Adarsh Library, Jaipur
Teen Shahar Teen Pahar
Front matter
No text on this page.
पुरपोतमदाम गौड़ 'फोमत'
No text on this page.
तीन शहर तीन पहर
मामाजिक उपन्याम]
पुरषोत्तमदास गौड़ 'कोमल'
No text on this page.
तीन शहर तोन पहर अपने पाठकों को "नेवर माइण्ड (कोई बात नहीं)" दन्त- पंक्तियां चमकाती वह बोली, "कम विद मी, पाई गैल लाइक ए कम्पनी विद यू)। (मेरे साथ प्रायो, मैं तुम्हारा साथ पसन्द करूंगी)।" रामानन्द के हर्ष का अन्त न था । वह आगे बढ़कर धीरे-धीरे विदेशी महिला के साथ ताज की ओर बढ़ने लगा। इस संयोग पर वह जितना प्रफुल्लित था उतना ही चकित भी। विदेशी महिला के रूप में भगवान ने उसे साक्षात् दया-प्रेम की देवी के दर्शन करा दिए १ धुंधतरे-भरे मोर में पाट की पोर जाते हुए रामानन्द के मुख से पपने पाप ही फूट पहा-"बाबा विश्वनाय को नगरी "मुरार मा समागम"धन्य है याराणसी.. !" "हर-हर महादेव शम्भू, काशी विश्वनाथ मंगे!" चिमटा बगा-वजा पर तव स्वर में गाते हुए साप को तन्मयता ने उसे मापित किया। पद सीढ़ियां उतरते हुए घाट पर पा राहा हुमा । गगा की वेगवती नहर को पाट से टकरा-टकरा कर ऐसा निनाद कर रही थीं गानो ब्रह्म मुहूर्त में मापमन पोर स्नान करने वाले भक्तजनो का स्वागत. पमिनन्दन पर रही हो। सुप लोग छुटपुट स्नान कर रहे थे। उसने उधर कुछ ध्यान नही दिया पोर एरपोर सरकार, पाट मो पलिम सीढ़ी पर सडा होकर, गगा के प्रवाह-गोन्दर्य को निहारने लगा। उसके गंभीर नेत्र प्रशान्त जल-राशि को विस्तृत पादर पर फैल गए। जहाँ तर दृष्टि जाती थी, जन हो जल दीसता था। ऐसा लगता पा से गंगा की विस्तारहीनता में संभार या कोई प्रस्तिल हो न हो । "सपमुप सेरी महिमा पपार है गगा मैया! मैं निरय हो या मुहूर्त में मेरादगंन करने पाता है, तेरे मक मे बैठार तेरी निद्रा नहीं भंग करता। पण रोरा परणामा कर मोट जाता हूँ।रिन्तु इतने मात्र से ददय पालिन..." "मपापी' ययामी...!" मिमी पीर मे मी रोमांचक पौर पररा ६ तीन महर : तीन पहर पुकार प्राई कि रामानन्द का विचार-प्रवाह क्षरण-भर में भंग हो गया और वह घबराकर चारों ओर देखने लगा। करुण पुकार अब तक घाट पर झनझना रही थी, परन्तु किसी पोर कोई दिवाई न देता था। बुधलका छट रहा था। रामानन्द ने घर-घूरकर देसा। सहसा उसका रोम-रोम सिहर उठा ! सामने कोई सौ गज की दूरी रो "बचायो, वनायो!" की गुहार लगाती हुई एक स्त्री अत्यन्त अस्त-व्यस्त दशा में घाट की ओर भागी पा रही थी। "क्या मामला है ?" रामानन्द साहस के साथ उस और झपटा और उस समय वह चकित रह गया जब उसकी दृष्टि उस भीमकाय शरीर वाले व्यक्ति पर पड़ी जो उस महिला को पीछे से खदेड़ता पा रहा था। क्षण-भर में उसने स्थिति का जान कर लिया। उसका सारा दारीर कोच से फलक उठा और वह स्वयं उस महिला के समीप पा गया। गुहार ने ग्रास-पास के लोगों को भी अपने पास खींचा। जिस प्रकार कसाई के बंटे से टूट कर भागी हुई गाय धड़ल्ले से अपने मालिक के घर में घुसकर पनाह लेती है ठीक उसी तरह वह महिला अपरिचित रामानन्द की भुजाओं में समाती हुई चीखने लगी, "मुझे इस भेडिरे ने बचायो या · बचायो मुझे !" वह भेड़िया' जो अपनी मूरत-शक्ल और हाव-भाव से भी भेड़िया ही नजर माता भा, निकट मारुर निर्दयता पूर्वक उस महिला का हाथ खींचने हए गुर्राया, "सीधे से चलती है कि नहीं ? तुझे कोई यहां बचा नहीं सकता।" "होश में बात करो।" प्रह्मचारी और हृष्ट-पुष्ट रामानन्द ने कड़कती हुई गावाज में कहा, "एक प्रपला स्त्री के चरित्र पर डाका डालने चले हो? कौन हो तुम? तुम्हारा इनसे क्या सम्बत्य है ?" पहनाये और रंग-सा से नंन्यारापयानुगामी दोसने वाले उस भेड़िये में मालती भार प्रांगों ने सामानन्द को पूरा । समान ही विमान कानुनी और नीली घानी ने उसे गोदामा
गीनगार:मीन पर
७
पिमित पर दिया।
"पार नही गममा गाहप, यह पोल मामला है। पर" का
पर पुनः महिना पाहाय गीपन मगा।
'नी भंया, मी नट बोलता है।"नयमीत मानों में उग
गंदानी गरेको पार दगी हुई महिला मिनिटापटी, "यह मा.
वार देरे पांग में मेरा मतीय अट परना चाहता पी मी
सगजान दसरमागी।"
"वयवान !"दान पोगनारामानंद ने गंन्यामीराममा
लोप निरा "मुर्ग, हामी वही के । गाय-गन्यानी बनता है। यहे-बरे
बान रन पोमानी माता पारणरणा हैमोर पम-गलागी
पोट में भोली-मानी प्रबनामी मी मुटमा रिरदा है। अभी देता हूँ तुझे
दुरिम में।"
पारी मनुष्परिकता ही बनवान मन नही, रो हापो पर गाने भी
मिति में गायर हो जाता है। ऐसी हीदमाग मन्यागीभडियमी भी हुई।
राम-भर में उमर गिर में वामनापौर नाम नानाग ना उतर
गया।
जंग-नंगे पाना मना हारर वह भागने की पेटा पग्ने मगा। जय
घर मा पो पानी भी यहाँ परत्रही परी पी। माग गमानन्दकी
पदमारमा पो मराला पर गंभोर गपागों को गामिया दे रहे है।
"मागे निम में प्यार।" पर पति नो ग्नान
fr पायाम महार मानम होगा पाने मना, "मंगापता
परपरनामपर पनर नगाने गगनगे पो गरी पामी पर भी
रालि नार मा पनदामना । मलामी ने म
मागिनी गिमार भटना नरा रानीगा।"
"f, दिगमसिनार मार्ग पर पार?"
नमस्कार संगी। या महिला गमावरी माह में पाटी
पदा पर.पर पानी पी।
तीन शहर : तीन पहर "तुम डरो नहीं, भगवान ने तुम्हारी रक्षा की।" रामानन्द ने उसे सांत्वना दी और 'सन्यासी भेड़िये' को घसीटता हुआ आगे ले बढ़ा। घाट पर नित्य एक सिपाही की ड्यूटी लगती है ताकि स्नानाथियों के जान-माल की सुरक्षा रहे। संयोग से वह अपनी ड्यूटी पर ना ही रहा या। "लीजिये इन महात्मा जी को।" रामानन्द ने भटका देकर संन्यासी महाशय को सिपाही के आगे धकेल दिया और उसके कुकृत्य का विवरण दिया। सिपाही ने महिला का बयान लिया । भीड़ में से दो-चार गवाहियां ली। रामानन्द का पता-ठिकाना पूटा और भद्दी गालियां देते हुये संन्यासी को पुलिस चौकी की पोर ले बढ़ा। धुंधलका साफ हो गया था। भीड़ छंट गई थी। महिला इस तरह से रामानन्द के साथ थी मानो घनिष्ठ परिचित हो। "कैसे फंस गई अाप यहां ? कहां घर है ?" उसने महिला को सिर से पांव तक भर ग्रांखों देखा। पी फटने को थी। पूर्व की मुनहरी अरुणिमा में महिला के अप्रतिम सौन्दर्य ने नवयुवक रामानन्द को चकित कर दिया। उसकी अवस्था और लावण्य के अनुसार उसे महिला कहना अन्याय होगा। वह एक अठारह- उन्नीस वर्ष की अविवाहित नवयुवती थी। बहुमूल्य परिधानों से अलंकृत। "मैं आपका एहसान जीवन-भर न भूलूंगी, भाई साहव ।" अथाह ग्राभार ग्नोर श्रद्धा से वह बोली। "यह तो ठीक है, मगर अापने मेरे प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया ?" रामानन्द ने दुवारा उसका परिचय पूछा । अब दोनों अगल-बगल से करी गली में से गुजर रहे थे। "यताऊंगो,सब कुछ बताऊंगी यापको।" वह जमा प्राकर्षक व्यक्तित्व से अत्यधिक प्रभावित होकर कहने लगी, "यवीर चौरा पर हमारा मकान है। गनपति वर्माबोरेट का नाम सुना होगा पापने..।"
तीन शहर : तीन पहर ६ "हां हां, वह तो यहां के बहुत नामी वकील हैं।" रामानन्द बीच ही में बोल पड़ा। "जी हाँ, मैं उनकी सगी छोटी बहन हूं।" "वर्मा जी की बहन है आप?" "जी हाँ।" उसने घटना का रहस्य खोला, "बात यह है कि शादी को पांच वर्ष होने को प्राए, हमारी भाभी की गोद न भरी। उन्हें चिन्ता होने लगी कि अवश्य हो उन पर भगवान की प्रकृपा है । इसीलिए उन्हें बच्चा नहीं होता । संतान के लोभ में पूजा-पाठ, दान-धर्म मौर दुमान्तावीज़ में उनका विश्वास जगा । अचानक एक दिन यही संन्यासी भेड़िया हमारे द्वार पर भिक्षा मांगने आया। "भाभी जब भिक्षा देने निकली तो उन्हें घर-घूर कर देखते हुए इस पापी ने कहा 'बहू तुझे संतान शोक है न?' "भाभी पाश्चर्य चकित रह गई कि एक अपरिचित साधु को उनकी सतान प्राप्ति की इच्छा कैसे मालूम हो गई। मैं भी मौजूद थी मगर उसने हमारे भूत-वर्तमान के बारे में इतनी सत्य बातें बताई कि मैं भी चक्कर में पड़ गई। हमने अनुमान किया कि अवश्य ही यह कोई पहुचा हुमा महात्मा है।" "ये पापी ठगने के लिए पहले से सब कुछ पता लगा रखते हैं।" रामानन्द बीच ही में बोला। " जी हां, मगर उस समय हम दोनो इसके फेर मे आ ही गये । मुझे भी भाभी को गोद सूनी होने का दुःख था इसलिये मैंने भी गहरी रुचि ली। "हमे आकर्षित देखकर यह बड़े विश्वास और सद्भाव के साथ बोला, 'तेरी अभिलाषा शीघ्र पूर्ण होगी बहू ।' "सच महाराज ?" भाभी पुलक उठी "विल्कुल, मैं ऐसा-वैसा संन्यासो नही हूँ । बीस वर्ष तक मैंने हिमालय की कंदरा में तपस्या करके शकर भगवान की सिद्धि पाई है और अब १० तीन शहर : तीन पहर ? जनता का कल्याण करने के लिये वाचा विश्वनाय की नगरी में ग्राफर प्रासन जमाया है। दशाश्वमेध घाट पर वाई पोर की गुफा में मेरा निवास है । तुम किसी दिन रात्रि में बारह बजे के बाद वहां आयो, , उस वक्त मैं गिव महामाया की सिद्धि करने बैठता हूं, तुम्हें फूंककर एक बूटी दे दूंगा । वस कल्याण हो जायेगा।" "यावा, पाप बूटी फूंककर यहीं दे जाइये।" भाभी ने झिझकते हुए पन्हा। "बिना अपने परिश्रम के फल नहीं मिलता बहू ! अगर मुराद मांगने वाला खुद भोले शंकर के दरबार में जाकर मुराद न मांगेगा तो औघड़ बाबा क्यों कर सुनने लगे ? झिझक कैसी बहू ? हम माधु-संन्यासियों से कैसा डर ? एक औलाद के लिए आदमी को जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं । जैसी तेरी मर्जी • 'जय महामाया !" अपने ढोंग और व्यक्तित्व का भरपूर प्रसर डाल कर वह चला पाया। भाभी को दृढ़ विश्वास हो गया कि इस महात्मा को जड़ी-बूटी उनकी गोद अवश्य भर देगी। फिर किसी वस्तु के लिये व्याकुल रहने वाले व्यक्ति का सहज ही छला जाना स्वाभाविक होता है। भाभी ने इस पापी महात्मा के दरवार में जाकर मुराद मांगने का निश्चय किया और मुझे भी साथ लेने को राजी कर लिया। "प्राश्चर्य है !" रामानन्द हंसते हुए बोले, "एक चतुर और प्रग्यात एवोगेट की मुगिक्षिता पत्नी इतने मूसंतापूर्ण घोचे में आ गई ?" "मैंने कहा न ! आकांक्षा की अतृप्ति मनुष्य का बुद्धि-विवेक हर लेती है।" नवयुवती फिर से कहने लगो, "फिर हमने भैया से यह दात किया भी तो ली क्योंकि वे अन्धविश्वासों के सात सिलाफ हैं। हमने उनकी अनुपस्थिति में यहाँ प्राने का प्रोग्राम बनाया। एक मुपा- दमे मे सम्बन्ध में ये पल रात इलाहाबाद हाईकोर्ट गए हैं और अभी दोपहर तर पायेगे। बस मौका देखकर हम रात को यहां चल दी। और फिर मुराद पूरी नागाने के बहाने उसने हमारे साय जो व्यवहार किया वह, तीन महरतीन मापने अभी देखा हो।" "और मारकी भाभी कहां चली गई?" रामानन्द ने पुछा ! "हम दोनों माय ही थी परन्तु यह पहले मुभी पर नपा । वयं तक भामो यो मौका मिला और वे निकल नागीं । अब तक वे घर पहुंच गई होगी। यदि वे मुझे बचाने का प्रयास करती तो हम दोनों ही लुट जाती।' भारी क्या समाप्त कर नवयुवती ने एक दो निश्याच लो। "अब कभी ऐने गौरवन्धन्धे में मत पहियेगा ?" रामानन्द ने मुस्क- राजे हमें कहा, "प्राने अपना नाम तो बताया नहीं ? जिस कक्षा में पढ़नी हैं आप?" "मेरा नाम इन्दिरा है, इस साल इन्टर फाइनल में हूँ। और आपने ती अपने बारे में कुछ भी नहीं बताया?" "अपने बारे में क्या बताऊँ ? बन रमता जोगी, बहता पानी समझिये ।" रामानन्द ने कुछ इस हास्यपूर्ण ढंग से हाय मटवाकर कहा कि इन्दिरा के हॉटों पर बरबस ही हनी फूट पड़ी। रामानन्द का व्यक्तित्व, मान्यवहार और स्वभाव सब कुछ उसे पापित और मारवयंचश्ति कर रहा था। "फिर भी कुछ न कुछ परिचय तो होगा ही प्रापका ?" उसने और देकर पूछा। "मेरा नाम रामानन्द है। सही मान मन्दिर के पास मकान है। पिताजी पुतिन मय-इन्सपेक्टर है। मैंने इमी मात्र इन्टर पास किया है, फिलहाल आगे की पढ़ाई स्थगित बर ग्ला है।" गमानन्द एक ही नान में मब कुछ यता गया। "एना को?" इन्दिरा ने प्रवरज ने उमली पोर निहारा। "इमोलिये कि म्यूली पढ़ाई में मेरा मन नहीं लगता । प्राजकल स्कूल-कालेजों में जो मिक्षा दी जाती है उसमे मेग मन मेल नहीं साना। "प्रापकी कुछ धार्मिक और प्राध्यामिक रचि मालूम पड़ती है।"
तीन शहर :तीन पहर "हां, अभी आप घंटे पहले तक मुझमें गहरी धर्म और भक्ति पूर्ण अभिरुचि रही है, परन्तु अब वे नोत भी छिन्न-भिन्न हो गये ! " "आये ही घण्टे में विचार परिवर्तन हो गया ?" इन्दिरा ने अचरज से उसके गम्भीर हो पाये चेहरे की ओर देखा। "जी हां।" रामानन्द मस्तक सिकोड़कर बोला, "क्या अब भी धर्म और भक्ति के प्रति आस्था बनी रहेगी ? ज़रा अपने साथ की दुर्घटना पर विचार कीजिये। धर्म और भक्ति को प्राड़ बनाकर लोग अनेक पापाचार कर रहे हैं । खैर, छोड़िये इन बातों को। अपना घर तो बताइये । आपको सुरक्षित दशा में पहुंचा दूं । फिर मुझे भी अपने घर पहुंचना है।" "वह रहा।" इन्दिरा ने सामने के एकम कान की ओर संकेत किया। "अरे, वातों में हम यहां तक पैदल ही पहुंच पाये ?" इन्दिरा उसके साथ घर में प्रविष्ट हुई। "अच्छा मुझे विदा दीजिये।" उसने मुड़ते हुए कहा । "ऐसे नहीं, पाइये, अाइये।" उसने रुक कर आग्रह किया, "परिचय तो करा दूं आपका । मुह अँधेरे से घर से निकले होंगे, कुछ जलपान तो कर लीजिये।" "देखिये मेरा कर्तव्य समाप्त हुप्रा । अब मुझे जाने दीजिये ।" वह चल पड़ा। "सुनिये तो सही।" इन्दिरा झपट कर उसका हाथ खींचने लगी। यह विवाद हो गया। इन्दिरा उसे घर में लाई। मगर बैठक में कदम रखते ही वह सिहर उठी। उसके भैया-भाभी और कुछ पुलिस के प्रादमी बाहर की ओर जाने को उद्यत दिखाई देते थे। "ग्रोह ! इन्दिरा आ गई, या गई इन्दिरा ?" दौड़कर भाभी ने उसे बाहों में समेट लिया। एबोट गनपति वर्मा और पुलिस टुकड़ी की अचरज-भरी दृष्टि इन्दिरा और नवयुवक रामानन्द पर पड़ी। "हम इसका ही पता लगाने जा रहे थे ? आप कौन है ?" एडवोकेट तीन शहर:तीन पहर साहब ने पूछा। "प्रापको कष्ट करने की कोई जरूरत नहीं।" रामानन्द सरल मुस्कान के साय कह पहा: "मैं इन्हें उस संन्यासी भेड़िये से बचाकर ले आया और उस पापी को पुलिस के हवाले कर पाया हूं। घबराने की कोई बात नहीं।" "मैं प्रापका बहुत-बहुत एहसानमन्द हूँ।" उसकी योर वढ़कर उसका कन्या थपथपाते हुए एडवोकेट साहव गद्गद् स्वर में वोले, "पाइये, वैठिये पापको महानता की जितनी भी सराहना करूं थोड़ी है।" रामानंद कुर्सी पर बैठ गया और एडवोकेट साहब के भव्य भवन की साज-सजा निहारने लगा। पुलिस वाले उसके साहस की प्रशसा करते हुए चलते बने । इन्दिरा अपनी भाभी से अपनी मुक्ति मोर रामानंद के साहस की सारी कथा सुना रही थी। "मैं इन लोगों को बेवकूफी को क्या कहूं? सच कहा गया है, औरतें कितना ही पढ़-लिख क्यो न जाएं, वे बुद्धि और दिमाग से हमेशा साली होती हैं। मैं बाहर गया था। यहा इतना बडा काण्ड हो गया। पाप न होते तो भाग में समाज में मुंह दिखाने के काबिल न रह जाता। बहुत शुक्रगुजार हूं पापका।" एक ही सास में इतनी सारी बातें कहकर वर्मा जी ने नौकर को चाय-नारता लाने का आदेश दिया। इन्दिरा भाभी को रामानद का परिचय देने लगी। वर्मा जी थोड़ा रोप मे बोले, "तुम्हारी ही वजह से इन्दिरा वहां गई थी। तुम तो अपनी जान बचाकर भाग ग्राईं और उसे ...।" "मौर मेरे सामने कोई रास्ता ही न था। स्कना हम दोनो के लिये ही सतरनाक था। मैंने देखा कि वह इन्दिरा को खदेड़ता आ रहा है, मैंने वहां गुहार लगाई मगर कोई सहायता के लिये प्राता हुआ न दिखाई पड़ा। हार कर मैं घर की ओर भागो और पापको सूचित किया।" "खर जो हुआ उमे भूल जाइये । अब भविष्य में सावधान रहें कि १६ तीन शहर : तीन पहर । रामानन्द भैया! मैं सदैव तुम्हारी महानता की पूजा करूंगी। तुम मेरे सगे भाईने भी बढ़कर हो।" उसने उसी क्षण संकल किया कि वह रामानन्द को जीवन-भर अपने सगे भाई की भांति आदर-सम्मान देगी। घर लौटते हुए रामानंद के हृदय में गहरी उथल-पुथल थी। एक अमला को सतीत्व-रक्षा की उसे जितनी प्रसन्नता, संतोप था, उससे कहीं अधिक धर्म-मार्ग की ओट में होने वाले पापाचार से वह क्षुब्ध हो रहा था। उसके मन में भीपण द्वन्द्व उठ रहे थे। वह सोच रहा था इस संसार में जाने कितने ऐसे ही संन्यासी भेड़िये होंगे जो सावुता और सिद्धता का स्वांग भरकार समाज में नाना प्रकार के पापाचार को जन्म देते होंगे। संन्यास भी एक ऐसा वाना है जिसके प्रावरण में अनेक अमानवीय कृत्य पलते-पनपते हैं । उफ ! ऐसे धर्म-पथ को वह दूर ही से प्रणाम करता है। धर्म, साधुता और ईश्वरत्व के प्रति उसकी समस्त प्रास्याएं और विश्वास डिगने लगे। वह एक स्वच्छंद विचारों का निलिप्त नवयुवक था। किन्तु धर्म और संन्यान में उसकी गहरी अभिरुचि थी। ईश्वरत्व को सहज प्राप्त करने के लिये उसने संन्यास ग्रहण करने का निश्चय किया था क्योंकि समाज को कुंठा, कुवृत्ति और पापाचार से वह विलविला रहा था। मगर मंन्यास-पथ ग्रहण करने की भावना भी प्राज पाहत हो उठी। वह गहरे अन्तद्वन्द में डूब-उतरा रहा था। घर पहुंचा तो मित्र नरेन्द्र बैठक में उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। "अाज बड़ी देर से लोटे।" नरेन्द्र ने उसके भावपूर्ण मुख-मण्डल की सोर दृष्टि डाल कर पूछा। "हां, ग्राज दूर तक टहलने निकल गया था।" हारा-थका-सा वह तम्त पर नरेन्द्र के समीप या बैठा। "पया बात है बहुत उपडे-उखड़े से दिसते हो।" नरेन्द्र ने हैरानी से पूमा "कोई दुशंटना हो गई ?" "नहीं, मैं दुनिया को पुरूपता पर हैरान हूं। सोचता हं ग्राज चारों ।
तीन महर : तीन पहर तरफ जो गंदगी और प्रमानुपिकता फैली है वह समाज को किस रमातल में ले जाएगी ?" "बहुत वहक रहे हो मान, जरूर तुम्हारे साथ कोई दुर्घटना हुई है।" नरेन्द्र ने उसको वाह पकड़कर मकमारा और उसके भावपूर्ण हो पाए चेहरे पर अचरज-मरो दृष्टि डाली। "क्या बताऊँ भाई । तुम जानते ही मैं बहुत विकृत मस्तिष्क का मनुष्य हो गया हूं।" रामानन्द पोज में कहने लगा "माज मेरे साथ एक समाधारण घटना घटी है।" "किसी से मांखें लह गई क्या ?" नरेद्र हथेली बजाकर हम पडा। "तुम्हे तो हर वक्त मजाक ही मूझता है भाई।" रामानन्द उसके व्यंग्य से मुस्कराकर कहने लगा "तुम जानते हो, किसी से प्रांखें लड़ने का मेरे लिये कोई महत्त्व नहीं, मगर घटना एक मुन्दर लड़की से ही सम्बन्धित है।" "ओह, सुन्दर लइको ? कोई रूपसी ! कहाँ मिली? क्या नाम या उसका ?" नरेन्द्र पातुरता में सभी बातें एकसाथ ही पूछ गया। "कोई तुम्हे लडकियों के किस्से सुनाने लगे तो तुम रात-दिन सुनते रह "मजाक में मत टालो, वताप्रो वो सही।" नरेन्द्र ने अधोरता से पूछा, "तुमने उससे परिचम जरूर किया होगा। क्या उन थी ?" "हद है तुम्हारी आतुरता की।" रामानन्द कहने लगा "इसमें कोई नाक नहीं कि लड़की अत्यन्त मुन्दर है । मैं उसके स्वभाव और व्यवहार से শকি মাৰিব । "पोह ! तो तुम्हारा दिल आ ही गया उस पर।" नरेन्द्र में फिर चुटको लो। "मेरी दातों का गलत अर्थ मत लगायो।" रामानन्द सीमाकर बोला, "महां सवाल है सा लड़की से सम्बन्धित घटना का । वह घटना जो घण्टों से मेरे मस्तिष्क को कुरेद रही है, जिसने मुझे विकृत कर रसा तीन शहर : तीन पहर इस बार उसने जो कुछ कहा था उसमें गम्भीरता और मामिकता थी। द्र ने इस सचाई का प्राभास किया और स्वयं भी गम्भीर हो पाया। "अाखिर हुमा क्या?" सारा हास्य भूलकर उसने हैरानी से पूछा। "तुम्हें याद है न ।” उसका कन्धा थपथपाते हुए कहने लगा रामानन्द, में अभी कुछ दिन पहले तुम से कह रहा था कि मैं संन्यास ग्रहण करूंगा, इस सामाजिक जीवन से विरक्ति लेकर इसी पवित्र काशी भूमि पर कहीं एकान्त में अपना साधना कुटीर बनाकर चिंतन करूंगा...।" "तो. . .?" नरेन्द्र बीच ही में अकुलाया। "यही कि आज मैंने उस विचार को तिलांजलि दे दी।" और फिर उसने प्रातःकाल वाली सारी घटना उसे अक्षरशः सुना डाली। नरेन्द्र मौन, सब कुछ सुनता रहा और जव सारी कथा समाप्त हो गई तो उसने कहा, "छोड़ो भी यार । कहां तक तुम अपना दिमाग खराव करोगे? "मियां ये वाराणसी है, वाराणसी। कहनेको बाबा विश्वनाथ की पवित्र । महात्मा गौतम बुद्ध का ज्ञान धाम, माता सुरसरि का प्रांचल, परन्तु यहां क्या नहीं होता ? मैं तो समझता हूँ धर्म-नगरों में अधिक कुकर्म होते हैं। ऐसी जगहों पर तमाम रंगे-सियार गेरुवा वस्त्र धारणकर बसते हैं। धर्म माने घोखा और मजहब माने मार-पीट, एक मशहूर परिभाष ।" "मुझे आज तुम्हारे इन विचारों से सहमत ही होना पड़ेगा ।" द निःश्वास के साथ रामानन्द बोला "अब समझ में आया कि नैति का लिवास केवल ऊपरी जीवन में पहनना चाहिये । भीतरी जीवन अनैतिकता के बिना चल ही नहीं सकता, क्योंकि उससे मनुष्य की कु भावनाओं को बल नहीं मिलता। "सैर जो कुछ भी हो, आज से अपना प्रातः कालीन गंगा-दर्शन अन्यथा इस तरह की घटनाएं फिर मेरे सामने पाएंगी और मेरी " तीन शहर:तीन पहर १६ "कहां की बातें करते हो रामानन्द भाई।" वह उसकी बांह में चुटकी भर कर बोला "प्रभी तुमने देखा ही क्या है ? किसी दिन मेरे साय घाट पर चलो । मैं तुम्हें कितने ही ऐमे ढोंगी, बूढे और सिद्धहस्त महात्मा, साधु कहे जाने वाले भेड़ियो को दिखाऊँ जो घाट पर बैठे हुए चिंतन, मनन या हरिस्मरण का बहाना मात्र रचते हैं मगर उनकी कामुक दृष्टियां स्नान करती हुई स्त्रियों को छातियों, नितम्वो और उनके यौन अंगों पर विछलती रहती है। फिर इन्दिरा तो एक रूपवती लडको घी, उस वेवारे सन्यासी का संयम डिग जाना स्वाभाविक ही था।" "तुम ठीक कहते हो मगर ऐसे वातावरण और पातकी समाज में मेरा निर्वाह तो नहीं हो सकता।"