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समर्पित * मोठा, दीय महाविद्यालय भमांक- माया कृष्णकान्त त्रिपाठी ७
राजकीय महाविया
अन्त मे, में साहित्य निकेतन कानपुर के अध्या सहा
पामनारायण कपूर का हृदय से धन्यवाद दूंगा, जिनके स्नेह के कार
स्तुत कृति पाठकों के हाथ में पहुच सकेगी।
कृष्णकान्त त्रिपाई
सनातनधर्म कालेज
कानपुर
रावली,१९६३
०५७
अनुक्रम प्रथमयभाय १. सस्कृत साहित्य में भवभूति, २. संस्कृत साहित्य में नाटक का स्थान, ३. साहित्य में रूपकों की उत्पत्ति ४. लौकिक सस्कृत साहित्य मे नाट्य परमारा मौर भवभूति पृष्ठ -१६ द्वितीय अध्याय ५. भवभूति का जीवन भोर समय, भवभूति की कृतियां और उनका समय क्रम पृष्ठ १७-४८ तृतीय अध्याय ६. भवभूति कृत प्रपत्रयगत सदृश पदस ग्रह- महाबीरचरित मौर उत्तररामचरित, उत्तररामचरित और मालतीमाधव पृष्ठ ४९-५६ चतुर्थ अध्याय ७. भवभूति को कथा वस्तु के स्रोत मोर रामकथा- रामायण, महाभारत तथा पुराण और भवभूति के नाटक, पपपुराण और रामकथानक, पपपुराण और भवभूति के कथानक मे यन्तर, रामकया समीक्षा, रामायण में इतिहास और कल्पना का योग, महाकाव्यो के उपरान्त रामकया के विविध रूप, रामकथा का सुधरा हिन्दू रूप, भास, कालिदास मोर बृहत्वपा भयभूति को वस्तु के स्रोत पृष्ठ ५७-७७
पचम अध्याय
८ भवभूति के नाटको का शास्त्रीय विवचन, महावीर
चरित-कथासार, नाम, वस्तु मोर पात्र समीक्षा,
रामायण और महावीचरित + धानक मे अन्तर,
सविधान की दृष्टि से वस्तु समीक्षा, महाबीरचरित
के गुए। उत्तररामचरित-क्यामार, पात्र परिचय,
परिवतित और परिष्कृत वधानक, कथानक वा
विकास, कथा सविधान का कलात्मक वैशिष्ट्य,
उतररामचरित के कुछ अन्य गुण, उत्तर दोष,
भवभूति की शैली, भवभूति का प्रकृति चित्रण, वाह्य
प्रकृति का चित्रण, भवभूति का प्रणय चित्रण उत्तर
में प्रयुक्त छन्द सौर यलकार
पृष्ठ ७८-१४३
उत्तर माधुरी
पृष्ठ १४४-१६३
परिशिष्ट
(अ) भवभूति स्तुति पावलि
(ब) भवभूति के नाम पर मग्रह ग्रंयो में उद्धृत पद्य
(स) सहायक ग्रप सूची
पष्ट१६८-१६८
.
37295 प्रथम अध्याय- यदोयकारण्यकटाक्षलेशं लब्धा हसन्तीव जना सुरेशम् । अघातिघातिप्रथमप्रवेशं । कामदशं शरणं मजाम ।। १ सस्कृत साहित्य मे भवभूति - सस्कृत भाषा और साहित्य हमारे आम देश की वह सम्पदा है, जिसमें बल पर हम सराार की समस्त सम्म जातियो के समक्ष उन्नत मस्तक होकर खड़े हो सकते हैं । जिस मस्कृत साहित्य शाश्वत प्रत्य. रत्न बेद मार्य जाति के इतिहास मे प्राप्त प्राचीनतम लेख हैं, ये आर्य जाति के वैभव के ज्वलन्त स्मारक हैं, इसमे दो मत नहीं हो सकते । महाकवि गेदे जिस समय मस्कृत साहित्य की एक कृति शकुन्तला को पढते हैं, हप विह्वल हो नृत्य करने लगते हैं । महाम् विधारक शापेन- हावर जब इस सस्कृत साहित्य के रस्नो (उपनिषदों) के जगमगाते प्रकाश से अपने हृदय को पालोकित पाते हैं, तब दृढ विश्वास के साप कह उठते हैं कि ये मुझे मृत्यु के पश्चात् भी शान्ति देंगे। 570 मैक्समूलर पौर डा० मैकडानल जिस साहित्य के निर्मातामो के प्रति विनम्र श्रद्धा- अलिपा समर्पित करते हुए अमित नहीं होते और अपने को भाग्यवान कहते हैं, उसी साहित्य के विपप मे-उसी सुरभारती के विषय मे- जिसे मार्य श्रद्धा के कारण देवभाषा कहते थे, हम यहा विचार करने को धृष्टता अपनी मन्दमति के बल पर करने बैठे हैं। जे०ए० १९१०-१२, १८४ पृ.
ईमा से संकठों वर्ष पूर्द बब कि बार यूशे से इंगन, एशिया म
और उत्तरी पश्चिमी भारत मागमित था, उस समय की भामा
मापा हमारी भारतीय मौर ईगनी भाषाओं की मूलमाला
आर्य भाषा का प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद है. जो मन गायब
अत्यधिक निक्ट का है। यह प्रत्य वैदिक सस्कृत में है जिसे इन्दम |
कहते । ऋग्वेद को मात सलोषिक सस्कृत ता, विकास के
चिन्ह दृढता और स्पष्टता के साथ दिखाये जा सकते है।
सस्कृतमा नियम शैचित्य सौकिक सस्कृत मे कठोर और व्यक्ति
विकास की प्रगति, परपरा और व्याकरण के नियमो से बढ़
पर भी नैसगिक रही है। जिसके परिणाम स्वरूप समत भाषा
भारत के प्राचीन दक्षिणी पोर पूर्वी भागों के निवासियों में सम्म
में, भार्यो के माने से, उनकी भाषामों का प्रभाव बहुत दूर
ईस स्मन पुप मे जो मैकडो वर्षों तक चलती रही, कुछ न
स्मृति प५ मे बिछुडा गये भोर कुछ नए माकर मिल गये। क्योकि
और साहित्य लेखन सामग्री के ममा म मौखिक स्मरणो पर
माश्रित थे। विदेशी भाषामो ने भी सुरभारती के चरणो पर सु.
भेटें-शम्दों के रूप में समर्पित की। किन्तु प्रचड वैयाकरणों के .
के कारण यह व्यापार नगण्य हो रहा: प्रा. स्यूडर के अनुसार पाटि
(५०० ई. ५०) ने निझर के समान नैसगिक प्रगतिशील संस्कृत में
को नियमो से बद्ध कर लौकिक रूप मे सकुचित कर दिया।
लेखन कला, अभिव्यजना प्रणाली और प्रगति की पति के
रूप परिवर्तित होने रहे हैं । लौकिक सस्कृत के प्रथम प्रभाष पूण प्रा
है पीटसंम्-जे. ए. पा. एस. ३२, ४१४-२०१०
२
का स्मारकरल बाल्मीकि रामायण है, जो विश्व माहित्य को प्रमर निधि है । हम महाकवि को प्रादि कवि के रूप में सदेव श्रद्धा ममपित करते रहे हैं । डा. कीथ इनका समय ४०० ई० पूर्व कहते हैं।' डा. हानल और ग्रियासन को यह भ्रम हो गया था, कि पाणिनि को भाषा वैदिक भाषा के उनर कालीन युग की भाषा को छाया थी, भोर लौकिक मस्कृत तो पालो के विरोध में कृत्रिम उपज है। किन्तु यह भ्रम भव किसी को नही है। संस्कृत, ज्ञान-विज्ञान दोनो को भाषा रही है । संस्कृत भाग के विकाम में ब्राह्मणो का बडा हाप रहा है, जिसके कारण पाश्चात्य मालोचक इस भाषा को ब्राह्मणधर्म और ब्राह्मण सस्कृति की भाषा कह देते हैं । यह उनके ज्ञान की कमी है । बौद्ध और जैन सस्कृत साहित्य पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। हां, सस्कृत भाषा और साहित्य की समृद्धि का धेय कुछ दूर तक ब्राह्मणो को उनके अथक परिश्रम और त्याग को दिया जा सकता है। साहित्य, शब्द और अम के मजल सामन्जस्म का नाम "सहि- तस्य भावः साहित्यम्" व्युत्पत्ति भी यही बात करती है । महाकवि और महान् वैयाकरण भर्तृहरि ने "साहित्य सगोत पला विहीनः" मे साहित्य शब्द का प्रयोग-शब्द मौर मधं के अनुरूप सनिवेश बाले काव्यो के अभिप्राय में किया है। कविरार राजशेखर भी-पचमी साहित्य विति यायावरोयः साहिवतसूर्णो विद्यानामपि निष्यन्दः ।" मर्थात् पुराण, ण, मीमासा और धर्मशास्त्र इन जाणे विद्यामी का सार साहित्य विद्याको कहते हैं। । हिस्ट्री माफ तस्कृत लिटरेचर पृ. २ विहारी डिक्शनरी ३ काव्य मीमामा १०४ भशी चालक २ साहित्य में नाट्य का स्थान :- नाट्य शद नो रूपका बची है, सर्वप्रथम भारत के नाटय शाम में शीर्ष स्थान प्राप्त करता है । भरत नाटय मात्र को पलामो का 'विश्वकोष' कहा जाता है। ललित कलाबो में काश्य कला पौर विद्याओं मे साहित्य विद्या अन्यतम पदभागी हैं। ब्रह्मान द सहोदर रसानुभूति काव्य र सरस, सरल और सहर माध्यम से ही सवदा होती रही है। काव्य के अनिवचनीय मानन्द सा सभी पाश्चात्य और पौर्वात्य विद्वान स्वीकार करते हैं । प्राचीन मुग के ऋषि रसास' fra रस की उपमा ब्रह्म से देते थे, उप्त माहित्यिक जगत् के मनोवैज्ञानिक रूप काले रस की अनुभूति प्राचीन साहित्य शास्त्री- जिसकी अनुभूति परपरा आचार्य भरत ने; विभावानुभाव व्यभिचारि योगा स निष्पत्तिः से व्यक्त की है-दृश्य काव्य तक ही सीमित मानत थे। एक युग पा, जब कि अलकार श्रव्य काव्य को और रस दृश्य काव्य की मारमा माने जाते थे। समय के साथ की सत्ता का काम जगत के प्रत्येक क्षेत्र में हो गया पोर मात्र काष्य को मारमा के रूप में रस सिदाद सभी को स्वीकार है । वस्तुतः, रस को सहज अनुभूति जितनी दृश्य काव्य में घर की वस्तु है, उतनी धम्प काव्य के नहीं । यही कारण है, जिससे काव्य जगत् में नाटक को सर्व श्रेष्ठ स्थान दिया गया है । कवि बिल्हण न अपने 'विक्रमादू देव परित' में काव्य रूपी अमृत को साहित्य समुद्र के मन्यन से उत्पन्न होने वाला कहा है " साहित्य पायो निधिमन्यनोत्यीकाव्यामृतं रक्षत हे कवीन्द्राः।" साहित्य में काव्य मोर काव्य में नाटक को मनोगता को दृष्टि परम पद प्राचीन सहदयों ने प्रदान कर दिया था- "काव्येषु नाटकं रम्यम्।" . ४
"
"
संस्कृत साहित्य ने तो यथार्थतः अपने " शाकुन्तलम् " ऐसे
उच्चकोटि के नाटक के दल पर ही विश्व मे स्याति प्राप्त की है। जैसे
गीताजलि के बल रवीन्ट ने। काव्य में नाटक की प्रतिष्ठा सर्वोच्च सभी
को सदा स्वीकृत रही है। महाकवि कालिदास का भी कहना है :--
गुण्योद्भवमन लोक चरितं नानारसं दृश्यते
नाट्यं भिन्न रुचेर्जनस्य बहुधाग्येकं समाराधनम् ॥"+
काक्ष्य के श्रवण की अपेक्षा रगमव का पाकर्षण पधिक होता ही है ।
काव्य के प्रानन्द की अनुभूति में मनुष्य भी नाटक के मनोज अभिनय
वो देखकर रससिक्त हो जाते है। आचार्य बामन का कहना
सन्दर्भ पु रूपकं श्रेय.। तद्धि चित्रं
चित्रपटयत् विशेष साकल्यात्
लोरवृत्त का अनुकरण नाटक होता है। पाचार्य भरत ने अपने
नाट्यवेद को सावरिणक कहा । इसमे तीनो लोको के भावों का
अनकीर्तन रहता है।
"त्रैलोक्यस्यास्य सर्वश्य नाट्य भावानु कीर्तनम्।
नाना भावोपसम्पन्न नाना वस्थान्तरात्मकम् ।।
लोक वृत्तानुकरणं नाट्य मैतन्मयाकृतम् ।
आगे भाचार्य भरत कहते हैं :-
'"न वज्ञानं न तन्छिल न सा विद्या न सा कला-
न म योगो न तत्कर्म नाटयऽस्मिन् यन्न दृश्यते।।'
ऐसा कोई जान, शिल्प, विद्या, कला, योग और कर्म नही है, जो
इस नाट्य में न दिखाई देता हो।
+ मालविशग्निमित्र १/४
१-काव्यालकार सूत्र १/३/३-३१ २- नाट्यशास्म २/१०८-१
३-नाट्यशास्त्र १/११४
गार
५
इस उपयुक्त विवेचन से यह स्पष्ट ही हो चुका है, कि नाटक मे गद्य और पद्य दानों का आनन्द प्राप्त हो जाता है। विश्व के प्रत्येक साहित्य मे नाटको को सबोच्च सम्मान प्राप्त है। शेक्सपियर अपने नाटको के ही कारण माग्न साहित्य में मूर्धन्य हैं । अन्त में प्राचीन आलकारिको की उक्ति को उद्धृत करने का लोभ नही सवरण कर सक्ते :- नाटकान्तं कवित्वम्" ३ साहित्य में रूपकों की उत्पत्तिः- किसी भी भाषा और साहित्य तथा उसके अगो और उपागों के जन्म को निश्चित तिथि को निर्धारित कर देना सदैव बहुत कठिन कार्य रहा है । क्योकि साहित्य एक सतत प्रस्रवणशील मोत होता है। उसके वास्तविक आद्यन्त का दिन नहीं निर्धारित किया जा सकता है। चिन्तु फिर भी, एक युग के लम्बे क्षेत्र में जन्म और समाप्ति को वाह्य रूप रेखाएं पहिचानने का प्रयत्न किया हो जाता है। पूर्व प्रथम नाट्य प्राब्द माचार्य भरत मुनि के नाट्य शास्त्र मे प्राप्त होता है। पाणिनि ने "पाराशर्यशिलालिग्या भिक्षनटसूनयो' सूत्र मै नट शब्द का प्रयोग किया है। नाट्य शब्द को न्युत्पत्ति के बारे में विद्वानों के विविध विचार हैं । रामचन्द्र गुणचन्द्र ने की व्युत्पति 'नाट्' धातु से मानी है। 'नाट्य सर्वस्वदीपिका'। मे मूल धातु 'नद' स्वीकार की गई है । डा. वैवर ने नाट्य सर्वस्वदीपिका के मत को स्वीकार करते हुए भी, कुछ सशोधन करते हुए कहा है कि नट धातु नृत धानु का प्राकृत रूप है । कुछ विद्वानो की धारणा है कि मूल धातु नृत ही है, उसे नट आदेश हो जाता है। विद्वान मन्कद ने पपने 'टाइम अफ गम्त ड मा' नामक ग्रन्थ में वेवर के मत का १-नाट्य दण पृ.२८ । 19 नाटय शब्द रसानाथस्यालय । खण्डन करते हुए लिखा है कि Resfristen BADK कही भी नहीं मिलता है । साधारणत अभिनयायंक नट धातु से नाट्य, नाटक प्रादिपवनेंगे। नाटक की उत्पत्ति के विषय म विद्वानों में विविध मत हैं। कुछ पाश्चात्य विद्वान यूनान करे नाटको का प्रादिम घर मानते हैं। शेष पाश्चात्य और भारतीय विद्वान् भारतवर्ष को नाटकों का भादि उद्- भावक स्वीकार करते है। भारतीय प्राचीन परम्परानुसार नाट्यवेद की सृष्टि ब्रह्मा जी ने की थी। तथा उमका प्रचार मरत मुनि ने धरातल मकिया । वैज्ञानिक अनुमन्धान पद्धति के अनुसार भी सस्कृत साहित्य म नाटकाका मस्तित्व अत्यन्त प्राचीन है और उसका भादि स्रोत भारत भूमि ही हैं। रूपकों की उत्पत्ति की भारतीय परम्परा-भरत मुनि प्रगीत 'नाट्य शास्त्र' नाटशास्त्र (ड्रामेटी) के ऊपर प्राचीननम लेख कहा जाता है। इसे सावणिक पचम वेद की सजा दी गई है । नाट्य- वद म स्पको को नापति की दैविक परपरा का वर्णन है। भरत मुनि का कहना है कि मत्म युग में अभिनय का स्थान तथा प्रेता घुग मे एक विशप पानन्द की पावश्यकता का अनुभव कर, सभी देवता मिलकर ब्रह्मा जी के पास गय और उनसे प्रार्थना के रूप में निवेदन किया कि विसो ऐमी वस्तु का निर्माण कीजिए जो पास और कानं दोनो को समान मानन्दप्रद हो जिसस सभी या प्रानन्द ले सकें। ब्रह्मा जी ने अनुग्रह करत हुए ऋग्वेद से पाठय, सामवेद से गीति, बजुर्वेद से पमि- नय और अथववद से रस लेकर नाट्यवेद का निर्माण कर दिया "जग्राह पाध्यमृग्वेदात् सामभ्यो गीतमेचा यजुःभिनयान ६म पश्चात् ब्रह्मा जी ने देवताओ केपी १-नाट्य शास्त्र १/२। It'शा प्रेक्षागृह निर्माण करने को माना दे दो। अभिनय के समेत ब्रह्मा जी ने भरत मुनि को प्रदान कर दिए। इस नई मृष्टि से प्रसन्न देवों ने यथानुकूल-शिव ने ताण्डव नृत्य, पावंती लास्य नृत्य और विष्णु ने मभिनय के चार प्रकार-मागिक, धानिक, माहायं भोर साविक प्रदान किए । अप्सराओं को भी उत्पत्ति कैशिको वृत्ति के अभिनयार्थ हुई और भरत एव उनके पुत्र पृथ्वी लोक में अभिनय के लिए निर्वाचित हए । क्योंकि मभिनय क्ला देवो के वश को नहीं मानवों के वश की समझो गई भरत के नाट्य शास्त्र का उल्लेख महाकाव्यो में भी पाचवें बेद के रूप में है ।। सर्व प्रथम इन्द्रवज महोत्सव में अभिनय हुधा । मभिनय में देवों को दानवो पर विजय दिखाई गई। वैदिक संवाद -न ट्य का ऋग्वेद से ग्रहण किया जाना सार्थक सिद्ध हो गया है । ऋग्वेद में कई ऐम सवाद स्थल है, जिन्हे विद्वानों ने निकाला है, उन्हे हम अपने नाटको वे भूल रूप कह सकते है। इससे भारतीय परपरा प्रमाणित होती है । प्राय, पन्द्रह सबाद स्थल विशेष प्रसिद्ध हैं। "प्रयम-१०/१० मे यम-यमी, द्वितीय-१०/९५ पुरूरवा-उर्वशी, तृतीय-८/१०० नेम-भार्गव मौर इन्द्र का, चतुष-- मगरस्य, लोपामुद्रा भौर उनके पुत्र /१७६, इन्द्र और वासुत्र ८/२८ पष्ट-इन्द्र, अदिति और वामदेव ४१८, सप्तम इन्द्र-इन्द्राणी पौर सुषाकपि १०/८६, प्रप्टम-सरमा और पणि १०/१०८, नवम-विश्वामित्र और नदिया ३/३३, दशम-वशिष्ठ और उनके पुत्र ७/३३, एकादशम-इन्द्र मौर मरुत १/१६५" मादि। पचम, ये सभी सवाद बडे ही नाटकीय है। इन सबादी के मौलिक उदभव और नरेश ने रे मोई स्पष्ट विचारधारा का ज्ञान नहीं १-हापकिन्स दि ग्रेट एपम प्राफ इण्डिया'०७१०/२३, 1 ६ . है। १८६ ९ म प्रो० मक्समूलर ने लिखा था, कि "यह सयाद (१/१६५) मरुत के प्रति भादर में यज्ञ के अवसर पर कहा जाता था।" प्रो० लेवी का भी कहना है कि" सामवेद से सिद्ध होता है कि वैदिक मुग म संगीत विद्या पूर्ण रूप से विकशित थी । अथर्ववेद १२/१/४१ मटस केन करता है कि मादमी को कैसे नाचना, गाना और बजाना चाहिए। इससे सिद्ध होता है कि वैदिक युग में नाटक के सभी उपकरण वर्तमान थे। पुराहित लोग देव भोर ऋपियो का स्थान लेकर स्वर्गीय धरनाओ का पृथ्वी पर अनुकरण करते थे। किन्तु प्रो० वानयादर न त किर ढग पर कहा है, कि १०/११९ के ऋग्वेदीय मवाद के बल पर हम कह सकते हैं कि ऋग्वेदकाल में नृत्य नहीं था। हाँ बागा युग यहीय शुभावमगे पर प्राकृतिक घग्नानो का अभिनय पाश्रय से किया जाता था। डा. हटंल का कहना है कि वैदिक मूक्त सदा गाए जाते रहे हैं । एक व्यक्ति कई व्यक्तियो के स्थान पर ही गा स.ता। फ्लत कई व्यक्ति गाया करते थे । मचाए प्रथमन. गीतगोविद के समान नाट्यकला के क्षेत्र में प्रविष्ट हुई । जिसका प्रमाण सुपणाध्याय है और जिनका रूप धार्मिक यात्रामो मे माभामित होता है। किन्तु इन तथ्यो का कोई प्रामाणिक प्राधार नहीं है । ऋग्वेद स्तुति परक ग्रन्थ है और उसका यज्ञों मे धामिक रूप व्यवहार होता न यक इन सवाद मूतो के उद्देश्य के बारे में प्रो. विडिश, डा. ओल्डेन वर्ग और डा. पिशेन आदि का कहना है कि यह सवादात्मक सूता पूर्ण बाटकीय हैं और नाटकों में गद्य पद्य मिश्रण इनका प्राचीन १-एस.बी. ई०, ३२ । २-टी० आई० १/३०७/८९०० । ३-कीय सस्कृत डामा पू०१६ ४--वि० यो० जे० २२/२२३ । ५-दि० मो० ० १८/५९ । ९ सूक्त पूर्ण न नाटकीय हैं और नाटकों में गद्य पद्य का मिश्रण इनका अर्वाचीन उदाहरण है विन्तु साहित्य में ऐसे किसी भी प्रकार के सकेत प्राप्त नही होते है जो इन तकों का ममर्थन करें। वैदिक यनों में अभिनय -प्रायों के यज्ञ, वैवल गाए गए सामो पौर देवो के सम्मान म कहे गए स्तवो स ही पूर्ण न रहते थे, किन्तु कुछ ऐसे उत्सव सम्बन्धी क्रिया कलाप होते थे, जिनमे अभिनय का प्रयोग किया जाता था। "सोम यज्ञ के लिए सोम का प्रय" सोम विक्रेता और क्रता उपरोहित के बीच पह सवाद रूप से अभिनय होता था। किन्तु इसे हम अभिनय रह सकते हैं क्योकि अभिनय वहीं कहा जा सकता है, जिसमें पात्र अभिनय के लिए ही किसी अन्य का रूप धारण करे और हे-मुने, और इस क्रिया से जव दूसरे प्रानन्द प्राप्त करे। हा० वीथ पूण निश्चय के साथ रहते हैं कि यजुर्वेद काल तक माटको का अस्तित्व न पा | वे नट शब्द को बहुत अर्वाचीन कहते हैं । उना मत से शैल्प शब्द प्राचीन है। प्रा. हिलवान्ड और डा० कोनो का विश्वास है कि यज्ञीय नाटक अवश्य थे। इनमें गीति, नृत्य और सगीत को प्रधानना होती थी। कोपीसको ब्राह्मण इसका प्रमाण है। किन्तु वैदिक सूक्तों का धार्मिक भयोग प्रारम्भ मे न मानकर लोरिक उपयाग कोई भी विद्वान् मानने को तैयार नहीं है। हम यह मानने को तैयार हैं कि वेद नाटकीय तत्वों के मूल नाटकों की उत्पत्ति व विकास में महाकाव्य:-रामायण' १-बाड वेदि. माइया१/६९ । २-कीय स. डामा पु. २४ ३-वी० एम० ३०/४। ४-२९/५ । ५-रामायण १९७२।६७।१५, २।११७, २०६९।४ २।८३११५॥ स्रोत हैं। १० मोर महाभारत के युग मे इस कोमन कला को मोर विशेष विकास- भय प्रगति हुई। जिसमें प्रमाण रूप में नट, नतंक, नाटक, रगमच, कुशीलव मादि पारिभाषिक शब्दो के प्रयोग हैं। महाभारत के शान्ति पोर मनुशासन पर्व में नाट्य के स्पष्ट सकेत है। प्रो. हिलेवान्ड महाभारत काल में नाटक के विकसित रूप की सत्ता मानते हैं। अनुशासन पर्व में टीकाकार नीलकण्ठ नट और नतंक शब्द का स्पष्ट प्रयोग बनाते है । हरिवश पुगण में तो गमायण पर भाधारित नाटक के अभिनय का उल्लेख है । हरिधश ईसा को द्वितीय शती से पहिले का है । गमायण २/७/१५ मे समाज उत्सव में नटो और नर्तको का वरान प्र या है। रामायण २६९/३ मे व्यामिश्रक' शब्द सस्कृत- प्राकृत नाटर के पथ में प्रयुक्त हुआ है । रा० कोथ का कहना है कि कुश और लव वाल्मीकि रामायण का गान करते थे, इसका प्रमाण है। इसा पनुमा होता है कि 'कुशीलव' कुश भोर लव मिश्रण से बना है राधा रामायण का मान मभिनय से सम्बन्धित था।' व्य कए और नाटकों का विकास -पाणिनि ने अपनी अगध्यायी मे नट सूत्र का स्पष्ट उल्लख किया है। कात्यायन और पतञ्जलि ने इस बध मोर बलि बध नाटको के सकेत दिए हैं जो पाणिनि चित है । डा. वेवर महाभाष्य के "शोनिक, शोभिका, शोभानिका", शब्दों से नाट्य रगमच को विद्यमानता व्यक्त करते हैं। डाक स्यूडर्स का कहना है कि शोभिक' छाया चित्रो की व्याख्या करने वाले को कहते हैं। प्रो० लेवी शोभिक' को नटो के शिक्षक की सज्ञा देते हैं। हमारा तात्पय केवल इतना है कि ई० पू० २०० के आस-पास नाटक विकास में थे। tो महाभारत ५१५, १।२१९।४, १२१८.१०. २११२॥३६॥ १-शान्ति पर्व १२/१४०/२१ । २-स० ड्रमा पृ० ३१ । ३- महाभाष्य २/३६.
. कस बघ और बलिवन्ध से ज्ञात होता है कि नाटकों का सम्बन्ध धर्म मोर अत्मवा से भी घनिष्ट पा । प्रोसे होलिकोत्पर की तुलना महे' से में रत है जिस साधार पर हरमा शास्त्री भारतीय नाटो की उत्पत्ति, इद्र-रता के उपलक्ष्य में उनके अभिनन्दनोताव के व्यक्त करने के रूप में हुई कहते हैं । यह इन्द्र की विजय मेघो के {राक्षसो)-उपर वर्षा काल मे हुई थी । इस धारणा वे अनुमार धार्मिक रामनीलामो और कृष्ण लीलाओ का भी प्रभाव नाटकों को उत्पत्ति और विकास में हैं। किन्तु हानिकोत्सव मौर वर्षा ऋतु का कोई सामञ्जस्य नही स्वीकार किया जा सकता है नाटकों को उत्पत्ति की लौकिक धारणाएँ-प्रो. हिलेवान्ड और कानो वा कहना है कि नाटको की उत्पत्ति के चिन्ह धामिक कृत्यों और और वमको में नहीं खोजने चाहिए। ये विकास में केवल सहायक है । बहुरूपियों का अनुकरण करना महामायो के माघ सस्कृत नाटकों के मूल ये हैं । किन्तु नाटको के पहिल बहरूपियो रे ऐमे मस्तित्व का कोई भी प्रमाण प्राप्त नहीं है। जातको मे यद्यपि इसका उल्लेख है । किन्तु जातको मे सैकडो वर्ष पहिले संस्कृत नाटकों का अस्तित्व था, यह सिद्ध है। प्रो. पिशेला कहना है कि पुतलिका नृत्य भारत को वस्तु है । नाटको को उत्पत्ति का मूल वे पुत्तिलका नृत्य को स्वीकार करते हैं । मित पुत्तलिका नृत्य का प्रचलन जिस समय भारत उसी समय सगार के अन्य देशों में भी। हा, इम नृत्य की जन्मभूमि भ रत अवश्य है। महाभारत तया गुणादय को वहाकया मे पत्तलिका नृत्य का उल्लेख है । वहया ३००६०को है । इसके पश्चात राजशेखर को बालरामायण म इसका उल्लख है किन्तु हमारे भास, कालिदास, शूदर मादि सो बहुत परिणाम १-हाम आफ दि १पट प्ले (लन्डन) में था, प्रो० कोनो का छायानाटयो से नाटयोत्पत्ति का सिद्धान्त अब भी इस रूप में ग्रागया है कि इन नाटको का भी हाथ में रूपको विकास भे है । क्यो कि छायानृत्य ई० पू० के नहीं है । कोनो का कहना है कि भशोक के चौथे शिलालेख मे 'हा' का उल्लेख है । किन्तु रूप से नाटक थोर वह भी छायानाट अर्थ लेना वह भी बौद्ध साहित्य से जहा उस युग मे नाटक देखना हेय था-कोनो के हो वश की बात है । रिशेन क तक कि छाया नाटक बहुत प्राचीन हैं.मूल्य हीन हैं, क्योकि प्राप्त छाया माटक दूतांगद १३ वी शती का है । डा०रिजवे का कहना है कि सभी धर्मों मे मृतात्मानो के प्रति मादर और श्रद्धा व्यक्त की जाती है । इसी तत्व के प्राधार पर नाटकोत्पत्ति हुई । किन्तु डा० कोष ने इसका पूर्णत खण्डन कर दिया है।' ग्रीकप्रमाव-डा. वेवर संस्कृत नाटको को उत्पति और विकास मे पीक नाटको का प्रभाव प्रतिपादित करते हैं।' किन्तु यह धारणा मध समूल नष्ट हो चुकी है। भारत मे यूनानियों के थाने के पहिले नाटक पे, यह सिद्ध है, तथा भारतीय नाटकीय तत्व ग्रीक नाटध तत्वो से पूर्णतया भिन्न भौर स्वतंत्र हैं। डा. दिण्डिश ने येवर की बात को प्रामाणों से सिद्ध करने का प्रयत्न किया, किन्तु कोष" और लेवी ने इस सिद्धान्त को समल ही नष्ट कर दिया है । हमारे विचार से सभी विद्वान् सत्य के कुछ २ अशो को लेकर चले है । वस्तुत. नाटकोलत्ति के मूल तत्व वैदिक साहित्य मे प्राप्त हो जाते हैं और जिनका प्रधार स्पष्टतः धामिक है। तदुपरान्त नाटको के विकास १-जे० आर०ए०एस० १९११, १००८ २-कोप स० ड्रामा पृ० ५० ३-१९८२ को बलिनि ओरियन्टल कास ४-१० डामा पृ. ३१ ५-टी0 आई०१/३४५ १३ म विविध तत्व जो विद्वानों ने एकागोरप से उद्भय के हो मूल मे रम्प दिए हैं- सहायक होते हैं। कोय बादि सभी विद्वान, इम विषय मे सहमत है। भारत में नाटक ईसा से ६-७ शती पूर्व थे यह मिद्ध है। ४ लौकिक संस्कृत साहित्य में नाट्य परंपरा और भवभूति- समार का मदमे समृद्ध संस्कृत साहित्य विदेशी यवन पात्रमणों के कारण माने धन को रक्षा न कर सका ! लुटेरों ने जीभर कर होलिया - अन्यरतों की जलाई। प्राप्त न टक साहित्य के प्राधार पर हमारे मादि। नाटककार मास हैं। इनके १३ नाटक म. म. गणपति शास्त्री ने प्रकाशित किए हैं। इनका समय कालिदास मे पूर्व निश्चित है । छ विद्वान जो कानिदाम को ई० पू० का स्वीकार करते है, मास को तीसरी पा चौथी शती ई. पू. का कहते हैं, और कुछ विद्वारा जो कालिदास को गुप्त कालीन मानते हैं, भास को तनीय या चतुर्थ शती ई० का मानते हैं। द्वितीय नाटक कार जिनकी कृति समुपलब्ध है शूद्रक है। इनका मृच्छकटिक तृतीय शती ई० पु० को रचना है। विद्वान् कालिदास के रामिन या सौमिल्ल से इनकी एक रूपला करते हैं । तृतीय प्रसिद्ध नाटककार महाकवि कालिदास हैं, जिनकी कला से संस्कृत साहित्य विश्व विश्रुत हो गया है। इनके बाद हपं-भट्टनारायण और मवमूति मादि पाते हैं। हम यहाँ पर, भाम से हर्ष और हर्ष से भवभूति तक एक मुदीर्घ पथ माप चुके हैं । जब हम पीछे मुहकर देखते हैं तो हमें महान् आश्चर्य होता है कि कैसे सरस और सादे वैदिक स्तवों ने प्रमश. प्रगति प्रौर विकास करते करते कलामय अभिनय के स्थान को प्राप्त कर लिया। यह विकास की घटना गति में धीमो और स्वाभाविक थी, जिसस इसे एक दीर्घ काल इस कार्य मे व्यतीत करना पड़ा है। भास, कालिदाम और शूद्रक सफर नैसगिक और जनप्रिय कलाकार थे। इसके वाद विवेकशील मानव स्वभावर इम आर मुडा कि इस नूतनभ० प्रौर रम्य कना को वन करके नियमबद्ध कर व्यवस्थित कर दिया जाय । यह ५ वी और ६ वी शती की बात है जब कि नाटक के क्षेत्र मे नियमवद्धता और वर्गीकरण की प्रवृत्ति का मूर्त फल हर्षवर्धन और भट्टनारायण के रूपक हुए, जिन्हे हम हि दू नाटय शास्त्र (डामेटी) के उदाहरणो के लिए विख्यात पाते हैं । महान लेखक दूसरे महान् लोगो के मदृश प्रात: कालीन मरीचिमाली को भाति उदय होते हैं । वे नई प्रेरण। और नये विचार लाते हैं । अतीत के अन्धकार को नष्ट कर उसके बीच से भविष्य के मार्ग का निर्माण करते है और एक लम्बी छाप छोड जाते हैं । महान कलाकार कालिदास को छाप एक बडे युग तक रही और सभी लेखक उनसे प्रभावित होते रहे हैं। किन्तु ६१०.६२४ ई० मे हपवधन ने नाटयकला में एक नई परपरा का श्रीगणेश कर दिया। जिसके उदाहरण रत्नावली, प्रियदशिका और नागानन्द हैं। "हर्षवर्धन के साथ सबसे बड़ी समस्या थी कि वह नैसगिक नाटककार न थे । वे नाट्य नियमो के महान ज्ञता थे।" निमका परिणम अवश्यम्भावी य पोर हुमा भी। उनकी कृतियामानो नाटकीय नियम निकप मे कसने के लिए ही रची गई हैं। हमने देखा कि हर्ष ने भाषा और कला को नाट्यशास्त्र के नियमो १-ड्रामा इन सस्कृत लिटरेचर पृ० १२६ ये प्राधीन कर अपनी रचनाएं की हैं और उ हे एक विशिष्ट स्तर पर स्थापित किया है। नाट्य रचना रवि वर्म के रूप मे दिखावे की वस्तु हो गई है । हर्प ने एक सफल नाटक के लिए चार प्रापमित तर विदिष्ट किए हैं - चतुरषि, २- प्रशसक्दशंक, ३-कुपएलनट, ४- प्रमिद्धक्यानक । । किन्तु महाकवि भवभूति ने हप को इन धारणामों के प्रति विरोध किया। भवभूति का कहना है कि नाटककार के लिए पहले माटककार होना प्रावश्यक है।' भवभूति ने उपयुक्त दोपो को निन्दा की है और उनक प्रति जागरूकता दिखाई है । वे शुगार को प्रेममयो कथाओं से पबहा कर महाबीर चरित मे आकुल हो उटते हैं । भवभूति नै हर्ष की परपरा के प्रति कथावस्तु के क्षेत्र में भी विद्रोह किया है। हर्ष के पानक प्रेम प्रधान और राजसभाओं से सम्बन्धित शृगारीथे । भवभूति ने पादर्श सामाजिक लोक चरित्र लिये हैं। पौराणिक कथावस्तु भी सामाजिक रूप में मालिक्ता के साथ चित्रित हुई है साहित्य मोर जीवन एकसाथ पल मिल गए हैं। भवभूति के साप मुद्राराक्षस के लेखा विशाखदत्त ने भी इस नव भान्दोलन म सपने को पीछे नहीं रखा है। नाटकीय नियमो को गौणता का यह सफल आन्दोलन भी भवभूति की विशेष बात है यद्यपि रोमास के प्रेमी और प्रम्यासी पाठको और दर्शकों मे भवभूति की यथोचित बादर देन मे कापतापी है- जिसको प्रतिक्रिया मे कवि चिढ़ पाता है, फिर भी भवभूति का स्थान नाट्य परम्परा में अपना विशिष्ट महस्व सदा रखता रहा है और भविष्य में भी रखेगा। १- मा०मा० १/१० २- महावीर चरित १/२-२ ३-मा०मा०१/- द्वितीय अध्याय ५-भवभूति का जीवन और समय :- जीवन-बहुत ही चमकते भौर स्मरणीय दिवसो का प्रभात प्राय: सुहिन करणो से छिपा रहता है । यही बात विश्व की मेधावी विशेषकर प्राचीन भारतीय साहित्यिक प्रतिभाप्रो के बारे में चरितार्थ होती है । केवल संशव ही नही अपितु उनको प्रौशवस्था के विषय मे भी हम कुछ नही जानते हैं । भारतीय इतिहास मे कही भी, कोई भी पृष्ठ मही प्राप्त होता है, जो उन महान् कवियों, दार्शनिको और नाटककारो के जीवन के बारे मे निश्चित सकेत दे, जिन्हाने अपनी कृतियो से भारतीय मस्तिष्क की जाज्वल्यमान शक्तियों भोर हृदय की सुकुमार भावनाओं को मोर विश्व को प्राकृष्ट करने में पर्याप्न क्षमता अजित की है । आज भी जिनकी प्रतिभा के आगे मानव हृदय विमुग्ध सा हो, अपनी सम्पूर्ण शक्तियो से एकाग्र होकर श्रद्धाञ्जलि समर्पित करने में गौरव मानता है। -साहित्य सुधा सूति भवभूति सस्कृत नाट्य साहित्य मे कालिदास के बाद ही प्रथम श्रेणी के नाटककारों में द्वितीय स्थान सभी विवेचकों से प्राप्त करते रहे हैं । बहुत से मालोचक तो भवभूति को कालिदास के पश्चात् स्थान देना अनुचित समझते हैं । महाकवि भवभूति ने अपने जीवन के बारे मे कही भी विशेष परिचय नहीं दिया है । उनकी कृतियों में प्रस्तावना में उनके विषय में कुछ स्पष्ट सकेत मिलते हैं। 'महाबीर चरित' मे भवभूति अपना परिचय देते हैं । "अस्ति दक्षिणापथे पद्मपुर नाम नगरम् । तत्र केचित्तैत्तिरीयाः काश्यपाश्चरणगुरवः पद्विपावनाः पञ्चाग्नयो पृतब्रताः सोमपीपिन १७ उदुम्बरा ब्रह्मवादिनः प्रतिवन्नि ! तदामुष्यायणम तत्र भवतो वाजपेय याजिनो महावे पञ्चम' सुगृहीतनाप्नो भट्टगोपालस्य पौत्रा पवित्र कोनीलकण्ठस्यात्मसमवः थोषण्टपदलाउछनो भवभूतिनाम जतुकर्णी- पुत्र: कविमित्रधेयमस्माकमिश्यत्र भवन्तो विदाइकुर्वन्तु ।" श्रेष्ठ परम हमानां महीणामिवागिराः । यथार्थनामा भगवान् यस्य ज्ञाननिधिगुरुः ॥ "दक्षिणा पथ मे पद्मपुर नामक एक नगर है। वहा पर कुछ उदुम्बर उपाधिवाले (सरलेम) ब्राह्मण रहते हैं । उनके वश को परपरा कश्यप ऋषि से प्रादर्भूत हुई है । वे कृष्णयजुर्वेद को तैत्तिरीय शाखा के मनुपायी हैं पोर पूर्णत: धोत्रिय तथा सोमयज्ञ करने वाले है। ये लोग पवित्र धार्मिक गृहस्थ थे, अपनी जाति पौर जनसाधारण सभी मे सम्मानित थे, तपा पञ्चाग्नि सुरक्षित रखते थे। वाजपेय यतो के प्रसिद्ध याज्ञिक उदुम्बरों के इस परिवार म महाकवि नामक एक पुरुप हुए । जिनकी पाचवीं पीढी म हमारे नाटककार पैदा हुए । भट्टगोपाल नामक महापुरुष भवभूति के पितामह भोर स्मरणशक्ति के धनी नील- कण्ठ उनके पिता ये । मवभूति की माता का नाम जतुकर्णी था। भवभूति का उपनाम कण्ठ पा । वे व्याकरण मौमासा मलकार और न्याय के ज्ञाता थे तथा वेदो, उपनिषदों, पुराणों, सास्य, योग और बौद्धदर्शनों का उन्होंने गम्भीर अध्ययन मिया था। उनके गुरू का नाम ज्ञाननिधि या, जो एक पहुंचे हुए योगी थे। उन्हे अगिरा के समान कहा जाता था और साघुमों के मध्य में उनकी गणना सर्वप्रथम होती थी। मवभूति का नटों के साथ अच्छा सम्बन्ध था।" इतना वर्णन भवभूति कृत माटको को प्रस्तावनामो से उनके जीवन के विषय में प्राप्त होता है। अन्यों के आधार पर अनुमान किया जाता , भवभूति एण्ड दि वैद : कोय "पद वाग्य प्रमाणश:"-उत्तर रामचरित प्रस्तावना १८ यह जीवन है कि 'मालती माधव' के नायक को भाति भवभूति भी अपने पुवक जीवन के प्रारम्भ म बरार का बोडकर उज्जैन या पदमावती में आ गये थे। जहा पर उन्होंने अपने गुरू ज्ञाननिधि के शिष्यत्व में अपना अध्ययन पूरा किया। भदभूति न केवल शास्त्र-ज्ञान-वैविध्य ही नहीं अजित क्यिा प्रत्युत मानव समाज के हाट-बडे सभी वर्गों से निकट सम्पर्क भी स्थापित क्यि । नटों में तो उनकी घनिष्ठ मित्रता थी । भवभूति का कुछ दूर तक समकालीन दा कबि से मिलता जुलता है। उत्तर गमचरित के ४/३२ के लद के क्यन स लक्षित होता है कि भवभूति न नाटको मे स्वय अभिनय किया है । सप्तम बक के अन्त में वाल्मीकि को प्रदेश कराके कवि मानों स्वप प्रविष्ट हो रहा है और कवि के विषय म घोषणा कर रहा है । राजोतर ने भवभूति को वाल्मीकि का भवनार कहा है । सम्भव है वाल्मीकि पात्र का मभिनय भवभूति ने किया हो जिसके कारण राजशेखर ने उन्हे मदतार कहा है । अपने नाटकों के अभिनय के लिए उन्होंन नटों को प्रत्येक प्रकार से सहयोग देकर उत्साहित किया हैं, इसमें तो लेशमात्र भी सह नहीं है । पर्याप भवभूति जनता में प्रमिद नहीं हो सबै हैं फिर भी उन्हें नाटककार मान लिया गया था, और राज्याश्रय प्राप्त करने में वे सफल हो गये। भवभूति के व्यक्तिगत जीवन के सम्बन्ध में उनके प्रत्य जो हमे मत दत है वे प्रत्यन्त आक्पा और मनोज है। वे कमी भी माम को अनुकूलता नहीं प्राप्त कर मरे है । कोनि क लिए उन्ह अन्त तक सपर्य करना पड़ा है । बहुत ममव है पारिवारिक जीवन की दैनिक मावश्यकतामो मोर भोजन के लिए भी उन्हें कष्ट उठाना पड़ा हो। उनकी कृतियों के विषय म जनता के नासमझ निर्णयों की वे स्वय दडी निन्दा करते हैं। इन सभी बातों में प्रगर होता है कि नदि को जीवन में भाग्य के उनट-फेर वरावर देखने पहे हैं । अन्त में मवभूति विजयो ही सिद्ध हुए हैं। मालनी. माधव १/८ मा० मा०८/१४, उत्तर०७/४ .
