Charan Sahitya Shodh Sansthan, Ajmer
Kudliyaramayan
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कुइलिशा रामायण ॥
हा नगत सकल दुख गजमुख सवसुखदानि । भतिग-
लिगति रघुपतिवरण विघ्नहरनको वानि ॥ विघ्नहरनको बानि
जानि सजन लव गावा। सक्ति मुक्ति वर देव शेक घासुर
ध्यावत ॥ शङ्कर ध्यावन शेष सुर रिपुगण खलजन गहन ।
काह तुललिदास शङ्करसुवन सनत भक्त भवसयदहन ॥१॥
दीनदयाल दया करो दीन जानि शिव मोहिं। सौहार
सनेह उर सहज अन्त गुण होहिं ॥ सहज सन्त गुण होहि
यगद लाभ दुःखसुख । कर्मविवश जहँ गाउँ तहाँ लियराम
पारखा रामकाज नित रहौं जगतजनित संशय हो। कहा
तुलसिदाल शहर उमा दीनदयात दया करो ॥२॥
रामचरित शतकोटि शेष शारद शिव भाखे। नारद शुक तन-
कादि वेद कहि वौचाहि राग्वे ॥ वौचहि राखे चरित पार काहि
पावत नाहिन। कहि कहि हारे सकल रामयश पहल सिस-
हिन ॥ नहिं लिहिं रघुबीरगुण सो तुलसी मन उस्त ।
सजन साव वैन कहा कहे चरित सबनिधि तरस ॥३॥
एनयज्ञ सप कौन जोरि सुनिगण द्विजअलवर। वह
वशिष्ठ भै सिद्ध दौन हवि ले प्रसाद कर ॥ लै प्रसाद कर दोन
देहु मामिनि लए जाई। सुनि दशरथमन हर्ष सकत प्रियनारि
बुलाई ॥ नारि बुलाई कौशला कैयौ युग साग कर। मन
पनन्द रानी पतिदीन्ह सुमित्रहि हाथ धर ॥ ४ ॥
२ कुण्डपिया पाया। मङ्गलमयो विचिन द्यत्ति प्रकट भई गृह आनि। ब्रह्म- सचिदानन्द उर प्रकट भये सुखखानि ॥ प्रकट भये सुखसानि हातिदारिद दुख नायो देवन लजो अनन्द मही मन मोद प्रकायो॥ मनो मोद दिन सकल लन्त सज्जन यथ गावत । ब्रह्मादिक गनदेव पवरपर चलि पावत ॥ गावत वर्मत सुमन धन तुलसो कहि जय जय जई। नाक नगर अहिपुर भुवन प्रकट भई मतगई॥५॥ मास भयो शुभवार घोगबर नखरा विराजत। तिथि नभ जल महि विनविता विदिशा सब भाजत ॥ आजत तस्य अवध देवगणा जय उच्चारत । वर्षत सुगन प्रशस हंस निजवंस निहा स्त हारत्त सरागमनानविन प्रष्ट भये सुख दुख गयो। सुमो रघुपर प्रकट गे माल एकको दिन भयो ॥ ६ ॥ गुनि सुपनि जान्न मगन नहि देह सँभारत । उठे भवन कई दारि बोलि तम गुरुहि प्रचारत । मुसहि प्रचारत चले विप्र संग त युनिवाया। न भविन वर्तमान ज्ञान सब जानन गायः नग मुगि सयुक्ति के जातकर्म सब विधि कियो । लोगो TET य गय सुपति दियो ॥ ७ ॥ चापक जोजे का रूप पूछि दियावत । वृन्द वर नारि किन र सोहेज नावत । गाक्त लोहित नर भूप हँतिहार उसाब । पटव गणिमात तात सुख नेहि पहिराव . " "गजराज सर्वसाड़िश्त। पुनि तु महारो तासमा कवियत ॥८॥ प्रीमान नर नाति वर्ग चारित प्रसन्न सवि। प्रति गृह पावन गीतकमरो कति॥ भरो चोग सुक माइग। हातुन सुगच सबोर रहेउ भरि विदिति न" दिनानिनि जारि ल्खो भामिनि मायका - ३ हालिग रामायण नहु प्रकट हो। रहिनाक सून्तित सुरु भयो जिमि सुख तोरटुमातिए पसाको होला सुन्दर सुख जाये। कर्म किया लोकरे तो-शाः पहिले पहिये मन मोद चारिसुत रहिरहरजा। पलवलासपक्षासौ सन साजा। ताजा सरन्दाजावाजन हो। सव कोउ कहत तराहिले लासला जो॥ ॥ समायोनि लन्त तलाकेकाजे। प्रसु धारयो तन हम तुम तुनि विकार सुता ॥ ताजे सतगण मलिनन- दिनविन उज्य पात। यतूक पि गये तेज पहिपर सुरपुर। सुरएरधुनि बटुलावतो चति राम रघुवंश जय । जय दारातल पवननारिहत लय ॥ ११ ॥ गृह यह वजत वाद नारि नर शवध अनन्दित। चौक कलश प्रतिद्वार लसत सुरतियगण बन्दित ॥ बन्दत सुर- गण सुनुल बन्दिगण विप्रवेनि। सरि सरि सुक्ताथार देखि सुत साग अधिक नि ! अनि गान लोहत भवन रामजन्स मङ्गल सजत। नरनारिवारि तन धन सबै सुरपुर जयदुन्दुभि - - वजत॥ १२॥ नाम धयो मुनि हेरि राम पनि भरत लषयवर । शन- शमन शुसनास दोन सुनि लिखि सृपति कर ॥ सूपति गनि- नदौन नगन तनु लहै उ समान सुख । गान निशान समान धरणि शाकाश एक राज । चक्टक निवत सुमनगण मन मतीन खरागण थे। चारि चारु सुन्दर सुवन सुरूत सुप तरुपल नये !:३८ सुन्दर तुतकर गोद मोद सरि मातु दुलारत। निरखि दमन विभिन्नु सकल तमगन धन बारत ॥ बार तनयन दंश भूपती गडगिया मामायग। । . दृष्ट नजरिकी । . - ::- ना गिन सनकादिक ब्रह्म चाहिचण मनसुख 17: माननित गाना प्रबध मङ्गलमय मृरति लखत। "षित तनपिनास नयननि चखत ॥ १४ ॥ - गनगो दृ पियन नहि पाजु। रोवत --77 नई दुल नगरिको साजु ॥ नई ठाने। नमो गोच उर भयो नौर नयन. जाडे काणा को गलहि हाप दिवावन धायक । ; : गिगाय पर राम सीवायत्त गायक २५ ॥ पा शाहि अम्मा रागाय। रामचन्द्र 7 बिचकोर गलपाय । वित्तचकोर राल वाय मी कोठे। घर पर नागन करत वोति कौशलला । बागल्या गुह बोलिक शुभ आसन गादर करतो' . पारलाय माय हाय शन पापी २६ ॥ नारं गुण कादी जो कछु यामें आय। सब जति जानत जाति कहत सब कोय ॥ सन कोर्ड परचो कहत बड़े बोगी। जो मंगिही देनौगोद तोोकरी सुधाको ...: को सुधाको भोग जन्म गरि राग पण पाछे। { व वन हसत मन शङ्कर मातु बचन मुनि ना ॥१७॥ बाक तोर यह बड़ा भागको सृल। याकै दर्शन जात :: गताको शूल । सब अन्तरको माहरो याने सुरस हो। नवौते मुनी एक मुनि संग करि देही॥ देहो सुनि च माह पनि पानी आई । गरय सुवन विवाहि सहित माई । १८॥ न कमन करी मकत खलगगा संहारन। महि द्विज :-मन सोच सुर दरहि निवारन ॥ करदि निवारन दोष किर गानाकागे। नोरहि शिवको धनुप सुयश तिहुं पुर : . ॥
दुरडरिया रामायण। बिलारी॥ बिलारी सुख सम्पदा सुतु कौशल्या तोर सुत । बचन सुषा बोलत नहीं मानु प्रतीति सनेहयुत ॥ १६ ॥ बहो केकयौ सुवनको लक्षण लवकर देखि। कौशला- सतमत्त यह मनान वचन विधेखि ॥ मन शाम बचन विशेषि रामपद प्रौनि सुहावन। सोवत जागत ध्यान नाम रसना रलपावना पवन तिरहुति व्यहि हैं याते सुखसम्पति लहौ। सुयशसिन्यु साँचौ सुन्न समुक्तिरेख नगगम कहौ । २० ॥ बुन्हु तषणही नाह सुलक्षण सुवन तुम्हारे। निज भाइ नलोति प्रबल रणके जिलकार। जितवार वत वाहु गुणनि पूरे सबसाई। राम सङ्ग शुलपुरी तहाँ लव होहिं सगाई। होहिं लगाई जनकाएर जनकत्यका सानिक। सत्य जालु रानो वचन लंठ न हौं बसानिक ! २१ ॥ सुनतो मन रानी लगन सुक्ता बार सराय। लेन करो हलि कौशला रामहि दीन कुवाय ॥ रामहि दौन लुवाय हाय धरि देउ अशोशा। बालक रहु कल्याण डोठि सुठि डारहु सैशा॥ खौल करहु प्रभु रोग साल सन्तन पढ़िवानी। बोलो हार सुबन हाथ जोरे सब रानी ॥ २२ ॥ वोत्यो योगी योगनिधि तुनह कौशलामाय। डोठि सूठि जनखानि अब देहीं सकल वहाय ॥ देहौं सकल वहाय बाल कबहूँ नहिं रोई। पलका गोद हिंडोर सुसुख सब थल शिश सोई ॥ सत्र थल शिशु सुख रही होय नाह कबहूँ रोगी । भृङ्गो शब्द सुनाय चल्यो मन हलिरि योगौ ॥ २३ ॥ सृपति रानौ मन मगन शिशु सब अतुल निहारि । गोद मोद सन गावतौ राम दुलारि दुलारि॥ राम दुलारि दुलारिवारि तन मन सत्र डारें। होरकर्मको सुदिन वैठि कुलगुरुहि हकारें। -- . ६ कुण्डचिया रामावगा। गुरुदि हँकारि विवेक सुफल करि मालवानी। गावहिं गौत विचिन जोन मनि रानी ॥२७॥ सन्तीने सानन भाकल गुरु सिय दिन पहिया वालक कोगनपाती बिच्चीत गाभाय ॥ चिरञ्जीव मन भाय देत मागिन गनुवो। सप रानी वा सुक्षक हे या फूले ॥ फू. या नारिलर ते अलि गान गोमे। नान नगर पहि- नगर नारि र मनवांछित तोले २५ ॥ नाग नानो भला गिलावर चामीगाकर लाय। गिरत परत उठि .75 पुनि रोना र रिजाय ॥ रोवत रहत माय तापलो टोपी रें। कुन्तामण विधानियन भरि नौर गितार ॥ नीर निहार हैन गुगत गति सोलर वानी। भनत भवनको पठि धरत त आँगन रानी ॥ २६ ॥ भृप दपि करवायो रुचिसो काणवेध उपवीत। छोटे धनुप धारण कर लोन्हे समुहान लागे नीत ॥ समुसान लागे नीति वेद विद्या गुरु दीन्ही। धर्म कर्म गति अगति नति अतिमग जेहि कीन्हो ॥ तिमग जेहि कीन्ही जगत जाहि मिखाय सब सिख्यो। धर्म प्रकट जग करनको परवन नृप घर वयो॥२॥ नाक नामप्रभावते जन्म मरणदग्व जाय। वेद शेष शारद शिवा शिवको अगम दिसाय ॥ शिवको अगम देखाय भेद ब्रह्म- हु नहि पायो। भक्तनले हित सोय कौशला उरमहँ आयो कोगया को उर बसे दशरथ सुत्त कहि गावते । काम क्रोध मद नाभ दृग्ब नाश नामप्रभावते ॥ २८ ॥ विश्वामित्र महापय विपिन बस मुनि सङ्ग। योगयन होमादि वन कान दनुज खन मग ॥ करत दनुज खल सङ्ग काय नि मन्त्र विचारो। हरि प्रवत्तर गुगवध हरन सहि- ७ बुजलिया रामायण। भारन भायो॥ भारो सुख उपजायकै हरि होई नयननि विष्य । लत्यूलरिज्ञान करिने दत्वार महाश्त्रय ॥ २८ सुनि राजा सहसा उठे मिले धाय परिपाय। लै माये सौतरसकन शुभ आसन कैठाय॥ शुम श्रासन बैठाय नारि युत मुनिवर पूजे। उदय भयो निज साग मोहि सम सुकत न दूजे। दूजे झापन जानिये पदरजको सेवक सदा। कहिय स्पा करिकाज निज काढतुरत मङ्गलप्रदा ॥ ३० ॥ सुनि सूपति द्विज मित्र गाय महिशोच निवारण । मम त्रय खल दनुज करत उमपात अपारन पार न पावहि मुनि विका रयन दिवस सकट परे। धर्मजात तिसेतु सकल वज्ञ खत हरै। हरे विपति दारुण जबै राम लषण जो देह नति। तुन शहं यश इनको सुफल गुनहु न मन सुनि भूमि- पति ॥ ६॥ सुनते राजा लूखि गो कमलबदन अम्हिलान। नाहक भनि दाहो हृदय मांगहि जीवन प्रान मांगहि जीवन प्राण राम लपण मिति देजा जाहि निरखि रहे नयन पत्तक निरस्न नहि तेजा ले अधश पालक सवे सुनि मुनि मनमें गुणि है। जागहु तन धन धेनु महि राम दिये किमि तनु रहै ॥ ३२ ॥ कह वशिष्ठ राजा बुनहु मुक्त सुनिपतिकह दे। इनकी रुपा पालकी कुशत भाव है गेहु ॥ छमताय है गेह दनुज सब करहि संहान। लिव शुद्ध करि होय सुबश जगमै रित्ता- वित्तारन मङ्गल सुवन मान ऑति नहिं मन गुनहु । सौंपहु विज्ञानिलको वह वधि सूपति सुनहु ॥ ३३ ॥ गुरु वशिके वचनको ते तजेंचपात। राग तमणको बोलिक सांप निहि कपाल ॥ सपि मुनिहि रूपात चौश सन - -- कण्डलिया रानायगा। सभा नवायो। कौगिक दियो अयौन मनई जप तपफल पायो॥ पय वहाय वारिजनयन उठे मौन धरि भवनको। उत्तरकन सुख कटमो गुरु वशिष्ठ के वचनको ॥ ३४ ॥ वेदमन्त दे सकल पङ्ग गत्न नके मारण। नौद भूख अरू प्याम नास सन प्रशभनिवार ॥ अशुभनिवारण पन्थ सुपथ Tङ्गलमय सुन्दर। बड़ो भाग निज समुझि करत जायत्तु प्रभु सादर ॥ सादर पूछत वेदगति चुग तरु भूधर सुमितल। पाठ करावत गुण कहत वेदमन्त्र दैदै लकल ॥ ३५ ॥ मारो बोचहि ताड़का एक बाण श्रीराम। मुनि चितवत चत खड़े गई, हर्षि सुरधाम । गई हर्पि सुरधाम रामको वनि मन चोन्। आश्रम निज प्रभु पूछि यज्ञ आरस्थित जोडे । कोन्हे यज्ञ अन्य प्रभु धनु धरि बाण सुबारिक। बन सुबाहु मारीच संग धायो धूम निहारिके ॥ ३६ ॥ बत मारे लव लवण बनवगर जारि सुवाहै। प्रभु मारोच- हि उपि पारकरि बाय चलाहै ॥ वाण चलाहै प्रफल सुफल करि हामविधान। वर्षत सुर शुभ वासुम प्रयोशत रूपानि- धान ॥ कपानिधानहि जानिक यज्ञभाग दै अमियफल । धनुपयनयन जनकके चले राम क्यपि त्यागि थल ॥ ३० ॥ गौतम श्रपिको भामिनी तनपपाण जेहि ठौर । गये लषण रखुवंशमणि मुनि कोथिक शिरमौर ॥ सुनि कौशिक गिर- मोर पूछि बुनो सब कारण। दारुण दाह विचारि पाव धरि क्षोन्ह निवारण: कौन निवारण पायको जय कहि उठि छनि ढामिनी। तुलसी विनती मृदु करत गौतम ऋषिको मामिनी ॥३॥ जय जय जगदातार प्रभु हरण घोर महिभार। दौनवन्धु मानव दहन सब गुगा रूप उदार ॥ सब गुण रूप उदार भजत ॥ पलिया रामायण । शिशुम सनकादी। पात पाहन चरित मध्य अन्तहु नहि माहो॥ आदि जल जड़ जमनानि मई शाप प.परमई मह पति पतन रान तुक्त मन्दिा गई३८ ज्ञापपापको किठिन रचि कर्जन रास्यो। सन चुधिचिद हमारी अमवस्तुनि काल्यो॥ बत्तु सकल मतराशि काम मददन तुमटपन। सुक्षत सत्वरण जौति दर्सको जमल सवै तन तन मग सुरगुण गाय प्रभु जिवत्त रुज शनत गहि । रियहि सहित मन कर्म टए शाप पापको दुर्ग दहि। 8. मलिनत फलदातार देवतकर सलकारना पतिसल लाग कपाकार कौन निवारन कौन निवारन पाप भई सुनि घरको भामिनि। पर वादीनिध नोहि चरणरतिदिन शन गगिनः दिन अरु यामिनि रत रहौं चरण हरए महि- भार हो। तुलसिवाल वर पाय कहि जय रघुपति दाता रहौ।। ४१ ॥ लखि गति सर सुमिहर्षि वर्षि शुभलन सराहत । नश- रएशरस समर्थ घोर स्वालिन्द निवाहत लिनु निताहत अग- ससुगम दरवायक लायन। अनाशिक रस कपट काति- लुमनशाय गुमनशायरान प्रसुलततिहास भजि नजि दरप। मन वच उर करनि मजहु लखि गति दुर सुनिमन हरण ४२ चले हर्षि सुनि सङ्ग रानलपण मगमाहौं। वन्न उपबन्न मुग विहग विटप लखि पूंछत नाहौं । पूंछत सुनि सव कह- त न्हाय सुरसरि रघुराई। हत का इतिहास जनकपुर पहुंचे जाई॥ पहुंचे प्रसुपुर निकट ताज बाग तागनि जति सले । खग सुग मधुप समाजयुत जनकनगर देखन चले । ४३ ॥ वापी सुसग सरोजयुत सरवर विविध माल। मानौ २ - २० कर द्वारा खिया रामायगा। गणित मान्सर शोभा देत विशाल ॥ शोभा देत 'विशाल पर, जलाधा सपूरे। परिवगण पुरट बँधान नारिनर मज्जत भूरे॥ रज्जत र मुनि आय जनु पर्व मानसर पाय जग। लद्दत चारिफनराशि जल नापी बापो सर सुभग 1 88 ॥ सुन्दर चहुँ दिशि बाग बन कुसुमित फलित अपार। जनु सुरधरको नाटिका नसी सहित परिवार । बली सहित परि- वार कोनोकिनुनि राजै। पधिकन लेत बुलाय विविध विधि पवन समाजै॥ पवन समाजे सुरभि सुख जनु वसन्त पातु यह सघन । ह तुलसिदास प्रभुपर निरखि सुन्दर चहुं दिशि बाग वन ॥ ४५ परे पति सजि सैन मत्त गज रथ दय राजत। नृत्य गान सच थान सुभग दुन्दुभि वर बाजत ॥ बाजन बन्दी सूत यूथ यूधनि भट गाजें। वनितादिक भाभ गान करहिं सुरतिय लखि ला॥ लाजै लम्बि अमरावतो सुरपुरको शोभा हरे। विवि- ध वृन्द इन्द्रादि सुर सेन साजि जनपुर परे ॥ ४ ॥ धवल धाम चिवनिखचित कलश मनहुँ रविज्योति ॥ जगमगात खग्नानि पुरट दामिनी होति प्रहर दामिनी होति गोनि मणि मालक करोखनि। भामिनि मृपय सनत मनहूं सुरतियतन धोसनि । धोखनि तन सुर- धाम सर धाप धाम सब घल नचति। जनकनगर विमय चाबाट वाट मणिमय खचति ॥४७॥ गुनि न न नापात पय भागमन आनन्दित । भूसुरवर पर नानि साथ मुनिपद भिर बन्दित ॥ वन्दित पहि मनो-मिलेगशित मुनिनायक । भये विदेह विदेह निरखि दोउ चन सब जायक ॥ सब लायक रघुनाथ कहि नरपति -- ॥ प्रकट कुफपियो रामायण १२ निरखि विशालको। देखि भानुकुलभूषणहि तनमनश्च नर- पातको ॥४८॥ विवशराव सरे प्रेमय निरखत तनशोसा। लोवन के चमोर रामसुखशशिस्त लोसा॥ लोमा सकला समाज परस्पर चाहत राम। धौरज धरि छप कहत वूनि मुनि सन गुणधामा सद गुरु तेज प्रतापसब काके सुरतरूपल नये। कहिय रुपाकरि कपानिधि येनालक काके लये ॥ ४ ॥ के सुनिमणि उपमणि लिधौं योग यज्ञफल माहि। गण- पति पशुपति तोकपति सब संभय मनमाहि॥ मन संभव मनमाहि ज्ञानगति गिराविनाशी। वरवस इनवश होल तनत सुखरत अविनाशौ॥ अविनायौ अवलोकिये युगलरूप निज सँगरधौ। नहिय प्रकट सन्देह मन के सुनिमणि अपमणि विधौ ॥ ५० । नपतप तरतधर्थ जगत जहँलगि शुभकर्मनि। दयाश- मादकनेमक्रिया प्राचार चार गनि । चार वेद सब भेदयोग रिधि लाधत योगी। प्रातम अनुभवरूप ब्रह्महरु पावत भोगी॥ पावत भोगी योगवश सो प्रकटत कबहुँक हिये। सो फल सुनिनायक किधौं जप तपवलने प्रकट किये। ५१ ॥ अलख अगोचर रूप हरि जो वरणत श्रुति शेष। जाने हित विधि देव सुनि ध्यावत गणप महेश । ध्यावत गणप महेश योग यत्नन नहिं पावत। जपनपनत कती बर्य वन हृदय वसारत । हृदय बलत बहुरूप जव सकल सिद्धि लब सुख भरि। प्रकटौ कौन सोइ रूप मुनि अलख अगोचर भूपहरि ॥ ५२ ॥ कौधौ सदन विशेष सँग सुनिनायक वन कौन। अघि तपतेजप्रतापते सेवत पदलवतीन । सेवत पदलवलीन शयुको वैर सँभायो। चाहत आप सहाय मन्त्र मनमाया - - जतिया रामायण - ॥ . व. 4 । नामोशी संगनले युगुलपकवि देफिी गार जनिति मदन निगेमिये । ५३ सामान बेनों त्योहत यन योरब्रह्म सचिव नामित चन्द चोर॥ चितवत चल चकोरक्षप हरि -तिसतो। निरसत बाराक नयन तौन सुन जात न तो जाननमानोज पुन यो प्रेम पजुरागलो। सो मन --पोन जान विरागलो। ५४ गाना पके प्रिय वचन पुतकि कह गुनिराण। जो कछु स गा तुमहि विदित सब काज॥ तुमहि TFT TE का राज हो जाये। मसहित जाने न सिधाये ॥ नगा शिक्षाये प्रापी राम र धरे। मरियक भव असुर सुन भूप मानद २१॥ भाग जानि अनुराग टप चले तिवाय निकेत। प्रादर "अम या पूजे प्रेम सगेग॥ पूजे प्रेम समेत निरखि - गरि सुनाई। रघुवारामण देखि सराहत सुकत - मुरुतपुच्च बना जनक कहि पुर नर पद वागही। ने का गुरुत याग भाग शनुरागही ॥ ५६ ॥ रामनि मकरानगि वनस्यामा गार पक्षमा दन वापिनि वरण तताम ॥ दामिपि :: TT व सोहै। जनकनगर नानारि चहा कि नोहैं ॥ पोहैं मन जो सकल को है पान पवि। तुमतिदास दैननि कहै कपटनयन बीराज- । ५७ दुनियानी वात युगल नूप। स्यामगौर- सका बदन मनः मदन युगरूप ॥ मना मदन युगक्षप विरचि - इलतिया रामारण। विधिरूमा सारी। निज सूरत के एज जनकपुर देखन पाये। रेख गहिरो विधि रवि रायोकाज। लिपवायोग्य योग यह सनुति देखु हि आज ।। ५८ ।। सपर कान जि सता है एक कठिन हठिकर्म। प्रण विदेहको धनुष यह उठे न गिरिसमधर्म्य ॥ उठे न गिरिते गह वात मुद् तिसअमारे। तो असमञ्जस कठिन सेटि को योग सँवारे साबर जर प्रतापदल सुनिगण कहत सुसत्य हैं। शप्रताप विदेहको एण्य सन्नि धतु सत्य हैं । पूE शयन पाय सुनौघको भोर लमण रघुराय। सुमनहेत उपवन गर्य ध्यासनौर दोउ माय ॥ सामगौर दोउभाय जानकी जाय निहारे। गिरिजापूजन हैत मध्य उपवन पग धार । परा धार नयननि लखे राजमार निहारिक। सो सुख तुलसी कहै किमि कहि न जाय सुख चारिक ॥ ६ ॥ रामलियाको मिलनसुख वेद न पावहि पार । प्रौति प्रेमपर- मिति समिति प्रोतमगति रतिसार ॥ गतिरतिसार विचार कहत कि रहत विचारी। तो कहीं विवेक कवन मति गति संसारी ॥ यतिगति शङ्कर शारदा कहि न सकत सुखसरसको। तुतलिदास दैहि विधि कहै रामसिया सुखदरशको । ६१ ॥ पूनि विविध विधि पाय परि विनती सौय सुनाय। आदि पन्त बयलोकल, स्ववविहारिणि माय । स्वदशविहारिणि माय मनोरए नानति होके । प्रकट प्रभाव प्रताप अगम बरदान एचीको॥ शचौ शारदा हरितिया सेय सेय सब सुखमरि। जय जय जय गिरिपतिभुता विविध विनय लियपाय परि । ३२ वचन प्रसाद लुपाय स्यि हर्षि चदौ निजधाम । सो छवि हृदय निपकहि सुरूएह गरने राम । गुरुपह गवने राम जानको भवन सिधाई। सुमन दिये सुनि हाथ रोम कहि कया १४ कुण्ड खिया रामायण। * 4 सुनाई। कथा सुहाई सुनत मुनि सतानन्द आवत भये । जनकविनय कहि मोद तहि रामलपण माथिप दवे ॥६३ ॥ भाजु भूप बनि बनि चले रङ्गभूमि घिरमौर। पावक पानी पवन महि सुर नर मुनि इकठोर । सुरनर मुनि बाठौर आपको जनक बुलायो। कौतुक देखन चलिय सतानँद वचन सुनायो। वचन कहे मुनि रामसो चलहु तात अवसर सते। काको यश दशदिशि विदित आजु भूप बनि बनि चले॥ ६४ ॥ राम लपण कौशिक सहित सत्तानन्द अगवान। चले रङ्ग- भूमिहि सकल मङ्गलमोदनिधान । मङ्गलमोदनिधान नारिनर गृह तजि धाये। नगर बगरमें बात सूपसुत देखन आये। देखि जनक परि पगनि पूरि प्रेम आनंद ताहित। प्रासन आदर देयकरि रामलषण कोगिक सहित ॥ ६५ ॥ रामरूप नृप देखिकै द्युति मुखको भा नोन। रवि- प्रताप निरनत मनो उडुगनज्योति मलीन । उडगनब्योति मलीन दोन बलहीन बिराजत। जहखलदल दलमर उ साधु सुर सजन गाजत ॥ गानत दुन्दुभि सुमन सुर मगन नारिनर पग्विके। घकिस चकित पल नहिं तगत रामरूप रूप देखिके । ६६ ॥ जो जाके उर भावना देग्यो रामशरीर। कोउ शिशु कोउ प्रभु मिनारि स्वामि सखा बलवीर ॥ स्वामि सखा वतवीर धौर धरि प्रभुहि निहारें। वर्षत मुर शुभकुसुम देव मुनि जयति उचारें। जयति उचारि समाज तनि जनक बुलाई जानकी। सतानन्द वानी तुरत खानि सकल कल्यानको । ६७ मिरिणापरके नारिनर सिय रघुवीर निहारि। बिनती का विचिसन अञ्चल अनलि धारि । अञ्चल प्रचलि थापि देह वरदान विधाता। राम जानकी योग्य जोरि मिल- A दुलिया रामायण। पडू यह नाता नात जपप्रण टरै सुपति जाय लजाय घर । यह संयोग विचारिकहि मिथिलापुरकै नारिनर ॥ ८ ॥ माल जलज युग हाथ अतुत विलिय पग धारी। जगत- जननि सुखलानि निरखि मोहे नरनारी। नारि मध्य बर जानको रघुवर पद सनुराग हिय । देखत सुर नर मुनि मगन दौन्हे नयननिमेख सिय ॥ त्यागि सकुच रामहि लखे नयन में दिवि हृदय भरि। रङ्गभूमि सिय पग धरे जलन माल युग हाय धरि ॥ ६॥ जनक वोलि बन्दी सकल को कहौ प्रण जाय। देव दनुन महिपति मनुज सबको दे सुनाय ॥ सवको देहु सुनाय भाट दश सहस लिधाये। चहुँ दिशि हाथ पसारि सुनहु सृपति चित लाये ॥ चित लाये प्रण जनकको धनुष धरतो यह रगथल । कर उठाय भन्न नृपति वरै जानकी वाहि पला 60॥ हरिगिरिते गरु जानिये कमठएठते खोर। महिसँग रच्छो विरचि जनु सकल वच तनतोर॥ सकल बजतन तोरि मोरि सुरि गये दशानन। वाणासुरसे सुभट भये भज्जित कहु जानन ॥ जान न कोउ याको मरम शिवहि छाडिको तानिये। निजवल हृदय विचारिक हरगिरिते गरु जानिये ॥ ७ ॥ रूपसमाज मण पाहत हो रेखा वचन खंचाय। रक्ष राज शिरताज सोडले है धनुष उठाय: लेहै धनुष उठाय जगत- मह कौरति होई। जयमाला उर डारि जानको व्याहै सोई॥ सोद धनु धरि बल समुमि निज सुखमें कारिख नहिं लहौं। वीर धीर धनु सो गहै नपसमाजमैं प्रण कहौं ॥ २ ॥ नहिं शैवै कर धनुष ये सबको कहौं बुझाय। जिन भूप- न रण मण्डिकै रिपवत्त देखि भगाय । रिपुबल देखि भगाय 1 निया समारा। 1 - . na . जनाका पीय परमन हे देत शठ हठ- - मनताश पातक बये। Tोतवन । ७३ : सपाल। प्रजादुण्ड ::, . 7 "नने बाल देव f.यो सडको पच न जानहि ॥ का न पितु धरपका ननात पात करें। कारिख माद ऐसे कप भगु धरै ॥ २५ । का गनु ना गदो मान पचन प्रतीति। पर रहि rf 7 रात नहीं समीति ॥ राखहि नही सभोत । नोति तोर। पात बांधे सेतु पुण्यसरि सर वृति भार॥ मान मर्दि दिन धन हरै तिय बालक बन कुल दहौ। नहीं पकारि पसारि कर ऐसे नुप धनु नागहो ॥ ०५ ॥ ममकि भूप धनुषहि धरो निजकुत्तवतदत देखि। मात् ग्रोर पितु ओर है धर्महि तगे विशति धर्महि तजे विपि को नौक न जातो। शव समर बरावन्त तेग दाना नहि नाजो बालो कोरति चन्द्रप्ती जगत उजेरो नहि दी। भाट कहा प्रण खाचिक ससुशि भूप धनुषहि ॥ . 4 ॥ बगे। ०६॥ धतुप ओगुरो जनि यो बत जत गाए निहारि। सत्य मुरून त्यागे हदय कइत सत्य विचारि ॥ कहत प्रलय विचारि नारिवध ब्राह्मण कौन्हो। अागतको सङ्गल्लि ऐंचि द्विज नवते लौन्हो॥ निमुख दरशन करि भरनो दानि- गिगेमणि यश लियो। बदन रदन मसि लागि है धनुष बागुरी नानि शुगो। ७७॥ क्षेत्र नमान नरेश सो धरे भूमिको भार। जाको भानु ॥ इथिा गाया। प,नो तेज र तेज प्रतार :- कम होतिलात। एकजन शुतिबन्त परत पर विशाल पर, अधिकारी परलो काम परेको। सो पतु एसे रहेको नमानमरे तो॥ पहि प्रकारके हर घर शिवरिनाक परचण्ड ॥ जाको सत्य प्रतापको धनादौनसण्ड । ध्वजा दीप नब खण्ड सृप हरि चन्दलो होई। रघु रघुवान हितोप सगर अंशुमान सो कोई ॥ वद्य यानि सुगारिसे शिविश्धीच प डच्च। बार बार प्रण उहौं यहि प्रारके पतु धरै ॥ ८ ॥ बौनारायण धतु धरै जाको प्रबल प्रताप। धयो मेल सन्दरमही मयेउ सिन्दु हरि दाप॥ मये सिन्धु करि दाप प्रबलहिरण्याक्षहि सायो। सुरनधुकैटभ वधन सुयज नगर्ने विस्तारगे। विविध भांतिवनुधा सकल बुलसी प्रतिपालन करें। दुयो होय पक्षप धरि लो नारायण धनु धरै॥८० ॥ विधि समान पर चण्ड तो ग्रामोहोय समाज । ज्यहि जगको रचना कारि सरिसर गिरि गजराज ॥ सरि तर गिरिगजराज ससुन सातहु जिन बांधे। ऊंच नौ जग सृष्टि प्रक्ल वलले यहि लाये ॥ साधि वेद चारौ सुखनि रचो सका ब्रह्मा- एलो। यह कोदण्ड लोई धरै विधि समान परचण्डसो॥८॥ कोएनि शङ्कर धनु धरै यहि विष कौगो पान। त्रिपुर जवाहन जगत हतो एबहीवान : हलो एजही वान नम तन रिलमें जारी। चन्द गगन गिर धरै एन लरजाति नायो । यायो दृख सब जातको जगत सनै पतन हरैं। आयोजी न्हप रूप धरि कोपनि शङ्कर धनु धरै ८ ॥ गयनायक सो होय जो सो धनु धरै प्रगान । जाको पूजै प्रथम सुर विघ्न हरणकोबान ! विघ्न हरणकोनान ध्यान हरि . ॥
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२६ कुण्डलिया रामायण। व्रत धम सुकमनि। अस्त्र शस्त्रकीहारि रूप चुति लाज काज पनि । लाज काज परगाज धरि राजनि धतु कर लो जियो। रोते बीते सत्र सये धतु धन सबको हरि लियो॥८८ ॥ गालि गाजि धतुकर घरो लागि लाजिगेभाजि । साजिलानि बल दल सबै राजा राज समाजि ॥ राजा राज समाज भये सुन गोबन लायक। सस्पति सबै गँवाय करतो शहर धतुधायक ॥ धायक पालन परगये जतनवल धनु छति हो। तानि लाजि बैठे सकत गानि गाजि कर धनु धरयो । ६॥ धतु सुसेरते गरु भयो उठै न कोटि उपाय। तिल न टर सूति तरै धरै घरै लपाय ॥ धरै गरे पटाय नायगड अधिक धरामें। जन्यो शेषले शोश ईश जनु चयो कलाम ॥ लारूप कैलासको धरणि रूप धनुको लयो। उदय अस्त- गिरि लार घर धनु सुलेरते गरु भयो ॥ ६ ॥ कोष बचन बोले जनक तुप तत पौतष देखि। प्रणा प्रमाण देखन सवै आये सुप विशेखि । प्राये भूप विशेखि मनुज सुर शपुर तमामें। लिल सरिस न टारिशंसु धनु धरसे घरमैं तनकटौ धतुपते वलन कालो सूपति तनक । वौर धौर धरणो नहीं शोध वचन बोले जनक । ६१ ॥ प्रण हलार मिथ्यायो जा सकल तुप धाम। विधि नर च्यो वे देहि वरु पुरुष न होऊ बाम ! पुरुष न कोऊजान तो तो पण यह धरतो कहा। कत्या म्हो कुमारी यह अई हास्य 'जगरहा ॥ हाच सई बसुधा एकल शहीद लव गटयो। जनक सामें कह वचन प्रण गायिभयो। २ ॥ लण्ण लालको लाललुख तुने पदैन। फरसे पर प्रलापको गरगा भये इउनै॥ प्रादुर मचन्न बोरि ॥ - -- ॥ दाण्दतिया रामायगा। कले किवा । ककमा निधिको गेर वचन बोले रिस बा ॥ को सिन रजनक बचन काही रवंश रुख। नमाजमह त्वरा ताल का तात सुख । ८२ ॥ क. तुम रोग घरों यह गुरुमारय कौन। प्रभु या पनी तनक धौं चोदोमोना चौदहीभौन तो नर नट पट फो। यनरत उपारितमुद बक्षुधा वो। बनमा बोरों समुद्र में समुदामातलमें अरौं ! नेगोरि मटि रजि कहा धाप जीरग यौं । ६8 ] महिा ठाउँ धनुष यह जो प्रा गायत्तु होय। दिग्गज चारि पका करिमहीधरन पसिना महीधरन पनि मनितो चोटपति पानी। निििगरि २० लास धन पर परिमानौं। तानां सकल समाज छप चढि मकिडागार कह। धाय सभा योजनमही सहित उठा वो धनुप यः ॥ २५॥ जना लिये सऊचे सहमिडरे सकरा महिपाल। दिग्गज हाल छुटिगो भयते दिशि यमझाल॥ भयते दिशि यम नारको हिय हर्मानो। गुरु रघुपति मन तोष कही चर मुटु वाना। महिपतिप्रण लनणके सूरजके मन सुख नमा सशंक प्रमाण सुनि जनक शोश सच्यो नो॥८॥ नौधिक मुनि श्रायसुदशो सुनहु राम रघुवौर। धनुप समत वाम कर हरहु जनकको पोर। पार नामो शौच निवारो। सुर सज्जन सुख लहहि सुजियमाने कारो मुख महिपात सब ज्यहि जिलो श्यिो। सोधनु की मृगाल व कौशिक जियाबाद। सघत। हरहु जकनकी आय- कुलरिया रानाषण। करि प्रणाम रघुवंश मणि उठे यथा मृगराज । सुमागेर जोरिकर सुझमा झवि शिरताज । सुषमा छवि शिरताज मंत्रते चले गोसांई। पुर जन पुणयसँभारि संसारि देव दुन्दुभि बजाई। दृन्तुभि वाजौं अति धनी बन्दीजन त्य धत्य सनि। मध्य वैदिका पर गये करि प्रणाम रघुवंशमनि ॥८॥ पटकत धतु तक्ष्मण लख्यो जात्यो प्रसु मन वात। कहा धरणि धारो सबै सजगहूजिरे गात ॥ सजगहूजिये गात धनुष ौधकादररो जो महि चलौतौ सृष्टि विकलता सबको हैरो॥ हरोलैं रघुवंशामणि लेत धनुष अनमें सखो। लटकत महौ संभारियो पटकत धनु लक्ष्मण लख्यो । ६६ बाम गृठा पायदवि वाम हाथ गहलिौन। दमक दामिनी ज्यों कर सके नचन सलौन ॥ सबके नयन मलौन बँचि कोनो नभनाई। शब्द रखो ब्रह्मांड खण्ड दूधयो गीताई धयो गोसांई शंभु धनु शब्द सुने योगी खण्ड धनु तन भयो वाम अंगूठारे लगे ॥ १०० शिव शिव वृषभ पुकारई धनुष शब्द सुनि घोर। दिग्गज दिग्पालन भयो हृदय कम्प अति जोर ॥ हृदय कन्य अति जोर सम्प केलास ईशथल। शिव शिर सुर सरि धार उलि आकाश गयो जल गयो सुजल आकाश- चल उमा गणेश विचारई। कहा भयो सो भयो शिव शिव वृषम पुकारई ॥ १०१ ॥ जय जय जय रघुवंश मणि सुर फूलन वर्षाय। वेद वित्र बन्दौ विरद नारी मङ्गल गाय ॥ नारी मगल गाय लिया जयमान रठाई। शोभित प्रभु उर मध्य विश्व कीरति जगे। ।
३. Himan 0 m वागडरिया रामायण । जनुनाई। कौरति गावहिं सिद्ध मुनि बल प्रताप छवि एप भनि। सतानन्द आनन्द कई जय जय जय रघुवंश मनि ॥ १.२॥ पगगा भये मलौन सत्र सन्त भये आनन्द। जनक गोच संकट गयो सिया मातु सुख वृन्द॥ सिया मातु सुम्न बन्द निशावरि मणिगगदेहौं। रामसियाछवि देखि प्रेम कोन न केहौं ॥ कौन न केहौं दान सत्र समय शंभु धनु दट जन। तुलसिदास संकट गये चप मन भये मलीन सन १२॥ गहा गोद मिथिला पुरी राम कियो धनुअग। सल मलीन राजन सुखद सुरसु सुमन शुभरङ्ग ॥ सरसु सुमन शुभरङ्ग कण्ट भूपनि मन माग्वे। लक्ष्मण उठे सक्रोध राम मात बचि राग्वे ॥ बचि राखे रघुबोर पतिय प्रकटौं जुनीडरो। राम मिया जोरी निरखि नहा मोटनिधिणा- पुगे॥१०॥ पर कुठार परशु रामके भावे भाग धन भय। गौर व्य गुरुप शिवगटा भमा संवंग ॥ जटा भरण संव दति सकुचे राब राजा। लागे करन प्रगोन काल निज पसुमित नमाना॥ ममुभि समाज पिनाक लखि कहे कान पारि कागके। काहि तोरो तोल्यो तुरत कर कागार परापके ॥ १०५॥ सोलो धनु रघु बंश मन्धि जाको प्रबल प्रताप। हानि पाहा गय गवरी कहिय प्रकट करि प्रापः पहिय प्रकट रिप देव द्विजवरती नाई। पूनिय मानीय तुम्हें नापने वृद्ध बडाई । वहाई तबहिं जगगाय विष पद पूनि कि मानिमाप्रेमतों धनु तोयो रघुवंश पगि ॥ १० ॥ । N .
