Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Do Soarupai Ka Chamatkar
Front matter
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सौ रुपये का चमत्कार
[प्रेरणादायी धार्मिक-सामाजिक कहानी ]
श्री शान्ति मुनि
प्रकाशक :
श्री अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गो जैन संघ
बीकानेर
पुस्तक.
दो सौ रुपये का चमस्कार
लेखक
0 श्री शान्ति मुनि
प्रकाशक
थी प्रसिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जन
समता भवन, बीकानेर-३३४००१ (राज.)
0 मूल्य : पांच रपये माम
द्वितीय अनावरण : १९८६
गुटक
जन धार्ट प्रेस
ममता गरा,
मीकानेर-३३४००१
समर्पण
मनात मनन्त उपकृति के केन्द्र
प्रखरतम वाग्मी
पौराणिक कथाकोश के
अनुपम संगायक
माराध्य देव
माचार्य श्री नानेश
के
परमपूत पाद पद्मों में
-शाप्ति मुनि
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मर्यादा ही इत्तम प्राचरण को सुरक्षा कवच है। प्रभु महावीर का संदेश है कि प्राचरण की धारा सम्यक ज्ञान के पट्टानी तटबंधों में ही मर्यादित रहनी चाहिये। माचार्य गुरुदेव गणेशीलालजी म. सा. ने श्रमण संस्कृति की मुस्थिति एवं उन्नयन के लिए 'शांत क्रांति' का अभियान चलाया। इस अभियान को प्रोजस प्रदान करना साधुवर्ग का दायित्व है । इसके लिए साधुवर्ग को जहां साधना के पथ पर अविचल रूप से प्रारूढ़ रहना है वहीं अपनी सापनागत अनुभूतियों को अभिव्यक्ति द्वारा सामान्यजन के लिए सुरढ़ साधना-सेतु का निर्माण भी फरते पलना है । णांत प्रांति प्रात्म-साधना से ही परात्म- सापना के उदय का प्रभियान है, जो प्रात्म पक्ष, परात्म पक्ष एवं परमात्म पक्ष, तीनों को उजागर करने में समक्ष है । साधु एवं साध्वी समाज ने विगत बीस वर्षों में सम्यक् शानाजंन की दिशा में अच्छी दूरी तय की है। रप बढ़ रहा है, पप भी प्रशस्त हो रहा है- -प्राचार्य श्री नाने
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प्रकाशकीय
जिन शासन प्रद्योतक, धर्मपाल प्रतिवोघका, समता
विभूति, प्राचार्य प्रवर श्री १००८ श्री नानालाल जी
म. सा. के विद्वान् शिष्य पंदित रत्न श्री शान्ति मुनि जी
बहुमुखी प्रतिमा के धनी हैं । पाप प्रखर वक्ता होने के
साथ-साथ सफल साहित्य-साधक भी हैं। श्रापकी वाणी
और लेखनी में प्रभावकारी शक्ति और सहृदयता का
सुन्दर सामंजस्य है।
साहित्य की विविध विधानों में यथा उपन्यास,
जीवनी, गद्यकाव्य, कविता, समीक्षा आदि के क्षेत्र में
प्रापफी पाई कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं । प्रापकी
साहित्य साधना सतत गतिमान है ।
प्रस्तुत कृति 'दो सौ रुपये का चमत्कार' प्रेरणादायी
पार्मिक सामाजिक कहानी है । ७ परिच्छेदों में लिखित
इस कृति में दान की महिमा और उसके माध्यम से
ममत्व त्याग तथा अनासक्ति भावना के विकास का
रोचक एवं मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया गया है ।
गुरणचन्द्र अपनी शालीनता,कर्तव्यनिष्ठा, कार्यक्षमता,
ईमानदारी, पार्मिक सुरदता, मितव्ययिता, साहसशीलता,
विगसता, सेवाभावना, वचन-निर्वाह,उदारता घादि गुरगों
यो पारण अपने भाग्य को बदल देता है । वह सेठ
भागचन्द का उदार सहयोग पाकर अपनी सत्यनिष्ठा
और त्याग भावना के फलस्वरूप ऐसा पारस पत्थर माना
करने में सफल होता है जिसका स्पर्श पाकर लोहा तो
बन जाता है । सचमुच दान देने मर्यात ममता:या में
वह शक्ति और चमत्कार है कि जिसमे तोहलता शुभ
जीवन भी स्वरिणम और दिव्य बन जाता है। म.
चमत्कार माम देवयोग नहीं वरन सकने पुरुषाय बार
भाग्य बदलने की कया है। कहानी को माया मरल, सरस
मौर हृदयरांगा है। प्राति से प्रा रामः उत्गुफा मनी
रहती है।
इसके प्रथम संस्करण में मामितियोni
संघ के पूर्व अध्यक्षा श्री गुमानमरोसा गया
अपनी स्वगीया मातुश्री श्रीमती मोगा में
स्मृति में प्रापिफ सपोग प्रदान किया गया
उनका प्रामारी है।
,
समाज में मानद मेवा मा ..
मिर होगा।
गन्नीलाल माता
श्री . . ., भर
अपूर्वा सेवापति धर्मपरायणा
श्रीमती मीनादेवी चौरड़िया
जयपुर की धर्मनिष्ठ, उदारचेता धावक स्वर्गीय
श्रीमती मीनादेवी चौरडिया प्रादर्श महिलारत्न पी ।
प्रापके पिता श्री मगनमलजी बोथरा समाज के सुप्रतिष्ठित
पर्मनिष्ठ श्रावक थे । अापका विवाह जयपुर समाज
अग्रणी श्रावक श्री केशरीमल जी चोरड़िया के सुपुत्र
प्रसिद्ध जोहरी श्री सरूपचन्दजी चौरडिया के साथ हुआ।
पितृपक्ष एवं ससुराल पक्ष दोनों परिवारों के धार्मिक
संस्कारों और प्रादशं वातावरण से श्रीमती मीना देवी के
जीवन में तप, त्याग, सहिष्णुता और निष्काम सेवा
भावना को उत्तरोत्तर वृद्धि होती गई और वे मादर्श
महिला-जीवन की प्रतीक बन गई । सेवा, स्वधर्मी-
वात्सल्य तथा गुप्तदान प्रारम्भ से ही मापके जीवन में
अंग रहे।
वैभव सम्पन्न परिवार में जाम लेकर भी और चारों
पोर भोतिक सुख-सुविधापों की सामग्री होते हुए भी
घापने "सादा जोवन उच्च विचार" को ही अपना मादणं
जीवन-सूप बनाया । धापके व्यवहार में शालीनता, वाणी
में माधुर्य, हृदय में प्रजरस करणा और पग-पग पर
प्रात्मीयतापूर्ण स्नेह सागर लहराता सा रहता था।
समाज को अनेक महिलाओं को अपने स्नेह, सेवा मौर
सहयोग का सम्बल देकर पापने उन्हें स्वावलम्बी और
प्रात्मनिर्भर बनाया । भाप प्रत्येक के मुख-दुःख में
पथ-प्रदशिका बनकर उन्हें मपना पासल मोर
वांटती थीं।
सन्त-सतियों के प्रति प्रापको मनना पना और
भक्ति थी। सन्तों की सेवा में माप मामी रही ।
आपको सामायिक मोर स्वाध्यायप्रविधि
थी । पापने अपने जीवन में कई प्रकार से मार
प्रत्याख्यान ले से थे। माम मादपतिना की।
मापने कई मठाइयां, पार, प तथा मास
तपस्याएं कीं । ४ प्रगमा १९८३ पो ७ पो ा
में संयारापूर्वक मापका स्वर्गवास प्रा।
मापने धर्मपरायण व्यक्तिसामोर गाभाग
का प्रभाव पार पूरे परिवार में परिrani
आपके तीनों पुर मा श्रीमानमानी सोर्ग:
(पूर्व अध्यक्ष श्री स. मा. मागी म)
उमरावमलजी गोलियामा
गुपुमा योमती नाम, ro;
वाणित या पिfinit?
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कहानी की कहानी । प्रिय वाल वन्धुप्रो ! मैं नहीं, दुनिया के सभी विचारक मानते हैं कि साहित्य की अनेक विधानों में 'कथा-कहानी की विधा ही वालकों की सर्वाधिकप्रिय विधा है । मेरी रष्टि में तो बालकों की ही नहीं, बड़े- । बूढ़ों, एवं युवकों को भी कहानी अति प्रिय लगती है। ; मेरा अनुभव है कि साहित्य की अन्य विधाओं से जो तन्मयता पैदा नहीं होती, यह कहानी से हो जाती है। • कई बार ऐसी कहानी हाथ लग जाती है कि उसे पूरा पढ़े विना छोड़ने की इच्छा ही नहीं होती है । मैंने बड़े- बड़े विद्वानों, लेखकों, वत्ताओं एवं श्रोताओं को लिखते- पढ़ते और सुनते देखा है । यही नहीं, बहुत से उच्च- कोटि के विद्वान् कहानी लेखक ही होते हैं । वे कहानी के अलावा और कुछ लिखते हो नहीं । कहानी प्रीतिकर इसलिये लगती है कि उसमें क्रमबद्ध सरसता तो होती ही है, कई बार उसमें हमारा जीवन ही चित्रित-सा लगता है । कहानी इसलिये भी
M
पथ-प्रदशिका बनकर उन्हें अपना वात्सल्य मौर में
बांटती थीं।
सन्त-सतियों के प्रति प्रापकी अनन्य श्रमावर र
भक्ति थी। सन्तों की सेवा में भाप अग्रणी रहती थीं।
पापको सामायिक और स्वाध्याय के प्रति विशेष रूम
थी । मापने अपने जीवन में कई प्रकार के त्याग और
प्रत्याख्यान ले रले थे। माप यादर्श तपस्विनी थी।
आपने कई मठाइयां, ग्यारह, पन्द्रह तथा मासामा
तपस्याएं की। ४ अगस्त १९८३ फो ७३ वर्ष की मा
में संयारापूर्वक मापका स्वर्गवास हमा।
मापके धर्मपरायण व्यक्तित्व और सेवाभावी जोगा
का प्रभाव आपके पूरे परिवार में परिलक्षिा होता
आपके तीनों पुम सब श्री गुमानगलजो बोरगा
(पूर्व अध्यक्ष श्री अ. भा. सायमार्गी जन गा)
उमरावमलजी चोरहिया एवं राजमननी नोरा:या तया
मुपुत्री श्रीमती प्रेमलता नलगा मामाका, माणित
शैक्षणिक तथा चिकिल्ला सम्बन्धी विवाहायाँ
एवं लोरल्याणकारी विधियों में प्राणी
मापके तीन पुर पर एक भी के मनाया नारी
गुक्त भरा पूल परिवार और वारा
जीवन्त प्रनोप है।
मापको मनति में प्रारक परिमाराnn
पुस्तक
के प्रकाश में जो शामिक माग
उसके लिए भी प्र. मा. गायमा नपामारी।
१०
कहानी की कहानी प्रिय बाल बन्धुप्रो ! मैं नहीं, दुनिया के सभी विचारक मानते हैं कि साहित्य की अनेक विधानों में कथा-कहानी की विधा ही बालकों को सर्वाधिकप्रिय विधा है । मेरी दृष्टि में तो बालकों की ही नहीं, बड़े- बूढ़ों एवं युवकों को भी कहानी अति प्रिय लगती है। मेरा अनुभव है कि साहित्य की अन्य विधानों से जो तन्मयता पैदा नहीं होती, वह कहानी से हो जाती है । कई बार ऐसी कहानी हाथ लग जाती है कि उसे पूरा पढ़े बिना छोड़ने की इच्छा ही नहीं होती है । मैंने बड़े बड़े विद्वानों, लेखकों, वक्तात्रों एवं श्रोताओं को लिखते- पढ़ते और सुनते देखा है । यही नहीं, बहुत से उच्च- कोटि के विद्वान् कहानी लेखक ही होते हैं । वे कहानी के अलावा और कुछ लिखते हो नहीं । कहानी प्रीतिकर इसलिये लगती है कि उसमें ग्रामवद्ध सरसता तो होती ही है, कई बार उसमें हमारा जीवन ही चित्रित-सा लगता है । कहानी इस लिये भी
अच्छी लगती है कि वह हमारे हृदय को सीधे हो?
उसमें करुणा, शौर्य, भावुकता एवं विह्वलता सभी :
सन्निहित होते हैं । यही कारण है कि सामान्य मुनिक
ही नहीं, विश्रु त विद्वान् आचार्य भी अपने उपदेश
कथा-कहानी के माध्यम से ही जन-जन के
विठाते हैं । यही नहीं, स्वयं भगवान महावीर ने मन
उपदेश-आगमों में अनेक आगम, कथा के रूप में
प्रतिपादित किये हैं।
के दम
यद्यपि कहानो सब प्रकार के व्यक्तियों को प्रभा
करती है, फिर भी बालकों की तो वह अपनी कि
थाती है । नानी से काहानी गुनने की परम्परा बाल
की सदा से रही है । बच्चों को कहानी सर्वाधिक नि
रही है ।
1
किन्तु मेद है कि आज कहानी की स्थिति विगः"
जा रही है । आज नानी की कहानी तो दूभर हो गई।
और वाल-पाट-युक्स के कप में जागी गनगनी दे
विकार भरी कहानियां का बोलबाला बढ़ गया है।
अभी प्रापको बताया कि कहानी गीचे हदय
हुती है। नानी की कहानियों में ये उदात-उदार
महान संस्कार होते थे कि वालकी के बोमल हृदय
गहराई तक चैट जाते थे। नानी कहानी के माध्यम
२
--.-.-.-
बालकों के हृदय में अपनी उदात्त पुरातन संस्कृति को उतार देती थीं उनमें धर्म प्रेम, देशभक्ति, चारित्र- निष्ठा, कर्तव्य पालन आदि के संस्कार समावेश पाते थे । इधर अाज की इन उपन्यास टाइप वाल-कहानियों में प्रायः धर्म-द्वप, चारित्र पतन, देश के प्रति गद्दारी, चोरी-डाकेजनी, व्यभिचार जैसे संस्कारों का बाहुल्य | रहता है । यही कारण है कि हमारी पिछली पीढ़ी जीवन-पतन के इन्हीं मार्गों पर गतिशोल हो रही है। अाज शहरी बस्तियों के प्रायः प्रत्येक बालक के हाथ बाल पाकेट बुवस देखने को मिल जाएगी, जिनसे उनका जीवन विपरीत संस्कारों से ग्रसित हो जाता है। --- -- यह हम जानते हैं कि बच्चों को कहानियां प्रिय होती है । फिर हम बच्चों के समक्ष ऐसी कहानियां भी प्रस्तुत कर सकते हैं, जो उन्हें जीवन के उच्चतम प्रादर्शों की पोर ले जाएं । उनसे हमारी संस्कृति के उदात्त संस्कारों का बीजारोपण तपा त्याग की भावनाओं का निर्माण हो सकता है। प्रिय बाल बन्धुनो ! एक ऐसी ही त्याग-प्रपान, बोप पूर्ण एवं रुचिकर कहानी आपके समक्ष प्रस्तुत है । इसके पीछे भावना एक ही है कि पाप इस कहानी के माध्यम से कहानी के प्रमुख पाम गुणचन्द्र की तरह गुणी ३
बनकर अपनी संस्कृति के प्रादर्श पथ पर चलने ।
- प्रयास करें।
यदि आपने इस कृति से कुछ भी शिक्षा-सरः
ग्रहण किये, तो मेरा श्रम सार्थक होगा।
..महावीर भवन,
-~-शान्ति
ब्यावर
उत्थानिका
प्रिय बालको! में अाज एक कहानी बताने जा रहा
हूं, जो बड़ी प्रीति कर, मजेदार साथ ही शिक्षाप्रद है ।
पाप जानते हैं, भारत की संस्कृति त्याग-प्रधान संस्कृति
रही है। हमारी इस संस्कृति में भोग की नहीं योग-त्याग
फी पूजा होती प्राई है। हमारी इस संस्कृति में राजा,
महाराजा एवं सत्ताधीशों को यह सम्मान कभी नहीं
मिला है, जो त्यागियों को मिला है । महावीर, राम
पण एवं चुद को जो सम्मान हमारी संस्कृति ने दिया,
वह उनके त्याग के कारण ही दिया है ।
घोर यह सर्वथा उचित भी है । प्राप जानते हैं ।
नहीं जानते हों, तो जानलें कि हमारे इस जीवन का
उद्देश्य मोक्ष के परम प्रानन्द को प्राप्त करना है, और
पह मिलता है त्यागमयी योग-पाधना के द्वारा हो ।
मनुष्य बाह्य वैभव मे जितना चिपका रहता है, उतना
यह त्याग-साधना से वंचित होकर भोग प्रवृत्त होता
है घोर उतनी ही मात्रा में मोक्ष के सच्चे और स्थाची
-
मानन्द से दूर होता जाता है । हम सभी यही चाहते। कि हमें जीवन में आनन्द ही आनन्द मिले, दुःो काले. कजरारे वादल हमारे जीवन पर नहीं मडराए सोने भोग की पोर नहीं, त्याग को प्रोर ही बना होगा। उसी के द्वारा हम सच्ची शान्ति, जो कभी कुटती नहीं, प्राय कर सकते हैं। तो अब आप समझ गये होंगे किहमारी गलने त्याग-साधना एवं त्यागी महापुग्यों को पीनों पूजनीय एवं वन्दनीय माना है, हमारे पगारों में ही महिमा के गीत क्यों गाये जाते या बार कोमल मानस में अच्छी तरस जमाने कि सम्ने सम्मका प्रमुख द्वार त्याग-मागेही प्रा: सुख-समृद्धि से भरे भय को मन में ठोकर मार कर त्याग-मार्ग की कठोर मापना पर निकलने से निश्चित ही पूजनीय-अभिवादनीय वन जाने । महापुमा हमारे सामने उच्चतम माविकार जाते हैं। प्रतएव उन देशार मागमणिो श्रद्धा से मर जाता है। हमारा मन पदार उन्हें कोटि-कोटि पनावाद देने को नानागिन उठता है। इम त्याग- माने सोय ! उनमें दो , हैं, एक सय पायाम पौराग सर्वस्व का त्याग करने वाला पन, बगर, सा, ६
मकान, जमीन सभी कुछ छोड़कर अकिंचन साधु वन
जाता है । उसका न कोई घर-द्वार होता है और न कोई
परिवार । सम्पूर्ण संसार उसका घर होता है और
प्राणिमात्र उसका परिवार । सही अर्थो में वह सर्वस्व
का त्यागी छोटे से घर-परिवार के दायरे से ऊपर उठकर
समस्त जगत में प्रात्मीय भाव का निर्माण कर अपने
जीवन को विराट् एवं महान् बना लेता है । ऐसे सर्वस्व
के त्यागी का अपना कोई मठ-मन्दिर अथवा घर नहीं
होता है । इसीलिये जैन शास्त्रों में उसे "अनगार" कहा
गया है । श्रनगार का अर्थ है प्रागार याने घर से रहित
और जिसका कोई घर नहीं, उसका परिवार से हो
सकता है ? ऐसे ही सवत्यागी महापुरुषों को सस्त, साधु,
मुनि, सन्यासी, महात्मा श्रादि शब्दों से सम्बोधित किया
जाता है ।
दूसरी कोटि का अल्प त्याग करने वाला प्यक्ति
सम्पूर्ण चं भय एवं परिवार का त्याग नहीं करता है ।
फिर भी वह हिंसा, झूठ और पोरी जैसे बड़े-बड़े पापों
को छोरता है। अपना जीवन नैतिक एवं व्यवस्थित
बनाता है, जिसे हम सद्गृहस्थ अपवा जैन परिभाषा से
अनुसार श्रावक कहते हैं । मुनि प्रयवा सर्वत्यागी पांच
महायतों को स्वीकार करता है, तो सद्गृहस्प अथवा
मायक गुट होटे-छोटे नियमों-प्रतों को स्वीकार करता
है, जिन्हें अणुमत कहा जाता है ।
चूकि गृहस्थ जीवन में रहने वाला व्यक्ति पूर्ण
अपरिग्रहो नहीं होता है, अतः परिग्रह को सोमा-गर्यायः
करता है है और अधिक धन का त्याग-दान करता है।
उसकी साधना के चार अग बताए गए हैं -दान, शोल,
तप और भाव ।
के
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इनमें सबसे पहला अंग है दान । दान के महत्व
विषय में अाप भली प्रकार से जानते होंगे कि दान जिसे
हम त्याग भी कहते हैं, भारतीय जन-जीवन का अषि-
भाज्य अंग है । उपनिषदों में 'अतिथि देवो भव' के
में अतिथि-सेवा का बहुत महत्त्व बताया गया है।
भगवान् महावीर ने सदगृहस्थ को चर्या के बारह यतों
में अन्तिम व्रत को अतिथि संविभाग त नाम दिया
है । सद्गृहस्य के जीवन में अपने भोज्य पदार्यों में
प्रतिधि का भी सविभाग होता है। अत: मालमतस्यों के
द्वार सन्त, महात्मा एवं दीन युतियों की सेवा के लिये
सदा गुले रहते हैं। वे अतिथियों एवं दीन-दुणियों की
वा करके बहुत प्रसमता का अनुभव करते,
पाप को धन्य समगते हैं।
अपने देश के गांव निकामको जमाकर,
तो हमें भास होगादे, मेंगपी दानवीर
हैं, जिन्होंने समय पड़ने पर दोन-तीन जा 4
किस प्रकार अपने भाडार सय दिये थे। में आपका
यक्ति ऐसे ही दानवोर किशोर की कहानी सुनाने जा रहा हूं,
मा. जिसने दो सौ रुपये प्रतिदिन दान को प्रतिज्ञा लेकर किस
करलाई प्रकार उसे निभाया पोर अन्त में कितनी समृद्धि का
न. स्वामी बन गया । तो पाए', प्रव हम कथा की ओर ही
चलें ।
--
(१)
बात कुछ पुरानी है । एक नगर था । बहुत समृद्ध,
बहुत रमणीय एवं मनोरम । नाम था उसका वसन्तपुर ।
यथा नाम तथा गुण की उक्ति के अनुसार वहां की जनता
इतनी खुशहाल थी कि वहां सदा वसात को वहार को
तरह सरसजता एवं प्राह्लादकता छाई रहती थी । वहां
की जनता पाप भीर एवं धर्माभिमुख थी, तो राजा
प्रजावत्सल एवं न्याय प्रिय । उस नगर में अपराध बहुत
फम होते थे श्रोर यदि इसके-दुपके अपराधी पकड़े जाते,
तो राजा उन्हें ऐसे मनोवैज्ञानिक ढंग से शिक्षा देते कि
वे पानी-पानी हो जाते और सहज रूप में अपराध प्रवृत्ति
छाए देते । इस प्रकार समस्त प्रजा भय और प्रांतक से
मुक्त थी । श्राप जानते हैं, जहां भय और प्रांतक नहीं
होते हैं, वहां धर्म-साधना एवं परमात्मा-मक्ति की भावना
सहज ही उत्पन्न हो जाती है ।
चूकि राजा और प्रजा सभी धार्मिक वृत्ति से सम्पन्न
थे, अतः वहां धर्म गुरमों-महात्मानों का प्रागमन भी
-
होता रहता था । प्रजा एवं स्वयं राजा भी कर
महात्माओं के परम भक्त थे। उनके सदुपदेश का मर
लाभ उठाते एवं उन उपदेशों को जीवन के प्रागरस
उतार कर आत्म-साधना एवं भक्ति-भावना के हा
आत्मा को पवित्र बनाने का प्रयास करते रहते ।
एक वार एक उच्च कोटि के त्यागी एवं विध
विद्वान् जैन प्राचार्य श्री विमल कीर्ति का बसन्तपुर ना
में अपने शिष्य-परिवार सहित पदार्पण हुप्रा । ये ना
के बाहर एक उद्यान में विराजित हुए ।
मुनि दर्शन एवं धर्म-प्रवचन श्रवण के लिये जना
उमड़-घुमड़ कर जाने लगी । प्राचार्य श्री के धामि
प्रवचन होने लगे । प्रवचन इतने सुबोध एव मर्मस्पा
होते कि जनता का पाकर्षण बढ़ता गया और ऊपनी
एवं जाति-सम्प्रदाय के भेद छोड़कर प्रवचन में उपस्यि
प्रतिदिन बढ़ती जाती । लोग केवल प्रवचन गुनरो
नहीं, उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास भी का
और दुष्प्रवृत्तियों के त्याग एवं नियमित धर्म-साधना
अनेक प्रकार के संकल्प भी ग्रहण करते । प्रत्येक गई
यथा-शक्ति कुछ न कुछ त्याग-संकल्प लेकर ही जात'
एक दिवस प्राचार्य प्रवर का प्रवचन बारा मई
चल रहा था । प्रवचन का विषय था-दान धर्म
महत्त्व । प्रवचन विश्लेषणात्मक एवं मर्मस्पर्शी या
श्रोता चकोरवत् मन्त्रमुग्ध हो गुन रहे थे ।
।
प्राचार्य प्रवर दान का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करते ए कह रहे थे- 'दान देने वाला व्यक्ति दान-पात्र को ता कम है, बल्कि लेता अधिक है । एक-दो रुपये का मान प्रतिदान के रूप में हजारों रुपये का प्राशीर्वाद साप्त करता है । दान लेने वाला व्यक्ति न जाने कितनी तुम भावनात्रों का सम्प्रेषण करता जाता है । इस प्रति- पान के अतिरिक्त दान का सबसे बड़ा लाभ है-ममत्व पाव अथवा प्रासक्ति भाव का छूटना । हम जितनी मात्रा में दान करते हैं, उतनी मात्रा में उस सम्पत्ति के ति हमारा ममत्व समाप्त होता है, जो कि मुक्ति-साधना के लिये आवश्यक है । स दान का गम्भीर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण सुनकर सभी श्रोता गद्गद् हो गये । प्रायः सभी ने यथा शक्ति कुछ पुछ प्रतिदिन दान देने का संकल्प लिया। उसो सभा में नगर-ध्रप्ठ श्री धनबाद का सुपुत्र गुणचन्द्र उपस्थित पा । गुणचन्द्र प्रमी १८ वर्ष का युवक ही पा, किन्तु या वह यथा नाम तथा गुण-सौम्य-शान्त एवं प्रति से प्रतिभद्र । चेहरे पर रूप लावण्य के साथ चन्द्र-सी शीतल- कान्ति बललती थी । जीवन व्यावहारिक गिक्षण के साथ प्राध्यात्मिक-धार्मिक शिक्षण एवं संस्कारों से भी सुसज्ज पा । वह अपने शैणव काल से ही सन्त-महात्मामों के प्रवचनों का लाभ लिया करता था । प्राज के प्रवचन
ने उसके जीवन में एक क्रान्तिकारी परिवर्तन ला दियः
प्रवचन का चातकवत-तल्लीनता से रसास्वादन करते
हुए वह भावविभोर हो गया । उसकी हृदय-वीणा के
तार झनझना उठे । प्रवचन समाप्ति के उपरान्त कर
एक गहरे चिन्तन में डुबकियां लगाने खगा । उस
चिन्तन'का मुख्य केन्द्र था-अपनी सम्पत्ति का सम्बर
उपयोग । वह सोचने लगा-"मेरे पिताजी के पास
करोड़ों की सम्पत्ति है और मैं उनकी इकलौती सन्तान
हूं। आखिर उस सम्पत्ति का उपयोग क्या होग? मी.
