Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Kavi Shri Mala Asmiya

Choudari,raghunath · 2010/12

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कवि-श्री माला
असमिया
कवित
रघुनाप चौधुरी
सम्पारम्-मनुवार
परेश धम्द्र शर्मा
लोकनाय मराली
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा

प्रकामक
मोहमसात भर
राष्ट्रमापा प्रचार समिति
हिसामपर, पा
सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करप-1...
मई १९६२
मूस्प--- २/-
मोहमनात भर
गदपापा प्रेस
हिमपर, पर्ण

भामुख
पिन विषय गिदमान-प्रचार समिति वर्धा अपने कार्य प्रल २५
वर्ष मन् ।९१ में पूरे कर सो है। म उपरम्पमें मनाये जामवाले रजत जयन्ती
महोरमय अवमरस ममी मरतीय मापाप्राक माग्य वयोल पा उनले उत्कट
अध्यन परिचय कविश्री माय' को पचास पुस्तकमे हिन्दी-गपानुवाद मस्ति प्रशनित
मनकी योजना के अन्तर्गत प्रस्तुत मन्य पाठको समय अगा।
पपिकिमी भी पाक मषष्ठ बथ्य-सईया निश्चय भन्न नमि
सर्य। फिर भी अपनी मामामाको प्यानमें रमले ए गण्यमान्य उन उन माषाओके
विमोदी ययमे नपस पर्व मम्पमा लिया गया।
प्रत्येक पुस्तक भारम्भमैं निम पाकविकी रचनाओका चयन किया गया।
उस मामा म्यारपत्र पीय और विशेष परिचय दिया गया। शिम मापाने
रवियोमा पाप रिया नया नया चुनाव मते ममय मन् १९२० मे पूर्व साहित्य
और १९२० मे वापस माहिस्प-म वराम एक विमाधन मानम रसगई।
मम मरण या लगभग मन् १९२ पूठिया १९२ बार महित्यमे
प्रपारित विचार-धारा विमान अमाव-सा पय पाता है।
प्रस्तुत मैया में मलित माहिस्प-बीचमे भी एकापडी मराठी वेसार
किया। 1मी पनि चार अर्मान पुम्तम्मे सवि-दीवय और सामान सम्पादित तथा
अनुवादित मागे म्यासे हम अपने प्रस्तुत कम महयोग दिया। मपानी
आपरमबानो बनया इन बी सी एन. अपरमजी ( मर टीपूर
ऑफ मार मार्ट, बर्मा) उपर मापोम मित्र उम ममिति ममी
आम्री
सिर मशिरियत II सपा प्रापाप टप मे जिवनया प्रस्पचव
अस्पसमायोग
मिमीमत तो ताना पाती।
मात्र प्रस्तुत ममा पाउन सचिम व उपयोगमीत हो ।
hilarin
मनी
राष्ट्रमाण प्रबार समिति, पर्या

अनुक्रमणिका
पृष्ठांक
[प्रारम्मरो सन् १९२६ तर] १
धरागिगानगाहित्य परिपय
कमि-गरिनप
कापनापम
२७

पविधी मामा
यसमिया
रपनाप चौपुरो

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असमिया साहित्य परिचय (प्रारम्मसे १९२० तक)

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असमिया भाषा
और
उसका साहित्य
भाषा साहिदपकी पूर्व पीठिका
प्राचीन मनुष्परा जीरन भामिनीवमरी गुमनामें न हो ना परिन
पा और उतारो भिरा रन मार खाप पानिने उनमा नपर ही मला
पानापा। नीरमरी तारे लिए ग्मे ना पागम बाप रहना पमा
मनोरन बनना तो है रितु मनुप्पो मारमा पाहा एक मामी
और कमल नारीपना कीमती एमे गौवम मानी भारा
निमति नित ग्मन निम पापारा मदार पिया होगा उमरा मन भी बने
तमायके मम मार होनेरा बानानीमे अनुमान रिया मा माता है। मममय
मनिमरा मापन पा और माग पानिषित मा। यमुम्पने गान
दुमनामा मागापार इन्दिा म ममपी भाग बनापास ही बारामणीन
और पिम्परिता एप मीभाना मार्य भी। जापाने बहन पिडिपारपर
मिनार मावि मनुप्पने गीरनी शिवनारो मोर सानिया ता उमरे
समास निति मौणि बागमारामार मार बाग या
पोर मारिप गामाता है। ना मागो मनोर माहिपा मोर पामः
साभारष मुगपुरातील मारमानानुसारी मनोपरासी

४ है। इस साहित्यको मापा सरस भाष पहल और दोन पम्म और ती परत-साधी होती पी। मनोरंषक तो बहही और साथ ही उत्साहमर्पक गौर लोकहिवार भी है। भाषा-साहित्य के इस स्तरको पार करने पार ही हमे भापामोका साहित्यिक प उपलब्ध होता है। यह मोक-साहित्य ही सभी साहित्योंका गगम-मोत है। •ठी हातानीका प्रारम्भिक मसमिया साहित्य बसमिया साहित्यका सर्व प्राचीन नमूमा भी ऐसे ही मोक-साहित्पमें मितवा है। गिमीत मो-चारष मौत निवार-गीत ग्रामीन मौत मोरी मारिके माध्यमसे हम मसमिया साहित्य के प्राचीनतम स्पको योग कर सकते है। असमिया समाबमें माम मोहन पीताका माइस्प है किन्तु इनकी भाषा प्राचीन न पकर मानिक रेपमें म मई मान और मपियनमा प्राचीन ही ए पई। इन नोक-पीतों की परम्परा ममिया मापाचे प्राचीन नोक-कपि एर्माकर, पीताम्बर बौर मानकीरे सममसे भारतकपती बाई । संसारको समस्त भापार्थोपें यह बात पाई माती है कि मोक- गीत और तोक-साहित्यका समागम बहुत प्रचार तो हवा । किन्तु उसे लिपि- पर करने का प्रयास बहुत कम होता नही ही होता है। इसलिए अमसिमा मापा-साहित्य के इस भारम्भिक पुपका मोक-नाहित्य मी भनिवित हो पा। ऐसे बनिखित साहित्यका एक प्रहर भए हमें गहर-सपन के रूप प्राप्त होता है। इन रचनाका रचना-भास इनपी सन् छठी पतामी माना जाता है। प्रारम्भिक नोकपी स्तरसे मे पवन कुछ भिन्न प्रकारके होते है। हम अपनोंमें पि-नबन्धी जानकारी मौसमका हान बोपप्रियोशन राजनीति और तत्समधी मान-सी बोका कि बहुत ही सरल और रोचक रूपमें मिल पाता है। भाषिकत्तर पचन स्परेगात्मक बार मुम्मर मर भी। गफ को ममियाका मुरान कहा पा सकता है। बाये चमार इस नोक-परमराको पावसे यात- मध्यान मोरिने मापे बहाया। पर संमेपमें ही मममिया साहित्य प्रारम्भिक स्वासपर रत्नेव म्यिा ममा। पापिर या काना नमवत मनुस्लिम हापा बिममिया मापा एक पूर्व भारतीय भाष पापा है और एमपी उत्पत्ति में पिरिपुमार पापा बनुमार मम्मपत मापी दा गौड़ मपर्मममे पुछ विमारा मन कि महाभारत परात अनमय (उन ममय प्रागमोतिपपुर) मायोरी पो मसत पापा पी पातानरमें उसने अपनी पाहतो प्राके लिए छोड़ दिया और इस प्राासने स्पानीप गिोपनामामो प्रहन र मममिपा प्रेमी एक सोगपूर्व भापा पम्म रिया। यहाँपर एक बात और शाम मैना माया होगा किण्टो ताम्बारे 'गर बलों अपराम्पापी पतारी बम्प माहित्यिक रचनामोंमें मनमिया भाषाफा पोसपा मानिसमामिपा बारामा उनले पामिन नहीं मा हिन्दी साहिपके मारिनामा मारियम पाया जाता है। गम-पना और बापम रचनाकी प्टिमे यह परिबनम बात ही कम हवा है। बप्प-कासका पूर्ववर्ती मसमिया समान और उसका उस समय के साहित्यपर प्रभाव हेरहमी सलाप्पी पूपिम मममें पत्नियामी माहोन सीमेश प्ररेग रमिग-पूर्वी रियाम हुमा। बाद ही रिनारे भीतर इम वीर मोमाने अममके विस्तृत पूर्वीप मंगपर अपना अधिकार जमा लिया और लगातार छह पतामियो तक उमरा शामन बममपर बना रहा। इम पनतिक पिलाके कारण ममें एक स्पाई जीवन-यात्रारा स्पापित हाना सम्भव हुमा और मममिया भाषा-नायिका सम्मत पुष मी-वामन काम पाहै और इसे एक स्माई बीवन भी मिमा। मिाफी पापहषी गलामीकी समाप्ति सार-साप ग्ता भारतकी भयेय मुस्मिम समिम माहोम रार-मिरा पर्व हुमा और मावार का पति बार ही राम्परा प्राचीन विस्तार कम होने लगा और ममम पम्पोटे-छोटे पम्पोमें ४पमा। नपानम ममम या कामरूप पामेसे माधुनिक मनमो भू भागा मान वो होता ही पा पर माप ही मानिए बमान (मरिभात ) मा उलरी हिम्ना भी निमे भारम्म रगपुर पमपाइपुरी और कोपनिहार रहा नाताई इसके मनगद पा। मी कोषमागमें गोपन्यगरगो रागा मरमापपगमे इस समय पग्य पिया पा। पग मरनारायनने मणिया माहिरपके विकास पूष हाप यया। पामा म माहितपन परमारापमा सामनमानमें एक सम्पूर्ण प्रण पीपन पापा। रामा मरमाणपण विधानुरागी पा मार रमने अपनी रागा-ममा विहानीरो स्थान रिया पा। माापुष गरदेव मापन रेष राममरम्मती सामान मापार्य पारि महान भारिपारिएकाशिपिक मी पम्ममा मभागत पे। प्राचीन राममे हीमप तब-मत्रर गोप प्रमिरई। मामारी एन-मी निपपार पापा न गम्परे गोपनी माई। बार भी गमती भाप मार ना माहोन गग्य-गतिमी तपन पहा माया नामागे माग्मान मिला तो रमन मानेमें मुहामेरा पाम पिया माहोम पनी नाप पारेया या पाना पाहिरिपाराम तिमशितलनगे पेमो माप मादागम्पो गानेनोने पी पीर बने पे और उनमें प्रति मेगा पापी पनि हाली पी। गोली मारपानी पापा-मे शपमें 'महापामाईना भी प्राचीन काम प्रान गा पाया पगाराना और तत्रया गिरा बन मा दी। भागमोमिर सामान रामाय रामगिरनाम मपरपाती। मरीपारि मराजान पाममे मी मा पो दी। या रारमा पातारा एमालेमा पीडा'पा पा रिमा . पी है।

सानी मौर कोई पीठ नही पा। कहा जाता है कि गतर-पूर्षी वसमके तामेसरी मामक मन्दिरमें उस समय नरवमि' प्रपाका भी मनपा। इस प्रकारको मा- कारमय पिष्ट परिस्थितिम असममें महापुष्य संकरोबरा सम्म हुमा। उन दिनों रायोंमें ऐसी विष्ट परिस्थितिका पदभव हो गया था कि मानवता माहि माहि करने सनी दी मनुष्यकी पाशविक तिकी सन्तुष्टिके मिए पुरा मनुष्ठानोंमें नौष-से नीच काम करने के लिए भी किसीको हिचकिचाहट नहीं होती थी। सस मस्वाभाविक मबस्वामें मामवताकी पुकार मुनकर उसकी रमाके लिए मानो स्वरले ही एक महापुरपको बसमम पेन विपा। ये महापुस्प भी करदेव थे। शंकरदेवका बम्म बिस बम हमापा पर भी भक्तिका ही उपासक मा। किन्तु कषको अपने बंधकी माम्बवाकि पिस्ट ही मिग्रोहकी पताका अपने हाथ मेनी पड़ी। उन्होंने पक्ति पूजा वित मपना यो सिद्वान्त स्थापित किया पा उभे मौमभाममवसे पहन पिया था। पिसे में एकेश्वरपार भी कहा करते थे। मोग नमें महापुस्प कहते थे और उनके बनाये हए सिम्तको उनके सम्मानमें (महापुरपीपा धर्म ) पहो यो मापबती धर्मो नाममे प्रसिद्ध है। ऊपर बताया पया है कि माहोम राम्प पक्किा पासा पा और इसलिए महापुरप करका यम्म माहोम राब होने पर भी अपने सिमान्तकी रमाक सिए उनेमावभूमिको छोड़ना पड़ा था और मान्यता कोष पणा मरनापपन दरबारमें बापर मेना पड़ा था। इस महापुष्परा जगम सन् १४९ में हुमाया। इनकी सम्मतिपिके बारे में जब भी सम्मेह है कि किम महीनेगी फिम तिथिम मका बारिषि मा वा। विभिन्न परिन् पुपियों (पीवनियों) में इन मम्मकी विनिम्न लिपियां मिलती। इमी तप करके जम्ममार-माप में पब- धर्मश प्रारम्भ होता है। मसमिया साहित्यका मारिकात t.vठी शताबसि १५ वी तादीके पूर्वार्ध तक नही एटी मनाम्दीमे माप पी पंकर बरमके ममय तक भान पगारी गलामोरे पूना बसमिया साहित्य बातमे पषि एवं माहिरिया हए। इन सपियोंकी पनामि काम्पकी पायएं गाली रिणतीहै। पो करिनार मापाले जानकारपे मार माने पागिश्या मिए रन पुगौ विस्यान में पम्हाने अपने पाम्पो भमिरी मरम पारा पानेसी मोपिग की। मरी रचना मा तो मंगल पाप या पुगनौरा मुनर बनामिरा अनुमार हाती वी या मसापों और बानियारो माणर बनार नी मीन रपनामाडी मुष्टिमी दी। . रपियो मबमे प्राीन रविन मागतारो माना जाता है रिमने 'प्रहार परित्र मामर पम्प मिला है। म मरम्पती बनमिया बापागा माता| गहोने निम्मम्मममिया पापाको पात मरस मोर पुष्ट पप दिया है। मग उस्लेयमीम मपि हिर पिन हुमा जिमने महाभारतके भावमेप पर पा मममिपा भनुमार पिया। तीमरा कमिमा परिरल नरपती। इमने महाभारतरे द्रोपपर्या बनुवाद छिया है। हम युगमा मर्षमष्ठ पपि मापदमी हमा। इम कापिने मानों माग गमापना मुरर पद ममिया भापाम भनुगार किया है। इस यावी पापिने एक मात्र पाम्प भी पिता का विमरा नाम देशगित । उमोम कापरे गरिए भगवान विष्णुप्पाबनारसी मर्यमेप्टमा दिपानेका प्रपम्म पिया है। बारा मभी मामाकी पराब रिवाराणी पेप्टना दियाई गई है। पप्णव कासीम साहिस्प ० १४९ से १९५० तक अनमिया माहिपकी यह विरामीम बसम्मा बम ही हीदी कि सन् पनाती गाणी मम्पमालम भगिया माहिती प्राम प्रतिष्ठा करनामे महा पुष्प करा सम्म एमा। उनहोंने ममम प्रचमिन गात मकि पिरर पीमा भागवत महिमामबारका यो उप-कोर प्पिा सममे गातार पमनोहरी निपटम्प नही मिा बस्किमममिया मागियरो भी अपने सिामो लिए नई प्रेरणारी। मरने शामिक मारे ममपन और प्रतिपादन निमित्त भी करती माहिप-देवतासी पान मनी पड़ी पार ये माहिती मूपिम निष्ठा मान र पर। रमाने मापा पुगगरे प्रपम सिीप भण्म म पात मोरारम मप्याय रामायके मणम भाग पश्मिनी हरण साप निबिनपमिर मम्बार बप्पामा मषित गलार (मपमें) शेतन बार पाप पुण् मनुवार और गुण मौमिक मिरे । उनले करीब बीम पर निब निममें पौर्तन मबमे मापा।। मा पप पहनमे मंगा पम्पोम मपने धर्ममा समर्पन मि मारम भंगारो पुनर गार पार पिया पपा पा। पीतंत दाम उनः पर्ममारा घोरा-मा मरकरण हमारे है। लिपरम्मुरो ममगारा और मिटनेती मैमा माननीय है और माय उना मागो रेहाती नोन शिन प्रसार तुममाडामो रामचरित मानमरा भार और सम्मान सी प्रसार सन-पागरे पनि बपिपा पामीन मारामामान और बारहै। मामा और मम्नासापर पापी पीतन पारा पा मा पा मारने ममना।। श्रीसरेर मनपिपा मारा-गापिपरे पामे गया और भागार। पीपाचन सीमामा रे मापमै मममिया मागिय माप मासिक मौरीपारना मन पापिय मन पनी प्रमाद रिसमीरम पाणितहण पौगपिप णि पात्रा मियाममारि मारा गया। भागार्यो प्रमागती पापो पागमmrभी एम पी गरारे मागोमं नमपिया पदासोप और पानी पपपप-अमिमा भाग साहित्य विकासमें एक दूसरी उस्तेवनीय घटना है। नाटक रचनेकी परम्परा भी असमियामे इसके पहले नहीं पी। नाटककी रपमा बौर पराका मागिय रोगों एक साप इए। सर्व प्रपम बसमिया मच भी नाटक पोपकपन में ही दिखाई पड़ा। कीया माटाकी रचनामें भी संकररेपने संसहत नादप साहित्पसे मनश्य प्रेरणा नी है इसमें कोई संदेह नहीं है। किन्तु संसस्त नाटक उपनाटक वारिका कोई भी नक्षम इनके नाटकोंमें पूर्व स्पसे नहीं है। इसी समय कहा पाता th मिरिनामें मैपिता या संसत मैविमी मिमित भापामें मोक-परम्पपमे पुर मारक मिरे पए थे। पी एकरपेयमे इन माटोकोकही मते देखा होया या पढ़ा होगा ऐसा अनुमान ही किया जा सकता है। उसकी पुष्टि के लिए हमारे पास कोई तप्य उपलब्ध नहीं है। मीकरणेषक इम नाटकोंरा एक ओर तोगामिक मतके प्रचारमें सहायता मिनी और दूसरी मोर साहित्यका भगार पुष्ट हुमा। इन सबके बसावा मी पहरमने अपने धर्ममतको दूर करनेके लिए अनादि पावन भक्ति प्रदीप सीमामाना बमामिलोपाम्यान नाममानिका प्रेम ममपी भोपा इस्लेष बनियमान नामक विभिन्न मोर प्राच मि। प्रचोकी विनिम्नता होते हुए भी इनकी विषयवस्तुमें भिन्नता नही बाई। उन्होंने बरगीत मामसे कुछ ऐसे मीत र जिनमें असमिया और गरमापाका एक मुन्दर समन्वय पिताई पाता। महापाप भी करके बार उनकी परम्पराको उनके सर्वप्रिय मिप्य भी माधवरेवने साहित्यिक मोर पार्मिनोलो पियर्योम कायम रखा। अपने पुर) पीषित हवे ही मी माभयोष नाहिस्पिक जीवन माबो पे और भागीयन गुरफ पाहिने हर बार उनके कार्यो महायता ले रहे। श्री माधवपकी हतियोंमें माम-बोपा रामापण भारि काग अस्ति एमापनी नाममानिका राममूष या नवी कीर्तन श्रीपरोपरासन एन्य पनि रलाकर भाप्य भारि है। इन प्रोपरा भी मारे अपने गुरुक धर्म-मतली भितिको दरबनाने में ममय तो एही माप ही बमिया मापा माहित्य भगारम भी मनुपम गगि गए। म प्रायो? पनाम मनीतरी ऐमी मासना जिनी किरगे या रेनेमे भोता और नायर दोनों मुम रखते हैं। पर पर प्रति अमनमी नसारे माप होने मम पारणाम प प्रमाणे मानोरा भारपंप भी एक बार मरापुरष श्री गायक मनुकरण श्री मापकारने रोपा मार मिगे है। उनकी माता पाई मूली इस प्रार है-मोगन विहार, भूमि मेरोगा मन भाम पिपरा-गा पम मुगुरा - १हिमारे एमासी तपती एक सापिसा पारपरा पोरा यताबा भूपन होगा और मामाहन मुमुरा। इस नाटकॉम श्री मापनपने पी गिरदेवकी मानि भगवान भौमिकी महिमामपनीमापी म्पसना की है। उन्हाने इममें अपनी कार नई पीर नही नाही है अपने गुपके पर पिम्हॉपर ही गाना उन्हें माता पा। उपराण पगारे समापापी मामबरेसने महापुरुष भी पपरदेगा मम बग्मीतीचमा भी पी पी। परा गाता है कि श्री गंगागरे मिते हुए बरगीत रिमो ममम मरान बम गापारम मप्ट हो गए ये मोर मी गारने श्रीमाधम रको पुन पुण् ऐ गीत रपमरे मिए अनुना री। गुरके बारेशानुसार ही उन्होंने परगीर मित्र है। 'बरपीता श्री माधबोगने एकावरपारा मिजास्त प्रविपारित काने हुए हरिमति रमतो स्मापना की है। बागीतणि गापर भी मापरेष स्रये गार मनमा प्रभार परते। बिन प्रकार मुरराम हिनी माहिपमें वाम्मस्प भारके नभष्टमिइए, श्री मापवरेस उमी प्रसार मममिया माहित्य पनि रहे। पर मीनोंमें भनगान भीाप्ण बानजीवनी विभिन्न घटनाएँ मनोरगर माप, अमि पास प्रत्येक बरमौतमें भी अपनी रिमीजामी नीरा न मिमता म बामीनारामाराम शास्त्रीय गीतोरमा बारारनम्मान पिया गाता है और ना मापन भी उमौ प्रसार ही होगा। परमीनाली भाषा पनि पी पा सममिया मैपिनी और गमापा पाक मिभिन रुप पी। । मम मोनापी पतासी भारमिर पाममें परि राममरम्बनीरा परम मा पार महापुरष भी गरेवती पाम हे पाविहारका गरमागपगरी गर ममामें अपर मिमी और पी पारेको पानी में मानागपण पगाम महामारगरा मनमिया एममें मनुवार परमी बाबा मिनी। रागाने उग म गमायमरी एक प्रति मॅरबी मोर का गाना है कि उन पपरो गम मगनीराम मानेर मिा करमपादीतरी व्यापा पानी पी पी। मानारायणले पनि पाप पत्तिोही माग पा पिनु मान भमपा मरे रियायधीमा मापाग मिपा गया पा। मामामा मापूर्म अनुरा मरनागपमान मसीहोमा। रमोटोर माििचपागपरे पापनागपमरे पाम पारी ममाणिई। मारामारामममिया भानामगरी पह अनासोने वाली मातम पस-मी मप परमार और पप होती है। अनुगणे मार मार रिम पाम पिग गया। मगा समान सपा अमराम अभिया मारि गीरमा पीपति मिमी पी और पाती पाना माहिरा पम और माने मुगामि रिपर गांग प्रान हमा। पुनरपी रिप वर माप मनाग पुगग माश्मि रोपाहानिया २ ममम प्रमादिमिर पामिर मदी।

