Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Sukta Muktawli

Maharaj, Vijay Kumar · 2010/09

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Front matter

विशेष खुलासो.
१श्री पुना निवासी शेट रत्नाजी डोंगाजीये पोतानी झ्यातीमां
पोताना पुन्याथै रुपीया २००१ शुभ खाते खर्च करवा कह्या तेमां
रुपीया ५०१ मां कोई पण पुस्तकनी १००० नकल छपावी प्रसिद्ध
करवा कहेलु हतु ते प्रमाणे आ पुस्तकनुं काम शरु कर्या पछी आ
पुस्तकना फारमो वधी जवाथी तेमज छपामणी वाइडींग विगेरे खर्च
वधवाथो एक हजार नकल रुपीया ५०१ मां थाय नही तेथी आ
पुस्तकमांथी पांचसो नकल मर्तुम शेठ रत्नाजी डोंगाजीना नामथी
छपावी छे.ते साधुसाध्वीजाहेर लायब्रेरी अने संस्थाओने फक्त पोष्ट
खर्च लेई भेट आपवामां आवशे.
२ मा पुस्तकनी एकंदर नकल २०५० छपावी छे ते नीचे मुजव.
.५०० नकल श्री पुनानिवासी रत्नाजी डोंगाजीनाखर्चथीछपाचीछे.
५०० नकल शा. शिवनाथ लुंबाजी जैन पुस्तकालयमा पुस्तको
वेचाणनां तथा परचुरण वीजा सदग्रहस्थो तरफथी ज्ञान
खाते खर्चवा आवेली रकममांयी छपाची छे.
१०५० मेसाणा श्री जैन श्रेयस्कर मंडळ तरफथी वधारानुं खर्च
आववाथी छपावी छे.
३ भेट मंगावनारे पोष्ट खर्च ,वास्ते चार आनानी टीकीटो
अगाउ मोकलवी ए शिवाय मोकलवामां आवशे नही.
४ किंमतथी मंगावनारे किंमत अने पोष्ट खर्च मली सवा
रुपीयो मनीऑर्डरथी प्रथम मोकली आपवो.
५ जवाब मंगावनारे रीप्लाय क्याई अथवा टीकीर मोकलवी
एमवाय जपाव आपवामां आवशे नही.
प्रसिद्ध कर्ता.

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२
waran
शान्तमूर्ति मईम महात्मा श्री बुन्द्रिविजयजी
(रेरामजी ) महाराज.
सद्गुणानुरागी मुनिवर्म श्रीमान
कविसमती महाराज

2: प्रस्तावनातांक प्रिय वांचनार ! समस्त जन समाजना कल्याण अर्थ स्वायला रस, भाव अने सदुपदेश पूर्ण आ त्रण ग्रन्थो एकज पुस्तकमा एकी सार्थ, शा- न्तात्मा मुनिराजे करेला विवेचन साथे समाज सन्मुख सहर्ष रजु करवानी सुंदर तक आजे अमोने मळी छे. तेथी अमे अमोने भा- ग्यशाळी समजीये छीये. आमांनो 'मूक्त मुक्तावळी' नामनो अति उपयोगी ग्रन्थ वि- क्रमनी सत्तरमी शताब्दीमा थयेला पंडित प्रवर श्रीमान् केसर वि- मळजीये मधुर. गुर्जर भाषामां, पद्यबंध, अति सरळ सुवोध अने संख्याबंध असरकारक विषयोथी भरपूर बनावेलगे छे आमां, धर्म, नीति, सदाचार आदि सेंकडो विषयो टुंकाणमां सुंदर मुद्दाओ रुपे क्रमपूर्वक गुथ्यां छे. दरेक विषयना बब्बे काव्यो पण घणे भागे मालिनी छंदमां रचेला छे. काव्ये काव्ये विशिष्टता अने ते ते वि- षयनी पुष्टि माटे एक के अनेक शास्त्रीय ऐतिहासिक दृष्टान्तो तेमज असरकारक दलीलोनी भरती करवामां आवी छे. कर्ताये 'मुक्त मुक्तावळी ' नाम आपी खरेखर तेमां शास्त्र अने अनुभव समुद्रमा उत्पन्न थयेली छीपमां बनेला पाणीदार मोतिओ लइ तेने क्रमबद्ध गोठवी तेनी माळा बनावी छे. आ किमती मोतिनी माळा समस्त जगतना मनुष्य मात्रने-आवाल वृद्ध सर्वने कंठे धारण करवा योग्य छ. तेमज दरेकने वाचवा, विचारवा, मननकरवा अने खास अ- भ्यास करवा योग्य छे.- आ मोतिनी माळाना दरेके दरेक मणकामां (मोतिमां) पु- • ज्यपाद शान्तात्मा सद्गुण सुवास पूर्ण मुनिराज श्री क'रविजयजी महाराजे कपूरथी पण अधिक सुवास भरी देवा बनतु कयु छे. झवे- रात अने सुवास अत्र एकत्र थयां छे. एक तो ग्रन्थ स्वतःज उत्तम अने तेनापर महात्माश्रीए सुंदर विवेचन करी, ग्रन्थनी गौरवतामां ओर वधारो कर्यो.छे. लाख्खो मानवहृदयोमा सुसंस्काररुप संभार भरवामां, अनी- तिनी अनेक रंगी बदीथी बचावी लेवामां, व्रत, नियम, संयम, धर्म अने सदाचारना मार्ग प्रवर्ताववामां अने जन्म, जरा, मरणरुप अना- दिनां दुःसाध्य दोंने नाश करवामां आ ग्रन्थना दरेके दरेक उपाय अमोघ हे. जेटले अंशे तेनी अनुभवरुप अजमायेश थाय तेटले अंशे तेनी अमोघपणानी प्रतीति थवी संभवे छे. एमांना उपदेश सूत्रोने जीवनमा उतारवा ए एनी अजमायेश छे अने ए अजमायेश माटेज , पुनः पुनः जुदे जुदे रुपे आवा ग्रन्थो ब्हार पाडता रहेवार्नु अमने , उचित जणायु छे. बीजो ग्रन्य श्रीमान् सोमप्रभाचार्यजीविरचित श्री 'सिंदुर प्रकर ' अपर नाम 'मुक्त मुक्तावळी ' नामनो सरळ मुमधुर मुस- स्कृत भाषामां विविध छंदोबद्ध अर्थ अने भावपूर्ण उपदेश रहस्यथी भरपूर रचेलो छे; के जे जैन वर्गमां अति सुपरीचित छे तेना मूळ १०० श्लोको आ ग्रंथमां पृष्ट २७६ थी ३०३ सुधीमां आपेल छे. " , ५ , आ ग्रन्थ- गुजराती भाषामा अवतरण पुज्यपाद महात्मा श्री मान् कर्पूर विजयजीये करेलुं छे. आमां एक एकथी चडता पचीस विषयो अनुभवमां आवे एवां द्रष्टान्तो साथे बहु सुंदर रुपमा अस- रकारक रीते वर्णव्यांछे. श्रीमान् तीर्थकरदेव, सदगुरु, जिनप्रवचन, अने श्री संघनी सद्भाव पूर्ण भक्ति, हिंसा, असत्य, अदत्त, अ- ब्रह्म, ममतात्याग, अंतर शत्रुओनो जय, सज्जनतानो आदर, सत्संगति, इन्द्रियदमन, दान, तप, भाव, वैराग्यादि विषयोर्नु म- मस्पर्शी कथन काव्ये काव्ये वृत भिन्नता, अने सर्वने सहेलथी.स- मजी शकाय तेवी भाषा आ सर्व अभ्यासीने बोध माथे आनंद आपे तेम के. , त्रीजो " आचारोपदेश" नामनो यथार्थ नामवाळो ग्रन्थ ख- डतरगच्छीय श्रीमान् चारित्र सुंदर गणि विरचित मूळ संस्कृत भाषामां बनावेलो छे तेनुं पण गुजराती भाषामां महात्माजीने शोभे तेवु सुंदर अवतरण श्रीमान् कर्पूरविजयजी महाराजजीए करेलुं छे. आ ग्रन्थमां श्रावकने अवश्य करवा योग्य करणीना छ वर्ग पाडी असरकारक शैलीमां वर्णवेला है. 'आ त्रण्ये ग्रन्थोनो एकत्र समागम ए गंगा, सिंधु, अने सर- स्वती ए त्रिवेणीना संगम रुप तोर्थनी गरज सारनार होवाथी अमो आ ग्रन्थोनी उपयोगिता अने महत्ता संबंधे वधु फंडा न उतरतां, तेना अधिकारी अभ्यासको अने मनन पूर्वक वाचनाराओ.माटेज रहेवा दइये छीये.

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श्रीमद चिदानंदजी माहाराजकृत प्रश्नोत्तरमाळा दोहा चोपाइ
रुप पद्यबंध छे ते पण दाखल करेल छे.
श्री जयशेखर सूरीकृत. श्री आत्मावबोध कुलकनी न्याख्या
पण छेवटना भागमा दाखल करेल छे.
सदरहु पुस्तक छपातांदृष्टी दोषथी कोई कोई भुलो रही तेमज प्रेस
दोषथी कोइ कोइ अक्षरोनी काना मात्रा विगेरे उडी गयेली छे. तेमां
खास मोटी भुलोनु शुद्धिपत्रक आ साथे छपावेल ते प्रमाणे सुधारी
वांचवा मुज्ञजनोने विनंती करवामां आवे छे. ए शिवाय वळी कोइ
भुलो सुज्ञजनोने मालम पडे तो ते भुलो अमने लखी जणाववाथी
तेनो बीजी आवृत्तिना वखते उपयोग करवामां आवशे.
आ ग्रन्थोनु विवेचन करी आपनार महात्माश्रीजीनो तथा
ग्रन्थ प्रसिद्धिमा द्रव्य सहाय करनारा उदारचित्त मददगारोनो अं-
तःकरण पूर्वक उपकार मानी वोरमीए छीए भुलचूक मिच्छामि
दुकडम्.
संवत १९७७ श्रावण शुदी १५
गुरुवार.
वीर संवत २४४७.
ली. प्रसिद्ध कर्ता

प्रथम श्री सूक्त मुक्तावली ग्रंथनी अनुक्रमणिका
प्रथम धर्म वर्ग पृष्ट १थी ११०
.
. ..
....
नाम.
१ देवतत्व.
'१
२ गुरुतत्व.
३ धर्मतत्व,
४ सम्यग् ज्ञान अभ्यास योगेज साची समज आवे छे. २२
५ मनुष्य जन्मनीदुर्लभता अने तेनी अनन्य उपयोगिता. २६
६ सज्जनोनी बलिहारी.
.... २९
७ गुणरागी अने गुणग्राही थवानी जरुर अने एथो
उपजता अनिवार्य फायदा
८ मार्गानुसारीना रुप गुणो.पैकी प्रथम गुण (न्या-
याचरण आदरखानी
आवश्यकता.) ३६
९ प्रतिज्ञा पालन
४०
१० उपशम गुण आदरवा आश्री उपदेश....
१० अ. उपशम सरलता गुणज सर्व गुणमा सारभूत छे. ५३
११ त्रिकरण शुदि साचवता हितोपदेश....
१२ उत्तम कुळनो महिमा प्रभाव.
१३ विनय गुणर्नु सेवन करवा विषे हितोपदेश
१४ सद्विवेक माप्त करखा हितोपदेश
४८
५९
....

