Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Jinhone Rah Dikhai
Front matter
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जिन्होने राह दिखाई
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जिन्होंने राह दिखाई
सग्रासिंह चौधरी
झान गंगा, दिल्ली-६
प्रकाशक ज्ञान गगा
२०५-सी, चावडी बाजार, दिल्ली-११०००६
सस्करण १९८०
मुख्य तीस रुपये
JINHONE RAH DIKHAI biographler
by Sangram Singh Chaudhari
Rs 3000
दो शन्द धरती पर जब मानव का जम हुआ तो वह आकाश, सूरज, नौद, बिजली, भूकम्प और मौसम आदि दैवी शक्तियो से बातकित और विस्मित तो अवश्य हुआ परन्तु उसकी सहज प्रकृति के इन सबके सामने झुकने से इकार कर उनके रहस्यो का आवरण हटाने का सक्त्म किया। हजारो पीढियो के सतत प्रयत्नो से मानव ने न केवल प्रकृति की बाधाओं को धरती ही पर पार किया, वरन् सुदूर अतरिक्ष मे भी विजय के नये कीर्तिमान स्थापित किये। यद्यपि यह उपलब्धियों सम्पूर्ण मानव समाज की हैं-देश, कास और आतिया की सीमाओ मे बंधी हुई नही हैं---फिर भी हजारो-लाखों साहसी और उद्यमी अवेषको म से कुछ के नाम सदैव के लिए अमर हो गये हैं । उहोने प्रकृति के रहस्यो पर विजय पाने के लिये सारा जीवन बपाकर यश, धन आदि सुखों की चिता न करते हुए, मृत्यु के खतरे को हंसते-हंसते गले लगाया । उनके कार्य सदैव प्रब सारे के समान मानव को प्रगति की राह दिखाते रहेंगे। उनके जीवन का अनुसरण कर हमारी नई पीढ़ी भी मानव की विजय पाना मे अपना योगदान दे सके, यही हमारी शुभाकामा है।
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अनुक्रम
२२
३४
१ आइज़क न्यूटन
२ एल्बट आइस्टाइन
३ मेरी क्यूरी
१ जगदीशचद्र बसु
५ डॉक्टर चन्द्रशेखर वेंकटरमण
डॉक्टर जहाँ भा
७ रावट एडविन पेरी
८ शेरपा तेनसिंह
३ पूरी गगारिन
५३
८६
१०४
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आइजक न्यूटन
-
"मैं नहीं जानता कि दुनिया
मुझे क्या समझती है। मैं तो
अपने को समुद्र के किनारे खेलते
हुए एक ऐसे लडके के समान
मानता हूँ जो जब-तब अपर
मनोरजन के लिए चिकने पत्थर
या सोपियां खोज लेता है । पर,
सत्य का अथाह सागर मेरे सामने
अनखोजा ही पडा है।"
-आइजक यूटन
आइज़क न्यूटन का जन्म इगलड के एक छोटे-से खेतिहर
गांव मे २५ दिसम्बर, १६४२ को क्रिसमस के दिन हुआ था।
ईश्वर ने सचमुच इस ससार के लिए इन्हे एक उपहार के रूप में
ही तो भेजा था। एक नन्हा-सा उपहार-क्योकि उनकी मां
प्राय बताया करती थी कि आइजक जन्म के समय इतने छोटे
थे कि उन्हें क्वाटर-साइज के पात्र मे बडी सुगमता के साथ रखा
जा सकता था। मां पहले हो विधवा हो चुकी थी और अब यह
नन्ही-सी जान नौ महीने से पहले ही पृथ्वी पर आ गई । डाक्टरो
ने उन्हें देखकर कहा था कि इनके अधिक जीने को कोई सम्मा-
वना नहीं। किन्तु न्यूटन अपनी युवावस्था को पार भी न कर
पाये थे कि उनकी गणना इतिहास में इने-गिने महान् वैज्ञानिको
में की जाने लगी।
जिहोंने राह दिखाई
गुरुत्वाकर्षण मे, गणित में, दृष्टि विज्ञान में और मैकेनिक्स
मे यूटन के अन्वेषण इतने मौलिए एव दूरगामी हैं पि उनमें
से कोई भी एक उसको इतिहास में अमर बनाने के लिए पर्याप्त
है चाहे उसने सारे जीवन में और कुछ भी न पिया हाता ।
मां ने जब पुनर्विवाह कर लिया और वह अपने पति के
साथ रहने लगी तो वालय आइजर की देखरेख उनकी दादी के
यहाँ होती रही। बचपन में वह माधारण वालक थे, उनमे
अद्भुत प्रतिभा का कोई चिन्ह नहीं मालूम पडता था और कक्षा
मे तो वह बडे मदवुद्धि मान समझे जाते थे। स्कूल में भर्ती
कराने पर उनका मन वहा नहीं लगा। उनका मन लगता था
कल पुर्जी के देखने में और मशीन बनाने मे ।
न्यू'न मे स्वय हवाई चक्को का एक छोटा सा मॉडल तैयार
क्यिा था जो कि वास्तव मे चलता भी था। उहोने पानी मे
चलने वाली पड़ियां और पत्थर की शिला पर एक सूम-घडी
बनाई थी, जो अब 'रॉयल सोसाइटी लन्दन' की सम्पत्ति है ।
उन्हे दिन-रात पढते रहने का, रेखाचित्रो की नकल उतारने का,
फूल और जडी-बूटियो को इकट्ठा करने का वाद था।
न्यूटन की अवस्था जब तेरह वप को थी तो उनके सौतेले
पिता को भी मृत्यु हो गई। मां अपने कृषि-फार्म पर पुन लौट
आई । “मैं चाहती हूँ कि तुम एक अच्छे किसान बनो," कहते
हुए मां ने न्यूटन को स्कूल से हटा लिया। कृषि फाम सम्भालने
के लिए एक सहायक की आवश्यकता भी थी। परन्तु कृषि के
इन कामो के लिए युवक न्यूटन बिलकुल आयोग्य सिद्ध हुए ।
उन्हें इस काम मे तनिक भी रुचि न थी, बल्कि वह कुछ-न-कुछ
पढते ही पाये जाते अथवा फिर दिवास्वप्नो मे या लकडी के
।
आइधर म्यूटन १५ । मॉडल बनाने में दुनिया की सुध से बेखबर रहते। मां भी आखिर समझ गई कि इनको स्कूल मे भर्ती करा देना चाहिए। १८ वर्ष की अवस्था मे न्यूटन ने इगलंड के प्रसिद्ध कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कालेज मे उनकी शिक्षा होने लगी । कैम्ब्रिज मे चार वर्ष व्यतीत होने के उपरान्त १६६५ मे उन्हे बी० ए० की उपाधि मिली। कैम्ब्रिज मे अध्ययन करते हुए ही उनकी अपने गणित प्राध्यापक आइजक बैरो से घनिष्टता हो गई । बैरो पहचान गये कि न्यूटन एक मेधावी छात्र है। उन्होने उन्हे प्रोत्साहित किया कि वह गणित मे ही विशेष अध्ययन करें। बडी त मयता से उन्होने अध्ययन किया । पढते समय वह अपनी सुध-बुध खो देते थे। उनके विषय मे प्रसिद्ध है कि एक बार जब वह पढ रहे थे, उनका एक मित्र आया। न्यूटन पढने मे एकाग्रचित्त थे और उनका खाना टेबल पर रखा हुआ था। मित्र ने न्यूटन की पढाई मे कोई हस्तक्षेप नहीं किया। उसने केवल खाना खा लिया और बरतन ढक दिया । न्यूटन को इस बात की कोई खबर नहीं हुई । पढने के पश्चात् वह खाना खाने टेवल पर आये। बरतन खाली देख कर उन्होने कहा, "मैं तो समझता था कि मैंने खाना नहीं खाया है, लेकिन लगता है, मैंने खा लिया है।" उन्हे इस बात का पता नहीं था कि खाना उहोने नही, उनके मित्र ने खाया है। इगलैंड मे उन दिनो ब्यूबानिक प्लेग की महामारी का आतक था । कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में छुट्टियां घोषित कर दी गई और विद्यार्थी अपने-अपने घरो को चले गये थे । न्यूटन भी अपनी मां के पास लौट आये और लगभग डेढ़ वर्ष विश्व- विद्यालय खुलने तक अपढे कृषि फार्म वाले मकान पर ही रहे । ।
१२ जिन्होंने राह दिखाई फार्म पर खेतो के बीच गुजारे ये १८ महीने विज्ञान के इतिहास मे सम्मवत बहुत ही महत्वपूर्ण दिन थे। इही दिनों मे न्यूटन ने मैकेनिक्स के मौलिक सिद्धान्तो का अन्वेषण किया और उनका प्रयोग ग्रह-मण्डल की गतिविधि में भी उसी तरह कर दिखाया। न्यूटन की विज्ञान को सबसे बडी देन थी-'गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त ।' एक बहुत छोटी घटना से इस सिद्धान्त का जन्म हुआ। वह एक सेब के पेड के नीचे बैठे पढ रहे थे कि उन्होंने एक सेब पेड से टूटकर जमीन पर गिरते देखा । उनके दिमाग में उथल-पुथल मच गई और अचानक ही एक प्रश्न उनके मस्तिष मे उठा कि यह फल टूटकर पृथ्वी पर ही क्यो गिरा विपरीत दिशा मे क्यो नही चला गया। इस प्रश्न पर उन्होने खूब सोच- विचार किया । आखिर उन्होने एक नया सिद्धान्त खोज निकाला ~-'आकर्षण-शक्ति का सिद्धान्त ।' उन्होने बताया कि पश्वी मे आकर्षण-शक्ति है । इस शक्ति के कारण ही फल पृथ्वी की ओर आया। न्यूटन ने अपने सिद्धात के बारे मे और गहराई से सोच- विचार किया। उनकी दृष्टि चन्द्रमा पर गई। उहोने सोचा, “च द्रमा पृथ्वी से इतनी दूर क्यो है, पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के कारण नीचे क्यो नहीं आ जाता ? इस प्रश्न का उत्तर उन्होने यह पाया-'पृथ्वी चन्द्रमा को तो अपनी ओर खीच रही है, लेकिन चन्द्रमा मे पृथ्वी के चारो ओर घूमने की शक्ति है इस घूमने के कारण चन्द्रमा नीचे नहीं आता, एक धेरे में धूमा करता है।" न्यूटन ने अपना सिद्धान्त तो बना लिया, परन्तु उन्होने इसे बहुत समय तक प्रकाशित नहीं कराया । 'डिफरेंशल तमा इन्टे- ग्रल कैल्क्युलस' का अविष्कार किया और दृष्टि-विषयक विश्व विख्यात नियमो का अनुसधान किया। अपना शेष जीवन उन्होंने इन्ही नियमो की व्याख्या मे, उनको बढाने और क्रियात्मक प्रयोगो में गुजारा । पर बौद्धिक सर्जन को उनकी वैज्ञानिक वृत्ति इन्ही १८ महीनो मे प्रदर्शित कर चुकी थी। अपने इन विलक्षण अन्वेषणो एव अनुसन्धानो को न्यूटन ने एक दम प्रकाशित नही किया। चुप रहने का उनका स्वभाव- सा बन गया था, जिसके कारण उन्हें सम्पूर्ण जीवन किसी-न- किसी वाद-विवाद या झमेले में उलझे रहना पड़ा। १६६७ में जब कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय पुन खुला तो वहां न्यूटन को पढ़ाने का कुछ काम मिल गवा । उन्होने वहाँ आशा- तीत उन्नति की, क्योकि २६ वर्ष की अवस्था में वह अपने गुरु एक अभिभावक आइजक बैरो के उत्तराधिकारी और गणित के प्रोफेसर नियुक्त हो चुके थे ।' न्यूटन बड़े समय से प्रकाश-विषयक परीक्षण व्यापक पैमाने पर कर रहे थे। उन्होंने कुछ टेलिस्कोप भी बनाये थे, पर वह अपने इस सब काम-काज से सन्तुष्ट नहीं थे। उनके बनाये ये उपकरण भी, जो दूर लोक की छाया उतारते थे, समकालीन अन्य दूरवीक्षण यन्त्रो की भौति थे। उनके किनारो मे भी कुछ- न-कुछ रगीनी-सी आ जाती थी। न्यूटन के मस्तिष्क मे प्रश्न -'ऐसा क्यो' और इस समस्या का समाधान करने के ‘लिए उन्होंने प्रकाश की वृत्ति का सूक्ष्म अध्ययन किया। एक त्रिभुजाकार प्रिज्म पर सूर्य की किरणें डाली। बन्द कमरे में खिडकी के एक छेद से ये किरणें प्रवेश पाती। उन्होंने देखा कि उठता- १४ जिहोंने राह दिखाई किस प्रकार श्वेत किरण फटकर दूसरी ओर दीवार पर एक सुन्दर सतरगिनी बन जाती है। सातो रगो में भी एक निश्चित कम था-लाल, नारगी, पीला, हरा, नीला, जामुनी और बैगनी। अब उन्होने एक प्रयोग किया कि सिफ,एक ही रग-मान लो, बैगनी दीवार पर पड़े और शेप रग आगे न आने पायें। यह बंगनी रग की किरण फिर एक दूसरे प्रिज्म मे से गुजारी गई। न्यूटन ने पाया कि इस बैगनी किरण की दिशा तो कुछ बदल जाती है, किन्तु प्रिज्म मे से दोबारा गुजरने पर उसके रगम किसी प्रकार का अन्तर नहीं आता। वह अव भी बैगनी ही रहती है । यही परीक्षण उन्होंने हर रग की किरण से बार-बार करके देखा । श्वेत किरण से एक बार विभक्त होकर ये रग फिर और आगे नहीं फटते थे। हां, दोबारा प्रिज्म मे से गुजरने पर हर रग की दिशा में एक विशेष और अलग ही अन्तर आ जाता था। न्यूटन का निष्कर्ष बहा आश्चर्यजनक था, लेकिन था बड़ा सरल। सूय की श्वेत किरणें वस्तुत सात रगो का ही मिश्रण हैं । प्रिज्म का शीमा इन सातो रगो को अलग-अलग दिशान्तरण दे देता है, जिसके कारण ये अलग-अलग फट जाते हैं। न्यूटन इन परीक्षणो के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ऐसा लेस बना सक्ना असम्भव है जिसमे रगो को यह झालर जरा-सी भी न आये। अत उन्होने एक रिफ्लक्टिग टेलिस्कोप का आविष्कार किया जिसमें तारो के प्रकाश को एक विदु पर केन्द्रित करने के लिए धातु से निर्मित प्याले के आकार का एक दपण प्रयोग किया जाता है। क्योकि प्रत्येक प्रकार के टेलिस्कोप माइजक न्यूटन १५ में प्रकाश को शीशे मे से गुजरना ही नही पडता, किरण के अशो को अलग-अलग दिशा ग्रहण नहीं करनी पडती, इसीलिए वह वर्ण-मिश्रण भी अब नहीं होता । आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि ऐसे लेस तैयार करने मे जिनमे कि रगीनी का स्पर्श आये ही नही, वैज्ञानिको को एक शताब्दी और लग गई । अलग- अलग प्रकार के शीशो को मिलाकर बनाये गये लेसो मे आज- कल वह पुराना वणस्पर्श नही आता । न्यूटन ने अपने बनाये टेलिस्कोप की भीतरी रचना स्वय अपने ही हाथो से की थी। न्यूटन के दर्पण का व्यास लगभग एक इच था, जबकि माउण्ट पलोमार की कैलीफोनिया इस्टी- ट्यूट आफ टेक्नालॉजी की वेधशाला मे एक रिफ्लेक्टिग मिरर (दपण) का व्यास लगमा १७ फुट है। दृष्टि विज्ञान के विषय में उनके अनुसन्धानो का और उनके । प्रथम वैज्ञानिक निबन्ध का यही विषय था। इस पर उनकी समान रूप से आलोचना और प्रशसा दोनो ही हुई। न्यूटन को अपनी स्थापनामो के प्रतिपादन मे उस युग के योग्यतम वैज्ञा- निको-क्रिश्चन, ह्यूजेंस, रॉबर्ट हुक आदि के आक्षेपो का प्रति- वाद करना पड़ा था। इन वाद-विवादो के प्रसगो से ही विज्ञान को प्रणाली विषयक एक नवीन दिशा सकेत देने का उन्हें अवसर 'मिला था-"विज्ञान मे कुछ भी कार्य करने का सबसे अच्छा, सुरक्षिततम उपाय यही हो सकता है कि पहले तो वस्तुओ के गुणो का अन्तर-वीक्षण मनोयोग के साथ किया जाये और फिर इन गुणों को परीक्षण द्वारा प्रतिपादित करते हुए उनकी व्याख्या मे शन शन कुछ उपयुक्त स्थापनाएँ उपस्थित की जायें।"
जिहोंने राह रिक न्यूटन अपने वैज्ञानिक अनुसन्धानों में लगे रहने पर भी विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व पालियामेण्ट मे करने के लिए सयय निकाल लेते थे। १६८४ मे विश्वविख्यात नक्षत्रविद् एडमण्ड हैली ग्रहों की गतिविधि के विषय मे केपलर के सिद्धान्तो पर विचार-विनिमय के लिए न्यूटन के पास पहुँचे। बातो-ही-बातों मे हैली को भी न्यूटन ने 'गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त' की स्थापना के विषय में बताया । हैली ने न्यूटन को प्रेरित किया कि वह इन अन्वेषणों को प्रकाशित करायें। न्यूटन को इगमें कठिनाई न हो, इसलिए यह भी स्वीकृति दी कि मुद्रण का सारा व्यय वह स्वय उठायेंगे। फलस्वरूप 'फिलासोफियाए नेचरलिस प्रिसीपिया मैथमेटिका' का प्रकाशन तीन खण्डो मे उस युग की वैज्ञानिक भाषा लैटिन मे प्रस्तुत हुआ। न्यूटन ने अपने गति-नियमों की रूपरेखा 'पिंसीपिया' में प्रस्तुत की है। पहला नियम है-"बचल स्थिति में पड़ी कोई वस्तु अचल ही पडी रहेगी, जब तक कि उसकी उस स्थिति को बलात् परिवर्तित नही कर दिया जाता; और गति की स्थिति । मे प्रवत्तमान कोई भी वस्तु उसी गति से निरन्तर चलती ही रहेगी, जब तक कि उसकी दशा में कोई बलात् परिवर्तन नहीं ले आया जाता।" न्यूटन ने अनुभव किया कि किसी भी वस्तु को चलायमान करने के लिए वह वस्तु चाहे वृक्ष से गिरता कोई फल हो या (सागर में उठा ज्वार हो, स्थिति परिवर्तन के लिए शक्ति को, बल की आवश्यकता होती है। तनिक सोचिए- जिस गाडी में आप याता कर रहे हैं, सहसा रुक जाये तो क्या'
मादक भ्यूटन
१५
होगा? क्योकि हमारे शरीर मे तो अभी वही गति है, हम रुक
नही सकेंगे अगर हमारा सिर सामने की सीट से एकदम टकरा
नही जाता। इस बात को यद्यपि लोग पहले भी जानते थे
किन्तु न्यूटन ने इसे गणित के नियमानुसार एक 'सूत्र' का रूप
दे दिया।
न्यूटन ने गति के दूसरे नियम मे यह प्रतिपादन किया है-
"गति मे परिवतन किस प्रकार आ रहा है, यदि हमे यह ज्ञात
हो जाये तो हम उस परिवतन के लिए वाछिन शक्ति का परि-
माण भी जान सकते हैं।" गति मे परिवतन की इस नियमितता
को विज्ञान में आरोहावरोह (एक्सिल्रेशन) कहते हैं-जिसका
अयं गति में घटती-बढती दोनो हो सकता है। उदाहरणार्थ, एक
मोटरगाडी को ३० मील प्रति घण्टा की गति पर लाने के लिए
अधिक शक्ति की आवश्यकता है, अपेक्षाकृत उसी गाडी को
उतने ही समय मे शून्य से २० मील प्रति घण्टा की गति में ले
जाने के लिए।
दूसरे नियम का एक दूसरा निष्कर्ष यह भी निकलता है कि
६. मील प्रति घण्टा की गति से चली जा रही एक मोटर को
दस सेकण्ड के भीतर रोकने के लिए उतनी ही शक्ति आवश्यक
है जितनी ३० मील की गति से चली जा रही उसी गाडी को
पांच सेकण्ड में रोकने के लिए अपेक्षित होगी।
गति का तीसरा नियम यह है-"प्रत्येक क्रिया की उसके
विस्ट समान प्रतिक्रिया होती है।" इस नियम के अनेक उपयोग
वि० रा०शि०-२
. । जिन्होंने यह लिखा हैं, सम्भवत जिनमे सबसे अद्भुत राकेटो की उहान में प्रत्यक्ष होता है। उधर, गरमागरम गैसें पीछे की ओर निकलनी प्रारम्भ होती हैं और इधर राकेट मागे की ओर गति मे आना शुरू कर देता है। गुरुत्वाकर्षण का व्यापक नियम सम्भवत इन सभी सिद्धान्तो से कही अधिक विस्मयकारी या। न्यूटन ने इसमे प्रतिपादित किया है कि पृथ्वी का प्रत्येक कण दूसरे कणो के साथ एक खिंचाव के द्वारा बंधा हुआ है । पृथ्वी जहाँ पेड पर लदे हुए फल को अपनी ओर खीचती है, वहाँ फल भी धरती को अपनी ओर खीच रहा होता है। यह नियम ग्रह-नक्षत्र पर भी उसी प्रकार लागू होता है। सूर्य पृथ्वी को अपनी ओर खीचता है, पृथ्वी चन्द्रमा को और चन्द्रमा पृथ्वी को। गणित के एक सूत्र मे यही बात प्रस्तुत करनी हो तो कहेगे कि दो वस्तुओ का परस्पर आकषण दो बातों पर निर्भर करता है--एक तो इस पर कि दोनो वस्तुएँ कितनी भारी हैं, और दूसरी इस पर कि उनमें निकटता व दूरी कितनी है। 'प्रिंसोपिया' के दूसरे भाग में प्रथम भाग की कल्पनाओ को आगे बढाया है और कुछ नये विचार-गति के अवरोध के सम्बध में भी आये हैं । यहा, उदाहरणार्थ, न्यूटन ने समझाया है कि समुद्र में जहाज बिना किसी प्रकार की रुकावट के चलता रहे, इसके लिए उसका आकार कसा होना चाहिए । पुस्तक के इसी अश मे तरगो की गति का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है, जिसका समर्थन आधुनिक वैज्ञानिक अक्षरश कर चुके है, क्योकि आज के युग में भौतिकी को उसकी आवश्यकता बहुत अधिक है।
१३ माइजम्यूटन अन्य के तीसरे अश को मानव-बुद्धि का एक महान् चमत्कार माना जाता है। पृथ्वी पर प्रक्षेपित यस्तुओ को गतिविधि के अध्ययन द्वारा न्यटन गति तथा गुरुत्वाकर्षण के मौलिक सिद्धान्तो पर पहुंचे और दोनों ही नियमो को सूर्य की परिक्रमा में सलग्न सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पर सही पाया गया। इन्ही के द्वारा सूर्य तथा पृथ्वी के परिमाण तक को सदैव के लिए माप-तोल- कर रखा गया। गणित के आधार पर यह भी बताया गया कि ध्रुवो पर धरती चपटी क्यो होती है, और भूमध्य रेखा पर उभरी हुई क्यो? चन्द्रमा के परिक्रमण पप में ये अनिय- मितताएं क्यो आती हैं ? क्योकि सूर्य का विशालकाय परिमाण उसे निरन्तर अपनी ओर खीच रहा होता है । सूर्य और चन्द्रमा दोनो समुद्र को अपनी-अपनी ओर खींचते हैं-इन ज्वार- माटों की गणना भो गणित के दो-एक सरल नियमों द्वारा की जा सकती है। न्यूटन का गणित सही-सही बता देता है-दो वस्तुओ में परस्पर आकर्षण कितना होता है। परन्तु इस गुरुत्वाकर्षण । का कारण क्या है, इस प्रश्न पर वह कुछ भी सुनना नही चाहते थे। "हमारे लिए बस, इतना ज्ञात कर लेना ही पर्याप्त है कि । गुरुत्वाकर्षण कुछ है जो इन नियमो के अनुसार सक्रिय होता है और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की, समुद्रो की, तिविधि की व्याख्या करने के लिए पर्याप्त है।" १६६६ में न्यूटन को टकसाल का 'मास्टर' बना दिया गया। १७०३ में उन्हें 'रायल सोसाइटी का प्रधान चुना गया। वह मृत्यु-पर्यन्त इस पद पर बने रहे । --- -
लिहनि रह
१७०५ मे महारानी ऐनी ने उन्हें 'सर' की उपाधि प्रदान
न्यूटन स्वभाव से बहत गम्भीर थे। हलकी बातों से वह
सदैव दूर ही रहे । उनको पुस्तक-सूची से ज्ञात होता है कि कलो,
सगीत, कविता, साहित्य आदि मे उनकी कोई रुचि नही पी।
अपने खान-पान और पहनने-ओढने में भी लापरवाह रहते थे।
उन्होंने जीवन मर शादी नही की। सम्भवत वैज्ञानिक अनु-
सन्धान मे अत्यधिक व्यस्त रहने के कारण मानव-जीवन की
