Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Nav Pad Oleeni Vidhi
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॥श्री॥
नव पद उलीनी विधि.
PM
तेमा
नर पट उसीनी विधि उपरात नव पद पूजा,
स्नानपूजा, शत्रुजानो रास, स्तनन,
चैत्यवदनो, थोयो विगेरेनो मग्रह
"
छपावी प्रसिद्ध करनार
श्रावक नीमसिद माणेक,
जैन पुस्तको तथा तीर्थाना नकशा वेचनार
तथा प्रसिप करनार
मामवी, मुवई.
IMA
भावृत्ति २जी
विक्रम संवत् १९७०
चीर सवत् २०४४
सने १९१०
Printed by ramchandra Vega Shelge at the Virnaya-Sagar
Prens, 28 Kolbhist Lane Bombay
Published by Bhanp Alaya for Dhim. I Bladech
2.3-231 standri sackgadli Bombay
F
॥अथ नव पद लीनी विधिनी॥ ॥ अनुक्रमणिका ॥ ~mar9 a विपय पृष्ठ अथ मरिहतपदपूजा अथ सिद्धपदपूजा थथ भाचार्यपदपूजा अथ उपाध्यायपटपूजा यथ साधुपदपूजा अथ दर्शनपदपूजा श्रयानपदपूजा अथ चारिनपदपूजा थथ तपपदपूजा थथ क्दारा १३ श्रय नर पदनी थारती अथ श्रारदिनकृत्य, देवपदन साध्ययी मदिर जगाती तथा पूजा करवानी विधि अथ अरिहतपद् चत्य सदन २२ श्रर्थ थरिदतपद सपन अस सिम्पद चेत्यान अथ मिळपट स्लपन अथ तृतीय पद चत्य सदन २५ विषय पृष्ठ अथ श्राचार्यपट स्तन अथ चतुर्थ पर चैत्यवदन २७ अथ उपाध्यायपद स्तवन २७ घय साधुपट चैत्यरत्न २० श्रय साधुपद लग्न अथ दर्शनपट चैत्यपदन अथ दर्शनपद म्तमा ३० अथ शानपर चैत्यान अथ शानपद स्नान ३२ थथ चारित्रपद चैत्यमा ३३ थथ पारिनपट स्तवन अथ तपपट चत्यपदन यथ तपपास्तरन चतुर्विशति जिन चैत्यपन्न ३६ अय अष्टापदादि नमस्कार १ ४३ पुन नर पर चैत्यवदन 88 थथ ना पट वृह स्तवन HU अपना पद स्तवन ४६ १४ नर पद चैत्यदन २४ od (३) विषय विषय पृष्ठ अथ मिडचा स्तान ४ मिचा मक्षेप उद्यापन विधि ७४ यय ना पद् शुरु ४७ श्री पनीरतमानपूजा ७५ अयनपद सीकरण विधि 10 श्रम शान्ति निानी धारती ०५ अरिहतपदेक १२ गुण पए अथ श्रादि जिननी भारती ०६ अथ दितीय दिएम विधि ५५ श्रीमागविजयजी फूल नर मिछपदवे ० गुण पदपूजा 60 यी १०० चथ तृतीय सिम रिधि ५० प्रथम परिहतप पूजा भाचार्यपरक ३६ गुण ५२ द्वितीय मिळा-पूजा थथ चतुथ दिवस विधि ५४ तृतीय थाचायपदपूजा जपा यायपदरे २५ गुण ५४ चतुर्थ उपाध्यायप पूना d यथ पचम दिवम विधि ५६ परम मुनिपपूजा ५६ माधुपत्रे २७ गुण ५६ पष्ठ सम्यक्त्व नपनापूना एज अथ पष्ठ दिवस विधि ५० सतम सम्यग्ज्ञानपटपूना १०० यथ स यत्त सतगी नेट, १० थष्टम चारित्रप पूजा यथ मतम शिवम विधि नाम तप पदपूजा १०४ यथ शानपत्रे ५५ नेद ६२ श्रय सिकराती रावन १० यय यटम दिवस विधि अथ द्वितीय नवनम् यथ चारित्रपर ६५ श्रथ तृतीय सपनम् श्रय नवम नियम विधि ६ए श्रम चार्य म्नानम् श्रथ तपपरे १० नेट श्रय पचम म्नानम् थम तपस्या ग्रहण करणको श्रथ पष्ठवपनम् गुस्के पास जानेकी पि ३२ अथ सप्तम स्तचनम् श्रय सदेप उनमणा विधि १३ अथ अष्टम स्वचनम् । । AAR (५) विपय पृष्ठ विषय पृष्ठ श्रथ नाम स्तचनम् ११७ अथ चैत्यरत्नम् श्री मिचनजीनु स्तवन ११७ ना पद चैत्यबदाम् १३७ अथ सिद्धचा स्तवन ११५ , ना पदजीनी स्तुति १३७ यथ याचिस तप आश्रयी श्री सिचाजीनु चैत्यरत्न १३५ सिडचानीनु स्तवन १२० सिकचन तीन स्तरा २४१ नर पढजीनु स्तवन १२४ अथ श्रानिक्ष तपनी मकाय १४२ श्री नर परजीनु स्तवन १२४ जिन पूज्यानु चैत्यवान १४३ थाविलीनी टळीना स्तनो अथ सूतर विचार १४४ प्रथम स्तरनम् १४५ नर पर स्तन १२६ श्तुरती स्त्रीप १४६ नरपत स्तपन १२० पञ्चरकाण काशी नरकायु मुटे १४६ नर पद तपन १२ वीश म्याना तपनी विधि २४७ सिहरनी स्तुति १२५ श्री मौन एकादशीना दोढमो सिचानी स्तुति कल्याणस्नु गएणु १४ मिचानी स्तुति १३२ श्रथ कल्याणपनी ममज ११० 'सिचम्नी स्तुति १३२ अथ श्रीशनुजय वृद्ध राम १५ नर पद जैवीनी विधि १३३ / श्री सिद्धगिरिनु स्तवन १७२ अथ चैत्यानम् १२५ मृत्यु सबधी ॥ अथ श्री। ॥ नव पद ओलीनी विधि। ॥ प्रथम अरिहंतपदपूजा ॥ १ ॥ ॥दोहा॥ ॥ परम मंत्र प्रणमी करी,तास धरी उर ध्यान ।। अरिहंतपदपूजा करो, निज निज शक्ति प्रमाण ॥१॥ ॥ उद् ॥ उप्पन्नसन्नाणमहोमयाण, सप्पामिहे- रासणसठियाण ॥ सदेसणाणं दियसझणाण, एमो एमो होन सया जिणाण ॥१॥ नमोऽनतसतप्रमोट- प्रदान, प्रधानाय जव्यात्मने नास्त्रताय॥थया जेहना ध्यानथी सोस्यजाजा, सदा सिकचकाय श्रीपाल राजा॥णाकयां कर्म धर्मर्म चकचूर जेणे,नता जव्य नव पद ध्यानेन तेणे ॥ करी पूजना नव्य नावे निकाले, सदा पासीयो यातमा तेणे काखे ॥३॥ । फिके तीर्थंकर कर्म जदये करीने, दीए देशना जव्यने हित धरीने ॥सदा या महापामिहारे समेता,मुरेशे नरेशे स्तव्या ब्रह्मपुत्वा ॥ ४॥ कस्या घातिया कर्म (२) चारे अलग्गां, नवोपग्रही चार जे वे बिलग्गां ॥ जगत् पच कल्याणके सौख्य पामे, नमो तेह तीर्थ- करा मोदकामे ॥५॥ ॥ ढाल॥ ॥त्रीजे नव विविसे करी,वीश स्थानक तप करीने रे॥ गोत्र तीर्थंकर वांधीयु, समकित शुधमन धरीने रे॥१॥अरिहतपद नित बंदीए, करम कठिन जिम मीए रे ॥ए याकणी ॥ जनम कल्याणकने दिने, नारकी सुखीया थावे रे॥मति श्रुत अवधि विराजता, जसु उपम को नावे रे ॥ अ॥२ दीक्षा लीधी शुज मने, मन पर्यव आदरीयु रे ॥ तप करी कर्म खपाने, ततखिण केवल वरीयु रे ॥ अ० ॥ ३ ॥ चठतीश अतिशय शोलता, वाणी गुण पेंतीशो रे ॥ अदिश ढोश रहित थपूरे सघ जगीशो रे॥॥॥ तन मन वयण लगाश्ने, अरिहंतपद आराधे रे ॥ ते नर निश्चयथी सही, अरिहतपदवी साधे रे ॥ अरिहतपद नित वदीए ॥५॥ ॥श्लोक ॥ अथाप्टदलमध्याज कर्णिकाया जिने- श्वरान् ॥ आविYतलसद्दोधा-नात स्थापयाम्य- दम्॥१॥नि शेपदोपेधनधूमकेतू-नपारसं सारसमु- (३) असेतून ॥यजे समस्तातिशयेकदेतून् श्रीमङिनान- बुजकर्णिकायाम् ॥शा उही अहदन्यो नम ॥इति॥ ॥ अथ सिइपदपूजा ॥२॥ ॥दोहा॥ ॥जी पूजा सिझकी, कीजे दिल सुशियाल ॥ अशुभ कर्म पूरे टले, फले मनोरथमाल ॥१॥ ॥उद ॥ सिझाणमाणसुरमालयाण, एमो णमोऽणत- चउकयाण ।सम्मग्गकम्मरकयकारयाण, जम्मजरा- उरकनिनारयाण ॥ १॥ करी थाप कर्म दये पार पाम्या, जरा जन्म मरणादिनय जेणे वाम्या । निरा- वरण जे आत्मरूपे प्रसिझा, शया पार पामी सदा सिक वुझा ॥ विनागोनदेहावगाहात्मदेशा, रह्या ज्ञानमय जातवर्णादि लेशा॥ सदानत सौरयाश्रिता ज्योतिरूपा, यनावाध अपुनर्नवादि वरूपा ॥१॥ ॥ ढाल ॥ सफल करमनो क्ष्य करी, सिद्ध अवस्था पाश्रे॥गुण गतीस विराजता, उपम जस नहीं का रे ॥ मन शुद्ध सिझपद बंदी ॥६॥m आकणी ॥ जनम मरण पुस चिद्रूपी रे।
(४) यरूपी रे ॥ मन ॥७॥ जास ध्यान जोगीसरु, करे अजपा जापे रे ॥ जव जव सव्यां जीवडे, कठिण करम ते कापे रे ॥ मन॥॥ध्यान धरंतां सिस्नु, पूजतां मनरागे रे ॥ अविचल पदवी पाए, कडं जिनवर व नागे रे ॥ मन ॥ ए॥ ॥ श्लोक ॥ तस्य पूर्वदले सिकान्, सम्यक्त्वादि- गुणात्मकान् ॥ नि श्रेयसपदं प्राप्तान्, विदधे नक्ति- निर्नर ॥१॥ तत्पूर्वपत्रे परित प्रपष्ट-पुष्टाष्टकर्मा- नधिगम्य शुछिम् ॥ प्राप्तानरान् सिकिमनतवोधान्, सिद्धान्यजे शांतिकरान्नराणाम्॥२॥झी सिझेन्यो नम ॥ इति ॥२॥ ॥ अथ आचार्यपदपूजा॥३॥ ॥दोहा॥ ॥ हिव आचारज पद तणी, पूजा करो विशेप ॥ मोह तिमिर पूरे हरे, सुमे नाव अशेप ॥१॥ ॥ उद ॥ सूरीपरीफयकुग्गहाण, णमो णमो सूरसमप्पहाण ॥ सद्देसणादाणसमायराण, अखम उत्तीस गुणायराण ॥ १॥ नमु सूरिराजा सदा तत्त्व- ताजा, जिनेडागमे प्रोढ साम्राज्यनाजा ॥ पट्वर्ग-
(५)
चर्गित गुणे शोजमाना, पचाचारने पालवे सावधाना॥
नविप्राणीने देशना देश काले, सदा अप्रमत्ता यथा
सूत्र आले ॥ फिके शासनाधार दिग्दति कल्पा,
जग ते जिर जीपजो शुरुजल्पा ॥१॥
॥ ढाल ॥ गुण उत्तीशे दीपता, पाले पच याचारो
रे ॥ जिनमारग साचो कहे, युगप्रधान जयकारोरे।।
याचारिजपद वदीए ॥ १०॥ ए आकणी ॥ सारण
वारण चोयणा, पमिचोयण चौ शिक्षा रे ॥ नव्य-
जीप समकायवा, देवाने ते दक्षा रे ॥ ०
॥१॥ जिनवर सूरज आथम्या, परतिख दीपक
जेहा रे ॥ सकल जान परगट करे, ज्ञानमयी जसु
देहा रे॥ आ ॥ १२ ॥ विधिशु पूजा साचवे,ध्यावे
निज हित जाणी रे॥ पावे लघुतर कालमा,याचारज-
पट प्राणी रे ॥ १३ ॥
॥ श्लोक ॥ स्थापयामि तत सूरीन् , दक्षिणे-
ऽस्मिन् दलेऽमले ॥ चरत पचधाचार, पत्रिंगत्सद्-
गुणेर्युतान् ॥ १॥ सूरीन् सदाचारारताश्च, साराना-
चारयत खपरान्यथेष्टम् ॥ उग्रोपसर्गकनिवारणार्थ--
मन्यर्चयाम्यक्षतगधधूपे ॥२॥उँ ही सूरिन्योनम.
॥इति ॥३॥
. ॥अथ उपाध्यायपदपूजा ॥४॥ ॥दोहा॥ ॥ गुण अनेक जग जेहना, मुदर शोनित गात्र॥ जवकायापद अरचीए, अनुजवरसनु पात्र ॥१॥ ॥ उद ॥ सुतचविधारणतप्पराण, णमो णमो वायगकुजराण ॥गणस्स संधारण सायराण, सहप्प- णाव झियमष्ठराण ॥१॥ नहीं सूरि पण सूरिगणने सहाया, नमु वाचका त्यक्तमदमोहमाया ॥ वली हादगागादि सूत्रार्थदाने, फिके सावधाना निरुका- निमाने ॥ धरे पचने वर्ग वर्गित गुणोघा, प्रनादि हिपोछेदने तुल्य सिघा ॥ गुणी गठनधारणे स्थन- भूता, उपाध्याय ते वदीए चित्पनुता ॥१॥ ॥ ढाल ॥ हादशागी वाणी वदे, सूत्र अरथ विस्तारे रे॥पच वरग गुण जेहना,सुमति गुपति नित धारे रे ॥ २४ ॥ श्री जयकाया वदीए ॥ए याकणी ॥ दायक यागम वाचना, नेट नान युत सारी रे॥ मूरसकु पमित करे, जगतजंतु हितकारी रे ॥१५॥ श्री० ॥ शीतल चट किरण समी, वाणी जेहनी कहीए रे ॥ ते उबकाया पूजता, यविचल सुसमा सहीए रे ॥ १६ ॥ इति ॥
॥ श्लोक ॥ हादशागश्रुताधारान् , शास्त्राध्ययन- तत्परान् । निवेशयाम्युपाध्यायान् , पचित्रे पश्चिमे दले॥१॥श्रीधर्मशास्त्रापनि प्रशात्ये, पति येऽन्या- नपि पाग्यति ॥ यध्यापकास्तानपराजपत्रे, स्थिता- न्पवित्रान्परिपूजयामि ॥ ॐ ही उपाध्यायेन्यो नम ॥ इति ॥४॥ ॥ अथ साधुपदपूजा ॥५॥ ॥ दोहा॥ ॥ मोक्षामारग साधन जणी, सारधान थया जेद।। ते मुनिवरपद वदता, निर्मल थाये देह ॥१॥ ॥ उद ॥ साहूण ससाहिय सजमाण, णमो णमो सुब्दयादमाण ॥ तिगुत्ति गुत्ताण समाहियाण, मुणीण माणद पयहियाण ॥१॥ करे सेवना सूरि वायग गणिनी, का वर्णना तेहनी शी मुणिनी ॥ समेता सदा पच समिति त्रिगुप्ता, त्रिगुप्ते नही काम- जोगेषु लिप्ता ॥वली बाय यन्यतर ग्रथि टाली, होये मुक्तिने योग्य चारित्र पाली॥ शुजाप्टाग योगे रमे चित्त बाली, नमु साधुने तेह निज पाप टासी ॥१॥ ॥ दाल ॥ सफल पिपय विप वारीने, आतम-
ध्याने राता रे ॥ उपशम रसमां जीसता, निजगुण
झाने माता रे ॥ १७ ॥ हित धरी मुनिपद वंदीए
॥ए आंकणी ॥ रतनत्रयी आराधता,पट्कायाप्रति-
पाले रे ॥ पचिड़ी जीपे सदा, जिनमारग अजुनाले
२॥ हित ॥ १७ ॥ गुण सत्तावीश अलकस्या, पच
महाव्रत धारी रे ॥ हादशविध तप आढरे, चिदा-
नंद सुखकारी रे ॥ हित ॥ १५ ॥ नवविध ब्रह्म-
चरिज धरे, करम महा जट जीत्या रे ॥ एहवा मुनि
ध्यावे सदा, ते नर जगत विदिता रे॥हित॥२०॥
॥श्लोक ॥ व्यारया दिकर्म कुर्वाणान्, शुजध्या-
नैकमानसान् ॥ उदरपत्रगतान्नित्य, साधून्वदामि
सुव्रतान् ॥१॥ वैराग्यमतर्वचसि प्रसिक, सत्य तपो
द्वादशधा शरीरे ॥ येपामुदक्पत्रगतान् पवित्रान्,
साधून् सदा तान् परिपूजयामि ॥ ॐ ही सर्वसाधु-
ज्यो नम ॥ इति ॥५॥
॥ अथ दर्शनपदपूजा ॥६॥
॥ दोहा॥
॥ जिनवर नापित शुभनय, तल तणी परतीत ।
ते सम्यग्दर्शन सदा, यादरीए शुनरीत ॥१॥
(ए) ॥ उद ॥ जिणुत्ततत्ते सरकणस्स, एमो णमो निम्मलदसणस्स ॥ मित्तनासा समुग्गमस्स, मुलस्स सम्झम्म महाऽमस्स ॥१॥ विपर्यास हव. वासनारूप मिथ्या, टले जे अनादि अ जेम पथ्या । जिनोते दुवे सहजथी प्रधान, कहीए दर्शन तेह परमं निधानं ॥ विना जेहथी शान अज्ञानरूप, चरित्र विचित्र जवारण्यकूप ॥ प्रकृति सातने उपशमे दय तेह होवे, तिहाथापरूपे सदा आप जोवे ॥१॥ ॥ ढाल ॥ सुगुरु सुदेव मुधर्मनी, सद्दहणा चित्त धरीए रे ॥ सात प्रकृतिनो क्षय करी, दायिक सम- कित वरीए रे॥१॥दरशणपद नित वदीए । ए थाकणी ॥ण विण झान नि फल कडूं, चारित्र नि फल जाये रे ॥ शिवसुख ए विण ना मीसे, बहु ससारी थाये रे ॥ द॥२५॥ समसठी दे शोचतु, अजरामर फल दाता रे ॥ जे नर पूजे जावश. ते पामे सुख शाता रे ॥ दरशणपदम् ॥ ३ ॥ ॥ श्लोक ॥ जिनमोक्तमत प्रसा-सक्षण : यजे॥ मिथ्यात्वमथन शुज,न्यतमीगानसरे उही सम्यग्दर्शनाय नमानि ॥ ६ , (१०) ॥ अथ ज्ञानपदपूजा ॥७॥ ॥ दोहा॥ ॥ सप्तम पद श्री ज्ञाननु, सिद्धचक तप मांहि ॥ आराधीजे शुन मने,दिन दिन अधिक उछांहि ॥२॥ ॥ छंद ॥ अन्नाणसमोहतमोहरस्स, णमो एमो नाणदिवायरस्स ॥ पचप्पयारस्सुवगारगस्स, सत्ताण सबठपयासगस्स ॥१॥ होये जेदयी ज्ञान शुरू प्रवोधे, यथावरण नासे विचित्रावबोधे ॥ तेणे जाणीए वस्तु पडू अव्य जावा, न दुये वितथ्या(वाद) निजेता खनावा ॥ होय पच मत्यादि सुझान नेदे, गुरूपास स्तिथी योग्यता तेह वेटे ॥ वली डेय हेय उपादेयरूपे, लहे चित्तमा जेम ध्वात प्रदीपे॥१॥ ॥ टाल ॥ नक्ष अनद विचारणा, पेय अपेय निर्धारो रे ॥ कृत्य यकृत्यने जाणीए, झान महा जयकारोरे॥२४॥ ज्ञान निरतर वदीए॥ए यांकणी॥ झान गिना जयणा नहीं, जयणा विण नहीं धर्मों रे॥ धर्म विना शिवसुख नहीं, ते विण न मिटे नर्मो रे ॥ ज्ञानः ॥ २५ ॥ पाच प्रकार वे जेहना, जेट' कावन तासो रे ॥ जाणीने पूजे सदा, ते लहे केरल सासो रे ॥ ज्ञान ॥ २६ ॥ , ॥ श्लोक ॥ अशेपमध्यपर्याय,-रूपमेवावजास- कम् ॥ ज्ञानमाग्नेयपत्रस्थ, पूजयामि हितावहम् ॥७॥ ॥ अथ चारित्रपदपूजा ॥७॥ ॥दोहा॥ ॥ अष्टम पद चारित्रनु, पूजो धरी उमेद ॥ पूजत अनुलवरस मिले, पातक होय उठेट ॥१॥ ॥ वद ॥ याराहियसमीय सवियम्स, णमो णमो सयम वीरिअस ॥ सकावणासगविवलियस्स, निवाणदाणाश्समुजायस्स॥१॥रली ज्ञानफल चरण धरीए सुरगे, निरागसता छाररोधप्रसगे । जवानो- घिसतारणे यान तुल्य, धरु तेह चारित्र अप्राप्त- मुख्य ॥१॥ रोये जास महिमा थकी रक राजा, वदी छादशागी नणी होय ताजा ॥ वली पापरूपोपि नि पाप याय, यह सिद्ध ते कर्मने पार जाय ॥२॥ ॥ ढाल ॥ सर्व विरति देशविर तिथी, अणगार सागारी रे॥जयवतो थायो सढा,ते चारित्र गुणधारी रे॥२७॥ चारित्रपद नित चढीए ॥ ए आकणी॥ पट् सम सुस तजी यादरे, सयम शिवसुसदायी रे॥ सत्तर नेदे जिन कह्यो, ते यादरीए ना रे .
(१२) ॥ चा॥ २७ ॥ तत्वरमण तसु मूल , सकल आश्रवनो त्यागी रे ॥ विधि सेती पूजन करे, नाव धरी वम नागी रे ॥चा ॥२॥ ॥श्लोक ॥ सामायिकादिनिदे,-श्वारिन चारु पचधासस्थापयामि पूजार्थ, पत्रे हि नेते कमात् ॥१॥ ही सम्यरचारित्राय नम ॥७॥ ॥ अथ तपपदपूजा ॥ ए॥ ॥ दोहा ॥ ॥कर्मकाष्ठ प्रतिजालवा, परतिख अगनि समान॥ ते तपपद पूजो सदा, निर्मल धरीए ध्यान ॥१॥ ॥ उद ॥ कम्मदुमोम्मूलणकुजरस्स, णमो णमो तिवतवोचरस्स ॥अणेगलखीण निवधणस्स, इस्सजा अधाण य साहणस्स ॥१॥ त्रिकाविकपणे कर्म कपाय टाले, निकाचितपणे वांधीया तेहवाले॥कद्यु तेह तप बाह्य अतर छ नेदे, क्षमा युक्त निहेतु मुान दे॥होये जास महिमा थकी सब्धि सिद्धि, अवाठकपणे कर्म आवरणशुद्धि ॥ तपो तेह तप जे महानद देते, होय सिकिसीमतिनी निज सकेते॥१॥ ॥ ढाल ॥ निज श्छा अवरोधीए, तेहीज तप जिन नारयुं रे॥वाह्य अन्यतर नेथी, बादश नेदे दारयुं रे॥३०॥अनुपम तपपद चंदीए॥ एयांकणी ॥ तभन मोदगामीपणुं, जाणे पण जिनराया रे॥ तप कीधा यति आकरां, कुत्सित करम सपायां रे ॥ य० ॥ ३१ ॥ करम निकाचित क्षय दुवे, ते तपने परनावे रे ॥ सब्धि अठ्यावीश उपजे, अष्ट महा- सिद्धि पावे रे ॥ य० ॥३॥ एहबु तपपद ध्यावता, पूजता चित्त चाहे रे ॥ अक्षय गति निर्मल खहे, संदु योगींद सराहे रे ॥ थप ॥ ३३ ॥ ॥ श्लोक ॥ द्विधा छादशधा निन्न, ते पत्रे तप- श्वयं ॥ सस्थापयामि जक्यात्र, वायव्या दिशि शर्म- दम् ॥ ही सम्यक्तपसे नम ॥ इति ॥ ए॥ ॥ अथ कलश ॥ ॥श्म नव पद ध्यावे, पर्म यानद पावे॥ नवमे नव शिव जावे, देव नर जर पाये । ज्ञान विमल गुण गावे, सिद्धचक्रप्रनावे ॥ सदु ऽरित शमाने, विश्व जयकार पावे ॥ अरिहत सिद्ध थाचार्य उवकाय, साधु दसण नाण ए॥चा नव पद थकी, हा सिजन (१४) प्रमाण ए ॥ १॥ श्रीपाल राजा सुरक ताजा, लया सिडचा ध्यानसोनपिजन जजो जिन लालजाणी, हिये आणी नाव सो॥३॥श्यनापयसिक, लछि- विकासमिक ॥ पयमियसुरवग्ग, झीतिरेहासमग्ग। दिसवश्सुरसार, सोणिपाढावयारं ॥ तिजयविजय- चक सिहचक नमामि ॥३॥नि स्वदेत्वादिदिव्या- तिशयमयतनून श्रीजिनेडान्सुसिकान् । सम्यक्त्वा- दिप्रकृष्टाप्टगुणगणनदाचारसारांश्च सूरीन् शास्त्राणि प्राणिरक्षा प्रवचनरचना सुदराण्या दिशत- स्तत्सिय पाठकाना यतिपतिसहितानर्चयाम्यर्य- दाने ॥ १॥श्चमष्टदल पद्म, पूरयेदर्ददादिति ॥ खाहाते प्रणवाद्यैश्च, पटैर्वितनिवृत्तये ॥२॥ ॐ ही पंचपरमेष्टिने सम्यग्ज्ञानादिचतुरन्वितेन्यो नम ॥ इति श्री नव पद पूजा ॥ ॥ अथ नव पद आरती। ॥ ए नव पद प्राणी नित ध्यायो, पचम गत सासय सुग्व पारो ॥ए आंकणी ॥धुरथी अरिहंतपद ध्याजे, थिरताए श्री सिझ थुणीजे ॥ ए० ॥१॥ याचारज तीजे आराधो, शुझे मन निज कारिज साधो ॥ ए॥२॥ उरकाया पचम अणगारा,प्रण- - (१५) मंता पामे जवपारा ॥ ए० ॥३॥दसण नाण चरण जला दीपे, तप तपता कर्म व्यरिने जीपे ॥९॥४॥ ए नर पद प्राणी नित थुणतां, गिया नरनन सफल गिणता ॥1॥५॥सिहचकनी कीजे सेना, मन. वंचित लहीए नित मेरा ॥ ए॥ ६॥ यजर यमर सुखदायक साचो, स्टे मनसे नित प्रनि राचो ॥ए ॥ ॥ इति नर पद यारती ॥ ॥ अथ श्रादिनकृत्य ॥ ॥ देववंदननाप्ययी मंदिर जवानी तथा पूजन करवानी विधि। ॥ प्रथम श्रारक दो चार घमी रात्र रहते उनके (प्रथम) दिससे नवकार मत्रका स्मरण करे म कोण इं, क्या मेरी जाति है, क्या मेरा मृत्य है, क्या मेरा धर्म हे, इत्यादि धर्मजागरणासे दिसको सापचेत करे पीछे मल मूत्रकी वाधार करके थगशूचिनूत करे सामायिक, प्रतिक्रमणादि करके, विधि सयुक्त घरटेरासरकी पूजा करे पीछे यथाशक्ति थधा पर (१६) आपण पहरके, घोमा, हाथी, रथ, पालखी, सिपा, नोकर, नाश, वधु इत्यादि परिवार सहित पूजा लायक फल, फूल प्रमुख उत्तम अव्य हाथमें से जव्यजीवोंको मोक्षमार्ग दिखाता हुआ, जिन- शासनकी प्रनावना करता हुआ, जिनमंदिर जावे । जिनमंदिरमें प्रवेश करके २० त्रिक विधिसाचवन करे। सो १० त्रिक लिखते है।पहिला त्रिक तीन निस्सिही करणेका, जिसमें १ निस्सिही जिनमदिरमें पैठतेही कहे पीठे ससार घर सवधी कुठ जी कार्यविचा- रणा न करे॥१॥सरी निस्सिही प्रदक्षिणा तीन दीए पीछे कहे। जिनमंदिरमें फूटा टूटा ठीक करा- नेकी सारसनास रखी थी सोनी ठोडे । इहां अव्य- पूजा करणी मोकली रही ॥२॥ तीसरी निस्सिही कहे पीठे नि केवल नावपूजा करे, पण अव्यपूजा न करे । यह प्रथम निस्सिही त्रिक कहा ॥ इसरा त्रिक ज्ञानत्रिककी थाराधना करनेको. मनुके दक्षिणावर्तसे तीन प्रदक्षिणा देवे । तीसरा त्रिक मूलनायकजीके बिचको पचाग मिलाके तीन बेर नमस्कार करे॥३॥ चोथा त्रिक । प्रजुकी अग अब २ नाव ३ त्रिविध प्रकार पूजा करे । अब m
।
(१७)
निस्सिही किये पीठे कृत्य अकृत्य तथा पूजाविधि
संक्षिप्त खिसते है। निस्सिही किये पीठेमनोगुप्ति,
वचनगुप्ति, कायगुप्ति करके युक्त रहे। पांचो शजि-
यांको वशमें रखे । गमनागमनमे उपयोगी रहे।
गीतादिक अन्यका सुनके चित्त व्याकुलता न रखे।
कुठली देवकार्यको वोरके र कार्यकी विचारणा न
करे । राजकथादि सपूर्ण विकथा ठोडे । जन्म योर
कर्मके अनुगत वचन नबोटे, अर्थात् कोश्के माता
पितादिकका किया थकाखोटा कार्यको प्रगट न करे ।
तथा कर्मानुगत वचन आधेको बांधा, गोलेको
गोला इत्यादि वचन न चोले निस्सिही किये
पी जिनमदिरमें धर्म सयुक्त,यात्महितकारी, प्रमा-
णोपेत वचन बोलना चाहीए। जिसने मन, वचन,
कायाके सोटे व्यापारोका निषेध अपनी यात्मासे
किया हे उसके नावसे निस्सिही होयाथोर जिसने
रूपणका त्याग न किया है उसके केवल शब्द
उच्चारण मात्र अव्य निस्सिही होय। इस वास्ते पूजा
योग्य उत्तम वस्त्र पहरके, आउ तहके उज्ज्वल बन्नसे
मुसकोश वा। धूपादिकसे व्यग अपना शुरु करे ।
नारसे झूमरी निस्सिही क्हते मूल में प्रवेश
मद.२
(१७) करे । जयणा संयुक्त पूजा करे । पूजा करते हुए शरीरमे खाज न खुणे, खेल खंखार न करे। नि केवल जगवानकी स्तवनामे चित्त रखे ।प्रथम सुगध युक्त जल पंचामृतसे स्नान करे। सुकुमाल अहा कोमल सुगंध युक्त वस्त्रसे जगवानका अंग चूहे । कपूर, कस्तूरी मिश्रित शुक्रकेशर चदनका विलेपन करे।शुन वर्ण, शुज गंध युक्त, जीवादि रहित निर्दोष गुलाव, चपा, चपेली, केवमा, जार, जुश्, मोगरादिक पुप्पसे पूजा करे । अष्टाग धूप अगरबत्ती खेवे । मगलदीप करे । अखम उज्ज्वल अदतसे प्रजुके सन्मुख अष्ट मगलिक विखे । दर्पण १ नझासन ५ वर्धमान शरावसंपुट ३ श्रीवत्स ४ मत्स्ययुग ५ कलश ६ खस्तिक नदावर्त एसा अष्ट मंगलकी रचना करे। पंच वर्ण फुलोंसे अष्ट मंगलिक पूजे। सुंदर कुकुम मिश्रित चदनसे हवा देवे । उत्तम नैवेद्य चढावे । अठा साद्य फल चढावे । इत्यादि पूजाकी विधि आरती पर्यंत रायपसेणी, ज्ञाताधर्मकया, जीवानि- गमादि सिघातोम लिरये मुजव करे। पीठे अतरंग नक्तिसे प्रजुके सन्मुस नाटक करे।जैसे देवेंज, दान- वैज, नारद नोंने तथा उदायी राजाकी राणीप्रनाव- (१) तीने, प्रौपदीने नाटक किया । और रावण प्रमुख कर जीवोने यष्टापदादि उपर नाटक करके तीर्थंकर- गोत्र उपार्जन किया तैसे प्रजुके सन्मुख शका रहित होके उत्तम पुरुप नाटक करे। ॥ अव जल चदन पुग्पादिकसे पूजा करे सो अग- पूजा (१)प्रजुके सन्मुख नैवेद्य प्रमुख चढावे सो अग्रपूजा (२)।प्रजुके सन्मुख शकस्तवादि गीत गान नाटकादिक करे सो नावपूजा (३)। यह अव्य- पूजाका विचार गर्जित चोथा त्रिक कहा।अब पाचमा त्रिक । तीन अवस्था विचारणी । पिंगस्थ १, पदस्थ २, रूपातीत ३। इसमें पिमस्थ अवस्थाके तीन नेद । जन्मावस्था (१)राज्यावस्था (२)श्रमणावस्था (३)। और केवल अवस्थाको विचार करणा सो पदस्थ अवस्था । निरजनाकार सो सिझावस्था । तिसर्कु रूपातीत अवस्था कहते है । अब हानिक । तीन दिशा वोगके प्रचुके सामने नजर रखे । जर्व अधो २, तिरठी ३, दहणी यांश पिगमी नजर नहीं करे । अव सातमा त्रिक । तीन वेर धरती प्रमार्जके उस ठिकाणे चेत्यवदन करे। अब आठमा त्रिक । वर्णा- दिक तीन सपटाना हरफ शुद्ध उच्चारण करे सो.