रामानंद ने उपेक्षा से कहा और लम्बी-लम्बी सांसें लेने लगा। "अरे भाई, तुम्ही को अगर ऐसा अवसर मिले तो क्या तुम छोड़ दोगे? प्रौरत किसी शराब के नशे से कम नहीं है. . .।" "कैसी बेहूदी बातें करते हो । रामानद वीच ही मे घुड़क पडा "संयम भी कोई चीज होती है। स्त्री कितनी ही रूपवती और कामुक क्यो न हो, वह मुझे व्यभिचार के लिए प्रेरित नहीं कर सकती।" "कठोर सच को झुठलाया नहीं जा सकता।" नरेन्द्र ने मेज़ पर मुक्का जमाकर कहा, “गम्भीरता पूर्वक विचार करना । अभी तुमको अनुभव नहीं है । तुम ब्रह्मचर्य, अध्यात्मवाद और प्रादर्शवाद के नशे मे डूबे हुए हो इसलिये स्वाभाविक और प्राकृतिक काम भी तुम्हे अनैतिक और पापाचार मालूम होते है मगर जिस दिन अनुभव क्षेत्र मे उतरोगे तुम्हारी भावनाए कुछ और होंगी।" "हो सकता है।" नरेन्द्र की दलील से कुछ परास्त होकर रामानन्द ने नया तक उठाया "औरत और शराब की तुलना करके तुमने नारी की महत्ता को बहुत गिरा दिया है।" "कुछ हद तक।" नरेन्द्र ने मुसराते हुए तर्क को दूसरा रूप दिया। "यहां प्रसंग पल रहा था एक हावती लड़की का जिसे एक तीन शहर : तीन पहर संन्यासी चकमा देकर अपनी काम-क्षुधा शान्त करने का दानवी प्रयास कर रहा था । तुमने उस लड़की की रक्षा की और निस्सदेह एक मानवतावादी कर्तव्य की पूर्ति की-है न यही कथानक ?" "हाँ, तुम तो अदालत जैसी जिरह करने लगे।" रामानन्द उसे धौल जमाकर वोला। "बिना जिरह के तुम्हारी विक्षिप्तता की तुष्टि न होगी।" नरेन्द्र विस्तार में आया "क्या ये सम्भव नहीं कि यदि उस बालिका पर तुम्हारी आसक्ति होती तो तुम भी उसे एकान्त में पाकर संन्यासी जैसा ही उपक्रम करते?" "कदापि नहीं ।" रामानन्द ने प्रात्माभिमान में दृढ़ता के साथ कहा। "विलकुल करते जनाव, यह जवानी का तकाजा है।"वह अपने कथन की पुष्टि करने लगा "तुम नौजवान हो, तुम में पुरुषत्व के सारे गुण हैं । आसक्ति की स्थिति में नारी आकर्षण से प्रभावित क्यों नहीं हो सकते ? देखो, उन चन्द कायर और अहमी तथा आदर्श का ढोंग भरने वाले कामुकों की बात छोड़ दो जो काम-पिपासा के नशे में चूर रहते हुए भी स्त्री-प्रसंग के अवसर पर उस हड्डी चूसने वाले कुत्ते की तरह खींसे काढ़े और दुम हिलाते रह जाते हैं, जो 'स्वादिष्ट मांस' का आनंद केवल सूघ कर प्राप्त कर लेता है।" "मैं तुम्हें इतना बड़ा 'सेक्स सायक्लोजिस्ट (काम-विज्ञानवेत्ता) न समझता था।" रामानन्द ने अचरज से अांखें काढ़कर कहा । "देखो टालो नहीं, मैं तुम्हें कनविन्स कर दूंगा।" वह पुनः कहने लगा, 'मैं फिर दुहरा रहा हूँ, औरत एक नशा है, शराब से भी अधिक प्रभाव- शाली नगा।" "अजीव परिभाषा है।" "अजीव ही नहीं सर्वथा सत्य ।" नरेन्द्र सभझाने लगा "शराव जब तक गले के नीचे नहीं उतरती तब तक आदमी पर उसके स्वरूप का कोई फिर तुम - तीन शहर : तीन पहर प्रभाव नहीं होता, परन्तु स्त्री का साक्षात्कार मात्र पुरुप में सिहरन और झिझकन व्याप्त कर देता है । "यौन-भार मे परिपूर्ण सुन्दरी ! क्या पूछना है !" क्षणभ को रुककर नरेन्द्र ने ऐसी मादक सिसको ली मानो कोई नवयौवना उसकी बाहों में सिमटी हो । फिर गर्म साम खींचता हुए बोला, "नारी उपभोग के बाद पुरुप को कातर और क्षुब्य करती है जबकि शराब अपने उपभोग के बाद पुरुष को उद्दण्ड, ससक्त और सतेज बनाती है। "एक उपभोग के बाद ग्लानि उत्पन्न करती है और दूसरी उपभोग के बाद प्रचंडता और पुरुषत्व जगाती है।" "छोडो इस वकवास को।" रामानन्द ऊबकर उठ खड़ा हुआ मानो उसका मन अस्थिर हो रहा हो। वास्तव में उसका मन अस्थिर हो रहा था। नरेन्द्र ने जो तर्क किए थे उनसे सहमत न होना चाहकर भी वह सहमति की स्थिति का आभास कर रहा था। कौमी विडम्बना थी? जब नरेन्द्र नारी की परिभाषा दे रहा था अनायास ही अप्रतिम सुन्दरी इन्दिरा का चित्र रामानन्द की आंखों के सामने उभर रहा था। मानो उसकी प्रात्मदुर्बलता के लिए इन्दिरा एक चुनौती के रूप में उसके संयम और पुरुषत्व की परीक्षा ले रही हो। "छि , छि., कंसी दुर्भावना है । मैं उसे बहन के रूप में स्वीकार कर चुका हूं।" वह अपने मापसे फुसफुसाया । फिर सब कुछ विस्मृत करने का प्रयास कर बोला, "प्रायो, थोडा धूम पाएं।तुम्हारी नारी चर्चा ने भेग मस्तिष्क और भी विकृत कर दिया । यह सब व्यर्थ का विवाद है।" "देखा ना।" उसके कन्धे पर घोल जमाकर बोला नरेन्द्र, "जब चर्चा- मात्र तुम्हें असंतुलित कर सकती है तो दूसरी स्थिति में तुम विवेकहीन भी हो सकते हो।" "भगवान के लिये मेरी विकृति का उपहास न करो।" रामानन्द के स्वर मे याचना-सी थी। नरेन्द्र ने उसे परेशान देखा। अधिक तक उसे उचित न आर तीन शहर : तीन पह दोनों खुले वातावरण में निकल पड़े। तर्क ने उन्हें इतना थका डाला कि उनमें वाक्-शक्ति शेष न थी। रामानन्द का जीवन सामाजिक परिस्थितियों और समस्याओं से मुक्त यद्यपि परिवार पूर्णरूपेण गृहस्थ है । प्रारम्भ से ही वह भावुकता, ध्यात्म और चितन प्रकृति का पोपक है। उसके विचार और आत्मा किसी प्रकार का बन्धन और व्यवधान स्वीकार नहीं करती। परिवार ने प्रारम्भ में उसकी उन्मुक्तता पर कड़े नियन्त्रण लगाकर विधिवत् गृहस्थ- पारिवारिक जीवन विताने को विवश किया, परन्तु ज्यों-ज्यों उसकी जन्म- जात प्रवृत्तियों का स्रोत सशक्त होता गया, नियंत्रण की सीमायें टूटने लगी। पिता ने अनुभव किया कि उनका पुत्र नियंत्रण की सीमाओं में विक्षिप्त हो जाएगा, क्योंकि उसकी स्वतंत्र प्रवृत्तियां परिपुष्ट हो चुकी हैं। अतः उन्होंने रामानन्द को उसकी इच्छा पर छोड़ दिया और उसके भविष्य की चिन्ता भी त्याग दी। मनमौजी और स्वाभिमानी रामानन्द का जीवन आत्मनिर्भरता की दशा में अपने-माप प्रशस्त होने लगा। स्कूल की पढ़ाई को तिलांजलि देकर उसने कालेज की पढ़ाई विचार त्याग दिया और व्यायाम तथा मल्लयुद्ध में अभिरुचि लेने लय गरीर-गठन के साथ उसकी दूसरी रुचि वैदिक संस्कृति और अध्यात । अतः स्वचितन-मनन में भी उसके जीवन का काफी समय । होने लगा। उसे जीवन की अन्य दिशाओं में रंचमात्र भी लगाव और दि नहीं है इसलिए उसका परिचयक्षेत्र सीमित है। अपने जीवन स्वभाव-विचित्रता के कारण परिचितों में वह 'विकृत मस्तिष्क युवक' कहा और समझा जाता है । इसलिए यों भी उससे सम्पर करने में लोग कतराते हैं । यद्यपि वास्तविक रूप से वह ऐसान ततायें अन्य लोगों से भिन्न हैं। इसलिये भने . तीन महर : तीन पहर २३ उसे अन्यया समझे। जो भी हो, स्पष्ट होते हुए भी उसका व्यक्तित्व बहुत उलझा हमा है। इतने बड़े समाज में प्रगर उसे किसी से अनुराग, लगाव और मित्रता है तो केवल दो व्यक्तियो से। एक महपि मारमानंद से, दूसरे नवयुवक नरेन्द्र से। विचित्र चुनाव है उसका महाप प्रात्मानन्द जितने बड़े योगी, तपस्वी और अध्यात्म-चिंतक है, नरेन्द्र उतना ही प्रचड भोगी, विलासोपोर मासक्त । जर लगभग १४-१५ वर्ष की अवस्या में प्रयम बार गहरी मानसिक प्रशांति और कुंठा ने उसे व्याकुल किया था तो महर्षि प्रारमानन्द के वरद्- हस्त और उपदेशामत ने उसे विक्षिप्त होने से बचाया था और वह उसी दिन से सदैव के लिये उनका शिष्य बन गया। और जीवन में अनुभव और अनुभूति के लिए वह नरेन्द्र के प्रति भापित हुमा। नरेन्द्र उसका बाल-मित्र है। वाराणसी नगर के एक धनाढ्य व्यापारी का लहका। दोनो साथ-साथ स्कूल में पढ़े हैं। नरेन्द्र इसलिए उसके स्नेह और पाकर्षण का केन्द्र है चूकि वह जीवन के भनेक मोठे-कड वे अनुभवों से परिपूर्ण है । वह भोगी है और प्रत्येक सांसारिक मार्ग पर चलकर जीवन को गहराइयों को मममने-प्रांकने वाला। रामानन्द उससे जीवन के विभिन्न पहलुप्रो पर तक करता है। उसकी त तृप्या को तृप्ति मिलती है और नरेन्द्र को उसके तर्क से जीवन के अनुभवों से रम और रहस्य निचोडने का विवेक मिलता है। इस प्रकार एक-दूसरे के प्रतिफल पथानुगामी होकर भी वे दोनों प्राग और पानी की तरह सम्बन्धित हैं । वे मित्र हैं, प्रतिपक्षी मोर समवयस्क भी। दोनों की मवम्या लगभग पचीस वर्ष की होगी। स्त्रमा वचार- विभिन्नता उनकी मंत्री में रचमार भी वाधक नहीं है।
२४ तीन शहर : तीन पहर "यहां पुलिस चौकी की पोर कहां चल रहे हो ?" सहसा नरेन्द्र ने उसको ध्यानावस्था भंग की। "जान-बूझकर इधर आया हूं।" उसने मुस्कराते हुए कहा, "देखू तो सही, उस संन्यासी भेड़िये का क्या हुआ जिसे मैं पुलिस के हवाले कर पाया था?" "इससे कोई लाभ ?" नरेन्द्र ने झंझलाहट से पूछा, "तुम तो अपना कर्तव्य पूरा कर ही चुके।" "तो भी।" रामानन्द पुलिस चौकी के निकट आकर दरोगाजी से पूछने ही वाला था कि सहसा ही उसकी दृष्टि एक और मजमा लगाये उसी भेड़िये संन्यासी पर पड़ी। वह दो-तीन सिपाहियों से घुल-मिलकर कहकहा लगाते हुए ऊंचे स्वर में कह रहा था, "क्या बताऊं दोस्तो, उस पहलवान के श्रा जाने से बड़ा अच्छा माल हाथ से निकल गया। खैर, फिर कभी तो जाल में पाएगी।" "तवियत तो हमारी भी उस पर आ गई थी महन्तजी । मगर काफी पब्लिक इकट्ठा हो गई थी इसलिए हमें ड्यूटी निभानी पड़ी।" "उफ !' रामानन्द ने अपना सिर थाम लिया मानो किसी ने सिर पर लाठी दे मारी हो। "सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं ।" नरेन्द्र मुंह सिकोड़कर बोला, "अरे यार, यह वनारस है ! वावा विश्वनाथ की पावन नगरी, यहां हर काम धरम खाते में होता है।" रामानन्द क्रोध से होंठ फड़फड़ाते हुए जलती प्रांखों से घूर रहा था और वह साधु भेड़िया मस्त चाल से बाजार की भीड़ में चला जा रहा था। रामानन्द अपने मन में सहसा ही उठ प्राई आसक्ति से हैरान था। इन्दिरा को लेकर उसके मस्तिष्क में गहरी उधेड़-बुन हो रही थी। नरेन्द्र ने उस दुर्वलता को गहराई तक छू लिया था जो रामानन्द के संयम और आत्माभिमान की चक्की में प्रायः पिस चुकी थी।
तीन शहरः तीन पहर २५ इन्दिरा रह-रहकर उसकी मांखों के सामने नाच रही थी। उसका रूप- लावण्य, सुवासित शरीर और यौन-मदिरा में भोगी मुस्कान, पभी कुछ उसकी प्रोखों के समक्ष नाच रही थी, उसके मस्तिष्क में उन्मत्तता व्याप्त कर रही थी। "उफ, कैसी विडम्बना है !" यह अपने प्रापसे फुमफुसाया, “क्या नारी सचमुच मदिरा से भी अधिक उत्तेजक है ? क्या उसके सामीप्य और प्रासवित-ग्रामंत्रण पर उदासीन रह पाना वास्तव में प्राय: असम्भव है ?" वास्तव में सचाई कुछ ऐसी ही है। नारी-सौन्दर्य और संसर्ग की उपेक्षा कर पाना एक दुष्कर कार्य है। यह जितना ही इन्दिरा को अपने मन से अलग कर अपने संयम-सतुलन को दृढ़तर रखना चाहता था उतना ही वह उसके करीब, और करीव माती चली जा रही थी। प्रात्मदुर्बलता को नियमित करने के लिए उसने प्रखें बन्द कर ली और सोने पर वाहे जकड़कर लेट रहा। सत्य ही कहागया है कि जो प्रकृति और कठोर सचाइयों को परे रख- कर निजत्व के अहम में अपना अनुभव पक्ष परे रराते हैं, मानवीय दुर्बलता और प्रकृति उन्हें कभी क्षमा नहीं करती। तन को एक बार झुठलाया जा सकता है परन्तु मन को झुठलाना सर्वथा असम्भव होता है। ऐमो ही दशा ग्रामक्ति को इस स्थिति में नवयुवक रामानन्द की भी प्रा बन्द करते ही उसे लगा कि इन्दिरा उसकी बाहों में समायो हुई करणालाप कर रही है । "ववानो, बवानो मुझे !" और गंगा घाट का वह दृश्य माकार हो उठा। इन्दिरा का सुन्दर मामन शरीर ! उम ममय रक्षाकर्तव्य की मनु- भूति में नारी-सर्ग अनुभूति विलोप थी, परन्तु इस समय रक्षा-अनुभूति विलोर थी और नारी-स्पर्श-अनुभूति प्रवल । रामानन्द, पचीसवर्षीय बहाचारी नवयुवक रामानन्द । सिर से पाय २६ तीन शहर : तीन पहर तक इस प्रकार कांप उठा जैसे किसी ने बर्फ का टुकड़ा उसके सीने पर रख दिया हो। अब तक वह नारी-संसर्ग अनुभव से सर्वथा कोरा था अतएव काम- चर्चा उसे बकवास और अनावश्यक प्रतीत होती थी परन्तु आत्मदुर्वलता की इस स्थिति में वह निजत्व के ब्रह्मचर्य अभिमान को धूल-धूसरित अनुभव करने लगा। 'क्या नरेन्द्र ने सच कहा है।' वह अपने-अापसे फुसफुसाया, 'तुम नौजवान हो, तुममें पुरुपत्व के सारे गुण मौजूद हैं । फिर तुम आसक्ति की स्थिति में नारी-पाकर्पण से प्रभावित क्यों नहीं हो सकते ?' देखो, उन चन्द कायर और अहमी तथा कोरी आदर्शवादिता का ढोंग भरने थाले कामुकों की बात छोड़ दो जो काम-पिपासा के नशे में चूर रहते हुए भी स्त्री-प्रसंग के अवसर पर उस हड्डी चूसने वाले कुत्ते की तरह खोसें काढ़े और दुम हिलाते रह जाते हैं जो सुस्वादिष्ट मांस का आनन्द केवल सूंघकर ही प्राप्त कर लेता है । क्या वह स्वयं इसी श्रेणी का कामुक और तृपित व्यक्ति नहीं है ? क्या वह स्वयं मन-मैथुन और मानसिक संभोग से व्याकुल नहीं है ? उसके माथे पर अनगिनत पसीने की बूंदें चुहचुहा आई। शरीर उसे आसक्ति और पिपासा से व्याकुल होता अनुभव हुआ। उसे लगा मानो उसके अंगो-पांग किसी मांसल प्रतिमा को अपने साथ एकाकार कर लेना चाहते हों। बहुत प्रयास किया उसने, परन्तु आसक्ति और तृष्णा उत्तरोत्तर फलीभूत होती चली गई। उसने तकिया अपने सीने से समो लिया और उसे दोनों हाथों से जकड़े हुए इस तरह गर्म लम्बी-लम्बी सांसें लेने लगा मानो एक अत्यन्त क्षुधित व्यक्ति पीपल की पत्तियां चबाकर अपनी क्षुधा को झुठलाने का असफल प्रयास कर रहा हो। सहसा द्वार पर किसी ने दस्तक दी। "कौन है ?" वह हांफता हुमा-सा बोला।
तीन शहर : तीन पहर "कोई है घर में ? सोलिये तो सही?" अागन्तुक ने उच्च स्वर में उसने अनुमान किया । यह कोई नारी कण्ठ था। क्षण-भर को उसे लगा जैसे उसे प्रासक्ति की चरम सीमा पर पहुंचाकर ईश्वर उसके मंयम, देवस्व और ब्रह्मचर्य की कटु परीक्षा ले रहा हो। चेहरे पर झांई-सी पड़ गई, मानो पागन्तुक ने उसकी भंगिमा पढ़ ली हो-~-वह अस्थिरता की दगा में पुनः द्वार खोलना भूल गया। प्रागन्तुक ने जब दुआरा सांकत बनायी तो उसको शून्य चेतना में सुई-सी चुभी और वह द्वार खोलने बढ़ा। द्वार भटके के साथ खोल दिया उसने । "कौन, इन्दिरा ?" उसके होंठ पड़फडा उठे और वह काम-जलित प्रांतों से इन्दिरा को घूरता रह गया। साक्षात् परम सुन्दरी इन्दिरा मनमोहक प्रसाधनों से अलंकृत एक हाथ में एक चमचमाती हुई पाली लिये सड़ी थी। वह मवाक्-सा अपला उसे निहारता रहा। "हां, मैं ही है भाई साहब !" मोहकता से मुस्कराती हुई इन्दिरा अन्दर प्राती हुई वह पड़ी, "अापने तो हमें एकदम से भुला ही दिया भैया। उस दिन से दर्शन तक न दिए।"धरा-भर को उसे लगा जैसे उसके अहम् और ब्रह्मचर्यत्व के पवित्र पात्र पर किसी ने थूक दिया हो। यह लौटकर तस्ल पर अपना सारा गरीर चादर मे रापेटते हुए बैठ गया। "हा, नही पा सका, कुछ व्यस्त था।" मासे झुकाकर उसने कापते स्वर में उत्तर दिया। "तो हम स्वयं हो चले पाए।" इन्दिरा दिना किसी भिभाव-सकोष के तस्त पर उसके इतने समीप ना बैठी कि उसकी सास का उतार-चढ़ाव तक उसे अपनी सासों में समाता हुमा महमूस हा । उफ ! उसका शरीर प्रगार हो रहा था।काम-उत्तेजना की प्रचण्डता में तीन शहर : तीन पहर वह ओत-प्रोत हा रही थी और मांखों के तले विवेकाहीनता का अंधकार-सा छाता जा रहा था। सुलगती 'आग' के समीप ही घी से भरी मटकी रखी थी, जिसकी गन्ध प्राग की साँसों में समायी जा रही थी। "खामोश क्यों बैठे हो भैया? क्या मेरे पाने से तुम्हें खुशी नहीं हुई ? मैं प्राण एक महान भावना को मूर्त रूप देने आई हूं।" कहकर इन्दिरा ने अतुल नेह से उसकी बांह पर हाथ रख दिया। जो गति आग में घी पड़ने से होती है और जो स्थिति बाढ़ में टूट जाने वाले बांध की होती है इन क्षणों में वही स्थिति रामानन्द की हुई। "अरे, तुम्हारा शरीर तो तप रहा है भैया!" इन्दिरा उसके तमतमाये चेहरे पर हैरान दृष्टि डालकर बोली । हाथ की थाली उसने बगल की मेश पर रख दी थी और उसका माथा छूकर ज्वर की भीपणता का अनुमान कर रही थी। मानो इन्दिरा की सात्त्विक सान्निध्यता उसकी कुत्सित-लिप्सा में डूब - गई हो । उसने अपनी कांपती हथेली इन्दिरा के सुडौल कन्धे पर रख दी और गर्म उच्छवास के साथ फुसफुसा उठा-"सचमुच तुम कितनी सुन्दर हो । 'कितनी।" "भैया' . .?" अथाह अचरज से, सशंकित इन्दिरा ने उसके चेहरे पर - देखा। , "राचमुच तुम उन्माद की मादक सरिता हो, जिसमें डूबने को मन ।" वह उसे अपनी ओर खींचने का प्रयास करने लगा। "यह क्या भैया ?" इन्दिरा सहसा ही तड़प-सी उठी, "तुम्हारी महान प्रात्मा में यह पाप कहां से समा गया ? भगवान के लिए अपने को संतुलित कर लो। मैं तुम्हें राखी बांधने भाई हूं।" "राखी । राखी ? मेरी झुलसन का मजाक न उड़ायो।" और वह भेड़िया-सा भयानक दीखने लगा। "संभल जाग्रो भैया !" उसने चेतावनी देनी चाही--"मेरे पवित्र ।
तीन शहर : तीन पहर २६ उद्देश्यों को कलंकित न करो। अपने देवत्व की गरिमा कलंकित करके तुम्हे आजन्म पश्चात्ताप होगा। तुम मुझे सगी वहन मानने का संकल्प कर चुके हो।" उसने रामानन्द को धकेल दिया। "इन्दिरा । मैं उस भावना को सुरक्षित नहीं रख सकता । मैं वासना में पागल हो रहा हूं.'' मुझे मजबूर।" "होश में आ जाइये..।" तत्क्षण ही इन्दिरा का हाथ भटके के साथ उठा और रामानन्द के गाल पर जा बैठा। वह लड़सड़ाकर घरती पर बैठ गया। और इन्दिरा हांफती-कांपती पहा से दूसरे कमरे मे भाग खड़ी हुई। वह वासना की प्रबल उत्तेजना में अपने-आपसे लडता रहा लड़ता रहा और नफरत की आग उसके दिलो-दिमाग को झुलसाती रही। वह सिर थामकर पृथ्वी पर बैठ गया । मन और मस्तिष्क को सुस्थिर करने का प्रयास करने लगा। सारा शरीर पसीने से भीग गया था। चेहरा स्याह पड़ रहा था । अपने अंग अपने को ही वोझिल लग रहे थे। कल तक ब्रह्मचारिता, प्रात्माभिमान और संयम के नशे मे डूबा रहने पाला रामानन्द प्राज अपने को संसार का सबसे प्रथम व्यक्ति समझ रहा था। उसे अपने-आपसे घृणा हो रही थी। 'इन्दिरा क्या सोचेगी ? वह भोली-भाली स्नेहमयी इन्दिरा, जो भातृत्व स्नेह की महान भावना से प्रोत-प्रोत होकर उसे राखी बांधने आई भी?' क्या इन्दिरा उसे कभी क्षमा कर सकेगी ? 'नहीं, कदापि नहीं।' बेहया और निर्लज्ज पुरुष अपना चरित्र और संयम विनष्ट करके भी स्वाभिमान को हेकडी भरता है मगर नारी अपनी शील, लज्मा और सतीत्व दिनप्ट करने के बाद सिर उठाकर चलने का अहम नहीं उठा पाती। फिर इन्दिरा तो एक प्रत्यन्त विनम्र और भावुक लडको है। अपनी स्थिति का प्राभास कर वह पदापि न जीवित रह सकेगी।
३० तीन शहर : तीन पहर - तो फिर उसकी मृत्यु या विनाश का सारा दोप रामानन्द पर पड़ेगा। रामानन्द फिर से बिलबिला उठा। मस्तक की नसों को कसकर भींचते हुए वह पराजित स्वर में बुदबुदा पड़ा, 'क्या इन्दिरा क्षमा-दान नहीं कर सकती ? क्या उसके चरणों पर गिरकर इस महाव्याधि से मुक्त नहीं हुया जा सकता?' वह उठा और मन तथा मस्तिष्क को काबू में लाने का प्रयास करते हुए दूसरे कमरे की ओर झपटा। किन्तु सहसा ही मानसिक क्षोभ ने उसे लताड़ा, 'अपना कलुपित मुंह लेकर उसके सामने जाएगा? लाज न आएगी तुझे ? उसी पर भातृत्व का नेह जताकर क्षमा मांगने जा रहा है ? अरे मूर्ख ! क्षमा याचना यात्मिक शान्ति का उपचार नहीं, ऊपरी ढोंग मात्र है। अांखें मिला सकेगा उससे? उजड़ी हुई फुलवारी भंवरे के करुणालाप में दुबारा नहीं खिलती। जा, कहीं चुल्लू-भर पानी में डूब मर । उसे इतनी गहरी यंत्रणा हुई कि वह छोटे बच्चे की तरह रो पड़ा। "ग्राह देव ! मैं क्या करू ? मेरा दम घुट रहा है । क्या अपने दुष्कर्म के चदले मुझे मौत नहीं मिल सकती ?" सहसा उसे कुछ ध्यान आया। वह पागल की तरह बाहर की ओर 'झपटा और सड़क पर दौड़ता चला गया। "तुम ठीक कहते थे नरेन्द्र । मैं हार गया।" वह लगभग चीख-सा उठा। नरेन्द्र अपने कमरे में अकेला वैठा हुअा मदिरा-पान कर रहा था। चौंक कर उसने उसकी विक्षिप्त मुखाकृति की ओर देखा और उठ कर "उसके समीप पाया। "यह क्या हालत बना रखी है दोस्त।" उसके कन्चे पर हाथ रखकर वह मन्द-मन्द मुस्कराया। "मैं पापी हूं। बहन के सतीत्व का घातक । तुम ठीक कहते थे ।"
. ३१ तीन शहर:तीन पहर वह पागल की तरह ठहाका मार कर हंस पड़ा। "मगर तुम्हारे तो कोई बह्न नहीं।" कौतूहल से उसकी मांखों में झांकते हुए नरेन्द्र बोला, "मोह, समझ गया। तुम इन्दिरा की बात कह रहे हो न । धर्म ही घो की टट्टी है। तभी मैं कह चुका हूँ कि धर्म माने घोखा, तुमने स्वाभाविक कार्य हो किया है।" "नरेन्द्र ..!" बीच ही में रामानन्द लगभग चीख-सा उठा, तुम्हारे पास जहरीले व्यंग्य और उपदेश सुनने नही पाया हूं। मुझे अधिक विक्षिप्त बनाने की कोशिश न करो।' "वैठो-बैठो, तुम भावुक और अनुभवहीन हो । इसलिए पश्चात्ताप की उत्तेजना ने तुम्हें गहरा आघात लगाया है।" स्नेह से उसकी बाहे पकड़- कर नरेन्द्र ने अपने समीप विठा लिया। "देखो मित्र, नारी रूपी मदिरा बड़े-बड़े ऋपियों, मुनियो और प्रादर्श- वादियों का संयम डिगा देती है और वे पाप कर बैठते हैं। फिर हम-तुम तो अभी साधारण नवयुवक हैं । उस दिन तुम मेरे तों का खण्डन कर रहे थे क्योंकि तुम्हें प्रत्यक्ष नारी-मसर्ग का अनुभव नहीं था। परन्तु आज जब नारी रूपी मदिरा की उत्तेजना..." "मेरी पारमा अपने कुकृत्य पर बिलबिला रही है नरेन्द्र ! मैं प्रात्म- शान्ति की तलाग मे भटक रहा हूं।प्रायश्चित्त का कोई मार्ग वतायो मुझे।" "जो कुछ तुमने किया वह पुरुषोचित या । उममें प्रायश्चित्तका सवाल नहीं उठता।" "वहन के माय बलात्कार का प्रयत्न पाप नहीं तो और क्या है ?" "नातेदारी दोनों पोर मे निमती है।" नरेन्द्र ने फिर तक किया, "उमने तुम्हें नाई मान लिया था मगर तुम्हारी पात्मा तो टम वहन के रूप में न स्वीकार कर मी थी। फिर उसुगमन पास कहा हमा ? पाप तव होता जब मम्बन्ध को दोनों की प्रान्मा ने प्रान्मिनाद में म्वीकार किया होता।" "तुम मित्रता के नाते मेरे पास पर दांडाल रहे हो।" दहशबहुना।
तीन शहर : तीन पहर
-
"नहीं दोस्त, ऐसा नहीं।" मदिरा की एक चुस्का लेकर वह बोला, "देश
छाती पर कितनी ही ऐसी घटनाएं विखरी पड़ी हैं कि पिता ने अपनी
गी पुत्री को, भाई ने अपनी सगी बहन को और बेटे ने मां को भ्रष्ट ...."
"चुप रहो, मेरा मस्तिष्क और विकृत न करो नरेन्द्र ।" वह तड़प
उठा और तत्क्षण ही उठ खड़ा हुआ।
"फिर वहक रहे हो।" मदिरा का गिलास उसकी ओर बढ़ाते हुए
नरेन्द्र ने चुटकी ली, "लो कण्ठ भिगो लो! स्त्री रूपी मदिरा-पान तब तक
मनुष्य को वास्तविक विपय-भोग का ग्रानन्द नहीं देता जब तक वास्तविक
मदिरा!
।"
"तुम सब पापी हो, समाज के कोढ़ और मैं महापापी।" उत्तेजना
में रामानन्द ने नरेन्द्र के हाथ के गिलास पर कसकर एक हाथ
मारा।
फर्श पर गिरकर गिलास चकनाचूर हो गया
नरेन्द्र अवाक-सा उसकी ओर देखता रहा और वह पुनः प्रात्मशांति
और प्रायश्चित्त की तलाश में सड़क पर भागता चला गया।
हांफते हुए वह अपने गुरुदेव श्रात्मानन्द के निवास स्थान के द्वार पर
रुका, मानो समस्त मानसिक विकारों और पापों को धोने का एकमात्र
स्थल यही हो!