१. इस सभ्य पौर ने के कारण पमता ससका प्रबार मार मोडप्रियता गती मार समिया साहित्यको पाने में मुगम मा मिस पपा। महामाररामीकपा माधारपर रामसरस्वतीने रोमाभिक काम मी तिथे है। उन ये युष्म है- कुमावत या कामुर बम पटामुर । मस्कर्ष मुरमा काम भी रोमास्टिक काम्पका एक बनम नमा है। एमसरस्वतीले भौमवरिनामकी एक दूसरी रमनाम भीमो बाम भीरमके मुप विष महन्दी मुम्बर पपर्षे हास्य रहार कर पीच है। पर समयके यसमिया पाया पीवन और समार-म्यवस्पाका अधारिष मिनवा है। बमिया साहित्यमें यह एक मेगाति है। मा परिण भामसे पवा सय काम्प नो हमें प्राप्त है। एमठासतीने महापग मानारायण मनुरोधपर मोनीत गोविनका असमिया भापान्तर बहुत ही मतित बोर्मे किया है। समन्द कादमीमी परदेषका समकालीन कपिपा। उसने भी पीपर- रेप अनुपहले ही महागन नरमायापकी गरसमा स्थान पापामा मोगाला सिवात पमहरस्वती मार मनात जपनी पानी एकही पति कहो। किन मनाम और रामसरस्वती वा अनन्त कमली उम्ही रममामि भामथे। अनन्त बाबतीने भी प्रकार मा धर्मका गौपानी मौर मुमारेयमे श्री मरमानवी सन सा बनमिमा पार किया। इस अनारा समन 'पुमार काम्ब और भीवार पानास प्रोम' नाटक लिये। यामारक पौकिनारकारका और पायपी वनरामार मिया मागम होता है। पुमार रम परम्पपी पी कारेको विमगो पाम्पते तुमनाया मपम्त परनीने बनन रामायज माबमे एक मति गमापन भी तिनीको मामीम मद्य प्मर पर एक निष्पा पार पह पहले मालपा और बारीकरणमे उमनपरीमानीवरtet साप यापन और रेजर पर्ष भामाग्री होनेराने शापाने पर पगमित हुमा मोर पापणनीपमा पमा और मारपियवा पानकिमीन पर मने गानों नामपर पिा । पाँच रपे का पर्ने पापा मार मानोरान रह सोगमीटर मोर मुरमपरहोममा । मानीनेही उमने पगमा मममिया राररिया पारगमन पर भायान पुगण बषिप्य पुगतामनुपात पिया मने पी मंगाएगोपन परिजमो मिगा। श्रीधर करनी भी जान्टापरिमा। वह पीर मरानीनमा और श्रीनगर मोगान पामरे भी। मग मीलिए ।

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- बोर मेहे कारण बनता उसका प्रचार मोर मोकप्रियता बापती मोर पसमिया साहित्यको पाने में मुमम मान मिल गया। महाभारतकी कवाडे गाधारपर रामसरस्वतीने रोमान्टिक काम्प भी लिये है। उनमें ये मुम्म माधम पक्ष बामुर बध बटामुरगा। 'यमकर्ष पुर' नामक काम्य भी रोमाटिक काध्यका एक जना ममूना है। रामसरस्वतीने 'भीमपरिव' नामकी एक दूसरी रपमा भीमके दाम बीवनके पुछ पिए बहुतही मुन्दर स्पर्म हास्म रसका पुर रेकर बीचे है। इस काम्पमें उस समयके भसमिया समागका बीवन और समाव-मस्पाका बना विवरण मिलता है। असमिया साहित्यमें यह एक गोर इति है। पार परिष नामसे उसका दूसरा पाम्य भी हमें प्राप्त है। रामसरस्वतीने-महाराणा नरमारायणके बनरोपर गपरेवत मीत मोविता मममिया भापान्तर गात ही मानिस मोमें पिया है। मनम्त मदनी भी चकरदेवा समकालीन कपिपा। उसने भी पीकर- बके बनुपहसे ही महारार मरनारायमको पर सभा स्थान पाया। लोगेका विश्वास है कि ममरस्वती बार बनम्त कममी रोली एक ही पति कहते है कि इसके रस नाम और राममरस्मती तमा अनन्त पदमी उम्ही रम मार्मों में से मामये। बनत करतीने मी पकरबसे बप्पर वर्मकी बीमा नी मोर पुरके मारेगमे मी मानवतके दाम या मममिया सपान्तर किया। इसके बनाया एमने 'बुमार र काम और मीनार पानाम प्रवेग नाटक मिले। यह माटप श्री करके मारकटिका है और मार भी उनका मार अममिपा समारों होता है। कुमार पर काम्पकी भी करके रसिमको काम्पमे तुममा की या सक्ती। बात करनीने अमन रामापन भाममे एक मषिप्त रामायण भी हिती दी। मानाम भट्टाचार्य पप्पर युगमा एक विम्यान पार पार पग परमे भानपा और बारका भीमबरोबमे रमने नव पर्म कीतानी। पीकर साप पात और गण धर्म मपाधी हानेमाने पापा बह पगतिहमा और बाराममोपना यया और पार निरालकि मशीन पर उमने पात्रों पापम्पयन रिपा। पांच वर्ष तापही राने पापा मार मानोपान पर पह सोमनौरा और तुरनवप्नवहादया। पारापमाम ही उमने पदमपुरा सममिया में अनुमारिया पा मोरपामाप पवार भागवत पुराम भविष्य पुगगमा बमबार रिपा। उन पीपरागीरनपरिष भी मियाहै। पीहर पली भी परमासा एक पपिपा। पहपी परदेष पानमानीन या मार पी मरेर उमरोबानमामो भी पे। मन मोमिए

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१२ संग्रह मारि पम्प सतमे निवे। इनके मनाया उसने भक्ति लापतों का बसमिपामे मनुवार किया। प्रसममाता मोर मुरबमारसी नामकी यो पुस्त उसने पप तिवी। मोपका गध-साहित्य माधुनिक भारतीय भाषाकि प्राचीन म मर्कोमेसे है। मामुनिक बसमिया मच-साहित्य भट्टरेको गप-साहित्पसे बात भिन्न मही है। मटरदेखके मा-भागा और कहा-मीठ अपने समपो पर साहित्यका उतष्टतम नमूना है। इसके अतिरिक्त रसुनापने कपा-यमापन मामबत भट्टाचार्यने कमात्र इप्पानन यिने सत्तिकसन और परगुपये कमा पोपा तिवी है। इन सबकी देखन-समी भट्टदेवकी जैसी ही पोहै। गोपान माताने मी कर मायकी परम्परामें 'बग्म माना' और उप समार नामसे रो नाटक निहै। माटकोपी भापा देवनेसे मानूम होता है कि गोपात माता एफ बना मेवर पा। रामचरण ठाकुरले मुरापरित का धार परित मिवा बा। *सा मामसे उसका एक मादा भी मिला है। गि भूपचने मनामित उपाम्मान नामसे इसप नाटक लिया है। प्यारि ठाकरने मुसिह यात्रा और स्पमन्त हरण नामसे रो नारक मिते है। इन नाको मार वा सेती भी कर-मापकी कोरिकी ही है। स्मारि गारने 'गुरु परिष' नानसे भी परिवारकी एक विस्तृत गोषनी मिव भी। यह पल पप गा। पुरपोत्तम मियावामीपने १५९८ बाबपास प्रयोग रल माता मामसे एक सम्मत-पाकरम निता था। संतरा पापाको सहर ही में बोलने और समाने गेष्यस पा मारष निता गया वा। इसी हानक गोपाल भित्रने गीता-माबगतके चुने हुए तो मममिया स्पान्तर पर बीपा-रल नामसे प्रस्तुत पिया। इनके अलावा पंतपुरमा महिपानुर बम परप निम्पग भारि प्रपनी मिते। मोबिर मिभने पीना पचम पावरफर गीता माहात्म्य' नामर प्रब प्रानुन पिया। पीमिम मिमपर श्रीरररेषा प्रभाव देखा ताई सरी मापा रमपुल और बनापूर्ण है। माहीम मद्यार्य मलायम रागाना ममा पगित पा। मार्गीप पदाचार्य मी परोपका अनुमापी बा और रमने भविष्य पुगन स्पर्म गा एप्प और मानपनी रचनापीबी। स्वर्ग में अपनी जीवनी साप-माव भी मंगर गारमें भी गलेत पा। मारि मना पीताम्बर पापम्पने रिगर परिभाषा समिया मनुसार पिया। विपद पसभा भीम अनुलिपिया ममा पा। रिवाजामनने भीम परा अनुयार मोर पानानिसा रामायण पी सपना दी। मापीमा nि मामा भगाने महामारना 'समा पर्व गौर होग पर्व सभापानररिया। एम गौ गीपनी मागिपी परम्परा भी मनमिया मारिम्भमें बम पड़ी। मीनिया गार ही मानिस गीनिमोपी तरह महीधी। ये गोपनियां मन- मामक महून मारधर्म- मुखमममम ही निधी माती पी। टम ममय इन मीनियाँका पनि पहा नाता पा। परितकारोंमें सिषम रामवरण टारर, यारी या, रामानन पिर माश्राि नाम प्रमुख हैं। विभूषभने पर परित्र मार ममामिन उपाध्यान नाटक मितरामचरण ठाकुरने मकर-मापा मम्बार एम्यबारी भक्ति पम्प कमपर'मामकमारक और फिर परिण मामानीवनी मिनी है। प्यारि राग्ने गुण परिण नामक पत्र मिडा। निममें भी परेम और भी मापपरेव दोनॉमी बीवनी है। उममें नृसिंह यात्रा मार 'स्पमान इमरामार मी नित। रामानन्द गिरने पोकरण मोर मानी पुरिया मामाकी गीपनी मिली। इस नामक मन्तिम मापदं प्रौमा-बापत पुगपके विभिन्न म्ममांका मममिया पधर्म पानर हुमा है। मामचन्द्रने उमा चतुर्म म्फर का रूपान्तर और रामाचरित मिना। हरिखने पंचममा का अनुवाद किया। मनिम्मने 'चतुर्ष मोर पंचम सनों सम्परा मनुवाद पिया। पोपाम परममिगत तृतीय और अष्टम सन्मका पानर म्मिा मनोबने मायबरे मबम म्परा बनगार किया। इसी प्रकार महापुप मी पेपर रेसने भीमदमारमतरी यो परम्परा बममम म्यापित की भी उमरी परम्परा निम्मर पमती रही मर महाँ पना भालोपनको मोबन मिलता हा। "मी ममप पुस्पोम पम्पत्रिने दीपिका छन् मामक पम्बा निर्माण किया। इसमें बाझप मौर बार अमन पनन खिाकर प्यन धर्मरा प्राणाय निाया गया है। मने प्रयामन नामक एक दूसरे अम्बी रचना की है। स्तर व पान भक्सिमूना प्रन्यो ममामा मरे विपकि कार मी प्रम्प मिले पए थे। पगित ग्पोतिप स्मृति मारि विपोपर भी पम्प लिये पए। भीपर कालीन म्योतिषका माम्य बग बाम कायम्पने मातातीरे गभित पापा मममिया पानर म्यिा है। नीमावतीका मनुवार रिताबा भगरी' नाममे प्रनित। मोतिप पूपमपि नामक म्याविप पम्प भी दम ममप उपपमा। पीनाम्बर मिसान पामीपने कौमुदी मामम १८ मा स्मृति प्रम्पपी भी रपमा पीपी। गरपीक नमूनेपर एम ममम अनेक मोठारी भी रचना हुई थी। इन पीमिंग्रह मानक निकम पुर। उत्तर बेमव कात (११५.१० से १८२५० तक) मायाम और ग्ला मकान बीच विशेष पमे पा मगर है हि यह बि पातमें रणव-मत्तिमोगरा ही माहिम्पम बोनानामा यहाँ उलर मान मरा गोर मन होकर पवित्र रिपर्योषा प्रापाप बपिकोने नगा। रिनु सा पर्प यह नहीं मि पाममें पत्र प्रमात्र एा ही नहीं।

वैष्णवकाम साहित्य क्षेत्रम मोटे तौरपर रो प्रमान ममनाये गए थे। एक तो या पाकिमी पहरमने भागवत पुराणके मापारपर विवरण धर्मका बार साहित्पके सामने रखा दूसरा ममप मा-भट्टोपने बाप गरमीत प्रविपारन। उत्तर प्वय कानमे इन दोनों नमोका विकास हुमा । समूचे असमपर धीरे चौरे माहोम पासनका स्मापी विस्तार हो पाने के कारण मी असमिया साहित्यो पिस्तारमें मुपिया मोर भनुम यवस्था प्राप्त हो सकी। बत इस कासरे साहित्य लिए विभिन्न विशाओमें मप्रसर होनेके निमित्त पस्वा पुन गया। महामारपके विनित पर असमिया बनुमापका इमरा और इसी कासमें प्रारम्भ हमा। सापर बहिन बनपी बाधारपर धर्मपती बम नामक काम्प-र की रचना की। विमुराम निगमें 'रावार पंचकी रचना की। सिप्ट भट्टाचार्यने समापक मापारपर 'पिमुपाम बर्षका म्पान्तर पिम्पा। रामोर रासने 'प्रोमप' पास्म पर्वका गौर राममिमने भीम पर्व का मनुसार यिा। कवियन मियने परापर्य और मम्मीनाव गिने पान्ति पर्वका अनुसार किया। बटायनी पतालीम पृथुराम रिमे महाप्रस्मानिय पर्व और मुपस पर्वका मनुबाब रिया । मनन्त ठाकुर माताने महाभारतसे हरफर भीराम कीर्तन' और 'प्रेमलता की रचना की। उसमें विप्न और राम दोनों बगता बारेमें बर्मन है। यह पमारन पिम्- रामायण की वह सिती गई है। रनाथ महन्मने रामायणको पप निवनेका प्रथम प्रमल किया है। रात "मग्य' मोर मात रामापग' मामक मोरोपंच सिते है। रमुनाप महन्त पणित पति और बा रामायण नामक उत मय पमान में कमान साब-साप भाग भी प्रतिपारन किया है। मगर उसके पार पण ही प्राप्त हुए है। भाषि अपोमा परम्प मौर किष्किा। यह मून रामापनका संक्षिप्त मनुगार। क्या- रामायण बामनिया पप-साहित्पकी गवतामें तीसरी कमी है। पारंपारने पप-ममी पच बापान यो प्रारम्नलिा वा भट्टरेवने रते ना भूमिपर स्ापित प्पिा और रघुनाथ माउने गम्भीर मौर बार प्रमान मापा साप-नाम पोम् माषा वारसे पहुँचाया। समापन भावारपर बहुत सारे द ग्न समय मिवे पर।पारामासने “माता बनामी रमाकी। भरेर चिने भावीप पर तिमान पगिने उपर नीति-रामापपा नमूनपर 'मंपर रागारमा रचना की। भमरपने 'पमा परिमारा मनोररी मनिहरम को बना सिम नुमानके आप प्मोक्तिी पारगार विहरमा पर पिया गया है। राम निपने बादौन चागो मारेर भीम पर रि समालोपोम' बोर परमरिक पपा परित'मा पपानुगरपिाहै। रामनाप मानने नम मुनानी मामा रेणा मन मम्बन्धी पम्प लिया। रामम ११ गरपाम मोहाते हरप्रीष माधवर याम्यान और योमिनी-सब मामक दो सम्पमिन कोप रागामोशी द्वाही माहोम गाबोंने भी मममिया साहित्यके उत्मानमें पोरान रियाह। माहोम पासा पर्म गुस्से बहुत दिनोंतक मपना स्वतन्त्र मस्तित्व बनाए रखने में ही प्रयत्नगीस एा। मत इस कानमें उसकी पृष्ठिपोषान्ता माहोम मापामें ही अपने रस्तार गौर पामन सम्बन्धी यस्प पम्प सिवे। मिाहोम सम्परा पर विस्तार बड़ा और इममें यब प्रौपता माई तो पिपात पनममूहके ममावी बाव रिलता मोर गाबा नही रे सरा। बाहामों को अपनी बम-भूमिका मोह सराफ लिए छोड़ देना पड़ा मार मपने पम्पके दिमाम बन-ममूहो सार मित जाना पड़ा। इसी कारण मसमिया साहित्यकी उम्नतिमें भी उसे हाप बेटाना पड़ा। माहोम समायोंमें मसिंह मौर पिबसिह भाप माहित्यके प्रति अनुपमी से मौर रमकी पृष्ठपोपतामें मसमिया मापा-माहित्य पपेप्ट उमति । माहाम राम-समामें एवर्त पुराण मीच माबिन्द पम्पमा बारिधर्म निरपेश पोरासमारमा परोसोनों पनि गीत-मोमिन्द मनुकरपपर मममिया मापा कविता मी पी पी। मिसिएकी करिताको सलामीन मममिया साहित्यमें ममा पान मी मिना है। इही गाहोम पनामाफी पापकवास मीत पोपिनका असमिया एनम अनुपाद कपिएम पनि किया। उसीने रानी पूर्वपरीकी मात्राम मंबा पप-काम्य' पनी प्रमपरीकी मात्रामे परत पुराम प बात पण और मन्ना का मी अनुमान किमा। संसाम भी ग्सम गिग उत्सपो बारेमें एक रिवरप प्रस्तुत छिया पपा है। मास्पति नामक ससत म्पोतिष पापका भी मनुमाव रमने म्मिा। इस कानमें पुराति बनुगार सम्बन्धी एक नया और भी प्रारम्भ होता है। परमात पुण्पो अनुमारके समन्वमें पहने ही गम्मेव भिमा मया । पर पुपमका मही प्रथम मनुगार है और इसके पहले हम पुराण प्रतिपारित रिपा असमिया रामायण और साहित्यमें बिपि स्थान नहीं पा। सबिमार कन्दमाने मासिक पुरान और 'माईगेम पाणी मनुगार यिा। पाली गनुपार ममप उममें करित पुरान' वामन पुरान' मौर 'बएरर्त पुराण में सहायता मी है। मागेर पाक मनुवार इस समय हए। रंगनाब पी मामून मिम इन दोनोंनि उमरा अनुसार पिया। बिहार विधाचन भट्यानाने हरियाणा मनुषार पिया। मनन्त भाचार्य मानत नही मामा पाप्प-प्रत्यकी रचना की मार हिर मुम मापने धर्म-मेगार नामक एक एपी रखना है। पुपोर मनुवारका मो सिममिता इम ममय प्रारम्भमा उमा मनुनार मापन निमन विष्णु पुराण मोर मालत तव मा पानिरामने यम-पोता का परमपम बनने सम्पूर्ण विष्णु पुराम और धर्म पुण्ण का पम्पोरिन्ने "माग पुराग और पिम पुरुष १ बतोराम सिने या पुराण' कप मा दुर्मेस्वर पिना बावर्त पुषको 'प्रकृति का भूगनेसर भारम्पति मिपते रहनारदीय पुराम का असमिया अनुसार प्रस्तुत पिना। वैवर्त पुरारक इस समय बहुत सारे मनुवार प्राप्त हुए है। माहोम पर-पक्रिने रामपुणपोमवारी पूपिकीपीमियमें अपने मात्र मत पटियर भी। पुरापति म मनुवादोके वापसाप बनेड भनियोने पर विभिन्न मनाएँ मौकी मीहम बिना मनुवार बार मौलिर रोमों प्रकारेकी पनाएं निमती है। इन रचनाही विषम-वस्तु रमा मतदारपोरम पनि मतवारोंकी पुष्टि। एकान्त भक्तिका मापाप आदि विभिन्न प्रकारीता पौ। पी कारेको परपीत और भीमावरदेवी पोपा बारपर र पारे पश्चिममा मीत भी इस सयम सिवे पए। ससस साप-मार हिन्दीसे मी बार कार्यमामा। हिन्दी काय मुपारती मधुमालती पापुरी बार पन्त्रागमोम बाप इसी समय पाया गावा है। मो बतामा राप-परितमानस मप मगार भी मी कान पाना माना है। एमालदरका महामोह पब मन परम्परा एक रस्मेय गोमा पपई। यह पर काम्प निदर्भ पाए एक पुब माम रिवाया पमा । रामाननावी नामक एक नाटकका भी उम्तेव मिता। समावमी और परिणाम प्रकार भी भी ममप पोप नपा हमा है। पानिर्मो परमानो' प्रमुख है। राममके निगरपसार सार सामाजिक बार निकमधामका भी उस्लेब म निसार परमारमास मेवा भूविज मा। रवि शिरले रामगंगामाती मिणा रामराव रामपा नानौता मीनारामा पामोरा व परिम, HAAR Tम और मीराम पशुपषिका पौपाल बार परिष सामान निका 'समापी पर रित पाना बंधीपोपान पर पति बपरीच हिरा बदेरर परिष मिपावन गाता महर परिष मारि विभिन्न पर धार्मिक मामाकी जीवनिया ए समय निती परी मी पोपनियां पप बी पिन पत्र्य मिदिन एक पण सुपरिण मी इस मामय शक है मिरा पामर या मूरपनि बह एक रियान पुर पलि बगिन मौनरदेव और भी मापारेरी बीवरिपबिमारा रम ममरे र सोमनमानमारी भागरिक भी मान होती है। समिरा ममापीन पासमा नमूना की इन प्राणदाई मि हाली नमा प्रति मागरम पोन भागमाइन निमिताप मारलापानमा मन पति गोपिरामरामन्ननगरमा पाप पीनाममा सम्पराप और पापा ममेरा परिचय पाया गाता है। मप ममापी बच्चे निपिन परघुपमकी कला पोपा में पास्मोपी टीका सात्वत तबका मनुमादप्मानन मियो पूर्ण भारतका पच पच मनुवाद पर पुराम भामक धामिन वाचारोंका संकसित इन्च भाबोध पर्माका नीतिमाकुर नामक प्रान्च भी इसी समय मिल गया है। मामिक बौर साम्प्रदायिक मतबाकि विभिन्न प्रकि अतिरिक्त इस काममें सम्पूर्ण सांसारिक विपर्योपर भी यसमिया पन्य पे गए हैं। इनमें बहुत सारे पच ही है और उनका मनुवार भी हुवा था। पयिक विपोमें सर्वप्रपम मसमिया पचका म्पबहार हल प्रत्यकि माध्यमसे हवा है। इससे पहले केवम धार्मिक मौर साम्प्रदायिक विपर्यो ही प्रसका साधारणतया म्पबहार होता था। कामीनावका बंपर भार्या इम समयका नस्लेखनीय पन्नई विसमें मक गणितके असामा बमीनको मारपोरबर्गफल निकालने के निपोमा उस्लेबाहे। सुभकरके भी हस्तमुक्तावनी मायक मनुवार अपमें मभिनयके समय प्रयोजनमें मानवाती हस्तमद्राोंका वर्णन है, विसमें पाप-साब मुद्रामका चित्र भी दिया गया है। मून सम्मत स्मोकोका उदाहरण के साप अनुसार दिया गया है। बाहोम राग-रानी मम्मिमादेवीके बावेशानुसार मुहमारपरकाने हस्ति विचार नामा प्रबका प्रगपन किया। यह भी चित्रयुक्त प्राव है बिनका मान दिलबर और दोणा नामके दो चित्रकाराने निमा बा। इसमे हापीका मर्दन उसके रोग बौर निदान और उसको पामतू बनाने के तरीकों चाबहै। इसमें किस प्रकार हावीपर किस प्रकारके बावमीको पाना चाहिए, इसका भी रस्नेव है। बसमके शासकों द्वारा मधिक संम्मा हाबीका उपमोम किए भाने कारण ही इस प्रकारके नमूस्य पम्पका प्रपयन उस समयमा पा। मोक रोप बार निधनके सम्बन्ध भी बोका निशान' मामक डम्ब भिवा पया है जिसमें पोकि प्रकारके बारेमें भी मस्सेव है। इस प्रबके मेबहका मबतक कोई पता नही पमा पगिक विपर्योपर मिले गए ममरन तन मामक मोरपनाषके मामके साप बोइए एक सय ग्रन्बा बनुबार मी बसमिया इमा। इममें बनस्पति और बीपपियोंके बारेमें रस्मेबके साप-साब फरारा पार्वतीको बपने बपमें रखने के उपायों बार्पग स्तम्भन मारम माविका विस्तृत पन दिया गया है। हर मौरी सम्पाद' मामक दाम्पत्य जीवन पर निता गया प्रम्प भी ममम रचा गया। इस काममें सबसे महत्वपूर्ण साहित्य हुमा-दुरंगी साहित्य मिसमें माहोम पासनका धारावाहिक विवरण मिपियर किया गया है। यहातिहास साहित्य बसममें पहने पहन माहोम धासोने ही प्रारम्भ किया था और मुझमें यह साहित्य माहोर्मोकी बपनी रपगातीय मापामें ही लिखा गया था। मिनु बाहोमों का बसमिया पातीयता बीर भारतीय सनातन धर्म-प्राण करनेके बार यह पुरवी साहित्प बसमिया मापामें ही मिया माने जमा। यह रंगी साहित्य का विस्तृत है मौर माहोकि बसमपर हुए रात सौ बोके पासनका पारावाहिक वन इममें मिलता १८ है। मह बरंगी साहित्य की दृष्टिकोषोंम महत्वपूर्ण है। पहली बात तो यह है कि घका रामनतिक निहास मिमनिमेवार प्राप्त होताई भो तत्कालीन सम्ब भारतीय साहित्पर्य नहारे बराबर है। दूसरी बात है कि इन पुरबियो परिए असमियोंमें एप्रभार पमर्मविक साहित्यको मुष्टि। तीम पाकिसमिमा नप साहित्यका एक मिनसिमेवार निकास इसमें मिमने नमा। गोभी बात है कि राजनीति मनाना सामागिल साहतिक माषिक और धार्मिक वातावरण भवा-गोवा प्राप्त हो सका। पांचवी बात है कि माहोमोके साग असमिया मोर बसमकी सीमाओंपर बसी दूसरी उपमाहिक समानाका परिचय प्राप्त होता है। बसमिमा पापा-माहित्यके लिए इस दुरजी साहित्यकी सबसे महत्वपूर्ण बात मह हुई कि एक सबम असमिया भापाले निर्माणमें इसका असमियेवर मापामसि स्पताल पसे पम मोर बपिम्पमिका पाम किया गया। इसकी पापा पम्मीर, परेतू गौर अभिमंगनापूर्ण है। पुरगी साहित्य पुराणमममपुरी ही सर्व प्राचीन माना जाता है। सर्व मायबरेव महापर पर भमरमाप नामक अन्न मतम दुरंगी मानसे प्रभाषित हुमाई । 'पाटाह एरंगी में माहोम-मोगमोके सम्बाके बारेमें गनेव है। माहोम समर्मयोगी हरकात बतायी असम पुरंगी पोनापारका तुमचाया पुरती कपारीपुरंगी जमन्तीमा पुरजी पिपुरापुरती मतम रंगी गौर काम पपुरंगी बजार प्रापित हो। माहोम सम्पविमपके समय बहुत सारे पुरवी पन बमा रिए पए मिण वा प्राप्त प्रसापित और अप्रकापित दुरंगीसे यह कहा जा सका है भिर भी उसका पिशाम साहित्य मागिप्ट है। इन प्रकार उत्तर प्पामा बामिया साहिब अपनी स्वाभाविक प्रगति पपरमासरहा। मसिमबार हिन्दी साहित्यमें जिस प्रसार पति सामान हासोम्मुत साहित्यात मग्न हुवा मा कमसे कम विपस्तुपी पिसे भगमिया साहित्य पेमामही हमा बस्कि पर कामते मुसहोदर लर पर पानमें अनमिमा साहित्य विमान रोग र मापापा और जीवन में भागापा मभी विषपाकी रचनाएं होने मपी पी इस बात एक प्रभान मालीम विपर है- पचमालिप धीरे-धीरे हान और मध माहित्यका विसाम। मममिमा पापा सारियो मामानिकपमै अपना को प्रपतिपदी परि पाप बाप माम मा पमी ती दो बाररामानिमममिया माहिप और ही प्रारका हता। रितु मी मन् १९२९ में मिगौरा मामपर अधिकार होने पापा अमिपा भाग-नाहियो नि माग्मिा भूमोगुरा विमा उग पारप पामाथि निराम पधाम माम पीर मया। [मोर-१२ मे भागा मनमिया मारिया संमित्र परिष तरी माना- अममिपा-अमिनोगमा सो रिया पाहै।]

