Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Bhakutuhalam
Front matter
प्रस्ता
जब कि, यवन पादशाहोंके महअत्याचारसे
घोरराहु अपने तीन तिमिरसे भा भण्डारके
सुग्रंथ ज्योतिप विद्याका चारों ओरसे छादित .
ऋपि सुनीश्वर त्रिकालज्ञोंके प्रणीत ग्रंथावलवान्
कुंडमें हवन कर रहे थे जिन ग्रंथोंके अवलंबसे
कहलातेथे ऐसी अपूर्व घटनाको अवलोकन कर
हेतु "जीवनाथ नामा ज्योतिर्विद” जो उसः ।
पुरुप कहलाते थे ज्योतिप विद्यामें अद्वितीय
उनकी जिह्वामें सरस्वतीका वास बतलाते थे.
शब्दरूपी अमृतपुंजसे "भावकुतूहल" ज्योतिप:
निकाली है इसमें निमग्न होने ( पढने ) से :
सक्ता है तीनों कालकी बातको जान :
कुण्डलीका फलाफल कह सकताहै यह ग्रंथ :
के समझमें नहीं आता था इसलिये अनभिज्ञ
टीहरी (गढवाल ) निवासी महीधुर नामा "
त्तम देशभापामें टीका करी है जो लोगोंके
आपका
खेमराज
"श्रीवेङ्कटेश्वर" नालय
अनुक्रमणिका । - 4- .... ... .... ... .... ... ... ... .... 10. :. विषय, पृष्ठ. श्लोक कीर्तिविस्तारक राजयोग ३२ ९/हुताशन योग :.. शत्रुनासेपलपूर्वकराज्यप्राठि ३२ १० राजयोगभंगकारक योग.... अत्युत्कृष्ट राजयोग ३३ ११ अथ सामुद्रिकवि०८ सिंहासन योग ५३. १२/राजयोग तथा राजराजचिह्न चतुश्चक्र योग .... की ऐक्यता एकापलीयोग १४ पुण्यचिह्न और राज्यविह शत्रुसे विजय तथा स्वतः- यव चिफल प्रतिष्ठाप्त... ३४ १५/पुन:राजचिह्न नृपमुकुटयोग ३५ १६, परमलक्ष्मीमाप्तिचिह्न सामान्य राजयोग १७ अखण्ड लक्ष्मी १: पंडित शत्रुओंको त्रासकापीग शोड ३ चिह्न प्रतापाधिक्य राजयोग (३६ अनेक राजाओंमें श्रेष्ठका सुत्रएश्चर्यगण युक्त राजयोग ३७ २१ चिह्न कुवस्तुल्य राजयोग २५) हाथ में तथा पैरोंमें तिलका राजयोगका विवरण ३८ २६ लक्षण.... कैवलनृपवालकोंकाराज्ययोग ३९ २७ लक्षणोंका विवर्ण द्रपिट केरलदेशके नृपपुत्रों को अथ स्त्रीजातकाध्यायः राजयोग ३२ स्त्रियोंका फलानुरोपण नृपवालोंको राज्य अन्यको ग्रंयकर्ता का वाक्य धनाधिक योग ३३ सौभाग्यादि स्थानोंकी संज्ञा श्रीछत्रयोग ३४ सुभगा तथा दुष्टायोग नृपयालोंकोसुखादियुक्त पुंश्चलीत्व तया वैधव्ययोग যালবাগ ४१ ३५/ रूपाणोंसेयुक्तंपतितायोग चन्द्रयोगोंका प्रस्तार ४२ ३८ पुरुषाकार कुरुपयोग तया अनफादियोग फलयुक्त ४२ ५७ स्त्रियोंको राजयोग। केमद्रुमभंगयोग ४६/इन्द्राणीके सदृश कारकयोग हृदयोग ४७ लावण्य तिलका राजपत्नी फणियोग ४५ योग काकयोग ४९. विशेप नृपकन्याओंको दरिद्र योग ४५ राजयोग ... ... .... ..... ... - . ... .... ४४ ... .... .... .... .... ....
.... .... छातीका लक्षण .... ... कंधेका लक्ष .... १७ ... .... ७८ इथलीका लक्षण ८२ .... कंठ लक्षण 'अनुक्रमणिका। विषय. पृष्ठ. श्लोक विषय. उदर लक्षण ३४ ललाटमें भग व शकटका योग त्रिवली रोमावली लक्षण ७५ ३९/ कंठमें भौरोंका लक्षण ४० शुभाशुभ लक्षणों का कारण कवि०८ स्तनका लक्षण ४३ स्त्रीको रेखासे पतिको लाभ राजचिह्न कुलक्षण और कुयोगसे बाहुमूलका लक्षण ४७ पतिको हानि.... ९वह हायके अंगुलियोंका लक्षण ५० कुलक्षोंके शांतिकेलिये उपाय ९५ ५१ उपचारका नियामक वाक्य ९५ हायके पृष्ठका लक्षण ५३) सामुद्रिक किस प्रमाणसेकहा ९५ सब हाथोंमें रेखाफल ५५ अथ शयनादि द्वादशाव- पुनः अंगुली लक्षण ८१ ६५ स्थाविचाराध्यायः ११. पुनः नखलक्षण ६८ शयनादि१२ संज्ञाओंकाविचार ९८ पृष्ठलक्षण ७० अवस्था करनेकी रीति ८३ ७३ अथ स्थानवशादवस्था- हनु लक्षण फलानि। कपोल (गालका ) लक्षण ७७, सूर्यकीअवस्थाकाफल होठ लक्षण चन्द्रकीअवस्थाका फल १.५ दांत लक्षण | मंगलकी अवस्थाका फल | बुधकी अवस्थाका फल .... १०२ ताल लक्षण गुरुकी अवस्थाका फल वाणी लक्षण ८६ शनैश्चरकीअवस्थाकाफल नाकका लक्षण राहु-केतुअवस्था फल नेत्रका लक्षण .... ९९ विशेपअवस्याओंकाफल पलकका लक्षण अवस्थासे पुत्रसुखका वि. भौंह का लक्षण कानका लक्षण ललाटका लक्षण २) अस्कृिततीर्थगतमृत्यु शिरके केशका लक्षण ५. पुण्यक्षेत्र मेक्षिलामयोग १०५ मस्सातिल लान्छनोकाल. ६ अथ ग्रहाणांप्रत्येकावस्था शिरमें त्रिशूलका ल. १२ फलाध्यायः १२. दांतके शब्दका ल. ९३ १४) सूर्यको १२ भवस्याओंकाफल १०१ .... ८४ ८४ १.. .... जीभ लक्षण घंटी लक्षण ... ८८/शुक्रकी अवस्थाकाफल .... ८७ ८७ .... ८८ ... ८९ .... .... ८९ १०० अपमृत्यु योग .... ... १०५ .... ... .... .... ૨૨ ....
। विषय. विस्थाओंका .... तम सूर्यका स्थाओंकाफल ११६ प्तिमचंद्र फल ७ तिम भावर २ अवस्थाओंका .... मृत्यु निश्चय.... .... ८ .... अनुक्रमणिका। (७) पृष्ठ, श्लोक विषय. पृष्ठ, श्लोक. पुनः शनिका मारकत्ववि० १३९ :प्तमस्थान ११. १ मारकों का कब चिंतनकरना १३९ ग्रहोंके फल. स्थाओंकाफल ११३ २ अल्पायु आदिकाव. १४. आयुःस्थान तथा मारक स्थान कथन हातभावा १/मारकीश आदिके दशामें पप्तमगुस्अवस्थाओंकाफल १२३ घुकसतरअवस्थाओंकाफल १२६ १ अथ राजयोगाः। पदनसं१२ अवस्थाओंकाफल १२९ १ नवमेश पंचमेशकृतराजयो० १४१ सम: १२ अवस्थाओंकाफल १३२ १/ कर्मेशसप्तमेशकृत राजयो० १४१ एका ग्रहाणां बालाद्यव- त्रिविध राजयो० ध्रुव १४२ स्थाफलाध्यायः१३. सबल-दुबलोंको राजयो- लादि अवस्थाओंकी संज्ञा १३५ गका निश्चय.... १४२ १४ त्यादि अवस्थाओंका राजपुत्रोंको राजयोग कालनियम... १३५ २ अथ धनिकयोगा। सादि अवस्याओंकीसं. ३ मणियोंसे सुखकायो २४२ १६ ग्रहका फल ५ बहुत धन धर्म-भूपताकायोग १४३ १७ वस्थग्रहका फल ६ अनेक प्रकारसे धनकी वृद्धि १४३ हर्षितग्रहका फल ७ वाहनरलाधिपका योग... गांतग्रहका फल १३७ ८ राजाके तुल्य होनेका यो० १४३ स्त ग्रहका फल १३० ९| दिनदिनधन वृद्धियो. २१ लुप्तग्रहका फल.... १३७ १० जन्मसे धनी होनेकायोग... १४४ दिनग्रहका फल.... १३७ ११ कुवेर तुल्य धनिया १४४ पीडित ग्रहका फल १२ अचंचला लक्ष्मीयो० मारकराजयोग-धनिक- सामान्य धनिकयो. १४४ दरिद्रविचाराध्यायः१४. अथ दरिद्र योगः। शवि मारकत्व निरूपण १३८ १ धन नाशक योग १४५ ग्रहोंकी शुभाशु- निर्धन योग १४५ १३८ १ तुका भावफलनिश्चय १३९ ३|ऋणीशयोग ३ ३ ... २० २० .... .... .... २३ .... १४४ २४ २५ २ऋणीयोग .... ....
.... .... .... ... .... अष्टमेश दशाफल ... .... .... सप्तमेश दशाफल .... ... .... .... (८) अनुक्रमणिका। विषय, पृष्ठ, श्लोक. विपय. पृष्ठ. श्लोक, अथद्वादशभावाध्यायः१५. उच्चगत ग्रहदशाफल तनुभाव विचार... १४६ १. स्वक्षेत्रीदशाफल १६७ धनभाव विचार १४७ ५ मित्र क्षेत्रीदशाफल १६७ . १६ तृतीयभाव विचार ११८ रिपुराशिस्थ दशाफल १६८ चतुर्थभाव विचार १५ रोगेशदशाफल १६८ १८ पंचमभाव विचार अरिभाव विचार २३ व्ययेशदशाफल २६२ २० सत्तमभाव विचार २८ २६२ . २१ अष्टमभाव विचार अस्तंगतग्रहदशा फल २२ नवमभाव विचार १५५ ३० चन्द्रमाके पलानुसार सब दशमभाव विचार १५७ दशाफल १७० आयभाव विचार ५० बलानुकूलदशाफल १७० २४ व्ययभाव विचार १६० ५३ भावाधीशके बलानुशार दशाफल अथदशानयनाध्यायः१६. सूर्यादि ग्रहोंकी विंशोत्त- अथ ग्रहाणां गर्विता. दिभावाध्यायः १७. रीदशावर्ष संख्या .... १६१ दशा करनेकी राति २ ग्रहोंकी गर्वितादि संज्ञा १७१ दशाका भुक्तभोग्यानयन १६१ ३. गर्वितादिभावफल... १७२ अंतर्दशा विदशाकरण.... १६२ ४ गर्वितदशाफल .... १७३ सूर्यकी दशाफल ५. मुदित ग्रहदशाफल.. १७३ चन्द्रमाकी दशाफल ६ जितग्रहदशाफल मंगलकी दशाफल ७क्षोभितग्रहदशाफल १७४ ९ राहुकी दशाफल १६४ क्षुधित मइदशाफल १७४ गुरुकी दशाफल १६४ तृपित ग्रहदशा फल १७४ शनिकी दशाफल १६४ १० ग्रंयकर्ताका स्वकीयप्रशंसा- बुधदशाफल वाक्य १७५ १२ केतुदशाफल २२. टीका समाप्तिका समय १७५ शुक्रदशाफल १६६ २१/ टीकाकारका वचन १७५ इति भावकुतूहलस्य विषयानुक्रमणिका समाप्ता। २७ १ ... .... . ७ ८ .... .... .... .... ... .... .... ....
॥श्रीः॥ अथ भावकुतूहलम्. भाषाटीकासमेतम्. श्रीगणेशाय नमः। प्रणम्य कांतां परमस्य पुंसो हृदजसंस्थां परदेवतां ताम् ॥ करोति भापामथ बालतुष्टचै महीधरो भावकुतूहलीयाम् ॥ १ ॥ भापाकार ग्रंथादिमें मंगलाचरण रूप प्रणाम करताहै कि, परम पुरुप, परमात्माकीकांता (परब्रह्ममहिषी) जो हृदयकमलमें नित्य संस्थित परम देवता अर्थात् साक्षात् परब्रह्म निर्विकल्प स्वरूप आपही होरही एवं जिससे परे अन्यकोई नहीं है ऐसी उस परम इष्ट देवता साक्षात् योगमायाको प्रणाम करके महीधर नामा (ज्योतिपी टीहरी गढवालनिवासी)अथ (मंगलार्थ) अव "भावकुतू- हल" के अनभिज्ञ, बालकोंके प्रसन्नतार्थ इसकी भापाटीका सरल देशभापामें करताहै ॥१॥ महः सेतुं हेतुं सकलजगतामंकुरतया सदा शंभोरंभोभवभवभयत्राणजनकम् ॥ अहं वंदे तस्यासुरसुरमनोमोदनिकर चिदानंदं पादामलकमललावण्यमधिकम् ॥१॥ ग्रंथकर्ता ग्रंथादिमें अपने इष्टदेवता शिवजीको प्रणाम करता कि (अहं) मैं जीवनाथ नामा ज्योतिपी उस सदाशिवके जलसे 'उत्पन्न संसार यद्वा ब्रह्माके उत्पन्न कीहुई सृष्टिमें जो (२) भावकुतूहलम्। जन्म मरणका एक मात्र भयहै उससे रक्षा करनेवाले अर्थात् मुक्तिदेनेवाले तथा दानव, एवं देवताओंके मनके आनंदकी खानि “आनंदो ब्रह्मणो रूपम्" इस वचन प्रकारसे वोधन हुआ कि, देवदानव परब्रह्म स्वरूप जिस शिवका मनमें ध्यान करते हैं तथा ( चिदानंद ) निराकार केवल प्रकाशमय सत्तामात्र एक आनंदस्वरूप; समस्त जगतोंका उद्धार करनेवाले (सेतु) पुल संसारके उत्पन्न करनेका ( हेतु ) बी ऐसे शिवजीके चरणकमलोंका ( अधिकलावण्य ) आनंदामृतास्वादपरिपूर्ण जो अनुपमकोमलताहै उसके ( महः ) उत्सवपूर्वक प्रणाम करताहूं ॥१॥ विचारसंचारचमत्कृतं यन्मतं मुनीनां प्रविलोक्य सारम् ॥ श्रीजीवनाथेन विदांहिताय प्रकाश्यते भावकुतूहलंतत् ॥२॥ जो प्राचीन मुनियोंके अनेक मतोंके अनेक ग्रंथ बडे बडे हैं उनमें जब बहुतसा विचार फैलायाजाय तब उसका चमत्कार मिलताहै उसका सारांश देखकर थोडेहीमें वही चमत्कार मिलनेके हेतु विद्वानोंके उपकारार्थ श्रीजीवनाथ ज्योतिर्वित्करके यह "भावकुतूहल" प्रकाश कियाजाताहै ॥२॥ धात्रोदितं यवनकर्कशशब्दसंगादाधिव्यथावि द- लितं परमं फलं यत् ॥ मत्कोमलामलरवामृतरा शिधारास्नानं करोतुजगतामपि मोदहेतोः॥३॥ ज्योतिपका परम होराफल जो ब्रह्माआदियोंका कहाथा) अर्थात् प्राचीन उत्तम ग्रंथ ऐसे चमत्कारी थे कि, जिनके प्रभावसे ज्योतिपी त्रिकालज्ञ कहातेथे परंतु वीचमें मुसल्मान बादशाह भापाटीकासमेतम् । (३) ऐसे मतवादी हुये कि सनातन धर्म संबंधी हिंदुधर्ममें अत्यंत अत्याचार किया यहां पर्यंत कि हिंदुओंके पास जो जो उत्तम ग्रंथ थे बलात्कारसे नष्ट भ्रष्ट करदिये और " यथा राजा तथा प्रजा" सर्वसाधारणमें यावनी भापा प्रचलित होगई संस्कृतका हास होता गया ऐसे कारणोंसे ज्योतिप संबंधी चमत्कारी फलादेश भी व्यर्थताको प्राप्त होकर यावनी भापासे दलित होगया. इसके उद्धारार्थ इसग्रंथके भूमिकामें ग्रंथकर्ता पंडित जीवनाथ कहतेहैं कि, मेरे कोमल एवं निर्मल शब्दरूपी अमृत पुंजसे जो यह भावकुतूहल ज्योतिप फलादेश रूपी धारा निकसती है इसमें उक्त फलादेश (जवनोंसे मलिन होरहा) मानकरे जिससे निर्मल होकर पुनः अपने उसी पदको प्राप्तहो तथा संसारभी उसके उन्नतिसे हर्पित हो॥३॥ (अथ द्वादशभावसंज्ञा) तनुकोशसहोदरवंधुसु ता रिपुकामविनाशशुमा विबुधैः॥ पितृभं तत आप्तिरपाय इमे क्रमतः कथिता मिहिरप्रमुखैः॥४॥ लग्नादिक्रमसे १२ भावोंके नाम ॥ तनु (१) प्रकारांतरसे लग्न मूर्ति अंग उदय वपु कल्प आद्य कोश (२)प्र० स्वं अर्थ कुटुंब धन ॥ सहोदर (३) प्र० सहज भ्रातृ दुश्चिक्य विक्रम बंधु (४) प्र. अंबा पाताल मित्र सूर्य हिबुक गृह सुहृत वाहन पाताल सुख अंबु जल ॥ सुत (५) प्र. तनय बुद्धि विद्या आत्मज वावस्था तनय मंत्र ॥ रिपु (६)प्र० द्वैष्य वैरि क्षत रोग मातुल ॥ काम (७)प्र० यामित्र अस्त स्मर मदन मद काम धून ॥ विनाश (८)प्र० रंध्र आयु छिद्र याम्य निधन लय मृत्यु संग्राम ॥ शुभ (९)प्र. गुरु मार्ग भाग्य धर्म ॥ पितृ (१०)प्र. राज्य कर्म आकाश ॥ आप्ति (११) (४). भावकुतूहलम् । प्र० लाभ भव ॥ अपाय (१२) प्र० व्यय रिष्फ नाश और त्रिकोण ९५ वित्रिकोण ९ केंद्र १।४।७।१०।पणकर २१९४८ ११ ।आपोक्किम ३।६।९।१२.येभी संज्ञाहैं ॥ ४॥ (राशिस्वामि)कुजकवी बुधचंद्रदिवाकरा बुध सितावनिजा गुरुसूर्यजौ ॥ शनिगुरू च पुरातन पंडितैरजमुखादुदिता भवनाधिपाः॥५॥ राशियोंके स्वामि कहते हैं कि मेपका स्वामि मंगल, वृपका शुक्र, मिथुनका बुध, कर्कका चंद्रमा, सिंहका सूर्य, कन्याका बुध, तुलाका शुक्र, वृश्चिकका मंगल, धनका बृहस्पति, मकर कुंभका शनि, मीनका बृहस्पति ये राशिस्वामि हैं ॥५॥ अंगारकेदुगुरवो रविचंद्रपुत्रावादित्यचंद्रगुरवः क विचंडभानू ॥ भौमार्करात्रिपतयो बुधसूर्यपुत्रो शुक्रेदुजौ दिनकरात्सुहृदोभवंति ॥६॥ सौम्यःसमा हि सकलाः कविभानुपुत्रौ मंदेज्यभूमितनया र विजः क्रमेण ॥.भौमेज्यको सुरगुरू रिपवोवशिष्टा स्तात्कालिका व्ययधनायदंशत्रिवंधौ ॥७॥ मित्रामित्रचक्रम् । शत्रु कहतेहैं कि सूर्यकेचं वृ०म० ग्रहोंकेमित्र सम चं. मं. . श. चं.. स.बु स.चं..शु. स. म. स. चं. ब.श. शु. वु. मं. बु. | मं.. शु.श. श..म. श. . शु.भ. रा.श. . चं. बु.गु. स.चं. म.चं.मं.. मंगलके सू०चं. म.. चंद्रमाके मू०० ० वृ० बुधके शु० मू • बृहस्पतिके सू० चं० मं शुक्रके बु० श० शनिके बु० शु. मित्रहैं तथा सूर्यका बुध सम चंद्रमाके मं० वृ० भापाटीकासमेतम् । शु. श० मंगलके सू० चं० वृ० बुधके सू० शु० वृहस्पतिका श. शुक्रके मं० वृ० शनिकाबृहस्पति समहै अन्य सब शवहैं अर्थात् सूर्यके शु० श. चंद्रमाका कोई शत्रुनहीं मंगल का वुध बुधका चंद्र० बृहस्पतिका बु० शुक्रके सू० चं० शनिके सू० चं० मं० शत्रुहैं और अपनेस्थित भावसे शरा१1१0३४४ स्थानोंमें तत्कालिक मित्र होतेहैं ॥६॥७॥ परमोच्चमते दशभिर्वृपभे शिखिभिर्मकरे गजयुग्मलवैः ॥ तिथिभियुवतीभवने विधुभे किल पंचभिरेव झपे त्रिचनैः ॥८॥ कृतिभिश्च तुलाभवने रवितः कथितं मदने खलु नीच- भतः ॥ मिथुने तमसः शिखिनो धनुपि प्रथमे बुधभे गुरुभे भवनम् ॥ ९ ॥ सूर्यका परम उच्च मेपके दश अंशपर चंद्रमाका वृपके (३) शपर एवं मंगलका मकरके (२८) बुधकन्याके (१५) वृ- हस्पति कर्कके (५) शुक्रमीनके (२७) शनि तुलाके (२०) राहुमिथुनके प्रथमांश केतुका धनके प्रथमांशपर परम उच्च होताहै और ३१६ राहुके ८।१२ केतुके स्वगृह हैं ॥ ८॥९॥ (अथ पड़र्गसाधनम् ) होराराशिदलं समे प्रथ मतश्चंद्रस्य भानोरतो व्यत्यासादशमे इकाण पतयःस्वाक्षांकभावाधिपाः ॥ मेषादादिमभेवृपे तु मकरायुग्मे घटादिंदुभे कर्कादेवनवांशकानि गदिताः स्युादशांशाः स्वभात् ॥ १० ॥ पर्गमेंप्रथमहोराकहतेहै कि समराशिकेप्रथमदल १५ अंशपर्यत चंदमाको उत्तराईमें१५ अंशसे३० पर्यंत सूर्यको तथा विषम राशिमें (६) भावकुतूहलम् । पूर्वार्द्ध १५ अंशपर्यंत सूर्यको उत्तरदल १५अंशसे३० पर्यंतचंद्रमाकी होराहोतीहै जैसे मेपके १९ अंशपर्यंत सूर्यकी १५से उपर चंद्रमाकी वृपके १५ पर्यंत चंद्रमाउपर सूर्यकी होराहै ऐसेही सबके जानना।। हकाण प्रथम विभाग१० अंशपर्यंत उसीराशिके स्वामीका, द्वितीय- भाग१० अंशसे २० अंशपर्यंत उसराशिसे पंचमराशिके स्वामिका द्रेष्काणहोताहै ॥जैसे मेपके १० अंश पर्यंत मेपके स्वामिमंगलका १० से २० लौं उससे पंचम सिंहके स्वामि सूर्यका २० से ३० पर्यंत उससे नवम धनके स्वामिबृहस्पतिका हकाण होताहै।नवांशक मेप सिंह धनको मेपसे वृपकन्या मकरको मकरसे मिथुन तुलाकुंभको मिथुनसे कर्क वृश्चिक मीनकोकर्कटसे गिनना अर्थात् चर स्थिरद्वि- स्वभावराशि तीन तीनका १।९।६ त्रिकोण मेलहै इनमें ( चरादि) जो चरराशिहो उससे नवांश गिनाजाताहै एकराशिके ३० अंशके९ भाग नवांश कहते हैं वहविभाग ऐसेहैंकि३अंश२०कलाका एकनव- मांशहै ६४०पर्यंतदूसराएवं३०० तीसरा १३२२० चौथा१६४० पंचम २०० छठा२३।२० सातवां २६४० आठवां३०१० नवम भागहैं. जैसे मेपके मेपहीसे गिननाहै तो३अंशर कलापर्यंत मेपका ६०४०० पर्यंत वृप्का १०० में मिथुनका तथा वृपमें मकरसे गिनती है तो ३२२० पर्यंत मकरका ६४० लौं कुंभका इत्यादि मिथुनमें ३।२० में तुलाका६४० में वृश्चिकका इसी प्रकार जानना द्वादशांश एकराशिकेवारह भागद्वादशांश होतेहैंरअंश३०कलाका एक द्वादशांश होताहै यह अपनीही राशिसे गिनाजाताहै जैसे मेपके २ अंश३०कलापर्यंत मेपका५०पर्यंत वृपकाएवं३० मिथुनका १०० कर्कका १२।३० सिंहका १५० कन्याका १७३० तुलाका २०० वृश्चिकका २२। ३० धनका २६० मकरका २७।३० कुंभका ३०० में मीनका द्वादशांश जानना ऐसेही वृ- पमें वृपसे मिथुनमें मिथुनादिद्वादशांशसंभीराशियोंमें जानने।॥१०॥ मा.
भापाटीकासमेतम्। (७) पंचपंचाष्टशैलाक्षास्त्रिंशांशा विषमे कमात् ॥ भौमभानुजजीवज्ञशुक्राणामुत्क्रमात्समे ॥ ११॥ त्रिंशांश ॥ विषम राशिके५ अंशपर्यंत मंगलका पांचसे उ- पर १० अंशपर्यंत शनिका एवं १८ पर्यंत बृहस्पतिका २५ लों बुधका ३० पर्यंत शुक्रका त्रिंशांश और समराशि (व्युत्क्रम) विपरीत जैसे ५ अंशपर्यंत मंगलका १२ पर्यन्त शनिका २० प० वृहस्पतिका २५ प.वुधका ३० पर्यंत शुक्रका होताहै।।११॥ उच्चनीचराशियाँ। १ . ६ ७ ८ १ उच्चराशि अंश नीचराशि अंश ७ AU or ३ ถาท चं. मं. बु. ३. श. श. रा. के. २ ४ १२ ३ २८ ५ ८ १२ । १० १ २८ १५ १ १ ८ १२ १३ २ ६ गोर रक्तगौर दुर्वाश्या. पीत | चित्र कृष्ण. कृष्ण श्वेत अतिर. हरित! पीत चित्र कृष्ण कृष्ण धम्र जल कुमार विष्णु चंद्र इंद्राणी ब्रह्मा राक्षस रा. वा. द आ. प. ने. ने. शुभ पा. शुभपा. शु. शु. पा. पा. मूलत्रिकोण ५ रंग रक्तश्या. वर्णरंग ताम्र देवतापति अनि दिशापति पापशुभ पाप श्री.पा. ३. पा. पु.स्त्री.नपुं. ए. स्वी नपुं स्त्री. न. पु. न. महाभूतप., अमि अ. | भाम | आका. वायु आ. आ. वाधीश राजा वैश्य रा. | वैश्य मा. मा. अंत्यज अं.रा. अ.रा. सत्यादिगु. सत्य सत्य तम रज सत्व तम तम तम स्थान देवालय जलाश आम नांडाभुभंडार शयन | खात लिद छिन्द मोटा नया दग्ध जलन अहट हद स्फटित मलि मलि ताम्र मणि सुवर्ण रोप्या मव./ मोती लो.शांश शीश मतु ग्राम वर्ग मी. शरद हेम. पसंत शि.पी.मी. ८ ४
(८)
भावकुतूहलम्।
--
नवांशगणना।
.
च०७
च०१/२०१०
१५१९ २।६।१०।३।७५११ | ४८1१२
ole
नयाँशविभाग।
भाग | १/२/३/१५/६/७/८/९
अंश/३१०१३१६२०२३/२६३०
कला २०१४०/०२०४०० २०४०
.
विषमई
त्रिंशांशन्यासः।
७१८५५५५ ८.७
५
मं श
..| बु.शु. श. बु. ३. श.मं.
११२।२०२५.३०५/२०१८/२५
समर्श
वि०
मकर कुंभ
धन
वि०
पुं०
कर
दि.
पद.
स०
तुला | वृश्चिक
न. स्थि.
सौम्य कर | सौम्य
स० पि.
राशिद ।
कन्या
पुं० स्त्री० | पुं० स्त्री० | पुं० । स्त्री०
संज्ञा. नतुप्प. नतु. द्विपद कीट. | चतु. | द्विप. द्विपद कीट | पूर्वाद्ध नौ.न नर जलन.
च० स्थि०] दि.
मिथुन, कर्क | सिंह
स० वि० | स० वि
सौ० कुर | सौ० क्रूर
चर | स्थिर द्विस्व.
द.
पु० स्त्री०
मेष
प्र०
राशयः
| विषमादि वि०
पु. स्त्री.
कराकर
चरादि
.
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०॥
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चरणविवृद्धया खेटादश-
मसहोत्थे त्रिकोणमे जन-
ने ॥ चतुरस्रथं कलत्रे प्रय-
ताः पश्यंति तत्फलं क-
मतः॥१२॥
ग्रहदृष्टि ॥ जिसभावमें ग्रहहै उस
ते तीसरे दशवें स्थानमें एक चरण
दृष्टि देखताहै ९.५ में दो चरण ८।४
में तीन चरण सप्तममें पूरे चार चरण दृष्टि देखताहै ऐसाही फलभी
दृष्टिका देताहै कोई ऐसाभो अर्थ करते हैं कि, सूर्य तीसरे चंद्रमा
दशममें मंगल नवममें बुध पंचममें वृहस्पतिअष्टममें शुक्र चतुर्थमें
शनि सप्तममें पूर्ण देखतेहैं यह.निसर्ग दृष्टिहै ॥ १२॥
चरस्थिरद्विस्वभावाः क्रूराक्रूरावजादितः॥
नरनारीक्रमादेव विषमाख्यसमावपि ॥१३॥
भापाटीकासमेतम् । (९) मिथुनं धन्विपूर्वार्द्धतुलाकन्याघटोनराः ॥ चतुष्पदा धनुःसिंहवृपमेपा मृगादिमः ॥ १४ ॥ मूलत्रिकोणमर्कादेः सिंहो वृपभ आदिमः॥ कन्याधनुस्तुलाकुंभः प्रवदंति पुरातनाः ॥१५॥ इति भावकुतूहले संज्ञाध्यायः प्रथमः ॥ १ ॥ मेपादिराशिकमसे चर, स्थिर, द्विस्वभावसंज्ञक हैं मेप चर वृप स्थिर मिथुन द्विस्वभाव कर्क चर इत्यादि (प्रकट) १४ ७।१०चर २०६८।११ स्थिर ३।६।९।१२ द्विस्वभाव हैं ऐसेही मेप क्रूर वृप सौम्य मिथुन क्रूर इत्यादि (प्रगट) १३५१७।९।११. र २।४।६।८१३०१२ सौम्य हैं ऐसेही मेपपुरुप वृपस्त्री मि- थुन पु० इत्यादि (प्रगट) विपम राशि पुरुप समस्त्री संज्ञकहें ऐसेही विपम सम क्रमसे जानने जैसे मेप विपम वृप सम इत्या- दि (प्रगट) ११३३९।७।९।११ विपम श६८।१०।१२ स- महें और मिथुन, धनका पूर्वार्द, तुला, कन्या, (द्विपद ) मनु- प्य धनका उत्तरार्द्ध सिंह; वृप, मेप, मकरका पूर्वार्द्ध चतुप्पद, उपलक्षणसे मकरकाउतरार्द्ध कुंभ मीन जलचर, कर्कवृश्चिक कीटहें और सूर्यकामूलत्रिकोण सिंह चंद्रमाका वृप, मंगलका मेप, वुधका कन्या, वृहस्पतिकाधन, शुक्रकातुला, शनिका कुंभहे यह प्राचीन आचार्योंने कहाहै ॥ १३ ॥१४॥ १५ ॥ इति भावकुतूहले माहीवरी नापायां संज्ञाध्यायःप्रथमः ॥ १ ॥ यहांसे जन्मलम निश्चयकरनेकेलिये चिद कहे जाते हैं. (अथ जातकचिह्नज्ञानम् ) जनुपि लग्न गतो वसुधास्ता दमनगोपिगुरुः कविरेववा॥ भववि (१०) भावकुतूहलम्। तस्य शिरोवणलांछितं निगदितं यवनेन महा- त्मना ॥१॥ जिसके जन्म लग्नमें मंगल तथा सप्तम बृहस्पति अथवा शुक्र हो तो उसके शिरमे चोटलगनेसे यद्वा वरणादिसे (दाग) खोट होवे यह योग महात्मा यवनका कहा है ॥१॥ भवति लग्नगते शितिनंदने भृगुसुतेपि विधा विह जन्मिनाम् ॥ शिरसिचिह्नमुदाहृतमादिभिर्मुनि वरैर्द्विरसाव्दसमासतः॥२॥ मंगल लग्नमें शुक्र चंद्रमा सहित जिस मनुष्य का हो उसके शिरमें दूसरे अथवा छठे वर्षमें चिह्नहोवै यह पूर्व मुनियोंने कहाहै इसमें स्मरण चाहिये कि, मंगल वलीहो तो (व्रण) दाग और शुक्र चंद्रमा वली हों तो तिल (मशक ) लाखन आदि चिह्न होते हैं ॥२॥. भार्गवे जनुरंगस्थेचाष्टमे सिंहिकासुते ॥ मस्तकेवामकणे वा चिह्नदर्शनमादिशेत्॥३॥ जन्म लग्नमें शुक्र तथाअष्टम स्थानमें राहु हो तो माथेमें अथवा बांयेकानमें कुछ प्रकार चिह्न होवै ॥३॥ मदनसदनमध्ये सिंहिकानंदने वा सुरपति गुरुणाचेदंगराशौ युते नुः॥प्रकथितमिह चिह्न चाष्टमे पापखेटे कविरपि गुरुरंगे वामवाही मुनीन्द्रैः ॥४॥ सप्तम भावमें राहु लग्नमें बृहस्पति हो अथवा लग्नमें वृहस्पति राहु युक्तहों अष्टम भावमें पापग्रहहों अथवा शुक्र बृहस्पति ल- भापाटीकासमेतम्। (११) ग्रमें अष्टममें पाप ग्रह हों तौभी मनुष्यके बांये (बाहु) भुजापर चिह्न होवें यह योग मुनि श्रेष्ठोंका कहाहै ॥४॥ लाभारिसहजे भौमे व्यये वा शुक्रसंयुते॥ वामपार्श्वे गतं चिह्न विज्ञेयं व्रण बुधैः॥५॥ लाभ (१३) आर (६) सहज (३) अथवा (व्यय) १२ वें स्थानमें मंगल शुक्रसहित हो तो बांयें वगलकी और (व्रण) खोटका चिह्न होवे ॥५॥ लग्ने क्षितिसुते मंदे शुक्रदृष्टे त्रिकोणभे ॥ लिंगे गुदसमीपे वा तिलकं संदिशेदुधः॥६॥ लग्नमें मंगल तथा शनि दा९ स्थानमें हो परंतु इसपर शुक्र को दृष्टिभी हो तो (गुदा) मलद्वार के समीप अथवा लिंगस्थानमें तिलका चिह्न होवै ॥६॥ सुतालये भाग्यनिकेतने वा कविर्यदा चाष्टमगौ ज्ञजीवौ ॥ शनौ चतुर्थे तनुभावगे वा तदा सचिह्न जठरं नरस्य॥७॥ शुक्र पंचम वा नवम हो अष्टमस्थानमें बुधवृहस्पति और लग्नमें वा चतुर्थस्थानमें शनि होतोमनुष्यके (उदर) पेटपरचिह्नहोवें॥७॥ धनेकवावष्टमलग्नभे वा दिवाकरेमंदकुजौतृतीये॥ कटिप्रदेशे प्रवदेन्नराणां चिह्न विशेपादिह जा तकज्ञः॥८॥ धन (२) स्थानमें शुक्र तीसरे शनि मंगल हो अथवा अष्टम
(१२)
भावकुतूहलम्।
भावमें वा लग्नमें सूर्य और तीसरे शनि मंगल हो तोजातक शास्त्र
जाननेवालेने मनुष्योंके कमरमें चिह्न कहना ॥ ८॥
पातालस्थौराहुशुक्रौ लग्नेमंदः कुजोपिवा ॥
पादमूलेथ वा पादे वामे चिह्न विनिर्दिशेत् ॥ ९ ॥
चतुर्थ स्थानमें शुक्र राहु लग्नमें मंगल अथवा शनि हो तो
पैरके नीचे अथवा पैरपर चिह्न होवे यह वांये पैर यदा पैरके बांये
ओर कहना ॥९॥
व्यये गुरो विधौभाग्य लाभारिसहजे बुधे ।।
गोलकं गुदमध्यस्थं व्रणं वा प्रवदेवुधः ॥ १० ॥
वारहवें भावमें बृहस्पति नवममें चंद्रमा तथा १११६३में से
किसीमें बुध हो तो (गुदा) मलद्वारमें गोलाकार चिह्न अथवा
(व्रण) किसी प्रकार दाग पंडितने कहना ॥१०॥
दिनपतौ नवमे हरिभे यदा सहजहानिरवश्यमि-
हांगिनाम्॥धनगते रविजे तनुगे गुरावगुरुगेजन-
नी नहि जीवति ॥११॥
जिस मनुष्यके जन्ममें सूर्य नवम सिंहका हो तो अवश्यमेव
उसके भाईयोंकी हानि होवै और दूसरा शनि लग्नमें वृहस्पति
निर्वल नीच शत्रु राशि अंशकादियोंमें अथवा अस्तंगत पापपी-
डित हो तो उस बालककी माता नहीं बचै ॥ ११ ॥
सुरगुरौ धनभावगते यदा कुजयुते शनिनापि च
जन्मिनाम् ॥ अगुयुते सहजे सहजासुखं निगदितं
यवनैः प्रथमोदितम् ॥ १२ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (१३) बृहस्पति धन भावमें मंगल तथा शनिसे युक्तहो और तीसरा भाव राहुसे युक्त हो तो भाईयोंकासुख नहो प्रत्युत भ्रातृपक्षीय (असुख ) केशहोवै अथवा (सहजा बहिनो का सुख) अर्थात् बहिन हों भाईनहों यहभी अर्थ है यह योग यवनोंने पूर्वाचार्यसंमतिसे कहाहै ॥ १२॥ अरिनिकेतनगेवनिनंदने भवति राहुयुते निधने शनौ ।। निगदितं सहजो जनिमात्रतो यमपुरं व्रज- तीति पुरातनैः ॥ १३॥ इति भावकुतूहले लग्नचिह्नाध्यायो द्वितीयः॥ २ ॥ छठा मंगल तथा अष्टम शनि राहयुक्त हो तो उसके जन्महोने होमें उसका भाई मरजावै यह प्राचीनाचार्योंने कहा है ॥१३॥ इति भावकुतुहले माहीधरीभापायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ (अथारिष्टाध्यायः) तुहिनकिरणहोरिका च संध्या भचरमगाः खलखेचरा जनौ चरेत् ॥ मृतिरथ रज- नीशपापखेटेरखिलचतुष्टयगैर्विनाशमेति ॥ १ ॥ बालकका सबसे प्रथम अरिष्ट विचार करना चाहिये वाल्या- रिप्टोंसे वचजाने पर अन्य ज्योतिपोक्त फलादेशभी कहाजासकता है. आरिष्ट योग जानकर उसका उपाय दीर्घायुकारक वैदिकतां- विकोक्त प्रकारसे मनुष्य करसकते हैं. इस निमित्त अरिष्ट योग कहतेहैं कि संध्याकाटमें जन्महो उस समय लयमें चंद्रमा का हो. राहो तथा कोई पापग्रह राशिके संत्य नवांशकमें हो तो वह बालक नहीं बचेगा अथवा पापयुक्त चंद्रमा केंद्र हो तथा अन्य तीनहूं कहोंमें पापग्रह हों तोभी वही फल कहना पूर्वोक्त योगमें संध्या
(१४)
भावकुतूहलम् ।
कही है उसका प्रमाण सूर्यास्तसे वा सूर्योदयसे डेढघटी पूर्व डेढ
पीछेकी समस्त,३ घटी पर्यंत संध्याजाननी ॥१॥
अशुभेपु शुभेपुचक्रपूर्वापरभागेपु गतेपु कीटलग्ने।
विरतिं समुपैति वालकोयं खलखेटेरपि कामि-
नीतनुस्थैः॥२॥
(राशिचक्र) लग्नकुण्डलीके लग्नसे सप्तमपर्यंत . चक्रपूर्वार्द्ध
अएमसे द्वादश पर्यंत उत्तरार्द्धहै चक्रके पूर्वार्द्ध में पापग्रह उत्तरार्द्ध में
शुभग्रहों और लग्नमें (कीटराशि) ११८ हो तो बालक मरजावै
तथा पापग्रह स्त्रीसंज्ञक (सम) राशियोंका लग्नमें हो तो भी वही
फल जानना॥२॥
खलखगसहितो निशाकरोयं तनुमृतिमारगतोहि
जन्मकाले ॥ मृतिपदमुपयाति देववालोऽपिच स
कलैरविलोकितो न सौम्यैः॥ ३ ॥
पापयुक्त चंद्रमा लग (१) मृति (८) मार (७) भावमें
जन्मकालकाहो उसे पापग्रह देखें शुभग्रहोंकी दृष्टिउसपर न हो तो
वह वालक मृत्यु पदको प्राप्त होगा ॥३॥
अशुभावगोदयगतौ शुभदैरवलोकितो न खलु युक्त
विधुः ॥ मृतिरंत्यगे कृशविधौ कुगजागभगैः खलैर
पिविकेंद्रशुभैः॥४॥
दो पापग्रह स्थिरराशि लग्नमें हों चंद्रमा परशुभग्रहोंकी दृष्टिनहो
शुभग्रहोंसे युक्तभी नहो तो बालककी मृत्युहोवे और क्षीण चंद्रमा
बारहवें लग्न अष्टम भावोंमें स्थिर राशियोंके पापग्रह हों केंद्रोंमें
शुभग्रह नहों तो वही फल जानना ॥४॥
भापाटीकासमेतम् । (१५)
शीतांशावरिविरतिस्थिते विनाशः पापैःस्यात्सपदि
युतेक्षितेपि जंतोः॥ अष्टाब्दैः शुभखचरैश्च मिश्रखे
टैबैदान्दैरपि मुनिभिर्निरुक्तमेतत् ॥५॥
चंद्रमा छठा आठवां पापग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हो तो शीघ्र मृत्यु
देताहै यदि वह शुभग्रहोंसे युक्त दृष्टभी हो तो८ वर्ष पर्यंत वचताहै
यदि शुभ पाप दोनहूंसे युक्त दृष्टहो तो ४ वर्पजीवताहै यह मुनि-
योंका निरूपणकिया हुआ है ॥५॥
अरिविरतिगते शुभे च दृष्टे वलसहिते न खलेन मा
समायुः ॥ मदनसदनगेपि लग्ननाथे खलविजिते
ध्रुवमस्य मासमायुः॥६॥
छठां आठवां कोही शुभग्रह हों उसे बलवान् पापग्रहदेखे उप-
लक्षणसे युक्तभी होतो उसवालककी एकही महीनेकी आयुहोवै
तथा लग्नेश सप्तम पाप ग्रहोंसे (विजित) युद्धमें हराहुआ वा
नीचादिनिर्वल होकर पापपीडित हो तो निश्चय वही फल
जानना ॥६॥
कृशशशिनि तनौ खलेष्टकेंद्रे मृतिरथ शीतरुचौ ख-
लांतराले ॥ मुनिहिवुकलयस्थितेपि लग्ने मुनिलय
गैश्च सहांवया खलैः स्यात् ॥७॥
क्षीण चंद्रमा लग्नमें पापग्रह आठवें तथा केंद्रोंमें हो तो
शीघ्र मृत्युहोवे और चंद्रमा पापग्रहोंकेभी ३।७।४।८ मेंसे
किसीभावमें हों तथा ७१८ भावोंमें पापग्रहभी हो तो वह बालक
कंगतासहित मरजावै ॥७॥
.
(१६)
भावकुतूहलम्।
भविरतिगतशोभनैरदृष्टे शशिनि नवेपु गतैः खलै
तिःस्यात् ॥ तनुगतहिमगौ खले नगस्थे मृतिरुदि
ता मुनिभिः शिशोरवश्यम् ॥८॥
लग्न वा अष्टम गत चंद्रमापर शुभग्रहोंकी दृष्टि नहो तथा
९५ भावोंमें पापग्रह हों तो शीघ्रही बालकको मृत्युहोवै और
चंद्रमा लग्नमें पापग्रह सप्तममें होतो मुनियोंने अवश्य बाल.
