Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Vichar-mat

Jaikumar · 2011/02

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11॥ पन्द श्रीगुन तारणम् MARA मल ययाग श्री १००८ श्री तारण तरण मनालामा विरचित Tr खरतरगयो JERKायामशालाया विचार- [ पंडित पूजा, माला रोहए, कमल बत्तीसी ] पानुवादक- समाज रत्न श्रीमान पृज्यकर पडित, ब्रह्मचारी जयबुमारजी यायायायायायायालयययययययययययययययय श्रीमान् दानवीर, मवाई सिंबई हीरालाल नोखेलालजी सिंघोड़ी (बिन्दवाड़ा) प्रथमवार श्री तारण म. ४२३ । सदविचार DI

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निवेदन- समाज में भ्रमण करने के कारण समय न मिलने से हम इस प्रथ का विशेप मशोधनादि कार्य पिलकुल न अतएन बहुतसी त्रुटियों का होना समर है। मके। पाठकों से क्षमा प्रार्थना करते हुये, निवेदन करते है कि इस में हमारी अल्पज्ञता वश जो भी त्रुटिया हों सुधार कर अनुगृहीत करें। -० जय

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in वन्दे श्री गुर तारणम् ॥
श्री १००८ श्री परम गुरु तारण तरणाचार्य विरचित -
पंडित-पूजा
, मंगलाचरण
ओंकारस्य उर्वस्य, उर्द्ध सद्भाव शाश्वत ।
विन्दस्थानेन तिष्ठन्ति, ज्ञान मयं शाश्वत ध्रुवं ॥१॥
शुद्धातम का प्रबोध कर्ता,
ओ पद ब्रह्माक्षर गाया।
वह पद शुद्ध ऊर्ध्व गामी का,
शिवपुर ठाम अचल गाया ॥
विन्दस्थान कहें उसको ही,
वहीं रहे यह चेतनराय ।
जिनकी ज्ञानमयी शुभ संपद,
अक्षय रूप रही निजमाय ॥१॥

ESS जत विचारमत-(पंडित पूजा) २ * शुद्धात्मा को नमस्कार * 12 नय निश्चय जानन्ते, शुद्ध तत्व विधीयते । ममात्मा गुणं शुद्धं, नमस्कारं शाश्वतं ध्रुवं ॥२॥ शा जो नर निश्चय नय को जाने, वही तत्व को पहिचाने । निज आतम ही शुद्ध गुणोंकर, युक्त यही निश्चय माने । शा ऐसे शुद्ध निजातम को, निज अनुभव में लावो प्राणी। वही शाश्वता रूप अटल है, नमस्कार करते जानी ॥२॥ है है SS

4.
विचारमत-(कमल-बत्तीसी)
ॐ परम इष्ट *
इष्ट च परम इष्ट,
इप्ट अन्मोय विक्त अनिष्ट
पर परजाव विलिय
ज्ञान सहावेन कम जिनय च
परमोत्कृष्ट इष्ट सुख मय,
परमातम पद अनुभव करन
अनिष्ट पर पर्जाय त्याग निज,
ज्ञान सम्पदा दृढ धरना
सिद्धि संपदा मिलती ऐसे,
भावो से निश्चय धरना
श्री जिन तारण तरण गुरू का,

विचारसत - (पंडित पूजा)
४
* ह्रींकार - पूजा *
ह्रींकार ज्ञान उत्पन्नं, उवकारं च वन्द्यते ।
अहं सर्वज्ञ उक्तं च, अचक्षु दर्शन दृश्यते ॥४॥
ह्रीपद से चौवीसों जिनवर,
अनुभव में आजाते हैं।
ओंकार से शुद्ध रूप वा,
पंच परम पद भाते हैं।
नमस्कार है शुद्ध रूप को,
जो जिनवर ने गाया है।
चर्म चक्षु से नहिं दीखे जो,
अचक्षु मनमें भाया है ॥४॥

विचारमत-(पडित पूजा)
* ज्ञान-पूजा *
मति श्रुतस्य सम्पूर्ण, ज्ञान पच मय ध्रुव ।
पडितो सोऽपि जानन्ते, ज्ञान शास्त्र सपूज्यते ॥ ५॥
मति श्रुत अवधि ज्ञान मनपर्जय,
केवल ज्ञान अचल जो हैं।
पंडित जन इन ज्ञानों को,
निज अनुभव में जाने शोमैं॥
यही ज्ञान मय शास्त्र जिनेश्वर,
वाणी की पूजा कहिये।
इस सम्यक् पूजा को निशदिन,
भविजन तुम करते रहिए ॥५॥

SSSS
विचारमत-(पंडित पूजा)
* देव - शास्त्र -गुरु-पूजा *
ऊवं हियं श्रियंकारं, दर्शनं च ज्ञानं ध्रुवं ।
देवं श्रुतं गुरुं चरणं, धर्म सद्भाव शाश्वतं ॥६॥
ऊनकार ह्रींकार तथा श्रींकार,
यही पद उत्तम है।
सम्यग्दर्शन तथा अटल निज,
सम्यग्ज्ञान
सदुत्तम है ॥
सच्चे देव शास्त्र गुरु के,
चरणों में निशदिन ही रहना।
सच्चे शाश्वत दयामयी,
जिन धर्म मार्ग को ही गहना ॥६॥

विचारमत-(पडित पूजा)
* पडित कैसे हों? *
वीर्य अकुरणं शुद्ध, त्रैलोक लोकित ध्रुव ।
रतत्रय मय शुद्ध, पण्डितो गुण पूज्यते ॥७॥
आत्म शक्ति का शुद्ध वीर्य,
जिनने निजमें अंकुरित किया।
तीन लोक को देखा उनने,
रहा नहीं संकुचित हिया ॥
रत्नत्रय से शुद्ध होय जो,
पण्डित जन गुण के सागर ।
वही पूज्य गुण युक्त कहावे,
जाय शीघ्र शिव वनिता घर ॥ ७॥

955SSES विचारमत -(पंडित पूजा) *ज्ञान स्नान देवं श्रुतं गुरुं वन्दे, धर्म शुद्धं च वन्द्यते । ति अर्थ अर्थ लोकं च, स्नानं च शुद्धं जलं ॥८॥ " देव शास्त्र गुरु को वन्दू मैं, तथा धर्म को नमन करूं। सम्यग्दर्शन ज्ञान चरित यह, तीन अर्थ नित मनन करूं ॥ यही शुद्ध जल है जिसमें, नित न्हवन करो भविजन ज्ञानी । तब होगा संसार पार यह- ही हमने निश्चय जानी ॥८॥ .

विचारमत-(पडित पूजा)
8
* ज्ञान-स्नान *
चेतना लक्षणो धर्मों, चेतयति सदा सुधै ।
ध्यानस्य जल शुद्ध, ज्ञान स्नान पडित ॥६॥
चेतन के लक्षण कर मंडित,
शुद्ध धर्म को कहते हैं।
जिससे नितही बुद्धिमान जन,
सावधान सब रहते हैं।
शुद्ध ध्यान मय जल पवित्र है,
ज्ञानीजन स्नान करो।
जिससे यह संसार भवोदधि,
मांहि सेति तुम शीघ्र तरो॥६॥

मुन्न विचारमत- (पंडित पूजा) १० ६. ज्ञान - स्नान के शुद्ध तत्वं च वेदन्ते, त्रिभुवनं ज्ञानेश्वरम् । ज्ञानं मयं जलं शुद्धं, स्नानं ज्ञान पण्डितः ॥१०॥ शुद्ध तत्व को जाना उनने, जो त्रिभुवन के ईश हुये। ज्ञान मयी जल में स्नान कर, वे प्रभुवर शुभ शुद्ध हुये ॥ शुद्ध ज्ञान मय जल पवित्र है, ज्ञानीजन स्नान करो। जिससे यह संसार भवोदधि, मांहि सेति तुम शीघ्र तरो॥१०॥ 7