"गुरुदेव, महर्षि !" वह पूरी शक्ति से चिल्ला पड़ा।
"महपि तो नहीं हैं।" एक व्यक्ति ने आकर उत्तर दिया।
"कहां गए ?" उसने व्याकुलता से पूछा ।
"वे राधास्वामी आश्रम, आगरा गए हुए हैं
"अोह, अभी मुझे और भटकना होगा?-"
उल्टे पांव वह लोट पड़ा।
उसके पैर अब स्टेशन की ओर भाग रहे थे। मानो गुरुदेव के च
में ही उसकी यात्मशान्ति और प्रायश्चित्त-भावना लिपटी हुई हो।
बदबास-सा वह प्लेटफार्म पर पहुंचा। गाड़ी रेंग चुकी थी।
तीन शहर: तीन पहर
हांफते हुए दौड़कर वह अंतिम डिब्बे में चढ़ गया।
गाड़ी ने चाल पकड़ी, रफ्तार बढ़ती चली गई। लम्बी-लम्बी मांसें
लेते हुए उसने डिवे के बाहर झांककर देखा।
वाराणसी विलोप हो चुका था और गाड़ी अंधकार में समाती जा
रही थी।
'मागरा में मिलेंगे गुरुजी।' वह फुसफुसाया और तेजी से बढ़ गया।
गाड़ी बढ़ती चली गई।
२ गुलाबी चूप-भरा दिन और आगरा कैण्ट । प्लेटफार्म के बाहर आकर क्षण-भर को उसने चारों ओर उड़ती-उड़ती दृष्टि डाली। "राधास्वामी प्राश्रम पता है ? शायद दयालबाग मुहल्ले में पड़ता है।" "जी हां, ले चलूं ?" रिक्शे वाले ने घण्टी घनघनाई। "चलता तो...।" वह जेब टटोलने लगा। जेव में एक घेला भी न था । वह अपनी विकृति पर मुस्कराया और सड़क पर झपटता हुमा चला गया। वह राधास्वामी आश्रम की ओर इतनी तेज रफ्तार से झपटता चला जा रहा था मानो वह उसके जीवन की अंतिम मंज़िल हो, वहां पहुंचने पर उसकी सारी पीड़ा • 'कुंठा, धुलकर साफ हो जाएगी। महर्षि वात्मानन्द वेद-वेदान्त के ज्ञाता तो थे ही साथ ही संस्कृत भापा के विरुपात विद्वान भी। श्री-सम्पदा और मान-सम्मान उनके चरणों पर लोटता थी परन्तु उन्होंने संसार की मोह-माया से विरक्ति ले रखी थी और एक वास्तविक तपस्वी का जीवन व्यतीत कर रहे थे। यौवनावस्था में वे रामानंद से कम आकर्पक न थे। आज साठ-बासठ वर्ष की आयु में भी उनकी कंचन-सी दमकती देह, उन्नत ललाट, चौड़ी छाती और मधुर वाणी अाकर्पण को अदृभुत क्षमता रखती है। आजीवन अविवाहित रहकर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने के लिये वे तीन शहर : तीन पहर प्रख्यात हैं। ऐसे ही दिव्य महापुरुष की शरण में रामानंद प्रारम-शान्ति की माकांक्षा से भागता हुआ चला जा रहा था। राधास्वामी याश्रम की विशाल भट्टालिका के समक्ष पहुंचकर वह ठिठक गया। "क्या महपिजी भीतर होंगे?" उमने एक सम्य दिखने वाले व्यक्ति से पूछा। "कोन महपि? मारमानन्द जो ?" "हा, हो ! ये मेरे गुरुदेव होते हैं । मुझे उनसे मिलना है। उसने भभिलापा प्रकट की। "सीधे सामने वाले घराण्डे में चले जाइए, बाईं तरफ के कमरे में उनका प्रासन है।" उसने उस व्यक्ति को धन्यवाद दिया और बरामदे की ओर चल पड़ा। कमरे का द्वार खुला था। मोटे कपड़े का रंगीन कलात्मक पर्दा अल रहा था। "गुरुदेव, मैं वाराणसी से पाया हूँ, प्रापका शिष्य रामानन्द ।" उसने सादर सम्बोधित किया। "मोह, रामानन्द ? चले ग्रामो, भीतर चले प्रायो।" वह तत्क्षण ही भौतर प्रविष्ट हो गया। एक शानदार मोटे गद्दे और उजली चादर वाली तस्त पर महाप मसनद से टिके किसी पुस्तक के अध्ययन-मनन मे तल्लीन थे। उसने झपटकर उनके चरण स्पर्श किये तो महपि जैसे सोते-से जगे। उन्होंने विद्यु गति से हाय की पुस्तक उजली चादर के नीचे डाल दी। भौर सस्नेह मुस्कराते हुए उसे आशीर्वाद देने लगे। "आपके दर्शन के लिए मारा-मारा फिर रहा हू गुरुदेव !" वह भर- भराए कण्ठ से बोला तोन शहर : तीन पहर "वाराणसी से प्रस्थान करते हुए मुझे तुम्हारा स्मरण पाया था । जीवन स्वस्थ तो है ?" महर्षि ने पूछा। "क्या बताऊ देव. . .।" वह अपना वाक्य पूर्ण भी न कर पाया था सहसा पाश्रम-सेवक ने द्वार पर आकर कहा, "महर्षि, सेठ रद्दीवाला की र वाहर खड़ी है । वे आपके सिर्फ दो मिनट लेंगे।" "पाया, आया।" मुस्कराते हुए महपि शय्या पर से उठे और बाहर निकलते-निकलते रामानन्द से बोले, "मैं अभी पाया रामानन्द, फिर तुमसे वार्तालाप होगा।" गुरुदेव बाहर चले गए तो रामानन्द की फटी-फटी आंखें कक्ष के चारों ओर घूमने लगीं। वैभव, आकर्पण और सुख-प्रसाधनों से युक्त कक्ष, किसी सुख-सौन्दर्य- धनिक के कक्ष से कम न था। रामानन्द प्रांखें फाड़े कक्ष की साज-सज्जा निहारता रहा। 'संसार की मोह-माया और सुख-वैभव से विरक्ति लेकर संन्यास- पथ ग्रहण करने वाले गुरुदेव के लिए इस वैभव-विलासपूर्ण स्थान का क्या महत्त्व ? वाराणसी में तो एक एकान्त निर्जन में उन्होंने पर्ण कुई डाल रखी है ? पूर्ण संन्यासी का जीवन व्यतीत करते हैं।' वह तर्क-वितर्क कर रहा था । कक्ष से फिसलकर उसकी दृष्टि गुरु की शय्या पर आ टिकी। कुशासन पर विश्राम करने वाले महर्षि सुकोमल विस्तर ने उसे चकित कर दिया।' 'संन्यास, वैराग्य में भी मनुष्य को जीवन-स्तर बनाना पड़ता तभी तो महपि ने यह जीवन-स्तर अपनाया है।' महर्षि दो मिनट कहकर गए थे, मगर लगभग दस मिनट बीते भी वे न लौटे। रामानन्द उकता रहा था। उसके मस्तिष्क की विकृति उसे थी। TII आया, जब वह कमरे में प्रविष्ट हुग्रा तीन :तीन पहर किमी पुस्तक का अध्ययन बड़ी तल्लीनता के साथ कर रहे थे। उसे उत्सुकता हुई। कौन-मी ऐसी महत्त्वपूर्ण पुस्तक है जिसने महपि को इतना नन्मय कर रखा था । उसे वह पुस्तक देखने की इच्छा हुई। उमने गुरुदेव को पुस्तक चादर के नीचे डालते देखा था। चादर हटा- पर उसने पुस्तक रसा ली और यथास्थान वैठकर देखने लगा। पुस्तक के पृष्ठ उलटने ही उसे ऐमा लगा मानो सहमा एक तपती हुई लोह-शनासा किमी ने उसके मोने में घुमेह दी हो। प्राय फैल गई ! जिह्वा दांतों से कट गई और वह एक छटपटाहट-नरी मिसको लेते-लेते रह गया "माह देव • !' तप्न होंठ कंपित होते रहे और पुस्तक के पृष्ठ अपने-माप सुलते-मरकते चले गए। यया मारा संसार इसी प्राग मे जल रहा है ? इमी भाव-भावना और कालिमा से प्रोत-प्रोत है ? उमे लगा, टमका मस्तिष्क फट जाएगा। पुनक बन्द कर उसने एक जलती हुई निवाम छोड़ी। पुम्नक को यया- म्यान रखकर घम्म मे बैट गया। महर्षि या मारीच ? निरलर दम वपों मे जिसे गुरुदेव, श्रद्धास्वामी और महातपस्वी सममकर घरगग-रज लेता रहा, वही पारमानन्द है यह ? पपा उमी योगिराज प्रात्मानन्द का यह म्वरूप है ? है परमात्मा ..? मस्तक याम निर्जीव की भांति बैठा रहा । तर्क-वितर्क की शक्ति उममें गैप न थी। जिम प्रतिमा की पाराधना में उनने जीवन के दम वर्ष विताए थे, वह प्रतिमा माज न्ययं उनके मिर पर पट पड़ी और उसकी ग्राम्या लह- महान हो उठी। उसकी दमा उम भ्रमित पषि-मी हो रही थी जो घोर निराशा में प्पादित होते हुए नौ केवल धागा पागा-रश्मि के महारे निर्दिष्ट स्थान तक पहुंचा हो; परन्तु सहमा ही उसे चेतना आई हो कि जिस वह अपने विश्राम का अंतिम पड़ाव ममझ रहा था, वह वानू के बोसले टोने के तीन शहर : तीन पहर अतिरिक्त कुछ नहीं है। वह पुस्तक काम-विज्ञान की सर्वाधिक चर्चित पुस्तक थी। महर्षि प्रात्मानन्द उसी के अध्ययन-मनन में तल्लीन थे। सहसा कक्ष में प्रविष्ट होते हुए महर्षि वोले, "सेठ रद्दीवाला ने बड़ा समय ले लिया। तुम्हारी ही तरह मेरे बड़े भक्त और अनुयायी हैं । अपनी कोठी में मेरा प्रवचन कराना चाहते हैं, सो अनुमति के लिए आए थे।" महपि शय्या पर पुनः बैठ गए। रामानन्द ने कुछ सुना नहीं। उसे ऐसा लग रहा था मानो उसके सामने दशहरे की चौकी में राम का पार्ट अदा करने वाला वह व्यक्ति वैठा हो, जो दैनिक जीवन में चोरों और गिरहकटों की सरदारी करता हो। उसे महपि की सूरत से घृणा हो रही थी। अभी कुछ क्षण पहले सुपवित्र, सतेज और अलौकिक दिखने वाला मुखमण्डल इस समय कालिमा और कुत्सितता में डूबा हुआ नजर आ रहा था। गुरुदेव उसकी मनोभावना न भांप सके और मधुर कण्ठ से बोले, "तुम्हारे लिए कुछ जलपान मंगाऊं ? सम्भवतः गाड़ी से उतरकर सीधे यहीं चले आ रहे हो?" "जलपान की इच्छा नहीं।" उसने मन को संयत कर कहा । गुरुदेव सेवक को पुकारने ही वाले थे कि एकाएक एक परम सुन्दरी पोडशी ने लहराते-मुस्कराते कक्ष में निःसंकोच भाव से प्रवेश किया। महर्षि का दमकता मुख-मण्डल क्षण-भर को इस प्रकार स्याह पड़ गया मानो वे कोई दुष्कर्म करते हुए पकड़ लिए गए हों। परन्तु दूसरे ही क्षरण अपने को संयत कर निष्फल मुस्कान के साथ वोले, "रामानन्द, राजवाला, सेठ रद्दी वाला की एकमात्र सुपुत्री । बड़ी ही विदुपी और प्रतिभावान । यहीं विश्वविद्यालय से देवभापा (संस्कृत) में एम० ए० कर रही है। मेरे पास अध्ययन के हेतु चली ग्राती है।" रामानन्द कुछ बोला नहीं । सिमटी-सिमटी प्रश्नसूचक दृष्टि से राजबाला को धूरता रहा। ? । ये है तीन पहर तीन पहर वह सुन्दर थी । वैगनीमती वस्त्रों एवं आधुनिक परिधानों में सुसज्जित। बड़ी ही चपन, निस्संकोच और एश्वास दीरती थी ! राजवाला महर्षि वी भय्या पर उनके एकदम निस्ट पावटी मोर ऐने हाव-भाव में मानो वे उसके मित्र हो अथवा प्रेमी। रामानन्द की उपमिति ने उसे विचलित नहीं किया। गुरुदेव के मुरादे की मांई उनके बहुत प्रयास से भी विलुप्त न हुई। वै नहीं चाहते थे कि राजबाला के माय उसके सम्बन्धों को कोई प्रतिक्रिया रामानन्द पर हो, परन्तु राजबाला को चपलता और पटना को संकेत-मात्र से दवा पाना मसम्भय हो गया। "और इनका परिचय ?" राजबाला ने पायें नचाकर, गरारत से रामानन्द की और इंगित किया। "परे, मो तो मैं भूल ही गया। तुम्हारी ही तरह ये भी मेरे एक प्रतिभाशाली शिष्य हैं । नाम है रामानन्द । मेरी तपोभूमि वाराणसी के निवामी हैं. दर्शन करने चले पाए।" "नमस्कार, पापक माक्षात्कार से प्रमन्नता हुई।" रामवाला में सामुरु, निलंग्ज प्रांखो मे रामानन्द के उस कुम्हलाए हुए मुपमण्डल की प्रोर देसा जो इस समय कातिहीन होते हुए भी पर्याप्त प्राकपंक दीखता था। "धन्यवाद।" रामानन्द के पयर फिमतकर रह गए, मानों धन्यवाद में माय उमरी मारमा पी चिलबिलाहट तडपकर रह गई हो। "मैं चलूंगा गुदेव !" उमने उठने-उठते कहा, "ययाममय पुन. दान करूंगा।" "ठेंगे नहीं ?" गुरदेव के म्बर में ऐनी प्रकुनाहट थी, जो के पामागा होने का प्रामाम दे रही थी। रामानन्द सब कुद समझ चुरा था। बुध भी उनकी दृष्टि-समता से प्रदत्य न या। वह वायु के झोंके की भाति कमरे में निकला और झमावत की तरह तोन शहर : तीन पहर . झपट पड़ा मानो कई पापात्माएं पीछे से उसे खदेड़ती चली आ रही हों। "बड़ा भोला नवयुवक था, मुझे अच्छा लगा।" राजबाला उम्र से वृद्ध, परन्तु शरीर से जवान योगिराज की कामुक अांखों में झांकतो हुई बुदबुदाई। "छोड़ो उसका ज़िक्र, मेरे संतुलन की सीमा टूट चुकी है ।" महर्षि के स्वर लड़खड़ाए और दूसरे ही क्षण राजबाला का मादक, मांसल शरीर उसके लम्बे-चौड़े शरीर में समा गया, समाता चला गया। वह विक्षिप्त दशा में सुनसान सड़क पर भागता चला जा रहा था- निरुद्देश्य, अनिश्चित यानी की भांति । उसकी विकृति और कुंठा अपनी चरम सीमा पर थी और उस सीमा का विस्तार निरन्तर होता जा रहा था। 'सारा संसार काम-वासना, पापाचार और कृत्रिम प्रतिष्ठा की अग्नि में दहक रहा है । नरेन्द्र ने ठीक कहा था। क्या महपि उस भेड़िये संन्यासी से कम हैं ? वह पकड़ा गया इसलिए भेड़िया था। महर्षि अप्रकट इसलिए संन्यासी हैं।' उसने फिर से झटका देकर समस्त विकारों और विकृतियों से मुकि पाकर अपने प्रापको सुस्थिर करने का प्रयास किया तो प्रात्मा से अप आप स्वर फूट पड़े, 'अरे पगले, तू भावुक है, अल्पदर्शी। अभी तूने दे ही क्या है ? संसार विचित्रताओं और विद्रूपताओं का अथाह सागर जिसमें मछलियां, मगर, घड़ियाल, कछुए और विविध स्वरूपधारी जन्तु हैं । हर एक की थाह कहां तक लेगा तू ? देख और देखता चल ठोकर एक अनुभव है, हर अनुभव एक कठोर सांसारिक सत्य । इसलिए संसार में तेरा पाप एक बूंद के समान है।' 'तो मैं छोटा पापीहूं।' वह अट्टहास लगा उठा। एकाएक अांखें चौंधिया उठीं मानो भरी धूप में किसी ने : उसकी आंखों के सामने कर दिया हो। तिलमिलाकर उसने दृष्टि स्थिर की। ?
तीन महर : तीन पहर ताज मामने ही मुस्करा रहा था। उनकी बुर्ज प्रौर मीनारें मरो धूप में दूधिया वर्फ की तरह मन्बी-पतली सलाओं-मी दीवनी यीं। मरी धूप में वे इस तरह चमक-दमक रही थीं मानो रुई के मम्मे गड़े कर दिए गए हो। ताजमहल विश्व की एक अनूठो कलामूति के समक्ष प्राकर यह मंत्र- मुग्ध हो गया। उसे लगा, ताजमहल को दूधिया मुम्फराहट उमले मन का कनुप घो रही है। धूप चिलक रही थी। दोपहर के टीक बारह बजे थे। ताज-प्रदंगों और इक्के-दुक्के दर्शकों के अतिरिक्त चांदनी रात वाली भीड़-भाड़ और चहल-पहल न यो। धीरे-धीरे ताज के मौन्दर्य को निरसना हुपा वह आगे बढा मोर पराइट की लम्बी-लम्बी मामें लेता हुमा ताज-दांत करने लगा-ताज की एक चिकनी युजं से लगकर मुमताज के प्रेम की कल्पना । नांग चांदनी रात में ताज की मौन्दर्य-मुपमा पर विमुग्ध होते हैं किन्तु यह कडी दोपहरी मे ताज के अपूर्व सौन्दर्य पर मत्रमुग्ध हो रहा पा1 जिम प्रकार मुग्धा नायिका क्रोध में भी मौन्दर्य की अद्भुत मूर्ति दिमती है, उसी प्रकार भरी दोपहरी मे भी नाज अजीब मुन्दर लग रहा था। नाज को सौन्दर्यानुभूमि मे अपनी विकृतियों को डुबोकर वह इतिहास के पृष्ठ उलटने लगा। ममा फिमी ने उमवी वाह पकड कर भामोरा और वह चौंक-मा पड़ा। "काहिए जनाव, का इरादा है ?" कठोर पर और रौबीलो मुद्रा ने उसे मानग्नि कर दिया। दो निराहियों के माय एक पुलिस सब-इन्सपेक्टर बड़ा या प्रोर उमे रोरम नेने की कोधित कर रहा था।
४२ तीन शहरे : तीन पहर : यह पुलिस टुकड़ी ताज की सुरक्षा और रखवाली के लिए तैनात थी। वहां से सरकारी वल्व उतार ले जाने, दर्शकों की जेव साथ कर देने (फारेन-विजिटर्स) विदेशी दर्शकों को लूट लेने की घटनाएं हो जाया करती थी, इसलिए पुलिस-विभाग ने सुरक्षा की व्यवस्था कर रखी थी। हृष्ट-पुष्ट, आवारा और निरुदेद्श्य दीखने वाले रामानन्द पर संदेह हो जाना स्वाभाविक ही था। "कुछ नहीं - यूं ही।" स्पष्ट उत्तर देने में रामानन्द सिटपिटा गया। "शातिर बदमाश मालूम होते हो।" सव-इन्सपेक्टर घुड़क पड़ा और उसे खींचते हुए एक ओर ले जाने लगा। पुलिस के फेर में पड़ने का, सीधे-सादे रामानन्द के लिए यह पहला मौका था इसलिए वह घबरा गया । उसका विवेक ही शून्य हो गया। "साले यहां पब्लिक को लूटने आते हैं। ऐसी भोली सूरत बना रखी है, मानो कुछ जानता ही न हो । गुरू है गुरू ।' ।" "भगवान के लिए मुझे छोड़ दीजिए। मैं एक शरीफ - ।" रामानन्द गिड़गिड़ाया। "शराफत तो तेरे चेहरे पर लिखी है। बदमाश कहीं का।" रामानन्द मुक्ति के लिए याचना कर रहा था, अपनी सभ्यता और सद्भावना की दुहाई दे रहा था परन्तु पुलिस-इन्सपेक्टर उसे गिरपतार करने पर आमादा था। एक खूबसूरत-सी छोटी कार वहां या रुकी। क्षण-भर को दारोगा पुलिस का ध्यान उस ओर गया। धागे की ड्राइविंग सीट का द्वार खुला। गंदुमी-गुलावी रंग-सा एक लचकदार पार्कपक नारी-शरीर बाहर निकला। कोई फॉरेन विज़िटर मालूम होती थी। सबके सब उस विदेशी तितली की ओर आकर्षित हो गए। वह अप्रतिम सुन्दरी थी। अवस्था तीस से पैंतीस के बीच मालूम होती थी, परन्तु सौन्दर्याकर्पण में किसी पोडशी को मात करने की क्षमता रखती थी।
तीन शहर : नीन पहर ४३ गांचे में ढली-सो सुडौल और अवनग्न देह । ऐसी लगनी थी मानो फेले के तने चमक रहे हो । गिर के धुंधराले 'याच्ड बाल' गोरे-गोरे मस्तक तक सहरा रहे थे और धूप में मुनहलो चमक पैदा कर रहे थे। उमने स्कर्ट पहन रखी थी और बाएं कन्धे मे एक लम्बा चला और दायें कन्धे रो कैमरा लटका रहा था। यार मे उतरते ही फुदकती हुई-मी वह अपनी गहरी भूरी-भूरी प्रां और कदली जैसी दन्त पंक्तियां चमकावर ताज को पोर निहार फिर, बड़ी राजाकत के साथ पागे बढ़ी। दर्मक तो दर्गक, पुलिस सव-इन्सपेवदर भी सुटकर रह गया। वह इधर ही पा रही थी अतः पुलिस इन्सपेक्टर ने एक सिपाही को रामानन्द की बांह पकडाकर हिदायत की, "ले जाकर इसे बन्द करो। मैं जरा उस फारेनर ।" (विदेशी) को अटेण्ड कर लू ।" सिपाही रामानन्द को गींचने घसीटने लगे पौर रामानन्द निरीह दृष्टि से मुक्ति-प्रार्थना करने लगा। विदेशी तितली को भूरी पाखें उस नवयुवक पर ग्रा टिकी ! वह अचरज से देखने लगी-नवयुवक उमे पाकर्षक और सुन्दर लगा । सर- सराती हुई यह दारोगा के पास माफर बोली- "टुमारा सिपाही लोग उम यंगमंन को विटर ले जाता है ?" "हो इज ए पोम, मैडम !" (यह पोर है देवीजी) दारोगा ने शिष्टता से उत्तर दिया। “यो थीफ नई है । टुम झूठ बोलता हो सोमम् टू वी लिटरेट एण्ड जेंटिल (यह मुगिशित और मन्य दोगता है)।" विदेशी महिला ने रामा- नन्द फी सहानुभूति में दारोगा को लताड़ा, "दुम पुलिस वाला जेंटिलमेन को झूटा टंग करता । रिलीज हिम (उसे छोडो) नई तुम्हारा एस० पी० को कम्पलेण्ट करेगा।" पप्रत्याशित रूप में एक अपरिचित विदेशी महिला की गहानुभूति ने रामानन्द को उसके प्रति अपार पचरज पोर यदा से भर दिया साथ ही तीन शहर : तीन पहर -इन्सपेक्टर भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहा। वह उसके आदेश का लंघन करने का साहस न कर सका और पुलिस को रामानन्द को छोड़ की आज्ञा दी। पुलिस से छुटकारा पाए हुए रामानन्द ने अथाह आभार और श्रद्धा विदेशी महिला को प्रणाम किया। फिर वुदबुदा पड़ा, "पाई यम हाइली सोबलाइज्ड ऑफ यू । आई कांट रिपे (मैं आपका बहुत आभारी हूं, मैं इस का बदला नहीं दे सकता)।" 'नेवर माइण्ड (कोई वात नहीं)" दन्त पंक्तियां चमकाती वह वोली; "कम विथ मी, आई शैल लाइक ए कम्पनी विथ यू)। (मेरे साथ प्रायो, मैं तुम्हारा साथ पसन्द करूंगी)।" रामानन्द के हर्प का अन्त न था । वह आगे बढ़कर धीरे-धीरे विदेशी महिला के साथ ताज की ओर बढ़ने लगा। इस संयोग पर वह जितना प्रफुल्लित था उतना ही चकित. भी। विदेशी महिला के रूप में भगवान ने उसे साक्षात् दया-प्रेम की देवी के दर्शन करा दिए थे। दारोगा-पुलिस मन ही मन रामानन्द के सौभाग्य और विदेशी महिला की विदेशी सभ्यता' को गालियां देते हुए एक अोर सरक गए । "पाई कैन इज़ली टॉक इन हिन्दी । आई नो हिन्दुस्तानी वेल ! यू प्लीज़ स्पीक इन योर मदर टंग । (मैं हिन्दी में सरलतापूर्वक बोल सकती हूं। मैं हिन्दुस्तानी अच्छी तरह जानती हूं। तुम अपनी मातृ-भापा में है वोलो।" उसने रामानन्द को ऊपर से नीचे तक निहारते हुए कहा। "पहले हम लॉन में बैठकर काफी पिएगा, फिर तुम्हारे साथ ता देखेगा।" वह दुबारा वोली और रामानन्द के साथ ताज के सामने क्यारी की हरी-भरी धरती पर आ बैठी। "टुमारा नाम ? टुमने अपना इन्ट्रोडक्शन (परिचय) नहीं दिया। "मुझे रामानन्द कहते हैं। इसी यू०पी० के वाराणसी सिटी में मन ताज देखने के लिए पाया था।" रामानन्द ने संक्षेप में कहा। .
४५ तीन माहर:तीन पहर "हम अमरीका से पाया है । मेरा नाम निकी चोना है । नावेन राइ- टिंग कसा है।" वह यरमस से, थरममी कटोरों में कॉफी उडेलती हुए चोलती गई, "टुम बड़ा इम्प्रेशिव पाडमी है, बहोट सन्नी।" "मोह, माप अमरीकी नावलिस्ट हैं।" अब रामानन्द उसकी पोर विशेष रूप से प्राप्ति हुआ। "हां, प्राजकल हम एका हिस्टोरिकल (ऐतिहागिर) नावेल लिस रहा है जिसका थीम (पृष्ठभूमि) इंडियन हिस्ट्री का मडवल (मुगल) पोरियट (काल) है । उममें हम शाहजहां और मुमताजमहल का लव्ह स्टोरी सास तोड पर लिरोगा। इगलिए हम टाज विजिट करने पाया है।" "पारसे मिलकर बड़ी सुशी हुई।" रामानन्द ने कहा और उसके प्राग्रह पर काफी पीने लगा। अमरीकी महिलालेसिका उसपर विमुर थी। उसकी कसरती देह, मुडौल अंगोपांग प्रौर मदभरी पास उसके दिल में गुदगुदी और हरकतें पदा कर रही थीं। मानो प्राज तक अपने देश में ऐगा वांका नौजवान न मिला हो! "टुम जानता है गाहजहा अपनी वेगम मुमटान को बहुत लव करता था।" वह भूरी-भूरी प्रांगें नवाकर बोली। "जी!"रामानन्द शिष्टता से इतना ही यह सका। "टुम भी किसी को लव करता है ?" रामानन्द चौर-मा पडा, मानो परों तले चिनगी पड़ गई हो। 'सब यग मन लव करता है ।" वह फिर बोली। 'जी !"दुबारा भी रामानन्द इतना ही बोल सरा। "मोह, दुम बहन भोता है।" उसने रामानन्द फा कन्धा पकड़कर पहा प्रौर गमानन्द कार मे नौपे तक मिहर-गिहर उठा। दोनों ताजमहल में प्रविष्ट हुए । पट्टी दारद का समय था, इस लिए दर्शकों की भीड न थी । इको-तुरेनो टटयर-उपर पर तोन शहर : तीन पहर - रहे थे। एक बूढ़े और तजुर्वेकार पथप्रदर्शक (चिरागची) ने जब विदेशी महिला को पाते देखा तो खासा इनाम-बख्शीश पाने की उम्मीद में झपट- पर समीप पाया। उसने बड़े अंदाज से लतर की तरह मुड़कर प्रादाब बजाया कि महिला खिलखिलाकर हंस पड़ी। "तशरीफ लाइए मेम साहब । ताज की डेहरी पर इस नाचीज़ की तमाम उन गुजारी । बन्दानवाज हुजूर, वो-वो अफसाना सुनाएगा कि तवियत खुश हो जाएगी। ताज का हर बुर्ज, हर पत्थर एक काविले- तारीफ़ पार्ट है।" महिला उसके पीछे-पीछे हो ली। वह बड़ी दिलचस्पी और बारीकी के साथ दोनों को ताज की खासियत-खसूसियत दिखाने समझाने लगा। चेहरे का हाव-भाव बदल-बदलकर वह इस तरह शाहजहां और मुमताज वेगम की मुहब्बत के अफसाने सुना रहा था, मानो सव कुछ उसने अपनी प्रांखों से देखा हो। "मोह ! सो डीप लय (इतना गहरा प्रेम)" वह मादकता से फुसफुसाई फिर रामानन्द की हथेली अपनी मांसल हथेली में भींच ली, मानो उसे सर्दी लग पाई हो। रामानन्द के सामने फिर एक नई पहेली, नई समस्या और नई उलझन पा सड़ी हुई। विदेशी महिला के हाव-भाव, विचार और व्यवहार उसे गहरी कामु- कता, पारागा और उन्मत्तता में डूबे हुए अनुभव हो रहे थे। उसके हाथों में मिची हुई अपनी हथेली वह खींच तो न सका परन्तु स्वयं को भी उसने उन्माद में तिरता-सा महसूस किया । "टुम खामोश क्यों है ? हम तुमको अच्चा नहीं लगटा?" वह उसकी कमर में बांहें पिन्हाकर चुदवुदा पड़ी। "पाप बहुत सुन्दर हैं।" रामानन्द इससे अधिक युछ न कह सका। . -
तीन महर: तीन पहर
:
"टुम हमको लय को गोरमामगार HTRो।
इस बार उगनेशग-भरको रामानन्दपागारागस विमा।
रामानन्द ऊपर से गोभे राशिहर-हर MEAft ift114)
मांसों में पासना के गुरगई को हराना
भीतर ही भीतर मोम यो भानियही हो।
चूदा पिरागनी मान-माग यहाए जा मामा, १२, गारमा की
चैमिसाल मुहम्परा, पफगान से मारत in enrinitil
है ताज । दुनिया में अपनी गुम्वत गीती पार नामा ५गी ।
नहीं बनाई..."