अभी 'प्राचार्य प्रवर ने फरमाया कि सम्पत्ति के तीन
उपयोग हैं-दान, भोग और नाश । सम्पत्ति का श्रेष्ठतम
उपयोग है-उसका परमार्थ में, परोपकार के कार्यों में
उपयुक्त होना । उसके पश्चात् उसका उपयोग है भोग
अर्थात अपनी व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं में उसे लगाना ।
इन दो के अतिरिक्त फिर उसका विनाश ही होता है।
अस्तु मुझे अब आज से अपनी सम्पत्ति का श्रेष्ठतम का
परमार्थ में उपयोग करना चाहिये । अन्यथा यह भण्डा
में भरी पड़ी रह जाएगी और हम संसार से चले
जाएंगे।"
गहरे चिन्तन में खोए-खोए उसे ध्यान ही नहीं रहा
कि अन्य सभी श्रोता प्रवचन-स्थल से प्रस्थान कर गरे
हैं । केवल दो-एक व्यक्ति प्राचार्य श्री के समक्षा ग कुछ
नियम ग्रहण कर रहे थे । वह चौंकता हमा-सा उठा और
मन ही मन कुछ निपचय करता हुप्रा प्राचार्य प्रवर के
: समीप जा खड़ा हुया । तब तक वे श्रोता भी. जो कुछ
। नियम ग्रहण कर रहे थे, जा चुके थे । प्रत्यन्त विनम्रता
पूर्वक वन्दन पार गुणचन्द्र ने प्राचार्य प्रवर मे निवेदन
किया-"भगवन् ! अापके पान के प्रवचन ने मेरे
मानस को अत्यन्त प्रभावित किया है । दान की इतनी
मनोवैज्ञानिक विश्लेषणा भने प्रथम बार ही सुनी है ।
प्राज मेरा हृदय उत्प्रेरणा से भर गया है। मेरे मन में
संकल्प जागृत हुप्रा है कि मुझे भी प्राप्त अवसर का कुछ
लाम उठा लेना चाहिये । प्रत: भगवन् ! घाज मुझे
प्रतिज्ञा करवा दीजिये कि जब तक मेरे पास सम्पत्ति
रहेगी, अथवा सम्पत्ति पर मेरा अधिकार रहेगा, मैं
२००/-रुपये प्रतिदिन दान करूगा ।"
प्राचार्य प्रवर ने युवक गुणचन्द्र की भावनाशीलता
को समझते हुए उसका परिचय प्राप्त करने की जिज्ञासा
की।
गुणचन्द्र ने बड़े शालीन शब्दों में परिचय देते हुए
कहा-"भगवन्, में यहां के नगर अंप्टि श्री धनचन्द्र
का पुष हूं। मेरे पिताश्री घसूट सम्पत्ति के स्वामी हैं और
नगर के प्रतिष्टित पत्तियों में गिने जाते है । अपने
पिता की इकलौती सन्तान होने के नाते उनपी समस्त
चल-अचल सम्पत्ति का उत्तराधिकारी में ही हूं । प्रतः
मैंने विचार किया कि यह छोटी-सी प्रतिज्ञा में अच्छी
तरह से निभा सकूगा । फिर पिताश्री के पास इतना
वैभव है कि मैं ही नहीं, मेरी सात पोड़ी बैठे-बैठे साए,
तो भी समाप्त न हो । इसलिए प्रापश्री बिना किसी
संकोच के मुझे यह प्रतिज्ञा करवा सकते हैं।"
आचार्य प्रवर ने कुछ समझाने के स्वरों में कहा-
"आप का कहना यथार्थ है कि आपके पिताश्री बहुत
श्रीमन्त है । किन्तु श्रीमन्त होने मात्र उदार वृत्ति प्रा
जाय, यह आवश्यक नहीं है । बहुधा देखा यह जाता है
कि अधिक धनवान व्यक्ति प्रधिक कंजूस होता है । धन
संग्रह करना उसकी तमन्ना होती है । किन्तु संग्रह के
साथ कृपणता का दुर्गुण भी बढ़ जाता है । मैं यह नहीं
कहता कि आपके पिताजी भी इसी श्रेणी के होंगे ।
किन्तु किसी भी, प्रतिज्ञा के पूर्व अपनी क्षमता का
निरीक्षण अवश्य कर लेना चाहिए। भावुकतावश
द हो जाना अलग बात है, और उसका पूरणं
से पालन कर लेना दूसरी बात । अतः पाप भावा-
वेश में न पाकर कुछ गहराई से चिन्तन करने के पश्चात्
ही प्रतिज्ञा प्रयवा नियम ग्रहण करें। वैसे प्रापकी
भावनाशीलता एवं संकल्पशीलता से मैं बहत प्रसम
ammar
गुणचन्द्र ने पुन: द्धता भरे स्वरों में निवेदन किया-
"गुरुदेव, मैंने इस विषय पर बहुत गम्भीर विचार किया
मैं
है और इसके पश्चात् ही श्री चरणों में उपस्थित हुप्रा
हूं। मैं जितना भावनाशील हूं उतना रढ़ चित्त भी । फिर
में प्रतिज्ञा ही इस रूप में ले रहा हूं कि जब तक मेरे
अधिकार में सम्पत्ति रहेगी तब तक में २०० रुपये प्रति-
दिन दान दूंगा । जिस दिन मेरे पास पैसे नहीं होंगे,
नहीं दूंगा । हां, मैं अपने भोजन-वसन की चिन्ता वाद
में करूंगा। पहले अपनी प्रतिज्ञा का ख्याल करगा।
श्रतः पापश्री मुझे यह प्रतिज्ञा सहर्ष करवा दें। साथ ही
यह आशीर्वाद भी प्रदान करें कि मैं अपने संकल्प के
पालन में पूर्ण सफलता प्राप्त फरू ।"
प्राचार्यश्री ने युवक गुणचन्द्र फी दृढ़ता देखकर उसे
दो सौ रुपये मूल्य के किसी भी दान योग्य पदार्थ के दान
की प्रतिज्ञा करवा दी।
गुणचन्द्र प्रसन्नवदन घर लौट गया। दूसरे दिन
प्रातःकाल उसने अपनी धार्मिक प्राराधना की नित्य
निया से निवृत्त हो, माता-पिता को प्रणाम किया और
मुनोमजी से तिजोरी की चाबी मांगी । तिजोरी से
दो सौ रु० निकाल कर वही में घर खर्च पाते के रूप
में लिख दिया। बाजार जा कर दो सौ रु० के कुछ साध
पदार्थ एवं कुछ वस्त्रादि सरीद लिये घोर एक दिमा में
बद पर मार्ग में कोई भी दीन-दुःसी मिक्षुक, लूला, ,
लंगड़ा-अपंग व्यक्ति मिला, उसे उसकी घावश्यकता-
नुसार पदापं दिया पोर मागे बढ़ गया । इस प्रकार घंटे
44ner भर में अनेक दुःखियों की दुआएं लेकर लौट पाया। इसी क्रम से वह प्रतिदिन दान देने लगा। काम औषधालयों की ओर चला जाता और गरीब मरीजों को औपघि एवं पथ्यादि पदार्थ दे देता, तो कभी विद्यालयों की ओर बढ़ जाता और गरीब विद्यापियों को अध्ययन सामग्री-पुस्तक-कापी कलम एवं विद्यालयो. यपोशाक मादि के द्वारा मदद देता । इस प्रकार चन्द दिनों में ही गुणचन्द्र की ख्याति द्वितीया के चन्द्र में तरह निरन्तर बढ़ने लगी। चारों तरफ गुणचन्द्र की है। चर्चा सुनाई पड़ने लगी । वसन्तपुर ही नहीं, भनेर निकटवर्ती ग्रामों एवं कस्बों में गुणचन्द्र की गुण-कीति फैल गई । दूर-दूर के अभाव-ग्रस्त लोग दान-प्राप्ति हेतु वहां पहुचते और मनोवान्छित प्राप्त होने पर गुणचन्द्र का यशोगान करते हुए लौट जाते । स्थिति यहां तक वन गई कि यानक-भिक्षुक समय- असमय गुणचन्द्र की दुकान पर पहुंच जाते । इसमें मुनीमों को परेशानी होने लगी। एक दिन मुख्य कर्मचारी (हेड मुनीमजी) ने विचार किया-मासिर इतने भिसारी यहां क्यों ग्राने लग गये हैं ? और गुणनन्द्र जी की प्रशसा के इतनं पुल क्यों बांधते हैं ? इसी चिन्तन में सोए-गाए सहमा उनको प्टि वहीं के उन पृष्ठों र पड़ी जिन पर २००म० प्रतिदिन घर रानं खाते में लिये हुए थे और वे गुणचन्द्र की हस्तलिपि में ही लिये MAR १६
गए थे । देखकर मुनीमजी चौंक उठे । वे सोचने लगे-
यथा गुणचन्द्रजी दो सौ रुपये प्रतिदिन इन भिखारियों
को लुटा देते हैं ? इस प्रकार से तो ये कुछ वर्षों में ही
सेठजी का दिवाला निकाल दंगे और वदनाम में हो
जाऊंगा कि ऐसा मुनीम था जिसने सेठजी का दिवाला
निकाल दिया........। नहीं, मैं यह सब सहन नहीं
करूंगा । मुझे सेठजी को सावधान कर देना होगा।
बाल को, पाप जानते ही हैं कि जिसके सोचने की
जितनी क्षमता होती है, वह उतनी ही दूर की सोच सकता
है । संकुचित विचारों वाला व्यक्ति दूर की कैसे सोच
सकेगा ! मुनीमजी बेचारे यया जाने कि दान देने से
कभी दिवाला नहीं निकलता । दिवाला निकलता है
घन का जुग्रा, मांस-शराब, प्रादि दुव्यसनों में उपयोग
करने से । दान दिया हुप्रा द्रव्य तो दस गुणी शक्ति
लेकर पुन: या जाता है ।
पाखिर अपने छोटे दिमाग में मामाग्य विचार कर
मुनीमजी ने गुणचन्द्र को ही समभाना उपयुक्त समानाकर
उन्हें दुकान पर बुलवाया धीर पूछा--- 'पुछ दिनों से
दो सी २० प्रतिदिन पर सपं साते में लिये गए हैं । गया
ये पापने ही लिरोहै ? इनका उपयोग माप जिन कार्यों
में करते है ?"
गुणचन्द्र ने सहज स्वर में कहा-"मुनीमजी मैंने
।
आचार्यश्री से दो सौ रुपये प्रतिदिन दान देने की प्रतिमा
ली है । अतः ये दो सौ रुपये में प्रतिदिन दीन-दुनियों
की सेवा में लगाता हूं।"
मुनीमजी ने गुणचन्द्र की प्रतिज्ञा की बात सुनो, तो
हतप्रभ रह गए। दो सौ रुपये प्रतिदिन दान की बात
उनकी कल्पना के भी बाहर थी। वे सोच ही नहीं सरसे
थे कि ऐसा भी कोई कर सकता है । और बात ही मु
ऐसी है । उस युग में दो सौ रुपये बहुत बड़ी कीमत
रखते थे । आज जो रुपये का मूल्य है, उस अनुपात में
उस समय के रुपये का मूल्य सौ गुना अधिक माना जा
सकता है । अर्थात् उस समय का दो सौ रुपया प्राज के
वीस हजार (२०,०००) के बराबर होगा । मग माप
ही विचार करें प्राज के हिसाब से बीस हजार का प्रति.
दिन दान कोई सामान्य बात है ! वेचारे मुनीमजी घबरा
उठे, तो इसमें पाश्चयं ही क्या है ?
हां, तो मुनीमजी ने गुणचन्द्र को बात सुनकर उसे
समझाते हुए कहा-"देगो, गुणचन्द्रजी, कभी-कभी
दस-बीस रुपये का दान कर देना अलग बात है कि
रोजाना दो सो रपये दान कर देना उनित नहीं है।
कमाना कोई हंसी-मेल नहीं है जो उसे इस प्रकार
लुटाया जाय । अाज तक जो दिया, मो दिया। आय कम
से पाप यह राय बन्द कर दें अन्यथा में मेट माहम को
शिकायत कर दूंगा।"
गुणचन्द्र ने गान्त, किन्तु दृढ़तापूर्ण शब्दों में कहा-"मुनीमजी, मैंने प्रापको अभी बताया है कि मैंने प्राचार्यश्री से यह संकल्प ले लिया है । अतः इस प्रतिज्ञा का पालन में प्राण-प्रण से करूंगा। रही धन कमाने की वात, सो इस विषय में प्रापको चिन्तित नहीं होना चाहिये। पिताजी के पास धन की कोई कमी नहीं है। पाखिर यह करोड़ों की सम्पत्ति किस काम पाने वाली है ? खाने वाला तो मैं अकेला ही हूं ! अतः शुभ कार्यों में इसका जितना उपयोग लिया जा सके, ले लेना पाहिये ।" - "देखिये गुणचन्द्रजी, मैं प्रापको सही कह रहा हूं। पापका यह हठाग्रह ठीक नहीं है । दो सौ रुपये रोजाना दान की कोई प्रतिज्ञा नहीं होती है और न ऐसी प्रतिमा निभायी हो जा सकती है । प्राप सीघी तरह से समझ जाएं, तो अच्छा है, नहीं तो मैं सेठ साहब से कहकर यह सब बन्द करवा दूंगा!" मुनीमजी ने कुछ प्रादेश- भरे शब्दों में कहा । गुणचन्द्र ने मुनीमजी से अधिक बहस करना उचित नहीं समझा । 'घाप जैसा उचित समझे, परें । मैं अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ सकता हूं।" कहकर चल पड़ा। गुणचन्द्र ने तो अपना एक निश्चय बता दिया, किन्तु १९
इधर मुनीमजी का पारा एक सौ पाठ डिग्री तक पहुंन
गया। वे तुरन्त उठे और चाबियों का गुच्छा लेकर सेठ
धनचन्द्रजी के पास गए । क्रोध में भन्नाते हुए उन्होंने
चाबियों का गुच्छा सेठजी के सामने फेंकते हुए कहा-:-
"सेठ साहब, सम्भालिये अपनी दुकान । मुझे यहां
नौकरी नहीं करनी है ।"
?
सेठ धनचन्द्र एकदम चौंकते हुए मुनीमजी की प्रोर
देखने लगे । मुनीमजी के चेहरे पर उभरी प्रावेश की
रेखाए उन्हें स्पाट दिखाई दे रही थीं । शान्त भाव से
उन्होंने कहा-"मुनीमजी, बात क्या है ? पाप गाज
इतने उग्र क्यों हो रहे हैं ? क्या किसी ने कोई अपमान
किया है ?'
"सेठ साहब, मान-अपमान की बात नहीं है। मुझे
ऐसी जगह नौकरी नहीं करनी है, जहां का मालिनी
अपना दिवाला निकालने की योजना बना कर अपनी
सम्पत्ति लुटा रहा हो । अापने कंबर साहब (गणनाद)
को अपनी सम्पत्ति का बड़ा अहंकार हो गया है। वे गले
हाथों धन लुटा रहे हैं । समकाया, तो कहते हैं- 'मैने
प्रतिज्ञा की है, इसलिये दो सौ रुपमा रोज टागा।"
मैं ऐसी जगह नौकरी यसपनी प्रतिष्टा नहीं गौना
चाहता हूं । प्रापिर प्रापणी गम्पनि कोई धेरका
भण्डार तो है नहीं जो कभी गमानी न हो। ग
प्रकार लुटाने से तो बुर का मार भी गाली ही
-
जाएगा । और कल यदि प्रापका दिवाला निकल. गया,
तो वदनाम में ही होऊंगा। लोग कहेंगे कि सेठजी के
मुनीम ने उनका दिवाला निकालवा दिया...।" सेठजी
की बात पूरी सुनने में पूर्व ही मुनीमजी ने अपना प्रावेश
उगल दिया।
सेठजी ने हल्के -- से मुस्कराते हुए कहा-"अच्छा !
तो प्रापका यह प्रोघ गुणचन्द्र पर है ! इसमें क्रोध की
पया घात है ! अरे, यह तो निरा बालक ही है !
अठारह वर्ष का हो गया है, तो यया हुया ! है तो वच्चा
ही । उसे समभाने में क्या लगता है ! लगता है श्राप
भी उसके साथ बच्चे बन गए हैं । बच्चे तो हठ किया
ही करते हैं । उनका ह कितने समय का ? उनके साथ
प्राप यदि ऐसे प्रावेश में प्रा जाए, तो यह बचकानापन
ही होगा। अनछा, पाप जाए । चाबियां यहां देने को
प्रावश्यकता नहीं है। मैं अभी गुणचन्द्र को बुलवाकर
समझा दूंगा।
मुनीमजी फुरल शर्मिन्दा होते हुए मे चले गए।
गेटजी ने एक नौकार को भेजकर गुणचन्द्र को वुल्न वाया ।
गुणचन्द्र पिताजी की प्रामा पाकर शीघ्र चला
पाया । पिताजी को भिवादन-प्रणाम कर सड़ा हो
गया । रोटनी ने उसे प्रति स्नेह से अपने पास बिठाया
पौर गिर पर सार भरा हाथ फिराते हुए मधुर शब्दों
में महा ... "जयों बेटा घाज पाल गया पर रहे हो ?
-
चारों तरफ से तुम्हारी बड़ी प्रशंसा सुन रहा हूँ । प्रातिर
इस प्रशंसा का कारण क्या है
विनम्र शब्दों में गुणचन्द्र ने कहा -- "पिताश्री,
विगत कुछ दिनों से प्राचार्य श्री विमलकीति के प्रासन
सुनता रहा हूं। एक दिन प्राचार्य श्री ने अपने प्रवचन
में दान-धर्म की गम्भीर व्याख्या की और उससे होने
वाले अदृश्य लाभ बताए । मेरे मन में भी दान की
भावना जागृत हुई और मैंने उनसे दो सौ रुपये प्रतिदिन
दान देने की प्रतिज्ञा ले ली। तब से मैं प्रतिदिन दो सौ
रुपये दान में लगाता हूँ। चारों तरफ फैल रही प्रशंगा
का मुख्य कारण यही हो सकता है।'
"प्रच्छा ! यह बात है गया ! बेटा, दान देग
वहुन अच्छी बात है। हर व्यक्ति को अपनी सामथ्र्य में
अनुसार देना ही चाहिये किन्तु इसकी कुल सीगा भी
होती है। प्रसंग पाने पर और उचित पाम के समय
होने पर पांच हजार का दान भी दिया जा सकता है
और गमुचित पाम अभाव में एक पेसा भी नही देना
उचित है । अतः यह नियम तो उगा नहीं जमा कि
दो मोसाये प्रतिदिन दिया जाय ।गर में नो
पायापाप का विगारही नहीं होगदो गो
रुपये देने हैं, चाहे को भी टाक्ति माने हो।" गेरी
ने सममाने के स्वर में यहा ।
२२
"नहीं पिताजी, ऐसी बात तो नहीं है । उचित पात्र
का चयन करना तो अपने हाथ में है । हम यदि पात्रता
को परख कर ही देंगे, तो हमारा दान अयोग्य पात्र के
हाथों में कैसे जाएगा ?'
।
"तो फिर बेटा, हमें प्रतिदिन पात्रों की खोज करनी
पड़ेगी। उन्हें टू ढ-टूढ़कर उनकी आवश्यकतानों की
पूति करनी होगी। वेटा, ऐसा नियमवद्ध कोई दान नहीं
होता है । जो दान-पान हमारे सामने प्रा जाए, उसे कुछ
दे दो, यही बहुत है । प्रतिदिन दो सौ रुपये का प्राग्रह
रखना उचित नहीं है और ऐसा जीवन पर्यन्त करना
सम्भव भी नहीं है । इस प्रकार तो कुबेर का खजाना
भी खाली हो जाएगा । अपने पास तो सम्पत्ति है ही
कितनी ? प्रतः प्राज तफ दिया, सो दिया। प्रव से
यह
दो सौ रुपये का प्राग्रह छोड़कर जब कोई पात्र प्राजाए,
पोड़ा-बहुत सहयोग कर देना, समझे !" सेठजी ने
निर्देशात्मक समझायिश दी।
-
-
पिताजी की वात गुणचन्द्र के गले नहीं उतरी ।
उसने कहा, पिताजी, भापकी बात मेरी समझ में
नहीं घाई । मैंने अभी प्रापसे निवेदन किया कि मैंने
पापानी से नियम ले लिया है और नियम भी उन्होंने
बहुत समभाकर तपा मेरी सारी परिस्थिति को सुनकर
दिया है । पब मैं इस नियम को भंग कैसे कर सकता
?
हूँ? मैंने प्राचार्य प्रवर को विश्वास दिलामा या
जब तक मेरे पास धन होगा, अथवा मैं सम्पत्ति
अधिकारी रहूंगा, खाने की परवाह नहीं करने पर
दान दंगा और इस प्रकार प्रतिज्ञा को प्राण-प्रण
निभाऊंगा । अतः प्रव इस प्राग्रह को छोड़ने का
प्रश्न ही नहीं उठता। फिर अपने पास धन की में
ही क्या है ! करोड़ों का धन है । हजारों को प्राय
और खाने वाला तो मैं एक ही हूँ। जब तक
देकर इसका लाभ क्यों न उठालें ? मैं तो पाप
यही निवेदन करगा कि पाप भी अपने धन का
हस्त से परमाणे हे कार्यों में उपयोग करें, इसी:
लाभ है।"
सेट बनानन्द्र हो भी कुछ-कुछ कामेश का वर?
लगा । उन्होने कहा-"बेटा ! तुम तो बरा होशिया
हो गए हो । मुम ही मीरा देने मगे हो । किन्तु मा
सगो, यो मुह बड़ी बात नहीं करनी चाहिए ।
अभी मेरो पापको समझने वयानी ? तुम में
बी हो ग पर ही जामा यो मारना
तव को गोवा कर चार गोदान का
करेगा । सभी तुझे काम माती, प्रो
उदाने घलेहा मरे रहा यह गबना गाना ।"
"पिताजी, आप यह है कि में पंग
रहा हूं। मैं किसी दुव्र्यसन में पैसे समाप्त करता, तो
प्रापका यह प्राक्षेप उचित माना जा सकता था.। किन्तु
मैं कभी किसी दुर्व्यसन का सेवन नहीं करता । प्रतः
प्रापका यह प्राक्षेप सर्वथा अनुचित एवं निराधार है ।
मैं जो कुछ पैसे खर्च कर रहा हूँ, वह परमार्थ के कार्य में
लग रहा है, और प्राचार्यश्री ने प्रवचन में फरमाया था
कि परमार्थ में खर्च किया हुअा द्रव्य दस गुरणी शक्ति के
साथ पुनः प्राप्त होता है । प्रतः कृपा करके श्राप यह
विचार निकाल दे कि दान में दिया गया पैसा निरर्थक
जा रहा है । वह तो उल्टे अपने प्रागामी जीवन का
राजाना भरा जा रहा है ।
"फिर प्राप और भी विचार करें। अपने पास इतनी
सम्पत्ति है। घाखिर उसका उपयोग क्या है ? यदि
इसका हम सही दिशा में उपयोग नहीं करते हैं, तो क्या
हम उसके चौकीदार ही नही है ? पिताजी ! एक बात
स्पष्ट निवेदन फर हूँ। जब तक में इस घर में रहूंगा
पौर मेरा यहां कुछ भी अधिकार रहेगा, मैं दो सौ का
दान दिये बिना संसार का कोई काम नहीं करने वाला
।"
सेठ पनचन्द्र अपने विनीत एवं सुनील पुत्र की इस
प्रकार के नियम के प्रति रखता देखकर दग पे, दूसरी
ओर हठवादिता, पर युद्ध भी। उन्हें समझ में नहीं मा
रहा था कि युक्ति-संगत सड़ता पर गवं किया जा
हठवादिता पर आक्रोश ! एक तरफ जगमा पिमन,
दूसरी ओर श्रेष्ठि-मन । पितृ-मन कहता कि पुर
कह रहा है । सम्पत्ति यहीं रह जाने वाली है। म
लाभ लिया जा सके, ले लेना चाहिये । गुपुम बार
एक तर्क पितृ-मन को प्रभावित कर रहा है। दूसरी
श्रेष्ठि-मन पाकर सड़ा हो जाता है । उसका तर,
पुत्र प्रमी समझता ही क्या है ? इसे पमा पarit
कैसे कमाया जाता है ? चोटी का पसीना ऐो
बहता है, तब कहीं पैसा कमाया जाता है। और इ
श्रम से उपाजित पंसा क्या इस तरह खुटाने
लिये है ?
फिर पितृ-गान बोल उठता है-नहीं, पर ठीक
रहा है । वह किसी दुर्यसन में तो पैसा नहीं उठा
है ! वह तो दोन-दु:गियों को मेवा में लगा रहा।
उड़ाना कसे यहा जा सकता है ? नहीं, पर मा
नहीं रहा है, उसका सही उपयोग कर रहा है।
को धन्यवाद देकर मोने से लगा लेना चाहिण । यद
प्रांखें गोल दे रहा है ।
फिन्तु घोष्ठि-मन अपनी पराना मानने को
तैयार है ? यह करना है, दस घोटे मे कनर
की बात में कैसे मानन? या वान होता
?
ने वाला ? और फिर प्राज इसकी बात में प्रा गया
दो पल यह मनमाने तरीके से पैसा बरवाद करने लगेगा
और घोड़े दिनों में ही मेरी सारी सम्पत्ति समाप्त हो
एगो । यह ठाठ पीर यह प्रतिष्ठा समाप्त होते देर
हीं लगेगी । नहीं नहीं । मैं ऐसा कभी नहीं होने
गा। इस नादान का अधिकार ही क्या है मेरी कमाई
। समाप्त करे ! बड़ा दानवीर वन रहा है। दानवीर
नना है तो पहले परिश्रम करे । पैसा कमाए फिर दान
। बच्चू फी घोटे ही दिनों में नानी याद आ जाएगी।
सा कमाना कोई सहज बात नहीं है । लाखों लोग
पारे दर-दर ठोकर खाते फिरते हैं, जी जान से श्रम
रते हैं फिर भी पूरी गृहस्थी भी नहीं चला पाते । पैसे
माएगा, तब पता चलेगा लल्लू को !
.
इस विचार-मायन में पासिर श्रेष्ठि-मन ने परास्त
र दिया पितृ-मन को । सेठजी का पोष तीव्रतम हो
ग पे प्राग बबूला हो बोल उठे.---"अरे नादान तू
हासके सामने बोल रहा है, तुझे पता भी है-तू अपने
अपको बड़ा धर्मात्मा समझ रहा है ! बड़ा दानवीर
नेि जा रहा है ! दानवीर बनना है तो पहले हाथों से
गाना सीख, फिर देना दान । खबरदार, मेरी सम्पत्ति
से एका पैसा भी उठाया तो । बाबू साहब को इतना
त से समभा रहा ह, घोर पाप सिर पर चढ़े जा रहे
! मुझे उपदेश मारने लगे हैं ! मुझे तुम्हारे उपदेश
की जरूरत नहीं है".....। जाओ अपना काम करो
और हां, ध्यान रखना पाज से तुम्हारा यह दातारी के
लिये घूमना-फिरना सब वन्द है । सुबह से शाम तक मेरे
साथ रहोगे और दुकान के कार्य में सहयोग दोगे।"
कहते हुए सेठजी उठ खड़े हुए ।
गुणचन्द्र दिग्मूढ़ सा बैठा ही रहा । उसने शिानी
का यह रौद्र-मयावना रूप प्राज पहली बार हो देश
था । इसके पूर्व पिताजी ने कभी उसे तक नहीं ?
पा । उसकी हर इच्छा कहने से पूर्व ही पूरी हुई हो।
कभी किसी भी वस्तु के लिये जिद नहीं करनी ही
थी। किन्तु प्राज!!! याज का पिताजी का मा "
उसे अप्रत्याशित ही पगा। फिर भी यह पितानी :
शोधपूर्ण विचारों को शान्ति मे सुनता रान उस
उनका कोई प्रतिवाद लिया, नगर में प्रामोशी
समझ रहा था कि पिताजी प्रभो पिता के
नहीं मोच रहे हैं। अभी इन्हें पेमा टीम मु .
दे रहा है । यह सोम्य एवं शाल मा Frti
को जाते देता रहा । न उगने गोमागोरोई
निवेदन ही किया।
चार कदम चलकर गेट पनपद मा पुनः
माए- "क्यों ! बंठे क्यों हो ? जानी, भोजनादि
निवृत्त हो लो, फिर मेरे साथ दुकान पर चलना :
कुछ शान्त स्वर में सेठजी ने गुणचन्द्र को उठनेः का
संकेत दिया ।
-
गुणचन्द्र ने शान्त एवं विनम्र. शब्दों में कहा-
"पिताजी, मैं भोजन तो तभी कर सकता हूं जबकि
मेरी प्रतिज्ञा पूरी हो । दो सौ रुपये दान दिये विना में
भोजन नहीं कर सकता । हां, कार्य का जहां तक सम्बन्ध
है, मैं प्रापके साथ दुकान पर चलने को तैयार हूं।' यथा
शक्ति कार्य में हाथ बटाने का प्रयास करूंगा।"
सेठजी ने कुछ स्नेह दिखाते हुए पुत्र गुणचन्द्र का
हाथ पकड़ा और उसे उठाते हुए कहा-"देखो बेटा,
ऐसी जिद्द नहीं करते हैं । ऐसी कोई प्रतिमा नहीं होती
है, और न ऐसी प्रतिज्ञा-जीवन भर निभ हो सकती है।
अभी पपने पास कुछ धन है, और मान लो कल कुछ नहीं
रहे तो फिर प्रतिज्ञा का पालन कैसे होगा ? प्रतः यह
प्राग्रह छोड़ो और भोजन करो।"
पिताजी ! मैंने प्रतिज्ञा इसी रूप में ली है कि जय
तक मेरे पास पैसा रहेगा, मैं भोजन की परवाह किये
बिना पहले दान करूंगा। हां, पाप यह बताए कि मेरा
इस पर में कोई अधिकार है या नहीं ? आपकी सम्पत्ति
पर मेरा भी कोई हक है या नहीं ?
"बेटा, घधिकार पोर हवा की क्या बात है ? सब
कुछ तुम्हारा ही है । तुम्हीं इसके मालिक हो । किन्तु कुछ समझने की कोशिश करो। इस तरह पैसा लुटाना तो अपने अधिकार का दुरुपयोग करना ही होगा। फिर मेरे रहते हुए तो मेरी प्राज्ञा ही तुम्हारे लिए सब कुछ है और मैं कह रहा हूं तुम यह दान-वान नहीं कर सकते ।" "पिताजी, आपकी आज्ञा शिरोधार्य है । किन्तु मेरा कुछ व्यक्तिगत जीवन भी तो है । व्यक्तिगत जीवन में ली गई प्रतिज्ञा का भी कुछ महत्त्व होता है । मैं प्राचार्य भगवन् के समक्ष निवेदन कर चुका हूं कि जब तक इस घर पर मेरा अधिकार रहेगा, मैं प्राण-प्रण से अपनी प्रतिज्ञा का पालन करूंगा । अतः यदि मेरा इस घर पर अधिकार है, तो मैं दो सौ रुपये दान दिये बिना भोजन नहीं कर सकता ।" सेठ धनचन्द्र को पुनः क्रोध ने ग्रा घेरा । नेम लाल- लाल हो गए। होंठ फड़कने लगे । वे एकदम ग्रावेश के स्वरों में बोल उठे-"चल उठ, निकल जा इस घर से। बड़ा अधिकारी बन रहा है ! मेरे रहते तेरा कोई अधिकार नहीं है। नासमझ को इतने प्रेम से सममा रहा हूं, और लाट साहब तो अधिकार-अनधिकार की वातें करने लगे हैं। हाथों में कमाना, फिर अपना अधि- कार जमाना ....."चलो, निकलो इसी समय घर से..."