दूसरी गतिविधियों में भाग लेने के लिए उनके पास समय का
अभाव वराबर रहा होगा। स्वभाव से वह दयालु और सौम्य
प्रकृति के थे।
न्यूटन सत्य के अन्वेषक थे। सत्य अनन्त है, उसकी
कोई सीमा नहीं है। ससार मे जो कुछ भी हम देख रहे हैं।
उतना ही सत्य नही है, उससे परे भी बहुत कुछ सत्य है । जिस
। शानिक और विचारक की दृष्टि जितनी पैनी होती है, वह
सत्य के उतने ही अधिक अश को देख सकता है। महान् वा
निक इस तथ्य को समझता है । स्वय न्यूटन ने बडी विनम्रता
के साप स्वीकार किया था-"मैं नहीं जानता कि दुनिया
मुझे क्या समझती है। मैं तो अपने को समुद्र के किनारे
खेलते हुए एक ऐसे लडके के समान मानता हूँ, जो जब-तन
अपने मनोरजक के लिए चिकने पत्थर, या सीपियाँ खोज
लेता है, पर सत्य का अथाह सागर मेरे सामने अनखोजा पडा
१७२७ ई० में सर आइज़क न्यूटन की मृत्यु हुई। तब
बाइयफ न्यूटन
उनकी आयु ५ वर्ष की थी। ऐसी प्रतिभा पुर्गों में कभी-
कभी हो अवतरित होती है। लेकिन न्यूटन ने स्वय पूर्व
आचार्यों का ऋण स्वीकार करते हुए कहा था-"यदि में कुछ
भी आगे देख सका हूँ तो वह दिग्गजो के कन्धो पर खड़े होकर
ही।"
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एल्मर्ट आइन्स्टाइन
,
मेरा स्वप्न पा कि
एटम का प्रयोग मानव-माति
की सेवा में किया जायेगा,
शेकिन इसका उपयोग तो
विश्व-सहारक के रूप में हो
-एस्पर्ट मामान
एल्बर्ट आइन्स्टाइन का जन्म १४ माचं, १८७६ को उल्म,
दक्षिणी जर्मन के एक नगर में हुआ था। एक साल पश्चात् ही
इनका परिवार महाँ से उठकर म्यूनिख मे आकर रहने लगा
था। एल्बर्ट के पिता एक मामूली इलेक्ट्रो-कैमिकल फैक्टरी के
. । एल्बर्ट आइन्स्टाइन मालिक थे और ऑपरेटर भी। एल्बट के चाचा जीनियरिंग मे प्रशिक्षण प्राप्त किया था। उन्होने विवाह नहीं किया था। इसलिए वह भी आकर इन्ही के पास रहने लगे और परिवार कार्य मे सहायता भी करने लगे। मां सगीत की बड़ी शौकीन थी और विशेषकर बीथोवेन की। मां की इस रुचि का परिणाम यह हुआ कि बालक को छह वर्ष की अवस्था से ही वॉयलिन मे सबक सिखाया जाने लगा। आइन्स्टाइन को प्रारम्भ मे तो यह विद्या-दान बहुत बुरा लगा, लेकिन शने -शनै वह इस कला मे निपुण होते गये । मोजातं की एक-स्वर, द्वि-सर, सरल धुने, आइन्स्टाइन को रुचि का संगीत था । सगीत की यह प्रारम्भिक शिक्षा आइन्स्टाइन की आजीवन सगिनी रही-वह थके हारे इन्ही गीतो में क्षणिक विशान्ति और सुख से आनन्दित हुमा करते थे। बचपन मे आइन्स्टाइन में प्रतिभाशाली होने के लक्षण दिखाई नहीं दिये । वह साधारण बच्चो की अपेक्षा बोलना भी देर से सीखे, जिससे मां-बाप को शका हो. उठी कि, बालक मन्दबुद्धि है, जड है। बहुत छोटी अवस्था में ही वह अपनी अवस्था के बच्चो से अलग-से रहने लगे और सारा दिन कुछ-न- कुछ करते रहना ही उनकी दैनिक दिनचर्या बन गई। वह किसी प्रकार का परिश्रम का काम अथवा व्यायाम नही कर सकते थे। भाग-दौड के खेलो से, और "सिपाही बनने से तो जैसे उन्हें सचमुच ही घृणा हो । उन दिनो म्यूनिख की गलियो मे आये दिन जर्मन सेना परेड करने निकला करती और बच्चे उसे बहे धाव से देखने आते, लेकिन एल्बर्ट का दिल तो इन दृश्यो से - बिन्होंने राह दिखाई बैठने ही लगता | उन्हें यह देख कर आश्चर्य होता था कि इन्सान किस प्रकार एक निर्जीव मशीन की तरह, जैसे वह स्वय कुछ सोच न सकता हो, अकड-अकड कर चलने-फिरने के लिए तैयार हो जाता है। म्यूनिख मे साधारण शिक्षा के लिए कोई प्रबन्ध नही था। थोडी-बहुत जो प्राइमरी पाठशालाएँ थी, उनकी व्यवस्था दो- एक धार्मिक सस्थामओ के आधीन थी। आइन्स्टाइन का परिवार यहूदी था, फिर भी उस परिवार के किसी भी व्यक्ति को धर्म में शुरू से ही अभिरुचि न थी। उनके निवास से एक कैथोलिक प्राथमिक स्क्ल ही निकट पडता था, इसलिए आइन्स्टाइन को उसी में भर्ती करा दिया गया। दस वप की अवस्था मे उहें एक स्कूल जिम्नेजियम मे दाखिल करा दिया गया कि वह विश्व- विद्यालय की उच्च शिक्षा की योग्यता प्राप्त कर सकें। स्कूल जीवन मे न उन्हे किसी प्रकार का सुख ही मिला और न सफ- लता ही। यहाँ पाठ को कण्ठस्थ करने की प्रथा थी। किसी विषय पर खुल कर विवेचन की कोई छूट नही थी जिससे तनिक विषयगत परिचय भी प्राप्त हो सके । आइन्स्टाइन को जिम्नेजियम मे रहते हुए यहूदी धर्म की सर्वप्रथम दीक्षा मिली। उनको कथोलिको की उदार प्रकृति के विषय मे कुछ आभास प्राथमिक स्कूल मे ही मिल चुका था। इस शिक्षा-दीक्षा का परिणाम यह जरूर हुमा कि धर्म की सार्वजनीन नीतिपरता अर्थात् चरित्र-प्रियता मे उनकी आस्था हट हो गई, लेकिन साथ ही उनके हृदय ने यह भी अनुभव किया कि सभी कर्मकाण्ड, चाहे वे किसी भी धर्म या सम्प्रदाय .
। स्बटे भान्सान हो, 'अन्धी जडता' के तारक्त कुछ नहीं हैं। इनको सम्भवत बनाया ही इसलिए गया था कि मनुष्य स्वाधीनतापूर्वक चिन्तन- मनन करना छोड दै। जिम्नेजियम से स्नातक होकर आइन्स्टाइन ने अपने धर्म-सम्प्रदाय की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। वर्षों बाद ही वह अपनी यहूदियो की बिरादरी मे मिले-उन दिनो जब कि हिटलर के अधीन नाजी अनुशासन मे जर्मनोने यहूदियो के बीज-नाश की जैसे सौगन्ध ही खा ली थी। आइन्स्टाइन के इन्जीनियर चाचा के कारण बालक आइन्स्टाइन की गणित में रुचि उत्पन्न हो गई । उन्हीं ने बालक को सर्वप्रथम यह समझाया कि किस प्रकार एक प्रश्न के समाधान में बीजगणित के द्वारा समय बच सकता है और प्रश्न भी सरलता से हल हो जाता है । उन्होंने सब कुछ परिहास और विनोद मे, बालक की परिहास-बुद्धि की जगाते हुए कहा, "देखो, विज्ञान कितना रोचक है । यह एक जानवर है, जिसका हम शिकार कर रहे हैं, पर वह बस में नहीं आ रहा, हम उसका थोडी देर के लिए, नाम रख देते हैं-'क्ष' और अपनी बन्दूक का नाम है 'य' । अब अपना शिकार प्रारम्भ करते हैं जब तक कि उसका 'क्षय' नहीं हो जाता-वह पकड मे नही आ जाता।" आइन्स्टाइन पर 'ज्यामिति' का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा। ज्यामिति के पढ़ने से वह बहुत प्रसन्न होते । कम शब्दो मै तर्क- पूर्ण ढंग से सब कुछ कह देना, प्रत्येक वाक्य के लिए प्रमाण और समर्थन की आवश्यकता तथा हर सिद्धि मे युक्ति-क्रम की बटूट श्रृंखला और प्रत्येक प्रश्न को हल करने के लिए निजी चिन्तन का अवसर। आइन्स्टाइन ने स्वप इस बात को माना - जिन्होंने राह दिखाई है कि दो घटनाएं उनके लिए बचपन मे वरदान सिद्ध हुई- एक तो उन्हें पांच वप की अवस्था में किसी ने एक चुम्बकीय कुतुबनुमा लाकर दी और दूसरी बारह वर्ष की अवस्था में यूक्लिड की ज्यामिति से प्रथम परिचय हुआ। आइन्स्टाइन ने लिखा है-"स्कूल के उन दिनो मे यूक्लिड हाथ में आते ही यदि हम में से किसी को ऐसा प्रतीत नही होता था कि मेरी दुनिया ही बदल गई है तो उसका मतलब हम यही समझते थे कि इस बेचारे को ईश्वर ने समीक्षा अथवा अन्वेपण की बुद्धि ही नही दी।" आइन्स्टाइन जब १५ वर्ष के हुए तो उनके पिता के लिए यह आवश्यक हो गया कि वह अपने पुराने बिजली के कामकाज को ठप्प कर दें। और फलस्वरूप परिवार म्यूनिख से उठकर मीलान (इटली) मे आ गया ताकि वहाँ कुछ कारोबार किया जा सके । एल्बर्ट कुछ समय तक डिप्लोमा प्राप्त करने के उद्देश्य से जिम्नेजियम मे ही रहे । लेकिन आइन्स्टाइन के लिए स्कूल का यह जीवन दिन-प्रतिदिन असह्य हो रहा था । गणित मे तो उनका ज्ञान अपने अन्य साथियो से बहुत बढा-चढा था, लेकिन अन्य विषयो मे वह पोरे थे । दूसरे, एक बात और हुई कि उनमें अपने शिक्षको के प्रति अघ-भक्ति नही थी । परिणाम यह हुआ कि उन्हें जिम्नेजियम से छुट्टी मिल गई और वह अपने पिता के पास इटली मे आ गये। इटली मे रहते हुए आइन्स्टाइनने निश्चय किया कि वह अपनी सारी जिन्दगी गणित तथा समीक्षात्मक भौतिकी के अध्ययन मे व्यतीत करेंगे। यह निश्चय कर उन्होंने ज्यूरिख (स्विट्जर- लंण्ड) के प्रख्यात स्विस फेडरल पॉलीटेक्निक स्कूल में प्रवेश के एश्वर्ट मान्स्टाइन २७ लिए परीक्षा दी पर असफल रहे । गणित मे पूरे अक मिले और भाषा एव प्राणिविज्ञान में बहुत कम अक प्राप्त हुए। पॉली- टेक्निक के डायरेक्टर आइन्स्टाइन की गणित मे योग्यता पर मुग्ध हो गये और फिर उन्होने कुछ ऐसी व्यवस्था कर दी कि वह प्रवेशिका परीक्षामो की इन आवश्यकताओ को स्विट्जर- लण्ड मे जाकर ही पूर्ण कर लें। स्विट्जरलैण्ड पहुँचकर आइन्स्टाइन को प्रसन्नता की कोई सीमा न रहो, क्योकि म्यूनिख के स्कूलो मे और यहां के पठन- पाठन मे बडा अन्तर था। यहां यदि विद्यार्थी स्वतन्त्र चिन्तन भी करे तो हर विषय पर शिक्षको का पूरा-पूरा सहयोग मिलता था। यह पहला अवसर था जब आइन्स्टाइन को स्कूल मे कुछ रुचि उत्पन्न हुई । पाठ्य-विधि पूर्ण कर उ होने ज्यूरिख के फेड- रल पॉलीटेक्निक स्कूल मे प्रवेश किया। उन्होने ज्यूरिख मे रहते हुए ही दृढ सकल्प किया कि वह मौतिकी के अध्यापक बनेंगे और पाठ्य-विषयो का चयन भी उन्होने अपने इसी ध्येय की पूर्ति के अनुरूप ही किया। उहोने यह भी महसूस किया कि वह स्विट्जरलैण्ड के नागरिक बन जायें । आइन्स्टाइन का ज्यूरिख मे जो समय व्यतीत हुआ, उसमे उन्हें बराबर पैसे का अभाव रहा, क्योकि उनके पिता को यहां नये कार्य मे सफलता नही मिल रही थी। प्रसन्नता की चात यह हुई कि एक सम्पन्न सम्बन्धो ने विश्वविद्यालय के द्वारा ही उनकी सहायता का प्रबन्ध करा दिया। पढाई समाप्त करने के बाद आइन्स्टाइन ने बड़ी कोशिश की कि किसी तरह वह भौतिक विज्ञान के अध्यापक बन जायें, । जिहोंने राह दिखाई पर उन्हें कही भी अध्यापक की नौकरी न मिल सको। जीवन- निर्वाह के लिए कुछ-न-कुछ तो करना ही पड़ता है । बर्न मे स्विस पेठेण्ट आफिस मे पेटेण्टों के एक परीक्षक के रूप मे उन्होंने नौकरी कर ली। आइन्स्टाइन ने १६०५ में इसी पेटण्ट आफिस में नौकरी करते हुए 'विशिष्ट आपेक्षिता' की स्थापना की थी जिसका 'प्रत्यक्ष प्रकटीकरण ससार ने चालीस साल पश्चात् 'एटम बम के निर्माण में किया। आइन्स्टाइन ने अपने एक पत्र मे लिखा था "डियर मिस्टर प्रेसीडेण्ट, ई० फेमि और एल० जीलार्ड के कुछ नये अनुसन्धानो से मुझे अवगत कराया गया है । इन अनुसन्धानो की पाण्डुलिपि का अध्ययन करने पर मुझे विश्वास हो गया है निकट भविष्य मे ही वैज्ञानिक यूरेनियम को एक नये और महत्वपूर्ण शक्ति- स्रोत के रूप मे प्रयोग करने में सफल हो जायेंगे। इस प्रकार का केवल एक ही बम यदि किसी बन्दरगाह पर फेंका गया तो वह उस बन्दरगाह के साथ-साथ आस पास के इलाके का भी सफाया कर देगा।" १६३६ की शिविर मे यह पत्र प्रेसीडेण्ट फेंकलिन डी० रूजवेल्ट को लिखा गया था। और फिर छ वर्ष पश्चात् ६ अगस्त १९४५ को इस प्रकार का केवल एक ही बम जापान के हीरोशिमा नामक नगर पर डाला गया, जिसके कारण लगभग ६,००० व्यक्ति मारे गये, १,००,००० धायल हुए और २,००,००० बेघर तथा बेसहारा हो गये । इस एटम बम ने नगर के ६०० मोहल्लों को मिट्टी में मिला दिया। कुछ दिन पश्चाद इसी प्रकार का एक वम नागासाकी पर डाला गया। इस भयर एस्बर्ट माइनसाइन २० विनाश को देख जापान सरकार ने घुटने टेक दिए और द्वितीय विश्वयुद्ध का अन्त हो गया । आइन्स्टाइन ने १६०५ में ही वह सिद्धान्त खोज लिया था जो एटम बम के मूल मे काम करता है। किसी भी द्रव्य को शक्ति मे और शक्ति को द्रव्य मे परिवर्तित किया जा सकता है। विज्ञान का प्राचीन सिद्धान्त था कि द्रव्य का स्वत न निर्माण किया जा सकता है और न विनाश ! आइन्स्टाइन के सिद्धान्त को सून रूप में इस प्रकार प्रकट कर सकते हैं श-द्व+प्र अर्थात् इस सूत्र द्वारा विसर्जित शक्ति (श) का परिणाम बराबर है। -दव्य ('प्रकाश की गति' (प्र) के वग से गुणित फल । अब क्योकि प्रकाश को गति स्वय एक अपरिमेय-सी वस्तु है- १,८६,००० मील प्रति सेकण्ड यानी लगभग ५६,००,००,००,००० फुट प्रति मिनट-तो थोडी माता के भी द्रव्य से विकीर्ण शक्ति बहुत ही अधिक निर्माण या सहार कर सकती है । वास्तव मे अगर एक पौण्ड कोयले को पूर्णतया शक्ति में परिवर्तित करें, तो उसके फलस्वरूप तीस हजार खरब फुट पौण्ड से भी अधिक परिमाण की शक्ति पैदा होगी। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी भी द्रव्य के १० पौण्ड से इतनी अधिक विद्युत पैदा की जा सकती है जो विश्वभर की एक महीने की आवश्यकता को सर- सता से पूर्ण कर दे। इससे पहले भौतिकी शास्त्र का सारा ढांचा न्यूटन के दो
मिहोने राह निधी
सौ साल पुराने गति के नियमो पर आधारित था और भौतिकी
के अधिकांश प्रश्नो का हल इन नियमो द्वारा निकल पाता
था। लेकिन अब कुछ ऐसी उलझनें सामने आई, जहाँ न्यूटन के
सिद्धान्त से काम नही चलता । उदाहरणापं, वायुयान से यदि
एक राकेट उडान को दिशा मे ही फेंका जाये, तो स्वभावत:
राकेट की एक तो अपनी गति होगी ही, और साप हो यान की
गति भी इसकी इस गति में सम्मिलित हो जायेगी।
यदि न्यूटन के नियमो की प्रकाश की गति मे भी स्थापना
की जाये तो प्रकाश की गति स्वभावत तब अधिक ही होती
जायेगी, जबकि प्रकाश-स्रोत भी देखने वाले की ओर स्वय बढ़ता
आ रहा हो और इसके विपरीत जब यही स्रोत अन्वीक्षक से
दूर हट रहा हो तो उसकी गति अपेक्षाकृत कुछ कम होती
जायेगी। लेकिन ए० ए० मिचेलसन ने कुछ परीक्षणो द्वारा
प्रमाणित कर दिया है कि प्रकाश की गति न्यूटन के गति सम्बन्धी
नियमो का अनुसरण नहीं करती।
आइन्स्टाइन ने मिचेलसन के इन परिणामो का अध्ययन
किया और कुछ मौलिक चिन्तन के बाद वह एक नई स्थापना
पर पहुँचे कि प्रकाश का स्रोत कुछ भी क्यो न हो और देखने
वाला कही भी क्यो न खडा हो, चाहे जिस दिशा मे क्यो न चल
रहा हो, प्रकाश की गति सभी ओर एक सी ही होगी। इस
स्थापना का तात्पर्य यह हुआ कि प्रकाश की गति में किसी भी
अवस्था मे कुछ परिवतन नही आ सकता ।
आइन्स्टाइन की स्थापना मे यद्यपि कुछ बडा तथ्य या असा-
मात्यता नही दीख पडती, लेकिन आइन्स्टाइन की प्रतिभा की'
यह निजी विशेषता ही रही है कि वह अपनी स्थापनाओ को
-- ३१ एल्बर्ट आइस्टाइन सदा कुछ अद्भुत, अविश्वसनीय, किन्तु सत्य कल्पनाओ मे व्यक्त करने मे बहुधा सफल रहे हैं। इसका एक उदाहरण देखिए- यदि घढी स्वय ( उसकी सुइयां ही नही) चलने लग जाए तो उसकी सुइयां सुस्त पड जायेंगी। इस वक्तव्य पर प्रयोग किये जा चुके हैं और प्रत्येक बार आइन्स्टाइन की 'कल्पना' ही सत्य सिद्ध हुई है । अणु-चालित अन्तरिक्ष विमानो मे मनुष्य के लिए सुदूर ग्रहो की यात्रा का स्वप्न जब सम्भव हो जायेगा, तब हमारा अन्तरिक्ष यात्री अन्तरिक्ष-विमान की घडी के अनुसार वापस पृथ्वी पर लौटने पर देखेगा कि उसका अपना ही पुन उससे (पिता से) बीस-तीस साल अधिक बूढा हो चुका है। आइन्स्टाइन का नियम ही पहली बार सूर्य की शक्ति के 'स्रोत कुछ व्याख्या कर सका कि सूय यदि अपने ही भीतरी इंधन द्वारा हमे प्रकाश और गरमी दे रहा होता तो कभी का ठण्डा पड़ चुका होता, बुझ चुका होता। वहीं सूर्य इतने वर्षों से ताप और प्रकाश का विकिरण करता आ रहा है और अरबो- खरबो वर्ष आगे भी/इसी प्रकार करता रहेगा। माइन्स्टाइन १६०६ मे ज्यूरिख के विश्वविद्यालय में विशेष प्राध्यापक के पद पर थे। वहीं से वह प्राग के जर्मनी विश्व- विद्यालय में आ गये। कुछ समय बाद फिर ज्यूरिख चले गये और अन्त मे वहां से बलिन कैसर विल्हेम इन्स्टीट्यूट में पहुँच गये। १६३३ मे नाजियो ने जर्मन सरकार पर अधिकार कर लिया। उन दिनो माइन्स्टाइन बलिन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर थे और इशलण्ड तथा अमेरिका मे दो व्याख्यानमाला देने के जिहोंने राह दिखाई लिए गये हुए थे। अत्याचारी नाजियों ने उनको अनुपस्थिति मे ही उन्हें उनकी सम्पत्ति से ही नहीं, विश्वविद्यालय के प्राध्या- पक पद से एव जर्मन गणराज्य द्वारा प्रदत्त 'समाहत नागरिक' की स्वाधीनता से भी वचित कर दिया। वह अमरीका मे प्रिस्टन की इस्टीट्यूट फॉर एडवास स्टडीज' मे गणित के विद्यालय के निदेशक बनकर आ गये। उन्होने यहां आकर इसराइल मे यहूदियों के लिए एक नया राज्य स्थापित करने का समर्थन किया और 'एक विश्व सरकार' के विचार को भी जनता के सामने रखा। लेकिन जब उहें इसराइल का राष्ट्रपति होने के लिए आमन्त्रित किया गया तो उन्होने इसे अस्वीकार कर दिया और कहा-"विज्ञान की समस्याओ से तो मेरा कुछ परिचय है, किन्तु मानव समस्यामो से जूझने की न मुझ में योग्यता है और न अनुभव ही।" आइन्स्टाइन को उनके विशिष्ट अनुसन्धानो--'फोरज' 'तथा 'क्वाण्टम सिद्धान्त' के लिए नोबल पुरस्कार प्रदान कर उनका सम्मान किया गया। १६५० में उनका नया सिद्धान्त 'अविभाजित क्षेत्र' (यूनि- फाइड फोल्ड ) प्रकाशित हुआ, जिसके गणित विषयक सूत्रों में २४ पृष्ठो में गुरुत्वाकर्षण तथा विद्युत चुम्बक के क्षेत्रों को एक हो शृखला से सम्बधित किया है। एटम बम के आविष्कार पर आइन्स्टाइन को बडा पश्चात्ताप हुना। उन्होंने इस पर कहा था-"मेरा स्वप्न या कि एटम को प्रपोम मानव-जाति की सेवा में किया जायेगा, लेकिन इसका उपयोग तो विश्व-सहारक के रूप में हो रहा है।"
एस्वर्ट माइन्स्टाइन
१८ अप्रैल, १९५५ को आइन्स्टाइन की मृत्यु हो गई, तब
भी वह सृष्टि को चलाने वाले अन्तर्यामी नियमो को गणित की
सरलता मे सूनित करने में लगे थे । उनका कहना था-
के मूल में विद्यमान महाशक्ति कोई जुआरिन नहीं है।"
५
मेरी क्यूरी
"भौतिक
विज्ञानवेता
अपनी गवेपणाओ को सर्दष
प्रकाशित करते आए हूँ ।
हमारी खोज का यदि कोई
व्यापारिक लाम है तो वह
केवल एक सयोग की बात है।
हमे इससे लाभ नहीं उठाना
पाहिए। और रेडियम तो रोग
के इलाज में काम आ रहा है,
इससे ही हम लाभ कैसे उठा
सकते हैं
मेरी क्यूरी
मदाम क्यूरी नाम से विश्वविख्यात वैज्ञानिक महिला का
बचपन का नाम मार्जा स्क्लोदोव्स्का था। इनका जम पोलण्ड
के वारसा नगर में प्रोफेसर स्क्लोदोव्स्का के घर ७ नवम्बर,
१८६७ को हुआ था। 'मार्जा' शब्द अंग्रेजी व फॅच 'मेरी' का
पोलिश रूप है।
इनके पिता स्क्लोदोव्स्का वारसा हाई स्कूल मे गणित और
विज्ञान के प्रोफेसर ये और मां मानी हुई प्यानो-वादिका मार्जा
दस वर्ष की थी कि उनकी मां का देहान्त हो गया, उन्हें तपेदिक
हो गया था।
उन दिनो पोलण्ड पर रूस का अधिकार पा। मार्जा के
पिता ने खुलकर पोलण्ड को स्वतन्त्रता का समर्थन किया था,
इसलिए उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। बाद में उन्होंने
अपनी जीविका चलाने के लिए एक बोडिंग स्कूल खोला और
परिवार की जैसे-तैसे गुजर होने लगी।
सन् १८८३ मे हाई स्कूल परीक्षा उत्तीर्ण करने पर मार्जा को
एक स्वर्ण पदक मिला। आगे पढने के लिए पैसे की आवश्यकता
यो, लेकिन परिवार की दशा को देखते हुए मार्जा ने अपनी बडी
बहन योनिया से कहा, "जब तक तुम पढती रहोगी मैं नौकरी
करके तुम्हारी सहायता करूंगी और जब तुम्हारी पढाई समाप्त
हो जाये तो तुम मेरी सहायता करना।"
जिस रूसी परिवार मे मार्जा अध्यापिका की नौकरी करती
थी, उसी परिवार के एक नवयुवक, जो वारसा विश्वविद्यालय
मे पढता था, के प्रेम में असफल होने पर १७ वर्षीया माजाने
अपनी चचेरी बहिन को लिखा था "इस दुखमय ममा में
विदा लेने को इच्छा होती है। मेरे न रहने से ममारोहट
कम क्षति होगी।"
लेकिन मार्जा पढाने का काम करती **
अपनी बहन को नियमित रूप से मोबॉन नहीं।
फिर कोनिया की वारी आई क्योंकि प्रा वाटर दर की
थी और पेरिस मे ही एक महाशदिवासी
कर लिया था।
.
