोने का है। यह वह सोना है कि जिसे सला. तीन ज़माना जमा करते करते मर गये; जान से गुजर गये। लेकिन खाली हाथ पेशे दावर गये। उनके काम कुछ न आयाः- जुल्म मज़लूम पर करते थे जो सोने के लिये। चल बसे ज़ेरे खाक ओ सोने के लिये ॥ और यह दूसरा संदूक चाँदी का है । इसका भी यही है। चमक जोरो शगाल है; इन दोनों की एकही मिसाल है। चाँदी से सोना, सोनेसे चांदी । लौंडी से गुलाम, गुलाम से बांदी। लेकिन कम कद्र लोहे की है। फीकी फीकी रंगत कमसिन माशूक के हुस्न मलीह की तरह दिल को लुभाती है ; इसमें तर्ज माशूकाना पाई जाती है । बस, नहीं है, सब

दिलफरोश।
का यारा ; लीजिये इम्तहान खतम हुआ हमारा। इस संदूक
की कुंजी दीजिये।
सलीमा-आपको अख्तियार है, यह लीजिये।
(सलीमा का कासिम को कुंजी देना; कासिम का सन्दूक
खोलना । भूतखाना गायब,
परिस्तान का नमूदार होना । एक
ब एक चारों तरफ रोशनी हो जाना ; शीरी की तसवीर को
संदूक से निकालना, साथ ही परदे का गिरना ! )
अंक तीसरा। सीन दूसरा।
रास्ता।
(ज़ार को गिरफ्तार करके सिपाहियों का लाना।)
गाना।
जार-खदाया सर पर क्या तूफान ।
हुआ घर छुटकर सर गरदान ।
भरोसा तुझ पर है हर आन । तू है सुभान,
ऐइज़दान। हांतूजग का है मुलतान, चलीअब जान॥
सरवर बरतर, खालिक अकवर, दावर सबका ।
कमतर बन्दा सरगरदान, मुभान कर दरमान,
बार बार बेशुमार हाल ज़ार पर हो मेहरबान ॥
(शायलाक का आना)
सिपाही १-हस्व जाब्ता कानून वारंट गिरफ्तारी आप
के पास लाये हैं।
सिपाही र रा--आप कुछ फैसला करना चाहते हैं या
हवालात में ले जायें।
-
खुदाया०-

दिलफरोश। . शायलाक--ता फैसला अदालत मबहूत रहे; अब दूर ही मेरे नज़रों से मनहूस रहे । ज़ार--ऐ शायलाक ! रहम कर । मुझे फक्त दो रोज की मुहलत दे, मैं तेरी कुल रकम अदा कर दूंगा। शायलाक--क्यों,क्यों कहां गई वह शखियां, कहांगई वह फबतियाँ । दूर ओ मगरूर, मैं औरों की तरह गर्दन हिला हिला कर तेरे हाल पर रहम खाने वाला नहीं; बगैर तेरा आध सेर गोश्त लिये बाज़ आने वाला नहीं। ज़ार--देख ज़रा खयाल कर, मुझे न पालाम करः- रहा जो दिल में हसीनों के ओ गुबार हूं मैं । खुदा की शान अब ऐसा नहीं फ़ोज़ार हूं मैं ॥ शायलाक-ज़ार, जार, कहां काज़ार, अरे ओदिल आजार, तेरे नाम से हूं बेजार । तुझ को लगाऊं सरे बाजार हज़ार हज़ार पैज़ार, तेरी ही राय से मेरी लड़की हो गई फरार । ज़ार-क्या तू जानता है कि इसमें मेरी भी कोशिश थी ? शायलाक--कोशिश कैसी, तेरीही तो साज़िश थी। ज़ार-तू झूठ बोलता है। शायलाक-और तू सच कहता है । ज़ार--इतना ही रहम कर कि एक दफ़ा घर जाने दे, लड़के बालों से मिल आने दे। शायलाक--मुफ्त क्यों सिर धुनता है; तेरी आहोज़ारी कौन सुनता है । सिपाहियो! लेजाओ इसे जेलर के सुपुर्द करो। (शायलाफ का जाना) ज़ार-है शोर फलक तक मेरी इस नौहगिरी का। क्यों इस पै असर है नहीं सोज़े ज़िगरी का ॥ क्या हाल है देखो यह मेरी बेसबरी का ॥

दिलफरोश।
.
वल्लाह के हंगामा है अब बे खबरी का।
ऐ नालये दिल ! जप्त नहीं बे असरी का ॥
सिपाहियो ! तुमही ज़रा मेरे हाल पर तरस खाओ ; थोड़ी
देर के लिये मुझे मकान तक ले जाओ।
सिपाही १ ला-तू क्या बकता है ; तुझपर रहम कौन कर
सकता है?
जार-तू भी भूल गया, नहीं पहचानता कि मैं कौन हूं।
सिपाही २ रा क्यों नहीं जानते हैं। तू शायलाक का
करज़दार मुजरिम ज़ार है।
ज़ार-ऐ ओ बेमुरव्वत, तुझ पर खुदा की लानत । क्या वे
दिन भूल गये जो चार चार पैसे के लिये मेरी दुकान की खाक
छानते थे।
सिपाही १ ला-अरे ओ नादान, तू अपने गुज़रे हुए वक्त को
अब तक याद करता है:
सदा ऐश दौरा दिखाता नहीं ॥
गया वक्त फिर हाथ आता नहीं।
दूसरा-हमको क्या गर्ज है जो किसी के दुःख दर्द के
लिये अपना फायदा गवायें।
पहिला-बस चलो, अब देर होती है ।
ज़ार-अरे सूजी कम्बख्तों ! तुम पर खुदा कीमार हो; मर्द
होकर ज़र पर निसार हो। (सिपाहियों का जारकोले जाना)
--
अंक तीसरा । सीन तीसरा।
सजा हुआ महल।
(कासिमो शीरों का गाना)
दिलदार यार, हम किनार, लालाज़ार, पुरबहार, बना दिल

दिलफरोश।
बेकरार था । खतर गया, वह डर गया, दिलपर नज़र इधर
तू कर चमन दिलारा बना । क्या हरहर दरदर गुन का दिल
पर मिलकर जोबन दरसा, हम पर सरवर का बरसा । दरसा
अनवर दिलपर मिलकर गुलतर खिलफर हुन बरसा ॥ दि०-
कासिम-मुहफिले इशरत है या शोला है बर्के तूर का।
है अजब शादी के दिल, खुश है हरेक रंजूर का ।
शारी-आरजू मुद्दत की थी, जिस दिन कि वह रोज है ।
अज्म था जिस बज्म का यह वह तर्बन्दोज़ है।
(सहेलियों का नाचना)
गाना।
झूम झूमकर आला चले मतवाला।
जोबन वाला मोरा बृजलाला रे ॥
तीखी तीखी नज़रों वाला, चितवन गुन हरे गुने मोती
बाला ॥ झूम०-
कासिम-आज आँखों में नूर है, दिल में सुरूर है।
मुहसिन-आपकी खुश नसीबी का ज़हूर है, जिससे
बन्दा भी मसरूर है।
मसऊद-और देखो, बन्दा क्या गोरा गोरा नूर है और
मेरी बीबी कैसी काली काली शबे दैजूर है।
सलीमा--दूर मुए, तेरी किस्मत जागी, जो मैं बेगम
की बदौलत तेरे, पाले पड़ी । मुझे तो होता है अचम्भा कि तू
है बावर्ची खाने का खम्भा या ख़त डालने का बंबा ।
मसऊद-खत डालने का बम्बा नहीं ; बल्कि दिल की
लगी को बुझाने का बंबा । मगर देखो, वह खां साहेब कैसे आ
खां साहेब-( आकर ) हुज़र, कोई गारीखुलवतन आयों

