Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Daivi Sampad
Front matter
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ॐ दैवी सम्पद "देयो सम्पद्विमोशाय निवन्धायामुरी मता।" अर्य-दैवी सम्पद से मोप और भारी से पन्धन होता है लेसफ- रावबहादुर सेठ गोवर्द्धनदास जी मोहता, ओ०बी०ई० के यात्मज श्री० रामगोपाल जी मोहता, बीकानेर 'काँद' कार्यालय, चन्द्रलोक, प्रकाशक- इलाहाबाद अक्टूबर, १९३० प्रयमावृति १०००] यह निध सावजनिक सम्पत्ति है [मूल्य २)
FIRST EDITION
One Thousand Copies
Printed and Published
by
R SAIGAL
al
The Fine Art Printing Collage
28 Edmonstone Road
Allahabad
November
1930
पy three
aulomdadaune
उपहार
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से वह स्वत प्राप्त होती हे" के स्थान में "स्वतन्त्रता स्वाभा. विक हे ओर एकता के थाधार पर साम्यभावस व्यवहार "समष्टि-धात्मा-परमात्मा की प्रकृति के इस (ससार- रूपी)सेल में चाहे गृहस्थी के स्वाँगमें-उसके योग्य व्यवहार किए जाय-अथवा सन्यासी के स्वाँग में-उसके योग्य व्यवहार किए जायें-दोनों हो कसित स्वाँग है और", पृष्ठ-२२ में सबसे नीचे की दो लाइने छोड़ कर उनके "अर्थात् समष्टि उत्पादन शति से अन्न (भोग्य पाठक-पाठिकाओं की सेवा में नम्र निवेदन पुस्तफ में निम्नलिखित स्थलों की इमारत छपने में कुछ गलती रह गई है, उनको इस तरह सुधार कर पढने फी कृपा करें पृष्ठ-११ में हेडिद्ग की इमारत "स्वतन्त्रता स्वामाविक है और एकता के आधार पर साम्यभाव से व्यवहार करने करने से वह स्वत प्राप्त है" पढ । ऊपर की चार लाइनों की इबारत इस प्रकार पढ़ें gg-३० की पांचवीं एवं छठी लाइनें इस तरह
[२]
होते हैं, यक्ष से समष्टि उत्पादन शफि होती है और या,
कर्म से अयोसपके अपने"
पृष्ठ-३४ में नीचे से ऊपर की चौथी लाइन इस तरह
पढ़ें-"व्यफि दूसरों का उपभोग करते हैं, उन्हें दूसरों के
सपभोग"
पृष्ट-५३ में पोथी लाइन के अन्तिम पार शम इस
वरह पदें-"उसके लिए दूसरों" और सातवीं लाइन के
आरम्म के दो शब्द इस तरह पढ़ें-"दायरा यद्यपि।"
इनके अतिरिक्त पुस्तक में जहाँ-जहाँ पूफ
सम्बन्धी
मगुद्धियाँ रह गई है उनको सुधार फर पढ़ने की कृपा करें
और उपरोक्त पशुद्धियों के लिए क्षमा करें।
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देवी सम्पद
3
1
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-
मात्मा स्वामा जी श्री उत्तमनाथ जी महाराज
रही महारमा जा के अनुग्रह म लगा महोग्य को
अन्याम विश्य का प्राशिय घोध हुआ है।
महाका सन्नता के लिए प्राजकल सभ्य जगत में माप संयंत्र ही असाधारण सहर्ष एव विशव मच रहा है। अनेक प्रकार के धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक एव थायिक पन्धनो से लोग इतने साल पा गए हैं कि उनसे छुटकारा पाने के लिए पढे ही चातुर प्रतीत होते हैं। कहीं पर धार्मिक सन्ध विरवासों और धर्म-गुरों के पाश से घुट- कारा पाने के लिए विभप मसा हुआ है और खून नगविर्षों होती है , कहीं राजनैतिक गुलामी की जीरों को तोड़ फेंकने के लिए अनन्त प्रकार के कष्ट उठाए जा रहे है और असख्य प्राणों की शाहु- तियाँ दी जाती है , कहीं सामाजिक बन्धनों से मुक्ति पाने के लिए सहर्ष की आग धधक रही है और कहीं प्राधिक दासता दूर करने के लिए परस्पर में घोर सम्राम हो रहा है। इतना सब कुछ होने 'पर भी सधी स्वतन्त्रता श्रय तक कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होती। यदि कोई वाति अथवा कोई देश किसी विशेष प्रकार के बन्धन से घुटकारा पाता है तो साथ ही साथ, उसी समय अन्य किसी प्रकार के बन्धन से बंध जाता है, क्योंकि सच्चो स्वतत्रता का वास्तविक रहस्य ब्राने बिना उसके लिए यथोषित उपाय नहीं किया . प्रस्तावना माता । किसी नास विषय में (अस्थाई) भौतिक स्वत प्रता प्राप्त कर लेना मात्र ही सची स्वतता नहीं है। परन्तु यह बात अवश्य है कि जिन लोगों में स्वतन्त्रता के भाव जाग्रत हो जाते हैं, उनमें दासता की मनोवृत्ति कम हो जाती है, फलत पराधीनता के बधन दीले पद जाते हैं। श्रय देशवासियों की तरह भारतवासियों में भी स्वतन्त्रता के लिए कुछ भातरता उत्पन्न हुई है, परन्तु वह पातुरता पय तक केवल राजनैतिक स्वतन्त्रता तक ही परिमित हे। जिन कारणों से यहां के लोग राजनैतिक परतत्रता में फंसे तथा जिन कारणों से यह भय तक बनी हुई है अर्थात् जो-अनैक्य उत्पन्न करने पाले- बढ़े हुए धार्मिक अधविश्वास, सामाजिक बधन और आर्थिक परावलम्पन, राजनैतिक परतन्त्रता के कारण हैं, उनको दूर करने का समुचित उपाय अय सक कुछ भी नहीं किया जा रहा है , भव भारतवासी सब प्रकार के पधनों की वेड़ियों में ज्यों के स्पों मजबूती है। क्या पार्थिक, क्या सामाजिक, क्या धार्मिक और क्या राजनेतिक-किसी भी तरफ दृष्टि हार्ले-भारतवर्ष में सर्वत्र पराधीनता ही पराधीनता का साम्राज्य दृष्टिगोचर होता है बीवन निर्वाह के लिए अर्थोपाजन करने में यहाँ के लोगों में स्वायरमन का प्राय प्रभाव है। मादूरी, नौकरी, व्यवसाय आदि अर्थोपाजन के जितने साधन हैं, उनके लिए हम लोग दूसरों पर निर्भर है-अपने आप कुछ नहीं कर सकते । यदि किसी व्यक्ति पर निर्भर न भो रहे-नो प्रारम्प, मह नपत्र, भूत प्रेत, देवी देवता एवं पीरपैग़म्बर पादि का ग्राश्रय अवश्य देते हैं और इन सब से से जकड़े हुए - ३ प्रस्तावना बद कर ईश्वर पर अपना सारा बोझ लाद कर पूरे परावलम्वी बने रहते हैं। सामाजिक व्यवहारों में, सामाजिक मर्यादाओं की प्राचीन पुस्तकों (धमशास्त्रों) और प्रचलित रूदियों के गुलाम बने हुए हैं । किसी भी सामाजिक व्यवहार में, इन पुस्तकों की मर्याशमों और रूड़ियों से विरोध का भ्रम हुधा कि "हम दीन दुनिया से गम" ऐसा भय रहता है और समाज के नेताओं, पञ्चों और जाति भाइयो के बहिष्कार के प्रातक से सदा दबे रहते हैं। अपनी भास्मिक उन्नति के लिए हम लोग धम और ईश्वर के ठेकेदार-भाचार्यों और धर्म-गुरुषों के सर्वथा अधीन रहते हैं, जिससे हमारे भारमल का नितान्त ही हास हो गया है। चोटी से लेकर पड़ी तक उन लोगों के गिरवी रखे हुए है यानी उनके प्रको में हैं। हमारा कोई व्यवहार ऐसा नहीं, जो उनकी स्वीकृति के बिना स्वतन्त्रतापूर्वक हम लोग कर सकें। अपना पारलौकिक कल्याया भी हम उन्ही की दपा पर निर्भर मानते हैं। उनकी कृपा के विना हम अपने परमारमा की प्राप्ति भी कर नहीं सकते। इस तरह की पराधीनता की मनोवृत्ति राजनैतिक स्वतन्त्रता कैसे कायम रख सकती थी? मस्त, जिन बोगों की मनोवृत्ति स्वाधी- नता को अपनाए हुए थी अर्थात् जिनके बन्धन हमसे कम और ढीले थे, उहाने हमारी राजनैतिक स्वतन्त्रता छीन कर इस क्षेत्र में भी हमें पूरा पराधीन बना दिया। इस समय हम लोग स्वय अपने स्वत्वों की रक्षा करने में नितान्त ही असमर्थ है-यहाँ तक कि छोटी से छोटी बात के लिए भी हर तरह से विशी और विधर्मी ४ प्रस्तावना लोगों की दया के भिखारी है। परावधन के भाव हममें यहाँ सक चढ़े हुए हैं कि अपनी मलाई के लिए तो दूसरों पर निर्भर रहते हो है, किन्तु अपनी बुराइयों के दोष भी दूसरों पर ही मदते हैं। सारा यह कि अपने लिए अच्छा या बुरा कुछ भी स्वतन्त्रता पूर्वक करने के लिए हम लोग अपने पापको योग्य नहीं समझते। अब देखना चाहिए कि हमारी इतनी पराधीनता का मूल कारण क्या है ? कई लोग हमारे पाति पांति के भेद माव , फई नाना पप और नाना सम्प्रदायों के झगड़, कई पण पाश्रम की मोदामों का नष्ट हो जाना कई माह्मण नाति के श्रन्याचार , कई धार्मिक अन्धविश्वास , कई रियों एवं अन्रयों की पद दलित अवस्था कई मापस का अनेकता , कह पात विवाहादि मामानिक कुमथानों के कारण यन वीर्य का हास होना मोर कद कलियुग का भागमन यादि-अनेक कारण हमारी पराधीनता के बताते हैं, परन्तु गहरा विचार करने से इसका एकमात्र कारण पही निश्चय होता है कि हम लोगों ने "देवा सम्पद"-अर्थात् अग्विख विश्व में सर्वत्र एकारम भाव के निश्चयपूर्वक सबके साथ एकता के प्रेमयुक्त व्यवहार करना-धोड फर "भासुरी सम्पद" को अपना लिया मर्यात हम सबने अपने पृथक्पृयर ग्यक्तित्व के अाधार और पृथक्-पृथक् व्यक्तिगत स्वार्थ में ही प्रासक्ति कर सी। यही हमारे पतन के अनेक कारणों का एक मूल कारण इसी से अन्य सन्न दुराइयाँ उत्पन्न हुई हैं और जब तक इस मूल कारण का समुचित उपाय नहीं किया जायगा, तब तक हमारी - प्रस्तावना + पराधीनतामा एष दुखों का भी पता नहीं होगा-पदिएक मिटेगी तो दूसरी उत्पन्न हो जायगी । जय सक रोग का मूल कारण नहीं मिला तर सक एक समय शान्त होता है सोमरा उठा रहता है। एकाही उपायों से बातविष रोग की निषि सभी नहीं होती। इस पुस्तक के टाइटिव पेज पर जो गीता का लोक, उसका थाराय यह है कि "देवी सम्पद" मोच भाग म्वाधीनता का कारण है और "मासुरी" बधन अर्याद पराधीनता का उभगवाय के अनुसार, पराधीनता से पोदा मुद्रा का स्वाधीन होने के लिए "भासुरी सम्पद" छोद कर "वी मापद" धारण करना कमात्र उपाय है और इसी का निरूपण करना इस पुस्तक का उदरम। इस स्थान पर यह खुलामा कर देना मावश्यक है कि यहाँ "मोर" शब्द का प्रयोग, मरने के पार पापों से एट पर "मुतिः" प्राप्त करने मात्र के समुचित थय में नहीं हुआ है, किन्तु हाबौकिक और पारसौकिक सब प्रकार के बन्धनों से-चाहे थे भायिका न्या सामाणिक, धार्मिक हों या राजनैतिक और चाहे वे अपने प्रा- -बुरे कर्मों के फल-स्वरूप हो या दूसों के-यहीं पर घुटकारा पाने भर्यात् पूरे स्वाधीन एवं जीवन मुक्त होने के पर्थ में इसका प्रयोग हुआ है। अब इस पुस्तक में भोप, मुक्ति, स्वाधीनता अथवा छुटकारा आदि शम्द जहाँ पाए हैं, वहाँ उनका यही व्यापक श्रथ समझना चाहिए। जहाँ अन्य देशों के लोग उक्त सच्ची सतन्त्रता (जीवन- मुक्ति) के मसलो रहस्य एवं उसकी प्राप्ति के वास्तविक उपाय । . स्वतन्त्रता, देवी सम्पद एव प्रवर्तित चक्र नानुवर्तयतीह य । अघायुरिन्द्रियारामो मोघ पार्थ स जीवति ॥ -गी..३१६ अथ-यज्ञ के लिए प्रयात् ससार धक्र को अभी तरह धजाने के लिए किए जाने वाले बाध्य कर्मों के अतिरिक्त विज अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए जो कम किए जाते हैं उनसे ही ये लोग पंधते हैं। तू उपरोक्त यज्ञ के निमित्त-उनम दूसरों से पृथक् पपने व्यक्तिरत्र के प्रकार और व्यक्तिगत स्वार्थ की मासक्ति छोद कर- कर्म करता रहा प्रारम्भ में यज्ञ चक्र के साथ ही प्रमा को रच का प्रजापति अझा ने उनस कहा कि इस यज्ञ चक्र के द्वारा तम्हारी वृद्धि होवे। यह यह चक्र तुम्हारी कामधेनु होवे अपात् यह पन पक्र ही तुम्हारी सय पावश्यक्तायों को पूरी करेगा। तुम इस यज्ञ से देवतामों को सन्तुष्ट करो और वे देवता तुम्हें सन्तुष्ट करें अर्थात् तुम अपने अपने हिस्से के क्त्तव्य कम करन द्वारा समष्टि मारमा परमामा का माया रचित इस जगत रूपी उसके विराट् शरीर को धारण करने वाली उसकी यूथम दैवी शक्तियों (विभूतियों)जो समष्टि रूप से जात के सय काय कर रही हैं- के साथ अपनी प्रानी व्यष्टि शक्तियों के व्यवहारों का योग दो और तुम्हारी सकसी व्यष्टि शक्तियों के व्यवहारों के योग से पूरित हुइ वे परमारमा की समष्टि देवी शक्तियों तुम सबकी भाव पूरी कर । इस तर सबके साथ ताल बद्ध होकर .
देवी सम्पद क अपहार करने द्वारा परस्सर में एक दूसरे को योग देते हुए और दूसरे की भावश्यकताओं को पूरी करते हुए परम श्रेय को माप्त होवो अर्थात् सयके साथ ताज-पद्ध होकर अपने अपने हिस्से या पाम दरावर करते रहने ही से ससार का व्यवहार यथावत् चलता रहेगा, जिससे सबको अपनी अपनी धानश्यक भोग्य सामग्री मिलती रहेगी। पन से सन्तुष्ट होकर देवता लोग तुमको तुम्हारे इच्छित भोग देंगे अर्थात् अपने अपने हिस्से के फत्तव्य कम अच्छी तरह पालन करने से जगत रूपी विराट शरीर को धारण करने वाली परमारमा की समष्टि देवी शक्तियाँ पोपित होफर जोगों के जीवन के लिए आवश्यक पदार्थ उत्पन्न करेंगी। परतु उन्हीं का दिया हुथा पीछा उन्ह दिप बिना जो व्यक्ति मव भोग्य पदार्थ केवल आप ही भोगता है, वह निश्चय ही चोर है अर्थात् ससार के समस्त मोग्य पदार्थ सबकी समष्टि (सम्मिलित) शक्ति से उत्पन्न होते है, उन मार्वजनिक पदार्थों को जो अकेला ही अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति के उपयोग में लेकर दूसरों को उनसे वचित रखता है यह सबकी चोरी करता है। पज से बचे हुए माग को ग्रहण करने वाले समन सब पापों से मुक्त हो जाते हैं अर्थात् जो सज्जन (स्त्री हो या पुरप) ससार घर में अपने कत्तम्य फर्म अच्छी तरह पालन करके उनसे प्राप्त होने वाले पदार्थों को, ययायोग्य दूसरों की आवश्यकताएँ पूरी करते हुए, आप भी अपनी थावश्यकतानुसार भोगते है उनको आदिका) पाप नहीं गता। परन्तु जो दूसरों की देची सम्पद ३० थापश्यकतानों की उपेश करके केवल अपने लिए ही पकाते हैं थर्थात् जो केवल अपने व्यक्तिगत शरीर के विपयों की तृप्ति के लए ही कर्म करते हैं, वे पाप भोगते हैं। श्रा अर्थात् भोग्य पदार्थों से भून पाणी होते हैं। पर य अर्थात् समष्टि उत्पादन शक्तियों से अन्न (भोग्य पदार्थ) होते है, यम से समष्टि शक्ति होती है और यज्ञ-कर्म से अर्थात् सबके अपने- अपने कत्तय्य-कम यथावत् करने से होता है। फर्म प्रकृति से और प्रकृति, अविनाशी समष्टि पारमा परमारमा से उत्पन हुइ जान । इसलिए सव-ध्यापक यात्मा- परमात्मा ही यज्ञ में अर्थात् समार धन को चलाने में स्थित है। इस तरह जगत के धारणार्थ प्रवृत किए हुए इस चक्र, यानी यज्ञ-धक के अनुसार जो नहीं बतता अपात् जो इस ससार के खेल में अपने व्यक्तिव की और व्यक्तिगत स्वार्थों की सपस एकता करके थपना कराव्य पालन नहीं करता, उसका जीवन पाप स्प है और उस इन्द्रिय सम्पद का अर्थान् केवल अपने व्यक्तिगत भौतिक शरीर के विषय भोगों के लिए ही उद्योग करने पाले का, जीना फिजूल है यानी उसका मनुष्य (स्त्री या पुरुष का)शीर व्यर्थ है। गीता के उपरोक्त श्लोकों का भावार्थ यह है कि चतुर्विध समष्टि अन्त करण रूपी चतुर्मुस ब्रह्मा के सङ्कल्प से,सब लोगा की-उनके कर्तव्यो सहित-रचना होकर, प्रेरणा हुई कि अपने अपने कर्चव्य यथावत् करते रहने से सबकी इच्छाएँ पूरी होकर सबकी वृद्धि होती रहेगी, क्योकि समष्टि- टची सम्पद ३१ मात्मा-परमात्मा की देवी शक्तियाँ जो सूक्ष्म रूप से सप में व्याप्त है और जो समष्टि भाव से जगत रूप यनी हुई है, वे व्यष्टि भाव से प्रत्येक व्यक्ति में रहती है और उनसे ही व्यष्टि व्यवहार होता है और उन व्यष्टि व्यवहारों का सम्मिलित योग ही समष्ट्रि व्यवहार है जिससे सारे जगत का सञ्चालन होता है। इसलिए सबके अपने अपने हिस्मे के कर्त्तव्य-कर्म यथावत् करने रूपी व्यवहार के योग से हो जगत का समष्टि व्यवहार यथावत् चल सकता है और समष्टि व्यवहार यथावत् चलने हो से व्यक्तियों को इन्छाएँ और आवश्यकताएँ पूरी हो सकती हैं। यज्ञ और देवताओं का खुलासा यज्ञ और देवतामों की जो व्यारया ऊपर की गई है वह साधारण लोगो की समझ में शायद ठीक प्रतीत न हो, क्योंकि 'यज्ञ' शब्द का अर्थ अधिकतर लोग पैदिक कर्म- फाएड के "हवन" (अग्नि मे पदार्थों की आहुति देने) का करते हैं। परन्तु गीता में प्रतिपादित यज्ञ का यह अर्थ नहीं है। अनेकता के भाव से व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए किए जाने वाले वैदिक कर्मकाण्ड का तो गीता के दूसरे अध्याय श्लोक ४२ से ५३ तक में भगवान ने साफ शब्दी में निषेध कर दिया है, अत आरम्भ में ही जिस "विषय का निषेध कर दिया उसी का पुन विधान किस +
देवी सम्पद
३२
तरह हो सकता है । इसके अतिरिक्त यदि यहाँ "यज्ञ"शद
का अर्थ हवन हो माना जातो तीसरे अध्याय के नवम तोक
फे अनुसार हवन के सिवाय अन्य-पठन, पाठन, प्रजारतण,
कृपि, गौरक्ष, वाणिज्य, सेवा, दान, परोपकार आदि के
निमित्त किए जाने वाले सभी फर्म बन्धन के हेतु हो जायेंगे,
जिनके बिना हवन तो क्या, ससार में किसी पाजीवित रहना
भी असम्भर हो जायगा, और जगत का विनाश भगवान
को अभिप्रेत नहा है (देसो गी० अ० ३शो०२४)। इसके
अतिरिक्त, उस समय भर्जुन को यह उपदेश देने का अवसर
भी नहीं था कि "हवन के लिए तू कर्म पर" क्योंकि यहाँ
तो उससे क्षार धर्म के अनुमार युद्ध करके अपने कर्तव्य
पालन करने के उपदेश का प्रसङ्ग था। अत यहाँ यज्ञ शन्द
का अर्थ हवन नहीं हो सकता, किन्तु लोक-समह अर्थात
ससार चा को भली भाँति चलाने में अपना पार्ट पूरी तरह
बजाना ही यज्ञ का एक मान ठीक ठीक अर्थ हो सकता
है। तीसरे अध्याय के चौदहवें श्लोक के अत में भगवान
यज्ञ कर्म समुद्भव ।" यह फर यह अर्थ स्पष्ट भी
कर दिया है।
इसी तरह "देवता" शद का अर्थ भी अधिकतर लोग
स्वर्गादि लोको में बैठे हुए इन्द्रादि देवता समझे हुए हैं।
परन्तु तात्विक दृष्टि से विचार कर देखा जाय तो यह अर्थ
स्थल घुद्धि के साधारण लोगों को सममाने के लिए जगत
देवी सम्पद %3D को धारण करने वाली समष्टि-यात्मा-परमात्मा की समष्टि- सूक्ष्म दैवी शक्तियों का स्थूल रूपक बाँध कर किया गया है । परन्तु जहाँ दर्शनशाखों का तात्विक विचार करना होता है वहाँ इन रूपकों को ही सत्य मान लेने से सचा तथ्य समझ में नहीं आ सकता और वास्तविक सच्ची स्थिति समझे विना सशयात्मक दशा में जगत के व्यवहार भी ठीक-ठीक नहीं किए जा सकते । यदि समष्टि आत्मा परमात्मा के इस जगत रूपी विराट शरीर को धारण करने चाली उसको समष्टि दैवी शक्तियाँ किसी एक ही स्थान में सीमाबद्ध होकर बैठ जायें तोवहाँ बैठी हुईवेइसवृहत् नहाएड का सञ्चालन ही कैसे कर सकेंगी ? और इन देवताओं को 'परमात्मा की देवी शक्तियों से भिन्न कोई और पदार्थ मान नहीं सकते , क्योंकि एक के अतिरिक्त दूसरा कुछ है नहीं। यदि मान भी लें तो सुदूर लोकों में बैठे हुए भिन्न भिन्न देव- साओं को इस लोक में थाफर यहाँ के लोगों से भोग्य पदार्थ लेने का क्या अधिकार है और क्या उनको पीछा देने का प्रयोजन है ? तथा यहाँ के लोगों को उन दूसरे लोकों में बैठे हुए देवताओं को मान कर उनको सन्तुष्ट करने और उनसे सहा भुगताने की आवश्यकता ही क्या है ? गीता में सष्ट कहा है कि वे देवता तुमको अपने इष्ट पदार्थ देंगे। अत यदि समष्टि आत्मा-परमात्मा की देवी शक्तियों से अर्थ होते दो लोगों को इष्ट पदार्थ देने की उनमें ३
देवी सम्पद
३
योग्यता कहाँ से आता। इससे यही सिद्ध होता है कि इस
जगत-रूपी विराट शरीर को धारण करने वाली समष्टि-
आत्मा-परमात्मा कीसमष्टि-देवी शक्तियों ही देवता है और
वे ही सूक्ष्म शक्यिों व्यष्टि रूप से प्रत्येक व्यक्ति के शरीर
में हैं और इन व्यष्टि शक्तियों का समष्टि शकियों के साथ
सहयोग अर्था एकतायुक्त व्ययहार करना हो यक्ष है।
सय भूत प्राणी इस मसार रूपी यश चक्र (विराट
पहिए) के पद (पुरजे) हैं और जैसे किसी मशीन के
एक पुरजे के भी निरम्मे हो जाने से उस मशीन के काम
में त्रुटि या जाती है, उसी तरह इस संसार-चक्र मे एक
भी प्राणी के फव्य पालन न करने से उसमें इतनी ही
श्रुटि या जाती है और उस घुदि से सपको कष्ट होता है
तथा उस बट के दोप का भागी अपना फर्त्तव्य पालन
करने वाला प्राणी होता है।
मसार में जितने सचेतन और जड़ पदार्थ हैं वे सम
परस्पर में एक दूसरे के उपकार्य-उपकारक अथवा भोका-
भोग्य (एक दूसरे के उपयोग में आने वाले) है एवं
अन्योन्यानित (एक दूसरे पर निर्भर रहने वाले ) हैं। जो
व्यक्ति दूसरों का उपभोग करते हैं नो रहें दूसरे के उपभोग
मे आना आवश्यक है। यदि वे अपने लिए वो पदार्थों
का उपभोग करते रहें और स्वय उनके उपभोग में थाना न
चाहे अर्थात् दूमरों से तो कार्य करवाते रहे और स्वय
देवी सम्पद
अपने हिस्से के कर्त्तव्य कर्म न करें तो यह समष्टि प्रात्मा-
रमात्मा की समष्टि देवी शधियों की चोरी है।
ऐसे तामणी अहवार वाले कर्तव्य के पोरों से समधिल
प्रात्मा-परमात्मा की माया (प्रकृति) परदसी कर्म
करवाती है और साथ में उनके माप का दगड भी देती है।
क्रिया को प्रतिक्रिया (Action का Reaction) होना
अनिवार्य है।
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
निष्प व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वा नियोपपति।
---गी.. १६५६
स्वभावजेन कौन्तेय नियतुः स्वेन कर्मणा।
कतुं नेच्छसि यन्मोहारकरिष्यस्यवशोपि तत् ॥
-गी. प्र.1510
अर्थ-तको अपने व्यक्रिया के सामसी पार से यह मानता
है कि "में युद्ध नहीं करेगा", सो तेरा यह निश्चय प है।
क्योंकि प्रकृति अर्थात् तेरा स्वभाव ही तुमसे यह पापेगा।
हे कौन्तेय ! मोह अयांत तामसी प्रकार के पश होकर तू
जियम करने की इच्छा करता है उसे ही तुम् सय अपने (मारमा
के स्वभाव से उत्पन्न होने वाले कर्म (प्रति) से पद्ध होने के
कारण-पराधीन होकर प्रयोत् अपनी स्वभाव अन्य प्रति के
अधीन होकर करना पड़ेगा।
देवी सम्पद
स्वामी भाव मे स्वतन्त्रतापूर्वक व्यवहार करने चाहिए
यह जगत, यात्मा के स्वभाव ही से उत्पन्न होने वाली प्रकृति
(माया) कासेल है और प्रत्येक व्यक्ति रस (समष्टिात्मा
का अश है,अत स्वय अपनेरचे हुए (जगत रूपो) कार्य की-
उसके स्वामी भाव से-अवश्य चलाना चाहिए। इस तरह
पलाने से कोई पन्धन या दुःख प्रतीत नहीं होता। पस्तु
स्था शरीर में ही बहभाव के तामसी प्रकार के वश होकर
यदि स्वयं अपने रचित कार्य को अपने ही राजसन्तामस
भावों से दुप रूप या बन्धन रूप मान कर उससे अलग
होने की चेष्टा की जाय अथवा उसकी उपेक्षा करके उसे
पिगाइ दिया जाय तो अपने ही भारों से वह दुस और
बन्धन रूप हो जाता है जिससे छुटकारा पाना अमम्भव हो
जाता है । इसलिए इस जगत रूपी स्वाधीन राष्ट्रीय राज्य
में अपने आपको उस राष्ट्र का एक मेम्बर (अङ्ग) ममम
कर, रवय अपने जिम्मे ली हुई ड्यूटी फो-उसका स्वामी
होर-स्वतन्त्रतापूर्वक अच्छी तरह धजाना चाहिए ।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा फर्म फल हेतुर्भूर्मा ते सगोस्त्वकर्मणि ॥
-० प्र०२१७
अध-कम में तेरा अधिकार है, पल में कदापि नहीं, फल
थयात् ग्यक्तिगत स्वार्थ पिद्धि के लिए तू कर्म मत कर और कर्मन
देवी सम्पद करने की व्यक्तिगत प्रकार की प्रासक्ति भी मत रखामथात् कर्म रूप जगत सब तेरे ही समष्टि भाव की प्रकृति का खेल होने से उस पर तेरा अधिकार है यानी तू इसका अधिपति है। परन्तु इस सेल से उत्पन्न होने वाले नाना भाँति के करिस्त मुख-दु नादि इन्हों का कुछ भी प्रमाव तुझ पर नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि यह सब तेरी ही रचना है, प्रत इन पर कुछ भी बघय मत रख और इन नाना भौति के कल्पित सुख दुसादि इहों से व्याकुल होकर अपने सेल को छोड़ कर विगाह देना भी तेरी महिमा के प्रतिकूल है। सारांश यह कि तू अपनी प्रकृति (माया) के इस खेल में दैत भार की भासक्ति बोद, जगत के अधिपति रूप से कार्य करता रह । योगस्थ कुरु कर्माणि सह्न त्यक्त्वा धनञ्जय। मिसिद्धयो समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ -नीम०२४८ अर्थ-"मैं करता हूँ , मेरे कर्म है, अमुक गर्म का मुझे श्रमुक फल मिलेगा"-इस तरह के व्यक्तिगत अहकार और व्यक्तिगत स्वार्थ का भाव छोर कर, पम की सफलता और असफलता में निर्विकार रहता हुआ, योगयुक्त होकर अर्थात् सारम साम्य भाव में जुड़ कर कम पर-साम्य भाव ही योग है। जिस तरह एक स्वाधीन राष्ट्र का मेम्बर सर्वथा स्वतन्त्र रहता हुआ अपने राष्ट्रीय राज्य के प्रति अपना कर्तव्य पालन करता है और यदि वह अपना कर्तव्य उचित रीति से पालन न करे तथा दूसरों के स्वत्वों को हानि पहुँचाने देवी सम्पद माणिक, मोती आदि फ्रीमती वस्तुओं को परह-पाहे धन- पुयर एवं राना-बादशाह ही क्यों न हो अथवा विद्वान् पपिहत, साम्प्रदायिक आचार्य या यति सन्यासी ही क्यो । हों, ये हैं पनिज वर्ग के हो । इन लोगों को राष्ट्र को उपमा दी जा सकती है, जा अपने शरीर के इर्द गिर्द ही पपर काटता रहता है। ये लोग अपने शरीर के रूप, यौवन, पल, बुद्धि, विद्या, ज्ञान, चतुराई, मान, मर्यादा, पद, प्रतिष्ठा, पप्पन, पवित्रता, कुलीरता एवं धार्मिकता आदि का पड़ा घमण्ड रमते हैं और इन उपाधियों के पमएड में पहुव ही सङ्कीर्ण शारीरिक नियमों का पालन करके दूसरे लोगों का विरस्कार करते तथा कष्ट देते हैं और स्वय भी दूसरों से विरस्कृत होकर फप्ट पाते हैं। शरीर में अत्यन्त आसक्ति रखकर ये लोग अपने लिए इतने पन्धन चौर रोगादि उत्पन्न कर लेते हैं कि दूसरों के अधीन होकर अपनी व्यक्तिगत स्वाधीनता एवं शारीरिफ सुखो से वश्चित हो जाते हैं। यदि धे लोग पारलौकिक सुखों की इच्छा करते हैं तो वह भी केवल अपने व्यक्तित्व के लिए ही। (२) दूसरी श्रेणी के लोग वनस्पति वर्ग के कहे जा सफ्ते हैं। पहिली श्रेणी वालों से इनमे पुछ अधिक यात्म- विकाश होता है और इनका दायरा (कार्यक्षेत्र) कुध विस्तृन होकरस्थपने घुटुम्ब तक परिमित रहता है। इन लोगों को अपने शरीर और उटुम्ब फे सिवाय और कुछ भी कर्तव्य ५१ देवी सम्पद नहीं रहता । ये लोग अपने शरीर के अतिरिक्त अपने कुटुम्ब के आधिभौतिक सुखों के लिए भी दौड़-धूप करते रहते हैं और उनके स्वार्थों के लिए दूसरों को हानि पहुँचाने मे कुछ भी आना कानी नहीं करते । इन्हें कोल्ह के बैल की उपमा दी जा सकती है। जिस तरह कोल्हू के बैल का दायरा यद्यपि लट्ट से विस्तृत होता है, परन्तु वह कोल्हू के इर्द-गिर्द ही घूमता रहता है , उसी तरह कुटुम्ब-पालक का दायरा यद्यपि पेट-पालू से बड़ा होता है, परन्तु है वह अपने कुटुम्ब तक ही परिमित । ये लोग अपने कुटुम्ब के धन-बल, जन- घल, मान, प्रतिष्ठा, उच्चता, कुलीनता एव पवित्रता आदि का बहुत घमण्ड करते हैं और इन बातों के अहवार से दूसरों के साथ घृणा करने, दूसरों को नीचा दिखाने तथा कष्ट देने वाली अत्यन्त सङ्कुचित फौटुम्बिक व्यवस्थाएँ बाँध कर उनका कट्टरता से आचरण करके स्वय कष्ट उठाते हैं और दूसरों को कष्ट देते हैं। इस तरह अपने कुटुम्ब ही में आसक्ति रसने वाले लोग इन कौटुम्विक मर्यादाओं से बँधे हुए दूसरे कुटुम्ब वालों से सदा सशङ्कित और कौटुम्बिक परतन्त्रताओ में जकड़े हुए रहते हैं । (३) तीसरी श्रेणी के लोग पशु-वर्ग के हैं । इनमें प्रथम और द्वितीय श्रेणी वालों से कुछ अधिक आत्म-विकाश होता है और इनका दायरा (कार्यक्षेन) अपनी जाति या समाज तक परिमित होता है । ये लोग अपने शरीर, कुटुम्ब और
देवी सम्पद
जाति या समाज को ही सब कुछ मानते हैं, इनके सिवाय
दूसरों से इनका कोई ममत्व नहीं रहता। इनके स्वार्थो के
लिए दूसरों को हानि या कट पहुँचाना ये लोग नीति सम्मत
मानते हैं। इन समाज सेवियों को घुड़दौड़ के घोड़े की
उपमा दी जा सकती है । जिस प्रकार घुडदौड़ के घोड़े का
दायरा (कार्यक्षेत्र) यद्यपि राट्ट और फोल्हू के वैल से
घडा होता है, परन्तु वह धुड़दौड़ के मैदान के इर्द गिर्द ही
चपर काटता रहता है, उसी प्रकार इन समाज सेवियों का
दायरा यद्यपि पेटू पाल और कुटुम्ब-पालक से थडा होता
है, परन्तु है वह समाज सेवा तक ही सीमा-बद्ध । ये लोग
अपनी जाति या समाज के धन घल, जन प्रल, मान, प्रतिष्टा,
पवित्रता, कुलीनता एवं सामाजिक मर्यादाओं की धार्मिकता
आदि का बहुत घमण्ड करते हैं और इन बातों के अहङ्कार
से दूसरे ममाज के लोगो के साथ घृणा करने, दूसरों को
नीचा दिखाने तथा फष्ट देने वाली अत्यन्त सङ्कीर्ण सामा-
जिक मर्यादाओं की व्यवस्थाएँ बाँध कर उनका कट्टरता से
आचरण करके स्वय कष्ट उठाते हैं और दूसरो को कष्ट
देते हैं। इस तरह अपने समाज ही में आसक्ति रसने वाले
ये लोग सामाजिक मर्यादाओं से बँधे हुए, दूसरे समाज
वालों से सदा सशक्षित एव सामाजिक परवन्त्रतामो से
जकडे हुए रहते हैं।
(४) चौथी श्रेणी के लोग मनुष्य प्रकृति के हैं। इनमें
५३ दैवी सम्पद प्रथम वीन श्रेणियों से अधिक यात्म विकाश होता है, अव ये उनसे उच्च कोटि के हैं। इनका दायरा (कार्य- क्षेत्र) अपने देश तक परिमित होता है अर्थात् अपने देश ही को ये लोग सब कुछ मानते हुए, देश के लिए दूसरों को कष्ट देना और हानि पहुँचाना सर्वथा न्याय समझते हैं। इनको चन्द्रमा की उपमा दी जा सकती है। चन्द्रमा का यपि दायरा लट्ट, कोल्लू के बैल ओर घुड़दौड़ के घोड़े से बहुत ही अधिक विस्तृत है, परन्तु वह पृथ्वी के इर्द गिर्द ही चार काटवा रहता है। इसी तरह देशभक्तो का दायरा यद्यपि पहिले तीनों से बड़ा होता है परन्तु अपने देश बक ही परिमित रहता है। अपना देश दूसरों से अधिक धन, जन एव शक्ति सम्पन्न, उन्नत, पवित्र, प्रतिष्ठित एवं धार्मिक होने का घमण्ड करके ये लोग दूसरे देशासियो का विर- कार करते हैं, उनको दवाते और उनके साथ ईर्षा करते हैं। इस तरह अपने देश ही मे भासक्ति रखने वाले लोग दूसरे देशवासियों से दबे हुए और उनके अधीन रहते हैं। (५) पाँचवी श्रेणी के लोग मनुष्य कोटि से ऊँचे, देव कोटि के होते हैं । इनका आत्म-विकाश सबसे अधिक होता है और इनको बुद्धि महान हो जाती है। इनका (कार्यक्षेत्र ) बेहद अर्थात् सम्पूर्ण विश्व तक फैला हुआ होता है। इनकी किसी व्यक्ति, समुदाय या देश विशेष ही में ममत्व की भासक्ति नहीं रहती, किन्तु समस्त भूत प्राणियो
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दैवी सम्पद सतोगुण इतना पढ़ा हुया रहता है कि किसी शरीर विशेष ही में उनको आसक्ति नहीं होतो, अत व्यक्तिगत शरीरों के प्रति उनका विशेष प्रेम प्रतीत नहीं होता। तमोगुण जलात्मक है, रजोगुण राग और क्रियात्मक तथा सतोगुण सुरस और ज्ञानात्मक है। सतोगुण से मनुष्य उनति करता है, तमोगुण से गिरता है और रजोगुण दोनो फे बीच में रह कर पदाने गिराने की क्रिया कराता है। ऊर्च गच्छन्ति सवस्या मध्ये तिष्ठन्ति राजसा । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसा ॥ -गी.०१४८ अय-सतोगुण का सेवन करने वाले उपर को उठते है, रजोगुणी यीच में ठहरते है और फनिष्ट तमोगुण का सेवन करने चाले नीचे गिरते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को साविक आचरणों से अपने में सतोगुण बढ़ाते हुए उन्नति करने और आगे बढ़ाने का प्रयत्न फरते रहना चाहिए चाहे सनिज-वर्गका व्यक्ति हो या धन- स्पतिवर्गका, पशु-वर्ग का हो या मनुष्य-वर्गका-सयको निर- न्तर आगे ही बढ़ते रहना चाहिए। चाहे देव-वर्ग का व्यक्ति क्यों न हो, किसी एक स्थिति में ठहर जाना उसके लिए पतनकारक है। एक अवस्था में पड़े रहना ही
दैवी सम्पद
अथवा तमोगुण है, अत ठहरने से गिरावट होती है।
रजोगुण क्रियाशील होने से अपना कार्य निरन्तर फरता
ही रहता है। यदि आगे बढ़ने का प्रयत्न किया जाय वो पढने
में सहायक होता है-नहीं तो पीछे गिरा देता है। ऊपर
उठने में प्रयत्न करने की श्रावश्यकता रहती है, गिरना तो
प्रयत्न के बिना ही हो जाता है।
रजस्तमचाभिभूया सत्त्व भवति भारत ।
रज सत्व तमश्चैव तम सत्त्व रजस्तथा ।
--मी. अ.१४१.