ऐसी कौन सी वस्तु है जो उन्हें विरोधौ विश्व में माथ मघर्ष करने के लिए प्रशक्ति दती रही है और जिमने उनक माहस को नय नय उसाहाँ स बचत्र रक्षा । यह पा- उनका ए प्रादर्श पारिवारिक जीवन के वातावरण मम सना और जीवन विताना । यही कारण है कि उन प्रेम का बादशं महान मोर आध्यामिक था। व सामारिक विषयोप- भोगों से, वामनाओं से कामों दूर एक महान् साधक थे । दन प्रेम चित्र' मित्र चित्र' और उमा चित्र विश्व माहित्य में अनाम हैं जो उनके बाम्पनर को वाह्य व्यबनाए हैं। प्रश्न जीवन सच्च पति कौर मित्र रह है। जन्मभूमि-भवभूति का वम स्थान पहिचानने में विद्वानोम विविध मत है। निश्चिन निएंय टाम प्रमाणों के अभाव म मात्र तक नहीं हो सका है। अधिकतर मानि का करार देगीय (दक्षिण) कहा जाता है जिसका प्राधार मालती माधव की कुछ प्राचीन हम्दनिमित प्रतिया है जिनम 'विदर्भ पद्मपुरम' एमा उस्तव है । भवनि क निवास स्थान का कलाप्रियनाथम विभप घनिष्ठ सम्बन्ध है। क्योंकि उनके ममी नाटक कलाप्रियनाथ के समव मही अभिनोद ए है । यदि सर्व साधारण जन मान्यता के अनुसार कानियकाय उन (पात्ताक महामानश्वर ही है, जिनका ठन्लव महाकवि कानिदाम और वाणम: न दिया है, ता मूत्रधार का कथन पुणन टोहै कि पद्मपुर दक्षिण में विदर्भ दंत म है। क्योंकि उज्जन से बरार दक्षिण में है। फितु हमारे अनुमार वरार मानवा मे नगमग पूर्व की ओर है। कला- प्रियनाथ का मन्दिर कालपी, कौन या कारमौर में होना चाहिए। कालपी और कन्नौज का यधोदर मनोवादा जिसकी सभा मकवि रह है और बाद में वे काश्मीर रहे है । दक्षिणापथे' गाद से सचिन है कि 1-उत्तर०/१३९ -मामा० ९/.. -रकम/३४, मेघदन ३७,३८ + कादम्बरी पृ. ३५ वा मौरित *-बलवलर . उत्तर रामचरित का इन्ट्रोडक्शन पृ० ३६ RESERVED BOOK भवभूति उस समय जब उनका नाटक निमित हुमा उत्तरापय मे थे। यशोवर्मा के राज्य में रहकर वे उज्जन नाटक खेलने नही जा सकते हैं। मालती माधव की प्राचीनतम हस्तलिखित प्रति नेवारी सवत् २७६ = ११५६ की है', निसप विदर्भपु' यह शब्द है ही नहीं। मालती- मापव के दृश्य पद्मावती नमरी से प्रारभ होते हैं। इस नगरी की स्थिति और देशकालीन रूपरेखा बडो विशेषता से चौथे अंक के अन्त और नवम अक के प्रारम्भ म पूर्ण विस्तार के साथ वलित है। मी वि लले ने पद्मावती की एकता पवाया नामक गाव से, जो नरवर उत्तर पूर्व ग्वालियर प्रदेश के मध्य में है, मानी है । लेले में पद्मावती और भवभूति के पद्मपुर को एक ही माना है।' कालीप्रियनाथ के बारे मे विवेचन करते हुए उन्होने लिखा है कि 'दक्षिणापथे' शाद यह पर्थ सूचित करता है कि-जहा नाटक खेला गया वहा से पदूमपुर दक्षिण को मोर था। कालपो कन्नोज राज्य की सीमा के भीतर है और पवाया वहा से दक्षिण की मौर है, जहा कवि का घर मोर परिवार था । लेले को धारणामो की पुष्टि प्रसिद्ध पुरातत्व वेत्ता कनिधम भी करते हैं । कालपी और क्लाप्रिय का नाम साम्य सन्देह की जगह नहीं छोडता । पदमावती के वनो की पूरी उपयुक्तता पाया और नरवर से बैठ जाती है। हा. वेलवलकर का कथन है कि मालती-माधव मे पद्मावती के वर्णन मे भवभूति कहते हैं कि ये पर्वत मुझे दक्षिण के पर्वतो माय गोशावगे को स्मृति का देते हैं। प्रतः भवभूति दक्षिण प्रदेश से पूर्व परिचित थे और पद्मावतो से बाद में उनका सपर्क मा । किन्तु हमारा कथन है कि भवभूति ने मालतीमाधव से पहिले उत्तर रामचरित की रचना की थी, जिसे हम आगे के पध्याय सिद्ध करेगे, भोर यहाँ 1.-नेपाल दरवार लाइकरी मन्या ३४ न. १४७३ -'मालतीमाधव' सार और विचार पु० ५ -प्राक्यिोलाजिकल रिपोर्ट १९६२-६५, पुस्तक २.० ३०७.८ पर उत्तर के गोदावरी वर्णनों को स्मृति के बारे में मालतीमाघव मे उनका सकेत है। डा० भाण्डारकर का कहना है कि भवभूति वरार के ही निवासी थे। मात्र मध्य प्रदेश के चोदा जिले के आस पास बहुत से वायपेयो ब्राह्मण परिवार हैं जो कृष्ण यजुर्वेद को तैत्तिरीय सहिता के अनुयायो हैं । चौदा वरार और गोदावरी के प्रत्यन्त सन्निकट है। कुछ भी हो इतना तो निश्चित है कि भवभूति के नाटक कालपी में खेले गए हैं पौर पद्मावती पवाया से एकता रखती है। भवभूति को युवावस्था तथा नाट्य रचना पवाया (नरवर) मे प्रफुल्लित हुई है। जहा से वे कपोज की राजसभा में प्रसिद्ध होकर प्रवेशकर सके हैं। जिसका अप्रत्यस प्रमाण माप का चरित्र है जिसे कुछ दूर तक' हम कवि के जीवन से मिलता पाते हैं । कवि भी युवावस्था मे पपपुर छोडकर पद्मावती माये होंगे। विभिन्न विद्वानों ने पधपुर को एकता- पम्पुर(काश्मीर), उज्मन (मालवा) करवीरपुर (कोल्हापुर) ममरावती के पास का स्थान बोर पवाया (नरवर, ग्वालियर) से सिद्ध करने का प्रयत्न किया है । यह प्रश्न अमी और प्रमाणों की अपेक्षा समाधान मे रखता है। हा भवभूति का जन्म दक्षिण में हुआ है, यह सभी को स्वीकार है। नाटककार का नाम-महाकवि भयमूर्ति के नाम के सम्बन्ध में भी विद्वानों में बहुत मतभेद है । डा० भाण्डारकर व बेलवलकर प्रादि का कहना है कि नाटककार का वास्तविक नाम पोकष्ठ पापौर भवभूति उनको उपाधि थी। कुछ व्यक्ति भवभूति उपाधिसमर्थन में- "तपस्वी कां गतोऽवस्थामिवि स्मेरानना विव गिरिजायाः फुचौ भन्दे भवभूति सिताननौ।" -मालतीमाधव के द्वितीय पाकरण की भूमिका पृ.३१ और- "सान्या पुनातुभवभूति पवित्रमूर्ति." पद्य उद्धृत करते हैं, जिनमे त्रिपुरारि, बीरराघव, मगेशराम, कृष्ण तैलग आदि है। भ्रम का कारण एक यह भी है कि उनके पिता के नाम के साथ भी कण्ठ' (नीलकण्ठ) जुड़ा हुआ है। किन्तु यदि 'कण्ठ' शब्द वश परपरागत था तो भवभूति क पितामह भट्टगोपाल के साथ भी जुडा होना चाहिए था, जो नही लक्षित होना है। श्रीकण्ड नाम के समर्थको के तर्क हैं कि-प्राचीन काल म कविता में किसी विशिष्ट शब्द के प्रयोग से कवि का नाम उम शब्द त प्रसिद्ध हो जाता था। घण्टा माघ- माध ववि के द्वारा 'घण्टा' शब्द के प्रयोग के कारण और भारवि- भारवि के द्वारा छत्र शब्द के प्रयोग के कारण प्रसिद्ध होगए । दशकुमार चरित की टीका म घनश्याम लिखते है कि कवि ने दण्ड शब्द का प्रयोग प्रारभ मे किया है अतएव कवि का नाम दण्डी हो गया है । इन प्रमाणो के आधार पर उनका कहना है कि उपरिलिखित श्लोको में भवभूति' शब्द के वैशिष्ट्य के कारण श्रीकण्ठ का नाम भवभूति पड गया है । डा. वेलवलकर ने तो भवभूति को एक सुन्दर मोर आधुनिक मराठी ढग का नाम दे दिया है- श्रीकण्ठ नीलकण्ठ उदुम्बर । किन्तु उन्हे यह पान नही रहा है कि उस युग म दो चार अक्षरो क छोटे से नाम ही पर्याप्त हाते थे। ऐसे नामी का पता प्राचीन युग मे कही भी नहीं चलता है कल्पना और अनुमान पर आधारित तक लिखित प्रमाणों के सामने कोई अस्तित्व नहीं रखते है। प्राप्त साहित्य के किसी भी साधक ने नाटककार का उल्लेख धीकण्ठ शब्द से नही किया है । सभी ग्रन्थो, सुभापितो और ऐतिहासिक उल्लेखों मे भवभूति नाम ही मिलता 1- उत्तर रामचरित, इन्ट्रोडक्शन पृ०३५ १-वभूष वल्मीकभर पुराकविस्तत प्रपेदे भुमि भतृ मेण्ठताम्। स्थित पुनयों भवभूति रेखया स वन सम्प्रति राजेश्वर । -राजशेखर २-कविर्वाक्यतिराज श्री भवभूत्यादि सेवित ॥" -कल्हण ३-भवभूइ जलहि निग्गय कव्वामय रसकणा इव फुरन्ति ।।' -चाक्पतिराज ४-भवभूते सम्बन्धात् भुघरभूरेव भारती भाति ॥". -गोवर्धनाचाय ५-भवभूते शिखरिणी निरर्गल तरङ्गिणो ।" -क्षेमेन्द्र से उद्धरणों मै सवत्र भवभूति नाम ही नाटककार के लिए प्रयुक्त हुआ है। मालतीमाधव को प्रस्तावना मे "भवभूतिनामा कवि " शब्द है। जिसका अर्थ ही यह होता है कि भवभूति नाम है जिस कवि का। ध्याकरण के नियमानुसार समास में यही भयं निर्णय के रूप प्रत्यक्ष माता है । जहाँ सदेह का स्थान नहीं है। "मवभूतिर्नाम' वाक्य मे 'नाम' यह अव्यय है । जिसका अर्थ प्रकाशन है । सस्कृत साहित्य मे किसी वस्तु के नाम(सना) बताने की यह एक साधारण और परपरागत शैली रही है कि व्यक्तिवाचक संज्ञा के साय 'नाम' अध्यय को मयुक्त कर देना चाहिए। जैसे-कालिदास- 'हिमालयो नाम नगाधिराज" "गिरिः प्रबवणो नाम" "श्रमणा नाम सिद्ध शबरी"पादि। और भी बहुत 1-बालरामायण -राजतरगिणी 1.-गोडवहो '--गाथा सप्तशती - सुवत्ततिलक जगदर टोका निर्णय सागर २४ भवभूति-म्बेक, मंडन, सुरेश्वर, और विश्वरूप:-कुछ दिनो म एक नये ढग के विवाद न विद्वानो का ध्यान आकर्षित किया है। यद्यपि वह शान्त मा है । किसी विशिष्ट विद्वान को साहित्यिक मान्यता बहुत दूर तक प्रभावित करने में समर्थ होती है। मालनीमाधव की एक प्राचीन हस्तलिखित प्रति में जो सभवत ४०० वर्ष स यधिक पुरानी है. तृतीय और छठ प्रक के अत मे उल्लेख है- “प्रकरणमिद कुमारिल शिष्यम्योम्वेकाचार्य स्येति ।" इमी प्रति के अ य अको म भवभूति रचित होने का उल्लेख । इस प्रमाण के पल पर मदभूति महान मीमा मक कुमारिल के शिष्य सिद्ध होते हैं । आचाय उम्बा कुमारिल भटट के शिष्य और ऊँचे मोमासक थे। यह प्रभाकर के विगधी और कुमारिल के 'श्लाकवानिक' के ऊपर टीका करनेवाले हैं। इमम यह सिद्ध हुमा कि भवभूति का दूसरा नाम उम्देन था। इस विषय पर विचार का एक पक्ष यह भी हो सकता है कि- प्राप्तमालती माधव, एक मिथित कृति है। जिसके कुछ अश की रचना सम्वेक ने और कुछ अंश की रचना मवभूति ने की है । सभव है भवभूति रचित मालतीमाधव के कुछ अक उम्वैक को पसद न आए हो और उन्होने उनले स्थान दूसरे पर निर्मिन कर रस दिए हो । यही कारण है कि भवभूनि रचित कुछ पद्य जो मुभापित ग्रन्थों में सकलित हैं नाट्यत्रयो में नही प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार उत्तररामचरित की एक हस्त लिखित प्रति भवभूति का नाम नीलकण्ठ देती है। मालती माधव की ११५६ ई. की हस्तलिखित प्रति में दशम प्रक के अन्त में है--"कृतिरियम् महावाकवर भूगर्भस्य" जिगगे यह भनाता है कि भूगर्भ भी भवभूनि का एक नाम रहा होगा। भवभूति और कुमारिल दोनों दाक्षिणात्य थे। दोनो के समाकालीन '-लेले पृ०८४, एम० पी० पण्डिा हा० भाण्टारकर : मालती माधव को भूमिका, १०८ -प्राप्त » हो के इन्ट्रोडक्शन में, २५ होने को सभावना भी कम नहीं है । भवभूति ने मोमासा शास्त्र के पारिभाषिक शब्द 'अर्थवाद' का उल्लेख किया है, किन्तु हा वेल- वलकार का कहना है कि सवल प्रमाणो के अभाव में हम भवभूति को कुमारिल भट्ट का शिष्य नहीं कह सकते हैं। क्योंकि इनकी कृतियों में वेदान्त दर्शन को सर्वत्र छाप है। विचार का विषय यह है कि भवभूति ने अपने गुरू को माननिधि नाम से अभिहित किया है कि कुमारिल भट्ट, जिसमें किसी प्रकार को भापति उन्हे न होनी चाहिए थी । हमारा यह मत है कि कुमारिल का ही दूसरा नाम ज्ञाननिधि हो सकता है अथवा भट्ट जी की यह उपाधि रही होगी। कवि प्रमावश भी स्वनामधन्य गुरू का नाम न देकर उन्हे ज्ञाननिधि रूप में उपस्थित कर सकता है। 'परमहसाना श्रेष्ठाः ज्ञाननिधि.' का विशेपण उन्हे वेदान्ती सिद्ध करता है। प्राचार्य कुमारित पूर्व मोमाना के विद्वान तो ये ही किन्तु उत्तर मीमासा के भी पूर्ण पण्डित थे, ऐमा विद्वानो का कहना है । श्लोक वार्तिक को यह उक्ति भी यही सिद करती है.- "इत्याह नास्तिक्य निरोक रिप्यु- रात्माऽस्ति तां माध्यकत्र युक्त्या दृढत्वमेतनिषयरच प्रयाति वेदान्त निपेवणेन ।" साथ ही यह कोई ईश्वरीय नियम नही है कि एक विषय का विद्वान दूसरे विषय का विद्वान न हो सके । उम युग के विद्वान दूसरे विप के मर्मों को जानने के बाद उनके खण्डन अथवा मन्डन में तत्पर होते थे। आचार्य शकर इस विषय मे प्रमाण हैं। क्या एक शिष्य के प्रारू नहीं हो सकते है । भवभूति के पूर्व बोध: '-उत्तर रामचरित १/३६ :-इन्ट्रोडक्शन : उत्तर रामचरित पृ०४२ २६ मोमासा के गुरु कुमारिल भट्ट और उत्तर मोमासा के ज्ञान निधि हो सकते हैं । जिन्हे हम मागे माचार्य शकर के साथ एकरूपता पर विचार करने के लिए पुन उपस्थित करेंगे । उत्तर रामचरित के चौथे मक में दाण्डायन और सौघातक वाद- विवाद मे 'समासोमधुपर्क' इति यह जो वाक्य है, वह मोमासकों की भांति घोतकर्म समयक के रूप में भवभूति को उपस्थित करता है। भवभूति के विवर्तवाद की प्रसिद्धि तो है हो । यही कारण है किं भवभूति ने पहिले 'पदयाक्या प्रभागजः,' विशेषण अपने लिए दे दिया है। श्लोक पानिप को तात्पर्य टीका में 'भट्टोम्बेक' शब्द मग्या है, जो कि भवभूति के पितामह मट्टगोपाल को भाति पूर्व सयोजित भट्ट विशेषण के सहित है । चतु शास्त्रवेत्ता को उपाधि उस समय 'भट्ट' यो । भवभूति के पिता चारों शास्त्रो के पण्डित न पे। इसीलिए उनके नाम के पहिले भट्ट शब्द नहीं व्यवहत हुमा है । तारपर्य टीका के प्रक्रम मे भट्टोम्वेक ने "ये नाम केचिदिह न: प्रथयन्त्यवज्ञा जानन्ति ते किमपि तान् प्रति नव यत्नः । उत्पत्स्यते मम तु कोऽपि समान धर्मा कालो ह्यय निरवधिविपुला व धरणी॥" लोक स्वयकृत के रूप में दिया है । यह प्लोक भवमूति के मालतोमाधव का है। इन सभी प्रमाणों से उम्वेक और भवभूति की एकता सिद्ध हो जाती है। ५० क्षितीशचन्द्र चट्टोपाध्याय का कहना है कि सम्वेक पोर भवभूति एक नहीं हैं । यद्यपि प्रत्यक स्वरूप भगवान् चित्सुखी की अपनी नपन प्रसादिनी में "सम्वेको भवभूति." कहते हैं, किन्तु उन्हीं के शब्दों को देखिए :- "नहि पुराप्त एव सन् नाटक नाटिकादि प्रबन्ध विरचन माने पानाप्तो भवति भवभूति. । उक्त चैतदुम्वेकेन "पदाप्तोऽपि कस्मैरि- -उत्तर रामचरित प्रस्तावना --मा० मा. रा. -दि डेट माफ कौमुदी महोत्सन पृ० ३९९, विन्टरनिट्स मेमोरियन दुपदिगनि न त्वया ननु भूतार्य विषय वाक्ये प्रयोक्तय्य यथागुल्य॑ग्र हस्तियूरातम मन ।" इम उल्लम से भवभूति और उम्वेक के मध्य में अन्तर स्पष्ट हो उठता है। उक्त चतदुग्वेक्न' के स्थान पर "उक्त चैतत्तेनैव' होना चाहिए । चट्टोपाध्याय जो प्रागे कहते हैं कि भवभूति ऐले गर्वीले व्यक्ति की शैली से उम्वेक की दौली का मेल भी नहीं बैठना है। किन्तु पण्डिन जी ने यह विचार नहीं किया है कि एक ही व्यक्ति विषयानुरूप भिन्न भिन्न जलियाँ प्रपना सकता है, यदि वह गिद्धहस्त कलाकार है। दर्शन और साहित्य को शैलियां भिन्न भिन्न होती है। मीमामक मण्डन मिश्र जब माचार्य शकर से परास्त होकर सन्यासी हए तो उनका नाम सुरेश्वराचार्य हो गया। माधव 'शार-विजय' में महन को ही सुरेश्वर कहत हैं। विवरण प्रमेय संग्रह' में माधव सुरेश्वराचाय की 'वृहदारण्यक वार्तिक' से उद्धरण देते हैं। किन्तु लेखक का नाम विश्वरूपाचार्य कहते हैं । माधव के मत से-मंडन, विश्वरूप पोर सुरेश्वर एक ही व्यक्ति हैं। विभावन ने याज्ञवल्क्य स्मृति की विश्वरूप कृत व्याख्या की व्याख्या मे लिखा है- "भवभूति सुरेशारयं विश्वम्पं प्रणम्य तम्" इस पद्य से भवभूति, सुरेश्वराचार्य और विश्वरूप की एक रूपता स्पष्ट सिद्ध है। प्रत्यक स्वरूप भगवान् अपनी 'नयन प्रसादिनी, में उम्बेक को भवभूति कहते हैं।' भवभूति की सभी कृतियाँ भीमासा, म्मृति और वेदान में उनसरी ममान प्रवीणता प्रदर्शित करती हैं । माधव अपन 'शकर विजय' में स्पष्ट रूप में कहते हैं, कि इम्वेक मन्डन विध का ही नाम था और वे विश्व रूप भी कहे जाते थे। उायत विवेचन मे यही सिद्धान्त सशक्त रूप से सामने प्रााता है कि स्पष्ट प्रमाणों के अभाव मे हम भवनि उम्वेक, महन, सुरेश्वर -बबई एडौगन तत्वदीपिका २६५ -शकर विजय /११३-१६ 1 १ २८
पौर विश्वरूप को पृथक पृथर व्यष्टियां क्यो मानें । जब कि इनकी एक
रूपता के स्पष्ट लिखित प्रमाण हमारे सामने हैं ।
भवभूति का पाण्डित्य-- महाकवि भवभूति का अध्ययन भत्यन्त
गभीर मौर विशान था। उनक प्रगाघ पाण्डित्य का परिचय मालतीमाधव
मे चलता है, जिसमे उन्होंने सभी शास्त्रों के मध्ययन की ओर स्पष्ट
सकेत किया है।
"यद्वोध्ययन तथोपनिपदी मोख्यस्य योग्गस्य.
च ज्ञान तत्कथनेन किं नहि तत कश्चित गण। नाटके।
यत्प्रौढत्व मुदारता च यचमा यन्चार्थ नो गौरवम,
तच्चेदस्ति ततस्तदेव गमकं पाण्डित्य वैदग्धयो ।
चे महान विद्वान थे। उन्होन वेद, उपनिषद, सास्य योग और वेदान्त
का मध्ययन किया था। उत्तररामचरित की प्रस्तावना में वे स्पष्ट
मम्मो में कहते है-
"पदवाक्य प्रमाणश
अर्थात् व्याकरण, मोमासा मोर न्याय शास्त्र के पारगत । कवि
गोही रीति के प्राचाय है। वाणी तो कवि के भावो और विचारो का
मनुगमन करती चलती है। उनका कथन वस्तुन' सत्य है-
ब्रह्माणमिय देवी वाग्यश्येषानुवर्तत ।।
वेद और दर्शनो सम्बन्धी उनका ज्ञान भनुपम था।
महावीर चरित मे पुरोहित को प्रासा मे-"राष्ट्रगोप: पुरोहित" यह
ऐतरेय ब्राह्मण मा प्रमित पग्र अधुन रिया या है ।
•विद्याकल्पेन मरुता मेघानां भूयसामपि ।
ब्रह्मणीव विपीना क्यापि प्ररिलय. कृतः ।।'
।
मा० मा० ११०
-उत्तर०२१२,
-उत्तर. ६॥
" इस पत्र में कवि ने अदंत वेदान्त के सिद्धान्त का स्पष्ट रूप से प्रतिपादन किया है। व्याकरण दर्शन के अनुसार वि शम्द- ब्रह्म के भी उपासक हैं । उत्तर के प्रारम मे--- वायोममृतामात्मनः कलाम मौर सप्तम प्रक के अन्त मे- 'शब्दब्रह्मविद' से यही सिद्धान्त प्रस्फुटित होते हैं। भवभूति का । वेदान्त प्राचार्य शकर के वेदान्त से कहीं २ अन्तर भी रखता है। उत्तर के द्वितीय मक मे भवभूति "शब्द ब्रह्मणस्तादृश विवर्तम् " मे सृष्टि को परिणाम स्वीकार करते हैं । जबकि शकराचार्य विवा मानते हैं । मालती माघव मे कवि ने सांस्य, योग बौद्ध और तत्र आगमों का ज्ञान प्रदर्शित किया है। पतिजल योग दर्शन मोर कापालिक दर्शन का चित्रण मालती माधव के ५/१,२' में साग निरूपित हुभा है। इसी नाटक' के १० म कवि ने महान कौशल के साथ माधव के मुख से मालती के हृदय मधिष्ठिन होने के विषय में योगाचार, सास्य, सौत्रा- तिक, विष्टि, पातञ्जल, नैयायिक, विज्ञानवादमादिमतों के सिद्धान्तों का उल्लेख किया है। उत्तर रामचरित मे जनक के मुख से "पसुर्यानाम ते लोका:" ईशावास्योपनिषद को व्यास्या कराई है। उत्तर रामचरित के २१३ में 'उद्गीयविदो सन्ति' में कवि ने छान्दोग्य उपविपद् के उद्गीप -प्रणव-ओम् रूपी त्रिगुणात्मक एकासुर ब्रह्म का ही चित्रण किया है । कवि छान्दोग्य के पूर्ण ज्ञाता थे। भवभूति की भाषा में दर्शन के पारिभाषिक शब्द इसने अधिक हैं कि जिनसे प्रतीत होता है-मानो लेवक दर्शनों का सतत चिन्तन करता रहता है। काम शास्त्र के लो वे प्राचार्य हो । मालतीमाधव के प्रथम अक मे माधव विरह व्यञ्जना मे कवि काम की दशों दशामों का चित्रण करदेता है। -मा० मा निर्णय-सागर प्रेस --चतुर्ष मक -~-देखिए निर्णयसागर जगद्धर टीका, सस्कृत साहित्य में कविकर्म में प्रदेश का अर्थी बलकार और छन्द शास्त्र का मर्मज्ञ होन का पहिले ही प्रयत्न करलेता है। भवभूति इन शास्त्रों मेपूर्ण रूप से निष्णात थे। जिसका प्रमाण हम भागे के मध्यायों में मवसर पाने पर देगें। महाकवि महाकाव्य (रामायण और महाभारत) के ज्ञाता तो ये हो, उनका पौराणिक ज्ञान भी महान है। उत्तर रामपरिन का कथानक पद्मपुराण के पातालखड से लिया गया है। विद्याधर की लवी विज्ञप्ति मे (उतर रामचरित) भवभूति ने मार्कण्डेय पुराण के प्रलय- विषयक विवरण को स्पष्ट रूप से उपस्थित किया है। स क्षेप में, भवभूति का शास्त्र ज्ञान वैविध्य में किसी अन्य नाटकार से कम न था। भवभूति का समय-महाकवि भवभूति ने अपना और अपने परिवार का परिचय अपने नाटकों की प्रस्तावनायो म छोटे से रूप मे दिया है। किन्तु अपन समय का कुछ भी सक्त उन्होने नहीं किया है । पहा तक कि उनके पाश्रयदाता के विषय में भी कोई सकेत हम उनसे नही प्राप्त कर सके हैं। उनके समय और आश्रयदाता नरेश के विषय मे हम अन्य लेखको पर माधारित हैं, जिन्होने उनके उद्धरण दिए हैं अथवा उनका उल्लेख किया है। १-भारतीय संस्कृत साहित्य में कल्हण को राजतरगिरणी एक ऐतिहासिक ग्रन्य है। इसके अनुसार काश्मोर नरेश ललितादित्य ने भवभूति के माश्रयदाता यशोवर्मन् कन्नौज नृपति को परास्त कर दिया । "कविर्वाकपतिराज श्रीभवभूत्यादि सेवितः जितो ययौ यशोवर्मा तद्गुणस्तुति वन्दिताम्॥४/१४४' सम्राट् ललितादित्य का समय-निर्धारण सर्वप्रथम हमें करना चाहिए । इसके पश्चात् यशोवर्मा का समय निश्चित किया जा सकता है । कल्हए -राजतरगिणी, बाम्बे सस्कृत सीरिज. प. दुर्गा प्रसाद सपादित चतुपतरण ।।
। ने लौकिक अथवा सप्तऋषि मवन् का व्यवहार दिया है। उन्होने प्रश्नी कृति २४ वें लोकिक (१०७. पक) सत् में प्रारम्भ को यो । जमिह ने, जिराके राज्य में कन्दरा ने अपनी तरंगिणो की रचना की है, २२ वर्ष राज्य किया। ललितादित्य से जयसिंह का समय एस० पी० पण्डित ने ४५५ वर्ष, ७ माह. ११ दिन निर्धारित किया है । ललितादित्य का सम्राट होने का काल ६१५,४,१९ शक संवत् (६९३ ई.) था। नियम भी यही तिथि मानते हैं । किन्तु पंडित महोदय ६२५ई०स्वीकार करते हैं जिस ट्रोयर भी स्वीकार करते हैं। विद्वान ललितादित्य का समय ६९३. ७२९ या ७३० तक मानते हैं। उनका कहना है कि एम० पी० पण्डित की तिथि चीनी समय से ठीक नहीं वहती है। चीनियो के अनुसार चन्द्रापोड २, जो ललितादित्य का भाई था और सारापीड के पहिले शामन पर आरूढ हुमा, ७१३ई० मे चीन में राजदूत भेजा और ७२० में चीन सम्राट् के द्वारा राजा की उपाधि प्राप्त किया। पल्हण का कहना है कि चन्द्रापीड ६८९ ई. में मर गया। चीनी समय मे बल्हा के ममय मे ३१ वप का यह अन्तर विचार का विषय है । चीनी समय निर्धारण सभी प्रसत्य नही होता है । यदि चन्द्रापीड ६२९ में मर गया होता तो ७१३ ई० म कैसे राजदूत को चीन भेजता । फ्ल्हण लिखते हैं कि ७३६ मे ललितादित्य ने चीन में राजदूत भेजा। यदि चीनो समय के अनुसार कल्हण के समय (कानोलाजी) को ठीक घरने के लिए हम ३१ वर्ष कल्हण की तिथियों में और जोड दे तो ललितादित्य का समय ७२४-७६० ई.या ७३१-७६७ ई० होगा । मोर यशोवर्मा की हार ललितादित्य से ७२४ ई० मा ७३१ ६० के बाद की घटना होगी। डा० बाटो स्टेन का कहना है कि यह घटना ७३६ ई. से पूर्व को नहीं हो सकती। स्टेन का कथन है कि चीनी लेखकों के अनुसार- 1-इन्द्रोडक्शन उत्तररामचरित, शारदारजन रे -राजतरणी, मनुवाद पृ०/८९ -राजतरणिो भूमिका ८९ मध्यभारत के 'आई-चा पोन मो' नामक नरेश ने ७३१ ई. में चीन म राजदूत भेजा था या, जिनकी मैं यगोवर्मा से एकता मानता हूँ । यह नवमूनि का प्राश्रयदाता था।' मुक्तापोड ललितादिन का जो राजदून घौन गया पा, वह अपने को मध्यभारत के सम्राट (यगीदमा कनौज) के मित्र का दून कहता है । डा० स्टेन का यह कहना कि सनितादिय न चीन में राजदून भेजने के बाद यशोवर्मा का हल्या डा० जकोबी व सिद्धान्तों और चीनी प्रमाशों म अमत्य सिद्ध हो चुका है। -प्रो कोदो न पण्डित के गोडवहाँ सम्करण के ८२३८३१ के पद्या के अधार पर कहा है कि ललितादित्य की यशोवर्मा पर चढ़ाई त्रिम गमय हुई उस समय सय ग्रहरा पड़ा था। ज्योतिष के प्रचार पर डा. जैकोबी न दम सूर्य ग्रहण का समय १४ अगस्त ७३३ ई० माना । डा. माण्डारकर मी मवभूति का यगोवर्मा को राज समा का कवि स्वीकार करते है । जनरल कनिंघम ने अनुमार ललितादिन का समय ६९२-७६२ ई० है । इम नियि के अनुसार यगोवर्मा की पराजय ७४० ई० के लगभग हुई है। पोवनी के ममापि दानातिराज ने माने पायपदाताको प्रममा म गौरवहीं' नामक प्राकृत काय १२०० पद्यो में लिया है। किन्तु यह बपूरा है, जो कदि को यगोवा के राज्य का उत्तर कालीन मिद करना । इममें लेकर एक गोट राज वय का वर्णन करता मित गौड राजा का कोई नाम निर्दिष्ट नहीं दिया गया है। इनका मादन शकर पादरण पडित ने किया है । इसकी भूमिका में पोवा में समय और वासदि के समर पर विचार किया गया है। हा. दहलर ने भी गौडाहो के समय आदि के बारे में विचार किया है।' हमारे विचार का प्रश्न यह है कि गोडवहीं की रचना क्यों हुई ? बोर इममें गौउनरेश के नाम का भी उल्लेख नहीं है तया उसका बन भी 1-दन्न बंड• • एम०, बाउ २१० ३२८.४० - नहीं हुआ है । इसका समाधान यही हो सकता है कि वाक्पतिराज यशोवर्मा के उत्तर-काल में हुए हागे । अन्य रचना राजा के वैभवशाली दिवसो में प्रारम्भ को होगी। इमोवीच मे ललित दिस्य से यशोकमा के पराभूत हो जाने के कारण अन्य रचना पूरी न हो सकी। यशोवर्मा के विकास काल के अन्त के साथ साथ ग्रप के विकास का भी अन्त हो गया । इस निपं के आधार पर गोडवहो का रचना काल ५३६ ई. से बहुत दूर नहीं हो सकता है। वानिराज मोर भवभूति को समसामयिक्ता दो लेखो पर माया त है। राजतरगिरणी प्रथम मोर गोडबहो द्वितीय । इममे तनिक भी सन्देह नही है कि वासनिराज गोडबहो के लेखक हैं। जिस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के कारण वाक्पतिगज का ग्रन्थ अधूरा रह गया है, उस स्पष्ट मवेत गोडवहो मे हैं । कल्हग दापतिराज, के साथ नाटककार भवभूति का उल्लेख करते हैं, यह भी निम्सदिग्ध है । वाद निराज और भवभूति का पन्नोज के राज दरवार म प साथ हो गया इसके विषय में कोई भी प्रमण हमारे पाम नहीं है । मवभूति वावरतिराज के पूर्वकालीन घे यह भी मिड ही है। किन्तु राजसभा में वापतिराज को विशेष सन्मान प्राप्त था । भवभूति राजा के विशेष प्रिय इस लिए नहीं हो सके कि उन्होंने राजा की प्रशसा में कोई रचना नहीं की । यही कारण है कि भवभूति सदा प्रपन्तुष्ट रहे है। वापति राज का नाम कल्हण ने प्रारम मे इसी लिए दिया है किवावपतिराज राज सभा के प्रधान कवि के रूप में स्थायी स्थान प्राप्त करने में सफल हुए, भवभूति नही। सभवतः भवभूति राज सभा मे जव कमी उपस्थित होते रहे हैं । इस युग म भवभूति नाम का और कोई भी कदि नहीं प्राप्त होना है। वापनिराज मग्न गोडवहो मे पाठ पद्यो मे भवति का उल्लेख करते है। वारातिराज राजा के घनिष्ठ मित्र हैं और प्रधान कवि की -एम. पी. पण्डिन, भूमिका गौडबहो पृ.७२ -एम० पीप ण्डत, ससरण ७९७-८०४.
