Banasthali University

शंकर विजय

शर्मा, रामस्वरूप · 2009/04

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श्रीशङ्कराय नमः * N शालेज लेका शङ्कर-विजय ६६८९ (भगवान् शङ्कराचार्यकी मर्त्यलीला) (धर्ममूलक नाटक) - साक्षात्-व्यासो नारायणो हरिः जिसको स्वर्गीय-सनातनधर्मपताका सम्पादक- ( ऋषिकुमार ) ० रामस्वरूप शर्मा द्वारा सङ्कलित और रामचन्द्रशर्मा ने सनातनधर्म प्रेस सुदूरादारोदमें छाप कर प्रकाशित किया मूल्य १) रुपया सम्वत् १९८४

वनस्थली विद्यापीठ वनस्थली (जयपुर)
तारीख.......
पुस्तकालय
वृद्धि सं....
ना.२१.
त
संकेत ....
संकेत
सूचीपन्न सं.....
11
चीपन सं..3....
स.४८-४०
खिजीमन्न सं........
........

म - - UTAM Pr भूमिका यह शंकर-दिप धर्मपू नक नाटत है, अतः इस धर्मस्तक भी कह सकते हैं, धर्मविषय में सम्प्रदायभेद सदासे चली है, इस कारण इसके साथ सव सम्पदायबालों की पूरी २ सहा- नुभूति नहीं होगी, इस बानको जानते हैं । तपापि हम हिन्दू शास्त्र के दास हैं, अथवा योगसिद्ध विजोलज्ञ महात्मा पुरुपोंके वाश्य पर भटन विश्वास रखना ही हमारा धर्म है, इसके प्रति- कूज अपना मतामन प्रज्ञाश करनेको हार अनुचित समझते हैं । इस पुस्तकमें ऐप्ती कितनी ही घटना हैं कि-जिनपर आज कलके भनेको नवशिक्षितोंका तो कभी विश्वास हो ही नहीं न्यता, कदाचित् नइ उलटा उपहास करेंगे । परन्तु यहाँ शर्तव्य के अनुरोरसे कहना पड़ता है कि-यह पुस्तक ऐसे पाठकों के लिये नहीं लिखागया है, किन्तु जो वास्तविक हिंदू हैं, जिनके रोग २ में विश्वांस भराहुपा है; उनके समीप हमारा सविनय निवेदन है कि दइ ज्ञानमार्गशी चरम सीमाको पहुँचे हुए वेदान्त. सिद-अनवादी-साधक चूड़ामणि भगवान् शंकराचार्यजीके इस संक्षिप्त जीवन चरितको जरा भक्तिके साथ पहुँ । अधिक क्या कहैं-जा घोर नास्तिकता और चौद्ध आदि वेददिशेधी धर्मों से मनानन दकधर्म की रक्षा करने के लिये साक्षात् त्रिशूलधारी भराचार्य रूपसे मृत्युलोक में अदनीर्ण हुए थे, जिन अगा सापक ईश्वरीय यलने एक दिन धर्महीन अधोगतभारत नया जला दिया था। जिनके अलौकिक संन्यास अखण्ड- नाय युक्ति-सारभरे उपदेश और अद्भुत दिन मुदूर हिमालयसे कन्याकुमारी पर्यन्त सकल धर्मगण्डल में हालाहल मचगया था, जिनके अनन्त बुद्धिकी शक्तिमय मस्तिष्कसे सैंकड़ो. धर्मग्रंथ निकल कर शाब भी हिन्दूपनकी रक्षा कार्यकलापोंसे एक (२) * भूमिका . करते हुए जगत् भरमें हिन्दुओं के मुखको उज्ज्वल कर रहे हैं, ऐसे महापुरुष के जीवन चरितकी शालोचना करने के लिये किसा विश्वासी हिन्दू की वासना बलवती नहीं होगी ? । इस कारण मनमें साइत हाता है कि-पुस्तक रचना भाँडी होने पर पाठक विरक्त नहीं होंगे। महात्माओंके चरितकी आलोचना करने में औरोंको तो क्या-परन्तु लेखकको भी बड़ा सुख मिलता है, ऐसे विश्वास से ही भाज इस पश्चिमी शिक्षाके अभिमानी हिन्दू- समाज के सामने ऐसे गम्भीर भाव भरे अतिकठिन विषयमें हस्त- क्षेप करने का साहस किया है । इस जगत् में यशका मिलना देवा- धीन है, अतः यशकी ओर ध्यान देकर किसी श्रेष्ठ विषयकी आलोचनासे हाथ खेचलेना युक्तियुक्त नहीं है। इस पुस्तककी ऐतिहासिक भित्ति नवीन शिक्षाको दृष्टिले पड़ी अशक्त है अथवा यह कहना ही था है,क्योंकि-ऐसे महान् जीवना के सव स्थलों में सामनन बनाये रखना मजुन्यकी शक्ति के बाहर है। सदानन्द-आनंदगिरि-और विद्यारएग ( माधवाचार्य ) इन तीनोंने, श्रीशंकराचार्यजी के जीवन चरित्ररूप तीन ग्रन्थ लिखे हैं, इनमें आनंदगिरिका गद्यरूप ग्रन्थ बहुत बड़ा है और उसके देखने का इमको अवसर भी नहीं मिला, शेष दो पुस्तक देखने में आये इन दोनोंके लेखों में भी परहार बहुन भेद है, यहाँ तक कि श्री. शंकराचार्यजीका जप निवासस्थान और माता पिताका नाम भी जुम्मा २ ही लिखा है, जो कुछ है, परन्तु ऐसी बातों में मत भेद होनेपर भी उनके जीवनकी सारभूत प्रधान २ आवश्यकीय वाते दोनों पुस्तकों में समान भावसे वर्णित हैं, इन ही दोनों पुस्तकों के माधार तथा ५० पा० किर्लोस्कर की रचनाका सहारा लेकर इस पुस्तकको यथा शक्ति पाठकोंका रुचिकर बनाया है । यद्यपि नाटकमें गद्य और पद्य दोनों का ही होना है है भूमिका उदित है, तश श्रीशंकराचार्यजीसे अलौकिक व्यक्तियोंके सुख से हिन्दी में तानटपले गवाना मखमलमें टाकी साँटकी समान कदापि पाठकों को रुचिकर नहीं दोससना, अतएव पोंके सपा- वेशकी इच्छा होने पर भी इस विषयको यथोचित पूर्तिसे पुस्तक । चाञ्चित हो रही है, हरें अन्य पात्रों के लिये कहीं २ पका पदेश भी किया गया है इस पुस्तकमें श्रीशंराचार्यजी और मण्डन मिश्रके शास्त्रार्थ में जो शोक आये है वह उनके मुख के कहे हुए है, ऐसा पानीन पहिडनों का कथन है, क्योंकि उनके जो अन्य संस्कृत ग्रन्थ हैं उनमें भी गह श्लोक ऐसी ही आनुपूर्वीसे लिखे हैं इसकारण इपने भो नाटकमें बह श्लोक ज्योंके त्यों लिखकर सरलताके लिये तहाँ ही नीचे भाषानुवाद लिदिया है। भाजकल हमारे हिंदी पाठकों से अधिकतर महाशयोंकी रुचि फा पदाइ नाटक उपन्यासों की ओरको झुकने लगा है और केवल श्रृङ्गार रस प्रधान कलुपित नाटक उपन्यासोंके पढ़नेसे मनुष्य धार्मिक जीवन बड़ी बाधा पड़ती है, क्योंकि प्रवृत्ति फा और स्वार्थका पदाद तो साप ही योनियों में है परंतु निवृत्ति और परोपकारका उचित साधन इस मानवयोनिमें ही जुटता है भत्तएव मनुष्यताको सार्थक करने वाले निवृत्ति मार्ग और परो- पकारकी ओरको सुनेके निमित्त हिंदीभाषामें शास्त्रीय तच्चों से गुथे हुए सच्चे ऐतिहासिक नाटक उपन्यासोंकी श्रावश्यकता है, अतएव मेरा यह धमनीवनमय संकलन धार्मिक भारतबा- सियोको रुकेगा, ऐसी आशर है, न जान्चे इस विष्टयों में कहाँ तक कृतकार्य होऊँगा। धार्मिकों का प्रेमाभिलाषी- (ऋ० कु.) रामस्वरूप शर्मा गौड़ा मुरादाबादः -

६ नमः श्रीशरायः
शहर-विजय
(भगवान शाझाचानी की सपतीला)
(धर्ममूलक-नाटक)
प्रस्तावना
पहिले सब संगीतकार आकर एक साथ लमत्रानुसार रागमें
शिवजीकी प्रार्थना करते है ।
जय उमारमन ! महेश! सामन-कलेश ! वन्दितसकलजन ! |
जय सकल कलिमलहरन ! तारनतारन ! शिव ! कल्यानधन !
जय स्वेत अंग ! भुजंगभूपन ! शीस गंग लसै जटन !
जय अलख ! आदि ! अनूप ! शांतिस्वरूप ! शिव ! करुणायतन
जय अलाव! अविनाशी ! अगोचर । शिव ! चराचरनायक !
जय प्रणनहिन ! नित शांतचित ! सुरईश ! संनसहायक ! ॥
जम अभय नर कल्पानकर ! वरवरन ! मंगलदायक! ।
जय चंद्रमाल ! कपाल ! जय दुखहरन ! सुख उपजायक !
तदनन्तर अनुलिमें फूट लिये आशीर्वाद एढ़ता हुआ सूत्रधार
परदेके चाहर आता है।
शुभग चंदामाथे, मल र कर पाषा नगन में ।
जमा है बङ्गिी, दुइ दि निशदिन सुगल में।
करै जिनकी आज्ञा, जगाके लय उत्पति थिती ।
तुमहिं सो नित, अमित सुख सम्पति पशुपती ।।
सूत्रधार-माहा ! सहन ही वसभरमें जमकी उत्पत्ति पालन
और प्रलय करने वाले परमेशवर सुख सम्पदा देकर तुम सबों
के मज्ञानेका नाश करें:( ऐसा कहकर अञ्जुलि के फूलों को

शङ्करविजय-नाटक 4 DA उछालना है ) अहो ! प्रवीण सभ्य महाशयों ! गुणिगणमान्य पंडित मुकुटमणि वाणीनाथ चंद्रचूड़ाचरण नञ्चरीक परम गुणों का सम्मान करने नाली आपकी कीर्ति मुझको, दर्शन- मात्रसे गात्रको पवित्र करने वाली इस सज्जन सभामें खेंच लाई है मेरे मनमें तरंगकी उमंग उठती है कि मैं आपके संमुम्ब कोई अभिनय करके दिखाऊँ आशा है आप उत्साह बढ़ाने वाले आशीर्वाद के साथ आज्ञा देंगे। इतने ही में विचित्रवेपंधारी विदूषक आगया विदूषक-( आप ही आप ) क्याफरूँ ? कल जो सुना था वह ठीक ही है, इस संसार में संकट ही संकट है गदि निरंतर ऐसे ही संकट आते रहे तो यार संसारसेही जाते रहे । (उचक कर ) वाह ! अच्छी मूर्ति है अरे ! कौन है रे ! शिरमें गाढीका पहिया साले डाढी सम्भाले और गले में मोटा साँग डाले जलो- दरसी तोंदपर हाथ फेरता मरघटका भूतसा बाते बघार रहा है ? सूत्रधार यह क्पा चमत्कार है ! ऐसा अदृसट बोलनेवाला यह न जाने कौन बुद्धिका भण्डार है ! बड़े उत्साहके साथ पति के घर जाने वाली नवीना तरुणीका मार्ग काटने वाले बिलाव की समान इसने भपशकुन किया है अब मैं क्या उपाय करूँ ? । चिपक- अरे ! नागतेमें ऐसा क्यों चर्रारहा है, मेरे प्रश्नका उत्तर दें, नहीं तो कुत्ते को देखकर मुख छिपाने वाले सिंहकी समान भागकर छूट ना, ऐनी बातें क्यों बनारहा है ? । सूत्रधार-अच्छे संकटमें फंसे ! बलिहारी हूँ इस बोलने की चातुरी पर और धन्यवाद है ऐसी बुद्धिको हाँ 'बहुरन्ना वसुन्धरा, यह बड़ों की कहानत बहुत ही ठीक है । हे भगवन् ! तुम्हारी लीला अपार है। अरे वाचा ! बना तो सही अचानक आकरं मेरे कार्गमें विघ्न डालने नाला तू कौन है ? । -

शङ्करविजय-नाटक
विदूपक क्या अभी कौन है यह भी न समझे ? भरे गड़-
घड़ना ? तेरी इन असम्बद्ध बातों को सुनते २ मेरी आँखोंकी
पुनलिनें बैठीजाती हैं, अच्छा तो मैं इस सभाका धनील हूँ, बत्ता
क्या है ?।
सूत्रधार- वाह वाह ! तो कमा सभासद ऐसे बुद्धिसागर.
घकीलके द्वारा ही मुझके। नाटक खेलने की आज्ञा देहे ? तब तो
सरा भाग्यही उदय हुआ!
विदूपक-अच्छा ! अपना भाग्य न फोड़िये, मैंने थोडासा
हास्य विनोद किया था. जाने दीजिये । अदाको यहां जो
कुछ करना है उसके लिये इन सभासदों की आज्ञा है परन्तु पहिले
यह तो कहिये कि होगा क्या ?
सूत्रधार-अरे वादा ! यदि पहिले हीसे ऐसे होशमें आकर
पोलता तो इतनी जलझन न पड़ती, घड़ी भर के लिये अपनी
जवानको लगाम दे तो मैं सब कहता हूँ।
विदूषक' -एच्छा लगाम लगाली कहो ( दोनों हाथों से मुख
को दवाए डालना है)
सूत्रधार-अरे ! ऐसा क्यों करता है, क्या श्वास बंद करके
माता है ? कहीं पाण न निकल जायें ! और हम सब देखते
रह जाएँ।
विद्गक वाह वाह ! तुमभी यार दुहे हो, कभी कुछ और
कभी कुछ कह रहे हो ? और मुझे काट देरहे हो, कहिये शीघ्र
कहिये । तुम को जो कुछ करना है उसमें तुम्हारी इस लबड़ धौं
घौं और हाहा हूहू से काम नहीं चल सकता, देखो यह सभासद्
उकता रहे हैं।
सूत्रगर-ठोक बहुत ठीक, लीजिये हमारे पण्डितजीने धर्मशास्त्र
के अनुपार, आजकल के लोगों को रुनने वाला "शङ्कर-विजय"
नामक एक नया नाटक बनाया है, मैं उसीका अभिनय करके

शङ्करविजय-नाटक ल दिखाऊँगा, जिसमें शृङ्गार वीर, भक्ति, हास्ग आदि रसोंका अच्छा जमाव और अज्ञानमें डबते हुए भारत वर्षको ज्ञानोपदेश देकर चारों वर्णाश्रयोंके धर्मको दृढ़तासे स्थापित करनेवाले भग- वान् शंकरस्वामीकी कथाका वर्णन है विदूषक-अच्छा यह ता रहने दो, यदि पहिले फड़कती हुई दो लावनी सुनाओ तो बस मेरी जेब में जे। कुछ होगा वह सब तुमही इनागमें पाओगे (जेबमें हाथ डालकर एक झिझी कौड़ी निकालता है)। सूत्रधार- अरे ! तू मुझमे गानेको कहता है, परन्तु यह अच- सर नहीं है, देख वह संगीतविशारद नारदजी हरिगुण गाते मनमें होते रहे हैं, उस को सुनकर हम दोनों अपना जीवन सफल करें [ ऐसा कहकर दोनों जाते हैं ] इति प्रस्तावना प्रत्यमका प्रथम दृश्य-मर्त्यलोक (माथेपर तिलक दिये हाथमैं वीणा लिये हरिगुण गाते नारदजी आते हैं) जय ! जय !! जगजनक देव शंकर अविनाशी । महा मोह तिमिर भानु, ईश सर्व शक्तिमान् ॥ अखिलेश्नर अपरिमान, शंकर स्वप्रकाशी ॥ जाकी महिमा अपार, गावत नित मति उदार । निराकार निर्विकार, निर्गुण गुणराशी ॥ अद्वितीय अन अनूप, विपुल विविध भूतिभूप। सत् चित् आनंदरूप, कठिन क्लेनाशी ॥ सर्वग सर्पज्ञ सत्य कर्ता कमनीय कृत्य । जाके सब भून भृत्य; भवनिज भाकांशी ।। पूर्ण माज्ञ पूज्य पित् परमात्मा प्रभु पवित्र ।

८ शङ्करविजय-नाटक महा माननीय मित्र, उत्तम अनुशासी ॥ नित्य शुद्ध बुद्ध भक्त -करुणा कल्याण युक्त । प्रमी पालन प्रयुक्त, दुर्जन तन त्रासी ॥ यह प्रताप ताप गेह, विनवत कर जोर एक । दीजै निज सहस' नेह, कीजै न निराशी ।। नारदजी-आहा ! विधनाकी रचना क्या ही अपूर्व है, देखते ही मन मोहिम होनाता है, कितनी लीला होती हैं और लीन हो जाती हैं, जिनका कुछ पता ही नहीं है, परन्तु सबके मून्त एक भगवान् ही हैं, जिधर देखो उधर उनका ही पसारा है, वह अनादि अनंत हैं, कोई उनका पार नहीं पासकता, इस असार संसारमें केवल एक बही सार हैं। जीव जन्तु, पशु पक्षी, कीट पतङ्ग, वृक्ष लता मादि सब कनज्ञनासे उनका परिचय देरहे हैं, संसारमें कुछ दिन क्रीड़ा करके आयु पूरी होते ही एकर करके अंतमें सब उसी पदमें लीन होजाते हैं। आहा ! कैसा गछन भाष है!चराचर संसा से उनका भेद चा अभेद् कुछ नहीं है,वह चैतन्य- स्वरूप अनन्त विश्चमें व्यापकरूपसे विराज रहे हैं। आहा ! यह कैसी अद्भुन बात है फि-वह जीवों के हृदय में व्यापकर भी पृथक रहते हैं । जब पवित्र हृदय में उनका ध्यान करता हूँ और उनके विचित्र कौशलमय कार्यों को विचारता हूँ तब ही उन्मत्त सा हो- जाता हूँ, सुधबुध जाती रहती है । आहां ! उन परमप्रेणीके प्रेममें जिसका पन रँग जाता है यही प्रापेको भूल जाता है, उसी के हृदपसे भेदाभेद दूर हो जाता है, वही जगत् भरको अपना कुटुम्ब समझने लगता है, ऐसे दुर्वासना और भेदभावको छोड़ कर सदा प्रानंदमें मग्न रहने वाले महात्मा धन्य हैं वही महा- पुरुष मोनेके अधिकारी हैं । नहीं तो जिन मूढों को धार्मिक पुरुष घृणाकी दृष्टि से देखते हैं, जो.सदा पिथ्याभाषण पापकों में मग्न रहते हैं और पज्जलित अग्निकी सगान गर हत्यारूप घोर पाप गरविजय-नाटक ९ ସଂe- करते हैं, भूतल पर उनसा महागापी कोई नहीं है। ईश्चर का तथा भले बुरेका विचार करनेकी शक्ति होनेसे गनुष्य सबसे श्रेष्ठ है। गिनकी कपासे मनुष्य ज्ञानरूप प्रकाशको पाकर चराचर विश्वको घशमें कर सकता है,परन्तु हा! इस मनुष्य समाजकी कैसी दुर्दशा देवरहा हूँ ! कितने कुत्लागार हृदय से कनज्ञनाको विसार उन जगत् पिताके नियमों को लापतेहुए स्वाभाविक घोर पाप कररहे हैं, कितनेही धर्मको छोड़ सत्यसे मुखमोड, धीरतासे असत्यकी नीरता दिखा रहे हैं ! हा ? सुखमय मृत्युलाफका यह परिणाम.! न जाने वह पहिला समय कहाँ नलागया ? वह पुएगवान् तपो. धन योगी ऋषि महात्मा बोल्मीकि आदि अब नहीं हैं, वह धर्म- वीर सत्य माण महाराज हरिश्चन्द्र. श्रीराम, नल धर्मपुत्र युधि- ठिर आदि भव नहीं हैं,जो धर्म की रक्षाकी अपेक्षा गनसिंहासन दाप दासी और कुटुपके भी तुच्छ समझ कठोर शोको सहने और वनों में संन्यासीके वेश में रहते थे, अब पहिलेकी समान. योग तप आदिका चमत्कार दिखाने वाला कोई नहीं है। हाय! सातनधर्म की कैसो दुर्दशा होरदी है कि जिप्तको देखते हुए छाती दहली जाती है । वौद्ध, जैन क्षपणक आदि नाना प्रकार के विधर्म प्रचाहमें सत्यधर्म वहाजाता है, हाय ! अब क्या उपाय होगा दिनदिन विश्वास उठा जाता है; दुर्बुद्धि मनुष्य कुतोंमें पड़कर सीमासे बाहर होगये, परम परित्र सनातनधर्मको त्याग विधर्मी होनेलगे इस घोर कलियुगमें धर्मकर्म तो रसातत्तको घसा चला जाता है, अब विपत्ति जीवों के शिरपर आरहुँची है,रक्षाका कोई ढंग नहीं है, हा ! न जाने क्या होना है ? (खिन्न हो कुछ देर टहल कर ) अब क्या करना चाहिये (विचारकर ) एक यही युक्ति समझमें आती है कि-सकल जीवहितकारी लोकपितामह ब्रागीके पास जाऊँ,मेरा अन्तरात्मा कहता है कि-तहाँ अब. 2

१०
शङ्कर विजय-नाटक
Law
श्य ही इसका कोई उपाय इनसकेगा । (हाथ जोड़ेहुए ऊपरको
दृष्टि करके ) हे अन्तर्यामिन् । हे देष ! तुम्हारेही अनुग्नइसे मेरा
मनोरथ पूर्ण होगा।
पद-लिख्यो कहा भाग मनके हाय !
भीषण पाप-प्रसाइ थाह नर्हि, वीर न पार लखाक }
तरहिं पातकी जन, कोई ऐसा, दीखत नाहि उपाय ।।
भवभय-हरण शरण हे गात्र, कीजिये केग सहारा ।
चढि तुम्न चरणकमल हद नौका, को न पार हुइजाय ।
श्रीगन्नारामण ! नारायण नारामण ! श्रीमन्नारायण ।।
इसप्रकार हरिगुण गाते नारदजी बाते
१
द्वितीयदृश्य-ब्रह्मलोक
( ध्यान मग्न ब्रह्माजीका विराजना और मौन धारे नारदजीका प्रवेश)
नारदजी-(मन ही मनमें ) यह क्या ! निलोफीके विधाता
ऐसे गम्भीर ध्यान में क्यों मग्न हैं ! मानो बाहर का ज्ञान ही नहीं है
ब्रह्माजी-( लम्बी श्वांस छोड़ते हुए आप ही आप ) :
मनुष्यों का यह कैसा दुर्दैव देख रहा हूँ! अब क्या उपाय होगा!
क्या अन्तमें मेरी सृष्टिकी दुर्दशा ही होगी? लीलामय भगवन् !
तुम्हारी लीलाका पार कोई नहीं पासकता ! (नेत्र खोलते ही
अचानक नारदगी देखकर ) तात ! श्रामो मैंने आज तुम्है
बहुत दिनों में देखा है ? वेटा ! तुम तो सदा मानंदमग्न रहते थे,
आज तुम्हारे मुखपर खिन्नता क्यों दीख रही है.१ मर्त्यलोक
में सब कुशल तो है ? अनहोनी वात तो नहीं हुई ? तुम्हारे मुख
को देखनेसे मुझे संदेह होगया।
नारद हेपितः ! हे अन्तर्यामिन् ! प्रभो! आप मुझसे क्या
बुझते हैं ? आपसे कौन बात छिपी हैं :
ब्रह्माजी- बेटा ! तथापि जो कुछ जानते हो कहो

शङ्कारविजय-नाटक १६ . मारद-अन्तर्या रिन् ! प्रभो ! क्या कहूँ ! अब मर्त्यलोककी कुशल नहीं है, मनुष्यों की दुर्गति होरही है, शरन अन्तर्धान हो गया, दुर्लभ मनुष्य जन्मको पाकर सब पशुसमान व्यवहार कर रहे हैं विवेकका पता नहीं, शर्मचर्चाकी तो बात ही क्या दिन दिन कुनी चढते जाते हैं, श्रद्धाका नाम नहीं, विश्वासका काम नहीं, सब नास्तिक होगए, जो कुछ वचा वह भी अधर्मियोंसे लचा है कुशल नहीं है, कोई स्वेच्छाचारकोही सर्वस्व जानते हैं, ईश्वरका होना मिथ्या मानते हैं,कोई दिखावेके लिये कर्मकाण्ड में रत हैं कोई नाशवान् श्न ऐश्वर्यमें ही उन्मत्त हैं, दीन दरिद्र पीड़ा पाते हैं कोई जन्मांतरको न मानकर स्वार्थ साधने के लिये ही मदा पारमें मान रहते हैं। ऐसे अनेकों प्रकारके सारहीन लक्ष्यहीन विधर्म पवाहमें सत्यधर्म वहा जाता है, हाय । सनातन चैदिकधर्मकी दुर्दशा होरही है, अनेकों पापी नारकी दुष्ट पुरुष प्रकाशमय जीवित धर्मको त्यागकर असार विधर्मकी शाखाओं का आश्रय कररहे हैं । हे देव ! अब इस दासकी यही दिनय है कि- शीघ्रही किसी उपायसे अपनी सृष्टिकी रक्षा करिये । अब भूमि पापके भारको अधिक नहीं सहार सक्ती, देव ! भव सुझसे जीवों की दुर्गति नहीं देखी जाती है हे मुक्तिदाता ! शीघ्र ही मुक्तिका उपाय करिने नहीं तो वसुधा रसातलको घसा चाहती है। ब्रह्मनी वैटा | मैं जानता हूँ कि दूसरों के दुःखको देख तुम्हारा पन मुरझाजाता है, मैं भी समाश्मेिं मर्त्यलोककी दुर्दशा देख च्याकुल होरहा हूँ अभी तक कोई उपाय निश्चित नहीं कर सका हूँ परन्तु आज इसीका उपाय विचारने के लिये इन्द्रदेवके यहाँ सभा होगी मैं वहीं जाता हूँ। (एक ओर ब्रह्माजी और दूसरी ओरको नारदजी जाते हैं) शहर विजय-नाटक p -- होगा। तृतीय दृश्य देवलोकमें इन्द्रसभा । ( ट दिक्पाल आदि देवता मलितमुख हुए आकर बैठते हैं) कुबेर-मित्रों ! इस सुधर्मा सभा हम सब तो नियत समग पार मा गये, परन्तु महाराज अभी तक न जाने किस कारण नहीं आये ? यम -मैंने इसका समाचार मँगालिया है, महाराज इन्द्र प्रस्तुत कार्यका विचार करनेके लिये गुरु वृहस्पतिजी के साथ नन्दन भवन के गुप्त मन्दिरमें बैठे सम्पत्ति कर रहे हैं, इस कारण ही सवारी पाने में विलम्ब हुआ अग्नि-हाँ यह तो ठीक है, परन्तु सब देवता बैठे २ बाट देखरहे हैं, इतना कहलाभेजने में क्या कुछ हानि है । वरुण-हानिकी तो न कहिये ! महारोज गुप्त मन्दिरमें वृह- स्पतिजी के साथ सम्मति कर रहे हैं। इस दशामें जहाँ जानेको पानकी भी छानी नहीं है तहां दूसरा कौन जाकर समाचार पहुँनावेगा? सूर्य-यह ठीक है, परन्तु इतनी अधिक झंझट करने की तुम्हें कौन आनश्यकता है, दो घडी बाट ही देखलेोगे तो क्या हानि है ? ( इतने होमें चन्द्रमा आते हैं) कुवेर-ठीक ठीक, यह निशाकर आरहे हैं, इनको पूग २ वृत्ति मालूप होगा, कहिये निशानाथ ! महाराज इन्द्रदेवके विषयका कुछ समाचार आपने सुना है क्या ? चन्द्रगा- हाँ सुना है कि इस समय हम सबोंपर जो संकट है उसके विषयमें क्या करना चाहिये, यह विचार बृहस्पतिजीके साथ एकांत में हो रहा था, ब्रह्माजी इतने ही में भी आगये, यह बात मैंने अभी सुलक्षण द्वारपालले सुनी थी, वैसे ही इधर को चला आ रहा हूँ।

शङ्करविजय-नाटक १३ यम-अरे ! वह देखो ब्रह्माजीका विमान भी बारहा है, अब निल भर भी दुःख न मानो, सफल ही कष्टोंसे छुटकारा हुआ जानो। ( इतने हीमें पर देके भीतरसे शब्द आता है ) [ सकलदेवतासागौपश्चण्डदोर्दण्डबलखण्डितपक्षसश्रीः, विलापभरितधाराधरकुहरो बज्रधरः, चतुर्मुखेन सह गच्छत्तीति सरा नारः कर्त्तव्यः शनैः शनैश्चलतु महारान:] दून-( दौड़ता हुआ आकर महाराज आगये । ( सव उठ कर खड़े होते हैं) तदनन्तर इन्द्रदेव और ब्रह्माजी आकर अासनपर बैठते हैं सब देवता क्रमसे प्रणाम करते हैं। इन्द्र बैंठो देवताओं वैठो (सब अपने २ आसनपर बैठने हैं ) मित्रों ! तुम्हारे संकट को दूर करने के लिये साक्षात् सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीने विचार किया है और भागेको जो कुछ करना चाहिये उसकी भी आज्ञा दी है। चरुण-देवनाथ ! महापुरुषों का अवतार परोपकार के लिये ही होता है, अतः व मानी हमारे निमित्त जो कुछ करें से उचित हो है, परन्तु श्रीमहारानने कौन उपाय करनेकी आज्ञादी है ? उसके सुननेको सव देवना उत्कंठित होरहे हैं ब्रह्माजी-हे देवताओं ! तुम्हारे यह कुमलाये हुए कपलोंकी समान मुग्व मुझसे नहीं देखे जाते, और यह संकट, कैलास पर पहुँच पार्चनीपनि महादेवजीको सुनाये विना दूर नहीं होगा.इस लिये सब मिलकर इस उद्योगको करो वस कार्य सिद्ध हुआ ही समझो। इन्द्र परन्तु महाराज ! आप और विष्णु भगवान् भी हमारे साग अवश्य होने चाहियें, क्योंकि - बटों के आश्रय चिना शिव- जीके दरबार में शीघ्र सुनवाई होना कठिन है ।

. जद २ अवतार धारते हैं, मेरे सहित ही भूलाकका सिधारते हैं। शङ्करविजय-नाटक भ ब्रह्मानी- हाँ मैं तो चलूँगा ही, उन भोलानाथका दर्शन करे विना मुझे बहुत दिन होगये हैं, विष्णु भगवान्से प्रार्थना करोगे तो वह भी अवश्य तुम्हारी सहायता करेंगे। इन्द्र-मित्रों ! अब विलम्ब क्या है ? सब मिलकर श्रीविष्णु. भगवानको साथ लेते हुये कैलासको चलें । सब - हाँ हम तयार हैं ( सम जाते हैं) चतुर्थ दृश्य कैलास पर्वत । पार्वती, गणेश और स्वामिकार्तिकेय सहित आसन पर बैठे हुए सहादेवजी का दर्शन । पार्वती-हे प्राणवल्लभ !भाग मुझसे और इन दोनों बालकों सेमके साथ भापण करते २ अचानक घबहाकर लम्बे और परम श्वास छोडने लगे यह देखकर मैं बडी व्याकुल होरही हूँ, उस त्रिपुरासुरकी समान कोई दैत्य तो देवादिकोंको कष्ट नहीं देरहा है ? महादेवजी- प्रिये ! इस हृदयकी दातको जान लेनेकी तेरी चोरीको देखकर मैं वडा प्रसन्न हुआ हूँ। प्रिये ! किसी दैत्य का तो भय नहीं है, परन्तु कुछ समगके लिये मुझे मृत्युलोको अवतार लेना पड़ेगा, क्योंकि-आजकल भूलोकमें दुराचार बहुत बढ गया है। पार्वती-मच्छा तो मुझे भी साथ ले चलिये, क्योंकि-माप महा० · नहीं नहीं, इस अवतारमें तुम्हारी कुछ भावश्यकता नहीं है, क्योंकि-ज्ञानमार्गकी स्थापनाके लिये मुझे संन्यासी बनना पडेगा उसमें स्त्रीका क्या काम ? पार्वती-ऐसा क्यों ? यह बात तो मैं नहीं जानती थी, क्या अब भाप संन्यासी बनेंगे ? क्या जैसे अर्जुनने सुभद्राको हरने शङ्करविजय-नाटक १५ के लिये संन्यासीका रूप बनाया था, तैसा ही आप भी करेंगे? तब तो मुझे अच्छा तमाशा देखने का अवसर मिलेगा! महा०-तमाशेके ध्यानमें न रहो, इस अवतारमें बड़ा भारी शास्त्रार्थ होगा, बडे २ कुनर्कियोंको जीनना पड़ेगा और भूलोक में तुम्हारे प्रिय अद्वैतमार्गकी बहुन चर्चा होगी। पार्वती परन्तु भूलोकमें ऐसा दुराचार करनेवाले कौन हैं। महा०-वतानेकी कौन आवश्यकता है, सब तुम्हें प्रत्यक्ष हुमा जाता है. वह देखो ब्रह्मा विष्णुको साथ लिये इन्द्रादि देवता आरहे हैं, उनके मुख से सत्र सुन लेोगी (सब देवता प्रणाम कर आकर खडे रहते हैं) महा० बैटो देवताओं वैठो; मित्र विष्णुजी ! ब्रह्माजी ! आप इधर आइये (सब देवता यथायोग्य स्थान पर बैठते हैं ) कहिये विष्णजी ! ब्रह्मानी ! आज इन सब देवताओं के साथ कैसे आना हुमो ? ब्रह्माजी-चन्द्रशखर ! आप त्रिकालज्ञ हैं, सबके घट २ की जानते हैं। महा०-अच्छा कहो तो सही,मेरे करनेका कौन काम है,यदि साध्य होगा तो अवश्य करेगा! इन्द्र-(आगे बढ कर ) हे भक्तभय भञ्जन ! करुणासागर ! आप रातदिन देवताओंके हितचिन्तन में मग्न रहते हैं, इस समय देवताओं के ऊपर संकट पडा है, भूलोकमें चौद्ध बडे उन्मत्त हो गये हैं, अनादि वेदमार्गका तिरस्कार करते हैं, श्रौतकर्म नष्ट हो चला, ब्राह्मण भी स्नान संध्या आदि षट्कर्मों को छोड़ कर उस मतमें जाने लगे, अधिक क्या कहें, सूर्यनारायणको नित्य एक भी अंजुलि न मिलनेका समय आगया, आजकलके राजे भी उसी गत पर आरूढ होगये, वौद्धोंमें बड़े २ पण्डित होगये, संस्कृतमें बड़े २ ग्रन्थ लिखकर वेदमार्गका खएंडन करते हैं,मौद्ध .

विजय-नाटक - . कापालिक, दिगम्बर आदि अनेकों नास्तियों के कारण वैदिक मार्ग तो बन्द ही होगी, अब भूलोकमें ज्ञान वैराग्य आदिकी तो चर्चा ही किसको सुहावेगी ? ऐसी दशामें यज्ञ याग प्रादि शान्तिक पौष्टिक कर्म वन्द होजानेसे इन अनाथ देवताओंका स्वर्गलोकमें जीवन कैसे हो ! सब देवता विकल होरहे हैं इस कारण ही मिल कर आपके चरणकमलोंकी शरण पाये हैं (ऐसा कह नमस्कार कर मौन होकर बैठसे हैं) महा०-इन्द्रदेव ! घबडाओ मत, नास्तिक नहुन बह चुके,अब शीघ्र ही वह अपने कर्मों का फल पावेंगे, मैं भी कितने ही दिनों से इस विचारमें हूँ । यद्यपि, स्वामिकार्तिकेय, गणेश और पार्वती मुझे परम पिय हैं परन्तु ज्ञानमार्ग मुझे को उन से भी प्यारा है, उसका नाश करने वाले चौद्धों का उद्धनपना अब मैं बहुन दिनों तक नहीं रहने दूंगा, यदि अब ही अवतार धार मैं ज्ञानमार्गकी स्थापना करने लगूं तो नहीं हो सकेगी, क्योंकि-इस समय सकल पाणी कर्मभ्रष्ट होने के कारण ज्ञानोपदेशके पात्र नहीं रहे हैं, इसलिये सब मागौंके मूल कर्म- मार्गकी स्थापना पहिले होनी चाहिए, इसलिए एक काम करो ! इन्द्र-कहिये ? महाराज ! जो आज्ञा हो उसको पूरी करने के लिये यह सबही आपके दास तयार हैं । महा० देवेन्द्र ! तुम सुधन्वा नामसे बौद्धोंके कुल में ही जन्म लो और नीति के साथ राज्य करने लगो तथा बौद्धोंको जीतने के लिये जो मात्र उसकी सहायता करके वेदनिन्दकों का नाश करो। भगवन् ! आपकी आज्ञा तो शिरोधार्य हैं, परन्तु चिंता यह हैं कि नीचकुलमें कैसे जाऊँ ? जो वेदोंकी प्रत्यक्ष निंदा करते हैं और ब्राह्मणों से बैरभाव रखने हैं, उनके साथ तो क्षण २ रसग चिताना कठिन होजायगा ?

शापविजय-नाटक २७ बा महा0 -इन्द्रदेव ! यह कैसी बात पन में लाते हो, भूमिके उद्धार के लिये विष्णु भगवान् ने क्या वराहावतार नहीं धारा था ? भाई ! बड़ाभारी परोपकारी कार्य साधने के लिये यदि नीचकाप भी करना पड़े तो वह भूषण ही होता है, तुपको कोई चिंता न करके मेरा वचन मानना ही चाहिये । गत मानतार धार वेदों का उद्धार फर जो यश भगवानने पाया था वही यश तुम भी पा- ओगे, क्योंकि यह उद्योग भी वेदोंके उद्धारके लिये ही है। इन्द्र-बहुत अच्छा महाराज ! आपकी आज्ञाका पालन करने के लिये यह दास निःशंक है। महा० ! चेटा सागिकार्तिकेय ! तुम भट्टपाद नागसे द्राक्षण- कुलमें उत्पन्न होकर सुधन्वा राजाही सहायताले बौद्धोंको जीत कर्मकाण्डका प्रचार करो। स्वामिकार्तिकेप-ऐसा कौन पुत्र होगा, जो पिताशी आज्ञा न माने, यह बालक आज्ञाको शिरोधार्य करता है । महा० -हे देव नारायण ! हे चतुरानन ! तुमको भी इस कार्गमें सहायता करने के लिये अवतार धारना होगा। ब्रह्माजी -मैं भी शिवहीन स्थान में रहते डरता हूँ। विष्ण-कहिये शंकर ! आपने मेरे विषयमें क्या विचार किया है ? महा०-हे चक्रपाणे! आप शेषजीको साथ लेकर संकर्पण- रूपसे भट्टवादरूपधारी स्वामिकार्तिकेयकी सहायता करें और हे ब्रह्माजी ! आप गृहस्थधर्मकी रक्षा करतेहुए जीवोंको मोक्षफल देने तथा देवताओं को संतुष्ट करनेके लिये ब्राह्मणकुलमें अति- प्रसिद्ध मंडनमिश्र नामसे उत्पन्न होकर याग यज्ञादि कर्मकाण्डके पक्षपाती बने। ब्रह्मा और विष्णु -हम भापकी इच्छानुसार कार्यको स्त्री. कार करते हैं। 3 १८ शङ्करविजय-नाटक महा० -और सव अंशावतार ब्राह्मणकुलों में उत्पन्न हो श.म- मार्गका प्रचार करें। सम-इप सत्र श्रीमहाराजकी आज्ञाका पालन करने के उद्यत हैं इन्द्र-भगवन् ! यह तो कहिये कि श्राप अतार धारकर किस कुलको कृतार्थ करेंगे। महा.-पवित्र भारतवर्पक केरलदेशमें एक स्थान है जहाँ पैदिक सनातनधर्मावलम्नियों का निवास है, नयाँ आकाशलिंगनामसे प्रसिद्ध एक मूर्ति है,मैंने विचारकर स्थिर करलिया है कि उस मूर्ति में मेरा पूर्ण अधिष्ठान होगा, तहाँ शिरभक्त पवित्र ब्राह्मणवंश की एक विशिष्टा' नामक स्त्री हैं कि जो निरन्तर भक्ति में भरकर मेरी पूजा करती हुई मुझसे सन श्रेष्ठ सन्तान मांगती थी, मैंने तथास्तु कहकर उसको वचन देदिया है । और उस विशिष्टाके पति शिवगुरु ब्राह्मण ने भी पाणपण से मेरी सेवा करी है.यदि मैं एसे सेवकों की इच्छा पूरी नहीं करूंगा तो मुझे सब दोष देंगे और फिर कोई मेरे शिवनाम का स्मरण भी नहीं करेगा, अतः मैंने दिनारा है कि विशिष्टा और शिवशुरुको माता पिता बनाकर भूलोसमें मनुष्य नाट्य फरूँगा और शंकराचार्य नामसे प्रसिद्ध होऊँगा; तब वेदादि अमूल्य ग्रन्थों का उद्धार और भूलोकमें फिरसे स्मृति न्याय धर्मशास्त्रका प्रचार होगा, लेाकों के सफल खोटे संस्कार दूर होकर पूर्ववत् ये ग जप तप आदि सनातन- धर्मपर प्रेम होगा, चार्वाक और बौद्धमत्त विलीन होजागा तात्पर्य यह है कि मैं भारत की सबप्रकारकी अशांतिको दूर कर के ज्ञानमार्गकी स्थापना करूँगा, उपनिषद् गीता और व्यास सूत्रोंपर भाष्यरचूंगा, अच्छा अब सबको अपने उद्योगमें लगना चाहिये। सब० - जो अाज्ञा श्रीगहारानकी संव स्तुनि गाते हुए जाते हैं) शरविजय-दाटक जय जय महेस अानन्द शंकर भूतपति विश्वम्भर । भय पतितपावन दुखनसावन त्रिगुण साधारन हर ।। जय चन्द्रमाल रुपाला निममन पाल त्रिपुर चिनाशक हद जयतु आनँद कह शिव स्वच्छन्द ज्ञान प्रकाश द्वितीय प्रक अथम-दृश्य मयूररिच्छधारी दो वौद्ध पण्डित्त आते हैं। कौकिशोर भईयो नमोनमः, अईयो नयो नमः ध्या, भगवान् बौद्धाचार्यने इमाम फैसा उत्तमधर्म स्थापित किया है "नास्कि परलोक मृत्युरेष महेता ऋणं कृत्वा घृतं पिब" यह चौद्ध बचन कानोंको कैसा सुबह देते हैं, जिसमें परलोककी आशापर देहको क्लेश नहीं, भरनाही मोक्ष है, ऐसे सुन्दर बंशमें जिन्होंने मुझे जन्म दिया है उन अहह का उपकार मैं कभी नहीं सुलूँगा ( आगेको देखकर ) अहेर ! यह तो मिल जनेन्द्रपिशोर इभरको ही आरहे हैं, मित्र ! आइये आइथे । जौनेन्द्रकिशोर-(आनन्द के साथ मिलकर ) नमोनमः कहा मित्र आनन्द तो हो ? बौद्ध-हाँ देहपात्रसे नानन्द हैं । जैनेन्द्र०--भाई ऐसी सन्देह भरी चपनसे तुम्हारे स्थिमित्रको खेद होता है, कहा तो सही क्या हुआ ? वौद्ध०-अरे भाई ! कौन बात सुनाऊँ, क्या किया जाय ? अपना समय ही उलरगया । जैनेन्द्र०-अरे ! यह भी आश्चर्य ही है, क्योंकि खुपसे बीर- पुरुषके मुख से तेर कभी ऐंसे अक्षर निकले नहीं यह तो कहो समयका उलटना कैसे समझा ?

२० शङ्करविजय-नाटक चौद्ध० -'राना कालस्य कारणं,' यथा राजा तथा प्रजा' यह बात तुम नहीं जानते हो क्या ? अरे ! राजाका चित्त फिरतेही समय भी फिरजाता है। जैनेन्द्र०-मित्र ! यह क्या कह रहे हो राजा सुधन्वाकी बुद्धि उलटी होगई क्या ? वौद्ध-क्या कहूँ मित्र उस दुष्टका तो नाग न लो वह तो हमारे शमें कुलागार निकला, जिस समय इसके बापका मरण होकर इसको राज्याभिषेक हुआ था तब इसके चालक पने के वीवों को देखकर ही मैंने कई मित्रों से कहा था कि यह कुल्हाड़ी का दंडा वंशका काल होगा। जैनेन्द्र०-अच्छा यह तो कहो वह ऐसा कौन काम करता है? बौद्ध० क्या कहूँ ! अपने परम्परागत धर्मपर उसकी कुछभी श्रद्धा नहीं है हमारे शत्रु ब्राह्मणोंसे पित्रता रखता है और भी उसने एक ऐसा दुष्कर्म करडाला है कि जिसको सुनते ही शरीर पर रोमांच खड़े होते हैं ( ऊपर को देखकर ) देव ! ऐसे दुष्टके नेत्र क्यों नहीं फोड़ देते । जैनेन्द्र -मित्र । कहो तो सही राजाने ऐसा कौन दुष्कर्म किया है ? बौद्ध-श्राज दो महीने हुए राजमहल में एक ब्राह्मणसे वेद- पाठ करा रहा है और उसको बहुनसी दक्षिणा देता है। जैनेन्द्र०-( कानोंपर हाथ रखकर ) अर्हन् भहन महन ऐसा घोर काम, कारे दुष्ट ! इन आचरणोंसे क्या तू इस निष्कलंक राजसिंहासन पर टिक सकेगा? बौद्ध क्या कहूँ मित्र ! सब राजपरिवार भी इसी चिंतामें है ऐसे इष्टद्रोही पुरुपको कैसे सह देखो इस बौद्धधर्ममें कोई कष्ट नहीं है परन्तु हमें इसके नीच आचरणोंके कारण राव दिन चिंता जलानी रहती है।

शङ्करविजय-नाटक २१ २१ जैनेन्द्र०-तो भाई सबको मिलकर राजाकी बुद्धिके भ्रमको दूर करनेका यन्न करना चाहिये। बौद्ध०-अरे भाई धीरे २ वोल ऐसी ही सम्मति पहिले दो चार वागहुई,परन्तु इस दुष्ट राजाने उन लोगों को पकड़कर प्राणा- न्त दंड दिगा। जैनेन्द्र० भव कुछ भी उपाय नहीं देख कर यदि हम सब ठे रहेंगे तब तो यह दुष्ट किसी समय हमारे मतका सर्वनाश कर डालेगा, इप्स लिये कोई न कोई युक्ति करके इस काँटेको निकाल ही डालना ही चाहिये। बौद्ध०-ठीक है मैंने अपने एक शिष्यको कुछ भेद लेने के निमित्त राजमहलमें, भेजा है, यहाँ खड़ा उसीकी वाट देखरहा हूँ देखो वह आकर क्या कहता है। इतनेही में शिष्य पाता है। शिष्य-अद्भयो नमोनमः, मैं श्रीचरणोंषों कृपासे राजमहल में तो पहुँचगया, परन्तु गुरुजीकी आज्ञानुसार कार्य करनेका मुझको अवसर नहीं मिला और मैंने इस समय जो बात सुनी है वह अत्यन्त ही कष्टदायक है । बौद्ध०-उपासक ! कहो क्या सुना, इस समय तो जितने भी कष्ट आवे थोडेही हैं शिष्य-एक भट्टपाद नामक ब्राह्मण हमारा नया शत्र उत्पन्न हुआ है वह साल शास्त्रोंका पूरा पण्डित है और उसका विचार सकल बौद्ध सिद्धांतों का खंडन करने का है, चारों ओर यह वात फैलरही है, नथा ऐसा भी सुनने में आया है कि उस ब्रा- ह्मण का राजासे बहुत कुछ मेलचढ़गया है और वह दो तीनधार गुप्तरूपसे आकर राजासे एकांतमें मिला है। बौद्ध०-ला जैनेन्द्रकिशोर ! यह एक नईहुई (शिष्यसे ) अरे ! तो तू उस दुष्ट राजाका शिर क्यों न काटलाया, फिर जो होता हम देखलेते।

शङ्करविजय-नाटक Uana है शिष्य-मैं इसी घातमें गया था, देख पायेगा तो पहरेवाला नहीं जाने देगा इस भयसे शस्त्रको जायेमें छिपा लिया था,परंतु उस नीच की भ्रकुटि देखते ही मेरे हाथ पैर सटपटा गये, शरीर काँपने लगा जीभ उसीगई और क्या कहूँ शस्त्र खिसककर नीचे गिरपड़ा,राजाने शस्त्रको गिरतामा देखते ही,अरे! इसको पको यह कौन मेरे पाण लेनेको आया था, इतना कहा कि मैं तहाँसे भागता हुमा आपके समीपको ही आया हूँ। बौद्ध-हा मूर्ख ! सब दांत बिगावदी, और केरल बात ही नहीं विगाड़ी किंतु मेरे ऊपर भी, राजाका सदेह कर दिया, क्योंकि राजाने तुझे मेरे साथ अनेकों बार देखा है, खोर जो कुछ हुआ, (जैनेन्द्रकिशोरसे ) मित्र 1 इस समय मेरे चित्तौ बड़ी व्याकुलना है अब मैं एक सम्गति करनेको जाता हूँ नमोनमः जैनेन्द्र० - जाइये मुझे भी अत्यावश्यक काम है, मैं भी जाता हूँ, नमोनमः (दोनों जाते हैं) द्वितीय-दृश्य (दो ब्राह्मग पंडिन हाथमें हाथ पकड़ कर बात करते हुए आते हैं) प्रभाकर-कहिये पं० नीलकठजी आपने कल कहा था कि शीघ्र ही तुपको एक शुभ समाचार सुनाऊँमा बताइये वह फोन वान हैं मेरे मन में सुननेके लिये बड़ी उत्कंठा. होरही है। नीलकंठ हाँ सुनिये, प० भदपाद नामक एक अवतारी पुरुष इन बौद्धों का गद उनारने के लिये ब्राह्मणकुलमें दीपकरूप उत्पन्न हुआ है, अब घोडे ही दिनों में तुम सुन लोगे कि नगरके मंदिरों में शिव और विष्णु की मूर्ति स्थपित्त होगई। प्रभा० अरे भाई ! यह तो तुम्हारी अाशा ही है यह तुमने किससे सुना है ? और वह अवतारी है इसका प्रमाण क्या ? नील उसका सब इत्तान्त सुनकर तुम ऐसा नहीं कहसकोगे

शङ्कर वेजय-काटक
२३
4.0
L
प्रभा०-हाँ ते। सव स्टुनाइये न; जिसका स्परण करता हुअर
आनन्दसे दिन बिताऊँ।
नील०-अरे भाई ! उस पंडितने बौद्धका वेप बनाकर उन्ही
की पाठशाला में पहना पारम्भ किया, उस शालामें प्रत्येक
विद्यार्थीमे वेदों को दूपण लगाकर लेख लिलानेकी रीति है,जब
इस भट्टपादसे कहागया तब इसने भी वेदों पर दोष लगाकर
ले व लिवा, उसको पढ़तेहुए मैं ब्राह्मण होकर कैसा अनुचित्त
कर्म कररहा हूँ ऐसा ध्यान होकर इसके नेत्रों में आँसू भर पाये
ऐसी दशा देखते ही यह चौद्ध नहीं ब्राह्मण है ऐसा जानते
ही उन तीन बौद्धोंने भट्टादको टीले परमे नीचेको ढकेल दिया
उस समय गिरते २ तिस ब्राह्मण ने 'यदि वेद सच्चे हैं तो मेग
वाल वाँका न हो ऐसा कहा और उसके चोट न लगी तथा
भूमिपर खड़ा होगया परन्तु इसमें उसका एक नेत्र जानारहा।
प्रभा०-अरे भाई जब उसने अपना सब भार वेदोंके ऊपर
रक्खा तब उसका नेत्र क्यों गया
नील०-उसने [वेद यदि सच्चे हों ] ऐसे सन्देह भरे शब्द
उच्चारण किये थे इस कारण उसको यह दंड मिला।
प्रभा०-भाई उसको तिस नीच पाठशालामें पढना ही क्या
पड़ा था ?
नील० - यद्यपि उसको हमारे सब शास्त्र आते ही हैं परंतु खंडन
तो बौदोंका करना था और उनके शास्त्रों का भेद कुछ भी मालूम
नहीं था इस कारण उनकी पाठशालामें पढ़ने को जानोपड़ा।
प्रभा०-धन्य है धन्य है ऐसे सत्पुरुपको, जैसा तुम कहरहे
हो इसके सुननेसे तो निःसन्देह अवतारी ही प्रतीत होता है,
नहीं तो ऐसा साहस कैसे कर सकता था और ऐसा भेदका गौरव
भी कैसे रहना?हां यह तो कहो फिर आगे क्या हुआ मुझे सुनने

ae
शङ्करविजय-नाटक
ଛୁ?
को बड़ी उत्कंठा होती है, टीलेपरसे धक्का देनेके अनंतर उस
वेदके प्रेमीने कौन काम करनेका प्रारंभ किया है ? ।
नील. उसने अब यह विचार किया है कि मैं बौद्धों का प्रकट
शत्रु होगया,
और र अब यदि निराश्रय रहा तो यह नीच मेरे
प्राण लेने में कुछ उठा न रक्खेंगे इस कारण राजाका आश्रय
लेकर एक बार उनके साथ वाद विवाद करूँ, फिर यश वा
अपयश मिलना ईश्वर के अधीन है।
प्रभा०-ओः यहांतक वात पहुँचगई ? अभी तक ब्राह्मण को
ईश्वर भरोसे पर ऐसा अभिमान है ? मित्र ! खाज तुमने मुझ
को यह गिय समाचार सुनाया इसके लिये मैं तुमको बहुत २
धन्यवाद देता हूँ।
नील-मित्र ! पहिले यह चमत्कार तो देखो (परदेकी ओर
को दिखलाना है ) बहुतसे ब्राह्मण जिनमें वह वेदाभिमानी
परमपण्डित भट्टपाद भी तारागों में शऋतुके पूर्ण चन्द्रमा
की समान शोभा पारहे हैं पुस्तकोंके ढेर लिये हुए राजमहल
की ओरको चले जारहे हैं, न जाने अव क्या चमत्कार होगा,
भाई इसको देखने का अवसर हमें न खोना चाहिये, चला हम
भी इनके ही साथ होले
दोनों जाते हैं
तीसरा-दृश्य-राजमहल
(आसन पर बैठे हुए सुधन्वाका प्रवेश)
राजा-क्या करूँ?न जाने ईश्वर इन पाखण्डियों के संगसे मुझे
छुटावेगा या नहीं, अब यह अधम आगे पीछे भाकर यहां धन्ना
देंगे और दूषित पाणीसे बड़ बड़ करेंगे, मैं उसको सुनूँगा ही
नहीं, इस सब समूहमें मेरी इच्छाके अनुसार दान करने वाला
केवल एक मेरा मन्त्री ही है,बस उन दुष्टोकी वाद सुनकर तपे