विचारमत-(पडित पृजा)
* ज्ञान - सरोवर *
सम्यक्त्वस्य जल शुद्ध, सम्पूर्ण सर पृरित ।
'स्नानं पिवति गणधरणं, बान शरणंत ध्रुव ॥११॥
सम्यक्दर्शन जल पवित्र,
सम्पूर्ण रूप से रस पूरित।
जिस निज आतम सरवर मे,
है भरा स्वाद रस मय पूरित ॥
गणधर देवो ने उस जल में,
न्हवन किया वा पान किया।
उस जल का ही शरण गहो,
तुम जो चाहो मतोष लिया ॥११॥

विचारमत -( पंडित पूजा) है * ज्ञान-स्नान * शुद्धात्मा चेतना नित्यं, शुद्ध दृष्टि समं ध्रुवं । शुद्ध भाव स्थिरी भूतं, ज्ञानं स्नान पण्डितः।।१२।। K शुद्ध आतमा का चिन्तन कर, शुद्ध दृष्टि निज में करलो। शुद्ध भावसे स्थिर होकर, ज्ञान जलधि निजमें भरलो॥ शुद्ध ज्ञान मय जल पवित्र है, ज्ञानी जन स्नान करो। जिससे यह संसार भवोदधि, मांहि सेति तुम शीघ्र तरो ॥१२॥ SSSSSSSSS

विचारमत-(पडित पूजा)
१३
* आत्म देव का प्रक्षालन *
प्रक्षालितं प्रति मिथ्यातं, शल्य त्रयं निकंदनं ।
कुजान राग दोप च, प्रक्षालितं असुह भावना ॥१३॥
निज आतम से धो डालो
मिथ्यात शल्य त्रय हे ज्ञाता।
खोटा ज्ञान अरु राग द्वेप को,
तथा भावना दुख दाता ।।
शुद्ध ज्ञान मय जल पवित्र है,
ज्ञानीजन स्नान करो।
जिससे यह संसार भवोदधि,
मांहि सेति तुम शीघ्र तरो ॥१३॥

विचारमत - (पंडित पूजा) १४ '* आत्मदेव का प्रक्षालन * कपायं चत्रु अनंतानं, पुण्य पाप प्रक्षालितं । प्रक्षालितं कर्म दुष्टं च, ज्ञानं स्नान पंडितः ॥१४॥ XX चार चौकड़ी कषाय की है, तथा पुण्य वा पापों को। प्रक्षालन कर शुद्ध होय, फिर दूर करो संतापों को॥ La प्रक्षालन कर दुष्ट कर्म को, ज्ञान 'मयी स्नान करो। जिससे यह संसार भवोदधि, मांहि सेति तुम शीघ्र तरो ॥१४॥ -

विचारमन-(पडित पूजा)
* निश्चय नय के वस्त्र *
प्रक्षालितं मन चपल, त्रिनिधि कर्म प्रचालित।
पंडितो वस्त्र मयुक्त, आभरण भूषणं क्रियते ॥१५॥
अति चंचल मर्कट सम जो मन,
उसे शुद्ध प्रक्षालन कर।
द्रव्य कर्म, नो कर्म, भाव मय,
कर्म, इन्हें प्रक्षालन कर ॥
,
।
अव आभूपण वस्त्र तुम्हें,
कैसे धारण करना चाहिये ।
यह गुरु सीख सुनो हे पाणी,
भव समुद्र तरना चाहिये ॥ १५ ॥

विचारमत-(पंडित पूजा)
१६
* निश्चय नय के वस्त्राभरण *
181
17
वस्त्रं च धर्म सद्भावं, आभरणं रत्नत्रयं ।
मुद्रिका सम मुद्रस्य, मुकुटं ज्ञान मयं ध्रुवं ।। १६ ॥
दश लक्षण जो धर्म बताये,
उनके वस्त्र बना पहरो।
तीन रतन के गहने गढ़कर ,
उनको प्रीति सहित पहरो॥
-
निज मुद्रा को शांत बनालो,
यही जानलो शुभ मुंदरी।
ज्ञान मुकुट को धारण करके,
बरलाओ तुम शिव सुन्दरी ॥ १६ ॥

विचारमत-(पडित पूजा)
* आत्म-दर्शन *
दृष्टित शुद्ध दृष्टि च, मिथ्या दृष्टि च तिक्तय।
असत्य अनृत न दृष्टन्ते, अचेत दृष्टि न दीयते ॥१७॥
जिनने देखी शुद्ध दृष्टि को,
मिथ्य दृष्टि का त्याग किया।
असत्य मिथ्या न देख करके,
शुद्ध रूप पर ध्यान दिया।
अचेत कहिये जड़ स्वरूप जो,
वस्तु कोई भी हो जग में।
सम्यक्वन्त जीव है सोई,
दृष्टि न देवे उस मग में ॥१७॥

विचारमत-(पंडित पूजा) * आत्मदर्शन * दृष्टितं शुद्ध समयं च, सम्यक्त्वं शुद्धं ध्रुवं । ज्ञानं मयं च सम्पूर्ण, महल दृष्टि सदा वुः ॥१८॥ जिसने देखा शुद्ध समय को, अटल शुद्ध सम्यक्त्व वही। ज्ञानमयी है पूर्ण वही है, विज्ञ वही शुभ दृष्टि वही ॥ शुद्ध समय का अर्थ यही है, आतम तत्व चेतनासार। इसको ध्यावो और छोड़दो, सबही आडम्बर व्यवहार ॥१८॥ ଆ

विचारमत- (पंडित पूजा)
% २५ दोपै त्याग *
लोक मूढ़ न दृष्टन्ते, देव पासंडि न दृष्टते ।
अनायतन मदाट च, शफा अष्ट न हटते ॥ १६ ॥
-
इस गाथा मे समकित के,
पच्चिस दोपो का नाम कहा।
तीन मूढ़ता अनायतन पट्,
अष्ट मदो का नाम कहा ॥
शंकादिक आठों दोपों को,
सम्यग्दृष्टि न धरते हैं।
ऐसे इन पच्चिस दोपों से,
भव्यजीव ही डरते हैं ॥१६॥

CE
-
विचारमत-(पंडित पूजा)
* आत्म दर्शन *
दृष्टितं शुद्ध पदं सार्ध, दर्शनं मलं विमुक्तयं ।
ज्ञानं मयं शुद्ध सम्यक्त्वं, पण्डितो दृष्टि सदा बुधः ॥२०॥
उपर्युक्त पच्चिस मल से जो,
रहित आत्म पद का श्रद्धान ।
वही ज्ञानमय शुद्ध कहा,
सम्यक्त्व नाम ताका अभिराम ॥
बुद्धिवान पण्डित पुरुषों की,
दृष्टि उसी पर रहती है।
वही दृष्टि तुमभी करलो भवि,
यह जिनवाणी कहती है ॥२०॥

विचारमत-(पडित पूजा)
* आत्मदर्शी-पुरुष *
वेदकामस्थिरश्चैव, वेदन्ति निग्रंथ ध्रुवम् ।
त्रैलोक्य समय शुद्धं, वेद वेदान्त पण्डित ॥२१॥
ज्ञातायों मे अग्र बुद्धि,
निग्रंथ दिगम्बर ने जाना।
तीन लोक मे सार समय जो,
शुद्ध रूप हैं सुख थाना ॥
वेद और वेदान्तों में सब,
पण्डित जन यों कहते हैं।
सार समय सम्यक्त्व और,
सब झूठा झगड़ा करते हैं ॥२१॥

विचारमत-(पंडित पूजा)
२२
* निश्चय पंडित पूजा
उच्चरणं ऊर्ध शुद्धंच, शुद्ध तत्वंच भावना ।
पण्डितो पूज्य आराध्यं, जिन समयंच पूजितं ॥२२॥
-
उच्चारण अरु शुद्ध भावना,
शुद्ध तत्व को ही धरना।
यही पूज्य की पूजा अरु,
अाराधन निशदिन ही करना ।
है
जिन जीवों को ऐसा यह,
जिनवर का आराधन भाया।
उनने श्री जिनवर को मानो,
साक्षात में ही पाया ॥२२॥

