Adarsh Library, Jaipur
Ma Teresa
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माँ टेरेसा
सुदेव रायचौधरी
हिन्दी रूपान्तर
जगत शहधर
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लेखकीय 'यह तो उनकी ही देन है'---नोबल पुरस्कार पाने के बाद ये शब्द मा टेरेसा के कठ से उच्चरित हुए थे। वह दिन या बुधवार, 17 अक्तूबर, 1979 1 शाम छह बज कर चालीस मिनट पर नावें से टेलिप्रिंटर से दो पक्तियों का एक समाचार आया नोवल कमेटी के अध्यक्ष अध्यापक जान सानानस ने सेवा,प्रेम तथा करणा की प्रतिमूर्ति मो टेरेमा को 1979 का नोबल शाति पुरस्कार देने की घोषणा की है। मगर जिनके लिए यह घोषणा की गयी थी, वह उम समय मध्य कलकत्ता के मौलाली के पाम जोडे-गिरजे के दूसरी ओर 54 ए, आचार्य जगदीश धसु रोड के भवन में दीन-दुखियो की चिंता में लीन थी। यह उन्ही के द्वारा स्थापित 'मिशनरीज ऑफ चैरिटीज' का कार्यालय है। यही में वह निरतर हो रहे अभिनदनो का जवाब देने में व्यस्त थी। कलकत्ता में सबसे पहले नोबल पुरस्कार रवीन्द्रनाथ ठाकुर को मिला। 1913 में । 'मेरा मिर झुका दो अपने चरणरज के नीचे, मेरे सारे अहकार मुमको डुबो दो आँखो के आंसू मे ।'-'गीताजलि' का यह निवेदन मां टेरेसा के जीवन से भी जड कर एक हो गया है। एक साहित्य में, काव्य मे। दूमरा मेवा मे, ममता में। परम करुणामय की भावना मे इन दोनों में कितना अपूर्व साम्य है ! रवीन्द्रनाथ के बाद 1930 में नोबल पुरस्कार मिला सी० वी. रमण को, रसायन में वैज्ञानिक रमण का शोधस्थल भी फलकता रहा । अन्त में सुदूर अमरीका में रह कर भी एक और व्यक्ति ने भारत का गौरव बढ़ाया। वे हैं डॉक्टर हरगोविंद खुराना । शरीर-विज्ञान के लिए सुराना को यह सम्मान मिला। जन्म मे भारतीय इस वैज्ञानिक ने बाद में अमरीको नागरिकता ग्रहण की। और 1979 मे रसायन. शास्त्र का पुरस्कार पाने वाले पाक्स्तिान के अन्दुस सलाम का जन्म भी भारत में हो हुआ। लम्बी प्रतीक्षा के बाद, अलवानिया में पलो, भारतीय नागरिक कलकत्ता की माटेरेसा को आज विश्वजननी का सम्मान मिला है। नोबल पुरस्कार की कीमत है एक लास नम्बे हजार अमरीकी डालर। भारतीय मुद्रा में लगभग सोलह लास रुपये।
6 - नोवल पुरस्कार मिलेगा, यह मैंने पहले कभी भी नहीं सोचा था। 1976 के अन्त में माँ टेरेसा के कर्मजीवन को लेकर मेरी लिखी हुई किताब बँगला में प्रका- शित हुई। कलकत्ता के आनन्द पब्लिशर्स प्राइवेट लिमिटेड ने इस पुस्तक को प्रकाशित कर अनगिनत पाठकों के समक्ष माँ टेरेसा के क्रियाकलापों के विभिन्न पक्षों को उजागर किया। इसके लिए व्यक्तिगत तौर पर मैं उन लोगों के प्रति कृतज्ञ हूँ। इससे पहले 1975 में 'देश' पत्रिका में माँ टेरेसा तथा उनके प्यार के पात्र- पात्राओं के बारे में लेखक का एक निबंध प्रकाशित हुआ था। निबंध प्रकाशित होने के वाद 'देश' के संपादक सागरमय घोप के पास एकाधिक पत्र आये। लेख पढ़कर पत्र-लेखकों में से बहुतों को ही परिपूर्ण तृप्ति नहीं मिली। परिपूर्ण न सही, उस तृष्णा को कुछ मिटाने के उद्देश्य से ही यह विनम्र प्रयास है। मगर मां टेरेसा कभी भी नहीं चाहती कि उनकी जीवनी लिखी जाये। बल्कि इसे वह नापसन्द करती हैं। मां के अपने शब्दों में-~~"इट इज ए काल फ्रॉम हिम टु वर्क अमंग्स्ट द पूअरेस्ट ऑफ़ द पूअर ।" जन्म से विदेशी मगर प्रेम में, कर्म में भारतीय एक महान महिला दरिद्र, पीड़ित मानव के लिए क्या कर रही हैं, सिर्फ दया-दाक्षिण्य देकर ही नहीं, किस तरह प्यार से दुखी हृदय की घोर हताशा और निस्संगता को उन्होंने तोड़ना चाहा है, उसका ही कुछ विवरण इस ग्रंथ में दिया गया है। हिन्दी में 'माँ टेरेसा' प्रकाशित करने के लिए मैं कलकत्ता के आनन्द बाजार प्रकाशन के हिन्दी साप्ताहिक 'रविवार' के योग्य संपादक सुरेन्द्रप्रताप सिंह का आभारी हूँ। सुरेन्द्रप्रताप के फलस्वरूप ही दिल्ली की अत्यंत श्रेष्ठ हिन्दी प्रकाशन संस्था राधाकृष्ण प्रकाशन ने माँ टेरेसा' का हिन्दी रूपान्तर कराया। इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ। लेखन के मामले में व्यक्तिगत साक्षात्कार तथा मिलने-जुलने के अलावा डेममयेंड डयेगेर तथा मैलकम मैगारिज की किताबों के कुछ हिस्सों से भी लेखक ने मदद ली है। अंग्रेजी में प्रकाशित होने पर भी, माँ टेरेसा के बारे में, भारतीय भापा में प्रकाशित यह दूसरा ग्रंथ है। हिन्दी में पहला ग्रंथ । लेखन के मामले में सव्यसाची सन्तोपकुमार घोप ने पांडुलिपि पर नज़र दौड़ाकर ही क्षण भर में नामकरण कर दिया। कृतज्ञता-ज्ञापन करके उनका ऋण चुकता करने की धृष्टता मुझसे नहीं होगी। - -सुदेव रायचौधुरी एक - मौलाली के मोड से पार्क सर्कस की ओर द्राम के तीन-चार स्टॉप पर जोड़ा- गिरजाघर के सामने वाले फुटपाथ पर लोअर सर्कुलर रोड, यानी आजकल के आचार्य जगदीश वसु रोड पर थोड़ा आगे जाने पर आसमानी रंग का नाग्म जिला मकान है। इसके ऊपर माता मेरी की सडी सफेद संगमरमर पोभूति राह चलने वाली की प्टि पीप लेती है। ज्ञात-अज्ञात सबके स्वागत के लिए ही मानो 'कल्याणमयी मां' वहां खडी हो। सिर का कपडा पोडा हटा, कपाल पर से जरा उठा हुआ है । चेहरे पर मुसकान है। बडी सड़क से मिलती हुई एक छोटी-सी गली है। गली में घुसते ही दाहिनी ओर एक दरवाजा है। बाहर आसमान पर वादल छाये हैं। तीसरे पहर से ही शाम-सी लग रही थी। थोड़ी देर पहले ही एक बौछार पड़ चुकी थी। वृक्षों के पत्ती पर बौछारी की छाप स्पष्ट है । भासपास के मकान भी भीगे भीगे हैं । ट्रामो और वमों की आवाज के सिवा इम अचल में सन्नाटा रहता है। कुडी पटपटाते ही एक युवती वाहर निकल आयो। अठारह उन्नीस वरम की युवती थी। यह नीले किनारे को सफेद साडी और पूरी आस्तीन का ब्लाउज पहने हुए थी। कंधे तक नाटी होते हुए भी गले में चांदी का क्रॉस का निशान ऐरो पहन रमा पाकि मजरो में अवश्य पड़े। नीचे की मजिल में एक कमरे में बंटाकर युवती सन्यासिनी बोली, "आप मदर को तलाश में आये हैं ? मदर तो अभी निमंला शिशु-भवन में गयी हैं । वह बहुत दूर नही, पास ही है । इटाली मार्केट के सामने।" मां ने मुझसे तीन से चार बजे के बीच आने को कहा था। बाहर के दरवाजे पर अंग्रेजी में लिखा हुआ था-मदर टेरेमा। नाम के पास 'इन' ही तो नजर में पड़ा। 'आउट' तो बद या। ऐसा होने पर भी वे नहीं थी। मन पराब हो गया। तो क्या मां मुझसे मुलाकात न करेंगी' नोटबुक खोलकर पता घट-मे एक बार फिर मिलाया। हो, ठीक ही तो है-'मिशनरीज ऑफ चैरिटीज', 94-ए, लोअर सर्कुलर रोड, फलकत्ता-161 पहली मंजिल पर ईमा मसीह की तसवीर की ओर कुछ देर तक देखता रहा। आंगन में वोगनविलिया के पत्तो से उस समय co माँ टेरेसा । भी बूंद-बूंद बरसात के पानी पड़ने की हलकी-हलकी आवाज़ कानों में पड़ रही थी। बादलों के अंधेरे में क्या करूं, यह सोच न पाने पर भी कुर्सी छोड़कर उठ खड़ा हुआ। तभी एक और भगिनी, सिस्टर क्लेयर, भागी-भागी आयीं। पहली अक्तूबर की सुबह बड़ावाज़ार में सत्यनारायण पार्क के सामने श्वेताम्बर जैन मंदिर में उपासना के समय उनसे परिचय हुआ था। मां के साथ मेरे इस साक्षात्कार की वात सिस्टर क्लेयर जानती थीं। वे बोली, "निराश न हों। पास ही शिशु-भवन है। वहाँ चले जाइये । तीन-चार मिनट का रास्ता है। वहीं भेंट होगी। बच्चों की पुकार पर ध्यान न देकर क्या माँ वैठी रह सकती हैं ?" कहीं ऐसा न हो कि वहाँ भी भेंट न हो, इसीलिए उसी दम उठ गया। जिस दरवाजे से आया था उसी से निर्मला शिशु-भवन गया। इंटाली मार्केट की उलटी तरफ़ लोअर सर्कुलर रोड पर ही यह भवन है। सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंचते ही एक नाचती हुई किशोरी को देखा। उसे घेरे हुए छोटी लड़कियाँ बैठी थीं। यह, मानो, कमरे में शिशु-मेला हो । विलकुल सामने की कुर्सी पर बैठी महिला मदर टेरेसा थीं । 'वन्य वन में सुंदर, शिशु कोड़ में'-साहित्यिक संजीव चट्टोपाध्याय का बह वर्णन सहसा आँखों के आगे तैर गया। दो बच्चों को गोद में लिये मां दुलार करने में व्यस्त थीं। चार-पांच बरस की एक लड़की के कोमल मुंह पर प्यार लेते-लेते मां ने पास की कुर्सी पर मुझे बैठने के लिए इशारा किया। मैं कुर्सी खींचकर बैठ गया। मन में न तो कोई डर था, न कोई संशय । लोरेटो की उस संन्यासिनी की बात अक्षरशः सच थी। मदर टेरेसा के संबंध में सबसे विस्मयजनक बात है उनका साधारणत्व । और इसी गुण ने उन्हें असाधारण बना दिया है। उनके नाम के पीछे कोई काल्पनिक वस्तु नहीं है। सहज, सरल और वहुत-सी स्त्रियों की तरह ही उनका जीवन आडंबररहित है। वे बैंगला में बोली, "पता है, इस लड़की को सड़क पर से उठाकर लायी हूँ। उस समय यह नवजात शिशु थी। और अब इसके मां-बाप कहने के लिए इस शिशु-भवन की सिस्टर हैं। प्यार पाकर विटिया मेरी गोद छोड़ना नहीं चाहती।" मह के पास मुंह ले जाकर माँ बोली, "तुम्हारा जांघिया कहां है ? अरे वेटी, लोग क्या कहेंगे?" । पता नहीं बच्ची समझी या नहीं, पर मां की बात पर बच्ची के चेहरे पर हंसी फूट पड़ी। वात कोई न निकली। काले फेम का चश्मा आंखों से उतारकर केस में रखते हुए बोली, "मेरो अणिमा बेटी बात नहीं कर सकती। जन्म से ही वह मूक है।" सारी सिस्टरों की तरह मां का पहनावा भी नीले किनारे की सफ़ेद साड़ी थी। बदन पर सफ़ेद पूरी बाँहों के ब्लाउज़ में जगह-जगह पर रिक्त स्थानों पर क्रूस-काँटों का काम साफ़ था। कंधे के वरावर क्रॉस का चिह्न यत्नपूर्वक लगाया हुआ था। हाथों में जप करने की माला थी। वयस पंसठ से अधिक होने मां टेरेसा 9 पर भी युवकों-सी मजबूत और समयं थीं। चमड़ी पर मुर्रियां पड़ने मे क्या, उनके चेहरे को मुमकान में अनन्त गक्ति है, अनुप्रेरणा का स्रोत है। नीरव सेवा की प्रतीक इम महान महिला ने पवाम वर्ष इस कलकत्ता शहर में बिता दिये हैं। पतृक मकान अल्वानिया में होने पर भी मदर टेरेमा का जन्म एडियाटिक सागर के पार यूगोस्लाविया के स्कपजे शहर में हुआ था। सन उन्नीस मो दस में सत्ताईम अगस्त को। सात वर्ष की उम्र में पिता को सोने के बाद टेरेसा मा के पास ही पली । उनकी दो बहनें और एक भाई थे। मां और बहनें गुजर चुकी । रह गया है एक भाई । वह आजकल रोम में हैं। दो मागर की विशालता कितना अनुप्राणित करती है, यह तो नहीं पता, पर स्कूली छाया होने के समय से ही उनको ध्यान-धारणा ईश्वरमुखी हो गयी। अन्तर के अन्तःस्थल मे कुछ विचित्र-सा अनुभव करती थी। दिन-रात जैसे कोई उन्हें बुलाता रहता था। उस पुकार मे न कोई मशय था और न था कोई अशुभ इगित । किन्तु, उस पुकार का मूल स्वर अभय का था। प्रथम विश्वयुद्ध का सूत्रपात बल्कान देशों में हो चुका था। टेरेसा उस समय मदर टेरेसा नहीं हुई थीं। और-तो-और, सन्यासी जीवन का प्रपम नाम मेरी टेरेसा भी उम समय नहीं लिया पा) छोटे-में अल्बानिया की लड़की अगनेस गोक्ला कोजाक्सिया परवर्ती जीवन में पोस्टीय दीक्षा को प्रतिमूर्ति मदर टेरेमा हो गयी। क्या प्रथम विश्वयुद्ध की प्रतिषिया ने चार वर्ष के शिशु-मन पर भी किसी प्रकार का प्रभाव डाला पा? इतिहास के अन्वेषक इसका निर्णय करेंगे। किन्तु शोषक और शोपित के सदा के को केंद्र कर समस्त यूरोप मे तथा विश्व में उसका नगाडा बज उठा और तमाम लोगों की तरह निश्चय ही उस युद्ध को लहर ने टेरेसा के माता-पिता के जीवन में भी आंदो- सन पदा कर दिया था। इसके ठीक तीन बरस दाद-विश्वयुद्ध समाप्त होने में उस समय भी पूरा एक चरस बाकी या टेरेमा ने पिता को खो दिया। उस समय उनकी आयु मात्र सात वरस थी। युद्ध से उत्पन्न स्पिति व पितृवियोग-एक साप ही इन दो अप्रत्याशित घटनाओं ने क्या शिशु टेरेसा के मन को आदोलित न किया होगा? आपरलंड के लोरेटो संप्रदाय के मठ को संन्यासिनिमों के प्रभाव ने उन्हें सन्यासी जीवन की ओर सोचा। सोरकर आश्चर्य होता है कि टेरेमा के जन्म के मात्र तैतालीस वरम पहले 1867 में इस आयरलंह के टायरन प्रदेश के छोटे-में 10 :: मां टेरेसा शहर डेनगेनन में भगिनी निवेदिता ने जन्म लिया था। उनका पहले का नाम मार्गरेट एलिजावेथ नोव्ल था। उनके पितामह थे रेवरेंड जॉन नोब्ल-वे एक गिरजे के याजक–पादरी-थे। वीसवीं सदी के आरंभ में टेरेसा का जन्म हुआ था, और भगिनी निवेदिता का जन्म उन्नीसवीं सदी के अंतिम भाग में हुआ था। वय की पृथकता रहने पर भी विचारधारा में ये दो विदेशिनी एक ही सूत्र में बंधी हैं। नीरव, अनलस कर्म में प्रतिदिन, प्रतिमुहूर्त इनका आत्म-समर्पण है । व्रत के लिए प्राण-विसर्जन कर देना ही जीवन का आदर्श है, सिद्धि प्राप्त करना नहीं। यही तो था निवेदिता का व्रत। धर्म के प्रेम के साथ स्वदेश-प्रेम था उनके चरित्र की मधुरता । यीशु को समर्पण कर मां टेरेसा का जीवन भी बिलकुल वैसा ही है। निवेदिता की तरह मां टेरेसा का भी कर्म-जीवन शिक्षिका के रूप में ही हुआ। मैंने इसी बीच मां से पूछा, "आज क्या कोई उत्सव का दिन है ?" "ठीक समझे । जिनके नाम के अनुकर ग पर मेरा नाम है उन्हीं संत टेरेसा का आज जन्मदिन है।" चार सौ बरस पहले इतिहास के संत टेरेसा ने भी अठारह बरस की उम्र में सव-कुछ त्याग कर कठिन संन्यासी-जीवन चुना था। उस समय के कारमेल मठ की सहधर्मिणी लोगों के व्यवहार से वे संतुष्ट न हो सकी। सैंतालीस बरस की उम्र में स्थानीय पादरियों का सारा विरोध अग्राह्य कर पोप की अनुमति लेकर स्पेन के आडिला शहर में, अपने जन्म-स्थान में नया मिशन बना लिया। केवल चार सिस्टर साथिर्ने उनको मिली थीं। आत्म-विश्वास की पूंजी लेकर संत टेरेसा ने धर्माध स्पेन में नये जीवन की वाणी सुनायी। कैसा आश्चर्यजनक मेल था ! पुनर्जन्म में विश्वास हमारा धर्मगत अधिकार है। उसी अधिकार-वोध में विश्वास करने की आकांक्षा लेकर इतिहास के संत टेरेसा डेढ़ हजार मील और चार सौ बरस का व्यवधान धो-पोंछकर फिर लौट आये हैं। मैंने सोचा कि मां ने शायद अव अपनी स्मृति की झोली में से शुरू किया है। न, उधर गयीं ही नहीं। माँ की अपनी वात के अनुसार, "जीवनी मेरी जीवित दशा में न लिखी जाये। यीशु की जीवनी उनके जीवनकाल में नहीं लिखी गयी। मानव-जाति के कल्याण के लिए यीशु आत्मत्याग कर गये हैं । मुमूर्षु, निराश्रय लोगों को आश्रयदान मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटीज़ का मुख्य उद्देश्य-मुख्य व्रत बना।" इतनी दूर क्यों जाना पड़ेगा? यह जो गंगा के पार दक्षिणेश्वर के मंदिर के रामकृष्ण परमहंसदेव हैं-इन परम पुरुप का कथामृत मुद्रित रूप में हमें उनकी जीवित अवस्था में तो मिला नहीं ! श्रीमा लिखित ठाकुर के उस कथामृत का स्वाद हमको उनके देहत्याग के बहुत बाद मिला। कुों के सामने नाचती हुई युवती को देखकर बोली, "उस लड़की को नाचते कुछ निकालना माटेरेसा :: 11 । देख रहे हैं, उसे भी हम सिस्टर लोग एक दिन सड़क पर से उठाकर लाये थे। सिस्टरों के लाह-प्यार, देसभात से लड़की शंशव-कशोर्य पार कर अब पूर्ण यौवना हो गयी है । वह ब्याह करेगी, पति की गृहस्थी करेगी। वह मां बनेगी।" थोड़ी दूर पर ही एक शिशु था। चार बरस का रहा होगा। लंगड़ा-संगडा. कर चलते देखकर मां ने पैर पर हाथ फेरना शुरू किया, "तुम्हारे पैरों में बैंडेज क्यों है ? लगता है, शरारत की होगी?" मी ने शिशु को कलेजे से लगा लिया। मां देखने में दूसरी भारतीय स्त्रिपों की तरह ही लग रही पी। शरीरका रंग छोड़कर बाकी सब-कुछ हमारी बहनों की तरह ही पा। दुहरा चेहरा। ऊँचाई पांच फुट के लगभग । आँखों में धूमर और बादामी का सम्मिश्रण होने पर भी गंभीरता है। पूरे चेहरे की झुरियों से प्रगट होती है उनकी वय और स्टोर जीवन-साधना। इस वृद्धा महिला की शक्ल पूरी तौर पर चमक-दमर से हीन घरेलू महिला-सी थी। नीचे फ़र्श पर सिस्टर बैठी हुई थीं। इस शुभ दिन में वे भी शिशुओं को तरह माता का सान्निध्य पाना चाहती थी। मां को घेर कर, जिसे जहां जगह मिली पी, बैठी थी। एक सिस्टर ने जवाब दिया, "सीढ़ी पर से उतरते वक्त अचानक लड़के का पैर फिमल गया था।"तेरह-चौदह वर्ष का एक किशोर मां के पास ही योगासन के ढेग से बैठाया। मन लगाकर गाना-बजाना-दुहराना सुन रहा था। मा कुर्सी छोड़कर उठ खड़ी हुई। उस किशोर के पास जाकर बैठ गयी। क्षण भर में ही लड़के को दोनों हापो से उठाकर अपनी ही साली कुर्सी पर बैठा दिया। बोली, "यह बहुत अच्छा लड़का है । इसके मां-बाप नहीं हैं। शिशु-भवन को सिस्टरों का निष्काम स्नेह उसके प्यारे गले को और भी मधुर बना रहा है।" मां की बात समाप्त होने से पूर्व ही किशोर के कंठ से निकले सगीत-'बोलो मा तारा, दोहाइ कोषा"ने कुछ क्षणो के लिए हॉल को नीरवता से भर दिया। पास हो की कुर्सी पर मां की बहन फिलिमाइन चूनी और उनके अध्यापक पवि लूके चूनी बैठे थे। अपने न होने पर भी मां के पास यह अघेड दम्पत्ति सुदूर आस्ट्रेलिया से यहां आये थे। उनका उद्देश्य या मदर को और मदर को बनायो तमाम सस्थाओं को देखना। तीन कोई तसवीर सीचकर लाया था, और कोई अपनी लिपी कविता पढ़कर सुना रहा पा, बहुत-से गाना भी गा रहे थे। मधिस्तर बच्चे बार-बार अपनी मां 1. वारा, बवायोमहा रहे?
10 मां टेरेसा . । शहर डेनगेनन में भगिनी निवेदिता ने जन्म लिया था। उनका पहले का नाम मार्गरेट एलिजावेथ नोब्ल था। उनके पितामह थे रेवरेंड जॉन नोब्ल-वे एक गिरजे के याजक–पादरी-थे। बीसवीं सदी के आरंभ में टेरेसा का जन्म हुआ था, और भगिनी निवेदिता का जन्म उन्नीसवीं सदी के अंतिम भाग में हुआ था। वय की पृथकता रहने पर भी विचारधारा में ये दो विदेशिनी एक ही सूत्र में बंधी हैं । नीरव, अनलस कर्म में प्रतिदिन, प्रतिमुहूर्त इनका आत्म-समर्पण है । व्रत के लिए प्राण-विसर्जन कर देना ही जीवन का आदर्श है, सिद्धि प्राप्त करना नहीं। यही तो था निवेदिता का व्रत । धर्म के प्रेम के साथ स्वदेश-प्रेम था उनके चरित्र की मधुरता । यीशु को समर्पण कर मां टेरेसा का जीवन भी बिलकुल वैसा ही है। निवेदिता की तरह मां टेरेसा का भी कर्म-जीवन शिक्षिका के रूप में ही हुआ। मैंने इसी बीच मां से पूछा, "आज क्या कोई उत्सव का दिन है ?" "ठीक समझे । जिनके नाम के अनुकर ग पर मेरा नाम है उन्हीं संत टेरेसा का आज जन्मदिन है।" चार सौ बरस पहले इतिहास के संत टेरेसा ने भी अठारह बरस की उम्र में सब-कुछ त्याग कर कठिन संन्यासी-जीवन चुना था। उस समय के कारमेल मठ की सहधर्मिणी लोगों के व्यवहार से वे संतुष्ट न हो सकी। संतालीस वरस की उम्र में स्थानीय पादरियों का सारा विरोध अग्राह्य कर पोप की अनुमति लेकर स्पेन के आडिला शहर में, अपने जन्म-स्थान में नया मिशन बना लिया। केवल चार सिस्टर साथिनें उनको मिली थीं। आत्म-विश्वास की पूंजी लेकर संत टेरेसा ने धर्माध स्पेन में नये जीवन की वाणी सुनायी। कैसा आश्चर्यजनक मेल था ! पुनर्जन्म में विश्वास हमारा धर्मगत अधिकार है। उसी अधिकार-बोध में विश्वास करने की आकांक्षा लेकर इतिहास के संत टेरेसा डेढ़ हज़ार मील और चार सौ बरस का व्यवधान धो-पोंछकर फिर लौट आये हैं। मैंने सोचा कि मां ने शायद अब अपनी स्मृति की झोली में से कुछ निकालना शुरू किया है। न, उधर गयीं ही नहीं। मां की अपनी वात के अनुसार, "जीवनी मेरी जीवित दशा में न लिखी जाये। यीशु की जीवनी उनके जीवनकाल में नहीं लिखी गयी। मानव-जाति के कल्याण के लिए यीशु आत्मत्याग कर गये हैं। मुमूर्प, निराश्रय लोगों को आश्रयदान मिशनरीज ऑफ़ चैरिटीज़ का मुख्य उद्देश्य-मुख्य व्रत वना।" इतनी दूर क्यों जाना पड़ेगा? यह जो गंगा के पार दक्षिणेश्वर के मंदिर के रामकृष्ण परमहंसदेव हैं-इन परम पुरुप का कथामृत मुद्रित रूप में हमें उनकी जीवित अवस्था में तो मिला नहीं ! श्रीमा लिखित ठाकुर के उस कथामृत का स्वाद हमको उनके देहत्याग के बहुत वाद मिला। कुर्सी के सामने नाचती हुई युवती को देखकर बोली, "उस लड़की को नाचते । ।
माटेरेसा :: देख रहे हैं, उसे भी हम सिस्टर लोग एक दिन सहक पर से उठाकर लाये पे। सिस्टरो के लाह.प्यार, देसमाल से सहकी शैशव-कंशोयं पार कर अब पूर्ण यौवना हो गयी है । यह व्याह करेगी, पति की गृहस्थी करेगी। वह मां बनेगी।" योड़ी दूर पर ही एक शिशु था। चार बरस का रहा होगा । लंगड़ा लंगड़ा- कर चलते देखकर मां ने पैर पर हाथ फेरना शुरू किया, "तुम्हारे पैरों में बैंडेज क्यों है ? लगता है, शरारत की होगी?" मा ने शिशु को कलेजे से लगा लिया। मा देखने में दूसरी भारतीय स्त्रियों की तरह ही लग रही थी । शरीरका रंग छोड़कर बाकी सब-कुछ हमारी बहनों की तरह ही था। दुहरा चेहरा। ऊँचाई पांच फुट के लगभग । आँखों मे धूसर और बादामी का सम्मिश्रण होने पर भी गंभीरता है। पूरे चेहरे की झुर्रियों से प्रगट होती है उनकी वय और कटोर जीवन-साधना। इस वृद्धा महिला की शक्ल पूरी तौर पर चमक-दमक से हीन घरेलू महिला-सी थी। नीचे फर्श पर सिस्टर बैठी हुई थीं। इस शुभ दिन मे वे भी शिशुओं की तरह माता का सान्निध्य पाना चाहती थी। मां को घेर कर, जिसे जहाँ जगह मिली थी, बैठी थी। एक सिस्टर ने जवाब दिया, "सीडी पर से उतरते वक्त अचानक लडके का पैर फिसल गया था।" तेरह-चौदह वर्ष का एक किशोर मां के पास ही योगामन के ढंग से बैठा था। मन लगाकर गाना-बजाना-दुहराना मुन रहा था। मा कुर्सी छोड़कर उठ खड़ी हुई। उस किशोर के पास जाकर बैठ गयी। रण-भर मे ही लहके को दोनों हाथो से उठाकर अपनी ही खाती कुर्सी पर बैठा दिया। बोली, "यह बहुत अच्छा लड़का है। इसके मां-बाप नहीं हैं। शिशु-भवन को सिस्टरो का निष्काम स्नेह उसके प्यारे गले को और भी मधुर बना रहा है।" मां की बात समाप्त होने से पूर्व ही किशोर के कंठ से निकले सगीत-'बोलो मा तारा, दोहार कोया"-ने कुछ क्षणो के लिए हॉल को नीरवता से भर दिया। पास ही की कुर्सी पर मां की बहन फिलिमाइन चूनी और उनके अध्यापक पति लूके चूनी बैठे थे। अपने न होने पर भी मा के पास यह अधेड दम्पत्ति सुदूर आस्ट्रेलिया से यहां आये थे। उनका उद्देश्य या मदर को और मदर को बनायो तमाम सस्थाओ को देसना। तीन कोई तसवीर सोचकर साया था, और कोई अपनी लिखी कविता पढ़कर मुना रहा था, बहुत-से गाना भी गा रहे थे। अधिकतर बच्चे बार-बार अपनी मा 1. मा तारा, बदामोरहाँ रहें।
12 मां टेरेसा - 'मदर टेरेसा' के प्रति इस शुभ दिन पर प्रेम प्रकट करने में व्यस्त थे। जिन मां ने अपना प्यार उजाड़ दिया था, उन मां को उनका थोड़ा-बहुत लौटाकर सचमुच कितना संतोप था! मां भी संतानों के प्यार में तन्मय थीं। मैंने मां से जानना चाहा---इसमें ऐसा क्या आनंद निहित है जिसके लिए आप पागल हैं ? कमर के नीचे से चाबियों के गुच्छे पर नहीं, जपमाला पर हाथ रखकर बोली, "यह तो यीशु की बात है ! क्यों, यीशु ने ही तो कहा था, 'मैं भूखा हूँ, मुझे भोजन दो। मैं नंगा हूँ, मुझे वस्त्र दो। मैं निराश्रित हूँ, मुझे आश्रय दो। मैं प्यार के लिए कंगाल हूँ, मुझे प्यार दो।' प्रेम के राजा यीशु तो बच्चों के रूप में, अनाथ बनकर, पंगु होकर, इनमें ही विराजमान हैं !" "जो लोग जीवों पर प्रेम करते हैं वे लोग ही ईश्वर की सेवा करते हैं।" स्वामी विवेकानन्द के इस आदर्श में विश्वास रखने वाली मदर टेरेसा बोली, "जेव से दो-चार पैसे दे देने से ही दरिद्रों की सेवा नहीं होती। धन के साथ-साथ उन्हें प्यार देना होगा। खोटा रुपया जिस तरह वाज़ार में कोई दूकानदार नहीं लेना चाहता, उसी तरह प्यार अगर हृदय से नहीं आता तो वह खोटे रुपये ही की तरह - . मां को समीप पाकर पूछा, "अच्छा मां, आपका शैशव-कशोर्य कहां बीता? जन्मभूमि कहाँ है ? और कव संन्यासिनी का जीवन चुना ?" प्रश्नों को सुनकर मां के चेहरे पर मुसकान छा गयी । मुसकान-भरे उस चेहरे से हम सभी परिचित हैं । शुद्ध और अनास्वादित आनंद की प्रतीक इस हँसी के माधुर्य को आँखों से देखे विना विश्वास करना कठिन है। "मेरा घर? वह तो एक सुख का नीड़ था। स्कूल की छात्रावस्था में अन्तर्यामी की पुकार पर जब ध्यान दिया-जव संन्यासिनी बनने के लिए मन फड़कता था, तब तो यह सोच कर बहुत बुरा लग रहा था कि मुझे यह सुंदर घर छोड़कर चले जाना होगा-वहां नहीं, यहां नहीं, कहीं और, और कहीं।" पहाड़ों से घिरे दार्जिलिंग के कर्सियांग में जेसुइटों के सेवा के कामों की वातें सुनकर हजारों मील दूर बैठकर कुमारी टेरेसा के मन में मिशनरियों के संपर्क में आने के लिए कुतूहल उत्पन्न हुआ। उस समय उनकी आयु थी ही कितनी? बहुत होगी तो वारह-तेरह बरस की होगी। छुटपन में स्कपजे शहर के स्कूल में क्लास में यूगोस्लाविया के जेसुइटों की चिट्ठियाँ पढ़कर सुनायी जाती थीं। उन सव चिट्ठियों में जेसुइट कलकत्ते की बातें लिखते थे। टेरेसा के किशोर मन में उस समय से ही कलकत्ता शहर का चित्र तैरना शुरू हुआ। यूगोस्लाविया के जेसुइट उन दिनों कलकत्ता में काम करते थे। भावी जीवन का पथ अनुसंधान करने के लिए वारह बरस की आयु क्या कम नहीं होती? प्रेम के संसार में आयु के कमोवेश होने का कोई अर्थ नहीं होता।
मा टेरेसा :: 13 मां-भाई-बहन के संसार में वे अच्छी तरह थी। अचानक इस पथ पर क्यों आयों? और अगर आयो ही, तो सात समुंदर तेरह नदी पार कर यहाँ, इस कलकत्ता में ही क्यों आयों? जलूमो के शहर, दुस्वप्नों के नगर ने उन्हें किस प्रकार आकर्षित किया? "सब उनकी इच्छा है । इट इज ए कॉल फाम हिम," बडे सहज भाव से मो टेरेसा ने जवाब दिया। आत्म-प्रचार-विमुष यह महान महिला अतीत को घसीटकर नहीं लाना चाहती। बात करते-करते मां का मुमकराता चेहरा मानो कही सो गया । क्षण-भर के लिए अपने में चला गया। जादू या किसी अलोकिक घटना पर विश्वास न रहने पर भी सन् 1946 का दस सितवर का दिन उनके मन के रत्नगृह में मृत्युपर्यंत स्मरणीय रहेगा। यह दिन उनके लिए 'इस्पापरेशन है। 'हे ऑफ़ डिसीजन' के रूप में गिनने योग्य है। इसके सत्रह वरम पहले सन् 1928 में मात्र अठारह बरस की आयु मे शिक्षक का काम लेकर वे कलकत्ता आयी। इंटाली के सेंट मैरी स्कूल में ही मां टेरेसा ने अध्यापन का काम शुरू किया। इंटाली लोरेटो से लगे हुए इस स्कूल में वे अठारह बरस तक पढ़ाती रही। भूगोल पढ़ाती थी। कई बरस तक अध्यक्ष का काम भी इसी स्कूल में किया था। बाद में लोरेटो के शिक्षक के काम में वे नियुक्त हुई। इस लोरेटो स्कूल में शिक्षण के समय मां टेरेसा के जीवन में दूसरी वही घटना हुई। लोरेटो की ननो के साथ परोक्ष रूप से युक्त 'डॉटसं ऑफ सेंट ऐन' का भार उन्हें मिला। सेंट मेरो स्कूल की दीवार के बाहर मोतीझील बस्ती थी। हां, इसी वस्ती मे मो टेरेसा ने सबसे पहले दरिद्रता से साक्षात्कार किया। दरिद्रनारायण की सेवा में उनका मन रो उठता। स्कूल की आधी छुट्टी के समय वे बीच-बीच में सामने की मोतीझील बस्ती में चली जाती। कच्चे घरी के आंगन में बैठकर लड़के-लड़कियो के सुख-दुस को कहानियों मुनती। लोटकर क्लास में बैठकर दरिद्र पिता-माता की निष्पाप सतानो को दुख-दुदंशा का चित्र उनकी आँसो के आगे तैर जाता। पढ़ाना समाप्त करके छात्राओ को बुलाकर कहती, "तुम घर से रोज आधी छुट्टी के लिए खाना लाया करो। सप्ताह में एक दिन का खाना क्या तुम सामने की वस्ती में रहने वाले लड़के-लड़कियों को नहीं दे सकते हो ?" मां की बात पर सभी हाथ उठाकर सहमति प्रकट करते। दिन-पर- दिन यह सारा दश्य देखने के बाद उनके भीतर और बाहर प्रबल उपलमुपल उत्पन्न हो गयी। मानो किसी ने हृदय के द्वार पर पपकी दी हो। वे फिर रुकन सकी। बड़े दिन से पहले ट्रेन पर दार्जिलिंग जाने के दौरान उनका मन उलट- पलट हो गया। ऐडियाटिक की विशालता और हिमालय का विराटत्व-इन दोनो के सम्मिश्रण से गठित उनके देह-मन में एक परिवर्तन का ज्वार 1। वही दिन उनके निर्णय लेने का दिन हुआ।
14 :: मां टेरेसा चार - जैसे मुझे किसी ने पुकारा हो । ट्रेन भागी जा रही थी। चारों ओर चार मनोरम पर्वतमालाओं को पीछे छोड़ती हुई गाड़ी बढ़ती जा रही थी। इसी के बीच अंतर के अंतःस्थल में वह आह्वान-वाणी सुनने को मिली। "आई हर्ड द कॉल टु गिव अप ऑल, ऐंड फ़ॉलो हिम टु द स्लम्स टु सर्व हिम अमंग्स्ट द पूअरेस्ट ऑफ़ पूअर ।" माँ ने दार्जिलिंग जाने की राह में ट्रेन में, सन् 1946 के दस सितंबर की तारीख को आह्वान-वाणी सुनी थी। और उसी शैलशिखर पर, हिमालय की शांत निर्जन गोद में उसी तारीख़ के ठीक पैतीस बरस पहले सन् 1911 की 13 अक्तूबर को शुक्रवार के सवेरे भगिनी निवेदिता देह त्यागकर चिर-निद्रा में खो गयी थीं। महाप्रस्थान के समय निकटवर्ती समझकर उस दिन सवेरे अपनी सबसे अधिक प्रिय रुद्रस्तुति का पाठ किया, "असतोमा सद्गमय, तमसोमा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय । अविरावीर्य एधि।"-असत् से हमें सत्य की ओर ले चलो, अज्ञानांधकार से हमें प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से मुझे अमृत की ओर ले चलो, स्वयं प्रकाशित परब्रह्म, मेरे निकट ज्योतिर्मय रूप में प्रकट हो । उपनिषद् की यह दिव्यवाणी उच्चारण करते समय अपने अंतर का आनंद उनके मुख पर दीप्त हो गया था। निवेदिता ने दिव्यवाणी का उच्चारण किया और मां टेरेसा ने दरिद्रतम मानवों की सेवा में आत्म-समर्पण करने के लिए दिव्यवाणी सुनी। अंतर के अंत:- स्थल में उसे अनुभव किया। किंतु स्कूल की शिक्षिका के लिए इस प्रकार से आत्म- समर्पण संभव न था। दार्जिलिंग जाने वाली ट्रेन के डिब्बे में बैठकर सुनी आह्वान- वाणी पर मां ने ध्यान दिया, पुकार सुनी। मात्र दो वर्ष में सन् 1948 के बीचों- बीच मा टेरेसा ने मिशन के अधिकारियों से लोरेटो छोड़कर चले आने की अनुमति मांगी। आवेदन-पत्र में वे अपने मन की इच्छा प्रकट करना न भूलीं। किसी बड़े आदमी के संपर्क में आना अथवा किसी बड़े काम का दायित्व लेकर विदेश जाना, अथवा अन्य कोई महत्वपूर्ण वात न थी। तब बात क्या थी? शहर की दीन-दरिद्र बस्तियों के रहने वालों के साथ वे मिल जाना चाहती थीं। उन्हें प्यार करना चाहती थीं। सेवा के माध्यम से अपने को आनंदित करना चाहती थीं । आनंद पहुंचाना चाहती थीं यीशु को, यीशु के मन को। इसी के लिए प्रार्थना- । पर था। शहर के केंद्रबिंदु में लोरेटो स्कूल की चहारदीवारी से घिरा सुंदर उद्यान, शांतिमय परिवेश उन्हें मुक्ति का स्वाद न दे सका। भगवान का नाम लेकर केवल अपने को, अपने जीवन को पवित्र करना ही मनुष्य का मुख्य लक्ष्य नहीं है। कलकत्ता का जन-जीवन, विशेष रूप से लाखों गरीब बस्ती के रहने वालों के दुख- मोटेरेसा :: 15 दारिद्रय ने उनके कोमल हृदय पर गहरा प्रभाव डाला। बचपन में अंग्रेजी पुस्तक में पढ़ी 'द लेडी विद द लंप' रचना याद बायो। फ्लोरेंस नाइटिंगेल के जीवन पर आधारित यह प्रबध मन पर एक गंभीर अनुभूति उत्पन्न करता। स्कूटरी नाम की किसी जगह का नाम हममें से बहुतों ने सुना हो नहीं है, फिर भी वहाँ के असताल को तसवीर जैसे कि हम अपनी यासों के आगे देख सकते हो। क्रीमिया के युद्ध में पायल सैनिको के मुंड-के-झुंड वहीं लाये जाते थे। चारो ओर घायल सैनिकों की चीख-पुकार, एक बूंद जल की आगा मे मृत्यु पथ का पानी कोई सैनिक तड़प रहा था। इस हालत में कोई-कोई तो मृत्यु की गोद में चले गये। कुछ मामूली चिकित्सक और सेविकाएं अपक परिश्रम कर रही थी। इनमे ही खड़ी पी पलोरेंस नाइटिंगेल-ममता, सेवा और सहनशीलता की प्रकाशमान प्रतीक। गहन रात्रि में जब सभी विधामरत ये, उस समय भी उसकी आंखो में नीद नहीं थी। अनन्द्र प्रहरी की भांति वे दीपक लिये घूम-घूमकर देन रही थी, वहां कौन यत्रणा से कातर सैनिक सेवा की प्रतीक्षा में है ? फल्पना या यह चित्र हमारे मन में एक पवित्र भाव उत्पन्न कर देता। अपने चारों ओर की धरती सहसा और भी अच्छी लगने लगती। फ्लोरेंस नाइटिंगेल को हमने इतिहास के पन्नो से पहचाना। लेकिन हमारा बड़ा सौभाग्य है कि सेवाधर्म के क्षेत्र में उनको वाद की एक महिमामयो को समसामयिक काल में अपने बीच पाया है। सोचने में आश्चर्य होता है कि वे हमारे देश को महिला नहीं है। फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने जिस वर्ष शरीर त्याग किया उसी वर्ष अर्थात् 1910 ई० को 27 अगस्त की तारीख को सुदूर यूगोस्लाविया के स्कपजे शहर में एक अलवेनियन परिवार मे मो टेरेसा ने जन्म लिया। और मान अठारह वर्ष की उमर में मिशनरियो के काम से गगा-तीर के प्राय. तीन सौ बरस पुराने, जॉब चानक के इस शहर मे चली आयी। अनाहार, अनादर और उपेक्षा मे जो तिल-तिल कर घुलकर मर रहे हैं उनके पास पहुँचने के लिए ही वह आवेदन पा। रोम भेजने के साथ ही प्रार्थना- पत्र स्वीकृत हो गया। पिंजरे मे बद पक्षी को मुक्त आकाश का स्वाद पाने पर जो महसूस होता है, टेरेसा का जीवन भी उसका अपवाद नहीं है। मात्र अठारह बरस की उम्र में सुदूर यूगोस्लाविया से कलकत्ता लोरेटो स्कूल की शिक्षिका के रूप मे चली आयी। तब तक यह पश्चिमी बंगाल बनकर, उनका स्वदेश, अपनी भूमि बन चुका था। मां से पूछा, "क्या आपने भारतीय नागरिकता ग्रहण को है ?" "निश्चय ही ग्रहण की है। आई ऐम ऐन इडियन वाई वायस ऐंड य भार ऐन इडियन बाई ऐक्सीडेंट ।" मां का प्रतिभावान जवाब था। कलकत्ता में रहने के कई बरस बाद मां ने अपनी इच्छा से भारतीयता स्वीकार की थी।
16 :: मां टेरेसा पाँच - प्रार्थना-पत्र तो मंजूर हो गया। लेकिन कहां जाकर रहेंगी, क्या खायेंगी? सव कुछ अनिश्चित था। 'कि रवे आर कि रवेना, कि हवे आर कि हवे ना, ओ रे हिसावी-~-ए संसारेर माझे कि तुइ तोर भावना मिटाबिकवि का यह कथन याद कर या, मालूम नहीं, सहाय-संबलहीन युवती मेरी टेरेसा किस तरह मदर टेरेसा बन गयों ! वह एक आश्चर्यजनक कहानी है। ईश्वर की अनुभूति से आरंभ कर माँ टेरेसा को जीवन में सब कुछ मुक्त रूप से मिला। खिड़की के दरवाजों से कहीं जाने के पक्ष में वे नहीं हैं। उनका कहना है, पिछवाड़े के दरवाजे से जाना तो जाना ही नहीं होता है। उसका. एक दूसरा नाम पिछड़ जाना है। सन् 1928 के अगस्त के महीने में मां टेरेसा ने कलकत्ता आने के बाद लंबे सत्रह बरस जहाँ बिताये, जिन अध्यापिका-छात्राओं के साथ दिन के-वाद दिन, महीने-के-बाद महीने, बरस-के-बाद बरस बातचीत की, सुख-दुख की बातें की, जीणं वस्त्र की तरह लोरेटो के वे रंग-बिरंगे दिनों का मोह त्याग कर चली आयीं। अछूत, गंदी कहकर जिस मेहतरानी से हममें से बहुत लोग बचकर निकलने के अभ्यस्त हैं, उसी मेहतरानी की पोशाक, नीले किनारे की सफ़ेद साड़ी, उन्होंने अपने शरीर पर पहनी। 'के वोले तोमारे बंधु अस्पृश्य अशुचि, शुचिता फिरिछे सदा तोमारि---कवि की इस उक्ति को मां टेरेसा ने प्रत्येक मर्म में प्राप्त किया है । भारतीय नारी के दृष्टिकोण और मनोभाव के संबंध में भी उनका जानकारी से उपलब्ध ज्ञान है। कथोलिक संन्यासिनियों में उन्होंने ही पहले भारतीय नारी की पोशाक साड़ी को ही अपने मिशन की पोशाक के रूप में ग्रहण किया। और क्या केवल पहनने के कपड़े ही? भारतीय आदर्श में रहना-खाना भी मिशनरीज ऑफ़ चैरिटीज़ की अन्यतम विशेषता है । फर्श पर घुटने मोड़कर बैठना, वाल्टी में पानी लेकर फ़र्श पर हाथ पटक-पटककर गंदे कपड़े निचोड़ना, हाथ की मुट्ठियों से भात, दाल, तरकारी, दही-यह सब खाना, सभी मां टेरेसा के कल्याण में है। यह उनका ही रिवाज है। भारत के ग़रीब जन-साधारण में काम करने के लिए पूरी तरह भारतीय वनना पड़ेगा~माँ टेरेसा इस बात पर पूरी तरह से विश्वास करती हैं। वही तो होगा ! वे हमारी मां हैं न ! उन्होंने नीली साड़ी के ऊपर क्रूस का चिह्न टांक लिया है। इस तरह अभाव, 1. यया रहेगा और पया नहीं रहेगा, क्या होगा और क्या नहीं होगा, बरे हिसाव किताव करने वाले ! इस संसार में पया तू अपनी चिता दूर करेगा? 2. मेरे बंध ! तुम को अछूत गंदा कौन कहता है ? शुचिता तो सदा तुम्हारे पीछे भागती रहती है।
माटेरेसा :: 17 ग्ररीबी, दारिद्रय का जीवन मां ने चुन लिया। विल अनुभूति अथवा यावंग में परिचालित होकर मंजिल पर नहीं पहुंचा जा मरता है । इमीलिए पहले ही चिकित्सा, दवा-दारू के सबंध में प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने की ओर माँ ने ध्यान दिया। सेवा करने के मार्ग पर चलने के लिए प्यार के माय-माप इस मानी भी अत्यन्त आवश्यकता होती है। पीड़ितों की सेवा भारत में नयी नहीं है । ईमा के पहले तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक के राज्यकाल में पहले-पहल पीड़ितों को सेवा के लिए अस्पताल वने । ईमापूर्व की चौथी शतान्दी में राजा बुद्धादिश ने भी 'वैग्जामा' नाम में रोगियों की सेवा के लिए एक प्रकार का प्रतिष्ठान स्थापित किया । मम्राट का आभिजात्य दूर कर अपने हाथों से रोगी और दुमी लोगों की सेवा का भार ग्रहण कर ईसवी सप्तम शतक मे सम्राट हर्षवर्धन ने अपने साम्राज्य के भिन्न-भिन्न कत्रों में रोगियों को चिकित्मा को व्यवस्था की। बारहवें शतक में राजा पराक्रम. बाहु ने आधुनिक अस्पतालों के समान स्वास्थ्य केंद्र के निर्माण के काम में अपना कोशल प्रदर्शित किया। मिस्र के कैरो नगर में सुल्तान अल ममूर ने 1283 ईस्वी मे जो अस्पताल बनवाया वह बहुत ही ऊंचे स्तर का है। ईमा मसीह के परवर्ती समय में ईसाई संमार के तमाम स्थानों पर सेवा के उद्देश्य से अस्पतालों की स्थापना हुई। महामान्य पोप के निर्देश से विभिन्न चर्को ने इन दातव्य सस्थाओं के निर्माण में योग दिया । इतिहास के पृष्ठों से इन सब उद्धरणों का उल्लंग करने का केवल एक कारण है, और यह यह दिखाना है कि मेवा के आदर्श में सचेत होने की घटना प्राचीन काल से ही चली आ रही है। प्रत्येक काल में इसका रूप बदला है। किन्तु, यह अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि मा टेरेसा-सी महान महिला का एक युग में एक से अधिक जन्म नहीं होता। उन्होंने लोरेटो की मंहगी महंगी पोशाक-ओशाक उतार डाली। 'Poverty istreedom'-गरीवी ही स्वाधीनता है-इस सत्य पर विश्वास करने वाली मा टेरेसा नमिग की ट्रेनिंग लेने पटना गया। वहां अमेरिका मेडिकल मिगनरी सिस्टरों से सब बताया गया।निग समाप्त होने पर वे लौट आयीं । सौट आपों अपने प्यार के नगर इस कलकत्ता में। मां ने धर्म के अनुशासन को कभी अस्वीकार नहीं किया। किसान जिस तरह आबोहवा को मान लेता है, समुद्र में दूझान उठने पर मल्लाह को जिम तरह 18 :: मां टेरेसा उसका सामना करना पड़ता है, उसी तरह मां भी धर्म से संबद्ध सब बातों को मानने की अभ्यस्त हैं । वे क्रांतिकारी बातें नहीं करतीं । दो-एक बरस बाद जब वे लोरेटो स्कूल से कलकत्ता की सड़कों पर निकल पड़ी तो उनकी जेब में सहारे के लिए केवल पांच रुपये थे। उन्होंने सियालदह के पास एक पुराने मकान में आश्रय लिया। वहीं खाना-पीना भी होता था। कई परित्यक्त शिशुओं को लेकर यही उनके प्यार की दुनिया शुरू हुई। पहला बरस बड़े कष्ट में वीता था। कमरे में जगह की कमी थी। दाल-चावल की भी कमी थी। अनिद्रा में न रहने पर भी उन्हें कभी-कभी अनाहार ही काटना पड़ा था। मां का कहना है, "हम एक दिन या एक वेला खाये विना उपवास करते हैं, उससे ही कितनी समवेदना होती है। और जो दिनोंदिन विना खाये या आधा खाये रहते हैं, उनके मुंह में दो मुट्ठी अन्न दे देना तो दूर की बात, जो बिना कुछ खर्च किये संभव हो सकता है, वह मौखिक सहानुभूति भी क्या हम देते हैं ?" प्यार-एकमात्र प्यार को ही जिन्होंने जीवन के सर्वश्रेष्ठ मूलधन के रूप में चुन लिया है उन्हीं के लिए उपेक्षितों में खाली हाथों कूद पड़ना संभव है । मानव को प्यार न कर सकने पर जीवन कभी भी सर्वांग सुन्दर नहीं हो सकता । अकृत्रिम प्यार के विनिमय में ही किसी आदमी में स्वार्थवश घृणा करने का अधिकार उत्पन्न होता है । वह कभी अच्छा नहीं चुनता । किसी भी हालत में किसी को घृणा करने का अधिकार नहीं है। बहुतों का प्रेमी-प्रेमिका के 'प्रेम और घृणा' के संबंध में भी वही मत है। मां को 1948 में इक्कीस दिसंबर को सियालदह के पास एक वस्ती में स्कूल खोलने की अनुमति मिली। दूसरे वरस फरवरी के जाड़ों की एक सुबह उन्हें मौलाली के पास एक घर में जगह मिली। प्राची सिनेमा छोड़कर मौलाली के मोड़ पर जाते हुए दाहिनी पटरी पर 'डेन्टल कॉलेज' है। इसी डेन्टल कॉलेज से मिलती हुई जो गली राजा सुवोध मल्लिक स्क्वायर में जाकर मिलती है उसी का एक मकान मां का ठिकाना हुआ। मकान के मालिक हैं माइकेल गोमेज़। मकान तलाश करने में बहुत तकलीफ़ न हुई। लकड़ी की सीढ़ी चढ़कर तीसरी मंजिल पर चढ़ते ही एक अधेड़ महिला से भेंट हुई। परिचय देते ही वह विवाहित महिला बोली, "माइकोल गोमेज़ मेरे पिता हैं। वैठिये, बुला देती हूँ।' साड़ी का आंचल पीछे से खींचकर महिला बिजली की तेजी से पास के कमरे में घुस गयों। कमरे की दीवार पर मां की तसवीर टंगी थी। पास ही कास पर चढ़ी ईसा की तसवीर थी। थोड़ी दूर पर स्वर्गीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की एक प्रति- कृति थी-बहुत दिन पुरानी। कुछ देर बाद माइकेल आये। उस समय सवेरे के नौ बजे थे। आने का कारण मोटेरेमा :: 19 जानकर परिचय देते हुए पचास से कार के यह सम्जन बोले, "देगिये, मदर हमारे यहां ही रहती थी। हम लोग उनके तमाम मुस-दुमो के सापी हैं। भूलने की बात नहीं, लेकिन उन दिनों की बातें तो हम आपरा बता न सकेंगे। मदर पर भी नहीं चाहती कि उनके कष्टों के दिनों के बारे में किसी को मालूम हो।" वास्तव में, मां के लिए सस-दुस में कोई अंतर नहीं है। दुग में में हो तो आनन्द का उद्गम होता है । इमीलिए तो शोकगापाओं के गीत ऐमे मपुर होने हैं । सुख और आनन्द मे अन्य ही काम्य होता है। गोमेज़ की लहकी से ही दो-एक दिनों को अलग घटनाओं को मना । जून. जुलाई का महीना होगा। भद्र महिला को मन् नहीं याद आया।...बाहर बहुत वर्षा हो रही थी। रात को दस के लगभग मदर भीगी भीगी ठिकाने पर लौटीं। आधे घंटे बाद मदर ने मेरे पिता के पास एक पुर्वा भेजा। पुजे में मां ने निगा पा, "गोमेज, घर में एक दाना चावल नहीं है । और अभी दो भूमे लोग आये हैं। तुम अगर कुछ मामूली-सा चावल उधार दे दो तो दोनों मेहमानो को भूग दूर को जा सकती है।" एक-दो दिन की नही, रोजाना को यही घटना थी। वे कभी विचलित नहीं हुई। राह चलने में रुकावट तो आती ही है। इसीलिए कहा जाता है कि पतवार छोड़कर वे रोने नहीं बैठ गयी हैं। जीवन गुलाब के फूलो की मेज नहीं है, इम सचाई को मानकर ही हर ओर उपलब्धि कर आगे बढ़ना होगा। माइकेल गोमेज़ का यह मकान बहुत दिनों पुराना है। पिता से मिला है। सन् 1947 में देश-विभाजन के समय गोमेज़ के चार भाइयों में दो भाई पूर्वी पाकिस्तान(आधुनिक बाग्ला देश)में चले गये। कलकत्ता के आविगप की सलाह से ही यहां के ईमाइयों की सेवा के उद्देश्य से आकविशप ने उन दोनों से जाने को कहा था। बडे भाई मदर टेरेसा को जानते थे। उसका कारण था कि उनकी सडको इटाली में पढ़ती थी। मदर वहाँ पढ़ाती पी। किन्तु, माइकेल गोमेज उस समय भी मदर को नहीं पहचानते थे। गोमेज की मां एक बार बहुत बीमार हो गयी। फादर हेनरी ने अतिम क्षण समझकर 'भगवान की कृपा-प्राप्ति की राह' या वैमा ही कुछ पढ़कर सुनाया। इसी समय फ़ादर ने उनसे एक छोटा-सा मकान सलाश करने को कहा (उपर की कोठरी पर भी आपत्ति न पी) 1 मदर टेरेसा के लिए कमरे को जरूरत थी। वे मे हैं । कलकत्ता में आकर रहने के लिए ही इस तरह की कोठरी की जरूरत यो । 