दिलफरोश। है ; आपसे मिलना चाहता है। कासिम-अच्छा जाओ, उसे मेरे पास ले आओ। ( खां साहेब का जाना) मसऊद-जनाबमन, मैं भी तो गरीबुलवतन हूं । जो कुछ देना दिलाना हो, वह मुझ ही को दे दीजिये । (बाहर देख कर) यह तो मियां महमूद ; यहां भी आ हुए मौजूद । (महमूद का आना) कासिम-( उठकर) भाई जान ! मुझ से जो कुल कुसूर हुआ हो, माफ फरमाइये। महसूद-ऐ अज़ीज़ बातमीज़, मुझको किसी की क्या शिकायत है । जो कुछ मैंने तुझ पर जुल्म किया इसकी . नदामत है। -अब किसी बात का गम न कीजिये ; यह सब मेरेही कुसूर का जवाब मुयस्सर हुआ। अब आप हम्माम में तशरीफ़ ले जायें, लिबास बदल आयें । मसऊद ! आपके हमराह हम्माम में जाओ और उम्दा पोशाक बदलवा दो । मसऊद--(आहिस्ता से ) जनाब, इस नंग-खान्दान को नंगाही रहने दीजिये। कासिम--चुप ओ नादान, तू क्या जाने बुजुर्गों की शान । हज़ार उससे हुई बेवफाई है ; मगर मेरा हकीकी भाई है। मसऊद--अच्छा तो गुदड़ी बाज़ार से कोई कपड़ा मोल ले दूं? कासिम--चुप, बक बक न कर। (महमूद से ) आप जायें और लिबास बदल महमूद-जी, अब मुझे किसी बात की ख्वाहिश नहीं है। मसऊद-विस्की के सिवा किसी से साज़िश नहीं है: महमूद-कर चुका ऐश दुनिया हेंच है। मालो ज़र क्या करूंगा हेंच है। .. आयें।

दिलफरोश।
%3
उम्र बाकी सिर्फ यादे हक में हो ।
सीमो ज़र लालोगौहर क्या हेच है।
मसऊद-वहां भी जुआ खेल खेलके शराब पीयेगा ।
कासिम--खैर, जो आपको मंजूर है।
महसूद-अच्छा,तो मैं इस वक्त जाऊँगा; फिर कभी आऊँगा।
कासिम--जो मर्जी।
महमूद--अस्सलाम अलैकुम ।
कासिम वॉलैकुमस्सलाम ।
महमूद-( मसऊद को ) सलाम ।
मसऊद-नमश्कार।
(जाना महमूद का ; खां साहेब का आना )
खां साहेब-ऐ आलीबकार!किसी का खत लाया है ताबेदार।
( कासिम का खत लेकर पढ़ना और अफ़सोस करते हुए
गश खाकर गिर पड़ना)
शीरी-अरे कोई दौड़ो । शिताब, लाओ गुलाब ।
मसऊद--बहुत अच्छा, लाया जनाब।
( मसऊद का गुलाब लाकर कासिम पर और बाद सलीमा
पर छिड़कना और थोड़ा खुद पीना)
अरे, यह गुलाब है या तेज़ाब है । मैं क्या जानता था कि
ऐसा कड़वा होता है । ( सलीमा से) मोटी, बोलती नहीं है;
चुपकी खड़ी देखती है।
मुहसिन
भाई कासिम, होश में आइये ; कुछ हाल तो
सुनाइये।
कासिम-हाय अफसोसाइस ख़त से खून की बूंदें टपकती हैं।
शीरी--ओफ़ ! यह क्या माज़रा है। प्यारे कासिम, यह
किसका ख़त है ?

दिलफरोश।
कासिम--यह खत उस दोस्त का है जो सलूक करने में
अपनी नज़ीर नहीं रखता। सच पूछो तो उसीकी बदौलतं मुझे
आपके पहलू में बैठना नसीब हुआ।
शीरी-उनकी बदौलत क्योंकर ?
कासिम-छः हज़ार रुपये मुझे एक बेदर्द यहूदी से कर्ज
अपने ज़मानत पर दिलाया था और अपने जिस्म का अधि सेर
गोश्त उस जालिम की दस्तावेज़ में लिख दिया था। उसकी
मियाद गुज़र गई है, अब वह इस आज़ार से गिरफ्तार है।
मुहसिन-हक़ीक़त में उस पर बहुत नाजुक वक्त है।
कासिम-जिसने लूटा मज़ा जवानी का ।
हुमा कुश्ता वह नातवानी का ॥
लब जो खन्दा हुए मस्सरत से ।
हुए वह प्राशना शिकायत से ॥
शीरी-तो यह बात क्या मुश्किल है; जिस कदर रुपया
चाहे ले जाइये और अपने दोस्त को छुड़ा लाइये।
कासिम-सच है। मगर तुम्हें छोड़ता हूं तो शर्त वफा से
मुंह मोड़ना हूं और जो उस दोस्त का खयाल होता है, तो
अज़हद मलाल होता है।
शशि-नहीं, नहीं; मुझे ज़रूर छोड़िये और उस नेक काम
की तरफ मुंह जोड़िये ।
कासिम-ऐ प्यारे, मेरे दोस्त मुहसिन !
मसऊद-(तमसखुर से) ऐ मेरी प्यारी बीबी सलीमा।
कासिम-यह सब सामान तुम्हारी सुपुर्दगी में छोड़कर
जाऊँगा और खुदा ने चाहा तो बहुत जल्द अपने दोस्त को
छुड़ाकर लाऊँगा।