विचारमत-(पडित पूजा)
२३
* निश्चय पूजा *
पूजित च जिन उक्त, पंडितो पृजितो सदा ।
पृजितं शुद्ध माघ च, मुक्ति गमन च कारणम् ॥२३॥
जिनवर ने जो कहा शुद्ध,
पूजा पंडित जन नित्य करें।
इस पूजा
पूजक जन भी,
निज शिव लक्ष्मी को प्राप्त करें।
से
इसही पूजा को तुम धारो,
निज स्वरूप का ज्ञान करो।
छोड़ो जड़ पूजा को प्रियवर,
निश्चय मे शिव गमन करो ॥२३॥

SSE
विचारमत - (पंडित पूजा)
२४
* संसार वर्दक जड़ पूजा निषेध *
प्रदेवं अज्ञान मूढंच. अंगुरु अपूज्य पूजितं ।
मिथ्यात्वं सकल जानन्ते, पूजा संसार भाजनं ॥२४॥
अज्ञानी अति मूढ मनुज ही,
अगुरु अदेवों को पूजे।
यह मिथ्यात्व अनादी से ही,.
जग कारण सबको सूझे ॥
जिसमें नहीं देव गुरु का,
लक्षण किंचित पाया जाता ।
वह अदेव अरु अगुरू कहा है,
यही भाव की यह गाथा ॥२४॥

विचारमत-(पडित पूजा)
२५
पंडित पूजा *
तेनाह पूज शुद्धच, शुद्ध तत्त प्रकाशकं ।
पडिनो वदना पूजा, मुक्ति गमन न सशय ॥२५॥
तत्व प्रकाशक पूजा की यह
कथनी इसी लिये की है।
पण्डित जन हो । पूजो, वंदो,
पूजा की यह रीती है ॥
इस पूजा से मोक्ष प्राप्त हो,
इसमें नहिं संशय लाना।
भूल न जाना भव्यजीव,
सव शिव मारग को ही जाना ॥२५॥

विचारमत - (पंडित पूजा) २६ * पूज्य पूजक कैसे हो * प्रति इन्द्रं प्रति पूर्णस्य, शुद्धात्मा शुद्ध भावना । शुद्धार्थ शुद्ध समयं च, प्रति इन्द्र शुद्ध दृष्टितं ॥२६॥ XXXXX शुद्धात्मा की शुद्ध भावना, i ACCIA तथा उक्त वस्त्राभूषण । धारण कर तुम इन्द्र सदृश हो, गुण धारो त्यागो दूषण ॥ श्री शुद्ध अर्थ जो शुद्ध समय है, उसकी पूजन तुम करना। तब ही शुद्ध इन्द्र सम हो, तुम यह निश्चय मनमें धरना ॥२६॥ SSSB

विचारमत-(पडित पूजा)
२७
* पूजक के गुण *
दातारो दान शुद्ध च, पूजा आचरण सयुक्त ।
शुद्ध सम्यक्त्व हदययस्य, स्थिरं शुभावना ॥२७॥
पूजा शुद्धाचरण आदि से,
जो दाता अति शुद्ध हुआ।
तथा दान भी शुद्ध और,
सम्यक्त्व हृदय में पूर्ण हुआ ॥
शुद्ध भावना स्थिर मनसे,
सत्पात्रों में दान करो।
मोक्षमार्ग का कारण है वह,
यह मनमें श्रद्धान धरो ॥२७॥

GSSSSS SSC जन % 3D - m विचारमत- (पंडित पूजा) २८ * सच्चे पूज्य पूजक * शुद्ध दृष्टी च दृष्टंते, साधे ज्ञान मयं ध्रुवं । शुद्ध तत्वं च आराध्यं, वंदना पूजा विधीयते ॥२८॥ X शा ज्ञानमयी जो शुद्ध दृष्टि है, यह पूजा वे ही करते। शुद्ध तत्व का आराधन भी, निज मनमें वे ही धरते ॥ इस पूजा से मोक्ष प्राप्त हो, इसमें नहिं संशय लाना। भूल न जाना भव्यजीव सब, शिव मारग में ही जाना ॥२८॥ SSES

विचारमत-(पडित पूजा)
* पंडित पूजा का प्रमाण *
संघस्य चत्रु सघस्य, भावना शुद्धात्मनं ।
समव शरणस्य शुद्धस्य जिन उक्त साधं गुव ॥२६॥
समव शरण बारह कोठा में,
चार संघ के मध्य वहां ।
जिनवर ने उपदेश दिया था,
असंख्यात थे जीव तहां ॥
शुद्धात्मा को भावो जीवो ।
सदा भावना निज मनमें ।
होगा भव भय दुःख दूर यह,
-सुन हाये सव क्षण में ॥२६॥

विचारमत-(पंडित पूजा)
* व्यवहार श्रद्धा *
सार्द्ध च सप्त तत्वानं, द्रव्यकाया पदार्थकं ।
चेतना शुद्ध ध्रुवं निश्चय, उक्तंति केवलं जिनं ॥३०॥
सप्त तत्व नव पदार्थ वा,
षट द्रव्यों का श्रद्धान करो।
निज स्वरूप का निश्चय करके,
शिव नगरी को गमन करो।
यह उपदेश जिनेश्वर का है,
इसको धारो हे प्राणी।
होगा भव भय दूर सभी का,
बन जाना दृढ़ श्रद्धानी ॥३०॥

विचारमत (पडित पूजा)
३१
*य उपादेय शिक्षा
मिथ्या तिक्त तृतीय च, कुजानं प्रति तिक्तयं ।
शुद्व भार शुद्ध समय, साधं भव्य लोकय ॥३१॥
मिथ्या प्रकृति तीन अरु तीनों,
कुज्ञानो का त्याग करो।
शुद्ध भाव से शुद्ध समय का,
भव्यजीव श्रद्धान करो॥
यह उपदेश जिनेश्वर का है,
इसको धारो हे प्राणी।
होगा भव भय दूर सभी का,
चन जाना दृढ़ श्रद्धानी ॥३॥

विचारमत-(पंडित पूजा) ३२ * उपसंहार * एतत्सम्यक्त्व पूजस्य. पूजा पूज समाचरेत् । मुक्ते श्रियं पंथं शुद्धं, व्यवहार निश्चय शाश्वतं ॥ ३२॥ यह सम्यक्त्व पूज्य पूजा को, पूजो हे भविजन प्राणी। निश्चय वा व्यवहार मार्ग यह, यही कहे श्री जिनवाणी ॥ बस यह पंडित पूजा की, बत्तिस गाथा का अर्थ हुआ। पढ़ो पढ़ावो शुद्ध करो यह, ग्रन्थ पूर्ण अरु सार्थ हुआ ॥३२॥ इति

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।
গা শাকিল।

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तस्मै श्री गुरवे नम IS श्री १००८ श्री परमगुरु तारण वरणाचार्य विरचित माला रोहण * मापा-पद्यानुवाद * - मंगला चरण* ओंकार वेदान्त शुद्धात्म तत्व, प्रणमामि नित्य तत्वार्थ साधं । ज्ञान मयो सम्यग्दर्शनेत्व, सम्यक्त्व चरण चैतन्य रूप ॥शा ओंकार शुद्धात्म तत्व है, सब वेदों का सार यही । नित्य नमूं उस पद को में, धर हृदय वीच श्रद्धान सही ॥ तान मयी सम्यग्दर्शन से, शोभित है चारित्र मयी। शुद्ध चेतना के द्विभेद हैं, दर्शन ज्ञान स्वरूप मयी ॥१॥ ।