'प्रासाद नगरी' कलकत्ता मे आस-पास जो गरीबी का स्वरूप हम लोगों की आँखों के आगे हर रोज तैरता है उसमे काम करने के लिए मो पदना से सीधे कलकत्ता आ रही हैं। किसी अभिजात इलाके में रहने की मां की इच्छा नहीं थी। वे गरीब बस्ती में ही रहना चाहती हैं। पटना 20 :: मां टेरेसा - माइकेल गोमेज़ की लड़की उस समय बहुत छोटी थी। फादर के मुंह से यह बात सुनकर साथ-ही-साथ बोली, "हमारी ऊपरी मंजिल खाली पड़ी है। क्या आप एक बार देखेंगे ?" फादर बोले, "हां, जरा देखना चाहता हूँ।" सब कुछ देखकर फ़ादर बोले, "यह तो बहुत बड़ा कमरा है। मदर कोई छोटा-सा कमरा चाहती हैं।" माइकेल के दोनों भाइयों के चले जाने के बाद यह कमरा खाली पड़ा था। असवाव वगैरह छोड़कर इस कमरे में और कुछ नहीं था। मदर टेरेसा इसी कमरे में आयीं। साथ में वे एक लकड़ी का संदूक और एक पैकिंग केस ले आयीं। इसी से मदर की डेस्क बनी । वे एक सूटकेस और एक कुर्सी भी ले आयीं। उनकी संपत्ति में यही था। जव जिस सामान की जरूरत होती तो माइकेल गोमेज़ बड़ी खुशी से उसे मां को दे देते । घर का किराया तो दूर की वात, खाना-पीना-सामान -किसी का भी माइकेल ने मदर से किसी दिन पैसा-कोड़ी नहीं लिया। किन्तु आज से तीस बरस पहले सियालदह के पास प्राची सिनेमा के पीछे की अंधेरी गली के इस मकान में ही जो ज्योति की शिखा प्रज्ज्वलित हुई वही अव भौगोलिक सीमाएं तोड़कर देश-विदेश में फैली है। इसीलिए इस गोमेज़-परिवार का यह अवदान चिरस्मरणीय रहेगा। लेकिन आंखों पर चश्मा लगाये, सामान्य पोशाक के इस अधेड़ आदमी के चेहरे पर ऐसा कोई भाव नहीं था जिससे लगता कि वे इतने बड़े एक महान कार्य में उसके जन्म के समय से ही संलग्न हैं इसी घर में धीरे-धीरे मां का काम-काज बढ़ने लगा। एक दिन मां ने माइकेल के पास एक पुर्जा भेजा। उसमें लिखा, "एक सिस्टर चेचक से रोगाकांत होकर यहां आ रही हैं। उनके लिए क्या एक अलग कमरा देना संभव होगा?" सुनते ही प्रबंध हो गया। इसके बाद सामने आयी बाथरूम की असुविधा। दो बाथरूम थे। और इन दो बाथरूमों का उपयोग करने वालों की संख्या थी तीस । एक दिन सेंट टेरेसा के लोग वाँस के टट्टर और ईटें ले आये। छत पर नहाने के लिए कुछ जगह का इंतजाम हुआ। लड़कियों ने बहुत खुश होकर छत पर के इस बाथरूम का उपयोग करना शुरू किया। अब वे दिन नहीं रहे। आचार्य जगदीश वसु रोड पर बड़ा मकान है। बहुत लोग हैं। यहां सिस्टर खेल-कूद सकती हैं। लेकिन सब चीजों के पीछे है 'शृंखला' नाम की कुंजी। घंटा वजने के साथ ही हर रोज सवेरे अपने-अपने काम से बाहर निकलना पड़ता, प्रार्थना पर बैठना पड़ता। वे सब दिन बड़े कष्ट के थे । काम भी करना पड़ता और उसके साथ पढ़ने-लिखने का दवाव । एक बार काम में लग जाने पर घर जाने की बात मुंह से नहीं निकाली जाती। मदर इनमें कॉलेज के लड़के-लड़कियों को पढ़ातीं। मुझे सिस्टर गई उ की बात याद आती है। सिस्टर गः ड इस वक्त यमन में हैं। मैट्रिक की परीक्षा में उत्तीर्ण होकर उन्होंने मां के काम में साथ दिया। मां ने उनसे तव डॉक्टरी पढ़ने को कहा। लेकिन आवश्यक - माटरसा':: 21 । नंबर न प्राप्त करने के कारण वे आई. एस-सी० में भर्ती होगी। और उस ममय मां को एक डॉक्टर की सख्त जरूरत थी। ऐगे भी दिन बीते हैं जव कि मां को खाने का ठिकाना भी नहीं था। दरवाजे दरवाजे भीख मांगकर भूख मिटानी पड़ती। किन्तु भगवान मदा उनके पाम आकर सहे रहे । साना किसी-न-किसी तरह उनको मिल ही जाता था। मां ने जब पहला स्कूल स्थापित किया उम दिन एक भने आदमी मां को देने के लिए कुछ रुपये लेकर आये । रपया किस काम के लिए है, यह जानना चाहने पर भले- मानम ने मां से कहा, "स्कूल के लिए।" धन प्राप्ति के स्वीकृति स्वरूप भले. आदमी को रसोद दिये जाने पर वे बोले, "मैं फिर आऊँगा।" लेकिन सच यह है कि वे फिर नहीं थाये। इटाली लोरेटो के पाम मोतीझील बस्ती में पहला स्कूल स्पापित हुआ। उसके चारो ओर झोंपडियां थी। बीच मे एक टुकडा खाली जगह पर शुरू हुआ मां का स्कूल।लंक बोर्ड, कुर्मी, मेज, तिपाई-कुछ भी तो न या। और शाति निकेतन का-सा आयम का परिवेश भी वहाँ न था। पेड़-पौधे तो दूर की बात, कहीं भी हरियाली का चिह्न न पा । मां ने एक मजदूर को बुलाया। इस मजदूर ने पायड़े से मूखी घास को उखाड फेंका। जमीन पर ही एक पतली डंडी से मां ने एक-एक कर अक्षर लिखना शुरू किया। मां ने पहले दिन बंगला भाषा के अक्षर लिरो। एक प्रार्थना सुदर ढंग से पढी और अंग्रेजी कविता-पाठ मे आरम हुआ उनका शिवाक का एक नया जीवन । स्कूल खुलने का समाचार जल्दी फैल गया था या नहीं, यह तो नहीं मालूम (उसका कारण है कि ऐसे ममाचार हमारे देश के अखबारों में बहुत प्रकाशित नहीं होते), लेकिन दूसरे ही दिन एक सहृदय व्यक्ति ने एक फर्मी- मेज मां को दान कर दी। शुरू से ही सड़क पर किसी मुमूर्प आदमी को देखते हो मा विना सोच-विचार किये सेवा करने लगती। उसका कारण था कि उस समय तो पही ले जाने लायक कोई जगह न पी। दवा आदि देकर कोई सहायता करेगा या नहीं, इस मामले में मां गोमेद्ध से पूछती। सेंट टेरेसा के फादर ने आउटडोर हिस्सरी के लिए एक कोना छोड़ दिया था। बीमारों के झुंड-के-झुड ने आना शुरू किया। मेज कुर्सी की तरह दवाएँ भी एक और व्यक्ति ने दे दी। उसके बदले में उन्होंने घेला भी नही लिया। मां के काम में वे थोड़ी मामूली सहायता दे मकै, यह मोचकर ही भले आदमी खुश थे। एक दिन मां ने वरमात में एक आदमी को सडक पर मरते देना। रोजाना का प्रम होने पर भी इस घटना ने मां के कोमल हृदय पर गहरा प्रभाव डाला। इसी से उन्होंने निश्चय किया कि जिस तरह भी हो ममूर्प लोगो का एक मात्रय. स्थल बनाना होगा। दो महीनों में स्थान ठीक हुआ। शालीपाट के पाली मदिर 22 :: मां टेरेसा " के पीछे यह मकान तीर्थयात्रियों के ठहरने के लिए बना था। कलकत्ता के बाहर से जो तीर्थयात्री आते थे, वे जरूरत पड़ने पर यहां ठहरते थे। एक बड़े व्यवसायी इन तीर्थयात्रियों के लिए विना मूल्य खाने-पीने की व्यवस्था करते थे। वे अकसर तीर्थयात्रियों को कपड़े भी बांटते थे। लेकिन अंत में यह जगह जुआरियों का अड्डा बन गयी। धर्म के स्थान पर अधर्म होने लगा। इस जगह को पाने के लिए मां को बहुत अड़चनों और मुसीबतों का सामना करना पड़ा था। यह भी एक आश्चर्यजनक घटना है। पहले, जब काम शुरू किया था तो मां की अवस्था मात्र पंतीस की थी। 1948 ई० से आज तक उनके चेहरे में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ। उम्र के प्रभाव को हटाकर माँ देखने में वैसी ही हैं। बीच-बीच में चिंता में डूबी अवश्य दिखायी पड़ती। मां का पहला काम था, शिक्षा का प्रसार । इसीलिए शुरू में ही एक स्कूल खोला। मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटीज़ की सिस्टरों में सामान्यतः कोई अकेली बाहर न निकलतीं। किसी भी काम पर हमेशा दो साथ होकर निकलती। जब मां के पास न कोई सिस्टर होती न कोई साथी, उस समय माइकेल गोमेज़ की लड़की या और कोई आत्मीय स्त्री माँ के साथ होती। सवेरे आठ बजे निकलतीं और बारह बजे लौटतीं। किसी-किसी दिन एक बज जाता। एक दिन मां को लौटने में ज्यादा देर हो गयी। गोमेज़ की पत्नी बहुत चितित हो गयीं। जब मां लौटी तो सारा शरीर भीग गया था। अपनी बात न सोचकर वोली, "वेचारी लड़कियां भीग गयी हैं।" गोमेज़ की पत्नी द्वारा मां की वात उठते ही माँ बोली, "वस्ती में जो दृश्य देखकर आयी हूँ उसकी तुलना में यह कुछ नहीं हैं।" वस्ती की एक टूटी कोठरी में एक महिला कंधे पर लड़के को लिये खड़ी थीं। लड़के को बुखार हो रहा था। महिला घुटनों तक पानी में खड़ी थीं। लड़के को बचाने के लिए सिर पर एनामेल का एक वर्तन हाथ में लिये खड़ी थीं। दो महीनों का किराये का रुपया बाकी हो जाने पर महिला को इस दुर्गति का सामना करना पड़ा था। और दो महीने का किराया आठ रुपये वाकी पड़ जाने के कारण भीषण वर्षा में मकान-मालिक ने अपने आदमियों को ले छत तोड़कर महिला को भगा दिया। लड़के को उस समय 104 डिग्री ज्वर था। माँ ख़बर पाकर परेशान हो गयीं। मां बोली, "मैं अभी उस वस्ती में जाऊंगी। आठ रुपयों के लिए एक बच्चा पानी में भीगकर मर जायेगा?" महिला का मामूली-सा सामान वर्षा के पानी में डूब रहा था। एक दूसरी घटना में सिस्टर लोग एक बच्चे को मां के पास ले आयीं। लड़के के पेट में बहुत दर्द था। सिस्टरों ने बताया, "बाहर का सड़ा खाना खाने से यह तकलीफ़ हो गयी है!" मां बच्चे के पास गयीं। उसके आगे बैठ गयीं, पूछा, "तुमने पा साया था?" सवेरे, शाम को, रात में उसके पेट में एक दाना भी नहीं गया - मा टेरेसा :: 23 था। कल भी यही हालत थी, अति उपवास था। भूख ही इस दक्ष का एकमात्र कारण थी पहले तो अधिकतर काम मा सुद ही करती थी। काम करते-करते बीच. बीच में थक जाती। कभी-कभी मां को बहुत खुशामद-दरामद कर मुलाया जाता। तीन बरस पहले सचमुच उन्हें नमिग होम में जबर्दस्ती भरती कराया गया। उनका शरीर प्रायः टूट गया था। सिस्टर लोग भी घबरा गयी थी। गरीर की दुर्वलता होने पर भी उनकी मानसिक शक्ति सदा ही अटूट रही। दूसरी तरह कहा जाये तो ईश्वर में उनका असीम विश्वास है। मां के उम विश्वास, भक्ति में कभी कमी न आयी। एक बार दाजिलिंग में मां का एक पैर टूट गया। प्रधानमंत्री श्रीमती इदिरा गांधी उन्हें देखने गयीं। श्रीमती गांधी मा और मां के स्नेह के ससार-मिशनरीज ऑफ चैरिटीज की भक्त हैं। दिल्ली में प्रधानमत्री मिशनरी ऑफ चैरिटीज के भवन में बीच-बीच में फ़ोन करती रहती हैं। श्रीमती गांधी के निवास स्थान के बगीचे में तरह-तरह की साग-सब्जियां होती है। वह साग-सब्जी उस चरिटी संस्था के काम में आयेगी या नहीं, यह जानने के लिए फोन होता था। साथ-साप दान के रूप में प्रधानमंत्री वह साग-सब्जियां भेज देती। इसकी एक और दिशा पी। एक दिन दिल्ली में एक मत्री ने मिशनरीज ऑफ रिटीज के भारप्राप्त 'सुपीरियर' को एक नोट भेजा। उस नोट को विषयवस्तु थी, "अभी विदेश से सहायता के रूप में जो कम्बल आये हैं उनमे से चार कवल उम मत्री के मोटरचालक को दे दिये जायें।" भारप्राप्त 'सुपीरियर' ने नोट लेकर उसके पीछे लिख दिया, "यह कवल दीन-दरिद्रों के लिए हैं।" बांग्लादेश से 1971 ई० में लायो व्यक्तियो ने कलकत्ता के बाहरी सीमांत अचलों में आश्रय लिया। उसी समय अमेरिकी सेनेट के सदस्य एडवर्ड केनेडी कलकत्ता आये। सरकार ने सेनेटर एडवर्ड केनेडी के लिए एक पायंत्रम बनाया। लेकिन वे स्वयं ही सब-कुछ देपना चाहते थे, और उन्होंने सीधे कंपों को देखने की इच्छा व्यक्त की। केनेडी के साथ सरकारी अफसर और जिस प्रकार जन-प्रति- निधि थे, उसी तरह कलकत्ता से रिपोर्टर, कैमरामैन भी उनके साथ गये थे। हमेशा हजारो लोग उन्हें घेरे रहते थे। इमीलिए वे अच्छी तरह से देय न सके। लेकिन वे भोड़ के बीच अचानक एक गये। कॉलरा के रोगी के कपड़े साफ़ करने में एक सिस्टर व्यस्त थी, और वे सिस्टर यी : 'सिस्टर अग्नेस।' सिस्टर अग्नेस में हाथ मिलाने के लिए सेनेटर केनेडी ने हाप आगे कर दिये। किंतु सिस्टर बोली, उनके हाप गदे हैं । केनेडी बोले, "वह जितने ही गदे होंगे मैं उतना ही अपने को सम्मानित समजूंगा। आप जो काम कर रही है वह अतुलनीय है।" यह एप माइकेल गोमेज़ को स्मृति में सदा जाग्रत रहेगा। वाग्ला देश के विस्थापितों को असोम दुग-दुर्दगा देग कर मोरा हृदय रो 24 :: मा टेरेसा । पड़ा। मां ने निश्चय किया कि इनमें से ज्यादातर कमज़ोर और रोगियों के रहने के लिए एक स्थान तलाश करना पड़ेगा। सोचते ही काम शुरू हुआ । खोजते- खोजते अंत में उन्हें एक जगह का पता चला। यह था फलों का एक सुंदर बाग़ । मां ने उसका नाम रखा 'ग्रीन पार्क'-हरा उद्यान। वाग़ में बैठकर मां ने उस वाग़ के मालिक से बातचीत की। दिन-भर बातचीत चलती रही। रात में जब सब लोग बगीचे से कलकत्ता लौट रहे थे तो उसी समय मालिक की पत्नी एक गिलास में नींबू का शरवत ले आयीं । गर्मी से सव थके हुए थे। माँ बोली, "हमको वाहर कुछ भी खाना मना है।" भलेमानस वोले, "मां, मैं आपसे खाने को नहीं कह रहा हूँ। मैं आपसे यह शरवत ही पीने का अनुरोध कर रहा हूँ।" इसके बाद मां ने गिलास को मुंह के पास ले जाकर चुस्की ली। उस समय रात के ग्यारह बजे होंगे। मां दिन-भर तो निराहार रहीं ही, इतनी रात गये यह पहली बार जल-स्पर्श किया। वक्त पर ज़मीन मिल गयी। इसके पहले दिन एक टेलीग्राम मिला। टेलीग्राम में मां को लिखा था : "एक प्लेन में एक अस्पताल का सारा सामान आ रहा है।" दूसरे दिन ही हवाई जहाज पहुँच गया। एक वार मिशनरीज ऑफ़ चैरिटीज़ की सिस्टर ऐंडियस को एम० बी० बी० एस० की परीक्षा में स्वर्ण पदक मिला। वे मां के पास आयीं। उनको स्वर्ण-पदक दिखाया। माँ बोली, "सिस्टर, यह स्वर्ण पदक तुम्हारे किस काम आयेगा ?" सिस्टर ऐंड्रियस बोली, "मैंने कुछ सोचा नहीं है।" माँ बोली, "तुम्हें इस बारे में ज़रूर सोचना पड़ेगा। यह स्वर्ण पदक तुम्हारे काम का नहीं हैं। यह वेमतलव है। तुम वाहर तो प्रैक्टिस करने जाओगी नहीं, या तुम अपने नाम के साथ एम० वी० वी० एस० (गोल्ड मेडलिस्ट) तो लिखोगी नहीं। तुम तोदीन-दुखियों के वीच काम करोगी। उनके लिए यह लिखने का कोई मूल्य नहीं है। कोई और इस स्वर्ण-पदक को ले सकता है। जाओ, और अधिकारी व्यक्ति से कह दो कि यह स्वर्ण पदक तुम्हारे किसी काम का नहीं है।" यह बात सुनने के बाद सिस्टर ऐंडियस खुशी से वापस चली गयीं और स्वर्ण-पदक अधिकारियों को दे दिया। वह स्वर्ण-पदक परीक्षा में दूसरा स्थान पाने वाले छात्र के भाग्य में आया। एम० बी० वी० एस० के उस विद्यार्थी ने अपने चैवर में स्वर्ण-पदक टांग दिया। मां के संसार में सिस्टर अग्नेस, सिस्टर क्लेयर के समान मानसिक ऐश्वर्य से समृद्ध और भी कई सिस्टर हैं । मां के न रहने पर यही तो मिशनरीज़ ऑफ़ चैरि- टीज़ की अभिभावक बनेंगी। माँ इस बात को अच्छी तरह समझती हैं और इसी कारण सिस्टरों के प्रति उन्हें इतना स्नेह है। रोगी बच्चे को स्वस्थ करने के लिए माता का मन जिस तरह तड़पता है उसी तरह सिस्टरों के संपूर्ण विकास के मार्ग में कोई बाधा दिखायी पड़ने पर भी मदर को वेचैनी होने लगती है । इसका कारण - माटेरेसा 25 है कि मां अच्छी तरह जानती हैं कि सिस्टरों के काम कार के अन्दे-बुरे मे मिगत- रीज ऑफ चैरिटीज का भला-बुरा प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। उसी साल, 1949 ई० का उन्नीम मात्र का दिन भी याद रपने योग्य है। कई बंगाली युवतियां स्वय प्रवृत्त होकर मां के पास आयी। युवतियां मौकी ही विद्यार्थी थी, सिस्टर अग्नस का पहले का नाम समापिणी दास था। सिस्टर अग्नेस के बाद एक बरस मे और भी कई युवतियां शामिल हुई। ये थों मिस्टर क्लेयर (किरण दत), सिस्टर बर्नार्ड (रोजारिओ), सिस्टर डोरोपी फ्रामिम (गोमेज), सिस्टर गड (गोमेज), मिस्टर सेटीसिया (माइत गोमेज की दीदी की बेटी), सिस्टर फासिस्का (रोगरिओ), सिस्टर फ्लोरेंस विमेंट (गोमेज), सिस्टर मार्गरेट मेरी (रेजिना गोमेज)-ये सभी 1949-50 ई. में सेवा के आदर्श से प्रेरित होकर मा टेरेसा के काम में सम्मिलत हुई। बहुत आंधी-तूफान झेलकर इन सिस्टरों ने आज मां के निर्देश में अनेक जगहों पर दायित्वपूर्ण पद का भार संभाला है । नि.स्वायं सेवा के मंत्र मे दीक्षित वे नीरव काम करती रही है। 1951 ई० से, आज से उनतीस बरस पहने, मिशनरीज ऑफ़ रिटीज का दीपक जल उठा। अंधकार से प्रकाश की ओर पलने के पच्चीम वरसों के निरंतर कार्य ने मदर टेरेसा को सफलता की चोटी पर पहुंचा दिया। कोई भाषण, वक्तव्य, पत्रकार-सम्मेलन नही । यह सर उन्हें पसंद नहीं है । जीवन को अंतर्मुखी बना लेने मे ही मुस का स्वाद निहित है। मा पारितो और अवाहित लोगो मे मिल गपी। ईश्वर प्रजापीड़क नही है-वे प्रजापालक है। धर्म आत्म. पीड़न नही होता है-अपनी उन्नति का साधन, अपना आनदवदंन ही धर्म है। ईश्वर में भक्ति, मनुष्यों के प्रति प्रेम, और हृदय मे शांति ही धर्म है । भक्नि, प्रेम, शांति-इन तीन शब्दो में जो वस्तु चित्रित हुई उसको मोहिनी मूर्ति की अपेक्षा संसार में और क्या है ? मां उसी मन को लेकर आगे बढ़ी। दुटियों में, मस्तिपो में दरिद्र मनुष्यों से प्रेम का संबंध स्थापित किया। "इतने बड़े शहर में आप अकेली? ऐसे रहने में आपकी भूतपूर्व छात्रा बिलकुल निरीह एक बंगाली सड़की, सिस्टर अग्नेस है। यही तो आपकी इस समय सहकर्मी है। इस बडे भारी कर्मयश का दायित्व मेकर क्या आपके मन में कोई दुविधा, , या कोई आशंका नही होती ?" "न, कोई आशका उत्पन्न नहीं होती।"
26 :: मा टेरेसा पैसठ वरस की कल्याणमयी मां ने बहुत धीरे और दृढ़ता से जवाब दिया। ज़रा रुककर बोली, "मैं जानती हूँ। ईश्वर ने ही मुझे इस पथ पर चलाया है। यह विश्वास मेरे हृदय में बहुत पहले ही हो गया था।" कम बातें। लेकिन मां के मुख पर ये दो-चार बातें ही कसी अच्छी लगती हैं ! उनका कंठ-स्वर मुग्ध था। कभी-कभी एक ही मामूली-सी बात में शोक, प्रेम, आनंद की अभिव्यक्ति ऐसी मनोमुग्धकारी रहती कि वह लंवी वक्तृता में भी संभव न होता। माँ ने ही तो कहा था, "मैं अगर सोचूं कि यह सारे काम में ही करती हूँ तो जीवित अवस्था में न होने पर मेरी मृत्यु के बाद मेरे काम भी समाप्त हो जायेंगे। यही स्वाभाविक परिणति होती है। मेरा दृढ़ विश्वास है, भगवान ही हमारे द्वारा सब-कुछ करा लेते हैं। तभी तो 'पंचभूत' में मिल जाने पर भी काम की कभी मृत्यु नहीं होती। भगवान ही किसी और के द्वारा काम करा लेंगे।" मधुर श्यामा- संगीत के कलाकार स्वर्गीय पन्नालाल भट्टाचार्य के गान की पंक्ति-'सकलइ तोमारइ इच्छा, इच्छामयी तारा तुमि, तोमार कर्म तुमि करें मां, लोके बॅले कॅरि आमि''—यही है मां के जीवनादर्श की मूल वात । मानव के साथ मानव के प्राणों का संयोग-स्थापन प्रेम द्वारा ही संभव है। यह प्रेम ही सभ्यता की मूल स्वीकृति है। हमारे देश में उच्च वर्ग और निम्न वर्ग में परस्पर सहृदयता ज़रा भी नहीं है। कुछ अपवादों को छोड़कर उच्चवर्ग के विद्वान लोग मूर्ख और ग़रीब लोगों के दुख से दुखी नहीं होते। और मूर्ख, ग़रीव लोग धनवान और विद्वान लोगों के किसी सुख से सुखी नहीं होते। यह सहृदयता का अभाव ही देशोन्नति के मार्ग में प्रमुख बाधा है। धन का अभाव उतना नहीं जितना कि प्रेम का अभाव दोनों वर्गों में दिखायी पड़ता है। वर्णगत भेद बहुत-कुछ दूर होने पर भी आदमी-आदमी में प्रेम-प्रीति-स्नेह का संबंध कटु से कटुतर होता जा रहा है । विज्ञान के युग में हम करोड़ों मील दूर चांद पर उतरे हैं। वहाँ पैदल चले हैं। लेकिन वही महाकाश पर विचरण करने वाले पृथ्वी-तल पर लोटने के लिए आकुल हो गये थे। करोड़ों मील की दूरी को यदि निकट लाना संभव होता तो मनुष्य के साथ मनुष्य के प्यार में अंतर कैसे रह जाता? तभी तो इस शोर- शरावे में मां की समीपता में आकर एक परिपूर्ण जीवन का स्पर्श मिलता है। नीरवता में मिट जाते हैं सकल संदेह, ठहर जाते हैं सहस्र वचन । कलकत्ता शहर में राह चलते-चलते अचानक किसी व्यक्ति से पूछिये : यहाँ सवका प्रिय कौन है, सब लोग किसे प्यार करते हैं ? किसी बड़े राजनीतिक नेता का नाम कोई न लेगा। बहुतों के मुंह से एक ही नाम सुनायी देगा। और वह है जननी करुणामयी मां टेरेसा का नाम । जाति के अभिमानी बंगालियों में साड़ी, 1. सब तुम्हारी ही इच्छा है, हे इच्छामयी मा तारा ! तुम अपना कार्य स्वयं करती हो, मा, और लोग कहते हैं कि हम करते हैं।
मा टेरेमा :: 27 .. पहने श्वेतागिनी विदेशिनी ने किस मंत्रवत से यह जनप्रियता अजित की है, उमका कुछ आभास मिल जायेगा कालीघाट के अत्यंत प्राचीन मंदिर काली मंदिर के पास आने पर। हिंदुओं के धार्मिक विश्वास का केंद्र-विद कालीपाट का यह काली मंदिर है। हर रोज यहाँ शक्ति की उपासना होती है। काली पूजा के समय मुंड- के-झुह भक्त यहां आते हैं। इन सारे भक्तों के ठहरने के लिए काली मदिर की दीवार से लगी जगह में कुछ धर्मशाला-सी बन गयी हैं। उस तरह की एक परि- त्यक्त धर्मशाला कलकत्ता की नगरसभा ने 1952 ई. में मदर के हापों में दे दी। कालोपाट के मंदिर में लगे फीके पीले रंग के एकमजिले मकान में घुसते ही बड़े ब्लैक बोर्ड की तरह एक बोर्ड पर लिये शब्द दृष्टि सोच लेते हैं : Corporation of Calcutta Nirmal Hriday Home for dying destitutes इसके नीचे बैंगला में लिखा है : कसकता पोर प्रतिष्ठान, निर्मल हृदय, मुमूर्षु निरामयों का आश्रय-स्थान । साइनबोर्ड को लेकर बहा भारी आदोलन हुआ था। मदिर के साय ईसाई प्रतिष्ठान-असंभव । न, यह नहीं हो सकता। इस तरह की संस्था यहाँ रह ही नही सकती । कट्टर हिंदुओं का एक भाग विगड़ उठा। मंदिर के पार सौ पुजारी भी बिगड़ गये । वे एक साप शोर मचाने लगे। विरोध प्रगट किया। किसी-किसी ने तो यह भी कहना शुरू कर दिया, "ब्रिटिश राज में जो नहीं हुआ, वही स्वतत्र भारत में होगा?" बहस-मुबाहिमा, धरना, व्याक्षरान-पर-व्याख्यान ! आलोचना के बाद जब गड़बड चोटी पर पहुँच गयी तो एक दिन शाम को मासुद ही मापी। धीर-स्थिर चित्त से आगे बढ़ी। विरोधियों से बातें की-"आप लोग अगर मुझे मारना चाहते हैं तो मारिये, उसमें कोई नुकसान नहीं, लेकिन इस मकान में जो कष्ट में पड़े शरणार्थी है, दया कर उन्हें परेशान न करें। दुनिया का मोह छोड जाने के पहले उनको जरा शाति में रहने दीरिये।" आग में पानी पाने के समान अचानक गहरी रात की-सी नीरवता छा गयी। सारे पुजारियोमा चेहरा मौकी ओर लगा था। यह तो यीशु की प्रतिध्वनि पी ! कम पर घडे, प्रबल पोडा मे कातर, यीशु ने ही तो कहा था, "हे प्रभ, तुम इनको क्षमा कर दो ये लोग नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।" और कुछ न कहकर ये दो ही बास्य महकर तो योगु गोस्ट अमर होकर हमारे हृदयासनों पर विराज गये। मां की भी तो यही बात पो, 'मुझे मारोतो कोई हानि नही, मृत्युपय-यात्री इन पीड़ितों को रासो मेने दो।'
28 माटेरेसा - यहीं अंत नहीं है। कुछ दिन बाद आंदोलनकारी पुजारियों में एक व्यक्ति को दुःसाध्य यक्ष्मा रोग हो गया। मां जिस प्रकार अपनी संतान पर ध्यान देती हैं उसी तरह मां टेरेसा ने उस पुजारी की सेवा की। पुजारी को मृत्यु के हाथों से वचाना संभव न हुआ। किन्तु यही सही है कि आत्मीय स्वजनों से उन्हें जो नहीं मिला वह मां से मिला। इसका मूल्य ही क्या कम है ? इसके बाद सबका हृदय- परिवर्तन हुआ । काली मंदिर के पुजारी, भक्त-सभी मां टेरेसा के भक्त और समर्थक बन गये । एक पुजारी ने मां को प्रणाम कर कहा, "मैं तीस बरसों से मां काली की पूजा करता मा रहा हूँ। आज तुम में ही अपनी मां का साक्षात कर धन्य हो गया। मेरा जीवन सार्थक हो गया।" केवल साइनबोर्ड टांगकर शोभा बढ़ाना ही नहीं, कोई मुमूर्षु व्यक्ति, परिचित हो या अनजान, यदि इस मकान के आगे एक बार आ जाये तो उसके जीवन का दायित्व इस 'निर्मल हृदय' पर हो जाता है। यहाँ का दायित्व जिन पर है मैंने उनसे ही पूछा था, "अच्छा, आपके पास दो कमरे हैं। एक में पुरुष हैं, दूसरे में महिलाओं के रहने का प्रबंध है। अधिक-से-अधिक तीन सौ लोग रह सकते हैं। लेकिन कलकत्ता-जैसे शहर में निराश्रित मुमूर्षु लोगों की संख्या तो उंगलियों पर गिनने से समाप्त नहीं होगी। इतनी कम शैया में कैसे चलाती हैं ?" सिस्टर लूक साड़ी पर टॅके चांदी के क्रूस चिह्न को स्पर्श कर बोली, "शया कितनी ही कम क्यों न हों, हम किसी मुमूर्षु को लौटाते नहीं। यह मकान तो उनका ही है। लौटाने का प्रश्न ही नहीं उठता। जिस तरह भी हो, कुछ व्यवस्था हो ही जाती है।" अंदर घुसते ही वायीं ओर एक बिस्तर पर एक युवक को बैठा देखकर उसके पास गया। तेईस-चौवीस वरस के दुबले-पतले युवक का नाम मंटूलाल था। मकान मेदिनीपुर के श्रीकृष्णपुर गांव में था। ढाई महीने पहले एक जाड़े की रात को यहां आया। बचपन में उसने मां-बाप खो दिये थे। राइटर्स विल्डिग्स के पास फल वेचने से उसका किसी तरह दो मुट्ठी खाने का इंतजाम हो जाता था। मेहनत के हिसाव से खाना न मिलने से मंटूलाल का स्वास्थ्य अकाल में टूट गया। बीच-बीच में गले से खून भी आता रहता था। सब-कुछ जान-बूझकर भी वह डॉक्टर के पास न जा सका था। इस हालत में फलों का टोकरा सिर पर लेकर उसे रोज़ डलहौजी के दफ्तरों की बस्ती में जाना पड़ता था। सेव, नाशपाती, संतरे उसके टोकरे में एक के ऊपर एक सजे रहते। मंटूलाल बोला, "एक दिन रात में टोकरी के साथ फुटपाथ पर गिर गया, खून की उल्टी होती रही। वेहोश हो गया।" तभी से मंटूलाल यहाँ है । यक्ष्मा रोग से मुक्त होने पर वह फिर सिर पर टोकरी रखकर निकलेगा, पुकार-पुकारकर फल वेचेगा। मंटूलाल के पास के विस्तर पर लेटा था तेरह-चौदह वरस का एक लड़का।
मा टेरेमा : 29 ! बहुत कमजोर पारदोनों पैर पतले पड़ गये थे। धरने में असमर्थ रिमोर एक पर छाती के सहारे लेकर एक विदेशी युवक मालिश करने में मगा पापा। विश्वविद्यालय का छात्र रोविन्म मुहर न्यूयार्क से यहाँ आमा है । अमरीका के पत्र. पत्रिकाओं में मदर के संबंध में लेख पढ़कर उसे अच्छा लगा। इसीलिए पये जमा कर हवाई जहाज से समुद्र पार कर मां के पास चला याया। मैंने रॉबिन्स से पूछा, "यह जो तुम मन लगाकर लड़के के पैर की मालिश कर रहे हो, इसमें तुम्हें कुछ कष्ट नहीं होता है ?" रॉबिन्म के लाल चेहरे पर हँसी फूट पड़ो-"नो, नॉट ऐट ऑल।" वम इतना-मा उवाब या ााण-भर में वह सूती हंसी जसे कहीं गायब हो गयी। रॉबिन्स उस समय भी सिर मुकापे मालिश किये जा रहा था। रॉबिन्स की उम्र ही कितनी होगी! बहुत होगी तो बोस इकोस । चौरंगी के एक होटल में ठहरा है । सवैरे-गाम माना-पीना भी वहीं होता है। माना-सोना छोडकर बाकी समय इसी 'निर्मल हृदम' में बिताता है। पार महीने की छुट्टी विताकर रॉबिन्स देश लौट जायेगा। शीशी में से मालिश का तेल हती पर उड़ेलते-उड़ेलते रॉविन्स बोता, "मैं अकेता नही हूँ। यह देसिये, मेरी उन के एक और विदेशी युवक मन को खुशी के लिए काम कर रहे हैं । उनका पर मारट्रेनिया में है।" न, मे हिप्पी नहीं हैं। सिर के बाल ठीक से व्यवस्थित है। पंट, शर्ट पहने हैं । परो में रवड़ के स्लीपर हैं। कोई दो महीने, कोई चार महीने मां-बाप की आज्ञा लेकर माटेरेसा से मिलने निकल पड़े हैं। साथ में ये अतिरिक्त धन निये जा रहे हैं-सेवा का मन । केवल मही दो नही, आजाद जीवन को छोड़कर पश्चिमी संसार के असख्य युवक-युवतियो दीवानों को तरह पारम पत्थर की सोर जैसी किसी और चीज़ की खोज में देश-विदेश में घूम रहे हैं। आठ याज कालीघाट के निर्मल हृदय' की पर्चा कलकत्ता के सारे लोगों की जुबान पर है। मां खुद भी शायद इसको मबमे अधिक प्याररती हैं। कलरत्ता में रहने पर हर इतवार को सवेरे मा यहाँ आती है, बातें करती है। बसों न हो? यही तो उनका 'फर्स लव' है ! अमरीका, , आस्ट्रेलिया, अफ्रीकापही भी क्योन जायें, मां निर्मल हृदय' की बात कभी नहीं भूल सरती। हवाईजहार पर जाते. जाते भी अकसर मा सीमाबों के आगे कालीपाट के निमंस हदय के मन मोगों 30 :: मां टेरेसा । -- की तसवीर तैर जाती है। आसपास ही यीशु की वाणी स्पष्ट हो उठती-'मुमूर्षु की सेवा करने के अर्थ ही हैं मेरी सेवा करना।' इसीलिए तो यह घर निर्मल है। अंग्रेजी के 'इमैकुलेट सोल' का यह सुन्दर बंगलाकरण मां का ही तो किया हुआ है । 'निर्मल' और 'निर्मला'-~~-ये दो शब्द मां को बहुत पसंद हैं। उन्होंने शिशु- भवन का नामकरण किया है 'निर्मला शिशु-भवन'। और दमदम में केनेडी सेंटर के आगे 'निर्मला' लगा दिया है । 'निर्मल करो, उज्ज्जवल करो, सुन्दर करो, है'-- मां के अंतर की बात भी तो वही है। चारों ओर पेड़-पौधे-बेल, जूही, रजनीगंधा, गुलाब के फूलों की छोटी-छोटी पौध, समीप ही हरियाली की धूम-इस परिवेश में वैसे ही मन कोमल हो जाता । कवित्व के 'क' की समझ न रहने पर भी अपने को कवि-सा समझना बहुत अच्छा लगता है, किन्तु मृत्युपथ-यात्री निराश्रितों के आश्रय-स्थल 'निर्मल हृदय' को देखने के लिए कठोर हृदय की ज़रूरत है। केवल सहानुभूति ही काफ़ी नहीं है। बड़े-से कमरे के एक सिरे से दूसरे सिरे तक क़तार-की-कतार लोहे की चार- पाइयां हैं । वे ऐसी वनी हैं कि उन्हें आसानी से हटाया जा सकता है । मोड़कर खड़ी कर दी जाती हैं । सलाइन की बोतल टांगने के लिए यह प्रबंध है। एक के बाद एक शैया विछी हैं । साफ़-सुथरी। मेडिकल कॉलेज की तरह बड़ा वार्ड है। अंतर केवल यही है कि हजारों रुपये सरकारी फंड से खर्च करने पर भी सरकारी अस्पतालों में जो दृश्य अकसर देखने को मिलता है वह यहाँ न था। हर शैया के पास होकर आने-जाने का पतला रास्ता है। दो हॉल कमरों में से पहले में पुरुष और भीतर के कमरे में महिलाएं रहती हैं। बीच में एक सफ़ेद पर्दे की ओट है। पास ही रसोई है। हॉल के दाहिनी ओर के कोने में एक छोटी-सी जगह प्लेटफॉर्म बनाकर ऊँची बनायी गयी है। यहीं सिस्टर ऑफ़िस का कामकाज निवटाती हैं। मॉफिस के सामान में है एक कुर्सी, एक मेज़ और मेज़ पर दो रजिस्टर । रजिस्टरों में बीमारी को भर्ती का दिन और जो गुज़र जाते हैं उनका नाम और मृत्यु-दिन लिखा रहता है। हमेशा दो सौ के लगभग रोगी यहाँ रहते हैं। सो में से पचास महिलाएं हैं । परलोक से बुलावा न आने पर यहां के रहने वालों में एक भाग मोटे तौर पर ठीक हो जाने पर भी जाना नहीं चाहता। मां कहती हैं, "वे कहाँ जायेंगे? उन्हें जाने लायक़ कोई जगह ही नहीं है।" 'मिशनरीज ऑफ़ चैरिटीज' की चार सिस्टर और दो बदरों पर इन सारे रहने वालों की देखभाल की ज़िम्मेदारी है। "Death is not an end, it is the beginning of life. 'मृत्यु जीवन का अंत नहीं, मारंभ मात्र है।' जीवन-मृत्यु का यह दार्शनिक तत्व अनुभव करने पर इस 'निर्मल हृदय' में आना होगा। कम प्रकाश के इस हॉल में मृत्यु रोज़ की घटना है । गौतम बुद्ध को जरा व मृत्यु देखने के लिए सड़क पर मुर्दा लिये शोकग्रस्त लोगों को देखना पड़ा था। और इस 'निर्मल हृदय' के जराग्रस्त ।
मोटरमा 31 रोगात्रांत लोग गरीबी की शंया पर लेटकर गड्ढों में धमी भागों यो मोर प्राय: देखते हैं कि उनके आम-पास की शैया पर क्षीण देह पर सफेद कपड़ा देश है। रविवार होने पर प्रार्थना के अंत में मां आचार्य जगदीशचन्द्र यसु रो से भरे ही महाँ चली आती हैं। हर एक को खाट के पास बैठती है, बातें करती है । पता करती हैं कि कोन कसे हैं। एक शैया पर सिर से पैर तक कम्बल से ढके एक यादमी को देखकर माने कंचल हटा दिया । उसमें से एक किशोर का चेहरा निकल आया। किशोर तेज-तेज सोसें ले रहा था। मां ने प्यार से रोगी मंतान के मिर पर हाप फरानिमी भी तरह का भावावंग व्यक्त न कर सहज भाव से बोली, "अब नहीं लगवा कि प्यादा देर तक बचेगा।" बात खत्म न होते ही दोनों निनछोही आमें उलट गयीं। मौका ही मन ! धीरे-धीरे अपने हो हार्यों से किशोर की देह को ढेंक दिया। बार वाला आदमी गोआ का रहने वाला था। साठ वरस के इम वृद्ध का नाम बोतदिन नोरोना था। जहाज का यह कर्मचारी ट्रक के नीचे देव कर पागल हो गया। तीन महीने तक अस्पताल में या। किसी ने उसको तलाश नहीं की। वोलदिन का कोई नपा । अस्पताल से सड़क पर डाल दिया गया था। मां ने उसके सात-विक्षत पाव पर हाय फेरते-फेरते कहा, "गग्रीन हो गयी है । काटकर निरान देना ठीक था।" औरतो के हॉल में घुसते ही एक वटा ऐंग्लो-इडियन महितागो और नजर गयी। फ़र्श पर लेटी हुई भद्र महिना कांप रही थीं। मां बोली, “अस्पतालों नहीं गयी?" महिला ने बताया, "उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है । इमी- लिए अस्पताल नही जायेंगी। उनकी यहाँ रहने की वही इच्छा है।" मा ने वृक्षाको आशा बंधायी। उनके लिए या का प्रबंध हुआ। वही देखा कि एक युवती नसिंग के काम में व्यस्त थी। युवती के पतले होंठ, मुंह, नाक-मव जल गये थे। यह दुर्घटना पेट्रोमैक्म फटने से हुई थी। वह मरणासन्न अवस्था में आयी थी। ठीक हो जाने के बाद युवती फिर कही न गयो। यही रहती है, और तमाम लोगों की सेवा करती है । इस प्रकार दो-एक युवक-युवतियों से साक्षात हुआ। निश्चित मृत्यु के ग्रास से लौट आने के बाद ये लोग फिर पर कोन सौटे। हॉल के एक हिस्मे से एक वृद्ध के स्वाम-कष्ट की आवाज वा रही थी। उम और कुछ देर देखने के बाद बोली, "यह दर कल रात यहां माये पे। बचने की आशा नही है ।" हॉल की दूसरी जया दोघूम कर देसा गा रियर के गले से अब आवाज सुनायी नहीं पड़ रही थी। माँ ने वृद्ध के माये पर हाय रसा नाही देसी कुछ देर तक चुप रही। वृद्ध को गों-गों अब नहीं सुनायी देगी। 'सव समाप्त हो गया है। यह कहकर सफेद कपड़े से ढकने के लिए मो ने मिस्टर गे अनुरोध - किया। घौदह परग मा रिमोर अजीसन हमे देवकर उठ बंटा। "प्रीम भाई, 32 माँटेरेसा । । तुम्हें क्या हुआ है ?" प्रश्न सुनते ही अजीजुल की आँखें छलछला उठीं। सामने ही करणामयी मां की तसवीर लटकी थी। तसवीर की ओर देखकर वह बोला, "वाचू, मुझे टी० बी० हुई थी। यहां की मांओं की दया से ठीक हो गया हूँ। चल नहीं सकता था। अव चल सकता हूँ।" अजीजुल का विश्वास था कि वह कुछ दिनों में अच्छा हो जायेगा। मंगलकोट में अपने घर लोट जायेगा। छोटी बहन रेवेका को लेकर हर मेले में घूमेगा-फिरेगा। पुरुषों का कमरा छोड़कर महिलाओं के कक्ष में गया। वहां एक और सिस्टर से परिचय हुआ । नाम बताने में अनिच्छा प्रकट करते हुए बोली, "मैं यहां कुछ दिन आयी हूँ। लोरेटो में स्कूल की अध्यापिका थी, बँगलोर में। वहां से लखनऊ। और अब यहां।" सिस्टर से बातें कर रहा था कि तभी पर्दा हटाकर एक युवक आये। महिलाओं के कमरे में अचानक बिना कुछ कहे-सुने उस स्वस्थ युवक को घुसते देख कर मुझे बुरा लगा। हुआ करें सिस्टर, हैं तो वे स्त्री। मैं तो अनुमति लेकर ही घुसा था। सिस्टर ने युवक से परिचय करा दिया। हंसते-हंसते चोवीस-पच्चीस बरस की युवती सिस्टर वोली, "आप शायद सोच रहे होंगे कि मुमूर्षु के आश्रय-स्थान में इस स्वास्थ्यवान, सुन्दर युवक की जगह कैसे हुई ? यह आप कृष्ण की जवानी ही सुनिये।" कृष्ण का मकान उत्तर प्रदेश में है। लगभग एक बरस पहले पता नहीं कौन उसे यहां मरने की हालत में छोड़कर चला गया। स्वस्थ होकर उठने के बाद सिस्टरों की कृपा से वह सेंट जेवियर नाइट स्कूल में भर्ती हुआ। अच्छे स्वास्थ्य वाला कृष्ण सुशिक्षित भी हो गया है। डायमंड हार्वर की तेरह बरस की लड़की सरस्वती मंडल अब बिस्तर पर उठकर बैठ सकती है। टी० बी० होने के बाद सरस्वती गांव का छोटा-सा मिट्टी का घर छोड़कर शहर आने पर विवश हो गयी। सड़कों पर वह रातें काटती थी। इस हालत में एक दिन सिस्टरों की करुण दृष्टि उस पर पड़ी। यह एक बरस पहले की बात है। सरस्वती के लिए यहां की माएँ साक्षात भगवती हैं। चाय, रोटी, मात, मछली, मांस, फलों के रस के सेवन से सरस्वती अब, सोलह आना न होने पर भी, बहुत ठीक थी। सीमा के अतिक्रमण के भय से सारी कहानी कहना संभव न होगा। 'निर्मल हृदय की बात बताने में मां जैसे अचानक चुप हो गयीं। जपमाला लेकर बोलों, "हां, पहली महिला की बात अभी भी मेरी आंखों के आगे छा जाती है। कहां से, यह याद नहीं है, लेकिन महिला को मैं ही सड़क पर से उठाकर लायी थी। चूहों और चोंटों के अत्याचार की छाप पूरी देह पर थी। चूहों ने शरीर से मांस नोंच- नोंच कर खाया था। पहले महिला को कलकत्ता के एक प्रसिद्ध अस्पताल में ले गयी। अस्पताल के इमर्जेंसी वार्ड में जो लोग ड्यूटी पर थे उन्होंने रोगी की हालत - मा टेरेमा :: 33 । देखकर पहले तो भती करने मे मना कर दिया। डॉक्टर, नर्म, ममार कल्याण के फर्मचारी--यह सही है कि मव गराव नहीं है। लेकिन यह बान अस्वीकार मही की जा सकती कि डॉक्टरों का व्यवहार कभी-कभी आगा के अनुरूप नही होता। मेरी हठधर्मिता देखकर बाद में उन्होंने महिला को प्रर्ती कर लिया।" उस घटना ने मां के मन को भीतर तक हिला दिया। कालोपाट के साली मंदिर से सगी धर्मशाला में निर्मल हृदय' वाद में ही स्थापित हुमा। उपेक्षित मुमूर्ष लोगों को पता लगे कि दुनिया में उनको प्यार करने वाला है। स्वामी विवेकानन्द का 'जीवे प्रेम करे बेइजन, मेहजन सेविहे ईश्वर"--यह उक्तिमा के जीवन के आदर्श को मूल कहानी है। मानव-प्रेम के आम-पास यह किर-प्रेम ही मदर टेरेसा के जीवन का मूलमत्र है। मां ने एक दिन से एक घटना बतायी। सियालदह से एक युवती को अघमरी हालत में एबुलेंस में 'निमल हदप' में लाना हुमा । उस समय रात के दस बजे होगे। रात का गाना-पीना समाप्त हो गया था। युवती श्वास-कष्ट में बीच-बीच में 'भात दो, भान दो' कहकर चिल्लाने लगती थी। मां की आज्ञा से फौरन भात-दाल पकाकर लड़की के आगे थाली में रखकर दिया गया। गरम-गरम भात देखकर इतनी तकलीफ होने पर भी साकी उठकर बैठ गयी और मुंह मे और रखने के पहले ही पाली के पास लुढ़क गयी। फिर वह न उठी। सामने इस तरह भात की पाली देखकर उसकी बातें उसट गयी थीं। मरने के पहले उसे कम-से-कम यह तो सुशी हुई कि उसके सामने भात की पाली रखने वाले लोग अभी भी दुनिया में हैं। मृत्यु अनिवार्य है। किंतु मृत्यु-पथ के यात्री को हम क्या यह सात्वना सादे सकते हैं कि इस दुनिया में उसके लिए सोचने वाले हैं ? उसे स्नेह करने के लिए भी कोई-न-कोई है ? विलकुल ऐसे न होने पर भी हम मव हो किसी दिन घले जायेंगे। अब प्रश्न यह है कि शाति किस में है ? आनद का स्रोत कहाँ है ? जो लोग कुछ न पाकर मृत्यु की गोद मे ठुलक पहे, या अतिम सांस छोड़ने के पहले क्षण में जिन्हें सेवामा स्पर्श मिला-इन दोनों में वस्तुगत अतर न रहने पर भी मानवीयता की दृष्टि से निश्चय ही अतर है। मुकरात बाजार मे यूम रहे हैं। पीछे अनुगत शिप्यो का है। ये विस्मित, क्लान्त सोच रहे हैं कि यह महान ज्ञानवान दूकानों के बाद दूकानों में एक पर एक सजी चीजें शाली आँखो से घस-चसकर किस अमत का स्वाद ले रहे हैं ! शेते : "क्या ले रहा हूँ ? वास गण ! आनन्द-जिमका परिमाण नहीं है, ऐसी गली। केसी बड़ी तृप्ति और मुस है " . 1.जो मोग जीवों से प्रेम रते हैं वे ही ईशर की सेवा करते है।
34 मां टेरेसा - जिसको इस आनंद का स्वाद एक बार मिल जाये उसका जीवन धन्य है। केवल उसकी ही प्रार्थना सार्थक है जो मनुष्यों, पशु और पक्षियों सभी को प्यार करता है। जिसका कोई नहीं होता उसकी सेवा में अपने को लगा देने का एक महत्व होता है। इस सेवा में जिस सुख की अनुभूति जागती है वह धन से नहीं मिलती। इसमें धन की कोई आवश्यकता नहीं होती। कोई व्यक्ति यदि प्रशासक की लाल आंखों से डर जाता है, या यश की लालसा से अप्रसन्न चित्त से दुर्भिक्ष दूर करने के लिए लाख रुपये दान करे तो क्या उससे उनको पारलौकिक मंगल प्राप्त होगा? दान पुण्यकर्म अवश्य है, किंतु इस तरह के दान से इस लोक में सुविधा होने पर भी परलोक में पुण्य का खाता शून्य ही रह जायेगा। जिस काम में स्वतः-स्फूर्ति का अभाव हो वह कभी प्रश्नातीत नहीं हो सकता। कितने रुपये दान किये, या कितने स्कूल, कॉलज या अस्पताल के आगे किसी के नाम को पत्थर पर लिखा गया वही किसी व्यक्ति का अपना परिचय नहीं होता है। वह इससे भी बड़ा होता है। जिस व्यक्ति के पास धन नहीं, बिना कौड़ी का वह व्यक्ति भी सेवा के प्रकाश से आलोकित हो सकता बेड नंबर चौदह के वृद्ध सज्जन गुजर गये । उस बेड पर नाक के नीचे पंगु हुए लड़के को लिटा दो। 'निर्मल हृदय' में कुछ देर बैठे रहने पर लगता कि मानो एक सराय हो । अभी तक कम-से-कम आधे लाख मुमूर्षु निराश्रितों ने यहाँ आश्रय पाया है। वेड नंबर चौदह की तरह सौ में पच्चानवे इस दुनिया से चले जाते हैं । वे लौटकर नहीं आते। यहां के हर रहने वाले से माँ बातें करती हैं। मां के स्नेह-ममता में यह सर्व- हारा का दल द्वितीय जीवन प्राप्त करता है। निरानंद जीवन में वे शुद्ध बंगला में आशा की वाणी सुनाती हैं : 'भगवान हैं।' भगवान और प्यार-ये दोनों शब्द समानार्थक हैं। तभी तो माँ कहती हैं, प्यार के विना भगवान के राज्य में प्रवेश नहीं किया जा सकता। उनका अनुभव नहीं किया जा सकता। मां के साथ दो-एक अनुष्ठानों में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। वहां भी बातचीत के बीच में प्यार की बात माँ के मुंह से सुनी थी। भक्त नर-नारियों का दल मां को घेरे हुए था। ऑटोग्राफ़ चाहिए। अपना नाम ऑटोग्राफ़ बुक के पहले पन्ने पर या कापी में लिख देती हैं। यीशु का, भगवान का अस्तित्व शयन में, स्वप्न में-सदा, सर्वदा । हर क्षण एक ही भावना। वी० बी० सी० लंदन के मैल्कम मैगरिज ने अपनी 'समथिंग व्यूटीफुल फॉर गॉड' पुस्तक में एक अलौकिक घटना का उल्लेख किया है। लंदन के वी० बी०सी० टेलिविजन के लिए वे मदर टेरेसा और मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटीज़ पर एक चित्र बनाने कालीघाट के निर्मल हृदय' आये थे। कैमरामैन ने बताया कि कमरे में जो माटेरेशा :: 35 रोशनी है उससे तसवीर नही सिंवेगी। इसीलिए कमरामैन ने कमरे के बाहर मा ही हिस्सा लिया। उस पर भी कुछ फिल्म याको रह जाने में कमरे के अहारी तसवीर भी ले ली गयो। यह ममन लिया गया था कि अंदर की तमवीर नहीं आयेगी। आपी भी तो अच्छी बनने की कोई मंभावना न पौ। फिल्म हवनप करने के बाद देखा गया कि वाहर धूप में जो तसवीर खीची गयी थी उससे बहुत सा और अच्छी, अदर कम प्रकाश में पीची वे तमवीर यो जिनकी आशा छोड़ दी गयी थी। इस घटना की बात पूछने पर माँ ने गहरे विश्वास के साथ कहा, "हो, ऐगी घटना हुई तो थी। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। ईश्वर सदा, हर दिन, हर क्षण, अपने को प्रकाशित करते रहते हैं। किसी-न-किसी घटना में उनका अस्तित्व हम अनुभव कर सकते हैं।" आवश्यकता उस अनुभूति को ही होती है--जिसके सहारे भगवान के प्रेम के राज्य में आगे बढना होगा। इस अनुभूति को कमी-वेशी में हो गब-कुछ समय- असंभव होता है। । नो उस भेड़ के बच्चे को करण वात याद आ रही है जो भेहिये के डर से जंगल में झरडियो की आड में अपने को छिपाये सहा था। एक आदमी ने भेड के बच्चे को उठा लिया। भेडिये से बचने की खुशी में उसने आदमी के शरीर, हाप, पर आदि चाटना शुरू कर दिया। लेकिन यह आदमी घर पहुंचकर जब भेर के बच्चे के गले पर तेज तलवार चलाने को तैयार हुआ तो भेट का बच्चा उससे बोला, 'मैंने सोचा था कि जगली भेडिये से पादा भयकर कोई नहीं होता। लेकिन भर देग रहा हूँ कि वह भेडिपा साक्षात मेरे सामने सहा है।' इसलिए ईश्वर की अनुभूति इन सभी लोगो के जीवन में आना बहुत कठिन बात है। उसके लिए मन पोतदार करना होता है। 'मन चलो अपने निवेतन को'~मह से इसकी आवृत्ति करना पा संगीत में कंठ में धारण करना जितना सहन है, वास्तव में, प्रियामर रूप में शायद उतना ही कठिन है। मन ही तो सारी इदियों का राजा है। इस राजाको ठीक राह पर चला सकें तो बहुत सा रास्ता वैसे ही तय हो जाता है। इस ईश्वरानुभूति के होते ही मनुष्य अपने हृदय में उम सत्य को प्राप्त कर सकता है। रवीन्द्रनाथ की भाषा मे-'पृथियो मत्यु फेओ कोने करिया मेंप, जीवन केओ कोले करिया रासे। पृथिवीर कोले उमरेड भाइचानेर मन मा परे।
36 माँटेरेसा - पृथिवीते याहा मासे ताहाइ जाय।" इस उक्ति को ध्रुव सत्य मान लेने पर मृत्यु- पथ-यात्री असहाय, अनाथों की सेवा में अपने को लगा सकने के समान और महान चीज़ क्या हो सकती है? पंगु, असमर्थ, अनाथ रोगियों के प्राण उनकी स्नेहमयी ममता में 'निर्मल हृदय' में आश्रित हैं। मां टेरेसा मानवता की साक्षात प्रतीक हैं। इस असाधारण मानव- प्रेम के निकट ईश्वर-प्रेम ने मां टेरेसा के हृदय में एक गहन विश्वास की रचना की है । इसी विश्वास का एक अनुपम उदाहरण मिला 1962 ईसवी में। इसी समय उन्हें आगरा से एक टेलिग्राम मिला। वहां के मिशनरियों ने उन्हें बताया कि मागरा में शिशुभवन के निर्माण के लिए पचास हजार रुपयों की ज़रूरत है। यह बहुत ज़रूरी है। उस समय मां के पास एक पैसा भी न था। इसीलिए बता दिया कि इतना रुपये देना उनके लिए संभव न होगा। रुपयों के न होने से एक भला काम, प्रेम का काम न होगा, यह सोचकर उन्हें दुख हुआ। लेकिन चारा ही क्या था? थोड़ी देर बाद फ़ोन घनघना उठा । दूसरी ओर से एक भले आदमी की आवाज़ सुनायी पड़ी। फ़िलिपाइन सरकार मैगसेसे पुरस्कार के साथ मां को नकद पचास हजार रुपये देगी। टेलीफ़ोन का रिसीवर रखकर मां ने हंसते-हँसते कहा, "देखती हूँ कि भगवान आगरा में शिशु-निवास बनवाना चाहते हैं।" इस सहज, सरल विश्वास ने ही मदर टेरेसा की अंतर्निहित शक्ति को जाग्रत किया है। मां के जीवन में किसका प्रभाव सबसे अधिक है ? गांधी, नेहरू, श्वाइतजर अथवा मार्टिन लूथर का? जरा भी दुविधा नहीं और न कोई संदेह ही। बोली, "पीशु का।" "किस पुस्तक ने आपके समस्त जीवन को प्रभावित किया है, मां ?" का उत्तर था, "वाइविल ने।" "सारी दुनिया आपका घर है । कैसे चलता है ? कहां से आता है धन ?" "रुपये तो कोई समस्या ही नहीं हैं। वह मिलते हैं, मिल जाते हैं। शुरू में जरूर थोड़ा कप्ट हुआ था। दुख तो रहेगा ही। वह तो आनंद का परिपूरक है !" मिलन में ही प्रेम का सुख रहता है। इसीलिए कहा जाता है कि वियोग में क्या केवल दुख ही है ? कवि की भाषा में-'प्रेमेर आनन्दे थाके शुधू स्वल्पक्षण, प्रेमेर वेदना थाके समस्त जीवन ।2 "अवर स्वीटेस्ट सांग्स आर दोज दैट टेल ऑफ़ संडेस्ट थॉट ।" भगवान ही अपने भक्तों में मिलते हैं। उनका जीवन सहज है। अनुत्तेजित स्वर में भी अनमनीय दृढ़ता या विश्वास स्थापित कर सकते हैं। 1. पृथ्वी मृत्यु को भी गोद में ले लेती है और जीवन को गोद में सिये रहती है। पृथ्वी की गोद में दोनों ही भाई-बहन की तरह खेलते हैं । पृथ्वी पर जो माता है सो जाता है। 2. प्रेम का आनंद कुछ देर ही रहता है किंतु प्रेम को वेदना जीवन भर रहती है। 3. हमारे सबसे मधुर गीत वे हैं जो सबसे अधिक टुप का वर्णन करते हैं। .