८ .... ७४ ... .... .... .... १५ विद्या संपादन करवा विषे हितोपदेश. ६४ १६ परोपकार करवा हितोपदेश. ६६ १७ सद् उद्यम-पुरुषार्थ सेववा माटे हितोपदेश. १८ दान धर्मनो प्रभाव. ६९ (१९ शील धर्मनो प्रभाव. ७२ २० तप धर्मनोभाव. ..२१ भाव धर्मनो प्रभाव. २२ क्रोध कषायनो त्याग. ७९ २३ मान कषायनो त्याग, ८१ २४ माया-कपटनो त्याग ८३ २५ लोभ कषायनो त्यांग करवा हितोपदेश ८५ २६ दयाधर्मनु सेवन करवा सदुपदेश. २७ सत्यवाणी वदवानो प्रभाव समजी प्रिय अने हित- वचनज उच्चारवा हितोपदेश. २८ चोरी करवानी कुटेवथी थती खुवारी समजी नीति आदरवा हितोपदेश. २९ कुशील तजवा हितोपदेश-परस्त्री गमनयो थता गेर फायदा. ९३ ३० परिग्रह अथवा द्रव्य ममता तजना हितोपदेश. ३१ संतोष गुणधारवा-आदरखा हितोपदेश. ३२ विषय तृष्णा तजवा हितोपदेश. ३३ इंद्रिय पराजय आश्री हितोपदेश. .... १०२ ८७ .... ९१ . .... .... .... wer ... ३४ प्रमाद परिहरवा हितोपदेश १०४ ३५ साधु धर्मना स्वरुपर्नु संक्षेप कथन. १०६ ३६ श्रावक धर्मना स्वरुपर्नु संक्षेप कथन .... १०८ द्वितीय अर्थ वर्ग पृष्ट ११० थी १५० ३७ अर्थ विषे (न्याय नोति अने प्रमाणिक पणाथीज द्रव्य उपार्जन करवा हितोपदेश.) .... ११० ३८ हितचिंतन विषे ११२ ३९ लक्ष्मी विषे ( लक्ष्मी प्रभाव वर्णन) ११४ ४० कृपणता दोष तजवा अने उदार दिल करवा हितोपदेश. ११८ ४१ पारकी आशा-स्पृहा या याचना नहीं करवा हितोपदेश १२० ४२ सदुपायवडे निर्धनता दूर करी सद्रव्य प्राप्त करी लेखा हितोपदेश १२२ ४३ राजसेवा वर्णन-अधिकार १२४ ४४ खळता-दुर्जनता वर्णन १२६ ४५ अविश्वास विषे १२९ ४६ मैत्री ( मित्रता ) वर्णन अधिकार ४७ जुगार प्रमुख दुर्व्यसनो टाळी सुमार्ग चालवा हितोपदेश. ४८ निर्मळ यश-कीर्ति प्राप्त करवा हितोपदेश. १४२ .... ... .... .. ..

१० .... .... .. .. -- . . ४९ प्रधान (मुख्य राज्याधिकारी) वर्णन १४४ ५० कला वर्णनाधिकार. १४५ ५१ मुर्खता वर्णनाधिकार १४६ ५२ लज्जा वर्णन अधिकार, १४८ तृतीय काम वर्ग पृष्ट १५० थी १६८ १ काम विषे. १५१ २ पुरुष स्त्री गुण दोषोद् भावन अधिकार. १५४ (१) पुरुष गुण वर्णन..... १५४ (२) पुरुष दोष वर्णनम्, १५५ (३) स्त्रीगुण वर्णनम् १५६ (४) स्त्रो दोष वर्णनम्.... १५७ (५) सुलक्षणी स्त्री वर्णनम् १५८ (६) संयोग वियोग विषे. १६ (७) स्वमाता प्रत्ये सुपुत्रनुं कर्तव्य. १६२ (८) पित् वासल्य वर्णन. १६४ (९) सुपुत्र वर्णन. चतुर्थ मोक्ष वर्ग पृष्ट १६८ थी २०४ १ मोक्षार्थ विषे.. १६८ परमपद--मोक्ष माटे पुरुषार्थ फोरववा हितोपदेश. १६९ २ कर्म विषे-कर्म विपाक वर्णनाधिकार. १७०-१७१ ३ क्षमा विषे-क्षमा गुण. वर्णना धिकार. १७३ ....

.. ... .... .... .... संयम विषे: संयम प्रभाव वर्णमाधिकार J द्वादश भावना विषे. ... १७६ १) प्रथम अनित्य भावना. १७६ (२) बीजी अशरण भावना. १७८ (३) त्रीजी संसार भावना.. १८० (४) चोथी एकत्व भावना. १८२ (५) पांचमी अन्यत्व भावना. १८३ (६) छही अशुचि भावना. १८५ (७) सातमी आश्रव भावना. १८६ (८) आठमी संवर भावना १८८ (९) नवमी निर्जरा भावना १८९ (१०) दशमी लोक स्वरुप भावना १९१ (११) अग्यारमी बोधिदुर्लभ भावना (१२) बारमी धर्म भावना १९४ ६ मोक्षवर्ग (रागद्वेष विषे)-- १९५ राग-द्वेष दूर करवा हितोपदेश १९६ ७ संतोष विषे संतोष गुण सेवन करवा हितोपदेश १९७ ८ विवेक विषे विवेक आदरवा विषे हितोपदेश १९९ ९ वैराग्य (निर्वेद) विषे वैराग्य वर्णनाधिकार २००-२०१ १० आत्मबोध विषे आत्मबोध संबंधी हितोपदेश २०२-२०३ उपसंहार पृष्ट २०४ थी २०९ .... :...

१२
.... २०७
प्रथमधर्म वर्ग
२०४
द्वितीय अर्थ वर्ग....
२०६
तृतीय काम वर्ग ...
चतुर्थ मोक्षवर्ग ....
२०७
श्री सूक्त मुक्तावळी ग्रंथनी अनुक्रमणिका संपुर्ण.
द्वितीय ग्रंथ सिंदुर प्रकर अपरनाम मूक्त मुक्तावली सुगम
भाषा अनुवाद पृष्ट २०८ थी २३५ तृतीय ग्रंथ श्रावक धर्मोचित
आचारोपदेश भाषान्तर पृष्ट २३५ थी २७५ सूक्त मुक्तावळीना मुळ
श्लोक १०० पृष्ट २७६ थी ३०३ चिदानंदजी कृत प्रश्नोत्तर माळा
पृष्ट ३०३ थी ३१० आत्मावबोध कुलक व्याख्या पृष्ट ३११ थी ३२०
सवैया नेवीसा.
आप विसारके जो दुःख पावत, सो दुःख जानत-मुख उच्चारी;
तातें सुज्ञान घरो अपने चित्त, ज्ञान असी ग्रही मोह विदारी;
ध्यान धरो नित शुद्ध स्वरुपको, जाय मिटी भव वास वसेरो;
त्यागी विभाव शुद्धात्तम लेखत, पाय अनुभव आतम केरो.
चाहकी दाहमें काहे जरे अब, भूली निजातम रिद्धि स्वतंती;
इंद्रीयः भोग विकार विषयरस, त्यागत जागत ज्योति अनंति;
शुद्ध स्वभाव रमे न गमे, विपयारस भोगविलास विपत्ति;
याते सु सम्यक् प्राक्रम फौरत, मृगमद तोरत सर्व विपत्ति.
कस्तुरांबाइ.
,

१३ . शुद्धिपत्रक. , पृष्ट लीटी. २१ २१. २८ ५८ ६० ६८ २ अशुद्ध. तेठलो नम्नताथी भेळवी परमाणन् कुळज ६ माइ मक्ति नीरवामां आश्चय मदुता जरिण कोधाग्नि चह रमणीकेळी ६ '१ १५ १२ शुद्ध तेटली. नम्रताथी मेळवी परमाणून कुळज ३ भाइ भक्ति नाखवामां आश्रय मृदुता जीरण क्रोधाग्नि चिहुं - ७० ७१ ७२ ७४ ७७ ३ ७९ ११ ८६ ८७ ३ रमण केले स M १२ सर्प ' दुःखनी ममताने लोभवश. दुःखनी भमताने लाभवश ६ १ १४ लीटी. १३ १०३ १०५ १०९ अशुद्ध. इन्द्रियो साधा श्रावक ८ १७ ९ १७ १० ११२ ११५ १२७ १२८ १३२ ३ इन्द्रियोथी साधवा श्रावक कहेवाय हे. श्रावक एवो तेटला साहचर्य आंबो लींबडानी शाठयं लेखवे न्याय शास्त्रमा बीजी माता पंक्ति R १ ८ १४२ १९ १४६ एवा नेटला सहचार्य आंवो ळींबडानी शक्य लेखव न्माय शास्त्रम! बीनो मातानी पकित P देव खाटा नौ कुर्तावे २ १४८ १५२ १७ १७ १२ १९ २० देवे १७० १७१ १७८ १७८ ** ६ खोटा तो कृतांते ११ १५ लीटी. . १८५ १९३ शुद्ध मायाथी आराधे अभ्यास वडे क्वचित् / ० ० १९३ २० २१ १० अशुद्ध. मायाथा अराधे अभ्यासक्डे क्वचित् मुख एने पीते ठगळा . १४ १८ १६ १४ १९५ २०२ २०५ २११ २१६ २२२ २२४ २२७ २२२ २३१ २३२ २३३ २० १३ समुद्र रहेवाना होथ राखमां मेटे उगाडववानो बाघेली सुख एवा पोते टाळी पणे समुद्र रहेवानी होय राखमांधी भेटे उगाडवानो बांधेली छ वाना अनुक्रमे शत्रुओने पान उठाये ११ ४ १२ १० १५ अमे शआने पन १ २५० २५० १६. लीटी. ५ १६. २५६ २५६ २५९. २५९ २६१ २६२ २६२ २६२ २६२ २६३ १७ १० अशुद्ध. सामानु आवेलां चर्चा शुद्धि तां बोल्यु पीतानी ** सामानु. मन आवेला छे. चया शुद्ध लेता बोल्यु पोतानी ले. वर्जवां. विहारनु . ६ १० २ . ८ २ १, बर्ज. विहार, (शके) पातोज धम भेदनो दाषा : पूर्वाध श्रर . . २६४ २६४ २६६ २६९ २७२ १० पीतोज धर्मोचित भोगनो दोषो: पूर्वाध, श्वर १५ १९ २. .

