Hindustani Academy, Allahabad

Nagari Pracharini Granthamala Series No. 4-8

Chand Baradai · 2004/20/11

PDF Proofread

Front matter

. ************************* ** ******* ** .* ** 00*** **** **** . Nagari-pracharini Granthmala Series No. 4-7. THE PRITHVIRAJ RASO OF BY CHAND BARD "Hindustani Academy EDITED Regt. 19. Mohanlal Visnulal Pandia, Red Brisna Das Syam Sundar Das, B. SI. CANTOS XXIV and XXV. 999. AND KKo *:**** महाकवि चंद बरदाई पृथ्वीराजरासो जिसको मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या, राधाकृष्णदास और श्यामसुन्दरदास बी. ए. ने सम्पादित किया। 36 4 पर्व २४ और २५ PRINTED AT THE TARA PRINTING WORKS, AND PUBLISHED BY THE NAGARI-PRACHARINI SABHA, BENARES. 1906. 0 . . . . o ***K...* K..* *** *** Issued 31st. October 1906. ****** ******** [Price Re. 1. मूल्य १)

सूचीपत्र।
-:0.:-
(२४) धनकथा
(२५) शशिवृता वर्णन (अपूर्ण)
पृष्ठ ७०५ से ७५८ तक
, ७५९ , ८३२
....
"
:0:
विशेष सूचना।
इस ग्रंथ का सारांश गद्य में लिखा जा रहा है, वह आगामी संख्या
से इस ग्रन्थ के साथ में छापकर प्रकाशित किया जायगा।

चौबीसवां समय २५ ] पृथ्वीराजरासो। ००५. कवित्त ॥ चढ़त भांन मध्यांन । बीर गष्पर उग्गरि घर ।। सुमरि सेन सामंत । ओट तत्तार पान भर ॥ बच घात आरिष्ट । बीरता रिष्ट गरिष्टिय । लुथ्यि लुथ्थि आहि । लुथ्थि लुथ्थन पर जुहिय ॥ धारंग कुहि अन कुटिहै । डंक बज्जि वजी विपत ॥ चरुवंत देखि उम्मै हसब । उधरि सिंभ दिष्यै सुपल ॥ छंद ॥ १५० ॥ बड़े बड़े बीरों का मारा जाना। पल उघरि दिषि सिंभु । ब्रह्म दिष्यौ ब्रह्मासन ॥ प्रकृति पुरुष दिष्पीन । प्रति दिष्यौ गुरु षासन । थान थान जम पुछिछ । रंभ पुच्छे पछ गृह फिरि ॥ भौ अचंभ कविचंद । लोक मंगै सु लोग सुरि ॥ लम्भी जु मुगति पग मग्ग करि । जोग मग्ग जिन मुक्कयौ । सामंत सूर मिलि सूर ग्रह। फिरि न तिनन तन चुक्कयो । छ० ॥ १५१ ॥ गष्पर ख़ां और तातार ख़ां दोनों का मारा जाना। दूहा ॥ उभय सहस गष्पर परिग । थल बियो सुरतान ॥ समरसिंघ रावर सिमुख । परिग बीर' बिय पनि ॥ छ० ॥ १५२ ॥ याकूब ख़ां का घोर युद्ध वर्णन । छंद भुजंगी॥ पस्यौ षांन आणब मुष्पं समाई । बजे टोप टंकार के तार साई । कट कंध कामंध नंचे विभंग। मनों अग्गि लम्गी समीपं न दंग छ। १५३॥ करै बीर भंग सुभट्ट कर कं । मनो उच्छरै मीन जल मभक पंकं । करे दोहदोही समं चिच कोटं। परे बीर बीरं सुरत्तान जोटं॥०॥ १५४ ॥ मथी सेन दूनं भई थोर थोरी। मनों वारिज पंति दंती भकोरी॥ बजै घाइ अघघाइ निभ्याइ घटुं। पढ़े वेद विप्रावकै ज्वान भट्ट॥ ई० ॥१५५॥ पर ढाल मालं विराजे कला की। मनों भीति गौष भिदै नीर जाकी । जि. नीर मुष्पं षगं नीर झल्ले। मनों माधवं मास वे वंक फुल्लै ॥ ई०॥ १५६ ॥ किरव्वान कुंतं भरै फैसु ककी। मनों बीज लट्टी कुलट्टा मनक्की । ई० ॥ १५७ ॥ (१) मो.-वीय।

२०६ पृथ्वीराजरासो। [चौबीसवां समय २६ जब आधी घड़ी दिन रह गया तो निसरत ख़ां और तातार खां ने सेना का भार अपने ऊपर लिया। दूहा ॥ रहिग जाम तन अव घटि । टरिन बीर जुध वार । षां निसुरत्ति तत्तार षां । खयो सैन सिर भार || ई० ॥ १५८ ॥ घोर युद्ध होना, पृथ्वीराज का स्वयं तलवार लेकर टूट पड़ना। छंद धमरावली ॥ जयं जय सद्द सु सदिय सूर। जु अच्छरि पुक्क उछारत दूर ॥ इहा हुहु गंध सुगंध्रव गांन । षच्यौ घरि एक उभे रथ भान ॥ ई० ॥१५८॥ भवंरुंड मुंडय सुगुंथय माल । धमीय उपावहि ढुंढहि लाल । जुषिझै चहुवान कृपान कसी। सुमनो दुति दोझर सी निकसी ॥ ई० ॥१६॥ तुटि पहन गौ उपमाहि लह्यो। सुपस्यौ जनु मेर सुरंग कयौ । नव पि नवै रस बीर नच्यौ। भमरावलि चंद सु चंद रच्यौ ॥०॥ १६१ ॥ नव नचिय रुंडति मुंड हस्यौ । तिन ठौर विभन्छ भयानक सौ ॥ परि लुथ्यित्र लुथ्थि तहां सरसं। सुभयौ रस शंकर रुद्र रसं ॥ ई० ॥ १६२ ॥ रुधि से गज राजति दान झरे। कवि चंद तहां उपमां उचरै छवि भी घन स्यांम रुरत्त परी। मनों बिंब बलै नदिदै उतरी ॥छ ॥ १६३ ॥ उपमा दुसरी रंग देषि कहै। जमुना जल में सरसत्ति बहै घन अच्छरि अच्छ कटाच्छ करै। रस भेद शृंगार पनाह हरै ॥ ई० ॥१६४ ॥ तिन जारन गाड़न को न बचै । रनसं रस तीय सु सत्य नचै ॥ धरकै धर कादर चित्त वियं । करुना रस केलि कुलान कियं ॥ छ ॥ १६५ ॥ बर बीरन जुद्द इता सँपज्यौ। तिहि ठौर भयानक सौ उपज्यौ ॥ छ० ॥ १६६ ॥ रावल की वीरता का वर्णन । दूहा ॥ अति प्राक्रम रावर सुभर । कूरभ नरसिंघ जन्गि ॥ रघुवंसी अति क्रम्म गुर । कथ्य करन कलि लग्गि ॥ ई० ॥ १६७ ॥ शाह का प्रबल पराक्रम करना । हिन्दू सेना का घबड़ाना। गाहा ॥ जब मचि रीठ अपारं । किय अतिक्रम्म जवनयं साह ॥ । ॥ (१) मो.-जांन । (३) मा.-हसं। (२) मो.-भवो। (४) को-कृ-संसर।

चे.बीसवां समय २७ ] पृथ्वीराजरासो । 909 भर हर हिंदुत्र भग्गं । कर धरि षग्ग धाय करभं। ई० ॥ १६८ ॥ रावल का क्रोध कर स्वयं सिंह के समान टूट पड़ना। कवित्त ॥ जबहि सेन चतुरंग । साहि अरि जंग आइ जुरि ॥ तबहि राज रघुवंस । झुकित बर षग्ग अप्प गहि ॥ हनिय मत्त गजराज । सिंघ कर मथ्य सिघ्र बहि ॥ मनो बसत रंगरेज । मह फुव्यौ सुरंग ढहि ॥ दौरे मसंद किलकार करि । धुश्र समान साहस धरै बज्जे बटुन असिवर सवर । सुकवि चंद कीरति करै ॥ छं० ॥ १६८ ॥ दोनों सेनाओं का लथ्य पथ्य होकर घोर युद्ध करना । छविराज। जुरे हिंदु मीर बहे षग्ग तीरं। मु मार मारं बहै सूर सारं ॥ ई० ॥ १७० ॥ भिरै दूअ भारं तुटै घग्ग तारं। अकथ्यं करारं कहे देव पारं ॥ ई० ॥ १७१॥ जुटै पंच षानं करक्कै कमानं । रघूवंस रायं धरै घग्ग धायं ॥ छ० ॥ १७२ ॥ नरं सिंघ रूपं जुरै नेक जूपं । महमूद षानं रघुवंस रानं ॥ छ ॥ १७३ ॥ यौ सेल मीरं पस्यौ मध्य वीरं । कही फौज साहं वहै कछवाह ॥छ।१७४ ॥ टु तीन षानं यंतीहि यानं । बहै षग्ग झट्ट सुदा हिंम घट्ट ॥ छं०॥१७५॥ बहै धार धारं करै मार मारं। हलो हल्ल मीरं नया नागपीरं । ई०॥ १७६ ॥ सिरै तुहि तारं मिले षांन सारं । अनुज्ज अपारं ॥ छं० ।। १७७॥ ढहावंत घायं मनो दृष्य वायं। गए सूर भेदं बरी अच्छ मेदं ॥ छं०॥ १७८ ॥ दुअं फौज राजंजु साहाब गाज। रहैदोस सामं करै सामि कामं छ०॥ १७८॥ करै देव साषो सबै कित्ति भाषी । ॥ छ ॥ १८० ॥ रावल के क्रोध कर लड़ने का वर्णन । कवित्त ॥ है तत्तो रघुवंस । भीर भंजन चहुआनिय ।। भयो तिन बेर । बरन बरनी सुरतानिय ॥ बीर मंत्र उच्चार । लोह अवछित उछछारै ॥ मिलि अछरि करि गांन । लोन गिद्दनि उत्तारै ॥ पुज्जत कलस धपि धवल सिर । कलह केलि भावरि फिरहि ॥ मंडप्प षेत मानिनि मुगल । सस्त्र कटाछ सु झुकि करहि ॥ छं० ॥ १८१॥ १मो.-सिंघ। * यह पंक्ति मो.-प्रति में नहीं है। (२) मो.-पूर्जत । - 900 पृथ्वीराजरासो। [चौबीसवां समय २८ .१ युद्ध की शोभा का वर्णन छंद चोटक ॥ दोउ दीन सु दुंदुभि लोह मिले । अँग अंग करकतर जंग षिले ॥ सहनाई नफेरिय नेक बज । सु मनों घट भद्दव मास गजं ॥ छं० ॥ १८२ ॥ घन टोप सु रंगिय तेज धुले । जनु पंतिय बग्ग हनेक मिले ॥ घन पाइक पंति भनंकत थे । मनों मोर कला करि नाचत यो॥०॥ १८३ ॥ धु धुरी दिस दिस्स* सबंग दिसा। दिशि पीत सु पत्तिय अब निसा ॥ गज बंधि सनैन चमकानि यौं। सुमनो लगि जक परब्बत ज्यौ ॥ई०॥१८४॥ किरवान कढंन कला दुसरी । सुमनों भर हौरिय सी पसरी । कटिकंध कमंधन कुहि जुरी। मनों बीज कला कुय छुटि परी॥ ई० ॥ १८५॥ असवार सु पष्षर कढि तवै । सुमनों घर बंटत: बंधव है। करि फुहि बगत्तर रत्त रयो। मनुजावक मैं जल बंटत ज्यौ ॥ छ॥१८६ ॥ भभकत भसुंडन सैड परी। बढि पावक ज्वाल मी निकरी ॥ दुडु बीच भसुंडन देव लसै । मनों वाल गनेस हि पूजि हंस ॥ छं० ॥ १८७॥ सिर फूटत भेजिय उड्डि चली । सु मनों दधि मट्ट उपहि हली ॥ तरफै घन घंटन घह सुधं । सु फिरै जल सुक्कय मीन उधं ॥ ई० ॥ १८८ ॥ गज उप्पर ढाल गिरै बर । सु गिरें गिरि केलि मनी जरतें ॥ गिरि केलि कमंधन चत परे । मनों भेष पिसाचन सांच करे। ई०॥१८॥ + बढ़ि बढि घनं घट सीस जरै । जनु बद्दल बद्दल बीज अरै जु सनाहन घाइ सुभै तन में। भर होरिका सी प्रगटी घन में ॥ ई०॥ १०॥ चवसठियों नारिय दै किलकी । सु नचै जनु गोपिय पैम छकी ॥ धन घाव सु बिद्दल यो घुरकैं। मनों बोलि कबूतर है सुरकै॥ ई० ॥ १८१ ॥ दुतियं उपमा कविता सुर कै । मनो पूर नदी इय ज्यों फुरकै ॥ तरवारनि तेज परै तरसी। घन घुम्महि मध्य मनों भरसी ॥ ई० ॥ १८ ॥ तिन उप्पर पंषिय बंधिय पंति । मनो षह इंद्र धनंकिय पंति ॥ पिलवान इलै करि पोल गिरे। कलसा मनो देवल के विहरै ॥ ई० ॥१९॥ १ मा-पिते। *को.--.-प्रति में "दिशि नीतिय नीति" पाठ है ३.-को-ए.-बंध। ४ मो.-"बंधव बंटत"। +ये दोनों पंक्तियां मो.-प्रति में नहीं है। ५ ए-द्विल। । २.-भरक्कत । ।

चौबीसवां समय २६ ] पृथ्वीराजरासो। 008 धन किंछ उपम करै सुरौ । मनो मेघ प्रवालनि कै वरषै । घन नाइ रही घन घुघघरियं । सु नचै मनों बालक विलरियं ॥ ई० ॥ १८४ ॥ इक सूरह की उपमा बरन । दर मध्य गरज्जन सिंघ मनों ॥ मुर तीन हजार सु लोह मिलें। तिन में दस तीन कमंध षिलें ॥ ई० ॥१८५॥ दस रावर हे वर घेत चढ्यौ । टुक की टुकरा नव टूक बनौ । दोह दीन रदै इतनै उनमान। मनों नारक प्रास' विचंद समान ॥ ई० ॥ १८६॥ रावल का शत्रु सेना को इतना काटकर गिराना कि सुलतान और उसके सेनानियों का घबड़ा जाना। कवित्त ॥ दसहै बर कटि समर । छोरि गज गाइ इथ्य लिय ॥ छिंछ श्रोन सब अंग । पुछप जनु दृष्टि देव किय ॥ किल किंचित रस भस्यौ । लुथ्य पर लुथ्यि अहुहिय ॥ सीस इक्कि धर जुहि । छुहि अरियन फिर जुहिय ॥ विड्डस्सौ देषि सुरतांन मन । सेन सब्ब मन विड्डस्यौ । अटि हार को पुज्जै नहीं। बल अभूत आतम कस्यौ ॥ ई० ॥ १८७ ॥ पृथ्वीराज का अपनी कमान संभाल कर शत्रुओं का नाश करना। कवित्त | तब पृथिराज नरिंद । साह सम्हौ गज साहिय ॥ पंच वान कम्मान | साहि गोरी झुकि बाघिय ॥ सरकि सेन सब धरकि । पछछ जंगल भए ठहूँ ॥ पथ्य जेम भारथ्य । कृष्ण सारथ सम गढ्ढे ॥ बर करकि करकि कमान कर | पंष तेज कुव्यौ सबल ॥ नट डोरि जानि पहा चौ। रुधिर कोरि मंडी तिलक । ई० ॥१९८॥ सुलतान का अपनी सेना को ललकारना कि प्राण के लोभ से जिसको भागना हो सो भाग जाओ मैं तो यहीं प्राण दूंगा। कुंडलिया | तब जंपै सुरतान अप । जीवत जाइ सु जाउ ॥ १ ए.-का--प्रान । (३) प.-मन । (३) मो.-तलक ।

900 ह तुम गज्जन बै पृथ्वीराजगसो । [चौबीसवां समय ३० जीवत रन रुक्किही । मो मति इहै सुभाउ ॥ मो मति इहै सुभाउ । ताहि निरषत बन्न एही ॥ कर तारी घन छांह । तूल अग्गै जिम देवी ॥ बीज छटा जिम प्रांन । नई काया मिन्न ढंपै ॥ ग्रह लोभी ग्रह जाउ । साहि आलम इम जपै ॥ छ० ॥ १८ ॥ सब लोगों का सुलतान की बात सुन बड़ाई करना। कवित्त ॥ सुबर बीर गजनेस | अंग चौरंग बात सुनि ॥ राज रंक पिल्लै विचार । नर नाग देव मुनि ॥ साह । दाव दिज्जै नहिं दुजान ॥ जस अपजस भै मरन । जद्द बंधै सज्जन इन ॥ दिसि अदिसि और दुष सुष्ष गति । ए सरीर लगा उच नीच चंपत चक्र गति । पति विपत्ति जिय सब सहै ॥ छ० ॥ २०० ॥ दूहा ॥ का काया मायातिका । का ग्रहनी ग्रह कोन ॥ अप्पन अंषिय मिहचतें । जो देषियै सुलोन ॥ ई० ॥ २०१ ॥ सुलतान का तातार ख़ां से कहना कि संसार में सब स्वार्थी हैं मरने पर कोई किसी के काम नहीं पाते । कवित्त ॥ सुनहि षांन तत्तार । अप्प स्वारथ सब लग्गे ॥ पसु पंषी बर जिते । तत्त सोइ तत मग्गे ॥ चियं बंध सेवक सुमंत । तन में तन चाहै ॥ सुर नर गनधर ओर । जग्य जापह अवगाहै । आचेत अवर परवसि परे । भूयन बिन मरदंग कह ॥ जम हथ्य जीव पंजर परै । पंच सलाकह तुछ सह ॥ ई० ॥ २०२ ॥ टूहा ॥ जमर काल सेो व्याल भ्रम । पंजर तुहत तेम ॥ षां ततार अरदास सुनि । मो आलम मति एम ॥ छ ॥ २०३ ॥ शाह का कहना कि सच्चा सेवक, मित्र, स्त्री वही है जो स्वामी के गाढ़े समय मुंह न मोडै। कवित्त । सो सेवक सनि खामि । स्वामि संकट कडावै ॥ । ।

चौबीसवां समय ३१ ] पृथ्वीराजरासो। ०११ । * सो सु मिच अप्पनौ । चित्त मित्ते न दुरावै ॥ * सो बंधव अप्पनौ । दसा अवदसा न कथ्ये । सोइ चिया अप्पनी । आस मुक्कै अंसु सथ्यै ॥ मति सोइ जो पग उप्पजै । बत्त मोह तत्तह मिलै ।। हम परत भिरत सुरतान सुनि । गज्जन वै गज्जन चलै ॥ ई० ॥ २०४ ॥ सुलतान की सेना का फिर तमक कर लोट पड़ना और लड़ाई करना। कवित्त ॥ तमकि तेज गोरी । नरिंद चित बेलै बल' साह्यौ ॥ अधम भृत्त बिन अब्ब । पुटि गोरी न समायौ । सुबर बीर सुरतान । सेन चहुआन ढंढोरिय ॥ पगी जांनि पारष्ष । जेम दरियाव हिलोरिय ॥ पछिलो पलन सुरतान दिषि । सिंघ लोक अविलरकयो ।। भुरि गयो सेन सुरतान को । छत्र सीस तब नंषया । ई० ॥ २०५ ॥ पांच खा और पांच ख़वासों का घोर युद्ध मचाना । कवित्त ॥ पंच पान सुरतान । पंच षावास सु चट्ठिय ॥ पासवान सुरतान । पास बाजू दोडू ठहिय ॥ रन रुंध्यौ सुरतान । सेन चहुबान ढंढोरिय ॥ मनु पलव्यौ नट भेस । बीर करुना रस सज्जिय ॥ भर भीर तीर कुहिय दिषिय । तब सु ओट आलम गहिय ॥ तत्तार षांन षुरसान षां । मंत मंडि सब दिषि कहिय ॥ ई० ॥ २०६ ॥ कवित्त ॥ जब सुषान षावास । भरर लग्गिय भय तप्पन ॥ बहिय सार मुष मार । छडि गोरिय बल अप्पन ॥ लाल डंड सिर छच । देषि सुरतान साहि पर । तब दौरै भर सुभर । इलै हल हल्ल धराधर ॥ बिचलिय सुफौज सुरतान लषि । तब कुहिय धर धीर सचि ॥ षानह सुपंच षावास भिरि । सिर पर श्रावध रीठ मचि ॥ ई० ॥ २०७ ॥ (१) मो.-मीचते। (२) ए.-.-ओल।

७१२ पृथ्वीराजरासा। चैबीसवां समय ३२ कवित्त ॥ दूत सुषान पावास । उतह सामंत सिंघ भर ।। रिस रिन मत्ती रीठ । तुट्टि ताइय मसंद घर ॥ गह गहत उच्चार । कही राजेंद्र राज गुर । तबह षांन रिस अब्ब । इथ्य बाहंत हंस धर ॥ जै जै सुसह जुग्गिनि करहि । कर पप्पर उनमंत मत ॥ दुअलरै दीन वस्ख स्वांम के । घुरत चंब चंबान घत ॥ ई० ॥ ६०८ ॥ युद्ध का वर्णन । छंद रसावला ॥ हिंदु मेछछभरी । ताल बजै हरी ॥ घाय घायं घुरी । मत्त छक्के परी ॥ छं० ॥ २० ॥ साहि साहाबरी । पान मुभम परी । राज रावल्लरी। कंध कंधे धरी ॥ ई० ॥ २१०॥ सीत तुट्टे तुरी । उक नह करी ॥ ईस सीसं जुरी । नंचि नारहरी ॥ ई० ॥ २११ ॥ थेडू थेई धरी । गिद्ध सिद्धं करी ॥ जस्स जंगलरी । षांन पावासरी। ई० ॥ २१२॥ जंग जुड़ें भरी । भीर राज परी॥ मार मारुचरी । हिंदु सामसरी ॥ छ• ॥ २१३ ॥ हल्ल इल्लं धरी । मन्ने दूई मुरी ॥ फौज पिछी फिरी । राज राजंगरी ॥ छ• ॥ २१४ ॥ धीर कुट्ट धरी । वालि रावल्लरी ॥ इनौ मीरवरी। अश्व ठंडे परी ॥ छ । २१५ ॥ हाय हायं सुरी। बढ़ियं बंबरी काल दिडं सुरी । मह घट्ट करी ॥ छं० ॥ २१६ ॥ दिष्षि राजंतरी । इंडि इंसं हरी ॥ कंक बंकं करी । मीरषांनू नरी । ई० ॥ २१७ ॥ ढाल षांनं ढरी। अप्प होरै अरी। कढि कीरं मरी । बाहि दूषां नरी ॥ छ । २१८ ॥ %3D चौबीसवां समय ३३ ] पृथ्योराजरासा । ०१३ सेस विच्छेदरी। रंभ थंभ ढरी । देषि दाहिंम्मरी । पीप सा निड्डरी ॥ ई० ॥ २१८ ॥ अल्ह सारौ सरी । दूर गजं बरी ॥ देषि लोहं जरी । बग्ग बग्गं भरी ॥ ई० ॥ २२० ॥ जुद्ध भूतं करी । काम सामंतरी। भीर पछछी परी । चढि हंसे सुरी ॥ ई० ॥ २२१ ॥ भाल भल्लै सुरी । राज कित्तं करी ॥ अठ्ठ षानं गिरी । दूअ रावल्लरी | ई० ॥ २१२ ॥ और सब्बं सरी । पान ढाहे धरी । कित्ति चंदं करी । नाम ले अन्नरी ॥ छं० ॥ २२३ ॥ दीह दस्सं बरी । सेष सेष परी। संक सुच्छ सुरी । भान थानं परी ॥ ई० ॥ २२४ ॥ भेद चल्ले सुरी। हर से अंबरी। बिंद ढुंढे फिरी । जैत राजगिरी ॥ छं ॥ २२५ ॥ कित्ति देवं करी । फौज इल्लै धुरी ॥ चल्ल विचल्लरी। कुस्स कुस्सं मरी ॥ ई० ॥ २२६ ॥ । देव नंबै परी । २२७ ॥ कन्ह का खुरासान ख़ां को मारना। छंद मातोदाम ॥ पस्ची जहा सेन सुरावर सार । मनों मदमत्त कँठीर गुंजार ॥ नया सिर नाग सुमंडिय जंग। घुरे सुर जोरया चंबक संग ॥ ० ॥२२८॥ वहै करि वार सु संगिय सूर। परे पर नार असूर पनूर ॥ गही बर सिद्ध रू सूर समंत । भया जनु आंनि कै ईसर अंत ॥०॥२२८॥ नवै दय तारिय चौमठि नारि । बर बर सूरय देय धमारि ॥ मिले सम कन्ह अनी षुरसान । वकै दुइ ईसह आन समान ॥ई० ॥ २३०॥ दुधे बर धारिय संग गुमान । हए हिय कन्ह सुषान उरांन । पयौ षुरसान सु बंधव नेत। बढी अति देषि प्रथी पति जेत ॥ 2 ॥२३॥ ॥ ५१) मो.-जोरसु ।

०१४. पृथ्वीराजरासो। [चौबीसवां समय ३४ खुरासान खां के गिरते हिन्दुओं की सेना का फिर तेज़ होना टूचा ॥ परे षेत पुरसान पां । ढहि घन घाय अचेन ॥ फिरि दल हिंदू जोर हुअ । बजि वरताई पेन ॥ ई० ॥ २३२ ॥ पृथ्वीराज का ललकारना कि सुलतान जाने न पावै इसको पकड़ो। सब सरदारों का टूट पड़ना। वंद मोतीदाम॥ मिले बर हिंदु तुरक सुतार । कटक्कट वज्जिय लोह करार ॥ उडे बर षग्ग न टूक निनार । मनो कुटि सूर किरन्न प्रचार ॥ छं० ॥ २३३॥ कहै बर कुहि सुबोल उचार । जपै उर राम कहै मुष मार ॥ भिरेभर मीर सु सामंत सुद्ध । कदै कवि कथ्य सु अंषिन लड्न ॥छ॥२३॥ बहै स्वर संग ढोजन अपार । ढहै बर मीर सुअंग अगार ॥ चंपे दल माहि जके चहुबांन । गही सुरतान हनौ षग पान ॥ ई० ॥ २३५ ।। फुले मनो साइप धम्म सुरत्त। बन्यौ मन सांहि गहन सुवत्त ।। चवै चहुबान अहो पर सूर। करी सबमीर षरग्गय चूरि ॥छ० ॥ २३६ ॥ तपे गहि राज सु संग विभाग । कुटे धर मीर सुधीरज नाग ॥ चवै मुष मार सुचावंड राह । दलों सुरतान करों इक घाइ ॥ ई०॥२३७॥ सुने बलिभद्रय पीप सु अल्ह । नरा सिर निडर रष्यन गल्ह ।। चंपे चव सामंत धाइ परेस। बर बर सेल किया इह भेस ॥ ॥२३८॥ लगी बर मेल कम निमास । फुले मधु माधुअ केसु पलास ॥ कटे वर षग्ग कमव निसार । तुटै वर देवल अंड अधार ॥ई० ॥ २३८ ॥ इकै बर सामंत जुद्ध अनुछ । परे असि टेकत उहि कमंध ॥ चले बर नालय रुद्धि प्रनाल। नषै वर सूर अपच्छर माल ॥ ई० ॥ २४०॥ कुयौ धर धीरज मीर अभंग । बढ़ी बर जैन सु दिष्यिय जंग ॥ फटी बर फौज अनंधिय जात। अघाइय गिद्ध रू सिद्ध सुमान ॥ ई० ॥२४॥ नचे बर नारद बीर निसान । थेई थे कहत वै थिरतान ।। (१) मो.-बहै। (२) मो.-शुद्ध। (४) ए.-.-को-ठहै वर। (३) ए.-कृ.-को.-घर । (५) मो.-सनास चाबीसवां समय ३५ ] पृथ्वीराजरासो। ०१५ बर सु । रिसै अति ताडू तुतार सुढांन। मिलै मुहुजोर हुए मरदान । छ० ॥२४२॥ हए हिय नेज ततार सुतंन । पस्यौ धर मुच्छि को धनि धंनि ॥ करै मुष कित्ति नषै कुसमंन । हली वर फौजय साहि सुतेन ॥ ई० ॥ २४३॥ ढहै मीर साहिज मंन । ....... ........... ई० ॥ २४४॥ घोर युद्ध होना, शाह और एथ्वीराज का सम्मुख युद्ध । द्वछा ॥ अति संकर वर जुद्ध हुअ । इत राजन उन साहि ॥ दोज नेन अंकुरि परे । बजि बीरा रस ताहि ॥ छ० ॥ २४५ ॥ शहाबुद्दीन का तलवार से और पृथ्वीराज का कमान से लड़ना। उअ रुष प्राइसाबदी। इय रुष आइय राज ॥ इय कर घोले घग्ग बर । उअ कमान कर साज ॥ 5 ॥२४६ ॥ दोनों नरेशों का युद्ध वर्णन । कवित्त ॥ जबहि साह अालम्म । झुक्कि कम्मान अप्पगहि ॥ तबहि राज प्रथिराज । तेग पक्करिय अप्प रहि ।। वह बरषत वर तीर । पंचि वरपंत सार ढहि ॥ इहै तेज पग भमहि । करी तुहे कमंध बहि ॥ आलम्म राज दुअ जुद्ध हुअा नह दिष्या दानव रू सुर ॥ बर दाय चंद इम उच्चरें । करत कित्ति गैनह अमर ॥ ई० ॥ २४७ ।। चोर वर्णन । शाह की सेना का भागना । छंद त्रिभंगी ॥ पढ़ मंदह रतन श्रह रतनं पुनि वसु हरनं रस रहनं । चभंगी छंदं पढ़ सु चंदं गुन वहि दंदं गुन साई । अंतै गुर सो महि लय मोदै सिइ.समो यह होई । विज्ज वर षग्गं असि मर लग्गं भिरि भिरि जग्गं रजि रंधं ॥ ई०॥ २४८ ॥ बज्जै रिन तालं माहो मालं षग्ग सु पालं भिरि चालं । राजा प्रथिराजं असबर झालं स हि सु साजं भिरि भाज। (१) मो.-रचे। (२) मा.-झुक्ति। (३) ए.-.-को.-हरणं । (४) ए.-.-को-हरणं ।

पृथ्वीराजरासो। [चौबीसवां समय ३६ । किरवान रुकतं सजि बलवंत भिरि भय अंतं कलमंतं । पप्पर अधिकारी मष्टि नारी दैदै नारी किलकारी ॥ छ० ॥ २४९ ॥ उक ईसर नई नचि उन मदं रजि रज सई जुरि जंगं। अदभुत रस अंगं षग्ग उनंगं सार सुभंगं परि रंगं ॥ सामंतं सूरं चढ़ि विनूरं बजि रन तूरं असि चरं । तुटै धर मीरं साह गुहीरं गजि गंभीरं भिरि बीरं ॥ ई० ॥ २५० ॥ नचि मीर कमंध इसै तसिद्धं भिरि भिरि जुद्धं षग षड़। न हय हंसं तेज तरंसं सहित सरंसं करिगंसं । बुल्लिय सुबिहानं हिंदुअरानं कढि कृपानं गहि पानं ॥ झारे षग माहं विज्जत कुटुं वाहि बिकई नचि नहं ॥ छं० ॥ २५१ ॥ इनि इनि सामंतं जानि जुगंतं भिरि भर जंतं अरि अंतं । चच्चर चहुबानं गह गह बानं साहि सुतानं बलपानं ॥ झंडे सिर छचं साहि स तंचं गोधीरचं मनमंतं । बहरी तजि बाजं रुहि गजराज लरिषग साजं कह काजं ॥ ई० ०२५२ ॥ तत्ते परि राजं साहि सु साज जै जुग का रस साजं ॥ आलम अरु राजं दुअ दे हाजी इनि हनि वाजं भिर वाजं ॥ दिषत्री तहां राजं तजि गज राजं हेंवर साजं गुर गाज गहि कर कंम्मानं तीर सुतानं लगि असमानं बहि वानं ॥ छ ॥ २५३ ॥ चिस झल्लर टोपं राजन धोपं असि वर जोपं वह कोपं ।। बिहानं कर अप्यानं अहि सुरतानं बलवानं ॥ उड़ि दिसि दिसि भाजं मीर अकाज पष्पि सहाजं गहि बाजं ॥ भग्गी बर फौज साहि सु जो मन करि मौज धरि धौज ॥छ ॥ २५४ ॥ शाह की सेना का भागना और शाह का पकड़ा जाना। दूहा ॥ भगी अनी बुरसान षां । कुहि मीर धर धंम ॥ गया साह आलम कर । विचलि सुभर तजि अंम | ई० ॥ २५५ ॥ सुलतान की सेना के भगेड़ का वर्णन । छंद भुजंगी ॥ कुसादे कुसादे कई पानजादे। (१) मो.-रानं है हनि सु चौबीसवां समय ३०] पृथ्वीराजरासो। ०१० । ग्रयो हथ्थ गोरी अबें साहि बादे ॥ लग्यो चित्र कोटी सुरत्तांन सायौ । वजे वे निसानं मजित्यो सराया ॥ ई० ॥ २५६ ॥ गया भग्गि तुरंभ मरहठ्ठ वाली । गयौ सत्त मुक्के नृपं वे पँचाली । सो सेत बंधी रहे सेत मुक्के । गया हब्बसी रोमसा धंम चुक्के ॥ ई० ॥ २५७ ॥ बरा रीत गौरं भगे रूंड मुडं । पस्यो मभभ सामंत गोवाल कुंडं ॥ भग्या कनरी हस्त बे हस्त बानं । भग्यौ बेदरी बल कदी छडि पानं ॥ ९ ॥ २५८ ॥ बदं वे कुसादी पत्रौ कासमीरं । मुलत्तान षड् कुन्यौ हथ्य तीरं ॥ भग्यो प्रब्बती एलची झारपंडी। जिने भुज्ज गोरी ग्रहं लाज मंडी ॥ ई० ॥ २५९ ॥ भग्यो वै बंगाली करनाट वाली। भग्यो भागि सांद्रोह कुरंभ वानी॥ पस्चौ झुझि सा बहरी वह तीनौ । जिने ठेलि चहुआन सब सह दीनौ ॥ ७० ॥ २६० ॥ बयं विंदु वाली भग्या सथ्य सब्बं । जिने लोहची लग्गि अंची न कब्बं । मयं मेछ बड्डे मयं मक्क राया । जितें भागते बार लागी न काया । ० ॥ २६१ ॥ भग्या ब्रह्म जा पुत्र अची कुचीरं । जिने तें भग्गि सुरतान धीरं ॥ भग्यो गज्ज पीरा उसा रत्त नाथं । भग्या अग्गिवानं मानं सु साथं ॥ ई० ॥ २६२ भग्ग सु (१) मो.-अंचन ।

०१८ पृथ्वीराजरासे। [चौबीसवां समय ३८ १ पस्यौ षांन आवब संसार साषी । जिने दीन बंदेन की लाज राषी ॥ छं० ॥ २६३ ॥ रविवार चतुर्दशी को समरसिंह का यह युद्ध जीतना और धन निकालने का चलना। कवित्ति ॥ गहि लीनो सुरतान । समर लिन्नौ जसुभारी ॥ चामर छत्र रषत्त । बषत लुहे रन रारी ॥ चिच कोट चव रंग । साहि दिन्नौ चहुबानं ॥ चतुर दसी रवि बार । वीर बज्जे परवानं ॥ बुल्लया बीर कैमास तब । धन कळून चल्लो समुह ॥ श्रारब्ब राव भीरा सुबर । चंपि जु रप्पा गंज उह ॥ छ० ॥ २६४ ॥ एथ्वीराज के सुलतान को पकड़ने पर जय जयकार होना। दूहा ॥ परे सेन गोरी गरुन । गहि लीनो सुरतान ॥ मोमेसर नंदन सुकर । जै लिन्नौ जय पान ॥ छं० ॥ २६५ ॥ इस विजय पर चारों ओर आनन्द ध्वनि होना। कवित्त ॥ गया साहि पालम्म । सुजस लीना चहुआनं ॥ पलक षांन भग्गिय विहानु३ । परे है मै धर थानं ॥ मीर मसंद मसंद । कटे सामंद इथ्य भर ॥ दु राजन भर जुरे । सुवर लिन्नौ सु अप्पकर ॥ सबद्द जुग्गिनि करै । सीस गरे ईसन समथ ॥ कवि कहै चंद भारथ्य बर । करिय गन्य प्रारंभ कथ ॥ छ ॥ २६६ ॥ राजगुरु का कहना कि अब विजय कर के एक बेर दिल्ली चलिए फिर मुहूर्त बदलकर आइएगा। दूहा ॥ करिय जैत राजन सु बर । चलिय लछिछ बर साज ॥ तब विचार राजन गुर । कही राज सिरताज ॥ ई० ॥ २६७ ॥ तव रावर वर राज गुर । कहिय राज प्रथिराज ॥ (१) मो.-नारी (२) मो.-वह । (३) ए.क.को-विहान ।