दिलफरोश।
मुहसिन-मुझे आपकी तामील हुक्म मंज़र है।
कासिम-मसऊद, तू हमारे साथ रहेगा।
मसऊद-बहुत खूब । ज़रा मैं भी अपने मन्जूर नज़र को
वसीयत कर दूं। (सलीमा से अलग जाकर) बड़ी जोटी, बड़ी
चोट्टी ! रोज़ आम चुन के खाती है। देख, तू मेरे वास्ते कहीं
रोना धोना नहीं; चूड़ियाँ तोड़ के चुपचाप कोने में बैठी रहना।
सलीमा-चल निगोड़े, दफ़ान भी हो।
कामिस-अच्छा प्यारी, अब मैं रुखसत होता हूं।
शीरी--फी अमानअल्लाह ।
मुहसिन-खुदा हाफिज । (कासिम और मसऊद का जाना)
शीरी-(सलीमा से) मेरा इरादा है कि मैं बहेसियत
एक वकील के बोग़दाद जाऊँ और उस सौदागर को यहूदी के
पंजे से छुड़ाऊं । अच्छा, में एक वकील का लिबास पहिनती हूं
आर तू भी एक मोहर्रिर की पाशाक पहिन ।
सलीमा-बहुत अच्छा।
शीरी-भाई मुहसिन, मैं अपने शौहर की सलामती और
उनके दोस्त के लिये रिहाई की दुआ माँगने एक इबादतगाह में
जाऊंगी। वापसी तक यहां का इन्तज़ाम तुम्हारे जिम्मा पर
छोडूंगी।
तिलहा-मैं भी आपके हमगह चलती हूं।
शीरीं-नहीं, तुम यहां रहो; मेरे साथ तकलीफ न करो।
मुहसिन--मैं आपका हर तरह फरमाबरदार हूं।
सलीमा-अब चलिये और रवानगी का सामान कीजिये।
(सलीमा और शीरों का जाना)

दिलफरोश।
अंक तीसरा। सीन चौथा ।
रास्ता।
शायलाक-खूब हुआ कि दुश्मन मेरा मगलूब हुआ।
अब मैं अपने कोने का रंग दिखाऊं; आध सर गोश्त लेकर
उसका लोहू बहाऊँ:-
दुश्मन वह मेरे दीन का, तो मैं जान का दुश्मन ।
वह जान का दुश्मन, तो मैं ईमान का दुश्मन ॥
वह रहता था हर वक्त मेरी शान का दुश्मन ।
पर अब तो हुआ उसके मैं अरमान का दुश्मन ॥
मैं अनुकरीब बदला अदालत से पाऊंगा ।
उम्मीद पूरी अपनी शरारत से पाऊंगा ॥
(नौकर का आना)
नौकर-जनाब,कुछ आपने सुना । कासिम मिश्र से आ गया।
शायलाक-यह तुझे कैसे मालूम हुआ ?
नौकर-अभी अदालत से उसने जमानत देकर जार को
छुड़ा लिया है।
शायलाक-क्या यह दुरुस्त बयान है ?
नौकर इसमें आपको कुछ: गुमान है ?
शायलाक-ओहो ! मामिला कहीं बिगड़ न जाय । मगर
नहीं ; कुछ नहीं होने वाला है। मैंने भी वह दाँव निकाला है;
क्या दस्तावेज़ का लिखा किसी ने टाला है।
नौकर-मगर अब यहां क्या कर रहे हो; जाओ कोई
तदवीर करो!
शायलाक-मैं अभी दारोगा जेल से मिलता हूं; कब
अपनी तबीरों से हिलता हूं। (जाना दोनों का)

दिलफगेश।
अक तीसरा । सीन पांचवां।
महल ज़ार।
जार-समझा था मैं कुछ, चर्ख ने कुछ और दिखा दिया।
गदिश ज़माने ने की, यह नया दौर दिखा दिया ।
काफ़िर ने अदावत का अजब तौर दिखा दिया ।
आफ़त में फंसी जान सितम जौर दिखा दिया।
कासिम-भाई ज़ार, आप इस कासिम की बदौलत किस
आज़ार में गिरफ्तार हुए:-
आप पर होते हैं, जालिम के सितम मेरे सबब ।
प्रापने क्या क्या सहे रंजो अलम मेरे सबब ।।
जार-भाई कासिम, कोई अन्देशा न करो ; यही गनीमत
है कि आपका अच्छे वक्त पर आना हुआ। आपका आना मेरी
रिहाई का बहाना हुआ। देखिये, आज कचहरी में क्या होता है।
कासिम-भाई चलो, अदालत में जिस कदर रुपया दर.
कार है, मेरे हमराह तैयार है। मैं आपकी हर आफत अपने
सर लूंगा ; आप पर किसी तरह का जुर्म न आने दूंगा।
ज़ार--शर्तिया अगर मैं किसी बला में फंस जाऊं और
बरहम यहूदी सितम पर ही आमादा हो, तो मेरे लिये कुछ
अफ़सोस न करना।
कासिम--हत्तल मकदूर
मैं आपको बला में आने दूं,
मुमकिन नहीं।
(सब का जाना).

दिलफरोश। अंक तीसरा। सीन छठवां। कोर्ट। , ! जज -- (वकील, मोहर्रिर, चपगसियों और लोगों का जमा होना; जज का आना ; सबका ताज़ीम देकर बैठना ; सरिश्तेदार का मिसिल देखकर कहना) जज--ज़ार आया? ज़ार-जी हां ; मैं हाज़िर हूँ। जज-ज़ार तुम पर बहुत तसं आता है कि तुम ऐसे ज़ालिम की जवाबदेही के लिये खड़े हो ; जिस्में रहम नाम को नहीं। जार-- हुजूर ! मैं खूब जानता हूं । आपने इस यहूदी के बर्ताव को नर्म करने में कोई दक़ीका उठा नहीं रखा । -शायलाक आया? शायलाक-हाज़िर हूं सरकार । जज --शायलाक, तुमको गौर करना चाहिये कि इस गरीब सौदागर की कमर तोड़ देने को इसके नुकसानात ही क्या कम हैं। इस पर तुम और जुल्म कर रहे हो। शयलाक-अपने ख्यालात से आपको पहिले ही आगाह कर चुका हूं। ज्यादा कहने की क्या ज़रूरत है। कासिम--मैं तुम्हें छः हज़ार की जगह बारह हज़ार देने को राजी हूं। यह लो और दावे से बाज़ आओ। शायलाक-यह बारह हज़ार क्या, अगर तुम १२ हजार के हर एक हिस्से को बारह बारह हिस्सों में तकसीम करो जब भी मैं न लूंगा। मैं अदालत से जुर्माना पाने की दरख्वास्त करता हूं। जज--शायलाक, हम जानते हैं कि तुम उस वक्त तक

दिलफरोश!
अपनी हठ कायम रखोगे, जब तक इस सौदागर का आखिरी
वक्त न आ जाये।
शायलाक-बेशक, अपनी हट से उस वक्त तक बाज़ न
आऊंगा ; जबतक कि मेरा हाथ इसके खून से न भर जाये।
जज-जब तुम्हारे रुपये से ज्यादा रुपया मिलता है,
तो क्यों इनकार करता है ?
शायलाक- हुजूर ! मैं मज़बूर हूँ ।
क्या करूं अपने
पाक दीन की कसम खा चुका हूँ।
जज-अपने मुनसबी अख्तियागत से जो मुझे कानून ने
दिये हैं, चाहता हूँ कि इस मुकद्दमें को दूसरेरोजपर उठा रखू ।
मसऊद -- बेहतर होता कि इस मुकद्दमें को कयामत तक
उठा रखते कि खुदा जैसे हाकिम आदिल के आगे पेश होकर
फैसला हो जाता। ( आना सलीमा का मोहर्रिर के लिबास में)
सलीमा--जनाबाली, मैं एक वकील का मोहर्रिर हूँ
जो शीरी की तरफ से जार के मुकद्दमें में बज़रिये वकालत
मिश्र से भेजे हुए आये हैं; उनके लिये क्या हुक्म होता है ?
जज--जरूर आयें, उनके लिये आना बहुत खूब होगा।
(सलीमा का जाना)
मसऊद-यह तो अजब किता का मोहर्रिर मालूम होता है।
(आना सलीमा का बलिबास मोहरिर के,शीरी का बलिबास
वकील के)
शीरी-तसलीमातअर्ज है।
जज--मैं आपके आनेपर निहायत खुशी जाहिर करता हूँ।
शीरी--मैं भी यकीन करता हूं कि आपके इजलास में
मुमताज़ हूँ। (बैठकर) इसमें कौच मुद्दई और कौन मुहाले है ?
जज--ज़ार और शायलाक सामने आओ?
।