ककी मृत्यु कहींहै ॥ ८॥
असुरमुखगते खलेनयुक्ते तनुगविधौ सममंवया
लयारे॥ मृतिरथतनुगेरवौ सशस्त्रं ग्रहणगते खलसं
युतेपि मृत्युः॥९॥
राहुके साथ यद्वा ग्रहण समयका चंद्रमा पाप युक्त होकर
लग्नमें हो मंगल अष्टम स्थानमें हो तो मातासहित वालक मरे इस
योगमें यदि सूर्यभी लग्नमें हो तो शस्त्रसे उनकी मृत्यु होवै
सूर्य वा चंद्रमा ग्रहण समयका शनिसे युक्त लग्नसे हो तौभी
• वही फलहै ॥९॥
सवलशुभखगैर्युते न दृष्टे तुहिनकरे दिनपेऽथवा
तनौ चेत् ॥ निधननवसुताश्रिताः खलाःस्युनिधन
मिहाशुवदंतिवै मुनीन्द्राः॥ १० ॥
सूर्य अथवा चंद्रमा लग्नमें पाप युक्त दृष्टहो उसे बलवान
शुभग्रह न देखे न युक्त शुभग्रहसे हो तथा ८ । ९५ भावोंमें पाप
ग्रहसे हो तथा ८९।५ भावोंमें पापग्रह हों तो बालककी मुनीन्द्र
शीघ्रही मृत्यु कहते हैं ॥१०॥
भापाटीकासमेतम् । (१७)
शनिरविविधुभूमिजैः क्रमेणव्ययनवलग्नलयाश्रित
म॒तिः स्यात् ॥ सबूलसुरपुरोहितेनदृष्टैन हि मरणं
गदितं तदा मुनीन्द्रैः ॥११॥
बारहवां शनि नवम सूर्य लग्नका चंद्रमा अष्टम मंगल हो तो
बालककी मृत्यु होवै. परंतु उक्तमृत्युकारक योगोंपर बलवान्बृहस्प
तिकी दृष्टि हो तो मृत्यु नहीं होती और उपलक्षणसे दुष्टयोग
शुभग्रहोंकी दृष्टि एवं योगसे मृत्यु नहीं करते अरिष्ट देतेहैं
कदाचित उपायोंसे अरिष्टोंकी शांति करतेहैं ॥ ११ ॥
लयमारलग्ननवधीव्ययगः खलखेचरेण सहितः
सितगुः ॥ अवलोकितो नहि युतश्च शुभैर्नियतं
भवेत्स मरणाय तदा ॥ १२ ॥
चंद्रमा पापग्रहसहित ८।११।९।५।१२ में से किसी भावमें
बालकका हो तथा उसपर शुभग्रहकी दृष्टि नहो न उसके साथ शुभ
ग्रह हो तो मृत्यु निश्चय करके शीघ्रही होतीहै ॥ १२ ॥
बलियोगकारकखगाश्रितभे जनिभे तवानपियदा
स्ति विधुः ॥ बलसंयुतः खलजक्सहितः शर
दंत एव मृतिद स तदा ॥ १३ ॥
इति भावकुतूहले वाल्यारिष्टाध्यायः॥३॥
उक्त योगोंमेंसे जिनके फलका समय नहीं कहागया उनकेलिये
कहतेहैं कि, बलवान् योगकारक ग्रह जिसमें बैठा है उसपर जब चं-
द्रमा आवै अथवा जन्मराशिपर जब आवै अथवा लगराशिपर आवै
परंतु इसपर पापग्रहकी दृष्टिभी हो तो उस समय अरिएयोगका
अरिष्ट होता है यह विचार एकवर्पके भीतर है ऊपर नहीं ॥१३॥
इति भावकुतूहले माहघिरीचापायां वाल्यारिष्टाध्यायस्तृतीयः ॥ ३ ॥
(१८) भावकुतूहलम्। (अथपित्रावरिष्टम्) आदित्यादशमेपापः पीडितोदश माधिपातदापितुर्महाकष्टं निधनं वेतिकीर्तितम्॥१॥ सूर्यसे दशम पाप ग्रह हो तथा लग्नसे दशम भावका स्वामि (पीडित) पापयुक्त हो तो बालकके पिताको वंडा कष्ट अथवा मृत्यु होवे ॥१॥ भवति यदिशशांकः पापयोरंतराले जनुपि सुखन गस्थैः पापखेटैः शशांकात् ॥ विधुरपि वलहीनो नष्टकांतिर्जनन्या निधनमपि विशेपादाहुराचार्य वाः॥२॥ चंद्रमा.पापांतर्गत हो तथा चंद्रमासे ४।७ भावोंमे पाप ग्रह हों और चंद्रमा वलरहित एवं क्षीणभी हो तो ऐसा योग जन्ममें होनेसे श्रेष्ठ आचार्योंने बालककी माताकी मृत्यु कही है ॥२॥ यदा पापखेचारिणो जन्मकाले धरानंदनाक्रांत भावात्सहोत्थे ॥ तदैवासुनाशं सहोत्थस्य धीरा मणित्थादयः प्राहुराचार्य्यमुख्याः॥३॥ यदि जन्मसमयमें पापग्रह मंगलस्थितराशिसे तीसरे हों तो . शीघ्रही भाईयोंका नाश होवै. यह मणित्यआदि मुख्य आचार्य पंडितोंने कहाहै ॥३॥ बुधारातिभावेतु पापा भवंति वृतं शोपिनीचाश्रितो नष्टवीर्यः॥तदा मातुलानां विनाशो विशेषादिति प्राहुराचार्यवां नराणाम् ॥४॥ बुधसे छठेस्थानमेंपापग्रह हों वुध पापांतस्थ वा पापयुक्त तथा
भाषाटीकासमेतम् । (१९)
बलहीन नीचराशिअंशकमें हो तो विशेपतः मनुष्योंके (मातुल )
मामाओंका विनाश होवै यह श्रेष्ठआचार्यों का मतहै ॥४॥ .
बृहस्पतेः पंचमभावसंस्था महीजमंदागुदिवाकरा
श्वेत्॥ गुरोरयत्याधिपतिःसपापस्तदात्मजानां वि
रतिं वदन्ति॥५॥
बृहस्पतिसे पंचम स्थानमें मंगल, शनि, राहु, सूर्यमेंसे कोई
भी ग्रह हो तथा बृहस्पतिसे पंचम भावका स्वामि पापयुक्त
हो तो उस मनुष्यके पुत्र न हो अथवा पुत्रहानि होवै ॥५॥
चेत्कवेरंगनागारगामीकुजातो विनाशोङ्गनायाः स
पापो निरुक्तः॥ नैधने मंदतः पापखेटावलिष्टानृणां
नैधनं सत्वरं संदिशन्ति ॥६॥
इति भावकुतूहले चतुर्थोऽध्यायः॥४॥
शुक्रसे सप्तम स्थानमें मंगल पापयुक्त हो तो स्त्रीहानि क-
रताहै और शनिसे अष्टम पापग्रह बलवान हों तो मनुष्योंके अल्प
मृत्यु करतेहैं ॥६॥
इति भावकुतूहले माहीधरीनापायां चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
(अरिष्टभंगः) भवतीन्दुरथो शुभांतराले परिपूर्णः
किरणैश्च जन्मकाले ॥ विनिहंति तथाशु दोपसंघा
निभसंघानिव केसरी वलिष्टः॥१॥
पूर्वोक्त वाल्यारिष्ट योगोंके परिहार अरिष्टभंगयोग कहतेहें
कि जन्म समयमें चंद्रमा शुभग्रहों के बीचमें तथा पूर्णभी हो तो
उक्तप्रकार दोपसमूहको नाश करताहै. जैसे बलवान सिंह हा-
थियोंके झुंडको नाशकरताहै. तैसेही यह चंद्रमा करताहै ॥१॥
. (२०) भावकुतूहलम्। यदि जनुपि निशाकरोरिभावं गुरुकविचंद्रजवर्ग गो विशेपात् ॥ शमयति वहुकष्टजालमद्वा मुरहर नाम यथाघसंघतापम् ॥२॥ जो जन्ममें चंद्रमा छठे स्थानमें. (शुभग्रह) बृहस्पति, शुक्र, बुध के (वर्ग) राशिअंशकादियोंमें हो तो विशेपतासे ब- हुत कप्टेंके जालको साक्षात् शमित करदेताहै. जैसे मुरदैत्यके मारनेहारे श्रीभगवान्का . नामकीर्तन पापसमूहको शमित करता है ॥२॥ यदि सकलनभोगवीक्ष्यमाणो लसिततनुर्जनुरिं दुरेवसद्यः॥ दिविचरजनितं निहति दोपं खगप तिराशु यथा भुजंगजालम् ॥ ३॥ यदि जन्ममें चंद्रमा पूर्णमूर्ति हो तथा उसे सभी ग्रह देखें तो यही एक ग्रह ग्रहोंसे उत्पन्न (दोप) अरिष्टको तत्कालही ना- शकरदेताहै जैसे सर्प (जाल) समूहको गरुड शीघ्र नाश करता है ॥३॥ भवति यदि तनोः क्षपाकरोयं मृतिभवने शुभ खेटवर्गगश्चेत् ॥ गदविकलतनुं पितेव वालं किल सरितः परिरक्षति प्रसन्नः॥४॥ यदि चंद्रमा लग्रसे अष्टम स्थानमें शुभग्रहके (वर्ग) राशि अंशादियोंमें हो तो समस्त अरिष्टोंसे वचताहै. जैसे रोगी वाल कको उसका पिता सर्वतः रक्षा करता है ॥४॥ शुभभवनगतस्तदीयभागे जनिसमये कविनाव भापाटीकासमेतम् । (२१) लोकितश्चेत् ॥शमयति सकलं शशी त्वरिष्टं जल मिव पावकमंगिनामतीव ॥५॥ यदि चंद्रमा जन्मसमयमें शुभग्रहके राशिमें एवं अंशक में हो व शुक्र उसे देखे तो समस्त अरिष्टोंको शमितकरता है जैसे जल अनिको शमितकरदेताहै ॥५॥ बलवानपि केंद्रगो विशेपादिह सौम्यो यदि लाभगो दिनेशः ॥ शमयत्यखिलामरिष्टमालामपि गांगं हि जलं यथाघजालम् ॥६॥ यदि बुध उपलक्षणसे अन्य शुभग्रहभी वलवानहो विशेषतः केद्रमें हो तथा लाभभावमें सूर्य हो तो संपूर्ण अरिष्टरूपी मा- लाको शमितकरताहै. जैसे गंगाजल समस्त पापजालको शमितकरताहै ॥६॥ भवति हि जनुरंगपो बलिष्ठः सकलशुभैरवलो. कितोनपापैः॥ इह मृतिमपहाय दीर्घमायुर्वितरति वित्तसमुन्नति विशेपात् ॥७॥ जन्मलगेश बलवान हो तथा उसे समस्त शुभग्रह देखें पाप ग्रह न देखें तो मनुष्यको मृत्यु हटाय कर दीर्घायु कर देताहै तथा विशेप करके धनकी उन्नति (वृद्धि) भी करता है ॥ ७॥ सुरपतिगुरुरंगधामगामी निजपदगोपि चतुरंगता. मुपतः॥ बहुतरखगजं निहंति दोपं हरिरिभयूथमु- पामतं हि यद्वत् ॥ ८॥ लग्नमें वृहस्पति अपनी राशि वा अंशमें हो अथवा अपने उच्चराशि(१) अंशकमें हो तो बहुत प्रकार ग्रहदोषणको नाश (२२) भावकुतूहलम् । . करताहै जेसे सिंहहाथियोंके झुंडमेंजाकरउनकानाशकरताहै ॥८॥ गुरुसितवुधवगंगा हि पापाः सकलशुभैरवलोकिता यदि स्युः॥ खगकृतमपि वारयति रिष्टं तृणराशी निव वह्निविंदुरेकः॥९॥ पापग्रह बृहस्पति शुक्र वुधके राशि अंशमें हों तथा उन्हें शुभग्रह देखें तो अरिष्टाध्यायोक्त अरिष्ट दूर होते हैं जैसे अग्नि- का एक (बिंदु ) कण तृण घास के पुंजको पूँकदेताहै ॥९॥ सहजरिपुगतोथ लाभगो वा सकलशुभैरवलोकि. तोयुतो वा।।अगरिह विनिहंति रिष्टजालं नगजाधी शइवाधितापराशिम् ॥१०॥ राहु जन्म लग्नसे ३।६।११ भावोंमेंसे किसीमें हो तो समस्त शुभग्रह उसे देखें अथवा शुभग्रह युक्त हो तो अरिष्ट रूपी जाल- को नाश करताहै जैसे (नगजा.) पार्वतीके पति शिव, तीन प्रकारके तापशांत करतेहैं ॥१०॥ अधिकवलयुता जनुर्नभोगा यदि सकला नररा शिगा भवंति ॥हितभवननिजोच्चगेहगा वा वहुतर माशुलयंप्रयाति रिष्टम् ॥११॥ इति भावकुतूहले अरिष्टभंगाध्यायः पञ्चमः॥५॥ जन्मसमयमें बलवान् ग्रह (पुरुप ) विपम राशियोंमें सभी हों अथवा मित्रके घरमें, अपने उच्चराशिमें, हो तो बहुत प्रकारके अरिष्ट नाशहोतेहैं ॥११॥ इति भावकुतूहले माहीधरीभापायामारष्टभंगाध्यायः पंचमः ॥ ५वि
भाषाटीकासमेतम् । (२३)
: अथ पुत्रभावविचारः।
नंदनाधिपतिना युतेक्षितं नंदनं शुभनभोगसंयु
तम् ॥ नंदनागमनमेव सत्वरं व्यत्ययेन नहिनंद
नागमः॥१॥
गृहस्थको संतान उत्पन्न करना मुख्य कर्तव्यहै परंतु यह
दैवाधीनहै इसलिये प्रथम संतानभावविचार करते हैं कि पंच-
मभावेश पंच भावमें हो अथवा पंचमभावको देखे तथा पंचम
भाव शुभग्रह से युक्त हो तो शीघ्र पुत्र उत्पन्न होगा यदि उक्त
प्रकारसे विपरीत अर्थात् पंचमेश तथा शुभग्रह पंचम नहों न
उसे देखें पापग्रह पंचममेंहों तथा पंचमको देखें तो पुत्रसुख न
हौवें ऐसे योग जन्म, वर्प, प्रश्न, सभीमें देखे जाते हैं ॥१॥
अंगाधिपे लग्नगते तृतीये धनालये वा प्रथमं सुतः
स्यात्।।सुखे यदा लग्नपतौ नरस्य कन्या सुतोवेति
सुतश्च कन्या ॥२॥
लग्नेश लग्न, धन, तृतीयमेंसे किसी में हो तो प्रथम पुत्र पीछे.
कन्या होगी यदि लग्नेश चतुर्थ हो तो मनुष्यके प्रथम कन्या पीछे
पुत्र पुनः कन्या पुनः पुत्र होते हैं अथवा कन्या पुत्र यमल-
होते हैं परंतु इसमें लग्न, लग्नेश, पंचम पंचमेश द्विस्वभाव
गत हो तब ये फल होतेहैं ॥२॥
यावन्मितानामिह पुत्रभावे नरग्रहाणामिहदृष्टयः
स्युः ॥ तावंत एवास्य भवंति पुत्राःकन्यामितिः
स्त्रीग्रहदृष्टितुल्या ॥३॥
भावकुतूहलम् ।
पंचम भावमें जितने पुरुप ग्रहोंकी दृष्टिहों उतने पुत्र तथा
जितने स्त्रीग्रहोंकी दृष्टिहों उतनी कन्या होती हैं परंतु योगका-
रक ग्रह यदि स्वगृह उच्चादिवलसहित हों तो द्विगुण त्रिगुण उत्पन्न
करतेहैं नीचशत्रु राशिगत उतने संख्यक गर्भहानि करतेहैं ॥३॥
सहजभावपतिःसहजे यदा तनुगतो धनगो व्यय
गोपिवा॥सुतगतःसुतहानिकरो नृणां वुधवरैरुदितो
मिहिरादिभिः॥४॥
तृतीयभावका स्वामि तीसरा, लग्नमें दूसरा बारहवां, अथवा
पंचम हो तो संतानहानि करता है यह वराहमिहिरादि श्रेष्ठपं-
डितोंने कहा है ॥४॥
शुक्रांगारनिशाकरा द्वितनुगाः संतानसौख्यं नृणा
मादौ संजनयंति जन्मसमये चापं विना प्रायशः।।
मीने वा धनुपि प्रमाणपटवः संतानभावे यदा सं
तानं न तदामनंतिविबुधाः पुंसां विशेपादिह।।५।।
शुक्र मंगल चंद्रमा द्विस्वभाव राशियोंमें विशेपतः पंचम
भावमें हो तो प्रथमहीसे संतानका सुख देते हैं परंतु विशेपतः
धनके होनेमें उक्त फल नहीं देते यतः वृहस्पतिके राशि मीन
अथवा धन पंचमभावमें हो तो मनुष्योंको पंडिजन संतान
सुखविशेष नहीं कहते ॥५॥
अर्के कर्कगते हरौ भृगुसुते मंदे तुलायामजे चंद्रे
यस्य नरस्य जन्मसमये वीर्यच्युतोसौ भवेत् ॥
लग्ने चंद्रयुते गुरौ रविस्ते पुत्रेपि वीर्यच्युतोजीवेंगे
शरवौ मृतावपि कुज़े कीवर्ड्सगे कंटके ॥६॥
भापाटीकासमेतम् । (२५)
जिसमनुष्यके जन्मसमयमें सूर्य कर्कका, शुक्र सिंहका, शनि
तुलाका, चंद्रमा मेपका हो तो वह (वीर्यच्युत ) नपुंसक किंवा
धातुक्षीणवाला होवे अर्थात् क्लीवतासे संतान नहोनेपावें तथा
लग्नमें चंद्रमासहित वृहस्पति पंचममें शनि हो तो वीर्य क्षीण
होवै अथवा बृहस्पति लग्नमें सूर्यसहित तथा अष्टममें मंगल
हो और नपुंसक ग्रह केंद्रमें हो तो नपुंसक होवै ॥६॥
कान्याराशिगते लग्ने बुधमंदावलोकिते ॥
शनिक्षेत्रगते शुक्रे वीर्यहीनो नरोभवेत्॥७॥
लगमें कन्याराशि हो उसपर बुध शनिकी दृष्टिहो तथा शुक्र
शनिके क्षेत्र 2019 में हो तो वह मनुष्य वीर्य्यहीन ( नपुं-
सक) होवै ॥७॥
नीचे गुरौ भृगा वापि समे ज्ञे विषमेरवौ ।।
तदा पुत्रसुखं न स्यादित्युक्तं गणकोत्तमैः॥८॥
बृहस्पति अथवा शुक नीचका हो तथा बुध समराशिमें सू-
र्य विषमराशिमें हो तो पुत्रका सुख न होवै यह उत्तम ज्योतिपि-
योंका कथन है ॥ ८॥
कर्कटेतु कलानाथे पापयुक्तेक्षिते यदा ॥
मंददृष्टे दिवानाथे पुत्रः पष्टिमितेव्दके ॥ ९ ॥
चंद्रमा कर्कटका हो उसे पाप ग्रह देखे पापयुक्तभी हो और
सूर्यपर शनिको दृष्टि हो तो ६० वर्षकी अवस्थामें पुत्र उत्पन्न
हो ॥९॥
पापमे पापसंयुक्त जन्मलग्ने रवावलौ॥
युग्मभे वसुधापुत्रे खगुणाव्दात्परं सुतः ॥१०॥
(२४) भावकुतूहलम् । पंचम भावमें जितने पुरुप ग्रहोंकी दृष्टिहों उतने पुत्र तथा जतने स्त्रीग्रहोंकी दृष्टिहों उतनी कन्या होती हैं परंतु योगका- रक ग्रह यदि स्वगृह उच्चादिवलसहित हों तो द्विगुण त्रिगुण उत्पन्न करतेहैं नीचशत्रु राशिगत उतने संख्यक गर्भहानि करतेहैं ॥३॥ /सहजभावपतिःसहजे यदा तनुगतो धनगो व्यय गोपिवा॥सुतगतःसुतहानिकरो नृणां बुधवरैरुदितो मिहिरादिभिः॥ ४॥ तृतीयभावका स्वामि तीसरा, लग्नमें दूसरा वारहवां, अथवा पंचम हो तो संतानहानि करता है यह वराहमिहिरादि श्रेष्ठपं- डितोंने कहा है॥४रा होताजपुत्र होना शुक्रांगारचंद्रमासे दृष्टहो यह ऐसाही लग्नमें पापदृष्ट हो तामा अपुत्र करताहै ॥ ११ ॥ १२ ॥ मंदालयेर्के खलदृष्टियुक्ते लग्नेपि वा पापखगस्य वग ॥ अपत्यहानिः कुलदेवकोपात्पुरातनैरंगभृतांनिरुक्ता१३ शनिके राशि १०।११ में सूर्य पाप ग्रहोंसे दृष्ट हो अथवा पाप ग्रहके ( वर्ग) राशि अंशकोंके लग्नमें हो तो कुलदेवताके कोपसे संतानको हानि कहनी यह फल मनुष्योंको प्राचीनाचा. यॊने कहाहै ॥ १३॥ अपत्यभावे यदि मंगलः स्यादपत्यराशि विनिहंति सद्यः। अस्तांशके पापयुते सुतेशे तदान संतान सुखं वदंति ॥ १४ ॥ पंचम स्थानमें मंगल हो तो जितने पुत्रहों सभीको नाश
भापाटीकासमेतम् । (२५)
जिसमनुष्यके जन्मसमयमें सूर्य कर्कका, शुक्र सिंहका, शनि
तुलाका, चंद्रमा मेपका हो तो वह (वीर्यच्युत ) नपुंसक किंवा
धातुक्षीणवाला हो अर्थात् क्लीवतासे संतान नहोनेपावें तथा
लग्नमें चंद्रमासहित बृहस्पति पंचममें शनि हो तो वीर्य क्षीण
होवै अथवा वृहस्पति लग्नमें सूर्यसहित तथा अष्टममें मंगल
हो और नपुंसक ग्रह केंद्रमें हो तो नपुंसक होवै ॥६॥
कान्याराशिगते लग्ने बुधमंदावलोकिते ॥
शनिक्षेत्रगते शुक्र वीर्यहीनो नरोभवेत्॥७॥
लग्नमें कन्याराशि हो उसपर बुध शनिको दृष्टिहो तथा शुक्र
शनिके क्षेत्रलग्नेश्वरः पाययुतः सुतेशो व्यवीर्य्यहीन ( नपुं-
सुखेन हीन ॥ १६॥
निर्वलसूर्य पंचमहो तो जितने बालकहों उतनेही का
नाश करे व लग्नेश पापयुक्त और पंचमेश ८। १२ में हो तो
पुत्रसुखसे रहित रहै ॥१६॥
यदोगुसूर्यारशनैश्चराणां दोपो यदा जन्मनि मान
वानाम् ॥ वंशेशकोपे नसुतस्य नाशं तदा वदंतीति
पुराणविज्ञाः॥१७॥
यदि जन्मकालमें संतानहानिकारक राहु सूर्य शनैश्चर
का दोप हो अर्थात् ये ग्रह संतानहानिकारक हों तो “वशेश"
} कुलदेवताके कोपसे संतानकानाश जानना उसके मनोहर
पूजादि करनेसे संतानसुख होताहै यह पुराणाचार्यों का मत है १७॥
बुधशुक्रकृते दोपे सुताप्तिः शिवपूजनात् ॥
गुरोचंद्रकृते दोपे यंत्रमंत्रौपधीवलात् ॥१८॥
. (२८) भावकुतूहलम् । यदि बुध शुक्र संतानहानिदोपकारक हों तो शिवके ( पूजन) आराधन करनेसे पुत्रप्राप्ति होने वृहस्पति चंद्रमाका दोष हो तो अनेक प्रकार यंत्र, मंत्र साधन तथा दिव्य औपधि प्रयोगसे. संतान सुख होताहै ॥ १८॥ राहुणा कन्यकादानं भानुना हरिकीर्तनम् ॥ शिखिना कपिलादानं मंदाराभ्यां पडंगकम्॥१९॥ संतानवाधनका राहु हो तो किसीको किसी प्रकार कन्या दान करना सूर्यका दोप हो तो (विष्णुका कीर्तन) भगवानका आराधन विशेषतः हरिवंशका आराधन करना केतु हो तो क- पिला गोदान करनी शनि मंगल बाधक हो तो (पडंग ) रुद्रा- ध्यायका अनुष्ठान रुद्राभिषेक घटीस्नानादि करना ॥१९॥ सर्वदोपविनाशाय संतानहरिपूजनम् ॥ कुर्य्याद्भौमव्रतं चापि कामदेवव्रतं नरः॥२०॥ इति भावकु० पुत्रभावविचाराध्यायः ॥६॥ समस्त दोपशांतिके लिये संतानगोपालका अनुष्ठान पूजन करना. तथा भौमवत अथवा कामदेवव्रत शास्त्रोक्त प्रकारसे कर- ना औरभी उपाय धर्मशास्त्रआगम शास्त्रोंसे जानने ॥२०॥ इति भावकुतूहले माहीधरीज्ञापायां पुत्रभावविचाराध्यायः ॥ ६ ॥ (अथ राजयोगाः) खेटायदा पंच निजोच्चसंस्थाःस सार्वभौमः खलु यस्य सूतौ। त्रिभिः स्वतुंगोपगतैः स राजा नृपालवालोन्यसुतस्तु मंत्री ॥ १ ॥ जिसके जन्ममें .पांच उपलक्षणसे चारभी ग्रह उच्चके हों तो राजवंशी समस्त पृथ्वी राजा चक्रवर्ती होवे अन्य कुलोत्प- भाषाटीकासमेतम्। (२९) नराजाही होवै यदि तीन ग्रह उच्चके हों तो राजपुत्र हो तथा राजा होवै अन्यजात मंत्री होवै. अथवा स्वकुलानुमानश्रेष्ठता पावै॥१॥ गुरावुच्चे केंद्रे भवति दशमे दानवगुरौ जनुः काले मुद्रा विलसति समुद्रावधि भृशम्॥ गुरौ कर्के चापे भवति च सचंद्रे दिनमणौ बुधे तुंगे लग्ने वलवति. खगे वा नरपतिः॥२॥॥ जन्मसमयमें उच्चका बृहस्पति केंद्र में हो शुक्र दशम हो तो उस- की (मुद्रा) मोहर, छाप समुद्रपर्यंत चले अर्थात् समुद्रात पृथ्वी काराजा होवै. यदि बृहस्पति कर्क वा धनका चंद्रमासहित होवैत- था बुध वा सूर्य लग्नमें अथवा कोई बलवान ग्रह लग्नमें हो तो राजा होवै ॥२॥ गुरावंगे कर्के मदनसुखभावे दिनमणेः सुते शुक्र वक्र प्रभवति जनेर्यस्य समयः ॥ महांभोधेनीर गमनसमये तस्य करिणां चलद्धंटानादारजति चपलवं हि परितः॥३॥ बृहस्पति कर्कका लग्नमें (सूर्यपुत्र ) शनिटा७९ भावमेंसे कि- तीमें हो तथा शुक्र वक्रगति हो. ऐसा योग जिसके जन्मसमयमें हो वह ऐसा राजा होवै कि, जिसके सवारी निकलनेमें चारों तर्फसे हा- थियोंके कंठ गत घंटाओंके नादसे समुङ्गका जलभी स्थिर होवे ॥३॥ अजे जीवादित्यौ दशमभवने भूमिननयस्तपी स्थाने शुक्रो बुधविधुयुतो यस्य जनने॥ जानामा (३०) भावकुतूहलम् । लीभिर्विजयगमने तस्य सहसा समाकांता पृथ्वी व्रजति चकिता मोहपदवीम् ।। ४॥ जिसके जन्मसमयमें बृहस्पति सूर्य मेपके मंगल दशम स्था- नमें शुक्र नवम भावमें और चंद्रमा बुध सहित हो तो उसके शत्रुपर चढाई करनेके गमनमें एकाएकी हाथियोंकी पंक्तिसे पृथ्वी भार जाकर (चकित ) आश्चर्ययुक्त होके मोहको प्राप्त हो जावै॥४॥ कन्यांगे सबुधे झपे सुरगुरौ भूपुत्रसूर्यौवली मंदे कर्कगते शरासनगते शुक्रे यदीया जनिः । तस्यालं शिरसा वहति वसुधाधीशाः सदा शासनमानंदा द्विकचारविन्दकलिकामालामिव प्रायशः ॥५॥ कन्याका बुध लग्नमें वृहस्पति मीनका सप्तम हो सूर्य मंगल किसी स्थानमें बलवान् हो शनि कर्कका शुक्र धनका हो. ऐसे राजयोगमें जिसका जन्म हो उसके आज्ञा (हुकुम) को राजा लोग सर्वदा आनंदपूर्वक ऐसे ग्रहण करते हैं जैसे खिलेहुये क- मलोंकी माला विशेपतासे गलेमें धारण प्रसन्नतासे करते हैं ॥६॥ भाग्ये भानुसुतो मृगे धरणिजो जीवज्ञशुक्राःसुते तिष्ठंति प्रवला दिवाकरकरव्यासंगमुक्ता यदा ॥ तत्रोद्भूतजनस्य यानसमये प्रोत्तुंगराजिवजव्य स्तन्यस्तपदप्रचाररजसाच्छन्नं नभोमण्डलम्॥६॥ नघम स्थानमें शनि मकर राशिका मंगल तथा वृहस्पति बुध शुक्र पंचम हों और उक्तग्रह बलवान् हों सूर्यकिरणोंके सं गसे मुक्तहों अर्थात् अस्तंगत नहो उदयी हो. ऐसे योगमें जिस .
भाषाटीकासमेतम् । .: (३१)
किसीका जन्म हो तो उसके सवारी निकलनेमें इधर उधरसे जो
साथ चलनेवाले (जलेवदार ) हैं उनके पंक्तियोंके. उलटे सीधे
पैर पृथ्वीपर रखनेसे जो (रज) धूली गर्द उडतीहै उससे आका-
शभी ढकजावै इतना बडा राजा होवै ॥ ६॥
यदि तुलामकराजकुलीरभे रविमुखाः सकला
विलसति चेत् ॥ इह चतुष्कमहोदधिसंज्ञकः सुर
पतेः समतां तनुते नृणाम् ॥७॥
यदि १०१।४ राशियोंमें समस्त सूर्यादिग्रह हों तो इस
योगके जन्मवाला मनुष्य चार समुद्रपर्यंतके राजाकी तुल्य-
ता पावै ॥७॥
राज्ये स्वामी निजोच्चे भवति तनुधनापत्यपाताल
कांतापुण्यानामुच्चराशौ पतय इह यदा वीर्यवतो
भवति ॥ राजानो यस्य तस्य प्रबलवलघटादंति
घंटाधना टंकारबातमीता जगदुदरगताः कंप
भावं भजति ॥८॥
जिसके जन्म समयमें दशम स्थानका स्वामि अपने उच्चमें
हो तथा लग्न, धन, पंचम, सप्तम, चतुर्थ, नवम भावोंके स्वामि
अपने अपने उच्चोंमें हों अथवा बलवान हो तो उस मनुष्यके
(प्रबल) बडी भारी सेना (फौज ) की घटासे एवं सेनाके हाथि
योंकी घटा घथा धनुपोंके (ज्या) चिल्लाके टंकारशब्दोंके स-
मूहसे भयमान होकर राजेलोग पृथ्वीके भीतर कंदरा (सात)
तैखाना आदियोंमें डरसे कांपतेहुये छिपजावें ॥८॥
(३२). भावकुतूहलम् । येषामेको निज़ोच्चे प्रभवति मकरे मंगलो वैरिभावे. दैत्येज्यः कर्मगामी शनिरपि सहजे जन्ममात्रेण तेषाम् ॥ पृथ्वी सद्दानतोयार्णवजनितयशश्चंद्रकां त्या नाभा मत्तोन्मत्तप्रचंडप्रवलरिपुशिरोमंडले वज्रपातः॥९॥ जिन मनुष्योंका सूर्य अपने उच्च (१) में मंगल मकरमें छठा शुक्र दशम शनि तीसरा हो तो उनके जन्महीसे पृथ्वी शु- भदान देनेके संकल्पसे समुद्ररूपी जलसे परिपूर्ण होवै यश रूपी चंद्रमाके कांतिसे अर्जुनके समान यद्वा (अर्जुनाभ) धव लित, श्वेत, स्वच्छ होजावै और ऐश्वर्यवान् तथा राजमदसे उन्मत्त अतिबलवान् बडे बडे शत्रुओंके शिरोंमें वज्रपात जैसा खटकने लगे ॥९॥ संबंधो दशमाधिपस्य नवमाधीशेन येपांजनुः काले पंचमभावपेन च वलोपेतस्य तुल्येन चेत्॥प्रस्थाने सति लोलया तनुभृतां वस्यारिविश्वंभरा गर्ज डोटकमत्तवारणघटकांता समंताद्भवेत् ॥१०॥ ग्रहोंके संबंध चार प्रकारके होते हैं परस्पर दृष्टि होनेमें दृष्टिसंबंध ( १ ) एकके राशिमें दूसरा दूसरेमें पहिला अ- न्योन्याश्रयसंबंध ( २), दोनहूं भावोंके स्वामि अपनी अपनी रा- शियोंमें स्थानसंबंध (३), कारकसंबंधी(४.) जिनके जन्म सम- यमें नवमेश दशमेशका किसी प्रकार संबंध हो अथवा पंचमेशके, साथ उनका संबंधहो परंतु संबंधकारक ग्रह बलवान होतो संबंधभो ( तुल्य) बलवान् एवं अधिकारीहीके साथ करें तो उनके यु-. द्धार्थ प्रस्थानमें वा अन्य सवारी निकलने में पृथ्वी गरजतेहुये .
भाषाटीकसमेतम् । (३३) घोडोंके, मतवाले हाथियोंके घटाओंसे चारों ओरसे आक्रांत होवे तथा चंचल होकर शत्रुको पृथ्वी (राज्य) विनाही युद्ध किये वश होजावे ॥१०॥ राज्येशो यदि देवतालयपदे पारावतांशे तपःस्था नेशो धनगोपि गोपुरलवे लाभाधिपो जन्मिनाम् ॥ चंचत्तुंगतुरंगकुंजरघटाघंटाधनुयारवैर्वित्रस्तागम नोत्सवे दिगबला भ्रांतिं भजति क्षणात् ॥ ११ ॥ यदि मनुष्योंके जन्मसमयमें दशमभावेश नवमस्थानमें पारा- वतांशकमें स्थित होवे नवमेश द्वितीयस्थानमें होवे तथा लाभेश उच्चवर्ती, गोपुरांशकमें हो तो उनके (प्रयाणोत्सव ) सफरके तया- रीमें चपल घोडे उन्मत्त हाथियोंके घंटाओंके शब्दोंसे एवं धनुषोंके टंकारशब्दोंसे भयभीत होकर दिशाओंको (अबला) शोभा यद्वा दिगीशोंकी पत्नो इंद्राणी आदिभो क्षणमात्रमें (भ्रांत ) घबरा- हटयुक्त हो जाती हैं ॥ ११॥ कन्यामीनवृषालिभे यदि खगाः सिंहासनः कीर्ति तः किंवा चापनृयुग्मकुंभहरिभे खेटे हि सिंहा सनः।यः सिंहासनयोगतो हि मनुजो भूपाधिराजो बलीगर्जत्कुंजरवाजिराजिमुकुटारूढोधरामंडले १२ यदि६।१२।२।८राशियोंमें सभी ग्रह हों तो सिंहासन योग हो- ताहै. यद्वा ९।३।११।५ राशियोंमें हो तौभी यहो योग होताहै जिस- मनुष्येका जन्म सिंहासनयोगमें हो वह पृथ्वीमें गर्जन करनेवाले हाथी घोडाओंके पंक्तिके ( मुकुट ) श्रेष्ठ स्थानमें बैठनेवाला राजाओंकाभी राजा होवै ॥ १२॥ ३ (३४) भावकुतूहलम् । अजे सिंहे. कन्याकलशमिथुनांत्यालितुरगे स- माजः खेटानामिह भवति जन्मन्यपि नरः ॥ चतु- श्चक्रे योगे सकलसुखभोगेन मिलितो महीपाना माली मुकुटमणिपाली विजयते ॥ १३॥ जिस मनुप्यके जन्ममें १।५।६।११।३।१२।८।९ राशियोंमें स- भी ग्रह हों तो इस योगका नाम चतुश्चक्र है इसमें जिसकाजन्म हो वह समस्त सुखभोगोंसे युक्त होकर राजाओंके मुकुटमणियोंके, पंक्तिको जीतकर स्वयं अधिराज होताहै ॥ १३॥ एकैकेन खगेन जन्मसमये सैकावली कीर्तिता मुक्तालीव समस्तभूपमुकुटालंकारचूडामणिः ॥ तज्जातो रिपुपुंजभंजनकरो गंधर्वदिव्यांगनावृंदा नंदपरो गुणव्रजधरो विद्याकरो मानवः॥१४॥ यदि एक ग्रह एक एक स्थानोंमें वरावर हो, जैसे मोतियोंकी माला पृथक् २ एक २ दानेकी रहती है, तो इस योगको एकावली कहतेहैं इसमें जन्माहुआ मनुष्य समस्त राजाओंके मुकुटकी शोभा देनेवाला (चूडामणि ) उत्तम नगसरीखा श्रेष्ठ होताहै. तथा शत्रुओंकेसमूहका भंजन करनेवाला गंधर्वकन्या और स्वर्गकी स्त्रियोंके समूहको आनंद करनेवाला गुणोंके समूहको धारण करने वाला तथा चतुर्दशदिद्याओंकी खान होताहै ॥ १४ ॥ कुलीरे कन्यायामनिमिषधनुर्युग्मभवने जनुःका- लेयस्य प्रभवति नभोगोरविमुखः॥ प्रचंडप्रोत्तुंग प्रबलरिपुहंता क्षितिपतिः समंतादाधिक्यं व्रजति धनदानेन महताम् ॥ १५॥ L
भापाटोकासमेतम् ।
कर्क कन्या मीन धन मिथुन राशियोंमें सूर्यादि सभी ग्रह जिसके
जन्मसमयमें हों वह आति प्रवल (वढीहुई ) तीक्ष्णयोधाओंवाली
वडी भारी शत्रुसेनाको जीतनेवाला राजा होताहै तथा धन देनेसे
सभी प्रकार बड़े बड़े लोगोंसे भी अधिकता पाताहै ॥१५॥
अथादित्यःसिंहे विधुरपि कुलीरे रविसुतो मृगे मीने
जीवो हिमकरसुतो यस्य मिथुने॥ तुलायां शुक्रश्चे
दजभवनगो भूमितनयो नृवालो भूपालो नृप
मुकुटभूषामणिवरः॥ १६॥
जिसके जन्मसमयमें सूर्य सिंहका, चंद्रमा कर्कका शनि मकरका,
बृहस्पति मीनका, बुध मिथुनका, शुक्र तुलाका और मंगल
मेषका हो तो वह मनुष्यवालक राजाओंके मुकुटका श्रेष्ट मणि
ऐसा श्रेष्ठ राजा होवे ॥ १६ ॥
दिवानाथः सिंहे गवि हिमकरो मेषभवने महीजः
कन्यायाममृतकरसूनुः सुरगुरुः ॥ भवेच्चापे कुम्भ
दिनमणिसुतस्तौलिनि कविर्जनुःकाले यस्य प्रभ-
वति नरोऽसौ क्षितिपतिः ॥ १७॥
जिसके जन्मसमयमें सूर्य सिंहका,चंद्रमा वृषका, मंगल मेपका,
बुध कन्याका, बृहस्पति धनका, शनिकुंभका और शुक्र तुलाका हो
तो वह राजा होवे ॥ १७॥
बली पुण्यस्वामी दशमभवनाधीशभवने तपःस्वा
म्यागारेभवति दशमेशोपि भविनाम् ॥ तदा गर्ज
इंतावलनिकरघंटाधनरवैर्दिगन्तं वित्रस्ता विजय
गमने यात्यरिगणः॥१८॥
भावकुतूहलम् । जिस मनुष्यके जन्ममें नवमेश बलवान होकर दशम वा दशमे शके राशिमें तथा दशमेश नवम वा नवमेशके राशिमें हो तो वह ऐसा प्रतापी राजा हो कि जिसके शत्रुविजयार्थगमन (शनुपर चढाई ) में गर्जन करतेहुये हाथियोंके घटाओंके घणेशन्दसे डरकर शत्रुसमूह दिगंतोंमें भागजावे ॥१८॥ यदा पुण्यस्वामी दशमभवने पुण्यभवने वली कर्माधीशो भवति भविनामेव जनने ॥ समुद्रांतं कीर्तिर्विजयगमने वैरिपटली धनुर्ध्या टंकारे जति चकिता भीतिपदवीम् ॥ १९॥ यदि जन्मधारियोंके जन्मसमयमें नवमेश और दशमस्थानमें दशमेश नवमस्थानमें हो, दोनहूं बलवान हों, तोसमुद्रपर्यंत कीर्ति फैलानेवाला राजा होवै तथा उसके शत्रुविजयार्थ गमनमें धनुपकी (ज्या) कमानके टं कारशब्दोंसे शत्रुसमूह आश्चर्ययुक्त होकर भयके मार्गको प्राप्त होताहै (यह योग केसरहिंदवादसाहाविक्टोरी याका देखनेमें आया जिसकी जन्मकुंडली यह है ) ॥१९॥ भवेदंगाधीशो जननसमये पुण्यभवने तथा कर्म स्वामीभवति च विलग्ने जनिमताम् ॥तदागर्जदंता बलकलभवाजिब्रजपदैः समाक्रांता पृथ्वी व्रजति गमने मोहपदवीम् ॥२०॥ जिसके जन्मसमयमें लग्नेश नवमस्थानमें एवं दशमेश लग्नमें हो तो वह राजा होकर गर्जनकरनेवाले हाथी घोडे हाथियोंके बच्चे आदियोंके समूहसहित जंब गमन करै तो सेनाके बोझोंसे दवीहुई पृथ्वी मोहपद (घबराहट) को प्राप्त होजावै ॥२०॥ ।
भाषाटीकासमेतम् । (३७) यदा राज्यस्वामी नवमसुतकेंद्रेऽर्थभवने बला- क्रांतोयस्य प्रभवति स वीरो नरवरः॥ सदा काव्या लापी नवमणिकलापी बहुबली तुरंगालीदंतावल कलभगंता धनपतिः॥२१॥ यदि जन्मसमयमें दशमभावका स्वामी ( ९१५) त्रिकोण वा (११४७१०) केंद्र यद्वा धन (२) स्थानमें बलवान हो तो वह सर्वदा काव्य करने वा कहनेवाला होवै एवं बहुत बलवान और अनेक घोडाओंके पांति और हाथियोंके मनोहर जवान पट्टा- ओंके सवारीमें गमन करनेवाला धनवान राजा होवै ॥ २१ ॥ यदा कर्मस्वामी सुतभवनगामी शुभयुतः सुतेशः कोदंडे भवतिभविनो यस्य जनने॥ भयातीतो भो गीभवति चिरजीवीबहुगुणी मतंगालीगंतारिपुनि- करहंता नरपतिः॥२२॥ जिस मनुष्यके जन्मसमयमें दशमेश पंचमभावमें शुभग्रहयुक्त हो तथा पंचमेश धनराशिका यद्वा दशम हो वह भयरहित, तथा सुखभोग भोगनेवाला, दीर्घायु, बहुतगुणवान होवै. हाथियोंके झुंड उसके सवारीमें रहैं वह शत्रसमूहको मारनेवाला राजा होवै ॥२२॥ धनागारस्वामी भवति यदि पारावतपदे विशालं भूपालं कलयति नृबालं बहुबलम्॥अरातीभवातां कुशमनिशमानन्दनिरतं नितांतं श्रीमंत विविधधन दानोद्यतमलम् ॥ २३ ॥ धनभावका स्वामी यदि पारावतांशमें हो तो मनुष्यके वाल- कको बहुत बडाराजा करताहै कि, जो शवरूपी हाथीके ऊपर अं-
(३८)
भावकुतूहलम्।
कुशतुल्य रहताहै. सर्वदा प्रसन्न, सर्वदा धन, राज्यलक्ष्मीसे युक्त
रहता है अनेकप्रकारसे(उदार)धन देनेमें निश्चयतत्पर रहताहै ।।२३।।
देवलोकलवगो निशाकरात्पुण्यराशिपतिरिन्दुकां
तिभाक् ॥ गोगजबजतुरंगमंडलीमण्डितो मणिग-
गौरलापतिः॥२४॥
नवमभावेश चंद्रमासे २१ वें अंशमें हो तथा चंद्रमा पूर्णमूर्ति
हो तो वह गौ, हाथियोंके समूह घोडाओंके मंडलीसे शोभायमान
( मणि ) रत्नोंके समूहसे युक्त पृथ्वीका पति होवै ॥२४॥
यदा माने याने भवति मदने वासवगुरौ स्वतुंगे
वा पंकेरुहनिकरवन्धावपिभृशम् । भयत्राता दाता
निगमविहिताचारचतुरोगुणवातैनम्रोधनपतिसमा
नो विजयते ॥२५॥
यदि १०४७ भावोंमेंसे किसीमें बृहस्पति अपने उच्चका हो
और उसके साथ विशेषतःचंद्रमाभी हो तो भयसे रक्षा करनेवाला,
बहुतदान देनेवाला, शास्त्रोक्त आचार करनेमें चतुर, अनेक
शौर्यो दार्यादिगुणोंसे नम्र और धनमें कुवेरके समान जयशाली
राजा होवै ॥२५॥
एतेषु योगेषु नरो नृपालो भवेदलं नीचकुलप्र
जातः॥ नृपालबालोऽपि च वक्ष्यमाणैः सुयोगजातै
रिति-संप्रवक्ष्ये ॥२६॥
इतने जो राजयोग कहेहैं इनमें नीचकुलका उत्पन्न पुरुषभी
राजा होजाताहै. ये सर्वसाधारणके लिये तुल्य और राजाका पुत्र
जिसका राजा होना संभवहै वह थोडेभी राजयोगसे राजा होताहै.
ऐसे अच्छे सुयोग आगे ग्रंथकर्ता कहताहै ॥२६॥
भापाटीकासमेतम्। (३९)
मृगे विलग्ने रविजे कुलीरे दिवाकरे चंद्रयुते प्रसूता ॥
कुजे यदायेभृगुजेष्टमस्थे भवेनृपालो नृपवंशजातः २७
यदिजन्ममें मकरलग्न हो शनि कर्कमें सप्तमहो चंद्रमाभी साथहो
तथा मंगल ८ का ग्यारहवे भावमें, शुक्र सिंहका अप्टम, जन्ममें
हो तो राजपुत्र राजा होवै अन्यकुलोत्पन्न कुलाधिक होवै ॥ २७ ॥
यदा कवीज्यौ भवतश्चतुर्थे नृपालबालोपि च भूमि
पालः ॥ कुलीरगो देवगुरुः सचंद्रो नृपालवालं
प्रकरोति वालम् ॥ २८॥
यदि जन्ममें बृहस्पति शुक्र चतुर्थ भावमें हो तो राजपुत्र राजा
होवै तथा कर्कका बृहस्पति चंद्रमासहित हो तो बालक राजाओंमें
श्रेष्ट होवै ॥२८॥
यदेंद्रमंत्री विधुजं प्रपश्येद्गुणज्ञविज्ञं नृपति क-
रोति ॥ प्रसूतिकाले यदि पंचराशौ चैकोपि वालंकु-
रुतेनृपालम् ॥२९॥
याद जन्मसमय बृहस्पति बुधको देखे तो गुणज्ञ तथा विद्या.