"टुम पिसी पेटी मोनागि"HERImarathi
गटकर फुगागाई, "हम तुम्हागनी गा|"
"कुछ गम्यता का भी I fram" in indian
उगने मुध प्याग गया airmiti Ind
मापकर व वृदयता पड़ी।
मिगी में पाना भी
निगरी प्रांगों में पानीfit at Rahatri
मुपगनेटप्राnिs" mmtHE RI11411
तीन शहर : तीन पहर प्रबन्ध कर रखा था, जहां कामोद्दीपन-हेतु सभी सामग्री को समुचित व्यवस्था थी। "केत्ता देर लगेगा?" कलाई घड़ी पर दृष्टि डालकर वह अधीरता से मुस्कराई। बूढ़ा शरारत से मुस्कराते हुए बोला, "थोड़ी देर और लगेगी हुजूर । हाजी उमराव हसन अपनी माशूका के साथ भीतर हैं । जईफ आदमी हैं, कितनी देर ठहरेंगे?" "हाजी उमराव हसन ?" रामानन्द फुसफुसाकर रह गया। "तुम बिल्कुल इन्नोसेण्ट"!"मादक और मधुर हास्य के साथ विदेशी महिला वोली और रामानन्द की कमर में हाथ डाले बूढ़े चिरागची के प्रबन्धित कक्ष की ओर उसका अनुसरण करने लगी। "आखिर आप मुझसे चाहती क्या हैं ?" मार्ग में चलते हुए रामानन्द से अमरीकी महिला ने पूछा। "आई लव यू" वह उसके बदन से लता की भांति लिपटती हुई बोली। रामानन्द कुछ उत्तर भी न दे पाया कि कमरे से निकलते हुए वृद्ध की ओर इंगित करते हुए चिरागची बुदबुदाया। "लीजिए हाजी साहब पा गए, मेम साहब । अब आप जाइए ।" रामानन्द की अांखें अचरज और घृणा से फैलकर रह गई । लगभग सत्तरीय वृद्ध अपनी पीपल की टेडी डाल-सी झुकी हुई पीठ को सीधी करके चलने का असफल प्रयास करता-सा कक्ष से निकल रहा था। इस समय उसके चेहरे पर कालिख-सी पुती हुई मालूम देती थी मानो वह कोयले की खान से निकलकर पा रहा हो। "कैसी विडम्बना है !" रामानन्द प्रांखें फाड़े हाजी जी को देख ही रहा था कि सहसा उसी कक्ष से आती हुई एक मासूम लड़की पर उसकी दृष्टि पड़ी। वह लड़की मुकिश्ल से १६-१७ साल की रही होगी और उसके चेहरे पर मासमियत और वेवसी की पीडा साक्षात दिखाई दे रही थी।
तीन शहर : तीन पहर ४६ मुमताज का प्यार-मन्दिर? और उसके प्राथय मे पलने वाला यह विलासियो का भोगस्थल? यह हाजी और यह मासूम लड़की ? कितना विपम और विचित्र मयोग है! रामानन्द दोघं निःश्वास लेकर लगभग कराह उठा । वह वहा से भाग जाना चाहता था किन्तु विदेशी महिला के सुकोमल हाय को पकड़ और कड़ी होती जा रही थी। वह प्रातुरता से उसे लगभग खींचती हुई का में प्रविष्ट हुई, चिरागची ने द्वार पर पड़े रेगमी पर्दे को ठीक किया और अपना इनाम लेकर एक पोर चला गया। पासों से मदिरा उडेलती हुई और रामानन्द के पैरों में चिकोटी काटती हुई अमरीकी महिला बोली- "हम टुमको इनग्याय के लिए यहा लाया है । टुम हमको लव क्यों नहीं करता?" और उमने रामानन्द के कपोल चूम लिए। "पाप एक पढ़ी-लिखी विदेशी स्त्री हैं। एक विदुपी महिला । पापकों यह शोभा नहीं देता।" वह उसे झिडकता हुमा वोला। "टुम प्राइडियल (मादसवादी) वात करता? प्रो माई गाड ! टुम कितना भोला मैन है।" उसकी कमर मे याह डाल कर उसे उत्तेजित करने का प्रयास करती हुई वह वह पडी, "सेक्स दुनिया का सबसे बडा चीज़ है। मको हर प्रादमी लाइक करता। जिमको टम सव्यता कहता वो हमारे फेण्ट्री में इलिट्रेमी (मसम्पता) पौर पिछडापन ममभा जाता। टुम फालतू बात में टाइम वेस्ट करता।" “मगर पराई स्त्री के माथ गम्पर्क करना हमारी सभ्यता में पाप समझा जाता है । और में पाप करने से डरता है। एक पाप ऐमा कर चुका हूँ निम के प्रायश्चित्त में दर-दर की ठोकरें खा रहा हु, लेकिन अभी तक यात्मा को शान्ति नहीं मिली । ईश्वर के लिए मुझे नया पाप करने को मजबूर न पर।" पर्मभीर रामानन्द के स्वर में याचना थी। "पोह यावा, टुम बिल्कुल हाट लेम, रड (कठोर) मन मालूम होता?' यह पानी भूरी-भूरी प्रांमें उसके दयनीय हो पाए चेहरे पर टिकार तीन शहर : तान । - . टुम हमको सेटिस्फाई (संतुष्ट) करके पुन्न करेगा । टुमको गलत है । जानता है हम ताज देखने आया है । हम सोचा था, यहां किसी के साथ इनज्वाय करेगा जानता है क्यों ? जो विज़िटर्स ताज. ने को शाहजहां और अपने विलवेड (प्रेमिका) को मुमताज समझ नज्वाय करता, उन्हें बड़ा आनन्द मिलता । उत्ता प्रानन्द जितना जहां को मुमताज के इनज्वाय से मिला होगा।" रामानन्द के हृदय में द्वन्द हो रहा था। महिला का एक भी तर्क उसे भोग के लिए डावांडोल नहीं कर पा रहा था बल्कि उसकी विरक्ति र कटुता बढ़ती जा रही थी। मगर उसकी दया और सहानुभूति से दवे होने के कारण सर्वथा उसकी इच्छाओं का विरोध कर पाना भी दुष्कर था। "मुझे सेक्स में कोई रुचि नहीं।" उसने मुंह बिगाड़कर कहा, 'मैंने अनुभव किया है, जब उत्तेजना बुझ जाती है, आदमी अपने पापको पानी में बुझे हुए कोयले की तरह महसूस करता है।" "तुम इम्पोटेंण्ट (नपुंसक) तो नहीं है वावा?" वेहूदे ढंग से कहकर वह मुस्करा दी। फिर सांस के भार से अपने उठते-गिरते उरोजों को देखती- देखती बोली, "टुम अभी उस बूढ़े हाजी और यंग गर्ल को देखा था। अगर सेक्स में कुछ न होटा तो वो दोनों इनज्वाय करने क्यूं आया होता? एक मरने के करीव बूढ़ा भी सेक्स का भूख नहीं दबा सका, फिर टुम तो फुल फ्लेश यंगमैन है।" "आप गलत समझती हैं, मैं इम्पोटेण्ट नहीं हूं।" इस वार अ पुरुपत्व पर प्राघात होने के कारण वह दृढ़ता के साथ वोला, ", जीवन में केवल किसी एक स्त्री को अपना कर ही संसर्ग करना चा मैं इस भावना को मानने वाला व्यक्ति हुँ ।आप फारेनर हैं, मेरे स्य अनमैरिड (अविवाहिता) भी । ऐसी हालत में मैं आपके साथ संसर्ग अनुचित समझता हूं।" सब दकियानूसी हिन्दुस्तानी ख्याल है।" वह झुंझलाक ? ।
तीन महर : तीन पहर
"मिर्फ एक लेडी में इनग्वाय करने याला प्रादमी सेवा का असली मजा
नहीं पा मयता । जिम तरह गाना या ग्बाद अलग-अलग होता, वैमा हो
मेवर का म्याद भी अलग-अलग होता।
"मैं पापके विचार में गहमन नहीं।" उगने तक पेश किया, "स्त्री-
पुरुष के ग्रंग समान होते हैं, और मंगगं-भावना गा होती है । संक्म एक
प्रबन भूग है और प्रवन भूग में म्याद नहीं, फेयल तृप्ति का महत्त्व
होता है।"
"भूम और म्वाद में डीप फ्रेन्डगिप (गहरी मित्रता) होता ।" वह
रामानन्द यो गमनाने लगी, "गाना जितना हो 'टेस्टो' (म्यादिष्ट) होगा
नग को उतना ही गहरा मेटिम्फरसन (गन्तोष, सलि) मिलेगा। उसी
तरह गेम में भी मिटटंग्ट होता है । मनगद पादमी के साथ. . . ।
"म मि मेरम है, मि पर बार।" रामानन्द ने प्रतिवाद
रिया, "उनेत्रनावी हासत में किसी भी पुरत मधमा किसी भी स्त्री रा
मंमग एक-गी स्थिति पैदा करता है।"
"टम की नर्वा नहीं।" यह जिद पर मर सेलो, "इस पोल
(क्षेत्र) में नुम बिपुल क्या है।"
"दमित में प्रभी मापको मनपिन्स (नहर कर देता है।"
हमरा र मानाया, "मेरी या योर से भर रिमाने
दारी) माय दमका जवाब दोगि।
"टम हमरो मेवग-माइलो
"मुनित भी मही।" हमारला. "
मार्ग मर पर पापा मगर
र नगः नान, हरा, Artm
का पण्डा Ther
कार के रंग को तहमा
"माई मोनहेर
मी गोरी- Tra
r
तीन शहर : तीन पहर ति में सव का स्वाद एक-सा होता है । सेक्स का स्वद बदलने की भावना अनेक स्त्रियों या पुरुषों से संसर्ग करना मात्र करप्शन् (चरित्रहीनता, भिचार) है !" रामानन्द का यह तर्क इतना यथार्थ और अकाट्य था कि विदुषी, वदेशी महिला कुछ क्षणों को गहरे सोच में पड़ गई। वह रामानन्द को कोरा एक भोला-भाला और शर्मीला नौजवान- मात्र समझती थी परन्तु इस तर्क ने उसे परास्त और चकित-सा कर दिया। "विल यू रिप्लाई ? हैव यू एनी ऑनसर? (क्या आप जवाव देंगी? है आपके पास कोई उत्तर?)।" रामानन्द उसकी भूरी-भूरी आंखों में झांककर मन्द-मन्द मुस्कराया । "डोण्ट चैलेंज मी (मुझे चुनौती मत दो)।" महिला अपनी गोरी पतली अंगुलियों से अपना मस्तक भींचती रही । वह कुछ क्षणों तक अपने- आप से तर्क करती रही फिर सहसा दन्तपक्तियां चमकाती हुई बोली, "ऐग्स (अण्डों) का टेस्ट अलग-अलग भी हो सकता है। अगर वे अलग अलग मुगियों ने अलग-अलग दिन पर दिए होंगे तो नेचुरली (स्वाभविक रूप से) वे अलग-अलग टेस्ट के होंगे।" "देयर इज नो क्यूश्चन ऑफ डिफरेण्ट हेन्स (यहां पर अलग-अलग मुगियों का प्रश्न नहीं है) सवाल केवल अण्डों का है।" रामानन्द ने दृढ़त के साथ कहा- "टेल मी वन थिंग।" (मुझे एक बात बतायो )" वह एक गहरा त सोचकर बोलो "सपोज, (मान लो) तुम्हारे सामने टेबल पर तीन ग्ल (गिलास) रखी हैं, एक में पानी भरा है, दूसरे में (कण्ट्री मेड) देशी श और थर्ड में शर्वत । तीनों का कलर (रंग सफेद है, क्या तीनों का टेस्ट माफिक होगा जवकि ग्लास तीनों एक जैसे सफेद कलर के हैं।" "कदापि नहीं। पानी, शर्वत और देशी शराब तीनों का स्वाद एक- शित होगा।" चूंकि महिला का तर्क विशुद्ध यथार्थ और वैज्ञ नहर नान पहा अतः रानातल हात् ही ऐसा रह गया। "वरी मुह।" दह उनी दोनों नुमानों को बाटो हो। रामानन्द एक बार पुनः काम-मट्टी में गुलगने को मिहो। हि जितना ही वासना से दूर भाग रहा था जत नहिल कामतिर मै जना हो वामना में लिप्त करता जा रहा था। जिस विदेशी महिला ने उसे पुलिस को गिद्ध दृष्टि से बवास, के प्रति स्नेह, सहानुभूति दर्शायी थी और उसे अपने तक पारित frमा था; भला उमकी अवहेलना वह क्ति साहस से कर सकता था। वह उसके मामल गरीर से लता की भाति चिटती चत्ती जा रही थी मानो नीम के तनों से गुरुच की शाखाएं लिपट रही हो। भब कुछ के बाद पुरुप पुरुष ही है नारी जिसकी जन्मसिद्ध दुर्बलता है। जब वह म्वर पुरुष को आमत्रित करती है, उस दशा में पुरुषमा सयम मोम की तरह पिघलने लगता है । उसका देवत्व और ब्रह्मचयंत्य दम बहे टोले की भाति दहने लगता है जिसे बच्चे घण्टों में उठाकर राम से हैं। वह उसके अगो से खेलने तमा। ताज शाहजहा और मुमताज ये प्रेम का स्मृति-मदिर है, परन्तु जब दो सौ ताज की रगीनियो को निहारते हैं तो वे एक-दूसरे को माहनही र मुमताज बनाकर अपनी प्रेमानुभूति की तुष्टि-पुष्टि करते हैं । इस वक्त टुम अपने को शाहनहीं समझो, मैं अपने को सुधार समझ हारिफ्लो, इट इज ए ग्रेट फीलिंगहू दिल गिय कस रिमन इसार, जन, यह एक महान अनुभूति है, जो हमें इस ममी में दावि प्रानन्द ५४ तीन शहर : तीन पहर पर रख दिया। "खुदा आप दोनों की मुहब्बत वादशाह सलामत की मुहब्बत - की तरह कायम रखे।" वह लज़ीज़ उर्दू में दुआएं देता रहा। वे दोनों सुनी-अनसुनी करके ताज से दूर होते रहे ! दोनों मौन, यंत्रवत् चल रहे थे, ठीक उस प्रकार जैसे तूफान खत्म होने के बाद निर्जीव हवा में कोई आवाज़ और सरसराहट नहीं रह जाती। ताज से लगभग दो-डेढ़ फर्लाग की दूरी पर टूरिस्ट रेस्ट्रा था, जो विशेष रूप से विदेशी ताज दर्शकों के जलपान के निमित्त स्थापित था। अमरीकी महिला उसी रेस्ट्रां की एक खाली केबिन में रामानन्द सहित आकर बैठ गई और वेयरा झपटता हुआ केविन में ग्रा पहुंचा। "टुम क्या खाएगा ?" महिला ने रामानन्द से ऐसी सूखी आवाज़ में पूछा जैसे वह उसके सिर पर कोई बोझ हो और उसे उठाए रहने में वह अव अपमान महसूस कर रही हो। "कुछ भी मंगा लीजिए।" रामानन्द ने संक्षेप में कहा। उसने दुवारा नहीं पूछा। अपने-मापसे वेयरे को आदेश देने लगी। रामानन्द को गहरी भूख लगी थी मगर इस स्थिति में भी वह अमरीकी महिला के मनोभावों से अनभिज्ञ नहीं रहा। वह अपने आप से कह पड़ा, 'काम-वासना भी कैसी अद्भुत चीज़ है। जो भोग के पूर्व स्त्री-पुरुप को एक-दूसरे का अनुचर वनाए रखती है और भोग के बाद दोनों को एक-दूसरे की क्षोभ और ग्लानि का कारण बना देती है।' तभी तो आध घंटे पूर्व यह कामान्य महिला उसे प्राणों से लगाए रही है और अब ऐसा व्यवहार कर रही है मानो वह उसका सेवक हो। ऐसे अपमान का चूंट पीकर भी उसने अपने उदर की क्षुधा तृप्ति की। भोजन के बीच महिला ने कोई भी प्रसंग नहीं उठाया। महिला ने रेस्ट्रां का विल चुकाया।फिर लचकती-मटकती बाहर निकल- कर प्रौपचारिक मुस्कराहट के साथ रामानन्द से बोली, "थैक्स फार योर तीन शहर : तीन पहर कम्पनी, नाउ पाईपल गो टू माई प्लेम (तुम्हारे गमगं के लिए धन्यवाद । प्रव में अपने ठिकाने पर जाऊंगी)।" रामानन्द के किगी उत्तर में पहले ही हाय हिलारूर टाटा करती हुई वह विदेशी तितली फुटकती हुई अपनी कार की भोर चली गई भौर रामानन्द स्किनंय-विमूह-मा सड़ा-पडा फटी-फटी मांगों से उसे जाते हुए देसता रहा। मन ने पाहत म्बर में कहा, 'मेकम एकः भूस है, एक स्वाद । कोई मावस्या नहीं कि वह केवल एक ही प्रकार के भोजन पर मंतुष्ट रहे।' महिला जब उगारो दृष्टि पोर भावक्षमता से परे हो गई तो सहमा उसे अपना ध्यान माया पोर एकबारगी उमा मम्तिएर भिन्नाने लगा। पर वह पहां जाए? क्या करे? उसके सामने एक विषम ममम्या थी। कोई निर्दिष्ट पय प्रथया मजिल उमर मामने न यी, जिधर भी मन दोडता था, गहरे अंधकार, घुटन और कठा के अलावा उमे और कुछ न दियाई पहना था! हर मोर धर्म माने घोसा, माधु माने ढोग, दमान माने येईमान और इंसानियत माने पापाचार ही दृष्टिगत होता था। हर मोर उसे वामना के कोड़े, पापाचार के पिम्गू, दुराचार के दीमा और हयानियत के पुतले विलचिलाते दिसाई पड़ते थे ! वही उसे दो पग भूमि भी ऐमो म्बन्ध-निर्मल न शिपाई पड़ रही थी जहा अपना मानन लगाकर वह अपनी भर को हुई प्रात्ममानि को पुन प्रनिष्ठारित कर सके। 'माह देव !'एक दर्द भरी माह उमरे मूये होठो में फिमलकर रह गई। उमा मिर फिर मे चाराने लगा,मगार फिरगी को तरह नाचता दियाई पहने लगा। मारे ग्लानि के मन टोग्ने हुए अपने भून से विम्मरणा करने की भायना मे यह तेच पदमी से मागे वहने लगा। एक लावारिम कुत्ते की मांनि वह निश्चित मजिल की भोर बढ़ता पना जा रहा था।
तीन शहर : तीन पहर - सहसा कोई मजबूत हाथ उसके कन्धे पर पड़ा और एकदम से चौंक- कार वह पीछे मुड़ा। पर से नीचे तक अप्रत्याशित रूप से यह कांप उठा। वही पुलिस-इन्सटेक्टर उसका कन्धा धामे हुए आग्नेय नेत्रों से उसे घूर रहा था। "वाहिए मिस्टर, मिजाज तो ठीक है ?" "जी. ' 'जी...।" वह अस्फुट स्वर में घिधियाकर रह गया। "जी, जी, के बच्चे।" सब-इन्सपेक्टर उसे जोर का धक्का देकर गुर्राया, "यहां गई वह तितली ?" संभल न पाने के कारण वह मुंह के बल पृथ्वी पर आँध गया। "देखता हूँ अब कौन बचाता है तुझे?" दारोगा ने कालर पकड़कर उसे खींचा और थाने की प्रोर ले बढ़ा। मुक्ति के लिए उसने याचना-प्रार्थना नहीं की, केवल निरीह-दयनीय दृष्टि से दारोगा के चेहरे की ओर देखता रहा। दारोगा उसकी प्राचारगी को पहले ही भांप चुका था मगर खास तौर से वह उस पर इसलिए कुपित था चूंकि अमरीकी महिला ने उसे छुड़ा दिया था और उसी के कारण उसे अपमानित होना पड़ा था। उसने एकाध बार गिड़गिड़ाकर दारोगा को अपनी निर्दोपता और सगाई की दुहाई देनी चाही मगर दारोगा ने उसे इसलिए नहीं पकड़ा था शिवह अपराधी था, बल्कि इसलिए पवाड़ा था कि वह सीधा-सादा और परेशान था। अन्यथा कुशल अपराधी और सफल बदमाश को पकड़ने की भूल पुलिस कभी नहीं करती। बिना किसी जांच-परख के उसके ऊपर दफा १०६ का अपराध लगा- कर जेल में ठूस दिया गया। पुलिस अपराधी बनाती है और अपराधी पुलिस विभाग की महत्ता की वृद्धि करते हैं । उसे बन्दी बनाकर दारोगा सेठ झंगामल बताशा वाला के पास प्राया। सेठ बंगामल बतासा वाला पुलिस का पुराना मुखबिर और गवाह था।
तीन महर : तीन पहर गवाही-महादत की रकम पर हो टगने प्रागरा शहर में तीन मंजिल की इमारत पड़ो की थी। यमे उगको वतागा को भी एक दूकान थी मगर वह वरायनाम हो चलनी थी। "क्या हुयुम है हजूर?" दंगामल दारोगा को मिर झुकाकर फिका में हम पहा। "गवाही देनी है, और क्या ?" दारोगा मन्द-मन्द मुसराते हुए बोला, "इघर यहुत दिनों बाद एक केग वना है।" "नही वाकया है " छंगामल ने प्रासं काढ़कर पूछा। "सही फेम में फर्जी गवाही की जरूरत नहीं पड़ती।" कहने लगा दारोगा, " अपने एरिया में कोई शातिर बदमाग सालो से हाथ साफ कर रहा है मगर पाज तक हमारे हाथ नहीं लगा । पतिक ने एस० पी० के पाग शिवायत की जिससे हमारे पाम माहव का जबावतलव माया है और मुझे 'वारनिंग दी गई है कि अगर पन्द्रह दिन के भीतर मैंने उम बदमाग को गिरफ्तार न किया तो मेरे कार चा लगेगा। 'हो भर गे पर होने को प्राए वह वदमाग हमारे हाय नही पाया। रोग हमारी मांगों में धूल झोककर एक न एक वारदात कर जाता है। प्रान मैंने एक मावारा मादमी को गिरफ्तार किया है । प्रव उमी के खिलाफ उम बदमाग का चार्ज लगाकर मुकदमा तैयार करना है।" "उमकी गिरनारी वहा हुई?" छणामल ने पूछा। "गिरफ्तारी तो ताजमहल एरिया में हुई है मगर उममे नुम्हे क्या मतलय?" "फिर?" "तुम्ह नो माफ-माफ गवाही देनी है कि वह तुम्हारे घर में चोरी की नीयत मे घसा पा। मटपट मे तुम जाग गए पौर उमे पर लिया । तबतक गनी पुलिस वाले प्रा गापौर उसे पकड़ लिया गया-ममझे।" "मगर मरणार?" "अमर-मगर कुछ नहीं।" दारोगा धुडका । फिर बड़े ५८ तोन शहर : तीन पहर से मुंह लगाकर कुछ कहता रहा । छंगामल की वांछे खिल गई ।। मुजरिम और मुकदमे की सारी वना- वटी कथा का रिहर्सल उसने दारोगा को उसी दम कर दिखाया। निर्दोष रामानन्द को सेठ छंगामल के यहां चोरी करने के अपराध में अदालत ने चार माह की सज़ा सुना दी। पुलिस ने उसके विरुद्ध जो मुकदमा बनाया था, रामानन्द का उससे रंचमात्र भी सम्बन्ध न था किन्तु सेठ छंगामल ने अपना पार्ट इतनी कुशलता के साथ अदा किया कि निर्दोप रामानन्द की सचाई-सफाई की कोई आवश्यकता ही न पड़ी। अदालत के फैसले के बाद वह आगरा डिस्ट्रिक्ट जेल भेज दिया गया, जहां उसे अपनी सजा भुगतनी थी । यथार्थ की कठोर धरती पर, अनुभव की नई दिशा रामानन्द को सहज ही मिल गई। अपराधियों के विस्तृत संसार में आकर रामानन्द दुःखी या विचलित नहीं हुआ । यह एक ऐसा संसार था जो नाना प्रकार की विचित्रताओं, रोमांच,अनूठी जीवन-कथाओं और विद्रूपताओं से परिपूर्ण था। उस दिन उसने प्रथम वार 'अद्भुत यातना गृह' (जेल) के दर्शन किए और अांखों में घृणा नहीं, वरन् कौतूहल समेटे सब कुछ देखता-निहारता रहा। 'वैरक' कहे जाने वाले उस लम्बे वाराण्डे को जिसमें उसे रहना या फटो-फटी आंखों से देखता रहा जो उसीकी श्रेणी के अनेक दोपी-निर्दोपी लोगों से भरा था। मनुप्य कहे जाने वाले तमाम लोग जो अपने-अपने मिट्टी के वने चौदरों पर कम्बल-फट्टा, जो मूज के बने थे, बिछाए और उघड़े मैले बदबूदार झिन्ने कम्बलों को प्रोढ़े बैठे थे मानो वह कोई अजायब- घर का जानवरों के रहने का स्थान हो या भेड़ों का ठौर । वे सब के सब निश्चिन्त, प्रसन्न और संतोप पूर्ण दीखते थे, जैसे संसार की कटुता-विषमता से भिन्न उनका यह सूक्ष्म संसार अत्यन्त आक पक हो। वैरक के द्वार पर ठिठका खड़ा रामानन्द सारे अनोखे दृश्य देख रहा तीन महर : तीन पहर था-यह दुनिया उसे अजीब लग रहो यो, मनुमको को सुली पोटली। तरह-तरह के चेहरे, अजीबोगरीव शक्लें । कुछ बहुत भयानक पौर कुछ मामूम सूरतें। कहने को जेल मगर एक ऐसो निराली दुनिया जो छोटी- सी होने के यावजूद भी संसार की अनेकानेक भाव-भावनापों का प्रगम सागर-सी लगती थी। यह अपने निर्दोष ही जेल में टूसे जाने के विक्षोम को मूल रहा या क्योकि अनुभवों और विचारों का यह नया संसार उमकी उत्सुकता का केन्द्र बन रहा था। पोडी ही देर में वैरक के एक मिट्टी के चबूतरे पर साली स्थान पर उमका भी फट्टा और कम्बल बिछ गया, और दूसरे दिन शरीर के दारीफाना वस्त्रों का स्थान जेली पडों ने ले लिया। बैरक के अन्य माथी जो मख्या मे नौ थे (इग ममय वहा पाठ ही उपस्थित थे) उस नए 'मेहमान' को मजीव ढंग से घूर रहे थे मानो उसके स्वभाव, मनोभाव मोर अपराध का अध्ययन कर रहे हो। उनकी प्रांखों में दया, व्यंग्य, सहानुभूति, उपेक्षा मोर हिमा भनेक मावो का मिला-जुना प्रभाव था। रामानन्द अपने स्थान पर बैठा-बैठा महमा-सा, भावपूर्ण मुद्रा में उन मत्रों को घूर रहा था मानो मांखों ही पासो में उन सबरी निकटता पौर मंत्री भाव की लालसा प्रक्ट कर रहा हो। चार माथी एक में प्रोटे पर मा जमे पारस में कुछ फुसफुमाए, यहाका मारकर हमे। फिर सबने बीडी मुलगाई मोर ताश के पत्ते वट गए जिसमें जेल का वार्डर भी शरीक हो गया ! रामानन्द गुम-गुम मा मय कुछ देख रहा था। जाहिर पाकि वे लोग जुमा रोल रहे थे क्योकि बीच- योन में याजी गत्म होने पर वे एक-दूमरे मे पैमे का हिसाब करते । फिर नया दौर शुरू हो जाता। 'जेल में भी जुमा?" रामानन्द प्रवरज से फमपुमा उठा। चार मन्य मापी जो जुमा मे रुचि नहीं रखते थे, अपने-अपने म्यान तीन शहर : तीन पहर से मुंह लगाकर कुछ कहता रहा । छंगामल की बांछे खिल गई।। मुजरिम और मुकदमे की सारी बना- वटी कथा का रिहर्सल उसने दारोगा को उसी दम कर दिखाया। निर्दोप रामानन्द को सेठ छंगामल के यहां चोरी करने के अपराध में अदालत ने चार माह की सजा सुना दी। पुलिस ने उसके विरुद्ध जो मुकदमा बनाया था, रामानन्द का उससे रंचमात्र भी सम्बन्ध न था किन्तु सेठ छंगामल ने अपना पार्ट इतनी कुशलता के साथ अदा किया कि निर्दोप रामानन्द की सचाई-सफाई की कोई आवश्यकता हो न पड़ी। अदालत के फैसले के बाद वह आगरा डिस्ट्रिक्ट जेल भेज दिया गया, जहां उसे अपनी सजा भुगतनी थी । यथार्थ की कठोर धरती पर, अनुभव की नई दिशा रामानन्द को सहज ही मिल गई। अपराधियों के विस्तृत संसार में आकर रामानन्द दुःखी या विचलित नहीं हुआ । यह एक ऐसा संसार था जो नाना प्रकार की विचित्रताओं, रोमांच,अनूठी जीवन-कथानों और विद्रूपताओं से परिपूर्ण था। उस दिन उसने प्रथम वार 'अद्भुत यातना गृह' (जेल) के दर्शन किए और प्रांखों में घृणा नहीं, वरन् कौतूहल समेटे सब कुछ देखता-निहारता रहा। 'वैरक' कहे जाने वाले उस लम्बे वाराण्डे को जिसमें उसे रहना था फटो-फटी आंखों से देखता रहा जो उसीकी श्रेणी के अनेक दोपो-निर्दोपी लोगों से भरा था। मनुप्य कहे जाने वाले तमाम लोग जो अपने-अपने मिट्टी के बने चौदरों पर कम्बल-फट्टा, जो मूज के बने थे, विछाए और उघड़े मैले बदबूदार झिन्ने कम्बलों को प्रोढ़े बैठे थे मानो वह कोई अजायब- घर का जानवरों के रहने का स्थान हो या भेड़ों का ठौर। वे सब के सब निश्चिन्त, प्रसन्न और संतोष पूर्ण दीखते थे, जैसे संसार को कटुता-विषमता से भिन्न उनका यह सूक्ष्म संसार अत्यन्त आक पक हो। बैरक के द्वार पर ठिठका खड़ा रामानन्द सारे अनोखे दश्य देख रहा - तीन महर:तीन पहर था-यह दुनिया उमे अजीब लग रही यो, अनुभवों को सुलो पोटनी। तरह तरह के चेहरे, मदीबोगरीब शस्लें । कुछ बढ़त मपानक पौर मुध मासूम मूरतें । कहने को जेलमगर एक ऐनो निराली दुनिया जो छोटी- सी होने के बावजूद भी मंमार की अनेकानेक नाव-भावनामों का पगम सागर-मी लगती यो। वह अपने निदोष हो जेल में ट्रूमे जाने के विक्षोभ को मूल रहा या क्योंकि अनुमवों और विचारों का यह नया मंमार उमरी उत्मुक्ता का केन्द्र बन रहा था। योड़ी ही देर में दरक के एक मिट्टी के चबूतरे पर साली स्थान पर फट्टा 'पौर कम्बल विध गया, और दूसरे दिन गरीर के गरीफाना चयों का म्यान जेनी करहों ने ले लिया। घरव के अन्य सायी जो मंख्या में नौ थे (इम समय वहां पाठ ही उपस्थित घे) उम नए मेहमान' को मनोव दंग से घर रहे थे मानो उसके स्वभाव, मनीमाव और अपराय का मध्ययन कर रहे हों। उनकी मांखों में दया, व्यंग्य, सहानुभूति, उपेक्षा और हिंसा भनेक भावों का मिला-जुला उमका भी प्रमाव था। रामानन्द अपने म्यान पर वैटा-बटा मह्मा-मा, भावपूर्ण मुद्रा में उन मयों को पूर रहा था मानो मांसों ही मांसों में उन सबकी निकटता और मंत्री भाव की लालमा प्रक्ट कर रहा हो। चार माथी एक. के प्रोटे पर मा जमे प्रापस में कुछ फुसफुमाए, ठहारा मारकर हमे। फिर मवने वीडी मुलगाई और ताग के पत्ते वट गए जिममें जेल का वार्डर भी शरीक हो गया ! रामानन्द गम-गुम सा सव बुछ देख रहा था। जाहिर था कि वे लोग जुमा रोल रहे थे क्योंकि बीच- वोच में याज्ञी पत्म होने पर वे एक-दूसरे से पमे का हिगाव करते । फिर नया दौर शुरू हो जाता। "जेल में भी जुमा ?" रामानन्द अचरज से फुसफुमा उठा। चार मन्य सायी जो जुमा में रचि नहीं रखते थे, अपने-अपने स्थान तीन शहर : तीन पहर . र बैठे आपस में कुछ मंत्रणा कर रहे थे। एक मस्तक पकड़े कुछ ऐसी करुण मुद्रा में बैठा था मानो घर-परिवार की स्मृति में डूबा हुआ हो । दूसरा पेट से घुटने टिकाए लेटा हुया कराह रहा था मानो उसके पेट में पीड़ा उठ रही हो जिसे वह इस प्रकार सहन करने का प्रयास कर रहा हो । तीसरा यथास्थान वैठा हुमा कभी मुट्ठियां भींचता, कभी दांत पीसता और कभी प्रोटे पर चूंसा मार कर अपने-आप-से कुछ कहने लगता मानो वह किसी भयानक शत्रु से बदला लेने की अनुभूति में पागल हो रहा हो और चौथा सबसे विलग सिर झुकाए कुछ लिखने में तल्लीन दीखता था। हर कैदी रामानन्द के लिए एक रोमांच और रहस्यपूर्ण चरित्र बन कर रह गया। वह सभी के प्रति उत्सुक और जिज्ञासु हुआ परन्तु अत्यन्त घुटन और गंदगो भरी वैरक में सर्वत्र से एकाग्र होकर लेखन कार्य करने वाले जेल-यात्री के प्रति वह सर्वाधिक उत्सुक और जिज्ञासु हो उठा। कई क्षणों तक वह भाव भरी आंखों से उसकी ओर देखता रहा । मग उस बीच एक बार भी उस व्यक्ति की लेखन-व्यस्तता भंग नहीं हुई। रामानन्द का जी बार-बार चाह रहा था कि वारी-बारी से वह प्रत्ये सह-जेल-यात्री के पास जाए, उसका परिचय प्राप्त करे परन्तु सर्वथा नर्व और संकोचशील जेल यात्री होने के नाते वह ऐसा न कर सका । म उसकी दृष्टि उन्हीं लोगों पर थी। सहसा एक विचित्र व्यक्तित्व का कैदी वैरक में दाखिल हुआ रामानन्द उसकी ओर आकर्षित हुा । वह वैरक के दसवें खाली प्रोटे का कैदी था मगर वेष-भूपा और स्वभाव में अन्य कैदियों से सर्वथा। दीखता था। बड़ी मस्त चाल से एक सस्ता फिल्मी गीत गुनगुनाते वह अपने प्रोटे की ओर चला आ रहा था। उसकी दृष्टि अचानक रामानन्द के बिस्तर पर पड़ी और मुंह सीटी बजाते हुए वह फिक्क-से हंस पड़ा, मानो अपने नए सह-य तीन शहर : तीन पहर म्यागन कर रहा हो रामानन्द के बगल में ही उसका बिन्तर या। बिम्नर पर पात-पाते उसने अपनी पंष्ट की जेब से मिगरेट-माचिम निकाली और फर में निगट मुलगाकर पाएं के लच्छेदार अम्बार रामानन्द के चेहरे पर फेंकने लगा। "हल्लो पार्टनर, ग्राप क्य तमरीफ लाए ?" उमने नुम्बराने हुए रामानन्द की प्रोर मवेत किया, "ससुराल पसन्द प्राई?" वह मुंह मटा- कर हंमा जमे रामानन्द से उसका पुराना परिचय हो । रामानन्द ऐसे प्रसभ्य और साधारण व्यक्ति के सम्पर्क में पानी न पाया था परन्तु यहा सम्य और उच्च व्यक्तित्व का मर्वया प्रभाव था। नया यह व्यक्ति बहा दिलवर मालूम होता या इसलिए वह उनकी और पापित हुमा । । "गम किस बात का माई डियर ?" घुए के अम्बार छोड़ते हुए उसने चुहल किया, "कौन यहा लढा सीवना है ? अरे खामो, पीयो मना करो। ममुराल समझो ससुराल । हा ये बात जरूर है, समुर बहुतेरे हैं, वीवी एक भी नहीं, क्या ये मेरयां एक और व्यक्ति को उसने सम्बोधित पिया और अपने प्रारही हथेली बजाकर हस पडा । "मये, धोबी बिठाने के चक्कर में हो तो तू यहा लाकर पटका गया ? गैरसां कहे जाने वाले व्यक्ति ने फनी कसी। रामानन्द अनुभव कर रहा था कि जेट यात्रा उनके लिए दुस, पश्चात्ताप नही ग्रानन्द, पाराम और निश्चिन्तता का पड़ाव है। उसने स्वय रामानन्द के ओटे पर पाकर उसे अपना परिचय दिया। रामानन्द अपने व्यक्तित्व, गारीरिक सौन्दर्य और प्राकांक कर के कारण अमिगप्त होता पाया है। यहा भी अपने स्वभाव के कारण अपने को अपने पवेनेपन के बीच न रस सका। अपना वृत्तान्त मुनाते हुए उस व्यक्ति ने बताया कि वह लखनऊ के एक मुविग्पात कीमती होटल में बेयरे का काम करता था। लगभग चार माह हुए एका लहको भगाने के केस में उसे छहमाम को सजा हो गई। माघी तीन शहर : तीन पहर लखनऊ में कटी, प्राधी आगरा जिला जेल में कट रही है ! "और तुम्हारा परिचय माई डियर?" उसने रामानन्द के कन्वे पर । स्नेह से हाथ रखकर पूछा, "गज़ब की जानमारू शक्ल पाई है मने ! किसी अच्छे-भले रईस खानदान के मालूम पड़ते हो?" "ऐसी बात तो नहीं।" रामानन्द ने हल्के से मुस्कराकर कहा, सव भाग्य का खेल है। वैसे मैं किसी अपराध में जेल नहीं आया हूं।" "खूव कही यार तुमने।" वह कहकहा लगाकर बोला, "असली अपराध करने वाले बहुत कम जेल आते हैं। जेल तो तुम्हारे जैसे शरीफ आदमियों के लिए बनाई गई है।" "क्यों एक सीधे-सादे आदमी पर कीचड़ उछाल रहा है माधव के बच्चे।" शेरखां घुड़क पड़ा, "ला, कुछ नसा-पानी है ?" "अभी लो उस्ताद ।" माधव पेंट की चोर जेब में से एक पुड़िया निकालते हुए बोला, "कीचड़ नहीं उछाल रहा हूं. सच कह रहा हूं। तुम्ही वतानो असली मुजरिम जेल में कितने आते होंगे ?" "दस परसेन्ट भी नहीं माधव ।" इस वार उस व्यक्ति ने कहा जो अभी थोड़ी देर पहले अपने प्रोटे पर बैठा, प्रतिशोध की भावना से आकुल अपने आपसे गुंथ रहा था। "आप इन्हीं शिवराम भैया को देखो। मेरी वात के जीते-जागते सब । अपना घर भी लुटाया, उल्टा यहां ठूस लिए गये !" "मुझे छूटने तो दो, फिर देखना।" शिवराम कहे जाने वाले व्यनि ने दांत पीसकर कहा, "उस सूअर के बच्चे की जान न ले ली तो कुछ 'किया, भले ही इस बार फांसी पर चढ़ा दिया जाऊ।" रामानन्द अवाक-सा उसकी ओर देखता रहा-उसे आभास हो था कि वास्तव में यह व्यक्ति निर्दोष ही सज़ा काट रहा है । रामानन्द अचरज से अपने सह-जेलयात्रियों का वृत्तान्त सुन रहा गेरखां, उसके साथ जुमा खेलने वाले अन्य तीन कैदी, इन चारों को डालने और हत्याएं करने के आरोप में लम्बी सज़ाएं हुई थीं। शेरखां हैं तीन महर : तीन पहर उसके माथियों ने बताया कि नागें पहले रिमी फैक्टरी में ईमानदारी की नौकरी करते थे, अचानक ही फैक्टरी को पाटा लगा और यह बार-बार बन्द हो गया। सालों वै लोग नौकरी की तलाम में मारे-मारे फिरते रहे मगर उन्हें कहीं नौकरी न मिली। इधर-उधर भटके । उपर घर में बाल-बच्ने नग मे तड़प रहे ये इधर उरदयूठि का कोई साधन न था। अन्त में हर मार मे हताग-निराग होकर उन लोगों ने लूटपाट शुरू कर दी। वे मालों लूट- पाट और हत्याएं करते रहे परन्नु कभी पकडे न गए । परन्तु अनी पाच माह पीये एक बड़े डाके में पुलिस ने जान की बाजी लगाकर उन्हें गिरातार कर लिया और उनके अपराधो के फलम्बाप उन्हें लम्बी मशाग ह। "अपने परिवार का पेट पालने के लिए तुम्हें सूट-गमोट करने की मगबूर होना पड़ा मगर इममें तुम्हारा प्रागे वा जीवन तो विनष्ट हो रामानन्द ने शेरमा और उसके माथियों में रहा। "जिन्दगी तो हमारी यू ही यरवाद थी।" वे बड़े मंनोप के माय यह पड़े-"घर पर इतना कमाकर राग पाए हैं कि पुस्त-दोपहत के लिए काफी है। रही हमारे बान, तो हम यहा पार गेज-रोज के प्रारा में सने। र ही मही, पाराम में पडे-पड़े रोटी तो गा रहे हैं।" गमानन्द अधिक तक न कर मा। टष्टी निम्म्वाम लेकर रह गया।" गया। यह व्यक्ति जो मबमे प्रलग-बग बीन में बैठा अब ना लियने में तल्लीन था, उगी पोर मोन कर गमानन्द ने वैयरे में पूछा, "कोई मध्यपनगील व्यक्ति मालूम होता है ! घन्टो मे नाचार लिखने में नन्दीन "पर वो।" उगी पोर मरेत कर माघर (बेपर) ने जरा प्रादर के मायबहा, "वह लंगर है ! बड़ी अच्छी कहानिया निपता है । जव-नव मृह टोर होने पर हमें गुनाया करता है। वारा यहा बग फमाः . !"वात पात्री ही घोड़कर वह नम्धी माम माव टा। "मोह, मुझे प्रारम्भ में हो, मानाम प्रा यानि प्रदन्यही वह कोई ६४ तीन शहर : तीन पहर ऐसा ही निराला जीव है।" रामानन्द अचरज और सहानुभूति से बुदबुदाया, "क्या उसने भी कोई अपराध किया है ? वह तो बहुत गंभीर और सभ्य दीखता है।" "मैंने कहा न कि अपराध करने वालों को सज़ाएं नहीं मिलती।" माधव थोड़ा गम्भीर होकर बोला, "किसी से इश्क करना अगर अपराध है तो वह जरूर अपराधी है।" "क्या मतलव ?" रामानन्द ने उत्सुकता से अांखें फैलायीं। "नहीं समझे ? बिल्कुल बुद्धू हो यार ! अरे इश्क, मतलव 'लव' ! वह प्रेम करता था।" "प्रेम और उसकी सजा का क्या सम्वन्ध ?" "यार, अक्ल के दुश्मन मालूम होते हो !" माधव अपने स्वभाव के अनुसार हथेली बजाकर फिक्क से हंसा । रामानन्द को उसका सस्ता हास्य बुरा लगा इसलिए इच्छा रखते हुए भी उसने दुवारा कुछ नहीं पूछा। मावत्र ने उसकी नाराजगी भांप ली और खुद ही कहने लगा, “ एक नामी-गिरामी रईस वैरिस्टर की साहब जादी को ट्यूशन पढ़ाया करता था । वह इसकी कहानियां पढ़कर प्रेम दीवानो हो गई और इससे इश्क करना शुरू कर दिया। इसने उसे बहुतेरा समझाया कि मैं गरीव लेखक हू और तुम एक करोड़पती की बेटी । हमारा-तुम्हारा प्रेम नहीं निभेगा मगर उस पर तो इश्क और जवानी का नशा सवार था। यह भी दिल वाला था। जव मुहब्बत खुद ही हाथ पसारे सामने खड़ी थी, वेचारा कहां तक अपने पर काबू रखता? इसके दिल में भी प्रेम की ज्वाला धधकने लगी। दोनों इश्क में डूब गए। " मगर इश्क की ग्राग की पांच जव साहबज़ादी के वाप तक पहुची तो तूफान उठ खड़ा हुमा । लेखक साहब का पत्ता कट गया और लड़की मार- पीटकर घर की चारदीवारियों में कैद की गई। "लेकिन सब कहा गया है कि कावट प्रेम की ज्वाला को और तेजी से नोन महर : तीन गहर घाती है । इधर भी यही हुमा। दोनों विरह में जलरहे थे। अचानक एक दिन रात को वह लड़की घर में भाग पड़ी हुई और लेगा साहब के पास पाकर बोली, 'तुम मुझे लेकर कहीं दूर भाग चलो!' "नहीं, तुम अपने पर लोट जानो।" लेखक ने ममनाया। "नहीं, मैं नदी में पूद कर प्रात्महत्या कर लूंगी !" "वेचारा क्या करता ? सड़को को नाय लेकर दूर चले जाने के प्रोग्राम के साथ स्टेगन गया मगर उपर उन्हें पकड़ने के लिए पुलिस का पहरा लगा था क्योकि याप मान ने पुलिस को घरनी मद की ये नागने की मूचना पहले से ही दे दी थी। " स्टेशन पहुचने ही लेखक महोदय गिरफ्तार कर लिए गए मौर लड़की जबरन बाप के पास पहुंचा दी गई। " में रहा मारा विस्मा ! "महकी ने अदालत में कहा क्यों नहीं कि मैं लेसा में प्रेम करती हूं। मैं उसके साथ विवाह करूंगी !" "नाम न लो, मौरत की जात यडी येवफा, हरजाई होती है भैया।" मायव पणा में मुंह मिकोड कर बोला, "समुरी अदालत में माफ कर गई। बाप के मिपाए-पदाए में माफ कर दिया कि वह मुझे भगाए लिए जा रहा था। बम बेनारे सेवक को नाबालिग लड़की भगाने के जुर्म में दो गाल की सजा हो गई।" "मोफत ! प्रजीय है दुनिया।" गहरी मास के नाय रामानन्द ने मत्यधिक महानुभूति में लेखक की ओर देखा जो अब भी लिखने में तल्लीन था! "यहा पर भी शायद कोई किताव लिग रहे हैं।" "उमै किमी से कुछ मतलब नहीं, वम दिन-रात लिपत्ता रहता है !" "परे सा रे, पय नही महा जाता। महमा वह कंदी पपने विनर पर तड़फड़ाता हमा डोर से चोस पड़ा जो अभी कुछ देर पहले पेट से पटने टिकाए घोरे-धीरे कराह रहा था।
तीन शहर : तीन पहर । "प्रानो, देखो तो सही, उसके पेट का दर्द बढ़ गया है।" माधव रामानन्द को साथ लेकर झपटता हुआ बीमार कैदी के समीप आया अब तक बैरक के अन्य कैदी भी उसके समीप पा चुके थे और उसे सान्त्वना दे रहे थे। वह बिल्कुल निर्दोष ही सजा भुगत रहा था। होम करते हुए उसके हाथ जले थे। मुहल्ले में दो दलों में मार-पीट हो रही थी। उससे नहीं देखा गया तो वह बीचबचाव करने पहुंच गया। उसी बीच एक दल के एक आदमी की हत्या हो गई। हत्यारे तो भाग निकले, हत्या का दोप पाया उसके सिर । पुलिस ने गिरफ्तार किया। झूठा जुर्म इकबाल कराने के लिए उसकी खूब मरम्मत की ! उसे भीतरी चोट पहुंचाने के लिए उसके पेट पर खूब धुंसे मारे गए। उन अाधातों का परिणाम यह हुआ कि पेट के अन्दर की कोई नस उखड़ गई। तब से बराबर उसके पेट में दर्द बना रहता है। हत्या के अपराध में लम्बी सजा मिली, वह आंसू पीकर भगत रहा है। मारे दर्द के बुरी तरह चिल्लाते-चिल्लाते वह बेहोश हो गया। सिवा उसे अस्पताल पहुंचाने के और कोई रास्ता न रहा। शीघ्र ही अपराधियों का यह विचित्र ससार रामानन्द को प्रिय लगा। उसे यह दुनिया बाहर की दुरंगी दुनिया से बेहतर मालूम होने लगी थी जो ऊपर से कुछ और भीतर से कुछ और दिखती थी। उसने जांच-परख कर देखा और पाया कि इस संसार में वह अकेला ही ऐसा व्यक्ति नहीं है जो जबरन अपराधी बनाकर सजा भुगतने के लिए मजबूर किया गया है बल्कि बहुत सारे ऐसे निरीह, निर्दोष और भोले-भाले इंसान जीते-जी यह नरक भोग रहे हैं । इस अनुभव और अनुभूति से उसकी ग्लानि और क्षोभ को कुछ शांति-सान्त्वना मिली। वह अपने-ग्रापसे कह पड़ा, "मनुप्य कैसे भी कुल में जन्म ले, कैसी भी परिस्थितियों में पले और कैसे भी उच्च संस्कारों-विचारों से प्रोत-प्रोत हो परन्तु भाग्य और कुचक्रों की विडम्बनायें उसे कल्पना से परे की स्थिति तीन महर : तीन पहर ६७ में सा पटकती हैं। अपने इस जीवनम्वरूप को क्या मुझे पलना भी हुई थी? अपने- माप पर ठहाका मार कर हसने को मन करता है-उस अहम, पादर्भ और मिदान्तवादिता को सुगन्धि और सात्त्विकता वहां गई जिसने कभी मुझे मंन्यास, वैराग्य और श्रेष्ठ जीवन-विधा की मोर पार पित किया था; जिसकी छाया में मैं अपने को श्रेष्ठ मनुष्य के मन में प्रतिष्ठिापित करने का गौरव धारण कर रहा था । पया भय कोई विश्वास करेगा कि यह यही रामानन्द है जो प्रलोषिक भावनामों में प्रोत-प्रोत यही म्वच्छन्दता, पवित्रता के साथ स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करता था? मेरा मन म्यय कहता है कि वह रामानन्द मर गया ! यह उस रामानन्द की एक जीवित लाभ है जो अपना पथरा-जीवन पथ पूरा कर रही है। कौन मोच सकता है कि रामानन्द भय नाली में फंगै हुए उम कोड़े की भांति बिलबिला रहा है जो फभी देवालय की प्रतिमा पर चढ़े हुए पुष्पों की मुगन्धि मे विहार किया करता था ! रामानन्द सोच रहा था-उसके भूत और वर्तमान में कितनी गहरी विभिन्नता पा गई है । कल मोर मान के रामानन्द में मावाग-पाताल या अन्तर है और उत्तरोत्तर यह अन्तर... "किंग चिन्ता में व ए भाई?" सहमा माधव ने कन्धे पर हाथ गगकर मरझोर दिया और उगको ध्यानावस्था भग हुई। "यु हो, कोई साग बात नही ।" रामानन्द के होठो पर निष्फन मुसमान फैल गई। "जो हमा। सो हुमा भय सोचना-समझना छोटो।" माधव बड़े स्नेह- महानुभूति के साथ कहने लगा, जितना सोचोगे, दु.म उतना ही वढेगा ! यह मय भाग्य का मेन है । देसने चलो।" "वह तो दंग ही रहा हू।" रामानन्द फुसफुसाकर रह गया। "फिर भागेश्या विचार है?"