जिहोंने यह दिखाई
r
-
अगली पक्ति में बैठनी, -बडी गुमसुम रहती और लेक्चर समाप्त
होते ही वहां से खिसक जाती I
चार वप तक उन्होंने एकाकी जीवन बिताया। वह पेरिस
के लैटिन क्वार्टर मे ,छठी मजिल के एक कमरे में रहती थी,
जिसमे न प्रकाश आता था और न गरम पानी की सुविधा थी।
डबलरोटी, मक्खन और चाय पर पूरा दिन काट देती थीं।
मास-अण्डे तो सम्भवत वह कमी प्राप्त न कर सको थी।
ब्रोनिया के पति को जब यह मालूम हुआ कि वह भूखी
रहती है, तो वह हठपूर्वक उन्हें अपने यहाँ लिवा लाये । लेकिन
कुछ दिनो वाद ही वह अपने स्थान पर ही लौट गई।
भौतिक शास्त्र, गणित, काव्य, संगीत और खगोल शास्त्र
आदि का मेरी ने गहन अध्ययन किया। सन् १८६३ मे वह
भौतिकी में एम० ए० मे प्रथम रहीं, फिर अगले साल गणित
को एम० ए० मे द्वितीय । इस समय मेरी की अवस्था २७
को थी किन्तु वह घर की दुखद स्मृतियां अभी भी अपने हृदय
से न निकाल सकी थी। वह सुन्दर शुभ्रवर्ण और इकहरे शरीर
की और एकान्तप्रिय थी।
पियरे क्यूरी की उस समय पेरिस मे खूब चर्चा थी। यह
३५ वर्षीय युवक विद्युत् सिद्धान्त पर शोध करने के कारण बहुत
ख्याति अजित कर चुके थे।
सन् १८६४ मे प्रोफेसर कोवाल्स्की के घर ही पियरे और
मेरी का प्रथम मिलन हुआ। कोवाल्स्की एक पोलिश वैज्ञानिक
थे और उन दिनो पेरिस मे आये हुए थे। विज्ञान पर दोनो की
वातचीत हुई और वे पहली मुलाकात में ही एक-दूसरे के काफी
निकट आ गये। मेरी ने शुत्सेनबेर्गेर के यहां काम करने की
वष
7
मेरी क्यूरी।
अनुमति ले लो और पियरे के साथ ही टेबल पर अपने प्रयोगो
में खो गई। कुछ दिनो बाद पियरे ने मेरी से विवाह का प्रस्ताव
किया । दस महीने तक वह उत्तर की प्रतीक्षा करते रहे क्योकि
मेरी का एक फ्रांसीसी से विवाह करने का अर्थ था, अपने देश
मोर परिवार को सदैव के लिए छोड़ देना । मेरो समझ नहीं पा
रही थी कि क्या करें । अन्त मे खूब सोच-विचार लेने के बाद
मेरी विवाह के लिए सहमत हो गई और मदाम क्यूरी (मैडम
का फेन रूप) बन गई।
क्यूरी दम्पति ने पेरिस मे एक साधारण फ्लैट ले लिया।
एक कमरे में दो कुरसियों, एक लम्बी मैज और मेज पर विज्ञान
को ढेरो पुस्तक, एवं लम्प और फूलो का गुच्छा-बस यही
उनका अध्ययन कक्ष था।
विवाह के बाद क्यूरी ने साइकिल पर फ्रांस-ध्रमण किया
और साइकिल यात्रा से लौटकर कुछ समय बाद उन्होंने एक
सुन्दर बालिका को जन्म दिया। वह अब बहुत व्यस्त रहने लगी
घर का काम देखती, बच्ची को सम्भालती और प्रयोगशाला
में भी काम करती।
सन् १८६७ मे मेरीने फेलोशिप प्राप्त की । अब उन्हे डाक्टर
की उपाधि के लिए तैयारी करनी थी और इसके लिए नये विषय
का चुनाव करना था।
क्यूरी दम्पति नै बैकेरल किरणो को अपने शोध विषय के
लिए चुना और वै काम में जुट गये।
उन दिनो इन खोजो से वैज्ञानिको को ससार के चारो ओर
होने वाली रेडियो गति विधि का पता चला था और यह भी
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--
+-
जिन्होंने राह दिखाई ज्ञात हो गया था कि कुछ पदार्थों मे, जैसे यरेनियम और सूर्य की किरणो मे, रेडियम-शक्ति होती है । क्यूरी दम्पति भी उत्साही वैज्ञानिक थे और इसी शक्ति की खोज मे वे निरन्तर प्रयत्नशील थे। आखिर एक दिन मेरी क्यूरी ने इस शक्ति का रहस्य पा लिया। ये पति-पत्नी पिच ब्लैण्ड नाम के काले और कठोर एक पदार्थ पर प्रयोग कर रहे थे। सन १८६८ मे मेरी क्यूरी ने इस पदार्थ के टुकडे करते हुए, इसके मूल तत्वो को अलग-अलग करते हुए एक तत्व की खोज की, जिसका नाम उन्होने अपने हो प्रिय देश की स्मृति मे पोलोनियम रखा और एक दूसरे तत्व का नाम रेडियम रखा। रेडियम में सर्वाधिक रेडियो शक्ति होती है । बैकेरल ने यूरेनियम की खोज की थी, परन्तु मेरी क्यूरी द्वारा खोजे गये पोलोनियम और रेडियम तत्त्वो मे यूरेनियम से अधिक रेडियो शक्ति थी। अभी तक वैज्ञानिक यह पता नही लगा पाये हैं कि बीमारी के क्षेत्र मे रेडियम द्वारा मनुष्य को कितनी सहायता प्राप्त हो सकती है। कैंसर जैसी लाइलाज बीमारियों पर उसका प्रयोग पूर्ण सफल रहा है । टाइफस, हैजा जैसे अनेक भयकर रोगो के कृमि रेडियम द्वारा नष्ट किये जा सकते हैं। रेडियम वास्तव में एक अद्भुत तत्त्व है। यह यूरेनियम से दस लाख गुणा रेडियो-सक्रिय होता है । फोटो फिल्म यदि काले कागज मे भी हो तो भी रेडियम की किरणें उसे पार कर जाती रेडियम गैसो के 'अणुओं' को बायोनाइज करता है, अर्थाद गैसों द्वारा विद्युत्-प्रवाह के लिए सहायता करता है।
मेरी क्यूरी इस खोज पर क्यूरी दम्पति को तरह-तरह के प्रलोभन दिये गये। पियरे ने मेरी के सम्मुख प्रस्ताव रखा, "हम अपने को रेडियम का मालिक मानकर इस विधि को पेटेण्ट करा सकते हैं।" पर मेरी कुछ देर सोचती रही, फिर बोली, "यह असम्भव है । ऐसा करना विज्ञान-मन्दिर को अपवित्र करना है।" उन्होंने समझाया-"भौतिक विज्ञानवेत्ता अपनी गवेषणाओ को सदैव प्रकाशित करते आये हैं । हमारी खोज का यदि कोई व्यापारिक लाभ है तो वह केवल एक सयोग की बात है। हमे इससे लाभ नही उठाना चाहिए। और रेडियम तो रोग के इलाज मे काम आ रहा है, इससे ही हम लाभ कैसे उठा सकते हैं।" इस अनुसन्धान के लिए जो संघर्ष क्यूरी दम्पति को करना पडा, वह वैज्ञानिको के लिए अनुकरणीय है । कठिन परिश्रम के कारण मेरी का स्वास्थ्य गिर गया और अनेक अवसरो पर जब उनमे प्रयोग करने की शक्ति न रहती तो विवश हो वह आराम करने लगती। मेरी को उनके पति पियरे ने अनेक बार इस कठिन कार्य को छोड़ देने का परामश भी दिया, लेकिन मेरी तो अपनी धुन मे मस्त थीं, कोई भी बाधा उनके रास्ते से उन्हें विच- लित न कर सकी। पिषम्लण्ड पदार्थ महंगा था और उसे प्राप्त करने के लिए धन की आवश्यकता थी। ऑस्ट्रिया का सम्राट् क्यूरी दम्पत्ति पर दयालु था और एक बार उसने प्रयोग के लिए एक टन यह महंगो धातु भेजी। ये प्रयोग भी खतरनाक थे। उनमें हर समय चलने का भय रहता था । पदार्थ मे से रेडियम निकालने में बुद्धि और निर्णय मेने की क्षमता की आवश्यकता पड़ती है। इसके पाथ-साप अपेक्षित परिश्रम और सहिष्णुता का अनुमान इस - Yo जिन्होंने राह लिई तथ्य से लगाया जा सकता है कि एक टन पिच ब्लैण्ड में रेडियम निकालने के लिए पचास टन पानी और पांच-छ टन अन्य द्रव्यो का प्रयोग करना पड़ता है। यदि इसमें सफलता मिली तो केवल छ ग्रेन अर्थात् साढे तीन रत्ती ही रेडियम प्राप्त होता + रेडियम के जनक पियरे और मेरी ससार में प्रसिद्ध हो गये। लन्दन की 'रायल सोसाइटी' ने उन्हें भाषण देने के लिए आम- न्त्रित किया और प्रसिद्ध 'डेवी मेडल' देकर उनका सम्मान किया। क्यूरी दम्पति ने अपने वैज्ञानिक अनुसन्धान कार्य में लगे रहने पर भी अपने घर की कभी उपेक्षा नहीं की । मेरी को सन् १६०४ मे दूसरी पुत्री को जन्म देने का गौरव मिला। वे सदैव उन दोनो बच्चो का ख्याल रखते थे। प्राय जब मेरी खाना पकाया करती, उस समय पियरे बच्चो की देखभाल और घर की सफाई करते। पति-पत्नी एक-दूसरे से अत्यधिक प्रेम करते थे और दोनो ने अपने वैज्ञानिक शोध कार्य को अपना साझे का काम बना लिया था। रेडियम की खोज के समय मेरी की अवस्था ३२ वर्ष थी। १० दिसम्बर सन् १६०३ को स्वीडन की साइस अकादमी ने क्यूरी के लिए 'नोबल पुरस्कार' की घोषणा की। हेनरी बैकेरेल भो इस पुरस्कार में भागीदार थे। सोर्वोन विश्वविद्यालय ने अपने पुराने छान और अध्यापक पियरे के सम्मान में एक नया विभाग खोला, जिसका अध्यक्ष पद भी उन्हें ही दिया गया। मेरी अपने पति की मुख्य सहायिका नियुक्ति की गई।
मेरी क्यूरी ४१६ सन् १६०४ को ग्रीष्म में मेरी ने लिखा था -"हमेशा भोड लगी रहती है, लोग हमारे काम मे बाधा पहुंचा रहे हैं। अब मैंने निश्चय कर लिया है कि किसी भी आगन्तुक को इण्टरव्यू नही दूगी। लेकिन फिर भी वे मुझे परेशान करते हैं । सम्मान और प्रसिद्धि से हमारा जीवन अव्यवस्थित हो गया है। हमारा न्ति और व्यस्त जीवन एकदम चौपट हो गया है।" एक पत्र- कार को उन्होंने कहा था-"लोगो के बारे मे जिज्ञासु कम रहो, जिज्ञासु केवल उनके विचारो के वारे मे रहो।" १४ अप्रैल, १६०६ को पियरे ने लिखा था-"मदाम और मैं माथ-साथ खोज कार्य में जुटे हुए हैं।" ये शब्द उन्होने अपनी मृत्यु के पांच दिन पहले ही लिखे थे । १६ अप्रैल, १९०६ को वह सास फैकल्टी के प्रोफेसरो द्वारा दिये गये एक भोज से लौट रहे थे। वर्षा हो रही थी। सडक पार करते हुए घोडाबग्घी ने उन्हे गिरा दिया और दूसरी ओर से आता हुआ एक ट्रक उन पर से गुजर गया। घटना स्थल पर ही उनकी मृत्यु हो गयी। मेरी को सूचना मिली तो वह बहुत देर तक चुप रही । फिर उनके होठ हिले-"पियरे मर गया, मेरा पियरे मर गया सच- मुच मर गया ।" 'पियरे की मृत्यु के बाद सरकार ने मेरी को पेंशन देनी चाही, लेकिन उन्होंने पेंशन लेने से इन्कार कर दिया। १३ मई, १६०६ को अपनी पुरानी परम्परा तोडकर साइस फैकल्टी की कौंसिल ने पियरे के स्थान पर भौतिक शास्त्र के प्रोफेसर के लिए श्रीमती क्यूरी को चुना। इससे 'चारो तरफ एक तहलका मच गया। कुछ वैज्ञानिक इस बात को सहन नहीं कर सके-"एक TOT -
जिहोंने राह दिखाई
औरत, और प्रोफेसर उनका कहना था, "सारा काम पियरे
का था, मेरी ने तो असिस्टेण्ट की तरह कुछ मदद ही की थी,
बस"
सन् १६१० मे उह रेडियम को शुद्ध रूप में प्राप्त करने मे
सफलता मिली। पिंघले हुए रेडियम क्लोराइट (रेडियम का
एक लवण) मे से विद्युत् सचरित करते हुए उन्होंने नेगेटिव
इलेक्ट्रोड पर एक परत सी देखी। उहोने पारे को उबाला और
शुद्ध रेडियम प्राप्त किया।
मेरी को इस खोज पर सन् १९११ मे दोबारा 'नोबल
पुरस्कार' मिला। इससे पहले किसी को भी यह पुरस्कार दो
बार नहीं मिला था।
विश्वविद्यालय ने उनके लिए रेडियम इस्टीट्यूट की स्था-
पना की। मेरी क्यूरी ने देश की राजधानी वारसा में भी एक
रेडियम इस्टीट्यूट पुलवाया।
प्रथम महायुद्ध मे स्वय उनकी देख भाल मे रोगियो पर
रेडियम के परीक्षण किये गये और उनकी सेवा के सम्मान मे
अमरीका के तत्कालीन प्रेसीडेण्ट हाडिंग ने उन्हें एक ग्राम रेडि-
यम और कुछ धन भेंट किया।
सन् १९२६ मे फ्रांस की सरकार ने रेडियम बनाने का
कारखाना और एक अनुसन्धानशाला के लिए मेरी को १५ लाख
मक देने का निश्चय किया।
पति की मृत्यु के बाद मेरी के जीवन के दो उद्देश्य रह गये
थे-अपने पति के काम को आगे बढाना और अपनी बच्चियो
को पालना। उनके लिए अति प्रसन्नता की बात यह थी कि
उनकी पुत्री भी उनके काम में आ जुटी जो अपनी मां से भी
मेरी क्यूरी एक कदम आगे बढने के प्रयास मे थो। १९३५ मे उनकी पुत्री श्रीमती क्यूरी जूलियट को अपने पति के साझे मे रसायन शास्त्र के लिए नोबल पुरस्कार मिला। ये दोनो साधारण तत्त्वो मे रेडियम शक्ति सचालित करने में सफल हुए थे। लेकिन मेरी क्यूरी यह शुभ घडी न देख सकी । युद्ध काल ने चार वर्षों मे घायलो के उपचार के लिए होने वाले रेडियम के निरन्तर सम्पर्क ने घातक प्रभाव डाला और उन्हें बुखार आने लगा। ४ जुलाई, १६३४ को एक सेनेटोरियम मे उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु से एक दिन पहले तक ससार को उनकी दशा के बारे मे कुछ भी पता न था। मदाम क्यूरी ने रेडियम का अनुस धान किया, वही रेडियम 'उनकी मौत का कारण बना । अनके प्रमुख अवयवो को रेडियम की किरणो ने निष्क्रिय बना दिया था।
जगदीशचन्द्र बसु "पेड-पौधों और वनस्पति में भी जीवन है । उनकी प्रत्येक किया-खाने-पीने, जगने-सोने, सर्दी-गरमी की अनुभूति है- वश उत्पति आदि की इच्छा इन्सान के ही समान है। ---जगदीशचन्द्र बसु जगदीशच द्र वसु की गणना विश्व के महान् वैज्ञानिको में की जाती है । वनस्पति शास्त्र तो उनका बहुत ऋणी है । इनका जम वगाल प्रान्त मे ढाका जिले के विक्रमपुर नामक ग्राम के पास राढोखाल गांव मे ३० नवम्बर, १८५८ को हुआ था। उनके पिता भगवानचन्द्र बसु फरीदपुर मे एक उच्च पदाधिकारी थे। वह बडे विचारशील व्यक्ति थे। पिता से साहस, दृढ सकल्प तथा सहानुभूति और माता से भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम के गुणों को ग्रहण कर वालक वसु अपने भविष्य का निर्माण करने लगे। उनके पिता ने उनकी शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया था। अनेक अंग्रेजी स्कूलो के होते हुए भी उन्होने अपने पुत्र को प्रारम्भिक शिक्षा एक ग्रामीण पाठशाला में दिलवाई। वहां वह ४५ ५ - 7 अगवीरावत बसु सीधे-सादे ग्रामीण वालकों के साथ अपनी मातृभाषा बगला का अध्ययन परिश्रमपूर्वक बडे ही मनोयोग के साथ करने लगे। गांव में उन्हे पशु-पक्षी तथा पेड-पौधो के सम्मर्फ में रहने का अवसर मिला। बालक जगदीश इन वस्तुओ को ध्यान से देखते और इनके विषय मे अनेक बातें सोचा करते । इनकी इसी प्रवृति ने आगे चलकर इन्हें एक महान वैज्ञानिक बना दिया। आरम्भिक शिक्षा के बाद बालक जगदीश कलकत्ता के सेंट जेवियर स्कूल में दाखिल हुए। वहां से उन्होंने मैट्रिक की 7 परीक्षा उत्तीर्ण की। तदुपरान्त सेंट जेवियर कालिज से ग्रेजुएट होकर आगे विज्ञान का अध्ययन करने के लिए इगलण्ड चले गये। वहां वह मैडिकल कालिज में दाखिल हो गये।, इस कालिज मे चीड-फार का कार्य करना पडता था, जो उनकी रुचि के प्रतिकूल था, इसलिए उन्होंने विशुद्ध विज्ञान पढने का निश्चय किया। लन्दन के प्राइस्ट कालिज से १८८४ में बी० ए० मे इतने अच्छे अको से उत्तीर्ण हुए कि उन्हें विज्ञान में राष्ट्रीय छात्रवृत्ति प्राप्त हुई। १८८५ मे लन्दन विश्वविद्यालय से वी० एस-सी० की परीक्षा उत्तीर्ण कर स्वदेश लौट आये। लन्दन से लौटने पर श्री बसु की नियुक्ति कलकत्ता के 1 प्रेसीडेंसी कालिज मे भौतिक शास्त्र के प्राध्यापक के रूप में हुई। उन दिनो के शिक्षा के क्षेत्र मे भी अंग्रेज और भारतीय प्राध्यापक मे भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता था। अंग्रेज प्राध्यापक की तुलना मे भारतीय प्राध्यापक को दो-तिहाई वेतन मिलता था । उनकी नियुक्ति के समय उसमें और भी अधिक कटौती कर केवल -- जिन्होंने राह दिखाई आधा कर दिया गया। जगदीशचन्द्र बसु को अंग्रेज शासको का यह पक्षपातपूर्ण व्यवहार बहुत अखरा और इसके विरोध में उन्होंने वेतन लेने से इन्कार कर दिया। वह निरन्तर तीन वर्ष तक बिना वेतन लिये अपना काम करते रहे । परन्तु अध्यापन के काम में वह किसी से पीछे न रहे । वेतन स्वीकार करने के लिए उनकी शर्त यह थी कि इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था तथा कातून को रद्द कर दिया जाये। बिना किसी प्रकार की आय के तीन वष उन्होंने बडे सकट मे व्यतीत किये, पर अपने स्वाभिमान पर तनिक भी आंच न आने दी। अपने स्वाभिमान के साथ-साथ यह उनके लिए स्वदेशाभिमान का प्रश्न भी बन गया था। तीन वर्ष की लम्बी साधना के पश्चात् श्री बसु की विजय हुई। उनको तीन वर्ष कापूरा वेतन एक साथ दिया गया और उनकी नियुक्ति भी स्थायी कर दी गई। १८६५ मे उन्होने अनेक गवेपणापूर्ण लेख लिखे। इनमें से विद्युत सम्बधी दो लेख इगलंण्ड के एक वैज्ञानिक पन मे प्रका- शित हुए। इन लेखो के प्रकाशित होने से उन्हे वडी ख्याति मिली। लन्दन की रायल सोसाइटी के मुखपत्र मे अपने लेख के छपने का गौरव प्राप्त करने वाले वह प्रथम भारतीय थे। विद्युत् के सम्बन्ध में लिखा गया यह लेख इतना अधिक सराहा गया कि उन्हें उसके विषय मे विशेष अनुसन्धान करने के लिए सोसा- इटी की ओर से विशेष छात्रवृति दो गई । दो वप पश्चात् बगाल सरकार की ओर से भो अनुस धान काय के लिए विशेष सहा- यता प्रदान की गई। जगदीशचन्द्र बसु मे एक बहुत बड़ा गुण यह था कि वह जगबीराधा बसु लकीर के फकीर न थे। उनकी विचारधारा पूर्णत, स्वतन्त्रीया और नये अनुसन्धानो द्वारा भारत का गौरव बढ़ाने की प्रबल अमितीषा उनके मन में थी। इसके लिए प्रयोगशाला की आवः श्यकता थी। कालिज की प्रयोगशाला मे अनुसन्धानो के लिए उचित प्रबन्ध न था, इसलिए बसु अपने घर पर ही एक निजी प्रयोगशाला बनाई। इस पर जो खच आया वह उनकी सामर्थ्य से बाहर था, फिर भी मित्रो के सहयोग से वह इस प्रयोगशाला को खोलने मे सफल हुए। १८६६ मे उन्होंने अपने एक नये अनुसन्धान का विवरण प्रकाशित किया। उन्होने अपने अनुसन्धान काय का प्रतिवेदन रायल सोसाइटी लन्दन को भेजा, जिसको पढकर बडा आश्चर्य प्रकट किया गया। लदन विश्वविद्यालय ने इसके लिए उन्हे -टी० एस-सी० की उपाधि से सम्मानित किया। दूसरा अनुसन्धान उन्होंने जो किया, वह था-बेतार के तार का। इटलो के डाक्टर मार्कोनी और एक अमरान भी इस सम्बन्ध मे खोज करने में लगे हुए थे। १८६५ मे जगदीश- चद्र वसु ने बगाल के गवर्नर के सामने इसका सफल प्रदशन किया। उन्होंने बिना तार के ही दूर पर पडे बोझ को हिला दिया था और घण्टी को वजाकर दिखाया था। लेकिन 'वेतार के तार के आविष्कार का श्रेय जगदीशचन्द्र बसु को न मिलकर इटलो के प्रोफेसरे मार्कोनी को मिला। देश को गुलामी का हमे यह मूल्य चुकाना पडा। बाद में मार्कोनी ने यही आविष्कार करके इसे अपने नाम से रजिस्टड करा लिया। जगदीशचन्द्र बसु ने एक विलकुल नया अनुस धान किया- + जिन्होंने राह दिखाई वह था वनस्पति और पशुओ को- एक समान ही प्राणधारी सिद्ध करना। हमारे देश मे इस बात को छोटे-बडे सभी जानते हैं कि वृक्षो मे भी मनुष्यों और पशुओ की भांति जीव रहता है। लेकिन वैज्ञानिको को यह बात वही अटपटी जान पडतो पी। जगदीशचन्द्र ने यही विषय लिया और उन्होने सत्य को ढूंढ़ निकाला तथा , पाश्चात्य वैज्ञानिको के वनस्पति- विज्ञान सम्बन्धी सिद्धान्तो को असत्य सिद्ध करके अपने सिद्वान्त को स्थापना की । उन्होंने प्रयोग द्वारा सिद्ध करके बताया कि "पेड पौधो और वनस्पति में भी जीवन है। उनकी प्रत्येक क्रिया-- खाने-पीने, जगने-सौते, सर्दी-गर्मी की अनुभूति और वश-उत्पत्ति आदि की इच्छा इन्सान के ही समान है।" श्री बसु ने स्वत ही ऐसे यन्त्रों का निर्माण तथा आविष्कार भी किया था, जो वनस्पति में होनेवाली क्रिया अथवा प्रतिक्रिया को स्पष्ट रूप से अकित कर लेते थे। उनमे एक यन्त्र ऐसा था जो सुई से शीशे पर हल्की-से-हल्की क्रिया को भी अकित कर देता था। पौधो द्वारा उद्जन वायु सेवन करने की प्रक्रिया का भी अध्ययन उन यन्तो द्वारा किया जा सकता था। पौधे पर सूर्य के ताप के क्म-ज्यादा पहने के अनुसार धीमी अथवा जोर को आवाज से बजने वाली एक घण्टी का भी उन्होंने आविष्कार क्यिा या । पौधो के पानी मे उत्तेजक पदाथ डालने की जो प्रति- क्रिया होती थी, उसका पजिय भी उस घण्टी से मिल जाता था। अन्य यन्त्रो से पौधों पर वाली क्लोरोफाम की प्रति- क्रिया का भी अध्ययन किया जा सकता था और वह प्रतिक्रिया जगदीशन बसु वैसी ही होती थी जैसी कि जीवधारी प्राणियो अथवा मनुष्यो पर होती है। खिला हुआ फूल उससे मुरझा जाता था। १६०२ मे पेरिस मे विज्ञान कांग्रेस का अधिवेशन हुआ भारत की ओर से जगदीशचन्द्र बसु को वहां भेजा गया। उनके भाषण सुनकर श्रोता बडे प्रभावित हुए। इगलैण्ड की 'रायल सोसाइटी' ने भी उन्हें अपने यहां भाषण देने के लिए निमन्त्रित किया । इस भाषण मे जगदीशचन्द्र बसु ने वृक्षो मे जीव सम्बन्धी अपने सिद्धान्त की व्याख्या की। इनके अनुसन्धान की सच्चाई पर अनेक वैज्ञानिक सहमत न हो सके, क्योकि यह एक बिलकुल अनोखी खोज थी। उन वैज्ञानिको ने स्वप्न मे भी इस ओर नही सोचा था। इसलिए रायल सोसाइटी की पत्रिका में उनका भाषण न छप सका । बसु फिर इगलैण्ड गये और उन्होने प्रयोगो द्वारा सबके सामने अपने अनुसन्धान की सत्यता सिद्ध कर दिखाई। वैज्ञानिको को उनके अनुसन्धान को मानना पड़ा। बसु महोदय ने वनस्पति जीवन को जानने के लिए जिन दो यन्त्रो का आविष्कार किया था, उनमे एक तो रेजीनेंट रिकार्डर पा और दूसरा क्रेस्कोग्राफ। रेजोनेंट रिकार्डर द्वारा पता चल जाता है कि पेड-पौधे खाने-पीने, जगने और सोने आदि को पेष्टाएँ हमारी तरह ही करते हैं। क्रेस्कोग्राफ द्वारा ज्ञात होता है कि कोई पौधा प्रति सेकण्ड कितनी वृद्धि को प्राप्त हो रहा है। यह यन्त्र वास्तविक वृद्धि को ५०० गुना बढाकर दिखाता है। बसु महोदय ने 'वृक्षों मे जोव है' नामक ग्रए १६०६ मे frof.५