मा टेरेसा :: 37 दुखिषों के लिए मां सब महने को तंपार रहती हैं। इस काम में अंत तक देमे विना वे कुछ नहीं छोड़ती। यदि किसी विषय में मा में उनके किमी साधी पामत- भेद होता है तो भी अंत में साथी को माँ को ही दान माननी पड़ती है। एक सर पोप पॉल ने स्वयं उनमे रोम की बस्तियों की उन्नति की योजना में रोम में मिगन- रोज ऑफ चैरिटीज की शाखा सोलने का अनुरोध किया । वहाँ के अनेक पादरियों ने प्रश्न किया था कि "रोम में अभी बहुत संन्यामिनी है । इन संन्यामिनियों को सही काम नहीं मिल रहा है । क्या वहाँ मिशनरीज ऑफ नरिटीर को बुलाने से जरूरत है ?" मा टेरेसा ने अपने स्वभाव के अनुसार शांत चित्त से उत्तर दिया। उन्होंने लिया, "वहाँ तमाम संन्यासिनियों को अगर सोनेपर काम नहीं मिलता, तो मिशनरीज ऑफ चैरिटीज का मुख्य काम यह बताना होगा कि किस तरह राम किया जाता है और काम मिलने पर उसे सिमाना।" मा सुद ट्रेन में दूसरे दर्जे में बंटती है । नीची उकडू होकर इम पैमठ बरम की उम्र में भी कमरे में फ़गं पोछती हैं। दुसी गरीबों का अकेलापन, ऐक्यवदता, सरल जीवन-यात्रा-कुछ भी उनकी नजर से नहीं चूकना । समस्त गरीच मोगों में जो महत्वपूर्ण है उमसे परिचित होने की आवश्यकता है। एक बार मी ने एक भूखे अन्नहीन हिंदू परिवार के लिए कुछ घावल जमा किये। मौके कुछ पहने के पहले ही हिंदू परिवार को गृहिणी ने उन चावलों के दो भाग कर लि, क्योंकि पड़ोस के मकान में जो मुसनमान परिवार पा वह भी बहुत भूसा था । उनको भी जरूरत कम न पी। गरीवी की इस महानता की क्या कोई तुलना हो सकती है ? याद आती है टीटागढ के पायममन हरिलाल के यात्मत्याग को महान घटना । छोटे-छोटे स्कूली बच्चे कापी-कितावें लेकर रेलवे लाइन पार कर रहे थे। हरिलाल ने देखा कि एक रेलगाडी तेज गति से पती आ रही है। क्षण भर में नन्हें-नन्हें बच्चो को कुचलकर चली जायेगी। हरिलाल अपनी बात भूल गया। रेल लाइन पर झपट पड़ा। छात्र को धक्का देकर हटा दिया। हात्र तोप गया, मां-बाप के पास घर लौट आया। लेकिन हरिताल न लौटा। राहासी रेम- साइन के नीचे उसका जीवन सदा के लिए दव गया। एक सो बारह रुपये वेतन वाला हरिलाल जायसवाल अपना जीवन देकर मानवता का जो अपमान गा गया वह किसी दिन दवा नहीं रहेगा। रेललाइन पर से दो जान बचाने के लिए हम बरस पहले बर्दवान लाइन पर इंटाचूना कॉलर के अध्यक्ष विशिष्ट गाविस अविवाहित गोपालचन्द्र मजूमदार ने अपना जीवन विसत्रित किया पा। दोनों ही मृत्यु महान है । और इनमे हरिलाल को बात ही बार-बार से मन कोमामोरठी - गरीब लोग जिस तरह हमसे कुछ चाहते हैं उसी तरह हमें भी उनके साप को ररूरत है। समाज से इनको दूर हटा रखने का अर्थ होता है अपने को परम- 38 :: मां टेरेसा पिता के पास से दूर हटा लेना। इसके सिवा, उनके संपर्क में आने से हमारी मान- सिकता और भी समृद्ध हो सकती है। यह मां का ही तो कहना है। दस मदर के साथ काम करने का सौभाग्य प्राप्त करने वाली एक सिस्टर ने मां के वारे में बातचीत करते हुए एक घटना बतायी-~"मां एक दिन मुझे साथ लेकर निकलीं। धनी और बड़े लोगों के अच्छे-अच्छे मकानों को देखकर वे बोलीं, 'इन मकानों में जाकर अनाथ शिशुओं के लिए खाना माँगना होगा।' मुझे बहुत संकोच हुआ। उसे शर्म भी कह सकते हैं। काम अजीब-सा लगा। मुंह खोलकर मन की बात भी न कह सकी। अंत में गरदन हिलाकर असहमति व्यक्त की। मां ने केवल इतना कहा, 'सिस्टर, यह काम तुमको ही करना होगा। क्योंकि इस बात को तुम अच्छी तरह जानती हो।' मां के मुंह से यह बात सुनने के बाद मेरी सारी लज्जा, घृणा, भय क्षण-भर में दूर हो गये। खुशी से भिक्षा की झोली लेकर निकल पड़ी। अव भी निकलती हूँ। वहुत-से लोग भिक्षा का दान ज़मीन पर फेंक देते हैं। कुछ लोग खफ़ा हो जाते हैं । ऐसा भी देखा है कि अस्सी के बाद के वृद्ध लाठी के सहारे नीचे उतर आये हैं। उन्होंने दान-सामग्री हाथों में थमा दी है । सामान्य रहने पर ही यह दान असामान्य रहता है। दान के पीछे इस आंतरिकता की आवश्यकता है । अब तरह-तरह के लोगों को देखकर अपने मन में हंसती हूँ और सोचती हूँ, यह सव ईश्वर की इच्छा है।" आडंबररहित, सहज, सरल और प्रगाढ़ प्रयत्न ही अनाथ उपेक्षितों के प्रति मां की सेवा है। जो किया जाना चाहिए उसे वे अवश्य करेंगी। वहाँ धन की रुकावट कुछ नहीं है । एक लाचार गरीव पंगु युवक के लिए एक जोड़ा कृत्रिम परों की आवश्यकता थी। माँ को उसका प्रबंध करना ही होगा। मां ने कलकत्ता में स्थित एक विदेशी दूतावास से बात की। इसके कुछ दिनों बाद ही युवक को पर मिल गये। पांच लड़कियों के पिता और उनकी संतानें सड़क की पटरी पर अपनी गृहस्थी फैलाकर दिन विता रहे थे। उस समय मां को स्वयं ही स्थान की कमी थी। लेकिन मां के कानों में यह बात पहुंची। पंचकन्या के पिता को जगह मिल गयी। मां ने उन छहों को गोद में उठा लिया। सुरुचिपूर्ण भोजन, राजमहल की तरह रहने की जगह तो शायद न दे सकें, पर कुछ भी न होने पर नमक-भात देने के लिए मां का दरवाजा खुला रहता है। मां ने खुद ही तो कहा है कि रुपये से भी बड़ी बात है - - माटोमा :: । भले काम के लिए मनुष्य को प्रभावित करना। रिमी को यह समझाना काटिन कि बुड्डे, कमजोर, रोगी, भूखे-रामी हमारे भाई हैं। मां ने जब यानी र यंग. कार में स्कूल शुरू किया तो उनको टेंट में पांच रुपये का मिकं एक नोट पा। "लोगो ने खुद ही ढूंढ-ढोड़कर मेरा, मेरे काम का पता मगाया । देग-भालकर ये ही सामान, रुपये-पैसे ले आये। यह सब ईश्वर को ही महिमा है। है न?" एक बार जाड़ो में रजाइयां कम पड़ गयी। रजाइयों के लिए कारपे, रई न थी। मां जब अपना तकिया फाड़ कर हई निकालने को तैयार हो गयी, तभी दरवाजे की घटी बजी। एक भले आदमी नौकरी पर विदेश जा रहे थे। वे अपने लगभग नये कंवल, चादर, बिस्तर मां को देकर जाना पाहते थे। एक दिन पावल कम पड़ गये। और विलकुल तभी एक मद्र महिला ने आकर मोरा-भर पायल दान दिये। देखा कि जितने चावलो को जरूरत थी, बोरे में उतने ही थे।नकम, न ज्यादा। मां के लिए रुपये कभी बड़ी समस्या न वने, क्योकि वे धनी लोगो का विवेक जाग्रत कर पड़ोसी भूखो के प्रति सहानुभूतिशील बना देने में सफल हुई है। सर. कार का द्वार उनके लिए सदा खुता रहता है। स्वर्गीय डॉ. विधानपद राम मो के सहज शुभचिंतक थे। बिना सूचना दिये मां सीधै राइटमं बिल्डिंग मे दुग्लेि पर बीच में डॉ० राय के कमरे में या राजा सुबोध मल्लिक स्कवायर में उनके मगर पर पहुंच जाती। डॉ० राय ने एक बार मां से कहा पा, "सोग तो सरकार का रुपया लेकर वर्वाद करते हैं । तुम अपने आश्रमों को चलाने के लिए जो जरूरी हो ले जाओ। उन्हें देंग से चलामो। तुम्हें कोई हिसाब-किताय न देना होगा। म तुम पर विश्वास करता हूँ।" डॉ. राय के अस्सी यरस पूरे होने के शुभ दिन एक संवाददाता ने उनसे पूछा, "आज का दिन उन्हे कैसा लग रहा है ?" जवाब में डॉ० राय बोले, "अच्छा ही लग रहा है, क्योकि राइटरां की सीरियो पर पड़ते. चढ़ते मुझे अचानक मदर टेरेसा की याद आ गयी। उस महिला ने अाना सारा जीवन दीन-दुखियों की सेवा में समर्पित कर दिया है।" (As Iclimbed the stairs leading to my office, I was thinking of Mother Teresa who devoted her entire life to the service of the poor. -Dr. B. C. Roy on his 80th Birthday.) । ग्यारह आज से पौदह बरस पहने सन् 1962 मेगा टेरेसाको सेपाकत में समपित जीवन 38 मां टेरेसा पिता के पास से दूर हटा लेना । इसके सिवा, उनके संपर्क में आने से हमारी मान- सिकता और भी समृद्ध हो सकती है। यह मां का ही तो कहना है। मदर के साथ काम करने का सौभाग्य प्राप्त करने वाली एक सिस्टर ने मां के बारे में बातचीत करते हुए एक घटना बतायी-"माँ एक दिन मुझे साथ लेकर निकली। धनी और बड़े लोगों के अच्छे-अच्छे मकानों को देखकर वे वोलीं, 'इन मकानों में जाकर अनाथ शिशुओं के लिए खाना मांगना होगा।' मुझे बहुत संकोच हुआ। उसे शर्म भी कह सकते हैं । काम अजीव-सा लगा। मुंह खोलकर मन की वात भी न कह सकी। अंत में गरदन हिलाकर असहमति व्यक्त की। मां ने केवल इतना कहा, 'सिस्टर, यह काम तुमको ही करना होगा। क्योंकि इस बात को तुम अच्छी तरह जानती हो।' मां के मुंह से यह बात सुनने के बाद मेरी सारी लज्जा, घृणा, भय क्षण-भर में दूर हो गये। खुशी से भिक्षा की झोली लेकर निकल पड़ी। अब भी निकलती हूँ। बहुत-से लोग भिक्षा का दान ज़मीन पर फेंक देते हैं। कुछ लोग खफा हो जाते हैं । ऐसा भी देखा है कि अस्सी के बाद के वृद्ध लाठी के सहारे नीचे उतर आये हैं। उन्होंने दान-सामग्री हाथों में थमा दी है। सामान्य रहने पर ही यह दान असामान्य रहता है। दान के पीछे इस आंतरिकता की आवश्यकता है। अव तरह-तरह के लोगों को देखकर अपने मन में हंसती हूँ और सोचती हूँ, यह सब ईश्वर की इच्छा है।" आडवररहित, सहज, सरल और प्रगाढ़ प्रयत्न ही अनाथ उपेक्षितों के प्रति मां की सेवा है। जो किया जाना चाहिए उसे वे अवश्य करेंगी। वहाँ धन की रुकावट कुछ नहीं है । एक लाचार गरीव पंगु युवक के लिए एक जोड़ा कृत्रिम पैरों की आवश्यकता थी। माँ को उसका प्रबंध करना ही होगा। मां ने कलकत्ता में स्थित एक विदेशी दूतावास से बात की। इसके कुछ दिनों बाद ही युवक को पर मिल गये। पांच लड़कियों के पिता और उनकी संतानें सड़क की पटरी पर अपनी गृहस्थी फैलाकर दिन बिता रहे थे। उस समय मां को स्वयं ही स्थान की कमी थी। लेकिन मां के कानों में यह बात पहुंची। पंचकन्या के पिता को जगह मिल गयी। माँ ने उन छहों को गोद में उठा लिया। सुरुचिपूर्ण भोजन, राजमहल की तरह रहने की जगह तो शायद न दे सकें, पर कुछ भी न होने पर नमक-भात देने के लिए माँ का दरवाजा खुला रहता है। मां ने खुद ही तो कहा है कि रुपये से भी बड़ी बात है मा टेरेसा :: 39 भले काम के लिए मनुष्य को प्रभावित करना। किसी को यह समझाना कठिन है कि बुड्ढे, कमजोर, रोगी, भूखे--सभी हमारे भाई हैं। मां ने जब वस्ती के अंध. कार में स्कूल शुरू किया तो उनकी टेंट में पांच रुपये का सिर्फ एक नोट या। "लोगों ने सुद ही ढूंढ-ढांढकर मेरा, मेरे काम का पता लगाया। देख-भालकर वे ही सामान, रुपये-पैसे ले आये । यह सव ईश्वर को ही महिमा है। है न?" एक बार जाड़ों मे रजाइयो कम पड़ गयी। रजाइयों के लिए कपड़े थे, रुई न थी। मां जब अपना तकिया फाड़ कर रुई निकालने को तैयार हो गयो, तमी दरवाजे की घंटी बजी। एक भले आदमी नौकरी पर विदेश जा रहे थे। वे अपने लगभग नये कंवल, चादर, बिस्तर मां को देकर जाना चाहते थे। एक दिन चावल कम पड़ गये। और विलकुल तभी एक भद्र महिला ने आकर बोरा मर चावल दान दिये। देखा कि जितने चावलो की जरूरत थी, बोरे में उतने ही थे । न कम, न ज्यादा। के लिए रुपये कभी बड़ी समस्या न बने, क्योकि वे धनी लोगों का विवेक जाग्रत कर पड़ोसी भूखो के प्रति सहानुभूतिशील वना देने में सफल हुई हैं । सर. कार का द्वार उनके लिए सदा खुला रहता है। स्वर्गीय डॉ० विधानचन्द्र राय मा के सहज शुभचिंतक थे । बिना सूचना दिये मां सीधे राइटसं बिल्डिंग में दुमजिले पर बीच में डॉ० राय के कमरे में या राजा सुबोध मल्लिक स्कवायर में उनके मकान पर पहुंच जाती। डॉ० राय ने एक बार मां से कहा था, "लोग तो सरकार का रुपया लेकर बर्बाद करते हैं । तुम अपने आश्रमों को चलाने के लिए जो जरूरी हो ले जाओ। उन्हें ढंग से चलाओ। तुम्हे कोई हिसाब-किताव न देना होगा। मैं तुम पर विश्वास करता हूँ।" डॉ० राय के अस्सी बरस पूरे होने के शुभ दिन एक संवाददाता ने उनसे पूछा, "आज का दिन उन्हे कैसा लग रहा है ?" जवाब में हॉ० राय बोले, "अच्छा ही लग रहा है, क्योकि राइटसं की सीढ़ियो पर चढते. चढ़ते मुझे अचानक मदर टेरेसा की याद आ गयी। उस महिला ने अपना सारा जीवन दीन-दुखियो की सेवा मे समर्पित कर दिया है ।" (As I climbed the stairs leading to my office, I was thinking of Mother Teresa who devoted her entire life to the service of the poor. -Dr. B. C. Roy on his 80th Birthday.) ग्यारह आज से चौदह बरस पहले सन् 1962 में मां टेरेसा को सेवायत में समपित जीवन 40 मां टेरेसा । । की सरकारी स्वीकृति मिली। उन्हें 'पद्मश्री' मिली। नयी दिल्ली में राष्ट्रपति भवन में एक आयोजन में डॉक्टर राजेन्द्रप्रसाद के हाथों से जब साड़ी पहने श्वेतांगिनी महिला ने सरकारी सम्मान-पत्र ग्रहण किया तो सारा दरवार तालियों की जोरों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। दर्शकों के आसनों पर सम्मानित अतिथि लोग बैठे थे। इनमें विजयलक्ष्मी पंडित भी थीं। विजयलक्ष्मी का वर्णन हृदयग्राही है। "मानवता की प्रतिमूर्ति यह संन्यासिनी मंच की ओर बढ़ीं। जिस उत्साह से वे रोगी शिशु या किसी मुमूर्षु व्यक्ति को कलेजे से लगा लेती हैं, पुरस्कार को हाथ बढ़ा- कर लेने में उन्होंने कोई अधिक उत्साह नहीं दिखाया। लेकिन कमरे में भरे दर्शक आनंद से आत्म-विस्मृत हो गये। तालियां यदि प्रशंसा और अभ्यर्थना का मापदंड हों तो मदर टेरेसा के भाग्य में वह सबसे अधिक मिली थीं। राष्ट्रपति की आंखें सजल हो गयी थीं । वाद में एक ही गाड़ी में घर लौटने के समय मैंने गाड़ी में ही भाई(जवाहरलाल नेहरू) से पूछा, 'मदर टेरेसा हृदय को बहुत विचलित कर देती हैं, ठीक है न ?' अब तक नेहरू चुपचाप बैठे हुए थे। उनकी दृष्टि कांच की खिड़की से बाहर, दूर कहीं थी। जवाहरलाल नेहरू ने जवाब दिया, 'तुमको कैसा लगा, पता नहीं, मुझे तो आंसू रोकने में बहुत तकलीफ़ हो रही थी।" विजयलक्ष्मी पंडित की अभिव्यक्ति अंग्रेजी भाषा में अभिव्यक्त हुई : "....the magnificent Durbar Hall of Rashtrapati Bhawan became silent, when the sari-clad nun-a picture of humility walkcd upto the dias. She took the award as if she was taking a sick child or a dying man in her arms. It meant nothing more than that to her-but the hall went mad. Mother Teresa receivcd the loudest applause. There were tears in the eyes of the president (the late Dr. Rajendra Prasad). Later, when we were going home, I asked my brother (the late Jawaharlal Nehru), 'Wasn't that a moving thing?' He said, 'I don't know how you felt, but I had great difficulty in restraining my tears'." विजयलक्ष्मी देवी ने कुछ वाक्यों में मां को सुन्दर रीति से स्पष्ट किया है : "नम्रता और प्यार करने की क्षमता का बहुत कुछ तो उनके दर्शन से ही अनु- भव किया जा सकता है।" श्रीमती इन्दिरा गांधी ने भी सहज रूप से मां का वर्णन किया है : "To meet her is to feel utterly humble, to sense the power to tenderness, the strength of love." इन्दिरा देवी के पिता दिवंगत प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी इस महान महिला को पहचानने में जरा भी भूल न की। तभी तो शिशुओं के एक आयोजन में जाकर नेहरूजी बोले थे, "आपके काम के संबंध में आपको कुछ बताना न होगा, मदर । मुझे मालूम है । इसीलिए तो यहाँ आया हूँ।" ("You don't have " मां टेरेसा :: 41 to tell me about your work, mother. I know about it. That's why I am here.") लोरेटो को उस संन्यासिनी को सरल अभिव्यक्ति बहुत सहज रूप से हृदय को स्पर्श करती है: The amazing thing about Mother Teresa is that she is ordinary. There are no legends (about her). (मदर टेरेसा के जीवन की सबसे विस्मयजनक वस्तु है कि वह सामान्य हैं। उनके जीवन या जीवनी के संबंध में कोई कहानीन ही है।) 'निर्मल हृदय' के एक मुमूर्षु की भाषा में, "यह महिला सचमुच मानवी रूप में साक्षात देवी हैं ।" लेकिन मां ने क्या कहा? मां बोली, "यह काम मेरा नहीं है । यह तो उनका ही काम है ! मैं नही, वे।"-छोटे-छोटे, सुगधित फूलो की तरह वाक्प थे। मां का अपना जीवन भी तो वही है ! जिनके प्राण, मन ईश्वर को समर्पित हो वे ही तो यह बात कह सकते हैं ! इसी प्रकार वे सबके बीच अपने को प्रकाशित कर सकते हैं ! - बारह इंटाली मार्केट के पास जोड़ा-गिरजा के सामने आचार्य जगदीश वसु रोड पर निर्मला शिशु-भवन है। सीढ़ियो से दोमजिले पर जाते ही दीवार पर टंगी तसवीर और ये शब्द नजर खीच लेते हैं . "The poor want your love, not service only.' केवल लिखा हुआ ही नहीं, कमरे में घुसने पर नन्हे-नन्हे बच्चों के मुसकराते चेहरे देखकर मन खुशी से भर जाता है। कोई छ महीने के बच्चे को दूध पिला रही हैं, कोई चार बरस के बच्चे के मुंह में भात का कौर दे रही हैं और कोई तेल मलकर छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियो को स्नान कराने में व्यस्त हैं। इसी बीच देखा कि एक युवती संन्यासिनी खिलौने लेकर बच्चों के साथ सेल रही हैं । पारो ओर से घिरी हुई छोटी-छोटी खाटें हैं। कुछ बच्चे लेटे हैं, कुछ बैठे हैं। फर्श साफ- उजला है । सहसा लगता है कि जैसे कलकत्ता के अभिजात हिस्से का कोई नसिंग होम हो। आश्रयहीनों के रहने की जगह आनदहीन नहीं है । प्रत्येक शिशु सिरटरो मे पास वेयेलहम के शिशु के समान है। सिस्टरों को देखते ही ये भागे-भागे आते हैं। साड़ी पकड़ कर सोचते हैं । हम देषकर एक सरकी पास फी मेश पर पर टिकाकार ।
42 :: माटेरेसा । कंधे पर चढ़ गयी। भारतीय पौराणिक कथा में परित्यक्त शिशु के रूप में शकुंतला की कहानी प्रसिद्ध है। अप्सरा माता द्वारा परित्यक्त शिशु-कन्या एक शकुंत के पंखों की छाया के नीचे पड़ी हुई थी। मुनि कण्व देखकर शिशु को अपने आश्रम में ले आये। माता की सेवा और ममता का स्वाद प्रत्येक शिशु पाना चाहता है। उसी मातृत्व- मय ममता की जीती-जागती प्रतिमूर्ति मां टेरेसा हैं। परित्यक्त, पंगु, अनाथ, पितृ- मातृहीन और रोगियों के प्राण उनके निर्मल हृदय' और 'निर्मला शिशु भवन' की स्निग्ध ममता में आधित हैं। इन शिशुओं में से अधिकांश अस्पतालों से आते हैं। दाइयां ले आती हैं। सिस्टरों ने डस्टविन--कूड़ेखाने-से भी उठाये हैं। मैंने एक शिशु को देखा, बहुत सुन्दर सूरत थी। खिंची खिची भांखें थीं। पांच-छ: बरस की बच्ची के चेहरे पर हंसी टिकती न थी। कलकता के एक अस्पताल में छोड़कर बच्ची की माँ चली गयीं। वह जव यहाँ आयी थी तो दो महीने की थी। सिस्टरों के दुलार से और देखभाल से बढ़ चली। लेकिन यह राह पर पड़ी बच्चियां नहीं हैं । अकसर कुमारी अवस्था में संतान हो जाने से उन संतानों की माँ छिपकर किसी अस्पताल में या किसी नसिंग होम में चली जाती हैं। वहां पैदा होने के बाद नवजात शिशु-संतान को छोड़कर अस्पताल से चली जाती हैं। अस्पताल में भरती होने के समय ये कुमारी लड़कियां अपने को विवाहित बताती हैं। जरूरत होने पर पति के रूप में किसी युवक को लाने में उन्हें जरा भी संकोच नहीं होता। फेवल कलकत्ता या पश्चिमी बंगाल में ही नहीं, पूरे भारत में पश्चिम की नकल कर युवक-युवतियों ने संभोग में लिप्त होना आरंभ कर दिया है। इसका ही अवश्यंभावी परिणाम है---अवां- छित शिशुओं की संख्या में वृद्धि। पहले से जन्म-निरोध का प्रबंध करने से अवां- छित शिशुओं के जन्म को रोकना संभव हो गया है । क्रमशः बढ़ती हुई जनसंख्या के दवाव से हमारा देश जब अत्यन्त कप्ट में है तो, जिस तरह से भी हो, इन अवां- छित शिशुओं का जन्म रोकना अत्यंत आवश्यक है। संतान के गर्भ में आने से पहले मां किसी भी प्रतिरोधक व्यवस्था की पक्ष- पाती हैं। लेकिन संतान यदि एक बार गर्भ में आ जाती है तो उसे नष्ट करना उचित नहीं है। मां का कहना है कि इस संबंध में पहले से ही लड़कियों को साव- धान होना पड़ेगा। उनको संयमी बनना होगा। मां को उस समय सबसे अधिक दुख होता है जब इस प्रकार की घटना किसी शिक्षित लड़की के जीवन में घटती है । क्षण-भर का आवेग रोक न सकने से कुमारी लड़कियों के गर्भ में संतान आ जाती है। उसी संतान को लंबे दस महीनों तक शरीर में रखकर रात के अंधकार में फेंक आने का किसी भी माता का मन नहीं चाहता। निस्संदेह अव कुमारी अवस्था में कोई भी महिला गर्भस्थ संतान को नष्ट कर सकती है। कोई कानूनी - मोटरमा :: रोक नहीं है । नया कानून बनने के बाद बहुत-मी नाकियों ने गर्भात कराया है। कानून की नजरों में कुछ भी क्यों न हो, गर्भपात को पटना सुनते ही मी हृदय में दुख होता है। मां का कहना है, अपनी मंभोग-दामना पूरी करने के लिए एक पापरहित निर्मल ग्राम को नष्ट करने का क्या सिमी गोरोईनलिम अधिकार है ? तभी तो मां ने कहा है, "lam fightingabortion with adop tion." इन परित्यक्त, पंगु शिशुओ को प्राणवंत करने का अध्याय बहुत ही पट- प्रद है। बहुतो को अपोषण के कारण भुगतना पड़ता है। मिस्टरी रे संमार में तीन- सो के लगभग शिश हैं। दस मिस्टर मुस्तंद प्रहरी की भांति इन गिनुओंरी देखभाल में लगी रहती हैं। शंशव, किशोरावस्था पार कर यौवन में पाँव रगने के पहले ही बच्चो को कहीं और भेजने की व्यवस्था होती है। हर वर्ष कुछ सह- लड़कियों को विदेश चले जाना होता है। वहाँ के महत्व व्यक्ति पालन-गोपन करने का वचन देकर ही मां के पाम में इन्हें ले जाते हैं। क्या वे मांगते ही मिन जाते हैं ? "न, कभी नही।" मा वा सप्र जवाब होता है। आवेदन करने वाले को योग्यता के सवध में सदेहरहित होने के बाद ही मां सब-कुछ निश्चय करती हैं। अपनी सतान को क्या अट-से किसी को उठाकर दिया जा माना है ? पिर से लड़कियों के बारे में मां को और भी सतर्क होना पड़ता है। आज नोगिय है कल वह किशोरी होगी। उसके बाद उसके जीवन में यौवन कास आयेगा। इसलिए यौवनावस्था में किसी लड़की को कोई बुरे काम में न लगा सके, इस बारे में भी मो सोचती हैं। सारे सोच-विचार के मूल में सतान का त्याग ही रहना शान, अज्ञान, चतत्य के लिए ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। उम्रत है मानवीयता को। यही देखिये, शिशु-भवन में आज तक कम में कम दम हसार सहजकियों ने अपूर्ण शिश-अवस्था से पाले जाकर अ-आ-क-ग सोसा । शिक्षा पर बडे हुए हैं। पुटनो-पुटनों, पावो-पाली चलकर वे एक दिन अपने पैरों पर गडे होते है। गंगव, किशोरावस्था पार कर युवावस्या दिखायी देने के साथ ही कोई महस्य सरणी का हाप पकहकर ले जाता है। न, कोई प्रेम नही, युवक के मां-बाप ही देख. भाल कर शादी कर देते हैं। लडकी को बहू बना कर से जाते है। हो, यही बिना मां-बाप को लडकियां पति के माय जाती हैं। उन्हें न जीवन का स्वाद प्राप्त होता है। व्याह के बाद लड़की जिम प्रकार वर कोनेकर वार के पर मे जाते समय करती है, बिलकुल उसी तरह यह भी मो से पाम आती है। 1. गोद मर गपात का सामना कर रही है।
44 मां टेरेसा प्रणाम करती हैं। मां भी आशीर्वाद देती हैं। संसार असार है। का तब कान्ता कस्ते पुत्रः । किंतु मां इन सब दार्शनिक तत्वों के पास नहीं जाती। नर नारायण हैं। इससे बड़ा दर्शन और क्या हो सकता है ? तभी तो यहां बच्चे के बड़े होने पर कभी-कभी कोई महिला मां होने का परिचय देते हुए भागी आती है। अपनी संतान को गोद में लेकर घर लौट जाती है। परिवार, समाज, लोकनिदा -सब-कुछ अग्राह्य करने के बाद ही तो यह संतान को वापस पाना चाहती हैं। माँ का हृदय तो ऐसा ही होता है। यही तो स्वाभाविक है। कुमारी अवस्था में जो अवांछित शिशु को अस्पताल में छोड़ जाती हैं, ऐसी युवतियों के भी मन से विवाह के बाद क्या उस प्रथम संतान की स्मृति दूर हो पाती है? मां का कहना है, "नहीं, वह दूर नहीं होती। वे माँ के सिवा और कुछ तो नहीं होती।" ऐसा भी तो हुआ है कि विवाह के बाद कोई-कोई माता पहले की उस अवां- छित संतान को वापस पाने के लिए उसे खोजती फिरी हैं। अवांछित ! किसके निकट? समाज के निकट? परिवार के निकट? आत्मीय स्वजनों के निकट ? उनके लिए अवांछित हो सकता है। लेकिन दस महीने दस दिन जिस युवती ने उसे गर्भ में रखा, क्या उसके लिए भी? "न, कभी नहीं। मां माँ ही होती है। उसका कोई विकल्प नहीं है।" नि.संतान दम्पत्ति आते हैं। कोई बच्चे से मां सुनने के लिए या कोई दो-एक बच्चे को ले जाते हैं। अपने बच्चे की तरह उसे पालते हैं। केवल पश्चिमी बंगाल या भारत के नहीं, दुनिया भर के लोग इस शिशु भवन में आते हैं। क्षण-भर के लिए ही सही वे इन शिशु-संतानों के सुख-दुख की काहानी सुनते हैं। दुखी मन पर शांति का प्रलेप लगाने के लिए कोई-कोई, इनमें से दो-चार शिशुओं को सात समुन्दर तेरह नदी पार तक ले जाते हैं। मां की नजर में, सिस्टर लोगों के लिए प्रत्येक वच्चा समान है । सब शिशुओं के हृदय में शिशुओं का पिता सोया हुआ है यही तो उनके मन की बात है। कौन कह सकता है कि इन सारे शिशुओं में जीवक के समान कोई महान व्यक्ति छिपा हुआ है या नहीं? गौतम बुद्ध के अंतिम समय में उनकी चिकित्सा का भार जीवक पर पड़ा था। कौन जीवक? उसके मां-बाप कौन थे? किसी को नहीं पता। एक जाड़े को रात में एक नवजात शिशु को राजपथ पर पड़ा देखकर राज- गृह के अभयकुमार उसे उठा लाये। दास-दासियों के पास वह बड़ा होने लगा।
मा टेरेसा :: 45 जान होने के गद जीवक ने एक दिन अभयकुमार से पूछा, "महाराज, मेरे मां- वाप कौन हैं ? मुझे देखकर सब अजीव से हो जाते हैं। जाने क्या बातचीत करते जीवक को वात मुनकर अभयकुमार शांत स्वर में बोले, "जीवक, मैंने तुमको आदमी बनाया । मैं ही तुम्हारा पिता हूँ।" "और मौ?" अभयकुमार की आंखें धुंधली पड गयो, "तुम्हारी मां कौन है, यह तो मुझे नहीं मालूम।" इतिहास कहता है कि जीवक राजगिरि में शिलावती नाम की एक तरकालीन अनिंद्य सुंदरी, नृत्य-निपुण रूपोपजीविनी की गर्भजात संतान था। परवर्ती काल मे तक्षशिला के श्रेष्ठ चिकित्सक जीवक, बुद्ध के बिलकुल समीप आ गये थे। फौन जाने, इन्ही मनाथ परित्यक्त शिशुओ में भविष्य का कोई जीवक छिपा है या नहीं ? छिपे रहें या नही, मां के लिए सब संतानें ही एक-सी हैं। तभी तो मां ने कहा है, "प्रत्येक मनुष्य के अंदर मैं यीशु को देख सकती हूँ। भूख से व्याकुल व्यक्ति को कुछ देते ममप मुझे लगता है कि पीशु को ही खिलाया है। "और जव सेवा करती हूँ तब भी वही दृश्य मेरी आँखों के आगे आता है। किसी के पैरों, हाथो या देह में या किसी और जगह पाव साफ़ करते समय लगता है कि यीशु को पवित्र देह को ही घो दिया है । यह आनन्द कहकर नहीं बताया जा सकता है। यह अनुभव करने को चीज है।" दुविधा नही, द्वंद्व नहीं। प्रश्न-मंशय के परे इस राज्य में एक वार घुसने के बाद कोई निकल नहीं पाता। मां की तरह सिस्टर भी अपना-अपना काम करती रहती है। असे अजगर भागा आता है। मा में आम पेड़ पर खाता है, 'ऐक्य, वाक्य, माणिक्य' या 'जल पड़े पाता न. मे शुरू कर सिप्ल साइमन मेट ए पाइमन'- बच्चो के मुखों से यही निकलता रहता है । पाठशाला के पडितजी स्लेट-पंसित हाय मे पकडाकर हमे लिखना सिखाते थे। उसको हम कभी नहीं भूल सकते । बिलकुल उसी तरह सिस्टर की गोद में बैठकर कोई लिखता है, तमवीर खीचता है। और कोई-कोई परियों की कहानी वाले राक्षम को वात मुनते-सुनते मा को गोद में ही सो जाते सिस्टर ही तो उनकी मां हैं। सत्रह-अठारह बरस की एक युवती सन्यासिनी से बात हुई। उनका घर केरल में है । माता-पिता की स्वीकृति लेकर ही वे इस पथ पर आयी हैं। देखा कि योर्ड ही दिनों में इम शिशु-राज्य में बहुत प्रिय हो गयी है।
46 :: मां टेरेसा दुनिया में एक-दो संतानों को लेकर हमें कितनी परेशानी रहती है। और यह शिशु-भवन ? यह कम-से-कम तीन सौ शिशुओं का संसार है। किस तरह और कैसे यह चलता है यह नहीं सोचा जा सकता। दान-दान पर ही चलता है। "जब कोई दान नहीं देता तो कैसे चलता है, मां ?" मां बोली, "ऐसा भी हुआ है । खजाना ख़ाली। इधर शिशु-भवन का भंडार भी खाली। तो क्या इतने बच्चे बिना खाये रह जायेंगे ? तभी कोई दाता मशरीर हमारे सामने आ पहुँचे।" "यह कैसे होता है ?" भक्त का प्रश्न सुनकर माँ कुछ देर के लिए चुप रहीं। बोली, "सब उनकी " - "ईश्वर पर मन-प्राण छोड़ दो। देखोगे, फिर कोई समस्या समस्या नहीं लगेगी। दुख, वेदना, व्यर्थता आयेगी। आने दो। याद रखो, दुख ही आनंद लाता है और व्यर्थता ही सफलता लाती है। और वेदना जीवन को मधुमय बना सकती है। जिसके जीवन का पात्र वेदना से परिपूर्ण है वही तो वेदना से पीड़ित मानव का दुख दूर कर सकता है।" यीशु के जीवन में भी व्यथा थी, वेदना थी। क्रूस पर चढ़ी हालत में मनुष्य पीड़ा से छटपटाता है। जीवित रहने के लिए मनुष्य बंधन छुड़ाना चाहता है। यीशु ने क्या किया ? यंत्रणा-कातर यीशु के धीर, स्थिर कंठ से एक ही बात निकली, 'हे प्रभु, तुम इन्हें क्षमा करो। इन्हें नहीं मालूम, ये क्या कर रहे हैं।' भक्त ने जानना चाहा, "दुनिया में भूख, भूखे लोगों की भीड़ बढ़ ही रही है। इस समस्या के समाधान में अकेले उनके लिए कुछ करना संभव है ? और संभव हो भी तो उसका परिमाण कितना है ?" मां बोली, "हमारा काम समुद्र में पानी की बूंद की तरह हो सकता है, किंतु उस समुद्र में एक बूंद जल भी न पड़ता तो उस एक बूंद जल से समुद्र वंचित हो जाता। यही न ?" विचार, तर्क, नैतिकता नहीं-सहज सीधा उत्तर था। असल में आरंभ में गलती होने पर ही तो सारे झंझट रहते हैं। बाधाओं का विचार रहता है। काम कितना बड़ा है, इस बात पर दिमाग परेशान करने से क्या फ़ायदा? काम तो काम है। छोटा-बड़ा सब ही वरावर हैं। नहीं दे सकेंगे, इसलिए क्या हाथ बांधे बैठे रहें? मां बोली, "ऐसा क्यों? सारे भूखों के मुंह में अन्न नहीं दिया जायेगा। सब बीमार व्यक्तियों की सेवा भी संभव नहीं है। तो क्या सेवा, दान, प्यार के पर .