तीन शहर : तीन पहर "मैं तो दिशा-हीन पथिक हूं।' "फिर वही फिलासफी की बातें ?" माधव ने मुह बिगाड़ा। "तो फिर मेरे सामने क्या रास्ता है ?" रामानन्द के स्वर में विवशता थी। यद्यपि रामानन्द और माधव के स्वभाव में विलकुल समानता न थी परन्तु परिचय के थोड़े ही समय में वे प्रगाढ़ मित्र बन गए। परिस्थितियों ने. रामानन्द को अप्रत्याशित रूप में भले ही पथ और उद्देश्यविमुख कर दिया था परन्तु उसका हृदय और विचारपक्ष अब भी पूर्व जैसा ही विशुद्ध मानवतावादी था। माधव उसके विपरीत सर्वथा साधारण और सस्ते विचारों का व्यवित था। वैसे वह पढ़ा-लिखा आठवीं कक्षा तक ही था परन्तु होटल की बेयरागीरी में अनेक प्रकार के लोगों का सामना पड़ता था जिसने उसे काफी कुशल और व्यावहारिक बना दिया था। रामानन्द से मेल-जोल बढ़ाने में उसका चाहे जो भी स्वार्थ निहित रहा हो परन्तु स्वयं रामानन्द ने जेल जीवन की नीरसता और घुटन को बहलाने के लिये ही उसका सामीप्य पसन्द किया । माधव रामानन्द के मन बहलाव और मनोरंजन का साधन है और रामानन्द माधव की किसी स्वार्थलिप्सा का साधन ! वैसे तो बैरक का प्रत्येक सदस्य एक दूसरे के सुख-दुःख और प्रानन्द-मनोरंजन का साथी है परन्तुरामानन्द और माधव का साथ, चोलीदामन का साथ हो रहा है अन्यथा इस छोटे-से परन्तु अत्यन्त विकृत, विद्रूप और भयानक अपराधी संसार में केवल एकाकी बनकर रहने की कल्पना-मात्र अत्यन्त भयावह है। रामानन्द जैसे भावुक और विच्छिन्न व्यक्ति के लिए तो मत्यु के समान कड़वी। कारागार जीवन के निकट और सूक्ष्म अध्ययन का रंगमंत्र है जिसे हम घृरिणत और उपेक्षित मानकर दूर ही से देखते हैं परन्तु इस उपेक्षित रंग-मंच के चरित्रों में कितनी कुरूपता, स्वल्पता, मार्मिकता और करुणा - तीन शहर : तीन पहर है ! रामानन्द ने थोडे ही समय में इन चरित्रों को निरट मे देगा पड़ा, और ममना है। अन्य महयात्रियों को भाति बरफ में पढ़े-पड़े जुमा मेनने, चरन-गांजा पीने या न मजाक उड़ाने की अपैया उमरा ममप अपराध, अपगधी-मनोवृत्ति और अपराधियों को पढने में व्यतीत हो रहा है। नित्य ही यह किसी न किसी बैरक में जाता है । बड़े स्नेह-सहानुभूति के सार विभिन्न प्राराधियों में मिलता है और उनके जीवन को होनी-अनहोनी घटनामो से एकाकार होकर चलन्त समम्पानों के अटूट जाल में मरुटी राग्ह गुथता चला जाता है। माधव उगतीग अपराध और अपराधी-अध्ययन पद्धति को उमको भावुकता और पागलपन कहता है, परन्नु रामानन्द उसके व्यंग्य और टहाके पर गरलता में मुकराकर नित नयी भावधारा में वहता चला जाता है । रामानन्द के मनोरंजन और मनबहलाव में भले ही माधव उमका मायो है, साझीदार है, मगर उमकी विचारधारा और भावभूमि में उसका कोई दपल-पहल नही। माधव मोच रहा था, गमानन्द जैसा रूपवान, नाक और ययेप्ट पढ़ा- लिसा नवयुगक यदि उसके व्यापार में शामिल हो जाय तो उसकी माय दिन दूनी, रात चौगुनी हो सकती है । उसको कार्य-कुदालता, प्रवीणता और रामानन्द काम्प तथा माधयं सोने मे सुहागे को मांति प्रतिफलित होगा। इसीलिए रामानन्द को प्रभावित, प्रापित करने का कोई भी स्पाय उमने शेप नहीं छोड़ा है। कारागार से मुक्ति पाते ही वह रामानन्द सो पानी (स्यायं-नाम) की कारा में बन्दी बना लेगा। और समय प्रदिराम गति में भागता चला जाता है। बेल-जीवन का मन्यस्त हो जाने से रामानन्द को अपनी यह दुनिया प्यारी-मी लगने लगी है। प्रथम बार यहां माने पर उसे जितनी ग्लानि और मापात-मा हुअा था पय रभी सोचकर वह व्याकुल हो उठता है कि एक दिन उसकी भी सजा पूर्ण हो जाएगी पौर दर दह पुनः लावारिम की भांति निरद्देश्य और निराश्रित भटकने लगेगा। फिर वह वहां जाएगा, क्या करेगा? अव कोई ७० तोन शहर : तान पहर सहसा बैरक में भी दिशा और मंजिल उसके लिए शेष नहीं । संसार-क्षेत्र उसके लिए सर्वथा अन्धकारपूर्ण हो चुका है। अपने अनिश्चित भविष्य की कल्पना करते ही उसका सिर फटने लगता है, धरती परों तले घूमती-नाचती मालूम होती है । कुछ हलचल हुई तो उसकी ध्यानावस्था भंग हुई। अव तक वह अपने बिस्तर पर पड़ा-पड़ा ऊँघ रहा था। उसने देखा, जेल सुपरिण्टेण्डेण्ट को घेरे हुए पचासों कैदी खड़े थे और किसी बात पर गरमा-गरम बहस चल रही थी। उसने माधव को तेज आवाज़ में कहते सुना, "आप ही बताइए साहब, यह सारे कैदियों के प्रति अन्याय नहीं है तो और क्या है ? हमारी ज़िन्दगी और हमारे पेट के साथ सरासर वेईमानी है। आप ही फैसला कीजिए।" मामला रामानन्द की कुछ समझ में न आया। भीड़ के निकट आकर वह समझने का प्रयास करने लगा। "बिल्कुल सा'ब, हमारे साथ इंसाफ होना चाहिए।" कुछ और कैदियों ने भी माधव की हां में हां मिलाई! "क्यों हरपाल, क्या ये सब झूठ बोल रहे हैं ?" सुपरिटेण्डेण्ट ने उस व्यक्ति को डपटकर पूछा जो उसके सामने ही खड़ा ढिठाई से अन्य कैदियों को घूर रहा था। "गुस्ताखी माफ हो सा'व, आप आज खुद टेस्ट करके देखें।" माधव निस्संकोच भाव से बोला, "सरकारी भण्डारे से तो फी खुराक का अनाज और तेल वगैरह तोलकर मिलता है मगर उसमें से काट-कपट इन मंजे हुए वावचियों (भण्डारियों) द्वारा होता है। पाटे में रोज मिट्टी मिलाई जाती है और तौल बढ़ाने के लिए रोटी कच्ची सेंकी जाती है और तरकारी तेल के नाम पर सूखे पानी में उबाली जाती है और काट कपटकर अच्छे आटे की खूब सिकी हुई रोटियां और तेल मिों में पकी हुई सब्जी अन्य पैसे वाले कैदियों के हायों वेचकर रोज सिगरेट-वीड़ी, गांजा और चरम मंगाया जाता है।"
तीन महर :तीन पहर ७१ "विस्तुल मूठ, हर।" भण्डारी कंदी, जो गाय की चोरी करके उसके सींग तोड़बर और तेजाब मे उराका रंग बदलकर पंचने में अभ्यस्त पा और मारी में घ माह को मजा भुगत रहा था और जेल प्रपितारियों की सहानुभूति पौर विश्वास प्राप्त कर हेड मडारी बन बैठा था; पय रोवीने स्वर में बोला, "गाव,सोग मुभगे जलते हैं क्योंकि इन्हें सरकारी हुक्म के राहर मनमानी गुराक नहीं देता। हर मुद जांच-मुप्रायना करफे देश में। अगर मेरी कोई गलती निकले तो चाहे जो सहाद।" "टीक है, ठीक है। हम गुदमल जांच करेंगे।"मुपरिटेष्ट ने असंतुष्ट कैदियों को पारवागन दिया और हेनदारी को छोड़कर बाहर पाकिम भी और चले गए। मगर माधव बोषित मुद्रा में दमे इंगित कर बोला, "देपता हूं पर- मरों की गिरचड़ी तुम्हें पब तर उचाती है ? कभी न कभी तो तुम्हारी कनई पलेगी ही।" टमा दोषारोपण मत्य पा। हरपानको पुगना विश्वान कंदी ममम- करदियों की ग्मोई मायाम मोरा गया था। मारणकि वह चोरी में उब- जब पाता हमेगा उम भन्दारी ही पारायं मांगा जाता।जिम चल पर्मचारियों या बी मला होता । पोर वह मनों प्राटे में दो-चार मर मिट्टी मिना देता और कच्ची रोटी मेंजर तौल भी पूरी कर देता और मम्मी में गले तक भरे तमेड़े में तैम के नाम पर मेर दो मेरी जगह पाय- माप मेर का ही प्रयोग करता था और मेप बचाकर प्रपनी और पानी मित्रमाली को रूरत पूरी करता पाा परि कुछ मिन-चने कैदियों को घोडार मेर मनी ऐमें जीवपाउक कार्य में पर्मतुष्ट थे परन्तु मार प्रपम गर मापय ने यह विद्रोह नटापा । यदि उम 'दर' ने वचन के 'मार' में उगे भी हिम्मा दिया होता तो गम्नवत. वह मामांग रहता, परनु टम में निपुण दादी को पांगा देकर वह माना न्यू मीया कर रहा था! मना यह यादती उमेर महन होती? रामानन्द मधममम गया और उसनमायव मे विद्रोह पार दुम्साहस ७२ तोन शहर : तीन पहर - को प्रोत्साहित किया। "तुम अच्छी नेतागीरी भी कर लेते हो।" माधव के कन्धे पर धौल जमाकर उसने मुस्कराते हुए कहा, "सच, हमें दो कौड़ी का खाना मिलता है! रोटी का स्वाद मिट्टी-सा लगता है। एक तो कच्ची और दूसरे मुंह में डालते ही किरकिराने लगती है और सब्जी यूं मालूम होती है मानो किसी रोगी का पथ्य हो। सिर्फ उबला हुआ ऐसा लगता है जैसे मानो हम सड़ा हुआ साग खा रहे हों । तुमने पूरे जेल-यात्रियों के लिए एक महत्त्वपूर्ण कदम उठाया है अन्यथा ऐसा सड़ा-गला खाना खाते हम सब क्षय और भयंकर रोगों के शिकार हो जाएंगे।" "सुपरिण्टेण्डेण्ट ने उसे छोड़कर अच्छा नहीं किया। लगता है.उस वचत में से कुछ न कुछ उसकी भी जेव में जाता है ।" माघव रोप में बोला, "कभी तो मेरे हथकण्डे पड़ेगा, तब देखना।' "जहां अपराधी दंडित किए जाते हैं, वहां अपराध के लिए ऐसी छूट है।" रामानन्द विक्षुब्ध होकर बोला, "माधव, यह कैसी सजा है ? कैसा दण्ड जो अपराधी मनोवृत्ति को रंचमात्र भी प्रभावित नहीं कर पाता।" "तुम तो हर बात में फिलासफी छांटने लगते हो भाई !" माधव एक सिगरेट सुलगाकर बोला, "मैं कई बार सजा काट चुका हूं. और इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि जेल-यात्रा एक वैसी ही पारामतलबी है जो आदमी मेहनत के बाद पाना चाहता है।" "क्या मतलब ?" रामानन्द ने अचरज से मुंह सिकोड़कर पूछा। "मतलब साफ है ।" माधव खिसियाकर वोला, "चोरी, डाकाजनी, चार सौ बीसी, या जाल वट्टा में मामूली मेहनत और दिमाग नहीं लगता और उस मेहनत और माथापच्ची को जेल यात्रा में कुछ दिनों के लिए प्राराम मिल जाता है.और मुलजिम इस खाली वक्त में कोई नया हथकण्डा सीख या सोच लेता है । सजा आदमी के खराब इरादों को मजबूत होने का मौका देती है।" "क्या कहा ?" रामानन्द सिमला उठा, "इसके माने जेल व्यर्थ है ?
No text on this page.
तीन शहर : तीन पहर ! मंगलवार को पंडितजी की वारी पड़ेगी और इतवार को पादरी हब की।" "यह तो नई बात सुन रहा हूं। अायो ज़रा, हम भी सुनें क्या कहते हैं लवी साहब ?" रामानन्द ने उत्सुकता दिखाई। "फिर वही पागलपन ।" माधव झुंझलाया-"उनकी मज़हबी शिक्षा से तुम्हारा क्या सरोकार ? पंडितजी आएंगे तो सुनना ! उपदेशों की झड़ी लगा देते हैं।" "धर्म-उपदेश में मेरा कोई विश्वास नहीं रहा ।" "फिर वहां चलना सरासर वेवकूफी है।" माधव ने दूसरी ओर मुड़ते हुए कहा। "मुझे कोई सवक और उपदेश नहीं लेना है । मैं तो सिर्फ यह जानना चाहता हूं कि धर्म और मजहब के ये पण्डे दरअसल खुद कितना धर्म और मजहब की वातें समझते-जानते हैं ? उनकी सीखों और शिक्षाओं का अपराधियों पर क्या प्रभाव होता है ?" रामानन्द ने व्यंग्यात्मक मुस्कराहट के साथ कहा। "चलो वावा, तुम एक ही झक्की हो।" माधव ने उसकी बात पर कहकहा लगाया और उसके साथ-साथ बारादरी की ओर बढ़ गया। अच्छी-खासी सभा लगी थी। जेल के प्रायः सभी मुसलमान कैदी वहां उपस्थित थे। सामने की एक कुर्सी पर श्वेत चोंगे से अलंकृत एक वृद्ध मौलवी साह बैठे दीख पड़ रहे थे। उनकी बुजुगियत, सन जैसी उजली दाढ़ी और गंभीर मुख-मुद्रा इ बात का आभास दे रही थी कि वे अवश्य ही महान और प्रभावशान व्यक्तित्व के व्यक्ति हैं । रामानन्द माधव के साथ मौलवी साहब की कुर्सी के समीप ही या डट मौलवी साहव बड़े सुरीले कण्ठ से कुरान की आयतें पढ़-पढ़कर लं को उसके अन्तरनिहित भाव समझा रहे थे।
तीन महर :तीन पहर रामानन्द चुपचाप राष्ट्रा-मड़ा मनता रहा । इम्लाम, पाविम पौर गोता पर मायारित एक समन्वित प्रश्नचिह्न उमर मम्लिप में मंडरा रहा था। मोलयो माहब जय अपना पटन-गाटन समान पर नो नो उमने गादर मिर झकारुर कहा, "मैं भी प्रारको पोडी-नी तरलीफ देना चाहंगा।" "फरमाइए।"मानी नम्बी-उजली दाड़ी पर हाप फिराते हुए मौनधी साहब मुस्कराए। "मैं जानना चाहता हूं कि कुरान, याइविल और गीता से गिधान्तों में यहा पहा मिलान है मोर कहा-पहा फर्क ? तीनों का प्रापिरो मागद क्या है ?" मौलवी माहब के पैरों के सले जैसे माग की चिनगारी पर गई हो! उन्होंने पीककर उस नौजवान की भोर देसा जिसने उनकी प्रश्न मोर शाबलियत को चुनौती दी थी। व्यक्तित्व से ये मले साटात हजरत मुहम्मद साह्य से मवतार मालूम होते पे मगर भान-विद्वत्ता में यह कुपन थे। दरमसल वे 'कामचनाऊ' मोर पसा कमाऊ तक की बिना रयते थे मगर माज उनका पाला बौहह नौजवान से पट गया । "देवो भाई,ये मजहब यो बारीक वाते हैं, इन पर चलते-फिरने वात नहीं हो सकती। वैसे में तुम्हारो मूझ को दाद देता हूँ।" इतना कहार उन्होंने रामानन्द को टालना चाहा। मगर रामानन्द यू टलने वाला नहीं पा-धारण-भर मे उसने मौलवी साहब के जाल यी पाह पा मी पौर मुस्कराते हुए बोला, 'मेमपने मवालो पा जयाय गुरु मुझे मालूम है। सिर्फ उमे मोर पका करने के लिए मैंने मार. पूछा या । कहिए तो मैं बता दू गकता है फिर कभी कोई मुझ-मा योहर पादमी पाप मे यही गवात पूछ बैठे" "शुक्रिया, शुक्रिया।" मौलवी माहव भैप-मे बोले, “पगली जुमेरात फो तुमसे बहस करूंगा। मभी मेरे पास कई प्रोग्राम है।" "देगा !" रामानन्द मापद कोइमिन र बोला-'मामो पर्ने।
७६ तीन शहर : तीन पहर मैंने तुमसे क्या कहा था? ज्ञान-विद्वत्ता के नाम पर जनता और सरकार की आंखों में धूल झोंकने वाले ये पंडित-पैगम्बर धर्म की छोटी-मोटी जानकारी नहीं रखते। इसीलिए मैं धर्म को धोखे की टट्टी कहता हूं।" "गजब का दिमाग पाया है तुमने ।" माधव ने अांखें फाड़कर कहा और दोनों गप्पें लड़ाते हुए आगे बढ़े । रसोईघर के पास भारी मजमा देखकर सहसा ही वे ठिठक गए। "क्या हुआ ?" एक कैदी से आगे बढ़कर पूछा। "तुम्हारा ही किया-धरा है सब कुछ।" मन्द-मन्द मुस्कराते हुए वह कैदी कहने लगा, "तुम्हीं ने तो रसोई इंचार्ज की रिपोर्ट की थी न कि वह खाने में गफलत करता है सो बड़े साहब मुयायने पर पाए हैं।' "ओह, तो यह मामला है।" माधव हथेली पीटकर बोला, "पायो, जरा देखें तो।" दोनों झपटते हुए उस ओर पाए । जेलर साहब, कुछ अन्य जेल अधि- कारी पोर पचासों की संख्या में कैदी रसोईवर घेरे खड़े थे। कैदियों का भोजन बनाने के निमित्त जो खाद्य सरकारी भण्डारे से दिया गया था उसकी जांच-परख हो रही थी। आटे की जांच की गई, मगर उसमें किसी प्रकार की गड़बड़ी नहीं पाई गई । शायद मुग्राइने की खबर रसोइये को पहले से ही मिल गई थी। "साहब, मुझे झूठा फंसाने का जाल रचा गया है।" रसोइया कहने लगा, "हुजूर, आप खुद ही देख रहे हैं । वह (माधव) कहता है कि मैं पानी में साग उवालता हूँ। भला कहीं पानी से सब्जी तैयार होगी सरकार? मुझे भण्डारे से तेल की जो भरो-भराई पतीली मिलती है पूरी की पूरी पतीली तमेड़े में उलट देता हूँ। हां, जो ज्यादा चटपट खाने वाले हैं, हो सकता हैं उन्हें स्वाद न मिलता हो। फिर हुजूर, यह जेल खाना तो है ही । सरकार, घर का सा स्वाद, भला कैसे मिल सकता है।" और इतना कहने के साथ ही उसने चूल्हे पर चढ़े तमेड़े में साहब के सम्मुख तेल की पतीली पूरी को पूरी उलट दी और अधिकारियों को जांच
तीन महर :तीन पहर
N
करने दिपाया!
"वहां गया यह मायब या यश्या ?" अगर शाहप भागपणा हार
वोले, "सामस्वाह के लिए कैदियों में हिगंदा करता है और हमें गो.
मान वरना है।"
" यही मौत हूं मगर।" मायय सामने पाकर योगा, "सार,
इन मारक मुमायने का पता लग गया होगा। नही तो...?"
"दावान दाद करो।" र गाइव प्राय फादकर योग, "तुम बहुत
दनाम मातून होत हो, मुझे तुम्हारा दिमाग टीफ करना पड़ेगा।"
"परमार, पारने शमी चार्जशीट नहीं देगी? शातिर बदमाशो में
में है।" रन प्रविगर्ग ने पुष्टि की।
"हिम्मत देना।" नर मादर फिर पटक पटे, "यह गादियों में
दियटनाने की मांग रहा है। मैं इसका मकराद समझ रहा हू।"
माती मिसान्दादित परिणाम देपार माधव मया था।
गगारन्दमण्टिरमान यात्री मान ।
"मगार, मुन्नानी माही. बभी मौवा दें तो मैं सुद पर
हिनी" निनद ने कहा।
"हवनहर माह अधीनस्थ अधिकारी को मादेश
"टा मान न करने दो हाते की तनहाई कंद हाई
दमकीनर र मोटी पाश्चर्यचकित रह :--
के दारोगामि हिम्मत थी जो कोई
"गिराय प्रधिकारी नायब रेस
मारपदुःकामावर क्षमा पाने की
मेरमाराचा।
गगनन्ददररावान माराम
इंटरी हो रही थी
रबरन I
७५ तीन शहर : तीन पहर जेल अधिकारी माधव को खींचता हुआ तन्हाई कैद की तरफले वढ़ा। कैदियों की भीड़ आपस में कानाफूसी करती हुई अपने-अपने बैरकों को लौट रही थी। रामानन्द यथास्थान मूर्तिवत् खड़ा इस अप्रत्याशित घटना पर विचार कर रहा था और माधव पलट-पलट करांसू भरी आखों से उसे देख लेता था। जब वह प्रांखों से ओझल हो गया तो लम्बी सांसों के साथ रामानन्द फुसफुसा उठा, 'अजीव है यह जेल की ज़िन्दगी भी--माधव बेकसूर ही फंस गया । वह सही रास्ते पर है मगर जेलर की बेइंसाफी से कौन मोर्चा ले? माधव के बिछड़ने के गम के साथ यह धीरे-धीरे अपनी बैरक की ओर लौट पड़ा। लेकिन वह बार-बार इसी उधेड़-बुन में डूबता-उतराता रहा कि माधव को तन्हाई कैद से मुक्ति कैसे मिलेगी? और वह खुद को कैसे बहला सकेगा? सहसा किसी ने उसकी बांह पकड़कर झकझोर दी और वह आंखें मलते हुए अपने बिस्तर पर उठ बैठा । देखा, तो सामने बैरक का लेखक सहयात्री खड़ा था। "क्या बात है भाई ?" उसने अचरज से पूछा। "पंडित जी का प्रवचन उपदेश सुनने नहीं चलोगे ?" साथी ने पूछा। "पंडित जी का प्रवचन-उपदेश ?" "हां, आज मंगल है न ? हिन्दू कैदियों के सत्संग का दिन।" "तुम हो पायो, मुझे प्रवचन-उपदेश में कोई दिलचस्पी नहीं।" उसने मुह बिगाड़कर कहा। "दिलचस्पी तो मुझे भी नहीं है ।" लेखक व्यंग्यात्मक हँसी के साथ चोला, “मगर पंडितजी ऐसी रसीली कथा सुनाते हैं कि बस मज़ा प्रा जाता है ?" "रसीलो कथा सुनाते हैं ?" "हां भाई । उपदेश-प्रवचन तो दस-पांच मिनट का ही होता है। बाकी तीन शहर : तीन पहर दो घण्टे ये तरह-तरह को रमोली कहानिया सुनाते हैं।" रामानन्द ने विस्तर समेटकर रख दिया मोर लेखक के साथ सत्संग- मंच की पोर चल पड़ा। जेल के हिन्दू कैदियों का मजमा वहां एकत्रित हो रहा था। रामानन्द के लिए पंडित जी का उपदेश-प्रवचन रंचमात्र भी प्रभाव. साली न रहा। मौलवी साहय की तरह उनसे भी उसने प्रश्न किया, "मैं धर्म की परिभाषा जानना चाहता हूँ।" "धर्म की परिमापा?" उसकीमोर मचरज मे देखते हुए पंडित जी ने पान को पीक यूकते हुए लटपटाती जवान से कहा,"अरे भाई, तुम्हें धर्मग परिमापा से क्या लेना-देना है ?" "याह पडित जी, वाह !" रामानन्द ठहाका लगाकर दोना, * को परिमापा जानने वाला व्यक्ति ही तो धर्म पर चलेगा। पौर उदेश्य को समझेगा?" पंडित जी को पास कपार पर चढ़ गई। मव नावे बन कर धितो, भपराधियों का भण्डार समझते थे परन्तु पात्र इन्हें फोयले की सान में हीरे को कनी भी होती है। "इधर कुछ पम-चर्चा का प्रमंग नहीं पाया, इनमें देखीं । सुमने छेड़ा है तो मव देवगा। जानते हो - फा गढ़ है। यहां घमं चर्चा की फुमंत क्विर्ग है "फिर पापकी क्या जरूरत है ?" "पापी पेट चाहे जो करा देवेटा" "माधी-सासी सरकारी रकम हाय है। "समझा !" मारी हुंदार के काम मान्न हामा लगाकर कहा, "तभी तो में रहा "धर्म माने घोसा? राना- "धर्म के नाम पर तुम P रानन्द उग .