. २३ कारहरिया रानायगा। काल काय वोक्त का गुरुको धनुष विहंड। विप्रन ऐ- सोबोल सुनु रूप बाल शिरको खंड प अल शिरको खंड रश करतौ तौक्षण धारा। धतु ज्यहितोसो शाजुतासु सुजकाटन वारा॥ काटनवार परशु यह ज्यहि काटे सूपति महा। त्वहि समेत रामहि हतौं काल वध्य बोलल कहा।। ६०७॥ सूपति मिले नखेतमै तुन्द विप्र कुल देव। हते तुम्हारे छति गयेते दिन पर दिन सेव ॥ ते विज पद विन लेव नद धर्य नते होने। ते तुम काटे पशु तर कपटी जड़ दौने ॥ जड़ दौने कृप तुम हते पाप राशि नहि तमें। ताते बाढ़े भवनमें सूपति मिडी नखेतम ॥ १०८ वह विहीनी महिक्री परशु बार इकबोस। सो न विदित त्वहि वाल जड़ तुरत जाइहै खौस। तुरत जाइहै जोल वचन सुख वोतु मारे। गुरु गुनही सो मौन ताहि तू पोछे डार । पाछे वचहुन कालवाला सखि करि घर टरी। पर धार ज्यहि काटिहौं इन विहीनी महिकरी। १०६ ॥ द्विज अल के नाते उसे सुन विप्र सत साव। नत हलो लतको तकल लेहुँ तुरत भवदाव ॥ लेहुँ तुरत अवदाय परशु धतु सृषि गिराऊँ। धर्मवड़ो रसदार मारिद्विजपात पाऊँ! पालन पाऊँ शौशपर दूजे रघुपत्ति कर डरों। दशहर दुलहि वसावतो दिनहाल वोगाते हों॥११० ॥ ले डाठार सन्मुख धरयो राग तमणको चौर। कौशिक घरको बालकहि सोहि नहीं शबखोर॥ मोहि नहौं श्रम खोरि करी पद काल हनाले। परशु वन्यो वह हाथ कुण्डनिया रामायगा। विपुल सुपति बर वाले। घर वाले गिर मात्तिका शंकरको यो। अब चाहत तब गिर हो लैकुठार सन्मुख अरमो॥ २१२ ॥ राम कही कर जोरिकै भृगु कुल कमल दिनेश। बालक दौन विचारि उर क्रोध न कौजिय लेश॥ क्रोध नकोजिय लेश बाल अपराध विहौनो। धनुकर ममरो टूट चूकसों मही अधीनो। महौं अधीनो कर्म बश बांधिय दीजिय छोरिके। दास विचारि प्रभाव मोहिं राम कही कर जोरिके ॥ ११२ ॥ शंभु दण्ड खण्डित करलो सो भुज खण्ड हुनाज। जो कर परश प्रचण्ड लखि कटे अनिके राज। कटे शवनिके गज बचए नहिं दीन उपायन। ननवंशतनपाय बचन मुम्ब भृदुल सुभावन ॥ मृदुल सुभायन क्योंवचौधनु तोरत नहि तब डग्रो। अनुज सहित भु नकाटिहों शंभु दण्ड खण्डित करो ॥ ११३ ॥ नब बंश दिन मानिये लपण कही हँसि बात। हमपै पापन होय 'द्विज जननी कोन्हो घात । जननी कौन्हो घात ताहिते पन अति बाढ़ो। बड़ बैरी रण हत्योविरद पायो भिर गाढो॥ गाढ़ो पाय पाप शिर तासों रिसनहिं ठानिये। तुम्ह मारिको प्रबल है नव बंश दिन मानिये ॥ ११४ ॥ रे कुठार कुण्ठित भयो गयो स्वभाव सक्रोध। अरि प्रचण्ड दहि अवनि चुप कोन्हो हृदय प्रबोध ॥ कोन्हो हृदय प्रबोध अझत अरि देखत ठाढे। उत्तर सुनत सरोप मोर हृदि वालन वाढ़े ॥ न्वाल न वाढ जरत उर घोर धारको ले गयो। काटि काटि कण्ठविक तरू रे कुठार इष्टिन भयो । ११५ ॥
वारहलिया रामायण। २५ जो रघुपति मायल करें तो द्विज देहुँ देखाय। रण- उसकी तठिनता तुमको देउँ जताय । तुमको देउ बताय पतु मन नल्यों तुम्हारों। सूमिशन से पार भारि बाल उर जानें॥ बाल उर फारों समुक्ति विश्वात पातक परें । तला एलेन विचारिरे जो रघुपति शायत करें ॥ ६१६ ॥ तपण वचन कहि धन लियो नयन लयन करि राम। वरजे तुम वातक निपट सृगपति सब गुणधाम भृगुपति लव गुण शम ताहिसों समसरि कौजे। जाकी पदरज सेव्यमापने शिर धरि लौजे शिर धरि बीजे रिस रुपा अनुज शिखावन प्रभु दयो। सुखरुख राम निहारि नत लर वचन कहि धनुलियो ॥ ११७॥ स समय भृगुवंशनणि सुररक्षक द्विजपाल। महि- मण्डल ईन गनि रौ निक्षत्र विशाल॥ करी निक्षत्र नही नकल कई विप्रने हाथ। रुधिरकुण्ड तर्पन कियो तेई भृगुऋजनाय॥ तेई भृगुडालनायके चरण शरण सेवहु सुमति। शमय होय तिहुँ लोकमहँ यस समर्थ भृगुवंश- पति॥ १८ ॥ जाके पदरजके धरे सुद मङ्गत कल्याण। समयकारन साउदरन गाव नवेद पुराण। गावत वेद पुराण कलतए सम सुखदाता। हरिहर पूजत जाहि पर्न तुलदानि विशता ॥ दानि विधाता जानिकै निशि बि लेवा जे कारें। अर्थ धर्म कामाविकी पढ़ रग सुख जाके धरै ॥ ११६ ॥ कारा यातना लो उरत के इन पद का पह जिया या योग है है योग जप नेन । यहै योग कस्ट तजिन वच काधक, सो सुरुतौ सोई घायल द्विज सक्ति सणायक ॥ मायक शल तजि पूजि पद का सा ह
२६
दुण्ड रािया रामायण ।
धन सेवा करत। जीव जाल दुखमाल सन काल व्याल
कासों डरत । १२०॥
सो निलोक पावन परम जिनके द्विज पद प्रीति ।
विभ्रम श्रमताको नहीं दिशा विदिशि सब जीति ॥ दिशा
विदिशि सब जोति मोह रिपु कटक भगावै। यशदायक
गुण ग्राम राप अनुनहि समुझावै॥ राम बुझावै अनुजको
चनजंश याही घरम। पदरज नित हित शिर धरें सो
त्रिलोक पावन परम । १२१ ॥
राम सिखावन दुहुँ सन्यो लय और भृगुवंश। मति
गति सुरति सँभारि उर ब्रह्म सच्चिदानन्द॥ ब्रह्म सच्चिदा-
नन्द भयो नृप सुत अवतारी। शारंग कामे दियो विविध
विनती अनुसारी॥ विविध भांति पातक लगे कटुक वचन
मनमें गुन्यो। परशुधरन पुनि लपणा हराम सिखावन दुहुँ
मुन्यो । १२२ ॥
प सभौन उठि उठि चले परशुराम गति देखि।
आशिष भृगुपति देय करि भानंद लखो विशेखि ॥ श्रानंद
लयो विशेषि जनकपुरजन सब रानी। बंदी मागध सूत
उच्चरहि मगल वानी॥ भन्नल बानी पुर भई बाजि उठे
दन्दुभि भले। सन्त सुधा सुरगण मुदित टप सभीत उठि
उठि चले ॥ १२३ ॥
ममय पाय कौशिक कहेउ जनक महीप बुलाय। सजह
सकरा मङ्गल सुभग दशरय नृपति बुलाय ॥ दशरथ पति
बुजाय व्याह कुरारोति सँभारौ। माइट रचहु विचित नगर
रद गलो सँवारो॥ गली सँवारह अगर मय लव कुतर्क
समय दहेउ चार पठाइउ अवधपुर समय पाय कौशिक
पाहे ॥ १४॥
दुनिया रामायण सतानन्द अवधहि चले तनपत्रिका हाय। हौर नौरयुत मणि पदिक सरल सुमङ्गत साथ ॥ सकल सुमङ्गल साथ दखि रघुपति पुर पावन। सूपति तियो हकारि दोन्ह पतिका सुहावन। दोन्ह परिका रूप तखी राम व्याह- मगर मले। यह गृह बजे घाव पर सतानन्द अवधहि चले।। १२५ ॥ रामजानकी याह सुनि साजो सूप बरात। रथ तुरङ्ग मानङ्ग वनगजपला हात । गजघण्टा घहरात दुन्दुभी धुनि चहुंओरन । मङ्गल सरि भरि धार भासिनी गान काकोरन । गान साकोर प्रमोद पर सानिय जय जय सुमन धुनि। दश- रघापुरपति सच्चो रामजानकौव्याइ सुनि ॥ १२६ ।। अल विचार व्यवहार हरि गुरुत्रायसु नप पाय । मिथिला पुरको मग तियो सुप निशान बनाय ॥ सूर निशान बजाय सगुण सुन्दर शुभ पाये। बौच वास करि विविध जनकपुर सूपति शये सुपति आये जनकपुर अति उशह पानन्द सरि। दृहुँ समाज संगम सुभग कुल विचार व्योहार रि॥ १२७ ॥ उमा रना ब्रह्मायणी एतिन सहित पुर आय। राम जानको पनि देखनको ललचाय ॥ देखनको ललचाय निरसिदशरथके बारे। मनवचनामवधप्रेम भये सब देखन- हार॥ देखनहारे से यगन अधिसिधि मङ्गलदायनौ। सिय विवाहकनकर्म सर्व उमा रमा ब्रह्मायकौ ॥ १२८ ॥ सुथल सूप डेरा दियो झोशिक लणण राम। पाय खबरि पितु आगमन चले हर्षि गुणधाम ॥ चले हर्षि गुण- धाम मुदित लेटे रघुराई। लुनिपदरज धरि सूप भरत भेटे दोउमाई ॥ भेटे पुरजन गुरुद्विजन राम देखि पूरण हियो। ॥
२८ दुगपतिया रामायगा। -रितिषिमा मत लिये सबलभूप डेरा दियो। १२६ ॥ तः ना सँग हूँ गोर रारा और गुठि गमा नाणी एक हैं एक नव जनु सना एक मत्य जनु सम - जेनगन निशाने। वसहि वदन मयंक नयन वसा रतमा बेहि जमा राम छषि तैमे बज घि दे दुन । नागान करत राति नृपरोंग द्वे पोर शत्त ॥ १२० ॥ । सबुझ दिये तोनि पो जोन। चा छावर गि यहि पुर प परवीन ॥ यहि पुर नप पत्तीन दोन पाई। जस कन्या तस कर याग गिन दीन ।दोन पिनाग महेंगा निकिलोग शाप दिया। नानासतो मगति तखि निपल सगुगहिये ॥ १६१ ।। का दावर तिरहुति चले पाय राभग ससुरा। काहुँ दिनदग मारा भरि देखि टन नरनारि॥ देखि तृप्त नारि पालि पनि दुलहिनि चारो। कल दिन वै उत रहैं जननीति नारो॥ जनक कुमारी शाय है प्रवध शांडि पने पर्व। पनि बनि दिन दश वोस चारि शयर तिर- इति । १३२॥ पंगा बड़ि पुण्यते राखि पुरवै विपुरारि। तो विरचि हम जो नलन टूट दिन चारि ॥ सरत ट्ट दिन चारि पापि पावर पिवाहो । माड़व तर निक्षारि लेह जग जीवन ना॥ जीवनलाही मावधि यह सुज देखहिं धन्य है। जरा जप उर जो वते ये बातें बडि पुण्यते ॥ १३३ ॥ सा- "नो तादी गने राम तमगा वि देखि। ताते पEजो पाये पर विशेखि ॥ भाये द्वावर विजलि सेप मार। दर्शनका तत्काल सूप दात्यहि ..! करम राम निहारिक राह इत्तदिनी पति बने। । ॥
वरजलिया रामायण चह सिहदेहि सनहि सखि तकनी तादौन। १३ ॥ इजिकई कई जना सुर गाय। राम किमाइ ३ बस चले बजाय॥ देखन चले बजार कानंद जाक बना। शत्र सहित रात जनकनन्दिर चति हाये. मन्दिा अति आर्य सबै पाउ परि जय जय नई। कर लाइ तनाज शुभ माघरी विधि लिखि २३॥ ॥ । को किान सुना है जिहि घल सुखमा आहि । नटत किती तसनो रुख जगवत पल जाहि ॥ ख गवत पल जाहि जहां दृतहिनि वैहो। विधि हरिहर यम इन् होत कि हित तेही॥ हित हित तेही रुपा दूतह भोग्छुपनि हैं। सनशै दशरघ जनक सम को वितान सरूला है ॥ १६ ॥ इन्छ नल दूनो मिते बन्दी वर्णत माय। सव समाज सब लाज तो हमें प्रत्यक्ष दिखाय॥ हलै प्रत्यक्ष दिलाय रह उपना जिव लादै। नारि सहित सुबमारि राम याहन गावे ॥ रानव्याह मुख देखही अमरावति संयुत चले। निज निज पर सुरगण सहित इन्द्र ब्रह्म दूनो मिले ॥१३७ ॥ राम सुमित जगमगे माड़व मध्य समाज। माथे सुक्ता मोवि नजत सहित निशिराज॥ नखत सहित निशिराज नारिनर देत शोभा। रघुपतिसुख शधियरद निरखि वि हन न को ला॥ रघुपति सुख रवि शशशि नयन- चकोरनि लत्रि तो। मदन कोटि शत वारिये राम लुभूषित जगमगे ॥ १३८ ॥ लुनि वशिष्ठ नसतानंद सरवान जाबालि। अत्रि अगल्ति सुगन पिकाइप सुनि तपशाति। कश्यपनि तपशालि देव कर पूजा दाण्डतिया रामायगा। सुषि सनक समेते। तोमश अरु चिरजीव व्यास पाराशर जेते पारागर सौशिक सहित गौतम शक उञ्चरत पद। वेदमन्त्र करणो करें मुनि वषिष्ठ पनि सतानंद । १३८ ॥ सूरज गलगति सब नहैं पावक 'पाहुशि लेय। गणपति करें विधि विवाह कहि देय। विधि विवाह कहि देय पवन पुनि शेष महेशा। तरपति सुरगण सहित मगन दिग लखत रमेगा॥ लखत रमेश सदेश चबि राम सबहि जानत रहें। निप्रवेष बैदन पढ़ें सूरज कुलगति सम् कहे । १४० जन मगन रानी सबै मुनि बशिष्ठ कहि दीन । सतानंद पानी सिया भूषण सजत नवीन ॥ भूषण सजत नवीन राम ढिग अस्थित कीन्हौ। मुनिवर अवरार समुझि गान्ति ति मग कहि दोन्ही॥ दीन्ही दुन्दुभि प्रतिघनी सिय मरउप भाई जब। दशरथ सभा समेत सुख जनक मगन रानी सबै ॥ १४ ॥ जनक पायं पूजन लगे शाखोच्चार उचारि। रानौ नृप मन मोद भरि लैको परश चिवारि॥ लेको परशु चिवारि नारि वरमगल गाई। कन्यादान विचारि देव फलन भरि नाएं ॥ फूले तरु नुप सुझतकै चरण प्रक्षालत सुख जगे। निरखि बदन दम्पति मगन जनक पायं पूजन लगे । १४२ ॥ जे पदपकज प धरे जे शिवमान सहंस। पदपङ्गज मदत रम मुनि संकुल अखिवंस ॥ मुनि संअल अति बश प्रकट कोन्ही जिन गगा। वरयत वेद पुराण प्रणतहित विग्द अमहा॥ विरद अभङ्ग प्रसङ्ग श्रुति मुनि तियके पातक हरे। अज सनकादिक ते भने जे पद पवान नव धरै ॥ १४३ ॥ ॥ ॥ जे ३२ कुरजतिया रोमायण। जनकराज समको सुचत कहत देव मनमाहिं। निरखि मगन कौतुक परम जय जय कहहि सिहाहि ॥ जय जय काहिं सिहाहिं वचन कहि चार संवारे । नरनारिन लखि आप नेहवश देह विसारे॥ देह विसारे रुपको व्याहताह लोयन रुकत । कोशलेश मिथिलानगर जनकराय समको सुरुत ॥ १४ ॥ होन लगौं वर भावरौ दुतहिनि तलित ललाम। दूलह सुन्दर सावरो शशि मुखपकज राम । शशिमुख पङ्कज रामवाम लखि महल गावहिं। सुनिगण भावरिश्त्त करहिं गनि जियनि सावहि ॥ मगन मोद भावरि परै रोनी तन मन वावरौ। सब हालचार विचार की होन लगौं वर सावरी ॥ १४५ ॥ राम निशवरि को गनै सुक्ता मणि गण खान। मण्डप धन पूरो भयो जनु जुवारि यव धान ॥ जनु जुवारि नव धान जनकमन्दिरते आदें। मुनि वशिष्ठके वचन नेग गहि ताहि दिवावें ॥ नेग साधि आहुति दई व्याह भयो सब कोउ भने। देव सूप रानौ जनक राम निशावरि को गनै ।। १४६॥ जेहि विधि रामविवाह भो सो कहि सकहिं न शेष सम्पति शोला सुख सुभग मङ्गल मोद सुवेष ॥ मगल मोद दुवेष साजु शुभ सकज्ञ समाजें। कहि कहि थक गणेश व्यास जिन श्रुति पथ साजें। श्रुतिपय साजै ते चकित मोद विनोद उशाह भो॥ तुलसिदास सो किमि कहै नेहि विधि रामविवाह भो १४७ ॥ जनक कौन जो मुनि कहेउ सब कत्यका विवाह । भरत शत्रुसूदन लषण दूलह करे उशाह, दूलह करे उशाह पति दशरथ सुख पायो। रामव्याह विधि शोधि सुनिन देवनि करवायो॥ देवनि करवायो सुक्षति दूलह दुलही . कुण्डनिया रामादगा। ना झो। जोी चारि कितानि मुल जनक कौन जो । १८ । गये मात्र दादा जोर। तर सरिता गन नये बानि चरो चरें मोर ॥ बाडि चले वर जोर शाति जनादित रानो। पुर परिजन से शो को सुख सुन्दर पानी । सुर पानी बद मणि भूषण चट वर्चत नये। रामलिया पावरा मुखद मघा रोष गरय अये १४८ ॥ वर कन्या राउन चले मुनि प्रायसु अस दोन । भूप समाज समेन लब ननवासे पर दोन ॥ जनवासे पग दौन बजे इन्दुभि प्रति भारी। दुतहिन दुराह लाय भवन सन दमागे दलद दुलमिनि सन गिरवि रानी मुख सानो । हावि र वरोरकत दरकन्या राउा चल ॥ १५० ॥ रना उमा गातग लगा ले माटनको नाम। भर कपोत -ह काम करीन खवावत राम॥ कनि खवाबा राम नाहल मगन्न होई। नेक अनेक प्रकार समचाहं प्रकटत दाई ५ प्रकटन तिय वचननि कहै रामसीय मनि पगौ। महायो पिता ना ना नावन गो। २५२ ॥ मिय यी दुम चतुर हो रना कहो मुसुकाय । सुनि- नियन नांच कहूँ कीजिय नहिं रघुराय ॥ कीजिय नहि समय निज सुनहु हमारी। पद कबहू जनि यो कि मातानि नारी ॥ न चारि विवाहिये एक वन विनय तहो। रगा पाइस रचनायलों लिय धो . ५२ ॥ . हासवितासविनादमय नेग योग करवाय। रान उठाये भनिने शिविका रुचिर चड़ाव ।। शिक्लिा सचिर चढ़ाय सुरलिया रामायण। m इतहिनिन सहित नहाये। दुन्दुसि देवन एहुप राम जनवासे नाये॥ जनवासे देखत सगन सूप दौन लखि द्विरद हय । पोचावक विविध सुख वासविलासविनोदमय ॥ १५३ ।। पटरस चारि प्रकारके सोजन विविध बनाय। सलानन्द गहि जनक दशरय रले लिवाय ॥ दशरथ चले लिवाय पाँबड़े अई तुहाये। मणिसिहासन रुचिर छस भोजन पासाये ॥ सोजन परुसाये सुदित तियगण गानविहारक। लुनि दशरय मोजन कियो बटरस चारिप्रकारके ॥ १५४ ॥ पान मान प्रसुदित दये सये विदा जनवास । गहगह बाजी दुन्दुसौ मङ्गल सोढ़ विलास ॥ सगल मोद विलास वरातिन मन्दिर सूले। जनक प्रौति रज सट्टङ रामवि पावर कूले। नले गज याचकन गृह पहिरि पाय मन्दिर गये। जान रायरघुपति सर्वाह पान मान प्रमुदित दये ॥ १५५ ॥ तौनि माल दशरथ रहे नित नव आदर होय। विदा- साज सानी जनक सवको सुखरुख जोय ॥ सवको सुख- रुख जोय महल दश वंदन साजे। मुक्तामणि गणसुपट माह कञ्चनके राजे ॥ मणिगण लागे अत्र जे ते ते रथपूरे लहे। जनकराज दायज सजे तोनि माल दशरथ रहे ॥ १५६ ॥ दिग्गज सहसपचासलौ सजे जरकसौ साज। मणि- मुक्ताकी लालरौ लपे सोह गजराज ॥ सपे सोह गजराज जरीजरकसी समारी। तिमिर अरुण इकठौर मनौ पावस अंधियारी॥ पावस अंधियारी सघन घण्ट शब्द सुरवासलौ। जनक राय दायज सञ्चो दिग्गज सहसपचासलौ ॥ १५७ ॥ तुरौ लाखदश वर सजे वरन वरनके जौन । रचतुरङ्गते अति भले चञ्चल सुभग नवौन ॥ चञ्चल सुभग नवीन अतशत -- 낡 ॥ - ।। १५८॥ गण्डविया रामायण । सूपच रागे। वरन निरि मनवेग रङ्ग रजनि बनि साजे निनि सामे बाजिबर जिनहि देखि शुरदय लगे। जनक- राय दायज सम्यो तुरौ ताखदश बर सजे । १५८ ॥ चनमा दशताखलो सुन्दर सब गुणधान। राज जात पुरट सोहत ललित तलाम । सोहत ललित तसाम भये भोजन पकवान। सौरभ मृगमद मलय अगर लपकुमके थाने। अगर कुमजमा रस भरे रूपे जरासी पाखती। जनकराय दायज सज्यो वृषभवृन्द दशलाख- लो महियो लाखसतानवै देश देशको खानि। मनौ श्याम- बनके सुबन मझी चरै सब आनि ॥ मही चरै सब आनि दूध धरनो धसि धारै। श्टङ्ग कण्ट मणिहार शिगुन प्यावत मुकुमार । प्यावत सुकमारै धननि दूध सुधार विधानवै। जनराय दायन सच्चो महिषी लाखसतानवै ॥ १६० ॥ धेनु लाखयुगवानबे कामधेनुसौ रूप। अतङ्कार मरिण- गण वमन सोहत परन अनूप । सोहत परम अनूप दूध सृधी सुठि सरौ। संगशिशुनके वृन्द सकल शुभ तक्षण- प्रौ! पूरो रविको को कहै जेहि देख्यो सोइ जानब। जनगाय दायज सच्चो धेनु लाखयुगवानबै॥ १६ ॥ शिविता लाख बहत्तरौ सियदासी असवार। मनहुँ काम- तिय रति चढी करि घोड़श गुटगार ॥ करि पोड़श श्टङ्गार जारलौपिय शधिकारी। मन गति रति परवीन चतुरविद्या लनि भारो॥ विद्या विततभाव उर सिय सेवा उनमत्त रो। दलावावज पोजिविका लाख बहत्तरी १६२ ॥ नयापन पिन्जा सम्शे सजनवंचित विचल। शुक का होवान शुचिमित्र ॥ अहोबाज शुचि- - । 1 नदिया रामायण। ३ ५ मित मिण रुचिकै प्रतिपाले। ते सेवक सब जिये जानकी लेकनवाले॥ सेकनवाले भाग बड़ जगतजननि जेहि जग हो। तासुसन यह कौन बड़ा सवालाख पिचर सन्चो ॥ १६३ वायन दियो रूद अजा अरु ज्ञानको लेखागनो सिराय। जे प्रिय लियकै हप लख्यो नगर वाहरे जाय। नगर बाहरे जाय मनहूँ अमरावति घेरौ। दुन्दुभि दये सहन छन अरु चमर घनेरौ॥ चमर घनेरी भवन पट अासन विविध विधानको। नये गने ऊट अजा अरू ज्ञानको ।। ६६ । रानिन सुना संवारिकै करुणा सौख सुनाय। पति- व्रतधर्महि हा धरेहु सेयहु सहज सुभाय ॥ तेया सहज सुलाय होड नित खामिहि प्यारौ। सदा सुहागिनि होह यह आपोश हमारी॥ यहै प्राशौशा देहि हम सुता अक्ष उर धारिके। भेंटि भेंटि पांयन पर रानो सुता संवारिक ॥ १६५ ॥ जनकनयन धारा बहै सुना लिये उर लाय। सिय कण्ठा शेड़न नहीं जनक न त्यागौ जाय । जनक न वागी जाय लचिव सनुकावत राजे। धीरज धर्मपरान ज्ञान गुण ध्यान समाजे॥ ध्याननमाज न लाज रह झुटत लगत रोवत गहै। मातु गरे पनि पितु गरे जनक नयन धारा बहे ॥ १६६ ॥ विदा हैन रघुबर गये जनकरायके धाम। गति लजि प्रासन दियो कौन्हे राम प्रणाम | दोन्ह राम प्रणान वहन मृद वचन सहाये। विदा दिजोये लातु पति चह सब सिधार्य ।। अवध सिधाये मुनत प राग सुख सूजत सये । वचन न मुखपङ्कज कदमो विदा हेतु रघुवर गये ॥ १६० वागडचिया रामायण। रानी रघुवर पाय धरि कहत वचन भरि नयन। तुम्हें जात मुनि योगि जन घटवट तुम्हरो अयन । घटवट तुम्हरो म्पयन सकल गति जाननवारे। दौजिय प्रभु वर युगल प्यास यह हृदय हमारे ॥ हृदय हमारे तुम बसी कहौं दूसरो विनय करि । सुता किङ्गरौ राखिये रानी रघुबर पाय धरि ॥ १६८ ॥ करि प्रणाम रघुपति चते रामसहित सब भाय। सुता चहाई पालकी सुन्दर सौख सिखाय । सुन्दर सौख सिखाय मृप पहुंचावन आये दुन्दुभि दोन व गाय मुनिन देवन गुण गाये॥ गुण गाये पाये सबनि सगुन सुहावन प्रति भले। समभो भेटि प्रणामकरि करि प्रणाम रघ्नति चले ॥ १३८ ॥ प्रवध पांचये दिन गये बनि वसि सकता सुवास । पुरप्रमोद श्रावन सुने रहसविवश रनिवास ॥ रहस विवशर निवास पहिरि नारन रानी। शारति मङ्गल साजि गीत गावहि सुशानो॥ वानी मङ्गल सजि सबै कलश चौक चामर नये। रावधनाय सुखको अवधि अवध पाचये दिन गये ॥ १७ ॥ परिशन करि भीतर गई पुत्रवध सुत साथ। मङ्गल मोद समाजयुत आये कोगलनाथ ॥ आये कोशल नाथ पुरी हर्पित गन्नारी। पुत्रवधू सुत देखि मगन तनमन महतारो॥ मह- ताग वारहिं सुभग भूषण पट मगिगणमई। सुभग सिंहा- सन चारि धरि परिलन करि भोत्तर गई ॥ १७१३ सुनिनायक जो जो कहेउ सो सो करि व्यवहार। दान दोन विमन मुदित भरि भरि कञ्चनथार । भरि भरि कञ्चन- पार भामिनी मङ्गल गावं। रानी भृपण देहि सकल आशिषा गुना॥ आशिप देहि सनेह भरि शन्दु उमा परसन रहेछ । रानभाय दशरय सुखद रहे सदा मुनि जो कहेउ ॥ १७२ ॥ रामविवाह वखामई मोदसमुद्र शाह। नारद शारद AU ७ कुछदिया रामायण। शेष शुक गणपतिको अवगाह ॥ गणपतिको अवगाह व्यास विधि कहि कहि हारी। मनिअनुरूप वरूानि भजनको भाव विचारे॥ मनित्रनुक्ष्म खानिक गिरा सफल निजु मानई। तुलसिवासके कोन मति रामविवाह बखानई ॥ १७३ ॥ - ति बालकाण्डः समाप्तः ॥ अयोधाकाण्ड। इण्डलिया॥ अवध ग्रनन्द प्रवन्ध सुख दिन दिन अति अधिकाय। जक्ते राम विवाह कराये कोशवराय ॥ प्राये कोशलराय भुवन सब आनंद करे। धिसिधिसम्पतिनदी अवधसागर सरिपूरे ॥ सागरसप्त समानली गयो शोक अरु दोष दुख। अमरपुरौ अहिएर धरणि कवधि अनन्द प्रवन्ध सुख । १ ॥ दशग्यभाग सराहई सुर मुनिवर नरनारि। धर्म- धुरोण प्रनानिधि जिन पाये सुनचारि ॥ जिन पाये सुतचारि जासु यश वरणि न जाई। भोरघुपतिसुख देखि हर्ष अति लोग लुगाई ॥ लोग लुगाई गण गनत शा' को सुख चाहई। पुरो भाग अनुराग सुर दशरथ भाग सराहा ॥ २ ॥ पसों विनय सुनायकै केकयसुवन सप्रौति। भरत- हेतु विननौ करो तहि मृदुवचन विनौत ॥ कहि मृदुवचन विनौत दिवस दश रहैं गुसांई। मुनिहु कहे तृप पाहि भूप -- २२ चाण्डरिया रामायापा पठये दोउ भाई । मुति रुखने आयप दियो भरन उठे गिर नायक। बोकानन ल भर सग पलों विनय सुनायक ॥२॥ चिदा रानके चरण धरि भरत गनु उन भाय। मातु गुरु भ्राता टपदि चले सबहि गिर नाम चले सबहि थिर नाय समट सेना सँग लौन्डे । श्रोरबपतिपदकमल हृदय मन मधुकर कोन्हे ॥ मनमधुकर पदकमलरनि सुमिरतनाम सनेह भरि । धन्य भरत भूतल भये बिदा रामके चरण धरि ॥ ४ ॥ नारद पाये अवधपुर रामचरित हित जाहि॥ प्रेम नेन जाके अवधि रामरूप उरमादि। रामा उरमाहि राम दखत उठि धाये। पूजत विविध प्रकार जोरि कर जमु शिर नाये ॥ प्रभु गिर नाय बूझियो मुनि प्रकटो विधि हृदय जुर । कहन विरच्चि संदेश सब नारद आये अवधपुर : ५ ॥ रामवचन मुनि मुनि गये पाय बचन विश्वाश । राम प्रकट माया करो सबके हृदय प्रकाश ॥ सबके हृदय प्रकाश गुरुहि नृप जाय सुनायो। रामतिलक करि दह नाघ सबके मन भायो॥ सबके मन भायो सुखद सुनि वशिष्ठ ग्रानंद भये। तिलकसान साजो सुदित रामभवन सुनि मुनि गये ॥ ६. - कृप बातें प्रकटौं सबै मुनि रघुबर समुझाय। नेम क्रिया बन धर्म र निनक भेद विधि गाय: तिलक भेद विधि- गाय कह भूपनिहि बुलाई। मङ्गल वस्तु मँगाय तिलकको घरों सुधाई। बरौ सुहाई कालि है गम राज्य बैठहि जवै। वाजे विरल धाव पुर पनाते प्रकटौ सवै ॥ ७ ॥ गम है। मङ्गल रचौ आनौ तौरय नोर। पान फूल फल मृल तर हय गय मणिधन चौर॥ य गय मणि धन चौर परा सुन्दर रचि राखी। बन्दनबार पताक कलप चौक कुतिया रामायण । ३२ मिलामो सिनामो समजप नगर बौथो रनिलों सचो। मणिमय दोष प्रकाशिये रामहेतु मङ्गत रचौ ॥ ८ ॥ देखिदेव मोचन सये व रामको राज। दुख कष्टको नाशि है निश्चय भयो मनोज ॥ निश्चय भयो अक्षाज सुमिरि भारता बुताई। राम विपिन कह जायें मातु सो करहु राम विपिन कह जायें जब उपाय बुधि वलनये। चरण गहैं पालन करी देखि देव घोचत उपाई॥ कर सये ॥६॥ । धिक विक देवन कहि चली आगे हेतु विचरि। अवध गई रानौ जहाँ देखौ सुमति सँभारि॥ देखी सुमति संभारि तहां परवेशन पायो। कण्ठ मन्यरा वैठि तासु चित हित सरमायो॥ हित सरमायो तेहि सबै प्रिया कयौको अलौ। एर दुखदागिनि लौ सई धिक धिक देवन कहि चलौ ॥ १० ॥ नगर देखि बातें कही हित तोरनको घात। मोहिं शोच एक उर भयो जो फर मानहु बात ॥ जो फुर मानहु वात हिलू हेतौ दुख जाने। काज नशात विचारि विना पूछेहु बखान ॥ दिनपूछे प्रसुके वचन इन वात पातक नही। उतर देत नहिं दोष है नगर देखि बातें कही ॥ ११ ॥ कून ठौरनि पूछे बिना कहै स्वामिसों दास। सर्प अब घरि विष अनल अनिल काण्ट दुर्वास ॥ अनिल कण्ट दुर्वास प्रशन पथ अपच जनावै। लाभहानि दुखदानि कहत पातक नहिं भावै। लाभहानि नदि बोलई प्रसु आयसु रुख निशि दिना। खामि सुहागिलि देहि सिख इन ठौरन पूछे विना। १२१ मोहिं सामिनी इख भयो समुजित एक उत्यात । सब पुरको नौको लगें तुम्हें भरतको घात ॥ तुम्ह भरतको घाव बीज अक्षर पाण्डतिया रामायण गन टु वरानि विचारो। काहि राम प होहिं भई शोभा पर भागे। भारि विपति विचारिके हृदय मोर दुखयुत तयो भरत मिटेग नरेग पर मोहिं भामिनी दून भयो ॥ १३ ॥ विपनि बोज पङ्ग,र भयो क्यो कौशला गनि। पावस प उर देवि शुभ आया सुन्दर पानि प्राय सुन्दर पानि पवनय नमान बल पाई। गुरु पुरजन भे वारि तुम्हें नित को उपाई ॥ कीन्ह उपाय सहाय सर भरत तेज तप सो गयो। चार दिवस गत देखियो विपति भगो ॥ १४॥ माय मानि रानो कहे कहु सखि मोहि उपाव। भरत गये अमगुन भये सा मा यहै प्रभाव ॥ सो सब यहै प्रभाव खदान में मा जाना। सपनि ईरषा छाडि पुत्र पति पापा पानां। धारा मानि न रु कश्यि नृप मतीन उन चहै। दिलू जगत मेरी तुही सत्य मानि रानो कहै ॥ १५ ॥ कहि गु'वाय रानो बदन जनि मन करमि मलौन। दै वर ने तृप चहें लंहि मांगि परवीन ॥ लेहि मांगि परबीन दाम्व दृढ वचन न डोले। राम विपिन सुत राज्य सत्य करि नृपमन बोले ॥ राम विपिन जब जाय है भरत भूप होई मदन। सवति हृदय यदि भाति दहि कहि सुखाय रानी वदन ॥ ६॥ मन प्रतोनि रानी भई लई सोख उमानि। जो कछु मन रघुपति चहैं सोई सत्य उर आनि ॥ सोई सत्य र पानि झोपके भवन सिधाई। दुर्गति करि तन दशा मनहुँ यमपुरले आई॥ दशा मनहुँ नप मरणको धरणि कुलक्षणको मई। दंवि कुरोनि सुधौति सिख मन प्रतीति रानो भई ॥१७॥ - जलिया रामायण । ४१ r का न काहि यह कमवल केहि जग यम नहिं लीन । पवन उगायो काहि नहि को दरख दुखौ न दौन॥ को दुख दुखौ न दोन मोहमद हि नहिं बाध्यो। तृष्णावर नहिं जयो कामशर काहि न साध्यो। काहि न साध्यो नोधदल केहि न चल्यो तरुणीतरत। चितचिन्तामालिनि यथा का न करहि यह कमबन ॥१८॥ अवरपुरी अमरावती वा विपुल बधाव । सबके उर आनन्द पति रानतिलक सतिभाव ॥ रामतिलक सतिभाव सॉक समया रूप पायो। सरल सुहद रूप हृदय कैकयी गृह चलि गयो आयो सनि रिसने सदन वदन पौत भय छारती। अधिनाय सुरपति सरिस अवधपुरी अमरावती ॥ १६ ॥ सो दशरथ कन्पहि हिये काम प्रताप बलौन! नाही दश लय लोकम केहि अनर्थ नहिं कीन॥ कोहि अन नहिं कोन चन्द्र सरपति गति देखौ। नृप दिलीप सुनि शम्भु, ययानिहि चिन अवरेखौ॥ चित भवरेखहु कामवत तौनिनोम मेदित किये। ताकी शर सुप उर गयो सो दशर कम्पत हिये ॥ २० ॥ देखि जाय रानी विकल भूमि शयन तन दौन। पट पुरान सूखे अधर नयन अरुणरंग पौन । नयन अरुणरंग पौन मनई दुईण अनेसौ। विपति नारिके रूप कुमति जसि प्रकटति तेमौ प्रकटति वचन बदनमहँ कुमतिसाण धरि इल अथल । भूप सभय पेठे भवन देखि नाय रानी विकल ॥२९॥ क्रोध कौन कारण कियौ गजगामिनि वरनारि। जो मांगसि सोइ देउँ तोहिं कामादिक फलचारि॥ कामादिक फल वारि तोहि परतौति सदाई। तेरे सुखने हेतु तिलकको ६ ठाण्डलिया रामाया। जोगवा ॥ घरी शोधाई तितकको अवत्र लोग सुनि लियो। करि प्रवोध रूप पाणि गहि नोष कौन कारण -- - जति ठौ बोलन भई करि कटाक्ष सुसुनाय। सूप न 3 हृदि नानि चरितो भाय ॥ नारि चरितके माय न जाननदार। है दर साती के गौर हम तजे सा॥ नगे तुम्हारे दानिता नहीं शपथ खाँचौ नई। किरिन टरै कहि उच्चौं उठिवठो बोतत सई : २३ ॥ समय सत्य लखि काह चलि वचन मङ्गलसूल। देह एबर प्रयन यह भरतराज्य अनुनाल॥ सरतराच्य अनुकूल उसो नागहुँ साई। चोदवपंबिशेषि राम बन सुनि को ॥ गुमिको नाई जाहि वन कालहि राम तौ शति मनो। मोर मरण अपनो अयश शपथ सत्य तखि कहि चला ॥ २४॥ सनि भूपति उर शति दयो बत्र हृदय जतु लाग। सुम्ब सुखान लोचन सजल प्राण विकल भय भाग ॥ प्राण विका भय भाग मदि राखे दोउ लोचन। शोक दाह उर 87 पादत न बनत न शोचन ॥ बनत न शोचन मुख वचन मगहु प्रेत कर्मनि छल्यो। धुनत शोश व्याकुल शिघिल पुनि पति र अति दयो ॥ २५ ॥ विकाल सुनि व्हप कहा वचन तगे जिमि वान। सत्य- सा मन किये को देन बरदान ॥ कबो देन बरदान उचा कि कसो संभारे। कौशल्यात सुवन भरत नहि सन तुम्हारे ॥ भरत सुवन पठये घत रामतिलकमानंद महा। सावउ इन तत फत लहौ भये पिकज सुनि टप दहा: ६ कुतिया रामायण । 83 ॥ न्यन उघारे हप कइत ससुकि प्रिया बर मागु। भरत सृपको तिलक एर तामें लगे नदार ॥ तामें तगै न वागु रास बन पठति बाहे। कौन लाग लपराध राम सब साधु मगहे॥ साधु सराहे नारिनर अब अचर्य छाती दहत । ताते समुलि विचारिकरु नयन उघारे रूप कहत । २७ ॥ ये न बचन टरि हैं न, पति मर उजरि पुर जाय। ग्यश अपि विधता करहि अघ रविवंश नशाय । अध रविश नशाय हाय पुर काल हवाले। कलह कपटको लागि बनि सगि जाय पताले ॥ भगि पताल अवनी घटै रवि शघि गहि उनटि गान । विघि हरिहर आएहि कहैं ये न वचन टरि है नृपत्ति । २८: अनत चन्द वरले कबहुं शौतल सूरज होय। शेष तजे धरती धरन समुद्र विना जल जोय ॥ ससुद बिना जल जोय शश्य शिर चन्द्र प्रसार। निभिर दहै रवि रूप वृद्धकर दण्डहि डारै॥ दधि विधि पा सृष्टि सब नारायण मिटि जाहि कहुँ। ये न वचन नापति टरें अनल चन्द वर्षे कबहुँ ॥ २६ ॥ राज्य न पा सरत पुर लागो तोहि पिशाच। मोरि मृत्यु बोलत वचन व सुख चढि गिर सौच ॥ तव शिर चढ़ि करि साब गम नृप होवहि मारो। तुहि कलई दुख भोर मिटहि करहुं क नहिं नारौ॥ नारी करि चित चाहिक वचन भार निय जानि फुर। राम सूप सेवक शनुग राग्य न चाहे सरत पुर ॥३०॥ बसौ अवध नृप राम हैं यह जानत सब कोय। मोर मग्ण मो साभिनौ यह सुख लख्यों न सोय । यह लुस नग्यों न साय नम जिय जानंसु आमिनि। मौन जिये विनु पनि किन नियों न पानिनो॥ नियों नमानिनि 88 - कुण्डलिया रामायण । दिन वृया जानि मरण परिणाम है। तू प्रभागिनी तनु रियो बसी पवध नृप राम है ॥ ३१ ॥ राम राम कहि नृप गिरया कुमति न मानी बात। अवक्ष बवाव अनन्द बड़ नौंद न लागो रात ॥ नौंद न लागौ रात कातहि शुभ घरी सुहाई। देयो जाय सुमन्त भूप गति मति विकलामति विकताई देखिकै लखि कुचाल आतुर फिररो। आये राम लिवायको राम नाम कहि नप गियो ॥ ३२ ॥ पितु उठाय बोले वचन नृपति लौन उर लाय। नयन नीर धारा धसे वचन बोलि नहि जाय ॥ वचन बोलि नहिं पाय राम पूछो महतारौ। कहानि कठोर कुबैन कया करणी पट् भारी ॥ कट भारी सो हेतु सुनि तन प्रप्तन्न कह मृद यवन। लघु उपदेगत दुग्न महा पितु उठाय बोले वचन ॥३३॥ राटर चरण प्रतापते बन सुब मङ्गल मोहि। मुनि तौरव देवन दरश मोर पमंहित होहि ॥ मोर पर्महित होहि पात विन बियम न सागै। आतुर ऐटो अवधि धरन पनि चरन समागे॥ धरन चरन पुनि श्राय हो आयमु देवय पापत। कुशल क्षेम घर आयहाँ राउर चरणा प्रतापते । ३४ ॥ उत्तर काळेउ न भृप्रमुख राम धरै नृपपाय। कुमति कठोर कुवचन कटु मा कहत मुसक्याय ॥ मातु कहत मसक्याय हृदय जोडन नहि राजा। करि प्रवाध शिर नाय विपिनको सानि ममाला। साजि समाज प्रसन्नमुख गहे मातुपद प्रेम सुख । राम चरस व्याकुल गिरयो उत्तर कयो न भूपमुख ॥ ३५ ॥ मातु गोद मोदति भरे कहति वचन आनन्द। काल्हि निक नप मुग्य सज्यो कितिक बार सुख वृन्द ॥ कितिक गा मुन्व वृन्द लाभ लोचलन सब टौ। सिंहासन सिय .
धाजलिया रामायण। सहित निषि रविशनचुति लूटौ॥ रविधतद्युति ल्टी गावधि मधुर लाल भोजन धरे। न्हाय खाउ बढ़ वार भो मात गोद मालिस॥ ३६ । राज विपिनको मोहिं दयो जहां मोर बड़ काज। राउर चरणप्रतापते कुरज प्राइ हौ सान॥ अशल आइ हौं साज मात आशिष मोहिं दोजे। जान दिवस नहि बार हर्षि मन आयसु कोजे । प्रायत कौजे हर्षि मातुचरस प्रसु शिर नयो। कह मृद दह कर जोन्कि राज विपिनको मोहि दयो। ७n सहनि सुनानौ शनि वचन सिया धरे पग आय। राम बुनाई जानकी विपिन विपति सब गाय । विपिन विपति सब गाय सुमन लक्षण उठि धाये। कहि कहि विविध प्रकार बषरा सिय प्रसु मनुजाय ॥ ससुलार्य प्रघमहि लिया करि विवेक बन प्रिय सदन। उत्तर कछुक न सिय दयो सहमि सुखानी सुनि वचन ॥२८॥ धरि धीरज कह जानको मन समुक्लिय रघुराय। कण्टक- दन नावानल अनिल व्यारा दुखदाय ॥ अनित व्याउ दुख दाय व्यव्र 'प्रहि गन घेरे। सूकर भालु पिशाच विषम बन भय वहुतेरै ॥ बहुतरे उत्पात जे उरन दहे भय भानको। प्रभु वियोग छातौ देह धरि धौरज कह जानकौ ॥ २६ ॥ विपिन प्राणु संग अति सुखौ हासि पात तरु शाह। गिरिगण सरि सरवर मुदित धा तषित नहिं दाह ॥ क्षुधा तृषित नहि दाह निरखि पदकमल तुम्हारे। श्रमपथ तन- क न लेश सकल विधि प्रभु रखवारे ॥ प्रभु रखवार विचारिये तजे जीव जानिय दुखो। त्यागिय मोहि विवेक परि विपिन सापु सँग अति सुखौ। ४० प्रसु सुखपर नहिं प्रण करे उत्तर दीन्हे पाप। तजौ तौ वाण्ड सिया रामायगा। प्राण कहा बनाय पिय समुझि बिचाग्यि पापः समुलि विचा- रिय पाप प्राण तन त्यागि निवारौं। प्रभु सँग जाइय धाय देह वर राखिय डागें: राय डारौं देह घर बहुत महत पातक डरों। सत्य मन्त मन दृढ धरनों प्रभु मुनपर नहि प्रगा करो। ४१॥ बुम रामाण मानी कही राम सिखावन देत। मात पिना पर गोच सब नागहु वसौ निओत । नाराहु वित "नेक अवधपुर भरत नाहों। अप द नरनारि दुखित मम दग्व मनमानी । दु' मगको दूषण तजो मानि मन्त राग्यो महो। दूषण देइहि मोहि नर तुम लक्ष्मगा मानो कहो ॥ ४२ ॥ प्रभु वनमें ही घर रहौं अायसु तज्यो न जाय । वायु ममवश नहीं देह कही तह जाय ॥ देव कही तह नाय भार यह कापर डारो। मैं सेवक शिशु कुमति चरणरज संवनवारी सेवनवाये रज चरण धर्म नीति मग किमि लहा। । अवध कान मेरो रहा प्रभु बनमें हौं घर रहौं ॥ ४३ ॥ मातुचरण रघुवर नये बिदा मागि कर जोरि । धार धाई धागि माता कहति बहोरि ॥ माता कहति बहोरि कठिन उर फाटत नाहौ। ठाढी देनत नघन राम सुत कानन जाहो ॥ कानन जाहि विशेपिके सबके सुख सुति गये। भेटि नाय उर यह को मातुचरगा रखबर नये ॥ १४ ॥ मापायन पुर सांपिक लोन लपण सिय साघ। चले भृप मदिर जहां विवाहेतु रघुनाथ ॥ विदाहेतु रघुनाथ राय उनि हत्य लगाय। नयनधार अन्हवाय राम बहविधि ममुकाय ॥ ससुमाय नृप राम वह सिया प्रेम उर तोपिके * भाट पनि गियो गम चले गा मौपिके ॥ १५ ॥ .
कुण्डलिया रामायण। 89 करि प्रणाम रघुपति चले त्यागि अवध सुखसूत। सब- दो सार संभार एरि सेटि मोहमप शूल। सेटि मोहमय शुत लोग सब व्याञ्जल सागे । रामविरहको आगि नारिनर उठि संग तागे! संग उठि लागे नारिनर कालकर्म गुण दल दले। शिर धरि रानि वखानि कटु करि प्रणाम रघुपति बले। ४६॥ सृप हलाय सुरन्तको सिखदै दयो पठाय। सुनत सचिव आतुर चलो यन्दन तुरत बनाय ॥ चन्दन तुरत वनाय विनय करि राम चढ़ाये। तमसातौर निवास प्रथम दिन रघुपति नाये॥ प्रथम लोग तजि प्रसु उठे सचिव साधि रछ तन्तजो। गये राम जिय जानि सब सङ्ग बुलाय सन्तको ।। ४॥ रामविरह दावामनल भयो अवध वन घोर। पुरबासौ उग सुग भये हैं सुखी सब ठौर ॥ रहे सुखौ सब ठौर- यो सई किराती। बाल व चहुं ओर जरति निशि दिन तन शती॥ अवधि मेघको आश र रहि न सकत तप पठिन थल। सो उपाय व्रत जप सुहृद रामविरह दावा- शनल। 8८॥ राम गये सुरसरि निकट शेवट परम हुलास। वचन सुमन्त बुलापकै बोले राम प्रकाश ॥ वाले राम प्रकाश तात नव व सिपावे। पितुपद गहि मम ओर कुशल सब विधि सलुजावे। ससुझाये कहि कोटि विधि तदपि पत्रो सकट विपाट। चले कर्मवश सचिव पुर राम गये सुरसरि निकट ॥ ४॥ मांगो नाउ निहारिले राम कहे मृदु वैन। सुनत बात दोनट वह सुनिये राजिवनेन ॥ सुनिये राजिवनैन रावरौ वातिया रामायग। पदरज खोटौ। मानुष उड़ि उड़ि जात काठको गति है छोटौ। गति है छोटो मोरि प्रभु बात कहौं डर डारिके। रज मातुन कर मूरिक मागहु नाउ निहारिक।. ५. ॥ तरनि होय मुनिको वरनि मरै सकल परिवार। कोटि करो वानन रोकहो बचन गतबार ॥ कहो बचन शतबार नाउ नहिं तुम्ह छुपाऊ। अपने कुलको हानि होय जो तुम्हें बड़ाऊं तुई चढाऊ नाथ जब चरा प्रज्ञालों निज करनि। बिन भोये न चढाय हौं तरनि होय मुनिको घरनि । ५१ ॥ चरण प्रहाल बिलम्ब कह राप को मुसन्याय। पानी प्यान्या दुई करनि धरतो कठोता आय: भरना कठोता आय गय पनि धोगन लान्या। देवन बर्ने फन कहत यहि समको वाग्यो । यहि मान बहभागोकहा शियविरञ्जि पदकाल वह । पत्य धन्य फदिम का मुर चरा प्रशन जदम्ब सह । ५२ : कौन पार परिवारको चरणमुधाजल प्याय। पौले भार उतारियो निज कर कोमलराय ॥ निज कर कोशल- गय उतरि निय सहित बहारो। केवट लोन बुलाय लेहु उनराई योरौ॥ उतराई योरो लदो ताहि भयो श्रम पारको। दौन देखि मोहिं दोन बढ़ पार कोन परिवारको ॥ ५३ । ते पद धोये आजु में शिव विधि योग कमाहि। जिन चरण नको शेष श्रुति वरणत निशिदिन जाहि । निशिदिन जाहि प्रकट कीन्हो जिन गगा। आशरण शरण पुनीत पगनिको विरद अमगा। मिरद अभंग प्रमाणको धोये सनक समागमें। सकल सिद्ध सिद्धन दई ते पद धोये माजमं ॥ ५४॥ विमल भक्ति बर दे चले राम तयण सिय सङ्ग। वन गिरि हरिमर ग्राम पुर दखत मुगजु विहङ्ग देखत मृगजुबिहङ्ग ॥ बरगत
४६
वजलिया रामायण ।
प्रापुर निगाह नाई। देखि काहिं नग्नारि रामसिय
पिन्दरलाई॥ मिलिग सा जमा देखि भाग तिनके
मले। सने नए योगफल बिमल सक्ति र दे चले॥५५॥
काहरू तुज चन्दतों सामिनि सावत मोहि। कला
होर, शशि शोलकर सौता कतित सनोहि । सौसा कलित
सजोलि स्याम रेजा शशिमाहौं। लिय सुखपर लट भ्याम
सुभग वरणत कविताही: वरणत कवि मृगज कहि यह
मृगनयन उनन्दसो। ताप हरत यह शधिसुनौ एक कहत
सुल चन्दसों ॥५६॥
एक काति सुख कमलसो और न पटतर ताहि। अरुण
सुवासिन पति मृदुग सो सियमख सवगाहि । सो सिय-
सुख एवमाहि शोत सुत वह यह सोता। कवि वरणत हैं वाहि
चाहि मुरव सुयश पुनौता ॥ सुयश पुनीता दुग्नको भ्रमर मित्र
युग मुबललो। और कही उपमा लगै एक कहति सुख कम-
ललो ॥ ५०
सौतामह सो मुख हौ कमल चन्द्र सो नाहिं। कमल
सन्द है रजनि द्युति चन्द मन्द दिनमाहि! चन्द मन्द दिन-
माहि राष्ट्र हिमिशनु लदाई। लौतामुख अरि नाहिं लोक-
तिहुँ खोजा जाई॥ लोकतिहूँ यह विदित है घटै बढ़े
निशिदिन लौ कमत चन्द पटतर कहाँ सीता
मुख
सो
मुख वाद्दौ ॥ ५८॥
एक कह पुर धन्य है मातु पिता पुनि धन्य। जिन देखे
ते धत्व है जहाँ जात धन धन्य । जहाँ जारा धन धन्य
बिटर निरिसरि सर जेते । खग मृग निरस्त धन्य वसा घर
बैठन तते। बैठत तेते सङ्ग हलि बोलत चितवत धन्य हैं।
धन्य पाय वन धन्य हैं हम देखत अति धन्य हैं ॥ ५८ ॥
साएर तिया रामायण। राम तषगा सौता सहित देखि प्रभाव प्रयाग। न्याय डान दोन्दे विजन प्रौति सहित अनुराग ॥ प्रोति सहित पनुराग दर्शन सहिन पाये। दुख सुख सबको देत पाप त्रिपाम पाये। आअन आये सुनत यषि भरद्वाज पानद लहित। पासन प्रादर मुनि कत्रो राम लषण सौता सहित ॥ ६॥ राम तुम्हारे दर्शते यह फल प्रकट दिखात। नेम प्रेम जप गोग तप तोरथ बत दुख गात ॥ तोरथ व्रत दुख गात प्राणु सत्र सुफल हमारे । राउर आगम लहत नयन मुख सुखद निहार ॥ सुखद निहारे सुख भयो तौरय राउर परशते । भया मोर मङ्गल परम राम तुम्हारे दरशते ॥ ६१ ॥ भार प्रयाग नहायके राम लषण सिय साथ। चले मनो- हर मनहरन वन्दि चरण मुनिनाय ॥ वन्दि चरण मुनिनाघ मदन रति स्तुपति मानो। ब्रह्म जीवके मध्य लसत माया छवि जानौ॥ माया छवि लय देखिधौं उमाशंभु गण नायकै। चले किधी सुरपति शची भोर जयन्त लिवा- यक। ६२ ॥ पन्य चरित सिय रामको सबसुख मग लदाय । लपण सियदर्थते खग मृग सुखौ सुभाय । खग मृग सुखी सुभाय परमपदके अधिकारो। को न लहे सुख सकल सुखद वर वदन निहारो ॥ वदन निहारि सप्रेममय भरयो पर्म सुख धामको। रि तरु खग मृग नारिनर देखि चरित सिय गपको ।। ६२॥ बालमौकिपाश्रम गये सिया लषण रघुराय। प्राये मनिवर मिलनको भेटे हदय लगाय । भेटे हृदय लगाय पूजि परिपूण कोन्हे। पासन आदर देय फल फल अवर दोन्है । राम जलिया रामायण। પૂર शरदोहे अमिय सम पास्तुति आनंद मन भये। सकल सिङ्ग साधन सुफल वालमौकियात्रम गये । ६५ । जाने हित मन गोत्र सित साधत साधन धाम। मोह- मदादिक गुण तजे अहनिशि जागत याम । अहनिशि जागत जाम जापतप योग विरागे। मानस ब्रह्मणि रुप रहत निशिदिन अनुरागे॥ निशिदिन अनुरागे रहै ज्ञान ध्यान मन्दिर लहित। सो प्रत्यक्ष सृरति लखौ जाके हित मन गोल सित ॥ ५ ॥ राम धो कर जोरिकै सुनिनायक सुनि बैन। आश्रम पावन दौजिये नही करौं शुचि अयन॥ जहाँ करौं शुचि प्रयन दिवस का तहाँ विताऊं। जानत कारण सकल कडा कहि प्रक्ट जनाऊँ। प्रन्ट जनाऊँ अाश्रम न देहु सुनौश निहोरिक। चलिय रुपा करि देहु मुनि राम कहेउ कर- . । जोरिक। ६६ ॥ सुन्दर गिरिगण सरित बन दौख जाय मुनि सङ्ग। कहत महातम पर्य यल देखि होय दुख भङ्ग, । देखि होय दुख सङ्ग सुखी खगमृग वनचारौ। तरुवर फलित विभाग सुधासम सुन्दर वारी॥ सुन्दर जल थल निरखि यह चित्रकूट मङ्गल सरित। पावन करिय विहारथल सुन्दर वन गिरिगण सरित ॥ ६॥ राम लषण प्राश्रम करो चित्रकूट सिय सङ्ग। मनह विपिन वसि तप करत रति ऋतुराज अनङ्गा रति ऋतुराज अनङ्ग राम लखि सुख वनचारौ। भरि भरि दोना सफल भेट धरि वदन निहारी । वदन निहारि निहारि सब मगन सदन मगल भयो। विपिन भयो कामद सुखद रामलषण प्रश्रम करो। अब सुमन्त अवधहि चले राम बिदा जब कौन। हय न ५२ ॥ 7 कुण्डतिया रामावग्य। चति रघुबरबिरह सचिव भयो दुग्न दीन ॥ सचिप भयो दुल दो गिशित घाकि 7 पायो। किल विषाद निकी म केवट पहुँघो केवट गृर गायो बरि सोक पाय नवप्सर भजे। हानि गलानि निहाल उर 'प्रय सुमन्त हि चले ॥६॥ कर घुमन्त गई रापसिथ उठे मिकत नरनाह। सचिन हृदय भेटेउ रपति नयगन नीरप्रनाम। नयनन नीरप्रवाह सचिवमन बोलि न पायो। रामसिया सन्देश साल मुग्व पनि न पायो करन न पायो मुग्नबचन ब्रझन्धपध यो जिय। गनण रामसिय रामसिय कहु सुपन्त र राम- मिय: ००॥ भूपभयन रोक्न परमो रानी पुर नानारि। प्रवधनाथ अषयो मन रविनिशि अवध निहारि॥ निसि सम पवध नि.रि गारि सब समति दे। विपति वियोग कुयोग पतह दृढ दौति नेई॥ दोन्हति सबसहं दुसह दुख हिक करता प यत्रो। हाय हाय लायो नगर भूप- भवन शेटा पयो॥ ७१ ॥ रात्रि सूप रात करि यरान कह वशिष्ठ समुझाय। दून पठाये भरनपहँ पार चार बुलाय ॥ प्रातुर चार बुलाय भुप गति प्रकटे नाही। गुरु बुलाये भरत बेगि से गमनहु नाती॥ गवनोन फिर नाय तब हयगति मारग सुनि वचन । मुनि बुझाय रानो सकरा राखि भूपतन करि यतन ॥ ७२ ॥ गृहमंश शाये भरत पाशकुन नगर नगौच। खान हगाण उतूक खर बोल्न अशुभ कुनौच ॥ अशुभ अनीच भात मति गति बिति नाहौ। भरत देखि नरनारि बाम दाहिन चलि पाहौ । बाम अवधपुर देखिकै दुखन्वरसों एहलिया रामायण ५३ शनौ जरति। घरत पार्न डगमग परत गुरुसँदेश आये सरत ॥ ३॥ शरण साजन लाजिकै सुन आगमन विचारि। ले शाई कयसुना त भारती उतारि॥ सुत भारती उतारि माय दोउ अमते मुले। पियो न जल पल बैठि शुलके असर शूते ॥ रहर शूल विचारिक कुशल पूछि निजराजिके। बोलो सुतवाहक वचन भूषण भाजन साजिकै ॥ ७ ॥ कुगल राञ्च सब काजमै राख्यों पुव सुधारि। भई मन्थरा परमहित दुख दूषण सब जारि । दुख दूषण सब जारि राज सत्र तुम्हते जान्यो। कण्टक भे सब दूरि अगम वर पसन माग्यो। अगम सुधारौ बान में तृप सुरपुर सुखसाजसैं । पाशुक विगारो विधि यह कुशल राज्य सब काजमैं ॥ ७ ॥ गमलषण सिय दन गये मरे भूप तेहि शोच। तुमकह राज्यविलास प्रब कीजे छाड़ि सकोच । कोजे लादि सकोच होत सब विधिका कोनो। मरन जियन जग रीति लेहु पुर राज्य नवौनो ॥ सच्च सुनत व्याकुल गियो रोदन करि सुति सध्। तात तात हा तात कहि रामलषण सिय बन गये ॥६॥ परन कौरा सुहँ जसो वर मांगत जड़ तोहिं। कुमति कठोर न चप लम्बी मिथ्या जन्मे मोहिं ॥ मिथा जन्म सोहि वॉक त भई न काहे। ऐसौ कुमति कठोर कर्म करि मो उर दाहे। दाहे उर खल वचन मुस्त्र राम बिपिन- कह मन धरयो। को तू काके रूप धर परं न कौरा मुख जयो। ७७॥ पौतम मारत नहि डरी बन पठये सियराम। प्रेत पिशाचिनि रूप तू भई कहांको वाम ॥ भई कहाँको बाम है ॥ . कुण्ड लिया रामायण राम तोहिं अनहित लागे। जोहसि सो उठि बैठु बोट तजि पोखिन आगे। आखिन आगेते टरै धिक मैं जन्मत्रों जोहि वरी। रामसुवन पठयै बनहिं पौतम मारत नहि डरी ॥ ७ ॥ पाई दुखदायिनि निया नाम मन्थरा जाहि। भूषण- भार टू गारि तन रिपहन लखि चष चाहि । रिपहन लखि चष चाहि दौरि पग कूबर मायो। परो धरणि धरि कोण घसौटत तनक न हाम्रो । तनक न हाम्रो बोर तब भरत जाय रक्षण किया। उठे त्यागि कुल दाहिनी आई दुख दायिनि तिया ॥ ७ ॥ उठत कोशला गिरि परौं भरत देखि उठि दोरि। लौन्हे हृदय उठायके आँगन गिरौं बहोरि आँगन गिरौं बहोरि रोय दीन्हों दृहुं भाई। मातु लगाई कण्ठ अनधारा नह- वाई ॥ नह दाये चपनौरते बीर भरत धीरज धरौ। विकल भरत समुझावती उठत कौशला गिरिपरी । ८० ॥ अञ्चल नयन लगायके आँसू पोछति मात। तोहिं विना सुत यह दशा उठन न पैयत गात । उठन न पैयत गात रामसिय बनहिं सिधाये। पुर परिजन भे बिकल लषण सिय वहु समुझाये॥ बहु समुझाये नहिं रहे राम चले सँग लायके। सुनत भरत जलसों भरे अञ्चल पोति धायक ॥१॥ मातु जगत जन्मत्रों वृथा भई न केकयि बाम। राम सिया अप्रिय भयो अयशमुल जगाम ॥ अयशमूल जगमाम जासु हित यह शति तारो। जन्मत हत्यो न मोहि देति विषमाहुर घोरो॥ माहुर दै माग्री जगत कुल कुटारि उपयो यथा। नपगति यह रघुपति विपिन मातु जगन जन्मत्रो वृया । ८२॥
वजलिया रामायण । ५५ सुर गुरु दिन पातक परै जो जानत यह बात। बाल वालवध अघ अयश गाय गोठ पुर घात ॥ गाय गोठ पुर धात मौत सप माहुर दौन्हे। परधन परतियहानि परै अघ गोवध कोन्ह ॥ गोवध निदावेदको पर अपकारौ अघ करें। जो जननी जानहुँ तनक सुर गुरु द्विज पातक परं।८३॥ परघर अग्नि लगावहीं अपथ पन्थ पग देय। वल करि जिय परधन हरे रण भगि अपयश लेय ॥ रण भगि अपयश लयं मातु पितु विप्र न मानें। हरिहर पदते विमुख भूत प्रेतन उर आने । उर आने तौरथ कुछत निन कुटुम्ब तण लावहौं। जो जानों तो अघ परै परघर आगि लगा- वहौ। लोभ मोह फासे हैं साधु सङ्ग नहिं लेय। मौत विप्र इल कष्ट लखि अशन नौर नहि देय ॥ अशन नौर नहिं दय कूप सर वाग विध्वंसें। तन पोषक विन तोष महत विष धन पर अंसें। पर अं0 जे नित धरै कुवचन बोलि छाती दह। तिनको गति विधि देहु जग लोभ मोह फासे रहैं ॥८ ते नर जग हो तै मरै करें जन्म भरि पाप। रणमण्डल अपयश लहैं देहि विप्र गुरु ताप ॥ देहि विप्र गुरु ताप बसत घर लाय उजारें। सन्तसभा नहिं वेठि मृषा मुख वचन उचारें। सृमा साखि जग उच्चर नित्य गरि उठि गृह करें रामसिया जेहि प्रिय नहौं ते नर जग होते मरें ॥ ६ ॥ तुम सुत शपथ न खाचियो राम प्राण प्रिय तोहि। तुम रामहि अति प्रिय सदा विधि गति वाकी होहि ॥ विधि गति बाकी होहि देह दूषण जनि काढू । कर्म प्रधान किसान व- काण्डलिया रामायगा। वे तुनियन सोइ ताहू ग बयो नियत जगतमें भूप मरे हम बाचिये। राम चले प्रायान चले तुम सुत शपश न खोचिये ॥७॥ वहे भोर मुनि पायगे बैठेहि रैनि बिहानि। भरत बुझाय वशिष्ठ मुनि भूपकिया बिधि आनि ॥ भूपक्रिया बिधि 'पानि दाह सरयूतट दोन्हो। रानिन केर प्रबोध भरत पायन परिकोन्हो॥ पायन परिकरि कर्म सव तिल पञ्जलि मन राग। भरत मिखाये मृत करम बड़े भोर मुनि पायके॥८॥ ध्य गय मणि भूषगा दये सिंहासन महिसाज। धेनु नमन पायव चवरहन पान शिरताज ॥ छत्र पात्र शिरताज वमति गनि मनि जस भाषो। शत शत कोन विधान भरत का भिनायो। करि करतूति प्रमाण जस सब प्रकार विधिवन भये। शुद्र मिद्ध करि काज सब हय गय मणि भूषगा दये गुढ़ भये मुनिवर गये जहां राजदरबार। नगर महाजन विप्रजन सचिव सुभट सरदार । सचिव सुभट सरदार बानि पठई सब रानी। भरत शत्रुहन साथ बोवि लौन्हे मनि ज्ञानो। मुनि ज्ञानी पेठारि ढिग मधुर बचन बोलत भये। गनसभा दरबार सब शुद्ध भये मुनि वर गये ॥ १० ॥ नृपनि प्रेम पूरण कियो तेत्रिको शोचित नाहि। जाको याम शादी को नहि देखि तिहादि। को नहिं देखि महा िभोग सुरपति सम कोन्हो। राम वियोग रुशात् पाल न: ढग परि दाडे। राम अपण तुम शत्रुहन चारि सुवन लम्बि भगजियो। बिरि गयो सुरलोक वर स्पति प्रेम पूरण कियो । ८१ .