रघुनाथ चौधुरी [कवि-परिचय]

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रघुनाथ चौधुरी सम्म तिथिबचपन पसमके भयो कविमेंसे मेष्ठतम बिहंगी कवि पी एसुनाप चौधुरी का बम्म २. बनगरी सन् १८०५. पुरणार, पुस्ता चतुर्षी पनेस पूषाके दिन कामम्म रितेने (मसम एम्मके) अन्तर्गत माजोपाय नामक मरिमें बा। उनके पिता स्म मोनानाप पोपुणे एक पनी किसान से मार सन्ने बाम में मोबानाप हो। नौमुरी बीकी मावाका नाम या नवा बीपुरी पा। ये भी बति क्यापील और धर्मपरायमा पली भीं। पौदुरीबी बपने माता-पिता की तीसरी सन्तान है। उनके एक बड़े भाई और एक बहन पी। करिके चम्मके दिन ही कुम पुरोहितने माकरस मोनापारीसे कहा था- 'तुमारे का यह रघुनापई। रामचनकी तप यह भी तुमारे का नाम रोशन करेपा।" पुरोहितनीकी बात सब निकली। नग-पत्रिका मनुसार पिका नाम पा--सोमनाप पारी। मेलि पुरोहिनीको मषिष्यवानी के साथ उनका पिया हमा नाम भी चोकप्रिय हो पाता। मौर माग करिको “पुनाप" नामसे ही सभी जानते ई-सोमनाप" नाम दो मन-पत्रिकामे ही पपया। कामिका बचपन बहुव्ही इप्टपूर्ण पा। बरामदेसे मुम्मार गिरणाने कारण माहिना पर हमेमाके लिए बेकार हो ममा गौर बायां पैर मी यगत कमजोर हो २२ पया। घर माप मी महीने के पी यह दुखद घटना घटी। विधिको कोपवृष्टि लनेसे ही पात नही हुई। पर बाप पार मर्पके सभी मापके दोनों भाईगाम इस दुनिमासे पत बसे। इस घटमाके एक महीने बाद ही मापकी मी भी इस पुनिया मपी। पिता व भोमामाप पौधुरीनी पायम हो गए। सने-सम्माधी मार पड़ोसी पारी मामाद बांट मेनेकी कोपिप करने मये। कषिके दिन बहुत ही कप्टमय हो परे। पमपाताल नामक पॉपके एक सम्मममे ग मापप दिया। भोलानामनी भोपुरी बा समस्याए, तब कपि वीपुरीको फिर अपने घर मे गए। शिलामीमा बाट बर्षकी मयस्मा पनने योग्य नही ये मत कमि पीपुरीकी प्रारम्भिक शिक्षा परमें ही हुई। कपिके परिवारको सम्पमस्मा देवकर मोमानापनीके मित्र म वामपम चौधुरीमा कपिको अपने पर भेमिहारविमा से बाए, और पहसि रहे वानारामजीके पुत्र स्व यराम पौधुरीके पास मोहाटी पापा रिया। पराम चौधुरी रमापगीको अपनी सतानकी ही तए मानने मये। धागतम पपि इस पर और परिवारकोअपमा पर और परिवार ही मानते माए है। असम स्का मार निमाम उस समय अपमा मापा प्रपमित बीर कपि गुनाप पोपुरी एक मिश्मि स्समें भर्ती कपए पए। पैर के कारण निय मित रुपमे सनम हागिर नही हो पाते थे। फिर भी पिपरीवाभीम पानही पे। नापिक परीभामे ये सर्व प्रथम या विवीय स्थान हमेसा मेते हो। मेकिन एवं दिलकी पटमाने पिको स्मोपिला कर प्राविसे शिया भनेको वाम यिा। मामाकी छमाही परीमा पमितके प्रश्नपत्र ग म मम्मर मधिक निममा पार किमी पारण पपिनो सम्पाप ने मारपिगीको नही दिए। पौधुरोगी उसके लिए बार कामे नपे पो मनितो पिर बार बार ही प्रधान मिमी मी नागवार गुग्य। पपि साधीन मनमें निमोहकी चिमणा बाप ठी। पपिपीपुरी बी भापकर गपुर पहुंचा पामिरे पिमी तप मोहाट मोटा माए गए। मेरिन अपने पिता और पर्पराम पोरगी समभामे-जाने पर भी न मानेरो एगी नही हुए। कपि पिता मनोसामाग्रीको यह बाल नही पुरी नगीऔर उनोले गुम्मे बार एरिया- मायने तेरा भूमही पा। फिर भी पविमटम पे। बY मानी माते ही परिवार भोपुरीली मी तिमाघ मनाना। बापत्र बाम पनीरन ममाल होने पर दो पीपुरोगीकी प्रातिक नारामाराममा। मम्मामो मार-माषमाप्रपन भीमानेनगे। मातीपरी ही एक प्रापमिक कन्या पाठमालाम चौमुरीनी मध्यापनका कार्य करने ममे । करिके इवयमें मानव पियों के प्रति एक नवीन भावना बामृताई। घिमुमाको ममाकि निए “मना" (मैना) नामकी एक पत्रिकाके सम्पादनका मार मी पौषुरीगीने अपने हापम मे लिया। पधी मीच वावगीके पितानीका मी रेहान्त हो गया। संसारम मन उनका कोई नहीं रहा। सभी एक एक करकविको बरेमा होकर बमे मए । बीपीगी पिताकी मृत्यु संबारसे अभिभूत हए बत उन्होंने पौहाटीमे बाहर प्रेसवमा ही पमेका निरचय किया। सेषिम बनाके मामने रविको बही नही पाने पिया- पएबम उनै गोहाटी मारना पग। गौहाटीमें बाकर इसबार कृषि सामागिक कार्मोमें जुट गए। बासफर समीत-मनुष्ठान पुस्तकालय स्थापन मत्रिका प्रकापन भारि कामोमें निमपस्पी मेने भने। सन १९.१ में मममके एक मात्र सरकारी ऋतिर म कॉलिनको स्थापना हुई। इस पनियो उपाटन समारम्भर्मे करिमाने "बाबाहन " मामक परचित कविताका पाठ यिा। प्रारम्भिक अवस्थामै सिक्षित 'बाबाहन' कविताम प्रकृति-संतान मसम माताकी अपस्प प्राविक प्यायमीका गर्भन कपिम किया ता। कवि नम्र समम गोहाटीके प्रायः सभी समीवानुष्ठानामें भाग मेते थे। सन् १९१में सत्यनाष बराके सम्पादनमें "जानाकी" नामक पत्रिकाको फुमारित किया गया और चीपुरीबी इनके सहायक सम्पादक नियुस हुए। स परागीरे सान्निम्प मौर "मोनाकी सम्पर्कम मार पनाम चौमुरोगामी साहित्य-म्पदा प्रबल हो रही। सन् १९.४ में कमि स्वर्य कपात्ता भार हामय मादि संग्रह कर माए थे। मेक्नि हुप अनिमार्यकारण पप मोनाकी का प्रकाशन मन्द हो गया। फिर मी “पानाकी" (मन) ने बसमिया साहित्य एक युगकी सृष्टि की भी। सन् १८८९ में इसकी स्थापना स्व चाकुमार अमरवानाने कममता की पी। मन् १९१ में मी "मोनाटी में पक्किी “मरमर परपी (पारे पछी) नामक पिता प्रवामित हुई पी। पानीपुरीमीकी पविताका प्रथम मापन पा-पहमी प्रकासित पविता एक पीको मेकर लिखी गई बार मन्तम पार उम्ह गिनी कषि ही कहा जाने मपा। पंछी बीवनको मेकर जिवनी कविताएँ कपि गौपुरीणीने मिची-मुम्भकर किसी भी भारतीय मापारे एक भी परिने उतनी कविताएँ नहीं लिवी होगी। बोनाकी के मतिरिक्त मौर ई पविराम्रो सम्पारनमे भी माप सम्बन्धित । मन् १९२३-२४ में येनमें निकलकर मापने "माना" नामकी बान पत्रिपारा मम्पादन किया था। मन् १३३ में भारडे मम्पादनम ही सपती नामकी पत्रिका निरनी पी। बोनाकी ने भिम तरह बममिया माहित्यम २४ रोमाटिसिग्म (Romantucum) का मानोत सम्पात किमा था। ठीक उसी वह बसन्ती में हमारे साहित्यम मामिक कविता" का गोर किया पा। रोमाटिक परे एक घेष्ठ कवि होनेपर पी माधुनिक कविताको इस नए प्रोत्साहन देकर करिने अपनी पाखा मोर प्रपतिपापी मनोभावनाका परिषय रिया है। असमिया मापाके अधिकार माधुनिक कवि समन्ती पत्रिकाकी ही सृष्टि है। वीन वर्पक बार अपनी भी बन्द हो पई। बारको काम सुरमि' नामकी और एक पत्रिकाका सम्पादन करने गये। पत्रिका सम्पादनकी पह अन्तिम प्रपेप्टा थी। मकिन इसमें भी सम्म नहीं हो पाए। तीन वर्ष पतकर मुभि ने भी असमिया साहित्य संसारसे बिरामी। फिर भी पोरीगी हतोत्साहनहीं हुए। भार ४ बर्षकी इस प्रमावस्था भी पाहाटी सबिता सभा (एक साहित्यिक संस्था) एक रनकोटिको पत्रिका सम्पारण की पनाकर पहै। पपिका सम्पादनको तह पुस्तकामगोपी स्थापना करने में भी पौरोगीने उत्ताह रिवाया। सन् १८९२ 1 में पुस्तकालय स्थापित करनेका मापने पहमा प्रयास किया। सन् १९९५ में इसे स्थाई सरिया-किन सन् १८९. निराद भूकम्प पर मोर पुस्त सभी भूगर्भ मिमीन हो गई। सन् १९४ में स्थापना पौहाटी पहर एक माम समा बाफने युनाई थी। इम कार्योको करते हुए भी कपि चौपुरीजी महामहोपामाप पारेपपरापार्य और ममिती परित मानापमा संसर्प बाए और संत साहित्यमा सामान करने लगे। उनकी कविता तलम ममों ही उनके सम्पपनसीन मनोवृत्तिा परिषय मिलता है। कविक जीवन में पावर निरापानक परिस्थितियां पीही। पपरमें माप संगहो पए, भाई-बहन माता-पिता-एक-एकर सभी पन बसे। सनी पिसारा भी बन्द हुमा- गिक अमिषारणे कारण पत्रिकाएँ बार हो गई। प्रकारे समापसे पुस्तकालय मिनुष्ट ए। मममी मौम्य में भी यही सम्पपस्या हो। सन् १९९५ में असम सरकारने दो पायामाको बगर रिवा-एक श्री महामहोपामाप पनि परम्परापानीको मनिगुम मापी संसत पाटमाता तमामरा रपुनाप चौपुण्यम्पारनामा बानिराला महामहोपातीने माना तर बीसने पपाम और पोरगीने पाप से दोन परेपरलेकी सारमे बनी दी। ससारमै बेतन तो गाया ही मही परन् सन भी पर रदिए। इनसे पोपुगीर मलो गुलही पोट पानिममे मविप्प सरान वरारी सरपौन मनोतिराधिकरम मपे। सरकार मान्दोमनने मेर बारेमाप्रतिभाग मानोरमता राममोरिलमानोरनो पारीती में सपिप माप निपा! रिमी पौधरोगी रिनी भी पति न मानो सरस्प नहीं बने। साहित्य और भारतीय संसतिक एनिष्ठ सेवाको स्पर्मे ही राष्ट्रीय और मानवीय समाई रमाके कारण ग्न मान्दोमो साप मा मिले। स्वाधीन पित्त उपर मनोभाव मिनु सुनम मायेप प्रबनता हंसमुख और मी गोमी रसुनाव भोपुरीगी भाकर्पक गुण है। सन् १९.१ से १९ ७० पीपुरीगी मतमा प्राममें रेती-बाड़ी में चुट पए पे। अपि जीवनके साप ही उनके पिपानी मनको बढ़ावा मिमा। सन् १९.८ में सरेपी माम्दोमनमें भाग लेने के पौहाटी चमे भाए गौर -मस्तिके संगठन कार्य मय गए। उनकी भागमयी यातासे पत्र सक्ति बात ही अनुमानित हुई थी। सन् १९११ में गर्मन पावरियोन गोहाटीमें एक माम्पमिक सनकी स्पाफ्ना की। पुमान गौरी उस स्यूमके एक पिक्षक नियुक्त हुए मेकिन यहाँ भी माप प्पाषा दिन नहीं इसके। सन् १९१४ के विम्म मुरमें रस स्फूमके सभी पारियोको मप्रेस सरकारने गिरपवार कर लिया। पतस्पम्प स्त पर हो गया। बापुनी फिरकार हो गए। कविती निरास होकर फिर बेहतमा नौट गए मोर खेती बापि ही म्यान ने समे। नारी पीवनकी विफनवाने हो चौधुरीमी को हमारे सामने एक पेष्ठ करिके स्पर्मे नाफरमा पिया है। सन् १९१४ से १९२१ परमियान करिगीने स्तिनी कवितामोकी रचना की-असमिया साहित्य मारमें सब एक-एक मोती सम्पही। पहाना बनातवास मिस्टमके 'हॉर्टन पीरिपा की तरह कषि रसुनाप गौरीगीके सात वर्पके पि-चीवनसे उनके मनकी मुहमार मृत्तिको अधिक परममित और प्रस्फुटित किया। "देनतमा का मैदान परे पिए गरेपणापार “लेडी" "हिरा" और "सारी* मारि काम-सम्बोकी कविताएँ कपिली भूम्म निरीमन-सक्ति निवि उपनाम पम्मीर यस्पना बोर ममनशीलताका परिचय देती है। बेमतमाकी र भूमिमें पोस-बीग बोया गया बा-उसीका स्मृति चिन असमिया साहित्य के इतिहासमें अमर हेमा। सन् १९२१ में महामानव महात्मा गांधी के बसहयोग संग्राममें कपिने भान लिया। मतमा मायके निवामियोको स्वाधीनता संग्राम मिए, एकत्रित किया और मफीम बार करने हेतु सत्पाग्रह बान्दोमन म्मिा। हम अपपप सरकारने उन्हें मिरफ्तार पिया मोर एकसानकी सनद की सगा दी। सन् १९२२ में ये पेनसे निकले और पोहाटीमें रहने मये-जहाँ मार भी ह रहे है। समी समपसे मेकर भाबतक परिणी माहाटीके प्राय सभी सामाजिक मोर सांसारिक मनुफार्म सम्मिनित रहे है। माफ्ने कितनी ही ममामा सभापतित्व मिया-किसने ही मानपत्र स्वीकार पिए-उनका हिसाब देना पाठिन है। चौपुरीनीकी कवि-प्रतिभा प्रतिमावर प्रमितकर भामस्प संजीवनी सभा में पापको "कविरत्न" की उपाधि दी है। भारत सरकारकी तरफ भी गर्ने साहिटिया पेपन मिलती है। शिरमा।

។ सन् १९५९ में पाप मसम साहित्य सभा सभापनि पपके लिए ले गए। विष- पास्ति समिति द्वारा कममता सन् १९५२ में मायोमित बखिम भारतीय अपि समास सभापतित्व करिबीमुरोगीने किया था। सन् १९५८ को रनमी पा-काम्पकी पुस्तक "मबमस्मिका" प्रजापित हुई। चौधुरीगी बर भी मिचते है मोर सनकी अप्रकापित कुछ सपनाएँ मग बी प्रकापना तैयार है। करि पौधुरीपरी कविताका मार बसमसे बाहर भी हमा। हामहीमें अमेरिकासे प्रकाशित मिस-साहित्य पुने हए संग्रहमे कपिनाकी “बहामीर बिमा (महापीकी मारी) मामक कमिलाको भी स्थान मिला। उनकी "रोकी" माम अपनाप्पका प्रेमी बनुवार भी कर निपमा। कमि मागीमन पारे । प्रकृतिको ही अपना सर्वस्व मानर भिषाह करनेका विचार उन्हाने नही मिया। कपिणी भरममावस्थामे विस्तरपर पहुए है। फिर भी अनेक नवीन प्रपीक माहिरियकोला समनट रनके विस्तर चारों तरपसमा ही रहा है। दृष्टि पानि पितुन मही पी। फिर भी बोलीमे ही मामीको पापान मते है। मसमिया कृपा भारतीय माहित्यकी मान-मोकन नेके लिए भगवान रहें (यु प्रमान तिर्योका परिचय- रपुनाम पोरी अपने विचार्षी पौरनमे ही कविता करले बा पेर और ममीन उनी माहित्यिक मेला गाना मी प्रथम प्रमाणित पबिना 'मरमर पती "मन् १९.१को “बोनापी पबियाम निम्मी की। मीना ही सनाएँ पाममानुसार निम्मप्रसाद (१) मारी (पामा पविता संग्रह) १९१ (२) कोकी (पानाम्य )-मन् १९९३ (1) कारवामा भगवा मारम पाम (अमिमामर का काम)- मन् १९२२ (४) परिमरा (पिता संपा)-मन् १९९१ (३) बमस्मिा (पा परिता) १९५० मिपमाहिपरे महान साहिवागमनरंग और बहिरम सीमार बान मानापरा प्रसार गाय पाला है मा मदिरा निपपई हो ममा पाएगी पाते। पाएगी मममिया मापा मार और मोमोमस दापार वाम पामारमा प्रभाव पाला प्रिमरी अभिम्पमि सो पत्तिात्रो ।