दिलफरोश।
शीरी--मैं मिसिल देखने की दरख्वास्त करता हूँ। क्योंकि
नकल मुकद्दमा मेरे पास नहीं है।
जज--क्या मुजायका है । (मिसिल देना; शीरी का देखना)
शीरी--क्या आपका ही नाम शायलाक है ?
शायलाक- हां मुअजज वकील साहेब, मेराही नाम
शायलाक है।
शीरी-वाकई तुमने अजीब पेंचदार मुकदमा दायर कर
रखा है, जिससे जज साहेब सख्त हैरान हैं। मगर बोगदाद
का कानून तुमको इस दावे से बाज़ नहीं रखना और यहां
का मुनसिफ जज तुम्हें मज़बूर होकर इस सौदागर पर
डिगरी देवेगा।
शायलाक-वाह रे मेरे
लायक वकील.! इन्साफ इसी को
कहते हैं और वकालत इसी का नाम है ।
शीरी-और क्या साहेब आपही ज़ार हैं, जो इस ज़ालिम
के प में गिरफ्तार हैं ?
ज़ार-जी हां मुझही पर इनके वार हैं।
शीरीं-मैं मिसिल के रुयेदात पर लाख गौर करता हूँ।
मगर कोई सूरत नज़र नहीं आती। लेकिन सौदागर साहेब,
मेरा ख़याल है शायद आपको इस तमस्सुक के लिखने से
इनकार हो।।
ज़ार--इनकार क्योंकर हो सकता है, मुझे इकरार है।
शीरी-फिर आपको सीना खोलकर तैयार होना चाहिये।
लेकिन ऐ यहूदी! तू इस सौदागर का गोश्त लेकर क्या करेगा ?
इसका ठीक ठीक जवाब दे, या इसके हालपर रहम कर । जज
साहेब की भी यही राय है कि तू दावे से बाज आ।
शायलाक-न मैं दावे से बाज आऊंगा और न किसी तरह

दिलफरोश।
१
का रहम करूंगा। लेकिन इसके जवाब में कि मैं गोश्त लेकर
क्या करूंगा। फर्ज कीजिये कि, किसी मूजी जानवर ने मेरे
घर में सर उठा कर रखा हो और उसको जाया करने के लिये
बीस हज़ार रुपया फूंक डालूंगा तो मुझे कौन रोक सकता है।
इसका गोश्त अगर किसी इनसान के काम में नहीं आ सकता,
तो मेरे कुत्ते की ग़िजा होगी और बुगदाद का मुनसिफ
जज मुझे बाज़ रखे तो उसकी बदनामी उसके कानून और इस
शहर की आज़ादी पर है।
शीरी-अच्छा मैं दस्तावेज़ देख सक्ता हूँ ?
(शायलाक का दस्तावेज़ दिखाना)
शायलाक-देखिये, शौक़ से देखिये । इसमें कोई फिकरा
फरेबन नहीं लिखा गया है । महज़ मामूली फिकरे हैं,जो हर
दस्तावेज़ में हुआ करते हैं। इसके हर एक लफ्ज़ से कातिब
की रजामन्दी ज़ाहिर होती है। (शीरी का दस्तावेज़ पढ़ना)
जज-शायलाक ! हम तुमसे फिर कहते हैं कि तुम इस
गरीब सौदागर पर रहम नहीं करते ; काश तुम भी किसी
आफत में फँसो तो उस वक्त तुमको दुनिया में किसी से क्या
उम्मीद हो सकती है?
शायलाक--जब मैंने कोई ऐसा काम ही नहीं किया, तो
किसी के
रहम से क्या गर्ज?
शीरी--ऐ यहूदी ! बेशक तुम्हें रहम करना चाहिये ।
शायलाक-यहां पर तो रहम हर किसीका तकिया
कलाम है । मैं समझता था कि, आप एक लायक वकील हैं,
किसी कानूनी गिरफ्त से अपने मुवकिल की जान बचाएंगे।
मगर आपने भी वही पुराना दुखड़ा दुहराना शुरू कर दिया,
रहम, रहम, कहना अख्तियार कर लिया।

दिलफरोश
शीरी--क्या रहम को तू कोई मामूली चीज़ समझता है ।
देख, इसके सिफत में कितनी कितनी खूबियां हैं । जो शख्स
किसी पर रहम करता है, उसे भी निहायत ही मस्लरत हासिल
होती है। जिस पर रहम किया जाता है, उसे भी बेहद खुशी
होती है । अगर बादशाह में यह सिफत न हो तो उसके सर का
ताज़ उसकी कुछ इज्जत अफजाई नहीं करता। ऐ यहूदी, गोकि
तू इस वक्त इनसाफ इनसाफ पुकार रहा है;मगर ज़रा गौर तो
कर कि खुदाए आदिल सिर्फ इनसाफ ही से काम ले और अपना
रहम शामिल हाल न करे, तो हमारे आमाल हमें सीधे जहन्नुम
का रास्ता दिखा रहे हैं। ऐसी हालत में हम किसी को नजात की
उम्मीद न करनी चाहिये । पस, तू ऐसी लतीफ चीज़ से क्यों
महरूम रहता है; जिसे खुदा भी पसंद करता है।
शायलाक-सुभानअल्ला! इजलास क्या है गोया सोहबत व
अज़ोनसीहत है । भला, तो मैं अपने सिर किसी किस्म का गुनाह
क्योंकर ले सकता हूं, अपनी अपनी मंजिल अपनी अपनी दौड़।
मुझसे रहम की दरख्वास्त बिलकुल फुजूल है ।
शीरी--शायलाक ! जज साहेब ने तुझे डिगरी इस सौदा-
गर पर दे दी। अब तुझे अख्तियार है कि आध सेरगोश्त इसके
जिस्म का, जहां से चाहे तराश ले । और ज़ार, तुम्हें भी सीना
खोलकर तैयाररहना चाहिये। जो कुछ कहना होबतौर वसीयत
के कह लीजिये । क्योंकि आप की रिहाई गैरमुमकिन है ।
जार--भाई कासिम, मेरा आखिरी सलाम कबूल करो।
अब मेरा जिन्दा रहना गैरमुमकिन है । हरगिज़ यह ख्याल न
करना कि मेरी मौत के बाइस तुम्हीं थे, इसमें तुम्हाराक्या कुसूर
है । वही होता है जो खुदा को मन्जूर है । अगर इस संगदिल
यहूदी ने गहिरा जख्म लगाने में कमी न की, तो मैं तुम्हारे सामने
।
.