मां टेरेसा 47 टांग दें? न, राह चलते-चलते आंखों के आगे अगर कोई भूषा आ खड़ा हो तो उसे देखना ही धर्म है। उसकी भूख मिटाने के लिए आगे बढ़ना मनुष्य की मानवीयता का तकाजा है। सख्या चाहे हजार, लाख, करोड़ कितनी ही हो। प्रत्येक भनुप्य यदि प्रतिदिन एक अच्छा काम करे तो फिर शायद समस्या न रहे।" 'एक ही सूत्र में गूंथे हैं सहस्र जीवन' यह मनोभाव लेकर सेवा के पथ पर, प्रेम के पथ पर बढना होगा। "कैसर, यक्ष्मा, कुष्ठ-कौन-सी अधिक भयंकर बीमारी है ?" मां बोली, "इससे भी अधिक भयानक जो वीमारी है उसका प्रतिकार क्या "वह कौन-सी बीमारी है ?" एक सज्जन ने मां से जानना चाहा। मां बोली, "वह रोग देह का नहीं, मन का है। डॉक्टरों, वैद्यो के पीछे रुपये फेंकने से उसका कोई प्रतिकार नहीं।" "तो वह क्या चीज है, मो?" "पच्चीस बरम से अधिक असें में बहुत-से लोगों से मिली हूँ। वहुत-सी चीजें देखी हैं। जिसे कोई नही चाहता, जिसका कोई नही, उसके लिए यदि कोई मागे नही बढ़ता तो वही समाज का सबसे बड़ा रोग है । उस रोग को दूर करने के लिए एकमात्र औषधि प्यार है।" जो अवाछित हैं, उपेक्षित हैं, परित्यक्त है उनके लिए स्नेह क्या चीज़ होती है, यह समझने के लिए इस निर्मला शिशु-भवन में आना पड़ेगा। यह एक अलग संसार है। कहने के लिए पार्क सर्कस, मौलाली के बहुतेरे रास्ते हैं । किन्तु इस राह के किनारे इटाली मार्केट के सामने ही एक घर मे जो दूसरा ससार बन गया है उसे उस दिन देखा। मन-ही-मन सोचा कि जीवन में कितनी ही चीजें शायद यों हो अनदेखी रह गयी हैं। उसके लिए कोई दुख नही है, न कोई शिकायत है। अपने मन को कम-से-कम यही सांत्वना दे सकता हूँ कि मैंने शिशु-भवन के निर्मल शिशुओ को सिस्टरों के कंधों पर, पीठो पर खेलते देखा है । देखा है उन्हे हँसते, रोते, दुलार करते । यही क्या कम है? तेरह सोदपुर के गांधी कुष्ठ आश्रम 'प्रेम निवास' से श्याम दाजार लौटा हूँ। बाहर वर्षा हो रही है। आसमान की हालत ठीक नहीं है। गाड़ी मे जो लोग आये थे वे 48 मा टेरेसा - सब एक-एक कर चले गये हैं। बरसात है, इसीलिए बाहर नहीं निकल सका। इसीलिए आयोजन समाप्त हो जाने के बाद भी पंडाल के नीचे खड़ा रहा। मां ने मेरे मन की हालत समझकर या कुछ और जानकर, समझ में नहीं आया, अचानक इशारे से मुझे बुलाया। कुछ और वात कहने का मौका नहीं दिया। स्टेशन-वैगन में चढ़ गया। विलकुल सामने की जगह पर मां के पास ही जगह मिली। कुछ समय पूर्व ही राज्यपाल ऐन्टनी लान्सलट डायस की पत्नी जोन डायस ने कुष्ठ आश्रम की स्थापना की थी। स्टेशन-वैगन के चालक बैठे। स्टार्ट किया। लेकिन गाड़ी चली नहीं । कई वार घड़धड़ की आवाज होने के बाद युवक चालक ने बताया, "माँ, लगता है कुछ गड़बड़ी हो गयी है।" मां हंसते-हमते बोली, "गुड।" मां के मुंह पर हँसी देखकर चालक को कुछ भरोसा हुआ। फिर एक बार स्टार्ट करने की कोशिश की। फिर भी अचल । मां बोली, "वेरी गुड।" उनके चेहरे पर मुसकराहट फैल गयी। लेकिन तीसरी बार चालक असफल नहीं हुआ। गाड़ी स्टार्ट हो गयी। तब हम सब हंस रहे थे। मां और क्या सोच रही हैं ! जव सोचने की बात हो तो वे उसे हँसकर उड़ा देती हैं । इसी तरह हर काम में मां आशा जगा देती हैं। गाड़ी वी० टी० रोड पकड़कर आगे बढ़ी। मैंने मां से पूछा, "आप बहुत जगहों पर बहुत तरह के काम करती हैं। इन सारे कामों का विवरण छापकर सर्वसाधारण में बँटवा क्यों नहीं देती ?" "दिस इज योर जॉब।" मां का संक्षिप्त-सा जवाब था। मन-ही-मन मां पर श्रद्धा बढ़ गयी। सोचा, हम ज़रा-सा कुछ करते ही अपना ढोल पीटने में लग जाते हैं। और यह महान महिला उसके आस-पास भी नहीं जाना चाहतीं। 'मा फलेषु कदाचन'-गीता की इस बात का तात्पर्य मानो फिर एक बार अंतर के अंतस्थल में अनुभव कर सका। समय बारह का होगा। थोड़ी-थोड़ी वरसात उस समय भी हो रही थी गाड़ी श्याम बाजार की ओर बढ़ती जा रही थी। मां बीच-बीच में पीछे घूमकर संन्यासिनियों के साथ बातें कर रही थीं। सहज, सरल, सुंदर, सुस्पष्ट । जरा भी जड़ता न थी। जड़ता जो है वह तो हमारे भीतर ही है। मेरा प्रश्न सुनकर मां क्या सोच रही हैं ? आंखें, मुंह-सब-कुछ सामान्य है। इनमें ही जैसे कही कुछ असाधारण छिपा हुआ है। खिची-खिची आंखें, प्रशस्त ललाट, उन्नत नाक-कुछ भी तो नहीं है । लेकिन एक बार बात करते ही लगेगा कि जैसे किसी अपने संसार के पास आ पहुँचे हों। मां अकेली ही नहीं हैं, जोड़ा- गिरजा ने पाम आचार्य जगदीश वसु रोड पर मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटीज़ के उस मा टेरेसा :: 49 आसमानी रंग के मकान को दूसरी मंन्यामिनियां भी बाहर मे देसने पर विलकुल साधारण लगेंगी। कुटिया कुटिया में, 'दरिद्र लोगों में काम करने में अमाधारण बनने से तो काम नहीं हो सकता। अतर के माधुर्य मे वे जैसी असाधारण हैं उम विपम में मदेह की जरा नी गुजाइश नहीं है । कुष्ठ रोगियों के लिए मां की चिंता का अंत नहीं है। हर सड़क पर कोरियों को मिक्षा का बतंन लिये घूमते देखकर उनका मन रो पड़ता है । वे उनके बीच चली जाती है। उनके पास जाती है। बातें करनी हैं। बदन को छूकर उन्हें प्यार करती हैं। जिसे कोई प्यार करने वाला नही उसे अगर प्यार का स्पर्श मिले तो वह उस व्यक्ति-विशेष के लिए मचमुच स्वगिक होता है । एक बस्ती से दूमरी वस्ती में, कुटिया-कुटिया में मां पहुंचती हैं । कोढी के पावों को हायो से धो देती हैं । उन पर हाथ फेरती हैं। उन्हें खुश करती हैं। स्वयं आनदित होती हैं। हमारे देश मे गाधीजी ने कोढ़ियों को सेवा अपने हाथों से की यी। उसके भी पहले एक और श्वेतागिनी ने कोढ़ी न सही, पर कलकत्ता में प्लेग की वीमारी रोकने के लिए एक वस्ती से दूसरी वस्ती में अभियान आरंभ किया पा। आज से इक्यासी बरस पहले कलकत्ता के वागवाजार को वस्तियों का दृश्य क्या था, इमे जरा सोचिये। 1899 ई० के अप्रैस की तेज धूप मे सिस्टर निवेदिता स्वय झाड़ लेकर सड़क साफ़ करने को तैयार हुई। मुहल्ले के युवक उस दिन शर्म से गढ़ गये। निवेदिता से लेकर उन्होंने खुद झाड़ ले ली। उस दिन स्वामी विवेकानन्द ने प्लेग रोग के आक्रमण को रोकने का सब तरह की व्यवस्था का भार निवेदिता पर ही छोड़ा था। प्लेग के समान साघातिक रोग, और उमे रोकने के लिए हाल ही में आयी हुई एक श्वेतागिनी ! इस तरह उस दिन एक अचिंतनीय व्यवस्या से सब लोग आश्चर्य में पड़ गये थे। स्वामीजी के लिए ही यह करना सभव या। स्वयं-शिक्षिका होकर भी वागवाजार के अस्वास्थ्यकर गांव मे, बस्ती की उन सीली-पुरानी कुटियों में निवेदिता प्लेग रोग से ग्रस्त बच्चे को गोद में लेकर घंठी हैं। दिन बीतने पर रात, रात बीतने पर दिन अपना निवासस्थान छोडकर वे इन सारी कुटियों में सेवा में लग गयी। घर को शुद्ध करने की जरूरत थी। वे पद ही छोटी-सी सीढ़ी लेकर कोठरी में चूना पोतने लगी। रोगी की मृत्यु निश्चित जानकर भी उमकी सेवा में जरा भी शिथिलता नहीं आयी। दो दिन बाद बच्चा इस कपणामयी के स्नेहतप्त अक में अतिम नीद में सो गया। मृत्यु के पहले बच्चा उनको ही मां समझकर अंत में 'मां-माँ' कहकर रो पड़ा। निवेदिता की 'स्टडीज़ फॉम ऐन ईस्टन होम' पुस्तक में प्लेग नाम के लेप में भी एक शिशु की मृत्यु का वर्णन है। केवल उनकी अपनी कोई चर्चा नहीं है । इम सांघातिक रोग के मात्रमण के प्रतिरोध में परम आत्मीय के ममान उनकी निरलम और एकातिक मेवा- ।
50 :: मां टेरेसा परायणता की बात कलकत्ता वालों को कभी विस्मृत न होगी। वस्तुतः इसके बाद ही निवेदिता का नाम चारों ओर फैला। वे केवल परिचित ही नहीं, श्रद्धेय भी हो गयीं। बहुत दिन हो गये। फिर भी किताव के पन्नों में इन कहानियों को पढ़कर शरीर आज भी सिहर उठता है। निवेदिता न सही, मां टेरेसा तो हैं । तभी तो हम मोतीझील, दक्षिण कलकत्ता के खिदिरपुर में मां के हाथ में बस्ती साफ़ करने के लिए झाड़, देखते हैं, जिस झाडू, को हाथों में लेकर आज से इक्यासी बरस पहले सिस्टर निवेदिता उत्तर कलकत्ता की वस्तियों को साफ़ करने उतर पड़ी थीं। चित्र एक ही है। एक पहले का और एक वाद का। समय का अंतर विचारों की एकता को अलग नहीं कर सका। निवेदिता के साथ मां टेरेसा का धार्मिक पार्थक्य अवश्य है। किन्तु मां जब कहती हैं, "जो धर्म जीव की सेवा करना, अनाथ-असमर्थ-परित्यक्त लोगों से प्यार करना नहीं सिखाता वह धर्म, धर्म नहीं है," तव इसके बाद निवेदिता की सेवा और मां की सेवा में फ़र्क कहाँ है ? अंधकार से प्रकाश में आना है - चौदह करुणामयी मां और उनकी सहस्राधिक भगिनी मिलकर इस सेवा के संसार को प्यार के प्रलेप से नित नूतन करती रहती हैं। गांधीजी के जन्मदिन, दो अक्तूबर, को टीटागढ़ के कुष्ठ आश्रम में सद्य कुष्ठ-व्याधिमुक्त उस युवती की बात बहुत दिनों तक याद रहेगी। 'गांधी प्रेम निवास' नामांकित कुष्ठ आश्रमों की स्थापना के बाद राज्यपाल डायस चले गये थे। धीरे-धीरे आयोजन का प्रांगण खाली हो गया । अचानक अधेड़ उम्र का एक आदमी मां के पास आया। मां को देखते ही अधर्मला कुर्ता पहने एक व्यक्ति वोला, "मां, मेरी लड़की अच्छी हो गयी है। उसका व्याह भी पक्का हो गया है। दिन और समय भी निश्चित हो गये हैं। लड़के वाले सोने के बटन, अंगूठो, घड़ी मांग रहे हैं। मैं अब गहने-कपड़े कहां पाऊँ, मां? मां तुम्हारे रहते...।" मां का हृदय पिघल गया। मां बोली, "होगा, होगा। उसका कुष्ठ जव दूर हो गया है तो व्याह भी होगा।" जैसी बात वैसा ही काम । गाड़ी पर बैठते ही एक सिस्टर को पुकारा । शुद्ध चंगला में बोली, "अरे मेरे पास एक अंगूठी है न ? वह रहे या न रहे, लड़की का माटेरेमा :: 51 कुछ ठिकाना करना ही होगा।" पास ही तेरह-चौदह वरम की एक लड़की को सड़े देयकर पाम आने के लिए हाय हिलाया। उसके पाम आते ही बोली, "मां, तुम्हारा हाय कंमा है ? तेल मालिश करती हो? आउटडोर मे कायदे से तो आ रही हो?" लडकी मां के मुंह की और मुग्ध दृष्टि से कुछ देर तक देखती रही। हाँ मां, दाग करीब-करीब गायब हो गया है। ये कुष्ट रोगी जूता-मिलाई मे चंडीपाठ तक किसी-न-किमी कार्य में निपुण हैं। खपरैल की छत के नीचे छोटी छोटी कोठरियां ही इन मब रोगियों के रहने की जगह है। जिनकी हालत पयादा पराव है उन्हें स्वावलंबी बनाने के लिए तरह-तरह के कामो में लगाया हुआ है। पोप छठे पाल 1964 ई० में भारत माये थे। लौटने के समय वे अपनी मफेद लिंकन गाड़ी मदर टेरेसा को उपहार में दे गये। मां ने एक दिन के लिए भी गाडी का उपयोग नहीं किया। गाडी मिलते ही एक लॉटरी का प्रबंध पिया। लॉट कई लाख रुपये मिले। सब रुपये कुष्ठ बाथम की स्थापना में सर्च हुए। इसी उद्देश्य के लिए मदर टेरेमा ने 1971 ई० को जनवरी में प्राप्त पोप जॉन माति पुरस्कार के 21,500 डालर पर्च किये। कुष्ट-रोगारांत गभी समाजों में परित्यक्त रहते हैं। सब होने पर भी उनका कोई नहीं होता। लेकिन जो सापातिक रूप मे आत्रात न हो, वे कुछ काम-माज कर मामूली-सा कुछ कमा सक, इसलिए मां ने निश्चय किया कि एक प्रेससरीदेंगी। प्रेस के बारे में मां की अपनी कोई जानकारी नहीं है। रोगावात ये व्यक्ति काम कर सकेंगे या नहीं, यह भी उन्होंन नही सोया। प्रेस सरोद लिया । कुष्ठ रोगी ही उम प्रेम को चला रहे हैं। मो में इस तरह के विचित्र माल देगने योग्य है। यह सब देस-मुनकर लगता है कि मदर टेरेसा के एक पनिट सहकर्मी ने जी कहा या यह सच है । यद्यपि रोग मत्रामक नहीं है, फिर भी इम मवध में एक पुणा का भाव समाज मे सर्वत्र फैल गया है। मां के लिए प्रश्न है, 'मनुष्य मनुष्य मे यह पणा क्यों है ?' आसनसोल के निकट रकार ने माँ को जमीन का एक टुकडा दिया। कुष्ठ रोगियो वा एक शहर-गानि नगर-गहा हो गया। यह तेईस बरम पहले की बात है, सन् 1957 की। पांच बुप्ठ रोगी मा के पास आये। पांच मोगों के मामूली मोड होने पर भी कुछ काम हुआ। कोड हो गया था, इसलिए उन्हें काम पर गे चले जाने को कहा गया । उन्हें अपने आत्मीयों के पास भी स्थान नहीं मिला। भीग मांगने के मिया और को पारा न था। उगी समय कुष्ठ रोग के विशेषज्ञ डॉ. मेन मा के पाम आये। डॉ० मेन ने इम रोग के संबंध में सिस्टरों को ट्रेनिंग दी। केवल गरीव ही नहीं, कुष्ठ रोगियों में ऊंची शिक्षा प्राप्त अध्यार, डॉक्टर, 52 माँटेरेसा इंजीनियर, सरकारी अफ़सर, धनी लोगों की संख्या भी कम नहीं है। किन्तु इस रोग ने उनको घर, घर के प्रिय लोगों, और तो और समाज को छोड़ने पर विवश कर दिया है। अपने ही वाल-बच्चे कोढ़ हो जाने पर मां-बाप से मिलना नहीं चाहते। जिस तरह भी हो, घर से निकाल देने पर ही उन्हें चैन आता है। इस प्रकार वे बिना किसी साथी के अकेले पड़ जाते हैं। कलकत्ता के अभिजात समाज में सुपरिचित व्यक्तियों में भी कई-एक अनादर व उपेक्षा से दिन बिता रहे हैं। इसीलिए मां ने इन रोगियों की सेवा के लिए सिस्टरों को नियुक्त किया है। इंग्लैंड, अमरीका से माँ ऐसी दवाइयाँ जमा कर रही हैं जो समय पर रोगी को देने से यह रोग पूरी तौर पर निर्मूल हो जाता है। कुष्ठ रोग अच्छा कर देना संभव है। किन्तु इसके लिए जरूरी है समय पर इलाज। निरोग होने पर सरकार की दी हुई 34 एकड़ जमीन पर वना शहर 'शांति नगर' उनका पुनर्वास होगा। तरह-तरह की व्यवस्था रहेगी। स्वस्थ होकर रोगी अपने ही छोटे-छोटे उद्योग खड़े कर सकेंगे। किसी को भीख की झोली लेकर न निकलना पड़ेगा। हिमालय के समान ऐश्वर्य की अधिकारी मां टेरेसा की सहृदयता से 55 केंद्रों में लगभग आधे लाख कुष्ठ रोगियों की चिकित्सा का प्रबंध हुमा। पंद्रह का स्कूल गरीबी दूर करना ही नहीं, साथ में शिक्षा के प्रकाश की भी आवश्यकता है। इसीलिए तो मां ने धर्म के नहीं, वर्ण-परिचय के माध्यम से शिक्षा देना शुरू किया है। छात्र-छात्राओं का स्थान है फुटपाथ। इन लड़के-लड़कियों में किसी की उम्र है वारह वरस, किसी की वाईस वरस । इससे भी अधिक उम्र के व्यक्ति हैं। शहर तो की वात, गांव की पाठशाला की शक्ल भी इन लोगों ने किसी दिन नहीं देखी। विद्यासागर का नाम नहीं सुना । वर्ण-परिचय के पन्नों के स्पर्श करने के सौभाग्य से ये लोग आज भी वंचित हैं। दो-एक ने अगर कभी स्कूल की शक्ल देखने की कोशिश की भी तो तथाकथित शिक्षकों ने उन्हें अशिक्षित, मूर्ख फहकर स्कूल की ड्योढ़ी से विदा कर दिया। मां बातें कम करती हैं, जो कुछ कहती भी हैं वह मन-ही-मन में। 'दरिद्र भारतवासी, मूर्ख भारतवासी... तुम्हारे भाई' -स्वामीजी की यह वाणी जैसे उनके हृदय में गूंजती रहती है। शिक्षा देने के पहले गुरू होते हैं स्वास्थ्य संबंधी कुछ पाठ। अपने हाथ से काम करके दिखाना पड़ता है, स्वस्थ्य रहने, साफ-सुथरा रखने के उपाय । शिक्षित मोटरसा : 53 कर किसी को कंलिक धर्म में दीक्षा देना मां का काम नहीं है। मां ने कहा, "मनुप्य को ईश्वर की ओर ले जाना ही मेरा काम है। और उसी के लिए आवश्यक है सेवा। "यदि प्रभु की कृपा से उनकी किसी संतान को सेवा कर सको तो तुम धन्य हो जाओगे। अपने को बिलकुत कोई महत्वपूर्ण न समाना। तुम धन्य होरि तुमको सेवा का अधिकार मिला है, औरो को नहीं मिला।" मारे जीवन में भी यह बात पूरी तौर पर लागू होती है। तभी तो अपने को भूलकर एक बात, एक प्राण-एकता के आदर्श में सब कुछ मिटा दिया। हिन्दू, मुमतमान.न. ईसाई का कोई भेद मां के पास नहीं है। भेद का विचार ही अमान है ! वोघ ही तो जान लात है। पहले दिन तीन छात्राएं आयी। अगले दिन कई छात्र-छात्राएं जाने। तरह शुरू हुआ--नया स्कूल, नया जीवन । जिस स्कूल में मापाडी पीने भी तीन अध्यापिकाएँ आयो। निरक्षरता हटाने के नाम पर ये नोर रवीर पुस्त, बड़ी-बड़ी पुस्तकें शायद न छपा सको, किन्तु वर्ण-परिचर का पार चलता रहा। इस सबके लिए तो धन की आवश्यकता है। वह कहाँ से आता है ? मां बोली, "शुरू-शुरू में कुछ अहवन न आयो हो, ऐसी बात नहीं है । हस्स- वान लोग सहायता करने आगे आये।" भामूली-से-मामूली दान को भी मां बहुत मूल्यवान मानती हैं। पाप गरे लेकर सड़क पर निकल पड़ी थी। और मात्र, लाखों रुपयों का दान पाकर भी मा में बहुत तेजी नहीं आती। सब उनकी दया है। मिशनरीज ऑफ़ पेरिटोर ने 31 स्कूलो में इस अवैतनिक शिक्षा-दान का प्रबंध किया है। इसके बाद ही सिस्टरों ने सन्यासिनी बनने के उद्देश्य से आना गुरूपिय। यह 1949 ई० की बात है। पहले आने वालों मे पाच-सात सारिया पूरी गाली युवतियां थी। उमके बाद कई राज्यों की लड़कियो आयी। उन्होंने इमर के प्रति अपने को समर्पित किया। धीरे-धीरे और भी बढ़तेरी सम्मिसित हुई। स्तरता में राह चलते-चलते अब इन्हें प्राय देखा जाता है। नीले किनारे को सफेद माहित पहने रहती हैं। सिर पर यूंघट तो नही, टोगो की तरह साही ही मुसी रहती है। डॉक्टर, नर्स, समाजसेविका, अध्यापिकाइनमें सब ही है। 1950 मेगम मिलाकर यारह सिस्टर यो। अब इच्छा रहने पर भी मो बनकता के बाहर नहीं जा सरती हैं। सिस्टरो को ट्रेनिग देनी होती है। "सवेरे से शाम तक, इन सिस्टरों को क्या-नया करना होता है? "क्या नही करना होता है ? पर धोना, पानी से माने से मे यस्ती-बस्ती दरिद्रों की सेवा-सिस्टरों को सबन करना होता है।
54 :: मां टेरेसा -- लंबे नौ वरस बाद सन् 1959 में कलकत्ता के बाहर पहला भवन बन गया। इसके बाद दिल्ली में "अधिकांश युवतियां कहां से आयी हैं ?" "पश्चिम बंगाल, विहार, उत्तर प्रदेश, असम, उड़ीसा, मेघालय. -कहाँ की नहीं हैं ! विदेशी भी हैं।" मां बोली, "अधिकांश मध्य वर्ग की हैं। प्रचुरता के प्रलोभन का त्याग कर कुछ धनी लड़कियां भी आयी हैं। एंग्लो-इंडियन भी अपवाद नहीं हैं।" "किन्तु धनी लड़कियों के लिए एक वस्ती से दूसरी वस्ती में काम करना वहुत कठिन काम नहीं है ?" "क्यों होगा? वे तो जीवन का सब-कुछ मिटा देने के लिए आयी हैं। उन्होंने अपना जीवन-मन भगवान को सौंप दिया है, इसी में तो आनन्द है। मान-सम्मान, सब कुछ तुच्छ है । मानव-सेवा के बीच उन्होंने ईश्वर को पाना चाहा है। असीम करुणा के आधार चिर-आनन्दमय ईश्वर की बात उनको कभी विस्मृत नहीं होती। उनकी ही कृपा से दरिद्र-से-दरिद्र मनुष्य की सेवा का सुयोग पाकर ये स्वयं को धन्य समझती हैं।" मां बोली, "जिस दिन इन्होंने इस सेवाव्रत में अपने को नियुक्त किया उस दिन से ही सेवा के काम, प्यार के काम के सबंध में आलोचना शुरू हो जाती है। ईश्वर की इच्छा पूरी करने की वात लेकर भी आलोचना होती है। प्रार्थना की नीरवता में अन्दर से ही शक्ति-संचय होता है। उसी संचित शक्ति के बल से बल- वती होकर वे एक वस्ती से दूसरी वस्ती को चल पड़ती हैं। वहां जाकर काम, लोगों के साथ मिलना-जुलना-~~यह दोनों ही ट्रेनिंग-इनमे अन्तनिहित है। सामान्यतः ट्रेनिंग की प्रथम अवस्था में सिस्टर बाहर नहीं जाती। "ऐसा न होने से वे यीशु को किस प्रकार पहचानेंगी ? अनुभव करने की शक्ति ही कहां से मिलेगी? दरिद्रतम मनुष्यों में ही छद्मवेशी यीशु छिपे हैं। मन की तयारी के लिए इस शक्ति को संचित करने की बहुत ज़रूरत है।" "मां, यह तो कठोर साधना है ! यह युक्ती संन्यासिनियाँ क्या इस सेवा के काम को सहज भाव से ले सकेंगी?" "वहुत कम संख्या में सिस्टरों ने मिशनरीज ऑफ़ चैरिटीज़ छोड़ी है । जो कुछ चली गयी हैं उन्हें गिनकर बताया जा सकता है। यह सचमुच खुशी की बात है। पहले से ही बहुसंख्यक सिस्टर विश्वास के साथ काम करती रही हैं।" "ऐसा होने पर क्या पूर्णता का स्वाद उन्होंने इसी प्रकार पाना चाहा था ?" "हाँ, यह एक चलेंज की तरह है। सब-कुछ के बदले में इन्होंने कठोरतम जीवन का सामना करने के लिए खड़े होना चाहा था।" 'हे दारिद्रय, तुमि मोरे करे छ महान'कवि की इस उक्ति का मतलब माटेरेमा :: SS उन लोगों ने मर्म-मर्म में पा लिया है। दरिद्रता को भूषण बनाकर काम करना। भगवान को, भगवान की प्रतिमूति को, तो इसके भीतर मे ही गांजकर निशाना होगा ! प्यार के कगाल को, उस सर्वशक्तिमान को, इमो सरह प्यार करता होगा। केवल बाहरी क्रियाकलापही नहीं, उममे भी अधिक कुछ जरूरी है। इसीलिए मन-प्राण सचमुच ईश्वर को समर्पित हैं या नहीं, इमे मो जांचकर देखनी है। इस तरह के जीवन को वे कितना चाहती हैं ? सस्था के काम की मुविधा के लिए अंग्रेजी सीपना अनिवार्य है। भारतीय भाषाओं में आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए पुस्तके हैं। किन्तु उनके अंग्रेजी में न रहने से सिस्टरो को अंग्रेजी मे प्रकाशित बाहर की कितायें पदनी पड़ती है। भारत के बहुत-से प्रांतों से सिस्टरें आयी हैं । तरह-तरह की भाषाओं के माध्यम से बहुत बार असुविधा उत्पन्न हो जाती है । इन्ही सारे कारणो से सामान्य माध्यम के रूप में अंग्रेजी को चुन लेना पड़ा है । इसके बाद आती है पादरी को स्वीकृति । उसके लिए भी आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश के बाद धर्म-संप्रदाय के शिक्षार्थी के रूप में दो बरस विताने पाते हैं। उसी समय तपस्या चलती है 'कृच्छ साधना' तपस्या। यही अंत नहीं है। मिशनरीज ऑफ चैरिटीज़ के नियम-अनुशासनों के साथ भी सिस्टरी का परिचय करा दिया जाता है। सिस्टर लोग जीवन-मन-प्राग से जिस काम को करने चली हैं उनके उद्देश्यों के संबंध में भी सम्यक मान रहना वांछनीय है। गरीवी को जीवन का साथी बना लेना बहुत सहन काम नहीं है। दरिद्र को प्यार करने के लिए, उसे जानने के लिए उसके निकट जाना पड़ेगा। दरिद्रतापूर्ण जीवन का अभ्यस्त होना पड़ेगा। सपूर्ण प्रेम यीशु के चरण-कमलों में समर्पित है। इमी पवित्रता की शपप तो ली है मां ने, मां की सिस्टरों ने । यही तो अनुसरण की शपप है ! मिशन के दूसरे अनुशासन तो हैं ही! "तुम ईश्वर को कहाँ ढूंढने जाओगे, यदि तुम बसे अपने हाय मे जीवित प्राणियों मे नहीं देख सकते, यदि उन्हें उस आदमो के अदर नहीं देख पाते को राह मै वोझ उठाये पसीने मे तर-बतर हो रहा है !" यह देगना हो तो अमनी देखना है ! जीवन-यात्रा का आदि और अत यही तो है। और अंत में, जो प्राणान करेगा, उसका भय नहीं है। दरिद्र मानव की सेवा में इन प्राणों को पिलर पर देना होगा । विना पैसे के इस सेवा को लेने और पाने के अधिकारी एरमात्र दरिद्र जनसाधारण हैं। इसीलिए तो सिस्टरों से मां को बहुत आशाएं हैं। उन्हें गिरती भी है। ये सब-कुछ दे देना चाहती हैं। यह वात हर सिस्टर जानती है कि योग कभी न 56 :: मां टमा कभी भूल, कभी बेसहारे-तरह-तरह के वेश में हमारे सामने उपस्थित होते रहते है।हम दो प्रतिदिन नित नये रूप में उनकी ही सेवा करते रहते हैं। प्यार करते है। प्यार ही आनंद का स्रोत है। यही विश्वास इनके जीवन में आनंद ला सका है। सोलह दमदम हवाई अड्डे से दिखायी पड़ता है—निर्मला केनेडी केंद्र। आम, जामुन, नारियल के पेड़ों की छाया में छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियों की मधुर कलकल ध्वनि है। देखने में बड़ा अच्छा लगता है। जैसोर रोड के पास फाटक के ऊपर लगा माइनवोद तमाम लोगों को दिखायी देगा। लेकिन इसके भीतर परित्यक्त, पंगु, अवांटित बच्चों से लेकर पति द्वारा परित्यक्त पत्नी, मूक, वधिर, मानसिक रोग- ग्रस्त लोग-सभी हैं। जब 1971 में बांग्लादेश के झुंड-के-झुंड शरणार्थी भारत चले आये तो इस जगह पर एक शिविर बन गया था। बांग्लादेश स्वतंत्र हुआ। शरणार्थी स्वदेश लौट गये। माँ ने यह जगह न छोड़ी। उन्होंने इसे जड़, पक्षाघातग्रस्त पंगुओं का आवास स्थान बनाया। यह केंद्र काफ़ी बड़ी जगह में फैला हुआ है । मिस्टर क्लेयर हमको एक छोटे से कमरे में ले गयीं। कमरे में घुसते ही देखा कि एक विदेशी स्त्री एक बच्चे के हाथ के नाखून काट रही है। यह भद्र महिला मुदूर कनाडा से आयी थीं। फिजियोथेरापी की विशेषज्ञ यह महिला पति की मम्मति लेकर चार महीने की छुट्टी पर यहाँ आयी हैं। पंगु, जड़बुद्धि वाले, पतले- पतले हाथ-पांव या सूखे अंग वालों के शरीर की मालिश करना उन्हें पसंद है। इस काम में उनकी ट्रेनिंग, ज्ञान-दोनों ही हैं। भद्र महिला के चेहरे पर मुस- कराहट बनी ही रहती है। बच्चे की उम्र सात वरस होगी। सिर शरीर की तुलना में बहुत बड़ा-फूले गुब्बारे की तरह था। प्रश्न करने के पहले ही सिस्टर क्लेयर बोली, "डॉक्टर जवाब दे गये थे। जीवित रहने की कोई आशा न थी।" बच्चे की ओर देखकर शुद्ध बंगला में बोली, "दिलीप, तुम्हारा गाना सुनने ताऊजी आये हैं। एक गाना तो सुना दो।" साथ-ही-साथ शुरू किया--"रघुपति राघव राजा राम, पतित- पावन सीताराम।" बाहर आते समय मन में आया कि जड़बुद्धि वाले इस बच्चे की यावाज तो बहुत मधुर है ! उसमें तो कहीं जड़ता नहीं है। सिस्टर क्लेयर समीप के कमरे में ले गयीं। वहाँ खाट पर एक सुंदर युवती को देखकर बोली, "यह वोल नहीं सकती। सारा दिन ऐसे ही बैठे-बैठे विता देती है ।"
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माटोमा :: 57 अन्दा स्वास्थ्य, मिर पर पने बाल, रस्ट पहने देगकर फौरन बंगाली रहने की तबीयत न होगी। जन्म में गूंगी न थी। दो-एक बरम पहले तक बात कर सकती थी। विवाहित थी। पहनी सतान होने के बाद में ही युवती की वारनि चली गयी थी। युवती का उलटा भाग्य उमरे बाद में ही दिमापी पड़ा। पहले सास-समुर, उमके बाद गुद पति के साथ मन-मुटाव हुआ। अंत में युवती की मा मदर की शरण में पापी । तभी गे वह यही है। मिस्टर क्लेयर युवती को जिलागु औसो की ओर देगती रही । "मित्रा, या हुआ? बातें करो। यह देपो, कौन तुमसे मिलने आया है। यान करो। तुम तो बात कर सकती थी !" मिष्टर की ओर आंग झाकर मित्रा देगती है । हमारे मित्र फोटोग्राफर पहाड़ी रायचौधरी के हाथों में कमरा देगकर फिम्-गे हंग दी। मित्रा की बात तो मुन नही पाये। लेकिन उग हैमी की आवाउ मानो अब भी पही है। मां के आदर्श पर प्रबुट होकर पहले जो दस सिस्टर मागे आयी थी, मिस्टर यलेयर उनमें विशिष्ट हैं। वे मा को ही छात्रा हैं। उनका पहले का नाम या किरण दत्त । ढाका की लड़की किरण अव मिस्टर पलेयर हैं। मां-बाप की मम्मति से ही इस राह पर आयी हैं। बंगला, अंग्रेजी दोनों ही भाषाएं समान रूप से बोल सकती है। 'निमंता केनेही आश्रम की जिम्मेदारी उन पर ही है। इन सारे पगु, जड्युद्धि वाले और मानसिक रोग-प्रस्त शिशुओं को देखकर एक भक्त सीधे मां से पूछ बैठे, "अच्छा मां, इन गिशुओं ने तो कोई पाप नही किया। हम बड़े सोग पाप करने पर दर पा सरते हैं। किन्तु वितयुन निष्पाप इन निर्मल शिशुओं ने तो कोई पाप नहीं पिया तो फिर..?" प्रश्न सुनकर मां से अनमनी हो गयो । अपने में ही डूब गयी। आरमस्य हो गयी । क्षण भर में फिर प्रकृतिस्प हुई। मां बोली, "अमली मुदरता तो यही है। निष्पाप, निरीह अगर षष्ट न पाते तो पृथ्वी रसातल को चली जाती। ये निष्पाप, निरीह ही तो हमारे लिए सारे पापो का दा भुगत रहे हैं। यह रितना वहा त्याग है. सोचा भी नहीं जा सकता। हम इनके कितने ऋणी है-यह महकर समझाया नहीं जा सकता।" जिस तरह ये सारे निष्पाप शिशु कष्ट पाते हैं उसे देषकर सगता है कि इन्हें हमेशा के लिए गुप्ता देना अच्छा होता। उससे इन निर्मल यच्चों को शाति मिनती। बच्चों के मां-बाप भाति पा जाते। मैकिन मां कभी ऐमा नहीं सोचती। "जीवन मात्र ही पवित्र है। अपनी सामय के अनुसार उमे सदर बनाना हमारा कर्तव्य है।" ।
58 :: मां टेरेसा सत्रह इस जीवन की कथा ही तो मां बचपन से सुनती आयी हैं। यूगोस्लाविया के स्कपजे शहर के स्कूल में-हां, उसी स्कूल में पढ़ते समय उन्होंने क्लास में शिक्षिकाओं से कलकत्ता में जेसुइट पादरियों के काम-काज के संबंध में किस्से सुने थे। शिक्षिकाएं क्लास में बैठकर जव कलकत्ता के पास दार्जिलिंग पहाड़ की चोटियों पर जेसुइटों के प्रतिदिन के जीवन पर समालोचना करती तो टेरेसा का मन ऐड्रियाटिक सागर को पार कर बहुत दूर चला जाता। कल्पना में किशोरी लड़की देखती दाजिलिंग की पर्वतमाला को। क्यों था यह आकर्पण? इस संबंध में मां ने भी किसी को साफ़-साफ़ नहीं बताया। पर एक कारण हो सकता है-उसी समय यूगोस्लाविया के जेसुइटों का कलकत्ता में आगमन । संन्यासिनियां दिनोंदिन, रातोंरात काम करती हैं । दरिद्र जनता की सेवा में उनका जीवन समर्पित है। किशोरी मन में इन सब बातों ने प्रभाव डाला। तभी तो बाद में विशेष रूप से कुछ सोचना न पड़ा। 1928 ई० की 29वीं नवंबर को मात्र अठारह वरस की उम्र में वे डबलिन के लोरेटो अवे में सम्मिलित हो गयीं। दरिद्र, दुखियों की सेवा की कहानी ने किशोरी हृदय पर जो प्रभाव डाला वही क्रमशः उनके जीवन में अधिकाधिक गहरा होता गया। मौलाली में जोड़ा-गिरजा के सामने आसमानी रंग का मकान वाहर से देखने में और तमाम मकानों की तरह ही है। 54-ए, आचार्य जगदीश वसु रोड के इस मकान में यदि कभी जाने का सौभाग्य मिले तो आप पायेंगे कि कोने की ओर एक छोटी बैठक मां के लिए निश्चित है। यहाँ सिस्टर भी बैठती हैं। दो-एक कुसियों के सिवा और कोई सामान नज़र नहीं आता। उस दिन फ़ोन करके मां से मिलने गया था। पिछली रात को ही अमरीका से आयी थीं। मार्च का महीना था। सवेरे के दस बजे थे। मिलने का उद्देश्य था कालीघाट के निर्मल हृदय' और दमदम के 'निर्मला केनेडी आश्रम' के कामधाम के बारे में फ़ोटो लेने की अनुमति लेना। सवेरे फ़ोन करने पर मां ने मिलने को कहा। दस बजे के वक्त फाटक के अंदर जाकर देखा कि मां एक विदेशी सज्जन से वातें कर रही हैं। बाहर एक ऊँची पक्की जगह पर बैठ गया। पांच मिनट बाद ही मां निकल आयीं। विदेशी सज्जन को दरवाजे तक पहुंचा कर लौटते वक्त मुझे लेकर कमरे में आयीं। सोचा कि अव पंड लाने के लिए किसी से कहेंगी। पर पैड कहाँ ? छोटे काग़ज़ का टुकड़ा मेज पर से उठाया। वह देखने में छुटपन में पंडितजी की क्लास से भागकर लॉटरी खेलने वाले काग़ज़ के टुकड़े की तरह था। उस पर ही दो वातें लिखीं। एक पर लिखा, "सिस्टर लूक, प्लीज़ ।
मोटेरेमा :: 59 असाऊ देमट टेक फोटोपाएम।" पोधे मुन्न प्रार्थी का नाम लिग दिया। दूसरा लिसा सिस्टर बनेपर को-जिन पर दमदम में 'निर्मता सेनेही आघम' का दायित्व पा। लिखने के बारे में पूछने पर मां बोली, "और क्यों ? यहुत हो गया है।" कोई और बात न कर प्रणाम करके चला आया। इसी बीच दीवार पर टेंगा एक पाटं देसा। देखने में बहुत बड़े मानचित्र को तरह गा। चार्ट में स्पष्ट करते हुए मिशनरीज़ यॉक रिटीउ के कामकाज का एक चित्र सड़ा किया गया था। स्कूलों को मंध्या थी 70-इन स्कूलों में पाने वालों की संख्या 6,300 से अधिक पी। 265 क्लीनिक। इनमें अभी तर 15,08,178 रोगियों को गुश्रूषा को व्यवस्था हुई थी। 58 युष्ठ टी मे 46,702 कुष्ठ रोगियों को चिकित्मा होती है। जहसि याने 1,172 बच्ची के लिए 25 होम और मरणोन्मुग 5,105 लोगों के लिए 25 अलग केंद्र मिशनरीज ऑफ़ चरिटीज के अंतर्गत है। कलकत्ता में कालीघाट, तिलजला, दमदम, टीटागढ़, आसनमोल, शातिनगर के सिवा रांची, दिल्ली, सी, आगरा, अभ्याता, अमरावती, भागलपुर, बबई, रायगढ सहित पूरे भारत में 61 प्रतिष्ठान मिशनरीज ऑफ़ परिटीज के अधीन रहकर पीडितो की सेवा में लगे हैं। भारत के बाहर स्विट्जरलैंड, आस्ट्रिया, वेनेजुएला, मास, अमरीका, कनाडा, इटली, आग्ट्रेलिया, हॉलंड, डेनमार्ग, माल्टा, इन्तंड, आयरलंह, न्यूजीलंड में 28 प्रतिष्ठानी पर कार्यों का समान दामिरय है। परित्यवत, पगु, अममर्य, अनाप, रोगियों के प्राण उनके निर्मल हृदय' की स्नेहपूर्ण ममता में आथित हुए हैं। निमंस हृदय,' 'शिशु भवन,' निर्मला देनेडी केंद्र' तो है ही। यदमा-क्लिनिक, कई दातव्य चिरिन्मालय, कमशियल स्कल तकनीकी विद्यालय, और क्या नहीं है ! करगामयी और उनकी हजार में अधिक भगिनी मिलकर इस सेवा के ससार को प्रेम के प्रलेप से नित नया करती रहती है। मा के इस विराट कर्मयश में किस मात्रा में धन पर्व होता है, यह बताना मुश्किल है। लेकिन सर आ जाता है। अठारह देश-विदेश में मदर टेरेसा एक नाम है। 'इटरनेशनल एमोगिएशन ऑफ पोवास ऑफ मदर टेरेमा' के अधीन सारी दुनिया विभिन्न प्रतिष्ठानों में जुटी हुई है। इसके 1. सिस्टर मदन मोयों को प्रोटो मेने दीजिये।
60 :: माँ टेरेसा एक चेयरमैन नियुक्त हुए। इसके सिवाय वाइस चेयरमैन हैं। उनकी संख्या बारह- तेरह होगी। बहुत-से सम्मानों से सम्मानित मां ने अपने सेवाधर्म के कारण एक के बाद एक पुरस्कार प्राप्त किये। डालर, स्टलिंग, रुपयों को मिलाकर करोड़ न हों, उसके नासपास तो कोई संख्या निश्चय ही होगी। 1962 में 'पद्मश्री' मिली। एक ही वरस वाद 'रैमन मैगसेसे अवार्ड' मिला। फिर लंवे नौ वरस के बाद 1971 ई० में वैटिकन सिटी में पोप तेईसवें का 'जॉन पीस प्राइज' मिला । उसी वरस दो अन्य पुरस्कार-'गुड सैमेरिटन अवार्ड' और 'जॉन एफ केनेडी इंटरनेशनल अवार्ड' भी उन्हें मिले । फिर दूसरे ही वरस 'जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार' प्राप्त किया-सन् 1972 में। 1973 में 'टेम्प्लटन अवार्ड' मिला। 1974 में 'मैटर एट मगरेस्ट्रा अवार्ड' मिला। अंतर्राष्ट्रीय नारी वर्ष के उपलक्ष में मेक्सिको में आयोजित विश्व नारी सम्मेलन में (1975) माँ विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित की गयी थीं। उसी वर्ष अंतर्राष्ट्रीय संस्था एफ़० ए० ओ० के सिरेस पदक के एक ओर मां टेरेसा की प्रतिमूति, और दूसरी ओर एक कमज़ोर शिशु को दोनों हाथों को बढ़ाकर लिये हुए कोई देवी अंकित की गयी थी। 'शांति के लिए नोबल पुरस्कार' के लिए उनका नाम प्रस्तावित हुआ और 1979 में उन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। केवल पुरस्कार ही नहीं, शिक्षा संस्थाओं ने भी उन्हें सम्माननीय उपाधियों से विभूपित किया है । इस प्रकार ये सब संस्थाएं भी कृतार्थ हुई। 1971 में कलिक यूनिवर्सिटी ऑफ़ अमेरिका ने दी सम्मानसूचक उपाधि-डॉक्टर ऑफ़ ह्य मन लेटर्स। और 1976 में विश्व भारती की 'देशिकोत्तम' उपाधि पायी। शांति निकेतन के आम्रकुंज के समावर्तन अनुष्ठान में हमारी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनके प्रशस्त ललाट पर चंदन का टीका लगाया और हाथों में प्रमाणपत्र दिया। वय के भार से नहीं, पुरस्कारों के भार से ही मां जैसे झुक-सी गयी हैं । यही है वह नम्रता-मां के जीवन का परम धर्म । इसीलिए तो हाथों में पुरस्कार धमाते समय सब लोग विनीत भाव से इस महान महिला की निःस्वार्थ सेवा, प्रेम की कहानी स्मरण कर धन्य हो गये थे। 'रेमन मैगसेसे पुरस्कार'(1962) मां के हाथों में देते समय बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज ने कहा : By ther clection, the board of trustees recognise her merciful cognizance of the object of poor of a foreign land in whose service she led a new congregation. इसके दस बरस बाद दिल्ली में 'जवाहरलाल नेहरू अवार्ड फॉर इंटरनेशनल अंडरस्टैडिंग' मिला। वहां भी उसी बात की प्रतिध्वनि थी:
माटोमा :: 61 Announcement by Indian Council for Cultural Relations: "Mother Teresa had dedicated herself to the service of the destitutc, the uncared for and helpless members of humanity. Such tireless and selfless dedication to so worthy a cause has been scen but rarely...in serving selflessly, without narrow considerations of nationality, caste or creed and without ctpectation of public recognition. Mother Teresa has set an outstanding example of how quiet dedicated effort can contribute to the promotion of goodwill, friendship and understanding among the people of the world." सदन में 1973 ई० में 'टेंप्लटन फागन प्राइज फोर प्रोग्रेम इन रिलिजन' लेते समय हमें इस महान महिला के मन को रात का पता लगा . "Mother Teresa has been instrumental in widening and deepening man's knowledge and of God and thereby furthering the quest of quality of life that mirrors the Divinc." सयने ही मां को मानवता के स्पर्श का अनुभव किया। तमी सो मा को सम्मानित कर मानवता का जयगान किया। मानवता जाति, धर्म, देश को मीमात्री में बंधी नही रहती-यह करुणामयी मां ने फिर एक बार पूरे ममार को दिरा दिया। यहुत लोग जानना चाहते हैं कि मो इतना काम कंगे करती है ? पार कंगे मिलता है ? दिन-भर मठिन परिश्रम के बाद सिस्टरें जब सो जाती है, इटाली के जोडा-गिरजा के पाग जब गहरी रात को निस्तब्यता छा जाती है, तब मां ऑफिस का कामकाज गुरु करती हैं। देश के विभिन्न भागों के साप-साप बाहर विदेश में भी प्रतिदिन जो चिट्ठियां आती हैं, उनका जवाब मां अपने हाथो से ही निगती है। कितनी चिट्टियो लिगती है, इसका किसी को पता नहीं। तरह-तरह की चिट्ठियो रहती हैं। किसी के मां-बाप अचानक मर गये हैं। दुनिया में उसका कोई नहीं है। कुछ लिपना-पड़ना भी नहीं आता। इसीलिए अंतिम महारा ममाकर मां को चिट्ठी लिसी है। किसी को कुष्ठ रोग हो गया है। अपने सोग, भाई-बहिन, और तो और, मां-बाप तक मुंह नहीं देखना चाहते । यम भगा देना-भर रह गया है। दिनोदिन इम अमल मानसिक पीडा से दुषी किमी युवक ने मां को मिट्टी लिपी है। पष्ठ रोगियों में गरीब ही नही, धनी पुत्र भी रहते हैं। सविवाहित युवती का पत्र भी मां के मन को हिना देता । युवती को विवाह के बाद वाप के घर छोडकर पति-देवता या तो रिमी मरी औरण या परस्त्री के प्रति आसक्त है। युवती के बाप के घर की हालत बात हो गराब है । किमी तरह चल रहा है। रजिस्ट्री शादी के मामले में गायद पछ गलती रह गयी 62 मां टेरेसा । थी। इस समाज में गरीव युवती को देखने वाला कोई नहीं है। मां-बाप के लिए भी वह अप्रिय हो जाती है । लाचार होकर 54-ए, आचार्य जगदीश वसु रोड पर मां को चिट्ठी भेजी । संभव है, माँ कोई रास्ता सुझा सकें। पंगु, मूक, बधिरों के मां-बाप के पास से भी तरह-तरह की चिट्ठियां आती है । न्यूयार्क से एक विश्वविद्यालय के विद्यार्थी ने कलकत्ता में उनसे मिलने की इच्छा व्यक्त कर चिट्ठी लिखी है। या आस्ट्रेलिया से कोई युवती गरमी की छुट्टियां उनके पास बिताना चाहती है। मां के सेवा के कामों को देखना चाहती है। मौका मिलने पर कोई-कोई अपने को सेवा-कार्य में समर्पित भी करना चाहती हैं। छोटी-छोटी बातें होती हैं। हर बात अपने में अलग होती है। लेकिन मां के लिए ये सभी मूल्यवान हैं। इसीलिए हर चिट्ठी पढ़ती हैं। जवाब भी देती हैं। यहाँ एक और व्यस्त आदमी की बात याद आयी। वे हैं पश्चिमी बंगाल को बनाने वाले डॉ० विधानचन्द्र राय । मुख्यमंत्री-काल में भी डॉ० राय के पास सामान्य लोगों की अनगिनत चिठियां आती थीं । चिठ्ठियों को पढ़कर वे बंगाल की नब्ज समझते थे। निजी सचिव को बुलाकर कहते, "देखो, इन सब आवेदन भेजने वालों की हम हमेशा तो मदद कर नहीं सकते। लेकिन उनके जवाब दे दो। और हर जवाब के नीचे मेरे दस्तख़त लेना मत भूलना।" केवल शरीर ही नहीं, धरती के प्रति भी उन्हें आकर्षण था। इसके बाद हैं दुनिया भर के उनके शाखा-प्रशाखा के पत्रों के जवाव । रात के डेढ़ या दो बजे भी यदि सोने जाती, सूर्योदय से बहुत पहले ही जाग जाती हैं । इतना परिश्रम करती हैं लेकिन थकान का कोई चिह्न नहीं । वातचीत या चलने- फिरने में कभी नहीं लगता कि मां टेरेसा की उम्र पैसठ चरस है। सचमुच क्या कभी मां घबरा भी जाती हैं ? एक छोटी-सी गृहस्थी चलाने में हम परेशान हो जाते हैं। उस पर अगर जड़बुद्धि वाले या पंगु या कोई असमर्थ बालक या युवक-युवती हो तो कटे घाव पर नमक छिड़कने की तरह पूरी जिंदगी वर्वाद होने लगती है। डॉक्टरों-वैद्यों से इलाज करवाते-करवाते वह गृहस्थी धीरे- धीरे वह जायेगी। इसी तरह किसी दिन घर बिगड़ जायेगा। और मां-जिनकी दुनिया ही पंगु, अनाथ, परित्यक्तों को लेकर है-उनकी क्या हालत हो सकती है, इसका सहज ही अनुमान किया जा सकता है। एक-दो नहीं. हम दो, हमारे दो फी तरह शांति-नीड़ नहीं, हजारों वाल-बच्चों का भला-बुरा जिसे देखना पड़ता हो उसे बीच-बीच में तो सोच-विचार में पड़ना ही होता है। वही तो स्वाभाविक ? । उस दुनिया की चाबियां मां के आंचल के खूट में बंधी रहती हैं। वे ही खर्च किया करती हैं। संसार में खर्च कम पड़ने पर वे चिंतित हो जाती हैं। मदर टेरेसा का जीवन व्यापक अर्थ में वैसा ही है। धन कहाँ से आयेगा, यह चिंता उन्हें स्वा- मोटेरेमा :: 63 भाविप गे करनी पड़ती है। यत्तिगत जीवन में पाया मिट्टी-मिट्टी सपना' में विश्वास करने पर भी अपने फर्मपा को सफलता पी चोटी पर पहुंचा देने से लिए धन की जरूरत भी होती है । लेकिन वास्तविक मूलधन है गंवा, प्यार । वह यत्राना गाली हो जाने पर करोड़ोंपों में भी कोई काम नहीं होगा। यहां तो सेवा का पगं चाहिए, जो धन के बटने में कभी नहीं मिलनी। एक दिन मां कमरे में बैठी थी। महमा पता चला कि शिगु-भवन या जाना साली है । उगमं अधेला भी नहीं है। बाजार गये विना तीन-चार मो य मंगे रह जायेंगे। क्षण-भर मे नन्हें-नन्हें पेहरे मा को आगों के आगे तर गये। माने सिस्टरी मे भिक्षा मांगने के लिए कहा। दूगरों के स्यायं के लिए मिसायत्ति ग्रहण करने में कोई रुकावट नहीं है । यीशु के लिए भिसा, इमगे यधिर अच्छी पोर और क्या हो सस्ती है ? इन सारे अनाथ, परिरयान बच्चों को ही तो मा, मिस्टरें यीशु की तरह प्यार करती है। पीशु को फूछ पाने को नहीं मिले यह बात सोचकर मां का गरीर सिहर उठना है। इसमें तो सबका समगल है । पर-हित के लिए मिशावृत्ति में जमे कोई महत्व दिया हुआ है। उन्नीस कवि की भाषा में 'आपनारे लॅपवित्रत ]ते आसे नाइ मेहें अपनी परे, कलेर ते? सॅकसे आमरा प्रत्येके आमरा परेर तरै ।' (अपने लिए परेशान होने को दुनिया में कोई नहीं आता, सबके लिए गय हैं. मभी एक-दूसरे के लिए है)। तभी तो मां ने यीशु को यात पही। वेपेलहम या यह गिगु जब यो हुमा नर कौन आगे बड़े थे? न, लिगे-पड़े वायू नहीं आये। तो क्या वे लोग जो धर्म लेकर गीचतान करते हैं ? न, सपाकथित धामिक भी नहीं याये। पीगु के धर्म या आलिंगन सबमे पहने बिके हुए दासों ने किया या-जिन्हें हम अशिक्षित मूर्ग रूप में ही जानते हैं। 'मैं भूगा हूँ, मुझे पाना दो। मैं प्यार के लिए पगान हूँ, मुझे प्यार करो।' यही तो योगु फा करता है। मां के मुग में तो उनकी ही प्रतिध्वनि है । माने पहा "Make us Northy, Lord, 10 scrie our fellow mon throughout the world who live and dic in poverty and hunger." "Gnc them through our hands this day their daily bread and by our understanding love, giic peace and joy." (सारिद्रय और आया मे हो जितसरी जन्म-मायु है हम उन सारे भाई-बहनों 64 मां टेरेसा ! की सेवा के योग्य बनें, हे भगवान् हम उनके मुखों में दोनों हाथों से क्षुधा के लिए अन्न दे सकें, बांट सकें प्यार, शांति, आनंद।) अंतर कितना कोमल है ! भीतर और बाहर से दोनों ही समान हैं। वैसा न होने से इतनी सरलता से क्या ऐसी कठिन बात कही जा सकती है ? अनुभूति जब प्रवल होती है तब सब-कुछ ऐसे ही सहज, सुन्दर, सरल हो जाता है। रवीन्द्रनाथ की भाषा में : 'सहज कथा बॅलते आमाय कॅह है। सहज कथा बॅला जाय कि सेंहजे ।' (मुझसे सहज वात कहने को कह रहे हो, सहज वात क्या आसानी से कही जा सकती है ?) हृदय जब रुई की तरह कोमल होता है तो फिर कठिन, कठिन नहीं रह जाता। माँ के साथी सेवक-सेविकाओं की प्रार्थना का आरंभ तो इसी से है । आर्मन के (Amen) अंतिम अंश का यह उद्धरण है : "Lord, make me a channel of the peace, that where there is hatred, I may bring the spirit of Forgiveness; that where there is discord, I may bring Harmony; that where there is crror, I may bring Truth; that where there is doubt, I may bring Faith; that where there is despair, I may bring Hope; that where there arc shadows, I may bring Light; that where there is sadness, I may bring Joy; Lord, grant that I may seek rather to comfort, than to be comforted to understand, than to be understood to love than to be loved, for it is by for giving that one is forgiven it is by dying that one awakens to eternal life.” . (हे ईश्वर, मुझे अपना शांतिवाहक बनने दो। स्नेह के प्रलेप से घृणा छूट जाये । जहाँ अन्याय, अविचार हों वहां मैं क्षमा का माधुर्य विखेर सकूँ। मैं विच्छेद में मिलन का स्वर गुंजरित कर सकू। जहां भूल है वहां मैं सत्य को स्थापित कर सकू, जहां संदेह है वहां में विश्वास ला सकू। अंधकार में प्रकाश दिखा सकू; जहाँ दुख है वहाँ मैं आनन्द ला सकू। क्षमा करने में ही तो मुक्ति का स्वाद निहित है । क्षमा करके ही तो मां टेरेसा : 65 । हम अपने को मुक्त कर सकते हैं । मृत्यु हो तो हमें अमृतलोक में ले जाती है।) और कुछ नहीं। मां ने इस प्रार्थना को ही जीवनसाथी बनाया है। मिशनरीज ऑफ चैरिटीज के पच्चीस बरस पूरे होने के उपलक्ष में किसी-किसी प्रार्थना सभा में मां का दर्शन-लाभ हुआ है । कोई बाहरी चमक-दमक नही। दिना आडवर के इन धार्मिक अनुष्ठानो में मां को अपनी बात कहने मे तीन-चार मिनट लगे। हिंदू, मुसलमान, ईसाई, जैन, पारसी, बौद्ध-~-मां सव जगहो पर गयी । न, ईसाई धर्म के प्रचार के लिए नही, सेवा के आदर्श की वात उठाना ही मिशनरीज ऑफ़ चैरिटीज़ का मूल उद्देश्य है। हिंदू स्त्रियों की तरह घुटने मोड़ वैठकर, खड़े रहकर, या कही झुके रहकर मां इन सव सभाओं में प्रार्थना के लिए वैठी हैं । शात स्वर में मां की वाणी सुनने मे किसी को अधीर होने की जरूरत नहीं होती। कोई उपदेश नहीं, केवल प्रार्थना करती हैं। क्यों, मां ने स्वय ही तो कहा है, "प्रार्थना हृदय को विस्तृत करती है, ईश्वर की शक्ति का पय दिखाने के लिए।" किन्तु पथ दिखा देने की बात कह देने से ही तो पथ की खोज नहीं हो जाती ! उन्हे खोजना पड़ेगा। ठीक से पुकारना होगा। इसी प्रकार से उस शुभ मुहूर्त का उदय होगा। ईश्वर की अनुभूति होगी। अपना जानना काफी नहीं होगा-इस तरह से अपने को जितना ही जानते हैं उतना ही और जानने के लिए उत्सुकता हमारे मन में प्रवल हो उठती है। अपने को जानने का अर्थ ही तो अपनी सता का अनुभव करना है। इसी तरह तो जीवात्मा के साथ परमात्मा के मिलन का द्वार हमारे निकट उन्मुक्त होता है । तभी तो बड़ा बाजार जैन मदिर को उस दिन की प्रार्थना-सभा के अत का वह दृश्य अब भी आँखो के आगे तर उठता है। सवेरे के दस बजे। दुमजिले के कमरे में प्रार्थना समाप्त कर मां सीढियां उतर रही थी। पीछे भक्त लोग थे। यह लेखक भी मां के पास खड़ा था। नीचे उतरते ही मां की स्टेशन-वैगन गाड़ी थी। मिशनरी संन्यासिनियां पीछे के दरवाजे से अदर बैठ गयी। मां ने गाडी पर चढ़ते-चढते अचानक जैसे कुछ देसा। बैठ गयी। एक बीमार अधेड़ महिला को पकडकर धंगला में बोली, "तुमको देखने वाला कोई नहीं है ? यहाँ रुको, हमारे आदमी आकर तुम्हें ले जायेंगे।" मालूम नही कि मां की संन्यासिनियां महिला को बाद मे आकर ले गयी या नहीं, लेकिन उस दिन की प्रार्थना सभा में सम्मिलित होने से मेरा जीवन धन्य हो गया। इतना समझा कि मां के प्यार के पात्र सारे दीन-दुखी लोग हैं। दीन- दुखियों के सपर्क में आने से ही जैसे हम मां को, मां के वास्तविक रूप को, देख सकते हैं। मां को गोद में दुबला-पतला बच्चा है-दृश्य कितना भी करुण क्यो न हो, देखने पर किंचित खुशी होती ही है।
66 मां टेरेसा . कालीघाट में 'निर्मल हृदय' में एक अध्यापिका संन्यासिनी से बातें हुई थीं। मां के आदेश से इस युवती संन्यासिनी को मनीला भेजा गया। बात-बात में संन्यासिनी ने बताया, कहीं भी संन्यासिनी या सिस्टर को भेजने के पहले मां खुद ही वहां जाती हैं। पहले वहां जाकर मां देखती है कि शहर में वस्तियों में रहने वालों की संख्या कितनी है ? जो अनाहार, अर्धाहार हैं, उनकी संख्या कितनी है ? यह सब समझ-बूझकर ही मां मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटीज़ के केंद्र की स्थापना करती हैं। सुख-दुख, व्यथा, वेदना-सब-कुछ प्रार्थना के समय ईश्वर के आगे निवेदन कर सकना ही तो सच्चा आनन्द है। समस्या में पड़ जाने पर उसका समाधान भी ईश्वर से मांगना पड़ेगा। बच्चा जिस तरह मां के आगे रो-रोकर अपनी मांग रखता है, उसी तरह ईश्वर के आगे आकुल होकर प्रार्थना करने पर वह कुछ व्यवस्था तो करेगा ही। हर चीज़ विश्वास से प्राप्त हो जाती है और तर्क से बहुत दूर हो जाती है। मां के जीवन में यह बात अक्षर-अक्षर मिलती है। इसीलिए तृष्णा को जिलाये रखना चाहिए। संसार के भौगोलिक मानचित्र से शायद यह मानचित्र कुछ भिन्न है । माँ का अपना अलग संसार है। उनका मानचित्र अलग है। वेनेजुएला में उन्होंने सुना कि परित्यक्त शिशुओं की संख्या बहुत है, और वह क्रमशः बढ़ती ही जा रही है। सुनते ही मां का हृदय रो पड़ा। साथ ही उनका हृदय वहां चला गया। आहिस्ता- आहिस्ता वेनेजुएला में काम शुरू हुआ। फिर शायद पोप के आगे रोम के दुखी मनुष्यों के कप्टों की कथा ने मां के हृदय को स्पर्श किया। दौड़ी वहाँ के लिए। हरदम मां, सिस्टरें सेवा के लिए यथासाध्य हाथ बढ़ा देती हैं। अमरीका, इंग्लंड, फ्रांस अफ्रीका-कहीं भी क्यों न जायें, माँ का हृदय कलकत्ता में पड़ा रहता है। कलकत्ता में दीन-दुखियों के बीच उन्हें जो भानंद मिला है वह उनके निकट स्वगिक है । दीन होते हुए भी ये दैन्य नहीं हैं-~यह सहज सत्य जिस प्रकार मां ने समझा है वह हमारी तरह के तथाकथित शिक्षित भी अच्छी तरह समझे हैं या नहीं, इसमें संदेह है। या घुमाकर कहा जा सकता है कि समझने की कोशिश नहीं की। कलकत्ता उनको सबसे अधिक प्रिय है। बीस वस्ती बस्ती में, कुष्ठ आश्रम में, रोगी को शैया के पास, कालीघाट के मुमूर्षु लोगों .