विचारमत- (माला रोहण) 3 महावीर स्वामी को नमस्कार के नमामि भक्तं श्री वीरनाथ, नंतं चतुष्टं तं व्यक्त रूपं । माला गुणं बोच्छति तं प्रबोध, नमाम्यहं केवलि नंत सिद्धं ॥२॥ भक्ति भाव से वीरनाथ जिन- वर को वंदन मैं करता। चार चतुष्टय स्वरूप जिनका, प्रगट रूप के जो धरता ॥ माला रोहण ग्रन्थ भव्य -- जीवों के हित कारण गाऊं। श्री जिन, केवलि तथा सिद्ध जो, नंत हुए उनको ध्याऊं ॥२॥ SSSSSIO विचारमत-(माला रोहण) * आत्म-स्वरूप Xxt+ काया प्रमाणं त बहा रूप, निरंजन चेतन लक्षणेल । भावे भनेत्वं जे ज्ञान रूपं, ते शुद्ध दृष्टी सम्यक्त्व वीयं ॥३॥ जीव द्रव्य कैसा है इसका, तुम श्राकार सुनो भाई। अपनी काया के प्रमाण वह, ब्रह्म रूप निर्मल गाई॥ चेतन के लक्षण मय इसको, जो ज्ञानी निजमें भाते। वही शुद्ध दृष्टी है जग मे, शुद्ध शक्ति को वे पाते ॥३॥ --- विचारमत-(माला रोहण) * सम्यग्दृष्टि - स्वरूप * संसार दुःख जे नर विरक्तं ते समय शुद्धं जिन उक्त दृष्टं । मिथ्यात्व मद मोह रागादि खंड, ते शुद्ध दृष्टी तत्वार्थ साधं ॥४॥ दुःख मयी संसार रूप से, जो नर विरक्त होते हैं जिनवर कथित शुद्ध चेतन के, स्वरूप को वे जोते हैं। मिथ्या मद वा मोह राग आदिक, को खंडन वे करते । शुद्ध दृष्टि हैं वही तत्व-- श्रद्धान सदा जो नर धरते॥४॥ SO

1
विचारमत-(माला रोहण)
३७
* शुद्ध-स्वरूप
शल्यं त्रयं चित्त निरोध नेत्व,
जिन उक्त वाणी हदि चत नेत्व ।
मिथ्यात्व देव गुरु धर्म दूर,
शुद्धं स्वरूपं तत्वार्थ साधं ॥५॥
तीन शल्य को दूर करो निज,
हृदय चीच जिन वचन धरो।
मिथ्या देव गुरु को त्यागो,
कुधर्म को तुम दूर करो॥
शुद्ध स्वरूप कहा चेतन का,
उसकी तुम श्रद्धा धरना ।
श्री जिन तारण तरण गुरू का,
यह उपदेश मनन करना ॥५॥

SSSSSS विचारमत -(माला रोहण) ४० * सम्यग्दृष्टि-कर्तव्य. सम्यक्त्व शुद्धं हृदयं समस्तं, तस्य गुणमाला गुथितस्य वीर्य । देवाधि देवं गुरु ग्रन्थ मुक्तं, धर्म अहिंसा क्षिम उत्तमध्यं ॥८॥ सम्यग्दर्शन शुद्ध हृदय में, पूर्ण रूप धरना चाहिये। उसकी गुणमाला को भविजन, अब गुंथन करना चहिये ॥ जिनवर देव गुरू ग्रंथों से, रहित होय वह मान्य सही। धर्म आहंसा क्षमा मयी हो, जिसमें नहीं विरोध कहीं ॥८॥ Xnos SS

विचारमत • (माला रोहण)
४१
* शुद्धात्मा को नमस्कार -
तत्त्वार्थ साधं त्व दर्शनेत्व,
मल विमुक्त सम्यक्त्व शुद्ध ।
ज्ञान गुण चरणस्य शुद्धस्य वीर्य,
नमामि नित्य शुद्धात्म तत्व ॥६॥
पच्चिस मलसे रहित शुद्ध,
सम्यक्त्व तत्व श्रद्धान धरो।
ज्ञान चरित शक्ती के धारी,
चेतन की पहिचान करो।
ऐसे शुद्धातम को नितही,
नमस्कार में करता हूं।
उस चेतन के शुद्धभाव की,
सदा भावना धरता हूं ॥६॥

विचारमत - (माला रोहण)
४२
* जिनवाणी-महिमा *
जे सप्त तत्वं षट् द्रव्य युक्तं,
पदार्थ काया गुण चेत नेत्वं ।
विश्वं प्रकाशं तत्वानि चेदं,
श्रुत देव देवं शुद्धात्म तत्वं ॥१०॥
-
सप्त तत्व नव पदार्थ वा षट्-
द्रव्य कहे जिन आगम में।
इनका प्रकाश जो करता है,
वेद वही परमागम में ।।
ऐसे श्रुत देवाधि देव जो,
जिन वाणी सद् ज्ञान मयी।
श्री गुरु तारण तरण कहें, यह,
करो. शुद्ध श्रद्धान सही ॥१०॥

विचारमत -(माला रोहण)
* माला-गुथन .
देवं गुरु शास्त्र गुणानि नित्य,
सिद्ध गुणं सोलह कारणेव ।
धर्म गुण दर्शन ज्ञान चरण,
मालाय गुथित गुणा सस्य रूपं ॥११॥
-
सच्चे देव शास्र गुरु के गुण,
नित्य मनन करना चहिये ।।
सिद्धों के गुण, तथा भावना-
सोलह चित धरना चहिये ।
जैन धर्म के गुण सद्दर्शन.
ज्ञान चरण मय भावों को।
अब गुंथन गुणमाला में,
करते हैं शुद्ध सुभावों को ॥११॥

विचारमत - (माला रोहण) ४४ * माला-गुण * पडिमाय ग्यारा तत्वानि पेपं, व्रतानि शीलं तपदान चिन्तं । सम्यक्त्व शुद्धं ज्ञानं चरित्रं, सुदर्शनं शुद्ध मलं विमुक्तं ॥१२॥ , 11 ग्यारह पडिमा नाम प्रतिज्ञा का, है धारो हे भ्राता । शील तथा तपदान व्रतादिक, चिन्तन करो मिले साता ॥ सम्यग्दर्शन ज्ञान चरण, आचरण सदा करना चहिये। पच्चिस मल से रहित शुद्ध, भावों को अब धरना चहिये ॥१२॥ ESE

विचारमत - (माला राहण)
सम्यग्दृष्टिकर्तव्य
मूल गुण पालंति जे विशुद्ध,
शुद्ध मयं निर्मल धारयेत्वं ।
झान मय शुद्ध धरति चिचं,
ते शुद्ध दृष्टी शुद्धात्म तत्व ॥१३॥
अष्टमूल गुण का पालन जो,
करते निर्मल भावों से।
ज्ञानमयी निज शुद्ध दृष्टि,
वे युक्त रहें सद्भावों से ॥
आतम शुद्ध करो हो प्राणी.
जिनवाणी में यही कहा।
सम्यग्दर्शन
हुया
जिन्हों को,
उनही ने पद मोन लहा ॥१३॥

5G
विचारमत - (माला रोहण)
४६
ॐ पच्चीस-मल
-
शंकादि दो मद मान युक्तं
मूढं त्रयं मिथ्या माया न दृष्टं ।
अज्ञान पद् कर्म मल पंच वसिं,
त्यक्तस्य ज्ञानी मल कर्म मुक्तं ॥१४॥
शंकादिक हैं आठ दोष,
ज्ञानादिक कहे आठ मद हैं।
तीन मूढ़ता रहित तथा षट्,
अनायतन जो दुखदा हैं॥
ऐसे यह पच्चीस दोष,
सम्यक्त्व धर्म के तुम तजना ।
अष्ट कर्म से रहित होय,
ज्ञानीजन शिवपद को भजना॥१४॥