(२०) वर्णशुकि (१)। हरफोके अर्थ पर लंवन रखे सो यर्थशुद्धि (२) आलंबन एक जिनप्रतिमाका रखे सो मनशुद्धि (३)। अब नवमा त्रिक । तीन मुजा करनी । जोगमुखा (१) जिनमुन (२) मुक्ताशुक्ति- मुडा (३)। इसमें जोगमुना किसकु कहते है। पद्म- कोशाकारे दोनु हाथ परस्पर अगुली मिलानी ए जोगमुझाए शकस्तव कहीए (१)। काउस्सग्गमुखा सो जिनमुखा (२)। और दो सीपका जोमा तिस आकार हाथ रखना सो मुक्ताशुक्तिमुसा (३) इस मुखासे प्रणिधान, जय वीयराय इत्यादि करे । अब दशमा त्रिक । प्रणिधान तीन। जिनवदन प्रणिधान (१)मुनिवदन प्रणिधान (२)प्रार्थनाप्रणिधान (३)। इसमे जो जावंति चेञ्या इत्यादि उह सतो तठ सता तक जिनवंदन प्रणिधान (१) जावंत केवि साहू इत्यादि तिविहेण तिदमविरयाण हा तक मुनि- वदन प्रणिधान (२)जय वीयरायसे लेके आजवमख- मा तक प्रार्थनारूप प्रणिधान (३)। एसे दश त्रिकका पहेला धार कहा । अव पाच अनिगम साचवणेका सरा द्वार कहते है ॥ सचित्त अव्य कुसुमादिक अपने पास होय उसकु अलग रस देना (१) योर (२१) राजचिह्न मुगट, उत्र, खड्ग, चामर, पाइका, अचित्त वस्तु वोमना। आलूपण प्रमुस पहस्वारसना (२) मन एकाग्र करना (३) एक पट्ट उत्तरासंग करना (५)जिनविव देखतेही 'नमो वणवधुणो' एसे नमस्कार करना (५) । ए दूसरा द्वार कहा॥यव तीसरा हार दो दिशिका । पुरुप दहणी दिशा वेग जगवतको वादे । स्त्री वा दिशा बैठके जगवत वादे । अब चौथा द्वार तीन अनिग्रह । अनिग्रह देव वादणामे कहा है । जघन्य नव हाथ र वेरके देव वादे (१)। मध्यम नर हाथसे उपरात वेटके देव वादे (२) । उत्कृष्ट ६० हाथ धर वेके देव वादे (3)।यव पाचमा द्वार चेत्यवदनका । सो जघन्य १ मध्यम २ उत्कृष्ट ३ तीन जेट है। तिहा णमो अरिहताण इत्यादिक करके वा एक दोय गाथाका नमस्कार कहके शकस्तब कहना ए जघन्य चैत्यवंदन (२)। जिस देववदनमे स्थापनाईस्तव- दमक नमुथ्थुणसे लेके यरिहतचेश्याण इत्यादिक सपूर्ण कही एक स्तुति कहे सो मध्यम चेत्सवंटन। ॥ कहे । पाच । तथा का , (२) गाथा ४ कहे 'सो मध्यम चैत्यवंदन कहीए । तथा विधिपूर्वक शकस्तवादि पांच दंमक, जय चीयराय पर्यंत आठे थुश्ए देव वादे सो उत्कृष्ट चेत्यवदन कहीए॥यवहाघार पचाग प्रणिपात करे।दो जानु, दो हाथ और मस्तक ए पाच अग मिलायके जमीन खगावे ॥ अव सातमा छार ॥ जघन्य एक गाथासे लेकर उत्कृष्ट एकसो याउ श्लोक तथा काव्यसे प्रजुकी स्तवना करे॥ ॥ यव स्तवना करने के प्रसगसे प्रथम नत्र पढके ए चेत्यवंदन ए स्तवन ए शुभ सिसते है। ॥ अथ अरिदतपद चैत्यवदन ॥ ॥श्रीऽष्टदेवाय नम ॥ जय जय श्री यरिदत जानु, नवि कमल विकाशी ॥ लोकालोक यरूपी रूपी, समस्त वस्तु प्रकाशी ॥१॥ समुद्घात शुन केवले, क्षय कृत मल राशि ॥ शुक्ल चमर शुचि पादसे, नयो वर अविनाशी ॥२॥ अतरंग रिपुगण हणीए, दुय अप्पा अरिहत ॥ तसु पदपकजमें रही, हीर धरम नित सत ॥३॥ इति अरिहतपद- चेत्यवंदन ॥ ज किचि ॥ नमोऽर्हत् ॥
(२३) ॥ अथ प्रथम पद स्तवन । ॥ पूजो मनरली, हा हो दादा कुशल सूरींद ॥ ॥ पू०॥ ए देशी ॥ श्री तेरम गुण बसिके कत, कर्मकु जजे श्री अरिहंत ॥ मन मान ले ॥ अष्ट समयमे समय तीन,सर्व थाहारथी होवे हीन॥म॥॥वादर काये मन वच जोग, तनु तनुसे फुन दृढ तनु योग । मन० ॥ सुखम कायते मन वच रोक, निज वीर्य ताकु कर फोक ॥ मन ॥२॥ सही मात्रके मन व्यापार, वेजिने वाक्य प्रचार ॥ म॥आदि समय रह्यो पणक सुजीव, सुसम लह्यो तिण जोग अतीव ॥ मन ॥ ३॥ एपा योगग्री समये एक, हीना सख- गुणो कर ठेक ॥ म० ॥ समया सखे जोग निरोध, कृत्वा जो लह्यो जोगी सोध ॥ मन॥४॥ वेद समे ना हारता पाय, कुशल कहे ते श्री जिनराय ॥म॥ तेरमे गुणमें गुण समे देव, यापोसा जगकु नितमेव ।। मन ॥५॥ इति अरिहंतपदस्तवनम् ॥१॥ ॥अथ शुश ॥ सकल प्रव्य पर्याय प्ररूपक, लोका- लोक सरूपोजी ॥ केवलज्ञानकी ज्योति प्रकाशक, अनत गुणे करी पूरोजी॥तीजे जव थानक धाराधी.
(२४) गोत्र तीर्थकर नूरोजी॥चार गुणाकर एहवा अरिहत, आराधो गुण रोजी॥इति अरिहंतपदस्तुतिः॥१॥ ॥ अथ सिइपद चैत्यवदन ॥२॥ ॥ श्री शेखेशी पूर्वप्रात, तनु हीन विनागी॥ पुवपउँगपसगसे, ऊरध गत जागी ॥१॥समय एकमे लोकप्रात, गये निगण निरागी॥ चेतन नूपे आत्म रूप, सुदिशा लही सागी॥२॥केवल दसण नाणथी ए, रूपातीत खताव ॥ सिह नये तसु हीर धर्म, वंदे धरी शुज नाव ॥३॥ऽति सिरूपदचेत्यवदनम् ॥ ॥ अथ सिपद स्तवन ॥२॥ ॥ था रे हिला उपर मेह रोखे चीजली ॥ ए चाल ॥ अष्ट वरस नग मास हीना कोमी पूर्वमें म्हारा लाल ही ॥ उत्कृष्ट करे वास सयोगी धाममे म्हा सण ॥ अजोगीके अत तजे जव जव्यता म्हा० त०॥शेलेशी लहे कर्म दले गुणश्रेणिता म्हा० द०॥१॥ खादर पच काल रहे ते योगमे म्हाग र० ॥ तेरस प्रकृतिनो अन्त करीने अन्तमे म्हाका ॥ गमन करे नगरासे अक्रिय होयने म्हा अपुत्व- पयोग असग स्वजाव अबंधने म्हा० ख० ॥२॥श्यु गुण (२५) नर परमाण जोजन सके कही म्हारा जो ॥ वर्नुल विसदा जाश निरालंबन सही म्हाण नि० ॥ मध्ये जोजन अष्ट घनाकृति अन्तमें म्हार घ० ॥ मक्षी पक्षयी हीन भणी सिघातमें म्हा जय ॥३॥ तनु- पन्जारानाम शिलासे जोयने म्हा०शि०॥ लघु अगुल वत्तीस प्रमाण अवगाहना म्हा० प्र०॥वृशि धनु शत पच गुणासे हीनता म्हा० गुण ॥ मिलिया एकमें नत अवाधा ना सहीम्हाण्या अष्ट प्राण धरी रम्य सिरीही जो सही म्हा०सि०॥ वीजो पद श्रीसिक धरो मन गेहमें म्हाण धरो० ॥ कुशल नये जगजीव मिलोगातेदम म्हा मिति सिद्धपदस्तपनम्॥ ॥अथ थुः ॥ यष्ट करमकुं धमन करीने, गमन कियो शिववामीजीयव्यायाध सादि अनादि,चिढा- नंद चिद्राशिजी।परमातम पद पूरण विलासी, अघ घन ढाध विनाशीजीयनत चतुष्टय शिवपढ ध्यागो, केलझानी जापीजी ॥ इति सिद्धपदस्तुति ॥२॥ ॥अथ तृतीय पद चैत्यवदन ॥ ॥ जिनपदकुल मुसरस अनिल, मितरस गुण धारी॥प्रवल सूबल घन मोहकी, जिणते चम (२६) हारी ॥१॥ शवादिक जिनराज गीत, नयतन विस्तारी॥जन कूपे पापे पमत, जगजन निस्तारी॥२॥ पचाचारी जीवके, याचारजपद सार ॥ तिनकु बदे हीर धर्म, अहोत्तरसो वार ॥३॥ इति याचार्यपद- चैत्यवंदनम् ॥३॥ ॥अथ आचार्यपद स्तवन । ॥ नणदल वदिली ले ए चाल ॥ सती खरगयी जेणे, हण्यो क्रोध सुनट सम देणे हो॥गणपति गुण पेसी ॥ मान महा गिरि धयरे, अति सोलन मदव चयरे हो ।। ग० ॥१॥ दलरूप विपवेली, वर अजर कीले ठेली हो ॥ ग० ॥ मूर्खा वेलथी नरीयो, लोह- सागर मुत्ते तरीयो हो ॥ ग ॥२॥मदन नाग मद हीनो, जिण दम शम जने कीनो हो ॥ गण ॥मोह महामद पुण वैराग मुगेर पाटयो हो । ग०॥३॥दोप गयद वस कीनो, धरी उपशम अकुश लीनो हो ॥ ग० ॥ अतरग रिपु द्या, सुर वर पिण जिण निषेध्या हो ॥ ग० ॥ ४॥ रस कृति गुणथी लीनो, सूत्र अरथे आगम पीनो हो ॥ ग० ॥ आचारिजपद एहवो, धरी जीव कुशलता सेनो ताड्यो, (२७) हो ॥ग ॥५॥ इति आचार्यपदस्तवनम् ॥३॥ ॥ अथ थुश् ॥ पचाचार पाले उजवाले, दोप रहित गुणधारीजी । गुण उत्तीसे यागमधारी, छादश अग विचारीजी। प्रवल सबल धनमोह हर- णकु, अनिल समो गुण वाणीजी । दमा सहित जे सयम पाले, याचारज गुणध्यानीजी॥इति आचार्य- पदस्तुति ॥३॥ ॥अथ चतुर्थ पद चैत्यवंदन ॥ ॥ धन धन श्री उवकाय राय, शवता घन नजन ॥ जिनवर दिसत डुवालसग, कर कृत जन- रंजन ॥१॥ गुणवण नजण मण गयद, सुय शणि किय गजण ॥ कुणालध लोय लोयणे, ज य सुय मजण ॥२॥ महा प्राणमें जिन लोए, आगमसे पद तुर्य । तिनपे अहनिश हीर धर्म, वदे पाठक- वर्य ॥३॥ इति उपाध्यायपदचैत्यवंदनम् ॥४॥ ॥ अथ उपाध्यायपद स्तवन ।। ॥ सारलिया अलगा रहोने ॥ ए चाल॥हुयने ३ पूरी दुयने, चेतन नापे शठने पूरी होयने । तु मुज पास + तुजने कुण बतलावे यी (२०) तोसंगे निज पचंजिनो,रचना चरम झूलाणो॥नाणा- वरणी खय उपशमसे, नावेति मंमाणो ॥५०॥१॥ अव्ये ते परजाप्ते कीना, जाति नाम व्यपदेश । एव तो गो तुरग गजादिक, किणा कमें उपदेश ॥ ५०॥२॥ऽत्यादिक बदु मुजकुगका, तेरे सगे लागी॥ नील वर्णकी शमता सेती, मे नयो तोशु रागी॥ ५०॥३॥ उप कहीए हणीयो नवियानो, यपियां लानत आय ॥याधीनां मन पीमा नामे,मायो येन विलाय ॥ ५० ॥ ४ ॥ आविस्ये स्मरीए वर आगम, सूत्रसे ते उक्झाय ॥ तत्सेवाते हणी शउताकु, चेतन कुशलता पाय ॥५०॥५॥इति चतुर्थपदस्तवनम्॥ ॥अथ थु॥ अग ग्यारे चउदे पूरव, गुण पच- वीसना धारीजी । सूत्र अरथधर पाठक कहीए, जोग समावि विचारीजीतप गुण गूरा आगम पूरा, नय निकेपे तारीजी।मुनि गुणधारी बुध विस्तारी, पाठक पूजो अधिकारीजी ॥ इति उपाध्यायपदस्तुति ॥४॥ ॥ अथ पचम पद चेत्यवदन ॥ ॥ दसण नाण चरित्त करी, वर शिवपद गामी ॥ धर्म शुक्ल गुचि चक्रसे, आदिम सय कामी॥२॥ ।
(C)
गुण पमत्त थपमत्तते, नये थंतरजामी माना
इदिय दमननूत, शम दम थनिरामी IPuri
घन गुण गण लग्यो ए, परम 2 मन्गिन
तत्पदपफज नमत है, हर धर्म Era
साधुपदचेत्यनंदनम् ॥ ५॥
(३०) ॥ अथ धुइ ॥ सुमति गुपति कर संजम पाले, दोष वयालीश टालेजी ॥ पट्काया गोकुल रसपाले, नवविध ब्रह्मवत पालेजी ॥ पच महाबत सूधा पाले, धर्म शुम्ल उजवालेजी॥६पकणि करी कर्मसपावे, दमपद गुण उपजावेजी ॥इति साधुपदस्तुति.॥५॥ ॥ अथ दर्शनपद चेत्यवदन ॥ ॥ हुय पुग्गल परियह, अह परमित ससार ॥ गग्नेिद तव करी लहे, सब गुणनो आधार ॥ १॥ दायक वेदक शशी यसख, उपशम पण वार ॥ विना जेण चारित्र नाण, नहीं हुवे शिव दातार ॥२॥ श्री सुदेव गुरु धर्मनी ए, रुचिं लछन अनिराम ॥ दर- शनक गणि हीर धर्म, अनिश करत प्रणाम ॥३॥ ॥ इति दर्शनपदचैत्यवंदनम् ॥६॥ ॥ अथ दर्शनपद स्तवन ॥ ॥ रामचलके वाग आंवो मोद रह्यो री॥ए चाल ॥ देव श्री जिनराज, गुरु ते साधुजण्योरी॥धर्म जिनेश्वर प्रोक्त, लठण वोधि तणो ॥१॥वोधि- लानके काज, सप्तम नरक जसोरी॥ तेण विना सुरलोक, ताते अधिक बूरो री ॥५॥ मिथ्या तापे
(३१)
तत, योधही गंह लहेरी ॥ उपशम दायक वेद,
ईश्वर तीन कहे री ॥३॥ जवसागर हे अपार, फुण
यस्ताध कह्यो री ॥ जसु खाने ते होय, गोसपद
मात्र सरो री ॥४॥ यदनावे अप्रमाण, नाण
चारित्त नलारी॥ बोध धर्ममें जीव, लाने कुशल
कला री॥५॥ इति दर्शनपदस्तवनम् ॥६॥
॥अथ यु॥ जिनपन्नत्त तत्त सुधा सरधे, सम-
कित गुण उजवाखेजी॥नेदद करी आतम निरसी,
पशु टाली सुर पावेजी ॥ प्रत्यारयाने सम तुल्य
नारयो, गणधर अरिहंत शूराजी ॥ ए दरशनपद
नित नित वदो, नवसागरको तीराजी ॥ इति दर्शन-
पदस्तुति ॥६॥
॥ अथ झानपद चैत्यवदन ॥
॥ दिप्रादिक रस राम वहि, मित आदिम
नाण ॥ नाव मिलापसे जिन जनित, सुय वीश
प्रमाण ॥१॥ जवगुण पड़ाव उहि दोय, मण
लोचन नाण ॥ लोकालोक सरूप जाण, श्क केवल
जाण॥शनाणावरणीनाशयीए,चेतन नाणप्रकाश।
सप्तम पदमे हीर धर्म, नित चाहत अवकाश ॥५॥
इति ज्ञानपदचैत्यवंदनम् ॥७॥
(३२) ॥ अथ ज्ञानपद स्तवन ।। ॥ म्हारे अति उमरगे ॥ ए चाल ॥ जिनवर जापितागमनणीया,तत्व यथास्थिति गमीयाजी। म्हारे जगजनतारु, ते उत्तम घर नाण कहाये। जविजन अहनिशि चाहेजी॥ म्हा०॥१॥जदया- जय कुपथा सुपथा, पेयापेय अग्रथाजी॥म्हा॥ देव कुदेव अहित हित धारी, जाणे जेण विचारीजी॥ म्हा ॥५॥ श्रुति मति दोय ते डि सारु, तेण परोक विचारुजी म्हा॥ हिमण केवल है वारु, जीव प्रतक सुधारुजी ॥ म्हा० ॥३॥ अयवि जस्स वले जग जाणे, खोकादिक अनुमानेजी ॥ म्हा॥ त्रिजुवन पूजे जासु पसाये, धारी शुज अध्यवसा- येजी म्हाणा॥नाणावरणी उपराम क्षयथी, चेतन नाणकु विलासेजी ॥ म्हा ॥ सप्तम पदमे नविजन हरपे, निशदिन कुशलता निरखेजी म्हाण ॥५॥ इति नाणपदस्तवनम् ॥ ७॥ ॥ अथ थुश् ॥ मति श्रुद्धः लहीए गुण गनीरोजी॥ छादा अग यस्ताराज तीन गुप्ति युत, (३३) वली, प्रत्यक्ष रूप अवधारोजी ॥ए पच ज्ञानकु वदो पूजो, नविजनने सुसकारोजी ॥ इति झानपद- स्तुति ॥७॥ ॥अथ अष्टम पद चैत्यवंदन ॥ ॥ जस्स पसाये सादु पाय, जुग जुग समिती ॥ नमन करे शुल नाव लाय, फुण नरपति मृन्द ॥१॥ जपे धरी थरिहत राय,करी कर्म निकद ॥ सुमति पच दे सुख अमद ॥२॥ऽपु कृति मान कपायथी ए, रहित लेश शुचिवत ॥ जीव चरित्तकु हीर धर्म, नमन करत नित सत ॥३॥ऽति चारित्रपद- चैत्यवदनम् ॥७॥ ॥ अथ चारित्रपद स्तवन । ॥निर्विकल्प अज निर्गुणी, चिदानास निस्सग ।। सुग्यानी सानलो ॥ मूर्तिहीन चेतन करे, रूपी पुल रग ॥ सु०॥ १॥ स्पर्कक कारण वर्गणा, कार्ये कारण नार ॥ सु० ॥ कृत्वा जोग सुधामता, लब्धा सस खन्नाव ॥ मु॥२॥ पर्याप्ता लघु जोगमे, वृद्धि लहे जुगमान ॥ मु० ॥ मध्ये वसु समये लहे, अते को ते जाण ॥ सु ॥३॥ सहकारी मानस मुसा, , मिल पद धर्ममे, (३४) कारण रम्य वलेण सु०॥ प्राप्ताघस्त्र प्रकारता, सप्त प्रातका तेन ॥ सु०॥४॥ तमोधन रूपी जलो, चेतन सयमधाम ॥ सु॥ कर धन कुशता नवतु अलिराम ॥ सु०॥५॥ इति चारित्र- पदस्तवनम् ॥ ॥ अथ थुइ ॥ कर्म अपचय पूर सपावे, आतम- ध्यान लगावेजी ॥ वारे जावना सूधी जावे, सागर- पार उतारेजी ॥ पट् सम राजकु पूर तजीने, चकी सजम धारेजी॥एडवो चारित्रपद नित वदो, बातम- गुण हितकारेजी ॥ इति चारित्रपदस्तुति ॥७॥ ॥अथ तपपद चैत्यवदन ॥ ॥श्रीश्पनादिकता विहि अतैरपि वाह्य मी वसु कर मित या नेदे समता युत नयमो श्री तपपद न गते नित हीर धर्म ५०चत्यवद - (३५) ॥ अथ तपपद स्तवन ।। वारस नेद जण्या जिनराजे, वाह्य मध्यनरत जगकाजे रे ॥ शिवपद श्रेणितिण निरा वर ग्याता, जिनवर पिण तपना ना रे समता सहिते जिनते जारी, जली कन्सर हारी रे॥ शि० ॥ जीव कनकने रहे तप पाननका जोरा रे ॥ गिरना कुसुम हे शकि, देव नरनी १० लिटर दिला पाप सकल है तमनी राशि वर माजोनाली रे। शि० ॥३॥ जस्स पमा सीट वान बधि सघली जगहितकारु रेाि अति घर मुख साध्यता हीना, काम नानवकीनार। शि०॥४॥ छारोधनरूपी कद्दीप दरही चेतन वद्दीए रे ॥ शि० ॥ ५॥ इति श्रीत टन्नयनम् ॥
(३६)
॥ अथ चतुर्विंशति जिन चैत्यवंदन ॥
॥ श्रीमदृपनसर्वा, वृषनाक सुवर्णरुक् ॥ जय
देवाधिदेवाई,-नाजिराजेन्छनन्दन ॥१॥युगस्यादी
त्वया येन, ज्ञानत्रययुतेन यत् ॥जनन्यामरुदेवाया,
पावन जरं कृतम् ॥ २॥ इति पत्नस्तुतिः ॥१॥
॥अर्हता जितनाथेन, गजलाग्नशालिना॥ जित-
शत्रुमहीपाल,-पुत्रेण कनकविपाशा विजयाकुक्षि-
रत्नेन, जगवंस्त्वयका जिन ॥ जिता रागादयो येन,
वदे त्वा सर्वदा मुदा ॥ ४ ॥ इत्यजितस्तुति ॥२॥
.॥ जितारिनृपतेवात्, सन्ना सजनानिध ॥
सेनाया नंदनो हेम, चणो गधर्वलाठन ॥ ५॥ सर्व-
सौग्यप्रदो मुग्य, शानदर्शनसयुत ॥ मुनीनां पुङ्गवो
देवो, नित्य दिशतु मा जिन ॥६॥ इति सनव-
स्तुति ॥३॥
॥ सिझार्थनदन सार्व, वीतराग जगत्पतिम् ॥
श्रीसवरसमुत्पन्न, प्लवगांक हिरण्यन्न ॥ ७॥ अजिन-
न्दननामान, विशुद्धहृदय सदा॥य स्तौति परया
नत्त्या, स ना लोकेऽचिनद्यते ॥ ७॥ इत्यजिनदन-
स्तुति ॥४॥
- (३७) ॥ मेघानिधधरित्रीश,-तनयो मासप्रद ॥ोच- लक्षणहेम,-मरीचिमङ्गलागज ॥॥ सत्य सुमति- नाश , सुमतिं तनुतात्तमा ॥ नविना पुण्यकतणा, वर्गसौग्यानसिप्रदाम् ॥१०॥इति सुमतिस्तुति ॥५॥ ॥ सुसीमापुत्र सत्कोक, नदद्युतिधगधर ॥ धरा- निधनृपोभूत, पद्मलक्षणधारक ॥१४॥जवाब्धोजन सकीणे, उस्तरे पतता नृणा ॥ त्राणाय सतत देव, पद्मग्रन जिनेश्वर ॥ १२ ॥ इति पद्मप्रस्तुति ॥६॥ ॥ श्रीसुपाानिधो देव, पृथ्वीज स्वस्तिकाक- नृत् ॥प्रतिष्ठनृपसजात, चामीकरकरो जिन ॥१३॥ समुख च गनीर , कर्मणा वेदने पर ॥य सार्य परमब्रह्मा, रत नोमि सदा चिनुम् ॥ १४ ॥ इति सुपार्श्वस्तुति ॥७॥ ॥ चयन प्रनो कात, चलक्षणसयुत ॥ तमा- पति धपिडान, तमोव्यूद विनाशन ।। २५ ॥ ससार- जसाथ, महसेननृपोनन ॥ लक्षणापुत्र मा खामि-नर कैलबोधनत् ॥ १६ ॥ इति चपन- स्तुति ॥७॥ ॥ अनाद्यछत्रप्रवध श्लोक ॥ सस्तुतो वो ददा- वाशु, सुरासुरनरेश्वर ॥ मुधिषिवित शम्म,
,
(३०)
मुग्रीवनृपनंदन ॥ १७ ॥ यस्यासीझननी रामा,
माननीया दिवोकसाम् ॥ मानमुक्तोऽवदातोयो, मायो
मकरलाठित ॥ १७॥ इति सुविधिनाथस्तुति ॥५॥
॥ चामरवधाविमो ॥ श्रीमछीतलनायेश, नदा-
दृटरथात्मज ॥ जाखत्मवर्णवद्देह, श्रीवत्साह्वाक-
बारक ॥ १५ ॥ त्वदीयचरणाजोज,-सेवकानां वपु-
घुता ॥ प्राकृत जिनव्यूह, उष्ट सनेय हे विनो
॥२॥ इति शीतलनाथस्तुति ॥ १० ॥
॥ विष्णुवंशार्कवद्देवो, विणुपुत्रो हिरण्यन ॥
श्रेयोझिकरोऽजन, सगलानजिन ॥ १॥
हित्वा कर्मरिपून सार्च , श्रेयास श्रेयसै सह ॥ पर-
ज्ञानमयेन त्वं, महानन्दपदं परम् ॥ २५ ॥ इति
श्रेयासस्तुति ॥११॥
॥ वरीवर्तितरामीहा, जवतां जवतां यदि ॥
जटिति दितु चित्ते, नो नव्या प्राप्तमकरम् ॥२३॥
तदा नजध्वमेन हि, वासुपूज्य जयासुतं ॥वसुपूज्य-
कुलोत्तसं, महिपाक च रक्तन॥ २४॥इति वामुपज्य-
स्तति ॥१२॥
(३0) वधिमलान, त्वदीयम्मरण विना ॥ कुर्वन्नप्येति नो ब्रह्म, प्रक्रिया नातिविस्तरा ॥ २६ ॥ इति विमल- स्तुति ॥१३॥ ॥ हेमनर्णस्य पुत्रस्य, सुयश सिहसेनयो ॥ दे- वस्य श्येनचिह्नस्य, वानन्तगुणोदधे ॥ ७ ॥ मादयोऽपि यस्यात, गुणाना लेनिरे न हि ॥ अन- न्तस्य गुणास्तस्य, क्षमो वस्तु नर कथम् ॥ २७ ॥ इत्यनन्तस्तुति ॥ २४ ॥ ॥ सुनतापुत्र बज्राक, जानुवंशासन्निन ॥ कनक- प्रन सर्वज्ञ, धर्मनाथानिधेश्वर ॥ २ए ॥ तवा गोपि पुरश्चारी, नूतले यात्यशोकता ॥ यनुत्तरफला सति, सतां सगतयोऽपि हि ॥ ३० ॥ इति धर्मनाथ- स्तुति ॥ १५ ॥ ॥ विश्वसेनधराधीश, नन्दन मृगलक्षण ॥ या- चिरेय सुवर्णाग, कलयामि जिनेश्वर ॥ ३१ ॥ तं श्रीमहातिनामान, यस्याग्रे कुर्वते मुदा ॥प्राज्या सुम- नसां वृष्टिं, विबुधा विवुधप्रियाम् ॥ ३२ ॥ इति शाति- नाथस्तुति ॥ १६ ॥ ॥ श्रीयुताया श्रिय पुत्र, श्रेयस्कर हिरण्यन ॥ सूरिनूपतिसंजात, गगलक्षणधारक ॥३३॥ कुथुनाथ:
(३०) सुग्रीवनृपनंदन ॥ १७ ॥ यस्यासीजननी रामा, माननीया दिवौकसाम् ॥मानमुक्तोऽवदातोयो, मायो मकरलाठित ॥ १७ ॥ इति सुविधिनाथस्तुति ॥ए॥ ॥ चामरवधाविमौ ॥ श्रीमठीतलनायेग, नदा- दृटरथात्मज ॥ नाखत्मवर्णवदेह, श्रीवत्साहाफ- वारक ॥ १ए ॥ त्वदीयचरणांनोज,-सेवकाना वपु- घुता ॥ प्राकृत वृजिनव्यूह, पुष्ट सन्नेद्य हे विनो ॥२०॥ इति शीतलनाथस्तुति ॥ १० ॥ ॥ विष्णुवंशार्कवद्देवो, विष्णुपुत्रो हिरण्यन ॥ श्रेयोवृझिकरोऽजन, सगलानजिन ॥१॥ हित्वा कर्मरिपून् साई , श्रेयास श्रेयसे सह ॥ पर- ज्ञानमयेन त्वं, महानन्दपद परम् ॥२२॥इति श्रेयासस्तुति ॥११॥ ॥ वरीवर्तितरामीहा, नवता नवता यदि ॥ कटिति दितु चित्ते, नो नव्या प्राप्तमकरम् ॥२३॥ तदा जजध्वमेन हि, वासुपूज्य जयासुत ॥ वसुपूज्य- कुलोत्तस, महिपाक च रक्तन॥ ४॥इति वासुपूज्य- रतुति ॥ १२ ॥ ॥ श्रीमछिमलनाथेश, कृतवर्मसमुभव ॥ शूक- कल्याणदीधिते ॥ २५ ॥ चम- , AN (३) वधिमलान, त्वदीयस्मरण विना ॥शयन में ब्रह्म, प्रक्रिया नातिविस्तरा ॥ २६ ॥ विन स्तुति ॥१३॥ ॥ हेमवर्णस्य पुत्रस्य, सुयश सिंहम्मे वस्य श्येनचिह्नस्य, वानन्तगुणोड़ने । मादयोऽपि यस्यात, गुणाना लेनिन: न्तस्य गुणास्तस्य, दामो वस्तु नर. कम्' श्त्यनन्तस्तुति ॥ १४ ॥ ॥ सुप्रतापुत्र वजाक, जानुमान प्रज सर्वज्ञ, धर्मनाथानिय पुरश्चारी, नूतले यात्यशोकता ने सता सगतयोऽपि हि ॥ स्तुति ॥ १५ ॥ ॥ विश्वसेनधराधीश, नन्दलाया. चिरेय सुवर्णाग, कसमाति वाय, श्रीमघातिनामान, यम्यान यांना नसा वृष्टि, विशुधा विनि ति नाथस्तुति ॥ १६ ॥ an (10) जिनेशस्य, तीर्थकरजगत्पते ॥ मदीयं पापसंदोह, जवातरकृत धन ॥३४॥ इति कुथुनाथस्तुतिः ॥१७॥ ॥ सुदर्शननृपोभूतं, नन्द्यावकिसयुत ॥ अनोज- वनिरालेप, देवीपुत्र सुवर्णनं ॥ ३५ ॥ जगन्मुरया गुणा सर्व, धुर्य प्रजुतया जिन॥चरीकर्मि नमस्तस्मा, अराय परमात्मने ॥३६॥ इत्यरनाथस्तुति ॥ १७ ॥ ॥ कुंनप्रनावतीपुत्रो, नीलपणे घटाफनृत् ॥ जगन्मित्र च ध्वान्त, नाशनाहिदित सदा ॥३॥ नत्रययुतो नाति, देवो यो विष्टपत्रये ॥ तस्य श्रीमल्लिनाथस्य, स्मरणेन मुदा ससे ॥ ३० ॥ इति महिनाथस्तुति ॥ १५ ॥ ॥ सुमित्रनृपते सूनो, पद्माकुक्षिपवित्रकृत् ॥ कूर्मलदाणधर्म,-दायक श्यामलटवे ॥३या मुनि- सुव्रत देवेन, क्षीणकारिममल ॥ देहि त्व मेऽव्य- यीनाव, पद तत्पुरुषोत्तम ॥ ४० ॥ इति मुनिसुव्रत- स्तुति ॥२०॥ ॥ श्रीमद्विजयपाल, कुलोत्तस हिरण्यरुक ॥ वप्रासुत नमिनाथ, नीलोत्पलसदकनृत् ॥४१॥ यस्ते- पचजनो देव, निन्दा च कुरुते खय ॥ स एति , (४१) परमझान, कोऽपि नद्यत्र सशय ॥ ४२ ॥ इति नमि- नाथस्तुतिः ॥२१॥ ॥ शिनायास्तनये वये, समुनिजयोभवे ॥ हरि- वशहरी शनी शसाके कमलप्रने ॥ ४३ ॥ त्यक्त- राजीमतीनेहे, नेमिनाथे जितम्मरे ॥ मिभिप्रमदया माता, प्रत्यक्षेपि जिनेश्वरे ॥ ४ ॥ इति नेमिनाथ- स्तुति ॥२॥ ॥ अश्वसेनारयनूपाल, सुतेन परमेष्टिना॥ वाम- येन दिता येन, क्मसम्याजिमानता ॥ ४५ ॥ तस्मै श्रीपार्श्वनाथाय, नमोऽस्तु मामक सदा ॥ दयनाशन- चिहाय, नीलवर्णाय शनवे ॥ ४६॥ इति श्रीपार्थ- नाथस्तुति ॥ २३ ॥ ॥श्रीमत्सिझार्थवशा,बेशलेय जगन्मणे॥महा- नादध्वजाहत, कल्याणकर सर्वदा॥४॥ चरमस्तीर्थ- कृधीर, मोहेनहनने मृगात् ॥ त्वशक्तिदत्तचित्ताय, कमला देहि मे जिनजाति महावीरस्तुति ॥२४॥ ॥ इति श्रीदमाकल्याणजीकृत चतुर्विंशति जिनेश्वरस्तरन सपूर्णम् ॥ ॥अथ अष्टापदादि नमस्कार।। “॥ यत्र श्रीजरतेश्वर शुचिमना. पूर्वाटिदिक्षु- (४२) क्रमात् । तीर्थेशान् किल युग्मवर्णवसुदिक संरयान- सरयश्रिय ॥साधु स्थापयति म्म विस्मितहदा दृश्य नगाधीश्वर । त चाष्टापदतीर्थराजमनिश अष्ट्र समीहे खयम् ॥ १॥ इत्यष्टापदस्तुति ॥ ॥ लसहिपचागधीश्वरालये,-विराजिते श्रीमति शाश्वताश्रये ॥ नन्दीश्वरे छोपवरे जिनेश्वरान्, वदे प्रमोदानव नीतिशातये॥१॥इति नदीश्वरस्तुति ॥ ॥ सकलकुशलवलीपुष्करावर्तमेघो, सुरित- तिमिरनानु कल्पवृक्षोपमान ॥ जयजलनिधिपोत" सर्वसपत्तिहेतु । स नवतु सततं व श्रेयसे पार्श्व- नाय ॥१॥ इति श्रीपार्श्वजिनस्तुति ॥ ॥ दर्शनाहुरितध्वसी, बदनाहावितप्रद ॥ पूज- नात्पूरक श्रीणा, जिन साक्षात्सुर म ॥१॥ इति जिनस्तुति ॥ ॥सुपर्णवर्णं गजराजगामिन, प्रलववाहुँ सुविशाल- लोचन ॥ नरामरेड स्तुतपादपकज, नमामि जत्यापन जिनोत्तम ॥१॥ इति आदिजिनस्तुति ॥ ॥ नमस्कारसमो मत्र , शत्रुजयसमो गिरि ॥ वीतरागसमो देवो, न नूतो न नविष्यति ॥ १॥ दि तुह मुहकमले, तिन्निमिण गड निरवसेसा॥