- उपाधि गजा ने उन्हे दी है । यदपि वह नसरिक प्रतिभा संपन्न कवि नही है किन्तु उन्हें जो आदर मिला है वह मलायुध की शिक्षा और स्नेह के कारण है। उनके कवित्व म जो अमृत के छोटे है, भवभूति के काव्य- सागर के मन्यन से हैं।" इसके बाद वे भास कालिदास का उल्लेख करते हैं । इससे सिद्ध है कि नाटककार भवभूति को ही वह चर्चा कर रहे हैं । ७९: पद्य मे वह भवभूति का प्रभाव और ऋणम्वीकार करते हैं। "भवभूइ जलहि निग्गय कन्चामयरस कणा इव फुरन्ति । जरस विपेसा अन्जवि वियडेसु कहाणिवेसेमु ।।" वावपति राज के ऊपर भवभूति का अचूक प्रभाव पडा था। सभवत: बानि न भवभूति क ग्रन्थो का गभीर अध्ययन किया था। भवभूति और वावपत्ति क रचना काल मे कुछ दोघं अन्तर अवश्य रहा हैं यह उपर्युक्त कयनो स सिद्ध हैं । भवभूनि राजा के पूर्वार्धकाल के पवि है, जबकि वावपति उत्तरार्घ काल के-इममे सन्देह नहीं है। कुछ विद्वानो का कथन है कि गोडवहो की रचना यशोवर्मा की पराजय के बाद ७३३-१५३ई. के बीच हुई है और भवभूति ८वीं शती ई. के पूर्वार्ध म हुए हैं। पर यह असत्य सिद्ध हो चुका है । मवभूति का समय प्राय समी विद्वान ७वी शती ई० का अन्त मानते है। भवभूति के समय निर्धारण के विषय मे कुछ विद्वानो का भा है कि भवभूति कहीं भी अपनी कृतियो में कन्नौज मोर यशोवर्मा का संकेत नहीं करते हैं। श्री मानन्दराम बरुमा का कहना है कि" मैं फिर से कह सकता है कि भवभूति कही भी कप्नौज के अस्तित्व के विषय मे भी नही कहते हैं । उनके नाटकों का कलाप्रियनाथ (महाकाल) के सामने अभिनीत होने से सिद्ध हैं कि वे उज्जयिनी से सबंधित थे।" वरुपा का यह भी कहना है कि 'कवि पापपति राज' मे वानिशब्द भवभूति -शारदारजनरे-उत्तर की भूमिका ३५ की उपाधि है । किन्तु दरमा का क्यन नितान मनगंन है। महाकवि कालिदास ने भी विक्रमादित्य का कोई क्यन नहीं किया है। 'कवि' वावपति राज' की व्याख्या भी देव्य में मनमानी करते है। यशोवर्मा की सभा में भवभूति का होना एक सिद्ध सिद्धान्त है । ३-जनति के अनुसार कालिदाम और भवभूति को कुछ लोग समसामायिक स्वीकार करते हैं। ममूति को भी वाल्दिाम में साय विक्रमादित्य की समा का एक रहल माना गया है। क्या इस प्रकार है -कालिदास विक्रमादित्य की समा के एक रन । एक दिन एक ब्राह्मण वालिदाम के पास आया और उनसे विक्रमादित्य से भेंट कराने और राज्याश्रय दिलाने की प्रार्थना की। यागन्तु महाप्रय कवि भवभूति पे उन्होंने अपने टत्तररामचरित को महारवि को बहे उत्साह और स्वर में साग सुनाया । कालिदास प्रघमुनी सी दशाम सार भी खेलते जान थे और सुनते भी जाते ये । बब भवभूनि ने वाक्य समाप्त किया तव कालिदास ने भवभूति को बहुत प्रशसा को और कहा कि यदि आप को स्वीकार हो तो १४२७ नोक को अन्तिम पक्ति में एक अनुस्वार हटादें। ("रागिरेव व्यरमीत") महाकवि के आदेशानुसार भवति ने कर दिया। भवभूति मी विक्रमादित्य की समा के एक रत्ल हो गए। कालिदास मवमूति से पहिले वे हैं, यह तो निविवाद सिद्ध ही हो चुका है । समवन कालिदास के ३७५-४७५ ई. के बीच के होने वारे में विद्वानी का बहुमत है। कालिदास का प्रभाव भवभूति के पर वत्यधिक है यह हम यथास्थान प्रागे सिद्ध करेगे। भवभूति प्रौर कालिदास सम्बन्धी एक उल्लेख दल्लाल सेन विरचित मोज प्रबन्ध में भी पृ० १५६ मे है । मवमूति को वाराणसी से बाया हुआ कवि कहा गया है और जिन्हे भोज राज की सभा में स्थान दिया 1-प्रो. के. वी. पाठन,प्रो. बी. लीविश, डा. दी० एस. उपाध्याय गया है। भोज प्रबन्ध मे भवभूति पोर कालिदास की तुलना कराई गई है। और कालिदास की श्रेष्ठता व्यक्त की गई है। किन्तु भोज की सभा मे कालिदास मोर भवभूति आदि वाहोना अनंतिहामिकता को पराकाष्ठा है । भान र पूब पुरुष (चाचा) मज को सभा मे स्थित दशरूपक कार न भवभूति क श्लोका को अपने प्राय : उद्धृत किया है । तव भवभूति पंस भाज व समय म बा पिछग । भाज प्रबन्ध की मनैतिहासिकता तो सव विदित है। प्राप्त प्रमाणो के प्राधार पर भवभूति बाणभट्ट के बाद के है । कन्नोज के सम्राट हपवधन ६०६-६४८ ई० तर शापन करते रहे है चीनी यात्री हनसांग न उनके राज्य के विषय में कई महत्वपूर्ण विवरणा दिए हैं । महाकवि बाए हक सभाववि थ। उन्होने हषचरित नामक काव्य मे अपने आश्रयदाता की कौति गाई हैं । इस पुस्तक का समय ६१० ई० है । बाण हपचरित की भूमिका मे मास, नालिदास और दूसरे अन्य प्रसिद्ध कविपो के साप भवभूति का उल्लेग्य नही करते हैं । यदि भवभूति वाण के पूर्व के होते तो बाण ऐसे सहृदय महाकवि भवभूति का उल्लख भास कालिदासादि नाटककारो के साथ अवश्य करत । स भवत य दानो महाकवि समकालीन थे। भवभूति अपने समय के पूर्वाधिकाल म विशेष प्रसिद्धि नहीं प्राप्त कर सके थे। इस समय तक बाण का हर्षचरित बन चुका था। भवभूति का उदयकाल मौर वाण का उत्तराधकाल एक ही रहा हागा, इसम सन्देह नहीं है । भवभूति वारण मे कुछ वाद के है । कल्हप की राजतरंगिणी के अनुसार वामन काश्मीर नरेश जयापीट के मत्रि-मण्डल में थे । इनसा समय ८.०ई० है। वामन का उल्लेख राजशेखर और मभिनव गुप्त आदि जो नवी शती ई. के है, परते हैं । वामन उत्तररामचरित के • इयं गेहे लक्ष्मो" लोक अपने 1 --वन्यालीक सोचन काव्यालकार सूययत्ति मे उद्धत करते है. प्रतः भवभूति बामन से पहिले के हुए। जैन साहित्य के अनुसार जन साधु बप्या भटिट ने यशोवर्मा के पुत्र प्रामराज को जैन बनाया जो गुजरात म था। वपाहि का समय ८०७ विक्रम सम्वत् हैं । इससे सिद्ध होता है कि यशोवर्मा ८०७-८११ विक्रम सम्बत् के आसपास स्वर्गगत हुधा और भवभूति प्राटवी शनी में सिद्ध हात हैं। किन्तु कनौज के यशोवर्मा के प्रामराज नाम का कोई पुत्र नहीं था, यह इतिहास से सिद्ध हैं। महाकवि राजशेवर भवभूति को बढे पादर और श्रद्धा के साथ उल्लिखित करते है । उनका कहना है कि पूर्वकाल में जो बाल्मीक भनुमेण्ट हुए. वही भवति राजशेखर के रूप में अवतरित है । रामकथा के सम्बन्ध स यह सिद्ध है कि राजशेखर नाटककार भवभूति का हो उल्लेख पर रहे है जिन्होंने बीरचरित और उत्तररामचरित लिखा है । राजशेवर बालरामायण ४४१ मे भो भवभूति के महाबीरचरित का उल्लेख करते । राजशेखर प्रपनो सभी कृतियो में अपने को कन्नौज नरेश महेन्द्रपाल का आध्यात्मिक गुरु कहते हैं । महेन्द्रपाल के समय को सियादीनी का शिलालेख ५०३-४ई० स्पष्ट रूप से कहता हैं । राजशेखर के उल्लेख मे स्पष्ट सिद्ध है कि भवभूति के स्वर्गवास के बाद राजशेखर ने अवतार लिया है। प्रत भवन का समय वो शती का अन्तिम माग हैं । दाण ने कवि का उल्लेख नहीं किया है माधवाचार्य के शकरदिविजयानुमार भी भावभूनि ७ वी शती के हैं । वरुणा मनभूति को ५ वी शती का कहते हैं। अनघराघम और प्रसन्नराधव पर भवभूति के प्रभाव को देखकर उनका कहना है कि भवभूति राजशेखर से बहुत पहिले के हैं। बाणा ने उनका उल्लेख नही किया है । यह कोई बड़ी बात 1-प्रबन्धकोश' गजशेखर -वानरामायण । १६ -कीरहानं एशिग्राफिया ११७१ काण्डिइ ३८ टेशन PLICERTEBOOK नही है। वाग ने मो याल्मीर का भी उल्लेग नही किया है । परप्रा भभूति को काविदास के समय के साथ पहुंचा देते है। विन्तु बरुआ जो ये कथन हा सण्डन वाह साक्ष्यों के साथ साथ अन्त साक्ष्यो से भी हो जाता हैं । १-भवभूति की शैली ५ वी शती को शैली स बहुत भिन्न और प्राग है । गुप्तयुग व शिनाखो की मैली बहुत ही नैसर्गिक और सहज सौदर्य से मरी हई मचिम साही हैं। यह शैली कालिदास की कला का भी मूतरूप हैं । वर्षो धाद कविया और लेखको न एक दूसरी ही शैली या ढाचा तैयार कर लिया, जिमम वृत्रिमता और सजावट न नसगिकता और सादगी का स्थान ल लिया । सबै मगास, यासकारिता और अतिशयाक्ति इसदौली सौन्दय मापदण्ड हा गए । भवभूति को शैली इसो धारा की थो। गद्य म ये पागभट्ट के पास स्पष्टत पहुंचे हुय हैं । वे वारण में सामयिक या कुछ बाद प हैं पहिल क नही। २-विद्याकल्पेन महतो मघाना भूपसामपि-ग्रहणीय विवता- माम् ०" म विवर्तवाद को भ्रान्ति के प्राधार पर प्रदतवाद का सिद्धात प्रापापं पाकर के पपसात् विकसित हुआ है। भयभूति प्राचार्य के पीछे या समसमय म हुए हैं । भवभूति नादिर शान, दिव कर्मकाण्ड के प्रति प्रेम और वैदिक शब्दावलि का प्रयाग यह सिद्ध करता है कि वह "वैदिक पुनर्जागरण काल ७वी शती में पहले के नहीं हो सकते हैं। बौद्ध धर्म के प्रति घृणा का भाव और वैदिक धर्म के प्रति पुरा प्रेम भाचार्य शकर के युग को देन है । भवभूति की कृति मालतीमाधव और विशाखदत्ता मुद्राराक्षस इसके प्रमाण हैं । . मालतीमाधव के गद्यखण्ड प्राकृत में उत्तर रामचरित १६ ३-भवभूति से प्रयुक्त प्रचलाक्ति और मौकुनि मादि शद अमर- कोग मे नहीं हैं । अनः भवमूति प्रमासिंह के उपरान्त हुए हैं। क्योंधि पाचे क कोशो में यह शब्द हैं। इन सब प्रमाणो के प्राधार पर भवभूति ७वी शतो के अन्तिम भाग व सिद्ध होत हैं। रमेशचन्द्र दत्त 'एनशियन्ट इन्डिया' में लिखते भवभूति जो श्रीकण्ठ भी वहै जाने ये, विदर्भ में पैदा हुए किन्तु शीघ्र ही के नौज मानाज्य म पागए । उनका प्रानि प्रेम प्रद्वितीय और विशिष्टता वाला है। वह कवि कला और नाटय कला के ज्ञाता थे। वह अधिक दिनों तक बौन के यशोवर्मन का मुष न उटा सके। काश्मीर का रितादित्य यशोगमन को हराकर उन्हें अपन माप ले गया।" मवमूति की कृतियां और उनका समय क्रमः- महाकवि भवभूति के तीन नाटक महाबोर चरित, उत्तर रामचरित और मालती माधव सर्वमाधारण में प्रसिद्ध है । विचार का विषय यह है कि उन्होन और कोई रचना की है या नहीं? इस प्रश्न के उपस्थित हान का कारण है भवभूति के नाम से लगभग एक दर्जन पद्यो का सुभाषित मग्रहों में प्राप्त होना, जो लखक के प्राप्त तीनों, नाटकों में नहीं प्राप्त होत हैं । शारराघर' न भवनि के नाम से दो एनोकों का उल्लेय . . निघ द्यानि पद्यानि यदि नाटयम्य साक्षतिः । मिक्षुकक्षा विनिक्षिप्त. किमिक्षनोरंमो भवेतत् ॥१॥ 'अलिपटलेग्नुयातां महाय हदय परं विलम्पन्नीम् । मृगमदपरिमल लहरी मनीर किं पामरेषु रे किरमि ||२|| शारधर पद्धात, पीटर्सन मम्बरण ७२ १. १४६ इन लोगो मे से कोई भी इलोक भवभूति के नाटको में नहीं मिलता है । इन दो श्लोको में से प्रथम श्लोक-अन्य ६ श्लोको के साथ जल्हा ने अपनी सूक्ति मुक्तावली में मालतीमाधव नामक लेखक के नाम म उद्धृत किया है। किन्तु निर्णय सागर के मालतीमाधव को सूक्ति विज्ञप्ति मे ऊपर के दो नाको मे से द्वितीय पद्य शेप ६ पद्यों के साथ ले लिय गया है। बल्हण द्वारा उदधुन ७ श्लोक सारगधर ने अपनी पद्धति में ले लिये हैं किन्तु एक पद्य को भवभूति के नाम से उद्धृत किया है। शेष पद्यों के लेखक के विषय में वे मौन हैं । गदाधर भट्ट द्वारा सालिन रसिक जीवन' में भी भवभूति के नाम से दो पय उद्धृत हैं । तो निखद्यानि पद्यानि." मोर दूसरा कि चन्द्रमा प्रत्युपकार निप्पय कपि गोभि कुमुदावबोधनम् । स्व माव एवो नत चेतसा सता परोपकार -यमन हि जीविनम् ॥" जल्हण प्रथम सुभाषित सग्रहकार हैं जिनका समय १२४७ ई० है। इनकी बात अधिक विश्वसनीय है। जल्हण न भवभूति और मालतीमाघद दो पृथक, पृषक, लेखक स्वीकार किए हैं । उस प्राचीन युग में ऐसे नाम के कयि होठे भी थे। जैसे 'निदादग्'ि, उत्यक्षावल्लम, सीत्काररत्न इत्यादि । मालतीमाधव नामक कवि को कोई बड़ी कृति न होने से कुछ समय बाद लोग उन्हे भुला बैठे और जर मानतीमाधव के नाम से पर मिले तो भवभूति को मालतीमाधव समझकर उन पद्यों को भवभूति का कहने लगे। यही कारण है कि सूक्ति सग्रहों के बहुत से पद्य, जो भवभूति के नाम से उधुन हैं, भवभूति के नाटकों में नहीं मिलते हैं । भवभूति ने अन्य कोई अन्य रचा है- इस सिद्धान को इन पदों के बल पर नहीं माना जा सकता है । डा० माण्डारकर आदि' का मी यही कहना है । उपयुक्त विवेचन से पाय निकला कि भवभूति रचित देवल तीन नाटक हैं, जो हमे सुरू। कोई कृति मौर भी हो सकती है, जो रसित जीवन ३/६५ 'मालतीमाधव--इन्द्रोडक्शन
ही प्राज प्राप्त नहीं है, किन्तु उसरे सबैत भी प्रामाणिम से हमारे
पास नहीं हैं।
महावीरचरित कवि को प्रथम रचना है। इसमे क्ला और
अभिन्यजना दोनों निखार पर नहीं है । नाटकीयता का भी विकास नही
हुआ है । भाषा, भाव, शैली पोर सविधान (टेक्नोक) मभी दृष्टियो में
महावीरचरित प्रथम रचना मिद्ध होती है । राम के जीवन का पूर्वाध
इसमें चित्रित है और उत्तराधं उत्तररामचरित में। इससे यह भी
सिद्ध होता है कि महावीरचरित प्रथम रचना है और उत्तररामचरित
द्वितीय वीरवरित में कवि समेत करता है।
"प्राचेतसो मुनिवृपा प्रथमः कवीना
यत् पावनं रघुपतेः प्रणिनाय वृत्तम् ।
भक्तस्य सत्र समरंसत मेऽपि याचस्तत्
मुप्रमन्नमनस: कृतिनो भजन्ताम् ।।
"समरसत' पद से सिद्ध होता है कि जब वीरचरित अभिनीत हुप्रा
तब तक उत्तरचरित भी प्राय: पूर्ण हो चुका था। क्योंकि कवि की
वाणी अब अधिक रामचरित मे फसी नहीं रहना चाहती थी । उधर
उतर के भी मन्त मे कवि कहता है
"पाप्मभ्यश्च पुनाति वर्धयति च श्रेयांमि संयं कथा
मागल्या च मनोहरा च जगतो मातेव गाव च ।
वाल्मीके: परिभावयन्त्व भिनयैर्विन्यस्त रूपा बुधाः
शब्दब्रह्मविद परिणतपक्षस्य वाणी मिमाम् ।।'
जिससे सिद्ध होता है कि कवि श्रद्धा और भक्ति के साथ राम क्या
का मान करना चाहता था। इसके लिए उसने नाटक का क्षेत्र चना ।
पूरी रामकथा का गान कर चुकने के १.से ही वह मालतीमाघव
प्रकरण में हाथ लगा देगा, ऐसी सभावना का स्थान नहीं है ।
'- उत्तररामचरित, ७/२१-विद्यासागर संस्करण
४२
। डा० भाण्डारकर और उनके अनुकरण पर डा० वेलवलकर भी उत्तर- रामचरित को अन्तिम रचना स्वीकार करते हैं । उनका कहना है कि कवि जबरौढ प्रतिभा की चरमसीमा पर था तब उत्तररामचरित का प्रणयन उसन किया है । किन्तु प्रतिभा को प्रौढता और पूर्णता लेखन का अन्त नहीं करा देतो प्रत्युत प्रौर भी आगे बढाती है । इससे वृद्धा वस्या ही मूचित हो यह कोई सिद्धान्त नहीं है ज्ञान वृद्धव और प्रौढत्व वय को अपेक्षा नही रखता है । इससे सिद्ध होता है कि उत्तररामचरित के बाद कवि ने सामाजिक और लौकिक प्रकरण का निर्माण किया जो उसकी कल्पना शक्ति की उपज है। वीर राघव, वेलवलकर आदि 'बाल्मीके" के स्थान पर "तामेता' और परिणतप्रज्ञस्य' के स्थान पर 'परिणताप्राज्ञस्य" पाठ देते है, जिसके कारण उन्हें भ्रम हना है। परिणत प्रज्ञस्य और शब्दब्रह्मविद ये दोनो विशेषण महाकवि वाल्मीक के हैं, न कि भवभूति के। क्योकि भवभूति शब्दब्रह्मविद् थे। वह तो प्रार्थना करते हैं कि विन्देम देवता वाचममृतामात्मन कलाम्। विद्यासागर एक अत्यन्त प्राचीन हस्तलिखित प्रति जो उनके पास थी के बल पर "बाल्मीके परिभावयन्तु" और 'परिणतप्रज्ञस्य' पाठ देते है । व्याकरण और तर्क की कसौटी पर ठीक है। क्योकि (वाल्मीके के स्थान पर 'तामेताम्' पढने पर वाक्य ऐसे बनेगा-'साइयं कथा ताम् एताम् इमावाणी परिभावयन्तु ।' ये दो वाक्य है। इनमे 'सा' शब्द किसी प्रसिद्ध और परोक्ष वस्तु को और सकेत करता है और 'को परिणत प्रज्ञस्य' मे कये शब्द अनुपस्थित वस्तु को सनिधि हमारे मस्तिष्क के सामने प्रस्तुत कर देता है, ऐसी दशा मे जब परोक्षता न रह गई और प्रसिद्ध पहिले सूचित ही है, (सा शब्द से) तो 'ताम्' का दूसरे वाक्य मे क्या प्रयोजन है ? यह सिद्ध मही हो पाता मोर '-उत्तर०७/२१ . ४३ वह चिन्त्य हो जाता है । साथ ही द्वितीय वाक्य म 'तामेलाम' म एत म को 'एव' पन्वादेश होजाना चाहिए था। क्याकि ताम्, एनाम और इनाम एक ही अभिव्यक्त म भद्दे मोर कलाकार को कभी मूचित करत हैं। और वाक्य को भी प्रमुन्दर करदेते हैं । जब हम बाल्मीके ' यह पाठ रखते हैं और वाक्य एसे बनेगा-- साइय कथा । इमा वाल्मीक वाणी परिभावयन्तु' प्रत्येक सहृदय और विचारक यही पाठ उपयुक्त समझेगा । भाण्डारकर साहब का परिणताम प्रादि के वलपर उत्तर रामचति को अन्तिम रचना सिद्ध करना प्रसगत है और मलतीमाव हो अन्तिम रचना सिद्ध होती है। मालती माधव की ली उत्तररामचरित को अपना निमंल और विशेष आकपक ही है । शली स व्यक्ति को प्रौढता बाकी जाती है शंनी के मजने में समय लगता है । वह आयु की वृद्धता के साथ २ अभ्यास स निखरती है । शैली का आक्षक होना सबस बडा गुग है। मालती माधव को सेली उसे मन्तिमकृति सूचित करती है । उत्तररामचरित को प्रस्तावना म वृष्टि हैं जो मालतीमाधव म दूर कर दी गई है । सूत्रधार नान्दी मादि के पश्चात् कहता है- "एषो ऽस्मि कार्यवशात पायोध्यक सवृत्त (समन्तादवलोक्य) भो भो, यदा तावदत्र ।" यह भो भो अयोध्या नगरवासी कह रहा है, सूमधार ने जिसका ही प्रतिनिधित्व क्यिा है । यह दाप पूर्ण है। क्योंकि प्रस्तावना 'सवृत्त ' क साप समाप्त हो जानी चाहिए। अबतो थक (दृश्य) प्रारंभ है । कदि के द्वारा अधिक सुन्दर ढग से रचना विधान यौं हो सकता था-"एषोऽस्मि कार्यवशात् सवृत्त ।" (परिक्रम्य नितान्त ) तत प्रविशति कश्चिदापोष्यक (समतादव लोक्य) मो भो । मालतोमाधवव में कवि ने ऐसा ही किया है। नादी मादि के पश्चात्-'सूत्रधार- बाढम 1 एपोऽस्मि कामदको सवृत । नट-अहमप्यवलोकिता । (इतिपरित्रम्य निष्पान्ली) । प्रस्तावना।। वत परिवृत्य रक्तपट्टिकनेपथ्ये कामन्दक्यवलोकिते प्रवियत । vy " यह विधानम ठीर है। उत्तररामचरित की नटि माल नीमावव महरा दी जान से मिद्ध है कि यह बाद की रचना है। सस्कृत नाटककार परंपरा से सदा नाटक के प्रारम में दर्शको के लिए एक या दो शब्द अत्यन्त नम्रता में अनुगृह और पक्षपात के लिए कहते थे। महावीर चरित म भव मूनि कहत है- "वग्यवान क्वे. काव्यं सा च रामाश्रया कथा। लब्धच वाक्य नियन्ट निष्पेष निकपो जन ।। दम पद्य में लबक अपनी, अपने वस्तु और दगंकममुदाय की प्रगमा करना है । वह प्रमिद्धि, अपनी मान्यता तथा आपक्षित सहृदय प्रशमा र प्रति केची महत्वाकाक्षा रहता है । किन्तु अनचाहा हाता है। उत्तररामचरित म दर्शको (ममाजिका) की प्रग सा मादि ना दूर रही वह कहता है- यया म्प्राणा तथा वाचा सायुन्द दुर्जनो जन कवि की यह शब्दावली निगगा और अनुत्साह की सूचा है। बीरचरित की ऊंची महत्वाशक्षा यहा नष्टप्राय सी है-क्योकि जनता ने वीरचरित का आदर नहीं किया । यही कारण है कि कवि दशको के प्रति अच्छा या बुग कुछ भी नही कहता है । वह पूरी सचाई और लगन से उत्तररामचरित की रचना में एकनिष्टता से लगा हुआ है। किन्तु इसका भी परिणाम बनकल नहीं होता है । परिणाम स्वरूप मालतीमाघद में कदि प्रत्यन्त खीझ उठता है और कोर मरे स्वर से मामाजिको को खरी खोटी सुना देता है- 'येनामचिदिहनः प्रथयन्स्यवनां जानन्तिते किमपितान् प्रतिनैप यत्न । उत्पत्स्यतेऽस्ति मस्यकोऽपि ममान धर्मा कालोहायं निमधिविपुला च धरणी ॥१/८॥ कवि अपने और सामाजिको जन्म और यध्ययनादि के बीच पलर अभिव्यजित करते हुए कहता है कि मेरा बश- ते श्रोत्रियास्तत्व विनिश्चियाय- भूरिश्रुतं शाश्वतमाद्रियन्ते। इप्टाय पूर्ताय च कर्मणेऽयांन्- दारानपत्याय ततोऽथमायु १७ सामाजिकों के प्रति उत्तरोत्तर कवि का बदलता दृष्टिकोण ध्यान देने योग्य है । नीर मे मादरसूचक, उत्तर मे उदासीन पोर अन्त में मालती में पोषपूर्ण । कुछ लोगों का यह कहना कि वीरचरित में अनुकूल प्रशसा न मिलने से द्वितीय रचना मानतीमाधव में कवि कोधित हो उठा है। किन्तु यह धारणा ठीक नही, क्योंकि प्रथम प्रयास में असफल होने पर कोई इतना कोषित नहीं हो सकता है । हा वह कुछ उदासीन हो सकता है । मालतीमाधव की प्रशसा यदि द्वितीय उद्योग में होगई होती तो कवि कभी भी उतररामचरित मे सामाजिकों के प्रति उदासीन न होता, प्रत्युत कोधित दृष्टिकोण म परिवर्तन कर पुन प्रासा करता, जैसा कि परपरायी। साथ ही यदि मालती को भी प्रशसा सहृदय न कर सके होते तो उत्तर में लेखक को और भी भयानकता के साथ दर्शको पर या पाठकों पर प्रहार करना था। किन्तु ऐसा नहीं हुमा जिससे सिद्ध होता कि उत्तररामचरित द्वितीय रचना पर मालतीमाधव अन्तिम रचना भरतमुनि का कहना है कि जिस प्रकार प्रगो से रहित मनुष्य युद्ध भारम करने में मसमर्थ होता है उसी प्रकार मगो से रहित काव्य प्रयोग योग्य कभी नहीं हो सकता। जो काम्य होन अपं वाला भी हो किन्तु नचित रूप मे प्रगो से युक्त हो तो प्रदीप्त बगो के कारण ही शोमा को प्राप्त हो जाता है, इसमें कोई सदेह नहीं । यदि कोई काव्य उच्च कोटि के अथं वाला भी हो किन्तु अगों से रहित होने पर प्रयोग हीनता के कारण सह्दयों के मन प्रसादन में वह समर्थ नहीं होता है। -नाश०१/५५-५८ अनाव कवि को चाहिए कि रस और सविधान के अनुसार उचित रूप सध्यगों का प्रयोग अवश्य करे।' भवभूति का उत्तररामचरित उच्चतम प्रय और भाव वाला होन पर भी नाट्य नियमो-सन्ध्यगो आदि के प्रति उपक्ष रखने के कारण जनप्रिय न हो सका। शान्तिकारी कवि, जिमन हर्ष आदि की शैली के प्रति विरोध करके नाट्य नियमों से म्बनत्र नमगिक नाटक रचना की थी,परपरा की अभ्यासिनी जनता के प्रति प्राधित हा उठा और मालती म उसने अपने क्रोध को स्पष्ट शब्दो प्राट कर दिया। इसके पश्चात् उसने अपनी इस कृति म सध्यगो, अयप्रतिया ,कार्यावस्थामा आदि सभी का सभ्य, विधान किया है। बस्नु भो रूपनाप्रमूत रोमान्टिक ली है। परिणाम प्राशा के अनुकूल हुमा मोर कवि जनता म प्रसिद्ध हागए । राजशेखर मोर वाक्पतिराज की उक्तिया इमम प्रमाण है। कल्हण की राजतरगिणी व अनुसार काश्मीर नरेश ललितादित्य वीज नरेग यशोवर्मा को हराकर भवभूति को अपने साथ ले गया था । उसन ललितपुर मआदित्य (मार्तण्ड) मन्दिर बनवाया और कन्नौज को प्राप्त सपत्ति को उस मदिर को दान में दे दिया। भवभूषि ने मालतीमापद वे प्रारम में प्रादित्य की प्रार्थना उनके वैभव वर्णन साय की है। उपयुक्त विवेचन के पश्चात् अब हम भवभूति के तीनो नादको मे प्राप्त समान सीको और वर्णन स्पलो पर विचार करेगें कि कौन से पद्य और स्थल प्रथम निर्मित हुए और वहाँ से दूसरे ग्रन्थ मे रखदिए गए । इस प्रकार भी ग्रन्थो के रचना क्रम का बहुत कुछ ज्ञान प्राप्त हो जागा। महावीर परित, उत्तररामचरित मोर मालती माधव के ३१ पद्य ममान रूप से सभी म प्राप्त होते हैं। जिनमै १३ पद महावीर पोरर उत्तर चरित में समान रूप से हैं और १८ पद्य उत्तररामचरित और '--मा०मा० १/८ माधीमाव में समान में हैं । महावीरबग्नि और भारतीमापद का कोई भी पद एक दूसरे में नहीं मिलता है। केवल दा होकरंसे है जो तीनों प्रायों में प्राण होते है। विचार का विषय यह है कि कौन विम प्रथ में पद्म उठाकर दूसरे अन्य में रखा गया है। एक सेवा के द्वारा रचित धिमित ग्रन्थों में समानता का प्राप्त होना स्वाभाविक है किन्तु वहाँ पर कोई वस्नु बनाइ परे म्यान न किमी दूसरे स्थान पर भी पढ़वा दी जाती है तो दसका मान दित नहीं रहता है क्योंकि पूर्व म्यान में बंद पानी नगिकता के कारण अपुक पनीट होती है, अकि दूसरे स्थान पर वह स्वानाविक मो टाकुन्ड नहीं प्रतीत होती है। महावीररित दौर उत्तररामचरित २ समान लोक महावीर चरित में विशेष सरयुक्त म्यता में है टया उत्तररामचरित और माननी मायव में एक समान प्राप्त होने वाले पद्य तो उत्तररामचरित में ही ठीक स्थानों पर वनादिना के साथ है । मारती मारब में दो वे खटकते से नगई है। महावीर चरित के इनोको को मनानहा टनको रचना समीरता और उत्तर रामचरित और मानदो माघर के पदों की प्रषिक मुमानढा दनकी रचना समानता को व्यक्त करती है। महावीर- चरित कदि की प्रारकि रमना है इस पर किसी भी विचारक की विवाद नहीं मानतीमापक अन्तिम रचना हैम डार पर मी किसी को आरन होना चाहिए । मापनी माद के नवम प्रकापवंत वर्गन उतर के गोदावरी तीरके पदेन वरान के पूर्व रचित होन को समूचना देता है " "स्मारपनि गोरादरी मुरित मा दक्षिजन्य नृपयन दनरामचरित जान सक और दानाविक है । मानवी माधव में टली मदादनी और दग पर यह वएन भनुमत और मम्दानाविक है। उतर पदरित के करए रन का प्रभाव मारती मायद के कार मा. मा. ९/३१ के दाद का पद १. २०५। निपावर । Y पार रम का नाटक होने पर भी मर्वत्र छाया हुआ है। माधव विरह और रोदन राम के ममान ही है। यतः मालती माधव उनर रामचरित में वाद की रचना है हम यहाँ पर पाठकों क लिए कृतियों में समानता कुं माय प्राप्त पदों का उल्लेख किए देते हैं। 3723 अध्याय ३ ६. भवभूति कृत ग्रन्य-त्रयगत सदृश पदसंग्रह महाबीर चरित और उत्तररामचरित १ विश्वामित्र- 12 नेपामिदानी दायादो वृद्धः सीरध्वजा नृपः । याज्ञवल्क्यो मुनियम्मै ब्रह्म पारायगई जगौम० ० १।१४ अरन्घती- एप व ग्लान्य सम्बन्धी जनकानां कुलोद्वदः । भानवल्क्यो मुनिर्यस्मै ग्रह्म पागयणं जगौ ॥ ३० च०४/ L2 257 78 चूडाचुम्बितकङ्कपत्रमभितम्नूर्णद्वयं पृष्टतः । मम्मम्तोक पवित्र लाञ्छनमुगेवचे लचं रौरवीम् । मौया मेखलया नियन्त्रितमयी बामश्चमाजिष्टकम् । पागो कामु कमशमूत्रवलयं दण्डोऽपरः पप्पलामच०१/१८ अनक- यही श्लोक ज्यों का त्यों उच०४/२० ३ विश्वामित्र- अपिप्रवृत्तयज्ञोऽमौ विदेहाधिपनि. मुबी। गौतमश्च शतानन्दो जनकानां पुरोहित. ॥ म. च. १/१६ 4 -rkee लग्मए- सचिनो वशिष्ठाटीनपनातस्तवाति । ਗੈਰਸ उ०च०४/२० ४ विश्वामित्र- ब्रह्मान्यो नाहिताय तप्त्वा परम्सहन शरता तपामि। एतान्यत्शन्गुरव पुराणा स्वान्येव तेनासि तपोमयानि । म. ०१/२ यही श्लोक व्यों का त्यों उ० च० २११५, ६/१५ राम- जनकाना रघूण च सम्बन्ध कस्य न प्रिय । यत्र नाता गृहीता च कल्याणप्रतिभूमपान् ॥ म. ५०१/४७ राम- . .. स्वय कुशीकनन्दन] २० च० १/१७ ६ जामदग्न्य- त्रातु लोकानिव परिणत कायवानस्त्र । हात्रोधर्म श्रित इव वनु ब्रह्म कोशस्य गुप्यै । सामर्थ्यानामिव समुन्य सचयो वा गुणानाम् प्रादुर्भूय स्थित इव जगत्पुण्य निर्माण राशि मध.४१ राम- ज्यों का त्यों केवल 'श्राविभूय' ।उच० ६/६ 6.4Modeas- ७ जामदग्य- अमृताध्मानीमृतस्निग्धमहननस्य ते। कुठार कम्बुकण्ठस्य कष्ट करठे पतिप्यति ॥ म. च०/४६ राम- .. . .. परिष्वज्ञाय वात्सल्यादयमुत्तएठते जन ॥३० च०६/२१ जन:--- ज्याजिहया वलिचितोत्कटकोटि दष्ट- मुनगारिघोरधन घर्घरघापनेतत् । ग्रास प्रसक्त हसन्तकमक पत्र जृम्भाविडम्पिविकटोरमस्तु चापम् ।।म० च० ३/२९ लव- ९ ज्यों का त्यों मुभूति केवल परिवर्तित है । उ० च०४/२६ दशरथ-- निसगत पवित्रस्त किमन्यन पावन तव । तीर्थोदक च वहिश्च नान्यत शुद्धिमहंत ॥ म० च०४/०७ राम- उत्पत्ति परिपूताया किमस्या पावनान्तरै । तीर्थो ज्या कात्यो.. ॥ उ० च. २/१३ १०-विश्वामित्र- किं वनुष्ठान नित्यत्व स्वातन्त्र्यमपकर्षतिर संकटा ह्याहिताग्नीना प्रत्यवायै गृहस्यता ।। म.च०४/३३ राम-ज्यों का स्वों । उ००१/- ११-जनक- पुत्र सक्रान्तलक्ष्मीकैर्यवृद्धत्वाकुमि तिम् । वयातलीर कण्ठेन प्राप्तमारण्यक प्रतम् ॥ मच०४/५१ लक्ष्मण- धृत वाल्ये तदार्येण पुण्यमारण्यक नतम् ।। उ०च०११२२ १२ जटायु- चतुर्दश सहस्त्राणि चतुदश च राक्षसा । त्रयश्च दूपण खर त्रिमूर्यानो रणे हता १॥ मच०५/१३ ॥ उ.च० २/१५ . शम्बूक-ज्यों का त्यों १६-यमणा- इह समदशकुन्ता क्रान्तवानौर मुक्त प्रसय मुरभि शीतस्वच्छनोया वहनि । फल भर परिणाम श्याम जम्बू निकुन स्युलन मुखर मूरिस्त्रोनसो निमरिण्य. ॥ मच०५/४० योर भी दघति कुहरमाजामत्र भल्लूक यूनाम् अनुसरति गुमरिण स्त्यान मम्यूकनानि । शिशिरकटुकवाय स्त्यायते सल्लकोनाम् इमलित विशीर्ष प्रयिनिष्यन्ट गन्ध ॥ म००५/४॥ माम्बूक-ज्यों का त्यों दोनों पद्य केवल विकएं ।। उ०च०२/२०,२ सौदामिनी-पति कुहर.ज्यों का त्यों । मा०मा०९/३ माधव- फलमर परिणाम श्याम जम्व निकुज । स्सलन तनु वरंगामुत्तरेण धवन्तीम् ।। मा०मा० ६/२४ नोट-केवल यही स्थल मच०, २०५० भोर मा०मा० के सदृश है। नहीं तो म०३० का कोई भी प्रश मा०मा में नहीं प्राप्त होता है। उत्तर रामचरित और मालतीमाधव- . माधव २-राम-- नैसर्गिको सुरमिणः कुसुमस्य सिद्धा। मूनिस्थितिर्नचरलैरवताइनानि ।। उ०प० १११४ मुसलैर्वतखुट्टनानि ।। मा०मा० /- एतस्मिन्मदकलमल्लिकास पक्षा व्याघूत स्फुर दुरु दण्ड पुण्डरीकाः। वाप्पाम्मः परिपतनोद्गमान्तराले संदृष्टा. कुवलयिनो मयाविभागाः । उ०प० १/३१ ५२ RESENTED BO? मकरन्द ज्यों का त्यों मन्तिम दृश्यन्नाम विरहितप्रियो विमागाः ॥ मा०मा० ९/१४ ३-राम- जीवन्निव ससाध्वसश्रम खेदविन्दुधि कण्ठमर्प्यताम् बाहु रैन्दवमयूख चुन्धित स्यन्दिचन्द्रमणि हारविभ्रमः।। उत्तर०१/३४ माधव-जीवनिव समूहसाध्वमस्वदे- "ज्यों का त्यों मा०मा०६३ माधव-"- म्लानस्य जीवकुसुमस्य विकासनानि- संवर्पणानि सकलेन्द्रिय मोहनानि । एतानि वे सुवचनानि सरोरुहाक्षि- मृतानिमनसश्च रसायनानि ।। उचर०१/३६ व्यों का त्यों- आनन्दनानि हत्यैक रसायनानि दिष्टया- ममाप्यधिगतानि पचोऽमृतानि ।। मा०मा०६/ गुब्जकज कुटोर कौशिक घटाधुस्काखकीचक- स्तम्याडम्बर मूक मौकलिकुलः क्रौञ्चामियोऽयं गिरिः।। उत्तर०२ गुञ्चत्कुज कुटीर कौशिक घटाघन्कार संवेस्तिठ- कन्दफेरव पण्डपातिमृत्याग्मारमोमैतः।। मा०मा०५६ परिपाण्डु दुवंलकपोलसुन्दरं दधतीविलोल कवरीकमानम् ।। 5चर माधव- ६-तमसा-
कामन्दकी-
परिपाण्डुपांसुलकपोलमाननदधती मनोहर तरत्वमागता ।।
मा०मा०२।४
लोलोस्सातमृणाल काण्ड कवलन्छे देषु संपादिता.
पुप्यत्पुटकरवासितस्य पयसो गरडूप सक्रान्तय ।
सेकःशीकरिणा रेणविहित: कामंदिरामे पुनः
यत्स्नेहादनरालनालनलिनी पत्रातपत्र धृतम् ॥
माधव-नस्नेहाद् केवल ज्यों का त्यों है । मा०मा०६३४
उत्तर.
दलतिहृदयं शोकोवेगाद्विधातु न भिद्यते
वहति विकल:कायो मोह में मुञ्चति चेतनाम् ।
ज्वलायति तनूमन्ताह.करोति न भस्मसात्
प्रहरति विधिर्ममच्छेनीन कृन्तति जीवितम् ।।
उत्तर०३०३१
माधव-दलति हृदय गाढोद्वेगम "शेष ज्यों का त्यों।
मा०मा०६४१२
हा हा देवि स्फुरति हृदयं ध्वसते देहवन्धः
शून्यं मन्ये जगदविरलम्बालमन्तज्वलामि ।
सीदन्नन्धेतमसि विधुरो मज्जतीवान्तरात्मा
विवस मोह स्थगति कथं मन्दभाग्य करोमि।
उत्तर०३३८
-मातर्मातर्दलति... जगदविफल.
शेष ज्यों का त्यों
मा०मा०२०
-
मकरन्दन
१०-तमसा-वासन्ती- तबवितरत भद्र भूयसे मंगलाय ॥ उत्तर०३।४८ सूत्रधार- भद्र भद्रवितर भगवन भूयसे मंगलाय । मा०मा०२५ ११-जनक- अनियत कादित स्मितं विराजम् कतिपय कोमल दन्त कुमलाप्रम् । वदन कमलकं शिशोः स्मरामि स्खलासमञ्ज ममञ्ज जल्पितं ने । उत्तर०४।४ कामन्दकी- शेष ज्यों का त्यों केवल सुमुग्ध ।। मा०मा०१०।२ १२-कञ्चुकी- मुहदिव प्रकट्य सुसप्रदाम् प्रथममेक रसामनुकूलनाम् । पुनरकाण्ड विवर्तन दारुणः परिशिष्टि विधिर्मनसोरजम् ॥ उत्तर०४।१५ माधव- सारा ज्यों का त्यों केवल प्रविशिष्टि ।। मा०मा०४७ १३-चन्द्रकेतु- व्यतिकर इव भीमस्ताम सो वैद्यु तश्च प्रणिहितम पिचक्षुर्ग्रस्त मुक्त हिनस्ति ।। उत्तर०५।१३ मकरन्द -"ज्यों का त्यों .. क्षणमु पहत चक्षुत्तिरुद्धय शान्त: । मा०मा०५४ कामन्दकी- ज्यों का त्यों..॥ मा०मा०१० १४-राम- व्यतिपजति पदार्थानान्तरः कोऽपि हेतुः नसलु बहिरुपाधीन् प्रीतयः संश्रयन्ते । ......
विकसवि हि पतहस्योदये पुण्डरीकम्
द्रवति च हिम रस्मा बुद्गवे चन्द्रकान्त: ।। उत्तर.६।१२
मकरन्द-ज्यों का त्यों ॥ मा०मा०॥
१५-भागीरथी-
को नाम पाफाभिमुखस्य जन्तुः
द्वाराणि देवस्य पिधातुमीप्टे ॥ उत्तर०७४
माधव-"ज्यों का त्यों-
।। मा मा.१३
चतुर्थ अध्याय
भवभूति की कथावस्तु के स्रोत और रामकथा
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महा कवि भवभूति ने अपने नाटकों के लिए इतिहास प्रएिक
कथानक राम कथा को चुना है। कवि के महापौर धरित और उत्तर
रामचरित इन दोनों की कथा वस्तु ऐतिहासिक हैं मोर मालती.
माधव की कवि कल्पित । भवभूति महावीर परित मे स्पष्ट करते हैं-
'प्राचेत सो मुनिवृपा प्रथम' फवीनायत्
पावन रघुपते प्रणिनाय धृत्तम् ।
भक्तस्य तन समरसत मे ऽपि वाच स्तत्
सुप्रसन्न
मनस कृतिनो मजन्ताम् ॥
तथा उत्तर के भी अन्त मे-
पाप्मभ्यरच पुनाति वर्धयतिच श्रेयासि सेर्यकथा
माङ्गल्या घ मनोहरा व जगतो मातेव गंगेव च।
याल्मीके परिभावयन्त्वभिनयैविन्यस्तरूपां धुधा
शब्दप्रक्ष विद. परिणतप्रज्ञस्य पाणी मिमाम् ॥
कवि राम कपा के प्रति श्रद्धा से पूर्ण है मौरमादि कवि की भोर
उसके सुस्पष्ट सपेत है । भवभूति के कथानक का मूलाधार रामायण
महाकाप्य है इसमे सदेह नहीं है। मुरारी कवि का कहना पस्तुत.
पपाप है-
"अहो सकलक विसर्थ साधारणी
सल्विये बाल्मीकीया सुभाषिता"
किन्तु उत्तरं रामचरित के कथानक में पपपुराण के
पाताससण्डस्थ रामकथा का पूर्ण प्रभाव है, जिसके कारण कवि उत्तर
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. के कथानक के लिए उसका ऋणी है। कवि के नाटकों को कथावस्तु और घटना चक नया दृश्य विधान मादि में भास और कालिदाम का कृतियों तथा महाकाव्यों का बहुत प्रभाव हैं, बिमका हम क्रमश विवेचन करेगें । अभी हम कवि के कथानक के राम कथा सम्बन्धी पक्ष पर विचार करेगें। भवभूनि पहिले नाटक कार हैं जिन्होंने पूरी राम कथा को नाटकीय सांचे मदाल कर वह प्रमुखता प्रदान को है कि जिसके प्रमाव से कन्दमाला, घालरामायण, प्रसन्न राधव, बनराघव, हनुमन्नाटक आदि न जाने कितने नाटक निर्मित हुए। राम कथा का इतिहास/- भारत में वाल्मीकि रामायण के चार सस्करण प्रचलित है । १-उत्तरी भारत का सस्करण २-वगालो सस्करण, ३-पश्चिमी मस्करण ४-दक्षिणी सस्करण। इन सभी सस्करणों में मूनकथानक मे कोई भी विभेद नहीं है केवल श्लोकों और सगो के विषय म अन्तर है। इन सस्करणों में कोन मा सस्करण सबसे प्राचीन है, यह नहीं बताया जा सक्ता है । रामायण में बहुत से प्रश बाद के जोडे हुए हैं जो कहीं २ पुनरुक्तिः सो करके अपने को प्रस्ट र देत हैं तथा उनकी रचना शैली से भी उनकी प्रक्षिप्त प्रशता सिद्ध हो जाती हैं। हम बबई सस्करण से विवेचन करेगें। कथानक का जहा तक सम्बन्ध है भवभूति का रामायण विषयक ज्ञान बाज की सुलभ रामायों से अन्तर नही रखता है। बाल्मीकीय रामकथा, कोशल देश की राजधानी अयोध्या में राजा दशरय राज करते थे। उनके वश में मनु, इक्ष्वाकु, सगर, भगीरथ, काकुत्स्थ और रघु ऐसे प्रसिद्ध प्रतापी नृपति हो चुके थे। दशरथ को तीन रानियां कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी थी । -इसके लिखने मे डा. फादर कामिल मुल्के के निबष रामकथा और डा. वेलवल्कर के उत्तर रामचरित के इन्ट्रोडक्शन हाव है सोरज से सहायता ली गयी है। .