शङ्करविजय-नाटक २५ हुए हृदयको शान्ति तो उस प्रिय मन्त्रीके भाषणसे ही होती है। ( परदेकी भोरको देखकर उधर कौन है रे ? इतने हीमें द्वार- पाल आता है)। द्वारपाल महाराज मैं दासानुदास हाजिर हूँ (प्रणाम करता है) राजा-अरे दुर्मुख ! विजयपाल मन्त्रीको बुला ला । द्वारपाल-जो आज्ञा ( ऐसा कहकर परदेके भीतर जाता है और फिर मन्त्रीके साथ प्रवेश करता हुआ मन्त्रीसे कहता है) चलिये, श्रीमहारान कुछ आज्ञा करने के लिये इधरको दृष्टि लगाए बैठे हैं। मन्त्री-(सिंहासनके समीप जा प्रणाम करके ) महाराजकी जय हो, श्रीमहाराजने इस दासको कौन आज्ञा करनेके लिये स्मरण किया है। राजा-प्यारे मन्त्री ! समझ बूझकर दुराचरण करना और निजजनोंको विरुद्ध आचरण करना, यह दोनों ही परम दुःख की बात हैं, यह दोनों ही बातें जिसके गले पड़ें वह माणी मेरे संमझमें इस दुःखको नरकवाससे भी अधिक मानेगा, गन्त्री ! मुझे सार्वभौम पद मिला है, भसंख्य धन है, अमृत पीने के सिवाय इन्द्रपदका सबही सुख है, यह कहना अनुचित नहीं है। परन्तु उन ऊपर कहीं दोनों बातोंकी झंझटमें पड़जानेसे मुझे यह अपने प्राण भी भार मालूम होरहे हैं, जैसे औषध न मिलने के कारण रोग बढ़कर शरीरको क्षीण करडालता है, तैसे ही मेरी यह पीड़ा बहुत बढ़गई है भतः अब मुझे निश्चय होगया कि यह माणों को लेकर ही मेरा पीछा छोड़ेगी। मंत्री-महाराज ! श्रीमहाराजके इस गूढ भाषणको यह गन्द- 'मति स्पष्ट रूपसे नहीं समझ सकता, इसलिये एकबार फिर स्पष्टरूपसे कहनेका परिश्रम करिये । - . 4

शाविजय-नाटक
الماليها -
राजा-मंत्री ! इसमें गूढ ही क्या है, भाई इस बौद्धधर्मको
देदवाहा समझ न्यूझकर पातक करने पड़ते हैं और राजनीति
निजजनों के प्रतिकूल कार्य कराती है, देखे। यह दोनों ही काम
सुझ एकके हागसे होने के कारण मारणात संकट होरहा है
मंत्री-राजाधिराज ! ऐसे अधीर न हृनिये, यद यच हारे
के स्थान पर पहुँच भी जाय ते वह उस स्थान पर बहुत दिनों
तक नहीं रह सकत्ता, परीक्षाके समय काचा काचे। मणिणि
कार कान ही होगा और हीरा हीरादी होगा, हे स्वधर्मपाखरू !
आप अपने चित्त में कुछ भी खेद न मानिन्छ ।
राजा-हाँ ! अच्छा स्मरण आया, च्या कोई ब्राह्मण कुल
का उद्धारकर्ता भपाद उत्पन्न हुआ है ? तुमने ही तो मुझसे
कहा था कि कहीं से गुप्तपत्र में यह समाचार अाया है, उसकी
सत्यताके विषयमें कोई दूसरा समार गिला क्या ?
मंत्री-महाराज और प्रमाणही फौन आवश्यकता है, वह
भट्टपाद ही अनेकों श्रेष्ठ ब्राह्मणों सहित फल श्रीमान्के नगरमें
पाकर एक शिवालयमें ठहर रहे हैं वह आज राजसभामें भी
आने वाले हैं।
राजा-(प्रसन्न होकर ) ओहो ! क्या यहाँ उनका शुभा-
गमन हुआ है।
मंत्री-हां हाँ, जब मैंने यह समाचार अपने दूतके मुख से सुना
उसी समय शिवालय में गया और अपनी आंखोंसे देखकर निश्चय
कर आया हूँ।
राजा-मंत्री ? तुम धन्यहो, उन महाभागके दर्शन करके तुग
पवित्र होगए, इस अधपको न जाने कच दर्शन होंगे।
गन्त्री महाराज ! साबधान हूजिये, यह सभामें नित्य आने
चाले जैन, कापालिक, दिगम्बर भैरती क्षपणक आदि पण्डित
श्रीरहे हैं।

on पावरविजय-नाटक क राजा हे ईश्वरं ! इन वेदनिन्दकों का तो सुख न दिखा ( इतनेही में पूर्वोक्त सव एंडित क्रमसे आकर राजाकी जय हो, ऐसा कहने हुये अपने २ स्थान पर बैठते हैं ) रागा- मागर होय रखकर ) में सच पण्डितोंको अभिया- दान करता हूँ। एंडित-पहारनके मनोरथ सिद्ध हो । (इनने ही द्वारपाल वड़ाया हुआ शाता है। हारपात-( हाथ जोड़े हुए प्रणाम करके ) पृथ्वीनाथ ! किननेही ब्राह्मण रागद्वार पर आकर खड़े हैं और श्रीमान से पिने की इच्छा करते हैं, जैसी आज्ञा हो वही किया जाय । जनपरिडत-(चीन में ही ) राजन् ! तुम्हारे समय ब्राह्मणों का आयागमन बहुत बढगया है, परन्तु यह हमारे कुलाचार के प्रतिकूल है. ऐसा करने से तुम्हारे ऊपर बुद्धं भगवान का कोप होगा,इस कारण उन ब्राह्मणों को सभा श्रानेकी याज्ञा न दीजिये सजा-(मन्त्री मद मोरको छुख करके ) क्यों मन्त्री ! मेरी उस समय कही हुई दोनों बातें सामने आई न ? ( पंडितों की औरोह फिरकर ) महाराज ऐसा करना राजनीतिक विरुद्ध है, राजधर्म सब जाति के लिये एक समान है, वह ब्राह्मण शिलीसे कष्ट पाकर प्रार्थना करनेके आये होंगे, अथवा उनने चारोंने लूट लिया होगा इससे रक्षा चाहने आये होंगे, कभी कोई चात तो मालूम हुई ही नहीं, यदि इस दशामें उनकी प्रार्थना नहीं सुनूँगा तो; प्रजा मुझे अच्छा नहीं कहेगी, इस कारण मुझे उनसे अवश्य ही मिलना चाहिये और उनका उचित सन्मानभी करना चाहिये, (द्वारपाल से ) जा रे ! उनको गणतषामें आने दे (मंत्री से ) सचिन ! उनके बैठने के लिये मेरे दाहिनी ओर सुपर्णक. सिंहासन मँगवाकर विनामो। .

२८
शङ्कर विजय-नाटक
Law
मन्त्री-जो आज्ञा है महाराज ! (ऐसा कहकर सिंहासन विछ
दाता है)।
बौद्धादि सब पंडित दाँतोंसे पोठोंको चवाते और कानाफूसी करते
हुए मौन होकर जहाँ के तहाँ बठे रहते हैं, इतने हीमें ब्राह्मणोंके समूहके
साथ भट्टपाद प्रवेश करते हैं, राजा उनके संमुख जा साथ लाकर
आसन पर बैठाता है
राजा-(बड़ी प्रसन्नताके साथ प्रणाम करके ) आपके दर्शन
से मैं धन्य भौर परम कृतार्थ हुआ इस चरणधूलिसे मेरा घर
पवित्र होगगा (शरीरको रोमांचित करके ) आहा ! यह कैसे
आनंदका संगय है, मानो इस आलसीके ऊपर,सकल जगतका
उद्धार करनेवाली और आध्यात्मिक माधिदैविक आधिभौतिक
इन तीनों तापोंको भस्म करनेवाली श्रीगंगाजीका प्रवाह आपड़ा।
मानोराजसूय अश्वमेधादि अनेकों पज्ञ और बड़े व्रत करनेपर
भी जो फल मिलना कठिन है वह सहजमेंही मेरे हाथमें आगया
अधिक यथा कहुँ, भाजके आनंदका मैं वर्णन नहीं कर सकता,
प्रतीत होता है मुझे भनेको जन्मों में संचित करेहुए अपने सुरुमा
का यह फल मिला है, अच्छा कहिये महाराज ! कौनसी आज्ञा
करने के लिये आपने स्वयं यहांतफ आनेका परिश्रम किया है,
इस वातको जानने के लिये यह दास उत्कंठित होरहा है।
सब जैनचौद्ध (कानोंपर हाथ रखकर) अहन् भहन् अहन ऐसी
भक्ति ! ऐसी स्तुति ! अरे चांडाल ! हमारे सामने ही तू ऐसा
करता है (आकाशकी भोर देखकर ) भगवान् सुगत ! गोंको
पसवान खिलानेवाले इस कुल कलंकका तुम नाश क्यों नहीं
करते ।
भटटपाद-राजन् ! तुम सफल वर्णाश्रमों का पालन करनेवाले
हो, इसकारण केवल तुम्हारा दर्शन करनेकी इच्छा थी (मनमें )
यह अनेकों चौद्ध पंडित मैठे है कोई कारण खड़ा करके इनके

शङ्करविजय-नाटक २९ साथ वाद विवाद करना चाहिये जयं भायें हैं तो कुछ तो करके चलें [इनने हीमें एक कोकिल वोली उसके शब्दको सुनकर ] धन्य कोकिले ! धन्य है तेरा नर कानोंको कैसा मधुर लगता हैं तेरे इस अलौकिक गुणसे लोगोंको तेरे ऊपर प्रीति करना चाहिये परन्तु लोग इसकारण तुझसे प्रीति नहीं करते कि नीच काकोंसे तेरा संग होगया है; नहीं तो जैसे लोग तोतेको पिंजरे रखकर मानंद पाते हैं, तैसे ही तुझको भी अपने पास रखते, कुतंग सकल गुणों का नाश करके जहाँ तहां तिरस्कार कराकर दुतकार दिलाता है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण यही है कि यह राजा सुधन्वा कैसा गुणसम्पन्न, परमदयालु, दानशूर और सत्यप्रतिज्ञ है परन्तु इन नीच वेदनिन्दक बौद्धों के संगसे लोग इसका तिरस्कार करते हैं (राजाकी ओरको) राजन् ! यह वेद. निंदक द्वेषपूर्ण बौद्ध तेरी संगति के योग्य नहीं हैं, महारोग सहा जासकता है परन्तु इन नीचोंका मुख देखना सह्य नहीं होता, हे निष्कलंक राजन् ! तुझमें और इनमें बड़ा अन्तर है, तू रत्न समान है यह जहरीले पत्थरकी सगान हैं तू राजहंसकी समान है यह काफकी समान है इसकारण तुझको इनके संगसे पचना चाहिये। बौद्धकिशोर-('दुःखित होफर ) अरे गिथ्याभाषी ! इस राजसपामें अतिथिकी समान आकर इस डरपोक राजाके देखते हुए, तू हम निष्पापोंकी निंदा करता है ? अरे नीच ब्राह्मण ! तुझे ऐसा बड़ा घमण्ड किसके भरोसे पर है ? भरे कृतघ्न ! हमारी ही पाठशालामें कपटरूपसे पढ़कर हमारे ही. ऊपर फिर पड़ा है, समझरख इन असंख्य पातकों का दंड पाये बिना त इस राजसभाके बाहर जीवित नहीं जासकेगा। भट्टपाद -( हाथ उठाकर ) अरे भ्रष्टपशु ! मैंने तुम्हारों शालामें पढ़कर तुम्हारे शास्त्रोंका भेद जागलिया है. भव मैं १ पारविजय-नाटक केवल निंदा करके ही तुपको नहीं छोडूंगा, किंतु आज इस सभामें ही युक्तिरूपी कुल्वाड़ीसे तुम्हारे सिद्धांतरूप इतके खंड खंड करके तुम्हें धूलि में मिलादूँगा, भरे !आजतक तुमने जितने ब्राह्मणोंका इस थोथे गतसे तिरस्कार किया है उनमें मुझे न समझना, (छातीपर हाथ रखकर ) किन्तु गह बौद्ध संतान धूमकेतु भट्टाद है तुमको जो कुछ प्रश्न करने हों करो। कविकाश-(आग्रेको सरकार) अरे भ्रष्टकुलसंगात ब्राह्मण ! तू जिस मतका अभिमान रखकर इतना उन्मत्त हो ऐसा साहस करने के उद्या हुआ है, उसमें कौनसी बात सत्य है ? शरीरपर राख गल, वन में रहकर तथा निराहार बन रखकर वर्षा और धूको सहने से यदि मुक्ति मिलनी तो खाना पीना छोड़कर. वर्णानक धूप और वर्षा को सहने वासे पत्थर बाज कहीं दीखते भी नहीं सवही मुक्त होगये होते, अरे । ऐसा भिखारी मतं, गृह- संगोंको ठाकर पेट भरने के लिये तुमने ही अपने मनसे गढकर चलाया है, क्या पए डेन कभी ऐसे गनका सन्मान कर सकते हैं। भपाद-अरे नास्तिक! हमारे गतके तत्वको न जानकर अट्ट सट्ट बातें बनाने से क्या तू मुझको जीत सकेगा ! करे! जड़ और चैनन्यकी एकता करने वाला तू हमारे मतको क्या जान सकता है ? मट्टो और कस्तूरी का भेद है ऐसा यदि किसी गधेसे बुझा जाए तो वह एकसा रंग होने से दोनों को एक ही बतायेगा, सर्वत्र दृष्टान और दान्ति की पूर्ण समना नहीं होती है, इस चातको जो नहीं जानता है ऐसे नादमें यदि आगे वह तो उसके दांत टूटेबिना नहीं रह सक्ते, इस लिये गरे महामूर्ख ! पीछेको इट बौद्रकिशोर-अरे बिना पूँछ सींगके पशु ! तुम्हें मिष्टान्न खाने की इच्छा होनी है तो श्राद्धके बहानेसे पक्कान खाते हो और कहते हो कि इससे पितर तृप्त होते हैं,यदि यह सत्य है शो-दीपक बुझनाने पर तेल डाल देने से वह दीपक फ़िर प्रज्वलित होजाना विजय-नाटक ब चाहिये, तैपेहो हम मांस भक्षण नहीं करते हैं, लोगोंको एमा ढङ्ग दिखाकर जव मांस भक्षणकी इच्छा होती है तब यज्ञके नहाने से हिंसा कर के मांस खाते हो और कहते हो कि "वैदिकी हिंसा दिसा न भवति" अर्थात् वेदकी हिंसा हिंसा नहीं है किन्तु यज्ञ में वध किया हुप्रा.पशु अपने बयालीस पूर्वगों सहित स्वर्ग को जाता है, फिर उस यज्ञके करने वालेको न जाने कितना फल मिलेगा ? इसपर हम कहते हैं कि पितरोंको स्वर्ग देनेके लिये जो कहते हो उसमें आने मा बापका वध क्यों नहीं करते हो ? अर्थात् पशु के स्थानमें तुम्हारे मा बाप ही वशालीस पूर्व पुरुषों संहिन स्वर्गको चलेगागे और तुम्हारी मांस भत्तणफी इच्छा भी पूरी होजायगी। भट्टाद-अरे ! यकवादी ! इसका उत्तर मैं तुझे थोड़े ही में देता हूँ, यह सब काम वेद के प्रमाणसे किये जाते हैं, और यज्ञ याग जप तप आदि सन साधन वेदने ही बताये हैं,इसकारण उन वेदों की अप्रमाणता सिद्ध करे विना इ में कहे।हुए कर्म असत्य सिद्धनहीं होसकते,यदि शक्ति हो तो वेदशी अपमाणता सिद्ध करो अपरसिंह-(वीनमें ही.) पित्रों ! अब गड़बड़ न करो, अव मेरे हाथ में आगया, अब मैं इसको वौद्धगतकी निंदाका क्या फल मिलता है सो दिखाये देता हूँ अरे वैल ! तू जिन वेदों को पवित्र मानता है उन वेदोंके ऊपर लात मारने वाले हम चौद्ध क्या उन वेदोंको अप्रमाण कहने में डरते हैं ? मैं स्पष्ट कहता हूँ कि- तुम्हारे वेद असत्यका भएडार हैं नहीं तो उनकी सत्यता दिखा भट्टपाद-भरे चौद्धबालक ! बता किस प्रकारकी सत्यता देखना चाहता है, परन्तु वादकी रीतिको न छोड़ना । अपरसिंह-अरे ब्राह्मण के वालक ! उन वेदोंका जो अर्थ हो उसकी सत्यता पत्रात करके दिखा, तब तेरी बात ठीकहो।

३३ शङ्करविजय-नाटक 7 भदपाद-अरे पाचाल ! वेद अनन्त हैं, उनमें से हरएक अर्थ की सत्यता दिखानेके लिये तो असंख्यों वर्ष चाहिये, फिर हमारे इस विवादका निर्णय कैसे होगा ? | अगरसिंह-अरे ! पकते हुए भातके सब कण नहीं देखे जाते हैं, किन्तु एक कण देख लेनेसे ही 'मालूम होजाता है तैसे ही अपने वेदोमके किसी एक पर्थकी तो सत्यता दिखा बस हम मानलेंगे। भट्टपाद-(संतुष्ट होकर ) यह कौन चात है ? अरे नीचे ! मेरी विजय तो होगई (गनासे ) राजन् ! आप मध्यस्थ होकर देखिये, अब मैं इनको जीते लेता हूँ, अरे वेद-निंदक नीच बौद्ध ! मैं कहता हूँ, इस श्रुतिके अर्थपर ध्यान दे । अमरसिंह-दिया दिगा, चोल अब वह कौनसी श्रति है, मैं सब जानता हूँ, तुम्हारे वेदकी पकवकमै ईश्वरके सहस्र मुख चार सहस्र चरण, बस ऐसी ही बातें भरी हैं, उनमें से तुझे कौनसी सत्यार्थ के श्रुतिका स्मरण है चोल ? । भट्टपाद-तो क्या ऐसा हो नहीं सकता है?सुन-'अग्निहिमस्य भेषजम्' क्योंरे मिथ्याभाषी ! इस श्रुतिका अर्थ तू जानता है ? अमरसिंह- मेरे जाननेको रहने दे, तू ही बता, इस श्रुतिमें क्या कलाद है। भट्टपाद-अरे अधम ! 'अग्निः' भाग 'हिमस्या शीतकी 'भेषजम्' औषध है; अब इसकी सत्यताको तू अपने आप प्रत्यक्ष करदेख, गनुष्यको शीत लगनेपर, अग्निकुण्डके समीप जाकर तापनेसे शीत जाता रहता है, क्यों वेद प्रमाणभूत होकर उसमें कहुए सफलधर्म सत्य होनेपर, उसकी निन्दा करने वाले तुम दंडके योग्य हो या नहीं (इतना कहते ही सब ब्राह्मण-जीत लिया, जीतलिया ऐसा कहकर तालिये बजाते और अँगोछे उछालते हुए बड़ाभारी कोलाहल करते हैं) - .

३३
सकारविजय-नाटक
पा
सब बौद्ध (बहुन निल्लाकर ) ऐसे निर्णप नहीं हुआ,
यह हपारी बनाई श्रुतिके अर्थको सत्य करके दिखादै ( ऐसा
कहकर वह भी बड़ी कलकल करते हैं, इसपकार कोलाहलसे
सब सभा गूंज उठी)।
राजा-(सब कोलाहल शांत होनेपर वौद्ध पंडितोंसे ) क्यों
पण्डितों ! तुम बादमें हार गये, ब्राह्मणोंने तुमको जीत लिया
अब तुमको और मुम दोनों को इनका शिष्य होना उचित है ।
बौद्धकिशोर-(खिझाकर ) अरेगिलज ! यह क्या कहता
है ? ऐसा यह बौद्ध गत ! क्या एकाध श्रुतिसे खंडित होसकता
है । हम स्पष्ट कहते हैं कि इस श्रुति को नहीं मानते, हग वतावें.उस
श्रुतिके अर्थको यह सत्य कर के दिखावें ।
राजा-(विचारकर) हाँ तो अब वादकी आवश्यकता नहीं है।
मतके सत्य असत्य होनेमें मैं दैवी प्रमाण निकालता हूँ, वह यह
है कि यह नगरके सपीपका पर्वन बहुत ऊँचा है, उसके ऊपरसे
नीचेको कूदकर जो जीवित रहेगा. उसका गत ही सच समझा
जायगा तुग कूदो चाहें ब्राह्मण कूदें।
सब बौद्ध-(आपसमें ) क्यों भाई ! राजाने यह युक्ति तो
अच्छी निकाली, अब उसको ही पर्वतके ऊपरसे कुदाओ बसं
यह दुष्ट अनायासमें ही मरजायगा ऐसे ऊँचे पर्वतके ऊपरसे
गिरकर मनुष्य जीता रह ही नहीं सकता, हाँ तो अमरसिंहजी
तुम ही इस विषयमें, राजासे कहो ।
अमरसिंह-अच्छी बात है ( राजासे ) महाराज ! बात ठीक
है और हम इसको स्वीकार करते हैं, परन्तु वाद करनेको
बाह्मण आया है, इस कारण पहिले इसीको ही कूदना चाहिये
राजा-हे महाराज भट्टरादगी ! मेरी कही हुई परीक्षा देने
को तगारो क्या ?
5

शङ्करविजय-नाटक 05 भट्टपाद-(खड़े होकर ) तयार होनेकी क्या वृझते हो, विलम्ब न करिये अब ही चलिये ( ऐपा कहकर सब ब्राह्मण के साथ चलने लगते हैं) (पर्वतके समीप पहुंचने पर) राजा-(शीघ्रतासे ) चलो तो सब पर्वतके सगीप चले [सव बौद्ध भी चलने लगते हैं] गजा-हे ब्राह्मणकुलभूषण ! वह पर्वत यही है इसके ऊपर से छलांग मारकर यदि तुम अक्षत रहोगे, तो तुम्हारे. मतको यह बौद्ध सचा मानेंगे। भट्टपाद-बहुत अच्छा, ( ऐसा कहकर पर्वत के ऊपर चढ़, हाथ जोडे खडे होकर ) हे वेदपुरुष ? तुम्हारे उद्धार के लिये मैं यह साहस करता हूँ अब यश देना तुम्हारे ही अधीन है। हे कैलाशनाथ शिवजी ! कृपा करिये । अब राजा, सकल बौद्ध, सकल ब्राह्मण और अन्य सफल कौतुकी पुरुष भी मेरी प्रतिज्ञा को सुनो, (ऊँचे स्वरसे) यदि वेद प्रमाण हों यह पातकी बौद्ध निंदित हों तथा सकल ब्राह्मण पूजनीय हो तो इस गिरने में मेरे शरीरको कुछ भी कष्ट न हो, अब सब देखें जय शिव- शंकर जय । (ऐसा कहकर छलांग मार किसी प्रकारका कष्ट न पाता हुआ पृथ्वीपर अक्षत खड़ा होता है)। गाना-(समीपमें आश्चर्यके साथ देखकर ) धन्य धन्य भट्ट- पाद धन्य निःसन्देह तुम्हारा धर्म सत्य है ( ऐसा कहकर हृदय से लगाता है) फविकंठाश-( दुःखित होकर) राजन् ! यह क्या बालकों कासा खेल कररहे हो इस पकार क्या तुम पत्तका निर्णय कर सकते हो । मरे ! मणि, मंत्र, औषध आदिसे ऐसे काम हो सकते हैं । कलको कोई गल्ल आकर इससे भी अधिक ऊँचेसे शहरविजय-नाटक تات वदनायगा तो क्या उसका मत राशा दोजायगा ? भईन् अर्हन् । हम तुम्हारे ऐसे असार वरिको कमी स्वीकार नहीं कर सकते ! राजा-( नेत्रों को लाल २ करके ) अरे आजतक मैंने तुमसे कोई पनि घान नहीं कही, परन्तु अब मैं स्पष्ट कहता हूँ कि तुम महापातकी अधम चांडाल हो, तुगको यह बात माननी. नहीं थी तो इस ब्राह्मण को ऐसा साहस करनेका परिश्रम क्यों दिया ? अच्छा मूर्यो ! अब तुम्हारा निघटाग करता हूँ [ ऐसा कहकर मंत्री को बुला उससे एकोन्तमें कहता है ] मंत्री विजय. पाल ! में जो कुछ कहना हूँ उसको मभी तत्काल इस प्रकार ठीक करलाभो कि के ई जानने न पाएँ । मंत्री-महारान जो भाशा होगी उसको अभी ठीक कर. लाता हूँ। सना मंत्रीके कानमें कहता है ] एक ताँरेके कलशमें शिकार- लानेमेंकर काला सर्प इस प्रकार बंद करलाभो कि कोई जानने न पा और उस कलशका मुख अच्छे प्रकार बंद करके अधी सगामें लेत्रामो, चलो उठो देरं न करो। यंत्री-[ भीतर जाकर मुख बँधा हुआ कलश लिये लौटकर आता है ] महाराज ! आज्ञानुसार यह कलश तयार होकर आगया। राना अच्छा, इसको बीच में रक्खो। (आज्ञाके अनुसार मन्त्री कलश रखता है) राजा-[*चे स्वासे] अब मेरी अंनकी प्रतिज्ञाको सव सुनलो [ कलशकी ओरको अंगुली उठाकर ] इस ताँव कलशमें कोई वस्तु मैंने अपने भाप गुम रूपसे रक्खी है बनानो वह क्या है ? जो सत्य कहेगा उसके ही मतको मैं सच्चा मानकर प्राणों से भी अधिक सममूंगा और जो मिश्गा-बादी ठहरेगा उसका पीन नाश करदूँगा, उसके कुटुंब भरको मरवादूँगा, और अपनी इस से न शङ्करविजय-नाटक प्रतिज्ञामें अंतर करूँ तो अपने बयालीस पूर्व पुरुषों सहित नरक पाऊँ चौद्ध पंडितों ! अब मैं किसी की भी हैं हैं, हैं नहीं सुनूँगा शीघ्र बतायो इसमें क्या है ? सब बौद्ध-[अापसमें । शत्र तो भाई बडी टेढ़ी खीर होगई इस छिपी हुई वस्तुको कैसे समझ सकेंगे हे अर्हन् ! गुरो अब तुम ही रक्षा करोगे। अमरसिंह-अरे भाई ! इतनी पंचायतमें क्यों पढते हो, एक चपणकधर्मी रस्माल मेरा मित्र है वह शकुन देखकर चाहे जैसी गुप्त वस्तु को बता देना है, वस राजासे भागके दिनकी छुट्टी गाँगला, रात को इसमें की वस्तु क्षपणकसे बूझकर प्रातः काल आते ही बतादेंगे, और काम सिद्ध होजावेगा कादो राजासे । चौद्धकिशोर-हे महाराज ! आपने परम दुःखित होकर ऐसी प्रतिज्ञाकी है परन्तु विकारे विना हग इसका उत्तर नहीं देसकेंगे इस लिये कृपा करके हमको भाग के दिन की छुट्टी दीजिये, वस्त्र फलको मातेही इस घटमें जो वस्तु है बनादेंगे। राजा-[भटपादकी ओरको मुख करके ] क्यों महाराज ! इस बात में तुम्हारी कोई हानि तो नहीं है, यह फल उत्तर देने को कहते हैं। भट्टपाद - राजन् ! मेगे अोर से तो निल भर भी विलम्ब नहीं हैं, मुझसे कहिये तो इसमें जो वस्तु है इसी समग वता, यह कल को बताने कहते हैं तो यों ही सही भौर रात भर जीलैं गाना- अच्छा तो चलिये कल. सूर्योदय .हे. ते ही सब · यहाँ होगाय [ मंत्रीसे ] विजयपाल ! मातःकालसे पहिले २ अपने लशकरके सब सबार और सिपाही तोपखानेको लेना- और सभाके भरते ही मनमहल के चारों ओर खडे होजाय, क्योंकि-दोनों मेंसे एक पक्षको तो प्राणान्न दण्ड देना ही होगा इप्त लिये तग तपारी के लिये अभीसे सावधान रहो [ कुछ देर

शङ्करविजय-नाटक
३७
-
विचार कर ] हाँ ! कलशमेंकी नातु के। तुम्हारे सिवाय और
पोई नहीं जानता है, अत: कईदेता हूँ कि यदि किसीने वह भेद
जानलिपा तो तुम्हारा शिर कटवालूँगा अच्छा तो अवसब चलें
[ सब जाते हैं।
चतुर्थ-दृश्य ।
(तदनन्तर मलिनमुख रोता हुआ विदूषक आता है)
विदूपक-( आप ही आप ) न जाने मेरे भागमें क्या लिखा
है . बौद्धाचार्गों के साथ रहनेसे रूपमती स्त्रियों के हाथों से उत्तम
पकवान खाने को मिलने हैं, काम नहीं धाग नहीं, पहिले तो
बस्तीके देवमंदिरमें पड़ा रहता था, झाडू बुहारी देनेसे एकवार
ही खानेको मिल जाता था, अंब तो दिनमें दोवार भोजन मिलता
है, इसी कारण तो ब्राह्मणसे जैन होगया हूँ, परन्तु अब मेग
भाग्ग फूट गया, क्योंकि कोई भट्टपाद ब्राह्मण बौद्रों का विध्वंस.
फरनेको उद्यन होगया है कलको सब बौद्ध और जैनोंके माण
वचना कठिन हैं चारों ओर यही चर्चा फैल रही है अब मैं
क्या करूँ।
( इतने ही में हंसता हुआ सूत्रधार आता है )
सूत्रधार- अरे ! मित्र क्या हु . १ कहो तो सही किसकारण
रोते हुएसे दीख रहे हो।
विदूषक-भाई तुम पारब्धी हो, मैं तुम्हारी हँसी करता था
और तुम्हारे सामने आने सुख की डींग मारता था, परन्तु तुम
अपने धर्मको न छोड़कर ब्रह्मण ही रहे परन्तु मैं उस चौद्ध
संन्यासीकी बातों में आकर झगड़े में पड़गया ऐसा कहकर अति
ऊँचे स्वरसे रोना है)
सूत्रधार-अरे तो ऐसा को घबडा रहा है ? ऐसी कौन सी
विपत्ति भागई जो चीख मार २ कर रोता है ? ।

शङ्करविजय-नाटक
GY
विपक-अरे ! कल को मारे जायँगे फिर ॐ नहीं तो
क्या करूँ ? भाई ! तुम्हारे जाने क्या है; जिसपर पड़ती है
वही जानता है।
सूत्रधार-भाई ! मुझे तो मालूप नहीं कि तुम्हारे ऊपर ऐसी
कौनसी विपत्ति आई है।
विषक-तुम्हें काहेको मालूम होगा ? चतुर हो ना ! सुनो
चौद्ध जैनोंका ब्राह्मणों के साथ पाद विवाद हुआ था फिर
फलशमें कुछ डालकर, राजाने सभामें रख दिया है. उसको जो
नहीं बना सकेगा वही कल मारडाला जायगा, इस कारण ही
मैं रोता हूँ।
सूत्रधार- अरे ! ऐसा क्यों घबड़ाता है, भला तूने यह कैसे
जान लिया कि वौद्ध जैन पंडितोंका ही पराजय होगा
विदूषक -भाई ! कोई घट्ट पैरोंका ब्राह्मण है, उसको दिव्य
ज्ञान है इस कारण वह सहज में ही इनको इरादेगा ऐसा ज्ञान
हमारे भोजनप्रेमी भाइयों को है नहीं ।
सूत्रधार -अरे! उन्होंने सपणक नाम वाले शकुनियेसे उस
वस्तुको जान लिया है, परन्तु देखो कल क्या होता है।
विक्षक-तब तो फिर मैं अब किसी देवतासे भी नहीं डरूँगा
कलको एक उपासकके यहाँ हमारे यतिजीका निमंत्रण है तहाँ
खीर पूरी खाऊँगा और आनन्दसे मठके भीतर पैर फैला
कर सोऊँगा।
सूत्रधार -परन्तु मित्र अब कौतुक देखने के लिये राजमहलको
क्यों नहीं चलते ? देखो यह सब चौद्ध जैनोंके झुड और
ब्राह्मणों के समूह जैसे छत्तपर मक्खि में जाती हैं तिसी प्रकार
गनमहलकी भोरको चले जारहे हैं, चला तो चलो नहीं मैं तो
जाना हूँ।

शङ्करविजय-नाटक
३२
गिद्गा-नहीं भाई में तो नहीं जाऊँगा कहीं बौद्ध जैनोंकी
हार होगई तो मुझको भी स्लीपर चढादेंगे, इस लिये मैं तो
भागा जाता हूँ गदि बौद्ध जैन हार गये तो ब्राह्मण वन जा-
ऊँगा नहीं जैन तो बनारनाया ही हूँ। [ एप्ता कहकर भागना
है और सूत्रधार भी दूसरी भोरको जाता है ।
पञ्चम-दृश्य
(राजा सुधन्वा मन्त्रीका हाथ पकड़े हए आता है)
राजा-मन्त्रिपरा! वह कलश भंडार खानेसे मँगवाकर या
रखवामो और सबों को बुलाने के लिये सिपाही भेजदो
मन्त्री-श्रीमहाराज ! भाज्ञाके अनुसार कलश मँगाकर रख
दिगा है, [ कलशकी मोरको अंगुली दिलाना है ] भव सिपाही
भेननेकी कौन आवश्यकता है या बौद्ध जैन पंडित सत्र आही
गये 'पौर ब्राह्मण, भी भाते ही हैं।
राजा-(घाड़ाकर ) महो मन्त्रिन् ! उन बौद्ध जैनोंके मुखों
को देखकर अनुमान तो करो, प्रसन्न हैं या निम्तेज ?
मंत्री- परदेमें देखकर ) महागज ! उनके मुख तो प्रसन्न
से दीखते हैं इससे मालूप होता है कि यह निर्भय हैं।
राजा ( लंगी सास छोड़कर ) क्या इन नीचोंने कलशमेकी
वस्तुको जान लिया ? प्रधानजी ! यदि ऐसा हुआ तब तो वही
कठिनता होगी, क्योंकि प्रतिज्ञा मैंने बड़ी दारुणकी है।
मंत्री-पहाराज ! आप भय न करें, जैसे पहिले दो बार
प्राह्मणोंको यश मिला है तैसे ही अब भी मिलेगा।
राजा-हो ! मैंने कल जो कहा था तदनुसार सेना तो तयार
हैन ?

शङ्करविजय-नाटक
प
मंत्री-गहाराज ! भाज्ञाके अनुसार सब ठीक है, किसी
मकारसी चिंता न करिये।
( इतने ही में ब्राह्मण चौद्व जैन आकर अपने २ स्थानपर बैठते हैं)
राजा-(सब सभाको भरी हुई देखकर ) मैं दोनों ओरके
पंडितों को प्रणाम करता हूँ।
ब्राह्मण और जैन-(एक साथ ) सदा जय हो ।
राना-प्रधानजी ! अब मेरी अंतकी प्रतिज्ञा इन दोनों
वादियों को सुनादो।
मन्त्री-जो आज्ञा ऐसा कह खड़े होकर 1 मेरे कथनको
सब पंण्डित सुनले [ऊँचे स्वरसे ब्राह्मण के साथ वौद्ध जनों
के मत निषयमें वाद विवाद होकर अंनमें श्रीमहाराजाधिराज
ने यह विचार करलिया है [ कल राकी ओरको अंगुली करके
कि इस कलशमें श्रीमहाराजने अपने आप जो गुप्त वस्तं रक्खी
है; उसको जिप्त पनके पुरुष बतादेंगे उसकां गत सच्चा और जो
न बना सकेंगे उनका मत झूठा समझा जायगा, और जो झूठे
ठहरेंगे उनको कुटुंम्व संहित माणान्त दण्ड देनेके लिये
श्रीमहाराज तो मँगवाकर खड़ी करली हैं भौर राजमहलके
मैदानमें शुली तथा फांसी देनेके खंभे खड़े करदिये गये हैं,यह
बात सब देखलें तब जिन को जो कुछ कहना हो कहैं एकवार
मुख मेंसे अक्षर निकल जानेपर वह राजकृपा या राजदंडके पात्र
हुए विना नहीं बचेंगे और फिर उनकी दूसरी कोई बात नहीं
सुनी जायगी. [ऐसा कहकर अपने आसनपर बैठता है ।
राजा-संघोंने मेरी प्रतिज्ञा तो सुनही ली तो अब मैं फिर प्रश्न
करता हूँ हे बौद्ध पंडितो.! इस कलशमें क्या है वताभो ? ।
बौद्धकिशोर-(बड़े आनन्दके साथ प्रांगेको.बढ़कर श्रीपा
राज ! इस कलशमें महासर्प है।

शङ्करविजय-नाटक . राना-( यह सुनकर सिंहासन परसे नीचे गिरता है और सेवक उठाते हैं) गन्त्री-'घनहाया हुआ समीप आफर ) महाराज ! साद- धान हनिये, सावधान हुनिये कौन है रे ? शीघनासे जल ला [सेक पानी लेकर आता है और मन्त्री उसको रामाके नेत्रों में लगाता है। राजा-सावधान हो माथे पर ाथ रखकर ] शिम ! शिर! मैंने कैसा चांडाल फर्म किया है ! मैं कितना अधम पातकी हूँ ! देव ! मुझ अपयशी पुरुषको ऐसा राज्य क्यों दिया था! निन ब्राह्मणोको दुःखसे छुटाने के लिये मैं उत्कंठित रहता था, हा ! क्या भव उनको मैं गरवाऊँ ! नहीं नहीं चाहें यह मेरा शरीर न रहै, चाहें मेरे पितर नरफमें जायँ परन्तु मैं ऐसा कुकर्म कदापि नहीं करूँगा, हे पन्द्रभाल शंकर ! अव अपना शिरश्छे- दन करडालनेके सिवाग दूसरा कोई उपाय नहीं है ( ऐसा कह गरदनके ऊपरको तलवार उठाता है) भट्टाद -(घबड़ाए हुए आगे जाकर ) हैं हैं, हे सत्यपतिज्ञ राजन् ! यह क्या करते हो ? ( ऐमा कहकर तलवार छीनते हैं) महाराज ! वादका निपटारा करे विना यदि माण खोदोगे तो नरकम पड़ोगे, इस लिये केरल एक पोरकी बात सुनकर ही निर्णय न करो, इस कलशमें बौद्धोंकी. वताई हुई वस्तु नहीं है, जो कुछ है उसको मैं बताता हूँ। राजा-मब क्या सुनूं ( ऐसा कहकर माथेपर हाथ रखता ) अच्छा महाराज ? कहिये २ इसमें क्या है ? भट्टपाद-इसमें सर्प नहीं है, किंतु उस सर्पके ऊपर शयन करने वाले श्रीनारायण की. ताम्रमयी मूर्ति है निकाल कर देखो राजा-मन्त्री ! खोलो इस कलशका मुख । 6 शङ्करविजय-नाटक मन्त्री जो आज्ञा [ ऐसा कहकर कलशका मुख खोलता है और उसके भीतर सर्प न निकलकर ताम्रपयी विष्णु मूर्ति निकलती है। राजा- देखते ही आश्चर्य और आनन्दसे प्रफुल्तिा होकर] आहा हा !! [ जफरको मुख करके ] हे प्रभो पुराण पुरुष । तुम्हारी शक्ति अपार है तुम्हारी माया ब्रह्मादिकों को भी चकित करती है, फिर औरोंकी तो बात ही क्या ? [ब्राह्मणों की ओर को फिरकर ] आहा ! यह कैसा चमत्कार है, मैंने अपने भाप सर्प डाला था इन बौद्ध जैनोंने भी सर्प ही बताया था परन्तु भारन् ! क्या इन ब्राहाणों को यश देने के लिये ही यह सर्पसे मूर्ति होगई ? इससे सिद्ध होता है कि मैं जो कुछ करना चाहता हूँ, उसमें तुम्हारी ही इच्छा है [ मन्त्रीसे क्रोध में होकर ] मन्त्री ! अन देखते क्या हो ? दूतों को बुलाकर इन चांडालोंकी सुशक बँधवाओ इनको यहाँके यहीं मरनादो घसीटो २ इनको मेरे नेत्रों के सामने से घसीटकर लेजाओ [ दूत आकर सबकी सके बाँधकर भीतरको खचेडे हुए लिये जाते हैं, फिर परदेके भीतर बड़ा हाहाकार होता है धड़ाधड़ तोपोंका शब्द होता है तथा अनेकों जैन बौद्ध मारे जाते हैं ] । मन्त्री-( हाथ जोडे हुए आगे जाकर ) श्रीमहाराजकी आज्ञा के अनुसार सबके। दंड देदियागया । राजा-( आनंदके साथ ) किस २ को क्या २ दंड दिया। मन्त्री-पृथनीनाथ ! सुनिये चौद्धकिशोर, अमरसिंह कधि- कंउपाश और जैनेन्द्रकिशोर आदि जो बड़े २ तीनसौ पंडित इस सभामें रन गटित सिंहासनोंपर बैठते थे उनको तोपके मुख से बाँधकर एक साथ उडादिया, शेष सात सौ पंडित जो सीने के सिंहासनपर बैठते थे उनको सूलीपर चढ़ा दिया तथा और जो बहुनसे थे उनमें से कितनों हीको फाँसी देदी और कितने ही का

शहरविजय-नाटक
है
?
शिरश्छेदन करा दिया, एवं नगर के सकल बौद्ध जैनों को दंड
हेनेके लिये हुन झेज दिये हैं और उनको दण्ड देनेका कार बरा-
वर होरहा है।
राना-(प्रसन्न होकर ) हाँ दुष्टों ! तुपको उचितही दण्ड मिला
मन्त्री-श्रीमहाराज ! अब क्या आज्ञा
-सेतुबंध रामेश्वरसे लेकर हिमालय पर्यन्त, इधर पूर्व समुद्र
से एक्षिण समुद्र पर्यन्त चौद्ध जैनोंशी स्त्री हो चालक हो, बूढ़े हों,
रहण हो सबोंको खटक एकह कर यादराजका अतिधि इना
क्षे, यही मेरी आज्ञा है और राज्य में हूँढोस पिटवादा कि जो
बौद्ध जनों को आश्रय देगा उसका कुटुम्ब निर्मूल करा दिया
जायगा 'चाहे स को छोड़ा परन्तु . बौद्ध जैनोंको न छोडो'
ऐसी बाबा लिख मुहर लगा सर्वत्र भेजा
मन्त्री-जो पाशा श्रीमहाराजकी [ ऐसा कहकर जाता है ।
राजा-मुनिवर ! आपकी कृपासे मैं इन नीचोंके संग छूट
प्रया । कहिये प्रागेको अब और क्या आज्ञा है ?
भट्टपाद-राजन् ! जबतक सूर्ग चन्द्रमा रहेंगे तबतक तुम्हारी
कीर्ति रहेगी, अब मैं मंडन मिश्रकी सहायतासे कर्मज्ञांडकी
प्रवृत्ति करूँगा अब हमारे कार्यमें कोई विघ्न नहीं करा सकेगा,
अच्छा तो अब मैं जाता हूँ [ ऐसा कहकर सब ब्राह्मणों के साथ
उठकर खड़े होते हैं ।
राजा-( उठ कर नमस्कार करके ) महाराज ! इस दासानु-
दासके ऊपर अनुग्रह बनाए रखिए ।
भट्टाद-राजा तेरे ऊपर तो सर्वेश्वर परमात्माकाही भनुग्रह
है नहीं तो यह यश क्योंकर मिलता अच्छा अब हम जाते हैं,
आप बैठिये (ऐसा कहकर सबके साथ चलने लगते हैं )।
राजा-मैं भी आपको पहुँचाने के लिये राजद्वारतक चलता हूँ।
(ऐसा कहकर सब जाते हैं)

୨୫ शङ्करविजय-नाटक- को हृतीय-अंका प्रथम-दृश्य-केरल-देशका एक ग्राम । (भोजनसे निवटकर डकारें लेते हुए शिवगुरुका प्रवेश । शिवगुरु-(पेटपर वायां हाथ फेरकर) प्रातापिक्षितो येन वातापिश्च महाबलः। अगस्त्यस्य प्रसादेन भोजनं मम जीयताम् ।। [ऐसा कहकर आसनपर बैठते हैं ] हे जगदीश्वर ! इस ब्रह्माण्डको रचने वाली आपकी माया बड़ी प्रबल है ! इस संसारमें आप किसीको सुखी नहीं रखते हैं जिनको विद्या है उनको अन्न नहीं है जिनको पूरा २ अन्न वस्त्र प्राप्त है उनको विद्या नहीं है । हे परमेश्वर ! इस त्रिलोकीमें आपके सिवाय दूसरा कोई सुखी नहीं है, मेरे पास पूरी२ सम्पत्ति है, विद्या है और स्त्री भी सुन्दरी सुशीला चित्तके अनुकूल वीष करनेवाली है, परन्तु वंशको चलाने वाली संतान नहीं है, यह चिंता मेरे सब सुखों को नष्ट करके शरीरको भी झुत्तसाये देती है,यह देखो वह चम्पकवदनी भोजनसे निपटते ही मेरे लिये ताम्बूलका पान लारही है हे शिव ! इस चन्द्रवदनीके मुखको भी तो पुत्रकी चिंताने पीड़ित करडाला है। ( हाथमे पानोंका डब्बा लिये हुए विशिष्टा आती है) शिवगुरु-प्रोमो प्रिये ! क्या इतने हीमें भोजन जीमलिया ? मुझको प्रतीत होता है तू पेटभर भोजन भी नहीं करती है (इतना कह हाथ पकड़कर समीप नेठाते हैं )। विशिष्टा-(नीचेको मुख करके ) नाथ ! स्त्रियों को भोजन जीमने में देरही कितनी लगती है ? शिवगुरु प्रिये ! मैं समझता हूँ पुत्रचिन्ताकी समान दूसरा कोई रोग नहीं है, चितासे चिंतामें एक चिन्दु अधिक ही है यही शहर विजय-नाटक कारण है कि निता तो मरे हुएको भस्म करती है परन्तु चिंता जीतेहुएको ही निरन्तर जलानी रहती है । विशिष्टा पाणनाथ ! यह चिंता भकेली मुझको ही नहीं आपको भी दुःखित रखती है ! मैं ऊपर दिखानी हूँ और भाप हृदयकी हृदय में ही रखते हैं बस इतना ही अन्तर है। शिगुरु प्रिये ! सत्य कहती है, यही दशा है !, सन्तानके विषपमें पुरुषोंको स्त्रियों की समान अधीर होना शोभा नहीं देता है, परन्तु मैं सत्य कहता हूँ कि मुझको भी धीरज नहीं है क्योंकि वेद कहना है पुत्रहीनकी परलोकमें सद्गति नहीं है और भय सन्तान होने की तो कुछ आशा ही नहीं है, व्रत जप आदि सब ही कुछ कर छोड़ा परन्तु मनोरथ पूरा नहीं हुआ इसकारण अब मेरे नित्त में तो वैराग्यसा होरहा है सो मैं तो अब संन्यास धारकर परम तत्त्त का विचार करता हुआ आयुके शेष रहे हुए दिनोंको पिताऊँगा। रिशिष्टा--(खिन्न होकर ) आप तो संन्यास धारकर या और चाहे जो कुछ करके अपने शरीरको सफल कर ही लेंगे, परन्तु मेरी कौन गति होगी, इसकी आपको कुछ चिन्ता नहीं है ! हाँ ! मेरे चित्तमें एक वात और आती है सुनो तो कहूँ ? शिरगुरु-हाँ हाँ ! भवश्य कहना चाहिये, यदि बचेगा तो उसको भी कर देनूंगा। विशिष्टा-इस ग्राममें भाजकलही एक शिवनीकी मूर्ति भपने आप पकट हुई है उसकी बड़ी जागती कला है, सब ग्राम उस विग्रह मूनिका पूजन करता है, सो चलो हम दोनों भी सब प्रपंच और घग्द्वारको छोड़कर उस देवमंदिर में रहते हुए उन शंकर भगवान् की भक्ति करें और यह भटल प्रतिज्ञा करलें कि मनो- रथ पूरा हुए बिना घाको नहीं जायँगे और अन्न जल भी नहीं करेंगे ऐसे निगममें यदि प्राण भी जाते रहेंगे, तो कुछ - शङ्करविजय-नाटक मस चिन्ता नहीं क्योंकि दूसरे जन्म में तो पुत्र हीन नहीं होंगे, आगे जैसी आपकी इच्छा हो। शिवगुरु -ठीक ठीक, वहुत ठीक है परन्तु प्रिये ! तुमसे यह साधना होना कठिन है, क्योंकि एक दिनका भी निराहार होने एर तुग अशक्त होनाओगी, उठना बैठना भी कठिन होनायगा इस कारण तुम घरको 'सम्हालो और मैं शिवालयमें जाकर लपस्या करता हूँ। विशिष्टा प्राणनाथ ! आप ऐसा विचार न करें, इस विषय में मैं आपसे अधिक दृढ हूँ, मेरी कुछ चिंता न करिये, मैं तो पहिले ही निश्रय करचुकी हूँ, इसकारण किसी प्रकार घर नहीं रह सकती, आपकी इच्छा हो तो घर रह जाइये । शिवगुरु-अच्छा तो (परदेकी अोरको देखकर) कौन हैरे? इनना सुनते ही सुबुदि नामक शिष्य आता है)। मुत्रुद्धि-गुरुजी ! क्या आज्ञा है ? रु-देखो भैया ! हम दोनों ! देवमन्दिर में जाकर करेंगे, इसमें हमको जितने दिन लगेंगे तब तक घरकी सब देख भाल तुम्हारे ऊपर छोड़ते हैं, देखो प्रतिदिन देवालयमें जाकर हमारी सुध लेते रहना और अग्निहोत्रकी व्यवस्था ठीक रखना सुबुद्ध (हाथ जोड़कर ) महाराज ! यह दास हरसमय आज्ञा पालन करनेको तयार है। शिवगुरु-जरा पचाङ्ग तो ला, देखू आजका दिन कैसा है सुत्रुद्धि - लाया महाराज ! ( ऐसा कहकर भीतर जाता और गंञ्चाङ्ग लाकर शिवगुरुके हाथमें देता है) शिवगुरु -( पञ्चाङ्ग देखकर ) अरे वा! आज तो बुधवारमें अनुगधा नक्षत्र होनेसे अमृतसिद्धियोग है; पिये ! चलो भान ही देवमंदिरमें चलकर नियमका आरम्भ करें। विशिष्टा मैं तो तयार हूँ ( ऐसा कहकर सब जाते हैं)। - , सादरविजय-नाटक १७ । द्वितीय दृश्य-भूलोक-मायापुरी। ( चारों ओर अन्धकार छारहा है )। (गम्भीरभावसे माया बेटी है और उसके सन्मुख प्रारब्ध हड़ी है ) माया-(लंबी सांस लेकर ) हे प्रारब्ध ! इस अनंत संसार में तू धन्य है, भूतलार तेरी लीलाकी बलिहारी हूँ। प्रारब्ध -मैया : तेरी कृपाले निना मेरी क्या शक्ति है ? मैगा ! भला मैं कौन कार्य करसक्ती हूँ ! जिस शक्ति के प्रभाव से मैं त्रिलोकीमें बिना पाती हूँ उस शक्तिकी मूल तो तू ही है अरी मा महामाये ! तेरी कुछ एक चेष्टासे ही अनन्त संसार मोहमें पड़ा है, जगत् भर कठपुतलीकी समान तेरे अधीन है। माया-अरी प्रारब्ध ! मैं तो बड़े जंजालमें पड़ रही हूँ रक्षा पाने का कोई उपाय नहीं दीखता, एक ओर तो ब्रह्माजीकी आज्ञा, कि ज्ञानामृत पीकर पात्र अपात्र सब मुक्त हों, परन्तु दूसरी ओर देखती हूँ तो ऐसा होनेसे मंगल नहीं है यदि संसारमें दुःख नहीं होता तो सुखका आदर कौन करता ? जीव के लिये तो सुख दुःख दोनों ही चाहिये, नहीं तो संसारकी मर्यादा कैसे रहसकती है इसीकारण कहती हूँ कि इस सदाके नियम के टूटने पर न जाने क्या फल होगा! पारध-मपा ! तू इच्छागगी है. जो इच्छा करेगी वही सिद्ध होगी, अब क्या मैं ब्रह्माजीसे यह सब निवेदन कर, ? माया हाँ ! उनसे कहना कि जगत् भरके पूर्ण ज्ञान पाने पर संसारकी सृष्टि करना ही निरर्थक होजायगा, क्योंकि ज्ञान और अज्ञान दोनों ही होनेसे संसार ठहर सकता है, जैसा कि पहिले से चला आता है, हां श्रीशंकरके प्रभावसे इतना विशेष होना चाहिये कि ज्ञानकी वृद्धि हो उसके प्रकाशमें महापापी भी मोहान्य नेत्रों को खोलकर अपनी दशाकों देखें।

शङ्करविजय-नाटक भारत मैगा ! जो तुम्हारी आज्ञा, अच्छा तो अब मैं जाकर यह सब समानार-ब्रह्माजीको सुनाती हूँ। मागा-मैं आशीश देती हूँ कि तेरा मनोरथ सफल हो । प्रणाम करके प्रारम्पका जाना और दूसरी ओरसे पापको बढ़ानेवाले काम क्रोध लोभ मोह मद और मात्सर्यका भयानक वेशमें नाचते गाते हुए पाना। सदागाइये गावे जयमातमाया । कपाकारसेजिसकीवलहमने पाया। हैमाकीसन्तानहमसवमुखारी। रचेहमसदाजगजंजालभारी। सभीनीचशंकित रहेंहमसे निशदिन । हमारेनचायेनचेंपलघड़ी छिन। अटल राज्यमायामेहमराजा । प्रजा सब हमारीकरैंकामकाजा। हो मापाकी जगमेंस दाजयर । कहोमिलकेभाईसदानयसदाजय । काम-यह क्या मातः ! अाज तुमको खिन्न क्यों देख रहा हूँ ! आज ऐसी दशा क्यों है ? मैगा क्या मेरे प्रभावको भूल गई ? मैं काम हूँ माना अधिक परिचय क्या दूँ तू जानती ही है, सर जीन मेरे खेलनेके खिलोने हैं क्या मेरे काममें कुछ ढिलाईहुई है ? क्रोध-साल भूनल मेरी मुहीमें है पल भरमें सारी त्रिलोकी को जलाफर खाफ फरसफता हूँ ऐसा फोन है, जो क्रोध इस नामको सुनकर न डरता हो,भूमिपर ऐसा कौन जीव है जो मुझ से बचा हो ? मेरी मूर्ति रक्तवर्ण है जहाँ चाहता हूँ तहाँ ही चारों ओर रक्त बहा देता हूँ, मैया ! तुझसे कौन वात छिपी है जिसका परिचय दूँ, क्या मुझसे कोई अपराध होगया है । लोभ-मेरी लामो लामो कभी पूरी होती ही नहीं इस भूतल पर ऐसा कौन है जो मेरे चुङ्गलसे बचा हो ? मातः ! जगत् भर के जीच मुझसे परम प्रेम करते हैं और मैं भी सदा उनके शिर पर सवार रहता हूँ, और.. सबके शुभकार्यों में जैसे बनता है तैसे विघ्न डालता हूँ क्या मेरे किसी काममें गड़बड़ी हुई है ? । . ?