कोई अधिकार नहीं है तुम्हारा इस पर पर ।" कहते
हुए सेठजी ने गुणचन्द्र को धक्का देकर कमरे से बाहर
कर दिया।
गुणचन्द्र ने इसका न कोई प्रतिवाद किया और न
प्रतिकार । वह इतना ही बोल कर वाहर निकल पाया-
"पिताजी ! पाप धन को बहुत अधिक महत्त्व दे रहे हैं।
याप एक बार पोर गम्भीरतापूर्वक विचार करलें।"
"चल हट, यहां से । मुझे ही उपदेश झाड़ रहा है ।
कर लिया मैंने सूब विचार.... मैं तेरे जैसे नालायक का
मुह नहीं देखना चाहता...। निकल जा इसी क्षण
मेरे घर से.......।" कहते हुए सेठ धनचन्द्र तेज कदमों के
साथ बह-वड़ाते हुए बाहर चले गए ।
२-
गुणचन्द्र गम्भीर मुद्रा लिये वहां से सीधा अपनी
माताजी के कमरे में गया । चरण स्पर्श कर प्रणाम
किया और प्राशीर्वाद मांगने की मुद्रा में निवेदन किया-
"माताजी, मैं विदेश जा रहा हूं । पाप प्राशीर्वाद दें, मैं
अपने पार्य में सफलता प्राप्त करू ।'
अपने इगालोते लाड़ले के चेहरे की गम्भीरता देखकर
एवं एकदम धनत्याशित विचार सुनकर मां अवाक रह
गई । वह अपने लाल को अपलक देखती ही रही । उसले
मुंह से कोई शब्द नहीं निकले ।
माताजी को चुप देखकर गुणचन्द्र कुछ अघोर है
उठा-"मां, मैं विदेश जा रहा हूं। क्या तुम मुझे आशी.
र्वाद नहीं दोगी? .""इस घर पर मेरा अधिकार नहीं
है, तो क्या तुम्हारे प्रेम पर भी मेरा अधिकार नहीं है ?
क्या मैं इतना अभागा-निराश्रय हूं कि तुम्हारा पाशीर्वाद
भी नहीं पा सकता ? मां, बोलो. बालो मां.....।'
गुणचन्द्र का गला रुघ गया, उसकी आंखें भर आई।
।
मां अपने बेटे की भावुकता भरी बातें सुनकर भाव.
विह्वल हो उठी । उसे समझ में नहीं मा रहा था कि यह
सब क्या हो रहा है, उसकी आँखों का तारा इतना
अधीर क्यों हो रहा है । उसने अाज तक अपने लाल को
कभी किसी वस्तु के लिये इतना अधीर होते नहीं देसा
था.."। उसने तुरत लाल को खींच कर पीने से भीन
लिया। उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली-"बेटा,
तुझे अाज हो क्या गया है ? तू ऐसी बहकी-बहकी बातें
क्यों कर रहा है ? तुझे विदेश जाने की नौबत मयों प्रा
गई वेटा ? तुम्हारो सौ पीढ़ी खाए, तो तुम्हारा धन
नहीं खूटे"....। बेटा, तुझे किसी ने कुछ कह दिया है
क्या? ......"बोल बेटा ! किसने कहा तुझे विदेश जाने
के लिए? तू मेरा इकलौता लाल और विदेश चला
?
३२
जाए ! मैं यहां जिग्दा कैसे रहूंगी ! ऐसा मत बोलो
बेटा । चलो हाथ-मुह घोकर भोजन करलो ।" मां
एकदम अधीर हो उठी ।
गुणचन्द्र मां की ममतामयी ग्रंक से अपने पापको
छुड़ाते हुए बोला-"नहीं, मां, मैं मभी इस घर का
भोजन नहीं कर सकूगा ।......"तुम मुझे पाशीर्वाद दो
कि मैं बहुत जल्दी तुम्हारे हाथों का भोजन खाने की
योग्यता प्राप्त कर सकू । मां, पाशीर्वाद दो मैं चलू...
गुणचन्द्र चलने को उद्यत हुप्रा ।
मां ने शीघ्र ही हाथ पकड़कर उसे खींच लिया । वह
फरणा-फातर होकर बोल उठी-'लाल, क्या सचमुच ही
तू मुझे छोड़कर जा रहा है ? अब तू मेरे हाथ का भोजन
नहीं खाएगा ? बेटा, बोल, ऐसी क्या बात हुई ? मुझे
यता तो सही ।" वह फफक-फफक कर रो पड़ी ।
जन
"मां, तुम अधीर मत बनो । तुम्हारे प्राशीर्वाद से म
बहुत जल्दी पुनः तुम्हारी सेवा में उपस्थित हो जाऊंगा।
अभी तुम मुझे जाने दो ।"
"पर बेटा, तू जा क्यों रहा है ? मुझे पारण तो
बता । अचानक ऐसी कौन-सी कमी हम घर में प्रा गई
नि तुझे इस छोटी सी उम्र में विदेश जाना पड़ रहा
है ?" गुछ स्वस्थ होते हुए मां बोली।
4.
-
.
"मां, वास्तव में बात यह है कि मैंने प्राचार्य श्री
नियम (प्रतिज्ञा)लिया है कि मेरे पास होते हुए मैं दो
रुपये प्रतिदिन दान करूंगा । तुम्हें भी मालूम होग
अभी कुछ दिन पूर्व आचार्य श्री यहां पधारे थे । उनी
उपदेश कितना प्रभावशाली होता था। मुझ पर उस
असर हो गया और मैंने सोचा अपने घर में धन की में
कमी नहीं है, जितना लाभ लिया जा सके, ले ते
चाहिये । मैंने यह नियम ले लिया । कुछ दिनों से मैं
सौ रुपये रोज दान करता रहा । किन्तु प्राज मुनीम
ने पिताजी को शिकायत कर दी और पिताजी कहते
कि पहले हाथों से कमायो, फिर दातार बनो । तुम्हा
इस घर में कोई अधिकार नहीं है, निकल जायो इस ।
से । पिताजी का कहना भी किसी सीमा तक ठीक है
जब तक में अपने परिश्रम से कमाने न लगू, तब त
मुझे क्या अधिकार, कि पिताजी की सम्पत्ति का ६
फरू? अतः मैं तुमसे आशीर्वाद लेने पाया हूँ तुग मु
हार्दिक पाशीर्वाद दो कि मैं अपनी प्रतिज्ञा का पूर्ण र
से पालन कर सबू ।
मां अपने सुपुत्र की सारी बातें अपलक मुनती रही
जब गुणचन्द्र अपना स्पष्टीकरण दे चुका तो गर्म
मुद्रा में मां ने कहा-"अच्छा, अब समझ में आई पू
बात । वेटा, प्रतिज्ञा लेना और दान देना बहुत अच
है । मैं इसको अच्छा समझती हूं । जब पूर्व पुण्योदय
?
पंसा मिला है, तो इसका लाभ लेना ही चाहिये । किन्तु
मातुम्हारे पिताजी वैसा नहीं करने देना चाहते, इसका भी
कोई कारण तो होगा ही । वे क्या कहते हैं इस विषय
मान में ? क्या उन्होंने विलकुल इन्कार कर दिया कि तुम
दान दे ही नहीं सकते हो !"
"नहीं, ऐसा तो नहीं कहते । वे कहते हैं कि यदा-
'कादा १०-२० रुपये दे दिया करो। यह दो सौ रुपये का
नियम नहीं चल सकता है ।
* "तो वेटा, उनका कहना भी कुछ ठीक ही है।
रोजाना इतना दान वे कसे सहन कर सकेंगे ! उन्होंने
बहुत परिश्रम से पैसा कमाया है ।"
.
"किन्तु मां, अब अपने पास पैसे की कोई कमी नहीं
है । अभी तुम्हीं ने कहा था कि सौ पीढ़ी खाए, तो भी
समाप्त नहीं हो सकता । फिर मैंने प्रतिज्ञा जो ले ली
! उसे तो पूरा करना ही पड़ेगा !
"बेटा, प्रतिज्ञा तोड़ने की बात भी मैं नहीं
पाहती । जो (प्रतिज्ञा) ली है, उसे पूरा निभाना ही
पाहिये । किन्तु प्रतिज्ञा लेने के पहले थोड़ा विचार कर
लेना चाहिये था । हमें भी कुछ पूछ लेना था। खैर, वह
तुम ने नहीं किया । अब मेरी समझ में एक ही मार्ग
दिखाई देता है कि तुम यहीं पर कुछ व्यापार-धन्धा चालू
पारा
आर उसस जमा कर जा प्राय हा, उसे दान
करो । तुम्हें यहां से कहीं बाहर जाने की मावश्यात
नहीं है ।" मां ने अपना सुझाव रखा।
"मां, तुम्हारा कहना ठीक है । किन्तु प्रथम तो यहां
रह कर पिताजी से अलग व्यवसाय करना मुझे उचित
नहीं लगता है । दूसरी ओर पिताजी का कहना है कि
मेरा इस घर पर कोई अधिकार ही नहीं है । उन्होंने
निकल जाने का आदेश दिया है । जब इस घर पर कोई
अधिकार ही नहीं है, तो व्यापार के लिये एक पैसा भी
पूजी में यहां से नहीं ले सकता हूं। ऐसी स्थिति में एक
ही रास्ता बच जाता है कि मैं कहीं बाहर जाकर नौकरी
करू और जितने पैसे मिलें, दान करू
इसमें मेरी
प्रतिज्ञा भी भंग नहीं होगी । क्योंकि उसमें मेरे पास
जितना होगा, दान करता रहूंगा। यहां रहने पर तो
अपने विचारों से इस घर पर अपना अधिकार मानता
हूं, और अपने अधिकार में इतना धन होते हुए प्रतिशत
के अनुरूप दान न करूं, यह अनुचित है । अतः तुम सो
मुझे आशीर्वाद दो, ताकि मैं अपने भाग्य और पुगता
की परख कर स ।" गुणचन्द्र ने विनम्न शब्दों
निवेदन किया ।
वेटे की प्रतिज्ञा-पावन वाले तकं पर मांगीन हो गई।
उसने कहा-"बेटा, तो मैं तुम्हारे पिताजो को गमभाने
।
का प्रयास करूं कि वे तुम्हें दो सौ रुपया प्रतिदिन दान
परने दें ? बेटा, इस तरह तुम्हारा जाना तो में सहन
नहीं कर पाऊंगी ।" कहती हुई मां पुनः भावुक
उठी।
"मां, अव यह सम्भव नहीं है । पिताजी ने मुझे घर
से निकल जाने का प्रादेश दे दिया है। मैं अब यहां किसी
भी कीमत पर नहीं रहना चाहता । पिताजी भी अव
प्रापफी कोई बात मानने वाले नहीं हैं ।.....अब तो
मुझे जाने दो, अपना पुरपार्थ प्राजमाने दो........।"
कहते हुए गुणचन्द्र ने मां के चरण-स्पर्श किये और चलने
लगा। मां ने कहा-"बेटा, जाग्रो मेरा घाशीर्वाद
तुम्हारे साथ रहेगा......। किन्तु बेटा, जाते-जाते मेरे
हाथ का भोजन तो कर जायो । भूखे पेट कैसे जा रहे
हो........!"
"प्राज में भोजन यहां नहीं कर सकूगा । जब तक
दो सौ रुपये दान न कर दू, तब तक मैं भोजन नहीं कर
सपाता। प्रब भोजन और कहीं करूंगा । विलम्ब हो
रहा है। मैं चलता हूं।" कहते हुए गुणचन्द्र भवन के
द्वार की घोर बढ़ गया ।
.
मां ने उसे फिर पुकारा । गुणचन्द्र रुका, तब तक
मां गमरे से स्वर्ण मुद्राओं की थैली ले आई और
गुणचन्द्र के हापों थमाने लगी । गुणचन्द्र ने उसे लेने से
साफ इन्कार कर दिया । उसने कहा-'जब इस घर में
मेरा कोई अधिकार ही नहीं है, तो मैं यह सब करो ले
सकता हूं ?"
मां ने कहा- "तुम्हारा कहना यथार्थ है । तुम्हारा
इस घर में कोई अधिकार नहीं है, किन्तु मेरा तो कुछ
अधिकार है इस घर में ! क्या तुम मेरे अधिकार
उपयोग से भी मुझे वन्चित कर देना चाहते हो ?" कहते
हुए उसने एक बार और वेटे को गले लगा कर नूम
लिया और फफककर रो पड़ी ।
गुणचन्द्र ने अधिक विवाद करना अनुचित समझकर
थैली ले ली। मां के चरण-स्पर्श करके नेत्र में छलक
पाए मांसुओं को पोंछता हुआ वह भारी कदमों से बाहर
निकल गया।
शहर से बाहर निकल जाने के पश्चात् उगने अपने
भावी जीवन की रूप-रेखा के विषय में विचार किया।
वैसे अव उसके हाथ में अपनी प्रतिज्ञा के निर्वाह क्षेत
मार्ग में प्रतिदिन दान देने के लिये पर्याप्त राशि गी ।
अतः प्रव उसे अपने भोजन, श्रादि की व्यवस्था की भी
कोई चिन्ता नहीं थी ।
कुछ विचार-मन्थन के पश्चात् उसने श्रीमन्तों की
नगरी प्रतिष्ठानपुर का मार्ग पकड़ लिया। संयोग ही
३८
उसे उपर जाने वाले एक काफिले का साथ मिल गया। उस काफिले के साथ गुणचन्द्र पड़ाव-दर-पड़ाव प्रागे बढ़ता गया । प्रतिदिन रात्रि-विश्राम के पश्चात् प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर लगभग एक-डेढ़ घण्टा सामायिक, प्रादि धार्मिक उपासना करना एवं अनन्तर शरीर शुद्धि से निवृत्त हो दो सौ रुपये दान के लिये काफिले से कुछ प्रागे-पीछे निकल जाना और पुनः पद-चिह्नों के आधार पर जा मिलना, उसका नित्य कम हो गया था। -- -३- यों लगभग ४५० मील की यात्रा तय करके संकल्प का पनी एढ़ निश्चयी युवक गुणचन्द्र प्रतिष्ठानपुर पहुंच गया । श्राज तक उसकी माता के द्वारा दी गई वे स्वर्ण- गुद्राएं भी समाप्तप्राय हो रही थीं । जो कुछ वची, उन्हें शहर में प्रवेश करते समय दीन दुःखियों में वितरित फरदीं । अब उसके सामने एक ही समस्या थी-अपनी प्रतिज्ञा का पालन करना और प्राजोविका चलाना । समस्या बहुत जटिल थी। पास में कुछ भी साधन नहीं पौर विदेण का प्रसंग, जहां स्वयं का कोई परिचित नहीं । ऐसी स्थिति में जीवन-निर्वाह को व्यवस्था करना फोई सामान्य बात नहीं है । समस्या के विकट जाल में उलझा गुणचन्द्र काफिले से अलग होकर प्रतिष्ठानपुर के मुख्य बाजार को मोर निकल गया। चलते-चलते उसने निश्चय कर लिया रि. आज उसे अपने भाग्य की परीक्षा कर लेनी है, अतएवं उसे किसी के समक्ष दीनता नहीं दिखानी है। स्वाभिमान को किसी प्रकार की चोट न लगे इस प्रकार से उसे अपने कार्यक्षेत्र की खोज करनी है। साथ ही भाग्य परीक्षण के लिये अनहोनी एवं अटपटो-अजीबोगरीब शर्त भी रखनी है । इस दृढनिश्चय के साथ गुणचन्द्र एक कपड़े की बहुत बड़ी दुकान पर जा खड़ा हुमा । दुकान पर अनेक मुनीम- गुमाश्ते, नोकर-चाकर अपने-अपने कार्य में व्यस्त थे, कोई बहीखाते में खोये हुए थे, कोई ग्राहकों को माल दिखा रहे थे। कोई माल पंकिंग करवा रहे थे तो कोई हिसाब करके पैसा ले रहा था । गुणचन्द्र अपनी छोटी- सी खाली थैली हाथ में लिये दुकान के दरवाजे पर ही खड़ा होकर निरीक्षण भरी दृष्टि डालने लगा वहां के कार्यकर्ताओं पर । एक कर्मचारी मुनीम की दृष्टि उस पर पड़ी। लगने पूछा-"कहिये, क्या चाहिये ?" गुणचन्द्र ने स्वाभिमान के साय गम्भीर स्वर में कहा-"नहीं, कुछ नहीं चाहिये । मुझे दुकान के स्वामी से मिलना है।" कर्मचारी ने हैड मुनीमजी की ओर इशारा करते
हुए कहा-"इस समय यहां कर्ता-धर्ता ये ही हैं। प्राप
इनसे बात करिये ।" साथ ही उसने हेड मुनीमजी को
भी संकेत कर दिया ।
?
-
हैट मुनीम ने कार्य से प्रांख हटाकर ऊपर देखा,
सामने एक सौम्यात तेजस्वी युवक खड़ा है । मुनीमजी
ने पैनी रष्टि से गुणचन्द्र को देखा । सोचने लगे कि
युवक तो खानदानी एवं स्वाभिमानी दीखता है । लगता
है । किसी परिस्थितिवश यहां पहुंच गया है । उन्होंने बड़े
गालीन शब्दों में कहा-"पाइये, कैसे पाना हुमा
विराजिये ।'
गुणचन्द्र हैड मुनीमजी के निकट जाकर अदव के
साथ बैठ गया- "मैं प्रापके यहां नौकरी की तलाश में
पाया हूँ । कहिये, मिल सकेगी ?"
"अवश्य, श्राप जैसे युवक के लिये नौकरी की क्या
मामी है । किन्तु लगता है श्राप किसी उच्च एवं श्रीमन्त
खानदान के हैं । फिर आपको यह नौबत क्यों आई।"
मुनीमजी ने जिज्ञासु स्वरों में कहा ।
"पापका विचार किसी सीमा तक ठीक है । मैं किसी
सम्पर पर से ही सम्बन्धित हूं। विन्तु प्राप जानते हैं,
फर्म इन्सान को कहां से कहां ले जाकर खड़ा कर देते हैं।
दस, समझ लीजिये कि किसी कर्मोदय जनित परि-
स्थिति ने मुझे यहां लाकर खड़ा कर दिया है मा
अपने भाग्य को पुरुषार्थ की कसौटी पर कसने के लिए
यहां तक पहुंच गया हूं । बस यही मेरा परिचय
कहिये कोई कार्य मिलेगा ?" गुणचन्द्र ने शालीन श
में अपना परिचय दिया ।
"मैंने कहा ना, आप जैसे युवकों के लिये नाम
कमी नहीं है । हां, आप किस कार्य में अधिक रुनि र
हैं ?" मुनीमजी ने दूसरा प्रश्न रस दिया ।
"माप जो भी कार्य देंगे, करने का प्रयास करंग
वैसे मेरी रुचि अर्थव्यवस्था अथवा बहोगाते में वि
अच्छा पाप रहिये, पापको रचि के अनुसार प
दे दिया जायेगा।"
"किन्तु नौकरी पर रहने के पूर्व मेरी ६ मारा।
इरहे पाप स्वीकार करें, तभी मैं यहां रह सकता है
गुणचन्द्र ने स्पष्ट किया ।
"श्रीमान्बी, यह तो कुछ समझ में नहीं पाय
नौकरी पर अापको रहना है। हमें नौकर की कोई र
अावश्यकता नहीं है । अतः कोई भी शतं अापकीन
हमारी हो सकती है । किन्तु इसके विपरीत प्रापही
रस रहे हैं । फिर भी बोलिये पाप क्या कहना चा
४२
हैं ?" मुनीमजी ने कुछ गम्भीर स्वर में कहा ।
"पहले मुझे यह पता चलना चाहिए कि सेठजी के
पास कितने लाख अथवा करोड़ की सम्पत्ति है, इनका
प्यापार कितना फैला हुआ है, कितनी जगह इनकी
दुकानें हैं, फितने मुनीम-गुमाश्ते नौकर-चाकर हैं, मुझे
अपना वेतन इच्छा अनुकूल मिल सकता है या नहीं ?
इन सब बातों की पूरी जानकारी मिलने पर ही मैं कहीं
लोकरी कर सकता हूं।" गुणचन्द्र ने गौरवपूर्ण शब्दों में
।
"श्रीमान्जी ! श्राप कहीं प्रागे पधारिये । इन वेतुके
'प्रश्नों के उत्तर यहां नहीं मिलेंगे। आपको इन सबसे
मतलव ही क्या है ? आपको अपनी नौकरी पौर वेतन
हो ही मतलव रखना चाहिये । श्राप यदि ऐसे वेतुके प्रश्न
हरेंगे, तो पापको कहीं पर भी नौकरी नहीं मिल
सयेगी । मोई पागल व्यक्ति ही आपको अपनी प्रान्तरिक
यति का परिचय दे सकता है । पाप चाहें तो अापका
तनमान निश्चित करके प्रापको यहां रखा जा सकता
है।" मुनीमजी ने स्पष्ट उत्तर दिया ।
।
1 "जी नहीं, मैं नौकरी नहीं करूंगा, जब तक मेरे
इन सभी प्रश्नों का पूर्ण समाधान नहीं हो जाता
हते हुए गुणचन्द्र वहां से उठकर चल पड़ा ।
४३
क्रमशः दूसरी, तीसरी और चोयी दुकान पर करोद
करीब यही स्थिति बनी। गुणचन्द्र की सौम्याकृति ए
शालीनता को देखकर दुकान मालिक अथवा मुनीम,
आदि कर्मचारी प्रभावित होते और उसे अपने व्यापारिक
संस्थान में रखने में प्रसन्न भी रहते । किन्तु उसकी शो
को सुनकर सभी मूक रह जाते । सभी सोचने लगी
दीखने में तो बड़ा सुन्दर और सभ्य लगता है, किन
शर्तों से लगता है कोई चोर-उचक्का हो ।
सभी संस्थानों से उसे कुछ समझायिश के साथ मागे
बढ़ने का उत्तर मिलता गया और वह भी अपने भाग्य
को पुरुषार्थ की कसौटी पर कसने हेतु आगे बढ़ता गया।
इतने भटकाव के उपरान्त भी उसके मन में न कोई
खिन्नता पाई और न निराशा ही । वह उसी मस्ती के
साथ दृढ़ संकल्प और उत्साह का सम्बल लिये यता
गया। यों चलते हुए प्रतिष्ठानपुर की एक बहुत बड़ी
फर्म मारणकचन्द भागचन्द की दुकान पर पहुंचा । फर्म
के मालिक सेठ भागचन्द स्वयं दुकान की गद्दी पर बेटे
हुए थे । मुनिम, आदि सभी अपने-अपने कार्य में स्थान
थे । सेठजी भी किसी यही में सोये हुए थे। अपने
अभ्यास के अनुसार गुणचन्द्र दुकान की सीटियां नटकर
दरवाजे पर खड़ा हो गया और अपनी पोर किमी,
ध्यानाकर्षण की प्रतीक्षा करने लगा : मरमा पकान है
मुख्यमुनीमजी को ही दृष्टि उस पर पड़ी। घोंने
४४
पूछा-"कहिये, क्या चाहिये ?" और वे एकटक गुणचन्द्र
फे सौम्य स्मित मुख की प्रोर देखने लगे।
गुणचन्द्र ने गम्भीर एवं शान्त स्वर में कहा--"में
यहां काम की तलाश में पाया हूं। यहां कोई नौकरी की
जगह हो तो.......।'
"गुणचन्द्र की वात को बीच में ही काटते हुए मुख्य
मुनीमजी ने कहा-"पाप और नौकरी की तलाश में
हैं । प्रापकी मुखाकृति तो बताती है कि आप बहुत बड़े
भाग्यशाली हैं । प्रापको नोकरी की प्रावश्यकता क्यों
पढ़ गई ?"
"प्रापका सोचना किसी सीमा तक ठीक हो सकता
है, फिरतु केवल प्राकृति और पोशाक से ही किसी व्यक्ति
के प्रान्तरिक जीवन का निर्णय नहीं लिया जा सकता
है । में वर्तमान स्थिति में नौकरी की ही खोज में हूं। यहां
फोई रधान खाली हो, तो बोलिये ।" गुणचन्द्र ने सहज
स्वर में कहा ।
"अवश्य, प्राप जैसे सज्जन एवं भाग्यशाली पुरुषों
के लिए कार्य को क्या कमी है ? श्राप जो भो कार्य
फरना चाहें, यहां रहिये । पापकी क्षमता . प्रन्कूल
फार्य मिल जाएगा ।"
"विन्तु नौकरी पर रहने के पूर्व में युद्ध जानकारी भी
पर लेना चाहता हूं। मुझे मेरी जिज्ञासामों का समाधान
४५
मिल जाए, तभी मैं कहीं नौकरी कर सकता हूँ ।
गुणचन्द्र ने जिज्ञासा की।
मुनोमजी ने मुस्कराते हुए कहा-'कहिये, आप क्या
पूछना चाहते हैं ? वैसे परिचय तो हमें आपको पूछना
था, विपरीत प्राप ही प्रश्न कर रहे हैं । खैर पूछिये ।"
"मैं यह जान लेना चाहता हूं कि इस फर्म के मालिक
सेठ साहब के पास कितनी सम्पत्ति है, उनका व्यवसाय
कितना फैला हुआ है, मुनीम""नौकर कितने हैं ? गया
वे मुझे मेरी इच्छा के अनुकूल वेतन दे सकते हैं ? इन
सभी प्रश्नों का समाधान मिलने पर ही मैं यहां कार्य
कर सकता हूं।"
गुणचन्द्र के वात करने के तरीके एवं उसके स्वामि-
मान भरे स्वरों से सभी कर्मचारी हो नही, स्वयं मेट
भागचन्द्रजी भी अपने कार्य को छोड़कर गुणचन्द्र की
बात सुनने एवं उसकी सौम्याकृत देराने लग गये ।
मुनीमजी तो गुणचन्द्र की शर्ते अथवा जिज्ञासाए
कर अवाक् ही रह गये । वे मोन नहीं पा रहे थे र
तना सीधा सरल-सौम्य चेहरा भी ऐ अटपटे प्रश्न
कर सकता है ? कुछ सावधान से होते हा गुनीमजी
कहने लगे-'भाई साहब, अापको बात नरन्छ समझ में
नहीं पाई, अापको इन सब बातों में जमा प्रयोग ?
पाप अपनी तनख्वाह की बात करिये और काम गरि।
।
सेठजी के पास जितना भी धन है, आप इस सव
जानकारी से क्या करना चाहते हैं ?
"चात ऐसी है कि मेरी एक प्रतिज्ञा है, उसके पालन
करने के लिये यह सब जानकारी आवश्यक है । बिना
इस जानकारी के में नौकरी नहीं कर सकता हूं।"
गुणचन्द्र ने स्पष्ट किया ।
"यह जानकारी तो आपको कोई भी समझदार
व्यक्ति नहीं देगा। कोई भी मालिक अपने घर का भेद
किसी अनजाने व्यक्ति को कैसे बता सकता है ? और
इस प्रकार पाप कहीं भी नौकरी नहीं कर सकते हैं।
मुनीमजी ने कहा ।
"ठीक है, वह तो मेरे भाग्य की बात है । पुरुषार्थ
फरना मेरा कार्य है और मैं कर रहा हूं। यह मैं अच्छी
तरह जानता हूं कि भाग्य चाहे कैसा भी क्यों न हो,
पुरपार्थ का भी व्यथं नहीं जाता है । मेरी मान्यता है कि
पुरुषार्थ से भाग्य को बदला जा सकता है और मैं
वही पारने जा रहा हूं। मेरा पुरुषार्थ निरन्तर जारी
रहेगा और उससे भाग्य को बदलना पड़ेगा । अच्छा
नमस्कार ।" गुणचन्द्र वहां से चलने लगा ।
गुणचन्द्र दुकान की सीढ़ियां उतरने को ही था कि
पीडे से सेठ भागचन्द्रजी ने उसे अावाज दी-"भाई
-
साहब, आप यों कैसे चले जा रहे हैं ? ठहरिये कुछ जा
पान तो करिये।"
"असल में सेठ भागचन्द्रजी गुणचन्द्र के वाणी-
व्यवहार, उसकी शालीनता एवं सौम्यता से अत्य
धिक प्रभावित हो चुके थे । इस प्रकार उसने जाते.
जाते भाग्य और पुरुषार्थ की जो थोड़ी-सी सूक्ष्म चच
करदी थी, उसने तो सेठजी पर जादू ही कर दिया
सेठजी जो स्वयं पारखी थे, एकटक उसके चेहरे को देर
रहे थे । वे समझ गये थे कि यह लड़का भाग्य.