जनक बढे कौशल्या सब से जेठी मोर कैकेयो सबसे अधिक प्यारी थी। दशरथ ने बहुत दिनो तक समृद्धि के साथ शासन क्यिा । उनके एक पुत्री शन्ता यो, जो ऋप्पथ ग को ब्याही पो -माने मित्र लोमपाद को पालन के लिए दे दिया या । शान्ता किस माता से पैदा हुई थी, इसका उल्लेख नहीं है । राजा के कोई पुत्र न था और वे अत्यन्न वृद्ध थे। कुलगुरु वशिष्ठ के कथनानुसार उन्होंने ऋष्यशृंग के नेतृत्व में पुत्रेष्टि यज्ञ किया। जिसके फलस्वरूप उनके चार पुत्र हुए। कोशल से पूर्व की भोर विदेह जनक का राज मिथिला था। ब्रह्मज्ञानी ये एक बार उन्होने यज्ञ के लिये पवित्र भूमि की रचना करते हुए हल से पृथ्वी जोती। जिसके फलस्वरूप सीता का जन्म हुमा । सीता धरती की पुत्री थी जनक ने बड़े प्यार से उनका लालन पालन किया । सौता जनक की पुत्री मिला और जनक के भाई कुशध्वज को पुत्रो माण्डवी एव श्रुतिकीति के साथ बढी । सीता जब विवाह योग्य हुई तो अनक ने स्वयवर रचा, जिसमे यह घोपरणा की गई कि जो शक्तिशाली पुरुष शिव धनुष को तोड डालेगा उसी से राजकुमारी का विवाह होगा। भारत के नरेशों ने प्री शक्ति भर प्रयत्नशीलता दिखाई पर सफलता किसी को नहीं मिली। एक दिन राजा दशरप की राजसभा मे राषि विश्वामित्र पधारे। दे निशाचरी से पीडित थे और अपने यज्ञ के रक्षणार्य राम और लक्ष्मण को जो दशरय के बेठे पुत्र थे लेने माये ये । विश्वामित्र का स्थान साधारण न था। दशरप को विना अपनी इच्छा के दोनों पुत्र मुनि के साय भेजने पहे। राम मोर लक्ष्मण ने जाकर ताडका मोर सुबाहु के साथ राक्षसों का सहार किया तथा मारोच को समुद्र पार मक दिपा विश्वामित्र जी का यज्ञ पूरा हुमा । उन्होंने राजकुमारों के कपर प्रसन्न होकर सभी अस्त्र शस्त्र विद्यायें जो मन्त्रों से प्रयोग में माती पी, सिखा दी, जिनमें जम्मास्त्र प्रमुख थे। राम लक्ष्मण को लेकर विश्वामित्र मिपिता गये । राजा जनक राजकुमारों को देखकर तथा उनकी धीरता सुनहर पस्यन्त प्रभावित हुए । विश्वामित्र जी की प्राशा से राम ने धनुष को तोड हाला मोर सोता जी से उनका विवाह हो गया। विश्वामित्र के आदेशानुसार ननकों ने शेष तीनों तकियों का विवाह दरारय के शेष तीनों राजकुमारों से कर दिया । दशरथ अयोध्या से, सूचना भेजकर इस अवसर के लिए बुला लिये गए थे। किना यह मानन्द जमदग्नि के पुत्र परशुराम जी के प्राने से दूर हो गया। वे अत्यन्त क्रोधी मोर इसकोस बार मत्रियो का सहार कर चुकने घाले थे। वे शिव भक्त थे घोर अपने गुरु के घनुप को राम द्वारा त्रुटित सुनकर प्रतीकार लेने माए ये । किन्तु एक साधारण युद्ध विद्या प्रदर्शन से राम ने उन्हें प्रसन्न कर दिया और वे दन को लौट गए। चारों राजकुमार राजकुमारियों को लेकर अयोध्या आ गए और १४ वर्ष तक यौवन सुख भोगते रहे । बालकाण्ड यहीं पर समाप्त हो जाता है। रामायण के कुछ सस्करण राम के जनकपुर से लौटते ही वन- पमम घटना प्रायोजित कर देते हैं, किन्तु भवभूति और पद्मपुरास का पातालखण्ड यह नही स्वीकार करते हैं। दधारप अपने ज्येष्ठ पुत्र राम को इस समय उपयुक्त प्रसर समझकर युवराज पद देने का विचार करने लगे मोर घोषणा कराके तयारि प्रारम्भ कर दी। किन्तु कैकेयो दासी मन्परा के बहकावे मे भाकर राजा द्वारा प्रदत्त दो घर लेने का विचार कर उनमे से एक में अपने पुत्र भरत के लिए युवराज पद और दूसरे मै राम के लिए १४ वर्ष का बनवास रामा से मांग लिया । राजा को फैकेयी के अपनों का विश्वास न हो रहा था, किन्तु राम ने परिस्थिति समझकर स्वयं वन मार्ग पकड़ा। उनके साप इनकी धर्मपत्नी सीता मौर मनुज लक्ष्मण भी बन को पले । दशरथ ने भी राम के बनगमन के साथ ही स्वयं का मार्ग पकड़ा। भरत जो कि अयोध्या में पटी इन भरनामो से अपरिचित थे, भरनी ननिहाल में ये बै मयोभ्या बुलाए गये मोर उनसे पिता के ६० सभी सस्कार करने तथा राज्य स्वीकार करने के लिए कहा गया किन्तु जब उन्हे मब बातें और अपनी माता की करतूत का पता चल जाता है, तो वे अत्यन्त दुखित होते हैं और पूर्णतया राज्य का लेना अस्वीकार करके, राम को दृढने के लिए वन को चल देते हैं। उनका ध्येय या गम को लौटाकर राज्य गद्दी सौंप देना । भरत राम को प्रयाग में आगे चित्रकूट मे बनवासी का जीवन व्यतीत करते पाते हैं। भरत इन तीनो को दशा देखकर विमूढ हो उठते हैं । राम को भरत को देखकर अत्यन्त आश्चर्य होता । किन्तु राम बहुत कहने सुनने पर भी अयोध्या विना १४ वर्ष पूरे किए लौटना उपयुक्त नहीं समझते हैं और तब तब भरत को राज्य मार ममालने को माना देते हैं। जनता की भलाई के लिए भरत राम के प्रतिनिधि के रूप अयोध्या का शारान समालते हैं । अयोध्या काण्ड समाप्त । इसके बाद राम चित्रकूट से दक्षिण के धनघोर जगलो मे प्रवेश करते हैं। उन्होने विन्ध्य के उसपार राक्षसो के जमघट सुनकर उसी ओर को प्रस्थान किया । विन्ध्य मे घुसते ही उन्हे विराप राक्षस मिला जिसे उन्होंने मिलते ही मार दिया। इसके बाद बहुत से ऋषियों और मुनियो से मिले । इस तरह से वनवास के उनके १० वर्ष व्यतीत हो गये । डा. वेलवलकर का कहना है कि यह ठीक नहीं है क्योंकि यदि १० वर्ष उनके पहिले ही व्यतीत हो गपे गोदावरी के किनारे पहुँचने के, तो पचवटी में वे कुछ दिनों के लिए कुटी न बनाते जवकि अभी तक नहीं बनाई थी। वे पद्मपुराण की बाते मानते हैं जिसमे १० वर्ष पचवटी में बिताने के लिए कहा गया है। इसके बाद राम और दक्षिण को मोर बढते हुए गोदावरी के किनारे पहुंचते हैं। वहां पर जन स्थान में भगस्त्य, लोपामुद्रा और प्रराज जटायु के समीप, प्रसव पर्वत के तट पर पचवटी में कुटी बनाकर रहने लगे । राम अपनी धर्मपत्नी और भाई के साथ शान्ति का जीवन व्यतीत कर रहे थे, किन्तु उनकी शान्ति '-पद्मपुराण ६/२६९ - चिरस्थायी न हो सकी। राक्षस राज रावण जो लका का अधिपति था, तथा ससार भर में आतक फैलाए हुए था, जिसका जन स्थान मे उपनिवेश था और सरदूपण तथा प्रिशिरा की अध्यक्षता में १४ सहस्त्र निशाचरी सेना जो जनस्थान में रखसे था-उमको विधवा वहिन शुर्पणखा पचवटी मे राम के पाम आई प्रौर मोहित होकर विवाह के लिए प्रार्थना करने लगो। राम ने उसे अनुज लक्ष्मण के पास भेजा मोर समेत से उसकी नाक और कान क्टवा डाले। वह रोती हुई खरदूपए मादि के पास गई, पोर पूरी राक्षसो सेना को मात्रमण के लिए लिया लाई । राम और लक्ष्मण ने राधर्मों का समूल सहार कर डाला। राम धनुप मै वाए बैठाने के लिए इस युद्ध में तीन पग पोछे हटे थे। शूर्पणखा भाग कर रावण के पास गई भोर सीता के सौन्दर्य का वर्णन कर सीता के प्रति रावण के हृदय मै कामवासना जगा दी। रावण सीता को अपने आधीन करने के लिए मारीच के पास पहुंचा और उसे कचन मृग बना कर साघु वेश मे पचवटी जाकर, राम के कनक मग के पीछे मारने के लिए दौड पड़ने पर अकेली सीता का बलात् हरण कर लिया । लक्ष्मण को सौता ने राम की सहायता के लिए भेज दिया या। रावण के मार्ग में जटायु बाधक बना किन्तु मारा गया । राम और लक्ष्मण ने लौटकर कुटी को सोता से शून्य देखा। यम अत्यन्त दुखित हुए । अरण्यकाण्ड समाप्त हुपा। सीता को दृढते हुए राजकुमार पपासर के पास पहुचे । यहा हनुमान के द्वारा मुग्रीव(वानरराज)मे उनकी मित्रता हुई। सुग्रीव बानर राज वाली के द्वारा स्त्री और राज्य छीन लिए जाने से उसके डर से यहाँ रहता था। राम ने सुर्माव के लिए बाली को मारा और सुग्रोव को उसको स्त्री तथा राज्य वापस लोटा दिया । बाली को राम ने मप्रत्यक्ष मारा था । सुग्रीव ने राम को कृपा के बदले में वानर सेना को सभी दिशाओं में सीता की खोज करने के के लिए भेजा विशेष कर अगद, हनुमान और जाम्बवान को दक्षिण दिशा में भेजा, क्योकि जटायु ने प्राण घोडते २ राम से रावण को करतूत प्रकट कर दी थी।किपिन्धा काण्ड समाप्त ।
रावण को राजधानी लंका का रक्षक समुद्र था। हनुमान लका को लाप गए । स वा म भशोकवाटिका मे सीता से हनुमान को भेंट हुई । अशोक वृक्ष के नीचे पृशकाय सीता को रावण तथा राक्षसियो सता करके, पमका करके वश में करने का प्रयत्न करती थी किन्तु ये तो पतियता थी। उनकी मोर ध्यात तर भी नहीं देती थी। उनने न रहने पर हनुमान सीताको राम प्रदत्त मुद्रिका देकर रामका पूरा सदेश पहते हैं और उनसे चूडामणि लेकर मक्षयकुमारादि राक्षसो को मारकर लका मे आगमगा वापस लौट माते हैं । सुन्दरकाण्ड समाप्त | राम सीता का समाचार पाकर शीघ्र ही लका पर मानमरा के लिए पल देते हैं। उनके साप मे ऋक्षवानरों को सेना है। पूरी सेना के साथ राम समुद्र के किनारे पहुचते हैं मोर नलनील के द्वारा समुद्र में सेतु का निर्माण कराते हैं। लका पर चढाई होती है भोर युद्ध मे मसैन्य रावण का सहार होता है। रावण का भाई विभीपण राम के पक्ष में चला भाया था। इस युद्ध की दिन सख्या में सभी सस्करणो मे मराभेद है। विभीपण समा के राजा होते हैं मोर सीता राम को प्राप्त होती है। राम जनता के विश्वास के लिए सोता की मग्नि परीक्षा लेते हैं जिसमे सीता सरी उतरती हूँ मौर राम सीता को सहर्ष स्वीकार करते है । राम को सो सीता पर सदा विश्वास रहा है येवल जनता के लिए पह करम किया गया था। भवतक १४ वर्ष पूरे हो चुके थे। मत' राम, सदमण, सीता तथा सारो सेना ने पुष्पक विमान पर बैठकर मयोध्या के लिए प्रस्पान किया । अयोध्या में ये सभी से मिलकर भेटे जो उनकी बाट जोह रहे थे। राम का राज्याभिषेक हुमा । युद्ध काण्ड ममाप्त । मानन्द की समष्टि पे साथ साय प्रबन्ध काय पहा समाप्त हो जाता है। किन्तु राग के उत्तर कालीन बीवन सबन्धित उत्तरकाण्ड शेप है। राज्याभिषेक के बुछ महीनों बाद जनता में सोता के विषय मे अपवाद को पर्चा फैली। अब राम को घरों से यह ज्ञात हुमा तो उन्होंने सीता के परित्याग का ६३ निश्चय किया और वक्ष्मण को बाझा दो कि सीता को ले जाकर गया के उसपार बन में घोड आमो। वहां उन्हें सब बता देना । पर सोडा इस समय पूर्ण गर्भा पी लक्ष्मण ने मादेश का पालन किया। सोडा ने लक्ष्मण से सौटते समय राम के लिए एक मार्मिक संदेश दिया और करुण रोदन करने लगी। वाल्मीकि ने उन्हें ले जाकर अपने धाश्रम मे मामय दिया जो वहां से प्रत्यक्ष समीप था ! बाधम में सीता के दो पुत्र पैदा हुए, जिनका पातन, पोषण और शिक्षण महर्षि वाल्मीकि ने पूर्ण सतर्कता के साथ किया । राम अयोध्या में बत्पन्न अशान्ति का जीवन व्यतीत कर रहे थे। केवल रतन्य पालन के लिए शासन करते थे। उन्हें अपनी निदोंप पलो को याद कराबर नाही रहती थी। वर्ष बीत गये। उन्होंने बश्वमेध करने के लिए मशवछोहा। यज्ञ समाप्ति के उत्सव को पूर्णता देने के लिए महर्षि वाल्मीकि भी बन दोनों राजकुमारी के साथ माय को मादिकवि रचित रामायण का गान कर रहे थे। राम ने सभा के समक्ष ही दातको से प्रभावित होकर उनके विषय में महर्षि से था। बाल्मीकि कोने बनाया कि यह आपके हो पुत्र हैं राम को अत्यन्त पाश्चर्य हुआ और जब उन्हें यह भी पता चला कि सोडा पभो बोषित है तो उन्हें लेने के लिए आदमी भेदा सौता आई सपा रामने सभा के सामने उनसे पुनः अपनी पवित्रता का प्रमाण देने को कहा । सीता दुख अपमान से भरकर जैसे ही बोली कि यदि मैंने अपने जीवन में राम को छोड़कर अन्य से कोई लगापन रक्खा हो तो पृथ्वी माता मुर्वे शरण । तत्क्षण हो पृथ्वी फट गई मोर उस के बीच से एक सिंहासन निस्ला मोर पुप्पो मावा पनी दिदोष पुत्री को लेकर अन्तर्धान हो गई। यहाँ पूर्ण शान्ति पाई। इसके बाद अपना बस्तकात समोर समझ राज्य को चारो भाइयों के पुत्रों में समान रूप से विभत कर राम स्वतत्र हुए। पारों माढायें स्वर्गारोहण कर गई। राम ने लक्ष्मण का परित्याग कर दिया और सरयू नदी में समाधि ले लो। उनका मनुमरण शेप भाइरों और नगर वासियों ने किया । उत्तरकाण्ड समाप्द।। ६४ रामारा, महाभारत तथा पुरा और मेवमूनि के नाटक प्रो० कोवी ने' दासरामायण म माषा, मगोत, ज्योतिष तथा अन्य प्राधारों पर आश्रित होकर गमायण का समय ८००-५०० बी०सी० निर्धारित किया है। रामायण म समय समय पर प्रक्षिप्त अश जुड़े हैं । यह कार्य ईसा की प्रथम शताब्दी तक होता रहा है। बालकाण्ड कुछ ही समं प्राचीन है, शेप मारा बालकाण्ड बाद को सम्मिलित किया गया है। उत्तरकाण्ड तो पूरा बाद का है । इन काण्डोम हम राम को सर्व प्रथम स्वर्गीय भवनार के रूप में वरिणत पाते हैं। उत्तररामचरित राम के जीवन के उत्तरकान से सम्बन्धित है। मवभूति का उत्तररामचरित रामायण की कथा स बहुत अन्तर रखता है। प्रश्न यह उठता है कि भवभूति के उत्तररामचरित के कयानक का स्रोत कहां हैं । यद्यपि भवनि ने स्पष्ट शब्दों में वाल्मीकीय कथा के प्रति आमार वीरचरित मे और उत्तररामचरित में प्रदर्शित किया है, फिर भी उनके कमानक में मन्म ग्रन्थों का भी बहुत बड़ा प्रभाव है। महाभारत में रामकथा सम्बन्धी रामोपाख्यान है। किन्तु इसमे राम राज्याभिषेक के बाद की कया का कोई भी उल्लेख नहीं है। इसलिए कुछ विद्वान रामायण के वर्तमान ६प को महामारत से बाद का स्वीकार करते हैं, किन्तु यह ठीक नहीं। क्योंकि मार्कण्डेय पुराण उत्तरकाण्ड की क्या का उल्लेख इस प्रकार करता है कि किस प्रकार श्रेष्ठ पुरुष और स्त्री भी दुर्भाग्य के फेर मे पहकर कष्ट उठाते हैं किन्तु अन्तु म आनन्द प्राप्त करते हैं । महाभारत अ५९ में राम को मृत्यु का सक्षिप्त विवरण देता है । किन्तु महाभारत का भवभूति) के नाटकों से कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है । राम क्या कर्म या अंधक विस्तृत रूप से विभिन पुराणों में प्राप्त होती है जिसे ब्रह्मरोग (जिसका एक भाग अध्यात्म रामायरा है मागवढ पुराण -दास रामायण पृ० १११ जर्मन सस्करण '-महाभारत ३/२७३ पुराण, स्कन्द पुराणा, अग्नि पुराण, कर्म पुगण और पद्म पुराण मादि। पद्मपुराण और गम कथानक:-पौराणिक साहित्य में पद्मपुराण गम व पाना की दृष्टि में विशेष महत्वपूर्ण है। इसमें राम कथा तीन विभिन्न स्थानों में विभिन्नना और अपनी अपनी विशिष्टता के माय प्राप्त होती है । यह तीनों विभिन्न रूप मपनी. अपनी सामयिक भेिदता और तर सिद्ध करते है। प्रथम रूप-पद पृयण के सृष्टि खड के तीन प्रध्यायों में (२६९-२७१) भगवान राम की क्या है । यह सक्षिप्त प में है और यह प्रश बाद का भी माना जाता है । यह कथा उपयुक्त राम क्या से मिलती जुलती है । वेदल ५ स्थानों पर मतभेद है- १- राम विवाह के बाद पूरे १२ वर्ष अयोध्या में रहे। २-काक का क्यानक गमायण में उस प्रश में है जो प्रक्षिप्त माना जाता है। यही पर यह प्रमुख स्थान में है और मौलिक ३-पुराण के अनुसार राम १३ वर्ष तक पचवटी में रहे मोर १४३ वर्ष शूर्पणसा को नाक और कान स्वय काटे । ४-पुराण के अनुसार राम राज्याभिषेक के बाद सहन वर्ष पर्यन्त राज्य करते रहे और बाद में सीता का त्याग अपवाद फैलने पर करते हैं 11 ५-पुराण में राम का चरित्र पूर्णरूप से देव रूप में चित्रित है। द्वितीय रूप-पद्मपुराण के पावान खड का ११२वा अध्याय राम कथा का यह रूप देता है, जिसे विद्वान् प्राचीनतम रुप मानते हैं। किन्तु क्या कोई मुन्दर व्यवस्थित रूप न होने से हम इसे परिपत कह सकते हैं, क्योंकि इस क्या दे तथ्यों के कोई प्रमाला उपलब्ध नहीं हैं। क्या भी मनगढ़ है।
तृतीय रूप--पद्मपुराण के पातालखड का एक छोटा मश' रामकथा का प्रत्यक्ष तो नही, किन्तु वाल्मीकीय रामायण के बारे में मोलिक विवरण प्रस्तुत करता है । इसके अनुसार रामायण में ६ काण्ड हैं । १-बाल काण्ड-जो माज के वाल काण्ड और अयोध्या काण्ड का योग है । २-परण्य काण्ड । ३-किष्किन्धा काण्ड ४-सुन्दर काण्ड । ५ -युद्ध काण्ड और ६-उत्तर काण्ड । उत्तर काण्ड को छोड़कर शेष काण्डों का कथानक रामायण के अनुसार ही है, किन्तु उत्तर काण्ड मे अगस्त्यादि ऋषियो से राम के वार्तालाप का, अश्वमेघ का और सीता परित्याग का वर्णन है । पदमपुराण का यह अश मौलिक रामायण मे-सीता का भूमि प्रवेश, लक्ष्मण को मृत्यु, राम व दूसरे भाइयों की जल समाधि, वाल्मीकि और राम पुत्रो का सभी में माना और रामायण गाना-- इन सभी घटनामा को नहीं स्वीकार करता है। हमारे पास रामायण के २४००० पद्य होने के प्रमाण भी हैं जो वाल्मीकि जी क क्थन १/४ बाल काण्ड से बिलकुल मिलता जुलता है । पद्मपुराण सर्गों आदि के बारे में कुछ नही कहता है। वाल्मीकि रामायण के विषय मे लेखक ने विश्वास के साथ सभी बातें लिसी हैं। पद्मपुराण का उत्तर काण्ड सम्बन्धी कथानक-वाल्मीकि रामायण का वाह्य रूप स्पष्टत उसे दुखान्त सिद्ध कर देता है। भवभूति के अनुसार वाल्मीकि रामाय ग अपने प्रथम रूप में राज्याभिषेक के पश्चात् सीता परित्याग के साथ साथ समाप्त हो जाती है । उत्तरचरित के बारे में वे सकेत करते हैं कि इसे वाल्मीकि ने अभिनय के लिए निमित किया और बाद मे जोडा जो सीतापुनमित्तान के माथ समाप्त होता है । भवभूति का उल्लेख सोद्देश्य है। उत्तर ७३ अङ्क मै वे अनुभव करते है कि वाल्मीकि द्वारा बाद मे जोड़ी गया अ श 'दुःखान्त' है जो हिन्दू नाट्यशास्त्र के अनुसार नाटको के -६६५० १६४-१८४ '-उत्तर० ४/२२ -उत्तर ७.१५ ६७ लिए उचित नहीं है । भारतीय सुखान्त नाटक (कामेडी) पसन्द करते हैं । दुचान्त (दै जडी) दृश्य वर्जित है । फलत: भवभूति ने उत्तरराम. चरित को सुबान्त कर दिया है । यद्यपि भरत मुनि ने स्पष्ट कहा है कि नाटक मे सुख और दुप दोनों का प्रदर्शन होता है फिर भी जनरुचि हो नियम होती है। भारतीय संस्कृति प्रानन्दवादी है दुसवादी नहीं। भवभूति ने रामके उत्तरचरित के लिए कथानक का वस्तु मविधान पपपुराण के पाताल खड़े के प्राधार पर दिया है। पातालखड मे राम के राज्याभिषेक कालोत्तर जीवन का विवेचन इस प्रकार है- प्रश्वमेध यज्ञ की योजना होती है-मश्य छोड़ा जाता है और कई स्थानों पर पकहा जाता है पर मयंत्र राम पक्ष को विजय होती है। मन्त मे अश्व वाल्मीकि साथम मे पाता है और लव द्वारा पकडा जाता है। युद्ध होता है। कुश माकर सभी रामपक्षी सेनापतियो की जिनमें हनुमान, सुग्रीव प्रादि हैं, बन्दी बनाते हैं। किन्तु बाद में सीता जो बन्दियो को पहिचान कर प्रश्न के साथ उन्हें छुड़ा देती हैं। प्रश्वमेध यज्ञ पूरा होता है । जव राम उन दोनों बालकों के शौर्यपूर्ण कार्यों को सुनते हैं तो यज्ञ में आये महर्षि वाल्मीकि से उनके विषय मे पूछते हैं।' वस्तुतत्व का यथार्य परिचय पाकर वे सीता को बुलवाते हैं। दोनों बालक भी रामायण गाते हुए, जो उन्होंने वाल्मीकि से सीखी थी, आते हैं। वाल्मीकि से शत्रुघ्न और अन्य लोगो की साक्षियों के साथ राम सीता को पुनः अगीकार करते है । इसके बाद बहुत काल तक सुख भोर समृद्धि के साथ शान्तिपूर्वक सीताराम राज्य करते हैं। पपपुराण में रामाश्वमेष प्रकरण का यह कथानक भवभूति से बाद का है, इसके लिए कोई हक और प्रमाण नहीं। हो सकता है ना. शा. १/७३ । भवभूति के समय राम के उत्तरवरित विषयक सुखान चोर दुखान्त दो प्रकार के कथानक प्रचलित रहे हों। पद्मपुराण और भाभूति के कथानक में अन्तर- १-पद्मपुराण के अनुसार अश्वमेघीय अश्व की रक्षा भरत पुत्र सेनापति पुष्कल कर रहे हैं। जबकि भवभूति के अनुसार लक्ष्मण पुत्र चन्द्रकेतु सेनापति हैं। २-पद्मपुराण के अनुसार बालकों (लव मादि ) को अवस्था १६ वर्ष है, जबकि भवभूति के अनुसार १२ वर्ष की हैं । ३-पदमपुराण के अनुसार युद्ध में हनुमान, सुग्रीवादि सभी अनुचरो को भी परामून दिखाया गया है । जबकि भवभूति इसका पूर्णत: बहिष्कार किय हुए हैं । ४-पुराणानुसार शस्त्र विद्या और युद्ध विद्या स्वय सिखाते हैं, जबकि भवभूति उन्हें पितृ परपरा से स्वय प्राप्त कह देते हैं। ५-पय पुराण में युद्ध क्षेत्र में राम का गमन नहीं दिखाया गया है। यहां सीता वन्दियो और अश्वो को, राम के जानकर मुडा देती है और बाद मे यज्ञस्थल मे राम का बालको से परिचय होता है। भवभूति राम, कौशल्या आदि परिवार के लोगो को युद्ध मे पहुँचाकर सभी को भेंट और पहिचान आपस मे करा देते हैं । ६-सीता अपनी शुद्धता का दुवारा प्रमाण नहीं देती हैं। रामकथा समीक्षा-भवभूति के दो नाटकों के कपानक की आश्रमभूत रामकथा में कितने रुप सम्बन्धी परिवर्तन-मौलिक उद्भावन, सप्रदाय और धर्मानकूल परिष्करण हुए और उसका ऐतिहासिक क्या स्वरूप है एव भवभूति के कथानकों का उससे कहीं सम्बन्ध है । इस पर विचार किया जावेगा। ऐतिहासिक तत्व-रामायण की कथा वास्तविक घटनामों पर मायारित है-इसमे सदेह नहीं है। वाल्मीकि ने केवल दो या एक स्थानो पर ही अपने नायकका पक्षपान किया है जैसे बालि वध को घटना यह कल्पना निरयंक होगी कि रामकथानक बिना किसी मूल के वाल्मीकि के मस्तिष्क की उपज है । डा. वेलवलकर सभावना करते हैं कि हो सकता है वाल्मीकि ने दो घटनाओं- १-राज्य परिवार के मगहे और वनवाम, २-दक्षिण भारत का आर्शीकरण । यह कोई मास्थान ना होगा जिममें किसी बोर क --जिसने दक्षिण भारत मे घार्य सभ्यता फैलाई होगी वर्णन रहा होगा. की कहानियो को एक ही नेता से सम्बन्धित कर एक महाकाव्य का कथावस्तु तैयार कर लिया। वाल्मीकि उत्तरी भारत के हैं मनः उनके अन्य मे दक्षिणी भारत सम्बन्धी भौगोनिक तथ्य सही होगे ऐसी आशा व्यर्थ है। कुछ लोग इमो वात का लेकर रामायण को कोरी कल्पना को उपज कह देते हैं। वे राम को मोघो राह की खोज में हैं। पचवटी, पपा और ऋष्यमूक की स्थिति आज भी विचारणीय है। वाल्मीकि का भूगोल सलभा हुआ है । किन्तु इन्हीं कारणो को लेकर रामायण के मौलिक तत्वों और कय न के ऐतिहासिक सत्यों को कल्पना कह देना कोरी देना विचारमून्यता ही होगी। रामायण में इतिहास और कल्पना का योग-रामायण इतिहास और प्राचीन प्राभिक प्राकृतिक मूतं कपामों (एलेगरी) का मम्मिश्रण है जैसे ऋग्वेद में सोता शब्द का पर्थ है -1 एक व्यक्ति वाचक संज्ञा नहीं है । सीता का जन्म पृथ्वो मे कहा गया है और उनके पुत्रों के नाम कुश-एक घास और लव-काटना है । सोना का पुनः पृथ्वी में पनर्धान होना, यह मद उपयुक्त वर्णन किसी कृषि देवता सम्बन्धी आख्यान (एनेगरी) ज्ञात होता है। यदि राम को वैदिक इन्द्र मान लें जो कि वर्षा का देव है, तो यह बातें बहुत सुन्दर ढंग से मेल खा जाती हैं। जैसे रावण का पुत्र इन्द्रजीत है मौर सोता 'इन्ट्रोडक्शन उत्तर रामचरित (हार्वर्ड सौरोज) कुड (फरो) की का श है और अवरोध का कारण भी है, मारुति जो मानसून वर्षा के वादलो की भाति है समुद्र के ऊपर उहता है और राम को सीता दा समाचार-आनन्द - पहुंचाने वाला है । मापति का अर्थ है, वायु- दव का पुत्र । य तथ्य इतिहास और वृपि आख्यान दानो के प्रतीक रखती हैं। प्रारूयान की ऐसी परपाय वैदिक युग में बहुत सी प्रचलित थी, किन्तु वाल्मीकि युग के प्रवेश काल म ऐमी परपराए पन्त समय को प्राप्त हो चुकी थी। उपयुक्त विवेचन से निष्कप निकलता है कि रामायण की कथा के तीन मोत है- १-ऐतिहासिक सत्य-जो राज्य परिवार के झगडे और पनवास ना सीमित है। २-इम कथा में वे ऐतिहासिक तथ्य हैं, जो अत्यन्त उलझे हैं पौर किमी ऐमे वीर से सम्बन्धित है जिसन दक्षिण का प्रार्थीकरण दिया है। ३- आस्यान (एलेगरी) सबन्धी सकेन जो इन्द्र मोर उसके शत्र. जो कृषि के शत्रु हैं-वत्र पादि) इनमे सबन्धित है । यद्यपि इन तत्वो ने अब अपनी विशिष्टना खो दी है मौर ऐतिहासिक रूप मे-ऐतिहासिक नेता के वर्णन के रूप मे स्वीकृत हो चुके हैं। क्या होमर क इलियड और मोडेसी भादि का वाल्मीकि के कथा- नक के अपर ऋण है। इसका विवेचन और मालोचन यहाँ हम नहीं करेंगे क्योकि डा0 वेवर के तकों का खण्डन केन्टी लगा और प्रो. जोवी' ने पूर्णत. कर दिया है । महाकाव्यों के उपरान्त रामकथा के विविध रूप- वोट रूप-रामकथानक का एक रूप 'दशरथ जातक' में प्राप्त होता है, जिसे माधुनिक विद्वान बौद्ध रूप से अभिहित रते है । -ऋग्वेद ४/५ १/४० -दण्डियन एण्टेक्वेरी १८७५, पृ०१४३ -दास रामायए पृ०९४ पाना इस प्रकार है काशी का राजा दशरथ या जिसके वीन सन्ताने थी, राम, लक्ष्मण और सोता। ये सभी उम्की प्रथम रानी से उत्पन्न हुए थे जिसको मृत्यु के पश्चात् उमने दूसरा विवाह कर लिया। इस नई रानी से उसके एक पुत्र पैदा हुमा, जिसका नाम भरत था। इस एक नये पुत्र को वृद्धावस्था में प्राप्ति से राजा अत्यधिक प्रसन्न हुए मौर अपनी इच्छा से नई सीको एक मुह मागावा देने को कहा। रानी ने इस पारितोषिक को समय आने पर लेने के लिए छोड रक्खा | सात या आठ वर्ष बाद रानी ने अपने वरदान का स्मरण कर राजा से अपने पुत्र भरत के लिए पर रूप में राजगद्दी मागी। राजा ने इस प्रकार का वर देना मस्तीकार कर दिया । किन्तु नारी जाति को द्वेष-बुद्धि से भयभीत होकर राजा ने अपनी प्रथम रानी की तीनों सन्तानो को १२ वर्ष बाहर रहने के लिए घर से हटा दिया। उसने १२ वर्ष के लिए ही इसलिए उन्हे बाहर कर दिया कि ज्योतिषियों की मविष्यवाणी के अनुसार उसे केवल १२ वर्ष और जीवित रहना है । राम भाई लक्ष्मण बोर बहिन सीता के साप हिमालय की भोर चले जाते हैं। जोतिपियो के कयन के विपरीत राजा दशरय नवें वर्ष ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। विधवा रानी भरत के लिए राज्य प्राप्ति के प्रयत्न करती है किन्तु भरत पूर्णतः अस्वीकार कर देते हैं और मपने बड़े भाई की खोज में चल देते हैं । राम से मिलने पर मरत उन्हें लौट चलने के लिए कहते हैं किन्तु राम उस समय लौटने से अस्वीकार कर देते हैं क्योंकि राजा की आज्ञानुसार भभी १२ वर्ष पूरे नहीं हुए थे । तीन वर्ष बाद वे काशी पाते हैं और सीता के साय विवाह करके शान्ति से शासन करते हैं। घौट सेखक ने राम फया का विकृत रूप दिया है। क्योंकि भारत में किसी भी युग में सगे भाई बहिन का विवाह प्रचलित न या। कुछ दिनों तक बाल्मीकि रामायण का पाघार दशरथ जातक को कुछ लोग मानते रहे थे। किन्तु प्रो० कोवी ने इस विचार को अनर्गल प्रलाप सिद्ध कर दिया है। आज विश्व के सामने ३०० बी०सी० से बहुत पहिले राम कपा को प्राचीनता प्रक्ट है।' जैन रूप-रामकथा का जैन म रविषेण के पद्मपुराण, अमितगान को धर्मपरीक्षा थोर हेमचन्द्र के विषष्ठिशलाका पुरुष- चरित म प्राप्त होता है । इन जैन ग्रयों को रामकथा प्रधानतया चाल्मीकि रामायग का हो अनुसरण करती है। रामक्या का प्रयोग जैनियो ने अपने धर्म की शिक्षाओं के प्रचार के लिए किया है । राम एक जैन माप हैं, जो मासादि का सेवन नही करते हैं । पलत: नियों ने पंचनमृग और मारीचि वाला कथानक हटा दिया है। रावण सीता का उस समय हर ले जाता है जब राम और लक्ष्मण जनस्थान के १४ सहस्त्र राक्षसों के साथ युद्ध मे सलग्न है। राम बाती का वघ प्रत्यक्ष युद्ध में करते हैं । सीता परित्याग के वर्षों पश्चात जब राम पुनः सीता से मिलते हैं तो अश्वमेघ यज्ञ के कारण नहीं, ( जैनी पशुहिंसा करते नहीं मतः यज्ञ का उल्लेख नहीं है ) महपि वाल्मीकि के कारण नहीं, प्रत्युत जनता के कहने से क्योंकि जनता वास्तविक तथ्य जानती है और किन्ही व्यक्ति विशेषो के कहने से यह त्याग अनुचित सममती है। राम सीता को पुनः सो देते हैं। इसलिए नहीं कि सीता पृथ्वी में समा जाती है, किन्तु जब सीता पवित्रताको पुनः परीक्षा ली जाती है तो वे संसार को कटुता को समझ पौर देखकर विरक्त हो जाती हैं और जैनमिक्षरणी वन जाती हैं । वे अपने सुन्दर और सबै केशों को अपने हाथों से काट डालती है । यह घटना देखकर राम स्वयं जैन मिावत ले लेते हैं । जैन ग्रन्थों के अनुसार रामायण के बन्दर, रीछ और रासस दास रामायण १.८४.९३ '-मास के दो नाटक रामाया से सर्वाधित हैं।
वस्तुतः बन्दररोछ और राक्षस नहीं है । रिन्तु वे मानव नहीं है। वे लोग अपनी पताकामो में ब.दर, रोछ पौर राधमो की पाकृतिया रखते थे जिसके कारण उन्हे इन नामो से पुकारा जाताया। रामकथा का सुधरा हिन्दू रूप-रामकमा क प्राप्त विविध हिन्दू रूपो के विषय में तो एक विस्तृत प्रप लिखा जा सकता है। सस्कन और विभिन्न प्रान्तीय भाषामा म इस विषय का साहित्य पूर्ण समृद्ध है। इस साहित्य के अध्ययन से, विभिन्न विचारो. विश्वासो और निर्णयों के कारण समय २ पर समक्या को कैसे २ रूप मिले इसका ज्ञान हो सकता है भोर माज उसे क्या प्राप्त है इसका ऐतिहासिक विवेचन किया जा सकता है। कुछ तत्वो के विषय मे हम यहां विवेचन करेगें जो हमारे विषय से भागे सबन्ध रखेगें। १-पतिशयोक्तियां-बाद की रामकयामों में अति प्रशसाए हैं। जिन्हें हम स्वभावत. सस्कारो के कारण स्वीकार कर लेते हैं। जैसे लका युद्ध दिनो से बढकर महीनो का गित किया गया । रामायण में (विविध सस्करणो मे दिन सस्या विभिन्न है ) यह युद्ध दिनो मे ही वणिन है । समय को दोर्यता श मन्तर प्रलौकिक क्रियारलापो से जो दोनों पक्ष दिखाते हैं भर गया । घटनापो और वर्णनो की पुनरावृत्तियों की गई। पानों के चरित्रों में उनके प्रतिकार्यों से मलोकिता भर गई । राम का प्रपतारी रूप-राम को विष्णु के अवतार के रूप मे पूर्णत चित्रित करना यह एक महान् वास यो। यद्यपि रामायण के बाल मोर उत्तर काण्ड से ही इस प्रथा का श्रीगणेश हो चुका था विन्तु मागे चल कर यह सीमा पार कर गई। रावण भी राम का महान् भक्त बननाया जाने लगा । उसकी शत्रुता मक्ति के रूप में ७४ चिक्ति को जाने लगी। रावण मुक्ति के लिए भगवान् राम से तत्रता करता था जिससे उनका सतत ध्यान रहे। सीताहरण उसको पापेच्छा से नही प्रत्युन उपयुक्त ध्येय से हुमा पा । रावण सीता को मानबुद्धि से देखता था, उन्हे जगज्जननी मानता था। ऐसी भावनाएं प्रदशित की श्राशरूपता-कैकेयो के चरित को उज्ज्वल करने के लिए बहुत दिनो से प्रपाल हो रहे थे। इसके लिए मन्धरा को चुना गया जो राम को बनवास दिलाने के लिए देवो को भोर से नियुक्त चित्रित की गई, क्योंकि रावण बघ देवो को मत्यन्त आपेक्षित था। मन्परा को कलि की आत्मा चित्रित किया गया जिसने कैकेयी की मारमा पर अधिकार कर लिमा पा । यह मानो इच्छानुकूल कैकेयो से कहलाती भोर कराती हैं। इस प्रकार से कैकेयो कृपा का पात्र बनाई गई । सीता के सकावास की पवित्रता का प्रमाण स्पष्ट करने के लिए ही उत्तरकाण्ड का कथानक रघा गया और सीता भूमि प्रवेश का करुणात्मक प्रसग सामने माया । मध्यात्म रामायण के मनुसार तो रावण ने वास्तविक पीता का हरण न कर धाया की सीता का हरण किया या राम ने सर्वज्ञाता होने के कारण काचन मृग के आगमन के समय ही सोना जो से मदम्य रूप में स्थित होने के लिए कहा और माया को सीता वहाँ उपस्थित हुई जिते रावण हर ले गग मोर मग्नि परोझा के समय माया नष्ट हो गई और वास्तविक सीता उपस्थित हो गई, जो रावण के स्पर्शादि से रहित थी। राम ने माया को सीता का हरण राक्षसो के बघ का अवसर प्राप्त करने के लिए करवा दिया था। इस प्रकार पूर्ण रूप से राम और सीता के मादशं परित्र की रक्षा की गई। पूर्व कारणता-सभी कार्यो, चरित्रो और घटनामो के कार्य रूप में चित्रित किया गया। राम और रावण आदि के जन्म भी पूर्व कारण जन्य हैं । दशरथ का पुत्र वियोग मे मरना, श्रवण कुमार के वियोग मे मृत उसके पिता की मृत्यु के कारण होने के कारण चित्रित किया गया। ।
प्रत्येक रासस राम द्वारा मारे जाने पर देवता हो जाता है वोंकि किसी कारएक्श बह देव से राक्षप हुमा था । राम क्या के पात्र पूर्व जन्म के कारणों से सम्बन्धित हैं। दार्शनिकता-लेखों का ध्यान कपानक को दानिक सिद्धान्तों के साथ उपस्थित करने की मोर गया। योगवाशिष्ठ पौर मध्यात्म रामायण (रामगोता) इसके निदर्शन है । वेदान्न दर्शन की महत्ता राम कपा में भी प्रविष्ट हुई। नूतन उद्भावनाए और कवित्वमयता-इस युग में सीता स्वयंवर मोरगद का दौत्यकर्म वहन ही विस्तार के साथ साहित्यिक वर्णनों के रूप में भाने लगे। पद्यपि दोष घटनायें जैसो को तैमी ही रहीं। सहस्त्रों लेखको ने रामकथा पर लेखनी चलाई है। जिनकी कृतियों सारेमारत में पड़ी जाती है। रामपा का पठन पोर यवरण सभी व्यक्ति यथायोग्य करते है। रामकथा भारत को सस्कृति और हिन्दुसम्यता का प्राण बन गई है । यह समाज को मर्यादाओं को दद करती है और भारतीय जनता में अपने आदर्श पात्रों के माध्यम से स्याग, प्रेम और सौजन्य के भाव भरती है । सत्य की विजय मोर मन्याय के विनाश का मौलिक सत्य प्रस्फुटिन करती है। भवभूति के नाटकों मे रामकथा का कितना और किस रूप में ऋण है-वाल्मीकि रामायण, पपपुराण मादि के रास कपानक का कहाँ तक उपयोग हुआ है-यह हम पृथक २ नाटकों क वस्तु विवेचन क समय मे विवेचित करेंगे। भास, कालिदास और वृहत्कथा भवभूति को वस्तु के स्रोत-- भवभूति ने उत्तर के प्रथम मक को कल्पना भास के स्वप्नवासवदत्तम् के ५ प्रक के स्वप्न में चित्र दर्शन दृश्य से, भपा रघुवर के १४/२५ के इस श्लोक से "तयोर्यया प्रापितमिन्द्रियान्"ि से लिया है ऐसा अनुमान होता हैं । उत्तर के ६ मई में राम, कुश मादि का के ७मक के दुप्पन्त, भरत बादि के मिलन के समान मिलन शाकुन्तल है । सीता का छायारूप शाकुन्तल के सानुमती के छायारूप की भांति है। मालतीमाधव के ९ क और विक्रमोर्वशीय के ४ अंक मे पर्याप्त साम्य है । विरहीमाधव का मेघदूत कालिदास के मेघदूत से पूर्ण अनुकृत है। मालतोमाधव को केन्द्रकया गुणादय को वृहत्कथा को ऋणी हैं, जितमा मारण क्षेमेन्द्र को मजरी है। सोमदेव के कयासरित्सागर से भी इस बात की पुष्टि होती है। यथास्थान हम इसका विस्तार के साथ विवेचन करेंगे । महाबीर चरित तो रामायण को कया का कुछ मन्तर के साथ ऋणी है। ७७ पञ्चम अध्याय भवभूति के नाटकों का शास्त्रीय विवेचन- महावीर चरित-कथासार-/ प्रपम अङ्क महपि विश्वामित्र के माश्रम में यज्ञ होन वाला है। उन्होंने यज्ञ को रक्षा हेतु राम लक्ष्मण को लाकर रख लिया है । कुशध्वज भी निमन्त्रण मे सौता तथा उर्मिला के साप यहाँ पधारते हैं । कुशल प्रश्न के उपरात बमध्वज राम लक्ष्मण का परिचय प्राप्त करके हार्दिक प्रसपना प्रकट करते हैं । इसी गौच राम अहिल्योसार करते हैं । कुशध्वज को राम को महिमा देख कर पछतावा होता है कि यदि धन भङ्गको प्रतिज्ञा न लगाई गई होती तो सीता का विवाह राम के साथ होकर ही रहता । इसो समय रावण ने मौता को मगनी के लिए दून भैगा । उसके प्रस्ताव पर टालमटोल होने लगा । घर राम ने ताडका को तलवार से समान किया । राक्षम को इससे बडा खेद हुमा । उसने पुन प्रस्ताव किया। राजा तथा विश्वामित्र ने फिर टाल दिया । विश्वामित्र ने राम लक्ष्मण को दिव्यास्त्र दिए । राजा को उत्कण्ठा बडो देख कर विश्वामित्र ने हर चाप मगवाया और राम से उसको भग करवाया । इस प्रकार चारो भाइयो के विवाह जनक तथा कुशध्वज को पुत्रियों से स्थिर हुए। राम ने मुबाहु तथा भारीच का भी बघ किया ।। ७९ 7 द्वित्तीय अंक मिपिला से लौटकर राक्षस ने सारा वृत्तान्त लकाधिप के मन्त्री से कहा, उसकी चिम बढ़ गई । उमने मूर्पणखा से राय ली, इसी समय परशराम का पत्र मिला कि दण्डकवासी निशाचर वहाँ के ऋषियो को सताते हैं उन्हें रोकिये । इसी प्रसग में निश्चय हुप्रा कि परशुराम को उकसाया जाय कि यह हरचाप भजक राम का दमन करें। इधर राम कन्यात पुर में थे, दशरय प्रादि उनके अभिभावक मिथिलाधीश के यहाँ पातिथ्य सत्कार प्राप्त कर रहे थे । इमो समय परशुराम पाए, और अपने गुरु के चाप के भजन करने वाले राम को देखने की इच्छा प्रकट राम पाए, परशुराम को राम के दर्शन से बड़ी प्रीति हुई, परन्तु वह अपनी प्रतिमा से असमर्थ थे, क्षत्रिय कुल नाश की प्रतिज्ञा को दुह- राते हुये परशुराम ने राम को भी बध्यकोटि मे गिना । इस ममगल वृत्त से अनक, सतानन्द राबको कष्ट हुमा, सबने अपने अपने ढग से परशराम को समझाया, फिर भी उनका क्रोध कम नहीं हुमा। जनक प्रस्त्ररहण करने पर तथा शतानन्द शाप देने पर भी उतारू हो गये, फिर भी परशुराम दृढ रहे । इसी बीच राम को अन्त.पुर में बुला लिया गया और पाप बन दसरय विश्वामित्र के पास गए । तृतीय अंक परशुराम के कोष को शान्त करने के लिए विश्वामित्र तया. वशिष्ठ ने भी बहुत समझाया । उनकी विद्या, तपस्या, कुल परम्परा को मत्यन्त प्रशसा की। परशुराम ने स्वीकार किया कि हमारे लिए आपके उपदेश मान्य है, माप हमारे घेष्ठ हैं, शिमा में इस क्षत्रिय का कोप उग्र होते देख दशश्यक बाद में शान्ती जागा परशुराम उप हमा, उन्होंने भी मस्त्र का अवलम्वन करना चाहा। इसी धन्य समझाये और उन्होंने परशुराम के दमन को प्रतिज्ञा सुनाई फालय चतुयं अंक पराजित परशुराम तप करने चले गए उन्हें शान हो गया । परसुराम को पराजय से राक्षसराज के मंत्री माल्यवान् को बड़ी,चिन्ना हुई, उसने उपाय सोचना प्रारम्भ किया, जिससे गम दवाया जा सके । राम के अभ्युदय से उसे भय होता था । परामर्शानुसार शूर्पणखा को मन्थरा का रूप धारण करके मिथिला भेजा गया, वह कैकेयो को दासो मन्धरा के रूप में मिथिला आई, और कैकेयो से राजा के द्वारा दिए गये वरदान की बात चलाने लगी। एक दर से भरम को राजा या दूसरे वर से राम को मौदह वर्षों के लिए वनवास दिलवाया। सीता तथा लक्ष्मण के साथ राम बन गए. साथ होन वाले पुरजनों को भाग्रहपूर्वक लोटा दिया। भरत को बहुत प्राग्रह पूर्वक लौटा दिया । भरत के बहुत भाग्रह करने पर राम ने अपनी स्वर्णमय पादुका उन्हे दे दी, जिसे मन्दिग्राम में अभिषिक्त करके भरत ने राज्य वायं का सबालन प्रारम्भ किया। राम दण्डक की ओर बढे। पश्चम अंक रावण ने मीता का हरण किया। उसकी खोज मे राम लक्ष्मण वन-वन भटकते थे, उसी प्रसग मे जटायु से भेंट हुई, जिसे सीतापहर्ता रावण ने मृत्युप्रतीक्ष बनाकर छोडा पा । जटायु से सारी स्थिति का शान प्राप्त करके राम लक्ष्मण किष्किन्धा की ओर बढ़े, मार्ग में विराध का वध किया। सुग्रीव मे मंत्री हुई। रावण प्रेरित वाली का बघ करके राम ने सीता की खोज में वानरों को भेजा। मरने के समय बाली ने भी राम और सुग्रीव को मंत्रो में दृढता का बन्धन डाला। षष्ठ अंक - वाली के मरने पर माल्यवान् को बहो चिन्ता हुई , उसे अपने पक्ष का दुर्बलत्व प्रकट प्रतीत होने लगा। उसने प्रयत्न किये कि रावण कुछ उपयुक्त उपाय काम में लावे किन्तु रावण ने इस पर कोई चिन्ता .
नहीं की। राम ने लका पर चढ़ाई को। राम रावण सैन्य में घोर युद्ध हमा, एक एक कर वीरगण बटने भरने लगे। घमासान युद्धोपरान्त मेघनाद सभी युद्ध में मेघनाद प्रयुक्त शक्ति से माहत लक्ष्मण भूचित होकर गिर पड़े। राम पक्ष में विपाद को घटा छा गई, सबको सम्मति मे हनुमान मञ्जीवनी माने गये, उस विशेप जही के नहीं पहचाने जान पर वे पर्वत हो उठा लाये । पर्वतवर्ती भोपयो को हवा के लगने में लक्ष्मण को चैतन्य हो भाया । राम पक्ष में खुशियां मनाई जाने लगी। तदनन्तर युद्ध मे मेघनादाराव सभी मारे गए, सीता का उद्धार हुमा। सप्तम अङ्क रावण को मत्यु के पश्चात् राम ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार विभीषण को लहर का अधिपति बनाया । विभीषण ने राज्याधिकार के मिलते ही देव वन्द्रियों को मुक्त कर दिया। तथा काण्ड समाप्त करके अग्निशुद्ध सौता को साथ ले, राम लड़ा से भयोध्या को चले । विमान पर. मे सीता को रोम ने मार्गवर्ती समुद्र पौर अन्यान्य स्थानों के परिचय दिए । मार्ग में विश्वामित्र का आश्रम मिला परन्तु उनका मादेश हुमा कि शोघ्र प्रयोध्या जाय, मार्ग मे रुके नहीं। अयोध्या व भरत पादि बन्धुओं से मिलने के बाद वसिष्ठ मादि पूज्य ऋपियो नागम का राज्याभिषेक किया। इस प्रकार राम का धीरचरित पूर्ण हुमा । मान नाम, वस्तु और पात्र समीक्षा महावीरचरित को घोरपरित भी कहते हैं । इस नाटक के नाम के विषय में बड़ा बाकपंक विचार यह है कि सारे नाटक मे राम के लिए कही भी महावीर नाम से अभिहित नहीं किया गया है। जब कि राम के सभी प्रमुख शत्रुगए, कवि और पात्रो द्वारा, स्वय राम द्वारा भौ-महावीर कहे गये हैं। रामी, खरदूषण, त्रिशिरा, रावण मौर परशुराम आदि सभी महावीर पदमाज है। राम के लिए कही भी महावीर शब्द नहीं प्रयुक्त हुआ है। प्रतः नाटक का नाम चिस्य न होते हुए भी विचारणीय है। राम की कथा जो प्राचीन वैभव मोर मनोरम विशद भविष्य को आमा लिए थी, कवि को आकृष्ट करने मे पूण सफल हुई। महावीर चरित के १/७ से यह स्नेह प्रथम बार ही स्पष्ट हो उठा है । इस नाटक में लेखक ने रामपा के पूर्वार्ध को नाटकीयता प्रदान की है । नाटक का कथानक राम विवाह के बहुत पहिले मे लेकर वनवास, सीता हरण तथा सीता की पुनः प्राप्ति और पयोध्या प्रागमन एव राज्याभिषेक के बाद जाकर समाप्त होता है । भवभूति ने बही कुशलता से कई वर्षों के लबे समय में फैली हुई विविध घटनामो और कार्यों को एक सूत्र में निवद्ध कर विविध प्रऔर बहुसख्यक पात्रों के साथ नाटकीय रूप में उपस्थित किया है । कवि के सामने यह एक बड़ी समस्या थी। एकता का कोई सूत्र न था। केवल वे सभी राम से सम्बपिन्त ये यहाँ एक एकता का मूल था। यदपि कवि की यह कृति कलापूर्ण और सफल नहीं कही जा सकती फिर भी कवि का यह प्रपम प्रयास स्तुत्य है। कवि ने इस नाटक में बहुत से पात्र-परशुराम, मन्धरा, शूर्पणसा, सर 'मरीच' जटायु, सुग्रीव, हनुमान, बाली, कैकेयी, माल्यवान्, विभीषण, कुभकार्ग, रावण, विश्वामित्र आदि न जाने कितने परिव उपस्थित किए है । जो पाते और तुरन्त जाते है। परिणाम स्वरूप नाटक में कथानक की एकता का मौन्दर्य नहीं है। नाटक एक भीड के रूप में है। किन्तु महाकाव्य की रामकथा को नाटकीय रूप में प्रस्तुत करने की दिशा में यह प्रथम चरण अपना महत्व रखता है। जिसमें एक या ऐतिहासिक म के साथ छोटी छोटी कई घटनामों में विभक्त कर दी गई है। ८२ रामायण व माय २ भास के बालचरित, प्रतिमा नाटक पौर प्रभिषक नाटक का भी महाबीरचरित के क्यानक के ऊपर प्रभाव है। रामायण और महावीर चरित के कथानक मे अन्तर-हम यहां पर यह विचार करगति भवभूति कैसे क्थान में एकता लाने और नारकीय आवश्यक तत्वा का संग्रह करने के लिए रामायण के क्यान : म घर उघर हु है । माटा र राम एक धादर्श नृपति हैं पोर भवभूति ने अपन नायक के मादश चरित्र की प्रत्येक प्रकार स रमा की है। उनका शत्रु रावण राक्षसा का राजा है जो दुष्ट और मायावी है। फिर उनका प्राचरण मानवीय भौर स्वाभाविक है। पोमणि अलौकिकता से रहित है । राम के विरुद्ध कार्यो का सचालन रावण की भोर स होता है। राम का चरित्र नितात उदात्त है। जनम सीता स्वयवर सपोजित करन पर रावण भी यपने को एक उम्म" यार के रूप म अप्रत्यक्ष रीति से उपस्थित करता है । वह स्वय उपस्थित न हाकर दूत के द्वारा जनक से साता की याचना करता है। उम अपन प्रमाव का गव है। जिसका कारण स्वयवर के नियमों का उल्लघन करता है। उसकी माग अस्वीकार कर दी जाती है और इमके मामने ही सीता राम का वरण करती है। यह रावण को शक्ति और वारता का अपमान था। वह अत्यत क्रोधित हो उठता है। उमा प्राधम और अधिक माढ़ पा जाती है जब वह यह भी जान पाता है कि राम ने ताडका, सुबाहु प्रादि राक्षसों का सहार कर डाला है। माल्यवान जो रावण का विश्वासपात्र मत्री और सलाह कार या उसे सागवना देने का प्रयत्न परता है तथा रावण की इच्यात्री की पूर्ति फूटनीति के माध्यम से सरलता और सहजता से कराना चाहता है। नाटककार ने माल्यवान को विशेष महत्ता प्रदान की है। वह महान सफल कूटनीतिज्ञ और प्रभावशाली व्यक्ति है जिसके 1 म.प.प्रथम यक आश्रय पर रावण को पूर्ण विश्वास है। माल्यवान परशुराम से जाकर मिलता है और राम के विरुद्ध उत्तेजित करता है। वह सफल होता है और परशुराम राम के विरुद्ध जनक्युर जा पहचते हैं किन्तु आमा के विपरीत यही पराजित होते हैं। माल्यवान की योजना को एक धक्का लगता है। फिर भी वोट और मयाना सचिव हताश नही होता है रावण की वहिन शूर्पणखा को अयोध्या भेजता है कि वह जाकर मन्यरा के रूप में कोयो को दासी बनकर रहे मोर राम के जनकपुर से लौटन के पूर्व ही जाकर उनस कहे कि उनकी सोतसी मा ने उन्हें १४ वर्ष के लिए वनवास दे दिया है। इस प्रकार माल्यवान राम और सीता को वन मे असहाय भटक्न के लिए छोड़ना चाहता है जिससे सर, दूपण के द्वारा सेना के बल स राम को पराजित कर सीता छीन लेना कोई कठिन कार्य नहीं रह जाता । यह योजना पुछ दूर तक सफल हुई। राम ने कर्तव्य रे दृष्टिकोण से नन जाना स्वीकार कर लिया। सीता तथा लक्ष्मण ने उनका अनुगमन किया। भवभूति ने रामक्षा मे यह नई उद्भावनाए करके तन कायाँ का सपादन कर लिया है। १-कैकेयी चरित्र को क्लुपित हाने से बचा लिया। २-शूर्पणखा को पहिले से ही राम विराध मे सलग्न रखकर कवि ने पचवटी के कथानक के लिए पृष्ठभूमि तयार कर ली जिससे राम को घोखा और सकोच न्याय की दृष्टि से न हो सके । ३-राम के चरित्र को ऊँचा उठाने के कई सुमवसर हाय मागए। लेखक नै सीता हरण प्रवेशक मे करा दिया है जबकि राम १४००० राक्षसों के साथ युद्ध में व्यस्त थे। माल्यवान अपनी जनस्थानीय सेना के द्वारा राम को पराजित करने में असफल होता है तो वानरराज वाली को अपनी मोर मिलाता है और उसके द्वारा राम -म० च० यक द्वितीय प्रदेशक 1-4.०५क -मक४ ८४ का वध करना चाहता है । गम भौर वालि का खुले स्थान में युद्ध होता है जिनमें वालो मारा जाता है । बाली ने मरते समय सुग्रीव पोर प्रगद को राम ने सरक्षण में दे दिया। इससे दिने दो बातो का सुधार कर लिया है- १-राम का सुग्रीव के साथ समझोता कर वालि का अन्याय से बध २-वालि और सुग्रीव का अनुपयुक्त युद्ध का दृश्य । यहाँ नाटर के कथानक को वरम मीमा (क्लाइमैक्म दिखाई देती है । माल्यवान एक के बाद दूसरा इस तरह से कई उपाय प्रयोग म लाता है किन्तु उसका उद्देश्य सिद्ध नहीं होता है । क्योकि अप्रत्याशित परिणाम निकल आते हैं । कूटनीतिक प्रयत्न असफल होने पर सीधे शक्ति में राम को विनष्ट के लिए उपारभ किये जाते हैं किन्तु माल्यवान असफल हाता है और रावण मारा जाता है। विमीपण लका के राजा होते हैं और राम पुन सीता को प्राप्त कर अयोध्या को लौटते हैं, जहां उनका राज्याभिषेक होता है । संविधान की दृष्टि से वस्तु समीक्षा-मयभूति द्वारा कृत कथा वस्तु सम्बन्धी परिवर्तनो पर जब हम विचार करते हैं तो यह बात पूर्णतः हमारे सामने उपस्थित रहती है, कि भवभूति ने अपने कमासोती के साथ मवैव स्वतत्रतापूर्ण व्यवहार किया है। उन्होंने परिवर्तन की अधिकता रखकर कथा को मौलिकता और नाटकीयता प्रदान की है जिसमें सुन्दरता और उपयुक्तता में वाद हुई है । जैसे बालि के बयानक को,एक नया रूप देकर उन्होंने अपने नायक को धीरोदात्तता की रक्षा को हैं । वालि का विसा वध धीरोदात्तनायक के प्रतिकूल कार्य होता । वह कुछ कहना चाहते थे, उसके विषय में उनके मस्तिष्क में स्पष्ट पारणा थी यही बात उनके परिवर्तन पौर परित्याग के बारे में भी वही जा सकती है । महाकाव्य की वर्णनात्मक क्या को ज्यो का त्यों 1-म०प०५यक -म..६ प्रक -म००७मक यह नाटक मे नही रखना चाहते थे। उन्होंने अपने नायक के विभिन्न कार्यों, मापत्तियो और सफलताओ में एक प्रम देकर एक पुष्ट परित्र का चित्रण किया है । वे ऐसी घटनायें चुनते हैं जहाँ स्वतत्रता के साथ उन्हें अवसर प्राप्त पा । राम का चरित्र, कर्तव्य के साक्षात भूतरूप, सहिष्ण ता, सत्यता, शोयं मोर चतुरता के भागार के रूप में चित्रित किया गया है। उधर परशुराम जिनमेशौर्य भयानक क्रोध के साए था। वालि जिसमे युद्ध वीरता के साप २ दूरदर्शिता विवेक मोर मात्म- विश्वास की कमी यो जिसके कारण ये दोनों विनष्ट हुए । रावए शारीरिक और मस्तिष्क को विशेष योग्यतामों से सबल या किन्तु सीता के प्रति अनुचित वासना उसके विनाश का कारण बनी। यह पूर्णत. स्पष्ट है कि सारा नाटक विरोधी भावनामों और विचारों का सघर्ष है। महाबीर चरित के गुण-भवभूति यह प्रथम रचना है। प्रथम प्रयास में कला निखरती नहीं है । नाटक कथानक को एकता की दृष्टि से कार्य के प्रपल को मोर निर्देश करता है। कपिलना उसके सुन्दर चरित्र चित्रण मे है । कवि का सारा प्रयत्न राम के भादर्श मौर सर्वा गपूर्ण चरित्र के निर्माण में लगा है। युद्ध बोरता तो उनका महान् गुण है । वे अपने शत्रुओं के प्रति भी हानि करने का विचार नहीं रखते हैं । शत्रुमों को वीरता का कथन वे उदाहरण के साथ करते हैं। वे सहृदयता के साथ उनकी मौर अपने व्यवहार पर विचार करते हैं।' उन्हें अपनी बीरता पर पूरा विश्वास है । वे युद्ध के नियमों के प्रतिकन अपने शत्रमों से कोई लाभ प्राप्त नहीं करना चाहते हैं । शिष्य को दृष्टि से, पुत्र को दृष्टि से पौर नृपति को दृष्टि म.च. ११३१-३२ 3 म० १०४।२१.१५६ म. च०६४६, ५।५०, म०५०२।३५-३६ म.१०२३३, .