अथ-रजोगुण और तमोगुण को दबा कर सर अधिक होता
है और रम एव सत्र को दवा कर तम अधिक होता है, इसी प्रकार
तम और साव को दबा पर रज अधिक होता है।
इसलिए प्रत्येक वर्ग क व्यक्ति को अपने आचरणों को
साविक बना कर आगे पढने में तत्पर रहना चाहिए ।
अपने अपने वर्ग के उपयुक्त पाचरणों को साविक बना कर
ही प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्रमोन्नति करता हुआ बिना रुकावट
के अतिम दर्जे (परमात्म भाव) तक पहुँच सकता है। यदि
आचरण सालिक बनाने का प्रयन्न नहीं किया जाय तो
वमोगुण की वृद्धि होकर उपर चढे हुओ की भी पीछी
गिरावट हो जाना अवश्यम्भावी है , अव चढ़ना और गिरना
अपने ही अधिकार में है।
दैवी सम्पद
उद्धरेदात्मनात्मान नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन ॥
-गी. अ०६-५
अर्थ-अपना उदार श्राप ही करे, अपने आपको गिरने न दे.
क्योंकि आप ही अपना वधु या श्राप ही अपना शत्रु हे।
प्रथम श्रेणी अर्थात् खनिज-वर्ग के मनुष्यों
(स्त्री-पुरपों) के सात्विक आचरण
स्वतन्त्रता या मुक्ति की इच्छा रखने वाले सनिज-वर्ग
के स्त्री पुरुषों को अपने शरीर के आचरण सात्विक धनाना
चाहिए। क्योंकि इस शरीर में रह कर ही मनुष्य (स्त्री-
पुरुप) जीवात्मा परमात्मा अर्थात् व्यष्टि-समष्टि की एकता
का अनुभव प्राप्त कर सकता है। और इस शरीर द्वारा ही
मनुष्य (स्त्री पुरुप) ससार-रूपी नाटक का खेल सपके साथ
एकता के प्रेम * भाव युक्त करके स्वतन्त्रता अथवा मोक्ष
प्राप्त कर सकता है। शरीर की स्वाभाविक आवश्यकतामो
तथा प्राकृतिक वेगो को सम आहार और समाविहार द्वारा
शान्त करके, शीत, उष्ण, रोग, विपत्तियो आदि से उसकी
रक्षा करके तथा शुद्ध वायु में, साफ-सुथरा रख कर उसे
आरोग्य, सुदृढ़ एव बलवान बना कर दीर्घजीवी बनाना
सीप प्रकरण में प्रेम और समताश खुलासा देखिए ।
देवी सम्पद
चाहिए, जिससे उसके द्वारा सात्विक आचरण होकर शारी-
रिक बन्धनों से छुटकारा मिले ।
ग्राहार
आहार सात्विक-शरीर को पोषण करने एव आरोग्य,
पलवान तथा सुदृढ बनाए रसने की दृष्टि से करना चाहिए,
न कि केवल जिह्वा के स्वाद के लिए। जिह्वा के स्वाद को
गौण मान कर, जहाँ तक बन सके, सादा थोर सम भोजन
करना चाहिए। आयु, विवेक शक्ति, पल, पारोग्यता, सुख
और प्रीति बढ़ाने वाले (अर्थात् साने के बाद जिनसे अजीर्ण
आदि रोग, दुस और अरुचि पैदा न हो, किन्तु सब प्रकार
से आराम मिले), रसदार , चिकने, अधिक ठहरने वाले,
हृदय को शक्ति देने वाले, शुद्ध किए हुए तथा अच्छी तरह
'पकाए हुए, युक्त अर्थात् जितना धाराम के साथ पच जाय
उतनी मात्रा में नियमित समय पर साना-सात्विक
आहार है।
रजोगुणी तमोगुणी थाहार भरसक न साना चाहिए ।
अति कड़वे, अति सट्टे, अतिसार, अति गर्म (जलते हुए),
'अति तीसे, अति रूसे, दाह उत्पन्न करने वाले, जिनके साने
से दुस, शोक और रोग उत्पन्न हो (अर्थात् अधिक माना
में वथा अनियमित रूप से अनेक यार असमय में खाना),
दुससे पचने वाले, पासी, नीरस, दुर्गन्धयुक्त, एक से अधिक
देवी सम्पद ५९ पार सस्कार फिए हुए , जूठे , बुद्धि को हानि पहुँचाने वाले और मैले थाहार राजसी तामसी होते हैं। जल पवित्र, साफ. एना हुआ, मीठा, न अति ठण्डा और न उष्ण पीना चाहिए। किसी प्रकार का व्यसन-मादक पदार्थ, धूम्रपान, सुरती-तम्नार आदि, बीमारी के मिना चाय, फॉसी, धर्फ, लेगनेड, सोडा-वाटर आदि तथा अनजानी विदेशी पाने- पीने की चीजें एव मिना रोग के औषधि सेवन आदि से सर्वथा बचे रहना चाहिए। यह पात सभी बुद्धिमान लोग मानते हैं कि आहार- विहार का प्रभाव मनुष्य की बुद्धि पर अवश्य ही पड़ता है। आर्य सस्कृति तो यहाँ तक मानती है कि नीति से उपार्जन किया हुआ आहार बुद्धि को शुद्ध रखता है और अनीति से उपार्जन किया हुआ आहार उसको मतिन करता है। तात्पर्य यह कि आहार शुद्धि को हमारे यहाँ बहुत ही महत्व दिया गया है और पाने-पीने के लिए मुंह पर एक प्रकार से मोहर सी लगाई हुई रसना आवश्यक समझा गया है । सात्विक आहार से बुद्धि निर्मल होती है और राजस-तामस से मलिन, परन्तु वर्तमान में बुद्धि पर प्रभाव पड़ने का सूक्ष्म विचार तो घट गया और उसके स्थान पर रूदिवाद पर अन्यश्रद्धा रसने वाले लोग छुआछूत, जाति पाँति आदि के स्थूल विचारों तथा .
कता दैवी सम्पद ६२ मर्यादा के अनुसार, अवसर और परिस्थिति की आवश्य- उपयुक्त वस्त्र पहिनना चाहिए, न कि केवल दिखावे की सुन्दरता बढ़ाने के लिए। किसी विशेप ढग के पहिनाव में आसक्ति और कट्टरता नहीं रखनी चाहिए। यथाशक्य मोटा, सादा और साफ सुथरा स्वदेशी वस्त्र पहिनना चाहिए। केवल दिखावे की चटक-मटक के बारीक और रेशम आदि के महीन वस्त्र न तो शरीर को शीत उष्ण तथा रोगादि से सुरक्षित रख सकते हैं और न वे लज्जा निवारण ही करते हैं। व्यायामादि विहार शरीर में वात पित्त कफादि दोपों को सम रस फर बल और दृढता पनाए रखने एवं उनके बढाने के लिए शक्त्या नुसार स्त्री और पुरुप सबको परिश्रम अवश्य करना चाहिए । जहाँ तक हो सके, उत्पादक श्रम ही करना, परन्तु यदि ऐसा न हो सके तो व्यायाम नित्य नियम से करना चाहिए। अमीरी, आलस्य या प्रमाद में निकम्मे रह कर शरीर को शिथिल न बनाना चाहिए। यथाशक्य स्वदेशी व्यायाम करना चाहिए । फैशनेल न होने के कारण देशी सादे व्यायामों से घृणा करके विदेशी बहुत खर्चीले व्या याम और खेलो में आसकि रसना सात्विकता के विरुद्ध है। वास्तव में देशी सादे व्यायाम और सेल बहुत अल्प सर्चीले
देवी सम्पद
होते हुए भी विदेशी आडम्बरों से कम लाभदायक नहीं।
शक्त्यानुसार पैदल घूमने का अभ्यास अवश्य रखना चाहिए,
सवारी आदि में बैठ कर आने-जाने में इतना आसक्त न हो
जाना चाहिए कि पैदल चलने की आदत ही छूट जाय और
आवश्यकता पड़ने पर पैदल चलने में दुख हो ।
इसी तरह शरीर के दूसरे विहार भी यथाशक्य सादे
बनाए रखने चाहिए, ताकि काम पड़ने पर परवशवा न रहे
और शरीर रोगों से मुक्त रहे ।
ब्रह्मचर्य
काम के वेग की शान्ति के लिए पुरुप को अपनी स्त्री के
साथ भौरखी को अपने पुरुप के साथ केवल ऋतुकाल मे-
वैद्यक शास्त्र के बँधे हुए नियमों के अनुसार-विषय करना
पाहिए। अमर्यादित रूप से, असमय में और पराए स्त्री-
पुरुषसे सङ्ग पदापि नही करना चाहिए। शरीर को थारोग्य,
सुदृढ एन पलवान बनाने और मन बुद्धि की सात्विकता के
लिए वीर्य की रक्षा करना अत्यन्त आवश्यक है, इसलिए इस
विषय में बहुत ही सयम से रहना चाहिए। विषयानन्द के
लिए वीर्य का जरा भी अपव्यय नहीं चाहिए।
दूसरी इन्द्रियों के विषय भी मर्यादित रूप से सयम
के साथ भोगना चाहिए , उनमें आसक्त होकर तल्लीन न
* तृतीय प्रकरण में ब्रह्मचर्य का खुलासा देखिए।
देवी सम्पद
६४
होना चाहिए। अनियमित विषय मोगों से ही शरीर कम
जोर होकर रोग-प्रसित होता है। आँखों से प्रिय पदार्थों
को देसने, कानों से प्रिय धनियों के सुनने, नासिका से
सुगन्धित वस्तुओं के सैंपने, त्वचा से सुहावने पदार्थों के
पर्श करने, जिहा से सान पान के स्वादिष्ट रसास्वादन लेने
आदि शौकीनी के भोगों की ऐसी आदत न डालनी चाहिए
कि उाके न मिलने पर चित्त में विक्षेप हो । यदि उपरोक्त
भोग्य पदार्थ अधिक प्रयास के पिना प्राप्त हों अथवा गुणियो
के गुण ज्या कारीगरो के कला कौशल की रक्षा अथवा
व्यवसायियो को सहायता देने के लिए व्यवहार में लाना
उचिव प्रवीत हो तो उनको अनासक्त बुद्धि से, मन और
इन्द्रियों को वश में रखते हुए भोगने में हानि नहीं । परन्तु
'उनको निरन्तर भोगने के लिए प्रयास करने, उनकी प्राप्ति
के लिए चिन्तित रहने तथा रात दिन उनका ही ध्यान करते
रहने से महान् अनर्थ होते हैं और वे सच्चे सुख मे बहुत
बाधक होते हैं , क्योकि विपय भोगों का सुख राजसी होने
से परिणाम में महान दु सदायक होता है।
विषयेन्द्रियसयोगाद्यत्तदयेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विपमिव तत्सए राजस स्मृतम् ॥
जी.श्र.१८३८
दि
शम और दम का खुलासा तृतीय प्रकरण में देखिए।
देवी सम्पद ६५ भइदियों और उनके विषयों के संयोग से होने वाला (माधिभौतिक) सुस राजम कहा भाता है। यह परिजे पो धन के समान प्रतीत होता है, परन्तु उसका परिणाम विप के समान होता है। ये हि सस्पर्शजा मोगा दुरापोनय एव आद्यन्तवन्त फौन्तेय न तेषु रमते युध ॥ -गीप.५२२ अर्थ-क्योंकि (बाह्य पदार्थों के ) संपोग से डर होने चाले भोग, उत्पचि और नाश पाले हैं, अतएव बेदुरा के ही कारण है। हे कौन्तेय ! यदिमान लोग इनमें मासक नहीं होते। नित्य कर्म सवेरे सूर्योदय से पहिले-जिवनी जली हो सफे- चठ कर, विस्तर छोड़ने के पूर्व सर्मान्तर्यामी, सर्वव्यापक, पर- मात्मा का स्मरण ध्यान करना चाहिए । फिर शौच, पातुन, स्नान आदि से शरीर के सब अगों को साफ और शुद्ध करने के उपरात अब नियमित समय सरु ईश्वरोपासना, मन को एकाप करने के लिए यानी अपने व्यक्तित्व को समष्टि में जोदने के अभ्यास के लिए, सात्विक भाव से- किसी फल की आशा न रस कर-अवश्य फरनी चाहिए, अर्थात् दिन भर ससार के व्यवहार करने में एक परमात्मा सांत्र एक समान व्यापक होने का साम्य भाव चित्त में - -
दैवी सम्पद
६
मना रहे, ताकि आत्मा के विमुख अर्थात् बन्धन फरने वाले
व्यवहार शरीर से न बने, यानी दूसरों के साथ राग-द्वेपादि
के आसुरी व्यवहार न हों, इसलिए सुबह के प्रशान्त समय
में कुछ समय तक मन को सर्वात्मा-परमात्मा के चिन्तन
रूप एकता में जोड़ना चाहिए ।
ईश्वरोपासना विधि *
सर्वात्मा-परमात्मा का सब से अधिक यथार्थ बोध
कराने वाला शब्द अथवा चिन्ह "प्रणव" अर्थात् "कार"
है, क्योंकि इस एक अक्षर में ही परमात्मा के सत् चित्
आनन्द स्वरूप, उसकी सर्वव्यापकता तथा विश्व की
आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक एकता का
भाव भरा हुआ है।
प्रणव सर्यवेट्रेप।
-गी.भ.०८
अय-सव घेदों में कार में है।
इसलिए उक अर्थ सहित "ॐ" के स्मरण और जपर
द्वारा परमात्मा की उपासना करना सब से श्रेष्ठ है तथा स्त्री,
पुरुष, ऊँच, नीच सब कोई उससे बहुत ही सुगमता से
कर सकते हैं। परन्तु यदि पहले उसमें मन न लगे तो
प्रथमावस्था मकैवल साधन मान के लिए अपनी-अपनी
*तीतय प्रकरण में ईश्वर भक्ति तथा अप का खुलासा देखिए।
देवी सम्पद कपि के अनुसार, सगुण अथवा निर्गुण उपासना, चाहे रिसी मूर्ति, पिन अथवा दूसरे चिन्ह को लक्ष्य पर भथवा भान द्वारा जिसमे मन रागे-करे । परन्तु अपने उपास्य देव को एक घ्यक्ति या एकदेशी अथवा उत्पत्ति- विनाश बाला न समझना , किन्तु पज, अविनाशी, जगदी- सर, जगन्नियन्ता, जगदाधार, सर्वव्यापी, सर्वश, सर्व- शक्तिमान आदि गुणों का चिन्तन करते हुए उसकी उपासना करनी चाहिए। उसमें रजोगुणीतमोगुणी भाव भर्यात काम, क्रोध, लोभ, भय, शोक, शीत, उण, क्षुधा, स्पा, राग, द्वेष आदि का आरोप कर, रजोगुणी-तमोगुणी पदार्थो द्वारा और रजोगुणी-तमोगुणी भावो से उपासना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि परमात्मा केवल सात्विक एवम् अनन्य भक्ति से प्रसन्न होता है, न कि रजोगुणी-तमोगुणी पदार्थो था भावी से संसार में ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो परमात्मा से पृथक हो , इसलिए उसकी उपासना करने के लिए किसी पदार्थ की आवश्यकता नहीं रहती। पत्र पुष्प फल तोय यो मे भक्त्या प्रयच्छति तदर भक्त्युपहतमन्नामि प्रयत्तात्मन ॥ ---गीभ०१२६ अर्थ-जो भक्ति से मुझे पत्र, पुष्प, पर अथवा थोड़ा सा मल (अर्थात् जो पाएँ मिना अधिक प्रयास के पास हो सकती . दैवी सम्पद हैं वे)ही अपण करता है उस निपत चिच म्यक्ति की भक्तियुक्त भेंद को मैं (प्रसन्नतापूर्वक) ग्रहण करता हूँ। अर्थात् प्रत्येक देहधारी की देह में मैं सर्वास्मा परमात्मा ही रहता है। भव मेरी उक्त देशों के उपयुक्त तथा उनकी यावश्यका और अपनी योग्यता के अनुसार पत्र, पुष्प, पल या मनदी के द्वारा जो मेरी हदेहरों की सेवा करता है-जिस सरह पशु पक्षियों को पास, पात, पुष्प यादि से और मनुष्यों की फल मल मादि से प्रर्यात् जो पदार्थ साधारण स्थिति के बोगों को भी सहन में ही प्राप्त हो सकते है उनसे प्रेमपूर्वक जो सेवा करता है , अथवा स्थूल यदि के साधा रण व्यक्तियों के मन एफाम होने के प्रयोजन से टपास के लिए परिपत की हुई देव-मूतियों, चित्र एव दूसरे पिहों पर पक्ष पत्र, पुष्प, फल और जल ही मो मति से पदाता है, उस-सबके साथ भैम में जुड़े हुए-प्यक्ति की उक्त भेद से मैं समष्टि मारमा परमारमा यहुत प्रसन्न होता है। समोऽह पर्वभूतेषु न मे वेष्योऽस्ति न प्रिय । ये मजन्ति तु मा भक्त्या मयि ते तेषु धाम्यहम् ।। ०१.१२६ अप-सब दूतों में मैं एक समान हूँ, मुझे म सो कोई पदार्थ अप्रिय है और न कोई प्रिय । बो भक्ति से मेरा भजन करते हैं मर्यात् जो मुझ परमात्मा को सर में एफ समान देख पर सपकी प्रेम युक्त सेवा और भादर करते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें भयात् वे मेरे साथ एक हो जाते है।
देवी सम्पद
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।
पुष्णामि चौपची सर्वा सोमो भूत्वा रसात्मक ॥
---गी०५० १५१३
थर्थ-पृथ्वी के अन्दर रह कर सब भूतो को मैं सारमा-पर
मात्मा अपने वेज से धारण करता हूँ। रसात्मक सोम होकर सय
औषधियों अथात् वनस्पतियों का पोषण में ही करता है।
इसलिए जब ससार का कोई भी पदार्थ उससे अलग
नहीं तो उसकी मूर्ति के सामने पदार्थ या भोग्य सामग्री
रखने मात्र की उपासना से वह प्रसन्न नहीं होता। पदार्थ
तो सासारिक लोगों की आवश्यकताओं को पूरी करने के
लिए होते हैं । इसलिए जिसके पास पदार्थ हों उसको उन
पदार्थो से देहधारियों को आवश्यकताएँ पूरी फरनी चाहिए,
यही परमात्मा की सच्ची उपासना है, क्योकि यही सम
प्राणियों में रह फर सब भोग भोगता है।
वैश्वानरो
भूत्वा
प्राणिना देहमाश्रित ।
प्राखापान समायुक्त पवाम्यन्न चतुविधम् ॥
--गी.भ.१९१४
पर्य-ही परवार धनि होकर सय प्राणियों की देहों में
रहता हूँ और प्राण, अपान पायु के समान योग से चार प्रकार के
मह (मोग्य पदापों) को पचाता हूँ (भोगता है)।
दैवी सम्पद
७०
सासारिफ फली के लिए देवताओं
का पूजन
सासारिक फलो की प्राप्ति के लिए की हुई राजसी
उपासना से नाशवान् फल तो प्राप्त होते हैं, परन्तु वे एकत्व
भाव अर्थात् स्वतन्त्रता अथवा मोक्ष प्राप्ति के मार्ग में बाधक
होते हैं।
कामस्तस्तैहनचाना प्रपद्यन्तेऽन्यदेवता ।
त त निपममास्याय प्रकृल्या नियता स्वया ॥
-गीप०७२०
यो मो या या तनु मक्त श्रद्वयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याधष्ठा श्रद्धा तामेव विधाम्यहम् ॥
गी०५० ०.२१
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।
लभते च तत कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥
जी०५०७२२
अन्तवन्तु फल तेया तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देयान्देवयनो यान्ति मद्रता यान्ति मामपि ।
गी.०७-२३
देवी सम्पद पई-मित्र मिल कामनापों से विपिस दिवाले लोग अपनी. अपनी प्रति के पश,मुझसमष्टि मामा-परमात्मा से मिव देवनामों को मान फर, उपासना के मित्र भिन्न नियम पालन जो, उनका यजन-पूजन करते हैं। मो-जो देव मत्त जिस नि शरीरधारी देवता की मसा पूर्व पूजा करने की इच्छा करता है उस उस फ्री धवा, में (सपका मारमा परमामा) उम-उस ऐवता म रिपर कर देना है। उस प्रवा से युक्त यह (भा) रस (देवता) की धारा धना करता है और उसी के अनुसार उमकी कामनाभों की यया. योग्य पत्ति, मुम्भ (सबके पारमा परमारमा)ही से होती है। परन्तु इन अल्प पुदि या लोगों को मिउने पाखे ये पक्ष मारवान होते है। देवतामों को मानने वाले देवताओं को माक्ष होते है और मेरे भक्त मुझे प्राप्त होते हैं। भावार्थ यह है कि परमात्मा से भिन्न न पो पूजा करने वाला है और न पूजा जाने एन फल देने वाला देवचा ही। परन्तु पृथकता के भ्रम से अपने व्यक्तित्व को अलग मानने के तामसी अहङ्कार वाले लोग अपने विषय-सुखों एव धन- पुनादि की फामनाओं से आतुर होकर आप ही-अपनी उन कामनाओ युक्त मन से अलग अलग देवता फल्पित कर लेते हैं और आप ही (उनमे स्थापित की हुई) अपनी अचरा श्रद्धा से फल उत्पन्न कर लेते हैं। यदि एक ही देवता को 'भा का गुलासा मृवीय प्रकरण में देविए।
देवी सम्पद
७२
मानने वालों की सरया बहुत हो और उसमे उनकी
अचल (द) श्रद्धा हो तथा सब मानने वालों में इस
विषय में आपस की एकता का भार हो तो उस बढी हुई
सम्मिलित भावना के कारण लोगों की कामनाओ की पूर्ति
की अधिक सम्भावना रहती है। परन्तु इन विषय-सुखों की
कामनाओं की प्राप्ति के लिए उत्पन्न होने वाली श्रद्धा का
फल, इन विषय सुखों को देने वाले कल्पित देवताओं को
उत्पन्न करके, उनके द्वारा इन नाशवान् कामनाओं की प्राप्ति
कर लेने के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता । परन्तु जिनको
सर्वन एक परमात्मा का निश्चय होता है वह अपने व्यक्ति
को उसमें समर्पण कर देते हैं, अत वे परमात्म भाव को
प्राप्त हो जाते हैं।
अपने उपास्य देव में पूर्ण श्रद्धा रखते हुए दूसरो के इष्ट
की निन्दा या अनादर न करना चाहिए, किन्तु सबके देवो
में अपने उपास्य देव को व्यापक देखना चाहिए, क्योंकि
सर घराचर सृष्टि में एक ही परमात्मा ओत प्रोत भरा हुआ
है। मिन भिन्न मजहर, भिन्न भिन्न मत तथा भिन्न-भिन्न
सम्प्रदाय वाले चाहे उसको भिन्न भिन नामो तथा भिन्न भिन्न
उपाधियों से विभूपित करके उसकी उपासना भिन-भिन्न
तरीकों से भले ही करें, परन्तु वास्तव
सर उपाधियों में एक परमात
ही ना-यह टह
परमात्मा ०म०६२३ ७३ देवी सम्पद परमात्मा के एकत्व भाव के तत्त्व योन जान कर, भिन्न- भिन्न लोगों के ईश्वर को पृथक् पृथक् मानते हैं वे को प्राप्त नहीं हो सकते। येप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विता । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधि पूर्वकम् ।। . अह हि सर्वयज्ञाना भोक्ता च प्रभुरेव च । न तु मामभिजानन्ति तस्वेनातश्च्यवन्ति ते॥ गी. ० ६२४ भय-हे कौन्तेय ! मुझ परमात्मा से भिग्न, अन्य देवता मान कर उनश श्रद्धायुक्त पूजन करने वाले भी मेरा ही पूजन करते हैं, परन्तु वह पूजन विधिहीन होता है। क्योंकि सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ , परन्तु ये तत्पर मुझे नहीं जाये, इसलिए गिर जाया करते हैं। तात्पर्य यह कि जब एक परमात्मा के सिवाय दूसरा कुछ है ही नहीं, तो देवताओं की कल्पना करके उनको पूजने वाजे भी परोक्ष रूप से परमात्मा ही का पूजन करत हैं, परन्तु वे लोग देवताओं को परमात्मा से पृथक मान कर व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि के भाव से उनका पूजन करते हैं, एकत्व भाव से नहीं करते, अत वह विपरीत भाव का पूजन उनके पतन का कारण हो यहाँ इतना कह देना .
देवी सम्पद १२६ अपनी हैसियत से बहुत ऊँचे दर्जे का विवाह सम्बन्ध स्थापित करने के लिए लालायित न होना, किन्तु विशेष ध्यान अपनो समता अर्थात् समान गुण एर समान योग्यता घालों के साथ सम्बन्ध करने पर ही रखना चाहिए, क्योंकि वास्तविक सुख समान स्थिति, समान आहार-व्यवहार तथा समान विचार वाले सम्बध में ही होता है। असमान सम्बन्ध से लम्बी मुद्दत के लिए सुख नहीं होता। विराह सम्बध में जन्मपत्रियों में लिखे हुए ग्रहों के मिलान करने की प्रथा मे हानि के सिवाय लाभ कुछ भी नहीं है, क्योंकि जन्मपत्रियों के अनुसार ग्रहों के फल ठीक- ठीक मिलें,यह निश्चय नहीं है। अनेक अवसरों पर तो बहुत विपरीत फल होते देखे गए हैं। ऐसी अवस्था में जन्मपनियों का मिलान करके नाहक वहम उत्पन्न नहीं करना चाहिए। जात-पात के सङ्कीर्ण विचारो के कारण योग्य वर-वधू की जोड़ मिलना वैसे ही बहुत दुर्लभ है, इतने पर भी सौभाग्य- वश जब कोई योग्य जोड़ मिल जाती है वो ज्योतिपी जी महाराज की प्रह शान्ति हुए बिना वे बीच में टॉग अड़ाकर योग्य सम्बन्ध जुटने में बाधा लगा देते हैं। फलत बहुत से बाल और वेजोड़ विवाह होने में जमपत्री का मिलान भी एक प्रधान कारण हो जाता है। सुख दुख जन्मपत्री मिलाए हुए विवाहों में भी उसी प्रकार होता है जिस प्रकार विना मिलाए हुओं में। बल्कि जन्मपनी विना मिलाए
१२७
देवी सम्पद
विवाहो में जोड़ ठीक बैठने से अधिक सुरस की सम्भावना
रहती है। ऐसी दशा में जन्मपनियों के मिलान पर विश्वास
और वहम फरके विवाह सम्बन्ध जैसे पवित्र और जन्म भर
सुप दुप निर्भर करने वाले गुरुतर कार्य के लिए स्वार्थी
ज्योतिपियों अधीन रहना पड़ी मूर्खता है ।
विवाह-व्यवस्था
विवाह-व्यवस्था के सम्बन्ध में भी आजकल बहुत
पाद विवाद चलता है। कई लोग वो सन्तानों के विवाह
पूर्ण रूप से माता-पिता और उनकी अनुपस्थिति में घडे
भाई आदि अभिभावकों के अधीन रखना ही श्रेयस्कर
मानते हैं, एवं जिनका विवाह होता है उनका इस विषय में
एक शब्द उच्चारण करना भी नीति विरुद्ध एन अधर्म
समझते हैं , और कई लोग विवाह करने वालो ही को पूर्ण
स्वतन्त्रता देने के पक्ष में हैं। प्रथम पक्ष वाले विवाह का
उद्देश्य केवल सन्तानोत्पत्ति ही मानते हैं, जिससे मृत पितरों
को परलोक में पिपडोदक पहुँचाने वाला वंश चलता रहे
और दूसरे पक्ष वाले स्थूल शरीर के विपय भोगादि सुपी
पर ही प्रधान लक्ष्य रखते हैं। परन्तु यदि विचार कर देखा
जाय तो दोनों ही पक्ष व्यक्तिगत स्वार्थ और आधिभौतिक
सुग्वों की दृष्टि पर ही अवलम्बित है । वास्तव में विवाह का
सचा उद्देश्य, स्त्री-पुरुष का-परस्पर एकता के निस्वार्थ प्रेम
-
दैवी सम्पद १२८ भाव से रहते हुए और आपस के सहयोग से एक दूसरे के शरीरों को आवश्यकताएं पूरी करते हुए तथा प्राकृतिक वेगों को मर्यादित रूप से शान्त करते हुए-अपनी- अपनी आत्मोन्नति करने के साथ साथ समाज को सुव्य- यस्थित रस कर इसकी उन्नति में भी सहायक होना है। सन्तानोसत्ति तथा आधिभौतिक विषय मुस तो इसके गौण फल हैं। वे तो विवाह के बिना भी नर मादा के सयोग से पशु पक्षियों में भी होते ही हैं। विवाह के उक्त पवित्र एवं सच्चे उद्देश्य की सिद्धि के लिए, घर वधू के माता पिता तथा उनकी अनुपस्थिति में अन्य अभिभावकों को किसी भी प्रकार के अपने व्यक्ति- गत इहलौकिक तथा पारलौकिक स्वार्थ सिद्धि का विचार न रप फर~ केवल उनके (वर-वधू के ) हित की दृष्टि से उनके उपयुक्त जोडे को अच्छी तरह जाँच पड़ताल करके चुनना चाहिए , फिर उनको एक दूसरे के गुणा अच्छी तरह परिचित करा देने के उपरान्त दोनों को अपने सम्मुख बैठा कर उनका आपस में बार्तालाप करवाना चाहिए। इसमे लना या सङ्कोच बित्तुल न रखना चाहिए। 'इस तरह करने पर वे एक दूसरे को पसन्द कर लें तब उनका सम्बन्ध करना चाहिए । वर-वधू को प्रसन्नतायुक्त सम्मति के बिना तथा माता पिता आदि के चुने विना कोई भी सम्बन्ध होना उचित नहीं। चाहे प्रथम विवाह
देची सम्पद
१२९
हो या पुनर्विवाह , इसी पद्धति से होना सुखदायक हो
सकता है।
विवाह एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण कार्य है, जिस पर
केवल इस जन्म का ही नहीं, फिन्तु भविष्य के जन्मों का भी
सुधरना-विगदना निर्भर है, इसलिए इस विषय में बहुत ही
सोच विचार तथा सावधानी से काम लेने फी यावश्यकता
है । यह कार्य यदि माता पिता श्रादि के हो अधीन रहे तो
अपने व्यकिगत स्वार्थ से अथा अशानवश या वर वधू
की रुचि न जानने के कारण अयोग्य जोड़ा चुन सकते हैं
जिससे दोनों का भविष्य बिगड़ सकता है जैसे कि वर्तमान
में अधिकतर हिन्दू समाज में हो रहा है, और यदि
युवक-युवतियों पर ही छोड़ दिया जाए तो अनुभर की कमी
तथा यौवन के वेग में अत्यन्त विषयासक्ति होने के कारण,
भावेश में थाकर-परिणाम पर दी दृष्टि से विचार किए
बिना-उनके अयथार्थ निर्णय को सम्भावना अधिक रहती
है, जिससे अयोग्य जोड़ा चुना जा सकता है और जिसका
परिणाम आगे जाकर भयङ्कर होता है, जैसे कि आजकल
के सभ्य समाज में बहुतायत से देखा जाता है। अब इस
सम्बन्ध में माता पिता तथा वर वधू दोनों को अपना-अपना
कर्तव्य यथायोग्य पालन करना चाहिए। जिन षड़ी थायु
के वर-वधू के माता पिता आदि अभिभावक न हो उनको भी
अपने अपने सुहदय जनी की सम्मति से अपने विवाह
me
meta.