मिहोंने राह दिखाई
प्रकाशित कराया था, जिसमे पौधो की चेष्टाएँ, वृद्धि और
विकास की भली-भांति व्याख्या की गई है।
जब वह फ्रांस मे पेरिस की विज्ञान कांग्रेस में सम्मिलित
हुए तो वहां उनका विशेष सम्मान किया गया। वहां रहते हुए
आक्सफोड तथा कम्ब्रिज विश्वविद्यालयो और अमरीका की भी
अनेक सस्थाओ से निमन्त्रण मिले। यूरोप और अमरीका का
उन्होने व्यापक दौरा किया। जहा भी वह गये विज्ञान प्रेमी
उनका भाषण सुनने के लिए उह घेर लेते।
स्वदेश लौटने पर कलकत्ता विश्वविद्यालय ने डी० एस-सी०
की डिग्री देकर उनका सम्मान किया। पजाब विश्वविद्यालय ने
उनको विशेष भापणो के लिए आमनित किया और उन्हें
१,२०० रुपये भेंट दिये, जो विज्ञान का अनुस धान करने वाले
किसी योग्य छात्र को १०० रुपये प्रति माह छात्रवृत्ति देने के
लिए उहोने विश्वविद्यालय को ही सौंप दिये।
१६११ मे सरकार ने उनको सी० आई० ई०, १६१६ मे अम
रीका से लौटने पर सी० एस० आई० और १६१७ मे सर की
उपाधि से विभूषित किया ।
१६१५ मे श्री वसु प्रेसीडेंसी कालेज से निवृत हुए। अपनी
५६ वी वषगांठ पर आपने 'बसु विज्ञान मदिर' की स्थापना
अपने नये भवन मे की । अपने परिश्रम से कमाये रुपयो में
से ५ लाख रुपया इस सस्था को दानस्वरूप दे दिया। अपनी
मृत्यु के समय भी पद्रह लाख रुपया देकर अपना नाम अमर
कर गये।
१९२० मे वे पुन यूरोप की यात्रा पर गये। इस बार मिस्र
-
। भी गये। इगलंण्ड के परराष्ट्र विभाग की ओर से उनके लिए वहां प्रबन्ध किया गया था। यूरोप में उन्होंने अनेक विश्व- विद्यालयो में भाषण दिये। अनेक स्थानो पर उनका हार्दिक अभिनन्दन और स्वागत किया गया। १९२८ मे समका ७० वो शुभ जन्म दिन पडे उत्साह और समारोह के साथ मनाया गया। देश-विदेशो से शुभ कामनाओं के मगलमय सन्देशो का तांता लगा था। महात्मा गांधी ने उन्हें वर्धा से ५ दिसम्बर, १६२८ को एक पत्र मे लिखा था-' यहाँ कूपमण्डूक को तरह रहता हूँ। मुझे मालूम नहीं होता कि इस कुएं की दीवारो के बाहर क्या हो रहा है । मुझे कल ही आपके जन्म दिन मनाये जाने का समाचार प्राप्त हुआ । यद्यपि में देरी से लिख रहा हूँ, फिर भी आपको जो अनेक शुभ काम- नाएँ और बधाइयां प्राप्त हुई हैं, उनमें मेरी भी शुभ कामना और बधाई सम्मिलित कर लें। भगवान मापको चिरायु करे, जिससे कि आपके निरन्तर बढ़ने वाले महान् गौरव एव यश में सारा भारत भागीदार बन सके।" इसी अवसर पर चीन के तत्कालीन शिक्षा मन्त्री ने लिया था-"समस्त विश्व की आंखें आपके उस महान कार्य की ओर सगी है, जिससे माप विज्ञान को आध्यात्मिकता के रग में रग रहे हैं। मापके गोरव से समस्त एशिया अपने को गौरवान्वित अनुभव करता है।" बसु महोदय का कद छोटा था, परन्तु उनके दिम्य पशु और विशाल मस्तक उनके साधारण परिस्व के परिचायक।
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मिहोंने राह दिखा
आप मे धैर्य, संकल्प-शक्ति, दयालुता तथा स्वाभिमान अत्यधिक
था।
सन् १९४३ मे इस महान् वैज्ञानिक का ८५ वप की अवस्था
मै स्वगवास हो गया। निस्सन्देह वह भारत अथवा एशिया ही
के नहीं, अपितु अपने युग के विश्व के एक महान् विज्ञानाचाय
थे।
डॉक्टर चन्द्रशेखर वेंकटरमण "वैज्ञानिसा मूस स्पान सरसरी पार्यालया में नहीं, उसकी अपनी प्रयोगमासा में --टर रमण डॉस्टर पगंवर वाटरमण पा विज्ञान में इतिहास में अदितीय पान | उहाले अपने परिश्रम के बल पर हो अपने भारम्भिय वा निर्माण शिया और अपने जीवन में प्रस्पर em मर गुपोषित मर्यादा ग्यापित की । वनपन मे हो यह पामरी ओर पप्रमर हुए और अपने मा यो विश्न- गाय पो हुए अपने मार पर पहुँचे। पर भरनी TITIENT HTTER मानते , और गो में यह नाविन्मान. भौमाधना मेमोन गहन। TER RETR ऐ दाम जिन्होंने राह दिखाई परिवार में हुआ था, जो अपनी विद्या बुद्धि के लिए पहले से ही प्रसिद्ध था। उनके पिता श्री रामनाथ चन्द्रशेखर भौतिक विज्ञान के एक सफल अध्यापक थे और उनका मातृकुल संस्कृत के पाण्डित्य के लिए प्रसिद्ध रहा है। उनके नाना इतने अधिक स्वाध्याय प्रेमी थे कि उन्होने न्याय शास्त्र के गूढ रहस्यो को समझने और उसमे पारगत होने के विचार से मद्रास राज्य से पूर्वी बगाल के नदिया जिले तक की पद-याना की थी। बालक रमण को अपने पितृ-कुल से जहां विज्ञान-प्रेम मिला, वहां उन्हे अपने मातृ कुल से स्वाध्याय प्रेम उपलब्ध हुआ। रमण के विद्यार्थी जीवन मे ये दोनो गुण निरन्तर विकसित होते रहे । १२ वर्ष की अल्प अवस्था में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीण की। फिर ए० वी० एन० कालिज, विशाखापट्टनम तथा प्रेसीडेंसी कालिज, मद्रास मे उन्होने शिक्षा प्राप्त की। एफ० ए० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के उपरान्त उन्होंने प्रेसीडसी कालिज, मद्रास से बी० ए० को परीक्षा उत्तीण की। विश्वविद्यालम मे वह सर्वप्रथम रहे, फलस्वरूप उन्हें अनेक पदक प्राप्त हुए । इसके बाद उन्होंने भौतिक विज्ञान मे एम० एस-सी० को परीक्षा उत्तीर्ण की, जिसमे वह सर्वप्रथम आये । इस परीक्षा मे इन्होंने इतने अक प्राप्त किये थे, जितने उनके पूर्व किसी परीक्षार्थी को नहीं प्राप्त हुए थे। १९०७ मे शिक्षा प्राप्त करने के बाद रमण हिप्टी एका उण्टेण्ट जनरल नियुक्त हुए। उस समय उनको अवस्था १६ वर्ष को पी। इस छोटी अवस्था में ही अपनी मेधावी प्रतिभा से उन्होंने अपने अधिकारियो को नाश्चर्यचकित कर दिया। वह । , डॉक्टर पशेषर वेंकटरमण ५५ बडे मेहनती और अध्ययनशोल थे । कार्यालय मे फाइलें निपटाने के अतिरिक्त वह अपनी विज्ञान-पिपासा को भी शान्त करते रहते थे । डिप्टी एकाउण्टेण्ट जनरल के सम्मानित पद पर आसीन होते हुए भी वह एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक होने का स्वप्न देखा करते थे। वह 'लक्ष्मी' की नही, बल्कि सरस्वती की उपासना में अधिक आनन्दित होते थे। उन दिनो सर आशुतोष मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय मे थे और उन्हें अपने भौतिक विभाग के लिए एक सुयोग्य अध्यापक की आवश्यकता थी। वह रमण की प्रतिभा से पहले से ही परिचित थे, इसलिए उन्होने रमण को अपने यहां बुलाना चाहा। रमण ने सहप अपनी स्वीकृति दे दो और वह सरकारी नौकरी छोड कर सन् १६१७ मे कलकत्ता चले गये। रमण ने कलकत्ता विश्वविद्यालय मे बडे परिश्रम से कार्य किया। उनके अनुसन्धान का मुख्य विषय था-'प्रकाश और रग।' उहोंने आसमान मे कुहरे और बादलो से बने हुए रंगीन किरीट एव इद्र-धनुष के रगो की व्याख्या की । अभ्रक वे अति सूक्ष्म पटल (फिल्म) आदि के रगो का विश्लेषण और अध्ययन भी उन्होंने इसी समय शुरू किया। विदेशो में उनके इन अनु सधानो का सबसे अधिक प्रचार हुआ और वह प्रकाश-विद्युत के प्रमुख वैज्ञानिक माने जाने लगे। १६२१ में उन्होंने प्रथम वार प्रयोग के लिए समुद्र-यातायी। इस यात्रा से रहे समुद्र के जल के गोले होने के कारण पर विचार करने को प्रेरणा प्राप्त हुई। सितम्बर में यह पारस लौट आये। इसके पश्चात् उन्होने जल और उसके रामा।
जिन्होंने राह दिखा द्रव मे होकर प्रकाश के आर-पार जाने का अनुशीलन आरम्भ किया। अनेक वर्षों तक वह अपने इस अन्वेषण में जुटे रहे। अन्त मे उन्हें अपने प्रयोग में सफलता मिली और उन्होने यह प्रमाणित किया कि अणुओ की गति के कारण प्रकाश का परि- क्षेपण होता है । यह परिक्षेपण केवल पारदशक पदाय मे ही नही होता, वरन् बफ और स्फटिक-जैसे ठोस पदार्थ मे भी होता है। उनका यह सिद्धात 'रमण प्रभाव' के नाम से सन् १६२६ में प्रकाशित हुआ। १६३० मे उनके अनुस धान- 'रमण प्रभाव'-पर उन्हें 'नोबल पुरस्कार' प्रदान किया गया। भारत मे रवीन्द्रनाथ ठाकुर के पश्चात् रमण ही दूसरे नोबल पुरस्कार विजेता हैं। डॉक्टर रमण असाधारण प्रतिभावाले असाधारण वैज्ञानिक थे। विज्ञान का सर्वोच्च पुरस्कार 'नोबल पुरस्कार' प्राप्त करने के बाद भी वह अपने प्रयोगो मे दिन-रात लगे रहते थे। कल- कत्ता विश्वविद्यालय के अध्यापन काय से मुक्त होकर वह बगलौर मे स्थायी रूप से रहने लगे। १६३२ से अन्त तक वहाँ के 'इण्डियन इस्टीट्यूट आफ रिसच' मै अपने अनुस धान कार्यों से रत रहे। इस सस्था में उन्होने भौतिक विज्ञान से सम्बद्ध एक प्रयोगशाला की स्थापना भी की है और उनका सारा समय इसी प्रयोगशाला मे व्यतीत होता। उनके कुशल निर्देशन मे अनेक स्नानको ने इस प्रयोगशाला मे अनुस धान काय किये। सर के० एम० कृष्णन सहश रत्न इसी प्रयोगशाला की देन हैं। डॉक्टर रमण स्वतन्त्र विचारधारा के सर्वोच्च वैज्ञानिक थे।
साफ्टर चद्रशेखर वेंकटरमण वह अपने अनुसन्धान कार्यों मे किसी का हस्तक्षेप सहन नही करते थे। उनकी विचारधारा प्राचीन ऋषि मुनियो की वाणी से प्रभावित थी और इसी कारण वह इस निष्कप पर पहुंचे कि किसी भी सरकार को किसी भी वैज्ञानिक के काय में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। वह अपने विचार के अनुसार कोई ऐसी राजकीय सहायता स्वीकार नहीं करते थे जिसके साथ कोई शत जुडी होती थी। उन्हे किसी के आश्रय मे रहना भी अच्छा नही प्रतीत होता था। स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त भारत सरकार ने अपने वैज्ञानिक अनुसन्धान विभाग में कार्य करने के लिए उन्हे एक उच्च पद देने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन स्वाभिमानी रमण ने अपनी स्वतन्त्र प्रकृति के कारण उसे अस्वीकार कर दिया। उन्होने कहा था-"वैज्ञानिक का मूल स्थान सरकारी कार्यालयो मे नही, उसकी अपनी प्रयोगशाला मे है ।" डॉक्टर रमण केवल एक शुष्क वैज्ञानिक ही नही थे। वह प्रकृति के उपासक, साहित्य-प्रेमी और सगीत प्रेमी भी थे । उनका उद्यान उनके प्रकृति-प्रेम का सुन्दर उदाहरण है। वह अपने उद्यान की साज सज्जा मे बहुत रुचि रखते थे। उनकी प्रयोगशाला भी बहुत आकर्षक है, लगता है, जैसे वह किसी कलाकार की प्रयोगशाला हो। इस प्रयोगशाला में विज्ञान के दुर्लभ यन्त्र विद्यमान हैं। प्रयोगशाला मे भाति-भांति के रत्नो का संग्रह उसकी अपनी विशिष्टता है। इन सबके बावजूद उसमे नाना प्रकार को रग-बिरगी तितलियां और पुष्प उसकी शोभा मे चार चांद लगा देते हैं । डॉक्टर रमण को फूलो से अति प्रेम था और - - जिहोंने राह दिखाई उनको प्रयोगशाला मे पहुँच कर लगता है कि दशक भूलकर किसी फूलो की प्रदशनी मे आ गया हो। डॉक्टर रमण के दोघ एव स्वस्थ जीवन का रहस्य या उनका मानसिक उल्लास और अनासक्त सलग्नता। वह वास्तव में विज्ञान के मौन साधक थे। अपनी प्रयोगशाला मे मानसिक श्रम करते-करते जब वह क्लात होकर घर लौटते तब वह अपनी पत्नी के साथ वीणा का आनद लेते । उनकी पली वीणा बजाने में बडो निपुण थी। कभी-कभी अपनी मानसिक थकान को दूर करने के लिए वह साहित्य-चर्चा मे रम जाते । उहें कविता पढने और सुनने में रुचि थी। राजनीति, भाषा, और अथ- विषयक समस्याओ पर भी वह एकाग्रचित्त हो विचार करते। उनकी इन विषयो से सम्बद्ध विचारधारा से प्रतीत होता है कि वह जागरूक, लेकिन सरल स्वभाव के एक वंज्ञानिक थे। अपनी प्रयोगशाला मे रहते हुए भी वह ससार की गतिविधि पर अपना ध्यान केंद्रित रखते और अपने विचार प्रकट करते रहते । उहोंने सगीत-वाव्यो पर भी एक पुस्तक लिखी थी। यह उनकी सगीत में रुचि होने का स्पष्ट प्रमाण है। डॉक्टर रमण ने जितना भी यश अजित किया वह केवल अपनी प्रतिभा और अध्यवसाय के बल पर ही। वह फीवर्ग के पी० एच-डी०, ग्लास्गो के एल० एल० डी० और पेरिस में डी० एस-सी० थे। १६४१ में अमरीका के पलाडलफिया को झकलिन इस्टी. टूयूट ने उहें 'कलिन पदर' देकर उनका सम्मान दिया। वह सदन की 'रॉयल सोसाइटी के 'फेलो' थे। इन उपाधियों और ५६ गफ्टर चद्रशेखर वेंकटरमण सम्मानो के अतिरिक्त वह 'इण्डियन अकादमी आफ साइस' के अध्यक्ष और भौतिक विज्ञान के नेशनल रिसर्च प्रोफेसर रहे थे। १६४७ मे उन्हे अन्तर्राष्ट्रीय लेनिन पुरस्कार भी मिला। "रमण इफेक्ट' अर्थात् 'रमण प्रभाव' पर तत्कालीन विदेशी सरकार ने उन्हे 'सर' की उपाधि देकर सम्मानित किया । सन् १९५४ मे भारत सरकार ने उन्हे 'भारत रत्न' की उपाधि देकर उनका सम्मान बढाया । उन्होने अपने जीवन-काल मे ही विश्व- विख्यात सम्मान और यश अजित किया। आधुनिक प्रकाश विज्ञान के क्षेत्र मे डॉक्टर रमण के 'रमण प्रमाव' का स्थान अति महत्वपूर्ण है । आधुनिक विज्ञान को उनकी यह मौलिक देन है । उनके इस अन्वेषण ने ही उहे 'रत्नो' | और 'हीरो' के बनाने की प्रेरणा दी। एक बार कुछ पत्रकार उनकी प्रयोगशाला मे आये। डॉक्टर रमण ने एक पत्थर का टुकडा-जैसा पदाथ उठा लिया। इसके बाद उन्होने 'आल्ट्रा वायलट' किरणो की लघु और दीर्घ धाराओ (वेव) से उसे परिष्कृत और सस्कृत किया। कुछ ही मिनटो मे वह प्रस्तर खड चमकने लगा। यह देखकर पत्रकार विस्मित रह गये । डॉक्टर रमण एक अच्छे लेखक भी थे । विज्ञान की अत्यन्त जटिल बातो को वह सरल भाषा और आकर्षक शैली मे अभि- ध्यक्त करने मे सिद्धहस्त थे। उनके लेख भारत, इग्लण्ड और अमरीका की वैज्ञानिक पत्र-पत्रिकाओ मे निरन्तर प्रकाशित होते रहते थे। गम्भीर होने के साथ-साथ वह अति विनोदी प्रकृति के थे। एक बार वह मास की एक पार्टी मे सम्मिलित हुए। वहां उन्होने
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जिन्होंने राह दिखाई
अपने अनुसन्धान 'रमण प्रभाव' पर भाषण दिया। भाषण के
बाद पार्टी आरम्भ हुई। पेय-पदार्थों मे मदिरा के प्याले रखे
गये। डॉक्टर रमण ने मुस्कराते हुए कहा-"आप लोगो को
शराब पर 'रमण प्रभाव' अभी बता चुका हूँ, आप अब रमण
पर शराब का प्रभाव देखना चाहते है।"
उनका यह व्यग्य शराब पर था। इसी प्रकार एक व्यग्य
उन्होंने जमन वैज्ञानिक लावे पर कसा था। लावे के आविष्कार
को 'लावे-चिन' कहते हैं। एक बार श्री लावे नगे होकर समुद्र
तट का आनद ले रहे थे। उसी समय कुछ व्यक्तियो के साथ
डॉक्टर रमण भी उस स्थान पर पहुँच गये । लोग लावे की उसी
मुद्रा का चिन उतारने लगे। डॉक्टर रमण उस समय स्वय को
रोक न सके। उन्होंने कहा-“यही वास्तविक 'लावे-चिन'
होगा उनका इतना कहना था कि पूरा समुदाय ठहाका मार
कर हंस पड़ा।
यद्यपि जीवन के अतिम समय मे वे हृदय-रोग से पीडित
थे, फिर भी निरन्तर कार्य करते रहे। २० नवम्बर, १६७० को
बगलौर स्थिति अपने निवासस्थान पर भारत के इस गौरवशाली
तुन ने अपनी जीवन-लीला समाप्त की।
डा० होमी जहाँगीर भाभा
"सच्चे वैज्ञानिक 'का
जीवन सतत् सत्य की खोज
के लिए सघषरत रहता है ।
वह सदैव सत्य की खोज मे
रहता है - सत्य जो सिद्ध
किया जा सके और जिसकी
सत्यता में सदेह के लिए
कोई स्थान न हो। फिर इस
सत्य का उपयोग भी भानव
* कल्याण के लिए किए जा
-~डॉक्टर मामा
डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा की गिनती विश्व के चोटी
के वैज्ञानिको मे की जाती है। ३० अक्टूबर, १६०६ को बम्बई
के एक सम्मानित एव सुसंस्कृत पारसी बैरिस्टर श्री जे० एच०
भाभा के यहां उनका जन्म हुमा । घर में किसी चीज का अभाव
न था और पूरा परिवार शिक्षा-प्रेमी था। ऐसे वातावरण मे
बालक भाभा को वही प्रेरणा मिली । उनको शिक्षा कैथेड्रल हाई
स्कूल मे प्रारम्भ हुई । १५ वर्ष की अवस्था मे उहोंने 'सीनियर
कैम्ब्रिज' की परीक्षा सम्मान के साथ उत्तीर्ण की। फिर उन्होंने
कुछ दिनो एलफिस्टन कालिज में अध्ययन करने के उपरान्त
बम्बई विश्वविद्यालय के 'रायल इस्टीट्यूट आफ साइस' मे प्रवेश
लिया औरयहां से उन्होंने आई० एस-सी० की परीक्षा प्रथम श्रेणी
में उत्तीर्ण की। आई० एस-सी० की परीक्षा उत्तीर्ण कर फिर.