are
अथ श्री सूक्त मुक्ताकळी
ग्रंथ प्रारंज.
Raning
देवाधिदेव अरिहंत जगवान् केवा ?
(तेनां लक्षण तथा हेतु दृष्टांतनी समज साथे).
देवतत्त्व.
(मालिनी वृत्त.)
सकळ करम वारी. मोक्षमार्गाधिकारी,
त्रिन्नुवन उपगारी, केवळ ज्ञान धारी;
नविजन नित सेवो, देव एनक्तिनावे,
शहज-जिंन जंता, सर्व संपत्ति श्रावे. १
जिनवर पद सेवा; सर्व संपत्तिदार,
निशदिन सुखदाइ, कल्पवल्ली सहाश्
नमि विनमिलहीजे, सर्व विद्या वमा,
सपन्न जिनह: सेवा, साधतां तेह पाइ.
जे सघळां कर्म निवारीने तीर्थकर पदवी पमाय छे
आवी रीते-

सूक्त मुक्ताबळी. नाम कर्म ने " ज्ञानावरणी क्षय करी, दर्शनावरणी कर्म; वेदनी कर्म दूरे करी, टाळ्यु मोहनी कम. आयु कर्म, गोत्र अने अंतराय; अष्ट कर्म ते एणी पेरे, दूर कया महाराय. राग द्वेषादिक सघळा दोषो सर्वथा दूर करी नांखवाथी जे- मने अनंता गुणो प्रगट थया छे अने त्रिभुवन एटले स्वर्ग मृत्यु, अने पातालवासी प्राणीओ उपर जे सदाय उपकार करी रह्या छे, वळी जगत् मात्रनी सर्व वात संपूर्ण रीते जाणी शकाय एवं नि- मळ केवळज्ञान जेने प्राप्त थयेलं छे, एवा देवाधिदेव श्री अरिहंत भगवान् होय छे. तेमनी हे भविजनो!- तमे पूर्ण प्रेमथी निरंतर सेवा-भक्ति करो.. पूर्ण प्रेमथी एवा प्रभुनी सेवा-भक्ति करवाथी तमे सघळी सुख-संपदा सहेजे पामी शकश. १ सकळ दोषरहित श्री जिनेश्वर भगवान्नी सेवा-भक्ति सर्व संपत्तिने आपवावाळी के अने सदाय सुख समाधिने करनारी छे तेथी ते (प्रभुनी भक्ति) कल्पवेली जेवी भविजीवोने सहायकारी कही छे. जूओ के ऋष- भदेव भगवान्नी खरा भावथी सेवा-भक्ति करवावडे नमि अने विनमिसर्व विद्यासहीन नीचे मुजब विद्याधरनी ऋद्धि पाम्या.२ प्रथम भगवाने गृहस्थ अवस्थामां नमि अने विनमिने पुत्र तरीके पाळ्या हता. ज्यारे भगवाने दीक्षा लीधी त्यारे ते बने पर- देश गयेला हता. परदेशथी ज्यारे पाछा आव्या न्यारे तेमने लायक राज्यभाग भरतजीए आपवा मांडयो, परंतु ते भरतजीए आपवा मांडेलो राज्यभाग तेमणे लीयो नहिं पण तेओ बने ऋषभदेव भग- - देवतत्त्व वान् पासेथीज ते लेवा माटे निश्चय करीने प्रभु पासे आवी उचित सेवा भक्ति करीने राज्यभाग मागवा लाग्या. प्रभु तो काउस्सग्ग (कार्योत्सर्ग) ध्याने मौनपणेज रहेता हता. तोपण बने भाइओनो प्रभु प्रत्ये गाढ भक्तिभाव जोइने प्रसन्न थयेला इन्द्रे तेमने अनेक पाठसिद्ध विद्याओ सहित वैतादथ पर्वत उपर विद्याधर योग्य मोटी राज्यऋद्धि आपी. आषी रीते जिनेश्वर भगवान्नी साचा भावथी भक्ति करवावडे अनेक जीवो सुखी थया छ एम समजी आपणे पण प्रभु सेवामां रसिक थर्बु अने आपणां कुटुंबी-संबंधीओने पण प्रभुभक्तिमा रसिक करवां. सारां धोयेलां वस्त्र (स्वच्छ कपडां) पहेरीने प्रभुना दर्शन करवा प्रभाते, बपोरे अने सांजे एम त्रण वखत नियमसर जq. निस्सिही कही देरासरना द्वारमा पेसीने घर संबंधी वातचित के कोइ जातनो कलेश कंकास कोइ साथे करवो नहि. प्रभु सन्मुख साथीयो करवा माटे सारा अणीशुद्ध चोखा तेमज बदाम, सोपारी, श्रीफळ विगेरे सरस फळ अने शुद्ध स्वदेशी साकर प्रमुखथी बनावेलां पकवानरुप नैवेद्य प्रभु पासे ढोकीने प्रार्थना करवी के “ हे देवाधिदेव प्रभु ! आप मारां जन्म, जरा अने मरणनां दुःख निवारो ! मने निर्मळ ज्ञान, निर्मळ श्रद्धा अने सद्- वर्तन प्राप्त थाय एवी सुबुद्धि आपो ! माराथी कइ पण लोकविरुद्ध कार्य न थाओ ! हुं सदाय न्याय मार्गेज चालतो रहुं, मारा वडी- लोनी सदाय चाकरी वरदास प्रेमथी करूं, परोपकारनां कार्य करु, अने सद्गुरुनो जोग पामी जीवतां सुधी तेमनी आज्ञानु अखंड पालन करु, अने मने आपनी कृपाथी इष्ट फळनी प्राप्ति थाय एम

खूक्त मुक्तावली.
इच्छु छु. वळी हे प्रभु! भवोभव मुझने आपना चरण कमळनी सेवना
प्राप्त थाओ ! तेमज समाधियुक्त मारुं आयुष्य पसार थाओ ! अने
भवांतर (बीजा भव)मां पण मने आपना पवित्र धर्मनुज शरण हो!
परम पवित्र देव, गुरु अने धर्ममांज मारी बुद्धि सदाय स्थपायेली
बनी रहो!”
गुरुतत्त्व.
स्वपर समय जाणे, धर्म वाणी वखाणे,
परम गुरु कह्याथी, तत्त्व निःशंक मारणे;
नविक कज विकाले, नानु ज्युं तेज नासे,
इहज गुरु नजो जे, शुद्ध मार्ग प्रकासे.
सुगुरु वचन संगे, निस्तरे जीव रंगे,
निरमळ नीर पाये, जेम गंगा प्रसंगे;
सुणिय सुगुरु केशी, वाणि-राय प्रदेशो,
लहो सुरनय वासो, जे यश मोक्षवासी..
जे स्वसंप्रदायनां शास्त्र-सिद्धांतमां तेमज पर संप्रदायना
शास्त्र-सिद्धांतमांनिपुण होय-तेमा रहेलं रहस्य सारी रीते जाणता
होय अने निष्पक्षपातपणे (मध्यस्थपणे) भविजनीने धर्म मार्गमा
जोडवा माटे शास्त्रवाणी संभळावता होय; जेमने राजा अने रंक उपर
समान भाव होय एटले सहु सहुनी योग्यता प्रमाणे जे नि:स्पृहपणे
३
४

५ गुरुतत्व. (परोपकार बुद्धिथी) धर्म मार्ग बतावता होय: परम गुरु-वीतराग परमात्माना पवित्र वचनानुसारे वस्तु तत्वनो निर्णय करीने जे प्रव- तता होय: जेमणे पर उपाधिनो विवेकथी त्याग करी सकळ उपा- धिरहित मोक्षमार्गज आदर्यों होय; एटले जे आत्म-साधन करी लेवामां सदाय उजमाळ रहेता होय अने जेम सूर्य पोतानां किरणो- वडे कमळोने विकस्वर करे छे तेम जे शास्त्रवाणीना प्रकाशवडे भवि- जनोने प्रतिबोध करे छे; एवी रीते जे शुद्ध-निर्दोष-मोक्षमार्गनुज सतत आलंबन लेवा उपदिशे छे एवा त्यागी वैरागी महात्माओने हे भव्यजनो! तमे सुगुरु तरीके आदरो !! जेम गंगा नदीना समाग- मथी गमे ते अने गमे त्यांथी आवी मळेलं जळ निर्मळ अने महि- मावाछं बने छे; पारसमणिना संगथी जेम लोडं होय ते सुवर्णरुप बनी जाय छ; अने मलयांचळना पवननो स्पर्श थवाथी अन्य रुखडॉ पण चंदनरुप थइ जाय छे; तेम सुगुरुनां अमृत वचननी ऊंडी अ- सरथी जीवनी पण दशा सुधरी जाय छे. जीवना अनादि दोषो, जेवाके मिथ्यात्व, अज्ञान, अविरति प्रमुख सुगुरुना उपदेशवडे ओळखीने दूर करी शकाय छे अने आपणा आत्मामांज गुप्तपणे ढंकाई रहेला रत्नना निधान जेवा निर्मळ ज्ञान, दर्शन अने चारित्र प्रमुख उत्तम गुणो समजीने आदरी शकाय छे, ए वधो प्रभाव मुगु- रुनौज समजवो. जूओं के प्रथम भारे नास्तिक मतिवाळो एवी प्रदेशोरांजा पण केशीगणधर महाराजनी अमृत समान अत्यंत हितकारी वाणी सांभळी हालाहल विष समान मिथ्यात्वनो त्याग करीने शुद्ध तत्वश्रध्यारुप समकितसहित गृहस्थ योग्य श्रावकोनां.