- । से उनका कर्तव्य पालन साध्य है । विरोधी चरित्रो के बारे में हम पहिले विवेचन कर हो चुके हैं यद्यपि भवभूति राम के दिव्य मोर अलौकिक रूप से पूर्ण परिचित है फिर भी उन्होने एकार्य स्थलों का छोडकर सर्वत्र राम को एक मानव के हा पूर्णन. निवित किया । क्योकि अगौकिक चरित्र लौकिक जीबो को विशेष रूप से आकृष्ट करने, शिक्षा देने और हृदयगम होन में विशेष सफल नही हो सकता है । इस नाटक के कुछ पद्य जो तृतीय और चतुप अफ के हैं, उच्च कोटि के हैं। कतिपय प्राध्यात्मक सवाद भी महत्त्वशाली हैं । वीर रस का परिपाक सुन्दर हुमा है। शिव जी क धनुष के खण्डित हो जान पर लक्ष्मण की दोक्ति- "दोर्दण्डाञ्चित चन्द्रशेखरधनुर्दण्डावमङ्गोग्रवम्--' जिसमे दर्प शब्दावली से ही टपका पडता है । जामदग्न्य राम को देख कर कहते हैं- त्रातु लोकानिव परिणत कायवानमनवेद तात्रो धर्मः श्रित इवतनु ब्रह्मकोशत्यगुप्त्यै । सामर्थ्यानामिव समुदयः सञ्चयो वा गुणानाम् प्रादुर्भूय स्थित इव जगत्पुण्यनिर्माण राशिः ॥ महावीर चरित २०४१ अपूर्तपदार्यों को मूर्तरूप देकर मुन्दर चित्र अक्ति किया गया है। श्रमणा का विन्ध्याटवी का वर्णन मपने क्षेत्र में मनितीय है। कवि इस स्थान के पद्यो को उत्तररामचरित में उठाकर रखने का लोन सवरण नहीं कर सका है- "इह समदशकुन्ता क्रान्त वा नीरमुक्त, प्रसव सुरभिशोवस्वच्छतोया वहन्ति । फल भर परिणाम श्यामजन्यूनिकुञ्जस्सलन मुखरमूरिस्रोतसो निर्मरिण्य: ।। ५४०म० २० म. च० ११३८,१२,१३९ ६७ और भी- दधति कुहरमाजामत्रभल्लूक, यूना नुसरति गुरूणिम्त्यानमम्वृकृतानि । शिशिरकटुकपाय: स्त्यायते सल्लकी- नामिभदलिनविशोणंग्रन्थिनिष्यन्द गन्ध: म०च० ५.४१ महावीर चरित की त्रुटियां-महावीर चरित की रचना में कवि को सफलता नहीं मिली है । लबे २ सवाद, बडे२ वर्णनात्मक प्रसग, जिनसे कई स्थलों पर घटनामों को गति में अवरोध उत्पन्न हो गया है। पात्रो के चरित्र चित्रणो मे उत्तरोतर विकास का प्रभाव है। मानव हृदय के सूक्ष्म निरीक्षण मे कवि सफल नही हुआ है । भाव और भापा उदात्तता की सीमा से दूर हैं । किन्तु इस नाटक का सबमे बडा दोष यह है कि इसके पान कुछ स्थानों पर तो चतुर हैं और शेष सारे नाटक में वे अविश्वासी, अन्धविश्वासी पोर हठी है, चरित्र विकार को दृष्टि से केवल परशुगम ही सामने प्राते हैं। राम तो प्रारम्भ से अन्त तक मादर्श नायक बने रहते हैं। वीरता, उदारता, सत्यता आदि सभी दशामों और रूपों में विभिन्न व्यक्तियों के सम्बन्ध में, सर्वत्र रामबआदर्श पुरुष हैं । यही बात नायिका सीता के भी साप है। मालतीमाधव की तरह का भाव और विचार वैविध्य तथा सघर्ष सीता में नहीं है । वासना मोर प्रेम के उतार चढाव और विकास का मालती में जो रूप है, वह यही नहीं है। मत्री माल्यवान भी प्रारम्भ से पन्त तक एक ही लकीर पर चलता और एक ही बात सोचता है। मुद्राराक्षस के राक्षस से उसकी तुलना की जा सकती है। दूसरा सरिघानिक दोप यह है कि कदि कही सुनी बातों को भी पुन. विस्तार के साय कहने में रुका नहीं है । माल्यवान के बारे में यह पूर्णत: चरितापं होता है। उसके वही उपाय, वही माशाएं वही निरा. शाए,मौर भय खेदपूर्ण कहे जा सकते हैं। चतुपं मक विष्कमक भी उपयुक्त नहीं है । तृतीय-अंक का शम्द युद्ध जो परशुराम और शतानन्द, ८८ जनक, दशरथ, विश्वामित्र इन दो पक्षो मे हुआ एक व्यर्ष का विस्तार हो है । इसे हम लेखक के द्वारा अपने व्याकरण, न्याय, मोमासा, धर्म. शास्त्र मादि विषयक ज्ञान के प्रकट करने के लिए निमित मानेगें। इससे अविनय की दृष्टि से रगमव में असुन्दर प्रसुविधा पैदा हो जाती हैं। एक पात्र और अधिक पात्र वाध्य है वाध्य हो जाते हैं प्रतीक्षा करने के लिए जब तक वक्तापात्र अपनी काव्यमय तकविली भाषण के रूप में प्रयुक्त करता रहता है । नाटक की भाषा कठोर, कृत्रिम और कम सुन्दर है। इसमें कई स्थल अनुपयुक्त हैं निन्हें मासानी से सकेतित किया जा सक्ता है । जैसे ५/३८ और ७/१६ ॥ डा. भण्डारकर तो महावीर चरित का परोचक और अपरूप कहते हैं । उत्तर रामचरित-उत्तर रामचरित भवभूति को कला को सुन्दर- तम सृष्टि कहा जाता है अपने गुणों से यह नाटक नाटय जगत् की सुन्दरतम सृष्टियों में से एक है । भवभूति अपने इसी नाटक के बल पर कालिदास के रामझ पाते हैं किसी-किसी मातोचक को दृष्टि से मागे बढ़ जाते हैं। "उत्तरे रामचरित मवभूतिर्विशिष्यते"/ यह तो निश्चित है कि उरार रामचरित के कारण ही भवभूति मौर कालिदास विषयक तुलनायो को परपरा चल पडी है जो अत्यन्त प्राचीन है। "कवयः कालिदासाद्याः भवभूतिर महाकवि." "तरवः पारिजाताधाः स्तुहीवृक्षो मेहातरुः" आदि विवाद प्राचीन काल से चले मारहे हैं। उत्तर की कथा वस्तु के स्रोत-उत्तर रामचरित के कथानक वे स्रोत रूप में बाल्मीकि रामायण प्रसिद्ध ही है और कुछ दूर तक हैं भी,किन्तु उत्तर के कथानक मे पद्मपुराण के पाताल लण्ड और रघुवंश, अभिज्ञानशाकुन्तस तथा मास के स्वप्नवासवदत्तम् का कुछ विशेष प्रभाव है। ८९ (१) उत्तर का मालेस्य दर्शन नामक प्रथम अक कालिदास क- "तयो यथा प्रार्थितमिन्द्रियार्था, ना से द्रुप सद्मम चित्रयत्सु । प्राप्तानि दुसान्यपि दएड केषु, सन्चिन्त्यमानानि सुसान्य भूवन ।।' का विस्तृत रूप है। (२) सीता मौर शकुन्तला जब दोनो अपने पुत्रो के साथ पूण रूप के पति परित्यक्ता है-उस समय कालिदास के राम कहते हैं- "राजपि बशस्यरवि प्रसूत रुपस्थितं पश्यत कीडशो ऽयम् मत्त सदाचार शुचे कलक पयोद वातादिव दर्पणम्य ॥ भवभूति के राम- "यत्सावित्रीपित भूमिपालै लोकश्रेष्ठ साधु शुद्ध चरित्रम् । मत्सम्वन्यात् करमला किं वदन्ती स्यान्चेदस्मिन हन्तधिक मामधन्यम् ॥' (३) सीता मौर शकुन्तला दोनों के पुत्रों से उनके पतियों को भट विना पूर्व कल्पित कारण के प्राश्रमो मे होती है-न जाने कितने प्राय १०-१२ वर्षों के बाद । दोनों पिता पुत्रो को देखकर समान रूप से मायका से अभिभूत मोर वारसल्य रस से योत प्रोत हो जाते है एव बालकों के स्पर्श से महान मुख प्राप्त करते हैं- "अस्य वालकस्य रूप सवादनी ते आकृति' शाकुन्तलम् ७ प्रह "अये न केवलमस्मत् संवादनी आकृति ६ प्रडू और मी- 'अनेन कस्यापि फुलाहकुरेण"-शाकु० ७/१६ "अगात् २ स्नुत इव निज स्नह जो देहसार"-उत्तर०६/२ रवश १४/२५ रघुवंश १४/३७ उत्तर० १/२ - " उत्तर (४) दोनो कवियो वे दम्पत्ति वियोग के महान् दुख सहते हैं विरहातुर होते हैं और जब अचानक मिलते हैं तो शत्रुन्तला दुप्पन्त को देखकर कहती है- "न पलु आर्य पुत्र इव"-२१ के बाद शाकु० भवभूति को सीता राम को देखकर कहती है- ' हा कथं प्रभातचन्द्रमण्डला पाण्डुराकृति' उत्तर० ३/% के बाद दुष्यन्त शकुन्तला को देखकर कहते हैं- "वसने परिधूसरे वसाना."-शाकु० ७२१ उत्तरराम चरित मे तमसा सीता के लिए भी यही कहती है- “परिपाण्डुदुर्वल कपोल."~-उत्तर० ३/४ भास के स्वप्नवासवदत्तम् का पचम अक जब वासवदत्ता जल पई है, ऐसा प्रसिद्ध था, उदयन वासवदत्ता को स्वप्न में देखता है तथा कुछ मस्पष्ट स्वरो मे कहता है, उसी समय पासवदत्ता अकस्मात् पहुँच जाती है और राजा से बात करती है एवं उनका हस्तस्पर्य कर लेती है । स्पर्श के होते ही राजा चैतन्य हो उठ बैठते हैं। वासवदत्ता तत्क्षण हो हट जाती है। भवभूति के उत्तररामचरित के ३ अक का निर्माण-सीता और राम का मिलन इसी प्रकार होता है। इसके उपरान्त उदयन भौर विदूषक का वार्तालाप, सोता मोर वासन्ती के वार्तालाप की भोर सकेत करता है। हमारा अनुमान है कि वाल्मीकीय रामायण के साथ-साप जिसे बोरचरित में भवभूति ने स्पष्ट स्वीकार किया है, उपयुक्त प्रत्यो के कथानक भोर घटनामों का आधार भी भवभूति को अपने नाटक को वस्तु के लिए प्राप्त था। कथानक का वैशिष्ट्य-उत्तर रामचरित के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है, कि इस कृति मे कवि ने राम के जीवन का उत्तरार्ष वरिपत किया है। मह नाटक राज्याभिषेक के उपरान्त सीतापरित्याग से
प्रारम्भ हाता है और उनक पुनर्मिलन र साप ममाप्त हाता है। उत्तर
वी घटनापो स सिद्ध है दिदि का अपन पूर्व न ट भांति इमको
पथावस्तु म स्यान-स्थान पर परिवतन नहीं करना पड़ा है। भवभूति
का कथानक दो समस्यामा खता है और इदी के समाधान
के साथ समाप्त हो जाता है,
1-सोना सामावो और प्रिय पत्रो का राम न छाइन का
साहस और हिलार क्या प्रौर कसे किया ।
सरित्याग को ही परिस्थितियों के रहने हुए भी पुन स्वीकार
भी किया ?
इने मनावनानिक समस्याओं का समाधान भवभूति न प्रथम तीन
मकॉम क्यिा है और फिर उन घटनाओं को उलझा हुई कहो ना
मिनन बराबी हैं अप चार प्रकों म है।
कथासार
प्रथम अ-रामराज्यामिपक क. प्रनतर जनक चल ज्ञान
पर सोता उशस हा जाती है राम रह सांत्वना त है। इधर सोता
के मनोविना लक्ष्मण ने राम के अब तक की बीवन की घटनाओं
को लकर एक चित्रपट तयार करवाया है। बीता राम व लक्ष्मण क
साथ उसे देखती हैं एव चित्र-यन स दत्पन्न हुई भगवती भागोरयो म
अवगाहन करने को अमिलापा व्यक्त करती हैं चित्र दशन के श्रम
पक कर सीता सो जाती है । इसो समय मध नामा एक गुप्तचर
सीता के सम्बध महाकापवादका समाचार लकर राम के पास
पम्पिन होता है । Y समाचार को सुनकर राम को पोहा होती है।
एर
पोर राज धम का प्रन और दूसरी बोर कठोरगर्मा सीता की
भवस्था । अन्त में व वपन कर्तव्य-पालन का निश्चय रठे है।
लोकरजन के लिए मानी प्राणप्रिया का परित्याग करन को विकल्प
वह लक्ष्मण को सीता के निवाधन का प्रादेश देते हैं। भागौरपो दान
१२
द्वितीय अङ्क निर्वासित हुई तो वे लक्ष्मण के जाने के दिसाय मसाच्यानल की इच्छा तो सीता की घो हो इसी इच्छा की पूर्ति के बहाने यह निवासित कर दी जाती हैं। -इसमे मायो नामक नपस्विनी व धनदेवता (वासन्ती) के सवाद माध्यम म रई घटनाओ की सूचना दी जाती है । आत्रेयी महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहकर अध्यमन करती थी किन्तु पही अध्ययन सम्बन्धी विध्न उपस्थित होने से दण्डकपन मे भाना पहा है। वह महापि वाल्मीकि वो किसी देव विशेष द्वारा दिये गये दो मद्भुत बालका को सूचना देती है जो कुश व लव नाम के हैं एव अत्यत कुशाग्र बुद्धि होने से उनके साथ अपने जैसो को साथ साथ पढने को अयोग्यता बतलाती है । वह सीता के निसिन की सूचना भी मात्रयो को देती है एव राम के अश्वमेध यज्ञ वे पारम्भ करने का भी समाचार देती है जिसमे राम हिरण्यमयी सीता को भूति से धर्म- चारिणी का काम लेंगे । तत्पश्चात् वह बताती है कि सीता का निर्वासन हो जाने के कारण दु ख स तप्त भगवान वशिष्ठ, माता अरुन्धती और कौशिल्या मादि माता दाभाद के यज्ञ से लौटन पर प्रयोध्या न जाकर वाल्मीकि के पाश्रम में पहुंच गई हैं। शम्बूर नामक शूद के दण्डकारण्य में तप करने की सूचना वास ती को उसके द्वारा प्राप्त होती है जिससे उसे राम के पुनर्दर्शन की माशा होती है । शम्बूक को खोजते हुये राम दण्डक वन में प्रवेश कर पाम्बूक या वध करते हैं। टण्डकवन में प्रकृति को सोभा का अवलोकन करत २ राम सीताको स्मृति से अवसान हो जाते है । तत्पश्चात् राम पञ्चक्टी में प्रवेश तृतीय श्रद्ध-तमता मोर मुरला सखियां बताती हैं कि सीता जब लक्ष्मण द्वारा करते हैं। . में कूद पड़ी वही जल में सब कुश धाम मा पृथ्वी ९३ - सीता को रमानन संभाल कर ले गई और बालकों को गगा देवी ने महषि वाल्मीकिको सौर दिया। इसके बाद सोना छाया रूप में प्राट होती है । राम पचवटी में प्रवेश करते हैं पर वे सीता को देख नहीं पाते । उनके हृदय में सीता विश्यक विरह वेदना अत्यत बढ़ी हुई है। अपने पुराने क्रीडास्पलों को देखार राम मूच्छिन हो जाते हैं तब सीता अपने स्पर्श से उन्हें वेतन करती हैं । यद्यपि राम सीता को देख नहीं पाते पर उन्हें विश्वास हो जाता है कि यह स्पर्श सीता का ही है अन्य का नहीं। बात चीन के प्रसग म वासन्ती राम को सीताक निर्वासन का उलाहना देनी है। राम सीता के शोक म प्रमुक्त कण्ठ होकर विलाप करते हैं। चतुर्य अङ्क-वाल्मीकि आश्रम में दो तपस्वी बालक परस्पर बातचीत करते हुये बाते हैं । यहाँ वशिष्ठ मोर भापती राम की मातामो के साथ पूर्व ही आ चुके थे। इमी ममय जनक का आगमन होता है। सीता के निर्वासन के कारण भत्यन्त दुखी हैं। अन्धती के साप कौशल्या उनसे मिलने आती हैं। कोशल्या प्रौर जनक परस्पर सात्वना प्रदान करते हैं। इसी समय अन्य बालकी के साथ लव का प्रवेश होता है। कौशल्या पोर जनक को उसे देखकर उसे जानने की उत्कठा जागृत होती है । लव भाकर उनका अभिवादन करता है। यह अपना परिचय वात्मीकि के शिष्य के रूप मे देता है। विप्र वद लब को इसी बीच अश्वमेध-प्रश्व के दर्शन करने के लिए बुलाते हैं । लय पहा जाकर अश्व रसकों की घोषणा श्रवण करता है। उसे सुनकर लव को श्रोध आता है और वह प्रश्वमेघ यज्ञ के घोडे को पकड़ लेता है। पश्चम अङ्क-लद को वाण वर्षा से सैनिक विचलित हो उठते है इसी बीच कुमार चन्द्रकेतु युद्ध क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। वे प्रयम दर्शन से ही सारयि सुमत्र से लव को वीरता और श्रोष एक प्रोजपूरी मुसभी की प्रशसा करते हैं। तदनन्तर दोनों का युद्ध प्रारम्भ होता है। लव पष्ठ अङ्क जम्मकास्त्र का प्रयोग करते है । उसे देखकर सुमत्र मौर चन्द्रकेतु दोनो को विस्मय होता है। युद्ध विराम के बाद दोनो मिलते हैं तथा अनुराग का उदभव होता है । वातचीत में ही सुमत्र रामभद्र कोचर्चा करते हैं । लव अपने इस कृत्य (अश्व ग्रहण) मे रक्षको की दर्पपूर्ण 'राक्षसी वाणी को हो कारण बताते हैं । पश्चात लव एव चन्द्र केतु में परस्पर दर्पपूर्ण कथन हाता है और दोनो युद्ध क्षत्र में पुन. उतरने के लिये प्रस्तुत होते हैं। -दानो वीरो (लव तथा चन्द्र केतु) के युद्ध का वर्णन एक विद्याधर और उसकी स्त्री के सवाद के रूप में किया गया है । इस युद्ध म दे परस्पर आग्नय, वारण और वायव्य मस्त्री का प्रयोग कर रहे थे। इसी बीच शम्बूक को मार कर लौटते हुए रामचन्द्र युद्ध स्थल में पहुंचते हैं तथा युद्ध रुक जाता है । लव को देखकर राम धात्सल्य मे भर उठते हैं । चन्द्रकेतु लय के द्वारा प्रयुक्त जम्भकास्त्र के सम्बन्ध मे राम को सूचित करते हैं यह ज्ञात कर राम को वडा प्राश्चर्य होता है । तब तक कुश भी प्रवेश करते हैं दोनो राम का अभिवादन करते हैं व राम उनका मालिंगन करते हैं। दोनो बालको के दर्शन से राम को सन्देह होता है कि क्या ये सीता के पुत्र हैं। कुश और लव से सीता परित्याग सम्बन्धी रामायण मे कतिपय श्लोक श्रवण कर राम की वेदना और भी जागृत हो जाती है । सेना के साथ लव के युद्ध करने का समाचार सुन कर वशिष्ठ वाल्मीकि, गनक, पर पती मोर राम को मावायें वहां आती हैं। उनके आने के समाचार से राम को लज्जा व खेद भी होता है और वे बालको के साथ उनका स्वागत करने भागे आते हैं। सप्तम् अङ्क-एक दिव्य नाटक का अभिनय होता है। परित्यक्ता सीता गया में कूद पडती हैं । किन्तु एक एक शिशु को गोद में ले फर भागीरपी और पृथ्वी सोता को जल से बाहर ले प्रगट होती हैं। पृथ्वी राम की कठोरता की निन्दा करती हैं गगा उसका कारण बतलाती हैं।
करो जब तक दोनों सीता को आदेश देती हैं कि तुम इन सिंओं का तब तक पालन व वाल्मीकि मुनि के सरक्षण में रतने योग्य बड़े न हो जायें। इस दृश्य को वास्तविक समझकर राम गोकावेग से मूछिन हो जाते हैं । तव नेपथ्य में 'ददि अरुन्धती हम पृथ्वी और गगा दोनों पवित्र व्रत वाली वधू सीता को आपको अर्पण कर रही हैं । पाप हम अनुग्रहीत करें।' यह सुनाई पड़ता है। अस्पती सौता को लेकर प्रविष्ट होती हैं। सीता स्वामी की परिचर्या कर उन्हें स्वस्थ करती हैं। वाल्मीकि भी लवकुश को समर्पित करते हैं। इसी बीच लवणासुर को मार कर शत्रुघ्न भी मा जाते हैं। चारो आर प्रसन्नता का वातावरण हा जाता है। पात्र परिचय स्त्री पान पुरुष पत्र मूत्रधार -नाटक का प्रारमकत्ता सोना--राजा जनक की पुत्री रगमच का मयक्ष राजा राम की पत्नी मट-मुत्रधार का सहयोगी वासन्ती-वन देवता, सीता की सखी गम -(रामचद्र') अयोध्याधिपति पायो-एक ब्रह्मचारिणी मूर्यवंशीय राजा। तमसा-एक नदी की अधिष्ठात्री लक्ष्मण-राम के छोटे भाई शत्रुघ्न -लक्ष्मए के छोटे भाई मुरला-एक नदी की अधिष्ठात्र जना-राम के श्वसुर देवी। अष्टावक्र -एक मुनि भागीरथी-गगा जी वाल्मीकि रामायण के रचयिता कौशिल्या-~-राम की माता सौधातकि'-बाल्मीकि का शिष्य पृथ्वी--सीता को माता कुशलवो- राम के पुत्र यह पती-वशिष्ठ मुनि की पत्नी चन्द्रकेतु-लक्ष्मए-पुत्र विद्याधरी--विद्याधर की पानी देवी।
स्त्री पात्र पुरुष पात्र समन्त्र:-सारयो प्रतीहारी -अन्त:पुर की द्वारपालिका विद्याधर:-देवयानि विशेप कञ्चको-जन्त पुर में रहते वाला वृद वाम दुर्मुख -गुप्तचर मम्वर --शुद्ध तपस्वी नि कुमार और सैनिक आदि। नाटक को मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि उत्तररामचरित करुण रस का नाटक है । कवि अपने कथानक प्रौर रस की पृष्ठभूमि को तैयार करना हुमा चलता है । वह दर्शको के हृदय मे-जो कुछ प्रवेश कराना चाहता है, उसकी पृष्ठभूमि पहिले म ही तैयार कर देता है। कवि एक महान् मनोवैज्ञानिक है। जब नाटक प्रारभ होता है तो मूत्रधार रहता है कि यह राम के राज्याभिपैक के उत्सव का समय है, किन्तु सभी कर्मचारी शान्त और चुप क्यो हैं : नगरी प्रसन्न होने के स्थान पर विपादमग्न सी है। कही कोई चहल पहा नहीं। इस मौन पौर शान्ति का कारण जानने को हम भी उत्सुक हो उठते हैं। क्योंकि रामकथा का पूर्व सस्कार पौर परिचय होने से हमे शका होने लगती है कि क्या सीता परित्याग हो चुका ? किन्तु नट सूचना देता है कि घर के लोग ऋष्यशृग के पाथम मे यज्ञ समारोह में सम्मिलित होने के लिए चले गए हैं। राम के लिए सामाजिक के हृदय में सहानुभूति पैदा होती हैं कि १४ वर्ष के बाद वन से लौट आने पर भी वे अपने परिवार के लोगो के मध्य रहने का मानन्द नही प्राप्त कर सकते हैं। यहो गर्भधारिणी सीता का भी समाचार है । नगरी में कोई उत्सव नहीं, कोई सजावट नहीं, नया नरेश, वेवारे का जीवन नीरस हो गया । कोई भी गुरुजन नगर मे नहीं रहे । सभी बाहर चले गए हैं। इसीलिए सत्रधार राम का मनोरजन करने के लिए राजभवन जाना चाहता है किन्तु वह शब्दो के प्रति बहुत जागरूक रहना चाहता है क्योकि लोग स्त्री मोर वाणो के प्रति बडे दोपदी होते हैं। मोता के प्रति मग्नि परीक्षा हो जाने पर भी उन्हे विश्वास नहीं होता है। राम और सीता को ऐसी दशा और उनके चारो मोर दुखद बाता- वरए मोर परिस्थितियों को घटा घुमडी देखकर हमारा हृदय करुणा से भर जाता है। राम को प्रियतमा बहुत दिनो के बाद मिनी यो जो इस समय पूर्णगर्भा भी है-उमी के प्रति लोगो को दुर्भावनाएँ । राम के हृदय को शोकाकुल कर देंगी। उपर वेचारी निदोष सीता ! जैसे ही प्रमुख म क मागे ददता है, हम अपने को विपाद से भावृत मोर पोले अन्धकार मे पाते हैं । जब हम राम और सीता को एक दूसरे को मानन्दित करने का प्रयत्न करते हुए पाते हैं तो अनुभव होता है कि प्रेमियों का वियोग प्रत्यक दशा में असह्य होता होगा । सीता का भी यही कहना है । हम विचार करने लगते हैं कि यदि कही सीता को अपने भावी परित्याग का संकेत प्राप्त हो जाये तो उनकी क्या दशा हो जायगी। इसी समय अष्टावक्र जी माते हैं। भगवती माता के पूछने पर कि क्या हम लोगो को भी गुरुजन याद करते हैं, अष्टावक्र कहते हैं कि हे देवि वशिष्ठ ने मापके लिए कहा है- "हे सौभाग्यवति । भगवती वसुन्धरा ने माप को जन्म दिया है, प्रजापति के समान राजा जनक मापके तात हैं मोर आप उन नृपतियों की कुल वध हैं जिनके कुल मे सूर्य मौर हम गुरु हैं।" उत्तर० ११९ इस पद्य मे सीता को श्रेष्ठता का वर्णन करते हुए वशिष्ठ वीरपुत्र प्रसविनी होने का माशीर्वाद देते है। राम के लिए दशिष्ठ ने कुछ भी नहीं कहा । यह दर्शन के लिए कठोर सकेत है कि राम के भाविकार्य (सीता परित्याग) को दिव्य ज्ञान दाले वशिष्ट जानने हैं मत उहे माशीर्वाद देने मे नहीं सम्मिलित किया । हमे राम के प्रति सहानुभूति और माता के लिए नय हो जाता है। गम दगिन के लिए उतर दन है कि प्रत्रा के प्रागवन के लिए मु माता रोइन में भी या न हानी। १.१॥ हमारा भर दृढ़ हा जाना है और हम सीता है विपनविगत द्रवित हान लगत है। इनौ समय लक्षमा मते हैं और गन कथन पर कहा है कि मीता अग्नि परीक्षा तक के चित्र है। हम गम + मय दिलार धापित करन लाते हैं कि जन्म मह पवित्र का प्रग्नि यादि का पवित्र करमा। १.१३॥ नादि भय म प्रानन्द का बादन और व्ययाको भकारीस गान्दिको वदनीन आन कहा पर सरया बात है। राम विवाहोत्तर कालीन मुन्दनय दिदमा का सार कम्त है। १८,१९॥ दे मुबनय प्रतीत को बदमान म तुलना करता है। माता का अचाना नय हावा है कि मुझे ऐमा प्रतीत हा रहा है माना में प्रान प्रियतम म पुन पृथक हो रही हूँ। राम १।३३ म लदन को चुप कर रहे है कि उन्हें ऐसा प्रतीत जा रहा है मानो त्रिदा रा विचार पुन लोट पाया है। दर्शक का दुःय वित हान लगता है यौर महानुभूति नी दी है। सीता बद्र अमित हैं फालन मा जाती हैं। उन्ह दिदि काल पद के पाट किम नपानक भविष्य की रचना हा रही है इसका कृचनी मान नहीं हैं। वॉर मांगा। मा मात्र दुर्नुप दमाद मानपानक ममाचार लिए पडा है जो मीना मी सुरमार लतिका के पर अनात दगा में टूटगा। यह है, भाग्य का ईल-निपनि नटी का नाट। जिसके कारण प्रदान और निडॉप के में डालकर बटन के निद छोड दिने जाते हैं। दर्शक-निति के सर युद्ध हो उठता है। वह चाहता है कि दुर्नुस का मुख द ही आर, दहमूक हो जार! राम के विरह शन्द साथ ही पहचा' शब्द को सम्बन्धित करटा हमा दूत दह मानक घरी सम्पित कर देता है जिसका हमें बहुत पहिले से हर पाारय दयार है, मीना दम पर चढ़कर नदमण के माय दन विहार के लिए चला रद का शानदर्शक चिन्नाकर उन्दै दमुश्यिति का
ज्ञान कराकर रोकना चाहता है किन्तु इमी समर मनिका पात्र हो
बाडा है और हम नी निति को को हुए चुप हो जाते हैं।
उत्तर का परिवर्तित और परिष्कृत क्यानक-कवि ने
दीरचरित रुष्ट हों में कह दिया है, कि दह बालीकि रामायण
बयान रहा है। जिन राम के जोदन और कार्यों का जो प्रदर्शन
कवि नाटक में करता है वह रामादप को क्यावस्तु के अन्र रम्बना
है। उसने सफल कलाकार को नि प्रधान्यकी वर्णनामा क्या
को लेकर नाटकीयता के साचे में डालने के लिए मनोन्नुवन समार
किर है । इन सरकारों ने क्या सी एक नवीन हो न दे दिया है। हम
प्रधान-प्रधान विभेदों पर दिचार करेंगे।
१-नाटक में राम और मोना का पुर्मिनन दिखाया गया है. जब
कि रामायरा में राम के रहने और वाल्मीकि के मारेन देने पर मोता
चरित्र का माप देने के लिए प्रस्तुत हदी हैं वो उनका
उदात्त हृदर मामान न सह सक्ने के कारण माना एम्बो से जरा
मागता है और पृथ्वी के गर्भ में शरण पा भी जाना है। रामाया को
क्या दुःखान्त है। किन्तु भारतीय पसरानुसार दुखान्त नाटक सभव
नहीं, फलत कवि उसे मुसान्त करदेता है । इसके प्रमारा में उसके पार
पचमुरारा के पाताल खण्ड का ४७ दा अध्याय है।
रामस्वामागतां दृष्ट्वा जानकी प्रेम बिहुलान
साध्वित्वया सहेनानी कर्वे यज्ञसमापनम् ॥
समागतां वीक्ष्यपत्नी रामचन्द्रस्य कुम्मत्र
मुवर्णपत्नी घिक कृत्वातामधात् धर्म चारिणीम् ।।
रामस्तदा यज्ञमध्ये शुशुभे सौतया सह,
वारयानुगतो चद्वच्छशीव सरघूत्तमः ।
एवं उनके पुत्र्यासो हयनेय त्रयं चरन् त्रैलोक्ये
कीर्विमतुला प्रपदेव सुदुर्लमान् ।।
२-पद्मपुराण, लव और कुश एव शत्रुघ्न तथा पुष्कल (भरतपुर) जो राम की अश्वरक्षक सेना के सेनापति थे, के रोव एक युद्ध का वर्णन करता है, जिसमे राम पक्ष के सभी वीर पराजित हो गये हैं। बाल्मीकि रामायण इस विषय में मोन है । मवभूति राम पक्ष की मोर से केवल चन्दकेतु को उपस्थित करता है । लव और चन्द्रकेतु में समान वल बीरता और शोर्य कदि ने दिखाया है। साथ ही दोनों को शोलवान् भी चित्रित किया है। ३-बाल्मीकि रामायण मे सीता परित्याग काल में गर्म के कोई भी चिन्द स्पष्ट नहीं प्रदर्शित किये गये हैं । रामायण के अनुसार जब लक्ष्मण मोग को छोड़कर चल देते हैं तो सीता केचे स्वर से करय अन्दन करती है। विज्ञप्त महर्षि वाल्मीकि आते हैं और मधुर शब्दों मे सान्त्वना देकर सीता को पुत्रीवत् अपना कर अपने बाश्रम मे लिया ले जाते हैं। आश्रमस्य तापसियों को सीता को देख रेख और सुख का भार विशेष रूप स सौप दिया जाता है क्योंकि वाल्मीकि जो रथकल वधू को पहिचानवे हैं और उनके सारे महत्वों से परिचित हैं । महीनों के उपरात सोना दो बालकों को जन्म देती हैं। उत्तर में भवभूति ने सीता त्याग के समय सीता को पूर्णगर्मा चित्रित किया है जिनका प्रसव काल सन्निकट है । ऐसा करने में भवभूति दर्शकों की सहानुभूति सीता के प्रति अधिक मापित कर सके हैं। लक्ष्मण के छोडकर जाते ही सीता को प्रसवकाल को वेदना से अत्यन्त पोहित दिखाकर कवि ने उन्हें गगा में कूदते चित्रित किया है। वहीं पर वे दो बालकों को जन्म देती हैं । गगा मौर पृथ्वी सोता को देख रेख करती हैं क्योंकि प्रयम मक में राम ने इसके लिए उनसे निवेदन कर दिया या । सीता पृथ्वी लोक में १२ वर्ष तक रहती हैं । बालक तो दुग्ध छोडने के उपरान्त हो वाल्मीकि आश्रम में विद्याध्ययन के लिए भेज दिये गये थे। ४-बाल्मीकि रामायण के अनुसार राम ने सौता स्याग के बहुत दिन बाद शनुप्न को लवणासुर के मारने के लिए भेमा है । शत्रुघ्न मधुरा जाते हुये एक रात बाल्मीकि प्राश्नम मे ठहरते हैं तथा सौता एव लवकुश को देखते हैं, पहचान भी लेते हैं । भवभूति ने 'उत्तर' में सोता त्याग और शत्रुघ्न का लवण के बघ के लिए मधुरा गमन साथ साथ दिखलाया है ५-मवभूति ने वाल्मीकि की रामकथा के रूप में कतिपय परिवर्तन अपनी राम के प्रति श्रद्धा और पादर्श रामचरित के कर्ता होने के कारण किये हैं । जैसे- (4) भवभूति ने बिना बशिष्ठ और गुरुजनो को सम्मति से त्यागी गई सीता का मकन इस ढग से किया है कि जिससे राम पर माक्षेप न हो सके, इसके लिए उन्होंने बशिष्ठारिकों को अयोध्या से दूर स्पित दिखाया है जिसके कारण अनुमति लेना सम्भव नहीं रहा। (ब) भवभूति ने उत्तररामचरित के अन्त मे सीता को पाताल ने प्रेरित कर राम और सीता का पुनमिलन उपस्थित किया है। यह उनके भक्त हृदय की उपज है। साथ ही, हिन्दू नाट्यशास्त्र के अनुसार सुखान्त हो उपयुक्त भी था। उत्तररामचरित का प्रथम मह, जिसका अधिक्तम भाग चित्र. दर्शन से व्याप्त है, भवभूति की कल्पना प्रौर कला कुशस्ता का प्रमाण है । इनकी कल्पना शक्ति बद्भुत है । यद्यपि चित्रदर्शन अडू का मूम सकेत कालिदास ने रपुरश (१४/२५; में दिया है, जिन्तु भवभूति ने इसका पूर्ण विकास वर्णनात्मक कयोपकथन के रूप म. जो कि कोमल भावनाओ को व्यक्त करने में सक्षम है तथा उत्तम विचारो से मौलप्रोत हैं एवं मधुरतम गार्हस्थ्य सुखानुभूतियो का निदर्शन है, उपस्थित किया है। द्वितीय पडू मे वासन्ती के साथ मारयो के प्रवेश का दृश्य पूर्णत: कवि कल्पना प्रसूत है। इस मक में प्रकृति चित्रण-दण्डकारण्य के सुन्दर पोर भयानक दृश्य, पर्वत, बन, नदी पोर जीव-जन्तुओं के सजीय वर्णन सहृदयो के सामने स्पष्ट चित्र उपस्थित करने में सक्षम मोर 4 पनुरम हैं । भवभूति समेर मे प्रनितीय हैं । तृतीय अराण रम ये परिपामारफनतम मर है । रससिर वपि को बल्पना और पता को यह मौलिक देश है। कवि मानव मस्तिष्क की कार्य सरणि का पूर्ण गाता है। मानवीय सभी भावनाओं को अनुभूति मे समर्ष रवि, पटना नाममाल की होने पर भी, गाहस्थ्य जीवन के सुसमय वातावरण म पले भादर्श प्रेमी मोर प्रियतमा का मुवावस्था में ही मन्नत वियोग विवश वियोग-चित्रित कर, सहदयों के हरयो को द्रवित पर देन है । निरपराध बुराम पोमल कलेवरोको पष्ट भौर सन्ताप सो परम सीमा मे फेर दिया जाना मानव हृदय को दुर्वलता को पिघला धनुष मर जिसमे जनर,कौशिल्या, पशिष्ठ और भरधनी मापस म यात्मीर पाश्रम मे मिलते दिसाये गये हैं, कवि कल्पना प्रसून है। यह नाटयीय विधान रामायण, पपपुराण या अन्य काम्य बन्यो मे कही भी सतित नहीं है। उत्तररामचरित के उप दार्शनिश विधारो मोर गम्भीर भायो से भरे होने के कारण विदूषा IT का न रसना, मवि का एक विशेष पा इस दगा मे पका हुआ दिखाई देता है । पञ्चम मनुको कथावस्तु यद्यपि भवभूति ने पपपुराण से ली है पिर भी उन्होने अपने मनोनुकूम परिवर्तन मोर परिवर्धन कर विषय को वह रूपरेषा प्रदान पर दी है कि पूरी कथावस्तु एर नवीन रूप में सामने आती है। कोई भी सेसर भवभूति के पहिले, राष्ट्र के भमर नेता राम में परित रे विषय मे पट मालोचना मरो का, भवभूति के समान साहस नहीं पर सका है। "परास्ते न विचारणीय परिता"५/३४ मे सब मोर २/२७ मे पासन्ती 'पयि पोर या पिसते प्रियम्" रामरे परिस की भरपूर पासोपना मरते हैं। भवभूति ने-कालिदास को भौति "अपि स्वदेहात् जिमुतेन्द्रियार्यात् यशोषनानो हि यशोगरीय" (रफ्षश, १४ वा सर्ग) १०३ . सोवा परिवार का पान हल किया है। हमारे करिने पचारारा पारापिट कथावस्तु को एक मोर रखकर तब और चन्द्र के सुपत का, जो कल्पना परिपूर्ण वर्णन किया है, वह प्रशसनीर है। उनके लम्बे मोर महशेले समास, मोडगुरा विशिष्ट पसरलो, पाठक के पस्तिक को नन्ना कर युद्ध स्पल को भरकरता का साक्षातकार करा देते हैं । राम का माने दोनों पुत्रों से मिलना, जिन्हें दे पहिचानत भी नहीं है, बहुत ही सुन्दरता से चित्रित किया गया है । मुन्दर भावों पौर विचारों से भरा यह बस कदि द्वारा पुरानो वस्तुों को नये स में रखे जाने का एक धनुग्न उदाहरण इन बातों से, कपावस्तु को एक रूपता हो भो सण्डिव नहीं होने पाई है। सभी गाउँ एक ही कथानक को कडी में गुपी हुई है। भवभूति ने राम के चरित्र को मानवोचित सांचे में दाना है, जब कि बाल्मोकि बार कालिदास राम को प्राप देवता के बवडार के र में पृथ्वी के प्रारियों को सुख देने के लिए पापा कह कर प्रति मानव रूप में चित्रित करते है । भवभूति के नाटकों मे राम-मनुष्य के रूप में मनुष्य की कमजोरियों को लिये हरे-भाडे हैं। नवभूति अपने पूर्व कानीनों के अन्ध यशानु होकर मनुकरण मात्र करने वाले नहीं थे और न वह पहम् मन्यता के साथ उनकी बदहेतना हो करते थे। साहित्य में प्रस्तुत ही मदभूति को वस्तुएँ मौलिकता को पृष्ठभूमि पर माधारित भी प्रतीत होती हैं। कुन्तला के सात अक का दृश्य, जर दुष्चत पपने पुत्र से मिलता है जिसे वह बनने पुत्र के रूप में पब तक नहीं जान सका है, सोचता है कि यह मेरा पुत्र है या नहीं किन्तु बाम प्रमाणों से उसे निश्चित हो जाता है कि यह मेरा हो पुत्र है, यह दृश्य भवभूति ने बहुत ही मापक दग से उत्तररामचरित्र के एक में बापेक्षित समान- - सारमौर स्थानानुसार परिवर्तन भौर परिवर्धन के साथ दिखाया है। सप्तम बहु को पादस्तु, उहाँ सौता देदो मुनिरों के समक्ष उपस्थित की गई है, नाटककार ने रामायण मे लिया है किन्तु भवभूति की मौलिकता न उमें एक नया ही रूप दे दिया है। भरत के द्वारा शिक्षित मानो अमराय हो मगा,पृथ्वी और मीता का अभिनय करती हैं। वस्तुन.. रामचरित को भवमूर्ति ने ही मर्द प्रथम नाटकीयता प्रदान की है। भवभूति से उत्तर काल के लेखक मदैव भवभूति के कृतज्ञ रहेगें। भवमति न राम क्या एसे सुन्दर क्यानक का प्रवेश साहित्य के नाटकीय क्षेत्रमें करके पय प्रदर्शन किया। भवभूति का यह कहना, कि उमने रामायण की क्या को ऐसा नाटकीय रूप दिया है, जो कि एक सिद्ध कलाकार की सृष्टि की ममना रखता है, प्रसत्य नहीं है। उनकी कृतियां मारत ही नहीं, विश्व के साहित्यिको को निर्मल मानन्द प्रदान करन में सक्षम है। उत्तर रामचरित के कथानक का विकास, नाटक के नाम से ही प्रकट होता है कि यह राम के उत्तर कालीन जीवन चरित से सम्बन्धित है। लका विजय से लौटने और राजगद्दी पर अयोध्या में बारुद ही जाने के बाद की घटनायें इसमें प्रयित की गई हैं। इस उत्तर भाग के जीवन में सर्व प्रधान और महनीय घटना है सीता का परित्याग-जो उनके व्यक्तिगत और समष्टिगत दोनो जीवनों मे भत्यधिक महत्वपूर्ण है। इसी घटना के आधार पर मौर बीज पर उनके इस महान नाटक का इतिवृत्त विकसित मूत्रधार मोर उसके सहयोगी के प्रयम प्रदु के सम्बाद यह सिद्ध करते हैं कि सीता की याचार पवित्रता के विषय में पयोध्या नागरिकों में प्रवाद फैल रहा है, जिससे राजा अभी विल्कुल अपरिचित है। मष्टावक के मन्देश वाला प्रथम दृश्य, जिसमें राजा के लिए अपने सुमों का बलिदान प्रमा के कल्याणार्य करना मादर्श कत्तं व्य कहा गया भावान राम के द्वारा किए गए सौता परित्याग के हेतु पृष्ठभूमि की उपयोजना मात्र कहा जा सकता है जिसमे राम को देवल प्रजा को प्रसन्नता के लिए स्वकीय अशेष सुखों के विनाशक उपेक्षा पर सीता के निर्मल चरित्र का ज्ञान रखते हुए भी सीता परियाग के लिए कृत निश्चय होना पड़ा। दूसरा दृश्य, जिसमें लक्ष्मण-राम और सीता के विगत जीवन परित के चित्रों के दिखाने का प्रबन्ध करते हैं तथा सोना अपरे पति से दूर विरह और वियोग सहती है, नाटक मे करुण रस का बीज सा बोता है । मीता दण्डक बन मोर भागीरथी को देखने के हेतु प्रयाग करने की प्रबल इच्छा रखती है । राम, सीना परित्याग के विषय में बहुत चिन्ताशील हैं और वे इस उपस्थित प्रय सर को ही सीता परित्याग का सबसे सहन अवसर समझ कर, निर्दोष पत्नी को उसे विना सूचना दिये ही परित्यक्त कर देते हैं, बन भेज देते हैं, यह नेता के चरित्र में एक विचारणीय वस्तु है। यह दृश्य इसलिए महत्व पूर्ण है कि यह दो नाट्य प्रयोजनो को पूरा करता है। सर्व प्रथम यह भगवान राम के विगत चरित के बारे में कुछ सरत करता है, जिससे महावीरचरित से राम के जीवनचरित की 'उत्तररामचरित' से एक कही जुड़ जाती है। द्वितीय यह दृश्य भगवान राम के दाम्पत्य जीवन का, जो प्रेम और वैभव से भरा अत्यन्त सुखमय है तपा जो राम के विरह में सीता को चित्र दर्शन म भी व्याकुल कर देता है, का चित्रण करता है। दोनो अनन्य प्रेमी हृदय वियोग के भयकर दिनो के शिकार बनते हैं। उनका परस्पर माकपंग और पवित्र प्रेम धन्य है । इस दृश्य ने दर्शकों को राम के महान त्याग का अनुभव करान में जो वे अपनी प्रजा को प्रसन्नता के लिए करते है-बहुत ही सहायता दी है। राम का प्रादर्श त्याग मोर उनका महान् विरह तथा उसकी प्रभिव्यञ्जना इस दृश्य के हो साहाय्य से सहृदय हृदय में मालता से प्रवेश कर जाती है। प्रथम प्र सीता + साय ही ममान हो जाता है और कार्य को प्रागे बढाकर द्वितीय बड में लाता है। दर्शक मीना के विषय में चिन्तित हो उठता है कि धागे उन्होंने क्या किया। उनका क्या हुप्रा ? और प्रार्थना करने लगते हैं कि कोई ईश्वरीय शक्ति उन्हें इस महान विपत्ति मे सहारा है। इस प्रकार से सीता व राम दोनों दर्शको की सहानुभूति के पात्र हा जात हैं। द्वितीय प्रह, में प्रायो, जो कि वाल्मीकि प्राथम से पाई है जनस्थान की धन देवी वासन्ती से कहती है कि किस तरह दो बालक जिनके पिता आदि का पता नहीं है प्रजात स्वर्गीय व्यक्ति से बाल्मीकि आश्रम में उपस्थित किये गये है। वाल्मीकि न उनका पत्रियोचित सस्कार किया है। बालको ने अपनी मेघा शक्ति से सभी पाश्रम-छात्रों को पराभूत कर दिया है। वाल्मीकि देवी मकेत से कवि हो गये है मोर राम चरित के गठन में सलग्न है । प्रायी वासन्नी को यह भी सूचित करती है कि राम ने सीता का परित्याग कर दिया और अश्वमेध यज्ञ करने का अनुष्ठान भो किया है । वे शुद्रक बघ के लिए अयोध्या से दण्डक बन की ओर प्रस्थित हो चुके हैं । वासनी दर्शको को बताती है कि शम्यून पचवटी में तप कर रहा है परिणाम स्वरूप दर्शक अपने को अग्रिम द्रश्य के लिए उत्सुक पाते हैं। यह दृश्य प्रथम पडु को घटनामो से पूरे बारह वर्ष वाद पोर अयोध्या में बहुत दूर होन जा रहा है। गटककार ने 'यूनिटो बाफ टाइम एण्ड प्लेस' का ध्यान बिलकुल ही नहीं रखा है । यह मूचित कर देना आवश्यक है कि सस्कृत नाटक- कारो का बहुमत स्थान और ममय की एकता के प्रति बहुत ही कम उत्तरदायी रहा है द्वितीम अक की घटनाएं सस्या में बहुत ही कम हैं तथा उनका महत्त्व भी कम है । जहाँ तक कथावस्तु के विकास का सम्बन्ध है, १०७ शम्बूक को दण्ड दैना मोर उसका पुन' देवयोनि में परिवर्तित होना मुख्य कथावस्तु का कोई माग नहीं है। हा, उसका महत्व केवल जनस्थान के वन वैभव