चाबीसवां समय ३६] पृथ्वीराजरासो । ७१६ ढिल्ली दिसि ग्रह चल्लियै । फिरि सु मुहरत साज ॥ ई० ॥ २६८ ॥ राजा का पूछना कि पीछे लोटने को क्यों कहते है। इसका कारण कहो। फिरि राजन हम उच्चरिय । सुनो हु नरिंद ॥ का कारन पी फिरै । सो कारन कहि नंद ॥ ई० ॥ २६ ॥ उनका उत्तर देना कि इस विजय का उत्सव घर पर चलकर करना चाहिए। तबै सिंघ फुनि उच्चरिय । अहो समंतन राज ॥ साह गयौ तु जैन हुअ । ग्रह करि मंगल काज || ई० ॥ २७० ॥ यहां राव दाहिम के साथ सेना चन्द भट्ट और सामंतों को छोड़कर शुभ काम कीजिए। रहै अप्प सेना सुसथ । अरु दाहिम्म सुराज ॥ भह चंद सामंत सथ । करि सुभ मंगल काज ॥ ई० ॥ २७१ ॥ वहां से लौट कर तब धन निकालना चाहिए। जतन लछि बर किज्जियो । रहो सुभर जब रह फिर दूरजिंद इन । तब कलै लछि आनि ॥ ई० ॥ २७२ ॥ पृथ्वीराज का दाहिम का मत मानकर दिल्ली चलना स्वीकार करना। गाथा ॥ कहि प्रथिराज नरिंदं । जु का कहै सिंघ दाहिमं ॥ सोइ थप्पिय द्रढ मंतं । चनि राजिंद ढिल्लि मग्गेयं ॥ छं० ॥ २७३ ॥ फागुन सुदी तेरस को दिल्ली यात्रा करना । ढिल्ली मग्ग सु चलयं । फागुन सुदि चयोदसी दिवसं ॥ क्रमे सु दस दिन मग्गं । अवरं रष्पि सब्ब भार तथ्थं ॥ ई० ॥ २७४ ॥ (१) मा.-करि चल दिल्ली साज । (२) मो. प्रति में "जब आंज दिल्ली सुजै तव कंठे लछियांन" । (३) ए.स.का-मंग्गाद। अप्पानि॥ - ७२० पृथ्वीराजरासा। [चौबीसवां समय ४० रावल के साथ दाहिम आदि सरदारों और सेना को छोड़कर और कुछ सामंतों और सेना को लेकर दिल्ली यात्रा करना। दूहा ॥ सकल सथ्य रावर सुभर । अरु दाहिम गुर राज ॥ भह चंद बर दाइ बर । आनि समंत सकाज ॥ छं० ॥ २७५ ॥ कवित्त ॥ बड़ सामंत सु काज । अचल पुंडीर मंच गुर ॥ राम रैन पावार । चंद हाहुल्लि सेन वर ॥ रष्षि पास नृप सिंघ । रहै थह बच्छि सुभदं ॥ और सकल सब सथ्थ । जुद्द जस लहन सुघहं ॥ ला मद्धि राज संबोधि थपि । सु गुर मंच बरदाइ थिर ॥ चढि चले राज दिल्ली दिसा । लै जडू पज्जून भर ॥ ई० ॥ २७६ ॥ राव पज्जून, कन्ह आदि राजा के साथ चले। द्वहा ॥ जाम देव पज्जन नर । वलि भद्र जैत अरु सिंग ॥ कन्ह काय चहुबान वर । चले राज गुर संग ॥ छ० ॥ २७७ ॥ शत्रु को जीत कर होलिका पूजन के निकट राजा चले। अरिय जीति ग्रह दिसि चले। आइ निकट हतास ॥ चन्डत पंथ राजन ने । पूजा करनह जास ॥ छं० ॥ २७८ ॥ होलिका की पूजा विधि से करके शाह को लिए घर की ओर चले कवित्त ॥ निकट सुदिन हूतास । पूजि इन भति राज नर । चंदन कुमकुम अगर । नंषि श्रीफल असंष फर ॥ फिरि परदष्षिन राज । मांनि बर विप्र बेद धुर ॥ घुरै नद्द नीसांन । गांन नर तर्क न. बर ॥ ज्वालनिय माल तृप्पय नृपति । अति सुदेव नवेद जुत ॥ दिन बीच चले जोगिन पुरह । अघिय मेछ संग्रहनि भति ॥ ई० ॥ २७८ ॥ कुमार का पैदल आध कास आगे बढ़कर मिलना। दूहा ॥ अहिथ साहि ग्रेहं गवन । आइ मिले सुकुमार ॥ मधसाह अध कोस पर । ईडि तरिय पै पारि ॥ ७० ॥ २८० ॥ ।

चौबीसवां समय ४१] पृथ्वीराजरासो । ०२१ राजा का कुमार का सवार होने की आज्ञा देना। चढन राज बर हुकुम दिय । रेत सुमंत हु साज ॥ जैन हुई आनंद करि । ग्रह जित्तन मुभ काज ॥ ई० ॥ २८१ ॥ चैत बदी सप्तमी को महलों में पहुंचे। गाथा । ग्रहन जित्त अरि अहियं । चैच बदी सत्तमी दिवसं ॥ गुरुवार सुभ जोगं । राजा संपन्न धवल मभझेनं ॥ ई० ॥ २८२ ॥ महल में सब स्त्रियों ने आकर निछावर किया। आये राज सुधामं । गए ग्रह मंद्धि साल सुभ तथ्यं ॥ बोलि आइ सव वामं । निवकावरं करि गई ग्रेहं ॥ २८३ ॥ स्त्रियां अपने अपने घर गई। राजा ने विश्राम किया और वे नाना भोग विलास कर सुखी हुए। गई ग्रेह ने चीयं । राजन सुख बिसमियं तथ्यं ॥ अति मादक उनमादं । करि सुष सेन रमन रस क्रीडा ॥ छ । २८४ ॥ दूहा ॥ क्रीडि वाम नृप रंग करि । नेह संपूरन काज ॥ दीय बचन रपन सुजन । डोली साह सुराज ॥ ई० ॥ २८५ ॥ शहाबुद्दीन की डोली मंगाकर उसे भोजन कराया और आज्ञा दी कि इन्हें सुख से रक्खा जाय । डोली साह सहाब की। दोडू रकेव बर मथ्थ ।। सो डोली कज दस असुर । करि हुकम मर मथ्थ ॥ ई० २८६ ॥ दस आदम साहाब कज । रषि भोजन चप पास ॥ सुष सचाब तुम रष्पियो । रहै राज सुभ भास ॥ छ ॥ २८७ ॥ शाह के पकड़े जाने और दिल्ली पहुंचने का समाचार पाकर उसके अनुचरों का आतुर होना। सुनिय बत्त गज्जन पुरह । ग्रहत साह की घत्त ॥ अनुचर आतुर अति भयो । उर जानी अविगत ॥ छ० ॥ २८८ ॥ । (१) ए.-.-सास।

०२२ पृथ्वीराजरासो [ चौबीसवां समय ४२ एक बीर ने दौड़ आकर यह समाचार तातार खां को दिया। डर जांनी अविगत्त जब । भजि आया भट मभि ।। कहर इक्कि पानीय चढि । कहि ततार अग गुभा ॥ छं० २८८ ।। ततार ख़ां ने खत्री को तुरंत पत्र देकर दिल्ली भेजा कि आप बड़े भारी राजा हैं अब कृपा कर शाह को छोड़ दीजिए। गाथा ॥ सुनिय ततार सु तब्बं । रहनं तुछ दिल्लीपुर राजं ॥ षिची आतुर पश्यं । बेगं माहि दंड कज्जेनं। कं० ॥ २९ ॥ दहा ॥ तुम जाहु सु चहुबान प्रति । कहु सलाम सब सथ्य ॥ तुम सु बढे हिंदून में । कुटै साहि सुभ बत्त ॥ ई० ॥ २९१ ॥ तब ततार अरदास लिषि । प्रति पठई राजान ।। तुम छडी । पतिसाह को। तुम सुं बड़े चहुबान । छं० ॥ २२ ॥ खत्री का पांच सौ सवार लेकर दिल्ली की ओर चलना। पित्री चलि चहुबान पै। करिके सबन सलाम । पंच सत्त असबार लै । कोस सत्त मुक्काम ॥ ई० ॥ २८३ ॥ खत्री शकुनों का विचार करता, बारह कास नित्य चलता हुआ दिल्ली की ओर बढ़ा। छंद पद्धरी ॥ धर मग्ग चल्यौ षत्रीस हिंदु । अति चिंत सुरतान बंद ॥ हादसह कोस प्रति चलै मग्ग। निज मंत्र इष्ट चितवन सु लग्ग । ई०॥२९॥ अपसगुन सगुन चितो विचार । दिसि बाम सिंघ दिष्षी दहार ॥ उल्लक सबद दिय गिरह सीस । दाहिन सुपत्त मग मृगी ईस ॥॥२५॥ मृतक रथी सनमुषह आइ । फुनि समुष ग्राम लग्गी स लाई ॥ अति उअर षिधि आनंद जग्ग। आतुरह चल्यौ दिल्ली समग्ग॥ छंगा२८६॥ खत्री लारक का दिल्ली के पास पहुंचना । कवित्त ॥ तव षिची लोरक्क । चले दिल्ली पुर मग्गं । पंच सत्त असवार । उर सु चिंता मन भग्गं । वामी देव चवंत । तार उकछव सिर उप्परि । मृग समूह दाहिने। चल्ल्यो पह पिंगी निकर चौबीसवां समय ४३] पृथ्वीराजरासो। बंदेव चित्त मन मत्त हुअ । चल्यो कूच पर कूच परि ॥ पाए निकह दिल्ली सु तट । मन चिंता अंदेस हरि ॥ ई० ॥ २८७ ॥ लोरक खत्री का दिल्ली के फाटक पर एक बाग में ठहरना और वहीं भोजन करना । गाहा ॥ मन चिंता अंदेहं । षिची आई दिल्ली मझेनं ॥ अनि सिरह मे क्रमियं । आयं डाक चैाकि लोरध्वं ॥ ० ॥ २९८ ॥ सहां उतरि लारष्यं । बाग निरष्धि उत्तिमं छाहं ॥ भोजन करि बहु भंतं । आहारे अन्न तथ्याहं ॥ ई० ॥ २८८ ॥ दो घड़ी दिन रहे दिल्ली में प्रवेश किया। दहा ॥ दोइ घरी दिन पछछ रहि । चल्यौ दिली पुर मांहि ॥ अति उज्जल वस्त्रंग वर । प्रावर षित्रि उछाह ॥ ० ॥ ३०० ॥ नगर में घुसते ही फूल की डाली लिए मालिन मिली। यह शुभ शकुन हुआ। नैर प्रवेस सगुन्न हुन । मालनि फूल उलंग ॥ लिए बंदि षिची सुमन । मुक्कि मधुर सुभ नंग ॥ ई० ॥ ३०१ ॥ खत्री का पृथ्वीराज की सभा में पहुंचना । चलि षिची दरबार मग । जहां राज प्रथिराज ॥ अवर सूर सामंत सुभ । बेठे सभा विराज ॥ ई० ॥ ३०२ ।। बोढ़ी पर से समाचार भिजवाया कि तातार खां का भेजा वकील पाया है। राजा ने तुरंत साम्हने लाने की आज्ञा दी। लोरक ने दौर में आकर सलाम किया। कवित्त । गय षिची दरबार । हार पालक सम अष्षिय ॥ कूरम केहरि कहाँ । साहि उक्कोल सुलष्षिय ॥ गय केहरि वप निकट । कहो गज्जन पुर दूत ।। पठयो पान ततार । साह झंडावन बत्तं ।। नृप बोलि कहाँ हज्जर तिहि । एका एकी मध्य लिय ॥ सनमुष्प आइ चहुवांन को । सीस नाइ तसलीम किय ॥ ३०३ ॥ ।

हुकुम राजांन किय । करि सलीम बैठे। नरिय ॥ ० ॥ ३०४ ॥ ०२४ पृथ्वीराजरासा । [चैबीसवां समय ४४ सभा में बैठे सामंतों का वर्णन । राजा की आज्ञा से लोरक का सलाम कर के बैठना ॥ कवित्त ॥ सभा विराजत राज । आइ बैठे सुब्बर भर ॥ कन्ह का चहुवांन । जैत बलिभद्र सिंह नर ॥ जाम देव पज्जन । बड़े सामंत लज्जभर ॥ और सकल भर राज । बैठि तहां माल रंग जुरि ॥ आए सुतांम लोरक्क तब । मिलि सलाम राजन करिय ॥ बैठन लोरक ने तीन सलाम करके तातार खां की अर्जी राजा को दी। दूहा ॥ सब षिची प्रथिराज को । करि सलाम तिय वार ॥ निषि अरदास ततारषां । समयी बीर विचार ॥ ई० ॥ ३०५ ॥ मध्धु शाह प्रधान को पत्र दिया कि पढ़े। मध साह परधान कर । दिय पत्री षत्रीस ॥ किय हुकम्म बर राज ने । बचे साह जगीस ॥ छ० ॥ ३०६ ॥ तत्तार खां की अर्जी में शहाबुद्दीन के छोड़े जाने की प्रार्थना । साटक ॥ स्वस्ति श्री राजंग राजन बरं धर्माधि धर्म गुरं । इंद्रप्रस्त सु इंद्र इंद्र समयं राज गुरं वर्तते ॥ अरदासं तत्तार षांन लिषियं सुरतांन मोक्षं करं । तुम बड्डे बड्डाइ राजन सुरं राजाधिपो राजनं ॥ छ० ॥ ३०७ ॥ राजा ने अर्जी सुनकर हँस दिया और खत्री का विदा किया दहा ॥ तब षिवी अरदास किय । बंचि सुनाइबर राज ॥ तब राजन प्रसन्न हुआ। दई सीष थह काज ॥ छ० ॥ ३०८ ॥ उठि राजन दीने बहुरि । थह षिची गय अप्प । मन चिंता लग्गी घनी । राजन देषत तप्प ॥ ० ॥ ३०८ ॥ (१) ए.-.-को--गुहीर । (२) मो.-.-.-n ॥ ।

धोबीसवां समय ४५ ] पृथ्वीराजरासो। 9२५ दूसरे दिन लोरक फिर दर्बार में आया। बहुरि सु आए दिन अवर । मिलि राजन किय बत्त ॥ सेंमुष राजन उच्चरिय । मन सु अगोचर तत्त ॥ ई० ॥ ३१० ॥ लोरक का पृथ्वीराज की बड़ाई करके शाह को छोड़ने की प्रार्थना करना । पृथ्वीराज का पूछना कि गोरी नाम क्यों पड़ा? छंद पङ्घरी॥ षत्रीस बेन सम अष्षि राज । चहुवांन बस तुम हिंदुलाज । चीतौर स्वामि कै संभरेस । चालुक्क राज जिहि षाग षेस ॥ छ० ॥ ३११ ॥ कमधज्ज मंगि तिहि व्याहि अप्प । जैचंद उरहि दिय अनुज नपरे ॥ कर वार साहिबंधया पांन । दीनो केवार जिहि जीव दांन ॥ छं० ॥ ३१२ ॥ तब लोरक समः पुकै नरेस । गोरी सु नाम किहि विधि कहेस ॥ सम राज अष्वि षत्री तिवार । नृप राज एह अदभुत विचार ॥छ०॥ ३१३॥ लोरक का इतिहास कहना कि असुरों के राज्य पर शाह जलालुद्दीन बैठा, वह बड़ा कामी था। पांच सौ दस उसके हरम थीं पर संतान न हुआ, तब शाह निजाम की टहल करने लगा। कवित्त । बैठि पाट असुरांन । साह जल्लाल प्रमानं ॥ अनँत तेज पग नाप । अनंत दातार दिवानं । पंच सत्त दस इरम । साह कामी तप भारी॥ इमल हरम निज जांनि । *हनै कर असि बर नारी॥ सुत ताप राज डरतें गहन । काम वैर निसि साह मन ॥ सुरतांन बैर अग्गै धरिग । मेष निजाम सु हुअ प्रसन ॥ ई० ॥ ३१४ ॥ शेख निजामुद्दीन ने प्रसन्न होकर आशिर्वाद दिया कि तुम्हें (१) को.-.-ए-तुगर । (२) .--नाय । (३) मो.-समह । * मो.-प्रति में "हनै कर वर कर नारी" पाठ है।

०२६ पृथ्वीराजरासो । [चौबीसवां समय - ऐसा प्रतापी बेटा होगा कि चारों ओर असुरों का राज्य फैलावेगा और हिन्दुओं को जीत दिल्ली पर तपैगा। प्रसंन निजाम सुसेष । लेष सांई इमलेषं । अहो साइ जल्लाल । आलि तुझा समथ सदष्यं । महा प्रबल तप तीन । दीन हिंदू दल अालम ॥ धरि करिहै निज पान । जोर जुग्गिनि पुर जालम ॥ अज्जाब नारि तिहि पाप तें । असुध कित्ति दुनियां रहै ॥ दस दिसा दप्प असुरांन दल । लिहि लिलाट तितो लहै। छ॥ ३१५ । शाह घर आया। चित्त में चिन्ता हुई कि जो यह लड़का ऐसा प्रतापी होगा तो मुझे मार कर राज्य लेगा। इतने ही में एक बेगम को गर्भ रहने का समाचार मिला। शाह ने सिर ठोका और उस बेगम को निकाल दिया। पांच वर्ष बीते शाह मर गया, वजीर लोग सोच में पड़े किसे गद्दी पर बैठावें। एक प्रख ने गोर में रहने वाले एक सुन्दर बालक को दिखलाया। छंद विअष्वरी ॥ आयो निज सुरतानह गेहं । बेन निजाम उवर दुष लेहं ॥ जौं मुझ सुत हहै बल कारो। तो मुझ मारि लेद धर सारी ॥ ई० ॥ ३१६ ॥ तितें नारि दूक अभह. धरयो । दासी कान साह अनुसरयौ । ततषिन साह सीस इनि नारी । समह गरभ धर मंडरे सुधारी ॥०॥ ३१७ ॥ बरष पंच अनि ऊपर वीतं । हु साह सुरतान सुअतं . सबै षांन मिलि मंत्र विचारं । कवन सीस अब छत्र सुधारं ॥ ई० ॥ ३१८ ॥ सेष एक मधि गोर निवासी । तिहि अदभुत रस दिष्षि प्रकासी ॥ अष्षिय आइ जहां मिलि षानं। कुदरति कथा एक परमानं ॥ ई० ॥३१९ ॥ भूठी होइ तौ सजा नहीजै । सच्ची हुबै निवाजस कीजै ॥ सबै षांन मिलि पछै बत्तं । कहिवे सेष सु क्म कुदरत्तं ॥ छं. ३२० ॥ [१] मो.-मसनि नानि हंसेष २] ए.-.-को.-अलि." [३] मो.-मंडह। [४] :ए.-:-को-कटररि।

चौबीसवां समय ४७] पृथ्वीराजरासो। १२० । बीवी फतेसाह की घरनी । कुदरति गोर मद्धि एक धरनी ॥ गोरि महिइक चेलक वास । देष सरूप कोटि रवि भासं ॥ ई० ॥३२॥ सबै षांन मधि गोर सिधाए । करि अंगुरी तिहि सेष दिषाए ॥ ई० ॥३२२ ॥ उस बालक का प्रताप सूर्य के समान चमकता दिखाई दिया । दूहा । गोरि दिखाई षांन तिहि । ततषिन भंजी पाज ॥ निकस्यौ सूरति सरस का। जोति भांन महराज ॥ छं ॥ ३२३ ॥ ज्योतिषी को बुलाकर जन्मपत्र बनवाया उसने कहा कि यह जलालुद्दीन से भी बढ़कर प्रतापी होगा। इस की जाति गोरी है। यह हिन्दुस्तान पर राज्य करेगा। कवित्त । जाति रूप महराज । साहते प्रगट सवाया। षांना षांन जिहान । बेगि निजूमि बुलाया ॥ लिषिय जनम तिय लेष। मेष तत षिन इम अष्षो । नाम साह साहाव । जाति गोरी तिहि दष्पी । बहुतेज तपत तप जग्गि है। धरा हिंद सम लम्गि है। दस दिसा साच दोही फिरै । घन बीरा रस भुग्गि है। ई० ॥ ३२४ ॥ लोरक ने शाह की पूर्व कथा इस प्रकार कह सुनाई। दूहा ॥ जाते बहु रिन भग्गि है। फुनि तिहि गरि है पानि ॥ पुब्ब कथा षिची कहै । सुनहु राज चहुनि ॥ ई० ॥ ३२५ ॥ पृथ्वीराज का कहना कि शाह के पास एक महा बलवान शुङ्गारहार नाम का हाथी है उसको शाह बहुत चाहता है। उसका और तीस हजार उत्तम घोड़े दो तो शाह छूटे। कवित्त ॥ तब सुराज प्रथिराज । कहै षिची सुनि बत्तं ॥ हम अालम गति कहैं। मोडू मान करि सत्तं ।। गज सु एक सिंघवी । नाम श्रृंगारहार गज ॥ अति पीय साह साहाब । लषै निसि दिन आलम सुज ॥

०२८ पृथ्वीराजरासे।। [चौबीसवां समय ४८ अप्पो स मोहि वह डंड करि । तीस सहस हय नेक बल ॥ छुट्टै जु साहि साहाब तब । हम तुम रहै सु प्रेम भल ॥ ई० ॥ ३२६ ॥ खत्री ने कहा कि जो आप मांगेंगे वही दूंगा पर शाह छूटना चाहिए। दूहा । तब पित्री इम उच्चरै । सुनौ राज प्रथुराज ॥ जो मंगो मा देउ तुम । छुटै साहि बर आज ॥ छ० ॥ ३२७ ॥ पत्र लिखकर दूत को दिया कि जो इकरार हुआ है वह भेजो। थप्पि वत्त दूह पत्र लिषि । दिया दूत के इथ्य ॥ जो कछु किया करार कर । सो पठवो तुम अथ्य ॥ छं० ॥ ३२८ ॥ पत्र पाते तातार खां ने हाथी घोड़े भेज दिए जो दस दिन में रात दिन चलकर पहुंचे। तब ततार षां मुक्कि दिय । रजत हयग्गय नंग॥ अहि निस आतुर श्रादूचर । उभय सु दस दिन संग॥ ई० ॥ ३२९ ॥ दण्ड पाने पर सुलतान को छोड़ देना । कवित्त ॥ दिय सु दंड सुरतांन । गय सु इक्कति पंचच इय ॥ भैराकी बर उंच । उभय प स निरममय ॥ नाम पह श्रृंगार । षह रिति मह पह भर ॥ अलि गुंजत मकरंद । वास भज्जत अवर डर ॥ सहस तीस अनि साज भल । दिय सु दंड सुरतान तय ॥ मुक्यौ सु राज प्रथिराज तब । चल्यौ साह गज्जन पुरय ॥ ई० ॥ ३३० ॥ सुलतान का ग़ज़नी पहुंचकर अपने उमराओं से मिलना। दूहा ॥ चल्यो मेच्छ गज्जन पुरय । दै सुदंड प्रति पिथ्य ॥ मिलिय उम्मरा अप्पने । करिय बैर सम सथ्य ॥ ० ॥ ३३१ ॥ शाह के महल में आने पर तातार खां खुरासान खां का बड़ा आनन्द मनाना। गया साहि आलम महल । करी बैर बर अप्प ॥ मिलि ततार पुरसान षां । बड़ वषत्त मिलि तथ्य ॥ ई० ॥ ३३२ ।।

चौबीसवां समय ४६] पृथ्वीराजरासो। SRE पृथ्वीराज का शृङ्गारहार को सामने रखना। हाथी की बड़ाई और राजा की सवारी की शोभा का वर्णन । कवित्त ॥ वह सु पह श्रृंगार । मत्त गज राज पटा झर ॥ रहै नरिंद मुष अग्ग । रास रेसम फंद पर ॥ जव राजन चढ़ि चलै । तबहि मुष अग्ग निरष्ये ॥ जे अनंत गज प्रवल । ते स ग्रंमल सह धष्पे जब चढ़े राज टामैक करि । तब अजब्ब मोभा लहै । आतस चरित्त अदभूत लिपि । कपाल बूंदन बहै || ई० ॥ ३३३ ॥ हाथी के रूप और गुणों का वर्णन । कवित्त ॥ सत्त इथ्य जरख । हथ्य नव देह लबाइय ॥ दस हथ्यां परिमांन । पीठ छत्ती गिर दाइय । भद्र जात उतपंन । दुरदृ हद पाट श्रृंगारं ॥ जो रावर कहि चंद । कोट गढ़ ढाहन वार । च्यालीस कोस चालंत मग । लिये लोह च्यालीस मन ॥ दिन प्रति गुलाल थानं करज | षंभारें डारंत घन* ॥ ई० ॥ ३३४ ।। सब सामंतों को साथ ले एक दिन शिकार के लिये राजा का जाना । वहां कन्ह चौहान का आना। एक सुदिन राजन्न । चढिव सिक्कार प्रपत्ते ॥ और सकल सामंत । जाडू सथ पच्छ मिलते ॥ सत्त सहस असवार । मिले मुष राज सुरत्ते । जाम देव पज्जन । मान मरदन मरदत्ते ॥ सिंघह पवार सुभ सथ्य तह । जैत राव वलिभद्र सम ॥ चहुआन कन्ह नर नाह वर । आतुर परि आयेव श्रम ॥ ई० ॥ ३३५ ॥ गाथा | परि कर सकल सिकारं । लीने सब राजनं राजं ॥ अवर सूर सामंतं । धरियं साज अप्प सा काजं ॥ ई० ॥ ३३६ ॥ एक अनुचर का आकर एक सूअर के निकलने का समाचार देना। * छन्द ३३४ मा प्रति में नहीं है।

०३० पृथ्वीराजगसो । चौबीसवां समय ५० दूहा । तब प्रथिराज नारिंद प्रति । कही सु अनुचर एक || सुभ वराह एकल प्रबल्ल । कही षरि सु बिबेक ॥ ई० ॥ ३३७ ॥ राजा का प्राज्ञा देना कि उसे रोको भागने न पावै। तब प्रथिराज सु उच्चरिय । अरे सिकारी साज । मति एकल बन जाइ भजि । करि रोकन को साज | छ० ॥ ३३८ ॥ चारों ओर से नाका रोक कर सूअर को खदेरना और उसके निकलने पर राजा का तीर मारना । कवित्त ॥ एक दिसा कूकरह । एक दिसि भूलह धारिय ।। एक दिसा षेदा अनंत । एक दिसि और प्रचारिय ।। एक दिसा राजंग । एक दिसि अनि अनुचारिय ॥ एक दिसा सामंत । एक वडु भांतिय तारिय ॥ यो व्योत सब राजन करिय । हक्कि सोर उछारि भर ॥ निकसंत सु सूकर अप्य रह । हने तीर पंचे सु कर || ई० ॥ ३३८ ॥ सूअर का मरना सरदारों का राजा की बड़ाई करना । टूहा ॥ लग्यौ वान वाराह उर । पचौ षेत धर मुच्छि ॥ मिले सकल सामंत तब । कही सबन धन अच्छि ॥ ई० ॥ ३४० ॥ बड़े अानन्द से राजा राज का लोटता था कि एक पारधी ने एक शेर निकलने का समाचार दिया। घन अनँद राजन भरिय । चल्यो राज चढ़ि बाज ॥ तब सु एक पारधि कही । नाहर घात सु राज || छ० ॥ ३४१ ॥ राजा का प्राज्ञा देना कि बिना इसको मारे तो न चलेंगे। तब सुराज से मुष्प कहि । सुनौ सबै प्रति सूर ॥ विन सुघान अग्यार में। श्रान राज इंद नूर ॥ ई० ॥ ३४२ ॥ एक नदी के किनारे वृषभ का मारकर सिंह खाता था राजा ने पारधी को आज्ञा दी कि तुम उसको हांको । (१) मो.-परिकर।

बीसवां सम समयः पृथ्वीराजरासा। ७३१ वित्त ॥ नदि एक जल किंदु । तहं सु एकह सुभ कोहर ॥ तर वर जल छीन । थान साभंत मनोहर ॥ ता नीचै केहरी । इनिब एक वृषभ अहारै अति अरिष्ट आभूत । कोइन पग अग संचारै उच्चरै राज दिल्ली धनिय । पारधी हक्को तुमैं ॥ बड़ सुभट अनि सामेस की। बिन अग्या घातन रमै ॥ ॐ ॥ ३४३ ॥ राजा का शृङ्गारहार गज पर चढ़कर सिंह को मारने चलना और सिंह को हंकारने की आज्ञा देना। कवित्त ॥ तब सु राज प्रथिराज । पार शृंगार मंगि गज ॥ बड पष्पर तन रज्जि । दंति कहारि बंधि सज । उभय पध्य असवार | गिरद रष्ये करि राजन ।। तीरंदाज अभूल । मूल रष्ये करि ताजन । से मुष्प राज यों उच्चरे । हक्कारो केहरि सकल ॥ सा वचन सुनत करि कूह भर । गज्ज सु केहरि अप्य वल ॥ छ ॥३४४॥ कोलाहल सुन सिंह का क्रोधकर निकलना । राजा का तीर मारना और तीर का पार हो जाना । कूरम्भ का बढ़ कर तलवार से दो टूक कर डालना। सब का प्रशंसा करना। निसांनी ॥ सुने गहब्बह केहरी उद्यो हक्कारे । कंपि धरधर मेदिनी गल्हन गल्हारे । कोइक काल अभूत के पचायन भारे। गात सु दीरघ हथ्थ गुर जीहा जक मारे ॥ छं० ॥ ३४५ ॥ नष तिष्या गिर वज के पुंछन तिष्पारे । कंध सु जड्डा केहरी नेनां ज्यों तारे ॥ दिव्या मरद महावली कंधा उप्पारे । गज्जत गज्जत आइया अरियन के थारे ॥ ० ॥ ३४६ ॥ (१) ए. कृ. को.-घत । (२) मो.-जीहा झक कारे।

७३२ पृथ्वीराजरासो। [चौबीसवां समय ५२, सिंह सु सम्हा चल्लिया गजराज संभारे । तव राजन गज चंपिया हेंवर ठट टारे ॥ तीर सनंमुष नंषिया कोई लग्गै न्यारे । नेरा आयां जैत राव सिंगनि उम्भारे ॥ छं० ॥ ३४७ ॥ छोड़े मोह सु हल्लिया नाहर ललकारे । पारधि एके चंपिया हथ्थल पछारे । राज कमान सु पंचि कर तरीन तिष्पारे । फूटि दुवा सूवार पार गल्लन जिम्भारे ॥ छ० ॥ ३४८ ॥ करिहै तत्ता कूरंभ झुक्या असि झारे । बाहे बब्बर वीचह्न है टूक निनारे ॥ मनों सबन विच सुश्मि थावहि तंतू सारे । भल मल सब सेना कहै कूरंभ करारे ॥ ई० ॥ ३४६ ॥ धनि माता अरु धनि पिता पजून पचारे ॥ छ० ॥ ३५० ॥ राजा के शिकार करने पर बाजे बजने लगे। दूहा । घन सिकार राजन करिय । हनि बराह अनि अट्ठ ॥ बाजे बज्जन सुबर' बजि । करि राजन पहु पट्ट ॥ ई० ॥ ३५१ ॥ सब सरदारों में शिकार बँटवा दिया। इनि सिकार वाराह बर । दीए सब सामंत ॥ बंटि सु दीनी अबर भर । करि उच्छाह अनंत ॥ ई० ॥ ३५२ ॥ राजा का दिल्ली लौटना, कवि चन्द का. पाकर फूलों की वर्षा करना। कवित्त ॥ तब प्रथिराज नरिंद। आइ दिल्ली पुर मझं ॥ अप्प चिंत बर अवर । बैठि सिंहासन रज्जं ॥ अवर सूर सामंत । सकल सम्भा भर मंडे ॥ तव सु चंद बरदाइ । आइ कुसुमावलि छडे ।। बैठे सु सबनि उच्चार करि । सुनिय गान गायन सकल ।। दिल्लीय नैर दिल्लीय पति । करि अनंद दंडे सुषल ॥ छ । ३५३ ॥ (१) मो.-सुरस।

चौबीसवां समय ५३] पृथ्वीराजरासो । राजा का गुरु से धन निकालने चलने का मुहूर्त पूछना। दूहा ॥ एक सुदिन देवंग से । बोलिय राज नरिंद ।। देउ मुहरत दुज सु गुर । तिहि हम करें अनंद ॥ ई० ॥ ३५४ ॥ राजगुरु का बैसाष सुदी तीज को मुहूर्त निकालना । तब दुजराज सु उच्चरिय । सुनि सामंत सु नाथ ॥ मेत बतिय बैसाष दिन । सुभ दिन चला समाथ ॥ छं० ॥ ३५५ ॥ सुभ सँजोग अंतर घरी । कहत बचन देवग्नि । साइ सुदिन आनंद करि । चली सुराज गुनग्नि ॥ छं० ॥ ३५६ ॥ एथ्वीराज का मुहूर्त पर धूमधाम से यात्रा करना। कवित्त ॥ चढिय राज सुभ जोग । करि सुमंगल अनंद गुर ॥ दै सु विप्र धन चंड । दीन अनि दान लोक कर ॥ बढि सामंत रु सूर । करै उच्छव उमत्त पर ॥ बजत नह नीसांन । चवै जै जया देव नर || सेनइ सु सथ्य है पंच सय । नैर निकरि बाहिर चले ॥ मत्त सुछक्क कुल्लाल घट । भरि वास्न मै मत मिले ॥ ई० ॥ ३५७ ॥ एक वेश्या का शृङ्गार किए मिलना। राजा का शुभ शकुन मानना। नैरजाइका इका एक चलि । तन आभन्न अलंकि ॥ देखि विपति रह सिर मिले । दुअ आनंद असंकि ॥ छ० ॥ ३५८ ॥ रात दिन कूच करते हुए राजा का चलना। गज राजन हादस रहे । सुभ संयोग सुभ साथ ॥ करिग कूछ उतिम प्रचर । षडि लसकर प्रथि माथ || ई० ॥ ३५८ ॥ कूच कूच राजन चले । सथ सामंत अभंग । पंच सत्त असवार संग । षडि मिलि सावत संग ॥ ई० ॥ ३६० ॥ रावल और सामंते तथा सेना का आगे बढ़कर राजा से मिलना। (१) मो.-वर।

२३४ पृथ्वीराजरासो। चिौबीसवां समय ५४ दीह निसा चहुबान चलि । आइ अचानक राज ॥ तब जानी जब दिष्षि प। मिलि सब सेन समाज ॥ छं० ॥ ३६१ ॥ सब सरदारों और रावल के मिलने से बड़ी प्रसन्नता का होना। कवित्त ॥ मिले सुभर अप्पान । जांनि आतुर षडि राजं ॥ हालि रा पुंडीर । अचल चौहान सु साजं ॥ राम रेन पावार । सु गुर गुरराज समाज ॥ अवर सुभर सामंत । बहुत परिकर सम राजं ॥ इत्तने आइ सब बैठि मिलि । तब जानी जब दिष्षि नृप ॥ सुनि बेंनि षबरि अातुर तुरत । मन प्रमोद आनंद वप ॥ छं० ॥ ३६२ ॥ गाथा ॥ आतुर षडि राजानं। मिलियं सेना सु अप्प भर मग्गं । हुअ आनंद अपारं । मिलियं सिंघ राज सामंतं ॥ ई० ॥ ३६३ ॥ रावल से मिलकर राजा का प्रेम पूर्वक शिकार और शाह के दण्ड का समाचार कहना। कवित्त ॥ मिले राज बर सिंघ । प्रेम पूरन राजन भर ॥ घरी दोडू बैठे सुतथ । बत्त सिकार कहिय गुर ॥ अरु सु दंड पतिसाह । कृत्य कारन कहि राजन ॥ सुनि दाहिंम्मरु चंद । सुभट सब कही सभा जन ॥ चल राज सिंघ प्रति सब कही । अरु कढ़न लकी गहिय ॥ आयो सु राज थह अप्पनै । एक निसा राजन रहिय ॥ ई० ॥ ३६४ ॥ शाह के पकड़ने और दण्ड देकर छोड़ने आदि का सविस्तार समाचार कहने पर बड़ा आनन्द उत्साह होना । कवित्त ॥ बजि नरिंद जय पत्त । बीय बज्जा घन बजे ताइप घर गजराज । राज दरबारन गज्जै ॥ चामर छत्र रषत्त । तषत लीनो सुरतानी ॥ उत्तर वै साहाब । गया मुलतानह पानी ॥ झंड्या छत्र सुरतांन सिर । राज छत्र सिर मंड्या ॥ बाजंत नह नीसान घन । बंधि साह डि एंडया ॥ ई० ॥ ३६५ ॥ (१) ए .. को.-परि। (३) प.-सनि।

चौबीसवां समय पृथ्वीराजरासो। ३५ १ गाथा ॥ जित्ते बज्जन वजं । सज्जे सेन सब सुभहायं ॥ सुद्धे घेत सु सूरं । । उप्पारियं केक सुभहायं ॥ छं० ॥ ३६६ ॥ राजा का गुरु से लक्ष्मी निकालने के विषय में अरिष्टों का प्रश्न करना । कवित्त ॥ बर बंध्यौ सुरतान । लच्छि कढ़न क्रम दिन्ना ॥ भई षबरि कै मास । राज अग्गै होय लिन्ना ॥ सत्त मंन जोतिगी । सब्ब जोतिग उच्चारै द्रिष्टि राह ग्रह दुष्ट । मंत्र जंत्रह बर टारै पुछयौ बीर चहुन तब । घन अरिष्ट गुन संभवै ॥ लछिन्न लछि अरु बंचि विधि । तब बहि मंतत सुन्नवै ॥ छं० ॥ ३६७ ॥ धन निकालने के विषय में राजा ने कैमास को बुलाकर परामर्श किया। कैमास ने कहा कि मैं चौहानों की पूर्व कथा सब जानता हूं, आप को देवी का बर है यह निश्चय जानिए। इस धन के निकालने के समय देव प्रगट होगा, उससे लोग डर कर भागेंगे। कवित्त ॥ धन कळुन चांन । बोलि कैमासह पुछिय ॥ बहु अदभुत जस सुन्यौ । आइ कढ़न बर लच्छिय ॥ पुब्ब कथा चहुन । हो जु आगम सब जानो ॥ देवी सुर बरदाई । कहों सु उर अंतर आनो ॥ अदभूत वत्त धन निक्करत । दोह बीर दानव जगे।। सा सूर धीर धीरज्ज जिय । कुँडिय सत्त काइर भगे ॥ छं० ॥ ३६८ ॥ पृथ्वीराज शिकार खेलते खटू बन में चले वहां एक पत्थर का शिलालेख कैमास को दिखलाई दिया। टूहा ॥ सो षह रहे थांन बर । द्रव्य अजै जै राज ॥ ता देषन चहुबान फिरि । गौ आषेट बिराज ॥ ई० ॥ ३८ ॥ (२) मा.-वर दारे। (१) मो.-जोतिषी। ।

०३६ पृथ्वीराजरासो । [चौबीसवां समय ५६ - उस शिलालेख को देखकर सब प्रसन्न हुए और आशा बँधी। अति आदर आखेट नृप । पति पुर बहू पास ॥ पाहन एक पयाल में । संपेष्यो कैमास || ई० ॥ ३७० ॥ कवित्त ॥ संपेष्यो कैमास । आस बंधी मन संती ॥ ज्यों बाल चंद निसि करक । मकर दिन मास वसंती ॥ यों उदिम नृप सेव । सेव वप सेव सुमंती ॥ ज्यां कन कलंक लगि अंक । सुबर बर बीर अनंती ॥ बच क्रम्म क्रोध अम्मर अरस । सुमन वास ज्यों वायवर ॥ लछिनह लछि अरु बंचि विच । हुबर हीर तत्तह सुनर ॥ ई० ॥३१॥ कैमास उस बीजक को पढ़ने लगा। दूहा ॥ मंची बप सामंत सम । परी.सु पाहल पास ॥ रास थंभ जनु ग्वाल लिखि । लगि बंचन कैमास ॥ छं० ॥ ३७२ ॥ अरध अंगुल सठ विसठ । तीर कहत चवसठि। तहां अकर विम्यौ सु इम । सरमै द्रव्य अनिछ ॥ ई० ॥ ३७३ ॥ भरि प्रसंक अंगुल भरिग । तिय अंगुल सत अंक ॥ अंगुल अंगुल अंक में । एकादसा प्रसंक । ई० ॥ ३७४ ॥ भवतव्यह जो दुज लधै। घरी दीह पल मास ॥ हृदय क्रोध ज्यों द्रिग लषै । त्यों लष्यौ कैमास || ई० ॥ ३७५ ॥ उसे पढ़कर उसी के प्रमाण से नाप कर खोदवाना प्रारम्भ किया। बंचि उचारि सुमंत तिहि । सरमय मप्पिय बांह ॥ मंडि सु अंगुल विगुलह । द्रव्य निरत्तिय ताह ॥ ई० ॥ ३७६ ॥ दुष्ट ग्रह और अरिष्ट दूर करने के लिये रावल समरसिंह पूजा करने लगे। ग्रह सु दुष्ट दूरी करन । धन अरिष्ट नृप जोड ॥ सोड पूजा क्रत चित्र पति । तिन पर वज्जन होय ॥ ई० ॥ ३७७ ॥ (१) मा.-छह । (२) मो.-सरमें। ।