(४३) दारिद्द दोहग्ग,जम्मतरसचिय पाय ॥१॥ पाताले यानि विवानि, यानि विवानि नूतले ॥ खगेऽपि यानि विवानि, तानि वदे निरन्तरम् ॥ १॥ प्रशम- रसनिमग्न दृष्टियुग्म प्रसन्न, वदनकमलमंक कामिनी- सगशून्य ॥ करयुगमपि यत्ते यत्ते शस्त्रसवपवध्य, तदसि जगति देवो वीतरागस्त्वमेव ॥१॥इति सर्व- जिनस्तुति ॥ ॥ हवा जेद सुलखणा, जे जिनवर पूजन्त ॥ एकण धम्मे वाहिरा, परघर कम्म करत ॥१॥ नव- वीजाकुरजनना, रागाद्या क्ष्यमुपागता यस्य ॥ ब्रह्मा वा विष्णुर्ग, हरो जिनो वा नमस्तस्मै ॥१॥ इति ॥ अथ सदाके देववदनमें तथा दशमे दिन उली पारणकी विधिमें कहणेका ( चै०) (स्त०) थुइ ॥ ॥ नव पद चैत्यवदन ॥ ॥जो धुरि सिरि अरिहत मूलदृढ पीढिपवित्र, सिकिसूरि उनकाय साहु चिहुसाहगरिचिठ॥दसण नाण चरित्त नहिं पासाहे सुन्दरु, तत्तकर सर- वग्ग लछि गुरुपय दल मवरु ॥ दिशिवाल जरक (४) जरकणी पगुह सुर कुसुमेहि अलकियठ, सो सिफचक्क गुरुकप्पतरु अम्ह मनवठिय दिय॥१॥ ॥ पुनः नव पद चेत्यवदन ॥ ॥श्री अरिहत उदार काति, अति सुन्दर रूप ॥ सेवो सिह अनन्त गात, यातम गुण रूप ॥२॥ आचारज उवजाय साधु, शमता रस धाम ॥ जिन- नापित सिझात शुरू, अनुन्नव अनिराम ॥२॥ वोधिवीज गुण सपदाए नाण चरण तव शुझ॥ध्यावो परमानन्दपद, ए नव पद अविमझ ॥३॥ह परनव आनन्दकद, जग माहि प्रसिद्धौ ॥ चितामणि सम जास जोग, बहु पुण्ये लछौ ॥ ४॥ तिदुअण सार अपार एह, महिमा मन धारो ॥ परिहर परजजाल जाल, नित एह सजारो॥५॥ सिहचकपद सेवता, सहजानन्द स्वरूप॥अमृतमय कल्याण निवि, प्रगटे चेतन प॥६॥इति श्रीसिद्धचकचैत्यवदन सपूर्णम्॥ ॥ अथ नव पद स्तवन ।। ॥ सुरमणी सम सहु मंत्रमा, नव पद थनिरामी रे लोय ॥ अहो नव०॥ करुणासागर गुणनिधि, जग अत्तरजामी रे लोय ॥ अहो जग ॥ १॥ विजुवन (४५) जन पृजित सदा, लोकालोक प्रकाशी रेखोचायो लोका॥ एहया श्री अरिहतजी, नमुचित उज्ञान रे लोय ॥ यहो न॥२॥अष्ट करमदल कर करी. थया सिह सरूपी रे लोय ॥ अहो थनिधन नधि नावथी, जे अगम यरूपी रे डोन । यही जे० ॥३॥ गुण उत्तीसे शोचता, सुंदर मुवारी लोय ॥अहो मु० ॥ आचारज तीजे पदे, वर- कारी रे सोय ॥ अहो व०॥४॥ आगमधारी - शमी, तप पिध आराधी रे लोय ॥ यदी। चोये पद पाठक नमो, सवेग समाधि अहो स॥५॥पचाचार पालणपरा, पचास रे लोय ॥ यदो प० ॥ गुणगगी मुनि पाई वमनागी रे लोय ॥ अहो प्र० ॥६॥निमल उलसे, श्रुत असा यावे रे लोय । के गुण दरगण नमो, यातम शुर अहो था० ॥ ॥ ज्ञान नमो प्रकारे रे लोय ॥ यहो जे॥ नमो, परजाव निवारी रेखांक HIM (४६) नेदे रे लोय ॥ अहो वा० ॥ वांध्या काल अनतना, जे कर्म उठेदे रेलोय ॥अहो जे० ॥१०॥ ए नव पद बहुमानथी, यावे शुन नावे रेलोय॥अहो ध्या॥ नृप श्रीपाल तणी परे, मनधवित पावे रे लोय ॥यहो म० ॥ ११ ॥ आसु चैत्रक मासमा, नव आबिल करीए रे लोय॥अहो न० ॥ नव उली विवि युत करी, शिवकमला घरीए रे लोय ॥ अहो शि० ॥ १५ ॥ सिरूचकनी बदु परे, वर महिमा कीजे रे लोय ॥ अहो व०॥ श्री जिनलान कहे सदा, अनुपम जश लीजे रे लोय ॥ अहो अ० ॥ १३ ॥ इति ॥ ॥ अथ नव पद स्तवन ।। ॥ राग मारु ॥ तीरथनायक जिनवरुजी, अति- शय जास अनुप ॥ सिह अनन्त महायणीजी, पर- मानद सरूप ॥ नविक मनधारजो रे ॥१॥धारजो नव पदध्यान ॥ न०॥ श्री आचारज गणधरु रे, गुण तीश निवास ॥ पाठक पदधर मुनिवरुजी, श्रुत- दायक सुविलास ॥०॥२॥ सुमति गुपतिधर शोन- ताजी, साधु समतावत ॥ सम्यग्दर्शन सुदरजी, ज्ञानप्रकाश यनन्त ॥ न० ॥३॥सवर साधना
(3)
चरण वे रे, नप उत्तम विवि होय ॥ ए नव पदना
ध्यानथी रे, निरुपाधिक सुस होय॥न॥४॥अमृत
सम जिनधर्मनो रे, मूल ए नव पद जाण ॥ अविचल
थनुलन कारणेजी, नित प्रति नमत कल्याण ॥
ज० ॥ ५॥ इति नवपदस्तवनम् ।।
॥ अथ सिचक्र स्तवन ॥
॥ राग प्रजाती ॥ नव पद ध्यान धरोरे॥जविका
न० ॥ मन वव काया कर एकते, विकथा पूर
हरो रे॥न न० ॥१॥ मत्र जमी अरु तत्र घणेरा,
इन सवकु विसरो रे ॥ अरिहतादिक नव पद जपने,
पुण्यनमार जरोरे ॥ न न० ॥२॥ अम सिद्ध नव
निध मगलमाला, सपत्ति सहज चरो रे ॥ लालचद
याकी बलिहारी, शिवतरु वीज सरो रे ॥ नव
न॥३॥ इति श्रीसिद्धचक्रस्तवनम् ॥
॥ अथ नव पद थुश्॥
॥ नित प्रति दु प्रणमु, सिद्धचक्र शुज नाव ॥ दिव
कारज सिछिनो, लाधो एह उपाय ॥तुज नाम पसाये,
थारति व्याधि पुलाय ॥ ग तुज अनुग्रहथी, सुस
सपत्ति मुज थाय ॥१॥श्रीअरिहत नमीए, सिक
. , (४०) सूरि उवजाय ॥ मुनिवर त्रिक करणे, टसण नाण सुहाय ॥ उगविधि चारित्ते, बुध विध तप मन नाय॥ ए नव पद ध्यावतां, निरुपम शिवसुख थाय ॥२॥ विद्यापरवादे, जाणो ए अविकार ॥ श्रीगुरु उपदेशे, सिझचक उद्धार ॥ प्रवचन अनुसारे, नारयो एह विचार ॥जविजन नित ध्यावो, सुरतरु गुणनमार ॥३॥ जिनधरम अनुरागी, चकेसरी सुखकार ॥ सेवकने आपे, मुख सपत्ति परिवार ॥ दिव निधि उदयकरी, चारित्र नदी मन नाय ॥ जिनचद सूरीसर, खरतर- पति सुपसाय ॥ ४॥ इति नवपदस्तुति ॥ ॥अथ नव पद ओलीकरण विधि ॥ ॥ प्रथम आसो सुदि ७ अथवा चैत्र सुदि से उली शक करे । कदाच तिथि घटी दुवे तो६से, वधी दुवे तो आमसे शरु करे । पिण याविल ए पूनिम ताऽ करे। तिहां प्रथम नूमि शुरू करके माम- सादिकसे चित्रित करे, पीठेवाजोउ उपरी सिद्धचक थापे । त्रिकाल पूजा करे सो विसते हे ॥ प्रजात समय राक्ष पनिझमण करके पीठे वस्त्र पमिलेहे। जहा सिद्धचक्र स्थापना है तहाआयके पांच शकस्त -- (80) देव पादे। पीछे नव चेत्ये यथना नन प्रतिमा यागे नव चेत्यवदन करे। वासक्षेपने पूजा करे । पीठे केसर चटनमे पूजा करे। पीछे मध्याह्न समय पाच शक- स्तवे देव वादे पीछे गुरु पाते यायके रायासोचे। थप्नुचिमि समायके यारिखनु पञ्चरकाण करे । प्रथम अरिहतपदका वर्ण सफेद , इसीसे याति- समें चारल अने गरम पाणी यह दो अन्य लेशु ऐसोयापित पञ्चकेापीठेयरिहतपद के बारे गुण है सो चिंतबके बारे नमस्कार करे सो विग्यते है । प्रथम सर्व ठेकाणे यामि समासमणो व० इत्यादि कहके नमस्कार करे। ॥ अरिदतपदके १० गुण ॥ यशोवृक्षप्रातिहार्यसयुताय श्रीयरिहताय नम २ पुष्पवृष्टिप्रातिहार्यमयुनाय श्रीयरिहताय नम ॥ ३ दिव्यमनिप्रातिहार्यसयुताय श्रीयरिहताय॥ ४ चामरयुगप्रातिहार्यसयुताय श्रीयरिहताय० ॥ ५ स्वर्णसिंहासनप्रातिहार्यसयुताय श्रीयरिहताया ६ जाममलप्रातिदार्यमयुताय श्रीयग्हिताय नम ॥ मुनिप्रातिहार्यमयुताय श्रीयरिहताय नमः ।। म.
(५०) नत्रयप्रातिहार्यसयुताय श्रीयरिहताय नम ॥ ए ज्ञानातिशयसयुताय श्रीअरिहताय नमः ॥ १० पूजातिशयसयुताय श्रीअरिहताय नम ॥ ११ वचनातिशयसयुताय श्रीअरिहताय नम ॥ १२ अपायापगमातिशयसयुताय श्रीयरिहंताय नम ॥ ॥ इत्यादि नमस्कार करके 'अनछ जससिएण' कहके चार लोगस्सका काउस्सग्ग करे। एक लोगस्स प्रगट कहे । पीठे स्वस्थानक जाके चैत्यवंटन करे। पञ्चरकाण पारके याविल करे। पहले जल पीवे जब चैत्यवंदन करके पीवे। पीठे फेर चैत्यवंदन करके तिविहार पञ्चरकाण करे। न ही णमोथरिह- ताण' इस पदको २००० गुणणो करे। श्रीपालजीको चरित्र, नव पद महिमा सुणे । पुण पहर दिन रह- ऐसे तीसरी वेर पाच शकस्तवे देव वादे । सामायिक लेके दिन ठते पमिछमण करे । आरतीके समय दीप, धूप, कुसुमपूजा करे । अथवा पहिले आरती प्रमुख करके पीठे पमिकमण करे। (सोनेके समय) ऽरियावही पमिकमके चेत्यवदन करके राइ सथारा गाथा गुणके सोवे । निशा न आवे जहा तक नव पदका गुण स्मरण करे ॥ इति ॥
(५१)
॥अथ नितीय दिवस विधि।
॥अब इसी तरेह इसरे दिन प्रत्नातकी करणी सब
करके सिझपदका लाल वर्ण है, इसीसे गहुके रोटीको
थाविल करे।'झी णमो सिहाण'इस पदको गुणणो
दो हजार करे। सिझपदके आठ गुण है सो ७
गुणाको गुरु नमस्कार करावे सो लिखते है।
॥सिपदके गुण ॥
१ अनन्तझानसयुताय श्रीसिद्धाय नम ॥
२थनन्तदर्शनसयुताय श्रीसिहाय नम ॥
३ थव्यायाधगुणसयुताय श्रीसिझाय नम ॥
। अनन्तचारित्रगुणसंयुताय श्रीसिकाय नम ॥
५ अक्षयस्थितिगुणसयुताय श्रीसिद्धाय नम ॥
६ अरपिनिरजनगुणसयुताय श्रीसिकाय नम ॥
७ अगुरुलघुगुणसयुताय श्रीसिहाय नम ॥
जयनन्तवीर्यगुणसयुताय श्रीसिकाय नम ॥
॥ यह आवे नमस्कार करके यन्नच ऊससिएण
कहके आप लोगस्सका काउस्सग्ग करे । एक
लोगस्स कहके पारे। पीठे पूवोक्त करणी अनुकमसे
करे ॥ इति छितीय दिवस विधि ॥२॥
(५२) ॥ अथ तृतीय दिवस विधि ॥ ॥ पूर्वोक्त विधिसे प्रजातकर्तव्य करे। आचार्य- पद पीले वर्ण है इसीसे चिणाकी दालका आबिल करे । 'झी णमो आयरियाण'इस पदको गुणणो दो हजार करे । आचार्यपदके ३६ गुण याद करके उत्तीस नमस्कार करे सो लिखते है । ॥ आचार्यपदके ३६ गुण ॥ १ प्रतिरूपगुरुमंयुताय श्रीआचार्याय नम ॥ २ सूर्यवत्तेजस्विगुणसंयुताय श्रीयाचार्याय नमः॥ ३ युगप्रधानागमसयुताय श्रीआचार्याय नम ॥ ,४ मरवाक्यगुणसयुताय श्रीयाचार्याय नम ॥ ५ गालीर्यगुणसयुताय श्रीआचार्याय नम, ॥ ६ धेर्यगुणसयुताय श्रीयाचार्याय नम ॥ ७ उपदेगगुणसयुताय श्रीयाचार्याय नम ॥ अपरिश्राविगुणसयुताय श्रीयाचार्याय नम ॥ : ए सोम्यप्रकृतिगुणसयुताय श्रीयाचार्याय नम ॥ शीलगुणसयुताय श्रीयाचार्याय नम ॥ २१ अविग्रहगुणसंयुताय श्रीयाचार्याय नम ॥ १५ अविकसकगुणसयुताय श्रीयाचार्याय नमः ॥ १० A ---
(५३)
१३ यचपलगुणसयुताय श्रीयाचार्याय नम ॥
१४ प्रसन्नवदनगुणसयुताय श्रीयाचार्याय नम ॥
१५ क्षमागुणमयुताय श्रीयाचार्याय नम ॥
२६ जुगुणसयुताय श्रीयाचार्याय नम ॥
२७ मृगुणसयुताय श्रीयाचार्याय नम ॥
२० सर्वमगमुक्तिगुणसयुताय श्रीथाचार्याय नम ॥
पए कादशश्चितपगुणसयुनायबीयाचार्याय नम ॥
२० सप्तदशधिसयमगुणसयुताय श्रीयाचार्याय० ॥
२१ सत्यव्रतगुणसयुताय श्रीयाचार्याय नम
२२ शोचगुणसयुताय श्रीयाचार्याय नम ॥
२३ अकिंचनगुणसयुनाय श्रीयाचार्याय नम ॥
२४ ब्रह्मचर्यगुणसयुताय श्रीथाचार्याय नम ॥
२५ यनित्यनारनानायकाय श्रीयाचार्याय नम ॥
२६ यशरपनाननानारकाय श्रीयाचार्याय नम ।
२७ ससारस्वरूपनारनानावकाय त्रीयाचार्यायः॥
त्वम्बरुपनारनानायकाय श्रीयाचार्याय
भए अन्यत्वनासनालारकाय श्रीयाचार्याय नम ॥
30 अगुचिनागनानायकाय श्रीयाचार्याय नमः ॥
३१ व्याश्रमलाननाजानकाय श्रीयाचार्याय नमः॥
३० सपरजारनानारमाय श्रीयाचार्याय नम
"
(५४)
३३ निर्जरानावनाजानकाय श्रीश्राचार्याय नम ॥
३ लोकखरूपन्नावनानावकाय श्रीआचार्याय० ॥
३५ बोधिपुर्खनन्नावनानावकाय श्रीयाचार्याय ॥
३६ धर्मलजलावनानावकाय श्रीयाचार्याय नम ||
॥ यह उत्तीस नमस्कार करके यन्नत ऊससिएण
इत्यादि कहके उत्तीस (३६) लोगस्सका काउस्सग्ग
करे । एक लोगस्स उचे खरसे कहके पारे। यथोक्त
करणी अनुक्रमसे करे ॥
॥ अथ चतुर्थ दिवस विधि ॥
॥जे झी एमो उवज्जायाण' इस पदको २
हजार गुणणो करे । लील मूगाकी दाल प्रमुखका
आदिल करे। उपाध्यायपदके २५ गुण याद करके
नमस्कार करे।
॥ उपाध्यायपढके २५ गुण ॥
१ श्रीयाचारांगसूत्रपठनगुणयुक्ताय श्रीनपाध्या० ॥
श्रीसुयगमागसूत्रपठनगुणयुक्ताय श्रीउपाध्या० ॥
३ श्रीगणांगसूत्रपठनगुणयुक्ताय श्रीउपाध्यायाया
४ श्रीसमवायांगसूत्रपठनगुणयुक्ताय श्रीउपा० ॥
५ श्रीनगवंतीसूत्रपउनगुणयुक्ताय श्रीउपाध्यायाय॥
।
।
६ श्रीज्ञातामत्रपउनगुणयुक्ताय श्रीउपाध्यायाय० ॥
श्रीपासकदशासूत्रपतनगुणयुक्ताय श्रीनपा० ॥
जश्रीअन्तगमदशासूत्रपउनगुणयुक्ताय श्रीनपा०॥
ए श्रीअणुत्तरोववाऽसूत्रपउनगुणयुक्ताय श्रीजपा ॥
१० श्रीप्रश्नव्याकरणसूत्रपउनगुणयुक्ताय श्रीउपा ॥
११ श्रीविपाकसूत्रपउनगुणयुक्ताय श्रीउपाध्यायाय॥
१५ उत्पादपूर्वपउनगुणयुक्ताय श्रीउपाध्यायाय नम ॥
१३ आमायणीपूर्वपनिगुणयुक्ताय श्रीउपाध्यायाय० ॥
१४ वीर्यप्रवादपूर्वपउनगुणयुक्ताय श्रीउपायायायः॥
१५ अस्तिप्रवादपूर्वपटनगुणयुक्ताय श्रीउपाध्यायाय
१६ ज्ञानप्रवादपूर्वपउनगुणयुक्ताय श्रीउपाध्यायाय०॥
२७ सत्यप्रमादपूर्वपउनगुणयुक्ताय श्रीउपाध्यायाय॥
२० यात्मप्रवादपूर्वपटनगुणयुक्ताय श्रीउपाध्यायायव
र कर्मप्रवादपूर्वपउनगुणयुक्ताय श्रीउपाध्यायायः॥
२० प्रत्यारयानप्रवादपूर्वपउनगुणयुक्ताय धीलपा ॥
२१ विद्याप्रमादपूर्वपउनगुणयुक्ताय श्रीउपाध्याया० ॥
२२ अविध्यप्रवाद पूर्वपउनगुणयुक्ताय श्रीनपा ॥
२३ प्राणायामप्रसादपूर्वपउनगुणयुक्ताय श्रीउपा॥
२४ क्रियाविशालपूर्वपवनगुणयुक्ताय श्रीनपाध्यायाय
२५ लोकनिष्सारपूर्वपवनगुणयुक्ताय श्रीला
(५६) ॥इस रीतसे पचवीस नमस्कार करे । समा होके अन्न अससिपण इत्यादि कहके पचवीस लोग- स्सका काउस्सग्ग करे । एक लोगस्त कहके पारे । पीठे पूर्वोक्त करणी करे ॥ इति चतुर्थ दिवस विधि ॥ ॥ अथ पचम दिवस विधि ॥ ॥ झी णमो लोए सबसाहूण इस पदको २ हजार गुणणो करे। साधुपद काले वर्ण है, इसीसे जमदका याविल करे।सर्व साधुपदके सत्तावीस गुण चितवके नमस्कार करे ॥ ॥ साधुपदके २७ गुण ॥ १ प्राणातिपातविरमणनतयुक्ताय श्रीसाधवे नम ॥ २ मृपागादपिरमणवतयुक्ताय श्रीसाधवे नम ॥ ३ अदत्तादानविरमणव्रतयुक्ताय श्रीसाधवे नम ॥ ४ मेथुनविरमणवतयुक्ताय श्रीसाधवे नम ॥ ५ परिग्रह विरमणव्रतयुक्ताय श्रीसाधवे नम ॥ ६ रात्रिनोजनविरमणबतयुक्ताय श्रीसाधये नम ॥ पृथ्वीकायरदाकाय श्रीसाधवे नम ॥ जयप्कायरदकाय श्रीसाधये नम ॥ ए तेलकायरदकाय श्रीसाधवे नम ॥
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(५)
लोगस्सका काउस्सग्ग करे। एक लोगस्स कहके पारे।
पीठे पूर्वोक्त करणी करे । यह पच परमेष्ठिपदके सर्व
गुण मिलाऐंसे १०७ होय । इसीसे जेनमें मालाके
दाणे (१०७) होते है । इति पचम दिवस विधि ॥
॥ अथ षष्ठ दिवस विधि।
॥क्षी णमो दसपस्स' इस पदको ५ हजार
गुणणो करे।दर्शनपद सफेत वर्ण है, इसीसे तंडुलका
आंबिल करे । सम्यक्तके सतसवी गुण चितवके
नमस्कार करे॥
॥ सम्यक्तके सतसी नेद ॥
१ परमार्थसस्तवरूपश्रीसद्दर्शनाय नम ॥
२ परमार्थातृसेवनरूपसद्दर्शनाय नम ॥
३ व्यापन्नदर्शनवर्जनरूपसद्दर्शनाय नम ॥
४ कुदर्शनवर्जनरूपसद्दर्शनाय नमः॥
५ शुश्रूपारूपमदर्शनाय नम ॥
६ धर्मरागरूपसदर्शनाय नम ॥
वैयावृत्त्यरूपसद्दर्शनाय नम ॥
७ अर्ह हिनयरूपसदर्शनाय नम ॥
ए सिहविनयरूपसदर्शनाय नम ॥
(एए) १० चैत्य विनयरूपसद्दर्शनाय नम ॥ ११ श्रुतविनयरूपसदर्शनाय नम ॥ १७ धर्मविनयरूंपसद्दर्शनाय नम ॥ १३ साधुवर्गविनयरूपसद्दर्शनाय नम ॥ १४ आचार्य विनयरूपसदर्शनाय नम ॥ १५ उपाध्यायविनयरूपसद्दर्शनाय नम ॥ २६ प्रपचनविनयरूपसदर्शनाय नम ॥ २७ दर्शनविनयरूपसदर्शनाय नम ॥ २७ ससारे जिनसारमिति चितनरूपसद्दर्शनाय नम | १एससारे जिनमतिसारमिति चिंतनरूपसदर्शनायण॥ २० मसारे जिनमतिस्थितसाधादिसारमिति चितन- रूपसदर्शनाय नम ॥ २१ गकापणरहिताय सदर्शनाय नम ॥ २५ काक्षापणरहिताय सद्दर्शनाय नम ॥ २३ विचिकित्सारूपडूपणरहिताय सहर्शनाय नम ॥ २४ कुदृष्टिप्रशसापणरहिताय सदर्शनाय नम ॥ २५ नत्परिचयपणरहिताय सहर्शनाय नम ॥ २६ प्रवचनप्रलापकरूपसदर्शनाय नम ॥ २७ धर्मकथाप्रचारकरूपसदर्शनाय नम । २ वादिप्रजावकरूपसदर्शनार नम ||
(६०)
शए नैमित्तकप्रनावकरूपसदर्शनाय नम ॥"
३० तपखिमनारकरूपसद्दर्शनाय नम ॥
३१ प्राप्त्यादिविद्यान्नृत्यनावकरूपसदर्शनाय नम ॥
३२ चूर्णाजनादिसिमनावकरूपसदर्शनाय नम ॥
३३ कविप्रजावकरूपसदर्शनाय नमः ॥
३४ जिनशासने कौशलनूपणरूपसद्दर्शनाय नमः॥
३५ प्रजावनानूपणरूपसदर्शनाय नम
३६ तीर्थसेवानूपणरूपसद्दर्शनाय नम ॥
३० धैर्यनूपणरूपसदर्शनाय नम ॥
३७ जिनशासने नक्तिनूपणरूपसदर्शनाय नम ॥
३ए उपशमगुणरूपश्रीसद्दर्शनाय नम ॥
४० सवेगगुणरूपश्रीसद्दर्शनाय नम ॥
४१ निवेदगुणरूपश्रीसद्दर्शनाय नम ॥
४२ अनुकपागुणरुपश्रीसद्दर्शनाय नम ॥
४३ यास्तिक्यगुणरूपश्रीसद्दर्शनाय नम ॥
४४ परतीर्थकादिवदनार्जनरूपश्रीसद्दर्शनाय नम ॥
४५ परतीर्थकादिनमस्कारवर्जनरूपश्रीसद्दर्शनाय ॥
४६ परतीर्थका दियालापर्जनरूपश्रीसदर्शनाय नम ॥
४७ परतीर्थका दिसलापर्जनरूपश्रीसद्दर्शनाय नमः॥
धG परतीर्थकादियशनादिदानवर्जनरूपश्रीसदी० ॥
६३ स च जीनो नित्य इति अझानस्थानयुक्ती० ॥ ६५ स च जीव कृतकर्माणि नेदयतीनि सान स्थानयुक्तश्रीसद्दर्शनाय नस ॥ ४ए परतीर्थकादिगधपुप्पादिप्रेषणवर्जनरूपश्रीस ॥ ५० राजानियोगाकारयुक्तश्रीसद्दर्शनाय नम ॥ ५१ गणानियोगाकारयुक्तश्रीसद्दर्शनाय नम ॥ ५२ बलानियोगाकारयुक्तश्रीसद्दर्शनाय नम ॥ ५३ सुरानियोगाकारयुक्तश्रीसद्दर्शनाय नम ॥ ५४ कातारवृत्त्याकारयुक्तश्रीसद्दर्शनाय नम ॥ ५५ गुरुनिग्रहाकारयुक्तश्रीसदर्शनाय नम ॥ ५६ सम्यक्त्व चारित्रधर्मस्य मूलमिति चिंगी॥ ५७ सम्यस्त्व धर्मपुरम्य छारमिति चिंध श्रीस० ॥ ५७ सम्यक्त्व 'धर्मस्य प्रतिष्ठान मिति चिं० श्रीस॥ एए सम्यक्त्व धर्मस्याधार मिति चिं० श्रीस॥ ६७ सम्यक्त्व धर्मम्य नाजनमिति चिं० श्रीस०॥ ६१ सम्यक्त्व धर्मस्य निधिसनिन्नमिति चिः श्री ६ अस्ति जीव ऽति श्रद्धानम्थानयुक्तश्रीसद्दर्शनायक ६४ स च जीन कर्माणि करोतीति युक्तश्रीसद्दर्शनाय नम ॥ ६६ जीवस्यास्ति निर्वाणमिति + श्रझानस्थान-
(६०)
६० यस्ति पुनमोक्षोपाय इति श्रझानस्थानयुक्त० ॥
॥ इस रीतसे सतसठी नमस्कार करे। समा होके
अन्न अससिएण इत्यादि कहके ६७ लोगस्त
अथवा लोगम्सका काउस्सग्ग करे । एक लोगस्स
कहके पारे । पीछे पूर्वोक्त करणी करे ॥
॥ अथ सप्तम दिवस विधि ॥
॥ ॐझी नमो नाणस्स' इस पदको २ हजार
गुणणो करे।झानपद उज्ज्वल वर्ण है, इसीसे तमुसका
याविल करे । झावन नेद झानपदके चितपके
नमस्कार करे॥
॥अथ ज्ञानपदके U१ नेट ।
१ स्पर्गनेजियव्यजनावग्रहमतिहानाय नम ॥
२ रसनेंजियव्यजनावग्रहमतिझानाय नम ॥
३ घाणे जियव्यजनावग्रहमतिज्ञानाय नम ॥
४ श्रोप्रियव्यजनावग्रहमतिझानाय नम ॥
५ स्पर्शनेपियर्थावग्रहमतिझानाय नम ॥
६ रसनेजियश्याग्रहमतिझानाय नम ॥
७ घ्राणेजिययर्थावग्रहमतिज्ञानाय नम ॥
चरिजियत्यर्थावग्रहमतिझानाय नम ॥
ए श्रोत्रंभियचर्यावनहमनिइनार नम ॥
१७ मनोऽर्धापग्रहमतिझानाय नम ।।
२१ स्पर्शनेंजियामतिकानाय नमः ॥
१२ रसनेंजियामनिशानाय नम ॥
१३ माणेनियाईहामत्तिज्ञानाय नम ।।
२४ चक्षुरिजियश्दामतिझानाय नमः ॥
१५ श्रोजियश्हामतिज्ञानाय नमः ॥
१६ मन ईहामतिझानाय नम 1.,
२७ स्पर्शनेंजिययपायमतिझानाय नमः ॥
१७ रसनेजिययपायमतिझानाय नमः ॥
रएमाणे यियपायमनिशानाय नम ॥
२० चकुरिंजियशपायमनिशानाय नमः ॥
१ श्रोत्रंघिययपापमनिशानाय नमः।
२२ मनोऽपायमनिडानाय नमः ॥
२३ स्पर्शनजियधारणामतिज्ञशानाय नम
२४ रसनेंशियायामतिदानाय नमः ।।
२५ घाणे जिवारसामतिदानाद नमः
२६ चतुरिजियथारशामनिझना का
७ श्रोशियधारणाम मिझाना
२७ मनोधारणामतिनाना
(६४)
गए अदारश्रुतडानाय नमः ॥
३० अनदारश्रुतज्ञानाय नम ॥
३१ सझिश्रुतज्ञानाय नम ॥
३२ असझिश्रुतझानाय नम ॥
३३ सम्यक्श्रुतज्ञानाय नम ॥
३४ मिथ्याश्रुतज्ञानाय नम ॥
३५ सादिश्रुतहानाय नम ॥
३६ अनादिश्रुतहानाय नम ॥
३७ सपर्यवसितश्रुतझानाय नम ॥
३० अपर्यवसितश्रुतज्ञानाय नम ॥
३ए गमिकश्रुतझानाय नम ॥
४० अगमिकश्रुतझानाय नम ॥
४१ अगप्रविष्टश्रुतझानाय नम ॥
४२ अनगप्रविष्टभुतज्ञानाय नम
४३ अनुगामिअवविज्ञानाय नम ॥
४४ अननुगामियर धिडानाय नम ॥
४५ वर्धमानयवधिज्ञानाय नमः ॥
४६ हीयमानयवधिज्ञानाय नम ॥
७ प्रतिपातियवधिज्ञानाय नम ॥
४ अप्रतिपातियवधिज्ञानाय नमः॥
(६५) पए जुमतिमन पर्यवज्ञानाय नम ॥ ५० विपुलमतिमन पर्यवज्ञानाय नम ॥ . ५१ लोकालोकप्रकाशकनीकेवलझानाय नमः ।। ॥ इस रीतसे ५१ नमस्कार करे। खमा होके अन्नत ऊससिएण इत्यादि कहे।५१ लोगस्सका काउ- स्सग करके प्रगट लोगस्स कहे। पीठे सर्व पूर्वोक्त करणी करे। इति सप्तम दिवस विधि ॥७॥ ॥ अथ अष्टम दिवस विधि। ॥ नमो चारित्तस्स' इस पदको २ हजार गुणणो करे। चारित्रपदका उज्ज्वल वर्ण है, इसीसे तडुलका याविल करे । सित्तर नेद चारित्रपदके चिंतपके नमस्कार करे॥ ॥ अथ चारित्रपदके 10 नेद ॥ १ प्राणातिपातविरमणरूपचारित्राय नम ॥ २ मृपानादविरमणरूपचारित्राय नम ॥ ३ अटत्तादानविरमणरूपचारित्राय नम ॥ मेथुन चिरमणरुपचारित्राय नम ॥ ५ परिग्रह विरमणरूपचारित्राय नम ॥ ६ क्षमाधर्मरूपचारित्राय नमः॥