को मोर सकेत करन में है. जिससे कवि को अपने प्रकृति प्रेम के प्रदर्शन और वर्णनात्मक शक्ति के प्रयोग करने का अवसर मिला है । सम्भवत ववि ने इसीलिए इम पात्र को रगमच म उपस्थित किया है । शम्बूक का नाटकीय महत्व केवल इतना ही है कि वह आत्रेयी को मुचना और राम के पचवटी म स्थित होने के बीच एक सम्बन्ध जोड देता है। तृतीय बक जिसमे दो नदियो मानवीकृत बात करती हैं कि सीता वै दो बालर उत्पन्न हुये हैं जिन्हें बाल्मीकि माश्रम में पहुंचाया जा चुका है तथा मीता पृथ्वी माता के लोक में रहती है। वे राम के पचवटी में पान के कारण प्रदृश्य Eप मे राम के शोकावेग के समय जनस्थान म रक्षणार्थ उपस्थित रहगी। पचवटी मा पूर्व परिचिन दृश्य, कथानक को जहाँ से प्रात्रेयी ने छोडा था, मागे बढ़ाता है । सीता का छापा प म राम से मिलन दोनों के वास्तविक पुनर्मिलन के लिए पथ प्रशस्त कर देता है । सीता अपने पति के विरह विलापों को सनती है एवं उनका हृदय प्रक्षालित हो स्वच्छ हो जाता है। सोला प्रपन पति की निर्दोपिता और प्रेम में न्योछावर हो जाती है और मनोमालिन्य निर्मल हो जाता है | सोता का राम के प्रति प्रेम भसीमता को प्राप्त करता है। यही इस तृतीय प्रड्स का उद्देश्य है। सोता को इम माति अपने प्रिय के विरह विनापी को सनन के लिए छाया रूप से प्रस्तुत करना, अभिज्ञान शाकुन्तलम् की सानुमती प्रप्सरा के समान दुप्यन्त के विद्वारोपवन में गकुन्तला के प्रति उसके विचार जानने के लिए उपस्थित होने के समान है। शकुन्तना का सर्वोत्कृष्ट प्रतिविम्ब (सानुमतगे) दुप्यन्त से शान्तला में विपप में उसकी निजी धारणा गनता है और प्रमानवश प्रियतमा त्याग की घटना को सुनकर शकुन्तर । स जाकर बहता है। पलत शकुन्तला अपने मनोमालिन्य को मलाकर पुन पति से मिलने को तत्वष्टित हो उठती है। नेतक का यह अत्यन्त सन्दर सगटन रहा जो उसने मोता को राम से पाया रूप म प गवटी म मिलाया है । यहाँ पर इस दम्पति ने चौदह ग्रीष्मे आनन्द के साथ बितायी थी। यहां उन्होंने प्रकृति के दृश्यो तथा पारस्परिक प्रेम का आनन्दोपभोग किया था, इसके लिए कवि की नाट्य कुशलता की हम प्रशसा करते हैं । पचवटी के विकसित वृक्ष, विहग कुल-कलरव और नोडा निमग्न मृग आदि सीता को स्मृति छा जात हैं । राम भी उन पूर्व परिचित दृश्यो को देखकर विह्वल हो उठते हैं तथा सीता का सहवास स्मरण कर चेतनाविहीन हो जाते हैं, मीता के स्पर्श का अनुभव करते हैं और भादित होत हैं- इस प्रकार स दोनो के पुनर्मिलन को वाघायें दूर कर दी गई हैं। कुशल नाटककार न दोनो के मिलन का स्थान, महान हा का यहाँ मुअवसर बाल्मीकि पाश्रम म हो सयोजित किया है। यहां सेशल्या, वशिष्ठ, बरु यती प्रादि सभी उपस्थित हैं। ये लोग ऋष्यशृग के यज्ञ स अयोध्या न लौटकर यही ठहरे हुए थे। भाग्यवश सीता और राम के पुनर्मिलन से सम्बन्धित एवं उत्कठित सभी व्यक्ति यहाँ उपस्थित थे। इस स्थान से बढकर सुन्दर और कौन स्थान हो सकता या । चतुर्थ, पञ्चम मौर षष्ठ अक की सभी घटनाएं यह स्थान पाती है । यहाँ पर जनक, कौशल्या, राम, लव, कुश, चन्द्रकेतु और सीता आदि सभी का विभिन्न कार्यकलापों वश उपस्थित होना वैविध्य के साथ साथ अत्यन्त कलात्मक हुआ है । यह सम्मिलन मानव भावनामों के विविध रूपों--प्रेम, क्रोध, वात्सल्य, करुणा आदि के साधारणीकरण के साथ साप सम्पन्न हुआ है । सभी दृश्य बडी सफलता और कला के साथ सगठित हुये हैं जो सहृदय को रस सिक्त कर देते हैं। सारा अन्तिम प्र के पुनर्मिलन को घटनामो से सम्बद्ध हैं। "कथा संविधान का कलात्मक वैशिष्ट्य" नाटककार भवभूति ने दो नाटको के निर्माण काल के बीच मे (महावीर चरित और उत्तररामचरित) यथेष्ट मध्यान्तर लिया है, जिसका प्रमाण उत्तररामचरित को पूर्णता है। यह नाटक कवि की प्रौड प्रतिभा का परिचायक है। उत्तररामचरित के सप्तम बङ्क के धीसवें प्रलोक मददि स्वयं इस बान को स्वीकार करता है कि इस मध्य काल में कवि ने मन्यास मोर साधना की है। सम्भवत उसन और भी अन्य रचनायें की होंगी जो हम पाज प्राप्त नहीं होती। यहा हम भवभूति की उस अमर थोर रस सिद्ध कृति के वारे म विचार करेंगे, जो प्राचीन मोर अर्वाचीन दोनों युर्गों समालोचकों द्वारा कालिदास की कृतियों की तुलना में रखी जाती रही हैं । भवभूति ये कुछ प्रशसकों का तो यहा तक कहना है कि उत्तररामचरित म भवभूति कालिदास स भी भागे बढ गय है- "उत्तरे रामचरित भवभूतिविशिप्यते" अवमूर्ति को कलात्मक विज्ञपतामों को प्रनक रूपों में देखा जा सक्ता है- १-नाटक के नाम से पता चलता है कि यह राम के जीवन में उत्तराखं से सम्बन्धित हैं जो राज्याभिषेक योर सीता परित्याग से प्रारम्भ होकर उनके पुनर्मिलन पर समाप्त होता है। उत्तर की कथावस्तु और घटनाओं से सिद्ध है कि यदि को अपने पूर्व नाटकों की भौति कथावस्तु के प्राप्त सातो मे कथावस्तु सवन्धी कोई विशेष परिवर्तन या सम्बधंन करने के हेतु परिधम मही करना पड़ा है। विज्ञ सामाजिक ये मन में यह प्रश्न उठता है कि सोता ऐसी धर्मपत्नी का त्याग राम ने कैसे किया, जब कि उनके मन से सदेह का प्रमेष मल सोता अग्नि परीक्षा के समय ही नष्ट हो चुका था, तथा परित्याग के बाद उन्हीं परिस्थितियों के रहते हुये भी सीता को पुन कसे स्वीकार किया। इन्हीं प्रश्नो के समाधान में कवि न अपनी कुशलता प्रदर्शित की है । कालिदास के दुष्यन्त ने अभिज्ञान माकुन्तल के पन्चम बडु में शकुन्तला का प्रत्यक्षा अनादर दिया था और पुनः जब वे दोनों सप्तम अष्ट्र मिलते हैं तव शकुन्तला अपने शकुन्तला होने का कोई भी .
प्रमाण नही रखती है, पल सानुमतो का सन्देश और उपर दुष्यन्त का दुर्वल शरीर दोनो के प्रेम के साक्षी हैं। अभिज्ञान शाकुन्तल के सप्तम प्रक में दुष्यन्त गन्तला से समा कर देने को करता है किन्तु शानला तो उसे पहले से ही क्षमा किये हुए हैं । शकुन्तला के इस आचरण के लिए कश्यप आश्रम का स्वर्गीय शान्त वातावरणी धारण हो सकता है, जहाँ वे यह भी शान्त हैं । कण्व के आश्रम में तो क्षब्ध सांसारिक वातावरण था जहाँ मत गज पोर भ्रमर मव्यवस्था उत्पन्न कर देत हैं । भवभूति अत्यन्त सीध साद ढग से वियोग और मिलन पसन्द नहीं करते हैं, उनमें सामने एक मनोवैज्ञानिक समस्या थी, जिसका समाधान भवभूति ने अपने द ग में प्रथम तीन अको म किया है । शेप चार को मे उन पटनामो की उल्मी हुई कडियाँ हैं जो मिलन कराती हैं। 2-भवभूति ने प्रथम अक की रचना में कोई विशेष नाटकीय कला नहीं प्रदर्शित की। इस अरु मे अन्तिम पुनर्मिलन के कुछ कलात्मक समेत प्राप्त होते हैं । इस प्रारम्भ में कुछ ऐसे मार्मिक तत्व हैं जिनसे प्रकट होता है कि राम सीता का परित्याग कर देंगे। सूत्रधार इम तय्य को (प्रथम अक, उठा श्लोक) हमे पहले ही मूचित कर देता अपवाद का वातावरण था ! जब यह अपवाद राम के पास पहुंचता है तो वे सीता परित्याग का निश्चय कर लेते है। हम अपवाद और परित्याग सम्बन्धी अनेक बातें नाटकार अपवाद को राम के नाम पहुंचने से पहले दर्शकों को बता देना चाहता है। वे तथ्य निम्न- लिखित है- (१) राम को स्वय अपवाद पर विश्वास है (१/१२, १४) अब लक्ष्मण चित्रावली (प्रथम अक) का विवेचन सीता और राम से करते हैं तो कवि को अग्नि परीक्षा दृश्य के विवेचन के समय सोता की पवित्रता के विषय मे पहने का अवसर प्राप्त हो जाता है। २-राम सीता को अपवाद के कारण नहीं छोड़ रहे हैं किन्तु । जनता के प्रति अपने सर्वोच्च कर्तव्य का ध्यान रखकर ही सीता परित्याग कर रहे हैं। उनके कार्य बनता के प्राक्षेप से शुन्य होने चाहिये। कर्तव्य के इस महान बादशं को ध्यान में रखकर राम सब कुछ बलिदान करने के लिए तत्पर हो जाते हैं (१३१२, ४१, ४२, ४४) राम अपने प्रथम भाषण में ही (११७, ) यह स्पष्ट कह देव है कि वे प्रजा के लिए सब कुछ छोडने के लिए तैयार हैं । उनका यह क्यन सहृदयो को दुखा कुलित कर देता है । ३-सीता, राम के इस महान् प्रादश को जानती है पौर यदि मावश्यकता चाहे तो वे स्वय ही सेबक के ममे बनवास स्वीकार कर सकती हैं (१।१२)। सौता परित्यक्त हुयी. यह कोई महान घटना नहीं। महान घटना तो यह है कि वे ऐसी निर्मम दशा मे त्यागी गई (१४९) कि उन्हें यह अवसर ही न प्राप्त हो सका कि अपना प्रसव कहाँ पौर कैसे करें। ४--राम एक नये राजा हैं (१०८)। राज्य का सारा भार उन पर है। प्रत्येक नया नियुक्त व्यक्ति राम के उत्तरदायित्व, । उलझन और सतर्कना का अनुभव कर सकता है, जो उसके कर्तव्यों के कारण प्रत्य: सामने प्रातो हैं । राम एकाकी हैं (१॥३) । उनकै गुरुजन, जो मंत्रणा दे सकते थे, दूर हैं (१.६) । ५-चित्र दृश्य यह सिद्ध करता है कि राम और सीता परस्पर कितना स्नेह करते हैं । वे चित्र में भी वियोग नहीं सह मकते (१२७, ३०,३३)। ६---भवभूति ने प्रथम म क मे ही सप्तम प्र क के विषय में विचार किया है प्रोर गर्भ व्यापार (१।१०,३३) के साथ साथ जम्भक का वर्णन की पहचान में काम देता है तथा भागीरथी (१।२३) एव पृथ्वी (१३५१) का भी सकेत दे दिया है । ये दोनो मागे सीता को रक्षा का कार्य समान रूप से करती हैं। ११२ ४-प्रथम पक को मापा समृद्ध मोर काव्यमय है । कोई भी ऐसा वाक्य या पद नहीं है जिसके लिए हम कह सके कि इसे ऐसा न होना चाहिये । एक भी शब्द ऐसा नहीं है जो गम्भीर भाव न भ्यक्त करता हो । शम्द मानव हृदय को स्पर्श करने की क्षमता और अर्थ रखते हैं। ५-द्वितीय और तृतीय प्र म हम भवभूति को एक दूसरे रूप में हो पात हैं। शम्बूब की क्या बाल्मीकि रामायण और पमपुराण में हैं । किन्तु उन दोनो छ यो मे यह स्थल काव्यात्मक और कलात्मक नहीं है । भवभूति के 'उत्तर' क दूसरे और तीसरे अह म जो वैशिष्ट्य है वह मद्वितीय है । भवभूति के यह भ पूर्णतया मोलिए है इसमें एक बहुत बड़ा मनावैज्ञानिक कारण निहित है । रामके चरित्र में कोई विशेष परिवर्तन और विकास नहीं है। केवल उनकी करुणा विशद मौर पचवटी दशन म उमडने दाली । सीता एस गतिशील भावधाराम बरती है। ये पति की उपस्थिति पोर पति क विलापो से प्रभारित होती है तथा सत्मा को पर चरम भावना के राम जा पहुँचती हैं । बहुत म मनोवैमानिक चढाव उतार भावा म आते हैं। तृतीय पद के सातवें लोक म सोता रामक प्रति गम्भीर बाणिक भावा की अनुभूति करती है। वह राम को मायं पुत्र कहन म मन का असमथ पाती हैं और 'राजा' पढ़ती है। ३.४६ मे बह अभिव्यक्त करती हैं कि उनमा हृदय राम के प्रति निमंन है श्यापि उन्होन मभी कुछ काल पहले राम की दशा दखो है उनकी बातें और विनम्रक्षमा प्राथना सुनी। वस्तुत. सीता पो यह प्राशा नहीं थी कि राम समा प्रार्थी होगें। सीता उन्हे क्षमा परती हैं । सीता का यह भान न था कि राम मह नहीं जानते कि उनकी पत्नी जीवित है और उन्ह अपने अपराध की क्षमा भी मिल जायगी। कवि को विशेषता यह है कि वह सीता को सदैव एक पादर्श प्रमिका और पत्नीक दो रूप में उपस्थित करता है, न कि पति ये अनसन नायिका ने रूप मे। इम सीता के उज्पल चरित्र के तीन मुख्य व्यापार म हैं- १-गम को दुखित और निप्कनुप दस सौता शोधता स सहायता के लिए भागे माती है (३.१०), किन्तु पोडा सा प्रतिविम्बित होते ही पृषर हो जाती है (१२). उनका यह पृषम होना भाग्य को दोष देने के साप होता है (३३२२)। सीता को विश्वास हो जाता है कि राम ने उन्हे भला नही दिया है । परित्याग एक महान रहस्य है । २-दितीय दशा मे सोता एकम और मागे सही हुई है। जब वासन्ती राम को स्वकीय स्त्री के प्रति निर्दय व्यवहार करने के कारण बुरा भला कहती है, तब सौता ऐसी पारशं नारी का प्रतिनिधित्व करती है, जो अपने पति के पक्ष में पति को निन्दा रने वाली दासतो का निवारण करती है (३।२६,२७)। मपनी चरम सीमा में यह बात तब पहुँच जाती है जब सोना, राम के लिए अपने स्वाभिमान का उत्सर्ग कर देती है (110) सेकिन तमसा का कथन (AIR) सीता को उसकी वास्तविक दशा का ध्यान करा देता है। ३-इसके पश्चात् दितीय प्रतिक्रियात्मर प्रवस्था पाती है (३१४३,४५), जो प्रथम अवस्था से अधिक मर्मच्छिा नहीं है। इसके पौधे ही एक उपरतिक्रिया होती है जबकि सीता को ज्ञात होता है कि उसका पति उसे पहले बसा ही स्नेह करता है और यहाँ तक कि वह पिसो भन्य स्त्री को स्नेह मही दे सकता । फलतः उसने द्वितीय विवाह भी नही किया है । यहाँ दम्पति का पान्तरिक मिलन पूर्ण हो जाता है (३४) यह सष्ट है कि एक कवि मानव हृदय की गहराई में जितना ही उतर सकता है मोर पारम्भ से ही पन्त का एक परिणाम निकाल लेता है, उतना ही महान कलाकार है क्योकि उसमे नमगिकता है। ऐसी ही मानवीय भावनायें नाटक के प्रत्येक पृष्ठ में पाई जाती हैं। उत्तर रामचरित के छ अफ का परिचय दृश्य भवभूति ने एक बहुत ही प्रतिभावान मौर यथार्य मनोवैज्ञानिक के रूप में चित्रित किया है। कवि के नाटक के अन्तिम मकों में छठाक महान है । इस मंक के लिए लेपक द्वितीय पंक के विष्कम्भक से हो भूमिका निर्माण करता रहा है। यहां हम प्रथम बार भावमेघ यज्ञ के विषय मे सुनते हैं। ।
राम इम वस्तु को ३।४६ में दृढ करते हैं । चौये क के अन्त मे हम प्रश्व का प्रत्यक्ष दखते हैं। ६१५ में पिता और पुत्र में दृष्टि को समता माश्चर्यजनक है । मह एक बहुत ही कलात्मक है बोर कालिदास के शाकुन्तलम् के सप्तम अ क स मिलता है। स्वीकृति को कौतूहलता बडी उत्सुकता के साथ अन्तिम अक के मत तक बनाई रखी गई है। उत्तर रामचरित के कुछ अन्य गुरण उत्तर रामचरित भवभूति की सर्वोत्कृष्ट कला का सुदर निदर्शन हैं । अपने गुणो मे यह नाटक नाट्य जगत को सुन्दरतम सृष्टियो से में एक है। यदि हम उत्तररामचरित के विष्कम्भको की तुलना महावीर धरित और मालती माधव से करते हैं तो हम कदि की एक अन्य बढी हुई सफलता को पाते हैं । उत्तर रामचरित म उसने विष्कम्भको का मावण ना की व्यवहार किया है । महारचरित और मालतीमाधव म एक ही व्यक्ति घटो भाषण करता रहता है और वह यह भी बतलाता है कि वह कौन है ? और क्या कर रहा है। उत्तर रामचरित क विष्कम्भकों मे पात्र सवादों मे सूचनायें दे देते हैं और सामाजिक इस बात का नही परख आता है कि वे सूचना देन के लिए हैं । उत्तर रामचरित के द्वितीय और चतुथ विष्कम्भक मत्यात सुदर हैं, जिनम एक भी शब्द व्यर्थ का नही है और जो पूर्णत स्वाभाविक भी हैं। --- भवभूति क 'उत्तर म नाटकीय विपरीत लक्षणा वे कुछ श्लाघ्य विकास देखत ही बनत है । चित्र दशन अ क म जब राम मोर सीता पूर्वानुभूत दुखो का स्मरण कर मानद ल रहे है वे चित्रो को पोर, जो भूतकाल + स्मृति चिन्ह हैं तथा जिनका उपयोग वतमान में आनन्द लना है योडा बहुत देखते है । सामाजिक प्ररबाद की बात पहले से ही मुने हुए होते हैं (१६) और उन दोनों के भाग्याकाश पर उमड़ते हुम दस के काले बादलो को देखत हैं । राम उस समय मी (१९२३) कुछ इस भरे सकत करते हैं और अपनी सोई हुई पत्नी के पास (१॥३८) न जाने क्या-क्या वियोग विषयक बात सोचते है। इसी समय प्रतोहारी बहती है 'पा गया' यह सब दशको पर प्रभाव डालन हैं। सेखक ने १२ वर्ष दीर्घकालीन अन्तर को जो प्रथम और हिनाय मक के बीच मे है, अत्यन्त कुशलता मे मेतु द्वारा साधा है। यह विधारणीय है कि यह मनेक प्रकार स एतत् सम्बन्धी तथ्यों को हम समझाते हैं । द्वितीय म क का प्रति चित्रण (२१२७) बोर युवक मयू की उपस्थिति (१९,२०,२१), गज के शावक को पूर्ण युवावस्था (३।१६,१७) इत्यादि सकेत देत है कि इस द्वादश १५ के समय में भनेक परिवर्तन वोर विकास हुये हैं। व्यक्तिमो म पोर म्याना म भी विविध परिवर्तन हुये है । जनक राज्य छोड चुके हैं (१९) । लपणासुर मारा जा चुका है । ऋष्य युग का द्वादश वर्षीय यज्ञ भी समाप्त हो चुका है किन्तु पर्वत वैसे ही (१२७) स्थित है, उनमें काई परिवर्तन नहीं दिखाई देता है । उत्तर के दोष मनेक थप्ठताओं के साप-साय उत्तर में कुछ दोप भी है, जिनका सकत अनेक समालोचकों ने दिया है । उनके कुछ प्रमुख दोष निम्नलिखित है- १-कुछ समाल एचकों का कहना है कि भवभूति को भाषा सगीत रहित और भारी है। उसमें लम्बे-लम्ब वर्णनों मोर लम्बे लम्वे समासो का प्रयोग खुलकर किया गया है। यह पचम मोर पष्ठ बक में विशेपकर देखा जा सकता है। २-मवभूति को क्लग वैशिष्ट्य के विषय म कुछ दातें खटकने वाती सामने माती हैं जैसे- (4) उत्तर को प्रस्तावना मे सूत्रधार कहता है 'एषोऽह कार्यवशात् मायोद्धक: 'यह कपन दोपपूर है क्योंकि मभिनय पयोध्यावासी के प्रवेश के साथ ही प्रारम्भ हो जाता उचित यह था कि प्रस्तावना को समाप्ति के बाद और सूत्रधार के रगमच छोर देने के बाद अभिनय .
A प्रारम्भ हाता । धनञ्जय आदि नाट्यशास्त्रियों के अनुसार यह प्रस्तावना दोषपूर्ण है। (1) तत्पश्चात् (प्रविश्य) नट -भाव प्रेषिताहि इत. स्वग्रहान महाराजेन लका समर सुहृद यह भी दोषपूर्ण है। श्योकि प्रम्नावना के बाद नर का प्रवश न होना चाहिए । पुन नट सूत्रधार को "माव' कहता है मौर मूत्रधार उस 'भारिप' आदि कहता है। माय, मारिप प्रादि शब्द केवल प्रस्तावना म ही प्रयुक्त किये जा सकते हैं । यहाँ यह नहीं कह सात कि सभी प्रस्तावना समाप्त नहीं हुई, क्योंकि बागे ही मिमिति विधान्त धारणानि चत्वर स्थानानि, 'वैदेशिकोऽस्मि इति पन्छामि। (स) मूत्रधार पूछता है किमिति विधात चारणानि । नट उत्तर दता है प्रेषिताहि इत मातर' यह अनुपयुक्त है। मयोंकि बशिष्ठादिका की उपस्थिति या अनुपस्थिति सगीत आदि के प्रारम्भ मौर समाप्ति स सबन्ध नहीं रखती। उनका सगोत से क्या सम्बघ? कवि तो क्वल सोना परित्याग के समय उन्ह दूर रखना चाहता है. जिमकी सपना वह दशका को देता है किन्तु मूचना रगमच के मनुपयुक्त है। (6) कला वैशिष्टय में यह भी दाप है कि वशिष्ठ मादि प्य शृग पाश्रम गये हैं और वहा से अयक के द्वारा सदश भेजते हैं कि 'वत्से पठार गति नानौतासि' यही पर चिन्तनीय है कि उसी दिन प्रात उनकी सास गई हैं और प्रप्टावक्र उमी दिन भयोध्या दोपहर व पश्चात पहच जाते हैं, सपा सीता भी दोपहर के बाद ही परित्यक्त हुई है एव दोपहर के बाद ही वे बच्चों का प्रसव करती हैं । यदि ऐसी बात है तो मातायें कुछ पटे पूर्व सन्निकट प्रसवा सीता का जान जाती और उसे छोड़कर न जाती। क्योकि तेरह वप व बाद तो वे मिली घी तथा सभी माताओं को सीता सत्य त प्रिय थी। प्रसवोपरांत वे यज्ञ म जाती हैं। (A)निष्ट ने राम को सदश अष्टावक्र के द्वारा मादेश रूप में भेजा है। वे जाते समय स्वयं भयोध्या में पर्चा नहीं कह गये । वशिष्ठ की यह भूल विचित्र है तथा वशिष्ठ का यह कहना भी जामात यर्शन वय उपयुक्त नही है। वयोकि इससे राम को अयोग्यता प्रकट हानी है। यह लेखक की वृद्धि है। (र)लका से लौटने के बाद केवल १४ दिन उत्सव हुए और १५दें दिन वशिष्ठ आदि ऋष्य शृग के यहाँ गये । उसो दिन अष्टावक पाये और सीता के पुत्र भी उत्पन्न हुये। सोता, राम के पास केवल १५ दिन ही अयोध्या में रही, तब कैमे सीता को गर्भ धारण हुमा और बालक हुयै । इस विषय में कवि मौन है। यह टि क्षम्य नहीं कही जा । सस्ती। . (ल) सप्तम अंक में भाल्मीकि कहते हैं कि शत्रुध्न लवणासुर को मार कर मारहे हैं । 'उत्खातलवएो मधुरेश्वर. प्राप्तः.. लवणासुर के कार चढाई १२ वर्ष पहले प्रारम्भ हुई थी, जिसकी सूचना हमें प्रथम क में प्राप्त होती है । प्रश्न सामने आता है कि क्या बारह पं तक मनवरत युद्ध होता रहा ? भोर राक्षस पर विजय नहीं मिली। तब अश्वमेघना प्रारम्भ से हुमा, जो सभी पापो के हरा देने पर ही हो सकता है। यह भी एक बही पटि है। ३-शब्द, याक्य मोर पद्य को पुनरुक्त करने की प्रवृति भवभूति में अधिक पाई जाती है । नाटक में विनोद के लिए कोई स्थान नहीं। भवभूति का विनोद जो कुछ हैं वह मस्तिष्क सम्बन्धी है । भवभ ति के नाट्य मे हास्य कोचमी का कारण यह है कि लेखक अपने विषय को प्रायः गम्भीरता मोर दार्शनिकता से लेता है। यह समझता है कि उसे कुछ शिक्षा देनी है। भवभूति अपनी प्रदर्शन की प्रवृत्ति को रोक नहीं पाये हैं और -सही कही इसके लिए उन्होंने विशेष परिश्रम किया है । अशेष नाटक में रस वस्तुतः गया है किन्तु इसकी अभिव्यक्ति मे कृत्रिमता भा गई है। राम के सम्बादो में सदैव इमा विवेचन होता रहता है । कालिदास की भाति उनका रस प्यग्य नहीं है।
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भवभूति को शैली
भवभूति की रचना के सभी अगो को पढ़ने के पश्चात उनकी माली
कविषय में जानना सरल हो जाता है। सस्कृत रचनाकारों की तीन
रिया प्राचीन पण्डिनो में पालन पो । पाचाली, गोटी, और वैदर्भी।
इनपदी शं नो प३म मरल होती हैं । महाकवि कालिदास इसी वैदर्भी
रोति दे कवि थे और उन्होंने अपने सभी ग्रन्थ इमी शैली में लिखे,
विनुभवभूति का गौडी और वंदों दोनों शेतिमो पर समान अधिकार
था। उनी भी शेती के कुत्र उदाहरण निम्नलिखित है-
बाम और मरस भादो को व्यञ्जमा उनका रचनामों में स्थान
स्थान पर मिलती हैं। जब राम दण्डक्वन में धन देवता बासन्ती में
मिलते हैं तो वह वह कितन सुन्दर मौर मार्मिक शब्दो मे अलहना
वं जोविन स्वममि मे हदयं द्वितीय'
त्वं कौमी नयनोरमृतं चमग ।
इत्यादिभि वियशस्नुस्थ्य मुग्धा
नामेव शान्तमा किमिहीचरेण ॥ (३/३६)
तुम्ही मेरा जीवन हो तुम्ही मेरा दूसरा हृदय हो, तुम मरे नेत्री
को पानी हो और तुम शरीर मे प्रभुत हो, मादि सी तरह की बातें
कह कर पहल तो पापा उस मुग्या को बताया और बाद में जान
दीजिये कहने से क्या लाभ
राम सीता को विष दिखाते हुए कहते हैं-
म्लानस्प जीवकसुमस्य विकासनानि
सन्तर्पणानि सकलेन्द्रिय मोहनानि ।
एतानि ते वयनानि सरोरुहादित
कर्णामृतानि मनसश्च रसायनानि ॥१॥३६ }
तुम्हारे ये मघर वन हो मेरे मुरझाए हुए जोवन कुमुम को खिलाने
पाले हैं, वे मुझको प्रसन्न करत है और मेरी इन्द्रियो को
तम्त
करते हैं।
वे मेरे कानो के लिए अमृत के समान है और मस्तिष्क के लिए प्रोपति के समान । सोती हुयो सीता को देख राम के मन में उमहते भावो मे यजना देखिए- इथं गेहे लक्ष्मीरियममतवतिर्नयनयो- रसावम्या म्पर्शी वपुपि दहलचादन रसः। श्रय पाहु वएठे शिशिर मसूरणो मौक्तिक सर किमस्या न प्रेयो यदि परम सहयस्तु न विरहः ।। (१/३८) यह मेरे घर की मदमी है, मेरो पाखों के लिए प्रपन रूपी बाजन के समान है, मेरे के लिए उसका स्पर्श चन्दन के रेप के समान है । मेरे पले मे पड़ी हुई उसको बाह ठण्ड और चिकने मोतियों को माला से समान है । इसकी पौनसी वस्तु मुझ प्रिय नहीं है । बस, इसका विरह ही मैं सहन नहीं कर सकता। इस प्रकार वैदर्भी रीति के मनेक सरल और सुन्दर उदाहरण हमको मिलते हैं । भवभूति ने बदलती हुई शैलियों का प्रयोग बही शीघ्रता और कुशलता से किया है। एक ही श्लोक मे हमको गोटी और वैदर्भी दोनों रीतियो के उदाहरण मिल जाते हैं-एक ही लोक में कोमल भाव और वीर रस को यजना दोनों के उदाहरण देखिये यथेन्दामानन्द भजति समुपोढे कुमुदिनी तथैवाम्मिन् दृष्टिमम रुहकाम पुनरयम् । मए कारक र क्वणित गणगंजत गुरु धन- धूत प्रमा बाहुविक्च विक्गलमण मुख । (५/२९) उत्तररामचरित के इस श्लोक मे हमको सव के मन में होने वाने बन्तदन्द का उदाहरण मिलता है। जिस प्रकार पूर्ण चन्द्र के उदित होने पर मुदिनी खिल उठती है उसी प्रकार मेरे नेत्र भी इसको देखकर प्रसन्न हो रहे हैं, किन्तु मेगे यह पुजा युद्ध करने को ध्यास हो रही है, जिसने भीषण मावा करने १२० वाले पनुप को धारण कर रखा है और जो भयङ्कर वीर रस से भर गौही रीति के तो भवभूति माचार्य ही हैं । इस रीति के उदाहरण उनके सब नाटकों में मिलन है । वही दामन्ती जो राम को उलाहना देते समय मोमलकान्त पदावली का प्रयोग करती है, दण्डकारण्य की भोपपता का वर्णन इन शब्दो मे करती है- कण्डूलद्विप गएडपिण्ड क्षणोत्यम्पेन मपातिभि- धर्म समित धन्धनैः स्य पुसुमैरन्ति गोदावरीम् । छायापरिकरमाण चिकिग्गुम व्याकृष्ट कीटत्वचः । फूजस्तान्त कपोल कुस्कुटकुला: कूले कुनायमा ॥ (OTE) उपयुक्त पद्य मे भवभूति ने अनुप्रास और समास का चमत्कार दिखाने में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन पिया है । श्लोक को पढ़ते ही दण्डकारण्य मे गोदावरी तट का दृश्य चित्रित हो उठता है। पञ्चम मक में लव के पराक्रम का वर्णन करते हुए पन्द्रकेतु युद्धस्थल का वर्णन करता है- आगजग्दिरिकुञ्जकुञ्जरघटानिस्तीर्ण कर्णज्वर, ज्यानिर्घोपममन्ददुन्दुभिरवैराधमातमुत्तम्भयन्। वेल्लभैरवरुण्डमुण्डनिकरारी विधत्तभुवं, तृष्यकालकरालवझविघसच्याकीर्यमाणामिव ॥५ अपने धनुष को डोरी सोचकर जब सब टवार करता है तो पर्वत कन्दरावों में गर्जने वाले हाथियो के कानो में दर्द होने लगता है। बजते हुए नगाहो और कट कर गिरते हुए हण्डमुण्डो के साथ बह शन मिल रहा है। बिखरे छटपटाते पण्डों से व्याप्त पृथ्वी ऐसी लगती है मानो मुत्य के मुख से छूटकर मृत्यु के भोजन के भाग इधर उधा विसर गए हैं। भवभूति को गौड़ी गली का एक उत्तम उदाहरण उत्तररामचरित १२१ के छठे अब में विद्याधर के द्वारा अपनी पत्नी से लव मोर चन्द्रकेतु के युद्ध का वर्णन है- रणत्करणमभणक्चणितकिङ्किणीकं धनु- व॑न्द्रगुणाटनीकन कगल कोलाहलम् । वितत्य किरता: शरानविग्त पुनः शून्यो- विचित्रमभिवर्तत भुवनमीममायोधतम् ॥ यह भवभूनि की शैली की ही विशेषता है कि मावानुसार छन्दों का प्रयोग करते है। उत्तररामचरित में उन्होंने शिखरिणा छन्द का विशद प्रणेग किया है जोकण रस के भावो की भाभन्यजना के लिए सहाय छन्द है। यह तो मवभूमि को कविता शैली के विषय में अभी तक विवेचन किया गया, भवभूति की गोली भी अत्यन प्रौढ, परिमानित और । भवभूमि के गद्य को देखकर ऐमा ज्ञात होता है कि मवभूति सम बाल के है जबकि दण्डो के प्रादानुसार 'पान ममामभूयस्त्वम्" प्राज और सपास हो गद्य के प्राण तथा कठिन गद्य ही श्रेष्ठ माना जाता था। गद्य का प्रयोग करम में भवभूति में लम्बे लम्ब समासों और वाक्यों से काम लिया है, किन्तु भावो को तीव्रता तथा कोमल भावों की अभिव्यन्जना मतहीन सरल गद्य का भी प्रयोग किया है। उत्तररामचरित म गम के चित्र का देवकर मीता कहती है-'अहा दल नवनीलारपद श्यामलस्निग्ध ममृण्मासलेन देह मौभाग्यन विस्मय- स्तिमिततातदश्यमानमाम्यमुन्दर श्री नादर सण्डितसर शरासन शिखहमुग्यमुखमहल अार्यपत्र प्रालिम्वित ।' भवभूति की पाली का अध्ययन करन ममय हम उनके इस कपन को सामने रखना होगा, जो उन्होंने लेखन का मादशं स्वीकार दिया है- यत्पादत्वमुदारता च वचमां यमार्यतो गौ खम् । ताचेम्ति ततस्तदेन गमकं पाहित्य वैदग्घयोः ॥ १२२ भाषा को अच्छी जानकारी और विभिन्न शैलियों का सफल प्रयोग Aथा अर्थ को गम्भीरता हो किसी की विद्वता और बुद्धिमानी के लक्षण हैं। भवभूति का प्रकृति-चित्रण प्रकृति-नटी चिरकाल से मानव को सगिनी धनकर अपने विविष मतरगें आपक उपादानो द्वारा उसके जीवन मे मिलकर एक होती रही है। कभी कभी वह वन्य-मानर को जननी बनकर अपनी सुखर एव स्निग्ध कार में आश्रय देती रही है, तो कभी सृष्टिकर्मा की अनुप धावयाँ अपन में समाहित करके अपनी प्रोर सृष्टि को आकर्षित करती हुई विधाता को विधायिनी शक्ति का मामास देतो रही है तो कभी सहृदयो को सहनरी के रूप में अपने मनोहर हावभावों से रिझाती हुई मानव को कालिदास और भवभूति जैसी विभूतियों को प्रदापिनी बनती रही है। यही कारण है कि हमारामादि-काव्य- 'मा निषाद प्रतिष्ठात्यमगम: शाश्वती समा. यत् कामिथुनादेवमवधी: कासमोहितम् ।' वे रूप में प्रकृति व मदु मञ्चल में कणा के स्रोत के साथ प्रकट हुमा था। प्रकृति में इस प्रवृत्रिम सौन्दर्य पर ही रोक कर आंग्ल कवि बायरन Byron कह उठा है- 'I love not the man less But more.. महाकवि Wordsworth सो प्रकृति को मानन्दम्य ही मानते है । पवतो की तुङ्ग यसलायें और निझरो का मादक सगीत उन्हें पानन्दालायित ही दिखाई देता है- "There was joy in the mountains There was joy in the fountains.' - nature १२३ हिन्दी काव्य के Wordsworth कवि मुमित्रार दन पन्त तो मनना-मौन्दर्य को भी प्राकृतिक सुपमा पर न्योछावर कर देते हैं- 'छोड द्रमों की मृदु छाया तोड प्रकृति से मा मया थाले तेरे बाल जाल में कैसे उलमा हूँ लोचन । भूल अभी में इस जग को।' मानव का मृष्टि के आदि से ही प्रकृति से तन्तु-पट जैसा मम्बन्ध रहा है। हमारा सारा माहित्य प्रकृति के रमणीय अञ्चल में विरचिन टुमा है । हृदय गन मनोभावों के प्रवल हो उटन पर मानव का प्रकृति में तादाम्य अधिकाधिक हा जाता है । मानद की दृष्टि में प्रकृति का संवेदनशील स्वरूप ही हिन्दी माहित्य को 'सायावाद' मी वस्तु र सका है। मानव क गुप दुघ मति महचरी बन कर तदरूप हो जाती है। प्रात कालीन मय-समोर, पक्षियों का नोडो म मृदु-कलरव, कायन की काकली भोर पोहा को 'पी वहां', अलिव ६ का गुन-गुन की मूर भाषा म मदु-मगीन प्रमूनों मादा सुरभि, मरितामों का कल वन निनाद, मासावकों को हृदय दारी कोहार्य वलिकाओं पर गबनम की भिनपिलानी मणि माला, खेता मली दूर दूर तक हरीतिमा, कपा का प्राक्त दकल, दिनमणि को रजत रमिओं क मद-चुम्बन से हिमाच्छादित लघेणियों को इन्द्र धनुष सा विभा प्रतीक प्रमोद प्रदान करता है तो चिनाकुन मानस म प्रकृति के मना रजक उपादान वृश्चिक वान बन पान हैं । इस न क मयोग म जो प्रकृति कलि- निज बन माती हैं, वियाग की प्राणाधातिनी मनाध्यथा बिनु गोपाल रिम मई पूज' का कथन वमी प्रकृति के लिए करवा देती हैं। सुम्प की अवस्था मे जो मप मुरति-मामि निवारक होते हैं तथा प्रियवियोग म उन मेघों को ही दूत कर्म करना पडता है। १२४ मृगया, केलि, बनविहार, तपभूमि, कृषिकर्म आदि कार्यों में प्रकृति से हमारा सयोग होता रहा है। मानवमान को अपनी स्निग्ध एव सुखद कोह प्रदायिनी-जननी वन्य-मानव से लेकर आधुनिक मानव को भी प्राश्रय प्रदान करती रही है । मावक एव विज्ञ जनो की विर सहचरी मह प्रकृति मुग युगान्तर से मानव जीवन में एक सार होती रही है। साहित्य समाज का दर्पण होता है । मानव हृदय को उदार वृत्तियो का सत्य शिवम् सुन्दर' को भावमयी पृष्ठभूमि पर समष्टि रूप में प्रस्तुतीकरण ही साहित्य है । हमारे मादि साहित्य पर्यात वैदिक साहित्य का सर्जन भी प्रकृति की रम्य सुषमा की परिधि मे हुआ है। जहाँ तक काव्य का प्रश्न है, साहित्य के व्यष्टि रूप के कारण प्रारभ से ही प्रकृति काव्य की भन्तरात्मा म भारती रही है वेदो का सर्जन ही वन्य प्रदेशो मे हुमा है। भगवान वेदव्यास, वात्मीकि आदि महर्षि तपोवनो को मलकृत करते रहे हैं। यही कारण है कि लक्षण अन्यों में लक्ष्य अन्यों के लिए प्रकृति-वर्णन (विशप रूप से महाकाव्यों के लिए) का निर्देश किया गया है। काव्य का सर्वोत्कृष्ट रूप नाटक मा नाट्य है । रूपको के दृश्य एवं श्रव्य होने से जहां उनकी उपयोगिता काव्य मे द्विगुणित हो जाती है, वहा नाटकीय-दायों के प्रकृति के नाना मनोरम उपादान अपने विविध परिधानों से परिवेष्टित होनाटक की चारुता में चार चाद लगा देते हैं । भारतीय नाटकों के दृश्यो मे प्रकृति प्रारम्भ से ही सजीव रही है । नाटक ही नहीं अपितु अशेष वाङ्मय (कविता, गद्य, पास्यायिका, गीतिकाव्य) में प्रकृति को छापा परिलक्षित हुई है। इस भाति बन-श्री हमारे साहित्य में नीर-क्षीर की भांति एक होती दिखाई देती है। सास्य दर्शन के अनुसार प्रकृति एक स्वतत्र तथा अविनाशो सत्ता है। इसके 'सत्व रजस् तमस्' तीन गुण होते हैं । यूनानी दार्शनिक प्रकृति को परमात्मा का अनुकरण बतलाते हैं। वे प्रकृति मे ईश्वरीय सत्ता का आरोप कर लेते हैं। इसी माध्यात्मिक सत्ता की मनुकृति मात्र १२५ प्रकृति को पनुकृति काव्य है । इसीलिए वे कान्य के रस को 'ब्रह्मानन्द- सहोदर' नही मानते। उनका कथन है कि अनुकृति की अनुकृति अकृत्रिम हो ही नहीं सकती। जो भी हो इपना मत्य है कि प्रकृति को इसी माध्यात्मिकता में आधार शिला पर ही भारतीय वृक्ष पूजा के विश्वाम एव परम्परा की प्राचीरों पर धार्मिकता का भव्य भवन सहा है। कालिदास के नाटको मे हमे प्रकृति की रम्य रूप-राशि देखने को मिलती है । 'अभिशान शाकुन्तलम्' का सम्पूर्ण कथानक प्राकृतिक वैभव से पाबद्ध है । तपोवन ना रम्य एवं सजीव वर्णन किसको विमुग्ध नह करता । रन-लताओं एव तह पादों का अभिमिग्यन होमतीव मुन्दर है। प्रथम दृश्य में मृगया हेतु आगत दुष्यन्त का मृगानुमरण पति मुन्दर है । पूरे नाटक की गतिविधियां प्रकृति की तपोभूमि में ही पटित होती हैं । कालिदास के नाटक होनही महाकाव्य भी प्रकृति सौदर्य से मोत प्रोत है। कुमारसंभव मे हिमालय का वर्णन अत्यन्त मार्मिक एव हृदयस्पर्शी है । भास अश्वघोष प्रादि का साहित्य भी प्रकृति को नैसर्गिक मुपमा से युक्त है। किन्तु सस्कृत साहित्य मे जिस महाकवि के प्रप विविध भोर सांगोपाङ्ग प्रकृति चित्रण से महनीय हैं जो इस क्षेत्रका सम्राट है वह है याम् विभूति भवभूति । शास्त्रीय द ग पर प्रकृति के दो रूप दृष्टिगत होते हैं-मालम्बन तथा उद्दीपन । लक्षण ग्रन्पों में प्रकृति का उद्दीपन रूप हो अपनाया गया है। यही नहीं प्रकृति कोमल मोर कठोर रूपों मे भी विभक्ति हो गई है प्रकृति का मानकीकरण भी प्रकृति वर्णन का विशिष्ट स्वरूप रहा है। वाहय् प्रकृति का चित्रण महाकवि भवभूति ने अपने विख्यात नाटक 'उत्तरगमचरित्र' में प्रकृति का सजीव एव विशद वर्णन किया है । महाकवि का यद्यपि प्रमुख लक्ष्य 'एको रस: करुण एव' का प्रतिपादन करना ही था किन्तु कथावस्तु एव घटनाक्रम के प्राकृतिक अचल मे घटित होने से तया वगन प्राधान्य होने से प्रति शेण न होकर पर्याप्त रूप में उच्चतर हो गई है। करणा- १२९ U पारावार को चचन लहरियो को प्राकृतिक दृश्यो का समोर सुरभित क्यि रहता है । भवभूति ने यदि प्राकृतिक शोभा को इतना न सजोया होता तो निश्चित हो करुणा-मावेग को सहन करना सहृदयो के लिए दुष्कर होता। चित्र-दर्शन के प्रथमा से ही करुण और प्रकृति एक्सार होती दिखाई देती है ।। कालिदास को भौति हो भवभूति की दृष्टि सर्वप्रथम तपोवन पर ही पड़ी है- "एतानि तानि गिरि निरिणीतटेप बैग्नानसाश्रित तरूणि तपोवनानि ।" मतीत को विरह-व्यापिनी घटना को क्टु स्मृति पचवटी के सूप'एसा प्रसङ्ग से प्रदीप्त हो उठती है और सीता वेदना पूर्ण मार्तस्वर मे क्रन्दन कर उठती है "हा। आर्यपुत्र । एतावत्त दर्शनम्।" करुणा की यह प्रतनु मन्दाकिनी कुछ ही आगे प्रकृति को पन्तस्थ कर लहरें मारने लगती है । प्रकृति की स्वतत्र सता भी वेदना के मस्तगत सूर्य की रक्तिमा से प्रारक्त हो उठती है। वाल्मीकि की "वैदूर्यविमलोपादका" पम्पा मासुग्रो से भाई-दृष्टि पय मे बारही है - "एतस्मिन्मद कलमल्लिकाक्षपक्ष- व्याधूतस्फुरदुर दण्डपुण्डरीका: बाप्पाम्भः परिपतनोद्गमान्तराले सदृष्टाः कुबलयिनो मया विभागा॥" माल्यवान पवंत, वे उत्तम शिखर पर माश्लिष्ट मेघ को दिखाकर महाकवि ने व्यजना का परिचय दिया है- "सोऽयं शैलः कुसुमसुरभिमल्यिवान्नाम यस्मिन्। नील: स्निग्ध, यति शिसरं भूतनस्तोयवाहः ॥" १२७
प्राकृतिक सुपमा से परिपूर्ण चित्रदर्शन भी करणा से माई हो
उठता है कि राम को भी 'विरम विरमातः परन क्षमोऽस्मि' कहना
पहता है। महाकवि का प्रधान लक्ष्य करुण रम को प्रधान के रूप में
सप्त करते रहे हैं। यही कारण है कि प्रकृति भी करुणामय हो उठी है।
भवमति ने वाह्यप्रकृति के विविध म गों का चित्रण किया है।
प्रकृति के मसुन्दर चित्रों का भी समावेश हो गया है । देखिये.-
'कण्डल द्विपगण्डपिण्ड कपणोत्कम्पेन संपातिमि
धर्मस्र सितबन्धश्च कुसुमं चन्ति गोदावरीम् ।
AM)" छायापस्किरमाणविकिरमुरा व्याकृष्ट कोटलच
फूजत्क्लान्त कपोत कुक्कुट कहा: कूले कुलायनुमः ॥'
प्रकृति के कठोर चित्र भी यत्र तत्र मिल जाते हैं
निफूजस्ति मिता: क्यचित्क्वचिदपि प्रोच्चण्ड सत्त्वस्वना:
स्वेच्छासुप्तगमोरि भोग भुजगश्वास प्रदीप्नाग्नय
सोमान पुटरोदरेप विरलस्वल्पाम्भसो यारवयं
तृप्यद्भिः प्रति
सूर्यकैरजगर स्वेदद्रवः पोयते ॥"
प्रकृति के शास्त्रीय स्वरूप मालम्बन और उद्दीपन भी
उत्तर रामचरित मे समाविष्ट हैं । आनम्वन रूप प्रकृति का एक चित्र
रामर
दृष्टव्य है:-
'एते त
एच
गिरयो विम्वन्मयूरा,
स्तान्येव मत्तहरिणानि वनस्थलानि ।
आमजुवललनानि तान्यमूनि,
नीरधनीपनिचुलानि सरित्तटानि ।'
सीता-निर्वासन के कारण राम को पंचवटी देखकर आत्मग्लानि
मोर पश्चात्ताप हो रहा जिसकी एक मात्र उद्दीपिका पंचवटी थी ही है-
'यस्यां ते दिवसास्तया सह यया नीता यथा स्वगृहे.