दैवी सम्पद योग्य जोड़े को चुनना चाहिए । विवाह सम्बन्ध अपने अनुकुल आयु तथा उपयुक्त गुणों की जोड़ मिलने ही से सुखदायक तथा शुभ परिणाम जनक होता है स्वार्थ और भोग कामना से कदापि नहीं । धेजोड़ विवाह का दुष्परिणाम केवल विवाह करने वालों ही को नहीं, किन्तु सब समाज को भोगना पड़ता है। भाई और यहिन यदि अपने से बड़े हो तो उनको भी पूज्य मानना, उनसे अपनी एकता के प्रेम एव प्रादर- सम्मान युक्त व्यवहार करना, आवश्यकता पड़ने पर उनकी से करना और उनके सुख दुःख में सहायक होना चाहिए और यदि अपने से छोटे हों तो उनके साथ अपने पुत्र पुनी के समान एकना के प्रेमयुक्त वात्मल्य भाव का व्यवहार करना तथा उनकी शारीरिक एवं मानसिक उन्नति में सहायक होना। इसी तरह जो दीन और अनाथ कुटुम्पी अपने आश्रय में हो उनका प्रेम सहित पालन पोषण, रक्षण शिक्षण प्रसन्न चित्त से फरना चाहिए। यदि चे बालक हों तो अपनी सन्तानों की तरह उनके प्रति वात्सल्य भाव का व्यवहार करना और यदि बड़ी प्रायु के हो तो पूज्य भाव से उनके साथ श्रादर सम्मानपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। सबके सुस दुःखों में सहायक होना और सनकी वास्तविक पावश्य- कताएँ पूरी करने तथा उनके वास्तविक हित साधन के व्यव. हारों में सहयोग देना चाहिए।
१३१
देवी मम्पद
कौटुम्विक अत्याचार
भारतवर्ष ने जब से आध्यात्मिकता को केवल निवृत्ति
के उपयोगी समझ कर ससार के व्यवहारों से उसको अलग
कर दिया अर्थात् जब से दर्शन शास्त्रों का विचार केवल
पर्वतों की कन्दराओं में रहने वाले, ससार से विरक्त-त्यागी
महात्माओं ही के उपयोग की वस्तु समझी जाने लगी-
गृहस्थी लोग उससे सर्वथा यश्चित हो गए-तब ही से यहाँ
के लोगो में जड़ता बढ़ती गई और इस समय यहाँ अधिक
सख्या आसुरी प्रकृति के लोगों ही की हो गई है। ये
लोग स्वय अपने फुटुम्ब के साथ भी एकता के प्रेमयुक्त
बर्ताव नहीं करते तो फिर अखिल विश्व के साथ एकवा के
प्रेमयुक्त बर्ताव को तो पात ही कैसी । अपने इस लोक
तथा परलोक के व्यक्तिगत स्वार्थी तथा शरीर के क्षणिक
सुस के लिए विषय करके ये लोग कीड़ो मकोड़ो की तरह
सन्तान उत्पन्न तो करते रहते हैं, परन्तु उनके उचित रीति
से पालन पोपण, रक्षण-शिक्षण के लिए कुछ भी कष्ट उठाना
नहीं चाहते । अपना (शरीर का) नाम अपने पीछे बहुत
काल तक चलता रहे तथा मरने के बाद परलोक में अपने
को स्थूल शरीर मिलने वथा उसके भूखे-प्यासे मरने की
कल्पना करके, वहाँ उस शरीर को-जल तथा भन्न का
पिण्ड पहुँचने की आशा से पुत्र उत्पन्न होने के लिए (यदि
देवी सम्पद १३२ साधारण तौर मे उत्पन न हो तो) पड़े-बड़े यत्न करते हैं और उसके उत्पन्न होने पर बहुत हपं मनाते हैं । यदि यन करने पर भी पुन उत्पन्न न हो तो किसी लड़के को खरीद कर या गोद लेकर बड़ी खुशी मनाते हैं तथा ऐसे पुनों को बड़े लाड़-प्यार से रखते हैं, परन्तु लड़की मिना यन के ही उत्पन्न हो जाने पर पहुत शोकातुर होते हैं और उससे बड़ी घृणा करते हैं। कई लोग तो उसको जन्मते हो मार डालते हैं और जो नहीं मारते वे भी मदा उसका तिरस्कार करते हुए उसके मरने की कामना करते रहते हैं और यदि वह मर जाय तो बड़े प्रसन्न होते हैं, क्योंकि उससे उनको अपने व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि की आशा कुछ भी नहीं रहती-नाहक उसको खिलाने पिलाने आदि पर सर्च फरना और कष्ट उठाना पड़ता है। अपना उत्तराधिकारी धनवान बना रहे इस व्यक्तिगत मोह तथा प्रतिष्ठा के लिए पुत्र के वारते तो अनेक तरह के कुकर्म करके न्याय अन्याय से धन बटोर कर छोड़ जाना अपना परम धर्म समझते हैं, परन्तु कन्या को-विवाह और गौने आदि के अवसर पर समाज में अपनी व्यक्तिगत प्रविष्टा के लिए लाजिमी दहेज देने (सी भी कन्या को नहीं, किन्तु उसके ममुर आदि अपने सम्बन्धी को) के अतिरिक्त-कुछ भी देना अन्याय मानते हैं। चाहे कन्या कितनी ही दोन अवस्था या विपत्ति में क्यों न हो, चाहे वह पिता की नादेहन्दी के कारण सास-
देवी सम्पद
१३३
ननद आदि के तानों से कोसी जाकर मर ही क्यों न जाय,
परन्तु उसको कुछ भी देकर विपत्ति से पचाना या सन्तुष्ट
करना अपने कर्त्तव्य से बाहिर मानते हैं।
पुत्र-पाहे औरस हो या खरीदा हुआ दत्तक, घर की
सम्पत्ति का उत्तराधिकारी वही होता है। उसकी अनु-
पस्थिति में पाप-दादे आदि सात पुश्तों की औलाद के पुरुप
उत्तराधिकारी हो जाते हैं , परन्तु अपने शरीर से उत्पन्न
कन्या का अपने पिता की सम्पत्ति में रत्ती भर भी अधिकार
नहीं, क्योंकि उससे अपने शरीर का नाम नहीं चलता और
न उसका दिया हुआ पिण्डोदक ही पहुँच सफचा है-ऐसा
भ्रम फँसा हुआ रहता है।
अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए बालक-बालिकाओ को
बेच देने में भी इन्हें कोई सङ्कोच नहीं। धन प्राप्ति के लिए
अथवा लोगों में अपना मान बढाने तथा मरने के बाद
पिण्डोदक पहुँचाते रहने वालो औलाद उत्पन्न होने के लिए
पुत्र का विवाह छोटी अवस्था में ही कर देते हैं, परन्तु इन
व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए किए हुए पाल और बेजोड़
विवाहों से होने वाले पालकों के सर्वनाश का इनके चित्त
पर कोई असर नहीं पड़ता। धन लेकर अथवा भविष्य में
आर्थिक लाम की आशा से अथवा किसी बड़े आदमी के
समुरे, साले श्रादि कहलाने के मान के लिए अथवा लड़की
के पहिले विवाह करने के पुण्य कमाने की
देवी सम्पद
लालसा से अथवा रजस्वला होने के बाद विवाहित रखने
के फल्पित पाप तथा लोक निन्दा से बचने के लिए अथवा
(इनमें से कोई भी अर्थ सिद्ध न हो तो) लड़की को घर से
जल्दी घाहिर करके उससे पीछा छुड़ा कर निश्चित होने के
स्वार्थ के लिए उसको चाहे जैसे अयोग्य, पालक, बुड्ढ़े,
मूर्स, रोगी, गॅवार, विधुर तथा जिसके एक या अधिक
त्रियों और सन्तान मौजूद हों ऐसे वर को भी जहाँ तक बन
सके जल्दी दे डालना इनके ननदो बिल्कुल ही उचित और
न्यायसङ्गत है। जब तक फुधारी पन्या घर में रहती है तब
तफ इनको बड़ी हो चिन्ता रहती है,मानो इनके सिर पर कोई
भारी योम लदा हुआ है और जब तक मसको घर से निकाल
पाहिर नहीं करते तय तफ इनकी नींद हराम हो जाती है,
परन्तु जिस दिन उसके विवाह का स्वाँग करके उसको घर से
विदा कर देते हैं उस दिन माता पिता सुख की नींद सोते हैं।
फिर वह दी हुई लडकी चाहे तुरत हो विधवा होकर जन्म
भर रजस्वला होती रहे तथा विवश होकर कुफर्म एव गर्भपात
फरके अपना सर्वनाश कर ले और कितना ही कष्ट क्यों न
पावे, इनकी जाने पला । इसका दूसरा विवाह वे हरगिज
नहीं करते, क्योंकि पुनर्विवाह करने से वो इनके मवा-
नुसार इनका धर्म डूब कर स्वय घोर नरक में पहने का
भय रहता है और न करने से पुछ भी व्यक्तिगत पाप लगने
को आशङ्का नहीं रहती, फिन्तु बड़े धर्मात्मा बने रहते हैं।
देवी सम्पद
स्त्रियों पर अत्याचार
इसी तरह अपनी पत्नी को भी अधिकाश लोग फेवल
अपने शरीर के विषय मोग सपा स्वार्थ-साधन की जद
सामग्री समझते हैं । पन्नो जब तक रूप-यौरन आदि गुणों
के कारण विषय भोग के उपयुक्त रहती है, अपने शरीर को
सुप देने वाले भाचरण और सेवा-टहल करती है, अपनी
भाशा का उपवन नहीं करती, अपनी स्वेच्छाचारिता के
विरुख कुछ भी नहीं करती और पुन उत्पन्न करती है
तर तक तो उससे अब पार करने जैसा यह कहे, अन्धे
होकर उसीके अनुसार किया जाता है और जैसा नाच
यह नचावे वैसा हो नाचा जाता है। उस दशा में ससार में
उसके घरापर और कोई पदार्थ नहीं होता। परन्तु जय
इसके रूप यौवनादि गुण अपने अनुकुल नहीं होते अथवा
यह धाज्ञापालन या सेवा आदि मे घटि करती है अथवा
पुरुप के मनमाने अत्याचार सहन करने में पानाफानी
करती है तो फौरन ही प्यार की नजर से देखे जाने फे अधिक
फार ए बैठती है और मोहरत उससे हट कर दूसरी किसी
मनचाही स्त्री पर डेरा जमाती है , र उसका (स्नी का)
केवल मिडकियों तथा गालियों द्वारा हो सरकार नहीं किया
जावा, किन्तु मार-पीट द्वारा पूजन भी किया जाता है और
पर तो वह किसी काम की ही नहीं रहती। कई
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दैवी सम्पद
शक्तिशाली एवं सम्पन्न लोग-एक-एक पुरुप-अपने भोग के
लिए अनेक पजियाँ तथा उप-पक्षियों रप कर ही सन्तोप नहीं
करते, किन्तु दूसरों की पत्रियों से व्यभिचार करने में भी अपनी
घडी प्रतिष्ठा समझते हैं , परन्तु जो इतनी निरङ्कुशता नहीं
कर सस्ते वे भी थोड़ा सा बहाना मिलने पर एक पनी की
भौजूदगी मे ही दूसरी लाफर दोनों का सर्वनाश कर देते हैं,
और स्त्री के वध्या होने पर (यद्यपि पन्ध्या होने का दोष
फेवल स्त्रियों का ही नहीं होता) या भाज्ञा का उहाइन करने
पर या किसी दीर्घ रोग प्रसित होने पर या सचा झूठा इल
जाम लगने पर--यहाँ तक कि कटुमापिणी होने पर भी-
फौरन दूसरी पत्नी लाना परम धार्मिक कृत्य माना जाता है
और एक पत्नी के मरने पर दूसरी लाने में खो पुरानी जूनी
फेक कर नई लाने में जितना विचार होता है उतना भी शायद
नहीं होता।
पुरुप की सम्पत्ति पर उसके जीवन काल में तो स्त्री
को किसी प्रकार का अधिकार होने का प्रश्न ही नहीं
उठता, किन्तु पुरुष के मरने पर यद्यपि स्त्री जन्म भर वैधव्य
भोगती हुई जड़वत् घर के एक कोने में बैठी, सड़ सड़ कर
जीवन बिताने के लिए बाध्य की जाती है, परन्तु पति की
सम्पत्ति में-सिवाय परिवार की सेवा रहल करने के ऐवज
में रूसा-सूखा अन्न खाके और कोई अधिकार नहीं रहता।
विधवा होने पर वह इतनी अशुभ और तिराकृत बना दी
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१३८ दैवी सम्पद किया जाता है, परन्तु यदि इसमें सफलता न हो तो या वो के बेचारी विषादि के प्रयोग से मार डाली जाती है या उन्हें घर से निकाल कर समाज में अपना मुस उज्ज्वल किया जावा है। इस तरह घर से निकली हुई वे बेचारी या तो निर्दयी गुण्डों के हथकण्डों में पड़ कर घोर विपत्ति और कष्ट उठाती है या वेश्यावृत्ति से नारकीय जीवन व्यतीत करती हैं अथवा इतनी यातनामों से तन माकर आत्मघाव कर लेती हैं । इस तरह के पैशाचिक कृत्य इन लोगों की दृष्टि में धर्म-सम्मत हैं और उन अपलानों का इस वरह सर्वनाश करने वाले धर्मात्मा ही बने रहते हैं, परन्तु जबान विधवाओं फा विवाह करके उनको सद्गृहस्थिनी बनाना पड़ा पापा चार माना जाता है। पहिले जमाने में जन सती दाह को अमानुपी प्रथा प्रचलित थी तब तो वेचारी विधवाओं को अग्नि में जलने की दारुण वेदना घण्टे धाव घण्टे मूच्छित होने तक ही सहन परनी पड़ती थी, परतु अब तो विना श्रमि के ही जलवे रहने की मर्म-वेदना वेचारी विधवाओं को जामभर मोगनी पड़ती है। इससे अधिक नृशस राक्षसी व्यवहार और क्या हो सकता है ? त्रियों को पर्दे के अन्दर बन्द रप फर सड़ाना, बुद्धि- विकास के साधन उनको ज्ञानेन्द्रियों के द्वारों को घूघट से ढॉक कर बन्द फर रसना और वेचारियों को पिख-
देवी सम्पद
की चिड़िया बनाए रखना उच्चकोटि की मर्यादा मानो
जाती है।
स्त्रियों को पर्दे के अन्दर इस वास्ते रक्सा जावा है कि
पुरुप उन पर फुष्टि न डालें अर्थात् फुष्टि डालने का पाप
तो करें पुरुष और उस पाप का फल भोग येचारी नियाँ।
कैसा विचित्र न्याय है ? मुंह यन्द करके पई में रखना चाहिए
एदृष्टि डालने वाले पुरुषों को, परन्तु रक्खो जाती हैं निर्दोष
अबलाएँ। यह बात ध्यान में रखने की है कि स्त्रियों को
अधिकतर अपने ससुराल को तरफ के घड़ों से घूघट
करवाया जाता है, जिससे सामिन होता है कि घर के
"बडेरे" ही कुदृष्टि डालने वाले पापी है, इसलिए घर के
पुरुषों के पाप का फल भी, उनके बदले येचारी त्रियों को
भोगना पड़ता है।
अबलाओं की पुकार
(तर्ज लावनी)
टेर
समन सुनो दे कान, धर्म कालो दम भरते हो।
नारी नर से कहे, जख्म हम पर क्यों करते हो ।
अन्तरा
महा जी ने थादि काल में सृष्टि रची सारी।
एक मुभा से हुआ पुरुष और धूनी से नारी ॥
७
ढवी सम्पट
सङ्गठन में रहते हुए मनुष्य का कार्यक्षेत्र विस्तृत होने के
वदते उलटा अधिक सङ्कुचित हो जाता है जिससे उन्नति के
बदते उलटी अवनति होती है। प्रत्येक समाज के टुकड़े-
टुकड़े होकर इतने फिरके पन गए हैं कि उनका दायरा बहुत
ही चोटा और सङ्कुचित हो गया है। प्रत्येक फिरका
अपने अत्यन्त सङ्कीर्ण नियमो की मज्वृत पहारदिवारी के
भीतर इस तरह जकड़ कर फ़ैद हो गया है कि उसका कोई
भी व्यक्ति उनसे बाहिर-किसी दूसरे फिरने के व्यक्ति के
साथ-किसी प्रकार कासामाजिक व्यवहारनहीं कर सकता।
इस परह की सङ्कुचितता में सात्विक भावो के विचार भी
उत्पन्न नहीं हो सक्वे । प्रत्येक निरके के नियम प्राय जन्म,
मृतु और विवाह आदि सम्बन्धी रीति रिवाज और रूदियों
का पालन करवाने तथा इन अवसरों पर अपने सभ्यों से
लाजिमी तौर पर बिरादरी और ब्राह्मणों के लिए मिष्ठान्न
भोजन आदि के आसुरी आडम्बर करवाने तक ही परिमित
होते हैं। इनके अतिरिक्त किसी प्रकार की धार्मिक, आर्थिक
अथवा नैतिक भलाई या उन्नति पर कोई लक्ष्य नहीं रहता।
चन किरकों के नेता-पञ्च लोग अपने अपने पिरत को
अपनी मौरूसी जायदाद समझ कर उससे अपनी व्यक्तिगत
स्वार्थ सिद्धि करने के लिए सदा प्रयत्नशील रहते हैं और
अपने नेतापन की प्रतिष्ठा के अभिमान में लोगों को दबात
तथा कष्ट देते हैं। किसी के घर में मृत्यु होने पर लाजिमी
देवी सम्पद
तौर से उससे मिष्टान्न भोजन करवा कर माल उड़ाते है।
जिस व्यक्ति से ऐसे भोज करयाए जाते हैं वह चाहे कैसा
ही दीन हो अथवा अनाथ विधवा हो या नानालिग बच्चा हो
और मृत्यु भी चाहे ऐसे जवान की क्यों न हो, जिससे उसका
घर एकदम वले धैठ जाए-फिर भी इन लोगो को उसके यहाँ
माल उडाने तथा जहाँ तक धन सफे घेचारे दीन, दुखिया
शोकातुर भोजन कराने वाले को तग करने और दुख देने
में किसी प्रकार का वरस नहीं आता। चाहे वे बेचारे दीन
और अनाथ अपना घर एव वनाभूपण बेच डालें अथवा
असहाय विधवाओ के जीवन निर्वाह के लिए कुछ भी
साधन न रहने से चाहे वे अपना शरीर भी गिरवी क्यों
न रस दे अर्थात् पेट की ज्वाला चुझाने और छोटे बच्चो
को पालन करने के लिए उनको आततायियो की मजदूरी
करके अपने सतीत्व को भी तिलान्जलि देना पड़े, परन्तु
बिरादरी का वह प्रेत-भोज करना लाजिमी है। यदि कोई
अत्यन्त गरीबी के कारण ऐसे भोज (जिनको "कारज"
कहते हैं ) करने में असमर्थ होता है तो फिर वह समाज में
मुँह दिखाने योग्य नहीं रहता और उसका "नाक कट
गया" माना जाता है तथा वह समाज के लोगो से सदा
कोसा जाता है। जत्र मृत्यु के अवसर पर भी इस तरह
का राक्षसो व्यवहार होता है सर विवाहादि हर्ष के अवसरो
की सामाजिक रीति-रिवाजों और भोज आदि के आसुरीपन
देवी सम्पद
१५०
सङ्गठन में रहते हुए मनुष्य का कार्यक्षेत्र विस्तृत होने के
घदरो उलटा अधिक सङ्कुचित हो जाता है जिससे उन्नति के
बदले उलटी अवनति होती है। प्रत्येक समाज के टुकडे-
टुकड़े होकर इनने फिरके बन गए हैं कि उनका दायरा बहुत
ही छोटा और सङ्कुचित हो गया है। प्रत्येक फिरक्का
अपने अत्यन्त सङ्कीर्ण नियमो की मजबूत पहारदिवारी के
भीतर इस तरह जकड़ कर कैद हो गया है कि उसका कोई
भी व्यक्ति उससे याहिर--किसी दूसरे फिरके के व्यक्ति के
साथ--किसी प्रकार कासामाजिक व्यवहारनहीं कर सकता।
इस तरह की सङ्कुचितता में सात्विक भावो के विचार भी
उत्पन्न नहीं हो सकते । प्रत्येक फिरके के नियम प्राय जन्म,
मृतु और विवाह आदि सम्बन्धी रीति रिवाज और रूदियों
का पालन करवाने तथा इन अवसरों पर अपने सभ्यों से
लाजिमी तौर पर बिरादरी और ब्राह्मणो के लिए मिष्ठान्न
भोजन आदि के आसुरी आडम्बर करवाने तक ही परिमित
होते हैं। इनके अतिरिक्त किसी प्रकार की धार्मिक, प्राधिक
अयवा नैतिक भताई या उन्नति पर कोई लक्ष्य नहीं रहता।
उन रिकों के नेता=प लोग अपने अपने पिरत को
अपनी मौरूसी जायदाद समझ फर उससे अपनी व्यक्तिगत
स्वार्थ सिद्धि करने के लिए सदा प्रयत्नशील रहते हैं और
अपने नेतापन की प्रविधा के अभिमान में लोगों को दबाते
तया कष्ट देते हैं। किसी के घर में मृत्यु होने पर लाजिमी
देवी सम्पद
तौर से उससे मिशाल भोजन करवा कर माल उड़ाते हैं।
जिस व्यक्ति से ऐसे भोज करवाए जाते हैं वह चाहे कैसा
हो दोन हो अथवा अनाथ विधवा हो या नामालिग बचा हो
और मृत्यु भी चाहे ऐसे जवान की क्यों न हो, जिससे उसका
घर एकदम वले बैठ जाए-फिर भी इन लोगों को उसके यहाँ
माल उडाने तथा जहाँ तक बन सके बेचारे दोन, दुखिया
शोकातुर भोजन कराने वाले को तग करने और दुर देने
में किसी प्रकार का वरस नहीं पाता। चाहे वे वेचारे दीन
और अनाथ अपना घर व पराभूपण वेच ढाले अथवा
असहाय विधवाओं के जीवन निर्वाह के लिए कुछ भी
साधन न रहने से चाहे वे अपना शरीर भी गिरवी क्यों
न रख दें अर्थात् पेट की ज्वाला धुझाने और छोटे बच्चों
को पालन करने के लिए उनको आततायियों की मजदूरी
करके अपने सवीत्व को भी विलाजलि देना पड़े, परन्तु
बिरादरी का वह प्रेत भोज करना लाजिमी है। यदि कोई
अत्यन्त गरीनी के कारण ऐसे भोज (जिनको "कारज"
कहते हैं ) करने में असमर्थ होता है तो फिर वह समाज में
मुंह दिखाने योग्य नहीं रहता और उसका "नाक कट
गया" माना जाता है तथा वह समाज के लोगों से सदा
कोसा जाता है। लब मृत्यु के भवसर पर भी इस तरह
का रासो व्यवहार होता है तब विवाहादि हर्ष के अवसरी
को सामाजिक रीति-रिवाजों और भोज आदि के आसुरीपन
१५२
देवी सम्पद
का अनुमान सहज हो किया जा सकता है। तात्पर्य यह
कि वर्तमान के सामाजिक सङ्गठन में रहने से मनुष्य
फो विवश होकर आसुरी व्यवहार करने पड़ते हैं। उसके
नियमो को पालन करते हुए मनुष्य सात्विक भाचरण
फर ही नहीं सकता। अतएव सात्विक भाचरण की इच्छा
रसने वाले पुरुषों को अपने समान गुणों तथा समान
विचार वाने व्यक्तियों के समाज का स्वतन्त्र सङ्गठन करना
चाहिए।
दैवी सम्पद १५३ चौथो श्रेणी (मनुष्य वर्ग) के मनुष्यों (स्त्री-पुरुपों) के सात्विक आचरण जिन लोगों का आत्म-विकास इतना विस्तृत हो गया है कि वे अपने देश की सेवा करना अपना फर्तव्य समझने है और देशोन्नति के लिए सदा प्रयत्नशीत रहते हैं, उनको जाति, वर्ण, धर्म या मत आदि के भेद भाव विना सारे देश धासियों के साथ अपनी एकता का ज्ञान रखते हुए सब से प्रेमयुक्त व्यवहार करना चाहिए। अपने व्यक्ति को सारे देशवासियों के व्यक्तित्व में जोड़ देना और अपने व्यकिगत खार्थों को देश के स्वार्थों के अन्तर्गत समझना चाहिए । निस्वार्थ भाव से देश के कष्ट दूर करना तथा उसकी प्राधि. भौतिक, आधिदैविक और श्राध्यात्मिक उन्नति करने एव शक्ति सम्पन्न बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिए। देश को हानि में अपनी, थपने कुटुम्य तथा समाज की हानि और देश के लाभ में सालाम सममना पाहिए। किसी व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि, मान, प्रतिष्ठा आदि के लिए देश सेवा नहीं करनी चाहिए। अपने देश की सेवा करने हुए दूसरे देशों के साथ भी भेम और मेल जोल रखना चाहिए और अपने देश- यासियों में दूसरे देशगासियों के साथ प्रेम के यर्ताव करने के भाव उत्पन्न करने चाहिए। अपने देश के धनयल, जन.
देवी सम्पद यन, प्राचीनता, विशा और फला-कौशल की उन्नति आदि, प्रतिक्षण परिवर्तनशीत आधिभौतिक शक्तियों के मोह और घमराष्ट्र में आसक्त होकर दूसरे देशवासियों को दयाना न चाहिए और 7 उनसे ईपी, द्वेप एवं घृणा के भार ही रखना चाहिए, क्यापि सभी देश एफ हो परमात्मा की माया शक्ति के अनेक नाम और रूप है, अत जिस देश के निवासी अपनी आधिभौतिकता के घमण्ड में दूसरे देशवासियों से घृणा करते हैं या उन्हें दगाते और कष्ट देते हैं वे स्वयं तिर स्कृत होते, पष्ट पाते पर दूसरों से दुयते तथा पराधीन रहते हैं। क्योंकि दूसरों से ईपी, द्वेष, घृणा और तिरस्कार करने की प्रतिक्रिया स्वय अपने उपर होती है जिससे अपने देश ही में आपस में द्वैत भार पढ़ कर एक दूसरे को दक्षाने, एक दूसरे की हानि फरने एव एक दूसरे के साथ घृणा, तिरस्कार पर ईर्षा, द्वेप करने के भाव उत्पन्न हो जाते हैं जिससे उस देश का अध पतन हो जाता है। परन्तु जिस देश के निवासी आपस म एकता का प्रेम रखते हुए, अपने देश को सुख समृद्धिशाली एवं उन्नत बनाने के लिए प्रयन्त्र- शील होने के साथ-साथ दूसरे देश वालों से मेल जोल, मैत्री एवं प्रेम रसते हैं वह देश सदा उन्नत, सुख समृद्धि सम्पन, शक्तिशाली एवं स्वाधीन रहता है। भारतपर्प जय तक दूसरे देशवासियों से मैग्री और प्रेम का व्यवहार करता रहा, तब तक वह सुख-समृद्धि सम्पन्न देवी सम्पद शचिशाली, एवं उन्नत रहा , परन्तु जब से यहाँ के लोग अपनी प्राचीनता, धार्मिकता एव पवित्रता आदि बड़प्पन के घमण्ड में दूसरे देश वालों को दबाने और उनसे ईपा, द्वेष तथा घृणा करने लगे एव दूसरे देशों में जाने से भी परहेज करने लगे, तप से ही प्रतिक्रिया स्वरूप यहाँ के निवासियो में फूट पड़ कर थापस में वही ईपा, द्वेष, घृणा और परहेज करने तथा एक दूसरे को दबाने के भाव उत्पन हो गए और गृह कलह के कारण दूसरे देश वालों ने इनको दवा लिया, अत दूसरों के अधीन होकर स्वय घृणा और तिरस्कार के पान हो गए । श्रम तक भी इस देश के अधिकतर लोगों में दूसरे देशों के प्रति ईपी, द्वेष, घृणा और परहेज के भाव यने हुए हैं और जब तक दूसरों के प्रति ये भाव यने रहेगे तम तक आपस में भी ये ही सर्वनाशी भाव बने रहेंगे । इसलिए दूसरे देशवासियों के साथ भी मैत्री और प्रेम के भाव रखने चाहिए।
देवी सम्पद
१५६
पाँचवी श्रेणी ( देव वर्ग) के मनुष्यों (स्त्री-पुरुषों)
के सात्विक भाचरण
इस श्रेणी के लोगों का पात्म विकाश अत्यन्त उन्नत
होता है और इनका कार्यक्षेत्र सारे जगत तक विस्तृत हो
जाता है अर्थाये लोग किसी प्रकार के जाति, वर्ण, धर्म
एवं देश के भेदभार मिना प्राणी मात्र की सेवा करना
अपना क्त्तव्य समझते हैं। लोकहित के लिए अपने देश,
समाज, कुटुम्ब और शरीर वफ को त्याग देने को तैयार
रहते हैं तथा दूसरों के कष्ट निवारण के लिए प्रसनवा-
पूर्वक स्वय कष्ट सहन कर लेते हैं। ये लोग मनुष्य देह
साक्षात् देवता हैं। जिस तरह परमात्मा की देवी शक्तियाँ
सारी चराचर सृष्टि का समान भाव से सञ्चालन करती
रहती हैं, उसी तरह इस वर्ग के लोग समान भाव से भूत.
प्राणियों की सेवा करते रहते हैं और अपने अपने फुटुम्ब,
जाति और देश के स्वायों को विश्व रूपी परमात्मा के
अर्पण कर देते हैं । परन्तु सर्वभूतात्मैक्य अात्म ज्ञान के
अभाव में जप वक इनमें यह द्वैत भाव मना रहता है कि
"जगत मुझमे भिन है , मैं उसकी सेवा करता हूँ" और इस
पृथकता के भाव से लोक-सेवा करते हुए यह अहङ्कार रहता
है कि मैं लोगो का उपकार करता हूँ, लोगों पर दया करके
उनके दुख मिटाता है, यदि मैं ऐसा न करूं तो लोग दुख
-
देवी सम्पद
.
-
१५७
पायेंगे" अथवा हीनता का यह भाव रहता है कि मैं एफ
तुच्छ व्यक्ति हूँ, फिसी के लिए कुछ कर नहीं सकता,
इत्यादि ' तब तक वे पूर्णावस्था को नहीं पहुँच सकते।
फितु जन तक द्वैत भारजन्य पृथक व्यक्तित्य का अहवार
बना रहता है वय वक कभी न कभी मोह के वश होकर पीछे
गिरने की भी बाशा रहती है।
इसलिए इतने बढ़े हुए यात्म रिफास एवं सारे विश्न की
सेवा करने वाले देव-वर्ग फे स्त्री पुरुषों को भी सब प्रकार के
बन्धनों से छुटकारा पाकर मुक्त होने के लिए सर्वभूतात्मैक्य
शान को अत्यन्त आवश्यकता रहती है, अर्थात् उनको इस
एकत्व भाव के अनुमवयुक्त जगत के व्यवहार करना चाहिए
कि "स्वय में धौर यह सारा विश्व एक ही परमात्मा के अनेक
रूप है, अत सरके साथ मेरी वास्तविक एकता है।"
मन्मना भव मलको मद्याजी मा नमस्कुरु ।
मामेवैयसि सत्य ते एतिभाने मियोऽसि मे।
--.भ.15६५
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेक शरण व्रग
अहत्या भयंपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच ।।
जी.भ.१९६६
अर्थ-मुझमें मन रख कर मेरा भक्त हो, मेरा यजन कर, मेरी
बन्दना कर, मैं तुझसे सत्य प्रतिश कर कहता हूँ कि इससे तु
दैवी सम्पद १५८ शरण में मुझमें ही चाफर मिलेगा, क्योंकि तु मेरा प्यारा मक्त है। भाषार्थ यह है कि जोसमष्टि प्रारमा परमा'मा फोसब में एक समान व्यापक समझ पर पानी सारा विश्व प्राप्मामय है, यह निश्चय करके- अपने प्यनिग्य को सय में जोड़ देता है, सबके साथ अनन्य भाव से प्रेम करता है। सबके हित के लिए यज्ञ करता है और सबकी मेगा करता है, पद-सदका प्यारा थयात् सयका मारमा-निश्चय ही परमारम स्वरूप हो जाता है, यानी यह मखिल विश्व का प्रेरक एक निम्य मुक्त है। सत्र धम्मों को छोई कर न एफ मेरी (सर्वाग्मा परमात्मा की) धा, मैं तुझे सयपापों से मुक्त कर हूँगा, चिन्ता मत कर। इसका भावार्थ पह है कि हैत भावजन्य सय धार्मिक (मनहबी) भोर साम्प्रदायिक एवं मत मतान्तर सम्म धीभेद भाव और विधि निषेध, पाप पुण्य, धर्म अधर्म, भच्छे बुरे, राति रिवाज अादि में शासक्ति के बधन एवं ऊँच नीच, छोटे-यड़े, मान अपमान, वण धाश्रम धादि पृथक् व्यक्मिय के महकार को छोड़ कर एक (अद्वैत) समष्टि मामा-परमात्मा में अपने पापको जोड़ देने से अर्थात् सारे विश्व के साथ अपनी एकता का अनुभव कर लेने से किसी भी कम का बचन शेप नहीं रहता औरन रिसीप्रकार की चिन्ता ही बाकी रहती है। जब तक पृथकता के ये भाव रहते हैं कि मैं अमुक धम, मजहब, मत या सम्प्रदाय का अनुयायी हूँ। मेरा अमुक घण, अमुक पाश्रम, धमुफ जाति व अमुक पद है, मैं अमीर हूँ, मैं हारीर हूँ, मैं फम करने पासा अलग हूँ, फर्म अलग है और जिससे तथा जिसके लिए फर्म * यश का सुखासा प्रयम प्रकरण में देखिए। -
१५९
देवी सम्पद
करता हूँ वे अलग है एव प्रमुक फर्म का मुझे धमुक फल मिलेगा
इत्यादि, तमी तक धमाधर्म, पाप पुण्य प्रादि का पन्धन होता है,
परन्तु अब सम में एक परमात्मा समान भाव से प्यापक जान कर
सपके साथ एकता का विश्व धम स्वीगार कर लिया जाता है अर्थात्
अपने पृयक व्यक्तित्व के भावों को सबसे एकता रूपी समष्टि भाव में
लप कर दिया जाता है तो फिर यन्धन करने के लिए कुछ भी शेष
नहीं रहता। अत सबके साथ एकता का अनुभव करने वाला यह
महान् भारमा संसार के सय व्यवहार धरता हुश्रा भी सदा सर्वदा
मुक्त रहता है यानी स्वप ईसर रूप हो जाता है।
इस तरह सर्वत्र साम्य भाव में स्थित एवं द्वैत बुद्धि से
रहित होकर वे जीवनमुक्त कर्मयोगी सप भूत प्राणियो को
अपने ही अङ्ग समझते हुए-अर्थात इस दृढ निश्चय से
कि "सेवक, सेवा और सेव्य अथवा उपफारी, उपकार और
उपकारच तीनो एक ही है यानी मैं आप ही अपनी सेवा
अथवा उपकार करता हूँ, मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं है"-
सबके हित (लोक-समह) के व्यवहार करते रहते हैं।
सर्वभूतस्थमात्मान सर्वभूतानि धात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन ॥
-गी०प्र०६२६
यो मा पश्यति सर्वत्र सर्वच मयि पश्यति ।
तस्याह न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
गी.म.६-३०
-
दपा स५५
अनेक रोगों को मिटाता है और दुरुपयोग
विष में परिणत होकर अनेक रोग उत्पन्न कर
तरह सदुपयोग से राजस तामस प्रतीत होने
भी सात्विक अर्थात लोक हितकर हो जाते।
योग से सात्विक व्यवहार भी राजस-तामस
और बन्धन के हेतु धन जाते हैं। ससार
पकरस रहने वाला कोई भी पदार्थ नहीं है।
निगुणात्मक माया के इस सेल में किसी र
स्वयं अपना अच्छापन या बुरापन नहीं है।
पन कर्ता की पुद्धि और उपयोग में है।
दूरेण यवर कर्म युद्वियोगाद्धनञ्जय ।
बुद्वौ शरणमन्विच्छ कृपणा फल हेतव
भय-हे धनन्जय' बुदियोग की अपेपा कम *
निकृष्ट हैं अर्थात् बुद्धि के उपयोग विना कोरे कर्म से
हो सकता-इसलिए तू बुद्धि की शरण में जा पर
काम ले। (घुदि से काम न लेकर ) केवल (स्यूल
पल की इच्छा से कर्म करने वाद्धे लोग कृपण अर्थात्
होते हैं।
अदएव सात्विक और राजस-तामस व्यं.
बुद्धि द्वारा सदुपयोग करना चाहिए। बुद्धि से का
.
१६९
देवी सम्पद
अर्थान् सूक्ष्म विचार के पिना-फेवल शानों के रोचक,
भयानक पचनों में ही अन्धश्रद्धा रस फर--अपनी व्यधि-
गत स्वार्थ सिद्धि के लिए व्यवहार करने से कई अवसरो
पर साधारणतया सात्विक प्रतीत होने वाले व्यवहारी से
अनर्थ हो जाता है और कई अवसरों पर साधारणतया
राजस-वामस प्रतीत होने वाले व्यवहार न करने से अनर्थ
हो जाता है।
परन्तु यह युद्धि सात्विक झानयुक्त अर्थात् आत्मनिष्ट
होनी चाहिए।
सर्वभूतेषु येनेक भावमध्यपमीपते ।
अधिमक्त विमक्तेषु तज्ज्ञान विद्धि सात्त्विकम् ॥
-गी.अ० १५-२०
अर्थ-जिससे विमत अर्यात मिन मिल सव भूत माणियों में
एक ही भविमत अर्थात् विना पटा हुमा और अव्यय भर्थात् सदा
एकरस रहने वाला माय दीखता है अर्थात सर्वत्र एक भा'मतत्व ही
दीखता है यह सालिक ज्ञान है।
व्यवसायाहिमका बुद्धिरकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा घनताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ।।
--गी..२-१
अर्थ-व्यवसायास्मिक अर्थात् निश्चयास्मिक पुदि एक ही
। जिनका एक निश्चय नहीं उनकी बुद्धि में अनन्त वासनाएँ
1
टैची सम्पद
1
i
v
अनेक रोगों को मिटाना है और दुरपयोग से म
विप में परिणत होकर अनेक रोग उत्पन्न कर देता है.