(६६)
आर्जवधर्मरूपचारित्राय नमः॥
मृताधर्मरूपचारित्राय नमः ॥
ए मुक्तिधर्मरूपचारित्राय नम ॥
२० तपोधर्मरूपचारित्राय नम ॥
११ संयमधर्मरूपचारित्राय नमः
१२ सत्यधर्मरुपचारित्राय नम ॥
१३ शोचधर्मरूपचारित्राय नमः ॥
२५ अकिचनधर्मरुपचारित्राय नम ॥
२५ वनधर्मरूपचारित्राय नम ॥
२६ पृथ्वीरक्षासंयमचारित्राय नमः॥
२७ उदकरदासयमचारित्राय नम ॥
२० तेउरदासयमचारित्राय नम ॥
रए वारदासंयमचारित्राय नम ॥
२० बनस्पतिरक्षासंयमचारित्राय नम ॥
२१ वेऽडियरक्षासयमचारित्राय नम ॥
२२ तेइडियरदासयमचारित्राय नम ॥
२३ चोरिजियरक्षासंयमचारित्राय नम ॥
२४ पचेनियरक्षासंयमचारित्राय नम ॥
२५ अजीवरदासयमचारित्राय नम ॥
२६ प्रेक्षासंयमचारित्राय नम ॥
२७ उपेक्षासयमचारित्राय नम ॥
२७ अतिरिक्तवस्त्रजक्तादिपरवणत्यागरूपसंयमः॥
शए प्रमार्जनरूपसयमचारित्राय नमः॥
३० मन सयमचारित्राय नम ॥
३१ वाक्संयमचारित्राय नम ॥
३२ कायासयमचारित्राय नम ॥
३३ श्राचार्यवैयावृत्त्यरूपसंयमचारित्राय नम ॥
३व उपाध्यायवैयावृत्त्यरूपसयमचारिध्राय नम ॥
३५ तपखिवैयावृत्त्यरूपचारित्राय नम ॥
३६ लघुशिप्यादिवेयावृत्त्यरूपचारित्राय नम ॥
३१ ग्लानसाधुवैयावृत्यरूपचारित्राय नमः ॥
३७ साधुवेयावृत्त्यरूपचारित्राय नम ॥
३ए श्रमणोपासकवेयावृत्यरूपचारित्राय नम ॥
४० सघवेयावृत्त्यरूपचारित्राय नम ॥
४१ कुलवैयावृत्त्यरूपचारित्राय नम ॥
४२ गणवेयास्त्त्यरूपचारित्राय नमः॥
४३ पशुपमगादिरहितरसतिरसनब्रह्मगुप्तिचारित्राणा
४४ स्त्रीदास्यादिनिकथार्जनब्रह्मगुप्तिचारित्राय ॥
४५ स्त्रीयासनपर्जनब्रह्मगुप्तिचारित्राय नम ॥
४६ स्त्रीश्रगोपागनिरीक्षणवर्जनब्रह्मगुतिचारित्रायल
((६))
४७ कुडयरस्थितनीहावनावश्रवणवर्जनब्रह्मगुप्तिः ॥
४७ पूर्वस्त्रीसनोगचिंतनवर्जनब्रह्मगुप्तिचारित्राय नम ॥
४ए अतिसरसबाहारवर्जनब्रह्मगुप्तिचारित्राय नम ॥
५० अतियाहारकरणवर्जनब्रह्मगुप्तिचारित्राय नम ॥
५१ अगविनूपावर्जनब्रह्मगुप्तिचारित्राय नमः॥
५५ अनशनतपोरूपचारित्राय नम ॥
५३ जनोदरीतपोरूपचारित्राय नम -11
५४ वृत्तिसपतपोरूपचारित्राय नम ॥
५५ रसत्यागतपोरुपचारित्राय नम ॥,
५६ कायदेशतपोरूपचारित्राय नमः ॥
५७ सलेसनातपोरूपचारित्राय नमः ॥
५० प्रायश्चित्ततपोरूपचारित्राय नमः॥
५ए विनयतपोरूपचारित्राय नम ॥
६० वेयावच्चतपोरूपचारित्राय नम ॥
६१ सज्कायतपोरूपचारित्राय नम ॥
६५ व्यानतपोरूपचारित्राय नम ॥
६३ उपसर्गतपोरूपचारित्राय नम ॥
६४ अनंतझानसयुक्तचारित्राय नम ॥
६५ अनतदर्शनसयुक्तचारित्राय नम ॥
६६ अनतचारित्रसयुक्तचारित्राय नम ॥
६७ क्रोधनिमहकरणचारित्राय नमः॥
६७ माननिग्रहकरणचारित्राय नम ॥
६ए मायानिग्रहकरणचारित्राय नम ॥
७० सोननिग्रहकरणचारित्राय नम ॥
॥ इस रीतसे ७० नमस्कार करे । खमा दोके
अन्नच ऊससिपण इत्यादि कहे । sa लोगस्सका
काउस्सग्ग करके एक लोगस्स कहे। पीठे पूर्वोक्त
करणी सब करे । इति अष्टम दिवस विधि ॥
॥ अथ नवम दिवस विधि ॥
॥झी नमो तवस्स' इस पदको २ हजार
गुणणो करे । तपपदका उज्ज्वल वर्ण है, इसीसे ता-
लका आविल करे । पचास जेद तपपदके चितवके
नमस्कार करे॥
॥ अथ तपपदके पद ॥
१ यावत्कथिकतपसे नमः ॥
२ श्वरतपोनेदतपसे नम ॥
३ वाहनोदरीतपोनेदतपसे नम ॥
५ अन्यतरजनोदरीतपोजेदतपसे नम ॥
५व्यतपोवृत्तिसक्षेपतपोनेदतपसे नम ॥
(७०)
६ क्षेत्रतपोवृत्तिसंदेपतपोनेदतपसे नमः॥
कालतपोवृत्तिसदेपतपोनेदतपसे नम ॥
जनावतपोवृत्तिसंदेपतपोनेदतपसे नम ॥
ए कायक्लेशतपोनेदतपसे नम ॥
१० रसत्यागतपोन्नेदतपसे नम ॥
११ इडियकपाययोगविषयकसलीनतातपसे नम ॥
१२ स्त्रीपशुपमकादिवर्जितस्थानअवस्थितसलीनता
१३ बालोयणप्रायश्चित्ततपसे नम ॥
१४ पमिकमणप्रायश्चित्ततपसे नम ॥
१५ मिश्रप्रायश्चित्ततपसे नम ॥
१६ विवेकप्रायश्चित्ततपसे नम ॥
१७ उपसर्गप्रायश्चित्ततपसे नम ॥
१० तप प्रायश्चित्ततपसे नम ॥
रए छेदप्रायश्चित्ततपसे नम ॥
२० मूलप्रायश्चित्ततपसे नम ॥
१ अनवस्थितप्रायश्चित्ततपसे नम ॥
२२ पारचियप्रायश्चित्ततपसे नम ॥
२३ ज्ञान विनयरूपतपसे नम ॥
श्व दर्शनविनयरूपतपसे नम ॥
२५ चारित्रविनयरूपतपसे नम ॥
(७१)
२६ गुर्वादिकमनोविनयरूपतपसे नमः॥
२७ वचनविनयरूपतपसे नम ॥
२७ काय विनयरूपतपसे नम ॥
शए उपचारकविनयरूपतपसे नम ॥
३० आचार्यवेयावच्चतपसे नम ॥
३१ उपाध्यायवेयावच्चतपसे नम ॥
३२ साधुवेयावच्चतपसे नम ॥
३३ तपखिवेयावच्चतपसे नम ॥
३व लघुशिष्यादिवेयावच्चतपसे नम ॥
३५ ग्वानसाधुवेयावच्चतपसे नम ॥
३६ श्रमणोपासकवेयावच्चतपसेनम ॥
३७ सघवेयावच्चतपसे नम ॥
३७ कुलवेयावच्च तपसे नम ॥
३ए गणवेयावच्चतपसे नम ॥
४ वायपातपसे नम ॥
४१ पृष्ठनातपसे नम ॥
४२ परावर्तनातपसे नम ॥
४३ अनुप्रेक्षातपसे नमः॥
४ धर्मकथातपसे नमः॥
४५ यार्तध्याननिवृत्ततपसे नम ॥
(३२)
४६ रोषध्यान निवृत्ततपसे नम ॥
धर्मध्यानचितनतपसे नमः ॥
४७ शुक्लध्यानचिंतनतपसे नमः॥
Yए वाह्यउपसर्गतपसे नम ॥
५० अन्यतरजपसर्गतपसे नम ॥
॥स रीतसे ५० नमस्कार करे । समा होके
अन्नछ जससिएण इत्यादि कहे। ५० लोगस्सका
काउस्सग करके एक लोगस्स कहे । पीछे पूर्वोक्त
करणी करे ॥ इति नवम दिवस विधि ॥
॥अथ तपस्या ग्रहण करणेको गुरुके
पास जानेकी विधि
॥प्रथम शुज दिन, शुज धमी देखके अछा
थापण पहरे। निलाममें तिलक करे । दोव सरसु
मस्तकमे धारण करे । हायके मोली वांधके
अक्षत, सुपारी,श्रीफल, नैवेद्य, यथाशक्ति रोक नाणो
लेके, नवकार गुणतो थको पास जावे । हादशा-
वर्त वादणा करके ग्यान पूजा करे। पीछे बहुत
प्रमोदवत होके गुरुके मुखसे 1ली तप ग्रहण करे।
(७३)
सो तपस्या ग्रहण करणेकी विधियागे लिखेगे। शति
तपस्या ग्रहण करनेको पोशाल जानेकी विधि ॥
॥अथ संक्षेप नजमणा विधि।
॥पच वर्णके धान्यंसे सिद्धचकका मंगल करे।
सिद्धचक्रजीके चोतरफ तीन गढ चूमीके आकार
वनावे । पहिले गढ माहे अष्ट दल कमलके आकार
नर पद स्थापन करे।पद पदके वर्ष गुण प्रमाणे रत्ला-
दिक चढावे। और पच वर्णके फल, पच वर्णके धान्य,
नव नालेरका गोटा रगके जिस पदका जेसा वर्ण
होय तेसेही रगका गोटा चढावे । पच वर्णी ए ध्वजा
चढावे । दूसरे वलयमें सोले श्रीफल अथवा पूगी-
फल चढावे । तीसरे वलयमें ध तुहारा चढावे ।नव
निधानके ठिकाणे ए नव वमा फल चढावे । दश
दिकूपाल, नव ग्रहको परमान्न प्रमुस चढावे । इत्या-
दिक विधि सयुक्त सिहचकस्थापना घर देरासर यागे
करे । और जिनमदिर माहे वाह्य ममपे ५-७ हाथ
प्रमाणे ममलरचना करे। विस्तारसे सब विधि गुरुके
वचनसे करके नर पदजीकी पूजा पढायके कलश
ढाले।धवल भगल गीत गान गावे। वाजिन वजावे।
।
,
(४) इसी तरेह महा महोठव उदार चित्तसे करे । मंगल- दीप, आरती प्रमुस करे।पूसरे दिन विसर्जन करे। ॥ इति सक्षेप सिहचक मंगल विधि ॥ ॥ सिचक्र संदेप उद्यापन विधि । ॥ अव १० मे दिन गुरुके पास आके उली तपको पारे । तप पारणकी विधि आगे लिखेगे । तथा उद्यापनमें छाननक्तिके कारण ए पूग, ए वीटा- गणां, ए पुस्तक, ए लेखण, ए ग्वणी, ए कितमिल, ए रुमाल, ए दोरा, ए मिजासणा, ए थापना, चक्षुधा, एपूरीश्रा,एयआरती,एकलश,एजापमाला, ए मदिर, एप्रतिमा, ए तिलक, ए मुगट । इत्यादिक अनेक नव नव चीज बनावे।शक्ति न होय तो यथा- शक्ति रोक नाणो चढावे । देवपदको देवपदमें देवे। गुरुपदको गुरुपदमे देवे । ज्ञानपदको ज्ञानसाते लगावे । इत्यादिक यथायोग्य शुज क्षेत्रेखरच करे। ॥ इति सिहचक सक्षेप उद्यापन विधि ॥ , U (५५) ॥श्री देवचंचजी कृत स्नानपूजा प्रारभ्यते॥ ॥ पासमी गाथा ॥ ढाल पहेली ॥ ॥ दोहा । चउत्तिसे अतिसय जुर्ड, वचनातिशय जुत्त ॥सो परमेसर देखी नवि, सिंहासण संपत्त॥१॥ ढाल । सिदासन चेठा जग चाण, देखी नविक जन गण मणि साण ॥ जे दी तुज निर्मल नाण, सहीए परम महोदय ठाण ॥ कुसुमाजवि मेलो यादि जिणदा, तोरां चरणकमल सेवे चोसठ श्दा ॥ कुं० ॥ १॥ चोवीश वैरागी, चोवीश सोनागी, चोवीश जिणदा ॥ कु० ॥ एम कही प्रजुना चरणे पूजा करीए॥गाथा॥ जो निय गुण पडाव रम्यो, तसु अनुभव एगंत ॥ सुह पुग्गल आरोपता, जो तसुरग निरत्त ॥२॥ ढाल | जो निज यातम गुण थापटी, पुग्गल सगे जेह अफदी॥जे परमेसर निज पद लीन, पूजो प्रणमो जव्य श्वदीन ॥ कुसुमाजसि मेलो शाति जिपदा । तो ॥ कुण् ॥२॥ एम कही प्रजुना जानुए पूजा करीए॥गाथा ॥ निम्मल नाण पयास- कर, निम्मल गुण सपन्न ॥ निम्मल धमोवएसकर, सो परमप्पा ३॥ ढाल
(द)
नाणी, नविजन तारण जेहनी वाणी ॥ परमानंद तणी
निशाणी, तसु
लगते
मुज मति उहाणी ॥ कुसुमा-
जलि मेलो नेम जिणटा ॥ तो ॥ कु० ॥३॥ एम
कही प्रजना वे हाथे पूजा करीए ॥ गाथा ॥ जे
सिद्या सिद्यति जे, सिद्यसति यणत ॥ जसु थावं-
वन नविय मण, सो सेवो अरिहंत ॥४॥ टाल ॥
शिवसुख कारण जेह त्रिकाले, सम परिणामे जगत
नीहाले।उत्तम साधन मार्ग देसाडे, सादिक जसु
चरण पसाले । कुसुमांजलि मेलो पास जिणदा ॥
तोप ॥ कु०॥४॥ एम कही अनुना खजाए
पूजा करीए ॥ गाथा ॥ सम्मदिछी देस जय, 'साहु
सादुणी सार॥ आचारिज उवकाय मुणि, जो निम्मल
आधार ॥ ५॥ ढालं ॥ चनविद सघे जे मन धार्यु,
मोक्षतणु कारण निरधार्यु । विविह कुमुम वर जाति
गहेवी, तसुचरणे प्रणमंत ग्वेव। ॥ कुसुमाजलिमेलो
वीर जिणदा ॥ तो० ॥ कुण् ॥५॥ एम कही प्रजुने
मस्तके
पूजा
करीए ॥इति पांसमी गाथा ॥
॥ वस्तु उद ॥ सयल जिनवर सयल जिनवर,
नमिय मनरंग, कल्याणकविहि सघषिय, करिस
धम्म सुपवित्त ॥ सुदर सय रंग सत्तरि तिटकर,
(199) एक समय विहरति महीयल ॥ चवण समय ग- वीस जिप, जम्म समय इंगवीस ॥ नतिय नावे पूजीया, करो सघ सुजगीश ॥ १॥ ॥ दास वीजी॥ ॥ एक दिन अचिरा दुसरारती ॥ ए देशी ॥ ॥ नव जीजे समकित गुण रम्या, जिननकि प्रमुस गुण परिणम्या ।तजी जयसुख शसना, करी स्थानकवीशनी सेवना ।।१॥ अति राग प्रशस्त प्रनावता, मन नावना एहवी जावता ॥ सपि जीव करु शासनरसी, इसी जापदया मन उससी ॥२॥ सही परिणाम एहवुनलु, नीपजावी जिनपद निर्मदु ॥ आयुवध बचे एक नव करी, श्रमा सवेग ते थिर धरी॥३॥ त्याथी चवीय लहेनरनव उदार, जरते तेम ऐरवतेज सार ॥ महाविदेहे विजये वर प्रधान, मध्य सडे यवतरे जिन निधान ॥४॥ ॥ यथ सुपनानी ढाल त्रीजी॥ ॥ पुण्ये सुपनह देसे, मन मांहे दर्प विशेपे । गजनर उज्ज्वल सुदर, निर्मल वृपन मनोदर ॥१॥ निर्जय केसरी सिह, लक्ष्मी थतिही यथीह ॥अनु- पम फूलनी मास, निर्मल शशी सुकुमाल ॥२॥ तेजे (30) तरणि अति दीपे, अध्वजाजग जीपे॥पूरण कलश पडर, पद्म सरोवर पूर ॥ ३॥ अग्यारमे रयणायर, देखे माता गुण सायर ॥ वारमे नुवन विमान, तेरमे अनुपम रत्ननिधान ॥४॥ अग्निशिखा निरधूम, देखे माताजी अनुपम ॥ ही रायने नापे, राजा अरथ प्रकाशे ॥५॥ जगपति जिनवर सुखकर, होशे पुत्र मनोहर ॥ शादिक जसु नमशे, सकल मनो- रथ फलशे॥६॥ ॥वस्तु द॥पुण्यउदय पुण्यउदय, उपना जिननाह, माता तव रयणी समे, देखी सुपन हरखती जागीय ॥ सुपन कही निज कतने, सुपन अरथ साजलो सोना- गीय । विजुवन तिलक महागुणी, होशे पुत्र निधान । शादिक जसु पाय नमी, करशे सिकि विधान ॥१॥ ॥ ढाल चोथी॥ ॥ चावलानी देशीमां ॥ ॥ सोहमपति आसन कपीयो ए, देश अवधि मन आणटीयोए॥ निज आतम निर्मल करण काज, जवजलतारण प्रगटयो जहाज ॥१॥ नवअम्वी पारग सहवाह, केवल नाणाश्य गुण अगाह ॥
(ए) शिवसाधन गुण अकुरो जेह, कारण उलट्यो यासाढी मेह ॥२॥ हरखे विकसी तव रोमराय, वक्षयादि- कमां निज तनु न माय ॥ सिंहासनथी उठ्यो सुरिद, प्रणमतो जिन यानदकद॥३॥ सग अम पय सामो आनी तक, करी अजलिय प्रणमीय मठ ॥ मुसे नाखे ए क्षण आज सार, तिय लोय पटु दीगे उदार ॥ ४ ॥रे रे निसुणो सुरलोय देव, विपयानल तापिन तुम सवेव ॥ तसु शातिकरण जलधर समान, मिथ्या विप चूरण गरुमवान ॥५॥ ते देव सकस तारण समठ, प्रगट्यो तमु प्रणमी दुयो सनाथ ॥एम जपी शक स्तव करेपि, तव देव देवी हरखे सुणेवि ॥६॥ गावे तव रजा गीत गान, सुरखोक दुनो मंगल निधान ॥ नरदेने यारज वंश गम, जिनराज वधे सुर हर्प धाम ॥ ७॥ पिता माता घरे उत्सव अशेप, जिनशासन मगल अति विशेष ॥ सुरपति देवादिक दर्प सग, सयमयर्थी जनने उमग ॥७॥ शुन वेला लगने तीर्थनाथ,जनम्या सादिक हर्प साथ ॥ सुस पाम्या विजुपन सर्व जीर, वधा वधाइ थर यती ॥ ए॥
vaa
(ज)
॥ ढाल पांचमी॥
॥ श्री शांति जिननो कलश कहीशू, प्रे
पूर ॥ ए देशी॥
॥श्री तीर्थपतिनु कलश मऊन, गाइए सुर्ख
नरखित्त मंगण ऽह विहंगण, नविक मन
तिहां राव राणा हर्प उत्सव, थयो जग जयवं
दिशिकुमरी अवधि विशेष जाणी, लह्यो हर्प
॥१॥निय अमर अमरी सग कुमरी, गावती
वद ॥ जिन जिननी पासे यावी पहोती, गहग
याणद ॥ हे माय ! ते जिनराज जायो, चिव
रम्म॥अम जम्म निम्मल करण कारण, के
कम्म शातिहा नूमिशोधन दीप दर्पण, वाय
धार ॥ तिहा करीय कदली गेह जिनवर,जननी।
नकार॥वर राखमी जिनपाणि बाधी, दीए
शीप॥जुगकोमाकोमीचिरंजीयो,धर्मदायक
॥ ढाल वही ॥ एकवीशानी ॥
॥ जगनायकजी, विजुवन जन हितकार
परमातमजी, चिदानद धन सार ए,
॥ए देशी॥
॥ दाल ॥ जिण रयणीजी, दश दिशि
. A (३) माधन रमी रेवकोमी दसी, उसमीने दिशि ॥ पउमदद थादि दट् गग नीर्थजल यमल सेवा नपी ते ग॥2॥ सकरी सहमयकोतरा, न चामर गुजतग ॥ उपकरण पुप्फ चगेरी पमुद्रा नापीया तेम याणी ग्वे ॥२॥ नीर्थ- कर कलश करी देता, गारतानापना 'ता॥निरिय नर यमरने दर्प उपजानता, आक्ति शुचि नक्तिगम जारना॥३॥सम- निज यात्म यारोपना, कसा पाणी- जसिचना ॥ मेरुमिदगेरे सर्व थाव्या उत्मग जिन देखी मन गदगही ॥४॥ वट ॥ इदो देवा ददो देगाथाणा कालो, निसोयतारणो तिसोयाधु, मिछत्तमोद । यणाऽ तिष्टा विणामणो, देवाहिनी य कामेदि ॥५॥ तेहीज ॥ गम पनणत पण नपण जोह- वैमाणिया नत्ति धम्मायरा ॥ केपि वाप- मित्ताणुगा, केपि पर रमणि ययगण (२) समो कोण अन्य ए॥ हे जगतजननी | पुत्र तुमचो, मेरु मजान वर करी॥उत्सग तुमचे वलीय यापीश, यातमा पुण्ये जरी ॥ ३ ॥ ढाल ॥ सुरनायकजी, जिन निज करकमले व्यापच रूपेजी, अतिशे महिमाए स्तव्या॥नाटक विधिजी,तव बत्रीशबागल वहे। सुर कोमीजी, जिनदर्शनने उम्महे ॥ध्रुटक॥ सुर कोमाकोमी नाचती वली,नाथ शुचि गुण गावती॥ अप्सरा कोमी हाथ जोमी, हाव नार देखावती ॥ जयो जयोतु जिनराज जगगुरु, एम देयाशीप ए॥ अम्ह त्राण शरण आधार जीवन, एक तु जग- दीश ए ॥४॥ ढाल ॥ सुरगिरिवरजी, पामुक वनम चिहु दिशे ॥ गिरि शिल परजी, सिंहासन सासय वसे ॥ तिहां आणीजी, शके जिन खोले ग्रह्या ॥ चौसजी, तिहा सुरपति आवी रह्या ।। त्रुटक ॥ आवीया सुरपति सर्व नक्ते, कलश श्रेणी चनाव ए॥ सिद्धार्थ पमुहातीर्थ औषधि, सर्व वस्तु अणाव ए॥ अच्चुअपति तिहा दुकम कीनो, देव कोमाकोमीने । जिन महानारथ नीर लावो, सवे सुर कर जोमीने ॥५॥ ॥ ढाल सातमी॥ ॥ शांतिने कारणे इंज कलशा नरे॥ ए देगी। " (३) ॥ आत्मसाधन रमी देवकोनी हसी, उबमीने यसी क्षीरसागर दिशि ॥ पउमदह याटि दह गग पमुहान, तीर्थजल यमल लेवा लणी ते गः ॥२॥ जाति यम कसश करी सहस अधोतरा, ठत्र चामर सिंहासण शुजतरा ॥ उपकरण पुप्फ चगेरी पमुहा सवे, आगमे नापीया तेम याणी उवे ॥२॥ नीर्थ- जल चरीय कर कलश करी देवना. गावता चारना धर्म उन्नतिरता॥तिरिय नर यमग्ने दर्प उपजायता, पन्य यम शक्ति शुचि नक्ति एम नारताामम- कित वीज निज यात्म यारोपता, वजा पापी मिपे नतिजल सिचता ॥ मेरुमिहगेवरेस थान्या वही, शक उत्मग जिन देवी मन गहगही ॥ ४ ॥ ॥ वस्तु उदः ॥ हहो देवा इंडोदेवा अशा कासो, यदिछ पुचो तिलोयनारणो तिजोरवधु मित्तमोह विकसणो ॥ यणाऽ तिटा विभामया, देवादिदेवों दिक योहिय कामेदि ।। ५॥ ॥ ढाल तेहीज ॥ पनपनु वा नव जो सरा, देव वेमाणिया ननिमारा | केपिकप्प हिया केवि मित्ताणुगा र रमणि प्रयो अ जागा ॥६॥ म , (1) ॥ वस्तु लंद ॥ तक अच्चुय त अच्चुय द याटेस॥कर जोमी सवि देवगण,लेय कलसादेस पामीय ॥ अद्भुत रूप सरूप जुथ, कवण एद उत्सगे सामिय ॥ द कहे जगतारणो, पारग अम परमेस। नायकदायक धम्मनिहि, करीएतसुयलिसेस॥७॥ ॥ ढाल आग्मी॥ ॥ तीर्थकमलदल उदक जरीने, पुष्करसागर यावे ॥ ए देशी॥ ॥पूरण कलश शुचि उदकनी धारा, जिनवर अगे नामे ॥ यातम निर्मल लाव करता, वधते शुज परि- णामे ॥ अच्युतादिक सुरपति मजान, लोकपाल लोकात ॥ सामानिक शाणी पमुहा, एम अनिपेक करत ॥१॥ गाहा ॥ तव ईसाण सुरिदो, सक पनणेई, कर सुपसा ॥ तुम अके महन्नाहो, पण- मित्तं अम्ह अप्पेह ॥ ५ ॥ ता सिकिदो पक्षणेई, सा- हमीपछलमि बटु लाहो ॥ याणा एव तेण, गिहि- हवो उझयचाजो ॥ ३ ॥ एम कही सर्व मात्रीया कलश ढाले अने मुसथी नीचे प्रमाणे पाव कहे ।। ॥ ढाल तेहीज ॥ सोहम सुरपति पत्न रूप करी, न्हवण करे प्रजु अग ॥ करीय पिलेपण पुप्फमाल (५) उवी, वर आचरण अनग ॥ तच सुरवर पद जय जयरव करी, नाचे धरी यापट ॥ मोक्षमार्ग सारथपति पाम्यो, नांजगु हवे नवफट ॥ ४ ॥कोनि वत्रीश सोचन उपारी, वाजते घर नादे ॥ सुरपति सघ अमर श्री प्रजुने, जननीने सुप्रसादे ॥याणी थापी एम पयपे, यमे निस्तरीया याज॥ पुत्र तुमागे धणी रे हमारो, तारण तरण जहाज ॥ ५॥ मात जतन करी रासजो पहने, तुम सुत यम आधार॥ सुरपति शक्ति सहित नदीश्वर, करे जिनानक्ति उदार ॥ निय निय कप्प गया सहि निर, कहेता प्रनु गुणसार ॥ दीक्षा केवलज्ञान कल्याणक, ज्छा चित्त मकार ॥ ६॥ सरतरगष्ठ जिन आणारगी, राजसागर उपद्याय ॥ ज्ञान धर्म दीपचट सुपाठक, सुगुरु तणे सुपसाय ॥ देवचन जिनजक्ते गायो, जन्ममहोत्सन नट || वोध वीज अकुगे उसस्थो, सघ सकल यानद ॥७॥ ॥ कलश ॥ राग वेलागल ॥ एम पूजा नक्ते करो, यातमहित काज ॥ तजीय पिनास निज नाम, रमता शिवराज । एम०॥ १॥ काल अनते जे दुआ, होशे जिणदः ॥ सपय सीमंधर (७६) केवलनाण दिणद ॥ एम० ॥२॥ जन्ममहोत्सव एणी परे, श्रावक रुचिवंत ॥ विरचे जिनप्रतिमा तहो, अनुमोदन खत ॥ एम० ॥३॥ देवचा जिनपूजना, करता जवपार ॥ जिनपमिमा जिन सारखी, कही सूत्र मकार ॥ एम ॥४॥ इति पमितभीदेवचजी- कृता स्नानपूजा सपूर्णा ॥ ॥ अथ श्री शाति जिननी आरती ॥ ॥ जय जय आरती शान्ति तुमारी, तोरा चरण- कमलकी मे जाउ बलिहारी ॥ जय० ॥१॥ विश्वसेन अचिराजीके नदा, शान्तिनाथ मुस पूनमचदा ।। जय० ॥२॥चालीश धनुप सोवनमय काया, मृग- लठन प्रजुचरण सुहाया ॥ जय० ॥३॥चक्रवर्ती प्रनु पाचमा सोहे, सोलमा जिनवर जग सदु मोहे। जय०॥४॥मगल आरती तोरी कीजे, जन्म जन्मनो लाहो लीजे ॥ जय० ॥५॥ कर जोमी सेवक गुण गावे, सो नर नारीअमरपद पावे॥ जय० ॥६॥ इति ॥ ॥ अथ श्री आदि जिनंनी आरती ॥ ॥ अप्सरा करती आरती जिन ागे, हारे जिन यागेरे जिन आगे॥ हारे ए तो अविचल सुसमा
(1)
मागे॥हारे नाजिनदन पास॥अप्सरा करती आरती
जिन आगे ॥१॥ताये नाटक नाचती पाय ठमके,
हारे दोय चरणे काफर जमके ॥ हारे सोवन घुघरमी
धमके, हारे लेती फुदनी वाल ॥०॥ताल मृदग
ने वासली मफ वीणा, हारे रुमा गावती खर जीणा ॥
हारे मधुर सुरासुर नयणा, हारे जोती मुसड्ड नीहाल
॥ अ॥३॥ धन्य मरुदेवा मातने प्रनु जाया,
हारे तोरी कचनवरणी काया ॥ हारे में तो पूरव पुण्ये
पाया, हारे देरयो तोरो देदार॥०॥४॥प्राणजीवन
परमेश्वर प्रजु प्यारो, हारे प्रजु सेवक हु तु तारो ॥
हारे नवोजवना उसमा धारो, हारे तुमे दीनदयाल
॥ अ० ॥५॥ सेवक जाणी आपणो चित्त धरजो,
हारे मोरी यापदा सघलीहरजो॥हारे मुनि माणेक
सुखी करजो, हारे जाणी पोतानो वाल ॥०॥६॥