१२८
यत्मबंधकथा भिरेय सततं दीर्घा मिरास्थीयन ।
एक: सम्प्रति नाशित प्रियतमस्तामेव राम.कर्थ,
पाप: पंचवटी मिलोकयतु या गच्छत्व सम्भाव्य वा ।'
पचवटी के दृश्य में मुहमार मौर-कठोर दोनों ही स्वरूप आये हैं ।
पटोर रूप देखिये-
'शुञ्जकुब्ज कटौर फोशिक घटा घुत्कारचाकीचकः
स्तम्याडम्बर मूकमौकुलिकुल नौश्वामियोऽयं गिरिः ।
एतस्मिन्यचलाकिनी प्रचलतांमुजिताः फूजित,
रुवल्लन्ति पुराण रोहिण तरुस्कन्धेषु कुम्भीनसाः ।।
पति वा सुमार स्वरूप भी कम माकर्षक नहीं है ।
एते
कर रेप गद्गदनददगोदावरी धारयो,
मेवालम्बित मौलिनाल शिखरा क्षोणी मतो दाक्षिणाः ।
अन्योन्य प्रतियात सकल घलकल्लोल कोलाहलैः
रुत्तालास्त इम गंभीरपयस. पुण्याः सरित्सङ्गमाः॥
अप्रस्तुत विधान में भी प्रकृति की सत्ता पा समावेश हो गया है।
देखिये-
.
शिमलयमिरमुग्ध ঘশ্বনামেনন
दृश्यरुमल शोपी दारुणो दीर्घशोकः
ग्लपयति परिपाण्ड दाममस्याः शरीर
शरदिन इव धर्म. केतकी गर्भपत्रम् ।।
अन्तःप्रकृति काचित्रण-महाकवि भवभूति ने मानवहम की विविध
दमामो एव मनोमावो का भी यरपत अनुपम चित्र खींचा है।
पानी हरण से उत्पन्न कोप रावण से विनष्ट हो जाने पर भी राम के
हृदय मे वृश्चिक-दशन सी वेदना उत्पन्न करता रहा है। मतीन को
मरमान जनक घटनायें, जिनसे इष्ट जनों को कष्ट होता है मुत्युपर्यन्त
हृदय मे शल्यसीचुभनी रहती हैं। देखिये राम के हृदय की स्थिति मानव हृदय
के घरतिल पर क्तिनी धास्तविक है- 'तत्काले प्रियजन विप्रयोग जन्मा, तीमोऽपि प्रतिकृतियाधया विमोदः । दुसाग्निर्मनसि पुनर्विपच्यमानो हृन्ममरण र पेनां तनोति । राम को फप्टन अतीत सुनने मात्र से ही भगवती जानकी का वियोग प्रत्यागत सा जात होता है । दुःखद बात सुनने की इच्छामात्र भी मानव-हृदय में नहीं रह जाती- "विरम विरमानः परं न क्षमोऽस्मि प्रत्यावृत्तः स पुनरिव में जानकी विप्रयोग।" प्रिया के भिलाषित अङ्गसरा स मानव हृदय की दशा क्या हो भाती है यह विरजन मयदा भुक्तभोगो हो अनुमान कर मत हैं। राम के चित्त की स्थिति को व्य जना स्तिने सुन्दर ढग सकी गई है देखिय- "विनिश्वेतु शस्यो न मुनिति वा दु समिति वा प्रमोहो निद्रा वा किमु विष विसर्प मि मरः तव स्पर्श स्पर्श मम हि परिमूदोन्द्रियगणो विकारश्चैतन्यं भ्रमति सम्मोलयति च ।।" सदेह के माध्यम से बानन्द की अनुभूति क्या ममिति भी कवि नहीं होने देता । लोकापवाद के कारण घोरोदान्त राम प्रजाजन के निमित्त सीता का परित्याग कर रहे हैं किन्तु उनके हृदय में भीषण द मचा है । एक थोर पति परापना, मनिन्द मुन्दरी जानकी को स्नेह- भक्ति, तो दूसरी पोर राजा का धर्म "। दोनो का निदह मावश्यक है किन्तु राम राजा हैं और राजा के धर्म को विजय होती है । किन्तु हृदय भशान्ति एव मारमग्लानि को रिभाषिषा है- शैशवात्प्रभृति पोपिता प्रियां सौहृदाद् पृथका श्रयामिमाम्। छद्मना परिददामि मृत्यवे सौनिके गृहशबुन्तिकामिव" । च यही नहीं राम का प्रतद्वन्द इतना भीषण हो जाता है कि राम स्वय को धिक्कार उठते है। पूर्व कर्मचाण्डाल मयि मुग्धे । विमुज्य माम् । नितासि चन्दनभ्रन्त्या दुर्भिपाक विपद्रुमम् ।।" अतीत की मुखद स्मृतियां, दण्डकारण्य दर्शन से पुन: उद्दीप्त हो उठती हैं। सोना के परित्याग की वेदना और ग्लानि राम के हृदय को शत-शत खण्डो म विभक्त सी कर रही है । "हा । हा । देघि स्फुटति हृदयं, ध्वंसते देहवन्धः । शून्यं मन्ये जगदविरल ज्वालमन्तलामि।" यद्यपि भवभूति के नाटक का प्रधान उद्देश्य 'एको रस करुण एव' को ही सिद्ध करना है किन्तु पात्र कथानक और स्थानक के सयोग से प्रकृति का अधिकाधिक ममावेश हुआ है । चित्रदर्शन, पञ्चवटी और दण्ड कारप्य व चित्र अनुपम है । उनमे प्रकृति के सभी स्वरूप (सुकुमार और कहोर, पालम्बन और उद्दीपन, अन्त और ब्राह्म) मिलते हैं। जब कि कालिदास ने प्रकृति व सुकुमार पक्ष को अपनाया है वहीं भवभूति ने कठोर व सुकुमार दोनो ही रूप मपनाये हैं उदाहरणार्थ मालती माधव नामक प्रकरण रुपा म रगमश्च पर व्याघ्र एप स्मशान के दृश्य दिखाये हैं जो नाटय परम्परा के भी विरुद्ध है। किन्तु इसका मर्थ यह नहीं कि उनकी प्रकृति भयकर ही है। उनके सुकुमार प्रकृति चिरयत चिन्ताकर्षक एवं प्रभावोत्पादक है। करुण रस परिपूर्ण उत्तररामचरित म प्रकृति का महत्वपूर्ण स्थान है। यदि करुण स्थलो में प्रकृति के ही कारण कोई अपने हृदय को संभाल सकता है अन्यथा करुणा का आवेग न जाने हृदय का क्या करता? भवभूति का प्रणय चित्रण भवभूति की रचनाओ मे प्रेम का जितना आदर्श और मर्यादापूर्ण चित्रण प्राप्त होता है उतना किसी अन्य कवि की रचनामों में नही ।
उन्होने भपते नाटको में विशुद्ध प्रेम का ही चित्रण दिया है। उनका प्रेम वासनात्मक न। यौवन की रोमानकारी प्रयम्थानों के वन में भी किसी प्रकार की कामलिप्या का मकेतनही प्राप्त होता । उदात्त, गाम्मीय स्थिरता दिखाई देती है । भवभूति पादर्श दाम्पत्य प्रेम के सफल चित्रकार हैं । भवभूति के पहले के कवि स्वच्छन्द प्रणय के चित्रण में विशेष दत्तचित्त रहे है। किन्तु भवभूति के प्रेम सम्बन्धी विचारों को पढने से ज्ञात होता है कि उन्होने एक बहुत ही बादर्श और सरल प्रेमी हृदय पाया था। प्रेम कैसे हाता है इस विषय में भवभूति का विचार है कि प्रेम क्यिा नहीं जाता वह तो हो हो जाता है और साथ ही भम मुन्दरता, माप, धन आदि बाह्य कारणों पर नहीं भाषारित होता, वह तो हृदय मे होता है एवं हृदय हो प्रेम वे रहस्य को जानता है। 'हृदयं त्येव जानाति प्रोति योग परम्परम्"। व्यतिपजति पदार्थानान्तर कोऽपिहेतु.॥ नसतु बहिरुपाधीन प्रीतयः संश्रयन्ते । विकसति हि पतंग स्योदये पुडरीकम् ।। द्रवति च हिमरश्मा बुदगते चन्द्रकान्तः।। प्रेम हो और वह किमी कारण पर प्राधित हो, यह दोनों बातें परस्पर विस्त हैं। प्रेम तो प्रसारण स्वतः प्रेरित और अनिवार्य होता है वास्तविक प्रेम भवति के अनुसार निस्वार्थ होता है । इस उदात्त प्रेम भाव की क्यास्या करते हुए भवभूति कहते हैं प्रेम में कोई किसी से कुछ मांगता नहीं। किसी के लिए कुछ भी न करने पर प्रेम पात्र प्रेमी के लिए एक अमूल्य निधि होता है। प्रिय के सानिध्य मान से हो प्रेमी का सारा दुख दूर हो जाता है। अकिंचदपि कुर्वाण., सौरयै सान्यपोहति । तत्तस्य किमपि द्रव्यं यो हि यस्य प्रियो जनः ।। (६१५) उत्तररामचरित के प्रथम मक मे हो कवि ने प्रादर्श दाम्पत्य १३२ प्रणय सरसता चित्रित की है। दाम्पत्य प्रणय को कवि ने उज्ज्वल भव्य और बड़े प्रण्यो स प्राप्तसोभाग्य माना है। वह सौभाग्य, जिसमें प्रम मुख दुख म सदा एक रस बना रहता है, जो सब स्थितियो मे उमो प्रवाह मे अनुगत रहता है, और हृदय को अपूर्व शान्ति देने वाला है। सन्चा प्रम अवस्था परिणति के साथ भी परिवतित नहीं होता, वह वृद्धावस्था में भी समाप्त नहीं हो पाता। यह प्रेम समय के ध्यतीत होने स सकोच के हट जाने से और अधिक प्रौढ़ रूम को प्राप्त कर लेता है। अद्वत सुखदु खयोरनुगुणं सर्वास्वस्थासु यद् । विश्रामो हृदयस्य यत्र जरसा यस्मिन्न हायों रसः। यालेनावरणात्ययात् परिणते यत्स्नेहसारे स्थित भद्र प्रेम सुमानुपस्य कथमप्येक हि तत्प्राप्यते ॥ (१॥४.) भवभूति के अनुसार प्रेम की ज्योति सुख के समीर में तथा दुख के झगावात में समान रूप से जला करती है। भवभूति ने जिस दाम्पत्य प्रणय का चित्रण किया है वह दुग्ध के समान धवल और गगाजल के समान पवित्र है। -Gokal chaudhary स्लपयति हृदयेशे स्नेहनिष्यन्दिनी ते धरल बहलमुग्धा दुग्धकुल्येव दृष्टिः । भवभूति क अनुसार दाम्पत्य प्रणय को परिणति सन्तान प्राप्ति में है। पति पत्नी का प्रेम तभी पूर्ण सफल होता है जब दोनों क सन्बन्ध को दृढ बनान के लिए मानन्दमयी ग्रन्थि सन्तान हो। अन्त करण तत्वस्य दम्पत्यो स्नेहसंश्रयात्। आनन्दप्रन्थिरे कोऽयमपत्य इति ते कप्यते ॥ (10) 'उत्तर' में विदूषको के प्रवरित न होने का एक मुख्य कारण भवभूति का अपना प्रेम सम्बन्धी उच्च मादर्श भी है । उनका प्रेम किसी विलासी सम्राट को प्रेम क्रीडा नहीं हैं जिसमें विदूषक की . - .
सहायता प्रापेक्षित हो । भवभूति की प्रणय कल्पना, प्रणय साधना बरयन्त उदात्त एव पावन है। जिसकी समता विश्व के पौर भारत के साहित्य में प्राण होना दुर्लभ है। 'करुण रस"/ "जयन्तु ते सुकुतिनः रस सिद्धाः कवीश्वग । नास्ति येषां यशः फाये जरा मरणजम् मयम् ॥" महाकवि भवभूति बाल्मीकि को भांति एक मोर कोची के विरह मान से द्रवीभूत हैं तो दूसरी मोर व्याध को शापाभिभूत करने में लिए उनकी वाणो में मोर भी भरा है। यही कारण है कि उनके द्वार करण पौर वीर दोनो रसों का चित्रण अपनी चरम सीमा में उत्तर रामचरित में पाया जाता है। भवभूति को प्रसिद्धि इसलिए है कि "काय भवभूतिरेव सनुते" अर्थात् भवभूति सबसे अधिक करण रस के उन्मेप मे सिद्ध हस्त है। भवभूति के करुण रस वर्णन में भलौकिकता हैं, पमत्कार है। भवभूति के करुण रस को प्रशसा करते हुए गोवधं. नाचार्य ने अपनी पार्या सप्त शती' में कहा है। "भवभूते: सम्बन्धाद् भुरेव भारती भाति । एतत्कवकारुण्ये किमन्यया रोदिति प्राव।।।" भवभूति करुण रस के प्रधान पाचार्य है। रस शास्त्रियों में प्रधान रस के विषय में भोजराज श्रृंगार को रसराज स्वीकार करते है तो अभिनवगुप्त शान्तरस को मुख्य मानते हैं किन्तु भवभूति ने करुण रस को ही सब रसों में प्रधान रस स्वीकार किया है। उन्होंने गण रस के सरस समर्थन मे सभी रसों को करुण रस को ही विशेष स्थिति या भिन्न-भिन्न परिणाम स्वीकार किया है। "एको रस: करुण एवं निमित्तमेदाद मिन्नः पृथक् पृथगिवाभते विवर्तान् आवत वुदबुद तरंगमयान् विकारान्। अभ्भो यया सलिलमेव हि तत् समप्रम् ।।" (३६४७) १३४ 'करुण इस ही एक मात्र मुख्य रस है जिस प्रकार एक ही बल कभी भंवर के रूप को, कभी बुदबुद के रूप को कभी तरयो के रूप को धारण कर लेता है किन्तु वास्तव मे है सब बल हो उसी प्रकार निमित भेद से मर्यात रस सामग्री के लक्षण्य मात्र से एक ही करुण रस पोर रसो के रूप को धारण कर लेता है। इस प्रकार करुण ही सब रमो को प्रकृति है। अन्य रस तो उसको विकृति है। जब करुण ग्स के विषय में भवभूति ऐसा उच्च दृष्टि कोण रखते थे, तब क्यों न उनके करुण रस वणन भत्यन्त उत्कृष्ट हो। उपयुक्त श्लोक अशेष उत्तररामचरित नाटक का बीज मन्त्र सा है। उत्तररामचरित के मशेष मक किसी न किसी रूप में करुण रम स भात प्रोत हैं। नाटक के प्रारम्भ में ही हम देखते हैं कि दुमस के विदा होते ही राम के दुख का बाघ टूट जाता है । "शैशवात्प्रभृत्ति पोषितां प्रियैः सौहृदाद पृथगा श्यामिमाम्। ब्रह्माना परिददामि मृत्यवे, सौनिको गृहशंतिकामिव ।।" श४५ प्रथम मक के चित्र दर्शन वाले दृश्य मे हम दम्पति के प्रत्यन्त अनुराग का दर्णन करते हैं दो भविष्य में विरह व्यथा को पौर भी मता बना देता है । जब पति पत्नी एक लम्बे दुख कास के बाद प्रणय के निर्भय भाव में तल्लीन होकर मानन्द अनुभाव के अवसर को प्राप्त करते हैं तभी मानन्द मधु का पाला जो मोठों तक भाया था, निठुर नियति से छीन लिया जाता है। दूसरे पक मे राम जब एकाकी चिर परिचित दण्डकारण्य भौर पचवटी में प्रवेश करते हैं तो इन्ही वनो मे सीता के साथ अनुभूत अपने मतीत सुखों को स्मरण कर वनको व्यया उमह पहती है। "चिरागारम्भी प्रसृत व तीनो विपरस: कुतश्चित्संवेगात्मचल इव शल्यस्य शकलः । प्रारणो रूदप्रन्थि स्फुटित इव हृन्ममणि पुन घनीभ नः शोको विकलयति मां मूर्छयति च ।" २२६६ १३५
तृतीय मक सो करुण रस का मानो अगाध सागर ही है । करुण
रस की जैसी तीन, गम्भीर ए मर्मस्पशनी बनना इसम हुई है वैसी
शायद ही कहीं भोर हुई हो
भवभूति का बरुण रस अत्यन्त गम्भीर तथा ममस्पर्शी है। उनके
अनुमार वह उस पुट पाक के समान है तो ऊपर से तो पडू लिप्त होने
से नितात शान्त, परन्तु भीतर तोद्रमतर्यदना स तप्त होता रहता है।
'अनिर्मिनो गभीर त्यादन्तर्गदधन व्यथ ।
पुटपाफ प्रतीकाशो रामस्य करणो रस ।।" (३१)
भवभूति के अनुसार शोकातिरेक की दशा में एकान्त में जो भर
कर रो लेने से हृदय हल्का हो जाता है।
पूरोत्पीडे तडागस्य परीवाह प्रतिक्रिया।' (३६)
राम को तितो करुणामयो सूक्तियां मत्यन्त हृदय स्पर्शी है ।
यहाँ 'कुकल' का सकेत कवि के गाढ़ अनुभव की पोर है । कुकूल की
प्रचि बहुत तेज होती है परन्तु वह एक साय न बल कर घोरे धीरे
पलती है जिसे हृदय में मसीम दुसह वेदना को तीब्र अभिव्यञ्जना
'बलात् होती है।
'चिरं ध्यात्वा ध्यात्वो निर्माय पुरत
प्रवासेऽप्याश्वास न खालुन करोति प्रियजन ।
जगज्नीारण्य भवति च शिकलव्युपरमे
कुकलाना राशौ सदनु हृदय पच्यत इव ॥" (६३८)
राम तो अपने दुख को शब्दों के द्वारा प्रकट करते हैं किन्तु सीतातो
मूतिमान करुण रस ही है तमसा, सीता का पणन करते हुये कहती है-
प्रलोक है परिपाण्ड दुवल कपोल सुदरम दघती विलोल कवरोकमाननम् ।
करणस्य मूविरपवा शरीरिणी विरह ध्यय व इनमति जानको ।।
जानकी के साथ साथ इस बक में भवभूति की वाणी भी धास्तव
में 'करुणस्य मूतिरयवा शरीरिणी' ही हो उठी
। राम, सीता के
लिए विलाप कर रहे हैं, ? मनोवैज्ञानिक दृष्टि से उनका यह विलाप
प्रत्यन्त मर्मस्पर्शी है।
.
हा हा देवि सुरति हृदय स्तंसते देहयध
शून्य मन्ये जगविरल ज्यालमतचलामि।
सीमन्य नमसि विधुरो मज्नतीवान्तरात्मा
विप्वमोह स्थगगयति कथमन्दभाग्य करोमि ।
प्राय कारुणिक पृष्ठभूमि पर ही वास्तविक प्रभविष्णु काम्प को
सर्जना हानी है। आंग्ल भाषा के प्रसिद्ध कवि सैनी ने लिखा है।
गवर स्वीटेस्ट सारस आर दोज ब्दिच टेल मवर सैडस्ट थाटस ।
हि के प्रसिद्ध कवि पत का भी कहना है ।
पापयोगी होगा पहला कवि, श्राह से उपज होगा गान ।
उमड कर आँसो चुपचाप, वही होगी कविता अननान ॥
भवभूति ने 'उत्तररामचरित म जो करुण रस की म दाकिनी
प्रवाहित की है वह वास्तव मे सम्कृत साहित्य की एक अभूतपूर्व एव
पमूल्य निपि है। इम मदाकिनी की अविरल धारा म सीता का
परित्याग-जय मालिय सदा के लिए धुल जाता है और दो हृदयो
का मच्चाअनुसन्धान हो जाता है । बभूति के करुण रस का हो यह
प्रभाव है कि जह भी चेतन भोर चेतन भो जड़ हो जाते हैं...
सडानामपि चैतन्ग भवभूतेरभूद् गिरा।
मावाप्यरोदीत् पावत्या हसत उमेरस्मनावपि ।।
भवभूति की काव्य-प्रतिज्ञा
मवभूति मूलत कवि हैं। भवभूति की कविता बडी चमत्कारिणी
है । सस्कृत भाषा के ऊपर मापका भगाध अधिकार है। वादेवी ब्रह्मा,
की तरह आपको वश्या घो। भवभूति की 'कवितरणमा रोटीलाषा
भावानुसारिणी है। दानो का अनुपम सामावपि ।
दृष्टि से भवभूति कोमल तथा गम्भीर दोनों प्रभार मावा के सफल
कलाकार है। संयोग वियोग करुण, और प्रादि सभी रसों का चित्रण
उन्हाने कुशलता से किया है । भवभूति की अतिशय
-
इतना प्रकट कर देती है कि उनका चित्रए कालिदास की तरह प्यग्य
नहीं रही पाता है । यही कारण है कि कालिदास के बाद भवभूति भाव
पक्ष की दृष्टि से माते है।
शब्द विन्यास के साथ साथ चित्र उपस्थित कर देना कवि की
विशेषता है । गद् गद् नाद के साथ बहने वाली नदियों का घोर रोरमय
शब्द चित्र स्पष्ट सामने खिंच जाता है।
एते ते कुहरेषु गद्गद नदद् गोदावरोवारयो
मेघालम्बितमौलिनीलीशिरवरा: क्षोणोभूतो दक्षिणाः ।
अन्योन्य प्रतिधात संकुल चलत्क्ल्लोल कोलाहले
रूत्तालास्त इमे गमीरपयसः पुण्या. सरित्यंगमाः।। (२।३०)
दाम्पत्य पराय के सयोग तपा वियोग दोनों अवस्था वाले चित्रण
उत्तररामचरित मे अनुपम हैं तपा तत्सम्बन्धी सूक्तियो सस्कृत साहित्य
को अमूल्य सपदा हैं। उत्तररामचरित के प्रथम प्रक में संयोग धृङ्गार
का सरस वातावरण है, जहाँ राम सीता को अतीत काल में अनुभूत
प्रणय व्यापारों की याद दिलाते हैं।
किमपि किमपि मन्द मन्दमासक्तियोगाद,
विरलितकपोल जल्पतोरक्रमेण
अशिथिलपरिरम्मव्यापते कैकदोणो,
रविदित गतयामा रात्रिरेवं व्यरंसीत् ॥
सीता को बनवास देने के उपरान्त प्रियतमा सीता के पियोग में
राम की दशा अस्पचिक शोचनीय हो जाती है। उनका हृदय विदीर्ण
होना चाहता है पर उसके खण्ड नहीं हो पाते । व्याकुल शरीर मूर्छिन
हो रहा है, पर समान्य नहीं होता। प्रिय वियोगाग्नि शरीर को
जलाती है पर भस्म नहीं करती। क्रूर विधाता मर्म पर प्रहार करता
है किन्तु जीवन का अन्त नही हो जाता।
दलति हृदयं शोकोद्व गाद द्विधा न तु मिद्यते
वहति विकल कायो मोहं न मुञ्चति चेतनाम् ।
. चलयति तनूमन्तर्दाह: करोति न भस्मसात् प्रहरति विधिर्ममच्छेदी न कन्तति जीवितम् ॥ ३॥३१ गार सपा कक्षण मे भवभूति को सरस्वती को तदनुकुल कोमल पान्त पदावली की सजा में दिखाई देती है तो बीर और रोद्र इस में गोडो की विक्ट बन्यता दिखाई पड़ी हैं। उत्तररामचरित की चन्द्रवेतु पोर लव की उक्तियों तथा उनके युद्ध वर्णन में वीर रसोवित पदावली का प्रयोग पाया जाता है। वाजिहया वलयितोत्कट कोटिदष्ट्र मुद्गारि घोरघन पर घोपमेतत् । प्राससक्त हसदैतकवक्त्रयन्त्र जुम्माविडम्धि विकटोदरमस्तु चापम् ।। (४।२६) भावों के स्निग्ध चित्रण के कारण कुछ लोग उत्तररामचरित को 'गीति नाटक' और प्रकृति तथा युद्ध के वर्णनों के विन्यास के कारण कुछ लोग इसे 'एपिक डामा, भी कहते है। यथार्थ में तो उत्तर-राम परित भवभूति की नाट्य प्रतिमा को प्रकट करने वाला सर्वोच्च नाटक -- है । अदभूति स्वभाव से ही गमीर प्रकृति के कवि हैं, जिन्हें अपनी वेदना अधिक दृष्टि गोचर होती है । फलत. वे भाव प्रवण कदि हैं। इस भावक्ता का प्रभाव उत्तर रामचरित में अत्यधिक पहा.हा -मवभूति और कालिदास- नाटय साहित्य के क्षेत्र में, भवभूति की समीक्षा करते समय कालिदास के साप यदि किसी कवि का नाम लिया जाता है, महाकवि । भवभूति यद्यपि प्राचीन काल में भी और वर्तमान काल मे भी कालिदास को सर्वथेष्ठ स्वीकार किया जाता है, फिर भी कुछ समालो पों की दृष्टि में उत्तर रामचरित मे भवभूतिविशिष्यते ।' कालिदास पौर भवमूति दोनों में कौन थेष्ठ है, इस विषय मे प्राचीन काल में एक विवाद उठ खडा हुमा था, जिसकी विज्ञप्ति इस पद्य से होती है ।
। काय कालिदासाद्या भवभूतिर्महाकवि । तरख पारिनावद्या स्नुहोवृक्षो महातरु ।। कलिदास और मवभूति की तुलना करते समय हम साहित्य के कुछ प्रमुख प्रणों को महाँ पर प्रस्तुत करेंगे। रस मिद्धि'-महाकवि भवभूति को कास्य कला का वैशिष्टय है उनको करुण रस की अभिव्यञ्जमा । जिसके लिए भवभूति मौर उत्तर- रामचरित विश्वनीय विख्यात हैं। 'करणे तू क्यों रोती है ? उत्तर में वह और अधिक रोई। मेरो विभूति को भवभूति क्यों कहे कोई ॥" कालिदास ने भी रवि विलाप मोर मज विलाप म करुण रस को प्रस्तुत किया है कि त मदति को पलौलिकता और वगत्कार को वह नही पा सके हैं । भवभूति का वीर रस का वणन भी अत्यन्त सजीव है थोरों का गाना गजन और शस्त्रों को मनकार, युद्ध का प्रत्यक्ष दृश्य उपस्थित कर देते हैं- किन, कालिदास शृङ्गार रस के सयोग और वियोग दोनों क्षेत्रों में भवभूति को बहुत पीछे छोड़ देते है। दोनों कवियों की रस परिपाक को दृष्टि स तुलना करते हुए एक समालोचक का कहना है- 'इफ कालिदास हैज मोर के सी एण्ड इमिजिनेशन भवभूति इज मोर सटिमेण्टल एण्ड पैसनेट । कालिदास स्पेशली एवसेन्स इन ' गार भवभूति इन करुण 'एण्ड वार' वट वोय डिपिक्ट दि पदर सेटोमेन्टस प्रक्टिकली विद दि सेम फसिलिटीएण्ड पोलिसीटो।" • शैली-कालिदास को कविता मे व्यञ्जना की प्रधानता हैं तो भवभूति की वाणी में वाच्याय को प्रगल्भता । कालिदास पोड से चुने ब्दों में अधिक से अधिक अथ को अभिव्यक्ति कर देते हैं तो भवभूति विपुल वागविम्वार द्वारा किसी भाव का विशद वणन करते हैं। भवभूति सन कुछ स्वय कह देते है जबकि कालिदास बहुत कुछ अपने पाठक की कल्पना के लिए छोड़ देते हैं । कालिदास की रचना प्रणाली . १४.