वान राजा करताहै तथा जन्मकालमें यदि पंचमभावमें एकभी
बलवान् ग्रह हो तो बालक राजा होवै ॥२९॥
हितलवे तपनो विधुनेक्षितो नृपसुतं कुरुते च नृपो
त्तमम्॥ विधुसुतः सविधुः कुरुते नृपं भवति तुंगगतो
यदि जन्मनि॥३०॥
सूर्य मित्रांशकमें चंद्रमासे दृष्ट हो तो राजपुत्र राजाओंमें उत्तम
होवे बुधचंद्रमासहित उच्च (६) का होतोजन्महीसे राजा हो॥३०॥
(४०). भावकुतूहलम् । जनुपिलग्नगतो यदि लग्नपो वलयुतःकिल कंटक गोपि वा॥ अविरतं.प्रकरोति तदा नृपं नृपजमेव न चित्रमिति स्फुटम् ॥ ३१ ॥ यदि जन्मसमयमें लग्नेश लग्नमें बलवान् हो अथवा किसी अन्यकेंद्रमें हो तो राजपुत्रको विना विलंब राजा करताहै. इसमें कुछ आश्चर्य नहीं ॥३१॥ रविरजे शनिना वलिना युतो भवति भूमिपतिं कुरुते शिशुम् ॥ द्रविडकेरलदेशसमुद्भवं कृतिवरं च परत्र धनेश्वरम् ॥ ३२॥ सूर्य मेपका बलवान् शनिसे युक्त हो तोवालककोराजा करताहै यह योग विशेपतः द्रविड तथा केरलदेशियोंको विशेप राज्यफल करताहै तथा उसे अन्यत्र पंडित एवं पराये कमाये हुए धनका स्वामीभी करताहै ॥ ३२॥ गुरुकवी यदि तुंगगताविमौ जनुपि कंटककोण गृहाश्रितौ ॥ नृपकुले कुरुतो नृपमन्यथा द्रविडपं परितो भवतो नरम् ॥ ३३॥ जन्मकालमें यदि बृहस्पति शुक्र अपने अपने उच्चराशियोंके केंद्रकोणोंमें हों तो राजकुलका उत्पन्न राजाहोवै परन्तु अन्यकुलीय होतो धनका स्वामी होवै॥३३॥ प्रसूतिकाले यदि सर्वखेटैस्वनुव्ययागार्थगृह [ स्थितैश्चेत् ॥ पुरातनात्पुण्यत एव पुंसां श्रीच्छत्र योगं प्रवदंति संतः॥३४॥ जन्मसमयमें समस्तग्रह लग्न व्यय धन सप्तम भावोंमें हो तो यह
भाषाटीकासमेतम् ।
(४१)
श्रीछत्र योग पूर्वजन्मके पुण्यसे मनुष्यका होताहै यह पंडित
कहतेहैं ॥३॥
(यदा जीवोलग्ने मकरमपहाय प्रवसति तदालं भू-
पालं नृपतिकुलबालं जनयति ॥ भवत्येवं चंद्रो
जनुपि जनुरंगं च कलया परिक्रांतः केंद्रे नरपति
सुतं भूपतिपरम् ॥ ३५॥
यदि जन्ममें बृहस्पति मकरराशिको छोडके अन्य किसी
राशिका लग्नमें हो तो निश्चय करके राजपुत्र राजा होता है ऐसेही
चंद्रमा अपने नीच (८) को छोडकर पूर्णकला होरहा लग्न अथवा
अन्य केंद्रोंमें हों तो राजपुत्रको राजा करताहै ॥३५॥
सुखागारस्वामी भवति नवमे वाथ दशमे सुखे वा
लग्ने वा हितलवगतोवा शुभखगैः ॥ युतो दृष्टोदंता
वलतुरगयानेन नितरां जनानामागारं कनकमणि
संधैः परिवृतम् ॥३६॥
जन्ममें यदि चतुर्थभावका स्वामी नवमस्थानमें अथवा दशममें
चतुर्थमें, लग्नमें, हो परंतु मित्रस्वांशकमें हो शत्रुके वर्ग में न हो अ-
थवा शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट हो तो हाथी घोडाओंकी सवारी नित्यउ-
सके रहै तथा घर सुवर्ण एवं माणिक्य और रत्नसमूहोंसे
युक्त रहै ॥३६॥
पंचमे भवति कर्मभावपे कांतिभाजि गजवाजिजं
सुखम् ॥सर्वतोऽस्य विधुताततोभवेदादिगंतमतुला
यशोलता॥३७॥
(४२) भावकुतूहलम्। दशमभावेश पंचमस्थानमें उदयी हो तो हाथी घोडाका सुख सर्वप्रकारसे होवै और उसकी निर्मलकीर्ति दिशाओंके अंत पर्यंत पहुँचे ॥३७॥ अथ चंद्रयोगाः) भवति चंद्रमसो दशमाधिपो जनुपि केंद्रनवद्विसुतोपगः ॥ अतिविचित्रमणि- व्रजमंडितो वसुमतौ वसुभूषणसंयुतः॥३८॥ अब चंद्रमासे योग कहते हैं कि यदि जन्मसमयमें चंद्रमासे दशमभावेश केंद्रि ११४७११० नव ९ द्वि २ सुत ५ भावमें हो तो अतिउत्तम, नानाप्रकारके मणियोंके समूहसे (मंडित) शृंगार युक्त होकर पृथ्वीमें धनभूपणोंसे युक्त रहे ॥ ३८॥ चंद्राक्रांतभपः सुखालयगतो दंतावलानां सुखं मुक्तास्वर्णमणिबजामलयशःपुंजं विचित्रालयम् ॥ भृत्यापत्यकलत्रमित्रपटलीविद्याविनोदं तथा पुण्यं संतनुते मुदं नरपतेरथ नराणामिह ॥३९ ॥ चंद्रस्थितराशिका स्वामी चतुर्थ हो तोहाथियोंका सुख, मोती सुवर्णमणिसमूह मिलें निर्मल यशके पुंज हो नानारंगोंका घर होवै (नौकर)सेवक,पुत्र स्त्री,मित्रोंकासमूह रहै विद्याके विनोदमें रहै पुण्य कमावै प्रसन्नतापावैराजासे धन पावै यह सभी मनुष्योंको कहाहै ३९ (अनफादियोगाः) व्ययगतैरनफारविवर्जितैर्द्ध- नगतैः खचरैः स्वनफा विधोउभयतोपि गतैरुदि- ता नृणां दुरुधरा मधुराशनभोगदा॥४०॥ चंद्रमासे बारहवें स्थानमें सूर्यरहित कोही ग्रह हो तो अनफा
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भापाटीकासमेतम् ।
चंद्रमासे दूसरेमें कोई हो तो, स्वनफा, और दोनों स्थानों में
ग्रह हो तो, दुरुधरायोग मधुभोजन, और अनेक प्रकारके भोगदेने
वाला होताहै ॥४०॥
(अथानफायोगः) जनिमतामनफा कुरुतेतरां
गुणवती युवतीरतिवर्द्धनम् ॥ नृपसभापटुताम-
मलंयशो वरपशोरपि सौख्यकरं परम् ॥४१॥
जन्मधारीको अनफायोग होतोगुणवती.(युवती) स्त्री एवं उससे
(रति) क्रीडाकीवृद्धि देताहै राजाके सभामें चतुरता, निर्मलयश और
श्रेष्ठपशु घोडेआदियोंकाभी परमसौख्य निश्चयकरके देताहै ।।४१॥
(स्वनफा) भुजबलेन रमापरमालयंजनिमतां ग-
रिमास्वनफा यदा ॥ अबलयामलया नवयानभूवि
भुतयाद्भुतया परमं सुखम् ॥४२॥
स्वनफायोग यदि जन्ममें हो तो उसके बाहुबलसे (परम) श्रेष्ठ
लक्ष्मी घरमें रहै (गुरुता) वीपैन मिले तथा सुंदरनिर्मलनवयौ
वनास्त्री, नइ सवारी और पृ-यो इनका अद्भुत सुख मिले ॥१२॥
(दुरुधरा) दुरुधरा बहुधा वसुधावसुव्रजसुवारण-
वाजिसुखं नृणाम् ॥ वितनुते नृपतेरतुलं यशो गुण-
कलापपटुलमिहाद्भुतम् ॥ ४३॥
• जिन मनुष्योंका दुरुधरायोग हो उनको( पृथ्वी) जमीन, धनके
समूह, उत्तम हाथी घोडआदिका सुख होवैराजासे अतुल यश मिलें
अनेकगुणोंके समूहसे अद्भुत चतुरता मिले ॥४३॥
(केमद्रुमः) न धने न व्यये खेटाश्चंद्रादिह भवंतिः
चेत् ॥तदा केमद्रुमंप्राहुःपंडिता मिहिरादयः॥४४॥
(४४) भावकुतूहलम् । यदि चंद्रमासे दूसरे वा व्ययभावमें कोईभी ग्रह न हो तो उस को मिहिराचार्यआदिपंडित केमद्रुमयोग कहते हैं ॥ ४४ ॥ कैमद्रुमे सुरंपतेरपि नंदनीयं देशांतरं व्रजति पुत्रंक- लंत्रहीनः ॥ धर्मच्युतो विकलितो गदसंघभीतो नानाधितापसहितो महीतोपहीनः ॥४५॥ जिसके जन्ममें केमद्रुमयोग हो वह इंद्रका प्यारा पुत्रभी हो तौभी स्त्रीपुत्रोंसे रहित होकर विदेशभ्रमण करै धर्मसे रहित रहै क- लाहीन, रोगोंसे भयमान नाना प्रकारकी मानसीव्यथा संतापसहित और संसारमें संतोपहीन रहै ॥ ४५ ॥ (तस्य भंगः) शुक्रेज्यसौम्यसहितोपि च कंटक- स्थो वा पूर्णबिंव इह यस्य भवेन्मृगांकः॥ केंद्राणि खेचरयुतानि तदा नराणां केमद्रुमोद्भवफलं विफ- लत्वमीयात् ॥४६॥ । उक्तकेमद्रुमयोगका भंग कहते है कि जिसका चंद्रमा शुक्रबृह- स्पतिवुधसे किसीसे युक्त हो अथवा केंद्र में हो अथवा पूर्णमंडल हो यद्वा उसके केंद्रोंमें ग्रह हो तो मनुष्योंको केमद्रुमयोगोक्तफल केमद्रुमहुयेमेंभी निष्फल होजावै ॥ ४६॥ (हृदयोगः) जनुषि नीचगताः सकला ग्रहा यदि भवंति तदाह्रदसंज्ञकः ॥ तदभवो विकलो विभवो नितो रिपुहतो नितरांशठतायुतः ॥४७॥ जन्मसमयमें यदि समस्तग्रह नीच राशिअंशकोंमें होतोह्रदयोग होताहै ह्रदयोगमें जिसका जन्म हो वह (विकल) कलारहित,ऐ- श्वर्यहीन शडसे(पराजित)हाराहुआ(शठोधूर्त्तवावंचकभी होवे १७॥
भाषाटीकासमेतम् । (४५) (अथ फ़ाणियोगः) घटगते तपने क्रियगेशनावलिगते च विधौ निज- नीचभे ॥ भृगुसुते जनने फणिसंज्ञको विकलितं कुरुते नरपुंगवम् ॥४८॥ कुंभका सूर्य मेषकाशनि वृश्चिकका चंद्रमा कन्याका शुक्र अ- पने नीचमें हो तो फणिसंज्ञक योग होताहै इसमें जिसका जन्म हों वह मनुष्य श्रेष्ठभी (विकल ) कलाहीन होताहै ॥ ४८॥ (काकयोग) अजगते भृगुजे रविजे. जनुर्वृषभगे दिनपेऽनिमिषे विधौ ॥ अवनिजे यदि कर्कटगेहगे भवति काकभवोविभवोनितः ॥४९॥ जिसके जन्ममे मेपका शुक्र मेषका शनि मीनका चंद्रमा वृपका सूर्य कर्कका मंगल हों तो यह काकयोग ऐश्वर्यहीन दरिद्री करताहै ॥४९॥ विधुयुतो घटभे दिवसाधिपो गुरुमहीजकवीन- सुतः पुनः॥ यदि भवंति च नीचगता जनुजति राजसुतोपि दरिद्रताम् ॥५०॥ चंद्रमासहित सूर्य कुंभका और बृहस्पति, मंगल, शुक्र, शनि अपने २ नीचराशियोंमें हो ऐसे योगमें जिसका जन्म हो वह राजाभी हो तौभी दरिद्रीही रहै ॥ ५० ॥ (अथ हुताशनयोगः) शनिमहीजनिशाकरचंद्रजायदिजनुः किल नी- चमुपाश्रिताः ॥ मकरभे भृगुजोपि हुताशनः परम तापकरों न करोति शम् ॥५१॥ : + . (४६) भावकुतूहलम् । यदि जन्ममें शनि मंगल चंद्रमा बुधअपने २ नीचराशियोंमें हों तथा शुक्रभी मकरका हो तो यह हुताशनयोग होताहै इसमें मनुष्य परम संतापकरनेवाला होताहै शुभफल कदापि नहीं ॥५१॥ यदि भवंति नवायदशाधिपा जनुपि नीचगता विकला भृशम् ॥ नृपतियोगजमंगभृतांफलं प- रिणयत्यमपि निष्फलतामिह ॥५२ ।। यदि जन्ममें ९।११।१० भावोंके स्वामी नीच राशियोंमें तथा अत्यर्थ करके अस्तंगत पीडित आदिभी हो तो मनुष्योंके राज योगभी होतोभी उसका फल निष्फल होकर दरिद्रीही होवै ॥५२॥ रिपुमंदिरगैरेव वैरिभावगतैरपि ॥ राजयोगा विनश्यंति दिवाकरकरोपगैः॥ ५३॥ यदि राजयोगकर्ता ग्रह शत्रुराशियों वा छठेभावमें यद्वा शड वर्गमें हो तथा अस्तंगत हो तो राजयोग नष्ट होजाताहै ।। ६३ ।। भवति वीक्षणवर्जितमंगिनां जननलग्नमिहांबर- गामिनाम् ॥ जननमं च नृपालभवो नरो जगति यातितरामंतिरंकताम् ॥५४॥ यदि मनुष्योंके जन्मलग्नको कोई ग्रह न देखे तथा चंद्रराशिको भी कोई ग्रह न देखे तो राजयोगवाला मनुष्य राजपुत्रभीहो तोभी (रंक) विरक्त (फकीर) ही होताहे ॥१४॥ भद्रायां व्यतिपाते वा तथा केतूदये जनिः॥ यस्य तस्य विनश्यति राजयोगफलान्यपि ॥५५॥ जिसका जन्म भद्रा, व्यतिपातमें तथा (केतु) पुच्छताराके उदयमें हो तो उसके राजयोगोंके फलभी नष्ट होजातेहै ॥५५॥ ।
भापाटीकासमेतम् । (४७) परमनीचलवे यदि चंद्रमा भवति जन्मनि तस्य विशेषतः।। नृपतियोगफलं विफलं ततः कलयतीति वदंति मुनीश्वराः ॥५६॥ इति दैवज्ञजीवनाथविरचिते भावकुतूहले राज- योगभंगदरिद्रयोगाध्यायः सप्तमः ॥७॥ यदि चंद्रमा परनीचांशकमें जिसके जन्ममें हो तो उसके विशेष- तामें राजयोगोंके फल निष्फल होजाते हैं यह मुनीश्वर कहते हैं५६ इति महीधरकतायां भावकुतूहलसापायां राजयोग- चंद्रयोगदरिद्रयोगराजयोगभंगाध्यायः॥ ७ ॥ (अथ सामुद्रिकविचारः) जनने प्रबलो यस्य राजयोगो भवेद्यदि ॥ करे वा चरणेवश्यं राजचिह्न प्रजायते॥१॥ जिस मनुष्यके जन्ममें राजयोगप्रवल होतो उसके हाथ वा पैरमें अवश्यमेव चिह्न होताहै ॥१॥ अनामामूलगा रेखा सैव पुण्याभिधा मता ॥ मध्यमांगलिमारभ्य मणिबंधांतमागता ॥२॥ सोर्द्धरेखा विशेषेण राज्यलाभकरी भवेत् ॥ खंडिता दुष्टफलदा क्षीणा क्षीणफलप्रदा ॥३॥ ) अनामिकाके मूलमें सीधी रेखा पुण्य देनेवाली होती है खंडित अशुभ जानना तथा मध्यमाके जडसे लेकर (मणिबंध) "हाथकेज- ड" नाडीस्थानसे नीचेपर्यंत पूरी सीधी एकरेखा हो उसे उर्द्धरेखा कहतेहैं विशेषतः राज्यलाभ करतीहै यदि खंडित होतो"दुष्टफल"
(४८).
भावकुतूहलम् ।
दुःखदरिद्र देतीहै और (क्षीण ) अथवा माडि हो तो फलभी क्षीण-
ही देती है ॥२॥३॥
अंगुष्ठमध्ये पुरुषस्य यस्य विराजते चारुयवो य-
शस्वी ॥ स्ववंशभूषासहितो विभूषायोपाजनैरर्थ
गणैश्च मर्त्यः॥४॥
जिस पुरुपके अँगूठेके बीचमें (यवरेखा) जौके दानेका रमणीय
आकार हो वह यशस्वी होताहै अपने वंशका भूषण होताहै तथा
स्त्री, भूपण, धनसे युक्त रहताहै ॥४॥
वैसारिणो वातपवारणो वा चेद्वारणो दक्षिणपाणि-
मध्ये ॥ सरोवरं चांकुश एव यस्य वीणा च राजा
भुविजायते सः॥५॥
जिस मनुष्यके दाहिने हाथमें मछली, छत्र, हाथी, तालाब,
अंकुशमेंसे कोईभी चिह्न हो अथवा वीणाका चिह्न हो वह पृथ्वीमें
राजा होवै ॥६॥
मुकुलशैलकृपाणहलांकितं करतलं किल यस्य स
वित्तपः॥ कुसुममालिकया फलमीदृशं नृपतिरेवनृ-
पालभुवो यदा ॥६॥
जिसका हाथ मूशल, खग,हलके चिह्नसे चिह्नित होवह धनका
स्वामी होताहै यदि पुष्पमालाका चिह्नभी हो तौभी धनवान् हो-
ताहै यदि यह चिह्न राजवंशीके होतो अवश्य राजा होताहै ॥६॥
करतलेपि च पादतले नृणां तुरगपंकजचापरथां
गवत् ॥ध्वजस्थासनदोलिकया समं भवति लक्ष्म
रमाः परमालये ॥७॥
भाषाटीकासमेतम् । (४९)
जिस मनुष्योंके हाथ वा पैरके तलेमें घोडा, कमल, धनुष,
चक्र, ध्वजा, रथ, सिंहासन, डोलीके तुल्य चिह्न हों तो उसके
घरमें परमलक्ष्मी सदा रहै ॥७॥
कुंभःस्तंभो वा तुरंगो मृदंगः पाणावंघौ वा दुमो
यस्त पुंसः॥ चंचदंडोऽखंडलक्ष्म्या परीतः किंवा
सोऽयं पंडितःशौडिको वा ॥८॥
जिस पुरुषके हाथ वा पैरके तलुवेपर कलश स्तंभ,घोडा,मृदंग
अथवा वृक्ष, लठ्ठीके चिह्न हों तो अखंड लक्ष्मीसे युक्त रहे यदा
या तो पंडित हो या (शौंडिक) मद्यवेचनेवाला होवै ॥८॥
विशालभालोऽबुजपत्रनेत्रः सुवृत्तमौलिः क्षितिमंड-
लेशः ॥ आजानुबाहुः पुरुषं तमाहुः क्षोणीभृतां
मुख्यतरं महांतः॥९॥
जिसका (भाल) माथाबडाहो नेत्र कमलदलकेसमान हों शिर
सुहावना वृत्ताकार हो तो पृथ्वीमंडलका राजा हो और जिसके
खडेहुयेमें हाथ सीधेनीचे छोडकर घुटनोंपर्यंत पहुँचे तोराजाओंमें
मुख्य बडा राजा होवै ॥९॥
नाभिर्गभीरा सरला च नासा वृक्षःस्थलं रत्नशि
लातलाभम् ॥ आरक्तवर्णी खलु यस्य पादौ मृदू
भवेतां स नृपोत्तमः स्यात् ॥१०॥
जिसके नाभो (गंभीर) गहरी, नाक सरल, छाती रत्नशिलाके
समान स्वच्छ, पैर लालरंगके तथाकोमलहोंतो श्रेष्ठ राजाहोवै॥१०॥
राजते करगो यस्य तिलोऽतुलधनप्रदः॥
तथा पादतले पुंसां वाहनार्थसुखप्रदः ॥ ११ ॥
(५०)
भावकुतूहलम् ।
जिसके दाहिने हाथमें तिलका चिह्न हो उसे असंख्य धनदेता
है एवं पैरके तलुवेमें हो तो वाहन धनका सुख देवै ॥११॥
राजवंशप्रजातानां समस्तफलमीदृशम् ॥
अन्येषामल्पतां याति तथा व्यक्तंसुलक्षणम् ॥१२॥
इति भावकुतूहले पुरुषस्य सामुद्रिकलक्षणाध्यायः ८॥
उक्तलक्षण प्रकट हुयेमें राजवंशीके हों तो पूर्ण राज्यफल देतेहैं
अन्यको धनमानआदि थोडाही फल देतेहैं ॥ १२॥
इति भावकुतूहले माहीधरीभापायां पुरुपस्य सामुद्रिकंलक्षणाध्यायः ॥८॥
(स्त्रीजातकम् ) शुभाशुभं पूर्वजनेविपाकात्सीम-
तिनीनामपि तत्फलं हि ॥ विवाहकालात्परतः प्रवी-
गैरसम्भवात्तत्पतिषु प्रकल्प्यम् ॥१॥
अब स्त्रीजातक कहतेहैं-जो कुछ स्त्रियोंके पूर्वजन्मार्जित कर्मों
से शुभ वा अशुभ होते हैं वह विवाहसे ऊपर जो फल स्त्रियोंको होने
असंभव हैं वे उसके भर्ताको चतुरज्योतिपीने कहने. जो स्त्रियोंको
संभव हैं वे उनहीको कहने. तथा समस्त फल देश, जाति, कुल
विचारके संभवासंभव जानके युक्तिसे कहना ॥ १॥
अतीवसारं फलमंगनानामुदीरितं शौनकनारदा-
यैः ॥ व्यक्तं यथा लग्ननिशाकराभ्यां मया तथैव
प्रतिपाद्यते तत् ॥२॥
ग्रंथकर्ता करताहै कि नियोंके लमालया चंद्रमा इचापरथा
आदिआचार्योंने अतिसारतर जो फल कहे हैं उनहोक्त लक्ष्म
प्रकट प्रतिपादन करताहूं ॥२॥
महं ॥६॥
तथा पालम हो तो अवश्य विधवा होवे शनि सप्तम हो तो (कमल भापाटीकासमेतम् । (५१) सौभाग्यं सप्तमस्थाने शरीरं लग्नचंद्रयोः ॥ वैधव्यं निधनस्थाने पुत्रे पुत्रं विचिंतयेत् ॥ ३ ॥ स्त्रियोंके सप्तमस्थानसे सौभाग्य, लग्न तथा चंद्रमासे शरीरशु- भाशुभ, अष्टमस्थानसे वैधव्य और पंचमभावसे पुत्रसुखासुख विचारना अन्य भावविचार पुरुपोंके उक्तप्रकारसे जानने ॥३॥ सौम्याभ्यां प्रवरा शुभत्रययुते जाया भूवेद्भूपतेः सौम्यैकेन पतिप्रिया मदनभे दृष्टे युते जन्मनि ॥ पापैकेन पुनर्विलोलनयना पापद्रयेनाधमा पापा- नां त्रितयेन सा परकुलं हत्वा पतिं गच्छति ॥४॥ जन्मसमयमें तीनशुभग्रहोंसे सप्तमभावयुक्त वा दृष्ट हो तो वह स्त्री राजरानी होवे, दो शुभग्रहोंसे ऐश्वर्यवान् एकसे पतिकी प्रिया होवै, तथा सप्तममें एक पापग्रह हो वा एक पाप देखे तो (चंचलनेत्रा) परपुरुपहदिवाली, दोपापोंसे अधर्मकर्म करनेवाली, तिनसे निजपतिको मारकर परायेघरमें अन्यपतिके पास जानेवाली होवै॥४॥ जनुःकाले यस्या मदनभवने वासरमणौ पर्ति त्य- क्त्वा नूनं कुपितहृया भूमितनये॥अवश्यं वैधव्यं सपदि कमलाक्षी रविसुते जरां पापैर्दष्टे निजपति जिसरेधं व्रजति वा ॥५॥ समान स्वच्चीके जन्ममें सूर्य सप्रमभावमें हो तो पविकोत्याम करे राजते इसे त्यागकरे तथा इसके हृदयमें नित्य क्रोधवना रहे यदि + भावकुतूहलम् । नेत्रा) सुरूपाभी हो तथापि अनव्याहेमें वृद्धत्व पावै अर्थात् बड़ी उमरमें विवाह होवे जो पापग्रहोंकी दृष्टि सप्तमभावपर हो तो पतिके साथ विरोध रक्खे ॥५॥ यस्याः शशांके जनिलग्न वा रामदंगे साप्रकृतिः स्थिरा स्यात् ॥ शुभेक्षित रूपवती गुणज्ञा पति- क्रिया चारुविभूपणाट्या ॥६॥ जिसका जन्मसमयमें चंद्रमा लग्नमें अथवा तीसरे भावमें हो तो उसकी प्रकृति सर्वदा स्थिर रहै उसे शुभग्रहभी देखें तोरूपवती गुण वती, पतिसेवामें चतुरा और रमणीयभूपणोंसे युक्त होवै ॥६॥ यदांगचंद्रावसमे भवेतां तदा नराकारसमा कु- रूपा ॥ पापेक्षितौ पापयुतौ विशेपागदातुरारूप- गुणैर्विहीना ॥७॥ यदि लग्न एवं चंद्रमा विपमराशि विपमनवांशकोंमें हो तो स्त्रीपुरुपकी (आकृति) स्वरूप यद्वा पुरुपोंके तुल्य कृत्य करने वाली होवै कुरूपाभी होवे यदि उक्त लग्न चंद्रमा पाप युक्त दृष्ट भी हों तो विशेपतः रोगसे आतुर रहे सुगुणोंसे हीन रहे ॥ ७॥ स्त्रीणां राजयोगाः। जनुःकाले यस्या मदनसदने दानवगुरौ शुभा भ्यामाक्रांते गतवति तदा सा विधुमुखी ॥ गजें द्राणां मुक्ताफलविमलमालांवृतकुचा प्रिया पत्यु- नित्यं प्रभवति शचीवत्क्षितिलके ॥८॥ निसके जन्मसमयमें सप्तमस्थानमें शुक्र शुभग्रहोंसे युक्त ताको भाषाटीकासमेतम् । प्राप्त हो तो उसके (हृदय).स्तनोंके ऊपर गज़मोतियोंकी माला विराजमान रहें अर्थात् ऐश्वर्यमें, परिपूर्ण रहे तथा पतिकी प्यारी नित्यरहे यदि नेत्रमें तिलका चिह्नभी होवे तो इंद्राणीके समा- न ऐश्वर्यवान होवे ॥ ८॥ समाक्रांते लग्ने त्रिदशगुरुणावाथभृगुणा बुधे कन्या राशौ मदनभवने भूमितनये। मृगे कर्के चंद्रे सति भवति लावण्यतिलका तपोरेखायोषा प्रभवति विशेषात्क्षितिपतेः॥९॥ यदि जन्मसमयमें लगका बृहस्पति अथवा शुक्र हो तथा कन्या- राशिका बुध सप्तमस्थानमें मंगल मकरमें चंद्रमा कर्कमें हो तो लावण्यता ( सुरूपता) वाली स्त्रियोंमें (तिलक) श्रेष्ठ होवै विशेपतःराजाकी महारानो बडी तपस्या करके पाई जैसी होवै॥९॥ शशांके कर्कस्थे भवति हि युवत्यां विधुसुते तनौ जीवे मीने गवि भृगुसुते जन्मसमयः। सहस्राली मान्या जगति नृपकन्या गुणवती विशेपादेपास्या- नृपतिपतिका पुण्यलतिका ॥१०॥ चंद्रमा कर्कका, बुध कन्याका, वृहस्पति मीनका, लग्नमें शुक्र वृपका, जन्मसमयमें हो तो एकहजारसखियोंमें मान्या संसारमें राजकन्या गुणवती होवै तथा विशेषतासे यह स्त्री राजाके घरकी स्वामिनी, पुण्यकी लता होवै ॥ १० ॥ (अथ सप्तमे प्रत्येकग्रहफलानि ) दिनपताविह कामनिकेतनं गतवति प्रवराप्यवरा भवेत्॥ जनुपि वल्लभभावविवर्जिता सुजनतारहिता वनिता भृशं ११
(६४)
भावकुतूहम् ।
जिसके जन्ममें सूर्य सप्तमहो वह श्रेष्ठभी अश्रेष्ठ होजावै पतिका
प्रेम उसमें न होवै अतिशयं दुर्जनता करे दुष्ट स्वभावा होवे कुटुंब-
सेभी विरोधी रहे ॥११॥
वृषेराकानाथेभवति मदने जन्मसमये भवेदेषायों
पाविमलवसना चारुवदनाविनम्रा मुक्तालीवलित-
कुचभारेण नितरां परा लीलालक्ष्मीरतिपतिरमेव
क्षितितले ॥ १२॥
जिसके जन्ममें सप्तमभावमें चंद्रमा विशेषतः वृपका हो तो यह
स्त्री निर्मलवस्त्र पहननेवाली सुहावने (मुख) वदनवाली नम्र मुखी
मोतियोंकी मालासे शोभितस्तनभारसे नम्र, परमलीलाक-
रनेवाली होवे और पृथ्वीमें सबसे सुंदर ऐसी होवै जैसी कामदे-
वकी स्त्री रती है अथवा लक्ष्मीके समान होवे ॥ १२ ॥
अंगारके मदनमंदिरमिंदुभावं मंदान्विते हरिभगे
जननेंगनायाः ॥ वैधव्यमेव नियतं कपटप्रबंधा
दारांगना भवति सैव वरांगनापि ॥ १३॥
जन्ममें स्त्रीका मंगल विशेपसे कर्कका हो अथवा मंगल शनि
सहित सिंहका सप्तम हो तो निश्चय वैधव्य पावै तथा कपटके
प्रबंधकरे (व्यभिचारिणी) वेश्या हो यदि यह स्त्री धर्मकर्मसे तथा
कुलसे श्रेष्ठभी हो तोभी वेश्याही होबै ॥ १३ ॥
अनेक श्रीभर्ता भवति मखकर्ता च मदने बुधे तुंगे
यस्या जनुपि खलु तस्याः पतिरिह ॥ स्वयं वामा
कामाकुलितहृदया मोदकलया परीता मुक्ताली
रजतकनकालीमणिगणैः ॥ १४ ॥
भाषाटीकासमेतम्। जिस स्त्रीके जन्ममें कन्याका बुध सप्तममें हो उसका भर्चा यज्ञ करनेवाला होवे तथा आप वह स्त्री कामदेवसे व्याकुलित हृदय रह कामकलामें तत्पर रहे और मोतियोंकी माला, सोने, चांदी, मणि रत्नोंसे भरी रहै ।। १४॥ परिकांते यस्या मदनभवने देवगुरुणा गुणज्ञा धर्मज्ञा निजपतिपदाब्जं भजति सा ॥ मणीनां मालाभिः कनकघटिताभिश्च शिरसा समाकांता कांतारतिपतिपताकेव शशिभे ॥ १५ ॥ जिसके जन्ममें बृहस्पति सप्तमस्थानमें बैठाहो वह (गुणज्ञा) समस्त सुगुणवाली, धर्मजाननेवाली, अपने पतिकी सेवा करनेवा- ली "पतिव्रता" होवै और सुवर्णमें जडेहुये (मणि ) रत्रोंकी माला- ओंसे शिर आक्रांत रहे यदि वह बृहस्पति सप्तममें कर्कका हो तो वह स्त्री कामदेवकी पताका जैसी उत्तम रूप गुणवती होवै ॥१५॥ कवौ यस्या जन्मन्यपि मदनगे मीनभवने तदा तो. दांतो रतिपतिकलाकौतुकपटुः॥धनुर्द्धा भर्ता स्वयमपि च संगीतरसिका विलोला पद्माक्षी वसनलसिता भूषणवृता ॥ १६ ॥ जिसके जन्ममें मीनका शुक्र सप्तम भावमें हो तो उसका पति उदार, कामकला क्रीडामें चतुर तथा धनुप धारण करनेवाला होवे आपभी वह स्त्री गायन विद्याके रसिका, चंचलतासे भर्ताको प्रस- करनेवाली कमलदलसमाननेत्रा एवं उत्तम भूषण वस्त्रोंसे करहै ॥ १६॥ बदनभावगते तपनात्मजे पतिरतीव गदाकुलि J भावकुंतूहलम्। तोभवेत् ॥ मलिनवेषधरो विबलो महाअनुषितुङ्ग गते प्रवरो धनी ॥ १७॥ जन्ममें शनि सप्तम भावमें हो तो उसका पति अतिरोग पीडित होवै मलिन वेप धारण करने वाला, अति निर्वल होवै यदि उक्त शनि उच्चका हो तो श्रेष्ठ और धनवान होवै ॥१७॥ सप्तमे सिंहिकापुत्रे कुलदोपविवर्धिनी ॥ नारीसुख परित्यक्ता तुङ्गे स्वामिसुखान्विता ॥१८॥ राहु सप्तममें हो तो कुलको ( दोष ) कलंक बढानेवाली, सुख रहित स्त्री हो यदि वह राहु उच्चका होतो भर्त्ताके सुखसे युक्तरहै १८ (अथान्ययोगाः) मिथस्तौ शुक्राी यदि लवगतौ वीक्षणमितौ भवेतां वालग्ने घटलवगते शुक्रभवने ॥ अनङ्गै रालीलाक लितनररूपामिरनिशं स्थिताभिः कांताभिः खलु मदनशांति व्रजतिसा ॥ १९॥ यदि वृहस्पति परस्परांशक अर्थात् बृहस्पतिके अंशकमें शुक्र शुक्रके अंशमें बृहस्पति होउपलक्षणसे राशियोंमेंभी परस्परहो तथा इनकी परस्पर दृष्टिभी होवे अथवा गुरुलग्नमें कुंभांशकी यद्वा शु- शुक्रे राशि में हो तो कामदेवकी लीलाओंसे निर्मित नररूप वाली नित्य अनेक नररूप मर्दके वेप स्थित स्त्रियोंसे कामदेवको शांत करे ॥ १९॥ क्षपानाथे यस्या गतवति कुलीरांगमथवा मदागारं सारं सुरगुरुबुधाभ्यामपि युतम्॥ महांतोपि भ्रांताः (६७), भाषाटीकासमेतम् । कति कति मनोजाधिकतया पुरस्तां पश्यतो दध- ति परमानंदलहरीम् ॥२०॥ जिसका चंद्रमा लग्नमें कर्कका हो अथवा सप्तमभाव मंगल स- हित हो तथा बुध वृहस्पतिसेभी युक्त हो तो अनेक बड़े बड़े महा- त्मालोगभी सन्मुख इस स्त्रीको देखकर कामदेवके अधिक होनेसे विभ्रांतमन होकर मोहितहो ऐसे वह परमआनंदलहरीको रूपकी छटासे धारणकरनेवाली होवै ॥२०॥ मृगागारे सारे गतवति विसारं सुरगुरौ कवौ वा पा- तालं तपनतनयेनापि मिलिते ॥ जनुःकाले यस्याः करिमुकुटमुक्ताफलमणिव्रजानां मालाभिर्वलित- मुत वक्षोजयुगलम् ॥२१॥ जिसके जन्मसमयमें मकरको मंगल मीनको बृहस्पति प्राप्तहो अथवा शनिसहित शुक्र चतुर्थ हो तो हाथीके शिरसे उत्पन्न (गज मोति ) मुक्ताफलोंसे सहित अनेकमणियोंकी मालाओंसे वेष्टित सर्वांग (उत ) और स्तनयुग्म रह ॥२१॥ (अथ वैधव्ययोगाः) निशाकरात्सप्तमभावसंस्था महीजमंदादिवाक- राश्चेत् ॥ तनोरिभे जन्मनि नैधने वा दिशंति वैध- व्यमलं मदे वा ॥२२॥ चंद्रमासे सप्तमस्थानमें मंगल शनिराहुसूर्यमेंसे कोईभी हो तो रचय वैधव्य करते हैं तथा जन्मलग्रमें शत्रुराशिके अथवा ष्टमस्थानमें हो तौभी वैधव्य देते हैं ॥२२॥ लग्नाधिपो वाथ मदालयशो वर्गे गतः पापनभश्चरा- (५८) भावकुतूहलम्। णाम् ॥ मदे तनौ वाखलखेटवर्गस्तदा कुलं मुञ्चति चञ्चलाक्षी ॥२३॥ जन्मलग्नेश अथवा सप्तमेश पापग्रहोंके (वर्ग)राश्यंशकादिकों में हो अथवा लग्नमें एवं सप्तमभावमें पापग्रहकेराश्यंशक हों तो वह स्त्री मदसे आकुल होके चंचलनेत्र करके भर्ताको छोडदेवै ॥२३॥ पापांतराले यदि लग्नचंद्रौ स्यातां शुभालोकन वर्जितौतौ॥अनंगलोला खलसंगमेन कुलद्रयंहति तदा मृगाक्षी ॥ २४॥ यदि जन्मसमयमें लग चंद्रमा पापग्रहोंके बीचहो शुभग्रहोंकी दृष्टि उनपर न हो पापयुक्तभी हों तो वह मृगाक्षी कामदेवसे चं- चल होकर पितृकुल भर्नुकुल दोनोंका नाशकरे अर्थात् व्यभि- चारिणी होकर दोनों कुलोंको डुवावै ॥२४॥ व्ययेऽष्टमे भूमिसुतस्य राशावगौ सपापे भवती हरण्डा ॥मदे कुलीरे सरवौ कुजेपि धवेन हीना रम तेन्यलोकैः ॥२५॥ यदि मंगलकी राशि ११८ में राहु वारहवां वा अष्टम पापयुक्त हो तो वह स्त्री रांड होवै अथवा सप्तमभावमें कर्कका सूर्य मंगल सहित हो तो पतिहोनहोकर अन्यपुरुपोंसे रमितरहै ॥२५॥ तनौ चतुर्थे निधने व्यये वामदालये पापयुतः कुज- श्चेत्॥अनंगलीलांप्रकरोति जारैः पर्ति तिरस्कृत्य विलोलनेत्रा ॥२६॥ यदि जन्मलग्नसे चौथा, वारहवां, अथवा सप्तम पापयुत मंग भाषाटीकासमेतम् । (६९) हो तो वह चंचला अपने पतिका तिरस्कार करके (जार) उपप- तियोंके साथ काम क्रीडा करे चंचल होवे ॥२६॥ परस्परांशोपगतौ भवेतां महीजशुक्रौ जननेंगना- याः॥स्वयं मृगाक्षीत्यभिसारिकेव प्रयाति कामा- कुलितान्यगेहे ॥२७॥ यदि स्त्रीक्ते जन्मसमयमें मंगलके अंशका शुक्र शुक्रके अंशका मंगल हो तो वह मृगाक्षी अभिसारिकाके समान आपही कामातुर होकर दूसरेके घरजावै ॥२७॥ पापग्रहे सप्तमगे बलोने शुभेन दृष्टे पतिसौख्यही- ना॥ स्यातां मदे भौमकवी सचन्द्रौ पत्याज्ञया सा व्यभिचारिणी स्यात् ॥ २८॥ पापग्रह बलहीन सप्तमस्थानमें हों शुभग्रह उसे नदेखे तो स्त्रीको भर्ताका सुख न होवै यदि सप्तम स्थानमें मंगल शुक्र चंद्रमा हो तो वह स्त्री भर्ताकी आज्ञासे व्यभिचारिणी ( जारिणी) होवै ॥२८॥ पापग्रहे सप्तमलग्नगेहे भ दिवं गच्छति सप्त माव्दे ॥ निशाकरे चाष्टमवैरिभावे तदाष्टमाब्दे नि धनं प्रयाति ॥२९॥ जन्ममें जिसके सप्तम एवं लग्नभावमें पापग्रह हो तो उसका पति विवाहसे सातवें वर्ष स्वर्ग जावैयदि चंद्रमाभी६।८ में हो तो आठवें वर्षमें पति मरे ॥२९॥ सप्तमेशोष्टमे यस्याः सप्तमे निधनाधिपः ॥ पापेक्षणयुतो बाला वैधव्यं लभते ध्रुवम् ॥ ३० ॥ जिस (बाला) नवयौवनाके जन्म लग्नसे सप्तमेश अष्टम अष्टमेश
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(६०)
भावकुतूहलम् ।
सप्तम पापदृष्ट हों अथवा पापयुक्त हों तो निश्चय वालवैधव्य पावै३०
सप्तमाष्टपती षष्ठे व्यये वा पापपीडितौ ॥ . .