or सूक्त मुक्तावळी. बारबत पाम्यो अने तेने अत्यंत आदरसहित आराधीने पोते प्रथम देवलोकमां उत्पन्न थयो अने त्यां पण समकितनी उत्तम करणी करीने हवे पछी उत्तम मानवदेह पामी मोक्षपद पामशे. तेनी विस्ता- रथी हकीकत रायपसेणी सूत्र' प्रमुखमां जणावेली छे. घणुं करीने जीव सुगुरुनी उत्तम सहायवडेज, निस्तार पामे छे. माटे सुगुरुर्नु आलंवन (आश्रय) लेवानी प्रथम जरुर छे. विनयगुण ए एक अजब वशीकरण मंत्ररुप छे. तेथी वीजा तो शुं ? पण परम त्यागी-नि:- स्पृही महात्मा पुरुषो पण वश थइ जाय छे. परंतु ते सुगुरु प्रत्ये आ- चरवानो विनय साचा दीलनो-निष्कपट भावनोज होवो जोइए. सुविनीत शिष्योए सुगुरुने सर्वज्ञ भगवान् समानज लेखी तेमनो सर्व प्रकारे विनय साचववानो के. खरेखरा विनययोगे आत्मा सकळ कर्ममळ्थो मुक्त थइ शके छे. उत्तम प्रकारे गुरु-विनय साचववा उपर उपदेशमाळा प्रमुखमा श्री गौतमगणधर, मृगावती, सुनक्षत्र अने सर्वानुभूति तेमज पथक प्रमुख मुनि जनोनां दृष्टांत सुप्रसिद्ध छे. सुविनीत थवा माटे हरेक आत्मार्थी जने उक्त दृष्टांतो आदर्शरुप करी राखवां जोइए. विनयना पांच प्रकार पण खास लक्षमा राखवा लायक छ. १ भक्ति-वाह्यसेवा, २ हृदयप्रेम-बहु- मान, ३ गुणस्तुति, ४ अवगुण-आच्छादन, अने ५ आशातना त्याग. वळी विनयगुणथी सद्विद्या प्राप्त थतां अनुक्रमे समकित (नि- मेळ श्रद्धा) अने चारित्र (निर्दोष वर्तन) वडे अविचळ मोक्षपदवीनी पण प्राप्ति थइ शके छे.