शाली है । इसका विशाल भाल स्पष्ट बता रहा है कि
यह उच्च-कुलीन खानदान का है और महान भाग
लेकर आया है । इस प्रभाव से सेठजी ने यह निश्चय कर
लिया कि इस युवक को किसी भी कीमत पर रर
लेना है ।
सेठजी की आवाज सुनकर गुणचन्द्र पुनः
लौटक
निवेदन किया, "क्षमा करें, मैं विना नोकरी लगे जलपा
भी नहीं कर सकता हूं। मेरी एक प्रतिज्ञा है, वह पूरी
होगी, तभी मैं जलपान करूंगा । और वह नौकरी लो
बिना पूरी नहीं हो सकती ।" कहकर गुणचन्द्र पुन
मुड़ने लगा, तो सेठजी ने कहा-"कहिये, पापकी क्य
प्रतिज्ञा है ?"
"नहीं, नौकरी लगने के पूर्व यह भी मैं नहीं बत
सकूगा । क्षमा करें, मुझे देरी हो रही है, मैं चलता है।
ने
४८
"लीजिये, में प्रापको नौकरी देता हूं। इस फर्म का
मालिक हूं। पहले जिनसे आपकी चर्चा हुई वे तो हमारे
हैट मुनीमजी हैं । बोलिये, पाप क्या जानकारी चाहते
है । आपकी सभी शर्त पौर जिज्ञासाएं पूरी होंगी ।"
सेठजी ने ढ़ता भरे शब्दों में कहा ।
"जिज्ञासाएं वैसे मैंने रख ही दी है । पुनः उन्हें
दोहरा देता हूं-"प्रापके पास कितना धन है, व्यापार
फतना फैला हुआ है ? नौकर-चाकर कितने हैं ?
"इसमें प्रापसे छिपाने की क्या बात है ? मेरे पास
रोड़ों की सम्पत्ति है, व्यापार बहुत फैला हुआ है,
वभिन्न शहरों में बीसों दुकानें हैं और सैकड़ों मुनीम,
कर-गुमाश्ते प्रादि हैं।"
"ठीक है । मैं आपके यहां नौकरी कर सकता हूं
रन्तु तनख्वाह मेरी इच्छानुसार लूगा । तिजोरी की
वियां भी मुझे मिलनी चाहिये ।'
सेठजी ने तो सोच लिया था कि किसी भी कीमत
र इस भाग्यशाली युवक को यहां से जाने नहीं देना है।
तः उन्होंने गुणचन्द्र की दोनों कठोरतम शर्ते भी
गीकार करली और कहा-"पाप चाहें उतनी तनख्वाह
पौर हैड मुनीमजी से कहा-"तिजोरी की चाबियां
४६
।
सेठ भागचन्द्रजी की बात सुनकर हैड मुनीमजी है।
नहीं, सभी कर्मचारी आश्चर्यचकित थे। किसी की समझ
में नहीं पा रहा था कि सेठजी को हो क्या गया है।
बिना जान-पहचान किये ही इस प्रकार किसी को तिजोरी
की चाबियां दे देना कहां तक उचित है ? इस लड़के
कहीं सेठजी पर सम्मोहन तो नहीं कर दिया? अने।
संकल्प-विकल्प होने पर भी सेठजी के सामने बोलने का
साहस किसी में नहीं था । अतः मुनीमजी ने चावियों
गुच्छा गुणचन्द्र की ओर फेंक दिया।
गुणचन्द्र ने चाबियों का गुच्छा उठा लिया, तं
सेठजी ने गम्भीर मुस्कान के साथ कहा-"मव तो जल
पान कर लीजिये और अपना कुछ परिचय भी तो
दोजिये ।"
गुणचन्द्र ने विनयपूर्वक किन्तु स्वाभिमान भरे स्वर
में ही कहा-"जलपान की तो कोई बात नहीं है । वह तं
अब आपके यहां करता ही रहूंगा । परिचय का जहां त
सवाल है, मुझे गुणचन्द्र कहते हैं। इससे अधिक परिच
माप मेरी कार्यक्षमता से समय-समय पर प्राप्त कर
रहेंगे।"
"बहुत सुन्दर ! आपका नाम ही तो आपका परिचः
दे रहा है । गुणचन्द्र शब्द ही आपके गुण को प्रगट का
रहा है। खैर, अभी आप रह कहां रहे हैं और भोजना
की क्या व्यवस्था है ?"
"प्रभी तो मैं एक काफिले के साथ चला ही पा रहा
हूँ। प्राज ही इस शहर में पहुंचा हूं और सीधे नौकरी
की तलाश में बाजार में चला पाया। अब कहीं कमरा
वगैरह लेकर रहूंगा। भोजन तो हाथ से ही बना
लूगा ।"
"पाप ऐसा क्यों करते हैं ? यह आपकी ही दुकान
है और ऊपर प्रापका घर है । दुकान पर सो जाया करें
पौर ऊपर भोजन कर लिया करें । क्यों हाथों से रोटी
सेकने की खटपट में पड़ते हैं । मेरे खयाल से आपको
रोटी बनाने का अभ्यास भी नहीं होगा ।" सेठजी ने
सुझाव दिया ।
"प्रापका अनुमान सही है । आज तक मैंने कभी
गूल्हा फूका नहीं है, अतः अभ्यास का तो सवाल ही
नहीं है । और फिर आपके यहीं खाना और सोना मिल
नाए, तो फिर पाहिये ही क्या? आपकी इन अहेतुकी
पा के लिए कृतज्ञ हूं।" कहकर गुणचन्द्र वहीं बैठ गया
नौर सेठजी से अपने योग्य कार्य सौंपने का निवेदन करने
गा।
"काम तो आपने अपना चुन ही लिया है । अव
जोरी की पावियां प्रापके हाथ में आ गई है, तो
पिको हिसाब-किताब का पूरा कार्य देखना ही है ।'
हते हुए सेठजी ने हैड मुनीमजी को संकेत करके समीप
लिया है । आप तो अपनी जगह है हो । प्रापकी सेवा
बुलाया और कहा-"आप अपना कार्य इन्हें समझा दें
किन्तु यह न समझ लें कि इन्हें आपके स्थान पर र
को मैं भुला नहीं सकता हूं। अभी कुछ दिन ऊपर ३
सारी देखरेख करें और इन्हें बहीखाते सम्भलाकर सा
व्यवस्था बतला दें।"
मुनीमजी ने स्वीकृति सूचक सिर हिलाया मो
गुणचन्द्र को संकेत कर अपनी बैठक पर ले गये । करी
घण्टे भर में गुणचन्द्र को सम्पूर्ण कार्य समझा दिया
गुणचन्द्र ने मुनीमजी के प्रति भी कृतज्ञता ज्ञापित कर
हुए कहा-"क्षमा करें, आपको कष्ट दिया। कृपा कर
समय-समय पर मेरा मार्गदर्शन करते रहें। मुझे अपा
ही पुत्र समझे । साथ ही मेरे कारण आपके किसी का
अथवा प्रतिष्ठा में कोई प्रांच पातो हो, तो निःसंको
मुझे सावधान करते रहें ।"
दूसरे दिन प्रातःकाल उठकर गुणचन्द्र ने अप
सामायिक (धार्मिक क्रिया विशेष) आदि धर्मानुष्ठान
नित्य कर्म से निवृत्त हो तिजोरी से दो सौ रुपये निका
मौर अपने वेतन के रूप में बही में लिखकर चल प.
शहर के बाहर । शौचादि से निवृत्त हो वापस भ
समय जहां कहीं दीन दुःखी, लूले-लंगड़े, अपंग दान पा
मिले उन्हें यथोचित पदार्थ वितरण करके लोट पाया
५२
यों प्रतिदिन दो सौ रु० अपने वेतन के रूप से लेना और उन्हें कभी विद्यालय के गरीव छात्रों में, तो कभी चिकित्सालयों के गरीव मरीजों में लगा देना उसका नित्य कम हो गया । दस-पन्द्रह दिन में प्रतिष्ठानपुर में गुणचन्द्र की यशोगाथाएगाई जाने क्षगीं। चारों दिशाओं में गुणचन्द्र सेठजी के नये दानी मुनीमजी के नाम से प्रतिष्ठित हो गया। जिघर निकलता उघर सैकड़ों नेत्र उसकी प्राकर्षकता से मुग्ध हो जाते और सैकड़ों दीन- दुःखियों के आशीर्वाद उस पर बरसने लगते । जिधर प्टि पड़े, उघर एक ही चर्चा-सेठजी के नये मुनीमजी पया पाए हैं, गरीबों के देवता मा गये हैं। गुणचन्द्र अपनी जितनी प्रशंशा सुनता, सिर झुका लेता और मन ही मन सेठजी की उदारता के प्रति भाव- विभोर हो अनवत हो जाता । कभी कुछ बोलना पड़ता, तो इतना ही बोलता कि यह सब सेठ भागचन्दजी की उदारता है । वे ही अपनी लक्ष्मी का सदुपयोग कर रहे में तो उनकी आज्ञा का पालन करने वाला नौकर गुणचन्द्र का गली-गली में फैलने वाला यश-सौरभ सैकड़ों व्यक्तियों को प्राह्लादित कर रहा था, तो कुछ लोगों के लिये वह ईर्ष्या का विषय भी बन रहा था। उन व्यक्तियों में प्रमुख थे हेड मुनीमजी, जिन्हें यह ईर्ष्या होने लगी कि इस नये मुनोम ने प्राखिर लोगों पर क्या ५३ जादू कर दिया है, जो चारों तरफ इसकी यशोदुन्दुभी बज रही है । सेठजी पर भी इसने आते ही कैसा सम्मोहन का जादू कर दिया कि जिन्होंने तिजोरी की चाबियां भी इसे दिलवादी । या तो लड़का बहुत अधिक पुण्य- शाली है, या इसके पास कोई सम्मोहन की कला है । कुछ भी हो इसका पता तो लगाना ही होगा कि इसकी इतनी जय-जयकार क्यों हो रही है । सुनता हूं यह बहुत दान करता है। किन्तु यदि ऐसा दानी और धनवान होता, तो यहां नौकरी करने क्यों पाता? जो भी हो, इस राज की जानकारी अवश्य लेनी चाहिये ? गुणचन्द्र की तेजस्विता के कारण मुनीमजी उसे पूछने का साहस तो नहीं कर सके, किन्तु नये मुनीम की इतनी ख्याति उनकी सहन-सीमा के बाहर थी। इस राज को प्राप्त करने लिये उन्होंने गुणचन्द्र का कुछ-कुछ पीछा करना प्रारम्भ किया और अपने अधीनस्थ कुछ कर्मचारियों को गुणचन्द्र की सभी गति- विधियों पर नजर रखने का संकेत कर दिया। परिणाम स्वरूप उन्हें ज्ञात हुआ कि गुणचन्द्र दो सौ रुपए प्रति दिन तिजोरी से निकालता है और उनसे कोई वस्तु खरीदकर गरीवों में बांट देता है । इस रहस्योद्घाटन के बाद उन्होंने एक दिन वहीखाता उठाकर देखा तो उसमें प्रतिदिन दो सौ रुपये वेतन के रूप में लिसे गये थे । यह सब देखकर मुनीमजी के धर्य का बांध टूट
गया । वे सीधे सेठजी के पास गए और कहने लगे- सेठ
साहब, यह प्रापकी नौकरी सम्भालिए । मैं अव प्रापके
यहां नहीं रह सकता ।"
सेठ भागचन्द जी ने कुछ चौंकते हुए-से किन्तु शान्त
स्वरों में पूछा, “वात क्या है ? श्राप अचानक यह कैसी
बात कर रहे हैं ? अापका किसी ने कुछ अपमान क्यिा
है या और कोई अनहोना प्रसंग बन गया है ? पाप पहले
तो बताए । प्रचानक नौकरी छोड़ने की बात क्यों उठ
खड़ी हुई है ?"
"नहीं अपमान, श्रादि की कोई बात नहीं है। बात
इतनी ही है कि वे अापके नये मुनीमजी खुले हाथों
पापको लक्ष्मी लुटाकर सस्ती वाहवाही लूट रहे हैं । हमें
तो एक माह का दो सौ रुपया नहीं मिलता और वे कंवर
साहब एक दिन के दो सौ रुपये वेतन लेते हैं और दातार
बनकर लुटा देते हैं।" मुनीमजी ने कुछ प्रावेश-भरे
शब्दों में कहा ।
"ठीक है, इसका कोई समाधान निकालेंगे । नये
मुनीमजी से बात करेंगे । किन्तु इसमें आपके लिए
नौकरी छोड़ने जैसी तो कोई बात नहीं है। भाप इतने
मावेश में पयों पा रहे हैं ?
"सेठ साहब, आपके दिमाग पर तो उसने जादू ही
कर दिया है। मापको उसकी कोई भी बात बुरी नहीं
लगती । इस तरह यदि वह सम्पत्ति लुटाता रहा,
दिवाला निकलते देर नहीं लगेगी। लोग तो मुझे
कहेंगे कि तुम्हारे जैसे व्यक्ति के होते हुए सेठजी में
दिवाला निकल गया । सेठ साहब ऐसी बदनामी लेने
लिये मैं आपकी नौकरी नहीं कर सकता हूं। मेरी ।
तो अपनी कुछ इज्जत है। मैं सरेआम अपनी इज्ज
कैसे खराब होने दूंगा ! अभी से बाजार में बड़ी-बा
दुकानों पर चर्चा होने लगी है और वे लोग आपन
मजाक उड़ाने लगे हैं कि सेठजी बड़े अच्छे मुनीम
चक्कर में फसे हैं, जो थोड़े दिनों में दिवाला निकालक
उन्हें निहाल कर देगा।"
सेठजी ने किसी तरह शान्तिपूर्वक मुनीम जी व
समझाया और विदा किया~"माप चिन्ता न करें।
गुणचन्द्रली से बात करके उन्हें समझाने का प्रया
करूंगा । किन्तु आपको भी यह तो समझना ही होर
दि यदि वे दो सौ रु० अपना वेतन ले रहे हैं तो इस
आपको अपनी योग्यता की कमी नहीं नजर मा.
चाहिए । आपकी क्षमता जो-कुछ है, और वर्षों से 5
आप इस फर्म की सेवा कर रहे हैं, उसे में बड़े सम्मा
की दृष्टि से देखता हूं।"
मुनीमजी कुछ-कुछ सन्तुष्ट होकर चले गये, तो से
जो ने एक नौकर को भेजकर गुणचन्द्र को बुलवामा
५६
गुणचन्द्र बड़े विनम्र भाव से सेठजी के समक्ष उपस्थित
हुया और हादिकतापूर्वक सेठजी को प्रणाम किया ।
सेठजी ने अत्यन्त स्नेह के साथ गुणचन्द्र को अपने समीप
बिठाया पौर मधुर शब्दों में पूछा-यहां आपको किसी
भी प्रकार की कोई तकलीफ तो नहीं है ? खाने-पीने
और रहने प्रादि में आप कोई संकोच तो नहीं कर
रहे हैं
'नहीं सेठ साहब, श्राप जैसे उदार हृदय, दयालु
पिता के यहां मुझे क्या तकलीफ हो सकती है ! मुझे
बड़ी खुशी है कि सेठानी साहब भी मुझे मां से बढ़कर
प्यार देती हैं । खाने-पीने में मेरा बहुत ध्यान रखती हैं।
मुझे तो प्रापकी पुनीत छाया-नीचे ऐसा लगता है कि
जिस इच्छा को मेरे सगे माता-पिता पूरी नहीं कर सके
प्रापकी उदारता एवं महानता ने मेरी उस इच्छा को
पूरा किया। सेठ साहब, श्रापकी महानता का वयान में
शब्दों में नहीं कर सकता हूं ।" कहते हुए गुणचन्द्र
भावुक हो उठा । उसके नेत्रों से श्रद्धा की कुछ बूदें टपक
पड़ी।
गुणचन्द्र के भावपूर्ण शालीन व्यवहार से सेठजी के
हृदय में भी प्रात्मीयतापूर्ण स्नेह का स्रोत उमड़ पड़ा।
थे क्षण भर के लिये सेठ और मुनीम का रिश्ता भूल गये
मोर गुणचन्द्र को अपने निकट खींचकर उसके मुंह पर
आंसू पोंछनें के अन्दाज से स्नेह भरा हाथ फिराते हुए
कहने लगे--"बेटा, इसमें भावुक होने की क्या बात है !
मैंने ऐसा कौन-सा बड़ा काम कर दिया है ! तुम्हारी
शालीनता से प्रभावित होकर तुमने जो अधिकार मांगे,
मैंने दे दिये और जो कुछ मैं सुन रहा हूं उससे मुझे
विश्वास हो गया है कि मेरे दिये गए अधिकारों का
दुरुपयोग नहीं होगा । किन्तु मैं एक बात पूछना चाहता
हूं। यदि तुम बताना उचित समझो, तो बताना । तुम
इतने कुलीन संस्कार-सम्पन्न युवक हो कि ऐसा युवक
हजारों में मिलना मुश्किल है । वैसे जाति-पांति से मुझे
मतलब नहीं है । तुम किसी भी जाति के क्यों न हो,
तुम्हारी शालीनता ही तुम्हारी महानता रही है । मैं तो
इतना ही जानना चाहता हूँ कि तुम किस कारण से
अपने घर परिवार को छोड़कर यहां चले पाए।"
।
"वैसे यह सव कुछ मैं किसी को बताना नहीं चाहता।
किन्तु आपने मुझे एक पिता का प्यार दिया है और
इतना अधिक दिया कि मेरे सगे पिता भी नहीं दे सको।
इसलिए मैं आपसे कुछ छिपाना नहीं चाहता । मेरे पूज्य
पिताजी के पास करोड़ों की सम्पत्ति है। मैंने एक बार
प्राचार्य श्री विमल कीर्ति के प्रवचन से प्रभावित होकर
यह प्रतिज्ञा कर ली कि अपने पास होते हुए में दो सौ
रुपये प्रतिदिन दान करूंगा । कुछ दिन तो मैं दान करता
रहा । एक दिन हमारे मुनीमजी ने पिताजी में शिकत
।
कर दी और कुछ वाद-विवाद के पश्चात् पिताजी ने
मुझे घर से निकाल दिया । उन्होंने कहा कि हाथों से
कमायो, फिर दान करो और में माताजी का प्राशी-
दि लेकर घर से निकल गया। मैंने दृढ़ निश्चय कर
लिया कि अपने भाग्य को पुरुषार्थ की कसौटी पर कसना
है । मुझे घर से निकालने के बाद इधर प्रतिष्ठानपुर की
पोर धाते हुए एक काफिले का साथ मिल गया और मैं
यहां तक प्रा पहुंचा । पहले कुछ अन्य दुकानों पर गया,
किन्तु मेरे वेतुके प्रश्नों को सुनकर सभी ने नौकरी के
लिये इन्कार कर दिया ।""आपने वह उदारता दिखाई
कि जिसका में जन्म-जन्म तक कर्जा नहीं चुका सकता।
मैंने अापके समक्ष अपनी इच्छा के अनुसार वेतन लेने का
ज्वलन्त प्रश्न इसीलिए रखा कि मैं अपनी प्रतिज्ञा का
पालन कर सकू। तदनुसार में दो सौ रुपये प्रतिदिन
अपने वेतन को लेता हूं और गरीबों में बांट देता हूं।
इसके अलावा भोजन, श्रादि आवश्यता के अनुसार
यहां मिल जाता है । हाथ खर्च के लिये मुझे एक पैसे
की भी घावश्यकता नहीं है। अापकी इस अहेतुकी
कृपा के लिये मैं पापका सदा ऋणी रहूंगा ।" गुणचन्द्र
ने नतशिर ही संक्षिप्त निवेदन कर दिया ।
सेठजी गुणचन्द्र के एक-एक शब्द को तम्मयता पूर्वक
सुनते रहे । गुणचन्द्र की बात पूरी होने पर उन्होंने
पाहा.---"बेटा, तुम यहां प्रानन्दपूर्वक रहो । अपनी
प्रतिज्ञा का बराबर पालन करो और किसी भी प्रकार
की कोई चिन्ता न करो । दो सौ रु० प्रतिदिन दान
करना कोई सामान्य वात नहीं है । इसके लिये प्रतिज्ञा
लेने से पहले तुम्हें कुछ सोचना था, किन्तु तुम निश्चिन्त
रहो । तुम्हारी प्रतिज्ञा पूरी होगी। मैंने जो वचन
दिया कि तुम अपनी इच्छानुसार वेतन ले सकते हो,
उसमें किञ्चित् मात्र भी इधर उधर होने वाला नहीं
हूं। यद्यपि मैं कुछ-कुछ सुन रहा हूं कि तुम्हें रखने के
कारण बाजार में मेरी हंसी उड़ाई जा रही है । किन्तु में
इसकी कोई परवाह नहीं करता । मैं यह अच्छी तरह
जानता हूं कि दान में दिया गया पैसो व्यर्थ नहीं जाता
है । वह दस गुणी शक्ति लेकर वापस आता है और फिर
वह दान भी तुम्हारे जैसे भाग्यशाली लड़का करे, तो
उसमें तो अशुभ का कोई सवाल ही नहीं है । हां, इतना
अवश्य ध्यान रखना कि हैड मुनीमजी अथवा अन्य कोई
नौकर कुछ उल्टा-सीधा बोल दे, तो घबराना नहीं ।
उनके किसी पड़यन्त्र में भी मत प्रा जाना । निष्ठा
शालीनता एवं सच्चरिता के साथ कार्य में लगे रहना।
सेठ भागचन्दजी के विचारों को सुनकर गुणचन्द्र
गद्गद् हो गया। उनकी महानता पर उसका मन मन्दर
ही अग्दर श्रद्धान्वित हो झुका जा रहा था । वह सोचने
लगा कि बिना किसी परिचय के सेठजी ने मुझे कितना
उदारतापूर्ण सहयोग दिया है । जिस धन के पीछे मुनीम
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जी के कहने मात्र से मुझे अपने पिता ने घर से निकाल
दिया, उस पन को अपनी प्रांखों के सामने दान दिये
जाते हुए देखकर भी यह महान् व्यक्ति मेरा उत्साह बढ़ा
रहा है । गुणचन्द्र इसी चिन्तन में अत्यन्त भावुक हो
सेठजी के चरणों में अपना सिर रख कर उन्हें अपने
प्रासुमों से घोने लगा।
---
--
सेठजी ने स्नेहपूर्वक गुणचन्द्र के सिर पर हाथ
; फिराया और उसे सावचेत करते हुए कहा-"देखो बेटा,
इतने अधिक भावुक न बनो । तुम इस घर को अपना
पर समझो और इसकी प्रतिष्ठा एवं उन्नति का ध्यान
* रसते हुए इच्छा हो, वैसे शुभ कार्य करो । प्रच्छा, अब
जाप्रो । अपने कार्य में लगो।"
सेठजी का संकेत पाकर गुणचन्द्र उठा और सेठजी
को प्रणाम कर दुकान पर चला गया । इघर सेठजी ने
किसी नौकर को भेजकर हैड मुनीम को बुलाया और
* पाहा---"मैंने नये मुनीमजी से बात करली है । वे मेरे
पैसों का दान नहीं करते हैं । अतः पापका यह कथन
असत्य है कि वे मेरा धन उड़ा रहे हैं। वे अपना वेतन
हो दान करते हैं।"
"सेठ साहब, यह तो द्राविड़ प्राणायाम वाली बात
ना है । वे दो सौ रुपया रोज दान कर रहे हैं और उन्हें
मपनी तनख्वाह के रूप में लिख देते हैं। क्या वेतन के
१०
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रूप में लिख लेने मात्र से वह पैसा उनका हो गया !
इतने वेतन के योग्य भी हैं ! नहीं, तो यह आपका धन
उड़ाना ही हुआ।" मुनीमजी ने बीच में ही वात काटने
हुए कहा ।
"मुनीमजी, आप विषय के एक पहलू पर ही विचार
कर रहे हैं । आप दूसरे पहलू से भी सोचें कि वह गुवक
कितना ईमानदार है । जब मैंने उसे वचन दे दिया है कि
तुम्हारी इच्छा हो उतना वेतन लेना, तो भी वह दो सौ
रुपया रोज ही लेता है और वह भी इसलिये कि उसके
दो सौ रुपये रोज दान करने की प्रतिज्ञा है। यदि यह
चाहता, तो दो हजार रु० रोज भी ले सकता था। तब
भी मैं उसे मना नहीं कर सकता था । मैं तो वचन दे
चुका था। आप जरा गम्भीरता से सोचें। वह अपनी
प्रतिज्ञा के निर्वाह के अलावा एक पैसा भी हाथ ती
का नहीं लेता है । वह अवश्य ही कोई श्रीमन्त पराने
का कुलीन-उदार दिल युवक है । और तभी उसने इतनी
बड़ी प्रतिज्ञा ली होगी। हो सकता है उसके पिता से
नहीं निभ पाई हो, और वह यहां पा गया हो । इसके
अलावा मुझे तो वह एक महान् भाग्यशाली सहमा
लगता है । इसलिए आप इस विषय पर अधिक चर्चा
न करें, तो अच्छा है ।
"
सेठजी की बात मुनीमजी के गले नहीं उतरी। फिर
भी सेठजी के बोलने के ढंग को देखते हुए उनकी प्राने
गुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई । हताश चेहरा लिये वे
यह पाहते हुए चले गए "ठीक है, जैसा उचित समझे,
सोचें । मुझे जैसा लगा, मैंने निवेदन कर दिया ।"
मुनीमजी दुकान पर पहुंच कर काम करने लगे।
पिन्तु उनका मन काम में नहीं लगा । रह-रहकर उन्हें
यही विचार सताता रहा कि मैं सेठ साहब के यहां इतने
वर्षों से काम कर रहा हूं। मुझे चालीस रुपये माहवार
मिलते हैं । मेरे साथियों को पच्चीस, तीस पीर पेंतीस
रुपये से ज्यादा नहीं मिलते । और यह कल का छोकरा
मेरे पांच माह की तनख्वाह एक दिन में लेता है और
मुफ्त में चारों तरफ अपनी प्रतिष्ठा जमाकर वाहवाही
लूट रहा है । इतना ही नहीं, सेठजी पर भी इसने पूरा
जादू कर दिया है । वे इसके विरुद्ध एक शब्द भी सुनना
पसन्द नहीं करते । ठीक है, मुझे ही अव कुछ योजना
बनानी पड़ेगी इसकी छवि विगाड़ने के लिये । नहीं तो
घोड़े दिनों में ही थे बाबू साहब तो इतने चमक जाएंगे
मि मुझे कोई पूछेगा ही नहीं ।
हैड मुनीमजी के मन में ईर्ष्या की प्राग बहुत तेजी
से जलने लगी । आप जानते हैं जिसके मन में किसी
दूसरे की उन्नति देखकर ईर्ष्या उत्पन्न हो जाती है, वह
मपना पापा खो बैठता है । दूसरे का अहित करने की
धुन में उसे अपने हिताहित का भी ध्यान नहीं रहता है।
वह यह भूल जाता है कि दूसरों को जलाने वाली माचिस
की काडी (तीली) को पहले खुद ही जलना पड़ता है उसकी एक ही तमन्ना रहती है कि किस तरह अप प्रतिद्वन्द्वी को अपने मार्ग से गिरा कर नीचा दिसाय जाय । बस इसी उधेड़-बुन में थे हैड मुनीमजी । योजन बनाने में ही जब कुछ दिन निकल गये, तो उन्हें लग कि अब तो नगर के कुछ गणमान्य व्यक्तियों में भी गुणचन्द्र की प्रतिष्ठा फैल चुकी है । लोग उसे बड़े आदर की दृष्टि से देखते हैं । उसके साथ बैठने मोर बात-चीत करने में प्रसन्नता अनुभव करते हैं । गुण चन्द्र की इस बढ़ती हुई प्रतिष्ठा ने मुनीमजी की अमू. याग्नि में घृत का काम किया । वे मन ही मन जल- भुनकर रह गये। आखिर उन्होंने एक अभद्र योजना वना ही ली। । हैड मुनीमजी ने अभ्य नौकरों को बहकाना नाल कर दिया । कहने लगे-- "आप लोग सुन रहे होंगे. नए मुनीमजी की कीर्ति चारों तरफ फैलती जा रही है । किन्तु इसका कारण प्रापको पता नहीं होगा। वे दो सो रुपए रोज का दान करते हैं । और वह पैसा सेठजी से, अपने वेतन के रूप में लेते हैं जरा विचार करें । हम लोग. इतनी मेहनत करते हैं, फिर भी हमें एक महीने में, मुश्किल से पच्चीस-तीस रुपए मिलते हैं। और ये नमें साहब एक दिन के दो सौ रुपए लेते हैं। यह सेठजी मः सरासर अन्याय है कि नहीं ! इस प्रकार के प्रध्याय को ६४
है। हम कब तक सहन करते रहेंगे। हमें भी अपने हित के
लिए कुछ सोचना चाहिए, नहीं तो ये नये मुनीमजी
सेटजी पर हावी हो जायेंगे औरः थोड़े दिनों में ही हमें
कोई पूछने वाला नहीं मिलेगा, या हमारी छुट्टी ही हो
जाएगी।"
ܚ
जैसा कि छोटे तबके के लोगों का सोचने का तरीका
होता है, वही प्रभाव हुग्रा मुनीमजी की वात का नौकरों
पर । सामान्य श्रेणी के कर्मचारी वर्ग का प्रायः यह
स्वभाव होता है कि उन्हें उनका मुखियाः चाहे जिस
दिशा में खींचकर ले जा सकता है। आजकल कामाम
हड़तालों में यही सब कुछ तो होता है । हैड मुनीमजी ने
फर्मचारियों को गुमराह किया और उनके मानस में यह
बात बिठाई कि हमारे साथ अन्याय हो रहा है। सभी
पर्मचारियों ने मिलकर सब भार हैड मुनीमजी पर ही
अल दिया । उन्होंने कह दिया कि वे तो उनके पीछे हैं,
वे जैसा कहेंगे, सब करेंगे । वे ही उन्हें मार्ग दर्शन दें कि
उन्हें नया करना चाहिये । वास्तव में वे जो कुछ कह रहे
हैं; यह उनके हित के लिये ही कह रहे हैं। वह नया
। मुनीम है भी ऐसा ही । सेठजी पर तो उसने भाते ही
जादू कर दिया। उससे निपटना तो बहुत प्रावश्यक है ।
~
क
है। मुनीमजी ने अपना तीर निशाने पर लगते हुए
देखकर मन ही मन खुश होते हुए कहा-“साथियो, इस
व्यक्ति को यहां से हटाने के दो ही रास्ते हैं-या तो
पर कोई बड़ा लांछन (आरोप) लगाकर उसे परेश
कर दिया जाय ताकि वह खुद ही जाने को विवश
जाय या फिर हम सब सेठ साहव से अपना वेतन बड़ा
की मांग करें और ऐसा नहीं करने पर सेठजी को सा
कह दें कि इस नये मुनीम को हटाएं, नहीं तो हम के
काम नहीं करेंगे।
उनमें एक कुछ बुजुर्ग-अनुभवी एवं समझाया
कर्मचारी था । उसने कहा--"मुनीमजी, सेठजी न
मुनीमजी को कितनी भी तनख्वाह दें, उससे हमें या
हानि है ! हमें अपने कार्य के अनुरूप वेतन गिल र
है । अतः हमें उस बालक (नये मुनीम) के पीछे ना
पड़ना चाहिये ।'
हैड मुनीम जी ने बात कुछ विगढ़ती देख रोप में
स्वरों में कहा-"आप इस बात को नहीं समझ रहे हैं
वह इस तरह सेठजी का धन लुटा रहा है कि थोड़े दि
में ही सेठजी का दिवाला निकल जाएगा । परिणा
क्या होगा, आप जानते हैं ! एक तो हमारी रोटी रो
छिन जाएगी और दूसरे बदनामी हमारी होगी
सेठजी के ऐसे मुनीम-नोकर थे कि सब माल हापक
और दिवाला निकाल दिया। प्रतः पाप इस विषय
गहराई से सोचें ।"
उस अनुभवी कर्मचारी ने कहा-"नहीं, मैं आपकी
इस बात से सहमत नहीं हूं। हमारे सेठजी कोई अन्धे या
पागल नहीं हैं, जो अपने सामने अपनी पूंजी लुटने देंगे।
कुछ दिनों में वे खुद सोचेंगे । इसके उपरान्त भी आप
उसे हटाना चाहते हैं, तो सेठजी से जाकर सारी स्थिति
पत्तादें । किन्तु किसी पवित्र एवं निर्दोष व्यक्ति पर कोई
झूठा कलंक या प्राक्षेप लगाकर उसे बदनाम करना
अनुचित है । यदि आपने ऐसा कोई मागं अपनाया, तो
में अापके इस षड्यन्त्र का भण्डाफोड़ कर दूंगा । अतः
माप समझदारी से काम लें ।"
उस अनुभवी व्यक्ति की बात सुनकर हैड मुनीमजी
(वं अन्य सभी कर्मचारी एकदम सहम गए। कुछ सरल
होते हुए हैड मुनीमजी ने कहा-"हम कहां कह रहे हैं
इस पर कोई लांछन ही लगाया जाय । मैंने तो दोनों
गं बता दिये । अव जैसा सभी को अच्छा लगे,
से किया जा सकता है।" अन्त में सभी ने यह निश्चय
पाया कि प्रपन सब चलकर सेठजी से ही निवेदन कर
। इसी में लाभ है । या तो सेठजी अपना वेतन बढ़ा
गे या उसे यहां से हटा देंगे ।
: यह निश्चय कर सभी व्यक्ति दूसरे दिन प्रातःकाल
भारली पे बैठक कक्ष में पहुंच गए । सबसे आगे हैड
नीमजी थे और वे सबका नेतृत्व कर रहे थे । अतः
।
६७
उन्होंने ही सेठजी से निवेदन किया- "हम सभी आपकी
सेवा में कुछ निवेदन करने आए हैं । अाप अनुमतिः,
तो हम अपनी बात आपके समक्ष रखें।".