चौबीसवां समय ५०] पृथ्वीराजरासो । ०३० । चन्द यह पहिले ही कह चुका था कि व्यास जगजाति कह गए हैं कि पृथ्वीराज सब अरिष्टों को दूर करके नागौर बन के धन को पावैगे। पहिलै अष्षिय चंद बर । कछिय व्यास जग जोति ॥ बीर सघन नागौर धन । * स्खभ अरिष्ट प्रथु होत ॥ ई० ॥ ३७८ ॥ राजा ने रावल से कहा कि अरिष्ट दूर करने के लिये पूजा करनी चाहिए, रावल ने उत्तर दिया मैं पहिले ही से पूजा कर रहा हूं। कवित्त ॥ पुछि राजा गुर सिंघ । सु गुरु देवग्नि सत्ति पति ॥ धन अरिष्ट गुन होई । तास मेठन्न रची मति ॥ सोइ सुभ काज सु राज । सुजस संग्रही सक्र भति ॥ सुर सुकाज सुद्धरै । अप्प उदरत कज्ज गति ॥ बुल्लिय सु राज सम चिच पति । तुम कारन पुज्जो सुग्रह ॥ आरिष्ट सु गुन दूरी करन । या मंगल कज्जै सुग्रह ॥ ई० ॥ ३७८ ॥ तब चन्द को बुलाया, उसने कहा कि आप लक्ष्मी निकालिए, जा ध्रुव है उसे मिटाने वाला कौन है। गाथा ॥ बुल्लिय भह सु चंदं । हो राजन लछि कट्ठिजै ॥ ज्यों बंध्यौ निरमांन । मेटन कवन सोइ विधि पचं ॥ ई० ॥ ३८० ॥ रात को सब सामंतों का रखकर रखवाली करो। टूहा ॥ थांन निरष्षिय राज बदि । अकिर द्रव्य सु अछ । सुबर सूर सामंत मिलि । निसि सथ रष्षा अक्छ ॥ ० ॥ ३८१ ॥ कुछ सरदार साथ रहे कुछ सोए । सवेरे वह स्थान खोदा गया, वहां एक पुरुष की मूर्ति निकली उस पर कुछ अक्षर खुदे थे, उनका कैमास ने पढ़ा। कवित्त ॥ सथ्य तथ्य निसि रष्टि । दीन वासन ग्रह थानह ॥ अबर सब्ब सामंत । कोन पारस विश्रामह ॥ * मो.-प्रति में "लहिं अरिष्टं होत" पाठ हो। हो चुका पृथ्वीराजरासो। [चौबीसवां समय ५८ रैनि मध्य विन चंद । जगे सामंत स्वामि तँह ॥ नीद सयल हुअ रुथ्थ । षनिय सम द्रव्य राज थह ॥ घोदंत पुरष इक्कह प्रगट । सिलह धत्त सतह सुमय ॥ नहि सकय अंक लिष्यो सुपर । बंचि रान कैमास तथ ॥ ई० ॥ ३८२ ॥ उस पर लिखा था कि हे सूर सामंत सब सुनो जो मुझे देखकर तुम न हँसो तो पाखान को देखो (?) दूदा । सुनो सूर सामंत सब । सु हृदय सकल रजान ॥ जो न इस मुहि बवर' कोइ । तो दियौ पाषान ॥ ई० ॥ ३८३ ॥ सब लोग कैमास की बड़ाई करने लगे न्याय नाम कैमास तुझ । दुज दीनी सुसाइ । ज्यों बेली फल भारतें । न्याइन मैं सुभाइ ॥ ई० ॥ ३८४ ॥ शुभ मुहूर्त आतेही कमान की मूठ में ताली थी वह देखी (?) भयो समय इमरत्तरी। ज्यों सुबाल॥ मध्य मुठि कमान की । रही रत्ति तिन तान ॥ ० ॥ ३८५ ॥ उसे शस्त्र से तोड़ते ही एक बड़ा भारी सर्प दिखलाई पड़ा जिसे देख सब भागे। तब दिष्षो वह थान तिन । सस्त्र अनी रिति भजि ॥ अप सुदिष्यो चव सुवल । रहे दूरि सब भजि ॥ ई० ॥ ३८६ ॥ विक्रम संवत ग्यारह सौ अड़तीस को सोमेश्वर के बेटे पृथ्वीरज ने असंख्य धन पाया। साक सुविक्रम इक दह । तीसरु अ संपत्त ॥ चहुश्रानां वप सोम सुअ । लभि वित्त अनमित्त ॥ ० ॥ ३८७ ॥ चन्द ने मन्त्र से कीलकर सर्प को पकड़ लिया तब धन देखने लगे। वय संधि ॥ (.१) ए. कृ. को.-सकल ।

चाबीसवां समय ५६ ] पृथ्वीराजरासो। ०३६ अप्प मंत्र बंध्यौ स कवि । द्रव्य निरध्यौ जाइ ॥ चिहं दिसा जौ देखियै । दिष्ट न आवे ठाइ ॥ ई० ॥ ३८८ ॥ कवित्त ॥ दियौ जीयड प्रमांन । मध्य राजा रघुवंसिय ॥ वाहन सोसत पुत्त । नात अग्यान न गंसिय ॥ दुष्ट देइ दिन मान । राज अग्या सुन मानै सेाक अग्गि तन दमझ । गया सुरलोक निथांनै ।। रचि मंच जंच पुत्तलि करिय । होम दिष्ट दानव जलिय ॥ चितै स चित्त कविचंद नहं । करयि बात इह इम भलिय ॥ ३८८ ॥ चन्द की बात मानकर धन निकालने के लिये स्वयं राजा वहां प्राए । गाथा || गृह वरदाइय बत्तं । कहन लछि भयं मयं । सुछ अंतर भर सेनं । आए लछि ठाइयं राजं ॥ ई० ॥ ३० ॥ राजा ने प्राज्ञा दी कि इस शिला का सिर काटकर धन निकालो। दूदा ॥ थह पाए बर राज धर । दिय हुकम्म सिल कहि ॥ छुप छुकम्म राजन को । कलै सिला सिर कहि ॥ ई० ॥ ३८१ ॥ शिला काटकर भूमि खोदने की आज्ञा दी कि इतने में पृथ्वी कांपने लगी। कहि सीस सिल कलि करि । दिया बचन घोदान || सब सु कपि भुधर धरिय । हांक सुनी वप कान ॥ ई० ॥ ३८२ ॥ शस्त्र की नोक से तीस अंगुल मोटा, बारह अंगुल ऊँचा खोदा तब ख़ज़ाने का मुंह खुल गया । कवित्त ॥ सस्त्र अनी रिति पनी । सेन सुत्तो गहिसि ॥ सपत धात पाषांन । तीस अंगुल दल बल कसि ॥ हादस अंगुल उंच । निठ करि ग्रीव लाइय ॥ उरि मुष्प वर द्रव्य । कही कवि चंद न जाय ॥ (३) ए.क. को.-यावह।

দৃশ্লীবালাখা। [चौबीसवां समय १ सिल तरति हलतल भ्रम्म हन्ति । द्रव्य परष्षिय मध्य ग्रसि ॥ सामन सूर इम उच्चरै । भी बीर कैमास लसि ॥ ई० ॥ ३९३ ॥ बारह हाथ खोदने पर एक भयानक देव निकला। सुनिय बत्त चहुआन । भयो आचिज्ज सब्बघन ॥ भूमि कित्ति संजुत्त । अहे पावै अभंग धन ।। पुर सु तिष्प धर मध्य । क्रोध जाजुल्यं नैन रत ॥ मुर लंगर विच बंधि । ग्रीव लीनो उमंग तन ।। घोदयो भूमि हादस सुइथ । इंकि बीर दानव गजिय ॥ कवि चंद दंद मन मचि बँध्यौ । चित्त चिंत ब्रह्मड लगिय ॥ छं० ॥ ३४ ॥ उस राक्षस ने निकल कर तरह तरह की माया करके लड़ना प्रारम्भ किया। छंद भुजंगप्रयात् ॥ प्रकारे सुचारे भुजंगं प्रयातं । षगप्पत्ति गायं अहप्पत्ति मात ॥ स्वयं वीर दानव्व हक्यो इकारं । बरं बंध रक्की षरके प्रहारं ॥ ई० ॥ ३९५ ॥ बरं व्योम ग्रब्बं षहं पत्ति संक्यौ । करे कोटि माया निसा पत्ति इंक्यौ पयं पाद उकै महा रोम झुम्मी । मनों चक्क फेरै कुलालं स भुम्मी ॥ छ० ॥ २६ ॥ पिनं रत्त दीसै पिनं मत्त माया । पिनं रक्त पीतं पिनं स्याम छाया । पिनं मेघ रूपं षिनं अग्गि सीसं । षिनं कोटि रूपं पिनं एक दीसं ॥ छं० ॥ ३७॥ षिनं बाल वृद्धं षिनं वै किसोरं । भयं भीम भी पिनं दिव्य गौरं ॥ पिनं मोह माया पिनं दट्ट बज्जै । पिनं मोहनी मोह रूपंति सज्जै ॥ छं० ॥ ३८८ ॥ पिनं मै विडाली पिनं विन माया। पिनं मेछ रूपं षगं इथ्य धाया ॥ इयं ग्रीव रूप पिनं मन दीसै । पिनं गज्जियं सिंघ आरत्त रीसै ॥ छ० ॥ ३९ ॥ - (१) ए. कृ. को.-याव । (२) मो.-सास।

चौबीसवां समय६१] पृथ्वीराजरासा । ०४६ दूहमाया जब बहुत उपद्रव मचाया तब चन्द ने देवी की स्तुति को कि मा अब सहाय हो कि लक्ष्मी निकले। कवित्त ॥ तारि बीर संकर समूह। ईडि गजराज थांन गय ॥ भयो समूह अरिष्ट । ढुंढि लम्भी न मत्ति श्य। सत्त मत्त कुढयौ । अप्य अप्पन संभार । भो अचिज्ज सामंत । व्यास बचनं न बिचार कविचंद मंच आरंभ बर । उमा उमा कहि बंचया ।। अप्पियै बचन मुछि मात पूछ । तुअ काली कालजच्चयो । ई० ॥ ४०० ॥ दूदा ॥ करि प्रस्तुति कविचंद बर । अहो मात बरदान ॥ में बड्डु मन । करै लच्छि तुअ पान ॥ ई० ॥ ४०१ ॥ देवी की स्तुति । छंद विराज || सुनी देवि बानी । चढ़ी सिंघ रानी ॥ मयं मक्त माया । तुंही तू उपाया ॥ ० ॥ ४०२ भरी जुद्ध भष्यं । प्रक्रत्ती पुरष्पं ॥ निराधार बंधी । निसंधे निसंधी ॥ छं० ॥ ४०३ ॥ चिहूं चक्क पंडी । इकं पार मंडी। जो तोहि तोही। जगचन्न मोही ॥ छं० ॥ ४०४ ॥ निसा पत्त मारै । दया वज्ज तारै तूही मंच मंत्री । तनं जा पविची ॥ ई० ॥ ४०५ ॥ तुही आसमानं । तुही भूमि थानं ॥ तुही बाग बानी । कला निधि रानी ॥ छं० ॥ ४०६ ॥ कवी चंद चंदं । करै दूरि दंदै । कलं षग्ग धारै। प्रनेता उचारै ॥ ई० ॥ ४०७ ॥ निसा बीर बन्छौ। हां पाडू ठन्यौ । ई० ॥ ४०८। देवी ने प्रसन्न होकर दानव को मारने का वरदान दिया। द्वता ॥ मात प्रसनन गुन गहिर । दियौ हुँकि हुंकार ॥ दिया बर सु दानव मनन । कियौ देव जयकार ॥ छं० ॥ ४०६ ॥ । ॥ । ।

०४२ पृथ्वीराजरासो । [चौबीसवां समय र बर पाकर पृथ्वीराज ने राक्षस को ललकारा और घोर युद्ध हुआ। दानव मारा गया। कवित्त ॥ तव प्रथि राज नरिंद। बीर दानव चक्कारिय ॥ सबद द्रुग्ग संभवौ । पच्छ दीनी हुंकारिय ॥ दिषत सथ्य सब तथ्य । कथ्य को बैन न मंडे भीत सीत भय अंग । रंग रस रोस सु चंडै । अरु नाइ प्रान सम ग्रेह तिछ । कज्जल कूट समान सुइ ॥ मन चिंत चंद प्रारथ्यनछ । जव देवि डर आन उडू ॥ ई० ॥ ४१० ॥ बल उत्तंग सुमेर । रुक्कि संकिन मग मुक्किन । छिनक मंत निय संत । तेज आहुटि बल सकिन । सबर बीर कविचंद । मंच दुरगा तब पल्यौ । करी नवनि कर जोर । जादू अग्गै भया ठठ्ठौ । अस्तुति अनेक उच्चार मुष । चरन चंपि द्रढ कर गहिय ॥ धन जोग कथा पूछी सुहित । उचित चंद अप्पन कहिय ॥ ई० ॥४१॥ चन्द ने स्तुति करके इस राक्षस और धन की पूर्व कथा पूछी। दूहा ॥ करि प्रस्तुति द्रढ चरन गहि । पछी भह विगति ॥ जु कछु आदि पुच्छे सहित । कहन सु बीर विमत्ति ॥ ई० ॥ ४१२ ॥ देवी ने कहा कि जी लगाकर तू इसकी पूर्व कथा सुन । कहै वीर कविचंद तुअ । पूर्व कथा कहुं मंडि ॥ जिन लच्छी धर मुक्कियै । धर रष्ये धन छडि ॥ ई० ॥ ४१३ ॥ सतयुग में मंत्र, त्रेता में सत्य, द्वापर में पूजा और कलियुग में वीरता प्रधान है। जुग सु आदि हुअ मंच गुर । चेता.जुग हुअ सत्त ॥ डापर जुग पूजा प्रसिध । कलि जुग बीरं दत्त ॥ छं० ॥ ४१४ ॥ रघुवंश में आनन्द नामक एक राजा हुआ है उसकी कथा कहती हूं। ॥ - (१) ९ ०० को-पाग। (२) ए०-सार।

चौबीसवां समय ३३ ] पृथ्वीराजरासो। ०४३ गाथा ॥ हुअ अानंद सु बीरं । बुल्लिय सु प्रसन होइ कल बानी ॥ सुनि उतपत्ति सु कव्वी । कहि अब रघुबंस आदि संकेत । ई० ॥ ४१५ ॥ वह राजा बड़ा अन्यायी था धर्म विरुद्ध काम करता था। कवित्त ॥ *तिहि तजिय सु रघुबंस । पुत्र मारंत इह विज्जि ॥ चित कीनी चरचित्त । मरन अंग श्रागम पिज्ज ॥ जो बरजै बहु बार । भ्रम मानै न भयंकर । सोक अग्नि तिन दभिभ । प्रान इंडौ रनियंकर । * सत बरस राज सय अंत करि । कित्ति भ्रंम संगह यस्य ।। आभ्रंम कित्ति ज्यों मंडनह । सो उब्बरि बीरनि रहिय ॥ छं० ॥ ४१६ ॥ यज्ञ विध्वंस करता था ऐसे बुरे कर्मों को देख ऋषियों ने शाप दिया कि जा तू राक्षस हो जा। कवित्त ॥ तिहि वाहन बल सूर । धरम रष्यो रघुबंसी ॥ वेद भ्रंम उध्यापि । काल कंटक बल कंसी ॥ सज्जि तेज जाजुल्य । जग्य विध्वंसिय सब्बल ॥ कमल समूह अरिष्ट । जीति दगपाल भ्रम पल ॥ मारग्ग इत्ति उथ्यापि करि । दिब सराप सब रिष्यि मिलि ॥ जा वीर दांन दानव सु बरि । अमर सिंह वल जीति इलि ॥ई० ॥ ४१७॥ उसका शरीर भस्म हो गया और वह दैत्य होकर यहां रहने लगा। मिलि अयास आयास । आप मिलि आप अहुहिय । मिलि समीर समीर । धरा धर धार आहुहिय ॥ तेज जोति चहु पीर ।सुबर मंगल फिरि आइय ॥ विहि अभ्रंम जरि तास । मांहि सो कछु न समाइय ॥ * मो.-"तिहि तजिय डर रघुवंस पुत्र चारच पुच्छ खिज ।" (१) मो.-अंकर। + मो. प्रति में इन दो पदों के स्थान में तीन पद दिए हैं जिसमें से अंतिम पद तो चारों प्रतियों में समान है किन्तु मो. प्रति में दोनों में एक का सारांश मिलता है यथा-मो.-"सत्त वरस राजा ने सवल राजंत अंत कर, सब भारव्य गिह अरि अंत करि कित्त धर्म संग्रह गहिय । .

०४४ पृथ्वीराजरासो । चौबीसवां समय ६४ । आकास मध्य ता मध्यते । फटिक बीर है चीर हुन॥ ते बीर बहुत दानव अतुल । भये काल थानय रक्ष्य ॥ ० ॥ ४१८ ॥ इसको बहुत काल बीता, इसके पीछे रामचन्द्र हुए, काल पुराना हो गया पर यह लक्ष्मी पुरानी न हुई। बहु बित्ते बर काल । चंद बरदाइ थान हम ॥ को जीवत देष्यो न। मरत देष्यो न न जे हम ॥ मात ग्रम जम निका । राम तामस करि नच्यौ । दूल हहै अंगनै । कैीन रुचै को रुच्यौ जीरन सु जगा संसार भैा । लच्छि न जीरन भइय इह ॥ आयंत जात धंधी सकल । ग्यानवंत जानहि सुबह ॥ ई० ॥ ४१८ ॥ तब पृथ्वीराज और चन्द ने प्रार्थना की कि अब धन निकालने में दैत्य दुःख न दे। दूहा ॥ तब प्रथिराज नरिंद बर । अरू सुमंत्रि कविचंद ॥ दृष्ट बत्त बर संमुहै। ज्यो दानव करै न दंद ॥ ई० ॥ ४२० ॥ इष्ट मंत्र का साधन करते यज्ञ करते हुए खोदकर लक्ष्मी निकालना प्रारम्भ किया। छंद चोटक ॥ कढि लच्छिदिसंक्रम दीन वर्ष । निज मंच बलं कल तत्र जपं ॥ भुज भान सुरं भज भान दिसं । बर इष्टय चंद कविंद कसं ॥ ॥ छ० ॥ ४२१ ॥ सब देव कम क्रम दीन पंजय जग्या जाप करत नपं ॥ घन गंध सुगंधन की इलितं । चलि सीन न सप्प सुभ मरुतं ॥ ॥ ० ॥ ४२२ ॥ धन सार मृगम्मद होम जरै । तिन उप्पर मौरन भौर परे । उड़ि धम चिहं दिसि छाय धनं । करि मंच सुदेव बलिं बलनं ॥ ॥ छ ॥ ४२३ ॥ देव ने चन्द से कहा मेरे पिता रघुवंशी धर्माधिराज थे मैं उनका बेटा मानन्दचन्द बड़ा अन्यायी हुआ मैं मैं ने अन्याय से संसार का जीता, इस लिये शाप से मैं दैत्य हुश्रा और मेरा नाम बीर पड़ा।

चार्वास समय १५] पृथ्वीराजरासा । ०४५ कवित्त ॥ नृप पूजी रघुवंस । नाम धृम्माधिराज सुत्र । बिय बाइन प सूर । पुत्र श्रानंद चंद दु ॥ सब जित्ते द्रगपाल । माल लिन्नौ अर्धम कलि ॥ राज नीति सब मुक्कि । क्रम बंध्यौ अक्रम कलि ॥ अदभूत मरन छिन भंग गति । चित वित्त कम अनुसरिय ।। तप भंग गच्छना जांनि नह । नाम बीर दानव धरिय ॥ ई० ॥ ४२४ ॥ बीर ने कहा कि इस लक्ष्मी को मैंने ही यहां रक्खा था। दैवगति से इसीको लेकर मेरी यह गति हुई। द्वदा ॥ कहै बीर सुनि चंद तुअ । अप्ण कथा कही मंडि ॥ जा मुक्की लच्छी धरनि । सो रष्यों उर संडि ॥ ई० ॥ ४२५ ॥ हो रष्यों इन भति करि। अहो चंद बरदाई ॥ रघुबंसी अति मोह मय । अवगति कोइ सुभाइ ॥ छ० ॥ ४२६ ॥ माया छाया पुत्तरी । क्रोधवंत हम बीर ॥ रहे छडि है लछि थह । चम्मित तुम इह धीर ॥ छ । ४२७ ॥ बीर का अपने पिता रघुवंश राज की प्रशंसा करना । कवित्त ॥ क्रोध लोभ जानी न । मोह माया न अलंकृत ॥ मोह गीत अरु सीत । जग्गि जा जापय सुक्कृत ।। बहु विवेक विमान । राज विसतरहि नीति बहु ॥ नव निवर्त धुनि वेद । कर्म छेदन अभेद लहि ॥ मो बद्दि सांडू से सब सुन्लप । जोवन बै विष अलप मन ।। रघुवंस वृद्ध श्रावस्त त्रिय । जोग मग्ग सेा छडि तन ॥ छं० ॥ ४२८ ॥ चारों युगों के धर्म का वर्णन । श्लोक ॥ सत जुगे वंधयो देवो । चेतायां साम जाधयो । हापरे वाहनो सूरो । कलिजुगे बीर भीषम ॥ ई० ॥ ४२८ ॥ सतजुगे ब्रह्मपुत्रश्च । चेतायां बीर भक्षय ॥ हापरे वित्रि वंशस्य । कलिजुगे सूद्र अनिका ॥ छ ॥ ४३० ॥ (१) मो.-भग्ग। (२) मो.-यंधि। (३) मो.-जोधयो। (४) मो.-भषिय ।

४६ . पृथ्वीराजरासो। [चौबीसवां समय १६ बीर का अपने बल का वर्णन करके अपने साम्हने धन निकालने का कहना। कवित्त ॥ हम सु भयंकर बन्न । भट्ट सुभटन हंकारहि ॥ म प्रचंड प्रब्बत्त । कनिष्ट अंगुलि उभारहि ॥ सत्तों समुद प्रमान । सु तत छिन तिरि दिहि ॥ सुनि न होइ देखी न । तोइ ब्रघमंड सु लष्षहि ॥ दैवान दुसंकह दुष्ट गति । देव जोग को गढ़वै आतम्म मनुच्छन जीव बल । मो देषत धन कट्ठ ॥ ई० ॥ ३१ ॥ चन्द ने कहा कि हे बीर तुम सब समर्थ है। तुम्हारे कहने से अब राजा धन निकालेंगे। अरिल्ल ॥ *बुल्लै चंद सुनी बर बीर । तुम चिकाल दरसी अति धीरं ॥ तुम अनंत बल रूप सरूपं । क धन तुम बचन सु भूपं ॥ छं० ॥ ४३२ ॥ गाथा ॥ कहै बीर चंदं बर बंदं । । देवाधि देव बलवनं ॥ सुम देषन गत पापं । होइ प्रसंन देहु बर बचनं ॥ ई० ॥ ४३३ ॥ सुनकर वीर ने प्रसन्न होकर धन निकालने की प्रज्ञा दी। दूहा ॥ सुर बानी सुन भह की । मन प्रमोद बरबीर ॥ दई बाच कट्ठौ सु धन । प्रसन देव करि धीर ॥ ई० ४३४ ॥ बीर की बात सुनकर चन्द ने राजा से कहा कि होम आदि शुभ कर्म कराओ और प्रानन्द धन निकाले अरिल्ल ॥ बीर बचनति चंद प्रकासिय । कहै राज गुरजन प्रति भासिय ॥ करो होम देवान मंत्र जप । सब प्रसन हुअ लई धन्न नप ॥ ० ॥ ४३५॥ चन्द का बीर से पूछना कि हमारे राजा तुम्हारी प्रसन्नता के लिये जो कहो वही करें। कवित्त ॥ तुम समान कोइ भान । पान पन दान मान मन ॥ कवन श्रवन रस राग । दैव परंग अंग नन । * मो.-प्रति मैं " बुल्लै धन चन्द सुनों पर वीरं" पाठ है और धन शब्द यहां विशेष चन्द की सुन्दर बानी से - - चौबीसवां समय ६७ ] पृथ्वीराजरासो। ०४७ राजस तामस सत्त । मत्त जोगिंद विराजहि ॥ जीह एक गुन कोटि । रत्ति से बोलन लाजहि ॥ महदेव सेव तुम चरन रत । पति पवित्र मन मोह धरि ॥ हिंद्यौ सुबीर उत्तर दिसा । इह पसाव चहुआन करि ॥ ई० ॥ ४३६ ॥ बीर का कहना कि मेरी प्रसन्नता के लिये पंडित से जप कराओ और महिष का बलि देकर धन निकालो। दूहा ॥ कदै वीर कबिचंद सैौ । हो सु प्रसन्नी तोहि ॥ तीन लोक में जुगति बति । सुभान नाहों मोहि ॥ ई० ॥ ४३७ ॥ पंडित बोलि रु जप करौ । हाम दान ग्रह मान ।। महिष मोहि पूजा करौ । तौ कट्ठौ पाषान ॥ ई० ४३८ ॥ दानव यह कहकर स्वर्ग गया । चन्द का राजा से कहना कि शाह को तो तुम बांध चुके अब रावल के साथ धन निकालो। कविक्त ॥ सुरग गया दानब्ब । बत्त वल महिष उच्चारिय ॥ मंच तंत्र वंधयो । बलन अप्पन सम्हारिय ॥ बर गज्जनी नरिंद । बंधि धंद्यौ बहवानं ।। धन कळून तिन थांन । बज्जि निर्घोष निसानं ॥ अनंद मं.त्र कैमास बल । तिथ्यि घरी बल पुच्छिबर ॥ जै जया सिंह बाद पति । मिलि विभूत कट्ठौ सुभर ॥ छः ॥ ४३६ ॥ राजा ने रावल का बुलाकर ज्योतिषी पंडित को बुलाय, पंडित ने होम की शामिग्री मँगाकर वेदी आदि बनवाकर शुभ अनुष्ठान का प्रारम्भ किया। छंद चोटक ॥ तब बुल्लिय राजन राज गुरं । सु मनो गुर राजत देव दरं । बुलि बेद सु पंडित जोतिगयं । जिन बुद्धि सु ब्रह्मय सुइ लयं ॥ इं० । ०.४४०॥ (१) मो.- सहदेव । (२) मो.-कढ़व ।

पृथ्वीराजरासो। [चौबीसवां समय सिन मंगिय होम प्रकार सयं । रचि जग्य प्रकार प्रकार मयं ॥ मिरई जिह दोष सु होइ जयं । छं०॥ ४४१ ॥ कढ़ि लच्छि दिसा क्रमि देवि नपं । कवि चंद अनंदिय मंच जपं ॥ विधि भान सुरंभिय भान दिसं । सब देव क्रम क्रम होइ रस ॥ छं०॥४४२ ॥ जय जग्य र जाप करै बलिता । धन गंध सुगंधन की हलिता ॥ सु रची रवनीय सवै अवनी। धज हल्लत बेदिय मंडि फनी ॥ छ० ॥ ४४३ ॥ भरि चंदन पाटक पाट करी । अनुराग सु कुंकम होम जरी । नव रत्त कला कल सान कुटे । मनुं हादस भान इहां प्रगटे ॥ छ०॥ ४४४॥ धुनि सुनिय बेदन होत रुषं । प्रगव्यौ कमलानन तास मुषं ॥ इं०॥४४५॥ छः प्रधानों को पास रखकर राजा ने पत्थर खोदकर हटवाया। कवित्त || कढि बीर पापान । राज घट रष्पि प्रधानं ।। चंद भह गुरुराम । कन्द रष्पिग चहुआनं ।। रष्ये अत्ता ताई । ईस लडौ बर भारी ॥ दैव बत्त संजोग । भोग लखौ रन रारी ॥ रष्पिजै भीम रघुवंस बल । अरु रष्यै पुंडीर सह ॥ अनवत्त अग्य लै स्यांम की । पंच दीह तिन थान रहि ॥ ई० ॥ ४४६ ॥ वह स्थान खोदने पर एक बड़ा भारी पत्थर का अद्भुत घर निकला, उसमें एक सोने के हीराजटित हिंडोले पर सोने की पुतली सोने की वीणा बजाती और नाचती हुई निकली, उसका नाच देख कर आश्चर्य होने लगा। घोदि थान पाषान । ग्रेह निकस्यौ अञ्चभम् ॥ हेम हीर हिंडोल । हेम पुत्तरी सुरंभम् ॥ हेम इथ्य वाजिब । कृत्य पुत्तरि जरि जंघिय ॥ इह अचंभ पुत्तरी । जानि सर जीबन मंत्रिय ।। (१) मो.-लहि।

चौबीसवां समय 8 ] पृथ्वीराजरासो । १ । आलिंग नयन करि सिथल गति । तिहि दिष्षत मन मयन सकि ॥ आचंभ चंद देखत भयो । रंभ कि नृत्यत तार चुकि ॥ ई० ॥ ४४७ ॥ पुतली को देख गुरुराम का आश्चर्य करना । दूहा ॥ सुर उद्योत गुरराज तिहि । पुत्तरि दिष्पि अचंभ ॥ रति पति मन समुह धरै । घट सु घटिय आरंभ ॥ छ० ॥ ४३८ ॥ चन्द का कहना कि यह मायारुपी है। कहै चंद गुर राज सुनि । यह माया बल रूप ॥ न करि मोह कर गहि सु दुज । मईि बहोरिय नूप ॥ छ० ॥ ४४६ ॥ रावल का फिर चन्द से पूछना कि यह पुतली किसका अवतार है? राज गुरू कहि चंद से। हो कविराज विचारि ॥ कोन रूप अवतार किय । क्यों लच्छिय पर नारि ॥ ई० ॥ ४५० ॥ ने कहा कि ठहरिए तब कहूंगा और उसने बीर को स्मरण करके पुतली का भेद पूछा। कवित्त । तत सु चंद बर दाइ । राज गुरु बचन अप्प सर ॥ किन इक धरौ विलंब । कहीं बर बीर पुच्छि नर ॥ करि अस्तुति कलि बानि । बीर देवाधि देव सुनि ॥ हम मनुष्य मय मोह । तास नहिं लहै अंत पुनि ॥ पुच्छड सु देव आपुब्ब कथ । कोन रूप इह पुत्तरिय ॥ रह लच्छि थान सुर केम तत । कौन काज बर सुद्धरिय छ० ॥ ४५१ ॥ देव का उत्तर देना कि यह ऋद्धि रानी है। गाथा | सुर बाँनीयं चंदं । सुप्रसन्नं देव मय कब्बी ॥ इह तेजे रिधि रांनी । संपेषे सु चंद गुरु कबी ॥ ई० ॥ ४५२ ॥ यह ऋद्धि साक्षात लक्ष्मी का रूप है इसे तुम बे खटके भोग (१) मा.-मुक्ति । (२) मो.-फुनि । (३) मो.-तन।

२५० पृथ्वीराजरासो । [चौबीसवां समय ७० १ । सकते है। यह देव बानी सुनकर चन्द प्रसन्न हुआ और रावल का संशय मिटा । कवित्त ॥ इह सु कृत्य बल रूप। देव देखहु सु मोह मत ॥ माया छाया सु लच्छि । अनुरुरै सु लच्छि रत ॥ इह लच्छी बर रूप । तेज जाजुल्य प्रमानं ॥ इम वचन इह रिहि । तुमहु सुप्रसन सुथानं ।। भोगवन काज संभरि सुपहु१ । इह बिधिना अप कर गढ़ियः ।। सुनि चंद बचन आनंद हुआ। राज गुरू संसय मिटिय ॥ ई० ॥ ४५३ ॥ इस हिँडाले का पूजन में रखना यह कहकर देव अन्तर्ध्यान हो गए। राजा फिर धन निकालने लगे। दूहा ॥ हिंडौनौ बर हेम करि । सिंघासन सुरराज ॥ वह प्रसन होइ रष्षिया । पूजन हरि गुर राज ॥ ० ॥ ४५४ ॥ पिन धरि माया अप्प दुरि । गए सु अंमर देव ॥ फिरि कढ़न लग्गे द्रव । लदै सुरपति भेव ॥ ० ॥ ४५५ ॥ कुवेर के से भण्डार सा धन निकलना, सब को आश्चर्य होना और तब सुरंग को देखना। कवित्त ॥ कलस बंक बक्क । लोह संकर बर बंध्यौ । रजत कलस अरु हीर । रत्त अंतर चित संधौ। हेम कलस नग भरिग । कति दीपन जनु अग्गी ॥ सुबर कलस पाषान । मद्धि मन तेज उपंगी॥ आचिज्ज चंद बरदाइ भय । ग्रह कुबेर करि लष्पयो । गुरराज राम भह सहित । फिरि सुरंग सब दिष्षया ॥ ई० ॥ ४५६ ॥ पुतली का बिना कुछ बोले चन्द और रावल की ओर तीक्ष्ण कटाक्ष से देखना । कवित्त । ना पच्छे कवि चंद । राज गुर संमुह दियौ (१) मो.-सपहु। (२) ए00 को.-घटिय । (३) मो.-लिष्पयो चैबीसवां समय ] पृथ्वीराजरासो। २५१ ब्रह्म थान शिव थान । थान पति नाक विसध्यौ ।। नवति बीर ग्रह जोग। सिद्ध नव निद्ध स अहो । च्यारि अंग लछी प्रमान । धूम हादस अंग दिठ्ठा ! सा अंग बाल पुत्तलि अचभ । हाइ भाइ विभ्रम बहै लावनि चिंत उत्तर रइति । बैंक कटान चित्त है । ई० ॥ ४५७ ॥ चन्द और रावल का मूर्छित होकर गिरना । कुछ देर में संभल कर उठना। कवित्त ॥ मुच्छि पस्यौ कवि चंद । मुच्छि दुजराज पचौ कन्च || नाच भंग तन भंग । अंष भल मलिय नैन जल ॥ उष्ट कंप तन श्वेद । भेद बल बिन कवि किन्नौ ॥ चढ़िय अंग पिंडरिय । गात सोभत जल भिन्नौ ॥ सिथल चरन गति भंग है। वै विलास अभिलाष गति ॥ जग्गेव मुच्छि दुजराज सब । देव एव चिचं सुभति ॥ छं० ॥ ४५८ ॥ उठने पर राज गुरु का पृथ्वीराज से पूछना कि असंख्य धन निकला अब क्या प्राज्ञा है। टूछा ॥ मुछि उद्यौ गुर राज तब । पुक्यौ संभरि बार । जु कक्कु सुबर अज्ञा नृपति । धन निकस्यौ अप्पार ॥ छ० ॥ ४५८ ॥ धन के कलश आदि का वर्णन । रावल और पृथ्वीराज का एक सिंहासन पर बैठना । कवित्त ॥ सत्त कलस चंवकिय । सत्तर अध मंडि रजकिय ॥ हेम कलस सत पंच । कलस पाषान सतक्किय ।। सत्त अबाजिव । सहस अध षग्ग प्रमानं ॥ हेम होर हिंडोल । एक प्राचंभ स थानं ॥ जान्यो न देव देवाधि गति । देव जोग सिंहासनह ॥ चिचंग राव रावर समर । सम सुराज प्रथु आसनह ॥ छ० ॥ ४६० ॥ (१) ए. स. को.-कंठ । (३) ए. कृ. को.-मित्त । (३) रा. कृ. को.-सित।

७५२ पृथ्वीराजरासा । [चौबीसगं समय ७२ एक दिन संध्या के समय देवी के मठ के पास पृथ्वीराज और रावल पाए। एक सुदिन संध्या समय । विझासनि के थान || एक अचंभो देखियै । जो आवै चहुबान ॥ छं० ॥ ४६१ ॥ उभय राज बर वत्त करि । चले सुथानक देव ॥ निकट देखि देवी सुमट । गए सिंघ बर सेव ॥ छं० ॥ ४६२ ॥ आए नृप चिचंग पति । अरु संभरी नरिंद ॥ तब लगि राम सु विन ने। करिय अचिज सु चंद ॥ ई० ॥ ४६३ ॥ पृथ्वीराज और रावल के शोभा और गुण का वर्णन । छंद भुजंगी । समं चढ़ियं समर रावर नरिंदं । तिनं वाम भुज्जं सनं सूर नदं ॥ घनं सथ्य मध्यं दोज बीर गज। तिनं देवतें वामता काम लाजं ॥ ई०॥४६४ ॥ उठी मुच्छ आनं धुनी लग्गि गेनं । मनों चंद बीयं सियं कीय हेनं ॥ दोजराज राजन्नता राज सक्की। दोऊ धंम पंडे जम डंडहकी ॥ई०॥४६५ ॥ दोज रत्त माया ननं अम्ग लग्गै। मनों कंजरे पत्र जलं भिटि भग्गै ॥ उभै सूर नूरं विराजत राज । जिन सोभियं कंठ रच हिंदु जांजं ॥ ई० ॥ ४६६ ॥ वेद मंत्र से दोनों राजाओं के लिये पूजा की और दस महिष बलि चढ़ाया। चतुःषष्टि देवि ने प्रसन्न होकर हुङ्कार किया। कवित्त । वेद मंत्र दुज राम। उभय कारन क्रित किन्नौ समर समरसन कीन । राज उनहार सुलिन्नौ । दस महिष्ण बल भंजि । चंद मंचं प्रारंभे ॥ नृप आज्ञा नन दीन् । सस्त्र मंगै प्रारंभे ॥ आरंभ मंच चवसठि जगि । हुंकारव सह हुअ॥ गत दंद चंद चंदाननहु । मात प्रसनन मत्त जुत्र ॥ ई० ॥ ४६७ ॥ है (१) ए.-सिथंकी । (३) ए. कृ. को.-कंप । (२) ए.-दत्त । (४) मो:-मगं ।