धर्मतत्त्व , धर्मतत्त्व. 'जळनिधि जळवेळा, चंथी जेम वाधे, सकळ विनव लीला, धर्मथी तेम साधे; मनुअ जनम केरो, सार ते धर्म जाणी, नजनजनवि नावे, धर्म ते सौख्य खाणी. ५ इह धरम पलाये, विक्रमे सत्य साध्यो, इह धरम पसाये, शाळिनो शाक वाध्यो, जस नर गज वाजी, मृत्तिकानां जिकेश, रण समय श्रया, ते जीव साचा तिकेश्. दुर्गति पडता प्राणीने बचावी जे सद्गति पमाडे ते धर्म कहे- वाय छे. ते दान, शील, तप अने भावरूप चार प्रकारनो अथवा गृहस्थधर्म अने साधुधर्मरूप व्यवहारथी बे प्रकारनो पण कह्यो छे. साधुधर्म सर्वथा अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य अने अ- किचनतारुप-पांच महाव्रतरूप (रात्री भोजनना सर्वथा त्याग सहित ) कहेलो के अने गृहस्थ (श्रावक) धर्म स्थूल अहिंसादिक पांच, अणुव्रत, त्रण गुणव्रत अने चार शिक्षाबत रूप बार प्रका- रनो कयो छे. अभयदान, सुपात्रदान, अनुकंपादान, कीर्तिदान अने उचितदान एवी रीते दान पांच प्रकारचें छे. तेमां अभयदान अने सुपानदान श्रेष्ठ फळदायी छे. दीन अनाथने दुःखी देखी तेर्नु ६ , ८ सूक्त मुक्तावली, दुःख ओछु करवा जे कइ आप ते अनुकंपादान कहेवाय छे. भाट चारणादिकने देवु ते कीर्तिदान अने स्वजन कुटुंबी प्रमुखने अव- सरे आप, ते उचित दान छे. शील नाम सदाचारनु छे. सदा- चारने सारी रीते सदा सेवनार सुशील कहेवाय छे. पोतानीज स्त्रीमा संताप राखी पराइ स्त्री वेश्या प्रमुख साथे खोटो व्यवहार न जोडवो ते पण शीलज कवाय छे. समज पामीने अधिक संतापवडे पोनानी के पराइ कोइ पण स्त्री माथे विषय क्रीडा नज करवी ते शील अति उत्तम छे. शीलवतने शुद्ध मन, वचन अने कायाथी पाळनार घणी रीते सुखी थाय छे. शीलवत सारीरीने पाळनारनी काया पवित्र अने निरोगी रहे , पवित्र शीलवंत स्त्री पुरूपोने क्वचित् कष्ट वखते देव पण सहायभूत थाय छे. उत्तम प्रकारचें शील पाळ, ए स्त्री पुरूपोनो श्रेष्ट शणगार (शोभारूप) छे. सुशील स्त्री पुरूपो ज्यां त्यां यश कीत्ति पामे के. शीलवगरनां स्त्री पुरूषो आवळनां फुल जेवां फुटडां होय तो पण ते नकामां ज्या त्यां तिरस्कार पामे छे. एम समजी सहु कोइए शील शण- गार सजवानी भारे जरूर छे. जेम अग्निवडे मुवर्ण शुद्ध थड़ शके डे-तेने लागेलो बंधी मेल बळी जाय छे तेम तपवडे आत्मा साथे अनादि काळथी लांगी रहेलो कर्म-मळ वळी जवाथी आत्मा शुद्ध-निर्मळ थइ शके छ. में तप बहु प्रकारना कहेलो छे. १ उपवास, छठे, अट्टम, प्रमुख करवा, २ जरूर करतां ओछु-अल्प भोजन कर, ३ जे ते चीजों मरंजी मुजव नहि खाता थोडी जरूर जेटली चीजबीज चलावी लेखु, ४ धर्मतत्व रसलोलुपी थइ गमे ते रस कसवाळी वस्तु गमे तेठली नहिं खाता प्रमाणमांज तेनु सेवन करवू, ५ शरीरने सारी रीते कसता रहे, विना कारण तेनुं हंद वहार लालन पालन नहिं करवं, अने ६ नकामी दोडधाम तजी स्थिर आसन सेवईं; एवी रीते बाह्य तप छ प्रकारनो कयो छे. बीजो अभ्यंतर तप पण छ प्रकारनो छे. १ जाणतां के अंजाणतां करेली भूल गुरू महाराज पासे केपटरहित जाहेर करी ते बदल गुरूजीए आपेली व्याजबी शिक्षा मान्य रा- खीने पोतानी भूल सुधारी लेवी, तेमज तेवी भूल वारंवार नाहि करवा पूरतुं लक्ष राखता रहेवू, २ आपणां वडील-माता, पिता, विद्यागुरु तेमजे धर्मगुरु साथे अनि ननंताथी आदर-मर्यादा राखी वर्तवू, ३ बाळ, ग्लान (रागी), वृद्ध अने तपस्वी साधु, आचार्य, उपा- ध्याय तथा संघ-साधर्मी भाइ व्हेनोनी यथोचित सेवा भक्ति वजा- बबी, ४ आत्म कल्याणार्थे धर्म-शाखनु पठन पाठन कर, ५ स्थिर चित्तथी अरिहंतादि नव पदना उत्तम गुणो विचारवा अने तेवा श्रेष्ठ गुणो आपणामां केम प्रगटे एवी धारणा-भावनों करवी, अने ६ आपणा देह उपरनी ममता तजीने परमात्मानां स्वरूप तल्लीन था. आवी रीते वर्णवेला अभ्यतरं तपने पुष्टिः मलें तेंवी रीतेज प्रथम वर्णवेलो वाह्य तप भाइ व्हेनाए अति आदरसहित से- ववो हितकारी छे. बाह्य तपथी अनेक फायदा थोय छे. प्रथम तो शरीर-शुद्धि थाय छे-अजीर्णादिक दोष दूरं थइ जाय छ, एटले शरीर समधात बन्यु रहे छे-निरोगी रहे छे. तेथी मर्न उपर बहु सारी असरं थार्य हे. मनमा खोटा विचारो-कुविकल्पो पेसता नथी, अने १० सूक्त मुक्तावळी. सारा विचारो सहेजे आवे छे. आम थवाथी अभ्यंतर तपने पण सारी पुष्टि मळी शके छे, तेमज शुभ भावना पण म्हजे प्रगट थाय छे. १ शास्त्रमा १ मैत्री, २ मुदिता (प्रमोद), ३ करुणा अने ४ मध्यस्थतारुप चार भावनाओ आवी रीते वतावेली छे. सहु कोइ जीव सदाय मुखी थाओ! कोइ कदापि दुःखी न थाओ ! सहु कोइ सन्मार्गे (सुखदायी-साचा मार्ग) चालो ! कोइ कुमार्गे न चालो ! एवा प्रकारनी अंत:करणनी भावनाने मैत्री- भावना कहे छे. कोइ पण सद्गुणी जनने देखीने के तेना उत्तम गुणो जाणीने दीलमां राजी थq. जेम मेघनो गर्जारव सांभळीने मोर खुशी थइ केकारव करे छे तेम गुणी जनोनुं गुणगान सांभळी मनमां आनंद उभराइ जाय अने आपणने पण तेवा गुण पामवा प्रेम वछूटे-अंत:करणमां उंडी लागणी पेदा थाय ते प्रमोदभावना छे. दीन अनाथने दुःखी देखी तेनु दुःख ओछु करवा जे लागणी पेदा थाय ते तेमज आपणाथी ओछा गुणवाळा जीव आपणी वरी- वर थाय वो सारं एम विचारी तेमना तरफ तिरस्कार बुद्धि नहि लावतां अनुकंपा या दयाभरेली लागणी प्रगटे तेने ज्ञानी पुरुषो करुणाभावना कहे छे. गमे तेवा पापी निर्दय अने निंदक नादान जीव उपर पण द्वेषभाव नहि राखतां तेनाथी अलग रहेQ, तेनी साथे राग पण वांधवो नहि तेने ज्ञानी पुरुषो माध्यस्थ्यभावना कहे २. द्वेष करवायी तेवा अघोर कर्म करनारा सुधरता नथी एटलुन नहि पण कलेश करवाथी आपणु तो अवश्य वगडे छे. अने राग. बंध करवायी तेमना कुकर्मने पुष्टि मळे छे. बळी तेना पापकर्मने अ-- धर्मतत्त्व. नुमोदन आपवा (मळवा)थी आपणे पण पापना भागी थइए छीए माटे तेमनाथी अलग रहेवामांज एकांत हित छे. उपर वर्णवेला दान, शील, तप, अने भावरुप चार प्रकारना धर्ममां भाव मुख्य छे. भाववडेज दीधेलं दान, पाळेलं शील अने करेलो तप लेखे थाय छे. भाववगरनां दान, शील अने तप लेखे थतां नथो.अलुणां धान (भोजन)नी जेम भाववगरनी करणी फीकी फक लागे छे अने भावसहित करवामां आवती सघळी शुभ करणी बहु लहेजत आपे छे. ते माटे शास्त्रमा भावने सहु करतां वधारे वखाण्यो छे तेथी आपणे पण भावसहितजशुभ करणी करवी दानथी दारिद्र दूर थाय छे. शीलथी सौभाग्य वधे है, तपथी कर्मनो क्षय थाय छे अने भावथी भवनो अंत थइ जाय छे. भावसहित-उल्ला- सथी सुपात्र-साधुने दोष रहित अन्नादिकनुं दान देवावडे शा- लिभद्रनी पेरे अन्य भवमा अनर्गल ऋधि मळे छे, अने अनुक्रमे मोक्षपदनी प्राप्ति थइ शके छे. केमके तेवा सुपात्र दानथी साधुनां ज्ञान, दर्शन अने चारित्रने पुष्टि मळे छे अने तेनुं अनुमोदन कर- वाथी आपणामां पण तेवा उत्तम गुणोनी योग्यता आवे छे. विवेक- थी दान देव, दान देतां खंचावु नहि तेमज उदारताथी दानदीधा बाद मनमा लगारे पश्चात्ताप करवो नहि. परंतु एम विचार के मने आएँ सुपात्र मळ्यु तेथी-मारं अहोभाग्य मार्नु छ. फरी एवो सुपात्रनो योग क्यारे मळशे शुद्ध-निर्मळ शील पाळवू एज खरु भूषण छे अने शीलवगरनुं जीवित पशुनी जेवू नका . शुद्ध शीलवडे पोताना शुभ आचार सूक मुक्तावली. विचार दीपे छे. शुद्ध शीलनो प्रभाव अचिंत्य चिंतामणि (रत्न) समान छे एम समनी उत्तम स्त्री पुरुषो शील-रत्नने पोताना मा- णथी अधिक साचवे छे. गफलतथी शीलरत्नने गुमावी देता नथी. कोइ पण लुचा-लफंगा (हीणां काम करनारा)नी संगतथी दूरज रहे छे. कष्ट वखते पोताना शीलरत्ननु रक्षण करवा वधारे काळजी राखे छे. खरी कसोटी तेमनी त्यांज थाय छे. भरहेसरनी सझा- यमा वर्णवेला अनेक सता अने सतीओ पोताना पवित्र शील- रत्नथी पोतानां नाम अमर करी गया छे. तेमनो उत्तम यश अद्यापि पर्यंत गवाय छे. आपणे पण पवित्र शीलनो अद्भुत प्रभाव समजीने निर्मळ शील पाळवा सदाय सावधान रहेQ जोइए. जे ते ठेकाणे भटकता मनने समजावी कबजे राखवाथी अने देहर्नु दमन करवाथी.तपनो लाभ मळी शके छे.जे भविजनो पो- तानी छती शक्तिने गोपव्या वगर तेनो सारो उपयोग करी ले ले तेमने परभवमा पराधीनपणानां दुःख भोगवां पडतां नथी. परंतु जे पोतानी छती शक्तिनो सद्उपयोग करता नथी, केवळ प्रमादमांज पोतानो अमूल्य वखत वीतावे छे ते बापडाने परभवमा पराधीनपणे • बहु बहु दुःख सहेवू पडे छे. निर्मळ ज्ञान अने वैराग्यवडे जेमने देह उपेरनी ममता उठी गइ ले ते आदीश्वर भगवान के वीर पर- मात्मानी पेरे दुष्कर तप करी शके छे. क्षमा-समना सहित करवामां आवतो तप कठण कर्मनो पण क्षणवारमा क्षय करी नाखे के.अने क्रोधथी करेलो गमे नेटलो दुष्कर नप पण लेखे थइ शकतो ~ धर्मरिषः १३ नथी-निष्फळं थइ जाय छे. माटे क्षमा राखवा अने क्रोध तजवा तपस्वी जनोए खास काळजी राखवानी छे. दृढप्रहारी जेवा अघोर पापी प्राणीओ पण दुष्कर तपना प्रभावथी सकळ कर्मनो क्षय करीने मोक्षपद पामी गया छे. एम समजी आपणे पण यथाशक्ति पूर्वे वर्णवेला बने प्रकारना तपमा समतासहित सदाय उद्यम करवो उचित है. यथाविध तप करवाथी आत्मा सहेजे निर्मळ थाय छे. उपर जणावेली मैत्री, मुदिता, करुणा अने माध्यस्थ्य भावना भविजनोए स्वपर उपगारी जाणी सदाय सेववी उचित छे. उपरांत शान्त सुधारस प्रमुख ग्रंथोमां वर्णवेली अनित्य, अंश- रण, संसार, एकत्व अने अन्यत्व प्रमुख द्वादश (बार) भाव- नाओ पण-आत्माने अत्यंत उपकारी-वैराग्य रंगने वधारनारी समजोने सदाय आदरवा योग्य छे. तेनुं विशेष वर्णन प्रशम- रति; शांत सुधारस अने अध्यात्म कल्पद्रुम प्रमुख ग्रंथों- मांथी तेमज तेनी सझायोमांथी ग्रहण करी लेवु. 'जेवी भावना तेवी सिद्धि' ए न्याये अंत:करण शुभ भावनामय करी देवू उचित छ जड़ वस्तु पण शुभ भावना योगे सुधरे छे तो चैतन्य युक्त आत्मानुं तो कहेज शुं ? सुगंधी फूलनी भावना देवाथी तेल सुवासित थइ फूलेल कहेवाय छे. तेवीज रीते अन्य पदार्थ आश्री समजवुः विषयरसनी भावनाथी जीव विषयी बनी जाय छे अने शान्तरस (वैराग्य)नी भावनाथी शान्त-वैराग्यमय बनी जाय छे. तेथीज कधु के के "नारी चित्त देखना विकार वेदना, जि- नंद चंद देखना शांति पावना." ए वाक्य वहु मनन करवा सूक्त मुक्ताबळी, योग्य छे अने तेनुं मनन करीने विषय वासना तजी वैराग्य वासना आदरवी योग्य छे. उपशम, विवेक अने संवर ए त्रण पदनी समज साथे वारंवार भावना करवाथी चिलातिपुत्र जेवो निर्दय जीव पण सद्गति पामेलो छे. एम विचारी आपणे सहुए शुभ लेश्या-परिणाम उपजावनारी भावना सेववीज उचित छे. साधु धर्म, रात्री भोजनना सर्वथा त्यागसहित. संपूर्ण अ- हिसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य अने अकिंचनता योगे पांच महाव्रतरुप वखाण्यो छे. कोइ पण त्रस के स्थावर (हालता, चालता के स्थिर रहेनारा) जीवने मनथी, वचनथी के कायाथी हणवो नहि, हणाववो नहिं, तेमज हणनारने सारो जाणवो नहिं; पण सहु जीवनी आत्म समान सदा रक्षा करवी ए अहिंसा म- हाव्रत कहेवाय छे. क्रोध, मान, माया, लोभ, भय के हास्यथी प्रमादवश लगारे असत्य न बोलवू, पण शास्त्र अनुसारे राग द्वेष रहित जरूर पडतुं प्रिय अने हित वचनज वदवू तेने शास्त्रकार सत्य नामर्नु महाव्रत कहे छे. देव, गुरु के शास्त्रनी आज्ञाविरुद्ध कंइ पण वस्तु तेना स्वामीनी रजा शिवाय राग द्वेषथी सर्वथा नज लेवी ते त्रीजें अचौर्य नामर्नु महाव्रत कहेवाय छे. देव, मनुष्य के सियेच संबंधी विषयभोगनो (रागथी के द्वेषथी) सर्वथा त्याग करवो, दुर्धरमन अने इंद्रियोने वश थइ नहिं जतां तेमने पोताने कवजे राखवा तेने शास्त्रकार चोथु ब्रह्मचर्य महाव्रत कहे छे. धन, धान्य प्रमुख नव प्रकारना वाद्य परिग्रहनो अने मिथ्यात्व, कषाय. अने हास्य प्रमुख १४ प्रकारना अभ्यंतर परिग्रहनो राग द्वेष रहितपणे सर्वथा त्याग 4 धर्मतत्त्व.. १५ करवो ते पांच, अकिंचनता महाव्रत कहेवाय छे. एवी रीते वर्णवेला पांच महाव्रत रुप साधु-धर्मर्नु यथार्थ आ- राधन करवाथी आत्मा जलदी मोक्ष पदनो अधिकारी थइ शके छे. तेथी आपणे पण सारां भाग्ये साधु-धर्मने लायक थइए एम सदाय इच्छवु अने तेटला माटे प्रथम यथाशक्ति गृहस्थ धर्म : सेवन कर उपर जणावेलां पांच महाव्रतो संपूर्ण रीते पाळवा असमर्थने माटे शास्त्रमा ते अहिंसादिक व्रतोने यथाशक्ति थोडा प्रमाणमां पण पा- लवा कहेल छे. एवी रीते अल्प प्रमाणमांज पाळवामां आवतां ते अहिंसादिक पांच अणुव्रतो कहेवाय छे. ते उपरांत अहिंसादिक व्रतानी रक्षा अने पुष्टि निमित्ते वीजां त्रण गुणव्रत अने चार शिक्षाबत पण कहेला छे. .एम सर्वे मळीने श्रावकनां बारव्रत कहेवाय छे. जो गृहस्थ योग्य ते व्रतो अंगीकार करवानी इच्छा थाय तो जरुर तेनुं स्वरुप सद्गुरु समीपे जइ विनयसहित जाणी लेवु जोइए. परमार्थ समजीने आत्माना कल्याण माटे जो धर्म करणी करीए तो तेथी सरलता साथे अधिक हित थइ शके छे. उपर जणा- 'वेलां द्वादश व्रतर्नु विस्तारथी वर्णन 'श्रावक कल्पतरु' अथवा 'व्रत गाइड' नामना पुस्तकमां अलायदुं आपवामां आव्यु छे. तेनुं लक्षस- हित अवलोकन करी तेमां रही जती शंका समाधान गुरुगमथी मेळवीने प्रेमपूर्वक अने प्रमादरहित यथाशक्ति ते ते व्रत सद्गुरु पासे अंगीकार करी पूरती काळजीथी तेनुं पालन कर उचित के. एम करवाथी अनुक्रमे साधु-धर्मनी पण प्राप्ति थइ शके छे. जैन शास्त्रोमा सघळा व्रतोतुं मूळ शुद्ध श्रन्हा अथवा स- .