दिलफरोश।
९३
.
इसके बार से सुबुकदोश हो जाऊंगा।
कासिम--यह क्योंकर हो सकता है कि, मेरे एवज़ तुम
हलाक हो, क्यों न मेरा ही सीना चाक हो । ऐ मुनसिफ
जज ! मेरी जमानत का इस पर जुर्म है। जब मुजरिम खुद
मौजूद है, तो ज़ामिन रिहा हो सकता है । आध सेर गोश्त यह
कासिम ही दे सक्ता है।
शायलाक-कासिम, तुम क्यों कोशिश कर रहे हो, बुग़-
दाद का कानून मुझे इसीसे दिलवायेगा।
जज--बेशक
कानून नहीं कहता कि कासिम का गोश्त
लिया जावे।
जार--भाई कासिम ! आओ, गले तो मिल लें।
( कासिम का ज़ार से गले मिलकर रोना)
शायलाक-तुम्हें रोने धोने से कब फुरसत होगी? मुझे
और भी काम है; अपना वक्त ज़ाया मैं नहीं कर सकता ।
शीरीं-( उठकर ) अच्छा तराजू और छुरी लाया है ?
शायलाक--जी हां सब मौजूद है।
शोरी--तो एक ज़र्गह भी बुलवाइये ताकि फौरन जस्म
बन्द कर दे । वरना ज़ियादा खन निकलने के सबब यह मर
जायेगा।
शायलाक--यह तमस्सुक में लिखा है ?
शीरी--लिखा तो नहीं है । लेकिन इसके साथ जो इतना
सलूक करेगा, तो तुझे सवाब मिलेगा।
शायलाक--जिसने इतनी दूर से भापको बज़रिये वकालत
भेजा है, उसने इतना न किया कि एक जर्गह भी रवाना कर
देता। शायद आपने याद न दिलाया होगा।
जज--यह वक्त बहुत नाजुक है। तुमको ख्याल करमा

दिलफरोश।
चाहिये । (शायलाक का छुरी तेज़ करते हुए ज़ार के करीब
जाना चाहना)
शीरी--ठहर, ठहर, ऐ यहूदी। इसमें एक कानूनी गिरफ्त है।
शायलाक--वह क्या ?
शीरी--देख, तमस्सुक अपने मश्शर्रह अलफाज से खून
एक कतरा नहीं दिलाता है ! सिर्फ आध सेर गोश्त साफ
बताता है।
( शायलाक का हैरान होना)
हां खामोश क्यों हुआ, अपना काम कर । मगर खबरदार,
एक क़तरा खून का इसके जिस्म से न गिरने पाये।
शायलाक--तो क्या यह कानून में लिखा है ?
शीरी--हां, तुझे कानून दिखा दिया जायगा।
मसऊद-वाहरे मेरे मेरे लायक वकील, इन्साफ इसको
कहते हैं और वकालत इसी का नाम है ।
शायलाक-अब मैं दावे से बाज आता हूं सिर्फ दूना रुपया
लेने पर छोड़ दूंगा।
कासिम-मुझे मन्जूर है, यह ले रुपया मौजूद है ।
शीरी-ठेरिये साहेब ! आपको बड़ी जल्दी पड़ी है । इस
से जुरमाना वसूल करने दीजिये । इसके साथ पूरा इनसाफ
बरतः जायगा । सुन, ऐ यहूदी ! एक कतरा खून का जिस्म से
गिरने न पाये और न गोश्त आध सेर से कमोबेश तरशे।
शायलाक-मैं गोश्त नहीं लेता हूं। सिर्फ दुगना रुपया
लेकर छोड़ता हूं।
कासिम-अच्छा ले, यह रुपया मौजूद है।
शोरी-ठेरिये साहेब, आपको बड़ी जल्दी पड़ी है । यह
अदालत में रुपया लेने से इनकार कर चुका है। इससे जुर्माना
वसूल करने दीजिये । ऐ यहूदी, कानून की कए गिरफ्त तुझपर
.

दिलफरोश।
त
यह है, कि, कोई बुग़दाद का आदमी बुग़दाद के रहने वाले
की जान लेने का हीलतन या सरीहन बंदिश करे, तो बुग़दाद
के कानून के मुताबिक उसकी आधी जायदाद सरकार की है
और आधी जायदाद वह शख्स पाने का मुश्तहक है, जिसके
वास्ते वह बंदिश की गयी हो । तूने भी एक बुग़दाद के बाशिंदे
की जान लेने का कस्द किया था; इस लिये यह कानून तेरे
साथ बरता जायगा। ले, ऐ यहूदी । देख कैसा नाजुक वक्त
तेरे ऊपर आ पड़ा है। जो अभी इनसाफ इनसाफ पुकार
रहा था; अगर यहां का मुनसिफ जज इनसाफ से काम ले, तो
तू कहीं का न रहे । अब तू अपना सर हाकिम के आगे
झुका ; रहम का स्वाइनगार हो और इन्साफ के लफ्ज़
को भूल जा।
मसऊद-यहूदी, यहां आ मैं तुझे एक तदबीर बताऊं।
शायलाक-हां हां बताओ, ऐ मेहरबान ।
मसऊद-देखतू जजसाहेब से कह दे कि तुझे खुदही फांसी
चढ़कर मर जानेका हुक्म देवें। अब तेरा मालो असबाब तो
सब ज़ब्त हो जायेगा, फिर तू उसे कहां से पायेगा? ले खाली
गला घोंटने को तो मैं मौजूद हूं।
जज-क्यों शायलाक, जवाब दे ।
शायलाक-जब आप मेरी कुल जायदाद जब्त करते हैं,
तो मेरी जान पहिले ही ले चुके । अब मुझे हुक्म दीजिये कि मैं
फाँसी लगाकर मर जाऊं।
मसऊद --हां हां, जल्द इसे फाँसी का हुक्म दीजिये ।
जहन्नुम की डोरी से झूला झुलाना चाहिये ।
शीरी-क्यों साहेब, आप लोग किस कदर इस यहदी पर
रहम कर सकते हैं?