चौबीस समय ७३] पृथ्वीराजरासे।। ०५३ ३ राजा ने सिंहासन हाथ में लेकर देवी की स्तुति की देवी ने प्रसन्न होकर हुङ्कार किया। दूचा ॥ सिंहासन प्रिथिराज ले । मात वरंनन कोन ॥ मान प्रसन चहुआन कै । जै हुंकारव दीन ॥ छ ॥ ४६८ ॥ देवी पृथ्वीराज को आशिर्वाद देकर अन्तर्ध्यान हो गई। कवित्त । हुत्र प्रसाद चवसठि । एथ्य सिंघासन अप्पिय ॥ बत प्रप्यौ प्रथिराज । कित्ति कलसा लगि थप्पिय ।। बिय सपत खम्भे न । पुत्र लभ सु थान तुम॥ मन सु बस जय लभै । सज्ज अनुसत पित्त जुत्र ॥ पूजन थान रविवार कहि । श्रादिष्ट मात अंतर भव्य ॥ सुभ लच्छि सुभग्रह आइ तह । बर सुहेम इत्यां दस्य ॥ पृथ्वीराज ने सिंहासन और लक्ष्मी मंगाकर रावल के साम्हने रक्खी । रावल ने कहा कि यह लक्ष्मी तुम्हारे पास आई है, तुम्हारी है। पाटन के यादव राजा की कुर्वरि ससिन्नता की सगाई का विचार ॥ कवित्त । मॅगि सिंघासन राज । लच्छि चतुरंग सु अप्पिय ॥ समर सिंघ रावर नरंद । अग्गै धरि जप्पिय । रंजि राज पाछुट । राज दिल्लिय दिस भाइय ॥ वर पहन जहाँ नरिंद । लिखि दूत पठाइय ॥ श्रोतान राग चहुआन हुआ। कथा अंपि ससिहत क्रिय ।। पावस प्रमान कहिय विकट । सुबर राज यों मत्त किय ॥ ई० ॥ ४७० ॥ गाथा। सिंघासने सुरेसं । अरु सु लच्छि सा इयं हियं ।। सो अग्गै बर सिंघं । मुक्के राज परिकरं सब्बं ॥ ई० ॥ ४७१ ॥ रावल समरसिंह का धन लेने से इंकार करना और कहना कि यह धन तुम्हें प्राप्त हुआ है सो तुम्हीं लो। कवित्त ॥ रंजि राज दष्विन गिरेस । राजन प्रति बुल्लिय ॥ तुम सु बड़े राजिंद । कहा गुन क कहै स भलिय॥ ।

[चौबीसवां समय ७४ पृथ्वीराजरासो । ०५४ धम सु तुम्म सगपंन । जानि पाए तुम सथ्यं । तुम लहुए बहुांन । मुष्य को सुअरथ्यं ॥ तुम कहिय बत्त अब जो हमें । तुम समान नहिं गीति भति । उच्चरो बचन तुम राज बर । सो हम हृदय सुमत्ति गति ॥ छः ॥ १७२ ॥ पृथ्वीराज ने जब देखा कि धन लेने की बात से रावल को क्रोध आ गया तब उन्होंने अनुचरों को धन ले लेने को कहा। दूहा ॥ अति क्रोधित रावर समर । जब दियौ प्रथिराज ॥ तब अनुचर प्रति उच्चरिय। लेहु लच्छि धरि साज ॥ ॥ ई० ॥ ४७३ ॥ पृथ्वीराज से रावल का घर जाने के लिये सीख मांगना पृथ्वीराज का कहना कि दस दिन और ठहरिए शिकार खेलिए । रावल का आग्रह करना। कवित्त ॥ तबहि जुग्गबर समर । राज राजन प्रति बुल्लिय ॥ सु सीष संभ। चलचित्रकोट स थलिय ॥ तब राजन उच्चरिय । रहो दस दिन सब मिलिय ।। रमें सरस भाषेट । करें क्रीला धर दिल्लिय ॥ तब करत राज आठपति । अहो राज राजन गुर । हम चलें राज काजंग गुर । भर सु सब सम नेह उर ॥ ई० ॥ ४७४ ॥ प्रेमाश्रु भरकर रावल ने विदा मांगी, पृथ्वीराज उठकर गले से गले मिले। दूपा ॥ भरे सु सकल सनेह करि। पर मंगिय सीप ॥ तष सुराज राजन गुर । उठि मिलि सज्जन ईष ॥ ० ॥ ४७५ ॥ पृथ्वीराज ने जाने की सीख देकर कहा कि हम पर सदा ऐसा ही नेह बनाए रहिएगा। देत सीष प्रथिराज प । इह बुलिय गुर राज ॥ होत सगप्पन ग्रेह रह । रष्षत रचियो काज ॥ छ० ॥ ४७६ ॥ (२) मो.नंग। (३) मो.-रहिलं (१) ह.मो.-गपत्र ।

चौबीसवां समय ७५] पृथ्वीराजरासो । रावल ने कहा कि हम तुम एक प्राण दो देह हैं, हमको तुम से बढ़कर कोई प्रिय नहीं है। नृप सन रावर उच्चरिय । तुम सम नेह न कोई ॥ जीव एक पंजर उभय । कहन लोप है दोह ॥ ई० ॥ ४७७ ॥ रावल समर सिंह गद्गद हो बिदा हुए, और अपने देश की ओर चले। तब सनेह नप नैन भरि । अंसुत्र आप सु राज ॥ समर सिंघ चित्तौर कै । दिय अन्या सु समाज ॥ ७० ॥ ४७८ ॥ रावल को विदा कर राजा ने चन्द और बैमास को बुलाया और रावल के यहां हाथी आदि भेट भेजा। जब रावर सीषद सु करि । चदि दष्यिन गिर राह॥ तब सुराज प्रथिराज गुर । बोलि चंद बिरदाह ॥ छं० ॥ ४७८ ॥ कवित्त ॥ तबहि राज प्रथिराज । बोलि कैमास चंद बर ।। दिय अध्या बर सेव । कीए एस राव गुर ॥ *जुगम सिंघ बर क्रमिय । लेछु परिकर करि वेसं ।। गय सुपंच मद गंध । सत्र इय साज सुरेसं ॥ ले चले चंद बर दाह बर । जहां राज रावर सुभर ।। लैधरी बसत अनेक सुर । करि प्रस्तुति मुष कोटि तर ॥ ई० ॥ ४८० ॥ रावल ने चन्द को मोती की माला देकर विदा किया और आप चित्तौर को कूच किया । । राजन बर रपिय प्रसन। करिय सब सामंत ॥ माल मुत्ति दिय चंद कवि । चल्या चित्रगढ़ भंति ॥ ई० ॥ ४८१ ॥ कैमास और चन्द का राजा के पास आना और राजा का दिल्ली चलना। मा.-"मग सिंह जिहि क्रमिय" । (१) मो.-नर ।

५६ पृथ्वीराजरासो। [चौबीसवां समय ७६ परिल्ल पार ॥ फिरि आये कैमास चंद बर । मिले राज तई पर्न प्रेम भर ॥ दिल्ली पुर पावत चछुभानछ । अति तारन उच्छव समानह ॥ ई० ॥ ४२ ॥ कैमास ने सब धन हाथियों पर लदवाया । राजा खटू बन में शिकार खेलता चला। कवित्त । बंचि राज कैमास । सई अंतर सिल लीनछ । द्रव्य नाम उभरीय । भरिय कर हासे तीनह । एकादस गज पूर । पंथ संभरि पुर थानछ । वासुर सत संक्रमे । भरिय भंडार विधान ॥ संचरिय राज गया बहुरि । पुर षह पारस रवन ।। कर पच रूढ़ जहा सुषह । आइ राज भेव्या सुजन ॥ ई० ॥ ४८३ ॥ पृथ्वीराज ने बहुत से धन को बराबर भाग कर के सब सामंतों को बांट दिया। सरदारों का बांट का वर्णन । इंटि दिया प्रथिरान । भाग किन्ने सह श्रब्बर ॥ एक भाग कैमास । तीय अप्ये नरसिंघ नर । पंच भाग चावंड । भाग अहो बर कन्हं । बादस भाग नरिंद। दियो परिगह सब ईनं ॥ प्रथिराज दिष्ट आवै नहीं । चिकट कुंभ ज्यां जल अभिद ॥ लग्गै न नीर पचह कमल । भिदै न मति छीवै उछिद ॥ ई० ॥ ४.४ ॥ दूहा ॥ एक भाग दिय विप्र कर । करै राज सुष कंद ॥ धन लभिय प्रथिराज धन । कथी कथ्य कवि चंद ॥ ई० ॥ ४८५ ॥ बड़ी धूमधाम से दिल्ली के पास पहुंचे, राजकुमार ने आगे से आकर दण्डवत किया। बड़ा आनन्द उत्सव हुआ। कवित्त ॥ अति तोरन उच्छवह । आइ ढिल्लीय निकट बर ॥ रेंन कुमार सु भाइ । सुबर सामंत मधुत्तर ॥ सत्त दून असवार । कहत नामी अग्गै भर ॥ छडि तुरिय पय लग्गि । दीय सा चढ़न सीष गुर । (१) मो.- बटाजूट बह।

चौबीसवां समय ७७]
पृथ्वीराजरासो।
999
बंदै व चढ़े तुरियं समथ । आए नंद उछाह घर ।
जित्ते मलेच्छ लभ्यौ सुधन । अति तारन उच्छव नयर ॥ छ० ॥ ४०६ ॥
जेठ सुदी तेरस रविवार को राजा दिल्ली आए।
गाथा ॥ अति तौरन उच्छाहं । आए जेठ सुदि चयोदसियं ॥
सुभ जोगं रविवारं । गहनं साह बढि जस भारं ॥ ० ॥ ४८७ ॥
महल में आने पर रानियों ने आकर मुजरा किया।
दूहा ॥ ग्रहन साहि जस बढ़िय धर । भाइ धवल मधि साल ॥
त्रिया सकल आई सु तह । मुजरा करन सु हाल ॥ छ० ॥ ४८८ ॥
दाहिमा, आदि रानियां न्योछावर कर राजा की सीख पा
अपने महल में गई।
गाथा ॥ दाहिम्मी प्रथु भही। पुंडीरी आइ नप ढिग्गं ॥
करि न्यौछावरि सकलं । नृप दी सीष गइय ग्रह अप्पं ॥ छ० ॥ ४८८ ॥
रात को राजा पुण्डीरी के महल में रहे । सबेरे बाहर आए,
मन में शाह के दण्ड का विचार उठा।
राजा धवल संपत्तं । गये ग्रह रति तथ्य पुंडीरं ॥
करि रस अनंग क्रीडा । बढ़िय सुबेलि सुमन मन मथी । ई० ॥ ४० ॥
सुमन वेलि मन मथ्थी । करि क्रीडा हुअपर प्रातं ॥
अंतर साल चयटुं। मन विचार सायं दंडं ॥ छ॥ ४८१ ॥
बादशाह से जो घोड़े आदि दण्ड लिया था सब सरदारों में
बांट दिया। अपने पास केवल यश रक्खा ॥
कवित्त ॥ दंड सुबर पतिसाद । दीय इय बंटि राज बर ॥
बीस सुभर इय कन्ह । बीस इय उंचह निठुर ॥
बीस टूअ रघुबंस । बीस उम्भय दाहिम्मं ॥
अत्तताइ अल्हन पहाड़। बीस इय जैन गुरंमं ॥
औरह सु सकल भर बीस अध । बंटि बंटि दिय सबन नर ॥
रष्यन सु गल्ह राजंद गुर । जस रब्यौ निज बर सुकर ॥ ई०॥४८२ ॥

पृथ्वीराजरासो।
[चौबोसवां समय ७८
गाथा ॥ जस रष्यो कर अप्पं । मुत्तिय माल लालयं द्रब्बं ॥
आरोही पुर दत्तं । कवि दीना सु अवर कर साई ॥ ई० ॥ ४६३ ॥
दूहा ॥ सकल दंड पतिसाह को । बैटि दिया सब सूर ॥
लपत राज अति पत्रिवर । ग्रीषम वित्तिय पूर ॥ छ० ॥ ४६४ ॥
इति श्री कविचंद विरचिते पथिराज रासके षट्ट बन मध्ये
आखेटक रमन धनसंग्रहन पातिसाहबंधनं धनकथा
नाम चौबीसम प्रस्तावः ॥ २४ ॥

अथ शशिवतावर्णनं नाम प्रस्ताव । ॥ ( पचीसवां समय।) शशिव्रता की आदि कथा वर्णन की सूचना दूछा ॥ आदि कथा शशित्त को। कहर अब्ब संमूल ॥ दिली वै पतिसाहि अहि । कढि लच्छि उन मूल ॥ छं० ॥ १ ॥ ग्रीष्म में पृथ्वीराज का विहार करना । अरिल्ल ॥ ग्रीषम नु कीड़ा सुराजन । पिति उकलत घेइ नभ साजन ॥ विषम वायु तपितर तनुभाजन । लग्गि सीत सम्मीर सुकाजन ॥ ई० ॥ २ ॥ कवित्त ॥ लग्गि सीन कल मंद । नीर निकटं सु रजत घट ॥ अमित सुरंग सुर संध । तनह उबटंत रजति पट ॥ मलय चंद मलिका । धान धारा ग्रह सुब्बर ॥ रंजिबिपन बाटिका । तीस द्रम शंह रजति तरु ॥ कुमकुमा अंग उवटंन अनि । धि केसर घरसार पति ॥ क्रीलंत राज ग्रीषम सुरिति । आगम पावस भइय भति ॥ ० ॥ ग्रीष्म बीतकर धपा का प्रारम्भ होना। गाथा ॥ श्रीषम वित्तिय कालं । आगम पावस दीमझेनं ॥ दिसि दधिन बर देशं । नारक आद चंद्रोदयं नाम ॥ छ० ॥ ४ ॥ राजा सभा में बैठे थे कि एक नट आया, राजा ने अादर कर उसका परिचय पूछा। सभा विराजित राजे । तहां नट आडू पत्त संगीतं ॥ मिलत मान दिय राज। पुच्च्यि विगति देस र मात ॥ ई० ॥ ५ ॥ (१) ए.-.-को.-श्रीलंत । (३) मो.-राजन । (५) ए.-.-का-तादूक। (२) ए.-.-को.-तपि तम तन । (४) मो.-घट। (६) ए.-..-को.-अय्यं ।

७६० पृथ्वीराजरासो। पचीसवां समय २ नट का गुण दिखलाने की आज्ञा देना। दूहा ॥ इह संभरि वप उच्चरिय । अहा सु नट गुरराइ । गुन उचार' का क्रिज्जियै । ज्यौ दिज्जै दानाइ ॥ ई० ॥ ६ ॥ नट का कहना कि मैं नाटक आदि सब गुण जानता हूं आप देखिए सब दिखाता हूं। गाथा ॥ नाटक प्रमान कथयं । सुनि राजन धी ढिल्लीसं ॥ पाचं घर के सब्बं । गुन सुनियै चितयं लायं ॥ ई० ॥ ७ ॥ दूहा ॥ अवसर मत्त प्रगह किय । जंत्र मृदंग सुतान ॥ करिय राग श्री उंचकर । करन नृत्य बहु गान ॥ ई० ॥८ देबी की बन्दना करके नृत्य प्रारम्भ करना । आदि सकल अस्तुति करिय। पहुपंजलि. पटिदेव ॥ कचि मंगल धरनी निरपि । करन नृत्य अति भेव ॥ छ० ॥ ८ ॥ चंद चारु मागध सुअरु । गीत प्रबंध प्रसन्न ॥ उघटि विघटि सब प्रमुष दै। देषि विगति सुर भिन्न ॥ छ० ॥ १० ॥ नट का नाच के पाठ भेद बतलाना । तब सुनह इम उच्चरिय । हो राजन नर इंद ॥ बहु विवेक संगीत कन्छ । अष्टह नृत्य सुनंद ॥ छ ॥ ११ ॥ आठों भेदों के नाम । रोक ॥ मृदंगी दंडिका तानी । कहली श्रुत धुर्धरी ॥ नृत्य गीत प्रबंधं च । अष्टांगो नृत्य उच्यते ॥ छं० ॥ १२॥ नृत्य देख कर बैठने का हुक्न देना। दूहा ॥ कश्यि नपति अष्टंग सुधि । रंजि राज कल गान ॥ बहुरि हुकम बैठन्न दिय । फिरि पुच्छिय थह न्यान ॥ छ ॥ १३ ॥ (१) ए.-उबार। (३) मो.-धरती। (७) मो. धधरी। (२) मो-कधियं । (४) मो.-सुरुमा (५) मो.-प्रमान। (६) मो.-तान । (८) ए.-.-को.-अष्टागो।

पदीस समय ३] पृथ्वीराजरासा। राजा का नट से उसके निवासस्थान का नाम पूछना । तब गजन में रिय । अहीस नटवर राय ॥ कान पान रह सुनम । की सु गुन पनि भाय ॥ ६ ॥ १४ ॥ नट का कहना कि देवगिर में मैं रहता हूं वहां का राजा मान- वंशी जादव बड़ा प्रतापी है। राजा की बड़ाई। तर नट नाम करि उहरिय। मुना गज दिल्लीस ॥ हो । वंश जय नृपति । देव गिरी बसि जीस ॥ ई० ॥ १५ ॥ कवित्त । देवगिरी जद्दव नरेश । अनि प्रबन नपान तप ॥ संगीतह बर कन्ना । बहन शुभ ग्यान सुभत वय ॥ ज्यान तान गुन सहन । भेद सुन ग्यान विचारं ॥ कास राज संभीर । रहो नट विद्य उचारं। ना महसु पच न्नेक गुन । रहै सुनहं निशि दीड पर ॥ राजन राज जद्दव नुपनि । ज्यों सुदेव पति नाक गुर ॥ ई० ॥ १६ ॥ मैं उनका नट हूं आपका नाम सुन यहां आया। गामा ॥ निहि ग्रह नर पर रूपं । आर मंगेत्र सीष करतं ॥ तुम गुन अति संभरियं । आयन हुअ एक दिल्लि मझोनं ॥ ई० ॥ १७ ॥ राजा का पूछना कि उनकी कन्या का विवाह किसके साथ निश्चय हुआ है। कहि संभरि नृप राज । हो नट रा सुनहु बर बचनं ॥ किहि लाइन बर संगं । को राजन कवन घर माझं ॥ ई० ॥ १८ ॥ नट का कहना कि उज्जैन कमधज्ज राजा के यहां सगाई ठहरी है। पर घर उजेन मकं । करि पामरि सगप्पनं राजं ॥ शुभ अंन करि बादं । व्याहन मन कीन राज कमज्ज* ॥ ई० ॥ १६ ॥ 14. मे-सान। (२) मा.-मान। (४) ए.-.-का-संभरिय। (३) ए.-.-का-इंद। * ध्याहन कीन कमज्नं।

पृथ्वीराजरासो। [ पचीस समय ४ दूचा ॥ कै सगपन जद्दव नृपनि । करै तु दिसि कमज्ज ॥ कोई पुत्र अनूप है। तिन गुन यान केज्ज ॥ ई० ॥ २० ॥ व्याहन मन कमज्ज करि । सगपन राजदार ॥ पंसारी दिय पुत्र पर । तिहि सुची बर ठौरं ॥ ई० ॥ २१ ॥ पुची वरी उजेन दिसि । पहिले पंग स पुत्त ॥ अवन उवन पुर आदि दै। पढि जद्दव ग्रह तत्त ॥ ई० ॥ २२ ॥ यादव राजा ने सगाई के लिये ब्राह्मण उज्जैन भेजा है। पर लड़की को यह सम्बन्ध नहीं भाया । गाथा ॥ पठवन किय दुज हो । पुषी दीय पुरो उजेनं ।। तिहि पुत्री नारत्तं । व्याही अंगात अज इंदं ॥ ई० ॥ २३ ॥ नट का शशिव्रता के रूप की बड़ाई करना । दहा । सुनि राजन क्यों करि कहै । जो शशित्ता रूप ॥ जीह एक बनत न बनि । तिन गुन बन्न नूप ॥ छ ॥ २४ ॥ सभा उठने पर राजा का नट का एकान्त में बुलाना। तव राजन ऊठी सभा। फिरि दीनी सब सीष ॥ अंदर नह बुलाइ के। पुछिय विगति बिसीपः ॥ ॥ २५ ॥ नट का शशिव्रता का रूप वर्णन करना। कवित्त ॥ कहै सु नट राजिंद । ब्रह्म आमोदक दिन ॥ चंद कला मुष कंज । लच्छि सहजंह सरूपतन ॥ नेन सु मृग शुक्र नास । अधर बर बिंब पक मति ॥ कंठ कपोत मुनाल भुज । नारंगि उरज सति ॥ करि लंक सिद्ध जुग जंघ भ । चन्नत हंस गति गयंद लजि ॥ सानाति काज नमिय तरुनि । मनों मेनिका रूम सजि ॥ छ० ॥ २६ ॥ दोहा । कह गुन बरनों राज कहि । कुंअरी जव नाथ ॥ विधना रचि पचि कर करी । मनुं में निका समाय ॥ छं. (१) मो.-सदीर। (२) ए.-.-को-पुरि। (३) ए.-.-को-विईख। ।

पचीसवां समय ५] पृथ्वीराजरासो। ६३ २८ उसका रूप सुन राजा का आशक्त हो जाना और नट से पूछना कि इसकी सगाई मुझ से कैसे हो। अरिल्ल ॥ सुनि राजन्न लगा औतानं । लको मीन केतु क्रत बानं ।। क.है नट सो राजन बर प्रेम । मह सगपन मा करहि सुकेने ॥ ७० ॥ नट का कहना कि इसका उत्तर पीछे दूंगा। मुझ से इस में जो हो सकेगा उठा न रक्खूगा । दूहा ॥ पुनि नर वर 2 उरिय । फिरि कहि राजिद ॥ जो मुझ कीयौ होइ है। तो करि हौं नृप इंद ॥ छ ॥ २८ ॥ राजा का नट का इनाम देकर विदा करना, नट का कुरुक्षेत्र की ओर जाना। तब राजन नट सोष दिय । गज सु एक पंच चल्यो । दिसि कुरखेन प्रनि । परसन चरि चरनंच ॥ ई० ॥ ३० ॥ ग्रीष्म बीतकर वर्षा का आगमन हुआ, राजा का मन शशि- व्रता के और लगा रहा । अरिल्ल || ग्रीषम रिति वित्ती सुभ रा । पावस भागम भई समाज ॥ सुनि बट बैन नायक जय कसा ! मनीरज्ज हंस अालम इथ ॥ ॐ ॥३१॥ राजा का शिव जी की पूजा करना, शिव जी का प्रसन्न होकर आधी रात के समय दर्शन देना। दूध ॥ हर हेवा राजन करत । अमिय मास जब संग ॥ अद्ध निना शिष बाद के। दिय सु वचन मन रंग ॥ ई० ॥ ३२ ॥ शिव जी का मनोरथ सिद्ध होने का बर देना। जो बामन मन सईई । को परे हर ईस ॥ नन रिता करि राज गुर । आया गुन तुछ बीस ॥ ई० ॥ ३३ ॥ राजा का स्वप्न में बर पाकर प्रसन्न होना और किसी तरह वर्षा ऋतु काटना। कत्ति ॥ हुभ प्रभात जब राज । सुपन मन महि राज रस ।। मरुन होइ शिव शिवा । काम सीम सु बंद जस ॥ ।

पृथ्वीराजरासो। [ पचीसवां समय मन जाने बर: अप्पा लगि ओमान राज उर ॥ चित्र महायतगैद' । बहुरि उमरैन अवर पर ॥ मन धीर करत पावस सुरिति । छिन छिन जुग जुग जान जिय॥ बर मार सेर ढकुर बचन । लगि नपत लन असम किय ॥ई. ॥ ३४ ॥ वर्षा की शोभा का वर्णन-राजा का शशिव्रता शे विरह में व्याकुल होना। कषित ॥ मार सर चिहुं ओर । घटा आसाढ़ बधि नभ ॥ बच दादुर भिंगुरम । रटन शानिग रंजन सुभ ॥ नील बरन बलुमतिय । पहिराधन प्रलंकिय । चंद बध सिर व्यंज । धरे बनुमत्ति सु रजिय ॥ बरन बूंद घा मेघ सर । नब सुमरै जइब कैपरि । नन इस धोर धीरज सुनन । इष फुढे मनमथ क.र ॥ ई० ॥ ३ ॥ वर्षी वर्णन-राजा का विरह वर्णन । ईद पहरी ॥ घन घरा बंधि नभ मेघाय । दामिन्यि दमकि जामिनिय जाय ॥ बोलन मार गिर बर सुचाइ । चतिग्ग रटन चिहुं ओर नाइ छ॥३६॥ दादुरन मोर दस दिस डराइ । रह पंथ पथिक कि पाद साह ॥ रिकिनी दूरि जिन पंथ नाइ। तिहि बुंद लगत जनु ईघ जाहाई॥३७॥ दंपती कर क्रीला उमंग । मनमथ रहसि बढि अंग अंग ॥ बिरहती रटन पप्पोह नार । प्रफुलित्त लता लल्लरिय बार ॥०॥३६॥ घन इच्छलमा ललिपुक्फ मंत। रुब रंग रंग पावसह कंत। उमरिय पलिय सजिता संर । चलि मिलिय ग सायरह दूर ॥ई॥३८ रनि.करन कीलन गज थाह । नन इस धीर नन मुष्प ना ॥ नहि सजे सुष्य बहिषन वा । नन होत नपनि शीतन मुहाइ ॥5॥४०॥ सुच्य गय नारि मांहि । अनिताप जानन रोन मांहि । नन नीटसुष नन राज भंग । नागेतु प.ग मन मध्य पंग ॥ ३०॥४१॥ १.का.-गयंद, गह। २ मो.-धातुक। मो.-यंदा ३.-तिन । ५मो.-.-उतंग। ६शा-पक्षी ८..-कोल। मा०-६। मन प्रीत पचीस समय ७] पृथ्वीराजगस।। ॥ भेदेव अंग गरोन राई । जानै न कोई बर अवर भात ॥ में करन गई पावसी विषम्म । किय सुमन दमा दक्षन बारमा०॥४२॥ वर्षी बीत कर शरद का श्रागमन । दूा ॥ गन पाक्स आगम शरद । गई गुडन नभ मान ॥ ज्यों सद गुरु मिलि अंदरद । मिलि प्रगह गुरु आन ॥ छ० ॥ १३ ॥ शरदागमन-शरद वर्णन । सुकि पंक उत्तरि सरिन । गय बली' व मिनार ॥ जन्नधर बिन यों मे.दनी । ज्यों पति हीन चिया ॥ ई॥४४ ॥ छंद पडरी। बम्मलिय मला उगो सोम। कंदर्प गर उदित व्योम ॥ करिना सुनीर श्रार निवांन । पंगु रन हरै त्रिय द्रग जान ॥ मजिका फूल पुगंध वार६ । संजोग कंन रहिं प्पटाइ ॥ फल फूल सकन लुरंत अंब । जम प्रभा सुम्भ सुनि रानांब ॥ देवास पूजि वप रजि विवेक । सिर छच चेरि राजन तेक ॥ आगम्म शरद रितु चलन साज । आनंद उअर उमो सु राज ॥ अति प्रीति सूर सामंत काज । पति नाक सभा हेमंत लाग । किय सुमन चलन गिरि दक्षनेस । श्रोतान राग लग्यो अस ॥ छ०॥४५॥ अरिल्ल ॥ पावस रितु कीलन सु राजन । फिरि आइय दिन सरद समाजन ॥ करन राज क्रीला आपेटं । संक्रमि देस मद्धि मन भेटं॥०॥ ४६ ॥ राजा का अपने सरदारों के साथ शिकार के लिये तय्यारी करना। कवित्त ॥ सम सिकार कजिराज । सबर चतुरंग सु सज्जिय ॥ सघन सूर सामंत । अप्प अप्पन भर गज्जिय ॥ रंजि राम प्रथिराज । राज कीलन मन लााय ॥ बर पहन जहवन । दून राज पै पठाइय ॥ (१) मे.-दिसा। (२) मो.-मित पगट । (३) मो.-बेली। (४) मो.-मिर्मली। (५) मो-को-उहित सु(६) ए... को-बार। (७) ए.-.-को.-विमेक। (८) मो.-राजत अनेक । PronstartenmahitidateAI- MAHARAamatuwannat Awami पृथ्वीराजरासो। [पचीसवां समय ८ श्रोत न राग चहुबान हुअ । कया जधि समित्त क्रिय ॥ अब कहत कथ विस्तार किय । जो राजन दूतन करिय ॥ छ० ॥ ४७ ॥ राजा का शिकार के लिये सवार होना। गाया ॥ नुछ दिन अन्तर कमियं । राज क्रीलंन अप्प धर महं॥ एक सुदिन रागानं । कोलन आवेट अप चढ़ि चलिधं ॥ छ ॥ ४८ ॥ दूहा ॥ कील राज आषेट चढ़ि । अन्तर दिन हुअ आदि । मिलिन जोग विधि लिषियबर । करि सनई चढ़ि सादि ॥ छं० ॥ ४८ ॥ माघ बदी मङ्गलवार को शिकार के लिये निकलना। अरिन ॥ कीलन राज चढ़े आपेटं । माघ बद्धि दुनिया दिन भेटं ॥ दिन सुभवार सु मंगल लहियं। करन सिकार अप्य चढ़ि चलियं ॥ ई० ॥५०॥ राजा की धूमधाम का वर्णन । कवित्त ॥ चढ़िय राज प्रथिराज । साज आषेट लिए सजि ॥ स्थ्य सुभट सामंत । संग सेना सु तुच्छ रजि ॥ जाम देव का कन्ह । अत्त नाई निडुर गुर ।। मति मंत्री कैमास । राव चामंड जुमझा भर ॥ परमार सिंघ सूरन समय । रघुबंसी राजन सुबर ॥ इतने सहित भर सेन चलि । उडी रेनु आयास पर ॥ ई० ॥ ५१ ॥ बन में जानवरों का वर्णन । बागुर जाल बयन । हिरन चीते सु स्वान गन ॥ कालबूत, नग, बिहंग । विवाह नहोय चलत बन ॥ सर नावक बंटूक । हरित जन बसन विरज्जिय ॥ गै जिमि गिरि करि अगा। अप्प बन संपति सजिजय ॥ हैभारि भईय कानन सकल । मग अमग दल संचरिय। पिल्लन सिकार चढिय वपति । प्रथियरान महि संभरिय ॥ छं० ॥ ५२ ॥ शिकार का वर्णन। (१) मो.-देवयोश। (२) मा.-भाय। (३) मो.-पहान पदीसवां समय ] पृथ्वीराजरासो। इन सु सान मृगया सु । बाज उत्तंग अंग बर । निष निमा संचरहि । निमित्र जोजन जोजन सर । चित्त लिये जिम पवन | वेग जग्गै जिम अग्गिय ।। घट छुट्टै जिम सद्द । उरह चक्रवाक विसग्गिय ॥ यों बंधि राज आषेट बर । वपु सुव सुअ दिष्षे सु चष ॥ धह मंगि अंषि मंगल पवन । सबै होइ जोजन समष ॥ छ० ॥ ५३ ॥ घर घुरंत घन स्वांन । अप्प पंजर तीतर बर ॥ मच्छ जाल बग्गुरि हि । फंद फैदैत सुबर धर ॥ धनक वान हक्कां सु । सिंघ पंजर जल रष्पन ॥ घाट बैर वितमिल्ल । तार तारक्क चित्र पन ॥ सर हद्द सुरस लग्गै रमत । भुलै साथ श्री नाथ पनि ॥ कविद विरद वनन करै । अवन सुनै दिल्लिय वपति ॥ ॐ ॥ ५४ ॥ शिकार पर जानवरों का छोड़ा जाना । गाथा ॥ जित नित कुढे पंधी । थाबर जलह जंगमं जोतो ॥ समि पालं हरि पाल । भूपालं काल प्रति पालं ॥ ई० ॥ ५५ ॥ भालू, सूअर आदि का आगे होकर निकलना। भान्लक आइ सहोयं । बाराहं वास अयं पंचं ॥ आतुर परि राजानं । अनि अदभूत रूप शुक्ररयं । ई० ॥ ५६ ॥ राजा के बन में घुसने पर कोलाहल होने से शूकरों का भागना। दूहा ॥ गये सुक्न राजन सुर । करन घात सु प्रपंच ॥ कोलाहल सुनि सूकर ह । उठि चय कोस पुलंच ॥ ई० ॥ ५७ ॥ निहि को हर इक प्रबल षह । षादि सुहै डर तार ॥ फिरि अष्षो राजन्न प्रति । व्यौरो कोल उचार ॥ छ ॥ १८ ॥ (9) राजन। (३) ए.-मुझ HAL (२) ए.-.-का-राजन । (२) मो.-विकस्सिय। (२) मो.-माल । (१) मो.-हर।

०६८ पृथ्वीराजगसो । [ पचीसवां समय १० सब सरदारों का भी वहां पहुंचना, एक वधिक का आकर शूकर का पता देकर राजा से पैदल चलने के लिये निवेदन करना। और सकल सामंत भर । आई संपते तथ्य ॥ अरज राज प्रथिराज सम । कही बधिक इह कथ्य ॥ ई० ॥ ५८ ॥ घय सु दिवस राजन अभिय । तीस कोस चै अम्ग । जान से बेद त्रय । सिन नालूर सुरंग ॥ ई० ॥ १० ॥ बधिक कही इइ गजपति । घान करै सुभ संच ॥ दल सह नजि चल्यैि । सुबक गद्दी तुर संच ॥ ई० ॥ ६१ ॥ राजा का तुरंत घोड़ा छोड़ तुबक कन्धे पर रख बाराह की खोज में चलना। सब राजन्न तुरंग नजि । गहि दिढ़ तुबक सुकंध कोहर मध्य बराह बर । करिय बोट सुर संध ॥ ई० ॥ १२ ॥ सूअर को राजा ने मार कर बधिक को इनाम दे कर सुन्दर बारी में विश्राम किया, समय होने पर भोजन की तय्यारो होना। कविताइनिग राज बाराह । अन्य बकि इनाम दिय ॥ सुभर सकन सामंत । रंजि गजन्नर सुभंगिय ॥ बारी को सदुआन । तास धरा ग्रह सुब्बर ॥ महं विराम करि राज । अवर सा1 अप्प जुर ॥ जब भई गोठि तथ्यह सुबर । तब परिहार सु सद्द किय ॥ सामंत सुभर राजन असा आहारे बिंजन मुग्लिय ॥ ई० ॥ १३ ॥ चारों और राजा के शिकार की बड़ाई होना। दूहा ॥ दिल्ली वैहै वैगहन । एना * अघटक राज || चाबहिसि सुर जपई । धन पान समाज | छः ॥ ६४ ॥ (१) एक (२)7. रावति। (१) मो. धारी। (२) मो.-राजान। •ए-का-वेगहन बरन अखेटक राज । (३) मो.-राजान। (३) मो.-सय ।

पचीसवां समय ११] पृथ्वीराजरासो। ०६६ कवित्त ॥ उभय सत्त मग मुदित । बंधि फै दैत रहति बर ॥ यों बंधे हग बीय । कहै ओपमा चंद बर ।। मन बंधि कुलटा विटप । ग्यांन बधि मुकलित आवै दिन बंधि आवै कुमति । काल नर बुद्धि डुला ॥ आनई लज्ज गुन जस पकरि । आंनि संचि आवै अजस ।। आनई क्रोध पर कलह को । यो आने मग बीय गस ॥ छ ॥ १५ ॥ नाम स्वान गति सीह । पत्त पर भवत बाय पुर । कन्न दृढ़ अग्गि सु ज्वाल । जीव पुज्जै न चित्त जुर ।। दीप नयन प्रज्जरै । क्रन्न लंबे फैध डारे । कहि ओपम कवि चंद । बीज चंचन गति हारे ।। अति ज्वाल परिग्रह रोसभर । दुति तरंग छिति जल छलिय ॥ पामर रूषाट पंजर विहर । राज पास दसदिसि चलिय ॥ ई० ॥ ६६ ॥ राजा का अकेले बधिक के साथ शिकार के पीछे चलना और सरदारों का राजा के पीछे पीछे चलना। कवित्त ॥ इक समय राजन्न । करन क्रीला घर अय्यं ।। विपन मध्य संक्रमन । करन भाषेट सतप्पं ।। ग्रह करि तुपक सु राज । सग्ग छत्ती धर चल्लिय ॥ अवर सूर सामंत । फौज पच्छे धरि हल्लिय ॥ कर इथ्य डार छन सुपर । चल्ले राज तुछ बधिक सथ ॥ लम्या सुरंग आषेट को । क्रम्यौ राज पर भूमि पथ ॥ छं० ॥ ६७ ॥ शुकी का शुक पूछना कि दिल्ली के राजा के गन्धर्व विवाह का समाचार कहो शुक ने कहा कि जादव राजा ने नारियल देकर ब्राह्मण को भेजा। पुच्छ कथा शुक कहो । समह गंध्रवी सुप्रेमहि ॥ खवन मंमि संजोगि । रज समधरी सुनेमहि ॥ से (५) मो.-सु। (४) उपमा सु। (१) ग्राखेटक।