माटेरेमा :: 67 के सिरहाने खड़े-मां के साथ घूमने से समझ में आता है कि मां इनके कितने निकट को व्यक्ति हैं । मां आयी हैं। उनके लिए यही बहुत कुछ है। मां को काम नही करना होगा। बात करने की भी जरूरत नहीं। मां उनके बीच आकर खड़ी है-यही खबर काफी है। सिर्फ यही लोग नहीं, सिस्टरें भी मां से दो दिन न मिले तो परेशान हो जाती हैं । जो सिस्टर कलकत्ता के बाहर रहती हैं उन्हें मां का अभाव सबसे अधिक खलता है। पूरे वरस राह देखती रहती हैं। इतनी व्यस्तता के बीच मां के लिए हर बरम सब केंद्रों में जाना मभव नहीं होता। कलकत्ता के बाहर दूमरे किमी राज्य में जाने पर सिस्टर मां से पहले ही पूछती हैं, “मदर व्हेन आर यू विजिटिंग मस नेक्स्ट?" (फिर हमारे यहाँ आप कब ना रही हैं ?) दवा खाने से बीमारी हटती है। नियम में खाना मिलने पर सभी सवल, स्वस्य हो जाते हैं । अस्पताल में, नसिंग होम मे यह होता रहता है। किन्तु प्यार ! इस प्यार के स्पर्श के बिना सब व्यर्थ है। मां का संमार तो प्यार का ही संसार है ! वैसा न होने पर? देखिये, उस दिन की बात । पंसठ वरस की यह महिला वस्तियो के रहने वालो के साथ सडक पर निकल पड़ी। यात्रा शुरू हुई, गोल पार्क में, रामकृष्ण इंस्टीट्यूट ऑफ कल्चर भवन के पास से । सवेरे के नौ बजे होंगे। इतवार का दिन या। विवेकानद की संगमरमर की मूर्ति के पास मौ खडी थी। सामने कई हजार बस्ती में रहने वाले लोग थे। जुलूस में स्कूल-कॉलेज के तमाम छात्र- छात्राएं भी थे। सबके हाथों में फेस्टून थे, "कलकत्ता के दीन-दरिद्र बस्तीवासियों का कल्याण, आपका-मेरा, सबका कल्याण है।" माँ ने सदा की तरह दो मिनट में वोलना समाप्त कर दिया। एक खुली जीप मे मां थी। पीछे की सीटो पर मां के मिशन की दो सिस्टर पी-सिस्टर अग्नेस और सिस्टर फान्सिस । मां के पास जीप मे मेरे लिए भी जगह थी। दूसरी ओर दो मत्री बैठे थे। जीप चलने लगी। मां खुली जीप मे लोहे का डडा पकडे खड़ी रही । हम मा के चरणो मे बैठे रहे । पीछे हजारो आदमी थे। बस्ती के आदमी थे, शहर के पढ़े- लिखे लोग थे, छात्र, युवक, घर की महिलाएं-सभी स्तरो के लोग इस पदयात्रा में थे। कोई नारे नहीं थे, न कोई उत्तेजना थी। गडियाहाट के मोड़ को पीछे छोड़- कर रासबिहारी एवेन्यू की ओर जाते समय देखा कि सड़क के दोनों ओर उडी पर, छज्जो पर उत्सुक लोगो की भीड है । कभी हाथ हिलाकर, कभी हाथ जोड़कर मां उनकी उत्सुकता शात करने में व्यस्त थीं। मां को लेकर कलकत्ता के राजन पर इतना बड़ा जुलूस कभी निकला हो, यह मुझे नही याद पडता। मां की जीप का चालक किमी तरह स्टीयरिंग पकड़े दंठा है। को सिवा उसे शायद और कोई काम न था। पीछे से युवक लोग र कोह .
68 :: माटेरेसा - : जीप को ढकेलकर ले चले। लगभग दो मील तक आने के बाद हाजरा रोड के निकट भीड़ विखर गयो । सामने लोरेटो की संन्यासिनियों को पैदल चलते देखकर सिस्टर अग्नेस और सिस्टर फ्रांसिस जीप से उतर पड़ीं। उन्होंने भी पैदल चलना शुरू किया । हम भी उतर पड़े। माँ ने खुद भी उतरना चाहा। लोरेटो की संन्यासिनियाँ इस धूप की उपेक्षा कर पैदल चल रही हैं। देखकर मन में अजीब-सा लगा। जनता के अनुरोध से मां नीचे न उतर सकी । वीच-बीच में पीछे घूमकर जुलूस देख रही थीं। एक बार एक स्वयंसेवक को बुलाकर जानना चाहा कि जुलूस का पिछला हिस्सा कहां है ? जुलूस एल्गिन रोड, जवाहरलाल नेहरू रोड होकर जब विक्टोरिया मेमोरियल हॉल के पास आ पहुंचा उस समय सूर्य आसमान के वीचोंबीच था। श्री अरविन्द की मूर्ति के नीचे खड़े होकर माँ ने कहा, "सबको प्यार करके ही हम भगवान के पास पहुँच सकेंगे। इसके सिवा किसी और राह से वहां पहुंचा जा सकता है या नहीं, वह मुझे नहीं मालूम।" माँ के मुंह से वह वात सुनने के वाद जुलूस के लोगों ने वह जगह छोड़ दी। जीप पर जाते-जाते माँ बोली, "मनुष्य ही सव-कुछ है।" जुलूस को देखकर मां का हृदय भी बहुत आनन्दित हुआ था। चौरंगी के पास आकर एक बैंक की होडिंग पर नजर गयी। उस पर अंग्रेजी में लिखा था : "कैलकटा इज़ फ़ॉर एवर।" (कलकत्ता सदा रहेगा)। लेकिन यह लिखना ही तो सव-कुछ नहीं है । चौरंगी के नियोन प्रकाश में कलकत्ता का वास्त- विक स्वरूप समझ में न मा सकेगा। कलकत्ता को समझने के लिए गरीब-से-ग़रीब आदमी के पास जाना पड़ेगा। यह बात अस्वीकार नहीं की जा सकती कि जॉब चानक के प्रायः चार सौ बरस पुराने इस शहर में भारत के देशप्रेमियों ने तरह- तरह से मानव का जयगान गाया है । उपेक्षित, प्रपीड़ित लोगों की बात बहुतों ने उठायी है । उससे काम भी बहुत हुआ है । लेकिन अब भी बहुत करने को है । इस कलकता में तमाम लोग आये। सात समुद्र तेरह नदी पार से घूमने आकर दो-चार पंक्तियां लिखकर हस्ताक्षर करके चले गये। किसी के मत से किसी का कोई मेल नहीं है। 1803 ई० में लॉर्ड वेलेन्सिया ने लिखा : 'चौरंगी प्रासादों का गाँव है। कुल मिलाकर मनोहर दृश्य है । जीवन में ऐसा कभी नहीं देखा।" 1863 ई० में जॉर्ज ट्रेवलियन ने कहा था : 'इस तरह की दूसरी निकम्मी जगह खोजने पर भी कसे मिल सकती है ? इस शहर का स्वाभाविक चरित्र ऐसा खराव है कि उसे और खराब करने में आदमी को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। जो कुछ यहाँ सामान्य है वह भी थोड़े-से असामान्य प्रयत्न से हो रहा है।' उसके एक सौ बरस पहले क्लाइव ने लिखा था : 'संसार की सबसे अधिक पराब जगह ।'
मां टेरेसा :: 69 वैटिक ने कहा : 'आश्चर्यजनक सुंदर दृश्यावली-मग्निफ़िशेंट !' विशप हिबर सोचते हैं : कलकत्ता मास्को है। मेरे पास मास्को के जो कई. एक प्रिंट हैं, वे हू-ब-हू चीना वाजार और कसाई टोले जैसे हैं। एक और साहब ने लिखा है : गर्मी का कलकत्ता मानो कारागार हो, सांस घुट जाती है। एक दूसरे साहब की राय है लंदन यत्रणापुरी है, स्वर्ग से लगे मुधार-गृह के समान, कलकत्ता साक्षात स्वर्ग है । विलियम हटर ने अपनी मित्र को लिखा : 'कल्पना करो कि प्रकृति में जो कुछ गौरवपूर्ण है उमके माय स्थापत्य मिल गया है, वैसा होने पर तुमको ठीक- ठीक तमवीर मिल जायेगी।' (इमम मदेह नहीं कि उस समय हटर प्रेम में पड़े थे।) उन्नीमवें शतक के अंत में विन्स्टन चचिल ने अपनी मां को लिखा था : 'मुझे खुशी है कि कलकत्ता देख लिया। खुशी-पिता जिस कारण से लिस्वन देखकर खुश हुए थे, उमी एक कारण मे, भविष्य में देखने की फिर कोई जरूरत न होगी। ...लोग समझते हैं कि कलकत्ता में सब-कुछ अनइटरेस्टिंग है।' मार्क ट्वेन 1896 ई० मे आये थे। होटल काटिनेन्टल में ठहरे थे। कुल दो- तीन दिन के लिए आये थे । वावू 'ओनोकूल चुन्दर मुखार्जी' और वगालियों के बारे में कुतूहलजनक बातें सुना गये। स्मारक देखने की बात भी सुनायो। किंतु प्रमण- वृतात मे कलकत्ता से अधिक दूसरे शहरो की ही प्रसिद्धि अधिक है। कलकत्ता में उनकी बहुत दिनो पहले खोयी हुई एक मित्र से मुलाकात हुई थी। किंतु ताज्जुब की बात है कि उन दोनों में बातें करने की चीज़ यो सूखी हेरिंग मछली। किपलिंग कलकत्ता में थोडे ही असे के लिए आये थे। वे राजभवन के सामने ग्रेट ईस्टनं होटल में रहते थे (जो आजकल सरकारी नियंत्रण में है)। वे लाहौर के सिविल ऐंड मिलिटरी गजेट के लिए हुगली नदी में पाइलटो के बारे में लेख भेजा करते थे। रात में पुलिस के वाइस-स्क्वाह के साथ सारा शहर घूमते-फिरते, रात का कलकत्ता देखते थे। यह शहर उनके निकट छोटे अविचारों और वडे पापाचारो का शहर था। वय के हिसाव से रोम या वाराणसी के साथ कलकत्ता की कोई तुलना ही नहीं है । और तो और, कलकत्ता न्यूयार्क से भी इक्यासी वरस छोटा है । माट्रियल भी उससे पचास बरस वडा है । और कलकत्ता विशाल शहर है। उसमे तीस लाख लोगो का निवाम है। वृहत्तर कलकत्ता मे अस्सी लाख लोग रहते हैं। किसी काल मे कलकत्ता अगर 'ब्रिटिश साम्राज्य का द्वितीय नगर था, तो वह अब भी दुनिया का चौथा नगर है। टोकियो, लंदन, न्यूयार्क-इन सभी के बाद कलकत्ता ही है। यह बड़ा भारी शहर वास्तव में समस्याओं का नगर है। कलकत्ता 'प्रॉब्लम सिटी' है। कलकत्ता तीसरी दुनिया का जीता-जागता प्रतिबिंव है। यहां एक ओर जहां ।
70 मा टेरेसा प्रासादों के समान अट्टालिकाएं हैं, वहीं दूसरी ओर सीमाहीन गरीवी है। शरीर पर तरह-तरह के गहने पहनने पर भी कलकत्ता की गरीवी छिपी नहीं रहती। किपलिंग द्वारा वणित यह कलकत्ता अब भी जीवित तो है ही, किंतु उसमें विपरीत चीजें और बढ़ गयी हैं। कलकत्ता के प्रति वर्गमील में 1,02,010 लोग रहते हैं। इस शहर के कम-से-कम तीन हिस्से में से एक हिस्सा लोग वस्तियों में रहते हैं। इस शहर में सौ में से 64 लोगों को अक्षर-ज्ञान नहीं है। चार लाख लोग बिलकुल बेकार हैं। आजकल यह संख्या दुगुनी होगी। 42 हज़ार पाखाना उठाने वाले हैं। फुटपाथों पर 30 नहीं, 70 हजार लोग सोते हैं । कुष्ठ रोगी 40 हजार हैं। भिखारी 60 हजार या ! लाख? ज्योफे मूरहाउज़ के 'कैलकटा' संबंध में 'श्री पान्य' की सम्मति के साथ उस रचना में कलकत्ता का यह चित्र माज भी बहुत कुछ सही है। अंग्रेज़ लिखते हैं-जहां यूरोपियन होंगे वहीं भिखारी होंगे। मानो एक दूसरे ही हैमलीन में एक दूसरा वांसुरी वाला हो। शराबी जिस तरह लैंपपोस्ट का उपयोग करते हैं, ठीक उसी तरह परिसंख्या को पकड़-पकड़ कर 'सबसे अधिक जानकारी की ओर विदेशी दर्शक आगे बढ़े हैं। यहां गरीवी दिखायी पड़ती है, अनुभव की जाती है, गंध नाक में खींची जाती है। चिड़ियाघर का हाथी यहां अपने लिए खाना नहीं, महावत के लिए सूंड से पैसे उठाता है । और महावत फिर भी वेतन पाता है। सौ गज दूर नाली के पास इंट रखकर मिट्टी की हंडिया में अखाद्य पकता है, पास ही आलोकित अक्षरों में विज्ञापन लिखा है-उपहार के लिए इस नरम विस्तर की बात सोची है ? आदमी चमगादड़ की तरह बस में लटकता है, विज्ञापन करता है-वी सी टेंडरनेस, परखकर देखो। सी० एम० डी० के काम-काज की देखभाल के लिए विश्व बैंक के चेयरमैन रावटं मंकनमारा भी कई बार इस शहर में आये हैं। फिर आ रहे हैं। इतना होने पर भी कलकत्ता कलकत्ता है । इस कलकत्ता को केंद्र बनाकर मां टेरेसा के प्यार का संसार आज सारे विश्व मे छितरा हुआ है। एक जाति, एक प्राण, एकता-~-इस मंत्र में दीक्षित मां सारे जीवों में परम करुणामय को देखती हैं। जुलूस में मां के साथ दो मंत्री थे। उनमें एक थे सी० एम० डी० के अवकाश- प्राप्त पूर्वकालीन मंत्री वैरिस्टर भोला सेन और दूसरे भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री शंकर घोष थे। वस्ती के रहने वालों का यह वर्णन-योग्य जुलूस सचमुच कलकत्ता शहर में अपूर्व था। संटियां, फेस्टून लेकर इस शहर में बहुतेरे जुलूस निकले हैं। इसीलिए तो स्वर्गीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कलकत्ता को 'जुलूसों का शहर' कहा या। अधिकांश राजनीतिक जुलूस होते हैं । तरह-तरह के अधिकारों की मांग करने वाले जुलूस होते हैं। किंतु मदर टेरेसा के उस दिन के जुलूस में किसी अधिकार मां टेरेसा 71 की बात न यो। न थी कोई कोरस-ध्वनि । उस नीरव पद-यात्रा का अधिकार कहने को एक चीज़ ही थी, और वह थी मनुष्य के प्रति मनुष्य का प्यार। वह प्यार केवल जुलूम में नहीं रहता, और न रहता है किसी जोश दिलाने वाले भाषण में। इसके लिए प्यार-भरा हृदय चाहिए। हृदय यदि उस प्रकार तयार न हो तो हजार विज्ञापन करने से भी कलकत्ता को प्यार न किया जा सकेगा। स्वामी विवेकानन्द ने कहा है, "किसी के लिए कुछ करने के लिए अनुभूति चाहिए।" वह अनुभूति जाग्रत न होने से कोई अच्छा काम करना संभव नहीं है। भगवान तो इन सब उपेक्षित, मनायो के भीतर सहज रूप से प्रकाशित होते हैं। भगवान का साक्षात पाने के लिए इनके निकट आना होगा। उस दिन शायद किसी उत्सव का दिन था। मदर को हाथ में दूध के पाउडर के पंकेट लेकर वाटते देखा। शिशु-भवन के आगे संकड़ो औरतें यी-सभी गरीब थी। ज्यादातर इंटाली मुहल्ले की थी। शिशु-भवन में शिशुओं को देखकर कभी नहीं लगेगा कि वे विना मां-बाप के हैं। सिस्टर अग्नेस बोली, "हमारे यहां एक दिन एक पितृ-मातृहीन बच्चे की वृद्धा दादी आयो । वृद्धा मां के पास आयी थी। वृद्धा को अंतिम इच्छा थी कि मां बच्चे को गोद ले लें। बच्चे को शिशु-भवन मे ले लिया गया । वच्चे ने स्कूल-फ़ाइनल परीक्षा पास की। उसके बाद कुछ लिखना- पढना किया। अब हावडा में युवक ने 'बदसं' में अपना स्थान बना लिया है। बचपन में मां के प्रश्न के उत्तर मे लड़का कहता कि बडे होकर वह मां की तरह बनेगा। मां ने उसकी आशा पूरी की। वह युवक अब पादरियो का काम करता चुपचाप बैठा देखा । यह सारे पितृ-मातृहीन शिशु जब बड़े होते हैं तो उनमे से बहुतों की शादी कर दी जाती है। मां ने एक दिन एक लडके को पेड के नीचे लड़के के मां-बाप नहीं थे। चाचा के पास रहता था। चाचा-चाची उममे घर का सारा काम कराते थे। लड़का काम करते-करते थक जाता। इतना करने पर भी उसे भरपेट खाने को न मिलता। इसी से एक दिन चाचा के घर से भाग गया। भीख और चोरी-इन दो का सहारा लेकर दर-दर भटकने लगा। इम हालन में लड़के पर मां की नजर पड़ी। मां उसे आचार्य जगदीश वमु गेट के शिशु-भवन में ले आयी। लडके ने लिखना-पढना शुरू किया । नकनीको स्कूल मे भर्ती हो गया। इस प्रकार उसका नया जीवन शुरू हुआ। अब वह बड़ा हो गया है। काम करता है। काम सीखते ही लड़के ने शादी करना चाहा। लेकिन मां इतनी जल्दी शादी के पक्ष में नहीं थी। मां ने एक दिन लडके को पाम दुलाकर कहा, "तुम इतनी जल्दी शादी क्यो करना चाहते हो?" लडका बोला, "मैं इस तरह अकेले जीवन कव तक विताऊँगा? अपना कहने को मेरा कोई नहीं है।" शादी के सिलसिले मे मिशनरीज ऑफ़ चैरिटीज ने दो लडके गांव भेजे। लडके को बहू के । ।
72 :: माँ टेरेसा , लिए कपड़े-लत्ते खरीद कर दिये गये। मां ने उसे एक टुकड़ा जमीन भी खरीद कर दे दी। मकान तैयार न होने तक लड़का ससुराल में ही रहेगा। यह एक लड़की की कहानी है। लड़की के किशोरावस्था पार करते-न-करते मां चल बसी। पिता ने फिर व्याह कर लिया। सौतेली मां उसे हमेशा डांटती रहती, मारपीट की भी अकसर नौवत आ जाती। एक दिन उसने सुना कि सौतेली मां उसके पिता से कह रही थी, 'तुम मुझे चाहते हो या अपनी लड़की को चाहते हो?' कुछ वाद ही दूकान जाने का बहाना कर पिता उसे लेकर रेलवे स्टेशन पर गया। प्लेटफार्म पर यात्रियों की भीड़ में उसे अकेला छोड़कर चला गया। लड़की ने बहुत देर तक प्रतीक्षा करने के बाद रोना शुरू किया। पिता लौटकर नहीं आ रहे हैं, यह देसकर उसका रोना बढ़ गया। सिस्टरें इस हालत में लड़की को शिशु- भवन ले आयीं। बड़ी होने पर उसकी शादी का प्रबंध हुआ। एक अच्छे-से युवक से उसका विवाह हुआ। मां ने दहेज के रूप में उसे एक टुकड़ा ज़मीन और एक छोटा-सा घर दिया। दाम्पत्य जीवन में वे दोनों सुखी हैं । चार-पांच लड़के होने के बाद युवती के पति को टी० बी० हो गयी । अब उस महिला के लिए कुछ काम का प्रबंध किया जा रहा है। मां का कहना है, "वह हमारी संतान है।" दुख का अंत नहीं है। । । इक्कोस आप कितने ही धनी. आभिजात्य क्यों न हो और आपकी उम्र जो भी हो, मां चाहने पर आपसे कोई भी काम करा सकती हैं। अन्य दूसरे गुणों के साथ यह मां का अपना गुण है। कलकत्ता के अभिजात वर्ग को भी मां ने आंदोलित किया है। बहुत दूर देश के धनी घरों के लड़के-लड़कियों ने अपने टिफ़िन के पैसे बचाकर कलकता में मिशनरीज ऑफ़ चैरिटीज़ के पते पर भेज दिये। बड़े नकचढ़े, जो किसी तरह संतुष्ट नहीं होते-इस तरह के नखरे वाले व्यूरोक्रेट भी मां के प्रभाव- से अजीब-से हो जाते हैं। आराम से लाल फ़ोते की गांठ खोलने में उन्हें ज़रा भी संकोच नहीं होता। भारत में आकर विदेशी पर्यटक लोग ताजमहल, अजन्ता, ऐलोरा, बेलू मठ, दक्षिणेश्वर काली मंदिर देखने के लिए जितने उत्सुक रहते हैं, मदर टेरेसा को देखने का आकर्षण भी उन्हें कम नहीं होता। वे मौलाली में मिशनरीज ऑफ़ चैरिटीज़ के भवन में जाते हैं। मां से मिलकर प्रायः सभी मां के हापों में कुछ-न-कुछ सहायता के रूप में रख देते हैं। फिर हर पैसे को यक्ष के धन की तरह जो संजोये रसते हैं वे व्यवसायी भी, पहले जिस संस्था की सहायता मा टेरेसा :: 73 करना चाहते हैं वह है-मिशनरीज ऑफ चैरिटीज । कोई जादू-टोना नही है। रात-दिन जब कभी जाये तो देखेंगे कि नीले किनारे की साड़ी पहने सारी सिस्टरें रोगियों के सिरहाने बैठी, पंगुओं की परिचर्या में व्यस्त, भूखों को अन्नदान या किसी अनाथ को आश्रय देने में लगी रहती हैं। बातें कम, काम अधिक-इस उद्देश्य मे विश्वास करने वाली सिस्टरों को जव राह में चलते देखता हूँ तो लगता है कि ये चल नही रही, दौड़ रही हैं। कोई सवाल करने पर उनका जवाब, जहां तक संभव हो, संक्षिप्त रहेगा। वातो में और काम में कोई अलगाव नहीं है। सिस्टरों या वदर लोगो का कामकाज देखकर ही आसानी से समझ में आता है । युद्ध-क्षेत्र में सम्मुख-समर में मृत्यु की बाजी रस युद्धरत स्वदेश-प्रेमी संनिकों से 'होम फॉर डाइग डेस्टिट्यूट' के सिस्टर और ब्रदर लोगो के काम की तुलना हो सकती है । सैनिकों की तरह इन सिस्टरों में भी साहस, धैर्य, यात्म-त्याग, देश और जनता के प्रति प्यार रखने वाला हृदय है । एक मनुष्य के हृदय और दूसरे मनुष्य के हृदय मे आकर्षण सभव है। किन्तु हृदय-परिवर्तन ? हां, वह भी संभव है । दस्यु रत्नाकर को राम-नाम लेने का अधिकार प्राप्त हुआ था। 'मरा-मरा' कहते-कहते वह एक दिन राम नाम पर पहुंच गया । इसीलिए तो बाहर सडक पर दुगंध-भरे, मुमूर्षु, किसी भिखारी को देखकर जो व्यक्ति नाक सिकोड़कर दूर हट गये हैं, ऐसे लोगों को भी 'निर्मल हृदय' में रोगियो की परिचर्या करते देखा गया है । पूछने पर जवाब मिला, "यहां आने के बाद अदर का मनुष्य जाग उठता है।" सिस्टरों के निकट एक दिन जानना चाहा था, "यहां ऐसे रोगी, दुर्गंधमय, गलित, मृतप्राय लोगो मे रहकर सेवा करने मे बुरा नही लगता? बीच-बीच में परिवेश असहनीय नहीं लगता?" सिस्टरों के चेहरे पर मुसकान खेल गयी। "न, कप्ट क्यो होगा? मैं जव किसी रोगी की सेवा करती हूँ तो, वास्तव में, इस प्रकार हम भगवान की ही सेवा करते हैं । किसी मरते हुए भूखे को अपने हाथो मे खिला देते हैं तो हमे लगता है कि यीशु को खिला रहे हैं। वह अनिर्वचनीय आनन्द होता है । हमें इस काम को करने मे सचमुच खुशी होती है।" बीच-बीच मे रुकावट आती है। लेकिन उन सारी समस्याओ का समाधान ऐसे ढंग से हो जाता है कि सोचा नहीं जा सकता। और ये अमानवीय घटनाएं इतनी होती है कि बहुत लोगो को यह सोचना पड जाता है कि मां के साथ भगवान का ही हाट लाइन पर कोई सपकं है। धन के अभाव से एक वार अनाथ बच्चो के आश्रय-स्थान शिशु-भवन मे वडे दिन का उत्सव बद होने वाला या। और जो जन्म से ही वचित हैं उनके लिए इस उत्सव का एक विशेष महत्व है । जव सब लोग 1. सीधा सपर्क।
72 माँ टेरेसा । लिए कपड़े-लत्ते खरीद कर दिये गये। मां ने उसे एक टुकड़ा जमीन भी खरीद कर दे दी। मकान तैयार न होने तक लड़का ससुराल में ही रहेगा। यह एक लड़की की कहानी है। लड़की के किशोरावस्था पार करते-न-करते मां चल बसी। पिता ने फिर व्याह कर लिया। सौतेली मां उसे हमेशा डांटती रहती, मारपीट की भी अकसर नौबत आ जाती। एक दिन उसने सुना कि सौतेली मां उसके पिता से कह रही थी, 'तुम मुझे चाहते हो या अपनी लड़की को चाहते हो?' इसके कुछ वाद ही दूकान जाने का बहाना कर पिता उसे लेकर रेलवे स्टेशन पर गया। प्लेटफार्म पर यात्रियों की भीड़ में उसे अकेला छोड़कर चला गया। लड़की ने बहुत देर तक प्रतीक्षा करने के बाद रोना शुरू किया। पिता लौटकर नहीं आ रहे हैं, यह देखकर उसका रोना बढ़ गया। सिस्टरें इस हालत में लड़की को शिशु- भवन ले आयीं। बड़ी होने पर उसकी शादी का प्रबंध हुआ। एक अच्छे-से युवक से उसका विवाह हुआ। मां ने दहेज के रूप में उसे एक टुकड़ा ज़मीन और एक छोटा-सा घर दिया । दाम्पत्य जीवन में वे दोनों सुखी हैं । चार-पांच लड़के होने के बाद युवती के पति को टी० बी० हो गयी । अब उस महिला के लिए कुछ काम का प्रबंध किया जा रहा है। मां का कहना है, "वह हमारी संतान है।" दुख का अंत नहीं है। - इक्कीस आप कितने ही धनी, आभिजात्य क्यों न हों और आपकी उम्र जो भी हो, मां चाहने पर आपसे कोई भी काम करा सकती हैं। अन्य दूसरे गुणों के साथ यह भी मां का अपना गुण है। कलकत्ता के अभिजात वर्ग को भी मां ने आंदोलित किया है। बहुत दूर देश के धनी घरों के लड़के-लड़कियों ने अपने टिफ़िन के पैसे बचाकर कलकत्ता में मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटीज़ के पते पर भेज दिये। बड़े नकचढ़े, जो किसी तरह संतुष्ट नहीं होते-इस तरह के नखरे वाले व्यूरोक्रेट भी मां के प्रभाव- से अजीब-से हो जाते हैं। आराम से लाल फ़ोते की गांठ खोलने में उन्हें जरा भी संकोच नहीं होता। भारत में आकर विदेशी पर्यटक लोग ताजमहल, अजन्ता, ऐलोरा, वेलूड़ मठ, दक्षिणेश्वर काली मंदिर देखने के लिए जितने उत्सुक रहते हैं, मदर टेरेसा को देखने का आकर्षण भी उन्हें कम नहीं होता। वे मौलाली में मिशनरीज ऑफ चैरिटीज़ के भवन में जाते हैं। मां से मिलकर प्रायः सभी मां के हाथों में कुछ-न-कुछ सहायता के रूप में रख देते हैं। फिर हर पैसे को यक्ष के धन को तरह जो संजोये रखते हैं वे व्यवसायी भी, पहले जिस संस्था की सहायता मा टेरेसा :: 73 करना चाहते हैं वह है-मिशनरीज ऑफ चरिटीज़ । कोई जादू-टोना नहीं है। रात-दिन जब कभी जायें तो देखेंगे कि नीले किनारे की साड़ी पहने सारी सिस्टरें रोगियों के सिरहाने बैठी, पंगुओं को परिचर्या में व्यस्त, भूखों को अन्नदान या किसी अनाथ को आश्रय देने में लगी रहती है। वातें कम, काम अधिक-इस उद्देश्य में विश्वास करने वाली सिस्टरों को जब राह में चलते देखता हूँ तो लगता है कि ये चल नही रही, दौड़ रही हैं । कोई सवाल करने पर उनका जवाब, जहाँ तक संभव हो, संक्षिप्त रहेगा। बातो में और काम में कोई अलगाव नहीं है। सिस्टरों या वदर लोगों का कामकाज देखकर ही यासानी से समझ में आता है । युद्ध-क्षेत्र में सम्मुख-समर मे मृत्यु की बाजी रस युद्धरत स्वदेश-प्रेमी सैनिको से 'होम फॉर डाइग डेस्टिट्यूट' के सिस्टर और ब्रदर लोगो के काम की तुलना हो सकती है। सैनिकों की तरह इन सिस्टरों में भी साहस, धैर्य, आत्म-त्याग, देश और जनता के प्रति प्यार रखने वाला हृदय है । एक मनुष्य के हृदय और दूसरे मनुष्य के हृदय मे आपण सभव है। किन्तु हृदय-परिवर्तन ? हां, वह भी संभव है । दस्यु रत्नाकर को राम-नाम लेने का अधिकार प्राप्त हुआ था। 'मरा-मरा' कहते-कहते वह एक दिन राम नाम पर पहुंच गया । इसीलिए तो बाहर सडक पर दुगंध-भरे, मुमूर्षु, किसी भिखारी को देखकर जो व्यक्ति नाक सिकोड़कर दूर हट गये हैं, ऐसे लोगो को भी निर्मल हृदय' में रोगियों की परिचर्या करते देखा गया है । पूछने पर जवाब मिला, "यहाँ आने के बाद अदर का मनुष्य जाग उठता है।" सिस्टरो के निकट एक दिन जानना चाहा था, "यहां ऐसे रोगी, दुर्गघमय, गलित, मृतप्राय लोगो मे रहकर सेवा करने में बुरा नही लगता? बीच-बीच में परिवेश असहनीय नहीं लगता?" मिस्टरो के चेहरे पर मुसकान सेल गयी। "न, कप्ट क्या होगा? मैं जब किसी रोगी की सेवा करती हूँ तो, वास्तव में, इस प्रकार हम भगवान की ही सेवा करते हैं । किसी मरते हुए भूसे को अपने हाथो से खिला देते हैं तो हमें लगता है कि यीशु को खिला रहे हैं। वह अनिर्वचनीय आनन्द होता है। हमें इस काम को करने में सचमुच होती है।" बीच-बीच में स्कावट आती है। लेकिन उन सारी समस्याओ का समाधान ऐसे ढंग से हो जाता है कि सोचा नहीं जा सकता। और ये अमानवीय घटनाएं इतनी होती हैं कि बहुत लोगों को यह सोचना पड जाता है कि मां के माय भगवान का ही हाट लाइन पर कोई संपर्क है। धन के प्रभाव से एक बार अनाथ बच्चो के आश्रय-स्थान शिशु-भवन मे बडे दिन का उत्सव बद होने वाला था। और जो जन्म से ही वचित हैं उनके लिए इस उत्सव का एक विशेष महत्व है । जब सब लोग 1. सीधा सपर्क।
74 :: माटेरेसा चितित थे उस समय आकर्षक वेश में एक युवती शिशु-भवन के प्रांगण में आयीं। कुछ पूछने के पहले ही युवती बोली, "बड़े दिन के उत्सव में शिशु-भवन का पूरा खर्चा उठाने का अधिकार मुझे दें।" शिशु-भवन का बड़े दिन का उत्सव वंदन हुआ। उसके विपरीत दूसरे वरसों की तुलना में और अच्छी तरह संपन्न हुआ। एक दूसरी सिस्टर ने एक और घटना बतायी। धनाभाव दूसरे क्षेत्र में भी है। रुपयों के अभाव में एक बार शिशु-भवन में दूध खरीदना बंद हो गया। सभी इस सोच में पड़े थे। शाम के वक्त दरवाजे पर एक सज्जन से सिस्टरों से भेंट हुई। अचानक कहना नहीं, सुनना नहीं । सज्जन ने जेव से कुछ रुपये निकाले । सिस्टर की मुट्ठी में रुपये देकर सज्जन बोले, "यह मामूली-से रुपये बच्चों के लिए खर्च करके मुझे सुशी होगी। अपने को धन्य समजूंगा।" मुट्ठी खोलते ही सिस्टरों ने देखा सौ-सौ रुपये के दस नोट थे, एक-दो नहीं। इस तरह की घटनाओं के और भी उदाहरण हैं । पदस्थ अफ़सरों की पत्तियां गलव में न जाकर बड़े दिन के उत्सव में सम्मिलित होने के लिए यहां आती हैं। मां की ही जुवानी सुना था कि मध्य-वर्ग परिवार का एक बच्चा जिसके मुंह से भच्छी तरह यात भी नहीं निकलती थी, वह भी दोनों हाथों में दो छोटी-छोटी शीशियों में भर कर चीनी ले आया। सिस्टर के हाथों में देकर बोला, "घर पर तीन दिन चीनी नहीं सायी है। वहीं चीनी अपने छोटे-छोटे भाई-बहनों को देने के लिए ले आया हूँ।" इसकी कोई तुलना हो सकती है ? बाईस मां में जो जादू है, जो किसी भी आदमी को प्रेरित कर सकता है, उसे एक भद्र महिला रो सुना कि कलकता विश्वविद्यालय के एम० ए० क्लास का एक छात्र मां से किस तरह मिला था। छात्र एक दिन कॉलेज से भागकर सियालदह अंचल में पाई दोस्तों के साथ सिनेमा देखने के लिए निकला था। उसने देखा कि एक महिला उसे बुला रही हैं । भद्र महिला नीले किनारे की सफ़ेद साड़ी पहने थीं। देखने में संन्यासिनी-सी घी। सामने ही ढेर किया हुआ कूड़ा था। कूड़े में अधमरी हालत में एक आदमी पड़ा हुआ था। उस आदमी को कूड़े के ढेर में से निकाल बाहर पारने लिए मां ने लड़के की सहायता चाही थी। अधमरी, बदबू भरी, कुद से ढकी देह को छूने की कल्पना भी लड़का न कर पा रहा था। लेकिन विश्व- विद्यालय के उस लड़के ने अकल्पनीय काम किया। विद्यार्थी के कहने के अनुसार, 'सियालदह में उस संन्यासिनी के मुंह की ओर देखकर मैं ऐसा आकृष्ट हुआ कि मैं । । ।
मोटरसा : 75 इसके आगे कुछ सोच ही न सका। प्रायः आविष्ट की भांति मैंने देगा कि मैं संन्यासिनी की सहायता कर रहा हूँ। क्यों, किस कारण से मैं ऐम्बुलेंस में चढ़कर उनके साथ उन मुमूर्षुओं के आश्रय-स्थान गया, बैंडेज बांधने में भी मैंने सहायता की। सारी बातें मुझे सपने-सी लगी। किन्तु सबसे अधिक एक चीज जो मुझे सचमुच लगी वह यह कि जीवन में यह पहला उल्लेखनीय काम किया। इस सबके लिए ही मनुष्य ससार में जीवित रहना चाहता है।' कर्मचचल कलकत्ता प्राणशक्ति से भरपूर है। चारों ओर ह्रास के बीच भी जीने का अधिकार यहां जोरों से मांगा जाता है। इसी के बीच बाहरी लोग यहाँ के रचिकर सास्कृतिक परिवेश में स्वतंत्रता-बोध करते हैं । कलकत्ता कलकत्ता ही है। फिर भी दुख नहीं मिटा । किन्तु जब देखते हैं कि निवेदिता इस दुप के शहर में ही चिर आनंद के स्वाद को खोज पाती हैं, या करुणामयी मां मदर टेरेसा की तरह इस शहर को अपना प्रियतम कहकर सबोधित करती हैं तो स्वाभाविक कारण से ही मन खुशी से भर जाता है । काफी ऐश्वर्यशाली न होने पर भी, हृदय के ऐश्वर्य से ही तो इम महान महिला को कलकत्ता ने, कलकत्ता के लोगों ने, आकर्षित किया है। यह किस तरह कम है ? समाज में सचेतनता बहुत बढ गयी है। इस शहर में ऐसे बहुत-से हृदय वाले लोग हैं जो मुक्त होकर दान करते रहे हैं। वह दान केवल नि स्वार्य ही नहीं करते, विलकुल गोपनीय रखने के लिए भी अनुरोध करते हैं। दुखी मनायो की सेवा में सभी स्तरो के व्यक्ति आगे आये हैं। शिशु-भवन से विदेशों में ही नहीं, इस देश के भी बहुतेरे धनी-मानी परिवार की माताओं ने दत्तक पुत्र-कन्या लिये हैं। जाति, धर्म की मकीर्णताओं को छोड़कर मानवता के लिए भारतवासी मात्र ही इमसे गर्व अनुभव करते हैं । हिमालय के समान बड़ी इस समस्या का समाधान होने में और भी समय की आवश्यकता होगी। सूखा, वाढ़, दुर्भिक्ष इन समस्याओ को और भी तीव्र बना देते हैं। इनके अंदर चमकती दीपशिखा मिशनरीज ऑफ चरिटीज है। बदन पर नीले किनारे की साड़ी, कधे से धर्म-विश्वास का प्रतीक लगा हुआ बाहरी आवरण के ये चिथड़े ही आज मेवा, धर्म और प्यार के प्रतीक हैं। अभी भी सद्यजात शिशुओ के लिए धरती बहुत कठोर है। पैदा होने के क्षण से ही मात्तं चीत्कार की ध्वनि से खुले आकाश के नीचे वायु भारी हो जाती है । ये शिशु किसी दिन अपनी जन्म देने वाली मां को न खोज सकेंगे। ऐसे असख्य लोग हैं जो अस्थिर मानसिकता वाले, पगु या अपूर्ण अग वाले शरीर लिये भी सिर पर कोई आच्छादन नही पात, फुटपाथ के कठोर बिस्तर पर असख्य भूसे, रोगी, अस्वस्थ पड़े हैं जिनके ज्वर से तपते माथे पर स्नेह की हथेली फेरने के लिए इस 76 :: माँ टेरेसा दुनिया में एक भी आदमी नहीं है। इनके लिए ही हैं मां टेरेसा और उनके विश्वस्त अनुगामियों का दल। तेईस भारतवर्ष साधना के लिए तीर्थस्थान है। संसार की सारी सृष्टि में सप्टा के आनंद को खोजने का प्रयत्न हमारे देश की धरती पर ही संभव हुआ है । आत्मा से अभिन्न ऐक्य की खोज और ईश्वर-प्रेम में जीवों की सेवा-यह तो इसी धरती का गुण है । माँ संन्यासिनी के रूप में आयीं। मिशनरी स्कूल में अध्यापन किया। किन्तु यह शांत, उद्वेगरहित जीवन माँ को बांधकर न रख सका। भारत के दीन- दरिद्र लोगों की असहाय अवस्था ने उनके मन में एक स्वतंत्र उपलब्धि और विश्वास जगा दिया। इसीलिए तो ईश्वर के प्रति गहरा विश्वास और ग़रीब-से- गरीव मानव के प्रति प्यार का खिंचाव-इन्हीं दो चीजों की पूंजी लेकर उन्होंने सव-कुछ छोड़ दिया । क्रमशः उनकी अपनी बनायी संस्था मिशनरीज ऑफ़ चैरिटीज़ बन गयी। स्वदेश और विदेश के नर-नारियों ने माकर योग दिया। इसे दुनिया के वहुत-से स्थानों से सहायता मिली। सीधे-सीधे मिशनरी के रूप में सम्मिलित हुए विना जो बाहर से उसे चाहते थे, उन्होंने दुनिया के बड़े-बड़े शहरों में 'इंटर- नेशनल एसोसिएशन ऑफ़ कोवर्कर्स ऑफ़ मदर टेरेसा' बना लिया। कलकत्ता की वस्तियों में दरिद्र और अनाथ शिशुओं के लिए प्राथमिक विद्या- लय की स्थापना से जो कर्मयज्ञ आरंभ हुआ वह क्रम से फैलकर देश की सीमाओं को पार कर दूर-दराज में सबसे निचले और सबसे पिछड़े सर्वहारा लोगों में फैल गया। बीच-बीच में घूम-फिरकर एक ही प्रश्न सबके मन में उठता है कि मां टेरेसा के इतने बड़े काम का स्रोत कहाँ है ? मात्र दो दशकों में उन्होंने जो संघशक्ति और संस्थाएं स्थापित कर लीं, वह वहुतों को अलौकिक लगता है । इस प्रश्न का जवाब पाने के लिए मां के पास जाना होगा। नीले पाड़ की सफ़ेद साड़ी पहने, सीधी- सादी चाल-ढाल, वक्ष के वायीं ओर उनके धार्मिक विश्वास का प्रतीक-चिह्न है- सब-कुछ साधारण ही तो है । इस साधारण में ही कहीं छिपा हुआ है असाधारणत्व। तभी तो मां की शांत, करणापूरित आँखें देखकर ही मन अजीब-सा हो जाता है । सहसा आंखों के आगे तर उठती है उस महामानव की वात, जो कांटों का मुकुट पहने वधभूमि पर खड़े अपने हत्यारों के लिए भगवान के निकट क्षमा की भीस मांग रहे हैं, जिनकी वाणी भौगोलिक सीमा पार कर सारी पृथ्वी पर फैल गयी मा टेरेसा 77 है, जिस वाणी का सारांश अपने पडोसी को प्यार और पीड़ित मानवता की सेवा मां से कुछ देर बातें करने पर समझ में आता है कि उनकी सारी साधना भगवान के पुत्र यीशु के प्रति निवेदन है। कट्टर धर्माध लोगों को सपूर्ण रूप से विजित होने पर भी धर्म-विश्वास में रहकर ही मां के सारे कार्यों की प्रेरणा मिलती रहती है। ससार मे जो लोग दीनो से दीन हैं, ससार मे जिन्हे अवांछित समझकर उपेक्षा से त्याग दिया गया, केवल उनकी सेवा और कल्याण में से ईश्वर की प्राप्ति संभव है-इस प्रवल विश्वास को लेकर ही वे काम कर रही हैं । अपने को सबके बीच खो दिया है। उनकी इस उपलब्धि मे कोई दुविधा नहीं है, और न कोई संशय है । इस अटल विश्वास को मां सबमें संचारित करने में समर्थ हैं। चौबीस सत्यकाम नाम की ओट में यह युवक आज शिक्षित और प्रतिष्ठित हुआ है। किन्तु सत्यकाम के मुंह से ही उसके जीवन की अनपेक्षित घटना सुनिये। "इस समय मेरी आयु छब्बीस बरस की है । दक्षिण कलकत्ता की एक रोलिंग मिल गे सवेरे और रात दोनो शिफ्टो मे सुपरवाइजर का काम करता हूं। दिन मे सेंट जेवियर्स कॉलेज मे वी० एस-सी० मे पढता हूँ। अच्छी तरह से पास होने का भरोसा है। मुझे अच्छी तरह पास करना ही पडेगा। वैसा न होने से मैं अपने उस पालने वाले को जिसे मैं अपने पिता से बढकर पहचानता हूँ और श्रद्धा करता हूँ, मुंह न दिखा सकूँगा। बी० एस-सी० पास कर पाने पर वे मुझे विलायत भेजकर इजीनियरिंग पढ़ायेंगे। यह मेरे लिए अकल्पनीय है ।" सत्यकाम ने पिछले जीवन में डुबकी लगायी । अपने जीवन के उन दिनो की बात कहते रहे जिन्हें सोचकर बदन सिहर है। "वीस बरस पहले मैं इस दुनिया से विदा लेकर-बहुत दूर-दर नक्षत्र पर चला जाता। और जिंदा रहने पर भी पगु भिखारी या मुहल्ले के गुडे, वैगन-ब्रेकर के रूप में मुझे जाना जाता। वही स्वाभाविक था। लेकिन वह न हुआ, क्योकि जब मैं बहुत छोटा था तो नीले पाड़ को सफ़ेद माडी पहने कई देवियो (हाँ, मेरे लिए तो वे देवियां ही हैं) ने और भी बहुतों के साथ मेरा उद्धार किया। रहस्यमय लगता है ? अच्छा, तो सुनिये मेरे जीवन की वह कहानी, जिससे एक टुकड़ा जली मिट्टी होरा बन गयो । जीवन के शुरू के दस बरस एक बस्ती मे बीते थे, कूडे-से परिवेश में। पडोसी भी वैसे ही थे। भूख को आग क्या होती है, तभी समझना सीखा था। मां की याद धुंधली.