विचारमतः (माला रोहण)
शुद्धात्म-श्रद्धान
शुद्धं प्रकाशं शुद्धात्म तत्वं,
समस्त सकल्प विकल्प मुक्तं ।
रत्नत्रयं लंकृत सस्य रूपं,
तत्वार्थ साधं बहु भक्ति युक्त ॥१५॥
शुद्धातम का वह प्रकाश है,
नहिं संकल्प विकल्प जहां।
रत्नत्रय शोभायमान है,
पूर्ण रूप से शुद्ध जहां ॥
-
तत्वों का श्रद्धान करो,
बहु भक्ति सहित भविजन ज्ञानी।
श्री गुरु तारण तरण करें-
उपदेश शुद्ध आतम ध्यानी ॥१५॥

विचारमत -(माला रोहण) ४८ * श्रद्धान की सफलता * , जे धर्म लीना गुण चेत नेत्वं ते दुःख हीना जिन शुद्ध दृष्टिः । संप्रोषि तत्वं सोई ज्ञान रूपं, व्रजति मोचं क्षण एक मेत्वं ॥१६॥ " -- धर्मलीन गुण हो चेतन के, जो 'जन आराधन करते । शुद्ध दृष्टि दुख हीन वही नर, तत्वज्ञान धन को धरते ॥ ऐसे भाव हुए जिनके, वे शीघ्र मोक्ष पद पाते हैं। श्री गुरु तारण तरण धन्य, यह शुभ उपदेश सुनाते हैं ॥१६॥ SSSSS

विचारमत - ( माला रोहण)
* सम्यक्त्व-महिमा *
+XX
जे शुद्ध दृष्टी मम्यक्त्व शुद्ध,
माला गुण कठ हृदय रूलित ।
तत्वार्थ साधं च करोति नित्य,
ससार युक्त शिव सौख्य वीयं ॥१७॥
हृदय कंठ में इस गुण माला-
को जिनने धारण करली ।
भव सागर से पार हुए वे,
उनने शिव रमणी वरली॥
तत्वमयी श्रद्वान जिन्हों के,
हृदय कंठ में रुलता है।
उनके लिये मुक्ति मंदिर का,
द्वार गीघ्र ही खुलता है ॥१७॥

5- - विचारमत-(माला रोहण) ५० ज्ञान गुण-माला* 1क्षा ज्ञानं गुणं माल सु निर्मलत्वं. संक्षेप गुथितं तव गुण अनंतं । रत्नत्रयं लंकृत विश्व रूपं, तत्वार्थ सार्थ कथितं जिनन्द्रं ॥१८॥ ज्ञान गुण मयी निर्मल माला. का गुंथन संक्षिप्त किया। तीन रत्न शोभित हैं इसके, धारण से हो दिप्त हिया जैसा कथन जिनेन्द्र देव ने, किया शुद्ध जिनवाणी में । वही कथन श्री गुरु तारण- स्वामी ने किया सुवाणी में ॥१८॥ झ SSSSSSB

विचारमत-(माला रोहण)
* राजा श्रेणिक का प्रश्न *
deuKha
श्रेणीय पृच्छन्ति श्री वीरनाथ,
माला श्रिय मागत नेह चक्र।
धरणेन्द्र इन्द्रं गन्धर्व जनं,
नर नाह चक्र विद्या धरेत्व ॥१६॥
वीरनाथ के समवशरण में,
राजा श्रेणिक ने बूझा।
भगवन कहो कौन इस माला-
का धारी होगा दूजा ॥
चक्रवार्त धरणेन्द्र
गन्धर्व यक्ष नरनाथ पड़े।
विद्याधर का समूह देखा,
श्रेणिक विस्मय साथ खडे ॥१॥

S स्ट विचारमत -(माला रोहण) ५२ राजा श्रेणिक के प्रश्न का --समाधान- (गाथा नम्बर १६) तब श्री गौतम स्वामी ने, राजा श्रेणिक को सम्बोधा । क्या सुरनर की विभूति में ही, तुमने शिव मारग शोधा ।। हे श्रेणिक! तुमही इस माला, के अधिकारी हो ज्ञानी । चौथेकाल आदि में धारोगे, तीर्थंकर. पद पद ध्यानी ॥१॥ ला -*-24

विचारमत-(माला रोहण)
५३
* बाह्य विभूतियों की-भसारता *
कि दिप्त रत्नं बह वे अनन्त,
किं धन अनन्तं बहुगेय जुक्त ।
किं त्यक्त राज्यं वनवास लेत्वं,
कि तत्व वेत्व बहु वे अनंतं ॥२०॥
दीप्त रत्न राशी वहुती इनसे,
क्या काज सफल होगा।
धन अनंत बहु भांति कहो,
इनसे क्या काज सफल होगा।
राज्य छोड़ वनवास लिया,
इससे क्या काम सफल होगा।
तत्व ज्ञान कर लिया कहो,
इससे क्या काज सफल होगा॥२०॥

विचारमत-(माला रोहण) ५४ * सम्यक्त्व-साला श्री वीरतार्थ उक्तं च शुद्ध, श्रुणु शेषि राया माला गुणार्थ । कि रत्न किं अर्थ किं राज नार्थ, कि तत्व वेत्वं नवमाल दृष्टं ॥२१॥ वीर नाथ की दिव्य धुनी में, देखो क्या उपदेश हुत्रा सुन श्रेणिक ! माला गुण को, अब जो तुमको संदेह हुआ। श रत्न अर्थ धन राज संपदा, तप तपने से क्या होगा। यदि इस माला को नाहं देखा, तो सबही निष्फल होगा ॥२१॥ SED विचारमत-(माला रोहण) * सम्यक्त्व रिना-बाह्य विभूतियां निष्प्रयोजन हैं * कि रत्न कार्य बहुवे अनंत, किं अर्थ अर्थ नहि कोपि कार्य। कि राज चा कि काम रूप, कि तत्व वेत्व दिन शुद्ध दृष्टी ॥२२॥ सम्यग्दर्शन नाहिं होगा तो, रल अर्थ नहिं काम पड़ें। राज चक्र क्या काम रूप भी, तत्वज्ञान सब नाम बड़े॥ हे श्रेणिक। अब आत्म तत्व, । का शरणा ही लेना चहिये। श्री गुरु कहें सुनो हो प्राणी, निज पद चित देना चहिये।।२२।।

विचारमत - (माला रोहण) ५६ सम्यग्दर्शन-रहित-जीव * जे इन्द्र धरणेन्द्र गन्धर्व जदं, नाना प्रकारं बहुवे अनंतं । ते नंत प्रकारं बहुभेय जुक्तं, नवमाल दृष्टं कथितं जिनेन्द्रं ॥२३॥ ला चक्रवर्ति धरणेन्द्र इन्द्र, गन्धर्व यक्ष नाना भांती । धन संपदा अनंत इन्हों के, साथ लगी यह दुख पांती ॥ ला नाहं देखी सम्यग्दर्शन की, माला सुखदाई इनने। श्रेणिक तुमको इस माला का, होगा लाभ एक छिनमें ॥२३॥ +-*- B SSSS निचारमत - (माला रोहण) ५७ * शुद्ध-मालारोहण * जे शुद्ध दृष्टी सम्यक्ल जुक्तं, जिन उक्त सत्यं तत्वार्थ साधं । आशा भय लोम स्नेह त्यक्त, ते माल दृष्टं हृदि कठ रुलित ॥२४॥ सम्यग्दर्शन सहित शुद्ध दृष्टी, जिनोक्त श्रद्धान धरो। आशा स्नेह लोभ भय त्यागो, निजपद की पहिचान करो।। ऐसे भाव हुये जिनके, उनने इस माला को पहिरी। निशदिन रुलन रहे तत्वों की, वही पायगे शिव दहरी ॥२४॥ ।