पृथ्वीराजरासो । [पचीसवां समय १२ ... ।इम चिंतिय मन मभिम। कै करो पति जुग्गनि ईसह । ईस पुज्जै सु जग्गीसह ॥ शुक चिति बाल अति लघु सुनत । ततविन विस उपजै तिहि ॥ देव सभा न जढुव बपति । नाल केर दुज अनुसरहि ॥ ई० ॥ ६८ ॥ ब्राह्मण का जैचन्द के यहां जाकर उसके भतीजे वीरचन्द से ससिव्रता की सगाई का संदेसा देना । एक गन्धर्व यह सुनता था वह तुरंत देवगिरि की ओर चला। ख केर दुज गहिय । हार जै चंद गयो बपु ॥ करी पवर हे जमह | अप्प अंदर बुलाइ बप ॥ नाल केर दुज आनि । कह्यो राजन अब धारी ॥ देव सु गिरि विप भ्रात । पुंज ससि वृत्त कुमारी ॥ सो दइय बंध नप बोर कहु । लगन मास दिन पंच वर ॥ सुनि श्रवन रह गंध्रव कथ । चल्यौ सु दछन देव धर ॥ छं० ॥ ६ ॥ गन्धर्वका शशिव्रता के पास आना, वह बन में विचर रही थी। दूहा ॥ चल्यौ सु दक्षिन देव गिरि । जहां शशिवृत्त कुमारि ॥ वियन मद्धि क्रीड़ा करन । समइ बाल चित चारि ॥ ई० ॥ ७० ॥ सोने के हंस का रूप धरकर गन्धर्व का दिखलाई देना, शशि- व्रता का उसका पकड़ना और पूछना कि तुम कौन हो। हंस का कहना कि मैं गन्धर्व देवराज के काम को आया हूँ। कवित्त । हेम हंसतन धरिय । बिपन मद्य विश्राम लिय। दिष्षि तास शशिवत्त । अतिहि अचरिज मानि जिय ।। बल कर गहिय सु तत्व । इत्व लै करि तिहि पुच्छिय ॥ कवन देव तुम थान । कवन माया तन अच्छिय ।। उच्चस्ची हंस ससिव्रत्त समं । मति प्रधान गन्धर्व हम ।। सुरराज काज आए करन । तीन लोक हम बाल गम ॥ ई० ॥ ७१ ॥ हूं पचीसवां समय १३] पृथ्वीराजरासो । २०१ कहा कि पङ्ग अर्थात् अर्थात् कान्यकुन शशिव्रता का पूछना कि हम पहिले कौन थीं और हमारा पति कौन होगा हंस का कहना कि तू चित्ररेषा नाम की अप्सरा थी, अपने रूप और गान के गर्व में इन्द्र से लड़ गई इससे दक्षिण के राजा की बेटी हुई। कवित्त ॥ कई वाल सुनि हंस । कवन हम पुब्ब जम्म कह ॥ करन पत्ति हम लहहिं । लेष विचार लहो इह ।। सबै ईस उच्चस्त्रौ । सुनहि शशित्ता नारी ॥ चित्ररेष अपकरि । सगीन अति रूप धरारी ॥ तिहि गरब इन्द्र सम कलह करि । क्रोध देवबंडी सुरम ॥ दच्छिन नरेस प तान बंधु । पुंज ग्रहै अवतार सुम ॥ ई० ॥ ७२ ॥ हंस ने कहा नरेश के भतीजा वीरचन्द्र के साथ तुम्हारे मा बाप ने सगाई की है पर वह तुम्हारे योग्य बर नहीं है। चौपाई ॥ कहै हंस सुनि बाल बिचारी । पंग बधुर बीर तिचि तु दई मातु पितु बंधं । सेो तुम जोग नहीं बर कंधं ॥ ई०॥ ७३ ॥ उसकी आयु एक ही वर्ष है, इस लिये दया करके राजा इन्द्र ने मुझको तुम्हारे पास भेजा है। तेम रहै बर वरष इक महि । इय गय अनत अभिभ हैं समतहि ॥ तिहि चार करि तुमहि पै आयो । करि करुना यह इन्द्र पठायौ ॥ ई० ॥४॥ शशिव्रता ने कहा कि तुमने मा बाप के समान स्नेह किया सो तुम जिससे कहो उसी से में ब्याह करूं ॥ तब उच्चरिय बाल सम तेहं । तुम माता सम पिता सनेहं ।। मुभम सहाय अवरि को करिहौ । पानि ग्रहन तुम चित अनुहरिहै। इं० ॥ ७५ ॥ हंस का कहना कि दिल्लीपति चौहान तुम्हारे योग्य बर है। सु पुत्तारी ॥ ।

००२
पृथ्वीराजरासी ।
[ पचीसवां समय १४
चौपाई. ॥ तब बोल्यो दुजराज बिचारं । सुनि समित्त कत्य एक सारं ॥
दिल्ली वै चहुबान महा भर । सेा तुम जोग चिन्तया हम बर ॥
छ० ॥ ७६ ॥
उसके सो सरदार हैं, उसने गजनीपति को पकड़कर
दण्ड लेकर छोड़ दिया।
सत सामंत सूर बलकारी । तिन सम जुद्ध सु देव बिचारी ॥
जिन गहियौ सर बर गज्जन वै। इब गय मंडि इंडि फुनि हिय वै ।
छं० ॥ ७ ॥
महा बली चालुक्य भीमदेव का जीता है। यह सुन शशि-
व्रता का प्रसन्न होकर कहना कि तुम जाओ और उन्हें
लाओ जो वह न आवैगे तो मैं शरीर छोड़ दूंगी।
गुज्जर वै चालुक भीमार । ते दिन राति डरै जंगल धर ॥
बरन जोग तुम तेह विचारं । सुनि की सुंदरि हरष अपारं ॥ ई० ॥ ८ ॥
तह तुम पिता कृपा करि जाउ । दिल्ली वै अनुराग उपाउ ॥
मांस षटह हो वृत्तह मेडों । थ्थुना आवै तौ तन छडॉ ॥ ई० ॥ ७८ ॥
हंस वहां से उड़कर दिल्ली आया।
तव उड़ि चल्यो देह दिस उत्तरि । ढिग ससिव्रत रष्पि निज सुंदरि ।
जुम्गिनि पुर आयो दुजराज । सोवन देह नगं नग साजं ॥ छ ॥ ८० ॥
बन में शिकार के समय हंस का आना उसे देखकर आश्चर्य
में आकर पृथ्वीराज का पकड़ लेना।
कवित्त ॥ बय किसोर प्रथिराज । रम्य हा रम्य प्रकारं ॥
सेत पष्य क्यि चंद । कला उहित तन मारं ।।
विपन मध्य चहुआन । हंस दिष्यो अप अष्षिय ॥
चरन भग्ग दुति होत । हेम पन्छी वियलष्षिय ।
प्राचिज देषि प्रथिराज बर । धाइ बपति बर कर गहिय।
आपुब्ब दुज्ज गति दूत कथ। रहसि राज से सब कहिय ॥ छ ॥८१ ॥

पचीसवां समय १५] पृथ्वीराजरासो । दूहा ॥ विपन मध्य आचिज्ज इह । दिष्यि राज प्रथिराज ॥ धत दूत कलधौत तन । हंस सरुप विराज ॥ ई० ॥ ८२ ॥ संध्या का हंस रूपी दूत का सबको हटाकर राजा को पत्र देना। सेझ सपत्तो नपति पै। द्वत सु जद्दव राइ ।। बर कग्गद बप इथ्य दै। कहि श्रोतान बधाइ ॥ ई० १८३ ॥ दूत का कहना कि एकान्त में कहने की बात है। इतना कहकर चुप हो जाना। कह्यो दूत मन अप्पनै । जो व्रनो विधि जोड ॥ दोषु जानि नन बन वहि । बप श्रोतान न होई ॥ छं० ॥ ८४ ॥ चौपाई ॥ अति सु मनह चिंते परि मान । मानहु थके सिंध जल वान ॥ दारून अप्प एक साइ जाइ । चितौ कहा सु अंनह पाइ ॥ ० ॥८५ ॥ दूहा ॥ इह कहि बत्त ठठुक्कि रहि । उत्तर एक न आइ ॥ मानो उरग छछूदरी । कंठ लगावहि धाई ॥ ई० ॥ ८६ ॥ गाथा ॥ मुष जंपी मन बत्तं । दूतं जे नवाइ हिर पर्छ । बर चहुबान कमानं । किम जहां नमो नम नाउं॥ छ० ॥ ८७ ॥ हंस का कहना कि शशिव्रता का गुण कहने को शारदा भी समर्थ नहीं है। टूहा ॥ इह अष्षो चहुआन से । नतो मार कहि आइ ॥ सुनिवेको समित्त गुन । सारदज ललचाइ ॥ छं० ॥ ८८ ॥ चन्द्र और सूर्य के बीच में शशिव्रता सेसी सुशोभित है मानों शृङ्गार का सुमेर हो। राका अरु सूरज विच । उदै अस्त दुहु बेर । बर शशित्ता सोभई । मनों शृङ्गार सुमेर ॥ ई० ॥ ८ ॥ शशिव्रता के रूप का মুল इन रूपह तरुनि । इन गुन आवै मान ।। सो बर बर कविचंद कहि । सुनहु तो कहं प्रमान ॥ छ ॥ १० ॥ (१) मो.-देशु । । वै 09४ पृथ्वीराजरासो। [पचीसवां समय १६ छंद चोटक ॥ बय संधिरु बाल प्रमान व्रनं । कहि चोटक बंद प्रमान सुनं ॥ बय स्यांमारु शैशव अंकुरयं । अह अंत निसागम संकरयं ॥ छ० ॥ ८१ ॥ जल सैसव मुद्ध समान भयं । रबि बाल बहिक्रम लै अथर्यः । बरसै सब जोबन संधि अती। सु मिलें जनु पित्तह बाल जती ॥ ई०८२ ॥ जुर ही लगि से सब जुब्बनता । सुमनों ससि रंतन राज हिता ॥ जु चलै मुरि मारुत भंकुरिता । सु मनों मुरवेस मुरी मुरिता ॥ ई०॥ १३ ॥ कलकंठ सु कंठय पंष अली । गुन जंपि कवित्त सु चंद बली ॥ ई०८४ ॥ कवित्त ॥ ससिर अंत श्रावन बसंत। बालह सैसव गम । अलिन पंष कोकिल्ल सुकंठ । सजि गुंड मिलत भ्रम ॥ मुर मारुत मुरि चले । मुरे मुरि बैस प्रमानं ॥ तुछ को परसिस फुहि । आन किस्सोर रंगानं ॥ लीनी न अमि नक स्याम नन । मधुप मधुर धुनि धुनि करिय ॥ जानी न वयन आवन बसत । अग्याता जोवन अरिय ॥ ई० ॥ ५ ॥ कवित्त ॥ पत्त पुरातन झरिग । पत्त अंकुरिय उछ तुछ ॥ ज्यों सैसव उत्तरिय । चढ़िय सैसब किसेर कुछ । शीतल मंद गुगंध । आइ रिति राज अचानं ॥ रोम राइ अंकुच नितंत्र । तुक्छ सरसानं ॥ बढन सीत कटि छीन हबै । लज्ज मान टंकनि फिरै ढंकै न पत्त ढंकै कहै । बन बसंत मंत जु करै ॥ ई० ॥ ९६ ॥ पृथ्वीराज का शशिव्रता का रूप सुनकर उसके मिलने की चिन्ता में रात दिन लगे रहना। सबेरे उठते ही ভি दूत से पूछना। दूहा ॥ श्रवनन भव श्रोतान वप । मन बंछै चछुआन ॥ मनु समित्त कुंआरि का । पच्चो उर हर बान ॥ ई० ॥ १७ ॥ के । (१) मो.-प्रमिय। (२) मो.-रोज। मा.-सु लगी अनु शैशव योबनता। (३) मो.-शीत।

पचीसवां समय १० ] पृथ्वीराजरासा । ००५ ॥ है वै कवित्त ॥ निसि नरिंद चहुबान । चित्त मनोरत्य विचारै भई दीह सब निशा । निशा सयनंतर धारै ॥ सयनंतर ससिटत्त । चाटु चटु बैन उचारे चारु चारु बर बयन । मान माननि संभारै। दैवान मनोरथ चित्त बर । भव भव छन्नन कह करै । भी प्रात दूत पुच्छै बपति । जद्दोवै चित्तै धरै ॥ छं० ॥ ८ ॥ हंस का राजा देवगिरि का जैचन्द के यहां सगाई भेजने और शशिव्रता के पण ठानने का वृतान्त कहना । दूहा ॥ बर बंध्यौ ससि वृत्त कौ । अरु बप भान कुंभार ॥ बेंही दिन कमधज्ज के। नाम बीरबर भार | ई० ॥ ८ ॥ ससिता कृत आडू । बरु देख्यौ बर कीन भान स्वयंबरह । एक वृत्त बल लीन ॥ ई० ॥ १० ॥ जैन धंभ मंद्यौ नृपति । बान हनन कृत लीन ॥ ला काजै दिसि दिसि नृपति । धर धर कग्गर दीन ॥ ई० ॥ ११ ॥ इह अमंत वप वर जिते । किया न मन्नै नाम । दारुन हत लीजै नहों । इह कहि पूरि सु ठाम ॥ ई० ॥ १०२ ॥ इह सुनंत प्रस्थान दै। बर पंचमि रवि बार ॥ पच्छ चला गवन्न सुनि । कानन बीरत बार ॥ ई० ॥ १०३ ॥ दोज वाल पावक बनि । सुनि परि उछह गात ॥ मानों त्रीय चतुर्दशी । कै शशि उठिय प्रात ॥ ई० ॥ १०४ ।। सुनि कै आसन उठि बर । ढुंढत फिरत कंत कंत के करत हो । कान भनक कछु होई ॥ ई० ॥ १०५ ॥ बीर चंद जैचंद बंधु । देवरु पुंज कुंअरि ॥ चहुआन पै। दै शशित्ता नारि ॥ छं० ॥ १०६ ॥ शशिव्रता की विरह जल्पना का वर्णन । । सु जो ॥ वप पठये (२) मो.-अमृत । (१) ए.-.-को-डवार। (३) कृ.-चार।

9७६ पृथ्वीराजगसो । [ पचीस समय १८ ॥ । आगाम बीर बसंत की। शिशिर संपते अंत ॥ प्रीतम पतन सु प्रीत को । दैन बांह सो कंत ॥ छ० ॥ १०७ ॥ कवित्त ॥ शशिर सु विथुरत बन । वियोग विक्कुरत बन कंते । दुइन बास रहि सास । कंत आयो न वसंते ।। उपवन पत्त संझरिय। विरह पंजर संसंझरि ॥ आस अनहिन 'हुलसि । विपन हुलसै सु सनझरि ॥ अनमेष जपत इच्छा रुघन । आनँद र भूषन तजै दोऊन होइ कवि चंद कहि । असु रयिरु धज सम सजै ॥ ई० ॥ १०८ ॥ शशिव्रता का चित्ररेषा के अवतार होने तथा पृथ्वीराज के पाने के लिये रात दिन शिव जी की पूजा करने का वर्णन । कवित्त ॥ चित्र रेष बाला विचित्र । चंद्री चन्द्रानन ॥ स्वर्ग मग्ग उत्तरी । चित पुत्तरि परमानन ॥ काम वान संजुरी। बाल अंजुरी सु लच्छिय ।। मार कलह उत्तरी । पुच अच्छी सु लच्छिय ॥ लछिन बत्तीस लच्छी सहज । रति पति चित्त समंधरै । संग्रहै वृत चहुआन का। गवरि पुज्ज दिन प्रति करै । ई० ॥ १० ॥ दूहा ॥ बरनी जोग बरन्न को । बर भुल्ले करतार ॥ तिहि कारन ढुंढ़त फिरै । सत्त समुद्रह पार ॥ छ० ॥ ११ ॥ वह आप अब मिल गए देर न कीजिए चलिए। जा कारन ढुंढ़त फिरत । सेा पाया दीलीस ॥ अब जद्दव सहित चढ़िय । दीनी ईस जगीस ॥ ई० ॥ १११ ॥ मैं महादेव जी की आज्ञा से तुम्हारे पास आया हूं। शिवा बानि शिव वचन करि । हो येठयो प्रति तुमझ ॥ कारन कुंरि वृत्त का। मन कामन भय मुझक ॥ ई० ॥ ११२ ॥ शशिव्रता के रूप गुण का वर्णन । (१) मो.-समानन।

पचीसवां समय १६] पृथ्वीराजरासो। वेसी ॥ । सुभ लच्छ जद्दव प्रिया । कचियै का सु विवेक ॥ हंस कहै राजन सुनिय । उत्तिम लच्छिन केक ॥ ई० ॥ ११३ ॥ काव्य ॥ पीनो रूपीन उरजा, सम शशि बदना, पद्म पचायतानी ।। व्यंबोष्टी तुंग नासा, गज गति गमना, दक्षना वृत्त नाभी ।। संस्निग्धा चारू केशी, मृदु प्रथु जघ्रा, वाम मध्या सु हेमागी कंति हेला, वर रुचि दसना, काम बाना कटाक्षी । ई० ॥११४ ॥ एथ्वीराज का पूछना कि तुम सब शास्त्र जानते हो सो चार प्रकार की स्त्रियों के गुणादि का वर्णन करो। मुरिल्ल ॥ सुनि प्रथिराज हंस फिरि पुच्चिय । तुम सब जान सु लच्छिन लच्चिय ॥ चारि जुत्ति चिया परकारं । कहु दुजराज सु लच्छिन सारं ॥ छं० ॥११५॥ हंस को देर होने के भय से कोई बात अच्छी नहीं लगती। टूहा ॥ कही हंस जद्दो सु कथ । लगि श्रोतान सुगज ॥ हिनन हंस धीरज धरै । लगै बान सम साज ॥ छ ॥ ११६ ॥ हंस कहता है कि स्त्रियों की बहुत जाति हैं पर शशिव्रता पट्दिनी है। कहै हंस बर राज सुनि । अति अनेक है जाति ॥ पदमनि है जद्दव कुंअरि । अनि तानि अनि भांति ॥ ई० ॥ ११७ ॥ राजा का उत्तम स्त्रियों का लक्षण पूछना। दुजराज सुनि । करि बरनन कथि सोइ ॥ को लच्छिन उत्तिम चिया । कहियै सो सव जोइ ॥ ० ॥ ११८ ॥ हंस का पद्दिनी, हस्तिनी, चित्रणी, और संखिनी इन चारा का नाम गिनाना । चारि जाति है त्रीय नन । पदमिनि हस्तिनि चित्र ॥ फुनि संषिनिय प्रम्भान इह । मन नह रंजिय मित्त ॥ ई० ॥ ११६ ॥ राजा जा चारा के लक्षण पूछना। छंद पद्धरी । सुनि इंस वैनं उर लगी बत्त । विधिना लिषत क्यों मिटै पत्त । श्रोतान राग उर लगे राज। तन लगे बान समरह सु साज॥ई०॥ १२० ॥ राज कहै पृथ्वीराजरासो। [ पचीसगं समय २० तुम देव अंस जानौ सु ॥ वुल्लेस राज फिरि हंस बत्त । सुनि श्रवन बेंन मन भयो रत्त ॥ पुच्छनह राज सब चिय विवेक । उच्चस्चौ हंस सा बत्त एक ॥ ई० ॥ १२१ ॥ भेउ । हम कहत परम दुज लहै केउ ॥ लच्छिन प्रकार चवचिय विवेक । करि वरन सुनावहुभांति नेक ॥ ई० ॥१२२॥ हंस का लक्षण वर्णन करना। गाथा ॥ कहै विवेक सुहंसं । चीय प्रकार चार लहि इंदं ॥ सुनि राजन सुभ वांनी । आनंदे श्रवन मझेनं ॥ छं० ॥ १२३ ॥ टूहा ॥ तब दुजराज सु उच्चरिय, रे संभरि पुर इंद ॥ पदमिनि हस्तिनी चिचिनी, संषिनि संषन नंद ॥ ० ॥ १२४ ॥ स्त्रियों के उत्तम गुणों का वर्णन । अरिल्ल ॥ रक्त जीभ हग अंक सु लच्छिन वान इहि ॥ बचन सु अमृत धार रती रति जानि जिहि ॥ इला' सील कुल वाल छती कामोदरी ॥ इन गुन नृप भय चारु सु चार जु सुंदरी ॥ ई० ॥ १२५ ॥ पट्दिनी का वर्णन। कवित्त ॥ कुटिल केस पदमिनी । चक्र हनन तन साभा ॥ स्निग्ध दंत सोभा विसाल । गध पद्म पालामा । सुर समूह हंसी प्रमांन । निंद्रा तुछ जंपै ॥ अलप वाद मित काम । रत्त अभया भै कपै॥ धीरज छिमा लच्छिन सहज । असन बसन चतुरंग गति ॥ आवंक लोड लग्गै सहज । काम वांन भूलंत रति ॥ ई० ॥ १२६ । हस्तिनी का वर्णन। उई केस हस्तिनी । वक्र अस्तन दसनं दुति ॥ मधुर गंध गरनाट । भुल्लि भ्रम काम बाम रति ॥ गूढ़ सवद मन जा । विषान रंगन छामोदरि ॥ चित्र नयन चंचल । विसाल बरनी जंमोदरि ॥ । * मो.-रि हंस राज यों वत्त एक । (१) कृ. स.-इली।

पचीसवां समय २१] पृथ्वीराजरासो। 998 नीवीय मान छिन रुदय इसय विहस्य लहय । वसि चित्तह चित पुत्तलिय ॥ जानें बहुत । कंत चित्त जादू न कलिय ॥ छं० ॥ १२७ ॥ নিন্মলী । মুল। दीर्घ केस चिचिनी । चित्त हरनी चंद्रानन ॥ गंध म्रग चिच निद्र। कोक शब्दन उच्चारन । मील नील लज्जा प्रमांन । रत्ति भै भय धन मारै अलस नयन रस बलित । कलित कल बोल उचारै धीरज छिमा कवि लोक करि । अवलोकन गुन औसरै ।। विस्तीर्ण संच मोहन पढे । चित्त वित्त कतहु हरै ॥ ई० ॥ १२८ ।। संषिनी का वर्णन। अलप केस कुच मूल । शून्न दंती उतारन । थूल उदर लंकीस । थूल क्रिस लंगध बारन । घोर निदरे तन तास । अलप रसना रस छडै ।। अलप सील गंभीर । सबद कलहतर मंडै ।। आचार अंन नहि सुद्द मन । विधि विचार विभचार घन ॥ आसंघ संघ संषिनि गुननि । सुष्य नाह पावै न तन ॥ ई० ॥ १२९ ॥ शशिव्रता के रूप तथा नखशिख शोभा का वर्णन । दूचा ॥ सुनौ श्रवन चहुवांन बर । देवग्गिरि नृप भान ॥ रूप अनूप अनूप गति । कहि ओपम सुनि कान ॥ ० ॥ १३० ॥ छंदनाराच ॥ चढंत वेस सामयं । अरंभ ग्रेह कामयं ।। उठंति एहि हल्लिता । वियद चंद्र चल्लिता || ई० ॥ १३१॥ नषं सुरंग रंजनं । तरक्क दर्प कंजनं ॥ हलंत पेंड रक्षयौ । अरुन्न नील कच्चयो । ई० ॥ १३२ ॥ रही स कति थावक३ । चलंत हंस सावकं ॥ दो हंस अंग अंगुरी । उपम काक विज्जुरी ॥ ई० ॥ १३३ ।। (२) मो.-नीद। (१) मो.-फुत्तरिय । ३) ए. कृ. का.-जाय। Hemamyantnagnaloverseastern Homenawar पृथ्वीराजरासा। [ पचीसवां समय २२ । । मराल होड़ मुक्कियं । चरंन चंपि लुक्कियं ॥ सुरेष पिंड सुभियं । अनंग अंग लुभियं ॥ छं० ॥ १३४ ॥ दीपंत जंघ पिंडरी । भराइ काम सुंढरी ॥ दुती उपम जंघ की। किधों उलाह रंभ की ॥ छं० ॥ १३५ ॥ वितिय उपम जंघरी । पराद काम को करी ॥ कनक्क घंभ रंभ सी । अनंग रंग रंग सी ॥ छं० १३६ ॥ नितंब तुंग मंडली । सयन्न काम की हली ॥ उतंग भाग अग्रता । मनों तुलाकि दंडिता ॥ ई० ॥ १३७ ॥ छछीन हीन लंकयं । कमांन काम अंकयं ॥ सरोम राइ राजई । उपम कब्बि साजई || ई० ॥ १३८ ।। सुमेर शृंग कंदकै । चढ़े पपील चंद कै ॥ उपम कब्बि ठहई । धनक मुढि चढ़ई ॥ छं० ॥ १३८ ॥ थनं विपान थोरया। अनंग बान औरया ॥ सुरंग रोम बाल सी । जु केवलं प्रवाल सी ॥ ० ॥ १४० ॥ उपम चंद ग्रीव की। मनो अनंग सीव की । दुती उपम तं लहै । कपोत कंठ कंक है। छ० ॥ १४१ ॥ चिबुक्क चारू बिंद की । इस्चौ कलंक चंद को ।। दसन्न जोति कामिनी । मनों दमकि दामिनी ॥ छ ॥ १४२ ॥ हसंत छब्बि में कही । सु लच्छि रंक ढंकही ॥ सुरंग ओठ अड़ सी । सु अद्ध रेष चंद्र सी ॥ ई० ॥ १४३ ॥ दसन्न चारु मानयं । प्रभात कै प्रमानयं ॥ दिपंत जोति नासिका। सु गत्ति कीर चासिका ॥ ई० ॥ १४४ ॥ भी जराइ राजई । उपम कवि साजई ॥ मनों तरक्क विछछरे । मिलत चंद उछुरे ॥ छं० ॥ १४५ ॥ तटंक कन्न राजई । उपम ता समाजई ॥ सुकाम बाम चाढिकै । धरे षरास बाढिकै ॥ छं० ॥ १४६ (१) ए. कृ. को.-पारयो । . ।

पचीसवां समय २३] पृथ्वीराजरासो। ७८१ सुमत्ति नास जीपकै । चुनंत कीर सीपकै । सुभाइ बंक नैन की। हरंत चित्त मैंन की ॥ छं० ॥ १४७ ॥ हलंत नेन भूव ले । धरंत चंद जूव ले ॥ लिलाट आड़ सेभई । अनंग थान लोभई ॥ छं० ॥ १४८ ॥ सुरंग केस पासयं । सु मुत्ति मंडि भासयं ॥ किरन सूर साजकी । अहार दूध भास की ॥ छ ॥ १४ ॥ विषंड मंड्या गुही । उपम काक विजुही । सावन्न घंभ दुस्तरी । उरग्ग चीय उत्तरी ॥ छं० ॥ १५० ॥ श्रृंगार भार भारियं । विलोकि काम पारियं । श्रवन्न मंडनं धरी । अनंग चित्त ही हरो ॥ ई० ॥ ० ॥ १५१ ॥ विसाल बाल विम्भरी । कबिंद बुद्धि विस्तरी । ई० ॥ १५२ ॥ राजा का पूछना कि अप्सरा का अवतार क्यों हुआ। दूहा । जंपि राज दुज राज सम । तुम मति रूप अलोड ॥ कवन काज अवतार इत । सत्य कहो तुम सोड ॥ छ० ॥ १५६ ॥ हंस का विवरण कहना । हंस कहै राजन्नसुनि । 'कही उतपत्ति चियेन सुनहु राज मन प्रसन होई । विवरि कहों सब बेंन ॥ ० १५४ ॥ इन्द्र और चित्ररेषा के झगड़ा तथा शाप का वर्णन । कवित्त ॥ एक समै सुर ईस । अप्प पुर इन्द थान गय ॥ आगम देव सुनेव । नाग पति अति उछाह भय ॥ अरघ पाद करि धूप । करै मंगल अपुव्व सुर ॥ सुभ आसन रजि रूद्र । करै घर सार बारि तर ॥ अस्तुत्ति करन लग्गौ सुरिंद । तब प्रसन्न भय ईस प्रति । उच्चरिय कूट जट इंद से। सुभ दिष्यो अच्छर नपति ॥ छ ॥ १५५ ॥ पृथ्वी पर जन्म लेने का शाप इन्द्र का देना। रंभ यताची मैन । मैंजुघोषा सुरंग चिय ॥ उरबसि केसी नारि । तुरत तिल्लोत्तमानि पिय ॥ (१) मो.-कए उतपति तिय दोन ।

८२ पृथ्वीराजरासा । [पचीसवां समय २४ बामं ॥ । किय श्रृंगार सुंदरिय । आइ उम्भी देषि चिया मन प्रमुदि। हुऔ मन उहित कामं ॥ अब सरस सत्य कारनह कजि । जंच मृदंग उपन्न सजि अस्तुति अनेक पढि घोष त्रिय । पहुपंजुलि सुर इंद्र कजि ॥छ॥१५६॥ अनेक स्तुति करने पर शिव जी का प्रसन्न होना। तब सु कोप धरि ईस । दिया सुर श्राप पतन धरि ॥ और रंभ किय नृत्य । सुबर अनेक विहि पर ॥ बहु विवेक कल मान । ताल मंडै चिग्गन सुर ।। रंजि राज सुर ईस । दीन बर बानि रंभगुर ॥ अति प्रमुदि चित्त कैलास पति । उभय देव आनंद हुअ ॥ सुभ सभा बिराजै राज सुर । सुबर प्रमोदिय मन सँभु ॥ ई० ॥ १५७ ॥ शिवजी का प्रसन्न होकर बर देना कि तेरा जन्म राजकुल में होगा और ब्याह भी छत्रधारी से होगा। पर तेरा हरन होगा और तेरे कारण घोर जुद्ध होगा। दूहा ॥ करि प्रसन सुर राज चिय । मुष अस्तुति सुर कीन बर बानी पुर इंदकै । यह सुवाक्य सिव दीन । ई० ॥ १३८ ॥ परै तुभम उत्तिम घरनि । पुची भूमि नरिंद ॥ दुअ पष्यां सिर छचहै । करि सेवा हर इंद ॥ छ ॥ १५८ ॥ बचन ईस ते वर लहै । हरन होइ तु नारि । कलह केलि भावन भवन । जुद्द अपार || ई० ॥ १६० ॥ शिव की उसी बानी के अनुसार वह अपने समान पति चाहती है कही बांनि कैलास पति । मैनकेस सुनि नारि ॥ परस दोष भरतार सम । करत सु क्रील अपार ॥ ई० ॥ १६१ ॥ है (१) मो.-उपम्म। (२) किय वधाय दिवतीन ।

पचीसवां समय २५] पृथ्वीराजरासो। दिन पूरा होने पर उत्तम पति पाकर फिर अप्सरा योनि पावेगी। गाथा ॥ तुछ दिन अंतर क्रमियं । आगम भरतार यांमि उद्घ लोकं ॥ फिरि अच्छरि अवतारं पांमै तुमझ ईस बर बांनी ॥ छं० ॥ १६२ ॥ शाप के पीछे शिव जी कैलस गए अप्सरा मृत्युलोक में गिरी, वही जादव राज की कन्या शशिव्रता है और तुम्हें उसने पति बरन किया है। कवित्त ॥ दै सराय सुर नारि । अप्प करि ईस थान चलि ॥ घन अस्तुति कर इंद्र । प्रमुदि अति रुद्र वानि फलि ॥ चलै थान कैलास । परी अच्छरो मृतं पुर ॥ जद्दव ग्रह त्रिय जाइ । उअर उप्पजी कुंअरि बर ॥ देवास थान तपि भान नृप । तिहि पुत्री ससित कुंअरि ॥ सोई वाच रुद्र देवह सुत्रिय । तुअ कारन साथइ उरि ॥ छ० ॥ १६३ ॥ हंस कहता है कि इस अप्सरा का अवतार तुम्हारे ही लिये हुआ दूहा ॥ और सुबर संकेत सुनि । हंस कहै नर राज ॥ मेंन केस अवतार इह । तुअ कारन कहि साज ॥ ई० ॥ १६४ ॥ हंस कहता है कि राजा जादव ने शशिव्रता को कान्यकु- जेश्चर का व्याहना बिचारा है पर शशिव्रता ने तुम्हें मन अर्पण कर शिव की आराधना की। शिव की आज्ञा से मैं हंस रूप धर तुम्हारे पास आया हूं। शीघ्र चलो। राजा का प्रस्तुत होना । दस सहस्र सेना सजना। है । (1) मो.-धारा। (३) मो.-कह। (३) मो. कारि।

९८४ पृथ्वीराजरासो। [ पचीसवां समय २६ गाथा। छंदवाघा ॥ हंस कहै प राज बिचारं । जो पूछौ कारन कृत्यारं ॥ देव गिरि जहां नृप भानं । ता पुची ससिहत्त सुजानं ॥ छं० ॥ १६५ ॥ सा मंगी कम धज्ज सुराजं । तिहि गुन सुनि चहुवानं सुताजं ॥ छंडे तमि पिन मान सुज्ञानं । दरन इत्त लोनै चहुवानं ॥ ई० ॥ १६६ ॥ हर सेवा सुमंडय कलेसं । तप आचरन कम्म संदेसं । हैं। गुन तास हंस भय रूपं । पुछि चिय कारन सुनिय सु भूपं ॥छ॥१९॥ दोल्ली वै अच्छे दृढ़ नेमें । हों पठया सु तुभम प्रति प्रेमं ॥ प्रसन ईस अंबिका समेतं । वुल्यौ राज सैल संकेतं ॥ छं० ॥ १६८ ॥ चढ़न कहिय राजन से हेसे । उड्डि चला दक्षिण तुम देसं सुनत श्रवन चढ्यौ नृप राजं । कहि कहि टून दुजन सिरताजाई॥१६॥ भय अनुराग राज ढिल्ली वै । दस सहस्व सज्जी वप हेवै ॥ ई० ॥१७॥ राजा का कहना कि जादव राजा के गुणों का वर्णन करो। जवै दुज सम राजं । तव गुन व्रन कीन अपारं ॥ हम गुन किम संभरियं । लग्गे श्रोतान राग किम जहां ॥ छं ॥ १७१ ॥ हंस का राजा भानु जादव के गुण प्रताप का वर्णन करना। टूहा ॥ हंस कहै राजन्न सुनि । इह उतपति अनुराग ॥ श्रवन सुनौ संभरि सु पहु । कहीं वृत्त संलाग । ई० ॥ १७२ ॥ कवित्त ॥ देवग्गिरि नृपभान । सेाम वंसी सुतपै नृप तिन अनंत बल तेज । बहुल है गै पैदल तप ॥ नयर मध्य कोटीस । बसै बानिक्क अनंत लछि । धर्म तप्पनह पार । न कोऊ दास रहै छु । सा एक लष्प पयदल पुलत । षग्ग जोर 'घूनं वहै । जद्दव नरिंद सब गुन कुसल । धन प्रताप दिन दिन लहै ॥ ई० ॥ १७३ ॥ उनके बेटे और बेटी के रूप गुण का वर्णन । तास पुत्र नारेन । पुचि ससित्ता प्रमानं ॥ दुअ अनंत सूरत्ति । रूप मकरंद सु जान । (१) मो.-खूनी ।

पचीसवां समय २७ ] पृथ्वीराजरासो। भगिनि भात दुथ प्रौत । पिता माता प्रिय मानं ॥ अति उछाह रंग रमै । असन इक ठाम प्रधानं ॥ सबरिष्प भई सत्रहारु दु । अति अभूत लच्छिन प्रबल ॥ लालित सरूप पिय चंद सम । राजकुंअरिराजै अतुल॥ छं० ॥१७४॥ एक आनन्दचन्द खत्री था उसकी बहिन चन्द्रिका कोट में ब्याही थी, वह विधवा हो गई और भाई उसको अपने यहां ले आया। तिन राजन के मंत्र । नाम आनंद चंद भर ॥ तिन भगिनी चंद्रिका । व्याह व्याही सु दूरि धरि ॥ नैर कोट हिस्सार । तास पित्रीय प्रमथ बर ॥ अति सु प्रौति नर नारि । सुष्प अनुभवै दौह पर ॥ कोइक दिवस भर तार वहि । तुच्छ दौह परलोक गत ॥ आनई बहनि फिर अप्प ग्रह । अति सुदुष्ष निसि दिन करताछं॥१७५॥ वह गान आदि विद्या में बड़ी प्रवीणा थी। दूहा ॥ अति प्रवीन विद्या लहन । गान तान सुभ साज ॥ केइक दिन अंतर वहिग । गइ अंते बर राज ॥ छं० ॥ १७६ ॥ उसके पास शशिव्रता विद्या पढ़ती थी। तिन संगह ससिटत्त सुत्र । पठन विद्य सुभ काज ॥ देवि कुंवरि अदभुत अवय । रंजित है अति लाज ॥ छं० ॥ १७७ ॥ उसी के मुख से आपको प्रशंसा सुन कर वह आप पर मोहित हो गई है। कवित्त ॥ जब षिविन चंद्रिका । कहै गुन नित चहवानं ॥ जेस पराक्रम राज । तेइ बरने दिन मानं॥ राजकुंअरि जब सुनै । तबै उम्भरै रोम तन ॥ फिरि पुच्छ ससिहत्त । सहि एकंत मत्त गुन ॥ १ ७८६ पृथ्वीराजरासो। पचीसवा समय २८ ] जे जे सु पराक्रम राज किय । सोइ कहै षिचिन समथ ॥ श्रोतान राग लग्यौ उअर । तो वृत्त लिनौ सुनौ सुकथ ॥ छं० ॥१७८॥ यों ही दो वर्ष बीत गए, बाल्यावस्था बीतने पर काम की चटपटी लगी। दूहा ॥ यो वरप्प दुअ वित्ति गय । भइय वैस बर उंच ॥ तब कामन सु कलेव सुर । कर सेव सुचि संच ॥ छं० ॥ १७६ ॥ तभी से नित्य शिव की पूजा कर के वह तुम्हें मिलने की प्रार्थना करती रही। हर सेवा निस प्रति करें । मन वचा क्रम वंध ॥ बर चहुआन सुकामना । सेवा ईस सुगंध ॥ १८० ॥ कवित्त ॥ कहै हंस सुनि राज । करों नन सु कह्यो गुर ॥ दिवस च्यार प्रजंत । ओर मो सरन लहो पर ॥ सेवत नित प्रति ईस । मास पंचह वित्तिय वर । एक सुदिन सिव सिवा । वचन संपुट लग्गी कर ॥ देवाधि देव सुनि ईस बर । करि सुचित्त कुंअरि सु व्रत ॥ पारथ्य एंड माली सरस । पर संगा गवरी करत ॥ छं० ॥ १८१॥ दूहा ॥ इह सुनि दस दिन गए बहि । सुनि रहि वचन सुईश । एक सुदिन ससिहत्त ने। किय द्रढ नेम जगौश ॥ छं० ॥ १८२॥ बर बरिहों संभरि सु पहु । वियौ पुरुष मुझ मात ॥ मिलन किया हर भास प्रति । भषिवै संनर घात ॥छ० ॥ १८३ ॥ शिव पार्वती का प्रसन्न हो कर सपने में बर देना। बचन सिवा सिव वाच दिया। पति पावै चहुआन ॥ बर प्रमुदिय प्रथमाधि पति । हुअ सुपनंतर मान ॥ छं० ॥ १८४ ॥ कै जानै मन अप्पनौ । कै षिचिन कै ईस ॥ और शिवा सुनि ईस प्रति । किय अस्तुति बर दौस ॥ छं० ॥ १८५॥ (१) मो.-करन ।

पचीसवां समय २६ ] पृथ्वीराजरासो। ७८७ प्रसन्न हो कर शिव पार्वती ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है कि जयचन्द ब्याहने आवेगा सो तुम रुक्मिणी हरण की भांति इसे हरण करो। कवित्त ॥ हुत्र प्रसन सिव सिवा । बोलि हूं पठय तुझ्झ प्रति ॥ इह बरनी तुम जोग । चंद जोसना वान रत ॥ ज्यों रुकमिनि हरि देव । प्रौति अति बद प्रेम भर ॥ इह गुन हंस सरूप । नाम दुजराज भनिय चर' ॥ बुनिय सु पिता कमधज्ज नर । व्याहन पठयौ सु गुर दुज ॥ आवै सु भ्रात जैचंद सुत । कमध पुंज व्याहन सुकज ॥ छं० ॥ १८६ ॥ राजा ने फिर पूछा कि उसके पिता ने क्यों व्याह रचा और क्यों प्रोहित भेजा। दूहा ॥ फिरि राजन यों उच्चरिय । सुनि दुजराज सुजान ॥ पिता व्याह क्यों कर रचिय । कयों प्रोहित पठवान ॥ छं० ॥ १८७॥ हंस का कहना कि राजा ने बहुत ढूंढ़ा पर दैव की इच्छा उसे जयचन्द ही जंचा। वहां श्रीफल ले प्रोहित को भेजा। कवित्त ॥ कहै दुज सकल बांनि । अहो ढिल्लौ नरेस सुनि॥ देवगिरौ जद्दव नरेस । रचि बहु भांति व्याह गुनि ॥ अति रचना विधि करिय । तासु गुन कहि न सकों बर ॥ संषपक कही । सुनि रु राजन कहै नर ॥ प्रोहित सुहत्थ जदुनाथ लै । पठइय श्रीफल सुदिन धरि ॥ कनवज्ज दिसा इक मास प्रति। चलि राजन गुर मिलि सुजुरि॥छं॥१८८॥ प्रोहित ने जयचन्द को जाकर श्रीफल और वस्त्राभूषण आदि अर्पण किया। मिले राज जयचंद । सु गुर पाहित्त समत्थं ॥ (१) मो.-वर । (२) मो.-चल्लि राजगुर ।