दिलफरोश। अपने दामाद कासिम-हम इसके निस्फ जायदाद का मुवाविज़ा सर- कार को अदा करने पर राज़ी है । और दूसरा हिस्सा भी उसे वापस दिया जायगा । मगर यह एक इकरारनामा लिख दे कि अपने मरने के बाद कुल जायदाद अपने दामाद मुहसिन व अपनी लड़की तिलहा को दी जाय । शायलाक- यह तो मैं कभी न लिखेगा। मसऊद-सुन, सुन, तुझे एक बात कहता हूं,अगर तू माने। शायलाक-हां हां, कहिये । मसऊद - देख, वह सत्यानाश और चौपट स्थान इसी रास का नाम है और वह नजूमी मैं ही हूं। शायलाक-ओ कम्बख्त ! वह नजूमी तूही है, क्या तूही ? मसऊद - तो अब तू मेरा क्या कर सकता है । जज--शायलाक ! अगर तुम अपनी जायदाद और अपनी लड़की के नाम न लिखोगे, तो तुम्हारे मालो जान की उसके आगे कुछ हकीकत नहीं । शायलाक - खेर, लीजिये मन्जूर है । मगर यहां मेरा दम घबगता है; अगर थोड़ी देर और ठहरूंगा तो मर जाऊंगा। ( ज़ार से ) आप इकरारनामा लिख कर मेरे पास भेज दें मैं दस्तखत कर दूंगा। जज-अच्छा इसको जाने दो। शायलाक-घाह वाह, अच्छा इनसाफ हुआ । मेराही झगड़ा साफ हुआ। (जाना) जज-वकील साहेब, मैं आपकी नाजुक ख्याली को दाद देता हूं: बेशक आप अहले कमाल हो । शीरी-हुजूर का बलंद एकबाल हो । बन्दा नाचीज़ है, मुझे क्या तमीज़ है। .

दिलफरोश।
जज-ज़ार और कासिम ! वकील साहेब परदेशी हैं, इनको
खुश करो, तुम इनके एहसान से ताउम्र सुबुकदोशनहीं हो सके।
कासिम
-दुरुस्त
जज-कचेहरी बरखाश्त (सबका बारी बारी से जाना)
है
हुजूर !
अंक तीसरा। सीन सातवां ।
महल।
शीरी - तकदीर आपकी मेरी तदबीर हो गई।
फज़ले खुदा से दूर यह तकसीर हो गई।
मसऊद -तदबीर इस तासीन की बेपीर हो गई,
पत्थर पै नक्श आपकी तहरीर हो गई।
कासिम-छः हज़ार जो यहूदा के देने को लाया हूं, वह
आप बतौर मेहन्ताना क़बूल फरमाइये ।
शीरी-जिसने मुझे बजरिया वकालत रवाना किया; उससे
मैंने सब कुछ पा लिया।
कासिम - यह न होगा । अगर रुपया नहीं लेते, तो बतौर
निशानी कोई चीज और तलब कीजिये।
शीरी - और तो मैं इस वक्त क्या मांग सकता हूं । खैर,
आप अपनी अँगूठी दे दें।
कासिम-( अलग होकर ) बड़ा गज़ब हुआ । इसे देते
हुए मेरा दिल माना होता है । (शोरी से ) आप कोई दूसरी
उम्दा चीज़ पसंद कीजिये।
शोरी-नहीं, मुझे और किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं । मैं
यह भी नहीं मांगता । मगर आपने खुद इसरार किया इस लिये
मैं ख्वाश्तगार हुआ।

दिलफरोश।
.
कासिम-आप यह यकीन जानिये कि अँगूठी मेरी नेक
असमत बीबी की निशानी है । वरना इसके देने में मुझे क्या
गिरानी है।
शीरी-जी हां, ऐसे फिकरे अकसर बहानाबाज़ लोगों के
पास हर वक्त गढ़े हुए मौजूद रहते हैं। अगर आपकी बीबी आक़ला
होंगी, तो जो एहसान आपके दोस्त के साथ किया है ; हमेशा
के लिये खुश रहेंगी। खैर, आपको उन है, तो मैं जाता हूं।
-ठरिये, ठेरिये, साहेब ! भाई कासिम, बीबी के
ख्याल से इनकी बात ज्यादा मानो । इन्हों ने बड़ा एहसान
हमारे साथ किया है। अपनी बीबी को समझा लेना क्या कोई
बड़ी बात है ?
कासिम-आपकी खातिर से क्या दूर
है । जनाब वकील
साहब, मेरे उज्र को माफ़ कीजिये; अँगूठी ले लीजिये।(अंगूठी ले लेना)
सलीमा-जनाबमन, मुझे भी कुछ इनायत कीजिये।
ज़ार--आप भी कोई चीज पसंद कर लें।
सलीमा-तो आँ जनाव की ( मसऊदकी ) अंगूठी दे देवे।।
मसऊद--वाह वाह जी, यह तो मेरी जान के साथ है।
कासिम-जल्द दे दे, बड़ा वाहियात है।
मसऊद-टुक्म आका से बन्दा मज़बूर है । वरना मुझे कब
मंजूर । ( अगूठी देकर ) अच्छी तहरीर की जो मेरी भी
अगूठी लेने की तदबीर की।
शीरीं- अब मैं इजाज़त चाहता हूं।
ज़ार-मैं बखुशी रुखसत देता हूं।
शीरी-खुदा हाफिज (सलीमा व शीरी का जाना)
मसऊद - हुज़र, बेअदबी माफ । अब तो बहुत दिन हुआ
मालूम नहीं कि सलीमा का क्या हाल है । हम यहां आये कहीं
है

दिलफरोश।
और रंग न बदल जाये।
कासिम-वाह रंग की ख़ब सुनायी; पागल हुआ है सौदाई ।
मसऊद -क्यों भाई ! क्या बुरी सुनायी ? मुझसे काले की
जगह कोई गोग आ जाय, तो क्या हो जाय ?
कासिम--बस बेहूदा मत बक ।
मसऊद-बेशक।
कासिम-भाई ज़ार ! आपने बहुत तकलीफ उठाई । अब
चलिये, चंद रोज मिश्र में आगम कीजिये । जब तक आपके
तिजारती जहाज़ की खबर न आये, वहीं कयाम कीजिये।
जार-मुझे आप की हमराही कबूल है ।
मसऊद-तब तो मेरा भी मतलब हुसूल है ।
कासिम मसऊद, बंदरगाह पर जाओ, रवानगी के लिये
जहाज़ ठहराओ। जब तक हम शायलाक से इकरारनामे पर
दस्तखत करा कर आते हैं।
मसऊद - बहुत खूब । तो मैं राह देखता हूं। (सबका जाना)
-
अंक तीसरा। सीन आठवां।
लास्ट महल-बारादरी।
मुहसिन-नहीं फसले खिजां जिसमें,गुलिस्तां इसको कहते हैं।
परी गुलगश्त करती है परिस्तां इसको कहते हैं ।
वाह वाह, क्या बागो बहार है;
कैसी
खुशगवार
है। जिससे मालम होता है कि भाई कासिम जल्द आने वाले हैं।
तिलहा--लेकिन मकान की गैनक मकान से होती है ।
अगर प्यारी शीगं भी यहां होती तो क्याही लुत्फ होता।
हवा
भी आज