सेठजीपने बड़े प्रेम से सभी को अन्दर बुलाकर
विठाया और कहा--माज-ऐसी क्या समस्या भाकर
खड़ी हो गई, जो मेरे सभी कार्यकर्ता एक साथ उपस्थित
हुए हैं ?-जो, कुछ भी समस्या हो; माप निःसंकोच कहें।"
"समस्या एक ही है कि नये मुनीमजी जिस प्रकार
से धन लुटा रहे हैं, वह हम सब की सहन-शक्ति से बाहर
है श्रिाप उन्हें दो सौ रुपया रोज का वेतन किस प्राधार
पर देते हैं, हम लोग इतताः परिधगः करते हैं, फिर भी
हमारा:वेतन उसकी तुलना में नगण्य है। इससे हम
सव की प्रतिष्ठा को चोट पहुंची है । अधिक योग्यता
वाले को कम वेतन और कम योग्यता वाले को अधिक
वेतन देना कैसे उचितःमाना जा सकता है ? इससे हमारी
योग्यता-तिरस्कृत होती है। अतः हमारा निवेदन है कि
पातो नये मुनीमजी का वेतन योग्यतानुसार किया जाय,
या हमारा वेतन बढ़ाया जाय।" मुनीमजी ने पट
किया।
वेतनमान के साथ प्रतिष्ठा की बात सुनकर गेट
विवार में पड़ गए । मुनीमजी का यह तक पहें पु
६८
4- वजनदारा लगा। कुछ क्षरण विचार करासेठजी ने कहा- "देखिये पापको इस विषय को प्रतिष्ठा का मुद्दा नहीं: बनाना चाहिये में उनके (नये. मुनीमजी) साथः वचन- बदा हूं। मैं उनका वेतन कमा नहीं कर सकता। रहा सवाल प्रापकी वेतन वृद्धि का. सो वह भी उनके अनुरूप में तो किसी भी कीमत पर नहीं हो सकता है । यह मेरी व्यापारिक क्षमता के बाहर है। अब एक ही बात रहा जाती है कि नये मुनीमजी को यहां नहीं रखा जाय। इस पर मैं विचार करूगा और आपको सन्तुष्ट करने का प्रयास करूंगा।। आप अपना कार्य यथावत् करते रहें ।मापकी प्रतिष्ठा को कोई पांच नहीं आने दूंगा । (कन्तु इतना अवश्य ध्यान रखें कि योग्यता का माप ।' केवल के बाहर क्रिया-कलापों से ही नहीं होता है । कोई कोई ध्यक्ति इतनी पुण्य प्रभा लेकर आता है कि उसके चंठे रहने मात्र से ही हजारों की आय हो जाती है । वह व्यक्ति हमें ऊपर से कुछ नहीं करता हुआ दिखाई देता है, किन्तु वह अरण्य रूप में बहुत कुछ करता रहता है । मेरी अपनी परख के अनुसार नये मुनीमजी मुझ ऐसे ही पुण्यशाली व्यक्ति लगते हैं और इसीलिये मैंने उन्हें इरधानुसार वेतन देना स्वीकार कर लिया है। फिर भी मैं पापको भावनाओं का प्रादर करता ह और आपकी प्रतिष्ठा-सुरक्षा का सन्तोषप्रद समाधान निकालने का प्रयास करूंगा।" ६६.:
सेठजी के विचारों से सन्तुष्ट हो सभी लोग चल दिये और अपने-अपने कार्य में लग गए । सेठजी अपने कक्ष में बैठे-बैठे गम्भीर विचारों में खो गए । उनके सामने अपनी वचनवद्धता की भारी समस्या थी। न तो वे गुणचन्द्र का वेतन कम कर सकते थे, और न उसे नौकरी से ही निकाल सकते थे । आखिर चिन्तन के द्वारा उनके मानस में समस्या का समाधान निकाल आया। उन्होंने किसी नौकर को भेजकर गुणचन्द्र को बुलाया । गुणचन्द्र उस समय अपने दान का नित्य कर्म करके लौट रहा था कि सेठजी के संकेत पर सेठजी के पास पहंच गया। सेठजी को प्रणाम कर निर्दिष्ट ग्रासन पर बैठ गया। गम्भीर किन्तु स्नेह भरे शब्दों में सेठजी ने गुणचन्द्र से बात प्रारम्भ करते हुए कहा-"क्यों चित्त तो प्रगम है ना ?" Paner "जी, आपके पाशीर्वाद से पूर्णतया प्रानन्द में है बस एक ही विचार उठता है बार-बार कि ग्राफ स ऋण को कैसे चुका पाऊंगा। जब पिताजी ने घर से काल दिया, तो यही विचार प्राता था कि मय गरी प्रतिज्ञा का क्या होगा? प्रतिज्ञा ही नहीं, जीवन निर्वाह की भी समस्या सामने थी। इम अप्रत्याशित सुयोग- संयोग की तो मैं कल्पना ही नहीं पार गकता था। केवल ।
? भाग्य को भरोसे एवं पुरुषार्थ के बल पर निकल पड़ा । भाग्य ने साथ दिया और पाप जैसे उदारमना महापुरुष का सहयोग मिल गया । अव तो मेरी एक ही तमन्ना है कि अापके इस उपकार का बदला चुका सकू । यद्यपि मुझे यह इस जन्म में तो असम्भव ही लगता है, फिर भी पुरुषार्थ में विश्वास करता हूं। अत: मेरी प्रात्म- साक्षी कहती है कि मैं आपका कज चुका सकूगा।' "खैर, छोड़ो यह उपकार वगैरह की चर्चा । मैंने प्रापका क्या उपकार किया है ? यह तो आपकी पुण्याई है, जो आपको पद-पद पर सहयोग मिलते ही रहेंगे। अभी मैंने आपको कुछ परामर्श करने के लिये बुलाया है । वैसे आपके किसी भी कार्य से मुझे कोई आपत्ति नहीं है और न मैं आपके वेतन में एक पैसा भी कम फरना चाहता हूं । आपके इस वेतन से मुझे बहुत प्रसन्नता है कि मेरे पैसे का आपके माध्यम से परमार्थ में उपयोग हो रहा है । किन्तु हैड मुनीमजी तथा अन्य कर्मचारियों के मन में आपके इस वेतन से ईर्ष्या उत्पन्न हो गई है । वे यह चाहते हैं कि उनका वेतन भी कार्य के अनुपात से बढ़ाया जाय । उनके अनुसार नये मुनीमजी को इतना वेतन देना, उनका अपमान है । वे इस अपमान को सहन नहीं करेंगे और सव काम छोड़ देंगे। "ऐतो स्थिति में मैंने विचार किया कि आप कुछ
दिनों के लिए 'महेन्द्रपुर चले जाएं। वहां भी अपनी
::दुकान है। आप वहां का कार्य देखते रहें और अपना
वेतन बरावर लेते रहें । वहां अपना रसोड़ा भी चलना
है, जहां आप अपनो इच्छा के अनुसार भोजन करते
रहें। क्यों, कैसा रहेगा?"
,
"सेठ-साहब, मैं तो आपका सेवक हूं । पाप जैसा
आदेश देंगे, उसके पालन के लिये सदा तत्पर रहूंगा।
किसी विषय में मुझे पूछने की आवश्यकता नहीं है ।
पाप तो निःसंकोच आदेश दें कि मुझे जाना है। हां, एक
चिन्ता अवश्य है कि जहां मुझे जाना है। कहीं वहां के
: "मुनीमजी के द्वारा पुनः कोई आन्दोलन नहीं उठा दिया
जाय । यहां तो आप सब कुछ सम्भालने वाले हैं। यहां
' पर कोन सम्भालेगा ?"
..
.
गुणचन्द्र- के विचार सेठजी को उचित ही नगे ।
उन्होंने कहा-"बात तो आपकी ठीक ही है । यह समस्या
तो सभी दुकानों पर उत्पन्न हो सकती है । इसरा
समाधान तो एक ही हो सकता है । पांचाल देश में
व्यापार चलने के बहुत प्रासार हैं, किन्तु उपर अभी
अपनी एक भी दुकान नहीं है। आप चाहें तो यहां से
पूजो लेकर चले जाए और वहां नयी दुकान लगा है।
चूकि वह काम नया ही होगा, इसलिये उराका पूरा
अधिकार प्रापका ही होगा। आप जितना व्यापार बड़ा
कें, बढ़ाए और अपना वेतन लेते रहें । वेतन के प्रति- त भोजन प्रादि की व्यवस्था के लिये भी निःसंकोच चं करते रहें ।" "ठीक है । जैसा भी पाप उचित समझे, प्राज्ञा रमा दें । मुझे यहां से कव जाना होगा, यह भी सूचित र दें ।" | "मेरे खयाल से मणिपुर नगर व्यापार का अच्छा न्द्र है । श्राप कल ही मणिपुर के लिये प्रस्थान कर ए । पाप जैसे पुण्यशाली इन्सान के लिये मुहूर्त प्रादि ई महत्त्व नहीं रखते । मैं अभी अर्थव्यवस्था जुटा ता हूं। प्रातः प्राप पचास हजार रु० लेकर यहां से ल - रोठजी के निर्देश को शिरोधार्य कर गुणचन्द्र दुकान र चला गया । दिन भर अपने कार्य में व्यस्त रहा। प्या भोजन के समय उसने सेठानीजी से चरण-स्पर्ण- पंक निवेदन किया-"माताजी, कल प्रातःकाल में "णिपुर जा रहा हूं । इतने दिनों तक धापरतो बहुत iट दिया । इसके लिये क्षमा चाहता हू । धापने जैसा गह-स्नेह मुझे दिया, वैसा ही स्नेह बनाए रखें घोर आशीर्वाद दें कि मैं अपने नियम का पालन करते अपने कार्यक्षेत्र में प्रगति कर सनू ।" हुए
सेठानीजी ने जब अचानक अप्रत्याशित समानः
सुने, तो उन्हें कुछ पीड़ा हुई । सेठानी के एक सुनो में
१२-१३ वर्ष की। उसके बाद सेठानी का स्नेह गुणवर
पर ही हो गया था । वह गुरणचन्द्र की शालीनता र
चरिघनिष्ठा से बहुत प्रभावित हो चुकी थी । गुणपर
के प्रति पुत्र जैसा ही प्यार उनके हृदय में उत्पन्न हो गए
या । अतः गुणचन्द्र के बाहर जाने की बात से चन
हृदय में थोड़ा आघात पहुंचा । उन्होंने भावुक होते
स्नेह भरे स्वरों में गुणचन्द्र को पूछा-"क्यों बेटे, तुः
मणिपुर क्यों जा रहे हो ? वहां से वापस कितने दिनों
आ जाओगे ?'
गुणचन्द्र ने भावुक मन से ही जवाब दिया-
"माताजी ! सेठ साहब वहां एक नई दुकान लगान
चाहते हैं, उसे देखने के लिए ही मुझे वहां जाने।
आदेश हुमा है । इसमें मुझे भी प्रसन्नता ही है । या
माप जैसी मां एवं सेठ साहब जैसे पिता का माथ
छूटेगा, फिर भी जिसमें सेठ साहब को लाग हो ओं
उनकी आत्मा को शान्ति मिले, वह कायं में ब
प्रसन्नता से करूगा ।"
सेठानी ने अधिक चर्चा करना उचित नहीं समझा
कहा-"ठीक है, बेटा । मेरा प्राणीदि तुम्हारे मा
है । तुम अानन्दपूर्वक विदेश याया करो। हुन्हा
--
पुण्यवानी तुम्हारे पीछे-पीछे दौड़ी भायेगी । हां, सुबह
मुमसे मिले विना मत जाना । मैं मार्ग में खाने लायक
नाश्ता तैयार कर दूंगी, वह लेते जाना ।"
- गुणचन्द्र ने स्वीकृति सूचक सिर हिलाया और
सेठानीजी को प्रणाम कर वहां से दुकान पर चला पाया ।
साध्या को हैड मुनीमजी आदि सभी कर्मचारियों से क्षमा
धाचना की और अपनी तैयारी में लग गया। दूसरे दिन
प्रातःकाल सूर्योदय के पूर्व ही सेठ-सेठानी से अश्रुपूरित
मैत्रों से विदा लेकर चल पड़ा मणिपुर की ओर । सेठजी
। करीब पचास हजार की पूजी उसके साथ करदी ।
लगाड़ियों में पैसा एवं माल भरवा दिया और चार
कर साथ कर दिये । गुणचन्द्र की सुख-सुविधा का
हरा ध्यान रखने का संकेत भी एक प्रौढ़ पनुभवी नोकर
तो सेठजी ने कर दिया ।
है।
६ गुणचन्द्र सेठ-सेठानी को प्रणाम करके पुनः अपने
मामाग्य को पुरुषार्थ की कसौटी पर कसने के लिए निकल
रा । मार्ग में प्रतिदिन प्रातः उठकर धार्मिक उपासना
करना एवं २०० रु० का दान करना उसके जीवन का
भिन्न अंग था । यों मार्ग भर दान के द्वारा अपनी कीति
ग सौरभ छोड़ते हुए गुणचन्द्र मणिपुर पहुंच गया ।
हर्वप्रथम वह कुछ भेंट योग्य पदार्थ लेकर नगर के सम्राट
इस समीप गया और अपना परिचय दिया । सम्राट ने
Hin
प्रसन्न होकर उसके व्यापार एवं रहने योग्य मार
व्यवस्था करवादी । साथ ही संकेत कर दिया कि
यदा-कदा राज दरवार में उपस्थित होता रहे
भी कार्य हो तो सूचित करदे ।
सम्राट को प्रसन्न कर गुणचन्द्र गणमान्य नगर
से भी मिला और सबसे सामान्य परिचय प्रास
अपने व्यापार कार्य को व्यवस्थित करने में लगमा
लगभग १०-१५ हजार की पूजी तो मार्ग में दान
नौकरों आदि की व्यवस्था में ही पूरी हो गई थी।
जो ३५-४० हजार की सम्पत्ति बची, उसमें में
व्यापार जमते-जमते प्रतिदिन दो सौ रुपये निकल
रहे थे। इधर दो-तीन माह तक व्यापार अच्छा जम
पाया और उघर पूजी समाप्ति पर प्रा गई ।
खर्च होता, उसके अनुपात से प्राय हो नहीं पा रहे,
अतः अब गुणचन्द्र को कुछ-कुछ चिन्ता सताने लग
वहुत कुछ चिन्तन के पश्चात् उसने सेठ भागद
एक पत्र लिखा कि अभी व्यापार जम नहीं पाया।
पूंजी प्रायः समाप्ति पर है, अत: कृपा करके पर
हजार रु० और भिजवाने का कष्ट करें।
पर हैड मुनीमजी के हाथों पा गया प्रौर
अन्य कर्मचारियों के समक्ष उमे मनोविनोद के
प्रस्तुत करते हुए कहा- "देखो, ये नसे मुनीमजी को
जी का दिवाला निकालने पर ही तुले हैं । हजारों रुपये
तो यहां लुटाये। फिर पचास हजार का माल साथ ले
गये और ये पचास हजार और मंगवा रहे हैं।"
सभी कर्मचारी विनोद के मूड़ में ही थे कि इतने में
सेठजी पहुंच गये । मुनीमजी ने सेठजी के समक्ष पत्र
बढ़ाया और कहा--"लीजिये, यह अापके नये मुनीमजी
का पत्र है । वे पचास हजार रुपये और मंगवा रहे हैं।"
-
सेठजी ने पत्र पढ़ा और गम्भीरतापूर्वक कहा-
"देखिये, नयी दुकान चलाने में और नये शहर में प्रतिष्ठा
जमाने में समय और धन लगता ही है । अपनी बड़ी पेढी
है और इसको चारों तरफ प्रतिष्ठा है । अतः आप इसे
चर्चा का विषय न बनाकर पचास हजार रुपये भिजवाने
की व्यवस्था करदें।"
ने
"सेठ साहब, इस तरह धन लुटाना मुझे पसन्द नहीं
है । यों उड़ाने के लिये मैं पैसा नहीं भेजूगा।" मुनीमजी
कुछ
रूखे स्वर में कहा ।
"देखिये मुनीमजी, पाप अपनी सीमा में ही रहकर
कार्य करें। धन लुटाने और नहीं लुटाने की बात में भी
समझता हूं। मापका कार्य केवल प्रादेश का पालन
करना है । मेरे घन को चिन्ता आपसे अधिक मुझे है ।
पापको मांग के अनुसार मैंने नये मुनीमजी को यहां से
७७
हटा दिया । इसका मतलब आप यह समझ रहे है कि
सेठ हमारी गरज करेगा । आप इस घमण्ड में गत रहिले।
यहां अनेकों व्यक्ति मिल सकते हैं माप से अन्धा का
करने वाले ।" मध्य छोटे कर्मचारियों के सामने है।
मुनीमजी ने मुंहजोरी की, प्रतः सेठजी को प्रवेश प्रा
गया । आवेश में ही सेठजी ने हैड मुनीमजी से कहा-
"लाइये, चाबियां कहां है ? मैं सुद ही कर तू गा
व्यवस्था रुपये की।"
हैड मुनीमजी ही नहीं, सभी कर्मचारी सन्न रह गये।
प्राज से पूर्व सेठजी को इतने प्रावेश में कभी किसी ने
नहीं देखा था। किसी के भी मुख से कोई शब्द नहीं
निकला । सब नीचे सर किये अपने-अपने कार्य में लगे
रहे । हैड मुनीमजी को अपने अहंकार की भूल महास
हो रही थी। उन्होंने तुरन्त खड़े होकर सेठजी से क्षमा-
याचना की--"क्षमा करें सेठ साहब, मेरी गलती हो
गई । आगे से ऐसी गुस्ताखी नहीं कराँगा । आप मुझे
नौकरी से नहीं निकालें । मेरे बाल-बच्चे भूगों मर
जाएंगे । सेठ साहब, दया करें।" कहते हुए मुनीमजी
ने सेठजी के पांव पकड़ लिये ।
सेठजी ने अपने पांव छुड़ाते हुए मुनीमजी को
किया और मधुर शब्दों में कहा "अरे, पाप कर
पहुंच गये। मैंने नौकरी से निकालने की बात ही का
की है ? चाचियां तो इसलिये मांग रहा हूं कि रुपये की
व्यवस्था प्राप न करें, तो में ही करलू । आप मेरे
विश्वासपात्र व्यक्ति हैं। फिर वर्षों से सेवा कर रहे हैं।
इस छोटी-सी बात पर श्रापको नौकरी से थोड़े ही
निकाला जा सकता है। आपको जीवन-पर्यन्त इस फर्म
की सेवा करनी है । यह तो आपने भाषा का कुछ विवेक
नहीं रखा, इसलिये मुझे कुछ जोश में कहना पड़ा।
अच्छा लाइये चाबियां दीजिये । मैं रुपयों का प्रबन्ध
पर भिजवा दूं।"
"नहीं सेठ साहब, मैं सारी व्यवस्था कर लूगा ।
माप निश्चिन्त रहें । प्राज ही पचास हजार रुपये
मणिपुर भिजवा दूंगा।" मुनीमजी ने विनम्र शब्दों में
पाहा ।
ठीक है, श्राप भिजवादें।" कहकर सेठजी चले
गये।
मुनीमजी ने पचास हजार रुपये मणिपुर भिजवा
दिये । गुणचन्द्र के पास रुपये पहुंचे, तब तक वहां की
पूजी भी समाप्ति पर थी । व्यापार जमने में कुछ समय
लग रहा था। इसी चिन्ता में गुणचन्द्र खोया रहता कि
काम कुछ लम्बा छेड़ दिया है और पूजी कम पड़ रही
। इतने में पचास हजार रुपये पहुंच गये । गुणचन्द्र
को प्रसन्नता का पार न रहा । एक बार फिर उसका मन
सेठजी के प्रति श्रद्धा एवं कृतज्ञता से भर गया । मन हो मन उसका सिर सेठजी की महानता के प्रति अपना हो गया। .. - पर्याप्त धन आ जाने से उसे व्यापार में प्रती सुविधा मिल गयी । अन्य व्यापारियों के साथ मिलन- सारिता के व्यवहार से एवं अर्थ की व्यवस्था से उसका व्यापार अच्छा चलने लगा। अपने नियम-पालन में अधिक की आय होने लगी। ज्यों-ज्यों माय बढ़ती गई, त्यों-त्यों वह व्यापार को भी विस्तृत करता गया । गुणचन्द्र की निष्ठा के कारण कुछ ही दिनों में उसके व्यापारिक प्रतिष्ठान की प्रतिष्ठा मणिपुर में ही नहीं, पूरे पांचाल प्रदेश में फैल गई । इतना होते हुए भी उसके मानस में बार-बार यही विचार उठता रहता कि इरा छोटे-से व्यापार से में मेटजी को कोई बड़ी उपलब्धि नहीं करा सकता हूं। मेटजी ने मुझ पर जो निष्कारण और विना परिचय के कृपा की है, मेरे द्वारा उन्हें उसी अनुपात से प्रतिफल मिलना चाहिये । गुणचन्द्र अनेक बार यह भी सोचता कि मेटली का दिल जितना उदार और महान है, उस अनुपात उनकी पुण्यवानी भी तेज होनी चाहिये । है
इसी उधेड़ चुन में खोए-खोए गुणचन्द एक दिन
जल-कुण्ड पर स्नान करने गया । सेठजी के उपकार के
चिन्तन में वह अत्यधिक भावुक हो रहा था। सहसा
उसके मानस में क्या विचार उठा कि उसने इस संकल्प
के साथ कुण्ड में डुबकी लगाई कि सेठजी के भाग्य में जो
भी हो, मेरे हाथ में आ जाए। उसका मन उस समय
मत्यन्त श्रद्धाविल एव भावावेष्ठित था । उसके हाथ में
पुण्ड में पड़ा हुअा लगभग एक फुट चौड़ा तीन फुट
खम्बा शिला-खण्ड (पत्थर-पट्टी का टुकड़ा) या गया ।
थोड़ी ताकत लगाकर उसने उसे बाहर निकाल लिया
मोर दुकान पर ले पाया । मार्ग भर उसे विचार पाता
रहा । अवश्य ही इस पत्थर में कोई रहस्य है । इसीलिये
यह पानी में एकदम खुला पड़ा था । अन्यथा किसी फशं
या दीवार में जड़ा होता । कुछ भी हो, मुझे यह सेठजी
के भाग्य के रूप में प्राप्त हुआ है, अतः इसे सेठजी के
यहां भिजवा देना चाहिये ।
दुकान पर नाकर उसने उस शिला के ऊपर कपड़े
का एक पूरा थान लपेट लिया । उसके ऊपर मखमल का
कपा मोर फिर अच्छा पेकिग करके उसे सेठजी के यहां
भिजवा दिया।
-
वह पजनदार बण्डल जव मुनीमजी के हाथों माया,
तो पे सोचने लगे-अवश्य ही नये मुनोमजी ने कोई साने
८१
की सिल्लियां भेजी होगी। किन्तु जब उसे सोला गया, तो मखमल और टूल (एक प्रकार का लाल कपड़ा) के यान में लपेटी हुई शिला निकली तमो गमंचार आश्चर्यचकित थे इस पत्थर को इतने बड़े एवं को कपड़े में लपेट कर भेजने का क्या उद्देश्य हो सकता है! मुनीमजी ने सेठ साहव को निवेदन किया कि "मनिपुर से नए मुनीमजी ने यह पत्थर भेजा है । इसका प्रयास जाय" पत्थर देख कर क्षण भर तो सेठजी भी असमंगा में पड़ गए । फिर सम्भलते हुए बोले-'ठीक है, उन्होंने कुछ विचार करके ही भिजवाया होगा । माप ऐसा करें, वह जो ऊपर जाने की सीढ़िया है, वहीं रख दें। ये भी वह पहली सीढ़ी कुछ ऊंची पड़ती है । समय पर मुगोम- जी से जानकारी कर लेंगे कि उन्होंने यह पत्थर पर क्यों भिजवाया है।" . सेठजी के निर्देशानुसार मुनीमजी ने यह परयर मरम सीढ़ी के नीचे रख दिया । सयोगत: वह पत्थर ? व्यवस्थित रूप से फिट हो गया और प्रथम गोड़ी को ऊंचाई भी अन्य सीढ़ियों के समान बन गई । इधर गुणचन्द्र का व्यापार व्यवस्थित गति पर रहा मोर प्राय-वृद्धि के साथ-साय प्रतिष्ठा भी दिशा
बढ़ती रही । अधिक लाभ होने पर भी वह अपनी दान
की सीमा एवं धार्मिक उपासना, प्रादि में यथावत् हो
चलता रहा । न तो उसने दान की राशि में वृद्धि की
पोर न अपने व्यक्तिगत खर्च में । क्योंकि जो वेतन उसने
निश्चित किया था, उससे अधिक पैसा उठाना वह
अनैतिकता समझता था। उसकी धार्मिक उपासना
(सामायिक प्रादि क्रिया) भो सुदृढ़ आस्था के साथ
चलती रही।
इस प्रकार कुछ ही महीनों में उसने मेठजी का नाम
चारों तरफ फैला दिया और अच्छा द्रव्य एकत्रित करता
रहा । वह इसी विचार में था कि एक अच्छी राशि
इवट्टी हो जाए. तभी सेठजी को भेजू । तव तक व्यापार
का विस्तार करता रहूं।
इपर व्यापार के विस्तार से सेठजी की प्रतिष्ठा पूरे
पांचाल प्रदेश में फैल रही थी, तो इघर दो सौ रुपये
प्रतिदिन दान से गुणचन्द्र की एवं सेठजी की कीर्ति
। दिग्दिगात को छूने लगी । हजारों याचक मणिपुर की
पोर बढ़ने लगे । ज्यों-ज्यों कीर्ति फैलती, त्यों-त्यों
'यानकों की संख्या बढ़ती जाती । इस बढ़ती हुई संख्या
को देखकर गुणचन्द्र ने समुचित दान की निश्चित समय
को व्यवस्था बना दी, ताकि उचित पात्र को उचित
। समय पर समुचित वस्तु प्राप्त हो सके ।
८
८३
ध्यापार-विस्तार एवं कोति-विस्तार के इस दौर
एक दिन पुण्य प्रभा की चमत्कारिक घटना घटित
गई । हुआ यों कि अपने दान के दैनिक कम के ?