78 :: मां टेरेसा । । - धुंधली-सी ही है। रूखी निर्मम निराशा में भी मां का स्नेह समझ में आता था। पिता को कभी देखा ही नहीं था। भीख मांगकर, मांग-मूंगकर मेरी पंगु मां को दिन-भर में जो मिलता, शाम को उसी की आशा में मुंह उठाये रहता। हम चार भाई-बहन थे। सभी बीमार रहते थे। दुबली-पतली हड्डियां, लकड़ियों-से हाथ- पर, पीले उलझे चिपके बाल; ज्यादा बखान करने की ज़रूरत नहीं है। ऐसे लोगों को राह-वाट में हर जगह देख सकते हैं। "सप्ताह में दो-तीन दिन कुछ नहीं मिलता था। कुछ न दे सकने पर मां निष्ठुर हो जाती थीं। हमारा रोना रोकने के लिए डंडे से पीटती। मुझे अच्छी तरह याद है, लगभग डेढ़ दिन पेट में कुछ नहीं पड़ा था। थकी अवसन्न देह लिये बहुत-कुछ अभ्यासवश ही वस्ती के निकट सूने मैदान में आकर बैठा था। देखा क्या कि एक सफ़ेद गाड़ी को घेरकर वस्ती के लड़के-लड़कियों की भीड़ खड़ी थी। मैं पास गया। देखा, नीले किनारे की सफ़ेद साड़ी पहने कई महिलाएं बच्चे- बच्चियों को दूध और डबलरोटी दे रही थीं। कहने की ज़रूरत नहीं कि मैं भीड़ में जा पहुंचा । मन में बड़ी उत्तेजना थी। दो रोटियां मिलने से एक तो खा सकूँगा। एक मुन्नी, खोका, सुकू को दे सकूँगा। अन्त में टीन का पाव-भर दूध, दो टुकड़े रोटी और एक गोली (वाद में पता चला कि विटामिन की) मेरे हाथ पड़े। भीड़ ठेलकर बाहर खिसक आया। बड़ी सावधानी से छाये नल के नीचे दूध का वर्तन और रोटी को रखा। चील झपट्टा न मारे, इसलिए एक डंडा भी लाया । दूध और रोटी सामने रहने पर भी मैं रो पड़ा। विलकुल भूखे छः बरस के बच्चे का रोना सुनकर मानो आसमान से परी उतर आयी। दोनों हाथ बढ़ाकर मुझे छाती से लगाकर पूछा, 'रो क्यों रहे हो? और दूध दूं?' "मैंने किसी तरह विसूरते-विमूरते जवाब दिया, 'मुन्नी, सुकू, खोका तो भूसे हैं।' "वह देवी चितित होकर वोलीं, 'वे कहां हैं ? मैं तुम्हारे दूध की रखवाली कर रही हूँ। तुम भागकर उन्हें बुला लाओ।' "वहीं मुझे पहली बार देवी के दर्शन हुए। इन्हीं देवियों ने मुझे अंधकार से उठाकर आलोकित समाज में प्रतिष्ठित किया। आजकल दोपहर को मैं छ: नंबर बस से उतरकर जल्दी-जल्दी पार्क स्ट्रीट होकर सेंट जेवियर्स कॉलेज की ओर पैदल जाता हूँ। शहर के इस भाग के प्रकाश की उज्ज्वलता हमें उस अंधेरी वस्ती के जीवन की दलदल से नहीं निकाल सकती जिसे मैं बहुत पहले पीछे छोड़ आया हूँ। अव भी जरा-सी सहानुभूति के अभाव में, सहृदयता के अभाव में हजारों निप्पाप जीवन बहुत अधिक पीड़ा पाते हैं।" इस दुख, निराशा, अंधकार भरी दुनिया में मां एक पारसमणि लेकर आगे बढ़ी हैं। जिसके हृदय में उस पारस पत्थर का स्पर्श होगा वही जीवन सार्थक होगा। । - माटेरेसा 79 इस प्रकार छः वरस का दालक नीले किनारे को सफेद साड़ी पहने परी का बंध-भक्त हो गया। "वह रोज आकर दूध देती, किसी को हारी-बीमारी में दवा देतीं। इसके सिवा सिखा देती कि किस तरह से वस्ती को साफ-सुथरा रसना होगा । उसके बाद एक दिन सुना कि वस्ती में स्कूल खुलेगा। वे ही सोलेंगी। "खामे बड़े स्कूल में अच्छे-अच्छे वच्चे-बच्चियां आते-जाते थे। देख-देखकर स्कूल में पढ़ने की बड़ी तबीयत होती। सोचा कि इतने दिनी वाद शायद वह इच्छा पूरी हो। लेकिन यह स्कूल वैमा स्कूल नहीं था। पर टीन का छाजन, वाम का बाड़ा और कुल दो कमरे थे। देवी से सीधे-सीधे कह दिया कि यह 'सड़ा स्कूल' है । उम दिन हंसकर सिस्टर बोली, 'पहले यहां पढ़ाई-लिखाई खत्म करो, बाद में तुमको जहर बड़े स्कूल भेज दूंगी।' जैसे किसी ने मन को हिलाया हो। आंखों के आगे मानो सुंदर संसार तर उठा । लगा कि आगे बढने का एक यही मार्ग खुला हुआ है। बस्ती के उमी स्कूल में लिखना-पढ़ना शुरू हुआ। तीन बरस बाद जब मैं प्रतिमा सेन स्कूल में भरती हुआ, उन दिनों तक हमारी वस्ती के 70-80 लड़के-लड़कियां प्राइमरी की पढ़ाई के क्षेत्र में आ गये थे। इन लड़के. लड़कियों में बहुतों के मां-बाप को अक्षर-ज्ञान भी नहीं था। मामूली स्कूलों में पढ़ने-लिखने की जिनकी उम्र बीत चुकी थी, प्रतिमा सेन स्कूल मुख्यतः उनके ही लिए है। हमारे साथ सुखेनदा पढते थे। हरिनाभि से साग-सब्जी लेकर शहर आते, खरीद-फरोख्त के बीच सुमेनदा ने पढ़ने-लिखने का मौका भी निकाल लिया। मनोहर जूते पालिश करता था, मदन चाय को दूकान पर काम करता। दूसरी जगह सुविधा न होने के कारण सब इसी स्कूल में आये थे। सुकुटा का दिमाग अच्छा नहीं था। उसने यही हाय का काम सिखाने के विभाग में बढ़ईगीरी सीखी पी । मुन्नी ने लिखने-पढ़ने के साथ-साथ यहां सिलाई सीखी। थोड़ी-बहुत सिलाई कर छोटा-मोटा रोजगार भी किया था। बाद मे यहीं से मुन्नी ने शॉर्टहैंड और टाइप सीख लिया। अब वह डलहौजी में एक छोटे-मे कमरे में बैठकर रेमिग्टन मशीन पर आंधी की तरह काम करती है।" बैठक के पास ही प्रतिमा सेन स्कूल है। जो लड़के-लड़कियां मां-बाप के लिए समस्या बन गये हैं उनके लिए ही है यह स्कूल । घर में जिनके लिए कोई स्थान नहीं, उन्हें ही यहां स्थान मिलता है। एक लडका किमी भलेमानुस के यहां चोरी करते हुए पकड़ा गया । एक दिन पुलिस कमिश्नर खुद ही लड़के को स्कूल मे भरती करने के लिए ले आये। एक लड़के का पेशा जेब काटना था। इसके लिए उसे जेबकतरो की विद्या में पारगत होने के लिए विशेष स्कूल में ट्रेनिंग लेनी पड़ी थी। यह लड़का कई बार जेबकतरी में पकड़ा गया। जनता हायों पिटाई के बाद उसने यह लाइन छोड़ दी। 1968 में लहका प्रतिमा सेन स्कूल में आया । अव 1 80 मां टेरेसा लड़के ने किशोरावस्था पार कर योवन में पैर रखा है। वह पूरे तौर पर आदमी हो गया है। पच्चीस सत्यकाम अपने जीवन की कहानी कहते रहे : "एक बड़ी उम्र की महिला कई दिनों तक 54-ए, आचार्य जगदीश वसु रोड पर सिस्टरों के पास अपने लड़के के लिए संबंध की तलाश में आती रहीं। लड़का मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव था। सात सौ रुपये महीना पाता था। महिला को मुन्नी अच्छी लगी । मुन्नी की शादी हो गयी। अब वह मौलाली में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव पति के फ्लैट में रहती है । मुन्नी की तरह अन्य बच्चियों के भी बड़े होने पर सिस्टरें शादी का प्रबंध कर देती हैं। "छोटी उम्र में ही मां को खो दिया। माँ के जाने के बाद शिशु-भवन में मुझे स्थान मिला। सिस्टरों ने मेरी मां के शून्य स्थान को पूरा किया। यहीं मुझे जीवन का माधुर्य मिला। उसके पहले जब मैं देखता था कि मेरी ही उम्र के लड़के- लड़कियां सज-धजकर अपने मां-बाप के हाथ पकड़ तरह-तरह के कपड़े-लत्ते पहन- कर घूमते हैं तो शुरू में मेरे मन में एक ईर्ष्या का भाव ही आता। उसके बाद आँखों में आंसू आ जाते। लेकिन यह मनोभाव अधिक दिनों तक रहने के पहले ही शिगु-भवन में जीवन का एक और अर्थ मिल गया। "एक दिन भवानीपुर अंचल के एक डॉक्टर अपनी पत्नी के साथ लड़के-लड़कियों को देखने शिशु-भवन में आये । इन सहृदय डॉक्टर विकास चौधरी ने मेरे जीवन का दायित्व ग्रहण किया। सिस्टरों से सुना कि डॉक्टर राय चौधरी हर महीने मेरी पढ़ाई-लिखाई के लिए तीस रुपये दिया करेंगे। और भी दूसरे खर्चों के देने में उन्होंने जरा भी कंजूसी नहीं की। केवल यही नहीं, वे बीच-बीच में भाकर मुझे देस जाते थे। अपना समझकर मुझे गोदी में उठा लेते। मेरी पढ़ाई-लिखाई, स्वास्थ्य के बारे में भी खोज-खबर लेना वे न भूलते। और तो और, अगर कुछ दिनों के लिए कहीं जाते, तो मुझे चिट्ठी लिखते। दुनिया में मेरे नाम से वही पहली चिट्ठी ची। चिट्ठी मिलने पर इतनी खुशी हुई कि वताया नहीं जा सकता। यही डॉक्टर भले आदमी ही अब मेरे लिए पिता-तुल्य हैं। मैं डॉक्टर साहब की पत्नी को माँ कहकर पुकारता हूँ। उन दोनों के साथ मेरा गहरा संबंध है । उनको. पाकर बचपन में ही मुझे लगा कि इस विशाल संसार में मैं अकेला और बेजान- पहचान का नहीं हूँ, मेरे भी अपने है, जो मुझे प्यार करते हैं, मेरे लिए चिंता करते हैं । शिशु-भवन के बहुत-मे रहने वालों को मेरी ही तरह मां-बाप मिल जाते - मां टेरेमा :: 81 हैं-जो अपरिचित प्यार-दुलार देकर नवजात शिशु को अभिशाप से बचाये रखते हैं। "हमारी बस्ती के एक और आदमी की कहानी है जिसे सुनकर सचमुच लगेगा कि जिनका कोई नहीं है, उनकी ये सब सेविकाएँ हैं। निवारण काका हमारी वस्ती में रहते थे। भीख मांगकर किसी तरह काम चलता था। हर दिन सपेरे हाथ-पांव में नकली घाव बनाकर कोढी वन कालीघाट मंदिर के पास भीख मांगते। फटा कंबल लपेटे, सूजा हुआ चेहरा, एक और दाढी-मूंछ -इस शक्ल में निवारण काका वीभत्स लगते । लेकिन यह नकली कब असली हो गया, इसका पता नहीं लगा। पर एक दिन सुना कि निवारण काका को सचमुच कोढ हो गया है। कालीघाट पर भीख मांगते समय ही निवारण काका को कालीमन्दिर के पोछे 'निर्मल हृदय' का पता चला था। यहां केवल लाचार मरते हुओ को ही आश्रय मिलता हो, यही नही, कुष्ठ रोगियों को भी यहाँ से दवा-दारू दी जाती थी। खाने-पीने का भी प्रवध है । निवारण काका को चिकिरमा शुरू हुई । वीच-बीच में 'मोवाइल लिप्रसी क्लिनिक' वस्ती मे आता रहता। कुछ दिनो वाद मिशनरीज ऑफ चैरिटीज के ब्रदर लोगो ने उन्हें टीटागढ के कुष्ठ आश्रम में भर्ती करा दिया। महीने-भर के बाद निवारण काका को देखकर ताज्जुब हुआ; निवारण काका बड़ी जल्दी चगे हो गये । मुझे पुकारकर बोले, 'ठीक कर लिया, अब भीख नहीं मांगूंगा, कूछ और करूंगा।' मैंने पूछा, 'क्या करोगे? कोई काम भी तो नहीं आता।' निवारण काका हँसकर बोले, 'सीख लूंगा। दवा देना, बैडेज बांधना-सब सीखकर यहीं रह जाऊंगा । सब अच्छा लगता है । यहाँ का सव-कुछ अपना-अपना-सा लगता है ।' लौटते वक़्त एक जोड़ा जूते मिले, वे निवारण काका के बनाये हुए थे। "एक बरस और बाद की बात है। आसनसोल से चौबीस किलोमीटर दूर शांतिनगर है। वहां की डिस्पेंसरी में निवारण काका काम करते हैं । बहुत खुश हैं। इन कुछ महीनों में ही निवारण काका-से निरक्षर भिक्षाजीवी, मिय्यामापी, रूखे आदमी ने देखा कि आदमी आदमी को कितना प्यार कर सकता है, कितनी सेवा कर सकता है, कितने सहज रूप से कलेजे के पास खीच सकता है ! "निवारण काका अकेले नहीं हैं। हर महीने निवारण काका की तरह हजारों कुष्ठ रोगियो की सिस्टर और ब्रदरी के तत्वावधान में चिकित्सा की जाती है। अखबारों में हर दिन विनाश की ख़बरें पढते रहते हैं। लेकिन पृथ्वी कव, किम ओर मे धनी हो रही है, उसकी ख़बर कौन रखता है ? "समाप्त करने के पहले अपने जीवन के सबसे बड़े पाप की बात बतानी जरूरी है । इसे मेरा 'कन्फेशन' कह सकते हैं। स्वीकार कर लेने पर पाप नष्ट हो जाता है, इसी से निष्कपट सव बताये जा रहा हूं। उस समय मेरी उम्र बीस-इक्कीस होगी। तभी कॉलेज में भर्ती हुआ था। कॉलेज में भर्ती होने से पहले ही एक - 82 मां टेरेसा । नोकरी मिल गयी थी। इसीलिए रुपये-पैसे की खींचतान न थी। सेंट जेवियर्स में मेरे सहपाठियों की गाड़ियां थीं, रोज़-रोज नयी-नयी पोशाकों की तड़क-भड़का- सब मेरी नज़रों में जाने कैसा लगता! बड़े दिन की पूर्व-संध्या को पार्क स्ट्रीट की फैशनेवल दुकान से एक सौ वीस रुपये मीटर का 'इम्पोर्टेड स्ट्रेचलॉन पीस' खरीद लिया। रोशनी से झलमलाती उस जगह और भी कुछ देर विताकर कपड़े का पकेट हाच में लिये चौरंगी और पार्क स्ट्रीट के मोड़ पर जब पहुंचा तो रात के दस बज रहे थे। सड़क प्रायः सूनी थी। जैसे सब कुहरे में छाया हुआ था। जाड़े की रात मानो और भी अंधेरी लग रही थी। नज़दीक ही गिरजे की घड़ी में टन-टन कर दस बजे। सहसा सामने नजर जाने पर देखा कि मैं मरकरी लैम्प की धुंधली रूपहली रोशनी में गांधीजी की मूर्ति के बिलकुल आगे खड़ा हूँ। पंद्रह वरस पहले का 'मैं' जैसे मेरे भीतर जाग उठा। मूर्ति के आगे एक पाँच वरस का नंगा बच्चा तेज ठंडक से कांप रहा था। मुझे मानो किसी ने सड़ाक से चाबुक मारा हो । लगा कि दुनिया में मुझसे बड़ा अपराधी दूसरा नहीं है। ज़रा भी देर न कर पैकेट को खोल डाला। स्ट्रेचलॉन के कपड़े को उसकी छाती पर लपेट दिया। "मां प्राय कहा करतीं कि वे जब किसी रोगी, कातर, असहाय को कलेजे के पास लगा लेती हैं, उसकी सेवा करती हैं, तो सबको यीशु मानकर ही उनकी सेवा करती हैं। मां बहुत ही महान हैं। यह विश्वास उनके लिए ही संभव है। किन्तु मैं जब किसी असहाय शिशु को गोद में उठाता हूँ, रोगी वालक को छाती से लगा लेता तो मुझे लगता है कि मैं अपने को ही आश्रय दे रहा हूँ, अपने को ही कलेजे से लगा रहा हूँ।" सत्यकाम की कहानी का यहीं अंत होता है। सत्यकाम अकेला नहीं है। मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटीज़ की दया से आज जीवन में और भी कितने ही सत्य- काम प्रतिष्ठित हुए हैं। कुछ अध्यापक बन गये हैं, और कोई-कोई मिशनरी संस्था के पादरी बनने के सौभाग्य से सौभाग्यशाली हुआ है। विवाह के बाद यह सिस्टरों के पास पत्नी को लाते हैं। संतान होने के बाद फिर मुलाकात करने आते हैं। सिस्टर भी इन्हें मां की तरह दुलार करती हैं. आशीर्वाद देती हैं। - - छब्बीस मां के जीवन की टुकड़े-टुकड़े कहानी मन को हिला देती है। वे उस समय लोरेटो में अध्यापिका थी। सहसा कोई अध्यापिका कलकत्ता से बाहर चली गयो । उसी अध्यापिका के पहने हुए कपड़े-लत्तों को मां ने पहनना शुरू कर दिया। बीच-बीच माटरसा :: 83 में कपड़े फट जाने पर अपने ही हाथो सिलाई कर लेती । और तो और, मोजे भी क्रूस के कांटे से सिलाई कर बहुत दिनो तक चलाती । जब उनके जीवन मे किसी चीज़ की कमी न थी उस समय भी बाहरी आवरण बहुत सामान्य था। बचपन मे पिता को खोने के बाद अपनी मां के पास ही माँ टेरेसा पली। माँ के निर्धनप्राय: जीवन ने उन्हें, उनके जीवन को प्रभावित किया। मां टेरेसा अपनी मां के संबंध में कुछ बताना नही चाहती। लोरेटो स्कूल में अध्यापन के समय या और कही काम मे नियुक्त रहने के समय किसी असावधान क्षण में बच- पन की दो-एक घटनाओ की बात मुंह से निकल पड़ी है। यूगोस्लाविया के स्कपजे पाहर में मां एक छात्रा थी। एक दिन स्कूल की छुट्टी के बाद खेल-कूद से फुरसत पाकर घर लौट रही थी। उस समय घर पर छोटा भाई और एक बहन थे। सध्या होने के साथ ही तीनो भाई-बहन पढ़ने के कमरे मे गये । पढने की पुस्तक आगे खोलकर माँ अपनी एक अध्यापिका के व्यक्तिगत जीवन की समालोचना कर रही थी। छोटा भाई और बहन मन लगाकर वह कहानी सुन रहे थे। लेकिन अचानक कमरे में बत्ती न रहने से कहानी मे बाधा पडी। पड़ोस के कमरे मे बत्ती जल रही थी। इस कमरे में रोशनी नही थी। इसी पर उन्होने आपस मे कहा-सुनी शुरू कर दी। एक ने कहा, शायद स्विच बिगड़ गया है, इसीलिए यह हुआ है। दूसरे ने कहा, मेन स्विच वक्स में खराबी होने से यह खराबी हो सकती है। ठीक सबब किसी को नहीं मालूम था । सबके संदेह को छात्रा टेरेसा (तब तक मां टेरेसा नही बनी थी) की मां ने दूर किया। बेटे- बेटियों के बीच आकर बोली, "देखो, रोशनी मैंने बुझा दी थी। इसलिए स्विच को बेकार दोष देने से फायदा नहीं है।" छात्रा टेरेसा ने सीधे-सीधे मां से पूछा कि उन्होने रोशनी क्यो बद कर दी ? मां ने उनके जवाब में कहा, "दूसरो के व्यक्तिगत जीवन की समालोचना के लिए रोशनी जलाने के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं। इसीलिए मैने रोशनी बद कर दी थी।" घटना बहुत ही मामूली थी, लेकिन उस दिन की वह घटना माँ को अब भी याद है । इसी तरह मां टेरेसा ने अपनी मां से शिक्षा प्राप्त की थी। छात्रा टेरेसा की मां भी धर्मपरायण महिला थी। बड़ी-बड़ी बातें नहीं, अपने हो जीवन से वे घर के और लोगों को प्रेरित करती रहती। एक दिन मां (छात्रा टेरेसा की माता) बाजार से कुछ सेव खरीदकर लायी। इन सेवो मे एक सेव मामूली-सा खराब था। मां ने टेरेसा को बुलाकर कहा, "सेवों को एक टोकरी मे रख दो।" मां के कहने के अनुसार टेरेसा ने सेवो की टोकरी कमरे के कोने मे रख दी। कुछ दिन बाद मां ने उनसे टोकरी लाने को कहा। टोकरी से ढक्कन हटाते ही देखा कि बहुत-से सेव सड़ गये थे।
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माटेरेसा :: 85 ऑफ चैरिटीज का मकान भी इमसे बचा नहीं रहा। इतनी रात में मकान को हिलते देखकर सिस्टरो में मैं कुछ डर गयो। बहुतेरी मां के पास भागी-भागी गयीं। मां ने इशारे मे किसी को भी कमरे से बाहर जाने को मना किया। हाय में माला ले, हाय जोड़कर मां योशु के चित्र के बागे सड़ी रहीं। आंखें बंद किये रहीं। भूकंप रुक जाने के बाद मां बोली, "माग-दौड़ करने से क्या फायदा या? यीशु अगर हमें संसार से लेना चाहते है तो भागकर क्या बच सकेंगे?" मां से यह किस्मा सुनने के बाद मिस्टरों का आत्मविश्वाम और भी पक्का हो गया। 1 रोजाना के जीवन में इस तरह की और भी घटनाएं हैं। एक बार मेंट जोजेफ के जन्मदिन के उपलक्ष्य में एक फादर मां के पास कुछ सहायता को आशा से वाये। मां ने अपना छोटा-मा टीन का वक्म सोना। खोलकर देखा कि वक्स में सिर्फ एक रुपये का एक नोट है। वही नोट उनका आखिरी सहारा था। नोट को फादर के हाथों पर रख दिया। मामूली-मा एक रपया देते हुए मां को बहुत बुरा सग रहा था। मां की मेज पर सेंट जोजेफ की एक छोटी-सी मूर्ति थी। एक सिस्टर को बुलाकर मूर्ति को रुपयों से खाली वक्म में रखने को कहा। सिस्टर ने हरते-डरते मां से पूछा, "मां, माज सेंट जोजेफ़ का जन्मदिन है। मूर्ति को बक्स में रख देना क्या ठीक होगा?" मां के चेहरे पर मुसकान फैल गयी, "ठीक कहा। वक्म में रुपये आने पर फिर सेंट जोजेफ़ को निकालकर ठोक जगह पर रख देना।" दूसरे दिन सबेरे मां कमरे से निकली ही थी कि एक मिस्टर ने उनके हाथ में एक सादा लिफ़ाफ़ा लाकर रखा। लिफ़ाफ़ा सोलते ही सौ रुपये का एक नोट निकल पड़ा । नोट को हाथ में लेकर बोली, "देखा, मैं कैसा जादू जानती हूँ ! कल फ्रादर को एक रुपया दिया या । और वही एक रुपया सौ गुना होकर लोट माया। तो, सेंट जोजेफ़ के वक्स में बंद रहने की जरूरत खत्म हुई।" काम के बीच में समय मिलने पर सिस्टरो के साथ बन भोजन के लिए जाना मां का पिछ्ले जीवन का शौक था। बीच-बीच में धार्मिक सिनेमा भी झुट बनाकर देखने जाना मां को अच्छा लगता। कलकत्ता में 'टेन कमाढमेंटम' आने पर वे मिस्टरों के लिए विना पैमे के टिकट जुटाती। अभी इस दरस ही मिशनरीज ऑफ चैरिटीज़ के पच्चीस बरस की पूर्ति के उपलक्ष्य में मां ने मिस्टरों और ब्रदरों को 'वैन हर' फिल्म दिखाने की कोशिश की। लेकिन अनेक कारणों से वह समव नही हुआ। किताबों में भी धार्मिक पुस्तकें ही उन्हें सबसे अधिक प्रिय हैं। अपने मुख-मुविधा की कोई बात नहीं सोचती। आचार्य जगदीश वसु रोड पर 'मिशनरीज़ यॉफ चैरिटीज़ भवन' के सामने किसी भी दिन नौ बजे के बाद जाने पर सिस्टरें गंदगी साफ करती हुई देखने को मिलेंगी। बड़ी-बड़ी टोन पकड़े 86 :: मां टेरेसा सड़क पर ले जाती हैं। वे कार्पोरेशन के कूड़ा फेंकने की जगह कूड़ा फेंककर लौट आती हैं। यह रोज़ का काम है। सिस्टरों की ही तरह मां के लेटने के लिए भी एक छोटी-सी चौकी है। और बहुतों की तरह एक पतला-सा गद्दा है। उस पर एक चादर है। मां के कमरे में विजली का पंखा नहीं है। केवल मां के कमरे में ही क्यों, सिस्टरों में भी किसी के कमरे में पंखा नहीं है। लेकिन शिशु-भवन में, निर्मल हृदय में या निर्मला केनेडी आश्रम में जहां छोटे-छोटे लड़के-लड़कियाँ रहते हैं वहां पंखे हैं। अपने को गरमी से बचाने के लिए पंखे की हवा खायें और गरीब लोगों से जाकर कहें : मेहनत करो, काम किये चलो--यह नहीं हो सकता । मां की बात भी वही है। अपने जीवन में जो करना संभव नहीं वह औरों को करने का उपदेश देने का कोई अधिकार नहीं है। हमेशा ही ग़रीव को चीजें देना पड़े, ऐसा नहीं है। मां का कहना है : "हम जो देते हैं उसे ही वे मांगते हैं। और भी अधिक पाना चाहते हैं। इन पच्चीस बरसों में इंसान के साथ मिलकर हमें धीरे-धीरे यह स्पष्ट हो गया है कि हमें कोई नहीं चाहता -यही भावना सबसे बड़ा रोग है । जीवन में मनुष्य के लिए इससे बड़ा अभिशाप और कुछ नहीं हो सकता। कुष्ठ रोग दूर करने की दवा निकल आयी है । टी० बी० भी ठीक हो जाती है, लेकिन मैं अवांछित हूँ, मुझे कोई नहीं चाहता' की-सी भयानक और कोई बीमारी मुझे तो मालूम नहीं है । इसे दूर करने की एक मात्र दवा प्यार का प्रलेप ही है।" अट्ठाईस एक प्रसिद्ध उपन्यासकार की वह कहानी याद आ रही है। जहाज़ से जाते हुए कुछ संन्यासी एक द्वीप में उतर गये। वहाँ एक संन्यासी का पैर फिसल गया। आखिर में सागर के पार उसका शरीर बिगड़ी हालत में मिला। विभिन्न कारणों से संन्यासी-जीवन की कठोरता झेलकर सब लोग हमेशा नहीं चल सकते। यह बात मानने को नहीं है कि दुनिया में विभिन्न प्रदेशों में संन्यासी या संन्यासिनियों में किसी-किसी का जीवन सुविधाजनक न हो । संन्यासी-संन्यासिनी बनने की प्रवृत्ति भी कम ही होती है। होठों पर लिपस्टिक या बड़ी-बड़ी पार्टियों में जाने की सुविधा और अवसर देने पर भी संन्यासी-संन्यासिनियों की संख्या वसी बढ़ नहीं रही है। किंतु मां टेरेसा के 'मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटीज़' में इतनी कड़ाई रहने पर भी हर दिन संन्यासिनियों की संख्या बढ़ रही है। चारह सिस्टरों की जगह आज एक हजार एक सौ इकसठ सिस्टर काम कर मा टेरेसा :: 87 रही हैं। इनमे बहुत बड़ी संख्या मे बदर भी हैं। केवल पच्चीस वरसों में इतनी अधिक संख्या में सिस्टर मिशनरीज ऑफ चैरिटीज़ के प्रति किस प्रकार आकर्षित हुई, यह सचमुच विचारणीय है। ये सब कठोर जीवन को अभ्यस्त हैं। छोटे-बड़े, जूनियन-सोनियर का झगड़ा नहीं है । यहाँ सब बरावर हैं । इमी से जिस तरह मां के कमरे मे पखा नही है, उसी तरह कमरा पोंछना, साफ करना, थाली-वर्तन धोना सबके लिए जरूरी है। काम की जिम्मेदारी लेने के बारे में छोटे-बड़े, जूनियर-सीनियर का विचार किया जाता है -अवसर और सुविधा के बारे में नहीं। जिम्मेदारी के मामले में सब एक बंधन में बंधी हैं। हजार से अधिक सिस्टरो में सौ में से पचास ने यौवनावस्था पार नहीं की है। इसीलिए उनके शरीर और मन को पवित्र रखने का दायित्व सीनियरों पर है। प्रार्थना ही इन सब युवतियों को अंतर्मुखी बना देती है। मा टेरेसा तो हैं ही। मिशनरीज ऑफ चैरिटीज की विभिन्न संस्थाओ के कामकाज चलाने की सर्वोपरि जिम्मेदारी पांच सिस्टरो की बनी एक 'काउसिल ऑफ एडवाइजर्स' पर है। सबके ऊपर मां खुद हैं । वे ही मदर-जनरल हैं। इसके बाद इस बरस जो पांच 'काउसिल ऑफ एडवाइजर' में चुनी गयी हैं वे हैं सिस्टर अग्नेस (असिस्टेंट मदर-जनरल), सिस्टर डोरोथी, सिस्टर फ्रेडरिक, सिस्टर जोजेफ माइकेल और सिस्टर कमेलूस । ये सभी निर्वाचित हैं । मां जब भारत के बाहर रहती हैं तो असिस्टेंट मदर-जनरल सिस्टर अग्नेस को ही सब-कुछ देखभाल करनी पड़ती है। मां सारी जिम्मेदारी उन पर छोड़ जाती हैं। सिस्टर अग्नेस, जिनका पहले का नाम सुभापिणी दास या, मां के काम पर पहले आती हैं। वे लोरेटो में मां की विद्यार्थी थी। आत्म-प्रचार-विमुख नन्ही- सो यह बंगाली महिला बहुत अच्छी अंग्रेजी बोलती हैं। बगला के माध्यम से लोरेटो में पढाई-लिखाई की थी। मां टेरेसा ही लोरेटो में 'बँगला माध्यम' शाखा को प्रधान थी। यह जिम्मेदारी लेने के पहले माँ ने खुद भी गला सीख ली थी। अब जरूर अंग्रेजी मे ही ज्यादा वातचीत होती है। वस्तियो में जाने पर सिस्टर अग्नेस शुद्ध बंगला मे ही बातें करती हैं। वस्तियो के रहने वाले भी सिस्टर को अपनी बहन की तरह ही मानते हैं । मा टेरेसा के ससार के जीवन का 'अग्नेस' नाम बगाली महिला सुभाषिणी दास ने लिया। इसके बाद है अंतर्राष्ट्रीय सस्था 1-इटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ कोवर्कसं ऑफ मदर टेरेसा । इस एसोसिएशन की अतिम रिपोर्ट में अतर्राष्ट्रीय चेयरमैन के रूप मे स्थान पाया कोदहाम, सरे (इग्लंड) 2, सिल्वरम की रहने वाली श्रीमती ऐन ब्लेफ़र के नाम ने । एसोसिएशन की वाइस चेयरमैन के रूप मे आस्ट्रेलिया, 88 मा टेरेसा - - आस्ट्रिया, वेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड, भारतवर्ष, आयर- लैंड, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, अमरीका और वेनेजुएला के निवासियों के नाम हैं। भारत से निर्वाचित वाइस-चेयरमन इस शहर कलकत्ता की ही निवासी हैं। उनका नाम है श्रीमती पेरिन आयचेड़ा। पता है-10, बालीगंज, पार्क रोड, कन्नकत्ता-191 उन्तीस वस्तियों से घिरे तिलजला का 'प्रेमदान केंद्र' भी देखने योग्य है । आज से तीन वरस पहले 1973 ई० के 5 अप्रैल को पश्चिमी बंगाल के राज्यपाल ए० एल० डायस ने इस केंद्र का उद्घाटन किया। इसमें पांच एकड़ जमीन है। बीच में एक सुंदर मकान है। मकान आई० सी० आई० की टेक्निकल सर्विस लैबोरेटरी की विल्डिग था। मां के कहने से अब वह 'लेबोरेटरी ऑफ गॉड' में रूपांतरित हो गयी है। यह कलकत्ता के पूर्वाचल तिलजला के पैतीस हजार लोगों की सेवा के लिए बना है। मैदान के एक कोने में एक प्राथमिक स्कूल खोला गया है। बड़े मकान का एक हिस्सा अपुष्ट लड़के-लड़कियों के रहने की जगह है। इन लड़के-लड़कियों में बहुतों को सिस्टर दूर-दूर के गांवों से यहां लायी हैं । सिस्टर केवल वस्तियों में ही नहीं, गांवों में गरीबों की झोपड़ियों में भी पहुंचती हैं। अच्छा हो जाने के बाद लड़के-लड़कियों को उनके गांव ले जाती हैं। उन्हें उनके मां-बाप के हाथों में थमा देती हैं। जहबुद्धि वाले बच्चों के लिए और मुमूर्षु लोगों के लिए भी यहां ठहरने का प्रबंध है। तिलजला का प्रेमदान, कालीघाट का निर्मल हृदय, दगदम हवाई अड्डे के पास निर्मला केनेडी बोंद्र-हावड़ा, कुमार सालि, वानन्त (मडियापली), आसन- सोल, शांतिनगर, दार्जिलिंग, सिलीगुड़ी, कलिम्पोंग, नागदा, न्यू जलपाईगुड़ी- बंगला देश के तमाग प्रांतों में मिशनरीज ऑफ़ चैरिटीज की सेवा-संस्थाओं के समूह सड़क पर चलते-चलते फुटपाथ के किनारे मां ने डाम के हजारों खोल प्रायः फैले हुए हैं। 1. पच्चा नारियल मां टेरेसा :: 89 पहें देखे हैं। एक दिन उन्होंने खुद कई खोल बटोरे। उन्हें सुखाया । हाभ के इन मूमे खोलों से वे तरह-तरह की चीजें बनाने लगी। हम डाभ का पानी पीकर खोल को सड़क पर फेंक देते हैं । इस तरह बहुत-सा कूडा जमा कर देते हैं । और मां ने उमी कूड़े को काम में ले लिया। सियालदह के पास प्रेमदान में जाने पर दिखायी देगा कि तमाम अनाथ नारियल के इन छोवडों से तरह-तरह की चीजें बनाकर जीविका निर्वाह कर रहे हैं। .. । तीस तमाम लोगों के तमाम प्रश्नों के जवाब में : मां प्रश्न : मां, आपके मन में इन भावनाओं का उदय कब हुआ; और कव आपमें यह चेतना आयी कि आप दद्धिनारायण की सेवा में अपने को समर्पित करें? मोटेरेसा : बहुत दिन पहले जब मैं अपने मां-गाप, आत्मीय स्वजनों के बीच घर मे थी। प्रश्न : वह जगह कहाँ है? मा टेरेसा : यूगोस्लाविया के स्कपजे शहर में । उस समय मेरी उम्र कुल बारह वरम की थी। मैं घर पर थी। छुटपन मे हम लडो लडकियां एक गैर-कलिक स्कूल में पढ़ते थे। हमारे स्कूल में अच्छे 'प्रीस्ट' थे। यह 'प्रीस्ट' भगवान के आह्वान के अनुयायी लड़के-लड़कियो की उपासना इत्यादि बातों में मदद करते थे। यही मैं पहले-पहत जान सकी कि भगवान की पुकार पर चलकर हमें दीन-दरिद्रों की सेवा के काम में अपने को लगाना होगा। प्रश्न : तो क्या नवजीवन का सूत्रपात यही से हुआ ? मां टेरेसा : हां, 1922 ई० मे। प्रश्न : अपने जीवन की मौज-मस्ती को चरितार्थ करने के लिए नही, तो क्या अपने को विशेष रूप मे ईश्वर के चरणों में समर्पित करने के उद्देश्य से ही नया जीवन शुरू किया? माटेरेसा: मैंने धर्म में, परार्थ के काम में अपने को रागाना चाहा । जिन देशों में मिशनरीज़ के कामकाज हैं उन्हीं देशों मे यीशु को दिसाये पथ पर मनुष्य की गेवा में अपने को नियुक्त करने की इच्छा हुई थी। ठीक उसी समय यूगो- स्लाविया मे कई धर्मप्रचारक या मिशनरी भारत आये। उन्होंने ही एक दिन मुझसे कहा, "लोरेटो के सन्यासी कलकत्ता और दूसरी जगहों में काम करते हैं।" मैं 'बंगाल मिशन' में जाने को तैयार हो गयी। और वहां से 1929 ई० में उन्होंने 90 :: मां टेरेसा मुझे भारत भेज दिया। प्रश्न : आपने यह स्वेच्छा की शपथ कव ली? मां टेरेसा: मैंने पहले-पहल लोरेटो में 1931 ई० में शपथ ली। इसके छः बरस बाद 1937 ई० में इस शपथ ने अंतिम रूप लिया। प्रश्न : बारह बरस के कुमारी जीवन और अंतिम शपथ लेने के बीच आपके मन में क्या कभी कोई दुविधा, द्वंद्व, संदेह नहीं उपजा? विशेष रूप से संन्यासी जीवन की कठोरतर वात सोचकर ? मां टेरेसा : पहले, बारह से सोलह-सत्रह बरस तक मैंने संन्यासिनी बनना नहीं चाहा। मेरा परिवार बहुत सुखी था। किंतु किशोरावस्था पार कर पांव रखने के साथ ही मैंने घर छोड़कर संन्यासिनी बनने का निश्चय किया। और तभी से, लवे चालीस वरसों में, मेरे मन में क्षण-भर के लिए भी संदेह नहीं हुआ कि मेरे निश्चय में जरा भी त्रुटि है । अर्थात, हमारा निश्चय सही है । वह हर क्षण विचित्र अनुभव कर सकें, यह भगवान की ही इच्छा है । प्रश्न : और आपकी शांति और सुख के मूल में वही निश्चय है । यही न ? मां टेरेसा : यह सुख मुझसे कोई नहीं छीन सकता। प्रश्न : आप लोरेटो में पढ़ाती थीं। क्या आपको पढ़ाना अच्छा लगता था? मां टेरेसा : पढ़ाने को मैं सबसे अधिक प्यार करती हूं। लोरेटो में मैं बंगला विभाग (बंगाली मीडियम) में थी। जो सिस्टर अव मेरे साथ हैं उनमें से बहुतेरी उस समय मेरी छात्राएं थीं। प्रश्न : इस सबकी समाप्ति तय हुई जव थाप किसी अपार्थिव काम के लिए उद्यत हुई? मां टेरेसा : हां, धर्म की पुकार मुझे सुननी ही पड़ी। यह दूसरी बार की पुकार थी। लोरेटो का सुंदर परिवेश छोडकर सड़क पर गरीबों के बीच आने का ही यह बाहान था। दीन-दरिद्रों की सेवा में ही तो भगवान की सेवा की कुंजी ? प्रश्न : दूगरी वार का आह्वान कंगे हुआ गां टेरेसा: 1946 ई० में मैं दाजिलिंग जा रही थी। ट्रेन के डिब्बे में बैठे- बैठे मैंने यह आह्वान सुना। मानो किगी ने अचानक मुझसे कहा हो, 'सब त्याग गार मेरे पीछे आओ। वस्ती-बस्ती में दरिद्रतम मनुष्य की सेवा करने से ही मेरी सेवा होगी।' प्रश्न : इसलिए ट्रेन में बैठे-बैठे ही आपने अपने जीवन का सबसे बड़ा निश्चय किया ? हृदय गो अंतरतल की पुकार को अपने जीवन का साथी बनाया ? मां टेरेसा : मैं जानती थी कि यह उनकी ही इच्छा है। यह भी जानती थी कि मुझे उनका ही अनुसरण करना होगा। यह जानकर भी मैंने चर्च का निश्चय मां टेरेसा 91 जानना चाहा था। प्रश्न : आपने लोरेटो कॉन्वेंट से बाहर आने के उद्देश्य से धर्म के अधिकारियों से अनुमति लेने की प्रार्थना की थी? इसको मिलने में कितनी देर लगी? मां टेरेसा : मैंने पहले कलकता के आचं विशप में आवेदन किया । माविशप से अनुमोदन पाने के बाद रोम को लिखकर भेजना होता है, जिसको लोरेटो की संन्यासिनियों की मदर-जनरल अनुमति देती हैं। जिम के लिए मैंने अतिम शपथ ली थी उसी के लिए सन्यासिनी रूप में कॉन्वेन्ट छोड़ने के पहले मुझे सर्वोच्च अधिकारी से अनुमति लेनी ही पडी। होली फादर पोप पायस बारहवें को सब-कुछ लिख- कर बताया। साथ ही वापसी डाक से 12 अप्रैल को अपनी विट्ठी का जवाब पाया । होली फादर ने बताया कि मैं बाहर जा सकती हूँ और संलग्न ही संन्यासिनी के रूप में उपदेश दिया। अर्यात, उन्होंने कलकत्ता के आर्चबिशप के अधीन धर्म के काम में यागे बढ़ने को कहा। प्रश्न : यह कितने बरस पहले की घटना है ? मा टेरेसा : वह 1948 ई० या। प्रश्न : पोप को चिट्ठी मे आपने अपने अभिप्रेत काम के संबंध में क्या लिखा? मांटेरेमा . मैंने चिट्ठी में लिखा कि ईश्वर मुझे सर्वस्व त्यागकर वस्तियों में उपेक्षित गरीव-से-गरीब लोगों की सेवा में बार-बार खुला रहे हैं। भगवान कह रहे हैं, दरिद्रों की सेवा का अर्थ उनकी पूजा करना है। प्रश्न : लोरेटो कॉन्वेन्ट स्कूल के सुदर उद्यान के प्रांगण के उस शात, स्निग्य परिवेश मे बाहर कोलाहल-भरी राहों पर निकल ना क्या बहुत कठिन नहीं है? मां टेरेसा : त्याग तो इतना ही था ! प्रश्न : इसके बाद आपने क्या किया? मां टेरेसा मैंने लोरेटो कॉन्धेन्ट छोड़ दिया। प्राथमिक चिकित्सा के काम में ट्रेनिंग लेने के उद्देश्य से पटना में सिस्टरो के पास गयी। गरीचो की कुटियो में जाने के पहले यह ट्रेनिंग बहुत ज़रूरी है। तब तक मैं एक अध्यापिका थी और अध्यापन को लेकर मेरे लिए उस समय काम करना सभव न था। पहले 'होम्स' में गयो । वहाँ शिशुओ को, रोगी व्यक्तियों को देसा। पहले मैंने एक बहुत छोटा स्कूल शुरू किया। उस स्कूल की छात्र-संख्या कुल पांच शिशु थी। धीरे-धीरे शिशुओ की संख्या बढने लगी। अब वहाँ पढने वालो को मस्या पांच सो से ऊपर है। प्रश्न : जहां आपने पहले शुरू किया था। मा टेरेसा : हाँ, वस्ती में एक परिवार के रहने की जगह के सामने टुकड़ा खुली जगह मे। एक 92 मां टेरेसा , प्रश्न : मां, कलकत्ता के समान भीड़-भरे शहर में आप किस तरह एक वात सोचकर ही काम के लिए निकल पड़ीं? न आपकी कहीं कोई जगह थी, न ही माथिक सामर्थ्य। वह होने पर भी इतनी बड़ी ज़िम्म्मेदारी सर पर लेकर चटपट चली आयीं? माँ टेरेसा : मैं उस समय पूर्णतया निश्चित थी, और मैं अब भी जी-जान से विश्वास करती हूँ कि यह सब उनका ही काम है, मैं कुछ नहीं हूँ। इसी कारण से मुझे डर न लगा। मैं जानती थी कि काम अगर मेरा ही होगा तो मेरी मृत्यु के साथ-साथ मेरे काम की भी मृत्यु हो जायेगी। इसी एक विश्वास से मैं समझ गयी कि यह उनका काम है। मेरी मृत्यु के बाद भी यह काम जीवित रहेगा और गरीबों का भला करेगा। प्रश्न : फुटपाथ के लड़के-लड़कियों को आप क्या सिखाती हैं ? मां टेरेसा : धर्म नहीं, वर्ण-परिचय से मैं उनकी शिक्षा शुरू करती है। यद्यपि इन लड़कों की उम्र बहुत अधिक होती है, ये कभी स्कूल नहीं गये। कोई स्कूल इन्हें लेना भी नहीं चाहता। इसके बाद स्वास्थ्य-रक्षा के संबंध में हम कुछ प्रारंभिक शिक्षा देते हैं। किस तरह से अपने को साफ़-सुथरा रखा जाये, यह उनको समझाया। जिस स्कूल में मैं इन्हें पढ़ाती थी उस स्कूल की तीन लड़कियाँ दूसरे दिन मेरे पास आयीं। इन तीन लड़कियों की सहायता से और भी छात्र मिले। इसी तरह काम शुरू हुआ। जिस स्कूल में मैं पहले पढ़ाती थी वहाँ की कई अध्यापिकाओं ने आकर मेरा साथ दिया । जी-जान से लग गये । शाखा-प्रशाखाएँ बढ़ने लगीं। प्रश्न : आपके पास रुपया-पैसा निश्चय ही रहा होगा ! कहाँ से मिला? मां टेरेसा : पहले मेरी टेंट में थे केवल पांच रुपये। किंतु जन-साधारण ने जब धीरे-धीरे हमारे काग के संबंध में जाना तो वे ही रुपये-पैसे, सर-सामान देकर हमारी सहायता करने लगे। यह सब ईश्वर की दया है। पहले दिन से ही रुपयों के लिए हमें किसी के पास हाथ नहीं पसारना पड़ा। हमारी जरूरत के मुताबिक रुपये आते रहे। प्रश्न : नया सारा-का-सारा दान अपनी इच्छा से दिया गया था? मां टेरेसा : हाँ, सब दान के रूप में मिला था। दरिद्रों की सेवा में ही मैंने भगवान को प्यार किया है। प्रश्न : आपका स्कूल गुरू हुआ। मापके काम में सहायता करने के लिए भी कुछ लोग मागे आये। इस तरह आपको कुछ रुपये भी मिले। इसके बाद क्या हुमा? मा टेरेसा : सिस्टरों ने सन् 1949 ई० से आना शुरू किया। पहली सिस्टर का नाम अग्नेस है । वह मेरी पहली सहकर्मी थीं। प्रश्न : क्या सिस्टर अग्नेस लोरेटो में यापकी छात्रा थीं?
मा टेरेसा :: 93 आने के बाद मृत्यु मा टेरेसा : हां, पहले जिन दस लड़कियों ने अपने को सेवा के काम में ईश्वर की आराधना में निवेदित किया वे सब मेरी स्कूल की छात्राएं थी। उन्होंने सव. कुछ ईश्वर को समर्पित कर दिया। धीरे-धीरे और भी बहुतों ने साथ दिया। डॉक्टर, नर्स, समाजसेवी-कोई भी वाक़ी न रहे। (सीधे मां से न जानने पर भी एक दूसरे सूत्र से पता चला कि पहली दस लडकियो में अधिकांश बगाली थी।) प्रश्न : मां, कालीघाट के निर्मल हृदय' के मुमूर्षु लोगों के लिए, आप क्या कर सकी ? 'निर्मल हृदय' मे जाने पर तो लगता है कि यहां के सिवा और क्या आशा की जा सकती है? मां टेरेसा . सबसे पहले हम इन्हें यह बताना चाहते हैं कि उन्हें प्यार करने वाले लोग इस दुनिया में है। मृत्यु तो अवश्यभावी है; मृत्यु के सामने जाने के पहले उनको थोड़ा प्यार, थोड़े-से स्नेह का स्पर्श मिल सके, यही यहां लाने को एक सार्यकता है। प्रश्न : जो मरते नही, जी जाते हैं, उनके लिए क्या करती हैं ? मां टेरेसा : जो काम कर सकते हैं उनके लिए कुछ काम-काज तलाश करने की कोशिश करती हूँ। औरो को 'होम' में भेज देती हूँ। वहाँ वे कई बरस सुस- शाति से बिता सकते हैं। प्रश्न : इनको यहां कोन ले आते हैं, मां ? मां टेरेसा पहले तो सिस्टर ही सड़को पर से उठाकर लाती थी। प्रश्न : जिस तरह पहले आप महिला को सड़क पर से उठाकर लायी थी? मा टेरेसा : हाँ, कप्ट में पड़े मुमूर्प लोगो में जब इस 'स्वर्ग' की चर्चा फैली तो बहुतों ने इस स्वर्गद्वार पर मुमूर्षुओं को पहुंचाना शुरू किया। इस तरह का कोई आदमी राह में पड़ा देखते ही वे ऐम्बुलेंस के लिए फोन कर देते हैं। फोन पाकर ऐम्बुलेंस घटनास्थल से सबंधित व्यक्ति को लेकर हमारे यहाँ ले आती है। (जिनका कोई नहीं होता उनके लिए यह 'होम' है। माँ ने इसका नाम "निर्मल हृदय' रसा है।) प्रश्न : पहले कुछ वरसों में सिस्टरो की संख्या किस दर से बढ़ी है ? मा टेरेसा । पहले तो कुल मिलाकर केवल बारह सिस्टर थी। यह 1950 ई० की बात है। धीरे-धीरे सख्या बढने लगी। दस बरस तक हम कलकत्ता के बाहर कही नही गये । उसका कारण है कि हमे सिस्टरो को ट्रेनिंग देनी पड़ी थी। 1959 ई० में हमने कलकत्ता के बाहर एक भवन स्थापित किया। इसके बाद दिल्ली में। तमाम महिलाएं अपने-आप आने लगी। जिस जगह भवन बनता वहीं हमें इस प्रकार की लड़कियां स्वत. मित जाती। प्रश्न : अधिकतर लड़कियों किस वर्ग की थी ?
92 :: मां टेरेसा - मृत्यु के प्रश्न : मां, कलकत्ता के समान भीड़-भरे शहर में आप किस तरह एक बात सोचकर ही काम के लिए निकल पड़ीं? न आपकी कहीं कोई जगह थी, न ही आर्थिक सामर्थ्य । वह होने पर भी इतनी बड़ी ज़िम्म्मेदारी सर पर लेकर चटपट चली आयीं? मां टेरेसा : मैं उस समय पूर्णतया निश्चित थी, और मैं अब भी जी-जान से विश्वास करती हूँ कि यह सब उनका ही काम है, मैं कुछ नहीं हूँ। इसी कारण से मुझे डर न लगा। मैं जानती थी कि काम अगर मेरा ही होगा तो मेरी साथ-साथ मेरे काम की भी मृत्यु हो जायेगी। इसी एक विश्वास से मैं समझ गयी कि यह उनका काम है। मेरी मृत्यु के बाद भी यह काम जीवित रहेगा और ग़रीबों का भला करेगा। प्रश्न : फुटपाथ के लड़के-लड़कियों को आप क्या सिखाती हैं ? मां टेरेसा : धर्म नहीं, वर्ण-परिचय से में उनकी शिक्षा शुरू करती हूँ । यद्यपि इन लड़कों की उम्र बहुत अधिक होती है, ये कभी स्कूल नहीं गये। कोई स्कूल इन्हें लेना भी नहीं चाहता। इसके बाद स्वास्थ्य-रक्षा के संबंध में हम कुछ प्रारंभिक शिक्षा देते हैं। किस तरह से अपने को साफ़-सुथरा रखा जाये, यह उनको समझाया। जिरा स्कूल में मैं इन्हें पढ़ाती थी उस स्कूल को तीन लड़कियां दूसरे दिन मेरे पास आयीं। इन तीन लड़कियों की सहायता से और भी छाय मिले। इसी तरह काम शुरू हुआ। जिस स्कूल में मैं पहले पढ़ाती थी वहां की कई अध्यापिकाओं ने आकर मेरा साथ दिया । जी-जान से लग गये । शाखा-प्रशाखाएं बढ़ने लगीं। प्रश्न : आपके पास रुपया-पैसा निश्चय ही रहा होगा ! कहाँ से मिला? मां टेरेसा : पहले मेरी टेंट में थे केवल पांच रुपये। किंतु जन-साधारण ने जब धीरे-धीरे हमारे काम के संबंध में जाना तो वे ही रुपये-पैसे, सर-सामान देकर हमारी सहायता करने लगे। यह सव ईश्वर की दया है। पहले दिन से ही रुपयों के लिए हमें किसी के पारा हाथ नहीं पसारना पड़ा। हमारी जरूरत के मुताबिक रुपये आते रहे। प्रश्न : गया सारा-का-सारा दान अपनी इच्छा से दिया गया था? मां टेरेसा : हो, सब दान के रूप में मिला था। दरिद्रों की सेवा में ही मैंने भगवान को प्यार किया है। प्रश्न : आपका स्कूल शुरू हुआ। आपके काम में सहायता करने के लिए भी कुछ लोग मागे आये। इस तरह आपको कुछ रुपये भी मिले। इसके बाद क्या हुमा? मां टेरेसा : सिस्टरों ने सन् 1949 ई० से आना शुरू किया। पहली सिस्टर का नाम अग्नेस है। वह मेरी पहली सहकर्मी थीं। प्रश्न : क्या सिस्टर अग्नेस लोरेटो में आपकी छात्रा थीं?