२४ हमा। कषिका याम प्रहलकी मोपमें हुमाया। प्रामीम बाताबरपमें ऋषि बड़ा अपना कर्ममेट भी उन्होंने प्राानिक प्यावनियाम भरे बेसनमाको ही जुना पा। प्रति निरीलबम ही उनकविता मली प्रेरणा मिमी पी। चौधरी ने स्वयं या स्वीकार किया है। पपिपीपरीको म्हमी मिया बहन मधिक नही मिनी-गगी बारि मापाके पषित नही हो पाए फिर भी ये चिनुनतीम एवं मम्पयन प्रिम ये है। उन्होंने भारतीय पनि मौर मसात काम्यका मम्मीर मध्यपन किया है। ममत मापो समयनके कारप ही उनकी कविता तत्मम मममहमा मिमम बनुमासोंडी छटा देखने साम्प है। पषि चौपुरीमी अपनी कवितापर मरे किमी मी कविकी विचारणाराका प्रभाष पीकार नहीं करते। उनरा कहना है कि 'मेरी करिता गम्भीर सभ्यपनका नहीं बरित मूम्म बनुभूमिका ही फम । मैन प्रतिक रमपीम माम घूम-फिरकर माविको मिम स्पमें रेवा उमका ठीक वैसा ही वर्णन अपनी कविताम किया है। तारो मार रहिवरा (१९१०-१९४)ये गेनों किना संग्रह है। पुस्तको पर्मे मारी ही कविका पहला प्रयाम है। मारराम २८ और पहिलतराम २५ कविताएँ सपहीन है। पर दोनों मंग्रहाकी कविताओंको भााम बाट मकवे है-() बिहम बीपन नमन्धित और (२) यबायकी परहामि प्राति परक बिताएँ। पसागती ममी पौगोंके मुत एनमें ममभानी होकर ममीको अपना नेमें कपि गौपुरोगीको तुमना किमी दूसरे भारतीय पविम करना मुशिल है। बिग बीवनको मेकर ठेकी दहिसरा पाबारे ए बार मार मिप दियिनि- केकीपण भरमर पची' भारित गरिये करिने एक निमा मन्य ममी सामने उपस्थित पिया है। कपिने 'मरमर पत्री" को प्यारमे महा मूत्र बापनेकी पा की मी महिन कार बमलो पावर 'मरमर पानी “रिम को बन" (रके एक पन) पी वरफ भाम गां। रमी दिन परिका हाप पुग-वेदनाम फरने मगा- चाहें निकल पाई। जीवन मानापार्हो मि मुब मित्तम मापुरी पार । [इम बीवनम मिहन मापूरी मानवाला यह मुख किरमे मुझे नही मिनेया।] पिर मौ“प्रिय बिहमिनि!" मीठी मोना रवित मनर पुनरितो इस परिकनिए इस“प्रिय रिइपिनि!" मभर सम्म को हिप पान परराएं,समिनियों व मी गमत्त हो उठ। उमी मान से मार मानव सयम भी मामा मामाका मनप भर दिया- २५ मवासी मानव शिव पुरभि वोमाहेन प्रिय मिती पठियाइ दिने विधि सपीय इतर कडे दुधा सानि। [मर्पवासी मानसको शान्ति के लिए भमरामामी मेकर इतने में स्पर्मसे सिमावाने तुम पंसी मममोन निधिको भेगाई।] नही झा पसी रेरे पान्तिका स्पा और पातिवापाका प्रचार परमेको हो पुप्पीर माया । कविको भी इमाई रस पमौके साम पान्ति बोरोप जताने यि मुख दोभार तय गरि पम्मा पिपिनि। सिमे पापिय नुप नही पाहिए, पी भी मै नही होम्मा। मोबिपिनी मैं तुम्हारे साथ ही गपगा। “रहिवरा के सम्बन्ध असमिया मापा तत्वमेला मरमातीपण स्म न.पापीकान्त पाविनीशा कहना स्वस्पमिहीन भानसमोहिनी जोपन वोपिषी प्रिय मिहनिमी भारिमें सबिने मिलन मन माप । पक्तको मिलन बागा मापापित पर रहित माममा पेटममय इस समवसे पाठमिनन करानेका परम भी मापन किया। पाएकामविहीन में पिता जिसमें इमरोंकी एप्टिमे मोशन-पलेवासा पहा पक्षी पिक बापने मृतिमान हो रहा है- विमेवीस तहि मुटिन पि मोर मावि रमिबीर बमता अति या बोच frतुति मेरमति प्राप रिम । [गिती मैवतापों नही मार! टेरा स्प नही है-और पौर सपा मानि परपोष होतो पारपती या बनाता ? मरिन प्रि--- मेरी भापप्रिय है। पमा पराि माल प्रतिमामिन मा पनि पाते है--मार आप ऐसितारोष मारे अनुभूतिगीन प्रामा म्पोमर रमा। भोपाटी गिरिधानपके अमाप (Dean of faculty of ant) . रितिक कुमार बगरीने नामिए पहार-Nature which, up till not had scried onts as a decorative background, has been २९ जोरपा chosen, as a subject of poetry, for its own sake PTO" भेटप मन मनरको कोमलता मोर परिषतामे रिमुर करने की या कपिने की। पीराके स्पर्म ही पुका मागार" (पूर भागार एम) का माश्चर्य मिट गया। दूसरी तरफ निरी" पृषकी मौवनोतना कारप गरीर सीप हो गया है। परिकारी उपस्थितिमें ही फस-फूल पेपा बौर पमी मावि समीम मानवी हमोर उठने ममी है- चाइ प्रपयर पानेकी बिगुम पनि बायो नि येन समतोमन । [ने प्रथयका निर्मन बार दिखाया है। पिम वरपरेला-याही नया नगर माना है। "कनेकी पर मामकी एकाटी लिाम पनि मानन बिमार हो पटाई। मी हाम्प और पवमयी मी ठार ममारम भागाका मचार करती है। हरि पनकी पसीको मम्म मग्मातर * मिए मना बनाकर पानके लिए बोकी -काप्पम म मोटोपी पविनाकी मारमाही पूर्ण माम नरिचाई पाता है। रगाप चौपुरी मही परिचय मिलता है-उनकी प्राति परम कविनामों में। प्रानिक मार कापिका मति निकटमा सम्मग्य । मिकी मेवनामें प्रातिको पगार्म अपम साकवा मिनी । प्रापिकी वेग-भूपा गरिएकी विपार मनिना" रीना-हीना मला नग्मभूमिड लिए मानपिना नाम पोड़ीमा पापापी भिक्षा मामी मईt- अपहम्हे बनती मु निमानमा रियाहि नामर माति [भिमानती यमनी-पायो मार मानती पनि प्रचन करा।] पापीर रिया* (महापीका विवाह ) करिता मानव मगर्म बिहीन माणिक माननोमवमवर्गन है। बभन्द सिा नापीके बियाह समगम पूम भवाएँ मार पनी मावि सभी मान विधार। बह्ममीके बिराहको कम रखकर प्राति पौन्दर्यत्र विकास करना ही कविता प्य है। माप ही इस परितारे बरिये समामिया गातीय नीवन मौर परेम् गौवनकी प्राम की पर। मापी प्रमिकाबीच तीन रापिनी मपान मिमाई और इम रिप मानमा एक परिपूर्भ कप “बहामीर बिया में यम है। "म" पषिवाम सर्पप्रए फा के गीवन विपसर गरिने मानन मौषमा फगुती गाडी मम्मम बीपनकी प्रमानि बोगी। निर" पारितामममिसिष-अप्यप्रशिपिका प्रमासापर पिम्मिन । *पमिप्यमम से मम्मानिता मार पावापी मन पनि मार प्रातिरा मनोहर र एकमारी ३० M देवार प्राचीन भारतकी पौरव-गापाकोस्मरणक,समम गठिसे भविषात 'बपिठो भम" को परमान्त पविको शान्ति-निकेतनकी बाम्या दी है। पुरके किनारे हरे-भरे पंगाम मुमोभित “पिरिमस्मिका ने करिके हममें मानन्धममी माननाओंटा देक मिमा है। कपिने भी सिरमस्तिकाके स्पर्स प्राण परितृप्य परमेसी अमितापा प्रष्ट की है। प्रामप्रिय मामि भोर बिनव तुमियाने तयता हाहिर रम। [पापप्रिम भार मेरे बिन नौ इंसाको तरंप रठायोमे मा?] प्राति पर कविताकि अतिरिक्त पिके दोनों संगहोमें पुण्यप मूसा कविताएं भी मिलती है। इन कवितामोके जरिए कविकी अभी जीवन पाप ही अप्रत्यारपसे प्रमाणित हुई है। सादरी की पहमी कविता “भिमा" में हो करिकी पम्प भावना मारित हुई है। करिने जीवन के पहले स्तरमें सम्भवत बड़ी बड़ी मापाएँ की मी मेकिन सभी नियम हो पाई। मा कपि संसारके सभी मामा-मुख पान्ति प्रेम बाममा पमपर-सम्मान पारण मारिका बार परित्याग कर पेहै। मामानी मुगदप्माकी वरन सब पोर्चाको बोरवे समय उमें व-ही-पुष मिता और इसलिए उहोंने पिशामिनी कामना को दर पार हुत-देम्पको भनवानकी रेन समा निमा है। साथ ही भगवानसे प्रार्थना की- मिलर रेवार र दबाते सराय पिवारा [पत्थरी मीरकी ठपही तुममें मेरा मरिषत विश्वास है। संमार सम्मन्त्री इस तरहो मनोभाव "मारी" पी बनियर का (पनियतीपात) नियम विपार गिधीर गति (पिपीकी रमि) संताप मारियाना मिलते है। बीपन में गानि पाहते हुए मिले मनमें 'मर' का माहबान रिया:- रिप-परि तुमि विा मोरया सिरिमाहे प्राचे बार मनिष सपना [रिम्प प पर तुम (परण) मे वर्गन से उसी दिन मुझे मापना मिनपी। तग" में तो बीवनके प्रति वरदमा तपा समारले प्रति पप्प भापता पम्भीर रूपमे सर। ममारम पिरोप-पया ही मिली। उमने गोपारा पा उमे भी पाया। और सपा मगरका प्रिपाबाने मी ोग उपार नही देगा। इनित परिसरो भाग्परीन मममसर ए प्रार पन विष्ठमबीबन मोर विफत सनो मामा माग्यहीन मावि मह दिया मोर कर्मनापा [विफत पीबन मेरा विफम सभी भाशाएँ। बाग मै मायाहीन है जौर मेरा एप कर्मनाभी है।] कविका सक्तिक जीवन भी नियम और देवनामय ही कहा जा सकता है। मरपनमें पैसो दुर्घटनाएं हुई किशोर जीवनमें गन्हें माता पिता एम भाई-बहनोंस विछोह मा तमा सारा जीवन गारा रहकर ही बिताना पड़ा। कपिने इस जीवनकी मात "राम्पर कमा कमिवाम सप्ट कही है- मामा पो मी पर अन्य हिया परिरस संसारत माविमा बासरीया [मापा रपी पमी उस गया-यूम्प हम परा हुमा है। संसारमें भाव में मोता] करिकी इन भाषमायाने तीजस्म पारण किया है "रहिमतप" को मन्तिम करिता पमपम्मा में पिताग्नि ही मानो उनके लिए फूसकी पैम्पा है- से मोर कुममया रस्तकमतर कर तावे मनन्तत्समम । [यह रक्त कमलाकी मैरी फूलनमा होमी वही मै अन्तिम चयन कमा।] धावरीकी " मरन" कविताही तर पहिकतपकी “तपय्या" कविताम संसार विमी करिने एक ही महा ( मृत्यु कामना) प्रकट की। इन मिनाकर इन रोनों संप्रहाको असमिया साहित्मके भेष्ठ कमिता सरहॉर्म मिना गा सकता है। कारवाता-पि चौरीगीण यह पाना पण काम है। कारणामा सन् १९२३ में कर्मपार चमनाम स्मृति प्रम्बावमी प्रथम गसिके रपमे प्रहापित हई। 'कारखाना काबमें कपि बीघुमीने इसमाम धर्मकी प्रसिर एक ऐतिहासिक बियोगान्तक काहानीको निम्पम चिम दिया है। कारवामा' महात्मा हसख मोहम्मरके पानानको अन्तिम म्याति हुसेनके तप्त फससे रमित है। अधिपति पापात्मा एनिवासनाम धर्ममें एक नापती प्रतिष्ठा कराने मोर इमाम बंघको निर्मून कलेकी बी-चौर कोपिप समा बा। साथ ही उसने सुन्दरी पुराको मपनी भकधायिनी बनानेकी फसमा भी की। पापत्र कर गुम्बेवा पारा ही महात्मा हुसेनकाब करना चाहा। प्रनोमनसे प्रमुख होकर पुरेरा मामे माई- हम राब रामरी बप्पाह पबिहार रामनवम्त पने स्वग बनोवारी एख। H [में पारमा एपिरके राममयम पर रामेसरी होगी। इस सपा सर्प सुब नहीं समी।] लेकिन युवाको बन्यता पममा मही मिला। एगिरने गोधको पाँ अपनाया परन् स्वामीकी इरमारिपी पापिषी बुके दो दमे मपनी ही सवारसे कर पिए। पापिप्रसौ मम्मेवात हरि मुंगेर पापरतिपरिणाम पसंत रपमा रेडपाले समामा बमा नमा। [पापिभी पुवाका मुरमेकर पापा ममम्त परिमाम रिचार समाजको पापित कर दिया। इमाम सम फिरसे मापगएँ नही बाई। मेस्माका बारपासन पाकर माम परिवार मीनागर शान्तिको योग पाके मिए रवाना हुमा। मेनि मा भूमकर ये कारवामा मह प्रान्त का परदूसरी तरफ फोटाट गरी पर एगियो सनिकाने परोपकर मिया मा। मत सारे पिपिर पानी के लिए हाहाकार मन पपा। हुनपुर पानी नाने गये मेनि मापस नही मासके परिपके सैनिक बासिनहीं सर्प सिधार पपेरे सरपर मुभीतल बसपान करि सरपर बस्तु मत मर्मधाम। [स्वरा मुघीयम पानी पीकर सक निवाती सर्पपाम बसे पए। इस पर पटना परान्त भी षण्मोकिमिए हमनके शिविर मानारकी तुमि बने गी। उनके मन्तिम बरोबके अनुसार कासिम और भविनाकी पारी हो पाई। मुग एक एकर सभी पास बसे। बारको मान हुमैन पर मामोरे हात फोगाटो किनारेको मुक्त कराने के लिए माने पाए। मरोंको पति कलामा फोटार का पानी पीने नन बामे ने मपे। मेपिन रमसीमावर्णक सामने म पानी के लिए गीत रेनेगामे बारम परिपार और प्ट गुरुम्मियोंकी पि. समरनेमी- एपि पनीर बात मत प्रामी भारम परिका और मिरि एम एरिजोबन भीषण मन्त [एक पानी लिए मेरो मोपों गिने ही बाग्मीर परिवना मार र दुम्मिपाल पम् भूमि प्राप दिए है। मनोरमोपसी पन और पटाने प्रेरनिगा। यात्रा पर, परप पीरो TRIYEममाहो पिनापापा ममापि पोरने ।

६२ इसी सर्व सबसरपर सक्ष सर्म महाका मोम रिचाकर एगिरने विमारको हुसैनका कटा मा सिर मानेके लिए भेगा। स्वर्गसे हारत मोहम्मद सैनहो मे मानेके मिए पर रखरमाए- हसरत महम्मद मोहम्से प्रिय माविर्भाव विमान परत बमोहर हिना यता । [हसरत मोहम्मद बिनोकसे अपने शिष्योंके साथ अपने प्यारे मित्रको मे पाने के लिए भाकास मार्मपर उपस्थित हुए।] पापी पिमारके हाथमें इमाम मनकी हत्यारे समपकी पाम इस्लामी मोप मुहर्रम प्रत स्पर्मे मनाते है। कपि चौधरीबीने इस्लाम धर्मकी प्रसिद्ध कहानीको बसविकी तरह अपने काममै अकित किया है। मनोरम शाली कमिटी मेवनीमें और भी मनोरम होकर नितर ठी है। मानोपाकी मापामें “एमा तप्त रक्त कर इसे मापने सगीय बनाया। पण पटके एप्पोको देखकर ही रमले मामारपर कारवामा महमूमिका सा काममिक चित्र चौधुरीणीने चौपाई यह बहुत ही बाश्चर्यजनक । परिका ग्पक्तित्व इसीमें है। इस्माम धर्मकी कहानी मिलते हुए भी कमिक इस काम्पमें विदेमी पदोंकी भरमार नही है। सम्पूर्ण काम्पमें कुल बस सत्रह विदेसी-सोका म्यहार किया गया है। मुरुमसमिया गमोंका प्रयोम उनकी काम्पमीकी एक खास पिम्पधा है। केटेकी कबिके बीवनकी सर्वमेष्ठ उपमधि कही जा सकती है। किसी एक पक्षीको मेकर इस तप वगकाम्प दूसरी भापायोंमें बहुत ही कम मिमेंमे। इस काम्पो समय नेपालीगीने कहा है-"महापौर विमा" में जो मानमान भूति गम्ति और पक्षी बीवनमें ही सीमित पी डी कवितामें नसीमे कुन छिनारा तोड़ मरोड़कर मानव समारो परेम् जीवनको भी प्रभाषित किया है। कोली के बारमनसे जावेतन जगवमें नर पौवनका सबार हमाईमौर चारों वरष भानमा ही भामम्द परिम्याप्त है। पाँच तरंगोंमें विभक्त रोकी पापकी प्रपम परपमें बनवान और मनात रेमसे बाहरबानमार राव सरसे पीत मा पाकर विभोर हो भूपते फिरते टेकी पापीको रेनकर कपि मापनलिई। गमी पीने से ही दिनोंमें तमीको अपनाकर "पनपापीहीन रेनिस्तान भी सीवनी ना भी है- ३४ समाइ तिमि पर मिल बपाप मम्मान। [बगर भूमिछो मी तुमने मपस मरणानका म देकर समाया ।] पपि इस संसार टेरे-मेरे रास्तेपर दुव-दैम्पक बीच मेलेकी पनी बीवनकी स्मनीम प्रेम-ग्रीति गौर उसका सुख देवार विस्मित है। मानवकी कायरता और छात्र कौसमको धिक्कारते हुए पक्षीकी स्वर्गीय प्रेम प्रीति को कपिने सिर बामा है। शिवीम धरममें कोकीमागमनस प्रति पम्पमें किस तपपूर्ण पोति मा परिसीमा बर्मन हुमा है। कलेकी मे गावाके मापरणको भेरकर प्रतिमें भर वेतनवा मा दी है। मौत मरासे अनुमित भुगनमोहिनी पनिमाममी निया वा बागमनसे गौर बाधिक व्योतित हो उठी है- कोनो बिष पूनिमार निमा अगत् बोनातीमय तोर मातमेव मर्प भुवनत ममृतर पारणम। [*सी ज्योत्स्नामयी यह पूर्णिमाको । तेरे सपने मे इसी मर्पमोम्मे ममृतकी पार पहा हो। वृतीय तरपदं भवेकी मानममसे मानिस मम्मरमें बो हिलोर ठीी उसकी तुमना उन्होंन मनीत काम कम माममम देवी मासमाके जीवन के पश्चिममसे की है। सावता पोमन राम मौर मवमारके मूममें मानो वा मधुर स्वर ही बा। मनी पन्न म्मा अनि ममन्ती बादिक नीरमो मार विपार मूममें भी उसीके मीना पर ही पाई। पतुर्षतरममें ठेकी में ही एक चिरंतन सरपा सम्मान मिला। सौर बाममनमे किए बह्मागमें भरतना और प्रेमा मधुर मधुरित है। महागिरको बासोदित परगामी छ बिपिनीमे दिने ही महामान्ति और मम्प्पा बोड़ी-सी परपापी मापना की है। परिप्पामा मई- भागामने पतिरतिपाते पादि निणे मोर प्राण x बार देगा मा साति मामाचौरमात [पया तुम ममी मानती होणारेही ममीरने मेरे प्रापारमित है। मैदम नगारन मी 'गा। तुम मुमे परिवार मेमो।] अम्मितरगर्भ रमेशरी मारा मोर गार गीर निम्तमें पसी रिपबिगर म मिागे भाग्यx x ३५ हिप पुधि पति रमना मायामो एरिसों तपो एरि मनि कि माय हब मार [तुम र देश बनी गई मैने तुमारे ही सरण संसारकी मायाको स्पागा-तुम भी बनी मई-पार मेरी क्या बचा होगी?] "वेकी करिता कपिकी माकस्मिा बिना नहीं है। यह सारी' कविता संग्रहमें प्रकापित पक्षी विषयक कविताका ही विकसित स्प है। कविको पहनेकी पारिता बितने प्रमोंका उपय हुमा पा समीका कवित्वमय उत्तर की कविताम मिमता है । "कपि बीवनके बहु काम संचित भावनामों का शमविकास गौपुरीबीकी पती-पिपयक कवितामोंको छोड़कर मसमिया साहित्पम और कहीं मिलना मुस्लिम है। नबलिरा-(१९५८) यह करि पीपुरीमीत्री मन्तिम रचना है। मन्तिम रचना होनेके माते कपि-जीवनकी गम्भीर उपलब्धियां इसमें मिलती है। यह उनकी कमा- कार्योका संग्रह है। प्रक्षिक साधारमसे साधारण विषयको मेकर फपिने बान-गम्भीर वलनमें समेटाई। असमिया मापा मा करिताका मह इसरा संग्रह। मावा-बोली- पौधुरीबीकी दृष्टिम भापा संसारका नारमय चित्र है। पीपुरोगीकी भापा, उत्तमता नामगिकता मित्रमयता समीतात्मकता वारि अमस्त है। भोपुरीमाको मापा तत्समता के साथ-साब सेपौरमकता भी होने के कारण उनकी कविताएँ पानेसे ऐसा मालूम पड़ता है कि एक बेमवती सरिता धौर, स्मिर, गम्भीर गतिसे निनाद करती हुई यह पीहो। चौपुगीकी भापा चित्ररमित मापा है जिसमें ममेक पप-पिन अस्पत सुन्दर। इसका एक बाहरम- पात पिवर येथे रवि प्यारगे सुरेरे बिपाम नमे सप्प नमोर्माण। [पारि पिपरपर बब एरित हो संप्या रागसे सुबसे विमाम मेते सम्म ममोमणि।] चौमुरीगीको मापामें मनुमासका प्रपोप अधिक देवा गाता है। इसीलिए पर-पापर मनुमासकी छटा देखने को मिमठी है। इसका एपमाष कारन है उनकी समीठ-प्रियता। रघुनाथ चौधुरीगीको भार प्रकासन पेसी सरत मार प्रविम । यसमिया और भारतीय बन्न मानिक काम्प-साहित्यका मम्मयन कर पिपेपार भी पसरव और कामिवासकी काम्प-नास बाप प्रभावित हुए पे मौर रन नोपोंधी रचना परति मोर ती ही करिने अपनी रपमाोंमें अपनाया है। बिदुतरी पर पयार बारिपसमिया न कामिधासही मम्दानम्ठा अमिताभरमौर मिरिकमारिपरि परिए कपि चौपुरोगीकी काम्पमयी मारमा विकसित हो उठी है। साहित्य में कविका स्माम- कपि चौपुरोगीके सम्बन्ध यसमिया साहित्य प्रम्मात मातोचकॉम मम्तम्प इस प्रकार है- मामाकान्त काठिगी एम ए पी एपी मिबते है-मुरमाई हामफ्नी भावनाको नपाकर भागोंके हिमोरोंमे भूममेसे बो मानन प्राप्त हताई-बही मामम्म कपिता बेटी है। पौधुमीकी कविता मह बानर नेकी पनि पिसममान है। बसमिया कविताकी कहानी में में महेसर मेमोमगी मिलते है- "चौधुरीणीने पमी बीवनको पदममी करमाका संबान करते हुए प्राठि पर कवितामें एक अभिनर तात्पर्य का मारोप किया है और उससे ही स्कीप प्रगीतात्मा विपाद साकार कर दिया है। कामिपास मारिकगि मुम्पोंकि मानसिक परिवेश त्रिफित मापाके पौत्पर्य का प्रभाव मानते हुए भी रम्होने मात गीविकाम्पको परिपुर और बाहर कर रखा था। “मसमिया साहित्य के इतिवृत्त* मे गे भरवेग मर्मातीने निणण t- * पापमिक माम्मान के साथ सेक्स करते हुए विपकका समावेश कर भावोपको मनावमी परतापूर्ण प्रयोगने उनकी वर्षम मीमो ममम मार हरप पासवा पिपोपमर रिवाई। “केकी सम्बन्ध माहित्य सम्राट् मदमामा बस्था गौने मिया पा-“म “मी को ही मेकर हम निम-नाहित्य परगारमें गा सये।" ममम मामान भूतपूर्व म्यामाधाम श्री हमिएम रेपानीने पोपुरोगीको कबिता ममप में की ममामोष पापीमें ही कहा है- Hu lines are chilled for immortalityhamn * पिच ममापीपक मनुमार निम्मकोष यह पहा या माना है कि पौरोजीरी कविता मनमिमा रोनाष्टिा माहिया गाम मपी है। उनकी करिता म्यानमम योपानी मायग्म माघमा की बापी। कसम अमरिया माहित्यमें ही नही भारतीय साहित्यमें मौ पोपुरीमोरा बोपरान मीनिए स्मरणीय हेमा किमिमकि कमरा होने मुम्पर पानी प्रशन गौ-मको गमितीका पार कर होणम्पी हुए परन् पावरती मामिा मारियोमा मनीष पिरमपम मनोहर बनाउन मम्मिपिटाप्पिा है। हरेक पक्लिामें सम्मान भार ही प्रधान है। यो रेषा गा तो परिमामी पनि परिकी रचनाम-पान मा भागाप्पा मोम और कारमपी परयोगमा उहे भैया पापियोंग अंगम पापा से मिा पपई।