प्रातः दो सौ रुपये लेकर गुणचन्द्र शहर के बाहर को
बस्ती में निकल गया । यथोचित दान करके कुदाले
की दृष्टि से शहर के बाहर बहती नदी के किनारे पर:
गया। वहां उसने कुछ मतीरे को फसल देखो तो और
खाने की इच्छा जागृत हो गई। उसने मालो से --
"भाई, एक मतीग दे दो।" माली इस महान दाने
युवक को अच्छी तरह पहचानता था । तुरन्त गया और
एक बड़ा-मा मीठा मतीरा तोट लाया । मला:
पैसे देने लगा, तो माली ने साफ इन्कार क
दिया।
गुणचन्द्र जेब से चाकू निकाल कर वहीं नदी कि
मतीरा चीरने को बैठ गया। मतीरा चौरामाः
उसके हाथ से चाकू पानी में गिर गया । उगने व
वाहर निकाला तो चाकू देखकर उसके याश्च या
न रहा । जो चाकू लोहे का था, वह सोने का काम
था। उमने सोचा निश्चित ही यहां कोई पारम
होना चाहिये । जहां चाकू गिरा था यहां के
पत्यर उठाकर उसने अपनी चाबियों उगा
करवाया। एक पत्थर मे चावी मोने की बनाई
अव क्या था ! उसने अन्य पत्यारों को वी राजा
। उस पारस पत्थर को जेब में रखकर इत्मीनान से मतीरा
खाया।
।
--
-
--
अव गुणचन्द्र के पास किस बात की कमी थी ? प्रव
• तो वह चाहे जितना सोना बनावे और मुक्तहस्त से
: हजारों का दान करे, तो भी उसे कोई रोकने वाला नहीं
था । फिर भी उसने व्यवसाय-कार्य में कोई कटौती नहीं
की । वह अच्छी तरह समझता था कि काम-धन्धा
छोड़ने से में प्रकर्मण्य हो जाऊंगा और साथ ही परिश्रम
का पैसा एक अलग ही प्रानन्द देता है । अतः उसने
व्यवसाय यथावत् चालू एवखा । किातु सेठजी को
अधिकतम लाभ हो, इस दृष्टि से उसने प्रतिष्ठानपुर
समाचार दिये कि यहां पचास मन लोहे की आवश्यकता
है । अतः प्राप तुरन्तु पचास मन लोहा भिजवाने का
कष्ट करें।
--
--
समाचार मुनीमजी को मिले । मुनीमजी सोचने
। लगे-बाबूजी सेठजी का दिवाला निकाल कर ही
घोड़ेंगे । सोचा होगा अब सेठजी पंसा नहीं भेजेगे, तो
पलो माल ही मंगवाकर उड़ाते रहो । फिर भी अपने
पत्तव्य की प्टि से मुनीमजी ने पत्र सेठजी को दे
दिया। सेठजो ने कहा-''ठीक है । व्यापार में कहीं
लोहे का सौदा किया होगा । प्राप आज ही पचास मन
लोहा भिजवाने की व्यवस्था कर दें।
1.
मुनीमजी ने अनमने भाव से स्वीकृति मूनक मि
हिलाया ।
पचास गधों पर पचास मन लोहा मणिपुर पगा
गघा लाने वाले व्यक्ति को अन्दर भोजन पर पिटार
इधर गुणचन्द्र ने कुछ ऊपर के लोहे को छोड़कर शेर
लोहे पर पारस फिरा दिया और अपर से चोरों को
यथावत् सिलाई करा दी। फिर गयालों से कहा,
"देखो, अब तुम यहां से खाली गो लेकर जागोगे । इसने
अच्छा है कि मैं तुम्हें दुगना किराया दे देता है।
माल वापस ले जाना और सेठजी को सम्मना देगा ।"
।
गधे वालों ने प्रसन्नतापूर्वक हां भरली पोर पर मात
लेकर पुनः प्रतिष्ठानपुर चले पाये । मेटली ने कहा---
"मुनीमजी, लोहा तो पापस पा गया है। चलो गोरे
बाड़े में थप्पी लगवा दो।"
सेठजी के निर्देशानुसार मुनीमजी ने ज्यों के त्य
बाड़ में बन्द वोरों की पाणी लगवा दी।
इघर गुणचन्द्र अपने कार्य में व्यवस्थित ना
रहा था, तो उबर दिन मेठ भागनयनी है।
निस्ट के रिश्तेदार, जी व्यवसाय में जो
प्रतिष्ठानपुर सेटजी के यहां प्रापहए ये । जोहानी है
ऊपर जाने के लिए ज्यों ही उस पत्यार पर, जिसका
८६
में भेजा था, पर रक्खा कि चौंक पड़े । सेठ भागचन्दजी
चौंकने वा कारण जानने हेतु इधर-उघर दृष्टि दौड़ाने
लगे कि कहीं कोई विच्छू-सर्प, आदि जीव तो नहीं है ।
जब उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दिया, तो जौहरीजी से
पूछा-"क्या बात है ? श्राप चौंक क्यों पड़े ? कोई
जहरीला जन्तु है क्या ?
जौहरीजी ने कुछ सहज होते हुए कहा - "नहीं ऐसी
कोई बात नहीं है । जीव वगैरह कोई नहीं है। मैं तो
इस पत्थर को देखकर ही चौंका हू । क्या यह पत्थर
पाप वेच सकते हैं ?"
सेठ भागचन्दजी की जिज्ञासा बढ़ी । उन्होंने पूछा,
"क्यों इस पत्थर में ऐसी क्या विशेषता है ? मैं इसके
विषय में कुछ नहीं जानता हूं । हमारे एक नए मुनीमजी
हैं-बड़े पुण्यवान एवं निष्ठावान, उन्होंने ही यह पत्थर
मणिपुर से भिजवाया है। हमने इसे सामान्य पत्थर
समझकर यहीं रख दिया ।"
जोहरी जी कहने लगे-"आपकी दृष्टि वहां तक
नहीं पहुच सकती है । कोई जोहरी ही इस पत्थर की
कीमत मांक सकता है । आप पांच लाख तक में यह
पत्थर देना चाहें तो में खरीद सकता हूं।"
सेठजी का प्राश्चर्य एवं विस्मय बढ़ गया । वे पूछने
सगे-"देखिये, वेषने की बात तो मैं नहीं करता हूं,
क्योंकि नये मुनीमजी ने किस अभिप्राय से भेजा गर
वे ही जानते हैं । किन्तु पाप मुझे इसके सम्मको
अवगत करादें कि आखिर इस पत्थर में ऐसी का
विशेपता है ?"
जोहरी जी ने कहा--"सेठ साहब, इस पर
चारों कोनों में पत्थर की हल्की सी मिल्ली के नोने भार
सवा-सवा लाख के हीरे लगे है। इनके अतिरिक्त
हीरा बीच में लगा है, जिसकी योगत में नहीं नाम
सकता । मेरी प्टि में वह हीरा इन चारों कोनीमा
भी कई गुना अधिक का है।"
--
जब सेठजी ने यह बात सुनी, तो तुरात छ र
हैड मुनीमजी को आवाज दी । मुनीमजा तुम मेरी
के पास प्रा मारे हुए । गठजी ने कहा--- "बताई जा
नये मुनीमजो फितना रुपया ले गए हैं ?"
मुनीमजी ने बड़े सकोच भरे शब्दों में सहम
कहा-"लास-सवा लाख रुपये तो उठाये ही होगा ।
पचास हजार तो यहां से जाते समय ले गए थे और
पचास हजार पीछे से और मगवाए। २०-२५ हजार
यहां रहते हुए खच किए होंगे।"
"बस इतने ही खर्च किये ! मापको भार
पत्थर फिराने भेजा था? नए मुनीमनी न हो ना!
स्पर के ये जोहरी जी पांच लाख तो देने को तैयार हैं र इसकी कीमत दस लाख से भी अधिक बता रहे हैं। ताइये नए मुनीमजी ने मेरी सम्पत्ति उड़ाई है कि दस गो बढ़ाकर भेजी है ? जो पचास हजार वे ले गए, नसे भी प्राखिर वहां व्यापार का विस्तार ही तो किया गा? उनके दो सौ रुपए प्रतिदिन के आपको प्रखर हे है । किन्तु उनकी पुण्य प्रभा को श्राप नहीं मझते........! उठायो इस पत्थर को प्रोर अन्दर उस श्री तिजोरी के पास रक्खो । [अव जव ज्ञात हो गया पत्थर कीमती है, तो उसे यों बाहर कंसे रक्खा जा यता है 1] मैं पाकर तिजोरी में रख दूंगा।" सेठजी पुछ गर्व के साथ कहा और जौहरी जी को साथ ले पर चले गए। · मुनीमजी यह सब सुनकर हक्के-बक्के रह गए । नगी घांस फटी की फटी रह गई । वे एकटक उस पर को देखते रहे । उन्हें यह सव बड़ा भारी चमत्कार- । लग रहा था । कुछ क्षणों में स्वस्थ होकर उन्होंने ह पत्थर उठाया और अन्दर तिजोरी के पास रख था। अन्य सब कर्मचारियों में भी कानों-कान यह खबर ल गई कि नए मुनीमजी ने एक साथ सेठजी को दस- रह लाख की धाय करवा दी है । सभी के मन में ८६
सहज ही अपने पूर्व कृत्यों पर पश्चात्ताप होने लगा।
गुणचन्द्र की पुण्य-प्रभा के प्रति श्रद्धा उमड़ पड़ी।
-
सेठजी भोजन, आदि से निवृत्त हो नीचे पाए ।
पत्थर को बड़ी तिजोरी में व्यवस्थित किया।
सेठजी को गुणचन्द्र को याद पाने लगी, साथ ही
उन्होंने यह देखा कि सभी कर्मचारी और स्वयं
मुनीमजी के हृदय में भी नए मुनीमजी के प्रति से
प्रादर एवं श्रद्धा के भाव उमड़ रहे हैं, तो उन्होंने
चन्द्र को पत्र द्वारा सूचना कर दी कि अब आप यहा
कार्य किसी विश्वस्त व्यक्ति को सम्भलाकर यहां
जाएं।
पत्र प्राप्त होते ही गुणचन्द्र ने एक अत्यन्त यिन
व्यक्ति को व्यापार का सम्पूर्ण दायित्व सौंप दिया
स्वयं प्रतिष्ठानपुर जाने की तैयारी में जुट गया।
उसे यह अहंकार छू तक नहीं गया कि अब तो
पास पारस पत्थर है, अव सेठजी की कोई गरज
उनके श्रादेश का पालन क्यों करे या ये उस पर
क्या आदेश चला सकेंगे ! विपरीत, वह तो सेरो
उपकार को स्मरण कर-करके श्रद्धा से भरा जाना
वह अच्छी तरह समझ रहा था कि उसे जो युद्ध
हुई है, वह सेठजी की कृपा का हो परिणाम है।
-
जो मुझे इतने भारी वेतन पर नहीं रखते, तो क्या में
ज इस स्थिति तक पहुंच पाता ? सेठजी की महानता
य है । उन्होंने बिना जान-पहिचान के इतनी उदारता
परिचय दिया । मैं इस जीवन में सेठजी के उपकार
ऋण नहीं चुका सकता । मेरा तो प्रब एक ही कर्त्तव्य
कि सेठजी के प्रत्येक इशारे को धर्म-शास्त्र मानकर
का यथावत् पालन करू । यह जो पारस पत्थर है,
भी सेठजी को उदारता एवं पुण्यवानी का ही परि-
म है। अतः इस पर भी मेरा कोई अधिकार नहीं है।
है इसे भी सेठजी को सौंप देना है। मेरा तो अधिकार
सौ रुपये प्रतिदिन पर ही है । इसके ऊपर सेठजी जो
{ भी दे दें, उनकी उदारता एवं महानता ही है ।
।
इस प्रकार सेठजी फी उदारता एवं महानता का
-ही-मन स्मरण करते हए गुणचन्द्र ने प्रतिष्ठानपुर
है की तैयारी करली । नगर-सम्राट से भेंट कर पाशा
त करली और परिचित नगर प्रमुखों से भी मिलकर
लापुर से प्रस्थान कर दिया । अपने हाथों से कमाया
। लाखों का द्रव्य एवं पारस पत्थर उसके साप पा
। सुरक्षा हेतु उसने कुछ कर्मठ कर्मवीर भक्तिशाली
तापों एवं अन्य नौकरों को भी साप ले लिया पा।
मार्ग भर दान को सुवास फैलाता हा घोर हजारों
-हीन व्यक्तियों के शुभाशीर्वाद प्राप्त करता हुमा
गुणचन्द्र प्रतिष्ठानपुर पहुंच गया । गुणचन्द्र के मारने
के समाचार सेठजी को एवं नगरजनों को प्राप्त हो न
थे। उसकी कीर्ति पताका वहां पहले ही फहरा नगी में
अतः अनेक गणमान्य सज्जन एवं अपने समस्त
चारियों के साथ स्वयं सेठ भागचन्दजी स्वागत हेतु नः
के बाहर तक गए।
स्वयं अपने मालिक सेठ भागनन्द को स्वागत
आये देख गुणचन्द्र विस्मित तो था ही साथ हो ना
एवं कृतज्ञता से उसका हृदय भरा जा रहा था । से
कुछ निकट प्रा गए, तो गुगणचन्द्र कुछ तेज कदम
चलकर उनके चरणों में झुक गया । सेठजी ने जमे :
कर गले से लगाया । फिर सभी प्रागत राजगनों
प्रणाम करता हया वह सब के साथ दुकान पर
प्राया। हैड मुनीमजी, आदि सभी उनके पुण्य :
एवं तेजस्विता को देखकर अवनत थे, तो अपनी
ईया पर शर्मिन्दा भी । गुणचन्द्र ने उन्हें एवं अन्य
कर्मचारियों को भी प्रणाम किया और उचित ग
दिया।
सभी ग्रागत सज्जनों के उचित सत्कार से
होकर गुणचन्द्र ऊपर माताजी/सेठानीजी के पास
भाव-विभोर हो प्रणत हो गया। सेठानीजी ने
वरद हस्त उसके सिर पर रक्खा और उसको
अपने अंक में छिपा लिया ।
१२
इस प्रकार भोजन प्रादि मे निवृत्त होकर व्यापार
प्रादि के सम्बन्ध में चर्चा हेतु सेठजी एवं गुणनन्द्र गद्दी
पर बैठ गए । सर्वप्रथम सेठजी ने प्रसंग छेडा-"प्रापने
जो वह शिला-पत्थर भेजा था, उसके विषय में कुछ
संकेत-सूचना भी नहीं लिखी कि वह पत्थर इतना कीमती
है । मैंने तो उसे सीढ़ियों के पास साधारण पत्थर समभ,
कर रखवा दिया था। यह तो एक दिन अपने सम्बन्धी
जौहरी जी पा गए । उन्होंने उसे देखा. तो वे चौंक पड़े
और उसकी कीमत दस लाख से भी अधिक बताई।"
।
गुणचन्द्र ने शान्त एवं गम्भीर स्वर में कहा सेठ
साहब, जबकि मैं स्वयं ही इसकी कीमत नहीं जानता तो
प्रापको कैसे सूचित करता कि इसकी कीमत दग लास
से भी अधिक है ? असल में पापके उपकार भार से मेरा
मन दवा जा रहा था। मैं गत-दिन एमी निन्ना में
रहता था कि अापके इम उपकार का बदला मे
चुकाऊंगा? इसी चिन्ता में एक दिन में स्नान करने गया
और आपके नाम से कृण्ड में जबकी लगाई कि टमाटर
के भाग्य में जो हो, मेरे हाथ में प्राये । मेरे हाथ में यह
शिला प्रा गई और मैंने यहां भिजवा दी। यर जो पार
है, यह प्रापकी पुण्यवानी का फल है।"
सेठजी गुणचन्द्र की प्रसाबिल भावना को देखकर
गद्गद् हो गये । ये मन-ही-मन सोनी को पदक
कितना सरल एवं सहज है । अपनी महानता को छिपा.
कर मेरी ही महानता को प्रदर्शित करता रहता है।
इसी चर्चा के दौरान मणिपुर की दुकान की सम्पूर्ण
स्थिति बताते हुए गुणचन्द्र ने सेठजी से पूछा-"सेठ
साहब, वह जो लोहा मैंने वापम भिजवाया था उसको
आपने सम्भाल लिया कि नहीं ?"
सेठजी ने सहज रूप से कह दिया -- "उसका पया
सम्भालना ? ज्यों-के-त्यों बन्द बोरों को बाहर बाड़े में
डलवा दिया था ।"
गुणचन्द्र ने
कुछ
विस्मय भाव से कहा-क्या आपने
उन्हें खोल कर देखा भी नहीं ! चलिये मुझे बताइये तो,
कहां रखें हैं वे बोरे ?"
"गुणचन्द्र के बात करने के विस्मयोत्पादक ढंग को
देखकर सेठजी कुछ आश्चर्यान्वित से होते हुए गुणचन्द्र
के संकेतानुसार उठ खड़े हुए। दोनों दुकान के पिछले
हिस्से में बने वाड़े में पहुंचे । सेठजी ने वोरियों को थप्पी
ओर इशारा करते हुए कहा-"वे रक्सी हैं सब
"
गुणचन्द्र बोरियों के निकट गया पौर एक वोपी की
सिलाई तोड़कर सेठजी को भीतर दृष्टि डालने का इशारा
किया। सेठजो ने देखा तो अांख फटी-की-फटी रह गई।
६४
बड़े प्रारकर्य के साथ पूछा-"यह क्या ? आपने उस
लोहे के बजाय वहां से सोना भेजा था ? कम-से-कम पत्र
में संकेत तो करना था कि माल को सम्भाल लें। मैंने तो
सोचा लोहा ही वापस पा गया होगा । और यहां थप्पी
लगवा दी । किन्तु श्रापने इतना पैसा कमा कैसे लिया?
यह मेरी समझ मे नहीं पा रहा है कि इतने थोड़े समय
में प्रापने इतना द्रव्य कहां से कमा लिया और यह लाखों
पा माल ले पाए ?"
गुणचन्द्र खड़ा-खड़ा मुस्कराता रहा । सेठजी ने उधर
ध्यान हटाकर हैड मुनीमजी को आवाज दी "मुनोमजो,
जरा इधर थाना तो........"
सेठजी की आवाज सुनकर मुनीमजी दौड़े पाए ।
सेठजी ने कहा-'जरा इन वारियों के टाके तोड़ कर
देखो तो भीतर क्या है ?"
मुनीमजी ने एक दो बोरियों के टांके खोल कर देखा
तो फटी-फटी अांखों से देखते ही रह गए। उनके मुंह से
कोई शब्द हो नहीं निकल सका।
सेठजी ने व्यंग्यपूर्ण, किन्तु गम्भीर शब्दों में कहा-
"उठामो इन्हें और अन्दर कोठार में रक्खो । न तुमने
खोलकर देखा, और न मैंने । इतना सोना इतने दिन
इस तरह बाहर खुले में ही पड़ा रहा ।"
।
मुनीमजी कुछ-कुछ शर्म महसूस करते हुए कहने
लगे-"सेठ साहव, इस सोने को तो आप सड़क पर
विखेर दें, तो भी कोई नहीं ले जा सकता है । नये मुनीम
जी की पुण्यवानी इतनी गजव को है कि थोड़े दिनों में
ही उसन चमत्कारी करके दिखा दिया। सेठ साहब, हमने
अपनी क्षुद्र बुद्धि का ही परिचय दिया था, किन्तु पापकी
महानता ने भी गजव की परख की।"
सेठजी ने बात को बीच में ही रोकते हुए कहा-
"खैर, छोड़ो इस चर्चा का । माप तो इन बोरों को उठा
‘कर अन्दर कोठार में जमाने की व्यवस्था करें ।'
सेठजी एव हैड मुनीम की इस चर्चा के समय ही
गुणचन्द्र ने धीरे से बोरों को देखने-टटोलने के बहाने
कुछ इधर-उधर करके जो कुछ ऊपर-ऊपर लोहा था उसे
भो पारस पत्थर के प्रभाव से सोना बना दिया।
मुनीमजी को कार्य सौंप कर सेठजी एव गुणचन्द्र
पुनः दुकान पर पाकर गद्दी पर बैठ गए । सेठजा के
हृदय में गुणचन्द्र की पुण्य प्रभा अव तक बहुत गहरा
स्थान बना चुका था । उन्होने भाव-विभोर होते हुए
'आखिर आपने किस तरीके से इतना धन कमा
लिया ? इसका राज तो बतावें ।'
गुणचन्द्र ने हल्की-सी मुस्कान बिखेरते हुए जेब में
पारस पत्थर निकालकर सेठजा के समक्ष रखते हुए कहा-
'
प भागों
?
ने गिट साहब, जहां आप जैसे दयालु, उदार चेता महा-
का कृपापूर्ण प्राशीर्वाद हो, वहां किसी चीज की
हामी रह सकती है ? अापकी कृपा से मुझे यह पारस
यो स्थिर मिल गया और मैंने यह सोना बनाकर भिजवा
उस दिया । वंगे लोहे की वहां कोई कमी नहीं थी, किन्तु
राहा में लोहा मंगवाने का मुख्य कारण यही था कि उसे
आपस भिजवाने में सुविधा रहेगी।"
। द्वारा पारस पत्थर देखकर तो सेठजी हवके-बक्के रह गये।
दोशनकी तो यह कल्पना भी नहीं थी कि पारस पत्थर भी
रा भी मिल सकता है । वे तो उसे ग्रन्थों का आलंकारिक
वषय ही समझते थे। आज अपनी प्रांखों पर ही उन्हें
के प्रयास नहीं हो रहा था । वे आश्चर्यचकित हो उस
जिने पत्थर को ही देखते रह गए । आखिर कुछ स्वस्थ हो
लोहार न्होंने गुणचन्द्र को पारस प्राप्ति का कारण पूछा कि
। निह उसे कैसे प्राप्त हुआ है ?
गुणचन्द्र ने मतीरा खाने और चाकू का पानी में
पर जाने की अथ से इति तक की पूरी कहानी सुना दी।
सारस पत्थर मिलने की कहानी सुनकर सेठजी का हृदय
जोर दिगद हो गया। अब तो सेठजी का गुणचन्द्र पर कृपा
जा नहीं श्रद्धा का भाव बन गया। भावावेश में उन्होंने
राचन्द्र को अपने सीने से लगा लिया । मन-ही-मन
दूर शासकी पुण्य प्रभा की तेजस्विता एवं त्याग-पालन की
सपना के पुरुषार्थ को लाख-लाख धन्यवाद देने लगे ।
स
lini
चते हैं कि
६७
m
गुणचन्द्र की पुण्य प्रभा एवं गुरणप्रभा का स्मरण कर
करते सेठजी एकदम भावविभोर हो रहे थे कि तो
चिन्तन ने सहसा करवट ली । सहसा उनका ध्यान पाने
इकलौती प्रिय पुत्री गुणमाला पर चला गया। गुरुवार
वे गुणमाला के सम्बन्ध में सोचते रहे । फिर कुछ गम्भीर
से होते हुए कहा-"आपके पुण्य प्रभाव से मैं हो गया
पूरा शहर और जनपद ही कृतकृत्य हो रहा है। पार
जैसे पुण्यशाली व्यक्ति का सान्निध्य प्राप्त कर मैं अपने
आपको धन्य अनुभव कर रहा हूं। मुझे लग रहा है।
किसी पूर्व पुण्य के उदय से ही मुझे आप जैसी पुण्यात्मः
का सुयोग मिला है । अब आप इस घर-परिवार के
अपना ही समझे एवं जितना चाहें, उतना दान करें।
वैसे भी अव पापको न किसी बात की कमी है और न
मेरे आश्रय की आवश्यकता है। दुनिया का श्रेप्टाम
आर्थिक स्रोत पारस पत्थर आपके पास है।"
नहीं सेठ साहब, आप ऐसा न कहें ।
आपके आश्रय तले ही जी रहा हूं और उसी पुनीत पायर
तले रहना चाहता हूं। रहा पारस पत्थर का सवाल,
यह अापकी पुनीत छाया से मुझे वञ्चित करने में निमित्र
नहीं बन सकता है। प्रथम तो आपकी नौकरी करते
जो कुछ, प्राय प्राप्ति हो उस पर आपका ही अधिक
होगा । मैं तो केवल दो सौ रुपये दैनिक का अधिकार
हूं। दूसरी वात कि पारस पत्थर ऐसी कोई चीज नई
-~- है, जिसके सामने श्रापके उपकार को भुलाया जा सके। वह है तो पाखिर भौतिक पदार्थ ही। उसके लिये स्वामी-सेवक अथवा पिता-पुत्र के सम्बन्ध को गौण नहीं किया जा सकता है। "मैं तो अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार दो सौ रुपये प्रति- दिन लूगा पीर दान करूंगा। बाकी यह पारस पत्थर प्रादि मभी कुछ आपका है। आप इस छोटी-सी चीज यो महत्त्व देकर प्रान्तरिक स्नेह भाव में व्यवधान न बालें ।" पाहते हुए गुणचन्द्र कुछ भावुक-सा हो गया। सेठजी ने अत्यन्त भावपूर्ण स्नेह भरा हाथ गुणचन्द्र पर फिराया और कहने लगे-"इतने भावुक न बनो बेटा, मैं इस पारस पत्थर के लिये इतना निष्ठुर नहीं बन सकता कि तुम्हारे प्रति वनी आत्म-प्रीति को प्रोझल कर दू । तुम्हारी पुण्यशीलता के सामने यह पारस पत्थर पया कीमत रखता है ? ऐसे अनेकों पत्थर तुम्हारे : परणों में लुढ़कते रहेंगे ।" "पाप रक्खें-पाप रक्खें" के सामान्य से विवाद के बाद पारस पत्थर सेठजी ने रख लिया । गुणचन्द्र मरिण- पुर से पाये हुए माल-असवाव और कर्मचारियों की स्यवस्था में लग गया और सेठजी सीघे ऊपर अपने निजी बैंठमा-कक्ष में चले गये । उनके मानस में एक योजना : निश्चय का रूप ले चुकी थी। उसी के क्रियान्वयन के 88
--
लिये वे सेठानी से विचार-विमर्श करने ऊपर पाये
अतः उन्होंने आवाज देकर अपने कक्ष में ही रोडालो
बुलवा लिया सेठानी गृह-कार्य से निवृत्त हो गुरुमा
से धर्म-चर्चा करने बैठी थी। यह उसका दैनिक र
ही था । जव कभी अपने कार्यों में अवकाश मिलता, ”
अपनी पुत्री में धर्म-संस्कार डालने का प्रयास करत
सेठजी की आवाज सुनते ही गुणमाला को वही
सेठानी, सेठजी के कक्ष में पहुंच गई।
सेठजी ने प्रसन्न भाव से सेठानी को सामने बैठने '
इशारा करते हुए गम्भीर भाव से कहा--"मैं साजन
से एक विशेष विचार-विमर्श करने पाया हूं।"
'फरमाइये ना, क्या प्रादेश है ? वैसे ग्राप जोर
करते हैं, अच्छा ही करते हैं । इसमें मुझगे परा गया
की क्या बात है ?" सेठानी ने नम्रता व्यक्त की।
"तुम्हारा कहना ठीक है। किन्तु आज एक नि:
प्रसंग में तुम्हारी राय लेना चाहता हूं। तुम्हें माना
कि अपने नये मुनीमजी, जो मणिपुर का काम
उन्हें वापस बुलवा लिया है। वे आज ही पाये हैं।
3
"हां, अभी-अभी तो मैंने अपने हाथों मे निमः
भोजन करवाया है । पर आप उन्हें मुनीमजी यो ।
हैं ? मुझे तो वे अपने बेटे जैसे ही लगते हैं।
"हां वही तो मैं भी कहने जा रहा हूं।"
"पया पाप उन्हें गोद (दत्तक) रखना चाह रहे हैं ?"