ESSSS विचारमत - (माला रोहण) * सस्यष्टि को मोष हो * जिनस्य उक्तं जे शुद्ध दृष्टी, सम्यक्त्व धारी बहु गुण समाधि। ते माल दृष्टं हृदि कंठ रुलितं, मुक्त प्रवेश कथित जिनेन्द्रं ॥२५॥ जितेन्द्र वचनानुसार जो हैं, शुद्ध दृष्टि बहु गुणधारी। उनने देखी यह गुणमाला, सुनो भव्य श्रद्धा धारी ॥ , ऐसे भाव हुए जिनके, उनने इस माला को पहरी ॥ निशदिन रुलन रहे तत्वों की, वहीं पायगे शिव दहरी ॥२५॥ ,

विचारमत-(माला रोहण)
५६
* शुद्ध मम्यक्त्वी*
-
सम्यक्त्व शुद्ध मिथ्या विरक्त,
लाजं भय गारव जीर त्यक्त ।
ते माल दृष्टं हृदि कंठ रुलित,
मुक्तस्य गामी जिनदेव कथितं ॥२६॥
सम्यग्दर्शन से पवित्र हो,
मिथ्या त्याग करो प्राणी ।
लज्जा भय गारव को त्यागो,
माला देखो सुखदानी॥
1
हृदय कंठ में रुलन करो तव,
पाओगे तुम शिव रमणी।
जिनेन्द्र ने यह कहा भव्यजन,
सुनकर पायो शिव श्रयणी ॥२६॥

विचारमत - (माला रोहण)
६०
* रत्नत्रय-धारी *
जे दर्शनं ज्ञान चारित्र शुद्ध,
मिथ्यात्व रागादि असत्यं च त्यक्तं ।
ते माल दृष्टं हृदि कंठ फलितं,
सम्यक्त्व शुद्धं कर्म
विमुक्तं ॥२७॥
सम्यग्दर्शन ज्ञान चरित से,
तुम पवित्र होना ज्ञानी ।
मिथ्या राग असत्य आदि से,
तुम विरक्त होना ध्यानी ॥
ऐसे भाव
भाव हुये जिनके,
उनने यह माला को पहरी ।
निशदिन रुलन रहे तत्वों की,
वही पांयगे शिव दहरी ॥२७॥

विचारमत - (माला रोहण)
६१
* धर्मध्यान-युक्त भव्य
पादस्थ पिंडस्थ रूपस्थ चित्त,
रूपा अतीतं ज ध्यान युक्त ।
आतं च रौद्रं मय मान त्यक्तं,
ते माल दृष्ट इदि कंठ रुलितं ॥२८॥
धर्म शुक्ल अरु आर्त रौद्र,
ध्यानों के भेद सुनो भाई।
धर्म शुक्ल अन्तर्गत ही-,
है चार और ये सुखदाई ॥
है पदस्थ पिंडस्थ रूप,
रूपस्थ तीन तो ये सुनलो।
चौथा रूपातीत ध्यान यह,
इसे ध्यान से तुम गुनलो ॥२८॥

995 विचारमत - (माला रोहण) *धर्म ध्यानी * (गाथा नम्बर २८) आर्तरौद्र को छोड़ जिन्होंने, धर्म शुक्ल स्वीकार किया। इस गुणमाला, को उनने ही, शुद्ध हृदय में धार लिया। विशेष इन ध्यानों का जिन- आगम से ज्ञान करो भाई। श्री गुरु ने यह कथन किया है, भविजन को शिव सुखदाई ॥२८॥ 181 వడం

विचारमत (माला रोहण)
* सम्यक्त्व-भेद *
आज्ञा सुवेदं उपशम धरेत्वं,
चायिक शुद्धं जिन उक्त साध।
मिथ्या त्रिमेदं मलराग खड,
ते मार दृष्टं हदि कठ रुलितं ॥२९॥
आज्ञा, वेदक, उपशम क्षायिक,
यह समिकित के भेद कहे।
त्रिभेद मिथ्या पचीस मलको,
त्याग, माल, कर माहि गहे ॥
ऐसे भाव हुए जिनके,
उनने इस माला को पहरी।
निशदिन रुलन रहे तत्वों की,
वही पायगे शिव दहरी ॥२६॥

विचारमत - ( माला-रोहण) * जड़ता को त्यागो * ये चेतना लक्षणो चेत नेत्वं, अचेतं विनाशी असत्यं च त्यक्तं । जिन उक्त सत्यं सु तत्वं प्रकाश, ते माल दृष्टं हृदि कंठ रुलितं ॥३०॥ जो शुद्धातम पा चेतन के, लक्षण को जान सचेत हुए। विनाशीक पद जो असत्य है, जड़मय जान सचेत हुए । , तातें जड़तें भिन्न लखो, निज प्रातम को चेतन ज्ञानी । देखो गुणमाला को धारो, रुलन करो मनमें ध्यानी ॥३०॥ SSSSS

विचारमत-(माला रोहण)
६५
* सम्यग्दृष्टि सुखी हो *
ये शुद्ध बुद्धस्य गुण सस्य रूपं,
रागादि दोष मल पुंज त्यक्त ।
जे धर्म प्रकाश मुक्त प्रवेश,
तेमाल दृष्ट हृदि कठ रुलितं ॥३१॥
+1Xx+
शुद्ध बुद्ध गुण स्वरूप जिसने,
ज्ञान रूप पद जान लिया ।
राग द्वेप आदिक मल पुंजो,
को उसने सब त्याग दिया ।
जो जन ऐसे धर्म प्रकाशक,
उनने यह माला पहरी ।
निशदिन रुलन रहे तत्वों की,
वही पांयगे शिव दहरी ॥३१॥

डा ६६ विचारवत - ( माला रोहण) * इस माला रोहण का प्रताप * जे सिद्ध नंतं मुक्ते प्रवेशं, शुद्धं स्वरूपं गुणमाल गुथितं । जे कोपि भव्यात्म सम्यक्त्व शुद्धं, ते यांति मोरं कथितं जिनन्द्रं ॥३२॥ 1 जीव सिद्ध जो हुये अनंतानंत, मुक्ति पद को को पाया। शुद्ध स्वरूप भयी गुणमाला, गुंथन कर शिवपद पाया । जो जन भव्य शुद्ध सम्यग्दर्शन, को अवश्य धारेंगे। प्राप्त करेंगे शिवपद को, वे जीवों को भी तारेंगे ॥३२॥ s *

विचारमत-(माला रोहण)
* उपसंहार *
3.
(गाथा नम्बर ३२)
ऐसे भाव हुए जिनके,
उनने इस माला को पहरी ।
निशदिन रुलन रहे तत्वों की,
वही पायंगे शिव दहरी ॥
श्री माला रोहण की भी यह,
भाषा टीका पद्य मयी।
अल्पमती लघु बालक की,
यह प्रथम कृती परिपूर्ण हुई ॥३२॥

--- -- E -- वन का महणा) Is. , प Mrane.wa.14 ३ atha होग। ३ . मोय ॥ । - सम्पूर्ण । Heart । 3 Rom H को चूर्ण ॥३२॥ . - , इति भी माला, रोहण na । , 33 SS श्री मालारोहण।

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म तस्मै श्री गुस्य नम ॥
श्री १००८ श्री परमगुरु तारण वरण मरलाचार्य विरचित
कमल-वत्तीसी
मंगलाचरण
तवं च परम तत्व
परमप्पा परम मार दीए ।
परम जिन परमेष्ठी,
नमाम्यहं परम देव देवस्य ॥१॥
तत्त्वों में जो परम तत्व है,
नमस्कार उसको करना।
परमोत्कृष्ट भाव दर्शी,
परमातम पद वंदन करना ।
परम जिनं परमेष्टी को.
श्री नमस्कार में करता हूं।
जो उत्कृष्ट देव देवों के,
उन्हें वंदना करता हूँ॥१॥