(७) ॥श्रीमद्यशोविजयजी उपाध्यायकृत ॥ ॥ नवपदपूजा प्रारंभः॥ ॥ तत्र। ॥ प्रथम अरिदतपदपूजा प्रारनः ॥ ॥ काव्य ॥ उपजातिवृत्तम् ॥ ॥ उप्पन्नसन्नाणमहोमयाण, सप्पामिहेरासण- संधियाण ॥ सदेसणाण दियसाणाण, नमो नमो होउ सया जिणाण ॥१॥ ॥ नुजगप्रयातस्त्तम् ।। ॥नमोऽनतसतप्रमोदप्रदान, प्रधानाय जव्यात्मने जास्वताय ॥थया जेहना ध्यानयी सौग्यताजा, सदा सिद्धचकाय श्रीपाल राजा ॥२॥ कां कर्म धर्मर्म चकचूर जेणे, नला जव्य नवपदध्यानेन तेणे ॥ करी पूजना नव्य नावे त्रिकाले, सदा वासीयो आतमा तेणे काले॥३॥ जिके तीर्थकर कर्म उदये करीने, दीए देशना जव्यने हित धरीने ॥ सदा आठ महापानिहारे समेता, सुरेशे नरेशे स्तव्या ब्रह्मपुत्ता ॥४॥ कयाँ घातिया कर्म चारे अलग्गा, नवोप- (ए) ग्रही चार जे वे विलग्गा ॥ जगत् पच कल्याणके सौग्य पामे, नमो तेह तीर्थकरा मोक्षकामे ॥५॥ ॥ ढाल ॥ उलालानी देशी॥ ॥तीर्थपति थरिहा नमु, धर्मधुरधर धीरो जी॥ देशना अमृत बरसता, निज वीरज वमवीरोजी॥१॥ ॥जलालो॥र अखय निर्मल झाननासन, सर्व जाव प्रकागता॥निज शुरुश्रझा आत्मनावे, चरण- थिरता वासता ॥ जिन नामकर्म प्रनाव अतिशय, प्रातिहारज शोजता ॥ जगजतु करुणावत जगवत नविकजनने दोजता ॥२॥ ॥पूजा ॥ ढाल ॥ श्रीपालना रासनी॥ ॥त्रीजे जब वर स्थानक तप करी, जेणे घाध्यु जिननाम ॥ चोस पूजित जे जिन, कीजे तास प्रणाम रे॥ नविका ॥ सिद्धचक्रपद वदो, जेम चिर काले नढो रे॥न ॥ सि० ॥१॥ए आकणी ॥ जेहने होय कल्याणक दिवसे, नरके पण अजवायु ॥ सकल अधिक गुण अतिशय वारी, ते जिन नमी अघ टाटु रे ॥ ज० ॥ सि ॥२॥ जे तिहु नाण समग्ग जपना, जोगकरम क्षीण जाणी ॥ लेदीक्षा शिक्षा दीए जनने, ते नमीए जिन नाणी रे जण ॥ सिक (ए) ॥३॥महागोप महामाहण कहीए, निर्यामक सव- वाह॥उपमा एहवी जेहने गजे, ते जिन नमीए उत्साह रे ॥ न ॥ सि० ॥ ४॥ यात प्रातिहारज जस गजे, पात्रीश गुण युत पाणी ॥जेप्रतिवोध करे जगजनने, ते जिन नमीए प्राणी रे॥न॥सि॥५॥ ॥ढाल॥ ॥ अरिहंतपद ध्यातो यको, दवह गुण पजाय रे॥नेद वेद करी यातमा, अरिहतरूपी थाय रे ॥१॥ वीर जिनेसर उपदिशे,सानलजो चित्त लाश रे ॥ यातमध्याने आतमा, कफि मले सवियाइरे॥ ॥वी०॥२॥ति प्रथम अरिहतपदपूजासमाता ॥१॥ ॥अथ द्वितीय सि-पदपूजा प्रारनः ॥ ॥ काव्य ॥ वज्रावृत्तम् ॥ ॥सिझाएमाणमुरमालयाण ॥ ॥ नमो नमोऽणतचउक्याण ॥१॥ ॥ नुजगप्रयातवृत्तम् ॥ ॥करी आठ कर्मक्षये पार पाम्या, जरा जन्म मरणादि जय जेणे वाम्या ॥ निरावरण जे आत्मरूपे प्रसिक्षा, थया पार पामी सदा सिबुझा॥१॥विना- (ए) गोनदेहावगाहात्मदेशा, रह्या कानमय जातवर्णादि- लेशा ॥ सदानंद सौरयाश्रिता ज्योतिरूपा, अना- वाध अपुनर्नवादि स्वरूपा ॥२॥ ॥ ढाल ॥ उलालानी देशी॥ ॥ सकल करममल दय करी, प्रण गुरुस्वरूपो जी ॥ अव्यावाध प्रजुतामयी, आतम सपत्तिपोजी ॥१॥ जलालो ॥ जेह नूप आतम सहज सपत्ति, शक्ति व्यक्तिपणे करी॥खजव्य क्षेत्र ख काल जावे, गुण यनता आढरी॥सुस्वनाथ गुण पर्याय परिणति, सिकसाधन पर जणी ॥ मुनिराज मानसहंस सम- वम, नमो सिद्ध महागुणी ॥२॥ ॥ पूजा ॥ ढाल ॥ श्रीपालना रासनी॥ ॥ समय पएसतर अणफरसी, चरम तिनाग विशेष ।। अवगाहन लहीजे शिव पहोता, सिकनमो ते अशेप रे ॥ न ॥ सि० ॥६॥ पूर्वप्रयोग ने गति- परिणामे, वधनवेद असग । समय एक ऊर्ध्व गति जेहनी, ते सिझ प्रथमो रग रे न ॥ सि ॥७॥ निर्मल सिहशिवानी उपरे, जोयण एक लोकत ॥ सादि अनत तिहा स्थिति जेनी, ते सिम् प्रणमो सत रे॥ ॥॥जाणे पण न
पुरगुण, प्राकृत तेम गुण जास ॥ उपमा विण नाणी
जव मांहे, ते सिद्ध दीयो नहास रे ॥१०॥ लिए
॥ ए॥ज्योतिशु ज्योति मली जस अनुपम, विरमी
सकल उपाधि ॥ यातमरास रमापति समरो, ते
सिक सहज समाधि रे ॥ न ॥ सि ॥ १० ॥
॥ ढाल॥
॥ रूपातीत वजाव जे, केवल दसण नाणी रे॥ते
ध्याता निज आतमा, होये सिम गुणखाणी रे॥वी
॥ ३॥ इति द्वितीय सिझपदपूजा समाप्ता ॥२॥
॥अथ तृतीय आचार्यपदपूजा प्रारंजः ॥
॥ काव्य ॥ अवजावृत्तम् ॥
॥ सूरीणपुरीयकुग्गहाण ॥
॥ नमो नमो सूरसमप्पहाण ॥
॥जुजगप्रयातवृत्तम् ।।
॥ नमु सूरिराजा, सदा तत्त्वताजा, जिनेवागमे
प्रौढ साम्राज्यनाजा ॥पटवर्गवर्गित गुणे शोजमाना,
पचाचारने पालवे सावधाना ॥१॥ नविप्राणीने
देशना देश काले, सदा अप्रमत्ता यथा सूत्र आले ॥
किके शासनाधारदिग्दत्तिकरूपा, जगे ते चिर जीवजो
शुरुजल्पा ॥२॥
- (ए) ॥ ढाल । उसालानी देशी॥ ॥ याचारज मुनिपति गणि, गुपनीली धामो जी ॥ चिदानट रस खादता, परनाने निरामो जी॥१॥ उलालो ॥ नि काम निर्मल शुद्ध चियन, साध्य निज निरधारथी ॥ निजबान टन घगा वीरज, साधना व्यापारथी । नपिजी गोरक नत्व. शोधक, सयल गुणसपत्ति परामरग्समाधिगत. उपाधि, मुविध तपगुण यागग ॥२॥ ॥ पूजा ॥ दाल ॥ श्रीपासना रामनी ।। ॥ पच याचार जे सूमा पासे, मारग नाम साचोते याचारजनमीण तेहशु, प्रेम करीन जाचो रे ॥ ज० ॥ सि०॥ ११ ॥ वर लीग गुणे करी सोहे, युगप्रधान जन मोहे॥ जग योद्धे न रहे खिण कोई, सरि नमु ते जोदे रे ॥ ० ॥ सि० ॥ १२ ॥ नित्य अप्रमत्त धर्म उपसे, नहीं विकया न पाय ।। जेहने ते याचारज नमीए, यस्युप थमल थमाय ॥ ज०॥ सि० ॥२३॥ जे दीप मागए या चाया .
(एव) नुवनपदारथ प्रकटन पटु ते, याचारज चिरंजीयो रे॥जविका ॥ सि० ॥ १५॥ ॥ ढाल ॥ ॥ ध्याता आचारज जला, महामन शुज ध्यानी रे॥ पच प्रस्थाने आतमा, आचारज होय प्राणी रे ॥ वी० ॥३॥इति तृतीय याचार्यपदपूजा समाप्ता ।। ॥ अथ चतुर्थ उपाध्यायपदपूजा प्रारंनः ।। ॥ काव्य ॥ वज्रावृत्तम् ॥ ॥ सुतठविचारणतप्पराण ॥ ॥नमो नमो वायगकुजराण ॥ ॥नुजगप्रयातवृत्तम् ।। ॥ नहीं सूरि पण सूरिगणने सहाया, नमु वाचका सक्तमदमोहमाया ॥वली हादशागादि सूत्रार्थदाने, जिके सावधाना निरुधानिमाने ॥१॥धरे पचने वर्ग पर्गित गुणोघा, प्रवादि हिपोछेदने तुल्य सिंघा॥ गुणी गठसधारणे स्थंजनूता, उपाध्याय ते वदीए चित्प्रनूता ॥२॥ ॥ ढाल ॥ उसालानी देशी॥ ॥सतिजुधामुत्तिजुश्रा,अजाब मद्दव जुत्ताजी॥सञ्च (ए) सोय अकिचणा,तव संजम गुणरत्ता जी॥१॥जलालो॥ जे रम्या ब्रह्ममुगुत्ति गुत्ता, समिति समिता श्रुतधरा। स्याहादवादे तत्सवादक, आत्म परविनजनकरा ॥ जरनीरु साधन धीरशासन, बहन धोरी मुनिवरा ॥ सिकांत वायण दान समरथ, नमो पापक पदधरा ॥२॥ ॥पूजा ॥ ढाल ॥ श्रीपालना रासनी॥ ॥ हादश अग सझाय करे जे, पारग धारक तास ॥ सूत्र अर्थ विस्तार रसिक ते, नमो नवजाय उल्लास रे॥ न० ॥ सि०॥ १६ ॥ अर्थ सूबने दान- विचागे, आचारज उबजाय ॥नपत्रीजेजे हे शिव- सपद्, नमीए ते सुपसाय रे ॥ ज० ॥ सि० ॥१७॥ मूरख शिष्य निपाउ जे प्रनु, पाहाणने पल्लव आणे ।। ते उनकाय सकल जन पूजित, सूत्र यर्थ सवि जाणे रे॥० ॥ सिम् ॥ १७॥ राजकुमर सरिखा गए- चितक, याचारजपद योग ॥ जे उवजाय सदा ते नमता, नावे नवनय शोग रे ॥न ॥ सि० ॥रए। चावनाचदनरस सम वयणे, अहित ताप सनि टाले ॥तेउवजाय नमीजे जे वती, जिनशासन अजु- वाले रे ॥ ज०॥सि ॥२०॥ - (ए) ॥ ढाल॥ ॥तप सजाये रत सदा, छादश अगनो ध्यातारे॥ उपाध्याय ते आतमा,जगवधव जगत्रातारेवी॥५॥ इति चतुर्थ उपाध्यायपदपूजा समाप्ता ॥ ॥ अथ पचम मुनिपदपूजा प्रारंजः ॥ ॥ काव्य ॥ वज्रावृत्तम् ।। ॥ साहूण ससा हिय सजमाण ॥ ॥ नमो नमो सुझदयादमाण ॥ ॥ तुजगप्रयातवृत्तम् ॥ ॥ करे सेवना सूरि वायग गणिनी, करु वर्णना तेहनी शी मुणिनी ॥समेता सदापच समिति त्रिगुप्ता, त्रिगुप्ते नहीं कामनोगेपु लिप्ता ॥ १॥ वली वाह्य अन्यतर ग्रथि टाली, होये मुक्तिने योग्य चारित्र पाली ॥ शुजाप्टाग योगे रमे चित्त वाली, नमु साधुने तेह निज पाप टाली ॥२॥ ।। ढाल । जलालानी देशी ।। ।। सकल विषय विप वारीने, नि कामी नि सगी जी ॥नवदवताप शमावता, आतमसाधन रगी जी ॥ १॥ उलालो ॥ जे रम्या शुद्ध स्वरूप रमणे, देह निर्मम निर्मदा ॥ काउस्सग्गमुझा धीर आसन ध्यान अन्यासी सदा ॥ तप तेज दीपे कर्म कीपे, नैव वीप पर नणी॥ मुनिराज करुणासिंधु त्रिजुवन, वधु प्रणमु हित नणी ॥२॥ ॥ पूजा ।। ढाल ॥ श्रीपालना रासनी ॥ ॥जेम तरुफले नमरो वेसे, पीमा तस न जपावे।। ले रसने आतम सतोपे, तेम मुनि गोचरी जावे रे ॥ न०॥ सि० ॥२१॥ पच इजियने जे नित्य कीपे, पटकायक प्रतिपाल ॥ सयम सत्तर प्रकारे आराधे, वंड तेह दयाल रे ॥ ज०॥ सि ॥ २२ ॥ अढार सहस्स शीलागना धोरी, अचल आचार चरित्र ॥ मुनि महत जयणा युत चंदी, कीजे जनम पवित्र २॥०॥ सि ॥२३॥ नवविध ब्रह्मगुप्ति जे पाले, वारसविह तप शरा॥ एड्वा मुनि नमीए जो प्रगटे, पूरव पुण्य अकुरा रे ॥ न० ॥ सि० ॥ २४ ॥ सोना तणी परे परीक्षा टीसे, दिन दिन चढते वाने॥सजम खप करता मुनि नमीए, देश काल अनुमाने रे ॥२०॥ सि ॥२५॥ ॥ढाल॥ ॥ त्य रहे, नवि हरखे नवि नव..
0 (ए) रे। साधु सूधाते यातमा, शुंडयेशु सोचेरे॥वी ॥६॥ इति पंचम मुनिपदपूजा समाप्ता ॥५॥ ॥ अथ पष्ठ सम्यक्त्वदर्शनपदपूजा प्रारंनः ।। ॥ काव्य ॥ वज्रावृत्तम् ॥ ॥ जिणुत्ततत्ते शश्वरकणस्स ॥ ॥ नमो नमो निम्मलदसणस्स ॥ ॥जुजगप्रयातवृत्तम् ॥ ॥ विपर्यास हग्वासनारूप मिथ्या, टले जे अनादि अछे जेम पथ्या ॥ जिनोक्ते होये सहजथी श्रदधानं, कहीए दर्शनं तेह परम निधान ॥१॥ विना जेहथी शान अज्ञानरूप, चरित्र विचित्र वारण्य- कूप । प्रकृति सातने उपशमे क्षय ते होवे, तिहां आपरूपे सदा आप जोवे ॥२॥ ॥ ढाल ॥ उलालानी देशी ॥ ॥ सम्यग्दर्शन गुण नमो, तत्त्व प्रतीत स्वरूपो जी ॥ जसु निरधार वन्नाव ठे, चेतनगुण जे अरूपो जी ॥१॥ उलालो ॥ जे अनुप अशा धर्म प्रगटे, सयल पर ईहा टले। निज शुद्ध सत्ता प्रगट अनुभव, करुणरुचिता उठले ॥ वहुमान परिणति वस्तुतत्त्वे,
(एए)
अहव तसु कारणपणे ॥ निज साध्यदृष्टे सर्व करणी.
तत्वता सपत्ति गणे॥२॥
॥ पूजा ॥ ढाल ॥ श्रीपालना रासनी॥
॥ शुरू देव गुरु धर्म परीक्षा, सदहणा परिपान
जेह पामीजे तेह नमीजे, सम्यग्दर्शन नाम
सि॥२६॥मल उपशम क्षय उपशम दायथी.देश
विविध थनग ॥ सम्यग्दर्शन तेह नमीने, बिन
दृढ रग रे॥॥ सि॥॥पच वार -
सहीजे, क्षय उपशमीय यसस। एक बार प्रक
तेसमकित,दर्शन नमीए यससरे||RA
जे विण नाण प्रमाण न होवे, चाहिम
फलीयो।सुख निर्वाण न जे विष सरद-
दर्शन वलीयो रे ॥ ज० ॥ मिEER
वोले जे अलकरीयु, ज्ञान चाग्नि
दर्शन ते नित्य प्रणमु, शिरपयन ॥
सि॥३०॥
(१००) ॥ अथ सप्तम सम्यग्ज्ञानपदपूजा प्रारंनः॥ || काव्यं ॥ वज्रावृत्तम् ॥ ॥ अन्नाणसमोहतमोहरस्स ॥ ॥ नमो नमो नाप दिवायरस्स ॥ ॥जुजगप्रयातवृत्तम् ॥ ॥ होये जेहयी ज्ञान शुभ प्रयोधे, यथावरण नासे विचित्रावबोधे ॥ तेणे जाणीए वस्तु पड् अव्य जावा, न हुये वितळा (बाद) निजेठा स्वजावा ॥ १॥ होय पच मत्यादि सुझाननेदे, गुरुपास्तिथी योग्यता तेह वेदे ॥ वली झेय देय उपादेयरूपे, लहे चित्तमां जेम ध्वांत प्रदीपे ॥२॥ ॥ ढाल ॥ उलालानी देशी ॥ ॥ जव्य नमो गुणज्ञानने, खपर प्रकाशक नावे जी॥परजय धर्मअनंतता, नेदानेद खनावे जी॥१॥ जलालो ॥ जे मुरय परिणति सकल झायक, बोध नाव विलछना ॥ मति आदि पच प्रकार निर्मल, सिक साधन लछना॥स्याहादसगी तत्त्वरगी, प्रथम नेदाजेदता ॥ सविकल्प ने यविकल्प वस्तु, सकल सशय वेदता ॥२॥ .
(१०१) ॥ पूजा ॥ ढाल ॥श्रीपालना रासनी ॥ ॥जक्षानद न जे विण लहीए, पेय अपेय विचार ॥ कृत्य अकृत्य न जे विण सहीए, झान ते सकस आधार रे।।जय सि०॥३१॥प्रथम ज्ञान ने पठी अहिसा, श्रीसिद्धाते नारयु॥झानने वंदो ज्ञान म निदो, ज्ञानीए शिवसुख चारयु रे ॥ ज०॥ सिक ॥ ३५ ॥ सकल क्रियानु मूल तेधा, तेहनु मूल जे कहीए ॥ तेह ज्ञान नित नित वंदीजे, ते विण कहो केम रहीए रे॥ ज०सि० ॥ ३३ ॥ पच ज्ञान माहि जेह सदागम, स्वपर प्रकाशक जेह ॥ दीपक परे विजुवन उपकारी, वली जेम रवि शशी मेह रे॥ ॥ सि ॥ ३४ ॥ लोक ऊर्ध्व अधो तिर्यग् ज्योतिष, वैमानिक ने सिझ॥ लोकालोक प्रगट सवि जेहथी, तेह झाने मुज शुद्ध रे ॥ ज०॥ सि० ॥ ३५ ॥ ॥ ढाल ॥ ॥शानावरणीजे कर्मठे, क्षय उपशम तस थाय रे॥ तो हुए एहीज आतमा, ज्ञान अवोधता जाय। रे ॥वी ॥७॥ इति सप्तम सम्यग्ज्ञानपदपूजा समाप्ता॥
(१०२) ॥ अथ अष्टम चारित्रपदपूजा प्रारंलः ॥ ॥ काव्यं ॥ अवजाहत्तम् ॥ ॥ याराहियसंमीय सकियस्त ॥ ॥ णमो णमो संजमवीरियस्स ॥ ॥ तुजगप्रयातवृत्तम् ।। ॥ वली झानफल चरण धरीए सुरंगे, निराशसता झाररोधप्रसगे ।। नवानोधिसंतारणे यान तुल्य, घरं तेह चारित्र थप्राप्तमूख्य ॥१॥ होये जास महिमा थकी रंक राजा,बली हादशागी नणी होय ताजा ।। वली पापरूपोपि नि पाप थाय, थश सिक ते कर्मने पार जाय ॥२॥ ॥ ढाल | उसालानी देशी॥ ॥ चारित्रगुण वसी वली नमो, तत्तरमण जसु मूलो जी॥ पररमणीयपणु टले, सकल सिह अनुकूलो जी ॥ १॥ उलालो ॥ प्रतिकूल आश्रवत्याग संयम, तत्त्व थिरता दममयी ॥ शुचि परम खति मुत्ति देश पद, पच सवर उपचई ॥ सामायिकादिक नेद धर्मे, यथारयाते पूर्णता ॥ अकपाय अकलुप अमल उज्ज्वल, कामकश्मसचूर्णता ॥२॥ L (१३) ॥ पूजा ॥ ढाल ॥ श्रीपालना रासनी॥ n देशविरति ने सरवविरति जे, गृही यतिने यनिराम ॥ ते चारित्र जगत् जयवंतु, कीजे तास प्रणाम रे॥ ज०सि० ॥३६॥ तृण परे जे पट्खम सुख मी, चक्रवर्ती पण वरीयो । ते चारित्र अदय सुख- कारण, ते मे मन माहे धरीयो रे॥०॥ सि०॥३॥ हुया रांकपणे जे पादरी, पूजित ऽद नरिदे ॥ अश- रण शरण चरण ते वऊ, प्रसुझान थानदे रे ॥ न० ॥सि ॥ ३७॥ चार मास पर्याये जेहने, अनुत्तर सुख अतिक्रमीए॥शुक्ल शुक्ल अलिजात्य ते उपरे, ते चारित्रने नमीए रे ॥ ज०॥ सि॥ ३५॥चय ते आव करमनोसंचय, रिक्त करे जे तेह॥चारित्र नाम निरुत्ते जाख्यु, तेवं गुणगेह रे॥ ॥ सि॥४॥ ॥ ढाल॥ ॥जाणो चारित्र तेयातमा, निज खनावमा रमतो रे॥ लेश्या शुरू अलकस्यो, मोहयने नबिनमतो रे ॥ वी० ॥॥श्त्यष्टम चारित्रपदपूजा समाता ॥॥
(१०४)
॥ अथ नवम तपःपदपूजा प्रारंभः ॥
॥ काव्य ॥वजावृत्तम् ॥
॥ कम्मदुमोम्मूलणकुजरस्स ॥
॥ नमो नमो तिचतवोजरस्स।
॥ मालिनीवृत्तम् ॥
॥श्यनवपयसिक, लकिविलासमिस ।। पय मिय-
सुरवग्ग, कीतिरेहासमग्ग ॥ दिसवश्सुरसार, खोणि-
पीढावयारं॥तिजयविजयचकं, सिकचक्क नमामि ॥२॥
॥ तुजगप्रयातवृत्तम् ॥
॥ त्रिकालिकपणे कर्म कपाय टाले, निकाचित-
पणे वांधीया तेह बाले ॥ का तेह तप वाह्य अतर
पुजेदे, क्षमा युक्त नितु अर्ध्यान वेदे ॥२॥ होये
जास महिमा थकी सब्धि सिकि, यवाठकपणे कर्म
आवरणशुकि॥ तपो तेह तप जे महानद देते, होय
सिद्धि सीमातनी जिम सकेते ॥३॥ इस्या नव पद
ध्यामने जेह ध्यावे, सदानद चिपता तेह पावे ॥
वली छानविमलादि गुणरत्नधामा, नमु ते सदा
सिरूचकप्रधाना ॥४॥
(१०५)
॥ मालिनीत्तम् ।।
॥ श्म नव पद ध्यावे, पर्म आनंद पावे ॥ नवमे
जव शिव जावे, देव नरजव पावे। झान विमल गुण
गावे, सिकचकनाचे ॥ सचि हरित समाचे, विश्व
जयकार पावे ॥५॥
॥ ढाल ॥ जलालानी देशी ॥
॥ श्वारोधन तप नमो, वाह्य अन्यतर दे जी॥
आतमसत्ता एकता, परपरिणति उच्छेदे जी ॥१॥
जलालो।उछेदे कर्म अनादि सतति, जेद सिकपणु
वरे॥ योगसगे आहार टाली, नाव अक्रियता करे ॥
अतरमुहूरत तत्व साधे, सर्व सवरता करी ॥ निज
आत्मसत्ता प्रगट जावे, करो तप गुण श्रादरी ॥२॥
॥ढाल॥
॥एम नव पद गुणममल, चल निक्षेप प्रमाणे
जी॥ सात नये जे यादरे, सम्यगानने जाणे जी
॥३॥ उलालो । निर्धारसेती गुणी गुणनो, करे. जे
बहुमान ए ॥तसु करण हा तत्त्वरमणे, थाय निर्मल
ध्यान ए॥एम शुझसत्ता नव्यो चेतन, सकल सिद्धि
अनुसरे ॥ अक्षय अनत मदत चिद्धन, परम
आनदता बरे ॥४॥
(१०६) ॥ कलश ॥ ॥श्य सयल सुखकर गुणपुरंदर, सिहचक पदा- पली ॥सवि लजि विद्या सिधिमंदर, नबिक पूजो मन रुली। उवकायवर श्रीराजसागर, झानधर्म सुराजता ॥ गुरु दीपचद सुचरण सेवक, देवचंद सुशोचता ॥१॥ ॥ पूजा ॥ ढाल ॥ श्रीपालना रासनी ॥ ॥ जाता त्रिहुँ ज्ञाने संयुत,तेजवमुक्ति जिएंट ॥ जेह आदरे कर्म खपेवा, ते तप शिवतरुकद रे॥ न ॥ सि ॥४१॥ कर्म निकाचित पण क्षय जाये, क्षमा सहित जे करता ॥ ते तप नमीप जेह दीपावे, जिनशासन उजमंता रे॥०॥ सि ॥४॥ आमोसही पमुहा बहु लछि, होवे जास प्रजावे ॥ अष्ट महा सिकिनव निधिप्रगटे, नमीपते तपजावे रे॥०॥ सि० ॥ ४३ ॥ फल शिवसुस महोटुसुर नर वर, संपत्ति जेहनु फूल ॥ ते तप सुरतरु सरिखं वंध, शम मकरंद अमूल रे ॥ न० ॥ सि ॥ ४ ॥ सर्व मगल मांहि पहेलु मंगल, वरणवीए जे प्रये ॥ते तपपद निहु काल नमीजे, वर सहाय शिवपथे रे ॥ ज० ॥ सि० ॥ ४५ ॥ एम नव पद शुणतो तिहां (१०७) लीनो,हु तन्मय श्रीपाल॥सुजश विलास ठे चोथे खडे,एह अग्यारमी ढाल रे ॥ ज० ॥ सि ॥ ४६ ॥ ॥ ढाल। ॥श्वारोघे संवरी, परिणतिसमतायोगे रे ॥ तप ते एहीज यातमा, वर्ने निज गुण नोगे रे ॥वी ॥१०॥आगम नोयागमतणो, नाव ते जाणो साचो रे॥ आतमनावे थिर होजो, परनाचे मत राचो रे ॥ बी० ॥ ११ ॥ अष्ट सकल समृद्धिनी, घट माहे शहिदासी रे॥तेम नव पद कहि जाणजो, यातम- राम ने साखी रे॥वी०॥१२॥ योग असख्य ते जिन कह्या, नर पद मुरय तेजाणोरे॥एह तणे अवलवने, आतमध्यान प्रमाणो रे॥वी० ॥ १३ ॥ ढाल चारमी एहवी, चोथे सडे पूरी रे ॥ वाणी वाचक जशतणी, कोड नये न अधूरी रे ॥ वी० ॥ १४ ॥ इति नवम तप पदपूजा समाता ॥ए। ॥ अथ काव्य ॥ तविलंबितवृत्तम् ॥ ॥विमलकेवलनासनजास्कर, जगति जतुमहोदय- कारण ॥ जिनवरं बहुमानजसोधन, शुचिमना (१००) स्नपयामि विशुद्धये ॥१॥इति काव्यम् ॥ या काव्य प्रत्येक पूजा दीव कहेतु ॥ ॥खात्र करता जगगुरु शरीरे, सकल देव निमल कलश नीरे ॥ आपणा कर्ममल घर कीधा, तेणे ते विबुध प्रये प्रसिक्षा॥शाहपंधरीयप्सराद यावे, मात्र करी एम आशीप नावे ॥ जिहां लगे सुरगिरि जबूदीवो, अम तणा नाथ देवाधिदेवो ॥३॥ ॥इति श्रीमद्यशोविजयजीकृता ननपदपूजा समाप्ता॥
(१०)
॥अथ श्री सिचक्रजीनां स्तवनो॥ ।
॥ अथ प्रथम स्तवनम् ।।
॥ तमे पीतांवर पहेयां जी, मुखने मरकलडे ।।
॥ए देशी॥
॥श्री सिद्धचकने वंदो जी, मनोहर मनगमता ॥
जे यविचल सुखनो कठो जी ॥ मनो० ॥ मास
आसोए मधुरे सोहावे जी॥मनोनिवि यादरो तमे
नले जावे जी ॥मनो॥१॥नर आपिल तप कीजे
जी॥मनो० ॥तो अविचल सुसमा लीजे जी॥मनो॥
सुटि सातमथी तमे मांगो जी ॥ मनो० ॥घरना था-
रजसवितामोजी।मनो ॥२॥ पहेले पदे अरिहत
सेवोजी॥मनो०॥थापे मुक्तिनो मेरो जी॥मनो०॥
चीजे पदे सिद्ध सोहावे जी ।। मनो० ॥मन शुझे पूजो
जले जावे जी ॥ मनो० ॥ ३॥ श्राचार्य त्रीने पदे
नमो जी ॥ मनो ॥ तमे क्रोध कपायने दमो जी।
मनो० ॥ उमझाय ते चोथा वदो जीमनो० ॥ साधु
पाचमे देसी आपदो जी।मनोजशाकेटरिसन
पद जाणोजी ॥ मनो॥ श्री ज्ञानने मानमे व
जी॥ मनो॥चारित्रपद शानमे सोडेसी
(१९०) वली नवमेतप मन मोहे जी॥मनो॥५॥ रसत्यागे यांविल कीजे जी॥ मनो० ॥ तो मुक्ति तणां फल सीजे जी ॥ मनो० ॥ सवत्सर युग पट् मासे जी॥ मनो० ॥ तप कीजे मनने उल्हासे जी॥ मनो० ॥ ६॥ ए तो मयणा ने श्रीपाल जी॥मनो॥ तप कीधु यश उजमाल जी ॥ मनो॥ तेनो कोढ शरीरनो टाल्यो जी॥मनो ॥ जगमा जस वास प्रगटायो जी॥ मनो० ॥७॥ पचम काले तुमे जाणो जी॥मनो० ॥ परगट परतो परमाणोजी॥ मनो ॥ एतु गणणु तेर हजार जी ॥ मनो॥ तमे धारो हृदय मजार जी ॥मनो॥ ॥ नर नारी ए पद ध्यावे जी॥मनो० ॥ ते तो सपद् सघली पावे जी॥मनो॥ मुनि रत्नसुदर सुपसाय जी ।। मनो॥सेवक मोहन गुण गाय जी । मनोहर मनगमता ॥ ए ॥ इति ॥ ॥ अथ वितीय स्तवनम् ।। ॥ यावे लालनी देशी॥ ॥ नव पद महिमा सार, साजलजो नर नार ॥ ॥आठे लाल ॥ हेज धरी आराधीए जी ॥ तो पामो नवपार, पुत्र कलत्र परिवार ॥ आ॥नव पद मंत्र - (१९१) धाराधीए जी ॥ १ ॥ए आकणी ॥ आसो मास विचार, नव यांवित निरधार ॥आ॥ विधिशुं जिन- वर पूजीए जी॥अरिहंत सिरूपद सार, गणणु जी तेर हजार ॥या॥ नव पदनु श्म कीजीए जी ॥२॥ मयणसुदरी श्रीपाल, आराध्यो तत्काल ॥ श्रा०॥ फलदायक तेदने थयो जी ।। कचनवरणी काय, देही तेहनी थाय ॥ श्रा० ॥ श्री सिद्धचक्र महिमा कह्यो जी॥ ३॥ सांजली सहु नर नार, थारायो नवकार ॥ आ॥ हेज धरी हियडे घणु जी ॥ चैत्र मासे वली एह, नव पदशु धरो नेह ॥या०॥जो ये शिवसुस घणु जी॥४॥णी परे गौतमस्खाम, नर निधि जेहने नाम थानव पद महिमावसाणीयोजी॥उत्तम- सागर शिप्य, प्रणमे ते निशदिस ॥ या० ॥ नव पद महिमा जाणीयोजी ॥५॥ति द्वितीय स्तवनम् ॥ ॥ अथ तृतीय स्तवनम् ॥ ॥ सीता तो रूपे रुमी ॥ ॥ देशी। ॥श्री वीर जिणद वसायो, तिहागौतम गणधर जाण्यो हो ॥ नविका नव पद ध्याए ॥ श्री श्रीपाल ( १९२) नरेशे, मयणाए गुरुजपदेशे हो ॥ न नार॥ श्री सिचक्रयाराध्यो, नो सयम पदारथ साध्यो हो ॥ न ॥ नव०॥ यासो मासे कीजे, सुटि सातमे जिन पूजीजे हो ॥ ज० ॥ नव०॥२॥अट कमलदल थापी, महिमा जस विन्नुवन व्यापी होनणानव ॥मध्य दले जिन ध्याने,ध्यावो नवि धवलेवाने हो ॥ ज० ॥ नव०॥ ३ ॥पूरव दिशे सिद्धवाजे, राते तनु तेज विराजे हो ॥ ॥नव०॥ याचारजपद बीजे, जिम सोवनवान करीजे हो ॥ ज० ॥ नव ॥४॥ पश्चिम दिश उपजाया, नीले तनुवान सोहाया हो ॥ज ॥ नव० ॥ साधु सकल घन पाने, उत्तर दिशि ध्यावो ध्याने हो।जानव०॥५॥ नाण अग्नि कोणे ध्यावो, जिम अत्यत सुस तुमे पावो हो ॥नमानवणा दसण थाराहो प्राणी, नेर्शत विदिशे मन याणी हो ॥ ज० ॥ नव०॥६॥ वायव्य कोणे कहीजे, चारित्र ध्यायी सुख लीजे हो॥नानवणा ईशाने तप ध्यावो, उहाल समकित सुस पावो हो । न०॥ नव०॥७॥ यासो चैत्रज मासे, जपता कि आवे पासे हो ॥ न० ॥ नर०॥ विधिशु देव वदीजे, श्री जिनवर पूजा रचीजे हो ॥ ज० ॥ नव० ॥ ७॥नव पद जाप (१९३) जपीजे, यांविष तप नव दिन कीजे हो।जानव॥ श्री सिंझचक सेवीजे, पचामृत न्हवण करीजे हो ॥ ॥ नव० ॥या चौद पवनो सार,एमंत्र वमो नवकार हो ॥ ज० ॥ नव० ॥ बुध उत्तमसागर राया, शिप्य कान्तिसागर सुख पाया हो।जविका नव पद ध्याइए ॥ १० ॥ इति ॥ ॥ अथ चतुर्थ स्तवनम् ॥ ॥ किसके चेले किसके पूत ॥ ए देशी ॥ ॥ सेवो रेजवि.नावे नवकार, जपे श्री गौतम गणधार ॥ नवि सांजलो ॥ हारे संपद् थाय ॥०॥ हारे सकट जाय ॥॥ श्रासोने चैत्रे हरप अपार, आणी गणणु कीजे तेर हजार ॥ ज० ॥१॥ चार वरप ने वली पट्मास, ध्यान धरोनावे धरी विश्वास ॥ ॥ ध्यायो रे मयणसुदरी श्रीपाल, तेहनो रोग गयो तत्काल ॥०॥२॥ अष्ट कमलदल पूजा रसाल, करी न्हवण गंयु तत्काल | नए सातसें महीपति तेहने रे ध्यान, देही पामी कचनवान ॥ ज० ॥३॥ महिमा कहेता एनोनावे पार, समरो तिणे कारण नवकार ॥ न ॥ ऽह नव परजव । नव०८ (११४) सुसवास, बहु पामे लछी लीलविलास ॥ ॥४॥ जाणी रे प्राणी लाज अनंत, सेवो सुसदायक ए मंत ॥ ज०॥ उत्तमसागर पंमित शिष्य, सेवे कान्तिसागर निशदिस ॥ नवि सांजलो ॥५॥ इति ॥ ॥ अथ पचम स्तवनम् ॥ ॥ जविया श्री सिद्धचक्र आराधो, तुमे मुक्ति- मारगने साधो, श्ह नरजव कुर्लन लाधो हो लाल । नव पद जापजपीजे ॥१॥त्रण टंक देव वांदीजे, निहुँ काले जिन पूजीजे, आबिल तप नव दिन कीजे हो लाल-॥ न०॥२॥ सुदि सो चैत्रज मासे, तप सातमयी अन्यासे, पद सेव्या पातक नासे हो लाल ॥ न० ॥३॥ मयणा ने नृप श्रीपाले, आराध्यो मंत्र जमाले, एह उस दोहगने टाले हो लाल ॥ न ॥४॥ एहनी जे सेवा सारे, तस मयगल गाजे बारे, इति नीति अनीति निवारे हो लाल ॥ न० ॥ ५॥ मिथ्यात्व विकार अनिष्ट, क्षय जाये दोपी पुष्ट, डणे सेव्या समकित पुष्ट हो लाल ॥ न० ॥ ६ ॥ जशवत जिने सुसाखे,जवि सिझचक्रना गुण जाखे, ते ज्ञान- विनोद रस चाखे हो लाल ॥ न० ॥ ॥ इति ॥