माङ्करविजय-नाटक st प्स मोह-मैया ! मेरा सदा यही काम है कि सबको लाकर तेरे चक्र जालमें फँसाना, जो कोई मेरे षशमें भाकर 'मैं-मेरा' यह बोली बोलने लगता है उसीके दोनों लोगों का नाश करडालता. हूँ ! मेरा नाम मोह है फिर मेरे काम भी संसारमें नामके अनुसार ही होते हैं,ऐसा कौन जीव है कि जिसपर मेरी प्रभुता न हो ? मातः ! मेरे किसी कार्यमें असावधानी हुई है क्या ? पद-'मैं बड़ा हूँ, मैं बड़ा हूँ, मेरासा ऐश्चर्य भूतलपर किसका है ?' बस यही मेरा मूलमंत्र है, इस मंत्रके प्रभावसे कौनसा जीव उन्मत्त नहीं है? और ऐसा कौन है जो मेरे चशमें न हो ? नजाने कितने राजा, रानी, पण्डित और सज्जनों को मैंने इस अहंताके जाल में डालकर ग्रस लिया है। मुझसे वचार कौन पुरुष रक्षा पासक्ता है ? मातः ! क्या मुझसे कोई अपराध हो. गया है ? मात्सर्य-'मैं बड़ा चतुर हूँ, मेरे सामने सव. मूर्ख हैं, मेरी युक्ति सागने कौन ठहर सकता है ?' यस पही मेरा तीखा अस्त्र है, बस इस अस्त्रके वलसे ही मैं बलवान् और सबों में प्रधान मैगा ! ऐसा कौन जीव है जो अपनेको श्रेष्ठ न समझता हो, मनुष्य के शरीर मेरे सिवाय दूसरा ऐसा कौन है जोकि पुरुषफे सुखसे उसकी प्रशंसा करा देय मैं साहसके साथ दण्ड ठोककर कहता हूँ कि भूनलपर काम आदि किसीकी भी शक्ति नहीं है कि जो मेरी गति रोकदेय, मेरा तेज बड़े भारी तेजस्वीको भी हीनकान्ति करसकता है, मातः ! मैं जोरके साथ कहता हूँ कि सबमें मुख्य मैं ही हूँ सब जीच मेरे चशमें हैं, फिर मेरे होते हुए तू शोकसे व्याकुल क्यों होरही है ? स्पष्ट कहो मुझसे कोई अप- राध तो नहीं हुआ है ? सब बोले -मातः ! दुःखका कारण बताभो, हमसे तुम्हारी यह दशा देखी नहीं जाती है । है

शङ्करविजय-नाटक
माया-नहीं सुपुत्रों ! तुम्हारा कुछ अपराध नहीं है, इस
समग मैं यात्मस्वरूपमें गगन थी और कोई बात नहीं है।
(अचानक स्वर्गीय प्रकाश होना)
काग-यह क्या ! एकायकी मेरा मन भयभीत क्यों होउठा ?
सब-(भाश्चर्यमें होकर ) यह प्रकाश कहाँ से आया ? इस
सबोंके गन क्यों घबड़ागये ?
(सबका भय मानकर चिल्लाना और काँपना
रक्षा कसे मैया ! बचाओ ! नहीं तो माण चले ।
माया-कुछ भय न माना बेटा ! धीरज घरो।
थोड़ी ही दूरपर पुण्वका प्रचार करनेवाले विवेक क्षमा सन्तोष श्रद्धा दया
और शान्तिका प्रवेश अचानक परदेका पलट जाना मायारचित स्वर्ग
और मायाकी प्रकाशमयी मूर्ति कुछ सावधान होकर पोपप्रवर्तक
काम क्रोधादिका अत्यन्त आश्चर्य के साथ भयभीत
भावसे आपसमें एकका दूसरेके
ओरको देखना ।
माया-(आगेको बढकर ) मामो मेरे प्राण प्यारों श्रायो।
अब मेरी इच्छा पूरी हुई।
विवेक-मातः हम सब साथी मिलकर तुम्हारी सेवा करने के
आये हैं,तुम जिसके ऊपर प्रसन्न होजाती हो उसको फिर जगत् में
किसी वस्तुकी कमी नहीं रहती है, मैया ! इस समय इम एक
भिक्षा माँगने आये हैं।
माया ! सुपुत्रों ! तुमको किस वस्तुको कमी है ? क्या चाहिये?
निक-मातः तुम्हारी करुणाके विना क्या होसकता है ? हे
चैतन्यरूपिणी ! शिवे ! शुभंकरि ! जीवोंकी ओरको मुख उठा
कर देखो, मैया ! तुम्हारे बिना शंकर क्या कर सकते हैं ?
माया-जीवोंका उद्धार करनेको श्रीशंकरने अवतार धारा है
यह बड़े आनन्दकी बात है उसमें मेरी क्या आवश्यकता है ?
क्षमा-क्षमामयी शुभकारिणी! तुम माताके बिना जीवोंक
जार क्षमा कौन करेगा।

शङ्करविजय नाटक सोप-मरतः ! आनन्दरूपिणी! तू सदा मानन्दपयी है तेरे सिसाय संताप देने वाला दूसरा कौन है ? श्रद्रा-चौतन्यरूपिणी मैया श्रद्धामयी । श्रेष्ठ श्रद्धाके बिना जीव कैसे रक्षा पासकते हैं ? दया-दयावती कन्याणदायिनी मैया ! दयाके बिना जगद का व्यवहार कैसे चल सकता है ? शान्ति-मातः ! ब्रह्माएडमें शान्तिमयी शक्ति तू ही है, तेरे दिना शांतिरूप अमृतफी ना कौन करसकता है। विरे-( काना होकर हाथ जोड़े हुए ) हे कास्यायनि ! हे मासनातनि ! जीनोंको झोनका दान देकर शीघ्र ही रक्षा करो तुम्हें छोड़कर भौर कोई रत्ता नहीं है। माया-मैं पहिले से ही सब जान बूझ चुकी हूँ है पापप्रवर्तक काम क्रोधादिकों ! भौर हे पुण्यप्रवर्गक विवेक क्षमादिकों : श्रानो सब मिलकर एक एक करके मेरे हृदयमें लीन होजाओ, श्रान मैं तुमको एक गुप्त बात बताती हूँ, तुम दोनों कुछ भिन्न रही हो, परन्तु संसारी पुरुष इस दातको नहीं जानते हैं, इस कारण ही काग क्रोधादिका अनादर और विवेक सगा आदि का आदर करते हैं, जो महात्मा पुरुष होते हैं वह कहीं भी भेद भान नहीं रखते हैं, परन्तु तुद पुरुषों को इस घातमें सन्तोप नहीं होता है, वह अपने स्वभारके अनुसार सबको भेदभावसे देखते हैं परन्तु वास्त्र में भूमण्डलपर पाप पुण्य कोई भिन्न वस्तु नहीं है क्योंकि रचनाके कगले एकसे ही दो प्रकट होनाते हैं और उन दोमें वह एक ही व्याप्त रहता है, परन्तु भ्रममें पड़ा हुआ जीव इस वातको नहीं समझता है इस कारण ही झंझट करता है, जो पुरुष तुम दोनों में भेदभाव समझता है उससे कभी सुवि- चारकी पोशा ही नहीं, जो महात्मा पुरुष हैं वह पाप और पुण्य ५२ शङ्कारविजय-नाटक २ को एक दृष्टिसे देखते हैं उनके लिये यह संसारही स्वर्ग होजाता है परन्तु ज्यों ही उनके मनमें भेदभाच आता है त्यों ही अशांति और डाह आकर उनके मन पर अधिकार जमा लेते हैं पाप पुरागमें भेदभाव रखना ही मनमें विकार उत्पन्न करदेता है, वह गनो- विकार ही पुरुपके लिये नरक समान दुःखका भण्डार है हे मेरे प्रिय पुत्रों ! इसके सिवाय और कुछ नहीं है; यह सब बुद्धिका खेल है, तुम सब एक हो इसकारण सब मिलकर आओ और मेरे हृदय में स्थान पाओ, मैं तुम सबोंका एक समान आदर करूँगी तुम सब अपने २ कर्तव्यका पालन करो। (अचानक घोर अन्धकारका होना) ( गम्भीर स्वरसे ) ! यहसप वही चमत्कार है! जद सारा ब्रह्मांड अन्धकारमें था सब जगतकी सामग्री भेदाभेद हीन एका- फार थी आदिमें चराचर कोई नहीं था,न पृथ्वी थी,न चन्द्रमा, सूर्य और तारागणों की अनन्त रचना थी जीवोंकी धर्माधर्म प्रवृत्तियें भी नहीं थीं,था एक अनन्तरूपसे व्याप्त घोर अंधकार, उस समय एकायकी दिव्य प्रकाश आया भौर उसने अंधकार को दूर कर दिया था मैं वही तो हूँ इस समयको भी तो मैंही हूँ [इतने हीमें परम प्रकाशझा होना,आकाश मार्ग, अत्यन्त नीला स्थान, एक साथ प्रकृति और पुरुष (शिव पार्वतो ) की मूर्तिका प्रकट होना] मैं वही तो हूँ कहाँ है मेरी नगरी ? और कहां हैं पापत्तिये तथा विवेक यादि पुण्य वृत्तियें ? क्यो-बात है जो कहीं कुछ भी नहीं दीखता है ? यह क्या यह तो सब एकाकार होरहे हैं? ( अचानक अन्तर्धान होना) (आकाशमें अदृश्यरूपसे देवताओंका स्तुति गाते हुए फूल बरसाना) जय रूप गुण बर्जित निरंजन, नित्य आनन्द मय जय ! जग आदि अन्त विहीन शंकर शुद्ध ज्योतिर्मय जय !

शाङ्करविजय-नाटक
५३
JG
द्वितीय दृश्य
(सुबुध और सुलोचनदो विद्यार्थियों का प्रवेश)
सुलोचन-वयों मित्र सुवुद्ध ! आज क्या बात है जो ऐसे
घबड़ाये हुएसे जार हो हो ?
सुबुद्ध-चाः ! क्या तुमने नहीं सुना ? हमारे गुरुजीके पुत्र
हुआ है, वारह दिन हुए नामकर्ण संस्कार भी होगया आज इष्ट
मित्रोंकी जीमनवार होगी, उसीके सामानकी ठीक ठाक लग
रहा हूँ।
मुलाचन-(आश्चर्य में होकर ) हाँ ! क्या यह वात सत्य है ?
चाः यह तो बहुत अच्छा समाचार सुनागा, विचारी विशिष्टा
पति सहित बहुन दिनोंसे पुत्रकी आशा लगाए हुए शिवजीकी
आराधना कर रही थी, ईश्वरने शीघ्र उसकी सुनली ।
सुबुद्ध-अरे भाई ! आराधना क्या ! अन्तमें हमारे गुरुजी
और गुरुगीताजी दोनों शिवालयमें रहने लगे और निराहार
रहकर उन्होंने तहाँ बड़ा उग्र तप किया था तब शिवजीने प्रसन्न
होकर कहा कि 'कुछ चिंता न करो, मैं ही तुम्हारे यहां पुत्ररूप
से अवतार धारण करूंगा।
सुलोचन-चाः.! फिर यह क्यों नहीं कहते कि इन ब्राह्मण
कुलशिरोमणिके यहां साक्षात् कैलासनाथने ही अवतार धारा
है तो क्या उस वालमें कुछ अलौकिक चिन्ह भी है
सुबुद्ध-भाई ।बूझने क्या हो, उस बालकको देखतेमें भारखे
चौंधाने लगती हैं,उसके जन्मसमयमें पाँच ग्रह ग्यारवें स्थान में थे
उत्पन्न होते हुए जब गुरुजीने जानकर्मसंस्कार किया उस समय
चड़े बड़े ज्योतिषी आये थे उन्होंने जो उस वालकका जातक
सुनाया उसने कहा था कि-"यह बालक अंवत्तारी पुरुष है,
तथा 'चारों वर्षों के धर्मकी स्थापना करके यह जगत् भर में प्रधा-

9 शङ्करविजय-नाटक. न नता पायेगा और उपनिषदादि वेदान्त वाक्योंकी उत्तम व्याख्या करता हुआ दिग्विजय करेगा? सुलोचन-मच्छा यह तो बनाओ कि उस अरतारी पुरुषका जन्म किस दिन हुआ था ? सुबुद्ध-भाई। जब मैंने यहकह दिया कि आज नामकर्णको चारह दिन होगये तव भी क्या तुमको जन्म दिनका पता नहीं लगा,अच्छा तो उस पुण्यपुरुषके जन्मके विषयमें एक कविने एक श्लोक बनाया है मैं तुपको वही सुनाता हूँ सुनो पासून तिष्यशरामतियातवत्यामेकादशाधिकशतानचतु:- सहस्रयाम् । सम्वत्सरे विभवनाम्नि शुभे मुहुर्ते राधे सिते शिर- मुरोहिणी दशम्याम् ॥ अर्थात् कलिके ३८८६ वर्ष बीतनेपर विभव नामक सम्वत्सर में वैशाख शुक्ला १०के दिन मध्यान्हकालके सगय शुभमुहूर्तमें शिगुरुकी स्त्री विशिष्टाने शंकर नामक पुत्रको उत्पन्न किया । सुलोचन-भाई ! इस समय तो तुमने मुझको मानन्दके सद पग्न करदिगा प्रतीत होता है अर भागेको आनंददायक समाचार ही सुनने में आवेंगे,परसों वेदविरोधी जैनोंके पराजय का समाचार सुना था और आज तुमने यह शुभसाचार सुनाया सुबुद्र-हाँ ! प्रतीत तो ऐसाही होना है कि अब परमेश्वरकी ब्राह्म गोंगर सुदृष्टि फिरी है ( पीछेको देखकर ) अरे मुझे वातों में कुछ ध्यान ही नहीं रहा अब मुझे जानेकी माज्ञा दो,क्योंकि वह देखो पण्डिन लोग इकडे हो होकर गुरुजीके यहां भोजन पानेको जारहे हैं मुझको बड़ा विलम्ब होगया है गुरुजी मेरे आने की बाट देख रहे होंगे, क्योंकि जबतक मैं यह पत्तले लेकर न पहुँचूँगा तबतक भोजनका प्रारम्भ नहीं होसक्ता। सुलोचन हाँ हाँ ! ठीक है शीघ्र जाओ; मैं भी जाता हूँ (ऐसा कहकर दोनों जाते हैं। अच्छा नमोनमः।

शङ्करविजय-नाटक * तृतीय दृश्य वगीचा (कईएक वालकोंके साथ वालकरूप शंकराचार्यका प्रवेश) शंकर-देखो भाई ! कैसे सुन्दर फूल खिलरहे हैं, मानो सारे बगीचे में चांदनी छिटक रही है। एक वालक-माओ भाई ! इन फूलों को तोड़कर माला गूंथे । शंकर-नहीं भाई ! ऐसा करना ठीक नहीं है, क्या हममें ही जीव है इन फूलोंमें नहीं है, जब किसीके नूचने पर हमारे शरीरमें कष्ट होता है तो क्या तोड़ २ कर वींपनेपर उनको कष्ट नहीं होगा? १ वालक-भाई ! तुम्हारी सभी बातें संसारसे निराली हैं, हम मनुष्य हैं और वह पेड़के फूल हैं कहाँ हम और कहाँ वह ? उनकी लकड़ी पत्तोंमें क्या हाइ मांस और प्राण हैं ? तुम ते भाई बड़े वहमी होगये हो ! शंकर-नहीं मुझको वहम नहीं है, हमारे यहां दो साधु भिक्षा करनेको भाये थे, पिताजीसे उनका वातीलाप होते समय मैंने उन महात्माओं के मुखसे सुना था कि सब चैतन्यवान् हैं, चैतन्य सबमें एक रूपसे व्याप रहा है, तो भाई ! यह फूल क्या सबसे अलग हैं ? भाई एक बात और है उसको सुन कर तो तुम्हें हँसी भावेगी जैसे बात चीत करते हैं तैसे ही फूल फल भौर पेड़ पत्ते भी करते हैं परन्तु हम उसको नहीं सुन सकते हैं, क्योंकि हममें उसको सुननेकी शक्ति नहीं है । २ बालक-भाई ! तुम्हारी तो सभी बातें संसारसे निराली हैं। कुछ भी हो. तोड़ो या न तोड़ो, हम तो यहाँसे फूल तोड़कर माला बनावेंगे। शंकर-भाई ! विचारो तो सही माला गूथनेसे ही व्या फल होगा?दो चार घड़ी में ही सह कुम्हलाकर नष्ट होजायगी,तव तुम शकरविजय-नाटक DHO उसको उठाकर फेंकदोगे, परन्तु यदि यह पृन्तः पौधोंपर लगे रहेंगे तो पवनमें कैसी सुगन्ध आवेगी और बगीचे में कैसी.शोभा रहेगी ? कितनीही मधुमक्खिये इन फूलोंका मद लेकर जीवन धारण करेंगी ? जो इतने काममें आगे ऐसे, फूलों को केवल आनी क्रीड़ाके लिये नष्ट करडालना क्या हमको उचित है. ? ३ वालक-श्रो भाई । देखो वह सरोवके किनारे पर बंगला कैसा आँखें मीचे बैठा है, आओ हम सब मिलकर इसके ढेले मारें यदि इसको पकड लेंगे तो छोटे भैयाके खेल के लिये ले चलेंगे (देला मारने का उद्योग करते हैं)। शंकर-नहीं नहीं भाई ! यह करा करते हो ? यदि तुमको ऐसा ही ऊधम मचाना है तो लो मैं तो घरको जाता हूँ! हाय.! हाय ! कैसा सुन्दर पक्षी है भला इसने तुम्हारी क्या हानि करी है जो इसको मारना चाहते हो, यदि कोई तुगको भी इसी प्रकार निरपराध सतावे तो कैसा कष्ट होगा, जरा विचारो तो सही ?, भाई जिस ईश्वर ने इपको रचा है उसीने इस पक्षीको भी उत्पन्न किया है,फिर तुम इसको वृथा कष्ट को देते हो ? ! २ बालक-भाई ! तुम तो बड़े डरपोक हो । शंकर-तुम मेरे लिये परमेश्वरसे प्रार्थना करो कि मैं सदा ऐसा ही डरपोक बना रहूँ। १ वालफ-भाई शंकर ! परमेश्वर कौन है ? शंकर-पह सारी पृथ्वी जिनकी है, जिन्होंने संसारके सब पदार्थोंको रना है, जिन्होंने हमको भी मनुष्य का जन्म दिया है जो हग्समग हमारी रक्षा करते हैं और परमदयालु अपक्षपाती और पाप पुण्यके विचारकर्ता हैं वह अनन्तदेव ही परमेश्वर हैं ३ वालक-अच्छा भाई शंकर ! यह तो बताओ, तुग- बीच वीचमें नेत्र मूंदकर क्या विचारते हो ?

शहारविजय-नाटक ५७ शंकर-भाई ! विचारता यह हूँ कि 'मैं कौन हूँ, यहाँ कहाँ से किस लिये आया हूँ अब मागेको कहाँ जाऊँगा, और इस संसार सुझको फरना क्यो चाहिये ?" इनही सब बातोंका तत्त्व जाननेकी बड़ी उत्कंठा रहती है। १ वालक-चलो भाई अब सब घरको चलें सायंकाल होगया । २ बालक-हाँ भाई ! अब घरको चलना चाहिये, नहीं तो पिताजी चिल्लावेंगे। ३ बालक-चलो शीघ्र चलो, और मार्ग में जरा वह परसों वाला भजन भी अलापते चलो। (आगे २ शंकराचार्य और पीछे सब बाल भजन गाते जाने हैं) रहोगे मन ! कव लों माया माहिं ॥ टेक ।। आँख खोलि देखहु मन नीके, कोई काहूको है नाहिं । मानत जिनहिं पापना यह सब, स्वारथहित लपटाहिं ॥ १ ॥ मात पिता भ्रातो सुत दारा, झूठे स्वजन लखाहि । समय पड़े कोई काम न भावे, पाप पुण्य सँग जाहिं ॥ २ ॥ जो प्रभु विपत हरत निज जनकी, करुणासिंधु कहाहिं । । सुमर तिनहि कर नेह तिनहिंसों, सब दुख द्वन्द्व सिरोहिं ३ रामस्वरूप निरखि निज हियमें संशय सकल मिटहिं । खुलै गाँठ हियकी साही छिन, फर्महु सकल बिलाहिं ॥ ४॥ * चतुर्थ-दृश्य (एक अरसे बड़बड़ातेहुए विदूषक और दूसरे ओरसे सूत्रधारका आना) सूत्रधार-(भागेको देखकर ) कहो मित्र विदूषकजी! अभी तुम जीते हो? विदूषक-मैं तुम्हारी आँखोंमें क्यों खटकता हूँ ? मेरे मरने का डौल तो होही गया था परन्तु शीघ्र ही सावधान होजानेसे बरगया। 8

५८
शङ्करविजय-नाटक
सूत्रधार -मला मैं अभी किसी सरकारी सिपाहीले काह, जि
यह घेद निंदक नास्तिक जैन हैं तो वह अभी तुझको भी तेरे
ढपोल शंख सुरुके पास पहुँचादेगा ।
चिपक-(आँख भौं चढ़ाकर ) अवे मुह सम्हालकर बोल!
किसको जैन कहता है ? क्या तेरी आँखों पर पट्टी बंधी है, मेरे
गलेमें पड़ा हुआ यह लंगर नहीं दीखता है ? (ऐसा कहकर
मलेगका जनेऊ दिखाता है।)
सूत्रधार-(हँसकर ) देखलिया २, तू तो वर्णसंकरोंका भी
बाबा बनगपा, रोज २ घिरघटकी समान रंग बदलता है, अरे!
पहिले तो ब्राह्मण था फिर मिष्टान्नके लोभसे जैनी होगया
और अब परनेकी पारी आई ते ब्राह्मण बन गया ? शाबासा
भाई शाबाश ! (एसा कहकर कमर ठोकता है )
विदू पक-अरे भाई ! परमेश्वर के लिये ऐसी बातें न करो।
तुम जानो या मैं जानूं, और हाथ धोकर मेरे प्राणों के पीछे ही
पड़े होमो तो और वात है।
सूत्रधार अच्छा यह तो बताओं,इस महासंकटसे तू बचा कसे ?
विदूषक-उस दिन तो मैं तुमको मिला ही था, फिर दूसरे
दिन मैं नागके देवालयमें अजगरकी समान अचेतसा पड़ा रहा,
इतने हीमें दश पाँच सिपाहियों के साथ लिये जमादार पाया,
और उसने एकायकी सिपाहियोंसे हमारे शुरुजीको वचे बचाये
शिष्यों सहित मुश्के बँधवाकर बाहर निकलवाया तब मैं घबड़ाकर
झाथर्मेका मोरछल तहाँ ही फेंक और गलेमें जनेऊ डालकर
राम राम कहता हुआ बैठ गया।
सूत्रधार-हाँ ! की तो बड़ी चतुराई, अच्छा फिर ?
विदुषक-फिर सिपाहियों ने उनको धकियाकर बाहर निकाला
और राजाकी माज्ञा सुंगगाकर एक एकके दो दो करही तो डाले
.

কুলি-গাদ १० यह देखकर तो मेरे देवता दूंचं कारगये, ईश्नरने घड़ी छपा की भाई, सिपाही मेरे ऊपर कुछ सन्देह न करके ज्यों ही तहाँसे टरके कि मैं चम्पत हुआ तबसे इसी मोहल्लेमें आनन्दसे गुजरती है, परन्तु पार कहीं किसीसे कह न देना !! सूत्रधार-देख तू माँतके सुखसे बचा है, परन्तु अब भी निश्चय हुआ या नहीं ? अब तो "स्वध निधनं श्रेय', 'गरण श्रेष्ठ निग धर्म' इस भगवद् वाक्य पर विश्वास रखकर धर्मा- चरण कर। विपक-हाँ भाटकर लगकर ही अक्कल पाती है ! अब चाहे जोकुछ हो, सनातन वैदिक धर्मको कभी नहीं छोड़ गा,परन्तु हाँ एक बात सूल ही गया ! मैं आज कल बडे चैनमें हूँ मेरा विवाह भी होगया ? सूत्रधार - अरे क्या ठीक फहरहा है ? कहाँ दाब लगा ? विदूषक-ठीक क्या बहुत ठीक कहरक्षा हूँ दाँव लगनेकी अप क्या बूझते हैं,इस फक्कड़ की अकल क्या ऐसी वैसी समझी माहिती नगरी में एक मण्डनमिश्र नाम वाले पंडित है, वह संन्यासको बड़ा बुरा समझते हैं यह तो तुमने सुना ही होगा, अब उन्होंने अपना यह नियम कर स्वखा है कि जिस किसी संन्यासीको देखते हैं उसीको शास्त्रार्थ में जीतकर विवाह करा देते हैं में भी यह बान सुनते ही अपना काम्प साधनेके लिये संन्यासी बनगगा और उनके नगर में गया तहां कितनेही पंडित मेरे पास आकर कहने लगे कि "शास्त्रार्थ कर” परन्तु तुम जानते ही हो हमारे लिये तो काला अक्षर भैसकी समान फिर मैं शास्त्रार्थ के लिये गरदन हिलानेको छोड और उतरही ल्या देसकता था, ? मेरे ना करते ही उन्होंने मुझे जबरदस्ती पकड कर रे गेरुवा कपड़े उतारकर स्वेत वस्त्र पहिराये और है ,

६०
शङ्करविजय-नाटक
PG
और उसी समय एक तरुणी स्त्रीके साथ मेरा विवाह करदिया
कहिये कैसा घर भाषाद किया ? वाह रे मैं !
सूत्रधार-भाई ! काम तो तूने बडी चतुराईका किया, अच्छा
फिर आज किधरको धावा है ?
विदूषक-ऐसे ही टहलता टहलता चला भाया हूँ वह इस
मौहल्ले में एक श्रीमान् प० शिवगुरु रहते हैं ना आपने नहीं
सुना क्या ? उनके एक शंकर नामक पुत्र हुआ था मुना है।
आज उसका यज्ञोपवीत होने वाला है, ईश्वरने कृपा की तो तहाँ
दो,चार दिन कचौडी पूरिये उडावेंगे,फिर मैंने विचाराकि घर
एक जने के लिये क्या चून्हा चलेगा,इसलिये गठजोडेसे जारहा हूँ
सूत्रधार-अरे ! अब तहाँ जाकर क्या करेगा, सभी थोड़ी
देर हुई सब कार्य होचु झा, मैं तहाँ से निबटकर ही आरहा हूँ
विदूषक-( भौचकासा होकर ) तो क्या यह मेरा इतना मार्ग
नापना वेकार ही गया अच्छा यह तो कहो तहाँ जानेपर
दक्षिणा भी मिलेगी या नहीं ?
सूत्रधार-छि अरे मूर्ख ! कहाँ दक्षिणा लेकर बैठा है,!
वह विचारी अपने दुःखसे ही खाली नहीं ?
विदूषक-दुःख कैसा ? क्या हुआ ?
सूत्रशार-अरे! उन शिवगुरु महाराजज्ञा देवलोक होगया ना!
इस बात को कहते हुए भी कष्ट होता है,देखो कैसे विचारे विद्वान्
थे कैसे मिलने वाले थे ! हा ! थोडी ही अवस्थामें, ऐसे श्रेष्ठ
पुत्रका कुछ भी सुख न भोगकर चल बसे, हे ईश्वर ! यह तेरा
बड़ा अन्याय है ?
विदूषक-छाररर ! यह लो मेरी तो दक्षिणा ही डूबगई हो।
यह बडा बज्र टूटा ?
सूत्रधार-भाडमें जाय तेरी दक्षिणा, ऐसे ही लोभियों ने

शङ्करविजय-नाटक
६१
2G
।
ब्राह्मणों की निन्दा करा रक्खी है, हां आज शिवगुरु होते तो
तुझको मुहमांगी दक्षिणा देते।
चिदुपफ-तो फिर उनके घर के और तो सब जीते हैं या मेरी
दक्षिणाके कारण सभीका. परलोक होगया ?
सूत्रधार-भरे फैसा अमङ्गत बोल रहा है? तुझ वात करना
भी नहीं आता, घरके सभी लोग हैं और ईश्वर उनकी उमर
बढ़ाकर सदा ऐसा ही सुखी रक्खे (परदेकी ओरको देखकर)
अरे ! वह देख, शिवगुरुकी स्त्री सती विशिष्टा इधरको ही श्रा
रही है, शिष ! शिव ! इस विचारीके विधवा वेषको देखनेसे
मेरे हदय पर चोट सी लगती है, चल भाई ! अब यहाँ खडे
होनेसे कष्ट होता है।
(ऐसा कह कर दोनों जाते हैं।
पञ्चम-दृश्य
(विधवा वेपधारी विशिष्टा का प्रवेश)
रिशिष्टा-( बडे कष्टसे नीचे बैठकर माथे पर हाथ रक्खे हुए)
जगदीश्वर ! जैसा तेरे मगमें आता है,तू उसी प्रकार मनुष्यको
नचाता है (लंबा साँस लेकर ) नरकवाससे भी अधिक कष्ट देने
वाले रँडापेका परमदुःख भोगनेको मैं क्यों जीती रही पतिके
साथ ही इस संसारसे उठ जाना ठीक था, परन्तु क्या करूँ इस
बालक शंकरकी रक्षा कौन करेगा इस मायाके जालमें फंस
कर वह सुग्व भी हायसे गया; अरेरे ! मैं इतना भी न समझी
कि-ईश्वर किसीके बिना किसीकी भी अटकी नहीं रखता है,
यदि ऐसा न होता तो उसको, विश्वम्भर या जगदीश नामसे
कौन पुकारता ? ( कुछ विचार कर ) खैर जो कुछ हुआ, अर
पछतानेसे भी क्या फल है ? जिसके कारण उस सुख को भी
तिलांजलि दी, उसके ऊपर दृष्टि रखकर समयको विताना ही

६२ शरोवजय-नाटक है है . सब अच्छा है ( चौकन्नी सी होकर ) मेरे शंकरमें हर एक गुण अद्भुत है, थोडीसी उमरमें कैसे गम्भीर विचार, कैसी बड़प्पन की बातें ! गानों पहिले गन्गका ही सीखा हुआ जन्मा है,ऐसी कौन बात है -जिसको मेरा शंकर नहीं जानता है ? परसों ही सशोपचीत हुआ है, सर्वथा पुस्तकमें लिखे हुए ब्रह्मचारी के नियमोंको पाल रहा है, न जाने आज भिक्षाके लिये कहाँ चला पा है, दुपहर ढलने लंगा, धूपमें पैर तचते होंगे ! ( इतने में ही परदेके भीतरसे 'भवति भिक्षां देहि मातः ऐसा शब्दहुआ) विशिष्टा-( सुनकर ) मालूम होता है यच्चू आगया। तदनन्तर ब्रह्मचारीके वेपमें शङ्कराचार्य आते हैं) शंकर-मैया ! यह भिक्षा कहाँ रक्खू ? विशिष्टा-बेटा ! उधर ही रखदे (शंकराचार्य भिनाफा पात्र रखते हैं ) बेटा ! रोज रोज भिताके निमित्त क्यों जाय है ? घर में क्या कमी है ? शंकराचार्य-मैयो ! क्या मैं घरमें कपी होनेसे भिक्षा करनेको जाता हूँ ? मातः ! ब्रह्मचारियों का धर्म ही यह है कि-भिक्षाके अन्नमा भोजन करके गुरुके घर वेद पढ़े, दिनमें सोवे नहीं, सवारी पर चढे नहीं, ताम्बूल न खाय, ऐसी शास्त्रकी आज्ञा होनेसे ही मैं उसके अनुसार वर्ताव करता हूँ। विशिष्टा-गोदी लेकर) बेटा ! इतनी बातें किसने सिखाई हैं ? ( लंबा साँस लेकर ) ईश्वर ! ऐसे सद्गुणी पुत्रका सुख भोगे बिना ही उनको क्यों बुला लिया ? ( नेत्रों मेंके भाँर पोंछ कर) बेटा ! अब मेरी यह इच्छा है कि-समयानुसार तेरा विवाह होकर तेरे दो चार संतान हो जाये तो मेरे सब मनोरथ पूरे होजायँ शंकराचार्य-मैया ! क्या मेरा विवाह करनेको कह रही है ? छिः छिः यह झगड़ा तो मैं कभी भी नहीं पालू गा, मातः !

शङ्करविजय-नाटक * LIST इसमें क्या रक्खा है, संसारके सर पदार्थ मिथ्या हैं, फिर सांसारिक भोगकी साधन स्त्रीसे भी सुखही या आशा ? विशिष्टा अच्छा तो फिर त क्या करेगा ? सदा हायसे ही ठेके खायगा? शंकराचार्य-पातः ! घरी संन्यास लेने की इच्छा है, बस तेरे श्राक्षा देनेकी ही देर है। विशिष्टा-अरे ! क्या यही तेरा चतुरपन है ! मैं जो तुझको बडा सुजान समझ रही हूँ क्या उसका यही फल है ? अरे ! तुझको यह दुर्बुद्धि किसने सिखाई है ? बेटा ! इतनी ही अद. स्थामें संन्यास लेकर क्या इस सब घर वारको मट्टी करेगा ? ( लंबा सांस लेकर ) अरे ! इस कुलका सहारा भी तो अकेला तूही है !, यदि फिर आगेको मुख से ऐसे अक्षर निकाले तो मैं कहीं जाकर पाने माण खोदूँगी, तब मेरे जाने चाहे जो कुछ करता रहियो। शंकराचार्प-(मनमें ) यह अज्ञानरूप अन्धेरेमें पड़ी है, संन्यास लेनेकी आज्ञा कभी भी नहीं देगी, इसलिये अव दूसरे प्रकारसे काम साधना चाहिए कुछ सोचकर (प्रकट रूपसे) नहीं मातः ! मैं तो हँसीमें कह रहा था, देखता था कि-तू क्या उत्तर देगी। विशिष्टा (फिर गोदी में बैठाकर ) नहीं वेटा ! ऐसी बाते नहीं करते हैं, देख सब संसारी सुखको ही चाह रहे हैं, विवाह के अनन्तर तेरे दो वालक होजाय तो मेरी आँखें मिचे पीछे बुढ़ापेमें चाहे जो कुछ करना । शंकराचार्य-जाने दे मातः ! अब उस . वातको बढाने का ही कौन प्रयोजन है ? जिस. मार्गको जाना ही नहीं उसके कोसं क्या गिनना ! अब. मेरे मध्यान्ह स्नानका समय होगया और शङ्करविजय-नाटक - तिस पर भी आज एकादशी है, इसकारण मैं स्नान करनेको नदी पर ही जाता हूँ। विशिष्टा-नहीं बेटा ! घरमें पी शीघ्रतासे स्नान करके भोजन पा ले, नदी स्नान तो रोज होता ही रहता है। शंकराचार्य-अरी ! देर नहीं लगेगी, गया और एक गोता लगाकर आया। बिशिष्टा-अच्छा तो बहुत देर जलमें न रहना,शीघ्र ही आना यदि देर लगाई तो फिर कभी नहीं जाने दूंगी। शंकराचार्य-अच्छा; गया और आया । ऐसा कहकर जाते हैं) विशिष्टा- मेरी डार कितनी मानता है, मेरे भौं चढाते ही घंवड़ा जाता है,न जाने इसको यह संन्यास लेने के लिये किसने बहको दिया है ? (विचारफर ) छा समझ गई, जिस पाठ. शालामें पढने जाता है, यह सब तहाँका ही प्रसाद है, मैं अब उस पाठशालामें ही जाना वन्द कर दूँगी, वस मैं इतनी ही विद्यासे भर पाई, अब मैं उसको घरके काम काजमें डालूँगी, जिससे अपने परायेको समझे। ( इतनेमें ही रोता हुआ सुबुद्ध आता है) विशिष्टा-(घबडाकर ) भरे ! रोता क्योंआया है ? अरे यह क्या दशा होरही है! अरे तेरे कपड़े कैसे भीजे हैं ? क्याहुआ, बतातो सही? सुबुद्ध-(काँपता २) च-च-च-च- चाची, मैं और श.श- शङ्कर नदीपर स्नान करनेको ग- ग- गये थे, तहाँ स्नान का क- करतेमें श- श- शङ्करका पैर बड़े भारी ना. ना. नाकेने पकडलिया मैंने उसको छु- छु-छुडानेमें बहुतसे उद्योग क- क. क-करे,प-प- परन्तु उसने नहीं छो- छो- छोडा,तव में तत्काल इधरको दौ. दौ दो दौड़ा भारहा हूँ श श शंकर पानी में खड़ा रो रो रो रोरहा है, ज ज ज जल्दी चल।

शङ्करविजय-नाटक
विशिष्टा-(छातीको मसोसार ) हे ईश्वर ! मेरे ऊपर यह
कैसा संकट डाला ? अब मुझे मेरा पुत्र न जाने देखनेको भी
गिलेगा या नहीं ? मैंने तो पहिले ही कही थी कि तहाँ डूबने
को मत जा, अरे चलतो सही देखू कहाँ है, (कमर पकड़के उठ
कर ) अरे !. यह सुनकर तो मेरी कार ही टूटगई ।
(ऐसा कहकर दोनों।दुःखित होतेहुए जाते हैं)
श्री षष्ठ-दृश्य
सुनोचा-( आप ही आप ) क्या करूँ, कितने ही दिन हो
मए मित्र सुबुद्धका दर्शन ही नहीं हुआ । इसी लिये मैं अपने
श्रीपही आग इधर आया हूँ, परन्तु अभीतक उसका कुछ पता
ही नहीं न जाने क्या बात है!
(इतने हीमें उदास हुआ सुबुद्ध आता है)
सुलोचन ( उसको प्रेमके साथ हृदयले लगाकर ) मित्र ?
आज तुम ऐसे उदास क्यों होरहे हो, तुम तो सदा प्रसन्न मन
रहने थे, आज नई बात क्यों है ?
सुबुद्ध-क्या कहूँ मित्र ! आज मेरी सब ही आशाएँ स्वमसी
होगई, सदाके सुखका समूल नाश होगया,
सुलोचन-भाई ! यह क्या कहरहा है. ? सब वृत्तान्त स्पष्टरूप
से सुना तो सही, क्योंकि अपना दुःख मित्रको सुनानेपर कुछ
कम ही होता है।
सुबुद्ध-गुरुजीके परलोक चासी होनेका समाचार तो तुम सुन
ही चुके होओगे?
सुखोचन-हाँ हां भाई ! सूर्यका अस्त होना किसको मालूम
न होगा ।
सुत्रु द्व-आज उनका पुत्र और मेरा मित्रं साक्षात् शिवाव
तार शंकरभी इपको छोड़कर चला गया (ऐसा कहकर रोता है।
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शङ्करविजय नाटक
Goo
प्रारू
मुलेवन-भाई ! यह क्या कहरहा है । 'छोडकर चलागया'
इप्त सन्देह भरी वातको सुन कर तो मेरी छाती फटी जाती हैं
कैसे २ हुमा, सच बात स्पष्टरूपसे सुना।
सुबुद्ध-क्या कहूँ ! वह भगवान् जगदाधार में मिलेंगे क्या
कबरे मित्र उनके चित्तमें संन्यास लेने की थी इसकारण उन्होंने
एकदिन अपनी मातासे संन्यास लेने की प्राज्ञा मांगी थी परन्तु
पात्ताने आज्ञा दी नहीं, इस कारण जघ अाज हम दोनों स्नान
को गये थे तब मागासा नाका बनाकर उससे अपनी टाँगा
पकड़ वाली और यह लीला दिखाकर आप रोने लगे।
सुलोचन-फिर क्या हुआ ?
सुबुद्ध फिर मैंने दौड़ते हुए जाकर सब वृत्तांत गुरु माताजी
सुनाया, वह तत्काल ही रोनी हुई तहाँ पहुँचीं और अपने पुत्र
को गहरे जलमें नाकेका पकड़ा हुआ देखकर कुछ घश न चलने
से प्रतिविलाप करने लगी।
सुलोचन-अच्छा अब पहिले यह बताओ कि नाकेने शंकर
को छोड़ा या नहीं?
सुबुद्ध-सव बताता हूँ सुनो, फिर माताको देखकर शंकर
जलमेंसे ही कहने लगा मातः ! अब मेरे प्राण वचना कठिन हैं
परन्तु हाँ ! यदि इस समग तू मुझको संन्यास लेनेकी भाज्ञा
देदेगी तो कदाचित् मेरे संन्यास धारणका संकल्प करते ही
पुनर्जन्म होकर बचाया तो बच ही गया,
सुलोचन-चाः अच्छी युक्ति रची, अच्छा फिर ?
सुबुद्ध फिर वह भोली भाली माता 'यदि भाज्ञा नहीं देती
तो हाथमें आपा हुआ पुत्र रत्न जाता है। ऐसे कठिन चक्र में
पडीहुई कोई उपाय न सूझनेसे पागलसी होकर टकटकी लगाये
चारों ओरको देखने लगी।
Phot

एकरविजय-नाटक
6U
मोचन-हा कैसा कठोर अवसर था, भाई ! उस समय
उसके विचार जो बीती होगी, उसका ध्यान करने से भी शरीर
रोमाञ्च खडे होते हैं।
सुबुद्र-तदनन्तर पानी माताको पुत्र मोहके कारण कुछ
उत्तर न देकर मौन हुई देखकर उन भगनान् परमविरक्त माता
शुन्य शंकरके नेत्रों से भी प्रांस कहने लगे, परन्तु उस समय
संन्होंने माँसुओंको रोक कर 'माता जो कुछ उत्तर देना हेर
खीच दे, मद मुझसे नाकेकी पीड़ा नहीं सही जाती, ऐसा कह
कर वह मायाको चलाने वाले चीख मारकर रोये ।
सुचन-हा ! ममताकी फाँसीको काटना बड़ा कठिन है,
अच्छा फिर
सुबुद्ध-फिर उसने 'यह मेरा पुत्र संन्यासी होकर ही जीत्तो
रहै,ऐना कहकर हायमें जल लेकर संन्यासी होने की आज्ञा देदी,
सुलोचन-मच्छा फिर नाकेसे छुटकारा कैसे हुआ ?
मुबुद्ध-भाई ! इसके लिये ही तो शंकरने अपने आप यह
रूपट रचा था माता माज्ञा देते ही न कहीं नाका था न जुला
रह उसी सपय जलसे बाहर आकर माताके पास खडा होगया
सुलोचन-अच्छा अब मेरा चित्त ठिकाने आया ! हाँ तो उस
कष्ट से छूटनेके अनन्तर क्या हुआ ?
सुबुद्ध-फिर माताने 'मैं तो नहीं जाने दूंगी' यह हठकी तब
उसको ज्ञानोपदेश करके और गरण के समय तेरे समीप अवश्य
पाऊँगा ऐसा कहर तथा घरके सब पदार्थ भाई बन्धुओं को
सौर माताकी व्यवस्था उनसे कहकर संन्यास धारण करनेको
चलागया (आँखें भरकर ) भाई ! अब मुझे तो शिस्तीका भी
आश्रय नहीं रहा।
'सुलोचन-भाई ! तेरी और शंकरकी तो मित्रता थी, फिर

शङ्करविजय-नाटक
तूने उससे अपने विषय में बातचीत क्यों नहीं की ?
सुबुद्ध-नहीं जी ऐसा कैसे हो सकता था उस समय जब मैं
अधीर होकर रोने लगा तो मेरे पास जाकर मुझको समझा
करकहा कि मैं संन्यास लेकर काशीमें गाऊँगा तब तूभी आकर
सुझसे मिलना तो तेरा उद्धार करूँगा।
सुलोचन-तब तो तू काशीको जाने वाला ही होगा ? मैं भी
साथ चलने के लिये अभी आता हूँ ऐसे पुण्य-पुरुपके सहवास
की समान दूसरा कौन सा सुख हो सकता है।
सुबुद्ध-भाई ! मैं तो अब दो घड़ी बाद ही यात्रा करनेवाला
हूँ यदि तुझको साथ चलना हो तो शीघ्रही प्राजा ।
(ऐसा कहकर दोनों जाते हैं)
* सप्तम-दृश्य
स्वख हिमालय पर्वत
(तदनन्तर आसनपर बैठहुए पूज्यपाद गोविन्दचार्य स्वामीका प्रवेश)
गोविन्द स्वामी-नारायण नारायण (ऐसा कहकर आप ही
आप ) कल समाविले समय जगदीश्वरकी यह आज्ञा हुई थी
जिलको जो शिष्य आये उसको ही आश्रपका भार सौंप
देना परन्तु अभीतक तो यहाँ कोई आया नहीं।
(इतने हीरों शंकराचार्य बाते हैं)
शंकराचार्ग--( आप ही आप ) मैंने माता की आज्ञा ले
बाले निकल कर अब तक अनेकों बन पहाडोंको लांघते २
आज इस हिमालग पर जाकर सुरुजीकी गुफाका पत्ता पाया है
उप तपस्वी ने जो पहिचान बताई थी, वह तो इस गुफा पर
दीख रही है, वह वह परमयोगीजी महाराज इसी शुफामें होंगे
( ऐसा कहकर और कुछ पग आगे बढकर ) धन्य धन्य यही
है यह गुही, वह देखो मेरे गुरु योगीजी महाराज बैठ हैं,अच्छा

शङ्करविजय-नाटक DI50 तो अब चरणों में प्रणाम करके अपने जन्मको सफल करूँ। (ऐमा कहकर समीप या चरणों पर मस्तक रखते हैं। गोविन्दस्वामी-नारायण नारायण, अरे बाबा तू कौन है ? शंकराचार्य-पृथ्वी, जल, तेग, वायु और भाकाश इन पाँचों महाभूतोंसे निराला में श्रात्मा हूँ। गोविन्दस्वामी-दाः ! यह तो उत्तम अधिकारी मालूम होता है, हे बेटा ! तेरा नाम क्या है ? शंकरा०-हे सगुरो ! इस पश्चपहाभूनके शरीरका नाम शंकर है। गोवि०-धन्य शंकर ! बता तेरी क्या इच्छा है ? और इस किशोर अवस्थामें ही यहाँ तपोवनमें क्यों भाया है । शंकर०-महाराज ! मैं संसारके तापोंसे बड़ा पीडित होरहा हूँ, इस कारण संसार दुःखको दूर करनेवाले संन्यास भाश्रम को पानेकी इच्छासे श्रीचरणोंका आश्रय लिया है, आशा है श्रीमान् मेरे इस मनोरथको पूरा करेंगे । गोवि०-( हँसकर ) तू कहता तो सत्य है परन्तु तेरा यह पैराग्य अधिक दिनों तक नहीं ठहर सकेगा,क्योंशि-भोग आदि फरके इन्द्रियोंकी तृप्ति हुए बिना यह इन्द्रियें कदापि कशमें नहीं होसकतीं इस कारण अभी तेरी अवस्था संन्यास आश्रम को धारण करने की नहीं है। शंकरा०-इन्द्रजाल विद्याके प्रभावसे होने वाले चमत्कार को देखने से बालकों को मोह होता है, परन्तु यह इन्द्रजाल है ऐसे सरकने पाले तरुण पुरुष उसको देखकर मोहित नहीं होते हैं; तैसे ही इन मिथ्या इन्द्रियोंसे सत्य विकार हों ही कैसे सकता है ? इसकारण श्रीमानकी कृपा होयगी ना मैं इन्द्रियों के मोहमें कदापि नहीं फँगा। गोवि०-अस्तु तू कौन है; यह मैंने जान लिया, अच्छा.अब

७०
शङ्करविजय-नाटक
I
मैं तुझको उपदेश देने के लिये अभी उद्यत हूँ परन्तु तू भागीरथी
के घाट पर जा और मुण्डन कराकर शीघ्र ही लौटकर श्रा।
[ तदनन्तर श्रीशङ्कराचार्य जी परदेके भीतर जा फिर लौट कर पाते हैं ।
शंकरा.-महाराज ! श्रीमान्की माज्ञानुसार मैं मुण्डनके
कागसे निवट आया
गोवि०-अब इन वस्त्रों को धारण कर ( ऐसा कहकर गेरुमा
वस्त्र धारण करवाते हैं ) दाहिने हाथमें इस दण्डको धारण
कर ( ऐसा कहकर दंड देते हैं, इसके द्वारा काम क्रोध आदि
शत्रओंका दमन करना चाहिये, अव दाहिना कान इथरको कर
क्योंकि-तत्त्वोपदेशक मन्त्रका उपदेश देवा हूँ [ ऐसा कह कर
शंकराचार्यजीके कान में उपदेश करते हैं ] भव ऊँचे स्वर से
'नारायण' शब्दका उच्चारण कर ।
शंकर०-(ऊँचे स्वरसे ) नारायण, नारायण, नारायण ।
गोवि०-अव तुझको इस आश्रमके धर्म सुनाता हूँ सुन-एक
ग्राममें तीन रातसे अधिक न रहना, रजस्वला स्त्रीका सुख
देखने पर उस दिन निराहार व्रत करना, धन इकट्ठा न करना,
सवारी पर न बैठना, इसपकार धर्मका आचरण करते हुये रात
दिन ब्रह्मतत्वका विचार करते रहना और जो मुमुनु पुरुष हों
उनको उपदेश देकर उद्धार करना केवल चौमासेमें चार पन.
अर्थात् दो महीने तक एक ग्राग में रहना, चौमासे के दिनों में
तीर्थयात्राके लिये न जाना।
शंकरा०-भाज्ञाके अनुसार ही वर्ताव करूँगा, इस शिष्यके
ऊपर श्रीगुरु चरणों की पूर्ण कृपा रहनी चाहिये ।
गोवि० तू मेरा मुख्य शिष्य है, तेरा 'भगवत्पूज्यपादाचार्य'
यह इस माश्रमका नाम रखता हूँ, अब तुझसे गुरुपरम्परा
कहता हूँ, सुन-प्रथम अद्वैतके मूल आचार्य श्रीव्यास भगवान्
थे, उनके शिष्य श्रीशुकदेवजी हुए; उनके. श्री गौडपादाचार्य

शङ्करविजय-नाटक
७१
और उनका मैं तथा मेरा तू [ भगनवपूज्यपादाचार्य ] अस्तु,तू
साक्षात् शंकर है, मनुष्य शरीरको धारण करने पर उसके
मनुसार ही लीला करनी चाहिये, इस कारण तू ऐसी लीला
कर रहा है, यह बात मैं स्पष्टरूपसे जानता हूँ।
शंकरा०-माप सर्वज्ञ हैं, ऐसी कौन बात है जिसको भाष
न जानते हों ?
गोवि०-हे मेरे प्यारे भगवत्पूज्य ! अव तू मुमुक्षुओंका उद्धार
करनेके लिये पृथ्वी पर विचर ।
शंकरा०-हे सद्गुरो ! मेरी यह इच्छा है कि-इन हाथों से
कुछ दिनो गुरुसेवा हो, अभी मुझे आश्रममें ठहरनेकी आज्ञा
दीजिए।
गोवि०-बहुत अच्छा, आनन्दित रहो, अब मैं मध्यानमाल
की सन्ध्या करने के लिये श्रीभागीरथीके तट पर जाता हूँ।
(ऐसा कहकर गुरु शिष्य दोनों जाते हैं)
* अष्टम दृश्य
[भगवान् शंकराचार्य का प्रवेश ]
शंकरा०-(भाप ही आप ) मैं तो गुरु महारानकी भाज्ञा
लेकर इस पुण्यक्षेत्र काशीपुरीमें आया हूँ अब इच्छानुसार यहाँ:
की सत्वगुणी सम्पत्तिको तो देखलूँ, आहा ! यह भागीरथीका
जल कैसा स्वच्छ है, (जल पीकर ) आहा ! जलमें तो अमृत
केसा स्वाद है, धन्य है इस गंगाजलका पान करने वाले यहाँके
निवासियोंको धन्य हैं ! ( गोता लगाकर ) अच्छा. मैं स्नानसे
सो निवट ही गया अब भगवान् विश्वनाथजीके दर्शन करनेको
जाना चाहिये ( ऐसा कहकर चलनेका उद्योग करते हैं)
(तदनन्तर चांडालके वेषमें भगवान विश्वनाथजीका प्रवेश)
विश्वनाथ-माज मेरा मुख्य कार्य परिव्राजक शंकराचार्य
की परीक्षा करना है देखू नाशवान् जगत्के भयानक गागाचक

शङ्करविजय-नाटक
"ETEP
में दुर्दमनीय इन्द्रि रूप शत्रुओं को इन्होंने कैसा चशमें करा है !
और इस अनन्त जगत को अब किस दृष्टिसे देखते हैं ! आज
देखता हूँ यह ग गत् भर घृणापात्र चाण्डालके साथ यह कैसा
नवहार करते हैं, अच्छा मार्गके बीचोबीचमें खडा होगाऊँ
ऐसा ही करते हैं !
शंकरा०-(सामने को देखकर बाप ही भाप ), छि: छि:
मार्गमें चाण्डाल खडा है ! अच्छा आपत्ति में पड़ा, पहा तो
मैं गंगास्नान कर पवित्र हो भगवान् विश्वनाथकी पूजा करने के
विचारमें था परन्तु अब क्या करूँ इसने तो मार्ग रोक रखा है
( ऐसा कहते हुए दो पग आगे बढकर ) हर हर ! यह कैसा
अमंगल चाण्डोल है, हाथमें मांसफा पात्र है, साथमें चार कुत्ते
हैं, शरीरकी दुर्गन्ध यहा तक आरही है, शिव ! शिव ! इसकी
तो छागासे भी बचना चाहिये, (ऐसा कह कर एक ओरको
वचकर चलने लगते हैं)।
(चांडाल वेषधारी विश्वनाथ ऊपरको ही आते हैं और शङ्कराचार्य
सटपटाते हैं)
शंकरा०-भरे भाई ! जरी वचकर चल ऊपरको क्यों चढा
आता है ? क्या तुझको कुछ भी ज्ञान नहीं है ? जरा बच कर
चल क्या मुझको छूही लेगा ?, मुझे देर हुई जाती है, गंगा-
स्नान करके विश्वनाथका पूजन करनेको जारहा हूँ,
चाण्डाल-(कहनेको कुछ न सुनकर धक्का देता हुआ जाता
शंकरा०-( नाक भौं चढाकर ) अरेरे ! देखो दुष्टने छूही
लिपा न ? अब मुझको फिर स्नान करना पड़ेगा, मुझको छूने
से तुझको वथा मिला ? हटने के लिये इतना कहा एकनहीं सुनी।
चाण्डाल-हटनेको किससे कहा था ?
शंकरा०-तुझसे ही कहा था और किससे कहता, यहाँ और
कौन है?
?