सरल और आईजर शून्य है किन्तु मभूति को वचनभगी प्रौढ भोय दोष समास सरल है। कालिदास री भाषा मसृण और कोमल हैं, भवभूति को प्रगल्भ और उदात्त । कालिदास मूत को उपमा मूर्त से देने हैं तो भवभूति प्राय: मूर्त को उपमा अमृतं से देते हैं। जैसे- शकुन्तला को उपमा सिवार से लिपटे कमल पुष्प से दी गई है तो सोता को भवभूति के द्व मूतिमती कररणा या विरह-व्यथा से । कालीदास ने प्रकृति के केवल ललित और मुकुमार पक्षों का ही वर्णन किया है किन्तु भवभूति ने प्रकृति के विकट, उग्र और भयानक पक्षी का भी वर्णन सुन्दर ललित और सुकमार पक्षो के ही समान किया है । डा० भण्डारकर दोनो कवियों को सलीगत तुलना करते "कालिदास, ऐज प्रो. विलसन रिमाक्स हैज मोर फैन्सी । ही इज ए ग्रेटर प्राटिस्ट दैन भवभूति । दि फार्मर सजेस्ट स पार इन्डिकेट्स, व्यार दि लेटर एक्सेप्रटेज इन फोसिफुल लैंग्वेज । दि करेक्टर्स माफ दि लेटर, भोवर कम पाई फोर्स माफ पेसन प्राफेन वीप बिटरली, व्हाइल दोज माफ फार्मर सिम्पली शेड ए क्यू टिपस इफ दे हू सो बाल।" ३ 'प्रणय' -प्रेम के मान्य भादशों में भी दोनों में महान अन्तर है। भवभूति ने जैसा उज्जल दाम्पत्य प्रणय का चित्र खीचा है वैसा संस्कृत साहित्य में दुलभ है । कालिदास आदि कवियो ने सासारिक वासना से भरे काम का अधिस्तर वणन किया है । भवनि की दृष्टि मे सच्चा और स्वर्गीय प्रेम वह है जो मा एक सा सुखद, श्वत और बिना किसो वाह्य कारणो के अलौकिक और मात्मिा होता है। "अद्वतं सुखदुसयोरनुगुणं सर्वास्त्रवस्थासु यत् ।" १६३६ "व्यतिषजति पदार्थानान्तरः कोऽपि हेतु- न खलु चहिरुपाचोन् प्रीतयः संश्रयन्ते ।" ॥१२ इन्हीं उपयुक्त विशिष्टतामों के फलस्वरूप प्राचीन आलोचक मानते थे-'उत्तरे रामचरिते भवभूतिविशिष्यते।' १४१ - ४. प्रभाव-भव ति मौर कालिदास की कृतियो के तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि भवभूति पर कालिदास का पर्याप्त प्रभाव पड़ा है। भवभूति ने भनेक भावो को प्रेरणा कालिदास से प्राप्त की है। उत्तर का प्रथम अ क मे स्थित चित्रदर्शन दृश्य रघुवंश प्रभावित है। उत्तर का छठा प्र शाकुन्तल के सातवें अंक से कुछ दूर तक प्रभावित है। मालतीमाधव का नवा अक विक्रमोर्वशीय के पौधे मक स पर्याप्त मिलता है । मालतीमाधव मेघदूत का कालिदास के मेघदूत से प्रत्यक्ष रूपए साम्य रखता है । भारतीय नाट्य सादिक इन दो चरमोज्जवल नक्षत्रों के विषय मे तुलानात्मक हुए द्विजन्द्रलाल राय ने कहा था- "विश्वास प्रेम की पवित्रता में भाव की तरण नोहा मे, भापा नाम और हृदय के माहात्म्य में उत्तररामचरित श्रेष्ठ है, तथापिट ओं को विचित्रता म, कल्पना को कोमलता मे, मानवचरित्र के सून हिश्लेपन मे भापा को सरलता और ललितता मे अभिज्ञान शान्तिल बेष्ठ है।" सकृत माहित्य में यह दोनो नाटक मद्वितीय हैं। पभिज्ञान शान्तल शरदऋतु की पूर्ण चाँदनो है, तो उत्तर रामचरित नक्षत्र खचित भील आकाश है । एक व्यजन है तो दूसरा हदि । एक वसन्त है तो दूसरा पावस । एक नृत्य है तो दूसरा मधु । एक उपभोग है तो दूसरा पूजन । उत्तर मे प्रयुक्त छन्द और अलंकार उत्तर के सात प्र को में २५६ पद्य है, जिसमे १९ छन्द व्यवहृत हैं। अनुष्टुप ९१ बार, शिखरिणी ३१ बार, वसन्ततिलका २६ बार, शादं लविक्रीडित २५ वार, मालभारिणी १, प्रार्या १ पार, वशस्थ १ बार, मालिमी १७ बार, रपोद्धता ३ बार, गालिनी५ वार, इन्द्रवजा और उपजाति ६ बार पुष्पितामा ५ बार, द्र तविलम्बित र वार, पृथ्वी ३ बार, मजुभाषिणी और हरिणी ८ बार,प्रपिणी ७ वार,मन्दानान्ता १३वार- । १४२ कदिने प्रयुक्त किया है। उतर के पद्यों में मुभ्यतः भवभूति न ३६ प्रल कारो का प्रयोग किया है । उसमा ४७ वार, उक्षा २८ बार, छायलिंग १७ बार, अर्यान्तरन्यास १३ बार, सकर. १२ बार, रूपक ११ बार, तुल्योगिता १० वार, समष्टि ८ वार, निदर्शना ७ बार, विषम ६ बार, स्वभावोक्ति- यतिशयाक्ति-अर्धापत्ति प्रत्येक पाच-पाच वार, सन्देह और दृष्टान्त प्रत्येक चार-चार बार, परिमख्या ३ बार, पर्याय-दीपक-विरोधाभास-विशेषोक्ति पाक्षेप प्रत्येक दो दो बार, अनुमान-परिणाम-स्मरण यमक विभावना- अनुग्राम-समाहित अप्रस्तुतप्रशसा-श्लेप अपहृति- तद्गुण-भाविक-दल्लेख- अतिरेम मलकार का एक प्रयोग एक बार हुआ है। उपयुक्त १९ छन्दो पौर ३६ अलकारो का सफल प्रयोग कवि के प्रौढत्व और अधिकार की सूचना दता है। इंदिर राजकीय महाविद्यालय मनांक- उत्तर माधुरी उत्तर रामचरित के कतिपय सुन्दरतम श्लोकों का संकलन ) प्रथम अंक- १-सूत्रधार.-य ब्रह्माणमियं देवो वाग्वश्येवानु वर्तते । उत्तरं रामचरितं तत्प्रणीतं प्रयोदयते ॥२॥ अन्वय-इय वाक् देवी दश्या इव य ब्रह्माणम्, अनुवर्तते । तत्प्रणीयम उत्तर राचरित प्रयोक्ष्यते । अनुवाद-यह सरस्वती देवी वरावतिनी चेरी की तरह जिस ब्राह्मण भवभूति का अनुगमन करती है, उसके बनाये हुये उत्तर रामचरित का हम मभिनय करेगें। २-सूनधार --सर्वया व्यवहर्तव्य कुतो ह्यच्चनीयता ययान्त्रीणा तथा वाचां माधुत्वे दुर्जनो जन ।।५।। अन्धय-सर्व या व्यवहर्तव्यम्, प्रवचनीयता कृतः, हि जको यथा स्त्रोणा तथा वाचा साधुत्वे दुर्जन । अनुराद-सब प्रकार से व्यवहार करना चाहिए, पर निर्दोपत्रा कैसे होसकती है, क्योकि लोक जैसे स्त्री के पातिवत्य मे उसी तरह बचन की निर्दोपता में भी दुर्जन दोपदी होता है। ३-राम-कष्ट अन कुलधनैरनुजनीय स्तमो यदुक्तमशिवं नहि तत् क्षम ते । नैसर्गिको सुरभिण. कुसुमस्य सिद्धा मूर्ध्नि स्थितिन चरणौरव ताडनानि ॥४॥ अन्वय-कुल धने ननः अनुरजनीय इति कष्टम्, तत् नः यत् ४-राम- प्रशिवम उक्तम् तत् ते नहि क्षमम् । सुरकिंग: कुसमस्य मूनि स्थिति गैगिको सिद्धा, चरण अवताऽनानि न । अनुपाद-दुप है, कुल का यश ही धन है जिसका ऐसे व्यक्तियो द्वारा लोक की प्रसन्न करना ही पड़ता है । इस लिए हम लोगो को जो अभद्र बात कही गयो है, वह तुम्हारे सबन्ध म उचित नहीं है। क्योकि सुगन्धित पुष्प का शिर पर रहना स्वभावसिद्ध है परन्तु उसका पैरो तले कुचला जाना स्वभावमिद्ध नहीं है। -प्रनयिरले प्रान्तोन्मीलनमनोहर कुन्नले र्शनकुसुमैमु ग्यालोकं शिशर्दधती मुखम् । ललितलाल ज्योत्स्ना प्रायैरवृत्रिम विभ्रमै रकृत मधुरै रम्बाना मे कुतूहलमग ॥ २० ॥ अन्वय-प्रतनविरलै प्रान्तोन्मीलन्मनोहर कुन्तल दशनकुसुमैः मुग्धालोकमुस दधती शिशु ललितत्तलित ज्योत्स्नाप्राय प्रकृरिमविभ्रम मपुर अङ्गकै मे अम्बाना कुतूहलम् महत्त । अनुपाद-प्रति सूक्ष्म तथा दिरल एक दूसरे से न सटे हुमे और मुख ये प्रति भागो कपोलो पर लहराते हुय केशो से, तथा कलियों के समान दाँतों से, सदर दिखाई पड़ने वाले मुख को धारण करती हुई, शैशव अवस्था में वर्तमान, यह जानकी भी अत्यन्म सन्दर, चादनी के सदश, स्वाभाविक मिकामो में युक्त तथा प्यारे लगने वाले छोटे छोटे अङ्गो म मरी मातामा दे दर्शनोसक्य को उत्पन्न करती थी। ५-अलमललित मुग्धान्यध सनात सदा दशिथिलपरिरम्भैर्दत्त संवाहनानि । परिमृदितमृणाली दुर्वलान्या कानि त्वमुरसि ममकृत्या यत्र निद्रामवाप्ता ॥२४॥ १४५ अन्वय-यत्र स्वम् मध्वसञ्जातवेदात् प्रल रासलिन मुग्धानि अशिथिल परिरम्भ दत्त सवाहनानि परिमुदित मृणाली- दुबलानि मङ्गकानि मम उरसि कृत्वा निद्राम प्राप्त । अनुवाद-जिस स्थान पर, मार्ग से उत्पन्न थकावट के कारण जहीमून, शिथिल और मनोहर, गाढ मालिङ्गनों से दबाये हुये तथा मसले हुये पतले कमलनाल के समान दुबल कोमल भ गो को मेरे वक्ष स्थल पर रखकर तुम निद्रा को प्राप्त हुई, वह प्रदेश किस प्रकार भुलाया जा सकता है। ६-राम -किमपि किमपि मन्दं मन्दमासक्ति योगा- दविरलित कपोल जल्प तोर क्रमेण । अशिथिलपरिरम्भव्यापृत कैकदोप्पो, रविदितगतयामा रात्रिरेव व्यरंसीत् ॥२७॥ अन्वय-आसक्तियोगात मविरलितकपोल किमपि किमपि मन्द मन्दम् मत्रमेण जरूपतो प्रशिथिलपरिरम्भ व्याप्तक कदीष्णो मविदितगतयामा रात्रि. एव व्यरसीत् । अनुवाद-प्रेमासक्ति के कारण कपोल सटा कर धीरे धीरे बिना क्रम के जो कुछ कहते हुये तथा एक एक बोह को गाढ मालिन्गन मे निरत करते हुथे हम दोनों के बिना प्रहरों का पता पाये रात ही बीत गई थी। ७-लक्ष्मण -श्रयेदं रक्षोभिः कनरहरिच्छद्मविधिना. तथा वृत्त पापैर्व्यथयति यथा क्षालितमपि । जनस्थाने शून्ये विकलकरण रार्य चरित- रपि मावा रोदित्यपि दलति वनस्य हृदयम् ॥२८॥ अन्वय-अप पापं. रक्षोभि. कनकहरिगच्छद्मविधिना इदं तथा मृत्त' पपा क्षालितमपि ध्यपत्ति । न्ये जनस्पाने विकलकरणः प्रायंचरित प्रावा अपि रोदिति बजस्म मपि हृदय दलति ।
रसायनानि ॥३६॥ अनुवाद--भूपणखा की घटना के अनन्तर पापी राक्षसो ने सुवर्ण- मग को कपटविधि स ऐसा किया, जो कि बदला लेने पर भी अभी तक दुख देता है । निर्जन जनस्थान में नेत्र मादि इदियों को दिया म असमथ मार्य के चरित्रों से पत्थर भी आंसू गिराता है और वज का हृदय भी विदीर्ण होता है। -राम-म्लानस्य जीवकुसुमस्य विकासनानि सन्तर्पणानि मकलन्द्रियमोह कानि एतानि ते सुचनानि सरोरुहाक्षि। कर्णामृत नि मनसश्च अन्वर-सरोरुहाक्षि । ते एतानि सुवचनानि म्लानस्य जीब पुसमस्य विकासनानि स तर्पणानि सकलेन्द्रियमोहनानि कर्णाम तानि मनसश्च रसायनानि । अनुवाद-ह पद्मलोचने । तुम्हारे ये कोमल बचन मुरझाये हुये जवनपुष्प को विकसित करने वाले, उत्तम प्रकार से तृप्त करन वाले, सम्पूण इद्रियो के मोहजनक कर्णो म अम तस्वरूप और रसायन की तरह मन की शक्ति को बढ़ाने वाले है। ६-राम -इ। गेहे लामोरियममनवर्तिनयनयो- रमावस्या स्पों वपुपि बहुलश्च नरस । अय वाहु कण्ठे शिशिरमसृणो मौक्तिक सर स्मिन्या न प्रो यदि परम मह्यस्तु विरह ॥३॥ अन्यय- इय गेहे लक्ष्मी, इय नयनयो. प्रम त वति., असो स्पर वपुपि बहुलश्चन्दनरस, सय कण्ठे (न्यस्त )वाहु शिशिरम सूण मौक्तिकसर , अस्या किम न प्रेय ? तु विरह यदिपरम, असह्य । मस्या . अनबाद- यह सोता घर में लक्ष्मी है यह नेत्रो मे प्रम त यो यजनशलाका है, इसका यह स्पर्श शरीर में गाढा पन्दन का रस है, यह भुत्रा कण्ड मे गोल तपा चिकना मुक्ताहार है । इसरा क्या नही अतिशय प्रिय है, यदि अत्यन्त मसहनीय है तो देवल इसका विरह हो। १०-राम - अद्वैत मुमदु सयोग्नुगतं सर्वास्वस्थामु यत् विधामो हृदयस्य यत्र उरसा यस्मिन्नहार्यो रस । कालेनावरणत्ययात्परिणते यत्नमसारे स्थितम् भद्र' सस्य समानुपरय पथमप्येकहि तत्प्राध्यते॥३६॥ अन्वय-यत् सुखद् खवो: मदत, सर्वास भवस्थासु अनुगत, यत्र हृदयस्य विश्राम यस्मिन् रस महायं यत् बालेन आवरणात्ययात् परिणते प्रेमसारे स्थित, तस्य समानुपस्य तत् एकं भद्र कथमपि हि प्राध्यते । अनुवाद-शुद्ध प्रेम जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में एक रस रहता है । हृदय को उसमे एक अनिर्वचनीय सुख भोर शान्ति को अनुभूति होती है। प्रवस्या का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता । वार्धक्य के कारण उसकी सरसता मे कोई कमी नही माती । कुछ दिनो के बाद जब सकोच या दुराव का भाव दूर हो जाता है, तब वह मोर भी अधिक परिपक्व एव प्रगाढ हो जाता है। ऐसे कल्याणकारी पवित्र दाम्पत्य प्रेम की प्राप्ति बडे भाग्य से ही किसी को होती है। द्वितीय अंक- ११-तापसो-प्रियप्राया वृत्तिविनयमधुरो वाचि नियम. प्रकृत्या कल्याणी मतिरनवगीत परिचय । १४८ पुरो वा पश्चाद्वा तदिदमविपर्यासितरसं रहस्य साधूनामनुपधि विशुद्ध विजयते ॥२॥ अन्वय-माधना वृत्ति प्रियप्राया, वाचिनियम विनयमपुरः मति: प्ररत्या रत्याणी, परिचय, मनवगीतः, तत्इद पुरो वा पश्चाता अविपर्यासितरसम् अनुपधि विशुद्ध रहस्य विजयते। अनुवाद-सज्जनो का व्यवहार अतिशय मालहकारक होता है, उनकी याणी का सयम विनय के साथ मधुर होता है, बुद्धि स्वभाव से हो मगलकारिणी होती है, परिचय निर्दीप होता है, मिलन पहिले या पोचे मन राग का उल्लघन न करने वाला, निश्चल एव पवित्र होता है और इस प्रकार उनका परित्र सर्वोत्कृष्ट होता है । १२-श्रात्रेयी-वितरति गुरु प्राज्ञ विद्यां यथैवतथा बड़े न तु सलुतयो नेशक्ति करोत्यपहन्ति वा। भवति हि पुनर्भूयान्मेद फलपति, तद्यथा ।। प्रभवति शुचिविम्बप्राहे मणिर्नमृदादयः ॥४॥ अन्वय-गुरु यथा प्राज्ञ त्तयर जर्ड विद्या वितरति, तुतयो. ज्ञाने शक्तिम मकरोति, वा न अपहन्ति, खलु । फल प्रति पुन भूयान भेदो भवतिहि, तद्यया शुचि. मणि विम्ब• प्राहे प्रभवति मृदादय न । अनुवाद-गुरु जिस प्रकार बुद्धिमान् छात्र को, उसी प्रकार मन्द बुद्धिधात्रको भी विद्या देता है। उन दोनो के चोध मेन सामध्यं देता है पौरन उसका नाश ही करता है । ऐसा होने पर भी फल में छहर भेद होना है, जैसे कि होप आदि निर्मल मणि प्रतिबिम्ब के ग्रहण करने में समर्थ होते हैं, परन्तु मिट्टी यादि पदार्थ प्रतिविम्ब ग्रहण करने में समय नहीं होते।
. १३-वासन्ती-वादपि कठोराणि मृन्नि कुसुमादपि । लोकोत्तराणां चेतांसि कोहि विज्ञातु मईति ॥७॥ अन्वय-वज्रादपि कठोराणि कुसुमादपि म दूनि लोकोत्तराणाम. चेतासि विज्ञातुम् कः महति । अनुवाद-प्रलोक्कि महापुरुषों के वन से कठोर तथा पुष्प से भी कोमल हृदयों को भला कौन जान सकता है । १४-यासन्ती कण्डूलद्विपगएडपिएडकपरणोत्कम्पेन सम्पातिभिः धर्मस्र सितयन्धनैः स्वकुसुमैरर्चन्ति गोदावरीम् । छयापरिकरमाण विकिर मुसव्याकृप्टकीटत्वच: फूलत्क्लान्तकपोतकुक्कुटकुला. फूलेकुलायदु मा अन्वय-छायापस्किरमाण विकर मुखव्यावृष्ट कोटत्वच कूजरवतान्तकपोत कुक्कुट कुलाः, क्ले कुलायगुमाः मण्डल द्विपगडपिण्डकथणोरकम्पेन सम्पातिभिः धर्मससितबन्धन: स्वकुसुमः गोदावरीम् अचंन्ति । अनुवाद-छाया मे जीविका के लिए किरोदते हुए पक्षियों की चोचों से खींचकर निकाले गये हैं कोट जिनसे ऐसी छालों पासे, कूजते हुए और सेदयुक्त कबूतरों तथा मुर्गों के समूह हैं जिनपर ऐसे, तट पर स्थित, पक्षियों के घोसलों से युक्त. वृक्ष, हाथियों को कण्ड युक्त पोलभित्तियों के घपंण के कारण हिलने से समूह रूप में नीचे गिरने वाले मौर घाम के कारण शिथिल वृत्तों वाले अपने पुषों से गोदावरी को पूजते हैं। १५-राम:-स्निग्यश्यामाः क्वचिदपरतो मोपणामोगरुक्षाः स्याने स्याने मुखर ककुमोमास्कृतैर्निराणाम् । एते तीर्थाश्रमगिर सरिदगर्न कान्तार मित्राः संदृश्यन्ते परि चितमुवो दण्डकारण्यभागाः॥१४॥ १५० अन्यय-क्वचित् स्निग्धश्यामा. अपरत: भीषणाभोगक्षाः स्थाने- स्थाने निराणा झाड कृत: मुखरककुभ तीर्थाथमगिरि सरितगतकान्तारमिश्राः परिचितमुव:एते दण्डकारण्यभागा: दृश्यन्ते । अनुगद-कही चिक्ने मौर श्यामल तथा दूसरी मोर भयकर विस्तार के कारण रूखे, स्थान स्थान पर झरनो की कार से मुखरित दिशानो वाले, तीर्थ माश्रम, पर्वत, नदी, गड्ढे और दुगम मागं वाले तथा परिचित भूमि वाल दण्डकारण्य क प्रदेश दिखाई दे रहे हैं । ६-शम्यूक- निकूजस्तिमिता क्वचित्क्वनिदपि प्रोच्चण्डसत्वस्वनाः स्वच्छ सुप्तगभारभोगभुजग सास प्रदीप्ताग्नयः। मीमान. प्रदरोदरेषु विरलस्वल्पाम्भसो यास्वय तध्यद्भि. प्रतिसूर्य कैरजगरस्वेद द्रव अन्वय-सीमान क्वचित निष्कूजस्तिमिता; क्वचि दपि प्रोच्चण्डसत्वस्वना स्वेच्छा सुग्नगमीर भोगमुजग- श्वास प्रदीप्ताग्नय प्रदरोदरेषु विरलस्वल्पाम्भस: यासु तृष्यद्भिः प्रतिसूर्यकं अयम् अजगरस्वेदद्रव. पीयते । अनुवाद-इस भीषण वन म कहीं पूर्ण नीरवता है और कहीं हिंसपशुओ को प्रचड गर्जना सुनाई पड़ती है, कहीं स्वेच्छा पूर्वक साय हुए, गम्भीर फूत्कार करने वाले सपा के नि श्वासो से प्रज्वलित होकर माग लग गई है,कहीं गढढों मे थोडा सा पानी झिलमिला रहा है और कहीं प्यास के मारे विह्वल गिरगिट अजगर का पसीना पी रहें है । १७-राम-न किञ्चिदपि कुर्वाण सौख्यदु स्वान्यपोहति । तत्तस्य किमपि द्रव्यं यो हि यस्य प्रियोजन. ॥१ पीयते ॥१६॥ प अन्वय-यो जनो यस्य प्रिय: किश्चित् न कुर्वाणोऽपि सौख्यं दुखानि मपोहति, हितत् तस्य किमपि ट्रव्यम् । अनुवाद-जो मनुष्य जिसका प्यारा है, वह कुछ न करता हुमा भी सामीप्य मात्र से उत्पन्न सुखो के द्वारा दु.खो का नाश करता है, इसलिए वह उसका अनिर्वचनीय पदार्थ है। २०. शम्यूक:-इह समदशकुन्ताकान्त वानीर वीरुत प्रसवसुरभिशीत स्वच्छतोया वहन्ति । फलभरपरिणाम श्याम जम्यूनिकुञ्ज स्खलन मुसर भूरि स्रोतसोनिमारिएय: ॥२०॥ अन्वय-इह समद शकुन्ता शान्त वानीरवीरुत् पसवसुरभिशोतर वरिष्यः च्छतोया: पलभर परिणाम श्याम जम्बू निकुञ्जस्वलनमुम्बर भूरि स्रोतस: निझरिण्य: वहन्ति । अनुवाद-यहाँ, मददाले पक्षियों से भारतलताओ के पुष्पो से सुगन्धित शीतल तपा निर्मल जल बाली, फलो की राशि के कारण श्याम वर्ण वाले जामुन वृक्षो के कजों मे टकराकर गिरने से शब्दायमान प्रबल प्रवाह वाली पहाडी नदियां बहती हैं। २१ राम-चिरोद्वगारम्भी प्रसृत इव तीतो विपरस. कुतश्चित्संवेगान्निहित इच शल्यस्य शकलः । प्रणो रूदप्रन्थि: स्फुटित इव हृन्ममणि पुन. पुराभूतः शोको विकलयति मां नूतन इव ॥ २६ ॥ अन्वय-चिरोद्वैगारम्भी प्रसृतः धोतः विपरस इव, कृतश्चित् संवेगात् निहितः शल्यस्य शकल इष, हममणि ढग्रन्थि, स्फुटितो प्रण इव, पराभूत: शोक: नूतन इव पुनः मा विकल यति । अनुवाद-बहुत अधिक दुख माज विष के समान मेरे हृदय है । ऐसा लगता है मानों मेरे मन में लगे हुए काटे को किसी ने खूब जोर मे पकड कर हिला दिया है। जो मेरे मन का शोक समय की दूरी से कुछ घट रहा था यह मानो फिर भर गया हरा हो गया और मुझे व्याकल बनाने लगा। २२ शम्यूक-गुञ्जत्कुलकुटीर कौशिक घटाधुत्कार वत्कीचक स्तम्बाइम्बरमूक्मौ कुलिकुल कौश्चाभिधोऽयं गिरि । एतस्मिन्प्रचलाकिनां प्रचलता मुजिता कूजते रुद्वल्लन्ति पुराणरोहिणतरुस्कन्धेषु कम्भीनसाः ॥२६॥ अन्वय-गुज्जरकुनकुटीर कौशिक घटा पुत्वकारसत्कीचक स्तम्बा डम्बर मूकमो कुलिकुल क्रौञ्चामिध भय गिरि । एतस्मिन् प्रचलता प्रचला किनाम कूजित उजिता कुम्भीनसा पुराण रोहिण तरुस्त धेषु उद्वेल्लन्ति । अनुवाद-यह कौञ्च नामक पर्वत है। इसपर गुजायमान कज कुटोरों में रहने वाले चल्नुमो के पू२ शब्द मिश्रित यासो के गुच्छों के ऊचे शब्दो स भयभीत कौवे शब्द पून्य हैं । यहा पर चलते हुए मोरो के शब्दों से डरे हुए सर्प पुरानै चन्दन के वृक्षों के स्कन्धों में इधर उधर २३ एतते करेषु गद्गद् नग्दद्गोदाबरो वारयो मेघालम्बित मौलिनील शिसरा क्षोणीभृतो दाक्षिणाः । श्रन्योऽन्यप्रतिघातसइल चलकल्लोल कोलाहले सत्तालास्नइमे गभीरपयस पुण्या सरित्सङ्गमा ॥३० ।। अन्वय-कुहरेषु गद्गदनदद् गोदावरी वारयो मेघालम्बित मौलिनील शिखरा त एते दाक्षिणा क्षोपोभृत । अन्योन्य प्रतिधात सडकुल चलकल्लोलकोताहले उसाला त मे गभीर पपस, पुण्या सरित्सङ्गमा । अनुवाद-गुफापों मे बहती हुई गोदावारी को पारा वही है । दक्षिण के ये वही पर्वत शिखर हैं जिनपर लिपटे हुए यादम है नीलिमा प्रदान कर रहे हैं। यही पर नदियों में ये पवित्र सङ्गम है जिनका जल गहरा है और जो गरी उनी गिरती हुई लहरो की मीपण पनि से भपार है। १५३ ततीय अंक अनिर्मिन्नो गभीरत्वादन्तगूढधनव्यथः । पुटपाकप्रसोकाशो रामभ्य करुणो रसः ॥१॥ अन्वय- मीरत्वात् अनिभिन्नः मन्तगूढघनन्यथो रामस्य करुणो रस: पुटपाकप्रतीकाश। अनुवाद-राम का करुण रस अर्थात् सीताविशेगजन्य शोक पुटपाक के समान है, जो गम्भीरता के कारण व्यक्त तो नहीं होता, किन्तु मौतर छिपी हुई गाद वेदना से युक्त है। २५. परिपाण्डु दुर्वल कपोलसुन्दर दधती विलोलकबरीकमाननम। करुणस्य मूतिरथवा शरीरिणी विरहव्यथैव वन मेति जानको ॥४॥ अन्वय-परिपाण्ड दुर्वल पोन सुन्दर विलोलकवरीकम् मानन दधती जानकी करुणस्य मूतिरथवा शरीरिणी विरव्यथा इच वनम एति । अनुवाद-(गोदाबरी के प्रयाध जल वाले बलाशय से निकल कर यह) प्रति पाण्डवर्ण वाने मोर कृश कपोलों से सुन्दर तपा सुले हुए होने के कारण चचल केशविन्यास से युक्त मुख को धारण करती हुई, करुण रस की मूति अपवा देहधारियो। वियोगवेदना-सो सीता वन में प्रवेश करती है। २६. वासन्तो-त्वं जीवितं त्वमसि मे हृदयं द्वितीय त्वं कौमुदी नयनयोरमृत त्वमग । इत्यादिभि. प्रियशतेनुरुध्य मुग्धां तामेव शान्नमथवा किमतः परेण ॥२६॥ अन्वय- स्वजीवितम्, व मे द्वितीय हृदयम्, स्वम नयनयो: कौमुदी। त्वम् बगे पमृतम् प्रसि, इत्यादिभिः प्रियशत, मुग्पाम् मनुरुध्य ताम् एव-मथवा शान्तम्, प्रतः परेण किम् ?
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न्यज्ञयति तनुमन्तीहः करोनि न भामसान. प्रहरति विधिर्ममच्छी न कन्तति जीवितम् ॥३१॥ अन्वय-हृदय शोको गाद दलवि द्विघा तु न मिद्य, विकल: काय: मोह वद्दति चेतना न मुञ्चति । अन्ताहत ज्वलयति भस्ममा न करोति, ममंदी विधि: प्रहरति वीवित न कृन्तनि । अनुवाद-हृदय शोर से विचलित होने के कारण विदीर्ण होता है, लेकिन दो टुकडो में विभक्त नहीं होता, गोक से विह्वन शरीर मोहधारण करता है, लेशिन चंतन्य को नहीं छोडता; अन्त:करण का सताप शरीर को दलाता है, लेकिन भस्म नहीं करता, इसी तरह मर्मस्पन को विदारण करने वाला माम्प प्रहार करता है, लेकिन बीवन को नष्ट नहीं करता है। ३. राम-हा हा देवि ' म्हटति हृदयं ध्यसवे देवबन्धः शून्यं मन्ये जग चिरल चालमंवर्चलामि । मीदन्नन्ध तममि विधुरो मज्जती वान्तरात्मा विश्व मोह. स्थगयति कषं मंद माग्य. करोमि ॥३८॥ श्रन्यय-हा हा देवि ! हृदय स्फुटति, देहवन्धो ध्वसते जगत् शून्य मन्य, अन्तः अविरत ज्वाल बलामि, सोदन विधुर, मन्त- राममा अन्धे तममि मरति इव, मोही विध्वक स्पगति, मन्दभाग्य कय करोमि। अनुवाद-हा हा देवि, हृदय फट रहा है. देह का बन्धन शिपिल पह रहा है। ससार की अन्य प्रतोउ कर रहा ह प्रवियान्न ज्वालाग्रोमे भीतर जल रहा हू प्रसादयुक्त हुमा विकल यन्त:करण गाढ भन्यकार में माना डब रहा है। चारों पोर से मूच्या घेर रही है । मैं मन्दभाग्य वाला क्या कई ! ३१ राम एको रम करुए एव निमित्तमेदान् मिन्नः पृथक् पृथगिव प्रयते विवर्तनि ।
भारत बुवुदतरगमयान्विारा नम्भी यथा मलिलमेव तु तत्समस्तम् ।। १७ ॥ अन्य-एक: कणा म एव निमित्त दात भिन्न पृथक पृथक विवाद थयन इव, यया अम्म प्रावतं वृद तर मयान विकारान् श्रयत: तुनत् समस्त सलिलम् एव हि । अनुवादक करुण रस ही निमित्तमद मे भिन्न हाता हुमा पृथक पृयक शृगार प्रादि परिणामी को प्राश्रय दता है ऐमा प्रतीत होता है जैम एक ही जल मेंबर, बृदयद पोर तरण्ड म्प विकारी का प्राथय करता है पर वास्तव म यह सब जल ही है। चतुर्थ अंक ३.अान्यवती मन्तानचाँहीन्यपि मानुपागा दु यानि मदनन्धु वियोग जानि। दृष्टे जने प्रेयमि दु महानि स्रोत मन्त्ररिय मप्लयन्त ॥ ८॥ अन्यय-मानुपाणा सन्तान वाहीन्यपि सम्बन्धिवियाग जानि दुम्मानि प्रेयमि जन दृष्ट दुमहानि (भूत्वा) या सहस्त्र व मनयन्त अनुवाद-मनुष्यो में अविच्छिन्न भाव में प्रवाहित हान पाल बन्धु वियोगजन्य दृष्य प्रत्यन्त प्रिय व्यक्ति का साक्षात्कार हान पर प्रमा हार यमध्य पाराया के रूप म वहन लगत है। २३ अरुन्धति शिगुर्ग शिष्या या यमि मम तनिष्टनु तथा विशुद्ध क कर्षम्यत्वयि तु मम भान ददयति । शिशु नंगा वा भवतु ननु बनामि जगतां गुणा. पूजास्थानं गुणिषु न च लिग न च घय 1११ ॥ अन्वय-वं मम गिगुर्वा शिष्या वा यत् असि, तथा निष्टत, स्वयि विशुद्ध दरकपस्नु मम भक्ति दृढ़यति । ननु शिगुरव स्त्रैण का भवत, जगता पम्पा अमि, गृणि गुणा: पूजाम्यान, न लिग न च वय । अनवाद-तुम मेरी बेटी हो या शिष्या हो, जो सम्बन्ध है वह वैसा ही रहे परन्नु तुझमे जो पवित्रता का बाधिषय है, वह मेरी भक्ति को दृढ करता है । तुममे बालभाव हो या स्त्रीभाव तुम संसार की वन्दनीया हो । गुणियों में गुण ही पूजा के स्थान होते हैं; स्त्रीत्व, पुस्त्व या जटा पाय वस्त्र आदि चिह्न विशेष और उम्र पूजा वे स्थान नहीं होते हैं। ३४ अरुन्धती प्राविभूतज्योतिषां ब्राह्मणानां ये व्यहारास्तेषु मा संशयो भूत्। भद्रा हपां वाचि लक्ष्मीनिपक्ता नेते वाचं विप्लुतार्था वदन्ति ॥ १८ ॥ अन्वय-बाविर्भूत ज्योतिपा ब्राह्मणाना ये व्याहारा: तेषु सशयों मा भूत । हि एपा वाचि भद्रा लक्ष्योः निपक्ता एत विप्लुताथी वाचनबदन्ति । अनुवाद-प्रकट हो गई है ब्रह्मज्योति जिनको ऐसे विप्रो के जो वचन हैं, उनमे तुम्हे सन्देह न होना चाहिए । इनकी वाणी में कल्याणकारिणी सिद्धि नित्य सन्निहित रहती है । ये अवधार्थ वाणी को नहीं बोलते हैं । ३५ जनक चूडाचुम्बितकक पत्रमभितस्तूणीद्वयं पृष्ठतो भस्मस्तोक पवित्र लाञ्छनमुगे धचे त्वचं गैरवीम मौा मेखलया नियन्त्रितमधो वासश्च माञ्जिष्ठक पाणौ कामुकमक्षसूत्रवलयं दण्डोऽपरः पैप्पलः ॥२०॥ अन्नय-पृष्ठत अभित. चूडाचुम्बित कडूपत्र तुणीद्वय, भस्मस्तोक पवित्र लाञ्छनम् उर, रौरवो त्वच धत्ते, मौव्यां मेखलया नियन्त्रित माजिष्ठक वासः, पाणी कामुकम् मपर: पप्पलो दण्ड:मास्त। अनुवाद--कपत्र से युक्त पीठ के दोनों मोर चोटी को छूने वाले दो तरकशो को, योडी सी भस्म से पवित्र चिह्न वाली छाती १५० को प्रौर हरु नामक मृग के चमडे को भी यह धारण कर रहा है। इमके वक्षस्थल के नीचे पौवी मैखला से बांयी गई मजीठ को रग वाली घोती, हाथ मे धनु, रुद्राक्ष माना और पात्र म दण्ट भी है । ३६ वटयः पश्चात् पुन्छ यति विपुलं तच्च धूनोत्यजस्र दार्थनीयः म म ति खर स्तम्य चत्वार एन । शपायत्ति प्रकिरति शकनपिण्ड कानाम्र मात्रा कि व्याख्यानै जयति स पुर्नामे ह्य हि याम्॥ २६ ॥ अन्याय-पश्चात विपुळ पुच्छ वहति, अजस्त्र घूनोति स दीर्घ प्रोवो भवति, यस्य चत्वार एव सरा: शापारिप अत्ति, याग्र मात्रान प्राकृपिण्डवान् प्रकिति, व्याख्यान कि स पुन: दूर ब्रजति, एहि एहि याम । अनुबाद-वह शरीर के पीछे वही पूछ धारण करता है और उसे निरन्तर हिलाता रहता है। उसको लम्बी गर्दन होती है पौर उसके चार ही खर होते हैं। यह पास साता है और थाम के फलो के बराबर लीद के टुकडो को छोडता है। बहुत कहने से क्या? वह फिर दूर जा रहा है मामी प्रामो हम जाते हैं। ३७ लय । याजिया वलायतोत्कट कोटि दंष्ट्र मुद्भरिपोर घन घर घोपमेतत् । ग्रामप्रसक्तहसदन्तक नवनयन्त्र जृम्मानिडम्बि निकटोदरमस्तु चापम् ॥ २६ ॥ अन्वय-ज्याजिया बलयितीत्कट कोटिदष्टम् उद्भरिपोरधनपरं घोशम् एतत् पाप प्रासप्रसक्तहसदन्त कवक्त्रयन्त्रम्भा विडम्नि विक्टोदरम् अस्तु । अनुवाद-मोर्वी रूप नीम से वेष्टित, उन्नतकोटि रूप दो दष्ट्रामो रो युक्त और असत्य भयङ्कर तथा धने घघर शब्दों वाला यह धनुष, निगलने मे तसर, हेमता हुआ यमराज के मुख रूप ' यन्त्र को जम्हाई का मनुकरण करने वाला मतएव यह भयकर मध्य माग वाला हो जाय । पश्चम अङ्क ३८ल- काम दुग्मे विप्र कर्पत्य लक्ष्मी कीर्ति मूते दुई निष्पलाति शुद्धां शान्ता मातर मगलानां धेनु धोरा.सूनृतांवाचमाहु ॥३० भन्नय-काम दुर धे अलक्ष्मी विप्रापंति कोनि मूने दुईद: निष्पलाति मत धीरा सूनुता वाच शुद्धा शान्ता मङ्गलाना मातर धेनुम् पाहु । अनुवाद-सत्य पौर प्रिय वाणी मनोरप को पूर्ण करती है, दरिद्रता को हटाती है कीति को उत्पन्न करती है और शत्रओ को विनष्ट करती है । अत सुघोगण सत्य और प्रिय वाणी को शुद्ध शान्त कल्याण दात्री एव कामधेनु तुल्य कहते हैं । ३६ लव वृद्धास्त न विचारणीय चरितास्तिष्ठन्तु किंचयेते ? सुन.म्पोमयनेऽप्यकुठयशसी लोके महान्तो हि ते । यानि त्रीणि धुतोमुरबा न्यपि पदा-यात्व खरायोधने यद्वाकौशललिन्द्रसूननिधने तत्राप्यभिज्ञो जन ॥३४॥ अन्याय-ने वृक्षाः विचारणीय चरिता: न तिष्ठन्तु किं वय॑ते ? सुन्दस्त्रीमथनेपि अकुष्टय सः ते लोके महान्तः हि खरायोधन यानि श्रोणि कुतोमुखानि पदानि अपि यासन् वा इन्द्रसूनुनिधने यत् कौशल तत्र मपि जन: अभिज्ञ.। अनुनाद-वे राम वृद्ध हैं। अतएव उनके चरित्र की मालोचना नहीं करनी चाहिए। सुन्द को स्त्री ताइका को मारने में भी अप्रतिहत पशवाले वे लोक म श्रेष्ठ ही हैं। घर के साथ युद्ध में तीन पग पीछे हटे थे, अथवा वालो के मारने में जो निपुणना की थी उससे भी लोग परिचित है। .
पप्ठोडक "-चियावर मण मागिताणामणितकिङ्किणीकधनु- ध्यनदगुग्गुणाटनाकृतरराल कोलाहलम् । पिनत्य किरता शगनपिग्न पुन शूरयो विचित्रमभिननत मुगनीममायोधनम् ॥१॥ अन्यय -मणमगिनकङ्कणक्वपिनविङ्किणीकध्वनदगुरुणाटनीकृत बरालकालाल धनु विनत्य परान अयिरत विरतो शुरयो पुन विचित्र अवतभीमम यायाधनम् अमिवतते । श्रनमान -मनमनात एकगना की भाति शायमान किकिणिया बाल नथा मोवी एव दानो नाम से भीपरा कालाहन करने वाल धनुप का फैलाकर लग तार बाण छोडत हुए दोनों वोरा का पुन प्रस्चयजनक तया ससार के लिए भयोत्पादक युद्ध हो रहा है। म-१ पातु लोकानिय परिरात कायराननवेद क्षात्रो धर्म श्रिन इन तनु रामोशस्य गुप्त्यै । मामायानामिन समुन्य , सञ्चयो वा गुणाना- मानिभूय स्थित दर जगत्पुण्यनिर्माण राशि ॥९॥ अन्यय-लाकान धातु परिणत कायवान् अस्त्रवद इव, ब्रह्मकोशस्य गुप्य तनु धित क्षामा धम् इव, सामर्थ्याना समुदय इव, गुणानां सञ्चया वा, जगत्पुण्य निर्माण राशि प्राविभूय स्थित इव । अनुवाद-लोकों की रक्षा करने के लिए धनुर्वेद मानो शरीरधारी हा गया है । वदरूप निधि की रक्षा के लिए क्षात्र धर्म न मानी शरीर धारण किया है । शक्तियों का मानौं एक आधार म मिलकर माविर्भाव हुआ है । यह गणो का मानो समूह है। लोको के धर्मानुष्ठानों का समूह प्रकट होकर मानो स्थित है। ४२ रामः- व्यतिपनि पढाथानान्तर कोऽपिहेतु- नं मलु बहिरूपाधीन प्रतोय मंश्रयन्ते। विकमति हि पतद्स्योदये पुण्डरीकम् द्रवति क्ष हिमरश्मावुद्गते चन्द्रकान्त. ॥१२॥ अन्वय-मान्ता कोऽपि हेतु: पदार्थान् व्यतिपति, प्रीतय बहिरूपा- घोन खलु न सश्रयन्ते । हि पतङ्गस्य उदये पुण्डरीक विकनि, महिमरश्मी उद्गते चन्द्रकान्तो द्रवति । अनुवाद-कोई आन्तरिक मानवचनीय कारण ही पदार्थों या प्राणियो मे प्रोनि सयाग स्थापित करता है । प्रेम कभी वाह्य कारणों पर भाग्निन नहीं होता । देखो न, सूर्य के उदय होने पर ही कमल खिलता है और चन्द्रमा के उदय होने पर ही चन्द्र- कान्त मरिण द्रवीभूत होती है। ४३ पुश तथैव राम सीतायाः प्राणेभ्योऽपि प्रियोऽभवत् । हृदयं त्वेव आनाति प्रीतियोगं परस्परम् ॥३२॥ अन्वयः- तथैव राम: मीतायाः प्राणेन्योऽपि प्रिय अभवत् । तु हृदय एवं परस्परम् प्रीतियोग जानाति । अनुवादः-राम उसी तरह से सीता के प्राणों से भी अधिक प्रिय थे। परन्तु हृदय ही परस्पर का प्रेम सम्बन्च जानता है । ४४ रामः-चिरंध्यात्या ध्यात्या निहित इव निर्माय पुरतः, प्रवासे चाश्वास न खलु न करोति प्रियजन. । जगज्जीकारण्यं भवति च क्लत्रे परते फुफूलानां राशौ तदनु हृदयं पच्यत इव ॥३८॥ १६२ थ-वर-प्रवाम द चिर यात्वा निमाय पुरन निहित इव प्रियजन आवास न रानि (इति) न ह । बलन उपरते जगत् जोगारण्य भवति हि, तदनु कुक्लाना राशी हृदय पच्यत श्रन पान -प्रवाम काल में भी दोघकान तक निरन्तर ध्यान करके बल्पना द्वारा रचकर सामन म्यापित किया हुआ सा प्रियजन माना न देता है, यह बात नहीं है। अर्थात सान्त्वना दना ही है। परन्तु पत्नी के देशान्त हा जाने पर ससार जीण भी अग्य को मोति हा जाता है और उसक पश्चात् हृदय माना तपाग्निक ढर म उलन लगता है। सप्तम अक "गम -पाप्मभ्यश्च पुनाति वव रनि च अं यामि सेयं कथा मगल्या च मनोहगच नगतो मातम गंगे च । न मना प.िभाग्यवभिनयैनिन्यस्तरूण धुधा शक.नमपि में परिणता प्राज्ञस्य वाणीमिमाम्।।२१ अन्वय-माता इव गगा इस च जगत मङ्गल्या च मनोहरा च सा इस क्या पाप्मभ्य पुतीति, श्रयासि वर्धयति च । अभिनय. विन्यस्तरूपा शब्द ब्रह्मविद प्रातस्य कवे. परिणताम् इमा वाणी बुधा परिमावय अन वाद -माता के समान तथा गगा के ममान मसार की मङ्गल- कारिणी तधा रमणीया यह चनाहर प्रसिद्ध रामायण रूप कया पापा स शुद्ध करती है और कल्याणों का बढाती है । इस सुमित कथारूप वाणी का जो विद्वान कवि भवभूति द्वारा रूपान्तरित की गई हैं तया जिसका रुस अभिनयो द्वारा प्रदर्शित दिया गया है, पण्डितगण चिन्तन करें। ताम एना
परिशिष्ट (अ)
भवभूति-स्तुति-पद्यावलि
(१) स्पष्टभावरसा चित्र: पादन्यासः प्रवर्तिता।
नाटकेपु नटस्त्रीव भारती भभूतिना ।।
(धनपास-निलक मजरी ५।३०)
(२) भरभूतेशिरसरणी निरर्गलित तरंगिणी।
रुचिरा घनसन्दर्भ या मयूरीव नृत्यति ।।
(क्षेमेन्द्र-सुवृति (तिलक) ३ ॥३३)
(३) भवभूते सम्बन्धाद्भधर भूरेव भारतीभाति ।
एतत्कृनकारुण्ये किमन्यथा रोनिति प्रावा ।।
(गोवर्धनाचार्य-आर्याशप्तशती ११३३)
(४) सुकविद्वितय मन्ये निसिलेऽपि महीनले।
भवभूति.शुप्कश्चाय वाल्मोफिस्त्रितयोऽनयोः ।
(भोज प्रबन्ध १९१)
(५) उत्तरे रामचरिते भवभूति विशिष्यते। (वित्रमा)
(६) रत्नवली पूर्वकमन् यदास्तामसीम भोग्यस्य वचोमयस्य ।
पयोघरस्येय हिमाद्रिजायाः परविभूपाभवभूति रेव ।।
(जल्हण-मूक्तिमुक्तावलि)
(७) भवभूतिमनात्य निर्वाणमतिना मया ।
मुरारि पदचिन्तायामिदमाधीयते मन. ।।
(जल्हण-मूक्तिमुक्तावलि
(८) मान्यो जगत्यां भवभूतिराया सारस्वतेवत्मनि सार्थवाहः ।
वाचं पताकामिवयस्य दृष्ट्वाजन, कर्वानामनुपृष्टमेति ॥
(उदयसुन्दरी चम्पू)
() भवभूतिजलधिनिर्गतकाव्यामृतरसकणा इव स्फुरन्ति ।
यद्य विशेषा अद्यापि विक्टेपु क्थानिवेशेषु ।।
(गौरवही वावपतिराज)
(१०) कारण्य भवभूतिरेवत्तनुते ।
( अज्ञात)
(११) जडानामपि चैतन्यं भवभूतेरभूद् गिरा।
प्राधाप्यरोवीत् पार्वत्या हसत स्मस्तनावपि ।।
(अज्ञात)
(१०) बभूव वल्मीकि भव कवि पुरातत प्रपेदेभुविभतृ मेण्ठताम्।
स्थित पुनयों भवभूतिरेखया स वर्तते सम्प्रतिराजशेषर
(बारामायण-राज)
(१३) मुबन्धौ भक्तिन क इह रघुकार न रमते
धत्तिनती पुत्र हरति हरिश्चन्द्रोऽपि हृदयम् ।
विशुद्धोक्ति शूर प्रकृतिमधरा भारविगिर:
तथाप्यतर्मोद कमपि भवभूतिर्वितनुते ॥
(सदुक्ति कर्णामृत)
(१४) थव्या यदि विभूति त्वतात कामयसेतदा ।
भवभूतिपटे चित्तमविलम्ब निवेशय ॥ (अज्ञात)
परिशिष्ट (व)
भवभूति के नाम पर संग्रह-ग्रंथों में
उद्धृत
पद्य:-
(१) निरवयानि पद्यानि यद्यनाद्यस्य का क्षति.।
भिक्षुक क्षाविनिक्षिप्त: किमिक्षुर्नीरसो भवेत् ।।
(शारगधर पद्धति)
(२) दैवाद्यद्यपि तुल्यऽभूद्ध देशस्य परिग्रह ।
तथापि किं कपालानि तुला यति क्लानिधे.
(शाग० प०)
(३) अलिपटैरन्यातां सहृदय हृदयनरं विलम्पन्तीम् ।
मृगमदपरिमल लहरी समोर पामरपुरे किरसि ।।
(शारगधर पति)
(४) चूढापीडनिवद्धवासुरिफ्णां फुत्कानिर्यद्विपा-
ज्यालाजम्भितमत्स्यक्च्छपवधू लोढेन्दुलेखामृतम् ।
मदनकाहाक्चाक्पण- अव्याव म्मरसूदनस्य ५च्योतन्नासरित्सरोपगिरिजादृष्ट अटामगलम ॥ 39285- (सदुक्ति कमि त) (५) गाढप्रन्थिप्रफुल्ललद्गल विफलफ्णापाठनिर्याद्विपाग्नि- ज्वालानिप्तप्तचन्द्रद्रपमृतरमप्रोपित प्रेतभावा । उम्भा वध्रु नेन तिममक सन्तप्णयालोक्यन्त्प पन्तु ना नागनालायतशरशिर श्रण यो भेग्वस्य ॥ (सक्ति) (६) वैकुण्ठस्य कर क्मङ्कनिहित भ्रष्ट पाल करे प्रत्यंग च विभूषण विरचित नाकौम्मा कीकसै । भस्म स्थापरलगमम्य जगत शुभ्र तनौ निभ्रत कल्पान्तेषु कपालिनो विजयते रौद्र कपालनतम् ॥ (मदृक्ति) (७) या तपस्वी गतोऽस्थामिति स्मेराविवस्तना। वन्दे गोरीधनाश्लेप भरभूति सिताननौ ।। (मदुक्ति) (८) शौर्य व कुताश्यावधि यशो ब्रह्माण्डमण्डावधि त्याग सप्तसमुद्रमुद्रित महौनियानदानावधि । वीयंयत्तु गिरा न तत्पथि ननु व्यक्त हि तत्कर्ममि सत्य ब्रह्मतपोनिधर्भगरत किनि लोकोत्तरम् ।। (सदुत्ति) (E) नि ससार करघान विदीर्णधान्तदन्तरुधिरारणमूर्ति । केमरीव क्टकादुदयादरलीनहरिणो हरिणाङ्क । (सदुक्ति०) (१०) उपसि गुरुसमन लग्नमाना मगाक्षी रतिरुतमनुक्त' राजकोरे प्रवृते ।
नवम्मल तित्यति शिशलीलानर्तनन्छमताल प्रचलवलयमाला स्फालकोलाहलेन ॥ (सदुक्ति०) (११) भुगां घमारम्भे पवनचलितं तापऽतथे पटच्छनाकारं वहति गगनं धूलि पटलम् । अमी मन्दागणां दबदहन संदोहितधियो न ढौकन्ते पातुक्षटिति मकरन्दं मधुलिहः ॥ (सदुक्ति कर्णामत) ( १२ ) पनि तृणकुटीरे क्षेत्रकोणे यवानां पलालस्रस्तरे सोपधाने । परिहरति सुपर हालिकद्वन्द्वमारात् स्तनकलशमहोप्मावद्धरेखस्तुषारः ॥ (सक्ति) ( १३ ) किंचन्द्रमा. प्रत्युपकारलिप्सया करोति गोभिः कुमदावयोधनम् । स्वभाव एवोन्नतचतसा परोपकारव्यसनं हि सोवितम् ।। (रसिक जीवन गदाघरमट्ट) परिशिष्ट (A) सहायक ग्रन्थ सूची [प्रस्तुत पुस्तक के प्रणयन में जिनकी सामग्री का सहारा लिया गया है। १ इनसाइालोपोडिया माफ रिलीजन एण्ड ईपिक्स-एडिनवर्ग, १९५५ ए हिस्ट्री माफ क्लासिकल सस्कृन लिटरेचर-डा. कृष्णमाचारी, मदास, १६३७ ३ ए हिस्ट्री आफ सस्कृत लिटरेचर-डा० मैक्डानल-मुशीराम मनोहरलाल-दिल्ली, १९५८ ए हिस्ट्री माफ सस्कृत लिटरेचर-डा० दासगुप्ता और डा० एस० के डे-कलकत्ता, १६४० २ ४ १६७ ७ . " " ५ सस्कृत माहित्य का इतिहात-प्रो. बलदेव उपाध्याय, चौ. स० पु. वनारस १९५९ ६ सस्कृत साहित्य की रूपरेखा-प्रो० चन्द्रशेखर पाण्डेय, कानपुर सस्कृन हामा-डा० ए० वी० कीथ, पावमफाई १९२४ ८ हमारी नाट्यपरम्परा-श्रीकृष्णदास, प्रयाग १९५६ t मालतीमाधवम् -नि० सा प्रे०, बम्बई १० महावीर चरितम्-रामचन्द्र मिश्र, चौ० स० पु० बनारम -डा. टोडरमल १२ उत्तर रामचरितम्-डा० पी० पी० काणे, मोतीलाल बनारसीदास दिल्ली -आनन्द स्वरुपएम०ए० -१० तारणोश मा, रामनारायण सात इलाहावाद डा० वैलवलकर, हावयूनीवसिटी प्रेस प्रिन्सिपल शारदारंगरे । -५० रुपगम शर्मा, चौ० स.पु. बनारस सस्कृत ड्रामा-ग्रो० आर० वि० जागीरदार, धारवार -प्रो. के. पी. कुलकर्णी २० दि थियेटर ग्राफ हिन्दून-विलमन, लत्ता १९५५ २१ दिक्लासिकल एन-भारतीय विद्याभवन बम्बई १९५४ २२ दि इण्डियन थियेटर-डा. चन्द्रमान गुप्त-मोतीलाल बनारसीदास बनाग्म १९५४ २३ कालिदास और भवभूति-द्विजेन्द्रलाल राय २४ भवभूति-हिज लाइफ एन्ह लिटरेचर-प्रो. एस० वि० दीक्षित, वेलगाव २५ मालतीमाधव. सार ग्राणि विचार-लेले " 17 AND-