SSSSSSS IE विचारमत-(कमल-बत्तीसी) * जिनवाणी-श्रद्धान * जिन वयनं सहहन, कमलं श्री कमल भाव उववन्नं। अरजक भाव स उत्तं, इन समभाव मुक्ति गमनं च ॥२॥ काल बत्तीसी ग्रन्थ बनाया, भव्य जीव संबोधन हेत । श्री गुरु संबोधन करते हैं, इस गाथा में आतम हेत ॥ सुनो भव्य जीवो जिन आज्ञा, भावों को निर्मल करलो। सम भावों से मुक्ति गमन है, यह निश्चय मन में धरलो ॥२॥ +-*

विचारमत-(कमल-बत्तीसी)
* सम्यग्ज्ञान-महिमा
अन्मोय ज्ञान सहावं,
रयन स्पन सरूव विमल ज्ञानस्प ।
निमल विमल सहान,
ज्ञान अन्मोय सिद्धि सपत्त ॥३॥
ज्ञान मयी शुद्धातम में ही,
नित प्रति आनन्दित होना।
ज्ञान रल के प्रकाश में ही,
निज स्वरूप को तुम जोना ॥
विमल स्वभाव ज्ञान का,
इस में जोजन आनन्दित होते।
सिद्धि संपदा को पाकर वे,
भव भव के दुख को सोते ॥३॥

-- विचारमत-(कमल - बत्तीसी) ७२ * मिथ्यात्व त्याग का उपदेश जिनयति मिथ्या भावं, अनृत असत्य प्रजाव गलियं च । गलयति कुज्ञान स्वभावं, विलयं कम्मान तिविह जोयेना ॥४॥ मिथ्या भावों को जो जीते, असत्य पर्जय बुद्धि तजें। कुज्ञानों को त्याग भव्य वे, भेद ज्ञान को नित्य भनें । ---- . ऐसे सम्यग्दृष्टि जीव ही, त्रिविधि कर्म को दूर करें। निज गुण संपत्ती को पाकर, शिव रमणी को शीघ्र वरें ॥४॥ 5

विचारमत-( कमल-बत्तीसी)
७३
* सम्यग्नानी का प्रयत्न -
नन्द
अनंद रूव,
चेयन आनन्द प्रजार गलिय च ।
जानेन ज्ञान अमायं,
अन्मोयं जान कम्म गलिय च ॥५॥
नन्द तथा ग्रानन्द रूप वा,
चिदानन्द जिनने पाया ।
उनकी पर्जय बुद्धि दूर हुई,
ज्ञानानन्द सदा
भाया ॥
उनके कर्म गले
गले सवही,
धनि धन्य मोक्ष पद को पाया।
श्री गुरु तारण तरण मंडला-
चारज ने यह दरशाया ॥५॥

-
७४
विचारमत - (कमल- बत्तीसी)
* सम्यग्ज्ञानी की कर्म निर्जरा *
कम्म सहावं खिपनं.
उत्पत्ति खिपिय दृष्टि संभावं ।
चेयनि रूव संजुर्ग,
गलियं विलयंति कम्म बंधानं ॥६॥
,
संचित कर्म खिपाय नया जो,
बंध कर्म को नहिं करते ।
सम भावों मय दृष्टि जिन्हों की,
निज चेतन अनुभव करते ॥
कर्मों के बंधन ऐसे से,
उनके सबही खुल जाते ।
निकट भब्य वे जांय शीघ्र ही,
क्षण में शिव सुख को पाते ॥६॥

पिचारमत - (कमल-चीमी)
৩
मनको वश करना
मन स्तमाव सं सिपन,
मंमारे शरण भाव मिपियेन ।
बान चलेन निशुद्ध,
अन्मोय विमल मुक्ति गमन च ॥७॥
मन का चंचल जो स्वभाव है,
उसको शीघ्र खिपा देना।
सांसारिक पद्धति वर्धक,
भावों को श्राप मिटा देना।
जान बलेन विशुद्ध करो,
मन आनन्दित हे सदृष्टी।
मुक्ति गमन का कारण है,
यह भाव धरो सम्यग्दृष्टी ॥७॥

विचारमत - (कमल - बत्तीसी) ७६ * * वैराग्य तीन तरह से होता है Hinxa वैराग्यं तिविह उवन्न, जन रंजन राग भाव गलियं च । कल रंजन दोप विमुक्तं, मन रंजन गारवेन तिक्तं च ॥८॥ तीन तरह उप्तन्न उप्तन्न करो, वैराग्य हृदय में हे ध्यानी। जन रंजन जो राग भाव है, उसे दूर कर दो ज्ञानी ॥ कल रंजन जो शरीर का है, दोष उसे त्यागो भाई। मन रंजन गारव को त्यागो, यही सीख सुखदाई ॥८॥ शा fter SSESO

पिचारमत-(कमल-पत्तीसी)
७७
* दर्शन मोह छोड़ो
+XXX-*-
दर्शन मोहन्ध विमुक्त,
राग द्वेप च विषय गलिय च ।
ममल स्वभाव उवन्न,
नत चतुष्टय
दृष्टि संदर्श ॥६॥
दर्शन मोह अंध कर देता,
जीवों को, उसको छोड़ो।
राग द्वेष अर विषय तथा,
क्रोधादिक भावों को तोड़ो॥
जिनके ऐसा भाव हुआ,
उप्तन्न शुद्ध अन्तर्यामी।
नंत चतुष्टय देख आपमें,
वही हुये शुभ शिव गामी ॥६॥

SH विचारसत-(कमल - बत्तीसी) ७८ * सम्यग्ज्ञानी को मोक्ष हो *- ति अर्थ शुद्ध दृष्ट. पंचार्थ पंच ज्ञान परमेष्ठी । पंचाचार सुचरणं, सम्यक्त्वं शुद्ध ज्ञान आचरणं ॥१०॥ ए+6m रत्नत्रय ही शुद्ध अर्थ है, पंच ज्ञान परमेष्ठि मयी। पंचाचार विचार शुद्ध, सम्यक्त्व और सद्ज्ञान मयी॥ ऐसे , la भाव हुये जिनके, वे शीघ्र मोक्ष पद पाते हैं। श्री गुरु तारण तरण मंडला- चारज यह समझाते हैं ॥१०॥ शा उच्च

विचारमत-(कमल-बत्तीसी)
७६
भन्यजीवों के कर्तव्य *
दर्शन शान सुचरण,
देव च परम देव शुद्धं च ।
गुरुमंच परम गुरुवं
धर्म च परम , धर्म सद्भार ॥११॥
सम्यग्दर्शन तथा ज्ञान चारित्र,
भले धारण करलो।
सच्चे देव गुरू पर भाई,
दृढ़ श्रद्धान पूर्ण करलो ॥
परम धर्म जो जैन धर्म है,
जिनेन्द्र ने जिसको गाया।
उसको धारण किया जिन्होंने,
सदृष्टी पद को पाया ॥१३॥

विचारमत- कमल - बत्तीसी) केवल ज्ञानी - माहिमा * जिनयं च परम जिनयं, ज्ञानं पंचामि अक्षरं जोय । ज्ञानेन ज्ञान वृद्ध, विमल सहावेन सिद्धि संपत्तं ॥१२॥ अष्ट कर्म को जीत प्रभूजी, केवल ज्ञानी पूर्ण हुये। ज्ञान वृद्ध जो शुद्ध स्वभावी, असरीरी सुख पूर्ण हुये ॥ - उनके कर्म गले सबही, धनि धन्य मोक्ष पद को पाया। श्री गुरु तारण तरण मंडला-- चारज ने यह दरशाया ॥१२॥ --

विचारमत-( कमल-बत्तीमी)
८१
* आध्यात्मिक-चिन्तवन *
चिदानन्द चितवन,
चयन प्रानन्द सहार प्रानन्द ।
कम्म मल पयडि सिपन,
विमल सहान अन्मोय सयुक्त ॥१३॥
चिदानन्द शुद्धातम पद है,
जो अथाह आनन्द मयी।
उसका चिंतन करो भव्यजन,
जिससे पावो मोक्ष मही॥
शत ऊपर अड़तालिस प्रकृति,
कर्मों की जो दुखदाई।
उन्हें खिपायो स्वरूप ध्याओ,
तव पद पाओ सुखदाई ॥१३॥