सुरजतिया रामावगा। ५० राम लभाव सनेहको कहिय कोन विधि गाय। पितु | मायसु तुरतहि उठे सब पुरजन समुलाय सब पुरजन समुलाय लिया लषणहि ससुझायो। प्राण तजौं यह जानि तर करि शोचन आयो॥ शोचन ज्ञायो भूपको भूपति वचन लेहनो। धर्मशीत गुणको कहै रामस्वभाव तनेझो। २॥ कठिन लेक्यो का कहौं कहतहु कही न जाय। कुमति मागि बायकै दौन्हो अवध लगाय॥ दोन्ही अवध लगोय राम लिय बनहिं सिधाये। पर परिजन मन शोच भूप हठि प्राण पठाये॥ प्राण गाये भूपवर भावी गतिको नहि दहौं। विधि विधता ति कठिन है कठिन क्यो नाहीं ॥ खुए वचन प्रिय प्राण नहिं सरत सुनौ सतिभाव। सो फुकुरको किय शिर धरिम धर्म म ति श्रुति गाव ॥ धर्म म ति अलि गाव तजे रघुबर जेहि लागौ। मातु सचिव पर लोग जरत जर नाश घागौ॥ नाशहु झागौ अवधको अवधि नोलर पाच तहि। दोप न क मानन बगै भूपवचन प्रिय माग नहि । ६४ महत कौशला पाय परि पून सुनहु गुरु वात । भूप नरं रघपति गये तुम यहि विधि कदरात । तुम यहि विधि कदरात नवा उत्पात विचारो। कालकम गति वाम कुदिन सुख कोजिय कारौ ! कौजिय गुरु प्रायसु मुदित पुर परि- जन शिरलार धरि। पालि शोच सबको हरौ कहत कौशला पाय परि॥६५॥ सरत नग्न धारा चलौ सुनि गुरुजननी वेन। हाथ जोरि बोले नधुर जल उपड़े दो नैन। जल उमड़े द्वौ नैन ५८ ॥ कुण्टलिया रामायन । सौख भलि दोन्ह गोसाई। मातु कहेउ उपदेश मोहिंपर दया सदाई॥ दया सदाईते कहत सचिव मातु गुरु हित भले। उतर देत पातक लहौं भरत नयन धारा चले ॥६६॥ पायन पनहीं नहिं धरौ राम विपिन किय गौन। भूप मरे प्रण पूर करिताको शोचब कौन ॥ ताको शोचव कौन घाव यह तीनण लाग्यो। यहै पौर नित दहत रयन भरि शोचन जाग्यो॥ शोचन जाग्यों निशि सबै जाति सबै छाती जरौ। राम लषण कटिपट तजे पायन पनहौं नहि धरी ॥ ७ ॥ प्रातकाल करि हाँ यह सुनहु सत्य सब बात। धर्म जाय गग अयश लहि नरकहु दुख सहिगात॥ नर कहुदुख सहि गात जना भरि मङ्कट होई। सत्र दुख दावा दही अनल बरु डारटु कोई। डारह कोय जुवाल ज्वर सकल दोष दुख भरि रहे। जाह अनुजयुत बिपिन कह प्रातकाल करि या यह ॥१८॥ गरगा सामुहे देखिकै रघुपति करि हैं छोह। शौल म्वभाव सम्वोमिका ममुहे जनपर मोह ॥ समुहे जनपर मोह राममिय बाम न काह। में शिशु सेवक नीच कुमति र प्रकटेउ ताहू ॥ प्रकटेउ विधि अघ अयश लै नीच दास शिण लेखिके। रामसिया करि हैं कृपा शरण सामुहे देखिकै ॥६६॥ भरत वचन लखि रवि नगे रामविरह निशि पाय। भृप- मरण कैकय कुमनि निमिर रहेउ पुर छाय। तिमिर रहेउ पर काय मुर्छि मोवत नरनारी। लषण सियाको विरह व्याव वृक गर्जत भारो। गर्जत भारी भय विकल तारागण मुनि दिन लगे । दुखद सेन सोवत विकल भरत बचन नवि रवि जगे । १०० ॥
५८ J कुण्डलिया रामायण। सबके मन सब सुख भयो भरत भलो मत कौन। दुख ससुद बूड़त सकल जेहि अवलम्बन दोन ॥ जेहि अबलम्बन दौन सभा सब उठि से ठाढ़े। रामचन्द्र सिय दर्श मन्त्र नर वारिधि बाढ़े॥ वारिधि बाद लोग सब भरत मन्त्र सबही लयो। साजि साजि वाहन चले सबके मन सब सुख भयो । १०१॥ भरत साज साजत भये मातु सकल पुरलोग। चले चित्रकूटहि भरत रुश तन रामवियोग ॥ कृश तन रामवियोग चले सजि साज समाजे। पायन पनहौं त्यागि शौश नहि सुषण राजे ॥ भूषण साजे त्यानि भाय मातु सँग सब लये। रामप्रेम पूरण भरे भरत साज साजत भये ॥ १.२ ॥ तमसातौर निवास करि प्रात समाज समेत। सुरसरि देखी जाय तव केवट कहत सचेत ॥ केवट कहत सचेत भरत सेना सँग लीन्हे । समुकि निषाद विचारि कपट अन्तरमह दोन्ह ॥ अन्तर कपट विचारिकै सजग होउ सब घाट धरि। राम जानि वन भरत सजि तमसातौर निवास करि। १०३ ॥ रामकाज जमाह सुभट भरत रामके भाय। मैं सेवक रघुवीरको लोहे देहुँ अघाय ॥ लोहे देहुँ अघाय सुभट विन कटक निहारौ। हय गय रथ जल बोरि पाउँ पौछे जनि धारौ। पाउँ न पीछे कोउ धरह राम ज अरु गङ्गतट । मोर निहोर विचारिकै स्वामि काज साह सुभट ॥ १०४ ॥ पहिरत अगरौ धनु धरत भई छौंक गति बाम। सगुन सगुनिया कहि चल्यो सगुन सुपङ्गलधाम ॥ सगुन सुमङ्गल- धाम भरत नहिं कपट कुचालौ। राम मनावन जाहिं सग ल मातु सुचालौ । सङ्ग मातु गुरु सचिव सब लोग राम साहतया रामावगा। गोजनि जरत। सहसा कार्य न कोजिये पहिरन तातो पनु धरत॥ १-५॥ समुमा भेट प ल चले मग पग धन पट मोन। मिलन साज सर सज लिये पुरजन पर तीन। पुरनन परम प्रवीन पिलो मुनि माग रामरागुनि त नले मिलने म त्यागे॥ रग लागे ओवन को नाम जाति पर जन म। भग्न गयो उमगत नाव नजि गेटि नाचले ॥ १० ॥ भग्न कुशलपयो सव हशिनो को। बस लपि कुगल मन प्रादर्शन जब दीन । प्रदशनी लन्त सकत दुमदार घगने। अनितो आपने पति राम जश सेवक जाने मेवक को पुगानि ताग्नि सादर जये। हे अशोष जनु नपगा मम हेतु कागल परी राने ॥१०॥ मब गपास मवको भयो सुरमरि भारत महाय। राम- मया मेवा करो मनको बाग शिवाय " जबको पाल दिवाय रयनि मत्र तहाँ नगर्न। एकहि खेवा पार किटी कैवट उतराई 7 गेयुत चले प्राग माग तिशो। रामर्श लातच हृदय सबसपामलको भयो ! १०८ ॥ न्द्राय प्रयाग प्रणाम करि दान दोन सुख पात्र । भरद्वाज आश्रम गये किले पनि वैठाय निले पूजि ठाय कलो हम सब मुधि पाई। कगन काह सह भरत प्राणसम प्रिय रखुराई ॥ प्राण गमान गर्न प तजि जतानि जनि हृन्य धरि। निशि ऋषि कौन सुपास सब प्रात नहाय प्रणाम करि।२०६॥ गमनाम रमना तिन व्याग रान लियरूप। श्रवया या रबुपति सगुणा हृदय चरित्र अनृप ॥ हृदय चरित्र उतराई॥ - - वातिया रामायगा । ६२ एनूप परत पन मान बरा डोलें। शिथिल सनेह गँभौर राम सिय सुख भरि बोलें ॥ सुख भरि बोलें रामसिय पन्थ रुपयह निश्चलिता वर्षत सुर जय जय कहत रामनाम सना ललिन। ११ सुन्दर वन गिरि गण सुदित मृग विहग कपि माल। प्रसु- हित प्रजा समाज तर राजा दुखद सुकाल ॥ राजा सुखद मुगल मल तरु पल सुखदायक। सुधा सरिस सरि- वारि कर्म अघ नोगुणखायक ? औगुण छल दल दपट दुरि काट दिए केरि विदित। केवट भरत बताइयो सुन्दर वन पिरिगण सुदित ॥ १११ ॥ नाघ बिटप बट तत तरे कौन छावनी राम। सिया बनाई वेहिका निज कर ललित तलाम। निज कर ललित ललाम राम शुभ आश्रम नौको। सुनिगण कहत पुराण सुनत किनजरअलटीको। दिनकरकुलमण्डन महौ दुख खण्डव कति जय हरे। रामसिया लक्ष्मण लखौ नाथ विटप रु बट त ॥ १२ ॥ जाय सरन गायन पर बाहि त्राहि अगवन्त। अशरण- शरण प्रताप जग यादि-मध्य नहि अन्त ॥ आदि मध्य नहि अत्त प्रगत जननक स्वामी। शील स्वभाव विचारि शरण पर रज अनुगामौ॥ अनुगामौ शिशु औगुणौ धाय पानि प्रक्षु पद धरे । बाहि बाहि रक्षक प्रभो जाय भरत पारन पर । १२३ । भरत प्रेम रघुबर शिथिल उठ शरीर बिसारि। धनुष तौर पट शिर मुजाट जटा दये छिटकारि । जटा मुकुट छिट- कारि नयन उसँगे जल धारा। दुहुँ कर लियो उठाय मगन नहिं कह सँभारा॥ देह संभार विचार तजि माय लाय कुण्डतिया रामायगा। उग्में विकल। देखि दशासुरगण तसित भरत प्रेम रघुवर शिथिल ॥ १२॥ जोडि न भावन शिथिल दोउ भाय प्रेम परिपूरि। मन अधि नित हिन लायके करि कुतर्क सब दूरि ॥ करि कुतर्क मादूरि राम पनि केवट भेटे। लषगा भरत पनि मिले शव- इन उर दम्ब मेटे । मेटि दमा उर दाह दुख भरन शीश पद धरे दोउ। मकल मभा मुनिगया मगन छोडि न भावत मगन हो॥ ११५ ॥ पट गुरु आगमन कहि राम उठे सब सङ्ग। धरे जाय मनिपकमल भेंट मनि धरि अङ्ग॥ भेटे मुनि धरि अङ्ग र प्रायहि निवाई। मातन भेटे आय मनहु शिशुधेनु गई । धेनु तुगई गति मिलौ लिय सासुनके चरण गहि । गटन कात विलाप करि केवट गुरु पमरगा कहि ॥ ११६ ॥ भय शुद्र मुनि वचन कहि भरत राम सब भाय । सब ममान करुणा हरप मातु सचिव ऋषिराय॥ मोतु सचिव ऋगिय भरन विगती उठि कोन्हो। श्रीरघबर मवच मकल गति मति रति चीन्ही॥ मति गति चौन्हि मनह सब अवश करिय सोइ आजु.लहि। चलिय अवध नृपता करिय भये शद्ध मुनि वचन कहि ॥ ११७ ॥ अायसु प बनको दयो सोई धरि शिर भाज। तुमको पितु पाको दयो पूरण राज समाज : पूरण राज समाज हमहुँ तुम आयमु कोजे। पालिय पितुको बैन जन्म अभिमत फल लीजै। अभिमत फलति न जग लदो पितुआयसु जिन शिर लयो। वचन न ग्वण्डित सो करो आयसु नृप बनको दयो॥ ११८ ॥ जो बृति कहत मुसत्य है भरत कहत कर जोरि। पितु प्रायमु गिर राखिये परमधर्म शत कोरि॥ परमधर्म शत कुण्डलिया रामायण। uly कोरि तदपि पितु तियवश होई। सन्निपात अतिवात वारू- णो सेवत सोई। सेवत सोई रोगवश वचन कुयोग अपत्य है। समुझि नाथ कोजे उचित जो श्रुति कहै सो सत्य है ॥ ९२६॥ प्रसुरुख लखि मन प्रण कियो गये गङ्गके तौर। जल उठाय सङ्कल्प करि जो न चलें रघुबौर ॥ जो न चलें रघुवीर देह तणसम तजि डारौ। तन मन अर्पित देखि गगतिय वेष सुधारौ॥ वेष सुधारो एक मुख ढिग उपदेश सुधारियो। सुतु विवेक रामानुजे प्रभुरुख लखि प्रणमन कियो । १२० ॥ सत्य सच्चिदानन्द हरि राम सकल सुर ईश। ताहिन सुत भ्राता गनौ सर्वोपरि जगदीश ॥ सर्वोपरि जगदीश शम्भु विधि हरिकारण कर। पद पताल शिर गगन लोक कर उर गिरि सरवर ॥ गिरि सरवर धर अङ्ग- सब भरण हरण घिति पनि भरि। हठन करो आयसु धरौ ब्रह्म सच्चिदानन्द हरि ॥ १२१ ॥ जन पालन खलगण दहन चले विपिन सुरकाज। महौदेव सुति द्विज विकल मुनिपालन तपसाज । मुनि- पालन तपसाज जात दश कण्ठहि मार। करि प्रमाण निज कर्म अवधपुर तिलक सुधार ॥ तिलक राज लीला करहि महौ मोद सुख निर्वहन। उठहु राम नायसु करो सुरपालन खलगा दहन ॥ १२० । शुभ आनन सुनि के भरत मगन भये सुख वन्द। भई अष्टि अशीश है श्रवण सुधा शुभ छन्द ॥ श्रवण सुधा शुभ छन्द भरत अानन्द सिधाये। औरघुवरपदकमत प्रेम धरि गोश नवाये ॥ भौश नाय विनती करौ देह पादुका शिर धरत । करत अटन तीरथ विपिन शुभ आनन सुनि सिख भरत ॥ १२३ ।।
दागड लिया रामायगा। मगन समाज समेत सो चित्रबाट बन देखि। सुखद राम कवदन लग्वि जोवन सफल विशेषि । जोवन सफल विशेषि भग्न गोरा गुलाये। निदाहेतु गुरु बचन करे सबकह समु- माये गा मोम बेटे मिले चले सगाम सनेहमों। गि पर चामगि नगन समाज सनेहसों॥ १२४ ॥ गम भरी पेमको को कविवरणात पार। नेम किया वर्णन गण पाचोर। कर्म परम आचार वाणि गमानन हार। मति जर बरणहि काह मसक नभ अन्त पिर॥ मग पन्त किमि पावई गगन उनै करिनेम को। नांगदाग गठ यों कहे राम भरतके प्रेमको । १२५ ॥ अंग अवध पर लोग रात्र भरम बसे पुर त्यागि। नन्दि- যা লি শুনি হল নব দৃষিণিগি লি সি নিমি दिन मनि बन गावि पाद का नप करि सवै । काग गा माग कान पूजन दिज देवे॥ देव मनावत ग्रयधिहिन गा गमागम होय कन। तुलसिटाम मुनि दन धन बम रावधपर लोग मव ॥ १२६ ! इनि अयोध्याकागद समाप्तम् २॥ - गन- अथारण्यकाण्डमारम्भः॥ फटिकशिला सुन्दर सुखद बैठे सिय रघबीर। सुमन लषण प्रानहिं सुभग सुरभित सुमुख समोर ॥ सुरभित सुसुन समोर राम सिय सुषण साजे। अङ्ग अङ्ग प्रति रुचिर कामरति तखि रवि लाने॥ लखि लाजे रति काम तन इन्द्र- सवन भरमें दुखद। परब्रह्म श्रीराम सिय फटिकशिला सुन्दर सुखद॥ १ ॥ समुझि मनुन अवगुण क्यो हत्यो चोंच तन काग। रुधिर देखि घर सुमनको कौन्ह क्रोध करि त्याग । कीन्ह क्रोधकर त्याग लोक लोकन भ्रमि आयो। मति गति विह्वल विकल मोह माया भरमायो। मोहअन्ध नारद लख्यो पाय सोख पायन पत्यो। बाहि त्राहि रक्षा करो समुमि यतुज अवगुण कत्यो ॥ २ ॥ एक ऑखि करि प्रभु तज्यो कर्म कौन वड़ धोर। पा- निधान समानको प्रणतपाल वरजोर ॥ प्रगतपाल वर- जोर चरित सुर नर मुनि गावें। चित्रकूट बस सुखद जानि सर आश्रम भावें॥ प्राश्रम विदित विचारिके विपिनसान सब तन सच्यो। अनि जहा पाश्रम गये चित्रकूटथल प्रभु तन्यो ३ ॥ ऋषि अनन्द भेटत भये देखि लषण सिय राम। श्रासन बेठारे मुदित पूजे अभिमतकाम । पूजे अभिमतकाम जानको लेन लाई। अनसूया पट दौन नित्य नूनन सुख-
.
जागतिया रामायगा।
म मखदागन उपदेश हैं पनिबन धर्मनि सब दये। पादर
मानि का नो भये ॥ ४ ॥
।-, "किमी पभ भा !ि रूपमा रघुराय। चले
-:: : डेमा पाय॥ महामुदित मन
-1 157 गुमि भ गे गुमागे। गिजा तप करहिं योग
नरोप शिलागे॥ होम विनारि संभारि हरि आशिष
भागों दगो। मजलमय सानन भयो बिदा अनिसों
प्रभ भगो ॥ ५॥
निगि मग साब भये देखि जाय सरभङ्ग। परि-
[[पि प्रा प्रफुलिन अङ्ग ॥ प्रेम प्रफुल्लित अज
ifr पर विनय नला। करि निहोर रचि चिता अगि
"रि दोन लगाः॥ दोन अग्नि नन अर्पिके राम लषण सिय
उड ये। गया धाम योएम लखि बधि विराध मग सुख
संय॥ ६ :
मिले सुतीनण धायकै पुलकनयन जलधार। जेहि
विधि गिव योगोश मुनि ध्यावन हृदि आगार ः हृदि मन्दिर
ध्यान मदा आये तेवन आजु है। देखों नयन सनेह भरि
गा। सुख रघुगन हैं। अन्तीमो धारि मन मूरति नेह
ननायक। राम जगाये प्रेन परि मिले मुनौक्षण धायक ॥ ७॥
सङ्ग गयो मगमै चल्यो जात लखत प्रभु रूप। कृषि
गामिटर ग्रम गये इघि म कल मुर सुप॥ हर्षि देखि सुर
Hiन साग बन्यो। त्रासन आदर पूजि वेद
नति पनि जान्या । जान ठानि व पानि प्रभु मधुर
व वम वाल्यो भल्यो। शुभ अस्थान वताइये सङ्ग गयो मगमें
चयी ॥८॥
- सुरलिया रामायण। शुभ गोदावरि समिर सुन्नर इट युरधाम । पन्चवटी छात्रा करिय ति पावन नौ ॥ अति पाचन और हर्षि निगनकाई। शुभ घर नरु मग देखि अटो रङ्गल- मय शई॥ मतमय कच्चायल राम लषण सिय शुभ चरित । कहत ज्ञान वैराग्य जनु शुभ गोदावरि वर सरित ॥६ जान सक्ति बेराग्य जनु को विधितिय सुत प्राप। महा- देव गिरिजा गणप लोन्हे कर शर चाप ॥ तीन्हे कर घर चाप मदन रति स्तुपति तौनो। परमारथ अरु योग प्रौति न्तु नर तन बौनो: नरतन कोनो बौररस शान्त और रङ्गार भनु । कम्ठ शेष सन्धेतुको ज्ञान भक्ति वैराग्य जनु [१० मन मोच्या तुन्न कलि वचन भूपनखा लखि राम । मदन- बाण उरमें लगो सुनहु डॉवर घनश्याम ॥ सुनहु छाँवर घनश्याम मोहिं दालो अब कौजै। हौं कुमारि छविधाम भगिनि रावण गनि लौजे रावण भगिनी जानिकै रमौ सा करिने सदन। सुख सम्पति सिधि पाइ हौ मन मोखो मुख कहि वचन ॥११॥ सत्य नही बाणो मृदुल गजगामिनौ विचारि। लषण चमारे विननिया मेरे लग यह नारि मेरे सँग सुनि नारि लवणको शेर सिधाई। लक्ष्मण सयो सक्रोध लान तोहिं तनक न आई। तन मन लाज न तोहि लकति निलज औरेहि नक्षत। गई रामपहं क्रोध करि सत्य कही वाणी मृदुला ॥ १० ॥ हाय मनुसि धावन सई रामवचन चित चाहि। धरे प व्यंगट विकट समय मिया मनमाहि समय लिया मनमाहि राम वह लमग निहारे। लन्ना लाव कान मालिका काटि निवार। काटि निवारे अङ्ग शुभ अशुभ कुरलिया रामायगा। पमा मुम्बई। खरदूषणा पहँ गय विकल हास समुमि भारत भई १३॥ करि प्रवोध सेना सनी खरदूषगा मन क्रोध। राम माये लगालो सिय गिरि राखिय शोध! सिय गिरि राजो गोवि दनुजसेना यह पाई। भानुयान छपि गये धूरि नामपदल झाई॥ ज्ञाय धरि नभमें रही दुन्दुभि दौरव अति गो। सोतहि राखी कन्दरा करि प्रबोध सेना सनौ ॥१४॥ घर धाम बोले व वन लाख छबि दूत पठाय। नारि समिर नप करे दूग यह आय॥ कहे दूत यह आय राम तेहि उत्तर दीन्हो। सुनि खरदूषण क्रोध सभट लै दपिन कोहो ।दर्पित डारहिं प्रत बहु धरि सफल असि क्ति बन। मन मेघ वर्षत अचल धरह धाय बोले वचन ॥ १५ ॥ राम मानि शारम भर चले विभिख जनु व्याल। कटे विकट खा उर चरण भज महि गिरहि कपाल । भुज महि गिरहि कपाल विकल भाजहिं लखि शायक। खलदल सभय सगोक निरखि खरदूषण धायक ॥ धाय क्रोधि गायक तने रहे पूरि दिशि गगन धर। सजि पावक्रशर जारि तम राम साजि गारङ्ग शर । १६ ॥ खलदल वृन्द निहारिकै प्रभु मन कोन विचार । रामरूप लौनो कटक सब लरि मखो अपार ॥ सब लरि मस्यो अपार । कौतुक लखि सुर मगन रामको चरित निहारें । चरित निहारि पुकारि सुर बर्षि प्रसून सुधारिक। जय जय जय महिभारहर खलदल मरन निहारिक । १०॥ खरदूपण निशिरा परे शूर्पणखा लखि नैन। रोवत रावणको सभा कहि कहि भारत वैन : कहि कहि आरत देन देशको सुरति विसारी। शिर अरि डेरा को खबर एक एकन धरि मारें।
दुहलिया रामावण। ફર नहि तोहि सुरारी। खबरि न तोहिं निहारु मोहिं अङ्गा सकल शोणित भरे। जरी जाय भ्राता समर खरदूषण निशिरा परे ॥१८॥ ताहि सङ्ग वरभामिनी रतिरम्मावि शौन। रमा भारती शिवतिया लागहि सकल मलौन । लागहिं सकल मलौन कोटि शशिप्सम छु ति शोभा। खग सृग पशु जड़ जीव वाहि लखि विकल न को भा। विकल नारि नर मुनि मगन तजत योग नप यामिनौ। दामिनि बरणत छु ति कहां ताहि सङ्ग वरभामिनौ ॥ १३ ॥ अवनि असुर खण्डित करें प्रबल शबु बरिबण्ड। देखत बालक काल सम प्रति विशाल भुजदण्ड ॥ अति विशाल भुजदण्ड मदन जनु वेष संवार। मुनि मन भये अनन्द विपिन विचरत भय डारे। भय डारे मुनि जय करहिं खल- दल दलि सुर दुख हरैं। भूपकुमार अपार छवि अवनि असुर खण्डित करें।॥ २० करि प्रबोध रथ चढ़ि चल्यो रावण मन अनुमानि। जह मारीचस्थान शुभ मन्त्र तन्त्र मन ठानि॥ मन्त्र तन्त्र मन ठानि गयो उठि भादर कोन्हो। मारौचहु मन लख्यो कछू स्वारथ मन दोन्हौ। स्वारथ घाते बिचारि जिमि प्रकाश धनु अहि छल छल्यो। नवै बिलारि विचारि छल करि प्रबोध रथ चढ़ि चल्यो । २९॥ तात हेतु स्वारथ करौ कथा समस्त सुनाय। हरहुँ बाम हप तनयको बैर सकल वुझि जाय। बैर सकल उकि जाय होउ मृगकपट बनाई। भगिनी लखि दुख मोहि करहु बन मोरि सहाई। मोरि सहाय बिचारिक निज कुल मङ्गल मन धरौ। बात जात घातक भयो तात हेतु स्वारथ करो। २२ ॥
दाहलियारामायगा। सन सन गाहि न न र गनो में जानत बल ताहि। बिन- मगर मोहि मारियो गधा समुद्र निरगहि ॥ गयों समुद निनाहि मारि ताइका सुबाही। नजी गिनको दण्ड जनक- 7 si fa जन कममाज पाल बहु मान मर्दि भृगु- पनि नो। ताहि निरोध न कुशव है सुनु सुन ताहि न नर गी। ०२॥ नान गिग्वारन मोहिक मैं सुर नर बण कौन। उत्तर सा न उठि चले डाडरात पुरतीन॥ डरडरात पुरतीन समांक मन देखि शिवारो। यहि मारे घल नरक राम कर सम्पद भारो॥ सुरपद भारो पाय हौ चल्यो नाय शिर गम तदं। रावगा पावर चदि चल्यो ज्ञान सिखावत मोहि- मायामय छाया करो सिय आयसु उर मानि। मृग देख्यो शचि हेममय खचित रतन मगिाग्वानि खचित रतन मषि- पानि लबत जानको सुखारी। यहि इति सन्दर छाल कग्यि प्रभु धनुयरधारो॥ धनुशरधारौ मन समुझि जानत प्रागमको घरी। चले लषण सिय सापिकै मायामय छाया करीव ५॥ मृग मारो दृगै निकरि राम कठिन शर तानि। हा लाग प्रथम कयो पोछे राम बखानि । पोछे राम बखानि करन जानको विचारौ। कहो लघणसों बात मङ्गट भारो॥ सङ्कटवय सुमिरत तुम्हें जाहु तुरत धनुवाण धरि। अगरसेन्य अरिदल ग्रसे मृग माचो दूरी नि- भाय तव । करि ॥२६॥ राम न सइट कहुँ पर काल जुरै रणमाहि। सकल सुरा- मा नरि मरें समर जौति है नाहि । समर जौति है नाहिं कुरडलिया रामायण। शोच भनमांक निवारौ। राम दौनता बचन बदन कवहूं न उचारौ: कबहुं न संशय आनिये सत्य वचन मेरे धरौ। कली वम निशिचर बिपिन राम कबहुं सकट परौ ॥ २० ॥ कझो बत्रन सहि नहिं गयो उठयो रेख धतु खात्रि। यतौ- वैन दशठ शठ प्रायो सियढिग याचि॥ आयो सिय- हिंग याचि जानको ताहि बुलायो। देन लागि फल मुल दुष्ट तब वचन सुनायो। वचन सुनाय सुखद कहि बँधौ भौख नहि कई लयो। भावोवश सिय रेख तजि वचन कह्यो नहिं सहि गयो। २८॥ रेख त्यागि सिय जब गई रघपर लई चढ़ाय। गल्यो गगन भयते मगन इत उत देखत जाय ॥ इत उत देखत नाय सिया रावण जब नान्यो। कहत पुकारि कपाल नाथ कहुँ दूरि परान्यो ॥ दृरि परान्यो लषण कह मोहिं दशानन हरि लई। परो विवश दशकण्ठके रेख त्यागि जब सिय गई।२६॥ . राम राम कहि खग चल्यो गृन जटायू देखि। रोच्यो रय रघुवरतिया दशशिर हरौ विशेखि । दशशिर हरी विशेषि मारि रथ भूतल डायो। सौतहि लई छुड़ाय विकल दशशिर महि पाया ॥ दशशिर पायो भूमितल छत चूर उर थल हल्यो। मुझेट अस्त्र शस्त्रहि दपट राम राम सुनि खग चल्यो॥३०॥ अति रिस रावण रण रच्यो तौक्षण काढ़ि रुपान। दल्यो पक्षमहि खग गिरो कहि मुख कृपानिधान ॥ कहि मुख कृपानिधान साजि यचन सिय लौन्हौ। लै नभपथ फिरि चल्यो गौध विहल गति कीन्ही॥ विहल गति कपि सिय वालिया रामावा। नोनपर दे कपि कर सच्चो। तर अशोकतर राखिक प्रति निगम फिरि रचो । ३२॥ लग वान नोको नहीं बन सिय आये त्यागि। असगुन मर मन हान प्रति सिय विन उर विरहागि सिय बिन उर लागि लमग पद गहि समुझाये। शोचत आत्रम देखि नान उमई जन शये ॥ उमडे जल छाये विकल खोजत गिरि मन मर महो। रुधिर धनुष आगे परग्रो लषण बात नौको न।॥ १२॥ राम गम रसना रटे लग्यो गोधपति जाय। कही कथा पिय हेतु गति रामनयन जल छाया रामनयन जल छाय गाद रि वचन उचारं। परमारथ तुम तात प्राणधन तण करि हार टण समान प्राणनि दयो कोपरहित रण- मई कटे। जियो भोग भोगो जगत राम राम रसना टं ॥ २३ ॥ दर्श लागि जीवन रहेउ भाग उदय रघुराय । जेहि विचि गिव सेवहौ लियो गोदभाहि आय॥ लियो गोद माहि पाय गम कई प्रागा गंवाये। भया तुरत हरिरूप चारि भुज अस्त्र सुहायः अस्त्र सबै शिर मुकुट वर पोताम्बर भृषा गह। जोरि पाणि अस्तुति करत दर्शलागि जौवन रहेउ ॥ ३४ ॥ परमधाम गो गोधपति किया कीन्ह श्रीराम। चले विरहग्रसर भये विपिन शाबरोधाम ॥ बिपिन शावरोधाम अर्घ आसन सब साने। धूप दीप फल सुजल धरे रघुपति- के काजे॥ सब सप्रेम पायन परो दर्श पाय पावे न गति। राम तुम्हारं रूप लखि परमधाम गो गोधपति ॥ ३५ ॥ काठ साजि रचिकै चिता सिय सुधि कही बहोरि।
कुण्डलिया रामायण । ७३ शवरी जरि सुरगति गई क्रिया करो प्रभु कोरि॥ क्रिया करौ प्रभु कोरि चले बन दूनौ भाई। मुनिगण मिलत अनेक दर्श अभिमतफल पाई॥ पावहि अभिमत जीव जड़ करहिं योग जेहि प्रभु निता। साजि साजि सुरगति लही काठ शावरौ रचि चिता ॥ २६ ॥ रामसिया खोजत गये पम्पा सुभग तड़ाग। सुन्दर जल तरु बिहँग मृग सुनिगण सदन सुवाग। मुनिगण सदन सुबाग करत जप तप मन लाई। देखि सरोवर मुदित कौन मज्जन रघुराई । रघुराई मजन करो नारद मुनि आवत भये। तुलसिदास सुर सुभग सर रामसिया खोजत गये ॥ ३७॥ इति अरण्यकाण्ड समाप्तः । . अथ क्लिष्किन्धाकाण्ड प्रारम्भ । चले विपिन लक्ष्मण सहित मिले पवनसुत प्राय। विप्र रूप पूछत भयो को तुम कहो वुझाय ॥ को तुम कहो बुझाय विपिन सुकुमार सलोने। नृप दशरथके सुवन तासु भायसु तजि भौने॥ तजेउ भवन आये विपिन नारि गई शोध न लहत। खोजत हम द्विज कवन तुम चले बिपिन लक्ष्मण सहिन ! ११ १.