सूक्त मुशायली. मकितव्रत कहेलु छु. जेम एकडा वगरनां करेलां मिंडां मिथ्या छ अने एकडा सहित करेलां सघळां मिंडां सार्थक'थाय छे तेम सम- कितवगरनी करणी मिथ्या छ भने समकित सहित करेली सघळी करणी सार्थक थाय छे. समकित-रुचिवंत जीवो आवी रीते प्रति- ज्ञा अंगीकार करीने तेने प्रेमपूर्वक पाळे छे-"राग द्वेषादिक दोष- मात्रथीः सर्वथा मुक्त थयेला अने अनंत ज्ञानादिक गुणोथी अलंकृत थयेला अरिहंत भगवान् मारा देव छे. उपर वर्णवेलां पांच महा- अतोने सद्गुरु समीपे अंगीकार करी, क्षमादिक दश प्रकारनी उत्तम शिक्षाने. सदाय सेवनारा भव्य जनोने तेमनी योग्यता अनुसारे अमृत उपदेश आपनारा सुसाधुओ मारा गुरु के. अने जिनेश्वर भगवाने भाखेला जीव, अजीव,, पुन्य, पाप, आश्रव, संवर, नि- जरा, बंध-ने. मोक्ष ए नव तत्व मारे प्रमाण छे. आवी रीते शा- स्त्रोक्त समकित जीवतांसुधी पाळवा हुं बंधाउं छु.” समकितवडे थोडा वखतमां भव भ्रमण मटी जाय छे तेथी तेनो प्रभाव. अचिंत्य छे. समकितवंतर्नु मूळ लक्ष आत्म, कल्याण; साधवामां होय छे. परंतु तेने कुटुंब प्रतिपालन करवा व्यावहारिक काम करवां पडे ते जेम बने. तेम अंतरी न्यारो रहीनेज करे छे. ए प्रभाव समकित रत्न- नोज, समजवो. समकित संबंधी ६७ वोलन सविस्तर वर्णन 'श्रद्धा शुद्धि-उपाय' ग्रंथमा अलायदुं आपेलु छे. समकित (तत्त्वश्रद्धा), श्रावकनां व्रत के साधुनां महावन योग्यता वगर प्राप्त थइ शकतां नथी. जेमने समकितप्रमुख प्राप्त करवानी प्रबळ इच्छा होय तेमने तेवी योग्यता मेळघवानी पूरी जरूर छे. सामान्य रीते धर्मरत्ननी n

धर्मतत्त्व.
त
योग्यता मेळववा इच्छता भाइ-व्हेनोए नीचे जणावेला २१ गुणोनो
अभ्यास पाडवानी बहु जरुर छे तेनी यादी आ प्रमाणे छे.
१ गंभीरता या उदार दील.
२ सुंदर निरोगी शरीर.
३ शान्त प्रकृति-स्वभाव.
४ लोकप्रियता (थाय ते सद्वर्तन).
५ हृदयनी कोमळता-आद्रता.
६ पापनो, परभवनो तथा वडोलनो डर,
'७ निष्कपटपणे
सरल
वर्तन.
८ व्याजवी दाक्षिण्यता राखवी (कोइए कहेला उचित वचननो
अथवा करेली उचित मागणीनो आदर).
९.लज्जा-मर्यादा-अदब राखवी.
२० दया-सहुने आत्म समान लेखवा.
११ रागद्वेष रहित निष्पक्षपाती वर्णन.
१२ सद्गुण-गुणी प्रत्ये पवित्र प्रेम-राग.
१३ हित-प्रिय-सत्य वचन कथन (विकथा वर्जन अने सत् शाख
वचन सेवन).
१४ स्वजन-मित्र कुटुंबीने धर्मरसिक करवा प्रयत्न
१५ शुभाशुभ परिणाम आश्री लांबो विचार कर्याबाद कोइपण
शक्य अने हित कार्यनो आरंभ करवानी टेव.
१६ कोइपण वस्तुना गुण दोष सारी रीते जाणवानी पद्धति.
प
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सूक्त मुक्तावळी. शखयो, तर्क-वितर्कवडे गुरु पासे शंकानुं समाधान करी लेवं, एम करीने तत्त्वज्ञान एटले सत्य वास्तविक परमार्थ युक्त ज्ञान मेळवबुं), अजीर्ण छतां-प्रथम खाधेल पच्यु न होय त्यां सुधी भोजन नहि करवू, अकाळे खावू पीयूँ नहीं, धर्म, अर्थ अने कामने पूर्वापर बाधा रहितपणे-विरोषरहित सेववा, गृहस्थ योग्य आगता स्वागता साचववी, हठ कदाग्रहरहित वर्तई, लोकविरुद्ध तथा राज्यविरुद्ध तजवं, ग्रहण करेलां व्रत-नियम दृढ टेकथी पाळवा, काम, क्रोध, लोभ, मद, मान अने हर्परुप अंतरंग छ वैरीने जीतवा, तेमज इंद्रि- योना विषयमुखमां नहि मुंझातां इंद्रियोनेवश करवी-तेनी शास्त्रकारे खास भलामण करली छे. आमांना घणा गुणोनो मोटे भागे प्रथम जणावेला २१ गुणोमा समावेश थइ जाय छे. अहीं टुंकामां वतावेला मार्गानुसारीपणाना ३५ गुणोनु कंडक विस्तारथी वर्णन हितोपदेश- प्रथम भागमा अने २१ गुणोनुं वर्णन हितोपदेश-बीजाभागभां आ- पेल के त्यांथी ते काळजी राखो जोइ लेबु अने तेनो परमार्थ समजी बनतां सुधी पोतार्नु वर्तन सुधारी लेवा सुज्ञ भाइ व्हेनोए प्रयत्न करवो. आपणा पोताना हित माटे ज्ञानी पुरुपोए आपेलो अमूल्य शिखामणोनो आपणाथी बनी शके त्यांमुधो आदर करवाथीज आपणुं श्रेय सारी रीते संधाय छे ए भूली जई नहीं. उपर जणा- च्या मुजब मार्गानुसारीपणाना ३५ गुणो अथवा धर्मरत्ननी योग्यता, माटे कहेला २१ गुणोनो सारी रीने अभ्यास-महावरो राखवाथी अनुक्रमे समकिनममुख धर्मरन्ननी प्राप्ति थइ शके छे. तेनो प्रभाव अति अद्भूत के. Apay धर्मतश्व. जेम चंद्रमानी वधती कळाना योगे समुद्रनी वेळा वृद्धि पामे छ तेम अधिक धर्म आचरणना योगे सर्व सुख संपदा सहेजे संपजे छ. पवित्र धर्म आचरण प्रमादरहित करी ले, एज आ मनुष्य जन्म पाम्यान मुख्य कर्तव्य समजीने हे भविजनो ! सकळ सुखना भंडार समान सर्वज्ञ भाषित धर्मर्नु तमे अति आदरथी सेवन करो! ज्यां सुधो जरा (वृद्ध) अवस्था आवी पहांची नथी, विविध व्याधिओ प्रगट थइ नथी अने इंद्रियवळ घट्युं नथी त्यांसुधी धर्म साधन जलदी करी लेवु ! नहिं तो पंछी पस्ताशो अने करी शकशो नहि. आ शरीरनो का भरुसो नथी. जोतजोतामा पाणीना परपोटानी जेम ते हतुं नहतुं थइ जाय छ माटे चेतवू होय तो जलदी चेती लेवु. तत्त्वातत्त्व, हिताहित, कृत्याकृत्य अने लाभालाभनो विवेकथी विचार करी लेवो एज बुद्धि पाम्याचें फळ छे, यथा- शक्ति शुभ व्रत नियम अंगीकार करी टेकथी पाळवां एज देह पा- म्यानुं फळ छे; विवेकथी पात्र-सुपात्रनुं पोषण करवू एज लक्ष्मी पाम्याचें फळ छे अने सामाने रुचे एवं प्रिय हितकारी वचन कहे, एज वाणीनु उत्तम फळ छे. एम दीलमां खूब समजी राखी समय ओळखी स्वकार्य सुधारी लेवु अने वनी ,शके तो वीजाने पण उचित सहाय आपता रहेवु. ए पवित्र धर्मनी सहायथीज विक्रमादित्य अने शालि- वाहन सुप्रसिद्ध थया. धर्मनी कृपाथीज बघां बनावटी मनुष्य, हाथी अने घोडा संग्राम समये साचा-सचेतन थइ कामे आल्या

सूक्त मुकावळी.
१७ आचार विचारमा कुशळ-शिष्ट पुरुषोने अनुसरो चालवू.
उत्तम पुरुषो पासे सालीम लेवी.
१८ वडीलोना तथा गुणीजनोनो उचित आदर करवा.
१९ उपगारी लोको माना-पिता-स्वामी विगेरे तथा हितोपदेश
देवावाला गुरु महाराजनो उपगार सदायं स्मरणमा राखवो.
२० त्रिभुवन हितकारी तीर्थंकर महाराज जेवा महापुरुषोनां पवित्र
दृष्टांत दीलमां धारी आपणे पण आपणुं कर्तव्य समजीने
परोपकार रसिक थQ.
२१ कोइ पण कार्यमा कुशळता, अल्प प्रयासे कार्य साधी लेवानी
चंचळता.
संक्षेप माथी उपर जणावेला २१ गुणो ज्यांसुधी आपणामां
पूर्ण रीने खीली नीकले त्यांमुधी वारंवार काळजीथी ते गुणोनुं
सेवन कर्या करवू जोइए. जेम दुनीयामां जीवे मानी लीधेली अनेक
व्हाली वस्तुओ माटे अहोनिश (रात्री दिवस) उद्यम करवामां
आये के नो. ते वस्तु वहेली मोडी पण मळेज के तेवी रीते कमर
कसीने जो उपर जणाघेला धर्म माटे खास जरुरना गुणो मेळवा
प्रयास लेवामां आवे तो ते उपयोगी गुणोनी प्राप्ति थनां आत्मा
जलदी धर्मरत्नने योग्य थाय है. करलो प्रयास सर्वथा नकामो
जनोज नथी. जेम जेम प्रेमसहित जणावेला गुणो खातर अधिक
प्रयत्न करवामां आवे तेम तेम आपणे ते गुणोनो लाभ वधारे
मलदी भेळची शकीए छीए. सघळा एकवीरा नहिं तो ओछामां
ओछा अर्धाथी अधिक गुणो तो अवश्य मेळवदाज जोइए, तोज