जिहोंने राह दिखाई एलफिस्टन कालिज में अध्ययन करने लगे और १६२६ ई० में एफ० वाई० ए० को परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इन तीनो परीक्षाओ मे विज्ञान और गणित उनकी रुचि के विषय थे। इसके बाद भाभा के पिता ने उन्हे पढने के लिए इग्लैण्ड भेज दिया और वहां वह कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के अन्तगत 'गानवाइल' और 'केयस' नामक कालिजो मे अध्ययन मे जुट गये। भाभा का विद्यार्थी जीवन अत्यन्त सरल और सवथा आडम्बरहीन था । वह बडे परिश्रमी छान थे। इग्लण्ड में रह- कर भी वह वहां के विलासी वातावरण मे दूर ही रहे। वह बडी लगन से अध्ययन करते रहे और १६२६ ई० मे 'मेकेनिकल साइस ट्राइपास' परीक्षा का प्रथम खण्ड उत्तीण किया और अगले वर्ष द्वितीय खण्ड प्रथम श्रेणी में उत्तीण कर बी० ए० की डिग्री प्राप्त की। कालिज के वार्षिक अवकाश को इधर-उधर सैर-सपाटे मे न खोकर उन्होने से छुट्टियां 'रगबी' के 'ब्रिटिश टामसन हुस्टन वस' मे अप्रटिश के रूप में बितायी और इजीनियरिंग की व्यावहारिक शिक्षा प्राप्त की । उन दिनो मेकेनिकल विज्ञान (इजीनियरिंग) ट्राइपास की परीक्षा छ विषयो मे होती थी, भामा ने सभी विषयो मे परीक्षा दी और उनमे उच्च अक प्राप्त कर अपने मेधावी होने का.प्रमाण दिया। उनकी असाधारण प्रतिभा से प्रभावित हो उनके शिक्षको की उन पर विशेष कृपा होने लगी थी, जिसके कारण वे उन्हें अध्ययन में प्रत्येक प्रकार का सहयोग देते थे।
मक्टर होमी जहाँगीर मामा १९३०-३१ मे भाभा ने भौतिक विज्ञान के ख्याति प्राप्त प्रोफेसर डाइरेक और प्रोफेसर माह के साथ रहकर भौतिक विज्ञान का गम्भीर अध्ययन किया। इही वैज्ञानिक मनीषियो के कारण भाभा सैद्धान्तिक भौतिक विज्ञान मे पारगत हो सके। यह केयस कालिज के विद्यार्थी रहे थे, इसीलिए कालिज के अधिकारियो ने १६३२ मैं उन्हें गणित के विशेष अध्ययन के लिए 'राउस बाल ट्रेवलिंग स्टूडेण्टशिप' छात्रवृत्ति प्रदान की, जिससे उन्हे यूरोप की यात्रा करने का सुअवसर मिला । १९३२ में वह ज्यूरिख गये और वहां प्रोफेसर डब्लू० पालि के सम्पर्क में रहकर १६३४ तक गणित का विशेष अध्ययन किया। अपना अन्वेषणात्मक मौलिक निबन्ध भी उन्होने वही लिखा था। इस निबन्ध का वैज्ञानिको पर वडा अच्छा प्रभाव पड़ा और उनकी ख्याति चारो ओर फैल गई। १६३४ मे वह ज्यूरिख से रोम गये और वहां उन्होंने प्रोफेसर फर्मी के साथ रहकर अध्ययन किया । फिर रोम से वह यूट्रैक्ट गये जहां उन्होंने प्रोफेसर केमस के सम्पर्क मे रहकर कुछ दिनो तक अध्ययन किया। १६३४ मे ही उन्हें उनकी असाधारण प्रतिभा से प्रभावित हो 'माइजक न्यूटन छात्रवृत्ति प्रदान की गई। उन्होंने इसी वर्ष पी-एच० डी० की उपाधि प्राप्त की। उन्हें १६३६ मे १८५१ को प्रदर्शनी को उच्चतर छात्रवृत्ति भी लगातार तीन वर्ष तक प्राप्त होती रही । इन छात्रवृत्तियो को प्राप्ति से सम्पूर्ण यूरोप के विश्वविद्यालयो के वैज्ञानिको पर उनकी विद्वत्ता और जिहोंने राह दिखाई असाधारण प्रतिभा की धाक बैठ गई। सब जगह उनका सम्मान होने लगा। उन्होने लगातार पांच महीने तक कोपेनहे- गन स्थित नील्स-बोह भौतिक प्रयोगशाला मे शोध कार्य किया। १६३७ मे प्रोफेसर मेक्सबान ने एडिनबरा मे उन्हे 'कास्मिक किरण-प्रसार' पर भाषण देने के लिए आमन्त्रित किया। वहां उन्होने कई भाषण दिये । उनके इन भाषणो तथा शोध काय मे उनकी सफलता से प्रभावित होकर 'रायल सोसाइटी' ने अपने 'माण्ड-फण्ड' से आर्थिक सहायता देकर उनको प्रोफेसर ब्लेकेट की मैनचेस्टर स्थित 'कास्मिक किरण अनुस धानशाला' मे काय करने के लिए आमन्त्रित किया और कैम्ब्रिज मे शोध कार्य करने की हर सम्भव सुविधा भी प्रदान की। यूरोप मे अपनी प्रतिभा से वहां के वैज्ञानिको को प्रभावित कर तथा सर्वोच्च सम्मान प्राप्त कर वह १६४० ई० मे स्वदेश लौट आये। १९४० मे वगलौर के 'इण्डियन इस्टीट्यूट आफ साइस मे सैद्धान्तिक भौतिक विज्ञान के विशेष रीडर नियुक्त हुए। १६४२ मे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने उन्हें 'एडम्स 'पुरस्कार' प्रदान किया और इसी वर्ष वह बगलौर के 'इण्डियन इस्टीट्यूट आफ साइस' मे कास्मिक किरण शोध के प्रोफेसर पद पर नियुक्त किये गये तथा १६४५ तक वह इस पद को सम्भाले रहे। १९४४ में पटना विश्वविद्यालय ने उन्हे 'डाक्टर आफ साइस' को सम्मानित उपाधि प्रदान की। १६४५ मे उन्होंने बगलौर से नौकरी छोड दो और फिर वह 'टाटा इस्टीट्यूट आफ फण्डा• मेण्टल रिसर्च' बम्बई के निदेशक नियुक्त हुए।
। गदर होमी जहाँगीर मामा १६४७ में भारत के स्वतन्त्र होने पर उन्हें भारतीय अणु- शक्ति आयोग का चेयरमेन घोषित किया गया। १६४८ मे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने उन्हे 'हपकिस पुरस्कार प्रदान किया। १६४६ में लखनऊ और १६५० मे काशी विश्वविद्यालय ने डी० एस-सी० को सम्मानित उपाधि देकर उनका गौरव बढ़ाया। १६५१ मे 'इण्डियन साइस कांग्रेस के सभापति बने । १६५२ में आगरा और १६५४ में पथ विश्वविद्यालय ने उनकी विद्वत्ता का सम्मान करने के लिए उन्हें डी० एस-सी० की सम्मानित उपाधियाँ प्रदान की। १६५४ मे उनकी देश और विज्ञान की सेवाओं के प्रति राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने उन्हे 'पद्मभूषण' उपाधि से विभूषित किया । इसी वर्ष उन्हें सरकारी 'परमाणु-ऊर्जा विभाग का सचिव पद प्रदान किया गया। १९५५ मे जनेवा में होने वाले सर्वप्रथम 'इण्टरनेशनल एटा- मिक एनर्जी कान्फन्स' के वह अध्यक्ष निर्वाचित हुए १६५७ मे कैम्ब्रिज के केयस और गानवाइल नामक कालिजो ने उन्हें अपना-अपना 'फलो' चुना । इसी वर्ष वह एडिनबरा की 'रायल सोसाइटी' के फेलो बनाये गये। अमरीका की 'अकादमी आफ आर्ट एण्ड साइस' ने भी उन्हे अपनी सस्था का सदस्य बनाया। १६५६ मे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने और १९६० विश्वविद्यालय ने उनको 'डाक्टरेट' की उपाधि प्रदान की। सभी देशो में इतना अधिक सम्मान और उनके सम्मान- जि. रा०दि०-५ मे लन्दन जिहोंने राह दिखाई प्रदर्शन के लिए सम्मानित उपाधियो की यह वर्षा इस बात की पुष्टि करती है कि डॉक्टर भाभा आज के नाभकीय युग की दिव्य विभूति थे। लेकिन ऐसे कर्मठ वज्ञानिक के लिए कोई भी सम्मान वडा नही है । वास्तविकता तो यह है कि विश्व की अनेक शिक्षण एव वैज्ञानिक सस्थाओ ने उन्हें सम्मानित कर अपना ही गौरव बढाया है। विज्ञान के क्षेत्र मे उन्होने जो शोध कार्य किया है और उसमे जो उपलब्धियां प्राप्त की हैं, वे अमूल्य हैं। सम्मान अथवा ख्याति प्राप्त करने को चाह से उन्होंने परमाणु शक्ति का अध्ययन एव अनुस धान नही किया, वरन मानव सेवा का व्रत ही इसकी भूल प्रेरणा रहा । परमाणु शक्ति की जिस भयकरता की कल्पना पर आज का मानव थर-थर कांप रहा है, उसे निर्मूल करना और परमाणु शक्ति का उपयोग मानव की सुख-सुविधा की वृद्धि मे करना उनकी वैज्ञानिक साधना का ध्येय रहा है । वह मृत्युपर्यन्त अपने इसी लक्ष्य को ट्राम्वे के परमाणु शक्ति सस्थान मे सफल बनाने के लिए रात-दिन लगे रहते थे। इस परमाणु शक्ति संस्थान का उद्घाटन स्वर्गीय प्रधान मन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने १६५४ में किया था। इसमे दो मुख्य भट्टियां हैं-एक 'अप्सरा' जिसका निर्माण १६५६ में हुआ था और जो अब सफलतापूर्वक कार्य कर रही है । इसके द्वारा रेडियो-सक्रिय आइसटोपो का निर्माण- कार्य होने लगा है, जो भांति-भांति के अनुस धान कार्यों में प्रयोग किये जा रहे हैं। दूसरी भट्टी का नाम है-'जरलीना'। यह परमाणु भट्टी कई करोड रुपयो की लागत से कनाडा के ६७ माटर होमी जहांगीर मामा सहयोग से बनाई गई है । इसका उद्घाटन १६ जनवरी १६६१ को पडित जवाहरलाल नेहरू ने किया था। 'जरलीना भट्टो' विश्व की सबसे बड़ी भट्टियो मे से एक है और इसके द्वारा प्रत्येक प्रकार के आइसटोप निर्मित किये जा रहे हैं । इसके अतिरिक्त एक थोरियम यन्त्र भी कार्य कर रहा है, जिसमें परमाणु शक्ति के उत्पादन के लिए आवश्यक योरियम और यूरेनियम को शुद्ध कर परमाणु भट्टी मे प्रयोग करने के योग्य बनाया जाता है। डॉक्टर भाभा सदैव अणुशक्ति के शान्तिपूर्ण उपयोग के । समथक रहे। अक्तूबर १९६४ मे एक भेंट में उन्होंने कहा था-"भारत नेचुरल यूरेनियम से यू-२३५ निकालने का कार- खाना नही लगायेगा।" उन्होने कारण बताते हुए कहा-"यह एक खर्चीला काम है और हम अपने साधन-स्रोतो का अपव्यय नही करेंगे।" १६६४ मे आकाशवाणी पर बोलते हुए डॉक्टर भाभा ने इस बात पर जोर दिया था कि पूर्ण निरस्त्रीकरण के लिए निश्चित व प्रभावकारी पग उठाए जाने चाहिए, क्योकि अणु वम बनाने पर बहुत कम व्यय होता है । और फम व्यय मे बनने के लालच में अनेक देशो को इसे बनाने का भूत सवार हो सकता है, जो अत्यन्त भयानक पग होगा और विश्व शान्ति के खतरो को और बढायेगा। १६६४ मे तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री ने डॉक्टर मामा के सामने अणु शक्ति और वैज्ञानिक शोध- मन्त्री के रूप में केन्द्रीय मतिमण्डल मे आने का प्रस्ताव रखा जिन्होंने राह दिखाई सेकिन डाक्टर भाभा इस प्रस्ताव को स्वीकार न कर सके। १९६३ मे वह न्यूयाक साइस अकादमी के आजीवन अवत निक सदस्य चुने गये। डॉक्टर भाभा मानवता के पुजारी थे। यह जानते हुए भी कि भारत नाभकीय विस्फोटो के निर्माण मे पूर्णरूपेण समर्थ है, वह परमाणु शक्ति का उपयोग मानव-कल्याण मे करने के लिए सतत प्रयत्नशील रहे। उनका विश्वास था कि परमाणु शक्ति खाद्यान्न उत्पादन और उसकी सुरक्षा के लिए अत्यन्त उपयोगी होगी। उनका यह भी कहना था कि विकिरण द्वारा कीडो की वृद्धि को भी रोका जा सकता है, इसीलिए वह फसलो की सुरक्षा सम्बधी प्रयोगो मे भी लगे रहते थे । अहमदाबाद के निकट तारापुर मे परमाणु बिजलीघर बनाने का कार्य भी उन्ही को सौंपा गया था। केरल के तट पर परमाणु-खनिज मोनेजाइट पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। वहाँ थोरियम-खनिज के छिपे भण्डार का पता चला है । इन्ही क्षेत्रो मे यूरेनियम भी प्राप्त होता है, जिससे प्लूटोनियम का उत्पादन सरलतापूर्वक किया जा सकता है । इस प्रकार हमारा देश अणु शक्ति के स्रोतो से भी सम्पन्न है। परमाणु परीक्षण की दृष्टि से भी देश अग्रणी है और आवश्यकता पड़ने पर वह नाभकीय विस्फोटक भी बना सकता है। डॉक्टर भामा से देश को ही नही बल्कि समूचे ससार को बडी-वडी आशाएं थी। डॉक्टर भाभा एक महान वैज्ञानिक होने के साथ साथ ललित कलामो के भी प्रेमी थे। उन्हें सगीत का शौक था और स्वय बड़े अच्छे चित्रकार भी थे।
शहर होमी जहांगीर भामा
२४ जनवरी, १९६६ को यूरोप जाते हुए एक विमान
दुर्घटना मे डॉक्टर भाभा का देहान्त हो गया और ससार ने एक
महान् अणु-वैज्ञानिक को अपने बीच से खो दिया, जो अणु शक्ति
को मानव के कल्याण के लिए शान्तिपूर्ण कार्यों मे नया मोड
देने में सफल हुआ था।
यह उन्ही की प्रतिभा और कुशल निर्देशन था, जिसने
भारत को गणना विश्व के चार-पांच समुन्नत अणु राष्ट्रो में
करा दी।
राबर्ट एडविन पेरी
"शारीरिक, मानसिक
और नैतिक, जो भी शक्ति
मेरे मदर है, यह मैं इस
(उत्तर प्रद अभियान)
पर लगा दूंगा।'
-ए-दिन पेरी
राबर्ट एडविन पेरी ने अपना समस्त बचपन इस प्रकार
से व्यतीत किया कि आगे चलकर इससे उसे उत्तर की ओर
ध्रव की खोज करने में बडी सहायता मिली। देखने मे ऐसा
प्रतीत होता था मानो ईश्वर ने उन्हें महान और कठिन काय के
लिए ही बनाया हो । उनका कद लम्बा, भारी कन्धे और चौडी
छाती थी। उनकी मूछे धनी और लम्बी थी तथा उनके चेहरे
पर बाद में सद हवाओ मे निरन्तर रहने के कारण चिह्न और
रेखाएँ पड़ गई थी।
६ मई, १८५६ को एडविन पेरी का जम पेनसिलवानिया
की कैम्बिया काउटी में हुआ, जहां उनके माता-पिता कुछ दिनो
पहले मेने से आकर बस गये थे। उनके पिता की मृत्यु के बाद
राबर्ट एविन पेरी उनको मा मेने में अपने सम्बन्धियो के पास जाकर रहने लगी थी और पेरी का जीवन, उस स्थान पर व्यतीत हुआ जो अब पोट- लैण्ड का एक भाग है। हाई स्कूल की शिक्षा समाप्त करके वह बोडोइन कालिज में दाखिल हुए, जहां वह कुशल खिलाडी होने के साथ-साथ सिविल इजीनियरिंग के प्रतिभाशाली विद्यार्थी थे। उनके एक प्रोफेसर का कहना था कि जितना मैंने पेरी को सिखाया, उतना ही मैंने उनसे सीखा। उस समय अधिकांश लोग पैदल चला करते थे और पेरी के लिए पच्चीस-पच्चीस मील चले जाना साधारण-सी बात थी। एक बार वह साढे आठ घण्टे मे तीस मील पैदल चले । कालिज मे नाव चलाने वालो मे वह सबसे आगे निकल गये। एक बार उहीने ३१६ फुट की ऊंचाई पर गेंद फेंककर अपने सब साथियो को विस्मित कर दिया । इन सब गुणो के अलावा वह एक अच्छे तैराक और नाविक भी थे। पेरो कालिज से इजीनियरिंग मे स्नातक बनने के बाद माय- वग मे इजीनियर लग गये। अब भी उनकी खेलो मे दिलचस्पी पहले जैसी ही थी-वह सर्दी मे पहाडो पर से फिसलना और स्केटिंग पार्टियो और नाटको मे भाग लेना पसन्द करते थे। उहोने गाना सीखने का अभ्यास किया। जवान घोडो को साधने मे उहे बडा आन द मिलता था। उहोंने ड्राइग बनाना भी सीखा, जो उनकी उत्तर की यात्राओ मे नक्शे और चार्ट आदि बनाने के बडी काम आई। वास्तव में ऐसा कोई कार्य न था जिसे पेरी ने अच्छी तरह सीखने का प्रयत्न न किया हो । - ७२ जिहोंने राह रिखाई वह कोस्ट एण्ड ज्योडेटिक सर्वे मे डाफ्ट्समैन के रूप मे वाशिंगटन गये । वहां उन्हें दस डालर प्रति सप्ताह मिलता था। जब वह वाशिंगटन मे थे, उन्होंने अमरीकी नौसेना के सिविल इजीनियर कोर का सदस्य बनने की परीक्षा दी। इस परीक्षा में २०० व्यक्तियो मे से चार उत्तीर्ण हुए, जिनमे एक पेरी भी थे। शीघ्र ही उन्हे मध्य अमरीका मे निकारागुआ भेज दिया गया। १८४४ में जव पेरी निकारागुआ मुहिम के साथ दक्षिण मे गये तो उनकी अवस्था २८ वर्ष थी। उन्होंने सर्वे को बहुत कठिन कार्य की जिम्मेदारी ली और वह एक अत्यन्त धने जगल मे घुस गये । आगे का रास्ता खोजने के लिए उन्हें पेडो पर चढना पडता था। वह दूसरे मित्रो के साथ नदियो और कीचड मे से आगे बढते रहे और रात में उन्हें खुले आकाश के नीचे ही सोना पडता। पेरी ने पहली बार इस मुहिम मे अपनी डायरी मे घव की खोज के आकषण का वर्णन किया । जब वह घर लौटे तो उन्होंने एक पुराने पैम्फलेट मे ग्रीनलैण्ड की बर्फ का हाल पढा, जिससे उनकी जिज्ञासा और बढ गई। उन दिनो उत्तरी ग्रीनलंण्ड के बारे मे बहुत कम जानकारी प्राप्त थी और यह ज्ञात नही था कि उसका उत्तर मे कहाँ तक विस्तार है । अब हमें ज्ञात हो चुका है कि उत्तर का यह सबसे बडा और अन्तिम द्वीप है। यह द्वीप पेनसिल्वानिया से तेरह गुना बड़ा है और ६,००० फुट की ऊंचाई पर बर्फ का एक बड़ा भारीप्याला-सा है, जिसके किनारे पर पहाड़ है। पेरी का विचार या कि ग्रीनलैण उत्तर में ध्रुव तक फैला ।
राबर्ट एविन पेरी हुआ होगा और वह इस द्वीप के उत्तर में चलते हुए ध्रुव तक पहुँच जायेंगे तथा उसे पार कर लेंगे। प्रोनलण्ड मे सूय कुछ महीने ही चमकता है और इन दिनो तट के निकट गरमी पडती है परन्तु सूर्य के क्षितिज के नीचे अस्त होते हो, जहाँ वह वर्ष के अधिकांश महीने रहता है, ग्रीन- लैण्ड में रक्त जमा देने वाली बडे कडाके की सर्दी पडती है और भयकर शीत हवाएं चलती हैं। पेरी अभी आकटिक (अयनवृत्त) से वापस लौटे थे, पर उस नौजवान के लिए उत्तर मे बडा आकर्षण था। इससे पूर्व किसी ने भी ग्रीनलैण्ड के पूर्वी तट तक पहुँचने की चेष्टा नहीं की थी। इसलिए उत्तर मे, उन्होंने जहां तक सम्भव हो सका इस द्वीप के भीतर जाने का सकल्प किया। १९८६ में पहली बार उत्तर के लिए चल पडे और डिस्को द्वीप के पूर्व से अन्दर जाना शुरू किया। उनका एकमात्र साथी -क्रिश्चियन मेगार्ड,। दोनो व्यक्तिमो ने अनेक गड्ढे पार किये, कइयो गिरे भी, लेकिन भाग्य से बच गये। एक बार तो पेरी एक नदी पार करते हुए गिर पडे । यह नदी बर्फ की दीवारो के बीच से बह रही थी। पानी को तेज धार उन्हें अपने साथ वहा ले गई और वह डूबते-डूबते बचे। वे द्वीप के भीतर सौ मील पहुँच कर वापस लौट आये। वाशिंगटन पहुंचने पर पेरी ने देखा कि निकारागुआ नहर का काम फिर प्रारम्भ होने वाला है। वह एक नई मुहिम के नेता वनकर १८८७ मे वहां पहुंचे। इस कार्य में लगभग एक वर्ष लगा और अयनवृत्त मे उनको यह अन्तिम मुहिम यो । पेरी को था-- जिन्होंने राह दिखाई अब एक ऐमा मिन मिल गया जिसने उनके कार्य में भविष्य में चही सहायता पी-वह पी स्मिथसोनियन इस्टीट्यूट के एक प्रोफेसर को लडको, जोसेफोन डीविस्व । पेरी को उससे प्रेम हो गया। १९८८ मे वापिगटन मे उन दोनो का विवाह हो गया। इस अवधि में भी उनमे उत्तरी ध्रुव का आकर्षण कम नही हुआ। पेरी ने इस बार एक बड़ी यात्रा की योजना बनाई। एक अन्य यात्री नासेन ने मोजलैण्ड के निचले भाग को पार किया पा, किन्तु भीतरी भाग नक्शे पर एक काले धब्बे के अलावा और कुछ नहीं था। उत्तरी और उत्तरी पूर्वी तटो के विषय में भी कुछ जानकारी किसी को नहीं थी। पेरी नै इन इलाको में जाने का निश्चय किया। ६ जून १८६१ को वह नौ सेना से छुट्टी लेकर उत्तर की यात्रा को चल दिये। उनके साथ उनकी पत्नी और कुछ वैज्ञा- निक भी थे। डॉक्टर फेडिक कुक इस यात्रा में एक डाक्टर था। बाद में उसने यह भी कहा कि पेरी से पहले मैं ध्रुव पर पहुंचा। पेरी के ध्रुव से लौटने के बाद कुक को इस बात से एक बवण्डर उठ खडा हुआ। पेरी ने भ्पने साथ एक व्यक्ति, ईविंड अस्ट्रप को लिया और इस बार सर्दी का पडाव ग्रीनलैण्ड के उत्तर-पश्चिम में 'इगलफील्ड खाडी को बनाया। उन्होने उत्तर-पूर्व में १,२०० मील तक यात्रा करने की योजना बनाई 1 उसके पास तीन स्लेजें, चोस कुत्त, राशन और औजार थे। पेरी और उनका साथी समूर ओढकर एस्कोमो को तरह बफ पर सोते थे। तापमान बहुधा ।