- . ॥ - ॥ गटमियारापायगा। यो। मिनाइयो प्रभु गुण मन गनुमानि। कहो कथा का पागा नपर दये बखानि : नूपुर दये वखानि राम । निरह विसरमा देखि कोश बहु विधि मनु मुकाये शुग्रोव अति गम लमय सुख मन्यो। पच भेटे इनुमन्त उर ते सुग्रोव मिलाइयो ॥ २ ॥ पभुतो कारण बन बसत बिपिन कपिराज। जया -7 गा विकी कोपि कहा बुराग ॥ कोपि पाहा गगल एड र पारे। सापति क्यधि तिय सहित inf: गनिक सना"। तिलक संवारौं कालहि नहि का पता भनन । तीन धाप गर कर धरौ मिव कारण कारण कानन २ ॥ योष दिलाइयो बालि महा बल बौर। गर्जि नगर नाची सादि चल्यो क्रोधि गणधीर ॥ चल्यो क्रोधि रणधीर जो पनि दो आ.। शरणागत प्रण समुकि वाण मोलो रबरा । मात्रा वाण प्रमाण करि मित्रो अवनि सुरक्षा- हा समालोचन पुरकि तब सुग्रीव दिखाइयो॥ ४ ॥ हा रागनि उर धरी वाणी महा कठोर। नर गति हरि गति तनि ६ सग प्रकाश सब ठार॥ सम प्रकाश सब ठार जगत अप्रिय कछु नाहौ। जो प्रिय तब होय सकाल एकस बिलाही । सङ्ग रङ्ग नहिं चाहिये विधि पिपौल रचना करो। जयति हरे श्रीराम कहि श्याम रामरवि उर परी i॥ ५॥ प्राण गये श्रीराम कहि नारि विकल पुरलोग। सुग्रीवहि शाया दयो करहु मुतककर योग । करहु मृतककर योग लाया गवको समुझायो। राज हेतु सुग्रीव अनुज सँग र पठायो । नगर बुलाये द्विज सकत बगदादिवापि बोध .
७५ धाई। सुरालिया रामायण। लहि। गलियोच दूषण हौ प्राण गये श्रीराम कहि॥ ६ ॥ रामनाम कहि उपकरौ तितक सारि शिरताजा राम कृपानिधि जगतमें विरद गरीवनिवाज॥ विरद गरौव- नियाज लियो सुयौव सुखारौ। गिरिवन विशल विहाल वाति र कस्थित भारी॥ कम्पित डर निरभय नहीं जात दुसह वर उर नयो। धाम बाम प यामको रामनाम कहि हप करो ॥ ७॥ राजनीति यहि प्रभु रहे शैलप्रवर्षण भाय। अनुज सहित सुन्दर सदन राखे देव बनाय ॥ राखे देव बनाय निरखि वर्गम गई। घनघमण्ड नभ घोरं मनहु रविपर निशि निशि धाई रवि भनि गये नौरवुन्द वाणन गहे। तड़ित रूपाण सुइन्द्रधनु राजनीति कहि प्रभु रहे ॥ ८ ॥ सरि मनोज डेरा जगत सजि अायो करि सैन । असित पौत लित घन अरुण तनि वितान सुखचैन । लनि वितान सुख चैन तड़ित ध्वज सुन्दर राजै। निशि दिन धन यह रात मनहु वा दुन्दुभि वाजे दुन्दुभि बाजे मोर पिक वक दादर वन्दी लगत। विरहवन्त कारण सन्चो करि मनोज डेरा जगत ॥६॥ सरपनिक गिरिगण ग्रसे वुन्दवाण करिलाय। कहुँ कहूँ मारत बशर घनगज शोश चढ़ाय । घनगज शीश चढ़ाय मोर हर बत पुर भाये। वाजे नौवति जीति कोकिला सुयश सुनाये। सुयध जनाव वितान तनि वेलि विटप गृह गिरि वसे। सुद्रित करि पाषाण जड़ सुरपतिकै गिरिगण असे ॥ १० ॥ समुद्र महिपर चढ़यो महि सुद्रित करि दौन। सर सरिता जलदल परे घरपञ्जर महि कौन ॥ शपचर महि Y के
वागड लिया रामायण।
कोन नड़ित बदवागिनि मानी। वर्पत नभ चढिवारि त्रसित
गिरि दिग्गज नानी ॥ दिग्गज कम्पहि घन सदल नाद
बाद ददिशि बदनो। कम्पमान महि गहि धरी के समुद्र
महिपर चन्दनी ॥ ११ ॥
गग्दभूप आयो मिलन धवल रूप ति साजि। कमल
पोक ननन चतुर द्वन उटं जग बाजि ॥ दत उठे जग वाजि
चन्द्र नन कव सुहागी। मरि सर निर्मल बारि पावड़े पावस
नाया॥ पानस दीन्हो तिलक नग गरदराज राजत घलन ।
पानम गया प्रगाम करि शरदभूप भायो मिलन ॥ १२ ॥
गोग गोध अब लीजिये जाहू जहा कपिराज। खबरि
विमागे सुख सुपर पाय नारि धन राज ॥ पाय नारि धन
गग बालि थल तुम्ह पठाऊं। कर धरि कीनो सखा ज्ञान दे
मन ममुमाऊँ॥ मन समुझाय समेत कपि आप गमन
परकीनिय। वानर भाल पठाय करि सियाशोध प्रब
नीजिये ॥ १३ ॥
लन्मगा चले लिवायकै प्रीति प्रबोध रिसाय। बानर
भालु बुलायक गये जहां रघुराय ॥ गये जहां रघुराय मिले
पायन कपि नाये। रघुपति हँसि मुदु प्रकृति पुलकि गहि
कण्ट लगाये। कगठ लगाय बुमाय कपि विनय करौ चित
लायक।
। वानर भानु विशाल भट लक्ष्मण चले लिबायके । १४
कपि लक्ष्मण सबसों कहेउ सिय सुधि खोजहु जाय ।
पाच दिवप्त बिन सुधि लिये हमहि मिल्यो जनि प्राय ॥
हहि मिल्यो जनि भाय बहुरि अङ्गदहि बुलाये। तुम मारुत-
मन मार जाहु दक्षिण शिरनाये। दक्षिण सिय शोधहु
एभट भानु नील नल सुन लयो। मुंदरौदै हनुमन्तको
कपिलक्ष्मण सब करो ॥ १५ ॥
कुरा लिया रामायण । चले सुभट व्यकट विकट खोजत गिरि सर खोह। राम- काज लवलौन मन विसरो तनकर छोह ॥ बिसग्रो तनकर छोह सघन बन जाय सुलाने। तृषावन्त भे विकल बिना जल सब अकुलाने । अकुलाने हनुमन्त लखि चल्यो ववर पैठयो सुभट। कया सुनाई शशि प्रभा चले सुभट व्यङ्कट विकट ॥ १६ ॥ जल फल खाय प्रणाम करि तेहि पठये जलतौर। सोस प्रेम पहुंची तहाँ लक्ष्मण श्री रघुबौर ॥ श्रीरघुकुलमणि बौर पठे बदरौवन दौन्हो। कपि सब सागरतौर सौय हित चिन्ता कौन्ही चिन्ता कीन्ही कपिन सव सम्पाती लखि कहत डरि। धन्य जटायू सुभटको जल फल खाय प्रणामकरि ॥ १७ सुनि सब कथा प्रणाम करि गये मुदित सम्पाति। भये पक्ष जल दीन शुचि कही पक्ष गति भांति ॥ कहाँ पक्ष गति भांति धरहु धौरन सब भाई । पैहौ सौतहि तवहिं पार सागर जो जाई ॥ सागर शत योजन उलघि प्रबल बौर जादू हि जो परि। सो सिय पावहि सत्य सुनि कपि सब कथा प्रणाम करि ॥१८॥ गयो कहत यह गौधपति कपि सब करत विचार । वहु रत संशय जिय कहैं अगद जातो पार ॥ अगद जातो पार कहत क्षेत्र बुढ़ाई। नल औ नील सकोच जानको कौन दिखाई ॥ कौन दिखाई जानको पनि प्रचारि कह रक्ष- पनि। कहा समुद हनुमन्त तोहिं गयो कहत यह गौध पति ॥ १० ॥ इति श्रोकिष्किन्धाकाण्ड समाप्तः।
मनिया गमायन। 73) ना दन हि जग मृच्या विधि हरि हर दिगपाल .. :- 1 पनि मि पायक बारिक नन्न बस्त्र वन बोरि। चढयो पदांना विधिगर करने नोरि ॥ विधिशर करते तोरि एटान्ना आगी। नगा यह सत्र पुर वारि विभीषण मन न लागा भनन भन्म भूपगा भये ममुद सुदर्प निवा- पि। मित्र यणि ने कूदन भयो अति रिस पावक गरि ॥1॥ करि प्रवाध मायो मरुत मधुवनके फल खाय। हर्षि हे प्रभुपटकपल उर भेटे रवराय ॥ उर भेटे रघुराय दोन्ह मगि प्रभु हरि लोन्ही। मियदुर्दशा निहारि पवनसुत प्रकटिन कोन्ही॥ प्रकटित कोन्हो सियदशा सुनत हाल पनि विकल। विजय करिय सिय पानि करि प्रबोध मावो मकन - १२ ॥ गमवचन कपिटल चल्यो दिग्गज अहि सचन्त । भालु बनी मर्कट मुभट यय यूथ बलवन्त ॥ यथ यूथ बलवन्त अन्त को पाहिलखा। राम पटकको विभव रूप जानहि जिन दंग्या । जिन देखा ते जानहो नभ अहि पुर भूतल हल्यो। मनट तोर डेरा पर रामबचन सुनि दल चलो ॥ १२ ॥ वचन सुनत रावण कझो मन्त्री मिन बुलाय। मन्त्र कहो पृलन मवहि कझो विभीषण आय ॥ कयो विभौपण प्राय मन्त्र मणि मानिय मेगे। सौतहि सौंपहु जाय मिलह रघुनाथ मवेग ॥ सुनि गुनि उठि लातन हत्यो मिलहि शव को उर दयो। चल्यो हदय अनुमान करि बचन सुनत रावण कझो। १३ ॥ मन मलानि हरिहै कवन चल्यो ताकि प्रभु पांय। दोन -- कुएजतिया रामायगा। चूड़ि जाय जर मनौ शेष डारि सहिसार। वारि खाय हवाइनल शचन्द्र शिरडार ॥ शन्धु चन्द्र घिर डारि चारि- सुख सृष्टि नशावै। पिरिसर सागर डारि धरणि तजि धौग्ज पावो धीरजाणी डर त जतहिनिले पिति रजौ। राम- बाण खत ना द डिजाय खुर अम्बनौ ॥ ५॥ मातु देह कायसु मुदित लखौं बाटिका जाय। सुन्दर फल लागे विटए रोजनकौं अघाय॥ भोजन करौं अघाय जानको उत्तर दौन्हो। सुत्त रखवारे प्रवता पवन परवेश न कीन्हो॥ पवन शर परवेश नहि लखि न सकहि रवि शशि उदित। वह कपि यह भय तनक नहिं नातु देह आयसु मुदित ॥६॥ करि प्रणाम शूबो सुलट लग्यो फूल पल खाय। मूल चलावे तजुन रक्षक पहुँचे जाय ॥ रक्षक पहुँचे जाय मईि महि गर्द मिलाये। पुरी परमो प्रतिशोर अक्ष रावण पठवाये। अक्ष वृक्ष लै क्षपि इत्यो सेघनाद आयो बिकट। भिर प्रवन रघुपति सुमिरि करि प्रणाम सूचो लुभट : ७ ॥ ब्रह्मवार इपि बाधिक धरि ले गयो बहोगि। आगे कर दियो कहि कटु वचन करोरि कहि कटु वचन करोरि वही रावण तव दानी। दो मईट त कहां काहि वल फलकर हानी । फल दल सूत विध्वति करि रण कौन्हो बराधिक। नहि कपि तव सुत छल करो ब्रह्मबाण कर साधिक ॥८॥ विधि हरि हर दिगपाल सब न्यात यक्ष गन्धर्व। पित प्रेत पशु मनुज जग सचराचर र सर्व ॥ लचराचर सुर सर्व गगन धरती गिरि धेरै। मैं पुर परिवार धाम धन तिय सुत तेरे। निय सुत तेरे लोक सत्र सवे रहे पनि होहि रावण कथा लड़कानड़ मामा १- २ जथे सेनारग भयो चतो विष कपिलयन। गर्जनि मर्कट मातु सब पावे राजिननरन। शवनारज नदोकारे ब; स तुम्तायो। तर तिर यो। —तु तुकतु निकालो, १ ॥ चल शामर परे सर पर छु पनि बनि सक्दन । बराज सर करा- पर ME 3 ताई। सागर लोकगारी- चहा - निती रा 7.717 -- : । गोममें सेटभ जब कोठी ।। -'पारियोः राम मटयूम हो । हार भट रावण कोकाद।२३ नक हन्यो पग नदिहलो पख इल्यो गिरिष्टग। उदय- गल कापन मनो मन्दर गित मा चन्दर इगिरि सहर मानानहाने। सतना उत कमठ विगन दम चालेचारी बगान्धर बदन तक्षपदन ढहि ढहि या। पो जो सब गुन मट रु हल्यो पर नाहि -- . ८ , । - है दर कुण्डलिया रामायण । बन्धु दाया हत्य तौहे तुत्त बुताय ॥ तोन्छे तुरल बुलाय तिलक पनि निन कर लामो। रावण पुर सब दियो मिल्यो जब शौउतारो॥ शौश उतारे शिव त्यो तव पाये का सवन। तो पुर धन पांत परत जन गतानि हरि है वदना १५॥ सजा निकट बैठारिक पूछो लागर पाय। केहि विधि इतरै वापियन तेहि बिकि करिय उपाय॥ तेहि विधि करिय उपाय जन्त पारित तट कोन्हो। तुद्र न वह विशेषि तरह प्रभु जु घर तौहो। धनु शर उर मानो विकल जिल्यो त तै गयो। पन्ट देहि इपिकटकामह सला निकट बैठायो । १५ ॥ नाट सुगम पास रच्चो जल महि पाक पौन। विटप शैलसर जड़ रचे इनको सिखवत कौन। इनको सिलवत कौन करहु प्रनु एक उचाई। गिरिगया वैधिहि सेतु नौल नल दूनहुँ साई। दूई साई बांधि हैं शैल सकस मर्कट सच्चो। शायु प्रताप सहाय मम नाथ सुगम मारग रच्यो ॥ १६ ॥ सुनि साचे सागर वचन कपिपति कोश बुलाय। धाबहु गिरि तरू बानिले नलहि देह सुख पाय । नलहि देहु सुख पाय धरहिं गिरि सागरमाहीं। सुनि शायसु कपिवृन्द चले चहुँ दिशि भ्रम नाहौं ॥ अप नहिं शिर वङ्ग ल फरहि कोटि कोटि गिरि धरि रचन। देहि मानि नत नौलाह सुनि साचे सागर वचन ॥ १७ ॥ इति सुन्दरकाण्ड समाप्तः ॥ ??
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कुण्डतिया रामायण ।
दात दुखदाई मारे सकल रावणा अन शोचत चले। जय
जय रघुवंचमगिा मारि दुष्ट रण दलमले 1 ॥
रण रावण आतुर चल्यो अनुरसेनदल साथ।
युद्र देवन डरत धरत शरासन हाथ ॥ धरत शरासन हाथ
चतर महि दिग्गन डोलें। चभित उधि जा स्टज शैत
रासि महिवार वोले । अहिधर बोते गति सभय रनि मुद्रित
सन हल हयो। सुजनचाड रण मरिज्यो रावण रण पातुर
पालो ॥ ॥
सुरजतिया रामायण ८२ शरिब इतपत सुर चल्यो वालिसुन दौर। नुहट पर प्रभु पायतर मिले हर्मि रखवार॥ त्रिले हर्षि रघुबीर काशिनुन बार साख्यो। गढ़ घयो तरि नन्त जहां तास तेहि रास्यो राखि वौर पर भयो दयो लक्ष ति त पुर। भयो युद्ध द्धित सनर हारिग दल दल । शाद मेधा सुलट लन्मण हन्यो विद्यारि। लई सूरछा प्रतु उसे हनत लौन प्रजारि ॥ हजुरत तीन प्रचारि नही लेन पकायो। दुष्ट हत्यो शपि बोत्र शेज्ञ शिर राखि जिसको शैल शोश देखन सात तानि गारि शायरू हिट! रास पाहत नंटत रखो तमण घाब पौड़ा ! 1 र बजेको सम हाशे को बडुवाया। वि. :- पटवा हिंसा: पठनहुं लोहि नव प्रगपते पर ना हजाई.का॥ प्रा जगाश बिचात्तिदोउ पन धरि पर पता : धन्य तुन्त जा त सहसेटमो . - - . रा:ठिकहे को हो वैर उपाय। जाने रावया .777 HIT STनाय काहे नतम है। को कि सोती. या वहशाह : इस यो राजगे ! की ६हिरिपुर इन्दुनी वधाय। तक्षणको पाय डियो सान हर नाय । तारापुर नाहि ह. ॥ उतना। राधा शिरपति जराइलोक। दुस- - - रामायण 11 राहतुना हो पाय समापिय सन: --। जगल जोति असुर संग्राम ' जीति सुर देन पर लाल बसाये। राज विभागीय : --- माये ॥ नारद शारद गर एक दिवाकर जमान पवाएर सुनाह मारा 22 " 11 ल न लगो पर्व मानो पाल। रवि 7 गगनों का कोई ... को. ITTरत गुनि नयन उभारी। गुनि हनत कर राम TT पागे सुमारे सुखभार उठि भावित it: । अयुगात पातन पुराकि सात नि w4 - है .. । . . . । . 1 + गाव या गले कलाद - २ ना को सम बात ॥ 77T17.., कला । ॥ बाबत देखि. .....! नि बरि पिक 1. गाव त अवाय प्रकटो सबै पुराना गाय। ए रिला पोय पदिय । गह 7.7 पुलाने। ---- ना! नानारो नानारोगत जि 17। चले नगर वाहिर जो । 1 तर पछि न 1 7. नुमन्त ते देवन न माग। नगर पारि में उतरे कृपानिधान॥ उतरेयान निरी गोसाई। प्राणिम देय ने न पूछी दुनि- 1 वारजरिया रानायण पूजा शङ्करको करौ सेतु सिया दरशाय। पञ्चवटी कुम्भ- जाहि मिलि अति आदि षिराय ॥ अति आदि ऋषिराय निले अनसूयहि जाई। आशिष प्रायसु पाय चले आगे रघुराई । रघुराई आये तहाँ चित्रकूट मङ्गर घरौ। पै- अन्हाय सुनिगण मिले पूजा शकरको कगै॥ १४ ॥ पायसु पायो सुनि यो चले हर्षि श्रीराम। यसुनहि पूजि तप्रेममय प्रसुदिल कीन्ह प्रणाम कौन्ह प्रयाग प्रणाम मिले सुनिगण प्रभु जाई। करि भजन लिय सहित विध मात्यता वड़ाई ॥ मान बड़ाई पूजिकै पुनि विमान चातुर गयो मिले निमाहि गङ्गतट अायसु पायो सुनि दयो ॥ १५ ॥ कपि हनुमन्त पठाइयो भरत कुशलता देखि। आवत सिय लक्ष्मण सहित यह तुन कहौ विशेषि यह तुम कहो विशेषि प्रातमिल निहारों। पुरवासिन पनि मिलों लातुको योच लिया : होघ निवारा शवधको लव प्रकार तजुल्काइयो। भरता है। प्रसुब.पि दुरन्त पठाइयो । १६ ॥ एडिजितात्यो पत्ति करुणाए। लै आयो मन्दिर परल सुनत धोच पकान ! सुजल थोष पदकञ्च तविजन डायो। धमदीप नदेव पूल पाल कर धारको कार्य से युवा तुज पाइयो। प्रातमिलावधि मिलाइ उतारयो : १७ ॥ खन ६ हाल जा का घऔर खौजटा शोष मुनिका बादले लो। म पनी तौन सल, सो। वालासोपान सृषण तमिहारो॥ सूत गिनि पान प्रति सन्त दिन पाहि पाहिरिमाधिकाहादेखि हनुमन्त जन:८॥
डनिया रामायण . . - - - ना ग उनको विप्र न गायनु दीन। देव 1157 वभिनेको गिने नवोन पाहि गी 7 गीर गावहि ना को जमति राम जय जय सो 75733 जो॥21 -~-~ी। तुरा 77 ; नमन थै .: का 777777 7. [ITE: "" P3 ना॥87 कि अपार। निम :: . जा जानकार कि । रन है। कार तोला पी iTIमरा अति व बलायकै। ... गगनदिननायक ५॥ 4 - उटि पाहर जय जय कनन राम स्वरूप तुम्हार। मङ्गल- गय न मर मिस सब ढाकार ॥ सुमिरत सब दातार मन मुटव सुन्दर ध्याये। गुगण गणा पावन गाय तरत सव- नाव सम्व पाये। सुख पाय मुनिगण मनहि ज्ञान ध्यान सो यदि चहन। रविकुराकासतदिनेश प्रसु उठि शङ्कर जय नयकत॥१॥ सम्पनिकाल प्रगान करिए राम सुग्धप। प्रति तार पार गण बरीत वेद प॥ वसंत वेद अनूप नया। नन गोलनको वलित राम -ति मिः॥ तादि पियारे तुम तपत बचे मोह जरिवा समाज ॥ बुकिाई प्रयु भेटिकै लरत हृदय सगवन्त लै। पति सलेमन सरत सङ्गहनुमन्त ते ॥ २३ ॥ निले सात पुर जन सुदित राम चरित यह कौन। सब जानल सहि मिले हमकहं राम प्रवौन। हमकहँ राम बौन बस नर नारौ। यथा योग्य मिलि सहि हुरिटी पाहतारो। सेंटी महतारी सबै प्रथम कैकयो पन हि दिरहविया नाशी सकल मिले सकल पुरजन सहित : २६ इति उक्षाकाण्डसम्राप्तः ॥ । ६. उत्तरकाण्ड मारमा। सा पाये कुगत घर घर यात साज। पुरी भई साली रामराज्य से काज ॥ रामराज्यके काज भरत रसव साज सजाई। सुर गन्धर्व सुनौश सकल आये सुरसाई ॥ दुरलाई मङ्गल सजे बजे अवध दुन्दुभि विमल। वर्षि सुमन जय जय बहत राम अवध आये कुशल ॥ १ ॥ शन लिहाजन सुचिकन्यो रघुपति वैठे आप। सूपण मणि- गरः जगनमत कोटिन भानुप्रतार ॥ कोटिन भानुप्रताप ध्वनि विप्र उचार। छनचंबर धतुनाच देख सरवादिक धारें॥ भरतादिका सुखमय मान लिय बाई सूपण इत्यो। राजनिता शोभित मो शस सिंहासन शचि वन्यो। २ ॥
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८2 अररिया रामायण। मद नामक। हम निभिदिन विषयाविवश सुरपति कहत प्रणाम ॥ ७॥ - - रविअन्जति जोरे इत राम सुनहु मम वैन। रूपा नरिय निक चरण रति निशि दिन राजिवन ॥ दौजिय सजिम्नयन तोम बड़ हृदय इमारी। जबते मम कुल जन्न सवरेनरतन धारे॥ नरतन धरि यच विस्तयो चिरन्जीव जोरी रहत। जय जय रविचलरविविमल रविनञ्जलि जोरे कहत॥८॥ अनिल अनल घर विनय करि खलखण्डन तुम राम। राज बाज जयएर विशद राजहि जग अभिराम ॥ राजहि जग अभिराम लन्त लज्जन सुखकारी। नरतन धनु धरि हाथ हयो धणी प्रघमारी॥ धरणीनण्डन खण्डि खल राज विशाजल सुन्न सरि। जय जय श्रौसौतारमन अनिल अनल घर मिनरवरि। निगम विप्रतन सरि कहत राम सुनहु सुरईश। कोटि कोहि यत्न करत नहिं पावत योगीश नहिं पावत यो- गौय हृदय शकर पचिहारे। विधि सनकादिक नेम धर्म परि तुम्हें निहारे॥ तुम्हें निहारत सुख लहैं ते कापि भालुहि पर गहैं। जयति राम. लोला नियम निगम विपतन करि बाहै ॥१०॥ शारत गारद जोरिक विनय करत चित ताय। अद्भुत चन्ति तुझार प्रसु सुनिये औरराय ॥ सुनिये औरघुराय पिला दबा सन नाहौ। हण सम तन तजि दोन सुयश जाको जगमाहीं। सुयश कियो हि जन्म भरि गयो विरह तजनरघर। पौधशिधा निजकर कहैं भारद नारद जोरि कर ॥ ११॥ १२ काण्डलियारामायगा। ईनों गुगा मुनिमें कडौं कपि समाजके काज। भरत -: पिग सदा कपिनायक शिरतान ॥ कपि नायक 7 दिने उठि साडि बहोरी। विदा किये सन्मानि 7 प्रविन गोगे॥ प्रीति न योरी प्रभु करी सन प्रणाम ली। तार बार यश प्रभु कहैं कहलौ गुण मुनिमें - 44 1 HT गा गा भयो गयो समज दुख भागि। रोग माण का कान गुमा त्यागि । कारा कर्म गुण :: मागको कागो। बारि दमन गति वारि गई पाणीहरभो गर धरणो मई कपट दम पाखंड ।।। श्रमविचार नर राम राम राजत भयो । २२ । कापनीय योग गर मान मोर मद गर्द। दोष दुःख का 47 पन बाटियामा मय । दारिददाहन सर्व वैर पर- कामगा। हमाय रात्र छुटि गई मति परअपकारी। ५. लोग जब भोग याग महि प्रकट अब। गये 127 काम बोध मात्र रोग सब ॥ २३ ॥ : -नगनच्या क्षमा सन्तोप। योग यज्ञ जप 7: ;. बदन पोप॥ वेद समङ्गल पोप रही परमा- १ त कत दृशन दन दुस्तर भय दूरी। दाग तेन रनि जगमगत। कमल को :23 मप्रटेजगत ॥ २४॥ r:::गायनो यह कजिन न शौर। ताते नो मत यह गिरमौर मन्त्र यह शिरमौर 7. किन गाऊँ। साधन उत्तम जानि सुमति निज मनट का मनहि दृढ़ाऊँ मन्स यह लिहि प्रसाद . M 28 दरियारा! - तारक में नाव दस - बिन गमगपर जाय। सान न निल होना थरि पाय ॥ रोपि लभा कि.८ ३८ रानौ। महि कोहि पनि हत्यो जकावर चरण धरे कन्चत अनुर लैन लर - दी। सविनयो एप सुयशदा ये बाद मुनि -किन ॥१६॥ हत विकारितुनि प्रान मिताये मोहि। कपिपति मदन जोरि त द्विक कर जोहि। तै सुद्रिक कर आदि कार तेल निकायो। ललित लगे सब मरण जाय है. - पद मियो : सुजल पिशयो सहिको ससुद- तो बन्न पनि पक्ष तच्च लपाति दे ये हनुमन्त मुनि ॥१८॥ पर इलट लायी तट बैठाय। हेलि सोय सहारन रिका जाय॥ वन उजारि फत वाय र रेलमारी। परि उपाय पुर लक दि घर घर "ः जारि वारि एनि वारिनिधि नदि चल्यो संकट । गर्जत दोर कोर सति गयो उधि पारे मट ॥१६॥ निय मरिहत चल्यो दिव्याज दरकन । पार जाय गोपहि दुर्गकियो पुर सजा दुर्गकियो पुर शन रसण हज यो। द्रोणागिरि धरि शोश रयक नल- :ो॥ मारग धावत भर लग्यो सरस कोपि उर पल एलो। नर मोच उरनानि लिय हित गिरि भिर ते + । r 2 1 कुण्डलिया रामावण । सुख पायबो। शुक नारदको सौख यह एक रामगुण गायवो ॥२५॥ एक राम सुख नाम त ध्यान रामको रूप। राम चरित गावत परम धर्म पबित अनूप॥ धर्म पवित्र अनूप करिय जद लौं जग जीजै। रसना रस करि चरित सरित निशि बासर पोजे॥ निशि वासर श्रम तजि सजे तुलसिदास यह शुभ सुश्त। कामधेतु कलि कल्पतरू एक राम सुख नाम हत । २६ ॥ इति श्री उत्तरकाण्ड समाप्तम ॥
:: मनोम प्रयोग मला तर ॥ गोतमनापसतीय तरो गम श्री मिपिनागरको पा आइ विलोकि 14 :: 1:Tifi। दवि नरेश गपान गयो दवि ॥ आयसु दा: ५५ नगनु । चाप चान बन पून महेशनु ॥ डिगै न मान प्रमाणम्। राम तोजनमान शरासनु । मेलि पाया - शागिरधान धरा मरू अम्बर ॥ च प चाहिनीपत। पारग वोच मिले फर- यापति गोपि अये तपसीवर। राउ विवाहि प' को घर। सातन्त्रि विवाह यथापनि । जो सुनिकै If गई गनि ६॥ दादा चरित चारु रघवोरके पनि मन कान्ह विचार। निज मनसों तुलसी कहै दम न होड भव पार ७ ॥ ॥ दति योवालकाण्डसमाप्तम् ॥ चामचन्द ॥ गाय दोगलेशने सुहाय सारसी गही। जनने समीप केश लखि नत है सही। रायकानमें मनोज- गरात वो यही। राजदेव रामको बने सिधाव नो सहौ।
अथ रामायण छन्दावली॥
1
दशकन्धर घटकर्ण अघ सारधरा दुख होइ । गई गगन गोदेह
धरि कहि सुरपतिसों रोइ॥ छन्दचौपय्या सुरपतिगुरु
बूमा सुरमति सूका गे विधिलोक तुरन्ता। विधि सुर समुझाये
सङ्ग सिधाये जहँ सोबत बौकन्ता ॥ दशमुखको करणी बहुवि-
धि बरणी धरणौ जेहि विधि रोई। सुनि शारंगपाणौ भइ नभवा-
गौ विधि जाना नहिं कोई ॥ विधि वचन सुनाये सुर तमुकाये
तजहु शोच मन देवा। जो जनहितकारौ प्रसु असुरारी
करहिं पार सोइ खेवा । वानर गोपूज्ञ मन धरि रोशा बसहु
जाय वनमाहौं। अवधेशनिकेता व्यूहसमेता प्रभु प्रावत
तुमपाही २॥ दोहा । यहि विधि विबुध विबोधि गे गे
सुर निज निज धाम। कछ काल बौते अवध प्रकट भये
श्रीराम ३॥
शशिवदनन्द ॥ जनहितकारी प्रकट
मुरारौ। नरतनधारो छविसुखकारी। मृदु वकारी अरि-
दलहारो। सुनुख निहारौ बलि महतारी॥ अवधविहारी
भवभयहारी। जयतपुरारी सबअघहारौ। अब उघारी यह
प्रणभारौ। तुलसिहि तारौ शरण सम्हारौ ४॥ हरि-
জীবিকালু। सम्हारि शरण बिचारि तुलसी रामयश
गावत लियो। वयतापशमन कलेशहरको चौर नहिं
जग मग वियो | जेहि गाइ यमन किगतखल हरिपुर गये
करि सुधि हियो। रघु औरयश सुनि हिय न हरप्यो बुरो ति-
न अपनो किगे ५॥ सुन्दरौशन्द : राजत मेचक अङ्ग
महाकवि। बोल मनोहर कहहिं महाकवि जो सुनिक
३
रामायणा बन्दा
को प्रणाम गाके १ ॥ दोहा॥ लखि मुकण्ठ
का मामह को विनार। एकपतिंह ये कवन है
TTTणार
॥
अनि योगारमय काण्डसमाप्तम ॥
" से.