तीन शहर : तीन पहर - उपेक्षा से कहा और उलटे पांव लौट पड़ा मानो पंडितजी की प्राकृति- त्र उसे धोखे की टट्टी लग रही हो। वह अपने-अापसे कह पड़ा, 'कैसा अद्भुत है यह संसार? बड़े-बड़े तानी-विद्वान भूखे मरते हैं और ज्ञान-विद्वत्ता का झूठा जामा प्रोढ़ने वाले ये पैसे के धर्माचार्य आज दुनिया को ज्ञान-धर्म के नाम पर उल्लू बनाते फिरते हैं।" रामानन्द बैरक के लान में चहल-कदमी कर रहा था। माधव को तन्हाई से मुक्त कराने की समस्या उसका मस्तिष्क कुरेद रही थी। तभी सहसा उसकी दृष्टि समीप के अहाते पर पड़ी। धुंधलके में, चार-पांच आदमी एक कोने में सिमटे हुए घुप्रां-धक्कड़ करते दीख रहे थे। अचरज से वह धीरे-धीरे उनके करीव पाया। वे सब आशंका से सिहर गए, समझे कोई अधिकारी गश्त पर निकला है ! वे एक-दूसरे से सिमटे हुए गांजे की चिलम फेंक रहे थे ! सज़ा की हालत में उनकी यह स्वतन्त्रता और साहस रामानन्द को गहरे अचरज में डाल रहा था। करीब आकर रामानन्द ने उनमें से एक को पहचान लिया ! वह वह ..ना रसोइया कैदी था जिसपर माधव ने इल्ज़ाम लगाया था औ परिणामस्वरूप तन्हाई भुगत रहा था। इस वक्त रसोइया इस नशेबाज़ गुट का सरदार बना हुआ था शराब के नशे में भी झूम-झूम के बढ़-बढ़कर बातें कर रहा था । रामानन्द सव कुछ समझ गया । और बड़ी तरकीव से उसके नि आकर बोला, "मुझे उस माधव के बच्चे पर बड़ा गुस्सा आया था। जैसे भले अादमी पर नाहक ही उसने इल्जाम लगाया । अाज अगर रसोई से अपना हाय खींच लो तब लोगों को पता चले । आखिर तुम क्या दोप था? सरकारी भण्डार से तुम्हें जितना नाप-तौल कर मि उतने में हो तो पूरा करना पड़ेगा।"
No text on this page.
८२
तीन शहर : तीन पहर
"और तुम किस मामले में पाए ?"
"अब तुमसे क्या छियाऊं उस्ताद !" इतना कहकर वह खींसे काढ़ते
हुए फुसफुसाया, 'मैं चार सौ बीस में पाया हूं !"
"चार सौ बीस?"
"हां, हेर-फेर करने में।" ऊधो इस बार खुलकर बोला, "हम चारों-
पांचों देशी में डालडा और शराब में क्लोरोफार्म का ऐसिड मिलाने और
कभी किसीकी गाय को चुराकर उसके सींग तोड़कर तेजाव से गाय
के रंग को बदलकर इधर-उधर वेच लेते थे। उसी में पकड़ा गया।"
"मगर यह तो कोई जुर्म नहीं।" रामानन्द हंसा, "व्यापार क्षेत्र में तो
धड़ल्ले से मिलावट का बोलवाला है।"
"पचासों केस थे हम पर।" ऊधो ने भी रंग जमाया।
"अरे वाचू, जेल आफिसरों और हजारों कैदियों की आंखों में धूल
झोंकाना मामूली बात है ?"
"सौ केसे ?" रामानन्द ने टोह ली।
नशा नशा ही है जो सिर पर चढ़कर बोलता है
ऊचो भला अपनी कला-कुशलता कैसे छिपाता ? तपाक से कह पड़ा,
"माधव का इल्जाम सही था मगर कोई मुझे पकड़ न सका। मैं रोज पाटे
मिट्टो मिलाता हूं, तरकारी विना तेल के बनाता हूं होगा कोई ऐसा
कारीगरी ?"
"मैं विश्वास नहीं करता।" रामानन्द तह में घुसकर बोला, "तुम झूठी
हींग मारते हो। ऐसा कभी हो ही नहीं सकता।
"ग्रानो दिखाऊँ।" ऊधो उसे एक ओर खींचता चला गया।
रामानन्द मन ही मन फूल रहा था। एक ऐसे जटिल नाटक का पर्दा
खुलने जा रहा था जिसने जेल अधिकारियों को भी चक्कर में डाल रखा
.
ऊयो नहीं, उसका नशा बोल रहा था, "अपने हेर-फेर से बड़ों-बड़ों
उल्लू बना देना मेरे बाएं हाय का सेल है।"
सोन घहर :सान पहर वह रामानन्द को एक कोठरी में ले गया जो रमाई से सम्ब- यित थी और वहां रामानन्द को अपनी हायसपाई के कई करतय दिसाए। रामानन्द पारों फाहे पाश्चयं से सब कुछ देयता रहा । उसके कौतूहल काभन्तनपा। कयो मंजा हुमा सिलाड़ी पा । रामानन्द रो परिचय बढ़ाने और उसे पपने कौशल दिखाने के पीछे उसका अपना कुछ निजी स्वार्थ भी पा। वह रामानन्द मी शातिर बदमाश मौर हरपारा समझ बैठा था प्रतः उसे अपने निकट पीचने का प्रयास कर रहा था ताकि भविष्य मे मुक्ति पाने पर उसे अपने दस में सम्मिलित कर से। परन्तु रामानन्द को तो अपना मतलब पूरा करना था। रहस्यों का पर्दा गुलने ताही उसे ऊयो से घनिष्ठना ररानी थी। "इतना ही नहीं, में पोर बहुत सारे कमात जानता हूं।" रामानन्द का हाय दयाकर ऊपो सीसें काद कहने लगा, "राजा सत्म होने के बाद तुम्हारा क्या प्रोग्राम है ? मैं तो पाहता हूँ कि मेरे दस में शामिल हो जामो । विना रिसी मेहनत-मारत में मजा मारोगे।" "बिल्कुल, तुम्हारा धन्या जोरदार है।" रामानन्द ने अपनत्य के गाप रहा, "मुझे तुम्हारे गाम मे शामिल होकर बड़ी सुनी होगी।" ऊपो ने विश्यम्न मित्र के रूप में उगे अपने फोन को पनेक पटनाएं मुना ली। रामानन्द उममें सारे रहस्य सेपर मोटा। अपनी वैरक में प्रवेश करते हुए रामानन्द की दृष्टि एक विशेष व्यगित पर पड़ी पौर यह उपर प्रारपित होकर रह गया। वह पकिन परपन्न पारा येप-भूषा वा सुनिशित पौर मुयोर ग्यतत्य यासापा। भांगरटेन्ट जनर माद उमसे गिी विषय पर तक कर रहे थे, परस के गमीप ही हार पर सोग गरे । अंक में पाने पर पता चला कि पादरी साहर है। प्रारमिर ८४ तीन शहर : तीन पहर को ईमाई कैदियों को धर्म-शिक्षा देने आते हैं। मौलवी साहब और पंडित जी की अपेक्षा पादरी साहब कहीं अधिक विद्वान और प्रखर दीखते थे। रामानन्द को इधर कुछ दिनों से ईसामसीह के जीवन-सिद्धान्तों के प्रति आकर्षण हो रहा था। बाइविल का काफी कुछ अध्ययन उसने विद्यार्थी जीवन में ही किया था। पादरी के व्यक्तित्व ने उसे प्रभावित किया। असिस्टेण्ट जेलर जो स्वयं भी ईसाई था, जव पादरी साहब से बातें करके विदा हो गया तो पादरी साहब दूसरी बैरक की पोर जाने लगे। "गुड मानिग सर।" उसने पादरी साहब के समक्ष पाकर पादर से यू टेल मी वन यिंग ? (क्या आप मुझे एक बात बताने का कप्ट करेंगे?)" "व्हाई नॉट ? (क्यों नहीं)" मुस्कराते हुए पादरी साहब ने उसे अपर से नीचे तक देखा। "ईसामसीह की प्रमुख जन शिक्षाओं की कोई पुस्तक मुझे मिल सकती है ? मैं एक सजा याफ्ता कैदी हूँ। समय नहीं गुजरता। सोचता हूं कुछ अध्ययन ही कर डाल ।" पादरी साहव चकित हुए, वह नवयुवक जो उनके समक्ष खड़ा विद्वत्ता- पूर्ण बातें कर रहा था उसके कैदी होने का उन्हें विश्वास नहीं हो रहा कहा, "विल था। "तुम बहुत टेलेण्टेड (प्रतिभावान) नवयुवक मालूम होते हो-तुम्हें किस केस में सजा हो गई ?" "वह एक वेकार की घटना है । छोड़िए उसे । हो सके तो मुझे जेल- लायरी से कोई पुस्तक दिलवा दीजिए।' "क्या तुमने वाइबिल के बारे में कुछ पढ़ा है ?" "मैं बाइबिल का अध्ययन कर चुका हूं।" रामानन्द ने रागर्व कहा, "उसके सम्बन्ध में आप मुभने कुछ भी पूछ सकते हैं।"
नीन गहर:गीन पहर ८५ "माया ! माः यम घेरो मन जीजा (म या प्रमादित) में गुम्हें मार पुन दूंगा।" "पन्यगद । पार से पाय पोर यहां मुनापात गरेगी?" "मैं सो हर गयो पाना है, ईमाई मंदियों को उपदेश देने के लिए।" "नय टीक है, में प्रयाय ही मापगे गम स्थापित मरूंगा। मुझे रिली. जगदिमागन में या पानन्द गाता है।" "पोह गुट ।" उमका मन्या थपथपारर पादरी गाहब ने प्रशंसा की पौर दूसरी मोर चले गए। निम्मन्देह रामानन्द मी प्रतिभा, मान-रिपामा पौर भाचार पर ये प्रभावित थे। रेल के ईमाई कदी उनके स्वारपान में रचि न लेने ये बोकि प्रारापी मनोवृत्ति के पारण उना मन पोर मनिप्प घर-उपर पो बालों में लगा रहता था। मगर गमानन्द ने ईमाई न होते हुए भी गहरी पभिरति दिगाई थी जो उमरी प्रतिमा का गत पा। ये अपने पापसे मह पड़े, 'मोर पाहे जो चुप भी हो, यह नौजवान मपगपी नहीं हो सकता। मवश्य हो यह उबरन अपराध में फंगाया गया है। अगर ऐमें प्रतिभारान व्यक्ति के विचार और भावनापो या प्रयोग प्रद गायों में हो तो येशक यह बहन काम का माबित हो सकता है।' पौर रामानन्द पा मस्तिष्क पोर मन मामगीह भोर याचिन की नियामी उलझ रहा था। विद्यार्थी जीवन में ही उने ईसामगोह की शिक्षामो में नगाव हुमा था। पर यह पूमने-पूमने गिरवापर यो मोर पसा जाना पा मोर वहा उपदेशा गुना करना था। याइबिल का हिन्दी अनुवाद उमने पर डाला था पोर उमरी जान- रिपामा पारी मात्रा में भान हो चगो यी मगर पान पादरी ने मरने मारक मश्तिय से पुनः उगे माने धर्म को मोर मारपित रिया। वादरिन मी शिक्षामों पर न परता हुमा वह कब सो गया-गाने तीन शहर : शहर : तीन पहर के नशे की झुरझुरी में उसे याद भी न रहा । परन्तु जब उसकी पाखें खुली तो वह सब कुछ विस्मृत हो चुका था और वह ऊधो का पर्दा फाश करने की गर्ज से जेल अधिकारियों के आफिस की ओर बढ़ा जा रहा था। "साहब, श्राप चुपके से प्राइए मेरे साथ।" उसने जेलर साहब से फुस- फुसाकर कहा, "मुझे सारा रहस्य ज्ञात हो चुका है। रसोई का वक्त हो रहा है। इस वक्त छापा मारकर आप उसे रंगे हाथों पकड़ सकेंगे।' "और जो इस बार भी इल्ज़ाम झूठा सावित हुया तो ? जेलर साहब सस्त ग्रावाज़ में बोले । "याप मुझे चाहे जो सजा दीजिएगा।" "ठीक है, पायो मेरे साथ।" जेलर साहब दो अन्य अधिकारियों के साथ रामानन्द को लेकर रसोई की ओर चल पड़े। ऊयो सिर से पैर तक कांप उठा। क्षण-भर को उसे रात की बातें याद आई । नशे की झूम में उसने जो गलती कर डाली थी, अव उससे मुक्ति पाने का कोई मार्ग न था। रामानन्द ने सब्जी से भरी हुई बाल्टी में नीचे दबे हुए भगोने को उघाड़- कर ऊपर खींच लिया। फिर उससे तेल व मिर्च अलग कर दिखाई। उसने कहा, "देखिए कमाल, जेलर साहब।" "इस तरह सब्जी का सारा तेल जो आप लोगों के सामने सब्जी में धार बनाकर छोड़ा जाता है, आप लोगों के हटते ही गड़े हुए भगोने को निकालकर तेल अलग बचा लिया जाता है।" रामानन्द ने रहस्य स्पष्ट किया। ऊधो तो इस जांच से अनभिज्ञ था। उसने अाज आटे में मिट्टी भी मिला रखी थी और रोटी भी कच्ची सेंकी गई थीं । जब जेलर साहब ने रोटियों की जांच की तो उसमें मिलावट । . मिली। यह रंगे हाथों पकड़ा गया। उसने रामानन्द के सामने अपने कौशल की जो डोंग मारी थी, वह क्षरण-भर में उसका सत्यानाश कर वैठी। -
तीन महर : तीन पहर
मन ही मन पार पानी मूल पर पाता रहा पा घोर गमान से
गानियां दे रहा था।
तर माहब ने ऊयो पोदो माह पी पीनहाई परमी गदा गुनाई
पौर मापय को नुरल गनहाई कंद मे रिता परता।
एर परनी मलाई कद में मुरगी पर माया पापान
रहगया।
गमानन्द ने मुगगहा गहा, 'तुमने गित मारूडाम यताया
पा, मगर मैंने उमेरमहावी पाहा दिया।"
"मी"दिग्मय में मार मे पूया।
गमानन्द ने उसे मार्ग पयागर गुना मोर मन में नेट में उग
पन्य पर हापगार मोला, 'तुम्हारे बिना मंग मन न रगता पा, पन में
गांचा रिमी हिरासत में तुम्हें पुमा पौर में पामयाब हमा।"
"मे भी मेरो गजादौतीन नि में गाने को है । माया माग
सन भी परीवही? पूटने के बाद यानिार है?"
"तुम मुझने एक गाना पहले ही नो पारधे । यम गुमारे एटने ये
मारतारे भीतर मुभ भी परमार नायगा।'
"मेरे मार पोगेन" माधव ने की प्रान्नीर भाय ।
"गपात पापभो युगपंचना नही र मगह।"
"का?" माय ने पनागर पूछा।
"गोद नहीं पा रहार निया में पूरा frग तरफ जाऊ
में मादिगाने सक्षम नहीं रहा। मेरे लिए प्रोगन भार बनार रह
गया है!"
"मामवाह परीक्षा करो।" माधव ने सपनर गाए पदा,
"तुम्हें अपने बारे में कोई मिना करने की जरूरत नहीं। तुम मेरे माप
पोगे, में शुमार पाम-पय माजगार नगा दगा।"
'देगा जाएगा।" रामानन्द पापान मा बोला, "दामन में
माई यदने पीया। गोच रहा है. पारी मादर में मेरी भेट
तीन शहर : तीन पहर उनका शिप्य बनकर "कहां चक्कर में फंस रहे हो ?" माधव बीच में ही डपट पड़ा, "चलो मेरे साथ, खाम्रो-पियो । ज़िन्दगी का मज़ा लूटो । धर्म वगैरह के चक्कर में फंस कर कुछ न पायोगे । यह सब पोखे की टट्टी है । सच्ची ज़िन्दगी मन्दिर, मसजिद और गिरजाघरों में नहीं है, वह तो दुनिया के माहौल में बसती "तुम ठीक कहते हो, मुझे तुम्हारी दोस्ती का भी भरोसा है मगर मैं अपने मन से हार जाता हूं। आगे क्या करूंगा? कुछ कह नहीं सकता।" दोनों तर्क-वितर्क करते हुए बैरक में पाए । पादरी साहब उससे इतना प्रभावित थे कि सीधे बैरक में उसी के पास पाए और बड़े स्नेह से उसे सम्बोधित करते हुए कहा, "तुम्हारी प्रतिभा और विद्वत्ता से मैं प्रसन्न हूं, तुम्हारे बारे में बड़ी देर तक सोचता रहा । मैं तुम्हें एक अच्छे नवयुवक के रूप में देखने को लालायित हूं। वैसे तुम्हारी सज़ा कब पूरी हो रही है ?" "यापका आशीर्वाद है।" रामानन्द कहने लगा, 'मैं स्वयं भी आपके स्वभाव-व्यवहार से बहुत प्रभावित हूं। एक सप्ताह बाद मेरी सज़ा समाप्त हो जाएगी।" "उसके बाद तुम मेरे पास आयो, मैं तुम्हारे जीवन को नई राह और नई रोशनी से भर दूंगा। अनेक भटके हुए नवयुवकों को मैंने राह दिखाई है। फिर तुम तो बहुत होनहार हो।" थोड़े ही सम्पर्क में वह पादरी साहब से घुल-मिल गया और उनके प्रति अपार श्रद्धा. यादर और विश्वास से भर गया। उनकी विद्वत्ता, पवित्रता और ज्ञान की उस पर गहरी धाक जम गई और उसने दृढ़ निश्चय किया कि जेल से मुक्ति पाने के बाद वह अात्म- शुद्धि केलिए उन्हीं की शरण में जाएगा। तभी उसका भ्रष्ट-क्षुब्ध जीवन संयमित और गुस्थिर हो सकेगा। "मापने धर्मगौरमानवता तथा आध्यात्मिक विचारों के प्रति पुनः मुझः तीन गहर:सीन पहर में विश्वास पंदा पिया है अन्यया मेरी मागे पाग्याएं मिट ली थी।" रामानन्द ने गदगद म्बर में कहा, "सोग बिना भनुभय, पम्पपन के धर्मगुरु मोर उपदेशक बन जाया करते हैं परनु इन विषयों मा म प म भी नहीं जानने । मैंने धर्मोकि मौतयो गान प्रौरपडित जी मे उनी विसा मी थाह के लिए कुछ प्रश्न पूर्ण थे मगर ये एक भी उतर न दे सके । ग्नानि पौर सजा मे उन्हें यतराना पहा।" "पपा प्रश्न पूछा पा तुमने?" पादरी गाय ने उरगुरता दिगाई। "मेरा एक मौविर प्रश्न या-इम्बाम, वाइबिन पोर गीता में नहीं समन्वय है और उनमें गर्मान्यन मार गया है?" "इममा उत्तर नहीं दे ग वे सोग!" पादरी गाहब यहागामार पर बोले, "मो में बताता हू । दंगो,इस्लाम, बा:पिन और गौना में जगह-जगह परगन्मयय है, यं गभी बर मोगता. महता को स्वीकार पग्ले हैं । इनमें मनुष्य के लिए समान भावनामा के. उपदेश है. पर उन उपदेशों का प्रत्यक्ष पदूगरा है पौर परोस में गय ममान है। हर एक पो मनिम मद्विस मनुष्योचिस जीयन प्यतीन करने परप्राप्ति और मोक्षप्राप्ति है । "नौनी पंगम्बरोपौर प्रवनागे ने गनुप्यरो एक ही थंगी की निक्षाए दी है। पेवस गिधाए देने पाप उनके जीयन-पनुभव के प्रापार पर यदल गया।" "मा बित्नुम टोक रही हैं. फादर' अक्षा विभोर होकर रामानः ने ग्यापार पिया। "मैं पागे पसार म विषय पर तुम्हे गम्भीरतापूर्वी विनार में समागा।" पादरी माहब ने महा। 'पारसे निवाग म्यानमारमा पना है'"रामानन ने पूदा । #ग्याची कामे सपना निवासी है। घर मगरारी पार पर तीन महीने पे लिए भागरा प्राया था. बम मोट बाऊंगा । मुम मंग पता नोट पर गोरिमोर होने पर गौर वेपदा मेरे नाग पने मामा तीन शहर : तीन पहर उनका शिप्य वनकर "कहां चक्कर में फंस रहे हो ?" माधव बीच में ही डपट पड़ा, "चलो मेरे साथ, खानो-पियो । जिन्दगी का मज़ा लूटो । धर्म वगैरह के चक्कर में फंस कर कुछ न पायोगे । यह सब धोखे की टट्टी है। सच्ची ज़िन्दगी मन्दिर, मसजिद और गिरजाघरों में नहीं है, वह तो दुनिया के माहौल में वसती "तुम ठीक कहते हो, मुझे तुम्हारी दोस्ती का भी भरोसा है मगर मैं अपने मन से हार जाता हूं। आगे क्या करूंगा? कुछ कह नहीं सकता।" दोनों तर्क-वितर्क करते हुए वैरक में पाए । पादरी साहब उससे इतना प्रभावित थे कि सीधे बैरक में उसी के पास आए और बड़े स्नेह से उसे सम्बोधित करते हुए कहा, "तुम्हारी प्रतिभा और विद्वत्ता से मैं प्रसन्न हूं, तुम्हारे बारे में बड़ी देर तक सोचता रहा। मैं तुम्हें एक अच्छे नवयुवक के रूप में देखने को लालायित हूं। वैसे तुम्हारी सजा कब पूरी हो रही है ?" 'अापका आशीर्वाद है।" रामानन्द कहने लगा, 'मैं स्वयं भी आपके स्वभाव-व्यवहार से बहुत प्रभावित हूं। एक सप्ताह बाद मेरी सज़ा समाप्त हो जाएगी।" "उसके बाद तुम मेरे पास आयो, मैं तुम्हारे जीवन को नई राह और नई रोगनी से भर दूंगा। अनेक भटके हुए नवयुवकों को मैंने राह दिखाई है। फिर तुम तो बहुत होनहार हो।" थोड़े ही सम्पर्क में वह पादरी साहब से घुल-मिल गया और उनके प्रति अपार श्रद्धा. यादर और विश्वास से भर गया। उनकी विद्वत्ता, पवित्रता और ज्ञान की उस पर गहरी धाक जम गई और उसने दृढ़ निश्चय किया कि जेल से मुक्ति पाने के बाद वह यात्म- शुद्धि के लिए उन्हीं की शरण में जाएगा । तभी उसका भ्रष्ट-क्षुब्ध जीवन संयमित और गुस्थिर हो सकेगा। "अापने धर्मोरमानवता तथा प्राध्यात्मिक विचारों के प्रति पुनः मुझ.
तीन महर:सीन पहर ct में विश्वास पंदा पिया है प्रन्यया मेरी मागे पारया मिट लीपीं।" रामानन्द ने गद्गद म्यर मे पहा, "सोग विना पनुभय, पप्पन के घमंगुर पौर उपदेगर बन जाया करते है परनु इन विषयों मा क ग ग भी नहीं जानने । मैंने धर्मोपदेगा मोमवी माहम पार पणित जी गे उनसरी विभत्ता सीधाह के लिए कुछ प्रश्न पूछ पे मगर ये हम भी उनर न दे गरे । 'नानि पोर सजा में उन्हें पतराना पड़ा।" "क्या प्रश्न पूछा पा तुमने ?" पादगे गाय ने उत्गुरमादिगाई। 'मेरा एक मौलिए प्रन या-इलाम, वादविन और गीता में बहा गमन्यय है पोर उनी गमन्वित मार गया है ?" "इममा उत्सर नही देगर ये सोग!" पादरी गादय रहारामार पर योगे, "यो में बताता हू । देगी, रसाम, बाइबिल पार गीता में जगह-जगह परगन्मयप है, यं गभी वर मी मसा. माना को स्वीकार करते हैं। इनमें मनुष्य से लिए समान भावगामी फे. उपदेश है, पर उन उपदेगी मा प्रत्यक्ष पदमरा है और परोक्षा में गय ममान है। हर एक यी पनि महिम मनुष्योचित जीवन व्यतीत परस्परप्राप्ति और मोक्षप्राप्ति है। " तीनों पैगम्बरो पौरपवतारों ने मनुष्यसो एक ही श्रेणी मी शिक्षा दो है। पेपन शिक्षाए देने पाहा उनके जीवन-मनुभय के प्राधार पर पर गया।' " "मर बिल्ल टोपहते हैं फार ।" रक्षा विभोर होकर रामानन्द नपर रिया। "मैं पागे पसार म विषय पर तुम्हें, गम्भीरतापूया विस्तार में यतासगा।"पादरी माहब ने पहा । प्राकिनियाम म्यान बाबा पना है गमानन्द नेपया। में म्याची माग गगनझरा निवासी हर घर गरमागे पाट पर मीन महीने के लिए मागग पाया था पन मोट बाऊगा । तुम मंग पता मोट कर लो।रिमार होने पर गोप येण्टा मेरे दाम चले माना।हाना .
तीन शहर : तीन पहर तो मैं खुद ही यहां आकर तुम्हें अपने साथ ले चलूंगा।" रामानन्द ने एक पर्चेपर उनके लखनऊ निवास स्थान का पता लिखकर जेब में डाल लिया। वह पूर्णतः उनका भक्त हो चुका था और ईसाई बनने का दृढ़ निश्चय कर चुका था माधव ने पादरी के साथ उसकी बातें सुनी थी और रामानन्द को उसके प्रभाव में पाया देखकर कुढ़ा जाता था। जिस समय माधव को अपने सज़ा से मुक्त होने की खबर मिली, प्रसन्नता के बजाय वह दुःखी हो उठा। "अरे भाई, तुम्हे तो खुश होना चाहिए ।"रामानन्द ने स्नेह से कहा, "अाज तुम्हारी सजा पूरी हुई, तुम्हें नर्क से छुटाकरा मिला।' "कोई खुशी नहीं।" माधव वोला, "तुम्हें तो अभी एक सप्ताह और काटना है । क्या अच्छा होता हम साथ-साथ चलते।' "फिक्र न करो।" रामानन्द ने हंसते हुए कहा, "एक सप्ताह पलक झपकते बीत जाएगा।" "फिर तुम हमारे साथ चलोगे न ?" माधव के स्वर में अगाव प्रेम- पाहन था। "तुम्हें बता चुका हू, मैं पादरी साहब की शरण में जाने का फैसला कर चुका हूं। फिर तुम्हारा साथ कैसे दे सकूँगा?" "कोई बात नहीं।" युक्ति सोचकर माधव ने कहा, "तुम्हारे पादरी साहब लखनऊ में ही तो रहते हैं ? तुम मेरे साथ लखनऊ चलो । फिर वहां उनके पास तुम्हें पहुंचा दूंगा।" "हां, अगर अपने कहने के अनुसार वे मुझे यहां लेने न आए तो मैं अवश्य ही तुम्हारे साथ लखनऊ चलूंगा।" वाहर होटल में कमरा लेकर एक हफ्ते तक तुम्हारा इन्तजार करूंगा।" फिर उसी दिन माधव की रिहाई हो गई और वह रामानन्द को प्रतीक्षा में एक हफ्ते के लिए आगरा में ठहर गया। m ?
तीन महर : नौन पहर प्रदिराम गनि मे नागले हुए समय के माय जब एक सप्ताह व्यतीत हो तो गमानन्द को गासे रिन्दगी के पन्धसार मे उने साग की मोर जाने का पय खुल गया हो। उसने उस दिन पुराने मंत्रारों को मस्तिष्क में दूर फेर दिया पोर जेल अधिकारियों में विदाई लेकर जब वह 'मुक्तिपत्र' वे माय जेल के मयंकर लौह द्वार में दाहर निकला तो उसकी प्रतीक्षा में द्वार पर मई माधव ने दीदकर उसे बाहों में भर लिया । दोनों ने बहरहे लगाए। देवयोग मे पादरी माहब मुक्ति के समय प्रागरा न पहुंच सके। प्रतः माधव की प्रसन्नता का अन्न न था। "ह जल्द में उल्द सम्बनक पहुंचना चाहिए।"मायव ने मुन्धाव रसा, "पहां वो पुलिप हमारी जानी दुम्मन है।" "बिल्लुल, में भी नुरंत यह म्यान छोड़ना चाहता हूँ।" फिर दोनों हायों में हाय हाने ताज-मुमताज के दम ऐतिहासिक रंगस्थल में दूर होते रहे। प्रागरा कंष्ट पर पहुंचकर उन्होंने दीघ निःस्वाम ली। अब गाड़ी बहन प्रागे निरन चुत्री थी। और मापद उमा कन्या पपयपाकर कह रहा था- "प्रागग का जिक्र छोड़ो, नमन की बात करो, जहां जिन्दगी बढ़ी मृवमृग्न है, बहन हसीन, बल नाजनीन पार वहन । ।" "और बढ़त बदमूरत भी।"गमानन्द युदवाया पौर सिडको मे दाहर अन्धकार में मारने लगा । उस मन्यवार में प्रागरा व गया था।
३ नवाबों की नगरी । तवारीखी नफ़ासत, नजाकत का शहर और शामे- वघ। सिगरेट के छल्ले उछालता हुमा माधव गुनगुना उठा- "इन चौदह सालों के अन्दर इस तरह जवानी चढ़ती है- जैसे कि चन्दरमा दूइज का. बढ़ता जाए, चढ़ता जाए ।' "तो मैं लखनऊ आ गया ?" रामानन्द अचरज से चारों ओर घूरता हुमा फुसफुसा उठा, "बहुत तारीफ सुन चुका हूं यहाँ की .." "जनाव, इसमें भी आपको शक है ? काविले-तारीफ है लखनऊ। हुस्नोजवानी में देखो, तो; नज़ाकत-नफासतमें देखो, तो । तवारीखो कहा- नियों, रोमांटिक पहलुओं में, हर तरफ से लखनऊ नौशा है नौशा।" माधव ने मधुरता से मुस्कराते हुए उसका कन्धा थपथपाया। उनका रिक्शा हज़रतगंज की ओर दौड़ रहा था ।गनेशगंज, अमीनाबाद और कैसर बाग को पार करते हुए वे लालबाग तक पहुंच रहे थे ! माधव प्रात्मानन्द में नहाया जा रहा था। एक मुद्दत वाद उसे अपने दिलोजान से प्यारे शहर का मुंह देखने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा था। लखनऊ की जमीन पर उसका वचपन बीता था, यहीं उसने जीवन की अंगड़ाई ली।मुहब्बत और रंगीनियों के स्वाव देखे और अब फिर इसी हुस्न और रोमांस की नगरी में या गया। रामानन्द के लिए यह जगह बिल्कुल अपरिचित थी। फिर भी उसे ।
तीन महर : तीन पहर नुभावनी लग रही थी। वह विस्मय-विमुग्य दृष्टि मे लगनऊ की गैलर और दिलकरंद रंगीनी को निहार रहा था। चौड़ी-चौड़ी सड़क, रंग-बिरंगी रोगनी, तरह-तरह की देप-भूपाएं, मोड़-माद, चहल-पहल, स्वरलहरियां और थिरकन-मचलन । अपनीसमूची जिन्दगी में उसने वलदोगहरदमे थे। वाराणगी, यहां उसका वचपन और जवानी का कुछ गमय व्यतीत हुअा था और प्रागरा, जहां उसकी विकृति और विवशता रमै अचानक ही दींच लाई थी और प्रान वह प्रथम बार मारे भारत में प्रमिद उम लम्बनकनगर वो देय रहा था जो वास्तव में टम एक अद्भुत रोमाटिक लोक' मालूम हो रहा या। वह म्यालों में डूब-इतरा रहा था। महमा माधव ने टमी वहि मकझोर कर कहा, "यहा हर गए नाई ? दंगो तो गही, हजरतगंज प्रा गया।" वह जेने चौक पहा हो। पांडे मीन कर हजरतगंज की हनीनी पर निगाह डाली, उग लगा वह उसे भारतीय माहौल में एकाएक अमरी माहौल में पहुंच गया हो। क्या वहन पे हजरतगंज के । एक प्रडीबोगरीव समां या वहां, अनुत जीवन-मंगार । एक ऐमी निराली बलादमी और दामन जो गमानन्द में सरल और अन्यदर्गी नवयुवक के लिए सर्वया बातृहल का मामान या। जिन्होंने देना और परला है उनके लिए नले ही यह मब पुगना हो माना है परन्तु गमानन्द के लिए एक्दम नया और प्राचजना था। चौड़ी-चौही, साफ-सुथरी मोमष्टी मड़क के दोनों पोर भव्य और कलात्मक अट्टानिया और नववध-मी मस्जित-मुग्लिन दूसरा । मद वैशकीमती,ममी विभिन्न प्रमायनों में अनंत । रामानन्द कोतूहल में देख रहा था विदूकानें खरीदारी करने वालो मे बहा रही थी और मरीदारी करने वाला बहन कम मस्या में पुरुष वर्ग, दहनायत गत्या में स्त्री वर्गया।
१८ तीन शहर : तीन पहर " "ऐसा लगता है जैसे लखनऊ तुम्हारे लिए कोई अद्भुत अजायबघर बनकर रह गया हो ?" मात्र ने चुटकी ली, "मैंने कहा था न अभी तुमने यहां देवा ही क्या है ? मगर अब मैं तुम्हें दिखाऊंगा, यकीन मानो, तुम प्रांखें फाड़े देखते ही रह जायोगे और तुम्हारे अचरज- यौनूहल का अन्त न होगा।" "तुम मुझे किस मीना बाजार में ग्वींच लाए माधव ?" रामानन्द मूखी मुकराहट के साथ फुसफुसाया, "मेरी विरक्ति और कंठा की दीवारें बरा- शायी होती जा रही है। मैं अपने को अत्यन्त रोमांत्रक अवस्था में डूबता- उतराता महसूस कर रहा हूं। लगता है जिन्दगी फिर एका अनोखी करवट लेगी?" "छोड़ो इन फिलासफी की बातों को, वो देखो अपना पैराडाइज़ या गया।" माधब ने उसका कन्या ठोंककर प्रफुल्लित स्वर में कहा। "पैराडाइज़ ?" रागानन्द की अांखें सामने की भव्य अट्टानिका को घरती रह गई। "रोक भाई जान, यहीं उतरना है।" सीट से उचककर माधव ने रिक्शे चाले की पीठ में घोल जमाई। रिकमा पराठाइज की भव्य अट्टालिका के सामने ठहर गया । माधव ने बड़ी गान के साथ एक मिगरेट जलाया और रामानन्द को टिहुनी मारकर उत्तरने को कहा। रामानन्द अपलक यांग्वे फाड़े देख रहा था। बीच हजरतगंज में विख्यात पैराडाइज का भव्य भवन मुस्करा रहा था। ऐसी गानदार पोर हमीन इमारत उसने दूसरी न देखी थी। हां, ताज- महल भले ही देखा था । परन्तु वह ऐतिहासिक महत्त्व की इमारत थी, मिल्पकाला या एक अलग नमूना। मगर पराडाइज अनेक कलापों का मम्मिलन था। वास्तव में - दाज (स्वर्ग) की सम्भावनाओं से परिपूर्ण था। सारी इमारत चाकलेटी रंग में दमक रही थी। फर्श दूधिया चादर
तीन महर : तीन पहर
सा लगता था। दरवाजों और खिरियो मे मोटे कोयती गोरी लगे
और उन पर रग-बिरंगे पदे भूल रहे थे। अनेक छोटी-बड़ी और कीमती
मोटरगाड़ियां पोटिको मे खही थीं।
उजले कपड़ों में इधर से उधर दौड़ते-भागते बैयरे पोर वेटर लखनऊ
नहीं, पेरिस के होटलों को याद दिला रहे थे।
"उतरो भाई, गवारों की तरह देख क्या रहे हो ?" माधव ने उसका
हाथ पकडकर नीचते हुए कहा ।
"कुछ नही. अपनी वेप-भूपा को देखते हुए भय-सा लगता है।"
रामानन्द दबी-दबी आवाज़ में बोला।
"धत्त तेरे की।" मायव हथेली पीटकर हसा ।
जैसे ही रामानन्द नीचे उतरा, एक झरियोंभरी हथेली उसके सामने
फैल गई, "अल्लाह तेरा शुक्र करे। कुछ दे दे वेटा ।"
रामानन्द ने चौककर उधर देखा। गदले, काले धुरके के भीतर से
दो कांतिहीन पाखें झाक रही थी।
उसने विवशता से जे टटोती, और गर्म नि.श्वास छोड़कर रह
गय।
मागे बढो भी।" माधव ने उसे झटकारा ।
"खुदा के लिए सिर्फ दस नए पैसे • I" फिर वही मिन्नतें।
• "तुम दो नये पैसे के काबिल भी नहीं।" माधव ने एक बेहूदा फती
कसी और रामानन्द को पैराडाइज की ओर खीच ले गया।
बुक वाली निरीह दशा में आगे की ओर सरक गई।
"भीख नही देनी थी, न देते, मगर तुमने उसे गदा जवाब क्यो
दिया?" रामानन्द ने पूछा।
"तुम नही समझते यार ।" लापरवाही के साथ माधव कह पडा,
'जानते हो वह कौन थी ?"