Marwar रावट एकविरा पेरी शून्य से कम होता था और जब तूफान आता तो वह बचाव लिए खोहो मे घुस जाते थे। वे चलते-चलने ५,७०० फुट की ऊंचाई पर पहुंच गये, जी से फिर पूर्व की ओर ढलान प्रारम्भ हो गई । २८ जून को उस ऐसी जमीन दिखाई दी, जहां से वर्फ पिघल चुकी थी। पहली जुलाई को उन्होने बर्फ के भीतर एक बडी उपत्यका मे चलना प्रारम्भ किया। हवा इतनी गरम हो गई कि उससे कष्ट होता था । उपत्यका मे उहे नील गाएँ दिखाई दी। उन्होंने उनको गोली का शिकार बनाकर अपने और अपने कुत्तो के लिए भोजन जुटाया। पूर्व दिशा मे पेरी ने जो समुद्र का टुकडा देखा था, उसका नाम उन्होने स्वतन्त्र खाडी रखा। उत्तर में धरती, पहाड और ग्लेशियर दूर दूर तक फैले थे, जिन्हें इन्सान ने पहले कभी नहीं देखा था। इस स्थान का नाम अब पेरीलंण्ड पड़ गया है। पेरी ने अपनी डायरी में लिखा था -"हमारे चारो तरफ धूप थी और जिन चट्टानो पर हम खडे थे उनमे पोस्त के पीले डोडे उगे हुए थे तथा हमारे पोछे उपत्यका में नील गाएँ थी। इसी उपत्यका मे मैंने नीचे अपना चिरपरिचित पौधा 'डंडेलियन' देखा, जिस पर फूल खिले थे। गोली की-सी तीव्रता से उडान भरता एक पक्षी देखा और मधु-मक्खियो की भनभनाहट सुनी।" उम दिन उस स्थान का तापमान ७० डिग्री था और यहां यहाँ से उत्तरी ध्रुव की दूरी ५०० मील से कुछ ही अधिक थी। गरमियो में यहाँ जब सूर्य चमकता है तो उत्तर की इस धरती ।
जिन्होंने राह दिखाई ग्रीनलैण्ड में बहुत-से फूल और काहे-मकोडे पाये जाते हैं । एक बार पेरी ७,००० फुट की ऊंचाई पर पहुंच गये थे, जहाँ वह तूफान के कारण ६० घण्टे तक रुकने को विवश हुए। वह इस समय तक की बड़ी-से-बही याना स्लेज द्वारा करके अपने कैम्प में सुरक्षित लौट आये। १,२००० मील से भी अधिक की याना उन्होंने वफ के भीतर की और कई नये स्थानो का पता लगाया। उनकी इस सफलता से उहे बडो ख्याति मिली और भावी कार्य की नीव मुदृढ बनी । खोज वाली इस यात्रा को ध्रुव तक पहुंचने की यात्रा से कही अधिक महत्व प्राप्त है । इसके उपरान्त उन्हे कई वर्षों तक असफलताओ का सामना करना पड़ा, पर उन्होने हिम्मत नहीं हारी। जून, १८६३ में पेरी ने फिलाडेलफिया से ग्रीनलैण्ड की अपनी दूसरी यात्रा के लिए प्रस्थान किया। श्रीमती पेरी इस बार भी उनके साथ थी और वह गर्भवती थी। उन्होंने १२ दिसम्बर को प्रीनलैण्ड में पहले बच्चे लडकी को जम दिया। इस बार पेरी अपने ध्येय में असफल रहे। उन्होने सबसे बड़ी गलती यह की कि अपने साथ ६० आदमी और ले लिये। जब उनकी पत्नी १८६५ में अमरीका लौटी तो पेरी के साथ केवल दो व्यक्ति-माट हेसन और हफ जे० ली रह गये थे। हेसन वडा साहसी पुरुष था । वह काली जाति का था, निकारागुआ में पेरी का नौकर था और अब उत्तर की यात्रा में कुत्तो का अच्छा कोचवान बन गया था। पहली अप्रैल, १८६५ को पेरी, हेंसन और ली पुन 'इडि. पेंडेंस (स्वतन) खाडी' की ओर बढे । वे सामान सहित स्लेजों राबट एविन पेरी पर बैठकर भीतरी भाग में एक ऐसे स्थान पर पहुंचे जो समुद्र से ६,५०० फुट की ऊंचाई पर था। यहां पहुंचते ही ली और उनके कुत्ते बीमार पड़ गये। लेकिन उन्होंने साहस न छोड़ा और आगे बढ़ने का निश्चय किया। पेरी का कवि हृदय इत शब्दो मे बोल उठा--"तब मैंने महसूस किया, जैसा कि मैं अब भी कर रहा हूँ, बडी देर सोच-समझ के बाद हमने जीवन- प्याले को हाथो में ले लिया , वह प्याला एकाएक चटक गया इडिपेंडेंस खाडी के समीप पहुंचने पर उन्हें बडी संख्या मे नील गाएं मिली और रन्होंने उनका शिकार कर पेट भर मांस खाया। यह मांस उहोंने अपने उन कुत्तो को भी खिलाया जो बीमारी के बाद बच 'हे थे। पेरी ने मौसम सुहावना होने पर एक बड़े पर्वत और उत्तर की ओर धरती को देखा । इस यात्रा में उन्हे दो वष लगे और उनके सारे कारतूस समाप्त हो गये । वह और उनके साथी लौट आये । उनकी ६०० मील की इस यात्रा में स्लेजें टूट गई जो दोबारा बनानी पड़ी। लेकिन ली इतना अधिक बीमार हो गया कि वह चल नहीं सकता था। उसने पेरी और हेंसन से कहा-"तुम जाओ और मुझे रहने दो।" पेरी का हृदय भर आया, वह बोले, "या तो हम सब घर पहुंचेंगे या फिर हममें से कोई भी नहीं " पेरी फ्री सेवा और दवाइयो से लो दूसरे दिन चलने के योग्य हो गया। प्रति दिन २० मील के लगभग यात्रा करते हुए वे चट्टानो और खाडियो ।
(
निहोने राह दिखाई
को पार कर जैसे तैसे पश्चिम तट तक पहुंचे। यह कम माश्चय
में डालने वाली बात नहीं कि पेरी ने अपने अतिम कूच में एक
खाडी पर के वफ के पुल को अधजागृति अवस्था मे पार किया।
ली और हेसन को महसूस हुआ कि उनका नेता बर्फ के गढढे में
गिरने हो वाला है । यह आवेश इतना अधिक था कि ली ने
राइफलो से कारतूर निकाल दिये, ताकि पेरी कही स्वय को
गोलो न मार बैठे।
पेरी अपनी यात्राओ से वापसी मे कुछ अद्भुत टूटे हुए तारे
(उल्का) भी अपने साथ लाये थे, जो अब न्यूयाक के अमरीकन
'म्यूजियम आफ नेचुरल हिस्ट्री' में सग्रहीत है ।
सन् १८६५ की यात्रा की असफलता के पश्चात् पेरी ने
ग्रीनलैण्ड की बफ पर चलकर ध्रुव तक पहुँचने का विचार ही
त्याग दिया।
पेरी ने फिर उत्तर की ओर जाने का निश्चय किया । सन
१८६८ की बात है, जब अमरीका और स्पेन में
हुआ था। पाच साल के लिए पेरी को नौसेना से छुट्टी दे दी
गई । जब वह केन के दोआबे पर गये तो बफ की नह इतनी
मोटी थी कि उसे पार करना कठिन था । अत वह ग्रिनेललेण्ड
के दक्षिण में दूरस्थ डीउविलें के अन्तरीप में सर्दी व्यतीत करने
पर विवश हुए।
ग्रीनलैण्ड के पश्चिम में द्वीप समुद्र को गहरी खाडियो के
कारण तीन भागो मे बँट गया है-दक्षिण भाग को इल स्मियर
द्वीप, मध्य भाग को ग्रिनेललण्ड और उत्तरी भाग को, जिसे
युद्ध छिडा
रावट एडविन पेरी पेरी ने खोजा, पाटलण्ड कहा जाता है। सम्पूर्ण द्वीप का नाम भी इलस्मियर द्वीप है। पेरी ग्राटलण्ड के ऊपरी भाग में फोट काजर तक की २५० मील की दूरी पाच दिन मे तय करना चाहते थे, लेकिन दबाव से अफ का पहाड-सा बन गया । जैसा कि आप जानते हैं, पानी जब जम जाता है तो फैलता है और अधिक स्थान घेरता है। समुद्र की खाड़ी में बर्फ एक सीमित स्थान में थी, इसीलिए जब वह जमी तो बाहर की ओर फैलने का प्रश्न ही पैदा नही होता, अतएव टूटकर अम्बार-सा बन गई। अनेक बार इस अम्बार की छोटो पहाडी भी सौ-डेढ सौ फुट ऊंची होती थी। पेरी थके-मांदे अन्धेरे और सर्दी में टूटी हुई बर्फ के अन्तिम अम्बार को पार कर फोर्ट काजर की सूनी झोपडी, जो एक माय खोज करने वाले ने प्रयोग की थी और वहाँ कुछ राशन भी छोड दिया था, में पहुंचे। उन्हें आशा थी कि कुछ खाने-पीने को मिलेगा, लेकिन राशन इतनी लापरवाही से छोड़ा गया था कि उसमे से अधिकाश विगड गया था। यहां पहुंचने पर पेरी के पांव जम गये। वह समर ओढकर एक तख्ते पर लेट जाने के लिए विवश हो गये और एस्कीमो अंधेरे में माग टटोल-टटोल कर कुछ खाने को खोल रहे थे। पैरी के पाव गल गये थे, इनमें पोडा हो रही थी। उन्होने महसूस किया कि अब उनकी मेंगुलियां झड जायेंगी। दद की अधिकता के कारण वह उठ नही सकते थे। उनके एक साथी ने पेरी से कहा, ."तुम्हारे पांव जम गये थे, कमाण्डर । क्या आपने यह नहीं सोचा कि वही अंगुलियां झड जाने से इन्सान जीवन भर के लिए,
जिहोंने राह दिखाई
अपाहिज हो जाता है
पेरी का उत्तर था -"कुछ समय तो मुझे इसका पश्चाताप
रहा, परन्तु दूसरी विपत्तिपो की तुलना में यह इतनी छोटी
विपत्ति थी कि मैं इसको भूला रहता था, जर कि मेरे अपाहिज
पांच इसकी याद नही दिलाते थे।" यह उस साहसी पुरुष के
शब्द थे जो अँधेरी झोपडी मे छ सप्ताह तक विवश और लाचार
केवल कमर के बल लेटा रहा। एक दिन लेटे-लेटे ही उन्होंने
झोपडी की दीवार पर अपने नाखूनो से लिखा-"मैं रास्ता
ढूढूंगा अथवा बनाऊंगा।"
तव एस्कीमो ने उहे स्लेज पर रखा और टूटी हुई बफ
पर २५० मील तक खीचते हुए जहाज पर लाये। वहां उनकी
छोटी अंगुलियो के अलावा शेष सभी अंगुलियों और अंगूठे काट
दिये गये।
अपाहिज होने पर भी उनके काम में कोई बाधा नही
आई । वह दो महीने बाद हो १६ अप्रैल, १८६८ को स्लेज मे
वैठकर फोर्ट काजर से चल पड़े। कई बार उन्हे स्लेज से उतर
कर लगडाकर पैदल ही चलना पड़ता था। एक बार लँगडाकर
चलते हुए उहोने अपने साथी से कहा-"व्यक्ति जैसा चाहे
वैसा ही स्वभाव बना सकता है।" स्थानीय लोगो ने भी पेरी
को यात्राओ की कठिनाइयो को आसान बना दिया और वे उहे
बरावर सहयोग देते रहे । पेरी स्वय अपना वचन पूरा करते
थे और चाहते थे कि एस्क्रीमो भी ऐसा ही करें। परिणामस्वरूप
भूत-प्रेत से डरने वाले एस्कीमो उनके साथ कहीं की बेझिझक
चले जाते थे।
।
-
राबर्ट एरविन पेरी
१६०० के आरम्भ मे वहाफोर्ट काजर से फिर उत्तर को
ओर रवाना हुए । टूटी हुई बर्फ, ग्लेशियर और बर्फ की चट्टानो
के कारण ग्रीनलैण्ड के उत्तर में मार्ग दूर तक खराब था।
लेकिन पेरो उत्तरी ग्रीनलैण्ड के अन्तिम छोर तक पहुंचे, जहाँ
से आगे धरती थी ही नहीं । वह फोर्ट काजर लौट आये। वहां
उन्होने जो झोपडियां बनाई, वे इस बात का ज्वलन्त प्रमाण हैं
कि पृथ्वी के इस भू-भाग को कैसे रहने के योग्य बनाया जा
सकता है। उत्तर की कडाके की सर्दी और सांय-साय चलती
तीन प्रभजनो से बर्फ की चट्टानें बन जाती हैं, जिन्हे ठोस सिलो
मे काटा जा सकता है। एस्कीमो इनसे सुगमता से अपनी
झोपडियां बना लेते हैं। इन सिलो की एक के ऊपर एक तह
लगाते जाते हैं और गुम्बदनुमा झोपडी बना लेते हैं। दरवाजे
को एक बफ की सिल से बन्द कर लेते हैं । ये झोपडियां बडे-से-
बडे तूफान मे भी सुरक्षित रहती हैं ।
रास्ते मे लौटते हुए कुछ एस्कीमो मिले । उनसे पेरी ने
पूछा,-"क्या गत वर्ष कोई जहाज आया था
"हाँ," एक एस्कीमो ने उत्तर दिया।
"जहाज का कैप्टन कौन था?"
"कैप्टन साम।"
"परिचारक कौन था " पेरी ने आगे पूछा ।
"वृद्ध चार्ली।"
"कोई दूसरा आदमी, जिसे मैं जानता होऊँ ?"
"मिट्टी पेरी और अहनीपीटो।"
जि.रा०दि०६
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जिहोंने राह दिखाई " "जहाज कब वापस गया "ओह, वापस कहाँ गया। पेयर हाबर मे है।" एक एस्कीमो ने बताया। अनुमान कीजिए, पेरी की क्या दशा हुई होगी, जब उन्हें ज्ञात हुमा कि उनकी पत्नी मिट्टी पेरी और वेटो अहनीघोटो उनकी बाट जोह रही हैं। पूछताछ करने पर ज्ञात हुआ कि उनका जहाज बहुत दिन हुए जम गया है, अतएव वे लौट नही सकी। पेरी बडी तेजी से उनके जहाज की ओर लपके । यहाँ तक कि एस्कीमो भी बहुत पीछे छूट गये । पेरी के छयालीसवें जन्म- दिन पर पति-पत्नी और बेटी का सुखद मिलना हुआ। सन् १६०१ की गरमियो मे पेरी की पत्नी और बेटी राशन वाले जहाज पर दक्षिण को चली गई और पेरी ने राशन को उत्तर मे भेजना प्रारम्भ किया। ध्रव सागर ससार की चोटी पर बफ से आच्छादित एक विशाल सागर है, जिसमे अनेक धाराएँ और ज्वार भाटे हैं । पेरी उत्तर मे जिस स्थान पर जाना चाहते थे, वहां ज्वार भाटे की दिशा पश्चिम से पूर्व और कुछ-कुछ दक्षिण को ग्रीनलैण्ड की दिशा मे थी। मार्च, १६०२ मे पेरी ने फिर यात्रा की और हेक्ल अन्तरीप पर पहुंचकर हेसन और चार एस्कीमो को साथ रख बाकी सभी को वापस लौटा दिया । ध्रुव सागर के छोर पर पहुँचने के लिए। जहां से उन्ह ध्रव को जाना था, वह पहले ही ४०० मील की यात्रा कर चुके थे । अप्रैल के पहले सप्ताह में वह उत्तर पहुंचे।
रावट एरविन पेरी
अब पेरी अपनी ग्रीनलैण्ड की यात्रा से आगे बढ आये थे, लेकिन
जब निराश हो उन्हे लौटना पड़ा तो उन्होंने अपनी डायरी मे
लिखा
"शिकार हाथ से निकल गया। मैं सोलह सालो से जो
स्वप्न संजो रहा था, उसका अन्त हो गया। मैंने अपने जीवन का
सर्वोत्तम सघर्ष किया है। निस्सन्देह यह सफलता है, पर मैं
असम्भव को सम्भव नही बना सका।"
सन् १६०२ में पेरी अपनी यात्रा से लौटकर नौ सेना में
अपनी ड्यूटी
चले गये, दो परीक्षाएं उत्तीर्ण कर कमाण्डर
बन गये और इजीनियरिंग में भी अच्छा काम किया।
जुलाई, १६०५ में पेरी एक नये जहाज पर, जो इसी उद्देश्य
से बनाया गया था और जिसका नाम अमरीका के छब्बीसवें
प्रेसीडेंट के नाम पर रूजवेल्ट रखा गया था, न्यूयाक से रवाना
हए। आगे चलकर पेरी ने कुछ एस्कोमो भी साथ ले लिये।
"रूजवेल्ट' १८४ फुट लम्बा और, ३५ फुट चौडा छोटा जहाज
था । जब गिनती हुई तो उसमें ४० एस्कीमो, २० मल्लाह और
२०० कुत्ते थे।
पेरी ने जहाज का वर्णन करते हुए लिखा है-"मेरे जीवन
के अनुभवो में कोई अनुभव इतना सजीव और उत्साहपूर्ण नहीं
है, जितना रूजवेल्ट' का बर्फ से टकराना और हिलना । जैसे
१,५०० टन का बेडा बर्फ से टकराकर उसमें से अपना रास्ता बना
अन्त में जहाज सघर्षों से गुर्जरता हुआ उत्तरी तट पर
शेरीडान अन्तरोप पहुंचा और वहां फंस गया। जहाज वही रहा
जिन्होंने राह दिखाई और पेरी को अपने उत्तरी अड्डे तक पहुंचने में डेढ़ महीना लग गया। यह कम आश्चय की बात नही कि इस सुदर उत्तरी भू भाग में नील गाएं, रेडियर और खरगोश मिलते हैं-जहाँ साल-के-साल बफ पडती है, तूफान आते हैं और कडाके की सद हवाएं चलती हैं। यहां अधिकांश समय अंधेरा रहता है, ऐसे चातावरण में ऐसे शाकाहारी प्राणी जी कैसे लेते हैं आखिर पेरी उत्तर में ८७ डिग्री ६ तक जा पहुँचे। वह आगे जाते तो लौटते समय भूख से मर जाना पडता । जब वह | अप्रैल मे लौटे तो ध्रुव से केवल १७० मील दूर रह गये थे । वह पुन वहाँ पहुँचने में असफल रहे। जब पेरी 'रूजवेल्ट' के पास वापस आये तो रास्ते में उनकी पार्टी के आदमी भी मिल गये जो जहाज पर से आगे बढ़ते समय रास्ता भटक गये थे। परन्तु पेरी तो कभी भी यात्रा करते थकते नही थे । वह लौटते ही नई धरती की खोज मे फिर पश्चिम को चल पडे । यह कार्य उन्होने ६०० मील की यात्रा स्लेज द्वारा करके पूरा किया । प्राय उहे पानी मे से ही चलना पड़ा था। वे सुरक्षित घर लौट आये। पेरी ने बोब का हाथ थाम लिया, परन्तु उनके मुख से हर्षातिरेक के कारण एक शब्द भी नही निकला । बाद मे एडमिरल सिग्सबी ने, इस यात्रा के विषय मे कहा--"उत्तरी ध्रुव की खोज के इतिहास मे यह यात्रा सब यात्राओ से अधिक योग्यता और साहस भरी यात्रा है। सन् १९०८ मे ५२ वर्ष की अवस्था मे पेरी अपनी उत्तर को अतिम यात्रा पर गये। बीस वर्षों से वह उत्तरी ध्रुव तक - राबट एडविन पेरी पहुँचने के लिए निरन्तर प्रयल करते रहे थे। दो वर्ष पहले वह अपने लक्ष्य के निकट से लौट आये थे। यात्रा शुरू करने से पूर्व प्रेसीडेंट थ्योडोर रूजवेल्ट पेरी से मिलने आये तो उन्होंने कहा-"मिस्टर, प्रेसीडेंट | शारीरिक, मानसिक और नैतिक, जो भी शक्ति मेरे अन्दर है, वह मैं इस पर लगा दूंगा।" "मुझे तुम पर विश्वास है पेरी" रूजवेल्ट ने कहा-"और यदि यह मनुष्य के लिए असम्भव नहीं तो मुझे तुम्हारी सफलता मे विश्वास है।" जहाज ग्रीनलैण्ड से यार्क अन्तरीप पहुँचा। एटाह.पहुँचते- पहुँचते उन्होंने एस्कोमो और आवश्यक कुत्ते साथ ले लिये। वहां से चलते समय उन्होंने लिखा- 'मेरे सम्मुख मेरा स्वप्न है, मेरा भाग्य है, और वह मजिल है जिसकी तरफ मैं 'महान् उत्तर के निषेध के बावजूद' २३ वर्षी से बार बार आकर्षित होता रहा और बढता रहा हूँ। यह जिन्दगी कुत्ते की जिन्दगी है, पर कार्य करना मनुष्य का धर्म है-", ध्रुव से ४५० मील तक की दूरी जहाज द्वारा तय हो चुके । थी, अब बारी थी स्लेजो की। पेरी ने किसी गहरी खाडी खोजने के उद्देश्य से २०० मील की स्लेज-यात्रा की। उनका उद्देश्य था । कि ध्रुब से १५० मील की दूरी पर कमाण्डर के पास सारी है सामग्री और बढिया कुत्ते हो, जिससे सफलता की अधिक र सम्भावना की जा सकती है। २८ फरवरी, १६०६ को कैप्टन बीब उत्तर को चला, और लोग उसके पीछे पीछे । वे हडसन नदी पर पहुँचे और वहां सिर्फ सा. सीन आदमी-पेरी, बौब और हेसन ही रह गये, शेष लोटाई जिन्होंने राह दिखाई दिये गये। जब वे उत्तर मे १८ डिग्री तक पहुंच गये तो बोब लौट आया । पेरी से अलग होने से पूर्व वह उत्तर मे पांच मोल तक आगे आ गया, जिससे ८८ डिग्री (एक डिग्री ६० मील के बराबर होती है) तक जा पहुंचे, पर वह असफल रहा। पेरी ने अन्तिम क्च करने के लिए सर्वोत्तम कुते चुने । वहां से ध्रुव केवल १३७ मील दूर था। उनके और हेंसन के पास ४० कुत्ते, चार एस्कोमो और बहुत सा राशन था। चलते समय पेरी ने वीव से कहा-“यदि हम मजिल तक पहुँच गये तो हम फिर दक्षिणी ध्रुव चलेंगे और तुम नेता होगे।" २ अप्रेल की आधी रात के तुरन्त बाद पेरी ने अपनी ध्रुव को यह ऐतिहासिक यात्रा शुरू की। उनके ध्र व पहुंचने से एक दिन पहले आकाश पर बादल छा गये और प्रत्येक वस्तु पर भूरी- सी रोशनी पड रही थी लेकिन पेरी इतनी शीघ्रता से बट कि १२ घण्टे मे वह ३० मील चले गये । ६ अप्रैल को अपने अतिम कूच की समाप्ति पर पेरा को ज्ञात हुआ कि वह ध्रुव से थोड़ी दूर हैं। लेकिन पकान से उनका बुरा हाल था और उनके कदम आगे की ओर नही उठते ये। झोपडियां बनाई गइ और कुछ घण्टे सोने के बाद पेरी की अखें खुली तो वह फिर आगे की ओर चल पडे। उनकी खुशी का कोई ठिकाना न रहा, जब उन्होंने अपने कोण-मापक यन्त्र से और कृत्रिम क्षितिज से सूय का कोण मापा तो उन्हें ज्ञात हुआ कि वह तो ध्र व से भी आगे निकल आये हैं । वह मनिल पर पहुंच ही गये। ६ अप्रेल १६०६ को पेरी ध्रुव पर पहुंचे। अपने अन्तिम राबट एडविन पेरी ७ कूच मे उन्हे ज्ञात ही नहीं हुआ कि वह उत्तर को जाते-जाते कब ध्रुव से दक्षिण की ओर उस पार चल पडे। छोटा-सा भौगो- लिक बिन्दु जिसे वह दूढ रहे थे, कही उनके निकट ही था । वह कई ओर गये और इस बिन्दु को ठीक से मालूम करने के लिए सूय के कई कोण बनाये । यह सब कुछ करने के बाद निष्कर्ष निकला कि वह उसी स्थान पर हैं, जिसकी वह खोज मे थे । पेरी ने उल्लास से अमरीका का झडा बफ के एक टुकडे पर गाड दिया । कुछ और झडे भी गाडे, जिनमे उनके कालिज का झडा भी था। एस्कीमो ने तालियां बजाई। रिकार्ड भरकर बर्फ मे एक बोतल दबाई गई। पेरी ने और उनके साथियो ने ध्रुव पर तीन घण्टे व्यतीत किये। फिर पेरी ने विश्व के इस सर्वोच्च बिन्दु से अपनी पत्नी के नाम एक पत्र लिखा। यह छोटा-सा दल कोलम्बिया अन्तरीप की ओर लौट चला। जब वे चले तो पेरी को बहुत कम आशा थी कि वे वहाँ तक पहुँच सकेंगे। वह सोचते, क्या उन्हे अपनी सफलता की वात ससार को कहने का अवसर मिलेगा? २२ अप्रैल को वे सुरक्षित पाटलैण्ड पहुँच गये। एस्कीमो उल्लास से भरकर नाचने लगे । ओटाह ने अपनी स्लेज मे थक- कर लेटते हुए कहा, "शैतान सो रहा है या अपनो स्त्री से लड- झगड़ रहा है, वरना हम इतनी आसानी से लौट नहीं सकते थे।" इस यात्रा के कारण पेरी कुछ दुबल हो गये थे और उनका वजन तीन पौड़ कम हो गया था, लेकिन अपनी सफलता के कारण वह बडे प्रसन्न थे। जब बह जहाज के निकट पहुंचे तो