तदा वैधव्यमानोति नारी नैवात्र संशयः॥ ३१ ॥
जिस स्त्रीके जन्मलनसे राप्तमअष्टमभावोंके स्वामी पापपीडित
होकर छठे वा बारहवें हों तो वह निस्संदेह वैधव्य पावै ॥३१॥
मंदारराशौ ससिते शशांके खलेक्षिते लग्नगते
मृगाक्षी ॥ मात्रां सहैव व्यभिचारिणी स्यान्मदे
खलांशे व्रणविद्वयोनिः ॥३२॥
यदि शनिमंगलकी राशि १०।११।११८ योंमें शुक्रसहित चं-
द्रमा पापदृष्ट लग्नमें हो तो वहस्त्री अपनी मातासहित व्यभिचारिणो
होवै यदि सप्तममें पापांशहो यद्वा उक्तग्रह पापांशकी सप्तममें हों तो
माँबेटी व्यभिचारिणी हों किंतु उसकी योनि व्रणसेवेधितरहे॥३२॥
अथ ग्रहराशिवशेन प्रत्येकत्रिंशांशफलानि
तत्रादौ भौमराशेः।
यदांगचंद्रौ कुजभे कुजस्य त्रिंशांशके दुष्टतमैव
कन्या ॥ मंदस्य दासी हि गुरास्तु साधवी मायावि
नी ज्ञस्य कवेः कुवृत्ता ॥३३॥
अब ग्रह राशियोंके वशसे प्रत्येक त्रिंशांशक फलकहतेहै इनमें प्र-
थम मंगलके राशिके त्रिंशांशकोंके फलहें कि यदि लग्न, चंद्रमा,
गलराशिमें हों तथा मंगलके त्रिंशांशमें हों तो वह कन्या दुष्टहोवै
शनिके त्रिंशांशमें दासी होवे वृहस्पतिकेमें पतिव्रता वुधकेमें माया-
वाली शुक्रकेमें दुष्टचरितवाली होवे ॥३३॥
भाषाटीकासमेतम् । (६१) अथ शुक्रराशौ। शुक्रभे कुजखान्यंशे दुष्टा सौरः पुनर्भवा ॥ गुरोर्गुणमयी विज्ञा कवेः कामातुरा भवेत् ॥ ३४ ॥ शुक्रके राशिमें लग्न चंद्रमा मंगलके शांशमें होतो दुष्टा हो एवं शनिक ( पुनर्भूः ) दीवार व्याही जावै बृहस्पतिकेमें गुणयुक्ता बुधके में पंडिता शुक्रकेमें कामातुरा होवै ॥ ३४ ॥ अथ बुधराशौ। बुधभे भूमिपुत्रस्य कापटी क्लीबवच्छनेः ॥ गुरोः सती विदो विज्ञाछवेः कामातुराभवेत्॥३५॥ बुधके राशिमें लग, चंद्र, मंगलके त्रिंशांशमें हो तो कपटी होवै शनिकेमें नपुंसकके तुल्य होवै बृहस्पतिकेमें पतिव्रता बुधकेमें जा ननेवाली शुक्रकेमें कामसे आतुर होवै ॥ ३५॥ अथ चंद्रराशौ। कुलीरभे भूमिसुतस्य वेश्या शनैः पतिप्राणविघात कीं ॥ गुरोणबातवती युधस्य शिल्पक्रियाज्ञा कुलटा भृगोः स्यात् ॥३६॥ कर्कराशिके लम, चंद्रमा, मंगलके त्रिंशांशकमें हो तो वह स्त्री (वेश्या) पतरिया हो वै तथा शनिकेसेभ के प्राणघातकरनेवाली बृहस्पतिकेसे गुणसमूहयुक्ता बुधकेसे (शिल्प ) कागिरी जानने वाली शुक्रकेत्रिंशांशकमें (कुलटा)व्यभिचारकरनेवालीहोवै ॥३६॥ अथ सूर्यराशौ। सिंहे नराकारधरा कुजस्य वरांगना भानुसुतस्य (६२) भावकुतूहलम् । नारी ॥ गुरोरिलाधीशवधूव॒धस्य दुष्टा कवरंगज गामिनी स्यात् ॥ ३७॥ सिंहराशिके लग्न, चंद्रमा, मंगलके त्रिंशांशकमें हो तो पुरुषके आकारधारण करे अथवा पुरुष समान पराक्रमी, चतुरा, हो। शनिकेसे श्रेष्ठहोवे बृहस्पतिकेसे पृथ्वीपति वधू होवे बुध केसे दुष्टा शुक्रकेसे अपने पुत्रको गमन करनेवाली होवै ॥३७॥ अथ गुरुराशौ। गुणैर्विचित्रा गुरुभे कुजस्य मंदस्य मंदा गुणतत्त्व- विज्ञा॥जीवस्य विज्ञा शनिनंदनस्य शुक्रस्य रम्या पि भवेदरम्या॥३८॥ बृहस्पतिके राशिमेलन, चंद्रमा, मंगलके त्रिंशांशकमें हो तो अनेकगुणोंसे युक्त होने शनिकेते मूर्ख वृहस्पतिकेसे गुणोंके तत्वको जामनेवाली बुधकेसे पंडिता शुक्रकेसे सुरूपाभी कुरूपसा प्रतित हो ॥ ३८ ॥ अथ शनिराशौ। मन्दालये भूमिसुतस्य दासी शनेरसाध्वी भवती- ति साध्वी ॥ गुरोनिशानाथसुतस्य दुष्टा शुक्रस्य वंध्या क्रमतःप्रदिष्टा॥ ३९ ॥ शनि राशिमें लग्न, चंद्रमा, मंगलके त्रिंशांशकमें हो तो दासी होवे शनिक पतिव्रता न होवेवृहस्पतिके पतिव्रता बुधकेमें दुष्टा शुक्र केमें (वंध्या) अपुत्रा होवे इतने क्रमसे चिंशांशफल हैं ॥३९॥ अथान्ययोगाः। मंदे मध्यवले कवीन्दुशशिर्वीर्य्यच्युतैः प्रायशः
भाषाटीकासमेतम् । (६३)
शेषेर्वीर्य्यसमन्वितैः पुरुषवन्नारी यदोजे तनुः ॥
जीवांगाररवीन्दुजैर्बलयुतैश्चेदंगराशौ समे गीता-
तखविचारसारचतुरा वेदांतवादिन्यपि ॥४०॥
जिसकेजन्ममें शनि मध्यवली, शुक्र, चंद्रमा, बुध, बलहीन,
और विशेषतासे अन्यग्रह बलवान हों तथा लय विपमराशिका होतो
वह स्त्री पुरुपके समान होवे यदि बृहस्पति, मंगल, सूर्य, बुध, बल-
वान् हो तथा लग्रराशि समसंज्ञक हो तो गीताका तत्व (ज्ञान) के
विचारसे सार जानने में चतुरा और वेदांतवादीभी होवै॥४०॥
यदाष्टमे देवगुरौ भृगौ वा विनष्टगी मृतपुत्रका
वा ॥कुजेष्टमेसा कुलटा मृगाक्षी चंद्रेऽष्टमे स्वामि-
सुखेन हीना ॥४१॥
यदि जन्ममें बृहस्पति अष्टम हो अथवा शुक्र अष्टम हो तो
उसके गर्भ नष्ट होवे अथवा पुत्र मरें यदि मंगल अष्टम हो तो वह
मृगाक्षी (कुलटा) व्यभिचारिणी होवै यदि चंद्रमा अष्टम हो तो
पतिके सुखसे हीन रहै ॥४१॥
मन्देष्टमे रोगरतस्य भार्या दिनाधिपे सा परिता
पतप्ता ॥ अनंगरंगा परकांतसंगा मृतावगौ सा
कुलधर्मभंगा ॥ ४२ ॥
जिस स्त्रीका शनि अष्टम हो तो उसका पति रोगयुक्त सर्वदारहे
सूर्य अष्टम हो तो सर्वप्रकार संतापोंसे संतप्त रहै यदि राहु अष्टम हो
तो कामदेवके (रंग) क्रीडासे परपुरुपोंका संगकरे तथा अपने
कुलके धर्मको खोवै ॥१२॥
(६४) भावकुतूहलम्। अथ पुत्रभावविचारः। पंचमे शुभसंदृष्टे पंचमाधिपतावपि । केंद्रकोणे तदा नारी वहुपुत्रवती भवेत् ॥४३॥ अब स्त्रियोंके संतानभावका विचार कहते हैं-कि, यदि जन्मलग्नसे पंचमभावमें शुभग्रहोंकी दृष्टि हो पंचमेश केंद्र कोण १।४।७।१०।६।९। में हो तो वह स्त्री बहुत पुत्रोंवाली हो ॥४३॥ पंचपुत्रवती जीवे स बले च सिते विधौ ॥ सुतासुखवती पापे नारी संतानवर्जिता ॥४४॥ यदिवृहस्पति बलवान् होकर पंचममें हो तो पुत्रवती होने शुक्र चंद्रमा सवल पंचममें हो तो कन्याओंका सुख होवै पापग्रह पंचम हो तो संतानके सुखसे होन रहै. जिनग्रहोंका जो फल पंच- ममें कहाहै वह उसकी दृष्टिसेभी जानना ॥४४॥ अथ विषयोगाः। भद्रासापानलवरुणभे भानुमंदारवारे यस्या जन्म प्रभवति तदा सा विपाख्या कुमारी॥ पापे लग्नेशुभ- खगयुतः पापखेटावरिस्थौ स्यातां यस्या जनन- समयेसा कुमारी विपाख्या॥४५॥ अव स्त्रियोंके विपयोग कहतेहैं कि, जिसके जन्मसमयमें भद्रा- संज्ञकरा७१२तिथि,आश्लेपा, कृत्तिका, शततारा, नक्षत्र, रविश- नि मंगल वार हो तो वह विपाख्य होती है. इसयोगके तीन भेद हैं कि द्वितीया तिथि आश्लेपा नक्षत्र रविवार (2) सप्तमी तिथि कृत्तिका नक्षत्र शनिवार (२) द्वादशी तिथि शततारा नक्षत्र मंगल भाषाटीकासमेतम्। (६५) वार (३) और पापग्रहराशि लग्नमें पापग्रहयुक्त तथा पापग्रह छठेभी हो तो वह कन्या विपाख्या होती है ॥ ४६॥ आदित्यमूनोर्दिवसे द्वितीया भुजंगभै भौमंदिनें- बुजः ॥ चेत्सप्तमी वाथरवौ विशाखा हरैस्तिथौं वा पिच सा विषाख्या ॥ ४६॥. इनके भेद कहते हैं कि शनिवारकी द्वितीयातिथिं आश्लेपी नक्षत्र (१) मंगलवारके शततारा नक्षत्र सप्तमीतिथि (२) रविवारके विशाखानक्षत्र द्वादशीतिथि (३) में जिस कन्याका जन्म हो वह विपाख्या होती है ।। १६॥ धर्मगेहगते भौमे लग्नगे रविनंदने । पंचमे दिवसाधीशेसा विपाख्या कुमारिका ॥४७॥ यदि लग्नसे नवम मंगल, लमसे सूर्यपुत्र(शनि)पंचममें सूर्य जिस कन्याका होवै वह विपाख्या ( विपकन्या) होती है ॥४७॥ विपाख्या शोकसंतप्ता दुभंगा मृतपुत्रिका ॥ वस्त्राभरणहीना च पुराणैसदिता बुधैः ॥४८॥ जो कन्या उक्तप्रकारोंसे विपाख्या हो वह शोकसे संतप्त दुर्भ- गा भाग्यहीना होवे. संतान उसकी मरतीरहें वस्त्रभूपणोंसे हीन रहे यह प्राचीन पंडितोंने कहाहै, ऐसेही विप घटिकाके जन्मवालीभी होतीहैं ॥४८॥ अथ विपयोगभंगः। सप्तम सप्तमाधीशः शुभो वा लग्नचंद्रयोः॥ विपयोगमलं हंतिरंहो हरिरिभं यथा॥४९॥ यदि जन्मलग्नसे सप्तमेश सतममें हो अथवा चंद्रमासे सप्तमेश -
(६६)
भावकुतूहलम्।
सप्तम हो तथा लग्नचंद्रसे शुभग्रह सप्तम हो वा उसे देखे तो निश्चय
विपयोगके फलको नाश करता है जैसे सिंह वलात्कारसे हाथीको
मारताहै ॥४९॥
इत्थं विवाहकालेपि ज्ञातव्यं लग्नचंद्रयोः॥
तदधीनं यतः स्त्रीणां शुभाशुभफलं भवेत्॥५०॥
विवाहसमयलग्न चंद्रसेभी ऐसाही विचार करना, क्योंकि विवा-
हमुहूर्तके आधीन स्त्रियोंका आजन्म शुभाशुभहै ॥ ५० ॥
वैधव्यभंगोपायः।
वैधव्ययोगयुक्तायाः कन्यायाः शांतिपूर्वकम् ॥
वेदोक्तविधिनोद्वाहं कारयेच्चिरजीविना ॥५१ ॥
इति भावकुतूहले स्त्रीजातकाध्यायो नवमः ॥९॥
जिसकन्याके वैधव्ययोग हो उसको प्रथमप्रतिमाविवाह, सावि-
तीव्रत, पिप्पलव्रत इत्यादि कल्पोक्तशांति करके वेदोक्त विधिसे
उसका विवाह. दीर्घायुयोगवालेके साथ करना ॥११॥
इति भावकुतूहले माहीधरीभापायां स्त्रीजातकाध्यायः॥९॥
अथ कन्यायाः शुभाशुभांगलक्षणानि ।
शुभलक्षणसंपन्ना भवेदिह यदांगना ॥
तत्करग्रहणादेव वईते गृहिणां सुखम् ॥ १ ॥
यदि स्त्री शुभलक्षणोंसे संपन्न होवे तो संसारमें उसे विवाह वि-
धिकरके ग्रहण करनेसे गृहस्थियोंका सुख बढताहै ॥ १॥ .
शुभाशुभं पुरा गीतं वेदव्यासेन धीमता ॥
प्रकाश्यते तदेवात्र नारीणामंगलक्षणम् ॥२॥
भाषाटीकासमेतम् । (६७) स्त्रियोंके लक्षणोंसे शुभ तथा अशुभ प्रथम बुद्धिमान व्यासदे वजीने कहाहै वही यहांभी स्त्रियोंके अंगलक्षण प्रकाश कियेजातेहैं। युवतिपादतलं किल कोमलं सममतीव जपाकुसुम- प्रभम् ॥ दिशति मांसलमुष्णमिलापतेरतिहितं बहु धर्मविवर्जितम् ॥३॥ स्त्रीके पैरके तलुआ यदि कोमल, (सम) सरल तथा (जपा) ओडू पुष्पके समान रक्तवर्ण हो तो स्थूलशरीर सौग कामतापसे गरम राजाकी प्रियतमा और धर्मरहित होवै॥३॥ कमलकंबुरथध्वजचक्रवत्पृथुलमीनविमानवितान वत् ॥भवति लक्ष्म पदे यदि योषितांक्षितिभृतां वनिता विभुतावृता ॥ ४॥ जिसके पैरमें कमल, कंबु (शंख), रथ, ध्वजा, चक्रके समान तथा स्थूल मछली, विमान, (वितान) चांदनी के आकारचिह्न हो तो उसस्त्रीका पति राजा होवै ऐश्वर्यसे युक्तरहै ॥४॥ शूर्पाकारं विवर्ण च विशुष्कं परुषं तथा ॥ रूक्षं पादतलं तन्व्या दौर्भाग्यपरिसूचकम् ॥५॥ जिसके पेरका तलुआशूर्पके आकार, विवर्ण, (शुष्क सरदरा करडा, रूखा हो तो यह लक्षण तन्वंगीके दौर्भाग्य सूचक है ॥६॥ यस्याः समुन्नतांगुष्ठो वर्तुलोऽतुलसौख्यदः॥ शूर्पाकारा नखा यस्याःसा भवेदुःखभागिनी ॥६॥ जिसके पेरका अंगूठा गोल, सरल होतो सौख्य देताहे जिसके नाखून शूर्पके आकार हों वह दुःखभोगनेवाली होती है ॥६॥ संचलंत्यां धराधूलिधारा यदा राजमार्गेचलायां
(६८)
भावकुतूहेलम् ।
बलादुच्छल ॥ पांसुला सा कुलानों त्रयं सत्वरं
नाशयित्वा. खलैोदते सर्वदा ॥७॥
जिसके चलने में पृथ्वीमेंसे (धूलिं) गर्दकी धारा उडे तथा स-
डकमें चलते जो स्त्री अपने बलंसे उछलेतीचले वह (अपतिव्रता)
जारिणी (तीन कुल ) माता पिता भर्ता को नाशकरके सर्वदा
दुष्टोंके साथ प्रसन्नरहैं ॥७॥
यस्या अन्योन्यमारूढा पादांगुल्यो भवेति चेत् ॥
सा पतीन्बहुधा हला वारवामा भवेदिह ॥ ८॥
जिसके, पैरकों एक अंगुली दूसरी अंगुलीके ऊपर चढीरहै वह
बहुतंपतियोंको मारके (. वारांगना) वैश्या होती है.॥८॥
कनिष्ठा न स्टशेद्भूमि चलंत्या योषितस्तदा।
सा द्रुतं स्वपति हत्वा जारेण रमते पुनः॥ ९ ॥
जिसस्त्रीके चलते समयमें ( कनिष्ठा ) छोर्टी अंगुली पैरकी
पृथ्वीको स्पर्श न करे वह शीवहीं अपने पतिको मारकर जारसे
रमितरहै ॥९॥
अनामिका च मध्या च यदि भूमि नसंस्टशेत्॥
आद्या पतिद्वयं हंति चापरा तु पतित्रयम् ॥ १० ॥
जिसस्त्रीके पैरकी अनामिका एवं मध्यमा.पृथ्वीको स्पर्श न करें
इनमेंसे एक ऊंची रहे तो दोपतिको दोनों ऊंचीरहे तो तीनपति
को मारे ॥१०॥
अनामिका च मध्या चं यदि होना प्रजायते ॥
तदासा पतिहीना स्यादित्याह भगवान्स्वयम्॥११॥
जिसके पैरकी मध्यम तथा अनामिकाभी छोटी हों तो वह स्त्री
पतिहीना होवैः यह भगवान वेदव्यासने आपही कहाहै ॥ ११॥
भाषाटीकासमेतम् । (६९) यदि पादनखाः स्निग्धा वर्तुलाश्च समुन्नताः ॥ ताम्रवर्णा मृगाक्षीणां महाभोगप्रदायकाः ॥ १२॥ यदि स्त्रीके पैरोंके नाखून (स्निग्ध) चिकने,(वर्तुल) गोलाकार, ऊंचे और तांबेके रंगके हों तो मृगाक्षियोंको उत्तम भोग देते हैं ।। १२ ।। यदि भवेदमलं किल कोमलंकमलप्टष्टवदेव मृगी- दृशाम् ॥ अरुणकुंकुमविद्रुमसन्निभं बहुगुणं पद- पृष्ठमिति ध्रुवम् ॥ १३॥ यदि मृगनयनोस्त्रियोंके पैरोंकी पीठ निर्मल, कोमल, कमलद- लके पीठके समान (अरुण) गुलाबीरंग यद्वा कुंकुम, वा (विद्रुम) मूंगाके समान हों तो वे बहुत गुणवती हो यह निश्चय है ॥१३॥ अंघ्रिमध्ये दरिद्रा स्यान्नम्रत्वेन सदांगना ॥ शिरालेनाध्वगा नारी दासी लोमाधिकेनसा ॥१४॥ पैरोंकी अंगुलियोंके बीच में (नम्र) गहरा हो तो वह स्त्री सर्वदा दरिद्रा रहै अंगुलियोंपर (नस) शिरा बहुत हों तोमार्ग चलनेवाली होवे बहुत रोम अंगुलियोंमें हों तो दासी होवै ॥१४॥ निर्मासेन सदानारी दुभंगा खल जायते ॥ गुल्फौ गूढौ शुभौ स्यातामशिरालौ च वर्तुलौ ॥१५॥ जिसके (गुल्फ) घुटनोंके नीचे (निर्मास )माडे हों तो वह स्त्री दुर्भगा होवै यदि उक्तस्थान (यूट) स्थूल, पुष्ट हों तथा (शिरा) नसि योंसे रहित हों एवं वर्तुल हों तो सुभगा होवे ॥१५॥ अगूढौ शिथिलौ यस्यास्तस्या दौर्भाग्यसूचदी ॥ गुल्फलक्षणमाख्यातं पार्णिलक्षणमुच्यते ॥ १६॥ जिस स्त्रीके गुल्फस्थान शिथिल एवं (भगृढ ) ढीले हो तो (७०) भावकुतूहलम्। वह दुर्भगा होवे इतने गुल्फलक्षण कहेगये अब (पाणि) घुटनोंके लक्षण कहेजाते हैं ॥ १६॥ समानपाणिः सुभगा पृथुपाणिश्च दुर्भगा ॥ 'कुलटातुंगपाणिश्च दीर्घपाणिगंदाकुला॥१७॥ जिसके (पाणि) घुटने समान हों तो वह सौभाग्यवती होवै पाणि मोटे होंतो दुर्भगा होवै जो पाणि उंचे हों तो व्यभिचारिणी और लंबी पाणिसे नित्य रोगसे आकुल रहे ॥ १७॥ जंघे रंभोपमे यस्या रोमहीने च वर्तुले ॥ मांसले च समे स्निग्धे राज्ञी सा भवति ध्रुवम् ॥१८॥ जिस स्त्रीके जंघा कदलीस्तंभके समान हों तथारोम रहित (वर्तुल ) गोलाकर सरल, मोटी, समान और चिकनी हों तो राजरानी होवै ॥ १८॥ एकरोमा प्रिया राज्ञो द्विरोमा सौख्यभागिनी ॥ त्रिरामा विधवा ज्ञेया रोमकूपेषु कामिनी ॥१९॥ जिसके जंघाओंके, रोमकूप, रोमोंके जडपर एक एक रोम हों तोवह राजाकी प्रिया, ऐश्वर्यवान होकै, दोदोहोंतो सुख भोगनेवाली, तिनसे विधवा जाननी ॥ १९॥ भवति जानुयुगं यदि मांसलं तदतिवृत्तमतीव शुभप्रदम् ॥ भुवनभर्तुरतौ विपरीतमादिभिरिदं विपरीतमुदीरितम् ॥२०॥ जिस स्त्रीके दोनोंजानु मोटी, अति सुंदर गोलाकारहों तो अति शुभफल करते हैं वह राजरानीके तुल्य होतीहै इससे विपरीतलक्षण हो तो फलभी विपरीत कहा है ॥२०॥ प भाषाटीकासमेतम् । (७१) समुन्नतनितंबाद्या यस्याः सिद्धांगुला कटिः ॥ सा राजपट्टमहिषी नानालीभिः समावृता ॥ २१ ॥ जिसकी कमर सिद्ध (२४) अंगुल चौडी हो तथा (नितंब) चूतड ऊंचे हों तो वह राजाकी पटरानी होवे और अनेक (सखी) दासियोंसे युक्त रहे ॥२१॥ निर्मासा विनता दीर्घा चिपिटा शकटाकृतिः ।। लघ्वी रोमाकुला नार्या वैधव्यं दिशते कटिः॥२२॥ जो कमर मांसरहित, माडी, गहरी, (चिपिट)वैठी हुई गाटिके आकारकी, छोटी और रोमोंसे भरी हुई होवह वैधव्य देती है।२२॥ सीमंतिनीनां यदि चारुर्विषो भवेन्नितंबो बहुभो- गदः स्यात् ॥ समुन्नतो मांसल एव यासां पृथुः सदा कामसुखाय तासाम् ॥२३॥ जिन भाग्यवानस्त्रियोंके चूतड रमणीय विव हों तो वहु प्रकार भोग देते हैं. यदि ऊंचे, मोटे, वडेभी हों तो सर्वदा कामदेवका सुख देते हैं ॥२३॥ यदा गजस्कंधसमानरूपो भगोथवा कच्छपष्टष्ठ- वेप ॥ इलापतेः कामविमोददायी वासोन्नतः सोपि सुताजनेता ॥ २४॥ यदि स्त्रीका (भग)योनि हाथोके गर्दनके सदृश यद्वा कछुआके पीठके सहश हो तो वह राजाको काम क्रीडामें प्रसन्न करनेवाली अर्थात राजरानी होवै यदि उक्तभग ऊंचे आकार होतो कन्याजनने वाली होती है ॥२४॥ अश्वत्थदलरूपो वा भगोगूढमणिःशुभः॥ चुह्निको (७२) भावकुतूहलम्। दररूपो यः कुरंगसुरसन्निभः ॥ २५ ॥ रोमाकुलो दृष्टनासी विकृतास्यो महाधमः॥ कामिनां न विनी, दार्हो भगों भवति सर्वथा ॥ २६॥ अथवा भग (अश्वत्थ ) पीपलके पत्रके समान अथवा गुप्त म- णिके समान होतो है शुभ हो तो जो भग चुल्लीके पेटके आकारका हो वह अधम होताहै यह भंग कामियोंके ('विनोद ) आनंदके हेतु सर्वदा नहीं होता है ॥ २५॥ २६॥ कामिन्याः कंचुकावर्तो भगो दौर्भाग्यवर्द्धकः ॥ स गर्भधारणाशक्तो वक्राकारोपि तादृशः ॥ २७॥ कामिनीका भग नदि दोनों ओर ऊंचा वीचमें गहरा होतो दौर्भाग्य बढ़ाता है. गर्भधारणमें असमर्थ होता है यदि (वक्राकार ) मुडा हुआ हो तौभी वैसाही फल करता है ॥२७॥ वेतसवंशदलप्रतिभासः कर्पररूपवदेव भगोवा ॥ लंवंगलो विकटो गजलोमा नैव शुभश्चिपिटोपि निरुक्तः ॥ २८॥ जो भग वेतके अथवा वांसके पत्रके आकारहो अथवा (कपर) वीचमें गहरा चारों ओर ऊंचाहो तथा गलेके समान एकओर माडा दूसरे ओर मोटा लंबाहो (विकट) ऊंचानीचा हो र हाथीकेसे रोम जिसपर हों तो शुभ नहीं होता ऐसेही (चिपिट) माडा जमी दोज़भी कहाहै ॥२८॥ मृदूत्तरं मृदुरोमकुलाकुलं यदि तदा जघनं भगभा- जनम्॥ उतसमुन्नतमायतमादरात्पतिकला कलितं. गदितं बुधैः॥२९॥ .
भाषाटीकासमेतम् । (७३)
जो यदि भग कोमलतर, कोमल बालोंसे भरा हो तो वह ऐश्व-
(पात्रं ) भोगनेवाला होताहै और ऊंचा बड़ा, कांतिमान
कलाकलित ) जिसके दर्शन वास्पर्शसे मनकी उमंग प्रसन्नतासे
ठे यह वैसाही है ॥२९॥ .
तदेव दक्षिणावर्त मांसलं शुभसूचकम् ॥
वामावर्त च नारीणां खंडितं खंडिताश्रयम् ॥३०॥
। वही भग दाहिने ओर घुमाहो यद्वा भौंरा मोटा हो तो शुभफल
कहताहै. यदि बाये ओर घुमा हो यद्वा भौंरा तथा (खंडित) किसी
जगेभंगजैसा हो तो व्यभिचारिणी करताह ॥३०॥
निर्मासं कुटिलाकारं रूक्षं वैधव्यसूचकम् ॥
अतिस्थूलं महादीर्घ सद्यो दौर्भाग्यकारकम्॥३१॥
यदि भग मांसरहित एवं कुटिलाकार, मोडवाला होतो वैधव्य
करताहै. जो अति मोटा व बडालंबा, हो तो अवश्य ( दौर्भाग्य)
भाग्यहीन करताहै ॥३१॥
मृदुला विपुला वस्तिःशोभना च समुन्नता ॥
अशुभारेखयाकांता शिराला लोमसंकुला ॥३२ ।।
(वस्ति) भग कोमल तथा वडा हो तो शुभहोताहै ऊंचीभी
योनि शुभफल देतीहै जिसमें रेखाहों एवं नसीहों तथा रोमोंसे भरीहो
तो अशुभफल देतीहै ॥३२॥
गभीरा दक्षिणावर्ता नाभी भोगविवर्धिनी ।।
व्यक्त ग्रंथिः समुत्ताना वामावर्ती नशोभना ॥३३॥
स्त्रीकी नाभि यदि गहरी एवं दाहिनी ओर (मोड)घुमाव भौरा-
वाली हो तो भोगवढातीहै. जिसकी (ग्रंथि) गांठ प्रकटहो नाभी
सुली हो यद्वा वामावर्ता हो तो शुभ नहीं होती ॥३३॥
(७४) भावकुतूहलम्। पृथूदरीयदा नारीमूते पुत्रान् बहूनपि॥ भकोदरी नरेशानां बलिनं चायतोदरी ॥ ३४ जिस स्त्रीका पेट बडाहो वह बहुत पुत्र जनतीहै.जिसका पेट में ककासा हो उसका पुत्र राजा होवे जिसका पेट बडे फैलावका उसका पुत्र बलवान होताहै ॥३४॥ उन्नतेनोदरेणैव वंध्या नारी प्रजायते ॥ जठरेण कठोरेण सा भवेझिंदुकांगना ॥ ३५ जिस स्त्रीका पेट ऊंचाहो वह वांझ होतीहै.जिसका उदर (कठोर) कर्डा हो वह किसी नीचजातिविशेषकी पत्नी होवै ॥३५॥ आवर्तेन युतेनैव दासिका भवति ध्रुवम् ॥ कोमलैमाससंयुक्तैः समानैः पावकःशुभम् ॥३६॥ जिसके पेटमें (आवर्त) भौंरा होतो वह दासी होवै यह निश्चयहै और जिसका उदर कोमल मांससे संयुक्त दोनहूं कूखी हों तो शुभफल होताहै ॥३६॥ विशिरेण मृदुत्वचा सपुत्रा जठरेणातिकृशेन कामिनी सा ॥ बहुधातुलभोगलालिता सानुदिनं मोदकसत्फलाशिनी स्यात् ॥ ३७॥ जिसका पेट नशियोंसे रहित,कोमल त्वचाका तथा कृश होतो वह कामिनी पुत्रवती होतीहै और बहुत प्रकारके अनुपम भोगोंसे उसका प्रेम होताहै दिनदिन प्रसन्नता पूर्वक मिष्टान्न, उत्तम मेवे खानेवाली होती है ॥ ३७॥ घटाकारं यस्या भवति चमृदंगेन सदृशं यवाकारं दवादुदरमहितं पुत्ररहितम् ॥अभद्रंनो भद्रं तदपि भाषाटीकासमेतम् । यदि कूष्मांडसदृशं निरुक्तं तत्त्वज्ञैः कठिनमुरुशा लेन च समम् ॥ ३८॥ जिस स्त्रीका पेट मृदंगके आकार हो अथवा दैवयोगसे (यव)जो केदानेके आकारकाहो तो वह पुत्ररहित रहै यदि (कूष्मांड) कुँम्ह- डेके आकारका पेट हो तो सर्वदा अमंगल देखे कभी मंगल नहो तथा कठोर (उरुशालो केसमानभीतत्वजाननेवालों ने कहाहै।॥३८॥ कृशतरा त्रिवली सरलावली ललितनर्मविनोद- विवर्द्धिनी॥ भवति सा कपिला कुटिलाकुला शुभ करी विरला महदाकृतिः॥ ३९ ॥ जिसके (चिवली) हृदयसे भगपर्यंत रोमवाली वारीक एवं सीधी हो तो वहस्त्री रहस्यके प्रेममें हँसीकी बोलचाल अतिरमणीय करै प्रेमवढावै यदि वह त्रिवली (कपिलवर्ण) भूरेरंगकी, मुडीहुई, बहुत रोमों की हो तो कुटिलस्वभाववाली, और गुस्सेवाली, करडेवचन कहनेवाली होवै. यदि छांटेरोम तथा बडी आकृतिको त्रिवली हो तो शुभफल देती है ॥३९॥ लोमहीनहृदयं यदा भवेनिम्नताविरहितं समा- 'यतम् ॥ भोगमेत्य सकलं वरांगनासा पुनःप्रिय वियोगमालभेत् ॥४०॥ जिस स्त्रीकी छाती रोमरहित, (समान) ऊंची नीची न हो उपर नीचेका (माप) परिमाण तूल अर्ज वरावर हो तो वह श्रेष्ठ स्त्री समस्त भोग सुख पावै परंतु पीछे (प्रिय) प्यारेका वियोग- भी पावै॥४०॥ उद्भिन्नरोमहृदया स्वपति निहति विस्ताररूप (७६) भावकुतूहलम्। हृदया व्यभिचारिणी स्यात् ॥ अष्टादशांगुलमितं हृदयं सुखाय चेद्रोमशं च विषमं न सुखाय किंचित् ॥४१॥ जिस स्त्रीके हृदयके रोम फटेमुखके हों अथवा अकस्मात् स्वयं उखडजावें वह अपने पतिको मारतीहै जिसका हृदय जितना लंबा उतनाही चौडाभी होतो व्यभिचारिणी होतीहै. जिसका हृदय १८ अंगुल हो तो सुख होताहै यदि रोमोंसे भराहुआ तथा कहीं ऊंचा कहीं नीचाभी हो तो उसको थोडाभी सुख नहीं मिलता ॥४१॥ उन्नतं पीवरं शस्तं हृदयं वरयोपिनाम् ॥ अपीवरमिदं नीचं पृथुदौर्भाग्यसूचकम् ॥ ४२ ॥ उत्तमस्त्रियोंके हृदय ऊंचे, स्थूल शुभहोतेहैं गहरा और चिपिट रूक्ष, कठोर हो तो दौर्भाग्य ( भाग्यहोन) करताहे ॥ ४२ ॥ भवत एव समौ सुदृढाविमौ यदि घनौ सुदृशस्तु पयोधरौ ॥ निजपतेरनिशं परिवर्तुलौ कुसुमवाण- विनोदविवर्धकौ ॥४३॥ यदि स्त्रीके दोनों स्तन समान एवं अच्छे (दृढ ) करडे, बहुत खूबसूरत, सुहावने हों तथा गोल हों तो अपने प्रतिको नित्य काम- देवके बाणोंके विनोद ( हर्प ) बढावनेवाले होते हैं ॥४३॥ सुधुवौ विरलौ सूक्ष्मौ स्थूलाग्रावहिताविमौ ॥ पयो- धरौतदा ना ः प्रभवेदक्षिणोन्नतः॥४४॥ पुत्र दोप्यथ कन्यादो यदा वामोन्नतो भवेत्॥सांतरा- लौ च विस्तारौ पीवरास्यौन शोभनौ ॥४५॥ सुंदर है भ्रुकुटि जिसकी ऐसे स्त्रीके यदि स्तन मिले हुये न हों
भापाटोकासमेतम्। (७७)
माडे न होंबडे स्थूल हों पत्थरके समान कठोर हों और (दक्षिणोन-
त) दाहिने ओर झुकें हों यद्वा दाहिना स्तन कुछ बडा हों तो पुत्र
देनेवाली होती है यदि (वामोन्नत) वामे ओर झुके यदा वाम स्तन
कुछ बडा होतो कन्या देते हैं जिन स्तनोंके बीचमें कुछ (अंतराल)
फासला हो तथा बडे हों उनके (मुख) चूंची मोटी हों तो शुभ
नहीं होते ॥४१॥४९॥
मूले स्थूलो क्रमकृशावग्रे तीक्ष्णौ पयोधरौ ।
सुखदौ पूर्वकाले तु पश्चादत्यंतदुःखदौ ॥ ४६ ॥
स्तन जडसे मोटे फिर क्रमसे माडे होते होते अग्रभाग तीक्ष्ण
हो तो प्रथमअवस्थामें सुख पीछे अत्यंत दुःख देतेहैं ॥ ४६॥
पुत्रिणी वनतस्कंधा हस्वस्कंधा सुखप्रदा ॥
पुष्टस्कंधा तु कामांधा रतिभोगसुखावहा ॥४७॥
जिसके स्कंधा पुष्टहों तो वह स्त्री कामदेवसे अंधीसी रहती है
यदि कंधा नम्र हातो पुत्रवती और छोटीकंधासे सुखी होतीहै४७॥
मंदांधा कुटिलस्कंधा स्थूलस्कंधा च तादृशी॥
यदि लोमाकुलस्कंधा वैधव्यं द्रुतमावहेत् ॥४८॥ .
जिसके कंधा) कर्दन टेडी हो वह मदसे अंधी रहती है मोटी
कंधावालीभी ऐसेही मदांधा रहतीहै यदि कंधामें रोम बहुत हों तो
शीघ्र विधवा होतीहै ॥४८॥
स्रस्तांसा संहतांसा च धन्या भवति कामिनी॥
'तुगांसा विधवा ज्ञेया विमांसा सा तथैवच ॥४९॥
स्कंधाके किनारे बाहुके जड़ (अंस) चौडे हो यद्वा करडे हों तो
वह कामिनी धन्य (भाग्यवती) होवै जिसके उक्तभाग ऊंचे हों
अथवा (मांस रहित) माडे हों तो विधवा जाननी ॥४९॥
(७८)
भावकुतूहलम् ।
अंगुष्ठांगुलिकं युग्मं यत्पद्मकलिकासमम् ॥
बहुभोगाय नारीणां निर्मितं विधिना पुरा ॥ ५० ॥
अंगूठा तथा दोअँगुली स्त्रियोंकी यदि कमलकी कलीके समान
हों तो बह भोग देती है यह स्त्रियोंके भोगनिमित्त पहिले ब्रह्माने ब-
नाया ऐसा जानना ॥५०॥
करतलं भुजयोर्यदि कोमलं विमलपद्मनिभं चसमु-
नतम् ॥ निजपतेः कुसुमायुधवर्द्धकं निगदितं
मुनिना विधिनोदितम् ॥ ५१ ॥
भुजाओंसे (करतल) हार्थोके तलवे यदि कोमल, निर्मल कम-
लके समान, तथा ऊंचे हों तो अपने पतिके कामदेवको बढानेवाले
होते हैं यह ब्रह्माके वचन मुनियोंने कहे हैं ॥५१॥
स्वच्छरेखाकुलं भद्रं नो भद्रं हीनरेखया ॥
अभद्रं रेखया हीनं वैधव्यं चातिरेखया ॥५२॥
यदि हाथका तलुवा निर्मलरेखाओंसे भरा हो तो मंगल देने
वाला होताहै यदि रेखा छोटीहो तो अमंगली है यदि रेखा न होतो
अमंगली होवै और अति रेखा हों तो वैधव्य पावै ॥२२॥
शिरालं कुरुते निःस्वं नारीकरतलं यदि ॥
समुन्नतं च विशिरं करप्टष्ठं सुशोभनम् ॥ ५३ ॥
हाथ अति (शिरा)नसियोंसे भरा होतो स्त्री निर्द्धन होवे और हाथ
का पिछवाडा ऊंचा (तथा) नसियोंसे रहित हो तो शुभ होताहै ५३
रोमाकुलं गभीरं च निर्मासं पतिजीवहृत् ॥
सुभ्रवः करपृष्ठस्य लक्षणं गदितं बुधैः ॥ ५४॥
भाषाटीकासमेतम् । (७९)
यदि हाथकी पीठ रोमोंसे भरी, तथा गहरी हो तो पतिके प्राणोंको
हरे इतने सुदृस्त्रियोंके करपृष्ठके लक्षण पंडितोंने कहे हैं ॥५४॥
गभीरा रक्ताभाभवति मृदुला वास्फुटतरा करेवा-
मेरेखा जनयति मृगाक्ष्यावहुशुभम् ॥यदा वृत्ताका-
रा पतिरतिसुखं विंदति परं विसारं सौभाग्यं
बलमपि सुतं स्वस्तिकमपि ॥५५॥
यदि स्त्रीके बॉयें हाथमें गहरी लाल रंगकी, कोमल पेखनेमें स्पष्ट
तर रेखा हों तो पतिका रति (कामक्रीडा)का परम सुख पाती है
सौभाग्यबढाती है वलदान होती है यदि हाथमें स्वस्तिकभी हो तो
पुत्रवती होवै ॥५५॥
करतले यदि पद्ममिलापतेः प्रियतमा परमा गरि-
मावृता ॥ नृपमपत्यमलं जनयेदरं बलवतामपि
मानविमर्दकम् ॥५६॥
यदि स्त्रीके हाथमें कमलका चिह्न हो तो परम बढपनसे युक्त राज
रानी होवैतथा संतानोंमें निश्चय राजाकोही उत्पन्न करे अर्थात् इस-
का पुत्रभी राजा होवै जो बलसे बलवानोंके वलकोभी मर्दन करने
वाला हो ॥५६॥
यदा प्रदक्षिणाकारो नंद्यावर्तः प्रजायते ॥
चक्रवर्तिनृपस्त्री सा यस्याः पाणितलेमले ॥२७॥
यदि स्त्रीके निर्मलहाथमें प्रदक्षिणाकार धुमाहुआ नंद्यावर्त
चिन्ह हो तो वह स्त्री चक्रवर्ती राजाकी रानी होवै ॥१७॥
आतपत्रं च कमठः शंखोपि यदिवा भवेत् ॥
नृपमाता गुणोपेता भव्याकारा पतिव्रवा ॥ ५८॥
(८०) भावकुतूहलम् । जोस्त्रीके हाथमें छत्र, कमल, कछुआ, अथवा शंखकासा चिह्न हो तो वह गुणवती राजमाता तथावडे यद्वा सुंदरआकारकी और पतिव्रता होवे ॥१८॥ यस्या वामकरे रेखा तुलामालोपमा भवेत् ॥ वैश्यवामा रमापूर्णा नानालंकारमंडिता ॥ ५९ ॥ जिसके वायें हाथमें (तराजू)तगडी अथवा मालाके समान रेखा हो तो उसका पति यद्वा वही व्यापारी होवै अथवा व्यापारी वा वैश्यको स्त्री होवै तथा धनसे परिपूर्ण रहे. अनेक भूपण अलंकारोंसे सुशोभित रहै ॥१९॥ करतलेगजवाजिवृपाकृतिः कृतिविदामवलाकिल कोविदा ॥ भवति सौधसमा यदि सुभ्रुवोः शशिनिभाऽतिशुभा किल रेखिका ॥ ६० ॥ जिस स्त्रीके हाथके तलुआमें हाथी, घोडा, वैलका चिह्न हो वह चतुर एवं कियेकामकी परीक्षा करनेवाली अर्थात् कदरदान और पंडिता होवै. जिस सुंदर भ्रुकुटिवाली स्त्रीके हाथमें चूनेवाला पक्केमकानके समान चिह्न हो अथवा चंद्रमाके समान रेखा हो तो वह अति शुभफल देती है. गुणवती भाग्यवती करती है ॥६॥ भवति सा विमलांकुशचामरामलशरासनवद्यदि रेखिका ॥ गुणविभूषितभूपतिवल्लभा करतले श- कटेन विशोवला ॥६१ ॥ जिस स्त्रीके हाथमें निर्मल अंकुश, चामर, तथा निमल वाणके आकारका चिह्न रेखाकाहो तो वह शुभगुणोसे शोभायमान, राज- रानी होवे अर्थात उसका पति राजा वा राजतुल्य होवे यदि हाथमें भाषाटीकासमेतम्। (८१) (शकट) गाडीके आकारकी रेखा हो तो उसका पति वैश्य यद्रा व्यापारी होवै॥६॥ अंगुष्ठमूलतो रेखा कनिष्ठां यदि गच्छति ॥ यस्याः सा पतिहंत्री तां दूरतः परिवर्जयेत् ॥६२॥ जिस स्त्रीके अँगूठेके जडसे (कनिष्ठा) छोटी अंगुलीके मूलपर्यंत पहुँची हो तो वह अवश्य अपने पतिको मारकर विधवा रहैगी. ऐसी स्त्रीको दूरहीसे वर्जित करना ॥६२॥ यदि करे करवालगदामलप्रखरकुंतमृदंगकुरंग- वत् ॥ भवति शूलनिभा खलु रेखिका भुवि सदा धनदा प्रमदा तदा॥६३॥ जिस स्त्रीके हाथमें तलवार, गदा, निर्मल एवं तीखा कुंत मृदंग हरिण, शूलके समान रेखा हो तो वह स्त्री पृथ्वीपर सर्वदा धनवाली तथा दाताभी होवै ॥ ६३॥ वृषभेकवृश्चिकभुजंगजंबुकाः खरकंकपत्रशलभा- विडालकाः ॥ यदि वामपाणितलगा भवंति चेत्कलहेन सार्द्धमतिरोगकारकाः ॥६४॥ जिसके बायें हाथमें हथेलीमें पैल मेंडक, बिच्छु, सर्प, स्यार, गदहा, (कंकपत्रपक्षी) कैंचुआ, शलभ अथवा ठडी, बिल्लीका चिह्न हो तो कलहारी होवै तथा अतिरोगपीडित रहै ॥ ६ ॥ कोमलः सरलोंगुष्ठो वर्तुलो यदि योषिताम्॥ क्रमादेवं कृशांगुल्यो दीर्घाकाराश्च वर्तुलाः ॥६५॥ पृष्ठरोमाः प्रजाःशस्ताश्चिपिटा उदिता बुधैः॥
(८२) भावकुतूहलम् । कृशाः कुंचितपर्वाणो ह्रस्वा रोगभयावहाः॥६६॥ अनेकपर्वसंयुक्ता उन्नतांगुलयो शुभाः ॥६७॥ यदि स्त्रीके अंगुष्ठ वर्तुलाकार (गोल) तथा सीधा और कोमल हो और अंगुली उससे क्रमकरके न्यून जैसे एकसे दूसरी कमहोती जावें तथा लंबे आकारकी (वर्तुल) गोल हों उनके पीछे रोम जमेंहों एवं पृष्ठभाग उनका चिपिट (चौडा) स्वल्पमांसवाले हों तो शुभ- फल देतेहैं ये शुभलक्षण हैं यदि अंगुलि माडी हो उनके रेखाओंके वीचके पर्व अथवा अंगुलियोंके अग्रभाग माडे हों तथा अंगुली छोटे कदकी हों तो रोगकी भय देती हैं यदि अंगुलियोंमें अनेक (पर्व) रेखा मध्यस्थान हो तथा ऊंची हो तो शुभफल देनेवारी हो तीहै ॥६५॥६६॥६७॥ शंखशुक्तिनिभा निम्ना विवर्णा न नखाः शुभाः ॥ कपिला वक्रिता रूक्षाःसुभ्रवः सुखनाशकाः ॥६८॥ स्त्रीके नाखून यदिशंख यद्वा सीपके समान हों तथा वीचमें गहरे वर्णरहित हों तोशुभ नहीं होते तथा कपिल वर्ण एवं मुडे हुये और रूखे भी हों तो सुखका नाश करतेहैं ॥ ६८॥ यदि भवंति नखेपु मृगीदृशां सितरुचो विरलायदि विन्दवः ॥ अतितरां कुसुमायुधपीडया परजनेन लयंति रमति ताः॥६९॥ मृगके समान हैं नेत्रजिनके ऐसी स्त्रियोंके नखूनोंमें यदि श्वेत- रंगके (पिंदु) छोटे हों तो वे अतिही कामदेव की पीडासे परपुरुषोंसे स्वयं बातचीत करें तथारमितभी रहें ॥६९ ॥ गुप्तास्थिप्टष्ठवंशेन मांसलेन पतिप्रिया ।। रोममूलेन पृष्ठेन विधवा भवति ध्रुवम् ।। ७० ॥ " Omgran भाषाटीकासमेतम् । (८३) 'जिस स्त्रोके पीठकी हड्डी (कनकदंड )मासमें छिपी हो तो वह पतिकी प्यारी होती है यदि पीठपर बहुतरोम हों तो निश्चय विध- वा होतीहै ॥ ७० ॥ सशिरेणातिभुग्नेन विनतेन च दुःखिता॥ सरलो मांसलो यस्याः पृष्ठवंशः समुन्नतः॥७॥ सापत्यु रनुभद्राख्या मुक्तालंकारमंडिता ॥ अतिप्रिया सुशीला चवरालीभिः समावृता ॥७२॥ जिसका पृष्ठभाग (शिरा) नसियोंसे युक्त हो कहीं ऊंचा कहीं नीचा हो तथा गहरा हो तो वह स्त्री दुःखित रहती है । जिसका पृष्ठभाग (सरल) सीधा, माससे भरा हुआ हो तथा पीठके बीचकी हड्डी ऊंची हो तो वह पतिव्रता पतिको मंगल करनेवाली मोति आदिरत्रोंके भूपणोंसे शोभित रहै पतिकी अतिप्यारी होवे अच्छा (शील) स्वभाव होवै श्रेष्टसखि किंवा दासियोंसे युक्त रहै ।७११७२। कंठो वर्तुलरूपः कमनीयः पीनतायुक्तः ॥ चतुरंगुलश्च यस्याःसा निजभर्तुः प्रिया भवति॥७३॥ जिस स्त्रीका (कंठ) गला गोलआकारका, सुंदरसुहावना तथा ऊंचाईको लिये है लंबाईमें चार अंगुल हो तो वह अपने भाकी प्यारी होती है ॥७३॥ गुप्तास्थिमासला ग्रीवा त्रिरेखाभिः समावृता ॥ सुसंहता तदा शस्ता विपरीता न शोभना ॥ ७४ ॥ जो गला(कंठ)मांससे पुष्ट हो हड्डी जिसकी प्रकट नहीं विवलीके समान तीनरेखाओंसे युक्त हो दृढहो तो शुभहोताहै इससे विपरीत
(८४)
भावकुतूहलम्।
माडा, ऊंची हड्डीवाला कहीं ऊंचा कहीं नीचा हो तो अशुभ
होताहै ॥ ७४॥
स्थूलग्रीवा धवत्यक्ता रक्तग्रीवा च दासिका।।
अपतिश्चिपिटग्रीवा लघुग्रीवार्थवर्जिता॥७५ ॥
गला मोठा हो तो पतिसे त्यक्त रहै गलेका लालरंग हो तो दासी
होवै जिसकी ग्रीवा (चिपिट) चौडी माडी हो तो विधवा होवै
जिसकी ग्रीवा छोटी हो वह (धनवर्जिता) दरिद्रा रहै ॥७५ ।।
सुघना कोमला यस्या निर्लोमा च हनुः शुभा ॥
लोमशा कुटिलालध्वी चातिस्थूला न शोभना ॥७॥
जिसकी टोडी घणी, कोमल और रोमरहित हो तो शुभहोती है
जिसमें रोम बहुतहों (टेढी) तिछौँ हो छोटी अथवा बहुतमोटी हो तो
शुभ नहीं; दुःख दौर्भाग्य दारिद्य करती है ॥६॥
मांसलौ कोमलावेतौ कपोलौ वर्तुलाकृती॥
समुन्नतौ मृगाक्षीणां प्रशस्तौ भवतस्तदा ॥७७॥
जिन मृगाक्षियोंके गाल बहुत मांस युक्त, गाढ़े, कोमल गोला-
कार ऊंचे हों तो शुभ होते हैं ॥ ७७॥
निर्मासौ पुरुषाकारौ रोमशौ कुटिलाकृती॥
सीमंतिनीनामशुभौ दौर्भाग्यपरिवईकौ ॥७८ ॥
जिस नवयौवना स्त्रीके (कपोल) गाल मांसरहित हों अथवा
पुरुपकेसे हों टेढ़ी विंगीआकृतिके हों तो अशुभ होतेहैं दौर्भाग्य
कंबख्ती बढानेवाले होते हैं ॥ ७८॥
वर्तुलो रेखयाक्रांतो वन्धूकसदृशोधरः ॥
स्निग्धोराजप्रियो नित्यं सुभ्रवः परिकीर्तितः ॥७९॥
भाषाटीकासमेतम् । (८५) जिन सुभ्रुओंके होंठ रेखाओंसे युक्त तथा अधर बंधूकपुष्पके समान रनवर्ण हों तथा अच्छा (स्निग्ध) चिकने हों तो (राज- प्रिय) बड़े लोगोंकी प्यारी यद्वा राजरानी होवै. यह पूर्वाचार्योंने कहाहै ॥७९॥ प्रलंवः पुरुषाकारः स्फुटितो मांसवर्जितः ॥ दौर्भाग्यजनको ज्ञेयः कृष्णौ वैधव्यसूचकः॥ ८० ॥- जो ओष्ठ लंबाहो, पुरुषकेसे ओष्ठसमान हो फटाहुआ हो तथा मांसरहित हो तो दौर्भाग्यदेनेवाला जानना यदि ओप्ट कृष्णरंगका हो तो वैधव्य जनाता है ॥ ८ ॥ उपय॑धः समा दंताः स्तोकरूपाः पयोरुचः॥ द्वात्रिं- शदास्यगा यस्याः सा सदा सुभगा भवेत् ॥ ८१ ॥ जिसस्त्रीके मुखमें दांत ऊपर तथा नोचेके सम हों मिलेहुये हों परंतु एकके ऊपर दूसरा न हो दूधके समान कांतिमान हों गिनतीमें बत्तीस हो तो वह सौभाग्यवती रहती है ।। ८१॥ अधोदंताधिकलेन मातृहीना च दुःखिता ।। विधवा विकटाकारैः स्वैरिणी विरलद्विजैः ॥२॥ जिसके नीचेके दांत बड़े हो यद्वा गिनतीमें उपर दातोंसे अधिक हों तो मातासे हीन एवं दुखितभी रहै यदि दांत ( विकटरूप) कुरूप हों तो विधवा हो और दांत (छोटे)बीचमें अंतराल सहित हो तो व्यभिचारिणी होवै ।। ८२ ॥ कोमला सरला रक्ता श्वेता च रसना शुभा ॥ स्थूला या मध्यसंकीर्णा विकृता सुखनाशिनी।।८३॥ स्त्रीकी जीभ कोमल, सरल और लाल, वा श्वेतरंगकी अथवा " (८६) भावकुतूहलम् । रक्त श्वेत मिले हुये रंगकी शुभ होती है जो जीभ आयतमें मोटी बीचमें माडी हो तथा विकृतरूप हो तो सुखका नाश करतीहै८३ श्यामया कलहा नित्यं दरिद्रं स्थूलया भवेत् ॥ अभक्ष्यभक्षिणी ज्ञेया जिह्वयालंवमानया ॥ ८४ ॥ *जिसकी जिह्वा श्याम रंगकी हो वह नित्य कलह करनेवाली होवै जिसकी जिहा मोटी हो वह दरिद्रा होवै और जिसकी जिह्वा लंबी हो वह (अभक्ष्यभक्षिणी) न खानेके वस्तु खानेवाली होवै८४ तालु कोकनदाभासं कोमल भद्रकारकम् ॥ नारी प्रव्रजिता पीते सिते वैधव्यमाप्नुयात् ।। ८५॥ जिसकी तालू कमल (रक्तोत्पल) के समान रंग, कांतिमान हो तो मंगलसूचक होता है यदि तालू पीतवर्ण हो तो स्त्री (प्रव्रजित) फकीरनी होवै. श्वेतवर्ण हो तो वह स्त्री विधवा होवे ।। ८५ ॥ श्यामले पुत्रहीना च रूक्षे तालुनि दुःखिता। वके कलिप्रिया नारी बहुरूपे च दुर्भगा ॥८६॥ जिस स्त्रीके तालू कृष्णरंग तथा रूक्ष हो तो अति दुःखित रहै. जिसके तालुका चक्र विपरीत हो वह कलिहारी,कहलमें शोक रखनेवाली होवे जो तालूके अनेक रूपरंगहों तो(दुर्भगा)दरिद्रा कुलकलंकिनीभी होवै ॥८६॥ क्रममूक्ष्मारुणा वृत्ता स्थूला घंटी शुभा मता ॥ अतिस्थूला प्रलंवा च कृष्णा नैव शुभा भवेत्।।८।। (घंटिका) कंठमूलके प्रथमभाग स्थूल तदूर क्रमसे सूक्ष्म तथा लालरंगकी, गोलाकार, मोटी शुभ होती है जो घंटिका अति स्थूल, बहुतलंबी कृष्णरंगकी हो वह शुभ नहीं होती ॥ ८७ ॥ भवति चेदनिमीलितलोचनं शुभदृशां दरफुल्लक-
भाषाटीकासमेतम् ।
(८७)
पोलकम् ॥ अलमलक्षितदन्तमुदीरितं पतिहितं.