"मुझे क्या पता, तुम जानो ?"
.
तीन शहर : तीन पहर "क्या मतलब ?" रामानन्द ने उलझकर पूछा। "हां, सच कह रहा हूं।" माधव अपने कथन की पुष्टि करने लगा, "आज से दस-बारह बरस पहले सारे चौक बाजार में उसकी हुस्नोजवानी का दूसरा जोड़ न था। गजब की दिलफरेव . . ." बात अध्री ही छोड़कर माधव ने ऐसी चटकार भरी मानो उस बुर्के वाली की पुरानी शक्ल उसकी प्रांखों के सामने आ खड़ी हुई हो। "तो फिर ये दिन कैसे पा गए ?" रामानन्द ने अचरज से पूछा। "अमा यार, तुम्हें तो मैं बहुत बुद्धिमान समझता था मगर तुम बिल्कुल कूड़मगज निकले ।" माधव हल्के कहकहे के साथ बोला, "भला ये भी कोई पूछने की बात है ? बड़े-बड़े अमीर-उमराव और राजा-महाराजा फकीर हो जाते हैं, फिर वह तो तवायफ ठहरी।' "तुम्हारा मतलब वेश्या?" हां वेश्या। माने रण्डी और दो-चार नाम गिनाऊं?" माधव की आवाज़ में खीझ पा गई, "जिस्म की सौदागरी मौसमी फूल की तरह होती है । जब तक बहार होती है हजारों भंवरे उसके आगे-पीछे गुनगुनाते- मंडराते रहते हैं लेकिन जैसे ही वहार गई, फूल मुरभाया; फिर कोई खूसट भंवरा भी उसकी ओर रुख नहीं करता। समझे कुछ। यही हाल उस कयामत जान का भी हुप्रा । एक ज़माना या दोस्त मेरे, जब एक हजार साए कयामत जान की मुहदिखाई के लिए दहेज बढ़ाना पड़ता था और पान वही कयामत जान सड़कों पर भीख मांगती फिर रही हैं और लोग-बाग उनके मुह पर थूकने को भी तैयार नहीं । सब मुकद्दर का खेल है । जवानी और पैसे के पंख बड़े तेज़ होते हैं। इधर पनपे; उधर उघड़ गए। रामानन्द का हृदय भर-भर पाया । और अधिक नहीं सुनना चाहता था वह । एक निःश्वास के साय सिमटा-सिमटा-सा वह माधव के साथ पैराडाइज के मुख्य द्वार में प्रविष्ट हुप्रा । पैराडाइज माधव का पुराना होटल है। जब से यह प्रारम्भ हुग्रा तीन शहर : तीन पहर तभी से माधव ने यहां वेदरे को नौकरी प्रारम्भ को और मालिक तथा प्रागन्तुको को अपने व्यवहार सेवा से प्रसन्न कर लिया। कहने को वह चेयरा कोटि मे ही माता है परन्तु मालिक को जो मुहलगी, विश्वास और स्नेह उसे प्राप्त है किसी और को नहीं। वह तो लड़को भगाने के जुर्म में अचानक ही पकड़ा गया। बम्बई के एक सेठ ने पैराडाइज को एक तितली' का सौदा पांच हजार रुपयो में किया था और उस तितली को उनकी वम्वइया फोटो तक पहुचाने का काम माधव के जिम्मे था । वह उम तितली को लेकर स्टेशन की पोर उड़ा मगर रास्ते में ही पुलिस जत्थे ने उसे गिरफ्तार कर लिया क्योंकि वह तितली एका न्यायाधीग की लाड़ली थी। माधव के भीतर पहुंचते ही पैराडाइज मे एक तूफान-सा भा गया। मालिक और सहामियों को सूचना देने से पूर्व ही वह अप्रत्यागित रूप से भा पहुंचा था। बेयरो, वेटरो का दल जिसमे महिलाएं भी शामिल थी उसके स्वागत के लिए दौड़ पड़ा। " माघद आ गया - 'पा गया माधव ।" सब हपंनाद करते हुए दौड़े मानो कोई बहुत महत्त्वपूर्ण व्यक्ति पा गया हो। रामानन्द ने पैराडाइज को भीतरी खूबसूरती देवो । उसको पाखे चौंधियाकर रह गई। लम्बा-चौड़ा हाल, छोटे-छोटे वेविन, चमाचम शीशे के वर्तन, काउण्टर पर शोगे की अलमारी मे चमकती विभिन्न प्रकार की चटनियां, अग्रेजी शराब की बोतलें, विविध फलों और साध पदार्थों के जार । कुछ कमसिन लडकियां उजले स्कर्ट में इधर-उधर दौड-भाग रही थी, और दूर से मानसरोवर में फुदकती बतखों-सी मालूम पडती थीं। रामानन्द इम दृश्यावलो पर न चाहते हुए भी लुटकर रह गया। उसका मन और मस्निप्फ चारों ओर से पैराडाइज की रगीनी में उलकर रह गया।
तोन शहर : तीन पहर U अपने-अापसे फुसफुसाया वह, 'माधव ठीक कहता था, जिंदगी यहां है, जिंदगी की खूबसूरती और असलियत यहां है । मगर वह बु- वाली. . .?' सहसा वह सिहर उठा। "हलो माधव, हल्लो माई डियर' 'कहिए मियां माधव ..? वल्लाह, याप आ गये।" तमाम स्वागत स्वर माधव के गिर्द गंज उठे। "या गया भाई, ना गया।" माधव हाथ हिलाकर मुस्कराया और पनिचितों, शुभचिन्तकों की बधाइयों-शुभकामनाओं पर आभार प्रगट करने लगा। गोल मटोल, विद्रूपी शक्ल, मगर वेष-भूपा से निहायत सभ्य-शिक्षित और व्यवहार-कुशल दिखने वाले पैराडाइज़ के मैनेजर ने अपनी मक्खी मार्ग मूंछों को मींचकर मुस्कराते हुए कहा, “तुम जब स्टेशन पर आया था हमने को 'रिंग' करता। हम तुमको लेने वास्ते गाड़ी भेजता।" "कोई बात नहीं मैनेजर साहब, बैंक यू ।" माधव उन्हें सिर मुकाकर खिमिया उठा। फिर रामानन्द को प्रागे खींच कर बोला, "सर, ये हमारा फ्रेन्ड रामानन्द है। इसको हम जेल में साथी बनाया है। बड़ा काम का श्रादमी है हमारे साथ ये भी काम करेगा।" और फिर अांखें मारकर वह रहस्यात्मक ढंग से मुस्कराया। मैनेजर जिसका नाम फन्टू साहब था, उत्तर में इस तरह मुस्कराया मानो कोई कठिन पहेली वूझ गया हो । रामानन्द ने शिष्टाचारवश उसे प्रणाम किया । यद्यपि वह होटल में नौकरी करने के प्राशय से माधव के साथ नहीं पाया था परन्तु यह कुछ बोला नहीं, चुपचाप कौतूहल से सब कुछ देखता रहा और मन ही मन सोचता, रहा माधव इस होटल का बेयरा है मगर छोटे से लेकर बड़े तक इस प्रकार उसका स्वागत-सत्कार कर रहे हैं मानो वह मालिक का दामाद हो। "प्रानो खा-पी लें, फिर तुम्हें मालिक से मिलाऊँगा । कल से हमारा ड्यूटी शुरू हो जाएगा ।" माधव ने कहा और उसे खींचते हुए एक - तीन शहर : तीन पहर केबिन की ओर ले वढ़ा। रामानन्द यंत्रवत् उसके साथ चला पाया। दोनों एक पेबिन में मा बैठे। केविन प्रमाघारण यो । दीवारों में नीली ट्यूब लाइट चमक रही थी। दो गद्देदार कोचों के सामने ऐसी चमकदार मेज रखी थी जिममें चेहरे झलकते थे। माधव ने दीवार मे लगो काल-वेल बनाई मोर कोई वेयग उरायी और मपटा। सहसा केविन मे बैठते हुए रामानन्द चौंक पड़ा। वगल की केविन से करुणा सिमको पा रही थी। कोई मुकुमार नारी कण्ठ था, "भगवान के लिए तंग न कीजिए' - ‘छोड दीजिए !" रामानन्द ने कान उमी पोर लगा दिए । वह जो बुध गुन-समझ रहा था वह पराडाइज (स्वर्ग) जैसे नाम पर कलंक का टीका था । माघव सुनकर भी मनमुना बना हुमा था मानो ये घटनाएं उसके लिए कोई महत्त्व न रसती हों। "हलो माधय, क्या साना-पीना है ?" एक लेडी वेटर ने केबिन में माकर भद्दा-मा मजाक किया, "तुम हमको कोई लेटर भी नहीं दिया । तुम बड़ा रूट (रूपा) प्रादमी है मायो ! हम तुम्हारे लिए बहोत तडपते थे।" रामानन्द उमकी ऐसी बातें सुनकर प्रचक रह गया । वैसे उसने बड़ी- बड़ी प्रेम कहानियां सुनी थी मगर ऐमा खुला हुमागेमास कभी न देखा- सुना था। वह उड़ती-उडती प्रांखों मे उस महिला की पोर देख रहा था, जो उमर मे धालीम के लगभग रही होगी मगर जिसने माने को वेष-भूषा, नज़ाकत और सिंगार मे शोडपी बना रहा था। रंग उसका यहुत कुछ शाम के प्राकाश की तरह गदला-काला था मगर शरीर इतना मांसल पोर प्रानुपातिक पा कि उसका मलीनापन उसको पूवमूरती में शामिल हो रहा था।
तीन शहर : तीन पहर उसकी अांखें इतनी भारी-भाग-सी उनींदी थीं मानो वह कई रात जागी हो या उसने दो-नार-पेग व्हिस्की पी रखी हो । "माफ करना मेरी प्रासा, मैं किसी को भी लेटर नहीं भेज सका।" माधव ने हाय बढ़ाकर उसकी कलाई पकड़ ली और भींचते हुए बोला, "तुम्हारे इश्का की शराव हमेशा मस्ती के अालम में डुबाए रहती थी गेमा । तेरी जान फसमः . .।" फिर थोड़ा प्रांखें मींचकर, रोमा की गदोली में निकोटी भरते हुए कह पड़ा, "इससे मिलो, यह तुम्हारे लिए नया 'व्याय झण्ड' लाया हूं. · ।" रामानन्द लज्जा से खीझकर रह गया। मगर रोमा वेहयापन के साथ उसे प्रापित करने के प्रयान में बोली, "प्रापसे मिलकर बड़ी खुशी हुई। मगर बड़े गर्भाने हैं माप ।" "शर्म तोड़ने के लिए तुम्हारी एक ही अदा · ·!" "मोह माई गॉड।" जीभ को दांतों से काटती हुई बीच में ही टुपक पड़ी, "मुझे जाने दो बाबा, मेरा ड्यूटी पावर चल रहा है !" और वह हाथ छुड़ाकर भागो। "दो थाल वेजीटेरियन ।" माधो कहकहे के वीच बोला। गगानन्द की ग्लानि और अचरज का अन्त न था परन्तु माधव सिगरेट के लच्छे फंकते हुए अपनी शान बघारे जा रहा था, "ये रोमा थी, जिस साल में इस होटल में प्राया उसी साल यह भी पाई तब यह वीस बरस की थी। गजर का नमक था इसके चेहरे पर । जाने कितनों को घायल सिया, कितनों को तीरे-नज़र का शिकार बनाया। इसी की वजह से उन दिनों पैराडाइज ने खूब 'नोट' बनाए । मेरा तो इससे उसी जमाने में 'लव' हो गया और · ·?" मावय अपने-ग्राप बड़बड़ाये जा रहा था। रामानन्द का दिलो-दिमाग तो पूरी तरह से बगल वाली केविन की ओर लगा हुआ था जिसमें अव भी फुसफुसाहट और दधी-घटी सिसकन के स्वर पा रहे थे। एक बूढ़ी-सी मरी-गरी आवाज उसके कानों से टकरा रही थी, "लिली, तीन महर तीन पहर हम तुमको बहुत जल्दी प्रोमोगन देंगे! हम तुमको 'गजटेड प्राफिसर' बना देंगे । तुम हमारा पावर जानती हो, लेकिन यग एक यार "भगवान के लिए मेरी मजबूरियों पर तरग साइए कमिश्नर माहय !"पद अब लिली गिड़गिड़ा रही थी-"प्राप जानते हैं मैं इतनी एडवान्स फेमिली को लड़की नहीं हूं। मजबूरी में नौकरी पर रही है । मां अन्धी है, पिता को लकवा मार गया है। छोटे-छोटे भाई-बहन सब मेरी कमाई पर जिन्दा है। मैं समाज को भत्संना सहार भी नौकरी कर रही हूँ। अगर वही यह वात "कसी छोटी-छोटी बाते करती हो!" घासना के नशे में या हमा बूदा कमिश्नर पिसियाए रो स्वर में रह रहा था, "मपनी तरक्को के लिए लोग जान तक दे बैटते हैं : मैंने तो तुम्हारे सामने बहुत मामूली-गा प्रपोजल रहा है । अगर तुमने मेरी बात मान ली तो मैं तुम्हे पहा से कहां पहुंचा दूगा।" "मामूली-सा प्रपोजल ?" लिली बुदबुदाई, "यह मेरी रजत वा प्रपोजल है कमिश्नर साहब ! पाप मेरे पिता वे तुल्य हैं, कुछ तो सोचिए।" "मेरा मूड 'माफ' न करो लिली।" सहसा कमिश्नर के स्वर में तनाव पौर कटोरता मा गई, "तुम जानती हो कि तुम्हे हासिल करने के लिए मैं बड़े सतरनाक कदम उठा सकता हू । मेरा एक ही प्रार्डर तुम्हारे लिए दफ्तर का दरवाजा बन्द कर देगा। पौर तव.. "मेरा परिवार तबाह हो जाएगा कमिश्नर साहब !" लिली की दयनीयता माफ बता रही थी कि वह पमिदनर के पैर पकड़कर प्रार्थना कर "मैं उसे उसको नालायकी का सबक दृगा।" महसा उत्तेजित रामानन्द ने मेज पर मुक्का जमाया और कमिश्नर की केबिन मे जाने को उठ सडा हुमा। उसरे उप रूप से माधव चकरा उठा।दूसरे ही क्षण स्थिति उसकी भी समझ में मा १०२ तोन शहर : तीन पहर - - रामानन्द का हाथ पकड़कर जबरन उसे सीट पर विठाने की कोशिश करते हुए वह फुसफुसाया, 'क्या गजब कर रहे हो रामानन्द ? ये पैराडाइज है, यहां तुम्हारी इंसानियत का खून हो जाएगा। यह दौलत मन्दों का 'मदरसा' और 'बाजार' है । इस तरह की सैकड़ों सौदेवाजी रोज होती है। पाहां तक तुम हरएका से निपटते-झगड़ते फिरोगे ? अपना काम देखो, कभी भुल से भी यह गलती न कर बैठना, नहीं तो खुद अपनी ही शामत या जायेगी।" अपनी स्थिति का ज्ञान कर कोध से उबलता हुप्रा रामानन्द यथा- ग्धान बैठ गया। थोड़ी देर बाद उसने बूढ़े कमिश्नर पौर अल्पवयस्क लिली को 'ब्लैक रूम' की ओर जाते देखा। शायद लिली पेटकी खातिर इरजत वेचने को राजी हो गई थी। । शाम के साये में लखनऊ नगर की प्रामा देखते ही बनती है। वैसे जहां पैसा है, वहीं की शामें रंगीन होंगी। मगर लखनऊ की शामें हर हालत में रंगीन और खुशनुमा नजर आती हैं। यहां मुफलिसी भी गजब के करिश्मे दिखाती है । यहां फनीकी में भी जशन मनाना एक कला है । चन्द वाशिंदों को छोड़कर बाकी सब मुद्दतों से चली प्राई नजारत-नफासत और शाहमिजाजी की परम्परा को निमारो चले पा रहे हैं। गाम के वक्त हजरतगंज की रगोनी देखिए जरा। हर तरह की तस्वीरें नजर प्रायेंगी, उजली-मैली। वेहद हसीन, इंतिहाई बदसूरत हजरतगंज दिल्ली के चांदनी चौक से किसी कदर कम नहीं। फैगन- परस्तो को ये वेगोड़ नमूने दिल्ली में भी शायद ही देखने को मिलें। रागानन्द पैराडाइज गोवाहर बारादरी में खड़ा हुग्रा हजरतगंज का माहौल देख रहा था, ठीक उसी तरह जैसे कोई नन्हा बच्चा कौतूहल और अचरज से नुमायग देखा करता है। ! - तीन महर : तीन पहर १०३ महसा उसको दृष्टि सामने से प्राते हुए एक विचित्र व्यक्ति पर पड़ी। पारतव में यह व्यक्ति विवित्र था। उसने रेशमी पचपन और चूड़ीदार पाजामा पहन रखा था । उसके मिर पर नवायी (लरानऊपा दुपलिया) टोपी यो-येलदार बढ़ी हुई और परी में गरी का काम बनी हुई कामदार जूतियां थी। और सबसे बड़ी बात यह थी कि उसके पीछे-पीछे एक व्यक्ति चन रहा था जिसके हायो में एक मिसान घाता था। दाता उसने अपने भागे चलते हुए इस अद्भुत व्यक्ति पर लगा रखा था। उनके पीछे बहुत सारे बच्चे शोर मचाते हुए चले भा रहे थे मानो नोग कोई तमाशा या मनोरंजन के सामान हों ! रामानन्द को कौतूहल हुमा ! धीरे-धीरे वह भी सड़क पर पा गया। मह तमाशा उसे भी रोचक लग रहा था। लोगो को पर्चा से पता चला कि ये महाराय 'नवाब कनकौदा' हैं । ये कही से पतंग (कनकोवा) की बाजी जीतकर लौट रहे थे। नवाय कनकौवा की लचकनी हुई कमर इस समय सीधी होती मालूम होती थी। उनकी चाल और चेहरे में ऐसा माव था मानो कोई जबरदस्त मोर्चाजीतकर पा रहे हों। वाकई कनकौवे की बाजी जीतना उनके लिये सहाईसा मंदान जीतने के हो बराबर था। नवाब बनोवा वाजिद मलीगाह के सानदान में सम्यनिधन थे । सम्भवतः पीढ़ी दर पीढी से चले पाप नाही सानदान को रोशन करने बारे एक नवाब कनकौवा ही बचे थे । वैसे शाही सानदान के बुनवे के पुनवे भरे पड़े हैं। मगर नयाव साहय एक मरने को छोडकर वापी को दोगला नवाय ही कहते हैं। कुछ भी हो, नयाव क्नकोवा को सारी जिन्दगी बनकौवायाजी में गुजरी । सात वरम पी उन से उन्होंने वनकौवा पोर लटाई-डोर उठाई १०४ तीन शहर : तीन पहर और आज लगभग साठ वर्ष की उम्र तक कनकौवा के पीछे तबाह और दीवाने हैं। शायद कनकौवे के इसी इश्क के कारण वे नवाब कनकौवा के नाम से प्ररूपात हो गए और सारे लखनऊ शहर में उनकी जोड़ का दूसरा कन- कीवावाज़ नहीं। खुदा जाने कहां तक सच है ? लोग कहते हैं कि कनकौवावाजी में नवाव ने अपनी सारी पुश्तैनी दौलत तबाह कर दी, मगर यह नशा जैसे का तैसा बना है। बाहर वे नवाब कनकौवा बने फिरते हैं मगर घर में फांके की नौबत बनी रहती है। उन्होंने अपनी नवाबी कैसे कायम रख छोड़ी है, यह तो नवाब ही जानें, मगर अक्सर वेगम से उनकी लफ्फाजी को लेकर तू-तू मैं-मैं हुआ करती है । वह खीझकर कहती हैं. 'कन्न में पांव डाले बैठे हो, मगर कनकौवाबाजी तुमसे नहीं छूटती । सुदा के लिए अपने बाल- बच्चों का तो कुछ ख्याल करो। मरोगे तो कफन देने वाला भी कोई न होगा।' 'क्या बकती हो वेगम !' नवाव चिड़चिड़ाते हैं, 'नवाव कनकौवा को कफन-दफन देने वालों का तांता न टूटेगा। मामूली हस्ती समझती हो ? मेरी दिलचस्पी में हाथ मत डालो। तुम्हारे बाल-बच्चों के लिए तो वजीफा ही काफी है।' शाही खानदान से ताल्लुक रखने की वजह से नवाव कनकौवा को वजीफा मिलता है। भले ही बंटते-बंटते वह रकम उनके हिस्से में पन्द्रह रुपए तेरह पसे ही पड़ते हैं। मगर जिस दिन वे वजीफा लेने जाते हैं उनकी शानो-शौकत देखते ही बनती है। उस पन्द्रह रुपए तेरह पैसे के लिए बीस रुपये तक तो तैयारी में ही खर्च हो जाते हैं । गजब के हैं नवाद कनकीवा और अजीबो-गरीब है उनकी नवाबी को कहानी। नवाब कनकौवा को पैराडाइज होटल में घुसते देखकर रामानन्द झप- टते हुए भीतर पा गया। ?