तरह सदुपयोग से राजस तामस प्रतीत होने वाले व्य
भी सात्विक अर्थात लोक-हितकर हो जाते हैं और
योग से सात्विक व्यवहार भी राजस-तामस होकर
और पन्धन के हेतु धन जाते हैं। ससार में सदा
एकरस रहने वाला कोई भी पदार्थ नहीं है। परमार,
निगुणात्मक माया के इस सेल में किसी भी व्यवा
स्वयं अपना भच्यापन या पुरापन नहीं है , पच्छा.
पन फो की बुद्धि और उपयोग में है।
दूरेण सवर कर्म धुद्वियोगाटुनञ्जय ।
धुद्वौ शरणमन्विच्छ कृपणा फल हेतव ॥
H
मध-हे धनन्जय ' दियोग की अपेसा कर्म (
निकृष्ट हैं अर्थात् उदि के उपयोग मिना कोरे फर्म से कुछ
हो सकता-इसलिए तू बुद्धि की शरण में ना अर्थात्
काम थे। (अदि से काम न लेकर ) केयन (स्थूल शरीर के
फल की इच्छा से कर्म करने वाले लोग कृपया अर्थात्
होते हैं।
अतएव सात्विक और राजसत्तामस
धुद्धि द्वारा सदुपयोग करना चाहिए। बुद्धि से काम न
दैवी सम्पद अर्थ-पान्तु जो प्रकृति (माया) से भी परे भव्यक्त (सूपम) से भी अव्यक्त (सूक्ष्म ) और सनातन (सदा इकसार रहने वाला) भाव अपवा धरव है उसका सय भूत प्राणियों के नारा (प) होने पर भी नाश नहीं होता और यही अन्तिम गति है। श्रत स्यूलता का उस्लान करके बुद्धि को सूक्ष्म तात्विक विचारों में बढाते-बढाते हो अन्त में वह भारमनिष्ठ होती है और उस आत्मनिष्ठ बुद्धि से यथार्थ निर्णय होकर, सयके साय एकता के अनुभवयुक्त व्यवहार ही पूर्ण रूप से सात्विक हो सकते हैं । स्यूल आधिभौतिकता में ही लौन रहने से ऐसा होना कदापि सम्भव नहीं। परन्तु बहुत हो थोड़े लोग सूक्ष्म विचार करने का प्रयत्न करते हैं और उनमें भी कोई विरला ही दीर्घ काल के अभ्यास के बाद असली तत्व (सर्वभूता- स्मैक्य भाव) की पूर्णावस्था तक पहुँचने में सफलता प्राप्त करता है। मनुष्याणा सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मा वेत्ति तत्वत ॥ --गी. २०७३ मर्ध-कारों मनुष्यों में से कोई विरला ही सिद्धि पाने भर्मात् भारमज्ञान प्राप्त करने का पन करता है और उन यन्त्र करने वालों में से कोई पिरसादी मुम (समष्टि मारमा परमामा) को यथार्थ जान सकता है।
देवी सम्पद । १७२ आधिभौतिक दृष्टि से कदापि नहीं । स्थूल-मोटे विचारों से सूक्ष्म-महीन विचार अधिक सच्चे और मान्य होते हैं। स्थूल बुद्धि के व्यक्ति धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक एव राज- नैतिक आदि सभी विषयों में, सूक्ष्म बुद्धि के व्यक्तियों की आज्ञा में रह कर उनके अनुयायी होते हैं, यह प्रत्यक्ष ही है। जितना ही अधिक सूक्ष्मता से विचार किया जाता है उतना ही अधिक सत्य के नजदीक पहुँचा जाता है । स्थूल पदार्थों से सूक्ष्म पदार्थ अधिक मूल्यवान् भौर प्राहा होते हैं। प्रत्येक स्थूल पदार्थ का सूक्ष्म सार हो उसफा सत्व अथवा तक होता है और तत्त्वों का सूक्ष्म विचार ही तत्त्वज्ञान कहलाता है। जितना ही अधिक सूक्ष्मता में बढा जाता है उतना ही अधिक अनैक्य की एकता होती जाती है और बदते चढवे जब अन्त में सब अनैश्य मिट कर केवरा एफ तत्व ही रह जाता है वही आत्मा-परमात्मा है । अतएव जहाँ तक बुद्धि काम करे सूक्ष्मता में पढ़ते जाना चाहिए, जब तक कि पराकाष्ठा (हद दर्जे) को सूक्ष्मता अर्थात् सूक्ष्म से भी सूक्ष्म आत्मा- परमात्मा की एकता के अनुभव यक न पहुँचा जाय | आत्मा- परमात्मा सूक्ष्म का भी सूक्ष्म और सत्य का भी सत्य है। परस्तमातु भावोन्योऽव्यक्तो व्यक्तास्सनातन । यस सर्वेषु भूतेयु नश्यत्स न विनश्यति ।।
देवी सम्पद
अर्थ-पान जो प्रावि (माण) से भी परे पप्पा (सूपम)
से भी अन्य (सूक्ष्म) और सनातन (सवाइफसार रहने याला)
भाव भयगतरव है उसरा सब भूत प्राणियों ये नारा (आय) होने
पर भी नाश नहीं होता और यही अन्तिम गवि है।
अव स्थूलता का उल्नान करके बुद्धि को सूक्ष्म तात्विक
विचारों में पढाते-बढाते हो थन्त में यह भारमनिष्ट होती है
और उस आत्मनिष्ठ बुद्धि से यथार्थ निर्णय होकर, सथफे
साथ एकता के अनुभवयुक्त व्यवहार ही पूर्ण रूप से साविक
हो सकते हैं । स्थूल आधिभौतिकता में ही लीन रहने से ऐसा
होना कदापि सम्भव नहीं। परन्तु बहुत ही थोडे लोग सूक्ष्म
विचार करने का प्रयत्न करते हैं और उनमें भी कोई विरता
ही दीर्घ काल के अभ्यास के बाद असली तत्व (सर्वमूता-
स्मैक्य भाष) की पूर्णावस्या तक पहुँचने में सफलता प्राप्त
करता है।
मनुष्याणा सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कथिन्मा येत्ति तरवत ॥
-गीय०७३
अर्थ-दारों मनुष्यों में से कोई विरला ही सिद्धि पाने अर्थात्
भारमशान प्राप्त करने का पत करता है और उन यन करने वालों
में से कोई विरला ही मुझ (समष्टि मारमा-परमात्मा)को यथार्थ
जान सकता है।
दैवी सम्पद
१७४
,
बहूना जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मा प्रपद्यते ।
वासुदेव सर्वमिति स महात्मा मुदुर्लभ ॥
गी०५०७६
अर्थ-बहुव जमों के अभ्यास के बाद, सूक्ष्म विचारों घाला
ज्ञानवान व्यक्ति, यह जान लेने से-कि जो कुछ है सर्च वासुदेव
परमात्मा ही है-मुझे माप्त हो जाता है अर्थात मेरे साथ एकता
का अमर कर लेता है। ऐसा महात्मा बहुत दुर्लभ है।
ऐसे महान् व्यकि ही कमों के विषय में यथार्थ निर्णय
करके ससार का व्यवहार यथायोग्य चलाने में समर्थ होते
हैं और उन्हीं महान व्यक्तियों के नेतृत्व में जन-साधारण
उनके अनुयायी होकर अपने अपने कर्तव्य कर्म यथायोग्य
पालन कर सकते हैं, क्योंकि अधिकतर जन-समाज की
तमोगुण प्रधान प्रकृति होने के कारण उनकी स्थूल का ही
में आसक्ति रहती है, सूक्ष्म विचारों में प्रवेश करने की
क्या सूक्ष्म तत्वों के समझने की उनमे योग्यता बहुत ही कम
रहती है। इसलिए तत्त्वदर्शी महात्मा उन लोगों को, यथायोग्य
स्थूल रीति से ही उनके कर्तव्य समझाने और उनसे श्रेष्ठ
आचरण करवाने क्या युरे व्यवहार छुड़वाने के लिए,
साधारणतया सात्विक तया राजस-दामय व्यवहारों के
स्थायी भेद करके उनके आधार पर देश, काल और पात्र की
परिस्थिति के अनुसार समय-समय पर विधि निषेध की
देवी सम्पद
१७५
मर्यादाएँ घाँध दिया करते हैं। वे विधि निषेध की मर्यादाएँ
ही साधारण लोगों का धर्म हो जाता है और साधारणतया
उनके अनुसार पाचरण करके वे लोग अपनी उन्नति करते
। यदि तत्त्वदर्शी महात्मा लोग स्थूल बुद्धि के लोगों के
लिए समय-समय पर यथोचित मर्यादाएँ न बाँध कर
केवल तत्वज्ञान का उपदेश देकर ही व्यवहार करने में
सर्वथा स्वतन्त्र कर दें तो तात्त्विक मर्म को समझने की
योग्यता न होने के कारण वे वामसी बुद्धि के लोग अर्थ
फा अनर्थ करके विपरीत पाचरणी द्वारा ससार का
व्यवहार सर्वथा निगाइदें।
अधर्म धर्ममिति या मन्यते तमसा वृता ।
सर्वार्थाविपरीताश्च बुद्धि सा पार्थ तामसी ॥
गी.. १३२
अथ-तमोगुण से प्यास जो (बुद्धि) अधर्म को धर्म और धर्म
को अधर्म मानती है और सय पदार्यों को विपरीत समझती है यह
तामसी पुदि है।
प्रकृतेर्गुण समूढा सज्जन्ते गुयाकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्त्रनविन विद्यालयेत् ।।
--गी.०३२६
अर्थ है भर्जुन ! प्रकृति के गुणों के घश में हुए मूद (भशानी)
और कर्मों में ही मापत रहते हैं, उन स्यूल एदि के
दैवी सम्पद १७६ अज्ञानीजनों को तत्वदर्शी महात्मा ( मर्यादा के अनुसार फर्म करने से) विचलित न करे। परन्तु जैसे कि पहिले कहा जा चुका है, वास्तव में च्यवहारों का साविक और राजस-तामस भेद सदा सर्वदा इफसार नहीं रहता , फलन उनके आधार पर बँधी हुई विधि निषेध की मर्यादाएँ भी सदा सदा स्थायी रूप से हितकारक एव सुखप्रद नहीं रह सकती। इसलिए तत्त्व दर्शी महात्मा लोग, साधारण लोगो को सात्विक तथा राजस तामस प्रतीत होने वाले व्यवहारों तथा उनके आधार पर बँधी हुई विधि निषेध की मर्यादाओं पर ही सता सर्वदा कट्टरता से पाबन्दी नहीं रपते, किन्तु अपनी आत्म- निष्ट सात्विक चुद्धि द्वारा अर्थात् अध्यात्म विचारो से, देश काल और पान की परिस्थिति के अनुसार, आवश्यकता होने पर उनमें परिवर्तन करके, अथवा नगीन मर्यादाएँ चाँध फर ससार के व्यवहार किया करते हैं। ऐसा करने से लौकिक दृष्टि से चाहे वे व्यवहार अच्छे प्रतीत हो या चुरे, अथया प्रचलित मर्यादाएँ रहें या टें, इसकी वे कुछ भी परवाह नहीं करते। ऐसे अवसरों पर उन महान पुरुपी के आचरण ही धर्म या मर्यादा धन जाते हैं और साधा रण जनता इन पड़े लोगों के पीछे चला करती है। वात्पर्य यह कि आत्मज्ञानी (जीवनमुक्त) महान पुरुष ही अपने सर्वभूतात्मन्य ज्ञान से पूर्णतया सात्विक व्यवहार कर देवी सम्पद १७७ सकते हैं तथा साधारण लोगों को यथायोग्य सात्विक आच- रण करने में प्रवृत्त कर सकते है, और साधारण लोग मपनी- अपनी योग्यवानुसार-उन आत्मज्ञानी महात्माओं द्वारा निर्णीत-सात्विक व्यवहारों के आधार पर घंधी हुई विधि- निपघ की मर्यादाओं का श्रद्धापूर्वक पालन फरके तया उन महान पुरुषों का अनुकरण करके दीर्घ काल के अभ्यास के याद सर्वभूतात्मैक्य ज्ञान अर्थान् सब प्रकार के पन्धनों से मुक्ति पा सकते हैं। साराश यह कि एफ तरफ वोधात्मशान से सात्विक आचरण होते हैं और दूसरी वरफ सात्विक आचरणो से आत्मज्ञान प्राप्त होता है अर्थात् आत्मज्ञान एवं सात्विक आचरण भी परस्पर में एक दूसरे के कार्य कारण अथवा उपकारी उपकार्य अर्थात् अनन्योभित हैं। इसलिए जनवा का नेतृत्व करने वाले घड़े लोगों का कर्त्तय है कि सूक्ष्म विचारों को पढावे पढाते आत्मज्ञान प्राप्त करके यात्मनिष्ट साम्य बुद्धि द्वारा ससार फे व्यवहार करते हुए साधारण लोगो को आदर्श दिखावें। यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेयेतरो जन । स यत्ममाण कुरुते लोकस्तदनुवर्तते । -गी.०३२१ अर्थ-श्रेष्ठ अयात् महान् व्यक्ति जो कुछ करता है वही अन्य साधारण रोग भी फनते हैं। वह जिसे प्रमाण मान कर स्वीकार कलता है लोग उसी का अनुकरण करते हैं। १२
देवी सम्पद
१७८
अव जिस समाज, राष्ट्रव देश के नेता लोग अपनी
इस जिम्मेदारी को अच्छी तरह पूरी करते हैं वह समाज, राष्ट्र
व देश उन्नति करता है और जिस समाज, राष्ट्र व देश के
नेता लोग अपनी इस सबवे अधिक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी
को भूल कर--स्थूलता में ही लीन रहते हैं अर्थात् फेवल
स्थूल
शरीरों के व्यक्तिगत स्वार्थ को ही सम कुछ मानते हैं,
उस समाज, राष्ट्र व देश का पतन अवश्य होता है। जिस
समाज, राष्ट्र व देश के नेता लोग जितने ही अधिक सूक्ष्म
विघार वाले होते हैं, रवना ही अधिक वह समाज, राष्ट्र य
देश उन्नति करता है और जिस समाज, राष्ट्र व देश के नेवा
लोग जितने ही स्थूल विचार वाले होते हैं, उतना ही अधिक
उस समाज, राष्ट्र व देश का पतन होता है।
अब पृथक-पृथक भावों का किस अवस्था में, किस तरह
प्रयोग करने से व्यवहार माविक अथवा राजस-तामस
होते हैं-इसका कुछ खुलासा (स्पष्टीकरण ) सक्षेप में
करने का यथाशक्य प्रयन्न किया जाता है। यह स्पष्टीकरण
"सन भूत प्राणियो की एकता सची है"~-इस निश्चययुक्त,
व्यवसायात्मिका बुद्धि से किए जाने वाले भिन्न भिन्न प्रकार
के व्यवहार सच्चे, यानी सात्विक और अनन्त प्रकार की
मूठी पृथकता को सच्ची मानने वाली भेद-बुद्धि से किए जाने
घाले व्यवहार मिथ्या, यानी राजस-तामस मानने के मूल
सिद्धान्त पर किया गया है।
देवी सम्पद साधारणतया सात्विक प्रतीत होने वाले व्यवहारों का खुलासा (स्पष्टीकरण) प्रेम समस्त भूत प्राणी एक सत् चिन्-यानन्द स्वरूप आत्मा के ही अनेक नाम और रूप हैं, वस्तुत. एफ आत्मा के अतिरिक और कुछ भी नहीं है-इस सर्वभूतात्मैक्य भाव से सबके साथ स्वाभाविक प्रेम करना, दूसरों के सुस दुए अपने समान समझना; अपनी तरफ से किसी से भी ट्रेप का भाव नहीं रसना, सभी सुपी हो, सभी सन्मार्ग पर चलें, सभी उन्नवि करें, सबके प्रति इस तरह की सद्भावना रसना- यह सहा अर्थात् सात्विक प्रेम है। परन्तु विशेष व्यक्तियों एव उनके भौतिक शरीरों के प्रेम में आसक्त होकर, उनके साथ यथायोग्य व्यवहार न करना अथवा अपने कर्तव्यों मे धुटि करना अथवा उनसे यथायोग्य काम न लेना अर्थात्-~ इस विचार से कि उनका उपयोग करने से उनका शारी. रिक परिश्रम या कष्ट होगा-उनसे अपने-अपने कर्तव्य- पालन करवाने की उपेक्षा करना अथवा किसी के परोक्ष के अधिक सुख प्राप्ति के निमित्त, प्रत्यक्ष में होने वाले थोड़े से
देवी सम्पद
शारीरिक टुस को भी, भौतिक प्रेम के वश होकर, सहन न
करना-यह मिथ्या प्रेम है। भौतिक शरीरो तथा विशेष
व्यक्तियो में प्रेम की भासक्ति, मोह में परिणत होकर
कईयों के प्रति राग और कईयों से द्वेप उत्पन्न कर देती है
जिससे बड़ी दुर्गति होती है। अर्जुन को भी भौतिक शरीरों
तथा विशेष व्यक्तियों में प्रेम की आसक्ति होकर मोह उत्पन्न
हो गया था, जिससे उसकी बड़ी उरी दशा हो गई थी और
जिसको मिटाने के लिए ही भगवान ने उसे श्रीमद्भगवद्-
गीता का उपदेश दिया।
आत्मा की त्रिगुणात्मक प्रकृति के, जगत् रूपी, इस
रोल में नाना प्रकार के भूतप्राणी होते हैं और उनका
परसर में नाना प्रकार का सम्बन्ध होता है ,
उनमें आपस में प्रेम का पाप भी अपनी अपनी योग्यता
और परस्पर के सम्बन्ध के अनुसार मिन्न भिन्न प्रकार
से होता है, अर्थान् पड़ों के साथ छोटों का प्रेम का बर्ताव
भक्ति के रूप में, छोटों के साथ बड़ों का प्रेम का पार
वात्सल्य के रूप में, वरावरी वालों से स्नेह के रूप में,
अपने से हीन स्थिति वालों से अनुमह के रूप में,
दुखियों के साथ दया, सुखियो से मित्रता, सज्जनों से
मुदिता और दुराचारियों से उपेक्षा के रूप में प्रेम का
पाव होता है। इन सबका पृथक् पृथक् स्पष्टीकरण निम्न
प्रकार है।
अत'
१८१ दैवी सम्पद ईश्वर-भक्ति सारे विश्व का समष्टि भाव अर्थात् सब भूत प्राणियों का एकत्व ही ईश्वर है यानी एक ईश्वर समस्त चराचर भूत प्राणियों मे एक समान व्यापक है-उससे पृथक् कुछ भी नहीं है-इस निश्चय से, जगत को ही जगदीश्वर समझ कर, सब घराचर भूत प्राणियो के साथ यथायोग्य प्रेम का पर्ताव करना , अपने न्यक्तित्व, को जगत रूपी जगदीश्वर के साथ जोड़ कर तथा अपने व्यक्तिगत स्वार्थो को जगन् रूपी जगदीश्वर के अर्पण करके संसार के व्यवहार करना , कोई भी कार्य करने मे सपके आत्मा ईश्वर की सर्वव्या- पकता को नहीं भूलना , किसी के साथ भी विपरीत बर्ताव न करना, अपनी तरफ से किसी के साथ ईपी, द्वेष, घृणा या तिरस्कार का वर्ताव न करना और किसी को किसी प्रकार की हानि न करना , अपनी शक्ति और योग्यतानुसार लोक सेवा करना-यह सच्ची ईश्वर-भक्ति है, अर्थात् विश्व- प्रेम ही सच्ची ईश्वर भक्ति है । श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय मे भगवान ने अपने विराट रूप में अर्जुन को सब चराचर सृष्टि दिसा कर कहा कि “भेद बुद्धि से वेदाध्ययन, तप, दान और हवन-यज्ञ आदि करने से-जगत् के एकत्व भाव-मेरे इस विश्वरूप को कोई नहीं देख सकता, किन्तु अनन्य भक्ति अर्थात् सबके साथ एकत्व भाव के प्रेम से ही T देवी सम्पद १८२ मैं (अपने इस रूप में) देखा एवं जाना जा सकता हूँ और इसीसे मेरे साथ एकता हो सकती है। अत' जो सबक लिए कर्म करते हैं , सब से एकता रखते हैं , अपने व्य- क्तित्व के अहवार और व्यक्तिगत स्वार्थों को सबके साथ जोड देते हैं और किसी भी भूतप्राणी से पैर नहीं करते, वे सम से प्रेम करने वाले मेरे भक्त मुझे प्राप्त होते है।" इस पर अर्जुन ने शक्षा की कि "इस विश्व-प्रेम रूपी थापकी सगुण उपासना करने वाले तथा जगत का तिरस्कार करके निर्गुण ब्रह्म को उपासना करने वाले भक्तो में से श्रेष्ठ योगी कौन है ?" इसके उत्तर में भगवान ने कहा मय्यावश्य मनो ये मा नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मता ॥ -गी.भ.१२२ मर्य-जो पराश्रद्धा भयात् सय में एफरव भाव की साक्षिक श्रद्धा से (जगत को जगदीश्वर जान पर) मेरे इस सगुण स्वरूप पानी विश्व की एकता में, अपने मन को निरवर भोप कर, मेरी उपासना करते हैं, उन भक्तों को मैं श्रेष्ठ योगी मारता हूँ। साराश यह कि विश्व के साथ एकता का प्रेमयुक्त व्यवहार ही सच्ची ईश्वर भक्ति है। और मन को इस प्रकार की एकता में जोड़ने अर्थात् एकाग्र करने के अभ्यास के देवी सम्पद १८३ लिए-किसी स्थान विशेष में स्थित होकर अथवा किसी मूर्ति, चिन अथवा दूसरे क्सिी चिन्ह या नाम विशेष में ईश्वर-पुद्धि करके निस्वार्थ भाव से पूजन, अर्चन, स्मरण, कीर्तन, मन्त्र, स्तुनि यादि से निराकार अथवा साकार ईश्वर के गुणों का चिन्तन करते रहना तथा सभी स्थानो, मूर्तियो, चिनी, चिन्हों और नामों में एक ही ईश्वर की सर्वव्यापकता का लक्ष्य रपना यह भी साधनावस्था की अर्थात् प्रारम्भिक ईश्वर-भक्ति है। यह प्रथमावस्था की ईश्वर भक्ति उपरोक्त सभी ईश्वर-मति का साधन मात्र है। जिस तरह विद्यार्थी विद्या प्राप्त करने के लिए, प्रथम वर्ण शिक्षा से प्रारम्भ करके उसके साधन से-भागे उच्च शिक्षा प्राप्त करता है, परन्तु जब वह उपर की कक्षा में पहुँच जाता है तो वर्ण शिता का अभ्यास पीछे छोड़ देता है, अथवा जिस तरह छोटी आयु की कन्याएँ, गुड़ियों के सेल द्वारा गृहस्थ की शिक्षा प्राप्त करती है, परन्तु जब वे घडी होकर गृहस्थिन बनती है न गुट्टियों का सेल छोड़ देती है, उसी तरह, यद्यपि विश्व प्रेम रूपी ईश्वर भक्ति में मन को जोड़ने की शिता के लिए प्रतीक उपासना-किसी स्थान विशेष में अथवा किसी मूर्ति, चिन्न वथा अन्य चिन्ह अथवा किसी नाम विशेष पर लक्ष्य कर-करना आवश्यक है, परन्तु इस प्रतीक उपासना का उद्देश्य केवल प्रारम्भिक अवस्था में मन को एकाग्र करने के अभ्यास तक ही परिमित रहना दैवी सम्पद १८४ चाहिए, न कि जन्म मर इसी में लगे रहने के लिए । यदि इसी को सच्ची अर्थात् पराकाष्ठा की ईश्वर भक्ति मान कर सारी आयु इसी में पिता दी जाय तो वह मिध्या ईश्वर भक्ति है। पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञान नाना भावान्पृधग्विधान् । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञान विद्धि रानसम् ॥ जी. १८२ यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्य सक्तमहतुकम् । अतत्त्वार्थदल्प ध तत्तामसमुदाहृतम् ॥ -गी.अ.14२२ अर्थ-जिस पृथकता के ज्ञान से सम्पूर्ण भूत प्राणियों में भिन्न- भिन्न प्रकार के नानात्व फो (बोग) सत्य मानते हैं-उस ज्ञान को तुराजसजाना और जिस ज्ञान से किसी एक ही कार्य को सब कुछ मान कर (लोग) उसमें आसक्त रहते हैं तया जो युक्ति अथवा साविक विचार से सवथा रहित है-वह सुग्छ ज्ञान तामस कहा गया है। तात्पर्य यह कि ईश्वर को किसी स्थान, मूर्ति, चित्र, चिन्ह अथवा किसी नाम व गुण विशेष ही में सीमाषद्ध मान कर तथा इन्हीं की उपासना को ईश्वर भक्ति को परमा- वधि समझ कर, जन्म भर एसी में लगे रहना और इनको अतिरिक्त दूसरे भूत प्राणियों में ईश्वर की सर्वव्यापकता
दैवी सम्पद
की उपेक्षा करके अथवा उनको ईश्वर से भिन्न मान कर, उनसे
ईर्पा, द्वेप, घृणा, तिरस्कार आदि के व्यवहार करते रहना ,
इस तरह की उपासना में निरन्तर लगे रह कर अपने कर्तव्यो
की अवहेलना करना, लोगों के साथ विपरीत व्यवहार करना,
किसी को कष्ट देना, किसी की हानि करना, अपने व्यक्तिगत
भोग विलास की कामना से अथवा लोगों में कीर्ति, प्रतिष्ठा
आदि प्राप्त करने के लिए दम्भ से पूजा-पाठ श्रादि में लगे
দু স্মৰ ইশ্বকে খান স্কা স্মষ্কাৰ কৰো, গয়না নানা
ईश्वर मान कर उनमें भेद भाव की कल्पना करके झगड़े
सडे करते रहना अथवा किसी स्थान विशेष या काल विशेष
में रहने वाले किसी विशेष शक्ति सम्पन्न एव विशेष गुणों
वाले व्यक्तित्व में ईश्वर की कल्पना करके, अपने चुरे कर्मे
के दुष्परिणामों एव विपत्तियों से बचने तथा किसी प्रकार की
अर्थ सिद्धि के लिए, उसकी खुशामद (प्रार्थना स्तुति आदि)
करना और अपनी शरीर याना का सन मोम उसके सिर
लाद कर आप निरुद्यमी, थालसी एव प्रमादी यन जाना
यह ईश्वर भक्ति नहीं किन्तु ईश्वर का विरस्कार है अर्थात्
नास्तिकता है।
राज्य-भक्ति
नराणा च नराधिपम् ।
-गी०५०१२
दैवी सम्पद करते हैं, वे किसी के भी शासन में रह कर, किसी भी नियम और कानून की पारन्दी रसना नहीं चाहते और कोई किसी के अधीन न रह फरसन कोई पूर्ण रूप से स्वतन्त्र होना अपना जन्म सिद्ध अधिकार सममते हैं। वास्तव में सूक्ष्म दृष्टि से विचार कर देखा जाय तो दोनों ही पक्ष अपने-अपने व्यक्तित्व के अहङ्कार और व्यक्तिगत स्वार्थी ही को प्रधानता देते हैं। यद्यपिजगत के व्यवहार अच्छी तरह नियम-बद्ध, सुव्यवस्थित रूप से चलाने के लिए राज्य सत्ता का होना अत्यावश्यक है, परन्तु यही राज्य सत्ता सबके लिए हितकर हो सकती है जिसकी प्रजा के साथ एकता हो अर्थात् जिसने अपने व्यक्तित्व को प्रजा के व्यक्तित्व में मिला दिया हो और अपने स्वाथों को प्रजा के स्वार्थों के अन्तर्गत कर दिया हो। जिसमें देवी सम्पद के गुण-धुद्धि, बल और प्रेम की अर्थात् एक्तापूर्ण युक्ति और शक्ति की (केवल कल्पना Theortical ही नीं, किन्तु व्यावहारिक Practical) अधिकता होती है वही शासन कर सकता है, चाहे ये गुण किसी व्यक्ति विशेष में हों या किसी जाति विशेष में अथवा क्सिी देश विशेष के निवासियों में, जिनमे ये सात्विक गुण अधिक होते हैं वे इन गुणों की कमी वाले लोगों पर शासन करते हैं और जिनमें इन गुणों की कमी होती है वे इन गुणों की अधिकत्ता वाले लोगों से शासित होते हैं।
देवी सम्पद - पत्र योगेश्वर कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीविजयो भूतिख़ुवा नीतिमतिर्मम ॥ -गी. 100% अर्थ-जहाँ सबकी एक्ता का केद्र योगेश्वर श्रीकृष्ण है अर्थात् जहाँ सफा ऐक्य है और जहाँ धनुषारी अर्जुन है अर्थात् यहाँ युक्ति सहित शक्ति है, वहीं निश्श्यपूर्वक भी पानी राज्य लक्ष्मी, विजय , ऐश्वर्य और नीति है.यह मेरा निश्चित मत है। जो लोग इन गुणों के बिना शासक बने रहना चाहे- कदापि सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। जब किसी शासक में ऐक्य के प्रेम भाव युक्त युक्ति और शक्ति की कमी आ जाती है तब वह अपनी सत्ता कायम रसने के लिए चाहे कितना ही प्रयत्न करे, उसकी सत्ता कदापि कायम नहीं रह सकती। इसी तरह जन तक शासित लोगों में इन गुणों की कमी रहती है तब तक उनको इन गुणों की अधिकता चालों के अधीन रहना ही पड़ता है चाहे वे शासक के साथ प्रेम (भक्ति) पूर्वक रहें या उससे द्वेष रखते हुए। प्रेम- पूर्वक रहने से आपस की एकता के भार उत्पन्न होकर बुद्धि और बल जल्दी सङ्गठित हो सकते हैं जिससे परा- धीनता से छुटकारा मिल सकता है। परन्तु द्वेप करने से अनैश्य (फूट) पढती है जिससे बुद्धि और पल का हास होता है, फलत पराधीनता बनी रहती है।
देवी सम्पद
,
मातृ-पितृ भक्ति
समाज को सुव्यवस्थित रखने के लिए मात पिट भकि
आवश्यक है , क्योंकि जिस तरह माता पिता अपनी सन्तानी
का, गर्भ से लेकर बड़े होने तक पालन-पोषण, रक्षण शिक्षण
आदि-एकवा के प्रेम क्या निस्वार्थ भाव से करते हैं तमी
सन्तान ससार के व्यवहार करने योग्य बनते हैं, उसी तरह,
वृद्धावस्था में शरीर शिथिल हो जाने पर माता पिता की
सेवा-शुश्रपा, पालन-पोपण श्रादि एकता के प्रेम तथा
निस्वार्थ भाव से,सन्तान फरेभी वे लोग शान्तिपूर्वक अपना
जीवन यापन कर सकते हैं और परस्पर में इस वरह व्यवहार
करने से व्यक्तिगत स्वार्थो के त्याग और दूमरों के साथ
एकता के प्रेम का अभ्यास होता है। प्रत माता पिता की
सेवा शुश्रूषा एघ आदर-मत्कार निस्वार्थ भाव से, अपना
कर्तव्य समझ कर करना, अपने सात्विक व्यवहारों से
उनको सुख देना , अपने राजसी-तामसी व्यवहारों तथा
विषय भोगो के लिए उनको कदापि कष्ट न देना वथा उनका
कभी अपमान न करना, उनकी उचित माज्ञाओं का पालन
करना, उनको सद्गति प्राप्त होने वाले व्यवहारों में सहायक
होना तथा उनकी वृद्धावस्था मे आदर सहित पालन-पोपण
करना-यह सची मातृ पितृ भक्ति है। परन्तु सालिकता के
विरुद्ध पड़ने वाली माता पिता को राजसी-वामसी भावों की
.