सततं स्मितमुत्तमम् ॥ ८८॥
जिस स्त्रीके स्वभावहीसे (वाणी) बोलना विना आँखवंदकिये
सुहापिसे हो. तथा कहनेमें (कपोल) गाल कमलके समान खिले
मुख करिके शोभायमान हों और बात करनेमें दांत दिखाई
न दें ऐसे लक्षणोंका मुसकराना हो तो शुभ लक्षण है पतिका
हित करती है ॥ ८८॥
नासिका तु लघुच्छिद्रा समवृत्तपुटा शुभा ॥
स्थूलाग्रा मध्यनम्रा च न शस्ता सुभ्रवो भवेत्॥८९॥
सुंदर भृकुटीवाली स्त्रीकी नाक छोटेछिद्रका, (सम ) सरल
वृत्ताकारपुटकी शुभ होती है. यदि नासिकाका अग्रभाग स्थूल
मध्यमें गहरी हो तो शुभ नहीं होती ॥ ८९ ॥
लोहिताग्रा कुंचिता च महावैधव्यकारिणी ॥
दासिका चिपिटाकाराप्रलंवा च कलिप्रिया ॥१०॥
नासिकाका अग्रभाग लालरंगका एवं मुडा हुआ हो तो महा
वैधव्य करती है जिसकी नाक (चिपिट)सूखी सरीसीहो तथा अति-
लंबी हो तो वह स्त्री (कलिहारी) कलहको प्रियमाननेवाली होवे ९०
रक्तांते लोचने भद्रे तदंतः कृष्णतारके ॥
कंबुगोक्षीरधवले कोमले कृष्णपक्ष्मणी ।।९१ ॥
स्त्रीके नेत्रोंका अंतिमभाग रक्त हो तो मंगल देनेवाले होते हैं
उन नेत्रोंके मध्यवर्ती (तारा) पुतलो कृष्णवर्णके तथा ( कंबु)
शंख यदा गोके दूधके समान श्वेतरंगके वाह्यपुतली हो एवं कोमल
हों और पलकोंके केश कृष्ण हों तो शुभलक्षण हैं ॥९१ ॥
(८८) भावकुतूहलम् ।। अल्पायुरुनताक्षी च वृत्ताक्षी कुलंटा भवेत् ॥ अजाक्षी केकराक्षी च कासराक्षी च दुर्भगा ॥९२॥ जिस स्त्रीके नेत्र ऊंचे हों वह अल्पायु होती है जिसके नेत्र गोल हों वह व्यभिचारिणी होवै जिसके बकरेकेसे अथवा केकर केसे अंधवा महिपकेसे नेत्र हों वह दुर्भगा होवै ॥.९२ ॥ पिंगाक्षी च कपोताक्षी दुःशीला कामवर्जिता ॥ कोटराक्षीमहादुष्टा रक्ताक्षी पतिघातिनी॥९३॥ पीले नेत्र यद्वा पिंगलपक्षीसे नेत्रवाली तथा कपोतपक्षीकेसे नेत्रवाली दुष्टप्रकृति कामरहित होवेंजिसके नेत्र कोटरके समान गहरे हों वह बड़ीही दुष्टा होवे और लाल नेत्रवाली विधवा होती है९३ बिडालाक्षी गजाक्षी च कामिनी कुलनाशिनी ॥ वन्ध्या च दक्षकाणाक्षी पुंश्चली वामकाणिका ॥१४॥ जो कामिनी विल्लोके समान अथवा हाथीके समान नेत्रवालीहो, वह कुलका नाश करती है जिसकी दाहिनी आँख (काणि) फूटी वा किसीप्रकार गई हो वह बांझ और वामआंख काणीसे व्यभि- चारिणी होवै ॥ ९४ ॥ सदा धनवती नारी मधुपिंगललोचना ॥ पुत्रपौत्रसुखोपेता गदिता पतिसंमता ॥९५॥ जिस स्त्रीके नेत्र सहतसमान पीले हों वह सर्वदा धनवतीरहै तथा पुत्रपौत्रोंके सुखसे युक्त पतिके संमत आचार्योंने कही है ॥९५॥ कोमलै रसिताभासैः पक्ष्मभिः सुघनैरपि ॥ लघुरूपधरैरेव धन्या मान्या पतिप्रिया ॥९६ ॥ जिस स्त्रीके पलक कोमल हों श्याम न हों तथा वणेभी हों और
भापाटीकासमेतम् । (८९)
छोटे रूपको धारण किये हों वह स्त्री धन्य है. लोकमें माननीय
तथा पतिकी प्रिया होवै॥ ९६॥
रोमहाँनैश्च विरलैल्लम्वितैः कपिलैरपि ।।
पक्ष्मभिः स्थूलकेशैश्च कामिनी परगामिनी॥९७॥
जिसके पलक रोमरहित हों अथवा कहीं कहीं स्वल्प रोम हों
तथा नीचेको लंबायमान एवं कपिलवर्ण हों अथवा मोटे केशवाले
हों तो वह कामिनी परपुरुषगामिनी हो ॥ ९७॥
वर्त्तला कोमलाश्यामा भूर्यदा धनुराकृतिः ।।
अनंगरंगजननी विज्ञेया मृदुलोमशा ॥९८॥
जिसकी भृकुटी (भौंह ) गोल, कोमल, श्यामरंग, और धनुपके
समान घूमेहुये हों वह कामक्रीडामें पतिको सुख देनेवाली होती है
तथा भृकुटीपर कोमलरोमोंसेभी यही फल है ।। ९८ ।।
पिंगला विरला स्थूला सरला मिलिता यदि ॥
दीर्घलोमा विलोमा च न प्रशस्ता नतध्रुवा ॥१९॥
जिस स्त्रीके भ्रुकुटीपर भूरे केश हों यदा छांटे केश हों मोटी हो
सीधी हो दोनों भृकुटी मिली हों अथवा लंकेशवाली हो यद्वा
विना केशकी हो तो यह शुभलक्षण नहीं है वह स्त्री दुर्लक्षणा होती
है. झुकी हुई ध्रुकुटीवालीभी ऐसेही होती है ॥ ९९ ॥
प्रलंवौ वर्तुलाकारौ कौँ भद्रफलप्रदौ ॥
शिरालौ च कृशौ निंद्यौ शप्कुलीपरिवर्जिती ॥१०॥
जिस स्त्रीके कान लंबे,गोलाकार (गिदं) हा तो शुभफलदेनेवाले
होते हैं जिनपर नशी (शिरा)बहुत प्रगट होंशुष्क (माडे) हों तथा
फेणिकाकार नहों तो निन्य है अर्थात् अशुभफल देते हैं।॥१०॥
(९०) भावकुतूहलम्। उन्नतत्यंगुलो भालः कोमलश्च नतभ्रुवाम् ॥ अईचंद्रनिभो नित्यं सौभाग्यारोग्यवर्द्धकः ।।१।। मस्तक (माथा) तीन अंगुलप्रमाण ऊंचा हो कोमल हो और जिन नम्रभुकुटीवालीस्त्रियोंका मस्तक अर्द्धचंद्रमाके आकारका हो तो वह सौभाग्य, नीरोगिता आदिसौख्य बढानेवाला होता है ॥१॥ व्यक्तस्वस्तिकरेखयाकुलमलं नार्या ललाटस्थलं सौभाग्यामलभोग्यकृत्तदलिकं लंबायमानं यदि ॥ अन्दा देवरमाशु हंति नितरां रोमाकुलं रोगदं रेखाहीनमनंगभंगजनकं ज्ञेयं बुधैः सर्वदा ॥२॥ जिस स्त्रीके (ललाट) माथेमें स्वस्तिक (भ्रू) चिह्न प्रकट हो अथवा बहुत स्वस्तिक हों तो वह स्त्री सौभाग्ययुक्त उत्तम निर्मल भोग युक्त रहती है यदि वही चिह्न लंबा यद्वा लटकतासा हो तो वह स्त्री साक्षात् देवरका नाश करती है यदि मस्तिष्क रोमोंसे भरा हो तो रोगी रहै यदि रेखाओंसे रहित हो तो कामदेव संबंधी भं- गता पंडितोंने सर्वदा जाननी ॥२॥ करिपुंगवकुम्भसमान उत प्रवरोन्नतएवकदंवनिमः।। इह मौलिरजस्रमिला विमला विविधा बहुधान्य- युता सुद्दशः॥३॥ जिन सुनेत्रा स्त्रियोंका माथा श्रेष्टहाथीके गंडस्थलसमान अथवा क्रमसे ऊंचा कदव सदृश हो तो उनके घरमें निरंतर निर्मललक्ष्मीका निवास रहे तथा अनेकप्रकारके बहुत अन्ना- दियोंकी समृद्धि रहे ॥३॥ पीनमौलिरतिमानहारिका दारिका कुजनसंगका-
॥
भापाटीकासमेतम्। (९१)
रिका ॥ लम्बमौलिरपि सर्वनाशिका बंधकी निज-
कुलान्तकारिका ॥४॥
जिस कन्याका माथा (ऊंचा) चूलीसदृश पैना हो वह अपने
मानको खोवे दुष्टजनोंकी संगतिकरे जिसका माथा लंबा हो वहभी
सर्वनाश करे अपने कुलका नाशकरे यदा बांझिनी होवै ॥४॥
केशा यस्या भ्रमरपटलोपेक्षवर्णाःसुवर्णावक्राकाराः
कुवलयदृशः किंचिदाकुञ्चिताग्राः॥ भाग्यसद्योदद
ति विरलाः पिंगलाः स्थूलरूपा रूक्षाकाराः परम
लघवो वन्धवैधव्यदुःखम् ॥५॥
जिस कमलनयनीके शिरके केश भ्रमरसमूहके समान कृष्णवर्ण
तथा चमकीले और मुडे हुये (कुंचित) तथा थोडे मुडे हुये अग्र
भागवाले होवें तो ऐश्वर्य (भाग्य) देते हैं यदि छांटे हों पीले
भरेरंगके, मोटे, रूखे, हों अथवा अतिही छोटे हों तौ वैधव्य बंधन
आदि दुःख देते हैं ॥५॥
मशकोपि ललाटपट्टवर्ती यदि जागर्ति स मध्य-
गोध्रुवोर्वा ॥ तनुते सुखमर्थराशिभोगं सततं
पत्युरपत्यभृत्ययोश्च ॥६॥
जिसके मस्तकमें (मसा) चर्मविकारसे छोटा व्रण सरीखा हो
अथवा वह भ्रुकुटीके बीच में हो तो सुख, अतिधनी, अनेकभोग,
और पतिपुत्रका सुख पाती है ॥६॥
मशकोपि कपोलमध्यगामी सुदृशो लोहित एवमि-
ष्टदः स्यात् ॥ हृदयं तिलकेन शोभितं लसनेनापि
च राज्यकारणम् ॥७॥
(९२)
भावकुतूहलम् ।
जिसके गालमें मसा लालरंगका हो तो इष्ट सिद्धि करता है.
यदि हृदयमें तिल वा ( लसन ) लाल वा, नीला चिह्न हो तो
राज्य देता है ॥७॥
लोहितेन तिलकेन मण्डितं सुभ्रुवो हि कुचमण्ड-
लं यदा ॥ जायते किल सुताचतुष्टयं वालकत्रय-
मुदीरितं तदा ॥८॥
जिस सुभ्र स्त्रीके स्तनमण्डलमें लाल रंगका तिल हो तो उसके
चार कन्या और ३ पुत्र होवें यह पूर्व शास्त्रोंमें कहा है ॥ ८॥
भवति वामकुचेऽरुणलांछनं शुभदृशस्तिलकं कमल
प्रभम् ॥ प्रथमतस्तनयं परिसूय सा कृतिवरं विध
वा तदनंतरम् ॥९॥
जिससुभ्रस्त्रीके वामस्तनमें लालरंगकालांछन हो वह प्रथम युवा-
वस्थामें गुणवान पंडित पुत्रको उत्पन्न करके विधवा हो जावै।।९।।
लसति बालमधुव्रतसन्निभं शुभशस्तिलकं
गुददक्षिणे ॥ नरपतेरबला कमलालया नृपमपत्य-
मरंजनयेदलम् ॥ १०॥
जिस सुंदर भ्रुकुटिवालीस्त्रीके छोटेभ्रमरोंके समूहसमान रंगका
(कृष्ण) तिल गुद द्वारके दाहिने हो तो वह राजाकी स्त्री हो
उसके घरमें लक्ष्मीका वास रहै तथा इसका पुत्रभी निश्चय
राजाही होवै ॥१०॥
मशकोपि च नासिकाग्रगामी सुदृशी विद्रुमकांति-
रर्थदायी ॥ अलिपक्षनवाभ्ररूपधारी पतिहन्त्री
किल पुंश्चली विशेषात् ॥११॥
भाषादीकासमेतम्। (९३) जिस सुनेत्रा स्त्रीके नासिकाके अग्रभागमें लाल रंगका मसा हो तोधन देता है यदि वही मसाभ्रमरपक्ष यद्वा नवीन मेघके रूप- को धारण किये हो तो पतिको मारती है विशेषतः व्यभिचारिणी होती है.॥११॥ यदि नामेरधोभागे तिलकं लांछनं स्फुटम् ।। सौभाग्यसूचकं ज्ञेयं मशको वा नतभ्रुवाम् ॥ १२ ॥ जिन नम्रभुकुटिवाली स्त्रियोंके नाभीके नीचे तिल अथवा लां- छन प्रकट होवै तो सौभाग्य जनाता है अथवा मसा हो तो भी ऐसाही फल करता है ॥ १२ ॥ यदि करे च कपोलतलेऽथवाभवति कंठगतं तिलक तदा। श्रुतितलेऽपि च सा पतिवल्लभा वरदृशी मश- कामललांछनैः॥ १३॥ जिस सुनेत्रा स्त्रीके हाथके तलुवामें, मालमें, अथवा कंठमें यद्वा कानके नीचे, तिल हो तो वह स्त्री पतिकी प्यारी होवै ऐसेही मसा आदि निर्मल लांछनसे जानना॥ १३॥ भालस्थेन त्रिशूलेन शंभुना निर्मितेन वै॥ यस्याः सालीसहस्राणामीशितामाप्नुयादरम् ॥१४॥ जिस भाग्यवतीस्त्रीके माथेमें शिवजी कृपाकरके विशुलाकार रेखाका चिन्ह करदें तोवह हजारहों (आली) सखियोंकी स्वामिनी होवे अर्थात् अतीव ऐश्वर्यवती होवे ॥१४॥ किटकिटे तिलकं कुरुते मिथः शुभदृशः शयने तु
(९४)
भावकुतूहलम् ।
रदावली॥ महदमंगलमाह विशेपतः प्रियतमेत -
लक्षणकोविदाः ॥१५॥
जिस सुदृशी स्त्रीके दोनों पंक्तिके दांत सोयमें किट किट शब्द
करें अर्थात् दांत परस्पर लड़ें तो उसके पतिको वही अमंगल हो.
ताहै यह विशेप दुर्लक्षण है शरीरके लक्षणोंके जाननेवाले पंडित
लोगोंने कहा है ॥ १५॥
शकटवद्यदि योनिललाटगो मृगदृशो मृदुलोमग-
जो भवेत् ॥ वरदुकूलमाणिव्रजमंडिता क्षितिभृतां
वनिता वनितावृता॥१६॥
जिस मृगनयनीके माथेपर कोमल छोटे केशोंसे बना हुआ गा-
डी अथवा (योनि) भगकासा आकार हो तो वह श्रेष्ठवस्त्र, अनेक
रत्नसमूहोंसे शोभित, अनेक (सखी) दासिकायोंसे युक्त राजरा-
नी होवे ॥१६॥
विलसति भगभाले दक्षिणावर्तरूपः कुवलयनय-
नायाः कोमलो लोमसंघः॥ नरपतिकुलभर्तुः का
मिनीमानिनीनामिह भवति वदान्या सैव धन्या
विशेपात् ।। १७॥
पूर्व श्लोकमें जो माथेपर बारीककेशोंसे भगका चिह्न कहाहै
वह यदि (दक्षिणावर्त्त) दाहिनी ओरको घुमा हो तो वह मुंगन-
यनी राजाधिराजकी (कामिनी) प्रिया होवै यौवनगर्विता स्त्रियों-
मे "वदान्या" श्रेष्टा होवै विशेषतः वही स्त्री धन्या है ॥१७॥
भापाटीकासमेतम् । (९५) कण्ठावर्ती भवति कुलटा भर्तृहंत्री कुरूपा पृष्ठाव- ती कठिनहृदया स्वामिहंत्री कुलनी ॥ आवतौ वा भवत उदरे द्वाविहैकोपि यस्याः सापि त्याज्या कृतिभिरवला लक्षण स्तु दूरात् ॥ १८॥ वारीक कोमल रोमोंका पुंज होकर मुडा हुआ जलका आवर्त्त भौंरा जैसा कंठमें हो तो बहुतपतिकरनेवाली,पतिमारनेवाली,कुरू- पा होवै पीठमें हो तो कठोरहृदय (कर्कशा, निर्दया) और भर्त्ताको मारनेवाली कुलका नाशकरनेवाली होतीहै जिसके पेटमें दो अथवा एक भी भौंरा हो वहभी स्त्रियोंके सामुद्रिकलक्षणजाननेवाले चतुरोंको दूरहीसे वर्जित करनी चाहिये ॥ १८॥ सीमंते च ललाटे वा कंठे वापि नतध्रुवः ॥ लोनामावतको दक्षी वामी वैधव्यसूचकः ॥ १९ ॥ माथेके ऊपर केश प्रांतस्थानमें अथवा माथेमें अथवा कंठमें जिस सुभ्रके (रोमावर्त) भौंरा दाहिने ओर अथवा पायें ओर घुमाववाला हो तो पतिव्रता, सौभाग्यवती और वाम भागमें यदा वामभागके ओर घुमाववाला हो तो वैधव्य जनानेवाला होताहै ॥ १९॥ याभिरेव वरदो महेश्वरः पूजितः किल पुरा व्रता- दिभिः॥ पार्वती च परिपूजिता मुदा भक्तियोगविधि ना सुवासिनी ॥ २० ॥ भूपितामलविभूपणादिभिः क्षालितं वपुरनेकधा पुरा ॥ तीर्थराजपयसा भवंति ता लक्षणैरिह शुभः सुलक्षणाः॥२१॥ जिन स्त्रियोंने पूर्वजन्ममें व्रतादिकोंसे शिवजीका पूजन किया हो , (९६) भावकुतूहलम् । तथा प्रसन्नतापूर्वक पार्वतीजीकाभी पूजन किया हो और भक्ति भावसे, योगसाधनविधिसे आराधन कियाहो (सुवासिनी.) सौभाग्य वतीका पूजन उमावतआदियोंसे किया हो उनको वस्त्र. भूपणादि अलंकार दियेहैं अथवा तीर्थराज प्रयागादियोंके जलसे शरीर अनेक वार प्रक्षालित किया हो वेउक्त शुभलक्षणोंसे युक्त लक्षित, सलक्षणा होती हैं अर्थात् जिन्होंने पहिले बडे पुण्य कियेहैं वही भाग्य, ऐश्वर्यवती होतीहैं उन्होंके उक्त शुभचिह्न लक्षण होतेहैं॥२०॥२१॥ कृतं नहि तपो यया नगजया समाराधितो हरिनहि रविव्रतं नहि कृतं च तीर्थाटनम् ॥धनं नहिधरामरे परममर्पितं तर्पितं गुरोः कलमिहांगना भवति सै व दीनांगना ॥२२॥ जिस स्त्रीने पार्वतीजीका तप न किया, अथवा विष्णुका भले प्र- कार आराधन नहीं किया. सूर्यके व्रत नलिये,तीर्थोमें नफिरे, ब्राह्म- णोंको धन नहीं दिया गुरुका कुलतृप्त नहीं किया, वह इस संसारमें (दीना) दुःखदरिद्रयुक्त दुर्लक्षणों सहित होती है ॥२२॥ यतः सुलक्षणी रेखायोषा हीनायुपं पतिम् ॥ दीर्घायुपं सुचरितैः प्रकरोति सुखास्पदम् ॥ २३ ॥ जिससे कि सुलक्षणरेखाओंवाली स्त्रीका पति अल्पायुभी हो तो यह अपने शुभलक्षणोंके प्रभावसे एवं अपने सुचरित्रोंसे उसे दीर्घायु तथा सुखका स्थान करदेती है ॥२३॥ दीर्घायुपं पतिं हंति कुयोगैश्च कुलक्षणैः ।। अंतःसुलक्षणा कन्या परिणेया विचक्षणैः ॥२४॥ जिसस्त्रीके कुयोग एवं कुलक्षण (उक्तलक्षणोंमें) से होतेहैं वे दी.
भापाटीकासमेतम् । (९७) र्घायु पतिकोभी नाशकरके विधवा होती है तस्मात् जाननेवालों ने सुलक्षणा कन्यासे विवाह करना दुर्लक्षणासे नहीं करना ॥२४॥ कुलक्षणविलंक्षिता यदिसुतात्र संजायते श्रुतिस्मृ- ति पथानया परमसोमवारव्रतम्॥विधाय तदनंतरं रहसि कारयित्वाच्युतद्रुमेण हरिणा कृती शुभघटे । न पाणिग्रहम् ॥२५॥ जिसके घरमें कुलक्षणोंसे युक्ता कन्या उत्पन्न होवे उसने वेद तथा धर्मशास्त्रके अनुसार सोमवारका उत्तम व्रत कन्यासे करावना इसके उपरांत एकांतमें विष्णुप्रतिमा तथा (पीपल) अश्वत्थवृक्ष घटमें स्थापन करके उनके साथ विवाह विधिसे विवाह करना२६॥ शुमेहनि कुमारिकाकरनिपीडनं कारयेदरेण चिरजीविना पुनरिदं न दोषायते।।इदंतु बहुसंमतं मुनिवरेण गीतं पुनः प्रमाणपटुनादृतं प्रियविनो- दकंदप्रदम् ।। २६॥ ऐसे प्रतिमाविवाह वा घटविवाह करनेके उपरांत शुभदिन मुहूर्तमें उस कन्याका विवाह चिरजीवी ग्रहवाले वरके साथ विधि- से करना इसमें पुनर्विवाहका दोप नहीं होता और दुर्लक्षण एवं वैधव्य योगोंका फल निराकरण होजाताहै. यह विधि बहुत आचा- र्योंके संमत है. श्रेष्ठमुनिने वर कन्यांके प्रसन्नताके निमित्त यह विधि अनेकाचार्य संमतसे कही है ॥२६॥ कुलक्षणैः कुयोगैश्च लक्षिता वनिता यदा ॥ तस्याः पूर्वविधानेन विवाहं कारयेद्बुधः।। २७॥ सामुद्रिकोक्तकुलक्षणोंसे यद्वा जातकोतकुयोगोंसे लक्षित (९८) भावकुतूहलम् । जो कन्या हो उसका पूर्वोक्तविधिसे प्रतिमाविवाह करना इससे सुहाग बढ़ता है दुर्लक्षण दुर्योगोंका उपाय यही है ॥२७॥ जीवनाथविदुषात्रकामिनीलक्षणं बुधमनोमुदे मया। स्कंदकुंभभवयोर्विवाद व्यासगीतमखिलं प्रका- शितम् ॥ १२८॥ इति श्रीजीवनाथविरचिते भावकुतूहले सामुद्रिकाध्यायःदशमः ॥१०॥ ग्रंथकर्ता आचार्य पंडित जीवनाथ कहता है कि मैंने बुधजनोंके मनप्रसन्न करनेके लिये इतने स्त्रीलक्षण स्कंद और अगस्तिके प्रश्नो- त्तर व्यास देवजीके कहेअनुसार समस्त प्रकाशित किया है १२८॥ इति भावकुतूहले माहीधरीमापायां दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ अथ शयनादिद्वादशावस्थाविचारः। प्रथमंशयनं ज्ञेयं द्वितीयमुपवेशनम् ॥ नेत्रपाणिःप्रकाशश्च गमनागमनैस्ततः॥१॥ सभायांच ततो ज्ञेयआगमो भोजनं तथा॥ नृत्यलिप्सा कौतुकंच निद्रावस्थानभःसदाम्।।२।। अव ग्रहोंकी अवस्था कहते हैं. शयन उपवेशन २ नेत्रपाणि३ प्रकाश ४ गमन ५ आगमन ६ सभा ७ आगम ८ भोजन ९ नृत्य लिप्सा १० कौतुक ११ निद्रा १२ ये अवस्थाओंके नाम हैं।॥१॥२॥ ग्रहर्भसंख्या खगमाननिघ्नी खेटांशसंख्या गुणिता ग्रहाणाम् ॥ निजेष्टजन्मक्षतनुप्रमाणैर्युतार्कतष्टाश- यनाद्यवस्था ॥३॥ जिस नक्षत्रमें ग्रह होउसकी अश्विन्यादिगणनासे जोसंख्याहोउसे भापाटीकासमेतम् । (९९) ग्रहकी संख्यासे गुनके पुनः ग्रहकी अंशसंख्यासे गुनाकर अपनी इष्टघटी, जन्मनक्षत्र, लग्नसंख्याओंसे युक्तकरके बारहसे भागलेना शेप जोरहै वह अवस्था जाननी जैसे (१) शेपमें शयनावस्था (२) में उपवेशन ( ३ ) नेत्रपाणि इत्यादि ॥३॥ शेष शेपहतं स्वरांकसहितं तष्टं पुनर्भानुना संक्षे पं गुणशेपितं खलु भवेदृष्टयाद्यवस्था विधा। पंचद्विद्विगुणाक्षरामगुणवेदाः क्षेपकांका वेःप्राची नैर्यवनादिभिः समुदितास्तेमी निबद्धा मया ॥४॥ उक्त विधिसे जो शेप रहे उसे उसीसे गुनाकर स्वरांक जोड़ना (यह स्वरांक आगे लिखेंगे) पुनः (१२)से शेप करके जिस ग्रह की अवस्था अभीष्टहै उसका (वक्ष्यमाण) क्षेपकांक जोडना तदनं- तर (३)से शेप करके एक (१)शेप रहे तोदृष्टि, (२) रहें तो चेष्टा ( ० ) शेप रहे तो विचेष्टा, जाननी और सूर्यके (५) चंद्रमा- के (२) मंगलके (२) बुधके (३)बृहस्पतिके (५) शुक्रके(३) शनिके ( ३) राहुके (४)क्षेपकांकहैं इतने अंक यवनादि प्राची नआचार्योंके कहेही मैंने यहां लिखेहैं उपपत्ति इनकी ज्ञात नहीं यह ग्रंथ कर्ता कहता है | स्वर शास्त्रमते स्वरांकचक्रम् । अ इ उ ए ओ ऊपर जो स्वरांक कहा वह इस चक्रस्थ क्रमसे लेना जैसे अका १ इके २ उके३ एके ४ ओके ५ नामके (प्रधान) आदि नाफाफ अक्षरमें जो स्वर हो उसका अंकलेते हैं भ म य र ल नाम प्रमाणभी ‘वहींहै जिस नामके व श प स ह पुकारनेसे सोता मनुष्य जाग उठे. क खग च ठ त थ -- (१००) भावकुतूहलम्। अवस्थाका उदाहरण ॥ किसीका जन्म पौपशुक्लपंचमी शुक्र- वारमिथुनलम धनिष्टानक्षत्रके चतुर्थचरणमें है.इष्टघटी२६॥ है.सूर्य मूलनक्षत्रमें चंद्रमा धनिष्ठामें मंगल श्रवणमें बुध पूर्वापाढामें वृहस्पति आ में शुक्र पूर्वाषाढामें शनि मूलमें राहु पूर्वाफाल्गुनीमें केतु पूर्वा भाद्रपदामें है सूर्य ७ अंश चंद्रमा ४ मंगल ११ बुध २६ बृहस्पति ११ शुक्र २५ शनि ७ राहु केतु २३ अंशपरहैं प्रथम सूर्य मूलनक्षत्रमें है इसकी संख्या (१९) सूर्यकी संख्या (१) सेगुना १९ धनके ७ अंश पर होनेसे ७ से गुनदिया १३३ इष्ट २६ जन्मनक्षत्र २३ लग्न मिथुन ३ इनको जोड गुणित संख्यामें मिलाया १८५ रवि १२ से शेप किया शेप ५ शयनादिगणनासे पाचवीं गमनावस्था सूर्यको हुई. पुनः प्रसिद्धनाम गुणानंद आद्याक्षरोत्तरवर्ती स्वर उकारके अधो पंक्ति में संख्या ३ पूर्वागतशेष ५ से शेप ५ गुनदिया २५ स्वरांक ३ जोडके २८ पुनः १२ से शेष किया शेप ४ सूर्यक्षेपक ५ जोडनेसे ९ तीन ३ से शेप किया शेष रहा. इससे सूर्यकी गमनावस्थामें विचेष्टाअवस्था हुई एवंप्रकारसे चंद्रमाकी उपवेशावस्थामें विचेष्टा, मंगल प्रकाशमें विचेष्टा, बुधआगममें दृष्टि बृहस्पति नृत्यलिप्सामें विचेष्टा, शुक्र प्रकाशमें दृष्टि, शनि गमनमें विचेष्टा राहु निद्रामें दृष्टि, केतु सभामें चेष्टा । अथावस्था फलानि। त्रिकोणं वा कर्मण्यपि नयनपाणौ दिनमणेः फलं शस्तं ज्ञेयं मदनसदने नंदनपदे ॥ प्रकाशे मार्तण्डे मृतिपदमपत्यं जनिमतां तथा जायायातिव्यय- मदनमाने च जनने ॥ १॥ पुण्यवाधाकरःपुण्यभे भोजने कोतुके वैरिभे वरिहन्तारविः॥ सप्तमे पंच .
आपाटीकासमेतम् । (१०१) मे तत्रगो वा भवेदंगनापुत्रहा लिंगरोगप्रदः॥२॥ अब अवस्थाओंके फल कहते हैं प्रथम सूर्यके फल हैं कि सूर्य त्रिकोण ६९ वा १० भावमें नेत्रपाणि अवस्थामें हो तो शुभ फल देताहै जो ७५ भावमें प्रकाशावस्थामें हो तो जन्मियोंके पुत्रहा- मि होवे तथा स्त्रीहानि हो ऐसेही फल १२१७।१० स्थानोंमें भी रक्तअवस्थाके जन्ममें जानना १ यदि ९ भावमें भोजनावस्था में हो तो पुण्यमें बाधा डालता है कौतुकावस्थामें छठा हो तो वैरिहन्ता होताहै यदि इसीअवस्थामें ७१६ भावमें हो तो स्त्रीपुत्र हानि और लिंगमें रोग करता है ॥१॥२॥ चंद्रस्य द्वादशावस्था फलंशुक्लदले शुभम् ॥ अशुभंकृष्णपक्षे तु विज्ञेयं गणकोत्तमैः ॥३॥ चंद्रमाके बारहोंअवस्थाओंका फल शुक्लपक्षमें शुभ कृष्णपक्ष- में अशुभ सर्वत्र उत्तम ज्योतिपियोंने जानना ॥३॥ मदननंदनगोवनिनंदनःशयनगश्च कलत्रसुतक्षयं।। प्रथमतः कुरते रिपुणेक्षितोरिपुगृहेकरभंगमनंगतः४ यदियुतःशनिनापि च राहुणा शिरसि रोगकरोध- रणीसुतः।तनुगतःशयने नयने गदं वितनुते नितरा क्षतमंगिनाम् ॥५॥ अंगारकोंगे यदि नेत्रपाणौकरो- त्यनंगातिशयेनभंगम्।भुजंगदंतक्षतपावकांबुभयं नगे हानिमिहांगनायाः ॥६॥ प्रकाशने पंचमसप्त मस्थः सुतं निहंत्याशु निहंति वामाम्॥ पापान्वितः पापखगांतरालेकुकार्मणां केतुवरंकरोति ।। ७॥ मंगलके अवस्थाफल येहें कि भीम शयनावस्थामें सप्तम भावनी 25204
(१०२) भावकुतूहलम् ।
में हो तो स्त्रीहानि पंचमहो तोपुत्रहानि करता है यदि शत्रुभावमें
शत्रुदृष्ट उक्तअवस्थामें हो तो कामदेवसंबंधीलेश यंदा कामदेवव्या-
जसे हाथ टूट जावै ४ यदि शनिसे वा राहुसे युक्तभी हो तो शिरमें
रोग करताहै तथा निरंतर शरीरियोंको हानिही देताहै।यदि मं-
गल लग्नका नेत्रपाणिअवस्थामें हो तो कामदेवके संबंधी कार्यसे
शरीरके अंगभंग करताहै. सर्पभय, दंतरोग, अग्नि जलकी भय हो३
स्त्रीआदिगृहस्थका सुख न होवै ॥६॥ यदि प्रकाशावस्थामें ६७
भावमें हो तो पुत्रस्त्रीकी हानि करता है यहां पंचममें पुत्र सप्तममें
स्त्रीहानि जानना यदि पापयुक्त, पापग्रहोंके वीचभी हो तो कुक-
मियोंमें श्रेष्ठ "पापध्वज" पापियोंमें श्रेष्ट ध्वजा जैसा करताहै।॥७॥
नेत्रपाणौ सुते सौम्ये पुत्रहानिः सुतागमः ।।
सभायामेव कन्यानामाधिक्यं मदने सुते ॥८॥
बुध नेत्रपाणिअवस्थामें पंचम हो तो पुत्रोंकी हानि होवै. सभा-
वस्थामें हो तो पुत्रप्राप्ति होवै अन्यअवस्थाओंमें ५।७ भावोंमें हो
तो कन्या बहुत, पुत्र थोडे होवें ॥८॥
भवति देवगुरौ यदि भोजनेलनुगते मनुजो हि धनु-
ईरः॥ नवमपंचमभे धनवर्जितो भवति पापयु-
तो विसुतो नरः॥९॥
वृहस्पति भोजनावस्थामें लग्नका हो तो मनुष्य धनुपधारी
होवै यदि उक्त अवस्थाम९।५ भावमें हो तो धनरहित और पापयुक्त
भी हो तो पुत्ररहित होवै ॥ ९ ॥
तनुगृहे मदने दशमे सितो नयनपाणिगतो यदि
जन्मनि ॥शुभमतीव फलं तनुते वलं दशनभंगमनं
गविवर्धनम् ॥ १०॥
भापाटीकासमेतम् । (१०३).
शुक्र १७११० भावोंमें नेत्रपाणिअवस्थामें जन्मा हो तो
अतीव शुभफल देताहै बलवान करताहै परंतु दांतोंका भंग और
कामदेवकी वृद्धिभी होती है ॥ १०॥
यत्र कुत्र स्थितो मंदो जन्मकाले विशेषतः ॥
अवस्थानामसदृशं वितनोति शुभाशुभम् ॥ ११ ॥
सभी समयमें विशेपतः जन्मसमयमें शनि किसीस्थानमें हो
तो अवस्थाको नामसदृश फल देताहै ॥ ११ ॥
नवमे मदने वापि राहुराहुरिहांगिनां। महांतो निद्रि-
तो वश्यं पुण्यक्षेत्रनिवासिताम्।।१२।।द्वितीयेद्वाद-
शेवापिलामेवा सिंहिकासुते॥वसुधां भ्रमते मयों
विधनः शयने भवेत्॥ १३॥ निजक्षेत्रे तुंगे कवियु-
धगृहे मित्रभवने स्ववर्गे सद्वर्गे तमसि शयने जन्म
समये ॥ फलं पूर्ण प्राहुः कथितभवनादन्यभवने
तदादुष्टप्रांचस्तदिह शिखिनो राहुवदिदम् ॥ १४ ॥
राहु ९१७ भावोंमें जिन शरीरियोंकी निद्रावस्थामें हो तो उन.