जिहोंने राह दिखाई
बौब दौडकर उनके पास आया और उनका हाथ पकड कर
बधाई दी।
१८ जुलाई को जहाज शेरीडन अन्तरीप से रवाना हुआ
और आखिर न्यूयाक पहुँच ही गया।
इस महान ध्रुव-यात्री, पेरी को उनकी सफलता के कारण
नौसेना मे रियर एडमिरल का पद प्रदान कर सम्मान दिया
गया और विदेश में भी उन्हे अनेक प्रकार से सम्मानित किया
गया । ससार मे जो कुछ भी आजकल हम देखते हैं ऐसे साहसी
पुरुषो के परिश्रम और लगन के कारण ही सम्भव हो सका है,
जिन्होंने सदैव असम्भव को सम्भव बनाया है।
शेरपा तेनसिंह
।
"जो सफलता की घडी में
असफल लोगो को अभ्य देना भूल
जाता है, उससे बढकर कृतघ्न
कोई नहीं।"
-नसिंह
एवरेस्ट विजेता तेनसिंह पूर्वी नेपाल के सोलोखुम्बू जिले
में खुमजुन गांव मे १९१७ मे एक अति निधन परिवार मे
उत्पन्न हुए थे। एक बार स्वय तेनसिंह ने ही यह कहा था-
"बहुधा मेरे पिताजी मुझे एवरेस्ट की कुहरो से घिरी हुई चोटी
की ओर सकेत कर कहते थे कि वहां चोमोलुग्मा (वायु की
माता) रहती है । मैं बहुत निर्धन था। सोलोखुम्बू मे सभी लोग
निर्धन थे। एक मकान था, कुछेक याक पशु थे, बस यही सारी
सम्पत्ति समझो । सोलोखुम्बू मे निर्धनता थी, फिर भी शेरपाओ
के जन्म के लिए यह एक आदश स्थान था, क्योकि सदियो मे
यहाँ तापमान शून्य से नीचे रहता है । यूरोप मे इतने तापमान
वाले अनेक स्थान है और वहां सभ्यता है, सुविधाएँ हैं और उनकी
दशा कुछ और ही है। लेकिन यहां क्या था, कभी थोडे से कोयले
मिल गये तो गरमी आ गई, नही तो जैसे भी बन पड़ा वैसे ही-
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जिहोंने राह दिखाई
सी सी करते सिकुडे हुए पड़े रहते । कुत्ता बार-बार बच्चे के
कम्बल में घुस आता है। यदि गृहणो की मानसिक दशा ठीक
है तो वह इस पर हंस देती है, नही तो जो भी चीज मिली उसे
फेंककर कुत्ते को मारती है।"
शेरपाओ का पहले एकमात्र काय तिब्बत के साथ व्यापार
करना था। वे इष्ट तो उनना ही सहन करते थे, जितना पर्वता-
रोहण में होता है, तो भी व्यापार व्यापार है और खेल
खेल । जव से पश्चिम से पवतारोही इधर आने लगे हैं तब से
शेरपाओ की स्थिति में सुधार हो गया है और प्रत्येक शेरपा
बालक यह कल्पना करने लगा है कि वह भी कभी इन गोरी
चमडी वाले साहवो के साथ जायेगा, पवतो की चोटियो पर
चढेगा और पुरस्कार प्राप्त करेगा।
सोलोखुम्बू के शेरपा दिन प्रति दिन अत्यधिक ख्याति प्राप्त
कर रहे थे। पर तु तेनसिंह को अभी तक न तो कोई अनुभव
था और न किसी प्रकार की दूसरी सुविधा । उन्हे ऐसा प्रतीत
होता था कि शायद उनके जीवन का स्वप्न -एवरेस्ट के ऊपर
पहुँचना-अधूरा ही रह जायेगा।
१९२३ मे वह घर से भाग निकले और दार्जिलिंग शहर मे
जा पहुंचे, जहाँ से सभी हिमालय-अभियानो की योजना बनाई
जाती है। उन्होंने दाजिलिंग मे ही विवाह भी कर लिया और
अब उ हे हिमालय पर जाने वाले कुलो का काम भी खूब मिलने
लगा । स्वप्न साकार होने की आशा बढ चली।
तेनसिंह ने अच्छी तरह से अभी पर्वतारोहण का काय भी
प्रारम्भ नही किया था । १६३५ की बात है जब कि गोरी जाति
.
-- शेरपा तेनसिंह के लोग हिमालय की सर्वोच्च चोटी पर पढने का प्रयास कर रहे थे। पहले इस चोटी की ऊंचाई २६,००२ फुट पाई गई थी। पर अब जो नाप जोख की गई है उससे विदित हुआ है कि इसकी वास्तविक ऊंचाई २६,२०० फुट है । १६२२ मे कुछ लोग २७,१४० फुट तथा २७,४७५ फुट तक पहुंच गये थे। इसके बाद भी प्रयत्न जारी रहा और १६२४ मे नाटन नाम का एक पर्वतारोही २८,२८५ फुट तक पहुंच गया। शेरपा तेनसिंह को १६३५-३६ मे शिप्टन और रूटलेज के साथ पहले अभियान में जाने का अवसर प्राप्त हुआ इसमे पार्टी २४,००० फुट की ऊंचाई तक पहुँचकर लौट आई। निष्कप यह निकला कि उत्तर से एवरेस्ट को जो मार्ग है वह वर्षा ऋतु की दृष्टि से एकदम बेकार है। इस तरह उनका अभियान व्यर्थ गया। १६३८ मे एरिव शिष्टन नामक एक पर्वतारोही इस कठिन काम की ओर बढा । उस समय तक जितने पर्वतारोहियो ने इस क्षेत्र मे प्रयास किया था, उसने उनकी असफलताओ पर गौर किया। वे सभी पर्वतारोही अपने काय मे साहसी और निपुण थे, इसलिए उसने यह माना कि अवश्य कोई ऐसी अलध्य बाधा आई होगी तभी वे, असफल हुए। जब सिलसिलेवार उनकी यात्राओ की डायरियो का अध्ययन किया गया, तो ज्ञात हुआ कि वे सब लगभग एक ही स्थान पर जाकर अटक गये ये और मजेदार बात यह रही कि वे शायद इस बात को समझते भी नहीं थे। शिप्टन ने अनुमान लगाया कि उहे जिस उत्तर- पश्चिम भाग से जाना था, उस पर धूप देर से आती थी । यदि
-३२
जिहोंने राह दिखाई
अभियान पहले आरम्भ किया जाता है तो यह भय रहता है
कि पर्वतारोही कही बर्फ मे वही न जमकर रह जायें और यदि
वे सूर्य की रोशनी की प्रतीक्षा करते हैं तो अभियान पूरा नही
होता और रात हो जाती है । शिप्टन इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि
इसी कारण से अब तक के सव प्रयास असफल हुए है।
१९२२ मे सात शेरपा एक तुषारखण्ड के नीचे दब गये थे।
१६२४ मे दूसरा शेरपा मानबहादुर भी इसी क्षेत्र मे मर गया ।
ठण्ड से उसके दोनो पांव जम गये थे, अतएव उन्हे काटना
आवश्यक हो गया था, जिसे वह सहन नही कर सका और मर
गया। एक गुरखा अफसर मस्तिष्क के भीतर रक्तस्राव से मर
गया था। उन्ही दिनो इसविन और मालौरी नामक दो पर्वता.
रोहियो का कुछ पता ही नहीं चला कि वे कहा गये। मौरिस
विल्सन का भी रहस्यपूर्ण परिस्थितियो मे इसी क्षेत्र मे अन्त
हुआ था। एवरेस्ट १२ व्यक्तियो की आहुति ले चुका था।
१६३ मे डॉक्टर कैलास की पहला तिब्बती दर्रा पार करते हुए
हृदय को गति रुक जाने से मृत्यु हो चुकी थी। इन सबका
अध्ययन कर एरिक शिप्टन ने जो निष्कप निकाला, वह था-
एवरेस्ट पर मनुष्य कभी विजय प्राप्त नहीं कर पायेगा।
१६३७ मे तेनसिंह को एक अय काम मिल गया और वह
सर्वे आफ इण्डिया के मेजर ऐशमहन के साथ गढवाल गये।
पर तु, एक तो यह कार्य कुछ ही दिनो का था, दूसरे, इस काम
मे उनकी तबीयत नही लगती थी।
१९३८ मे वह टिलमैन के साथ फिर एक वार एवरेस्ट की
और चल पडे । अभी वह एक कुली के रूप मे ही थे। टिलमैन
शेरपा तेनसिंह ने उनके विषय मे अपनी डायरी में लिखा था - "वह तरुणा, जागरूक, तगडा और बहुत ही प्रिय था।" इस अभियान में पहले की अपेक्षा ५०० फुट आगे तक पहुंचे और टिलमैन एवं तेनसिंह रोगबक ग्लेशियर के ऊपर से होते २४,५०० फुट तक पहुंच गये । इसके उपरान्त जून के महीने में पश्चिम की ओर से एक ओर अभियान हुआ। ६ जून को उन्होंने अपना २५,६०० फुट तक पहुंचने का रिकार्ड स्थापित किया। इस मौके पर तेनसिंह ने अपनी शारीरिक शक्ति का जो उदाहरण प्रस्तुत किया, उसके विषय मे टितमैन ने लिखा है-"जब वे २५,६०० फुट वाले अपने स्थान पर पहुँच चुके तो अचानक याद आया कि एक बण्डल पीछे छूट गया है। तेनसिंह छ -सात सौ फुट नीच उतरे और फिर सामान लेकर वही पहुँच गये। यह स्मरणीय है कि इतनी ऊंचाई पर विशेषकर एवरेस्ट पर एक-एक फुट चढना बहुत कठिन कार्य है । वह तगडा और सजीव तो था ही, साथ ही बहुत नि स्वार्थी भी था।" १९३६ मे जब सर्वप्रथम हिमालय क्लब ने शेरपाओ को छांट की तो उसमे यह तय हुआ कि जो लोग २५,००० फुट से ऊपर तक शेरपा का काम कुशलता से कर चुके हैं, उहें शेर का बैज दिया जाये। इसके अनुसार जो पहले १२ व्यक्ति चुने गये, तेन- सिंह उनमे से एक थे। यह उनके लिए एक बहुत वडा सम्मान। - 4 - १६३६ मे तेनसिंह तिरिचमी अभियान में सम्मिलित हुए
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जिहोंने राह दिखाई
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-और उसके पश्चात् लगभग पांच वर्ष तक वह चितराल और
गिलगित मे रहे। दार्जिलिंग मे लोग उन्हें भूलने भी लगे।
१६४५ मे वह पुन दार्जिलिंग पहुंचे। वहां पहुंचते ही उनकी
सेवामओ की मांग बढी और १६४६ मे किरसुप साहब के साथ
सिक्किम गये । इसके बाद एक बार फिर एवरेस्ट की ओर जाने
का अवसर मिला। वह डैनमन के साथ १६४७ मे एवरेस्ट गये,
पर इसमे इहे उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। १६४७ मे ही
गगोत्री गये और १६४६ मे इटली के विख्यात भारत-विशेषज्ञ
अध्यापक तुकची के साथ ल्हासा गये । तुझ्ची की रुचि पवता-
रोहण मे नही थी, बल्कि पुस्तको मे थी। इस यात्रा के परिणाम
स्वरूप उनको ४० मन के लगभग ग्रन्थ प्राप्त हुए।
एक दिन पार्टी के एक अफसर ने तेनसिंह से पूछा, "क्या तुम
सोचते हो कि इन्सान कभी एवरेस्ट को जीत सकेगा?"
"इन्सान से लिए कुछ भी असम्भव नही, यदि वह कोशिश
करता रहे तो अवश्य सफल हो सकता है।" सक्षिप्त-सा उत्तर
था।
१६४८ मे एक बार फिर तेनसिंह का साथ टिलमैन से
हुमा, लेकिन इस बार टिलमैन ने एवरेस्ट पर चढने के बजाय
छोटी-छोटी चोटियों पर ही चढाई की। १६५० मे तेनसिंह
गिन्वन के साथ गये और २१,००० फुट वाली चोटी बदरपूर्व
तक सफलतापूर्वक चढ गये।
तेनसिंह अब तक अनेक अभियानों में भाग मे चुके थे,
शेरपा सेनसिंह
लेकिन उनके कथनानुसार उनके जीवन का सबसे भयावह
अभियान था-नन्दादेवी का अभियान । १६५१ में वह इंस
अभियान मे गये । इस यात्रा में जिल्बरवीन्य और रोजर-दिप्ला
नन्दादेवी की ओर बढते हुए पता नहीं कहां गायब हो गये।
तेनसिंह २३,००० फुट की ऊंचाई पर थे, जब उन्हे नीचे से यह
खबर मिली कि इन दो साहबो का पता नही लग रहा है। तब
अपने साथियो की खोज में वह और दिवोस्त खतरनाक और
कठिन चढाई करते हुए चोटी पर गये । तेनसिंह के शब्दो मे
इसका वणन इस प्रकार है-~-"दोनो तरफ से बहुत अधिक ढलान'
है, मैं एक-एक इच करके चढ रहा था, न तो कुछ पकडने को
पा और न पर रखने की कोई जगह थी। बर्फ मे बहुत ज्यादा
फिसलन थी। आक्सीजस जम गया था, बिलकुल काम नहीं
कर रहा था। तब मैंने पम्प वही छोड दिया और आगे बढ़ने
तेनसिंह को हिम्मत और बहादुरी देख उनके फासोसी
साहब विस्मित रह गये। अन्त तक बहुत थक गये, यहां तक
कि उनके पैर की दो अगुलियां मामूली तौर पर जम गई थीं।
उनकी इस वीरता से प्रभावित हो झासीसी साहब ने समोसो
को माला बनाकर तेनसिंह के गले मे डाल दी क्योंकि वहाँ पर फूल
मिलने का तो प्रश्न ही नहीं था। इस अभियान में दो व्यक्तियों
को मुत्यु हो गई । वह स्वय मरते-मरते बचे । वह क के दक्षिणे
में जार्ज फेई के साप कोक्तग शिखर पर चढ रहे थे, जी
१६,६०० फुट ऊँचा है । २६ अक्तूबर, १६५१ को जाब का के
ने राह दिखाई साथ जहां वह चल रहे थे, वह जगह बहुत ढलवां थी। कुछ बर्फ जमी थी, लेकिन थी बहुत ही पतली। ऊपर एक पहाडी और थी जिस पर ढलान और ज्यादा था। मई मागे-आगे चल रहे थे और तेनसिंह लगभग दस कदम पीछे थे तथा दूसरा शेरपा औग्दचा उनसे भी दस कदम पीछे चल रहा था। अचानक फेई का पैर फिसला और वह तेनसिंह की ओर चला। तेनसिंह ने उसे बचाने की कोशिश की, परन्तु स्वय उनके भो पर डगमगा गये। पर उन्होंने अपनी बुद्धि से काम लिया और हाथ में बफ काटने वाली कुल्हाडी को मजबूती से पकडे रहे, बल्कि यह कोशिश की कि उसके सहारे फेई को गिरने से बचा लें। पर वह ऐसा न कर सके, उल्टे दूसरे सेरसा औग्दचा से जा टकराये। तीनो लुढकने लगे, लेकिन भयकर ढलान पर पहुंचने से पहले ही वेनसिंह संभल गये और उन्होंने अपने प्राणो की बाजी लगा कर भोग्दचा को भी बचा लिया । जार्ज फेई को वह न बचा सके और वह १,४०० फुट नीचे गिर- कर मर गये। इसके पश्चात् तेनसिंह और औग्दचा एक-दूसरे से बँध कर बड़ी मुश्किल से नीचे उतरे । १६५२ में स्विस पर्वतारोही एवरेस्ट पर विजय पाने के लिए बढे । इस अभियान में भी तेनसिंह साय थे। यह अभि. यान पर्याप्त सफल रहा और दल के लोग लोतो ग्लेशियर तक पहुँच गये । २५ मई को लेम्बर्ट, फ्लोरी, गोवर्ट, तेनसिंह और कुछ शेरपा एवरेस्ट पर जाने के लिए तैयार हुए। दो शेरपा २५,२०७ फुट तक पहुँचने में सफल हुए। आगे जाने की बात गोपा तेनसिंह सोच ही रहे थे कि भयकर बर्फीली आंधी आ गई और दल के सदस्य एक छोटे से सुरक्षित स्थान पर एक-दूसरे से बंधे मांधी के वेग के कम होने की बाट देखते रहे । वह डर के कारण हिल- हुल भी नहीं रहे थे कि कही एक इच को हिलने की गलती के कारण आँधी उन्हे उखाड़ फेंके और फिर उनकी हड्डियो का भी पता न चले । ऐसे समय मे भी तेनसिंह ने बडी वीरता दिखाई और साहस से काम लिया। उन्होंने इस आंधी मे ही दूसरे तम्बू वालो को चाय और खाना पहुंचाया। सबेरे जब उठे तो थकान उतरने के बजाय और बढी हुई थी। तेनसिंह ने इस समय आश्चर्यजनक शारीरिक शक्ति का परिचय दिया। वह ऐसे प्रतीत होते थे जैसे कुछ हुआ ही नहीं और वहाँ सब को सहायता पहुंचाते रहे। वह नीचे गये और वहां से कुछ वस्तुएं लाये। परन्तु प्रकृति तो बुरी तरह कुपित थी। वायु इतनी तीव्र थी कि लोगो मे खड़े होने का साहस नही था और वे छाती के सहारे रेंग-रेंगकर चल रहे थे। तीन शेरपा बुरी तरह क्लान्त थे और अब उन्हें साथ रखना एकदम व्यर्थ था। तेनसिंह और लेम्बर्ट बडी मुस्किल से २७,५५० फुट तक पहुँच सके। उन्होंने निश्चय किया कि छोटा-सा तम्बू लगाकर रहा जाये और सुबह की राह देखो जाय । उस समय उनके पास न स्टोव था, न गद्दा, न तुसार--यानियो के सोने के लिए जो थैला होता है, वह था। अस वर्फ का गला हुमा पानी पीने के लिए था। वे एक दूसरे को बरावर थपथपाते रहे, ताकि रक्त- संचार होता रहे, और खून न जमने पाये । राति काटना पहाई जिस रा०वि०७ हो गया
२८
मिहोंने राह रिवाई
२८ की सुबह थी। वे लगभग जम चुके थे। इधर प्रकृति
बहुत कुपित जान पडती थी-बादल घुमड रहे थे और तेज
पश्चिमी हवा हड्डियो मे से सांय-सांय करती पार हो रही थी।
इस दशा में भी वे कुछ खाद्य और आक्सीजन लेकर आगे की
ओर बढ चले । आक्सीजन से काम लेने के लिए उन्हे ठहरना
पडता और फिर आगे की ओर कदम बढाते। उनको प्रत्येक
तीसरे कदम पर ठहरना पडता । यह थी उनकी गति । और इसी
दशा मे वे २८,२१५ फुट पर पहुँच गये, जो अब तक की सबसे
महान् सफलता थी। यदि आक्सीजन ठीक काम करता और वे
इतने थके न होते तो यह निश्चित था कि वे और आगे बढते ।
इस अभियान से लौटने के बाद तेनसिंह बहुत समय तक बीमार
रहे।
एवरेस्ट की चढाई कितनी कठिन और भयानक है, इसे
वही जान सकते हैं, जो पर्वतारोहण करते हैं। बादलो से भी
ऊँचे उस शिखर के समीप ऋतु भी अस्थिर रहती है। आंधी,
वर्षा, तूफान हिमपात और कडी धूप निरन्तर एक दूसरे का स्थान
लेते रहते है। वहां की शुष्क हवा मे समुद्री धरातल की अपेक्षा
एक-तिहाई भाग आक्सीजन ही होता है और पर्वतारोहियों को
कृत्रिम आक्सीजन को इस्तेमाल करना पडता है। परन्तु इसके
बावजूद शरीर एक विचित्र दुर्वलता का अनुभव करता है और
लगता है जैसे हाथ-पांव अचेत हो। जूते का फीता बांधने जसा
मामूली काम भी जवान आदमी को थका देता है। शीत और
हिमपात के कारण चेहरा और होठ नीले हो जाते हैं और अंगु-
लियो बफ से गलने लगती हैं। वर्फ पर चमकती धूप के कारण
।
दै
शेरपा तेनसिंह
कभी कभी आदमी अन्धा तक हो जाता है, और एक के स्थान
पर दो वस्तुएँ दिखाई पड़ने लगती हैं। इतना ही नही, दांत
गिर जाते हैं और गला बैठ जाता है। शरीर की तरह ही मन