रघुनाथ चौधुरी [काम्पसञ्चय] कवि-थी मासा- १ मिक्षा मासागे तोमार प्रमु एश्वय विभूति रायपर, सम्मान गौरव पारािपर मामोमोटा मिभार समुलि सेये मोर मतुस बभव माओं शिरित आरि सम्भ्रमर माला भावों ताफ मति हेप पुसि, मपमान मपया, साधना शिरत मम प्रमु मायहरे तुलि ॥२॥ सचाकामा माइ प्रम, सुन हायत करा मोक सामोरे सह मान पपारत मेने पाले माला पत्र पुष्प फमहीन तर मालागे तोमार प्रमु पापित सम्पर गुरिनोया सुपर बाहामि भकमारोपा करि माम बाटते एरि पायाप वा काहामि IYA मामागे मुम्बर यह पाम्ति कमनीय युम-पच, मामम विमाप्त पर छसना मात्र मोहर विकार सिबोरत नाइममिमाप पिशापिनो कामनाक पिछी मातराइ तार मोफ रिटेबह पुष पारोर गिरिरहे परिते ममत रामसोर परापार मुण

-सप्तमिया
१ मिमा
हे प्रम, तुम्हारा ऐश्वर्य विभूति राषपद सम्मान गौरव
मुझे नहीं पाहिए। दरिद्रताका भिक्षापात्र ही मेरा अतुल
बैभप है ॥१॥
सयमका कष्ठहार में अत्यन्त सुमा सममता ह। (पत
उसे) गमे नहीं मगाऊंगा। अपमान अपयश माममा वडे
भाग्रहके साप सिरोधार्य कर सूंगा ॥२॥
मेरे स र दयउमामीक्षा नहीं है। मुझे सबसे
छोटा बना दो। उसी तरह जसे मदान गौच पत्र पुष्प
फतहीन मृत अकेला बड़ा रहता है ॥३॥
है प्रभु दो दिन सुबनी सामग्रियां मा तुम्हारी पापिय
सम्पदा मुझे नहीं चाहिए। क्योंकि मे सभी बीच रास्तमें ही
मुझे अकेसा छोड़कर कमी-म-कभी पलो पाएँगी ।।४।।
मुझे सुन्दर भरीर मनीय कान्ति दांव-पेंच वानन्द
मिनास नहीं पाहिए। मे समी मोहके विकार है--स्पकी
छननाएँ मात्र है उन्हें पानकी मेरी अमिमापा नहीं है ।।५।।
पिपणाची कामनाको मैंने बहुत दूर भगा दिया है। उसने मुझे
बहससे दुख दिए हैं। उस राक्षसोके विकराल मुबका स्मरण
होते ही मेरा शरीर सिहर उठता है ॥६॥

कवि-भी माता-
समुखत धमर मि माछे मघकप
तात येन मिपिछले भरि
पिरविम पिसपी हम लागे प्रभु
मभावर पत्रणात परि
॥७॥
यरिमो भ्रमत परि पिमों हताहत
हियामि परि पाय कसा,
मिरम सहिम प्रम, रिया मार मोक
ससारत माछे यत स्यामा
भुगिहों मुगिम मार बग्ध हरपत
धात शत वृश्चिक रशन,
मकरों बेगार प्रभु तोमार कापस
मामन्यत पाकिम मगन
मुखर हाहिटि यदि सिमो मार याय
छिग्न हय मानासता सुपि
सामपना रिता मोर माछे सगरीया
विपावर कुमो एपि
मा-मुप शान्ति प्रेम बासमा पिति
सरसी ये मरोधिराम
यहरपी हा मोर मुमारि मापोन
मोपमाप वित्तत भिम
सिकारणे मुख बाछा मारों, मामागे
मिमिधारी पीपार पास
मिपाइ रिसों यत बस्तु मरमर
मोर पक्ष मापार भात
॥१२॥

भसमिया अभावका यत्रमाएँ मोगकर विरदिन में पिरदुखी बनकर रगा। परन्तु सम्मुखमें धमका को अन्धकूप है उसमें मेरे पैर न फिससने पाए।७॥ यपि भ्रममें हलाहल पीते हुए मरा हदय भी काला हो जाए, फिर भी में उसे चुपचाप सहूँगा। ससारमें और भी जितनी ज्वामाएँ है मुझे दे दो।८।। इस दग्ध हृदयमें शत शव परिपा देशम भोग रहा हूं और भोगता रहेंगा। फिर भी दुख नहीं परंगा। तुम्हारे पास रहकर सदा आनन्दमें मग्न रहूँगा ॥९॥ मेरे मुंहकी हसी यदि म रहे और पासाकी मता मगर टूट मी गाए–सव भी मुम सान्त्वना देनवाले विपादरे बसू मरे सापी रहेंगे ।१०॥ बाशा सुख शान्ति-प्रम वासना तृप्ति ये सभी मृगतृप्माएँ है। वहस्पी बनकर ये मुझे सिर्फ घोचा पती है और अन्तरमें भ्रम उत्पन्न परतो है॥११॥ इसलिए, में सुख नहीं पाहता प्रकास मुप्त महीं पाहिए और नमकी याचना भी नहीं करेंगा। सभी प्यारी पस्तुमोंको मैमे फेंक दिया है--मेरे लिए वो बन्धकारही अच्छा है ।।१२॥

कवि-श्री माता-
समुवत धमर यि आछे मघरुप
तास येन निपिछले भरि,
बिररिम पिसी हम मागे प्रमु
मभावर पप्रणात परि
यरिमो भ्रमत परि पिर्क हलाहन
हियावनि परि याय कला
मिरमे सहिम प्रम, रिया मार मोक
ससारत माछ यस म्यामा
IMER
मुगिछों मुगिम मारु ग्य हरयत
पात पात वृश्चिक पशम,
महरों बेगार प्रमु तोमार कापत
बामन्दत पाकिम मगम
मुपर हाहिटि परि सिमो मार याय
छिन्म हय मापासता अपि
सामवना रिमोंता मोर बाछे सगरोया
बिपायर परमो एटपि
माशा-मुख शान्ति प्रेम बासना-तृपिति
सकली मे मरोगिता मम
बहस्पो हा मोक मुवा रि मापोन
मोपमाय बितत विभ्रम
सिकारमे मुख बाट मकरों, मालागे
निविषारी पीहरर फास
रसिया विमौ यत बस्तु मरमर
मोर पसे मौधारो भास
॥१२॥

-मसमिमा अभावको मगाएँ भोगकर चिरदिन में पिरदुदी बनकर रहूंगा। परन्तु सम्मुबमें घनका जो अन्धकूप है उसमें मेरे पैर न फिसलने पाएँ ॥७॥ यपि प्रममें हलाहम पोते हुए मेरा हदय मी माला हो जाए, फिर भी में उसे चुपचाप सहूंगा। ससारमें मौर भी जितनी ज्वासाएँ है मुझे दे दो॥८॥ इस दग्ध हृदयमें यत पत वृश्चिक दंपन भोग रहा हूँ और भोगता रहेगा। फिर भी दुव नहीं करेगा। सुम्हारे पास रहकर सदा पानन्दमें मग्न रएंगा ॥९॥ मरे महकी हेसी यदि न रहे और पाशाको सता अगर टूट भी गाए-व भी मुम सान्यना वैनवाले विपादरे आंसू मेरे सापी रडॅग ।।१०॥ मागा-मुख भान्ति प्रम वासना-वृप्ति ये सभी मृगतृष्णाएँ है। यहस्पो बनकर ये मुम सिर्फ धोखा देती हैं और मम्तरमें प्रम उत्पन्न करती हैं ।।११।। इसलिए मैं सुख मही पाहता प्रमाण मुम नहीं चाहिए मौर उनकी याचना भी नहीं रहेगा। सभी प्यारी वस्तुओं को मन फेंक दिया है--मरे लिए तो अन्धकारही यच्छा है ।।१२॥

कवि-पी मासा-
४२
यत विमा दुब चैम्प कांधत चपाह
मानो एको पगार मनत
तोमारे विभूति नानि सरसो सहिम
यत दिन पाकों ससारत
सुषण, होहि अघु, हप या विचार
तोमाता राव बिलय,
ममुरल, प्रतिकूम तुमिये गोवर
सकलोते ? तुमिमय
पयामय, मार्गो एटि परमत मिक्षा
दिया मोक प्राणत आपवास,
शिलर रेवार बरे तोमाते सवाय
पाके येम अटल बियास
॥१५॥

-मसमिया
पाहे कितन ही दुख-दन्य मरे ?पर क्यों न लाद दो
मनमें दुख नहीं करूंगा। इन सवको तुम्हारी विभूति
समझकर उन सबको सहता माऊंगा ॥१३॥
सुख-दुख हास्य-अत्रु हर्प या विषाद--सभी कुछ तुमसे ही
उद्भव होते वीर सुममें ही सय भी होते है। जीवका अनुकूल
प्रतिमूल सब कुछ तुम्हीं हा—मैं समीमें तुम्हाग ही दर्मन
करमा हूँ॥१४॥
हे दयामय! तुमस में एक भिक्षा मांगता हूँ--मुझे
याश्वासन दो-पत्परकी मकोसी तरह तुम्हारे प्रति मेरा
भटल विश्वास पिरकास तर बना रहे ॥१५॥

कषि-यी मासा- Y यत दिया बुष पम्प कधित पपार मानो एको बेगार मनत, तोमारे विभूति बानि सकतो सहिम यत दिन पार्को ससारत सुख दुख, हाहि मधु, हर्ष वा विपार तोमातेइ उदय बिसय, ममुत, प्रतिइन तुमिये नोबर सकसोते रेपों सुमिमय ॥१४॥ बयामप, मार्गो एटि चरमत मिक्षा पिया मोक प्रामत भाश्वास, शिमर रेवार परे तोमा सवाय पाके पेन मटन विश्वास ४३ -मसमिया पाहे कितने ही दुख-य मरे कॉपर क्यों न साद दो मनमें दुख नहीं कहेंगा। इन सबको तुम्हारी विभूति सममकर उन सबको सहता नाऊंगा ।।१३।। मुख-दुख, हास्य-मयु हप या विपाद--समौ कुछ तुमस ही उद्भय होते और तुममें ही मय भी होते हैं। जीवका अनुकूम- प्रतिकूम सब कुछ तुम्ही हा-मै समीम तुम्हारा ही बन करता हूँ।।१४।। हे दयामय! तुमस में एम भिक्षा मांगता है-मुम माश्वासम दो-पत्परपी मकीरकी तरह तुम्हार प्रति मरा मटम विश्वास चिरकास तम बना रहे ।।१५।।

पबिपी मासा- २. पहागौर दिया प्रहति बीयारी गामर होबासो बहागो बारे बिया, उमह मामहे सकमोरे पेन आनने न घरे हिया स्परग मरत सकसो हाते उठि मानन्द रोत, सासन काचन र महत गीठो जगत मोत ॥२॥ मम्परत सुरस प्रेमिक भमरे बिसे सकसोते सन या सतिकार प्रति गिरे मिरे मगरि उठिसे प्राण शिमत्त बलाश मनोक मन्दार श्यामस टिपी राशि श्रीग आमरण ससा माहिछे रासी सामेरे सानि कामिनी कोबन पम्पा मागेश्वर सुगघि कुसुम मासा नगरपरि पुष्प पाति प्रेमर ऐसा मतप समीर गय इणिकर गात तत् मारिया सर मुपाग पोरोपात मा हाहि विसनीया

४२
-मसमिया
२ वहागीका घ्या
प्राति पुत्री युबती मासिका यहागी विटियाका म्याह है।
सभीका मन आनन्द उमादमे परिपूर्ण हो उठा है ॥१॥
म्वर्ग-मत्य समो जगहोंमें आनन्द-प्रनियां हो रही है।
रग-पोंसे समधन परनमें मारा विश्व विभोर है।।
प्रेमी प्रमग्न भम्यक्त स्वरम ममीको मूचना दे दी है।
गुम-सतामा नस-नममें भी प्राण सन्दित हा उठा है ।।३।।
ममम पसास अमान मन्दा, श्यामल विटपी राजि आदि
समीन जीण आमरण वदमकर नवीन रमाके गगारम पदापण
दिमा ह॥४॥
कामिनी, कांपन पम्पा मागेवर, यादि मुगन्धयुक्त पुष्प
भी मए-नए प धरकर पुष्प कम्नमें प्रमा बम बम
रहे हैं।
मध म्पापारी मप्तय ममीरको बसे बव होग नहीं रह
मया है। यह पुष्पोंका मुगम पोठ पर मादपर वितरित पर
रहा है।॥६॥

कपि-मी माता- १ २ वहागीर दिया प्रति चोयारो गामद छोवासो महागी मारे बिया, मह मामहे सकसोरे मेन मानम्मे न घरे हिया स्वरग मरत सकसो घाइते उठिछे मामन्द रोस, सामन काचन र राहत गोटो मगत मोत ॥२॥ अम्पात सुरत प्रेमिक भ्रमरे रिम सकप्तोते जन गए मतिकार प्रति शिरे शिरे मगरि उठिसे प्राम शिमसु बताश मनोक मन्नार प्यामस बिटपी रानि पोम माभरण सताइ माहिछे राामी सामर सामि कामिमी गोपन चम्पा मागेश्वर सुपपि कुमुम माला, २ मनपरि पुष्प कानमत पाति प्रेमर ऐसा ॥५॥ मसय समोर गप पिर गात सत् माइकिया, पुलर मुपाण मोमोबात ना हामहि धिमनीया -मसमिया ४५ २ बहागीका ध्या प्रकृति पुत्री, युपती नासिका यहागी विटियाका म्याह है। सभीका मन बानन्द-न मादसे परिपूर्ण हो उठा है ॥१॥ स्वर्ग-मर्त्य सभी जगहोमें आनन्द म्वनियां हो रही है। रग-पोंसे समधन करनमें सारा विश्व विभोर है ॥२॥ प्रेमी प्रमरमे अम्यक्त स्वरसे सभीको सूचना दे दी है।" वृष मताओंके मस-नसमें मी प्राण स्पन्दित हो उठा है ।।३॥ सेमत पसास असोक मम्दार, श्यामम विटपी रानि आदि सभीने जीर्ण आभरण पदमकर नवीन रगोंके प्रगारमें पदापण किया ह॥४॥ पामिनी कापन पम्पा मागेश्वर वादि सुगन्धयुक्त पुष्प भी मए-मए स्प कर पुष्प जाननमें प्रेममा पेस सेम गपके म्यापारी मामय समीरको पैसे मय होश महीं रह गया है। यह पुप्पोका सुगास पीठ पर मादकर वितरित कर रहा है॥॥

कवि-मी माता
1011
ch
॥९॥
घुनोया पनीया मतारे मरित
कुसुमित तदरानि
रमक नमक करि ठाये ठाये
पिछे बेड पर साजि
होरक मगित बनातप पनि
योसमिछे आकाशात,
आर बसुमती बिछे पाटो परि
सेउतीमा मासमत
भापती सकसे रभार तमते
करिछे मार यि काम,
कोनोमनी माहि रिछे पुष्पांमति
कोनोये गाइछे माम
अपे भये माहि फेल पराइटी
मगस सरस रिसे,
बहिकतराइ प्रमाती मुरत
स्तुति गीत मारमिसे
मात्र काममत रशियात कुति
सगाप्ते एपार मात
गसर प्पमित स्वागत येन
पहिस प्रेमर हाट
सरि उठिम पुप्प उपवन
बसिस प्रमाबा,
हाहिटि मारिस माधैमासती
पाते मगाइमा
पाटर बसे गात मरियार
पाटमा चषि मागि
जोरोण पिघा आहित मुमरी
पारगामष्टी साजि
॥१०॥
॥१२॥
॥१४॥

मसमिया
सुन्दर सुन्दर मता मणित कुसुमिस सरु-रामिर्योने मिल
मित पर जगह-बगहपर तोरण बना दिए हैं।॥७॥
होरम मगित पन्द्रप्ताप (दोवा) माकाधमें तना हुआ
है। भोर धरती माताने हरा पासन विछा दिया है।
.
सामियानक नोच महिमाएँ अपने अपने कामोंमें मगो हुई
है। कोई माकर पुप्पाबसि दे रही है तो कोई गीत गा
रही है॥९॥
गुरू-शुस्में बार पह" पक्षीन मगल पनिका उच्चारण
किया। दहिकतराने (पक्षीमा नाम है ) प्रभाती रागिनीम
प्रार्थना सगोतका प्रारम्भ किया ह॥१०॥
मफे वगीमें रसिक कोक्सिने भी अपना स्वर मसापा।
उसमें गीतमी पनिसे मानो स्वगमें भी प्रेममा हाट मम
गया है॥११॥
प्रेमका पवन चलने सगा, पुप्प उपवन सा हो उठा।
मधु-मालती गमबाही गलकर हेसन मगी ।।१२।।
पाटक पेमें (महिनामोंका एक प्रकारका पावर जसा
पहमावा) पहनकर पाटमादै (पक्षी) सजधमार जोरोण"
(विगाहा पहलेका एक समार-गिसमें कम्याको परपी
तरफस कपड़े और बसपार पहनाए जाते है और शादीमी बाप
पसी हो जाती है।) पहनामे सिए सुन्दर युवती बंसी
सगार आर ॥१३॥

कविमो माला-
सोण बरणीया परीया कॉमन
सोणाक, कनक बम्पा
रबिले धुनीया मीर माकारे
कम्पार माहतो सोपा
सिएर रक्तिम मसकर तिमक
पिंघाहि म्यारामो
निमज पासत कुसुम फुगर
रिहि रहन सानि
पिधाप्ते काणत गमिम फूतर
बापर पतोबा केद,
हात दुपनित कुम मतिफार
सोमवता मुठियार
पिघासे मपुर गोमचे मेवेसा
भमका फुत्तोया चाप,
दिम युटा तुति फुस बहा हि रिहहा
रचमी पचिसा बाह
॥१॥
॥१०॥
॥१८॥
चामलम्तिक मार्गी फुसर
माकमर कोत्मणि,
सामसी घबती मपरामितर
मातर करपनि
सानिकादि मेन माछ पारराणी
गोमापो नाम्यात बहि,
शिवा मपरप पसाबम्पत
पेसामे गत मुहि
धरि योगान फारामी सये
फुसरण पुहि पात,
कोनोरनी माहि सनर मुरि
छरिया फाकु गात
॥११॥
॥२०॥

-असमिया सुनहमी दाढ़ीवाले कांचन अमसतास और कनक-चम्पाने पीके आकारसे कन्याक यूरोको मुन्दर उगसे गूंथकर सजाया है॥१४॥ उपा रानीने अलका तिसक रक्तिम सिन्दूरसे लगाया और उनन कोमल गासपर कुसुम फूलने नया रग पढ़ा दिया ॥१५॥ कानोमें अमारसे फूमोंक बड़ाळ (एक प्रकारका सोनेका) यसकार पहना पिए हैं और दोनों हापोंमें कुग सतिकामोंक सोन पकी मुठिवास ( (वाजूकी तरह हापके असकार) पहमा दी॥१६॥ मोर पक्षीने बरे परे फूमोंके गोमचे लहँगा (एक विशिष्ट प्रकारका लहँगा । असमिया मड़कियों के प्यारसी बीज) पहनामा मौर रसीली तिवमी वहनने बसमूटदार पावरके 'रिहा" (चादरकी तरह कम पौगाईवासा एक कपड़ा-पादरके साप असमिया महिसाएँ इसे पहनती हैं) सजा दिया है।।१७।। माबी फूलोंकी और आकके फूलोंको पारु ममान्तिक कोतमणि (मीन) बनाई गई श्यामस मौर श्वेत रगने मपरामित फूर्मोकी कमरकी 'परमनी' यमाई गई ॥१८॥ । (वहागी) सवधरकर गुसावी पसगपर, रापमहिपी (को तरह) बैठी हुई है (मानो) मपने अपूर्व प सापप्यसे (उसमें) समग्र विश्वको मोह लिया है।।१९।। फुल रानियां पुष्प-पराग मोर कोमम पस्मय दे रही है- तो नहीं कोई बाकर पीसा हुआ 'मछम शरीरपर उड़ा रही है ॥२०॥ पा गुमाल कब ८-४

कदि-मी माता-
१
.
॥२१॥
॥२२॥
॥२॥
कम्र्प कुमार प्रेमिक पसम्त
माहिछे पराटि सानि,
विविध सुरत पवित्र प्रेमर
रठिछे माजमा मावि
मारिहि मेये होमत वापर
विसीये बगाय पाप्ति,
टुनी बुमबुमो माये वे मेरे
हेनुका मोबापासि
नब पस्लवित तर वाचामोरे
हातात पॉवर धरि,
को बाइको बिया गावस
मामिछे बरम करि
आनि पुर्णिमार राप्तिटो सिकोम
माकाम होनेरे मरा,
रक्त धवम सिमग्ध किरपत
होहि उठे बसुधरा
बीपक सुरत गुरिमे सगीत
बिया बाग्माननी,
मिसिकि उठिसाम्म काममा
मिकुम माप बनि
कटह बनत सि प्रेम गीतत
फुमिस कोको फस,
मॅटफुल कसि अस बरोरो
हाय मुकत्ति हत
मा जगप्तत जीव अगतत
पाओं सरसोते पा
महा भिर नरि गिरिशिछ मेन
मानमर पूण रेषा
॥२४॥
1॥२४॥
॥२६॥
॥२७॥