मो टेरेसा :: 93 .. मां टेरेसा : हां, पहले जिन दस लड़कियों ने अपने को सेवा के काम में ईश्वर की आराधना में निवेदित किया वे सब मेरी स्कूल की छात्राएं थी। उन्होंने सब. कुछ ईश्वर को समर्पित कर दिया। धीरे-धीरे और भी बहुतों ने साथ दिया। डॉक्टर, नर्स, समाजसेवी-कोई भी बाकी न रहे। (सीघे मां से न जानने पर भी एक दूसरे सूत्र से पता चला कि पहली दस लड़कियों में अधिकांश बंगाली थी।) प्रश्न :मा, कालीघाट के निर्मल हृदय' के मुमूर्प लोगों के लिए, आप क्या कर सकी ? निर्मल हृदय' में जाने पर तो लगता है कि यहां ले आने के बाद मृत्यु के सिवा और क्या आशा की जा सकती है ? मां टेरेसा : सबसे पहले हम इन्हें यह बताना चाहते हैं कि उन्हें प्यार करने वाले लोग इस दुनिया में हैं । मृत्यु तो अवश्यंभावी है; मृत्यु के सामने जाने के पहले उनको योड़ा प्यार, योड़े-मे स्नेह का स्पर्श मिल सके, यही यहां लाने की एक सायंकता है। प्रश्न : जो मरते नही, जी जाते हैं, उनके लिए क्या करती हैं ? मां टेरेसा : जो काम कर सकते हैं उनके लिए कुछ काम-काज तलाश करने की कोशिश करती हूँ। औरों को 'होम' में भेज देती हूँ। वहाँ वे कई बरस सुख- शांति से बिता सकते हैं। प्रश्न : इनको यहां कौन ले आते हैं, मां ? मां टेरेसा : पहले तो सिस्टर ही सड़को पर से उठाकर लाती थी। प्रश्न : जिस तरह पहले आप महिला को सड़क पर से उठाकर लायी थी? मा टेरेसा : हाँ, कष्ट में पड़े मुमूर्प लोगों में जब इस 'स्वर्ग' को चर्चा फैली तो बहुतों ने इस स्वर्गद्वार पर मुमूर्षुओं को पहुंचाना शुरू किया। इस तरह का कोई आदमी राह में पड़ा देखते ही वे ऐम्बुलेंस के लिए फोन कर देते हैं। फोन पाकर ऐम्बुलेंस घटनास्थल से सबंधित व्यक्ति को लेकर हमारे यहाँ ले जाती है। (जिनका कोई नही होता उनके लिए यह 'होम' है। मां ने इसका नाम 'निर्मल हृदय' रखा है।) प्रश्न : पहले कुछ बरसों में सिस्टरो की संख्या किस दर से वही है ? मा टेरेसा : पहले तो कुल मिलाकर केवल बारह सिस्टर थी। यह 1950 ई० की बात है। धीरे-धीरे संख्या बढ़ने लगी । दस बरस तक हम कलकत्ता के बाहर कही नहीं गये । उसका कारण है कि हमें सिस्टरों को ट्रेनिंग देनी पड़ी थी। 1959 ई० में हमने कलकत्ता के बाहर एक भवन स्थापित किया। इसके बाद दिल्ली में। तमाम महिलाएं अपने-आप आने लगी। जिस जगह भवन बनता वहाँ हमें इस प्रकार की लड़कियां स्वतः मिल जाती। प्रश्न : अधिकतर लड़कियां किस वर्ग की थी?
94 :: मां टेरेसा मां टेरेसा : अधिकतर मध्यवर्ग के परिवारों की थीं। कुछ धनी घरों को भी थीं। : : प्रश्न : क्या वे पढ़ी-लिखी थी ? मां टेरेसा : अधिकतर सुशिक्षित थीं। प्रश्न : उच्च मध्यवर्ग की लड़कियों के लिए अनाथ, पंगु, उपेक्षित, मुमूर्षु लोगों में काम करना क्या बहुत मुश्किल काम न था ? मां टेरेसा : इन युवतियों ने जीवन का सर्वस्व मिटा देना चाहा था। भगवान के निकट उन्होंने अपना जीवन सौंप दिया था। सब-कुछ उनके ही चरणों में निवेदन करने में ही उनका जीवन सार्थक था। मान-सम्मान सब-कुछ छोड़कर मानव-सेवा में ही उन्होंने ईश्वर को पाना चाहा । असीम करुणा के आधार ईश्वर की बात कभी उनका हृदय भूल न जाये। उनकी ही कृपा से दरिद्रतम मनुष्य की सेवा का सुअवसर इन्हें मिला। प्रश्न : ग़रीबों की सेवा में सब-कुछ मिटा देने की यह शक्ति इनको कहाँ से प्राप्त हुई ? मां टेरेसा : जिस दिन उन्होंने इस सेवाव्रत में अपने को नियुक्त किया उस दिन से ही हम अपने सेवा के काम के संबंध में इनके साथ विचार-विमर्श करते हैं। भगवान के निकट इच्छा पूर्ण करने की बात लेकर भी बातचीत होती है। प्रार्थना में आध्यात्मिक-शक्ति-संग्रह करती हैं और उस शक्ति से बलवती होकर उन्हें बस्तियों में जाना होता है। वस्तियों में काम और वहाँ के लोगों के साथ मिलना-जुलना-यह दोनों ही ट्रेनिंग में सम्मिलित होते हैं। सामान्यतः ट्रेनिंग के प्रथम चरण में 'नोविसेज'-नये लोग-वाहर नहीं जाते । लेकिन हमारी चौथी प्रतिज्ञा---दरिद्र-से-दरिद्र मनुष्य की सेवा करना, दरिद्रवेश में यीशु की सेवा करने के लिए ही तो इस मिलने-जुलने की जरूरत है। उसी कारण से यह दरिद्रतम व्यक्ति का सामना करती हैं। उनके जीवन की धारा किस ओर बहेगी, उस संबंध में पूरी जानकारी पाना इनको जरूरी होता है। दरिद्रतम मनुष्य के सुख-दुख के बीच यीशु को, यीशु के अस्तित्व को, चौबीसों घंटे प्राप्त करने की तैयारी के पहले पूर्ववर्ती जानकारी जमा करने का क्षेत्र ये वस्तियाँ हैं। प्रश्न : यह तो कठिन साधना है ! क्या सभी इस काम को सहज भाव से ले पायी हैं ? मा टेरेसा : बहुत कम, बहुत ही कम संख्या में सिस्टर चली गयी हैं। जो-कुछ चली गयी हैं उन्हें उँगलियों पर गिनकर बताया जा सकता है। यह सचमुच खुशी की बात है कि पहले से ही इतनी अधिक संख्या में सिस्टर विश्वास के साथ काम करती रही हैं। प्रश्न : इस कठिन परीक्षा में से ही उन्होंने पूर्णता का स्वाद पाना चाहा था?
माटेरेसा :: 95 .. मां टेरेसा : उनके लिए यह 'चलेंज' की तरह है। उन्होंने सव-कुछ छोड़ना चाहा था । कठिनतम जीवन के सामने खड़ा होना चाहा। इस जीवन को जी-जान से प्यार करना होगा, दरिद्रता को अलंकार बनाकर हर एक के बीच काम करने जाना होगा। भगवान के प्रति प्यार को प्रतिमूर्ति ही यह काम है। हमारे प्यार का स्पर्श किसी-न-किसी के लिए तो निदिष्ट है ही। प्रश्न : कालीघाट का निर्मल हृदय', साचार्य जगदीश वसु रोड पर 'निर्मला शिशु-भवन', दमदम में 'निर्मला केनेडी केंद्र' या पार्क स्ट्रीट पर सिस्टरो का निवाम स्थान-जहां भी गया वहां ही सिस्टरों को आँखों और चेहरों पर प्रसन्नता का भाव देखा। इस कठोर जीवन में जिस प्रकार वे सदा चेहरे पर हंसी खिलाये रहती हैं वह सचमुच अकल्पनीय है ! मां टेरेसा : यही तो दिन-रात हमारी सोसायटी की शक्ति के मूल में काम करता रहता है । स्वय का उनके ही चरणकमलो में समर्पण, प्रेम का विश्वास, यानंद-यही हमारा मूलधन है। धन से ही क्या सेवा होती है ? मां बोली, "नहीं, केवल धन से ही सेवा नहीं होती। सेवा का हृदय चाहिए। अस्पताल के डॉक्टर, नर्स भी तो सेवा करते हैं। उम सेवा में प्यार का स्पर्श भी है या नहीं, वही देखने की बात है। प्यार की दुनिया में धोने के लिए कोई स्थान नहीं है । मुंह से नहीं, काम से समझाना होगा कि हम उन्हे प्यार करते हैं । प्यार करते हैं हृदय के अन्तस्तल से। इसीलिए हमेशा इनके पास प्रसन्न मन से जाना होगा। दुनी मन लेकर जाने से ये दुखी लोग और भी टूट जायेंगे।" प्रश्न : ये लोग क्या देने से खुश होगे? इन सव उपेक्षितो को कुछ चीजें देने की जरूरत है? मां टेरेसा : हमेशा उन्हें कुछ देना हो, ऐमी वात नहीं है । जो हम देते हैं वे लोग वही चाहते हैं। अधिकतर लोग पाना चाहते हैं । इन पच्चीस वरमों में लोगो से मिलकर हमे क्रमश. यह स्पष्ट हो गया है कि 'हमें कोई नहीं चाहता'-यही भावना सबसे बड़ा रोग है। मनुष्य के जीवन में इससे बड़ा और कोई अभिशाप नहीं हो सकता। आजकल कुष्ठ रोग अच्छा करने की दवा है। टी० बी० अच्छी हो जाती है । लेकिन 'मैं अवांछित हूँ, मुझे कोई नहीं चाहता' का-सा भयानक रोग और कोई है, यह मुझे नहीं मालूम । इस रोग को दूर करने की एक ही बीपधि है । और वह है-प्यार। प्रश्न : इस भयानक रोग से छुटकारा देना ही आपका, आपकी सिस्टरों के जीवन का एकमात्र लक्ष्य है ? मां टेरेसा : हमारा लक्ष्य यही है । दरिद्रतम व्यक्ति को यीशु समझकर उसकी सेवा करना, उसे प्यार करना।
96 :: मा टेरेसा : प्रश्न : मुमूर्य के सिवा अनाय शिशुओं की बात भी आपको सोचनी पड़ती है? मा टेरेसा:हाँ। प्रश्न : ये सारे बच्चे कहाँ से आते हैं ? माटेरेसा : अधिकतर बच्चे मां-बाप के निकट अवांछित होते हैं। सड़क पर से, हावड़ा और सियालदह स्टेशन से हम इन्हें उठा लाते हैं। मां-बाप ही अपने बच्चे-बच्चियों को छोड़कर चले जाते हैं। कारागार में से, पुलिस की हिफाजत में रो भी हमें परित्यक्त बच्चे मिलते हैं। जहाँ से भी आयें, और जिस हालत में भी आयें, हमने आज तक एक बच्चे को भी लोटाया नहीं। (मां के दरवाजे पर जो एक बार आ जायेगा वह लोटकर नहीं जायेगा। जिस तरह भी हो, उसकी व्यवस्था हो जाती है।) मां बोली, "एक अतिरिक्त बच्चे के लिए सदा एक सीट अधिक रहती है, यह पाहा जा सकता है।" प्रश्न : तो आपको कभी किसी को वापस नहीं भेजना पड़ा मा टेरेसा :न। .. इकतीस पुरानी कुटिया में या किसी वस्ती में घूमते-घूमते कोई कुमारी लड़की जब माँ की सेवा की बातें गरीबों के मुंह से सुनती है तो उसका मन भी रो पड़ता है । वह लड़की भी इसी तरह रोया करना चाहती है । लेकिन क्या उसे फ़ोरन अवसर मिल जाता है ? मां बोली, "उन्हें अवसर निश्चय ही मिलेगा।" रोवा की भावना लेकर जब ये सब कम उम्र की लड़कियां आती हैं तो उन्हें हाथ बटाने को कहा जाता है । छ: महीने का काम-काज देखकर वे वात को समझने का प्रयत्न करती हैं। अनुभव, अनुभूति के द्वारा समझना होगा कि भगवान उनके माध्यम से यह काम करवाना चाहते हैं। इनका मन-प्राण ईश्वर के प्रति निवेदित है या नहीं, यह भी जांच लेना पड़ता है। माद चंगला-हिंदी में बहुत अच्छी बातचीत कर लेती है। किंतु सोसायटी में विविध भापा-भापी सिस्टरों और अदरों के काम की सुविधा के लिए अंग्रेजी जानना जरूरी है। भारतीय भाषाओं में आध्यात्मिक चेतना पाने की पुस्तकें हैं । लेकिन उनके अंग्रेजी में न रहो से सिस्टरों को अंग्रेजी में प्रकाशित बाहरी पुस्तके - मौ टेरेसा :: 97 पढनी पड़ती है। इसके बाद पौरोहित्य स्वीकृति पाने के लिए इन्हे छः महीने तक आध्यात्मिक जीवन का प्रारंभिक पाठ लेना पड़ता है। प्रारंभिक पाठ के बाद दो बरस धर्म-संप्रदाय के प्रशिक्षार्थी के रूप में रहना पड़ता है। इन्ही दिनों कष्ट- साधना चलती है। मिशनरीज ऑफ चैरिटीज़ के नियम व अनुशासन से भी सिस्टरो का परिचय कराना होता है। उसका कारण है कि सिस्टर अपने जीवन- मन-प्राण से जो काम करने चली हैं उनके उद्देश्यों के संबंध में सम्यक ज्ञान होना वाछनीय है। दरिद्रता को जीवन साथी चना लेना बहुत आसान काम नहीं है। गरीब को प्यार करने मे, गरीव को जानने के लिए, उनकी निकटता प्राप्त करने के लिए सिस्टरों को भी गरीब-जीवन का अभ्यस्त बनना पड़ेगा। प्यार का सब-कुछ यीशु के चरणकमलों में समर्पित है-इस पवित्रता की शपथ प्रत्येक सिस्टर ने ली है। मिशन के अनुशासन के अनुसार इन्होने और भी शपथें ली हैं। सब-कुछ उन (ईश्वर)की इच्छा है-इसी विश्वास पर जीवन का आदि और अंत आधारित है। एक चीज़ का और पालन करना होता है। और वह है अंत तक गरीयो की सेवा में प्राण दे देना । सब-कुछ दातव्य है । अर्थात धनियों के लिए ये कभी काम न कर सकेंगे। या काम के विनिमय में किसी से भी कोई कभी एक धेला भी न ले सकेगा। विना पैसे के इस सेवा और प्यार के पात्र गरीव लोग है। प्रश्न : ऐसा है तो आप सिस्टरों से बहुत प्रत्याशा करती हैं। बताइये, सही है या नहीं ? इन लड़कियों को ग़रीब-से-गरीब व्यक्ति की तरह जीवन विताना पड़ेगा। सिर्फ वही नहीं, जीवन की शक्ति, प्रेम-सब-कुछ इन्हे दरिद्रनारायण की सेवा में मिला देना होगा। मां टेरेसा : वे तो वहीं देना चाहती है। वे भगवान को सब-कुछ देकर प्राप्त करना चाहती हैं। वे अच्छी तरह से जानती हैं कि यीशु कभी नंगे, कभी भूने, कभी आश्रयहीन-तरह-तरह के वेश में हमारे सामने जाते हैं। हम तो इस तरह ही यीशु की सेवा करती हैं, प्यार करती हैं। सिस्टरें भी इसे अच्छी तरह समझती हैं। और इसीलिए वे खुश है। वे इतने दिनों तक जिस चीज को खोजती रही दी वह उनकी मुट्ठी मे आ जाने से वे भी प्रसन्न हैं। यह तो अनुभूति की ओर है। जबरदस्ती से या रुपये-पैसे से यह प्रसन्नता नहीं मिलती। यह नो हृदय के अन्न से आती है। प्रश्न : आपके आगे पहाड़ की तरह काम है, और बाप सीमित है। आपके या आपकी सिस्टरों के दगाव दिन्धान काम करना संभव है ? आप क्या कभी निम्माटि नईईट धारणा है कि इस तरह के बहुत बड़े काम की हिन्दर को लेना ही संभव है । उनका विधान हैटिन - .. ।
98 :: मां टेरेसा बहुतेरी मिस्टरों को इतने बड़े धर्म-यज्ञ में उतर पड़ना अवास्तविक बात है। इस संबंध में आपने क्या कुछ सोचा है ? मां टेरेसा : हम यदि काम को अपने धर्मचक्षुओं से देखें तो यही लगना स्वा- भाविक है कि हम कुछ भी नहीं कर सकेंगे। लेकिन इसको जैसे ही मात्र यीशु का काम समझ लिया तब फिर कोई वाधा बाधा नहीं लगेगी। और इसी कारण से यह काम करना संभव हुआ है । हम इस बात में निश्चित हैं कि वे (यीशु) ही हमसे काम करवा लेते हैं । गरीबों के लिए जो-कुछ होता है वह तो उन्हीं की इच्छा से पूरा होता है। प्रश्न : तो सारी अनुप्रेरणा के स्रोत वे ही हैं ? मां टेरेसा : हां, सब-कुछ यीशु के पास से आता है। प्रश्न : इसीलिए क्या प्रार्थना से आपके दिन का प्रारंभ होता है ? मां टेरेसा : हाँ । इसको छोड़कर हम कुछ नहीं कर सकते । यीशु की मूर्ति के आगे घुटने टेककर प्रार्थना करते समय हम गरीबों के दुख गौर कण्टों की तसवीर देख सकते हैं। सब-कुछ हमारे मानस-पटल पर तर जाता है। और वहाँ बैठकर हम अनुभव कर सकते हैं। यह दुख, काप्ट ही वृहत्तर प्रेम के राज्य में प्रवेश का वृहत्तर मार्ग है। प्रश्न : इस सबके पीछे है विश्वास । यह विश्वास ही आज दुनिया में दुर्लभ चीज है । लेकिन क्यों ? विश्वास हमारे जीवन से अन्तहित क्यों हुआ है ? माँ टेरेसा : विश्वास नामक चीज़ भगवान का दान है। इसके विना जीवन नहीं चल सकता । भगवान के प्रति निवेदित कामकाज तभी सार्थक होगा जब सव- कुछ गहरे विश्वास से उत्पन्न होगा। क्यों, यीशु ने ही तो कहा है, 'मैं क्षुधात हूँ, में रोगी हूँ, मैं नंगा हूँ और मैं वेघर हूँ-~-मुझको तुम ऐसा ही समझकर मेरी सेवा करो।" यह बातें याद करते हुए ही हमें राह तय करनी होगी। प्रश्न : विश्वास नामक चीज़ का अभाव वर्तमान जगत में अत्यंत भीपण दिखायी दे रहा है । इस विश्वास का हृदय में पोपण करने की कुंजी कहाँ है ? मां टेरेसा : इसका कारण है कि अधिकांश लोग स्वार्थपरता और व्यक्तिगत लाभालाभ लेकर ही अपने में मग्न हैं। प्रेम का अकुंठित प्रतिदान किये बिना विश्वास उत्पन्न नहीं होता। प्यार और विश्वास समानार्थक न होने पर भी इन दोनों की गति एक ही है । एक-दूसरे का परिपूरक है । प्रश्न : हम जो स्वार्थ में अंधे हैं वे इस पथ पर कैसे चलेंगे? अथवा किस प्रकार प्रेम के संसार में प्रवेश करना संभव है ? मां के कहने के अनुसार : लोगों के साथ मिलना-जुलना होगा। उनको समझना होगा। आदमी में ही भगवान मौजूद हैं। उसी सीमा के अंदर असीम' को तरह इस मनुप्य में ही सर्वशक्तिमान ईश्वर नये-नये रूपों में प्रकाशित हैं । हम मौ टेरेसा 99 यीशु को देश नहीं सकते, हम यपने प्यार को उन्हे प्रत्यक्ष रूप में जता नहीं सकते। किन्तु हम अपने पडोमियों को हमेशा देख सकते हैं। यीशु को देखकर हम जो कुछ करते, वही यो समझकर हम अपने पड़ोसी गरीव आदमियो के लिए कर सकते हैं। इस सेवा के काम में भी पग-पग पर विपत्ति को नाशका है। हमे सदा एक बात याद रखनी होगी-हम जो भी करें, सब उनके लिए। हर वस्ती में, पुरानी झोपड़ियों में, अनाहार में, अनादर में जो समय काट रहे हैं वे भी हमारी हो तरह सुस-दुस मे निर्मित मनुष्य हैं- इस बात को हम कभी न भूलें । गरीव की उपेक्षा फरने में अपने अहम् को प्रकट करने के सिवा और कोई बड़ी बात नहीं है। फिर अगर ये सब लोग गरीवो के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करें तो संसार का स्वरूप ही दूसरा हो जाये। मिशनरीज ऑफ़ चैरिटीज के भवन में एक दिन सवेरे गया था। मां उन दिनों अमरीका में थी। असिस्टेंट मदर-जनरल सिस्टर अग्नेस के साथ बहुत-से विषयी पर बातचीत कर रहा था। सवेरे के दस-साढे दस बजे होंगे। सहसा एक युवक आया । कुछ कहने के पहले ही युवक ने जेव से दो सौ-सौ के नोट निकाले । मिस्टर अग्नेम को दोनों नोट देते हुए युवक वोला, "आज मेरे बेटे का जन्म-दिन है । इम उपलक्ष मे दो-चार लोग घर पर खाना-पीना करते हैं। कुछ खर्च होता है। इम वर्ष कुछ न करके वह रुपये मां टेरेमा को देने की इच्छा हुई। इसीलिए यह सामान्य-सा दान लेकर मुझे आशीर्वाद दें।" मैंने मन-ही-मन सोचा, 'क्या हम अपने बेटे-बेटियों के जन्म-दिन का खर्च बचाकर उस रुपये को इस तरह दे सकेंगे? कितना ही मामूली क्यों न हो, इस दान का मूल्य ही अलग है।' सिस्टर अग्नेस बोली, "हर महीने दो रुपये का दान भी हम कृतज्ञता के साथ लेते हैं।" मा टेरेसा अधिक शब्दो मे कुछ कहने की पक्षपाती नहीं हैं। उनके निकट सबसे बड़ा है व्यक्ति रूप में आदमी। व्यक्ति को छोड़कर तो फिर समष्टि नहीं रहती। यह व्यक्ति का सबंध ही सबसे ऊपर है । बड़े-बड़े शहरो में सब व्यस्त हैं। चारों ओर प्रतियोगिता है। कभी-कभी यह तीव्र हो उठती है। बहुत लोग ताल मिलाकर नहीं चल सकते। कुछ लोग ठोकर खाकर अपने को संभाल लेते हैं । उठ खड़े होते हैं । प्रतियोगिता का सामना करते हैं। किन्तु जो गिर जाते हैं, उदकर खड़े नहीं हो सकते; इनको क्या कोई नहीं देखेगा? क्या ये प्यार से सदा के लिए वंचित रह जायेंगे? तभी तो मां ने कहा है, "यही तो हमारे प्यार के पात्र है। हम कितना कर पाते हैं ? जो कुछ करते हैं वह तो 'सागर में बूंद' का-सा है। लेकिन यह दूंद ही न होती तो समुद्र उस एक बूंद से वचित रह जाता।"
100 मां टेरेमा अभी तो हमने वस्तियों में बहुत से स्याल खोले हैं। कॉपी, किताव, फीस वगैरह कुछ भी छान-छात्राओं को नहीं देना पड़ता है। अभी यह प्रायगिक स्कूल न रहने पर कई हजार लड़का-लड़कियाँ रास्तों पर पड़े रहते । सड़क पर उन्हें न छोड़कर जैसे-तैसे स्कूल में पढ़ाई-लिखाई का मौका देना क्या अच्छा काम नहीं बत्तीस आचार्य जगदीश वसु रोड पर मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटीज के भवन के नीचे छोटे-से बैठक के कमरे में तीन बोर्ड टंगे हैं। एक में चार स्वीकृतियों की बातें लिखी हैं । ये यीशु ने दिखाये जीवन का अनुसरण करने के बारे में सोसायटी की स्वीका. रोशितयाँ हैं । चार स्वीकारोक्तियाँ हैं : दरिद्रता, पवित्रता, अनुसरण और दान । एक अन्य बोर्ड पर कई चिम हैं । यीशु के दिखाये मार्ग पर चलने में क्या-क्या आव- श्यक है, यही इन चियों में प्रदर्शित किया गया है । चित्रों में है हर बस्ती में काम में लगी सिस्टर । मुमूर्षु और परित्यक्त लोगों के बीच स्कूल में कुष्ठ रोगियों के बीच, चलती-फिरती डिस्पेंसरी में-~-ये सर्वत्यागी सिस्टरें यहां नहीं है ! चित्र के कपर और नीचे गा टेरेसा की अपनी प्रार्थना है, 'मेन अस वर्दी, लॉर्ड,टु सर्व अवर फ़ेलो मन भू आउट द वल्ड, ह लिव ऐंड डाई इन पावर्टी ऐंड हंगर। गिव देग अवर हैंड्रा दिस डे देयर डेली ग्रेड एंड बाई अवर अंडर-स्टैंडिंग लव, पीस ऐंड - , ज्वाय।" - . "दारिद्रय और क्षुधा के बीच ही जिनकी जीवन-मृत्यु है, पृथ्वी पर उन्हीं मनुष्यों की सेवा में जिस प्रकार हम आ सकें, उसीलिए हे ईश्वर, हमें समर्थ बना दो। हमें प्रेम, शांति और आनंद दो।" प्रत्येक सिस्टर को दरिद्र मनुष्य में देखना होगा; और यही बात सोचकर ही मनुष्य की सेवा करते चलना होगा। यीशु तो छपवेश में हमारे निकट इसी प्रकार प्रकट होते है। तीसरे बोर्ड में 1950 ई० में मां टेरेसा को बनायी सोसायटी के गठन से संबंधित विषय को स्थान मिला है। सोसायटी के उद्देश्यों के संबंध में लिखा है : 'टु वन्य द वस्ट ऑफ़ जीसस क्राइस्ट ऑन द क्रास फॉर लव सोलर बाई द सिस्टसं आम्जवेंस यॉफ़ फ़ोर बेज़ ऑफ़ पावर्टी, चेस्टिटी, ओवीडियस एंड चैरिटी।" उसी बोटं में भारत और भारत के बाहर किस-किस जगह मिशनरीज़ ऑफ चैरिटीज़ को शासाएं हैं, उस संबंध में भी लिखा है। किस तारीख को कौन- - मां टेरेसा :: 101 -- सो शाखा सुली, यह भी उस वोर्ड में है। भारत में मिशनरीज ऑफ चैरिटीज के अधीन 60 से ऊपर संस्थाएं हैं। उनमे 51 को चलाने की जिम्मेदारी सिस्टरों पर है। शेष दस-बारह की देखभाल वदर लोग करते हैं। स्कूलो की संख्या 81 है, 335 मोबाइल डिस्पेंसरी, 28 परिवार निर्धारण केंद्र हैं। वदर हैं 185। सिस्टर अग्नेस ने बताया कि चलते- फिरते क्लिनिक मे लगभग सोलह लाख रोगियों को चिकित्सा होती है । होम गे आजकल मुमूर्षु रोगियों की संख्या करीब दो हजार होगी। लिप्रसी क्लिनिकों में तेंतालीस हजार से कुछ अधिक रोगियों की चिकित्सा का प्रबंध है। मिशनरीज़ ऑफ चैरिटीज़ पर दो हजार परित्यक्त बच्चों के लालन-पालन की जिम्मेदारी है। इसके सिवाय प्रतिदिन भूसे और भूख से क्लेश पा रहे लोगों को खाना दिया जाता है । इनकी संख्या कई सौ होगी। तेंतीस सिस्टरों को सब तरह के लोगो की सेवा करनी पड़ती है । संक्रामक रोगों से लेकर कुष्ठ तक कुछ भी उनकी गूची में वाक़ी नहीं रहता है। एक सिस्टर बोली, "आस्ट्रेलिया मे हम आदिम जातियो और शराबियों तक में काम करते हैं। दवा पीते-पीते बहुतों मे दवाइयों के लिए भी दुर्बलता पैदा हो गयी है। जरा सोचकर देखिये, हमे इन सय जगहों में काम करने में 'ड्रिक्स' भी रखनी पडती हैं । इन लोगों के जीवन का रुख मोडने के लिए यह जरूरी है।" एक वृद्ध व्यक्ति ने शराव छोड़ देने का निश्चय किया। कई दिन तक उन्होने पाराय छुयी तक नहीं। किन्तु, एक दिन उन्ही वृद्ध ने सिस्टर को बुलाकर कहा, "सिस्टर, भाप मेरे साथ आइये । चार के बाहर इतजार कीजिये । मैं एक पेग गले के नीचे उतारकर आ रहा हूँ। एक पेग से अधिक किसी तरह न होगा। प्रतिमा कर रहा हूँ।" सचमुच, किसी आदमी को बचाने के लिए धीरज की जरूरत होती है। बंगाली लड़कियाँ वैसे भी शराब नहीं छूती, विन्तु सुदूर आस्ट्रेलिया जागर पे लडकियां आसानी से काम करती हैं। रोम मे सिस्टरवारकों में जाती हैं। वारक माने वस्ती। लदन में ये जिणी और दूसरे गरीबो की सेवा में लगी हैं। मदर ने किसी-किसी को समझाकर कहा है, "अफ्रीका में गरीब कहकर संबोधित नहीं किया जाता। 'गरीब' शब्द के बहुत-से अयं हैं। गरीय करार उन्हें अपना भाई, अपनी बहनें कहना क्या अच्छा नहीं लगता?" दुनिया के किसी 102 मा टेरेसा । भी देश में किसी भी स्तर के लोगों को भाई-बहन कहकर संबोधित किया जा सकता है । शायद यही सबसे मधुर संबोधन है। इसीलिए तो स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो में विश्व धर्मसभा में भापण के आरंभ में ही 'सिस्टर एंड ब्रदर्स ऑफ़ अमेरिका' कहकर उपस्थित श्रोताओं को संबोधित किया था। उस संबोधन की प्रतिक्रिया क्या हुई थी, यह किसी को अज्ञात नहीं है। पूरे हॉल के श्रोताओं ने जोरों से तालियां बजाकर स्वामीजी का स्वागत किया था। 1973 ई० में आई०सी० आई० (इंडिया) ने एक बड़ा-सा मकान मां को दान में दे दिया था। मकान में कंपनी की एक लेबोरेटरी बनने की बात थी। मां के निकट प्रेम के संसार में यह एक उदाहरण रहेगा और इसी कारण से मां ने इसका नामकरण 'प्रेमदान' किया अर्थात प्यार का दान। बड़े-बड़े हॉल-से कमरे, कॉरिडोर, ऑफ़िस-सब जगह अव माँ के स्नेह के संसार के आदमी भरे पड़े हैं। इस 'प्रेमदान' के फाटक में घुसने पर मां का बनाया हुआ एक पुनर्वास केन्द्र दिखायी देगा। इस केन्द्र में शहर के रास्तों पर से बीमार लड़के-लड़कियाँ डाभ के बोल बटोर लाकर सिस्टरों के पास जमा करते हैं। केवल एक लॉरी है। सियालदह के रैन-बसेरे में दो छप्पर वाले घर हैं । बड़े-बड़े मकान नहीं हैं । वहुत-से गाड़ी-घोड़े नहीं हैं । माडंवर, शोरगुल, प्रचार कुछ भी नहीं है। केवल सेवापरायण प्राणों की सहानुभूति, हृदय के अशेप प्रेम के पुण्य प्रयास में सामान्य सीमित विषयों की संपत्ति में ही यहाँ माता टेरेसा फेंके हुए डाभ के खोलों से समाज के परित्यक्त अनाथ बच्चों को पुनरुज्जीवित कर रही हैं। इन डाभ के खोलों से मां टेरेसा ने जीवन-धारण की संपत्ति खोज निकाली है । जो अनाथ बच्चा आज एक- सौ दाभ के खोल इकट्ठे कर ला देता है तो अनाथ जननी टेरेसा के रेन-बसेरे से एक वक्त की खुराक के बारे में वह निश्चित हो जाता है। इन खोलों से तिलजला में मां के 'प्रेमदान' केंद्र में बनते हैं जाजम, गद्दी के छोबड़े, दरी इत्यादि। पहली समस्या गाड़ी की है। हर बार जितने डाभ के खोल जमा होते हैं उन्हें उस 'प्रेमदान' केंद्र में भेजना संभव नहीं होता। उसका परिणाम होता है कि जिन तमाम अनाथ बच्चों को मां सियालदह, हावड़ा स्टेशन के प्लेटफॉर्म से, सड़क के फुटपाथों से, वरितयों के अंधकार से उठा लाकर स्वस्थ नागरिक के रूप में बनाना चाहती हैं यह संभव नहीं हो पा रहा है। मां ने बताया, "सियालदह के रनवसेरे में रात में वस्ती के रहने वालों और फुटपाथ पर रहने वालों को सोने की जगह मिलती है। दिन में बच्चों को एक मग दूध और एक टुकड़ा रोटी मिल पाता है। यहीं उनका अक्षर-परिचय-गानों में, तसवीरों में होता है। रोगी और अस्वस्थों के लिए डिस्पेंसरी है। पूरी दोपहरी और तीसरे पहर तक वे बच्चे सड़कों पर घूम-घूमकर टामों के खोल इकट्ठा कर लाते हैं। गिगालदह के चार नंबर के गेट के अंदर रैनबसेरे को उलटी तरफ़ फुट- + माटेरेसा :: 103 पाथ पर गिन-गिनकर अपने पिरामिड बनाते हैं। संध्या को उन जमा किये हुए हाभों के बदले में मिलता है एक सौ डाम पर एक पोंह को रोटी या सोलह विस्कुट । जिसे जो पसंद हो। सप्ताह में दो वार मिशनरीज ऑफ रिटीज की लारी इन पिरामिडों को जमा करने आती है। इन डाभों के खोलो पर, आशिक रूप मे ही सही पर, तिलजला के 'प्रेमदान' केंद्र के विकलाग तीन सौ लोगो की जीविका निर्भर करती है। कलकत्ता मे धनी लोगो को संख्या कम नहीं है। उनमे से कोई अगर दो-एक लॉरी देकर सहायता करें तो मां को उससे खुशी ही होगी। चौंतीस सियालदह स्टेशन बहुत बार गया हूं, किन्तु मा टेरेसा का यह रैनबसेरा कभी दिखायी नहीं पड़ा। आसपास दो छप्पर वालो कोठरियां हैं। उन पर ऐस्बेस्टोस की छाजन है । दीवार लाल ईंटों की है। यहां आने के पहले मिशनरीज ऑफ चैरिटीज़ के मुख्य दफ्तर में गया । उस समय मां वहां नहीं थी। सिस्टर अग्नेस थीं। सिस्टर अग्नेस ने एक पुर्जे पर मेरा परिचय लिखकर निशावास-रेनवसेरा–की सिस्टर फेबियन के पास भेज दिया। फेबियन से भेंट करने जाने पर देखता हूँ कि रैनबसेरे के सामने दुखियों की बड़ी भारी लाइन है । वहुतों की गोद में बच्चे थे। भीड हटाकर जाने पर पुर्जा सिस्टर फेवियन को दिया ! फासीसी लड़की फेबियन कुछ दिन पूर्व ही इस निशावास की जिम्मेदारी लेकर आयी हैं। प्रश्न करने के पहले ही पूरे चेहरे पर मुसकराहट फैलाती हुई वोली, "यू सी फॉर योर- मेल्फ । आस्क द सिस्टर ऑन ड्यूटी। नो प्रॉब्लम।" साफ फर्श पर स्लेट रखकर छोटे-छोटे लड़के-लड़कियां लिखने मे व्यस्त थे। एक कमरे में तीन-चार वच्चे करमयोर्ड खेल रहे थे। उन्नीस बरस की लडकी तीला दरवाजे के पास चुपचाप खड़ी थी। सिस्टर फेवियन के कहते ही मागे वह आयी। सिस्टर ने छोटे-छोटे लड़के-लड़कियों से परिचय करा दिया। अनिल, सुनील, अमर, समर, निमाई, ममता, आरती-नाम वडे सुदर थे। आठ-दम बरम की उम्र के लड़के-गड़कियां थे। पयादातर नंगे बदन थे। हाफ पट पहने । शरीर नगा रहने पर भी गर्द का कोई निशान न था। सिस्टरें रोज मोरे उन्हें माबुन- पानी गे नहलाती थो। किसी के वाप है तो मां नहीं है, किमी के मां है दो दार ।
104 मां टेरेसा - नहीं। कोई पूरे तौर पर अनाथ है। ठिकाना सबका सियालदह का प्लेटफ़ॉग या वर-बाजार सिन शेड को पाटपाथ थे। अचानका आठ-गो घरस के दो बच्चों ने गोई चीज लेवार छीना-झपटी शुरू कर दी। लड़की ने धीरे-धीरे आगर सिस्टर रो गाहा, "सिस्टर, दादा गुशे विस्गुट नहीं देता। लेकिन मैं कुछ मिलने पर दादा गती दिये बिना नहीं खाती।" सिस्टर ने लड़की को सिर पर हाथ रखकर कहा, "ये दोनों ही अनाम हैं। और रहते हैं भाई-बहन को तरह । इतना लगड़ा करते हैं। लेकिन दादा अगर रंगवसेरे में लौटने में रात कर दे तो लड़की मेरे पारा पूछने चली आती है कि दादा गयों नहीं लौटा।" पिछले तीन बरसों से रेनवरोरा चालू हुआ है। इसी बीन छात्र-छात्राओं की संख्या तीन सौ से अधिक हो गयी है। अधिकतर धर्म से मुसलमान हैं। इनके सिवा हिंदू, नीलिक ईसाई और प्रोटेस्टेंट हैं। सिस्टर लीला वय में युवती होने पर भी बातचीत और चितन में बहुत तेज है। शुद्ध बंगला में बोली, "देखिये, इन सब लहन-लड़गियों को हम आजकाल अ, आ, क, ख सिखा रहे हैं। यहाँ गलारा फ़ोर नया पढ़ाने के बाद उन्हें रास्ते के उरा और सेंट ऐन चर्च बैठावाने के पास प्रतिमा रोग स्कूल में भेज देना होगा। यहाँ आठवीं तक पढ़ाने का प्रबंध आप इनको अच्छा दे रहे हैं। जब पहले-पहल यहां आते हैं तो इन लड़गों के सारे बदन पर मिट्टी जमी रहती है। और जमी भी क्यों न रहे ? इन्हें मिलता गया है ? दोनों वक्त तो दूर, एक जून भी भरपेट खाने को नहीं मिलता। भूख से परेशान होकर भीड़-भरी ट्रेनों, ट्रॉमों या वसों में चढ़कर मौके के हिसाब से कोई- कोई गॉगेट मार देते हैं। पकड़े जाने पर फुटकर हिसाब से थप्पड़, ठोकर, धूरो गाकर अधमरे होकर लोटते हैं। कुछ दिन अलग रहने के बाद बदन का दर्द कम होते-ग-होते फिर माँ काली' गाहकर ये निष्पाप बच्चे निकल पड़ते हैं।" इरा रंगवरोरे में जो आगे उनमें से किसी-किसी ने ये बातें सिस्टरों के समक्ष निएल भाव से स्वीकार कर लीं। लेकिन रेनवरोरे में ठिकाना मिलने के बाद उनके जीवन में अकल्पनीय परिवर्तन हो जाता है। लड़का-लड़कियां ऐसे ही बड़े होकर गुंठे-बदमाश, गोर-गकार बनते हैं। मां ने सुद इसका जवाब दिया : 'नयों नव ? दोष किसका है ? इन निष्पाप बच्चों गा या समाज का ?' बच्चों का नंगा बदन देकर बहुत लोग शवानी दुरा प्रकट करते हैं। गिन्तु पया इन पांच सो वजों के लिए गागडे देने की सामध्यं किसी में नहीं है ? सिगालदाह पोर्ट के पी चार नम्बर फाटक पर सियालदह रटेशन के रेनवरोरे से निकालते समग बार-बार आगों के आगे नन्हें-नन्हें लड़के-लड़कियों के चेहरे तैरने लगे। गांत्वना की बात है कि नाम-रो-रग मां टेरेसा ने उनके गाने और रहने का प्रबंध कर दिया।
माटरसा 105 मनुष्य के कर्तव्य पूरा करने में सबसे पहला और मूल धन आंतरिकता ही है। इसके अभाव में सैकड़ो आयोजन और उपकरण बेकार हो जाते है। फिर आंतरिक स्नेह के उत्साह से मामूली और कम उपकरणो से भी मनुष्य बहुत-से अच्छे और बड़े-बड़े दृष्टांत स्थापित कर सकता है। चालीस बरस पहले वे इस देश में आयी थी। बिना प्रचार के, चुपचाप गरीबों को झोंपड़ियों में चक्कर लगाकर हजारों दिनों की अथक मेहनत से सोज लिया कि इस देश में यदि सबमे अधिक किसी चौउ का अभाव है तो वह है प्रेम । हममें कोई किसी को प्यार नहीं करता। हमें इस बात का पता पोर-पोर में लग रहा है। हमारे देश मे लखपतियों का अभाव नहीं है। कितनी योजनाएं, कितना खर्च होता है ! कितने सघ, समिति, मठ-मिशन इत्यादि हैं। कहना न होगा कि अधिकाश क्षेत्रो में उनका अवसर या पहुंच गरीबों के लिए संभव नहीं है। बड़े आदमियो का सहारा न होने पर आजकल कुछ सभव नहीं होता। आजकल सब-कुछ तयाकथित दूपित राजनीति के अंतर्गत है। ऐसे दिनों में, निराशा और अराजकता के घोर काले अंधेरे में मां टेरेसा मानो एक शुचिशुध्रा थेयसी उपा हो। भोर का प्रकाश बनकर उन्होंने दुख से भरे पीड़ित मनुष्यों को स्वस्थ जीवन का सुख और शांति प्रदान की है। इस प्रकार फुटपाथ के अनायों के लिए और किसी ने तो इतना कुछ नहीं किया। वे धन्य हैं ! इस युग को मूर्तिमयी ममता, मां टेरेसा महान हैं ! वे मानवता की साक्षात प्रतिमा हैं। शाश्वत मातृत्व के स्वत.-स्फूर्त शतदल हैं ! पैंतीस केवल सियालदह का रैनबसेरा, तिलजला का 'प्रेमदान' ही नहीं, हर अस्पताल मे जो परित्यक्त शिशु हैं, मां उन सबको ही गोद में उठा लेना चाहती है । इसके लिए सरकार से मां ने किसी प्रकार की सहायता की प्रार्थना नहीं की है, कोई मांग नहीं को है । अख़बार की यह खबर मानवीय ममता के अत्यत महान सकल्प और त्याग की घोषणा का प्रचार करती है । मा टेरेसा इस देश के जनजीवन के लिए, विशेषतः कलकत्तावासियों के लिए एक पुनीत नाम है। महान नारी की आशा, आदर्श, कर्मसाधना और व्यक्तित्व जैसे सेवा और ममता का एक अनंत निर्झर है। अनाप, दुखी लोगों के व्यथित जीवन की दीर्घ श्वास और वेदना की ध्वनि पाते ही यह महान नारी वहां पहुंच जाती हैं। उनकी सेवा के स्पर्श से ही पीड़ितों की पीड़ा कम हो जाती है। यह है मानवता की दुसमय कीचड़ में फंसे लोगों के उद्धार का महान प्रत । समाचार को कल्पना में चित्रित करने पर यह दृश्य दिखायी पड़ेगा 106 माटेरेसा कि महान मां टेरेसा दोनों हाथ फैलाकर सहस्राधिक शिशुओं को गोद में उठा रही । परित्यक्त और उपेक्षित बच्चे हर देश के सभ्य जनजीवन का एक दृश्य होते हैं। जब तक इस समस्या और इन निंदनीय जटिलताओं का अंत नहीं होता तव तक समाज के कोनों में अनाथ बच्चों का रोना सुनना पड़ेगा। यह विपन्न और असहाय मानवता का करुण कंदन ही तो है ! और सभ्य समाज ऐसे अनाथ बच्चों को पालने के दायित्व को अस्वीकार नहीं कर सकता। किन्तु, परित्यक्त शिशुओं की रक्षा और पालने के लिए सभ्य समाज के आचरण में आंतरिक ममता के अभाव के कारण समस्या वीच-बीच में और भी निर्मम हो जाती है। परित्यक्त शिशु देखभाल और रक्षा के अभाव में अकाल- मृत्यु का शिकार हो जाते हैं । पश्चिमी बंगाल, और विशेष रूप से कलकत्ता शहर का जनजीवन इस बात से आशान्वित और निश्चित होगा कि मां टेरेसा ने जव भार लिया है तो अनाथ बच्चों का रोना रुक जायेगा। शिशुमात्र ही मां की सेवा और ममता का स्वाद पाना चाहते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि मां टेरेसा का संघ मातृत्वमय ममता के आचरण में आदर्श रूप में अभ्यस्त है। आश्चर्य की बात है कि महान मां टेरेसा ने इतना विशाल दायित्व लेने पर भी आर्थिक आवश्यकता का कोई प्रश्न नहीं उठाया। यह समझना होगा कि मां टेरेसा का विश्वास है कि महान कामों को आवश्यकता में धन का अभाव नहीं होता। यह सेवक और सेविकाओं के ईश्वरपरायण जीवन का एक विश्वास है। हम भी देखते आये हैं कि मां टेरेसा ने अप्रतिहत उत्साह से सब तरह की सेवाओं को मार्तव्य स्वीकार किया है। पंगु, असमर्थ, अनाथ और रोगियों के प्राण अपने निर्मल हृदय की ममता पर आश्रित हैं। आर्थिक सामर्थ्य का प्रश्न रहने पर भी वह उनकी सेवा और ममता की प्रेरणा को कम नहीं कर सका। रवीन्द्रनाथ की कविता में दुभिक्ष-पीड़ित धावस्तीपुर की जनसेवा का भार ग्रहण किया था अनाथ पिडों की कन्या सुप्रिया ने । 