पृथ्वीराजरासो। पचीसवां ममय ३० ] पठर जदव सुनाथ । वस्त श्रीफल सुभ सत्थं ॥ हय साकति सजि पंच । सहस इक वस्त्र पटंबर ।। मुत्ति माल जुरि पंच । अवर जो वस्त व्याह पर॥ हेमंग पंच सत लेइ दुज । सुर राजन अग्ग धरिय ॥ ते बस्त अनेकं बिधि सुबर । रजि राज अप्पन सु जिय ॥ छं० ॥ १८६॥ टीका देकर प्रोहित ने कहा कि साहे को दिन थोड़ा है सो शीघू चलिए। मिलि मोहित जैचंद । दियौ श्रीफल सुविंद कर ॥ जे पठई बर वस्त। अग्ग ले धरिय राज बर । सोइ श्रीफल कमधज्ज । दियौ सुइ अवध पुंज नर ॥ अति उछाह माननिय । मिले रस हास परसपर । बोलयौ तब प्रोहित सुबर । अहो राज पंगुरन मुनि ॥ लै चलै बौंद ननकरि बिलंब। दिन तुच्छै साहौसु पुनि॥ छं॥१९॥ प्रसन्न होकर जयचन्द का चलने की तयारी और उत्सव करने की आज्ञा देना दूहा ॥ व प्रसन्न बहु पंगुरै। दियौ हुकुम सुअ बंध ॥ प्रेरि सथ्थ जब अप्प पर । अति पर घर सुअनंघ ॥ छं० ॥ १६१ ॥ सज्जि सेन चतुरंग नर । देवग्गिरि कज व्याह ॥ अति अगनित सथ द्रव्य लिय । नर उच्छव करनाह ॥ छं० ॥१२॥ हंस कहता है कि वह पचास सहसू सेना और सात सहस हाथी लेकर आता है अब तुम भी चलो । पृथ्वीराज ने दस सहस सेना लेकर चलना विचारा। छंद पद्धरौ ॥ चढि चलिय सञ्च रट्ठौर सेन । उडि रेन रथ्य रुक्किय मुगेन ॥ दस लष्ष सेन सज्जिय कमंध । वारुनिय गंध दै सजि मदध ॥छ०॥१८३।। सा अड लष पै पुलिय नैर । हज्जार सात मैगल सु भैर ॥ (१) मो.- विरम ।

पचीसवां समय ३१ ] पृथ्वीराजरासो। दर कूच घरे बल बंस 'बौर । व्याहनह काज उच्छव सुबौर ॥छं०॥१८४॥ कह हंस राज राजन सु बत्त । चढ़ि चलौ कलू रष्पन सुकत्थ ॥ तुम योग नारि बरनी कुमारि।हूं पठय ईस तुअ वृत्त नारि॥ई०॥१८५॥ उन लियौ वृत्त तुअ दृढ नेम । नन करि विरम्म राजन सु एम ॥ इक मास अवधि दुजकहै वत्त। व्याहन सुकाज मन करौ रत्ताछ०॥१८६॥ बर ईस भयौ अरु सिवा बानि । सुख लहौ बहुत हम दुज बघानि ॥ सुनि सुनि श्रवन अनुराग कौन।तन रोम अंग उम्भारि चौन्ह॥छं०॥१६॥ दस सहस सेन सजि पास राज। चढ़नै सुचित्त करि बाज साज ॥छं०॥१८॥ पृथ्वीराज का शशिवृता से मिलने के लिये संकेतस्थान पूछना। दूहा ॥ कह संभारि बर हंस सुनि । कह जद्दों संकेत ॥ कोन थान हम मिलन है। कहन बीच संमेत ॥ छं० ॥१६६ ॥ ब्राह्मण का संकेतस्थान बतलाना। गाथा॥ कह यह दुज संकेतं । हो राज्यद धौर ढिल्लेसं तेरसि उज्जल माघे । व्याहन बरनीय थान हर सिद्धि ॥छं०॥२०॥ राजा का कहना कि मैं अवश्य आऊंगा। दूहा ॥ तब राजन फिरि उच्चरै। हो देवस दुजराज ॥ जो संकेत सु हम कहिय । सो अध्षौ त्रिय काज॥ छं० ॥ २०१॥ हंस का कहना कि माघ सुदी १३ को आप वहां अवश्य पहुंचिए। अरिल्ल॥ सो अष्षिय हम नेम सु दृढं । तुम अवस्य आवो प्रभु गढ्ढं ॥ सेत माघ त्रयोदसि सा वहि। हर सुकलेव थांन सुति भावहि॥छ॥२०२॥ इतनी वार्ता करके हंस का उड़ जाना। दूहा ॥ इह कहि हंस सु उड़ि गयौ । लग्यौ राज श्रोतान ॥ छिन न हंस धीरज धरत । सुख जीवन दुख प्रान ॥ छं० ॥ २०३॥ (१) मो.-धरि । (२) मो.-कुंआरि । (३) मो.-सत्त ।

पृथ्वीराजरासो। पचासा समय ३२] दस हजार सेना सहित पथ्वीराज का तैयारी करना। दस सहस्र हेंवर चढ़िय । वप दिल्ली चहुआन ॥ हुकम सद्दि साहन कियौ । दै सूरन विलहान ॥ छं० ॥२०४॥ राजा का सब सामंतों को हाथी घोड़े इत्यादि बाहन देना छंदभुजंगौ॥ दियौ कन्र चहुअांन मानिक बाजी। जिन देष चित्त को गत्तिलाजी मुषंमभझ पायंकदै वाजराज। मनो वग्ग भौषकृतं कढि पाजं॥छं०॥२०५॥ दियौ बाजि इंदं बरं जाम देवं । दिपै तेज ऐसे चिरं पंघ एवं ॥ धरै पाइ ऐसे इलं मभिझ जैसे।सुनैजैन धंमं धरै पाइतेसे॥छं० ॥२०६॥ चढ्यौ राव कैमास चिन्तं तुरंगौ । रहै तेज पासं उछत अंगी ॥ 'चमकत नालं विसालंखुरंगौ। मनोबोज छब्बी कि अाभा अनंगी छं॥२०७ उड़े भार भारं पयं नाल झारौ । समं बूंद धावै मनों चार तारौ ॥ चढ़े राजहंसं सुचामंड जोटं। मनो तेज बंधी मुनौ बाइ मोटं॥छं० ॥२०८॥ डुलै कंन नाहौं सिलौका सुग्रीवं । मनां जोति बंधौ "सुनृवात दौवं ॥ चढ्यौ राज घोचौ प्रसंगं पहूपा । उडै वास ज्यों वाय वग्गै अनूपा॥छं० २०६॥ बंध चार चित्तं चमकंत चाहं । हरदार छुट्टै कि गंगा प्रवाहं ॥ चढ्यौ राज पट्टे अजानंत बाहं। कही कविराजं उपम्माति चाहं॥ छं० ॥२१॥ दियै "बीच तारौ कोई नाहि पुज्जै। बलं ताहि दिप्पै सरित्ता अमुझे ॥ दियागराजंचढ्यौ देवराजौ।उडै पंखि पाजीरहीपच्छ लाजौ॥छ ॥२११॥ चढ्यौ निड्डुरं राइ अंग अभंगं । छुटै जानि तारान के व्योम मग्गं ॥ चढ्यौ हाहुलौराइ जंबू नरिंद।बढ्यौबांन ज्योंतेज कम्मानचंद।छं ॥२१२॥ चढ्यौ लंगरौराव लंगा सुबौरं । किधों वाय बढ्यौ बुझं जानि धौरं ॥ चढ्यौ राज गोइंदाहुछ राज। किधों वाय बुंदंस छुट्टीय साज॥ छं० ॥२१३॥ चढ्यौ राव लष्पं सु लषं पवारं। भ्रमें अंग ऐसे उपम्मा विचारं ॥ किधों अग्गि दंडंब्रजंबाल फेरैं। किधों भोर हथ्थं किधों चक्र हरैं॥छ०॥२१४॥ (१) मो.--चमक्कति । (३) ए.--जोतं । (६) मो. -वेगे। (२) मो.--तालं । (४) ए.- कैन । (७) मो.--वाच। (५) ए.--सुनि बात।

पचीसवां समय ३३ ] पृथ्वीराजरासा। ७६१ किधों राति बोहिथ्थ भमि भोर नारं । कही चंद कच्ची उपमाति चारं। चढ्यौ चंद पुंडौर राजीव नामं। तिनं अोपमा चंद देषौ बिरामं॥छ ०॥२१५॥ जिने गत्ति जौती सयन्न पगारं। चलो अषि के पंघ चित्तं बधारं ॥ चढ्यौ अत्तताई उतंगंतुरंगा।मनों बौज को गति अाभा अनंगा॥छ॥२१६॥ चढ्यौ राव रामं रघूवंस बोरं । गति सूर जित्ती मृगं चंद भौरं ॥ चढ्यौदाहिमंदेवनर सिंघ कैसे । मनो चित्त की अर्थको गत्तिजैसे॥छं॥२१७ चढ्यौ भोज राज पहारं विनतं । फुटै सह तंज अवाजं वितेतं ॥ चढ्यौ बौर जोडंकनक कुमारं। चलौ कृत्य पूरन आचार पारं॥छं०॥२१८॥ चढ्यौ राव पज्जून कूरंभ बौरं । बढ़े लोह अग्गं धनं जैतपूरं ॥ चढ्यौ सामलौ सूर सारंग ताजी।गही होड़ बंधौ वयंवाम पाजी॥छ॥२१॥ चढ्यौ अल्हनं बौर बंश्व्व पानं । चढ्यौ दान ज्यों ग्रहनं जुद्ध वानं ॥ चढ्यौ लष्ष लष्यो सलष्पं बघेला।बढ्यौ नेत ज्यों देह देषै सुहेला॥छ॥२२०॥ चढ़े सब्ब सामंत छल बलत बौरं । मनों भान छुट्टी 'किरन्नौ कि तौरं॥ चढ्यौ बाजराजं प्रथौराज राज। तबै पष्पर्यो बाज साकत्ति साज॥छं०॥२२१ उडै सूर ज्यों हंस तु? कमंधं । बरं ओपमा चंद जंपो कविंदं ॥ द्रुमं ज्यों मरोरै 'शिरंवामि हेत। मयूरंकलाबाजरचौबंधि नेतं॥छ०॥२२२॥ चढ़े सब्ब सामंत सामंत बोरं । तबै जग्गियं जानि जोगाधिधौरं॥ जगी जोग माया सुजग्गीय थान। प्रलौनं प्रलै ज्यों प्रलौनंप्रमानं॥छ०॥२२३॥ जगें बौर बौराधि डोरूं बजावै। नचैनद नंदी विघाई विघावै॥छ०॥२२४॥ माघ बदी पञ्चमी शुक्रवार को पृथ्वीराज का यात्रा करना। दूहा ॥ 'आगम निगम जांनि कै। चलि नप "सुक्रवार ॥ माह वद्दि पंचमि दिवस । चढ़ि चलिये तुर तार ॥ छं० ॥ २२५ ॥ चन्द का सेना की शोभा वर्णन करना। छंद त्रोटक ॥ कवि चंद सु व्रनन राज करं। सोइ बोटक छंद प्रमान धरं ॥ (१) मो.-उप्पमा । (३) मो.--त्रिनेतं । (५) ए.-सिरं । (२) मो.--रघोस । (४) मो.-किरन्न । (६) ए.--अगम निरागम ।

७६२ पृथ्वीराजरासो। पचीसवा समय ३४ ] जिहि च्यार परे सगना सगनं । सुभ अच्छिर लाइ तजै अगनं॥छ॥२२६॥ विवहार धरै बरनं सु बरं । पड़ि पिंगल बाहन केन हरं॥ वर चोजन चारु सुरंग इलं । तहां भौर न मोर सुरंग हुलं॥छं०॥२२७॥ गज उप्पर ढाल ढलकि तरं । सुकहों तहां कलि 'अचिज्ज बर। तहां पल्लव लल्लित रत्त बचं । तहां जे धन दंतिय पंतिरचं ॥ छं०॥२२८॥ झमकै बर नंग मयूष कसौ। निकसी तहां केतक सी बिकसी ॥ सु चलें बर मंद सुगंध प्रकार । बढ़ी दिसि दस्मसु उज्जल मार॥छं०॥२६॥ बजे महु रंग सु गंधन भंग। बजे सहनाइ न फेरि उपंग ॥ हल बर लत्त पवन्न झकोर । घरघ्घर होहिं पिलप्पित जोर॥छं० ॥२३०॥ बुलै कल कं सु कंठह सह । तहां चढ़ कब्बि वसौठ उवह ॥ सकस कुसंम रु अंकुस पानि।हने हर काम असो गज जानि ॥छं०॥२३१॥ अततौ बर पुफ्फ सु वाढहि भुंग। बजै गज पांनि सु इंदुब रंग ॥ लता ललिताह हलावन ढाल । उतह जम लग्गय रुपतितालछ०॥२३२॥ विकासित केसर कुंकुम काम । सरोज सुरंभ अनूपम नाम ॥ उहां मिटि ताल तरंगिनिकांम। उहांचलितेनिय ना तिहि ठांम॥छं०॥२३३।। उहां बरहा जनु उप्परि केल । किने तब ढीठ हिया छबि मेल ॥ हले जनु नेजे पजूर बसंत । ढलो बन राह सुढालह मंत ॥छं०॥२३४॥ तजौ बर बाल सुरंग सुभेस । चल्यौ प्रथिराज सु दष्पिन देस । विरदै चहु विप्र कहै कविचंद। सही चहुआन प्रथी पर इंद॥छं०॥॥२३५॥ दूहा ॥ चढि चलिय प्रथिराज बर । देवग्गिरिधर राज। ता सुकन्ट बरदाय बर। पुच्छिय बिगत सुकाज ॥ छं० ॥ २३६ ॥ कहत कन्ह बरदाय बर । अहो राज सुभ मांनि ॥ कहो पयांन सज्या कहां । सोहम कहों प्रमांन ॥ छं० ॥ २३७ ॥ चलने के सयम राजा को भय दिलानेवाले सकुनों का होना। (१) मो.--अचज्जि। (३) ए.--उतंग । (५) ए.--कुसुम । (२) मो--लालित । (४) मो.--गिन । (६) मो.--सरूप ।

एचीसवां ममय ३५ ] पृथ्वीराजरासो। ७६३ कवित्त ॥ चढ़त राज प्रथिराज । सगुन भै भौत उपन्नौ ॥ स्यांम अंग तन छिद्र । कलस संमुहं सपन्नौ ।। रत्त वस्त्र आरुह्य । रत्त तिलकावलि छुट्टिय ॥ मुकत माल छुट्टियं । केस छुट्टिय कस तुट्टिय ॥ लुट्टिय अनंग भय भौत गति । मन अलुम्भ निद्रा 'असति ॥ विभ्भाइ भाइ उनमोद पति । मंद मंद सक्रति हसति ॥छ०॥२३८॥ राजा का इन शकुनों का फल चन्द से पूछना। अरिल्ल ॥ सोभय भौत देषि कवि पुच्छिय । जंपि कहौ मति मोहि सु अच्छिय ॥ तुम सब जांन विमान प्रमानं । जंपि कहौ कविराज सुजान।छं०॥२३॥ चन्द का कहना कि इस शकुन का फल यह होगा कि या तो कोई भारी झगड़ा होगा या ग्रहविच्छेद । दूहा ॥ पाछे बौर सगुन्न भय । ते कहंत कविचंद ॥ कै दंदग्गेनय जपजै । कै नवीन ग्रह दंद ॥ छं० ॥ २४० ॥ चन्द ने राजा को जैचन्द के पूर्व वैर का स्मरण दिलाकर कहा कि इस काम में हाथ देना मानों बैठे बैठाए भारी যন্ত্র को जगाना है। कवित्त ॥ सौस डोलि कविवंद । चित्त अंदेह उपन्नौ ॥ पुच्च बैर चहुबान । बैर कमज्ज दिपन्नौ ॥ सवर जोर संग्राम । निबर अँगम्यौ न जाइय को जम हटथ पसारि । लेह ग्रह अप्प बुलाइय । मंडाय पेट डंकिन सरसि । कोन बांह सायर तिरै ॥ "अपसगुन जानि चहुआन चलि ।दै विधान निम्मित करै ॥छ॥२४१॥ वय, पराक्रम, राज और काम मद से मत्त राजा ने कुछ ध्यान न दिया और दक्षिण की ओर शीघ्रता से वह चला। (१) मो.-असित (२) मो.-सह । (३) ए. कृ. को.-मैडाप्र । (४) ए. कृ. को.-असुम्भ । २ ७६४ पृथ्वीराजरासो। पचीसवां समय ३६ ] कवित्त ॥ बेस मह बल मद्द। और बंध्यौ सुरतानी। राज मह उनमद । काम महह परिमानी ॥ अरु श्रवनौ श्रोतांन । तौन बंध्यौ चहुबानं ॥ दल बद्दल पावस्म । चल्यौ दछिन धर वानं ॥ छतौस कुली बर वंस विय । चढ़ि प्रथिराज नरिंद चलि ॥ उपवन्न बंब बजी बिषम । खान थान दिगपाल हलि ॥छं०॥२४२॥ पृथ्वीराज से पहिले जैचन्द का देवगिरि पहुंचना । दूहा ॥ इन अग्गै कमधज्ज ले । आइ सँ पतौ थान ॥ "माघ नवमि चंबक बजै। चहुाना परिमान ॥ छं० ॥ २४३ ॥ जैचन्द के साथ की एक लाख दस हजार सेना का वर्णन । जैचन्द का आना सुन शशिटता का दुखी होना । कवित्त ॥ 'एक लष्य दस अग्ग । सेन सज्ज कमज्जं ॥ बीय सहस बारुन्न । सत्त हज्जार फवज्ज अद्ध लष्प पैदल्ल । अद्ध साइक वहंतं ॥ सजि समूह चतुरंग । दिसा दछिन 'परजंतं ॥ सुनि श्रवन कुंअरि शशित्त लिय । सुनि अवाज बर बौर घन। चहुआन वृत्त लौनी अध्रम । प्रान हीन कढन सुमन ॥छं०॥२४४॥ शशिता मन ही मन देवताओं को मनाती है कि मेरा धर्म न जाय और उसका प्राण देने को प्रस्तुत होना । दूहा ॥ मिलि पूजे बर बौर को । करौ भगति घन भाइ ॥ बाला प्रान सुकढ्ढनह । अंतर धम्म न जाइ॥ छं० ॥ २४५॥ सखी का समझाना कि व्यर्थ प्राण न दे, देख ईश्वर क्या करता है। ईश्वरी लीला कोई नहीं जानता। सखियों (१) मो.-छत्रीस । (३) ए. कृ. को.-फरजंतं । (२) ए.कृ. को.-एह । (४) मो.-फढतंह।

पचीनवां समय ३७ ] पृथ्वीराजरासो। ७९५ ॥ का श्रीरामचन्द्र, पाण्डव आदि के प्राचीन इतिहास सुनाकर धीरज धराना । 'कहै सषौं समझाइ कर । पु कथा कहुं मंडि ॥ घरी अद्ध जो सुनिहि तुअ। प्रान बाल नन छडि ॥ छं० ॥ २४६ ॥ छंद पडरौ॥ मिलि बाल ताहि रचि कहै बत्त । संग्रहन भवन क्यों मिटै पत्त॥ दैवान बत्त जानै न कोइ । लिष्ये जु अंक मिट्टय न सोइ ई०२४७॥ बल बौर जुद्ध पंडव नरेश । बन गयौ राज मुक्क्यौ सुदेश॥ जिप्पनह सच दृगपाल जोग । संध्यो सुजोग तजि राज भोग ॥छं०॥२४८॥ बलि राइ जग्य आरंभ सत्य । जित्तनह इंद्र आरंभ पत्त ॥ मुक्किय सुथान तिन मान पंडि। सेवह सुदेव पाताल मंडि ॥छं०॥२४६॥ कट्टन कलंक शशि जग्य कौन । का कुष्ट अंग छिन मान होनः॥ नधु राइ कौन राज सु अनूप । का कुष्ट काल संहर्यो कूप॥छ ०॥२५॥ श्रीराम हथ्थ पकौ. प्रवीन । आरन्य बहुत दुष सौय कौन ॥ गुरुदेव त्रिया तारा प्रमान।भकलोरि परौ देवन समान॥छं० ॥२५१॥ सिय लई निशाचर रूप चौन्ह । मिलि देव जुद्ध आरंभ कौन आतम्म घात मंडो विशाल । पावै न सुष्प वे भ्रमें काल ॥छं॥२५२॥ तिय मात तात बंधह सु देहि । बाला विचित्र ते वृत्त लेहि ॥ कुलजाहि धंम ग्रह राजनीति।जे मँडहि बाल गुरजनन जौतिाछं॥२५॥ शशित्त जु वत्तिय मत्ति मानि । हित काज मत्ति हम दै प्रमान ॥ पंषौ न पच्छि को लगै धाइ। आवैन वृत्त पैजम जाइ छ॥२५४॥ आवै न मेह ग्रह लगै अग्गि । पावै न जीव को दान मग्गि ॥ मानै न विनति तिन मंत सुझझा जनु कान होन गुर कही गुझझार५५॥ मनै न बाल उर मत्त मान। चिंत्यौ सुतात कढ्ढन परान॥छ ॥२५६॥ चौपाई ॥ मिलि मिलि बाल रचावै बाले। तन मन मने न चित व्रत साले ॥ बहुत करे सिंगारे सार। मनो मृत्तक ना रंग न धारे ॥छं०॥ २५.१॥ छंद पडरौ ॥ राजन अनक पुत्री त्ति व्याह । शशित्त देव कन्या सिवाह ॥ (१) मो.-कही। (३) मो.-मंडै । २) मो.-जिप्पतह । (४) ए. कृ. को.-कृद्द । ।

७९६ पृथ्वीराजरासो। पचीसवां ममथ ३८] चहुआन चिंत जुग्गिन 'पुरेस।आत्त बौर जिन करहु भेस॥छं०॥२५८॥ निव्वरै बाद जौ करौ मंत्र । साधम्म वौर कढ्ढे 'जु कंत ॥छं०॥२५॥ राजा का पृथ्वीराज के आने और शशिवृता के प्रेम का समाचार जानकर हंमीर समीर (?) से मत पूछने लगा। दूहा ॥ कंति कति प्रति बढई । चढ़े चाइ चहुआन ॥ मो पुच्छ प्रति तान जो। बौर चंद दै दान ॥ छं० ॥ २६० ॥ हमीर समीर का मत देना कि वीरचन्द को कन्यादान दीजिए। गाथा ॥ बोरं चंद सुदानं । पानं विधाय नित्तयौ गुरयं ॥ बुल्ल नृप हम्मौर। साइ संमौर साइ मंगायं ॥ छं॥२६१ ॥ दूहा ॥ ज हमौर संमौर गति । समुह सु दुज्जन भेव ॥ जिन बड़वानल कुप्पयौ । सार मत्ति प्रति सेव ॥ छं० ॥२६॥ सार भार संसार कौ । नव निधि नव प्रति पान ।। व्याह वीर शशित्त का । अप दोर्जे प्रति दान ॥ छं० ॥ २६३ ॥ कन्या के प्राण देने के विचार और शकुन विचार से राजा भानु चुपचाप पृथ्वीराज के पास दूत बाल प्रान कढ्ढत सुपुनि । सगुन एक मन मान ॥ बढि अवाज चहुआन को । अलौ सुन्यौ अप कान ॥ छं० ॥२६४॥ यों सु सुनिय बप भान नैं। पुचि प्रलय व्रत कौन ॥ चर २ पिष्षिय चहुआन पै । जद्दव 'मोकल दौन ॥ छं० ॥ २६५ ॥ राजा ने पत्र में लिखा कि शिव पूजा के बहाने शिवाले में तुम को शशिटता मिलेगी। मुकार मति वंतिनौ । नप कागद दै हथ्थ ॥ पूजा मिसि बाला सुभर । संभु थान मिलि तथ्थ ॥ छं० ॥ २६६ ॥ ने भेजा। (१) ए. कृ. को.- परेस । (२) मो.-सु । (३) ए. कृ. को.-छिप्पय। ४) मो.-कलि ।

पचीसवां समय ३६ ] पृथ्वीराजरालो। ७९७ इधर पृथ्वीराज के सरदारों का उत्साहित होना। कवित्त ॥ हय गय दल चतुरंग । कंक मंद्यौति कन्र सिर । राजद्दव वग्गरौ । राम रघुवंस जुद्ध जुर ॥ निडुर रा रठौर । सेन सज्जै भ्रत रज्जै॥ एक एक संपज्ज । एक एकन गुन লতল जुग्गिनि डहकि बंबरि लसथ । जिम जिम शंकर सिर धुनिय ॥ अत ताइ उत उत्तंग बर। बावारो सारह 'सुनिय ॥ छं० ॥ २६७ ॥ कवि कहता है गन्धर्व व्याह शूरवीर ही करते हैं। गाथा ॥ सार प्रहारति भेवो । देवो देवत्त जुद्दयौ बलयं गंध्रव्वौ प्रति व्याहं । सा व्याहं सूर कलयामं ॥ छं० ॥२६८॥ पृथ्वीराज का आना सुनकर मन ही मन राजा भान का प्रसन्न होना, परन्तु वीरचन्द का सशंकित होना। कवित्त ॥ सन सद्धि संमुहिय । भान आवाज राज सुनि ॥ प्रान लधि जो मद्धि । लाज लम्भी जु सूर धुनि ॥ प्रिय विरहिनि रिधि रंक । कै ध्यान लभ्भै जोगिंदं ॥ बलह काम कलहंत । कि कह विश्वासत इंदं॥ संभरिय कान संभरि नृपति । बौर चंद आगम विषम ॥ निह काल काल भंजन गदै । बढ़ सार सारह विभ्रम ॥छं०॥२६॥ दूहा ॥ सार धार पूजै नहै। षिति सामंत न नाथ ॥ आवृत बौर क्यों पूजई । दैव दैवतह साथ ॥ छं० ॥ २७० ॥ गाथा ॥ दुअ वंस अंस सरिसं । बज बाहु बलयो बलयं ॥ बजे दृष्टिति रिष्टं । सानिष्ट अष्टयो किलयं ॥ छं० ॥ २७१ ॥ अरिल्ल ॥ बर बरिष्ट बर लोभ प्रकार । लष्प लष्य सा मंतह सार ॥ तिन बर बर अंगम प्रति जानिय ।सो देवत देवत्तह मानिय ॥छं०॥२७२॥ कवित्त ॥ अति प्रचंड बलवंड। बैर 'बाहरू तत्ताइय । (१) मो.-धुनय । (२) मो.-सुनय । (८) मो.-बाहरू तनाइय । (३) कलयामि । (४) मो.-मध्य ।

७६८ पृथ्वीराजरासो। पचीसवां समय ४०]] माया हौन मसंद । दंद दारुन डर नाइय ॥ दल दुंदन सिंधु रहि । बाहु दंतन उष्षारहि ॥ एक एक संग्रहै। एक शस्त्र करि डारहि ॥ दैवत्त वाह दैवत्त भर । देवग्गिरि संसहौ चलिय॥ बर बौर और साधन सकल । अकल महरति मति कालिय ॥छ॥२७॥ दूहा ॥ अकल वीर रस अफल भुज । कलि न जाहि सामंत ॥ भीम भयानक बल सु त । जे भंजे गज दंत ॥ छं० ॥२७४॥ लम्भ जस लिष्षीय बर । दैव जोग नहरे हथ्थ ॥ पुबब दई प्रथिराज कौं। सोइ प्रन मन समरथ्थ ॥ छं० ॥ २७५ ॥ चाहुान को कृत सयन । मरन सरन प्रथिराज ॥ उभे सिंघ दुब बौच पल । उभै सिंघ सिर ताज ॥ छं० ॥२७६ ॥ गाथा ॥घटिका उभय सु देवो । रहियं निकट राजनं ग्राम ॥ जानिज्जै नृप नैरं। दिष्ष न काजैव सोभियं नैनं ॥ छ ॥२७॥ दूहा ॥ रंध्र गवष्पनि नैर मधि । जारि न चिंत प्रमान ॥ मानहु प प्रथिराज कौ । रंध्र नैन प्रत प्रान ॥ छं० २७८ ॥ पृथ्वीराज का नगर में होकर निकलना, स्त्रियों का झरोखों से देखना। शशिता का प्रसन्न होना। कवित्त ॥ दुई पास नृप नयर । राज दिपै प्रति राजं ॥ मनों हथ्थ बर नयर । राज संमुह प्रति साजं ॥ कोट कठिन मेखल सु । कटि दिग पलक उघारिय ॥ राज कित्ति संभरन । गोष श्रवनन संभारिय ॥ किकिनि सुपाइ धुंधर सु गज । राज निसान सबद्द प्रति ॥ चहुआन राव आगम सुव्रत। कमल होय बढिय मुरति॥छं०॥२७६॥ राजा भान के हृदय में पृथ्वीराज का आना सुनकर हर्ष शोक साथ ही उदय हुआ। १) मो. लभ लिक्खंत बर (२) मो.-नन । (३) मो.--तजि । , सुजस पचीसवां समय ४१ ] पृथ्वीराजरासो। ७६६ दूहा ॥ काम कलह रत बढि प्रति । सुनिय भान नृप कान ॥ आनंदह दुष उपपज्यौ । मरन सु निश्चय मान ॥ छ २८० ॥ श्लोक ॥ मंगलस्य सदा क्याह । अव्याहं सु मंगलं ॥ ब्रह्मा चकितं समो दृष्टे । 'जेक कंज सु कंजभिः ॥ छं० २८१ ॥ पृथ्वीराज की सेना का उमङ्ग के साथ नगर में घूमना । कवित्त ॥ फिरिग पंति चिहु पास । सूर उम्भौ चाव दिसि ॥ अतित जुद्ध आवड्त । मत्त' बरपंत बौर असि ॥ और क्याह मंगलह । व्याह मंगल अधिकारिय ॥ परि पिशाच दानव । सु बुधि मग्गह विच्चारिय ॥ नन करहु तात दुष पुत्त को । घर लौनौ जम सहकै ॥ प्रथिराज राज राजन बलिय । को पुज्जै रन बदिकैं॥ छं० ॥२८२॥ दूहा ॥ को पुजै बद्दत 'सुरन । बयन सयन प्रथिराज ॥ अत जित्ति जित्तिय सयल । को मंडै कृत काज ॥ छं ॥ २८३॥ गाथा ॥ को मंडै क्रत काजं । साजं जावय सूर योवेनं ॥ तारिज्जै सजि राजं । बंकिम भूमायं विषमयं होई ॥ छं० ॥ २८४ ॥ देवालय में शिव पूजा के लिये शशिवृता का जाना । पृथ्वी- राज का वहां पहुंचना। देवालय भगवती । पूजैवं पूजयो बालं ॥ सुबर पुछ्यौ प्रथिराज । कुज संसा बौरयो हथ्थं ॥ छं० ॥ २८५ ॥ पृथ्वीराज की प्रशंसा। दूहा ॥ विषम ठौर बंकम विषम । कल “सोभित वृत कंद ॥ जो प्रथिराजह अंग में । मनों प्रथौ पुर इंद॥ छं० ॥ २८६ ॥ मनों राज पृथ्वी पुरह । धनि सुध्रम्म लवलेश ॥ मानहु बौर नरिंद कौ । रति आयौ अविशेश ॥ २८७ ॥ (१) मो.-कंजे कंज सुकं कजसि । ३) ए. कृ. को. नर । (२) ए. क. को.--बरषन्न । (४) मो.-मंडे को । (५) मो.-सोभत ।

पृथ्वीराजरासो। पचीसवां समय ४२ ] सखी का शशिटता से कहना कि तू जिसका ध्यान करती थी वह आ गया, देख। यों करत 'दुत्तिय बियौ । कथा श्रवन सुनि मंत॥ जाकौ तें पतिहत्त लिय । सो आयौ अलि कंत ॥ छं० ॥ २८८॥ शशिटता का आँख उठाकर देखना। दोनों की आँखे मिलना। शवन नयन का मेल कै । भय चंचल चल चित्त ॥ शोताने दिष्टांन अरु । मिलि पुच्छ दोइ मित्त ॥ छं० ॥ २८६ ॥ मारे लाज के कुछ बोल न सकी पर नैन की सैन से ही बात हो गई। चंद्रायना ॥ कर्न प्रयंत कटाछ सुरंग विराजही। कछु पुच्छन कों जाहिपै पुच्छत लाजही ॥ नेन सेन में बात सबनन सों कहै काम किधों प्रथिराज भेद करिना लहै ॥ छं० ॥ २१० ॥ नैन श्रवण का संवाद । दूहा ॥ नेन श्रवन्नन पूछई। तुम जानै बहु मेरे जौय अंदेस है। कही न मैं पिय जंत ॥ छं० ॥ २६१ ॥ श्रवनन सन नेना कहो। तुम जानौ चहुआन ॥ काम पति को रूप धरि । आवत है इन थान ॥ छं० ॥ २१२ ॥ हंस ने पहुँचकर शशिटता से कहा कि ले पृथ्वीराज शिवालय में तुझ से मिलने आ गया। ताम हंस आयौ समषि । कह्यो अहो शशिवृत्त ॥ चाहुआन आयौ प्रछन । मिलन थांन हर सित्त ॥ छं० ॥२६३ ॥ कवित्त ॥ घेरि गांम जद्दव नरिंद। उम्भे चिहु पासं॥ भंत॥ (१) मो. दुदिय । (३) मो.-दोय । (२) मो.-लियो। (४) ए. कृ.--जिन । (५) ए.-घोरि पचीसवां समय ४३ ] पृथ्वीराजरासो। ८०१ पल नंषिय रंभा सु । करन आरंभ प्रवासं ॥ एक एक गुन करहि । सब फूले सत पत्र। तिन मध्यह शशिवृत्त । भई कम्मोदनि मंत्र॥ 'पित पुच्छि पुच्छि परिवार सब । पुच्छि बंध रज्जन सकल ॥ आवृत्त तात अग्या सुग्रहि । भईय बाल बुध्या विकल ॥छं० ॥२६४ ॥ दूहा ॥ बिकल बाल जहं सकल हुअ । बुद्धि विकल प्रति साज ॥ 'भान वचन सच्च सुकरि। जिन अप्पी प्रथिराज ॥ छं० ॥ २६५ ॥ गाथा ॥ बोरं चंद सुव्याहं । सो व्याहं जोगिनौपुरयं ॥ संभरि क्रन शशितं । अगम बोराइमं जनंत तयौ ॥ छं० ॥२६६ ॥ माता पिता की आज्ञा ले शशिवृता का देवालय में जाना। कवित्त ॥ पुच्छि मात पित पुच्छि । पुच्छि परिवार ग्रेह सब ॥ में वृत लियौ निवड्व । गवरि पुज्जनं बाल जब ॥ तिन थानक सब देव । नौति आरंभ व्रत लोनौ॥ तव प्रसाद उप्पनौ। मोहि इच्छा व्रत दौनौ ॥ तिन काल व्रत्त लोनौ सुमैं । गवरि प्रसाद सु पुज्ज फल ॥ बारंज बात तुअमोह हुअ । कहै और अब लहि अफल ॥छ॥२६॥ दूहा ॥ दुष देवल कौ छंडनह । उर सिंचन अंकूर ॥ दोह काल बल वोचि बदि । लिय समान संपूर ॥ छं० ॥ २६८ ॥ शशिवृता के रूप का वर्णन । बाला बेनौ छोरि करि । छुट्टै चिहर सुभाइ ॥ कनक थंभ तें अतरौ । उरग सुता दरसाइ॥ छं० ॥ २६६ ॥ कवित्त ॥ तजि भूखन बर बाल । एक आचिज उपन्नौ ॥ लता हेम पर चंद । उभै षंजन ढिग चिन्हौ शौफल उरज विसाल । बाववर भंग, सुपत्तौ ॥ सुकि सुत रंग अरन्नि । करी भग्गावल वत्ती ॥ सोभंत उरगपति भुअ शरन । हंस मुत्ति चर 'बर करी ॥ सुध काज चढ़े पप्पौल सुत । काम पत्तिनौ दुख डरौ॥ छ० ॥३०॥ (१) मो.-पति । (२) मो.-तान । (३) मो.-नवल । (४) मो.-चर। । ३ ८०२ पृथ्वीराजरायो। पचीसवां समय ४४ ] दस दासियों के साथ शशिवृता का शिवालय में आना। दूहा ॥ ते दासी दस बाल ढिग । तिर बरने कवि चंद ॥ तिन में बाल सुसोभियै। मनों प्रथीपुर इंद॥ छ० ॥३०१ ।। शशिवृता का रूप वर्णन । छंद चोटक ॥ मय मंजन मंडित वाल तनं । घनसार सुगंध सुघोरि घनं । नव लोइन अंजित मंजि चलौ।कि मनो कस कुंदन षंभ हलौ ॥ॐ॥३०॥ सुभ वस्त्र सुअंग सुरंगनसौ । मुहलो मनु साष मदन्न कसौ ॥ जरि जहरिपाइजराइजरी। सजि भूषन नभ्भ मनौ उतरौ॥छं॥३०॥ सिगरी लट यों विथरी विगसें । शशि के मुख तें अहि से निकसैं ॥ रँग रत्त उवट्टन उज्जल के । तिन में कछु सेत सुधा चलि के॥छं०॥३०४ ॥ नव राजियरोम बिराज इसी । जमना पर गंग सरस्वति सौ ॥ परिपान सु कुंकम मज्जन कै। नव नौरज अंजन नेननि कै ॥ छं० ॥ ३०५॥ दूहा ॥ छुटि मग मद कै काम छुटि । छुटि सुगंध को बास ॥ तुंग मनों दो तन दियौ । कंचन घंभ प्रकास ॥ छं० ॥३०६ ॥ कुंडलिया ॥ धर उप्पर कुच कनि परौ । राजस तामस रंग ॥ तौजौ तिहि सत काम मिलि । सो ओपम कवि अंग ॥ सो ओपन कवि अंग । मदिन मिलि काम पतंगी। चढ़त घरं संमूह । करौ भइ फेरि पतंगी ॥ * बरं सिर दार बिमार । सेभु चहुआन नाह नर । गंग यमुन भारत्थ । हत्थ जोरंत सु अवर ॥ छं० ॥ ३०७ ॥ दूहा ॥ तिमिर बौर गवनं कुवट । त्रिगुन तेज रवि त्रास चवनित विक्रम परिस की। 'काम ज्वाल बल हास ॥ छं० ॥३०८॥ कुंडलिया ॥ करि मज्जन सज्जन सुक्रम । आभूषन न समान ।। के काके कोहि दिसि । सजि सषि नैन कमान । सजि सघि नैन कमान । केश वागुरि विस्तारिय ॥ * छंद ३०७ के दोनों अंतिम पद अशुद्ध हैं । पाठ चारों प्रतियों में समान है (१) मो.-इल ।