H
रामरामको लेवाइकै तब शेल ऊपर
I. ' । गादति गोत्र दें हरि कीन्ह प्रोति दृढाइकै।
दो तम गलऊपर राम बुझ कपोणसों॥ त्यों कयो
11 TITो उर रामगों । वालिको वधि वाणसों
SITE : झाां गशे। जानको तुमको मिलावों
Fiff. पिने को॥ बालि मारि रुपालराम सुराग
द
...। भाम चारि रानामऊ तह शासना करि
का! IT ... मुत्रि गरी कपिरंग कोश पठादक।
गम पपिगि ल्याव खागि देह जाइके १ ॥ दोहा ।
न्या विद्या प्रसंग तिन अगन कियो पलफूल। पूछि
नियमिद नयन ठादे नतनिधिताल २ ॥
इति श्रोकिम्किन्धाकाण्समाप्तम् ॥
१
।
नोटका गन्द॥ हनुमान गयो तरि सागरको। उलथ्यो
ना गोद अनावरको ॥ गिरि ऊपर चदि लड़ तग्वौ। हनि
निको सिविधान भन्यो । लघुरूप धरयो हनुमान बली।
frrनोकि नाइ भनो । रघुबोर प्रिया कितहून
ना। नरें देवि विनोयगाोरि घनी। रघुवीर सुप्राजुद्धि
चिन जायो। बिके ढुलमान हियो सुभयो। तेहिको
रानामत इन्दकी। । केश्यो सुनौ सुपात शोकमात ते गहौ। राज मांग पूतको श्रीरामको बने ही रानते सनौ सी बात लात ताप यों तये। समसौय सङ्गले सदन्छ, काननै गये। रायरामचन्द्र साथ प्राण कादिकै दये। गङ्गगग होइकै सचित्रकूट में गये । राजका- जकै सरत्य शोजलिन्ध में भले । साथ लैवशिड वन्धु पायप्याद ही चले ॥ केवटै सबन्दु सँटि राम प्राग जाइक। राम दोन पावरौ हिये सुगौन लाइकै १॥ दोहा । पाइकै गवन गेहको कौन। गणक बोलि तव भरथने नेमघ- रमत्रत लौन २॥ इति नौअयोध्याकाण्डसमाप्तम् । राम पावरी सुन्दरीछन्द ॥ विहजातको कहे सुदेशतातने सुवो। श्रीरामबाण तागते विहीननेन तो हुवो। नौदेवदक्ष तातो श्रीराम बन्दना कियो। तिन्होंकि तौय सौयको सचेलमृघणो दियो॥ विराध वद्धि रामचन्द्र शाहके गयो। तहां पुरैश देखिकै सबन्धु सुःख लो भयो। वहोरि श्रीसवन्धुसङ्ग पञ्चवाटिका गये। तहानखानकाननाक सूप- नेखके हये ॥ निकश आदिदै सुरारि एक वाणसों इये। सुनौ सो वात रावणा मरौचपास सो गये॥ कही कथा सुनी तिनो सो नेकुरा सो भयो। लस्रो श्रीराम मारि ताहि धाम आपनो क्ष्योसुन्यो सो शब्द सौव शेष राम पास पाठयो कत्यो विरूप रावणा लै सौय जातयो भयो । लवन्धुशाल देखिक रूपाल दुःखमें पगे। तहां ललामशातते तिन्होंतो वृनाते लगे। कहौ सुसुद्धि गौधने करववय चले। कौशनाथ शेवरी त- बन्धु वैग्ले भले ॥ बहोरि पन्चताल श्रीरालगम जायके। तहां -- . ॥ . . . , . 711::-:॥ नमो गन गगह चाची दुआरे । 1 . ना: पबारे॥ नने नोर बांदगानन । नाना गा मोलाना जो पाये। नहारोप- Tirगा। महापत पातारानो विगजे। बनौ : 1गि गाज। नगा वागा नौणान घनघोर नानादि गोधा पनाते। तरं वोर ऋषि 10 :॥ किरण मग जे जे पुकारे। तह { iffin { { 7व्य पार ॥ तो गोर रणवीरवन्धू जगाये। ::. गोटि भांति लाये ॥ लम्रो जाइ रघुवीर १, ५ । न्यागिनान गार योगी न लडे । मुनी 14 पात्रा। ना तातगों वौद्ध घननाद • 171 प्रा। पागम पिनानीमायो। कयो क्रोध पना : दिग गहिकं प्रभायो। ....? . तामा पठागो। त्यो ताहि सौमिवना घट। वन बाध्य मन्यो तीयने 7.मी वाया। । म IT हिलोक मांची॥ राना दम भाचा। मरे बाण गहि हाथ में पर पोचा। हनी ग्राजु रग, मध्य गमे प्रचारी। कावा- १ वानरा बार चा॥ चले लानि सेना सबै बोर गाजें। गग मार पाव भरि बा ॥ तवे रामके सामुहे रथ जो प्रायो। हिय हाट योगम सीमित लायो। तब राम शग्को माट चि बाध्यो। लियो चाप बर साधि वर ताहि माया र दुई बागा दोगी भीग छीने। लसे शोध अनार भये ने नवाने । नब गम लशको भन्त बृक्षो। जाना न दान्ध जो ॥ उनी नाथ चहि ईपको . का। मदादिमा निन्हा एख कीन्ह । हिये - रामायण बन्दाली। ५ । मिति सुनि लई सगरी। हर हरिको पिलि ज्यों नगरी। तह जाय लबौ रघुवीरप्रिया। चश पन मलौ सुखदौन सिया ॥ पुनि रावण आनि कलेश कियो। सुनि क्रोध भयो हनुमान दियो । सुदगै दा डारि निहारि प्रिया। सुखदुःख भयो हनुमन्त हिया ॥ रघुबीरको दूत प्रसन्नकिया। फलखानको आयसु मांगि लिया । लखि बाग लग्यो फल खान हनू। उतपात महा अतिवाग घनू ॥ मनुजादनि जाय पुकार करौ। हनुमान हनी सेना सगरौ॥ घननाद गज्यो पवनातमजा। दमकन्ध सभामह जाइ गजा। चलिगो रिपु ज्यों न डग्रो मनमें । मद- मत्त गयन्दनकै घनमें ॥ घनतेल लँगूर लपेट सही। जलसो निनपेकरि ला दही। हनुमानके हांकते गर्भ गिरयो । मनुजाद किया नहिं धीर धरो॥ सियायसु लेकरि सिन्धु तरग्री। हनुमान सदेह कयो सिगरयो । सुनिक हियसिन्धु अनन्द नग्रो सजि सेन समूह पयान करयो॥ वल देखि पयोनिधि पाय- परयो। नल देखिके सेतु समुद्र तम्रो सुनि मयतनया पिय- पांय परी। प्रसु व्यापकवित्र विराटहरौ। तब जाय सभाह विचार करी। तपसौन धरो हमरौ नगरौ॥ तिन मन्त्रिन मन्त्र कुमन्च कियो। लघु वन्धुहि मारेसि लात हियो । रघुवीरके तौर गयो भजिकै । हपको अविवेक कयो सनिके ॥ प्रभु लङ्ग हि अगदलो पठयो। पद रोपि सभापण जाइ ठयो । दशकन्ध सभा मह बौरवचा। नटयो पदच्यों महिलङ्ग रचा। वरवीर सभा नद नारि फियो । रघुवोर पदाम्बुज पाइ पम्रो ॥दोहा मुनि रुपाल अङ्गवचन दूले मन्त्रीयूह। अनी चारि करि द्वारचढ लागै कीशसमूह २ ॥ इति श्रौसुन्दरकाण्ड समाप्तम ॥
. गायगा पन्दावनो। :::-दिसा जे जे करें। गहि नत चामर चमर दोराप के लये। भरतादि अनुज निभौपाङ्गद F: Tणन गे॥ सनु मिया श्रीरघुबोरको अवि- -fia; भो। कर दाम तुलमी जन्मनुख लहि --': गगन यम नरे॥ दोहा : नित नब मङ्गल अवध- " • कन नानारि। नहि चारिफल अछत तनु 1:11रि॥ ॥ नित प्रोति सरित अन्हाइ बन्धु- १ : प्रभ भीगन करे। गज बाजि राजसमाज लखि सत्र FEEP : फिरे बैठे सभामहँ गाइ औरघुवीर दुख ल्या पान उलकको लबि लोग सब विमा य -।। पापो युनिकिरति उरमिलासो सबनि सुत द्वद्र ..?। गान को गन युगल गाये सब निगम आनंद बने । पानकादि नापट प्रादि मुनिवर सफल अवधहि आवहीं Hinादि बार चम्ति सब विधिदि जाय सुनावहौ। गक वाकी महिंदेवको मुत मभामहे प्रायो मनो। गुरु दिपने मारि पदहि नदिमे उठि जिय परो॥ यहि भान राम चग्नि पामपवित्र नित नूनन करें। कहि दाप्स- उनको सुनन मत्र के वचन मन पानक टरै ३॥ दोहा । सुनि मटा युगन्न मन गम कोन्ह अनुमान ॥ लोक सिखावन दोन्ह दिन रात्रीभगवान दनि श्रीउत्तरकाण्ड समाप्तम ।
-- . M.H ! --- गाम का नमोजानो :::.- मागितली॥ किनारमा । राम चन्धिान उत्तर निदेना। कागान ममी बायो। तहां राम हनुमान न पठानी ॥ मोक भाल लिय सजलै तिरबेगो को न्हाय। सरदानको वन्धि प्रभु केवट सेटरो माया इति लङ्काकाण्ड समाप्तम् ॥ इन्द॥ शुभ समुण अवध जनाइ तेहि क्षण होत मुद मङ्गल महा। शीतल सुगन्ध सुमन्द मारुत अमल जल सुर- सरि वहा। शुभ रङ्ग फरकत सरतके हिय हुलसि अहि आनंद लहा। तेहि समय श्रीहनुमान प्रभुको आइ सन्देशो कहा ॥ मन हरष सरत सुनाइ गुरुकहँ मातु सकल बुला- इके। कहि जबरि श्रीरघुवीरको तिन सजे मङ्गल जाइकै॥ गुरु वन्धु संयुन चले प्रसुपर निरखि पदपसाज गहे। धरि भरत भुज उर ल्याइ प्रभु राजीवलोचन जल वहे। पुनि प्रेम- युत सब मातु भेटौं निरखि प्रनु हुलयो हियो। तिन कनक मणिगण वसन सूषण नानि महिदेवन दियो॥ शभ समय जानि वशिष्ठ वैगि लिवाइ लियो सुमन्तको। सब राजसाज सम्हारि तेहि क्षण राज दिय भगवन्तको । सिय सहित रघु- कुलमणि विराजत सुभग सिंहासन परे। सुर सुमन बरपहि ग . तरामीमतहई। हग्न मकल, मलमूल। तुलसी मर्म हियो गलहि उपजत सुख तुन । रेफरमित परमातमा सह प्रकार सिय रूप। दौरघ निलि शिनात तुलसो पमान अनूप ॥ अनुस्वार काग्या 7T1ोकरार मिल कार मकारसो दललो अरे का ज्ञान विरागे भक्ति गानि तुगलो पेपि। मा पनि महिलामा प्रतिमा भिण्ड विग्यपि ॥ नाम i: नानि जिन तुनी कार पग्नान ॥ बरगा निपयंग - ग.: । जानती शुभ कारण सनुति ' नाम। मा शनि शुभरणा भक्ति गया राम गमाग पर लपने आपर गान । • मोन पनि चालनि गति परमाना पाहि रस- । यी बाग गणागति दि गुरुवार। माधव सित सिय- नमावि गागा अवतार ॥ अरण हरगा अति अमिति विधि का पथ कविता महाक मिसान्त मत तुलसी वदन विवानि ॥ विमतवोध का मुमनि सतमैया सुखधाम ॥ र पटि मनि पान है वि वि भक्ति अभिराम ॥ मन भय का या प्रकार छन्द युत क्षेइ । मो घटना शुभदा सदा ८. पिलर नामा ममान ता वान राघु अपर वेद 1817 मंशमादिविजय पनि पद न आन्त इजान ॥ दोग्य घर नह पठन 15 सहि नियाम। प्राकृत प्रकट ::11 व 1417 । दुनो सारमा - रामा प्रासान युग तु हरगण सोइ। न किलो बत्तम नाम। सन्चति ६. निर्गव मिय धरमधुरन्धर राम । दम्पति रस रसना 27 परिजन बदन सुमेह। तुलसो हर हित वरण शिशु वल मनेह: हिय निगुण ननन समृण रसना राम ॥ . - तुलसी सतसई॥ 4. नमो नमो नोरान प्रसु परमातम परभाम। जेहि सुनिरत तिब होत हैं तुललो जन मन काम ॥ रान बाम दिशि जानको लमण दाहिनी ओर ॥ ध्यान सकल कल्याणकर तुलनी सुरतर तो॥ पालपुरुष परधाम वर जापर अपर नशन। तुतलो तो सनुमान सुनत राम सोई निर्वान ॥ समल सुजड़ रख जातु सो राम कामनाहौन। सकत काम- प्रद सहित तुली वाहहि प्रवीन । जाके रोमरोम प्रति अमित रित प्रल। सो देवत तुतली प्रकट अमल सु- चल प्रपा ॥ जातजननि श्रीजानको जनक राम राम रूप। जातु रूपा अति अवहरणि करणि विवेक मनप । तात मातुपर जाके तातु न लेश कध। ते तुलसी तजि जात मिमि तजि घर तर परदेश ॥ पिता विवेकनिधान वर मातु दगा युज नह। तासु सुवन किमि पाद है अनत अटन तजि गेह । बुद्धि विनय गतिहीन शिशु सुपथ कुपथ गत जान। जननि जनक तेहि किनि तजे तुलसी सरिस अजान ॥ मात तास जियरामरख बुधि विवेक परमान। हरत अखिल अध तरुण तर लव तुती क जान॥ जिन ते उद्धन वर विभव ब्रह्मादिक संसार। सुगति तासु तिनको रुपा तुलसी वदहि विचार॥ शशि रवि सौताराम नम तुलसी उरसि प्रमाण ॥ उदित सना अथवत न सो अवलित तमकर हान॥ तुलसी कहन विचार गुरू राम सरिस नहि आन। जातु रूपा शुचि होति रुचि विशद विवेक प्रमान । सरसरूप अनूप अल गर्म काम . - 77 fनाप सोइ रागि रामपद तुलसी --77TT लागो सो चतरता रामचरगा गव- -'। 7 पर-7 गणिका परम प्रवीन । -: --- गर गहि जानादि सजाय ॥ तुलसी प्रेम + : गा गाना नाम, प्रा भारोर समानता हो ॥ नमो भलो सो बेनि बाबई Bf. टिपर निगा वर महिना नाम गापार। .: मग पहल पाई तलगि डार॥ तुरागी ..! 1111 MI जनि किसने कई बोर। प्रा राम मक 1 : नगन कोर॥ ऊँचे नोचे हुँ मिसे हरि- • ! IT पिण। सो काम प्रगोलाग कोनेउता ॥ ... TET दुरीम होनो नाग। गाडर ताये ऊनको नाम TT TIT॥ तलब नोति मग रामपद प्रेम निवार- । नागो प:िग्यि सो बमन जोन्य वारत फोक ॥ व गमवावंत बाद सुनाव गुण दोष। होउ दृवरी द ना पान पान गोग। रामिान रोबा रामपद राम- चालान। ए लाभ ननका मन तो तुजलो हित- हाम पवायक भये साधक भये न कोय । तु गौराम- "होय ना हाय ॥ तुमो मिट नकलना गये । ना ये नमरि हा जनकप्ताको । जिनपिना पनिट दुव गोवा तनय सुरोति । गमो नमते उचित घोति॥ जाय कश्व कानि कि नाय चीजबिन म। तुरानी जाब उपाय सब दिना गम ॥ नमो राति पहिरै निपट हानि मन मोट। निमि सुमरिगत सक्ति वर सुरा सरिस । हर चरहि हरे चरहि तापहि बर्ष फरे पसारहिं हाथ । 77 ३ ३ तुलसीसतसई । सुनाम। मन पुरट लम्पट लसस तुलसौ ललित ललाम ॥ प्रसु गुणगण सूमण वनन वचन विशेष सुदेश। रामसुनौति कामिनी तुरापो करतब कैन्य ॥ रघुबरको रति तियक्दन इब कह तुलसीदास। शरदप्रकाश अकाश झवि चारु चिबुक तिल जाता तुलसी शोमत नखतगण भरदसुधाकर हाथ । सुन मातर बालक जनु रामसुषज्ञ शिशु हाच । भाम सव्य विक विनु राम मनत अजात। लोश सहित पर- लोकको अवश विकाची वात ॥ बल मरत मानत तजे चन्द्र शौत रवि घाना मोर मदादिक जो तजे तुललौ तजैन रान॥ शासन हद गहार हा सुमति ज्ञान हा होय । तुलली विना उपासना दिनु दुलहेको जोय । रामचरण अवलम्ब बिनु परमात्यको श्राश। चाहत वारिदबुन्द गहि तुनो चढ़न अशाश॥ रामनाम तसपूत रस अष्ट पन फत एक । युगत सन्त शुभ चारि जग वरणत निगम अनेक राम कामरू परिहरत सेवन कलितरू , ठ। खारथ परमारथ चइत सकल मनोरघ लंठ ॥ तुलसी केवल कामना राम- चरित प्राराम। निशिचर कलि सरि निहत तरू मोहि कहत विधि बाम खारय परमात्य सकल सुलम एकही ओर द्वार दूसरे दीनना उचिन न तुलसी तोर ॥ हितसम हित रति रामलन रिप्सन वैर विहाव ॥ उशतीन संसारमन तुलसी सहज सुमाव ॥ निलपर राखै सकल जग विदित विलोक्त लोग ॥ तुलसौ महिमा रामको को जग जानन योग ॥ जहां राम तह काम नहिं जहां काम नहिं राम । तुलसौ कवह होत नहि रवि रजनी दूक ठाम ॥ राम दूर माया प्रबल घटति जानि मनमाहिं। बढ़ति भूरि रवि दूरि लखि शिरपर पगुतर छाहि ॥ सम्पति सकल জানী , . . तुगमीमतमई। - गोकपई नाता होको साथ। सुनियत जा- ::लिये दार नार। प्राति पीपीट :: नि। यान जगत अधीन इन किये कोको ान ॥ ॐो जान पपोतरा नोचो पियत न नौर। के छांचे नों के दब ग. गरोर ॥ करप वन समय गिर ., म गमग || तु गो घातक याचका त- 1. I चार चातक चित कालई प्रध. ना- . . । गाती प्रवरात्रि बर तुगलो योग न हो। ( 1 1 HITनी ए 5 एक घन यानि ॥ देत सो भूमाज- । भाटभरि पनि प्रधान याचत न मि. कान:। ऐ मागो मांग को वारित मिन दय ॥ '. If fifनगम अनि भर पर सीनिदोप नगर नाम तुला रागह रोमा॥ कोन जियाये जानमः नविनदायक पागि। भगो कनाडो चातकाहि पापविना मान राखिनो मांगियो पियों स.ज म।। नागो गोगों ात्र प. जर चातक मन लेवा हाली चाफ धान गखियो प्रेम। वक्तवंद रखि सातिको Hि मान गम ॥ उरल बरपि गरगत तजि डारत हरिश कर। चि.व कि चालक ननद नजि कवहँ भान नौगार॥ वाईन न पाइन जनद पन करै टक टक। तुसो तदपि न चाय बतुर चातकहि चक ॥ रटा रटरा रसना पटो ढग सम्बिगी । तुलमो चातक हिये नित नतनहि । गला यमुना सरग्यतो सातसिन्धु भरिपूर। तुतली चारके मन बिन बानो नब धूर ५ तुलसी चालक मते माना पियन न पानि। प्रेमण बढता भलो टे घंटंगी नि' सर सरिता चातक तजे स्वाती सुधि नहि लेद।
مر - तुलसोसतसई। ततली रूग्ध मौत जग परमारथ रघनाथ। तुलसी खोटे दास्का राखक रहवर गन।ज्यों दूरउ परोहितहि देत दान यजमान न्यों जग रो मौनको आयु सहित परिवार। त्यों तुललो रघुनाथ रिन त्रापनि दशा विचार । तुलसी राम भरोस शिर निये पाप धरि नोट। ज्यों व्यालिचारी नारिकहँ बड़ी खसन्की मोटा लागै सौतामायनी तुनलगि नेरी दौर। जो कागजहाजको दूत गौर न ठौर ॥ तुलसी तत्र छह झंडिले को राम सनेह। अन्तर पतिलों है कहा किन देशी सर देह : सबही कोप रखे लले बहु कहे का होय। तुलसी तेरो रान तनिहित जग सरन कोय॥ तुलसौ हन- सों रामलों नतो निलो है तून । छड़े वने न संग रहे ज्यों घर- माह पपूत ॥ कोटि विधन सट विकट कोटि शत्रु जो साथ ॥ तुनलो वत नहि करि सकें जो सुदृष्ट रघुनाथ ॥ लगन सुहूर- त योगदल दुलमी गनत न काहि। राम सये जेहि दाहिने सबै दाहिने ताहि ॥ प्रभु प्रसुता जारहँदई बोत सहित गहि वांह। तुगलोते गाजत किरहिं रामलको शं। सावन सातति सब सहत सुमन सुखद फल लाहु॥ तुलतो चालक जतदको रोगिा कि बुध काहु। जीवन जतदकह जानन सय सुरोति । तखत तखत लखि परत है तुलगी प्रेज प्रोति जीव चराचर जहलगे है सब- को प्रिय से। तुती चातक मन वलो घनसों सहन सनह । डोलन हित विल बा पिवत पोखरोवारि। सुयश धवत चालक नवल तोर सुबन दशकारि ॥ सुख मोठे मानस जतिन दोकि मोर चकार। सुपर लतिन चालक वजित रहौ सुवन भरि तोर॥ मागत डोलत है नहीं तजि घर अनत न जाल। तुलसी चातक मतको उपमा दंत लगात ॥ चानक " । 1- T प - , । M " -- । तुमगा। 77 ला सँग पाक मेगत हाय। तुलसी रा: जिग नाम, तुजनो केवल "-17.5 कायर बानन पाटनहँ कतहु 17 नया करू हेल। " 71 सेत॥ के ताधि fi । न उचित ।।। .7 || रान काम संग | रोच गन नृड गये वश ।।।। वस्तुकतु नागि। च; चावा॥ राम गरीव- ।। जन नाना तो मा परिदास नदि ....... If i.fim घ की घर होत हैं घर छाड़े । ती घर बन बो वदी रक्षी प्रमपुर शय ॥ THो तुगो सता न खाय। बारकावते ॥ नमसन न कोनिये भनि । न , TI, घास सारिसे तोर॥ मान सर्व बाजारा। छातामुन '! 17॥ नानालग गाखि . मावा गिवि तर ज्यों तरुवर- 2.7 गुग परन नरा बनन निरनोप नमा लब सन्ताप ॥ अशी वसन ::पा घर हो । : पर होग। सन्त समागम रामधन .: दुगनवा । तुको तोरदियो बले रायशि पाइये । बाद गाव न पाइवे सर सरिता अवगाह । डग का अंग जन निषि जलनच्चार। तुललो करिया मा इन तरन न बार ॥ तुलसी हरि अपमानते होत . । - 1 . । - . . . 1 7 4 ७ तुलसीसतसई । तुलसौ सेवक वश कहा जो साहब नहिं दे । आश पपीहा प्यदवी सनु हो तुलसीदास। नो अंच जल स्वातिको परिसर बारहमास ॥ चातक धन तजि दूसरे जियत न नाई न। मरत न मांगे गर्द्ध जल सुरसरिहूको वारि ॥ व्याधा यो पपीहा परो गङ्ग जल जाय। चोंच मंदिपो नहीं जिश पिच मों प्रण जाय॥ बधिक बधो परि पुण्यजल उपर स्काई नोंच। तुलसी चातक प्रेमपट मरत न लायो खोंच॥ च. तहि सिखाव नित आन नौर जनि लेहु। ये हमरे कुलको धरम एक खातितों नेहु ॥ दरशन परशन आन जल विनु न्हातौ सुन तात। सुनत चेचुवा चित चभो समुमित नौति पर बात। हुतही सुतमे कहत हैं चातक बारवार। तात न तरपन कौजियो बिना बारिधरवार ॥ बाज चङ्ग गत चालकहि भई प्रमती पौर। तुलसौ परवश हाड़ मम परि एहुनो नौर ॥ अण्ड फोरि किय चेचुवा तुत्रा परो नौहार। गहि चङ्ग त चातक चतुर डाखो बारहि बार । होय न चातक पातको जीवनदानि न सूढ़। तुलसी गति प्रहलादको समुलि प्रेमपद गृढ॥ तुलस के मत चातकहि केवल प्रम- पियात। पियन स्वातिजल जान जग तावत बारहमास ॥ एक भगेलो एक वल एक गश विश्वास । स्वातिसलिल रघुनाथ वर चानक तुतलीदास ॥ आलवाल सुक्ताहलनि दिय भने तरुनूल। हेरू हे चित चातकहि स्वातिसलिल "नुकूल॥ समपम विन दूवरे रामपम सह पौन। विशद सलिल सरवर वरन जन तुलसी मन मौन ॥ आप वधिक वर वेव धरि कहै बाङ्गमराग। तुलसी ज्यों मुगमन सुरे पर प्रेमपट दाग॥ इनि प्रेम भक्ति निदेशः घमः सर्गः १ ॥
. . . 7 । . मना। नागार एक गाई जाहि विधि प्रकट तौनि । सात्तिक गजापति जानत है बुन वेद । Fff नर नाम ना गुगा नौन। चन्द्र भान ". समन तिधि हरिहर - प्रौन ॥ अनल रकार . 7 जानु पार प्रमः । बोकार मार विधि मन ग: तनन नाहै बदन का नल प्रचण्ड रिपकार र पोट हम तुलसी कहहिं विचार ॥ IF ITEणि गार न पाम गतार। निधि हरि : ... उनको नाम र भातुकलागु भयङ्गको ' . नाम। विधि , गिरोपणो प्रमन सकल ...। माग अनयम धि तुतपो जानत राम । 1.1 का भानामा मन काम ] छन मुकुट सम - 477 युगल हल। सकल बरव गिरपर रहत नाअनन॥ रामा सदगुदा विक नाम राम 17। भामा भान गा को तुलनो मत अकार । 7 नाव बरको धर धो। विधि विहरत ना कार तुलना जनगण पोर॥ हग करण सङ्कट कर बननाम। मा महेश गरिदवनवर लषण , .: पिआम ॥ राम सदा मम मोल घर सुखसागर पर- अन कारण अद्वैत लिन समार पद अभिराम ॥ होन- महान ना निमद नोव नहि होन। गगन गिरह दारि- दे दनाती पडत दान तुगली होत सिखेन हित तन दबाना भमण निग्विन करने कबो प्रकट विलोकहु जिग्न अ नयट अरुण जलज पन अनयास । जन संा केहि जात सुरनटि अकाल ॥ विविध न 7 पत्र विच अधिक नन नम गुर। कब कौने तुलसी - तुसोसतसई। कान समाज। राज करत रज मिलि गयो सदत सात बारुराका तुलजी मोठे वचनते सुज उपजत चहुँ ओर । वशी- करण यक मन्त है परिहरु वचन कठोर ॥ रामपाते होत सुख रामरूपा बिन जात ॥ जानत रघुबर भजते तुलसी रठ अलतात ॥ सनसुख द्वै रघुनायके देहु सकल जग पौठि। तो केचुरो उरगाह होत अधिक अति डोठि॥ मरयादा दूर- हि रहे तुलसोशिये विचार॥ निकट निरादर होत है जिनि सुरसरिवरसार ॥ रान रूपानिधि स्वामि मम सब विधि पूरणकाम। परमारब परधाम वर सन्त सुखद बतधाम। रामहि जानहि राम रट भजु रामहि तजु काम। तुलसौ रान अजान नर किमि पावहिं परशाम ॥ तुनलो पति रशिएका सम सस्त साधना सून। नक रहित कछु हाथ नहिं सहित भक दश गून ॥ तुलसी अपने रामकहं भजन करहु इक अस। नादि अन्त निरवाहिवो जैसे नवको अङ्क ! दुगुग ति- गुणे चोगुणे पच षष्ठी सात। आठौते पुनि नव गुण नवके नव रहि जात ॥ नवके नव रहि जात है तुलती किये विचार। रमो राम इमि जगतमें नहीं दुत विस्तार । तुलसौ राम सनेह बरु त्याग सकल उपचारू। जैसे घटत न न नव नवो लिखत पहार॥ अझ अगुण आखर सगुण समुभाड उभय प्रकार। पोये राखे शाप भल तुलसौ चास विचार ॥ यहि विधिते सन राममय ससुझहु सुमतिनिधान । यात सकल विरोध तजु भजु सब ससुमन अान ॥ राम कामनाहौ- न पुनि सकलकामकरतार। याहौते परमातमा अध्यय अमल उदार ॥ जो कछु चाहत सो करत हरत भरत गत भेद काह सुखद काहू दुखद जानत हैं बुध वेद । सन्त कमल मधु- मास कर तुलसौ बरण विचार। जग सरवर तर भरण कर । २ - . -- - सोमा। 17- गति एक॥ विधा देह गति एक विधि कबहूँ । शिनि कर पावत सदा निरसहि मन्त । गाने मनाार रातहि राम प्रमान। नागपति लान पान ताते गन्त गाल । नोबहनिय जानिके नरयन :: मो रात मावत फूति फरहि पर- मोमल देव दाब सुख दोनों {D ITS। उदय गति कार जिमि ॥ तुलगी राम सुजानकी राम जनावै । गाने पवन गान कबहूँ ना हो ॥ सो मनी विषमता लेग। ताकी छपा कटान- ,,गि गुहकहै तब समझ सुनै निज कर- ।। कहना गुरु कर तत्र करे मिट सकल भव- ।। प्रागन नदि समय जिन्ह हियधी सियक्षप। .पी यानं पर उपदेश। संशय गगन नशाय ना। वा सोता सम स क गरु विवेक । का नियमन गो मा भयो विगत मग वाम ॥ मन कुमी ए समान। तई सन्त -- नगनि आन ॥ एवं शुद्ध उपासना परा- नि।यो गहि मगु पगु धरे रहे रामपद प्रीति । - 771 दिन गांव के किनि जाने कद् कोय। जहेते जो नाव नहीं है मोया अपगत ये सोई अवनि सो टहां जनम शापि मरापि समुहि सुम- -7 7 मा. दोनत भेद अस मधु मदिरा मकरन्द । गुरु :: प्राट पुरय परमानन्द ॥ डावर सागर कूपगत दाई दन। हे एक दूजे नही देत आनके हेत॥ गुण- । 7 - . .