१९१
देवी सम्पद
धाज्ञामो को अन्ध-श्रद्धासे, फेवल इसलिए मानना कि माता
पिता की भाज्ञाएँ मानना हर हालत में उचित ही है, उनको
सचित सम्मति न देना , उनकी रजोगुणी-तमोगुणी वृत्तियों
को प्रसन्न करने के लिए आत्मिक पतन करने वाले व्यवहार
करना, उनके आधिभौतिक शरीर के मोह में फंसे रह फर
उनके सच्चे प्रास्मिक सुस पर दुर्लक्ष्य रखना अथवा उनकी
जीवित काल में अवज्ञा करते रह कर मरने के बाद उनके
लिए रोना चिल्लाना, शोक करना वथा निया-कर्म-श्राद्ध
आदि लोक दिसावे के बड़े-बड़े राजसो तामसी पाडम्बर
करके स्वय क्लेश उठा कर मृतक को भी क्लेश पहुँचाना--
यह माह पितृ-भक्ति नहीं-मातृ पितृ-द्रोह है।
माता-पिता का विशेष सम्बन्ध केवल स्थूल शरीर से
ही है, अत' मातृ-पितृ-भक्ति में इतनी भासति नहीं होनी
चाहिए कि जिससे यात्मिक उन्नति के मार्ग में बाधा पहुंचे।
मक प्रहाद का दृष्टान्त इस विषय में प्रसिद्ध है।
गुरु-भक्ति (आचार्योपासना)
विद्या पढा कर सूक्ष्म विचारों में प्रवृत करने वाले तथा
सत्य ज्ञान के देने वाले, श्रेष्ठ आचरण युक्त, सद्गुरु
की सेवा-शुभूपा, आदर-सत्कार, भरण-पोपण करना तथा
उसकी दी हुई विद्या वथा ज्ञान का पदुपयोग करना यह
सधी गुरु-भक्ति है। परन्तु ऐसे सद्गुरु की सेवा-शुश्रपा,
A
दैची सम्पद १९२ भरण-पोपण आदिन करके तथा उसके उपदेशानुसार पाच- रण न करके फेवल उसके भौतिक शरीर को ही ईश्वर तुल्य मान कर उसका पूजन, अर्चन और स्पर्शादि फरने मात्र ही से अपने को कारस्य मानना तथा मूर्ष, पासण्डी, अशानी, दुराचारी एव धूर्त-वश परम्परागत तथा साम्प्रदायिफ- गुरुओं से फेवल जनेऊ, फराठी आदि पेंधवा कर अथवा दीक्षा लेकर, अपनी बुद्धि से कुछ भी काम न लेते हुए, फेवल अन्ध- विश्वास से उनकी याज्ञाओं का पालन करना, उनके मुख से निकले वचन ही प्रमाण मानना , उनके घेरे के पशु धन जाना और ऐसे बुपान गुरुषो फा पादर-सत्कार, भेट पूजा करके उनका गोरव बढ़ाना एवं सब कुछ उनके अर्पण करके उनके दुराचारों में सहायक होना शुर-भक्ति नहीं, गुरु द्रोह है सद्गुरु अपने शिष्यो को-नि स्वार्थ प्रेम भाव से उनको आत्मिक उन्नति के लिए-सत्य ज्ञान का उपदेश देते हैं, भव धे प्राधिभौतिक शरीर के अर्चन पूजन आदि से तथा आर्थिक भेंट-पूजा और भोग्य साममियों से सन्तुष्ट नहीं होते, किन्तु उनके उपदेशों को धारण करके उनके अनुसार भाचरण करने द्वारा अपनी आस्मिक उन्नति करने से सन्तुष्ट होते हैं । पति-भक्ति (पातिनत्य) नारी असिल विश्व को अपने गर्भ में धारण करती है, अत साधारणतया उसमें अपने जोड़े नर की अपेक्षा देवी सम्पद १९३ रजोगुण को विशेषता होना स्वाभाविक है और नर में नारी की अपेक्षा साधारणतया सतोगुण की विशेषता होना भावश्यक है , इसलिए साधारणतया पुरुष का पद स्त्री से बड़ा होता है अर्थात् वह उसका पूज्य होता है और स्त्री को ऐसे पुरुष के संरक्षण मे रहना और उसकी अनुगामिनी होना उचित है। पुरुष का क-न्य स्त्री और पालकों के भरण-पोपण के लिए वाहिर से भाजीविका उपार्जन करके लाना है और स्त्री का कर्तव्य गृहस्थी का सब काम सम्पान करना तथा सन्वानों का पालन-पोपण करना प्रादि है। दोनों के परस्पर में एकता के प्रेम भाव से अपने अपने जिम्मे के काम परामर करने ही से जगत का व्यवहार ठीक- ठीक चल सकता है और इसलिए स्त्री को पति-भक्त होना आवश्यक है। थत अपने अपने समाज के नियमानुसार, सदभावना से नियत किए हुए योग्य पति के साथ अनन्य प्रेम रखना अर्थात् उसके सिवाय दूसरे किसी पुरुप से स्त्री पुरुष के सहवास सम्बन्धी प्रीति न रखना , अपनाव्यक्तित्व उसमें जोड़ देना, तन, मन और वचन से उसका कोई अहित न करना; अपने मन को चञ्चलता से वस्त्राभूषण, विषय-भोग, धर्म-पुण्य, तीर्थ-व्रत आदि में समय, शक्ति और धन का इतना व्यय न कराना कि उनके लिए उसको बहुत परिश्रम करना, कष्ट उठाना तथा अनुचित कर्म करना पड़े, उसके
देवी सम्पद
१९४
करना,
-
व्यवसाय में सहायफ होना , ससके सुख दुःख, सम्पचि-
विपत्ति, हर्प शोक, मान-अपमान, निन्दा-स्तुति को अपना
हो सममना,
घर गृहस्थी के काम अच्छी यरह करना,
सात्विक भोजन वथा सेवा शुश्रूपा से उसके शरीर को रता
मीठे पचनों तथा नम्र और सत्यव्यवहारी से उसको
प्रसझ रसना, कभी उससे छल, कपट और मिथ्या व्यवहार
न करना और उसके साथ एक साल-बद्ध होकर सात्विक
व्यवहार तथा भात्मोन्नति के उपाय करना--यह सच्ची पति
भक्ति है । परन्तु आवतायो, मूर्स, अज्ञानी, कर्तव्य विमुस,
हृदय-हीन, स्वार्थी मावा पिताओं आदि द्वारा नियत किए हुए
भर प्रकृति के दुष्ट, दुराचारी, प्रमादी, गुण हीन, अयोग्य
और धेजोड़ पति से हो यायजीवन पँधे रह कर, आत्मा के
विरुद्ध, उसकी अनुचित आशामी का अन्धविश्वास से
पालन करते रहना और हृदय में प्रेम के भाव हुए मिना ही
लोक-दिखावे के उपरी प्रेम का ढोंग करके उसको प्रसन्न करने
के लिए, अपनी आत्मा के पतन करने वाले व्यवहार करते
द्रुप इस देव दुर्लभ मनुष्य-जन्म का चालविकाम न उठा
कर इसे वृथा गँवा देना, पति के निरङ्कुशवायुक्त अत्या-
चारों को चुपचाप सहन करते रहना , पति के शरीर फी
सेवा-शुभग, भादर-सरकार तथा उससे प्रीति आदि के पति-
भक्ति के व्यवहार करते रहने और उसके विदेश गमन
पर खूप मोह, करने पर भी अपने रजोगुणी विषय-मुख
देवी सम्पद - १९५ तया वल-आभूषणों आदि के लिए उसके इतना व्यय कर- चाना कि बद जन्म भर आर्थिक फष्ट पाता रो और मान- सिक चिन्ता से प्रस्त रहे, उसके जीवित रहते उससे यात- विक प्रेम न होते हुए भी उसके मरने पर उसके लिए अत्यन्त रोना-चिहाना और शोक फरते रहना तथा ठ- पूर्वक भूपन्यास, शीतोष्ण श्रादि द्वारा कष्ट सहन फरके शरीर को सुसा पर अपनी आत्मा को वथा (सर्वभूतामैक्य सम्बन्ध से) मृत पति की प्रात्मा को भी कनेश देना और मलात वैधव्य रख कर अपने मनुष्य-जीवन के स्वभाव सिद्ध अधिकारी को भी, अप्राकृतिक पवि-भक्ति को अन्ध-श्रद्धा से कुचल डालना एवं शरीर के प्राकृतिक गी के सहन न कर सकने पर-धर्मपूर्वक पुनर्विवाह न करके कुमार्ग में प्रवृत्त होना-यह पवि-भक्ति नहीं, किन्तु पवि-द्रोह है। पति पत्नी का विशेष सम्बन्ध फेवल स्थूल शरीरो का है ओर यह सम्बन्ध यहाँ ही जोड़ा जाता है यानी स्त्री-पुरुप के प्राकृतिक वेगो की मर्यादित रूप से शान्ति के लिए क्या एक दूसरे की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए, एक दूसरे की सहायता से मनुष्य देह के वास्तविक ध्येय-सच्चे यात्म- सुख प्राप्त करने के प्रयत्न में अग्रसर होने के लिए और साथ ही साथ समाज को सुव्यवस्थित रख कर पतन से बचाने के लिए, एक स्त्री का एक पुरुष के सहवास में जीवन-यात्रा करने के नियम, प्रत्येक सभ्य समाज में अपनी ८
देवी सम्पद
१९६
अपनी परिस्थिति के अनुकूल बने हुए हैं और उन नियमों
के अनुसार जो सम्बन्ध जोड़े जावे हैं-उनको विवाह
कहते हैं। विवाह का दूसरा अधिक महत्व का प्रयोजन
यह है कि पति-पत्नी के पारस्परिक प्रेम के भाव इतने पढ़ जावे
है कि दोनों का व्यक्तित्व एक हो जाता है और एक दूसरे के
सुख-दुःपादिअपने होजाते हैं, अत अपने पृथक् व्यक्तित्व
को सबके साथ जोड़ कर सब से एकता करने के सर्वात्म
भाव के अभ्यास में यह सब से यदा सहायक है। परन्तु
यह प्रयोजन तब हो सिद्ध हो सकता है जम कि दोनों तरफ
से एक समान निस्वार्थ प्रेमयुक्त वर्ताव हो तथा विवाह के
नियम ऐसे हो कि जिनमें एकतरफे सार्थ के भार न हों
अर्थात् जिनसे दोनो के खत्व और भधिकार यथायोग्य
सुरक्षित रहें और जो देश, काल और व्यक्तियों की परि-
स्थिति के अनुसार संशोधित होते रहते हों। जप ऐसे
नियम यथोचित रूप से पूरी तरह पालन किए जाते हैं
सभी वे समाज को सुव्यवस्थित रस कर पतन से पचा
सकते हैं। इसके विपरीत यदि एक के स्वार्थ के लिए
दूसरे के अधिकारो को कुचलने के अन्यायपूर्ण एकतरफा
नियम बनाए जाते हैं, तो उस समाज का पतन अवश्य
होता है।
वर्तमान में हिन्दू समाज में विवाह के नियम एकतरफा
स्वार्थ के हैं । चाहे वे पहिले किसी जमाने की परिस्थिति के
देवी सम्पद . १९७ उपयुक्त रहे हो, परन्तु वर्तमान परिस्थिति के तो विल्सल ही प्रतिकूल हैं। इन नियमों के अनुसार स्वार्थी और मूर्स अर्थलोलुप पिता, मावा, माई अथवा उनको अनुपस्थिति में कोई भी गैरजिम्मेवार पुटुम्यी, लड़की को-पाये जिस अवस्था में, चाहे जैसे भयोग्य व्यक्ति को, पाहे जय क्या अपना दिल चाहे जैसी स्वार्थ सिद्धि करके देहाते (क्योंकि यहाँ सन्या का विवाह नहीं होता, किन्तु पशुओं और जड़ पदार्थों की तरह कन्या का दान होता है तो उसको बिना किसी प्रकार के इस फे उस व्यक्ति की दासी नहीं, किन्तु जड पदार्थ फी धरह उसकी भोग्य वस्तु होकर रहना पड़ता है और अन्त करण में उस व्यक्ति से घृणा रसते हुए भी पात्मा फे विरुद्ध उससे प्रीति का स्वाँग करना पडता है तथा उसके दासत्व में अपना अमूल्य मनुष्य जीवन मिवा देने के लिए मजबूर होना पड़ता है, सो भी उस व्यक्ति के जीवन- फाल तक ही नहीं, फिन्तु उसके मरने के बाद भी जब तक यह स्त्री जीवित रहे तब तक उसकी मिल्कियत होती है और बिना पवि के पतियत धर्म पालन का स्वाँग करना होता है। स्त्री के लिए तो उस पुरुष के साथ जन्म-जन्मान्तर पहिले আ আঁৰ সা-সুমাল বউ ভার স্কাল ব ক্ষা सम्बन्ध जुड़ा हुआ बताया जाता है, परन्तु पुरुष के लिए उस स्त्री के साथ इस जन्म में भी पा सम्बन्ध नहीं सममा जाताउसके जीते जी अनेक स्त्रियों व्याही जा
दैवी सम्पद
१९८
सकती है और अनेक बिना ब्याहे ही रक्सी जा सकती है-
यदि वह पुछ ऐतराज करे नो कठोर सजा पाती है। यद्यपि
गुलामी की प्रथा वर्तमान कानून में नाजायद्ध है, परन्तु
स्त्रियों की यह गुलामी वर्तमान कानून में भी जायज है ,
उनका इस गलामी से उद्वार न तो कानून ही कर सकता
है, न धार्मिक एवं सामाजिक व्यवस्थाएँ, और न देश
को गुलामी से मुस्त करने का दावा करने वाले लोग
ही। इस राक्षसी व्यवहार को इस समाज के लोग "पति
भक्वि" या "पतिव्रत धर्म" कहते हैं, परन्तु वास्तव में
यह पतिव्रत-धर्म नहीं, किन्तु उसकी विडम्बना और पोर
अन्याय है।
स्वामि-भक्ति
ससार के व्यवहार सुव्यवस्थित चलाने के लिए नौकर
का मालिक के प्रति पितृ-भाव और मालिक का नौकर के
प्रति सन्तान-भाव रहना आवश्यक है, और अपने पृथक
व्यक्तित्व को दूसरों में जोड़ कर सबसे एकता करने का
अभ्यास इस सम्बन्ध से भी बढता है, प्रत शरीर और उसके
सम्बन्धियों के पालन पोषण के लिए यदि किसी की नौकरी
करना स्वीकार किया हो वो जब तक उसकी नौररी करे,
उस स्वामी के प्रति एकता के प्रेमपूर्वक आदर और श्रद्धा
के मार रसना, जो सेवा स्वीकार की हो, उसको दत्तचित्त
दैवी सम्पद
होकर प्रसन्नता और तत्परता के साथ अच्छी तरह पजाना,
स्वामी का कभी अहित-चिन्वन न करना ,
उसके
सुप
दुख, हानि-लाभ, मान-भपमान आदि को अपने ही तुल्य
समझना, उसको हानि या व्यथा पहुँचे, ऐसा कोई काम न
फरना-यह सची स्वामि-भक्ति है । परन्तु दुष्ट-दुराचारी,
भाववायी एव मूर्स स्वामी को श्राक्षाओं का अन्ध विश्वास
से पालन किए जाना, उमके अनुचित व्यवहारों में "हाँ में
हो" मिला कर उनका प्रतिवाद न करना अथवा उचित
सम्मति न देना और उसके स्नेह के वश होकर अथवा
वेतन के लोभ से यात्मिक पतन कराने वाले कार्य करना-
यह स्वामि भक्ति नहीं, किन्तु स्वामि द्रोह है।
वात्सल्य
अपनी पत्नी, सन्तान, प्रजा, सेवक, शिप्य आदि छोटे
सम्बन्धियों से एकता का अनुभव करते हुए नि स्वार्थ भाव
से, प्रेमपूर्वक उनके रक्षण-शिक्षण, पालन-पोपण आदि
की सुव्यवस्था करफे, उनको अनिष्ट से बचाने तथा उनकी
उन्नति के लिए सद्भावना युक्त प्रयत्न करते रहना , उनके
सुख-दुखों को अपने सममना , सदुपदेशो द्वारा उनका
अज्ञान दूर करके उनको सन्मार्ग पर चलाना या उनसे
अपने अपने कर्तव्य पालन करवाना और पुरे व्यवहारो,
कुव्यसनों तथा पिलासिता से उनको पचाना-यह सचा
देची सम्पद वात्सल्य है। परन्तु छोटे सम्बन्धियों के भौतिक शरीरों के प्रेम में इतना थासक्त हो जाना कि उनकी अरुचि के कारण उनको विद्याध्ययन न फरयाना, मुशिक्षा न दिलाना , कुमा! तथा अनर्थ करने से न रोकना, राजस-तामस आहार- विहार की आदत डालना, प्रत्यक्ष में उनको थोड़ा शारीरिक फष्ट होने के भय से परिणाम के बहुत सुख की उपेक्षा करना, उनसे उनके कर्तव्य पालन करवाने में असावधानी करना और विपरीत आचरण करने पर उचित दण्ड न देना-यह वात्सल्य नहीं, किन्तु निष्ठुरता है। , करना। स्नेह अपने परावरी के स्नेहियों से पफता का अनुभव करते हुए निखार्थ भाव से, प्रेमपूर्वक उनके साथ सद्व्यवहार उनकी वास्तविक पावश्यकताओं की पूर्ति तथा कष्ट निवारण में सहायक होना और अनिष्ट से बचा कर उनके सच्चे सुख तथा वास्तविक हित-साधन के लिए यन करना तथा उनके हित की सम्मति देना यह सच्चा स्नेह है। परन्तु उनके स्नेह में इवना थासक्त हो जाना कि उनकी अप्रसन्नता के भय से उचित सम्मति आदि न देना, उनके अनुचित हानिकर व्यवहारों में साथ देना अथवा उनके स्नेह के घश स्वयं अनुचित कार्य करना-यह स्नेह नहीं, किन्तु मित्र द्रोह है।
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देवी सम्पद २०६ वर्तमान समय में वैराग्य का व्यविक्रम इतना हो गया है कि जिसका जी चाहे वह ससार के व्यवहारों से विमुख होकर साधु, फकीर, यति, प्रहाचारी और वैष्णव-चैरागी धादि का भेप ले लेता है। यही नहीं, किन्तु बहुत से बालको को बाल्यावस्था ही में साधु आदि के याने (सॉग)दे दिए जाते है और कइयों को तो जन्मते ही उनके माता पिता, साधु आदि नामधारियों की भेंट कर देते हैं। इनमें लड़के लड़की दोनों ही होते हैं । भला एस अरस्था में वे लोग त्याग वैराग्य का प्रयोजनक्या जान सकते हैं। इन नामधारी साधु, शफीर, यति, ब्रह्मचारियों, वैष्णव वैरागियों आदि को सख्या इतनी बढ़ गई है कि इन लोगों की अगणित सम्प्रदाएँ बन गई हैं। इनमें वास्त- विक त्याग-वैराग्य का तत्व जानने वाले तो पिरले हो महात्मा होते हैं, शेष जगत व्यवहार से विमुख होकर प्रमाद, बालस्य और दुराचार में श्रायु पिताते हुए समाज पर धोम-रूप हो रहे हैं और वे स्वयं भी बहुत दुख पाते हैं । ये लोग संसार लोगों का कुछ भी हित किए बिना दूसरों की सेवा पर निर्भर रहते हुए शरीरल्याना करते हैं , और अज्ञानी लोग अन्य. विश्वास से केवल भेप थादि भाइम्बर ही के कारण इनको महात्मा मान फर इन निरुद्यमियों की पूजा, सेवा शुश्रूषा, मरण पोपण आदि करते हैं। वास्तव में जो व्यक्ति लोगों की कुछ भी सेवा किए बिना मुस्त में दूसरों से सेवा करवाते हैं वे त्यागी या सन्यासी नहीं होते, किन्तु भालसो, प्रमादी, २०७ देवी सम्पद कर्तव्य पोर होते हैं। इनमें से बहुत से वो साधु मादि फे भेप में, पड़े धूर्त, ठग, विपय सम्पद और नशेषाज होते है और आसुरी सम्पद फे अनेक दुर्गुण इन लोगों में भरे रहते हैं। इन लोगों से जगत के अहित के सिवाय और कुछ भी नहीं होता। समता - साचित् आनन्द स्वरूप मारमा परमात्मा जगत में सर्वन, सर्पदा, एक समान प्रोत-प्रोत भरा हुआ है, उसके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं है , स्यूल जगत का दृश्य प्रपन उसकी माया-शक्ति का सेल मात्र है, वह भी उससे भिन्न नहीं, उसकी सघी और स्थायी सूक्ष्म सत्ता पर ही- क्षण-क्षण में परिवर्तन होने वाले स्थूल जगत दिसावटी सत्ता निर्भर है थोर स्थावर जगम सब देहों में एक परमात्मा समान रूप से व्यापक है-यह साम्य भाव चित्त में रखते हुए जगत के सन व्यवहार करना , सुख- दुस, हानि-लाम, मान अपमान, निन्दा-स्तुति, जय पराजय, सिद्धि प्रसिद्धि, शुभ अशुभ, प्रिय अप्रिय, इष्ट-अनिष्ट, आदि द्वन्द्रों में हर्प, शोक, राग और द्वेप की वृत्तियों से मन में विक्षेप उत्पन्न नहीं करना अर्थात् अनुकूलता में अत्यन्त माहाद और प्रतिकूलता में विपाद न करना , भी आत्मा परमात्मा के अर्थात् अपनी आत्मा को माया- - ये द्वन्द्व
देवी सम्पद
२०८
शक्ति के प्रतिक्षण परिवर्तन होने वाले सेल है-अपने
से भिन्न कुछ भी नहीं है-ऐसा निश्चय करके एकरस
रहना , वथा छोटे-बड़े, स्त्री-पुरुष, पशु-पक्षी, ऊँच-नीच,
अच्छे-बुरे, शत्रु-मित्र, अपने पराए-सपको एक परमात्मा
के अनेक रूप समझ फर (गी०१० ५१८) उनसे राग,
देप, घृणा, विरस्कार आदि भेद उत्पन्न करने वाले भाव न
रखना, किन्तु सबके साथ एकता का अनुमर करते हुए
ययायोग्य प्रेम का व्यवहार करना ।
समदु खसुख स्वस्थ समलोष्टाश्मकाञ्चन ।
तुल्यप्रियामियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसस्तुति ।
गी. अ.१४२५
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो।
सर्वारम्भ परित्यागी गुणातीत स उच्यते ॥
-गी.. १४२१
भर्य-जो अपने पाप में स्थित होकर अर्थात् अपनी भारमा
ही में सवका समावेश जान कर, सुस-युस,भाटी, पश्यर, सोना,
प्रिय, अमिय, निन्दा, स्तुति, मान, धपमान, शत्रु, मित्र आदि
हद्रों में सम अर्थात् एक समान बह कर विचलित नहीं होता और
जिसने (विषमता के) सय भारम्म (प्यवहार) छोड़ दिए हैं उस
पीर पुरुष को गुणातीत कहते हैं।
*प्रेम का खुलासा इसके पहिले देखिए।
दैवी सम्पद
और उन कमों के परिणामस्वरूप भौति माति के भोग
वर्तमान काल म साम्यवाद को लेकर सभ्य समार
२०९
और ससार पक को चलाने में भिन्न भिन्न शरीरों की
योग्यतानुसार, उनके नाना भाँति के व्यवहारों का एक समान
महत्व और एक समान आवश्यकता है ऐसा समझ कर
सबके साथ सहयोग रसते हुए अपना अपना कर्तव्य पालन
करते रहना , दूसरों के सुख दुस को अपने समान मान कर
(गी० १०६३२) परस्पर में सहायता देना और सरके हित
का यथायोग्य पान रसना-यह सची समता है। परन्तु
समता का यह अर्थ नहीं है कि जगत के व्यवहार में छोटा,
वडा, सी, पुरुप, पशु पक्षी, अच्छा, चुरा, बुद्धिमान और मूर्स
सब एक ही प्रकार के कार्य करें और एक ही प्रकार के
भोग भोगे, क्योंकि जगत प्रकृति के सत्व, रज थोर तम
तीनों गुणों के तारतम्य का रोल है अर्थात् गुण चैचित्र्य ही
जगत है, अतएव यदि गुणो के तारतम्य के अनुसार भाँति-
भॉति के कर्म न किए जायें और भौति माति के ऊँचे-नीचे,
अच्छे-बुरे भोग नै भोगे जायें दो कर्मो (प्रति) की साम्या
वस्था में जगत के सेल का प्रलय हो जाय । अव फर्म करने
तथा उनके फल भोगने में समता होना प्रकृति के विरुद्ध
है इसलिए यह समता नहीं विपमता है । जिस शरीर के
गुणों की जैसी योग्यता हो उसीके अनुसार कर्म करना
भोगना ही सच्ची समता या सान्य माव है।
है
,
देवी सम्पद
बहुत विशृङ्खलत्ता उत्पन्न हो गई है। एक तरफ तो पढे हुए
विचारों के साम्यवादी, मनुष्य मान के लिए एक समान
कर्म करने और एक समान भोग भोगने का अधिकार स्था-
पित करने के अप्राकृतिक प्रयन में जी-जान से लगे हुए हैं
और वे पूँजीपतियों तथा सत्ताधारियों से द्वेप तथा घृणा
फरते हैं, और दूसरी तरफ पूंजीपति तथा सत्ताधारी लोग
स्वय अपनी आवश्यकताओं से बहुत अधिक भोग भोगते
हुए तथा प्राडम्बरों एवं अनाचारों में बेहिसार पदार्थो का
अपव्यय करते हुए साधारण लोगों तथा श्रमजीवियों के
मनुष्योचित अधिकारो को कुचलते रहते हैं और (मनुष्य)
जीवन के लिए उपयुक्त एव आवश्यक भोग्य साममियों से
भी उनको वश्चित्त रखने पर तुले हुए हैं। इन सम्पत्तिमानों
के अतिरिक्त कट्टर धार्मिक विचारों के लोग, साम्प्रदायि-
कता की रूढ़ियों में जकड़े हुए-विषमता के व्यवहारों में
हद दर्जे तक पहुँच गए हैं। मनुष्य जगत के प्राधे भाषी
जाति को, पुरुषों ने अपने भोग की जड़ सामग्री की तरह
मान कर, उसको मनुष्यता के अधिकारों ही से वश्चित कर
रुपा है। पुरुप, ससार का सब ज्ञान-सब प्रकार की
विद्याएँ पढ कर-प्राप्त कर सकता है, परन्तु स्त्रियो को किसी
भी विद्या के पढ़ने का कोई अधिकार नहीं। पुरुप, ससार
में चाहे जहाँ स्वतन्त्रतापूर्वक खुला विचर सकता है, परन्तु
स्त्री को घर से बाहिर निकलने तथा अपना मुंह सोलने
देवी सम्पद २११ तक का भी अधिकार नहीं। ससार को सब सम्पत्ति और सब भोग्य पदार्थ तो एक मान पुरुषो की मौरूसी जायदाद है हो यहाँ तक कि खी का अपना व्यक्तित्व ही नहीं माना जाता-किन्तु परमात्मा की प्राप्ति भी पुरुप समाज ने एक मात्र अपने लिए रिजर्व रस कर त्रियों को उससे भी वश्चित कर रक्खा है। जन अपने आधे अङ्ग स्त्री जाति के साथ भी इवनी विषमता है वो इतर प्राणियों की तो गिननी ही क्या ? पशु-पक्षी तो न केवल पुरुषों के खाद्य पदार्थ ही हैं, किन्तु उनके आमोद-प्रमोद के लिए भी बेचारों के प्राणों तक का हरण किया जाता है और पुरुपो के अदृष्ट स्वार्थी की सिद्धि के लिए कल्पित देवताओं के नाम पर इनका बलिदान किया जाता है। मनुष्यों का मनुष्यों के साथ परस्पर में इतनी विषमता का बर्ताव है कि कई निम्न श्रेणी के माने जाने वाले मनुष्यों को उच्च श्रेणी के अहवार वाले मनुष्य छूना भी पाप समझते हैं और उनके साथ पशुओं से भी हीनता का व्यव- हार करते हैं एवं उन पर पशुओ से भी अधिक अत्याचार करते हैं । उच्च जाति वालो में आपस में भी इतना भेद भाव है कि समान गुण कर्म तथा समान आचार-विचार वाले लोग भी आपस में सान-पान और विवाह सम्बन्ध के व्यवहार नहीं करते। एक दूसरे को नीचा और अपवित्र मान कर आपस में परहेज करते हैं। यह विषमता यहाँ तक दैवी सम्पद २१२ बढी हुई है कि कहीं-कहीं तो सगे भाई (सहोदर) भी एक दूसरे का छुपा नहीं साते ओर पनी पवि फा हुआ नाही साती। जिस तरह इस प्रकार की विषमता अप्राकृतिक तथा सर्वनाश करने वाली है, उसी तरह कर्म फरने तथा मोग भोगने में एकाकार समता होना भी अप्राकृतिक तथा नाश- फारी है । यह घाव पहिले कही जा चुकी है कि जगन्, परमात्मा की निगुणात्मक प्रकृति का रोल है और गुणों का तारतम्य होने ही से यह सेल घनता है , गुण चैधिन्य ही संसार है । गुणों की साम्यावस्था में ससार ही नहीं रहता, इसलिए गुणों की पूर्ण समता हो ही नहीं सकती। श्रत जब तक समार है, वप तक गुणों की विषमता रहनी मनि- वार्य है। परन्तु वह विषमता गुणवैचित्र्य तक ही सीमाबद्ध रहनी चाहिए। इससे पढ कर, जो जाति या समाज अपने स्वार्थ तथा अहङ्कार से प्रारदस्ती अपने मनमानी विपमता उत्पन्न करता है, वह प्रकृति के विरुद्ध पड़ता है, अत उसका विनाश होता है। जगत के स्थावर-पाषाण आदि-पदार्थों में बमोगुण की अधिकता होती है , उनमें सत्व, रज बहुत ही अल्प होते हैं, वृक्षादिकों में क्रमश पापाण आदि से तमोगुण कुछ कम होता है और सत, रज का कुछ उत्कर्ष होता है , इसी तरह पशु- पक्षियों में प्रमश वृक्षादिकों से गुणोत्कर्ष है और मनुष्यों में
.
२१३
दवा सम्पद
क्रमश पशु आदिको से गुणोत्कर्ष है। मनुष्यों में आपस में भी
गुणों का अनन्त तारतम्य है, परन्तु सामाजिक सुव्यवस्था
के लिहाज से साधारणतया उनके चार प्रधान भेद किए जाते
हैं। कइयों में तमोगुण की अधिकता होती है और सत्व की
न्यूनता , कइयो में रज की अधिकता और सत्र की न्यूनता,
कइयों में रज की अधिकता और तम की न्यूनता एवं कइयों
में सत्व की अधिकता और रज तम फी न्यूनता होती है।
जिनमें तम की अधिकता और सत्व की न्यूनता होती है, उनमें
बुद्धि का विकाश बहुत कम होता है, अत उनमें बुद्धि द्वारा
सूक्ष्म विचार करने की योग्यता नहीं होती, किन्तु दूसरों के
आदेशानुसार स्थूल शरीर से काम करने की (शारीरिक श्रम
की) योग्यता अधिक होती है। जिनमे रजोगुण की अधि-
फता और सत्व कम होता है, उनमें अपनी बुद्धि की प्रेरणा
से व्यवसाय आदि करने की योग्यता पहिरो वालों से अधिक
होती है । जिनमें रज की अधिकता और तम की न्यूनता
होती है, उनमे उपरोक्त दोनो की अपेक्षा बुद्धि का विकाश
अधिक होता है और अपनी प्रेरणा से काम करने की भी
विशेष योग्यता रहती है, अत उनमे दूसरों का शासन धीर
रक्षण करने की योग्यता होती है, और जिनमें सरगुण पी
अधिकता और तमोगुण को न्यूनता होती है, इसकी बुद्धि
बहुत विकसित हो जाती है, अत उनमें मर प्रकार के मूत्त
शान सम्पादन करने तथा उनके प्रचार कामे की सिंध
।
दैवी सम्पद
२१४
योग्यता होती है । अत गुणोत्कर्ष के अनुसार जिनमें बुद्धि
का विकास कम होता है-शारीरिक श्रम को योग्यता विशेष
होती है-वे शारीरिक श्रम ही कर सकते हैं, बुद्धि का कार्य
उनसे नहीं हो सकता,
और उनकोशारीरिक श्रम-जिनकी
बुद्धि विकसित हुई है, उनके आदेशानुसार--करना होता
है, क्योंकि
स्थूल फर्म से सूक्ष्म बुद्धि श्रेष्ठ होती है। इसलिए
केवल शारीरिक श्रम करने वाले तम प्रधान लोगों के लिए
सत्व, रज प्रधान लोगों को शिक्षा, रक्षा तथा व्यवसाय के
आश्रय में अपना व्यवसाय करना पापश्यफ है। और सत्व
प्रधान लोग रज तम प्रधान लोगों के रक्षण, व्यवसाय तथा
श्रम के पाश्रय से ही अपनी विद्या तथा ज्ञान का व्यवसाय
कर सकते हैं। इसी तरह मध्य श्रेणी के गुण विकास
वाले लोगों का परस्पर सम्बन्ध रहता है और एक को दूमरे
पर निर्भर रहना पड़ता है। सबको अपने अपने गुणों के
तारतम्य के अनुसार भिन्न भिन काम करने होते हैं और
उनके अनुसार ही सान पान, रहन सहन तथा दूसरे भोग
भी भिन्न भिनश्रेणी के उनके उपयुक्त होते हैं । सत्व गुण
प्रधान लोगों के पान-पान, रहन-सहन आदि तमोगुण
प्रधान लोगों के अनुकूल नहीं पड़ते और तमोगुण पालों के
पान पान, रहन-सहन आदि सत्व गुण वालों के अनुकूल
नहीं पड़ते । इसी तरह दूसरों के समझना चाहिए।
स्त्रियों में साधारणतया अपने समान गुणों के पुरपो की
दैवी सम्पद
२१५
अपेक्षा स्वभाव से ही कुछ रजोगुण को विशेषता रहती है।
अतः उनमें साधारणतया अपने-अपने गृहस्थी के और अपने.
अपने समाज के भीतरी काम-काज करने की ही विशेष
योग्यता रहती है। इसलिए द्रव्योपार्जन आदि के पाहिरी
सब काम काज के लिए पुरपी के आश्रय में रह कर गृह के
भीतरी सब कामों को वह स्वामिनी होती है। पुरुषों को
गृहस्थ के कामों के लिए स्त्रियों पर निर्भर रहते हुए
बाहिरी काम करने होते हैं और साधारणतया त्रियों की
रता, शिक्षा और भरण पोषण आदर सहित फरना पुरुपो
का कर्तव्य है । तात्पर्य यह है कि बी-पुरुषों के कर्तव्य-कर्म
यद्यपि पटे हुए हैं, परन्तु हैं वे एक ही श्रेणी के , अत्त
समान गुणों के बी पुरुपो के सान-पान, रहन-सहन आदि
आय समान श्रेणी के होने चाहिए।
साराश यह कि गुणो के तारतम्य के आधार पर
अपनी-अपनी योग्यतानुसार भिन्न-भिन्न कर्म करना तथा
भिन्न भिन्न भोग भोगना-यही सच्ची समवा है । गुणों
की उपेक्षा करके सबके एक समान कर्म और एक समान
भोग अथवा गुणों के विपरीत कर्म और भोग-समता नहीं
किन्तु विषमता है।
पापाण, वृक्ष, पशु-पक्षी आदि सब जड़ और चेतन पदार्थों
के साथ भी उनके गुणानुसार यथायोग्य व्यवहार करना ही
समता है।
दैवी सम्पद २१६ सूक्ष्म विचार से देखा जाय तो गुणों के तारतम्य के अनुसार भिन्न भिन्न फर्म और भिन्न-भिन भोगी की उप- रोक विषमता भी केवल समष्टि-मात्मा परमात्मा की माया के सेल-इस समार-चक्र को यथावत् चलाने के लिए है, श्रत यह विषमता भी केवल दिपावटी सेल मात्र ही है, क्योंकि ऊँचे-नीचे कर्म और भोगों से होने वाले सुप दुख भी अस्थायी-क्षण-क्षण में परिवर्तनशील होते हैं। स्थायी और वास्तविक सुख या दुप किसी भी कर्म या भोग में नहीं है। सासारिक विषय भोग-बड़े-छोटे, अमीर गरीब-सम ही के लिए दुप परिणाम वाले होते हैं, अधिक भोगों से अधिक और थोड़े से थोड़ा दुख होता है । अव वास्तव में भिन्नता कुछ है नहीं, क्योकि फर्म और भोग तथा उनके उपयुक्त सष सामग्री एव सय शरीर एक ही परमात्मा के अनेक मायिक रूप है। उसमे पृथक फुछ है नहीं। जो परमात्मा पगिडतों तथा उनके शास्त्र प्रन्यों में है, जो हवन फरने वालों तथा हवन-कुण्ड में है, ज्ञानियों तथा उनके ज्ञान में है, साधुओं तथा उनके भेप मे है, योगियों तथा डाकी समाधि में है, मदिरों, पुजारियों तथा मूर्तियों में है. और जो परमात्मा कर्मकाण्डियों तथा उनके कमों में है- वही परमात्मा शासक क्षत्रियों और उनकी तलवारों में , वही वैश्यों और उनकी फलम में, शिल्पकार और उसथी शिल्प कला में , लोहार और एसको भट्टी में, पुम्हार और उसके . -
२१७
दैवी सम्पद
चाक मे, सुथार और उसके बसोले में, जुलाहा और उसके
कर्षे , कारखानों और मशीनो में, इन्जन भौर वायलरो
मे, मेहतर और उसके झाडू में , धमार और उसके चमडे में
तथा फसाई और उसके छुरे में है और वही परमात्मा पुरुषों
और उनके द्रव्योपार्जन के उद्योगों में और वही स्त्रियो तथा
उनके गृहस्थ के फाम-काज में है।
मत्त परतर नान्यत्किचिदस्तिधनञ्जय ।
मयि सर्वमिद प्रोत सूत्र मणिगण इव ।।
नी. ०७७
धर्य-हे धाअय! मुझसे परे प्रथात् मुमो मिस कुछ भी
नहीं है, यह सय समार धागे में पिरोए हुए (धागे ही की)
मणियों की तरह मुझमें गुंथा है।
साराश यह कि वास्तव में घडे, छोटे, ऊँच, नीच,
पविन, अपवित्र आदि का भेद कुछ भी नहीं है। अपनी-
अपनी योग्यतानुसार सभी काम इकसार उपयोगी और
आवश्यक हैं और ससार-चक्र को अच्छी तरह चलाने के
लिए अपने-अपने स्थान में सरके फर्म अच्छे हैं, क्योंकि
सब कर्म तथा उनके कर्ता सभी परमात्मा के व्यक्त म्वरूप
हैं। इसलिए किसी से द्वेप, घृणा या तिरस्कार न करके सब
से एकता का साम्य भाव रपते हुए तथा दूसरों के उचित
अधिकारी पर आघात पहुँचाए बिना-गुणों के
क
देवी सम्पद २१८ के अनुसार-अपने-अपने व्यवहार करने तथा उनके अनुसार ही भोग भोगने में सन्तुष्ट रहना-यही धास्तविक समवा है। सन्तोष अपने कर्तव्य-कर्म पूब अच्छी तरह-पूर्ण शक्ति एवं युक्ति के साथ-करने पर जो सुख दुःख, हानि-लाभ, कीवि- अकीर्ति आदि प्राप्त हो जाय उसी में सन्तुष्ट रहना और चित्त को शान्त रखना ही सचा सन्तोप है । परन्तु सन्तोष का यह तात्पर्य नहीं कि प्रारब्ध, दैव, भावी या ईश्वर के भरोसे पर बैठ कर उद्यम ही न करना , अपने तथा दूसरे लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति तथा इहतौकिक सुख- समृद्धि एव पारलौकिक श्रेय साधन के लिए उद्यम ही न करना--यह सन्तोष नहीं, किन्तु आलस्य एवं प्रमाद है साधिक आचरण एव शुभ व्यवहारो मे निरन्तर दत्त चित्त होकर उद्यम फरते रहना चाहिए। मन को अपने वश में रस फर सासारिक विषयों में आसक्त न होने देना, सङ्कल्प विकल्पों से निग्रह कर उसे आत्मा अर्थात् एकता में जोडना और अपने कर्तव्य कर्म जिस समय जो उपस्थित हों उनमें लगाना तथा उन कर्तव्य-कमों के परने में एकाग्र रखना-यह सच्चा शम है । परन्तु मन को सर्वथा मार डालने का उद्योग करना या उसे
देवी सम्पद
.