'केवल यह भिक्षापात्र है'---इतना ही संबल लेकर भूखों के लिए अन्नदान करने का भार ग्रहण किया था। महान अभीष्ट में लगता है कि यह स्वीकृति निहित होती है कि धनाभाव किसी समस्या के समाधान में वाघा नहीं बनता। आधुनिक समय में मां टेरेसा इस नैतिक सत्य की साक्षात प्रतीक हैं। छत्तीस यह बहुत समय पहले की बात है। उन दिनों गौतम बुद्ध जीवित थे। राजगिरि के भी टेरेसा :: 107 निकट एक स्थान से तीन युवक शहर से दूर एक जंगल के पास चले गये। उनका अभिप्राय था कि सारा दिन बिताकर रात को घर लौटें। तीनो युवको के साप शहर की एक नामी वैश्या भी थी। तीन युवकों में दो विवाहित थे। इसीलिए उनकी पलियां भी साथ थी। तीसरा युवक अविवाहित था। उसने वेश्या को ही पत्नी के रूप मे समझ लिया। शाम होते ही देखा गया कि सब नशे में धुत थे। भद महिलाएं भी बची न रहीं। लेकिन वेश्या यह अच्छा मौका देखकर नशे में धुत महिलाओ के कीमती गहने-पत्त र लेकर भाग गयी। नशा कुछ कम होने पर सबको होश आया। उन्होंने देखा कि उनके गहने- पत्तर कुछ भी नही हैं । वह वेश्या भी कही दिखायी न पड़ी। कुछ दूर पर पेड़ के नीचे एक संन्यासी को बैठे देखकर वे उघर गये। उन्होंने सन्यासी से कहा, "इस रास्ते से किसी रमणो को जाते देखा है?" सन्यासी-वेश में गौतम बुद्ध ने सब सुनकर कहा, "आप लोगो की सारी बात समझी । आप भले घर की सतान हैं । शिक्षित भी हैं। जरा अच्छी तरह सोचकर देखिये कि कौन चीज फ्यादा अच्छी है ? उस औरत की तलाश या अपने को खोजना?" बुद्ध से यह बात सुनकर उनका मन परिवर्तित हुआ। यहाँ कहानी को उद्धृत करने के पीछे अपने को खोजने का प्रमग है । मां टेरेसा के साथ एक बार बात करने या उनके काम की ओर एक धार नजर पड़ते ही मन में तरह-तरह के प्रश्न उठते हैं। अपने सवध मे बिना इन कामों में किसी तरह भी सम्मिलित होना संभव नहीं है। इस अपने को जानने में ही तो सब कामो की शुरुआत है। तभी तो हम कालीघाट के निर्मल हृदय' में देश-विदेश के युवक-युवतियों को देखते हैं । अपने मन से वे इस सेवा के काम को चुन लेते हैं । कुछ दिन सेवा कर फिर अपने देश को लौट जाते हैं। सिस्टर-बदर हमेशा काम करते हों, ऐसी बात नहीं है। बहुतेरे मां टेरेसा के काम की बात सुनकर खुद ही आगे आ जाते हैं। अमरीका के एक डॉक्टर के साथ एक साक्षात्कार में मां बोली, "जो अपनी इच्छा से आना चाहे, उन्हे हम कभी नही रोकते। कनाडा से एक लडका केवल दो दिनों के लिए घूमने आया था। उसकी उम्र चौबीस-पच्चीस बरस होगी। एक महीना बीत जाने पर भी लडके ने स्वदेश लौटने की बात नहीं कही। उसका कारण या कि यहां का काम उसे बहुत अच्छा लगा था। पिछले इतवार को टालीगंज की बंगाली पत्नी अपने एडवोकेट पति (भट्टाचार्य) को लेकर यहाँ के रहने वालों को खिला गये । इस तरह के बहुत-से लोग आते हैं। "ईश्वर ने जिन्हे सद्बुद्धि दी है उन्हें कैसे रोका जा सकता है ? कुछ जाने 108 मा टेरेसा - । "डॉक्टर, तुम्हारे जैसे आदमी को हमें बहुत जरूरत है। तुम आदमियों से प्यार करते हो, और डॉगटरी भी जानते हो। ये दो गुण सदा हमारे काम में आते है। फ्रांस से एक डॉक्टर यहां पांच महीने काम कर गये थे। तुम छुट्टी पाते ही यहाँ चले आना। सिर्फ यहीं नहीं, भारत के बाहर लंदन-अमरीका में भी इस तरह की जगहें हैं।" अमरीका के एक चिकित्सक सज्जन ने जानना चाहा कि उन सब जगहों में एक ही पाम होता है या नहीं? मां बोली, "काम बिलकुल एक ही ढंग का होता है। गरीव रागी जगह हैं, यही न? हां, समस्या में अंतर है। यहां लोग खाने की चीजों के कारण भूसे हैं। पश्चिम में इस तरह की जरूरत कम है। वहां के लोग इंसान के साथ, अंतरंगता, प्यार के लिए कंगाल हैं। अकेलापन तुम्हारे देश में अभिशाप है। हम लोगों का अभाव पार्थिव है, तुम्हारा मानसिक । इन दो दरिद्रताओं का स्वरूप भिन्न है, किंतु उनकी समस्याएँ एकसमान तीन हैं। उलटे तुम लोगों का समाधान बहुत अधिक कप्टसाध्य है। यहां कोई भूखा है, उसके आगे खाने की थाली रख देने से समस्या का समाधान हो गया। लेकिन उन देशों के लोगों की भूख-मनुष्य के प्रेम के अमाय से उत्पन्न है। इसके लिए एक थाली-भर खाना रखने के समान क्या थाली- भर प्यार रखा जा सकता है ? इसीलिए यह समस्या अधिक गंभीर है। उसका समाधान भी कठिन है। मेलबोर्न में नशे में चूर और संस्कारहीन लोगों के लिए काम करगे हमारी सिस्टरों ने अच्छा फल पाया । अस्पताल के नियमों के अनुसार चिकित्सा में इन योगों में बड़ा काम नहीं होता। इसके लिए जरूरत है हृदय की- जो इनको मन को स्पर्श गार राके। उस देश में एक रोगी ने मुझसे कहा था कि उसे अपने मित्र के व्यवहार से बहुत बड़ा आपात लगा है। एक दिन उसी मित्र के साथ यह किसी जगह घूम रहा था। कुछ दूर जाकर दोस्त को छोड़ तेज फ़दमों से आगे चला गया। दोस्त ने फिर उसके पास आना न चाहा। यह बात सोचकर उसे अजीब-सा लगा। किंतु हमने मन की इस सूक्ष्म दिशा की वात एक बार भी सोच- पर नहीं देखी। हृदय की ओर से जो भूरो हैं, उनकी भूख मिटाना बहुत कठिन है। "लेकिन यहाँ हमारे देश के इन सब रोगी लोगों को देखो। जीवन के हर क्षेत्र में वंचित रहगार भी कोई शिकायत नहीं है। अन्न नहीं, वस्त्र नहीं, लेकिन उसके लिए अफसोरा भी नहीं है । इन लोगों ने राव-कुछ भाग्य गो मान लिया है, मानो यही उनकी अवश्यंभावी परिणति है। लेकिन ऐसा तो नहीं है। राहनशीलता असामान्य है और इसी में उनकी महानता है। पाश्चात्य देशों में इस चीज की बड़ी कमी है। उनमें संतोष नहीं है, और इसीलिए दुख बहुत तीन लगता है। हमारी तरह घे भासानी से नहीं मान सकते, इसीलिए पश्चिम से लोगों को शांति नहीं मिलती। किंतु इस देश में अकिंचन लोगों के आगे एक थाली भात रखने से ही काम चल मा टेरेमा :: 109 जाता है। सारा अभाव क्षण भर में दूर हो जाता है। कुछ दिनों पहले यहाँ एक लड़को आयी थी। वह बहुत दिनों मे भूसी थी। हमारे थाली-भर खाना उसके आगे रखने पर लड़की कुछ देर तक थाली को और देखती रही । उमने बहुत दिनों मे भात की सूरत भी नहीं देखी थी। लड़को मर गयी। लेकिन मरने के पहले उसने कोई शिकायत नहीं की, कोई विरोध नहीं किया, किसी को दोप नहीं दिया। केवल चुपचाप देखते-देसते आखिरी सांस छोड़ दी। लेकिन वह विसर्जन भी निःशब्द था। जैसे चुपचाप कही चली गयी हो, सोचा ही नहीं जा सकता। कैसा महान है यह जीवन ! इन सामान्य लोगों में कितनी असाधारणता छिपी हुई है उसे हम इस तरह की घटना से ही समझ सकते हैं। "मुझे खुद तो नहीं लगता कि मैं उन लोगों की तरह सहज, सरल हो सकूँगी, प्रतिवादहीन, अभियोगहीन, स्वच्छंद हो सकूँगी।" अमरीका के चिकित्सक डॉ० स्टेन्च वोले, "मैं अमरीका के बहुत-से अस्पतालों में काम करता हूँ। उम देश के गरीबों में भी काम करता हूं, लेकिन ऐसा कहीं नहीं देखा। समय और सुयोग पाने पर यहां आऊँगा। काम करूंगा। यहां दो चीजें हृदय को आकर्षित करती हैं। पहली, रोगियो के प्रति जो प्रेम की जानकारी मिल रही है उसे अमरीका के अस्पतालो में नहीं देखा। दूसरे, यहाँ जिस तरह का मामूली सामान है, जिन दवाइयों और औजारों से काम हो रहा है, अमरीका के अस्पतालो से वह बहुत भिन्न हैं। वहाँ नयी-नयी दवाइयां और सामान हमेशा मौजूद रहते हैं। लेकिन इन मामूली सामानों से भी जो बहुत बड़ा काम किया जाता है वह यहाँ आकर ही समझा जा सकता है।" सेंतीस हममे मे बहुतो की धारणा है कि मनुष्य निस्पृह, सहानुभूतिहीन, विवेकहीन, शीतल जीवों में परिणत हो रहा है। किंतु मो उस पर बिलकुल विश्वास नहीं करती। यह बहुत गलत धारणा है । इसके विपरीत मनुप्य अब बहुत अधिक सचेतन, विवेचक, सहानुभूतिशील है। प्रतिदिन ही मां के निकट लोग आते हैं, और सहायता करते हैं। यह माना पहले की तुलना में बहुत-बहुत बढ़ गया है। बढ़ता ही जा रहा है। कुछ वरम पहले ही इस कलकत्ता में सड़क के किनारे एक आदमी को पड़े देखकर लोग न देखने का बहाना करके कुछ न कर, चले जाते। लेकिन अब ऐसा बिलकुल नहीं होता। होता यह है कि रास्ते के आदमी ही उमका कोई प्रबंध करते हैं, नहीं तो वे 'मिशनरीज ऑफ चैरिटीज' को बता देते हैं। अर्यात कुछ-न-कुछ उपकार 110 माटेरेसा किया जा रहा है । यह क्या महान नहीं है ? असल बाधा दूसरी है। किसी-न-किसी परंपरागत दुर्दशा में लोग फंसते जा रहे हैं। सूखा, अकाल, बाढ़, दुर्भिक्ष आदि तो लगे ही रहते हैं। यह मनुष्य को अवस्था को अवनति की मोर लिये जा रहे हैं, हम अपने पैरों को अवनति की ओर लिये जा रहे हैं, ये हमें अपने पैरों पर खड़ा नहीं रहने देते। भारत के संयुक्त परिवारों के टूटने से मां को बहुत कप्ट है। मां का कहना है, "आज पूरी दुनिया में संयुक्त वातों का बहुत प्रचलन हो गया है। किंतु भारत में संयुक्त परिवार के समान आदर्श 'समवाय' और क्या हो सकता है ! किंतु वहीं संयुक्त परिवार निश्चिह्न होता जा रहा है। इसीलिए पश्चिम के अनुकरण पर यहां भी परिवार के नाम पर पति-पत्नी और उनकी एक या दो संतानें होती हैं। कुछ समय पहले यह अवस्या नहीं थी। भारतीय सामाजिक जीवन को स्वस्थ और बलवान बनाने के लिए फिर उसी संयुक्त परिवार की ओर लौटकर जाना पड़ेगा। "यह बात मानने की नहीं है कि जगह की कमी के कारण बहुतों को अलग रहना पड़ता है । अलग रहने के ठिकाने के साथ-साथ उनके जीवन भी मानो अलग- अलग हो जाते हैं। बूढ़े मां-बाप, छोटे-छोटे भाई-बहनों की वात वे भूल जाते हैं। यह सचमुच बहुत कष्टकर है।" दुःस्वप्नों की नगरी, जुलूसों की नगरी -कलकत्ता को किन्हीं भी विशेषणों से क्यों न विभूपित किया जाये, कलकत्ता कलकत्ता ही है। सोचकर ताज्जुब होता है कि इस शहर में ही मां टेरेसा का प्रधान कर्म-क्षेत्र है। उसके सिवा एक और गोरी सिस्टर निवेदिता ने भी पहले कलकत्ता और बाद में पूरे भारत को प्रेम किया था। एक का जन्मस्थान यूगोस्लाविया, दूसरी का जन्मस्थान आयरलैंड था। मां टेरेसा को भी कलकत्ता आने के पहले आयरलैंड में लोरेटो अवे में जाना पड़ा था। दोनों ही अध्यापिकाएं थीं। बाद में वे सेविका-मातृत्वमय ममता की प्रतीक वनीं। दोनों ने ही कलकत्ता में विद्यालय की स्थापना के माध्यम से अपना कार्य आरंभ किया। सिस्टर निवेदिता का विद्यालय था वाग़वाज़ार के पिछड़े गांव में, जो आज 'निवेदिता स्कूल' के नाम से अधिक प्रसिद्ध है। और मां टेरेसा ने अपना पहला विद्यालय स्थापित किया वस्तियों में । अर्थात केवल सेवा नहीं, निरक्षर को अक्षरज्ञान करा देना भी इन दोनों के जीवन का अन्यतम उद्देश्य था। इस सेवा के लिए शक्ति की भी जरूरत है। तभी तो मां ने कहा है, "हम ईश्वर को पाना चाहते हैं। चारों ओर शोर- शरावे से भरे परिवेश में उन्हें देख सकना मुश्किल है। भगवान निस्तब्धता- नीरवता में रहते हैं। प्रकृति की ओर दृष्टि डालकर देखो- वृक्ष, पुष्प, पूर्वादल नीरवता में ही जन्म लेते हैं। आकाश की ओर आँखें करो। वहाँ भी देखोगे कि चन्द्र, मूर्य, ग्रह भोर तारों का चलना भी नीरवता में है। वस्तियों में गरीब-से-गरीब मा टेरेसा : 111 व्यक्ति के निकट भगवान के अस्तित्व की बात बता दैना क्या हमारे जीवन का लक्ष्य नहीं है ? वह भगवान मुर्दा नही, प्राणवन्त है, भगवान प्रेम के माधार हैं।" देना चाहते हो, कहने भर से तो दिया नहीं जाता! नीरव प्रार्थना से हम जितना उनके पास पहुंच सकेंगे, कर्ममय जीवन में हम उतना ही पाने के अधिकारी होगे। आत्मा के साथ एकत्व के लिए ही नीरवता आवश्यक है । हम कहते क्या हैं वही तो असली चीज नहीं है। किंतु भगवान हममे हैं और हमसे कहलाते हैं। सुदर-सुंदर शब्दों को सजा कर हम कुछ भी क्यो न वोलें वह सब व्यर्थता में समाप्त हो जायेगा, यदि वह हृदय के अंतस्तल से उच्चरित नहीं होता है। जिन वातो मे यीशु का प्रकाश नहीं फैला है वे अंधकार को ही बढाती हैं। कुष्ठ रोग की चिकित्सा के क्लिनिकों में 43 हजार रोगियों को चिकित्सा हो रही है। शिशु-भवनों में दो हजार बच्चे हैं। किसी को नहीं पता कि अभी तक 'मिशनरीज ऑफ़ चैरिटीज़' के दान से कितने लाख क्षुधात्तं लोगों के अन्न का प्रबंध हुआ ! क्रमपूर्वक बढती हुई इस संस्था का हिसाब ही कौन रखे ! मां तो अन्नपूर्णा हैं। किमी मुमू के आने पर तो मां उसे लौटा नहीं सकती। चलती-फिरती डिस्पेंसरियो से 16,00,000 रोगियों को चिकित्सा का लाभ पहुंचा है। विभिन्न भवनों में रहने वाली मुमूर्षु व्यक्तियो की संख्या दो हजार होगी। सबमे वाद को गणना के अनुसार देखा गया कि 'मिशनरोज ऑफ चैरिटीज' में 135 सिस्टर और 185 बदर हैं। काम की मान्यता के अनुसार मा टेरेसा 1962 मे 'पद्मश्री' से विभूपित हुई। उसी वर्ष उन्हें फ़िलिपाइन्स का रेमन मैगमेसे पुरस्कार मिला। इसके नौ वर्ष बाद 1971 ई० मे द पोप जॉन तेरहवें का शाति पुरस्कार, द गुड समरिटन पुरस्कार, और जॉन ऑफ केनेडी इटरनेशनल पुरस्कार-यह तीनो मां के भाग्य से प्राप्त हुए। बाद में सन् 1972 मे जवाहर लाल नेहरू पुरस्कार पाया। 1974 मे मंटरेट मैस्ट्रो पुरस्कार मिला। 1975 ई० मे एफ० ए० बी० के सिरेस पदक के एक ओर माँ का चित्र और दूसरी ओर एक कमजोर बच्चे को पामे हुए हाय हैं। 1975 ई० में अंतर्राष्ट्रीय नारी वर्ष मे नोवेल प्राइज के लिए भी मां का नाम आया था। किंतु यह पुरस्कार उन्हें 1979 मे मिला। रुपयों की संख्या मे ये पुरस्कार कुल मिलाकर करोडो न हो, लाखो तो जरूर ही होगे । इम धन-प्राप्ति के मूल में है मानव-सेवा का आदर्श। उसी सेवा के काम मे पुरस्कारो का सारा धन खर्च हुआ है। रवीन्द्रनाथ के नोवेल प्राइज के धन की बात अलग रखने पर भारत मे कवि, साहित्यिक, दार्शनिक, राजनीतिक ऐसा कोई न मिलेगा जिसने स्वेच्छा से परसेवा में पुरस्कार का सारा धन दान कर दिया हो। मां की बात के अनुसार, "यह पुरस्कार मेरा नहीं है, यह विश्व के 112 :: मां टेरेसा मानवता के पुजारियों का है।" धन ? धन के लिए मां को अब हाय नहीं फैलाना पड़ता। असली धन जिसकी मुट्ठी में आ गया उसे क्या गड्डी-के-गड्डी नोटों के लिए परेशान होना पड़ेगा? धन मिल जाता है और यह धन ही कुछ अनर्थ न उत्पन्न करे, उस ओर भी मां की बहुत ही सतर्क दृष्टि है। सिस्टरें जिससे अपने कठिन जीवन में ज़रा भी न डग- मगायें, उस ओर भी सदैव नज़र रखनी पड़ती है। किसी मुमूर्षु या अवांछित व्यक्ति को 'निर्मल हृदय' में जो खाने को दिया जाता है वही खाना सिस्टर-बदर भी खाते हैं। रहने की जगह में भी बहुत अंतर नहीं है। कपड़े-लत्ते भी मामूली रहते हैं । आनंद और अटूट विश्वास के सिवा उनकी और कोई पूंजी नहीं है। क्या काम कर रहे हैं और उसका परिमाण कितना है-इसे लेकर सोच- विचार करने से कोई फायदा नहीं। तभी तो माँ कहती हैं, "इट इज नॉट हाउ मच वी आर डूइंग बट हाउ मच मॉनेस्टी, हाउ मच फ़ेय इज पुट इनटु डूइंग इट।" यह मन, यह विश्वास जिनमें है वे ही कह सकते हैं, 'दारिद्रय ही हमारी प्रतिज्ञा है।' भारतीय, विशेष रूप से बंगाली, लड़कियां सामान्यतः घर-गृहस्थी में रहने की ही अभ्यस्त होती हैं। किन्तु इन सिस्टरों में जब बंगाली (ईसाई ही हों) लड़- कियों को देखता हूँ तो सचमुच अच्छा लगता है। नशे में धुत, पंगु, अवांछित, रोगी लोगों के पास बैठकर ये निरंतर सेवा करती रहती हैं। सेवा के संसार में 'न' के लिए कोई स्थान नहीं है। 'निर्मल हृदय' की उस महिला की बात बहुत दिनों तक याद रहेगी। मुमूर्षु महिला मां को देखकर बोली, "मेरा जीवन सार्थक है। मां मेरी स्वयं भगवती हैं।" मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटीज़' के एक साथी बोले, "मां सचमुच पवित्र हैं । वे साधु हैं । मैं कहता हूँ कि वे जीती-जागती साधु हैं।" एक डॉक्टर बोले, "इस सबके पीछे भगवान का हाथ है।" चाहे जिस भाव से देखिये, मां मां हैं। मां सबको प्यार करती हैं। और उनमें जो संतान कमजोर होती हैं उनके प्रति उसका आकर्षण अधिक रहता है । हमारी मां टेरेसा भी अपवाद नहीं हैं। मां जिस तरह सबके लिए अनंत प्यार देती हैं उसी तरह वे खुद भी प्यार के लिए कंगाल हैं। मां के जीवन में बड़े-बड़े लेख, सुन्दर-सुन्दर शब्द-चयन से समृद्ध भापण या किसी पुस्तक की रचना- इनमें से कुछ भी नहीं है। उनका सब-कुछ छोटा है। हृदय बड़ा है। छुटपन में स्कपने शहर में एक दिन रात की वह घटना अब तक उनके मन में है। रात के वक्त तीन भाई-बहन पढ़ने के कमरे में बैठे स्कूल की एक अध्यापिका की नमालोचना कर रहे थे। मां टेरेसा की मां ने साथ के कमरे से वत्ती बुझा दी । बोली, "औरों की समालोचना के लिए तो मैं अपने घर की रोशनी की चर्यादी नहीं कर सकती।" तभी से मां वातों की अपेक्षा काम से ही अपने को प्रकट करने की पक्षपाती हैं। -
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114 :: मां टेरेसा - आनन्द ही प्रार्थना है-आनन्द ही शक्ति है-आनन्द ही प्रेम है-प्यार के जाल-सा यह आनन्द ही आत्मा को पकड़ सकता है। जो आनन्द के साथ यथाशक्ति दे सके वही भगवान के प्यार का अधिकारी है। जो प्रसन्न मन से दान करता है वही तो सबसे बड़ा दानी है। भगवान के निकट, मनुष्य के निकट कृतज्ञता प्रकट करने का उत्तम मार्ग है-सब-कुछ हंसते हुए स्वीकार कर लेना, प्यार के सिवा भगवान का साथ पाना किसी प्रकार संभव नहीं है। इसलिए भगवान को स्वर्ग की ओर न देखकर इसी पृथ्वी पर-मर्त्य में प्यार के द्वारा उसे पा सकते हैं। इसके लिये आवश्यक है कि हमें- जिस प्रकार वे प्यार करते हैं उसी प्रकार प्यार करना होगा, जिस प्रकार वे सहायता करते हैं उसी प्रकार सहायता करनी होगी, जिस प्रकार वे देते हैं उसी प्रकार देना होगा, जिस प्रकार वे सेवा करते हैं उसी प्रकार सेवा करनी होगी, जिस प्रकार वे उद्धार करते हैं उसी प्रकार उद्धार करना होगा, सोने में, सपने में, सदा ही उनका स्मरण करना होगा, उनके साथ रहना होगा, छद्मवेशी, दुखी के रूप में ही उनका स्पर्श पाना होगा। दयालु और क्षमाशील बनना होगा। जो तुम्हारे पास एक बार आये वह लौटते समय और भी अधिक प्रसन्न होकर लौटे। दयालु भगवान की प्रतिमूर्ति मानो सदा ही तुम्हारे हृदय में, मन में प्रकाशित होती रहती हो । मुखाकृति में वही दया होगी । दया आँखों से प्रकाशित होगी, मुसकराहट में और आदर सहित तुम्हारी बोलचाल में व्यक्त होगी। बस्तियों में हम ही दरिद्रतम लोगों के निकट भगवान की दया के प्रकाश के समान होंगे। शिशु, दरिद्र जो तरह-तरह से कष्ट और दुख भोग रहे हैं उन्हें हार्दिक प्रेम की आवश्यकता है। मां ने अपने सहकर्मियों को एक चिट्ठी में लिखा था, "यीशु समझकर सबकी सेवा कर सकने पर ही विश्व में शांति के द्वार खुलेंगे। यीशु ने स्वयं ही तो कहा हृदय से। , मैं क्षुधात हूँ-केवल भोजन के लिए ही नहीं, शांति के लिए भी किन्तु वह शांति आयेगी पविम मैं प्यास से व्याकुल हूँ-पेय ही नहीं, युद्ध की तृष्णा जिससे मिटे, वह शांति, परिपूर्ण शांति ही मुझे काम्य है। मैं वस्त्रहीन हूँ-वस्त्रों की कमी से नहीं, नर और नारी के असम्मान के कारण। मैं वैघर हूँ-ईट-पत्थर के बने आश्रय के अभाव में नहीं, उस हृदय के अभाव में जो प्यार बांट सके। - मा टेरेसा 115 "क्षमता के लोभ को त्यागकर सवको प्यार करके ही भगवान को पाया जा सकता है। "घृणा, द्वेष, हिंसा के हाथों से मुक्ति पाने का एकमात्र हथियार प्रेम है। मुसकराते हुए सब काम करते रहने में ही जीवन का माधुयं निहित है । इस माधुर्य का स्वाद जिसे एक बार मिल गया उसे और सव-कुछ छाया समान ही लगेगा। इच्छा करने और पाने की अंतिम सीमा पर खडे होकर केवल यह प्रेम वाट सकना ही जीवन की सार्थकता है।" बचपन के उन दिनो की बातें मां के मन मे आज भी गुंथी हुई हैं । उस समय मां मां नही हुई थी। अग्नेस गोनाक्सा वेजाक्सिउ (Agnes Gonaxha Bejaxhiu) की उम्र उस समय मात्र वारह वरस थी। इस उम्र में ही वैज्ञाक्सिउ के मन में यह विश्वास न हुआ कि वह संन्यासिनी बनेगी। दो वरस बाद उसकी पुकार हुई। सिस्टर ऑफ लोरेटो के काम में सम्मिलित होकर उसे कहां जाना पडेगा, यह उन्होंने झट-से समझ लिया। हां, उन्हें भारत जाना होगा। उन्हें जीवन का शेष भाग वही विताना पड़ेगा । ईश्वर के काम के लिए उस युवती ने प्रसन्नता से अपने को समर्पित कर दिया। हजारों संन्यासिनी इसके पहले भारत आ चुकी थी। पहले मां भी उनका अपवाद न थी। भारत की धरती पर पर रखते ही उन्हें दाजिलिंग जाना पड़ा। वहाँ लोरेटो कॉन्वेंट में पढाने का दायित्व उन पर आया। ब्रिटिश राज्य के समय दाजिलिंग गर्मियों में गवर्नर के अवकाश का स्थान था। हिमालय का सौंदर्य, माल पर टहलना, जिमखाना क्लब में नाच के बाद रात्रिभोज-यही सव ब्रिटिश लोगो के लिए आकर्षण की चीजें थी। कंचनजंघा का शुध्र समुज्ज्वल रूप देखने के लिए इस शैलशिखर पर आना होगा। सिक्किम-भूटान की पंक्ति-की-पंक्ति पर्वतमालाएं तो इसके चारों ओर हैं। दार्जिलिंग में ब्रिटिश लोगो का एक शिक्षा- । केन्द्र था। युवती संन्यासिनी ने 1931 ई० को 24वी मई को शपथ ली। दाजिलिंग से मां चली गयी कलकत्ता। कलकत्ता और दाजिलिंग में कोई तुलना ही नही है । दार्जिलिंग के साथ मां की जन्मभूमि यूगोस्लाविया के ग्रामांचल की कुछ समानता है। कलकत्ता में लोरेटो कॉन्वेंट में आयो। सियालदह स्टेशन के पीछे इस कॉन्वेंट के चारों ओर जनाकीर्ण वस्ती है। निकट ही कारखाना है। चिमनी के धुएँ के सिवा कुछ दिखायी नही पड़ता । पास ही आदमियों के बनाये हुए छोटे-बड़े-मझोले पहाडो को तरह ढेर-के-ढेर कूड़े हैं। हवा में चमडे को गघ उडकर आती। कुछ गजों के अंदर ही चमडे का कारखाना था। लेकिन दीवारों से घिरे कॉन्वेंट के अंदर का हरा-भरा उद्यान बहुत ही मनोरम है । बहुत बड़े मरुस्थल में वह मरुद्यान 116 माटेरेसा । की तरह है। इंटाली लोरेटो की अधिकांश लड़कियां पितृ-मातृहीन अथवा तलाकशुदा हैं। इनमें प्रत्येक जाति और धर्म की लड़कियां हैं। उसी प्रांगण में एक और स्कूल है, जिसका नाम है सेंट मेरी। इस स्कूल में बंगाली लड़कियां लिखना-पढना करती में हैं। कलकता के अभिजात घरों की लड़कियां यहां की विद्यार्थी हैं। इस स्कूल ही पहले सामान्य अध्यापिका और बाद में अध्यक्ष बनकर मेरी टेरेसा आयीं। 1937 में इस स्कूल में ही उन्होंने अंतिम शपथ ली सेंट मेरी स्कूल में मां का कोई स्मृति-चिह्न नहीं है। मां जहां बैठती थीं वह कमरा है । उस कमरे में अव दूसरी अध्यापिकाएँ वैठती हैं । मां ने खुद ही तो कहा था, "मैं-मैं करने से कोई लाभ नहीं। कर्म ही जीवन है।" वीस बरस पहले की बात होगी। उस समय डॉ० विधानचन्द्र राय मुख्य- मंत्री थे। राइटर्स बिल्डिंग के गलियारे में नीले पाड़ की साड़ी पहने महिला को देखकर उनकी समझ में नहीं आया कि यह माँ टेरेसा हैं। उनकी वेश- -भूपा बहुत ही साधारण थी। मां टेरेसा की छात्राओं में एक पहले आगे आयीं। इस बंगाली छात्रा का नाम था सुभापिणी दास । सुभापिणी इस समय सिस्टर अग्नेस नाम से सब जगह परिचित हैं। छोटी-सी यह महिला कैमरा देखकर आतंकित हो गयीं । वातचीत से अधिक काम ही को चाहती हैं। स्वल्पभापी अग्नेस के गले की आवाज़ कोमल होने पर भी उनके चेहरे-मोहरे पर दृढ़ता की छाप सुस्पष्ट है। वे पिछली बातें जानना चाहने पर टाल जाती हैं। कुछ पूछते ही दो-एक काग़ज़ आगे बढ़ा देती हैं । ज्यादा अनुरोध करने पर मां के पास जाने को कहती हैं। बहुत ही अच्छी बंगला बोलती हैं और अंग्रेजी का प्रयोग भी कम नहीं करतीं। सिस्टर अग्नेस 1949 ई० को 29 मार्च को मां टेरेसा के साथ सम्मिलित हुई। इसके दो बरस पहले 1947 में पंद्रह अगस्त को हमने स्वतंत्रता प्राप्त की । अग्नेस की अपनी जुवानी : "इंटाली में मैं मां की विद्यार्थी थी। नौ बरस की उम्र में जब मैं पहले-पहल स्कूल में आयी तब से मेरा माँ से परिचय है। स्कूल में मुझे याद है कि अंतिम वर्ष था, ठीक उसी वक्त मां ने स्कूल छोड़ दिया। जब सुना कि मां स्कूल छोड़कर जा रही हैं तो बड़ा दुख हुमा । फ़ादर हेनरी ने ही पहले समाचार दिया। बोले, 'रोम से विशेष अनुमति मिली थी। ईश्वर की पुकार पर उनको गरीबों की सेवा (वह कितनी ही सामान्य क्यों न हो) में अपने को लगाना होगा।' हम छोड़नेवाले नहीं थे। फ़ादर से पूछा, 'ग़रीबों के लिए कुछ करने के लिए बुलाहट क्यों हुई? और भी तो संन्यासिनी धों?' फादर हेनरी बोले, 'किसी को जबर्दस्ती इन मार्ग पर नहीं उतारा जा सकता है । यह तो भगवान को पुकार है। इस पुकार पर जाना ही पड़ेगा। भगवान के पुकारे विना इस काम में उतरना ।
मां टेरेसा :: 117 किसी तरह संभव नहीं है। हम, जिन्होंने मां का सामीप्य पाया था बहुत ही खिन्न हो रहे थे। उनके चले जाने का एक और बड़ा कारण हुआ-उन्होंने कॉन्वेंट स्कूल से ही गरीबी को देखा। और उस गरीबी को दूर करना ही उनके जीवन का संकल्प बन गया।" लोरेटो छोड़ने के लिए मां ने रोम से अनुमति की भिक्षा मांगी । साय-ही-साथ उन्हे अनुमति मिल गयी। एक घरस के लिए यह अनुमति मंजूर हुई। यह बात भी बता दी गयी कि अगर वे अपने काम में सफलता न पा सकें, तो फिर लोरेटो के जीवन मे लौटकर आ सकती हैं। लेकिन मां क्या फिर लौट सकेंगी? यह तो भगवान को ही पुकार थी । उस पुकार का जवाब दिये विना क्या मां रुक सकेंगी? भगवान ने ही तो गरीव आदमियों की मेवा में जीवन और मन समर्पित करने को कहा है । प्रार्थना अवश्य ज़रूरी है। प्रार्थना के बिना भगवान नहीं मिलता। किन्तु सेवाविहीन प्रार्थना से भगवान के पास नहीं पहुंचा जा सकता। यह अनुमति मांगने की बात जितनी आसान लगती है उतनी सहज है नहीं। रोम से आवेदन करने के पहले मां को अपना अभिप्राय 'सुपीरियर' को समझाना पड़ा था। मां पहले लोरेटो से पटना गयी। वहां चार महीने मेडिकल ट्रेनिंग ली। 'द होली मिली' की सन्यासिनियां अभी तक वहाँ हैं। वे सदा सहायता करने को तैयार हैं । अकेले मां ने ही नहीं, वाद मे मिशनरीज ऑफ चैरिटीज़ के बहुत-से लोगों ने यहाँ ट्रेनिंग ली। कलकत्ता लौटने के बाद सर्कुलर रोड पर 'लिटिल सिस्टर्स ऑफ द पुअर' भवन में उन्हे जगह मिली। इस भवन से ही उनके नये जीवन का बाहरी प्रकाश हुआ। प्रतिदिन सवेरे वे सड़क पर निकल जाती । दो-चार रोटियाँ और कुछ दवा-दारू उनके साथ रहते। उनका गंतव्य स्थान एक वस्ती से दूसरी बस्ती था। सदा ही कुछ-न-कुछ काम होता । सदैव सेंट टेरेसा में जाकर प्रार्थना मे बैठती। थाली में कुछ बचा रह जाने पर (प्रायः वचता न था। सब ही शायद बांट देती थी ।) उसे खाती। मां टेरेसा की तरह सिस्टर अग्नेस भी अपने संबंध में कुछ बताना नही चाहती। और-तो-और मां के काम में सम्मिलित होने में वे सबसे पहले आयी थी- इतना बताने में भी उन्हे बहुत सकोच था। लोरेटो का आराम का जीवन छोडकर मां ने सड़क पर जीवन बिताने की अनिश्चयता को प्रसन्नता से ग्रहण किया। कहाँ खायेंगी, रहेगी कहां, और खाने का ठिकाना ही कैसे होगा?--मां ने इन सब बातो को जरा भी चिंता न की। क्या सचमुच चिंता करने की कोई जरूरत है ? मां यह अच्छी तरह जानती हैं कि यीशु ही उनसे सब करा लेंगे। सोचना होगा तो वे ही सोचेंगे। इस प्रगाढ विश्वास ने ही उनके जीवन की सारी बाधा-विपत्तियों को घो-पोछ फेका है । और इस विश्वास के स्रोत हैं-यीशु ।
118 मा टेरेसा । । "जब भी मैं कल के लिए सोचती तो मां मुझे झिड़क देती। कहती, 'क्यों? भगवान क्या हमें देख नहीं रहे हैं ?' मां की यह बात अक्षरशः सत्य है। सत्ताईस बरस के इस जीवन में हमने कितने लोगों के मुंह में खाना दिया ! और हमारा अपनी आय का कोई ठिकाना नहीं। लोगों के दान पर ही सब-कुछ निर्भर करता है। भगवान की करुणा से ही हृदयवान लोग हमारे पास आते हैं, यथाशक्ति सहायता करते हैं। "अब विभिन्न संस्थाओं से हमें सहायता मिलती है। शुरू में यह सब-कुछ न था। मां सुद ही पहले खाली टीन लेकर इस कलकत्ता शहर में सड़कों पर निकल पड़ती। वे घर-घर जाकर कहती, 'खाना फेंकें नहीं। अगर कुछ हो तो इस टीन में दें।' मां की देखा-देखी सिस्टरें भी निकलतीं । टीन में इकट्ठा किया हुआ खाना वे गरीबों में बांट देती। जिन लोगों में काम करने की शक्ति नहीं होती उन्हें भी खाना दिया जाता। दिन-भर जिस आदमी के पेट में एक दाना भी न पड़ा हो उसे क्या भूखा लौटा दिया जाये ? आप बीमारी में मर सकते हैं, लेकिन बिना खाये- सोये तिल-तिलकर मृत्यु की ओर बढ़ते जाने से अधिक सांघातिक अवस्था और कौन-सी हो सकती है ? सियालदह, हावड़ा स्टेशन पर ग़रीब आदमियों की भीड़ रहती है। वे विना खाये प्लेटफ़ॉर्म के एक कोने में पड़े रहते हैं। इस तरह वे धीरे-धीरे मृत्यु की ओर बढ़ते रहते हैं। मां सदा इन लोगों की बात सोचती हैं । मान लीजिये मां हवाई जहाज से कहीं जा रही हैं। याग्रियों के पास जाकर झुक- कर कहती हैं, 'आप लोग दया करके बचा हुआ खाना फेंकें नहीं। दया करके मुझे दे दें। मैं ले जाऊंगी।' यह हैं मां !" अकसर किसी के कुछ चीजों के दान करना चाहने पर भी सिस्टर उसे नहीं ले सकतीं। एक बार एक सज्जन ने 'मिशनरीज ऑफ़ चैरिटीज़' को वाशिंग मशीन देनी चाही। मां ने सब सिस्टरों को बुला भेजा। शायद परीक्षा लेना चाहती हों। सभी एक साथ बोली कि इस मशीन की उन्हें कोई जरूरत नहीं है। सिस्टर बोली, "मां, हम अपने कपड़े खुद ही साफ़ करेंगे।" और इसी कारण मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटीज-भवन में अभी तक वाशिंग मशीन न घुस सकी। टेलीफ़ोन के वक्त भी इसी तरह की बात हुई। पहले मां के पास कोई फ़ोन न था । किन्तु जब माँ ने देखा कि काम की सुविधा के लिए फ़ोन की वहुत अधिक ज़रूरत है तो उन्होंने एक टेलीफ़ोन लिया। अब उसी को सब काम में लाते हैं। मिशनरीज़ ऑफ़ चरिटीज-भवन को पहली मंजिल पर बैठने के छोटे कमरे के सिवा उस घर में कहीं पंगा नहीं है। और चैपल में है। बाहर के लोग प्रार्थना करने को आते हैं, इसीलिए यह प्रबंध है । भगवान के बनाये इस संसार में मुक्त वायु के सेवन में कोई रुकावट नहीं है। यह है भी काफ़ी। दुनिया में आदमी जिस परिमाण में दुख और कष्ट सहन करता है उसकी तुलना में इतना-सा कष्ट तो कुछ भी नहीं है । , माटेरेसा :: 119 संचामिनियों के जीवन में कारंभ से ही सफेद साड़ी और पूरोधास्तीन का सदलाव होता है। इन जीवन की पहली छ है-कान के समर कोई भी भवन में बैठा नहीं रह सकेगा। किसी-न-किसी काम के लिए सबको निकल पड़ना होगा। टेलीफोन आये तो समाचार बताने और जानने के लिए आदमो को जरूरत है सिस्टरें सवेरे चार बजे बिस्तर छोड़ देती हैं। सवेरे साढ़े-छः बजे तक प्रार्थना होती है। इसके बाद ही सबेरे का जलपान। काम पर निकलने से पहले सिस्टरों को खुद अपने कपड़े-लत्ते और घर साफ़ करना होता है। दोपहर को संन्यासिनियाँ भवन में लौट आती हैं। बाहार आदि और प्रार्थना होती है । इसके बाद नियमित कक्षाएं होती हैं। नियमावली और 'स्क्रिप्चर्स' पढ़े जाते हैं । सफ़ेद साड़ो के बदले नोले किनारे की साड़ी पहनने के पहले उनकी परीक्षा ली जाती है। जो पूरी तौर पर संन्यासिनी हैं वे साढे-बारह बजे आती हैं। दो बजे फिर निकलना होता है । लौटती हैं शाम को साढे सात बजे । प्रार्थना के लिए सबको आना पड़ता है। यह बहुत जरूरी है। मां कभी नहीं चाहती कि मिशनरीज ऑफ़ चैरिटीज को संन्या- सिनियां केवल 'समाज-सेविका' मात्र रहें। यह अनुभूति होते ही मनुष्य की सेवा करना एक सार्थक रूप ले लेता है। सिस्टर अग्नेस की तरह सिस्टर फ्लोरेंस, सिस्टर वार्ड भी पहले मां की विद्यार्थी रह चुकी हैं, जो अब मां के काम मे योग देती है। अड़तीस तभी तो मां ने कहा है, "आज सबसे बड़े रोग कुष्ठ या यक्ष्मा नहीं है । उससे अधिक समाज में वे लोग जो अपने को परित्यक्त समझते हैं, अवाछित और उपेक्षिरा कहकर जो अपनी कोठरी के एक कोने मे सिकुड़े रहने मे लगे हैं वे ही सबसे भयंकर रोग से ग्रस्त हैं। यही रोग असली रोग है। समाज का सबसे बड़ा शनु है-प्यार के अभाव का बोध। रास्ते के किनारे का फुटपाथ ही जिनका घर है उनके मारे में क्या हम एक वार भी सोचते हैं ?" अभी कुछ दिनों पहले उत्तरी कलकत्ता के देशवधु पार्क के पास रागा दीने स्ट्रीट पर एक लॉरी फुटपाथ पर चढ़ गयी। उस समय रात के दो बजे होंगे । रा. बारह लड़के-लड़कियों और उनके मां-बाप गहरी नीद में सो रहे थे। पारी पहियों से सव पिस गये । फिर उनकी नीद कभी नहीं टूटी। यह घटना अखबारों में दूसरे दिन बड़े-बड़े शीपंकों के साथ प्रकागिता 120 :: मां टेरेसा घटना सुनने के बाद बहुतों ने दुख प्रकट किया। लेकिन हमें तो यातायात मार्ग के किनारे यह दृश्य निरंतर देखने को मिलते हैं। उस समय क्या हमारा मन इन सब आश्रयहीन लोगों के लिए रो नहीं पड़ता है ? इसी मन के रो पड़ने का दूसरा नाम प्यार है। मां टेरेसा उम्र में मुझरो छब्बीस वर्ष बड़ी है। किन्तु और चीजों में उससे भी बहुत-बहुत बड़ी हैं । युवावस्था में कदम रखते ही इस कलकत्ता में आयीं। उस वक्त तो मैं मां के पेट में भी नहीं आया था। अठारह बरस की वह तरुणी यौवन, प्रोढ़त्व लांघकर वय-भार से आज थोड़ा झुक गयी है। सत्तर बरस में से लंबे बावन वरस इस शहर में ही बिता दिये । परित्यक्त, अवांछित, अनाहूत लोगों के बीच ही वे जीवन का शेप भाग बिता देंगी। सूर्योदय से बहुत पहले यीशु की मूर्ति के आगे नतजानु होकर निःशब्द प्रार्थना से शक्तिसंग्रह और उसी शक्ति को सूर्य के प्रकाश के समान प्रसारित करने में ही उनके रोजाना के काम की शुरुआत होती है। बहुत ज़रूरी काम न होने पर दिन के अंत में आचार्य जगदीश वसु रोड के आसमानी रंग के उस मकान में लौट आती हैं। रात में ग्यारह के बाद वे सोने जाती हैं। लेकिन सिस्टरों को भी नहीं मालूम कि मां कव गहरी नींद में सो जाती हैं। बारह, एक, दो-कुछ भी समय क्यों न हो, एक बार पुकारने पर ही सबको माँ का जवाब मिल जाता है । विस्तर छोड़कर चली आती हैं। बारह-तरह घंटे तो हैं ही, कभी-कभी यह महान महिला और भी अधिक समय काम में डूबी रहती हैं। अगर राह में चलते-चलते कभी भी नीले किनारे की सफ़ेद साड़ी और पूरी आस्तीन का ब्लाउपा पहने, छाती पर यूस का चिह्न लगाये किसी महिला को वस्ती में गरीबों की पुरानी कुटिया में देख सकें, तो समझ लो कि सशरीर न होने पर भी मां टेरेसा वहां मौजूद हैं। उनकी ही कोई सिस्टर इस काम में लगी हैं। कुमारी अवस्था में जो मां बन जाती हैं उनके लिए मां टेरेसा की चिंता का अंत नहीं । शायद इसलिए कि अस्पतालों में परित्यक्त बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसके लिए मां भ्रूणहत्या स्वीकार नहीं कर सकतीं। उनके प्यार के पात्र दुखी लोग हैं। अनाय अवलाओं की आंखों में आंगू देखते ही मां का हृदय बच्चों की तरह रो पड़ता है। फोटोग्राफ़र को देखकर जिस तरह सिर झुका लेती हैं, उसी तरह जिनको प्यार करने वाला कोई नहीं है उन्हें देखते ही उनका मुंह झुक जाता है। मां मुंह से मुंह को स्पर्श करने का आनंद प्राप्त करती हैं। आत्मस्थ हो जाती हैं। शायद मन-ही-मन सोचती हैं कि उनके इस प्यार का स्पर्श कितने लोगों को मिला है। ईसाई धर्म में दीक्षित करने के लिए नहीं, सब ही ईश्वर की संतान हैं-इस विश्वास से ही मां ने सेवा के काम में अपने को नियुक्त किया है।
मा टेरेसा 121 ...यदु के बगीचे में एक दिन रामकृष्ण घूमने आये। बैठक में बैठार यदु से बातें करने लगे। सहसा दीवार पर टंगी एक तसवीर पर उनकी नजर पड़ी। बहुत अच्छे भावों का चित्र था। मां और पुत्र का। मां की भरी बाहों की लपेट में एक पवित्र शिशु, उपा के आकाश मे उगते प्रथम सूर्य की भांति था। मां की बड़ी-बड़ी विभोर आँखो मे द्रवीभूत स्नेह और चेहरे पर तृप्तिपूर्ण मुसकराहट थी। शिशु के चेहरे पर जो पापरहित सरलता थी उसे जैसा रामकृष्ण ने समझा वैमा क्या कोई समझेगा? "यह कौन हैं जी?" "एक मेमसाहब और उसका बच्चा है।" वही होगा। रामकृष्ण ने दूसरी ओर आँखें फेरना चाही । लेकिन आंखें फेरना इतना आसान न था। "सच बताओ न-यह कौन हैं ? वह तो ज्योतिर्मय देवशिशु दिखायी दे रहे हैं। और उसकी मां तो पुण्यमयी पवित्रता ही है।" "मां मेरी और उनका बेटा यीशु खीस्ट हैं।" रामकृष्ण एकटक देखते रहे। देखा कि यशोदा हैं और उनकी गोद में वाल गोपाल हैं। सीधे शंभु मल्कि के पास पहुंचे। बोले, "मुझे यीशु खोस्ट की कहानी सुनाओ।" रामकृष्ण ने देखा कि वही चित्र जीवित हो उठा है। मां और बेटे के दिव्य शरीरों की ज्योति से दशों दिशाएँ भरी जा रही हैं। और उनका भीतर-बाहर उसी ज्योति-स्नान से धुला जा रहा है। इतने दिनों का जमा पक्का संस्कार उखड़ा । तुम परम योगी परम प्रेमी कौन हो? कौन हो तुम 'आदित्य-वर्ण तमसः परस्नात् ?' ससार के दुख-गहन से जीवों के उद्धार के लिए सर्वस्व दे दिया ! जिसका प्राण करने आये उनके ही हाथों हँसते हुए प्राण दे दिये । जो यंत्रणा के निवारण के लिए आया वह यत्रणा ही क्षमा बनकर, प्रेम बनकर, शांति बनकर प्रकट हुई .। मां टेरेसा ने भी तो देखा-विश्व मे सर्वत्र ही तो यह यीशु विराजमान हैं। यीशु मानकर दुखी की पीड़ा मे जीवन समर्पित कर देना ही मां टेरेसा के जीवन का चरित्र और परम उद्देश्य बना। तारीख़ याद नहीं है। आचार्य जगदीश बसु रोड पर निर्मला शिशु-भवन मे उपासना-कक्ष के निकट बरामदे मे एक मेज के आगे खड़े होकर मां से बातें हो रही थी। मां ने मेरे बदन पर हाथ रखकर कहा, "फिर आना।" वे काबुली चप्पल उतार कर उपासना-कक्ष मे चली गयी। यीशु की भूमि के आगे घुटने टेककर बैठ गयी । आश्विन को उतरती साँझ । रवीन्द्रनाय के 'गोरा' 122 मां टेरेसा की आनंदमयी मां की कहानी मन में कौंध गयो। आयरिश पिता का परित्यक्त बेटा गोरा अपना वास्तविक परिचय जानने के बाद आनन्ददमयी से वोला था, "माँ, तुम ही मेरी मां हो। जिस माँ को खोजता फिर रहा था वे ही मेरे घर में आकर बैठी थीं। तुम्हारी जात नहीं, विचार नहीं, घृणा नहीं-हिंदू, मुसलमान, ईमाई, ब्राह्मण-सबकी ही तुम कल्याण की मूर्ति हो। तुम ही मेरा भारतवर्ष हो।"
जीवन-परिचय 1910 ई० की 27 अगस्त को यूगोस्लाविया के काजे शहर में अग्नम गोनाक्मा बेजाविमउ ने जन्म लिया। बाद में मां टेरेसा। मां-बाप का पैतृकस्थान अलवेनिया। एक भाई, दो बहनें। माता-पिता विगत । शहर के मरकारी स्कूल में शिक्षा का श्रीगणेश । स्कूल में रहते ही वे सोडालिटी' की सदस्य बनीं। उन्ही दिनों यूगोस्ला- विया के जेसुइट लोगों ने 'कैलकटा याकंडायमिम' काम लेने की मम्मति दी। जेसुइटों का पहला दल 1925 ई० की 30 दिमम्बर को कनकता याया। इसमें एक जेमुइट को कसिपांग भेजा गया। पर्मियाग से इम चेमुइट ने बंगाल मिगन फील्ड के सबंध में यूगोस्लाविया को एकाधिक उत्माह जनक चिठ्यिो भनी। उन चिट्टियों को 'सोडालिस्टो' को नियमित रूप से पढ़ाया जाना। युवती अग्नेम ने कलकता जाने की इच्छा व्यक्त को। आयरलैंड में मंन्यामिनियों के माय उनका संपर्क करा दिया गया। सन् 1928, 29 नववर । इस दिन उन्हें आयरनंड (पफॉम-इन्जिन) में लोरेटो अये में और फिर लिन से भारत भेजा गया। भारत में आने ही वे सीधे दाजिलिंग में 'नोविमियेट' शुरु करने के उद्देश्य से चली गयौं । • सन् 1929-48 । कलकत्ता के इंटालो में मेंट मेरीज हार स्कूल में भूगोल की अध्यापिका के रूप में काम किया। कुछ समय वे राम स्कूल की अध्यक्ष भी रही। लोरेटो सिस्टर्स के साथ परोक्ष रूप से मवद्ध इडियन रितिजन ऑर्डर की 'डाटर्म ऑफ सेंट ऐन' को जिम्मेदारी निवाहती रही। मन् 1946, 10 मितंबर । 'ए हे ऑफ़ हिमोउन' या निर्णय लेने का दिन ।' मां टेरेसा ने लोरेटो के निश्चित सुख का जीवन छोड़कर दरिद्रतम मनुप्यो की सेवा के लिए अपने को समर्पित करना चाहा । इसके लिए अधिकारियो से अनुमति लेकर उन्होंने जो प्रार्थनापत्र दिया वह रोम भेजा गया। रोम भेजने के साथ ही उनका प्रार्थनापत्र स्वीकृत हो गया। सन् 1948, 18 अगस्त । मां टेरेसा नै लोरेटो के वस्त्रादि छोड़ दिये । भार- तीय नारी की तरह साड़ी पहनी। नीले पाड़ को सफेद माडी। कधे के पास टोक 124 मा टेरेसा - पित हुआ लिया फूस का निशान । नसिंग ट्रेनिंग लेने के लिए वे तीन महीने के लिए पटना की अमरीकी मेडिकल मिशनरी सिस्टरों के पास गयीं। बड़े दिन के बीच ही वे फलकत्ता लौट आयौं । कलकत्ता आकर वे 'लिटिल सिस्टर्स ऑफ़ द पुअर' संस्था में आयीं। रहने-खाने की भी व्यवस्था नहीं थी। सन् 1948, 21 दिसंबर । मोतीझील बस्ती में उन्हें पहला स्कूल खोलने की अनुमति मिली। उसी वरस भारत की नागरिक बनीं। सन् 1949, फ़रवरी। सियालदह के पास माइकेल गोमेज मामक भले आदमी के घर में एक छोटे-से कमरे में जाकर रहीं। सन् 1949, 19 मार्च । प्रथम सिस्टर ने मां टेरेसा के रजिस्टर में नाम लिखाया। यह बंगाली सिस्टर थी-सिस्टर अग्नेस । पहले का नाम था सुपापिणी दास । माँ की ही विद्यार्थी थीं। सन् 1950,7 अक्तूबर । मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटीज़ से संबद्ध अधिकारियों से अनुमोदन प्राप्त किया। मिशनरीज ऑफ़ चैरिटीज़ का भवन कलकत्ता में स्था- और कलकत्ता से ही सारे भारत में फैल गया। पता, 54-ए, भाचार्य जगदीश वसु रोड, कलकत्ता। सन् 1962 1 फ़िलिपाइन में रमन मंगसेसे पुरस्कार। फ़िलिपाइन के दिवंगत प्रेजिडेंट के नाम पर यह पुरस्कार था इंटरनेशनल अंडरस्टैडिंग से संबंधित । उसी वर्ष भारत का 'पाश्री' का सम्मान भी मिला। सन् 1963, 25 मार्च। नयी शाखा मिशनरी ऑफ़ ब्रदर्स के शुभारंभ पर कलकत्ता के आर्चबिशप ने आशीर्वाद दिया। सन् 1964, दिसंबर। महामान्य पोप ने बंबई में यूकरिस्टिक कांग्रेस में मां टेरेसा और उनके मिशनरीज ऑफ चैरिटीज को अपने उपयोग में आने वाली गाड़ी दान की। सन् 1965, 1 फरवरी। मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटीज़, प्रधान पादरी संबंधित अधिकारों की सोसायटी में परिवर्तित हुआ। सन् 1965 1 वेनेजुएला में नये पेन्द्र की स्थापना। सन् 1967 1 कोलम्बो में नये केन्द्र की स्थापना । सन् 1968 । तन्जानिया के टोचारा और रोम में वस्तियों के अंदर नये केन्द्रों की स्थापना। सन् 1969 1 आस्ट्रेलिया के ब्रुक में। सन् 1969, 26 मार्च । 'द इंटरनेशनल एसोसियेशन ऑफ़ कोवर्कर्स ऑफ़ मा टेरेसा' को मिशनरीज ऑफ चैरिटीज़ का अनुमोदन मिला, और एसोसियेशन का संविधान पविण पोप पाल छठे को दिखाने पर उन्होंने आशीर्वाद दिया। सन् 1970, अप्रैल । मेलवोन में।
मा टेरेसा :: 125 । सन् 1970, जुलाई । अमान (जॉर्डन) में। सन् 1970, 8 दिसंबर। यूरोप और अमरीका के 'नौविसेज' को ट्रेनिंग के लिए सदन में एक 'नोविसियेट' की स्थापना हुई। सन् 1971, 6 जनवरी । मां टेरेसा को पोप जॉन तेरहवें का शाति पुरस्कार मिला। पुरस्कार मा टेरेसा के हाथ मे पोप पॉल छठे ने दिया। सन् 1971 में न्यूयॉर्क में गुड सैमेरिटन अवार्ड मिला। सन् 1971 मे वाशिंगटन मे केनेडी इंटरनेशनल अवार्ड। सन् 1971 में कैथलिक यूनिवसिटी ऑफ़ अमेरिका प्रदत्त सम्मानसूचक उपाधि :डॉक्टर ऑफ़ ह्य मन लटसं । सन् 1972 में दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू अवार्ड फार इंटरनेशनल अंडर. स्टडग । सन् 1973 में लदन में फाउंडेशन प्राइज फ़ॉर प्रॉग्रेस इन रिलीजन। सन् 1975 मे मेक्सिको में अंतर्राष्ट्रीय नारी-वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित सम्मेलन मे विशेष अतिथि। सन् 1975 मे मिशनरीज ऑफ चैरिटीज के पच्चीस बरस पूरे होने के उपलक्ष्य मे रोप्य जयंती उत्सव । सन् 1975 में अगस्त मे फाउ (एफ-ए-ओ) के सिरेस पदक के एक ओर मा टेरेसा का चित्र (ब्रिटेन के कलाकार माइकेल रिजेलो द्वारा चित्रित), दूसरी ओर दोनो हाथ फैलाये एक नवजात शिशु को चिपटाये हुए का दृश्य । सन् 1976, नवंबर । कैटरबरी के आचं विशप डोनाल्ड कोगन ने मिशनरीज़ ऑफ चैरिटीज के आचार्य जगदीश वसु रोड पर परित्यक्त शिशुओं का आवास- स्थान निर्मला शिशु-भवन, काली घाट पर मुमूर्प लोगो के आश्रय-स्थल निर्मल हृदय की स्थापना की। सन् 1976 के नवंबर महीने मे विश्व बैंक के प्रेजिडेंट रॉबर्ट मैकनमारा की पत्नी ने कलकत्ता में मां टेरेसा को कालीघाट के निर्मल हृदय देखने के बाद सम्मति दी, "सचमुच मां टेरेसा उज्ज्वल-दुर्लभ व्यक्तित्व हैं।" सन् 1979 मे नोबल शाति पुरस्कार । सन् 1980 मे 'भारतरत्न' उपाधि से विभूषित ।
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