७३ शङ्करविजय-नाटक r चांडाल-मुझसे कहा था या मेरे शरीरसे ? शंकरा०-भाई ! तू चांडाल नीच जाति है, अब फिर गंगा- स्नानरूप प्रायश्चित्त करना पडेगा ! चांडाल-(हँसकर ) यह तो बना तू है कौन ? शंकरा०मैं उस ब्राह्मण नातिका हूँ, जिसको चाण्डालका स्पर्श होने पर स्नान करना चाहिये । चांडाल-अरे ! तू जातिसे ब्राह्मण है या गुणोंसे ? शंकरा०-पदार्थ उसके गुण कभी अला २ होकर ठहर ही नहीं सकते, इस कारण यदि मैं ब्राह्मण हूँ तो उसके गुण भी मुझमें हैं ही अतएव में जाति और गुण दोनों हीसे ब्राह्मण हूँ। चांडाल-तब तो तुझको 'ब्राह्मण' इस पदका अर्थ मात होना चाहिये। शंकरा०-हाँ हाँ ! जानता हूँ रूढ माननेपर ब्राह्मण पद एक वेदोक्त अनादि सिद्ध जातिका वाचक है और यौगिक माना- जाय तो ब्राह्मण शब्दका पदार्थ 'ब्रह्म जानाति ब्राह्मण' अर्थात् जो ब्रह्मको जाने वही ब्राह्मण है, ऐसा होगा। चांडाल-तू अर्थ जानता है परन्तु उसके अनुसार वर्ताव नहीं करता, यदि तुझको ब्राह्मण शब्दके पदार्थका अनुभव होता तो तू. अपने मुखसे ऐसी भट्टसह बातें न निकालता ! शंकरा०-मुझको मत छू इस वाक्यमें तुमने क्या अट्टसह देखा ? चाडाल-अरे ! मूढ ! जो तुझको छूरहा है वह 'गत छू' इस कहनेको समझता नहीं है और जो समझता है उसको छूने और न.छूने से कुछ सम्बन्ध ही नहीं, तिसी प्रकार 'मुझे मत छू' ऐसा जो कहता है वह छुआही नहीं जाता है और जिस शरीरको स्पर्श होता है उसको स्मर्शके विषयमें भले बुरेका कुछ ज्ञान ही नहीं है, क्योंकि वह जड़ है; गंगाजल, गोवर पड़ने से क्या गंगा . 10 FGg शङ्करांवजय-नाटक म जल का माहात्म्य जाता रहता है ? जो सूर्यकी किरणें स्वच्छ गंगानल में पड़ती हैं वही यदि अपवित्र माने भरे हुए पात्रा पड़ें तो क्या ? सूर्य की पवित्रता नष्ट होकर किरणों में नीचभाव आसकता है ? तैसेही शाकाशकी समान व्याप्त जो आत्मा उसकी दृष्टिमें ब्राह्मण और चांडाल में कुछ भेद नहीं है, क्योंकि मेरे प्राणों का प्राण अनन्त ब्रह्मांडव्यापी निर्विकार सच्चिदानन्द जो ब्रा या मेती हृदयरूप गुहा में स्थित आत्मा क्या तुम्हारे पूर्णज्योतिर्मण परमात्मासे भिन्न है ? यदि कहो कि तेरा यह चांडाल शरीर अपवित्र है तो इसका उत्तर यह है कि क्या मेरा यह देह पृथ्वी, जल तेज, वायु, पोशाश इन पंच महाभूनीका रचा हुआ नहीं है ?, यह जड़-शरीर पवित्र ो चाहे अपचित्र हो, इसमें आत्मा का क्या जाता आता है ? इस नाशवान् जड शरीरका कर्म भोग रूप कार्य समाप्त होते ही यह अपने मूल कारण पञ्चमहाभूतों में जामिलेगा, तब मुझमें और तुममें कुछ भी भेद नहीं रहेगा,इस आत्माका कोई एक स्थान नहीं है, यह तो सर्वव्यापक है, इसस सब तच्चपर ध्यान देकर जरा विचारो कि मेरे शरीर से घणा करके वचना तुमको कहाँतक उचित है, इस कारण ई यतिजी! देह दृष्टिसे मैं तुम्हारा दास हूँ, जीव दृष्टि से तुम्हारा अंश और आत्मदृष्टिसे जो तुम हो वही मैं हूँ । इस कारण बाहर अभेद दृष्टिका डौल बनाकर भीतरसे ऐसे भेद भावका आच- रण करनेवालेको ब्राह्मण न कहकर पशु कहना क्या परंग उचित नहीं है। शंकरा०-(आप ही आप ) यह चांडाल नहीं है, क्योंकि चांडाल समान नीचके मुखसे तो ऐसी पवित्र वाणी और सद्वि- चार निकल ही नहीं सकता अतः यह चांडालके वेशमें कोई दिव्य पुरुष हैं (प्रकाशरूपसे) जीव और ब्रह्म द्ध और जल सङ्कारविजय-नाटक HORE • . सप्तन मिले हुए हैं उनमें से हंसकी सगान ब्रह्मरूप दूधको अलग करके ग्रहण करनेवाला कि जिसकी ऐसी भेद बुद्धि होजाय वह चाहे चांडाल हो, चाहे यवन हो तथा जातिसे परप नीच हो तब भी यह मेरा प्रणाम योग्य गुरु है। (ऐसा कहार चांडालके चरण छूने को झुकते हैं उसी समय भगवान् विश्वनाथ चांडाल का वेप त्यागकर प्रत्यक्ष मूर्तिसे प्रकट होते हैं और चाण्डाल अन्तर्धान होता है)। विश्वनाथ -हे मेरे अंश शंकराचार्य ! उठो, तुप मेरे अपत्तार पूर्ण हो या नहरें ? यह परीक्षा करने के निमित्त मैंने यह वेष रख कर तुमको स्पर्श किया था, अस्तु तुमने मुझको पहिचान लिया इस कारण मैं सन्न हूँ। शंकरा०-(ऊपरको उठ सन्मुख साक्षात् विश्वेश्वको देख और प्रणाम करके ) हे भगवन् ! पार्वतीमाणवल्लभ ! चरा- चर गुरो ! मैं भापकी परीक्षा में कैसे पार पासकता हूँ ? हिलोरें लेते हुए भयानक समुद्र में जैसे प्रचण्ड जलकी तरंगें एफके पीछे दूसरी चली माती हैं तैसे ही इस संसार समुद्रमें तुम्हारे वशमें रहने वाली जो माया तिसंकी तरङ्गे माती जाती हैं वह बड़े २ तत्त्वज्ञानियोंके छक्के छुटा देती है, फिर मेरी तो बात ही कौन निसके ऊपर भापकी कृपा है केवल उसका ही वह मायाँ कुछ नहीं कर सकती है सेहे भगवन् ! इस संसार सागरमें रहने वाले जे कामादि क र पशु हैं उनका मथन कहने के लिये मेरे पास मापका कपा खटग होना चाहिये । विश्वनाथ -हे शकर ! तुम यह क्या कहते हो मेरा तो चित्त ही तुम्हारे पशमें है,फिर उस चिचमें रहनेपाली कपा हो इसका तो कहना ही क्या ? शंकरा०-आप जो कुछ कहते हैं यह सब सत्य है, क्योंकि ?

शङ्करविजय-नाटक मेज देहयष्टि से मैं आपका दासानुदास हूँ, जीच दृष्टिसे मैं आपका अंश हूँ तथा आत्मदृष्टिसे मैं साक्षात् भापरूप ही हूँ । विश्वनाथ-धन्य ! शंकर ! तुम धन्य हो, जैसे व्यासजी साक्षात् नारायण हैं तैसे ही तुम भी. मेरे प्रिय हो ! जब २ धर्म की ग्लानि होकर अधर्मकी वृद्धि होती है तबरही मैं इसीप्रकार का अवतार धारकर धर्म की रक्षा करता हूँ। अस्तु, अब तुमको जो कुछ करना चाहिये सो कहता हूँ. सुनो श्रीव्यासजीने सत्र श्रुतियों का सार उपनिषदोंके द्वारा वर्णन किया है, उसका मूढ पण्डित अनेकों कुतर्के करके अर्थके स्थानमें अनर्थ कररहे हैं उन सबका जिसमें खण्डन हो ऐसा उपनिषदोंके ऊपर वेदान्तभाष्य वनाओ फिर कर्मकांडको ही सर्वोपरि मानकर उसीमें मग्न रहने बाले मंडनमिश्रको जीतकर दिग्विजय करो और द्वैतवादियों को जीत ब्राह्माद्वैतमतकी स्थापना करके जगद्गुरुकी पदची पात्रो, अब मैं अन्तर्धान होकर निजधामको जाता हूँ । शंकरा०-( नमस्कार करके ) भगवन् ! आप विद्याके भंडार हैं, आप चाहे जिससे चाहे जो कार्य करवासकते हो, मैं पाशा नुसार सब कार्य करनेको उद्यत हूँ, परन्तु मेरे रचेहुए भाष्यका देखकर शुद्ध करनेके निमित्त एकनार फिर भी दर्शन होना चाहिये। विश्वनाथ-तुम्हाग भाष्य पूर्ण होनेपर साक्षात् व्यासनीही तुपको मिलेंगे और वहीं शुद्ध करेंगे, अस्तु, अब मैं जाता हूँ । ( ऐसा कह अन्तर्धान होते हैं) शंकरा०-भाहा ! आज साक्षात् भगवान् विश्वनाथको दर्शन हुआ इसकारण मेरा आत्मा प्रसन्न होरहा है,अब उनकी आज्ञानुसार वर्ताव करने में प्रवृत्त होना चाहिये। (ऐसा कहकर जाते हैं)

शङ्करविजय-नाटक
-
मैं
हतीय-श्रक
प्रथम-दृश्य ।
[ कैलास पर्वत पर आसन पर बैठी हुई लक्ष्मी और पार्वतीका प्रवेश]
लक्ष्मी-सखि पार्वती ! परसों मैं तुझसे मिलनेको आई थी
तच तूने एक बात चलाई थी, परन्तु वह आधी ही कहकर छोड़
दी थी और बाकी की फिर कहूँगी ऐसा कह दिया था, आज
उस बानके ही सुनने को आई हूँ अब मुझे बता फिर भागे
को क्या २ हुआ?
पार्वती-ऐसी कौनसी बात थी ? सखि ! मुझे तो स्मरण
रही नहीं।
लक्ष्मी-अरे ! तेरे स्वामीने मृत्युलेोकमें अवतार धारकर बडे
बड़े चमत्कारिक काम करने प्रारम्भ कर दिये हैं उनका समा-
चार क्या तू मुझे नहीं सुनावेगी? ऐसी रुंठाई तो नहीं चाहिये।
पार्वती-(हँसफर ) हाँ हाँ ! यह शत परन्तु यह तो पता मैंने
तुझको कहाँ तक सुनाई थीं !
लक्ष्मी-सखि ! तुम्हारे स्वागीने अपनी मृत्युलोककी माता
को धोखा देकर उससे संन्यासके विषयमें प्राज्ञा ली थी, वह
यहाँ तक ही सुनाई थी, अब भागेका वृत्तान्त वता !
पार्वती-भरी ! मुझे भी यहाँ ही तक मालूम थी,फिर भागे
को क्या हुआ यह बात अभी तक मैं भी नहीं जान सकी हूँ।
लगी ऐं ऐं क्या ? तूने कहा था मैं फिर सुनाऊँगी इस
कारण मैं तो बडी आशा करके आई थी परन्तु तूने यों ही टरका
दिया ना!
पार्वती-थोड़ी देर थम, आगेको क्या क्या हुआ से सब
बता दूँगी, इसीका पता लगानेके लिये मैंने दो गण भेजे हैं वह
आते ही होंगे, वस उनके मुखसे सब सुन लेना।
(तदनन्तर तुंडी नामक शिवजीका गण आता है)

शङ्करविजय-नाटक तुडी -( समीप आकर ) पानाजी ! दोनोंके चरणकमलों को मैं तुंडी प्रणाम करता हूँ (ऐसा कहकर प्रणाम करता है। पार्वती और लक्ष्मी चिरायु हो, सकल कन्यास मिलें । पार्वती-अरे तुण्डी ! तू अकेला ही आया और वह भृगी कहाँ है? तुण्डी-माताजी ! आपके कथनानुसार हम दोनों भूलोकमें गये और तात महाराजकी लीला प्रत्यक्ष देखनेके लिये, किसी को न दीखनेवाले अश्यरूपसे उनके पीछे ही खड़े रहे, उस समय जो कुछ देखा वह सब निवेदन करनेको ही चला आरक्षा हूँ और भागेको क्या होता है यह देखने के लिये भृङ्गीको वहाँ हो छोड़ आया हूँ। पार्वनी-हाँ तो संन्यासके विषयमें मातासे आज्ञा लेकर फिर क्या लीला हुई वह सुना ? तुण्डी-माताजी ! ध्यान देकर सुनो-संन्यास ग्रहण करने के लिये माताकी आज्ञा मिलते ही अकेले ही वन और झाड़ियों को खाँचते हुये चले गये, परन्तु कोई गुरु न मिले तब परप- चिन्तामें पडकर ईश्वरकी स्तुति करते हुये हिमालयकी तलैटीमें जो घना बन है तहाँ निराश होकर बैठ गये। पार्वती-वया पृथ्वी भरमें कोई दीक्षा देनेवाला संन्यासी ही नहीं मिला। तुण्डी-जगदम्बे । सुनो-माहिष्मती नगरी में एक मण्डनमिश्र नागक कर्मठ हैं उन्होंने ऐसा ऊधम मचा रक्खा है कि जिस संन्यासी को देखते हैं उसीको शास्त्रार्थमें जीतकर विवाह करा देते हैं, इस भयसे सब संन्यासी छुपे रहते हैं। पार्वती-अच्छा तो फिर प्रागे क्या हुआ ? तुण्डी-तात पहाराज उस वनमें बैठ गये और अनन्यमनसे ईश्वरका ध्यान करने लगे, उसी समय उनको यह शब्द सुनाई शङ्करविजय-नाटक भर आया कि इस हिमालयकी गुफामें एक महायोगी गोविन्दपूज्य- पादाचार्य नायक स्वागी हैं उनसे संन्यासकी दीक्षा ले । पार्वती-( हँसकर ) सखि लक्ष्मि ! खूब रूप बनाया होगा! अच्छा फिर क्या हुआ ? तुपडी-फिर उस गुफाको ढूंढते हुए हिमालय पर गये, तहाँ कितने ही पियोंने उस गुफाकी पहिनान बनाई, उसीके अनु- सार गुफाको ढूंढकर गुरु गोगिन्द पूज्यसे मिले और संन्यास की.दीना ली। पार्वती-(मुख विमूर कर.) फिर क्या हुआ ? लक्ष्मि-सखि ! तूने मुख क्यों चिमुरा ? पार्वती-हाँ लक्ष्मि ! तू हँसी नहीं उड़ावेगी तो कौन उड़ा- वेगा! (गणसे ) फिर क्या हुआ ? तुण्डी-फिर उसी भाश्रममें गुरुसेवा करने के लिये कितने ही दिनों रहे,सेवा करते समय तांत महाराजने बडे २ चमत्कार किये पावती-वह क्या.? शीघ्र सुना तुण्डी-सुनिये-एक दिन स्वामी गोविन्दपूज्यजी गङ्गाके तट पर समाधि लगाये बैठे थे और गङ्गाजीका गं गं प्रचण्ड शब्द होरहा था, उस शब्दसे गुरुजीकी समाधिमें विघ्न पड़ता समझ कर तात महाराजने सारी गङ्गाको अपने कमण्डलुमें भर कर गंगाका प्रवाह ही बन्द कर दिया ? पाती-जिन्होंने गङ्गाको अपनी जटाओंमें बिन्दुकी समान रोक रक्खा है उनको कमण्डलुमें छिपा लेना कौन कठिन है ? अच्छा फिर ? तुएडी-यह बात ज्ञात होते ही गुरुजीने तात महारोजसे कहा कि-गुरुसेवा पूर्ण होगई, अब तुम अवतार का कार्य पूरा करनेको जाओ, इतना कहकर एक कथा सुनाई।

S
शङ्करविजय नाटक
Jion
पाती-वह कथा कौनसी थी ?
तुण्डी-उन्होंने कहा कि-एक समय में ब्रमसभामें गया था,
तहाँ मेरे आदिगुरु व्यासजी भी पाए थे, तहाँ प्रसंगानुसार
यह बात चली कि व्यासमुत्रों पर भाष्य होना चाहिये, तर
'गोविन्दपाद के शिष्यों में से जो गङ्गापयाहको कमण्डलुमें भर
लेगा वही मेरे सूत्रों पर ठीक २ भाष्य रचेगा' यह वात व्यास
जीने कही थी, इस कारण अब तुग काशीमें जाकर उपनिषदों
पर और व्याससूत्रों पर भाष्य रचो, गुरुजीकी यह आज्ञा पाले
ही तात महाराज काशीको चले गये।
पार्वती-काशीमें आकर क्या चरित्र किया, वह भी सुना ?
तुण्डी-काशीपुरीमें आने पर पद्मपाद, आनन्दगिरि आदि
को उपदेश देकर शिष्य बनाया और जो कोई संसार रोगसे
दुःखित होकर शरण आते हैं उनका उद्धार करने के लिये तात
महाराज अाजकल.काशी में ही ठहरे हुए हैं, अब अागेको क्या
होता है, उसको जाननेके लिये भृङ्गीको तहाँ छोड़कर मैं श्रीमती
के चरणों में वृत्तान्त निवेदन करनेको चला पाया हूँ ( ऐप
फह प्रणाम कर मौन धारे हुए बैठता है )
पार्वती-सखी लक्षिा ! सुन लिया, अब मागेका पता भृङ्गी
के आने पर लगेगा।
लक्ष्पी-सखि ! महान् पुरुषों के चरित्र चाहे जितने सुने चलें
जाओ तृप्ति नहीं होती है, अच्छा भान तो मैं जाती हूँ, अव
कलको फिर पाउँगी।
पार्वती-अच्छा सखि ! हाँ बाते करने सुनते बहुत समय हो
गया, अब कल जैसा होगा देखाजायगां ।
( ऐसा कहकर सब जाते हैं)

शङ्करविजय-नाटक cvn द्वितीय दृश्य स्थल-काशीपुरी तदनन्तर श्रीशंकराचार्यजीके शिष्य पझपाद आनन्दगिरि हस्तामलक और विष्णुगुप्त आदि नारायण २ शब्द क हुए प्रवेश करते हैं आनन्दगिरि-भाई ! हम बड़े भाग्यवान् है जो ऐरो श्रीगुरु के चरणों की शरण पाई है। पद्मपाद-पातकी नरनारियों के तारनेके, पापसे दबत्ती हुई भूगिका भार उत्तारनेको, सत्य सिद्ध वेद वगेका प्रचार करने को,तथा सक्को शुद्ध अद्वैत नादसे दीक्षित कनेके निमित्त साक्षात् भगवान् त्रिशूलधारी शिवने अवतार धारा है, वही गुरु महारानके रूप इस भूनलपर विराजमान है, किन्ही पूर्वजन्मों के पुण्यसे हमको भी ऐसे पुण्यपुरुपके चरणों की शरण पिल गई है, भाहा कैसे भानन्दका सुअवसर है । विष्णुगुप्त-मेरा मनतो गुरुपहाराजके उपदेश वचनों को सुनते हुए किसी शास्त्रके पढ़ने को नहीं चाहता, मानो वेद शास्त्रका सारभून अमृन ही पिला देते हैं। 1 इस्तामलक-क्यों पद्मपादाचार्यजी ! जब गुरु महाराज उत्तर पानसरोवरकी यात्रा करनेको गये थे तब तुम तो साथ ही थे; यह तो बताभो तहाँ क्यों २ चमत्कार देखे भौर श्रीमहाराज फेहाँ हैं? पद्मपाद कोई कहनेयोग्य बड़ाभारी चमत्कारतो देखा नहीं,उधर के सत्र तीर्थों में स्नान हुआ, सब देवताओं के दर्शन हुए, जिस जिस क्षेत्रमें गये तहाँ २ श्रीपहागजने देवताओं का यथाविधि पूनन किया, अनेकों प्रकारकी स्तुति की, सार यह है कि श्रीगुरु महाराजके साथ यात्रोके दिन बड़े आनन्दसे चीते । आनन्दगिरि-मच्छा अब गुरु महाराज कहाँ हैं ? 11

शाङ्करविजय-नाटक
पापाद-मगागमें "तुग काशीको चलो, दोचार दिन पीछे
मैं भी आता हूँ" एसा कहकर रहगये हैं, उनकी अवज्ञानुसार
थोड़ार मार्ग चलकर मैं तो यहाँ ओपहुँचा हूँ अनुमानतः श्रीगुरु
महाराज भी आज ही आते होंगे।
( इतने हीमें परदेके भीतर नारायण शब्दकी ध्वनि होती है )
आनन्दगिरि-भाई ! अनुपान होता है कि गुरुमहाराज आगयो
तदनन्तर कई एक शिष्यों सहित श्रीशङ्कराचार्यजी आते हैं और
नारायण नारायण कहकर आसन पर वठते हैं
पद्म और कानन्दगिरि-( हाथमें दण्ड धारण करेहुए यलियों
के सम्पदायके अनुसार प्रणाम करके नारायण नारायण शब्द
का उच्चारण करते हैं,
शंकराचार्य-(प्रेमके साथ ) क्यों सब शिष्यों कुशल तो है ना?
आनन्दगिरि-भगवन् ! आपके छपा.कटातसे सब कुशल है,
कुछ दिनों तक श्रीचरणोंका दर्शन नहीं हुभा इस कारणही कुछ
एक अधैर्यसा रहा था, अब श्रीचरणों का दर्शन होनेसे वह
भधैर्य भी दूर होगया।
शङ्कराचार्य-हे श्रेष्ठ शिष्यों ! सूर्यास्त होनेको है इस कारण
अब मैं गंगास्नान करताहुआ भगवान् विश्वनाथ के दर्शन करने
को जाऊँगा, तुम सब भी जाकर अपनी अपनी नित्यक्रियासे
निनो,
(नारायण २ कहते हुए सब जाते हैं)
* तृतीय-दृश्य *
काशी मणिकर्णिका घाट
(चारों ओर शिष्य मण्डली और मध्यभागमे आसनपर विराजमान
श्रीशंकराचार्यका प्रवेश)
शंकराचार्य-शिष्यों ! पुण्यक्षेत्र काशीपुरीमें पाये बहुतदिन
होगये, इस कारण मेरी इच्छा है कि और २ देशों में भ्रमण

অনিলh करूँ बहुत स्थानों में गये विना संसारकी दशाफा पता नहीं लगसकता। शिष्य-हम सब श्रीमहाराजको भाकाको स्वीकार करते हैं शंकराचार्य-तुप सब मेरे शारीरक भाष्यको तो भलीभकार समझते ही हो ? पद्माद-जब श्रीमान्के चरणरेका आश्रय लिया है और श्रीमान्की हम सोंके ऊपर कृपा है तो फिर शास्त्रीय किसी विषयमें भी अङ्गता रहना कैसे सम्भव हो सकता है ? शंकराचार्य-( सापनेको देखकर ) यह बूढा ब्राह्मण कौन भारहा है। (बूढे ब्राह्मणके वेशमें वेदव्यासजीका प्रवेश) वेदव्यास महाराज ! माफ कौन हो और किस शास्त्रका विचार कररहे हो? आनन्दगिरि-हे द्विजवर्य ! यह अद्वैतवादके प्राचार्य हम स्पदोंके गुरु हैं, इन्होंने वेदान्तसूत्रों पर भाष्य रचा है, जिसमें द्वैतवादका पूर्ण विचार किया गया है, हम सब उसी तत्त्व- झानको सीखते हैं। वेदव्याप्त-(शंकराचार्यसे ) क्यों भैया ! यह तेरे शिष्य क्या कह रहे हैं, यह कहीं पागल तो नहीं होगये हैं ? यह तुझको भाष्यकार कहरहे हैं, परन्तु वेदान्तसूत्रों पर भाष्य रचना ते बड़ा कठिन काम है ? भाष्य तो एक ओर रहा तू यथार्थ रूप से वेदव्यास जीके एक सूत्रकामी व्याख्यान कर देगा तो मैं भनेकरें धन्यवाद दूंगा। शंकराचार्य-विपद ब्रह्मज्ञानी आचार्योंके चरण कमलोंको मैं सैंकड़ों वार प्रणाम करता हूँ, और उन्न सोंके चरणोंकी धूलि झपने शिरपर लेता हूँ,हे ब्रह्मन् ! यदि आप वूमना चाहेंगे तो मैं - शङ्करविजय-नाटक Pur अवश्य ही इस वातको दिखाऊँगा कि व्याससूत्रों के ऊपर मेरा कैसा अधिकार है ! वेदव्यास - अच्छा हो तो सही "तदनन्तरपतिपत्तौ संइति- सम्परिष्वक्तः ।" इसका क्या. तात्पर्य है.? शंकराचार्य-(छापने पनमें ) यह ब्राह्मण कौन है ?. इसने इतना सूक्ष्म गूढ प्रश्न क्यों किया है ? पहिले तो इस सूत्रके पूर्व पक्षमें ही बैंकड़ों युक्तियें हैं फिर उत्तर के विस्तारका तो कहना ही क्या है ? इसकी मीमांसा कहीं सहजमें ही थोड़े, हो सकती है १( स्पष्ट रूपसे पद्मपाद के प्रति) भाई ! यह ब्राह्मण कौन है ? कुछ समझ नहीं पाता ? पद्मपाद-गुरुदेव ! मुझे तो ऐसा अनुमान होता है कि यह कोई योगसिद्धिसम्पन्न तपस्वी, ब्राह्मणका रूप धरकर आये हैं (ब्राह्मण की ओरको देखकर ) अनुपान क्या प्रत्यक्षही देख लीजिये महाराज ! इनके नेत्रों में अलौकिक तेज दमक रहा है, सस्पसे ढकी हुई अग्नि कवतक लुकी रहसकती है, ( क्षणभरके अनन्तर ) अनुगान नहीं, गुरुदेव मैं सत्य कहता हूँ यह बूढ़े ब्राह्मण साधारण पुरुष नहीं किन्तु जगद्गुरु परमगुरु साक्षात् भगवान् वेदव्यास है शंकरः शंकरः साक्षाद्वयासेो नारायणो हरिः। तयार्थिवादे सम्वृत्ते किङ्करः किङ्करोम्यहम् ॥ शंकराचार्य-(ध्यासदेषके चरणों में प्रणाम करके) हे महा- भाग ! इस छलनाको छोड़िये अब मैंने समझा कि श्राप साक्षात् व्यासदेव हैं अब एकचार प्रत्यक्ष दर्शन देकर इस दीन को कृतार्थ करिये। वेदव्यास -( एने.रूपसे प्रत्यक्ष होकर ) हे शंकर 1. तुम् इस शूनलपर धन्ध हो, मैंने शम्भुकी सभामें तुम्हारे भाष्यकी धर्चा सुनी, थी; इसी कारण उसको देखने यहाँ आया हूँ।

शङ्करविजय-नाटक प्रू शंकराचार्य-प्राः १.धन्य है मेरा जीवन ! भगवन् ! कहाँ आपके गम्भीरसूत्र और कहाँ मेरी अल्पबुद्धि ? वेदव्यास -( शंकराचार्यजीके हाथमेसे भाष्य लेकर क्षण भर देखनेके अनन्तर ) हाँ ! तुम्हारा यह भाष्य वहुन उत्तम बना है, इनने बड़े ग्रन्थमें कहीं भी भ्रम वा प्रमाद नहीं है, हे शंकरा- चार्य ! योग, न्याय,सांख्यः गीगांसा श्रादि कोई तुम्हारे भाष्य की संपान नहीं है, क्यों न हो, जव कि तुम स्वामी गोविन्द- पूज्यपादके शिष्यं साक्षात् शित्र हो, भाष्यको अनेकोंने रचा है परन्तु तुम्हारे सिवाय मेरे हृदयके भारको देव असुर मनुष्यं ऋषि आदि कौन जान सकता है ! तुम्हारे समान अकाट्य- युक्तियें और प्रमाण किसीने नहीं लिखे, अब तुम एक काम और करो भूमि पर भेदवादी मूढमति दुष्ट नास्तिकोंका पराजय करके अपने मंतफा प्रचार करो। शंकराचार्य-महाराज ! अब मेरी भायु पूर्ण होचुकी है। वेदशास-सत्य है, किन्तु तुम्हारे विना. वेदान्तके सच्चे तत्तको प्रकाशित करनेवाला दूसरा कौन है ? पातकियोंको सच्चा.मार्ग कौन दिखावेगा ? यद्यपि देवसभामें तुम केवल सोलह वर्ष का ही निगम करके मृत्युलोकमें आये थे, जो कि- आज पूरे होनागगे, तो भी अभी. तुमको बहुन कुछ कार्य करना शेष है; इतने समयमें भवतारको समाप्त न करो. अब दैववल से अाठ बर्ष और मेरी योगशक्तिसे आठ वर्ष इस प्रकार सोलह वर्षकी आयु तुम्हारी बढाता हूँ, इननेमें सबं भेदनादियों को जीत पृथ्वीका दिग्विजयाकरके ब्रह्माद्वैत मतका प्रचार करो अब मैं जाता हूँ। शंकराचार्य और शिष्यों का व्यासजीके चरणों में प्रणा" करना और व्यासजी का अन्तर्धान होना शङ्करविजय-नाटक بالا ... शंकराचार्ग-भक्तशिष्यों । चलो सब देशों में भ्रमण करें, संन्यासीको एक स्थान पर अधिक नहीं रहना चाहिये । सब शिष्य-जो माज्ञा गुरुदेव की। ( ऐसा कहकर सब जाते हैं ) * चतुर्थ--दृश्य * प्रयागराज-त्रिवेणी का तट | ( जलता हुआ अग्निकुंड चारों ओर शिष्यों का खिन्न चित्त होकर खड़े होना) भट्टपाद-मिग शिष्यों । आज मेरे जीवनकी मन्तिम लीला यह अन्त समय है, सब मिलकर एक स्वरसे अमृतमय हरि शुणों को गाओ, माज मैं संसारकी कलकलसे छूटकर शांतिमय भगवान्के नित्यपदमें परमसुख पाऊँगा। शिष्प-हरेन म हरेन म हरेनामैन केवलम् । : (फिर सबका एक खरसे गाना.) रटहु मन ! निशिवासर हरिनाग ॥ टेक ॥ साँचे मीत भक्तपेमी हरि, झूठ सब धन धाम | ब्रह्मा मादि देव ऋषि जिनके, पूजन पद अभिराम ।। तात मात दारा मृत वान्धव, नहिं मावत कोई काम । एक नाम हरिको दुख टारत, सुमिरहु आठों यांग ॥ (नारायण नारायण कहते हुए श्रीशङ्कराचार्यजी का प्रवेश) शंकराचार्ग-(अपने गनमें ) आहा ! यह कैसा अद्भुन दृश्य है ! आज नगर भर में इनके तुपाग्निमें प्राण त्यागनेका कोला. इल मचा है ? ऐसे प्रसन्न मुख होकर जलती हुई चित्ता में वैठना, धन्य धीरज ! धन्य तेज ! भट्टपाद शंकराचार्यको देखकर ) भगवन् ! मैं आज अंत समय श्रीचरणों का दर्शन पाकर कृतार्थ होगया। ( जलनी हुई चितामेंसे उठकर प्रणाम करनेके मनन्तर ) देन ! आपने मेरे जीवनकी समाप्तिमें दर्शन दिया ?

शङ्करविजय-नाटक ८७ शंकराचार्य-प्रिय भट्टपाद ! तुम यह क्या कह रहे हो ? कहाँ जामोगे ? क्या अपने स्वरूपको भूल गए हो ? मैं तो यहाँ तुम को अपना रचा हुआ वेदान्तभाष्य दिखानेको आया था, मैंने लोकोंके मुखसे. यह संकटमग समाचार सुना था, परन्तु अब प्रत्यन ही देखरहा हूँ, इस समय इस इच्छाको छोड़ो। भट्टपाद (वेदान्तभाष्यको देखकर ) भगवन् !. मेरी इच्छा थी कि श्रीमानके भाष्य पर मार्तिक वनाऊँ गरन्तु भाग्यवश भयानक कालचक्रने मेरे उस मनोरथको पूरा नहीं होने दिया, परन्तु अन्तसमयमें स्वामीजी के चरणों का दर्शन होगया, इस पातकीके लिये यही बडे गौरवकी बात है। शंकराचार्य-प्रियवर ! मैं अनुरोध करता हूँ कि इस समय ऐसा साहस न करो! : ..भट्टपाद-प्रभो ! मेरी इस धृष्टताको क्षमा फरिये और मेरे पहिले वृत्तान्तको सुनिए भाप भान भी जिन. वौद्धोंको. चारों और देख रहे हैं, कुछ दिन पहिले यह चौगुने थे, इनके घोर उत्तातसे मैदिकधर्म दवता चला जाता था, वेद वेदान्त आदि को कुछ आदर नहीं रहा था, चारों ओर नास्तिकता छागई थी भाने धर्मकी ऐसी दशा देखकर मेरोनित्तको: बडा कष्ट हुमा, तब मैंने राजा सुधन्याकी सहागता ली और बौद्धगतका खंडन कानेको अटल प्रतिज्ञा की, इसकारण कोई और उपाय न होने से उनके दूषित ग्रन्थ पढने पढ़े, हाय ! अभ्यासके गुण अवगुणों को कौन मेट सकता है ? प्राणपणसे वौद्धग्रन्थोंका. अभ्यास करते २ चित्त पर उनके ही सिद्धान्तोंका अंकुर जमने लगा; अन्नमें उसका ऐसा विषम-फल हुआ कि-एक दिन मैं वेदमें दोषदृष्टि करने लगा, परन्तु किसी पूर्वजन्मके पुण्यवंश क्षण भरमें ही.चित्तको बडी ग्लानि हुई। अपनेको धिक्कार देने लगा ८८ शङ्करविजय-नाटक Lality उस समय मेरे नेत्रोंमें जल भर आया, यह देख और मेरे मभि- प्रायको समझकर चौद्ध लोग क्रोध भरकर. मेरे विनाश का उद्योग करने लगे, अन्तमें उन्होंने निश्चय करके मुझे एक बड़े ऊँचे स्थान परसे नीचेको ढकेल दिया, गिरते समय मैंने कात. भावसे कहा कि-'यदि वेद सत्य होंगे ता मेरा मरण कभी नहीं होगा' इस वेदोंके सत्य होने में सन्देहथरे वावयको कहने से तथा गिन बौद्धोंसे पढा उन्हींसे शत्रुता करनेके कारण गुरुद्रोही होने से मैं जैमिनि मुनिके मतानुसार आज इपके साथ अग्निमें भस्म होकर विधर्मशिक्षा और अपने धर्ममें सन्देह होनेका प्रायश्चित करता हूँ, हे भगवन् ! मैं जानता हूँ श्राप साक्षात् शिवावतार हैं,इसकारण इस समय आपका दर्शन होने से मैं कृतार्थ होगया, अब मुझको प्राण त्यागनेका कुछ कष्ट नहीं है। शंकराचार्य-स्वामिकार्तिकेय ! क्या तुम अपने स्वरूपको भूल गये ? भूनल पर तुम्हारा अतार बौद्धमतको निर्मूल करने के लिये हुआया,फिर तुम्हारे कार्य दोष कैसे लग सकता है ? अब मैं तुपको प्राणदान देता हूँ, मेरे भाष्यपर वानिक बनायो। भट्टपाद-भगयन् ! आपका कहना ठीक है, आप क्या नहीं फरसकते हैं ? मुझे जीवन देना आपके लिये कौन दात है? आप चाहें तो जमतका संहार करके फिर सृष्टि रचसकते हैं। परन्तु नोभी मेरी प्रतिज्ञा भङ्ग नहीं होनीचाहिये, अतएव चरणः छूना हूँ, इस समय मुझको केवल ब्रह्माद्वैतभाचका दान दीजिये जिससे संसारसागरमें परित्राण पाऊँ, और एक निवेदन. याई है कि एक मएडनमिश्र'नामक कर्मकाण्डी माहिष्मती नगरी रहते हैं, यदि आप उसको जीत लेंगे तो नगर भर जीत लिया सा. होजायगा, उसकी समान कर्मकाण्डी भारतवर्ष भरमें और कोई नहीं मिलेगा वह गृहस्थ धर्मको चलाने और निवृत्तिमार्ग ८९ है। शङ्करविजय-नाटक ar को हटाने वाला है; यदि अतिमतका प्रचार करना हो तो पहिले उसका प्रचार करिये, मुझे निश्चय है कि-धर्मजगत्में आपका भासन सबसे ऊँचा होगा, अब मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिये श्राज्ञा माँगता हूँ। शंकरानार्ग-सत्यपद्वैतम् । सत्यमद्वैतम् !! सत्यगतम् !!! सब शिष्प- सत्यमद्व तम् ! सत्यमद्वैतम् !! सत्यमद्वैतम् !!! शंकराचार्ग-आहा ! धन्य है भट्टपादके धैर्य और तेजको, भट्टपाद ! तुम्हारी कीर्ति जगत्में चिरकाल तक रहेगी ( लो मैं भी अब गण्डनमिश्र के समीप चलता हूँ) सब शिष्य-हे महाराज ! हम सब भापके दर्शनसे निष्पाप होगये, इस कारण अपनेको धन्य मानते हैं। शंकराचार्य-तुम्हारी सम्मति हो, अब मैं जाता हूँ। ( एक ओरको शङ्कराचार्य और दूसरी ओरको सबका जाना) * पञ्चम-दृश्य * माहिष्मती नगरीका मार्ग (शिष्यों सहित शंकराचार्यजीका आना) शंकराचार्य-शिष्यगण !.चलते चलते बहुत समय होगया, अब कुछ देर इस सामनेके शिवालयमें आराम करके चलेंगे,और सुना था कि इस मंदिरके समीप जो ग्राम दीखरहा है यहाँके शेष भेदवादी हैं किसी प्रकार उनसे भी बातचीत होकर उनका भ्रम दूर होजाना चाहिये ( सामनेको देखकर ) यह मंदिर में बहुतसे शिवभक्त पूजन के भरे और खाली पात्र लिये हुए जा रहे हैं (क्षणभर विचारकर ) प्राः आज शिवत्रयोदशी है. हम भी चलकर भगवान् भूतपतिके दर्शन करें (शंकराचार्यजीका मन्दिरमें जाकर शिष्यों के साथ महादेवजीकी स्तुति करना और पूजकोंको शङ्कराचार्य की दिव्यमूर्ति के दर्शनसे भौचक्के होकर एक मोरको संकुचित होकर खड़ा होना) - 12 - . शङ्करविजय-नाटक * * पशूनां पात पापनाशं परेश, गजेन्द्र कृत्ति घसान वरेण्यम् । जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारि, महादेचमेकं स्माणि स्मरामि ॥१॥ महेशं सुरेशं सुरारातिनाश, विशुं विश्वनाथ विभूत्यंगभूषम् । विरूपाक्षबिन्दवन्हित्रिनेत्रं, सदानन्दगीड़े पञ्चवक्रम् ।।२।। गिरीश गणेश गले नीलवर्ण, गवेन्द्राधिरुई गुणातीतरूपम् । अचं भास्करं भस्मना भूषितांगं, भवानीकलनं भजे पञ्चवक्रम् । शिमाकान्त.शम्भो शशा कार्धपोले,महेशान शूलिन्जटाजूटधारिन खयेको जगद्व्यापको विश्वस्त्रए, प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप ४ परात्मानमेकं जगवीजमाद्यं, निरीहं निराकारणोंकारेवद्यम् । गतो जायते पाल्यते येन विश्वं, तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वस्५ न भूमिर्न चापो न बन्दिन वायुर्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा न ग्रीष्मो न शीतं न देशोन वेशेष,न.यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिपूर्ति तमीड़े।। अजं शाश्वतं कारणं कारणाना,शिवं केवलं भासकं भासकाना । तुरीयं तमः पारपायन्तहीनं, प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम् ॥७॥ नमस्ते नमस्ते विभो निश्चमूर्ते, नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते । नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्प, नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य।।दा प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ, महादेव शम्भो महेश त्रिनेत्र। शिवाकान्त शांत स्मरारेपुरारे,त्वदन्यो घरेण्यो न मान्यो न गएग: शम्भो महेश करुणामय शूलपाणे। गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन् ।। काशीपते करुणया जगदेतदेक- स्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि ॥ १० ॥ स्वत्तो जगद्भवति देव भव सारारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ । वय्येष गच्छति लयं जगदेतदीश लिगात्मके हर चराचर विश्वरूपिन् ॥ ११ ॥ स्तुति करने के अनन्तर शंकरा जीका ध्यान मग्न होकर बैठना और शिवोपासकोको. परस्पर वातचीत करना।

शहरविजय-नाटक
भ
१ शिवोपासक-भाई ! तुमने सुना होगा, कोई शंकराचार्य
नामक संन्यासो सर्वत्र दिग्विजय करते हुए भद्रुतमतका प्रचार
कररहे हैं, मुझे ते अनुमान होता है, यह वही हैं,अनेकों पंडित
शास्त्रार्थ में हार मानकर इनके शिष्य होगये हैं, न जाले हमारी
क्या दशा होगी।
दूसरा -हाँ ! भाई.कहते तो ठीक हो, यह पही हैं, इनके
सामने जीभ हिलाना भी ठीक नहीं है, यहाँ तो हाँ हाँ हूँ हूँसे
ही काय चलेगा।
तीसरा-चाहे जो कुछ कहो, परन्तु है यह बड़े विद्वान ! लोग
जो इनको शिशावतार कहते हैं सो ठीक ही है ।
प्रथम-हाँ भाई ! अवतारी नहीं होते तो इतनीसी अवस्थाम
ऐसी विद्वत्ता प्रसिद्धि और सब जगह विजय कैसे पाते ?
इतनेोहीमें ज्यानमग्न शंकराचार्यजीके सन्मुख दिव्य मूर्ति भगवान्
शिषका प्रकट होना।
शिव-सत्यमद्वैतम् !! सत्यप? तम् !! सत्यमद्वैतम् !!!
इतना कहकर अन्तर्धान होना और भेदवादी शैवाका
शंकराचार्यजीकी शरण आना ।
सब शिवोपासक-( शंकराचार्यजीके चरणों में गिरकर )
महाराज ! हम आपकी शरण हैं, सत्य उपदेशः देकर हमारा
उद्धार करिये हम घोर नारकी हैं इसकारण ही अबतक अज्ञान
रूप अन्धकारसे दृष्टिहीन होरहे थे, अब नापके उपदेशके अनु-
सार अति ब्रह्मका विचार करेंगे, भगवन् ! छपा करके ज्ञाना.
पदेश देकर हमाग उद्धार करिये ।
शंकराचार्य मैं तुमसे बडा प्रसन्न हूँ, अब तुपको अतिकठिन
आत्मतत्त्व सुनाता हूँ,सावधानीसे ध्यान देकर सुनो यह जो तुग
अपने सामने विशाल अनन्त संसारको देखरहे हो,यह एकमहान्
चैतन्य है और ओत प्रोत. भावले सर्वत्र च्याप रहा है जिसके

१२ शङ्करविजय-नाटक कारण सकल ब्रह्माण्डकी १ खला बँधीहुई है,यह पूर्ण परात्पर परब्रह्म चैतन्य ही अनादि कारण है जिसकी इच्छासे संसारकी सृष्टि स्थिति और प्रलय होती है, वेदान्तके मत्तमें एक वह निर्गुण ज्योतिःस्वरूप सत्य सार भानन्द स्वरूप परमपुरुष ही सब कुछ हैं उनसे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं है । इस नाशवान् जगत् में ब्रह्म ही सत्य नित्य और सार है चारों ओर और जो कुछ दीख रहा है सब भ्रम है। तुम, मैं, घर, द्वार, पशु, पक्षी, वन, लता आदि भुवन में जो कुछ चराचर हैं सब ही मोह भ्रमकी छाया है । यही श्रुतिमें कहा है एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ।। ऐसा ही उपनिपदादि वेदान्त का मत है। इसपर भी जो हम को तुम, मैं, घरद्वार आदिका भेदभाव प्रतीत होता है, इसका कारण अभ्यास है, अर्थात् जो जो वस्तु नहीं है, उसको वह वस्तु सगझना, संक्षेपसे भावार्थ यह है कि मनुष्य बडा अल्प- बुद्धि है सदा मत्तिके अधीन हुआ मायाचक्रमें घूपता रहता है इस कारण ही पूर्ण ज्ञानमय परमात्माको नहीं जानसकता है, सहजमें ही मोह भाकर इसके हृदयके ऊपर अधिकार जमा लेता है और भीतरके विवेकको नष्ट भ्रष्ट कर डालता है, तब सब अपने वास्तिवक स्वरूप को भूल जाते हैं,अंधपरम्परा पर विश्वास करके जीव अज्ञानका भण्डार बन जाता है, तब जो देह गेहादि मिथ्या है उनकही सदा रहनेवाला समझने लगता है,जैसे कमल वायुका रोगी सकल विश्वको ही पीला देखता है,अथवा जैसे कोई अंधेरेमें भ्रपसे रस्सीको सर्प समझने लगता है तैसेही यह जीव भ्रामरे नेत्रों से केवल मिथ्या जगत्की भोरको ही देखता है; परन्तु जब इसके हृदयके ज्ञान नेत्र खुलते हैं, तब अपरूपी अन्धेरा दूर होता है, और अनन्त: जगन्मय एक पूर्ण ज्ञानमय मदरविजय-नाटक रा चैतन्य ही दीखने लगता है यह चैतन्य मनुष्य मात्रमें एफसमान है सर तन्यनानोमें पूर्ण, ब्रह्म सगभानसे पुगहुमा है, भव विचारकर देखो ब्रह्म और मैं दोनोंमें मभेद है, यह विचार वडा गहन है. इसका विचार बड़े ध्यानके साथ होसकता है, मनुष्य जब इस गम्भीर तत्त्वज्ञानको पाजाता है उसी दिन जन्म सफ्ल दोजाता है केवल मुखसे ही 'महंब्रह्म' करनेसे काम नहीं चल सक्ता है किन्तु मनसे सोहंभारका वर्तार करके दिखाना चाहिये जव ही मनमें ब्रह्मोनका प्रकाश होगा उसी दिन जीन मुक्त होनागा। शिनोपासक-गुरुदेन ! क्या जीवात्मा और परमात्मा एक ही चवन्य "? हम तो समझते थे फि-भिन्न २ हैं। शंकरा०-यह बड़ा भ्रम,भराहुभा और युक्तिहीन नैयायिकों फा गत है । मनमें विचारो फि-सर्वत्र शून्य ही शुन्य है, उसमें से तुम्हारे शिर पर जो शन्य है ( हायकी मुट्ठी वाँध कर ) मेरी मुट्ठीयेका यह शून्य वया उससे भिन्न है ? इसी प्रकार वास्तव में जीवात्मा भौर परमात्मा भिन्न २ नहीं है, मनुष्यको भ्रम- वश भेद प्रतीत होता है और जब ज्ञानका प्रकाश होनेसे घर भ्रा दूर होजाता है तब कुछ भेदाभेद प्रतीत नहीं होता है,सर्वत्र अद्वैत,पूर्ण, ज्योतिःस्वरूप, चैतन्य, मनन्तव्याप्त, अनन्त संसार में आदि पन्तहीन, सर्व मूलाधार, सत्प; नित्य, चिदानन्दगय परात्पर, ब्रह्म ही दीग्वने लगता है, भव तुं जीवका कर्तव्य मुनो-'मैं कौन हूँ संसाग्में क्यों आया हूँ और मुझको क्या करना चाहिये' मनुष्यमात्रको यह विचार करना चाहिए, जब मन तत्वज्ञानकी खोजका अभिलापी हो तब श्रेष्ठ गुरुकी शरण लेकर अमृन समान उपदेशोंको ग्रहण करे, तिनु केकी समान हला पर उसकी समान सहनशील वन जाय, सदा धर्मकी शारविजय-नाटक . रक्षा करे, हृदयमें तिल भर भी तमोभार न रक्खे, : सरल वि. रंचासी बना रहे, कभी मनमें कपटपार न रक्खे, समयको सज्जनोंके संगमें विताचे, जीवन के प्यारे साधी क्षमा-दपा- सरल ना-शमन-दमन भादिका सेवन करे, यदि मन मोक्षका मामिलापी होग तो नैराग्य और रिवेक इन दो परप मित्रों की शरण लेय, तथा भात्मतत्वका विचार करे तब पूर्णज्ञानमय छानन्त ईश्वरकी प्राप्ति सहममें ही होजायगी, विषकी समान जोन विषयवासनामों से बचा रहे, जगद् भरको अपनी समान देखे, मनामन्दिरमें सदा सर्वसार नित्य पूर्णज्ञानका प्रकाश करे, जिनकी आज्ञासे इस संसारमें आये हैं, जिनकी कृपासे सोचम ज्ञानरूपी रत्न पाया है, सदा मनसा पाचा कर्मणा उनही की सेवा करना मनुष्य शरीरधारी जीरका परमकर्तव्य है । इसको छोडकर दूसरा कोई मुक्तिका उत्तम उपाय नहीं है । शिवोपासक-गुरुदेन आपने हमारा उद्धार कर दिया, पर हम भी संन्यास आश्रमकी दीक्षा लेकर सदा आपकी सेवा में ही अपने जीपनको सफल करना चाहते हैं। शंकरा०-भाई ! इस भाश्रमका निर्वाह होना सहज नहीं है जब आत्मतत्वको सपझने लगे, आध्यात्मिक बलसे पलान् होनाय, मायामोह जडभाच दूर होजाय, सच पुरुष अद्वैतमतका अधिकारी होसकता है,परन्तु जबतक जीच इस गम्भीर ज्ञानको न पासके तवतक, शिव-दुर्गा-विष्णु गणेशादि देवताओं का सदा सरल हृदयसे भजन और पूजन करता रहै । इसीके द्वारा धीरे२ ज्ञानका प्रकाश होकर पुरुष परमात्माके समीप होजायगा इसी कारण परम प्रवीण महाज्ञानी शास्त्रकारोंने ईश्वरस्वरूपकी मिन्न २ रीति से व्याख्या करी है। विश्वासके साथ ईश्वरकी भक्ति करने वाले के सकल मनोरथ सफल होते हैं । परन्तु सूक्ष्म