२१९
ससार के व्यवहारों से सर्वथा हटा लेना-यह शम नहीं,
दुराग्रह है, क्योंकि ससार फे व्यवहार मन से ही चलते हैं
थोर जन तक संसार है वध तफ मन का नाश नहीं हो
सकता। अत' मन को सदा वश में रख कर साम्य भार से
व्यवहार करना ही सच्चा शम है।
दम
इन्द्रियों के विषय मर्यादित रूप से,मन को वश में रखते
हुए-आसक्ति एव राग द्वेप रहित होकर-जैसे प्राप्त हो
जायँ, भोग कर परम सन्तुष्ट रहना, विषयों के भोगने में
इतना आसक्त न होना कि रात-दिन उन्हीं में लगे रह फर
लोक व्यवहार बिगाड़ दिए जायें तथा सात्विक आचरण छूट
कर विपरीत व्यवहारों में प्रवृत्ति हो जाय अर्थात इन्द्रियों के
अधीन न होकर उनको अपने अधीन रखते हुए विषय
भोगना-यह सच्चा दम है।
रागद्वेषवियुक्तस्तु विपयानिन्द्रियैश्चरन् ।
प्रात्मवश्यैविधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥
-गी.भ.२१५
अर्थ-राग इंप को छोड़ कर, अपने अधीन की हुई इन्द्रियों
से विषयों को भोग करके भी, भपना पत परण पश में रसता या
मनुष्य प्रसन्नता को प्राप्त होता है।
परन्तु हठ से इन्द्रियों को अपने विषयों से सर्वथा हटा
दैवी सम्पद
२२०
कर मन से उनका चिन्तन करते रहना तथा शारीरिक वेगों
से को विक्षिप्त रसना-दम नहीं, किन्तु मिथ्याचार है।
श्रद्धा-विश्वास-आस्तिकता
जो पदार्थ वस्तुत जैसा है उसको वैसा ही मानना
अर्थात् प्रत्यक्ष प्रतीत होने वाले-इन्द्रियगोचर स्थूल जगत्
के नाना भाँति के दिसाव को-प्रतिक्षण परिवर्तनशील
तथा उत्पत्ति विनाश वाला होने के कारण मूठा, और उसके
एकत्व भाव के अस्तित्व को सदा एकरस रहने वाला,
समझ कर सच्चा मानना, और उस एकत्व भाव यानी
असली सूक्ष्म पत्त्व-सत् चित् आनन्द स्वरूप आत्मा
परमात्माको यथावत् जानने का श्रद्धापूर्वक प्रयत्न करना,
आत्मा परमात्मा इन्द्रियातीत है अर्थात इन्द्रियों, मन और
स्थूल बुद्धि से वह जाना नहीं जा सकता, वह वो अपरोक्ष
ज्ञान अर्थात अनुभव का ही विषय है और वह अपरोक्ष
ज्ञान अर्थात् आत्मानुभव-अनेक जन्मो तक सात्विक
व्यवहार करते करते बहुत दीर्घकाल के अभ्यास के बाद
सर्वभूतात्मैक्य बुद्धि होने पर-विरले ही सज्जनों को होता
है, साधारण व्यक्तियों को केवल पढने-सुनने मात्र से उसका
प्रत्यक्ष अनुभव नहीं हो सकता, अव उस अध्यक्त, अवि-
नाशी, सपके हृदय में स्थित भात्मा-परमात्मा के अस्तित्व
और उसकी सर्वव्यापकता के विषय म, जिन ज्ञानी महा.
२२१ देवो सम्पद स्माओं ने उसका प्रत्यक्ष अनुभव किया है उनके वचनों में श्रद्धा विश्वास रसता तथा उक्त अपरोक्ष धान यानी पारमा- नुभव प्राप्त करने के लिए उक्त मानी महात्माओ के उपदेशा- नुसार सात्विक आचरण श्रद्धापूर्वक करना, सत्शात्रा के अध्ययन में तथा जिनमें देवी सम्पद फे गुण अधिक हो और जो देवताओं की तरह सर्व भूत प्राणियों के हित में लगे हों, उनके वाक्यों तथा उपदेशों में और जिस विषय का जिसको यथार्थ ज्ञान हो उस विषय में उसकी बातों में श्रद्धा रखना और प्रत्येक उद्योग में अपनी और सनकी प्रात्मा (परमात्मा)पर सब से अधिक भरोसा रसना--यह सच्ची श्रद्धा, विश्वास अथवा भास्तिकता है। आत्मविश्वास रूपी सच्ची श्रद्धा के बिना ससार का कोई भी व्यवहार ठीक ठीक चल नहीं सकता और न आत्मविश्वास के बिना किसी प्रकार की सफलवा ही हो सकती है। इसी तरह लौकिक या पारमार्थिक, किसी भी प्रकार के व्यवहार में पहिले दूसरों के किए हुए अनुभव पर श्रद्धा करके ही प्रवृत्ति होती है और एक दूसरे का कुछ न कुछ विश्वास करना ही पड़ता है। श्रद्धा के बिना सशययुक्त चित्त से किया हुआ कोई भी काम सिद्ध नहीं हो सकता। अश्रद्धयाहुत दत्त तपस्तप्त कृत च यत् । असदित्युरयते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ -गी०म० १७-२८
दैवी सम्पद
२२२
1
अर्थ-मथदा से जो यज्ञ किया हो, दान दिया हो, तप किया
हो या जो कुछ कर्म किया हो, वह "असत्" पहा जाता है। हे
पार्थ । पद (मरने पर) परलोक और (जीवित रहते ) इस लोक,
दोनों में ही निरर्थक है।
यहाँ तक कि सबका जीवन ही श्रद्धामय है।
सत्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽय पुरुपो यो यच्छूद्ध स एव च ॥
-गी..१७३
अर्थ-हे भारत सब लोगों की श्रद्धा अपने अपने सब अर्थात्
प्रति (स्वमाव) के अनुसार होती है। मनुष्य अवामय ही है।
जिसकी जैसी अदा होती है वह वैसा ही होता है।
परन्तु श्रद्धा सात्विक होनी चाहिए।
यजन्ते सात्विका देवान्यक्षरक्षासि राजसा ।
प्रेतान्भूतगणाश्चान्ये यजन्ते तामसा जना ॥
-गी.१७४
अर्थ-साविक लोगों की देवों में अर्थात् जिनमें देवी सम्पद्
के गुण भरे हों, अथवा जो दैवी शक्तियों की तरह सबके साथ एकत्ता
मार रखते हों उनमें श्रद्धा होती है, रजोगुणी लोगों की यनों
और राक्षसों में अर्थात् व्यक्तिगत स्वार्थ या धन, मान और कीर्ति
आदि के (अर्थ) लोलुप व्यक्तियों अया धान्यों में क्या राक्षसी
प्रति के भाववायियों (मस्याधारियों) में श्रद्धा होती है और
A
२२३ दैवी सम्पद समोगुणी लोगों की प्रेत अर्थात् भरे हुभों में और भूत भाव जद पदार्थों तया जड प्रकृति के लोगों में श्रद्धा होती है। परन्तु सात्विकी श्रद्धा मी पहिले किसी कार्य में प्रवृत्त होने तक ही रहनी चाहिए । जय किसी कार्य में प्रवृत्त होकर उसका कुछ अनुभव कर लिया जाय तब उसमें अन्धश्रद्धा नही रणनी चाहिए, किन्तु फिर अपनी बुद्धि से काम लेना चाहिए अर्थात् प्रात्म-विश्वास एव स्वावलम्बन का आश्रय लेना चाहिए। किसी भी कार्य में बुद्धि से कुछ भी काम न लेकर तथा अपनी भात्मा अर्थात् स्वावलम्बन पर भरोसा न करके सदा दूसरों पर अन्ध-श्रद्धा रत फर और दूसरों पर निर्भर रह कर परावलम्बी बने रहना यह श्रद्धा या आस्ति- कता नहीं, किन्तु नास्तिकता है। जिस तरह भेद-बुद्धि से एक परमात्मा से भिन्न अनेक परोक्ष देवी-देवता, भूत प्रेत, पीर- पैगम्बर आदि की कल्पना करके अन्धविश्वास से उनका पूजन अर्चन करना, उनको अप्रसन्नता से विपत्तियों को उत्पत्ति मानना और उनके प्रसन्न होने से विपत्तियों से छुटकारा पाने तथा पुत्र-कलत्र, धन धान्य, मान-प्रतिमा आदि प्राप्त होने का विश्वास रखना तथा उनको प्रसन्न करने के लिए न्याय या अन्याय से पदार्थ साह फरफे उनके नाम पर भेंट करना और पशु तथा अन्य प्राणियों की धशि देना , अज्ञानी, मूर्स, दम्भी, स्वार्थी तथा वाक- पटु धूतों की बातों तथा ऐसे लोगों के रचे हए शाखों में
दैवी सम्पद
२२४
अन्ध विश्वास रखना, जिसको जिस विषय का यथार्थ ज्ञान
नहीं उस विपय में उसकी बातें मानना, अपनी बुद्धि से
काम न लेफर पुराने ग्रन्थों में लिखी हुई होने से अथवा
नए जमाने की पुस्तकों के प्रमाण हो से अथवा पूर्वजों की
प्रचलित की हुई होने से अथवा नई रोशनी के लोगों के
स्वीकार कर लेने ही से किसी व्यवस्था पर अन्ध-विश्वास
की श्रद्धा कर लेना~यह राजसीतामसी श्रद्धा है।
सरलता
साधारणतया स्वभाव सरल अर्थात् सीधा रखना
अपनी तरफ से किसी के साथ छल, कपट, देदापन, ऐंठन,
रुपाई तथा कूट नीति के भाव चित्त में न रखना वया घाणी
और शरीर से ऐसे व्यवहार न करना-सच्ची सरलता
है। परन्तु दम्मियों, ठगों, धूतों तथा दुष्टों के साथ सरलता
तथा सीधेपन का भाव रख कर उनके फन्दे में फैप्र जाना
और अपने कर्तव्य बिगाड़ देना सरलता नहीं, भोंदूपन है।
सुप-दुम्य, हानि लाभ, हर्प शोक, मानापमान, निन्दा-
स्तुति भादि द्वन्द्वों एवं शारीरिक कष्ट से व्याकुल होकर
धीरज नछोड़ना और अपने कर्तव्य-कर्म पर दृढ़ रहना-
सच्चा धैर्य है । परन्तु अनर्थ को टालने की सामर्थ्य होते
हुए भी चुप होकर बैठे रहना तथा जिस काम में अनर्थ के
देवी सम्पद २२५ सिवाय और कोई शुभ होने की सम्भावना न दीसे सो भी वह करते हो जाना, उसे बदलने की चेष्टा करने में विलम्ब परना-धेर्य नहीं किन्तु प्रमाद है। उत्साह अपने कर्तव्य सम्पादन करने में प्रफुल्ल पित्त से योग करते हुए श्रमसर होते रहना , हताश न होना-सा उत्साद है। परन्तु अपनी शक्ति और परिणाम को सोचे विचार मिना किसी भी कार्य में कूद पड़ना चपा विपरीत व्यवहारों में उत्साह दिखाना-उत्साह नहीं किन्तु चपलता है। - उदारता दूसरों के विचारों, विश्वासों, सन्कायों तथा गुणों को उचित महत्त्व देना, दूसरों के सुखदुस, हानि-लाभ, मानाप- मान, निन्दा-स्तुति आदि में हमदर्दी रसना, फेवल अपने ही स्वार्थ पर लक्ष्य न रप कर दूसरों के स्वार्थों को भी स्थान देना , लोगों की वास्तविक आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए सुमार्ग को द्रव्यादिक दान देना , देश और काल की परि- स्थिति क्या आवश्यकतानुसार अपने विचारों में परिवर्तन करना-सच्ची उदारता है। परन्तु निरर्थक फिजूल खर्च करना , अन्ध विश्वास से दम्मियों का आदर प पूजन करके उनको सममी से दान देकर उनका महत्व प्रदाना, ठगों क्या खुशामदियों को बातों मे आकर अपव्यय करना -
दैवी सम्पद
२२८
,
अमुक आश्रम है" इत्यादि देहाभिमान जन्य मलिन अहकार
के भाव चित्त में न रखना , "मैं यह प्रति क्षण बदलने
तथा उत्पत्ति नाश वाला शरीर नहीं, किन्तु शरीर के अन्दर
रहने वाला सच्चिदानन्द अविनाशी आत्मा हूँ, शरीर तो
मेरे रहने का स्थान है, जिसमें रह कर मैं जगत का खेल
किया करता हूँ, सत् चित आनन्द-स्वरूप आत्मा अकर्ता
होने से उसमें सुप दुःखादि द्वन्द्व धर्म नहीं होते, ये सब मेरी
प्रकृति के खेल है, मैं (आत्मा) इन खेलों में केवल साधा
रण सत्ता एव स्फूर्ति देने वाला हूँ, सब कुछ करता हुधा भी
मैं वास्तव में कर्ता भोका नहीं-" इस तरह के भाव अन्त
करण में रखते हुए ससार के सब व्यवहार करना यह सचा
निरहझार है। परन्तु निरहकार का यथार्थ तत्व न समझ कर
व्यवहार में अपने कर्चव्य पालन करने की जिम्मेवारी को
भूल जाना और कुछ भी न करना यह निरहङ्कार नहीं-जड़ता
है। क्योंकि व्यवहार त्यागो का भाव भी तामसी अहङ्कार
है। इसलिए अपने अन्त करण पर किसी प्रकार के शारीरिक
अहवार का अभिनिवेश न रखते हुए यथायोग्य ससार के
सब व्यवहार करना ही वास्तविक निरहङ्कार है।
तप
सरकार, मान, पूजा अथवा और किसी भी प्रकार
के स्वार्थ का मार छोड़ कर, देवता, ब्राह्मण, आचार्य और
देवी सम्पद - २२९ बुद्धिमानों का श्रद्धायुक्त पूजन फरना, याहिर-भीतर से पविनता रसना , किसी को फष्ट न देना, सरलता रसना, ब्रह्मचर्य पालन करना, पाणी से किसी को उग न करने पाले सच्चे, मीठे और हित के वचन बोलना, विद्या पढ़ना; मन को प्रसन्न, शान्त, एकाप और अपने वश में रपना तथा इन्द्रियों को अपने अधीन रसना-यह सथा तप है। परन्तु मूदवा के कारण, हठ से शरीर को मृस प्यास, शीतोष्ण आदि से अथवा दूसरी फियाओ से कष्ट देना या दूसरों को दुस देने के लिए जप, अनुष्ठान आदि करना अथवा मान, पूजा तथा तोक-दिसावे को-तपस्वी कहलाने के लिए- छल से उपरोक्त तप करना यह तप नहीं किन्तु दुराग्रह है। सत्य बोलना सत्य, मधुर और लोक हितकर वचन बोलना- सचा सत्य है । परन्तु जिन सत्य वचनों से दूसरों को बिना प्रयोजन उद्वेग उत्पन्न होता हो अथवा कठोरता से दूसरी के चित्त पर आघात पहुँचता हो अथवा जिन सत्य चचनों से लोगो का अहित होता हो, ऐसे वचन फेवल सत्यवादीपन के अहवार और हठ से बोलना-यह सत्य नहीं किन्तु असत्य है। जो सत्य हित का विरोधी हो वह वास्तव मे सत्य नहीं होता, क्योकि हित को याद किसी समय सत्य योनिय न भी हो तो उससे किसी की कोई हानि
देवी सम्पद
२२८
अमुक आश्रम है" इत्यादि देहाभिमान जन्य मलिन बहकार
के भाव चित्त में न र "मैं यह प्रति पण बदलने
स्था उत्पत्ति नाश वाला शरीर नही, किन्तु शरीर के अन्दर
रहने वाला सच्चिदानन्द अविनाशी आत्मा हूँ, शरीर तो
मेरे रहने का स्थान है, जिसमें रह कर मैं जगत का रोल
किया करता हूँ , सत् चित मानन्द-स्वरूप प्रारमा अकती
होने से उसमें सुख दुसादिद्वन्द्व धर्म नहीं होते, ये सर मेरी
प्रकृति के खेल है, मैं (आत्मा)इन खेलों में केवल साधा
रण सत्ता पर स्फूर्ति देने वाला हूँ, सब कुछ करता हुथा भी
मैं वास्तव में फळ भोका नहीं-" इस तरह के भाव मन्त -
करण में रखते हुए ससार के सब व्यवहार करना यह सपा
निरहवार है। परन्तु निरकार का यथार्थ तत्व न समझ कर
व्यवहार में अपने कर्तव्य पालन करने की जिम्मेवारी को
भूल जाना और कुछ भीन करना यह निरहकार नहीं-जड़ता
है। क्योंकि व्यवहार त्यागने का भाव भी तामसी भहकार
है। इसलिए अपने अन्त करण पर किसी प्रकार के शारीरिक
अहवार का अभिशिवेश न रखते हुए यथायोग्य ससार के
सत्र व्यवहार करना हो वास्तविक निरहवार है।
तप
सरकार, मान, पूजा अथवा और किसी भी प्रकार
के स्वार्थ का भाव छोड़ कर, देवता, ब्राह्मण, भाचार्य और
देवी सम्पद वह वास्तव में सत्य नहीं होता, क्योंकि हित को मालिसी २२९ बुद्विमानों का श्रद्धायुक्त पूजन करना चाहिर-भीतर से पवित्रता रसना , किसी को कष्ट न देना, सरलता रसना , ब्रह्मचर्य पालन करना, वाणी से किसी को उद्वेग न करने चाले सच्चे, मीठे और हित के वचन योलना, विद्या पढना, मन को प्रसन्न, शान्त, एकाग्र और अपने वश में रमना तथा इन्द्रियों को अपने अधीन रखना यह समा तप है। परन्तु मूढता के कारण, हठ से शरीर को भूस प्यास, शीतोष्ण आदि से अथवा दूसरी मियात्री से कष्ट देना या दूसरों को दुख देने के लिए जप, अनुष्ठान आदि करना अथवा मान, पूजा तथा तोक-दिखावे को-तपस्वी कहलाने के लिए- छल से उपरोक्त तप करना-यह तप नहीं किन्तु दुरामह है। सत्य बोलना सत्य, मधुर और लोक हितकर वचन बोलना- सच्चा सत्य है । परन्तु जिन सत्य वचनों से दूसरों को गिना प्रयोजन उद्वेग उत्पन्न होता हो अथवा कठोरता से दूसरी के चित्त पर आघात पहुँचता हो अथवा जिन सत्य पचनों से लोगो का अहित होता हो, ऐमे वचन केवन सत्यवादीपन के अड्ड्वार और हठ से बोलना- नहीं किन्तु असत्य है। जो सत्य हितका विरोधी या प्रिय न भी हो वो रससे किसी देवी सम्पद २३० नहीं होती, परन्तु अहित की बात यदि सत्य और प्रिय भी हो तो उससे हानि के सिवाय लाभ नहीं होता अतपय प्रधान लक्ष्य हित पर ही रखना चाहिए। सबके लिए हित- कर पाक्य अन्त में सत्य हो ही जाते हैं। केवल मुस से सच्चारण कर देने मात्र से कोई वाक्य सत्य या भूल नहीं होता, पचनों की सत्यताया असत्यता, बोलने वाले के भाव और उससे होने वाले परिणाम पर निर्भर है। शौच (पवित्रता) अन्त करण को राग, द्वेष, ईर्या, लोभ, कपट, घृणा धादि यात्म विमुख करने वाले मलिन भावो से शुद्ध रखना तथा इन्द्रियों के व्यवहार शुद्ध रखना अर्थात् आँखो से ऐसे दृश्य न देसना, कानों से ऐसे शन्न न सुनना, जिह्वा से ऐसे पदार्थ न खाना, नासिका से ऐसे पदार्थ न तूंपना, त्वचा से ऐसी वस्तुओं का स्पर्श न करना, जिनसे चित्त की चञ्चलवा बढ़े और मन मलिन होकर आत्मिक पतन कराने वाले व्यवहारो म प्रवृत्ति हो, इसी तरह फर्मन्द्रियों के व्यवहार भी शुद्ध रसना और शरीर को स्नान, मज्जन, स्वच्छ वखादि से शुद्ध रखना यह सच्चा शौच है। परन्तु अन्त करण के तथा इन्द्रियों के व्यवहारों को शुद्ध न रप कर केवल स्थूल शरीर को छुआछूत, चौका-चूल्हा, कञ्ची-पफी आदि में ही पवित्रता की इतिश्री सममना और स्पर्शास्पर्श के सङ्कुचित
दैवी सम्पद
२३१
मावो से दूसरो का तिरस्कार तथा घृणा करना यह शौच
(पवित्रता) नहीं किन्तु मलिनता है। वास्तव में यह स्थूल
शरीर वो मलो का खजाना ही है केवल ऊपरी छुवाछूत
से यह शुद्ध नहीं हो सकता । जीवात्मा के सयोग से ही यह
पवित्र रहता है। जिस क्षण उससे इसका विछोह होता है
उसी क्षण से यह छूने योग्य भी नहीं रहता-मत एकमान
यात्मिक, उन्नति के सात्विक व्यवहारों से ही यह पवित्र
होता है।
अहिंसा
प्राणीमात्र एक ही परमात्मा के अनेक रूप होने के
निश्चय से मन, वाणी तथा शरीर से किसी भी जीवधारी को
अपनी तरफ से शारीरिक एव मानसिक कष्ट न पहुँचाना ,
अपने स्वार्थ एव विनोद के लिए अथवा प्रमावश किसी
के शरीर से प्राणो का विछोह न करना, न करखाना तथा
किसी की वृत्ति में बाधा न देना-यह सच्ची अहिंसा है।
परन्तु किसी को किसी बड़े कष्ट से बचाने के लिए, थोड़ा
कष्ट भी न देना तथा किसी बड़ी हिंसा को रोकने के लिए
थोडी हिंसा न करना अथवा किसी श्रेष्ठ की रक्षा के लिए
दुष्ट को दण्ड न देना , यदि कोई दुराचारी अपनी आर्थिक
शक्ति से दूसरो पर अत्याचार करता हो तो उसकी आर्थिक
वृत्ति न छीनना अथवा उच्च कोटि के प्राणियों की रक्षा के
। देवी सम्पद २३२ लिए होन कोटि के जीवों को मारना अथवा लोक हिव के लिए कोई किसी महितकर प्राणी को दण्ड देवा हो सो मिथ्या दया के यश होकर उसको सहन न कर सकना और उसको रोकने का प्रयत्न करना-यह अहिंसा नहीं किन्तु हिंसा है। अहिंसा के विषय में जन-साधारण में केवल भाधित भौतिफ दृष्टि से ही विचार करने के फारए-बहाभ्रम फैला हुआ है और इस अहिंसा तथा दया के दुरुपयोग से प्रति- दिन महान अनर्थ हो रहे हैं। विपैने जन्तु और क्रूर जान वर मनुष्य समाज वथा उपयोगी पशुमा की हानि करते रहें तो भी उहे मारना, अहिंसा धर्म के विरुद्ध सममा जादा है, डाकुओं, दुष्ट-दुरापारी 1-समाज द्रोहियों वथा सूनियों को प्राण-दण्ड देकर उनको कुकर्म करने से पचाना तथा उनसे समाज की रक्षा करना और चोरों, पासण्डियों, पुर्मियों को वृत्ति छीनने में सहायक होना तथा उनको चचित दण्ड दिलाना भी अहिंसा धर्म के विमुख होना समझा जाता है, इसी तरह दुष्ट-दुराचारियों (जालिमों) से मले मनुष्यों की तथा असहाय गरीयो की रक्षा करने के लिए उनको मारना या दण्ड देना भी अहिंसा धर्म के विरुद्ध सममा जाता है । वास्तव मे यदि सूक्ष्म दृष्टि से विचार कर देसा तो बिना सूर तथा बिना उचित कारण के किसी निरपराध प्राणी का प्राण शरीर से अलग कर देना या जाय- २३३ देवी सम्पद उसको फष्ट देना या उसी सि धोनना अवश्य ही हिंसा है। परन्तु जिन प्राणियों से दूसरों को कष्ट होता हो या हानि पहुँचती हो क्या जिनसे समाज या वया स्वय उनका अहित के सिवाय और एक नहीं होता दो-उनको मार डालना अथवा घर देना भयवा उनकी पृत्ति पीनना पस्तुत अहिंसा है। यह यात अवश्य है कि इस प्रकार की अहिंसा का यथार्ध तत्व सूक्ष्मदर्शी, प्रात्मभानी महान पुरुष ही जान सकते हैं और वे ही उसका उचित निर्णय कर सकते है। अत इसका उपयोग ऐसे महा पुरुषों की आज्ञा से होना चाहिए। येदाविनाशिन निरुप ए एनमजमव्ययम् । कप स पुरुष पार्थ क पातयति हन्तिकम् ॥ गी०५०२२१ अर्ध- हे भजन ! लो यह मानता है कि यह मारमा अविनाशी, निस्य, मन और अम्पय है, यह किसी को कैसे मारे चोर म मरया अर्थात् मान किसी को मारता है और न किसी को मायाता है। तात्पर्य यह है कि मामा घो सदा इकसार रहता है । इसमें मरना, घटना, पदना अथवा सुखदुए कुछ है नहीं। शेप रहा शरीर से प्राणों का विछोह होना या शरीर का कष्ट पाना, सो जिस तरह शरीर पर के वन मैने होने पर पछाड़ कर धोए जाते हैं और जीर्ण अथवा अनुपयोगी
देवी सम्पद
२३४
एव दुखदायफ होने पर पतार दिए जाते हैं, उसी तरह
जीवात्मा का शरीर के साथ सम्बन्ध है, भव यदि किसी के
प्राण विछोह से या फष्ट पाने से ही उसका तथा औरों का
वास्तविक हित होता हो और सूक्ष्मदर्शी तत्त्वज्ञानी ऐसा कर
दें वो वह हिंसा नहीं, किन्तु सच्ची अहिसा है।
ब्रह्मचर्य
अपने लिए नियत बी अथवा अपने लिए नियत पुरुप
के अतिरिक्त पराई स्त्री अथवा पर-पुरुप के साथ अष्ट प्रकार
में से किसी भी प्रकार का सङ्ग-मन, वाणी व कर्म से न
करना तथा अपनी स्त्री अथवा अपने पुरुष के साथ भी
नियमित रूप से ही सङ्ग करता यानी वीर्य का अपव्यय न
करना-यह सचा ब्रह्मपर्य है । परन्तु हठ करके, अपनी
श्री या पुरुप से भी योग्यकाल में नियमानुसार सग न
करना और शरीर से विपय न करके मन से उसका चिन्तन
करते हुए सदा व्याकुल रहना अथवा जबरदस्ती अप्राकृतिक
रूप से अपने जोड़े के सहवास से वश्चित रहना या दूसरों
को वञ्चित रखना अथवा दुनिया में सस्कार, मान, पूजा
पाने की कामना से गृहस्थ न करके, जन्म भर ब्रह्मचारी
ही बने रहने का दोग करके लोक मर्यादा नष्ट करना एवं
लोक-समद में पापक होना यह ब्रह्मचर्य नहीं किन्तु
मिध्याचार है।
२३५ देवी सम्पद कर्मेन्ट्रियाणि सयम्प प मारते मनसा स्मरन् । इन्द्रिपार्यान्विमूदात्मा मिष्याचार. अश्यते ॥ गीम०३१ मधोमूह कमेन्द्रियों को रोक कर मन से इन्द्रिों के থিবী ধিৰ যিধামে মিথ্যা প্রমাণু শী कहा जाता। देवपूजन जगत को धारण करने वाली परमात्मा की ममष्टि देवी शक्रिया रूपी देवताओं के साथ अपनी व्यष्टि शक्तियों की एकता फरने रूपी देवपूजन करना अर्थात् अपनी सम प्रकार की व्यक्तिगत शकियों का समष्टि जगत के लिए उप- योग करना , माता, पिता, स्त्री के लिए पति तथा जिनमें दैवी सम्पदा फे गुण तथा सालिकवा की विशेषता हो, ऐसे प्रत्यक्ष और घेतन देवों की सेवा शुश्रूपा पर भादर- सत्कार द्वारा, निस्वार्थ भारसे पूजा करना यह समा देव- पूजन है। देवपूजन भी अपने पृथक् व्यक्तित्व को दूसरों के साथ जोड़ने का साधन है। परन्तु किसी स्थान विशेष पर धैठे हुए किसी रूप विशेष के देवताओं को कल्पित कर, उनसे किसी फल प्राप्ति के प्रयोजन से अथवा दूसरो को पोहा देने एव हानि पहुँचाने के भाव से, धन पर रजोगुणी- तमोगुणी पदार्थ पदाना तथा उनके निमित्त पशुओं एवं अन्य
देवी सम्पद
इसी तरह
सामग्रियों की प्रलि भादि देना अथवा भौतिक पदाथों-
धातु, मृत्तिका, पापाण धादि--को ही देवता मान कर, उन
पर जड़ पदार्थ बढाने की पूजा करना और उन, अपनी
करपना के माने हुए देवताओ से डरकर या कष्ट में उनसे
सहायता पाने अथवा भोग्य पदार्थों की प्राप्ति के लिए
जड पदार्थों द्वारा उनका अर्धन करना
प्रत्यक्ष चेतन देव माता पिता आदिकों की, उनके जीवन
चाल मे सेवा शुश्रूषा आदि ने फरफे, उनके मरने के बाद
अपनी कीर्ति और मान के लिए श्राद्ध आदि पितृ कर्म
के पड़े-बडे डम्बर करना तथा उनकी चिता समाधि
यादि पर बडे बडे मफमरे घना फर उनको पूजना और
मृतकों को याद करते रहना-यह देवपूजन नहीं, किन्तु प्रेत
और भूतपूजन है।
द्विज-नामप-पूजन
मन और इन्द्रियों को वश में रहने वाले, अन्दर बाहिर
से पवित्र रहने वाले, तपस्वी अर्थात् गी० अ० १७ श्लोक
१४ से १७ तक में वर्णित मन, वाणी और शरीर से सात्विक
सप करने वाले, आमाशील, सरल स्वभाव वाले, ज्ञानी
(आत्म ज्ञानी), विज्ञानी (सासारिक पदार्थों तथा व्यव
हागे का विशेष ज्ञान रखने वाले) और आस्तिक अर्थात्
आत्मा-परमात्मा को सर्वव्यापक मान वर साम्य भाव से
२३७ दैवी सम्पद संसार के व्यवहार करके निरन्तर लोक-हित में लगे रहने वाले ब्राह्मणों का आदर-सत्कार, भरण-पोषण, सेवा-शुश्रूषा आदि करना-यह सच्ची ब्राहाण-पूजा है। परन्तु उपरोक्त गुणों के बिना ही केवल ब्राह्मण के घर में जन्म लेने ही से नाह्मण मान कर अन्धविश्वास से उनको सिलाना- पिलाना, सेवा-शुश्रूषा करना तथा दान देना , उनकी आज्ञा मानना अथवा अपने मरे हुए सम्बन्धियों के पास भोग्य सामग्री पहुँचाने के मिथ्या विश्वास से उनको पदार्थ देना तथा अपने इस लोक और परलोक के फल की इच्छा से उनका पूजन करना-यह ब्राह्मण-पूजन नहीं, किन्तु ब्राह्मणो की अवज्ञा है। जहाँ अपूज्यों की पूजा होती है, वहाँ दुस, मृत्यु और भय के सिवाय और कुछ नहीं होता। मा-बुद्धिमानों का पूजन विशेष बुद्धिमान व्यक्ति-चाहे वे पुरुष हों या खी अथवा वे किसी भी वर्ण या जाति के हो-जिनकी बुद्धि की विचक्षणता से लोगों का हित होता हो, उनका श्रादर- सत्कार, सेना-शुश्रूपा करना तथा उनकी आवश्यकताएँ पूरी करने में सहायक होना-यह सची प्राज्ञ पूजा है। परन्तु जो बुद्धिमान व्यक्ति अपनी विचक्षणता का दुरुपयोग करके लोगों को हानि पहुँचाते हों, या कष्ट देते हों ऐसे बुद्धिमानो देवी सम्पद २३८ का आदर-सत्कार, सेवा शुरूपा करना तथा उनकी भाव- श्यकताएँ पूरी करने में सहायक होना-यह मिथ्या प्राइ- पृजा है। सत्सङ्ग श्रेष्ठाचरणों वाले ज्ञानवान, बुद्धिमान तथा विद्वान व्यक्तियों के तथा जिनमें देवी सम्पद की अधिकता हो, ऐसे सात्विक व्यवहार करने वाले सजनों के साथ रहना , से सजना के समाज में तथा सम्मेलनो में समय-समय पर सम्मिलित होना , जहाँ आत्मा-परमात्मा के सच्चे ज्ञान, सद्विद्याओं तया सात्विक व्यवहारों की कथा या उपदेश होते हों वहाँ जाना और उन उपदशो को धारण करके उनके अनुसार व्यवहार करने का प्रयत्न करना--- यह सच्चा सत्सङ्ग है । परन्तु लोगो में सत्सङ्गो फहला पर सरकार, मान, पूजा प्राप्त करने तथा इसके द्वारा लोगों को ठगने अथवा और किसी प्रकार की स्वार्थ सिद्धि फरने के दम्भयुक्त भावो से उपरोक्त श्रेष्ठ पुरुषों के साथ रहना अथवा ऐसे सजना की सभा, समाज, सम्मेलनों तथा कथा उपदेशों में जाना और वहाँ जाफर कोई सद्गुण धारण न करके, केवल वाद विवाद करना अथवा उनमें छिद्र ढूँढने का प्रयत्न करना यह सत्सङ्ग नहीं, किंतु दम्म है।
२३९ देवी सम्पद स्वाध्याय शान-पृद्धि यथा बुद्धि तीक्षण करने के लिए घेद-शास्त्री तथा अन्य प्राचीन पर्व नवीन अनेक प्रकार की विद्याओं वया भाषाओं का पठन पाठन करके उनका लोकहित के लिए उपयोग एवं प्रचार फरना-यह सद्या स्वाध्याय है। परन्तु फेवल प्रन्यों को रट फर फण्ठ पर लेना अथवा अनेक अन्य पदते ही जाना और युद्धि से उसका कुछ भी उपयोग न करना अर्थात् बुद्धि को प्रन्यो के गिरवी रख कर फेवज्ञ शास्त्रो के फीडे पन जाना अथवा शास्त्रों की फेवल प्रक्रि- याओं को याद करके वाद-विवाद फरना , पढ़ी हुई विद्या के वास्तविक तत्त्व की तरफ बुद्धि को न लगा कर उनके सूसे फ्लेवर ही का अध्ययन फरके यहुत शाखा के ज्ञाता- पण्डित होने का अभिमान करना-यह स्वाध्याय नहीं किन्तु मूर्खता है। जप और ध्यान समष्टि भात्मा=परमात्मा में जुड़ने के लिए उसके अविनाशी, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, सदा एफरस रहने वाले, अनादि, अनन्त, नित्य, निर्मल, अद्वितीय भाव का तथा सत्-चित्-आनन्द स्वरूप का पार पार चिन्तन करना, उस स्वरूप फे द्योतक । ॐ" एकाक्षर मन्त्र का उच्चारण करते रहना और परमात्मा के इस स्वरूप में मन को निर- "
देवी सम्पद
न्तर जोका, यदि ऐसे स्वरूप के चिन्तन आदि में पहिले
मन न ला सके तो प्रारम्भिक अवस्था में इस स्वरूप पर
लक्ष्य रपवे हुए उसके द्योतक किसी नाम का चिन्तन और
उच्चारण करना तथा उस स्वरूप के द्योतक किसी रूप पर
ध्यान लगाना यह सञ्चा जप और ध्यान है। परन्तु पर.