१०० दिलफरोश। मुहसिन--वाकई, शीरी के न होने से बिलकुल बेरौनकी है । तुमने इस वक्त उनकी याद दिलाकर मेरे दिल को अफ- सुरदा कर दिया। तिलहा--इस वक्त उनका ख़याल आ जाने से मेरा भी दिल घबरा रहा है। मच्छा, म एक गाना गाती हूं; आपका दिल बहलाती हूं:- गाना। - मैंतो सइयां की प्यारी दुलारी, उपर मेरी बारी । नजर मतवारी, हो नजर कर बारी । मैं तुझ पर जान शान बरतर बार बार कर बात प्यार की । मैं तो सइयां ॥०- नैन वही सोहावने हैं जिस में होवे लाज । विषभरे जो नैन प्यारे पावें कौने काज ॥ मुनो दिल जान, तेरे कुरवान, नजर का बान, इधर मत तान, लगे कारी जी में बान ॥ मैं तो०- मुहसिन--प्यारी ! अगर मेरी नज़र खता न की, तो देखो वह शीरी की सवारी आती है। तिलहा-बेशक, यही मालूम होता है। लीजिये, वह खुद आ गयीं। आना शीरी व सलीमा का) शीरी-ऐ मेरे अजीज मेहमानों! खुश तो हो ? मुहसिन और तिलहा--आपकी दुआ से । शीरीं-मैं तुम्हें खुश खबरी सुनती मुस्तेज़ाब हुई । शौहर और उनके दोस्त अब आते होंगे। मुहसिन-निहायत खुशी का मुकाम है ; दुवाए खैर इसीका नाम है। (आना मसऊद का) मसऊद-आदाब बजा लाता हूं। शीरी--क्यों मरऊद, माये खैर से? - कि मेरी दुआ दिलफरोश। १०१ मसऊद--आ तो गये खैर से या सैर से। शीरीं-वह कहाँ हैं ? मसऊद--वह आहिस्ता आहिस्ता आते हैं । मगर मुझको अपनी बीबी का इस्तेयाक जल्दी खींच लाया। शोरी-बयान कर मुकद्दमा क्योंकर हुआ? मसऊद--अजी न पूँछिये । अगर मैं न होता तो वह बिचारे जान से मारे जाते । मैंने ही तो उनकी जान बचायी । शीरी--तने क्योंकर जान बचायी ? मसऊद--मैंने ऐसी ऐसी बहस और ऐसे ऐसे फिकरे जज साहेब के सामने पेश किये कि जज साहेब भी अश अश करने लगे। बल्कि फरमाने लगे:- Well-Mr. masud, you are just like Babujogendronath Govtt. Pleader. ( कासिम का आना) शीरी--मरहबा, मरहबा । आओ प्यारे कासिम । कासिम-प्यारी ! यही मेरे दोस्त ज़ार हैं, खदा ने फजल - किया। शीरीं-मैं आपकी तशरीफ आवरो का शुक्रिया अदा करती हूं। ज़ार-मैं भी बड़े अदब से खुशी जाहिर करता हूं कि आपके अस्ताने बलंद काशाने में सरफ़राज़ हूं। मुहसिन-भाई कासिम व भाई ज़ार, मैं आपको देख कर बड़ा खुश हुआ। कासिम-दोस्त मुहसिन, मैं तुम से बहुत शाद हूं कि बाद मेरे तुम यहाँ के मुहाफिज रहे। ( मसऊद और सलीमा का इशारे में झगड़ना) सलीमा-- अरे बोल कोल, क्यों नहीं बचाता।

दिलफरोश। मसऊद-बता तो दिया। फिर सर क्यों खाती है ? शीरी--तुम लोगों को रोज लड़ना ही रहता है। आये दिन लड़ाई शुरू होती है, क्या मामिला है? मसऊद--सलीमा ने मुझे एक मामूली सी अँगुठी बुग- दाद जाते वक्त दी थी, वह मांग रही है। सलीमा-बीबी, मैंने अपने शादी की अंगूठी मसऊद को दी थी और इसने कसम खाकर कहा था कि मरते दम तक इसे जुदा न करूंगा । अब कहता है कि किसी वकील के मोहरिर ने ले ली है। मैं खूब जानती हूं कि इस ने किसी औरत को दे दी है। मसऊद -- हरगिज नहीं। मैंने वह अँगूठी एक मोहरिर को दी, जो उसके हमराह हम उम्र जवान लड़का था शीरी-वाकई तूने सख्त गलती की। अपनी प्यारी बीबी की निशानी खो दी। देखो, मैंने एक अगूठी अपने शौहर को बतौर निशानी दी है। वह उसको जान से ज्यादा अज़ीज रखते होंगे। मसऊद --वाह, बिसमिल्लाह तो उन्हीं से हुई है । वह जब अपनी अंगूठी वकील को मेहनताने में दे चुके, तो मेरी अंगठी मोहर्रिर को शुकराने में दिलवा दी । शीरी --तू ग़लत कहता है । मसऊद-झूठ से मुझे क्या मिलता है। शोरीं-- हमें क्योंकर यकीन हो ? मसऊद उन्हीं से पूछ लो । शोरी--प्यारे शौहर ! जो अंगठी मैंने तुम्हें दी थी वह कहां है ? कासिम --( ब्लग ) हाय ! अब मैं क्या जवाब दूं । - दिलफरोश। १ ३ लाजिम था कि, अपना दाहिना हाथ काट डालता तो जवाब देता कि,जब तक मेरा बल चला, उसकी हिफाजत की। जब हाथ ही कट गया तो मजबूर रहा । प्यारी बीवी ! मैंने अंगठी उस वकील को मेहनताने में दी है, जिसे तुमने भाई जार के मुकदमे की पैरवी के लिये मिश्र से भेजा था। जिसकी वजह से वह रिहा हो गये। शीरी-मैंने किसी को न भेजा था । बातें बनाना छोड़ दो। कलम खाकर कहती हूं कि तुमने अँगूठी एक नौजवान औरत को दे दी है, जिसे तुम प्यार करते हो। कासिम--हाँ हाँ कसम न खाना।यह क्या गजब करती हो। A सच कहता हूँ कि अँगूठी किसी औरत को नहीं दी। मैं गाना। शीरी-अजी लामो मुन्दरिया मोरे सइयाँ सँवरिया मैं न मानूं रे । प्यारे कहाँ गँवाई, बतायो बताओ, मोरे सइयाँ, मुंदरिया बताओ॥ मसऊद-लाख कहीं मैंने एक न मानी, मुंदरिया सुद- रियाँ डगर गँवायी। अजी लामो०. मैं न कहता था, मैं न कहता था, क्यों भला ? शीरी--मैं तो जानती थी। मलऊद--रंडी एक मुफ्ती थी । सलीमा--वाहजी वाह । मसऊद--वाहजी वाह मियां। सलीमा--वाह जी वाह मियां, वाहजी वाह मियां, वाह । शीरी--सुनिये, वह अंगूठी जिल औरत को तुमने दी है उसने किसी मर्द के हवाले की है। जो कई रोज से मेरा मेहमान है । उस अँगूठी में तासीर पिनहा है, जिसके पास वह आती है मेकनातीसी १०४ दिलफरोश। असर दिखाती है । बन्दी उसी की हो जाती है । अब मैं जाती हूँ; उस मर्द को तुम्हारे पास भेजती हूँ। ताकि तुम भी देख लो कि कहीं वह वकील तो नहीं है ? मसऊद - अगर शीरी उस वकील की हो गयी, तो कहीं ऐसा न हो कि सलीमा और मुहरिर से भी कुछ गड़बड़ न हो। पर मैं तो कहीं का न रहूंगा । क्यों ऐ प्यारी बोबी, नेक असमत; यानी बहुत बहुत पाक इफ्फत ! तेरी नेक असमती का तो मुझे कयामत तक भरोसा है। मगर यह तो बताओ कि उसके साथ कोई मोहरिर तो नहीं है। सलीमा-यह तो मैं नहीं जानती। मसऊद-फिर तू क्या जानती है ? सलीमा-इतना कि एक तरहदार हसीन मर्द उस वकील के साथ है, जो कई दिन से शीरी का मेहमान है। मसऊद-तो बस ठंडा हो जाना चाहिये। क्यों जनाब ! अब रंज व गम करने से क्या फायदा । कोई दूसरी शादी कर- लीजिये । हर गली कूँचे में तो शादी की दुकानें खुली हैं । यहाँ नहीं, वहाँ सही। ज़ार-तू तो बड़ा वाहियात है । यह कौन मौका दिल्लगी का है? कासिम-अफसोस ! यह क्या वारदात है, कुछ समझ नहीं पड़ता। जार-भाई कासिम, घबराओ नहीं। खुदा आसान करेगा। ( शीरी का बलिबास वकील आना) कासिम-आह ! अब तो जीना बेकार है । ऐ वकील! तू बड़ा मक्कार है। तूने मुझे दगा से धोका दिया ; अब इस जिन्दगी से मरना बेहतर है। ( कासिम कारखंजर उठाना, जार का रोकना, शीरी का ।