मेठानी ने बीच में ही बात काटकर पूछा।
"दत्तक तो नहीं, पर हां वैसा ही समझलो। देखो
अपनी बेटी अव कुछ मयानी हो गई है । उसका
विवाह तो हमें करना ही है और इसके अतिरिक्त अपने
और कोई सन्तान है नहीं । मैं सोचता हूं कि गुणचन्द्रजी
से बढ़कर भाग्यशाली लड़का कहीं नहीं मिलेगा। इसकी
पुण्यवानी कितनी प्रबल है, यह तुम्हें मालूम नहीं है ।
दो सौ र० रोज दान देने के याग्रह से इन्होंने घर छोड़
दिया और मैंने इन्हें केवल इनके चेहरे की आकर्षकता एवं
पुण्यशालिता को देखकर इच्छानुसार वेतन पर रख
लिया । ये यहां दो सौ रुपये प्रतिदिन दान देते थे ।
पुराने मुनीमजी ईर्ष्या करने लगे, तो मैंने इन्हें सभी
मुविधाएं देकर मणिपुर भेज दिया। वहां से इन्होंने
घोड़े से दिनों में दस-पन्द्रह लाख की कमाई दे दी । यही
नहीं, अब इस पुण्यशाली को पारस पत्थर भी मिल गया
घऔर वह भी इन्होंने मुझे दे दिया बड़े अाग्रह के साथ ।
मैं नहीं ले रहा था तो कुछ भावुक बन गये । अब तुम्हीं
सोचो, इससे बढ़कर पुण्यशाली लड़का कौन मिलेगा
गुणमाला के लिये ? हम इन्हें ही अपना कुल दीपक
मानकर सारा भार इनको सौंप देंगे और धर्माराधना में
लग जाएंगे।"
१०१
सेठजी के विचारों से असहमत होने का तो समाः
ही नहीं था। ये विचार सुनकर उसे बड़ी प्रसन्नता हुई।
उसने कहा--"यह तो मेरे मन को वात ही अापने कर
है। मेरे मन में तो यह जव यहां रहता था, तभी से में
की तरह भा गया था। मैं कई बार सोचती भी योनि
क्या ही अच्छा हो कि इसे हम अपना घर जमाई बनायें,
जबकि मुझे इसके बारे में इतनी विस्तृत जानकारी में
नहीं थी। हां, इसका रहन-सहन, सरलता, सादगी एा
खास चारित्रनिष्ठा, दृष्टि की पवित्रता से ही मैं या
प्रभावित हो गई थी। निश्चय ही ऐसा निष्ठावान लहा
मिलना मुश्किल है। किन्तु इसके कुल खानदान का में
कुछ पता है कि नहीं ?" सेठानी पूर्ण सहमति के मा
छोटी सी जिज्ञासा भी रखदी।
वैसे मैंने उनसे जाति कुल आदि के विषय में ग
नहीं पूछा, किन्तु उनके जीवन व्यवहार से यह स्मः
लगता है कि यह बहुत कुलीन है । विना सानदान ,
कुलीनता के दो सौ रुपये प्रतिदिन दान की प्रतिमा
नहीं हो सकती है। फिर इनका तो पूरा जीवन प्रार
सामने हैं। पुण्यवानी एवं कुलीनता तो उनका जीय
बता रहा है।
A
"फिर अब देरी किस बात की । पाप तो या
सम्बन्ध अभी ग्राज ही निश्चित करलें।"
१०२
सेठानी की सहमति प्राप्त कर सेठजी प्रसन्नवदन
नीचे दुकान पर चले गये । दिनभर व्यापार आदि का
कायं देखते रहे । गुणचन्द्र भी अपनी यहां की नई
व्यवस्था में लीन रहा ।
सन्ध्या को दुकान के कार्यों से निवृत्त हो सेठजी
पर जाने लगे, तो गुणचन्द्र को भी ऊपर बुला लिया ।
अपने बैठक कक्ष में जाकर दोनों उचित प्रासन पर बैठ
गये । सेठजी ने ही वात कर सूत्र पकड़ते हुए कहा-
"उधर मणिपुर के व्यापार की सारी स्थिति तो आपने
बता दी, किन्तु यह तो आपने बताया ही नहीं कि वहां
नया व्यापार जमाने में आपको कोई परेशानी तो नहीं
हुई । श्राप पर कोई कष्ट तो नहीं पाया ।""अपने पैसों
एवं लाभ की चर्चा के भुलावे में आपके दुःख दर्द के
विषय में मैंने पूछा ही नहीं ।"
"प्रापके आशीर्वाद से वहां मुझे कोई कष्ट नहीं
हुप्रा । जाते ही मैंने पहले वहां के राजा को कुछ भेंट
देकर प्रसन्न कर लिया और उन्हीं के द्वारा आवास आदि
को समस्या एवं अन्य व्यापारियों से परिचय कर लिया।
"हां, यदि आप पीछे से पचास हजार रुपये और
नहीं भिजवाते तो अवश्य कुछ दिक्कत होती । किन्तु
प्राप तो इतने महान् हैं कि मैं क्या कहूं-मेरे पीछे आपने
पानी की तरह पैसा वहाया।" कहते हुए गुणचन्द्र
कृतज्ञतावश भावुक हो गया । उसकी आंखों से पता की कुछ बून्दें टपक पड़ो। . सेठजी ने बड़े मृदुल स्वरों में कहा-"पाप बार- बार ऐसा क्यों कहते हैं ? मैंने आपके साथ किया क्या है ? मैंने तो अपनी आत्म तुप्टि का कार्य किया है मेरे द्वारा जो कुछ बना, वह तो अापकी पुण्यवानी में ही परिणाम है । आपने नहीं सुना होगा, किन्तु मेरे कानों पर शब्द आ गये हैं कि आपके यहां आते ही सा बाजार में आपकी चर्चा चल पड़ी है । न जाने रिनो द्वारा उस शिला की और पारस पत्थर की चर्चा बाजार में पहुंच गई है । जिन-जिन दुकानों पर आप पहुंचे थे और जहां से निकाल दिये गये, वे सभी सेठ पश्चात्ता कर रहे हैं और अपने मुनीमों को आड़े हाथों ले रहे। कि उन्होंने ऐसे भाग्यशाली लड़के को अपने यहां नहीं रखकर पागे धकेल दिया । यदि यह हमारे यहां सा, तो आज हम माला-माल हो जाते। हमने एक बस बड़ा अवसर खो दिया। इस चिन्तन के अनुसार हो मुझे भी अपने आपको भाग्यशाली मानना चाहिये ।। आप जैसे पुण्यशाली व्यक्ति मिले और मेरी कोतिर लक्ष्मी की वृद्धि होने लगी। उधर आप ही मेरी ali के गीत गाये जा रहे हैं। वास्तविकता तो यह है कि आपका और हमारा यह संयोग किसी पूर्व भव के मंकार से प्रेरित है । अन्यथा न आप मुझे जानते ग्रार न में । १०४
भापको । जाम-जन्मान्तर के किन्हीं संस्कारों से ही हमें
एक दूसरे से मिल गये हैं।
"अब तो एक बात है कि मैं इस जन्म-जन्मान्तर है।
सम्बन्ध को वर्तमान जीवन में भी दृढ़ बना लेना चाहता
हूँ । यदि माप मेरी बात मान लें, तो कहूं।" सेठजी
जिज्ञासा भरी दृष्टि से गुणचन्द्र की मोर देखने लगे।
गुणचन्द्र उनकी प्रान्तरिक भावनामों को नहीं
समझ सका । उसने कहा-"पाप कैसी बात कर रहे
है । मैंने कभी मापकी कोई बात टाली है ? भापकी
पाशा नहीं मानने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। मैं
तो आपका नौकर हूं। मोर वह भी आपके उपकार के
पीछे इतना कृतज्ञ हूं कि आप पाग में कूदने की माज्ञा
दें, तो भी बिना तर्क किये. उसमें कूद पडूगा ।"..."
फरमाइये श्रापका क्या मादेश है ?"
"मुझे भी पूरा विश्वास है कि भाप मेरी बात
नहीं टालेंगे। फिर भी यह विषय पूरे जीवन से सम्बन्धित
है । अतः मैंने मापसे पूछ लिया । अब मेरी यह भावना
है कि माप हमारे घर के अनम्य सदस्य बन जाएं। बेटी
गुणमाला अब योग्य हो चुकी है, अत: माज से ही वह
मापकी हो चुकी है । वस इसी रिश्ते के भाधार पर मैं
अपने सम्बन्धों को दृढ़ बना लेना चाहता हूं। साथ ही
उस प्रिय बेटी के मतिरिक्त मेरे भौर कोई सन्तान नहीं
हा अता आपका यहा रहकर इस यरका मा कर
है । मुझे विश्वास है कि मेरे इस प्रस्ताव के
अस्वीकार नहीं करेंगे।"
एकदम अप्रत्याशित वात सुनकर गुरुवार
गया । कुछ क्षणों तक तो उसकी समझ में हो :
पाया कि सेठजी को क्या जवाब दे । यह मार
नीची दृष्टि किये बैठा रहा । फिर कुछ स्वस्य-साया
होता हुआ वोला-"सेठ साहब, यह तो पापने हर
कल्पना के बाहर की वात रखदी है । मैंने अपने का
के इस पक्ष पर कभी कुछ सोचा ही नहीं, मोर
सहसा ऐसा प्रस्ताव रख रहे हैं । इसे कैसे स्वीकार
जाय । दूसरी ओर आपने कभी मेरी जाति-कुन
खानदान के विषय में भी कोई जानकारी नहीं लो।
एकदम इतना बड़ा प्रस्ताव रख दिया। यह मेरी :
में नहीं पाया। इस विषय के निर्णय में माप कुमार
कर रहे हैं । मेरी दृष्टि से माप इस विषय पर पुरा
धैर्य एवं गम्भीरता से विचार कर निरांय लें।" गुरु
ते अपनी स्थिति स्पष्ट की।
मैंने खूब अच्छी तरह विचार कर लिया है
गुणमाला की मां से भी मैंने परामर्श कर लिया।
आपके कुल-गोत्र का जहां तक सवाल है, समे म
पुण्यप्रभा स्पष्ट बता रही है। साथ ही पाने
क्षिप्त परिचय में बताया ही था कि प्राप एक अच्छे
म्पन्न घराने के सदस्य हैं और एक ही प्रवचन से प्रापने
सनी बड़ी प्रतिमा करली थी । इस सवसे यह तो
प्रश्चित है कि प्राप कुलीन हैं । अतः अब भाप बचने
की कोणिश न करें। आपको मेरा यह प्रस्ताव स्वीकार
पारना ही पड़ेगा । आप वचनवद्ध हैं कि यदि में अग्नि
यूदने पो पाहूं तो भी याद जायेंगे । तो फिर मेरा यह
ताव अस्वीकार कैसे कर सकेंगे ?"
।
सेठजी के इस तर्क-संगत प्राग्रह के सामने गुणचन्द्र
बोलने का साहस नहीं कर सका । उसे 'मौन
कृति लक्षणम्' के रूप में सेठजी की बात स्वीकार
रनी पड़ी। फिर भी उसने साहस करके इतना तो कह
दिया "प्रापकी प्राज्ञा का पालन करूंगा । किन्तु एक
विदन है कि विवाह के पश्चात् मैं इस घर का मालिक
मोर यहीं रहं, इस अनिवार्यता में पाप मूझे न
। मैं तन-मन से प्रापकी सेवा करूंगा, किन्तु घर
माई के रूप में रहकर नहीं, आपका सेवक रहकर ही।
गोंकि जिन माता-पिता ने मुझे जन्म दिया, उनका भी
क पर उपकार है । वे वृद्धावस्था में मुझे याद करें तो
नको मेवा का भी मेरा कर्तव्य है । और यह मैं अच्छी
रह जानता हूं कि जोश-जोश में उन्होंने मुझे विदा
कर दिया. किन्तु फिर उन्हें पश्चात्ताप अवश्य रहा
'गा। पदाचित् पश्चात्ताप न भी हो तो भी चूकि
१०७
में उनकी इकलौती सन्तान हूं, प्रत! मेरा यह कतई
जाता है कि मैं वृद्धावस्था में उनकी सेवा करूं।
मुझे इसी स्थिति पर तो निकाला था कि हापों
कमाकर दान करू। तो अब में वैसी स्थिति में पहुंबर
एनके दर्शन करू', यही मेरे लिये हितकर है। साथ है
आप उचित समझे, तो विवाह को सूचना भी कि
को कर दें।"
सेठजी गुणचन्द्र की दीर्घ दृष्टि पूर्ण कर्तव्यनिष्स में
भावना से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने गुणचन्द्र को ।
बात को स्वीकार कर लिया कि वह भले ही यहां न र
किन्तु पिताजी को अभी सूचना देने के पक्ष में
नहीं हैं।
गुणचन्द्र से गुणमाला के साथ विवाह की सो
लेकर सेठजी सेठानी के कमरे में गये, मोर उमेर
समाचार सुनाये दोनों हर्पित थे । शीघ्र ही राब मुर्गम
कर्मचारियों में और उनके द्वारा नगर में यह शुभ गंगा
फैल गया कि सेठ भागचन्द्रजी अपनी माया
विवाह गुणचन्द्र के साथ करने जा रहे हैं । गुणपदक
पुण्य कीति के सामने किसी के द्वारा कोई आपति
जाने का सवाल ही नहीं था।
बड़े धूमधाम से विवाह की तैयारियां होने की
नगर भर में अपनी प्रतिष्ठा के अनुसार सेठजी ने उमर
रनवाया । निश्चित समय पर विवाह रस्म पूरी हुई।
सेठजी ने एक बहुत सुन्दर भवन गुणचन्द्र के लिये बनवा
लिया था। वह भवन तथा लाखों की सम्पत्ति के साथ
वह पारस पत्पर भी प्रीति दान-दहेज के रूप में उसे दे
दिया । जिस उत्साह और उमंग भरे वातावरण में शादी
हुई, उसकी सौरभ सब तरफ फैल गई ।
अब गुणचन्द्र एवं गुणमाला अपने भवन में सानन्द
रहने लगे। सेठजी का पूरा कारोवार देखने के साथ
अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार प्रतिदिन दान का क्रम चलता
रहता है । उसमें भी प्रब वृद्धि होने लगी । वे बहुत सुखी
उमृद्ध एवं धर्ममय जीवन जीने लगे। धर्मसाधना के
संस्कार दोनों की प्रात्मा में बहुत गहरे जमे हुए थे।
प्रतः उनके जीवन-व्यवहार में भी धर्म उतरा हुअा था ।
वे सब तरह से सुखो, समृद्ध एवं निश्चिन्त थे। फिर भी
गुणचन्द्र को यदा-कदा मां के प्यार की एवं पिता के
स्नेह की स्मृति पा ही जाती थी। वह कुछ चिन्ता में
घिर जाता कि मां की एवं पिताजी की क्या हालत
होगी। मेरे चले जाने से वे अवश्य चिन्तित एवं दुःखी
होंगे । वह कई बार बसन्तपुर जाने का विचार भी
करता, किन्तु परिस्थितिवश एवं संकोच से वह वैसा
नहीं कर पाया।
पर गुणचन्द्र अपने दाम्पत्य जीवन में मानन्दमग्न
रहता हुआ अपनी कीर्तिपताका फहरा रहा था, तोर
बसन्तपुर में उसके माता-पिता की हालत बहुत विक्षनरी
हो गई थी। सेठ धनचन्द्र ने आवेश में गुणचन्द्र से कर
तो दिया, किन्तु थोड़े ही दिनों में उन्हें अपने बेटे की पार
सताने लगी । गुरणचन्द्र की मी तो बहुत मषिक विकार
करने लगी । वह कई वार सेठजी से भी झगड़ा का
बैठती कि उन्होंने धन के लोभ में उसके लाल को घर से
निकाल दिया। कोई दो-चार बेटे तो थे नहीं, जो पर
का बंटवारा करना था। अरे वह एक ही तो था उसकी
प्रांखों का तारा । अब क्या वे इस धन को साय
जाएंगे ? वह अनेक वार रो पड़ती और मधीर होर
विलाप करने लगती ।
सेठानी की अधीरता देखकर कई बार सेठजी की
विह्वल हो उठते और पश्चात्ताप के स्वर में बोल उठने,
"वास्तव में मैंने अावेश में आकर बहुत बड़ी भूल करी
है । मुझे कुछ धैर्य से काम लेना था। कुछ दिन में
स्वयं ही समझ जाता । अब वह न जाने कहां होगा,
क्या करता होगा ? मैंने उसे जाते हुए कुछ भी सोन
दिया। हाथ-खर्चा के चार पैसे भी नहीं। हाय ! लाल,
तू कहां है ? पाजा वेटा! अव तेरी इच्छा हो न
दान करना बेटा...!" कह-कहकर सेठजी रोने लगते ।
?
यह क्रम बहुत दिनों तक चलता रहा । मागिर र
११०
दिन सेठानी से रहा नहीं गया, उसने कहा-"प्राणनाथ,
इस पुत्र-वियोग को पव अधिक नहीं सह सकूगी.
रोते-रोते मेरी प्रांखों की रोशनी मन्द पड़ गई है ।
वृद्धावस्था के चिह्न सामने दिखाई दे रहे हैं । अब प्राप
ही बताइये इस बुढ़ापे में अपनी सेवा करने वाला कौन
? अव तो पाप कृपा करके गुण का पता लगाइये।
चारों तरफ अपने श्रादमियों को भेज दें। मेरी प्रात्मा
कहती है कि वह बहुत पुण्यवान और भाग्यशाली वेटा
है । वह जहां भी होगा, सुखी हो होगा । किन्तु वह
पापके बुलावे की प्रतीक्षा में है । अतः अव मेरा निवेदन
है कि पाप अपने नौकरों को सब तरफ भेज दीजिये।"
पाहते हए सेठानी ने अपने प्रांसू पोंछ लिये ।
।
सेठजी स्वयं अपनी भूल का अनुभव कर रहे थे और
चिन्ता-ही-चिन्ता में उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि
ये गुणचन्द्र को पाने के लिए क्या करें। सेठानी का
पुझाव तुररत उनके दिमाग में जग गया और वे सेठानी
को प्राश्वस्त फर बाहर चले आये । अपने बैठक कक्ष में
आफर उन्होंने मुनीमजी को बुलाया मोर उनके माध्यम
अनेक नौकरों को एवं अन्य कुछ व्यक्तियों को सूचित
रवा दिया कि वे मार्ग-व्यय प्रादि ले जाएं और सब
रफ खोज करें । गुणचन्द्र जहां भी मिले, उसे हर
लत में सभी शर्ते स्वीकार करते हुए ले पाएं ।
१११
अनेक व्यक्ति निकट एवं सुदूरवर्ती शहरों में
पौड़ पड़े। सभी अपनी-अपनी क्षमता एवं परिवार
अनुसार गुणचन्द्र का पता लगाने लगे। अधिकार
निराश होकर वापस लौट आए मोर सेठजो को म
दे दी कि गुणचन्द्र का कहीं कोई पता नहीं लगा है।
इसी क्रम में भ्रमण करते हुए दो व्यक्ति प्रति
पुर भी पहुंच गये । वहां उन्हें ज्ञात हुमा कि सेठ भाग
जी के यहां एक नये मुनीम आये हैं, जो दो सौकानेर
दान करते हैं । अब तो वे सेठ भागचन्द्रनी के दाम
बन गये हैं।
बस, दो सौ रुपये प्रतिदिन दान की बात ही दो
लिये पर्याप्त थी। दोनों व्यक्ति खुशी में झूम उठे। पर
दूसरे से कहने लगे-"वस, वह व्यक्ति गुणना में
अलावा और कोई नहीं हो सकता है ।" शोज कर
करते वे सेठ भागचन्द्र की दुकान पर पहुंच गये । दूर
ही सेठजी की गद्दी पर बैठे गुणचन्द्र पर दष्टि पर।
पनकी प्रसन्नता का पार नहीं रहा । वे वेपहा दुरा
पर चढ़ गये और सीधे गुणचन्द्र के सामने जाकर
हो गये । गुणचन्द्र ने उनका अभिवादन किया और
"पधारिये, पाप कहां से पधारे हैं ? कोई सेवा है।
फरमाइये।"
दोनों व्यक्ति कुछ क्षणों तक तो कुछ यो
vi
..
११२
में ? अपलक गुणचन्द्र को देखते ही रहे । गुणचन्द्र भी अब उन्हें ध्यानपूर्वक देखने लगा। उसे लगा कि ये व्यक्ति तो परिचित हैं और दूसरे ही क्षण उसने उन्हें पहचान लिया पौर खड़े होकर उनका उचित सम्मान करते हुए कहा- "प्राणो, कृपाचन्दजी भोर मंगलदासजी प्राप यहां कैसे ? कहिये बसन्तपुर से कब और कैसे पधारना हुआ? वहां - सब कुशल-मंगल तो है ? माताजी-पिताजी प्रसन्न तो है है ?" एक ही सांस में उसने अपनी जिज्ञासाएं रखदीं प्रागातुकों के सामने । दोनों प्रागन्तुक हषं से इतने उत्फुल्ल हो रहे थे कि उनसे कुछ भी बोलते नहीं बन रहा था । गुणचन्द्र अपने घासन से अलग हट गया और उन्हें वहां बैठने का पाग्रह करने लगा। उस पर तो नहीं, पर उचित प्रासन पर वे दोनों बैठ गये । बड़े शान्त भाव से मंगलदासजी पुरोहित ने कहा- "कंवर साहब, पाप तो यहां बड़ प्रानन्द में है। ऐसा लग रहा है, किन्तु वहां सेठ साहब एवं सेठानीजी को जो हालत है, वह हमसे देखी नहीं जाती। दोनों ने रो-रो कर प्रांखें खराब करली हैं और खाना-पीना छोड़ने उनका शरीर भाषा रह गया है। जोश-जोश. में सेठ जी ने प्रापको निकाल तो दिया, किन्तु थोड़े दिनों बाद ही वे गहरे पश्चात्ताप से भर गये । सेठानीजी की हालत तो इतनी दयनीय है कि कुछ कहते नहीं बनता। सेठ- सेठानी ही नहीं, पूरा बसन्तपुर प्रापकी याद में झूर से
रहा है। वहां का बच्चा-बच्चा आपको पुतिः
हजारों दीन-दुःखी दुकान पर प्रा-आकर मार
जाते हैं।
१
कवर साहब, हमें आश्चर्य और दुःस तो हम
का है कि इतनी सुख-समृद्धि को स्थिति में होने ।
भी आपने कभी अपनी जामभूमि एवं माता-
याद नहीं किया । आपने यह भी नहीं सोचा
जननी-जनक की क्या हालत होगी ?"
मगलदासजी की प्रांखों से कुछ बूदें टपक पड़ी।
जी के नेन भी सजल हो गये ।
गुणचन्द्र अवाक् भाव से अपनी मातृभूमि के प्रयास
सुनता रहा । सहसा उसे मातृ-ममता एवं पिट
स्मृति हो पाई । वह भी कुछ भावुक हो !
लगा-"माप यह न कहें कि मैंने मातृ भूमि
माता-पिता को पाद ही नहीं किया है । उनको मा
अनेक बार मैं रातभर रोता रहा हूं। कई बार
का विचार भी किया, किन्तु मैं यह पाया
अपनी पूरी योग्यता बनाकर ही जाऊ । वैसे या
सेठ साहब ने दो सौ रुपये प्रतिदिन की नौकरी
किन्तु यह तो आखिर नौकरी ही थी । उस free!!
देश लौटने की बात नहीं सोच सकता था ।
साहब ने मुझ अपना दामाद बनाकर बहुत महा
११४
दिया है। प्रता प्रव में स्वयं विचार कर बसन्तपुर प्राने
ला था। इसो रष्टि से मैंने सेठजी के इस प्रस्ताव को
वीकार नहीं किया कि मैं यहीं उनका घर जमाई बनकर
भाई । प्राप ही सोचिये मातृ भूमि एवं माता-पिता के
पकार को भूल जाता, तो मैं इस प्रस्ताव को अस्वीकार.
से करता ?"
?
इस बार कृपाचन्दजो बोले-"खेर, छोड़ो इस चर्चा
। हमें तो पाप यह वतामो कि अव आप यहां से कब
ल रहे हैं ? हम पापको खोज में ही पाये हैं । सेठजी ने
जाने कितने प्रादमी दौड़ाएं हैं चारों दिशाओं में । यह
ति हमारा परम सौभाग्य है कि प्राप हमें मिल गए ।
ब हम प्रापको साथ लिये विना यहां से नहीं जायेंगे।"
में
गुणचन्द्र ने गम्भोर स्वरों में कहा, "अब तो.प्राप के
हने को प्रावश्यकता हो नहीं है। जव मुझे यह ज्ञात
गया है कि मुझे पिताजो ने याद किया है, तो मैं यहां
के दिन भी रहना कैसे पसन्द करूंगा? आप चलें,
भान, भोजन से निवृत्त हो लें, तब तक में सेठ साहब
बातचीत करके चलने की तैयारी करता है । सेठ
हिव का हृदय इतना उदार एवं महान है कि वे मुके
कार नहीं करेंगे।" कहते हुए गुणचन्द्र उठा और दोनों
तिपियों को अपने नवनिर्मित भवन की ऊपरी मंजिल
का ले गया । स्नान, मादि की व्यवस्था समझाकर- गुण
११२
माला को सूचित किया कि बसन्तपुर से दो मेहकार ।
हैं। उनके लिये भोजन को समुचित व्यवस्था करना है
साथ ही संकेत में उसने यह भी बता दिया कि
यथाशीघ्र वसन्तपुर चलने की तैयार करनो है।
गुणमाला को संकेत कर गुणचन्द्र सेठ भागवत
के पास आया । अभिवादन-चरण स्पर्श के बाद
विनम्र शब्दों में निवेदन किया-"सेठ साहय, TERT
से सन्देश प्राप्त हुआ है कि माताजी-पिताजी मेरे कि
बहुत चिन्तित हैं और उस चिन्ता में दोनों रात हो ।
है । जो दो व्यक्ति सन्देश लेकर आये हैं, उनका कहना
कि मुझे अतिशीघ्र बुलाया है । मैं नहीं पहुंगा।
माताजी के विलाप को देखते हुए कुछ भी अघटनीम
सकता है। अब आप ही फरवाइये, मुझे क्या है?
चाहिए ?"
kya
सेठ भागचन्द्रजी ने ज्यों ही ये अप्रत्याशित समा'T
सुने कि गहरे विचार में डूब गये । उन्हें यह तो न पर
भी नहीं थी कि बेटी के विवाह के तुरन्त बाद ही
इस तरह विदाई देनी पड़ेगी। विपरीत ये सोइयो
में ये कि भले ही घर जमाई न रहें, ये रहेंगे तो म
किन्तु उनकी प्राशा पर पानी फिर रहा था।
गुरगचन्द्र को बैठने का इशारा किया और मम्मीर ।
में बोले-"पाप अभी यह क्या समाचार नाम हैं ? ४.