-असमिया
प्रेमी कन्दर्प कुमार वसत आम 'वर रूपमें समकर
द्वारपर आया है सलिए विविध स्परोंमें पवित्र प्रेमके
याच मनने लगे ॥२१॥
-
वादस माकर रोस बजाने सगे। भीगरोंमे शहनाई
बनाई। टमी युसयुस आदि पक्षियोंने विविध भगिमाओंसे नृत्य
भारम्भ किया और “हेटलुका' (पस्ती विधेप) 'योमा
पामि ' नृत्य कर रही है ।।२२॥
मय परममित तरु-शाबाएँ हायमें पंचर मिये हए केतकी
वहनको मीत गाने के लिए बुसाकर माई है ॥२३॥
आज पूर्णिमाको रात है ज्योत्स्नासे प्मावित आकाश सुन्दर
हो उठा है। रजत-धवस स्निग्ध-विरगोंमें वसुन्धरा हंस
रही है ॥२४॥
वायमी 'मिहुवा (पक्षी विशेष) न दीपक स्वरसे सगीत
प्रारम्भ किया। कमनीय कानों निकुर रूपी माप इससे
मनुगुजित हो उठे ।।२५॥
उसी प्रेम गीत ही के कारण कण्टा बनमें क्तकी विस
उठी है और मसकमारी मुदिनीने भी हृदय-दार उम्मुफ्त पर
विमा है ॥२६॥
में देख रहा हूँ-स्पावर-जगम समग्र महाविश्वमें मानों
बानम्दगी पूर्ण रेखा वदीप्यमान हो रही है ॥२७॥

कवि-भी माता-
३ गोपा हे सवार मोर प्रिय विहगिनि
॥१॥
॥२॥
गोवा हे एवार मोर प्रिय बिगिनि
शुनिले ममिया मात,
हरय परिव शान्त,
मसित मधुर स्वरे मोवन तोपिमी,
गोवा हे एगार मोर प्रिय बिहगिनि
पि सुरत मुग्ध हप बनर हरिणी,
गोतर तहरो तुमि,
गोवा मन प्राण बुति,
गुराक पराण मोर मर मास शुनि,
गोबा हे एवार मोर प्रिय विहगिनि
प्रहतिर मोतामूमि सौनयर अमि,
गहीन नितास बने,
उसाह मानन्न मने,
रासेगते परि फुरा बन मिहारिणी,
गोवा हे एवार मोर प्रिय मिहपिनि
कठत मिसाइसा उमिन रागिणी
प्रेमिका बिहमी तुमि,
मुताता कामम भूमि
गिरि गुहा उपबम, सिग्छ तरगिनी,
गोवा हे एवार मोर प्रिय हिगिनि
परे में मनत पपी यमुना तटिनी,
करम गात परि,
पषमत सुर परि
परिछितामांगना प्रेम गम्मारिनी,
गोगा से मुरे मोर प्रिय निर्गमिनि
Iril
॥५॥

५३
-असमिया
३ गामो सकवार मेरौ प्रिय विहंगिनी!
मरी प्रिय विहगिनी एक्वार गाना। तुम्हारी अमृतमपी
पाणी मुनकर मेरा हृदय शान्तिसे परिपूण हा उठता है।
समित मधुर स्वरसे हे जीवन-तोपिणी गाया-मेरी प्रिय
विहगिनी--एक यार गाओ।।१।।
निस स्परस वनके हरिण मुग्ध हो उठते हैं वसही गीतकी
लहरें उठाकर नरमुक्त स्वरसे गाया। तुम्हारा गोत मुनकर
मेरे प्राणाको शान्ति मिस। गामो मरी प्रिय विगिनी-
एकवार गाओ ।।२।।
हे बन बिगिनी सौम्दयको वान प्रकृतिको लीलाभूमिके
गभीर निगन बममें मानन्दोम्साससे लोंकी गलियोंपर
तुम पूमती फिरती हा। गाओ मरी प्रिय मिगिनी एक
बार गाओ
कळमें छत्तीस रागिनियोंका समन्वयफर प्यारी बिगिनी-
तुमन कामन, भूमि, गिरि-गुफा उपवन सिंधु तरगिनी-
मादि सबको माहित पर गमा है अन गाआ--मेरी प्रिय
विहगिनी--एक वार गाना I४
हबिहगिमी-
-या तुम्हें स्मरण है कि यमुना सटपर कदम्ब
वृक्षपर वठकर अपने पपम स्वरमे तुमने प्रांगनामोंका प्रेमो-
ग्मादिनी बना गमा है। गाओ-मरी प्रिय मिगिमी-
उसी म्बरसे एक बार गायो॥॥

स कवि-धी माता हरयर स्तरेस्तरे शशव কাশি, भगाइ अतीत स्मृति, सोमार सुबसा गोति, मानस त हहि माशा कुमुगिनी, गोवा हे एबार मोर प्रिय विहंगिनि मर्पवासी मानवक दिवस जुराणि, तोमा हेन प्रियमिधि पठिया दिसे विधि, स्वर्गीय दुतर येशे कठे सुधा सामि, गोवा हे एवार मोर प्रिय हिपिमि 1ron एगार पुराइ गोवा मानस मोहिनी, सरमा बिहगी दुमि, गीत सुनि याओं पमि पापपतीया हा पाहों किया गणि, गोबा हे कोमस सुर प्रिय मिहगिमि 1011 परमेरित करे तनु ससार पोरणि, पोणार मपुर ताने, मापाओं सास्वना प्रागे, मस्फुट सगी रिपा मृत समोरनी, मामारिया ममागाक प्रिय बिगिमि 118 शातिर भराप्त रेहि! मा हिया यनि, नागामा मागर प्राणे, मामाना दुपपे मे, पुस मप हि फरा फुसनि पनि गोवाह एपार मोर प्रिप हिणिमि -मसमिपा हृदयके प्रति स्तरमें शैशवको कमाएं समाई हुई है। तुम्हारे मधुर गीतने अतीत स्मृतिको भगाकर मानस-सरोवरमें याणा कुमुदिनीको विकमित कर दिया है। गाओ-मरी प्रिय विगिनी एक वार गाओ॥६॥ मर्यगासी मानवको शान्ति प्रदान करनेके लिए विधाताने सुम्हारे काठमें अमृत भरसर स्वर्गीय दूतके वसे तुम्हें खपनी-प्रियनिधि बना मेगा है। गायो-मेरी प्रिय निहमिनी-एक्वार गाओ 11011 हे मानस मोहिनी-सुम सरम विहग हो तुम्हारे गोठ मुनकर मैं मम्न हो जाता हूँ मौर तल्लीन होकर कुछ गुनमुनाता रहता हूँ-गायो-हे प्रिय विहगिनी-एकवार कोमल स्वरसे गाओ ||८|| संसारकी ग्यासासे परीर गरित हो रहा है। वीणाको मधुर रागिणीसे मुझ साम्स्यना महीं मिल पाती। तुम्हारे यस्फुट सगीतसे मृत सगीवनी फूल दो। गाओ-६ प्रिय विहगिनी- मुझे हताश न परो॥९॥ सुम शान्तिका भण्डार हो-न तुम्हारा छोटासा हाय पकावट ही मानता है और न उस दुम्सनी मनुभूति ही होती है चूंकि तुम फसाका मधु पीत हुए वाग-वगी!में घुमती फिरती हो। अत गामो-हे प्रिय बिहगिनी-एकबार गाभो ।।..॥

कषि-मी माता-
कोबायोन प्रियतमा काक मो बयानि
फुगे वे परिपरि,
गोवा कत ठेमोरि,
प्रेमिक मिसन गीत मधुर भाषिणी,
गोवा हे एगार मोर प्रिय विहगिमि
॥११॥
बस पाम सेइ शक्ति ज्ञान विकामिनी
हिया प्रम रसे मरा
बने बने गाइ फुरा,
भूर महिमा पश तुमि विरहिणी,
गोवा हे एवार मोर प्रिय बिहगिमि
॥१२॥
बिहगी मोहोबा सुमि कार प्रेमाघीनि
कोने मोकरिसे कोबा,
ममृत मार वोवा,
कोन सहजन प्रेम करणार पनि,
रेगुवाइरिया मोक प्रिय बिगिनि
सुमाहे एवार पखो ममागारवाणी
मासागे पार्थिव सुण,
मपरी मनत पुग
तोमार लगते गरि याओं बिगिनि,
साय यहछे यत प्रेम मनापिनी
॥१४॥

-मसमिया ५७ प्रियतमे, बतायो पुरकुनमें कितनेही रूपोंमें किस प्रेमीको प्रशसाम मिलम गीत गाती हो-हे मधुर भापणी-गायो- मेरी प्रिय विहगिनी-फिरसे एक वार गामो॥११॥ वह मान विकासिनी शक्ति मुझे कहाँसे मिलेपी? तुम्हारा हदय प्रम रससे परिपूर्ण है । हे विरहिणी तुम विभुमी महिमा बनमनमें धूम घूमकर गा रही हो-गाओ एक बार मरी प्रिय मिहगिनी गायो।।१२।। तुम विगिनी नहीं हो वतामो रिसकी प्रमाघीना हो क्सिन तुम्हें अमृतका मार ढोनगामी पनाया है। प्रेम और परणामी बाम वह कौन है ? गायो-हे प्रिय विहगिनी-मुझे उन्हें दिया दो ।। १३॥ हे पक्षी-एकवार इस अभागकी भी बात सुन लो मुझे पापिय मुख नहीं चाहिए (उनके अमायसे) मममें भी मै दुध का अनुभव नही करूगा। यहाँ सवा प्रममी मन्दाकिनी प्रवाहित हो रही हो वहातक मैं तुम्हारे साप उस पगा।

कषि-श्री मासा १८ । केकी राह म फैलेको, अ केलेको किय एनेबरे भूपे अपये सरि उरि किय फुरा पूरि पूरि, फार मो बिरह गोवा अबुन भापारे ॥१॥ गगन बिहारी पपी कोन सुमि बोया, सोबासप एरिसुमि फुरा से गले मि, मावेग सुरत किलो प्रेम गीत गोवा ॥२॥ स्वाधीन पावरे पूर्ण हय तोमार गहीन भारमि बन, किम्बा पुष्प उपबम, करा गा तुमि तात भामम्बे बिहार "ती" साहरी माम कि गुगत समा कार प्रेमे मस्त हा पोर मरण्यात गर, गछ मता गिरि मो सवा मुसाप्ता प्रेमगीत गायमा कत मो शिपिता, एकेटि भायर गान, एफेरि प्रागर ताने, स्टवा सप्तार पुमि मोमस करिता 11 निगम सुपर निगा गहीन वमत ममिया पीतर पार सुनिमिमी त पार घोरे धोरे मिति योषा घोर ताहत 1111

-मसमिया
केतकी पक्षी
मरी पेन्तको बरी ओ कनकी इस तरह पूयमें क्यों
पुमती फिरती हो और अपनी अनजान वोलीमें किसकी गिरह
बेदना मा रही हो ॥१॥
है गगन विहारी पक्षी तुम कौन हो यतायो लोकालय
स्यागकर मृोंकी टहनियों और गलियोंपर पूमती फिरती
मावेग मर स्वरसे किस प्रम-मगीत गा रही हो? ॥२॥
म्वाधीन मावोंस ही तुम्हारा हृदय परिपूर्ण ह । गहन
मिर्गन वनों अथवा पुप्पोद्यानोंमें आपर तुम मानन्दसे बिहार
करती हो ॥३॥
कोको एसा सुन्दर माम सुमने किम गुणस लिया?
सुमने किसके प्रेममें उमरस होर पोर परप्पमें मुक्ष सता
गिरि, मी आदि सभीको मोहित कर लिया। 1ml
प्रेमगीत गाना सुमन कहाँस सीवा? एकही भावनाम
परिपूण माम और एक हो जीवन-साममे कठोर ससारको भी
तुमन भोमस बना दिया है ।।५।।
निस्तब्ध दोपहर निसीपकामम मपन बनमें धीग्धीरे
पपनरे साप विमीन होते हुए सुम्हारे मुन्दर गीतोंको मने
जितनी ही वार मुना है ॥६॥

कवि-भी माता
५८
। फेतेकी घरात
म तेको, म कतेको किम एनेबरे
शुमये मुपूये सरि उरि
रिप फुरा पूरि पूरि,
कार मो बिए गोवा मयुन मापारे
॥१॥
गगम बिहारी पती कोन सुमि कोवा,
सोसालप एरितुमि
फुरा गले गते भ्रमि,
मावेग सुरत किनी प्रम गोत गोवा ॥२॥
स्वाधीन मावरे पूम एय तोमार
महीन पारणि बन,
किम्बा पुष्प उपवन,
करा गा तुमि तात मानन्ये बिहार ॥६॥
"सको " माहरी माम कि गुगत मता
कार प्रेमे मस्त हा
पोर भरण्यत गह,
गछ मता गिरि मरो सबाले मुसाप्ता
111
प्रेमगीत गारसा त भो मिकिता,
एकटि भाबर गामे
एकेटि प्रापर ताने,
कठ्या सप्तार तुमि कोमस परिता
॥५॥
निगम पर निगा गहीन बनत
ममिया पीतर धार
गुनिहिती पन्त पार,
धीरे धोरे मिमि मोवा धीर बताहत
॥६॥

-असमिया ४. केते की पट्टी अरी फेतेगी अरी को केतकी इस तरह शून्यमें क्यों मुमती फिरती हो वीर अपनी अनजान वोसीमें किसकी विरह वेदना गा रही हो? ॥१॥ है मगन बिहारी पक्षो तुम कौन घतामो मोकामय स्पागकर वृक्षोंगी टहनियों और गमिर्योपर घूमती फिरती आपेग भरे सरसे किसका प्रेम-सगीत गा रही हो? ॥२॥ ? स्वाधीन भावोंसे ही तुम्हारा हृदय परिपूर्ण ह । गहन निर्जन वनों अपवा पुप्पोद्यानोंमें जाफर तुम आमन्वसे विहार करती हो ॥३॥ ॥ 'कतेको' ऐसा सुन्दर माम तुमने क्सि गुमसे मिया? तुमने क्सिके प्रेममें उन्मत्त होकर पोर मरम्पमें वृक्ष, सता गिरि मदी आदि सभीको मोहित पर सिया? in ? एमी भार प्रेमगीत गाना सुमने कहाँसे सीवा परिपूम गान और एक ही मीबम-तानस कठोर नए तुमने कोमल बना दिया है ।।५ निस्तब्ध दोपहर निगीकारने पवना साप विप्तीन होते हटन कितनी ही वार मुमा है ! !!

कवि-मो मासा- मरतत पायोवा सगोतर धारा एकपरे अनि पनि पाको किया माबि गणि, मापोनाक मापुनिये हों आत्महारा तोमार सगोते प्रिय नामे नि मोहिमी, माशार पतुम पाहि मारे मिचिरिया हाहि, हाय मीणात बागे प्रेमर रागिणी HEL प्रेमिक मिसम माशा मुके बाघिसा, आनर सोतत माहि पना माम यांही मिमम पातरि दिया प्रेमिकक गइ तुमि बिने सखी संसारत नाइ, परर सुपत मुखो परर दुखत गुपो एकटि उद्देश्य सा फुरिया सराय पमर बिहा तुमि प्रमर मिवारी मानएर रोतिनोति दुरिमोया स्नेह प्रीति सम्मी ममोपा रिहमा पनपारी ॥११॥ बिहतु मोबीया पपी मामुहर मुय पापिय मुपर साप भातागे ने भास बाद सपारुप मा मेरि रासारत मुण्?

-असमिया मस्पनोस में प्रवाहित संगीतमा प्रवाह मुनत सुनत तस्लीन हो कुछ सोपताही रह जाता है और अपने आपमें खो पाता हूँ हे प्रिये तुम्हारे सगीतमें कौनसा सम्मोहम-मत्र है जिससे अन्तरमें स्थित बारे मम-वल स्मित हाम्पसे दिम उठते है और हषय-वीणाम प्रमकी रागिनी वर उठसी है।।८।। प्रियतमकी मिसन-कामना हृदयमें सैनोपर आनन्द प्रवाहमें सोन मृदुसवमो बजावो हुई प्रमीका मिसनकी सूचना देवी हो ॥९॥ तुम्हारे विना ससाग्में मेरा कोई नहीं है। तुम दूसरोंक सुखम मुवी मीर पुबमें दुखी हा-एक ही उद्दश्य लिए तुम निरन्तर पूम रही हो ।।१०॥ बनकी बिहगिनी तुम प्रेमको मिवारिन हो। मनुप्पी रीति-नीति मौर दो दिनोंही स्नेह प्रीति सभीका परित्याग पर तुम वनवारिणी बनी हो ॥११॥ हे पक्षी सुम मनुष्यका मुह कमों नहीं पयती? पापिन मुखोंड ला क्या तुम्हें मन्छ नहा लगत ससारमें सुख महीं है' ।।१२।। 7 क्या वम्मुत

कपि-पी माता-
मातत बह योगा संगीतर धारा
एकेपरे गुमि शुनि
पाकों किया माबि गणि,
आपोनाक मापुनिये हों आत्महारा
1101
तोमार सगीसे प्रिये पामे कि मोहिनो,
माशार पाम पाहि
मारे मिधिकिया होहि
हरय बीणात बाम प्रमर रागिणी
॥८॥
प्रमिक मिसम माशा युके बाधिना,
मानन्द सोसत माहि
बजार माम पाही
मिसन पातरि दिया प्रेमिका गा
॥९॥
तुमि दिने सपो संसारत माइ,
परर सुखात सुखी
परर दुखत गुपो,
एफटि उदम्य सा फुरि सराप
॥१०॥
बनर बिहग दुमि प्रेमर मिपारी
मानहर रोतिनोति
दुदिनीया स्मह प्रीति
समतोके ममोपा रिहमा पमबारी ॥११॥
रिहनु मोबीवा परी मानुहर मुण
पापिन मुगर सार
मासागे, भाम बाप
समास्ये ना मरि ससारत मुण?
॥१२॥

-असमिया मर्यलोकमें प्रवाहित संगीतका प्रवाह सुनस सुनसे तस्तीन हो कुछ सोचताही रह जाता हूं और अपने बापमें यो पाता हूँ ॥७॥ हे प्रिये तुम्हारे सगीतमें कौनया सम्मोहन-मत्र ह जिससे अन्तरमें स्पित पाशाके कम दस स्मित हास्यसे खिल उठते है और हृदय-वीणा प्रमरी रागिनी वज उठती है।1।। प्रियतमपी मिमन-कामना हृदयमें संजोकर मानन्द प्रवाहमें सीम मृदुलवधी बनाती हुई प्रेमीको मिमनकी सूचना देती हो ॥९॥ तुम्हारे विना ससारमें मेरा कोई महीं है। तुम दूसरों सुधर्म सुधी मीर दुखमें युवी हो-एक ही उद्देश्य लिए तुम निरन्तर घूम रही हो।।१०॥ वनकी बिगिमी तुम प्रमको भिवारित हो। मनुप्यकी रीति-मोति मोर दो दिनोंको स्नेह प्रीति समीका परित्याग कर तुम बनपारिगो वनी हो ॥११॥ हे पक्षी, तुम मनुप्यका मुंह क्यों नहीं पती ? पामिन सुखोंक सा क्या तुम्हें अम्छे नहीं मगत ? ससारमें मुव नहीं है ? ॥१२॥ क्या यम्मुत- करिभी माता- झुनियामे प्रिय सबा क्या एटि कमों एफोरे मामागे मोक, मकरों बार शोक, जन्म पन्मान्तरे येन तोमाहे हे पार्मा ॥१३॥ सुम्बर पनि हिया माद मेगामेर, एके माम एशाम, मिलि माय दुटि प्राप, कदापितो दुजनर महन विभड

-असमिया
प्रिय सखी-एर बात कहूं-सुनोगी क्या? मुझे और कुछ
महीं चाहिए। (उनके मिए ) मैं किसी प्रकारमा पोक भी
नहीं करेगा। सिर्फ एकही अभिसापा है कि बम नमान्तरमें
तुम्हीको में प्राप्त कहे ॥१३॥
सुन्दर दुखी दो-हदय जिनमें कोई मवमाव नहीं। एक
म्यान, एक शान-गेना एक प्राण हो जाएंगे और कभी भी
दोनाका पिछद नही होगा ॥१४॥

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-मसमिया ५. पशिष्ठामम हे पपिक अपमा सापित गीवन यहाँ आकर शान्त करो- यहाँ क्षणभर मान पठनेस आपका अन्तर शान्त हो जाएगा। यह गिरि सध्याचम पपिकके लिए शान्ति-निकेतन और प्रेम-पुरी है ।।१।। यह प्रकृतिका काम्यवन ऋपिका माश्रम है। वेव-वांछित यह पुरी अत्यत सुन्दर है। चारों ओर मजामहीन निस्तब्ध और निर्जन है गंभीर प्रकृति मोगीक समान ध्याममें मम्न है ॥२॥ पर्वत-सम्या सुन्दर स्वभाववाली सध्या ममिता कान्ता- सीनों बहनें स्वर्गीय मार्कोस महिमाके गीत गाती है भौर ग्रामपुप मानो स्वामीको गोदमें सम्मापण कर रही है ।।३।। दोनों तरफ फूलोंनी पक्तियाँ-पक्षमताएँ ममूमकर पिये परणोंमें प्रगाम करती है। गगमबिहारी पक्षी काममको मोहित पर कुर काननमें मगम भारती करते है ।।४॥ (यहाँ किसी कालमें ) पवित्र यज्ञकी मधसे दूर-दूर तक पुण्य तपोवन पवित्र हो उठे पे। वन विहग और हिरण प्रेममुग्ध होकर सामवेयके गीत म्यामस सुना करते पे ॥५।। स्पर्ग विवापर, देव भोर देवियाँ विविध भगिमासे विवाद बजाया करते पे भौर ऋपि-कल्याएँ मिनार पंपमस्वरमें दीपक मसाप माराधमाके गीत गाया करती थीं ।।६।।

कवि-पी मासा-
५. पशिष्ठाश्रम
है पपिक, जुरोवाहि तापित पोवन,
मन्तेक पहिले हिया परिव शोतस,
मागवा पयिकर शान्ति निकेतन,
ममया प्रेमर पुरी गिरि सम्माचल
प्रातिर काम्यवन ऋषिर भाभम,
अमर बौधित पुरी अति बितोपम
धारि रिश मिमांस निमात नियम,
गमोर प्राति योगी भ्यानत मगम ॥२॥
सप्या ममिता कान्ता पब्बत जापारी,
तिमिमोटी बाइ मनी स्वर्गीय मावत,
महिमार गीत गाय स्वभाव सुम्परी,
समापिछे प्रह्मपत्र स्वामीर कोमात
एकापे फुतर शारो गए मतिका
हासिमाति सेया करे शपिर पावत,
पगम विहारी पदी कानन मुनाइ,
मगस भारति परे पुर कामनत
पवित्र होमर गये बह रमा,
परिसि मुपवित्र पुष्प तपोवन
बनर पराा पह प्रमे मुम्य हा
माण, पाति शुनिटिल सामोरे गान ॥५॥
स्वरगर पिचापरी रेष रिप्पांगमा,
बमाप ममर पाप हो परिपरि
रोपर पषम मुरे गीत माराधना
गालि मिति पर पिर जीयारो
॥४॥