मात्मा के उपरोक भाव तथा स्वरूप पर लक्ष्य रक्से गिना
फेवल किसी नाम के जप की माला फेरते रहने में क्या
किसी भौतिक रूप पर मन को लगाए रखने में समय
और शक्ति का अपव्यय फरना-यह मिथ्या अप और
ध्यान है । नाम और रूप चाहे कितने ही मुन्दर और व्य
कोटि के क्यों न प्रतीत हों, वस्तुत वे कल्पित माया के सेल
ही हैं। इनका जप और ध्यान प्रारम्भिक अवस्था में केवल
मन को एकाम करने की आदत डालने मान के लिए करना
ठीक है , पीछे इनको छोड़ कर समष्टि प्रात्मा परमात्मा के
उपरोक्त सच्चिदानन्द स्वरूप में स्थिति फरनी चाहिए और
नाम तथा रूप से छुटकारा पाए बिना उस स्वरूप में स्थिति
हो नहीं सकती-श्रत नाम और रूप को ही सब कुछ
मान कर सर्वदा उन्हीं में निमग्न रहना-मनुष्य देव के
अमूल्य समय को निरर्थक गँगाना है।
परोपकार-लोकहित
आधिभौविक और आधिदैविक सिपमता के कारण हो
दैवी सम्पद २४१ प्राणियों को अनेक प्रकार के क्लेश होते हैं और वे समता फे उपचार से शान्त होते हैं। जिस तरह पात, पित, कफ आदि दोपों की विषमता से शरीर में जो भूख-प्यास तथा नाना भाँति के रोगादि होते हैं, वे उन विषम दोपो को सम करने की चिकित्सा से शान्त होते हैं तथा पृथ्वी, जल, वेज, वायु आदि महाभूतो को विषमता से अनावृष्टि, अतिवृष्टि, याद, महामारी, दावानल, भूकम्प आदि भौतिक उपद्रवों से लोगों को जो अनेक प्रकार के कष्ट होते हैं, वे भौतिक समता के उपचार से शान्त होते हैं, और भेद बुद्धि जन्य मानसिक विपमता से राग, द्वेप, काम, क्रोध, लोभ, मोह, शोक, भय आदि विकार उत्पन्न होकर उनसे जो अनेक प्रकार के मान- सिक क्लेश होते हैं, वे सर्व-भूतात्मैक्य ज्ञान के उपदेशादि से मन को साम्यभाव में स्थित करने अर्थात् शम से शान्त होते हैं। इस तरह समता के उपचार से लोगों के आधिभौतिक और आधिदैविक केश मिटाना-सच्चा परोपकार अथवा लोक- हित है।परन्तु इसके विपरीत परोपकार या लोकहित के नाम से लोगों में उलटी विषमता उत्पन्न करने वाले उपचार करना- जिस तरह जिनकी सादगी से रहने की आदत हो अर्थात् जो मोटा खाते, मोटा पहनते और सब शारीरिक विषयादिकों में सयमरसते हों तथा जिनकी आवश्यकताएँ इतनी कम हो कि उनकी पूर्ति के लिए उन्हें परावलम्बी न बनना पड़े, उनके लए राजसी भोग्य पदार्थ सुलभ करने द्वारा भोग विलास में २४२ देवी सम्पद उनको प्रीति उत्पन्न करके उनको विषयी एवं भय्याश बनाने की विषमता उत्पन्न करना और उन भोग्य पहायों की प्राप्ति के लिए परावलम्बी बनाना अथवा एक तरफ वो लोगों को अपनी अपनी प्रकृति के विरुद्ध आहार विहारों में प्रवृत्त करके शारीरिक विषमता उत्पन कर, रोगी बनाना और दूसरी तरफ उनकी चिकित्सा आदि के बडे-बड़े प्रायोजन करके, लोगों को उन पर निर्भर रखकर, पूरे परावलम्बी और उद्यम- हीन तरह मानसिक विकार मिटाने के नाम पर उपदेश देकर, लोकहित दूसरो आशा
२४३
देवी सम्पद
मनुचिय पत्र हो कि दूसरों से धन धोनने का प्रयत्न करना
पड़े तथा दूसरों पी धास्तविक आवश्यकचाएँ पूरी होने में
पाधा पड़े तथा सह. पाटफे, जुए जैछे धन्धे न करना कि
जिनसे पुष भी लोक-सेया हुए बिना ही दम्य सात होने
के भाव रहे-यह सरचा अस्तेय है। परन्तु पूर्व फों के
पल से पैएर सम्पत्ति श्रादि पिना परिश्रम फिर क्या मिना
दूसरों के हक छीने, प्राप्त होने वानी सम्पत्ति को त्याज्य
मान कर मोद बैठना श्रयया अपने कर्तव्य कर्म यथावत्
फरने पर उसके पुरस्कार में जो दयादि क्या भोग्य पदार्थों
की प्राप्ति हो उसको यह समझ कर छोड़ देना कि ये पदार्थ
किसी दूसरे के परिश्रम से उत्पन्न हुए हैं, इन पर मेरा हा
नहीं है-यह मिथ्या अस्तेय है।
-
तेज
फिसी से प फर आत्मा के विरुद्ध, कोई अनुचित
काम न करना तथा अपने कर्तव्य को न धोदना, जो अपने
मातहत हों उनसे उनके फर्सन्य-कर्म समुचित रूप से
करवाने तया पनो, सन्तान, शिष्य, प्रजा आदि जो अपने
सरक्षण में हो उनको विपरीत पाचरणों से रोकने के निमित्त
धन पर धचित प्रमाव रसना-सचा तेज है। परन्तु अपने
रोव के अभिमान में दूसरों को अनुचित रूप से पाना---
यह सेज नहीं, अत्याचार है।
देवी सम्पद २४४ कार्य-कुशलता जो अपने कर्तव्य-कर्म और पेशे हों उनके शान, विज्ञान तथा क्रिया की पूरी जानकारी रप फर अपने-अपने कार्य करने में सब प्रकार से प्रवीण होना-यह सची दक्षता या कार्य-कुशलता है। परन्तु प्रमाद के विपयो में-जिनसे अपने कर्तव्य में हानि पहुँचती हो कुशलता रसना तथा अपने कर्तव्यों पर ध्यान न देकर दूसरों के कर्तव्यों में कुशलवा प्राप्त करने में लगे रहना-यह दक्षता या कार्य- कुशलता नहीं, किन्तु चपलता है। लज्जाग्लानि अपने कर्तव्य के विरुद्ध अनुचित और बुरे काम करने में लज्जा या ग्लानि होना-सच्ची लज्जा या ग्लानि है। परन्तु अपने कर्तव्यों के पालन करने में सथा साविक (लोक- हिर फे) व्यवहारों में अक्ष लोगों की टोका के भय से त्रुटि करना अथवा अपने कर्तव्य-कर्मों को नीचे दर्जे का अथवा हीन कोटि का समझ कर उनसे ग्लानि करके उपेक्षा करना- यह लना या ग्लानि नहीं, किन्तु कर्त्तव्य-विमुखता है। तितिक्षा-सहनशीलता किसी कारण से शरीर में गर्मी, सर्दी, भूप, प्यास, रोग, थापात थादि किसी प्रकार की पीड़ा उपस्थित हो गाय तो उसको शान्तिपूर्वक सहन करना, मन में क्षोम
२४५
दैवी सम्पद
न करना तथा शरीर को इस वरह के कष्ट सहने योग्य
बनाना-सची तितिक्षा है। परन्तु मूर्सता से हठ करके शरीर
को पीड़ा देते रहना, शीत, ताप, भूस, प्यास आदि से शरीर
को कष्ट देना-तितिक्षा नहीं किन्तु दुरामह है।
देवी सम्पद
२४६
राजसी-तामसी व्यवहार
फाम (इन्चा)
दूसरों के हित धौर स्वार्थ पर दुर्लक्ष्य फरक सपा में
पापा देकर फेवल अपनी व्यक्तिगत मार्य सिलिकीया
रखना , केवल अपने शरीर सपा उसके साथियों पे
लिए ही आधिभौतिक विषय-सुपण नया मान-कोवि भादि
को निरन्तर चमिलापा कर रहा और विषय सुपों
के लिए अप्रात पदायों की प्राप्ति की लालसा रसना समा
फर्तयाफर्तय, एपित-मनुचित का कुछ भी पिपार न
फरपे सदा कामोपभोग में ही पासक रहना--यह काम
का राजस-वामम स्वरूप है। इस तरह के व्यक्तिगा स्वार्थ
फी फामा से दूसरों से भिन्न अपने व्यक्ति के दैव भार
की रदता होती है और सर्वभूतात्मैक्य साम्य भार प्राप्त
होने में यह काम दी सप से अधिक बाधक है। सर मुणों
फा भण्डार तो सय अपना थाप पर्यात भात्मा है, इसी
के प्रतिविम्म से विपयादिकों में सुरग का पणिक भामाम
प्रतीत होता है। अत आमा से भिन्न नाशवान् भौतिक
पदार्थों में सुप मान कर उनकी कामना करते रहो से पतन
होता है। परन्तु इन व्यक्तिगत स्वार्थो और विषय भोगों की
अभिलापाओं से ऊँचे उठो को सदिग्या रसना, सर्वात्म
साम्य भाव में स्थित होने की अभिलाषा करना, समष्टि
-
देवी सम्पद
आत्मा-परमात्मा के साथ अपनी एकता के अनुभव करने
की लालसा रसना तथा किसी भी प्राणी को हानि पहुँचाए
मिना क्या किसी का अहित किए बिना-सबके साथ
एकता का प्रेम भाव पते हुए-लोक-सग्रह के लिए,
मर्यादानुसार जो कामोपभोग, विना अधिक प्रयास के
प्राप्त हो जाय उनको अनासक्त बुद्धि से, चित्त की शान्ति
मग किए बिना भोगना-यह सालिक काम है। जगत
का व्यवहार यथावत चलाने के लिए काम फी भी अत्यन्त
आवश्यकता है।
धर्माविरुद्वो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ।
-सी०म०७.10
अर्थ-हे भरतश्रेष्ठ धर्म के विन्द म बापाला भूत प्राणियों
में काम भी मैं अर्थात् जिस काम से भूत प्राणियों का अदित ।
होता हो यह-लोक-सग्रह के विरद न जाने वाला काम भी
परमात्मा की मगर को धारण करने वाली एक विभूति है।
क्रोध
अपने को किसी से हानि या दुख पहुँचने या किसी
से अपने स्वार्थ और सुप में पापा लगने या किसी से
अपना अपमान होने आदि के अशुमान में अथवा अपने
मन के
अनुज्ञ
फो कार्य न होने से क्रोध का आवेश
उत्पन्न कर पित्त को शुभकामा भीर अनेकवा की रिपन
देवी सम्पद
२४६
राजसी-तामसी व्यवहार
फाम (इन्छा)
दूसरों के हित और म्यार्थ पर दुर्लक्ष्य करके तथा उनमें
बाधा देकर केवल अपनी व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि की इच्छा
रसना, फेवल अपने शरीर तथा उसके सम्बन्धियों के
लिए ही आधिभौतिक विषय-सुखों तथा मान-धीति आदि
की निरन्तर अभिलाषा करते रहना और इन विषय सुखों
के लिए अप्राप्त पदार्थों की प्राप्ति की लालसा रसना क्या
कर्तव्याकर्त्तन्य, उचित-अनुचित का फुछ भी विचार न
करके सदा कामोपभोग मादी आसक रहना यह काम
का राजस-तामस स्वरूप है। इस तरह के व्यधिगत स्वार्थ
की कामना से दूसरों से भिन अपने व्यक्तित्व के द्वैत भाव
की ददता होती है और सर्वभूतात्मैक्य साम्य भार प्राप्त
होने में यह काम ही सय से अधिक पाधक है। सब सुपों
का भण्डार तो स्वय अपना श्राप अर्थात् आत्मा है , इसी
के प्रतिविम्य से विषयादिकों में मुसी का इणिक आमाम
प्रतीत होता है । अत आत्मा से मिन नाशवान भौतिक
पदार्थों मे सुप मान कर उनकी कामना करते रहने से पवन
होता है । परन्तु इन व्यक्तिगत स्वार्थों और विपय मोगों की
अभिलापानों से ऊँचे उठने की सदिच्छा रसना ,
सर्वात्म
साम्य भाव में स्थित होने की अभिलाषा करना, समष्टि
देवी-सम्पद
२४७
आत्मा-परमात्मा के साथ अपनी एकता के अनुभव करने
की लालसा रसना तथा किसी भी प्राणी को हानि पहुँचाए
बिना तथा किसी का अहित किए बिना-सबके साथ
एकता का प्रेम भार रखते हुए-जोक-साह के लिए,
मर्यादानुसार जो कामोपभोग, विना अधिक प्रयास के
प्राप्त हो जायँ उनको अनासक्त बुद्धि से, चित्त को शान्ति
भङ्ग किए बिना भोगना-यह साविक काम है। जगत
का व्यवहार यथावत चलाने के लिए काम की भी अत्यन्त
आवश्यकता है।
धर्माविरुद्वी भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ।
गी००७-10
अर्थ-हे भरतश्रेष्ठ । धर्म के विरुद्ध न जाने वाला भूत प्राथियों
में काम भी मैं हं अर्थात जिस काम से भून प्राणियों का अहित र
होता हो वह-लोक-सग्रह के विरुद्ध न जाने वाला काम भी
परमात्मा की भगत् को धारण करने वाली एक विभूति है।
क्रोध
अपने को किसी से हानि या दुस पहुँचने या किसी
से अपने स्वार्थ और सुस में बाधा लगने या किसी से
अपना अपमान होने आदि के अनुमान से अथवा अपने
मन के अनुकूल कोई कार्य न होने से क्रोध का
उत्पन्न कर चित्त को क्षुश्य करना और अनेकता की
देवी सम्पद २४८ बुद्धि से सस हानि या दुख पहुँचाने वाले को बदले में दुःख या हानि पहुँचाने में प्रवृत्त होना-यह मोघ फा राजस- तामस स्वरूप है। परन्तु क्रोध को अपने अधीन करके मूर्स, अज्ञानियों तथा फुमार्ग गामियों को सुधारने और अपने अधीन व्यक्तियों को कर्चव्य-विमुख होने से बचाने के लिए एचित माना में उसका उपयोग करना, अज्ञानी वया पालक किसी हानिकर व्यवहार का दुराग्रह करे तो उनको मोध दिखा कर डॉट देना और क्सिी दुराचारी का दुराचार छुड़ाने के लिए क्रोध के उपयोग से उसको धमका देना- यह सात्विक क्रोध है। ऐसे अवसरों पर मोघ के उपयोग से कोई अनर्थ नहीं होता, किन्तु क्रोध करना आवश्यक हो जाता है। उसकेन फरने से अनर्थ और लोगों का अहित होता है क्योकि रजोगुणी-तमोगुणी लोग उनकी प्रकृति के अनुकूल क्रिया से ही सुधरते हैं। अत उनके तथा दूसरों के हित के लिए प्रेम-भाव से ऐसे अवसरों पर उन पर क्रोध करना चाहिए। जैसे अपनी सन्तान को कुमार्ग से बचाने के लिए उसके हित की दृष्टि से क्रोध किया जाता है, वास्तव में वह क्रोध नहीं, प्रम होता है, उसी तरह दूसरों को सुधारने के लिए एकता के भाव से उनको नाहना देनी चाहिए, परन्तु ऐसा करने में मोध से अपने मन को तपाना नहीं चाहिए और न उसके परा में होकर ब्रोध करने की यादत ही डालनी चाहिए।
देची सम्पद
२४९
लोभ-तृष्णा-कृपणता
सासारिक पदार्थो में-पात्मा से भिन्न-सुख समझ
कर, अपने व्यक्तिगत भोग-विलास के लिए, उनका समह
करने में सन्तोप न करना, किन्तु आवश्यकता से भी अधिक
पदार्थो का येन-केन प्रकार से समह फरने में वन मन से
लगे रहना और समह किए हुए पदार्थों का अपने तथा
दूसरों के हित के लिए एव बावश्यक कामों में त्याग न
करना-यह लोभ, सृष्णा, कृपणता का राजस-तामस स्वरूप
है। परन्तु आत्म-ज्ञान-प्राप्ति की तृष्णा करना , ससार से
प्रेम, सबकी भलाई और अपना कर्त्तन्य पालन करने में
सन्तोप न करना तथा लोकहित के कामों में उपयोग करने के
लिए पदार्थों का समह करना और अनावश्यक एव अयोग्य
स्यवहारों में उनका व्यय न करना-यह लोभादि का
सात्विक स्वरूप है।
शोक-चिन्ता-पश्चात्ताप
गए हुए तथा अप्राप्त सासारिक धनादि पदार्थो, कुटु-
म्बियों, सम्बन्धियों, मित्रो तथा विपय-सुखो का चिन्तन
करके उनके लिए शोक करना तथा उपस्थित पदार्थो के
रक्षण आदि के लिए उचित उपाय न करके केवल उनको
चिन्ता हो फरते रहना तथा उनके बिछुड़ने पर या हानि
होने पर अपनी भूसंता, असावधानी आदि कारणों के
देवी सम्पद २४८ युखि से उस हानि या दुख पहुँचाने वाले को पाले में दुख या हानि पहुँचाने में प्रवृत्त होना-यह मोघ का राजस- तामस स्वरूप है। परन्तु क्रोध को अपने अधीन करके मूर्प, अज्ञानियों तथा फुमार्ग-गामियां को सुधारने और अपने अधीन व्यक्तियों को फव्य-विमुख होने से बचाने के लिए उचित मात्रा में उसका उपयोग करना, अज्ञानी या पालक किसी हानिकर व्यवहार का दुरामद करे तो उनको मोघ दिसा कर साँट देना और क्सिी दुराचारी का दुराधार छुड़ाने के लिए क्रोध के उपयोग से उसको धमका देना--- यह सात्विक सोध है। ऐसे अवसरों पर क्रोध के उपयोग से कोई अनर्थ नहीं होवा, किन्तु मोघ फरना आवश्यक हो जाता है। उसके न फरने से अनर्थ और लोगों का अहित होता है क्योंकि रजोगुणी-तमोगुणी लोग उनको प्रकृति के अनुकूल क्रिया से ही सुधरते हैं। अत उनके तथा दूसरों के हित के लिए प्रेम-भाव से ऐसे अवसरों पर उन पर क्रोध करना चाहिए। जैसे अपनी सन्तान को कुमार्ग से बचाने के लिए उसके हित की दृष्टि से क्रोध किया जाता है, वास्तव में वह क्रोध नहीं, प्रम होता है , उसी तरह दूसरों को सुधारने के लिए एकता के भाव से उनकी वाहना देनी चाहिए, परन्तु ऐसा करने में क्रोध से अपने मन को सपाना नहीं चाहिए और न उसके वश में होकर मोध करने की आदत ही डालनी चाहिए।
२४९
देवो सम्पद
लोभ-कृष्णा-कृपणता
सासारिफ पहा)ी में-धात्मा से भिन्न-सुस समझ
फर, अपने व्यक्तिगत भोग-विलास के लिए, उनका समाह
करने में सन्तोप न करना, किन्तु यावश्यकता से भी अधिक
पदार्थो का येन-फेन प्रकार से समह करने में तन मन से
लगे रहना और सह किए हुए पदायों का अपने तथा
दूसरों के हित के लिए एप पावश्यक कामों में त्याग न
फरना-यह लोभ, सृष्णा, कृपणता का राजस-तामस स्वरूप
है। परन्तु आत्म-ज्ञान प्राप्ति को कृष्णा करना , ससार से
प्रेम, सपकी भलाई और अपना कर्त्तन्य पालन करने में
सन्तोपन फरना तथा लोकहित के कामों में उपयोग करने के
लिए पदार्थों का समूह परना और अनावश्यक एवं अयोग्य
व्यवहारों में उनका व्यय न करना~यह लोभादि का
सात्विक स्वरूप है।
शोक-चिन्ता-पथाचाप
गए हुए तथा अप्राप्त सासारिक धनादि पदार्थे, कुटु-
म्थियों, सम्यन्धियों, मित्रों तथा विषय-सुसो का चिन्सन
परके उनके लिए शोक करना तथा उपस्थित पदार्थो के
रक्षण आदि के लिए उचित उपाय न करके केवल उनको
चिन्ता ही करते रहना तथा उनके बिछुड़ने पर या हानि
होने पर अपनी मुर्सता, असावधानी आदि कारणों के
r
दैवी सम्पद २५० लिए पश्चात्ताप करते रहना और उस शोक, चिन्ता, पश्चा- ताप आदि में डूब कर अपने कर्तव्य कर्मों को भूल जाना अथवा उनमे त्रुटि करना-शोक, चिन्ता, पश्चात्ताप का राजस-तामस स्वरूप है। परन्तु अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए सदा सावधान और चिन्तित रह कर प्रयत्न अपने भीतर धात्म विमुख करने वाले रजो गुणी-तमोगुणी भावों से होने वाले अनी का चिन्तन करके उनको सुधारने में यत्नशील रहना तथा अपने किए हुए अनथे, प्रसारधानियों तथा जुटियों का पश्चात्ताप करके पुन उनके न फरने के लिए सावधान रहना यह सब शोकादि का सात्विक स्वरूप है। करते रहना मोह-ममता सासारिक पदार्थ ही को सत्य मान कर, उनमें ममता बढा कर, उनके लिए अपने असली आप-आत्मा को भूल जाना शरीर तथा उसके सम्बन्धियों के मोह में फॅप्त कर अनर्थ करना तथा कर्तव्याकर्तव्य का मात्विकी बुद्धि से निर्णय न करके अन्धविश्वास में पड़ कर अपने कर्तव्यों को भूल जाना—यह मोह ममता का राजस-तामस स्वरूप फर्तव्य के अनुसार जिन सासारिक सम्ब- निधयों, पदार्थों या व्यवहारो का भार अपने ऊपर हो अथवा जो व्यवहार स्वयम् स्वीकार किए हो उन-अपनी जिम्मे- है। परन्तु २५१ दैवी सम्पद दारी में आए हुए-सम्बन्धियों एव पदार्थों के प्रति अपना कर्तव्य स्नेहपूर्वक अच्छी तरह पालन करना और अपने आभितो का प्रेमपूर्वक भरण-पोषण, रक्षण-शिक्षण करना , उनके दु सों में स्नेहपूर्वक सहायता करना तथा उनके हित के लिए उद्योग करना-यह मोह-ममता का सात्विक स्वरूप है। , भय लोगों को अपनी विद्या, बुद्धि, नल, तप, धन, सत्ता और सामर्थ्य का भय दिखा कर दयाना तथा दुख देना , मिथ्या बातो का भय बता कर लोगो को मुलाना, ठगना तथा मिथ्या ज्ञान की शिक्षा से लोगो को अज्ञान मेरस कर अपने अधीन रसना, अपने कर्तव्य पालन करने में तथा सात्विक व्यवहारो और कल्याण के प्रयान में रजोगुणी-तमोगुणी प्रकृति के पुरुषो की निन्दादि का भय करना तथा कल्पित देवी-देवता, भूत प्रेत आदि से डरना या डराना-यह भय का राजस- तामस वरूप है। जो दूसरो को भय देते हैं वे स्वय भयभीत रहते हैं, क्योकि आत्मा सप में एक है। परन्तु बुरे कर्मों के करने में सपके श्रात्मा परमात्मा का भय करना तथा अपने से अधिक ज्ञानी, बुद्धिमान, पलवार, धनवान, सत्तावान् आदि विशेष विभूति सम्पन्न व्यक्तियो का भय करके बिना समुचित कारण के उनका सामना न करना-भय का सात्विक स्वरूप है।
देवी सम्पद
२५२
-
राग-भीति-आसक्ति
भौतिक पदार्थो मे अति प्रीति करके मन को निरन्तर
उनमें उलझाए रखना और धन, कुटुम्ब आदि में पासक
होकर अपने कर्तव्यों में त्रुटि करना तथा अपने असली
कर्तव्य -सर्वभूतात्मैश्य ज्ञान से विमुख रहना-राग फा
राजस-तामस स्वरूप है । भेद बुद्धि से विशेष पदार्थों में राग
करने से उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप दूसरे पदार्थों में द्वैप स्वत'
उत्पन्न हो जाता है। परन्तु आत्मज्ञान तथा उसके साधन
साविक व्यवहारों में राग और एक प्रात्मा में पासक्ति
रखना-राग का सात्विक स्वम्प है।
अपनी प्रकृति के प्रतिकूल होने वाले पदाथा से तथा
अपने से प्रतिकूल दीपने वाले व्यकियो के साथ अथवा
बिना कारण ही किसी को अपने से मिन्न (येगाना) मान
फर इनसे द्वेष फरफे उनको हानि पहुँचाने या उनका
अनिष्ट फरने छ गिराने का भाव रपना-यह पग
राजस-सामस स्वरूप है। परन्तु दूसरों से द्वेष
कराने पाले अनेकता भेद भार को मिटाने के
उसका द्वेष करना अर्थात् द्वेष का द्वेष-वस्तु द्वेष'
किन्तु प्रेम-रूप हो जाता है, थव'
२५३
देवी सम्पद
घृणा-तिरस्कार
किसी को अपने से हीन, तुच्छ मलीन, अपवित्र
अधर्मो, पतित या दुराचारी समझ कर उससे घृणा करके
उसका तिरस्कार करना और उसे दु स देने में प्रवृत्त होना-
यह घृणा तिरस्कार का राजस-तामस स्वरूप है। जो दूसरों
से घृणा तिरस्कार करते हैं, वे स्वय तिरस्कृत होते हैं, क्योंकि
सब एक ही श्रात्मा के अनेक अङ्ग है। परन्तु अपने
तथा दूसरों के भीतर के रजोगुणी-तमोगुणी आसुरी भावों
को हटाने के लिए उन भावों का तिरस्कार करना यह घृणा
का सात्विक स्वरूप है।
ईपी
किसी के वैभन, सुख, सम्पत्ति, प्रतिष्ठा, मान, फीति,
गुण, विद्या, बुद्धि, पल, ऐश्वर्य आदि को देख कर जलना
और उस जलन से उसको हानि पहुँचाने या नीचा दिखाने
का प्रयत्न करना यह ईपी का राजस-तामस स्वरूप है।
परन्तु श्रेष्ठ पुरुषों के सद्गुण तथा सात्विक भाचरण देख
कर चित्त में जलन उत्पन्न किए बिना उनका अनुकरण
करके उनके सदृश बनने की स्पर्धा करना-ईर्षा का साविक
स्वरूप है।
मान-अहङ्कार
अपनी जाति, मर्यादा, प्रतिष्ठा, धन, पद, सत्ता, ऐश्वर्य,
दैवी सम्पद वल, विद्या, बुद्धि, धान, रूप, यौवन श्रादि भौतिक शरीर की उपाधियों का धमएष्ट करना , सय अपने को श्रेष्ठ, धनी और कुलीन समझ कर दूसरों को तुच्छ और नीच सम- मना और अपने कृत्यों को प्रशसा में पृले रहना~यह मान- अहवार का राजस-वामस स्वरूप है । दूमरों को तुन्छ जानने वाला अभिमानी स्वयं तुच्छ होता है, क्योंकि निया की प्रतिक्रिया अवश्य होती है। परन्तु तुच्छ सासारिक सुखों के लिए रजोगुणी-तमोगुणी पुरुषों के सामने दीनता न करने का आत्म गौरव रसना, स्वावलम्बी होना तथा अपनी परिस्थिति में मम्न रहना , किसी से डर कर या दर पर अपने कर्तव्य कर्म से न हटना-यह मान का सालिक स्वरूप है और अपने को पञ्चभौतिक शरीर के अन्दर रहने चाला उसका आधारभूत शुद्ध भात्मा समाना सात्विक . अहार है। दम्भ..-पाखण्ड छल-कपट कर लोगों को घोसा देना , पापण्ड और "अशुद्ध व्यवहार से किसी को ठगना , अन्दर से एक यात और उपर से दूसरी बात पर पश्चना करना अथवा मुलावा देना-यह दम्म का राजस-सामस स्वरूप है। दूसरों को ठगने वाला स्वयं ठगा जाता है-अपने भावों का फल भाप ही को प्राप्त होता है। परन्तु दुष्ट, दुराचारियों से अपनी क्या
२५५
देवी सम्पद
अपनी रक्षा में पाए हुश्री की रक्षा करने के लिए दुष्टों से
छल का व्यवहार करना चावश्यक तथा न्यायसङ्गत
होता है।
द्यूत
छठयतामस्मि ।
-गी०५०१०३६
भय-पलियों में जुमा में है। अयान् एल करने पालों को
धूल से ही जीतने के लिए सब से यदा छल शुमा भी मैं परमेश्वर
यह छल किसी को हानि पहुँचाने की नियत से, द्वेप.
भाव से नहीं किया जाता, किन्तु लोगों के तथा स्वय छत
फरने वालों के हित के लिए प्रेम भार से किया जाता
है कभी-कभी मूर्यो, पालको और पशुओ को हानि से
बचाने के लिए भी छल करना पड़ता है, जैसे कि पालक
को औपधि देने के लिए मिश्री दिसाना-यह छल का
सात्विक स्वरूप है।
हिंसा-दण्ड
मन, पाणी तथा शरीर से उचित कारण के बिना किसी
को किसी प्रकार की पीडा पहुँचाना अथवा किसी फी वृत्ति
में बाधा देना-हिसा का राजस तामस स्वरूप है । परन्तु
परिणाम के बड़े सुप या बड़े लाभ पहुँचाने के भाव से
अथवा बड़ी हिसा रोकने के लिए एक बार थोडी देर के लिए
देवी सम्पद
२५६
,
किसी को कष्ट दिया जाय या थोड़ी हिंसा की जाय तो वह
हिंसा नहीं, दया है । जिस वरह फोड़ा मिटाने के लिए चिरा
देने की पीड़ा करना, भयानक रोग से बचाने के लिए टीका
देना, अजीर्ण के मोमार का भोजन छीन लेना इत्यादि ।
इसी तरह फभी ऐसे अवसर आते हैं कि उच्चकोटि के
जीवों की रक्षा के लिए हीनकोटि के जीवों को मारना
भावश्यफ हो जाता है। जैसे कि सिह या पागन कुत्ते धादि
से मनुष्यों के प्राण बचाने के लिए उनको मारना, कोई
हत्यारा भले आदमियों की हत्या करने को उद्यत हो और
अन्य उपायों से निवृत्त न हो तो उन भले आदमियों की
प्राण-रक्षा के लिए हत्यारे को मार देना अथवा किसी
हत्यारे को प्राण-दण्ड देकर अनेक हत्याएँ बचाना-यह
हिंसा का सात्विक स्वरूप है।
परित्राणाय साधूना विनाशाय च दुष्कृत्ताम् ।
धर्म सस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।
अर्थ-भले भादमियों की रा तया दुराचारियों के विनाश
के हेतु सया धर्म की स्थापना के लिए मैं युग युग में-भवतार
खेता हूँ।
इसी तरह चोर, डाकू, अन्यायी, पावतायी, दुराचारी
को पचित दरास देना भी हिंसा नहीं, किन्तु अहिसा है
२५७ देवी मम्पद दगहोदमयतास्मि । -गी. प्र .२% पयशासन करने वालों का दयह मैं हूँ अर्थान् दुष्ट प्रति के लोगों को सम्मागं पर खाने के निण, "दए " भी समष्टि धारमा परमामा की (गत को धारण फरो पाली) एक विभूति है। सशय परमात्मा यानी अपने स्वम्प के सत्शास्रोत सय ज्ञान में, अपने कर्तव्य-कर्म करने में तथा अपने निश्चय में सशम या शङ्का फरते रहना , किसी भी विषय में निश्चया- स्मक न होकरसङ्कल्प विकल्प करते रहना-सशय का राजस- तामस स्वरूप है । परन्तु बिना जॉच किए हुए व्यक्तियों के वास्यों, आपरणों तथा व्यवहारों की सत्यता के विषय में शक्षा करके उनको अच्छी तरह जाँच करने के बाद निर्णय फरना तथा अपनी बुद्धि के उपयोग बिना किसी विषय में निश्चयात्मक न होना-मशय नहीं, किन्तु सारधानी है। हठ-दुराग्रह किसी यात अथवा क्रिया को मूदता से पकड़ कर नहीं छोड़ना, उससे अपने तथा दूसरे शरीरों को पीड़ा होती हो अथवा अपनी तथा दूसरों की हानि होती हो तो भी उसे कट्टरता से पकड़े रहना, पतन होने वाले व्यवहारों में अन्य विश्वाम रए कर उन्हें किए ही जाना, देश, काल और .
देवी सम्पद २५८ परिस्थिति की भावश्यकतानुसार विचारों तथा व्यवहारों में परिवर्तन न करना , किसी विषय के विचार में युति और न्याय की अवहेलना कर कोरा जिद्द किए जाना तथा भय, शोक और मद के भावों में अन्ध श्रद्धा करके उन पर अत्यन्त आमह करना यह हठ अथवा दुराम का राजस-तामस स्वरूप है । परन्तु सपके साथ एकता के भाव से अपने कर्तव्य- फर्म करने में द रहना, अच्छी तरह युक्ति और विचारपूर्वक जो सिद्धान्त स्थिर किए हों उनके विषय में सशय रहित रहना, उनसे विचलित न होना तथा जो काम अच्छी तरह सोच विचार कर करना स्वीकार किया हो, उसे यथाशक्य पूरा करने के लिए जी-जान से प्रयत्न करना-यह छठ और दुराग्रह नहीं, फिन्तु मात्विक दृढ़ निश्चय है।
चतुर्थ प्रकरण
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चतुर्थ प्रकरण
उपसदार
स प्रत्य में परतन्त्रता अर्थात् पन्धन से
मुक्ति यानी स्वतन्यता पाने क उपाय
फा निरूपण दिया गया है और वह
उपाय, मन्य के मुख पृष्ठ पर ही "देवी
सम्पद्विमोक्षाय नियन्धायासुरी मता"
(दैवी सम्पद् से मोक्ष और आसुरी से यन्धन होता है)
का मूल मन्त्र देकर वहीं पता दिया गया है, फिर सारे अन्य
में उसी की व्याख्या की गई है। जगत की अनन्त प्रकार
की अनेकता (नानाव) को सथी मान फर, राग-द्वेप के
भावयुक ससार के व्यवहार करना='
"आसुरी सम्पदा"-
और वक्त नानात्व को मूळा-माया का सैल-जान कर
उसके एकत्ल भाव को सथा जानना और उस सच्चे ज्ञान
के आधार पर सबके साथ प्रेम का व्यवहार फरना-
"दैवी सम्पदा-श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों से प्रमाणित
.