१२ तुरताई। वे हि विधि पक्ष मयूर , काकरता गृह ना करे यह अत्रज बवाय। तुलसौ कहि उपदेश सुनि जनित पिता घर जाय तुपर अपय लौन्हे जानत व स्वभाव अनु- कार। तुमलो सिजन नाहिं शिशु मूषकहन न मजार ॥ उलनी जानत है समान वेतन सिजन अचेत। कौट जात उडिनिय निकट किनहि पति देत। होनहार सब आपते या शोच कर जौन। क बरसो सुगन कहहु उमेठत कोना मुल चाहत सुखमें बसा है सुखरूप विशाल। सन्त- तजा निशिनानसर क न तजत मराल ॥ नौति प्रौति यश यश गति तक शुभ पहिलान। वस्तौ हस्तौ हस्तिनौ देत न पनि रति बन॥ तुलसौ अपने दुखदते को कह रहत अजान। दोश अन्त कर काहिं उपजत करत निदान । यया धाथि सत्र बौजमें नखत अकाम निवाला तथा राम शुब चन्य जानत दुलसीदास। पुडमी पानी पायकहु पनड माह सनात। ता कह जानत राम अपि विनु गुरु कि- निलखि जानः शगुण ब्रह्म तुलसो सोई सगुण विलोकत सोह। दुल सुजनाना सांतिको तेहि विरोधते होइ॥ शूर या गण जौगि मरि पलटि आव चलि गेह। तिमि गति जानाति रामकी तसो सन्त सनेह ॥ परमातमपद राम एनि ती सन्त सुनान। जे जगमह विरचहिं धरे देह विगत अनिमान॥ यो संज्ञा जीवको सढा रहत रत काम। ब्रह्मणसेतन रामपद निशि वासर वशवान । सुख पाये हरमन हशत से सात तहे विषाद। प्रकटत दुरत नित्य पर- त क्षेवल रत विनखाननाना विधिको कल्पना नाना विधि- को सोग। सूक्षमता अस्व तन कबहुँ तजत नहि रोग ॥ जे- से भदौको सदा मजिल रहत दोउ दे। विन्दुको गति तै- - - । -- - . - तुमन - = - चाक होन पचेन। तुललो विविध प्रकारको 7 ॥ नामों का विरोध हाठि बहु तुलसी न TTT न लगा तब नाहक होमि मलान । नानिमोको मारि न जाय। ऐन लाभ १. :: विप जाय ॥ कोह द्रोह पत्रमूल है ।:: : पर्ग का समुनि को दुख । .if ॥ नीलामी हे पा समुफ रहित नहिं गृल। मोनितो फा॥ अनि दिगोयः रागा .IN वणगान न उरण ग आम गोरि। तस्ति- :: पागा गा पोरि ॥ तुलसो तेरो . . . ना गुदा। तात गिसोही उचित प्रव ।। विशेष निषेध पति उर मानसु "MR.7 की तेदि मजु पलटि सन्त शहित मुम्बधाम । . .. मन गुजदाम। वोज धन- मा -ति ।। नमो नया गया। प्रकट तहां नहि तम मन बन रहा नगदरचन कानन कोकनद वश विन्द गुर। गन पुरहुन गरि सदल जगहित मानस 17: जगने रद् इत्तोस है रामचरगा छत्तोन। तुलमो ३ बिचारि हिय है यह मतो प्रवीन॥ बन्दिन दून नचल नि गती वानुन नैहि कोन्ह। जहि हरि कर अनि मान हनि काली नहि पद नान्ह । शिला श्रायु मोचक वरण हरण बन जनाल। भरण करग सुख सिद्धितर तुलसी परम र विपनि हर घर मम धराधरण वलबाम। करालोचदत वग्ग लिन अभिराम ॥ विहम . पा . . - .
१ तुलसीसतसई। गत नाना मांति तेहि प्रकटत कालहि पाय। जान जाय गुरु ज्ञानते बिन जाने सरमाय ॥ तुलसौ तरु फूलत फलत जा विधि कालहि पाय। तैसेही गुण दोषते प्रकटत समय सुभाय ॥ दोषहु गुणको रौति यह जानु अनल गति देखि। तुलसौ जानत सोनदा जेहि विवेक सुविधेखि ॥ गुरुते प्रावत ज्ञान उर नाशत सकल विकार। यथा निलय गति दीपक मिटत सकल अधियार॥ यद्यपि अवनि अनेक सुख तोय ता- सु रस ताल । सन्तत तुलसी मानसर तदपि न तजहि मराल । तुलसौ तोरत तौर तरु मानस जहँ सविडार। विगत नलिनि अलि नतिन जल सर सरिहू वडि आर ॥ जो जल जीवन जगत को परतत पावन जौन। तुलसौ सो नौचे ढरत ताहि निवारत कोन । जो करता है करम को सो भोगत नहिं आन। ववनहार लनि है सोई देनो ल है निदान । रावण रावणको हन्यो दोष रामकह नाहि। निज हित अनहि देखु किन तुतसो आपहिमाहि। सुमिरु राम भजु रामपद देखु राम सुनु राम। तुलसी ससुलहु रायकह अहनिशि इह तव काम ॥ रज अप अनल अनिल नस जड़ जानत सब कोइ । इह चेतन्य सदा समुल काजरत दुख होइ॥ निजकृत विल- सत सो सदा बिन पाये उपदेश। गुरुपगु पाय सुमग धरै तुलसी हरै कलेश सलिल शुक्र शोणित समुक पल अरु अस्थि समेत। वाल कुमार युवा जरा है सुसमुक कर चेत । ऐसिहि गति अवसानको तुलसी जानत हेत। ताते यह गति जानि जिय अविरल हरि चित चेत ॥ जाने रामस्वरूप जब तब पावै पद सन्त। जन्म मरण पदते रहित सुखमा अमल दन्त ॥ दुखदायक जाने भले सुखदायक भजि राम। अब . मोमतमः। परि पनि पातन पवन तुलमी का विचार । : :: पफ पन्तयन तामत तव निरधार ॥ हम कपट : मा पा पाटि प्रथमन्त। भगु तुलसो तजि बाम if; भगान्त ॥ कना समुकि कवरण हरहु 7 : लार। मोर तमहर वाया बर तुलसो सरत Sir गारग आदि युन पाण्डुप्तगु सह अन्त । iiit मा सतर करि है कृपा परन्त ॥ झटिति T: HIR दिय आदि बरा हर एक। अन्त प्रथम | गागल सिवेक ॥ गादि चन्द्र चञ्चल सहित ! हाम। घगन्नन रन्जनमुगन भवभजन . - in fhini ना जागु पनि पद रति सहित •i; । ति पनि मति चागि मुगति नदि तुलतो करु प्रेम ॥ नागाव गरिसुना गगि सारंग मदि जान। आदि नमप्रथम युन तुलसो समुझ न आन ॥ गिरिजागति कन आदि दक हरि ननन युधि जान । आदि अन्त भज अन्त नि तलना शचि मन मान तुपतिपद पुनि पदि- ४. या प्रथम प्रादि पुर लेड। अन्त हरया पद द्वितियमहँ 7 बारा नह नह ॥ बाहन शेष सुमधु परब भरत नगर युत आना हरि भरि मरित विर्य करि आदि मध्य अवसान । राना उगमाको बरगा बनज सहित दाउ अन्त। ताकह पारन हित एकवल अन्त ॥ वारिज वारिज वरण वर गत दनमादाम। आदि आदि भजु आदि पद पाये परम सन भन नुनमी कुलिगान्तकह सह अगार तजि काम। सपनागर नागर ललित बलो अलो परधाम ॥ चञ्चल सहि- रचना अन्न अन्त युन नान। सन्त शास्त्र सम्मत समुकि का परमान॥ आदि बसन्त इकार दे आशय ता- " , -- -- . तुरागसतसई। वौत्र रैयत वितय पति पति तुलसी तोर। तासु बिमुख सख एनि विम्म सपोह हो न सोरः द्वितिय कोल रागिव प्रथम बाहु न निश्चय साहि। ब्रादि एक कल दे रुनहु वैद विदित गुण नाहि॥ वसत जहां राघव जलज तेहि मिति गोजहि सन। मज तुललौ तेहि अरि लुपद करि उर प्रेम अमन ॥ मन तरणिरि आदिकहूँ तुलसी प्रात्मन अन्त पन्जानन लहि पदम मथि गहे विमल मन सन्त । बनिता शैल सुतासको तासु जनमको ठान। तेहि भजु तुलसीदास हित प्रणत सकल सुखधाम ॥ भज पतङ्गसुत आदिकह मृत्युञ्जय अरि अन्तु। तुलसौ पुहकर यज्ञकर वरण पासु- मिचन्तु ॥ उल्टे नालो तानु पलि सौ हजार मन सत्य ॥ द्वितिय दृतिय हर काल नहिं म तेहि तुलसीदास। काका- मन असन किये सासन लहे उपास ॥ अादि द्वितिय भव- तारक मज तुलसौ सप अन्त। कमल प्रथम अरु मध्य सह के विदित मत सन्त ॥ जेहि न गन्यो कछु मानसह दुरपति परि सौ ग्रास। तेहि पद शुचिता अवधि भव तेहि सजु तुतसौदाल ॥ नैनकरण गुणधरण वर तावर वरण विचार। चरण लतर तुलसी चहसि उबरन शरणमधार । भजु हरि आदिहि वाटिका सरिता राजिव अन्त। करिता पढ़ विज्ञास भव सरिता तरसि तुरन्त ॥ जड़ मोहन वरणादि- कह सह चञ्चल चित चेन। भजु तुलसौ संसार अहि नहि गहि करत अचेना मरण अविप वारण वरण दूसर अन्त अगार। तुलसौ इषु सह रागधर तारण तरण अधार॥ ज्यों उरविन चाहलि कटित तौ करि घटित उपाय। सुमन सवर वर अरि- चरण सेवन लरत सुभाय ॥ द्वितिय पयोधर परमधन बाग अन्त युत सोय। सजु तुलसौ संसार हित याते अधिक न ॥
तुलमी सतमई। को ताहि बिसारि शठ भरमत फिरत भुलान । कौन जाति नोकामनी को दुखदायक बाम। को कहिये शशिकर दुखद को राम ॥ को मकर गुरुवागवर शिवहरको अभिमान को प्रजगतको भरताको हरिजान । सरवेय सरजीव- I कम रोहिउदपहिचान। पञ्चवर्ग गहि युतसहित तुलसी of गाना होत हरप का पाय धन विपति तजे का धाम ॥ .' : पनि कनारि तर राति सुखदायक राम ॥ बोर कवन :, नगर भोर करन रतराम । कवन कर हरिपदविमुख ... कामो वाम ॥ कारण को कंजीव को खंगुण कह सब ।।मानको तुनामी कहत सो पुनि आवन होय ॥ तुलसौ गापिकाको ओचप वितिय रामेत ॥ अब समुझे जड़ सरि- - माधु सचेत ॥ जामु आतु सरदेवको अरु असार ४. वान। गफज दुग्वद उन्नती तजहु मध्य तासु सुखधाम ॥ चल नियमन प्रथम हरि जो चाहसि परधाम। तुलसी कहहि तन गुनह यही सयानप काम ॥ कुलिशधर्म युग अन्तयुत मन नाना नज काम ॥ अशभहरगण संगयशमन सकल कता वाम ॥ योकरको रघुनायहर अनयम कह सब कोय । सुख- दाको नानन मुमति तुलसी समतादोय ॥ वैरमूलहित हरवचन ममृल उपकार। दोहा सरल सनेहमें तुलसौ करै विचार ॥ माग कवन गुरु लघु जगत तुलसौ और न आन। श्रेष्ठाको हरि- भकिमर को लघु लोभ समान ॥ चरण द्वितिय नाशक निरय तन्नमा अन्तग्मा। भजहु सकल योकरसदन जनपालक खल- मार' च पश्येय सम्बर सहित यमबत दुखद न आन। तुलसौ त्यतने इगल अन्तिकार सहजान : तुलसी यमगण बोध नि मिटै कलेश । ताते सदगुरुशरण गह जाते पद- .: भगा जगण कासों करसि रामसयन नहिं कोय। ।
6 तुलसी सतसई। सुवित्रार! तुतसी तासु शरण परे कासु न सयो उबार । धत धराशर वरण युग शरण हरण भवभार। करन सतर तर परम पद तुलसी परमानारबरन धनञ्जय सूतपति चरण शरण रति नाहि। तुलसौ जगवचक किठि किये विधाता नाहि कुन्नसौ रजनी पूर्णिमा हा महित लजि लेहु। श्रादि छन्त युन जानिऋदि तुलापनतरने सानु गोब तिनि ताल पति कार प्रतिदिन जाहि। ज्ञान सुगति युत सुखसयन लको लान ताहि॥ भजु तुललो औषानिह सहित तल गन गन्त २६ मायुय जासुबल मन चल अचल बरता देत दहा बर वाजपर लेत कहा इत राज। अन्त आदि युर हिन मजु जो चाहलि शुल काज॥ चन्द्रवलि भज मुण लडित समुक्ति सन्त अनुराग। तुमती जो यह वन पर तो तक पूरण भाग ' लिनकै हरि वाहन नहीं दधिलुत अन जेहि नाहि। तुलसीते नर तुछ है विना समोर उड़ाहिं। रवि चञ्चल अरु ब्रह्म द्रव बौत्र सुवास पिचारि। तुलसि- दास प्रासन परे अनिता उर धारि । वन वनिताहगको- रमा युत काश सहित विवेक। अन्त आदि तुलसी मजहु परि- हरि मत कर टेक । उौं अन्तहु सादि युन कुत शोभौ काम- तादि। के विपर्य ऐसेहि सजह तुलसी शमन विषाद॥ तो तोहिकहं सब कोर सुख: करहि कहा तव पाव । हख तिथ वारिज वरण तजब लोन सुतु साँचा तजहु सदाशुभ माशमरि सजु सुननस रिकाती सजुमतईश शवन्तिका तुलसौ विमल विशाल ॥ एतवन्त वरवरणयुग सेत जगत सब जान। चेत सहित सुमित्य करत हरत सकल अघखान॥ मैत्रीवरणय- कारको सहसर आदि विचारि। पञ्चवर्गगहियुत सहित तुलसी ताहितसारि हलयम मध्य समानयुत याते अधिक नमाना In
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तुतणे सतसई। तुलसौ पतिपहिचान बिन कोउ तुलकबहुँलहोय ॥ तुलसौतगण- विहौन नर सदा नगणके बीच । तिनहिं जगण कैसे लहै पर संगणके बीच ॥ इन्द्रमणि सुरदेव ऋषि रुक्मिणिपत्ति शुभ जान। भोजनहिता काक अलि आनंद अशुभ समान ॥ को हिन सन्त अहित जुटिल नाशकको हित लोभ। पोषक तोषक दुखद अरि शोषक तुलसौ क्षोम ॥ सदा नगण पद प्रौति यहि जातु नगण सम ताहि । जगण ताहि जययुत रहत तुलसौ संशय नाहि ॥ भगण भक्ति करू भरम तजि तगण सगण विधि होय। सगण सुभाय समुसि तनो भजे न दूषण कोय ॥ श्रोगज आसनजतजू विहरत तौर सुधौर । यज्ञ णय मैत्राणपद राजत औरघुवीर वाणद्युतज तट निकट विहरत रामसुजान। तुलसौ करकमलन ललित लसत शरासन वान । मृदृमेचक शिरसह रुचिर शौशतिलक ध्वङ्ग । धनुशर गहि जतु तहितयुत तुलसी लसत मयङ्क॥ हंस कमल विच वरणयुन तुलसौ अतिप्रिय जाहि। तीनलोकमह जो भजे लहै तासु फल ताहि ॥ आदि महै अन्तहु महै मध्य रहै तेहिजान। अनजाने जड़जीव सव समुके सन्तसुजान । आदि रहै मध्ये रहै अन्त देहे सो वात। रामविमुखके होत है रामविमुखते जात ॥ ललित चरण कटि कर ललित लसत ललित बनमाल । ललित- चिबुक दिन अधरसह लोचन ललित विशाल भरणहरणअव्य- अमल सहित विकल्यविचार। कह तुलसौ मति अनुहरत दोहा अर्थ अपार ॥ वशिष्ठादिलकारमह सङ्कतादि सुरौति ॥ बहे बहुरि आगे कहब समुभव सुमतिविनौति ॥ दोष अलङ्गत सन्धि गति मैत्रीवरण विचार। हरण सरण सुविभक्ति भल कविहि अर्थ निरधार : देशकाल करताकरम बुधि विद्यागतिहीन। ते सुरतरु तर दारदौ सुरसरितौर मौन ॥ देशकाल गतिहीन जे ॥ " . । - तुमो मतमः। मेरे परम पिगाम ॥ सोई सेपर सोइ मुवा सेवत्त 17। तगमी महिमा मोह को विदित बखानत सन्त ॥ पातलो नगन संगय गमन समान। तुलसो समता कान पान कह पान । बसहा भव अरि हित । गोपि न सगुमान होन। तुलसी दौन मलौनमति । पगा पोन भटगत पर अतता अटकत ज्ञान । गरिन पिटि फटकत तिघु अभिमान । दिनु दुगिन प्लखित रहित तेहि होइ। तुलसी '; या पाम शुगम रामते सोइ । मात पिता निज : :: नट उपदेश। सुनि माने विधि आप जेहि Hi म कलेगा गागी भलो मनाबो भलो होनको || कान गगन के गडुआ सो गठ तुलसौदास ॥ बिलि- दयन देवता करणौ समना देव। मुये मार अविचार- बाय मात्रक एव ॥ बिनहि बोज तरु एक भव शाखा दल न पन। को वागणे अनिणय अमित सब बिधि अकल 77॥ शुरू पिक मुनिगगा बुध विबुध फल आश्रित अति न । ननमो ने मत्र विरहित सो तक तासु अधीन ॥ को न- है गंबन प्राय भव को न मेय पनाय। तुलसौ बादहि का है प्रापदि पाप नगाय॥ कहत विविध फल विमल दि सहन न एक प्रमान । भरम प्रनिष्ठा मानि मन तुलसी कार भुनान ॥ मृगजल वट भरि विविध विवि सौचत नभ- । तुन्नमी मन हरपित रहत बिनहिं लहे फल फूल ॥ मंरि बडि हमकई लखो नभतहको फल फल। ते तुलसौ उनले किन मनि मानहि मुद मूल ॥ तेपि तिन्हें याहिं 27 सरि करि बार हजार। तुलसौ गाडरको ढरन जाने विकार ॥ शशि कर सग रचना किये कत शोभा सर- ।
- तुलसी रुतराई। इतसौ सो तब लखि परै कर पा वरधौर ॥ अपने खोदे सूपमह गिरे थया दुख होई। तुलसी सुखद ससुकि हिये रचत जगत सब कोय ॥ ता विधिते अपनो विभव दख सुख दे करतार। तुललौ कोड दोउ सन्त वर कीन्हे विरचि विचार । रसनाहौके सुत उपर करत करनतर प्रौति। तेहि पाछे जग सर तरी रूनुक नरोशिौति माया मन जिन ईश अणि ब्रह्मा विष्णु महेश। सुर देवौ श्री ब्रह्मलौं रसना सुत उपदेश । करणबार वारिधि अगम को गर्म करै अपार। जन तुलसौ लनलगात पारे विशद विचार ॥ गहि सुवेल विरले सक्षुम्ति वहि गय अपर हजार। कोटिन कूड़े खबरि नहिं तुलसी कह- हि विचार: मन सुनत देखल नयन तुतन न विविध विरोध। कहहु कहौ केहि मानिये केहि विधि करिय प्रवोध । श्रवणात्मक ध्वन्यात्मक वरणात्मक विधि तोन। विविध शब्द अनुभव संगम तुलसी कहहि मन कहत सुनत यादिहि कारण देखा वरणविहीन। दृष्टिमान चर अचमण एकहि एकान तौला पन्च से च गराविपुल, तुलसी जहहिं विचारि । नर पशु खेदज खगज संग हनि बुध मत निधारि॥ अनि विरोध तिनमह प्रचल प्रस्ट परत पहिचान। बरसा- वरनति अएर नहि तुतली कहाहि सान॥ रोष रोम ब्रह्माण्ड बहु देखत तुलसीवाल। विन देखे बोले कोऊ सुनि याने विशाल : वेद कहत जलगि जगत तेहिते अलग न आन। तेहि राधार व्यवहात लखु तुलसौ परम प्रमान ॥ सरमए सूक्षात जासुबहँ ताहि सुमेरु सूक। कहेउ न ससुलत सो अबुध हुलसौ विगत विसूमा । पाहत अदर ससुलत अवर गहत तजत कछु और। कहेउ उनै ससुरून नहीं तुलसी जाति मतिवौर । देखो तर अदेख व अनंदखो विण्डास। कठिन प्रबलता r -- तुमो मतमः। जान। . 1 - + - - - . . - . . . , . . . - । TFT ---को ग्टन पगये पोर ॥ सनं वरण माने वरण निजा।। नुलगी मुगुरुप्रसाद बत परै वरण निगगा नागके मागाकार न -::गिना ना गम भुलान ॥ करना हो नागाहार कानारमो भोगे ट गर्दने मटक पटक अपिल नाहि - भरता फिरत जुलाना नों | 1 :। - भग भुना है मा न प चित पवार गगनिज मन गण मौना T-नरका ने लामो 7 Fram शिपयनसीन पनि नारदा भरि मनि । नागठितुगो कोन विचार। का रिटान नहा निरधार ॥ काम क्रोध -.--.पन्नं बाग। का पीउन का मरख ॥ गो कागो तो उन नमजे सग- ":ो सो बाको पान। कोर 17 बाबा। मन राग्वा वैराग- गः॥ रामचरगा परच नहो विन साधन पट, । मुहाय बादहो भाड भये राजि गह ॥ काह गयो 77271 गो बनि आयो नाहि। बनते बनते बनि गयो बढीमाहि॥ जो गनि जाने वरणको तन गति सो । गा बिन्द कारण यषा तथा जानु नहिं आन॥ योग मनान नग जान भरमको मूल। तु नसो करता जान मानु जनि भृत ! नाम जगत लम समुक जग , - 7- . ។ । 1. - २२ ॥ तुलसी सतसई। सात। बर्ग समन अवसन्त खलु चाहत अचरज बात । तुलसौ बोल न बूझई देखत देखन जोय । तिन शठकै उपदेश- का करब सयाने कोय ॥ जो न सुनै तेहि का कहिय कहा सुनाइय ताहि। तुलसौ तेहि उपदेशही तासु सरिस मति जाहि ॥ कहत सकल घट राममय तौ खोजत केहि काज। तुलसौ कह इह जमति सुनि उर आवत अति लाज ॥ अलख कहहिं देखन चहाहि ऐसे परम प्रवीन । तुलसौ जग उपदेशही बनि बुध अबुध मलौन । हहरत हारत रहित विद रहत धरे अभिमान। ते तुलसौ गुरु आब नहिं कहि इतिहास पुराना निज नैनन दौसत नहौं गही आधरे बाह। कहत मोहवश तेहि अधम परम हमारे नाह॥ गगनवाटिका सोंचही सरि भरि सिन्धुतरङ्ग। तुलसौ मानहि मोद मन ऐले अधम रामङ्ग। दृषद करत रचना विहरि रङ्ग रूप सम- तूल। विग वदन विठा करे ताते भयो न तल ॥ चाह ति- हारो आपते मानन अानन आन। तुलसौ करु पहिचान पति याते अधिक न मान ॥ प्रातमवोध विचार इह तुलसौ करू उपकार। कोउ कोउ रामप्रसादते पावत परमतपार ॥ जहां तोष तहँ राम हैं राम तोष नहिं भेद। तुलसौ देखि गहत नहीं सहत विविध विधि खेद ॥ गोधन गजधन वाजिधन और रतनधनखान। जब आवै सन्तोषधन सब धन धूरि समान ॥ कृधि रति अटन विमढ़ लट घट उदघटत न ज्ञान । तुलसौ रटत हटत नहौं अतिशय गति अभिमान । भुभुवन गत दाम भुव काम न विविध विधान। तो तन वर्तमान यत तत तुलसी परमान ॥ भो उर मुक्ति विभव पढ़ि मनगत प्रकट लखात। मन भो उर अति सुत्तिते विलग विजानव तात ॥ रामचरण पहिचान विनु मिटौ न मनको दौर।
. तुलपी मतम। - लोक पहिचान । प्राजु जेड सो काल है तुलसी भर- - - 17 पान आधोन दोउ भावी भूत विचार । तुलसो Pा मनन कक जो हे सो निरुपार। मानस उर बर मम पगाग गनिनौर। उठेउ वृजिन बुधि मल भई बुधि जमा पभोर ॥ अलङ्कार कवि रोति यत भूषण दूषण ''।। जान वागान निविध तुलमी विमल बिनौति । iमाता सो पराग रस गन्ध । कामादिक तेहि !' • TITTो घाट प्रबन्ध ॥ प्रेन उमंग कवितावली चली । नार। राम रावरि मिलन हित तुगसी इरष तर छन्द वर हरत द्वैत तरु मूल। वैदिक | FII विमल लमत विशदवर काल । सन्तसभा विमला fif शुमाल ग्वानि। तुलप्ती उर सुरसरिसुता लसत 7 { . नि ॥ मुक्त मुमुजू ार विषद श्रोता विविध प्रकार । '' न • गा पुग्युग सुतट तुलतो कहहि विचार । बाराणतो- f. if नदिशेनमुना मत होय। तिमि अवधहि सरयु न तजे मावि सर कोय ॥ कहा सुनब समुभव पुनः मुनि समु- पर पान। श्रमहर घाट प्रबन्ध वर तुलसी परम प्रमान । नि चतुर्थःमर्गः ॥ ४॥ ग्रनन गनुपम जानु वर मकन कला गुणधाम ॥ अविनाशी अब यह 17 भा यह तनु धरि राम॥ सदा प्रकाश सरूपवर नया नमान। अत्रमेय अद्वैत अज याते दुरत न ज्ञान । दिहमा ग्ममकह तुलप्तौ सन्त न आन। जाको कृपा टाकते पाये पदनिवान ॥ तजत सलिल अपि पुनि गहत घटत नहि गति । तु नमो यह गति उर निरखि करिय रामपद- . - २५ , तुइसी सतसई । बस्तु न करिचित वैन। विन्द गये जिमि गैनते रहत ऐनको ऐन ॥ आपुहि ऐन विचारु विधि सिद्धि बिमल गति मान। आन बासना बिंदुसम तुलसौ परम प्रमान ॥ धन धन कहे न होत कोउ समुकि देखु धनमान। होत धनिक तुलसी कहत दुखित न रहत जहान ॥ हिमको सूरतिके हिये लगत नौरको प्यास। लगत शब्द गुरु तरनिकर सोसैं रहौ न पास जाके उरवर वासना भई भाष का आन। तुलसी ताहि विड- स्वना कहि विधि कयहि प्रमान : रुजत न भव परचे विना भेषज करि किमि कोय। जान परै भेषज करै सहन नाश रुज होय॥ मानस व्याध कुचाह तव सदगुरु वैद समान। जासु वचन अलबल अवल होन सशल रुन हान ॥ रुचि बाढ़े सत- सङ्गमह नौति क्षुधा अधिकाय । होत ज्ञानबल पौन भल वृजिन विपति मिटि जाय॥ शुक्लपक्ष शशि स्वच्छमौ रुष्णा- पक्ष द्युतिहीन। बब बटब विधि भांति बिचि तुलसी कह- हिं प्रवीन॥ सतसङ्गति सितपक्ष सम असित असन्त प्रसङ्ग। जानु अापकहँ चन्द्र सम तुलसी बदन प्रभङ्ग तीरथपति सतसग सन भक्ति देवसरि जान । विधि उलटौ गति रामको तरणि सुता अनुमान॥ वर मेधा मानहु गिरा धौर धर्म न- योध। मिलन त्रिवेणौ मनहरणि तुलसी तजहु विरोध ॥ समकब सब मञ्चन विशद मल अनौत गइ धोय। अवश मिलन संशय नहीं सहन रामपद होय ॥ क्षेम विमल बारा- गसौ सुरअपगा सम भक्ति। ज्ञानविपर्व पूवर अति विशद लसत दया सह शक्ति । वसत क्षेम गृह जासु मन वाराणसी न दूरि। बिलसित सुरसरि भक्ति जहँ तुलसी नय कृत भूरि । सित काशी मगहर अमित लोभ मोह मद काम। हानि लाभ तुलसी समुझि वास करहु वसुयाम ॥ गये पलटि आवे - ५ F - । तुगमोमतगई। - पमिर पम्प ग। सूनम गुगको जीवकर तुलसो सो तन- • पावन पपर तिते गया जात तया रविमाहि॥ जहते लोग तुरूमौ जानन ताहि 1 प्रकट भये देखत दान लखत को कोय। तुलतो यह अतिशय भगम fini गम न होथ। शा जग जे नयहीन नरबरबस दुखनग- । पकटरा दरत महादुखी कहलागि कहियत ताहि ॥ 17 मग पपने गहे मगकोहु गहत न धाय। सौ राम- गा, किनु सो किमि जानो जाय । महिते रवि रविते अवनि दापट नादि। तुलसौ तबलगि दुखित अति शशिन- [ न न नाहि॥ सन्तनको गनि योतकर लेश कलेश न होय । सायिप गुम्बदा सटा जानु परमपद सोय । तजत अमिय fगानि जग तुलमो देवत रूप । गहत नहौ सबकह विदित पानिय अमल पनप ॥ गगिकर सुखद सकल जगत को तेहि जानन नाहि। कोक कमलकर दखदकर तदपि दुखद नहि द॥ बिन दो ममुझे मुने मोउ भी मिथ्यावाद। तुलसी एक गमन महर्जाह मिटे विषाद ॥ वरपि विज्ञ हरषित करन हाल नाप अयप्यास । तुलमो दोष न जलदकर त्यों जड़ गद नाम ॥ चन्द्र दंत अमि लेत विष देखहु मनहि विचार। दी निमिश्यि सन्नर नहिमा विशद अपार ।। रसम विदित रविर लय गान गोतकर जान । ललत योगयशकार भव दतनी मनमा ममान ॥ लति अवनि रविअंगकहं दति अमिय नार। दुल सौ सृनमको सदा रवि रजनीश अधार । भूमि भान अन्य लअप समज चराचर रूप । तुलसौ विन गुरु ना लहै हमत राम र अनप ॥ तुलसौ जे लयलोन नर ते निशिका तन- गेन । अपा सकन रविगत भये महाकष्ट अतिदौन ॥ तुलसी नोगते मनमति जब होय। राम मिलन संशय नहौं ||
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तुमसतसई।
प्रोति । चुम्बक वाहन सेति निम सन्तन हरि सुखधाम । जान
निरीक्षर सम सफरि तुलसौ जानत राम । भरत हरत दरशत
सबहिं पनि अदरश सबकाहु ॥ तुलसौ सुगुरु प्रसादवर होत
परमपद लाहु । यथा प्रत्यक्ष सरूप बहु जानत है सब कोय ॥
तथाहि ले गतिको लखब असमञ्जर अति सोय । यथा सकल
अपि जात अप रविमण्डलको माहिं। मिलत तथा जिव रामपद
होत तहांलै नाहि ॥ कर्मकोष सँग लै गयो तुलप्तौ अपनी वानि ।
जहां जाय बिल तहाँ परै क. पहिचानि। व्यों धरणीमहँ
हेतु सब रहत यथा धरि देह। त्यों तुलसौ लै राममहँ मिलत
कबहुं नहिं एह ॥ शोषक पोषक समुल शुचि राम प्रकाशतरूप।
यथा तथा बिन देखिये जिमि आदरश अनूप ॥ कर्म मिटाये
मिटत नहिं तुलसौ किये विचार । करतब होके फेर है या विधि
सार अधार ॥ एक किये हो दूसरो बहुरि तौसरो अङ्ग । तुल मौ
सेहु ना नशै गतिशय कर्म तरङ्ग ॥ इन दोउनते रहत भो कोउ न
राम तजिबान । तुलप्तौ यह गति जानिहै कोउकोउ सन्तसु
जान ६ सन्तनको ले अपिसदन समुझाहि सुगति प्रवौना कर्मविप
र्यय कबहुँ नहिं सदा रामरसलौन : सदा एकरस सन्त सिय निश्च
य निशिकर जान ॥ रामदिवाकर दुखहरण तुलसौ शौलनिधान ॥
सन्तनको गति उरविजा जान शशि परनाम। रमित रहत रसमें
सदा तुलसी रति नहिं आन। जातरूप जिमि अनल मिलि
'ललित होत तन आना सन्तपील कर सोय तिमि लमहि रामपद
पाय ॥ आपुहि बाधत आप हठि कौन छुड़ावन ताहि । सुख्दा-
यक देखन सुनत तदपि सो मानत नाहि ॥ जौन तारते ?
गति उर्द्ध तौन गति जात । तुजसी मकरो:न्त इव भिक
नशात । जहाँ रहत तहँ सह सदा तुलसौ तेगै बानि। सुधरें
विधिवश होय जब सतसङ्गति पहिचानि रवि रजनौस घातला
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- . -- तमोमतमई। - परनाम। मो वरतरता समन कोउ सब विधि पूरण- कग्ना कारगा सारपद प्रावै अमल अभेद। कर्म -7 पनि रन हैं वलसो जानत वेद। स्वेदज जवन प्रका- पार करे कोउ नाहि। भये प्रकट तेहिके सुनौ कोन निमा ताहि॥ भगो विषमता कर्म मह समता किये न । रानमो गमता समुझ कर सकल मान मद धोय गांदन रामस्त जग सुहृद जान सबकाहु। तुलसौ यह ६ : 115 37 दिन प्रति प्रति मुन लाहु। यह मनमहँ पाल्हे कोउ अपर न आन। कासन करत विरोध दिगो समु प्रमान महि जल अनल सुअनिल नही प्रकट तर रूप। जानि जाय वर बोधते अति शुभ अपन अना॥ जोपे आक्रममातते उपजे बुद्धि विशाल । नानी अनि छलहीन है गुरुसंवन कछु काल॥ कारज युग जान हिय निन्य अनित्य ममान। गुरु गमते देखहि सुजन वह तुन्दमी परमान॥ महि मय अहिनाको आदि ज्ञान भी भट। ना विवि तंई जीव कह होन समुझ विन खेद ॥ पंग फेर निन कर्म मह भ्रम भवका यह देत॥ तुलसी कहत मजन सुन चन न समुझ अचेत । नामकार दूषण नहौ दुलमी किये विचार। कर्मनको घटना समुझि ऐसे वरण उचा। सुनन कुजन महि गत यथा तथा भानु शशिमाहिं। नमो जानन हो मुखौ होत समुन विन नाहि ॥ मातु तात भवानि जिमि तिमि तु नसो गति तोरि। मात न तात न जान कर है तेहि ममुम बहोरि । सर्व सकल तें है सदा विपिन मब ठौर । तुलसी जानहिं सुहृद जे ते अति मति जिमार ॥ अनङ्कार घटना कनक रूप नाम गण तीन। दरमो गमप्रसादने परमुहि परमप्रवीन । एक पदारथ - .