को अवश्य पुण्य क्षेत्रमें निवास मिले यह बड़े आचार्य कहते हैं।
यदि राहु शयनावस्थामें २।१२।११ भावमें हो तो वह मनुष्य
निर्द्धन रहकर पृथ्वी भ्रमण करे | राहु यदि अपनी राशि ३।६
अपने उच्च ३ अथवा शुक्र २।७बुध ३ के राशियोंमें हो अथवा
मित्र राशिमें हो यद्वा अपने वा मित्रके अंशादियोंमें शयना-
वस्थामें जन्मकालका हो तो फल पूर्ण देताहै उक्त भवनोंसे अन्य
गृहोंमें हो तो दुए जनोंका पूज्य होवे राहुके समान केतुकाभी
फल जानना ॥ १२॥ १३ ॥१४॥
(१०४) भापकुंतूहलम् । अथ विशेपफलानि। यदि निद्रागतः पापःसप्तमे पापपीडितः।तदाजाया- विनाशः स्याच्छुभयोगे क्षणान्नहि ॥ १५॥ निद्रितो रिपुगेहस्थो रिपुंयुक्तेक्षितोमदे ॥ भार्या विनश्यति क्षिप्रविधिनारक्षितापि चेत् ॥१६॥शुभयोगेक्षणा- देका विनश्यति परा नहि ॥ शुभाशुभदृशाभाऱ्या कष्टयुक्ता नृणां भवेत् ॥ १७॥ विशेषफल अवस्थाओंके कहते हैं कि यदि कोई पापग्रह निद्राअवस्थामें सप्तमस्थानमें पापपीडित हो तो स्त्रीनाश होवे यदि उसपर शुभग्रहकी दृष्टिहो वा शुभग्रहसे युक्त हो तो स्त्रीकष्ट भोगकर बचजायगी ॥ १५॥ निद्राअवस्थावाला कोईभी ग्रह छटेभावमें शत्रुग्रहसहित वा उससे दृष्टहो. अथवा ऐसाही सप्तम स्थानमें हो तो शीघ्रही स्त्री नष्टहोवै यदि विधाताभी रक्षाकरने आवे तो भी नहीं रहै ॥१६॥यदि ऐसे ग्रहपर शुभग्रहकी दृष्टिहो अथवा शुभयुक्त हो तो एक स्त्री मरे दूसरीसे गृहस्थसुख होवे यदि शुभ पाप दोनहूंसे दृष्ट वा युक्त हो तो स्त्री कष्टयुक्त रहै ॥१७॥ पुत्रसुखयोगः। अपत्यभावे यदि तुंगगेहे निजालये पापयुतेक्षित- श्चेत् ॥निद्रागतोपत्यविनाशकारी शुभेक्षितश्चैकसु तस्यहंता ॥ १८॥ यदि कोई ग्रह पंचमभावमें अपने उच्च वा अपनी राशिका हो- कर निद्रा अवस्थामें हो तथा पाप ग्रहसे युक्त वादृष्ट हो तो संतानका भापाटीकासमेतम् । (१०५) नाश करता है उस ग्रह पर शुभ ग्रहकीभी दृष्टि हो तो एक पुत्रकी हानि करता है औरकी नहीं ॥१८॥ अपमृत्युयोगः। राहुणा सहितौ यस्य निधनस्थौ कुजार्कजौ ॥ अपमृत्युभवेत्तस्य शस्त्रघातान्न संशयः ॥ १९ ॥ निधेनपि शुभो यस्य पापारिग्रहवीक्षितः ॥ तदा मृत्युर्विजानीयादाहवे शस्त्रपीडनात् ॥२०॥ जिसके अष्टमस्थानमें राहुसहित मंगल शनि हों इनमेंसे कोई निद्रावस्थामें हो तो उसकी अल्पमृत्यु शस्त्रके कटनेसे होवे इसमें संदेह नहीं ॥ १९॥ जिसके अष्टमभावमें शुभग्रहभी पाप अथवा शवग्रहसे दृष्ट वा युक्त हो तो उसका मृत्यु संग्राममें शस्त्रसे होवे यहांभी संबंधसे निद्रावस्था विचारणीय है ॥२०॥ अथारिकृततीर्थकृतमृत्युयोगौ । यदा निद्रायुक्तो निधनभवनं पापमिलितःशयानो वामृत्युं व्रजति रिपुकोपेन मनुजः॥ शुभैदृष्टो युक्तो निजपतियुतो वांतसमये नरो गंगामेत्य व्रजति हरिसायुज्यपदवीम् ॥ २१ ॥ यदि कोई ग्रह पापयुक्त अष्टमस्थानमें शयनावस्थामें हो तो शत्रुके कोपसे मृत्यु पावै और वही ग्रह शुभग्रहोंसे दृष्ट वा युक्त हो अथवा अष्टमेश अष्टम हो तो मृत्यु समयमें वह मनुष्य गंगापायकर विष्णुकी ( सायुज्यपद ) मुक्तिपद पावे ॥२१॥ अथ पुण्यक्षेत्रलाभयोगः। यदा पश्येदंगं तनुभवननाथोष्टमपतिर्मृति धर्माधी- (१०६) भावकुतूहलम्। शो जनुषि चतपःस्थानमथवा ॥शुभाभ्यामाक्रांतं. नवमभवनं पापरहितं वरक्षेत्र प्राप्य व्रजति मनुजो मोक्षपदवीम् ॥ २२॥ इति श्रीभावकुतूहलेस्थानवशेनावस्थाफल- कथनं नाम एकादशोध्यायः॥११॥ यदि जन्मसमयमें लग्नेश लग्नको, अष्टमेश अष्टमभावको और नवमेश नवम भावको देखे अथवा इनमेंसे एकभी अपने स्थानका देखनेवाला हो तथा शुभग्रहोंसे युक्त पापोंसे रहित नवम हो तो मरण समयमें (उत्तम क्षेत्र) पुण्य स्थान पायके मुक्तिपदको प्राप्त होवे ॥२२॥ इति महीधरकतायां भावकुतूहलभापायामेकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ अथ ग्रहाणां प्रत्येकावस्थाफलानि । (तत्रादौ सूर्यस्य.) मंदाग्निरोगी बहुधा नराणांस्थूलसमंधेरपि पित्तकोपः॥ व्रणंगुदे शूलमुर प्रदेशे यदोष्णभानौशयनं प्रयाते॥१॥ शयनादि १२ अवस्थाओंके प्रत्येक फल कहते हैं कि यदि सूर्य शयनावस्थामें हो तो मनुष्योंको सर्वदा (मंदामि ) क्षुधामंद पाचन शक्ति न्यून रहे पैर स्थूल हों पित्तका विशेषतः कोप रहै गुदामें व्रण होवे हृदयमें शूल रहै ॥ १॥ दरिद्रता भारविहारशाली विवादविद्याभिरतो नरःस्या- त्॥कठोरचित्तःखलु नष्टवित्तःसूर्येयदाचेदुपवेशनस्थेर जो सूर्य उपवेशनावस्थामें हो तो दरिद्री रहे पराया भार ढोने- भाषाटीकासमेतम् । (१०७) वाला सर्वदा रहै कलहही विद्या जाने और वह मनुष्य (कठोरचित्त) निर्दयो होवे वित्त उसकी नष्ट होवे ॥२॥ नरः सदानंदधरो विवेकी परोपकारी बलवित्तयुक्तः महासुखी राजकृपाभिमानी दिवाधिनाथे यदि नेत्रपाणौ ॥३॥ जिस मनुष्यका सूर्य नेत्रपाणि अवस्था हो वह सर्वदा आनं- दमें रहे विवेकवाला होवे पराया उपकारकरे बलवान् एवं धनवान् रहे बडा सुख भोगता रहे राजकृपासे अभिमान युक्त रहे ॥३॥ उदारचित्तः परिपूर्णवित्तः सभासु वक्ता बहुपुण्य- कर्ता ॥ महाबली सुंदररूपशाली प्रकाशने जन्म- नि पद्मिनीशे ॥४॥ जिसके जन्ममें सूर्य प्रकाशनावस्थामें हो वह ( उदार ) देने- वाला चित्तका होवेधनादिसे परिपूर्ण (संपन्न) रहे सभामें चातुर्य सहित वार्ता करे बहुतसे पुण्य करे वडा बलवान होवे सुंदररूपवान् होवे ॥४॥ प्रवासशाली किल दुःखमाली सदालसी शोधन- वर्जितश्च ॥ भयातुरः कोपपरो विशेषादिवाधिनाथे गमने मनुष्यः ॥५॥ यदि सूर्य गमनावस्थामें हो तो मनुष्य नित्य परदेश रहनेवाला होवे निश्चय सर्वदा अनेक दुःखोंसे युक्त रहे (अलसी) निरुद्यमी होवै धनसे रहित रहे भयसे आतुर रहै विशेपतासे (कोप) गुस्सा युक्त रहे ॥५॥ परदाररतो जनतारहितो वहुधागमने गमना (१०८) भावकुतूहलम् । भिरुचिः॥ कृपणःखलता कुशलो मलिनो दिवसा- धिपती मनुजः कुमतिः॥६॥ सूर्य जिसके जन्ममें आगमनावस्था हो वह पराई स्त्रियोंमें तत्पर रहै बहुत मनुष्योंकी संगतिसे रहित (अकेला ) रहे बाहुल्यं 'तासे (गमन ) सफरकी इच्छा किया करे (कृपण) मूंजी होवे दुष्टतामें निपुण और मलिनभी होवै ॥६॥ सभागते हिते नरःपरोपकारतत्परः सदार्थरत्नपूरि तो दिवाकरे गुणाकरः॥वसुंधरानवांवरालयान्वितो महावली विचित्रमित्रवत्सलः कृपाकलाधर परः॥७॥ जिस मनुष्यका सूर्यसभावस्थामें हो वह पराये उपकार करनेमें तत्पर रहे सर्वदा धन एवं रत्नोंसे भरा रहे गुणोंकी खान होवै(पृथ्वी) जमीनका मालक होवे नवीन घर और वस्त्रोंसे युक्त रहे वडा वल- वान होवे अनेक प्रकारके मित्र रक्खे उनका प्रिय होवे दयावान् होवे परम कृपाकी कली उसके हृदयमें जागृत रहै ॥७॥ क्षोभितो रियुगणैः सदानरश्चंचलः खलमतिः कृश- स्तथा ॥ धर्मकर्मरहितो मदोद्धतश्चागमे दिनपतौ यदा तदा॥८॥ सूर्य जिसका आगमअवस्था हो वह शत्रुसे कंपायमान चंचल होवै कुटिलवुद्धि, दुष्टता करनेवाला होवे शरीर कृश रहै सत्कर्मधर्मसे रहित रहे मदसे उछलता रहे ॥८॥ सदांगसंधिवेदना परांगना धनक्षयो वलक्षयःपदे पदे यदा तदा हि भोजने ॥ असत्पथाच्छिरोव्यथा भाषाटीकासमेतम् । (१०९) तदा वृथान्नभोजनं रवावसत्कथारतिः कुमार्ग- गामिनी मतिः॥९॥ सूर्य भोजनावस्थामें जिसका हो उसके सर्वदा शरीरकी संधि- योंमें पीडा रहे परस्त्रीके संसर्गसे धन एवं बलका क्षय पैर पैरपर अ- र्थात् एवं कुकर्मसे शिरमें रोग रहे खायापिया व्यर्थ जावे यद्वा अन्न पचे नहीं अनिष्टवार्तामें रुचि रहे कुमार्गचलनेकी बुद्धि होवे ॥९॥ विज्ञलोकैः सदा मंडितः पंडितः काव्यविद्यानवद्य प्रलापान्वितः॥राजपूज्योधरामंडले सर्वदा नृत्य- लिप्सागते पद्मिनीनायके ॥१०॥ जिसका सूर्य नृत्यलिप्सावस्थामें हो वह सर्वदा विद्या जानने वाले लोगोंसे शोभित रहे पंडित होवे काव्यविद्याजाने बड़ी वाचाल शक्ति होवे राजासे पूजा (आदर) पावे पृथ्विमेंभी पूज्य होवे॥१०॥ सर्वदानंदधर्ता जनो ज्ञानवान यज्ञकर्ता धराधीश सद्मस्थितः॥ पद्मबंधावरातीभपंचाननः काव्यवि- द्याप्रलापीमुदा कौतुके ॥११॥ सूर्य जिसका कौतुकावस्थामें हो वह सर्वदा प्रसन्नताको धारण करताहै ज्ञानवान्, यज्ञ करनेवाला, राजद्वारमें रहनेवाला होवे शत्रुरूपी हाथियोंके ऊपर सिंहसमान प्रतापी होवे काव्यविद्या जानने वाला अतिवाक् शक्तिवाला मनुष्य होवे ॥११॥ निद्राभरारक्तनिभे भवेतां निद्रागते लोचनप यु- ग्मे ॥ रखौ विदेशे वसतिर्जनस्य कलबहानिः कतिधार्थनाशः ॥ १२॥ जिसका सूर्य निद्रावस्थामें हो उसके नेत्र नींदसे भरे हुये रुधि-
(११०)
भावंकुतूहलम् ।
रके समान लालरंगके रहें विदेशमें निवास पावे और स्त्रीहानि एवं
कितनेही वार धननाश होवे ॥ १२॥
अथ चंद्रस्य।
जनुः काले क्षपानाथे शयनं चेदुपागते ॥
मांनी शीतप्रधानीच कामी वित्तविनाशकः॥ १ ॥
जिसके जन्म समयमें चंद्रमा शयनावस्थामें हो वह (मानी) इज्ज
तवाला होवे शरीरमें शीतप्रधान रहे अतिकामी होवें धनका नाश
अपने हाथसे किसी व्यसनमें करे ॥१॥
रोगादितो मंदमतिर्विशेषाद्वित्तेन हीनो मनुजः
कठोरः॥अपायकारी परवित्तहारी क्षपाकरे चेंदुप-
वेशनस्थे ॥२॥
जिसका चंद्रमा उपवेशनावस्थामें हो. वह रोगसे पीडित रहे
(मंद ) जडबुद्धि होवे विशेषतः धनसे हीन रहे कठोरस्वभाव होवे
परायानाशकरे परायेधन लूटनेवालाभी वह मनुष्य होवे ॥ २ ॥
नेत्रपाणौ क्षपानाथे महारोगी नरो भवेत् ॥
अनल्पजल्पको धूर्तः कुकर्मनिरतस्सदा ॥३॥
चंद्रमा जिसका नेत्रपाणिअवस्थामें हो वह महारोगी राजरोग
आदि बडे रोगवाला मनुष्य होवे तथा बहुत वाचाल धूर्त होवे और
सर्वदा कुकर्मोंमें तत्पर रहे ॥३॥
यदा राकानाथे गतवति विकाशं च जनने विकाशं
संसारे विमलगुणराशेरवनिपात्॥नवाशालामाला-
करितुरगलक्ष्मा परिवृता विभूपा योपाभिः सुख-
मनुदिनं तीर्थगमनम् ॥४॥
भापाटीकासमेतम् । (१११)
यदि जन्ममें चंद्रमा विकाशावस्थामें हो तो मनुष्य संसारमें
निर्मलगुणोंके समूहसे (विकसित ) प्रफुल्लित रहै राजासे नवीन
मंदिर, रत्न आदियोंकी माला, हाथी घोडे धनसंयुक्तभूपण एवं स्त्रि-
योंसे नित्य सुख पावे तीर्थयात्रा करे ॥४॥
सितेतरे पापरतो निशाकरे विशेषतः क्रूरतरो नरा
भवेत् ॥ सदाक्षिरोगैः परिपीडयमानो वलक्षपक्षे
गमने भयातुरः॥५॥
उक्त अवस्थाका वा अन्य चंद्रमा यदि कृष्णपक्षकाहो तो विशे-
पतः मनुष्य (कठोर) अतिक्रूर स्वभाव होवै सर्वदा नेत्ररोगसे पी-
डित रहे शुक्लपक्षका होतो गमनमें भयमान रहे ॥५॥
विधवागमने मानी पादरोगी नरो भवेत् ॥
गुप्तपापरतो दीनो मतितोषविवर्जितः॥६॥
चंद्रमा आगमनावस्थामें होतो (मानी) इज्जत यदा गर्ववाला
होवै पैरोंमें कुछ प्रकार रोग रहे गुप्तपाप करनेमें तत्पर रहे दुर्वल,
दरिद्री होवै बुद्धि और संतोपसे वर्जित रहे ॥६॥
सकलजनवदान्यो राजराजेंद्रमान्यो रतिपतिसम-
कांतिःशांतिकृत्कामिनीनाम् ॥ सपदि सदसि याते
चारुर्विवे शशांके भवति परमरीतिप्रीतिविज्ञो
गुणज्ञः॥७॥
चंद्रमासभावस्थामें होतोमनुष्य समस्त मनुप्योंमें खदान्योचतुर
होवे राजा तथा चक्रवर्तियोंका माननीय होवै कामदेवके समान
सुंदरकांति होवै युवास्त्रियोंको कामक्रीडामें शांति करनेवाला होने
समस्तधनोंसे संपन्न रहेप्रेमकलाजाननेवाला होवे गुणोंको पहिचाने
इतने पूरे फल पूर्ण चंद्रमाके हैं क्षीणमें पूरे नहीं होते ॥ ७॥
(११२)
भावकुतूहलम् ।
विधवागमने मयों वाचालो धर्मपूरितः॥
कृष्णपक्षे द्विभार्यःस्याद्रोगी दुष्टतरो नरः॥८॥
चंद्रमा आगमनावस्थामें हो तो अतिबोलनेवाला धर्मसे परि-
पूर्ण होवै यदि कृष्णपक्षका चंद्रमा उक्त अवस्थामें हो तो दो स्त्री
होवें रोगीरहे अतिदुष्ट स्वभाव होवै ॥ ८ ॥
भोजने जनुषि पूर्णचंद्रमा मानयानजनतासुखं
नृणाम् ॥ आतनोति वनितासुतासुखं सर्वमेव न
सिते तरे शुभम् ॥९॥
जन्मकालमें जिनका चंद्रमा भोजनावस्था पूर्णमंडल हो तो
मानवाला होवै सवारी तथा मनुष्योंका सुख उन मनुष्योंको हो
तथा स्त्रीसुख कन्यासुखभी होवै परंतु इतने फल पूर्णचंद्रमाके हैं
क्षीणमें शुभफल नहीं होते ॥९॥
नृत्यलिप्सागते चंद्रे सबले बलवान्नरः॥
गीतज्ञो हिरसज्ञश्च कृष्णे पापकरो भवेत् ॥१०॥
चंद्रमा नृत्यलिप्सा अवस्थामें (बलसहित) पूर्णमंडल हो तो
मनुष्य बलवान होवै (गीत) गायन जाने श्रृंगारादिरसोंकोभी जाने
कृष्णपक्षका हो तो पाप करनेवाला होवै ॥१०॥
कौतुकभवनं गतवति चंद्रे भवति नृपत्वं वा धनपत्वं॥
कामकलासु सदा कुशलखं वारवधूरतिरमणपटुवं ११९
चंद्रमाकौतुकावस्थामें होतो मनुष्य राजा वा राजाके तुल्य
होवे अथवा धनका मालिक होवे और (कामकला) रति क्रीडामें
सर्वदा चातुर्य रक्खे वारांगनाओंके साथ रतिक्रीडा, रमणमें
चातुर्यता पावै ॥११॥
भापाटीकासमेतम्। (११३) निद्रागतंजन्मनि मानवानां कलाधरेजीवयुते मह- त्त्वम् ॥ यदागुणाःसंचितवित्तनाशःशिवालयेरौति विचित्रमुच्चैः ॥ १२ ॥ यदि मनुष्योंके जन्मसमयमें चंद्रमा निद्रावस्थामें पूर्ण मंडल यद्वाबृहस्पतियुक्त होतो (महत्त्व)बडप्पन पावे कृष्णपक्षका हो तो संचय किया हुआ धनादिका नाश होवे गुण औगुण होते. दुःखसे (शिवालय) देवमंदिर यद्वा स्यारोंके स्थान, जंगलमें अथवा श्म- शानमें अनेकप्रकारके स्वरोंसे ऊंचा रोदनकरे अर्थात् शोक, दरि- द्रसे ग्रस्त होवे ॥ १२॥ अथ भौमस्य फलम् । शयने वसुधापुत्रे जनुरंगे जनो भवेत् ॥ बहुना कंडुना युक्तो दगुणा च विशेषतः॥१॥ जन्ममें मंगल जिसकाशयनावस्थामें हो उसके अंगोंमें बहुतसी (कंडू) खुजली रहाकरे विशेपतः (दछ) दादभी होवे ॥१॥ वली सदा पापरतो नरः स्यादसत्यवादी नितरांप्र- गल्भः॥धनेन पूर्णो निजधर्महीनोधरासुते चेदुपवे- शनस्थे॥२॥ मंगल उववेशनावस्थामें हो तो मनुष्य बलवान होवे पापकर्ममें तत्पर, झूठ बोलनेवाला, निरंतर वाग्वादचतुर, धनसे परिपूर्ण, 'धर्महीन रहे ॥२॥ यंदा भूमिसुते लग्ने नेत्रपाणिमुपागते ।। दरिद्रता सदा पुंसामन्यभे नगरेशता ॥३॥ ८ (११४) भावकुतूहलम् । यदि मंगल नेत्रपाणिअवस्थाके लग्नमें हो तो मनुष्योंको सर्वदा दरिद्रता रहे अन्यभावमें हो तो नगरके स्वामि होवे ॥३॥ प्रकाशो गुणस्यापि वासः प्रवासे धराधीशभर्तुःस- दामानवृद्धिः ॥ सुते भूसुतं पुत्रकान्तावियोगो युते- राहुणा दारुणावा निपातः ॥४॥ मंगल प्रकाशावस्थामें हो तो परदेशमें नित्य निवास होवे राजासे सर्वदा मान बढतार यदि उक्तअवस्थाका मंगल पंचम भावमें हो तो स्त्री पुत्रका (वियोग) विछोह पावे यदि उसके साथ राहुभी होतो वृक्षसे गिरपडे ॥४॥ गमने गमनं कुरुतेनुदिनं व्रणजालभयं वनिताकल- हम् ॥वहुदद्रुककंडुभयं बहुधा वसुधातनयोवसुहा- निमरेः॥५॥ संगल गमनावस्थामें हो तो प्रतिदिन (गमन) सफर करताहै अनेकप्रकारके (व्रण) फोडा, फुन्सीका भय, स्त्रीकलह करता है और दाद, खुजलीभी बहुत रहते हैं. शत्रुसे धनहानि होती है॥६॥ आगमने गुणशालीनामणिमाली कराल करवाली ॥ गजगंता रिपुहंता परिजनसंतापहारको भौमे॥६॥ मंगल आगमनावस्थामें हो तो पुरुप मणियोंकी माला पहिने तीक्ष्ण खगोंकी पांति उसके आगे चले हाथीकी सवारीकरे शत्रुको मारे दुःखी मनुष्योंका संताप हरण करनेवाला होवे ॥६॥ तुंगे युद्धकलाकलापकुशलोधर्मध्वजो वित्तपः को णे भूमिसुते सभामुपगते विद्याविहीनः पुमान् ॥ अंतेपत्यकलत्रमित्ररहितः प्रोक्तेतरस्थानगे वश्यं भाषाटीकासमेतम् । (११५) राजसभाबुधो बहुधनी मानी. च दानी जनः॥७॥ मंगल सभावस्थामें उच्चराशिका यद्वा केंद्रका हो तो युद्ध विद्या की समस्त युक्तिजाने तथा धर्मकाध्वज अर्थात् बड़ा धर्मात्मा और धनवान, धनका स्वामी होवे यदि ९।५ स्थानमें हो तो पुरुष (विद्याहीन) मूर्ख होवे बारहवें स्थानमें हो तो स्त्री, पुत्र, मित्रोंसे रहित रहे उक्तस्थानोंसे अन्यमें हो तो अवश्य राजाके सभाका पंडित होवे तथा बहुत धनवान्, मानवाला दानी भी होवे ॥७॥ आगमे भवति भूमिजे जनो धर्मकर्मरहितो गदातुरः॥ कर्णमूलगुरुशूलरोगवानेककातरमतिः कुसंगमी॥८॥ मंगल आगमावस्थामें हो तोधर्म कर्म से रहित रोगसे आतुर रहे. कानके नीचे बडा शूलरोग रहै कायर तथा कुसंगी होवै ॥ ८॥ भोजने मिष्टभोजी च जनने सवले कुजे ॥ नीचकर्मकरो नित्यं मनुजो मानवर्जितः॥९॥ जन्ममें बलवान् मंगल भोजनावस्थामें हो तो मिष्टान्न खाने वाला होवे तथा सर्वदा नीचकर्म करे (मान) अहंकार वा इज्जतसे रहितरहे ॥९॥ नृत्यलिप्सागते भूसुते जन्मिनामिंदिराराशिरा- याति भूमेः पतेः ॥ स्वर्णरत्नप्रवालैः सदा मंडिता वासशाला विशाला नराणांभवेत् ॥ १० ॥ मंगल नृत्यलिप्साअवस्थामें हो तो मनुष्योंको राजासे बहुत (लक्ष्मी धन आवे तथा रहनेका गृह सोना, रत्न, मुंगा आदियाँसे शोभित और बहुतभारी होवे ॥१०॥ ..
(११६)
भावकुतूहलम् ।
कौतुकी भवति कौतुके कुजे मित्रपुत्रपरिपूरितो
जनः॥ उच्चगे नृपतिगेहपंडितो मंडितो बुधवरै-
गुणाकरैः॥ ११ ॥
मंगल कौतुकावस्थामें हो तो मनुष्य (खेल) तमासा करने
. वाला वा उसमें प्रेम रखनेवाला होवे मित्र पुत्रोंसे परिपूर्ण रहे यदि
मंगल उच्चकाभी हो तो राजाके दर्वारका पंडित होवे और बहुत
गुणवान पंडित श्रेष्ठोंसे शोभित रहैं ॥११॥
निद्रावस्थागते भौमे क्रोधी धीधनवर्जितः॥
धूर्ती धर्मपरिभ्रष्टो मनुष्यो गदपीडितः॥१२॥
मंगल निद्रावस्थामें हो तो क्रोधी होवे बुद्धि तथा धनसे वर्जित
रहे धूत होवे धर्मसे भ्रष्ट रहे और रोगसे पीडित रहे ॥ १२॥
अथ वुधावस्थाफलानि।
क्षुधातुरोभवेदंगे खंजो गुंजानिभेक्षणः॥
जन्मभे लंपटो धूर्तो मनुजःशयने बुधे ॥ १ ॥
बुध शयनावस्थामें लग्नकाहोतोभूखसे सर्वदा आतुर रहे गंजा
शिर होवे नेत्र लाल गुंजाके समान होवे ( लंपट ) झूठा वकवाद
करनेवाला और धूर्तभी होवे ।। १ ।।
शशांकपुत्रे जनुरंगगेहे यदोपवेशे गुणराशिपूर्णः ॥
पापेक्षिते पापयुते दरिद्रो हितोच्चभे वित्तसुखी
मनुष्यः॥२॥
बुध जन्ममें लगका उपवेशावस्थामें हो तोसमस्त गुणोंके समू-
इसे पूरित रहे पापयुक्त हो अथवा पापदृष्ट हो तो दरिद्री होवे यदि
मित्रराशि वाउचराशिमें हो तो मनुष्य सुखी रहे॥२॥
भापाटीकासमेतम् ।
विद्याविवेकरहितोहिततोयहीनोमानीजनोभवति
चंद्रसुतेक्षिपाणौ ॥ पुत्रालये सुतकलत्रसुखेन हीनः
कन्याप्रजो नृपतिगेहबुधो वरायः ॥३॥
बुध नेत्रपाणि अवस्थामें हो तो मनुष्य विद्याएवं (विवेक ) स-
दसज्ज्ञानसे रहित होवे भलाई किसीकी नकरे संतोपभीन रखे ग-
वाला होवे यदि उक्त बुध पंचम भावमें हों तो स्त्री पुत्रके सुखसे
हीन रहे कन्या संतति होवे राजद्वारका पंडित तथा श्रेष्ठ होवे॥२॥
दाता दयालुः खलु पुण्यकर्ता विकासने चंद्रसुते
मनुष्यः ॥ अनेकविद्यार्णवपारगंता विवेकपूर्णः
खलगर्वहन्ता ॥४॥
बुध विकासनावस्थामें हो तो मनुष्य (उदार) देनेवाला, दया-
वान्, निश्चयसे पुण्य करनेवाला और अनेक विद्याओंके समुद्रके
पार पहुँचनेवाला विवेक ज्ञानसे परिपूर्ण दुष्टोंके (गर्व) घमंडके
तोडनेवाला होवे ॥ ४॥
गमनाग मने भवतो गमने वहुधा वसुधावसुधा-
धिपतः ॥ भवने च विचित्रमलं रमया विदिनुश्च
जनुःसमये नितराम् ॥५॥
बुध गमनावस्थामें हो तो नित्य (गमागम) जाना आना होता
रहे बहुतायत करके राजासे भूमि मिले तथा जन्ममें उक्त बुध मनु-
प्यके घरमें अनेक प्रकारकी शोभा, लक्ष्मी निरंतर करताहै ॥५॥
सपदि विदि जनानामुच्चभेजन्मकाले सदसिधनस
मृद्धिःसर्वदा पुण्यवृद्धिः॥ धनपतिसमतावा भूपता
मंत्रिता वा हरिहरपदभक्तिः सालिकी मुक्तिरद्धा॥६॥
(११८) भावकुतूहलम् । बुध जन्मकालका सभावस्थामें हो तो मनुष्योंको सर्वदा धनकी संपन्नता रहे पुण्यकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहे धनमें कुबेर समा- नता पावे अथवा (राजत्व ) हाकमी मिले यद्वा ( मंत्रिता ) वजीरी मिले और विष्णु एवं शिवकी भक्तिसे साक्षात् सात्विकी मुक्ति होवे६ आगमे जनुषिजन्मिनां यदा चंद्रजे भवति हीनसे- वया ॥ अर्थसिद्धिरपि पुत्रयुग्मता वालिका भवति मानदायिका ॥७॥ यदि मनुष्योंके जन्ममें बुध आगमावस्थामें हो तो नीचजनकी सेवा करनेसे कार्यसिद्धि होवै तथा दोपुत्र होवे और एक कन्या अति सुलक्षणा सन्मान देनेवाली होवे ॥७॥ भोजने चंद्रजे जन्मकाले यदा जन्मिनामर्थहानिः सदा वादतः॥ राजभीत्या कृशलं चलत्वं मतेरं गसंगा न जाया न माया सुखम् ॥८॥ बुध भोजनावस्थामें जन्मकालका हो तो मनुष्योंको सर्वदा (विवाद ) कलहसे धनहानि, कार्यहानि होवेंराजाके भयसे (कृश- त्व) माडापन आवै बुद्धि चंचल रहे स्थिर न रहे तथा स्त्रीका सुख और धनका सुखभी न होवे ॥ ८॥ नृत्यलिप्सागते चंद्रजे मानवो मानयानप्रवालवजैः संयुतः॥मित्रपुत्रप्रतापैः सभापंडितः पापभेवा रवा मारते पटः ॥ ९॥ जिसका बुध नृत्यलिप्साअवस्थामें जन्मका हो वह मनुष्य(मान) इजत सवारी, मूंगा आदिरत्नसमूहसे युक्तरहे तथा मित्र, पुत्र, संयु- तै रहे प्रतापवान होवे सभामें (पंडित) चतुर होवे यदि पाप राशि
भापाटीकासमेतम् । (११९)
नीच शत्रु आदिमें हो तो (वारांगना ) पतुरियाके साथ रतिक्रीडा
में लंपट ( व्यसनी) होवे ॥९॥
कौतुके चंद्रजे जन्मकाले नृणामंगभे गीतविद्यान-
वद्या भवेत् ॥ सप्तमे नैधने वारवध्वा रतिः पुण्यभे
पुण्ययुक्ता जनिः सद्गतिः॥१०॥
जिन मनुष्योंके जन्ममें बुध कौतुकावस्थामें लग्नका हो उन-
को अनर्गल गायन विद्या आवे यदि उक्त बुध ७१८ भावमें हो तो
वारांगनासे प्रीति होवे. नवम भावमें हो तो सारा जन्म पुण्य करते
बीते अंतमें सद्गति (मुक्ति) होवे ॥ १० ॥
निवात्रितं चंद्रसुतेन मुद्रासुखं सदा व्याधिसमा-
धियागः ॥ सहोत्थवैकल्यमनल्पतापो निजेन
वादोधनमाननाशः।। ११ ॥
बुध निद्रावस्थामें हो तो सर्वदा मोहर, रुपया आदिके कृत्यसे
सुख मिले और रोगकी समाधि सर्वदा रहे, भ्रातृपक्षसे (विकलता)
चिंतारहे बडा संताप रहे अपने मनुष्योंसे कलह होतारहै, धन एवं
मानका नाश होवे ॥११॥
अथ गुरोरवस्थाफलम्।
वचसामधिपे तुजनुः समये शयने वलवानपि ही-
नरवः ॥ अतिगौरतनुः खलु दीर्घहनुः सुतरामरि-
। भौतियुतो मनुजः॥१॥
जन्म समयमें बृहस्पति शयनावस्थामें हो तो मनुष्य बलवान
हुयेमेंभी (स्वरहीन) अल्पआवाजबाला होवे. शरीर अति गौरव-
ण, ठोडी लंबी होवे शत्रुकी भय निरंतर बनी रहे ॥१॥
(१२०) भावकुतूहलम्। उपवेशं गतवति यदि जीवे वाचालो बहुगर्गपरीतः॥ क्षोणीपतिरिपुजनपरितप्तः पदजंघाकरव्रणयुक्तः॥२॥ वृहस्पति यदि उपवेशावस्थामें हो तो बडावाचाल बडे (गर्व) घमंडसे भरा होवै. तथा राजा वा राजतुल्य होते. परंतु शजसे सर्वदा संतापयुक्त रहे और पैर, जंघा, मुख, हाथोंमें व्रण फोडा आदि रोग रहा करे॥२॥ नेत्रपाणौ गते देवराजार्चिते रोगयुक्तो वरार्थश्रिया शोभितः।गीतनृत्यप्रियः कामुकःसर्वदा गौरवर्णी विवर्णोद्भवप्रीतियुक् ॥३॥ बृहस्पति नेत्रपाणि अवस्थामें हो तो मनुष्य रोगगश्रेष्ठ . धन, एवं शोभासे रहित रहे. गीत नाच रंगको प्रियमाने पातकामी सर्वदा रहे. गोरारंग शरीरका होवे कुरूपोंसे अथवा (वर्णवाह्य) विजातीय मनुप्योंसे प्रीति रक्खे ॥३॥ गुणानामानंदं विमलसुखकंदं वितनुते सदा तेजः पुंजंव्रजपतिनिकुंज प्रतिगमम् ॥ प्रकाशं चेदुच्चै?- तमुपगतो वासवगुरुगुरुत्वं लोकानां धनपतिसम- वंतनुभृताम् ॥४॥ बृहस्पति प्रकाशावस्थामें हो तो मनुष्यको गुणोंके आनंद वा- ला, निर्मल सुखका भाजन करताहै. सर्वदा तेजका पुंज सदृश व- नाये रहताहै श्रीकृष्णके समान (कुंज) वन उपवनोंमें विहार क- स्ता अथवा भक्तिसे भगवानके भवनमें प्राप्त होता है. समस्त लो- कोंमें श्रेष्ठता पाव. समृद्धिमें कुवेरके समान होताहै. इतने पूरेफल मनुप्योंको बृहस्पतिके प्रकाशावस्या उच्चादिगतिमें होते हैं॥४॥ . - भापाटोकासमेतम् । (१२१) साहसी भवति मानवः सदा मित्रपुत्रसुखपूरितो मुदा॥ पंडितो विविधवित्तमंडितो वेदविद्यदि गुरौ गमंगते ॥५॥ बृहस्पति गमनावस्थामें हो तो मनुष्य सर्वदा साहसी तथा मित्र, पुत्र, सुखसे परिपूर्ण रहे पंडित होवे अनेक प्रकारके धनोंसे शोभित रहै ॥ ५॥ आगमने जनतावरजाया यस्य जनुःसमये हरि- माया॥ मुंचति नालमिहालयमद्धा देवगुरौ परितः परिबहा॥६॥ जिस मनुष्यके जन्म समयमें बृहस्पति आगमावस्थामें हो तो उसके बहुत मनुष्य रहें स्त्री श्रेष्ठ मिले उसकेघरको साक्षात् लक्ष्मी कदापि नछोडे चारों ओरसे बँधी हुई जैसीरहे ॥६॥ सुरगुरुसमवक्ता शुभ्रमुक्ताफलाग्रः सदसि सपदि पू- ो वित्तमाणिक्ययानैः॥ गजतुरगरथाढयोदेवताधी शपूज्ये जनुषि विविधविद्यागर्वितो मानव स्यात्७ बृहस्पति जन्ममें सभावस्थामें होतोबृहस्पतिके समान (शा- स्त्रवक्ता) पंडित होवे (श्वेत) कांतिमान मोतियोंसे युक्त रहे.धन, मणि, सवारी, आदियोंसे सर्वदा परिपूर्ण रहे. हाथी, घोडे,रथोंसे युक्त रहे और वह मनुष्य अनेक विद्याओंसे(गर्वितोभराहुआ रहे ॥७॥ नानावाहनमानयानपटली सौख्यं गुरावागमे भृत्यापत्यकलत्रमित्रजसुखं विद्यानवद्या भवेत् ॥ क्षोणीपालसमानतानवरतं चातीव हृया मतिः काव्यानंदरतिः सदा हितगतिःसर्वत्र मानोन्नतिः ॥
(१२२) भावकुतूहलम्। वृहस्पति आगमावस्थामें हो तोअनेक प्रकार(वाहन)हाथी घोडे रथ (यान) पालकी आदियोंके समूहका सुख होवे तथा (सेवक) नौकर, पुत्र, स्त्री, मित्रोंका सुख मिले विद्या अतुल आवै रा- जाके समान ऐश्वर्यमें सर्वदा रहे अति रमणीय बुद्धि होवे काव्यरस के आनंदमें प्रेमरहे सर्वदा हितकारी चालरहे सर्वत्र मानकी उन्नती होती रहे ॥ ८॥ भोजने भवति देवता गुरौ यस्य तस्य सततं सुभो- जनम् ॥ नैव मुंचतिरमालयं तदा वाजिवारणरथैश्च मंडितम् ॥९॥ वृहस्पति भोजनावस्थामें जिसका हो उसको उत्तम पदार्थ भोजनको मिलते रहें तथा उसके. घरको लक्ष्मी कदापि नछोडे हाथी घोडे रथोंसे घर शोभित रहे ॥९॥ नृत्यलिप्सागते राजमानी धनी देवताधीशवंये सदा धर्मवित् ॥ तंत्रविज्ञो बुधैमैडितःपंडितःशब्द- विद्यानवयो हि सद्यो जनः ॥१०॥ वृहस्पति नृत्यलिप्सावस्थामें हो तो मनुष्यराजमानवालाधन- वान,सर्वदा धर्म जाननेवाला तंत्रशास्त्र, वा युक्तियाँ जाननेवाला पंडितोंसे युक्तरहे आपभी पंडित होवे (शब्दविद्या) न्यायव्याक- रणादि निपुण तत्काल उपस्थितिवाला होवे ।। १०॥ कुतूहली सकौतुके महाधनी जनः सदा निजान्व- याब्जभास्करः कृपाकलाधरःसुखी ॥ निर्लिपराज- पूजिते सुतेन भूनयेन वा युतो महावली धराधिपे- न्द्रपद्ममंडितः॥११॥ बृहस्पति कौतुकावस्थामें होतोमनुप्य (सेल) तमासा करने
भाषाटोकासमेतम् । (१२३)
वाला होवे सर्वदा बडे धनसे युक्त रहे अपनेवंशरूपी कमलके विका-
शनमें सूर्यसदृश होवे कृपाकला, दया धारण करनेवाला होवे
सर्वदा सुखी रहे नम्र पुत्रसे यहा पुत्र, भूमि और नम्रतासे युक्त होवे
बडा बलवान शरीर होवे राजद्वारको शोभादेनेवाला होवे ॥११॥
गुरौ निद्रागते यस्य मूर्खता सर्वकर्मणि ॥
दरिद्रता परिकांतं भवनं पुण्यवर्जितम् ॥ १२ ॥
जिसका बृहस्पति निद्रावस्थामें हो तो उसकोसमस्त कामोंमें मू-
र्खता आवै दरिद्रतासे दवारहे. पुण्यभी उसके घरमें न रहे ॥१२॥
अथ शुक्रस्य फलम् ।
जनो बलीयानपि दंतरोगी भृगौ महारोषसमन्वितः,
स्यात् ॥धनेन हीनः शयनं प्रयाते वारांगनासंग-
मलंपटश्च ॥१॥
जिसके जन्ममें शुक्र शयनावस्थामें हो वह मनुष्य बलवान होवे
बडे क्रोध (गुस्सा) वाला तथा धनसे रहित रहे दांतोंमें रोग रहा
करे(वारांगना)वेश्याओंके संग करनेमें (लंपट) व्यसनी होवै॥१॥
यदिभवेदुशना उपवेशने नवमणिबजकांचनभूपणैः।।
सुखमजनमरिक्षय आदरादवनिपादपि मानस-
मुन्नतिः ॥२॥
यदि शुक्र उपवेशनावस्था में हो तो नवीन मणियोंके समूह एवं
सुवर्णके भूपणोंके सौख्य वारंवाररहे शत्रुओंकाभी वारंवार क्षय होये
राजासेभी आदरपूर्वक मानकी उन्नति होवे ॥२॥
नेत्रपाणिं गते लग्नगेहे कवौ सप्तमे मानभे यस्य
तस्य ध्रुवम् ॥ नेत्रपातो धनानामलं चान्यभेवास-
शाला विशाला भवेत्सर्वदा ॥३॥
(१२४)
भावकुतूहलम् ।
यदि शुक्र नेत्रपाणिअवस्थामें लग्न, सप्तम, दशममें हो तो
उस मनुष्यका नेत्र गिरे तथा निश्चय धनभी क्षय होवे यदि अन्य
भावोंमें हो तो उसके निवासका गृह बहुत बडा सर्वदा रहे ॥३॥
स्वालये तुंगभे मित्रभे भार्गवे तुंगमातंगलीला-
कलापी जनः॥ भूपतेस्तुल्य एवं प्रकाशं गते का-
व्यविद्याकलाकौतुकी गीतवित् ॥४॥
प्रकाशावस्थाका शुक्र जिस मनुष्यके स्वराशि २१७ उच्चराशि
(१२) अथवा मित्र राशिमें हो वह उन्मत्त हाथियोंके लीला(क्री-
डा) का प्रेमी होवे तथा राजाके समान ऐश्वर्यवान होवे काव्य
शृंगारआदि कलाओंमें निपुण,खेल,नाच,गायन जाननेवाला होवे॥
गमने जनने शुक्रे तस्य माता न जीवति ॥
अधियोगोवियोगश्च जनानामरिभीतितः॥५॥
जिसके जन्ममें शुक्र गमनावस्थामें हो उसकी माता शीघ्रही
मरजाती है. तथा शत्रुका उसको ऐसा भय रहे कि कभी अपने
मनुप्योंमें रहे कभी उनसे पृथक् होनापड़े ॥५॥
आगमनं भृगुपुत्रे गतवति वित्तेश्वरो मनुजः ॥
स तु तीर्थभ्रमशाली नित्योत्साही करांघ्रिरोगीच ६॥
शुक्र आगमनावस्था में हो तो मनुप्य बहुत धनका स्वामि होवे
तथा तीर्थयात्रा करनेवाला, नित्य (उत्साही) उद्यमी, हो और
हात पैरोंमें रोगभी रहे ॥६॥
अनायासेनालं सपदि महसायाति सहसा प्रगल्भ-
त्वं राज्ञःसदासिगुणविज्ञः किल कवौ।सभायामाया
ते रिपुनिवहंहता धनपतेः समलं वा दंतावलतुरग-
गंता नरवरः॥७॥
भाषाटीकासमेतम् । (१२५) यदि शुक्र सभावस्थामें (तेजमान ) उदयका, बलवान हो तो अकस्मात् ही चतुरता आवे राजाके सभा (प्रगल्भ) चतुराईसे बात करनी आवे गुणोंका जानने पहचाननेवाला होवे तेजस्वीहोवे शत्रुके समूहको मारनेवाला होवे धनमें कुबेरको तुल्यता रक्खेअथ- वा हाथी घोडोंकी सवारीमें चलनेवाला, मनुष्योंमें श्रेष्ठ होवे ॥७॥ आगमेभार्गवे नागमो जन्मिनामर्थराशेररातरतीव क्षतिः॥ पुत्रपातो निपाते जनानामपि व्याधिभीतिः प्रियाभोगहानिर्भवेत् ॥८॥ शुक्र आगमावस्थामें हो तो मनुष्योंको धनका आगम न होवै अर्थात् दरिद्री रहे शउसे बहुत हानि होवे. बहुतसे मनुष्योंके समु- दाय रक्षक हुयेमेंभी पुत्रका शोक मिले रोगकी भयरहे प्यारे स्त्रीके भोगकी हानि होवे ॥८॥ क्षुधातुरो व्याधिनिपीडितः स्यादनेकधारातिभ- यादितश्च ॥ कवौ यदा भोजनगे युवत्यां महाधनी पंडितमंडितश्च ॥९॥ शुक्र भोजनावस्थामें हो तो क्षुधासे सर्वदा आतुर रहे अर्थात् भूखसहन नकरसके रोगसे पीडित रहे, अनेक प्रकार शउसे दुःखी रहे स्त्रीसहित यहा स्त्रीके प्रतापसे बडा धनवान होवे पंडित जनोंसे सुशोभित रहे ॥९॥ काव्यविद्यानवद्या च हृद्या मतिःसर्वदानृत्यलिप्सा गते भाववे ॥ शंखवीणामृदंगादिगानध्वनिवातनै पुण्यमेतस्य वित्तोन्नतिः ॥ १० ॥ शुक्र नृत्यलिप्सावस्थामें हो तो अनर्गल काव्यविद्या आवे बुद्धि सर्वदा (मनोहर) रमणीय रहे शंख वीणा मृदंग आदिवाने , (१२६) भावकुतूहलम् । एवं गायनकी (ध्वनि) शब्दोंमें निपुणता होवे धन इसका सर्वदा बढताही रहे ॥१०॥ कौतुकभवनंगतवति शुक्र शक्रेशत्वं सदसि महत्त्वम् ॥ हृद्या विद्या भवति च पुंसः पद्मानिवसति पद्मोदरतः १.१ शुक्र कौतुकावस्थामें हो तो इंद्रके समान ऐश्वर्य, पृथ्वीमें श्रेष्ठ- त्व पावे सभामें वडप्पन मिले तथा उस पुरुषको रमणीयविद्याआवे लक्ष्मी उसके घरमें आदरपूर्वक निवास करे सर्वतः शोभायुक्त रहे यद्वा लक्ष्मी कमलमें रहती हो वह कमलका वास छोडकर इस मनुष्यके घरमें निवास करे ॥११॥ परसेवारतो नित्यं निद्रामुपगते कवौ ॥ परनिंदापरो वीरो वाचालो भ्रमते महीम् ॥ १२ ॥ निद्रावस्थामें शुक्र हो तो सर्वदा पराया सेवक रहे पराई निंदा करनेमें तत्पर होवे वीरता रक्खे अति बोलनेवाला (वाचाल) होवे तथा सारी पृथ्वीमें फिरता रहे ॥१२॥ अथ शनेः प्रत्यवस्थाफलानि । क्षुत्पिपासा परिक्रांतो विश्रांतःशयने शनौ ॥ वयसि प्रथमे रोगी ततो भाग्यवतां वरः॥ १ ॥ शनि जिसका शयनावस्थामें हो वह सर्वदा भूख, प्याससे दवा- रहे पहिली अवस्था (छोटी उमर ) में रोगी रहे पोछे भाग्य वंतोंमें श्रेष्ट होवे ॥१॥ भानोः सुते चेदुपवेशनस्थे करालकारातिजनानु- तप्तः ॥ अपायशाली खलु दद्रुमाली नरोभिमानी नृपदंडयुक्तः॥२॥ शनि उपवेशनमें हो तो बडे प्रचंड शत्रुजनोंसे (संतप्त ) दुःखी
जिस मनुष्यका शनि प्रकाशावस्थामें हो वह अनेक प्रकारके
गुणोंके समूहको जाने कुछ (ग्राम) गांव तथा धन उसके आधी-
नतामें रहे सर्वदा सुवुद्धिके विनोदवाला होवे सुंदरकांति होवे दया
भाषाटीकासमेतम् । (१२७)
रहे सर्वथा धनादिका नाश करता है तथा निश्चयहै कि उसके शरी-
रमें ( 8 ) दाद बहुत होवै और वह मनुष्य बडा (अभिमानी)
घमंडखोर होवे राजासे दंड वारंवार पावे ।।२।।
नयनपाणिगते रविनंदने परमया रमया परया
युतः॥ नृपतितो हिततो मतितोषकद्वहुकलाकलि-
तोविमलोक्तिकृत् ॥३॥
शनि नेत्रपाणिअवस्थामें हो तो अतिसुंदर, परम रमणीय परा-
ईस्त्रीसे युक्त रहे राजासे प्रेमपूर्वक प्रसन्नता पावै अनेक (कला)
विद्या वा तरकीबें जाने निर्मल वाणी बोले ॥३॥
नानागुणग्रामधनाधिशाली सदा नरोबुद्धिविनोद-
माली ॥ प्रकाशने भानुसुते सुभानुः कृपानुरक्तो
हरपादभक्तः॥४॥
वान् एवं श्रीभगवानके चरणोंका भक्त रहे ॥४॥
2. (१२८) भावकुतूहलम् । क्तः॥भानुसुते भ्रमते भुवि नित्यं दीनमनापि यदा- श्रयभावम् ॥६॥ शनि आगमावस्थामें जिसका हो वह पैरोंके रोगकी भयसे युक्त रहे पुत्र, . स्त्रीके सुखसे हीन रहे (दीन) दुर्बल मनकरके सर्वदा पृथ्वी विचरता रहे पराये चरणों के आश्रयमें रहे ॥६॥ रत्नावली कांचनमौक्तिकानां बातेन नित्यं व्रजति प्रमोदम् ॥ सभागतेभानुसुते नितांतं नयेन पूर्णों मनुजो महौजाः॥७॥ शनि सभावस्थामें हो तो रनोंकी (पंक्ति) लड़ियाँ, सुवर्ण, मोतियों के समूहोंसे सर्वदा आनंदित रहे तथा सभी समयमें मनुष्य नम्रतासे परिपूर्ण होवे तथा बडा तेजस्वी होवे ॥७॥ आगमे गदसमागमो नृणामब्जबंधुतनये यदा तदा ॥ मंदमेव गमनं धरातले याचनाविरहिता मतिः सदा॥८॥ यदि शनि आगमावस्थामें हो तो मनुष्योंको वारंवार रोग होते रहें संसारमें (मंदगति ) ढीलीचाल चले तथा सर्वदा बुद्धि (याच- ना) माँगनेसे रहित रहे।॥ ८॥ संगते जनुपि भानुनंदने भोजने भवति भोजनं रसैः ॥ संयुतं नयनमंदताज्ञतामोहतापपरिता- पिता मतिः॥९॥ शनि भोजनावस्थामें जन्मकालका हो तो मनुष्यको भोजन उत्तम पड्सोंसे मिले नेत्रोंकी दृष्टि मंद (अल्प) होवे अज्ञान एवं चिन्ता संतापोंसे बुद्धि संतप्त रहे ॥ ९ ॥ -
भाषाटीकासमेतम् । (१२९)
नृत्यलिप्सागते मंदे धर्मात्मावित्तपूरितः ॥
राजपूज्योनरो धीरो महावीरो रणांगणे ॥ १० ॥
शनि जिसका नृत्यलिप्सा अवस्थामें हो वह धर्मात्मा तथाधनसे
परिपूर्ण होवै राजासे (पूजा) आदर पावै वडा धैर्यवान होवै और
रणभूमिमें बडी वीरता करनेवाला होवै ॥१०॥
भवति कौतुकभावमुपागते रविसुते वसुधावसु-
पूरितः ॥अतिसुखी सुमुखीसुखपूरितः कवितयाम
लया कलया नरः॥११॥
शनि कौतुकावस्थामें हो तो मनुष्य भूमि एवं धनसे संपन्नरहे
सर्व प्रकार अतिसुखी होवै सुरूपास्त्रीके सुखसे पूर्णरहे निर्मल कवि-
ताकी कलासेभी पूर्णरहे. कविता जाने एवं कवितारसज्ञ होवै ११॥
निद्रागते वासरनाथपुत्रे धनी सदा चारगुणैरुपेतः ।।
पराक्रमी चंडविपक्षहंता सुवारकांतारतिरीतिविज्ञः१२
शनि निद्राअवस्था में हो तो मनुष्य सर्वदा धनवान होवे उत्तम
गुणोंसे युक्तरहे पराक्रम करनेवाला होवै बडे' प्रचंडशबुओंकोभी
मारडाले सुंदर वारांगनाओंके साथ (रति) क्रीडाकी विधि जाने १२
अथ राहोः प्रत्यवस्थाफलानि ।
गदागमो जन्मनि यस्य राही क्लेशाधिकवं शयनं
प्रयाते ॥ वृपेथ युग्मेपि च कन्यकायामजे समाजो
धनधान्यराशेः॥१॥
जिसके जन्ममें राहु शयनावस्था हो परंतु वृप, मिथुन,
कन्या, मेपराशिमें हो तो अन्न, धनकी (राशि) समुदाय मिलते रहें
उपलक्षणसे अन्य राशियोंमें इतना फल नहीं देता ॥१॥
(१३०)
भावकुतूहलम् ।
उपवेशनमिह गतवतिराहौ दद्रुगणेनजनः परि.