धर्मतत्व. आपणे कइ पण अंशे धर्मरत्नने योग्य बनीए छोए. जो वस्त्रने धोई सारी रीते साफ करेलं होय तोज तेने रंग यथार्थ गते चडी शके छे अने भिंत विगेरेने पण घठारी मठारीने सारी रीते आरिसाजेपी साफ करी होय तोज तेनी उपर सारुं चित्रामण उठी शक छेतेवीज रीते उपर जणावेला उत्तम २१ गुणोवडे चित्तरूपी वस्त्रने प्रथम साफ-निर्मळ करवु जोइए, अथवा हृदय-भूमिने यथार्थ शुद्ध करी लेवी जोइए, तोज तेमां धर्म रंग (राग) सारो जामे के अथवा उत्तम व्रतरुपी चित्रामण तेमां सारी रीते खीली नीकळे छे अने लांबी वखत सुधी टकी पण शके छे. एम समजी आपणे सहुए आ अनि अगत्यनी वात उपर पूरतुं लक्ष राखी जेम ते २१ गुणोनी प्राप्ति, रक्षा अने वृद्धि बने तेम अधिकाधिक प्रयत्न प्रेमसहित करवा उचित छ. तेनी प्राप्तिथीज आपणे समकित प्रमुख उत्तम धर्मने लायक बनी, सद्गुरुनी कृपाथी आत्माने अत्यंत उपगारी धर्म अल्प प्रयासे पामी शकशुं. जे भाइ व्हेनो मार्गानुसारीपणाना गुणोनु सारी रीते पालन करे छे, ते जलदी पवित्र धर्मने पामी शके छे. ते गुणोमा प्रथम न्याय नीतिथी प्रमाणिकपणे वर्तीने द्रव्य उपार्जन करवानें कहेलं छे. ते शिवाय विशेषे करीने सुघडता राखची, सत्संग करवी, परनिंदाथी निवर्तवं, सारा धमिष्ट पाडोशमा रहे, निर्भय स्थानमा वास करवो, मातापितादिक वडील जनोनी आशामां रहे, आवकना प्रमाण- मांज खर्च राखवों, बुद्धिना आठ गुण धारवा (शास्त्र सांभळ्वानी इच्छा, शाख सांभल, तेनो अर्थ समजवो, समजेलो अर्थ याद H4 सूक्त मुक्तावळी. , शखबो, तर्क-वितर्कवडे गुरु पासे शंकानुं समाधान करी लेवू, एम करीने तत्त्वज्ञान एटले सत्य वास्तविक परमार्थ युक्त ज्ञान मेळवh), अजीर्ण छतां-प्रथम खाधेलं पच्यु न होय त्यां सुधी भोजन नहि करवू, अकाळे खावू पीयूँ नहीं, धर्म, अर्थ अने कामने पूर्वापर बाधा रहितपणे-विरोधरहित सेववा, गृहस्थ योग्य आगता स्वागता साचवबी, हठ कदाग्रहरहित वन, लोकविरुद्ध तथा राज्यविरुद्ध तजवं, ग्रहण करेलां व्रत-नियम दृढ टेकथी पाळवा, काम, क्रोध, लोभ, मद, मान अने हर्षरुप अंतरंग छ बैरीने जीतवा, तेमज इंद्रि- योना विषयसुखमां नहि मुंझातां इंद्रियोने वश करवी-तेनी शास्त्रकारे खास भलामण करेली छे. आमांना घणा गुणोनो मोटे भागे प्रथम जणावेला २१ गुणोमा समावेश थइ जाय छे. अहीं टुंकामां वतावेला मार्गानुसारीपणाना ३५ गुणोनुं कंडक विस्तारथी वर्णन हितोपदेश- प्रथम भागमा अने २१ गुणोनुं वर्णन हितोपदेश-वीजाभागभांआ- पेलुं छे त्यांथी ते काळजी राखी जोइ लेवु अने तेनो परमार्थ समजी बनतां सुधी पोतार्नु वर्तन सुधारी लेवा सुज्ञ भाइ व्हेनोए प्रयत्न करवो. आपणा पोताना हित माटे ज्ञानी पुरुषोए आपेलो अमूल्य शिखामणोनो आपणाथी बनी शके त्यांमुधो आदर करवाथीज आपणु श्रेय सारी रीते सधाय छे ए भूली जई नहीं. उपर जणा- व्या मुजब मार्गानुसारीपणाना ३५ गुणो अथवा धर्मरत्ननी योग्यता माटे कहेला २१ गुणोनो सारीरीने अभ्यास-महाबरो राखवाथी अनुक्रमे समकिनममुख धर्मरत्ननी प्राप्ति थइ शके छे. तेनो प्रभाव अति अद्भूत के. • . .

धर्मतत्व. जेम चंद्रमानी बधती कळाना योगे समुद्रनी वेळा वृद्धि पामे छे तेम अधिक धर्म आचरणना योगे सर्व सुख संपदा सहेजे संपजे छे. पवित्र धर्म आचरण प्रमादरहित करी लेवू एज आ मनुष्य जन्म पाम्याने मुख्य कर्तव्य समजीने हे भविजनो ! सकळ सुखना भंडार समान सर्वज्ञ भाषित धर्मर्नु तमे अति आदरथी सेवन करो! ज्यां सुधो जरा (वृद्ध) अवस्था आवी पहोंची नथी, विविध व्याधिओ प्रगट थइ नथी अने. इंद्रियवळ घटयु नथी' त्यांसुधी धर्म साधन जलदी करी लेवु ! नहिं तो पछी पस्ताशो अने करी शकशो नहि. आ शरीरनो केइ भरूंसो नथी. जोतजोतामां पाणीना परपोटानी जेम ते हतुं नहाँ थइ जाय छे माटे चेत, होय तो जलदी चेती लेबु. तत्त्वातच, हिताहित, कृत्याकृत्य अने लाभालाभनो विवेकथी विचार करी लेबो एज बुद्धि पाम्यानुं फळ छे, यथा- शक्ति शुभ व्रत नियम अंगीकार करी टेकथी पाळवां एज देह पा- म्यानुं फळ छे; विवेकथी पात्र-मुपात्र पोषण करवू एज लक्ष्मी पाम्यानुं फळ छे अने सामाने रुवे एवं प्रिय हितकारी वचन कहेवु एज वाणीनु उत्तम फळ छे. एम दीलमां खूब समजी राखी समय ओळखी स्वकार्य सुधारी लेवु अने बनी शके तो बीजाने पण उचित सहाय आपता रहेQ. ए पवित्र धर्मनी सहायधीज विक्रमादित्य अने शालि- वाहन सुप्रसिद्ध थया. धर्मनी कृपाथीज बर्चा बनावटी मनुष्य, हाथी अने घोडॉ संग्राम समये साचा-सचेतन थइ कामे आल्या २२ ७ सूक्त मुक्कावळी. जेथी पोतानी आण दाण सर्वत्र पसरी. ए पूर्व करेलां धर्म-पुन्य- नोज प्रभाव समजयो. सम्यग् ज्ञान अभ्यासयोगेज साची समज आवे छे. तन धन ठकुराइ, सर्व ए जीवने , पण इकज उही, ज्ञान संसारमा बे, नव जळ निधि तारे, सर्व जे सुःख वारे, निज पर हित देते, ज्ञान ते कां न धारे? जव ऋषिक गाथा, बोधयो नय निवार्यो, इक पदथी चिलाती-पुत्र संसार वार्यो; श्रुत नगत सुझानी, मास तुसादि थावे, श्रुतश्री अन्नय हाये, रोहिणी चोर नावे. जान ए अपूर्व रसायण, अमृत अने जैश्वर्य के एम समर्थ शास्त्रकारी कहे ." जीवने पूर्व पुन्य जोग सुंदर-मनोहर-मजबुत-नीरोगी देह मळी शके छे, जेने देखी अन्य जनो चकित थइ जाय छे तेमज तेमां मोहिन बनी जाय छे; वळी पुन्य जोगे विशाळ लक्ष्मीनी संजोग थइ शके छे, जेने देखी लोको नेन कुबेर भंडारी प्रमुखना उपनाम .