किया गया है।
~
*प्रेम का नखासा पीछे तृतीय प्रकरण
देवी सम्पद
"
२६०
यह भी कहा गया है फि फेवल आध्यात्मिक दृष्टि से
ही नहीं, किन्तु आधिभौतिक और आधिदैविक रष्टि से भी
जगत की एकता सञ्ची और अनेकवा झूठी है। पुस्तक के
प्रथम तीन प्रकरणों में उक्त विषय की विस्तृत व्यारया करके
अप उपसहार में उसका निष्कर्ष दिया जाता है।
यह नाना भाँति का स्थूल (भौतिक) जगत जो प्रत्यक्ष
इन्द्रियगोचर हो रहा है अर्थात् जो आँखों से दीखता है,
कागों से सुना जाता है, नाक से सूंघा जाता है, जिहा से
धक्सा जाता है, त्वचा से स्पर्श किया जाता है वह सप,
उही पञ्चतत्वों (अथवा जो अन्य दार्शनिक एव वैज्ञानिक
लोग पाँच से अधिक तत्व मानते हैं, उनके मसानुसार उतने
तत्त्वों) के सम्मिश्रण का अनन्त प्रकार का यनाव है, अर्थात्
जिन पञ्चतत्वों का, एक राजा, महाराजा, विद्वान, प्राचार्य,
ज्ञानी, महात्मा का शरीर होता है, उन्हों का एक छोटे से
छोटे व्यक्ति, अछूत, चाण्डाल और पशु पक्षी, वनस्पति आदि
का शरीर होता है । स्थावर जगम जितनी सृष्टि है वह सम
उन्हीं पञ्चतत्त्वों के सम्मिश्रण का अनाव है और सभी एक
दूसरे के उपकारी, उपकार्य हैं तथा एक दूसरे पर निर्भर
(अन्योन्याश्रित ) हैं। इसलिए भौतिक (स्थल ) जगत की
एकता सच्ची है और इसमें जो अनन्त प्रकार की भिन्नता
का बनाव दोपता है, उसका प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता
है कोई भी वस्तु सदा एक सी नहीं रहती इसलिए वह
देवी सम्पद २६१ असत् है। किसी भी प्राणी का शरीर लीजिए-गर्भाधान से लेकर ज्यों-ज्यों वह बढता है, उसकी अवस्था प्रतिक्षण पद लती रहती है । गर्भ में अनन्त प्रकार के रूप बदलता हुधा, विशेष अवधि मे पूरा शरीर बन फर गर्भ से बाहर आता है और बाहर भी वही परिवर्तन की क्रिया निरन्तर जारी रहती है। कितने ही परमाणु प्रति क्षण शरीर में से निकलते और कितने ही प्रवेश करते रहते हैं। शनैशने याल्यावस्था से युवावस्था, प्रौढावस्था और फिर वृद्धावस्था हो जाती है। इन अवस्थाओं का परिवर्तन किसी विशेष समय में ही एकदम नहीं होता, किन्तु प्रति क्षण निरन्तर होता रहता है और घटा- पढी को क्रिया निरन्तर जारी रहती है। शरीर का विनाश, यद्यपि किसी विशेष समय में एकदम होता प्रतीत होता है, परन्तु वास्तव में वह भी पहले निरन्तर होता रहता है और मरने के समय, इस एकर परिवर्तन की प्रतीति एक साथ होती है । इसी तरह स्थावर पदार्थो का भी प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है। वनस्पति (वृक्ष लता आदि) किसी विशेष समय में एकदम नहीं उगते और न एकदम सूखते ही हैं, फिन्तु उनके बढने घटने की क्रिया प्रति क्षण निरन्तर जारी रहती है। सनिज पदार्थ-हीरा, पन्ना, माणिक, मोती, सोना, चाँदी, पत्थर, मट्टी आदि-भी निरन्तर परिवर्तन की क्रिया में से गुजरते हुए अपने अपने प्रकृत रूप में आते हैं और फिर भी उनका परिवर्तन एव वृद्धि, हास जारी रहता है। काल
देवी सम्पद
२६२
(समय) का भी निरन्तर परिवर्तन होता है। सूर्योदय से
लेफर सूर्यास तफ तथा शाम से लेकर सुबह वफ, समय
निरन्तर पदलता रहता है। इसी तरह ऋतु मी प्रति पण
पदलती रहती है। सुबह के सुहारने शोवल समय कोहदा
फर उसके स्थान में दुपहर का फड़ा धूप एकदम नहीं था
जाता और दिन के प्रकाश को हटा फर राम का अन्धकार
भी हठान पृथ्वी माइल को आच्छादित नहीं कर लेता, न
जाड़े की सर्दी सहसा प्रोम में परिणत होती है, किन्तु
सभी परिवर्तन प्रतिक्षण निरन्तर होता रहता है। इसी तरह
वस्तु और काल के साथ-साथ देश का भी निरन्तर परिवर्तन
होता रहता है । इसके अतिरिक्त देश-काल और परतु यानी
ससार का कोई भी पदार्थ सयको सदा एक-सा प्रतीत भी
नहीं होता। किसी को कोई वस्तु किसी अवस्था में एक
प्रकार की प्रतीत होती है, दूसरी अवस्था में तथा दूसरे
व्यक्ति को वही वस्तु दूसरी तरह भान होती है, किसी को
कोई वस्तु किसी अवस्था में अनुकूल प्रतीत होती है, दूमरी
अवस्था में अथवा दूसरे व्यक्ति को वही प्रतिकूल प्रतीत
होती है । दिनचरों को सूर्य प्रकाश रूप दोसता है-निशा
चरों को अन्धकार रूप, सूखे में पृष्टि सुदापनी लगती है-
अति-वृष्टि के समय वर्षा भयानक प्रतीत होती है, भारत
वर्ष में प्रीष्मरतु में सूर्य का वेज असह्य होता है-विलायत
में सूर्य के दर्शन को लोग सरसते हैं, प्यास से मरते हुए
२६३
दैवी सम्पद
फो जल जीवनदावा है-जलोदर फे रोगो तथा डूबने वाले
फा प्राण हरता है , सुख शान्ति के समय जो देश प्रिय
लगता है-प्रशास्ति और विपत्ति के समय उसफो छोड़
भागना हितकर प्रतीत होता है , सुख का दीर्घ काल भी
पहुत अल मालूम देवा है-दुप का एक क्षण भी वर्ष के
गरावर भान होता है, धन धान्य आदि का साह एवं सत्ता
तथा मान-प्रतिष्ठा शान्ति के समय एव योग्य व्यक्तियों के
पास हो तो सुपदायक होते हैं-विप्लव के समय अथवा
अयोग्य व्यक्तियों के पास ये ही महान् दुखदायक होते हैं,
सदाचारी व्यक्तिया की विद्या सबको लाभदायक होती है-
दुराचारियों को विद्या से सबको हानि होती है , पुन-हीन
गृहस्थी पुत्र जन्म पर पड़ा हर्ष मानता है-विधवा खी
गर्भ में हो उसे मार डालना चाहती है , पतित्रता स्त्री पति
फो और स्नेह करने वाला पति पत्नी को एव सुपुन पिता को
प्यारा लगता है-इनके विपरीत गुणों वाले पति, पत्नी और
पुन, शत्रु प्रतीत होते हैं , सर्दी में जो गर्म कपड़े तथा गर्म
आहार-विहार अच्छे लगते हैं---गर्मी में वे ही पुरे प्रतीत
होते हैं , भूखे को भोजन यहुत स्वादु लगता है-अपाए
हुए को उससे ग्लानि होती है , तेच अग्नि वाले को युक्ति
से पाने पर दूध, धृतादि पौष्टिक पदार्थ मलवर्द्धक होते हैं-
मन्दाग्नि की दशा में अथवा अयुक्ति से पाने पर रोग उत्पन्न
करते हैं, मनुष्य के लिए श्राफ विप हैवही बकरी को
.
,
-
दैवी सम्पद २६४ सुराक है , मनुष्य को शहद मीठी लगती है-कुचे को कड़वी , हिन्दू लोग गङ्गा लान से पुण्य मानते हैं-जैनी पाप , हिन्दू मूर्ति-पूजा और गौरक्षा धर्म मानते हैं-मुसन- मान मूर्ति तोड़ना और गौहिंसा धर्म मानते हैं, भारत- धामी स्त्रियो को पददलित रसना हितकर समझते हैं- पश्चिमी लोग उनको पूरी स्वतन्त्र रसना श्रेयस्कर मानते हैं, भारतवर्ष में पुरुप का स्त्री को विवाह कर अपने घर ले जाना श्रेष्ठाचार है-बर्मा मे स्त्री का पुरुप को विवाह कर अपने घर लाने की रिवाज अच्छो गिनी जाती है । कहाँ तक गिनाया जाय, जगत का कोई भी व्यवहार सदा-सर्वदा एकसा नहीं रहता । अत जो वस्तु निरन्तर परिवर्तनशील है- -एक क्षण के लिए भी स्थिर नहीं रहती-उसके किस रूप को सच्चा माना जाय । सत्यता के ठहरने के लिए कोई स्थिर विन्दु भी तो होना चाहिए। किन्तु जगत के नाना भाँति के यनाव में जरा भी स्थिरता (स्थिर विन्दु) नहीं है इसलिए वह सत्य नहीं कहा जा सकता। परन्तु एकस्य भाव में, जगत अवश्य ही सत्य है , क्योंकि उसका अस्तित्व (होना) प्रत्यन है, उसमे हलचल (चेतनता) प्रत्यक्ष है और वह प्यारा (सुहावना) भी लगता है इसलिए अस्ति भावि प्रिय रूप से सदा एकसा रहने वाले एकल भाव में यह स्थूल जगत सत् है और प्रति क्षण बदलने वाले नानात्व भाव में श्रसन्।
देवी सम्पद
२६५
अब सूक्ष्म आधिदैविक दृष्टि से विचार कर देसा नाय
वो मौलिक जगत के मूल तत्व अपने सूत्म भार में पनी
भूत होकर हो स्थल धनते हैं और सत्व, रज, तम तीनों
गुणों के सयोग के तारतम्यानुसार अनन्त प्रकार के श्य
उत्पन्न करते हैं, साथ ही प्राणियों के अन्त करण की सूक्ष्म
वृत्तियों, अपनी घनता से स्थूल होकर, उफ तीनों गुणों के
तारतम्य से, जगत के उपरोक्त नाना प्रकार के दृश्यों के
साथ सम्बन्धित होकर भौति भाँति के व्यवहार करती हैं।
साराश यह कि स्थूल जगत का कारण सूदम जगव है।
किसी भी घटना भएका कार्य का पहिले (सूक्ष्म ) मन में
सङ्कल्प उठता है और वह सङ्कल्प जय रद्ध होकर पनोभून हो
जाता है, नब कार्य रूप में परिणत होता है। मन में जम
देसने का सङ्कल्प उठना है तो वह तेनात्मक होकर पशु रूप
से नाना प्रकार के रूप देखता है., सुनने का सङ्कल्प पठता
है तो आकाशात्मक होकर कर्ण रूप से शब्द सुनवा है।
तूंपने का सङ्कल्प उठता है तब पृष्ठयात्मक होकर नासिका
रूप से गन्ध लेता है , रसास्वादन का सङ्कल्प उठता है तो
जलात्मक होकर रसना रूप से सम्म रसा का स्वाद लेता है
और स्पर्श करने का सङ्कल्प रहता है. तो बाप्वात्मक होकर
त्वचा रूप से सब प्रकार के म्पर्श करता है। एक तरफ
सो (सरके ) समष्टि मन के सङ्कल्प से हम पश्चतत्व
स्यूल होकर समष्टि जगत के सत्र पदार्थ रूप धनते हैं और
दैवी सम्पद खुराक है २६४ , मनुष्य को शहद मीठी लगती है कुत्ते को कड़वी, हिन्दू लोग गङ्गास्नान से पुण्य मानते हैं जैनी पाप , हिन्दू मूर्ति पूजा और गौरक्षा धर्म मानते हैं-मुसल- मान मूर्ति तोड़ना और गौहिंसा धर्म मानते हैं , भारत- वामी त्रियों को पद्दलित रखना हितकर समझते हैं-- पश्चिमी लोग उनको पूरी स्वतन्त्र रसना श्रेयस्कर मानते हैं, भारतवर्ष में पुरुष का स्त्री को विवाह कर अपने घर ले जाना श्रेष्ठापार है-धर्मा में स्त्री का पुरुप को विवाह कर अपने घर लाने की रिवाज अच्छी गिनी जाती है । कहाँ तक गिनाया जाय, जगत का कोई भी व्यवहार सदा सर्वदा एकसा नहीं रहता । अत जो वस्तु निरन्तर परिवर्तनशील है -एक क्षण के लिए भी स्थिर नहीं रहती-उसके किस रूप को सच्चा माना जाय । सत्यता के ठहरने के लिए कोई स्थिर विन्दु भी तो होना चाहिए। किन्तु जगत के नाना भाँति के बनाव में जरा भी स्थिरता (स्थिर विन्दु) नहीं है- इसलिए यह सत्य नहीं कहा जा सकता । परन्तु एकत्य भाव में, जगत अवश्य ही सत्य है , क्योंकि उसका अस्तित्व (होना) प्रत्यक्ष है, उसमें हलचल (चेतनता) प्रत्यक्ष है और वह प्यारा (सुहागना) भी लगता है इसलिए अस्ति भाति प्रिय रूप से सदा एकसा रहने वाले एकत्व भाव में यह स्थूल जगत सन् है और प्रति क्षण यदलने वाले नानात्व माव में असा। - देवी सम्पद . - २६५ अब सूक्ष्म आधिदैविक दृष्टि से विचार कर देखा जाय तो भौतिक जगत के मूल तत्त्व अपने सूक्ष्म भाव में धनी- भूत होकर ही स्थल बनते हैं और सत्त्व, रज, तम तीनो गुणों के सयोग के तारतम्यानुसार अनन्त प्रकार के दृश्य उत्पन्न करते हैं, साथ ही प्राणियों के अन्त करण की सूक्ष्म वृत्तियाँ, अपनी धनता से स्थूल होकर, उक्त तीनो गुणों के तारतम्य से, जगत के उपरोक्त नाना प्रकार के दृश्यो के साथ सम्बन्धित होकर भौंति भाँति के व्यवहार करती हैं। साराश यह कि स्थूल जगत का कारण सूक्ष्म जगत है । किसी भी घटना अथवा कार्य का पहिते (सूक्ष्म ) मन में सङ्कल्प उठता है और वह सङ्कल्प जब दृढ होकर घनीभूत हो जाता है, तब कार्य-रूप में परिणत होता है। मन में जब देखने का सङ्कल्प उठता है तो वह तेजात्मक होकर चक्षु रूप से नाना प्रकार के रूप देखता है, सुनने का सङ्कल्प उठता है तो श्राकाशात्मक होकर कर्ण रूप से शब्द सुनता है , सूंघने का सङ्कल्प उठता है तर पृथ्व्यात्मक होकर नासिका रूप से गन्ध लेता है , रसास्वादन का सकल्प उठता है तो जलात्मा होकर रसना रूप से सत्र रसो का स्वाद लेता है और स्पर्श करने का सङ्कल्प उठता है तो वाय्वात्मक होकर त्वचा रूप से सब प्रकार के सर्श करता है। एक तरफ तो ( सबके ) समष्टि मन के सङ्कल्प से सूक्ष्म पञ्चतत्व स्थूल होकर समष्टि जगत के सब पदार्थ रूप यनते हैं और देवी सम्पद २६६ दूसरी तरफ प्रत्येक शरीरधारी फे व्यष्टि मन के सर से सक पश्चत ही व्यष्टि भाव से इन्द्रिय रूप होकर जगत के पदार्थों के साथ सय प्रकार के व्यवहार करते हैं। अत स्थूल आधिभौतिक जगव की सत्ता सूक्ष्म बाधिदैविक जगत पर ही निर्भर है। परन्तु सूदम आधिदैविक जगत का नानात्व भी परिवर्तनशील है अर्थात् वह मन का सङ्कल्प रूप होने से प्रति-क्षण निरन्तर पदलता रहता है, क्योंकि मन के सकल्प एफ क्षण भी इसार स्थिर नहीं रहते, किन्तु क्षण क्षण में उठते और लय होते रहते हैं, अव सूक्ष्म जगत का नानात्व भी झूठा है । परन्तु चित्त जय एकाग्र होता है तय सब सङ्कल्प मिट जाने पर भी एफामावस्था का अस्तित्व, उसका अनुभव और उसका आनन्द समान रूप से सम में रहता है, अत सूक्ष्म जगत की भी एकता सच्ची है। उपरोक्त विषय का प्रत्यक्ष अनुभव नित्य-प्रति-जाप्रत, स्वप्न और सुपप्ति (स्वप्न रहित गाद निद्रा) की अवस्थाओं सब लोगों को होता रहता है । जाप्रत अवस्था मे स्थूल शरीर से स्थूल व्यवहार होते हैं , स्वप्न अवस्था में सूक्ष्म- सङ्कल्पमय शरीर से केवल मानसिक व्यवहार होते हैं और सुपप्ति (गाद निद्रा) की अवस्था में जामत और स्वप्न (स्थूल और सूक्ष्म दोनों शरोरों) के व्यवहार अपने कारण = प्रकृति में लय होकर कारण (बीज) रूप से रहते हैं और फिर इसी कारण प्रकृति से पुन इनका प्रादुर्भाव होता दैवी सम्पद है। जिस तरह जामत स्वप्न और सुपुप्ति-तीन अवस्थाएँ प्रति दिन समको अनुभव होती हैं, उसी तरह मनुष्य शरीर की वायु में भी सक्त तीनों अवस्थाएँ होती हैं। प्रत्येक शरीर अपनी उत्पत्ति से पहिले बीज रूप से पिता-माता के गर्भ में सुपुप्त अवस्था में रहता है, फिर शैशव में मनोराज्य की स्वप्न अवस्था में से होकर स्थूल जगत का अनुभव करने वाली बाल, युवा एव वृद्धावस्था रूपी जाग्रत को क्रमश प्राप्त फरता है और शरीर के नाश होने पर उक्त स्थूल (जामत) और सूदम (स्वप्न मनोराज्य की अवस्था) दोनों सुषुप्ति (कारण) में लय हो जाते हैं और समय पाकर जब मन के सङ्कल्प उद्भव होते हैं, तब फिर सुषुप्ति (कारण) से स्वप्न (सूक्ष्म) और जापत (स्थूल) निकल पाते हैं। इसी तरह यह स्थूल और सूक्ष्म जगत भी अपने कारण रूप प्रकृति से उत्पन्न होता है और पीछे प्रकृति में ही लय हो जाता है । साराश यह कि जामत:स्थूल का आधार स्वप्न = सूक्ष्म है और जापत =स्थूल और स्वप्न सूक्ष्म दोनों का आधार सुपुप्ति= कारण है। जाप्रत स्थूल मे, स्वप्न = सूक्ष्म अवस्था यानी मन के सङ्कल्प और सुपुप्ति= कारण अवस्था यानी प्रकृति, दोनों बनी रहती है और स्वप्न सूक्ष्म अवस्था में सुपुप्ति कारण यानी प्राकृत अवस्था बनी रहती है और जामत, स्वम एव सुपुप्ति तीनों अवस्थाओं का अनुभव करने वाला अपना आप (आत्मा) सब अव- देवी सम्पद २६८ म्याओं में इफसार रहता है। जामत अवस्था में जो अपना आप "" रूप से सय रचूल व्यवहार करता है वही अपना पाप स्वप्न अवस्था में सूक्ष्म मानसिक व्यवहार करता है और जय जागता है, सप अपने स्वप्न के धनुभय स्मरण करता है। सुपुप्त अवस्था में यही अपना भाप गाद निद्रा का आनन्द रोता है और जब जागमा हे वय अपनी सुपुस्ति के घानन्द, और कुछ भी न जानने रूपी अशान, का स्मरण करता है। यद्यपि शरीर की जापत (स्यूल), स्यम (सूदम) और सुपुप्ति (कारण)-तीनों अवस्थाओं को भिन्नता बदलवी रहती है, परन्तु इन सीना भवस्थाओं में एफया रूप अपना थाप यानी सत चित् आनद स्वरूप, मर्वव्यापक, अज, यविनाशी बात्मा सदा एकरस रहता हुमा सपका था। भव फरता रहता है। जिस तरह व्यष्टि शरीर को तीन अवस्थाएँ हैं, उसी तरह समष्टि जगत की भी स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीन अवस्थाएँ हैं और जो सत चिा मानन्द- स्वरूप आत्मा व्यष्टि शरीर में सदा इकसार रहता है, वही समष्टि जगत की तीनों अस्थाओं में भी सदा इफसार पना रहता है और साथ ही साथ यह इन अवस्थाओं से परे अर्थात् इनसे अलिप्त रहता है। जिस तरह बाइस्कोप फे दिपाय में साथ पर्दा सपका आधार होता है- -उसमकेद पर्दे पर पहिले अंधेरे का प्रतिविम्य पडता है और फिर उस अंधेरे के बीच में एक गोल प्रकाश पड़ता है और उस गोल देवी सम्पद २६९ प्रकाश में नाना प्रकार के रश्यों का प्रतिविम्ब पड़ता है, उसी तरह एक शुद्ध स्वरूप आत्मा में पहिले उसको चित्त-शक्ति अर्थात् प्रकृति (माया) के आवरण की सुपुप्त अवस्था भाती है, फिर इस सुपुति में मानसिक सम रूपी स्वमावस्या का गोल प्रफाश पड़ता है और उस स्वभावस्था रूपी प्रकाश में नाना भाँति के स्थूल जगत का पनाव बनता है। जिस तरह पाइस्कोप के दिसाय में उस अन्धकार, प्रकाश और नाना मांति के दृश्यो का आधार जो सफेद पर्श होवा है वह एक और सत्य होता है तथा उस पर भाँति-भाँति के जो प्रतिविम्म पड़ते हैं ये सब मिया दिताव मात्र होते हैं , उन दिखानों से पर्दे का कुछ पनवा बिगड़ता नहीं, इन नाना प्रकार के श्यों के दिखाई देते समय, उससे पहिले तथा पीछे वह ज्यों का त्यों निर्लेप बना रहता है, उसी तरह जामत, स्वप्न और सुषुप्ति अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म और कारण सरका भाधार-अपना थाप अर्थात् यात्मा-एक है तथा मदा एकरस रहने वाला एवं सत्य है और स्थूल, सूक्ष्म व कारण- नीनों अस्थाओं के मिन्न भिन्न परिवर्तनशील, कल्पित एवं मिथ्या पनावों का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वह सदा निलेप रहता है। जगत की एकता अर्थात् नाना भाँति के नाम रूपात्मक बनाव में जो एकल भाव है वही पात्मा-परमात्मा अथवा ईश्वर है और उस एकता रूपी ईश्वर में किसी प्रकार का -
देवी सम्पद
२७०
-
ऐश, धन्धन व पराधीनता आदि नहीं है, किन्तु वह पूर्ण
सुख स्वरूप, सदा स्वतन्त्र अर्थात् मुक्त है। उस एकता
रूपी ईश्वर को सर जगत में निरन्तर एक समान व्यापक
देखते हुए, अपने व्यक्तित्व को उसमें जोड़ कर तथा अपने
व्यक्तिगत स्वार्थों को उसके अर्पण करके अर्थात् सारे
जगत से अपनी एकता करके तथा अपने म्याओं को सबके
स्वार्थों के अन्तर्गत फरके, सबके साथ प्रेम पूर्वक समता
फा व्यवहार करने से कोई क्लेश, बन्धन या पराधीनता
शेप नहीं रहती।
इसलिए ससार में जितने भूतप्राणी हैं, उनसे अपनी
एकत्ता का अनुभव करते हुए, समत्व भार से सपके साथ,
उनके प्राकृतिक गुण तथा अपने अपने सम्बन्ध के अनुसार
यथायोग्य प्रेम का व्यवहार करना चाहिए। चाहे कोई
व्यक्ति किसी भी मजहब, धर्म, सम्प्रदाय अथवा मव का
अनुयायी हो, किसी भी देश का निवासी हो, किसी भी
जाति या समाज का हो अथवा किसी भी परिस्थिति में
हो यहाँ तक कि ब्रह्मा आदि देवता एवं पृथ्वी के सम्राट
से लेकर पशु, पक्षी, वनस्पति आदि ही क्यों न हो-सब
से एकता का अनुभव करते हुए, सनके प्राकृत गुणों की
योग्यता तथा परस्पर के सम्बन्ध के अनुसार यथायोग्य
साम्य भाव से प्रेम * का व्यवहार करना चाहिए। किसी
* प्रेम व समता का खुलासा पीछे तृतीय प्रकरण में देखिए।
देकी सम्पद - २७१ के साथ भी राग, द्वेप , घृणा, तिरस्कार का भाष नहीं रपना चाहिए। परन्तु यह प्रेमयुक्त ममता का व्यवहार, एकता रूप ईश्वर के लिए होना चाहिए, पृथकता रूप पिशाच के लिए नहीं । अर्थात् जो साविक प्रकृति के लोग, एकचा रूप ईश्वर के उपासक हों, उनके साथ सतोगुणी बर्ताव द्वारा सहयोग करना और उनके सात्विक आचरणों में सहायक होना चाहिए और जो राजस- तामस प्रकृति के लोग पृथकता (भेद बुद्धि ) रूपी पिशाच फे दास बन कर र के लोगो के प्रति राग-द्वेष आदि भावों के कारण एकता रूपी ईश्वर से विमुख रहते हैं- धनको पृथकता (भेद-बुद्धि) रूपी पिशाच से छुड़ाने के लिए-उनसे उनके प्राकृत गुणों के अनुकूल व्यवहार फरना चाहिए। इस तरह व्यवहार करने से किसी व्यक्ति को मानसिक अथवा शारीरिक व्यथा हो अथवा किसी की आर्थिक हानि हो अथवा किसी का प्रिय पदार्थों से वियोग हो जाय अथवा किसी का शरीर भी चला जाय तो कुछ भी परवाह न करनी चाहिए अर्थात् उपेक्षा कर देनी चाहिए, परन्तु इस बात का हरदम ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा करते समय अपने चित्त में कभी एकता के प्रेमयुक्त साम्य भाव का अभाव न हो। अपने शरीर के रोगी श्रङ्ग राग, देप, gणा, तिरस्कार का खुलासा तृतीय प्रकरण में दरिए।
देवी सद २७२ को स्वस्थ धनाने के लिए जिस तरह काट-छाँट, पुल्टिस, सिरसाव, मरहम-पट्टी धादि का उपचार किया जाता है, उसी तरह भेद-बुद्धि रूपी रोग-प्रस्त व्यक्तियों को एकता रूपी आरोग्यता प्राप्त कराने के लिए उनके हित के उद्देश्य से उनसे उनके उपयुक्त पर्वाय करना चाहिए, द्वेष तथा घृणा के भाव से नहीं । जिन लोगों के चित्त में एफ्ता के प्रेम भाव को दृढ़ता नहीं हो गई हो अर्थात् जिन्होंने अपने व्यक्ति की एव व्यक्तिगत स्वार्थों की दूसरों के साथ एकता न कर दी हो एव जिनका हदय राग, द्वेष तथा घृणा के भावों से दूषित पना हुआ हो, उनको दूसरों के राजस-तामस भान छुड़ाने के लिए किसी को शारीरिक कष्ट देने तथा किसी प्रकार की हानि पहुँचाने का कोई अधिकार नहीं है । उहें पहिले अपने भाव शुद्ध करने चाहिए। जो धार्मिक, साम्प्रदा- यिक, सामाजिक पर राजनैतिक सिद्धान्त अथवा नियम, सर्वत्र एक्ता के समस्त भाव के विरुद्ध, राग द्वेष से भेदो सादक विषमता उत्पन्न करने का समर्थन करते हो-चेपाहे कितने ही प्राचीन अथवा प्रतिष्ठित क्यों न हों-उनको अव हेलना कर देनी चाहिए। कोई सतोगुण प्रधान व्यक्ति या समाज अपने श्रेष्ठ गुणों के कारण ऊँचे दर्जे के कर्म करे और उनके फल- स्वरूप ऊँचे दर्जे के भोग भोगे , तथा रज तम प्रधान व्यक्ति या समाज अपने उक्त गुणों के कारण नीची श्रेणी के फर्म २७३ देवी सम्पद , करे और उनके फल-स्वरूप निम्न श्रेणी के भोग भोगे, तो आपस मे एक दूसरे के प्रति घृणा, तिरस्कार अथवा ई- द्वेष के भाव रखने का कोई कारण नहीं है अर्थात् ऊँचे दजें क कर्म करने और भोग भोगने वालों को निम्न श्रेणी वालों से घृणा और तिरस्कार न करना चाहिए तथा निम्न- श्रेणी वालो को उच्च श्रेणी वालों से ईर्या-द्वेप न करना चाहिए , क्योंकि गुणों के अनुसार कर्म करना और भोग भोगना ही सच्ची समता है। निम्न श्रेणी वाले लोगों को उच्च श्रेणी वालों से मैत्री का वर्ताव करना और उच्च श्रेणी वालो को निम श्रेणी वालो के प्रति करुणा और अनुमह का बर्ताव करना चाहिए । (आपस के भिन्न भिन्न प्रकार के प्रेम के बर्ताव का विस्तृत खुलासा इस पुस्तक के तीसरे प्रकरण में देखिए ।) वास्तव में कर्म और भोग स्वयं उचे-नीचे अथवा अच्छे-बुरे नहीं होते, किन्तु सभी अपने अपने स्थान में एक समान आवश्यक और आपस में एक-दूसरे के एक समान उपकारी हैं। सभी एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं । बडे-छोटे सभी एक दूसरे के भोक्ता भोग्य हैं-चाहे वे किसी जाति, वर्ण, समाज व देश के हो । यदि स्त्री पुरुष की दासी है तो पुरुष स्त्री का गुलाम है, पुत्र पिता का आज्ञाकारी है तो पिता पुन का टहलुआ है, शिष्य गुरु का अनुचर है तो गुरु शिष्य का सेवक है, का दास है तो स्वामी सेवक के घशवर्ती है - सेवक दैवी सम्पद २७४ और प्रजा राजा की भक्त है तो राजा प्रजा का नौकर है। अपनी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सभी एक दूसरे की सेवा पर निर्भर रहते हैं, अत्त एक दूसरे के सेवक सेव्य है। किसान स्थय अपनी क्या दूसरो को अन्न की आवश्यकता पूरी करता है, परन्तु वस्त्र के लिए उसे जुलाहा के अधीन रहना पड़ता है , औजारों के लिए जुलाहा तथा किसान धादि को सुथार और लुहार के अधीन रहना पड़ता है, चमड़े के सामान के लिए सबको चमार के और मकाई के लिए मेहतर के अधीन रहना पड़ता है। इसी तरह एक प्राम, नगर, प्रान्त अथवा देश के लोग अपनी सारी आव- श्यकताएँ अपने ही प्राम, नगर, प्रान्त अथवा देश में पूरी नहीं कर सकते, फिन्तु अपनी-अपनी विशेष योग्यतानुसार अपने यहाँ उत्पन्न होने वाले पदार्थो से दूसरे प्राम, नगर, प्रान्त एव देश की थावश्यकवाएँ पूरी करते हुए उनके बदले में दूसरों को विशेष योग्यता मे उत्पन्न होने वाले पदार्थो के लिए उनके अधीन रहते हैं। चाहे वे पदार्थ विद्या और शान के रूप में हों अथवा विज्ञान, कला, कौशल, मेहनत, मजदूरी के रूप में अथवा सगृहीत पूंजी एव सैनिक शक्ति की सहायता के रूप में अथवा आवश्यकीय भोग्य सामग्रियों के रूप में हो। साराश यह कि अपनी सारी इच्छाएँ और आवश्यकताएँ कोई भी व्यक्ति और कोई भी देश स्वय अपने आप पूरी नहीं कर सकता, किन्तु किसी न किसी
दैवी सम्प
२७५
रूप में एक दूसरे का श्राश्रय लेना ही पड़ता है। जिसकी
आवश्यकताएँ और आकाक्षाएं जितनी अधिक होती हैं,
उतना ही अधिक वह दूसरो के अधीन रहता है और
जिसकी आवश्यकताएँ तया आकाक्षाएँ जितनी कम होती
हैं, उतना ही वह कम पराधीन रहता है। परन्तु अपनी
घदो हुई आवश्यकताओं और आकाक्षाओ की पूर्ति के
लिए यदि कोई दूसरो की प्राकृतिक आवश्यकताओं और
आकाक्षाओं को अस्वाभाविक रूप से कुचल कर उनको
दयाना या पन्धन में रखना चाहे तो वह स्वय दबता और
बंधता है। रस्सी किसी के हाथ पैर बाँधती है तो वह
स्वयं बंधती है , अत्याचारी पुरुष किसी को किसी स्थान में
कैद करता है तो उसकी पहरेदारी में वह स्वयं कैद हो
जाता है , सर्प छछुन्दर को अपने मुँह में दबाए रखता है
तो वह स्वय उसके अधीन हो जाता है. यही दशा जगत में
सर्वत्र प्रत्यक्ष देखने में आती है, क्योंकि क्रिया की प्रतिक्रिया
अवश्य हुआ करती है।
तात्पर्य यह कि ऊँचा-नीचापन, सुख-दुख, स्वाधीनता-
पराधीनता आदि कोई स्वतन्त्र पदार्थ नहीं है ये केवल
व्यक्तियो और समाज के मन के भावों से उत्पन्न होते
हैं। इसलिए ऊँचे नीचे कर्म करने और भोग भोगने तथा
वाधीनता-पराधीनता के भेद-भाव से, आपस में लगा
गहना मूर्यता है और इसी से सा
-
देवी सम्पद २७६ होते हैं । सच्चा निरङ्कुश सुप और स्वाधीनता, सबके साथ एकता का प्रेम रखने और अपनी यावश्यकताओं एवं आफाक्षामों को कम करके उनको सर्वथा अपने वश में रखने में है। किसी व्यक्ति या समाज में जब तक सतोगुण की प्रधा- नता रहती है, तब तक वह राजस-तामस लोगों की अपेक्षा ऊँचा, सुखी और स्वतन्त्र ही रहता है, चाहे राजस- तामस प्रकृति के लोग उससे कितनी ही ईर्षा द्वेष करके ल. मगडें । और जिनमें रज-तम की प्रधानता होती है वे अपने राजस-वामस भावों के रहते सात्विक लोगों की अपेक्षा नीचे, दुसी और पराधीन ही रहते हैं। योग्यतम लोग ही समार में (अयोग्य लोगों की अपेक्षा) अधिक टिक सकते हैं, और जिनमें सतोगुण की प्रधानता है वे ही योग्य- तम हैं। निर्बल सबल को खुराक है, यह प्रातिक नियम प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है और जिनके हृदय में एकता रूपी ईश्वर का जितना ही अधिक निवास है अर्थात जिनमें श्रात्मशक्ति का जितना ही अधिक विकाश है, उतने ही वे अधिक सबल हैं तथा जो एकता रूपी ईश्वर से जितने ही अधिक विमुख हैं अर्थात् जिनमें आत्मप्रल की जितनी हो कमी है वे उतने ही निर्बल हैं। इसलिए सुख शान्ति- पूर्वक जीवित रहने की इच्छा रखने वालों को सात्विक आचरणो द्वारा एकता रूपी आत्मबल को पढ़ाना चाहिए।
दैवी सम्पद
जिस तरह गणित को इकाई ( Unt ) के योग
(एकता से ) दहाई धनती है, दहाई के योग से सैकड़ा,
सैकडा के योग मे सहस, सहस्र के योग से लक्ष , इसी
सरह उत्तरोत्तर योग के बढ़ते-बढते अनन्तता होकर सर्वत्र
एकता हो जाती है-एक के योग से अनन्त और अनन्त में
एक होता है उसी तरह अखिल जगत की एकता प्राप्त
करने के लिए एक-एक व्यक्ति अपने स्त्री-पुनादि नजदीकी
सम्बन्ध के व्यक्तियों की एकत्ता के योग से फौटुबिक एकता
करे, एक एक कुटुम्ब दूसरे कुटुम्मों से एकता में जुड़ कर
सामाजिक एकता फरे, एक-एक समाज दूसरे समाजों से
एकता में जुड़ कर देश की एकता करे और एक-एक देश
दूसरे देशों से एकता में जुड़ कर विश्व को एकता करे। इस
तरह एकता के योग की बढ़ती हुई क्रिया द्वारा प्रत्येक व्यक्ति
सारे विश्व से एकता करके अनन्तता को प्राप्त हो सकता है
अर्थात् परम सुखी और पूर्ण स्वाधीन-जीवन मुक्त हो
सकता है।
ससार के सारे लड़ाई झगड़े और नाना प्रकार के क्लेश
मिटा कर वास्तविक सुख-शान्ति स्थापित करने एव सच्ची
स्वतन्त्रता प्राप्त करने का एक मात्र अचुक उपाय यही है।
ॐततू सत
देवी सम्पद २७८ गीता-सार मित रहो सबों मे यार, मजा यही मिन्दगानी का ॥ टेक। पढे भाग मानुप देह पाई, राग द्वेष में अगर गंवाई, सख धौराली पाच हाल होगा ईरानी का मिथ रहो. एक ही राम जगत सारी में, पशु पक्षी और नर नारी में। छोड़ो रस्ता चैर भाव और बंचा तानी का मिल रहो ॥२॥ दुखियों अपर दया लोसता, पुषो जनों को मित्र समझता। मोद करे मन में सुनके यश हरिजन वानी का ॥ मिल रहो ॥३॥ पल दुष्टों से करे किनारा, सो हो भगवत को पारा। समता वृद्धि रपे मना करता सापाशी का मिल रहो. un पोळे सरप वचन प्रिय हित के निर्मल सरज भाव हों चित के। हिमा छल पमिमान करे नहीं काम गिनानी कामिका काम-क्रोध के रहे न वश में, आप शोक नहीं यश अपयश में। भीते ममता लोभ चिद यह सच्चे ज्ञानी का ॥ मिनरहो ॥६॥ फरतय समझ कर्म शुम करना, प्रहार का दम नहीं भरना। जग में रहो निसन सार मावत को पानी का मिल रहो.॥७॥ हर दम ध्यान प्रभू का धरिये, सब कुछ उसके अर्पण करिये। दूर करे दुख दाद पति सचमी महारानी का ॥ मिल रहो सों से यार, मग यही जिदगानी का l तत् सत् * श्रीमद्भगवद्गीता । प्रकृति
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दैवी सम्पद २७८ गीता-सार मित रहो सयों में यार, ममा यही जिन्दगानी का ॥ टेक॥ बदे भाग मानुष देह पाई, राग द्वेष में अगर गंवाई, लख चौरासी पीच हाल होगा ईरानी का ॥ मिल रहो ॥१॥ एक ही राम जगत सारी में, पशु पो और नर नारी में। छोदो रस्ता और भाव और बंचा-सानी का॥ मिल रहो ॥२॥ दुनियों ऊपर दया को रखता, सुखी जनों को मित्र समझता। मोद करे मन में सुनके यश हरिमन दानी का ॥ मिल रहो ॥३॥ सन दुष्टों से करे किनारा, सो होवे भगवत को प्यारा। समता बुद्धि रखे भला करता सरप्राणी का मिल रहो० ॥ यो सत्य वचन प्रिय हित के निर्मल सरल भाव हों चित फे। हिसा छल अभिमान करे नहीं काम गिलानी का मिल रहो ॥शा काम-क्रोध के रहे न वश में, हपं शोक नहीं पश अपयश में। जीते ममता लोभ चिह्न यह सच्चे पानी का | मिज रहो ॥३॥ करतय समझ कर्म शुम करना, महार का दम नहीं माना। जग में रहो निस सार भगवत की पानी का मिल रहो. हर दम ध्यान प्रभू का धरिये, सब कुछ उसके अर्पण करिये। दूर को दुख इन्द पति वमी महारानी फा॥ मिल रहो सवा से यार, मजा यही शिदगानी का MER वत् सत् * श्रीमद्भगवद्गीता । प्रकृति
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