तप्तः ॥राजसमाजयुतो बहुमानी वित्तसुखेन सदा
रहितः स्यात् ॥२॥
जिसका राहु उपवेशनावस्थामें हो वह अनेकप्रकार (दद्रु)
दादआदियोंसे संतप्तरहे तथा वडे मानवाला, राजाकी सभामें
बैठनेवाला होवै परंतु धनके सुखसे सर्वदा रहितरहे ॥२॥
नेत्रपाणावगौ नेत्रे भवतो रोगपीडिते ॥
दुष्टव्यालारिचौराणां भयं तस्य धनक्षयः॥३॥
राहु नेत्रपाणिअवस्थासे हो तो नेत्र सर्वदा रोगसे पीडितरहे
और सव शत्रु, चोर, आदि दुष्टजनोंका भय, धनका क्षय होवै॥३॥
प्रकाशने शुभासने स्थितिः कृतिः शुभानृणां धनो
नतिर्गुणोन्नतिः सदाविदामगाविह ॥ धराधिपा
धिकारिता यशोलता तता भवेन्नवीननीरदाकृति-
विदेशतोमहोन्नतिः॥४॥
राहुकी स्थिति प्रकाशनावस्था (शुभासन) १२।३।६
राशियोंमें हो तो मनुष्योंको उत्तम धनको (उन्नति) वृद्धिहोवै
ऐसेही सदोंकी वृद्धि होवै सर्वदा पांडित्य चातुर्यता होकर राज्या-
धिकारिता मिले यशरूपीटता बहुत फैले नवीन (मेघ) बादलों-
कीसी आकृति होवे परदेशसे बडी उन्नति मिले ॥१॥
गमने च यदाराही बहुसंतानवानरः॥
पंडितो धनवान दाताराजपूज्योनरोभवेत् ।।५।।
राहु गमनावस्थामें हो तो मनुष्य बहुतसंतानवाला होवे
पंडित, तथा धनवान्, उदार और राजपूज्यभी होवे ॥ ५ ॥
भापाटीकासमेतम्। (१३१)
राहावागमने क्रोधी सदा धीधनवर्जितः ॥
कुटिलः कृपणः कामी नरो भवति सर्वथा ॥६॥
राहु आगमनावस्थामें हो तो मनुष्य क्रोधी होवै सर्वदा बुद्धि
एवं धनसे रहित रहे (कुटिल ) अनारी होवै (कृपण) मूंजी होवै
और सर्वप्रकारसे अतिकामी होवे ॥६॥
सभागते यदा राही पंडितः कृपणो नरः॥
नानागुणपरिकांतो वित्तसौख्यसमन्वितः॥७॥
राहु सभावस्थामें हो तो मनुष्य पंडित, अनेकगुणोंसे युक्त,
एवं धन सुखसे युक्तरहे परंतु (कृपण) मूंजी होवे ॥७॥
चेदगावागमं यस्य याते तदा व्याकुलं सदाराति-
भीत्या महत् ॥ बंधुवादोजनानां निपातो भवद्वि-
तहानिःशठवं कृशत्वं तथा ॥ ८॥
राहु आगमावस्थामें जिसका हो वह सर्वदा शत्रुके भयसे व्या-
कुल रहे जातभाइयोंमें कलह रहे कुटुंबमें मनुष्य न रहे धनकी
हानि होवै मूर्खता रहे. शरीर (कृश)माडाभी रहे ॥८॥
भोजने भोजनेनालं विकलो मनुजो भवेत् ॥
मंदबुद्धिः क्रियामीरुः स्त्रीपुत्रसुखवर्जितः ॥९॥
जिस मनुप्यका राहु भोजनावस्थामें हो वह भोजनसे विकल रहे
अर्थात् भोजनप्राप्ति कठिनतासे होवे बुद्धि जड होवे कार्य करनेमें
डरे अलसी होवै स्त्रीपुत्रोंके सुखसे वर्जितरहे ॥९॥
नृत्यलिप्सागते राही महाव्याधिविवर्दनम् ॥
नेत्ररोगं रिपोर्मीतिर्द्धनधर्मक्षयो नृणाम् ॥ १० ॥
(१३२) भावकुतूहलम्। राहु नृत्यलिप्साअवस्थामें हो तो मनुष्योंको बडे बडे रोगवटें नेत्रोंमें रोगरहे शत्रुकी भयहोवै धनका और धर्मका क्षय होवै॥१०॥ कौतुके च यदा राहौ स्थानहीनो नरो भवेत् ॥ परदाररतो नित्यं परवित्तापहारकः ॥ ११ ॥ राहु कौतुकावस्थामें जिस मनुष्यका हो वह (स्थान) गृह भूमिसे रहितरहे.सर्वदा पराईस्त्रीसे रमितरहे पराये धनका हरण- करनेवाला होवै ॥११॥ निद्रावस्थागते राहौ गुणग्रामयुतो नरः ॥ कांता संतानवान धीरोगवितो बहुवित्तवान् ॥१२॥ राहुनिद्रावस्थामें हो तो मनुष्य अनेक गुणोंके समाजसे युक्त हो. स्त्रीपुत्रवाला होवै धैर्यवान (गर्वित) घमंडखोर और बहुत धनवान होवे ।। १२॥ अथ केतोरवस्थाफलांनि। मेषे वृपेथ वा युग्मे कन्यायां शयनंगते ॥ केतौधनसमृद्धिः स्यादन्यभे रोगवर्द्धनम् ॥ १॥ केतु, मेप,पभामिथुन,कन्या राशिमेंसे किसीमें शयनावस्थामें होतो धनकी समृद्धि होवै. अन्य राशियोंमें होतो रोगवढे ॥१॥ उपवेशं गते केतौ दट्ठरोगविवर्द्धनम् ॥ अरित्रातनृपव्यालचौरशंकासमंततः ॥२॥ केतु उपवेशावस्थामें हो तो (8) दादका रोग वढे शउसमू- ह, राजा, सर्प, चोरोंसे भयकी शंका होवै ॥२॥ नेत्रपाणि गते केतौ नेत्ररोगः प्रजायते ॥ दुष्टसपी-
भाषाटीकासमेतम् । (१३३)
दिभीतिश्च रिपुराजकुलादपि ॥ वित्तं विनाशमा-
याति मतिश्च चपला भवेत् ॥३॥
केतु नेत्रपाणिअवस्थामें हो तो नेत्रोंमें रोग रहे दुष्टजंतु सर्पा-
दियोंका भय होवै तथा शत्रुसे, राजकुलसे भय होवै धनका नाश
हो बुद्धि चंचल रहे ॥३॥
प्रकाशने गते केतौ धनधान्यसमुन्नतिः ॥
राजमानं यशोलाभ विदेशे सौख्यमाप्नुयात् ॥ ४॥
केतु प्रकाशावस्थामें हो तोअन्न धनकी वृद्धि होवै राजासे मान
मिले यश बढे विदेशमें सौख्य होवे ॥४॥
गमने तु यदा केतौ पुत्रसंपत्तिमानरः ॥
पंडितोराजमानी च धनेन परिपूरितः ।।५।।
केतु गमनावस्थामें हो तोपुत्रोंकी संपत्तिवाला मनुष्य होवे तथा
पंडित होवै राजासे मान पावै धनसे परिपूर्ण रहे ॥६॥
केतावागमने दुष्टमतिः श्रीरहितः पुमान् ।
कामी धीधर्महीनश्च जायते क्रोधनःशठः॥६॥
केतु आगमावस्थामें हो तो पुरुपको दुष्पवृद्धि होवे लक्ष्मी
रहित रहे कामी होवै सहुद्धि तथा धर्मकर्मसे हीन रहे कोधी और
ठगुआ होवै॥६॥
सभावस्थागते केतौ वाचालो बहुगर्वितः ।।
कृपणो लंपटश्चैव धूर्तविद्याविशारदः ॥७॥
केतु सभावस्था हो तो बडा वाचाल होवे (गर्वित) बडा
मिजाजी होवै (कृपण) सम होवै झूठ बोलनेवाला, ठगोरी करने
वालाभी होवे धूर्तता करे विद्यामें भी निपुण होवे ॥७॥
.
(१३४)
भावकुतूहलम् ।
यदागमे भवेत्केतुः केतुः स्यात्पापकर्मणाम् ।।
बंधुवादरतो दुष्टो रिपुरोगनिपीडितः॥८॥
केतु यदि आगमनावस्थामें हो तो पाप कर्मोंका (ध्वजा) श्रेष्ट
वह मनुष्य होवे बंधुजनोंमें विवाद करता रहै दुष्टता करे शत्रुसे
तथा रोगसे पीडित रहे ॥८॥
भोजने तु जनो नित्यं क्षुधया परिपीडितः॥
दरिद्रोरोगसंतप्तः केतौ भ्रमति मेदिनीम् ॥९॥
केतु भोजनावस्थामें हो तो मनुष्य नित्य (क्षुधा) भूखसे पीडित
रहै दरिद्री तथा रोगसे संतप्त रहकर पृथ्वीमें भ्रमण करे ॥९॥
नृत्यलिप्सागते केतौ व्याधिना विकलोभवेत् ॥
बुद्बुदाक्षो दुराधर्षो धूतॊनर्थकरो नरः॥ १० ॥
केतु नृत्यलिप्साअवस्थामें हो तो मनुष्य रोगसे सर्वदा (विकल)
कायल रहे आँख उसकी देखनेमें कांपे स्थिर दृष्टि न होवे किसीसे
हारे नहीं धूर्त होवे और अनर्थके काम करे ॥१०॥
कौतुकी कौतुके केतौ नटवामारतिप्रियः॥
स्थानभ्रष्टो दुराचारो दरिद्रो भ्रमते महीम् ॥११॥
केतु कौतुकावस्थामें जिसका हो वह नटिनीके (संभोग) रतिको
प्रियमाने (स्थानभ्रष्ट ) घरसे निकल जावै दुष्ट आचार करे दरिद्री
होकर पृथ्वीमें भ्रमण करे ॥ ११ ॥
निद्रावस्थागते केतौ धनधान्यसुखं महत्॥
नानागुणविनोदेन कालो गच्छति जन्मिनाम्॥१२॥
इति श्रीजीवनाथविरचिते भावकुतूहले
शयनाद्यवस्थाविचाराध्यायः॥ १२ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (१३५)
केतु निद्रावस्थामें हो तो अन्न तथा धनका सुख मनुष्योंको
बहुत होवे अनेक प्रकार गुणोंके चर्चासे खुसीसे दिन कटें ।।१२।।
इति महीधरकृतायां भावकुतूहलभाषायां ग्रहाणां शयनाथ-
वस्थाविचाराध्यायः ॥ १२॥
अथ ग्रहाणां वालाद्यवस्थाफलानि ।
बालो रसांशैरसमे प्रदिष्टस्ततः कुमारो हि युवाथ
वृद्धः॥ मृतः क्रमादुत्क्रमतः समः वालाद्यवस्थाः
कथिता ग्रहाणाम् ॥ १॥ फलं तु किंचिद्धि तनोति
बालश्चाई कुमारः प्रयतेन पुंसाम् ॥ युवा समग्रं
खचरोथ वृद्धः फलं च दुष्टं मरणं मृताख्यः॥२॥
अब बालादि अवस्था कहते हैं कि विपम राशिके ६ अंशपथ-
मकेमें ग्रह हो तोवाल अवस्था, ७ से १२ अंशपर्यंत कुमार,१३ से
१८ लौं युवा, १९ से २४ पर्यंत वृद्ध, २५ से ३० पर्यंत मृत्यु अव-
स्था होती है. समराशिमें ग्रह हो तो विपरीत अर्थात् प्रथम ६ अंश
पर्यंत मृत्यु, ७ से १२ पर्यंत वृद्ध, १३ से १८ पर्यंत युवा, १९ से
२४ लौं कुमार, २५ से ३० पर्यंत वाल अवस्था होती है ।। १॥
इनके फल येहैं कि, बाल अवस्थावाला ग्रह अपना पूर्वोक्त फल
थोडा देता है कुमारमें आधा, युवामें समस्त, वृद्धमें अनिष्ट फल
और मृत्युवाला मृत्युही देता है ॥२॥
अथ दीप्ताद्यवस्थाः।
उच्चे दीप्तः स्वभे स्वस्थो मित्रभे हर्पितो भवेत् ॥
शांतःशोभनवर्गस्थोऽतिशस्तो दीप्तदीधितिः॥३॥
लुप्तोस्ते नीचभे दीनः पीडितः पापशत्रभे॥
एवमष्टौ नभोगानां भावा दीप्तादिभेदतः॥४॥
(१३६)
भावकुतूहलम् ।
अब अन्य प्रकार दीप्तादि अवस्था कहते हैं कि जो ग्रह अपने
उच्च राशिमें है वह दीप्त अवस्थाका एवं अपनी राशि स्वस्थ,
मित्रकी राशिमें हर्पित, शुभग्रहके राशि अंशादियोंमें शांत, उदय-
का शस्त अस्तंगत लुप्त नीचराशि वा दीन पापराशि वा शत्रुराशिमें
पीडित होता है ऐसे दीप्तादि भेदोंमें ग्रहोंके ८ भाव हैं ॥३॥४॥
अथ दीप्तग्रहफलम् ।
दीप्ते मदोन्मत्तगजेंद्रगंता सदारिहंता वरतीर्थगंता॥
कांतो मनस्वी नितरां यशस्वी प्रदीप्तवेषोमनुजोमहीपः
दीप्त ग्रहका फल वह है कि मनुष्य मत्तवाले हाथीकी सवारीमें
चलने वाला, सर्वदा वैरिको मारनेवाला, श्रेष्ठतीर्थोमें जानेवाला,
सुरूपबुद्धिमान, सर्वदा यशवाला, कांतिमान् राजा करताहै॥५॥
स्वस्थे गुणागारजवालयानामुपार्जको वैरिविनाश
कर्ता॥ नरोप्युदारोनृपपूजितः स्याद्विशालकीर्तिः
कमनीयमूर्तिः॥६॥
स्वस्थग्रहवाला मनुष्य गुणोंके भंडार, गृह, धन, सवारीआदि-
योंका (उपार्जक) कमानेवाला, तथा शत्रुका विनाश करनेवाला
उदार, राजपूजित बडी कीर्तिवालासुहावनीमूर्तिवाला होता है॥६॥
हर्पितेभवति हर्पितः सदा मित्रपुत्रपरिपूरितोमुदा॥
धर्मकृन्मणिगणेन मंडितः परमदैवविपाकविज्जनः७
हर्पितग्रहका फल ऐसा है कि मनुष्य सर्वदासुशरहे पुत्रोंसे तथा
मित्रोंसे सर्वदा प्रसन्नतापूर्वक परिपूर्ण रहे धर्म करनेवाला होवै म-
णियोंके समूहसे भूपित रहे पंडित होवे और परमेश्वरको जाननेवा-
ला युद्वा (देव) पूर्वार्जित कर्म अर्थात् कर्मविपाक आदि ज्योतिप
जाननेहारा होवे ॥७॥
में भाषाटीकासमेतम् । (१३७) शांतेति शांतो युवराजराजोजनो महौजा जनता- समेतः ॥ अनेकविद्यामलगद्यपद्याभ्यासानुरक्तः खलु वित्तयुक्तः ॥८॥ शांत ग्रहवाला मनुष्य अतिशांतस्वभाव सर्वदा जवान राजाओं काराजा होवै अथवा (युवराज) भविष्यराजा यद्वा राजा होवै बडा तेजमान होवे बहुत मनुष्यों के साथरहे अनेक प्रकार निर्मल गद्य पद्यसहित विद्याओंके अभ्यासमें तत्पर रहे और निश्चय धनयुक्त सर्वदा रहे ॥८॥ शस्ते विशेषाद्विदुपांप्रशस्तःप्रशस्तवेपो गतरोगसं- घः॥ विशालमालालसितोऽमलोक्त्या नरो नराणा- मधिपप्रधानः॥ ९॥ शस्त ग्रहका फल है कि मनुष्य विशेषतासे विद्वानोंका प्रशंस- नीय (श्रेष्ठ ) होवै सुंदर सुहावना (वेप) सजीला जवान होवै निरोग रहे बड़ी कीमती मालासे भूपित रहे और निर्मल वाणीकरके मनुः प्योंका स्वामि, किंवा (प्रधान) श्रेष्ठ होवै ॥९॥ लुप्ते च लुप्तो गुणधर्मभावैः प्रपीडितोरातिकुलेन मर्त्यः ॥ भवद्विरक्तो गदजालयुक्तो प्रमादशाली खलु पापमाली॥१०॥ लुप्त ग्रहका फल है कि मनुष्य गुण तथा धर्मके कामोंका लोप- करे अर्थात् निर्गुणी, विधर्मी होवे. शकुलसे (पीडित ) दुःखी रहे गृहस्थसे विरक्तरहे अनेक रोगोंसे युक्तरहे प्रमादी होवै पापकरने वाला होवे ॥१०॥ दोनेति दीनो मतितोपहीनो जनो जनेशादिनि- (१३८) भावकुतूहलम्। पीडितश्च ॥ गुणेन हीनः परदारलीनः परार्थहारीच कुभूमिचारी ॥ ११॥ दीनग्रहवाला मनुष्य अति (दीन) गरीब होता है बुद्धिहीन संतोषरहित, गुणहीन, पराई स्त्रीमें आसक्त पराये धन चोरने- वाला निषिद्ध भूमिमें फिरनेवाला और राजा आदिसे पीडित- भी रहता है ॥ ११॥ पीडिते गदनिपीडितः सदा चिंतया च परया सम- न्वितः ॥ व्यग्रितो बहुमदोद्धतः पुमानाधिरोगस- हितो विशेषतः॥ १२ ॥ इति भाव कुतूहले ग्रहावस्था फलाध्यायः॥१३॥ पीडित ग्रहसे मनुष्य सर्वदारोगपीडित बडीचिंतासे युक्त (व्यय) वे फुर्सत, बडे मदसे उन्मत्त रहता है तथा(आधि) मानसी दुःख- से दुःखी विशेषतः रोगी रहता है ॥ १२॥ इति महीपरकतायां भावकुतूहलक्षापायां त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ अथ मारकविचाराध्यायः । मारकग्रहसंबंधात् पापकर्ता शनिस्तदा ॥ तिरस्कृत्य ग्रहान् सर्वान्निहंता भवति ध्रुवम् ॥ १ ॥ अब मारकाध्याय कहते हैं समस्त ग्रहोंमें मृत्युकारक यमका भाई होनेसे शनि विशेष है वक्ष्यमाण विधिसे मारकत्व जो ग्रह पावै उसके साथ चार प्रकारोंमेसे किसी प्रकार संबंध शनि पावै तो मारक ग्रहोंको हटायकरआपही मारक होजाता है अपने मारकत्व होनमें तो क्याही बाकी रहेगा ॥३॥ त्रिकोणभवनाधिपाः शुभफलास्तु सर्वे ग्रहास्त्रि- वैरिभवभावपाः खलफला निरुक्ता बुधैः ॥ भवंति भाषाटीकासमेतम् । (१३९) यदि केंद्रपाः शुभखगा न शस्ता नृणामतीव शुभ- दायकाः खलखचारिणो जन्मनि ॥२॥ त्रिकोण ९१५ स्थानोंके स्वामि शुभसंज्ञक एवं शुभ फल देने- हारे और ३३१ भावोंके स्वामी पाप संज्ञक एवं क्रूर फल देने वाले पंडितोंने कहे हैं तथा केंद्र'११४७११० स्थानों के स्वामि शुभ ग्रह हों तो शुभ फल नहीं देते पाप ग्रह हो तो अति शुभ फलदेते हैं यह विचार जन्ममें मुख्य है ॥२॥ यद्यद्भावगतो राहुः केतुश्चं जनने नृणाम् ॥ यद्यद्भावेशसंयुक्तस्तत्फलं प्रदिशेदलम् ॥३॥ राहु तथा केतुभी मनुष्योंके जन्ममें जिन जिन भावों में हों और जिन जिन भावोंके स्वामियोंसे युक्त हो उन उन भाव संबंधी फल निश्चय देते हैं ॥३॥ मंदश्वेत्पापसंयुक्तो मारकग्रहयोगतः ।। तिरस्कृत्य ग्रहान्सान्निहता पापकृयदा ॥४॥ यदि शनि पापयुक्त होकर मारक (सप्तमेशद्वित्तीयेश) से युक्त उपलक्षणलसे दृष्टभी हो तो समस्त ग्रहोंके फलोंको हटायके मारने वाला हो जाता है क्योंकि यह ( पापकृत् ) यमही है ॥४॥ अल्पमध्यमपूर्णायुः प्रमाणमिह योगजम् ॥ विज्ञाय प्रथमं पुंसां ततो मारकचिंतना ॥५॥ प्रथम अल्प, मध्यम, पूर्ण आयुका विचार वक्ष्यमाण योगोंसे करके तय मारकका विचार करना जैसे योगसे पूर्णायु है और मार क दशा अल्प वा मध्यमायुके समयमें हो तो अरिष्टमात्र होगा मृत्यु नहीं होगी. ऐसेही मारकयोग अल्पायु समयमें हो तथा मार- -- . (१४०) भावकुतूहलम् । क दशा पूर्णायु समयमें हो तो ऐसेही जानना जब मारक दशा और योगायुभी तुल्य समयपर होतब मृत्यु होती है ।। ५.॥ चेदंगपो यदिरवेररिरेव हीनं पूर्ण सुहृद्यदि समः सममायुराहुः ॥ वालग्रहो हितसमारिपदेपि पूर्ण मध्यं च हीनमिह जातकतत्त्व विज्ञाः॥६॥ योगसे अल्प मध्यम दीर्घ आयु कहते हैं कि यदि लग्नेश सूर्य- का शत्रु हो तो अल्पायु, मित्र हो तो पूर्णायु, सम हो तो मध्यमायु होती है अथवा लग्नेश मित्रगृही हो तो पूर्ण समके राशिमें हो तोम- ध्यम और शत्रुराशिमें हो तो अल्प आयु होती है यह जातकोंके तत्व जाननेवाले कहते हैं आयुका प्रमाण ४० अल्प ८० पर्यंत मध्यम १२० पर्यंत पूर्ण हैं परंतु कलिकालमें लोभमोहादि तथा अनाचार, कुपथ्य झूठ कूट आदियोंके करनेसे मनुष्योंकी परमायु ६० के लग भगही हो जाती है इस व्यवस्थामें इसके ३भाग२०प यंत अल्प ४० लौं मध्यम ६० पर्यंत पूर्ण आयु जाननी ॥६॥ अष्टमर्श तृतीयं च बुधैरायुरुदाहृतम् ॥ द्वितीयं सप्तमं स्थानं मारकस्थानमुच्यते ॥ ७॥ लगसे अष्टम तथा तृतीय आयु स्थान पंडितोंने कहे हैं इनसे वारहवे अर्थात् लगसे दूसरा और सप्तम स्थान मारक संज्ञक कहे हैं यहां ग्रंथकर्ताने तृतीयभी आयु स्थान कहा किंतु यह अन्य ग्रंथोंमें न होनेसे अयुक्त है ॥७॥ मारकेशदशापाके मारकस्थस्य पापिनः॥ पाके पापयुजां पाके संभवे निधनं दिशेत् ॥ ८ ॥ मारकभावका स्वामि मारक स्थानमें हो तो उसकी दशादशा- तरमें मृत्यु होती है परंतु वह ग्रह ( पाप )३६११३८ भावेशसे भाषाटोकासमेतम् । (१४१) भी संबंध रखता हो और पाप ग्रहोंकी दशामें यदि पापयुक्त होकर मारकसेभी संबंध रक्खें तो उनकी दशादिमेंभी मृत्यु होती है ॥८॥ असंभवे व्ययाधीशदशायां मरणं नृणाम् अभाव व्ययभावेशसंबंधिग्रहमुक्तिषु ॥९॥ मारक ग्रहकी दशाके ( असंभव)वर्तमान न होने एवं बहुत दूर मारक ग्रहदशा होनेमें अथवा मारक दशा मुक्त हो जानेमें व्यया- धीशके दशामें मनुष्योंको मृत्यु हो जाती है उसकाभी पूर्वोक्त प्रकारों से अभाव हो तो व्यय भावेशके साथ जो ग्रहसंबंध करता हो अथवा मारकेशसे जोसंबंध करताहोउसकी दशामें मृत्यु होती है ९ तदभावेऽष्टमेशस्य दशायां निधनं पुनः ॥ दुष्टतारापतेः पाके निर्वाणं कथितं बुधैः ॥ १० ॥ पूर्वोक्तके अभावमें अष्टमेशकी दशामें मरण होता है अथवा दुष्टराशि ८।२ पतिकी दशामें यद्वा पापग्रहदशामें मृत्यु पंडितों- ने कही है।॥१०॥ अथ राजयोगाः। नवमभावपतिस्तनयालये सुतपतिनवमे यदि ज- न्मिनः ॥ अतिविचित्रमणिव्रजमंडितो वसुमतीवि- भुतांस नरो व्रजेत् ॥११॥ अवराजयोग कहते हैं कि, जिसके जन्ममें नवमभावका स्वामि पंचम भावमें तथा सुतेश नवम स्थानमें हो तोवहुत मूल्यके अनेक प्रकार (मणि ) रत्रोंसे भूपित होकर पृथ्वीका राजा होवे ॥११॥ कर्माधीशः सुतस्थाने सुतेशः कर्मगो यदा ॥ त्रिकोणपतिना दृष्टो राजा भवति निश्चितम् ।। १२ ॥
(१४२)
:: भावकुतूहलम्।
जिसके जन्ममें दशमेश पंचम स्थानमें पंचमेश दशम स्थानमें
त्रिकोण९।५ भावेशमें दृष्ट हो तो निश्चय राजा होता है ॥ १२ ॥
राज्येशांगपवाहनेशसुतपा धर्मालये स्वामिना
संयुक्ता यदि वीक्षिताश्च वलिनोराजाभवेन्मानवः॥
पुत्रेशो यदि धर्मपेन सहितो लग्नाधिपेनांगगो दृष्टो
वा सहितःसुखेऽपि दशमे राजा भवेनिश्चितम्॥१३॥
जिसके जन्म लग्नसे दशमेश, लग्नेश, चतुर्थेश, पंचमेश, नवमेश-
युक्त वा दृष्टहों तथा बलवान्भी हों तो वह मनुष्य राजा होवै
और पंचमेश यदि नवमेश तथा लग्नेशसे युक्त होकर लग्नमें हो
अथवा दशममें यद्वा चतुर्थ स्थानमें नवमेश लग्नेशसे युक्त वा दृष्ट
हो तो निश्चय राजा होवै ॥ १३ ॥
यत्र कुत्रापि केंद्रेशस्त्रिकोणपतिना युतः ॥
सवलो मनुजो राजा दुर्वलो धनपो भवेत् ॥ १४॥
केंद्र ११४७११० का स्वामी किसी भावमें त्रिकोण ५.९ से
युक्त हो बलवान्भी हो तो मनुष्य राजा होवै धनवान्भी होवे परंतु
शरीर निर्वल रहे ॥ १४ ॥
पुण्यस्थाने गुरुक्षेत्र दशमे भृगुणा युते ।
पंचमस्वामिना दृष्टे राजपुत्रो नराधिपः ॥ १५॥
लग्नेश नवममें अथवा बृहस्पतिकी राशि ९।१२ में वा दशम
स्थानमें शुक्रसहित हो तथा पंचमेश उसे देखे तो राजाका पुत्र
राजा होवे अन्य नहीं ॥१५॥
अथ धनिकयोगाः।
पंचमे निजभे शुक्रे लाभे रविसुते यदा॥
भोक्तामणिसुवर्णानामधिपोजायते नृणाम् ॥ १६ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (१४३)
शुक्र अपनी राशि२१७ का पंचमस्थानमें होलाभ भावमें शनि
हो तो मणियोंके समूहका भोगर्नेवाला सुवर्णका भोगनेवाला
राजा होवे ॥१६॥
कर्कटे तु कलानाथे पंचमे लाभगेशनौ ।
नानाधनसमृद्धिः स्याद्धर्मवृद्धिश्च भूपता ॥ १७ ॥
चंद्रमा कर्क राशिका पंचम भावमें शनि लाभभावमें हो तोअ-
नेक प्रकार धनोंकीसमृद्धि धर्मकी वृद्धि और राजत्वभी होवै॥१७॥
पंचमे तु मृगे कुंभे समंदे यस्य जन्मनि ॥
बुधे लाभालये तस्य सर्वतो द्रविणोन्नतिः॥ १८ ॥
जिसके जन्मलनसे शनि १०1११ का पंचमभावमें तथा बुध
ग्यारहवें भावमें हो उसको सर्व प्रकारसे धनकी वृद्धि होती रहै॥१८॥
पंचमे तु रवौ सिंहे लाभे देवगुरौ सदा ॥
वाहनस्वर्णरत्नानामधिपो जायते क्षणात् ॥ १९ ॥
सूर्य सिंहराशिका पंचमभावमें हो बृहस्पति लाभ ११ भावमें
हो सर्वदा वाहन हाथी घोडे आदि, तथा सुवर्ण रत्नोंका स्वामि
अकस्मात्भी होवे ॥१९॥
पंचमे तु गुरुक्षेत्रे सगुरौ यदि जन्मनि ॥
लाभगाविंदुभूपुत्रौ पृथ्वीपतिसमो नरः ॥ २० ॥
पंचममें बृहस्पति अपनी राशि ९।१२ का हो तथा लाभ भावमें
चंद्रमा मंगल हो तोमनुष्य इस जन्म योगसे राजाके समान होवे २०
रविक्षेत्रगते लग्ने रविणा संयुते सति ॥
गुरुभौमयुते वापि धनाधिक्यं दिने दिने ॥२१॥
(१४४)
भावकुतूहलम् ।
सूर्या लग्नमें सिंहका हो अथवा वृहस्पति मंगल करके युक्तभी
हो तो दिनोदिन धनकी अधिकता होती रहै ॥२१॥
कर्क जन्मलग्ने तु सचंद्रे यदि जन्मनि ॥
संयुते जीवभौमाभ्यां स सद्यो वित्तपो भवेत् ॥२२॥
जिसके जन्ममें कर्क लग्न हो उसमें चंद्रमाभी हो मंगल वृहस्पति
से युक्त हो तो अकस्मात् धनका स्वामि होवै ॥२२॥
कुजक्षेत्रगते लग्ने सभौमे यस्य जन्मनि ॥
ज्ञ शुक्रमंदसंयुक्ते स धनेशसमो नरः ॥ २३ ॥
जिस मनुष्यके जन्ममें लग्नकामंगल अपनी राशि ११८ का बुध
शुक्रशनिसे युक्त हो वह कुवेरके समान धनवान होवै ॥ २३ ॥
गुरुभे गुरुसंयुक्त जन्मलग्नगते सति ॥
चंद्रांगारयुतो यस्य तस्य लक्ष्मीरचंचला ॥ २४ ॥
वृहस्पति लग्नमें अपनी राशि ९।१२ का हो तथा चंद्रमा मंगल-
सेभी युक्त जिस मनुष्यका होउसके घरमें लक्ष्मी स्थिररहे ॥२४॥
कन्यामिथुनयोलग्ने सबुधे यस्य जन्मनि ॥
संयुते शुक्रमंदाभ्यां वृपे वाधनिको भवेत् ॥ २५॥
जिसके जन्ममें मिथुन वा कन्याका बुध लगका शुक्र शनिसे
युक्त वा दृष्ट हो वह धनवान होवै ॥२६॥
शुक्रराशिगते लग्ने ससिते यदि जन्मनि ॥
चंद्रजादित्यजाभ्यां तु युते दृष्टे धनाधिपः॥ २६ ॥
जन्ममें जिसका शुक्र लग्नमें अपनी राशि २१७ का बुध शनि-
संयुक्त हो अथवा दृष्ट हो तो धनका स्वामि होवे ॥२६॥
भाषाटीकासमेतम् । (१४५) अथ दरिद्रयोगाः। त्रिकोणपतिसंबंधी यो यो वित्तप्रदो ग्रहः ॥ स षडष्टव्ययाधीशैर्युतो धनविनाशकः ॥२७॥ अव दरिद्री योग कहते हैं जोजोधनदेनेवाला ग्रह है वह त्रिकोण ५।९ भावेशोंसे संबंधी होकर छठे आठवें बारहवें भावोंके स्वामि योंसेभी युक्तहो तो धनका नाश करके दरिद्री करते हैं ।। २७ ।। रिपुभावपतौ लग्ने लग्नेशे रिपुभावगे । मारकस्वामिना दृष्टे युते वा निईनो भवेत् ॥२८॥ षटेश लग्नमें लग्नेश छठे भावमें हो इनपर मारकेशकी दृष्टि हो अथवा उससे दृष्ट होतो मनुष्य (निर्द्धन) धनरहित होवै ॥२८॥ चंद्रादित्यौ यदालग्ने वांगपे निधनालये ॥ मारकेणयुते दृष्टे नरो भवति निर्द्धनः ।। २९ ॥ सूर्य चंद्रमा लग्नमेंहो अथवा लग्नेश अष्टमभावमें हो इनपर मा. रक ग्रहकी दृष्टिहो वा मारकसे युक्त हो तो मनुष्य निर्द्धन होवै२९ यदांगनाथस्त्रिकभावनाथैर्युतेक्षितः पापयुतो थवा स्यात् ॥ पुत्रेश्वरेणापि युते विलग्ने शुभैरदृष्टे च भवेदणी सः ॥ ३०॥ यदि लग्नेश त्रिकभाव६८।१२ स्वामीसे युक्त वा हट हो अथवा पापयुक्त हो शुभग्रह उसे न देसे तो पंचमेशसे युक्त लगेश लग्नमें जो धनवान योग कहाहै इसके हुयेमेंभी वह मनुप्य (ऋणी) कर्जदार होवे ॥३०॥ आस्तारिनीचत्रिकभावगे वा लग्नेश्वर मारकनाथ
(१४६). भावकुतूहलम्।
युक्ते ॥ भाग्याधिपे वाथ शुभैरदृष्टे भवेदृणीशो
मनुजेश्वरोपि ॥ ३१॥
इति भावकुतूहले नानायोग निरूपणं नामचतु-
दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
यदि लग्नेश अस्तंगतहों अथवा शत्रुराशिमें, नीचराशिम,
त्रिक ६।८।१२ भावोंमें हो मारक ग्रहसे युक्त तथा उसे भाग्या:९
धीश यद्वा शुभग्रह न देखें तो वह मनुष्य राजाभी हो तो भी ऋणि
योंमें श्रेष्ट हो ॥३१॥
इति महीधरकृतायां भावकुतूहलनापायां नानाविधयोगकथनं नाम
चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥.
अथ भावाध्यायः।
(तत्रादौ तनुभावविचारः)
अष्टारिव्ययगो यस्य लग्नस्वामी खलैर्युतः ॥
सुखंनिहंति तस्याशु सर्व भावेष्वयं विधिः॥१॥
सभी भावोंमें यह विधि है कि जिसका लग्नस्वामी ८६१२
भावोंमेंहो, पाप युक्त हो तो उसके सुखको शीघ्रहरणकरताहै।॥१॥
लग्नपश्चंद्रराशीशो नीचस्तु रिपुराशिगः ॥
विनास्वर्श त्रिकस्थश्चेद्वलहीनों ग्रहो भवेत् ॥२॥
लग्नेश अथवा चंद्रराशीश नीचराशिमें अथवा शत्रुराशिमें
तथा विना अपनी राशिनिक ६।८।१२ स्थानमें हो तो वह ग्रह व-
लहीन कहाताहे अपनी राशिका ८१२ मेंभी बली होताहै ॥२॥
दुष्टस्थानगते यस्य चंद्रलग्नेश्वर यदि ॥
काय गदभयं नित्यं वितनोतिरिपूदयम् ॥३॥
भापाटीकासमेतम् ।
(१७)
जिसका लग्नेश वा चंद्रराशीश (दुष्ट स्थान ) शत्रु नीच त्रिकों
हो उसको कृशता, रोग भय और शत्रुकी वृद्धि नित्य रहती है।।३।।
निजाच्चे निजभे वर्गे स्वकीये लग्नपे यदि ॥
दीर्घायुः सुखसंतप्तो बली भोगी प्रजायते ॥४॥
यदि लग्नेश उपलक्षणसे चंद्रराशीशभी अपने उच्च राशिमें,
स्वगृहमें, अथवा अपने अंशादियोंमें हो वह दीर्घायु, सुखी, बलवा-
न और भोगवान होताहै ॥ ४॥
अथ धनभावविचारः।
धनेशः शुक्रसंयुक्तोथवा शुक्रात्रिके भवेत् ।।
संबंधी लग्ननाथेन नेत्रयोः पीडनं भवेत् ॥ ५॥
धन(२) भावेश शुक्रके साथ हो अथवा शुक्रसे ६८।१२वें स्थान-
में हो तथा लग्नेशसभी संबंध करता हो तो नेत्ररोगी होताहै ॥६॥
चंद्रादित्यौ धनेस्यातां निशांधो मनुजो भवेत् ॥
अर्कलग्नपकोशेशाः सुखाधिपतिनायुताः ॥६॥
तातादीनां प्रकुर्वति मंदता नेत्रयोरपि ॥
उच्चगो निजगेहस्थो ग्रहो नैवात्र दोपकृत् ॥७॥
जिसके सूर्य चंद्रमा दूसरे भावमें हो वह मनुष्य (राव्यंध)रतौंधी
वाला होता है. यदि सूर्य, लग्नेश धनेश, चतुर्थेशके साथ हो तो
उसके माता आदियोंको ( नेव मंदता) दृष्टि कम करती हैं.
उक्तयोगमें यदि उक्तग्रह अपने उच्च वा स्वराशिका हो तो
दोप नहीं करता ॥६॥७॥
गुस्वाग्भवनाधीशो
त्रिकस्थानगती यदा॥
मूकतां कुरुतोप्येवं पितृमातृगृहेश्वरः ॥ ८॥
(१४८) भावकुतूहलम् । ताभ्यांयुतस्त्रिकस्थाने तेषां मूकत्वमादिशेत् ॥ बलाबलविवेकेन जातक विशेषतः ॥९॥ बृहस्पति और द्वितीयस्थानका स्वामि विक ६।८।१२ स्थान में हों तो (मूकता) गूंगापन आता है. यदि उक्तवृहस्पति और द्वितीयेशके साथ मातृपितृआदि जिस भावका स्वामी त्रिकमें हो उसको मूकता कहनी विशेषतः जातक जानने वालेने उनका बल एवं निर्बलता देखके फल कहना जैसे योगकारकग्रह उच्च स्वरा- शिमें हों तथा शुभग्रहोंसे युक्त दृष्ट हो तो अनिष्ट फल पूरा नहीं देते नीचशत्रुराशिगत, पापयुत कष्टफल पूराही देतेहैं इत्यादि विचार करना ॥८॥९॥ धनाधिपो माननवायभावे बली यदा तिष्ठति जन्म काले ॥रमा विहारालयवासिनी वा निजोच्चमित्रा लयगो जनानाम् ॥१०॥ धनभावेश दशम, नवम, लाभ-भावमें बलवान् जन्मकालमें हो अथवा अपने, उच्च, मित्र, राशिमें हो तो लक्ष्मी उसके रहनेके घरमें विहार करे ॥१०॥ अथ तृतीयभावविचारः। सहजे सहजाधीशे पड़ादित्रयगेपिवा ॥ सहजेपिविशेषेण भ्रातुः सौख्य न जायते ॥११॥ तीसरे भावका विचार है कि, तृतीय भावका स्वामी तीसरा हो अथवा छठेआदि ३ में हो तो भाईयोंका सुख नहोवै विशेपतः सह- जभावमें यह विचारहै सर्वदा ग्रंथोंमें जिस भावका सुख स्वामीअपने गृहमें रहता है उसकी वृद्धि करता लिखा है यहां श्लोकार्थ विरुद्ध प्रतीत होताहे परंतु ग्रंथकर्ताका आशय आप तथा विशेप शब्द:
भाषाटीकासमेतम्। (१४९) से है, कि बहुत सुख भाइयोंकान होवे क्योंकि भाईयोंको (दायाद) पितृधनलेनेवाले कहते हैं कैसाही भाइयोंमे मेल हो परंतु कभीन कभी शत्रुता कुछ प्रकारभी होतीही है ॥ ११ ॥ सहोत्थभावेशकुजौ सपापौ पापालये वा भवतो जनस्य ॥ उत्पाद्य सद्यो निहतः सहोत्थानितीरितं जातकतत्त्वविज्ञैः॥ १२॥ तृतीयभावेश तथा मंगल पाप युक्त हो पाप राशिमें हो तो मनुष्यके भाई जन्म पाकर मरते हैं इस प्रकार जातकोंके तत्व जाननेवाले कहते हैं ॥ १२॥ स्त्रीखेटःसहजाधीशः शुक्रो वाथ निशाकरः॥ तत्रगो भागिनीं दत्ते भ्रातरं पुरुप ग्रहः॥१३॥ तृतीयभावेश स्त्रीग्रह, शुक्र अथदा चंद्रमा तृतीयभावमें हो तो (भगिनी) बहिन होवे यदि तृतीयेश तृतीय पुरुषग्रह हो तो भाई होते हैं ॥ १३॥ अथ चतुर्थभावविचारः। सुखपतिः सुखगस्तननाथयुग जनयति प्रवरालय मंगिनाम् ॥ त्रिकगतो विपरीतमिहादिभिः सुख जनुः पतिरेव तथा बुधैः॥ १४॥ चतुर्थेश चतुर्थस्थानमें लग्नेशयुक्त हो तो शरीरियोंको बडे बडे घर मिलते हैं यदि त्रिक ६।८।१२ स्थानमें हो तो विपरीत फल करता है ऐसेही चतुर्थेश लग्नेशसभी पंडितोंने कहा है ॥१४॥ सुखाधीशे जीव सुखनिवहचिंता भृगुसुते विभूपा योपांग प्रवरतुरगाणामपि बुधे ॥अगो मंदे नीचो- (१५०) भावकुतूहलम् । द्भवसुखमतेरेवदिनपे पितुश्चंद्रे मातुः क्षितिनिकर चिंता क्षितिसुते ॥ १५॥ चतुर्थेश बृहस्पति हो तोबहुत सुखकोचिंता रहे चतुर्थेश शुक्र हो तो भूषण, स्त्री, स्त्री संभोग, श्रेष्ठ घोडा आदियोंकी चिंता होवे ऐसेही बुधसेभी होती है, शनि तथा राहु चतुर्थेश हो तो नीचजन संबंधी सुखकी चिंता होवैः सूर्य हो तो पितृपक्षकी, चंद्रमा हो तो मातृ पक्षकी और मंगल हो तो भूमिसमाजसंबंधी चिंता रहे. ऐसाही विचार प्रश्नमेंभी प्रष्टाके मनकी चिंतामें करना ॥ १५॥ त्रिकोणे वाहनाधीशे केंद्रे च वलसंयुते॥ निजोच्चादिपदे नूनं वाहनं नूतनं भवेत् ॥ १६ ॥ चतुर्थेश त्रिकोण ६९ में हो अथवा केंद्र १।४।७।१० में बलवान अपने उच्चादिपदमें हो तो निश्चय नवीन वाहन मिले ॥१६॥ - अथ पंचमभावविचारः। लग्नाधीशे कुजक्षेत्रे पुत्रभावपतावरौ॥ म्रियते प्रथमापत्यं ततोऽपि न सुतोद्गमः ॥१७॥ पंचमभावका विचार है कि लग्नेश मंगलकी राशिमें हो तथा पंचम भावका स्वामी छटा हो तो प्रथम संतान मरजावैः उपरांत पुत्रोत्पत्ति न होवै ॥ १७॥ पडादित्रयगे नीचे पुत्रेशे पापसंयुते ॥ काकवंध्यापतिस्तत्र केतुचंद्रसुतौ यदा ॥ १८॥ पंचमेश पापयुक्त होकर ६७८ भावमें नीचराशि वा नीचांश- कमें हो तो वह पुरुप काकवंध्याका पति होवे अर्थात् उसकी स्त्री- (काक वंध्या) केवल एकही संतान जननेवाली होवे परंतु उसभा- वमें अथवा पंचममें केतु तथा चंद्रभी हो तोभी यही फल होताहै १८॥
.