शङ्करविजय-नाटक
भारसे विचार करने पर ब्रह्माण्ड भरमें एकके सिराय दूसरी
वस्तु ही नहीं है, जीके मायाको त्यागने पर ब्रह्ममें कुछ भेद
नहीं रहना है और भी धीरभाषसे देखने पर प्रतीत होगा कि
सकल वैदिक सम्पदायोंका परिणाममें एक ही फल निकलता
है, परन्तु बाय ! प्रज्ञान के कारण सब लोग इसको नहीं समझ
सकते हैं; इसकारण रथा गोलयोग करके भापसमें नैरभान
रखते हैं, परन्तु यह भदतवाद ही ज्ञानियों का माना दुभा मुक्ति
का एकमात्र पाय है।
शिवोपासक-भगवन् ! यह तत्वोपदेश तो हमारी समझमें
भारा परन्तु भर हम यह जानना चाहते हैं कि-मोक्षमार्गका
माश्रय लेने के लिये कौन २ उपाय श्रेष्ठ मौर मुलभ हैं ?
शंकराचार्य-पक्तिका उपाय तो विनेक और गैराग्य ही हैं
परन्तु संसारमें रहकर सरसे विवेक और पैराग्यकी साधना
नहीं होसकती है संसारकी घोर कुटिलता ममता मोह भादि
बडी २ पापाएँ देते हैं इस कारण भक्ति सहित संन्यास ही
मोतमार्गका दिखलाने वाला है।
शिवोपासक-तव तो है देव ! अपनी परसेनाके लिये
भाज्ञा दीजिये।
शंकराराय-परमकरुणामय मालर्ति भगवान् ही तुमार
मंगल करेंगे।
शिवोपासक - जय हो गुरुदेवकी, जय हो धर्म की जय हो
सत्य की।
शंकराचार्य-देखो श्रेष्ठशिष्यों ! भव रिलम्ब करना उचित
नहीं है,शीघ्र ही यात्रा करके माज ही मण्डनमिश्रसे मिलना है।
सब-भगवन् ! जो माज्ञा हो हम सेवक उसका पालन करने
को उद्यत है।
(सव जाते है।

शङ्करविजय-नाटक
मैं
पष्ठ-दृश्य
[ माहिष्मती नगरी और रेवाका किनारा]
(तदनन्तर लवंगिका और बबुलिका नाम चाली मण्डनमिश्रकी देश
दासियों का प्रवेश)
लवंगिका-सखि ! आज तुम्हारी पण्डिताइन बडी निल्ला
रहीं थीं, तूने ऐमा कौन अपराध किया था ?
चकुलिका-अरी वहिन ! मुझसे बड़ी भूल होगई थी, मैं
आँगनमें खड़ी थी और मेरा ध्यान दूसरी शोर था इतने हीमें
पण्डिताइनजी तुलसीका पूजन करनेको आई उसी समय में
पीछेको इटी सो मेरे लहँगेकी लामन उनके लगगई इस कारण
मुझे डपटरहीं थीं मोर कोई बात नहीं थी।
लवंगिका-हाँ हाँ मैं समझगई ! तेरा ध्यान जहाँ था वह
जानती हूँ वह गरा रामा उधर आया होगा और कौन बात है
वकुलिका-(कुछ सकुचा कर सखि लवंग ! तू बूढी होने को
गई परन्तु अभीतक तेरा चौल करनेका स्वभव नहीं गया ?
देख तो तू खुल्लमखुल्ला ऐसी बातें कररही है, यदि यह वात
पण्डिताइन सुनले तो मेरी कौन दशा करें ?
लवंगिका-ओहो! तुझे ही तरुणाई चढी है और जगत्. भरकी
सब बूढी हैं। क्या हम कभी तरूणी नहीं थीं ?.और हमने तो
ऐसी बातें करी ही नहीं ? परन्तुं आजतक किसीने जान भी
पाया ? और तेरा सारा मौहल्ले भरमें डका वजरहा है परसों
पण्डिताइन भी कहरही यी कि रामा भौर बकुलीमें रात दिन
रहता
वकुलिका-(घवदाकर ) अरी बहिन ! सत्य कह रही है
क्या ? पण्डिताइनसे किसने कह दिया है।
लपङ्गिका-किसने कह दिया ? कह कौन देता.? तेरे गुणोंने
कह दिया उस दिन पंडिताइन न्हाकर चुकी थीं तो तू केश पूछ
है

शङ्करविजय-नाटक l रही थी और मैं पहरनेकी साड़ी देरही थी तब मरेने तेरे पीछे आकर क्या किया वह मैंने भी देखा था, परन्तु उन्होंने देख कर भी अनदेखासा कर दिगा, तुम दोनोंने यही समझा कि किसी ने देखा ही नहीं है,जब विल्ली आँखें मूंदकर दूध पीती है तो वह यही समझती है कि मेरी समान किसीको दीखता ही नहीं । वकुलिका-अब तो मेरा सवही भेद खुलगया तो अब चुराकर ही क्या करूँ ? सखि ! तू मेरी माकी वरावर है, तू ही कोई उपाय वता, मैं कैसी करूँ ? उसको देखते ही सब सुधबुध भूल जाती हूँ और उसकी भी ऐसी ही दशा होजाती है, इसीकारण ऐसी मूर्खता होजाय है। लवंगिका-री ! सेई तो मैंने कहा था कि तरुणाईमें सभी स्त्रियों की ऐसी दशा होजाय है परन्तु ऐसी निर्लज्जता कोई नहीं करे हैं, अरी ! तुम तो दोनों यहाँ ही रहो हो,काम बामसे निवटकर रातको जो चाहे सो करो कोई रोकने वाला है ? परंतु, इरसमय चाहे जो कुछ करना तो मनुष्योंको शोभा नहीं देता है बकुलिका-अरी ! तू करे है सेतो सब ठीक है परन्तु उनकी, मेरी चार आँखें हुई कि मुझसे फिर रहा ही नहीं जाता,आज भी मरी वही तो बात होगई । लवंगिका-आज क्या हुआ, वताओं ? वकुलिका-कल बसन्तपंचमी थी ना ! सो रातमें हम दोनों ने यथेच्छं क्रीडा करी वही बातें सवेरे मेरे मन में घूमने लगी से मैं आँगनमें खड़ी हुई न जाने क्या काम कररही थी परन्तु ध्यान मेरा रातकी बातों में ही था, इतने हीमें मेरा ऐसा ख्याल बँधा कि वह आकर मेरे ऊपर रंग डालते हैं इसकारण मैं पीछे को. इटी,तभी तो पण्डिताइनजीके मेरे लहँगेकी लापन लंगगई । लवंगिका-देख सखि। ऐसी ही पागल बनी. रहेगी तो शिर - 13 शङ्कर विजय-नाटक .. पकडकर रोवेगी, खुब सावधानीसे काम लेना अच्छा है नहीं ते पंडितजीको खबर होनेपर दोनों कान पकड़कर निकाल दिये जाओगे । बैसे स्त्री पुरुषों में ऐसी बातें होने को कौन नहीं जानता ? परन्तु समय समय पर ही सब बात सजे हैं, तू और तेरा पत्ति दी संसारसे निराले नहीं हो पागे सहिन तू जान । चकुलिका-अच्छा तो अब शीघ्र चलो, पानोंमें चड़ी देर हो गई इप्समें गी पण्डिताइन जाने क्या समझने लगें? शीघ्र कलश झरझर चलना चाहिये ( ऐसा कहकर नदीमेंसे कलश भरती हैं) ( इतने हीमें परदेमें नारायण शब्दकी ध्वनि होती है) बहुखिका-( उदफकर ) यह काहेका दुन्द है ! (परदेशी ओर को देखकर ) यह मरे कहाँ से आये ? सखि लवंग ! तूने यह भी देखा ? देख तो गरे कितने संन्यासी आरहे हैं। लवंगिका-(देखकर ) श्रोः हो ! भरी यह ततइयोंका छत्ता कहाँसे निकलपड़ा मुझे मालूम होता है, अब इनकी आयु पूरी होचुकी, जो इधरको आरहे हैं। बकुलिका-हमारे पंडितजीको कहीं खवर होगई तो इन मरोंके शिर ही उड बादेंगे मरे वाइलोंने ढोंग कैसा बनाया है ? (तदनन्तर नारायण शब्दका उच्चारण करते हुए सब शिष्यों सहित श्रीशङ्कराचार्यजी झाते हैं) शंकाच र्य-शिष्यों । देखो इस-माहिष्मती नगरी में कैसी शोभा है यह रेवा नदी भी क्या सुन्दर लगती है, जिसका जल अमृनको भी लज्जित कररहा है, यह देखो दोनों पार वडे २ एक्के घाट बनेहुए हैं जिनपर सुंदर मण्डपोंकी भी कमी नहीं है जिनमें बैठेहुए यह सहस्रों ब्राह्मण मध्यान्ह सन्ध्या कररहे हैं, गानो गहाँ कर्मकाण्डकी मूर्ति विराजमान है धन्य ! मंडन मिश्र धन्य !! पद्मपाद महाराज ! इस नदीपर जहाँ तहाँकी भूमि स्खेत क्यों होरही है ? .

शङ्करविजय-नाटक २२ PAN शंकराचार्य-ठीक प्रश्न किया अरे ! इस ग्रागमें असंख्यों अग्निहोत्री हैं, उनकी भस्मसे जगह२ यह दशा होरही है देखो ना ! निधर तिघरंसे होमके धुएँकी सुन्दर सुगंध प्रारही है । नोटक-तब तो गुरुजी ऐसा कहना चाहिये कि इस नगरीमें सीमांसाके पूर्व कांड (कर्मकांड ) की वर्षा ही होती है। शंकराचार्य-इस में कमा संदेह है, अच्छा अब हमको मण्डन- मिश्रका घर हूँढना चाहिये (सागनेको देखकर ) यह कोई स्त्रिय जल भररही हैं इन हीसे बूझना चाहिये ( आगेको बहकर) हे स्त्रियों ! हग बटोही हैं हमको कुछ बूझना है तुम बतादोगी क्या? बकुलिका-शिक शिन, हे महापातकी ! तू हमको मुख भी न दिखा तुझे इस परम सुन्दर तरुणाईको व्यर्थ करने का उपदेश जिस चांडालने दिया है, उसका सत्पनाश हो ( ऐसा कहकर बँगूठा दिखाती हैं) शंकराचार्य-( हँसकर ) अरी स्त्रियों ! हमारे पारव्यमें ही ऐला था,उसमें कोई क्या कर सकता है ? जो वात बीत गई उस की चर्चा करने से कौन लाभ है ? सो अधिक बातें न बनाकर जो हम बुझे से मालूम होतो उसका उत्तर देदो । लवंगिका-(आगे बढ़कर ) अरे वा ! तू क्या कहता है क्या तुझे आजकी पूरियों की ठीकठाक करनी है ? तुम इन मिवारियों के गेहा काड़ोंके। उनार डालोगे तो केवल पूरियें ही कसा जो कुछ चाहोगे सो ही इस नगरी में मिलेगा। शकराचार्ग-गाताओं ! हमें और कुछ नहीं चाहिये इस नगरीमें एक मण्डनमिश्र नामक पंडित है, उनके घर जाना चाहने हैं यदि तुम जानती हो तो वतादो । बकुलिका-बाह रे पागलों ! सूर्यको देखने के लिये क्या १०० शङ्करविजय-नाटक - मसालकी आवश्यकता होती है ? बनाती हूँ और जिससे मैं महाराज मंडनमिश्रजी के घरकी दासी होने के योग्य हूँ यह तुगको ज्ञात होजायगा सुना- जगद् ध्रुनं स्याज्जगध्रुवं स्यात्सीराङ्गना यत्र गिरा गिरन्ति । द्वारस्थनीडान्तरसन्निरुद्धा जानीहि तन्मण्डनपण्डितोकः ।। अरे भिक्षुकों ! जिनके द्वारपर दो पींजरे लटक रहे हैं उन में एक २ तूती है, तिन दोनों में से एक कहती हैं कि यह जगत् सत्य है तो दूसरी कहती है कि असत्य है, इस प्रकार जिनके द्वारपर टंगे हुए पनी संस्कृत में वाद करते हैं उस स्थानको ही मंडन महाराज का समझना । लवंगिका-(आगे बढकर ) अरे ! सुखका स्वाद न जानने वाले कुन- स्वत्तः प्रमाणं परतः प्रमाणं, कीराङ्गना पत्र गिरा गिरन्ति । द्वारस्थनीडान्तरसन्निरुद्वा जानीहि तन्मण्डन पण्डितौकः ।। अरे ! उनमें से एक तूती कहती है कि यह जगत् स्वतः सिद्ध है, तो दूसरी कहती है कि जगत् दूसरेकी सत्तासे भास. रहा है ऐसी स्पष्ट संस्कृत भाषामें जिनके द्वारपरके पक्षी वाते करते हैं । उप्ती स्थानको मंडन महाराजका समझ लेना । शंकराचार्य-क्यों शिष्यों ! सुनी ना इन दासियोंकी बातें ? इससे अनुपान करलो, उस ब्राह्मणफी कैसी पंडिताई होगी ? बकुलिका-सखि लवंग ! अब तो जल के कलश लेकर चलो बहुत देरी होगई पंडितानी क्या कहेंगी ? ( ऐसा कहकर सब जाते हैं) पद्मपाद-मालूम होता है यह शास्त्रार्थ बड़ा अद्भुत होगा क्योंकि बरावरका जोड़ होनेपर ही युद्ध और शास्त्रार्थका चमत्कार देखने योग्य होता है।

BVCL 04947 शङ्करविजय-नाटक 8-23 । शंकराचार्य -अस्तु, अब हम ऐसे जायँगे तब तो काम नहीं चलेगा, क्योंकि उनके द्वार पर पहरा रहता है, तिस पर भी अनेकों पण्डित हैं, उनको जीतने पर कहीं मण्डनमिश्रसे संभा- पण होगा ! ऐसा करनेसे तो बीस वर्ष भी काम सिद्ध नहीं होगा, इसकारण तुम सब इस रेवा नदी के किनारे परके शिवा- लपमें विश्राम करो, मैं योगमार्गसे झरोखेको जाकर उसके घरके भीतर उतरता हूँ और एक साथ उससे दी मिलता हूँ, निवट कर फिर इसी शिवालयमें आजाऊँगा सब शिष्य-जो आज्ञो। ऐसा कहकर नारायण नारायण शब्द करते हुए सव शिवालयमें और शङ्कराचार्य नगरीमें जाते हैं। सप्तम-दृश्य (हाथमे पञ्चपात्र लिये मण्डनमिश्र का आना) मण्डनंमिश्र-( आप ही आप ) आज श्राद्धका दिन है, इस कारण व्यासजी और जैमिनि ऋपिको निमन्त्रण दिया है, परन्तु मध्यान्ह होनेको भागया, वह दोनों ऋषि अभी तक न जाने क्यों नहीं आये! ( इतनेमें घबड़ाए विद्यार्थीका आना) मण्डनमिश्र-क्योरे कृष्णगिश्र ! सब सामग्री ठीक होगई ! कृष्ण मिश्र-गुरुजी ! पक्वान्न तो सब तयार है, ब्राह्मणों की ओरसे ही देर है। मण्डनमिश्र-और पूजाकी सामग्री, तिल पवित्री आदि सब इकठे करके रख दिये हैं। ? कृष्णमिश्र-हाँ सब ठीक करके रख दिया है, परन्तु यह तो बताइये श्राद्ध के ब्राह्मण कौन हैं ? हमें तो मालूम नहीं है, आप बनायें तो मैं बुलानेको जाऊँ। मण्डनमिश्र-ब्राह्मणों के नाम आनेसे पहिले किसीको भी १०३ १०२ शङ्करविजय-नाटक 2 daw मालूम नहीं हो सकते, श्राद्धका समय होते ही वह अपने आप भाजायँगे, तुम और सब सामग्री ठीक रक्खो । कृष्ण मिश्र-(विचार कर अंगुली चलाकर ! अरेरे ! पूजाकी थाली में तिल रखने तो सूल ही गया)। गण्डनमिश्र-[ हँसकर ] क्यों बेटा ! भूल गया ना ! ऐसा कहकर शिष्य दौड़कर भीतर जाता है और घबड़ाया हुआसा आताहे मण्डनमिश्र-देख और कुछ न रहगया हो ! कृष्णमिश्र-अब कुछ नहीं रहा, परन्तु महाराज ! व्यासदेव और जैमिनि ऋषि आगये । भण्डनमिश्र-फिर वह हैं कहाँ ? यहाँ को लिवाता क्यों नहीं लाया? कृष्णमिश्र-उनको चरण धोने के लिये जल देकर आपको समाचार देने आया हूँ। मएडनमिश्र-जा तो उनको लिवा कर मा, और पूजाकी सामग्री भी लेते माना। कृष्ण मिश्र-प्रतीत होना है आज श्राद्धके निमित्त इनको ही नियन्त्रण दिया गया है ! गण्डनमिश्र-हाँ हाँ यही बात है, ना शीघ्र जा। तदनन्तर विद्यार्थी भोतर जाकर पूजाकी सामग्री लिये हुए व्यासदेव और जैमिनि ऋषिके साथ आता है । कृष्ण मिश्र-महाराज ! इधरको आइये, गुरुजी इधर ही हैं। मण्डनमिश्र-[उठकर नमस्कार करके ] आइये महागज ! इस आसन पर बैठिये। तदनन्तर व्यास नी और जेमिनि ऋषि आसन पर बैठते हैं ध्यासजी-मण्डन ! अव विलम्ब क्या है ? श्राद्धका काम चलता करो। मण्डनमिश्र-बहुत अच्छा महाराज पैर धोकर आता हूँ

शङ्कारविजय-नाटक
१०३
[ऐसा कहकर जलका लोहा लिये हुए हाथ पैर धोनेको उठ
कर जाते हैं,इतने हीमें नारायण नारायण कहते हुए श्रीशंकरा-
चार्य झरोखेमें को उत्तरते हैं, उनको देखकर दुःखित होते हुए]
शिव ! शिर !! कौन हैरे यह दुष्ट ! पुरापकर्मके समय अपना
कालामुँह दिखाकर मुझको दुःखित करता है ( फिर क्रोध
भरकर उनसे प्रश्न करते हैं।
कुत्तो मुण्डी ॥
अरे यह मुण्डन कराने वाला कहाँसे ? भाया ।
शंकराचार्य-( कुतः ) इस पदका दूसरा अर्थ लेकर उत्तर
देते हैं।
आगलान्मुण्डी॥
अरे कर्मी ! मैंने गले पर्यन्त मुण्डन कराया है ।
मण्डनमिश्र-( अपने प्रश्नका अर्थ दूसरी रीतिसे फरा हुआ
देखकर फिर कहते हैं)
पन्थास्ते पृच्छयते मया ॥
अरे ! कहाँ से मुँडा है यह नहीं बूझना हूँ, किन्तु तरे मार्गको
वूझता हूँ।
शंकराचार्य-( इसका भी अर्थ बदलकर कहते हैं )
॥ किमाह पन्थाः ॥
अरे ! मेरे मार्गको बूझता है फिर उस मार्गने तुझको क्या
उत्तर दिया ?
मंडनमिश्र-( इस प्रश्नका भी तैसे ही दूसरा अर्थ करने पर
क्रोध होकर)
॥ त्वन्माता मुण्डेत्यौह तथैव हि ॥
अरे मूर्ख ! मुझे मार्गने यह उत्तर दिया कि तेरी गाता मुण्डा है
शंकराचार्य-(हँसकर )

१०४
शङ्करविजय-नाटक
पन्थानमपृच्छ स्त्वां पन्थाः प्रत्याह मंडन ॥
"त्वन्माते" त्यत्र शब्दोऽयं न मां यादपृच्छकम् ।।
अरे नासमझ ? तुझे जो यह उत्तर गिला कि 'तेरी माना
मुण्डा है' वह तुझ प्रश्न करने वालेके ऊपर ही घटसकता है,
सुझसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है।
मंडनमिश्र-(अपना कहना अपने ही ऊपर आने के कारण
अतिक्रोधमें भरकर )
॥ अहो पीता किम सुरा॥
अरे ! एसी ऐंडी बेंडी बहकी हुई बातें कहता है, कहीं सुरा
(शराव) तो नहीं पीली है ?
शंकराचार्य-(पीता शब्दका पीना अर्थ न लेकर पीलेवर्णकी
यह अर्थ करके बोलते हैं)।
न वै श्वेता यतः स्मर ॥
अरे मूर्ख पशु ! सुरा 'पीना' कहिये पीली नहीं होती है
किन्तु 'श्वेता' कहिये स्वेतवर्णकी होती है,इसका स्मरण तो कर
मण्डनमिश्र-( ताली बजाकर)
किं त्वं जानासि तदर्णम् ॥
अरे नीच ! संन्यासी होकर भी तू सुराके पर्ण ( रङ्ग ) को
जानता है ?
महं वर्णं भवान् रसम् ॥
हाँ मैं वर्ण को तो जानता ही हूँ,क्योंकि प्रकार ककार आदि.
वों में कहा हुआ जो वेद है उसको मैं जानता ही हूँ, परन्तु तू
उस सुराके स्वादको भी जानता है।
मण्डनमिश्र- बात को बदल कर ) अरे निर्लज्ज ! यह तो
रहने दे-
॥ कन्यां वहसि दुर्बुद्धे तव पित्रापि दुर्बहाम् ।।
॥ शिखायज्ञोपवीताभ्यां कस्ते भारा भविष्यति ।।

शङ्करविजय-नाटक १०५ - - अरे वैल ! सब पशुओं का टाट पलान ढोनेको गधा होता है परन्तु गधे से भी न उठ सके ऐसी गुददीको तो उठाने में तुझे पोझा नहीं लगता है, भरे पातकी ! चोटी भौर यज्ञोपवीतका वया तुझको वोझा लगता था ? शंकराचार्य-अरे विषयलम्पट ! सुन- कन्या कहामि दुर्बुद्धे ता पित्रापि दुर्वहाम् ।। शिखायज्ञोपवीताभ्यां श्रुतेर्भारो भविष्यति ।। अरे ! तेरे वापसे भी न उठसके ऐसी गुदड़ीको मैं शरीरपर- ओढता हूँ, और शिखा यज्ञोपवीत मुझे भारी नहीं लगते थे, परन्तु हाँ वह वेदको भार प्रतीत हुए मण्डनमिश्र-अरे"पुरुषार्थहीन ! सुन- त्यतया पाणिगृहीती स्वामशक्त्या परिरक्षणे । शिष्यपुस्तकभारप्सो व्याख्याता ब्रह्मनिष्ठता ।। परे ! स्त्रीकी रक्षा करने की शरीरमें शक्ति न होने से गृहस्थ धर्मको त्यागकर, शिष्यों के समूह और पुस्तकोंके भार उठाने वाला जो तू उस तेरी ब्रह्मनिष्ठा जानली । शंकराचार्य-अरे सुन! गुरुशुश्रूपणालस्यात्सगाचवं गुरोः कुलात् । स्त्रिया शुश्रूषमाणस्य व्याख्याता कर्मनिष्ठता ।। अरे स्त्रीलम्पट ! गुरुसेवा करनेकी शक्ति न होनेसे ब्रह्मचर्य को समाप्त करके स्त्रियोंसे सेवा कराने वाला जो तू तिसं तेरी कर्मनिष्ठता देखली। मण्डनमिश्र-अरे ! अधिक बडबड क्यों कररहा है ? तू जिस कारण संन्यासी बना है वह भी मुझको मालूम है सुन- क्व ज्ञानं क्व च दुर्मेधाः क्व संन्यासः क्व वा कलिः । स्वाद्वन्नभक्ष्यकामेन षोयं योगिनां धृतः ।। 14 १०६ शङ्करविजय-नाटक प्स अरे वार्मभ्रष्ट ! तेरा पह ज्ञान कहाँ ? संन्यास कहाँ ? और तेरी दुर्बुद्धि कहाँ?तथा यह कलियुग कहाँ ? इनमें कहीं किसीका सम्बन्ध बनाता है ? रोज रोज मिष्टान खानको मिलता इसी कारण यह भिखारीको भेष बनारक्खा है, अरे नीच तूने जो पेट के लिये कर्म छोड़ दिये, अरे । इससे तो तूने अपने पेटमें छुरी ही भोंडली होती। शंकराचार्य-अरे मूह ! तू फर्मठ क्यों बना है यह मैं भी जानता हूँ, सुन- पच स्वर्गः च दुराचार क्याग्निहोत्रः कर पा कालिः । गान्ये मैथुनझामेन वेषोऽयं कर्मिणां धृतः ।। छारे ! यह तेरा कर्म कहाँ ? और तिससे मिलने वाला स्वर्ग कहाँ ? तथा यह अग्निहोत्र कहाँ ? और गह कलियुग कहाँ ? एकका दूसरेसे कुछभी मेल नहीं है केवल स्त्रियों से मैथुन मिलता है इस कारण ही यह कीपना फैलाया है। गण्डनमिश्र-अरे ! तू कैसा नीच है ? इरे हरे ! क्या स्त्रियों की निंदा करता है ? सुन- थितोऽसि योषितां गर्भे ताभिरे विचद्धितः ।। अहो कृतघ्नता सूर्ख इथं ता एव निन्दति ॥ अरे ! जिन्होंने तुझको जन्म दिया और अनेकों दुःखं सह कर चढाया, ऐसी स्त्रियों की जो तू निंदा करता है इसकारण तू बडा छनघ्नी है, तेरा तो मुख भी नहीं देखना चाहिये। शंकराचार्य-अरे पापों के पहाड ! मैंतो कृतघ्न नहीं हूँ परन्तु तु जैसा है सो सुन याला स्तन्यं लगा पीतं यास जातोऽस योनितः ।। तासु.मूर्खतम स्त्रोषु पशुनद्गसे कथम् ॥ शारे ! तूने जिन स्त्रिोंका दूध पिया है और जिनकी योनिमें से निकला है. उन ही स्त्रियों के साथ पशुओं की समान रमण शङ्करविजय-नाटक २०७ करता है, तुझे लज्जा नहीं आती ? ऐसा वह तो केवल पशुओं मेंही होता है, इस कारण टू माहगामी है, भरे तेरे पातक का तो प्रायश्चित भी नहीं है, पण्डनमिश्र-( यह गी जैसेका तैसा उत्तर मिला, इसकारण हाथ उठाकर) दौवारिकान वश्चयित्वा कथं स्तेनवागतः ॥ अरे नीच ! मेरे ड्योढीवानको धोखा देकर तु चौरकी समान कैसे चला आया. इस कारण तुझको अवश्य ही दण्ड मिलना चाहिये। शंकराचार्य-छारे ! तू चोर होकर दूसरेको चार कहने वाले सुन- भिक्षुभ्योऽन्नमदत्वा त्वं भोक्ष्यसे स्तेनचत्कथम् ।। संन्यासी महात्माओंको अन्न देना पड़ेगा, इस कारण द्वार पर सेवकको बैठाकर भीतर ही भीतर मिष्टान्न खाने वालेको शास्त्र चोर कहते हैं इसकारण चोर मैं नहीं हूँ तू ही दण्ड पाने के योग्य चार है। मण्डनमिश्र-अरे दुराचार सुन- भ्रूणहत्यागवामोपि पुत्रान्नोत्पाद्य धर्मतः ।। अरे ! चांडाल तूने ब्रह्मचर्यको समाप्त करनेके अनन्तर पृहस्थमें जाकर पुत्र उत्पन्न नहीं किया,इसकारण तुझको बाल- 'हत्याका पाप लगा। शंकराचार्य -( हँसकर ) अरे ! वालहत्या तेा होली, परन्तु तुझको तो सबसे घोर इत्या लगी है सुन- आत्महत्यामवाप्तस्त्वं अविदित्वा परमं पदम् ।। अरे ! तुझको आत्महत्याका पाप लगा है,क्योंकि मैं कौन हूँ आगेको क्या होगा, इसका कुछ विचार न करके आत्माको जीवन परणके चक्रमें डाल दिया। इस विषयमें शास्त्र कहता है कि १०८ शङ्करविजय-माटक قاالت आत्मानं सततं रक्षेदारैरपि धनैरपि । स्त्री, पुत्र, धन आदिसे हाथ धोने पड़ें तो कुछ चिन्ता नहीं परन्तु आत्माकी रक्षा करें, इसके विपरीत आत्माका नाश करने बाला जो तू तिस तुझको वता कौन दण्ड दिया जाय मएडनमिश्र-( यह बात भी अपने ही ऊपर आई इस कारण दाँतोंसे दाँत पीस फर) कर्मकाले न सम्भाष्यस्त्वहं मूर्खेण साम्प्रतम् । अरे ! इस पुरुष कर्मको करते हुए मैं तुझसे मूर्खसे वोलना नहीं चाहता। शङ्कराचार्य-(हँसकर और मण्डनमिश्रके कहने में 'संभाष्य- स्त्वह' यहाँ छन्दके चिरागमें यतिविच्छेद हुआ जानकर अहो प्रकटितं ज्ञानं यतिभंगो न भाषिणा ॥ शाह ! वाह ! अरे यतिभंग करके वोलने वाले तेरी पण्डि- ताईके प्रकाशकी तो खूब कलई खुली ॥ मण्डनमिश्र-छारे ! ( उसी वातको साधने के लिये ) गतिभंगे महत्तस्य यत्तिभंगो न देोपभाक् ॥ अरे मूर्ख ! यत्तिका भंग (पराजय) करने में जो प्रवृत्त हुआ है उसके कहने में यदि यतिभंग होजाय तो कुछ दोष नहीं है। शङ्कराचार्य-( 'यतिभंगे प्रवृत्त' इस मण्डनमिश्रके कथन पर कोहि कहकर उसकी अँगुलिसे उसीकी आँखों को ठसी हुई सी करते हैं। यत्तिभङ्गे प्रवृत्तेश्च पञ्चम्यन्तं समस्यताम् ॥ अरे बहुत ठीक कह रहा है, क्यों कि-'यतिभङ्ग' इस पदका पञ्चम्यन्त समास करो तब 'यतिसे भङ्ग अर्थात् पराजग' ऐसा ठीक २ अर्थ निकल कर, इतने समय तक जो बात चीत की है उसका परिणाम तू अपने आप ही निकाल लेगा।

है शङ्करविजय-नाटक Ly मण्डनमिश्र-( उत्तर न आनेसे झुंझलाकर ) मत्तो जातः कलजाशी विपरीतानि भापसे ।। अरे ! क्या करूँ, यह क्षुद्र मांसभक्षी मत्त होकर इतना बड- वडा रहा शङ्कराचार्य-( 'मत्तशब्दका ) उन्मत्त अर्थ न करके 'मुझसे ऐसा मर्थ करते हुए कहते हैं) सत्यं ब्रवीपि पितृसत्वत्तो जातः कलञ्जभुक् ।। अरे ! ठीक ही है जैसा बीज तैसा अंकुर, तुझसे जो उत्पन्न हुआ वह अपने पिताकी समान क्षुद्र मांसभक्षी और उलटी बातें करने वाला ही है, इसमें आश्चर्य ही क्या ? मण्डनमिश्र-(जैव आगेको कुछ उत्तर न बन पड़ा तो हाथ में का लोटा पटक कर चिल्लाने लगे कि-) भरे कौन है रे, इस चाण्डालको पुण्यकर्ममें कैसे पाने दिया ?, यज्ञ मण्डलमें कुत्ते के घुस आनेसे जैसा दुःख यज्ञ करने वालेको होता है, तैसा ही इस समय इसके यहाँ घुस आने से मुझको होरहा है, ( दाँत चबाकर ) क्या करूँ ! यदि इस समय मेरे पास तरवार होती तो इसका शिर ही काट लेता (जोरसे चिल्ला कर ) कौन है रे ! इस दुष्टको उधर लेगा कर गरदन तो मारदो ! शंकराचार्य- मण्डनमिश्रसे भी अधिक चिल्ला कर और कमंडल तान कर ) अरे विपरूपी मदसे अन्धे ब्राह्मणों में पशु वड़ी भारी वाईके महासर्पकी समान स्त्री-पुत्र-सुवर्ण आदि रूप बिलमें छुपकर बैठा है, परन्तु (छाती पर हाथ रखकर ) यह परम मंत्रवेत्ता उन्त विल ( भट्टे) मेंसे तुझको निकालकर, नाकमें नाथ डाल, दाँन तोड़ और संन्यासी बनाकर अपने साथ लेनाये विना नहीं छोडेगा, यह निश्चय जान । (व्यासदेव और जैमिनि. मुनि चकित होते हैं।)

'११०
'शङ्करविजय-नाटक
ध्यासदेव-वों जैमिनिजी ! यह कौन है पहिचाना क्या ?
जैमिनि-गुरुदेव ! मापने जान लिया होगा, मेरी ऐसी
योग्यता कहाँ है ?
व्यास देव-अरे ! भविष्याचर पुराणमें जो शंकराचतार लिखा
है, वह यही तो है।
जैपिनि-क्या यह कैलासनाथ हैं ! फिर इनके विषयों
कहना ही क्या ? परन्तु गुरुजी ! आपको इनके. बांदसे बचे
रहना चाहिये और किसी प्रकार विवाद भी रुकवाना चाहिये
व्यासदेव-चुप रहो, वही युक्ति करता हूँ, अब यह मण्डन.
मिश्रको छका भी बहुत चुके ( मण्डनमिश्रसे) अरे ! मण्डन
यह क्या गड़बडी कर रक्खी है, अपने धर्मकी ओर ही ध्यान
देकर देख, मध्यान्हकालमें जो अतिथि प्रावे वह विष्णुकी समान
पूजनीय है, इस कारण यह कैसा ही हो,इसको दुर्वचन न कह
कर सत्कारपूर्वक अन्न दे, फिर चाहे जो कुछ बातचीत करना
मण्डनमिश्र-( सावधान होकर ) आहा हा ! ठीक है, महा-
राज ! आपने बहुन अच्छा उपदेश दिया, पहिले मुझको क्रोध
आगया था, इस लिये मैं क्षमा चाहता हूँ (ऐसा कहकर जलसे
नेत्रों को धोनेके अनंतर शंकराचार्यजीकी ओरको मुख करके आप
सुझसे पड़े हैं इसकारणमें अापको प्रणाम करता हूँ,मध्यान्हकाल
में जो मेरे द्वारपर आवेगा वह चाण्डाल होने पर भी मेरा पूज्य
है, इस कारण मैं आपको नमस्कार करता हूँ (ऐसा कह कर
नमस्कार करके ) महाराज पिता करने को चलिये ।
शंकराचार्य -भाड़में जाय तेरी यह भिक्षा, यदि भिक्षा देनी
हो तो प्रतिज्ञा करके मुझे शास्त्रार्थकी भिक्षा दे।
मण्डनमिश्र-बहुन अच्छा,
मैं शास्त्रार्थसे डरने वाला नहीं हूँ
मेरे भी भुजदण्ड फडक रहे हैं, तुमको शास्त्रार्थकी भिक्षा देता
परन्तु इस समय यह अन्नकी मिना लेना चाहिये, तिस पर

शङ्करविजय-नाटका आज मेरी पितृतिथि है से आपको भी भोजन करानेकी मेरी है। शंकराचार्य-बहुत अच्छा, अरे ! इसमें हमारी कौन हानि हा तो यति हैं, जो हमको निमन्त्रण देगा उसीको पवित्र करने के लिये जायगे, परन्तु अभी मध्यान्ह स्नान करना है उससे निवट कर पाता हूँ ऐसा कहकर नारायण नारायण कहत हुए जाते हैं। व्यासदेष-मण्डनमिश्र अव विलम्ब न करो श्राद्धका कर्म समाप्त होना चाहिये और वह यति अव आते होंगे सब तयारी है ना॥ मएडनमिश्र-सब ठीक है, उनके आते ही भारम्भ होजायगा व्यासदेव-परन्तु ब्रामण वैठेगे कहां ! क्या यही स्थान भोजन करनेका है ? मण्डन मिश्र-नहीं गहाराज ? इस पिछले दालानमें भोजन करना होगा। व्यासदेच-अच्छा तो चलो उधर ही चल । (ऐसा कहकर जाते हैं) अष्टम-दृश्य (रेवा नदीके किनारेका शिवालय) ( पद्मपाद बीटकाचार्य आदि शंकरार्यजीके शिष्य आते हैं) पद्मपाद-त्रोटकाचार्य ! गुरुमहाराज कहगये थे-कि-'गण्डन- मिश्रसे मिलकर माना हूँ, तुम इस शिनालयमें ठहरो' सेो. अभी तक नहीं लौटे, न जाने क्या कारण हुआ मुझको तो बडी चिना है त्रोटक-चिन्ता क्यों करते हो ? किसी कारण बिलम्ब होगया होगा, उनको कष्ट पहुँचाने वाले तो त्रिलोकीमें कोई है ही नहीं ( इतने ही में परदेमें नारायण शब्दका उच्चारण होता है ) ११२ शङ्करविजय-नाटक पद्मपाद-लो महाराज स्मरण करते ही आगये । ( तदनन्तर शंकराचार्यका प्रवेश ) शंकराचार्य-( नारायण नारायण कहकर आसन पर बैठते हुए ) हे शिष्यों ? मेरे आनेमें थोडासा विलम्ब होनेसे तुमको अधिक चिंता तो नहीं हुई ! पद्मपाद-हे गुरो ! आपका वियोग तो क्षण भरके लिये भी हमको असह्य होता है, फिर इतने समयका तो कहना ही क्या ! शंकरा०-अच्छा अब उधरका वृतान्त तो सुना मैं मण्डनमिश्र के घर के झरोखेमेंको होकर वीच घरमें जा ही उत्तरा उससमय वह श्राद्ध के काममें लगा हुआ था, फिर मेरे ऊपर दृष्टि पडतेही बड़े क्रोधमें भरकर दुर्वचन कहने लगा, तब मैंने भी उसको तैसे ही उत्तर दिये, अन्तमें उससे शास्त्रार्थ करने की प्रतिज्ञा करवा कर उसके ही यहाँ भिक्षा करके चला रहा हूँ, अब वह यहाँ आवेगा तब उसका और मेरा शास्त्रार्थ होगा । त्रोटक-महाराज ! भापका और मण्डनमिश्रका शास्त्रार्थ बडा ही अलौकिक होगा देखिये कब देखनेको मिले ! ( इतने ही में बहुतसे पंडितोंके साथ मण्डनमिश्र आते हैं) मण्डनमिश्र-(शंकराचार्यचीके सामने आसन विद्या बैठकर) अजी संन्यासीजी ! तुम्हारा शास्त्रार्थका हौंसला देखने आया हूँ, अब शास्त्रार्थ का प्रारम्भ करिये । शंकराचार्य-( हँसकर ) बहुत अच्छा !, परन्तु मैं ऐसे शास्त्रार्थ नहीं करूंगा. निरर्थक शास्त्रार्थ करनेकी मुझको भाव- श्यकता नहीं है, पहिले दोनों ओरसे कुछ २ प्रतिज्ञा होनी चाहिये तब शास्त्रार्थ होगा। गण्डनमिश्र-मरे । प्रतिज्ञाकी क्या आवश्यकता है ? दोनों का शास्त्रार्थ होने पर जो परिणाग निकलेगा बह निकल ही आवेगा।

शङ्करविजय-नाटक शंकराचार्य-वाः। ऐसा कभी नहीं होसकता प्रतिज्ञा विना हुए मैं एक अक्षर भी न बोलूँगा। मण्डनमिश्र-अच्छा, ऐसा ही सही, लो मैं अपना सिद्वान्त कहकर प्रतिज्ञा करता हूँ उसको सुनो उपनिषद् भाग, आत्म- स्वरूपका वर्णन करने के लिये नहीं है, किंतु क्रियाको ही दिखाता है, क्यों कि-शब्दमें कोई तो क्रिया दिखाई देती ही है, वह क्रिया आत्माका स्वरूप कहने वाली सिद्ध नहीं होसकती कर्मसे ही मुक्ति होती है, इस लिये जबतक जिये तब तक कर्म करने चाहिये यह मेरा सिद्धान्त है, यदि तुम इसका खण्डन करदोगे तो मैं सफेद कपडे उतारकर गेरुमा कपड़े पहिन. लूँगा और तुम्हारा शिष्य होकर संन्यास धारण करलूँगा,यदि मैं ऐसा न फरूँ तो अपने बयालीस पूर्वपुरुषों सहित नरक पाऊँ यह मेरी प्रतिज्ञा है, अब तुम क्या प्रतिज्ञा करते हो वह भी बतायो । शंकराचार्ग-दाः ! अब कोई हानि नहीं है, अब मेरी भी मंतिज्ञा सुनो "संच्चिदानन्द ब्रल एक ही है, अनादि अविद्या के कारण भ्रमसे जैसे सीपीमें चांदी की प्रतीति होने लगती है, तैसे ही वह ब्रह्म जगत्के आकारमें दीख रहा है, उस ब्रह्मका ज्ञान होने से सब प्रपञ्चका लय होजाता है, इस विषयमें उप- निषद्ध प्रमाण है जीव और ईश्वरमें भेद नहीं है कर्मसे कभीभी मुक्ति नहीं मिलप्तक्ती, विचारके द्वारा आत्मज्ञानसे ही मुक्ति मिलती है यही मेरा सिद्धान्त है, यदि तुम इसका खण्डन कर दोगे तो इन गेरुआ वस्त्रोको त्यागकर सफेद वस्त्र पहिन लूंगा तथा विवाह करके तुम्हारा शिष्य होजाऊँगा, और यदि ऐसा. करूँ तो मैं भी बयालीस पूर्व पुरुषों सहित नरकमें जाऊँ। मएडनमिश्र-दोनों की प्रतिज्ञा तो होही गई. मौर इन सब सभा. सदोंने सुनली मात्र शास्त्रार्थ छिड़ना चाहिये, 15

११४
शङ्करविजय-नाटक
शंकराचार्य-नहीं अब भी एक बात रह ही गई भला यह तो
बतायो मेरा तुम्हाग शास्त्रार्थ बडा भारी होगा, इधर प्रतिमा
भी होगई परन्तु शास्त्रार्थमें हारा कौन और जीता कौन इसका
निवटारा करने के लिये कोई तीसरा मध्यस्थ भी ते। होना चाहिये
जोकि इस सभामें पाकर Jठे नहीं तो शास्त्रार्थ करनेका फल
ही क्या होगा ।
मण्डनमिश्र-श्रव मध्यस्थ वननेको तीसरा कौन भावे यह
तुम ही बताओ?
शंकराचार्य-मध्यस्थ तो तुम्हारे घरमें ही है तुम्हारी स्त्री साक्षात्
सरस्वतीका अवतार है, यह मैं जानता हूँ इस कारण हमारे
शास्त्रार्थ में वही मध्यस्थ होनी चाहिवे उसको यहाँ बुलवाओ।
मण्डनमिश्र-बहुत अच्छा ( शिष्पकी ओरको मुख फरके )
अरे कृष्णमिश्रा जा शीघ्रतासे घर ते जा और उससे मेरी आज्ञा
कहकर वहाँ लिवाला।
कृष्णमिश्र-बहुत अच्छा गुरुजी ( ऐसो. कह परदेके भीतर
जाकर और फिर सरस्वतीके साथ प्राफर उससे कहता है.)
गाताजी! गुरुजी और संन्यासीजी यह सामने भिराजरहे हैं उधर
हीको चलिये।
सरस्वती-( यति और पतिको प्रणाम करके महाराज ! इस
भरी सभामें मुझ अवलाको क्यों बुलगाया है ?
मएडनमिश्र इसका उत्तर यह यह यति ही देंगे इनसे ही
बुझेो।
शंकराचार्य-सरस्वति । इधर ध्यान दो, यहाँ तुमसे इस
कारण चुनाया है कि तुम्हारे पतिका और मेरा शास्त्रार्थ होगा
उसमें यदि इन्होंने मुझको जीत लिया तो मैं इनका शिष्य हो
जाऊँगा और मैंने इनको जीनलिपा तो इनको मेरा शिष्य होना
पड़ेगा, यह प्रतिज्ञा पहिले होचुकी है, परन्तु हारजीतका निश्चय
-

शविजय-नाटक ११५ प करनेके लिये कोई तीसरा मध्यस्थ चाहिये सो हम दोनोंने इस कार्य के लिये तुम्हें चुना है भव तुम उस स्थानपर बैठकर हम दोनों में कौन हारता है और कौन जीतता है, इसका निश्चय करो सरस्वती-महाराज! मैं ! स्त्री हूँ;तुम्हारे इस अपार शास्त्रार्थ में भला मैं क्या समझ सकूँगी ? इसकारण मैं मध्यस्थ बनने के योग्य नहीं हूँ। शंकराचार्य-सरस्वति ! तुम मुझको क्या लिखाती हो ! मैं तुमारी योग्यताको जानता हूँ तुम सब विद्याओंकी माता हो, फिर ऐसी कौन पिया है कि जिसका हम शास्त्रार्थ फरें और उसो तुम जानती नहीं हो ! इस कारण तुमारा यह कहना ठीक नहीं है। सरस्वती-आप जो कुछ करते हैं यह कदाचित् ठीक हो परंतु एक दूसरी अड़चन और है, मेरे पत्तिके साथ शास्त्रार्थ होगा, उसमें मैं मध्यस्थ वनें यह बात ठीक नहीं है, क्योंकि-यदि उन की जय हुई और मैंने उचित समझकर यही बात कही तो मुझ को पक्षपातका दोष लगेगा और आपकी जय हुई सब ऐसा कहनेपर, पतिसे द्रोह करनेका कलङ्क लगेगा इस कारण आप इस झगडे में मुझको न फँसा । शंकराचार्य-हमारे शास्त्रार्थ को समझने वाला तुमको छोड कर दूसरा और कोई है ही नहीं तथा पक्षपातको छोड़कर पनि करनेवाले मध्यस्थको कोई दोष देही नहीं सकता। सरस्वती-और भी एक यात..कहनेको रहगई अर्थात् घरमें अग्निहोत्र है, कामकाजकी बहुत सी अड़चन है तिसपर भी पति यहाँ शास्त्रार्थमें लगजायँगे, इस कारण मुझे तो घर अवश्य ही रहना पडेगा, अतः मैंने एक यह युक्ति विचारी है कि मैं आप दोनोंके कंउमें एक २ फूलों की माला पहिराये देती हूँ फिर आप शास्त्रार्थ का प्रारम्भ करिये, शास्त्रार्थ करते २ जिसकी . पुष्प- . ११६ शङ्करविजय-नाटक "ए50 माला कुम्हला जाय उसीको हाराहुना और जिसके कंटकी पुष्पमाला ज्योंकी त्यों बनी रहे उसको जीतने नाला समझ लेना ऐसा होनेपर आपको मध्यस्थकी कोई आवश्यकता नहीं रहेगी। शंकराचार्य-धन्य ! सरस्वती धन्य !! अच्छी युक्ति निकाली वास्तवमें तू वडी चतुर है अच्छा तो वह पुष्पमाला दोनोंको पहिरा दे और तू जा। सरस्वती-बहुत अच्छा (ऐसा कहकर दोनोंके कंठमें पूष्प- माला पहिराकर जाती है)। मण्डनमिश्र-क्यों यतिजी ! सब तयारी तो हो हीगई अब शास्त्रार्थ का प्रारम्भ होना चाहिये । शंकराचार्य-सब कुछ चिन्ता नहीं मेरा सिद्धान्त तुमने सुनही लिया, पहिले आप ही प्रश्न करें। मयडनमिश्र-पच्छा संन्यासीजी! आप जीव और ईश्वरकी एकता पानते हैं, परन्तु मुझे तो यह ठीक नहीं मालूम होता ? शंकराचार्य-श्वेतकेतु यादि शिष्यों से उद्दालक यादि महर्पियों ने जीव और ईश्वरकी एकता कही है, ऐसा चेदमें कहा है, यही प्रमाण है। मएडनमिश्र-वेद में लिखे हुए "तत्त्वमसि' आदि वाक्य "हुँ फंट्' आदिकी समान केवल जप करने के लियेही हैं, उनका और कोई अर्थ नहीं है। शंकराचार्य-'हुँ फट' इत्यादि वाक्योंमें, अर्थ कुछ हैही नहीं इस कारण ज्ञानी पुरुषोंने उनको जपके लिये नियत्त कर लिया है और 'तत्वमसि' आदि वाक्यों का अर्थ तो स्पष्ट प्रतीत होता है फिर वह जपके लिये हैं यह बात कैसे कही जा सकती है मण्डनमिश्र-यदि इस वाक्यमें जीव और ईश्वरकी एकती का अर्थ भासता है तो वह यज्ञ करनेवालेकी प्रशंसा समझना + शङ्करविजय-नाटक. १३० चाहिये, क्योंकि तुम उसका वाक्यार्थ-जीव और ईश्वरकी एकतापर करते हो यह बात किसी की बुद्धिमें जम नहीं सकती इस कारण यज्ञ करने वालेकी प्रशंसापर अर्थ करना ही ठीक है, इस कारण सच उपनिषद कर्मकी पूर्णचाको दिखाने वाले हैं यही सिद्ध होता है। शंकराचार्ग-"मादित्यो यूपः" इत्यादि कर्मकांडमेंके वाक्योंका अर्थ कर्मकी प्रशंसामें करना ठीक है;तैसे ही ज्ञानकांडमेंके 'तत्त्व. मसि' आदि वाक्योंका अर्थ करने में कोई प्रमाण नहीं है । मण्डनमिश्र-तो 'मनकी उपासना ब्रह्मरूपसे कर' ऐसा कहने के लिये जैसे 'अन्नं ब्रह्म' इत्यादि वाक्य हैं तैसे ही उपासनापरक अर्थ हो परन्तु ऐक्यं अर्थ करना ठीक नहीं है। शंकराचार्य-नकी ब्रह्मरूपसे उपासना करे, इत्यादि विधि पाक्य के अनुसार 'तत्त्वमसि' इस बाक्यमें विधि नहीं है, फिर उपासनापरक अर्थ कैसे हो सकता है? मण्डनमिश्र-तत्वमसि आदि वाक्यों में विधि अर्थ स्पष्ट नहीं दीखता है तब भी विधिकी कल्पना करना चाहिये, 'रस्सी है साँप नहीं है' ऐसा कहते ही साँपकी भ्रान्ति दूर होकर उसी समय भय जाता रहता है; तैसा 'तत्त्वमसि' इस वाक्यको सुनते ही नहीं होता है तथा सुख दुःख भादि होते हैं, इसके सिवाय तत्त्वमसि वाक्य के श्रवणके मनन्तर मनन निदिध्यासन आदि कहे हैं, इस कारण तत्काल फल नहीं होता है अत: उपासना परक विधि अर्थ ही कर लेना चाहिये । शंकराचार्य-उपासनापरक अर्थ करनेसे स्वर्ग अथा प्यान, इसपकार मोक्षको मानसिक कृत्रिमपना प्राप्त होगा। मंडन मिश्र-भच्छा उपासनापरक अर्थ नहीं सही तो-जीन को ब्रह्मफी उपमा देते हैं, ऐसा अर्थ कर लेना चाहिये । है .