-मसमिया म. पशिष्ठाश्रम हे पथिम अपमा सापित जीवन यहाँ आकर पात रो-- यही क्षणमर मात्र पंठनेसे पापका बतर पान्त हो पाएगा। यह गिरि सम्यापम पथिको सिए शान्तिनियतन मोर प्रम पुरी है॥१॥ यह प्रतिमा काम्यवन ऋपिका भाषम है। वेग-वांछित यह पुरी अत्यत मुन्दर है। चारा मोर जजासहीन, निस्तया और निर्जन है गभीर प्राति योगीन समान भ्यानम मम्न है॥२॥ पर्वतमन्या सुन्दर सवभाववामी सध्या, ललिता काम्ता- तीनों बहनें सर्गीय भावोस महिमा गीत गाती है मौर ब्रह्मपुत्र मानो स्वामीकी गोदमै सम्भापम कर रही है ।।३।। दोनों तरफ फूमोंकी पक्तियां-वृक्ष मताएं मामूमार पिक परगोंमें प्रणाम करती हैं। गगनविहारी पक्षी माननका मोहित कर पुन काननमें मंगस मारती करते है ।।४।। (यहाँ किसी कासम) पवित्र यसको गघसे दूर-दूर तक पुण्य तपोरन पवित्र हो उठे प। बनरे विहग और हिरण प्रेममुग्ध होकर सामवेदके गोत म्यामस मुना करते पे ।।५।। स्वर्गक विपाधर, देव बोर देवियो विविध भगिमासे दयबाप माया परखे पे मौर अपि-कम्याएँ मिलकर पत्रमस्सरमें दीपक अमाप माराधमाके गीत गाया करती थीं।६।।

रुक्मिी माता-
इनार ममरावती प्रमोर कानम,
भरतमूमिस चोदा किया दोमा घरे
बमदेवी सवे पिधि पुष्प मामरण,
प्रति मनि मागे मानन्वे बिहरे
तुराम बसम्तर प्रिय समापणे,
सौमप्य मोपदि पर पुष्प कामनर
फुसर सुगम्य मामि साप्प समोरणे,
विलाछे शान्ति सुधा स्वर्गीय प्रेमर
ch
सुबगी कुसिये माते भपूर्व सानेरे,
मिलोपे अमाप बीमा मिसन मुरत,
मोरब प्रति मेरि मसित प्रकारे,
उठे तार प्रतिध्वनि काम्प कानन्त
॥९॥
सरतर मीण पोति पुषप्ति मीनर,
विरित पेतिया माहि फ़सर पोपात
कि ये मनोमोहा दृश्य कुग कानमर,
पराग बिमीत हय पवित्र भावत
॥१०॥
पहम श्यामस क्षेत्र शितमिरे पया,
सपा माछे बगिप्टर हरप बुगत
मतीत गौरव स्मृति मार पुष्य नपा,
विश्वमोसा मभिनय कौतिशत त
परत युग मार गम रासर सोतात,
भागिमो पगिप्टापम मा एपेमागे,
माप्पर गोरप पोपि मस्प मुपनत,
रिमतार हेदोसनि सहि मोरये
॥१२॥

६७
-मसमिया
मानो इन्द्रको प्रमोदकानन अमरावती ही मर्यमें सुशोभित
हो रही है। वनवियाँ पुप्पोंके याभरण पहनकर प्रतिके
पुप्पो-पानमें आनन्दसे बिहार पर ही है ॥७॥
ऋतुराज वसन्त प्रिय सम्मापणसे पुप्पकाननका सौंदर्य
छमम रहा है और साम्य समीरम फूलोंकी सुगध मार
स्वर्गीय प्रमकी पान्ति सुधा पिरतम कर रहा है।
रमीसी मोफिल भपूर्व स्वरसे माती है । मुर मिमन स्वरमें
बीगा पगाते हैं। ममित झंकारसे मीरव प्रासिको भेवकर
कमनीय कामनमें उसकी प्रतिम्पनि गूंज उठती है ॥९॥
पारदीप चन्द्रमाकी प्रभातकासीम क्षीण ज्योति यव पुप्प
गुभा पर पाकर मसकती है, उस समयक पुन माननका दृश्य
मिसना मनोरम हो उठता है। पवित्र मावोंसे प्राण आत्म
विमोर हो उठते है॥१०॥
विस्तृत पयामस क्षेत्र पिसाामे गुपी हुई है। अतीत
गौरवकी स्मृति बौर पुण्य पाएँ तथा पत पत विष-मीसा
मभिनय-नीति गायाएँ वपिप्ठन हृदम-दुर्गपर लिखी हुई
कालक्रममें कितने ही युग बीत गए, पिन वशिष्ठायम
बान भी उमी तरह ही है। माय मुवनमें पार्योकी गौरव
पोपणा करना हतु (उमने) विजेताओंके (काम) आक्रमण
मौन रहार सहे हैं।॥१२॥

कवि-पी मासा-
६८
६ मरण
॥२॥
माष्टिमों निधई सरु एकोके मजना
मातुर कोसात रगे नाचि फुरिहितों
मायामय ससारर बिचिन भामोना,
हहा कम्दा पृश्य किमों एको मेरे पिमों
तोतयाओ तुमि देय, पातमिते माहि
भाग्यमिपि देखि मोर पठिष्ठिमा हाहि
पारिसों मसीतर सि सप फाहिमी,
मापामों सि सुष माय इह बनमत
देखिसों ससार चिन, प्रापर संगिनी
हल मोर दुखे पुपी ससार पनत
सतियामो तुमि मोर रेति रेहदप,
प्रणयर परिणाम बुमिसा स्पषप
मरि रिसों जीवनर तृतीय पापत,
प्रिय परिमन सा पातिमों संसार,
परत पे सहितों दुए भीवन पपत,
मेरेवि उपाय एको करों हाहाकार
तोतयामो दुमि मोर बहि गितानत,
जोयमर पाप सीता पिता माग्यत
Iril
माति मापय तर रगत बासा,
सम्पार तपरीया, भारमीय स्वमने,
उमति भाचाय मोफ रेगि पुरा,
महता पानि काग्नि फरों बने बने
तेतियाभो तोमारे मुवरि मुपरि,
पिधारो परम साप दिगि मापा गरि
॥४॥

-मसमिया ६ मरण में बहुत छोटा था। कुछ जानता नहीं था। मांकी गोवमें उल्लाससे बला कूता करता था। मामामय ससारके विचित्र माटपके हास्य मौर फ्रन्दन के दृश्य मैने कुछ भी नहीं देखे ॥१॥ हे देव! तव मी तुम मक्षित स्पमें भाकर मरी माम्प सिपि देवकर हंस पते थे। आम मतीतकी उन वार्ताको मैं मूल गया हूँ। यह सुर इस सम्ममें अब और नहीं मिलेगा ॥२॥ । ससार पित्र मैंने देखा। ससारमें मेरी प्राण-सगिनी मेरे बुख दुपी हुई। फिर भी तुमने भरा रग-रग देवार प्रणयका परिणाम ठीक समम मिया था।।३।। पर मैंने जीवन सुतीय स्तरमें प्रवेश मिया-प्रिय परि- जनको लेकर ससारसी रचनाकी-कितने नहीं दुख मैंने सहन किये जीवन पर पर! उस समय कोई उपाय म देवकर मेरा मन हाहाकार कर उठता पा। हे देव तव भी तुमने मेरे सिरहाने वैठकर जीवनको दोप मौसा मरे भाम्यमें सिय दो मेरा सहारा ही टूट गया--पर उमा गया सम्पदा पसे पानसे मेरी दुईयाम पास्मीय स्वगन भी मुझे अनदेखा करने समे। मैं अरमा ही रोता हुमा-गर्मोमें भटकता मा । हे दव! उस समय भी मायानी मेरी सोर तुम्हारा ही म्यान कर परम सीमाका अनुसघाम करता था ।।५।।

मि-भी मामा--
४
माहा मोर पिर सगो, आहा प्रिय, सपा,
सोमार मुबके भाइ दुख पाहरिम,
रिम्प सपरि तुमि रिपा मोक रेचा,
पिविना चिताक मा सावटि धरिम
सिविनाहे दूर हर ससार पातमा,
सिबिमाहे प्रामे मोर तमिव साम्स्वना

-मसमिया
आमो हे मरे पिर सापी मरे सबा बामओ-मै तुम्हारा मुंह
देवकर ही दुख भूम पाऊंगा। जिस दिन म मिताग्निका
मासिंगन कर सूगा, उस दिन मुझे दिव्य रूप धर दान दोगे।
उसी दिन मेरी ससार-यातनामा भन्त होगा मौर उसी दिन मेरे
प्रार्गोको सान्स्पना मिसेगी ।।६।।

कविधी मासा-
૭૨
० दहिकतरा
॥२॥
म मरमी यषु मोर म पहिकतरा
कोन मुर्छनात तोर पाने होतोरा,
मिसन माघुरो ला
माहिण सायरी मा
कोन बिरही करिवि प्रेमर पतरा
पमिते आछे ए गुचि कतरा
मामोक में अधकार सुदूर प्रान्तर
कोन सागर परा
ममृत गरम भरा
मेसि विछ सफरादि मोहिनी कठर
बागस मिश्वव्यापि रिक दिगन्तर
कोनेनो पठासे तोक कमफष्ठी करि
पुवे रिले धमफाट
मातिसि मुवती मात
गोसती मत्तपा बा शिम पात तर
प्रातिर निस्तप्यता गत मे परि
ग्रह गस धर्पा गल माहित भारत
विधापरी पित्रसखा
पसनी रिहिरवा
मागे पत पप तुति कपण गुरत
पमर सणासि पिनी मम्मनपुरस ?
कापत मगरलपट पृप्तर परणि
मिति यत बममाता
पिणारे बनमाला
पृक्त राबाद रिट दुगडुगोपनि
परिपाइरपनर मरणी
॥४॥
॥२॥

-मसमिया ७३ - दहिकतरा (पक्षी विशेष) ऐ प्यारी सखी दहिकतरा किस मुईनामें तुम्हारा तारा वन रहा है ! मिलन-माधुरी सेकर तो तुम आई हो पर क्सि बिरहीको प्रेमका सदेश दोगी? यझिारपर 'गुलपि 'फतरा (फूल विधेप ) सुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हैं ॥१॥ तुम कौनसे सूदूर प्रान्तका बालोक और अधिकार मा रही हो! अपने मोहनी कण्ठ क्सि सागर अमृत और विपको साल रही हो जिससे कि विश्वके दिग्दिगन्त परिम्याप्त हो रहे हैं॥२॥ कमकाठी बनाकर तुम्हें किसम मेमा है 2. पूर्व दिशाम पौ फटत ही तुम्हारो सुरीमी तान सुनाई देती है, जो प्रकृतिको निस्सम्यता भेदती हुई-दूर पसी पाती है महरा कुछ उसी सरह जिस तरह शीतस मलम पायुसे पालतनी नाव पमी मावी हे ॥३॥ ग्रीष्म गया वर्षा पई और मा मई भरद् ऋतु इसमें विचाधरी चित्रसपा सपीसनन पक्षीने दर्शन दिया। यह कितने ही फंदोंमें करुण स्वरसेि मृत्म रती है जिससे नम्वनपुर मारपर्य विभोर हो पाता है ।।४।। गोदमें मगमगर और फॉपी मी मिए बनवासाएँ आपसमें वनमाला पहना रही है और यक्षपर दुगदुगो (बस्त्रविशप) समा रही है। सपा भी धीरे धीरे सम- घनकर स्वर्णिम वप म मिया है ।।।। - - कषि-मी माला- ७४ पुष्प वृष्टि हम तोर पराममित निमम पनि गरा पानी पियसिरे मरा मुकुतार गुममाता श्यामप्त पाटीत कि मुम्मा स्निग्ध कान्ति फस्त बनमित श्यामप्त तमेरे भरा पनीया पपार सुपरी शाररबाता पिंधासे हरित माता संगीतर हिस्सोसत प्रेमर माधार फुमित पत कत कुमुर महसार माछिसि निमाती हा कत रिन परि बसिस पोसताव कुरपार रिमे राव आहिम बसम्त रा साहबाह करि, माररिमानिनि तपे तुसि सुवागरि 11. क्षीरपाबी मुरष्ठर मस्सार नित वामि उठ बनवेणु गरि फरे फारेन परेप सीसामगी फुस्स फुसनित, उठिस स्पनन गिरि शिवमषित ॥९॥ पस्सनै पस्तो परिरठे गीत हम, बिबामपरप प्रय गमित महापित ममता वाति सि मरतत प्रम मगरम स्वरगर परा मानि

-असमिया
७
तुम्हारे स्पर्म मात्रसे ही मानो पुष्पवृष्टि हो रही है। हरी
भरी तृपाम्छादिता भूमि पानी पिपलि" (एक प्रकारका
पौधा) स भरी हुई है जो मानो श्यामस बिस्तरपर मुस्तानी
शुभ मालाएँ हैं। इस प्रकार उत्फुल्ल वनमें कितनी सुन्दर
स्निग्धशान्ति विराजमान ह! ॥६॥
श्यामल तोसे सुन्दर वेद विभूपित है। मानो मुन्दरी
सरदवामान ही यह हरित मामा पहनाई हो। प्रमाघार
हदयोंमें सगीतको हिस्तोरोंसे न जाने कितने ही कुमुष
प्रस्फुटित हो रहे हैं।७॥
कितन दिनों तक तुम नौरव रहीं? (मफिन यव) पीतल
मायु प्रवाहित होने सगी कुरवा (पसी रिप) वोसने मगा
मौर बसत परवेगमें समधन कर माया तब तुमन हो मगस
मौतोंसे उसका म्यागत किया ।।८।।
निस समय मधुर प्पनिसे माहार मलापसी हो उस समय
मानो तुम्हारे कठस क्षीरसी वर्षा होती है निमसे मन बेगु घर
उठती है फाम रणु (गुमाम) उड़ने सगती है तया विविध
भाव भगिमासे भ्रमर नृत्य परन समता है--सिम समस्त
गिरि पिवर स्पन्दित हा उठता है ॥९॥
पत्तों-पत्तों तक में गीतिएर मर ठा है। इस तरह प्रेम
मकरन्दमे परिपूर्ण बिके इस मनुपम दृश्यको देखकर
महाविश्व उसित हो उठा है। मानो तुमन ही सगम अमृतमा
पात्रता मर्यसोपमें उप दिया हो॥१०॥

कृषि-भी मासा- फार प्रेरणात तापरिनि सगोत सटिमीर क्षीरधारा फार प्रेमे आरमहारा पि गीतर तरगत मम सरगित; दवय माप्सुत करे माचीन भगीत सगीतर सुधा धारा रिसि तह पाकि, माकाशत रामघे रमिले मौसिमा तनु देयपुरी एरि पा माकाशो नतको, मरतत भरि दिसे सवशी तेफो ॥१२॥ मेपमन्या स पिधि तदितर हार, गात महमीसाबरी मारोवाम पनि परि मागहरे रिछे तोफ प्रीति उपहार, पुगे मे पुरि पन्त करिए पिहार ॥१॥ मामोडि गपपुर मापन पान, पाति बिन्नी विश्वमित मदालसा मेम गीत पातिमि प्रेमर हाट सोसा निपेतन परे पत पसम्ता पुर निप्पन ॥१४॥ सोमटि सोमारवंगा पोपामणि पर पक्षिा रवि दिउ प्रेम उपाधि धमाल मपर पर तुलापातानि रत पाय पपाए पनि

-मसमिया
वताओ तोक्सिको प्रेरणास मोर दिम प्रेममें आरमरिमोर
होकर तुमने गीस प्रारम्भ किए, पिमरी महरोंमें मोन हो
हृदय नाच उठा है॥१॥
तुम्हारे समीतने मानो ममत मी धारा ही यहा दो-मिसन
याकागक नीसे परीरको मो इम्प्रधनुप के रूपमें प्रभावित
फिमा ह । एसा प्रतीत होता है फि दयपुरीकी मतमी-उर्वशी
केतकीरे रूपमें मर्य-सोपमें आई ह॥१२॥
समी मेष फम्यामोंने विजुत्का हार पहनकर सरीरपर
नीलाम्बर धारणकर वा आग्रहसे तुम्हें प्रीतिका उपहार
दिया है। तुम पुग-कुरमें कहाँ बिहार कर रही हो' ॥१३॥
गघर्षपुर नन्दन काननको मालोतिर विश्वजीत मवामसा
के प्रेमगीर्योपो क्या तुमने पाया है जिससे सीला मिस्तन
प्रेमका हाट बस गया है पहो पसत कुरको मधुवन बना रहा
है।॥१४॥
स्वर्ष मोर बमप्तवासने मणिगुम्छ मेकर कनक परिवानी
रखनापर मयापित प्रेम प्रशन किया । सुप्र वापसका पक्ष
मानो भूगपत्र है जो किवनो हो काय्य पाओंसे मुन्दर वना
हुआ है ॥१॥

क्-िभी मासा- सुइतर काणे काणे कहबार फस बताहत हासि जाति हौवे डोये रोपेप्सि तुषार पवस कान्ति घरिछे विपुस पेन सुरे तरंगिनो पुसके मास ॥१६॥ सोजोवामी रहणर सरिमहरा, पर माथुरो समा हाति प्रेम म्पोसिम्या उराह पराग फाकु मनप्रापहरा रमक नमक हम विश्व बसुन्धरा ॥१७॥ शोमार अमत दुस्य तरू-सोनिम, ताते परि प्रिया सा तुमि सगोतर सय सानि रिति इपाटा घवती भजन, करिऐ स्वर्गीय दृश्ये हाय रंजन ॥१८॥ पुरा मामररोता माडि सि धमक तागिम बसम्त या उसह मामह गा भव मिलासप बसेरेमरमर समापि मागस्वा पत परिक गिरोप गलत प्रिय परि राति रिन फस कॉपरक सा कि पेसा पसिछता तपनि सागि तोर रहा हम सोप, एपे मेकि या तोर मासपोवा पिन ॥२.14

-असमिया
साहितक किनारमें कांसक माने हवामें झूम-भूमकर
महरोंके साप महराते हुए तुपार घरस कान्ति ग्रहण कर मी
तरगिनी पुसदमे माकुल हई है ।।१६।।
हमानो
स्वर्णिम रगर सरसारे खेत-रप माघुपमें प्रेम न्योतिषण
मनप्राण आकर्षित करनवास पराग गुमाल उग रहे है
निमसे विपर बसूपरा अनुरवित हो उठी है ।।१७।।
मगनकी तरह गोमागास माग्न वृमपर बैठकर सगीतकी
सय गुंगाकर तुमने घवमी असनक साप स्पट्टा सान दी है
मौर एक स्वर्गीय दृश्यसे सबका हृदय रबित कर रही हो ।।१८।।
पूर आगारका भी तुमने पमका दिया है। बसत पवनसे
उसका हृदय मी आन्दोलित हुआ है। वमक्त हुए मय किससय
दमने जगमगात हुए किवन ही परियान्त पपिकाको टस्साहित
किया है ॥१९॥
गिरीप (वृक्ष शिप) की गलियोंमें बैठकर
पमियॉर साप रात दिन कौनमा बस तुम बेस रही हो?
यौवनोन्मादसे तुम्हारा मरीर क्षीण हो गया ह? प्रिये या
यही तुम्हार प्रमको निधामा है ? ॥२०॥

कवि-भी मासा
रपट्टी, सेउती, भया, पम्पा, युति गति
फुप्तर कुर्वरोपोरे
सानि र स्पाहर
फुसर शराइ क्स पाने थाने पाति
जनाइछे प्याकुसता इगितरे माति ॥२१॥
रिमफुमी भासतीर रूप बितोपन,
पिचित्र बरण धरि
कुपमि चरि करि
लागध उपहार तुम चन्दन
पासिझे सारी तोफ प्रमय चुम्बम
॥२२॥
करवीर तगरतोतुति दिसि को
फुले फुले फुसरापी
सानि रित पुसरेणी
मौपिया माइटकी लागे किवा मो,
ममर मागादि बार पुरावि मेनो
॥२३॥
मातमुवा गनिमीर पापनि मुरि
पाषिताहि पपिसाब
पने पर्ने चुमा पार
स्पताती तरगत मारि सारि,
हेपाह पसार पोये ममिपा मापुरी
॥२४॥
प्रेपसी गरिमाप्ती महपि मधोरा
निपतम बने माहि
बमा मोहन पाही
पियार मिमन ने प्रमप मरिरा
पसाब पिपाह मोर दापपर पोड़ा
॥२॥

52
-असमिया
मही, सेपन्ती बमा बम्पा, युति पाति (फूमोंक माम)
मावि फूल गुमारियोने विविध वर्णोसे सजघपकर बगह जगह
मैवेब सनाये हैं और इशारेसे पुप्ता-बुसाकर अपनी व्यासुसता
सूचिस की है ॥२१॥
सूर्यमुखी मामती अपने मनोहर स्प एप गिचित्र वण वामे
हृदयको पोसकर गन्ध म्पो कुसुम-पन्दनका उपहार दे देकर
सुमसे प्रणय घुम्बन मांग रही है ॥२२॥
"
करपीर तगरको भी तुमने तरगित कर दिया । घसस्य
फूलोंसे फूलरानीन अपमो फूसवेणी सगाई है। मौ-पिया
बिटिमाको भी कौनसा मधुरस पाहिए? उसके मनकी आशा
पया तुम पूरी नहीं करोगी? ।।२३।।
मोमस गमिमी पक्षको मातकर पयवासी तितमी वार
पार मुमती है। यह उसकी स्पलासीकी तरंगोंमें तरती हुई
इच्छानुसार बमियमाधुरोका पान करती है ।।२४।।
मो प्रियतमा गुटिमामी धीरज मत घोमो। प्रियतम बाकर
मोहन बसी वजाएंगे मोर मिमम दूत माकर प्रणय-मदिरा
पिनाएगा। सब सब प्रकारकी शुधा पिपासा मोर हषयको
पीड़ा गायम हो जाएगी ॥२॥