पचीसवां समय ४५ ] पृथ्वीराजरासो। ८०३ हावभाव कढाच्छ । टुंकि षुट्टौ दिय भारिय ॥ बेठि नैन वप मूल । पेम 'देषन गह सज्जन ॥ मन मृग पिय कृत काज । ताकि बंधन किय मजजन॥छं०॥ ३०६॥ छंद नाराच ॥ सुगंध केस पासयं । सुलग्गि मुत्ति छंडियं॥ अनेक पुप्प बौचि गुंथि । भासिता विषंडियं ॥ मनों सनाग पुषफ जाति । तीन पंथि मंडियं । दुतौ कि नाग चंदनं । चढ़त दुद्ध पंडियं ॥ छं० ॥ ३१० ।। सिं दूर मध्य गुच्छता । अगंमदं विराजयं ॥ मनो कि सूर उग्गते । महे सु पुत्र लाजयं ॥ सु तुच्छ सुचछ पाट आट । पेम वाट सोभियं ॥ मनो कि चदं राह वान। बे प्रमान लोभयं ॥ छं० ॥ ३११ ॥ कनक काम कुंडिलं। हलंत तेज उभभरे ॥ ससी सहाइ मान भाइ। सज्जि सूर दो करे॥ दुतौ उपम्म बिंद को। किरन्न चंद दिठ्ठयं ।। मनों कि सुर इंद गोदि । अप्प आनि विठ्ठयं ॥ छ ॥ ३१२ ॥ भुवन्न बंक संक जूत्र । नैन नग्ग जूवयं ॥ जरडता चपल्ल गत्ति । 'अच्छ आनि जवयं ॥ कटाक्ष नैन बंक संक। चित्त मान बंकयं ।। सुछंडि वै सु कुंचितं । श्रवन्न बान नंषयं ॥ छं० ॥ ३१३ ॥ सुगंधता अनेक भांति । चौर चारु मंडियं ॥ सु केहरौ कटिं प्रमान । बीच बंधि छंडियं ॥ सुरंग अंग कंचुको । सुभंत गात ता जरौ ॥ बनाइ काम पंच बान । श्रोट जोट लै धरौ ॥ छं० ॥ ३१४ ॥ सुरंग "माल लाल बाल । ता विसाल छंडयं ॥ सु पुब्ब बैर जानि काम । अग्गि संभ मंडयं ॥ 'दुतौ उपम्म मुत्ति माल । यों विसाल ता कहौ ॥ (१) मो.-पेदन । (४) ए. क को.-रंग । (२) मो.-गहंत रहे लाजयं । (५) मो.-लाल माल ३) ए. कृ. को.-अप्प । (६) ए.-उदी पृथ्वीराजरासो। पचीसवां समय ४६ ]] को आना। जु भारथौ सु 'गंग लै। सुमेर शृंग ते बहौ ॥ छं० ॥ ३१५ ॥ जराइ चौकि स्याम पाट । रत्ति पत्ति तें षुली ॥ सुरंग तिथ्थ थान मंडि । ईस शोश तें चलौ ॥ सुवर्न छुद्रघंटिकादि । षोडसं बघानयं ॥ सु मुत्ति तात मोर तन्न । 'गोदरं बषानयं ॥ छं० ॥ ३१६ ॥ सुगंध गोप चिन्ह मंडि । पौत रत्त जावकं ॥ अभूषनं धरंत चित्त । मित्त हित्त शावकं ॥ बनाइ के चौडोल लोल । चढिता सु सुंदरौ ॥ सुदोषिता सुरंग थान । अस्तु तास उच्चरौ॥ छं ॥ ३१७ ॥ शशिवृता का चंडोल पर चढ़ कर देवी की पूजा दूहा ॥ सजि शृंगार शशिवृत्त तन । चढ़ि चौंडोल सुरंग ॥ पूजन का बर अंबिका। आई बाल सु अंग ॥ छं० ॥ ३१८ ॥ तेरह चंडोलों को चारों ओर से घेरकर राजा भानु की सेना का चलना। सज्जि सेन जहव बपति । दसत तीन चाडोल ॥ लकरि लाल से पंच अग। दस दिसि लष्पन लोल ॥ छं० ॥ ३१६॥ सूर्योदय के समय पूजा के लिये आना। राजा की सेना का वर्णन । कवित्त ॥ अरुनोदय उद्यमह । सुच्छि लिन्न सु बंध भर ॥ उभय सहस बाजित्त । ढोल चंबकी सुमत गुर ॥ अद्ध सहस नफरि। सहस सहनाइ सुरंगी। सुवर बौर पूजा प्रमांन । कौनौ मति चंगी बिन पुंज संग सेना सकल । अकल अपूरब बत्त बर ॥ चर सकल विकल अलि कुलन को। सुचित मित्त इक्कह सुथिर॥छ०॥३२०॥ (१) मो.-मंग (३) मा.-दिष्यन । (२) ए.-सादरं पचीलवां समय ४७ ] पृथ्वीराजरासो। ८०५ गाथा ॥ गुज्जर वै गुज्जर धनौ । सथ्यं सेनाह सब्बयौ बौर ॥ जांनैनि सबर अद्धं । उग्गे वा तिमिर तप हरनं ॥ छं० ॥ ३२१ ॥ मन्दिर के पास पहुंचकर शशिरता का पैदल चलना । हरनंत पति तुरंगं । साहस मंत्राय गिद्धयो रनयं ।। देवालयं पासं । सा पासं बालयं चालं ॥ छं० ॥ ३२२ ॥ शशिटता के उस समय की शोभा का वर्णन । छंद नाराच ॥ चलो अलौ घनं बनं । सुभंत सथ्थ संघनं ॥ विहंग भंगयो पुरं । चलंत सोभ नोपुरं ॥ छं० ॥ ३२३॥ अलीन जुथ्थ आवरं। मनो विहंग सावरं॥ चुवंत पत्त रत्त जा । उवंत जानि अंबजा ॥ ३२४ ॥ कलिंद सोभ केसयं । अनंग अंग लोभयं ॥ उठंत कुंभ कुच्चयं । उपम कच्चि सुच्चयं ॥ छं० ॥ ३२५ ॥ मनों जरंत बाल को। धरी सु आनि लालको ॥ सुभंत रोमराजयं । 'प्रपौल पंति छाजयं ॥ छं० ॥ ३२६ ॥ मनोज कूप नाभिका । चलंत लोभ आलिका ॥ सुरंग सोभ पिंडुरौ । परादि काम पिंडुरौ ॥ छं० ॥ ३२७ ॥ नितंब तुंग सोभए । अनंग अंग लोभए ॥ मनौ कि रथ्थ रंभ के । सुरंभ चक्क संभके ॥ छं० ॥ ३२८ ॥ नषादि आदि अच्छनं । मनों कि इंद्र 'द्रप्पनं ॥ ढरंत रत्त रड़ियं । उपम्म कबि टेरियं ॥ छं ॥ ३२६ ॥ मनौ कि रत्त रत्तजा । चिकंत पत्र अंबुजा ॥ छं० ॥ ३३० ॥ गाथा ॥ मढ़ मे रष्षत बाले । लगा सेनाय पास चिहु बौरं ॥ धरि धौरं तन दुरयं । रोमं राज रोमयं अंचं ॥ छं० ॥ ३३१ ॥ कान्यकुब्जेश्वर को देख कर शशिवृता का दुखी होना और मन में चिन्ता करना। दूहा ॥ बाल धरकति वचनि गति । ग्यान मोह विष पान ॥ त्यों कमज्जै देषि कै । बर चिंते चहुआन ॥ छं० ॥ ३३२ ॥ (१) मो.-पपील । (२) मो.-दर्पनं । (३) को.-पढ़ ।

पृथ्वीराजरासो। पाचीसवां समायः ४८.] एक ओर कान्यकुब्जेश्वर की सेना का जमाव होना और दूसरी ओर पृथ्वीराज की सेना का घेरना । कवित्त ॥ देषि सुभर 'लच्छिनति । फौज चतुरंग रिंगावै ॥ अरी सेन सम भार । धार भंजत मग पावै ॥ बहु गिरष्टता रिष्ट । हक्कि अप्पन पर धावहु ॥ सुबर स्यंघ आलस्य । स्याल सूधौ करि पावहु ॥ उठुन बौर बोरहु उठत । सुबर मंत्र फुनि करिय बर ॥ अभंग सेन भद्दव सरिस । अभंग अंग ' सज्जे कहर ॥छं०॥३३॥ पृथ्वीराज की सेना का चारों ओर से घेरना। दूहा ॥ चाहुआन सब सेन जुरि । भिरि रू'धे चहुंपास । देव दुतिय देवह दरस । बल बढिय आयास ॥ छं० ॥ ३३४ ॥ जैचन्द और पृथ्वीराज की सेना की तुलना । कवित्त ॥ असुर सेन कमधज्ज । सु सुर प्रथिराज सेन बर ॥ अमृत कित्ति संग्रह्यौ । मदह भौ क्रोध वौर तर॥ महन मोह रंभनी । तहां शशिता समानं॥ दुहुन बीच सुिभ्भयै । हेत चहुआन सुजानं ॥ अकित्त राह पच्छे फिरग । चक्र तेग सद्धिय सुबुधि ॥ अलि सकति सेन माया विषम । सुबर बौर बढिय सु सुधि ॥छं०॥३३५॥ दोनों सेनाएं तलवार लिए तैयार हैं। जिसने द्रोपती का पण रक्खा वही शशिवृता का पण रक्खेगा दूहा ॥ दुहूं तेग तारुन्य तन। सयन सुक्रति प्रतिकाल ॥ जिन रष्यौ द्रोपत्त पन । सो 'रष्ये प्रति बाल ॥ छं० ॥ ३३६ ॥ देह कंचुकि दह दून अलि । विच सुंदरी अमूल । डोल तीस संयोग भति । भौ भारथ्थ समूल ॥ छं० ॥ ३३७ ॥ (१) मो.-लष्षिन सु। (२) मो.-सज्जै। (३) ए. कृ. को.-त्रसि । (४) ए. कृ. को-रष्षै।

पचीसवां समय ४९ ] पृथ्वीराजरासो। ८.७ गाथा ॥ भारथ्थं प्रति राजं । सज्जे सेनाय बौर बौरयं ॥ धौरं धौर सधौरं । अधोरं सब सेनायं ॥ छं० ॥ ३३८ ॥ दूहा ॥ देषि बाल पारस फिरिय । मेर भान प्रति मान ॥ ज्यों शशि पछ पारस सुभति । शंकर सोभत थान ॥ छं० ॥ ३३६ ॥ मठ को देख कर शशिटता के मन में काम उत्पन्न हुआ और उसने मनही मन शिव को प्रणाम किया। शंकर रस आचार किय । मढ़ दिष्षिय प्रति जोइ ॥ मन लग्गिय बंधत सु पय । मन कंद्रप रस भोइ ॥ छं० ॥३४० ॥ तीस डोलियों के बीच में शशिता का चौंडोल था जिसको ५०० दासी घेरे हुई थीं। ५००० सवार और ५०००० पैदल सिपाही साथ में थे। कवित्त ॥ 'दहति तीन चाडोल । मध्य चाडोल बाल भय ॥ भमर टोल भंकार । दासि बिंटिय सु च सय ॥ सित्त पंच असवार । पंति मंडिय चावहिसि ॥ अद्ध लष्प पैदल्ल। सथ्थ आयो सुअंग कसि ॥ मंगल विवेक विधि उच्चरे । बंधी बंदन मार करि ॥ उत्तरी बाल देवल सुढिग। लग्गि पाइ परदच्छि फिरि॥ छं० ॥३४१॥ शशिता ने चौंडोल से उतर कर पृथ्वीराज के कुशल की प्रार्थना की। दूहा ॥ उतरि बाल चौडोल तें । प्रौति हेत प्रथिराज ॥ जिन देवत्त जु संपज्जौ । सो मंडन प्रथिराज ॥ छं० ॥ ३४२ ॥ बाजों का शब्द सुनकर सामंतों का चित्त पलट जाना। मंडन रन छंडन कलह । दल दैवत्त सु जुद्ध ॥ बर वज्जे बाजिव सुनि । भौ सामंत विरुद्ध ॥ छं० ॥ ३४३ ॥ (१) मो.-सर्व, सरब। (२) ए. कृ. को.-दसत ।

पृथ्वीराजरासो। पचीसवां समय ५० ] विरुध जुद्द बंधन सुदल । स्वामि धंम्म चित पान ॥ दुतिय |म जानै नहौ । धनि सामंत बषान ॥ छं० ॥ ३४४ ॥ गाथा ॥ बड़े दलं समूरं । लब्धं सेनाय अतं बलयं ॥ ते जग्गे रस बौरं। जानिज्जै जोग जोगायं ॥ छं० ॥३४५ ॥ सेना में बीर रस का जागृत होना। छंद भुजंगी ॥ जग्यौ बौर बौरं सु डोंरू बजावै महा चित्त चित्त सुमंतं निपावै जग्यौ बौर बौराधि बिराधि रूपं । मनो ईश शोशं नचै बौर 'रूपं ॥ छं० ॥ ३४६ ॥ दूहा ॥ भयौ बौर बौरह तिगुन । नच्यौ रुद् बहु भेद ॥ सो दिष्यौ दिष्यौ 'नहै । सो देषन गुन छेद ॥ छं० ॥ ३४७ ॥ नह तारक्कि सु जुद्ध बर । नह देवा सुर मान ॥ सो दिष्यौ कमधज्ज सौ । चाहुान बलवान ॥ छं ॥३४८॥ चाहुान कमधजज बर । बरै षटक्क सुबह ॥ देवग्गिरि उग्गाहिये । करि भारथ्थ न सह ॥ छं॥ ३४६ ॥ देवालय के पास सब लोगों का चित्रलिखे से खड़े रह जाना। छंद भुजंगी ॥ सुसह विसह विसह निसानं । रहे देव यांनं 'बटे देव थानं ॥ रहे सब्बयोंही टगी टग्गा लग्गे। मनो चित्रलिष्षे विचित्रत ठग्गे ॥ छं० ॥ ३५० ॥ गाथा ॥ जो इजजै मन चरियं । हरियं एक कग्गयौ सबदं । सब सेना कमधज्ज। विंटे वा बाल सर सायं ॥ छं० ॥ ३५१ ॥ सखियों का जैचंद के भाई को शशिटता का बर कहना जो उसे बिष सा लगा। (१) ए. कृ. को.-सूपं । (३) मो.-सु उगाहिए। (२) मो.-नीं। (४) मो.-रह (५) कृ. को.-वड़े, ए.-वढे पचीसवां समय ५१ ] पृथ्वीराजरासो। बर जैचंद सुबंध । प्रोहित पंग रष्षियं आइयं ॥ सहचर चारु सुपड़ियं। हालाहलं बालयं मनयं ॥ छं० ॥ ३५२ ॥ अपनी सेना सहित वह भी शिवपूजन के लिये वहाँ आया। दूहा ॥ चढ्यौ पंज नव साज बर । अरु भर लित्रे सथ ॥ शंभु थान पूजन मिसह । चलि बर आयौ तथ्थ ॥ छं० ॥ ३५३ ॥ तब तक पृथ्वीराज के भी ७००० सैनिक हथियारबंद कपट भेष धारण किए हुए भीड़ में धंस पड़े। तब लगि दल चहुबान के । ग्रह गुपंति कर आइ ॥ रुक्कि सके नन मध्य लिय । बोलै संमुह धाइ ॥ छं० ॥ ३५४ ॥ कवित्त ॥ सहस सत्त कप्परिय । भेष कौनौ तिन वारं ॥ गोप तेग गहि गुपत । कपट कावरि सब भारं ॥ किहुन फरस किहुं छुरौ । चक्र किन हाथन माहौ ॥ किन विसूल किन डंड । सिंगि सब सथ्थ समाहौ ॥ सा अंग सिद्ध चहुआन लै । दूतन दूत बताइ हरि ॥ सा अंग बाल उतकंठ करि । पै लग्गी परदच्छि फिरि ॥छं०॥३५५॥ शशिरता ने चौंडोल से उतर कर शिव की परिक्रमा की और पृथ्वीराज से मिलन होने की प्रार्थना की। अरिल्ल ॥ फिरि परदच्छि बाल अपु लग्गौ। सुमन काम कामना सुभग्गी ॥ मन मन बंधि कियौ हथ लेवं । सुमन मंत्र प्रारंभ सुदेवं ॥ छं० ॥ ३५६ ॥ दोहा ॥ उतरि बाल चाँडोल तें । प्रौत प्रात छुटि लाज ॥ शिवहिं पूजि अस्तुति करौ । मिलन करै प्रथुराज ॥ छं० ॥ ३५७ ॥ शशिटता का शिव जी की स्तुति करना। (१) ए. कृ. को.-आहि । (२) कृ.किए, कियउ, कियव । * यह दोहा मो. प्रति में नहीं है। "puternamammoorterta पृथ्वीराजरासो। पचीसवां समय ५२ ] छंद हनूफाल ॥ प्रारभं मंच सु राम । तिहि जपो अजपा नाम ॥ हरि हरी बरुन विरत्ति । कबि कही चंद किरत्ति ॥ छं० ॥३५८ ॥ श्रुत कयौ बेद पुरान । ज्यों सुन्यौ श्रवन निभान ॥ तन स्याम अम्मर पौत । रघुबंस राजस रौत ॥ छं० ॥ ३५६ ॥ दृग कमल कमला पान । मधु मधुर मिष्टत बान ॥ जिन नाम 'जनमह कोट। कंद्रप्प लावन मोट ॥ छं० ॥३६० ॥ गंभौर साइर मान । आदिष्टवान प्रमान । नह बाल व किशोर । उर वरन स्याम न गौर ॥ छं० ॥ ३६१ ॥ अरि दहन उग्रस कोट । पोवै कि गोपिन पोटि ॥ भ्रम भूलि ब्रह्म भुलाइ । सुरनाथ नाथ नचाइ ॥ छं० ॥३६२ ॥ निज पानि पदम कटाच्छ । जिन भूमिय भूतल लाछ । आदित्य कोटि प्रकास । सय सक कोटि विलास ॥ छं० ॥ ३६३ ॥ आराम कलप निधान । सुर तीन कोट प्रमान । नव रूप रेष अनंग । परकार गर्व विभंग ॥ छं० ॥ ३६४ ॥ पर पाप लिपत इहै न । भुत्र भुक्ति मुक्ति सु दैन ॥ काकुस्थ करुना कार । गुन निधि सुभ्भर भार ॥ ॐ ॥ ३६५ ॥ रन रंग धौर सधौर । भव पार कढ्ढन तौर ॥ सुर सुरौ नाथ नचाइ । भ्रम भूल ब्रह्म भ्रमाइ ॥ छं०॥ ३६६ ॥ चतुरान घट्ट सु घूमि । सुरपत्ति फनपति तूमि ॥ तारुन्य रूप प्रकास । सहभूत अंग निवास ॥ छं० ॥ ३६७ ॥ जय मंत्र जंपित वार। हर दौन तह हंकार ॥ छं० ॥३६८ ॥ अरिल्ल ॥ बाले वित्त विषम्म प्रमानं । हय गय दल रंध्यौ चहुबानं ।। कंकुम कलस सलेवर हेमं । देव दैव साधारन नेमं ॥ छं० ३६६ ॥ . पंगौ पय सतह परिमानं । संमुह दलन रुध्या चहुबानं॥ गहह गहह कित्तौ अविसेशं। सुवर चित्त चिंते जुनरेशं ॥छं॥६७०॥ गाथा ॥ बर छित्ती छिति धारी। सारं संग्राम नेहयो बलयं ॥ अग्गैई मग जूथं । ना झुक्कै 'मृग्गयं राजं ॥ छं० ॥ ३७१ ॥ (१) ए. कृ. को.-जनमहि । (२) ए. कु. को-जोट। (३) मो.-फोटि । (४) ए. क. को.-मृग्गयो।

पचीसवां समय ५३ ] पृथ्वीराजरासा। ८११ उद्दर सेन सनो। 'संग्रामं वौर सुभट्टायं ॥ कालिंदीय सुरंगे । सो अंगो सुद्ध भूतायं ॥ छं० ॥ ३७२ ॥ पृथ्वीराज सात हजार कपट वेषधारी कामरथी वीरों के साथ देवी के मन्दिर में धंस पड़े। कवित्त ।। सहसः सत्त कम्परिय । भेष कौनो तिन वारं॥ कपट कंध कावरिय । धसिय देवी दरबारं ॥ सर्व शस्त्र प्रारंभ । हस्त आरंभ मुरी सल ॥ धसिय भौर सम्मूह । जूह पाई समंडि कल ॥ दल प्रबल उदधि ज्यों मथन कज । भुज सुकिस्न चहुबान किय ॥ शशिवृत्त बालरंभह समह । मिलिय गंठि बंधन सुहिय॥छं॥३७३॥ पृथ्वीराज और शशिवृता की चार आंखें होते ही लज्जा से. शशिवृता की नज़र नीची हो गई और पृथ्वीराज ने हाथ पकड़ लिया । दिठ्ठ दि© लग्गी समूह । उतकंठ सु भग्गिय ॥ निष लज्जानिय नयन। मयन माया रस पग्गिय ॥ छल बल कल चहुबान । बाल कुअंरण्पन भंजे ॥ दोषत्रीय मिट्टयौ । उभय भारी मन रंजे ॥ चौहान हथ्थ बाला गहिय । सो अोपम कविचंद कहि ॥ मानों कि लता कंचन लहरि । मत्त बौर गजराज गहि ॥छं०॥३७४॥ पृथ्वीराज के हाथ पकड़ते ही शशिवृता को अपने गुरुजनों की खबर आगई और इससे आंख में आंसू आने लगे पर उन्हें अशुभ जानकर उसने छिपा लिया। चंद्रायना ॥ गहत बाल पिय पानि । सु गुर जन संभरे ॥ लोचन मोचि सुरंग । सु अंसु बहे घरे ॥ (१) ए. कृ. को.-संग्रामे । (२) ए.कृ.को.-भूताय । (३ ) मो.-कामुचि ।

८१२ पृथ्वीराजरासो। पचीसवां नमय ५४ ] बही॥ अपमंगल जिय जानि । सु नेन मुष मनों घंजन मुष मुत्ति । भरकत नंषही ॥ छं० ॥ ३७५ ॥ दुहु कपोल कल भेद । सुरंग ढरकही। सज्जन बाल बिसाल । सु उरज घरकहौ ॥ सो ओपम कवि चंद । चित में बस रही। मनु कनक कसौटी मंडि । सग्ग मद 'कसरही ॥ छं० ॥ ३७६ ॥ गाथा ॥ मग मद कसयति चित्ते । मित्तं पुनरोपि चित्तयं बसयं ॥ अजहूं कन्र वियोगे। कालिंदी कन्हयो नौरं ॥ छं० ॥ ३७७ ॥ गहियं गह गह कंठो। बचनं संजनाई निठ्ठयो कहियं ॥ जानिज्जै सत पत्र । बंधे सदाइ भवरयं गहियं ॥ छं० ॥ ३७८ ॥ तप तंदिल में रहियं । अंगं तपताइ उप्परं होई॥ जानिज्ज कसु लालं । घटनो अंग एकयौ सरिसौ॥ छं० ॥ ३७६ ॥ अपमंगल अल बाले। नेनं नपाइ नष किं सलयौ ॥ जानिज्जै धन कृपनं। सपनंतरो दत्तयं धनयं॥ छ० ३८० ॥ जिस समय पृथ्वीराज ने शशिवृता का हाथ पकड़ा पृथ्वी- राज के हृदय में रुद्र, शशिवृता के हृदय में करुणा और उन शशि के हृदय वीभत्स रस का संचार हुआ। कवित्त ॥ गहि शशितृत्त नरिंद । सिढौ लंघत ढहि थोरौ ॥ काम लता कल्हरी । पेम मारुत झकझोरी ॥ बर लौनौ करि साहि । चंपि उर पुट्टि लगाई ॥ मन सुरंग सोइ 'बत्त । कंत लगि कान स्नई नृप भयौ रुद करुना सुचिय । बौर भोग बर सुभर गति । सगपन सुहास बोभच्छरिन। भय भयान कमधज्ज दुति ॥छं॥३८१॥ शत्रुओं के में (१) मो.- फरसही। ४) ए. कृ. को, वात। (२) ए. पत्तं । (३) ९. कृ. को. शब्दाय ।

पचीलवां समय ५५ ] पृथ्वीराजरामो। ८१३ परिवृत्त से एक घरी ठहर कर पृथ्वीराज शशिवृता को साथ ले कर चल दिए । दोहा ॥ बोर गत्ति संधिय सुमति । वृत्त अत्त न जाइ ॥ घरी एक आत्त रघि । सुबर बाल अनुराइ ॥ छं० ॥ ३८२ ॥ शशिवृता के पिता ने कन्या के बैर से और कमधज्ज ने स्त्री के बैर से लड़ाई का विचार किया और सेना सजी। बाल सु बैर स बैर चिय। भान विरुद्ध न कौन सकल सेन साधन घरी । कलहंकृत गति 'चौन ॥ छं० ३८३॥ अरिल्ल ॥ आत्त वृत्त गुन निग्रह राज । देव जुद्ध देवत्तह साज ॥ है गै दल सज्जै तिहि बौर । हरौ बाल चहुआन सधौर ॥छं०॥३८४॥ शशिवृता के पिता का कमधज्ज के साथ मिलकर पांच घरी दिन रहे सकट व्यूह रचना। कवित्त ॥ घरिय पंच दिन रह्यो । मंत जद्दव प्रारंभिय ।। मिलि कमधज्ज नरिंद । सकट व्यूह आरंभिय ॥ अई सथ्य अप्पनौ । चरन मंडिय बाम दिसि ॥ व्यूह चक्र विय पाइ । सथ्य उभभौ नरिंद कसि ॥ उडवन भार अंगत सकट । सबर पुंज अप्पन सजिय ॥ रघुनाथ साथ बलियं बिहसि । हंकि सु लछिमन तहँ रजिय ॥ छं० ॥ ३८५॥ कमधज्ज की सेना का वर्णन । छंद रसावला ॥ भरं भौर भाजी। कहं कह वाजी । सुने पुज राजौ । मनो मेघ गाजी ॥ छं० ॥ ३८६ ॥ सनाहं सु साजौ । चढ़यो बोर वाजी ॥ बगं मेल ताजौ । सबै सेन साजौ ॥ छं० ॥ ३८७ ॥ करों काम आजी । सिरं मोहि लाजौ ॥ (१) ए.चिन्ह ।

पचीसवां समय ५६ पृथ्वीराजरासो। ८२४ उठौ मुच्छि एनं । सिरं लग्गि गेनं ॥ छं ॥ ३८८ ॥ कमंद निहारी । सयंनं विहारी॥ कमानै निहारी । तरकस्म झारी॥ छ० ३८८ ॥ अरौ तुंग तारौ । फिरै 'गज भारौ ॥ सरोसं विहारी । मया मोह जारी ॥ छं० ॥ ३९ ॥ महंतं विडारी। किए नैन रत्तं । रसं रोस पत्तं ॥ छं० ॥ ३६१ ॥ मुरं बौन बोरं । करौ आज तौरं ॥ परै मोहि गत्तं । हरै शशित्तं ॥ छं० ॥ ३९२ ॥ असौ जा पहारं । चढ्यौ धार धारं ।। लियौ त भारी। पगं सौस डारी ॥ छं० ॥ ३९३ ॥ पर्यो मद्ध धाई । असौजा पुलाई ॥ बजी कह कूहं । अवाजं सजूहं ॥ छं० ॥ ३६४ ॥ घरियाल के बजते ही सब सेना जुट गई। कवित्त ॥ सुनि वज्जो 'घरियाल । लाग नौसानन बाजिय ॥ इक दिन दोज सेन । चंपि चावहिसि साजिय ॥ महन रंभ सा जग्य । मध्य मोहन शशिवृत्तं ॥ असुर सु सुर मिलि मथहि । सूर बंसौ रजपूतं ॥ आरंभ पत्र मंद्यौ कपट । कपट मुक्ति कढिय लपट ॥ दुहूं बीच जद्दों कुंअरि । उभय सिंह सारह झपट ॥ छं० ॥ ३९५ ॥ चहुआन और कमधज्ज शस्त्र लेकर मिले । दूहा ॥ चाहुान कमज्ज बर। मिले लोह जल छोह ॥ भर भर टट्टर बज्जही । बंसह लग्गिय कोई ॥ छं० ॥ ३९६ ॥ शत्रुता का भाव उच्चारण करके दोनों ने अपने अपने हथियार कसे। ( १ ) मो.-गन्न । (३) मो.नीसानत । (२) ए. कृ. को.-घरि, घरी पंच ।

पचीसवां समय ५७ ] पृथ्वीराजरानो। ८१५ गाथा ॥ उद्धरियं अरि भायं । सायक कस्लेव अप्प अप्पायं ॥ कढ्ढे लोह करारं । मार मारं जंपि जी हाई ॥ छं० ॥ ३८७ ॥ दूहा ॥ अत घाइ घट भंग कौ । करन मतह बर बौर ॥ मनहु काल कपि दल निरति । लेन 'लंक मति धौर ॥ छं० ॥३६८॥ 'धर औरत्तन बौर बर । करिय न पंग प्रवाह ॥ चच्चर सौचव रंग गति । विधि बंधन रिन चाह ॥ छं० ॥ ३६६ ॥ दोनों सेनाओं के युद्ध का वर्णन । छंद सुजंगी। मिले घाइ विघाइ सा पुंज राजै।लगे अंग अंगंसुरंगति छाजै॥ मिले हथ्थ बध्थं सु सथ्थं निना। मनो वारुनी मत्त मय मत्त भार॥ छं० ॥ ४० ॥ किधी जुद्द लग्गे कि मल्ल सवारे ॥ उर लोह पंती पर श्रोन रुद्रं । मनों रत्त धारा बरष्प समुद्र॥ .... .... छ० ॥ ४०१ ॥ .... क - उ. छिछि इछ सनाहं सुभिजै । मनो पुफरत्तं नभं देव पुज्जै ॥ सुनै ईस सदं निसानं गहार। बजै धार धार घनं कै प्रहार ॥ छं० ॥ ४०२॥ मनो पट्टनं मंझि कंसी डकार । दुतौ ओपमा चंद जंप विचार ॥ बज झल्लरी देवलं हार मार । उड़े सार किंचौ कि रच्च प्रहार॥ छं० ॥ ४०३॥ मनो सिंगनं भवं रौनि भार। * सबै सस्त्र मंत्र भर जेम वाहे। पिझ घग्ग कढ्ढे बिहथ्थै समाहे छं० ॥ ४०४॥ कर कंस मत्तं पलं पारि छडै । रुधं धार हल प्रसादेति मंडे । सिवा लौति सोभै 'प्रनाली अनेकं । फिरै अच्छरी पंति बिय बार वेकं॥ छं० ॥ ४०५॥ (१) ए. कृ. को.-फलक । (२) मो.-धन । (३) मा.-निधान । ( ४ ) में -मै । (५) मो.-उप्पमा । (६) ए. कृ. को.-मनाली । * ए. कृ. को.-सबै शास्त्र मंत्रं भजैरं समाह । बिजै खग्ग कहै बिबी हथ्य बाह ॥

पृथ्वीराजरासो। पचलवां समय ५८] बहै नाग मुष्पो सु सोहै बिकंतं । फटै हस्ति कुंभं ठनंकत घंटे ॥ वियं वांह पंचै गिरै गज्जराज । लनो द्रोन पंचे कपो काज पाजं ॥ छं० ॥ ४०६॥ पिजै दंत दंती भरं कंध डारै ॥ मनो कोपियं भौम हथ्थी उच्छारै भर लोहि गिद्धो धमै भंति छुट्टै। मनो देवलं इष्ट चलि डोरि तुटै ॥ छं॥४०७॥ लगै लोह हथ्थौ सिर वंबिझारै। तिनं गात तिंदू जर अग्गि लारै ।। परै घोपरी तुहि भेजी सुभावै । दधौ 'भाजनं जानि वायस्म आवै ॥ छं० ॥४०८॥ फटै बौर बौर सुबौर सुघट्ट । मनो कर्क करवत्त विहरत कहूँ ॥ नचैजा कमंधं कर हाक शौशं । चरमं सुभज्जै हसै देषि ईशं छं० ॥ ४०६॥ युद्ध के समय शूरवीरों की शोभा वर्णन । गाथा ॥ मानिक प्रति ताजं । हेमं हेमेल विद्ध साधरियं ॥ जानिज्जै निसि मई । निरमल तारक सोभियं गैनं॥ छं०॥४१॥ मुच्छो उच्चस बंको । बाल चंद सुभ्भियं नम्भं ॥ गज गुर घन नौसानं । रौसानं घंग पल याई ॥ छं० ॥ ४११ ॥ अरिल्ल ॥ दहीक बज्जि नौसानति 'न । सबै सेन संग्राम बिवह ॥ इक अंग चावहिसि सेनं । जर राज रत्त रस नेनं ॥ छं० ॥ ४१२॥ छंद रसावला ॥ लगी कर कोह । लगे घन लोह ॥ छकै अति छोह। महा ताज मोह ॥ छं० ॥ ४१३ ॥ भरा भर भार । तुटै तरवार । मची घन मार । परंत प्रहार ॥ छं० ॥ ४१४ ॥ धुकंत धरनि । सरोस सरन्नि ॥ निफूटत रुन्नि । बरै सु बरुन्नि ॥ छं० ॥ ४१५ ॥ (१) मो.- भोजनं । (३) मो. को.-गत्त, गत । (२) मो.-गेनं । (४) ए. कृ. को.-नदै, विषदै । ५ मो. रन ।

पचासवां समय ५६ ] पृथ्वीराजरासो। कर घन घत्त । महा इत मित्त ॥ लर बर लत्त । फटै रिन पत्त ॥ छं० ॥ ४१६ ॥ कटारिय एक । लगंत अनेक ॥ सु चंदन साष । संजोइय भाष ॥ छं० ॥ ४१७ ॥ धषै अति धौर । मनों बर बौर ॥ छं० ॥ ४१८ ॥ कमधज्ज की शोभा वर्णन । कवित्त ॥ सबर बौर कमधज्ज । अरघ अप्पिय घग मग्गं ॥ इष 'अच्छित उच्छरहि । जानि परिमानन मग्गं ॥ सार धार पुंषियै । बौर मंगल उच्चारै ॥ सबै साथ बंदियहि । सकल पूजा संभारै ॥ बर मुक्कि बरन बरनौ सुबर । इह अपुब पिष्यौ नयन ॥ उप्पनौ बौर सिंगार सँग । रुद्र बौर चौरी नयन ॥ छं० ॥ ४१६ ॥ दूहा । सिर सोहत बर सेहरौ। टोप ओप अति अंग ॥ बगतर बागे केसरे। रुधि भौजत विषमंग ॥ छं० ॥ ४२० ॥ सकट भग्ग लइ बग्ग बर । कमधज बौर विसेज ॥ मिले बौर बौरत्त बर । दोऊ दैवत तज ॥ छ० ॥ ४२१ ॥ शशिवृता का चहुआन प्रति सच्चा अनुराग था। देव तेज दैवत्त गुन । अत मत्ति गुन कंति ॥ शशित्ता चहुआन सैौं । सुस्त मंत गुन पंति ॥ छं० ॥ ४२२ ॥ सांइ सूर सांई सु गति । दल दंदुभि दैवत्त ॥ विधरं कर वौरह करह । सुबर बौर मारुत्त ॥ छं० ॥ ४२३ ॥ कालकूट कौनौ विषम । कोलाहल घन कौन ॥ अरत वृत्त अंतह भषै । सो भारथ्थ प्रवौन ॥ छं० ॥ ४२४ ॥ भारथ दिष्षिय तत्त मति । अत चिंत बल छौन ॥ जिन गुन प्रगटित पिंड किय । सो भारथ्य प्रवीन ॥ छं० ॥ ४२५ ॥ (२) मो.-संगट। (१) मो.-अष्पित । (३) मो.-मिलें।

i ८१८ पृथ्वीराजरासो। पचीसवां समय ६० ] कंठ कोल कोलौ सुत । तत जुद्ध सम पाइ॥ मुबर बौर भारथ्थ गुन । उठे बौर विरुभाइ ॥ छं० ॥ ४२६ ॥ घल संकुल अंकुल प्रक्रित । चतुर चित्त विरुझाइ ॥ मनु बड़वानल मध्य तें। समुद सत्त गुन भाइ । ई० ॥ ४२७ ॥ वीर थान विभ्रम भइय । नयन रत्त सम सार ॥ मानहु बर धरि अद्ध में । नाकपत्ति गिरि मार ॥ छं० ॥ ४२८॥ पृथ्वीराज की श्री शेषजी से उपमा वर्णन। कवित्त ॥ नाक पत्ति संभरिय । उमै काया अधिकारिय ॥ वह जित्यौ बलि राइ । यहन दुज्जन सम सारिय ॥ छित्ति पत्ति अति अभ्भ । दुहुन आभा पति बुद्धं ॥ वह गोरी सुरतान । इहति दानवति विरुद्ध ॥ घग घुलै दुहुन पुज्जै न को । दोऊ बाउ बर बौर रन ॥ लै चल्यौ हरिव शशित्त को । पहु पंजलि पुज्जै तरुन॥छ०॥४२॥ दूहा ॥ तरुन तेज तम हरन बर । बाल बहिक्रम उच्छि ॥ मानों रति आरुढ़ करि । बर बारधि मति लच्छि ॥ छं० ॥ ४३० ॥ लच्छि सु लच्छिरु लौन हरि । इह लोनी संग्राम ॥ घटि बढ़ि मंत्रह समन बरि । दोज बौर बढ़ि 'वाम ॥ छं० ॥ ४३१ ॥ गाथा ॥ चावहिसि बप बिंयौ । पुंजं सेनायं सेनयौ बौर ॥ धर धरनी आधारं। सा धारं डुलियं शौशं ॥ छं० ॥ ४३२ ॥ उस युद्ध में वीरों को आनन्द होता और कायर डरते थे। 'मुरिल्ल ॥ बढ़ि सस्त्र दुहाइय बौर रसं । दुहु सेन सुधावत अंग कसं ॥ मुष वीर विगस्मिय रेन ससौ । भय कायर चंद प्रभात दिसौ ॥ छं० ॥ ४३३॥ छंद विराज ॥ लगे लोह सारं । दोज बौर भार॥ महा तेज तार। बर कंज मार ॥ छं० ॥ ४३४.॥ (१) मो.-काम | (२) मो.-विटं । (३) मो.-प्रति में यह छन्द त्रोटक नाम से लिखा है ।