शङ्करविजय-नारक को शंकराचार्य-जीचको जो ब्रह्मकी उपमा देते हो तहाँ यदि चेतनताके विषय में उपमा कहोगे तो इस सर्वत्र प्रसिद्ध अर्थके उपदेशकी मावश्यकता ही क्या है ? और यदि सर्वज्ञपने के सुणों की उपमा कहोगे तो जीयके सर्वज्ञ कहने का दोष तुम्हारेही मतमें आवेगा। मंडनमिश्र-सर्वज्ञाना आदि गुण पायासे डर रहे हैं फिर उपमा लेनेमें हानि ही क्या है ? शंकराचार्य-यदि ऐसा है तब तो-जीच ईश्वरके भेदभाव की शंका मायाकी करी हुई है, इस बातो तुम अपने पाप ही मान रहे हो फिर भी 'तत्त्वमसि' इस वाक्यका अर्थ एकताको जतानेमें नहीं है, ऐसा खोटा आग्रह तुम विद्वान् होफर क्यों करते हो? मंडनमिश्र-ऐसी एकता यद्यपि भासती है, तथापि मैं ही ईश्वर हूँ, ऐसी प्रतीति किसी को नहीं होती है, इस कारण 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों को केवल जपके निमित्त ही मानना उचित है। शंकराचार्य-यदि इन्द्रियों के द्वारा भेदज्ञान सिद्ध होजाय ते अभेदका वर्णन करने वाली श्रुतियोंमें बाधा पड़े और ऐसा होता है नहीं, क्योंकि-वाक्पके ज्ञान को इन्द्रियें जान ही नहीं सकतीं । मंडनमिश्र इन्द्रिये जान कैसे नहीं सकतीं ? मैं ईश्वरसे निराला हूँ, ऐसा भान क्या जीवको नहीं होता है ? शंकराचार्य-अनात्म पदार्थोंका भान होजाय, परंतु मारमा इन्द्रियोंसे कभी नहीं जाना जासकता। मंडनमिश्र-मात्मा और चित्त, इन दोनों ही को द्रव्य माना है, फिर आत्मा इन्द्रियोंसे नहीं जाना जाता है, यह कहना ठीक नहीं है। शंकराचार्य-मात्मा व्यापक और सूक्ष्म है, इन दोनों ही शङ्करविजय-नाटक ११६ ११९ ब कारणों से इन्द्रिगोंके द्वारा नहीं जाना जासकता, जिसके अच- यव (भाग ) होसके बह सावराव पदार्थ ही इन्द्रिगोंसे जाना जासकता है। मण्डनमिश्र-आत्मा वेद्य (जानने योग्य) नहीं है तो श्रुतियों ने जीवात्मा और परमात्माकी एकता कैसे जताई है ? शंकरानार्य श्रुतियोंने 'अघिद्योपाधि जीच' और 'मायोपाधि ईश्वर' ऐसा भेद कहकर फिर दोनोंकी उपाधियोंको त्याग कहा तिससे आप ही एकता सिद्ध होजाती है, इसकारण आत्मा वेद्य नहीं है। मएडनमिश्र-जीप और ईश्वरको भोपाधिक (मिथ्या) कहते हो 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि अनेकों वेदवाक्यों में जीव भौर ईश्वर दोनों का स्वरूप क्यों वर्णन किया है ? और आत्माके सिवाय भन्य पदार्थों को अचेतन कहोगे तो जीव और ईश्वरके विषय में प्रत्यक्ष चेतनता क्रिया कैसे दीखती है ? इसका ठीक २ उत्तर बताभो। शंकराचार्य-श्रुतियोंने, जगत्में अज्ञान के कारण जो भेदकी प्रतीति है उसका वर्णन मात्र करके वह भेद झूठा, मायाका रचा हुमा है यह बात दिखाकर अन्तमें अभेदका ही वर्णन किया है, तिससे भेद दिखाने वाली सन श्रुतिये वाधित होगई भव जीव तथा ईश्वरके वि चेतनता रूप कापने का जो धर्म दीखता है. वह मिथ्या है तथा वह जीव ईश्वरका अपना नहीं है किन्तु जैसे तपायो हुमा लोहेका गोला जलाता है यहाँ जलाने का धर्म भग्निका है लोहेके गोलेका नहीं है परन्तु लोहेका गोला जलाता है, ऐसा झूटे ही समझा जाता है तिसी प्रकार पांच ज्ञानेन्द्रियों में तथा मन आदि अन्तःकरणके विषय में जो ज्ञानका व्यापार दीखता है वह सब आत्मा ही होता है और इन्द्रियों में १२० शङ्करविजय-नाटक UNG जो उस ज्ञानकी प्रतीति होती है वह मिथ्या है जीव और ईश्वर यह दोनों परछाही और उष्णता ( गरमी ) की सपान हैं जैसे इन दोनों को कारण सूर्ग इन दोनोंसे निराला ही हैं तैसे ही आत्मा सबसे भिन्न होकर सबका कारणरूप है, यही सत्य तत्त्व है और इसका ज्ञान न होने का ही नाम अज्ञान है, इस. अज्ञानसे ही बन्ध शोक श्रादि होते हैं और है ऐसा समझनेको ही ज्ञान कहते हैं, उस ज्ञानसे सफल शोक बन्ध आदिका नाश होकर मोक्ष मिलता है भर्थात् पाणी जन्म मरण के चंकसे छूट जाता है, इस ज्ञानको मुख्य अधिकारी श्रत्तियों के कथनके आनु- सार शान्त, दान्त आदि गुणों से युक्त होना चाहिये, ऐसे अधि. कारियोंको विचार करनेसे ज्ञानकी प्राप्ति होती है। कर्म उपा- सना आदि सब चित्त निर्मल होनेके साधन हैं; इनसे मोन्त नहीं होता है, इस कारण हे मण्डनमिश्र ! अपने कर्मों के दुराग्रहको छोड़कर विचार करो तव यह संसार मिथ्या भास. रहा है, केनल अधिष्ठान आत्मा ही सत्य है, उसी के कारण यह संसार भी सत्य सा दीखता है, जैसे जलमें तरङ्गों या सुवर्णमें गहनों की प्रतीति होती है, उनमें सत्य जल और सुवर्ण ही होते हैं, तरंगे और गहनोंके मांकार मिथ्या होते हैं तैसे ही इस जगत् में सब भाकार मिथ्या हैं सत्य एक सच्चिदानन्द ब्रह्म ही है, यह वात तुमको प्रत्यक्ष भासने लगेगी और तत्काल मुक्त होजाओगे मंडमिश्र-परन्तु मुझे प्रतीत होता है अब सायंसन्ध्याका समय होगया, इसलिये आज यहाँ ही शास्त्रार्थ रोक देना चाहिये,कलको मैं नित्यकर्मसे निबटकर फिर यहाँ ही आऊँगा तब शास्त्रार्थका मारमा होगा। शंकराचार्य-ठीक है, आप सायंसन्ध्याके लिये जाइये हम भी भत्र नदी पर जाते हैं। ऐसा कहकर सब जाते हैं) .. शङ्करविजय-नाटक १२१ म अष्टम दृश्य (तदनन्तर पण्डित यज्ञदत्त और पण्डित ब्रह्मानन्दका प्रवेश) यज्ञदत्त-क्यों ब्रह्मानन्दजी ! आज आठ दिन होगये तुम्हारा कहीं पता ही नहीं लगा एक दो बार मैं तुम्हारे घर भी गया परन्तु तहाँ भी भेट नहीं हुई ऐसे किस, आवश्यक काममेंमें लग रहे थे ब्रह्मानन्द-वास्तवमें आजकल मेरे न मिलने का एक ऐसा ही कारण है आजकल मण्डनमिश्र और शंकराचार्यजीका शास्त्रार्थ होरहा है ना ! बस वही आनन्द देखनेके लिये मैं दोनों समय शिवमंदिर में जाता हूँ। यज्ञदत्त-मैंने भी वह समाचार, यहाँतक सुना था, कि सर- स्वतीने उन दोनों के कंठमें पुष्पमाला पहिराई, परन्तु यह नहीं मालूम आगेको क्या हुआ, इस कारण ही मैं तुम्हारे पास आया : ब्रह्मानन्द-हाँ तो आगे दूसरे दिनसे उन दोनोंका शास्त्रार्थ होने लगा, व्या कहूँ उन दोनोंकी वाणीका कैसा मिलतण पत्राह चलता था । बड़े २ पंडित बैठे हुए थे परन्तु कितने ही स्थानपर उनकी भी समझमें नहीं आता था कि यह दोनों क्या कहरहे हैं,दोनों ही अस्खलित बोलनेवाले थे मंडनमिश्रका बोलना तो मैंने पहिले भी कितने ही वार सुना था इस परन्तु शास्त्रार्थ के बोलनेके सामने यह सौवाँ भाग भी नहीं था, वह संन्यासी तो बड़े ही विलक्षण हैं, एक बार मण्डनमिश्रके मुख से प्रश्न निकला कि तत्काल विना विचारे ही समाधान करके उस पर अपनी कोटी करदेते हैं इस प्रकार उस शास्त्रार्थके समय सुनने पालोंको भी तो अपने शरीरका भान नहीं रहता है, संव सभा तसवीरमें खिचीहुई सी निश्चल बैठी रहती है । यज्ञदत्त-अच्छा यह तो बताओ,इस शास्त्रार्थको दिन कितने होगये और किस रीतिसे होता है ? 16 -- y train - .१२२ शङ्करविजय-नाटक वात ब्रह्मानन्द-प्रति दिन देोघड़ी दिन चहे शास्त्रार्थका प्रारम्भ होता है, इससे पहिले दोनों महात्मा अपने स्नान संध्या आदि नित्य अनुष्ठानले निवट लेते हैं, इस प्रकार मध्यान्ह काल पर्यन्त बराबर शास्त्रार्थ चलना रहता है, । मध्यान्ह के समय सारस्वती शिरालयमें जाकर पतिको भोजनके और यत्तिय मिनाक लिये लिशानेको भाती है तब मास्त्रार्थ वन्द होकर दोनों भोजनको जाते हैं, फिर कुच काल निश्राम होकर सूर्यास्तपर्यन्त शास्त्रार्थ होता रहता है, ऐसे बाज छः दिन बीत चुके । गज्ञदत्त परन्तु शास्त्रार्थमें हारता हुआ पक्ष किसका है, इस का तो अनुमान होगया होगया,मित्र ! यदि वह संन्यासी हार गमा न तो बडी मौज होगी ? मैं तो दश सहस्त्र ब्राह्मणों को जिमाऊँगा। ब्रमानन्द - छिः छिः ऐसा.निचार तो स्वममें भी न करना वह संन्यासी तो साक्षात् वृहस्पत्ति भाजायँगे तो उनकामी चिना जीते नहीं छोड़ेगा फिर इनकी तो बात ही क्या ? तुमने उनका भाषण सुना नहीं है तब ही ऐमा कहरहे हो, आजतक मेरी भी कर्ममार्ग पर बड़ी श्रद्धा थी और मैं संगासिगोका बड़ा तिर- स्कार करता था परन्तु जब वे उन महात्मा संन्यासीले भोषणको सुन रहा हूँ तबसे मुझे अपना वह समझना भ्रगसे भरा हुआ प्रतीत होने लगा है,अधिक क्या कहूँ जब उन महात्मा संन्यासी जीके मुख से मोतीसे मच्छ वाक्य निकलते हैं उस संगय चित्तपर वैराग्य ही उत्पन्न होता चला जाता है, ऐसी इच्छा होती है कि सब झगोंको छोड कर इनका शिष्य बन इन ही के साथ रहूँ। यज्ञदत्त-तब तो तुम्हारे इस कहने से स्पष्ट यही प्रतीत होता है कि गण्डनमिश्रका ही पक्ष-गिरता हुआ है। ब्रह्मानन्द-मेरी समझो तो परिणाम नही होगा मैंने खुब ध्यान देकर देखा है, मण्डनमिश्रके कंठगेकी. पुष्पमाला कुछ २ - शङ्करविजय-मानक ૨૩ कुम्हनाती सी जाती है. कल सायंकाल तो वह बहुत कुम्हलाई हुई प्रतीत होने लगी थी, मैं निश्चगरूपसे कहता हूँ कि प्रायः आज हो शास्त्रार्थ समाप्त हो जायगा, क्योंकि मण्डन मिश्रके कंठगेकी पुष्पमाला आजसे अधिक निभती नहीं प्रतीत होती । यज्ञदत्त तब तो भान मैं भी अवश्य पाऊँगा, क्योंकि आजतकका आनन्द तो दुर्दैववश हाथरसे गया ही । विहानन्द-चलो चलो तो सीघता फरो, अत्र अधिक देर नहीं है, वह देखो सत्र पंडितों की टिकलिये की टिकलिमें चली जारही है और शास्त्रार्थ प्रारम्भ होन्का घण्टाभी वजने लगा बह देखो मानाकालके स्नान संध्या प्रादि चिपिसे निवस कर प्रभानकालके सूर्य से दगा रहे हैं जिनके आगे पीछे सहस्रों पंडितों की भीड़ है और जिनके कंठ मेंकी पुष्पमाला सन्निपातहुए रोगीकी नाड़ी की समान कुछ एक चमक रही है ऐसे मण्डन- मिश्र नी शिवमंदिर की ओरको जारहे हैं इस कारण अब हमको भी चलने में देरी करना ठीक नहीं है, (ऐसा कहकर दोनों झपटे हुए जाते हैं) दशम दृश्य स्थान सिंचालक। शिष्यों सहित श्रीशंकराचार्यजी आकर बैठते हैं फिर अनेका पंडितो के साथ सण्डनमिश्र भी अपने स्थान पर आकर बैठते हैं। शंकराचार्य-पण्डनमिश्र ! मेरा और तुम्हारा शास्त्रार्थ छ: दिनसे बराबर चल रहा है; आज सानवाँ दिन है, तुमने जो जो शंका करी,उन सबको ही मैंने दूर कर दिया, फिर भी तुम हठ कर के अपने गतको नहीं छोड़ते हो यह क्या बात है? अच्छा और भी तुम्हारे जो प्रश्न हो उनको कहकर अपने मनकी निकाललो। मएडमिश्र-हे संन्यासी ! तुपं यह सिद्ध करते हो कि जीव और ईश्वमै अभेद है, फिर संपारमें कितने ही जीव सुखी . शङ्कारविजयं-नाटक Dist और कितने ही दुःखी देखनेमें आते हैं, यह भेद क्यों है ? शंकराचार्य - बहुत अच्छा प्रश्न किया, इसका तत्व भी तुम्हें पत्ताता हूँ सुनो-अनिर्वाच्य अनूपम आत्माकी तुलना (समता) तो किसी कीही नहीं जासकती,क्योंकि-मात्मस्वरूप प्राकाश की रहमान व्याप्त है तथापि घटाकाश (घडेके भीतरका आकाश) जलाकाश (जलमेंका भाकाश) और मझाकाश (सब स्थानमें व्याप्त आकाश ), यह मानो भिन्न २ हैं ऐसे प्रतीत होते हैं, घट युद्धिसे घटमेंका आकाशं स्वतन्त्रसा प्रतीत होता है, तैसे ही और भी परन्तु उस घटके फूटते ही वह आकाश कहाँ चला जाता है ?, इसके सिवाय घटके होनेपर तो घटाज्ञाश निराला होता है, क्योंकि-घटके व्यवधानसे उसकी प्रतीति होती है परंतु उस ब्राझाशमें घटाकाश जलाफाश होनेसे क्या कोई विकार नाता है ? कुछ भी विकार नहीं आता तैसे ही परमेश्वर के स्व- रूपका क्रम है । अब कोई जीव सुखी और दुःखी च्यों हैं ? यह जो तुम्हारा प्रश्न है इसका भी उत्तर सुनो यह सुख दुःख आदि भेद उस निरञ्जन परमात्माके निर्षे हैं ही नहीं, मायासे ढकेहुए जीवका यह भ्रम है। देखा-चिल्लौर पत्थर स्वभावसे स्वच्छ सफेद होता है, उसीको लाल कपडेपर रख दो तो वह लाल २ दीखने लगता है नीले वस्त्रपर रखदो तो नीला २.दीखने लगता है परन्तु वास्तवमें उस पत्थर के श्वेतवर्णमें कुछ विकार नहीं होता है, तैसे ही सुख और दुःख यह किसी रङ्गकी समान हैं और उस चिल्लौरकी समान स्वच्छ आत्मापर ढकेहुए हैं इस कारण मूढपुरुषोंको वह स्वच्छ भारमा सुख दुःख चाला दीखने लगता है, वास्तव में सुख दुःखरूप विकार आत्मामें जराभी नहीं हैं, किन्तु सुख दुःख आदि बुद्धिके धर्म हैं। मण्डनमिश्र-अच्छा तो तुम यह जो कहते हो कि-जीवकी शकविजय-नाटके १२० है . मुक्ति होती है, वह कैसे प्राप्त होती है और मुक्तिका लक्षणं शङ्कराचार्य-यह सब जीव वासनारूप सूत्र में गुथे हुये जन्म मरण अदि उपोधियों का अनुभव कर रहे हैं, उस वासनाको जड़मूल से नष्ट होना ही मुक्ति कहलाती है । मण्डनमिश्र-शंकराचार्य ! इस विषयमें तो मैं तुमको जीते लेता हूँ, भरे भाई ! जब यह कहते हो कि-वासनाके नष्ट होने पर मुक्ति मिलती है, तब तो निद्राके समय भी वासना नष्ट होजाती है, उस समय जीवकी मुक्ति क्यों नहीं होती ? उसको फिर संसारचक्रमें क्यों पड़ना पड़ता है ? शंकराचार्य-धन्य ! गण्डनमिश्र धन्य !! बड़ा अच्छा प्रश्न किया अच्छा तो सुन-वासना जड़मूल से नष्ट होनी चाहिये, यह बात मैंने कही थी,यह तो तुम्हारे ध्यानमें होगा ही! वासना नष्ट हुये विना निद्रा तो आवेगी ही नहीं यह तो सिद्धान्त है, परन्तु उस समय समूल नष्ट नहीं होती है, किन्तु जैसे विनौलेमें वस्त्र गुप्तरूपसे होता है तैसे ही यह सब जगत् उस समय पासनामें लीन होजाता है, फिर वह वासना अज्ञानमें गढे हुए जीयके समीप, विनौलेकी समान चीजरूप होकर लीन होजाती है,यदि कहो कि-चिनौलेमें वस्त्र कैसे रहता है तो सुना-विनौलेको वाने पर उसमें अंकुर निकलता है, तिससे वृक्ष होकर फूल आते हैं, फिर फल होकर उसमेंसे कपास निकलती है फिर उसके रुई- सूत आदि होकर वस्त्र वनते हैं अब व हो कि-उस वस्त्रका अधि.. ष्ठान चिनौला रहा या नहीं ? ऐसे ही यह सब जगत् वासनामें रहता है फिर इस जीवकी जाग्रत् अवस्था होनेपर उस वासनामें अंकुर फूटकर यह विश्व भासने लगता है । अब यदि उन ही बिनौलों को भून लिया जाय तो उनमें से कभी भी अंकुर नहीं निकलेंगे,तैसे उस वासनाको ज्ञानाग्निसे. भून देनेपर यह संसार

হান্বিন্ত--শান্ধ
s
रूपी अंकुर उसमें से कदापि नहीं निकलेगा और मिथ्या मान
नष्ट होजागगा इसीका नाग मुक्ति है ।
गएडनमिश्र-हे संन्यासीजी ! उस मुक्ति के अनुभवका आनंद
कैसा होता है ?
शंकराचार्य-अनी गएडमिश्र ! मुक्ति जो अखण्ड आनंद
का अनुभव होता है वही है।
मण्डनगिश्र-चढ़ आनन्दका क्या दिपयोंके आनन्दसे अलग
कोई और प्रकारका है ?
शंकराचार्य नहीं नहीं गह विषयोंके आनन्द भी सब उसी
मानन्दका बहुन थोड़ा भाग है, भात्मस्वरूपके अनुभव के विना
तो आनन्द हो ही नहीं सकता।
मंडनमिश्र-तो फिर विपरोंके भोगसे जो आनन्द होते हैं
का झूठे हैं क्या ?
शंकराचार्य अजी ! यह भी ब्रह्मानुभवरूप मानन्द ही हैं,
आत्मस्वरूपके अनुभवके विना तो मानन्द हो ही नहीं सकता,
ऐमा मैंने अभी तो कहा था, उसको मैं सिद्ध करता हूँ सुना
जगत की मूल वासनाके धर्म यह हैं-वासना यह चाहती है कि-
जी के पाससे निकल कर किसी विषय पर झपट्टा लगाऊँ
और उस विषयको पाकर फिर पीछेको लोहूँ और फिर दूसरे
विषयकी भोरको दौडूं, इस प्रकार कासनाके अनेकों चक चलते
हैं, इसीको अन्तःकरण की दृत्ति कहते हैं, अब उदाहरण के लिये
एक अन्य विषय को ले लीजिये, वासना जीवसे निकली और
अन्न पर चली, तहाँ उसको अन्न मिला, तब वह पीछेको लौटी
उस सगग पीछेको लौटने में उस वासना की और आत्माकी सन्मु-
खना होती है और ब्रह्मका प्रतिबिम्ब उस वासनामें पड़ता है
उसके साथ ही नीचको आनन्द होता है, परन्तु यह मूढ उसको
भी विषयानन्द ही समझता हुआ तिस ब्रह्मानन्दको भूता रहता
-

शङ्करविजय-नाटक १२७ है. तदनन्तर फिर वासना अपने व्यापारमें ला जानी है, इस प्रकार विषयानन्द और आत्मानन्दका भेद है, परन्तु योगी विषयानन्दको भी ब्रह्मानन्द ही जानता है, ब्रह्मानन्दके विना- आनन्द है ही नहीं, क्या मेरा यह कहना असत्य है ? इतने ही में गण्डनमिश्रकी समाधि लगती है इस कारण वह कुछ उत्तर नहीं देसकते हैं और कंठमेकी माला कुम्हलाती है तब सब लोग 'जीत लिया २, वाह वाह ऐसा कहकर तालिग बनाते हैं और श्रीशंकराचार्यजीके ऊपर फूलोंको वर्षा होती है शंकरानार्य -(आनन्दसे) शिष्यों! देखो इससे उत्तर न होसका आनन्दका स्वरूप सुनाते ही समाधि लग गई। पद्मपोद-महाराज ! क्या अब भी हारजाने में कुछ सन्देह हो सकता है ? मण्डनमिश्र कण्ठमेंझी पुष्पपालाको तो देखिये, कैसी मुरझागई है। शंकराचार्य-इनको समाधिसे जगाफर सचेत करना चहिये (इतना कह मण्डनमिश्रको झकझोरके सावधान करते हैं) क्यों मण्डनमिश्र ! यह क्या दशा है ? ऐसे मौन क्यों बैठे हों ? और कोई प्रश्न करो, इस तुम्हारे चुप सांधने पर यह तुम्हारे साथ के ही पण्डित हास्य करते हैं। तदनन्तर मण्डनमिश्र जौर-सव पण्डित श्रीशंकराचार्य जी के सामने साष्टाङ्ग प्रणाम करते हैं शंकराचार्ग-कहो, कहो ! चित्तमें कोई शंका शेपं न रक्खो, क्यों.कि-जन्म मरण का मूल कारण शंका ही है । गण्डनमिश्र-मुनिये सद्गुरो ! सकल वेदान्तका.वर्णन करने वाले भगवान् वेदव्यासजी हैं और कर्मकाण्डका उपदेश देनेवाले उनके शिष्य जैमिनिजी हैं,से। अपने गुरुके प्रतिकूल यह कर्म- मार्ग जैमिनिजीने क्यों चलाया और अपने मंतके विरुद्ध मन चलाने वाले शिष्यसे जैसे गुरुका मन खट्टा होजाता है तैसें श्रीवेदव्यासजीकी मीति गिनिजी के ऊपर से क्यों नहीं घटी ? ?

१२८ शङ्करविजय-नाटक अब तक जैमिनिजी उनके प्यार कैसे बने हुए हैं ? मुझको यह बड़ा सन्देश है। शंकराचार्य-झाजी गण्डनतिश्र ! मान तुगने जो जो शंका करी वह वहुन ही अच्छी है, अच्छा अब इस शंशाका भी उत्तर देता हूँ सुनो जैमिनिजीका मत गुरु व्यासजीके प्रतिकूल नहीं है। किन्तु अनुकूल ही है. कों कि-कर्मके बिना चित्तशुद्धि नहीं होसकनी और चित्तशुद्धि के बिना आत्मचिचारमें श्रद्धा ही नहीं होसकती, इस कारण जैसे छत्तपर चढ़ने में सरलता होने के लिये सीढियें बनाते हैं जैसे ही कर्ममार्गको ज्ञानमार्गकी सीढी समझो इसके सिवाय यह मात भी है कि-पदि कर्ममार्ग न होता तो मूढ पुरुषों की व्यर्थ ही अधोगति होती, इस कारण जैमिनिमुनि ने सर्व सांसारिक जीवों पर कृपा करने के लिये यह कर्ममार्ग चलाया है, अब तुग आप ही विचार देखो कि-जैमिनिमुनि का यह मत गुरुके प्रतिकूल है या अनुकूल ? और इसका प्रमाण तो तुम अभी पाचुके, क्यों कि-अक्तक कर्म करनेसे तुम्हारा हृदय शुद्ध हो गया था तक ही तो शानन्दका यथार्थ वर्णन होते ही तुम्हारी समाधि लगगई । मण्डनमिश्र-(हाथ जोड़े हुए ऊपरको नेत्र करके) हे जैमिनि जी ! इस मेरी शंकाका निवारण एक बार आप प्रत्यक्ष पाकर , . कीजिये। (तदनन्तर परदेके भीतर शब्द होता हैकि-अरे मण्डनमिश्र ! शङ्कराचार्यजी जो कुछ कहते हैं वह ठीक है, अन्तःकरण की शुद्धि होकर ज्ञानमार्गका अधिकारी होने के लिए ही मैंने कर्ममार्ग चलाया है) ण्डनमिश्र-(शंकराचार्यजीके चरण पकड़ कर महाराज!: आप धन्य हैं और आपके चरणोंकी कृपासे अब मैं भी धन्यः होगयो, अनसक मैं मायाके जञ्जालमें पड़कर भ्रान्त बद्धि से वृथा शङ्करविजय-नाटक १२९ से की कन्पनाएँ कर रहा था, परन्तु आपने पधार कर उचित उपदेश दे मेरा उद्धार कर दिया, यह मेरा थोड़ा सौभाग्य नहीं है, हे गुरो ! अब विलम्ब न करके शीघ्र ही मुझको संन्यासी बना लीजिये जिससे कि मैं इस संसारके जञ्जालसे छूटजाऊँ, क्यों कि अब मुझको यह सब असार दीखता है मैंने मनमें पक्का संकल्प करलिया अब मुझको न घरका ध्यान है, न धनकी चिंता है, और स्त्रीका मुख देखनेकी भी इच्छा नहीं है; अब आप देर न फरिये, कोई है रे ! नाईको तो बुलाला ॥ ( इतना सुनकर शिष्यों सहित श्रीशङ्कराचार्यजी बड़े आनन्द के साथ नारायण नारायण शब्दकी ध्वान करते हैं और इतने ही में मण्डनमिश्रकी स्त्री सरस्वती आती हैं) सरस्वती-(पतिकी मोरको देखकर ) हर हर, हे हृदयनाथ! माग आप हारगए क्या ? अच्छा शंकराचार्यजीकी ओरको) संन्यासीजी ! अब आगेके लिये क्या होरहा है शंकराचार्य-सरस्वती ! तेरे पतिको मैंने जीत लिया सो अब जैसी प्रतिज्ञा होगई थी, उसके अनुप्सार तेरे पतिको संन्यासी बनाता हूँ; इस विषय में तू भी इनको आज्ञा दे, क्योंकि तेरे पृणसे भी यह मुक्त होचुके हैं । सरस्वती-वाह संन्यासीजी पाह ! मेरे पतिको पूरा २ विना जीते हुए ही संन्यास दिये देते हो। शंकराचार्य-जीता कैसे नहीं ! इस बातको अपने पतिसे ही बूझ ले, और तूने मेरे और इनके कंठमें जो एक २ माला डाल दी थी, सो इन के कंठगेकी मालाको भी देख ने कैसी मुरझा. गई और मेरे कंठमें की माला देख जैसीकी तैसी बनी हुई है, इसपर भी क्या तुझको इनके हारने में कुछ सन्देह है ? सरस्वती-मनी संन्यासीजी ! कहाँ भूले हो ! क्या तुम यह 17 शङ्करविजय-नाटक -- . नहीं जानते कि-स्त्री पत्ति दोनों को मिलाकर शास्त्रने एक मूर्ति बताई है, फिर मुझको विना जीते मेरे पतिको पूरा २ फैसे जीत्तसकते हो ?, अभी तो तुमने प्राधे भागको ही जीता है, इस लिये चाहें तो आप आधे शरीरको अभी संन्यास देदीजिये, परन्तु वाएँ अंगको हाथ नहीं लगाने दूंगी, पहिले जुझे जीत लो, फिर जो चाहे सो करना । शंकराचार्य-सरस्वती ! जैसा तू कहरही है, ऐसा करना तो हमारे संन्यास आश्रमके प्रतिकूल है, क्योंकि संन्यासियों को सो स्त्रियों से बात चीत करने तकका निषेध है। सरस्वती-अजी ! यह तुम कैसी अज्ञानियों के सी बातें कररहे हो ! अद्वैतवादमें तो संन्यासी चाहे जिसके साथ बात करसकता है, इसका शास्त्रने कब निषध किया है ? पहिले याज्ञवल्क्यजीने गार्गीके साथ प्रश्नोत्तर किये ही हैं, ऐसे ही अनेकों दृष्टांत मित्त जायँगे, इसलिये में स्पष्ट रूपसे कहती हूँ कि जवनक मुझको न जीत लोगे तबतक मैं अपने पतिको संन्यास न देनेदंगी । शंकराचार्य-(मनमें ) यह तो बड़ा उलझट्टा पड़ा यदि इस से शास्त्रार्थ नहीं करता हूँ तो जीता हुमा मण्डनमिश्र हाथसे निकला जाता है तथा मेरे काममें गडवडी पडती है और यदि शास्त्रार्थ करता हूँ तो लौकिको विरुद्ध होगा (विचार कर ) अच्छा चाहे कुछ हो, शास्त्रार्थ तो इसके साथ करूँगा ही मंडन- मिश्रको शिष्य किये विना कभी भी नहीं छोडूंगा (प्रकाश रूपसे ) बहुन अच्छा सरस्वनी ! तेरे नित्त शास्त्रार्थ करनेकी इच्छा हो तो सामने भाकर बैठ और जो कुछ प्रश्न करने हों सो कर ॥ सरस्वती-( सन्मुख आकर बैठ कर ) मनी संन्यासीनी तुम्हारे मतमें यह संसार मिथ्या है, परन्तु यह बात समझमें

शवजय-नाटक
Day
नहीं पाती, सो यह असत्य किस प्रकार है ? इसको प्रति
देकर समझाइये ।।
शंकराचार्य-संसार सत्य कैसे है इस बातको पहिले तू ही
सिद्ध फार तर मैं उसका खण्डन फरूँगा।
सरस्वती-अनी ! सत्य होने में तो भार किन्ही कारणों की
भानश्यकता ही नहीं है, जय कि-यह सब समय एकत्सा दीखता
है तब और कौनसा प्रमाण चाहिये ?
शङ्कराचार्ग - सब कालमें एकसा दीखने पाला कहती है यही
ठीक नहीं है, यदि सबकालमें एफसा दीखता तो इसको गिथ्या
कौन कहसाता था ?
सरस्वती-तो तुम्हारे मतमें, जगत्मा अनुभव सदा नहीं
होता है ? भला सिद्ध करो यह कैसे होसकता है ?
शङ्कराचार्य-तू जब सोती है तब तुभाको कभी २ सम भी
दीखते ही होंगे ! उस समय क्या तुझको इस जगत्का कुर
अनुभव होता है ? और जर तू सुषुप्ति अवस्थामें होनी है उस
समय नो वह स्वप्नका भी जगत् नहीं देता है और वह जगद् भी
नहीं होता है और जगजाने पर भी स्वतके जगका पता नहीं
होता है, इस प्रकार एक समयके जगदका दूसरे समय में जब
मभाव होता है तब फिर जगतकी सत्यता कहाँ रहो ?, अज्ञान
चश रस्सीमें सर्पकी प्रतीतिकी सपान ब्रह्मके स्वरूप पर इस
जगत्का भान होरहा है, इस प्रकार जगत् धोखे टहीके सिवाय
और कुछ नहीं है।
सरस्वती-(मनमें ) यह तो शास्त्रार्थमें मुझे चुप ही करदेंगे
जिसने मेरे पतिको जीत लिया यह मेरे जीतने में भला काहेको
बाने लगा है ? आखिर तो मैं अबला ही हूँ, अच्छा अब कुछ
कपर करके इनके छक्के छुटाऊँ (प्रकट ) मच्छा संन्यासीनी !
?

, शारविजय-नाटक Palu तुम्हारे अद्वैत शास्त्र में जिन छ: रिपुमोंको जीतना कहा है, वह फौनसे हैं, उनके नाम तो बताओ? शंकराचार्य-(हँसकर ) सरस्वती ! यह तूने क्या प्रश्न किया। प्रच्छो सुन -१ काम, २ क्रोध, ३ लोभ, ४ मोह, ५ मद, ६ मत्सर, इन छःको अपने वशमें करना चाहिये, तिसमें काम तो वढा ही कठिन है परन्तु योगीके सामने उस कामदेयकी भी कुछ नहीं चलती है। सरस्वती-अनी संन्यासीजी ! सुनो तो सही- पृच्छामि वद कामस्य कला भिक्षो विमात्मिका । कियन्त्यश्च किमाधागस्तथा कागस्य का स्थितिः ।। पूर्वपक्षे पर नार्या नरे तिष्ठति वा कथम् एतंपामुत्तरं देहि सम्विचार्य यतीश्वर ॥ उस कागकी कलाओं का क्या स्वरूप है ?, भौर वह कितनी हैं ? तथा किस भांशरसे रहती हैं मनुष्यमें कामकी स्थिति किस प्रकार होती है ?, शुक्लपक्ष और कृष्णपक्षम, मनुष्य और स्त्री के विवाह कामकी कला कहाँ २ कैसे २ रहती है ? इन मेरे प्रश्नों के उत्तर ठीक २ विचारकर दो। शंकराचार्य-( विचारमें पडकर मौन रहजाते हैं) सरस्वती-क्यों महाराज ! चुप क्यों साधली ? क्या मेरे प्रश्नका उत्तर नहीं देसकते ? तब तो तुमको हार माननी पडेगी इतनेसे प्रश्नका उत्तर नहीं देशकते ? फिर तुम सर्वज्ञ कैसे हो ? शंकराचार्य-सरस्वती ! इस प्रश्नका उत्तर मैं तुझको एक महीने के भीतर दूंगा, तबतककी मुझको अवधि दे।। सरस्वती-बहुत अच्छा यदि एक महीने के भीतर उत्तर नहीं दोगे तो हारे समझे जाओगे, एक महीनेके लिये तो मैंने अपने पतिको सान्यासरूप अकाल मृत्युके मुख से बचाही लिया ( पतिसे ) महारान ! घरको चलिये। ( तदनन्तर मगन नमिश्र सरस्वती और सन पण्डित जाते हैं.)

গাঙ্গুলি-না १३३ पद्माद-(शंकरानार्गनीसे) महाराज ! मापने यह क्या किया क्या कहा जाय ? आपने तो हायमें आये हुए मण्डनमिश्रको खोदिया! शंकराचार्य-अरे भाई ! सरस्पनीने तो प्रश्न ही ऐसा वेढव किया कि-मैं जिसका उत्तर ही नहीं देसका। पद्मपाद गुरुजी ! आप कौनसी घातको नहीं जानते हैं ? कामशास्त्रकी ही बात थी तो क्या था ? भाप सर्वेश्वर हैं, उत्तर देही देते तो उसमें कौन हानि यी । शंकराचार्य-भाई ! उसका उत्तर देना ठीक ही नहीं था, क्यों कि-यदि मैं उस प्रश्नका उत्तर देता तो वह यह कहती कि-तुम ब्रह्मचर्य माश्रमसे एक साथ संन्यासी होगये थे, फिर कामशास्त्र कब सीखा ? इस लिये तुम भ्रष्ट हो । पद्मपाद-अच्छा ! आपने जो एक महीने की अवधि ली है,उस में अब क्या करोगे। शंकराचार्य-दात यह है कि इस समय अमरक नामक राजा फा मरण हुधा है और उसकी लाश दाह करने के लिये स्म- शानमें लाई गई है, यह बात मैंने अभी योगाष्टिसे देखी है, सो मैं योगवलसे उसके मृत शरीरमें घुस कर उसके शरीरसे उस की सैकडों स्त्रियोंसे दिलास करता हुआ सव. कामशास्त्रको जानलूँगा और एक पालके आनन्तर इस ही अपने शरीर में, आजाऊँगा, तुम इतना काम करना कि--इस गुफामें बैठे घड़ी सावधानीके साथ इस मेरी शरीरकी रक्षा करते रहना ।। पद्माद-महाराज़ ? ऐसा न करिये, इससे बडा अनर्थ हो जायगा, मण्डनमिश्र मिलो या न मिलो, इसकी कुछ चिन्ता नहीं है, क्यों कि- हमने सुना है कि-पहिले समय में एक योगी थे वह भी इसी प्रकार राजांके शरीर में प्रवेश करके स्त्रीलम्पट हो अपने स्वरूपको भूल गए थे, सब उनका एक योगी शिष्य लौटा

१३४
शकरविजय-नाटक
कर लाया, सो हमसे आपके वियोगका संकट नहीं सहा जायगा
शंकराचार्य-अरे भइगा ! यह तुम्हारा क्या ध्यान है? क्या
मैं विषयों में फंस कर अपने कर्त्तव्यको भूल जाऊँगा मुझ
ऐसा अज्ञान होने का तुम कुछ सन्देह न करो, सावधानी के साथ
धैर्यसे येरे इस शरीरको रक्षा करते रहो, मैं बहुतही शीघ्र लोट
फर आऊँगा, भर जानेको देर होती है, क्योंकि उस राजा
को शरीर अब चिता पर रक्खा ही जाने वाला है (इतना कह
फर मोणायामके द्वारा शरीरको छोड़ते हैं, इसी समय शरीर
शिथिल हो भूमि पर लम्बो२ पड़ता है, और सब शिष्य नारा-
यण नारायण करते हुए उस शरीरको उठाकर लेजाते हैं) ।
इति गण्डनविजय परकाया-प्रवेश नामक तृतीय अंक समाप्त ।
श्रय चतुर्थ अंक
ॐ प्रथमदृश्य
(श्रमरक राजाकी नगरी मेंका राजदरवार)
(तदनन्तर अमरक राजाका सुविचार नाम घाला मंत्री और विचक्षण
नामक न्यायाधीश आते हैं)
सुविचार-(भासन पर पैठ कर ) आइये न्यायाधीशनी!
आपसे कुछ गुप्त बातें करनी हैं, इसी कारण बुलवाया था।
विवक्षण-मन्त्रीनी ! मैं भी आपका सिपाही पहुँते ही हाथ
का काम जैसाका तैसा छोड कर चला आरहा हूँ, जो कुछ विचार
फरना हो करिये, यहां कोई तीसग तो है ही नहीं।
सुविचार-कौन है रे उधर ! (इतना सुनते ही द्वारपाल
आता है)॥
द्वारपाल-(पणाम करके) महारान मैं सेवक हाजिर हूँ, क्या
भाज्ञा है. ? .

शङ्करविजय-नाटक १३५ सुविचार-द्वारपाल ! खूब सावधानीके साथ पहरा देना, हमारी आज्ञा लिये बिना किसीको भीतर न आने देना। द्वारपाल-बहुत अच्छा महाराज ! जो आज्ञा । (ऐसा कहकर फिर प्रणाम करता हुआ वाहरको जाता है) सुविचार-न्यायाधीशनी ! महाराजका दुसराकर जीवित होना तो मापने सुना ही है ? विपक्षण-सुनना क्या वह सब वात मेरी आँखोंकी देखी हुई है ! ऐसा चमत्कार मैंने तो अपनी उमर भरमें कभी देखा नहीं भला उनमें क्या कुछ बाकी रहा था ?. बडे २ राजवैद्योंने हाथ सकोड लिया था, तब ही तो माणहीन समझ पा स्मशानको लेगये थे ! परन्तु जैसे कोई सोकर उठ बैठता है उसी प्रकार महाराज एकायकी उठ बैठे, भौर यह भी तो देखो-जिस रोग से महारानको यहाँ तक फष्ट हुआ था वह रोग.भी अब नहीं रहा, न जाने क्या भेद है, हमारी तो समझ ही काम नहीं देती ऐसी अघटित घटना परमेश्वरकी इच्छासे ही हुई है, इस राज- धानीका यह प्रारब्ध ही समझना चाहिये। सुविचार-इस विषयमें मुझे जरासा सन्देह है, क्यों कि- महाराजकी व्याधि भी जीवित होने के साथ ही दूर होगई इतना ही नहीं किन्तु महाराजका स्वभाव भी पला गया है, इससे मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि-हमारे महाराज तो इस संसारसे गये सो गये ही, यह कोई और ही इस शरीरमें भागया है । पिचक्षण-तुम जाने क्या कह रहे हो, यह बात मेरी समझ में आई नहीं, तुमने क्या समझा है सो साफ साफ कहो ? सुविचार-देखो हमारे महाराज तो हस्ताक्षर करनेके सिवायः और एक अक्षर भी नहीं लिख सकते थे और अब तो यह न्यायका सब कारोबार अपने भाप ही लिख डालते हैं, कार्यमें कितनी चतुराई है ! सब बातों पर कितना ध्यान है ! कौन १३६ १३ शङ्कर विजय-नाटक Velhe अधिकारी कैसा कार्य करता है, सो बरावर देखते हैं मजाके ऊपर कितनी सूक्ष्म दृष्टि है, कहाँ तक पहूँ, इनमें जितने गुण हैं, हमारे महागग में नो इन गुणों का पता भी नहीं था, न जाने एक साथ कहाँसे श्रागये? विचक्षण-भाई ! यह शंका तो कुछ नहीं है ! क्यों कि-जब परमेश्वर की देन हो तो वि.स बातकी कमी रह सकती है. ? जिसने दुसराकर जीवनदान दिया वह अलौकिक गुण भी दे सकता है। • सुविचार-छिः छिः ऐसा कहना तुम्हारे विचक्षण नामको बट्टा लगाता है, भाई ! इसमें कुछ और ही भेद है। विचक्षण-अच्छा, क्या भेद है ? बताओ तो सही इस विषय में बुद्धि काम नहीं देती, एक बार यह सन्देह तो मुझको भी हुआ था कि जिस मुकद्दमेका फैसला मैंने अपनी बुद्धि के अनु. सार न्यायानुकूल कर दिया था, उसकी अपील जव महाराज यहाँ हुई तब उन्होंने उसकी खूब ही छानबीनकी और अन्त में फैसला भी बडी ही योग्यताके साथ किया, उसको देखकर मैं तो चकित होगया, और महाराजकी पहिले समयकी योग्यतासे तुलनाही तो पृथ्वी आकांशलासा अन्तर प्रतीत हुआ, उस समय भी मैंने परमेश्वर भी देन समझकर ही सन्तोष करलिया था सुविचार-मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि-किसी योगीने राजयोग करने के लिये अपने शरीरको कहीं रखकर इस राज- शरीरमें प्रवेश किया है, क्यों तुम्हारे ध्यानमें भी कुछ आता है विचक्षण-इसका निश्चय कैसे हो ? और योगी पुरुष तो निरीह रहते हैं उनको इस खटखटेमें क्या सुख मिल सकता है ? सुविचार -मैं यह बात केवल अपनी बुद्धिसे ही कहता हूँ, और यह बात एक दिन मैंने राजपुरोहितसे भी कही थी तब उन्होंने बहुत कुछ सोच विचार कर उत्तर दिया कि--यह कोई शचिजय-नाटक १३७ प पहायोगी है और ऐसा भाजतक भनेको स्थान पर हुआ भी है क्योंकि योगी पुरुष राजयोग साधनेको ऐसा किया करते है चिचत्तण-तब तो परमेश्वरकी पासे यदि यही सदा हमारे राजा रहें तो अच्छा हो! सुविचार-मेरी भी ऐसी ही इच्छा है भौर इसके लिये मैंने कुछ प्रबन्ध भी करना प्रारम्भ करदिया है। पिचतण-यही योगी बहुत दिनोंतक इस राजशरीरमें रहें, इस विषयमें कोई युक्ति तुमने गुरुजीसे भी बूझी थी ? सुविचार-दाँ बूझा था, उन्होंने भी मुझे युक्ति बताई भौर बद ठीक भी मालूम हुई ! विचक्षण-मुझे भी तो वतामो, उन्होंने क्या सम्मति दी ? सुविचार-उन्होंने कहा कि-बहुतसे राजदूत सारी पृथ्वीपर ढूँढने को भेजो, उनको जहाँ कहीं कोई मृतक शरीर मिले उसको अग्नि भस्म कर दें,ऐसा करनेसे सहनमें ही उस योगीका शरीर नष्ट होजायगा तब वह आप ही इस राजशरीरमें चिर. काल तक रहेंगे। विचक्षण-बाद ! वाह ! यह युक्ति तो बहुत अच्छी है ! फिर इसमें देरी नया है ? किन्ही विश्वासपात्र सेवकों को शीघ्र ही इस कागके लिये भेजदेना चाहिये । सुविचार-भेजता हूँ, परन्तु पहिले रानी साहबके मन में जाकर भी कुछ सुराख लगा देखू, उनको भी इस विषयमें कुछ संन्देह हुमा है या नहीं, बाँकी टोह लेकर फिर सब प्रबन्ध करूँगा। में विवक्षण-अच्छा तो सब वृत्तान्त तो मापने मन ही लिगा जाता हूँ। सुविचार-भच्छा तो चलिये मैं भी भव उधरको जाता (ऐसा कहकर दानो जाते है) 18 शङ्करविजय-नाटक Pl द्वितीय दृश्य (राजाका आनन्दकुंज बाग) (बसन्ती और माधवी नामक राजमहलकी दो दासियोंका प्रवेश) माधड़ी-साखि वसन्ती ! जैसे तरुणाईमें भरी हुई गतवाली इथिनी का आसपास के हनों का कुछ ध्यान न करके उनात्त हुई फिरती है, तैसे ही तू यहाँ खड़ी हुई मेरी ओरको न देखकर आपनी छानी पर सुवर्णके कलशोंकी समान दानों स्तनों को निहारती झिसकी ओरको जारणी है ? बसन्ती-अरे ! मेरी प्यारी सखी बसंती है क्या ? सखी ! जाननी ही है जब कहीं न जापडता है तो फिर समीपमें कोई भी पदार्थ हो वह नहीं दीखता, इसकी सुझको क्षमा दे ( ऐसा कहकर उसका हाथ पकडती है ) माधवी-सखि वसंती 1 जिसने तेरे मनको भी विचलित कर दिया है, ऐसा भाग्यवान् पुरुष इस नगरी में कौन उत्पन्न हो- गया है? वसन्ती-( लज्जित होकर ) सखि ! तू जैसा समझ रही है क्या अब मेरी अवस्था इस योग्य है ? न जाने तू ऐसी बातें. क्यों कर रही हैं ? माधवी-ऐसी तो बूढी भी नहीं होगई है ! फिर जिस मंदिर में निरन्तर शृंगाररूम मेघकी वर्षा होती रहती है और जिस मंन्दिरमै कामदेव की समान सुन्दर पहाराजाधिराजको दर्शनीय- मूर्ति, पूर्ण खिले हुए कमलार भौरे की समान, जिनपर गोहिन पहनी है, उन महारानी गदनमञ्जरीके मंदिर, तु रहती है, फिर में कैसे समझलू फि तेरा चित्त ठिकाने रहना होगा ? अच्छा ! यदि ऐसा नहीं है तो यह हान भाव कटान्नं आदिसे शरीस्की सनाचट काहे के लिगे. होती है ?