भी विकृत हो जाता है। आदमी चिडचिडा हो जाता है और
कोई-कोई तो विक्षिप्त हो जाता है।
इन अनेक प्रकार की मानसिक और शारीरिक कठिनाइयो
के होते हुए भी साहसी पुरुष एवरेस्ट विजय के प्रयत्न निरन्तर
करते रहे। ग्यारह चढाइयो की असफलता के पश्चात् अन्त मे
बारहवी टोली ने प्रकृति पर और सामने आने वाली समस्त
कठिनाइयो पर विजय प्राप्त की। इस दल के नेता थे, कर्नल
हट और इसका सगठन किया गया था, इग्लैण्ड के ब्रिटिश
हिमालय-श्लव के द्वारा । पर्वतारोहण की कठिनाइयो और अपने
पूर्वगामी दलो के अनुभवो के आधार पर हट-दल ने नवीनतम
वैज्ञानिक उपकरणो को जुटाया था। स्वय तेनसिंह ने, जो इसके
पहले के लगभग सभी महत्वपूर्ण पर्वतारोहण मे भाग ले चुके थे,
कहा है कि इतनी बढिया तैयारी अभी तक किसी दल ने नहीं की
थी।
इस बार तेनसिंह की स्थिति कुली की नहीं थी, बल्कि वह
अभियाश दल के एक सदस्य ही बना लिये गये थे।
यह भी स्पष्ट रूप से स्वीकार कर लिया गया था कि यदि
चोटी के ऊपर पहुँचने के अन्तिम प्रयास मे वह यह अनुभव कर
कि नह चोटी पर पहुँचने और वापस आने में समर्थ हैं और
उनका साथी लडखडा रहा है तो वह अकेले ही बढ जायें और
पर पहुंचने का प्रयल अवश्य करें।
nu
१००
जिहोंने राह विधा
१० मार्च को यह दल काठमांडू से एवरेस्ट की ओर चला।
इसमे सदस्यो के अलावा १६२ कुली और १७ शेरपा भी थे।
प्रत्येक कुली को ६० पौड सामान ढोने के लिए दिया गया था।
काठमांडू से एवरेस्ट लगभग २७२ किलोमीटर दूर है। यह तय
'किया गया था कि चोटी तक पहुँचने के लिए रास्ते मे आठ
कैम्प लगाये जायें, जिसमे अन्तिम ७६२० मीटर की ऊंचाई पर
हो और इसी आठवें कैम्प से चोटी पर पहुंचने का अन्तिम प्रयास
किया जाये।
मई मास आरम्भ होने से पहले ही दल के प्रमुख सदस्य
७०१० मीटर की ऊंचाई पर स्थित कैम्प मे पहुंच गये। कर्नल
हट ने अन्तिम चढाई के लिए दो-दो व्यक्तियो की दो टुकडियां
बनाई–पहली मे इवास और बोडिलन थे तथा दूसरी मे हिलेरी
और तेनसिंह । २६ मई को पहली टुकडी ६८१६ मीटर की ऊंचाई
तक पहुँचकर वापस लौटने पर विवश हो गई। इससे पहले कोई
'पर्वतारोही इतनी ऊंचाई तक नही पहुंच सका था।
उस समय हिलेरी और तेनसिंह ८३३६ मीटर की ऊंचाई
पर स्थित पडाव मे थे। वे रात पडाव मे बिता कर सबेरे आगे
बढना चाहते थे, लेकिन मौसम ने रात्रि में ही बडा भयानक
रूप धारण कर लिया । २७ मई को भी तूफान के प्रचण्ड वेग से
चलने के कारण वह रात भी इन्हें वही व्यतीत करनी पड़ी।
२८ मई को प्रात काल, १० बजे ये दोनो साहसी वीर
अपना-अपना सामान पीठ पर लादकर निकल पडे। तीसरे पहर
८५०३ मीटर की ऊंचाई पर १८ मीटर लम्बी और ६ मीटर
चोही ऊपर-नीचे की दो टुकड़ियों पर अपना फैम्प लगा दिया।
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शेरपा तेनसिंह
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उस रात्रि का तापमान बर्फ के तापमान से भी २७ अश कम
था। सवेरा होते होते मौसम खुल गया तो वे दोनो साढे छ:
बजे तम्बू से बाहर निकल आये । तेनसिंह और हैलरी के सामने
एवरेस्ट का दक्षिणी भाग था। वे उस ओर बढे, लेकिन मार्ग
बडा खतरनाक था। थोडी-सी ऊंचाई चढने के लिए बहुत चक्कर
लगाकर जाना पड़ता था और कही-कही तो आगे बढ़ने के
लिए चाकू की धार के समान सकरी जगह पर पैर रख कर
सरकना पड़ता था। उनसे शिखर केवल १२२ मीटर ऊपर रह
गया था।
दोनो बडे उत्साह से चढने लगे कही-कही आगे बढने के
लिए कुल्हाड़ी से बर्फ काटकर सीढियां बनानी पडती थी। कही-
कही बर्फ कार्निस की तरह आगे को निकली हुई थी, लेकिन
प्राण हथेली पर रखकर दोनो बराबर बढते हो गये। दोनो ने
परस्पर अपने को एक रस्सी से बाध लिया था। कभी हिलेरी
आगे बढते थे, कभी तेनसिंह । वढते-बढते उनमे अव शिखर १२
मीटर ऊपर रह गया था।
यह १२ मोटर की अन्तिम चढाई सबसे अधिक खतरनाक
थो । पवत का यह भाग बिलकुल सीधा खडा था। इसमे कही
कोई पकडने या हाथ-पैर टेकने योग्य स्थान न था। एक दरार
से होते हुए वे एक-एक सेंटीमीटर आगे बढ़ रहे थे । वर्फ काट
कर बहना जारी था और ऊंचाई पर बर्फ काटना हँसी-खेल
नहीं था। तनिक मे परिश्रम से सांस फ्ल जाती है। दोनों
बादमी धैर्य और साहस के साथ आगे बढ़ते गये और अन्त में
सफलता ने उनके चरण चूमे।
।
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जिहोंने राह दिखाई
ठीक साढ़े ग्यारह बजे तेनसिंह शिखर पर पहुँच गये और
उसके बाद हिलेरी । दोनो वडे उल्लास के साथ गले मिले । उहें
उनको मजिल मिल गई थी। ससार को सर्वोच्च चोटी पर
भारत, नेपाल, ब्रिटेन तथा सयुक्त राष्ट्रो के झण्डे फहराये गये।
हिलेरी ने झण्डा लगाते हुए तेनमिह के तथा आस पास के वई
फोटो उतारे। चारो ओर फैला हुआ हिम का साम्राज्य धूप
मे
चमक रहा था। जैसे इन वीरो की सफलता पर प्रसनता प्रकट
कर रहा हो।
तेनसिंह ने साथ ही एक स्कार्फ भी हिलाया जो अपने गत
वष के साथी लेम्बर्ट की असफलता को स्मृति मे था। प्रत्येक
सफलता के पीछे कितनी ही असफलताएं होती है। तेनसिंह के
मुख से अस्फुट वाणी मे जो शब्द निकले, वे कुछ ऐसे थे-"जो
सफलता की घडी मे असफल लोगो को अर्घ्य देना भूल जाता
है, उससे बढकर कृतघ्न कोई नहीं है।" तेनसिंह कुछ क्षण चुप
रह कर फिर बोले-"मैंने बचपन में एवरेस्ट-विजय का एक
प्यारा सा स्वप्न संजोपा था, देखता हूँ, आज वह पूरा हो गया
है। संसार में ऐसी कोई चीज नही जो इसान के लिए अजेय
हो।"
वेससार की सर्वोच्च चोटी पर १५ मिनट तक रहे और
फिर तुरन्त ही उतरना प्रारम्भ कर दिया। उन्हें इस विजय
की कहानी लोगो को सुनानी भी थी। उधर माक्सीजन
समाप्त हो रहा था और पढने से उतरना कुछ कम विपत्तिपूर्ण
नही पा।
शेरपा तेनसिंह
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तेनसिंह और हिलेरी ने एवरेस्ट पर विजय पाई थी, पर
यदि पहले की असफलताएं न होती और उनसे जो ज्ञान-वृद्धि
हुई, वह न होती, तो वे कैसे अपने लक्ष्य तक पहुँचते ?
यूरी गगारिन "अन्तरिक्ष मुझे अपने घर जसा ही लगा। मैंने वैसे ही खाया पिया, जसे पथ्वी पर खाता पीता है। मैंने अपनी डायरी भी ठीक से लिखी। मेरे लेख में कोई अन्तर नहीं आया, यद्यपि मेरा हाथ 'भारहीन' था । भारहीनता से गुरुत्वाकर्षण की दशा में आने पर भी मुझे कोई कष्ट महसूस नहीं हुआ।" -यूरी गगारिन "मानव सदा पृथ्वी की परिधि मे नही बंधा रहेगा। वह ब्रह्माण्ड और अन्तरिक्ष की खोज मे पहले डरते-डरते वायुमण्डल की सीमा से परे पहुंचेगा और फिर सूर्य के चारो ओर और समूचे आकाश पर विजय प्राप्त कर लेगा।"-रूस के कालुगा नगर मे एक शिलालेख पर ये शब्द उत्कीण कर अकित किये गये हैं । यह वही जगह है जहाँ विश्वविख्यात वैज्ञानिक जियोल- कोव्स्की रहा करता था, जिसने आज से ५० वर्ष पूर्व अन्तरिक्ष-
पूर्व गगारिन
.
यात्रा करने की अभिलाषा और लालसा की थी। उस समय तो
इस महान वैज्ञानिक की बात को निरी कल्पना लोफ का एक
स्वप्न हो माना जाता था।
अब मानव ने यह स्वप्न साकार कर दिखाया है। १२
अप्रैल, १९६१ को एक युगान्तकारी घटना घटी और विश्व
के प्रत्येक वैज्ञानिक ने, राजनीतिज्ञ ने, जन-साधारण ने एक
रोमाचक कहानी सुनी--"यूरी गगारिल को अन्तरिक्ष में
उडान' जनसाधारण को विश्वास नहीं हो रहा था, लेकिन
अविश्वास करने की भी कही गुंजाइश ने थो। २७ वर्षीम एक
सजीले. सुगठित और बांके मेजर यूरी गगाग्नि ने अन्तरिक्ष में
१०८ मिनट तक अपने अन्तरिक्ष यान के कक्ष मे बैठ कर उडान
भरी। तदन्तर वह सकुशल पृथ्वी पर लौट आये।
- रूसो अन्तरिक्ष यात्री यूरी गगारिन को उडान के २३ दिन
बाद ही ५ मई, १९६१ को अमरीकी नौ सेना के लेन प्रोपर्ड ने
भी ११५ मील की ऊंचाई तक यात्रा की।
इन दोनों उद्यानो से यह सिद्ध हो गया है कि अब वह दिन
दूर नहीं, जब अन्तरिक्ष यानो मे अनेक यात्रियो की उहान,
धाममा तथा अन्य प्रहाँ तक मानव की उडान और पृथ्वी लोक
के यात्रियों के चन्द्रमा में बसने के समाचार हमे प्राप्त होंगे।
पूरी गगारिन एक ही दिन में असाधारण प्रसिदि और
सम्मान प्राप्त करने वाले सर्वप्रथम अन्तरिक्ष यात्री हैं।
यूरी गगारिल का जन्म मार्च, १६३६ को एक कृषक
परिवार में गाया। उनका बचपन निर्धनता में ही व्यतीत हुआ।
दूसरे महायुद्ध के समय, पद महायुर समाप्त होने वालापा,
-
जिहोंने राह दिखाई गगारिन परिवार ग्यात्सम नगर मे आ बसा था। यहां पर रह कर ही वालक यूरी गगारिन ने अध्ययन किया और सारातोव के औद्योगिक स्कूल से स्नातक की परीक्षा उत्तीण की। स्कूल में- जब यूरी गगारिन अध्ययन करते थे तो उन्ही दिनो उहोने उड्डयन क्लव मे हवाई प्रशिक्षण लेना प्रारम्भ कर दिया था। १६५५ मे वह ओरेनबुर्ग के हवाई-स्कूल में भर्ती हो गये और प्रथम श्रेणी मे परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात् उनको गणना विशिष्ट स्सी उडाको मे की जाने लगी। गगारिन विवाहित है। उनकी पत्नी का नाम बालेनतीना गगारिना है । उनकी दो पुत्रियां-येलेना और गाल्या हैं । गगा- रिन का वैवाहिक जीवन बडा सुखद है और पति-पत्नी एक-दूसरे को बहुत मानते है। यूरी गगारिन जिस नाटक के नायक बने, उनका शुभारम्भ ४ अक्तूबर, १९५७ को ही हो चुका था, जबकि सोवियत रूस ने अपना स्पुतनिक-१ छोडा था। स्पुतनिक ६४७ किलोमीटर अर्थात् ५६८ मोल तक गया था और उसने ६४ दिनो मे पृथ्वी की १,४४० बार परिक्रमा की थी। तदुपरान्त, ३ नवम्बर, १९५७ को स्पुतनिक-२ छोडा गया, जिसमें लाइका नामक कुतिया भी विद्यमान थी । लाइका अन्त- रिक्ष मे जाने वाली प्रथम जीवित प्राणी थी। स्पुतनिक-२ अनुमानत स्पुतनिक-१ से छ गुणा भारी था और उसने १६२ दिन की अवधि मे पृथ्वी की २,३७० बार परि- क्रमा की। इसके बाद यह नष्ट हो गया । लाइका इसी अन्तरिक्ष यांना ये पथ पर शहीद हो गई। ।
५ यूरोगगारिन जो तीसरा स्पुतनिक १५ मई.. १६५८ को छोडा गया, स्पुतनिक-१ से १६ गुणा भारी था। अमरीका ने भो इन्हो दिनों कई उपग्रह छोडे। इन सभी (उपग्रहो का उद्देश्य अतरिक्ष की परिस्थितियोका सूक्ष्मतम अध्य- यन करना था, जिससे मानव की चन्द्र-यात्रा का मार्ग प्रशस्त हो सके। ४ अक्तूबर, १९५६ को रूस द्वारा छोडे गये अन्तरिक्ष-पान सूना-३ (रूसी मे लूना का अर्थ है-चांद ) ने चन्द्रमा पर पहुँच- कर उसके अदृश्य भागों के फोटो खोचे । अन्तरिक्ष यानो मे रूस ने कुत्तो को भेजा तो अमरीका ने बन्दरो को । एक ओर लाइका, स्तैल्का, बेल्का और चेतुरका ये तो दूसरी ओर एबल, बेकर और हेम थे। इनमे से कुछ जीवित बचे और कुछ का बलिदान हो गया, या वे अन्तरिक्ष-पथ में शहीद हो गये। अमरीका ने एक वन-मानुष को भी ५,००० मील प्रति घटे की गति से चलने वाले राकेट में भेजा। वह ११५ मोल को ऊंचाई तक उडान भर कर वापस लौट आया। यूरी गगारिन को अन्तरिक्ष यात्रा के लिए प्रशिक्षण दिया गया था। गगारिन का अन्तरिक्ष यान १२ अप्रैल को दोपहर साढ़े बारह बजे (भारतीय समय के अनुसार) उडा था और २ बज कर १० मिनट पर सकुशल वापस लौट आया था। इस बीच न्होंने कुल ३२,४०० मील की यात्रा की। उनके यान की गति १८,००० मील प्रति घण्टा थो, पर्यात् पाँच मील प्रति सेकिंड। अन्तरिक्ष यान की पृथ्वी से अधिकतम दूरी १५ मील और पनतम दूरी १०५ मोल रही थी।
- १०८ जिन्होंने राह दिखाई जिस समय यूरी गगारिन उडान भर रहे थे, सोवियत रूस की जनता टेलीविजन पर उन्हें देखकर खुशियां मना रही थी। यूरी गगारिन की पुत्री ने टेलीविजन पर देखते हुए खुशी से तालियां पीटते हुए कहा-"अहा, पापा, मेरे पापा.. मेजर गगारिन ने अन्तरिक्ष यात्रा के अपने अनुभवो को मास्को के एक पत्रकार सम्मेलन में बताया। पृथ्वी के अद्भुत सौदर्य-दर्शन के सम्बन्ध मे उनके अनुभव बडे रोचक और मनो- रजक है । उहोने बताया था- "मेरे बार-बार 'नुरोध करने पर मुझे अन्तरिक्ष यात्रा के प्रशिक्षणार्थियो मे सम्मिलित किया गया। मैंने प्रशिक्षण लिया और उसमे पूर्ण सफल रहा।" उन्होने आगे बताया, "उडान' भरने से पहले मैं बिल्कुल अच्छा था, पूरी तरह से ठीक । उडान के बीच भी मैं बड़े आनन्द से रहा।" वह थोडी देर रुके और फिर बोले, "न गुरुत्वाकपण मे वृद्धि ने, न शोर ने, न यान के कक्षा में प्रवेश के समय के वायु-कम्पनो ने ही मुझ पर किसी प्रकार का पीडादायक प्रभाव डाला । कक्षा मे प्रवेश और राकेट के अलग होने से भारहीनता की अनुभूति हुई, परन्तु मैं शीघ्र ही इसका अभ्यस्त हो गया।" वह बडे उत्साह के साथ बोले, "पृथ्वी १७५ से ३०० किलो मीटर की ऊंचाई से बिल्कुल स्पष्ट दिखाई देती है । आप पवत- श्रेणियो नदियो, द्वीपो, समुद्री किनारो और झीलो को साफ- साफ देख सकते हैं।" वह कुछ क्षण रुक कर फिर कहने लगे, "आकाश बिलकुल काला दिखाई देता था। तारे कहीं अधिक प्रकाशमान थे। पृथ्वी के १०४ रोगणारिन चारो ओर बहुत ही सुन्दर नीले रग का मण्डल दिखाई देता था। 'पृथ्वी के क्षितिज का किनारा चमकीले नारंगी रंग का ज्ञात होता है जो धीरे-धीरे इन्द्रधनुप के रणो मे परिवर्तित हो जाता यूरो गगारिल ने अपना हाथ ऊपर उठाते हुए फिर कहा, "आप अपनी बाँहे ऊपर कर लें, फिर वे वैसी ही रहेंगी, आपको ताकत लगाने की आवश्यकता नहीं । कोई वस्तु रखनी है, उसे ऊपर रख दीजिए, वह गिरेगी नहीं, ऐसी रहेगी जैसे ऊपर तेर रही हो।" एक पत्रकार ने यूरी गगारिन से पूछा, "अन्तरिक्ष आपको कैसा लगा" मेजर गगारिन ने उत्तर दिया, "अन्तरिक्ष मुझे अपने घर जैसा ही लगा | मैंने वैसे ही खाया-पिया जैसा पृथ्वी पर खाता- पीता हूँ। मैंने अपनी डायरी भी ठीक से लिखी, मेरे लेख में कोई अन्तर नही आया, यद्यपि मेरा हाथ 'भारहीन' था। भारहीनता से गुरुत्वाकर्षण की दशा मे माने पर भी मुझे कोई कष्ट महसूस नहीं हुआ।" ये हैं अन्तरिक्ष योत्री के अनुभव ।। रूस और अमरीका इन दोनो देशो में अन्तरिक्षयात्रा के सम्बन्ध में कठिन प्रतियोगिता है । यूरी गगारिन द्वारा अन्तरिक्ष में उडान भरने से अमरीका में खलबली मच गई। अमेरीका के अन्तरिक्ष कार्यक्रम की कटु बालोचना को गई और इसकी जांच की मांग भी की गई। तभी एक महीने के भीतर ही अम- रीका के एक ३७ वर्षीय यान-बालक एकेन शेपड को अन्तरिक्ष प्राना का समाचार सुना।
११० जिहोंने राह दिखाई शेपड ने मकरी कैप्सूल मे ११५ मील की ऊंचाई तक यात्रा की और प्रथम बार इतनी ऊंचाई पर किसी यान को सफल सचालर के बाद सफलतापूर्वक पृथ्वी पर ले आया गया। यह कैप्सूल धनुषाकार मार्ग बनाता हुआ गया और १५ मिनट वाद एटलाटिक सागर मे उतरा, जहां वैज्ञानिक, डाक्टर और मल्लाह पहले से ही उपस्थित थे। नौसैनिक कमाण्डर शेपड ने अपनी उडान के समय जो दृश्य देखा, वह बडा आकर्षक था। लगभग गगारिन के समान ही उसने भी पृथ्वी के सौन्दय का वर्णन किया है। अनेक वैज्ञाज्ञिक समीक्षको ने गगारिन और शेपड की उडानो की तुलना की है। उनका कहना है कि रूसी राकेट की शक्ति आठ लाख पोंड थो, जबकि मकरी कैप्सूल को ले जाने वाले रेड- स्टोन राकेट को शक्ति केवल ७८,००० पौंड थी। शेपर्ड केवल साढे चार हजार मोल प्रति घटा की गति से उडा, जबकि गगारिन १८,००० मोल प्रति घटा की गति से। शेपर्ड की उडान केवल १५ मिनट की थी, जबकि गगारिन १०८ मिनट तक उडा और गगारिन की अपेक्षा शेपड़ने केवल सौभाग की यात्रा की। जो भी हो, वैज्ञानिको ने शेपर्ड की उडाा को गगारिन की उडान से किसी भी प्रकार कम नहीं आंका है । अन्तरिक्ष नाटक के एक दृश्य मे गगारिन हीरो बना तो दूसरे दृश्य मे शेपर्ड । यद्यपि अव तक अन्तरिक्ष में मानव ने अनेक उडान भर ली हैं, परन्तु अभी भी अनेक समस्याएँ हैं जिनका वैज्ञानिको को सामना करता है। गगारिन ने वैज्ञानिको को अनेक धारणाओ को निर्मूल सिद्ध कर दिया है। विकिरण का उन पर कोई प्रभाव नही पडा है, उनके शरीर की प्रक्रियाएँ भी पूर्ववत् चालू - पूरी गगारिन ૧૧૧ रहीं। उन्होंने भारहीनता के प्रभावो को भी सहा और उसे, उन्होंने आनन्ददायक अनुभव किया। यूरी गगारिन की अन्तरिक्ष माता-अवधि बहुत कम थी, लेकिन जब मानव काफी समय तक अन्तरिक्ष मे रहेगा तो विशेष परिस्थितियो के परिणामस्वरूप उसे अनेकानेक अनुभव होंगे। उसकी भूख में कमी या ज्यादती हो सकती है। सांस लेने में कठिनाई हो सकती है और जीव-कोपो पर विकिरण का प्रभाव पड सकता है। हो सकता है, मानव को अन्तरिक्ष मे अकेलापन भी अनुभव हो और शूयाकाश में विचरण करने का भय भी मानव मन मे रहेगा। १६६७ के आरम्भ मे ही अमरीका के तीन अन्तरिक्ष यात्री अपनी यात्रा पूरी होने से पूर्व ही यान्त्रिक गडबडी के कारण शहीद हो गये । चन्द्रमा पर मानव की विजय निश्चित है, हो सकता है इस सफलता प्राप्ति के ध्येय मे अनेक व्यक्तियो को और शहीद होना पड़े। साराश यह है कि पृथ्वी जैसी परिस्थितियां न मिलने के कारण मानव को अन्तरिक्ष में अधिक समय तक विचरण करने में अनेक समस्याओ का सामना करना पडेगा। वैज्ञानिक इन समस्याओ का अध्ययन करने और इन्हे सुलझाने मे अपनी पूरी शक्ति के साथ बुटे हुए हैं। अब जब स्सी राकेट चद्रमा पर सफलतापूर्वक पहुँच हो चुका है तो न जाने, आने वाली घडियो मे सि शुभ बेला में मानव के चरण भी वांद पर पडें और उसका संजोया स्वप्न- चांद पर विजय-साकार ले । मुद्रव वधु प्रिंटिंग सरिस २०, दिल्ली ११००३२
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