7
तो मादी हुई हैं पोर मभी जाने की बात ! मुझे तो ऐसा
लगा कि जैसे सिर मुंडाया और प्रोले पड़ गये । मभी
पाप कहीं जाने का नाम न लें। समय पर में स्वयं आपको
प्रसन्नता पूर्वक विदा करूंगा।"
ब
गुणचन्द्र ने बड़े घर्य के साथ कहा-"सेठ साहब,
। पाप कुछ गम्भीरता से विचार करें! जिन माता-पिता
ने मुझे जन्म दिया, उनके प्रति मेरा क्या कर्तव्य होता
है ? प्रापका उपकार भी महान् है । इसे मैं जन्म भर
नहीं भूल सकता । किन्तु अभी परिस्थिति दूसरी है ।
उधर माताजी अस्वस्थ हैं । ऐसी स्थिति में मैं नहीं पहुंचू
तो पया यह उचित होगा ? नाप यही सोचें कि मैंने
प्रपनो पुत्री की शादी कहीं दूर देश में करदी है, या
पसंध्यपालन हेतु अपने पुत्र को कहीं दूर भेज रहा हूं।"
फर्तव्य-पालन के तर्क पर सेठजी कुछ विवश हो
गए । कहने लगे-"प्रार यह न सोचें कि बेटी को दूर
भेजने से मैं चिन्तित हूं। मुझे वेटो से भी अधिक स्नेह
माप से है । मैं पापको अपने पुत्र से भी अधिक प्यार
करता हूं। पाप जैसे पुण्यशाली पुरुष का वियोग ही
मुझे प्रसर रहा है । पर हां, आपका वह भी कर्तव्य है।
पार खुशी-सुशो पधारें । पर इतना अवश्य ध्यान रक्ख
कि हमारे बुढ़ापे का सहारा भी प्राप ही हैं । अतः हमें
भी वापस शोघ्र सम्भालें ।"
1
११७
वापस शीघ्र.पा जाने का आश्वासन देकर ने सेठजी से विदा ली और सेठानीजी के पास माना। उन्हें पूरी स्थिति से अवगत कराया। एक गरको सेठानी भी कुछ चिन्तित हुईं, किन्तु परिस्थिति में समझ कर उन्होंने भी गुणचन्द्र को अनुमति दे दी। गुरगचन्द्र वापस घर आया, तब तक भोजन तैयार चुका था । पोर मेहमान भी स्नानादि से निवृत हो गो थे। सभी ने भोजन किया और गुणचन्द्र एवं गुणगान जाने की तैयारी करने लगे । अति आवश्यक एवं मार- पूर्ण वस्तुओं को सन्दूक में जमाया । वस्त्र, प्राय मादि बहुमूल्य पदार्थों को अलग-अलग सन्दूकों में रमा उन पर ताले लगाए । मार्ग में भोजनादि की या के लिए सम्पूर्ण सामग्री की व्यवस्था कुछ विराण कर्मचारियों पर डाल दी और उन्हें साथ चलने का मौर कर दिया। इस प्रकार पूरी तैयारी करके गुणचन्द्र है। मुनीम, प्रादि सभी कर्मचारियों से मिलने चला गया पोर . माला अपनी माताजी के पास गई । हैड मनीमजी, मा सभी कर्मचारियों ने अपने द्वारा की गई पटता लिये गुणवन्द्र से क्षमा मांगी । गुणचन्द्र शादियो क सबसे मिला और आश्वस्त किया कि वे उमगन' वात को भूल जाएं । उन्होंने कोई बुरा व्यवहार न? ११८ हाथ लगी। - को पोज लिया । मुछ स्वस्थ हो सठानी न गुणपदको पिया । सही पूचं तो उनकी कृपा से ही उसे मणिपुर देखने को मिला और पारस पत्थर जैसी कीमती वस्तु नगर प्रमुगों से भी मिलकर उनसे तुम प्राशीर्वाद लेकर गुणचन्द्र सेठानी जी के पास पहचा । सेठानी जी गुणमाला यो शिक्षा दे रही थी । गुणचन्द्र को विदाई को पूरी तैयारी में देखकर सेठानी पा धांस छलक पायीं। अपनी बेटी को सीने से लगाते हुए उन्होंने पाहा--"बेटी, में अच्छी तरह जानती है कि पन्या पराया धन होती है। उसे पितृ-गृह छोट बार एक दिन जाना होता है । पही स्पिति घाज तुम्हारी भी है। बेटी, तुम जाम्रो । पुशी-खुशी जाम्रो । अपना पर दसाम्रो । पूर्व फलो- फूलो । पर बेटी, अपने पुल फा लाज रखना । मेरे दूपर फा गौरव बढ़ाना । पति को परमेश्वर एव सास-ससुर को माता-पिता मानना।" कहते हुए सेठानी पावन मारना कर रो पड़ी। गुणमाला भी मां के भांचल में मुंह छिपाये सिस- कियां भरने लगी । गुणचन्द्र ने मह पुमाकर सजल नेत्रों पोर घभिमुस होकर महा-"मेघापको एक. दे की सरह देखा है और अभी भी में दही मानती मेरी रप्टि में बेटे घोर जमाई में कोई पनार नहीं है। मेरी सोमाशाएं पी कि पाप रही रह पर मारी गरे ।
१
किन्तु एक कर्तव्य आपके सामने है। इसलिये
आग्रह नहीं कर सकती। पर आप यह नितिन
कि गुणमाला के वियोग से अधिक दुःत मोर
वियोग का है। आपका जाना आवश्यक है, तो
जाएं । गुणमाला को अच्छी प्रकार से रनरों । मह :
सीधी सरल लड़की है । कोई त्रुटि कर बैठे तो प्रेम
समझाते रहें। एक बात का ध्यान रहे, वापस हमें जा
ही सम्भाल लें। वहां का कार्य होते ही पुनः शो
पधार पाव।"
.
.
.
गुणचन्द्र ने आश्वासन भरे दो शब्द रहे
जी, आपने जो मातृ-स्नेह मुझे दिया, उसे में जन्म
नहीं भूल सकता । अभी तो मेग जाना प्रापयर
गया है । अतः जा रहा हूं, नहीं तो प्रापको छोहार जो
का मन नहीं होता। हां आप कहें, तो इसे (मुरामा
को) यहीं छोड़ जाऊं ।"
सेठानी ने कहा-"नहीं, इसे अपने सास-पुर
दशन कव होगे? अभी आप इसे ले जाएं । वा।
निवृत्त होते ही शीघ्र पधार पावें ।"
गुचरणन्द्र ने सेठानी के चरण स्पर्श किये और मा
नेत्रों से विदा ली । गुणमाला भी कुछ क्षणों मां से कि
रोती रही । फिर पति का अनुगमन पर चल पड़ी।
माकर सारा साजो-सामान जमाया। तत्कालीन सातार
१२.
के साधन बैलगाड़ियां, घोड़े, ऊंट आदि. का- काफिला
तयार था । दोनों के लिये एक सुन्दर रथ तैयारःथा।
पच्चीसों नौकर-चाकर एवं कुछ दासियां तैयार थीं।
सम्पूर्ण तैयारी के साथ चल पड़, अपने गन्तव्य की और।
नगर की बाहरी सीमा तक स्वयं सेठ, सेठानी, मुनीम,
नौकर-चाकर एवं गुणमाला की- सहेलियां सब विदाई
देने माई । सभी के नेत्रों में प्रश्रुधारा बह रही थी।
सेठ-सेठानी, गुणमाला एवं गुणचन्द्र तो फवक-फबक्र कर
रो रहे थे । कुछ क्षणों तक तो सेठजो ने गुणचन्द्र को
पौर सेठानी ने गुणमाला को सोने से चिपकाए रक्खाः ।
प्रांसुमों से एक दूसरे के कपड़े गीले करते रहे।
पासिर चलने का समय हुआ, तो गुणचन्द्र एवं
गुणमाला ने सब के चरण स्पर्श किये और सब के अन्तर
में उठने वाले प्राशीर्वाद लेकर रथ में जा बैठे। काफिला
अपने गातव्य की प्रोर आगे बढ़ा चला । सेठ-सेठानी,
प्रादि सभी नगर-जन रथं के दृष्टि में प्राने तक वहीं
सर-सड़े देखते रहे । रथ के भांखों से प्रोझल हो जाने
पर भारी मन से शहर की और लौट पड़े।
गुणचन्द्र का काफिला पड़ाव-दर-पड़ाव मागे. बढ़ता
गया । मार्ग में जहां कहीं रात्रि विश्राम करते, प्रातः
उठते ही दो सौ रुपये ही नहीं, हजारों का. दान. उसका
१२१
नित्यक्रम बन गया । जब पारस पत्थर से
था, तो कमी किस बात की थी? नहीं नहीं नगर में
से गुजरा, लोहा लिया, सोना बनाया मोर दान कि
कहीं अच्छे सामाजिक कार्यकर्ता मिते, सो र
विद्यालय, जलाशय, औषधालय भादि के लिहा
लाखों के ट्रस्ट कायम कर दिये । इस प्रकार मार
अपनी धवल कीर्ति की सुवास बिसेरते हुए एक म
सेठ की महिमा प्राप्त करते हुए गुपचन्द्र का कर
बड़े ठाट-बाट के साथ वसन्तपुर की सीमा में ।
गया।
कृपाचन्दजी एवं मगलदासजी, जो काफिले के ?
ही थे, हर्षित-प्रफुल्लित शीघ्र गामी मश्वों पर
पहले ही नगर में पहुंच गए। उन्होंने सेठ धनवान
अन्य नगर प्रमुखों को सूचित किया कि गुणपति
ठांठ पूर्ण वैभव से पा रहा है, वह किसी महाराज में
कम नहीं है । यह सबर बिजली की तरह सारे शर
फैल गई कि घर से खाली हाथों निकला यह TY
रास्ते भर लाखों रुपये लुटाता पा रहा है। उसको
का कोई सेठ हमारे यहां नहीं है ।
सेठ धनचन्द्र को और सेठानी को अपने साल
की सूचना मिली, तो वे हर्ष से विहत हो उठे । है*
कृपाचन्दजी एवं मंगलदासजी को बहा रारा'
१२२
- दिया, और दोट पड़े अपनी प्रांतों के तारे को लाने शहर के बाहर । सेठ ही नहीं, हजारों व्यक्ति गुणचार के स्वागत हेतु नगर के बाहर पा गए । गुणचन्द्र ने देखा कि पिताजी के साथ हजारों नगर- जन नगर के बाहर मा गए हैं. तो वे रप से उतर पड़ा। गुणमाला ने भी उसका अनुगमन किया । कुछ तेज कदमों से चलकर गुरगचन्द्र पिताजी के चरणों में गिर पहा । सेठजी ने उसे उठाया और सीने से लगा लिया। इस प्रेम-मिलन में सभी को प्रांखों से हर्ष के अश्रु बह रहे थे । गुणचन्द्र फरक-फरक फर रोता हुमा हो पियाजी से क्षमा-यापना करने लगा-"क्षमा करें पिताजी, मग पापको बहुत दुःप दिया । पापको इस हालत में घोटकर चला गया। क्षमा करें, अपने इस नासमन बेटे को ।" पादते हुए पिताजी के सीने में मुंह छिपा कर सिसकने सेठ पनचन्द्रजी फोतो अपनी पांखों के तारे के मिल जाने से भान ही नहीं पा फि दे गया बोलें और क्या नहीं ? दे तो सिसकियां भरते हुए उसे सीने में भींचते गए। गुणमाला मी सद पुछ देखकर भाव-विभोर हो रही पी। मिलन का यह रश्य रतना स्नेहिल एवं माद- पूर्ण था कि उन हजारों व्यत्तियों में गायद ही कोई ऐसा हो, जिसकी मांखें गोली नहीं हों। . १२३
i
कुछ मिनटों में गुणचन्द्र एवं धनवन्द्रजो में
तो धनचन्द्रजी ने अपना बाहुबन्धन ढोला मार
को मुक्त करते हुए कहा-"बेटा, मैं बस
निकाला । मैं पिता कहलाने के लायक नहीं .
अपने इकलौते लाल को थोड़े से पैसों के लिए
सोचे-समझे घर से निकाल दिया ।... पेटा को
भाग्यशाली है, जो खाली हाथ जाकर भी को
वनकर पाया है । किन्तु मैंने तो अपनी निष्ठा में :
कमी नहीं रक्सी.... वेटा, क्षमा कर देना मुझे
कहते
हुए सेठ धनचन्द्र पुनः रोने लगे ।
गुणचन्द्र ने बड़े विनम्र शम्दों में कहा - Frt
मापने तो मुझे आगे बढ़ने का मार्ग ही बताया है !
मैं यहां से नहीं जाता, ता मेरे पुरुषार्थ और माग
परीक्षा कैसे होती? आपका तो मुझ पर प्रकाश
उपकार है कि आपने मुझे जन्म ही नहीं दिया, मुझे
भी बनाया ।"
।
v
"
इस प्रकार स्नेह पूर्ण मिलन के पश्चात् गुमा:
मागत सभी नगर-जनों का अभिवादन पियार
विशाल जुलूस के साथ नगर-प्रवेश किया I AMTE
की तैयारी उसने बीच के किसी नगर के पार
कर ली थी । तदनुमार स्वर्ण मुद्रा एवं स्वा
वृष्टि मागं भर करता रहा । नौकरों के हाथों में
।
तरफ स्वर्ण पुप्पों एवं स्वर्ण मृटानों के बाल थे ।
गुणचन्द्र एवं गुणमाला पूरे राजमार्ग एवं पीथियों में
मुग हरन से लुटाते जा रहे थे। पूरे नगर में गुणचन्द्र
मी दानणीलता की जय-जयकार गुन्जायमान हो रही
पी । नारियां छत्तों एवं करोखों से सम्पूर्ण दृश्य देसकर
पुलवित हो रही थी।
जुलूस पनचन्द्र के निवासस्थान के बाहर पहुंचा तो
गुणचन्द्र ने मकान के बाहर बने चवृतरे पर होकर
पभिवादन किया। एव जन-मेदनी को विदा पर ममता-
मूर्ति, वात्सल्यमयी मां ने मिलने पी उत्सुकता से मीघ्र
गति से घर में प्रवेश किया। मां को यहां फम उत्सुकता
पी? घपने कलेजे की पोर को निहारने के लिये वा,
ध्यन धी। वह तो स्वयं प्रांग विदाए गड़ी थी। बाहर
जय गादों को सुनकर बहमार तप पर फर विचार
की प्रोट में खड़ी-पटो निहार रही पी-अपने लाल को।
ज्योंही गुणचन्द्र एवं गुणमाला में प्रादर प्रवेश किया,
मां अपने प्रापको रोक नहीं लगी। गुगग चन्द्र मां के
परण-रपर्ण नो भागे बदा मि.भ.गाने पूर्व ही माने
उसे अपने सीने में पिपा लिया और नियपियां भी
हर अपने लाल के मापही पोसांगों के पानी में भिगोने
लगी। किन्तु पदिक समय तय कर हमे सपने में
नहीं छिपा सकी । गुणमाला ने धागे कर पा
निया, तो गुणचन्द्र को छोडमार उसने गुरANT सपने
-4
अंग में छिपा लिया। उस भावपूर्ण मिलन बसे.
पास खड़े सभी नौकरों-चाकरों एवं मागासों के ये
सजल हो गए। सेठजी भी पास सड़े-बड़े समाने
सभी दृश्य देखते रहे।
कुछ क्षणों से स्वस्थ हो सभी बैठक कक्षा में बनेगा
गुरणचन्द्र ने अपनी यात्रा, सेठ भागचन्द्रजी को भार
विवाह एव पारस पत्यर प्राप्ति, आदि का संक्षिक,
किया। सेठ-सेठानी टकटकी लगाए सुनते रहे मोर मा
ही मन पुत्र की प्रतिज्ञा पालन को हडता एवं पुष
से मानन्दित एवं पुलकित होते रहे । साथ ही क्षेत्र में
अपने कृत्य पर पश्चाताप भी कर रहे थे । से में
लगे कि कहां तो सेठ भागचन्द्रजी, जो बिना जा.
पहचान के दो सौ रुपये प्रति दिन देने लगे, और में -
प्यार दिया और कहां में, जो अपने इकलौते ।
प्रतिज्ञा पूरी नहीं कर सका ।
अपनी पूरी कहानी सुनाने के पश्चात् मुगमः
पिताजी-माताजी को कहा- "मव माप को किसी प्रा?
की चिन्ता नहीं करनी है। यद्यपि अपने पाम 5.71
पत्थर जैसी बहुमूल्य मणि है, किन्तु में गो र
जीकर अकर्मण्य नहीं बनना चाहता है। जब भी
पर कोई संकट पाएगा, तो उसका उपयोग कर !
अन्यथा अपने श्रम से हो अपना व्यवसाय पा र
:-
१२६
प्रतिष्ठा प्रजित करूगा पाप सब धर्म-साधना में लगें।
राकी सारे काम-काज में देख लूगा । मापने अपनी उम्र
के अनुसार बहुत कुछ किया है । अब प्रापकी उम्र
साधना के लिए ही है। घर का सारा कार्य गुणमाला
देख लेगी, और बाहर का मैं । प्राप दोनों तो निश्चित
साधनामय जीवन बनालें । बस हम पर भाशीर्वाद की
रष्टि बनाये रखें।
पुष के मृदुल एवं गम्भीरतापूरण विचारों को सुनकर
सेठ-सेठानी अत्यन्त हपित हुए। इस लघुवय में उसके
विचारों को महानता से दोनों गद्गद् ये । उन्होंने अपने
जोवन का लक्ष्य निश्चित कर लिया।
भब गुणचन्द्र व्यापारादि का पूरा कार्य देखने लगा।
उसने सेठ धनचन्द्रजी को धर्म-साधना के लिये पूरणतया
मुक्त कर दिया, तो गुणमाला ने घर की सारी व्यवस्था
अपने हाथ में लेकर सेठानी जी को साधना के लिये मुक्त
कर दिया। सेठ-सेठानी दोनों प्रावक-धर्म के बारह व्रत
स्वीकार करके पात्म-उपासना में लीन रहने लगे मोर
इसी पाराधना-उपासना के क्रम में उन्होंने कालान्तर में
सद्गति प्राप्त की।
इघर के कार्यों को व्यवस्थित करके गुरणचन्द्र प्रति-
ठानपुर की व्यवस्था भी देखता रहा । उसने सेठ
१२७
भागचन्द्र जी एवं सेठानी को भी धर्मारायनाको
देकर उन्हें व्यवसायादि से निवृत्त कर दिया।
इसी कार्य काल में गुरणचन्द्र को पुष-रल को "
भी हो गई । नाम रखा-गुणवन्तकुमार । राम
नन्हें-मुन्ने की किलकारियों से भर गया। कुलोपा ।
देख-देखकर पति-पत्नी प्रफुल्लित रहते | Marath
एवं माध्यात्मिक शिक्षण के साथ ही उRT ?
का सर्जन उसमें नगिक ही था। ज्यों-ज्यों का
होता गया, अपने नाम के अनुरूप ही उसमें पुरा
वृद्धि होती गई । दान के सस्कार तो उसे भानु
रूप में धरोहर में ही मिले थे । परिणामतः ।
साथियों की यथायोग्य सहायता करना सके स्वभार
अग था । सब मिलाकर योग्य पिता को मुनो
सम्तान की सूक्ति वह सार्थक करने लगा।
जब गुरणचन्द्र एवं गुणमाला ने देखा कि पुत्र
हो चुका है, तो दोनों ने धर्मजागरण के समय
किया कि अब इसे विवाह-रात्र में बाघ कर सारा :
इस पर डालें और हम आत्म-साधना में लगे ।
जीवन का जो उद्देश्य होना चाहिये, अब अवारमा
है, कि हम उस उद्देश्य के प्रति सजग हो जाय ।
जीवन को साधनामय बनाकर सफल बनाये।
विचारों को मूर्तरूप देने के लिये गुरुवार
संस्कार-सम्पन्न कग्या की खोज प्रारम्भ कर दी। वैसे संकड़ों सम्बाघ गुरगवन्त के लिये पा रहे थे। किन्तु गुणचन्द्र गुणवती कन्या की खोज में था। माखिर एक दिन सेठ लक्ष्मीचन्द्र जी की संस्कार सम्पन्न गुणवती पन्या सुप्रीति का संयोग उसे मिल गया और गुणवन्त का विवाह बढ़े घूम-घाम के साथ सम्पन्न हो गया। T धीरे-धीरे गृहस्थी एवं व्यवसाय का सम्पूर्ण दायित्व पुत्र-पपू एवं पुत्र को सम्भलाकर गुणचन्द्र एवं गुण- मासा सात्विक रूप से श्रावक-श्राविका के बारह व्रतों की पाराधना करने लगे । उनका अधिकांश समय स्वाध्याय, चिन्तन, मनन एवं ज्ञानाराधना में हो व्यतीत होने लगा। कई बार दोनों तत्त्वज्ञान की अत्यन्त सूक्ष्म चर्चा में उतर जाते और शास्त्रार्थ को गम्भीर स्थिति में पहुंच जाते । . एक दिन दोनों में जमकर ज्ञान-चर्चा चल रही थी। विषय था-पुण्य और धर्म का । गुणचन्द्र ने कहा- "पुण्य के बिना संसार में कुछ नहीं हो सकता है। पुण्य फे प्रभाव से हो व्यक्ति मलम्य अवसर एवं अनुपम सम्पदा प्राप्त करता है । पुण्य के प्रताप से ही मानवता, निरोगी देह, स्वस्थ इन्द्रिया एवं उत्तम कुल, मादि की प्राप्ति होता है। मैं जो प्राज इस स्थिति तक पहुंचा, दुनिया में इतनी प्रतिष्ठा प्राप्त की, पारस मरिण जंसी १२६
दुलम वस्तु मिली । क्या यह सब पुचकाम
प्रतः पुष्य सर्वथा उपादेय है।"
1
गुणमाला भी तत्त्वज्ञान में काम नहीं थी।
अनेक ग्रामों का अध्ययन किया था। पनेर म
के प्रवचन सुने थे । उसने याहा--"प्रापका
एकान्त सत्य नहीं माना जा सकता । मर हो
समस्त भौतिक नमव पद-प्रतिष्ठा सम पुग्ण ."
ही प्राप्त होते हैं। फिर भी जीवन में मोतिगर
ही तो सब कुछ नहीं है। पद-प्रतिष्ठा के पार
इस जन्म तक ही सीमित है। इन बारा :
पानन्द कितना मिलता है? मोनिता गुग मोद
मिश्रित होता है । मुसको सायदा भी लगा
प्रतः पुण्य सर्वया उपादेय नहीं है, पमं माय
को एक गियति पर जाकर छोड़ना पवा
एकान्त रूप से उपादेय नहीं माना है। यो
में यही अन्तर है कि पुरय मोनित गति प्रदान १'
है और धर्म प्राध्यामिक समृद्धिमा ।
'आप यह सोचें कि प्रारको या गरम
के प्रभाव से मिली । किन्तु पर गदि ITY
प्रतिष्ठा से अधिक क्या प्रदान की है !
सोचती हूं कि प्रापको जोध मिला, माया,
से मिला। दो मोरपये प्रतिदिनार
१२
पा परिणाम है यह अपार वैभव । वह त्याग पाप नहीं
करते, तो प्राप दान नहीं देते प्रार दान के विना पुण्य
संचय नहीं होता। प्रतः मूल तो त्याग ही रहा और
त्याग को ही धर्म कहा है ।
"पुण्य को तेरहवें गुणस्थान तक उपादेय कहा है,
उसके बाद पुण्य हेय हो जाता है । शास्त्रकारों ने पुण्य को
नौका की तरह माना है। नौका को प्रावश्यकता नदी
पार न हो, तब तक हैं । नदी पार हो जाने पर फिर
नौका से चिपके रहना नासमझी मानी जाती है । ठीक
उसी प्रकार से मोक्ष-प्राप्ति के पूर्व तक पुण्य भी आवश्यक
रूप से उपादेय है, उसके बाद नहीं । किन्तु धर्म सदा
उपादेय ही रहता । भाप सोचिये-दो सौ रुपये के
प्रतिदिन के त्याग ने श्रापके जीवन को मानन्द से कितना
भर दिया। यह परम्परा से त्याग अर्थात् धर्म का हो
प्रभाव है।"
दो सौ रुपये प्रतिदिन त्याग एवं उसके द्वारा प्राप्त
मानन्द की चर्चा ने गुरणचन्द्र के चिन्तन को एक नया
मोड़ दे दिया। वह एक गहरे चितन में खो गया । दो
सौ रुपये के त्याग ने मुझे इतने प्रानन्द से भर दिया, तो
सम्पूर्ण भौतिक वैभव का त्याग कितना अतुलित आनन्द
दे सकता है ? सहसा उसने कहा - "गुणमाता ! तुम्हारा
रष्टिकोण एकदम यथार्थ है-पुण्य एक सामान्य तत्त्व है-
-
धर्म के समक्ष । धर्म महान् है । त्याग महान है इस विवेचना से मुझे अब यह समस्त भर, पर- फीके लगने लगे हैं। इन धाणिक सुखद गोगों के हम अपना पूरा जीवन खो देते हैं ? मेरा मिना रहा है कि जब दो सौ रुपये प्रतिदिन के दाम इतने भौतिक वैभव के साय पात्मिा पानीको है, तो यदि मैं सम्पूर्ण वैभव का त्याग कर , सो र वह मुक्ति का सच्चा और शाश्वत माना सकता ? "प्रिये ! अब में अपनी इम पिहली प्रारसा तया साधना में लगा देना चाहता हूं। मैं मम " कर प्रात्म-कल्याण करना चाहता है । गोलो गा" क्या अभिमत है ?" "प्राणनाथ ! संयम से बढ़कर हम जीवरको कता और क्या हो सकती है ? माय-जीवन के लिये प्राप्त होता है। मैं तो नाममा चिन्तन में थी कि उचित प्रबार देर ? ' में निवेदन कर और हम दोनों गायना- अनुगम करें। साज सहा पापो मात्र प्रार! अब मोर क्या चाहिने ? पत्र मुगावा या समझाकर उनी सामाप्राप्त कर मामी - -- ग्रहण कर नं ।"
यह एक अद्भुत संयोग ही था कि इघर गुणचन्द्र
पौर गुरामाला दीक्षा का चिन्तन कर रहे थे और उधर
। नगर पथ में यह चर्चा फैल रही थी कि प्राचार्य विमल
: कीति के पट्टधर शिष्य महान् विद्वान् प्राचार्य श्रुतकीति
फा एवं साध्वी प्रज्ञावतो का अपने शिष्य-शिष्या परिवार
सहित वसन्तपुर में प्रागमन हया है । जैसे कि दोनों के
। विचारों का सम्मेलन बेतार के तार द्वारा हो गया हो
! मोर आचार्य श्री एवं साध्वी जी को यहां आने को
विवश कर दिया हो ।
।
माचार्य प्रवर एवं साध्वी प्रवरा के प्रागमन का
। संवाद ज्योंही गुणचन्द्र एवं गुणमाला ने सुना,उसके प्रानन्द
की सीमा नहीं रही । वे तुरस्त अपना रथ सजवा कर
दर्शन-वन्दना एवं प्रवचन-श्रवरण हेतु चले गए। इधर
उपादान तयार पा और उपर प्राचार्य प्रवर श्री श्रुत
। फीति के पैराग्योत्पादक प्रभावक प्रवचन का निमित्त मिल
१ गया। दोनों की मन्तज्योति जगमगा उठी।
पर पाकर पुत्र गुणवन्त को समझाकर दोनों ने
पाशा प्राप्त नी भोर विशाल जन-मेदिनी के साथ नगर
को वोपियों में लाखों का धन बिखेरते-लुटाते दान करते
पापाय प्रवर के परगों में पहुंच गए । दोनों ने प्राचार्य
प्रवर के समक्षा संयम-सापना की भावना प्रदशित की
मौर दीक्षा हेतु प्रस्तुत हो गए।
भाचार्य श्री ने सामाग्य जिज्ञासा-ममा -
उन्हें वीतराग शासन में दीक्षित कर दिया।
गुरगचन्द्र मुनि गुणचन्द्र बन गए और सेशीर
साध्वी गुणमाला बन गई । मुनि मुगनाः
की सन्निधि में एवं माध्यो गुणमाला सामो
के सानिध्य में ज्ञान-दर्शन-मारिन को मार
तल्लीन हो गए।
अनेक वर्षों तक विशुद्ध गारित-पारामा ifr.
रहकर विविध ज्ञानारावना एवं तप साधना है."
अपनी आत्मा को भावित करते है तथा भर
अन्तिम दिनों में अपनी प्रात्मा को पानी
आलोकित कर दोनों मिल बुन-मुक्त होना 2.
जीवन के चरम लक्ष्य, परम पाना शालिको
हो गए।
दो सौ रुपये का चमत्कार --- शुद्धि पत्र | पृष्ठ संख्या पंक्ति प्रशुद्ध । प्रा. पृ. २ ११ मैं नहीं १० को लिखते कहानियां १२ सवत्यागी जन १ शुद्ध जैन मैं ही नहीं को कहानी लिखते कहानियों सर्वत्यागी के -- ७ १६ से ३ है है sher ११ १४ प्रग को सविभाग अंग की संविभाग छोड आतंक प्रातंक प्रेप्टि चातकवत् . १६ प्रांतका प्रांतक श्रेष्ठ १२ २ चातकवत (4) पृष्ठ संख्या पंक्तिः पंक्तिः मम १२ १४ 8 होग APAN १४ १५ ह १६ १३ १६ २० मान उबार मागीवाद पहुचते प्रशमा बाधने * * * * * * * * मे वालको है १७ ४ १७ है १७ २२ १८ १५ २० २० १२ २१ in रेगाए निकालवा दंगा । नि २२ १४ १८ गानि कहा, पिताजी, 2 ५ नही । । मा शुद्ध "पिताजी नहीं ?" पृष्ठ गंग्या पंक्ति अशुद्ध २६ १६ पिताजी नहीं ? ३१ १७ कार सकू। ४० काय १२ पकिगं ८१ ५ गौम्याकृत १ सकू।" कार्य पेकिंग सौम्याकृति ४१ है ४५ ६ "गुग्गचन्द्र गुणचन्द्र ४७ २ ३ है ?" २० १२ १८ १४ "प्रमर प्रसन्न है ? है ?" महानता रही महानता बता रही मच्चरिता सच्चरित्रता मुभा मुझे कर्ज ६० ६३ २२ ده गया ? पया ?" १६ वर्च जो . . मट मेठ (:)
पृष्ठ संख्या पंक्ति अशुद्ध सोन ५ नमसारी न में ६६ ११ १६ १४ १५ एच भा ए भी नुका १६ २२ २ मठजा सेना किसी चीज की गिनी : मंठानी पूर्ण मंदानी १०२ १२ १०३ १०७ १० १११ १६ ११३ मौन जग १५ बा ४ म ग द है पृष्ठ नन्या पंक्ति अशुद्ध ११४ १८ ११४ १८ ११४ १९ शुद्ध बसे मुझे प्रतिदिन देदी है . . मुम प्रतिादन ददी ह फरवाइये वड़ जमी पहचा . प्राव फरमाइये बड़े जैसी पहुंचा अग्वेिं की अभिमुख जावें दर्शन होंगे ११६ ६ ११९ २ ११६ ५ ११० ११९ १४ ११६ २१ १२० 8 १२० १७ १२० १२० १८ १२१ ८ १२१ १२३ का प्राभमुख प्राव होगे प्रावें जानें पड़ चना वे पढ़े चढ़ वह तो को अंक ता का अंग १२६ ५ (3) पृष्ठ संख्या पंक्ति पंक्ति असुन ५ निश्चित १२६ १२७ १२७ १२७ १२७ १० गे पूणतया गिरगक साथ सम्पाका सजन सर नागिन १२७ १६ १२८ १२८ १२८ १२८ ११ १२८ १४ १२८ १५ १२८ २२ १२६ २० १२१ २१ प्रग या RAM इन्द्रिया प्राप्त हावा पारगमणि जमी पा" दुभि गम गंगामास १.. " . ३ अनुगमन (क)
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