m - - ( ११५) ॥ अथ पष्ठ स्तवनम् ॥ ॥ जगजीवन जगवालहो ॥ए देशी ॥ ॥श्री सिळचक याराधीए, शिवसुख फल सह- कार लाल रे॥ ज्ञानादिक त्रण रलनु, तेज चढावण- हार लाल रे ॥ श्री सि० ॥ १॥ गौतमे पूर्यता कह्यो, वीर जिणद विचार साल रे॥ नव पद मंत्र आराधता, फल लहे नविक अपार लाल रे॥श्री सि० ॥२॥ धर्मरथना चार चक ठे, उपशम ने सुविवेक खास रे॥सवर त्रीजु जाणीए, चोयु सिद्धचक वेक लाल रे॥श्री सि० ॥३॥ चक्रीचक रयणवले, साधे सयल व सम लाल रे॥तिम सिद्धचकप्रजावधी, तेज प्रताप असम साल रे॥श्री सि ॥४॥ मयणा ने श्रीपालजी, जपतांबदु फल लीधलाल रे। गुण जशवत जिनेंनो,झान विनोद प्रसिद्ध लाल रे॥श्री सिया ॥ अथ सप्तम स्तवनम् ।। ॥ चिंतामणि खामी सच्चा साहेव मेरा॥ए देशी॥ ॥ राहो प्राणी साची नव पद सेवा ॥ ए कणी। नव निधि आपे नव पद सेवे, मनासे श्री '(१९६) जिनदेवा ॥ आ० ॥१॥ श्री सिद्धचक धरो नित्य दिलमे,जेसेगजमनरेवा ॥या॥२॥ व्यरिहंतादिक एक पद जपतां, हारे लहीए सुख सुदेवा ॥याण ॥३॥ समुदित जपतां किम करी न करे, सुरसुख सुमफल देवा ॥ आ॥४॥ जिनें कहे श्म ज्ञान- विनोदे, हर्पित द्यो नित मेवा ॥ आ० ॥ ५॥ इति ॥ ॥ अथ अष्टम स्तवनम् ।। ॥ राग सारंग ॥ ॥ गौतम पूर्वत श्री जिन नाखत, वचन सुधारस पानकी ॥ बलिहारी नव पद ध्यानकी ॥१॥ नव पद सेवे नवमे खर्गे, पावत शछि विमानकीव०॥२॥ याकी महिमा वल्लन हमकुं, जेसे जसोदा कानकी ॥ व० ॥३॥ पावे रूप सरूप मदनसो, देही कंचन वानकीव०॥४॥याको ध्यान हृदय जव यावत, उपजत लहेरी ज्ञानकी ॥ व ॥५॥समकितज्योति होवे दिल जीतर, जेसे लोकनमें जानकी॥ व ॥६॥ जिन छानविनोद प्रसगे, नक्ति करो जग- वानकी । बलिहारी नव पद ध्यानकी ॥७॥इति ।।
(१९९७) ॥ अथ नवम स्तवनम् ॥ ॥ पूज्य पधारो मरु देशे । ए देशी। ॥ नव पद मदिमा सानलो, वीर नाखे हो सुणो पपंदा वार के ॥ए सरिखो जग को कहीं, आराध्यो हो शिवपद दातार केन ॥१॥नव उसी यानित तणी, नवि करीए दो मनने उहास केनूमिशयन ब्रह्मवत धरो, नित सुपीए हो श्रीपासनो रास के ॥ न० ॥२॥ नव विधिपूर्वक तप करी, उजमणुं हो कीजे विस्तार के ।। सादामी सामिणी पोपीए, जेम सहीए दो जवनो निस्तार के न०॥३॥ नरमुख सुर- सुख पामीए, वली पामे हो जवनय जिनधर्म के । अनुक्रमे शिवपद पंप सहे, जिदा मोटा हो थक्षय सुख शर्म के न०॥४॥साजली जनियण दिल धरो, सुखदायी हो नव पद अधिकार के ॥ यचनविनोद जिनेअनो, मुज होजो हो नवजव थाधार के। नव पढ़ महिमा सानो ॥५॥ इति ।। ॥ अथ श्री सिश्चक्रजीनु स्तवन । ॥ आठे सालनी देशी॥ ॥ समरीशारदा माय, प्रणमी निज गुरु-पाय -- o (१९७) ॥यारे लाल ॥ सिद्धचक गुण गायशुं जी॥ए सिद्ध- चक आधार, नवि उतरे नवपार ॥या॥ते लपी नव पद ध्यायशु जी॥१॥सिकचक गुणगेह, जसगुण अनंत अछेह ॥या॥ समर्या सकट उपशमेजी। लहीए चवित जोग, पामी सवि सजोग ॥ या० ॥ सुर नर आवी बदु नमे जी॥२॥कष्ट निवारे एह, रोग, रहित करे देह ॥या॥मयणासुदरी श्रीपालने जी॥ ए सिझचक पसाय,आपदा रे जाय ॥॥आपे मंगलमालने जी॥३॥ ए सम अवर न कोय, सेवे ते सुसी होय ॥ आ ॥ मन वच काया वश करी जी ॥ नव याविल तप सार, पमिकमणु दोय वार ॥ या ॥ देववंदन प्रण टकना जी॥४॥ देव पूजो त्रण वार, गणणु ते दोय हजार ॥या॥स्नान करी निर्मल जले जी॥आराधे सिहचक,सान्निध्य करे तेनी शक ॥या ॥ जिनवर जन आगे लणे जी ॥५॥ ए सेवो निशिदिश, कहीए वीशवावीश ॥ या० ।। याल जजाल सवि परिहोजी॥ए चिंतामणि रल, एहना कीजे जत्न ॥ या ॥ मत्र नहीं एह उपरेजी ॥६॥श्री विमलेसर जद, होजो मुज परतद ॥ थाप ॥ हु किकर तु ताहरो जी॥पाम्यो तुहीज (११ए) देव, निरंतर करु हवे सेव॥था॥ दिवस वल्यो हवे माहरोजी ॥७॥ विनति करु तु एह, धरजो मुजयं नेह ॥ आ ॥ तमने शु कहीए वसी वली जी॥श्री सब्धिविजय गुरुराय, शिष्य केसर गुण गाय ॥या॥ अमर नमे तुज लली खली जी ॥ ॥ इति ॥ ॥ अथ सिचक्र स्तवन ।। ॥अवसर पामीने रे, कीजे नव यांविखनी उली॥ जैली करता आपद् जाये, शहि सिछिलहीए बहुली ॥ अ॥१॥ यासो ने चेत्रे आदरशु, सातमथी सजाली रे ॥ आलस महेली यावित करशे, तस घर नित्य दीवाली॥ अ० ॥२॥पूनमने दिन प्री थाते, प्रेमेशु पखाली रे ॥ सिद्धचकने शुफाराधी, जाप जपेजपमाली॥ अ० ॥३॥ देहरेजश्ने देव जुहारो, आदीश्वर अरिहत रे॥चोवीशे चाहीने पूजो, जावे' जगवंत ॥ य० ॥४॥ वे टके पमिक्मणु बोब्यु, देववदन त्रण काल रे॥श्री श्रीपाल तणी परे समजी, चित्तमां रासो चाल ॥ य० ॥५॥ समकित पामी अतरजामी, आराधो एकात रे ॥ स्याहादपये सच- रता, आवे नवनो यत ॥ अ॥ ६ ॥ सत्तर चोराएं ? न
(१२०),
सुदि क्षेत्रीए, चारशे बनावी रे॥ सिकचक गातां सुख
संपत्ति, चालीने घेर आवी ॥१०॥७॥ उदयरतन
वाचक उपदेशे,जे नर नारी चाले रे॥ जवनी नावठ
ते जाजीने, मुक्तिपुरीमा महाले॥॥॥शतः॥
॥ अथ आंबिल तप आश्रयी श्री
सिचक्रजीनु स्तवन ॥
॥ जीहो कुंवर वेवा गोखडे ॥ ए देशी ॥
॥जीहो प्रणमु दिन प्रत्ये जिनपति ॥ लाला ॥
शिव सुखकारी अशेप ।। जीहो यासोइ चैत्री तए
॥ लाला ॥ यहाइ विशेष ॥ नविकजन ॥ जिनवर
जग जयकार ॥१॥जीहो जिहा नव पद आधार
॥ ज० ॥ ए आकणी ॥जीदो तेह दिवस आराधना
॥ लाला ॥ नदीश्वर सुर जाय ॥ जीहो जीवानिगम
माहे कयु ॥ ला ॥ करे अम दिन महिमाय नम
॥ ॥जीहो नव पद केरा यत्रनी ॥ ला० ॥ पूजा
कीजे रे जाप ॥जीहोरोग शोक सवि यापदा ॥ सा॥
नासे पापनो व्याप ॥ ज० ॥ ३ ॥ जीहो थरिहत
सिहयाचारज ॥ला॥जवकाय साधु ए पच॥जीहो
दसणनाण चारित्र तनो ॥ लाए चल गुणनो प्रपच
, (१२) ॥ न ॥४॥जीहो ए नव पद याराधतां । ला॥ चपापति विख्यात ॥जीहो नृप श्रीपाल सुखी थयो ॥ ला० ॥ ते सुणजो अवदात ॥ न० ॥५॥इति ॥ ॥ ढाल वीजी॥ ॥ कोऽलो पर्वत धूधलो रे लो ॥ ए देशी ॥ ॥मालव धुर उपीए रे लो, राज्य करे प्रजापाल रे॥ सुगुणी नर ॥ सुरसुदरी मयणासुदरी रे सो, वे पुत्री तस वाल रे॥ सु० ॥ श्री सिद्धचक याराधीए रे लो॥१॥जेम होय सुसनी मास रे॥ सु०॥ श्री० ॥ ए श्राकणी॥पहेली मिथ्याश्रुत नणी रेलो, वीजी जिन- सिझांत रे॥सु०॥ बुझिपरीक्षा थवसरे रे लो, पूर्वी समस्या तुरत रे ॥ सु ॥ श्री० ॥२॥ तूगे नृप वर आपवा रे लो, पहेली करे ते प्रमाण रे॥सु० ॥वीजी कर्म प्रमाणथी रे लो, कोप्यो ते तव नृपजाण रे ॥ सुप ॥श्री० ॥३॥कुष्ठी वर परणावीयो रे लो, मयणा वरे धरीनेह रे॥ सु० ॥ रामा हजीय विचारीए रे लो, सुदरी विणसे तुज देह रे॥सु०॥श्री॥४॥ सिद्धचक- प्रजापथी रेलो, नीरोगी थयो जेह रे ॥ सु॥ पुण्य- पसाये कमला लही रे लो, वाध्यो घणो ससनेह रे ॥ सु०॥ ए॥माउले वात ते जर सही (१२५) वांदवा आव्यो गुरु पास रे ॥ सु०॥ निज घर तेकी आवीयो रेलो,आपे निज यावास रे॥सुमश्रिी॥६॥ श्रीपाल कहे कामिनी सुणो रे लो, हुं जाउ परदेश रे ॥सु०॥ माल मता बहु सावरे लो, पूरशु तुम तणी खांत रे ।। सुण ॥ श्री०॥ ७॥ अवधि करी एक वर- पनी रेलो, चाल्यो नृप परदेश रे॥सुशेठ धवल साये चट्यो रेखो,जलपणे सुविशेप रे॥ सुणाश्रीगा। ॥ ढाल त्रीजी॥ ॥मर आंवा आंवली रे ॥ ए देशी ॥ ॥ परणी वब्बरपति सुतारे, धवल मूकाव्यो ज्यांह ॥ जिनहर बार उघामते रे, कनककेतु वीजी'त्यांह ॥१॥ चतुर नर, श्रीश्रीपाल चरित्र ॥ ए आंकणी॥ परणी वस्तुपालनी रे, समुषतटे यावंत ॥ मकरकेतु नृपनी सुतारे, वीणावादे रीमत॥च० ॥२॥ पांचमी त्रैलोक्यसुदरी रे, परणी कुब्जारूप ॥ ही समस्या प्रती रे, पच सखीशुं अनुप ॥ च०॥३॥राधा वेधी सातमी रे, आग्मी विप उतार ॥ परणी याव्यो निज घरे रे, साथे बहु परिवार ॥ च० ॥ ४॥ प्रजापाले सानली रे,परदल केरी वात॥खधे कुंहामो लेश्करीरे, मयणा हु पिरयात ॥ च ॥५॥ चपा राज्य लेड (१३) करीरे, जोगवी कामित जोग ॥ धर्म आराधी अव- तर्यो रे, पहोतो नवमे सुरखोग ॥ चतुर नर ॥ ६ ॥ ॥ ढाल चोथी॥ ॥ कंत तमाङ परिहरो ॥ ए देशी॥ ॥ एम महिमा सिक्ष्चकनो, सुणी याराधे सुवि- वेक ॥ मोरे लाल ॥श्री सिद्धचक्र आराधीए ॥१॥ए आकणी ॥ अमदल कमलनी थापना,मध्ये व्यरिहत उदार ॥मो॥चिहु दिशे सिझादिक चज, वक्र दिशे तु गुणधार ॥ मो० ॥ श्री० ॥२॥ चे पमिकमणां जत्रनी, पूजा देववदन त्रिकाल ॥ मो० ॥ नवमे दिन सविशेपथी, पंचामृत कीजे पसास॥मो॥श्री ॥३॥ जूमिशयन ब्रह्मविध धारणा, रुधी राखो त्रण जोग ॥ मो० ॥ गुरु वैय्यावच्च कीजीए, धरो सद्दहणा नोग ॥ मो॥श्री॥४॥गुरु पमिलानी पारीए, सादम्मि- वछस पण होय ॥ मो ॥ उजमणा पण नव नवां, फल धान्य रयणादिक ढोय ॥ मो०॥श्री०॥५॥श्र जर सविसुखसपदा, परनवे सविसुख थाय॥मो॥ पमित शान्तिविजय तणो, कहे मानविजय उपकाय ॥ मोरे साल ॥ इति ॥
.
(१४)।
॥ नव पदजीनुं स्तवन ॥
॥ नव पद ध्यान सदा जयकारी॥ एयांकपी।
अरिहंत सिहयाचारज पाठक, साधु देखो गुणरूप
उदारी॥ नव पद ॥ १॥ दरशन झान चारित्र हे
उत्तम, तप दोय दे हृदय विचारी ॥नव० ॥२॥
मंत्र जमी उरतत्रघणेरा, उन सबकुं हम पूर
विसारी
॥नव०॥३॥योत जीव जवजलसे तारे, गुण गावत
हे पहुं नर नारी ॥ नव०॥॥श्री जिन जक्त मोहन
मुनि वंदन, दिन दिन चमते दरसअपारी॥नवणा॥
॥श्री नव पदजीनुं स्तवन ।
॥ नव पद धरजोध्यान, नवितुमे नय पद धरजो
ध्यान ॥ ए नव पदनु ध्यान करता, पामे जीव विस-
राम ॥जवि०॥ १॥अरिहंत सिमाचारज पाठक,
साधु सकल गुणवान ॥ नवि०॥२॥ दर्शन झान
चारित्र ए उत्तम, तप तपो करी बहुमान ॥ नवि०
॥३॥ यासो चैत्रनी सुद सातमथी, पूनम लगे पर-
मान ॥ नवि०॥४॥ एम एकाशी आविल कीजे,
वरप सामाचारनु मान ॥ नविण ॥५॥पमिकमणां
दोय टकना कीजे, पमिलेहण वे वार॥जवि०॥६॥
, ((१२५) देववंदन प्रण टंकना कीजे, देव पूजो चिकाल । नविण॥॥चार यात्रीश पचवीशनो, सत्यावीश समसठ सार ॥ नवि०॥ ॥ एकावन सित्तेर पचा- सनो, काउस्सग करो सावधान ॥ नविक एक पदनु गणणु, गणीए दोय हजार॥ नवि०॥१०॥ एनी विधेज ए तपधाराधे, ते पामे नवपार॥जविण ॥ १९॥ कर जोनी सेवक गुण गावे, मोहन गुण मणि माल ॥ नवि० ॥ १५ ॥ तास शिष्य मुनि हेम कहे ठे, जन्म मरण इस बार ॥ नवि० ॥ १३ ॥ इति । ॥ अथ आविलनी लीना स्तवनो। ॥ तत्र प्रथम स्तवनम् ॥ ॥ केशर वरणो हो, के काढ कसुमो माहारा खाल ॥ ए देशी॥ ॥ गोयम नाणी हो, के कहे सुणो प्राणी माहारा लाल ॥ जिनवर वाणी हो, के हियडे यापी मा॥ यासो मासे हो, के गुरुने पासे मा० ॥ नव पद ध्याशे हो, के यग उल्लासे मा०॥१॥ आंघिल कीजे हो, के जिन पूजीजे मा ॥ जाप जपीजे हो, के देव वादीजे मा॥ नावना जावो हो, के सिद्धचक ध्यावो मा ।
(१५६)
जिनगुण गावो हो, के शिवसुस पावो मा०॥२॥श्री
श्रीपाले हो, के मयणा वाले मा०॥ध्यान रसाले हो,
के रोगज टाले मा॥ सिमचक्र ध्यायो हो, के रोग
गमायोमाणमंत्र याराध्यो हो, के नव पद पायो मा०
॥३॥ नामनी जोली हो, के पहेरी पटोली मा० ॥
सहीयर टोली हो, के कुकुम घोली मा० ॥ याल
कचोली हो,के जिनवरसोली मा०॥पूजी प्रणमी हो,
के कीजे जैसी मा० ॥४॥ चैत्रे यासो हो, के मनने
उल्लासे मा०॥ नव पद ध्याशे हो, के शिवसुख पासे
मा०॥ उत्तमसागर हो, के पमित राया मा० ॥ सेवक
काते हो, के बहु सुख पाया मा॥५॥ इति ॥
॥ नव पद स्तवन ।
॥ सिद्धचक्र वर सेवा कीजे, नरनव लाहो लीजे-
जी ॥ विधिपूर्वक याराधन करता, नवनव पातिक
ठीजे ॥१॥ नवियण नजीएजी॥अवर अनादिनी
चाल, नित्य नित्य त्यजीएजी॥ए आकणी ॥ देवनी
देव दयाकर ठगकर, चाकर सुर नर श्टाजी॥ त्रिगडे
विजयन नायक वेग, प्रणमो श्री जिनचदा ॥ नम
॥२॥०॥ अज अविनाशी अकल अजरामर,
-
(१५) केवल दसपनाणीजी॥थव्यायाध अनतुचीरज, सिक प्रणमो विप्राणी ॥ ज० ॥३॥ ॥ विद्या सोनाग्य लक्षी पीव,मनजोगराज पीवजी॥सुमेरुपीठ पच प्रस्थाने, नमो याचारज ऽष्ट॥ ॥४॥०॥ अग उपाग नदी यनुयोगा, उठेद ने मूल,चारजी। दश पयन्ना एम पणयालीस, पाक तेहना धार ॥ ज० ॥ ५ ॥ अ० ॥ वेद वणने हास्यादिक पट, मिथ्यात्व चार कपायजी ।। चोट अन्यतर नवविध चायनी, प्रथि त्यजे मुनिराज ॥ ज० ॥६॥ अ॥ उपशम क्षय उपशम ने क्षायिक, दरशण त्रण प्रका- रेजी श्रद्धापरणतियातम केरी, नमीए वारवार ॥॥॥०॥ ययावीश चोद ने खटु सुगएक, मत्याटिकना जाणजी ॥ एम एकावन नेदे प्रणमो, सातमु पद वर नाण ॥॥॥॥निवर्तिव्यप- वर्ति जेदे, चारित्र व्यवहारेजी ॥ निज गुण थिरता चरण ते प्रणमो, निश्चय शुभप्रकार।जापाom चाह्य अन्यतर तप ने सवर, सुमता निर्जरा हेतुजी। ते तप नमीए नाव धरीने, जवसायरमा सेतु ॥ ॥२०॥ अ॥ ए नव पदमा पण ठे धमी, धर्म ते वरते चारजी ॥ देव गुरु ने धर्म ते एदमा, दो तीन चार (१०) प्रकार ॥ ज०॥११॥०॥ मारगदेशक यविनाशी. पणो, याचार विनय सकेतजी ॥ साह्यपणुं धरता साधुजी, प्रणमो एहीज हेतुजी ॥ ॥रायण विमलेश्वर यक्ष सेवा सारे, उत्तम जे याराधेजी॥ पद्मविजय हरे ते जविप्राणी, निज श्रातम हित साधे ॥०॥ १३ ॥ य० ॥इति ॥ ॥ नव पद स्तवन । ॥वीर जिणंदनी वाणी, चित्त घरजो अमीय समाणी॥हो नविया।नव पद नित्य नित्य सेवो ॥१॥ अरिहंतपद सुसकारी, वीजे सिजनमो हितकारी हो ॥ ज० ॥ न ॥२॥ याचारज सुविचारी, उवकाय ते श्रुत उपगारी हो ॥ ॥ न० ॥ ३ ॥ सत्यावीश गुण धारी, ऐसे साधु नमो ब्रह्मचारी हो॥जान॥४॥ दसण नाण नमीजे, वली चारित्र महातप लीजे हो ॥ ॥ न० ॥ ५॥ कर्म गहन तप कापे, ए तो मन चंगित सुख थापे हो ॥ ज० ॥ न०॥६॥ समर्या सफट जाजे, जमु दिन दिन मंगल गजे हो॥जमानत ॥७॥ नव पद जे नर ध्यावे, ते तोसुर नर शिवसुख पावे हो ॥ ज० ॥ न० ॥ ॥नक्ति विलासेजे गावे, , A (१२५) ते तो मुर नर शिवसुख पावे होना। ॥नव पद स्तवन ।। ॥ अहो नविप्राणी रे सेगो, सिचाध्यान समो नहीं मेयो। अहो ॥ जे कोइ सिकचकने वागधे, तेहनो जग माहि जग वाधे ॥ यदो० ॥ ३॥ पहेले पदे रे अरिहत, वीजे सिक बुद्ध ध्यान महंत ॥ बीजे पदे रेसुरीश, चोथे उरकाय ने पाचमे मुनीशाय ॥२॥ के दरसण रे कीजे, सातमे ज्ञानथी शिवसुत लीजें । थाउमे चारित्र पालो, नवमे तपथी मुक्ति जालो ॥ ॥३॥ यानित ली रे कीजे, नोकार- वाली चीश गणीजे ।। नणे टकना रे देयो, पमिलेहण पनिकमणु सेनो ॥ अ॥४॥ गुरुमुस किरिया रे कीजे,देव गुरु नक्ति चित्तमा धरीजे॥ एम कहे रामना रे शिगो, उली उजवीए जगीशो ॥ य० ॥५॥इति ॥ ॥ सिचक्र स्तुति ॥ ॥ वीर जिनेश्वर यति अलवेसर, गौतम गुणना दरीयाजी। एक दिन थाणा वीरनी सेश्ने, राजगृही सचरीयाजी॥श्रेणिक राजा वंदन याव्या, उलट मनमा प्राणी जी ॥ पर्षदा यागल वार विराजे, हवे , (१३०) सुणो नविप्राणीजी ॥१॥ मानवजव तुमे पुण्ये पाम्या, श्री सिझचक थाराधोजी॥अरिहत सिक सूरि उवकाया, साधु देखी गुण वाधेजी ॥ दरशण नाण चारित्र तप कीजे, नव पद ध्यान धरीजे जी॥धुर आसोथी करवां यांबिल,सुख संपदा पामीजे जी॥२॥ श्रेणिक राय गौतमने पूठे,खामी एतप केणे कीधोजी ॥ नव आचिल तप विधिशु करतां, बठित मुस केणे लीधो जी ॥ मधुरी ध्वनि वोट्या श्री गौतम, सानलो श्रेणिक राय वयणांजी॥रोग गयो ने संपदा पाम्या,श्री श्रीपाल ने मयणाजी ॥३॥रुमकुम करती पाये नेउर, दीसे देवी रूपालीजी ॥ नाम चकेसरी ने सिद्धा, यादि जिनवर रखवाली जी॥ विघन कोम हरे सटु संघना, जे सेवे एना पाय जी ॥ नाणविजय कवि सेवक नय कहे, सानिध करजो माय जी ॥४॥ ॥ सिश्चक्र स्तुति ॥ ॥श्री सिद्धचक सेवो सुविचार, आणी हेडे हरस अपार, जिम लहो सुख श्रीकार ॥ मन शुझे ली तप कीजे, अहोनिश नव पद ध्यान धरीजे, जिनवर पूजा कीजे ॥ पमिकामपां दोय टकना कीजे, याचे
थुपए देव वादीजे, भूमि सथारो कीजे ॥मृपा तो
कीजे परिहार, अगे शीयल धरीजे सार, दीजे दान
अपार ॥१॥अरिहत सिझयाचार्य नीजे, वाचक
सर्वसाधु वदीजे, दसण नाण मुणीजे । चारित्र तपनु
ध्यान धरीजे, यहोनिश नव पद गणणु गणीजे, नन
आधिल पण कीजे ॥ निश्चल राखी मन हो निश्च,
जपीए पद एक एक ऽश, नोकारवाली वीश ॥ ठेले
याविल मोटो तप कीजे, सत्तरनेटी जिनपूजारचीजे,
माननजव लाहो लीजे॥२॥सातसें कुष्ठीयाना रोग,
नाग यत्र नमण सजोग, र दुथा कर्मना जोगा-
ढारे कुष्ठ रेजाये, ख दोहग र पलाये,मनववित
सुरव थाये॥ निरधनीयाने दे बहु धन्न, अपुत्रीयाने ये
पुत्ररतन्न,जे सेवे शुद्ध मन्न ॥ नवकार समो नहीं को
मंत्र,सिकचक समो नहीं को जत्र,सेयो जवि हरखत
॥३॥ जिम सेव्या मयणा श्रीपाल, उबर रोग गयो
सुस रसाल, पाम्या मगलमाल|श्रीपाल तणी पेरेजे
याराधे,दिन दिन दोलत नस घर वाधे,यति शिवसुस
सारे ॥ विमलेश्वर यदा सेवा सारे, यापदा कटने घर
निनारे, दोलत लक्ष्मी वधारे ॥ मेघविजय कवि
(१३२) यणना शिप्य, पाणी हेटे नाव जगदीश, विनय वंदे निशदिश ॥४॥ ॥ अथ श्री सिक्ष्चक्र स्तुति ।। ॥ जिनशासन वंठित, पूरण देव रसाल ॥ जावे नविनणीए, सिरुचक्र गुणमाल ॥ त्रिहु काले एहनी, पूजा करे उजमाल ॥ ते अमर अमरपद, सुख पामे मुविशाल ॥१॥ अरिहत सि वदो, आचारज जवजाय ॥ मुनि दरिसण नाण, चरण तप ए समु- दाय ॥ए नव पद समुदित, सिद्धचक्र सुखदाय ॥ए व्याने नविना, नव कोटि इस जाय ॥२॥आसो चैतग्मा, सुदि सातमथी सार॥पूनम खगे कीजे, नव यावित निरधार ॥ दोय सहस गणेवू, पद सम सामाचार॥ एकागी आंबिल तप, आगमने अनुसार ॥३॥ सिद्धचकनो सेवक, श्री विमलेसर देव ॥ श्रीपाल तणी परे, सुस पूरे खयमेव ।। उख दोहग नावे,जे करे एहनी सेव॥ श्री सुमति सुगुरुनो, राम कहे नित्यमेव ॥ ४ ॥ इति ॥ ॥ अथ सिइचकनी स्तुति ॥ ॥ अरिद्त नमो बली सिझ नमो, आचारज ए (१३३) वाचक सादु नमो दर्शन झान चारित्र नमो तप, सिहचक सदा प्रणमोरायरिहंत यनत यया यागे, चली जान निखेपे गुण गाशे। पमिक्रमणा देववढन विधिशु, याविल तप गणणु गणो विपिशु ॥२॥ वरिपाली जे तप करशे, श्रीपाल ताणी परे जव तरो। सिझचकने कुण थावे तोले, पहना जिनयागम गुण वोले ॥ ३ ॥ सामाचारे बरपे तप पूरु, प कर्म विदा- रण तप शूरु । सिचकने मनमदिर थापो, नय निमलेश्वर वर थापो ॥४॥ इति ॥ ॥ अथ नव पद लीनी विधि। ॥ प्रथम सपारमा नहेला उनी प्रतिकमण करी पमिलेदण करखु पठी देर बादी काउस्सग्ग करवो. जे पद होय तेना पागधनाथ करेमि कालस्सग्ग वदणवत्तियाए कही, यन्न ऊससिएण कदेबु पहेले दिवसे चार लोगस्सनो, वीजे दिवसे याव लोगम्सनो, बीजे दिवसे नीलोगस्सनो, चौथे दिवसे पचीग लोगस्सनो,पाचम सत्यावीशनो,बहेसमसवनो, सातमे एकानननो,यामे सिग्नो ननमे पचासनी,यप्रमाणे काउस्सग करवा जेटला लोगस्सना काउस्सग्ग होय (१३) तेटलां खमासमणां, तेटला साथिया, तेटलां फल जाणवां पठी वासदेपपूजा करीनब देरे नव चेत्य- वंदन करवा, अथवा नव प्रतिमा यागल चैत्यवंदन नव करवा तेवी जोगवा न होय तो गक ठेकाणेज चेत्यवदन करवां पठी गुरु पासे जवु, पञ्चरकाण करतु, श्रीपालचरित्र सानलवु पठी जिनमदिर जा, नाश, उज्ज्वल वस्त्र पहेरी, स्नात्रपूजा नणावी, अष्ट प्रकारी पूजा करे पठी वीश नोकारवाली जे पद होय तेनी गणे पठी जेटलाखमासमणा होय तेटली प्रढ- क्षिणा करे पठी वपोरना देव गांटी, चेत्यवदन करी, पञ्चरकाण पारी याविल करे पठी निविदारनु पञ्च- रकाण करे पठी चेत्यवंदन करी त्रीजे पहोरे पमिलेह णने वसते पमिलेहण करे. पठी सध्याकालना देव वादे पठी जिनमदिरमा ज धूपपूजा,थारती,मगल- दीवो विगेरे करे पठी उपासरे गुरुपासेज प्रतिक- मण करे सूती वसते पोरिसिनी गाथा लणावी निझा करे ए प्रथम दिवसनी विवि कही ए प्रमाणे नवे दिनसनी विवि जाणवी विशेप एवे के रोझे... दिवसे विशेप नक्ति पूजा प्रमुस करे (१३५) ॥चैत्यवदनम्। ॥ श्री सिरि सिद्धचक्क नव पय महल पढ मिट्ट पय भय जिणद असुरिद चिय पयपकय नाह तुक नमो ॥१॥ सिरिरिसहेसर सासिय फल दाण कप्प- तरु कप्पकदप्पगजण नवनजण देव तुक नमो॥२॥ सिरि नानि नाम कुलगर कुलकमखुल्लास परमहस समअसम तम तम तमो जरहरणिकपञ्च तुक नमो ॥३॥ सिरि मरुदेवासामिणि दरदरी दरिय केसरि किसोर घोर जयदम समिय पयम मोहस्स तुझ नमो ॥४॥ कागुवमनूमण गयकुमण ऽरियमयगल मश्द चद मम वयण वियसिय नीलुप्पल नयण तुक नमो ॥५॥ कक्षाण कारणु सम तत्त कणय कलसस- रिस सगण कर ग्यि कलकुतल नीवुप्पल कालेय तुक नमो॥६॥आश्सर जोसर लयगयमणलरक लखिय सरुन नवकूव पमिय जतुतारण जिपनाह तुऊनमो ॥७॥ सिरि सिखसेलममण मुह खमण सयरराय नयपाय सयलमह सिद्धिदाय जिणनायग होन तुक नमो ॥ ७॥ तुज नमो तुज नमो तुज नमो देव तुक चेव नमो ॥ पणयमुररयणसेदर रुझरजिय पाय तुफ नमो ॥ए ॥ इति । .