दिलफरोश।
बलिबास असली होना । कासिम का शोरी को गले लगाना
गाना।
शुक्र तेरा है ऐ बारी, तेरी है कुदरत सारी।
तू है खल्लाक आलम, तू है रज्जाक आलम ।
कौन है तेरा सानी, है ज़ात तेरी लासानी ।
हो मुनकिर तेरी कुदरत का तो बेशक है नारी। शुक्र०-
दे नेकी से दिलको रग़बत । बदी से हो हम को नफरत ॥
हो हमपर फजले रब्बानी । बस तर्क हो कार शैतानी ।
हो जालिम की पामाली । बदकार से दुनिया खाली ।
ऐ दावर सिक्का नेकी का ता हश्र रहे जारी ।।
था बेशक खुश नीयत कासिम ।
कौलपर ज़ार अपने कायम ।
दोनों को मिला इसका समरा ।
ईमांदारी का था समरा।
महमूद बना था जालिम ।
आखिर को हुआ वह नादिम ।
वे दर्द यहूदी जालिम की किसतरह हुई ज़िल्लत खारी ॥शु०-
लो ख़तम हुआ किस्सा अहसन ।
नेकी का मिला हिस्सा अहसन ।
की अहले सखुन ने जो इमदाद ।
मेहनत की मुरासर पाई दाद ।
ऐ आजिज़ो कम्तर अइसन ।
मुहफिल में झुका सर अहस्नु ।

१०६
दिलफरोश।
है खालिक बारी, जिसके करम से रौनक है सारी॥ शु०-
(दापसीन का आहिस्ता आहिस्ता गिरना ; सबका सिर झुकाना)
;
तमाम शुद।
सिर्फ कवर और आखिरी ३२ पेज बी. एल. पावगी द्वारा
तचिन्तक प्रेस, रामघाट, बनारस सिटी में मुद्रितः।

गायन को एक नयी पुस्तक
गायन को एक नयी चीज़
संगीत थियेटर।
।
यों तो हिन्दी भाषा में गायन को अनगिनती पुस्तके
और सभी एक दूसरे से बढ़कर हैं। परन्तु 'संगीत थियेटर
हिन्दी भाषा में बिलकुल ताजी और नयी चीज है । प्रसिद्ध
हारमोनियम मास्टर बाबू बच्चेलाल ने इस अपूर्व संग्रह को
तैयार किया है । इसमें जितने गायन लिखे गये हैं; सभी ताल
और धुन के साथ हैं। जिस प्रकार इसका नाम संगीत थियेटर'
है, उसी प्रकार इसमें थियेटरों के प्रसिद्ध प्रसिद्ध खेलों के
चुने चुने और नये नये
गायन भी लिखे गये हैं । असीरे हिस,
सफेद खून, महाभारत, खूबसूरतबला, भूलभुलइयाँ, सैदहवस,
शहीदेनाज़, जहरीसांप, सिलवरकिना, अलीबाबा, कालीनागिन,
मुरीदेशक, बागबेदाद, गुलरूज़रीना, चित्राबकावली, हरिश्चन्द्र,
खूनेनाहक के आप्तिरिक्त और और जितने प्रसिद्ध खेल हैं, उनके
चुहचुहाते और प्रेम रस में डूबे हुए कोई गायन ऐसे नहीं हैं,
जो इस पुस्तक में न हो । संग्रहकर्ता ने इसमें यहाँ तक
परिश्रम किया है कि, कलकत्ते की मशहूर सायफ और
यका गौहरजान के भी चुने हुए गाने इसमें भर दिये हैं ।
गदा क्या लिखें, यदि आप पुस्तक को केवल देखही लें, तो
। उसे नहीं छोड़ सकते । कारण कि, उसके ऊपर गौहरजाने
। सुन्दर चित्र सोने में सुगन्ध का काम कर रहा है। दाम ।)
मिलने का पता:-
जयरामदास गुप्त,
उपन्यास बहार आफिसः
का भी । ( बनारस

* .07.00PCS apapwom अस्ली थियेट्रिकल नाटक। मय गाने और ड्राम के. । ॥ ... . दुश्मने ईमान शरीफ बदमाश काली नागिन ज़हरी सांप महाभारत शहीदेनाज ख्वाबेहस्ती खूबसूरतवला-( दूसरी बार छपा है ) ... Crorecasana.omcoopam.0000000000000000CRETOSorror सुफेद खून .. - .. ... Parma भूलभुलइयां - (दूसरी बार छपा है) सैदहवस दिलफुरोश-(दूसरी बार छपा है) खूने नाहक कलियगागमन संगीत थियेटर -- ( थियेटर के चुने हुए गानों का अ' रग्रह मय फोटो गौहर) मिलने का वही प्रसिद्ध पता- जयरामदास गुप्त, उपन्यास प्रहार आफिस; काशी । (बनारस) Transpomamaeraae. PODORE

Dil Farosh Natak

Author
Shakespeare, William
Title
Merchant Of Venice
File name
Dil Farosh Natak
Text
OCR done
Citation
1916
Published
2005/01/10
Publisher
Jayaram Das Gupta, Kashi
Language
Sanskrit
Pages
117
Library
Natya Sodh Sansthan, Kolkata
Classification
Literature
Keywords
A Popular Parsi Theatre Play
DLI number
292683
Barcode
4990010202572.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
In Public Domain
VMLT id
mMNx2e9lDC0
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