कषि-श्री माता-
८२
८ गिरिमातिका
अयि मनवगुन्ठिता फस्तशिवरिणी
रनि मणिकपिकार हरित मेवता,
माछा प्रोमि मवेदो, करि सुरमित
साहित्पर तीरभूमि श्यामत बननि ।
नन्वनर रूप म्योति परिमस सुधा,
करि माहरण विश्व विजयिनी स्पे
मोहिमा नितम्ब दश बिनम प्रान्तर।
वनस्पति गुमादमे मव पल्मवरे
जनाइछे हरपर गुप्त सम्मापम
स्तोक्नम्रा सतिकार कुन पस्सयत
उठिछे उमि पेन प्रेमर सरग
प्रिया, तुमि गसिता कि मोहन मरिरा
हाहि पटाक्षर पि हाहित बमे बने,
हरिता क्षत्रत तर तग लतिकारो
माहित बमक, ठाये छाये बिघे यि
फुलित रेकुटर दुटमात रागि
द्रोगिमात मुभकान्ति फुस्त रोगिरने
प्रोतिमरा सामानसि पाचिछे साबरे।
रेषता सासर माल पराग
र महा पदमर मास गतित
मुकोमल गौर तनु पेलाइछे पुर।
रनित तुपार पत्र निमन गामत
मुरभि पुरम राग रक्त पारनर ।
पापानि शियर परे रमि संप्या राणे
मुरे विधाम समे साम्य नमोमणि
बिघ पनिता सबै सिपि ममोरण
रिहि पिया मुक्ताहार माभरण

-मसमिया
८३
6 गिरिमरिसका
बपि बनवगुष्ठिता फुस्म शिखरिणी,
रवित कर मणिकर्णिकामसे हरित मेवलाको
शोभित हो रही हो शुभ वेशधारिणी, कर सुरमित
मोहित्यकी तीरभूमि-श्यामल वन ।
मदनकी स्प-ज्योति सुधाके परिमतका
कर बाहरण विश्वविजयिमी स्पमें
मोह लिया नितव देश निर्जन इस प्रान्तका।
वनस्पप्ति दुमदल नव पल्लवोसे
पतमाया हवयका मुप्स सम्भापण।
किचित् विनम मसिका कुभो पस्लवासे
मानों उछल रही प्रेमको सरगें ।
प्रिये गसी है तुमने ऐसी-कटाक्षकी ?
कैसी मोहन मदिरा जिस हसीसे वन वनकी
हरित क्षेत्रको तस्--सताओंकी
चमक उर गई ठौर-ठोरपर माति-मांतिक
विस रहे विविध रग रमित कुटम फुटमा समूह।
द्रोपोगात शुभकान्ति प्रफुस्मित प्रोणीवोस
प्रीतिपूर्ण मानिमि करते अपंग सादर ।
देव वृर्षोक सकत मुकुस परापने
महा उड़त हुए पमनकी मृदुस गतिसे
सुकोमम मौर वनुको किया है शाम्त ।
तुपार शुम मसण गासपर रजित है
पन्दनका सुरमि कुंकुम राग रसत
पाद्रि शिवर होता मग रंगित सम्म्या रागसे
मी सुखसे विश्राम मेते साध्य नभोमणि
विबुध पमिता सभी सिंच नमोरेषु
पहना देती मुक्ताहार बाभरण

कवि-मी माता-
मसपि विछिस गाव कोमस हातेरे
पुष्पतीया मासिनोर शसस बलेरे।
प्राणप्रिया, बानि मोर बिगन कुमत,
तुतियाने मपलासे हाहिर तरंग
म्यपारे पछि परा माकुल प्रागत
विया प्रेम मकरम्ब ममृत परशा
महनिम प्रणयर मेह भासिंगन
निष्प्रम फुसनि मोर हक ज्योतिमय ।

-मसमिया
८७
किमान निन कोमल करोंसे सहलाकर परीर
करनी पुष्पतोमा मालिनीका शीतम जस सिक्त करता है?
प्रापप्रिये याम मेरे निर्णन इस कुजमें
उस्मासके मयसे उठामोगी क्या हास्य तरगें ?
ध्यपासे विमा व्याकुस मरे प्राणोंमें
भर दो अमृत स्पर्धामय प्रेम मकरन्द,
यात्रिम प्रणयके स्नेह-मासिंगनोंसे
प्रमाहीन उपवन मेरा हो उठे ज्योतिर्मय ।

फदि-श्री माता 65 ९, हैराग्यर कथा नाचार्मो मानह मुब मार्या पुत्र धन मन रिलों मा बिसमन मितिर टम कमो नाइ मगरोया, भाशा पनी रि गम शुष्य हिया परि रस ससारत मानि मा मकसभरीया ॥१॥ सुबर ससार मोर मचिर परिस मोर निमामले बहि कस काहो हमुनिया, सहाय सपदहीम देखि सरे पर पिण येये रेषे सेये बोले बाटर बलिया ॥२॥ मासागे ससार सुब बीवनत पातों बहु बेगार मामनि, घुन पंप बिमासिता सकमोनागिछे तिता मारि पेशामो माया मोहर बान्धनि ॥३॥ सामोरे एरि आश मरम्पत सलों बास मन गमे मकसा पुत पपों बने बने ठापे ठाये माछे बह सिहतर सगी मोर औदमे मरणे ॥४॥ खाप परियाचे पो परों परिवामगोटे परिमोगा भाष किया परे ममगस नपरों एकोहे मय बाछे प्रभु पामय हर में मामितर मापपर पप्त 11 मोस्त मातुरहसे मरम्पर फस मुसे, गुमायो पेटर ग्वामा पतापे मागर, मोरातर पासपमि से गारमापरमि सारे गुलामों मार मासा कापोर ॥६॥ विविध बराह पह ८९ -मसमिया वैराग्यकी कथा बाधा रूपी भार्या पुत्र धन पन सभीको मैंने विसगित कर दिया। मेरे सापी मित्र आत्मीय स्वजन कोई नहीं है। पक्षीर तर पानेसे हृदय शम्यवत् हो गया ह अब संसारम में केबस अबला रह गया हूँ॥१॥ मेरे सुखका ससार पीपही नप्ट हो गया अब में किसी मिर्जनमें बैठार सम्वी माहे भरता हूँ। मुस मसहाय और सम्पत्ति हीनको देखकर सभी पृणा करते हैं वो देखता है वही मुम रास्तका पागम कहता है ।।२।। मुझे ससारके सुख नहीं चाहिए मानवरी मारुतिसे भी दूर ही रहना पाहता हूं। बीवनमें बहुतसी विरक्ति और उदासी ही मुझ मिली है। सांसारिस पाव-पेप विमासिता बाधि सभी कट लग रहे है माया मोहो बंधम मने समेट लिए ॥३॥ सव प्रकारकी माधाओं और ममिलापाओंको छोहार मैंने मरण्य-निवास प्रहम कर लिया है। यहाँ इच्छानुसार बोला मन-बनमें पूमता रहता हूँ अनेकों प्रसार पशु पक्षी महाँ बहु तायतसे है के हो अब मेरे लिए बम मरणके सापी है ॥४॥ अगर मुम गाप सिंह वा गलें या बार वोहमें मगर में पा मिई या और कोई ममगल हो जाए, तो भी मुझे अब इनमसे किसीपा मय नही सगता क्याफि दो दयामय प्रमु है केही मुम्न आश्रितके याप्रयदाता मन गाएंगे ॥५॥ अघासे प्याकुम होनेपर मरम्पो कन्द मूस फसोंगो वापर उपरपी ग्यासा गुनाता हूँ। मोवास वृक्षकी छाम परीराबरणा पाम दसी है मोर उसीसे गीत विता देता हूँ मुझे वस्त्रोंकी आवश्यकता नहीं।।

कवि-भी माता-
९०
माछे कत नवम
कोमलता सरसता
प्रकृतिर तपोबन
हियात मतुन मारे पेमे कत हो,
स्वरगर पवित्रता
मानम मूरति यत विराने निती ॥
तारे पत सोभा पामों
हरगत शान्ति पामों
बिमूर महिमा गार्मों पतोर सुरत,
तरगर सोमा पेसा
मपूर्व मोहम मेमा
र ममे यहि षाओं तटिमी तीरत
fiull
पेति हेर.मि पति विपित्र रहन ढाप्ति
ताहे माहे याय मीस सागरत तत
फमर सुगघ वाही मतप समीरे माहि
सन्तापित प्राप मोर करे सुधीतस
॥९॥
हिंसा रेप प्रबचना संसारर पिगम्बमा
मोमर हानि तात एको माइकिया
मामाबो सिबोर कपा
मार मार एको सेठा
सबा कये आमि मा परम मुखीया ॥१०॥
विरिना मसाटी रेहा बेहाइ ससार हा
बिचारिब पाबत मुहिर विधाम,
पर पारेसमा मा पिटि मा पना
ताते बहि पाम मा "प समिधान ॥११॥

-असमिया
प्राति तपोवन सदा कुजवन अन्यत्र कहाँ है? नबीन
भावनामोंनी ऐसी हृदयमें तरग कहाँ उठा करती है मामलता
सरसता स्वर्गीय पवित्रता मानन्दकी प्रतिमा यहाँ (प्रतिमें)
नित्य विराजमान है॥७॥
कितने भावम उम सबनी पोभा मिरमार में मान्तरिक
सान्ति पाता हूँ। पक्षियॊके स्परमें सर मिसाकर में
विमुकी महिमापा गान करता हूँ। मदीक किनारे बैठकर
में तरंगोंका सीलामय खप्त देखता हूँ-बो एक अपूर्व मोहन
मेमे सदृशा है ।
मय रक्तिम मूर्य विपित्र वर्णोको समत हुए धीरे धीरे नीस
(बाकाश समुद्र) के नीचे पला नाता ह तप मलय-बायुमें
तरती हुई सुमनोंकी सुगंध आकर मेरे सतप्त प्रामोंको पीतम
कर देती है ॥९॥
बहाँ हिंसा उप प्रबचना ससारसी विडम्बना सोभका
म्पापार कुछमी नहीं पसते । याज में उन विपयोंका
चिन्तन महीं करता। भव कोई समालही नहीं रह गया है।
सच कहता हूँ माग में परम सुखी हूँ ॥१०॥
निस दिन मबर शरीर संसार म्यापारको समाप्त कर
मुक्तिका विधान पाना चाहेगा ( उसदिनके लिए ) मुक्षक
पत्तोंसे बनी हुई टूटी फूटी हुई पुटियामें बैटमर में अम्सिम
समाधान पातूंगा ॥१॥

कवि-धी मासा १० मन्तिम ज्योति मरम मिवारी मा विश्व भागरत मिम्मिों मन्तरर पान, गरल उपमय हल सियु मंपनत, ममता मा पार्मो समान रहाम यासमा सा स्वण मृगबरि ससारत प्रमिसो दिमाम, पुग्नेय माससा तमो मुषिल मोर प्यप हम सम्पमेरी बाम ॥२॥ महित प्यपाहत दुमह भोवम माळे मोह मावतत पुरि स्पम्बनत तमातुर दुगस चित्तर मातार मिछे समा हरि प्पमार सहनाममा प्यपतार सामि या पोरा तपत गमास, कोममा गृपाव मोर कोममा मिर मारम्पर स्वप्ण उपम्पास? जीवनर ए.पतरा मार पामो यामों मन्तिम चुक्ता परम मानगरप प. पोतिरमा मापामममार सि मोक्त?

-भसमिया १० अन्तिम ज्योति में प्रेममा मिवारी म विश्व भारमें अन्तर समर्पणका सघान कर रहा पा (परन्तु) सि घु मन्यनमें गरमका टमय हा, अमृतका सम्धान महीं मिमा ॥१॥ उद्दाम वासना लिये स्वणमृगक पीछ दौरते हुए मैंने समारमें म जाने कितने चार मगाए, तो भी मरी दुग्य माससा न मिटी लयमेवी बाग म्पर्य हो गया ॥२॥ मर्माहत प्ययाहस मरा दुग्ह बीवन माह बाठनमें भूम रहा है । पाकनेवाल तन्त्रातुर दुर्वल निसरी याता उसकी लामो हर रहो ह ॥३॥ म्पपाकी सहल मालाएँ ह म्पर्मताक कारण पैदा होनमाली ग्सानि है एव हृदय दग्धकारी तप्त उम्दवास है। इन्हें कौन दररेगा? मेरे सप्नोंको बरपी पपाएँ कौन सुनगा11४|| मनन्सके अन्तिम पम जीवनमा घुगवारा अस्त होनेवासा है। उस मोक्में क्या में परम आनम्रस्प गुग ज्योतिकणको माप्ठ न पर पाऊँगा? ॥

कपि-भी मासा ११ फुल शय्या ॥२॥ माझ्मो किमान रिया वेबमार बोमा हे मोर हाय देवता परम रोक्न तुलि माहिरिमा किम प्रामर मिनि मोरवता? मीवमर समिक्षण बिमि सात हिया घुमि रठे कोप्साहन मार रिय तिमत प्पया रिक्त हरपत रासि रिला तोय हसाहन कोन काहानिये तुमि हरि मिण मोर प्रीतिमरा प्रभयर साह मम्तही रापपर बिता कुरा कोम बिना मुमायनो माय? मानम्बर पूगपात्र शुम्प मागि मोर कोपिनों हाहाकार साबग्मिर परि गेहत छारणार मारिधिम शक्तिस ताहानि पिपात पोवा नाइ सि विप जामरि बेगनार पत मात्र परिहा प्रयोग पर पाति सो सामरि हिपा भगा विपारर तिति मपूमले पाहरिणों ससार मरम, मारापास्त चित्त मानि दलित करि रिया गुण पाना प्रिपतम? रहनत रेवरार १५ -भसमिया १५ फूल-सेज हे मर हृदय दबता मोर कितनी बदनामा मोम गमोगे? मरे प्राणोंकी निवि नीरवताको तुमने करुण सदनम क्यों भग पर दिया? ॥१॥ जीवनका सधिकाम इस सम्याम हृदयको पीडितकर कोसाहस मपा रहा ह। तब इस हदयमें शूम्प मौर अधिक पटू म्पपामा सोव हसाहन क्यों द्वारा दिया ॥२॥ किवन दिनों पूष हो तुमने मरे प्रीतिभर प्रणयक मोदक (सर) को हर लिया है! अन्सर वनारी रावणको प्रबलित पिता मौर कितने दिनोंमें बुमगी? ॥३॥ 7 पूरा भरा हुमा मेरा मानन्दका घट आग रिक्त हो गया है मैं अपन पारों बार हाहाकार ही हाहाकार देखता हूँ मानों दावाग्निको ज्वालाम विशाम देववार वृक्ष जमकर राप हो गया हो In (उनक द्वारा) मेरे बक्षम गिनने भी गतिसत मार गए है बाम तक उममा विप नाम्त नहीं हा पाया है। फिर भी मुमपर बदनाक मिन अम्बामा तुम प्रयाग कर रह हो उन सबमा में अपन पक्षपर समास रहा है ॥५॥ हृदयमग परनवाले बिपारके मामुमोंमे सिमत होकर ससारका स्नेह विस्मृत हो मा ह। मर म भाराकान्त बिस्तको अलित कर ह प्रियतम तुमन क्या मुत्र पाया करिधी मामा- मरहिछे पोवनर दुलम मायुरी मोपारिमो मापांक्षा पुराब, माहिछे प्राणत मावि लाम्ति भवसार रिया मोक शान्तिरे ग्राम ॥७॥ यातनात मिपीरित मोरे जीवनात कलियासी पत आवग्यमा, तोमारे विपुम रान बहुत सावटि मम्तिमत समिम सामवमा 101 ज्यामिछे दूरत सठ प्रसपर शिवा घरि किरप पितोपन सेये मोर फुसभप्या रक्त पमतर मम ताते ममन्त सापम

१७
-मसमिया
जीवनको दुमम माधुरी मुसाती भा रही है में
माक्षिाओंको पूण नहीं कर पाया। प्राणों में बार मान्तिला
मवसाद मा रहा ह मुभ गाम्तिसे विभाम सने दो ॥७॥
यातना पीडित सारे जीवनमें मैने जितनी आवर्जनाएं ओर
है उन्हें तुम्हारा हो पिपुस दान समझकर वक्षमें धारण कर
बन्तम साम्स्वना प्राप्त कर सूया ॥८॥
सुदूर प्रसयकी शिखा प्रग्पमित हो क्सा अपूर रूप धारण
कर रही है ! वही मरी गपत-कमलपी फूलसेन बन में
उसी में मनन्त शयन से मूंगा ॥९॥

कषि-मी माता- १२ तेकी! ॥२॥ [प्रपम सरग] कर परा ता माहिसि सोनार कोन विदो पाय गरि, किप बा फरिछ दुर गुरमित मकमा परि फुरि? मोकामोक एरि मिगान भूमित मुगुमा मापारे तर कि मात मातिए किहर मामात मुनों बिहगी मा पर दुमम मानिछ कि धम काममो बिमा रिवि पिम्वाधार माल परतुविनि कोनाला निषि? असंप्य गिरिर गियर शिपरे घर बिनमोया मुर, कतियाचा गा तटिमी तौर निस्तापता कर दूर बिनम बनत प्राम्तर भूमित ममत किमा पर बत परि पा पराग मगिक माम भरम पर? जमम समिर मानव मनात माछे frमुन्दरमा भगा, शाति या देवमासा सर्व बिहरिः समाप ..

-मसमिया
१२ केतेकी!
[प्रयम तरग]
बरी! कहाँमे आई हो तुम बार किस विधाको उस्ती
पली माओगी? अपनी ही दूर-दूर तम क्यों घूम फिर रही
हा? ॥१॥
मोकामा छारकर इम पनगान भूमिपर स्मिकी आमा
बनगाम भाषामें क्या कह रही हा है मिहगी में समान नहीं
पाता।॥२॥
क्या दव-दुलम पिमी निधिका किसी विपना यांटन आ
गई? मपग इस देषको उत्तम बस्तुमा किमी दूसर दशमें
म मापागो।
||-11
तुम कमी असम्प गिरिक गिवरोंपर मधुर तान छड़ती
कमी नयीक तीर जाकर उसकी नीग्यता दूर करती
हा ॥४॥
एता हा
मनमें क्या सकर विजन मम प्रान्नको भूमिम सुम पूमती
और अपन गीवन-माणिकरा सुमन कहाँ रण
छाड़ा ह॥५॥
मानवा उम अनाव मुन्दर स्पानमें तुम्हारा जग्म हुभा है
वहाँ पा शान्ति दया भादि मनीयवामाएँ सग बिहार
करती है ॥६॥

कमि-भी माला
दुष्ट म्पधि तात मोहर बागुरा
पातिछे मुम्बरमा
किम्त पयो तामाग पीछ गमि
फरिवि पतक हा
माहिए बिहगी मालचि ममत
निमा बाम पाम बुसि,
मोमर देहानि माछे मार
याब तोर मन मुति
इपिने सिपिने शिकि मेमि मेलि
काक चाव मुमिनुमि,
कार मिहत बिरहिमी तोर
गाछे हरय पमि?
कारमी पातरि मामिछ साबरी
कारनी पातिनि कपा
हरम पमोपा मात मि तोर
हियात मागिछे देया
बिरह बार मानिण्हे परि
तोर कपा मनावि,
मिसम बातरि बानिछह परि
मावमि मुरत गागि
माहियो ता मुसामि सागर
मुसामि पबत बम
ममृत बरपा एपारि मातले
मुसाति ससारयन
बनप्राणीहोन मह
गार सनीवनो गाम
समाा सिति पर भूमित
॥१७॥
॥१८॥
मपाप
महणन
॥२०॥

-असमिया
यहाँ दृष्ट शिकारी मोह माल सजाए बैठे हैं। परन्तु हे
विहगी, तुम आगा पीछा सोचकर सतर्क होकर घूममा ॥१४॥
हे मिहगिनी पया तुम यहाँ कुछ खाने पीनेकी आशा मेकर
आई हो? यहाँ मोमके बहुतसे म्यापार घालते है मिनमें
तुम्हारा मम मूत गाएगा ॥१५॥
इधर उधर सिर उठा उठाकर तुम वार-बार किसे दबती
हो किसके गिरहसे बरी विहगी तुम्हारा हदय विगमित हो
रहा ह? ॥१५॥
परी प्रिये, तुम किसना संध सा रही हो? मिसकी
गापा सुमाअोमो ? अन्तर विचलित कारनेवाली तुम्हारी बोसी
सुनकर हरयमें बड़ी वेदना हो रही है।॥१७॥
यदि तुम मिहमा सरेच माई हो तो अपनी बात म
सुनामो मौर यदि मिमनका संदेश माई हो तो मधुर सरसे
मामो ॥१८॥
तुमने आसे ही समुद्रमो मोह मिया परतों और वमोमो
प्रमित पर सिया तुमने अपनी पीयूपी मेवम पोड़ी सी
योनीसे सारे ससारको मोह मिया है ।।१९।।
तुमने जनहीन माप्रान्तम समीयन सबार परनवामे गीत
गाकर बगर भूमिमें भी मपूर्व मग्यानकी रपमा पर
रासी ॥२०॥

कवि-श्री माता-
॥२८॥
बोणार मकार मुरतीर प्वनि
तटिनोर कुस तान,
तोर सुरत बाये सिपोरत
बिमल प्रेमर गान
तोरे मिचिना मोव माछे बेति
माझे मरमर भापा,
कोमल हाहिटि कटास चावमि
तये निराकार माझा
प्रेमर शिकनि शिकमि मर्पक
पियासि अमृत बिम्,
तोके माहि मह तरार माजत
हाहिछे बिमस इणु
॥२९॥

यसमिया
गोणाकी सकार, मुरमीको ध्यान नदीका कम-मम माव-
समोमें तुम्हारे ही स्परोंसे निर्मल प्रेममा संगीत वमता
है॥२८॥
तुम से जीव वर्तमान में इसीमिए प्रेमकी भापा भी बनी हुई
है। तुम्हारी कटाक्ष दृष्टि और कोमल हसी ही मिराशोंकी
माशा है ।।२९॥
तुमने मोको प्रेमकी शिक्षा दो ह तुमने ही अमृत
वन्दुका पान कराया है। तुम्हारा ही बावर्स सेकर तारोंके
वीच बिमस चम्मा हंसा करता ह ॥३०॥

. कदि-श्री माता ॥२८॥ बोभार प्रकार मुरमोर पनि सटिमीर कुतु ताम, तोर सुरत बाये सिबोरत बिमत प्रेमर गान तोरो मिबिना बीब माछे देखि माछे मरमर भापा, कोमम हाहिटि कटास चावनि तये मिराशार आशा प्रेमर शिकमि शिकसि मरर्यक पियासि ममृत बिनु, तोके माहि सर तरार मानत होहिणे बिमल मु

मसमिया
वोगाको भकार, मुरलीको पनि मदीना कम-कम नाद-
समोमें तुम्हारे ही स्वरसेि निर्मम प्रेमका सगीत बनवा
है।॥२८॥
तुम जैसे गीय बर्तमान है इसीलिए प्रेमकी मापा भी बनी हुई
है। तुम्हारी कटाक्ष दृष्टि और कोमल हंसी ही निराधोंकी
माधाद॥२९॥
तुमने मयोंको प्रेमनी शिक्षा दी है तुमने ही अमृत
बिन्दुका पान पराया है। तुम्हारा ही बादर्श मकर सारों के
पीच रिमस चन्द्रमा हंसा करता है ॥३०॥

Kavi Shri Mala Asmiya

Author
Choudari,raghunath
Title
Kavi Shri Mala Asmiya
File name
Kavi Shri Mala Asmiya
Text
OCR done
Citation
1962
Published
2010/12
Publisher
Vardha,rasth Bhasha Pracharak Samiti
Language
Sanskrit
Pages
124
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514750
Barcode
4990010022436.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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