२६ दमौतमई। कहहिं सुमति सब कोय । सेवक पद सुखकर सदा दुग्वद सेय- पद जान। यया विभीषण रावणहि तुतसो समुल प्रमान । शौत उप्र मयुग निशिदिन कर करतार। तुलली तिन- कहे एक नहि निररहु करि निरधार । नहि नैनन काहू लस्यो धरत नाम सब कोय। ताते लाँचो है समुल रु ठ कबहुँ नहिं होय । वैद कहत सब कोउ विदित तुलसी अपिय स्वभाव । करत पान अपि रुन हरत अविरल बमल प्रभाव ॥ गन्ध शीत अपि उष्णता सवहि विदित जग जान। महिनन अनल सुमानि लग विन देखे परमान ॥ इनमह चेतन अमल अल बिलखत तुलसीदास । सो पद गुरुउपदेश सुनि सहन होत परकास ॥ यहि विधिते वर बोध वह गुरु प्रसाद कोउ पाव । हैं ते अल तिहुँ कालमह तुलसी सहन प्रभाव ! काकसुतासुत- वासुता मिलत जननि पितु धाय । आदि मध्य अवसान गत चेतन सहज सभाय ॥ समता स्वारघहीनते होत न विशद वि- वैक ॥ तुलसौ यह तिनहौं फवै जिनहि अनेक न एक सब स्वा- रघ खारघ रटत तुलसौ घटत न एक। ज्ञानरहित अज्ञानरत कठिन अमनकर टेक ॥ स्वारथ सो जानहु सदा जासों विपति नशाय। तुलसौ गुरुउपदेश बिन सो किमि जानी जाय । कारज स्वारथ हित करै कारण करे न होय । मनवा ऊषविषते तुलसौ समकहु सोय ५० कारण कारज जानता सबकाहू पर- मान । तुलसौ कारजकारजो सो तें अपर न आन ॥ विन करता कारज नहीं जानत हैं सब कोय। गुरुमुख श्रवण सुनत नहि प्राप्ति कवन विधि होय ॥ करता कारण कारजहु तुलसी गुरु पर- मान। लोपत करता मोहवश ऐसो अबुध मलान । अनिल सलिल विधियोगते यथा वोचि बहु होय । करत करावत नहि कलुक करता कारण सोय ॥ क्षेम धरण करतार कर तुलसी
तुमीमा।
- बनान। नलपी ना लखि पाइ हो किये अमित अनु-
मात ॥ चनमान साचो रहित होत नहीं परमान। कह तुलसी
177 गो सो कर अगरको आन मिति कारण करता सहित
नाज जिरो पनेक। जो करता जाने नही तो कहु कवन
कि॥ म्वकार करता कनक कारगा प्रकट लखाय । अल-
ार कारग शबद गगा गोमा सरसाय ॥ चामोकर भूषण
अपित करना कह तब भेद। तुलमो ने गुरु गमरहित ताहि
मिन पनि ग्वेद ॥ तन निमित्त जह जो भयो तहां सोद पर-
पा। गिन जाने माने तहां तुलसी कहहिं सुजान ॥ मृण्मय.
मानव विधि काना मन भव रूप । तुलसो जानेते सुख-
द गा गम जान अनूप ॥ सब देखत मुण भाज नहिं को कोद
अपन कलान । नाके मनके रूप वह भाजन विलखु विशाल ।
* अप कुनालको माटो एक अनूप। भाजन अमित
चिगान लघु सो काता मन रूप॥ जहाँ रहत वन्तत तहां
नलमो नित्य स्वरूप। भूत न भावो ताहि कह अतिशय अमल
अनृप । वाम ममोर प्रत्यन अप स्वच्छा दरश लखात । तुलसी
समयमाट पिन अनिगनि जानि न जात ॥ तुलसी तल रहि
जान है युग तन अचल उपाधि। यह गति तेहि लखि परत
जहि भई समनि शुठि साधि ॥ करता कारण कालके योग
काम मन गान। पुनःकाल करता दुरत कारण रहत प्रमान ।।
इति पञ्चमः सर्गः ॥५॥
३१ । तुलसतसई। विविध गुण संज्ञा अगम अपार। तुलसौ सुगुरुप्रसादते पाये पद निरधार ॥ गन्ध न मूल उपाधि बहु भूषण तन गण जान। शोभा गण तुलसौ कहहि समुझहिं सुमतिनिधान । जैसो जहां उपाधि तह घटित पदारथ रूप। तेसो तहां प्रभा समन गुणगण सुमति अनूप ॥ जानु वस्तु अस्थिर सदा मिटत मिटाये नाहिं। वपु नाम प्रकटत दृरत समुझि विलोकहु ताहि ॥ पेष रूप संज्ञा कहब गुण सुविवेक विचार। इतनो- ई उपदेश वर तुलसौ किये विचार ॥ सदा सगुण सौता रमण सुखसागर बलधाम। जन तुलसौ परखे परम पाये पद विश्राम । सगुण पदाग्य एक नित निर्गुण अमित उपाधि । तुलसौ कहहिं विशेषते समुम सुगति सुठि साधि ॥ यथा एक- महँ देद गुण तामह को कहु नाहि। तुलसौ वर्तत सकल हैं समुकत कोउ कोउ ताहि । तुलसौ जानत साधुजन उदय अस्तगत भेद। बिन जाने कैसे मिटे विविध जनन जन खेद । संशय शोक समूल रुज देत अमित दुख ताहि। अहि अनुगत सपने विविध चाहि परायण जाहि। तुलसौ सांचो शाप है जब लगि खुलें न नैन। सो तवलगि जवलगि नहौं सुनै सुगुरुवर वैन ॥ पूरण परमारथ दरश परशव जौलगि आश। तौलगि खन उत्यान नद जवलगि जल न प्रकाश । तबलगि हमते सब बड़ो जबलगि है कछु चाह। चाहरहित कह को अधिक पाय परमपद थाह । कारण करता है अचल अपि अ- नादि अजरूप।ताते कारज विपुलतर तुलसौ अमल अनूप । करता जानि न परत है विन गुरुवरपरसाद। तुलसौ निज सुख विधि रहित केहि विधि मिटै विषाद ॥ मृण्मय घट जानत जगत विन कुलाल नहिं होय। तिमि तुलसौ करता रहित कर्म करै कहुँ कोय । ताते करता ज्ञान कर जाते - है तुलमीमतगा। निगोजपहें महाप्रतल पति सोय। जो कोइ तेहि पाई र पो पर पागे हो। तुलसो होत नहौं कछुक रहित सुवन चार । तोहीते अपन भयो सब विधि तेहि परचार ॥ सुवन जि भने राकल भर अति परम अधीन। तुलसी जेहि समु- मागे गो मन करन मलोन ॥ मानन सो साँचो हिये सुनत HITT आदि तुलमोते समुशन नहीं जो पद अमल नाटि जाहि कहत है माल सो जेहि कह तब सो ऐन ! नाशिक शिव अगहुँ करहु जिन वैन । तुलसी नीत पान सर काय। यहि विधि परम विड- Fili कदन का होय ॥ गुरु करित्रो सिद्वान्त यह होय पयाय बाय। प्रवित उचित ल वाय उर तुलसौ मिटै धि॥ गनगानिको फल यही संशय लहै न लेश। If"पालि माल चिन पायै पनि न कोश। जो मरवो पद गवन को यह लगि साध अमाध। कवन हेतु उपदेश गुरु मनमदनि भार वा । नो भावो कम है नहीं मठो गुरु सत- मद । गमि अति ते ए गुरु सन्त नको परसङ्ग जोले लखि हा पान तुलमो परपद आप। तोलगि सौहि विवश मदन बहन पुनको वाप॥ जहंलगि संज्ञा वरण भो जासु वने हाय। तो तुलसौसे है सबल आन कहा कहु होय । अपने नेनन देखि जे चलाहिं सुमतिवर लोग। तिनहिं न विपनि विवाद रुन तुनसी सुमति सुयोग। मृगा गगनचर नान विन करत नही पहिचान। परवश शठ हठ तजत मुख दलनी कित भुलान । काह कहो तेहि तोहिके जेहि उप- दानान। नुनसो कहत सो दुख सहत समुम रहित हिन बान ॥ बिन काटे तरुवर यथा निट कवन विधि छाह । तो तुलसी उपदेश दिन नि:सशय कोउ नाह। अपनो कर- - 1 तुलसतसई। जल थल तन गत है सड़ा ते तुलसी तिहु काल। जन्म भरण लसुलो विना भाषत समन विशाल ॥ तें तुलसौ करता सदा कारण शब्द न आन । कारण संज्ञा सुख दुखद बिन गुरु तेहि किनि जान॥ कारजरत करता ससुम दुख सुख सोगत सोय। तुलसी श्री गुरुदेव बिन दुखप्रद दूर न होय कारण शब्द स्वरूपमें संज्ञा गुण भव जान। करता सुरुगरते सुखद तुलती अपर न आन ॥ गन्ध विभावरि नौर रस सलिल अनल गत ज्ञान। वायुवेगकहँ बिन लखे बुध जन कहहिं प्रमान॥ अनुस्वार अक्षर रहित जानत हैं सब झोय। कह तुलसी जहँलगि वरण तासु रहित नहिं होय ॥ श्रादिहु अन्त- हु है तोई तुलसी और न आन। विन देखे ससुके बिना किमि को करै प्रमान । रहित विन्दु सब वरणते रेफ सहित सब जान । तुलसी स्वर संयोगते होत वरण पद मान । अनु- खार सूक्षम यश तथा वरण अवस्था दो सूक्षम अस्सूल सो तुलसी कबहुं न सूल ॥ अनिल बनल पनि सलिल रज तनगत तनवत होय । बहुरि सो रजगत जल बनल मुहत सहित रवि सोय ॥ और भेद सिद्धान्त यह निरखु सुमति करु सोय । तुलसी सुत भव योग विन पितु संज्ञा नहिं होय ॥ संज्ञा यह तब गुण समुस सुनव शब्द परमान । देखब रूप विशेष है तुलसौ वैष वखान ॥ होत पितातै पुन जिमि जानत को कहु नाहि। जवलगि सुन परसो नहीं पितु पद लहै न ताहि ॥ तिमि वरणन संज्ञा करे वरण वरण संयोग। तुलसी होय न वरण कर जबलगि वरण वियोग॥ तुलसी देखहु सफलकहं यहि विधि सुत अाधौन। पितु पद परनि सुदृढ़ भयो कोउ कोउ परम प्रवीन ॥ जहँ 'देखो- सुत पद सकल भयो पिता पद लोप। तलसी सो जानै सुई जासु अमोलिक चोप ॥ स्यात सुवन ५ तुलमोमताई। चलो मन पापा, भलो मन्द जेहि काल। तब जानव यो भई पति गय बुद्धि विशाल । नुलसी नबलगि लखि पार पाणको भेद। तबलगि केसेकै मिटै करम जनित र गेरा जोर देह सो प्राण हे प्राण देह नहिं दोय। बनलो जो लगि पाय है सो निरदय नहि होय ॥ तुलसौते कठो भगोकरिझठे रॉग प्रीति। है साँचो हो साच जब गद्दे गमती शेति ॥ मठो रचना साँच है रचत नहीं अलप्तात । गनर मागरस विठि नेक न बूझत बात ॥ करम खगेकर मोह शना पारावर नाल। हरत भरत भर हर गनत जगत जातागो काल॥ दिन कात किल सकल बुध ताकर यह व्य- महार। पति यिति लय होत हे सकल तासु अनुहार । श्रा गिलाय दल विपुल गाखायुत वर मृल। फूलि फरत गात जात तुलशी सकल सवल कहतब करतब सक नदिनाहि रहन नदि पान। जानन मानन आन विधि अनू- माम अनि हानि लाभ जय विधि विजय ज्ञान दान मामान। खान पान शुचि रुचि अशुचि तुलसो विदित विधान मानक पानक सम विषम रम भम गम गति ज्ञान। घट घट लट नट नादि जट तु नसौ रहित न जान ॥ कठिन काम करमा बबन करता कारक काम ॥ काय कटकारण पाम होत कान सम शाम ॥ खबर पातमा वोध वर खर पिन क न होय। तुलमो खसम विहीन जे ते खरतर नहि मोय। नित रति विन व्यवहारित विधि अगम सुगम जय नीच। धीर धरम धारण हरण तुलसो परत न बौच । पद विवरन विगढ़ तासु योग भव नाम। करता प नानि नहि मंना सर गृणधाम ॥ नाम जाति गुण देखि यो प्रबन उर भर्म। तुलसो गुरुउपदेश विन जानि सके तुकीसतसई। ३५ तब आप लखि सुनि गुनि श्राप विचार। तो तोहिकह दुख- दा महा तुम्बदा सुमति अधार ॥ ब्राह्मण वर विद्या विनय सुरनि वितनिधान पथ रति अनय अतीत मति सहिन या तिमान । वियन शिर नासुके प्रतिपद पर- उपकार। तुलसौ सो क्षतौ सही रहित सकल व्यभिचार ॥ वैश विनय मग पग धरै हरै कटुक घर बैन। सय मदा शुचि सरलता होय अचल सुख ऐन शुद्ध क्षुद्र पथपरि हरे हृदय विप्रपद मान। तुलसी मन समता सुमति सकल जीव सम जान। हेतु वरण वर शुचि रहनि रसनि रास सुखसार। चाहन काम सुरा न रस तुलसौ सुदृढ़ विचार॥ यथालाभ सन्तोषरत गृह मगबन सगरौत। सो तुलसौ सुखमें सदा जिन तनु विभव विनीत ॥ रहै जहां विचरै तहां कमौ कई कछु नाहिं। तुलसौ तह आनन्द सँग जात यघा सँग शाहि ॥ करत कर्म जेहिको सदा सो मन दुखदातार। तुलसी जो ससुमो मनहिं तो तेहि तजे विचार॥ कहत सुनत समुमत लखत तेहित विपति न जाय। तुलसौ सवते विलग हैं जबते नहिं ठहराय, सुनत कोटि कोटिन कहत कौड़ी हाथ न एक। देखत सकल पुराण अति तापर रहित विवेक ! ससु- मत है सन्तोष धन याते अधिक न आन। गहत नहौं तुलसौ कहत ताने अबुध मलान ॥ कहा होन देखे कहे सुनि समुमो सब रोति। तुजसी जवतगि होत नहि सुखद रामपद प्रीति । कोटिन साधनके किये अन्तरमल नहिं जाय। तुलती जौ लगि सकल गुण सहित न कर्म नशाय ॥ चाह बनौ जबलगि सकल तवलगि साधन सार। तामह अमित कलेशकर तुलसौ देख विचार। चाह किये दुखिया सकल ब्रह्मादिक सद कोय। निश्चलता तुलसी कठिन राम कृपावश होय।
॥
तुलमोससमई।
- परे नानातिनात नगाय। बातहि प्रादिहि दीप भव
प-7 नाग ॥ नातहिते बनि पावई बातहिते बनि
। गाTT पिलान वातहिते बोरात ॥ बात बिना
11: शिल गानाहि ते हरषात । बनत बात बर बात
"TTAR॥ बलमा जानु बान विन त्रिगरत हर दुक
गा। गाने दुव नातके जानिपरत कुशलात ॥ प्रेम वैर
गोपग पर गश अपयश जय हान। बात बीज दून सवनको
मोकादिरागान । सदा भगन गुरु साधु द्विज जीव दया
14 IT। घायद सुने त मन्यत्रत स्वर्ग सप्तसोपान । वञ्चक
{"f नातनय विविहिप्ता अतिलीन। तुलसो जगमहँ
दिन या नामनिशंनो तोन ॥ जे नर जग गुण दोषयुत तुलसी
बदन बिचा। कवह सुखो कबहूँ दुखित उदय अस्त व्यवहार।
कारन नगके युनतम काल अचल बलवान। त्रिविध विकल
नने हटहि तुलमो कहहिं प्रमान ! अनुभव अमल अनूप गुरु
बलक शास्त्रगनि होय ॥ बचे काल क्रम दोषते कहहिं सुबुध
सन कोय। सब विधि पूरगा धामबर राम अपर नहिं आन ।
नाको कृपाकटाचते होत दिये दृढज्ञान॥ सो स्वामी सो तर
सपा मो वर मुग्वदातार । तात मात पापदहरण सो आसमय
पधार ॥ सुखद दुखद कारज कठिन जानत को तेहि नाहि।
जानेहपर बिन गरुकृपा करतब बनत न काहिं। तुलसौ सकल
प्रधान है वेट विदित मुग्वधाम। तामहँ समुझन कठिन अति
यादभेद गृणनाम । नाम कहत सुख होत है नाम कहत दुख
जान। नाप कहन सब जान दुरि नाम कहत दुख खात ॥
नाम कहन देण्ट मुम्ब नाम कहत अघखान। तुलसो तोते
7 मनम्झि करहु नाम पहिचान। चारों चौदह अष्टदश रस
मान र भरिपूर। नामभेद समुझे विना सकल समुझमहँ धूर
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- । तुलसीसतसई। को मर्म। अपन कर्म वर मानिकै आपबंधो सब कोय। कार- जरत करता भयो आपन समुभात सोय ॥ को करता कारण लखै कारज अगम प्रभाव। जो जह सो तह तर हरष तुलसी सहज सुभाव ॥ तुलसी दिन गुरुको लखै वर्तमान विधिरौत। कह देहि कारणले सयो सूर उष्णा शशि शौत ॥ करता कारण कर्मते पर पर मातमज्ञान ॥ होन नविन उपदेश गुरु जो घट वेद पुरान ॥ प्रथम ज्ञान समुने नहीं विधि निषेध व्यवहार उचितातुचितहि हेरि धरि करतब करिय सँभार॥ जब मन- महँ ठहराय विधि श्रीगुरुवरपरसाद। इहि विधि परमातम लखै तुलसी मिटे विषाद॥ बरबस करत विरोध हठि होन चहत अकहीन। गहि गति बक वृक ज्ञान इव तुलली परम प्रवौन ॥ खाक कर्म भेषज विदित लखत नहौं मतिहीन। तुलसी घठ अक्षवश विहठि दिन दिन दौन मलौन करता- होते कर्नयुग सो गुण दोष सरूप । करत भोग करतब यथा होय क्ष किन सूप ॥ वेद पुराणरुशास्त्र युत निज बुधिवत अनु- मान। निज निज करि करि है वहुरि कहु तुलसी परमान । विविध प्रकार कान करे नाहि यथा भवमान । तुलसौ सु- गुरुप्रसादवत कोउ कोउ कहत प्रमान । उर डर अतिलघु होनको सव लघु मुरति भुतान। स्वर्गलाह लखि परत नहि लखत लोहको ज्ञान ॥ ननदोष निज कहत नहिं विविध वनावत बात । सहत जानि तुजसो विपति तदपि न नेक लनात करत चातुरो मोहवश लखन न निज हित हान। शुक मरकट व गहत हठ तुलसौ परम सुजान ॥ दुखिया सकल प्रकार शठ ससु- कि परतही नाहिं। तखत न कण्टक मौन जिमि अशन भषत भ्रम नाहिं॥ तुनासौ निज मनकामना चहत सुन्यकहँ सेय। वचन गाय सबके विविध कहहु पयत केहि देय । वातहि बात - . ॥ । तुलमीमतगई। मपयपरे सुपुत्र नरन लघुकरि गनिय न कोय। नायक पीपर वोजसम बनैतो नतर होय ॥ नडे गास रत जगत में के परहित निन जाहि॥ प्रेमपेज निनही जिद नड़ो लो साही चाहि ॥ दमो मन्तातेपने गन्तन नहे विचार ॥ तनवन चन्चल शबल जग 77ग पर उपकार ॥ ॐ दि गापः निभय बर नोचहि दत्त नहानिदि द्विजगननागगा जोय॥ बहे सकिन गुणदिवामी वहिन हेन । तुझाते मुनाअरुण मनाको मन । होहिं बड़े लघु ममय सइ तो ललकहिं न हा दागे लागे नऊ नग्बनते बाकि उरण तुरग नारी नानीची प्रियार । तुलगी परम्बन रहब निन इनहिं न पाना ॥ दरगन आप सपान करि को रास्त्रे हितलागि । नपातीय गहनाहि पनि पत्नटि बनावा यागि ॥ मन्त्रनन्त्र- नवोनिया पुरुष अन धन पाठ। पुनि गुमा योगवियोगते तुरत नाहिं ये पाठ॥ नोच निचाई नतिजे जो पावहि सतप्तग। न तमो चन्दनविप वमि बिनविप भय न सुनत ॥ दुरजन दापणनन मदा कर देग्यो हिय दोर ॥ सनमुम्बकी गति और है दिन भय का और ॥ मिवक अवगुण मितको परपइँ भापत नाहिं। वारशेड गिमि अापती राखत आपदि माहिं ॥ तुललो मी समरय मुपनि सुक्रतो साधु सुजान। जो विचारि व्यवहरत जा खरच गाम अनुमान ॥ सोन सखा सेवक सचिव सुतिय निपावन मंाच ॥ मुनि करिये पनि परिहरिय परमनरन्जन पंच॥ पष्टिहि निज रुचि काज करि रुष्टहिं काज बिगारि। निया ननय संवक सम्ना मनोकण्टक चारि । नारि नगरभोजन मचिव नवक सम्बा अगार ॥ सरस परिहरे रङ्गरस निरस विषा- दविकार दोरव रोगी दाग्दिी कटुवच लोलुपलोग। तुलसी मारा ममानच्यों द्वरित त्यागिवे योग॥धाय लगे लोहा ललकि - १ तुलसीसतसई । चार दिवस निशि माससित असिन वरष परमान। उत्तर दक्षिण आश रवि भेद सकल महँ जान ॥ कर्म शुभाशुभ मित्र भरि रोदन इसन बखान ॥ और भेद अति अमित है कह लगि कहिय प्रमान ॥ जर्ह लगि जन देखब सुनब समुभव- कहव सुरौत। भेदरहित कच्छु है नहीं तुलसौ वदहि विनौत भेद याहि विधि नाममहँ बिनु गरु जान न कोय॥ तुलसौ कहहिं विनौत वर ज्यों विरचि शिवहोय । इति षष्ठःसर्गः६॥ . तिनहिं पढ़े तिनहीं सुने तिनहिं सुमति परगास। जिन शथा पाछे की गहे अजख नौसास ॥ तबलगि योगी जगतगुरु जबलगि रहै निरास । जब आशा मनमें जगौ जग गुरु योगो दाम ॥ हित पुनौत स्वारथ सबहि अहित अशुचि विन- चाउ। निनमुख माणिक सम दशन भूमि परत भौहाउ॥ निज गुणवटत न नागनग हर्षि न पहिरन कोल। गुच्चा प्रभुभूषण करे ताते बढ़ेन मोल ॥ देव सुमन करिवास तिल परिहरि खरि रस- लेता स्वारयहित भूतल भरे मनमैचक तन सेत ॥ अँसुवन पथिक निराशने तटभुइ सजल सरूप। तुलप्तौ किन वञ्च नहीं इन सबध ल केकूप । तुलसौ मित्र महासुखद सबहि मित्रको चाउ। निकट भये विलसत सुखप एक चाकर भाउ ॥ मित्र कोप बरतर सुखद नहित मृदुल कराल॥द्रमदल शिशिर मुखात सव सह निदाघ भति लाल ॥ खल नेरे गुण मान नहिं मेटहि दाता वोप। जिमि- जल तुलमौ देत रवि जलद करत तेहि लोप । वरषत हरषत लोगसब करषत लखत न कोय। तुलसौ भूपति भानुसम प्रजा भागवश होय. मालो भानु कृशानु सम नौतिनिपुण महिपाल। प्रजा भागवश होहिंगे कहिं कहिं कलिकाल । ॥ ॥ 1 - गुनगोमामा। f---। साप सा गत्यवत रामभरोसो एक ॥ तुलसी पापा गाम धर्मविचार । सकतौल स्वभावरिज गरगाणा घानार पियाजिनग विकरति रोति जासु उरहोय। गरपागा मोगा पाण्दनाहिनकाय ॥ बिनप्रपञ्च खलभोस- अनिन किये कनेग। आमनबलिमों लोन्हि छलि दोन्ह ifraiग ॥ निकालापन बलिहिलो भलो जियiii। पलागि भादपि गते गइनगलानि ॥ बढ़े बड़े- II मनातीटिं। बुलमोनोपति गिालस बलि- निगाह ॥ मन उगकार विकारफलतुलसीजानजहान 'मट किया मत्य उपखान । ज्यों मूरख "बालगोग नझन । योधन नहबोधकिन आयेण्याम 7, ITI ॥ स्निपर चढत विरोध जब अनाहितपर अपमान । राम- 1417 विनामानि सगुन शनाय अमान " साहसही सिख If टिन गरिपाः। घठ सइटभाजन भये हठि चजना पत्राका मारि सोहं करि लोजलें करिमतसब बिन- नार। मुंगे नोच दिनमोचते ने इनके विशाल ॥ रोक आपनी पोस विवाविहीन । तेउपदेशन मानही मोह महोद विना: . मनुमिसुनान कुनोतरत जागतहोरहस य । उपदे- जियानगाव! तुनना उचित न होय ॥ परमारय पथमत समु- कि नमन विषय त पटान। उरि चितात अधजरी मानहुँ सती पगन । जत यामय उपदणगरु भजत विषय विषखान। चन्द्रकिरयोग्वे पयस चाटन मिमि गठवान । सुरसदतन नवग्नि निपट चाणि कुसान । मनहुँमवासे मारि कलि गत मदिन समान ६ चार चतुर बटमार भट प्रभु प्रिय भाभण्ड। सब भनो परमारयो कलि सुपन्य पाखण्ड : 17 नपान न बनन महामहिपाल । साम न - ง? . । तुलसीस्तराई। सचिव लेयनौच । समय पापोलावर तीन वेसाही मीच॥ तुल पो हान्य मासु परमारव तन पौठि॥ सन्ध कहे दख पावहि हिटियारे हियडोलि 1 अनसमकने शोचवर अवशि समुलिये आप ॥ तुकली आपन समुकिवन पल बत्त पर परि- तार तूप सहि मन्दिर जरत लावहिं धारि वर । बोये ला- चह समय दिन पतिभिरोनणि का निडर अनय गरि अन- कुशल वेसकाइ सम होय। गयो गयो कह सुमतिजन भयो अपति का कोय ॥ वहुमुत बहुचि बहुवचन बह चारव्यवहार इनको सलो मनाइवो इह अज्ञान अपार॥ अपयश योग कि जानकी मणिचोरी कि कान्ह । तुलसौलोग रिकात्रो करति कातिको नान्ह ।। मागि मधुकरी खान जे सोबत पाव पसारि। शापप्रनिष्ठ वडि परौ तुलमो बाढोरारि ॥ लहौ आखिकाआध- रहि वाक पून का जाय । कत्र कोड़ो काया लहौ जगबहराइच- जाय ॥ या जगी विरौति गति काहि को समुशाय। जल जलिगो साब बाधिगो जनतुल नौ मुघुकाइ ॥ के जूभित्रो कि बूभित्रो दान कि कायकलेश । चारिचारु पालोकपय यया योगउपदेश । बुध कि मान मरवेशन मते खेन सब सोंच ।। तुलसौ विगनि जानिदो उत्तम मध्यन नौच ॥ सहि बोल सासति असम पाय अनट अपमान । तुललो धर्म न परिहरहि ते वर सन्त सुनान ॥ अनहित ज्यों परहित किये अापनहित तमनान ॥ तुनुस्तौ चालविचारयति करिव कान समनान : मिथ्यामाहुर सजनकह खलहिं गरतसम साँच। तुनमी परसि परात जिमि पारद पावाच ॥ तुलसो स्खलवाणो विमल सुनि समुभव हिय हेरि । रामराज बाधक सई मन्दम्यार दान दयादिक युद्धकै बोरवीर नहिं आन । तुल नौ कहहिं विनी- त इति ते नरवर परमान ॥ तुलसो साधो विपतिक विवाविनय- - , ६
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४३ तसीमनगई। दाम न भेद कति देवल दण्ड कराल ॥ पाप पलौता कठिन गुरु गोला पुहमपाल । राग रोष गुग दोषको साक्षो हृदय- सरोज। तुलसौ विकसत ति लखि सकुचत देखि मनोज । बयर सनेह सयानपहि तुजली जो नहि जान। ते कि प्रे-पग मग धरत पशु विन पूछ बखान ॥ रामदास यह नायक जो नर कयहि सयान। तुलमी अपने खाड़-हँ खाक मिलावत ज्ञान ॥ विविध एक विधि प्रभु अगण प्रजहिं सँवारहि राउ। काते होत रूपाणको कठिन घोर घन घाउ ॥ काल विलोकत ईशरुख भानु काल अनुहार। रवि हि राहु राजहिं प्रजा,बुध व्यवहाहि विचार ॥ यथा अमल पावन पवन पाप सुसङ्ग कुसङ्ग। कहिय सुवास कुवास तिमि काल महौश प्रसङ्ग । भल उ चलन पय शोच भय वृप नियोग नय नेम। कुतिय सु- भूषण भूषियत लोह निवारित हेम । सुधा अनाज सुनान पल आम अशनसम जान। सुप्रभु प्रजाहित लेहि कर सामादिक अनुमान ॥ पाके पकए विटप दल उत्तम मध्यम नीच। फल नर लहहि नरेश तिमि करि विचार मन बीच ॥ धरणि धेनु चरि धरम तन प्रजा सुवत्स पहाय। हाथ कल नहिं लागि है किये गोष्ठी गाय। टक टक टू परत गिरि शाखा सहस खजूरि। गरहि कुन्नुप करि करि जनय सो कुचाल मुवि भूरि ॥ भूमि रुचिर रावणसभा अगदपद महिपाल। धर्म राम नय सोमवन अचन होन तिहुँ. काल ॥ प्रौति रामपद नौनिरत धर्म प्रतोय स्वभाव। प्रभुहि न प्रभुता परिहरे कबई वचन मन काय ॥ करके कर मनके मनहि वचन वचन जिय जानि। भूपति भलहि न परिहरहि विनय विभूति सयानि । गातौ वाण सुमत्त सुर समुझि उलटि गति देखु । उत्तम मध्यम नौच व . सपो मामा। मा मपाठ गरीर कोग्व पागडव जानिबो क्रोध • गोर। पीनाहि मानिश सक सयो निपाते भीम ॥ ते मो मानुर देउ न नाउ। जग जिति हारे 'T It गिते रबराउ ॥ झोप न रसना सोशिये बड़ : नार। गत मधुर परिणाम हित बोलब बचन १ नमी पोठो समय मागी मिलेजु मौच। सुधा HIT नि कालनाटते नोच । पाही खेती लगन {: कयाज प्रग खेतु। बैर मापते बड़न क्रियो पाच ::योक गरु देत शिव शिपहि सुसाहब साध । १६. पाप फल होय भल तक काटे अपराध । चढो वरहि मिलान गोक रामाज। करम धरम सुख सम्पदा बिनानियो कुरागपेट न फूटत बिन कहे कहे न लागत ।। बोना वचन विचारयन समुमि सफेर कुफेर ॥ प्रीति मगाई मकन विधि बनिज उपाय अनेक । कल बल छल कलि- पन मन्दिन इश्कत एकहि एक दम्भमाहित कलि धर्म सब चन्न ममेन व्यवहार। स्वारथ सहित सनेह सब रुचि अनुहरत प्रचार ॥ धातु बचौ निरुपाधिवर सदगुरु लाभ सुभोत । वाम दाग कलिकानमहं पोयिन सुनब सुनीत । कायर कूर पृत कति घाबर मरिस उधार ॥ ज्यों जगदीशतो अति मना ज्यों महीयतो भार। जन्म जन्म तुतसो चहत राम- चा अनुगग का भापाका संसहन विभव चाहिये साच बामनो मावे कामगौ का ले कांग्य कमाच। वरण विशद मलामरिम अर्थ सूत्र सम तूल। सतसेया जग वरविशद गुण जाना मुम्पन्न वर माना बाला समति उर धारै यत नेह । पर गोभा मरमाय नित लहै रामपनिगेह॥ भूप कइहिं गरिनकदै गुणो कहहि ल भूप। महि गिरि गत दोउ तुलसीसतसई। राज यमराज यम कहत सकोच न शोच ॥ तुलसी देवल रामके लागे लाख करोर। काक अभागे हगि भरे महिमा सय- उन थोर ॥ भलो कहहि जाने बिना कि अथवा अपवाद । तुलसौ गांड़र जानि जिय काहु न हरष विषाद तन धन महिमा धर्म जेहि जावह सह अभिमान । तुलसौ जियत बिडम्बना परिणामह गति जान॥ वड़ो विबुध दरबारते भूमि भूप दरबार। जापक प्जक देखियत सहत निरादर भार ॥ खग मृग मौन पुनीत किय बनहु राम नेपाल। कुन बाल रावण घरहि सुखद बन्धु किय काल ॥ रामलषण विजयी भये सुनहु गरौबनिवान। सुखर बोलि रावण गये घरही सहित समाज द्वारे टाट न दै सकहिं तुलसौ जे नर नौच। निदरहि बलि हरिचन्द्र कह किहुका करन दधौच । तुलसी निज कोरति चहहि परकौरतिकहं खोय। तिनके मुंह मसि लागि है मिटहि न मरिहैं धोय ॥ नौच चङ्गसम जानि- वो सुनि लखि तु नसौदास। ढौल देत महि गिरि परत खेंचत चढ़त अकास ॥ सहवोसौ काचौ भषे पुरजन पाक प्रवोन। कालक्षेप किहि विधि करै तुलसौ खग मृग मौन बड़े पाप वाढ़े किये शेटे करतल जात। तु नसौ तापर सुख चहत विधिपर बहुत रिसात ॥ सुमति निवारहि परिहरहि दल सुमनहु संग्राम। सकल गये तनविन भये साखौ यादव काम ॥ कलइ न जानवि छोट करि कठिन परम परिणाम। लगत अनल अत नौच घर जरत धनिक धनधाम ॥ जूझे त भल वृमिवो भलो जोतते हारि। जहां जाइ जहं डाइवो भलो जा करिय विचारि॥ तुलसो तीन प्रकारते हित अनहित पहिचान। बरबस पर परासवश पर मामला जान । दुर- जन बदन कमान
तुबपीमतसई।
लखत जिमि तुतसो खस्वस रूप ॥ दोहा चार विचारु चलु
परिहरि वाद विवाद। सुकृत सोम स्वारय अवधि परमारथ
मरयाद॥
इति सप्तमः सर्गः
दति ॥
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