ভুল-না
द
वसंती-ऐं भाड़ में जामो झुंझसे तो ऐसी बाचें ना पाली !
हरे जीमें भावे सो समझ; अब यह तो बत्ता वू कहाँ जारही है?
आपली-बसा तेज दूंगी, परन्तु तू इस बरतकी प्रतिज्ञाकर कि
किसीसे कहूँगी नहीं !
वसंती-मैं जान का भी तू मेरे स्वभावको नहीं पहिचानती
हैं ?, भारी परपि मैं तू दोनों खौतिगाडाह रखने वाली देर
रानियोंकी दासी हैं तथापि तेरे साथ मैं जैसा पचहार रखत्ती
हूँ क्या उसको नहीं जानती है ?
'माधवी-सखी ! इसी कारण तो कहती हूँ, लुन फल सत
महराजसे हमारी नी साहवं रूठ गई थीं, उस समय जैसे
तैसे, 'अब मैं कभी मदनगञ्जरीका सुख भी नहीं देखू मा,' यह
प्रतिज्ञा होनेपर महाराजकी उनके सदथ एक शय्या हुई थी,
परन्तु आज फिर महारानी साहबको समाचार मिला है कि इस
समय महाराज मानन्द कुञ्जनागमेंके जल मंदिरमें महारानी
मदनगञ्जरीके साथ हैं, 'यह बात ठीक है या नहीं ?' इसका
पता लगानेको महारानी सादरकी भेजी हुई मैं गुप्तरूपसे आई
समझगई?
वपन्ती-सखि ! जैसे कुम्हलाकर सूखी हुई झगलनी पर
भौंरा बैठता है वैसे ही महाराज न जाने उस बूढी स्त्री के प्रेम
कैसे फंसगये १. मुझे तो बडा पाश्चर्य है ?
गाधनी-सखि ! रित्तकी प्रबलताके बिना भला कुटकीका
सेवन कौन करेगा? ऐसी गाँठ पड़जानेका कोई और ही कारण है
वसन्ती-चह कौनसा कारण है, क्ता ते सही !
माधवी-कल महारानी साहब ने एक व्रतका उमापन किया
था; उसकी सांगता करने के लिये महाराज जा. फँसे थे. सो
भोजन भी तहाँ ही हुआ था, फिर भला निकलकर कहाँ. जा
शकते थे इस कारण विवश होकर तहाँ ही रहना पड़ा।

१४७
शङ्करविजय-नाटक
jo
बसन्ती-बहुतसी त्रिपोंसे मेष रखना पुरुषको बड़ा ही
कष्ट देता है, देख अब तू. तहाँ जाकर यह कहेगी कि
महाराज हमारी महारानीके साथ इसं वागमें हैं तो वह बुढिया
महाराजको नोच नोचकर खायगी।
माघची-(हँसकर ) तेरे इस कहनेसे तो निश्चय होगया कि
महाराज यहाँ ही हैं ! मेग काम तो सिद्ध होगयो, अब मैं
जाती हूँ।
वसंती-सखि ! बातों में सुझको कुछ भी ध्यान नहीं रहा
और गुप्त बात मुखसे निकलगई, अब कृपा करके किसी मेरा
नाम न बताना नहीं तो मैं सदाको दो कौड़ीकी होजाऊँगी।
माधवी-नहीं ऐसा कभी नहीं होगा, अच्छा यह तो पता कि
तू घबडाई हुई जा कहां रही है ? और महाराज जद तुम्हारी
महारानी साहिबा के साथ मिले तब क्या २ श्रानन्द हुमा ?
वसन्ती-कल रातको जब अाधीशेत तक महाराज नहीं
पहुँचे तब महारानी बहुत ही बिगहीं, और सबं दासियोंको यह
भेद जानने के लिये कि महाराज कहाँ हैं भेजा, उस समय हमने
बहुत खोजकी परन्तु कुछ पता नहीं लगा अंतको महाराज बडी
महारानी साहबके भवन में पधारे हैं, ऐसा पता लगाकर खवर
देते ही हमारी महारानी ठुकराई हुई नागिनीकी समान लंबी २
सांससे लेकर पलँगपरसे नीचे पडरही और सब गहने उतार
कर फेंकादये।
पाचवी रानी साइचको जैसा क्रोध आया होगा उसको मैं
अनुपान करंसकती हूँ क्योंकि सच राजरानियों में एक बड़ी तो
अपनी सुन्दरतासे सत्यभामाको भी लज्जित करने वाली हैं
अच्छा फिर क्या हुआ ?
वसंती-फिर हम सब जनी घबडाकर महारानीके पास गई
परन्तु उन्होंने किसीकी एक न सुनी और कहने लगी कि मैं तो

on
शङ्करविजय-नाटक
१४
अब प्राण खोद्गी भोर महाराजको अपना मुख नहीं दिखाऊँगी,
उस समय मैंने अनेकों उतार चढ़ापकी बातें समझाई तब कुछ
शांति हुई, परन्तु नेत्रों की मश्रुधारा तब भी वंद नहीं हुई
इतने हीमें मात:काल होगया, तव जैसे से हमने पलंगपर
लिटाया, इतने ही सरकार भी जागनेसे मौंघाते हुएसे भाकर
पलंगपर बैठगये।
माधवी-महाराज विचारोंको फहीं भी सुख नहीं, क्योंकि-
कल रातभर तहाँ भी ऐसे ही दुर्दशा रही थी।
वसन्नी-जब बड़ी महारानीने वडी प्रीतिके साथ महाराजको
रोका था तो फिर उनके यहाँ यही दशा क्यों हुई ?
माधी-यह तो ठीक है परन्तु जब दोनों शव्यापर बैठे तब
पहाज बहुत दिनोंतक भाये नहीं थे इस कारण मारानी
रूठकर मौन होगई।
वसनी-ससि ! भला कबतक मौन रही होगी ! बहुत समय
के भूखे ब्राह्मणके भागे पंचपक्वानका थाल रखनेपर भला वह
कवनक धीरज धरे बैठा २ देखता रहेगा? यही दशा क्या वडी
महारानीकी नहीं हुई होगी?
माधवी-हमने भी परिले ऐसा ही समझा था परन्तु कल तो
बहुत ही सेंच हुई, ज्यों २ महाराज खुशामद करते थे त्यों २
महारानीका मान बढना जाता था, और जैसे नई विवाहिता
स्त्री प्रथम बार समागम होते समय पति के हाथको छूनेही झटक
देती है, बस तैसी ही दशा होने लगी तब हमको प्रतीत हुआ
कि महारानी साहबकी तरुणाई मानो फिर लौट भाई है।
बसंती-ससि ऐसा तमाशा कितने समयतक होता रहा ।
माधवी-सलि ! क्या कहूँ तू झूठ समझेगी गातःकाल तक
यही झंझट रहा, महाराजने अपनी सब बुदि खरच करडाली
परंतु व्यर्थ ही गई तब महाराजने सिन्न होकर एक श्लोक पढा

मैं क्या करूं?" १४२ शङ्करचिजप-नाटक भु था वह इस समय मुझको याद नहीं रहा परंतु उसका भाव ध्यान में है कहे तो सुनाहूँ? वसन्ती हाँ हाँ मुना- माधी-सखि ! प्रातःकालके समय महाराजने खिन्न होकर जो श्लोक बोला था उसका पानार्थ यह है कि "हे कृशोदर ! रात्रि कृश होगई परंतु तेरा मान कश नहीं हुआ पूर्वकी दिशामें संग ( लाल रंग ) भागगा परंतु तुझमें राग (प्रग) उत्पन्न नहीं हुआ यह प्रामाश प्रसन्न (साफ) होगया परंतु तेरे मुख पर प्रसन्नता न आई यह पक्षी बोलने लगे परंतु तूने मौन नहीं छोड़ा, भव वसंती-हर हर, यहां तक नौरत भागई तम भी उस कठोर को दया नहीं पाई। पाधवी-वस केवल मौन दुर होगमा तब ही-"मदनमञ्जरी का मुख अब कभी यहीं देखू गा" ऐसा बचन दो यह कहने लगी। बसंती -इसीकर नाम सौतियाडाह है, अच्छ। फिर ? माधवी-तब महाराजने रानीसे यह प्रतिज्ञा करके घड़ी भरको आराप किया था कि-प्रभातकालके मांगलिक,शब्दयुक्त वन्दी ननों की स्तुतियों ने उनकी महारानीके बाहुबन्धनसे बाहर निकाल लिपा उसी समय महाराज मुख धोकर इधरको आये हैं, यही अनुमान करके भेद मँगाने के निमित्त मुझ को इधर मेजा है, अब तेरी महारानी मौर महाराज का साक्षात्कार होने पर क्या गुल खिन्ता से। तो सुना ? वसन्ती-बातचीत तो कुछ हुई नहीं, गहाराज आकर पलँग पर बैठ गये, यह देख महारानी उठी और मेरा हाथ पकड कर कहने लगी कि-मेगा स्नान करने का समय होगया, चल मुझे स्नानालयमें लिग चल तथा और दासियों को भाज्ञा दी कि- शङ्करविजय-नाटक सरकार कल रात भरके थके भौर जगे हैं, उनको पलँग पर निद्रा लेने दो और तुप इनकी इच्छानुसार सेवामें लगी रहो. इनना कहने पर मैं महारानीको लेकर स्नानागारमें गई तहाँ नियमानुसार स्नान करके महारानी पीली साड़ी पहरे हुए दन- मन्दिर में जाकर पूजा करनेलगी और मुझको गहाराजके समीप जाने की आज्ञा दी सो मैं उधर ही गे जारही हूँ। माधवी-मच्छा तो अब मैं भी जाती हूँ ( ऐसा कह कर चली गई)। (इतनमें ही सुविचार मन्त्रीका प्रवेश) सुविचार-(भागेको देख कर ) यह तो, महारानी मदन- गञ्जरीकी दासी बसन्ती भारही है, इससे भेद निकालें ऐसा काफर वसन्तीसे) भरी बसन्ती ! जरा इधर तो भा; तुझसे बड़ा आवश्यक कार्य है। वसन्ती-( सामने को देखकर ) ग्या मन्त्रीजी हैं ( ऐपा कह समीप ज कर ) महाराज ! क्या आज्ञा सुविच र-सन्ती ! मैं महारानी मदनमंजरीसे एकान्तमें कुछ सम्पति करना चाहता हूँ, इसका भरसर किसी प्रकार मिल सकता है क्या ? मैं जानता हूँ महारानी तुझसे बड़ी प्रीति रखनी हैं, इसकारण या काम जैसा तुझसे होगा तैसा दूसरेके साथसे नहीं होसकेगी। बसन्ती-महाराज इस कामके सिद्ध होने का तो अभी भर- सर है ! इस समय महारानी साहब स्नान करके देवमन्दिरमें पूजाके निमित्त भकेली ही बैठी हैं, आइये चलिये, बस काम बना ही समझिये। सुविचार-अच्छा तो जा मेरे मानेकी सर देकर भीतर प्रवेश दोनेकी माझा लेमा। वसन्ती-बहुत अच्छा, मेरे साथ भाइये [ ऐसा कह कर दोनों जाते है] है ? R १४४ शङ्करविजय-नाटक Ok प * तृतीय-दृश्य महारानीका देवमन्दिर । ( तदनन्तर पूजारीके साथ पूजा करती, आसन पर बैठी रानी मदनमंजरीका प्रवेश) रानी-(पुजारांसे ) महाराज ! ठाकुरजी को मैंने स्नान करा दिया, अंब आप सच मूर्तियोंकों पोंछ कर सिंहासन पर पध- राओ और सबके आभूषण पहरादो। पुजारी-जो आज्ञा (ऐसा कहकर मूर्तियोंको पोंछकर वस्त्र और गहने पहराता है. इतने ही में रात भर जागनेके कारण रानीको औंघाई आती है और वह पीछेकी दीवारसे शिर लगा कर सो जाती है,यह देख पुजारी भी विचारमें पड़ा खडा रहता है ( इतने हीमें सुविचार मन्त्री और बसन्ती दासी, यह दोनों आते हैं) वसन्ती-मन्त्रीजी ! इधरको आइये, (दो पग चलकर) वह देखो महारानी साहब बैठी हुई अनन्यभाषसे भगवान की पूजा कर रही हैं । मैं जाकर आपके आनेकी सूचना देती हूँ, तब तक भाप यहाँ ही खड़े रहें। सुविचार-ठीक है, तू जाकर महारानी साहबसे मेरे विषयमें भाज्ञा लेकर प्रा। बसन्ती-बहुत अच्छा ( ऐसा कर समीप जा उस दशामें स्थिन हुई देखकर ) महारानी साहब ध्यानमें हैं या सो रही हैं ? ( विचार कर ) ठीक ठीक समझ गई। कल रात भर निद्रा न होने के कारण इस समय आँख झपक गई है ( फिर इशारे से मन्त्रीको पास बुलाती है और मन्त्री भी आता है) सुविचार-क्यों वसन्ती ! महारानी साहबकी प्राज्ञा ले ली क्या ? वसन्ती-मन्त्रीजी ! महारानीको इस समय जरा झाकीसी शङ्करविजय-नाटक १४५ लग गई है सो क्षणभर खड़े होकर देखें तो सही क्या चमत्कार होता है । ऐसा कहकर दोनों देखते हुए खडे रहते है ] रानी-[ सोतेमें ही ] प्राणवल्लभ ! सारी रात्रि भर मेरी वेत्रवती [ दासी ] की समान गलितस्तना स्त्री पर मदनछत्र होकर, कपात्रमें सत्पात्रपना मानकर, वात्स्यायनसूत्रत्ति [काम- शास्त्र ] का अभ्यास करनेके लिये शृङ्गाररूपी सत्र [ यज्ञ ] में दीक्षित हुए, परन्तु हे आर्यपुत्र ! नीतिदोत्र [अग्नि से पतित शुष्कपत्रवनकी समान इस अपत्ताका गात्र भस्ममात्र होजायगा, यह विचारकर मापके चित्तमें तिलमात्र भी दया क्यों नहीं आई? सुविचार-[ घनड़ाकर रयों वसन्ती ! इस समय यह गहा- रानी सारकी बातें अट्ट सट्ट नहीं है क्या ? पसंती-मंत्रीजी इसका वीज कुछ और ही है, वह बिना बताये आपके ध्याजमें नहीं भासकता, परन्तु यह तो सोतेकी परस्ट है। सुविचार-संती ! इस ढङ्गसे तो मुझे ऐसा अनुमान होता है कि-शायद कल रात महाराज कहीं और रहे थे ? वसन्ती-( मुख ही मुखमें हँसकर ) अच्छ। मागेको या. होता है से। देखो! गदनमञ्जरी-(निद्रामें ही) प्राणनाथ ! इष्टजनको तष्ट कर के लिये मुझको कष्ट देकर उस नष्ट गन्गयाको यथेष्ट आनन्द देने मोपने अपने अपरको केवल भ्रष्ट ही किया और चण्डायु सूर्य की प्रचण्ड किरणों के इस ब्रह्माण्ड मण्डल पर ताण्डचनृत्य करने पर उस गभरी स्त्रीके शर्वदग्य (कामदेन ) को खर्व करनेके लिये सर्व शर्वरी निद्रा न पड़नेसे निस्तेज हुए पर्व- शशिसमान मुसको स्त्रके भाचलसे ढककर मुझे समझानेके लिये माये हो क्या ? तो लो अब मैं मापसे बोलना ही छोड़े देती हूँ। 9 ala शहरविजथ-माटक ए वसंती-(दया करके) अरेरे ! रातभर हृदय में घुटने वाली वातें इस समय निद्राझी वेखवरीके कारण रानी साइबके मुरु से स्वयं ही बाहरको निकल रही हैं। सुनिचार-उसन्ती! ध्यान दिया ? देख तो इन बातों में रानी साहवली वाक्यं रचना कितनी सुन्दर है ? निरन्तर संकल विद्यानिधि महाराजका साथ होनेसे जैसे लोहा पारसका स्पर्श होनेसे सोना होजाता है तैसे ही होकर रानी साइबझी वाणी में मानों सरस्वतीका वासा ही होगया है, अच्छा देखो अच्च आहे को क्या हाल मालूम होता है। वसंजी-माज महाराज रानी साइचके मन्दिरमें सूर्योदयक समय आये थे, तस्तकका हाल तो खुलगया; देखो भागेकह क्या गुल खिले? रानी-[ निद्रामें ही ] वा चूक होगई ऐसा समझकर चरण एसडनेमें भी लाज नहीं लगती, भच्छा तो लो मैं यहाँ बैठतीभी नहीं, मेरे स्नानका समय होगया, पसंती ! मुझे स्नान करने को देर होती है, स्नानके स्थान में लेचल [ ऐसा कह उठकर चलने लगती है, मंत्री घबडाकर दूरको घटना है और रानी भी जाग कर लज्जिन होती हुई फिर नीचे बैठती है ] वसन्ती ! तू यहाँ कर भाई? वसन्ती-सरकार ! आपके सुखसे स्वाभाविकही सुंदर वाक्य पंचना प्रकट होरही थी उसी समय आई हूँ। रानी-बसन्ती ? सौतिया डाहरूप अधीका झोका मेरे क्रोध रूप समुद्रको क्षुब्ध करता है अब मैं क्या करूँ ? माज मुझसे पूजन पाठ भी तो नहीं बनसका। वसंती-सरकार ! तुम अपने कोगलं चित्तको इस दुष्ट क्रोध के पशमें न होने दो, नहीं से बड़ा कष्ट होगा, चित्त संतोष और धैर्य रखनेसे परमसुख और कार्यकी सिद्धि होती है। ,

शङ्करविजय-नाटक
१४७
Band
रानी-[चौंककर ] भला कैसे सन्तोप करूँ ? महाराजने
सुझसे कपट करके उस भसन्लोको प्रसन्न करने में सारी रात
वितादी, क्या यह थोडा अपराध किया है ? अब परमेश्वर
मुझे उनका मुख भी न दिखाये ।
वसंती-रानी साहब ! यदि क्रोध न करो तो मुझे एक
प्रार्थना
रानी-मच्छा कहो. तेरा कथन तो मुझको अमृतसे भी मिल
लगता है।
वसन्ती-प्रकार ! मेषको सब देशके चातक एक समान हैं
का २ से सवोंके मनोर. यदि वह शांति न देख तो उत्तको
जीवानन्द कीन करे?
रहनी-[विचारकर ] अन्य दासी धन्य ! तेरी इस चतुरता
को देखकर तुझको दासी कहते हुए भी मुझको लज्जा लगती
सखि ! मैंने वृथा ही उन अपने प्राण पारेको दोष लगायां !
बसन्ती-परंतु सरकार ! यह आपके श्रेष्ठ मंत्री आपसे कुछ
प्रार्थना करने को आये हैं, यदि आज्ञा हो तो यहां बुलालूँ
रानी-क्या मुविचार हैं ? वा मेरे मनमेंके दुर्विचार दूर
होनेही क्या सुविचार भागये ? वसन्ती ! पहिले तो एक आसन
लाकर यहाँ विछादे, फिर उनको बुलाला ।
वसन्ती-जो आज्ञा [इतना कह आसन लाई और बिछा कर
मन्त्रीको इशारेसे बुलाया मंत्री भी भाकर प्रणाम करके प्रासन
पर बैठंगया।
शनी-मंत्रीजी ! आप तो चिना आवश्यक कामके इधर
आते ही नहीं है और तिसपर भी आज आप कचहरीके समय
में इधर आये हैं इससे प्रतीत होता है कि आज आपको कोई
वडी भावश्यक सम्मति करनी है ? ।

१४८
शङ्करविजय-नाटक
N
सुविचार-महारानी साहब ! भाप अपनी चतुरताके कारण
म्ही, सब रणवास भरमें चतुरशिरोमणि कहलाती है। अतएव
मैं आपसे कुछ सम्मति लेने को आया हूँ ।
मदनमञ्जरी-फिर बिलम्ब क्या है ? जो कुछ कहना हो,
कहिये।
सुविचार-सरकार ! वह बात बहुत ही गुप्त है इस कारण
सबके सामने निवेदन नहीं करसता ।
मदनमजरी-(दासी शोर पुजारीसे ) तुम चाहर बैठो और
किसीको भीतर न माने देना।
दासी और पुजारी जो आज्ञा [ ऐसा कहकर बाहर जाते हैं ]
मदनमञ्जरी-वयों मन्त्रीजी ! अब तो कुछ खटकेकी बात
नहीं है ? कहिये क्या कहना है ?
सुविचार-महारानी साहच ! मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ
वह पहले तो आपको नई बात मालूम होगी परन्तु पूरा विचार
करने पर उसका तत्त्व समझमें आजायगा, परमेश्वरने जो आप
को परम चतुरता दी है इस समय उससे काम लीजिये।
मदनमञ्जरी- मन्त्रीजी ! कहिये ते सद्दी, आपने कोई उत्तम
सी. विचार किया होगा।
सुविचार-अच्छा तो सुनिये सरकार ! महाराजका फिर
जीवित होना कैसे चमत्कार की बात हुई है?और उनके स्वभावमें
भी कितना लौटफेर होगया है ! इत्यादि भद्भुत बातोंका गुप्त
रहस्य क्या है ? इस विषयमें श्रीमतीने आज तक कुछ विचार
किया है क्या ?
मदनमञ्जरी-[ हँसकर ] वाह मन्त्रीजी ! तुग वास्तव में बडे
चतुर है, क्या कहूँ जब जब मैं अकेली बैठी होती हूँ तब तब
मेरे मनमें यही विचार फिरते हैं परन्तु तत्त्व कुछ समझमें नहीं

शङ्करविजय-नाटक
११२
V
।
माता भौर तुम जो कुछ कहर हो, यह ठीक ही है वात २ में
पहिले स्वभाव और भाजकलके वर्तानको गिलाने पर पृची
भाकाशकासा अंतर प्रतीत होता है, और दूसरा प्रमाण देने
की क्या भाररयकता है भान कल महाराजने जो एक ग्रन्थ
वनागा है, पडे २ पंडित उसकी प्रशंसा करते है, उसीसे पहिली
मर भर की योग्यताका पूरा २ पता लगरहा है ।
सुविचार - नास्तबमें मापने अकाट्य प्रमाण दिया है भाज
कल जो महाराजने भमरक नाम वाला ग्रन्थ बनाना है
उसमें सकल शृङ्गार शास्त्र और अलंकार शास्त्रको कुट २ कर
भर दिया है, इस बातको आपकी राजसभाके परम प्रसिद्ध
विद्यामुकुट पण्डितनी भी करते हैं और इस पुनर्वार जीजानेसे
पहिले महाराजसे बातचीत करने में यदि कोई एक भी संस्कृत
का शब्द आजाता था तो उसके अर्थको कितनी ही देर तक
विचारते रहते थे, सो इतना ज्ञान एक साथ कैसे दोसकता है?
मदनमंजरी-[ सकुबाकर ] ऐसी बातें मैं तुमको कहाँ तक
सुनाऊँ ? मुझे तो सब ही बानों में बड़ा भारी अचरज होता है
और मेरी तो वुदि दी इस विषयमें कुछ काम नहीं देती ! परंतु
तुमने इसमें क्या तत्व समझा है वह भी तो सुनामो ?
मुविचार-रानी सारण ! मैं निश्रय कहता हूँ कि-किसी
योगीने राजयोग साधने के लिये इस राजशरीरमें प्रवेश किया है।
मदनमंजरी-(घरदाकर ) मन्त्रीजी ! यदि यह सत्य है तन
मुझको बड़ा भय होगया ! क्योंकि उस योगीने हमको भ्रष्ट
कर दिया ।
सुविचार-[ हँसकर ] छिः छिः आपको ऐसा सन्देर न
करना चाहिये, संसारके सब नाते शरीरसे हैं, जीवके सम्बन्ध
से नई है, क्योंकि-यह रिकार जीवमें हो ही नहीं सकते, इस

१० शङ्करविजय-नाटका ला कारण जिस शरीरसे भापके शरीरका स्त्री और पतिभान रूप सम्बन्ध हुआ था, वही तो शरीर है, केवल जीप बदल गया, इससे आपको कुछ दोप नहीं लग सकता। मदनमंजरी-यदि यही तत्व है तब तो चित्तको कुछ शान्ति होती है ! परन्तु मन्त्री जी ! यही महागज चिरकाल तक इस शरीरमें रहें, इसका कोई उपाय होसकता है क्या ? सुविचार-महारानी साहब ! इस बात का सब प्रबन्ध करके ही मैं भापकी सम्मति लेनेको आया हूँ, मैंने यह काम करना विचारा है कि-अभी जाकर सारी पृथ्वी पर दूतोंको भेजूंगा, वह जहाँ जहाँ कोई मृतक शरीर पायेंगे उसको भस्म काडालेंगे सब अवश्य ही कहीं न कहीं इन योगिराजका शरीर भी भस्म हो ही जायगा तब यह लाचार होकर चिरकाल तक इस राज- शरीरमें ही रहेंगे। मदनमंगरी-यह तो बहुत अच्छी युक्ति है ! अब आप जा कर इस कामको शीघ्र ही कर डालिये और दूनोंको समझा दीजिये कि-वह बहुत ही ध्यानके साथ पृथ्वी भरके मृतक शरीरोंको ढूँढ २ कर जला डानें, समझ गये न ? मुविचार-इस विषयमें सरकार कुछ चिन्ता न करें, अच्छा तो अब मैं आज्ञा चाहता हूँ। मदनमंजरी-जाइये प्रधानजी ! भापके इस उपकारको मैं जन्म भर कभी नहीं भूलूँगी [ परदेकी ओरको देखकर कौन है उधर ! वसंती-दौडती हुई आकर ) रानी साहन क्या आज्ञा है ? मदनमंजरी-सन्ती ! यह मन्त्रीजी जाते हैं, इनको हमारे रणवासके रखवाले सिपाहियों मेंसे कोई न रोके, इस कारण तू इनके साथ जाकर पहुँचा मा ।

शहरविजय-नाटक
१५१
वसन्ती-जो आज्ञा (ऐसा कह कर मन्त्रीसे ) चलिये
सुविचारजी !
(ऐसा होने पर सपिचार मन्त्री नमस्कार करके दासीके साथ जाता
है और फिर लौट कर नसन्ती दासी भाती है )
मदनमंजरी-[ दासीको माई हुई देखकर ] भरी बसन्ती !
कुछ समय पूजा और कितना ही समय मन्त्रीजीके साथ संमति
करने बीत गया परन्तु उधरसे अवसर मिलते ही फिर मेरा
चित्त महाराजके ही देखनेको चाहने लगा, क्या करूँ ?
बसन्ती-महारानी साव! आपने भाज ही तो यइ प्रण
टाना था कि मैं भव महाराजसे कभी नहीं मिलूंगी, क्या वर
सब विचार पानी पर लिखे हुए भतरोंकी समान जरा देरमें
विला गया।
मदनमंजरी-सखि ! यदि मच्छी जलका त्याग करना चाहे
तो उस प्राण त्यागनेके लिये भी तयार होना चाहिये इसी
कारण कहती हूँ कि जैसे ही तैसे अब तो उन शृंगार समुद्रके
साथ इस चएड नदीका संगम होनेसे ही शान्ति होगी।
बसन्ती-सरकार ! भाप घबड़ा नहीं, मैं अभी मन्त्रीजीको
पहुँचाने गई थी तो इसका पता लगाया था कि इस समय महा-
राज काँ हैं. तब मालूम हुआ कि-अभी भोजन करनेको बैठे
हैं, इससे मैं निश्चित करती हूँ कि-भोजनसे निपटते ही वह
ताम्बूल सानेको मापके ही रंगमहलमें मारेंगे, इसकारण आप
भी अब शीघ्र ही भोजनसे निवट लें।
गदनमंजरी- परन्तु हमारे महलकी रसोई तयार है क्या ?
इसका पत्ता तो ला।
बसन्ती मैं भव उधरको ही होकर भाई थी, सब तयारी है
भाग चलिये।
मदनमंजरी-अच्छा तो चल [ ऐमा कहकर दासीके साथ
जाती है]

२५२
शङ्करविजय-नाटक
न
चतुर्थ-दृश्य
(अमरक राजाके नगर बाहरका स्थान)
पद्मपाद, हस्तामलक, त्रोटक आदि शंकराचार्यजीके शिष्य नारायण
नारायण शब्दकी ध्वनि करते हुए प्रवेश करते हैं)
हस्तामलक-पझपादजी ! गुरु महाराजने जो एक मासकी
अवधि की थी वह तो पूरी होगई, परन्तु अभी तक आ नहीं
इस कारण कुछ शिष्यों को यहाँ गुफामें श्रीमहाराजके शरीरकी
रक्षाके लिये छोडफर, हम उनको खोजनेके लिये कितने ही
दिनोंसे फिर रहे हैं, परन्तु अभी तक कुछ भी पता नहीं लेगा,
भला भर क्या करें?
पद्मपाद-जिस समय गुरु महाराजने यह कहा था कि-'मैं
दूसरे शरीरमें प्रवेश करने में जाता हूँ मुझे ध्यान होता है कि
उस समय उन्होंने यह भी तो बात बताई थी कि मैं अमुक्के
शरीरमें जाऊँगा ? परन्तु इस समय वह नाम मुझे स्मरण
नहीं आता ? इसी कारण इतना कष्ट उठाना पड़ रहा है।
त्रोटक -भाई तुम सी बातें कर रहे हो ! कहीं अन्धकारमें
सूर्य छिप सकता है ? उत्तम कस्तूरीको वस्त्रमें वाँध कर रखनेसे
क्या उसकी गन्ध छुप सकती है ? इसी प्रकार सफल विद्याओं
के समुद्र गुरुमहाराज चाहें जहाँ हों, अद्भुत शक्तिके कारण
अवश्य ही पहिचानमें आजायेंगे, इसीलिये चिन्ता न करो, योडे
दी समगमें उनका पता लगा जाता है।
इस्तागलक-अब हम इस अमरक, राजाकी नगरीके समीप
आपहुँचे हैं, यहाँ भी तो गुप्तरूपसे ढूँढ लेना चाहिये।
पद्मपाद -यहाँ तो खूब सारधानीसे खोजने के लिये मैंने चिदा-
भासजीको नगरके भीतर भेन ही दिया है कुछ देर इस बगीचे
वैठकर उनके लौटने की वाट देखना चाहिये।
इतने ही में नारायण२ करत, चिदाभासाचार्य प्रवेश करते हैं।

शङ्करविजय-नाटक हस्तागलक-[उनको देखकर] चिदाभासजी तो यह आरहे हैं, देखें क्या कहते हैं। पद्मपाद-निदाभाससे ) कहो भाई ! काम बना या निराश ही लौटे। मैं के चिदाभोस-मित्रों ! निराशाका तो नाग भी न लो, जिनके लिये इम व्याकुल हुए फिरते हैं नह हमारे परम हितू जीवन माण यहाँ ही हैं। पद्मपाद-( बड़े उल्लाससे ) यह तुमने कैसे जाना ? बताओ तो सही। चिदाभास सब वृत्तांत कहता हूँ, मुनो, तब ही तुमको शांति होगी, तुम्हारे कहने के अनुसार मैं वेष बदलकर नगरभर सब ही गृहस्थोंके घर घूमा, तब कहीं कहीं भमरक राजाके आश्चर्य भरे चरित्र मेरे कानों में पड़े, परन्तु हमारे प्रयोजनकी वात कहीं भी सुननेमें नहीं भाई,जहाँ देखा तहाँ राजाके बोलने की प्रशंसा उसीकी चतुराई की चर्चा, उसीकी शुरताकी पाहनाह उसीकी पण्डिताईका चक्करवा और उसीकी उदारताकी बातें सुननेमें आई, तब मैंने ताडा कि-हमारे इष्टदेन हों न हों तो इसी रानाके शरीमें हैं। पद्मपाद-अच्छा फिर । चिदाभास -फिर मैं गुप्त वेशसे उस राजाके रणनासमें गया तहाँ, क्या कहूँ जो अद्भुन शोभा देखी उसका तो मुझसे वर्णन ही नहीं हो सकता, उस राजाके रणनासमें जो सैंकड़ों रानिमें हैं वह सब ही रूपसे देवांनामों को भी लज्जित करने वाली हैं, मैं उनमें से हरएकके महल में गया तो उस समय नह यही मना रही थीं कि महाराज कब आयेंगे और हमारे चित्तको संतुष्ट करेंगे तथा सवही अपनी२ दासियों को महाराजको प्रसन्न करने वाले उपभोगके.पदार्थों को तपार करनेके निमित्त कहरही थीं इन सब 20 १५ शङ्करविजय-नाटक बातोंके देखने से मुझे निश्चय होगया कि वह राजा जैसा संद का प्यारा है तैसा ही बड़ा भारी उपयोगी और कामशास्त्रमें चतुर भी होगा, परन्तु मुझको जैसा आनन्द होना चाहिये तैसा प्राप्त नहीं हुआ, क्योंकि मेरे प्याले कानोंको जो नयनामृत मिलना चाहिये था वह गिला ही नहीं। यमपाद- अच्छा फिर क्या किया ? चिदाभास-तहाँसे फिर मैं नदीके तटपर चला गया, तहाँ कोई जान कररहे थे, कोई सङ्कल्प पढरहे थे, कोई आसना बिछाकर सन्ध्या आदि नित्य क्रिया कररहे थे, कितनी ही सौ- भाग्यवती स्त्रि स्नान करके वस्त्र पहिन रहीं थीं और कितनी ही शिरों पर जल में भरे कलश धरे आपसमें अपने २ घरकी सुख दुःखकी बातें कहती हुई चली जारही थीं, परन्तु मेरी इच्छा तहाँ भी पूरी होती न दीखी तब मैं उस घाटसे ऊपरको चल दिया आगे जाकर मुझको पुरुषोंकी भीड़ कुछर कम प्रतीत हुई पौर तहाँ एक तरुण स्त्री एक युवा पुरुषके साथ कुछ बातें कररही थी, यह देख मैं उनके समीप गया और उनकी बातें मुनने लगा। पापाद-फिर क्या हुआ ? चिदाभास-सुनो वह दोनों बड़े डर २ कर बातें कर रहे थे और उनकी बातोंसे मुझको यह प्रतीत हुआ कि यह कोई राजा के अपराधी हैं, मित्रों ! अब मैं तुपको बहुत देर सन्देड में डाले रखना नहीं चाहता, मेरे कानरूपी चकोरों को उन दोनों की बाते ही चन्द्रमाकी समान आनन्ददायक हुई. पद्मपाद-( उत्कंठासे) कहो, कहो, वह बातें. शीघ्र सुनाओं? चिदामास-दाह स्त्री बोली भाड़में जाओ अब तुम्हारा अज्ञात- वास ( तुकार रहना.) मैं इस वियोगके.दुःखको कवतक सहती रहूँ ?, इसपर वह पुरुष कहने लगा कि हे प्राणप्रिये ...वियोग

शङ्करविजय-नाटक
म
का दुःख तुझे ही होता है मुझे क्या नहीं होता है ? परन्तु क्या
करूँ
महारान भमरक मुझसे प्रसन्न होगये हैं, उनको नगरीमें
मेरे मानेका सयाँ चार मिलते ही वह मुझको गाणान्त दण्ड
दिये बिना कभी भी नहीं छोड़ेंगे इस कारण प्रिये ! जैसे आज
तकके दिन विताये हैं तैसे ही कुछ थोड़ेसे दिन और भी दुःख
साले।
पनपाद-(वीचमें ही) इसपर वह स्त्री क्या बोली ?
चिदाभास - हाँ हाँ जरा धीरज रक्खो, फिर वह स्त्री करने
लंगी कि हे प्राणनाथ ! अब तुम राजाका भय कुछ न मानो,
क्योंकि वह राजा तो परलोकको सिधार गगा आज कल जो
राज्य फररहा है यह तो बड़ा साधु परमनीतिमान् गौर अत्यन्त
दयालु कोई योगी है, इसपर उस पुरुपने चकित होकर बूझा
कि हे प्रिये ! तू जाने क्या कह रही है ? मेरी तो समझमें नहीं
भाषा, क्योंकि थोड़े दिन हुए अभी जो राजा मेरे ऊपर कुद्ध
हुआ था उसीको मैंने आव देखा है, न जाने तू उसका गरण
होना कैसे कहरही है ?
पझपाद-इसपर उस स्त्रीने क्या उत्तर दिया, यह भी तो
पत्ताश्रो?
चिदाभास-तब वह स्त्री कहने लगी कि अभी तुमको भेद
नहीं मालूम है, मैं कहती हूँ; सुनो तुम्हारे ऊपर जिसका कोप
हुआ था वह राजा कुछ दिन हुए रोगी होकर मरगया, उसी
समय उसको स्मशानमें दाह कर्म करने को लेगये थे, सो स्मशान
में पहुँचते ही वह एक साथ जीठा तंव ते सबको बडा भारी
আখম
हुआ ! वह दुसराकर जीवित हुआ राजा ही आजकल
राज्य करपहा है और इसके आज कल के गुणोंसे पहिले गुणों
को गिलाने पृथ्वी आकाशकासा अंतर दीखता है, कुछ

मो
१५६
शङ्करविजय-नाटक
श
सम्बन्ध ही नहीं बैठता इस कारण यह कोई योगी, राजयोग
साधने के लिये भायां होगा, इस बात का राज्यके चतुर मंत्रियों
ने और रणवासकी सच रानियों ने निश्चय करलिया है, इस
कारण हे प्यारे ! अब तुम आनन्दके साथ घरको चलो, इस
पर वह पुरुष वडा प्रसन्न होकर उसके साथ चला गया, क्यों
मित्रों ! इससे सब तत्त्व तुम्हारी समझमें आगया या नहीं ?
मैं तो पूरे निश्चयसे कहता हूँ हमारे गुरुमहाराज यहाँ ही है ।
( उस समय सब शिष्य नारायण शध्दनी ध्वनि करते हैं
पद्मपाद-पित्रों ! अब विलम्ब न करो, गुरुमहाराजको विष.
योपभोगके कारण इस शरीरका स्मरण नहीं रहा है सो अब
मैं गवैया बनकर उस राजाके पास जा गाना गाता हूँ उस
गायनमें ही इस तत्त्वका स्मरण दिलाऊँगा तब वह स्मरणं
होते ही उस राजशरीरको त्यागकर अपने इस पहिले शरीरमें
आजायेंगे।
हस्तामला-उस सगय मापको भी पूर्ण रीतिसे सावधान
रहना चाहिये, क्योंकि यह स्मरण होते ही उस शरीरको त्याग
देंगे तब मंत्री आदि कहीं सन्देहमें पकडकर, आपकी दुर्दशा न
करडालें?
पद्मपाद-छिः छिः इसकी तुम कुछ चिंता न करो उनको
स्मरण होते ही मैं योगवलसे अंतर्धान होकर यहां तुम्हारे पास
ही आपहुँचूंगा, अब तुम सब इस गुफामें ही जाकर बैठो केवल
चिदाभासजीको ही मेरे साथ रहनेदो कोंकि यह नगरका सब
भेद जानते हैं, अच्छा तो अब तुम सब गुफाको जाओ, मैं
भी चिदाभासनीके साथ नगरीमें जाता हूँ।
(तदनन्तर सब नारायण नारायण करते हुए जाते हैं)

शङ्करविजय-नाटक
१५७.
Lat
ॐ पञ्चम-दृश्य
( मदनमञ्जरीका रंगमहल)
(वसन्ती दासीके साथ मदनमञ्जरीका प्रवेश)
मदनगञ्जरी-सखी वसन्ती ! मैं तो भोजन करके इस महलमें
आवेठी; भव महाराज इधरको आ तभी ठीक है, नहीं तो सब
घ्या है जाने महाराज अभी भोजनसे निवटे होंगे गा नहीं ?
वसन्ती-सरकार भोजन करके अभी उठे हैं, निःसन्देह अव
इधरको ही आगे, परन्तु उनके भाने पर अब तुम किस दंगका
वर्ताच करोगी?
मदनमंजरी-हाँ ! ठीक प्रश्न किया, पहिले इस बातका
निश्चय कर लेना उचित है, सखि ! यद्यपि महाराज मुझको
धोखा देकर कल रात सौतके घर गये थे; तथापि मेरे ऊपर
उनका प्रेम कम नहीं हुआ है, यह बात मैं निश्चय कह सकती
हूँ, इस कारण अब महाराजकी सवारी आने पर उनसे कोप न
करके उनको प्रसन्न करना ही उचित है
वसन्ती-आप जो कुछ कहरही हैं, बहुत ठीक है,परन्तु ऐसा
करने में कामदेवके नाटकका पूरा रंग नहीं जमेगा, आगे
आपकी जैसी इच्छा हो सो करें।
मदनमंजरी-(हँसकर ) वसन्ती ! मुझको तू चित्तके अनु-
कल ही दासी मिली है, मैं तेरा ही कहना करूँगी, परंतु तांबूल
अंगराग आदि सब उपभोगकी सामग्री तो तयार है न ?
वसन्ती-महारानी साहब !आपके बिलासभवन में क्या किसी
प्रकारकी कपी रह सकती है ? आप किसी प्रकारको चिन्ता न
करें आग और दिनसे अधिक सामान तयार कर रक्खा है।
( इतनेगें ही परदेके भीतर शब्द होता है )
आलोलामलकावली विलुलितां विभ्रञ्चलत्कुण्डलम्।
किश्चिन्मृष्टविशेषकं तनुतर स्वेदाम्भसा जालकैः ।।

१.५८ शङ्करविजय-नारक तन्व्या यत्सुस्तान्तत्तान्त नयनं प रतिव्यत्यये । तत्त्वां पातु चिराय किं हरिहरनह्मादिभिर्दैवतैः ।। पदनाजरी-सखी बसन्ती ! तूने श्लोक सुना पया ? आहा ! कैंसी मधुर वाणी है। सखि ! मन्त्र जानने वालोंके मुखसे पन्त्रका उच्चारण होते ही जैसे पिशाचका संचार होता है तैसे ही प्राणनाथके कहे हुए श्लोकको सुनते ही मेरे शरीरमें काम- देवका आदेश होकर शरीर परकी कंचुकीके सैड़ों टुकडे होगये! वसन्ती-महारानीजी ! यह क्या ! अभी तो दर्शन भी नहीं ৪ है तिस पर यह दशा ! भलो उस कामदेवकी समान सुंदर सूर्तिके नेत्रोंके सामने आने पर तुम मेरी सम्मतिसे क्या काम ले सकोगी १ वह देखरे महाराज समीप ही श्रागये, यह सरकार को मन्दिरमें पहुँचाकर सब सेवक भी पीछेको लौट गये, पर मैं कहूँ तैसा करिये, इस पलँग पर, हथेली पर गालको रख कर नीचेको देखती हुई चुप बैठ जाओ, महाराज चाहे जितने उपाय करें ऊपरको मत देखियो और मैं भी तुम्हारे पीछे चुत्त सी सुस्त खडी रहूँगी और जब मैं इशारा करूँ उसी समय सर- कारको कहना मान लेना तो बड़ा आनन्द होगा। मदनमंजरी-बहुत अच्छा, जैसा तूने कहा ऐसा ही करूंगी (ऐसा कहकर दासीके कहने के अनुसार बैठती है और दासी पीछेकी ओर खड़ी होती है ) ( इतने हीमें अमरक राजा पाते हैं) राना-( उसो श्लोकको फिर पढ़ कर ) भगवन् कामदेव ! सृष्टि पालन और प्रलर करने वाले ब्रह्मा-विष्णु-महेश भी तुम्हारी आज्ञाका उल्लंघन नहीं कर सकते, फिर अन्य संसारी जीलों का तेरे कहना ही क्या है ? हे गकरध्वज ! रतिमें मद मस्त हुई स्त्रीके सकल शरीरमें जब तुम्हारा निकास होता है उस

नवरविजय-नाटक
१५९
समय तिस कामिनी मुखके माहात्म्पका क्या वर्णन करूं ।
निर्लज्जताके साथ क्रीड़ा करनेको तयार दोनेके कारण सब
केश खुलकर बिखर जाते हैं, सब इच्छा पूरी होनेफी माशासे
भागन्दपूर्वक गरदनको हिलाते कानों के मोची और गहने
कपोलों पर झूलने लगते पतिके शरीरको द्धमें जलके
मिलनेकी सपान आलिंगन करनेके कारण आये हुए पसीने की
बूंदोंसे लन्नाट परका केसरका तिलक कुछ पुछसा जाता है,सुरत
सुखका पूरा २ भानन्द पानेके लिये उधर ही को रित्त लड़-
लीन दोजाने पर विशालनेत्र कुछ एक मुंद जाते है, ऐसे लक्षण
नाला स्त्रीका मुल, वह कार्य कर सकता है कि-जिस कार्ययो
चाहे एक बार ब्रह्मा और शिव विष्णु भी न कर सकें, इस
कारण सुख चारने वाले पुरुषों को उस मुखकी ही उपासना
फरनी शरिये।
मदनमंजरी-सरली बसन्ती ! चन्द्रमाका उदय होने पर कुमु.
दिनी न खिले, इसके लिये कोई कितना ही यत्न करो वह
व्यर्थ ही होगा, यही दशा मेरी औरही है, इस कारण जैसे
चन्दनके रसको नइ गालतीकी नेल लिपट जाती है तैसे ही मैं
महाराजको कौलिया भर कर लिपट जाऊँ क्या ?
बसन्ती-सरकार ! भभी थपिये, ऐसी अधीर होनेसे ना
बनाया सब काम बिगड जायगा, ऐसे धीरपनेका ढोंग बनाने
पर अधीरताका लड़कपन शोभा नहीं देता है।
राना-(दो पग बढ़कर ) रानीके सन्मुख हो) ओह।। यह
क्या चमत्कार है ? ( फिर अपने आप ही भटकल लगाकर
या क्या सोलह कला पूर्ण शरद ऋतुका चन्द्रमा है ? अथवा
मोकाशं गंगाका अत्यन्त दमकता हुमा सुवर्णका कमल है ?
अथवा स्वच्छ पिल्खौरकी थाली है ? (विचार कर ) छिछि

१६० शङ्कविजय-नाटक Vino यर तो मेरी प्राणप्यारीका सुन्दर मुख गा । अरे ! यह क्या दोनों बड़े २ नील कमल हैं ? अथवा स्वच्छन्द तैरने वाली दो मच्छिमें हैं ? या कामी कुरंगको विद्वत करनेवाले कामदेवके वाण हैं ? ( विचार कर ) नहीं नहीं या तो मेरी हँसमुख प्यारीके नेत्र होंगे ( जरा एक नीचेको देखकर ) भरे ! यह दो चकवे हैं क्या ? या मालतीके फूलोंके गुच्छे * ? अथवा सोनेके फलश हैं ? [विचार कर] यह मुझको कैसो सन्देह दोरहा है? यह । मेरी पिकचयनीके कुच होंगे [फिर उत्सेक्षा करके भरे। यह क्या आँखोंको चौंधाने बाली विज्जुछटा है ? अथवा भाकाशसे गिरा हुआ तारा है ? या सुवर्णकी वेल है ? [विचार कर ] अरे रे ! देखो मुझको वडा भारी धोखा हुघा, यह तो मेरी मृगनयनी मदनमंजरी है। ऐमा कहकर आलिंगन करनेके लिये उसकी शय्या पर जाकर बैठते हैं उसी समय मदनमंजरी चट्ट उठ कर दूर जाकर खड़ी होती है ] मदनमञ्जरी-[ दासीकी मोरको मुख करके ] क्यों दासी। भूल तो बड़े २ पण्डितोंकी बातों में भी स्वाभाविक होती ही है, कपोंकि-देख महाराजने सत्र वर्णन बहुत ही ठीक किया परन्तु अन्तमें "पटरानी शृङ्गारचन्द्रिका" इनना भूलकर अभागिनी मदनमञ्जरीका नाम कह गये, भरी ! इस वर्णनके योग्य तो यह वुदिया ही है! राजा-[ मन ] आज मेरे साथ यह उलटा व्यवहार भोर टेढ़ी २ वाते क्यों हैं ? अच्छा समझ गया, कल जो मैं भयंकर संकटमें पड़ गया था यह उसीका फल है !, रहो, सब स्त्रियों में इसका मेरे ऊार बड़ा प्रेम है, इस कारण यह कोप बहुत देर नहीं र सकता, योडी सी मनमें चुभती हुई बातें करने ही से कामह वन नायगा [प्रकाश रूपसे प्यारी चन्द्रबदनी मदन .

शङ्करविजय-नाटक
6a
मजरी ! कल रात मैंने तुझको निःसन्देह वडा ही दुख दिया,
परन्तु उसके लिये तुझ चतुराको मेरे ऊपर दोष न लगाना
चाहिये, क्योंकि-कल मुझको तेरे आलिंगनके न मिलने में जो
कारण हुआ था वह वसन्तीने तुझको सुनाया ही होगा!
पदनमजरी-[वसन्तीकी मोरको देखकर ] सखि ! अक
तुझको ही उत्तर देना चाहिये।
वसन्ती-सरकार ! फलकी दशा क्या कहूँ ? समय अच्छा
था और मैंने अपने आप ही जैसे तैसे तहाँका समाचार लाकर
सुना दिया था, इसपर महारानी सावका क्रोभ कुछ शांत हो
गपा, नहीं तो बडी ही कठिनता पडती ।
राजा-(पलंगपरसे उठ मदनमंजरीका हाथ पकडकर ) जो
हुमा सो तो होही गया, फिर अब कोपमें क्यों है ? जब ठीक
ठीक वृत्तान्त तुमको मालूम होगया तो मैं निर्दोप हूँ, इस बात
को तुमको निश्चय हो ही गया होगा, अब पलँगपर चलो, बहुत
देरतक खड़ी रहकर इन कोमल चरणोंको क्यों कष्ट देरही हो?
(इतना कह रानोको वलात्कारसे लाकर पलंगपर अपने पास बैठाते हैं)
वसन्ती-भव मेरे नेत्र संतुष्ट हुए।
मदनमंजरी-(कुषितसी होकर वसंतीसे) ऐसी वरुवक
मुझको अच्छी नहीं लगती, जा द्वार बन्द करके बाहर बैठ
वसंती-जो प्राज्ञों, मेरा वोलना ही मुझे निकलना देने में
अच्छा कारण हुआ (ऐसा कहकर हँसतीहुई बाहरको जाती है।
राजा-प्रिये ! इस समय तो बडी चतुगईसे दासीको टाल
कर एकांत करलिया, इससे मुझको वडी प्रसन्नता हुई, परन्तु
अब भी गनमेंके सब कोपको दूर करके शृगारशास्त्र में कोहुए
माठ प्रकारके आलिंगनों में से अपने को परम प्रिय लगने वाला
तिलतण्डुल नागक आलिंगन प्रसन्नचित्तं होकर क्यों नहीं
देती है ?
91

१६२
शङ्करविजय-माटक
5no
मदनमंजरी-जैसे तैसे अपना काम निकाल लेना तो पुरुषों
का स्वभाव ही होता है, इस बात को मैं भली प्रकार जानती हूँ
और अधिक प्रेमको परिणाम भी दुःख ही होता है, कल रात
इस बात का पूरा २ अनुभव होगया है, इस कारण मैं प्रसन्नता
से करती हूँ कि आप आजसे प्रानन्दपूर्वक कलकी समान
वर्ताप करें, इसमें मैं तिलभर भी चुरा नही मानूंगी।
राजा-प्यारी कोलिलाएठी ! पुरुप कितना ही विषयी हो
परन्तु उसका सच्चा प्रेम सर्वत्र नहीं होता है और जिस एकाश
स्थानपर होता है, तहाँ एफ साय इस प्रकारका उलटा भाग
दीखते ही उसके जीवनतककी कुछ माशा नहीं रहती है, सो
हे विलासिनी ! इस अपरफके अन्ताकरणकी अभी तूने पूरी
परीक्षा नहीं की है, इसकारण ही तेरे मुखसे ऐसे कठोर अक्षर
निकल रहे हैं, पिये ! तुझसे सत्य कहता हूँ कि यदि तूने ऐसा
बर्ताव करनेका पक्का निश्चय करलिया हो तो अब मेरे जीवन
की आशा छोड़देना।
मदनमंजरी-( अति व्याकुलसी होकर ) ऐसे निठुर चना
न उचारिये जरा सत्य २. तो वतामो फल रात जो मापनो.
मुझको कष्ट दिया ऐसा मैंने क्या अपराध किया था।
राजा-पिये ! मैं सत्य २ कहता हूँ स्त्रियों की पशिनी
चित्रिणी, शंखिनी, और। एस्तिनी यह चार जातियें हैं उनमें
सबसे श्रेष्ठ जो पद्मिनी जाति तिस जाति की तू है; इस बातका
मैंने निश्चय करलिया है और पद्मिनी जातिकी स्त्रीको रातमें
कभी कामशान्तिकी इच्छा होतीही नहीं है, क्योंकि कमल केवल
सूर्योदय से सूर्यास्त के समय तक ही खिला रहता है, इस कारण
मैं रात्रिका समग तहाँ किताकर तुझको प्रसन्न करने के लिये
अब इधरको भागा हूँ आगा समझमें ?

शङ्कर विजय-नाटक १६३ मदनमञ्जरी-(गालों ही गालोंमें कुछ हँसकर) वाह ! यह तो मापने समयकी गढ़ी, यह ज्ञान आपको कलसेही हुआ होगा! याके अनुग्रहसे कामशास्त्रका कुछ थोडासा ज्ञान मुझको भी होगया है क्या इसका यथोचित उत्तर हूँ ! राजा-[ सकुचाकर ] दे दे, इन कानरूपी पिलासे चातको पर तेरे वचनरूप मेव बड़े ही पिये लगते हैं, मदनगजरी-माणनाथ ! कमलको सूर्यका दर्शन चाहें जिस समय हो वह उसी समय खिल उठता है उस्स में रात और दिन क्या, तैसे ही मेरे लिये आप सूर्यरूप हैं इस कारण आप जिस जिस समय इस दासीके समीप आवेंगे तब २ ही मेरा हृदय- रूपी कमल खिले विना कदापि नहीं रहेगा । राजा-धन्य प्रिये धन्य ! वात्स्यायन ऋषिने कामशास्त्र पनाया है परन्तु तेरी कलाना उनसे भी.मागे चढगई इस कारण पास्तव में तेरा मदनमंजरी यह नाम योग्य ही है। (ऐसा कहकर उसकी ठोड़ीको हाथ लगाकर अपना मुख आगेको करते हैं मदनपंजरी-[राजाका हाथ एक अोरको करके महाराज ! बलात्कारसे अपना प्रयोजन साधने में क्या मट. मिलता है ? जरा धीरज रखिये। राजा-प्रिये ! क्या कहूँ ! सुख तो इसमें ही है देख- सन्दष्टाघरपन्लवा सचकितं हस्तानमाधुन्वती ।। बा मा. मुश्च शठेनि कोपवचनैरानतितभ्रखता ।। सीत्काराचिनलोचना सपुलका यश्चुम्बिता मानिनी ।। प्राप्तं तैरमृतं श्रमाय मथितो मूहः सुरैः सागरः ।। पिये ! चुम्बनके समय अधरपल्लरको दलानेपर चकित हो कर हायको झटकने वाली, 'अरे भो शठ मुझको छोड छोड' इस प्रहार कोप युक्त वचनों का कहती हुई गोएं टेढी करने १६४ शङ्कारविजय-नाटक शु बाली कुंछ एक नेत्र मूंदकर सिसकी भरने वाली स्त्रीको रोमा. चित्त हुए जिन पुरुषोंने चुम्बन किया है उनको ही सच्चा अमृत मिला है विचारे देवताभोंने तो समुद्र पथकर केवल परिश्रम ही किया उनको सच्चा अमृत नहीं मिला ! मदनमंजरी-प्राणनाथ ! ऐसे चातुरीके समुद्र पुरुषपर कौन सी नीच स्त्री अप्रसन्न रहेगी ? महाराज मैंने अबतक जो आप के साथ अनुचित वर्ताव किया इसको नपा करिये [ऐसा कह कर राजाको आलिंगन देती है ] । ( इतने हीमें परदेके भीतरसे शब्द होता है कि यदि महाराज महल में हा तो जाकर निवेदन कर सुविचार मंत्री मिलनेके लिये आये हैं) राजा-प्रिये ! प्रतीत होता है कि परम चतुर सुविचार मंत्री यहाँ भाने वाला है इसलिये जरा सावधानीके साथ बैठ । मदनमंजरी-[शिरका वस्त्र सम्हाल कर ] ॐ: मंत्रीको भी यही समय बँटा था ! ऐसा कहकर दूरको वैठती है ] । (तदनन्तर वसन्ती आती है ) वसन्ती-[ राजासे ] महाराज ! मंत्रीजी आपसे मिलनेको आये हैं, यदि माज्ञा हो तो उनको यहाँ लिचा लाऊँ ?। राजा-शीघ्र ही लिवाकर ला। बसन्ती-जो आज्ञा (ऐसा कहकर परदेके भीतर जाती और मंत्रीको साथ लाकर उनसे कहती है ) यंत्रीजी इधरको भाइये महाराज वह रानी साहबके साथ बैठे हैं ! मंत्री-[ पार जाकर ] महाराज और महारानीका जयजय- फार हो [ इतना कह नमस्कार करके खड़े रहते हैं ] राजा-मंत्री ! मेरे इधर चले मानेसे फिसी राजकाममें गड- बड़ी पडगई क्या ? मंत्री-सरकार ! आपने ऐसा हँग ही नहीं रक्खा जो राज काजमें गड़बड़ी पड़े, सब काम योग्य अधिकारियों को सौंपकर

शङ्करविजय-नाटक.
& गुरू
फिर भी उनके ऊपर आग सूक्षा दृष्टि रखते हैं, इसी कारण
दरचारमें दुःख सुनाने के लिये किसी को नहीं माना पडता है!
मैं इस समय यह निवेदन करनेको आया हूँ कि किसी दूर देश
से एक गई या भाया है और उसकी बातों से प्रतीत होता है
हि अपने काममें वह कमालको पहुँना हुआ है । ऐसे पुरुषों के
आते ही श्रीमान्को सूचना होनी चाहिये, आपकी यह कठोर
आज्ञा है, इस कारण ही मैंने इस समय सरकारको कष्ट दिया
है, इसको क्षमा करिये।
राजा-(प्रसन्न होकर ) कौन, गवैया आया है ? अच्छा
उसको बड़े दिवानखानेमें लेकर चलो और अपने यहाँ के सब
गयों को भी आने की आज्ञा दो, मैं भी कुछ देरमें तहाँ ही
आता हूँ।
मन्त्री-आज्ञानुसार सब तयारी करनेको जाता हूँ (ऐसा
कहकर प्रणाम करता हुआ जाता है । )
राजा-वसन्ती ! रानियोंके महलोंमें खबर करा दो कि-
आज बडे दिवानखानेमें उत्तग गयोंका गाना होगा, इसलिये
सब रानियें भी तहाँ पधारें, यह मेरी प्राज्ञा है।
वसन्ती-जो आज्ञा ( ऐसा कहकर जाती है)
राजो-पिये! तुमको गायन बडा प्रिय है, इस कारण ही
इतना ठाठ किया है, कहो क्या मर्जी है ?
मदनमञ्जरी-मेरी इच्छा कभी आपके विरुद्ध होसकती है
ले। मैं अभी चलनेको तयार हूँ।
राजा-चलो तो बड़े दिवानखानेमें चलें (ऐसा कहकर दोनों
चलने लगते हैं)
मदनमञ्जरी-[अपशकुन सा हुभा दख कर ] चलनेको
तयार होते ही मेरी दाहिनी आँख फड़कने लगी, न जाने इस
समय ऐसे अपशकुन क्यों होते हैं ?