तीन शहर : तीन पहर धरण-भर को उसने सोचा, अगर नवाब मुफलिम होते तो इतने कीमती और शानदार होटल में पाने की हिम्मत उन्हें कम होती ? नवाव का भीतर घुमना था कि चार-पांच वेटर उनको मोर दौड़ पड़े। वे अक्सर जेब गरम होने पर पराडाइज में ही नोश फरमाते थे। "अरे भाई, नवाब कनकौवा पाए, नवाव कनोवा ..." मारो तरफ चहल पहल और हास्य-व्यंग्य गूंजने लगा। "प्रादाय अगं है नवाव साव।" मावच बड़ी ऐक्टिग के साथ उनके सामने झुका। "हल्लो माधय, तुम मा गए ?" नवाव साहब पोपले मुंह को भीच- कर खिलखिलाए। "गरीवपरवर की इनायत जो है।" माधव उनकी तारीफ के पुल बांधने लगा, वल्लाह ! अखबार में खबर पढ़ी थी, आपने तो कमाल कर दिया। शाहजहांपुर के कनकौवाबाज को जो पानी पिलाया ...|प्रव मापके सामने प्रापकी क्या तारीफ करूं। पाप बेमिमाल हैं। कहा लखनऊ और कहां साहजहांपुर ! वाह नवाव साय ।" नवाब साहब गदगद हो उठे। वे एक वेबिन में जमकर बैठ गए। होटल के कर्मचारी पोडी देर तक उनकी नवाबी का मजा लेकर अपने- अपने काम मे लग गए तो माघर के साथ दोस्ताना ढग पर उनकी गुफ्तगू होने लगी। समीप ही रामानन्द भी सहा हुमा उनके यदलने रूपी का मानन्द ले रहा था। "प्रापकी तारीफ ?" कुचड़ी कुचडी प्रांखो से रामानन्द को घूरते हुए नवाब ने पूछा। "ये वाकई काबिले-तारीफ हैं नवाब साय।" माधव रामानन्द के वन्धे पर हाथ रखकर बोला, "प्ररने वडे जिगरी दोस्त जनाय रामानन्द हैं, प्रारकी जूतियों पर परवरिम पा रहे हैं । "वल्लाह ! यो ममिन्दा करते हो माधव ?" नवाब साहब मुस्कराते हुए रामानन्द पो पोर मुसातिद होकर बोले, "प्राप निहायत गरीफ " तीन शहर : तीन पहर इंसान मालूम होते हैं । आपकी मुलाकात से खुशी हासिल हुई। आपने तो सुना ही होगा, मुझे नवाब कनकौवा कहते हैं। "अरे साहब, आप तो पूरे हिन्दुस्तान में मशहूर हैं।" रामानन्द ने चुटकी ली। नवाब साहब फूलकर कुप्पा हो उठ । तपाक से शेरवानी की जेब में हाय डालकर बोले, "क्या खातिर करूं आपकी ? लीजिए, काज़ नोश फरमाइए।" उन्होंने जेब से हाथ निकाला तो काजू की जगह हथेली पर छिली हुई मूंगफली के चार दाने निकले। रामानन्द यह देखकर मुस्करा पड़ा। "तौबा, तौवा यह कमबख्ती किसने की ?" नवाव साहब मुट्ठी भींच- कर खिसिया पड़े और सफाई देने के लिए बड़बड़ाते रहे, "असल में मेरे बच्चे बड़े अाफत के परकाला हैं । यह उन्हीं की हरक्त है। जेव से काजू साफ कर दिए और उसकी जगह मूंगफली के दाने रख दिए-छोड़िए ! और कुछ मंगाऊं आपके लिए ?" "शुक्रिया।" रामानन्द ने उनकी भैप मिटाते हुए कहा, "आप बड़े दिलचस्प यादमी हैं । कभी मुझे भी अपने कनकौवे की कोई बाजी दिखाइए ?" "जरूर, जरूर।" वे खीसें काढ़कर कहने लगे, "अगली जुमेरात को मलीहाबाद से एक बाजी वदी है। आइए, शोक से देखिए।" "जरूर पाऊंगा।" रामानन्द ने हामी भरी । "अब इस कनकौवाबाजी में क्या रह गया ?" नवाव साहब दामानन्द को अपनी जिन्दगी की दास्तान सुनाने लगे मानो वह उनका बहुत पुराना । दोस्त हो। रामानन्द उनका असली रूप समझ चुका था। फिर भी वह उनकी बातों में मजा ले रहा था और जव माधव ने नवाब साहब को इशारे से बताया कि रामानन्द भी बहु। बड़ा 'कनकोवावाज़ है तव तो नवाब नीन महर: नीन पहर मादव की दिलचस्पी उनमें और भी बढ़ गई और वे ऊंची-ऊंची डोमें माग्ने लगे। घोरे-धीरे पंगडाइ रामानन्द का सुपरिचित म्यान बन गया। माधव यहां पाकर अपने निश्चित कार्यक्रम में समा गया था और गमानन्द को इम जीवन और वातावरण के प्रति मावपित कर रहा पा। दह चाहता था कि वह भी इमी वातावरण में पुल-मिलकर होटन कर्मचारी दल का एक मदस्य बन जाए, क्योंकि रामानन्द की प्रतिमा-समता में उसे भारी लाभ उठाने की मागा बन चुकी थी। म्वय रामानन्दभी नौकरी के लिएउत्सुक हो रहा पारितु में वैरा- गौरी पसन्द न थी। वास्तव में यह राम उसके स्तर के मनुकूलन या परन्तु जो मानन्द पौर स्वतन्त्रता इस काम में यो दह मैनेजर बनने में भी नहीं थी, इमलिये माधव के मामह पर उसने यह कार्य स्वीकार कर लिया मोर अपने जीवन के पिछले मारे मध्याय मुताकर दर्तमान के प्रति एकनिष्ठ हो गया। निम्मंदेह जससे लोग अत्यधिक प्रभावित होते थे और मायव उमरी प्राह में एक से एक मन्द्र गिभर फैसा लिया करता था। पंगहाइज़ ऊपर से पैराडाइज रिन्तु भीतर मे नरकया। यहां सभी बुध होता था ! यह होटल या, बनव भी; रेस्ट्रा या, जोमयाना भी ; बार पा, मोगमाला भी। रामानन्द को वहां की मनाई और वास्तविक्ता नामान धीरे-धीरे हुमा। धीरे-धीरे उसे अनुभूति होने लगी कि वह सारी दुनिया को विद्रूपता और सांप छोड़कर गहरे नरक में भा पडा है। वह देखता है रात के साये में, पराडाइज में तरह-तरह के नकावा चेहरों को चमकः । मिनिस्टरों और लखपतियों के चेहरे । नेतामो-महात्मामो और समाजो भेडियों के चेहरे।
१०० तीन शहर : तीन पहर वे नयावी चेहरे, जो दिन में लोगों को सरलता से दिखाई नहीं पड़ते, जो प्रत्यक्ष प्रादर्श के पुतले कहे जाते हैं मगर जिनका अान्तरिक रूप' • • ! रामानन्द की विकृति और विस्मय-विमुग्धता अब विलुप्त हो चुकी है। अब उसे ऐसे नाटकीय और नारकीय वातावरण में प्रानन्द पाने लगा। चरित्रपठन में स्वाभाविक रूप से उसकी दिलचस्पी बढ़ गई है। अपने- पापको गवार-बुद्ध और हीन बनाकर वह होटल में वक्त गुजारने वाले उन चरित्रों को भीतर ही भीतर पढ़ता-समझता रहता है जो यहां पाते ही अपने असली रुप और लिवास में आ जाते हैं। जिनका शैतानी रूप यहां इत्मीनान के साथ उभरकर सामने प्रा जाता है। अपने को एक भोले-भाले वैरे की भांति यह उनकी खिदमत में लगा देता है। वे उसे जाहिल और भोला-भाला समझ कर अपनी गन्दी ख्वाहिश खोलकर उसके सामने रख देते हैं और वह अन्य वैरों की भांति उनकी खिदमत में लगा रहता है जैसे इस पेणे में उसकी बहुत गहरी और पुरानी दिलचस्पी हो । कोई नहीं जानता कि जीवन की उच्चत्तम परम्पगनों से अनायास टक्३.र खाकर वह इस अघो- गति को पहुंचकर आज जीवन को कीड़े-मकोड़ों की तरह ढो रहा है। रामानन्द काम से अवकाश पाकर वाह्य वातावरण में टहलने का शौकीन हो गया था। अक्सर माधव भी उसके साथ हो लेता था परन्तु जब कभी माधव की ड्यूटी होती थी वह अकेले ही घूमने निकल जाता था। प्राणज्यों ही कपड़े बदलकर वह निकला सहसा ही उसकी दृष्टि सामने से होटल में प्रवेश करती हुई उस लड़की पर पड़ी जो विशुद्ध-भारतीयता की मूति दीखती थी। उजली साड़ी में बिना किसी सजाव-शृंगार के वह लड़की उसे इन्दिरा की प्रतिरूप लगी। यह क्षण-भर को सिहरकर अचरण से उसे निहारने लगा। 'यह तो जाना-पहनाना चेहरा है।' मन ने अपने आप से पाहा। अचरज उसे इस बात का था कि प्राण तक इतनी सभ्य और सुशील तीन शहर : तीन पहर लड़की को उसने इस होटल में माते नहीं देखा था। 'मोह ! याद आया । यह तो लिली है।' लिली? अपाहिज मा-बाप और भाई-बहनो के लिए नौकरी करने वाली लिली ! उसो यूदे, खूसट व मिस्नर के द्वारा उसकी हविश के लिए मजबूर की जाने वाली लिली। 'उफ!' क्षरण-भर को उसका मन गहरी सहानुभूति से भर पाया देवी स्वरूपा लिली के प्रति श्रद्धा हो पाई। 'मगर लिली जैसी लड़की को किसी भी कीमत पर अपना पारीर उस यू भेडिये को नहीं देना चाहिए था।' वह अपने प्राप से कहने लगा। "तुम तो यही काम करते हो न । मैं एक तकलीफ देना चाहती हूँ तुम्हे ।" सहसा लिली ने उसके निकट प्राकर बड़े प्रार्थनीय स्वर में कहा और उसको ध्यानावस्था भंग हो गई। "जी हां, क्या प्राशा है ?" उसने बड़ी गिष्टता से उत्तर दिया ! "कमिदनर साहब तो नही पाए ? इसी वक्त वे रोज़ महा पाते "माई थिंक, यू पार पामकिंग प्रबाउट दैट कलह जैकाल ! (मैं राम- झता हूँ, माप उस रंगे सियार के बारे में पूछ रही हैं)" इतना कहकर रामानन्द व्यग्यात्मक ढंग से मुस्कराने लगा । और लिली को तो काट-सा मार गया। उसे दो बातों का गहरा प्रचरज हो रहा था । पहला तो यह कि निरा अपढ समझा जाने वाला रामानन्द फरटि मे अग्रेजी में बोल रहा था और दूसरे यह कि वह उसके और कमिश्नर के सम्बन्ध पर व्यंग्य कर रहा था। "क्षमा कीजिएगा।" वह सिसियाई-सी बोली, "मैंने सममा धा प्राप पराडाइच में काम करते हैं।" "जी हां, में यही काम करता हूँ।" उसके अचरज को समझकर तीन शहर : तीन पहर । - मानन्द बीच ही में बोल पड़ा, “ क्या करूं । वेकारी के इस जमाने में रे जैसे कितने पढ़े-लिखे नौजवान बिलो स्टैण्डर्ड (निम्न स्तर) के काम रते होंगे। "हां, तो ग्राप उस भेड़िया कमिश्नर से मिलना चाहती हैं। वह सात सम्बर केविन में बैठा हुप्रा पी रहा है । मगर अच्छा हो कि आप उस नीच से न मिलें।" रामानन्द के स्वर में इतनी हमदर्दी थी कि लिली डबडबा-सी आई। मगर दूसरे ही क्षण उसने संयत होकर कहा, "क्या तुम हमारे बारे में कुछ जानते हो? तुम्हारी बातों से तो...?" माफ कीजिएगा, मुझे अापके व्यक्तिगत मामले में कुछ कहने का अधिकार नहीं, परन्तु मनुष्य होने के नाते मुझे हमदर्दी तो है ही। मैंने काफी कुछ सुन लिया है । इसलिए आप से . ." बात अधूरी ही छोड़ कर रामानन्द लम्बी सांसें लेने लगा। लिली का चेहरा करुणा और विक्षुब्धता से भर-भर पाया। रामानन्द पहला व्यक्ति था जो उसके लिए सर्वथा अपरिचित होते हुए भी उसे अपना सर्वाधिक हितैपी और परिचित महसूस हो रहा था। वह अपनी । विवशता और व्यथा को छिपाए न रह सकी । हृदय में आन्दोलित संताप का बांध फूट पड़ा, "आपकी सहानुभूति के लिए आभारी हूं। आप एकदम अपरिचित हैं। फिर भी आपकी सहृदयता ने झकझोर कर रख दिया है । श्राप तो जानते ही हैं, वह कमिश्नर मेरा ग्राफिसर है और मेरी इज्जत लूटन' चाहता है । कुछ समझ में नहीं पाता कि किस तरह उससे अपनी रक्ष करूं? मेरी मजबूरी...।" उसका कण्ठ भर पाया, आगे कुछ न कह सकी उसकी अांखें गीली हो पाई थीं। "तो क्या उस दिन ?" कहते-कहते रुककर रामानन्द ने फिर का "उस दिन वह आपको ब्लैक रूम की ओर क्यों ले गया था?" वह मुझे गन्दे इरादे से ही ब्लैक रूम की ओर ले गया था।" लि पिता के लिए लटने को तैयार - तीन दशहर : तीन पहर ॥ हो गई थी परन्तु ब्लक रूम के द्वार तक पहुनते-पहुंचते मेरो मारमा एक- वारगी विद्रोह कर उठी और मैं अपनी लाज बचाकर भाग पाई।" "पोर फिर उसने क्या किया?" "मुझे पता नहीं।" लिली ने बताया, "उसी दिन से मैं दफ्तर नहीं गई, छुट्टी का प्रार्थनापत्र भेज दिया।" "मगर इस तरह कब तक चलेगा ?" "नहीं, प्राज मन्तिम निर्णय करके प्राई हूं।" "अन्तिम निर्णय।" "हां।" "वह क्या?" रामानन्द के रवर मे गहरी जिजामा थी। "यही कि मैं उसे अपना शरीर दे दूगी।" "नहीं, नहीं, वह तुम्हारी मजदूरी से नाजायज फायदा नहीं उठा मकता।" रामानन्द के स्वर मे गहरी उत्तेजना और अपनत्व था। "मगर मेरे सामने और रास्ता हो क्या है ? आप हो मुक्ति का कोई उपाय बताइए।" सहसा हो लिली के मुख से निकल पडा। ' घबराने की बात नहीं लिली!" वह अत्यन्त उदारतापूर्वक बोला, "तुम्हे कोई एतराज न हो तो आयो मेरे माथ । हम एक दूसरे होटल मे बैठेंगे । फिर इस विषय पर बातें होंगी !' लिली ने सहमति मे सिर हिलाया और उसके पीछे-पीछे बाहर की पोर चल पड़ी। दोनो एक साधारण से होटल मे प्रावैठे । क्षण-भर के परिचय मौर सहानुभूति ने दोनों को म्वाभाविक रूप में एक-दूसरे के निकट ला रामानन्द के भावुक और मानवीय हृदय पर उसकी विवशता को गहरी प्रतिक्रिया हुई थी और लिली के सदनारोत्व से प्रभावित होकर वह उसके प्रति माफपित हो गया था। स्वयं लिली अपनी असहाय प्रवस्या में उसकी सहानुभूति की मवहेलना ११२ तीन शहर : तीन पहर न कर सकी। "कुछ खाने के लिए मंगाऊ?' रामानन्द ने बड़े स्नेह से पूछा। "अपने लिए मंगा लीजिए, मुझे तो इच्छा नहीं।" वह सरलता से बोली। "कुछ तो।" कहकर उसने वैरे को चाय-टोस्ट लाने का आर्डर दे दिया और कुछ तमतमाकर उत्तेजित स्वर में कह पड़ा, "उस भेड़िये से मुक्ति पाने के लिए आपको थोड़ा हिम्मत से काम लेना होगा।" "वह क्या ?" लिली अकुलाई। "देखिए, आप अपनी छुट्टी महीने दो महीने के लिए बढ़ा दीजिए और उसके खिलाफ गर्वनमेण्ट को एक दरख्वास्त भेज दीजिए। मैं हर कदम पर आपका साथ दूंगा। अगर उसे छठी का दूध न याद आ जाय तो कहिएगा।" "यह तो आप ठीक कहते हैं, मगर पानी में रहकर मगर से बैर नहीं निभता । आज मैं उसके खिलाफ दरख्वास्त दे दूऔर कल को नौकरी से हाथ घोऊ।" । "नौकरी छीन लेना कोई मजाक नहीं है। पाप औरत हैं इसलिए 'बराती हैं । पहली बात तो उसी का पत्ता कट जायगा और यदि नौकरी चली भी गई तो आप चिन्ता न करें। मैं प्रच्छा कमा लेता हूं...।' "मगर' • •?" "मगर कुछ नहीं।" रामानन्द ने बीच ही में लिली की बात काटी. "इज्जत बेच कर रोटी कमाने से, इज्जत बचाने के लिए मेरी मदद लेने में आपको एतराज़ नहीं होना चाहिए।" लिली पाकण्ठ उसके प्रति श्रद्धा और श्रादर से विभोर हो उठी। प्रतिवाद के लिए उसके पास शब्द न थे। मौन, आंखों में अथाह प्रेम और सम्मान भरे वह रामानन्द की अोर निहारती रही। चाय-टोस्ट आ गया। दोनों नाश्ता करते हुए एक-दूसरे को अपना निकट परिचय देते रहे।
तीन शहर : तीन पहर लिली ने उसके प्रास्वागन और विश्वाम पर अपने प्राषिगर विद प्राधना-पत्र देने का निश्चय कर लिया। लगभग दो घण्टे होटल में बिताकर पौर पर-दूसरे दतनिट हो- पर ये बाहर निकले । उग ममय निली के चेहरे पर निकौर मान्दिय मुम्कान थी पोर रामानन्द के चेहरे पर दमकी मान्दिरना, गतीत्व और. नारीत्व के प्रति सहानुभूति पौर श्रद्धा । जिस समय गमानन्द माधव के साथ नवाव बनाया पदोलनमाने पर पहुंचा, नवाब कनकौया या चेहरा धूमिल पड़ गया। उन्होंने अपने दौलतखाने की तारीफ बहुत बढ़ा-चढ़ाकर वो थी मगर यहां नो एक टा. फूदा राण्डहर था । वह भी गहर के सबसे पुराने और गन्दै माहौर में । उन्हें थपा पता था कि रामानन्द मचमुच उनके यहा प्रा धमलेगा पौर, उनकी रईगी की होंगों का पर्दाफाश हो जाएगा। फिर भी जबरन पुशी जताते हुए उन्होंने माधव प्रौर रामानन्द का स्वागत रिया और बाहर बगाई में एक बाट बिहार बोले, "वठे मौके से तारीफ लाए पाप लोग । क्या मातिर कम्?' "पातिर के लिए पाप परेगान न हो ।" मायव तपाक मे बोला, "हम तो पापको बाजी देसने पाए हैं।" "जहर, जरूर ।" नवाब सिमियानी हमी हसकर बोले, "वरा प्रमा एक घण्टे में याजी गुरू होती है । मैं ममा (पतंग उड़ाने की होर) लेने प्रगीनाबाद जा रहा था। प्राप बेटें, मैं अभी पलक नपने प्राया।" और फिर ये तीर की तरह भीतर जनानमाने में चले गए। "मगीना को देखा है ?" मुम्कराते हुए माघय ने रामानन्द को युहनी मारकर धीरे मे पदा। "गौना कानगीना?" "उफ! इन को परी! गजद की दमूरती है।" माधव ने घट- यार भरी। 41 ११४ तीन दशहर : तीन पहर - . "पहेनी न बुझायो।" "अरे भाई, नवाब साहब की साहबजादी है । नवाब साहब की लड़की । छिः छिः ! तुम ऐसे गन्दे ख्याल रखते हो उसको बारे में ?" रामानन्द विगड़ा। "मैं ही नहीं, उसके हुस्न का हर खरीदार उसके बारे में ऐसे ही ख्याल रखता है।" माधव कहने लगा, "बड़ी लाजवाब है। देखोगे तो तदियत बाग-बाग हो जाएगी। कहो तो तुम्हारा सौदा पटा दूं?" "सौदा ? क्या वह विकती है ?" रामानन्द प्रांखें फाड़कर बोला। "बिल्कुल, नहीं तो पन्द्रह-बीस रुपये के वजीफे में इतने बड़े परिवार का क्या हला-भला ? नवाब साहब की कनकौवाबाजी वीवीजी का पानदान पोर ?" रुक कर सिगरेट सुलगाते हुए वह पुनः कहने लगा, "रात-भर के तीस रुपये दो घण्टे के बीस रुपये और एक घण्टे के दस • • • " "वकवास बन्द करो!" कान पर अंगुली देकर रामानन्द लगभग तड़प उठा मानो माधव जो कुछ कह रहा हो महज बकवास हो, केवल लांछन । "खर, हाथ कंगन को पारसी क्या ?" माधव सिगरेट प्रूरता हुआ फुसफुसाया, "कनकौवावाजी बहुत देखी है मैंने । अाज तो सकीना से र लगाने पाया हूं। और तुम • • .!" "खुदा कसम, जो एक पैसा भी हो मेरे सन्दूकचे में।" जनानखाने में फूटकर पाने वाली इस गिड़गिड़ाहट ने रामानन्द और माधव के कान अपनी पोर प्रापित कर लिए। "मुझे झूठा न बहलामो बीवी, मेरी बाजी निकल जाएगी। खुदा के लिए चार भले प्रादमियों के सामने वेइज्जत न करो।" यह स्वर नवाब' साहब के थे। "देवा ?" माधव रामानन्द को खोदकर बोला-" यह है नवाब कनकोवा का असली । नवाब कानकोपका ही नहीं उन जैसे नेता विभागों को तीन शहर : तीन पहर " नवावों का 1 सहमा तेजी के साय नाव गाय बाहर पाए और वे चुर हर उनकी भोर मुसातिय हुए। "मुग्राफ कीजिए. जरा देर मे तौटा।" वे बोले । "कोई बात नहीं । मगर माप वाजी यव गुरु नरेंगे?" "मोह !" सहसा पोडा संजीदगी-मरा चेहरा बनाकर नवार साहब ने पहा, "कल मुझे बैंक से रुपया निकालने की याद नरही पौर मात्र मी वन निकल गया। प्रापमें से किसी की जेब में दो टूटे राय नो न पड़े होंगे ?" रामानन्द ने जैसे-नमे नवाव माहब को नाटकीयता पर अपनी हंगी दवाई। मगर ऐसे अनेक अवसरो के अन्मस्त मात्र ने दो ये निकालकर उनके हवाले कर दिए। "पाप तमगेफ रमें। मैं सभी बाजार मे लौटा।" इनना पहार नवाव साह्य तो झपटते हुए बाजार की तरफ चल दिए मगर माधव मोर रामानन्द प्रश्नमूचा दृष्टि से एक-दूसरे को देगते रहे। जव माधव ने मीना में मिलने वा उपक्रम विया तो रामानन्द उते. जित होकर योला, "कम मे कम मेरे सामने तो यह नमाया न परो। मे के तूने पर मिमी यो मजबूगे मोर दरबन में मिलवाद करना कोई भला काम नहीं होता।" "तुमफिर धर्म और पिलामफो की बातें करने लगे?" माघय ने प्रति- वादरिया. "मैं तुम्हारे पठोर अनुभवों में एक अनुमवार जोटना पाहता हूँ। तुम्हें नवाब को नवाबी पर अचरज या मय जरा उनका असली रूप भी देय लो। ये तजननी मामानी से न मिलेंगे रामानन्द ! देगो तो मही। पादमी प्रानी याहरी इरजन बनाने के लिए कितना नीचे गिर गरना है मरनी लत दुय्यमन और शौक के लिए यह रिम पदर प्रपनी पोर अपने परिवार की इज्जत दाव पर लगा माता है." माघर के कथन में इसना गहरा यया था कि रामानन्द प्रतिवाद न कर सका। सिर नीचे किए लम्बी सम्बी माम सेता रहा। ।
तीन शहर : तीन पहर
।
और फिर कुछ ही क्षणों के बाद सकीना उनके सामने खड़ी थी।
स्वाभाविक रूप से मां की रजामन्दी पर ही वह सौदा करने आई
होगी?
सकीना!
मुश्किल से समह वर्ष की एक बेहद खूबसूरत लड़की जिसके चेहरे पर
मामूमियत नाच रही थी मगर जिस के मुखमण्डल की करुणा साफ स्पष्ट
करती थी कि 'जिस्म की सौदागरी' ने उसे तोड़-मोड़कर रख दिया है
और वह अनेक वासनात्रों द्वारा शोपित की जा चुकी है।
माधव उसे देखते ही उन्माद में डूबने लगा । मगर रामानन्द ठगा-ठगा
सा उसे देखता ही रह गया । उसे लग रहा था मानो एक सुवासित गुलाब
को कीचड़ में फेंक दिया गया हो और अब वह अपने दुर्भाग्य पर गटर में
चिलचिला रहा हो।
"प्रब तो और खिल आई हो।" माधव बेहूदगी के साथ उसे
घूरते हुए 'व्यापारिक-व्यवहार' पर उतर रहा था मगर रामानन्द के
सारे शरीर में शीशा पिघल रहा था कि सकीना के पीछे द्वार के पर्दे से
कोई ग्राकृति भांक रही है और इस व्यापारिक सम्पर्क के प्रति उसके
बुधले नेहरे पर गहरी उत्सुकता को लहर व्याप्त है ।
सकीना की मांग
हां! वह सकीना की मां ही हो सकती है।
"मुझे जाने दो।" वह क्षुब्ध होकर फुसफुसाया और झटके के साथ
वाहर निकल गया।
माधब उसे पीछे से उच्च स्वर में पुनार रहा था मगर वह वापस नहीं
।
लौटा।
यह व्यापार' रामानन्द के लिए असह्य था, उसकी भावनाओं और
भावुकता के विरुद्ध । इस माहौल के प्रति उसमें रंचमात्र भी दिलचस्पी
गेपन श्री।
उसने जिंदगी को काफी भेला था और ऐसे कठोर अनुभवों और
नोन शहर : तीन पहर मनुभूतियों में कण्ठ तक डूबकर कई वार विचलित और पथभ्रष्ट हो चुका था। अब उमने जीवन का नया मार्ग बनाया था। एक सर्वथा नमो, पृष्ठ- भूमि जो केवल जीने के लिए थी। किसी प्रकार की अनुभूति, वितृष्णा और छटपटाहट तथा प्रायश्चित्त के लिए नहीं, मगर माधव उसे फिर से शुन्ध, पनावित और उत्कंटित करने का प्रयास कर रहा था। यह तेजी के साथ अपने गन्तव्य स्थान को प्रोर लौटते हुए सोच रहा था, "मैं नाहक ही दुबारा जिन्दगी से जुड गया। मेरो कृतघ्नता और निकृष्टता इमसे अधिक और क्या हो सकती है कि मैं बार-बार पाप में नहाकर भी उममे तैरने का मोह नहीं मंवरण कर पाया। 'उफ, दुनिया गन्दी है और हर क्षेत्र विषय-वासना और पापाचार से भरा हुमा है । तो क्या मेरे ही अनुभव, अनुभूति, ग्लानि और प्रायश्चित्त के लिए? 'नही नहीं, मैं जल्द से जल्द यह विपाक्त वातावरण छोड दू गा। मुझे यहां शाति और संतुष्टि नहीं मिल सकती । नारकीयता से तटस्य रहकर ही नारकीय जीवन के प्रति जेहाद बोला जा सकता है।...' लिती उसको प्रतीक्षा कर रही थी, बड़ी उत्सुकता और व्यग्रता वे माय । रामानन्द को देखते ही उसका प्रकुलाया हुमा मुख-मण्डल सिल उठा और हृदय में मीठी-मोठी घडकन होने लगी। "मैं तो प्रतीक्षा करते-करते अव गई।" मुस्कराते हुए उसने बडे मे चले गए "क्या बताऊ लिनो ?" निकट पाकर वह कहने लगा ! "मेरा मस्तिष्क विकृत हो रहा है, पारमा वितथिला रही है।" "ऐसी क्या बात हो गई ?" लिली ने बीच ही में पूछा, "क्या कोई दुर्घटना हो गई?" "मेरा जीवन पग-पग पर विकृतियो पोर दुर्घटनामो से भरा हुमा है।" रामानन्द के घर में गहरी व्यया थी। "पाए यहत भावुक है ।" लिली ने पामीपत्ता के साथ कहा और दोनों मालघर "कहा तीन शहर : तीन पहर । शान्त-एकान्त स्थल की ओर चल पड़े। "लिली, मैं थोड़े ही समय के परिचय में अपना सारा जीवन एक निकट सम्बन्धी की भांति तुम्हारे सामने खोलकर रख चुका हूं। जाने तुमने मुझे कैसा भला-बुरा व्यक्ति समझा हो . .?" "प्राप बहुत विक्षुब्ध नज़र आते हैं।" लिली अचरज से कहने लगी, "मैने भी तो बड़े अपनत्व और विश्वास के साथ अपने को आपके सामने खोलकर रख दिया है। समझ में नहीं आता, आप जैसा संघर्षशील और दूसरों को जीवन और साहस की सीख देने वाला व्यक्ति आज इतना विखर क्यों रहा है ?" "लिली, मैं ऐसे विद्रूप और बोभत्स जीवन से ऊब गया हूं। अब एक क्षण भी मेरा मन यहां नहीं रमेगा । मैं अब तक भटकता आया हूं। सच्ची आत्मशांति, सच्ची जिंदगी और सभ्य जीवन बिताने की मेरी कामना मेरी एक प्रारम्भिक भूल के कारण सदा टूटती और बिखरती आई है। इसलिए अब मैं फिर से अपने पुराने जीवन में लौट जाना चाहता हूं।" "पुराने जीवन में ?" लिली गर्म सांस लेती हुई उसके भावपूर्ण हो आए चेहरे को निहारती रही जो अचरज से फैलता जा रहा था। "फिर मेरा क्या होगा? आपने अनजाने ही सहानुभूति और प्रेम जताकर मुझे पाप में डूबने से बचाया है और आपके ऐसे ही स्नेह की प्राकांक्षा जीवन-भर' • ।" "हां, मैं तुम्हारा साथ देना चाहता था।" सहसा ही रामानन्द का स्वर 'पाप'से 'तुम' में बदल गया मानो लिली के प्रति प्रेम का उद्गार वरवस ही मचल पड़ा हो। लिलो अकस्मात् प्रानन्द से नहा उठी । 'तुम' का सम्बोधन उसे बड़ा , "तो मुझे पाप पुनः निराश्रित करके चले जाएंगे?" उसने मृदुलता से कहा। "हृदय तो ऐसा नहीं कहता।" रामानन्द ने फसफसाकर कहा और नीन महर : तीन पहर ११६ मस्तक से होली टिकाकर भावनामों में डूब गया। उसके हृदय में गहरा अन्तरन्द्र हो रहा था। "एक वान वहूं लिली ? एक प्रस्ताव है मेरा।" "कहिए न? प्रापका कोई भी प्रस्ताव मुझे अमान्य न होगा। उसे मानकर मुझे हादिक खुशी होगी।" "अब मैं गृहस्थ जीवन व्यतीत करना चाहता हूं।" रामानन्द अत्यन्त दयनीयता के साथ कहने लगा, "यही जीवन की एक ऐसी विधा है जो नंतिक रूप में मेरी प्रात्मा को मच्ची गांति दे सकेगी।" "यह तो बड़ी अच्छी बात है ।" लिली ने समर्थन किया। "और इस जीवन-विधा के साथ मैं तुम्हें भी वांधना चाहता हूँ । क्या नुम जीवन पथ में मेरा साय दे सकोगी? सोचो लिली ..." लिली का मुख मण्डल स्वामाविक लज्जा से तमतमा पाया । वह कई भगों तक मौन रामानन्द के चेहरे को निहारती रह गई। "मैं यह प्रस्ताव किसी स्वायं लिप्सा मे नहीं, वरन् सद्भावना के माय...1 'मैं पापको भावनाप्रो को समझती हूं।" लिली वीच ही मे कहपडी, "यह प्रस्ताव स्वीकार कर मुझे हार्दिक खुनी होगी।" "मध' - 'मच कह रही होलिलो?" भानन्द विह्लता में उसने लिली पाहाथ थाम लिया और लिली उसको अखिों से प्रांखें छुपाए मुस्कराती रही। महमा ही रामानन्द ने अपना जीवन-पथ बदल दिया है । अचानक ही उमगी जीवन-विधा का पाया- बल हो गया है । माधव उसके परिवर्तन पर हैरान है। उसको 'योजनाएं विफल हो रही है मगर रामानन्द का यह परि- दग्नि-स्वम्प इतना सुदृढ है कि कोई हस्तक्षेप करने का उसे माहस नही होता। बम, वह इतना ही समझ पाया है कि रामानन्द उस लिली नामक तीन गहर : तीन पहर की से प्रेम करने लगा है और गीव्र ही उसके साथ व्याह रचाकर वन विताने की कल्पना में विभोर है। स्तव में रामानन्द अपने-पापको नये जीवन-पथ पर बढ़ाने की में खोया-डूबा है। लिली के साथ बड़ी दूर तक उसकी बातें हो हैं। लिली श्राफिस से अवकाश पर थी इसलिए नित्य सरेगाम ही होटल कर उससे मिलती थी और दोनों शीघ्र ही परिणय-बन्धन में बंधकर जिंदगी विताने के विषय में घण्टों बातें किया करते थे। मगर उस दिन लिली बहुत शाम बीते तक भी न पाई और रामानन्द प्रतीक्षा का बांध टूटने लगा। प्रतीक्षा करते-करते हारकर वह एक खाली केबिन में प्रा बैठा यो बाय मंगाकर पीने लगा । बगल की केविन में कोई जोड़ा बैठा बातें कर रहा था। चाय की चुस्कियां लेते हुए रामानन्द का ध्यान स्वाभाविक रूप से बगल की केबिन में बंट गया। पुरुष कह रहा था, "मैं कब तक तुम्हारी प्रतीक्षा करूं? कितनी बार कहा तुम से नौकरी छोड़ दो। तुमने अपने माता-पिता और घर वालों के पालन-पोषण करने का ठेका नहीं ले रखा है। अगर तुम एक माह के भीतर मेरे साथ शादी नहीं कर लेती तो मजबूरन मुझे तुम्हारे प्रेम का नाता तोड़ना पड़ेगा।" "सिर्फ तीन महीने और रुक जायो सुशील ।" अव नारी कण्ठ याचना कर रहा था, "तब तक मेरे भाई की नौकरी लग जाएगी। फिर मैं निश्चिन्त होकर तुम्हारे जीवन में आ जाऊंगी।" "तुम बड़ी छलिया हो लिली !" सहसा पुरुप स्वर फूटा और रामानन एक बारगी चौंक पड़ा मानो तलुवे में विच्छू ने डंक चुभा दिया हो । 'लिली' लिली ।' वह जलते होंठों से फुसफुसाया और अच से उसकी मांखें कपार पर टंगी रह गई। जानकर हंसी आएगी सुगील कि इस होटल का एक तीन शहर : तीन पहर : १२१ भी मुझ से शादी करने का स्वप्न देख रहा है।" फिर लिली की आवाज घो। "तुमने क्या कहा ?" "पागल हुए हो! बिलो स्टैण्ड मरिज करूंगो ? हां, यूं ही मारवामन देदिया है।" रामानन्द विक्षिप्त हो उठा । उसे काटो तो मून न था। 'लिली - "भूटो, विश्वासपातिनी • •! उफ़! सम्रता और चरिय- मोलता का ढोंग भरकर तूने मुझे खूब छला उमका सारा शरीर स्वयं की ग्लानि, धोम और जया में डूबा जाता था । एक क्षण मी बंटा रह पाना उसके लिए मुश्किल या। मागे उससे कुछ नहीं सुना गया। वह उठा और जननी मांखों म उस के दिन की मोर देखता हुआ बाहर निकल गया। जिदगो फिर बिखर उठौ ।नारा मुन्धर्वाम्यत परिवर्तन छिन्न-भिन्न हो गया। उमने महसूस किया कि उसे विरश्मि के प्रनिरिक्त अन्य कहीं गालि नहीं मिल सकती । उसे मच्ची मान्ति के लिए तरना होगा। मगर नहीं, वह मार्ग मो उन लिए गयुक्त नहीं। हर जगह गन्दगी और महार है। हर तरफ पापाचार' । मूर - परेव - पोवा-घडी मोर दानवता का नग्न नृत्य। चिर- फिर कहा जाए वह ? किन और : मिदिमा में किम पपपर? पचानक माप्तिस में एक नये विचार को दिलो काँध गई। मचानर हो यादमापा उमे। पादरी ! हो पादरी। जोपानरार में मिला था। जिनने भर-भर मम में चमकृत पर दिया था। दिय व्यक्तित्व । महानानी। ईसामसीह का सामान मवतार । .
तीन शहर : तीन पह- फ़ ! जिंदगी की चमक-दमक में एकदम भूल ही गया उन्हे । उन्होंने लखनऊ का पता दिया था। सस्नेह गिरजाघर में ग्रामंत्रित था। वस, अब सच्ची शान्ति और सात्त्विक जीवन के लिए वही एक सम्बल । " फादर (पादरी) के चरणों में जायेगा वह ! अपने मन, वर्म और विचारों का कायाकल्प करेगा। यह पापी जीव . उतारकर रख देगा। वह ईसाई बनेगा। ईसामसीह का अनुगामी । फादर का शिप्य · । और वह द्रुतगति से गिरजाघर की ओर बढ़ रहा था, मानो पादरी साहब का दर्शन मात्र उसकी ग्लानि और भटकाव को सदा-सर्वदा के लिए विनष्ट कर देगा। शाम का धुंधलका गाढ़ा हो रहा था, मगर गिरजाघर में रोशनी जगमगा रही थी । पास-पास सर्वत्र गान्ति का साम्राज्य था। "मैं फादर से मिलना चाहता हूँ।" गिरजाघर के बहिार की सीढ़ियों पर बैठे हुए एक पहरेदार से उसने पूछा। पहरेदार ने उसे ऊपर से नीचे तक घूर-धूर कर देखा । फिर थोड़ी पर स्थित एक बंगले की ओर संकेत करके बोला, "अभी-अभी तो गर फादर ! बंगले पर चले जाप्रो। सामने वाले कमरे में मिलेंगे।" वह तेज़ कदमों से बंगले की ओर चला गया। बंगले में निस्तब्धता थी मगर रोगनी जगमगा रही थी। द्वार से उसने 'फादर, फादर' की कई ग्रावाजें लगाई, मगर में कोई नहीं बोला। द्विविधा में वह कमरे की ओर बढ़ा। गाढ़े हरे रंग का में कमके द्वार पर लटक रहा था और रोगनी जगमगा रही थी। फादर? फादर से संकोच कैसा? वे तो महाविद्वान और को लगा लेंगे। सच्ची शान्ति से मन क ?
तीन महर : तीन पहर
घा देंगे।
मैं पा गया !" उसने उच्च स्तर में कहा मोर घडपड़ाते हुए
कमरे में घुग गया।
मगर यह क्या ?
कमरे के दूधिया विम्तर पर एक लगभग पचीसवर्षीया पौरत ए.
दम नग्न पड़ी थी और वही त्यागमूर्ति पादर (पादरी) उसो गरीर में
गेल रहा था।
रामानन्द कपाट पकटकर पटो-फटी पासो से यह दृस्य देवता रह
गया।
पौर वह नन् अपना नग्न गरीर हिराने के लिए बिम्वर वा चादर
सोचने लगी।
पादरी सिरियाया-मा पतलून पहनने लगा।
"उफ ! तुम्हारा अमली का यह है ? फादर ! तुम ईमाममोह
के पथानुगामी हो ? च . • • च ।" उमने दांतों से अपनी जीभ काट
सी।
"तुम्हें हुक्म पाकर कमरे में प्राना चाहिए था।" पादरी तमतमाए
चेहरे से कह पडा।
"हूं ! ताकि तुम मेरी निगाह में फादर ही बने रहते पौर में जिंदगी
की प्रापिरी बाजी भी हार जाता। तुम सब पापो हो. • तुम सब
पाखण्डी हो.. धूतं हो. • • मानवता के हत्यारे हो
ढोंग रचार तुम भोले-भाले मानव समाज को रसातल को प्रोर धकेलते
रहते हो, मुक्ति का पाठ पढाकर ... धर्म माने पाखण्ड, घोगा।
हा।" उमने पागल की तरह पट्टमास लगाया मोर उल्टे पायो लीट
पड़ा।
गिरजाघर उसके विटून के यह कह में कार रहा पा।
वह विद्युतीय गति में विलोम दिगा में चला जा रहा था-जोर-जोर
से ठहाका लगाता हुमा-"तुम्हारो दुनिया तुम्हीं को मुबारक हो · धर्म
घमं का
...
तीन शहर : तीन पहर
१२४
माने घोखा · · · साधू माने चोर मजहब माने मारपीट: . और
दोस्त माने दुश्मन ..."
"रामानन्द, रामानन्द!" पादरी दौड़ते हुए पुकार लगा रहा था, मगर
वह कदम बढ़ाता चला जा रहा था।
शाम रात में खो गई थी। पादरी की आवाज़ सन्नाटे में दम तोड़ रही
थी और रामानन्द की परछाई लम्बी, और लम्बी होती चली जा
रही थी।