(१३६)
॥अथ चैत्यवदनम् ॥
॥ नियतरंगारिगणे सुनाणे, सपामिहेराइ सयप्प-
हाणे ॥ संदेहसंदोहरय हरतो, काएह निच्चपि जिणे
रहंतो॥१॥ उच्च कम्मावरणप्पमुके, अणतनाणा
सीरीचजक्के ॥ समग्गलोगग्ग पयसिके, काण्ड
निच्चपि समग्गसिके ॥२॥न तं सुहं नहि पीया न
माया, जे दति जीवान्हिसूरीसपाया ॥ तम्हाहु ते
चेव सया जजेह, ज मुरक सुरकाश लहु लहेह ॥३॥
सुत्तबसवेगमय सुएण, संनीरखीरामय विसुएण ॥
पीनंति जे ते उवप्नायराए, जाएह निच्चपि कयप्प-
साए ॥ खतेय दतेय सुगुत्तिगुत्तो, मुत्तेय सते गुण-
जोगजुत्तो ॥ गयप्पमाए गयमोहमाए, काएह निच
मुणिरायपाए ॥५॥ज दवचिकायेसु सद्दहाण, त
दसण सवगुणप्पहाण ॥ कुग्गहि वाही उवयति जेण,
जहाविधेण रसायणेण ॥ ६ ॥ नाण पहाण नय-
चकसिझ ततववोहीक मय पसिद्ध ॥ धरेह चित्ता-
वसए फुरत, माणिकदिवतमो हरत ॥७॥ सुसवर
मोहनिरोधसार, पचप्पयार विगमाश्यारं । मूलोत्त-
राणेगगुण पचित्त, पालेद निच्चपि तु सच्चरित्त ॥ ७॥
(९३७) चप तहानितरजेयमेय, कयाय उप्रेय कुकम्म नेयं । इस्करकयछे कयपावनास, तवेण दाहागमय निरास ॥ए ॥ एवा जे केवि नवप्पयाड, याराहयतिकफ- लप्पया॥ लहति ते सुरकपरंपराण, सिरि सिरीपाल नरेसम्म ॥१०॥ इति ॥ ॥ नव पट चैत्यवदनम् ॥ ॥ उप्पन्नसन्नापमहोमयाण, सप्पामिहेरासण- सठियाण ॥ सदेसणाण दियसकणाण, नमो नमो होज सया जिणाण ॥ १॥ सिद्धाणमाणसुरमालयाणं, नमो नमोऽणतचजकयाण ॥ सूरीणपुरीयकुग्ग- हाण, नमो नमो सूरसमप्पहाण ॥ २ ॥ सुतचविछा- रणतप्पराण, नमो नमो वायगकुजराण ॥ साहूण ससाहिथ संजमाण, नमो नमोसुझदयादमाण ॥३॥ जिणुत्ततत्ते झलकणस्स, नमो नमो निम्मलदस- एस्स ॥अन्नाणसमोहतमोहरस्स, नमो नमो नाण- दिवायरस्स ॥४॥ वाराहियसमीय सक्अिस्स,नमो नमो सजमवीरियस ॥ कम्मदुमोम्मूलणकुजरस्स, नमो नमो तिवतवोचरस्स ॥५॥श्यनवपय सिद्ध- सद्धिविकासमिझ ॥ पयझियसुरवम्ग, हीतिरेड़ा-
(१३६)
॥ अथ चैत्यवंदनम् ॥
॥ नियतरंगारिगणे सुनाणे, सपामिहेराउ सयप्प-
हाणे ॥ सदेहसदोहरय हरतो, काएह निच्चपि जिणे
रहंतो॥१॥ उछठ कम्मावरणप्पमुक्के, अणतनाणाश
सीरीचजक्के ॥ समग्गलोगग्ग पयसिके, जाएह
निश्चपि समग्गसि ॥२॥न त सुहं नहि पीया न
माया, जे दति जीवान्हिसूरीसपाया ॥ तम्हादु ते
चेव सया नजेह, ज मुक सुरकाइ लदु लहेह ।।३।।
सुत्तबसवेगमय सुएण, सनीरखीरामय विसुएणं ॥
पीनति जे ते जवनायराए, जाएह निच्चपि कयप्प-
साए ॥ खतेय दतेय सुगुत्तिगुत्तो, मुत्तेय सते गुण-
जोगजुत्तो ॥ गयप्पमाए गयमोहमाए, काएह निच
मुणिरायपाए ॥५॥ ज दवचिकायेसु सद्दहाण, त
दसणं सवगुणप्पहाण ॥ कुग्गहि वाही उपयति जेण,
जहाविधेण रसायणेण ॥ ६॥ नाण पहाण नय-
चक्रसिक ततनवोहीक मय पसिह ॥ धरेह चित्ता-
वसए फुरत, माणिक दिवतमो हरत ॥७॥सुसवर
मोहनिरोधसार, पचप्पयार विगमाश्यार ॥ मृलोत्त-
रापोगगुण पपित्त, पालेद निच्चपिदु सञ्चरित्त ॥ ७॥
(१३७) वर्ष तहाचितरनेयमेय, फयाय नेय कुक्म्म जेय ॥ मुकररूयछे कयपावनास, तवेण दाहागमय निरासं ॥ए ॥ एवाइ जे केपि नवप्पयाड, थारायतिहफ- सप्पया॥ लहति ते सुरुपरंपराण, सिरि सिरीपाल नरेसरुव ॥ १०॥ इति ॥ ॥ नव पद चैत्यवदनम् ॥ ॥ उप्पन्नसन्नाणमहोमयाएं, सप्पामिदेरासए- सठियाण ॥ सदेसणाप दियसझणाण, नमो नमो होट सया जिणाण ॥१॥ सिकाणमाणसुरमालयाणं, नमो नमोऽणतचउक्याण ॥ सूरीणपुरीकयकुग्ग- हाण, नमो नमो सूरसमप्पहाण ॥२॥ सुतजविद्या- रणतप्पराण, नमो नमो वायगकुजराण ॥ साहूण ससाहित्य सजमाण, नमो नमोसुदयादमाण॥३॥ जिणुत्ततत्ते कलरकणस्स, नमो नमो निम्मलदस- णस्स ॥ अन्नाणसमोहतमोहरस्स, नमो नमो नाण- दिवायरस्स ॥४॥थाराहियसमीय सकियस्स,नमो नमो सजमधीरियस्स ॥ कम्मदुमोम्मूलएकजरस्स, नमो नमो तिवतवोचरस्स ॥५॥श्यनवपयसिद्ध- बछिबिजासमिस ॥ पयमियसुरवग्ग, दीतिरेदार (१३७) समग्ग ॥ दिसबसुरसारं, खोणिपीढावयार ॥ तिजय विजयचक, सिहचकं नमामि ॥६॥ इति ॥ ॥ नव पढजीनी स्तुति ॥ ॥प्रह उठी वंड, सिचक सदाय ॥ जपीए नव पदनो, जाप सदा सुसदाय ॥ विधिपूर्वक ए तप, जो करे थ उजमाल ॥ ते सवि सुख पामे, जिम मयणा श्रीपाल ॥१॥ मालवपति पुत्री, मयणा अति गुण- वंत ॥तम कर्मसंयोगे, कोढी मिलीयो कत ॥ गुरु- वयणे ते हो, आराध्यु तप एह ॥सुख सपद्वरीया, तरीया नवजल तेह ॥२॥ आबिल ने उपवास, छ वली अहम ॥ दश अहार पदर मास, मास विशेप॥इत्यादिक तप बहु, सटु मांहि शिरदार ॥ जे नवियण करशे, ते तरशे संसार ॥३॥ तप सान्निध्य करशे, श्री विमलेसर यक ॥सद् सधना संकट, चूरे यश् प्रत्यक्ष । पुमरीक गणधार, कनक विजय बुद्धि शिष्य ॥ बुध दर्शनक विजय कहे, पहोचे सकल जगीश ॥४॥ इति ॥ ॥ अर्हन्मूल प्रकामोतनुनिकरधर सूरिराजश्च शासा , गुल्म समाचकेशो दलततिपरिधि साधवो (१३ए) मंजरीचित् ॥ पुप्पोधो दर्शन चानिमतपरिमलश्चारु चारित्ररूप शस्त शस्यं तपश्चामरतरुविना सिद्ध चक्र पुनातु ।।१॥ याप्ता सिखा मुनीमा प्रवरमुनि वरा. साधवो ज्ञानपान श्वेता रक्ताश्च पीता वुधसम- हरिता कजालाना जिनेगा ॥ चचत्पुप्पागपत्र नवि- कनकरज पर्णरोलवधारा गीणा गा श्वेष्ट सकल- मतिततं पावन सटहतु ॥२॥ सार्शना गूढनेत्रा द्विधनपरिमिता कर्म निर्मुसकाना-माचार्याणा रसत्रि- नवनव मुनयो वाचकाना मुनीना। रिंशत्या ससयुक्ता मुनिकृतिसहिता नेत्रसग्या चतुर्णा पटिरब्धि सस- सीगंगनगरमिता सजणोघा जयति ॥३॥ देवेसा यष्टरों ग्रहगणसहिता गोमुसाया परेऽपि चकेव- यादि देव्योऽपि च कुशलकरा सिद्धचकस्य जक्ता ॥ श्रीश्रीपालादिकानामिन सुशमता प्राणिना नक्ति- नाजा श वक्ष ददतु प्रगमसुसफल मुक्तिसोजाग्य. वीजम् ॥ ४॥ इति सिद्धचक्रस्य स्तुति ।। ॥ सिचक्रजीनु चैत्यवदन ॥ ॥श्री सिचक याराधता, सुससपत्ति लद्दीए । सुरतरु सुररमणी यकी, यविकज महिमा कहीए॥
(१४०) ॥१॥ यष्ट कर्म हाणी करी, शिवमंदिर रहीए ॥ विधिशु नव पद ध्यानथी, पातिक सवि दमीए॥२॥ सिद्धचक जे सेवशे, एकमना नर नार ॥ मनवाठित फल पामशे, ते सवि त्रिभुवन मोजार ॥३॥ अग देश चपापुरी, तस केरो पाल ॥ मयणा साथे तप तपे, ते कुवर श्रीपाल ॥४॥ सिचकजीना नमन थकी,जस नागरोग॥ तत्क्षण त्यांथी ते लहे, शिव- सुस संजोग ॥५॥सातसे कोढी होता, दुवा नीरोगी जेह ॥ सोवन वाने जलहले, जेहनी निरुपम देह ॥६॥ तेणे कारण तमे नविजनो, प्रह उठी नक्ते ॥ आसो मास चैत्र थकी, थाराधो जुगते॥७॥ सिद्ध- चक्र त्रण कालना, वदो वली देव ॥ पमिकमणु करी उन्नय काल, जिनपर मुनि सेव ॥ ७॥ नव पद ध्यान हृदे बरो, प्रतिपालो नवि शील ॥ नव पद याबिल तप तपो, जेम होय लीलम लीज॥ ॥ पहेलो पद अरिहतनो, नित्य कीजे ध्यान ॥ चीजो पद बली सिनो, करीए गुणग्राम ॥१०॥याचारज त्रीजे पदे, जपता जयजयकार ॥ चोयो पद उबजायनो, गुण गाउ उदार ॥१२॥ सरव साधु वंासही,यढीछीपमा जेह ॥ पचम पदमा ते सही, घरजो धरी सनेह Im (११) ॥११॥ पदे दरसण नमु, दरशन यजवाबु॥ज्ञान पट नमु सातमे, तेम पाप पसालु ॥ १३॥ यादमे पट रुडे जपु, चारित्र सुसग ॥ नवमे पद वहु तप तपो, जिम फल हो यनग ॥ २४ ॥ एदी नव पट ध्यानथी, जपता नावे कोम ॥ पमित धीरविमल तणो, नय वदे कर जोम ॥ १५ ॥ इति । ॥ सिचक्रजीतुं स्तवन ॥ ॥ श्री सिद्धचक राधो, मनवावित कारज साधो रे ॥ नविया ॥ श्री सिद्धचक याराधो ॥ ए बाकणी॥पद पहेले थरिहत ध्यायो, जेम थरिहत- पदवी पावो रे । जवियां ॥ श्री सिह ॥ पद जे सिक मनावो,ध्यम सिह सरूपी होइजामोरे ज श्री० ॥ सूरि बीजे गुणवता, जशना एक जग जय- वता रे ॥ ॥ श्री० ॥ चोथे पदे उरकाया, जेणे मारग आण वताव्या रे ॥ न॥ श्री० ॥ साधु सकल गुणधारी, पद पचमे जग हितकारी रे ॥ ॥श्री०॥ दरसण पद उठे वदो, जेम कीरति होय शीर नटो रे ॥०॥ श्री० ॥ ज्ञानपद सातमे दासो, चारित्रपद आग्मे नाख्यो रे ॥ न ॥ श्री ॥ तप नवमे पद (१४) शारयो, जेम वीरजीने वचनेरारयो रे॥०॥ श्री॥ श्रीपालने मयणा लीधो, नवमे नव कारज सिष्ठयो रे॥०॥ श्री ॥ नव पद महिमा जाणी, जिनचाही ए मन आणी रे ॥ न० ॥ श्री० ॥ इति ।। ॥अथ श्री विनय पिजयजी कृत ।। ॥आविल तपनी सफाय।। ॥ समरी श्रुत देवी शारदा, सरस वचन घर यापे सदा॥याविल तपनो महिमा घणो, जविजन नाव थकी ते सुणो ॥१॥ विगय सकलनो जिहा परि- हार, यशन मांहि घणो नेद विचार ॥ विदल सर्व तिल तूयर विना, अलसी कोऽव कागनी मना ॥२॥ खम्धान पुहक कट फल सर्व, वर्जीजे आदिलने पर्व ।। सामण परे जो जल नले, तो आविल अबिल रसटले ॥३॥ विलवण सूठी मरीच नेसूया, मेथी सचल रामराजुया॥यजमादिक नेला राय, तो याविलमा सेवा थाय॥॥जीरु जले ते जेवमी कही, ते सूजे पण जीरु नही ॥ गोमूत्र विना अठे अणाहार, ते सवि लेवानो विवहार ॥ ५ ॥ सात जाति जे तल तणी, ते सूजती यांविलमा नण।। सेकिल धान अपकी दाल, मामा साखर सेवा टाल (२४३) ॥६॥ हसदर लविंग पीपर पीपली, हरडे सेंधव वेसण वक्षी॥सादिम स्वादिम जे कहेवाय, ते यावि. समा नवि लेवाय । उत्कृष्ट विधे उष्ण जल नीर, जघन्य विधे काजीनु नीर । म निरपण या विल करे, मुखधोवण दातण नवि करे ॥ ॥ जे निर- पण लीएथाहार, उदननो तेहने विवहार ॥ बाटो लिंगट पाणीवतु, ते पण आविलमा सूफतु ॥ ॥ए॥ अशव गीतारथ अणमधरी, जे जेनिधि वोले ते सरी ।। लानालान विचारे जेह, विधि गीतारथ कहीए तेह ॥ १० ॥ याविल तप उत्कृष्टो कह्यो, विधन विदारण कारण लयो॥ वाचक कीर्तिविजय सुपसाय, लाखे विनयविजय उरकाय ॥ ११॥ इति आविलमा आहार देवानो विधि सजाय ॥ । जिन पूज्यानु चैत्यवंदन ॥ ॥ प्रणमी श्री गुरुराज याज, जिनमदिर केरो।। पुन्य जणी करशु सफल, जिनवचन जलेरो ॥ देहरे जावा मन करे, चोथ तणु फल पावे॥ जिन जुहारमा जवता, पोते आवे । जश्शु जिनवर जणी ए, मार्ग चालता॥होवे घादश तणु पुन्य,नक्ति मालता।
(१५४) यध पंथ जिनवरे तणो ए, पदरे उपवास ॥ टीगे स्वामी तणो जुवन, लहीए एक मास ॥ जिनवर पासे आवता, उमासी फल सिह॥आव्या जिनवर वारणे, वपी तप फल लीव ॥ सो वर्ष उपवास पुन्य, प्रद- क्षिणा देता ॥ सहस वर्प उपवास पुन्य, जे नजरे जोता॥ फल घणो फुलनीमाल, प्रनु को पता।।पार न आवे गीत नाद, केरा फल स्थुणता ॥ शिर पूजी पूजा करो ए, सूर धूप तणो धूप ॥ अक्षर सार ते अदय सुख, दीप तनुरूप ॥ निर्मल तन मने करीए, स्थुणता 5 जगीश ॥ नाटक नावना नावता, पामे पदवीजगीश ॥ जिनवरत्नक्ति वली ए, प्रेमे प्रकाशी। सुणी श्रीगुरु वयण सार, पूर्व शपि नासी ॥ यष्ट कर्मने टालवा, जिनमदिर जशु॥नेदी चरण जगव- तना, हवे निर्मल थशु ॥ कीर्तिविजय उबकायनो, विनय कहे कर जोग ॥ सफल होजो मुज विनति, जिन सेवानु कोम ॥ इति ॥ ॥ अथ सूतक विचार।। (जन्म सवधी) ॥ पुत्र जन्मे सूतक दिन १७ नु जाणवु, पुत्री जन्मे सूतक दिन ११ नु जाणवु, अने चार दिवस (९४५) सुधी घरना माणस जिनपूजा करे नहीं न्यारा जमता होय तो वीजाना घरना पाणीथी जिनपूजा करे एम चर्चरी प्रथमा का वे, अने स्त्री दिन ३७ सुधी जिनदर्शन तथा दिन ४ सुधी पूजा करे नहीं तथा साधुने वहोरावे नहीं घरना गोत्री जनोने दिन ५नु सूतक लागे घोमी, उटणी, नेश प्रसवे तो दिन नु सूतक लागे नेश प्रसवे तो दिन १५ पठी उध कल्पे गाय प्रसवे तो दिन १० पठी उध कल्पे चकरी प्रसवे तो दिन पठी सुध खपे (मृत्यु सबंधी) ॥ जेने घेर मृत्यु थाय तेने दिन १५ नु सूतक लागे, ने त्तेने घेर तेटलाज दिवस साधु बहोरे नही अने तेना घरना यग्निथी तथा पाणीथी जिनपूजा न थाय मृतक पासे सुतेलाने दिन ३ नु सूतक दर्शन, पूजा ने प्रतिक्रमण थाय नहीं दिवस चार पठी थाय मृतफने थमायो न होय तो स्नान कीधेशुध याय ने अमन्यो होय तो दिन १ नुस्तक लागे जेने घेर जन्म तथा मरण थाय ते दिन १५ जिन- पूजा न करे मृतकने श्रमकनार पहोर वसुधी प्रति- नव .
(१४६) क्रमण करे नही वेश पालटनारने ७ पहोरनु सूतक जाणवू जन्मे ते दिवस मरे अथवा देशांतरे मरण पामे तो दिन १ नु सूतक जाणवु आठ वर्पथी नानुं बालक मरे तो तेटलाज (ज) दिननु सूतक जाणवु गाय प्रमुखनु मरण थाय तो कलेवर वहार लश जाय त्यासुधीनु सूतक जापवु दास दासीनी कन्या आपणी निष्टाए घरमा रही होय तो तेनो जन्म थया पठी मृत्यु थाय तो त्रण रात्रिनु सूतक लागे जेटला महीनानो गर्न होय तेट- दाज पहोरनुं सूतक जाणवु इति सूतक विचार ॥ ॥ शतुवंती स्त्री विषे॥ ॥ शतुवंती स्त्री दिवस प्रण लगेनमादिकने नीचे नहीं, दिन चार लगे प्रतिक्रमण करे नहीं, पण तपस्या करे ते लेखे लागे दिन पाच पठी जिनपूजा करे चार दिवस पछी रोगादिक कारणे रुधिर दीगमा आवे तेनोदोपनथी एम महानिशीय सूत्रमा काठे ॥ पच्चरकाण कर्याथी नरकायु त्रुटे॥ नवकारशीयी १० वर्षनु नरकायु नुदे
(१४)
पोरिसिथी २००० वर्षनु नरकायु त्रुटे
सापोरिसिथी १०००० वर्पनु नरकायु त्रुटे
पुरिमयी १००००० बर्पनु नरकायु त्रुटे
एकासणाथी १000000 वर्पनु नरकायु त्रुटे
निवीथी एक क्रोम वपनु नरकायु त्रुटे
एकलागणाथी दश क्रोम वर्पनु नरकायु त्रुटे
एक्लदत्तीथी सो कोम वर्पनु नरकायु त्रुटे
याविलथी हजार क्रोम वर्पनु नरकायु त्रुटे
उपवासथी दश सहस्र क्रोम वर्पनु नरकायु त्रुटे
एम जाणवु
माटे अवश्य जैनधर्म समुदायना पुरुष अने स्त्री.
वर्गे यथाशक्ति प्रत पञ्चरकाण करवु
॥ वीश स्थानक तपनी विधि ॥
१ नमो अरिहताण २००० गणवु लो २४ अथवार
२ नमो सिहाण २०० गणवु लो १५
३ नमो पवयणस्स २०० गणवु लो ४५
४ नमो यायरियाण २० गणवु लो ३६
५ नमो थेराण २००० गणवु लो १०
६ नमो उवज्फायाण २००० गणवु लो २५
(१४)
७ नमो लोए सबसाहूण २००० गणवु लो २७
जनमो नाणस्स २००० गणवु लो ५
ए नमो दंसपस्स २००० गणवु लो ६७
१० नमो विणयसंपन्नाण २००० गणवु लो १०
११ नमो चारित्तस्स २००७ गणवु लो so
१२ नमो वनवयधारिण २००० गणवु लो ए
१३ नमो किरियाण २००० गणवु लो २५
१४ नमो तवस्स २००० गणवु लो १५
१५ नमो गोनमस्स २०० गणवु लो २७
१६ नमो जिणाण २००० गणवु लो २०
२७ नमो चरणस्स २०० गणवु लो १७
२७ नमो अजिनवनाणस्स २००० गणवु लो ५१
रए नमो सुयनाणस्स २०० गणवु लो १५
२० नमो तिठस्स २०० गणवु लो ५
एरीते वीशस्थानकनुं गणणु सर्व पदे गणवु, अने
पदे पदे नवकारवाली वीश गणवी, एटले जे पद
होय ते पदनी नवकारवाली वीश गणवी लोगस्स
सपूर्ण गणवो
यारीते वीश स्थानकनीउलीजघन्यथी ये मासमां
पूरी करवी अने उत्कृष्टथी उ मास सुधीमा एक
(ए)
उसी पूरी करवी यनेते उपरांत थाय तो ली लेसे
न लागे (जे उली शरु करी होय ते )
॥ अथ श्री मोन एकादशीनां दोढसो
कल्याणकनुं गणj॥
(१) जचुकीपे जरते यतीत चोवीशी
४ श्री महायश सर्वज्ञाय नम ॥
६ श्री सर्वानुनूति थईते नम ॥
६ श्री सर्वानुनूति नाथाय नम ॥
६ श्री सर्वानुति सर्वज्ञाय नम ॥
श्री श्रीधर नाथाय नम ॥
(२) जचुहीपे चरते वर्तमान चोवीशी
२१ श्री नमिनाथ सर्वाय नम ॥
रए श्री मलिनाथ अईते नम ॥
रए श्री मतिनाथ नाथाय नम ॥
रए श्री मलिनाथ सनशाय नम ॥
१०श्री अरनाथ नाथाय नम ॥
(३) जबुधीपे भरते अनागत चोवीशी
४ श्री खयप्रत सर्वज्ञाय नम ॥
६ श्री देवते नमः॥
(१५०)
६ श्री देवश्रुत नाथाय नमः ॥
६ श्री देवश्रुत सर्वज्ञाय मम ॥
श्री उदयनाथ नाथाय नम ॥
(४) धातकी सडे पूर्व जरते अतीत चोवीशी
४ श्री अकलंक सर्वज्ञाय नमः ॥
६ श्री शुनकरनाथ अर्हते नम ॥
६ श्री शुनकरनाथ नाथाय नम ॥
६ श्री शुनकरनाथ सर्वशाय नमः ॥
श्री सप्तनाथ नाथाय नम ॥
(५) धातकी खटे पूर्व जन्ते वर्तमान चोवीगी
२१ श्री ब्रह्मनाथ सर्वज्ञाय नमः ॥
रए श्री गुणनाथ अर्हते नम ॥
रए श्री गुणनाथ नाथाय नम ॥
रए श्री गुणनाथ सर्वज्ञाय नम ॥
१७ श्री गागिकनाथ नाथाय नम ॥
(६) धातकी सडे पूर्व नरते अनागत चोवीशी
४ श्री साप्रत सर्वज्ञाय नम ॥
६ श्री मुनिनाथ अर्हते नम ॥
श्री मुनिनाथ नाथाय नम ॥
६ श्री मुनिनाथ सर्वज्ञाय नम ॥
.
(१५१)
श्री विशिष्टनाथ नाथाय नम ॥
(3) पुप्फरवरछीपे पूर्व जरते अतीन चोधीगी
५ श्री सुमृडनाथ सर्वज्ञाय नम ॥
६ श्री व्यक्तनाथ यईते नम ॥
६श्री व्यक्तनाथ नाथाय नम ॥
६ श्री व्यक्तनाय सर्वज्ञाय नम ॥
७ श्री कलाशत नाथाय नम ॥
(0) पुण्फरपरछीपे पूर्वजरते वर्तमान चोवीशी
१ श्री यरण्यास सर्वज्ञाय नम ॥
रए श्री योगनाथ यईते नमः ॥
रए श्री योगनाथ नाथाय नम ॥
२९ श्री योगनाथ सर्वझाय नम ॥
१७ श्री अयोगनाय नाथाय नम ॥
(ए) पुष्करपरकीपे पूर्व जरते अनागत चोषीशी
४ श्री परम सनशाय नमः ॥
६ श्री गुहार्तिनाथ अर्दते नम ॥
६ श्री शुशातिनाथ नाथाय नम ॥
६ श्री शुभार्तिनाथ सर्वझाय नम ॥
श्री निकेशनाथ नाथाय नम ॥
(१०)धातकी खडे पश्चिम जरते अतीत चोवीशी
(१५२)
४ श्री सर्वार्थ सर्वज्ञाय नम ॥
६ श्री हरिला अहंते नम ॥
६ श्री हरिजन नाथाय नम ॥
६ श्री हरिन सर्वज्ञाय नमः ॥
श्री मगधाधिप नाथाय नम ॥
(११) धातकी खडे पश्चिम जरते वर्तमान चोवीशी..
१ श्री प्रयच्छ सर्वज्ञाय नम ॥
रए श्री अक्षोननाथ अर्हते नम
१५ श्री अक्षोलनाथ नाथाय नम ॥
रए श्री योजनाथ सर्वज्ञाय नम ॥
१० श्री मलयसिह नाथाय नम ॥
(१२) धातकी खडे पश्चिम जरते अनागत चोवीशी
४ श्री दिनरुक् सर्वज्ञाय नमः॥
६ श्री धनदनाथ अर्हते नम ॥
६ श्री धनदनाथ नाथाय नम ॥
६ श्री धनदनाथ सर्वज्ञाय नम ॥
श्री पौपधनाथ नाथाय नम ॥
(१३) पुप्फरवरछीपे पश्चिम जरते अतीत चोवीशी
४ श्री प्रलंच सर्वज्ञाय नम ॥
६ श्री चारित्रनिधि अर्हते नम ॥
६ श्री अजिनदननाथ सरशाय
7
६श्री चान्त्रिनिधि नावाद
६श्री चारिजनितिक
श्री प्रभागनिन नामा म
(१४) पुकरवरही पश्चिम नाते वगन नाही
२१ श्री स्वामि सर्वज्ञाय नम ॥
रए श्रीविपरीतनाव बईते नम -
*
DH
बोवीशी..