DO - शङ्करविजय-नाटक ग राजा-इसकी कुछ चिन्ता न करो, तुम कल रात भर जगी हेर इसकारण नेत्रमें ऐसा विकार होगया होगा, तथापि कुछ शांति करनेसे हि उपाध्यायजीसे कहला भेजेंगे, चलो। ऐसा कह कर दोनों जाते हैं * छठा-दृश्य [शंकराचार्यजी के शरीर बाली गुफा] (तदनन्तर शंकराचार्यजी के शरीर को लेकर हस्तामलंक आदि शिष्य नारायण नारायण करते आते हैं) हस्तामलक-अनी त्रोटकाचार्यजी ! हम पद्मपाद और चिदा- भासजीको अमरक रानाकी नगरी में छोड कर यहाँ आये. थे, सो उनको कई दिन हेरगये, अभी तक उघरका कुछ समाचार हो नहीं मिला, इसकारण मुझको बडी चिन्ता होरही है। त्रोटक-भब तुम अधिक चिन्ता न करो, चिदाभासने जो कुछ काम नगरीके बाहर किया वह मैंने सुना है, प्रतीत होवा है अब यह गुरु महाराजको लेकर ही यहाँ मागे । ( इतने ही में परदेके भीतर नारायण शन्दकी ध्वनि होती है) इस्तामलक-(भानन्दित होकर ) यह शब्द तो चिदाभास जी केसा प्रतीत होता है। [तदनन्तर नारायण नारायण करते हुए चिदाभासजी प्रवेश करते हैं । चिदाभास-[घबडाए हुएसे ] क्या अभी तक पद्मपाद यहाँ नहीं पाये? नोटफ-भाई ! तुम और वह तो एक साथ ही थे,फिर अलग अलग कैसे होगये ? हमको तो यह बड़ी भारी चिन्ता होगई, भला वनाभो तो सही हमसे विदा होकर तुम दोनोंने क्या २ किया? चिदाभास-सुनो भाई ! जब तुम इधरको चले आये तो मैं और पद्मपाद दोनों गये बनकर उस राजाके मन्त्रीसे जाकर

शारविजय-नाटक
२६०
मिले, पद्माद गुरु गोये बने और मैं उनका शिष्प बन गया था
मन्त्रीसे भेंट होने पर अपने गुरु गौयेकी खूब प्रशंसाकी और
बातों में यह वान दिखाई कि-हमारे गुरुजीको धनकी कुछ इच्छा
नहीं है,हाँ यह गाना उसीके सामने गाते हैं कि-जो इनके गुणों
को भली प्रकार समझ सके, हम यहाँके राजाका बड़ा गुगु-
ग्राहक और गायनके मर्म को सामने वाला सुनकर आये हैं,
इस कारण हमारे आनेका समाचार महाराजके पास पहुँचा
दीजिये?
हस्तामलक-अच्छा फिर क्या हुमा ?
विदाभास-फिर वह परमचतुर मन्त्री हमारा पूर्ण सन्मान
करके और हमको एक उत्तम स्थानमें ठहराकर हमारे भारामके
लिये एक सेवाको छोड गया और महारामको खबर पहुँचाने
के लिये भाप ही चला गया।
हस्तामलक-अच्छा फिर ?
चिदाभास-उस सेवकने हमारे भोजन आदिका उत्तम प्रबंध
कर दिया, फिर मैं और मेरे गये गुरु भोजन करनेको वैठे,
इतने ही में मन्त्री भी झपटा हुआ आया और कहने लगा
महाराज भव ही. तुम्हारा गाना सुनना चाहते हैं सो मेरे साथ
चलिये, उसी समय हम तगार होगये और मैंने कन्धे पर बीणा
रखली तथा मन्त्रीके साथ उस राजाके रणपासमेंको होकर बडे
दिवानखानेमें जापहुँचे भौर नैठकर अपना सान सम्हालने लगे
हस्तामलुक-[ बडे उत्कंठित होकर ] फिर क्या हुआ ?
चिदाभास-मित्रों ! उस स्थानकी शोभाको देखकर मेरे तो
नेत्र चौंधा गये, वह सारा महल सोनेका था और उस पर गी
हीरा, पन्ना मोती भादि नौरत्नोंके जडारका बारीक काम हो
रहा था, उस अठपैलू बने हुए दिवानखानेमें रत्नजडी, सेंकडों
सोनेकी कुरसिये घेरा देकर बिछाई. हुई थी और उनके बीच

१६८ शङ्करविजय-नाटक में सबसे ऊँचा एक राजसिंहासग लगा हुआ था, मन्त्रीने हम को उसीके सामने जाकर बीठाला था कि-इत्तने ही में और भी सैंकडों गये आगये, उनमें से कोई सारंगी, कोई सितार, कोई वीन और कोई जलतरंग, इस प्रकार अनेकों बाजे निकालकर सबका एक स्वर मिला लिया और इमसे भी हमारी वीणा उन ही चाजों के साथ मिला लेने को कहा। हस्तामलक-अच्छा फिर क्या हुमा ? चिदाभास-तब मेरी तो पोल खुलने लगी, क्योंकि-वीणा को कन्धे पर धर लेनेके सिवाय यहाँ तो और कुछ माता ही नहीं था और मैं यह भी समझ रहा था कि मेरे गुरु भी कुछ अधिक नहीं जानते हैं परन्तु मेरे गवैये गुरूने वडी गम्भीरताके साथ मुझसे वीणा लेकर कुछ खुंटिये ऐंठीं और कुछ एक बंधन ऊपर नीचेको सरकाये, दात यह है सरसरी रीति पर वीणाको मिला दिया, इतने ही में एक साथ दीवानखाने के सामने का द्वार खुला। हस्तामलक-[वडी उत्कंठासे ] अच्छा तो फिर क्या हुआ ? चिदाभास-उस द्वारमेको, रत्नजटिल गहनों से लदी हुई और एकसी साड़िये पहिने हुए एक साल तरुणी दासियें आकर जो सौ आसन बिछरहे थे उनके चारों ओर खडी होगई। हस्तामलक-फिर क्या हुआ ? निदाभास-उसके अनन्तर, जैसे वसन्त ऋतुर्मे सपस्त हथ- नियोंके साथ गजराज आकर सरोबरमें प्रवेश करता है तिसी प्रकार वह राजा अपनी सौ रानियोंके साथ आया और सबसे ऊँचे सिंहासन पर बैठ गगा फिर वह सब रानिये भी चारों ओर जो सौ आसन लगे हुए थे उन पर. ऋमसे बैठ गई, इतने में ही जो पैरों तक जरीका चोगा.पहर रहा था और जिसके .

शङ्करविजय-नाटक 6फ गरू हायमें सेोनेकी छडी थी ऐसे बूढ़े चोचदारने. आकर हमारे गुरु जीसे गान प्रारम्भ करने को कहा। इस्तामलक -अच्छा फिर ? चिदाभास-उस समय मैं तो घबडा गया, क्योंकि मुझे यह. निश्चय नहीं था कि-मेरे गुरु गानेमें चतुर है, और मैं तो यह भाँपने लगा कि यहाँसे भागते समय किस द्वारसे सुभीता रहेगा परन्तु पद्मपादजीने जो वीणा लेकर गानका आरम्भ किया तो. एक वडा ही उत्तम पद गाया, भौंरेको लक्ष्य करके उस पदका यह अर्थ था कि तुम कौन हो ? तुम्हारा कर्तव्य क्या है ? तुम. जिनको आशा देकर इधर आये थे वह तुम्हारे वियोगसे व्या- कुल होकर प्राण देनेको उद्यत हो रहे हैं । पद्मपादजीज्ञा यह पद समाप्त होते राजाको स्मरण आगया और उसी समय नेन घुमा. कर उस बड़े भारी सिंहासनपरसे वह राजा साहब नीचे गिरपड़े। हस्तागलक-(आनन्दित होकर ) बाइ ! वाह ! अच्छा फिर क्या हुआ? चिदाभास-उस समय सारे दिवानखानेमें हाहाकार मचाया सब रानियें राजाके प्राण हीन शरीरको लिपट २ कर विलाप करने लगीं यह काम गयेशा है, देखते क्या हो, उसको पकड़ो इतना शब्द कानमें पड़नेही, अब यहाँ रहे तो बड़ी बढ़िया विदा यगी मिलेगी इस भयसे गये गुरुको इशारा करके मैं तो योग- शक्तिसे सूक्ष्मरूप धार अभी तुम्हारे पास आया हूँ परन्तु अभी तक पद्मपादजी न जाने क्यों नहीं पाये ? हस्तामलक-(घबड़ाफर ) कहीं पद्मगादजी उन लोगोंके कोप देवनाकी भेट तो नहीं होगये ? हा ! अब गुरुनी अपने पूर्व शरीरमें आवेंगे और जिसने इतना साहस करके अपनेको पूर्ण का स्मरण करागा, वह विचारा पपने प्राणोंसे भी गया ऐसा देखें सुनेंगे तो उनको बड़ा कष्ट होगा ! अब हम कैसी करें ? 22

शङ्करविजय-नाटक
चिदाभास-इतने न घबड़ामो, मायः वह अब पाते ही होंगे
जब उनके ऊपर गुरु महाराजकी कृपा है तो किसकी शक्ति है ते
उनका बाल बाँजा भी भरसके ?
इतने हीमें परदेके भीतर बड़े जोरसे नारायण शब्दकी ध्वनि होती
है तब सब ही आनन्दित होमर नारायण शब्द की गुंजार
करते हैं इसके अनन्तर पद्मपादजी भाते हैं ।
पद्मपाद-मित्रों ! उधरक्षा सत्र हत्तान्त तो तुमने चिदाभासा-
चार्यजीसे सुन ही लिया होगा ?
हस्तामलक-हाँ हाँ ! सुन लिया परन्तु आपके मानेमें जो
विलम्ब हुआ, इसकी हमको बड़ी चिंता होरही थी।
पद्मपाद-अव कोलाहल न करो, शुरु महाराजकी सवारी
अपने पूर्व शरीरमें आने वाली है।
सब लोग श्री शंकराचार्यजी के शरीर की ओर को दृष्टि लगाते हैं इतने
ही में धीरे धीरे प्राण-संचार होकर श्रीशङ्कराचार्यजी उठ कर
बैठे होते हैं उसी समय सव शिष्य नारायण २
शब्दकी ध्वनिसे गुफाको गुंजारते हैं।
शंकराचार्य-(बड़े प्रमानन्द के साथ ) शिष्यों ! विषयों का
मोह बडा कठिन है जिसने मुझको भी भुलाके डाल दिया,
इस कारण तुमको बड़ा कष्ट हुआ होगा ! अस्तु; अब देर न
करो मण्डनमिश्र हमारी वाट देख रहे होंगे इसलिये उधर चलें
और सरस्वतीको उत्तर देकर मण्डनमिश्रको संन्यासी करें बस
काम चनजायगा, चले तो सब ! (ऐसा कहकर नारायण नारा.
यण कहते हुए सर जाते हैं ) ।
सप्तम दृश्य
[माहिष्मती नगरी में मंडनमिश्रका घर ]
(तदनंतर मण्डनमिश्र और सरस्वतीका आगमन )
सरस्वती-( हाथ जोड़कर ) महाराज ! जिस दिनसे आप
को.उस संन्यासीने परास्त किया है उस दिनसे श्राप.मेरे साथ

शङ्करविजय-नाटक 'God सुन पहिलेकी समान चित्तसे दांत तक नहीं करते हो और न श्राप का मन दी पहिलेकी समान भोगपिलासमें जमता है तथा अपने परमप्रिय कर्मकाण्ड में भी आपकी रुचि नहीं है, एकसाथ ऐसा पयों होगा। सण्डनमिश्र -( हँसकर ) प्रिये ! जिसको सर तत्वों का पता ला जाता है नह पुरुष सांसारिक मनुष्योंकी दृष्टिमें पागलसा दीखने लगता है, इसमें आश्चर्य नहीं है। जिन दयालु मुरुने मुझको ऐसा ज्ञान दिया हैं उनके लौटकर आने की अषधि टल. गई इस कारण मेरा ध्यान उधर ही पड़ा है। सरस्वती-( डरती हुई ) माणनाय ! क्या आपने पहिले जो संन्यास लेनेका निश्रय किया था वह अभी ज्योंका त्यों बना है? मएडनपिथ-इसमें क्या सन्देह है? प्रिये! ऐसे सदगुरुके मुख से निकले ज्ञानामृतको पीकर भी क्या मैं नाशवान् इन्द्रियों से झूठे कल्पना किये हुये संसारमेंके मिथ्यामुखों के लिये, लुभियाऊँगा? इतने ही परदेके भीतर नारायण शब्दकी ध्वनि होती है। सरस्वती-(उचककर) अरेरे ! मेरे और मेरे पति के सम्बन्ध को तोडने वाला सत्यानाशी संन्यासी आगया ! (तदनन्तर सब शिष्यों सहित श्रीशङ्कराचार्यजी आते हैं और सर- स्वती सहित मण्डनमिश्र उनको प्रणाम करते हैं) शंकराचार्य-( सरस्वतीकी भोरको मुख करके ) सरस्वती ! अब तुझको कामशास्त्रमें जो कुछ गश्न करने हों फरले । सरस्वती- फिर प्रणाम करके ] महाराज ! मैंने सब उत्तर पालिये भगवन् ! आप तो सब विद्यामोंके समुद्र हैं, इस बात को मैं जानती थी, परन्तु स्त्रियों को पतिके लिये कैसा समझना चाहिये, इतना दिखानेके लिये ही मैंने वह विवाद किया था भाएकी विद्याकी परीना करने को मैंने वह प्रश्न नहीं किया था। हे भाचार्य ! यह मेरे पति भापके अधीन हैं, आप १७२ सङ्करविजय-नाटक अब अपनी इच्छानुसार इनको संन्यास दीजिये, मैं भी अब सत्यलोसको जाती हूँ, क्योंकि 'मृत्युलोकमें जन्म लें' ऐपा शाप होनेके अनन्तर 'तेरे पतिको शास्त्रार्थ में जीत कर जब कोई संन्यासह देगा तब तू अपने पहिले रूपको पाकर इस पदपर प्रा. देगी' इस प्रकार शापमा उद्धार भी होगया था इस कारण हे जगदगुरो ! अब मुझको जानेकी आज्ञा दीजिये [ ऐसा कहकर फिर प्रणाम करती है। शंकराचार्य-( बड़े भानन्दके साथ ) सरस्वती ! मैं तुझको सत्यलेाकमें जाने के लिये आज्ञा नहीं देसकता, क्योंकि मेरे मुख्य मठ ऋष्यश्रृगपुर और द्वारकामें होंगे तहाँ तेरा पूर्ण निवास जबतक यह अद्वैतपत जगमें रहे तबतक होना चाहिये और शिष्यपरम्पराले उन पीठोंपर जो जो वैठेंगे उनको पूर्ण विद्वान् बनानेके लिये तुझको Eष्टि रखना चाहिये। सरस्वती-महाराज ! आपकी आज्ञाका उल्लंघन करने की मुझमें शक्ति नहीं है, इस कारण अब मैं ऋष्यश्रृंगपुर और द्वारकापुरीमें निवास करनेके लिये जाती हूँ आज्ञा दीजिये ? शंकराचार्य हे देवि ! जो जो मेरे शिष्य इस सत्य अद्वैत- गार्गको चलोगे वह सब बहुत सारधानी के साथ तेरी सेवा और आराधना करेंगे तथा तुझको बहुत ही सन्मान देंगे । सरस्वती-अब मैं अन्तर्धान होती हूँ [ ऐसा कहकर योग- शक्तिसे तहाँ ही अश्य होगई । यण्डनमिश्र-[शंकराचार्यजीके चरणों में मस्तक रखकर ] हे सदगुरो ! अब मुझको संन्यास देकर पवित्र कीजिये। शङ्कराचार्य-[ प्रसन्न होकर ] हाँ ठीक है। अब यही करना चाहिये [ चिदाभासनीकी ओरको फिरकर ] चिदाभास ! तुम यण्डनमिश्रको लेकर बस चलो, इनका मुण्डन मादि सब विधि करना तब तक मैं भी आता हूँ।

शङ्करविजय-नाटक १७३ -- चिदाभास-जो ज्ञा महाराजकी (ऐसा कह कर मण्डन. मिश्रके साथ जाते हैं) शंकराचार्य-( पद्मपादकी ओर को देखकर ) पद्मपाद ! एफ तो बड़ा भारी कार्य होगया, क्योंकि-सकल कर्म काण्ड के सार्व- भौम मंडनमिश्रको जीतकर शिष्य कर ही लिया अब मेरी इच्छा है कि-दिग्विजयके लिये चलें। पद्मपाद-पहाराज ! इसमें अव देर भी क्या है.? मण्डनमिश्र को शिष्य करके साथ ले चलिये वस होगया। शंकराचार्य-इतने ही से काम नहीं चलेंगा, राजा सुधन्वाकी सहायता विना पूरा दिग्विजय नहीं होसकता, क्योंकि-कोईर पुरुष ऐसे हठी होते हैं कि-परास्त होजाने पर भी अपनी ही अलापे जाते हैं, यदि राजा सुधन्वा साथ होगा तो वह लोग राजदण्डके भयसे उद्दण्डपना नहीं कर सकेंगे, इस कारण तुम राजा सुधमाके पास जाओ और उसको मेरी ओरसे सूचित्त करो कि-वह सेना सहित हमारे साथ चले, तब तक मैं यहाँ ही हूँ, जहाँ तक हो शीघ्र ही इस कार्यसे निचट कर आना । पझपाद-जो आज्ञा { ऐसा कहकर जाते हैं) शंकराचार्य-( और शिष्योंसे) चलो अद मण्डनमिश्रको संन्यास दीक्षा देनेके लिये चलें (ऐसा कहकर नारायण कहते हुए सब जाते हैं) * अष्टम दृश्य ( केरल देश-शङ्कराचार्यजीका जन्मस्थान) (आसन्नमरण शय्या पर लेटी हुई शंकराचार्यजीकी माता विशिष्टाका प्रवेश) विशिष्टा-लेटी हुई बड़ी दुःखित होकर] परमेश्वर ! दीन दयालो ! जिससे अपना शरीर तक नहीं सम्हाला जाता ऐसी मुझसी भनाथ अबलाको जीवित रखना मात्रा बड़ा अन्याग १४ शङ्करविजय-नाटक DI है, भगवन् ! सब जगत्मेंके अज्ञानरूप अन्धकारका नाश करने के लिये ज्ञानका सूर्यरूप पुत्र मैंने पाया, तिस पर भी अन्तकाल में कोई मेरे मुख में पानी डालनेवाला तक नहीं ? आहा रे पुत्र! तेरे गुणों का मैं कहाँ तक बखान करूँ ? यह मेरे ही दुर्भाग्यकी बात है जो अधिक दिनों मुझको तेरा संग न मिला, न जाने अब इस समय तू कहाँ होगा १, मेरा अन्तकाल समीप भागया केटा ! अव मेरी यही इच्छा है कि-एक वार तेरे चन्द्रमुखको देख कर प्राणों को छोड़ दूं, मुझको और दूसरी कुछ चाहना नहीं है। (इतने ही में योगमार्गसे शंकराचार्यजी प्रवेश करते हैं) शंकराचार्ग-[ माताकी शय्याके पास जाकर दुःखसे भरेरे! जिसने नौ महीने तक इस शरीरके वोझेको उदरमें रखकर तथा आगेको और भी अनेकों दुःख झेलकर इसका पालन किया था वह मेरी माता यही अकेली इस कंबल पर पड़ी है क्या ? [फिर मातासे ] मैया ! यह तेरा पुत्र संन्यासी शंकर आया है एकवार नेत्र खोलकर इसकी ओरको देख । विशिष्टा-[ नेत्र खोलकर देखती हुई ] वेटा शंकर ! कवका भाया है ? वेटा ! आनन्द तो है ? शंकराचार्य-मैया ! जिसका कभी नाश हो ही नहीं सकता उसका सदा कुशल ही है । परन्तु मातः ! तेरी यह दशा होरही है ! और तेरे पास हमारे भाई बन्धुभों से कोई भी नहीं इसका क्या कारण Bar विशिष्टा-बेटा ! जिसको पेटके पुत्रने ही छोड दिया, उसको फिर भाई बन्धुओंसेमें भी कौन बूझता है? वह केवल एक बार पूर्व पुरुषोंकी सब सम्पत्ति लेनेको. भाये थे, उसके भनन्तर हिंसीने आकर मुख भी नहीं दिखाया, कुछ बात नहीं है बेटा! जब अपने प्रारब्धमें ही दुःख भोग लिखा है तो दूसरों को उसका शङ्करविजय-नाटक १७५ TV दोष देनेसे कौन फल है। शंकराचार्य-मयां ! मैं तो सब धन सम्पत्ति उनको सौंप कर तेरी रक्षाका पूर्ण ध्यान रखनेको कह गया था, तिसपर भी तेरे साथ उन्होंने ऐसा व्यवहार किया । विशिष्टा- वेटा ! अब वह भांडमें जाय,उस बातका इस समय मैं स्मरण करना भी नहीं चाहती, परन्तु अव भन्तमें तुझसे इतना कहना है कि-वेटा ! जैसे तू सब जगत्का उद्धार करता है तैसे इस अपनी माताको भी सांसारिकचक्रसे छुटानेकी कृपा कर, बस मैंने सब कुछ पालिया। शंकराचार्य- बहुत भच्छा, मातः ! अव तू नेत्र द, तो तुम को गणों सहित विमान दीखेगा और वह गण तुझको विमान में बैठा कर लेजायँगे, अब तू अपने मनमेंसे सब वासनामोको दूर करके एक शिवजीका ध्यान कर, क्योंकि-यह तेरा अन्त- विशिष्टा-[ नेत्र मूंदती है और उसको विमान दीखना है उसी समय घबड़ा कर फिर आँखें खोलती हुई ] चेटा शंकर! उस विमानमें जाते हुए मुझको वडा भय लगता है, क्योंकि- उसमें तो सब गण पिशाच ही हैं, मुझे चैकुण्ठ पहुँचा, क्यों कि-भगवान् नारायण मुझको बड़े प्रिय लगते हैं। शंकराचार्य-[कुछ हँसकर अच्छा मातः ! फिर नेत्र {दले अब तुझको विष्ण भगवान् के गणों से युक्त विमान दीखेगा। विशिष्टा-फिर नेत्र मूंदती है और विष्णु भगवान्के यहाँका विमान दीखता है उस समय बडी आनन्दित होकर] आहाहा ! मैं धन्य हूँ ! इस विमानका क्या वर्णन करूँ? इसपर जो विष्णु भगवान्के गण हैं, वह सब चार भुजा वाले, पीताम्बर धारी हाथों में शङ्खचक्र-गदा-पद्म लिये, मस्तक पर किरीट और गले में वैजयन्ती माला पहिरे हुए हैं, तो क्या अब मैं इसी विमान पर काल है। तू १७६ १ विजय-नाटक बैठकर जाऊँगी ? वेटो शंकर ! ले मैं जाती हूँ, मेरे ऊपर पूर्ण छपा रखना. पुत्र ! तू परम विरक्त संन्यासी होते हुए भी इस अनाथ माता पर कृपा करनेको आया और मुझे वैकुण्ठलोकको भेज दिया, इसका मैं बडा उपकार मानती हूँ, अच्छा तो मैं अब चली-राम-राम-राग- [प्राण छोडती है। शंकराचार्य-[ नेत्रोंमें जल लाकर ] अरे ! मैं इतना विरक्त हूँ, दीखने वाले सब संसारके पसारेको नाशवान् समझता हूँ, इसके सिवाय मैं इतने दिनोंसे इसकी ममतारूप फांसी से भी अलग था, तब भी इस माताके पियोगसे मेरी छाती दहली जाती है, फिर संसारमें मग्न रहने वाले पुरुषोंको न जाने ऐसे अपसर पर कैसा कष्ट होता होगा?अच्छा अब मैं कुटुम्बियोंसे इस की प्रेतक्रियाके लिये कहूँ [ ऐसा कहकर परदेकी अोरको मुख करके ऊँचे स्वरसे पुकारते हुए ] रे कुटुम्बियों ! यह शिवगुरु महाराजही स्त्री परम पतिव्रता श्रीमती विशिष्टाका मरण होगयो है, अब इसकी प्रेत क्रिया करने के लिये तुम शीघ्र पाओ। (तदनन्तर परदेमेंसे शब्द आया कि-अरे दुष्ट अघम ! तूने हमारे कुल उत्पन्न हो दोनों लोकके विरुद्ध मतको स्वीकार करके इस विशुद्ध वंशको कलंक लगाया है,सकारण तुझको उत्पन्न करने वोली यह स्त्री वड़ी पापिन है इस लिये इसकी अन्तक्रिया करने के लिये हम कोई नहीं पायेगे तेरे,चित्त में श्रावे सो कर) शंकराचार्य -[सुनकर क्रोधसे अरे भाई ! यदि कोई अनाथ मरजाता है तो उसकी प्रेतक्रिया करनेका भार सबके ही ऊपर होता है और यह तो तुम्हारे गोत्रकी है फिर इसके विषयों ऐसा उत्तर क्यों ? भौर तुमको ऐसा प है तो मुझे अग्नि तो ला दो, यद्यपि मुझको अधिकार नहीं है, क्योंकि-मैं संन्यासी शहाविजय-नाटक १७७ हूँ, तथापि अगत्या में अपनी माताके मेनकी दादकिया करेगा। (फिर परदेके भीतरसे शब्द आया कि-अरे नीच! ऐसी अपवित्र स्त्रीका दाह करने लिहम अपनी अग्नि कभी नहीं देंगे, यदि तेरी इच्छा हो तो किसी शूबके यहाँसे अग्नि लाकर दाह करदे) शंकराचार्य-( सुनकर ) हर हर !! परमेश्वर !!! क्या यह भी मनुष्य हैं [फिर परदेकी ओरको मुख करके अरे! तुम्हारे ब्राह्मणपन पर बुदशा आगई है उसमें तुम क्या करोगे ? अपने आपसे ही] अब माताका मृतक शरीर ऑगनमें लाकर और घर सेके काष्ठोंकी चिता बनाकर उसपर घरेदेता हूँ पर इसकी ही दाहिनी भुजाको मथकर अग्नि उत्पन्न कर घरके भीतरही दाह करे देता हूँ [ ऐसा करकर गात्ताके शरीरको भीतर लेजाते हैं और फिर बाहर भाकर बड़े स्तरसे ] अरे वान्पनों ! अब मेरा कहना सुना भाजसे तुम्हारा स्मशान तुम्हारे घरों में ही होगा और तुम सब दसे पतित होकर शूद्रकी समान आचरण करोगे तथा तुमको संस्कृत भग्नि कभी नहीं मिलेगा, सार यह है कि-यहाँके रहने वाले तुम सब ब्राह्मण इस पातकके कारण, आजसे ब्राह्मणपनेसे हीन होजाओगे, मैं तुमको यह शाप देता [फिर अपने आपसे हरी ] अब यहां रहकर क्या करना है? अपने कार्यके लिजाऊँ [ ऐसा कहकर जाते हैं ] नवम-दृश्य (काशीपुरीकी स्मशान भूमि ] 'तदनन्तर तुण्डी नामक शिवतीका गण आता है। तुण्डी-(भपने आप ही ) मुझको पार्वती माताकी आज्ञा है कि मृत्युलोकमें जिस जिस प्रकार श्रीशंकराचार्यजीका चरित्र हो वह सब कैलासमें आकर निवेदन कर, उस भाजाको मस्तक पर घर यहाँ आकर मुझको जितना मालूम हुआ. मह तो मैंने जाकर निवेदन कर ही दिया भौर मागेका वृत्तान्त जाननेके 23 १७८ २८ शाङ्करविजय-नाटक लिये मैंने अपने मित्र भृगीको भेजा था,तथा उसका और मेरा इस काशीपुरीके मरघटमें मिलनेशा संकेत हुआ था, सो मैं तो यहाँ आगया परन्तु मेरा मित्र न जाने अभी तक क्यों नहीं आया? इतने हीमें भृगी नासक शिवजीका गण माता मुंगी-(इधर उधरको घूमते हुए तुण्डीको देखकर ) अरे.! यह मेरा परग मित्र तुंडी संकेतके अनुसार यहाँ भागया अच्छा अब इससे बात चीत करूँ, ( पास जाकर ) पित्र तुण्डी । है । नमो नमः । तुंडी-( उसको देखकर प्रसन्न होता हुआ ) नमो नमः क्यों पित्र ! श्रृंगी सब कुशल तो है ? भृङ्गी-सखे ! परमदयालु भगवान्के चरितरूपी अमृतको पीते हुए अमंगल हो ही कैसे सकता है ? क्या कहूँ मित्र ! उन सद गुरुकी लीलाको देखते हुए वो भी क्षणभरकी समान प्रतीक तुण्डी-अच्छा मित्र ! इधरका समाचार तो सुनाओ,जिससे कि अप माता पार्वतीजीके पास जाकर सुनानेमें सुभीता रहे। भृङ्गी-पहिले यह तो बताओ कि तुम पार्वतीजीको कहाँ तक का समाचार सुनाचुके हो ? तव में आगेके चरित्रके वर्णन करनेझा प्रारम्भ करू। तुण्डी-श्रीशंकराचार्यजीने चित्त में दिग्विजय करनेका निश्चय करके राजा सुधन्धाको चुलबाभेजा, यहाँ तकका तो सब समा- चार मैं माता पार्वतीजीको सुना चुका हूँ इससे आगे जो कुछ हुआ हो वही सुनाओ, तो ठीक होगा। भृङ्गी-अच्छा तो सुनो श्रीशंकराचार्यजी अपनी माताको बैकुण्ठ पठाकर, मण्डनमिश्र आदि सब शिष्यों के साथ सेना सहिन राजा सुधन्दाको संगलिये बड़े ठाठ के साथ दिग्विजय करनेको निकले और पहिले श्रीरामेश्वरको जाते हुए मार्ग में कुछ

रसिय-नाटक
मोर शाक्त पिले उनके मतकी पित्त वार्ताका खण्डन करके
रामनाथ जी पहुँचे, तहाँसे चौल विड-पांडय मादि देशों में
भसन्मतोंको परास्त करते हुए कांचीपुरीमें गये और तहॉके
सन पण्डितों का गर्व नष्ट करके चैकुण्ठाचलपर गये और तहाँ
पुरुषों को अपने वश करतेहुए कर्णाटक देशमें जापहुँचे ।
तुण्डी-फिर क्या हुआ ?
भृङ्गी-तहाँ भैरककी दीना पारने वाला एक ककच नामक
थोर कापालिक अपने साथियों के बडे भारी समूहके साथ रहता
था, पर श्रीशंकराचार्यजीके सन्मुख शाकर दुर्वचन कहने लगर
तव ते राजा सुधन्दाको पि आगया, और उसने तिस दुष्ट
को सभासे निकलता दिया, वह धूर्त इस प्रकार अपमान होते
ही अपने साथके सत्र कोरालिकोंको लाकर युद्ध करने के
उहत हमा
तुण्डी-( चकित होकर ) मोहो ! उस दुष्टने ऐसा सोहस
किया ? अच्छा तेर फिर ?
भृङ्गी-तदनन्तर सुधन्वाकी सेनाके साथ उस फापालिका
युद्ध होने पर कुछ करपालिकों ने श्रीशंकराचार्यजीके धर्ममठमें
आनन्दके साथ भोजन करके भगवद्भजनमें समयकर वित्ताने
वाले ब्राह्मणोंपर चाल खेच उनमें से अनेकोंको यमपुरी पहुँचा
दिया उस समयकी दशा क्या कहूँ ! जिधर तिधर हाहाकार
होने लगा सा ब्राह्मण नंगे उपाड़े रोते हुए श्रीशंकराचार्यके
पास पाकर जीवदान माँगने लगे।
तुण्डी-ओहो ! उन चाण्डालोंने तो चडा र अनर्थ किया
हा। भच्छा फिर?
भृङ्गी फिर उन कृपासिंधुके चित्तपर पहिले तो कृपाकी
लहर भाई और पीछे उन दुष्टोंके आनरणसे अत्यन्त दुःखित
होकार, महाराज अपने आप युद्धभूमिमें आये और एक हुंकार

६८० शङ्करविजय- Lal - मैं शब्दमें ही सब कापालिकों को भस्म कर डाला, उस समय केवल वह अकेला करूच ही वासी रहगया, तब अपनी मन्त्राशक्तिसे श्रीभैरवदेवको प्रकट करके उनसे-शङ्कराचार्यजीका नाश करने के लिये प्रार्थना की। तुण्डी-(घबड़ाकर ) फिर क्या हुआ ? महाराज उस संकट से छूटे या नहीं? भृङ्गो-मित्र ! घबडाओ मत, वह भैरवदेव श्रीशंकरायंजीकी ओरको देखकर हँसे और फिर उस दुष्ट क्रकचकी अोरको प्रलयकाल की अग्गिकी समान लपटें छोडने वाली दृष्टिसे देख कर कहा कि अरे मदान्ध ! क्या मेरेही अवतार भगवान् शंकरा- चार्यका नाश करने के लिये कहता है ? अच्छा तो अब तुम को ही यहाँ से कपूर किये देता हूँ, ऐसा कहकर उन उन भैरव- देवने जैसे मतवाला हाथी अपनी झंडसे कमलके फूलको सहज में ही तोड़ लेता है तैसे ही उस नीच कापालिके मस्तकरूप कमलको धड़से अलग कर दिया और भगवान् शंकराचार्यजीफी जप चोलते हुए वह भैरवदेव अन्तर्धान होगये। तुण्डी-[प्रसन्न होकर ] मित्र ! अव मेरे होश ठिकाने आये अच्छा फिर क्या हुआ ? मङ्गी-फिर भगवान् शंकराचार्यजी पश्चिमसे समुद्रकी ओर को फिर कर गोकर्णक्षेत्रमें आये, तहाँ पण्डित्त नीलकण्ठके साथ शास्त्रार्थ करके उनको जीतकर द्वारकापुरीको चले गये, यहां कितने ही पारखएडी नीव थे उनको अपने वश करके अवन्ती नगरीमें आपहुँचे, तहाँ पण्डित भास्कर के साथ बडा भारी शास्त्रार्थ करके उनको भी अपने चरणों में नमांजर छोड़ दिया, फिर एक अभिनव गुप्त नाग बाले बडे भारी मन्त्रशास्त्र आये उनके गर्वका भी चूग करके, उत्तर दिशामें दिग्विजय करनेको गये।

शङ्करविजय-नाटक
१८१
तुण्डी-अच्छा फिर क्या हुभा ?
भङ्गी-फिर कोशल देश, अंगदेश आदिके असत् मतोंको
जीतकर गौड देशमें आये तहा मीमांसाशास्त्र के पारगामी पण्डित
मुरारिमित्रको जीता।
तुण्डी-पित्र ! तुम धन्य हो उन परम मङ्गलमूर्ति के दिग्विजय
चरित्रको देखकर पवित्र होगये हो, अच्छा फिर क्या हुया ?
भृङ्गो-फिर शंकराचार्यजीने अपने साथियोंके सहित उत्तर
दिशामें जाकर जिन अभिनवगुपको परास्त किया था उन्होंने
अपनी मन्त्रशक्तिसे शंकराचार्यजीपर एक कृत्या [ मारणकी
विधि ] की उसके कारण महाराजके शरीरमें बडा दुःखदायक
भगन्दर नामक रोग उत्पन्न होगया।
तुणी-[घवडाकर] मित्र ! यह एक और नया संकट
आया अच्छा फिर ?
भृङ्गी-फिर यद्यपि महाराज तो यही कहते रहे कि मौषधि
मादिकी कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह शरीर भोगका
ही स्थान है, तथापि सत्र शिष्योंने भौर राजा सुधन्वाने अनेकों
वैद्यों को बुलाकर चिकित्सा करनाई, परन्तु रोगका निदान
किसीसे भी न होसका; मन्तमें पद्मपादनीने अश्विनीकुमारोंका
भावाइन करके उनो मूर्तिमान् बुलाया वह रोगकी परीक्षा
करके यह रोग इत्यासे उत्पन्न हुआ है ऐसा कर कर
भन्तर्धान होगये ।
तुण्डी-फिर क्या हुआ यह तो लता महाराजका उस रोग
से छुटकारा हुमा या नहीं ?
भही-तब तो पद्मपादजीको क्रोध भागया भौर उन्होंने अपने
मन्त्राला उम्न हत्याको शान्त किया तब महारान नीरोग हुए
और उसो कृत्याके द्वारा उस दुष्ट अभिनवगुप्तका गाणान्त होगथा
तुण्डी-(प्रसन्न होकर) रोग शान्त होने पर फिर क्या हुआ?

ছবি- - भृङ्गी फिर एक दिन महाराज गंगाजी के तट पर बैठे अपने शिष्योंका उपनिषद्ध विद्या का उपदेश देरहे थे इनने ही में उनके एरमगुरु भगरान् गौड़पादाचार्य आगये और शंकराचार्यजीके शारीरकभाष्य आदि सब ग्रन्थों को देरद कर परग प्रसन्न होते हुए चले गये फिर काश्मीरमें सरस्वतीका विद्याभद्रासन नामक पीठ है, जे. उसके ऊपर बैठ सकेगा उसीका दिग्विजय पूरा समझा जायगा, तश तहाँ बड़े २ धुरन्धर पण्डित भी हैं, इस बातको जहाँ तहाँ सुनकर भगवान शंकराचार्य भएने शिष्यों सहित काश्मीरको चले गये । तुण्डी-फिर क्या हुआ ? भुङ्गी-उस काश्मीरके दक्षिण द्वार पर भगवान् शंकराचार्य जी पालकी में बैठे हुए बड़ी धूमधामसे पहुँचे, काणाद, नैया- गिक, सौगत, दैगम्बर, कर्मकाण्डी आदि अनेकों वादियोंने आकर श्रीशंकराचार्यजीसे प्रश्न किये उस समय उन सब प्रश्नों का उचित उत्तर भगवान शंकराचार्यजीके देते ही यह सर्वप्न खर्वशक्तिमान् साताद ईश्चर ही हैं, इस चानका उन सबको निश्चय होगया और उन काश्मीर के निवासियों ने भगवान् शंकराचार्य जी का सत्यात स्वीकार कर लिया तथा बड़े उत्साह के साथ महाराजको लेजाकर विद्याभद्रासन पीठ पर बैठानेकी ठहरी, शंकराचार्यजी के सन्मान के लिये दिनमें ही मसालें जला फर शोर महारानकी पालकीको छत्र चचर श्रादिसे शोभायमान करके अनेकों बाजोंका शब्द करते हुए ले चले यहाँ तक का चरित्र देखकर में आरहा हूँ अभी महाराजकी सवारी विद्या- भद्रासन पर बैठाने के लिए बड़ी धूपसे जारही है । तुण्डी-मित्र ! तो मैं यह समाचार माता पार्वतीजीको सुनाने के लिये कैलास पर जाता हूँ और तू भी अब आगेका चरित्र देखने के लिये जा। ऐसा, कहकर दोनों जाते हैं शङ्करविजय-नाटक दशम-दृश्य काश्मीर। [तदनंतर परदे में अनेकों प्रकारके वाजे वज हैं और वैतालिक (नकीव) का शब्द होता है-श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यवर्य-पदवाक्यप्रमाण पारावारपारोण-यमनियमासन-प्राणायाम-प्रत्याहारध्यानधारणास- माध्यष्टांगयागानुष्ठाननिष्ठतपश्चक्रवर्त्यनाद्यविछिन्नगरुपरम्पराप्रा- सषड्दर्शनसंस्थापनाचार्य-व्याख्यानसिंहासनधीश्वर-सकल निगमागमसारहृदय-सांख्यत्रयप्रतिपादक-वैदिकमार्ग प्रवर्तक-सर्वतन्त्रस्वतन्त्र-नास्तिकद्वैतध्वांतकदम्ब- मानमार्तण्ड-बोधाजविभाकर-श्रीराजाधिराज- विद्याशंकराचार्य-श्रीजगद्गुरुमहाराज ] नदनन्तर पालकी में बैठे हुए श्रीशंकराचार्यजी, आगे २ विरुदावली पढ़नेवाला नकी पालकीके साथ चलनेवाले शंकराचार्यजी के सब शिष्य चतुरंगिनी सेनासहित हाथमें श्री- शंकराचार्यजीकी चरणपादुका लिये राजा सुधन्वा और नगरके सव पण्डित ते PUR नकीव-(फिर पहिले की समान श्रीमत्परमहंस इत्यादि पढना है) राजा सुपन्या-(पालकीके पास जाकर ) जगद्गुरुं महा- गज ! सरस्वतीका विद्याभद्रासन आगया, वह मन्दिर यही है, अर पालकीमेंसे उत्तरिये । [ तदनन्तर नगरके पण्डित पालकीको नीचे रखते हैं और महाराज पद्म- पादजीका हाथ पकड़ कर बाहर आते हैं, इतनेमे ही राजा सुधन्वा, चरणपादुका आगे रखता है,उनको पहर कर महाराज चलने लगते हैं उस समय अनेकों बाजे बजते हैं और नकीन फिर वही विरुदावली' पढता है ] १८३ शङ्काविजय-नाटक L- शंहाचार्य-( विद्याभद्रासन के पास जाकर ) पक्षपादनी निस पीठ प-बैठने पर ही दिग्विजय समझा जाता है यह वही विद्याभद्रासन पी- है क्या ? पद्मपाद-श्रीमहाराज ! हाँ गही है वह पीठ, अब आप इस पर विराजें। शंकराचार्य-बहुत अच्छा [ ऐसा कह कर पद्मपादनीके हाथ का अवलम्बन किये हुए ऊपरको चढते हैं, उसी समय आकाश में सरस्वतीका शब्द होता है ] हे शङ्कराचार्य जो सर्वज्ञ और परम- पवित्र होगा वही इम सिंहासन पर वैठ सकता है, अव तुमको सर्वज्ञ कह में तो कोई सन्देह नहीं है क्यों कि-ब्रहादेव के अव- तार मण्डन-मिश्र भी तुम्हारे शिष्य हो गये, परन्तु अभी तुम परम-शुचि नहीं हो, क्यों कि-तुम ने संन्यासी हो कर राजा अमरक की स्त्रियों के साथ विलास किया है, इस कारण तुम इस पर वठने के योग्य नहीं हो शंकराचार्य-[ सुनकर कोपसे ] तेरे घमण्डको मैंने एक पार छोड़ दिया, अब फिर भी तू इस समय हमारे सिंहासन पर बैठने में विघ्न डालती है; अच्छा तुझको इसका भी उत्तर देता हूँ, सुन-हे वाग्देवते ! मैं जिस शरीरसे इस सिंहासन पर बैठता हूँ, यह मेरा शरीर पवित्र ही है और जिस शरीर से मैंने अमरक राजाकी रानियों से विलास किया था वह देह तो चितामें भस्म होगया, पवित्रता और अपत्रिताका आत्माके साथ कुछ सम्बन्ध नहीं होता है केवल शरीरके शङ्करविजय-नाटक LI ही साथ होता है, देखो-जो पुरुष एक जन्ममें चापडाल जातिका होता है वही किन्हीं पुण्यों के प्रतोपसे दूसरे जन्म में ब्राह्मण होजाना है, तो क्या दह पहिले जन्ममें चाण्डाल था इसकारण उसको दूसरे ब्राह्मण के जन्ममें भी वेदा. धिकार नहीं होगा ? इसकारण मैं जिस शरीरसे इस समय इस विद्यापीठ पर चढ़ता हूँ मेरा यह शरीर परम पवित्र है फिर विघ्न क्यों किया जाता है? यदि ऐसा होने पर भी तुझे और कहना हो तो वह भी कथन कर । इसपर सरस्वती निरुतर होती है और श्री शंकराचार्यजी विद्यापीठ पर चढ़कर ठते हैं उसी समय वाजोंका धनखोर शब्द होता है और आचार्यके अपर पुष्पोंकी वर्षा होती है तथा काश्मीरके सत्र पण्डित पाकर श्री. शंकराचार्यजीका पूजन करते हैं) राना सुधन्वा-(आगे बढकर ऊपरको हाथ उठा ऊँचे स्वर से.) सब लोग मेरे कथनको सुनें हे सभासदों ! जिन देवाधि. देवने प्रथम भट्टपादजीके द्वारा जैनोंका पराजय करवाकर उन को निर्वीन करवाया पौर जिन्होंने अपनी इच्छाके वलसे इस भूमण्डलपर मण्डनमिश्र आदिके द्वारा कर्ममार्गकी प्रवृत्ति कर- बाई, फिर जिन्होंने शिगुरु पिता और माता विशिष्टाके गर्भ से जन्न धारण कर अनेकों चमत्कार किये तथा जिन्होंने मायाका नाका रचकर मातासे संन्यास धारण करने की आज्ञा ली, तद- नन्तर जिन्होंने श्रीगोविन्द पूज्यपादा चार्यसे संन्यास लेकर काशीपुरीमें साक्षात् विश्वनाथ भगवान् से. दर्शन भाषण किया इसी प्रकार जिन्होंने मेण्डनमिश्रसे अगाध शास्त्रार्थ करके सर- स्वतीको जीतने के लिये राजा अमरककी कागो में प्रवेश किया और फिर जिन्होंने सब दिशाओं के पंडितोंको जीत कर अपने मशमै कर लिया वही यह भगवान् कैलासपति इस समय इस 24 १८६ शङ्करविजय-नाटक बैठे विद्यामदान पर हुर तारागों के मध्य में शारद् ऋतु के पूर्णचंद्रमाको समान शोभायमान हैं ( ऐसा कहकर सिंहासन के सामने साांग प्रणाम करता है) शंकराचार्य-( ऊँचे स्वरसे नाराबण शब्दका उच्चारण करके) शिष्योंािन मेरे इस अवतारको सब कार्य समाप्त होगया अब तुम्ठ सबको सीमाज्ञा है कि चारों दिशात्रों में मेरे जो चार गट होंग उनमें रुपले हुए तुम शिष्य पशिष्यों के द्वारा मेरे इस अद्वैतमार्ग को फैलाफर सच अधिकारियों में दिकमार्गमा प्रचार करो और जो दुराचारमें प्रकृत्त हो उनको दण्ड देकर सन्मार्गका प्रचार करने वालों पर अनुग्रह करो और यद्यपि संन्यासियोंको राजसी ऐश्वर्य निपिद्ध है तथापि सोपर प्रताप बैठाने के लिये तुम राजाको की समान ठाठं रखो परन्तु उल राजसी ठाठसे मानन्द मान्न कर केवल पात्मानन्द में ही निमग्न रहते हुए जगतका उद्धार करो अन्न मेरी आयु भी थोड़ी ही शेष्ठ रही है इस कारण अब में हिमाल गएर जाकर तहाँ से आपने कैलासागको चला जाना लाहना हूँ (सुधन्वा समीप कुन्तामर ) तुमने मेरे इस कार्यमें सहायता की है इस कारण तुम्हारा भी उद्धार होगया भव मेरी आज्ञाके अनुसार तुगको इन होरे शिष्यों की भी सहायता करनी चाहिये। रांजन सुधन्वा-(फिर नमस्कार करके ) महाराज! आपने कृपा करके मेरी सेवाको स्वीकार किया, इसको मैं क्या कर सकता था जो जुन्छ कार्य मेरे द्वारा हु वह सब आपकी ही शक्ति से हुआ, मन में श्रीमान्की आज्ञानुपार चारों दिशाओं में मठ स्थापित करवाकर अद्वैन सम्प्रदायके व्याहत चलने उद्योग करता रहूँगा। शङ्कराचार्य अच्छा, सरकाप ते ठीक हो ही गया व तुम "64 शङ्करविजय-नाटक, १४ सब अपना २ कार्य सिद्ध करनेके लिये जानो भौर आजसे इस मेरे ऐश्वर्य को पनपादाचार्य भोगें ( ऐसा होने पर सब लोग प्रणाम करके जाते हैं और तदनन्तर शंकराचार्यजी भी हिमालयको जाते हैं। एकादश-दृश्य (हिमालय) तदनन्तर नारायण नारायण शब्द करतेहुए श्रीशंकराचार्यजीका प्रवेश शंकराचार्य-[अपने आप ही] मैंने विष्णु भगवान् और ब्रह्म देव आदि देवतामोसे जो प्रतिज्ञा की थी, उसके अनुसार सवं अवतार चरित्रको तो पूरा कर ही चुका, अब मुझको कोई कार्य करना शेष नहीं रहा, इस मृत्युलोको विधाता की कैसी सुंदर रचना है। उनके इस अनन्त रहस्यका वर्णन कौन करसकता है, इन चर्मचक्षुओंसे मैंने चारों दिशाओं में अनेकों नगर देखे, परन्तु यह हिमालयका दृश्य सब ही स्थानोंसे निराला है चारों पोरकी भूमि पर फसे ढकी हुई है, सूर्यका प्रकाश क्षीण होनेसे ह पता ही नहीं लगता कि इस समय दिनका मध्यान्ह है या पायंकाल होने को है। हाँ ! माज़ तो मेरी आयुका अन्तिम दिन है, भगवान् व्यासनीकी भाशानुसार आज मेरे बत्तीस वर्ष पूरे होगये, अब इस मृत्युलोकमें वृथा ठहरना ठीक नहीं है इस कारण इस पवित्र तीर्थ, केदारनाथकी गुफामें जाकर निजधाम को जाता हूँ [इतना कहकर नारायण शब्दकी ध्वनि करते हुए गुफामें प्रवेश करते हैं और गुफाके भीतर से- ॐमनोबुद्धयङ्कहारचित्तानि नाहं, न श्रोत्रं न जिह्वा न च घ्राणनेत्रे । न च व्योमभूमी न तेजो न वायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोहम् १ अहं प्राय संज्ञो न पंचाविला मे, न तोयं न मे ध.तवो नैच कोशाः ॥ न वाक् पाणिपादौ न चोपस्थपायू, चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोहम न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःख, न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यक्षाः १८८ জাহাঙ্গ अल अहं भोजनं. नैव भोज्यं न मोक्ता, चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोहम् न मे द्वे परागौ न मे लोभमोहो, मो नैव में नैव मात्सर्यमानम् ॥ न धर्मो न चार्ज न कामो न मोक्षः, चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः, पिता नैव मे नैव माता न जन्म ॥ न बन्धुर्न मित्रं गुरुनैव शिंप्या-चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो, विभुर्व्यापि सर्वत्र सर्वेद्रियाणि । सदा मे ममत्वं न मुक्तिन बन्धः चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोहम् । ॐ तत्सत्-ॐ तत्सत् -ॐ तत्सत् सत्यतम् - सत्यदै तम्- सत्यवतम् । ऐसी ध्वनि सुनाई देकर भाकाशमें गुजारती हुई धीरे धीरे लीन होती है, तदनन्तर ब्रह्माजी और इन्द्र आदि देवता आते हैं इन्द्र- हे पितामह ब्रह्माजी ! श्रीशंकरके अपनारका काय समाप्त होगया इस कारण हम सब उनको परम सन्मानके सा शिवलोक में लिया जानेके लिये भाये हैं और बाद भगवान् शंकर हिमालयकी इस गुफामें हैं यह बात हमने दिव्याष्टिसे जान ही ली है, सो अब आप ही आगे बढ़ कर उनसे निवेदन करिये ।। ब्रह्माजी-[ गुफाके सुखपर जाकर हाथ जोड़े हुए हे देवा- धिदेव ! जगन्निवास ! पार्वतीपते ! आपने सब देवताओं को और सब लोकोंको सुख देने के लिये मनुष्य रूप धारकर हमारी इच्छाको पूरा करते हुए संत्य सनातन धर्मका प्रचार किया, पृथ्वी के भारको घटाया जीवन्मुक्ति के मार्गका प्रकाश और अस- दुर्गों का नाश किया, जिससे कि वेद वेदांतमादिका उद्धार तुम्हारे निज कर्तव्यका पालन और धर्मराज्यमें सर्वत्र आपकी विजय हुई इस प्रकार अब आपको कुछ कार्य शेष नहीं रहा अतः अब निजधामको पारिये । भगगन्! आज बैशाख शुक्ला पूर्णिमा है और यही दिन आपका लौटकर कैलासको जानेका नियत हुअा था'

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शंकर विजय

Author
शर्मा, रामस्वरूप
Other authors
सनातनधर्म प्रेस, मुरादाबाद
Title
???? ????
File name
शंकर विजय
Text
OCR done
Citation
1927
Published
2009/04
Publisher
रामचन्द्रशर्मा
Language
Sanskrit
Pages
192
Library
Banasthali University
Classification
Literature
DLI number
409863
Barcode
99999990067330.00
Scanning centre
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