पचीनवां समय ६१ ] पृथ्वीराजरासो। ८१९ . घरौ यार सार । परें कै प्रहारं ॥ भए पार पार । मनों प्रात तार ॥ छं० ॥ ४३५ ॥ कर मार मार। बबकै बकारं ॥ चलें रूद्धि पारं । पलं मचिच गार ॥ छं ॥ ४३६ ॥ चर मंस चारं । दिपै प्रेत दारं ॥ धप धार धार । टर जे न टारं ॥ छं० ॥ ४३७ ॥ डकै भूत डार । ढर सौस ढार ॥ उड़ौं बौर रैनौ । भमै भौर सेंनौ ॥ छं० ॥ ४३८ । अवध्य न गोपं । इसे बौर कोपं ॥ छं० ॥ ४३६ ॥ दूहा ॥ कोपि बौर कायर धरकि । परघि पयंपन जोग। यह गति छंडे बौर बर । परै परत्तर भोग ॥ छं० ॥ ४४० ॥ कवित्त ॥ बांन पथ्य बलभौम । सत्त 'सिवरी अधिकारी ॥ गंभौरां गुर सिंघ । नेह करनह क्रत धारौ ॥ बल सुजग्य सक्रह बिसाल । पुरषारथ सारी॥ सुर सिधि बुद्दि गनेश । क्रम्मन घुन घू अधिकारी॥ सामंत सूर सूरह विरुध । बौर बौर पारस फिरिय ॥ बर सिंघ सिंघ रपै मरन । बर कोबिद कोबिद डरिय॥छं० ॥ ४४१॥ कवि का पृथ्वीराज. को कलि में वीरों का सिरताज कहना । दुहा ॥ सु रिधि बुद्धि बुध्यां तरन । मिरन खूर दुति राज ॥ चाहुआन प्रथिराज कल । मंडि बौर सिर ताज॥ छं० ॥ ४४२ ॥ पृथ्वीराज और कमधज्ज का मुकाबला होना। चाहुआन कमधज्ज बर। मिले लोह छुटि छोह ॥ धार मुरै मुष ना मुर। मरट 'मुच्छ कत जोह ॥ छं० ॥४४३॥ चाहुआन कमधज्ज दुति । रति नाइक प्रति धौर ॥ सारंगी सारंग बल । इह लग्गी अति बौर ॥ छं० ॥ ४४४ ॥ (१) मो.-सिवरं । (३) मो.-भारी। (२) मो.-गंभीरं । (४) मो. मूल ।

८२० पचीसवां समय ६२ १ पृथ्वीराजरासो। धन्य है उन शूरवीरों को जो स्वामिकार्य के लिये प्राणों का मोह नहीं करते। अरिल्ल ॥ द्रव्य 'वस्य नन होइ प्रमानं । अण्पन 'प्रान स्वांम कृत दानं ॥ जिन जग जित्ति कित्ति बसि कौनी। मरन सुर सस्त्रह बर लोनी ॥ छं० ॥ ४४५॥ दूहा ॥ कहां पंच पंचौ बसत । कहां प्रकृति प्रति अंग ॥ कहां हंस हंसह बसे । कौन करै रन जंग ॥ छं० ॥ ४४६ ॥ पृथ्वीराज और कमधज्ज का युद्ध । इह कहि कट्ठिय सार कर । पोलि घग्ग दोउ पानि ॥ मानहु मत्त अनंग है। धृत छुट्टै जम जांनि ॥ छं० ॥ ४४७ ॥ घोर युद्ध वर्णन । छंदभुजंगी॥मिले हथ्थ बथ्थं न सथ्थंस धारे। मनौ बास्नी मत्त गजदंत न्यारे । उड़े लोह पंती पर श्रोन 'रुदें। मनौ रुट्वि धारा बरष्यंत बुंदं ॥ छं० ॥ ४४८॥ घुमे घाय घायं अघायं अघायं । झुमै झार झार झनक झकायं ॥ करें जोगनी जोग काली करालो। फिर पैट धाये महा विकराली॥ छं० ॥ ४४६ ॥ पर सूर वाहै बहथ्थी कृपानं । कढ़ी तांत बादी मलं चारि जानं॥ धमां धम्म मत्ती महो माहि "धानों। पिंजारे सतं रुव पौत मानों॥ छं० ॥४५० ॥ महादेव मालानि में गूथि मथ्थं । कहैं वाह वाहं वहै सुर हथ्थं ॥ छं० ॥ ४५१ ॥ मुरिल्ल ॥ हाहर रूष कायर प्रकार । छडौति लज्ज अरु बौर मार ॥ अभ्यसै सूर जिन सूर रूप । दैवत्त भूप दिष्य अनूप ॥छं० ॥ ४५२ ॥ (१) मो.-बसें। (४) ए. कृ. को.-रुदं । (७) मो.-हारे । (२) ए. कृ. को.-काम । (३) मो.-यम। (५) मो.-घानों। (६) मो.-है। (८) मो.-छंडी लज भये बसि मार ।

पचीसवां समय ६३ ] पृथ्वीराजरासो। युद्ध की यज्ञ से उपमा वर्णन कवित्त ॥ विषम जग्य प्रारंभ । वेद प्रारंभ शस्त्र बल ॥ है गै नर होमियै । शौश आहुत्ति 'स्वस्ति कल ॥ क्रोध कुंड विस्तरिय । कित्ति मंडप करि मंडिय ॥ गिद्धि सिद्धि बेताल । पेषि पल साकृत छडिय ॥ तुंबर सु नाग किंनर सु चर। अचरि अच्छ सु गावहौं । मिलि दान अस्म अण्पन जुगति । भुगति मुगति तत पावहौं । छं० ॥ ४५३ ॥ दूहा ॥ करि सुचार आचार सब । समद कित्ति फल दौन ॥ गुरुजन मिसि करुना करिय । कायर हाहर कौन ॥ छं० ॥ ४५४ ॥ कमधज्ज का सर्पव्यूह रचना। कवित्त ॥ मिलि जद्दव कमधज्ज । अहिर क्यूह आरंभिय ॥ पुच्छ सु लषि मनि बंध । पांइ गुज्जर पारंभिय ॥ सुधर मंडि वर बौर । पंग बंधह रचि गढलै ॥ फन अप्पन भय पुंज । जीभ करंभ सु ठड्दै ॥ हथनारि जोरि जंबूर घन । दसन दृढ हग मुष्य करि ॥ मनि भयौ मेर मारूफ़ षां। 'चचचर सौचौ रंग परि ॥छं० ॥ ४५५ ॥ गाथा ॥ अप्प व्यूह अरंभो। प्रारंभी बौर भद्रायं ॥ जानिन्ज चव रंगं । चतुरंग इक घंटायं ॥ छं० ॥ ४५६ ॥ दूहा ॥ घटिय घट्ट अघटन घटिय । पढ़िय सार दुअ पंगराइ बंध्यौ सु वृत। किये रत्त बर नैन ॥ छं० ॥ ४५७ ॥ रत्ते नैन विषम्म गति । दावानल प्रथिराज ॥ बौर चंद घन उन्नयौ । सार सु बुढन आज ॥ छं० ॥ ४५८ ॥ पृथ्वीराज का मयूरव्यूह रचना। कवित्त ॥ मोर व्यूह प्रथिराज । सध्थ सज अप्पन कौनौ । चुंच केश मंडलौ । कन्ह चहुआन सु दीनौ ॥ सैन (१) ए.-सुस्ति । (२) को.-पच्चर । (३) मो.-जल ।

८२२ पृथ्वीराजरायो। पचीसवां समय ६४] १ । पांइ पिंड विधि पंष । गरुअ गहिलोत बौर सजि ॥ पुच्छ राज रघुवंश । चान पुंडीर चंद रजिः ।। दुह लोह कन्दि परियार तें । सारधार में श्रम्मि भर ।। पल पंच तरंगनि रुकि जल । जांनि कमोदनि नंचि सर ॥छं०॥४५६॥ दिषि वर 'लपिन फवजः । चंपि चतुरंग रिगावहु ॥ अरि सयन्न संभार । धोर संजै मग पावहु ॥ बहु गरिष्ट तारिष्ट । हकि अप्पन पर धावहिं॥ सु बर सिंघ आलसैं । स्थाल सूधौ करि ध्यावहिं ॥ उठ्ठ न बोर बौरह उठत । सुबर 'मंत फुनिः फुनि कर ॥ वरसै न अंब सर मेघ को। जो न समर सरवर भरै ॥ छं० ॥ ४६० ॥ गाथा ॥ समर सु मथ्यौ सेनं । तार झंकार बौर भद्रायं । केवल गति कल रूपं । भूयं बौर जुद्धयो समर ॥ छं० ॥ ४६१ ॥ बीररस में श्रृंगाररस का वर्णन । दूहा ॥ समर जुद्ध मच्चिय समर । हालाहल बर मत्ति ।। कोलाहल पंषिन कियौ । कांम रूप बर जित्त ॥ छं० ॥ ४६२ ॥ छंद नाराच ॥ बरंत काम रूपयं । असौ वह अनूपयं ॥ लगै सु गौरि पासयं । परक्रिया कटाछयं ॥ छं० ॥ ४६३ ॥ सरंत तौर सोहयं । उरंद मुठ्ठि छोहयं ॥ हला हलं हलं मलं । भिलंत अंग संभिलं ॥ छं० ॥ ४६४ ॥ "कडा कडी कडकयं । दडा दडी दडक्यं । पड़े सिर पडक्यं । डकंत बौर डकयं ॥ छं० ॥ ४६५ ।। बिसै न ज्यों पडक्यं । तुटत तजि डकयं ॥ हडा हडी हडक्यं । ॥ छं० ॥ ४६६ ॥ निरष्यि पत्ति नाकयं । परंत होय धाकयं ॥ बरंत अच्छरौ बर। भषंत गिवनी भरं ॥ छं० ॥ ४६७ ॥ लगंत लोह सो लर। अरिंम मत्त संमर ॥ छं० ॥ ४६८॥ .... (१) ए. कृ. को.-लच्छन । (४) को.-सत्ति । (२) ए कृ. को.-मंत्र। (५) ए. कृ. को-कटा कटी। (३) मो.-समूर । (६) मो.-सोलरं।

पचीसवां समय ६५] पृथ्वीराजरासो। ८२३ ॥ अरिल्ल ॥ आरिष्टन सम दिष्टन दिष्षिय । बौर चंद गह गह मुष भष्षिय ॥ यद भरि होन न परत सुबंध । बर भारथ बौर रस संधं ॥ छं० ॥ ४६६ ॥ गाथा ॥ उठुहि एक प्रमानो । धावंताय पंचयो सयनं वाहतं वर लोहं । साइनं देषयौ बोरं ॥ छं० ॥ ४७० ॥ रुधिर पत्र तसतयौ । दो मझ काय हक्कयौ सिरयं ॥ अति गति दुष्ट प्रकार । अगिनत होंइ बौर सम सेनं ॥ छं ॥ ४७१ ॥ अगनित गने न जानं। ई कोइ कोपि रुदयो सहसं॥ बर बौरार सुभट्ट । दावानलं पंगयौ बौर ॥ छं० ॥ ४७२ ॥ पृथ्वीराज की आज्ञा पाकर कन्ह का क्रुद्ध होकर झपटना। दूहा ॥ तव चहुआन सु कन्ह वर । ठट्टौ करि गुरुराज ॥ हुकम नपति छुट्टौति इम । जनु तौतर पर बाज ॥ छं० ॥ ४७३ ॥ कवित्त ॥ मुष छुट्टत नप बैन । नैन दिछौ धावंतौ क्रम बंध बल मोह । छोह बंध्यौ सु बरत्तौ ॥ सु बर सेन चहुआन । सिंग जदूनं 'नवाई ॥ जनुं मंदिर बिय बार । ढंकि इक बार बनाई ॥ तकसौर करन दोउ अंस बर । कित्ति मग्ग करतव्य कर ॥ अथवंत रविह आदित्य दिन । अगनि सार बुढिय कहर ॥ छं० ॥ ४७४॥ गाथा ॥ मुष छुट्टा नप बैनं । कै दिठ्ठाय धावता नैनं ॥ बज्जो वाहु सुबार । धारं ढारि मत्तयौ धरयं ॥ छं० ॥ ४७५ ॥ कन्ह का युद्ध वर्णन दूहा ॥ मत्त ढरहि संमुष भिरहि । स्वामि सनाह ससूर ॥ आज मुष्य चहुबान कन्ह । सिंधु सत्त को नूर ॥ छं० ॥ ४७६ ॥ गाथा ॥ सह सिद्धत नूर । कारूर करनयो नध्यौ ॥ एको अंग सुरंगो। दिष्य वा बौरयं बौरा। छं० ॥ ४७७ ॥ (३) मो.-मनु (१) को.-व्याहतं । (४) मो.-नमाई। (२) मो.-काम । (५) ए. कृ. को-मत्तयो।

८२४ 'पृथ्वीराजरामी। [पचीसवां समय ६६ धनयं लछि नरिंदं । तिहि संचिय सायरो नथ्थी॥ कलहंतं बल विषमं । जुषमं देहौय लज्जतौ सूरं ॥ छं० ॥ ४७८ ॥ कट्ठ लोह दुइष्ध्यं । सतं घरियाय बज्जयौ अंगं ॥ चावहिसि चतुरंगी । अनुरंगौ सेन सबाई ॥ छं० ॥ ४७६ ॥ दूहा ॥ अनुरंगी सेना 'सकल । सह सुरत विरुद्ध ॥ अबुध बुद्ध भारथ्थ में । दान मान सु 'प्रवद्ध ॥ छं० ॥ ४८० ॥ गाथा ॥ बर अथवंत सु दौहं । अझ विन जोतयं कलयं॥ घरिघट अघट नरिंदं । सा बुड्व बौर भद्रायं ॥ छं० ॥ ४८१ ॥ पृथ्वीराज के बीर सामंतों का प्रशंसा । मुरिल्ल ॥ बौरभद्र अरु रुद्र जलप्पिय । कहौ सत्त संकरषन थप्पिय ॥ तुम सकल कलित भारथ फिरि दिष्यौ। इन समान कोइ बौर विसष्यौ। छं० ॥४२॥ गाथा ॥ को दिठौ सम बोरं । सामंतं स्वामयौ क्रमयं ॥ ज्ञकं करन प्रमानं । अंगद कामेय रावनो "भिरयं ॥ छं० ॥ ४८३ ॥ चौपाई॥ राम काम अंगद अधिकारी । स्वामि काम सामंतव धारी। जिन हय गय तन तिन वर जान्यौ । सुमत धंम स्वामित्त पिछान्यौ। छं० ॥ ४८४॥ सुपति धम्म जिन तंत प्रमानिय । मुकति सुर्ग केवल सुनि बानिय ॥ घट्टिय घट्ट विघट्ट सुषंयो। सुपथ साथि आपथं सु मंद्यौ॥छ०॥४८॥ जिन छंडिय मंडिय क्रत धारिय । सार कट्टि हय तज्जि सु धारिय ॥ "परनि प्रहार सारतजि सारं। जड़ता तज्ज लगत तम तारं ॥ छं०॥४८६।। छंच विराज ॥ लगे बौर सारं । किर मत्त पारं। बहथ्थत धारं । अनुजा प्रहारं ॥ छं० ॥४८७॥ तुटै धार धारं । मनों श्रुत्त तारं ॥ अवित्तं विहारं। कलिंदी कहारं ॥ छं० ॥ ४८८ ॥ ॥ (१) ए. कृ. को.-सुबल । (३) मो.-नट्टी। (५) मो.-भरयं । (२) ए. कृ. को.-प्रबुद्ध । (४) को-मो.-कृतयं । (६) ए.-सुमति । (७) मो.-परति ।

पचीसवां समय ६७ ] पृथ्वीराजरासो। ८२५ ३ मनों नभम धारं । सु भारथ्थ सारं ॥ छं० ॥ ४८८ ॥ * चौपाई ॥ सार धार भारथ प्रहारं । मानहु दुत्तिय अंग बिहारं ।। धार तिथ्य के तिथ्थह राजं । जनक काम कामनि सिरताजं ॥ छं॥४१०॥ कवित्त ॥ बर अथवंत सु दौह । अभिभ 'लच्छिन जद्दव भर ॥ लोह धार लगि विषम । ईस लौनों ज शोश कर ॥ रह्यौ न तन दझझन सु मंस । पल चरन न पाइय ॥ अश्व शस्त्र पपर पलान । दुढंत नन पाइय ॥ बरि लियन बौर अंतर मिल्यौ। अच्छर सुच्छर ना लियौ ॥ मिलि गय सुभान सुत भान कौ। दिवदुंदुभिबज्जत बियौ ॥ छं०॥४६१। अगनि झार धर धार । सार वज्जी प्रहार असि ॥ कंक दिष्ट सिंघा सुरारि । भग्गौ नल गंभरि ॥ शस्त्र घात आघात । बथ्थ अन बध्थ सु लग्गा ॥ सुरत अंतरित सेत । मिले दूतो मन भग्गा ॥ सिरदार सैन नप है करिय । दोज धाव घन घुम्मि घट ॥ उबर्यो कन्ह प्रथिराज क्रम । झुझिक पुंज बंध्यौ सुभट ॥छ०॥४८२॥ इस युद्ध को देख कर देवताओं का प्रसन्न हो कर पुष्पवृष्टि करना। छंद भुजंगौ ॥ बजौ दुंदुभी आज आयास थानं। करेलोह लोहं सुलोकति गान। कहै चंद सूरं महाबौर पाई। परै पुप्फ बर विष्ट वज्जै विघाई।छ०॥४६३। सांझ हो गई परंतु कमधज्ज की अनी न मुड़ी। कवित्त ।। जौति लियौ जै पत्ति । चारु चतुरंग स मोरौ ॥ बर बंध्यौ नप पुंज । ढाल जद्दव न ढंढोरौ ॥ बर लच्छिन परि षेत । कन्ह चहुबान उपारिय ।। * मो.-प्रति में अरिल्ल । (२) मो.-प्रमान । (५) ए. कृ. को.-लोकेसु । (१) मो. लन। ३) मो. अत्सर। (६) मो०-लप्षिन । (४) मो.-सुत्सर । ६ ८२६ पृथ्वीराजरासो। [ पचीसबां समय ६८ घेत ढूंढि प्रथिराज । सुभत भोरी करि डारिय ॥ इतने सुभान अस्तमित भये । दोज सेन बर उत्तरिय ।। मुको न बग्ग कमधज्ज को । रोस राह विसरन भरिय ॥छं०॥४८४॥ बजी संझ घरियार । सार बज्यौ तन भंभर ॥ जनु कि बज्जि भननंक । ठनकि घन टोप स 'उच्चर ॥ अनल अग्गि सम जग्गि । जेन धज बंधि सलग्गा ॥ मनु द्रप्पन में बैठि । नेत बडवा नल जग्गा ॥ घन स्यांम पौत रत रंग बर । त्रिविध बौर गुन बर भरिय ॥ हर हार मंठि रुठ्ठि उमां । किम उतारि पच्छो धरिय ॥छं० ॥४८५॥ कमधज्ज का अपने बीरों को उत्साहित करना । छंद भुजंगौ ॥ भियौ राम रन बौर कमधज्ज बोरें। करो आज सर्व सुन्निबीर धौरं॥ गुहै माल ईशं न. जोग बौरं। निरं तंत प्रेतं धरं धौर होरं ॥ छं० ॥ ४६६ ॥ सब रन भूमि में तीन हाथ ऊँची लाशें पड़ गई। दूहा ॥ परि पथ्थर सथ्थर सुरन । गनक गर्ने नहिं जाइ ॥ हथ्थ तीन लुथ्थह चढ़ौ । मुरबौ मद्ध न माइ ॥ छं० ॥ ४६७ ॥ संझ सपत्त वपति बर । नव नव रस अरपंत ॥ बर प्रथिराज नरिंद दुति । सो ओपम कविकत ॥ छं० ॥ ४६८ ॥ तीन घड़ी रात्रि होजाने पर युद्ध बंद हुआ। कवित्त ॥ घरिय तीन निसि गइय । बार बर सुक्र सु आगम ॥ पंति परौ अरिजूह । बौर विंयौ अरि जागम ॥ कोट घलन सोभै । विसाल सामंत सूर थंभ ॥ जस देवल उप्पनौ । बौय गय गिरी सेत रंभ ॥ प्रथिराज देव दानव दलन । लच्छि रूप जद्दव कुँअरि ॥ नव रस विलास पूजा करहि। बर अच्छरि भइ पहुप सरि ॥छं०॥४६॥ (१) ए.-उब्बर । (२) ए०-सन्निवरि । (३) ए०-सद्ध ।

पचीमवां ममय ६९ ] पृथ्वीराजरासो। बाल रस ।। . पृथ्वीराज की सेना की समुद्र से उपमा वर्णन । श्रम सु अंग बिंटयो। सुधा २बिंटयौ जु. अमिय चंद बिटयौं। समुद बिंटयौ बडवा तस ॥ अरि के दिल विष उरग । मंत्र ससि वृत्त प्रेम भर ॥ लहि न सुद्धि सब बसन । आइ लग्गेति रोस भर ॥ बजि बौर बार दुज दल सघन । लाग निसानन नत्य पर ॥ प्रथिराज सेन बंधौ स अति । सु कविचंद उच्चारि बर॥छ ॥५०॥ युद्ध में नव रस वर्णन करना। भान कुंअरि शशिवृत्त । नैन शृंगार सुराजे॥ बौर रूप सामंत । रुद्र प्रथिराज बिराजै ॥ चंद अदभ्भुत जानि । भए कातर करुना मय ॥ बोभछ अरिन समूह । सात उप्पनौ मरन भय ॥ उप्पज्यौ हास अपरि अमर । भौ भयान. भावी बिगति ॥ कूरभराव प्रथिराज 'बर। लरन लोह चिंते तरनि ॥ छं० ॥ ५०१ ॥ राम रघुवंश का कहना कि जिस बीर ने युद्धरूपी काशी क्षेत्र में शरीर त्याग करके इस लोक में यश और अंत में ब्रह्म पद न पाया उसका जीवन वृथा है । कहै राम रघुबंस । सुनौ सामंत सूर तुम ॥ अमर नरन बंछहि सु । जुद्ध किन कथ्थ नरिद भम ॥ धार तिरथ बर आदि। तिथ्थ काशौ सम भज्जै असि वरुना तिन मध्य । लोह तेज सम गज्जै॥ सिव सिद्ध जोग सज्जै सकल । अकल अपूरब बत्त इह ॥ लभ्यो न बौर जिन ब्रह्म पद । छिनक मद्धि गति लमिभ इहाछं०॥५०२॥ गुरुराम का पृथ्वीराज को विष्णु पंजर कवच देना। पढ़ि सुमंत्र गुर राम । विष्णु पंजर सनाह दिय ॥ (१) मो.--वीट्यौ । (२) ए. कु. को.-छर ।

.८२८ पृथ्वीराजरासो। [पचीसवां समय ७० केस कंस मरदन्न । नंद नंदन लिलाट किय ॥ भोह भुअधर धरि समुह । नैंन निज्जिय नाराइन ॥ बदन दिन श्रीकृष्ण । हृदय थप्पौ मथुराइन ॥ कटि जंघ गुविंद रक्षा करन । चरन प्पि असरन सरन ॥ गुर इष्ट समरि प्रथिराज कौ । इह सुदिव रक्षा करन॥छं० ॥५०३॥ कमधज्ज और जद्दव की मृत फौज की शोभा वर्णन । दूहा । परि पारस जद्दव सयन । मिलि कमधज्ज प्रमान ॥ घट बिय ग्रह मनु नछित लै । 'पंति सु मंडिय भान ॥ छं० ॥५०४॥ किन किन बीरों का मुकाबला हुआ। छंद चोटक ॥ परि पारस पंग नरिंद घनं । मनो भान सुमेर कि पंति बनं ॥ धन सद्द सुरंग निसान धुनं । मनों बज्जत दुंदुभि देव तनं ॥ ५०५॥ चव दून निसान सुकन्द धनौ । जु कियौ सिरदार मु पंग अनी ॥ दिसि पच्छिम बालुकराय अर्यो । तिनके मुख कन् पजून लौ॥ छं० ॥ ५०६॥ हुच ईस दिसान दिसा टप मान । तिन के मुष भौरन भाटिय भांन॥ दिसि पूरब भौ पुरसान धार । तिन के मुष मंडि सलष्ष पवार ॥ छं० ॥ ५०७॥ अगिनेव दिसा वन सिंघ अचाइ। तिन के मुष मंडिय निढ्दुर राय॥ दिसा जम लच्छिन बंधिय फौज । तिन के मुष चामँड दाहर कौज॥ छं० ॥ ५०८॥ सुनै रति छत्र उठ्यौ कर बौर । तिन के मुष मंडिय चंद पुंडोर ॥ जुबायु दिशा दिशि इंद्रयपाल । तिने मुष भौम भिरे रिनमाल ॥ छं० ॥ ५०६॥ 'सु उत्तर दै प्रभु पंग कुँबार । तिने रघुवंस वजावत सार॥ बढे गुर जंबुर हथ्थह नार । मनौं गज भद्दव को उनिहार ॥ छं० ॥ ५१० ॥ (१) ए.०--पत्ति । ( २, ३) पंक्ति मो.-प्रति में नहीं है । (४) ए, कृ.को.-हथं हथ । ।

पचीसवां समय ७१ ] पृथ्वीराजरासो। દરદ छुट्टै गुरजं बवियानन सें । पह तें पलटे मनों तारक में ॥ पति वंधि सनाह सयान करें। अरि के मुष सामत सूर लरें ॥ छं०॥ ५११॥ रात्रि व्यतीत हुई और प्रातःकाल हुआ। भये प्रात अगंतय सूर परे । तिन के लरतें ब्रह्मण्ड डर ॥ गय सब निशा पहु फट्टि ननं । दोउ संगम अंग विचंग घनं ॥ छं०॥ ५१२॥ प्रिय प्रातक सौत चलै मधुरं । निशि लोय उसास निसास डरं ।। बर तोरत तारक भूषन सो । मुष मंदि कमोदनि ना बिगसो ॥ छं० ॥ ५१३ ॥ पहु फट्टिय बौर प्रमांन नषै। रवि 'रत्त सुतत्त वियोग लषै ॥ जु भई गति सिथथल ता सगरौ । सर छिप्पन केलि कला निसरी ॥ छं० ॥ ५१४॥ बजि दुंदुभि देव निसान धुआं । प्रगटे सत पत्र सुरंग हुअं॥ बर रंग जवा सन जोति फिरौ। घन देहि असौस चकौ चतुरी ॥ छं० ॥ ५१५॥ घन रोर चकोर कमोद भगे। जु गए दुरि चोर सु देव जगे ॥ जमुना हुलसौ जमराज हंस्यौ । जु गयौ तिमरं भजि तेज सज्यौ ।। छं० ॥ ५१६ ॥ बर इंद अनंदिय चंद कह्यौ । जु सज्यौ रथ उंच अरुन्न गह्यौ ॥ सु चल्यौ चक्र एकहु चक्र कह्यौ । सु गयौ कमलं कर को अकरयौ ॥ छं० ॥ ५१७॥ बर उदग नौर पवन उर्छ । जु चले सब कंमज जग्गि गर्छ । जु भयौ धन धंम मिटी वनिता । वल जाप अजाप न सो जपता ॥ छं०॥ ५१८॥ गाथा ॥ गई सर्बरौ सु संबै । फट्टी पहुवँ नठुयौ तिमिरं॥ तम चूरन प्रति किरनं । तरुनं विराइ तरुनयो रचयं ॥ छं० ॥ ५१६ ॥ (१) को.-वृत्त । (२) को.-वटि । (३) ए.-जवासनि ।

पृथ्वीराजराहो। [ पचीसवां समय ७२ प्रातःकाल होते ही घोड़ों ने ठी लगाई, शूरवीरों ने तयारी की और दोनों तरफ के फौजी निशान उठे। कवित्त ॥ 'सुफट किरनि पहु बौर । परिय आरनि निसा गय ॥ उभय षट्ट प्रगटीय । हक बोलत हयनि हय ॥ तिमिर तेज भंजन। प्रमान कमधज्ज नरिंदह ॥ मांन तुंग चहुबान । जग्य जंपिय कवि चंदह ॥ नव ग्रह नवम्मिय नव निसा । नव निसान दिशि मान धुरि ॥ सामंत सूर भुज उप्परै। रहसि राज प्रथिराज फिरि ॥ छं० ॥५२० ॥ शूरवीरों के पराक्रम से और सूर्य से उपमा वर्णन। गाथा ॥ सुघटं किरनं बोरं । पारस मिसह सेन कमधज्जं ॥ उदयं अस्तमि भानो । मेर पच्छि दच्छिनो फिरयं ॥ छं० ॥५२१॥ दूहा ॥ दष्पिन पत्त सुमेर फिरि । यो पारस पहु पंग ॥ सार धार धारह मिले। सुबर बौर प्रति अंग ॥ छं० ॥ ५२२ ॥ चौपाई॥ सार धार प्राहार प्रकार । मनौं मत्त घन पंति विभार ॥ उठे बौर सत्तों विरभाइ। भान पयान न मत्त सुचाइ॥ छं०॥५२३॥ पृथ्वीराज का शुद्ध हो कर विष्णुपंजर कवच को धारण करना। गाथा ॥ ग्रह सुद्धा प्रथिराजं । अष्ट ग्रहं बंकमो विषयं ॥ विष्णुं बौर सुधारं । पंजर भंजे राजयो अंगं ॥ छं० ॥ ५२४ ॥ उस पंजर में यह गुण था कि हजार शस्त्र प्रहार होने पर भी शस्त्र नहीं लगता था। दूहा ॥ सा पंजर दिय राज बर । सस्त्र लगै नहिं चाइ ॥ कोटि अंग घावह घने । भुज प्रमान सो पाइ॥ छं० ॥ ५२५॥ बैकुंठ बासी विष्णु भगवान पृथ्वीराज की रक्षा पर थे। गाथा ॥ बैकुंठह बर वासी । सासौ गहनाय गिरन सा धरियं ॥ सो रक्षा चहुअानं । अनरव्या मंत्रयो धरयं ॥ छं० ॥ ५२६ ॥ (१) ए. कृ. को. भट।

पचीसवां समय ७३ ] पृथ्वीराजरासो। ८३१ इधर से पृथ्वीराज उधर से कमधज्ज की सेना की तैयारी होना। दूहा ॥ बज्जि राग चौहान भर । उत कमधज्ज नरिंद ॥ सार धार बज्जिय विषम । कहि ब्रनन कविचंद ॥ छं० ॥ ५२७ ॥ आगे यादवराय की सेना तिस पीछे कमधज्ज की सेना, तिस के पीछे हाथियों की कतार देकर रूमी और अरबी, का सेना सज कर युद्ध के लिये चलना । छंद चोटक ॥ मुर तीन फवज्ज सु बंध थपौ। अग जद्दव राइ नरिंद रूपो॥ तिन पच्छ सु बौर सुरंग अनौ। बिच बंधिय हथ्थिय पंति घनी ॥ छं० ॥ ५२८ ॥ बर हब्बसि किन्नर रूमि बिचै। भननंकत पाइक पंति नचै॥ तिन सौर सुगंध बिछाइ घनं । बहु जुभम कपट्टिय मंडि डनं ॥ छं० ॥ ५२९ ॥ हय उच्छरि षेह अयास लगी। नव तुट्टि 'तिनं बनि बारि भगी। अरची सरसोरुह संकुचिता। चकई चक मूकति चूक तता ॥ छ० ॥ ५३० ॥ पवनं गवनं नन पंष वहै। नव नेज धजा धज लग्गि रहै ॥ फन फूंक फनं पति को बिसरी। मुदरी दिग अठ्ठ दृगं धुंधरौ ॥ छं० ॥ ५३१ ॥ घन बज्जत घंट सघंट घनं । नव नोरथ नारि निभंग मनं ॥ ढलकै गज ढाल सुनेज बनं । चमकै बल के मन चौज मनं ॥ छं० ॥ ५३२ ॥ १) मो. नितम्बनि । (२) ए.-कृ. को.-संकुरित, संकरित । (३) मो.-धन । ( ४ ) मो.--चमकें बल के यमकें जमनं । ४ ।

पृथ्वीराजरासो। [पचीसवां समय ७४ तिन को उपमा कविचंद करो। मनों मेघ महेंद्रव बीज झरौ ॥ घन मन्त्रिय नह बिबंक सुरं। सुभिहै बिब हथ्थ धजा विथुरं ॥ छं० ॥ ५३३ ॥ गज नद्द जंजीरन के घुरयं । मनों बंधिय भिंगुर सा सुरयं ॥ तिन के कछु दान कपोल भरे। सु मना नभ के वरसे बदरे ॥ छं० ॥ ५३४ ॥ बजि लाग निसान धर्मक सजौं। सहनाइन सिधुंअ राग बजौ ॥ नव नारद सारद ते किलकै । नब बंदि बिरद्द नदे हलकै ॥ छं० ॥ ५३५ ॥ घन देषि अरिष्ट सुबाल डरौ । मुदरौ नव आनद चित्त हरी ॥ कमधज्ज कला चढ़ती बर पेषि । मुंदरौ ससिवृत्त दइ 'शशि लेखि ॥ छं० ॥ ५३६ ॥ सेना की सजावट की शोभा वर्णन और उसे देख कर भूत वेताल योगिनी आदि का प्रसन्न हो कर नाचना । निसाणौ ॥ फौज रचौ तिन दोय घन मध्य मसंदा । जालिम जोध जुवान सेर रस बौर रजिंदा ॥ अग्गै उम्भा अप्प आइ जादव्व नरिंदा । मनौ उभ्भै मेर के अड्डी अग डंदा ॥ छं० ॥ ५३७ ॥ पौछ ठाढ़े राठ बड़ बल जे विचरंदा । जानकि उत्तर उन्नया घन लोह सहंदा ॥ पाइक पंति अपार वर जनु मोर नचंदा । बाग गहिग्गहि बाज कौन रन बौर नषंदा ॥ छं० ॥ ५३८ ॥ (१) ए. कृ. को.--गति । (२) मो.-पेषि ।

--indiamara-e- सूचना । ... .... ཇ ... ... ... निम्न लिखित पुस्तकें “सेक्रेटरी नागरीप्रचारिणी सभा, बनारस सिटी" को लिखने से मिल सकती हैं। मूल्य डांक व्यय मलिक मुहम्मद की अखरावट कविवर बिहारीलाल-(बाबू राधाकृष्णदास रचित.) गद्यकाव्यमीमांसा-(पण्डित अम्बिकादत्त व्यास रचित) हिन्दी भाषा के सामायिक पत्रों का इतिहास ( बाबू राधाकृष्ण दास रचित) समालोचना-(पण्डित गंगाप्रसाद अग्निहोत्री द्वारा अनुवादित) समालोचनादर्श--पद्य-(बाबू जगन्नाथ दास रचित) कर्तव्याकर्तव्यशास्त्र- ( पण्डित नारायण पांडे रचित) विसूचिका चिकित्सा ॥ हरिश्चन्द्र-पद्य-(बाबू जगन्नाथ दास रचित) भगवद्गीता-(वाबू गदाधरसिंह द्वारा अनुवादित ) उथेलो-(बाबू गदाधरसिंह द्वारा अनुवादित) नागरीप्रचारिणी पत्रिका ( सभा द्वारा सम्पादित ) १० भाग छप चुके हैं ( आठवां भाग नहीं है) मूल्य- -प्रति हिन्दी लेकचर-(बाबू हरिश्चन्द्र रचित) ध्रुवदास की भक्तनामावली, टिप्पणी सहित सदलमिश्र की चन्द्रावती सूदन कवि का सुजानचरित्र ... लाल कवि का छत्रप्रकाश १० नन्ददास की रास्लपञ्चाध्यायी.. प्राचीन-लेख-मणि-माला-१ भाग ( बाबू श्यामसुन्दर दास लिखित ) १] अशोक का जीवनचरित्र ( ठाकुर सूर्यकुमार वर्मा लिखित) नेपाल का इतिहास (पण्डित नारायण पांडे लिखित) पृथ्वीराजरासो-पहिला भाग ( समय १-११) समय १२-२५ कुमारसम्भवसार (पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा अनुवादित) श्रीधर का जंगनामा धम्मपद ( ठाकुर सूर्यकुमार वर्मा लिखित ) भाग ... ... .. ... 1-) ... .. རྡ རྡ ༽རྡ་དོn、ཇ༽ རྡ རྡ ད ད ད ... ...

(... २. ) ... རྡ རྡོ ॥ ... A ... सभा के पुस्तकालय की सूची... मनोविज्ञान ( पण्डित गणपत जानकी राम दूबे लिखित) चंद्रशेषर का हम्मीर हठ महिला मृदुवाणी (मुंशी देवीप्रसाद लिखित) वैज्ञानिक कोश ( बाबू श्यामसुन्दर दास सम्पादित ) ३) दादू दयाल की बानी -) कवि नूरमुहम्मद की इन्द्रावती १ भाग १) वनिताविनोद नवीन दृष्टि में प्रवीन भारत गीतावली योगदर्शन गुरुगीता ।) বিমানৰ नोट-ऊपर लिखी पुस्तकों में से अन्त की ६ पुस्तकों को छोड़कर शेष पुस्तकें श्राधे मूल्य पर काशी नागरीप्रचारिणी सभा के सभासदों को मिल सकती हैं। अन्तिम पुस्तक का मूल्य सभासदों के लिये ६) रु. है। ... R 2227 DHI ... ... ।

Nagari Pracharini Granthamala Series No. 4-8

Author
Chand Baradai
Title
Nagari Pracharini Granthamala Series No. 4-8
File name
Nagari Pracharini Granthamala Series No. 4-8
Text
OCR done
Citation
1906
Published
2004/20/11
Publisher
Nagar Pracharini Sabha, Delhi
Language
Sanskrit
Pages
132
Library
Hindustani Academy, Allahabad
Classification
Literature
DLI number
383055
Barcode
5990010042546.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
Rights
Not Available
VMLT id
mntYceUb2B6
Download PDF

Nagari Pracharini Granthamala Series No. 4-8