1
रए श्री विपरीतनाथ नाथाय नमः ॥ -
१५ श्री विपरीतनाथ सर्वहाय नम ,
१० श्री प्रमादनाथ नाथाय नम
(१५) पुप्फरवरहीपे पश्चिम बरते यनागन बोबीगी.
श्री अघटितनाथ सर्वज्ञाय नम ॥
६ श्री मणनाथ यईते नमः॥
६ श्री उमानाथ नाथाय नम ॥
६ श्री प्रमणेऽनाथ संप्रदाय नम ॥
श्री पजचा नाथाय नम
(१६) जंबडीप ऐरवते यतीत चोपीशी
४ श्री दयांत समझाय नम ॥
६ श्री अनिन्दननाथ यदते
नमः॥
६ श्री बनिन्दननाथ नाथाय नम
-
(१५४)
श्री रलेशनाथ नाथाय नम ॥
(१७) जबुद्धीपे ऐरवते वर्तमान चोवीशी
१ श्री श्यामकोष्ठ सर्वज्ञाय नम ॥
रए श्री मरुदेवनाथ अहते नम ॥
रए श्री मरुदेवनाथ नाथाय नम ॥
रए श्री मरुदेवनाथ सर्वज्ञाय नम ॥
२७ श्री अतिपार्श्व नाथाय नम ॥
(१७) जवुधीपे ऐरवते अनागत चोवीशी
४ श्री नदिपेण सर्वज्ञाय नम ॥
६ श्री व्रतधरनाथ अर्हते नम ॥
६ श्री व्रतधरनाथ नाथाय नम ॥
६ श्री व्रतधरनाथ सर्वज्ञाय नम ॥
श्री निर्वाणनाथ नाथाय नम ॥
(रए) धातकी खडे पूर्व ऐरवते अतीत चोनीशी
४ श्री सौंदर्य सर्वहाय नमः ॥
६ श्री त्रिविक्रमनाथ अर्हते नम ॥
६ श्री त्रिविक्रमनाथ नाथाय नम ॥
६ श्री त्रिविक्रमनाथ सर्वज्ञाय नम ॥
७ श्री नरसिहनाथ नाथाय नम ॥
(२०) धातकी खडे पूर्व ऐरवते वर्तमान चोवीशी
(५) पुष्कराधे पूर्व ऐरवते अतीत चोवीशी
श्री उदयज्ञान नाथाय नम ॥
(२३) पुष्कराधै पूर्व ऐरवते वर्तमान चोरीशी
(१५)
१ श्री खेमन सर्वज्ञाय नम ॥
रए श्री सनापितनाय यईते नम ॥
रए श्री मनोपितनान नाथाय नम ॥
१ए धी मतापितनाथ सर्वज्ञाय नम ॥
१० श्री कामनाथ नाथाय नम ॥
(२१) धातकी सडे पूर्व ऐश्वते अनागत चोवीशी.
४ श्री मुनिनाथ सनडाय नम ॥
६ श्री चटाह यहते नम ॥
६ श्री चढाह नाथाय नम ॥
६ श्री चइदाह सर्वज्ञाय नम ॥
३ श्री दिवादित्य नाथाय नम ॥
४श्री यष्टाहिक सर्वज्ञाय नम ॥
६ श्री वणिकनाथ यहते नम "
६ श्री वणिक्नाथ नाथाय नम ॥
६ श्री वणिक्नाथ सर्वज्ञाय नम ॥
१ श्री तम कट' सर्वज्ञाय नम ॥
१९ श्री सायकाद अर्हते नम
,
(१५७)
४ श्री कलापक सर्वज्ञाय नमः ॥
६ श्री विशोम अर्हते नम ॥
६ श्री विगोम नाथाय नम ॥
६ श्री विशोम सर्वज्ञाय नम ॥
७ श्री अरण्यनाथ नाथाय नम ॥
॥ इति मोन एकादशीनां दोढसो कल्याणकनु
गणणु समाप्त॥
॥ अथ कल्याणकनी समज ॥
कल्याएकनो शब्द
थर्थ
१ च्यवन परगतिथी याववु
परमेष्ठिने नम
२ जन्म मातानी कुसथी जन्मे ते अर्हते नम
३ दीक्षा मुनिपणु धारण करवु नाथाय नम
४ केवल सपूर्ण ज्ञान यवु
सर्वाय नमः
५ मोदा कर्मथी मूकाबु
पारगताय नम
जाप
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(१५) ॥ अथ श्री शत्रुजय रास ॥ ( रास) ॥दोहा॥ ॥ श्री रिसहेसर पाय नमी, आणी मन थानद॥ रास जणु रलियामणो, शत्रुजय सुसकद ॥१॥ संवत् चार सत्योतरे,हुवा धनेसर सूर ॥तिणे शत्रुजय माहातम का, शिलादित्य हजूर ॥२॥वीर जिणद' समोसस्या,शत्रुजय उपरजेमादिक आगल कह्यु, शत्रुजय माहातम एम॥३॥शत्रुजय तीरथ सारिखु, नहीं ठे तीरथ कोय ॥ स्वर्ग मृत्यु पातालम, तीरथ जोय ॥ ४ ॥ नामे नव निधि सपजे, दीठे हरित पुलाय ॥ जेटता नवनय टले, सेवता सुस थाय ॥५॥ जवु नामे छीपए, दाक्षण जरत मजार ॥ सोरव देश सोहामणो, तिहा वे तीरथ सार ॥६॥ । ढाल पहेली॥ ॥ राग रामग्री॥ ॥ शत्रुजय ने श्री पुमरीक, सिकनकदुतहकीक ॥विमलाचलने करु प्रणाम, ए शनुजरना सघला 1 7 , (१६०) नाम ॥१॥ सुरगिरि महागिरि ने पुन्यराश, श्रीपद पर्वत श्वप्रकाश ॥ महातीरथ पूरवे सुखकाम ॥ए ॥२॥ शाश्वत पर्वत ने दृढशक्ति, मुक्तिनिलो तिणे कीजे नक्ति ॥ पुप्फदत महापद्म सुगम ॥ ए०॥३॥ पृथ्वीपीठ सुनज केलास, पातालमूल अकर्मक तास। सर्व काम कीजे गुणग्राम ॥ ए॥४॥श्री शत्रुजयनां एकवीश नाम, जपेज वेठा अपणे गम ॥ शेत्रुज जात्रानु फल लहे,महावीर नगवंत श्म कहे।एगाय॥ ॥ दोहा ॥ ॥ शेजो पहेले यरे, असी जोयण परमाण ॥ पहोलो मूले उचपणे, ग्वीश जोयण जाण ॥१॥ सित्तेर जोयण जाणवो, वीजे आरे विशाल ॥ वीश जोयण उचो कयो, मुज वदन व्रण काल ॥२॥साउ जोयण त्रीजे अरे, पहोलो तीरथराय ॥ सोल जोयण उचो सही, ध्यान धरु चित्त लाय ॥ ३ ॥ पचास जोयण पहोलपणे, चोथे अरे मकार ॥ उचो दश जोयण अचल, नित्य प्रणमे नर नार॥४॥वार जोयण पचमे थरे, मूल तणो विस्तार ॥ दोय जोयण उचो कह्यो, शेत्रुज तीरथ सार ॥५॥सात हाथ ठठे यरे, (१६१) पहोलो पर्वत एह ॥ उचो होगे सो धनुप, शाश्वतुं तीरथ एद ॥६॥ ॥ दाल वीजी॥ ॥ जिनवर मेरो मन बीणो ॥ ए राद ।। ॥ केवलज्ञानी प्रमुख तीर्थकर, अनत सिझा श्ण गम रे ॥ अनंत वली सिद्धशे ऽण वामे, तिणे करूं नित्य प्रणाम रे ॥१॥ शेत्रुजे साधु अनता सिका, सिगे वलीय अनत रे ॥ जिणे शेत्रुज तीरथ नहीं नेट्यो, ते गर्नारास खहत रे ॥ शेत्रुजे॥२॥ फागण- सुधि आरमने दिवसे, रुपनदेव सुसकार रे॥रायण- रुख समोसा खामी, पूरन नाणु वार रे । शेण॥३॥ भरत पुत्र चैत्री पूनम दिन, इण शत्रुजय गिरि आय रे ॥पाच कोमीशु पुमरीक सिध्या, तिणे पुंगरीककदाय रे॥शेण ॥४॥नमि विनमि राजा विद्याधर, वे वे कोमी सघात रे॥ फागण सुदि दशमी दिन सिम्झा, तिणे प्रनु प्रणमु प्रजात रे॥शे०॥५॥ चैत्र मास पटि चौदशने दिन, नमि पुत्री चोसवरे॥अपसण करीशत्रुज गिरि उपर, एसड सिध्या एका रे ॥ शे॥६॥ पोतरा प्रथम तीर्थकर केरा,जाविरुने वारिसिवरे। कार्तिक ना."
. (१६२) सुदिपूनम दिन सिध्ध्या, दश कोमी मुनि नि शल्य रे ॥शे॥७॥ पांचे पाझव ऽण गिरि सिध्या, नव नारद शपिराय रे॥सांव प्रद्युम्न गया तिहां मुगते, आठे कर्म खपाय रे ॥शे० ॥७॥ नेम विना त्रेवीश तीर्थकर, समोसर्या गिरिशृग रे ॥ अजित शान्ति तीर्थकर वेहु, रह्या चोमासुरंग रे॥शे॥॥सहस्स साधु परिवार संघाते, थावच्चासुत साधरे ॥ पाचसें साधुशुं शैलग मुनिवर, शेत्रुजे शिवसुख लापरे ॥शे० ॥१०॥ असरयाता मुनि शेत्रुजे सिद्ध्या, जरतेसरने पाट रे॥ राम अने जरतादिक सिध्या, मुक्तितपी ए वाट रे॥शे०॥१॥जाली मयाली ने उवयाली, प्रमुख सावुनी कोमी रे॥साधु अनंता शेत्रुजे सिध्ध्या, प्रणमु वे कर जोमी रे ॥ शे॥ १५ ॥ ॥ ढाल त्रीजी॥ ॥ देशी चोपाश्नी ॥ ॥ शेत्रुजाना कहु सोल उकार, ते सुणजो सदुको सुविचार ॥ सुणतां यानद अग न माय, जन्म जन्मना पातिक जाय ॥१॥ रुपनदेव अयोध्या पुरी, (१६३) समवसर्या स्वामी हित करी ॥ नरत गयो वंदनने काज,ए उपदेश दीयो जिनराज॥२॥जगमा मोटा यरिहत देव, चोसठ श्य करे जसु सेव ॥ तेहथी मोटो सघ कहाय, जेहने प्रणमे जिनवरराय ॥३॥ तेथी मोटो सघनी कह्यो, जरत मुणीने मन गह- गयो । जरत कहे ते किम पामीए, प्रनु कहे शेत्रुजे जात्रा कीये ॥४॥ लरत कहे सघवीपद मुज, ते थापो हुँ अगज तुज ॥ क्षे याण्या अक्षत वास, प्रनु थापे सघनीपद तास ॥५॥ तेणी वेला तत्काल, भरत सुनना चेटुने माल ॥ पदेरावी घर सप्रेमीया, सरसर सोनाना रथ यापीया॥६॥शपत्न- देवनी प्रतिमा वली, रल तणी कीधी मनरली॥जरते गणधर घर तेमीया, शातिक पोष्टिक सह तिहा कीया॥ ॥ककोत्री मूकी सदु देश, जरते तेडयो सघ अशेप ॥ याव्यो सघ अयोध्या पुरी, प्रथम तीर्थंकर यात्रा करी॥७॥ सपनगति कीधी यति घणी, सघ चलायो शेत्रुजा नणी ॥ गणधर वाहुवली केली, मुनिवर कोमी साथे लीया वली ॥५॥ चक्रपतींनी सबली शकि, जरते साये लीवी सिधि हय गय रथ
.
(१४)
पायक परिवार, ते तो कहेतां नावे पार ॥१०॥ नर-
तेसर संघवी कहेवाय, मार्गे चैत्य उरतो जाय ॥
संघ याव्यो शत्रुजय पास, सनीपूगी मननी आश
॥ ११॥ नयणे निरग्यो शेत्रुजो राय, मणि माणेक
मोतीशुवधाय॥तिणे गमेरहीमहोत्सवकीयो, जरते
याणदपुर वासीयो ॥१२॥ संघ शेनुजा उपर चढयो,
फरसंता पातिक जम्पड्यो। केवलज्ञानी पगलां
तिहां, प्रणम्या रायणरुख वे जिहां ॥ १३॥ केवल-
ज्ञानी स्नान निमित्त, ईशाने थाणी सुपवित्त ॥
नटी शेत्रुजी सोहामणी, जरते दीदी कोतुक जणी
॥ १४ ॥ गणधर देव तणे उपदेश, छे वली दीधो
आदेश॥श्री आदिनाथ तणो देहरो, जरते कराव्यो
गिरि सेहरो॥१५॥सोनानाप्रासाद उत्तग, रत तणी
प्रतिमामनरग ॥ जरते श्री यादीश्वर तणी, प्रतिमा
थापी सोहामणी ॥ १६ ॥ मरुदेवानी प्रतिमा वसी,
माही पूनम थापी रखी ॥ब्राह्मी सुदरी प्रमुख प्रासाद,
नरते थाप्या नवले नाद ॥ १७॥ एम अनेक प्रतिमा
प्रासाद, जरते कराव्या गुरु प्रसाद ॥ एद लण्यो
पदेखो उझार, सघलोही जाणे ससार ॥ १७ ॥
1 (१६५) ॥ ढाल चोथी॥ ॥ राग सिधुमो याशारी॥ ॥जरत तणे पाट याठमे, दमवीर्य थयोरायोजी॥ जरत तणी परेसघ कीयो, शत्रुजय सघवी कहायोजी ॥१॥ शत्रुजय उकार साचलो, सोल मोटा श्रीका- रोजी ॥ असरयाता वीजा वली, तेह न कहु अधि- कारोजी॥॥॥चेत्य कराव्यु रूपा तणु, सोनानो विव सारोजी ॥ मूलगा चिंच नमारीयां, पश्चिम दिशि तेणी वारोजी ॥ श० ॥३॥ शत्रुजयनी यात्रा करी, सफल कीयो असतारोजी ॥ दमवीर्य राजा तपो, एबीजो उकारोजी॥॥४॥सो सागरोपम व्यतिकम्या, दमवीरजधीजे वारोजी॥शाने करा- वीयो, ए त्रीजो उकारोजी ॥ श०॥५॥ चोया देव- लोकनो धणी, माहें नाम उदारोजी॥तिणे शत्रुज- यनो करावीयो, ए चोथो उद्धारोजी ॥ श० ॥६॥ पाचमा देवलोकनो धणी, ब्रोड समकित धारोजी॥ तिणे शत्रुजयनो करावीयो, एपाचमो उद्धारोजीशन ॥॥जरनपति खतणो कीयो, एहो उधारोजी॥ चक्रवर्ती सगर तणो कीयो, ए सातमो उहारोजी
,
(१६६)
॥श०॥७॥अनिनदन पासे सुण्यो, शत्रुजयनो अधि-
कारोजी॥व्यंतरेंड करावीयो, ए आरमोउधारोजी
॥ श० ॥ ॥ चपन स्वामीनो पोतरो, चशे-
खर नाम महारोजी ॥ चज्यश राये करावीयो, ए
नवमो उकारोजीश॥ १०॥ शान्तिनाथनी सुणी
देशना, शान्तिनाथ सुत सुविचारोजी॥ चक्रधर राय
करावीयो, ए दशमो उधारोजी॥श० ॥११॥ दशरथ
सुत जगदीपतो, मुनिसुव्रत सुवारोजी॥ श्री रामचं
करावीयो, ए यगीथारमो उझारोजी ॥ श० ॥ १५ ॥
पानव कहे अमे पापीया किम वृटुं मोरी मायोजी
॥ कहे कुन्ती शेनुजा तणी, यात्रा कीया पाप
जायोजी ॥ श० ॥ १३ ॥ पांचे पामव सघ करी,
शत्रुजय नेटयो अपारोजी ॥ काप्टचैत्य विव लेपनो, ए
वारमो उकारोजी॥श ॥ २४॥ मम्माणी पापाणनी,
प्रतिमासुदर सरूपोजी॥श्रीशेत्रुजनो सघकरी,थापी
सकल सरूपोजीश ॥ १५ ॥ अन्योतरसो वरपां
गया, विक्रम नृपथी जिवारोजी॥ पोरवाम जावम
करावीयो, ए तेरमो उझारोजी ॥ श० ॥ १६ ॥ सवत्
वार तेरोतरे, श्रीमाली मुविचारोजी ॥ वाहमदे
मुहूर्ते करावीयो, ए चौदमो उझारोजी ॥ श० ॥१७॥
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(१६७)
सवत् तेर एकोतरे, देशसहेर यधिकारोजी ॥ समरे-
शाहे करावीयो, ए पंदरमो नझारोजी ॥ श० ॥२॥
सवत् पन्नर सत्याशीए, वैशाख मुदि शुज वारोजी॥
करमे दोशी करावीयो, सोलमो उझारोजी॥श
॥रए ॥ सप्रति काले सोलमो, एवरते ठे उधारोजी
॥ नित्य नित्य कीजे वदना ने, पामीजे नवपारोजी॥
शत्रुजय उधार सानसो ॥ २० ॥
॥हा॥
॥ वली शेत्रुज माहातम कहु, साजसो जिम ठे
तेम ॥ सूरि धनेसर श्म कहे, महावीरे का एम
॥१॥ जेद्दयो तेहवो दरसणी, शेत्रुजे पूजनीक ॥
जगवंतनो नेसमानता, सान दुवे तहतीक ॥२॥श्री
शेत्रुजा उपरे, चेय करावे जेह ॥ दल परमाण समु
खहे, पथ्योपम सुख तेह् ॥ ३॥शेत्रुजा उपर देहरु,
नवु नीपावे कोय ॥ जीर्णोद्धार करावता, थाउ गणु
फल होय ॥४॥ शिर उपर गागर धरी, स्नान करावे
नार ॥ चक्रवर्तीनी स्त्री यश, शिवसुस पामे सार
॥५॥ कार्तिक पूनिम शेत्रुजे, चढीने करे उपास ॥
नारकी सो सागर तणो, करे कर्मनो नाश ॥६॥
(१६०) कार्तिक परव मोटुं कछु, जिहां सिध्या दशकोम ।। ब्रह्म स्त्री वालकहत्या, पापथी नाखे ठोम॥७॥ सहस साख श्रावक जणी, नोजन पुन्य विशेष ॥ शेत्रुज साधु पमिलानतां, अधिको तेहथी देख ॥७॥ ॥ ढाल पांचमी॥ ॥ धन्य धन्य अवंतीसुकुमालने ॥ ए देशी॥ ॥ शेत्रुजेगयां पाप वूटीए, लीजे आलोयण एमोजी ॥ तप जप कीजे तिहां रही, तीर्थंकर कडं तमोजी ॥शे॥२॥ जिप सोनानी चोरी करी, ए आलो. यण तासोजी ।चैत्री दिन शेत्रुजे चढी, एक करे उप- वासोजी ॥ शे० ॥ ॥ रत्न तणी चोरी करी, सात आविल शुरू थायजी, काती सात दिन तप कीयां, रत्नहरण पाप जायजी ॥शे० ॥३॥ कांसा पीतल बावा रजतनी, चोरी कीधी जेणजी ॥ सात दिवस पुरिमह करे, तो चूटे गिरि एणजी ॥ शे० ॥४॥ मोती प्रवाला मुंगीया, जेणे चोयाँ नर नारोजी ॥ थाविल करी पूजा करे, त्रण टक शुद्ध याचारोजी॥ शे॥५॥धान्य पाणी रस चोरीयां,जेनेटे सिदेतो- जी॥ शेत्रुज तलहटी साधुने,पमिलाने शुरू चित्तोजी .
(१६ए) ॥ शेण ॥ ६॥ वस्त्राभरण जेणे यां, ते वूटे णे मेलोजी ॥ आदिनाथनी पूजा करे, प्रह उठी घदु वहेलोजी॥०॥७॥ देव गुरुनु धन जेहरे, ते शुरू थाये एमोजी॥अधिक अव्य खरचे तिहां, पान पोपे वहु प्रेमोजी॥शे॥॥गाय नेशघोमामही, गजनो चोरणहारोजी ॥ चूटे ते तप तीरथे, अरिहत ध्यान प्रकारोजी ॥शे०॥ ए॥ पुस्तक देहरा पारका, तिहा सखे आपणां नामोजी॥॥ लूटे ठमासी तप कीयां, सामायिक तिण वामोजी ॥शे० ॥ १० ॥ कुवारी परिवाजिका, सधव विधव गुरुनारोजी॥ व्रत बाजे तिणने कछु, उमासी तप सारोजी ॥ शेण ॥११॥ गोविन स्त्री वासक शपि, एहनो घातक जेहोजी॥ प्रतिमा यागे थालोवतां, बूटे तप करी एहोजी॥ शेजे गया पाप बूटीए ॥ १५ ॥ ॥ ढाल बही॥ ॥ कुमर जले आवी ए॥ए देगी। ॥ सप्रति काले सोलमो ए, ए वरते तेव्हार॥ शेत्रुजय यात्रा करु ए, सफल करु अवतार उदरी पालता -ए, शेत्रुन केरीबाट ठोon.
(१७) पालीताणे पहोंचीए ए, संघ मल्या बहु थाट ॥ शे० ॥२॥ ललित सरोवर पेखीए ए, वली सत्तानी वाव ॥शेणातिहा विसरामो लीजीए प, वमने चोतरे याव ॥शे॥३॥पालीताणे पावमी ए, चढाए उठी परजात ॥ शेण ॥ शेत्रुजी नदी सोदामणी ए, घर यकी देसात ॥शेणाचढीए हिंगलाजने हडे ए, कलिकुम नमीए पास ॥शे॥ वारी माहे पेमीए ए, याणी अग उदास ॥ शे॥५॥ मरुदेवी टुक मनो- दरु ए, गज चढी मरुदेवी माय ॥शे० ॥ शान्ति- नाथ जिन सोलमो ए, प्रणमीजे तसु पाय ॥शे॥६॥ वंश पोरवाडे परगमो ए, सोमजी शाह मल्हार ॥ शे० ॥ रूपजी सघवी करावीयो ए, चोमुख मूख उझार ॥ शे॥७॥श्री जिनराज सूरीश्वरु ए, सरतर गठ गणधार ॥ खहाथे जेणे प्रतिष्ठा करी ए, शुन दिवस शुन वार ॥शे॥॥चोमुख प्रतिमा चरचीए ए, नमती माहे जला विव॥ शेणापांचे पांमय पूजीए ए,अदबुद यादि प्रलव॥शेणपाखरतर वसही खां. तशु ए, विव जुहारुच्यनेक ॥ शेण ॥ नेमिनाथ चोरी नमु ए, टादुथलग उठेग ॥ शे० ॥ १० ॥धर्मधार माहेनीसरु ए, कुगति करु अति दूर ॥ शेण ॥ यावु (१७१) आदिनाथ देहरे ए, कर्म करु चकचूर ॥शे ॥११॥ मूलनायक प्रणमु मुदा ए, यादिनाथ नगवत॥शे॥ देव जुहारु देहरे ए, जमती मांहे नगवंत ॥शेण॥१२॥ शेत्रुजा उपर कीजीए ए, पाचे गमे स्नान ॥ शेण ॥ कलश अगेतरसो करी ए, निर्मल नीरशु गात्र॥ शे० ॥ १३ ॥ प्रथम यादीश्वर आगसे ए, पुमरीक गणधार ॥रायण तल पगला वली ए, शान्तिनाथ मुख- कार ॥ शेण ॥ १४ ॥रायण तले पगला नमुंए, चोमुख प्रतिमा चार ॥ शेण ॥ वीजी नूमे रिवावली ए, पुन रीक गणधार ॥ शेण ॥ २५॥सूरजकुम नीदालीएस यति नली नलकाकोल ॥ शेण ॥ चेलणातला सिक शिला ए, अग फरसु उबोल ॥शे० ॥१६॥ यादि- पुर पाजे उतरु ए, सिद्धवम सदु विसराम॥शे॥ चैत्य, प्रवामीणी परे करीए, सिझा वठित काम ॥ शे॥ १७॥जात्रा करीशेजा तणीए, सफल कीयो अवतार- ॥शेणाकुशल देमशु आनीया ए, सघ सटु परिवार। शे०॥७॥ शत्रुजय माहातम सानली ए, रास रच्यो अनुसार ॥०॥जो नरिगावेजावगु ए,यानद होय अपार ॥ शेण ॥ १ए ॥ शत्रुजय राम सोहामणो ए, सानलजो सह कोय ॥ शे०॥ घर वेग लणे (१७) जावशु ए, तसु जाना फल होय ॥ शे० ॥ २० ॥ जपशाली थिरु यति जलोए, दयावंतदातार ॥शे॥ शत्रुजय संघ करावीयो ए, जेसलमेर मकार ॥ शेण ॥१॥ शत्रुजय माहात्म्य ग्रथथीए, रास रच्यो अ- नुसार॥शेणानाव नक्तेलणतां थका ए, पामीजेजव- पार ॥शे० ॥ २२॥ सवत्सोल व्याशीए ए, श्रावण सुदि सुखकार॥शे॥रास नएयो शेत्रुजा तणो ए, नगर नागोर मकार || शेण ॥ २३॥ गिरुळ गछ खर- तर तणो ए, श्री जिनचदसूरीश॥शे॥प्रथम शिप्य श्री पूज्यनाए, सकलचद सुजगीश॥०॥२॥तास शिष्य जगजाणीए ए, समयसुदर उवकाय ॥ शेण ॥ रास रच्यो तिणे रुसमो ए, सुणता आनंद थाय ॥ शेत्रुजे याना करु ए ॥ २५॥ ॥ इति श्री शेत्रुजय वृह रास समाप्त ॥ ॥श्री सिगिरिनु स्तवन । ॥ सिकगिरि मंगन ईश सुणो मुज विनति, मारु- देवीनो नद गे शिवरमणी पति ॥ पूरक श्ष्ट अनीष्ट चूरक कर्मावली, नवनय नजन रजन तुज मुजा
.
(१७३)
जली ॥अनत गुणना आधार अनंती लक्ष्मी वर्या,
क्षायिक नावे ज्ञान दर्शन चारित्र धर्या॥अजर अमर
निरुपाध स्थान पहोता जिहां, चार गतिमांदिनमतो
मूक्यो मुजने श्हा ॥ क्रोध लोन मोह मत्सर वश
हु धमधम्यो, पण निज नावमा एक घमी प्रजु नवि
रम्यो ॥ सार करो श्ण अवसर प्रजुजी उचित सही,
मोह गये जो तारो तो तेहमा अधिक नहीं ॥ पण
तुज दर्शन पामी अनुजव उबस्यो, मिथ्या तामस सूर
सरिसो तुही मख्यो । उदय दु प्रजु थाज नाग्य
मुज जागीया, तुज मुख चद चकोर नयण मुज
लागीयां ॥ तेहीज जिह्वा धन्य जेणे तुज गुण स्तव्या,
धन धन तेहीज नयण जेणे तुज निरखीया ॥ मूर्ति
मनहर पद्म मन अखि मोहीउँ, जाणु जव महा
सायर चूलकपणु सह्यो।नवअटवी सम्पादकर्म करी
केशरी, जन्म जरा मृति रोग वेद धनवंतरी॥ ज्ञान
रयण रयणायर गुण मणि धरा, राग द्वेप कपाय
जीती थया जिनवरा ॥ तारक मोह निवारक कष्ट
मुज कापजो, जसोदधि पार उतारीमुक्तिपद' यापजो
॥ कमलविजयजी पन्यास चरण तस किंकरु, कहे
मोहन तुज ध्यान जवोचव हुँ धरु ॥ इति ॥
,
एक यजिप्राय श्री श्रावक कर्तव्य तथा विविध स्तरमादि ममु घय ग्रंथ प्रकाशक धारक जीममिह माणेक मुसर जामा जुना जैन पुग्नो प्रतिक करनार, जेन साहित्य वहार पाणी पहेस करनार श्रावक भीमसिंर माणेकनु नाम जैन समाजमा मशहुर ले तेजना तरफश्री अनेक ग्रयो, उपयोगी प्रयो अत्यार मुधीमा चणे जागे शुद्ध थने सरस प्रसिद्ध करवामा आव्या , जेगा था प्रथे एक वधु अपनी वृद्धि करी ने था अयमा प्रथम सममा प्राताम्मरणीय उदो, नानो, पीआमा रामरेजवानी विधि तथा चैत्यमदनविधि, श्रीजामा तिथि विगेरेना चैत्यवान, नानो भने योयो, चोयामा चोवीशी म्नान तथा चैत्यगन्न, पाचमामा प्रसीर्ण तीर्थ विरेना स्तनो, उकामा उपदेशी पदा, सातमामा सम्झायो, थाउमामा दापणी विगेरे नाटकना रागना प्रनुस्तको भने दशमामा नास्मरणादि निगरे विषयो थापामा पाल्या ने श्राश प्रकरणमा जे जे यापपामा थापेस ने ते प्रचलित तेमज फेटयार ना परतु तमाम पूर्वाचार्यो त होने टोक्ने निन्य क्रिया माटे माम उप- योगी ने की बणामाथी चुटणी करेखी होगाथी एक प्रयरूपे करेख प्रसिदि थानालायर प्रस्तावनामा देवदर्शनमहिमा तेमन प्रतिमापूजानु निरूपण अने चैन्यन्नविधि श्रापी तेनी सुदरतामा यधारो रेखो ने 'मुदर शास्त्री टापमा सारा कागळ उपर उपाची सुदर वाश्मींगी श्रखकृत करेस वे, जेथीत नैनो मारे थपश्य सरीची सायक अने उपयोगी ने श्रमो प्रकाशम्ने थाना प्रयो प्रसिद्ध करमा माटे धन्यवाद थापीपीए शास्त्री अक्षरनी (आत्मानद प्रकाग) ग ) गुजराती , जादेरखबर. निवृत्तिना पवित्र वग्नतमा बाचा माटे पूरे श्रा गयेसा महान् श्राचायांना रचेत अमृतमय ज्ञानना पुस्तको " प्रकरए रलाकर जीयविचार नाग१खो करपसूत्र मुघोधिका प्रकरण रत्नाकर टीकानु लापातर ३-०-० नागयो -5-0 करपसूत्र मूल पारसो थज्ञानतिमिर सचित्र जास्कर २-८-- देवसि राउप्रतिममण पामाचरित्र सूत्र अर्थ साये ०-६- जापातर मचित्र ६-०-० विधियुक्त ०-६-० मुमुक्तावली ३-७-० अचजगउ पाच पनि नपतच प्रसोत्तर ---- क्मणासून मूळ 1-0-0 थढीदीपना नकशानी खरतरगड पाच पनि हकीस्त चार पर्वोनी कथा उघु प्रकरणमग्रह १-०-० नाग १सो २-0-0 नवतत्त्वप्रकरण थर्थ लघु पृजासग्रह ०-६-० साये १-०-जनप्रयोध दमक लघुमघयपी- सग्मायमाला कमणा सूत्र विविध पूजासग्रह 4-n-e --६-० शत्रुजय तीर्थनो (२) देवपदनमाला १-४-- जपूस्वामि चरित्र -१२-० स्वरोदयज्ञान रंगवेरगीतीर्थोनानकशा नक्तामर स्तोत्र ०-१२-० चद राजानो रास अर्थ साये नकशो समरादित्य केवलीनो अदीदीपनो रास ४-0-0 जंबुदीपनो श्रीपाल राजानो समेतशिखरनो रास शास्त्री ३-०-० गौतमस्वामीनीववी ----- सामुहिक शास्त्र तथा ज्ञाननाजीनो नकशो-- स्वमविचार १-१-० तारगाजीनो शकुन शास्त्र थईनीति पावापुरीनो जैन कथा रत कोप चपापुरीनो केशरीयाजीनो नाग १ सो ३---- जो २-१२० अष्टापदजीनो २ यो ३-४-० गिरनारजीनो ६ को 2-0-0 श्रावुजीनो मो ३--- माणिजप तथा पद्मा- मो ३-४ पतीनी उनी श्रावक नीमसिह माणेक, जैन पुस्तको वेचनार तथा प्रसिद्ध करनार मामवी, शाकगनी-मुक " -७-० " व " " 9 "
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