विचारमत- (कमल - बत्तीसी) ८२ * भेद ज्ञानी-सम्यग्दृष्टि * अप्पा पर पिच्छन्तो, पर परजान शल्य मुत्तानं । सहावं शुद्धं शुद्धं चरणस्य अन्मोय संयुक्तं ॥१४॥ ज्ञानं 18 आत्मा पर की पिछान करता, पर परजाय शल्य से दूर ज्ञान स्वभावी शुद्ध आचरण, सहित तथा जो है सुखपूर ॥ - होवे, ऐसा सम्यक्त्वी जो वही मोक्ष पद को पावे । कृत कृत्य कहावै, निजगुण भावे, जग में फिर वह नाहं आवे ॥१४॥ 1 Xbe 59555SSS

विचारमत-(कमल- बत्तीसी)
८३
अब्रह्म-भाव त्यागोर
अवम भाव च वक,
विक्हा विसनस्य विषय मुक्त च ।
ज्ञान सहाव सु समय,
समय सहकार विमल अन्मोय ॥१५॥
ब्रह्म रहित जो वक्र भाव है,
विकथा व्यसन विषय त्यागो।
भेद ज्ञान मय निज स्वभाव है,
सुखमय विमल वहां पागो ॥
#
ऐसा सम्यक्त्वी जो होवे,
वही मोक्ष पद को पावै।
कृत कृत्य कहावे, निज गुणभावे,
जग में वहुरि न वह आवै ॥१५॥

लिज विचारमत-(कमल - बत्तीसी) ८४ * जिनवचन-शक्ति * altxams जिन वयनं च सहावं, जिनयति मिथ्यात्व कपाय कंमानं । अप्पा शुध मप्पानं, परमप्पा विमल विमल दर्शये शुद्धं ॥१६॥ जिनवर वचन सहाय जिन्हों के, उनके मिथ्या भाव टरें। कषाय त्यागैं वे ही जग में, कर्म पटल संहार करें । शुद्ध करें निज आतम को, वे परमातम पद के दी। उनके पद कमलों को भाविजन, शिव रमणी ने ही पर्शी ॥१६॥ S विचारमत (फमल पत्तीसी) ८५ इट-रष्टी बिन दृष्टि इट सशुद्ध, इट सजाय तिक्त आनिष्टं । इंएं प मान सहावेन फर्म मंपिनं ॥१७॥ इष्ट शुद्ध दृष्टि जिनवर सम, जिन जीवों ने प्राप्त करी। उनको इप मिला उनकी ही, अनिष्टता मय दृष्टि टरी।। इप्प कहो या अभीष्ट पदको, उनने प्राप्त किया भाई। ज्ञान म्बमार धार निज में, कमों में खूब विजय पाई ॥१७॥ Ri..

-- विचारसत - (कमल - बत्तीसी) ८६ * सम्यग्ज्ञानी झी लगन * XXX मज्ञानं नहिं ज्ञान सहारन अन्मोय विमलं चा। नहिं दिटुं, पर परजार दिहि अंतर सहसा ॥१८॥ ज्ञानंतर . है नहिं देखे अज्ञान भाव को, ज्ञान भाव में मगन रहे । अंतर नहिं जिनके सुज्ञान में, अन्तरंग में लगन रहे ।। . - पर परजाय बुद्धि नहिं जिनके, घट में कभी उदय होवै । सम्यकवन्त जीव है सोई, जन्म जरा दुख को खोवै ॥१८॥ है

विचारमत (कमल-बत्तीसी)
८७
* आत्म चिन्तवन र
अप्प सहावं,
अप्पा शुद्धप्प विमल परमप्पा ।
सरूवं
रूवा तिक्तं च विमल जान च ॥१६॥
परम
रूव.
निज में निज का स्वभाव देखे,
जो परमातम : रूप कहा।
परम स्वरूप रूप है सोई,
विमल ज्ञान मय शुद्ध अहा॥
पुद्गल रूप त्याग करके,
निज में ही दृष्टि लगा लेना ।
श्री गुरु का कहना है भाई,
इस पर ध्यान सदा देना ॥१॥

विचारमत- (कमल - बत्तीसी)
* भेदज्ञान-शिक्षा *
विमलं विमल सरूवं,
ज्ञानं विज्ञान ज्ञान सहकारं ।
जिन उक्तं जिन वयनं,
जिन सहकारेण मुक्ति गमनं च ॥२०॥
धरै।
परम शुद्ध जो विमल स्वरूपी,
ज्ञानों में विज्ञान
जिनवर के शुभ वचन धार वह,
मुक्ति रमा को शीघ्र वरै ।
पुद्गल रूप त्याग करके,
निज में ही दृष्टि लगा लेना।
श्री गुरु का कहना है भाई,
इस पर ध्यान सदा देना ॥२०॥

विचारमत-( कमल-चचीसी) ८४ * मैत्री आदि-मापना. पद् काई जापान, कृपा सहकार पिमल भारेन । मतो जीव सभाव, कृपा सहकार विमल कलिष्ट जीवानं ॥२१॥ पृथ्वी जल अग्नी वायू अरु, वनस्पती त्रस पद काई। जीवों पर निर्मल भावों से, करुणा कृपा करो भाई ।। चार भावनाओं में पहिली, मैत्रि भावना सुखदाई। अब आगे मध्यस्थ भावना- का वर्णन करते भाई ॥२१॥ -

विचारमत-(कमल - बत्तीसी)
* माध्यस्थ-भावना *
एकांत विग्रिय दिटुं,
मध्यस्थं विमल शुद्ध संभावं ।
शुद्धं सहाव उक्तं,
विमल दिही च कंम संखिपनं ॥२२॥
हठग्राही एकांत तथा,
विपरीत मार्ग पर जो चलते।
उन पर भी मध्यस्थ भाव,
धरलीजे कर्म सभी गलते ॥
शुद्ध दृष्टि का विमल भाव यह,
कर्म खिपाने का कारण ।
धारण करलो मित्रो इसको,
कहते हैं श्री गुरु तारण ॥२२॥

विचारमत (कमल-बचीमी) AU *कृपापरत्व-मारना सत कलिष्ट जीपान, अन्मोयं सहसार दुगोय पन । जे निराह मंमार, समारे शरण दुस्स पोयमी ॥२३॥ xma दुसी जीव को देख दुष्ट जो, श्रानन्दित होते मन में। दुर्गति पात्र विरोध भाव मय ये फिरते है भव वन मे ॥ ऐसे भाव त्याग दुख दाता, शुभ भावों को तुम पालो। दुखियों के दुख में दुखी हो. उदार भाग को प्यालो ।।२३॥

oi विचारमत - ( कमल - बत्तीसी) १२ * सम्यग्ज्ञान-महिमा * ज्ञान सहाव मुसमयं, अन्मोयं विमल ज्ञान सहकारं । सरूवं, ज्ञानं अन्मोय सिद्धि संपत्तं ॥२४॥ ज्ञानं ज्ञान शुद्ध समय यह ज्ञान स्वभावी, विमल सुक्ख का ले शरणा। बान मयी निज शुद्ध रूप में, ज्ञानानन्द लखा करना॥ 11 सिद्धि संपदा मिलती ऐसे, भावों से निश्चय धरना । श्री जिन तारण तरण गुरू का, यह उपदेश मनन करना ॥२४॥ O

Vichar-mat

Author
Jaikumar
Title
Vichar-mat
File name
Vichar-mat
Text
OCR done
Citation
1916
Published
2011/02
Publisher
Chindvada, Hiralal Nokhelalji Sighidi
Language
Sanskrit
Pages
101
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
549844
Barcode
99999990030692.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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