भापाटीकासमेतम्। (१५१)
तदीशो नीचगो यत्र पुत्रभावं न पश्यति ॥
तत्रैव बुधमंदौ वा काकवंध्यापतिर्भवेत् ॥ १९ ॥
पंचमेश नीचराशिमें हो पंचम भावको न देखे. अथवा पंचममें
बुध शानि हों तो मनुष्य ( काकवंध्या ) एक संतान जनने
वालीका पति होवे ।। १९॥
धर्माधीशोंगगो नीचे सुतेशो यदि जन्मनि ॥
केतुज्ञौ पंचमेस्यातां पुत्रं कष्टाद्रिनिर्दिशेत् ॥२०॥
जन्ममें नवमेश नीचराशिका,हो तथा पंचमेश नीचराशिमें हो
और बुध केतु पंचम भावमें हो तो पुत्र कटसे होवै कहना ॥२०॥
पंचमाधिपतिः केंद्रे त्रिकोणे वा शुभैर्युतः ॥
तदा पुत्रसुखं सद्यो विलोमेन विलंवतः॥ २१ ॥
पंचमेश केंद्रो वा त्रिकोणमें शुक्रग्रहोंसे युक्त वा दृष्टहो तो पुत्रका
सुख शीघ्र होताहै यदि (विलोम ) पंचमेश केंद्रकोणरहितस्थानोंमें
शुभग्रहयोग, दृष्टि रहित हो तो पुत्रसुख विलंबसे होताहै ।। २१ ॥
संतानभवनाधीशो जन्मलग्नाधिपस्तथा ॥
नरराशौ तदा पुत्रः स्त्रीराशौ कन्यका भवेत् ॥२२॥
पंचमेश तथा जन्मलग्नेश ( पुरुपराशि ) विपमराशिम हो
व उपलक्षणसे विपम नवांशोंमें हो तो पुत्र बहुत और (स्त्रीराशि)
समराशियोंमें हो तो कन्या बहुत होतीहैं मिश्रितमें कन्या सुनतु-
ल्य जानना ऐसे विचार प्रश्नमें भी है ॥२२॥
अथारिभावविचारः।
रोगेशो लनगो यस्य निधनस्थोपि जन्मनि ॥
व्रणोदयस्तु सर्वांगे स पापो न व्रणं दिशेत् ॥ २३ ॥
(१५२) भावकुतूहलम् । छठे भावका विचारहै कि, (रोग भाव) छठे स्थानका स्वामी जिसका लग्नमें हो अथवा अष्टम हो तो उसके सागमें (व्रण) तिल मसा, दाग, खोट, आदि चिह्न होवै. यदि वह ग्रह पाप युक्तभी हो तो सर्वांगमें व्रण न होवै ॥२३॥ एवं तातादिभावेशास्तत्तत्कारकसंयुताः ॥ व्रणाधिपयुताश्चापि षडादित्रय भावगाः॥२४॥ तेषामपि वणवाच्यं जातकज्ञैः सुकोविदैः । कारकस्य दशाकाले व्रणमागंतुकं दिशेत् ॥२५॥ इसी प्रकार पितृमातृआदि भावोंके स्वामी उन्हीं उन्हीं कार- कोंसे युक्त एवं (व्रणाधिप) पप्ठेशसे उक्त हो तथा ६७१८ भावोंमें हो तो उन पितृमात्रादियोंके अंगोंमें जातक जाननेवाले अच्छे चतु- रोंने विचारपूर्वक चातुर्यतासे व्रण कहने ये व्रण उसी कारक ग्रहके दशा समयमें होनेवाले कहने ॥२४॥२५॥ शिरोदेशे भानुर्मुखपरिसरे शीतगुरलंधरासूनुःकंठे जनयति बुधोनाभिनिकटे॥ गुरुर्नासामध्येपदनय नयोरेव भृगुजः शनी राहुः केतुर्वणमुदरभागे जनिमताम् ॥ २६॥ उक्तयोगकारक यद्वा पष्टेश सूर्य हो तो शिरमें चंद्रमा मुखमें मंगल (कंठ) गलेमें. बुध नाभीके समीप, बृहस्पति नाकके वीचमें शुक्र पैर तथा नेत्रोंमें शनि राहु केतु (उदर ) पेटमें मनुष्योंके अवश्य (व्रण) खोट आदि करते हैं ॥२६॥ लग्नेशो यदिभौमभे बुधयुतो रोगमुखेजन्मिनारो- गांगाधिपती यदा कुजबुधौचंद्रेण वाराहुणा। मंदेना
भापाटीकासमेतम् । (१५३)
पियुतौ प्रयच्छत इति प्रायोंगगो रात्रिपोयुक्तो वात
मसा सितं च शनिना कुष्ठं तदा श्यामलम् ॥ २७ ॥
यदि लगेश मंगलके राशिमें बुधसहित हो तो मनुष्योंके मुखमें
रोग रहे लग्नेश षष्ठेश बुध मंगल हों चंद्रमाअथवा राहु शनिसे युक्त
हों तो कुष्ठसमानरोग होता है विशेषतः चंद्रमा लग्नमें राहुसे युक्त हो
तो श्वेत कुष्ठ और शनि युक्त हो तो कृष्ण कुष्ट होवे ।। २७ ॥
अथ सप्तमभावविचारः।
विना स्वर्श कलत्रेशस्त्रिकस्थानगतो यदि ॥
रोगिणीं तरुणी दत्ते तथा तुंगपदं विना ॥ २८ ॥
सप्तमभावेश त्रिक ६८।१२ भावमें हो स्वगृही न हो तथा उच्च
राशि नवांशमें न हो तो स्त्री रोगिणी मिले ॥२८॥
जायास्थानगते शुक्रे कामी भवति मानवः ॥
पापभे पापसंयुक्ते कवी नारीसुखोज्झितः॥ २९॥
जिस मनुष्यका शुक्र सप्तम हो वह (कामी) अतिस्त्रीसंग चा-
हनेवाला होवे यदि शुक्र अथवा सप्तमेश पापराशिमें पाप संयुक्त
हो तो पुरुष स्त्रीके सुखसे रहित रहे ॥ २९ ॥
चतुर्थे महिलाधीशे लग्ने लग्नाधिपे यदा ॥
कलने वा कुटुंबे वा व्यभिचारी नरोभवेत् ॥ ३० ॥
सप्तमेश चतुर्थमें लग्नेश लग्नमें यदि हो अथवा सप्तममें वा
द्वितीय स्थानमें हो तो पुरुप (व्यभिचारों) यथेच्छ स्त्रियोंका गमन
करने वाला होवे ॥३०॥
यावंतो निधने खेटा निजस्वामिसमीक्षिताः।
तातोपि विवाहाः स्युः प्राणिनां कथितायुधैः॥३१॥
(१५४) भावकुतूहलम्। जितने ग्रह अष्टम स्थानमें अष्टमेशसे दृष्ट हों उतने विवाहमनु- प्योंके पंडितोंने कहे हैं ऐसा विचार सप्तम भावमेंभी होता है ।।३.१॥ जायाधीशे निजक्षेत्रे निजोच्चे कोणकंटके ॥ शुभग्रहैर्युते दृष्टे विवाहः सत्वरं भवेत् ॥३२॥ सप्तमेश अपनी राशिमें अथवा अपने उच्चमें त्रिकोण केंद्र भाव- में हो उसे शुभग्रह देखें या उनसे युक्त हो तो विवाह शीघ्र एवं बहुत होवें ॥३२॥ अथाष्टमभावविचारः। अष्टमाधिपतिः पापैर्युतोलग्नेश्वरोपि चेत् ॥ करोत्यल्पायुपं जातं शुभेक्षणविवर्जितः॥ ३३ ॥ अष्टम भावका विचार है कि अष्टमेश अथवा लगेश पाप युक्त हो उसे शुभग्रह न देखें तो मनुष्यको अल्पायु करता है ॥३३॥ तमः शनिभ्यां निधनाधिनाथः पापैर्युतो हीनवलो- स्तगो वा ॥ अल्पायुपं जातकमेव सद्य करोति नैवोच्चनिजक्षगश्चेत् ॥ ३४॥ अष्टम भावेश यदि राहु शनिसे युक्त अथवा पाप युक्त एवं बल हीन, अस्तंगत हो तो मनुप्यको (अल्पायु) थोडे दिन जीनेवाला करता है परंतु यदि अपने उच्च राशि वा स्वगृहमें न हो ॥३४॥ अष्टमस्थेरवो वह्वेश्चंद्रे तु जलयोगतः ॥ करवाला- कुज्ञेयं मरणं ज्वरतो बुधे ॥३५॥ गुरौ त्रिदोपतः शुक्रे क्षुधया तृपया शनी॥ चरस्थिरद्विस्वभावः प- रदेशे गृहे पथि ॥३६॥ अष्टम भावमें वा अष्टमेश सूर्य हो तो अग्निसे, चंद्रमा हो तो भापाटीकासमेतम्। (३६५) जलके संयोगसे मंगल हो तो (तलवार ) आदि शस्त्रसे बुध हो तो ज्वरसे बृहस्पति हो तो ( घिदोप ) वात पित्त कफ तीनों रोगोंसे शुक्र होतो (क्षुधा ) भूख, अथवा अन्नादिकीअरुचिसे शनि हो तो (वृषा) प्यास रोगसे मनुष्यकी मृत्यु होती है और उक्त मृत्यु कारक ग्रह चर राशिमें हों तो परदेशमें स्थिरमें हो तो घरमें द्विस्वभावमें हो तो मार्गमें मृत्यु होवै ॥३५॥३६॥ केंद्रे कोणेऽष्टमाधीशे तुंगादिपदगे तदा ॥ दीर्घायुरुदितं पूर्वैर्व्यत्यये हीनमंगिनाम् ॥ ३७॥ अष्टम भावका स्वामी केंद्र अथवा.कोणमें हो तथा उच्च स्वरा- शि आदि पदमें हो तो पूर्वाचार्योंने वह मनुष्य दीर्घायु कहा है इनसे ( व्यत्यय) विपरीत अर्थात् केंद्र कोणोंसे रहित स्थानों में तथा नीच शत्रु आदि राशियोंमें हो तो अल्पायु जानना ॥ ३७ ॥ अथ नवमभावः। लगादिन्दोनवमभवनं भाग्यमाय्यः प्रदिष्टं भाग्यं तस्मात्प्रथममसुतः संविचित्यं प्रयत्नात् ॥ युक्त दृष्टं जननसमये स्वामिना सौम्यखेटेज॑न्तोर्भाग्यं प्रसरति विधोरेव शौक्लीकलेव ॥ ३८॥ लग्नसे तथा चंद्रमासे नवमस्थान श्रेष्ठ आचार्योंने (भाग्य) ऐश्वर्य वा प्रारब्धका स्थान कहा है इससे ज्योतिपीने प्रथम अपने ( प्राण ) चित्तसे यत्नपूर्वक भाग्यका विचार करना भाग्यभाव नवमस्थानको कहते हैं यह जन्मसमयमें भावेश एवं शुभ ग्रहोंसे युक्त दृष्ट हो तो मनुष्यका भाग्य शुक पक्षको चंद्रमाकी कलाके समान प्रतिदिन (फैलता) बढता है ॥३८॥ सहोत्थ पुत्रांगगतो ग्रहश्चेद्भाग्यं प्रपश्यद्यदिवा स-
(१५६) भावकुतूहलम् ।
वीर्यः ॥ हिरण्यमाली खलुभाग्यशाली प्रसूतिकाल
यदि यस्य जंतोः॥ ३९॥
जिस मनुष्यके जन्ममें यदि ३।५।१ भाव स्थित ग्रह बलवान
हो तथा नैसर्गिक दृष्टि से नवम भावको देखे तो वह सुवर्णमाला पह-
रनेवाला धनवान तथा भाग्यवान् होवै ॥३९॥
निजोच्चभे पुण्यगृहे नभोगो बलियंदा तिष्ठतिज-
न्मकाले ॥ स पुण्यशाली नवरत्नमाली धराधि-
पो राजकुलप्रसूतः॥४०॥
अपने उच्च राशिका कोई ग्रह बलवान् नवमस्थानमें जन्म .
कालका जिसका हो वह पुण्यवान्, नव रत्नोंकी माला पहिरनेवाला
हो राजवंशमें उत्पन्न भया हो तो राजाही होवै ॥४०॥
जीवज्ञशुक्रा नवमे बलिष्ठा सुतेशदृष्टा यदि जन्म-
काले ॥ स पुण्यकर्त्ता नृपतेरमात्यो नृपालजातो
नरपालवयंः ॥४१॥
जिसके जन्म कालमें बृहस्पति बुध शुक्र नवमस्थानमें बलवान
हों उनपर पंचम भावेशकी दृष्टिभी हो तो वह मनुष्य पुण्य करने-
वाला, राजाका मंत्री होते, राजवंशीका यह योग हो तो श्रेष्ठ राजा
होवे ॥११॥
भाग्यभावाधिपो नीचे रविलुप्तकरे सति ॥
अरिंगेहगतो वापि भाग्यहीनो नरो भवेत् ॥ ४२ ॥
भाग्यभाव ९ का स्वामी नीच राशिमें हो तथा अस्तंगत
अथवा शत्रुराशिमें हो तो मनुष्य (भाग्यहीन ) कमबख्त दरिद्री
होताहे ॥४२॥
भाषाटीकासमेतम्। (१९७).
अथ दशमभावविचारः।
कर्मभावाधिपो नीचे षडादित्रयगोपि चेत् ॥
करोति कर्मवैकल्यं स्वोच्चस्वक्षपदं विना ।। ४३ ॥
दशम भावका विचार कहते हैं इसको कर्म, राज्य, तात आदि
संज्ञा पूर्व कहीहै इसका स्वामि नीच राशिका त्रिक स्थान ६।८।१२
में हो परंतु अपने उच्च एवं स्वराशिमें हो तो (कर्म वैकल्य) कार्यमें
विघ्न यद्वा कार्यहानि भाग्यहानि करताहै ॥ १३ ॥
कर्माधिपे केंद्रनवात्मजरूं बुधेज्यदृष्टे सबले नरा-
णाम् ॥ तुरंगमातंगनवांवराणि भवंति नानाधन-
। संयुतानि ॥४४॥
दशमेश केंद्र १।४।७।१० नवात्मज ९१५ स्थानमें हो बुध
बृहस्पति उसे देखे बलवान हो तो मनुष्योंको घोडे, हाथी नवीन
वस्त्रादि अनेक प्रकार धनोंसे संयुक्त रहे ।। ४४॥
कर्मठः केंद्रकोणस्थो ज्योतिष्टोमादियज्ञकृत् ॥
कूपायतनकर्ता च देवतातिथिपूजकः॥४५॥
दशमेश केंद्र कोणमें हो तो ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ करनेवाला
तथा (कूप) कुवा, बावड़ी, धर्मशाला, मठ मंदिर आदियोंका वना
नेवाला देवता एवं (अतिथि) अभ्यागताका पूजन करनेवाला
हो वै॥४५॥
लग्नादिन्दोर्दशमभवने जन्मकाले नराणामादि-
त्याद्यैः क्रमत उदिता जीविका खेचरेंद्रैः। ताता-
न्मातुर्निजरिपुकुलान्मित्रपक्षात्सहोत्थात्पत्न्याः पु-
त्रादपि बुधवरैर्जातक विशेपात् ॥ ४६॥
(१५८) भावकुतूहलम् ।
लग्नसे अथवा चंद्रमासे दशमस्थानमें जो ग्रह मनुष्यके जन्मका-
लमें हो उसके अनुसार कर्मसे वा संबंधसे (आजीविका) योगक्षेम
होता है दशममें कोई ग्रह न हो तो दशमेशसे कहना. सूर्य हो तो
पितासे वा पितावाले कर्मसे ऐसेही चंद्रमा हो तो मातासे मंगल
हो तो शत्रुकुलसे बुध होतो मित्रपक्षसे वृहस्पति हो तोभ्रातृपक्षसे
शुक्रहो तो स्त्रीसे शनि हो तो पुत्रसे कर्माजीवि पंडितोंने विशेपतः
जातक जाननेवालोंने कही है ॥४६॥
रविशीतकरांगकर्मगानां पतिवृत्त्याभिहिता नरस्य
वृत्तिः ॥ कनकोणतृणौपधैर्दिनेशे कृपिदाराम्बु-
समाश्रयाच चन्द्रे ॥४७॥
दूसरा प्रकार कहते हैं कि सूर्य तथा चंद्रमा अथवा लगराशिसे
दशमेश जो उग्र हो उसको (वृत्ति) आजीवनोपाय मनुष्यका होता
है जैसे सूर्य जीविकादाताहो तोसुवर्ण, ऊन, (तृण ) घास आदि
औषधि अन्नादिके संबंधसे, चंद्रमा हो तो (कृषि) खेतिके कर्म,
जलकर्म, स्त्रीके आश्रयसे आजीवन होता है ॥४॥
अथसाहसवह्निधातुशस्त्रैः क्षितिजे काव्यकलाकला
पतोशे ॥ लवणद्विजकांचनेभदेवमणिगोरौप्यचयैः
क्रमाच्च गुरूः ॥४८॥
इससे उपरांत फलहै कि मंगल कर्माजीविदेनेवाला हो ता साह-
सके कर्म, अग्निकर्म धातुसंबंधिकर्म, शस्त्रकर्मसे बुधहो तो
काव्योंके संबंधि कर्मसे (गुरु) वृहस्पति हा तो लवण व्यापारसे
ब्राह्मण, एवं सुवर्ण, हाथी, देवता संबंधि कर्मसे; शुक्र हो तामणि,
• चांदी गो समूहसंबंधी कृत्यसे जीविका मिले ऐसे जानना ॥४८॥
भापाटीकासमेतम् । (१८९) रविजे श्रमभारनीचतः स्यादिह कर्मेशभवांशना- थवृत्तिः ॥ हितवैरिनिजक्षतुंगसंस्थैर्हितवैरिस्वव- शाद्धनाप्तिरुच्चैः ॥ ४९ ॥ शनि हो तो (श्रम) कष्ट मेहनत भारढोना, (नोचकर्म) गुलामी आदिसे आजीविका होवै यह (कर्मेश) दशमेश जिस न- वांशकमें हो उसकाजोस्वामि है उसके उक्त आजीविका मनुष्यकी होती है वह ग्रह मित्रराशि अंशकमें हो तो मित्रपक्षसे शत्रुमें शत्रुसे स्वराशिमें अपने पराक्रमसे उच्चमें अकस्मात् बडे लोगोंसे धनप्रा- प्ति आजीविका होती है ॥४९॥ अथायभावविचारः। लाभेशो यदि केंद्रस्थो लाभाधिक्यं प्रजायते ॥ पडादित्रयगे नीचे लाभवाधा नृणां सदा ॥५०॥ अब ग्यारहवें भावका विचार कहते हैं, कि लाभेश यदि केंद्रमें हो तो मनुष्यको लाभ अधिक होता है यदि६।८।१२ भावमें यदा नीचराशिमें हो तो लाभकी बाधा करता है ॥५०॥ आदित्येन युतेक्षिते नृपकुलाल्लामालये चौरतो लाभो नित्यमथेंदुना गजजलप्रोद्भूतवामाजनैः ॥ भूपुत्रेण विचित्रयानमणिभूस्वर्णप्रवालादिभिर्जतो- चंद्रसुतेन शिल्पलिखनव्यापारयोगैरलम् ।। ५१ ॥ लाभेश सूर्यसे युक्त अथवा ग्यारहवें स्थानमें हो अथवा सूर्य इस भावको देखे तोराजकुलसे तथा चोर मनुष्यसे नित्य लाभ हो- वै उक्त प्रकारसे चंद्रमा हो तो हाथी, जलसंबंधी कृत्यसे तथा स्त्री जनोंसे, मंगल हो तो अनेक प्रकारके वाहन, (मणि ) रन भूपण ॥
(१६०)
भावकुतूहलम्।
भूमि, सुवर्ण, मूंगा आदिसे बुध होतो (शिल्प) कारीगरी, लिखना
व्यापार आदि कृत्योंसे मनुष्यको लाभ होता रहै ॥५१ ॥
जीवेनापि नरेशयज्ञगजभूज्ञानक्रियाभिः सितेनालं
वारवधूगमागमगुणव्याख्यानमुक्ताफलैः॥ मंदेनापि
गजबजव्यसनभूनीलेंद्रलोहव्रजैरित्थं तंत्रबहुग्रहैर
भिहितो नानार्थलाभो बुधैः ॥५२॥
उक्त प्रकारका वृहस्पति हो तो राजासे यज्ञ कृत्यसे हाथी एवं
भूमि संबंधि कृत्यसे ज्ञान संबंधि क्रियाओंसे लाभ होवै शुक्र हो तो
निश्चय (वारांगना) वेश्याओंके (गमागम) कुकर्मचारी आदिसे
तथा गुणोंके व्याख्यानसे, मोतियोंके व्यापारसे और शनि हो तो
हाथियोंके समूहकृत्य यद्वा (गोठ) गोपालकृत्य (व्यसन)
द्यूत आदि, भूमि कृत्य, नीलम, लोहा आदिसे होवै यदि बहुत ग्रह
लाभभावमें हों वा उसे देखें तो बहुत ही प्रकार धन मिले यह तंत्र
पूर्वपंडितोंने कहा है ॥५२॥
अथ व्ययभावः।
शुभग्रहाः प्रयच्छंति व्ययस्था विपुलं धनम् ।।
विपरीतं खला जंतोर्जन्मकाले विशेपतः ॥५३॥
वारहवें भावका विचारहै कि शुभग्रह इस स्थानमें बहुत धन
देतेहैं तथा मनुष्यको पापग्रह व्ययभावमें विपरीत फल जन्मका-
लके विशेपतासे करते हैं ।। ५३ ।।
क्षीणेंदुरत्यगो यस्य रविणा सहितो यदि ॥
तस्य वित्तं हरेद्राजा कुजेनापि युतेक्षितः ॥५४॥
इति भावकुतूहले भावाध्यायः पंचदशः॥१५॥
भापाटीकासमेतम्। (१६१)
जिसका क्षीण चंद्रमा व्ययभावमें यदि सूर्यसे युक्तभी हो तोउ-
सके धनको राजाहरलवे मंगलसे युक्त दृष्ट होने में भी यही फल है५४
इति भावकुतूहले माहीधरीभापायां भावफलाध्यायः ॥ १५ ॥
अथ दशानयनाध्यायः ।
रसा आशाशैला वसुविधुमिता भूपतिमिता नवे-
लाः शैलेला नगपरिमिता विंशतिमिताः ॥ रखाविं-
दावारे तमसि च गुरौ भानुतनये बुधे केतौ शुके
क्रमत उदिताः पाकशरदः ॥१॥
अब दशाविचार कहते हैं कि सूर्यके (६) चंद्रमाके (१०)
मंगलके (७) राहुके (१८) बृहस्पतिके (१६) शनिके (१९)
बुधके (१७) केतुके (७)शुक्रके (२०) वर्प नियतहैं दशाक्रमभी
इसी क्रमसे है ॥१॥
कृत्तिकादिस्त्रिरावृत्त्या दशा विंशोत्तरी मता ॥
अष्टोत्तरी न संग्राह्या मारकार्थं विचक्षणैः ॥ २ ॥
कृत्तिकासे तीन आवृत्ति गिननेसे नक्षत्र दशाधिपती मिलताहे
जैसे कृत्तिका जन्मनक्षत्रमें सूर्यको दशाप्रथम, रोहिणीमें चंद्रमाकी
इत्यादिापुनः दूसरी आवृत्ति उत्तरा फाल्गुनोसे, तीसरोंमें उत्तरापा-
ढसे गिनना यह विशोत्तरी (१२० वर्षके क्षेपककी) दशा कारक
मारक विचारमें मुख्य है जाननेवालोंने इसीसे मारक कारक फल
कहनाः अष्टोत्तरी आदि से नहीं ॥२॥
गतर्मनाडी निहतादशाब्दै भोगनाड्या विहता
फलं यत् ॥ वर्षादिकं भुक्तमिह प्रवीणैर्भाग्यं दशा
ब्दांतरितं निरुक्तम् ॥३॥
(१६२) भावकुतूहलम्। नक्षत्रकी पष्टिप्रमाण मुक्त घटीको जिसग्रहकी दशा प्रथम है उसके वोसे गुणाकर ६० से भागदेना अथवा नक्षत्रके भुक्त को दशा पतिके वाले गुणाकर नक्षत्रके सर्व भोगसे भाग देना लब्धिं वर्ष, मास, दिन, वटी, क्रमसे उस ग्रहके भुक्त दशाहोतीहै इसको ग्र- हके वोमें घटायके भोग्य दशा होती है. अन्य ग्रहोंके पूरे वर्प जो- डते जाना यह विंशोत्तरी उडुदशा होती है. उदाहरण है कि भरणी नक्षत्र भुक्त २४१२० भोग्य ३९।५ सर्व भोग्य ६३।२५ पष्टिप्रमाण भुक्त २३।१ भरणीमें प्रथम दशापति शुक्रके वर्प २० नक्षत्र भुक्त २४१२० को दशा प्रमाण २० से गुनाकिया पलात्मक २९२०० हुआ इसमें सर्व भोग्य ६३।२५ पलात्मक३८०५ से भाग लिया तो लाभ (७) वर्प हुये शेप २५६५ को १२ से गुणा किया३०७८० इसे पुनः ३८०५ का भाग लेनेसे लाभ (८) महींना मिले शेप ३४० को ३० से गुणाकिया१०२०० इसमेंभी उसीहारसे भागलि- या तो लब्धि दिन (२) मिले शेप २५९० को ६० से गुनाकर १५५४०० इसमें भागलेनेसे लाभ (४०) घटी मिली यह भुक्त द- शा शुक्रकी हुई इसको शुक्रके वर्प२० में घटाया तो शेप १२ वर्प३ महीने २७ दिन४० घटी शुक्रकी भोग्य दशा रही इसमें सूर्यके वर्ष ६जोडनेसे १८।३।२७।४० वर्षादि सूर्य दशा होती है ऐसेही सभी ग्रहोंके वादि जानने ॥३॥ दशा दशाहता कार्या विहृता परमायुपा॥ अंतर्दशाक्रमादेवं विदशाप्यनुपाततः ॥४॥ अब अंतर्दशाकी विधि कहतेहैं कि दशा वादि दशसे गुणाकर परमायु १२० से भागलेकर पूर्वोक्तरीतिसे वादि ४ अंकलेने वह वादिग्रहकी अंतर्दशा होती है एकग्रहकी दशामें इसी प्रकार भापाटीकासमेतम् । (१६३) प्रत्येक ग्रहोंकी अंतर्दशा लेनी. ऐसेही अनुपातक्रमसे विदशायें भी होती हैं ॥४॥ अथ दशाफलानि । (तत्रादौ मूर्यस्य) उद्वेगिता हृदि तता परितो लतावद्दायादवाद उत वित्तवियोगयोगाः॥ चिंता भयं नरपतेरपि पाक- काले रोगागमो भवति भानुदशाप्रवेशे॥५॥ -सूर्यकी दशाप्रवेशमें मनुष्यके हृदयमें चारों तर्फसे वृक्षपर लता जैसी फैलीहुई (उद्वेगता) अनवस्थिती रहे. भाई, विरादरीमें कलह होवे धनहानि मिले चिंतारहै राजासे भय होवै तथा दशाप्र- वेशमें रोगभी होता है ॥५॥ अथ चंद्रस्य फलानि। सदापाके राकेशितुरधिकृतिर्भूपतिकृता सतां संगो रंगोत्सवसवकृतिप्रीतिरतुला ॥ अलंकारागारी रिपुकुलमलंगारजसुखकलावत्यारत्या गमइभरथा रामरमणम् ॥६॥ चंद्रमाकी दशामें सर्वदा राजासे अधिकार मिलेसजनोंकी संगति नाचरंग आदि उत्सव, (नाट्य ) नाटक, नट खेल आदियोंका वडा आल्हाद मिले भूपण वस्त्र आदि अलंकारोंका घर होवै शकुलके क्षय होनेसे सुख होवै पोडशवपकी सुरूपा स्त्रीके साथ रतिक्रीडा मिले हाथीरथ आदि वाहन मिलें बाग आदियोंमें रमित रहे ॥६॥ अथ भौमस्य फलानि। अनलगरलभीतिः शस्त्रघातो नराणामरिगणनृप चौरव्यालशंकाकूलत्वम् ॥ क्षितिसतपरिपाके कामि नौपुत्रकष्टं भवति वमनमाधिया॑धिरर्थक्षतिचा (१६४) भावकुतूहलम् । मंगलको दशामें मनुष्योंको अग्नि, विपका भय शस्त्रसे घाव होवेंशत्रुजन तथा चोर, राजा सर्पसे भय होनेकी शंका एवं व्या- कुलता होवै स्त्रीपुत्रोंको कष्ट मिले (वमन ) वांतिका रोग होवै मानसी चिंता, पीडा, रोग और धनहानिभी होवै ॥७॥ अथ राहोः फलानि। राकेशारातिपाके नृपकुलवशतो द्रव्यनाशो विनाशो मानस्यातीव रोगागमनमपि तृणां तात- कष्टं विशेपात् ॥ कांतापत्याकुललं हितजनखल- तारातिरायाति समव्यामोहागारमंतः परित . उततता तुंगता तंकता वा ॥८॥ राहुकी दशामें राजकुलके वशसे धनकानाश मानका विनाश होवैबहुतरोग उत्पन्न होवें तथा मनुष्यों को विशेषतः पितृकष्ट मिले स्त्रीपुत्रोंके ओरसेव्याकुलता रहे मित्रजनोंके साथ दुष्टता होवै. शत्रु चढकर मकानहीपर आजावें, चित्तमें चारों ओरसे अज्ञानता आवै अकिल मारी जावै चिंता बहुत फैले अथवा बडेबडे कप्टहोवें ॥८॥ अथ गुरुदशाफलम् । गुर्वी गुर्वी समायात्यवनिपतिकुलान्नायकवं ज- नानां कांतादंतावलापागम इह कमलालंकृता वासशाला ॥ मैत्री संद्भिर्महद्भिगुरुजनगरिमाका- लिमारातिकास्ये हृद्या विद्यानवद्या भवति च वच- सामीशितुः पाककाले ॥९॥ बृहस्पतिको दशामें ( गुरुता ) येष्टता मिलतीहै. राजकुलसे अधिकारिता (प्रधानता) होती है. तथा मनुप्योंको रमणीय स्त्री भापाटीकासमेतम् । (१६५) मिलतीहै. सवारीको हाथी मिलते हैं रहनेका बहुत बड़ा घर धना- दिशोभासे भूपित रहताहै सजनोंसे तथा बडेलोगोंसे मित्रता गुरु- जनोंसे (गौरवता) मान मिलता है. शत्रुके मुख काले होते हैं रमा णीय एवं अनर्गल विद्या होती है ॥९॥ अथ शनिदशाफलम् । मिथ्यावादेन तापोरिनरजनकृतातंकता रंकता वा कृत्या गुप्ता प्रतप्ता मतिरपि कुजनैरर्थनाशो जनाना म्॥ कांतापत्यादिरोगो जनककनकगोवाजिदंता- वलानां विच्छेदो मित्रभेदो दिनपसुतदशायाम- नर्थो विशेषात् ॥१०॥ शनिकी दशामें मनुष्योंको झूठेकलंक लगनेसे संताप, शत्रुज- नके किये उपद्रवसे केश होता है. अथवा (फकीरी) भीख माग- नी होती है.गुप्तकृत्या जादूगरीसेभी संतप्तता रहै दुष्टजनसंगति होवै बुद्धिभी दुष्ट हो जावे. धननाश होवै. स्त्री पुत्रादियोंको रोग होवै. पिता, सुवर्ण, गो, घोडे, हाथियोंका (वियोग) नाश हो मित्रोंसे शत्रुता होवै. विशेष कके इस दशामें अनर्थ होते हैं।॥१०॥ अथ बुधदशाफलम् । दिव्याहार विहारयानजनतापत्यार्थमानांबरश्रेणी- ग्रामनवालयेदुवदनालाभं विशेषादिह ॥ सद्भिः संग मनं गमंगमतुलं प्रोत्तुंगमातंगजं सौख्यं संतनुते दशासुतयशोवृद्धिं च सिद्धिविदः ॥११॥ बुधकी दशामें मनुष्योंको (दिव्य ) उत्तम (आहार ) भोजन, विहार, सवारी मनुष्य संगम, यद्वा मनुष्यता, संतान, धन, मान, (१६६) भावकुतूहलम्। वस्त्र, ग्राम, भूमि, नवीन मकान, (चंद्रमुखी) सुरूपा स्त्री इतने वस्तुओंका विशेपतः लाभ होता है. सज्जनोंका संग कामदेवकी वृद्धि, ऊंचे हाथीकी सवारीका सुख मिलता है. संतानवृद्धि, यशकी वृद्धि, सबकार्यमें सिद्धि और होती है ॥ १० ॥ अथ केतुदशाफलम् । मनस्तापं तापं निजजनविवादं खलकृतं सदाचं- द्रारातरुदरभवरोगं वितनुते ॥.दशा पुंसामारादनु- गतिमपायं निजमतेः कृशवं वित्तानामवनिपति- कोपेन परितः ॥ १२॥ केतुकी दशामें मनुष्योंको मनमें संताप, ज्वर, अपने मनुष्योंमें (विवाद) कलह होवे. दुष्टजनोंसे मुकाबला होवे. केतु अपनी दशामें पेटमें रोग उत्पन्न करताहै. शीग्रही शीघ्रगमन, भ्रमण होते रहैं अपनी ही बुद्धिसे धनादियोंका नाश होवे. शरीरमें कृशता आवै सर्वप्रकार राजाके कोपसे धनका क्षय होवे ॥ १२ ॥ अथ शुक्रदशाफलम् । तुल्यत्वं धरणीधवेन महता मित्राज्जयो न्मिना- मारोल्लासविकास एव कमलालावण्ययुक्तंगृहम् ॥ दिव्यारामसुधामसामवहुला व्याख्यानगानध्वनिः प्रज्ञासौख्यमतीव पाकसमयेशालाविशालाकवेः१३॥ शुक्रकी दशामें मनुष्योंको बड़े राजाकी तुल्यता मिलती है मित्रसे (जय) जीत, भलाई होती है. कामक्रीडाका उत्सव विलास हासमें आनंद होता है घरमें लक्ष्मी, कोमल स्त्रीका वास होवै उत्तम बाग बगीचा, उत्तममकानआदि बहुत होते हैं शास्त्रोंका व्या भाषाटीकासमेतम्। (१६७) ख्यान, गायनका शब्द, बुद्धिकी कुशलता आदियोंका बहुत सुख होता है. तथा बडे बडे घर बनते हैं ॥१३॥ अथ उच्चगतग्रहदशाफलम् । निजोच्चगामिनो यदा तदातता यशोलता नवांवरा- दिभूषणैः सुखं वरांगनागमः॥ उपेंद्रतुल्यता गजें- द्रवाजिराजिकारथो वृपाश्च वैरिणः कृशा वशा दशा यदा भवेत् ॥१४॥ जो ग्रह जन्ममें उच्चका हो उसकी दशा जव हो तब मनुष्योंको यशकी लता बहुत फैलती है नवीन वस्त्र, भूपण आदियोंका सुख मिलता है. श्रेष्ठअंगवाली स्त्री घरमें आती है. ( उपेंद्र ) श्रीकृष्ण यद्वा चक्रवर्तिराजाके समान पराक्रमी एवं ऐश्वर्यवान् होता है. श्रेष्ठ हाथी, घोडे, रथ, बैल आदि मिलते हैं शत्रु घटते हैं ।।१४।। अथ स्वक्षेत्रगतदशाफलम् । दशा निजागारगतस्य यस्य नवांवरागारविहार- सौख्यम् ॥ नवीनयोषा बहुभूमिभूषायशो विशेषा- दरिवर्गहानिः ॥ १५॥ जो ग्रह अपनी राशिका हो उसकी दशामें नवीनवस्त्र नवीनघर विहार आदियोंका सौख्य होवै. नवीनस्त्री मिले, बहुत भूमि बहुत भूपण मिलते हैं शत्रुपक्षकी हानि होतीहै ॥ १२ ॥ अथ मित्रक्षेत्रगतग्रहदशाफलम् । कलत्रपुत्रैरपिमित्रपुत्रैरतीव सौख्यं हितराशिगस्य॥ दशाविपाके वसनं नृपालाद्विशेपतो मानविवर्द्धन स्यात् ॥ १६॥ .
(१६८)
भावकुतूहलम् ।
जो ग्रह अपने मित्रकी राशिमें हो उसकी दशामें स्त्री, पुत्रोंसे
तथा मित्र,एवं उनके पुत्रोंसे अतीव सुख मिले. तथा राजासे वस्त्र,
खिलत मिले विशेपतः मानकी वृद्धि होवै ॥ १६॥
रिपुराशिस्थग्रहदशाफलम् ।
मनोजवेगोरिपुवर्गभीतिः कृशत्वमर्थक्षतिराप्तिवाधा।
दशा यदारातिगृहस्थितस्य तदा नरस्य प्रकृति-
श्चला स्यात् ॥ १७॥
जो ग्रह शत्रुराशिमें हो उसको दशामें मनुष्यको कामदेवकावडा
वेग रहता है शत्रुपक्षसे भय, शरीरमें कृशताधनकी हानि, आमदमें
विघ्न वा विलंब होता है स्वभावभी चलायमान होजाताहै बुद्धि
ठिकाने नहीं रहती ॥ १७॥
अथ रोगेशदशाफलम्।
रोगाधीशदशा वला जनकलिं रोगागमं जन्मिना
माधिव्याधिमरिव्रजव्रणगणातकं कलंकं खलात् ॥
भानध्वंसमतिक्षयं कलयति ज्ञानार्थनाशं तथा
चित्तव्याकुलता च पापवशतो धातुक्षयं प्रायशः।।१९
(रागेश) पप्ठेशकी दशामें यदि निर्वल वह ग्रह हो तो मनुष्योंके
साथ कलह, रोगकी उत्पत्ति मानसीचिंता, रोग, शत्रुसमूहकी वृद्धि
मनुप्योंको होते हैं (व्रण) फोडे आदियोंसे केश, दुष्टजनोंसे(कलंक)
झूठा अपवाद मिलता है मानका विध्वंस होता है. बुद्धिमारी जाती
है ज्ञानका व धनका नाश होताहे. चित्तमें व्याकुलता रहती है.पाप
मले पापके वशसे उक्त फल मिले विशेपतः धातुक्षय होवे ॥१८॥
भापाटीकासमेतम्। (१६९) अष्टमेशदशाफलम् । निधनभावपतेरवनीपतेरतिभयं गदजालभयंदशा।। कलयति स्वजनस्य विनाशनं निधनतामपि वा भविनामिह ॥ १९॥ अष्टमेशको दशामें जन्मिको राजासे बडा भय, रोगोंका भय, होतीहै अपने मनुष्योंकानाश और मृत्युकाभयभी होता है।॥१९॥ व्ययेशदशाफलम्। वित्तक्षतिरवनीशादाधिव्याधिय॑येशपरिपाके ॥ कष्टं मृत्युसमानं भवति कुयानं कुसंगसंयोगः॥२०॥ व्ययेशको दशामें राजासे धनका क्षय होता है. मानसी चिंता, रोग होते हैं.मृत्युके समान कष्ट मिलताहै.भैसा,गदहा आदि निषिद्ध सवारी मिलती हैं कुसंगियोको संगति होती है ॥२०॥ सप्तमेशदशाफलम् । जायापतिपरिपाके रोगज्वाला हृदि स्थिता भवति॥ रिपुजनजनिताबाधा वित्तविनाशो नरेशभीतिश्च॥२१ सप्तमेशके दशामें रोगकी ज्वाला हृदयमें स्थिर रहती है. शत्रुसे उत्पन्न (बाधा) दुःख रहताहै.धनका नाश राजाका भय होता है२१ अस्तंगतग्रहदशाफलम्। दशाधीशेवास्तंगतवति विरोधो बलवता सदारोगा गारं हृदयकुहरे वाथ जठरे ॥ अरेराधिव्याधिव्य- सनमुतमानक्षतिरथो विरामो वित्तानामवनिपति- कोपेन भविनाम् ॥२२॥ दशापति ग्रह अस्तंगत हो तो अपनेसे बलवान् मनुष्यके साथ (१७०) भावकुतूहलम् । विरोध होवे सर्व रोगका मकानही मनुष्यके हृदयमें यद्वा पेटमें बनारहे शत्रुसे चिंता होवै रोग, व्यसन और-मानक्षय होवै. धनसे अलग (निर्द्धन ) राजाके कोपसे रहे ॥ २२ ॥ दशाप्रवेशे सवलः शशांको दशाफलं शस्तमतीव जंतोः॥ अतोऽन्यथा चेद्विपरीतमाय्यरुदीरितं चंद्र- वलानुमानात् ॥२३॥ दशाके प्रवेश समयमें तत्काल लग्नसे चंद्रमा बलवान् हो तो जीवको उस दशाका फल अति शुभहोताहै.निर्बल होनेमें विपरीत फल श्रेष्ठ आचार्योंने कहाहै.ग्रहके उक्त फलके अतिरिक्त चंद्रमा- के बलानुसार फल होताहै ॥२३॥ वलवंतो दशाधीशा दिशंति सकलं फलम् ॥ निर्वला नैव कुर्वति मध्यं मध्यवला नृणाम् ॥२४॥ जो ग्रह बलवान हैं वे अपनी दशामें अपना उक्त फल पूर्ण देतेहैं निर्वलग्रह पूराफल नहीं देते जो मध्यवली है वे फलभी मध्यम ही करते हैं ॥२४॥ लग्नेशस्य दशाफलं बहुधनं वित्तशितुः पंचतां कष्टं वेति संहोदरालयपतेः पापं फलं प्रायशः।। तुर्यस्वा- मिन आलयं किल सुताधीशस्य विद्यासुखं रोगा गारपतेररातिजभयं जायापतेःशोकताम् ॥ २५॥ लग्नेशकी दशामें बहुत धन होना फलहै. द्वितीयेशको दशामें मृत्यु अथवा कष्ट तृतीयेशकी दशामें बहुधा पाप फल होता है. चतुर्थेशकी दशामें गृहसुख पंचमेशकी दशामें विद्याका सुख, पप्ठे शकेमें शष्ट भय, सप्तमेशकेमें शोक होताहै ॥२५॥ मृत्यु मृत्युपतेः करोति नियतं धर्मेशितुः सुक्रियां भाषाटीकासमेतम्। (१७१) चित्तं राज्यपतेर्नृपाश्रयमथो लाभ हि लाभेशितुः ॥ रोगं द्रव्यविनाशनं च बहुधा कष्टं व्ययेशस्य वै पूर्व रंगभृतामुदीरितमिदं तन्वादिभावेशजम् ॥ २६ ॥ अष्टमेशकी दशामें मृत्यु निश्चय करताहै. नवमेशकी दशामें पुण्यादि कृत्य, दशमेशकी दशामें धन एवं राजाका आश्रय मिल- ताहै, लाभे शकीमें लाभ, व्ययेशकीमें रोग, धननाश, बहुतसे कष्ट होते हैं इस प्रकार साधारणफल पूर्वाचायौंने लग्नेशआदियोंके शरीर धारियोंको कहे हैं ॥२६॥ भवाधिपो वलयुतो निजगेहगामी तुंगत्रिकोणशुभ- वर्गगतोपि पूर्णजितोः फलं किल करोति यदारिनी- चस्थानस्थितोऽशुभफलं विवलो विशेषात् ॥२७॥ इति भावकुतूहले दशाफलाध्यायः षोडशः ॥ १६॥ जिस भावका स्वामी(बलवान् ) अपनी राशि अपने उच्च मूल- त्रिकोण, शुभग्रहोंके अंशादिवर्गआदिमें होनेसे पूर्ण बलीहो वह दुशोक्त पूर्ण फल निश्चय देता है. यदि शत्रगृह नीचराशि, आदिमें होनेसे निर्वलहो वह विशेषतः अशुभफल देताहै ।। २७ ॥ इति भावकुतूहले माहीधरीक्षापायां दशाविपाकाऽध्यायःपोडशः ॥१६॥ अथ ग्रहाणां गर्वितादिभावाध्यायः। कोणे तुंगगृहे गतो निगदितः खेटस्तदा गर्वितो मित्ररूं गुरुसंयुतोपि मुदितो मित्रेण युक्तेक्षितः॥ पुत्रस्थानगतोऽगुभौमरविजाः संयुतो लज्जितः पापारिग्रहवीक्षितो हिरविणासंक्षोभित कीर्तितः॥१॥ अब ग्रहोंकी गर्वितादिदशा कहते हैं कि, जो ग्रह अपने उच्च वा (१७४) भावकुतूहलम् । तिक्षयम् ॥ सुतगदागमनं गमनं वृथा क.ि . भिरुचिं न रुचिं शुभे ॥८॥ लज्जितग्रहको दशा विवशतासे रतिक्रीडाका (विराम) बुद्धिका क्षय, पुत्रको रोग, व्यर्थसफर, कलहसंबंधी वार्ता में और शुभकृत्यमें अरुचि करती है ॥ ८॥ क्षोभितग्रहदशाफलम्। संक्षोभितस्यापि दशाविशेपादरिद्रजातंकमती: वकष्टम् ॥ करोति वित्तक्षयमंघ्रिवाधां धनाप्तिवा- धामवनशिकोपात् ॥९॥ क्षोभित ग्रहकी दशा विशेपतः दरिद्रताका क्लेश करती है त अतिकष्ट, धनक्षय, पैरोंमें पीडा. धनके आमदमें बाधा करती है ॥९॥ क्षुधितग्रहदशाफलम् । क्षुधितग्रहदशायां शोकमोहादितापः परिजनपरि तापादाधिभीत्या कृशत्वम् ॥ कलिरपि रिपुलोकै रर्थवाधा नराणामखिलवलनिरोधो बुद्धिरोधा. विशेपात् ॥१०॥ क्षुधित ग्रहके दशामें शोक, (मोह ) अज्ञानादिसंताप होते शत्रुजनोंसे संताप मिलता है मानती व्यथाके भयसे शरीर होता है शत्रुजनोंसे कलह होता है तथा मनुष्योंको धनकी 5 समस्त बलका (निरोध) रुकावट, बुद्धिका रोगभी विशेषतः होता हैं ॥१०॥ तृपितग्रहदशाफलम्। तृपितखगदशायामंगिनामंगमध्ये भवति गदवि- भाषाटीकासमेतम् । (१७) कारो इष्टकाधिकारः॥ निजजनपरिवादादर्थ- हानिः कृशत्वं खलकृतपरितापीमानहानिःसदैव११ तृषितग्रहकी दशामें शरीरियोंके शरीरके बीच में रोगका विकार होवे इष्टकायंका अधिकार मिले अपने मनुष्योंसे विवाद होने जिसमें धनहानिभी रहे अंग माडे हो जायें दुष्टजनके कृत्यसे संतापयुक्त रहे सर्वदा मानहानि होवै ॥ ११॥ आसीच्छ्रीकरुणाकरो बुधवरो वेदांगवेगकरस्त- त्सूनुः क्षितिपालवंदितपदःश्रीशंभुनाथः कृती ॥ वि- ज्ञवातकृतादरो गणितविज्जोतिर्विदां प्रीतये चक्र भावकुतूहलं लघुतरं श्रीजीवनाथः सुधीः ॥ १२ ॥ इति श्रीमन्मथिलशंभुनाथगणकात्मजजीव- नाथविरचिते भावकुतूहले गर्वितादि- दशफलाध्यायःसप्तदशः ।। १७॥ पहिले मैथिलदेशमें श्रीकरुणाकरनाम पंडितश्रेष्ट वेदवेदांगका जाननेवालोंमें श्रेष्ठ यद्वा (खान) उक्त विद्याओंको प्रगट करने वाली भूमिका भया इनका पुत्र पंडित शंभुनाथ भया जिसके चर- णोंकी वंदना राजालोग करतेथे तथा विद्वानोंके समूहसे आदरणीय एवं गणितविद्या जाननेवाला रहा इनका पुत्र श्रीजीवनाथ नामा पंडित ज्योतिर्विजनोंके प्रसन्नताके लिये छोटासा ग्रंथ भावकुतू- हल (जिसमें पाठ स्वल्प प्रयोजन बहुत है ) बनाया ॥ १२॥ इति महीधरहतायांभावकुतूहलनापाटीकायां ग्रहाणां गर्विता दिदशाफल कथनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ नवाधिनवभूमिविक्रमदिवामणेर्वत्सरो महीधरध- सिरष्टिहरिसंज्ञके पत्तने॥विवर्णमिहभापया फलि- (१७६) भावकुतूहलम् । तभावकौतूहलेऽकरोच्छिशुमनो मुदे चपलतांक्षम- ध्वंबुधाः॥ १॥ जातकेपुवृहदाख्यजातकस्ताजिके पुखलु नीलकंठिकाणहौरिकेफलविधौशिरोमणी तौ मया प्रकटितौ विवर्णितौ ॥२॥ लक्षणैरसमस्तोपि ग्रहवस्थाविधानतः ॥ सामुद्रिकविचारैश्च विशेपोत्र प्रदृश्यते॥३॥अतोमया प्रकटितं भापया लोकया भुवि ॥वेणीमाधवसंतुष्टयैग्रंथोभूयात्समर्पितः ॥४॥ भापाकारका समर्पण है कि विक्रमार्क संवत् १९४९ में महीधर शर्माब्राह्मणने राजधानी ठीहरी नगर (जिला गढवाल ) मे पाठक बालकोंके मन प्रसन्नताके हेतु इस फलितग्रंथ भावकुतूहलका विव रण भाषामें किया इस भापामें जो कुछ गलती हो उसे विद्वान् लोग क्षमा करें ॥१॥ जातकों (जन्मफलों) में बृहज्जातक ताजिकों (वर्षफलों) में प्रश्नसहित नीलकंठी ज्योतिपके फलप्रकरणमें शि रोमणो है इनको मैंने भापाटीका करके लोकोपकारार्थ प्रकट कर दिया कि जिनसे अन्य ग्रंथोंमें श्रम करनेकी आवश्यकता नहींथी॥ यह ग्रंथतो जातकलक्षणोंसे संपन्न नहीं परंच इसमें ग्रहोंकी अवस्था ओंके तथा सामुद्रिक लक्षणोंके विचार विशेप होनेसे इसकी विशेपता देखनेमें आई ॥३॥ इससे मैंने इसको देशभापामें टीका करके संसारमें प्रकट किया यह ग्रंथ मेरासमर्पित वेणी माधवकी प्रसन्नताके अर्थ होवै ॥४॥ शुभम् ।। पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना, खेतवाडी-में --