सम्यग् भान अभ्यासयोगेज साची समज आवे छे. आपे छे; तेमज पुन्य जोगे जीवने मनमानती म्होटी ठकुराइ, म्होंटा मानवता होद्दा, खीताब विगेरे एनायन थाय छे जे देखी लोको तेनी मुक्त कंठथी प्रशंसा करे छै. आ बधु पूर्व पुन्य जोगे जीवने प्राप्त थर्बु मुलभ छे. दुर्लभ केवळ जीवने साचु-सम्यग् ज्ञान प्रश्न य, एज छे. भव भवनी भावठ भांगनार साचु-सम्यग् ज्ञानज के विनय-बहुमान सहित सद्गुरुनी सेवा-भक्ति करतां भव्य जीवने एवं साचुं तत्त्वज्ञान प्राप्त थइ शक के तेनां फळ अलौकिक कह्यां छे अने एथीज एवा अमूल्य ज्ञान माटे यत्न करखो जरुरनो के. सद्गुरुनी साचा दीलथी विनय-बहुमान सहिन सेवा भक्ति करता तेमनी कृपाथी सहेजे सत्य ज्ञान प्राप्त थाय छे; एटले जीवना उपर आवी रहेला कर्मनां आवरण ओछा थतां जाय के अने एथी अंत- रमां ज्ञान उजाश-प्रकाश थतो जाय छे, जेथी जीवने सत्यासत्य, हिताहित, कृत्याकृत्य, लाभालाभ, भक्ष्याभक्ष्य, पेयापेय 'अने गुण दोपर्नु स्वर भान थइ शके छे. आर्नु छेवट परिणाम म् आवे छे के जीवने सत्य-हित मार्ग तरफ रुचि-प्रीति वधती जाय छे अने अ- सत्य-अहित मार्ग तरफनी रुचि घटती जाय छे. आ रीते अनुक्रमे वधता जता विवेक-अभ्यास वडे जीवन चिन्तामणि रत्न सरखा अमूल्य समकितरत्ननी प्राप्ति थइ शके छे. जेम एकडा उपर करेला सघळां मोंडा सार्थक थाय छे तेम समकित सहित करवामां आवती सघळी करणी लेखे थाय छ, प्रमाद दोष ओछो धतो जाय छे अने क्षमा, मृदुता (नम्रता), सरलता अने संतोषादिक सद्गुणो मंगट- येदा करवा आत्मा जाग्रत् थनो जाय छे एटले वीर्योल्लास वधता , ૨ सूक्त मुक्तावळी, जाय छे अने शुद्ध आचार-विचारनो अभ्यास करवा आत्मा समर्थ गाइ शके छे. ए रीते विनयपूर्वक करेल सम्यग् ज्ञानर्नु आव॑ रुटुं परिणाम आवे छे. सम्यग् ज्ञान कहो के आत्म ज्ञान साथै आत्मानु खरुं हित-कल्याण साधी शके एवी साची करणी भळे छे-एक रस थाय छे त्यारे तेजलदी जीवने जन्म मरणनां दुःखमाथी मुक्त करावी के छे. जेम जळमां जळनो रस साथेज मळी रहे छे तेम सम्यग् ज्ञानमा साची करणी पण साथेज मळी रहे थे, ते एक बीजाथी विखूटां रहेतांज नथी. पछी ते करणी वाद्य रुपे होय के अभ्यंतर रूपे होय. शुद्ध उपयोग सहित कराती साची करणी सघळां दुःखनी अंत करे छे अने विशेषमा तेथी अन्य अनेक भव्य जीवो, पण हित सधाय छे. मतलब के आवा सरल स्वभावी जीवन पोतार्नु कल्याण तो निःसंशय थाय के पण एर्नु अनुमोदन करनारनुं तेमज अथाशक्ति तद्वत् वर्तन करनारनु पण सहेजे श्रेय थइ शके छे. आ प्रमाणे अनेक रीते स्वपरने उपकार करनारं सम्यग् ज्ञान छे एम जो समजवामां आवे तो पछी एवं अखूट ज्ञान-धन पेदा करवा है मुखना अर्थी भाइ व्हेनो! तमे केम उद्यम करता नथी? पूर्व जव नामना ऋपि-मुनिए एक गाथाना बोध मात्रथी भरणनो भय निवार्यों (ए वान शास्त्र प्रसिद्ध छे) अने चिला- तिपुत्रे उपशम, विवेक अने संवर रुप पदना परिचय मात्रथी भवभ्रमण निवार्य. ज्यारे तेणे महात्मा मुनि पासेथी ए पढनुं श्रवण क्यु त्यारे ते पदनो रहस्या जाणवानी इच्छा थइ. तत्संबंधी मनमा संडो आलोच करतां तेने तेनो यथार्थ भाव मूज्यो; एटले तेणे क्रो- सम्यग् ज्ञान अभ्यासयागेज'साची समज आवे छे. २५ धादिक कषायने शमाची दीधा अने हिताहित, कृत्याकृत्य, यावत त्याज्यात्याज्यनो निर्णय करी पोताना एक हाथमा रहेलं खड्ग अने वीजा हाथमा रहेलं सुसीमा कन्या- मस्तक तजी दीधु. पछी पोते एक महात्मा मुनिनी पर कायोत्सर्ग ध्यानमा निश्चळपणे उभा रह्या. त्यां वन जेवा तीक्ष्ण मुखथी डंख मारती अनेक कीडीओ तेने वळगी, जेथी तेनी काया चालणी जेवी थइ गइ तोपण,पोते निश्चळ ध्यानथी डग्या नहि अने अढी दिवसमा आक्षणभंगुर देहनों त्याग करी पोते सद्गतिना भागी थया. ए सम्यग् ज्ञाननो प्रभाव समजवो. सम्यग् ज्ञानना प्रभावथी जीवनू केटल बधुं श्रेय थाय छे? श्रुत ज्ञानना 'मा रुष मा तुष' एवा एकाद अविकारी पदना प्रभावी माषतुषादिक कइक जीवो सुज्ञानी थइ परम कल्याण साधी शक्या के अने एज श्रुत ज्ञानना जे थोडाक बोल रोहिण्या चोरना का- नमां पडी गया हता तेना प्रभावथी ते अभयकुमार जेवा बुद्धिवं- तना हाथमा आवीं शक्यो नहोतो. अर्थात् प्रभुना मुखथी निकला थोडांक वचन तेना कानमां वगर इच्छाए पडयां हतां तोपण तेथी ते बची जवा पाम्यो हतो. तो पछी जे भव्यात्माओ भाव सहित सर्वज्ञ भाषित वचनोनो आदर करे तेमर्नु तो कहेवूज ? तेओ तो अवश्य स्वश्रेय साधी शकेज. एम समजी सत्य ज्ञान अभ्यास करवा सहु कोइए चीवट राखवी युक्त छे. ए ज्ञान-गुणवडेज अनु- क्रमे आत्मा अक्षय सुख पामी शंक छे.

२६ सूक मुक्तावळी. मनुष्य जन्मनी दुर्लभता अने तनी अनन्य उपयोगिता. नवजळधि नमंता, कोइ वेळा विशेख, मनुष्य जन्म लाध्यो, उन्लदो रत्न लेखे, सफळ कर सुधर्मे, जन्म ते धर्म योगे, परनव सुख जेथी, मोक्ष लक्ष्मी प्रनांगे. मनुष जनम पामी, आळते जे गमे , शशि नृपति परे ते, शोचनाश्रीनमे : पुलह दश कश्रा ज्युं, मानुषा जन्म ए , जिन धरम विशषे, जोमतां सार्थ ते . १० आ चार गतिरुप संसार सायरमा कर्मवश अरहां परहा अथ- डातां पछडाता तथा प्रकारनी अकाम निर्जरादिक योगे अनुकूळ समयने पामी जीव चिन्तामणि रत्नसमान अमूल्य मानव भव मे- नवी शके छे. एवो अमूल्य-दुर्लभ मानव भव पामीने सर्वज भग- वाने बनावेला दान, शील, तग अने भावरुप धर्मनु सेवन करी तेने लेखे करी लेवो युक्त छे. अहिंसा, संयम अने तप लक्षण धर्म महा मंगलकारी कयो छे. ए धर्ममा जेनुं मन मदाय वा करे के तेने म्हीटा देव दानवो पण नमस्कार करे छे. ए धर्मर्नु यथाविध अखंड मनुष्य जन्मनी दुर्लभता अने तेनी अनन्य उपयोगिता. २० आराधन करनार मुनीश्वरो मोक्षनां अक्षय मुग्व मेळवी शके हैं अने मुनि योग्य महाव्रतोने पाळवाने अशक्त एवा जे भव्य जीवो तेर्नु देशथी (अंशथी पण) आराधन करे ले ते पण स्वर्गादिक सद्गतिनां चढीयानां सुख संपादन करी अंने अक्षय सुख मेलबी शके के. एम समजी साचा मुखना अर्थी भाइ व्हेनोए प्रमादाचर- गथी आ अमूल्य मानव भव वृथा जवा देवो नहि. स्वस्व स्थिति- संयोगादिक अनुसारे सहु कोडए यथाशक्ति वन नियमनुं पालन करी आ नरभवने सार्थक करवो जोइए. बुद्धिबळने पामी आपणे आपणुं हिताहित समजी हितमार्गज आदरवा उजमाळ थर्बु जोइए, पुन्य जोगे लक्ष्मी पामीने विवेकसर तेनो जरुर जेवा स्थळमां मदु- पयोग करी लेवो जोइए अने वाक्पटुता (वचन वदवामां कुश- लना) पामीने माणीओने प्रीति उपजे एवां नरमाश भरेला, मीठा- शवाळा अने हितरुप थाय एवांज वचन वदवां जोइए. आ विगेरे दुर्लभ सामग्री पूर्व पुन्यजोगे पामी जे भव्यात्माओ स्वहित करी लेवा सावधान रहे छे तेज पुन्यात्माओ अनुकूळ प्रसंगने पामी पर जीवोर्नु पण हित हैडे धरी करी शके छ; अने ए रीते स्वमानव- भवने सफळ करें छे. आ मानवभवने चिंतामणि रत्न समान एटला माटे गणेल छे के एना वगर कोइ जीव कदापि पण अक्षय अनंत मोक्ष मुख मेळवी शकतो नथी. आवा उदार आशयथी उत्तराध्य- यन सूत्रमा आ मानवभव दश दृष्टान्ते दुर्लभ वखाण्यो छे. ते साधे, आर्यक्षेत्र, उत्तम कुळ, इन्द्रिय पटुता, शरीरे सुख, धर्मश्रद्धा-रुचि, सद्गुरुयोग अने व्रत-नियमरुप विरतिना परिणाम ए सर्व उत्तरो- सूक्त मुक्तावळी. तर पुन्यवडेज प्राप्त थइ शके छे. तेवी दुर्लभ शुभ सामग्री महा पुन्य नोगे पाम्या पछी मुज्ञजनाए स्वपर हित साधी लेवा लगारे. आ- ळस करवू न जोइए. एम छतां आळस-प्रमादथी जे जनो आ शुभ सामग्रीनो जोइतो लाभ लेता नथी, वायदामां ने वायदामांज पो- तानो बधो वखन बीताबी दे छे ते वापडाने पाछळथी शशि रा- जानी पेरे बहुज शोच-पस्तावू पडे छ. शशि राजाने नेमना वडील बंधुए बहु समजाव्या छतां तेणे विपय तृष्णादिकना परवशपणाथी तेनुं कहे, मान्यु न हतुं, जेधी ने माठा परिणामे मरीने नरकमां यो हतो. त्यां (नरकमां) महा कदर्थना सहन करवी पडी तेथी बेने पाताना स्वच्छंद आचरण माटे वहुज खेद उपजवा लाग्यो पण एथी वळे शुं ? झुरी झुरीने पण नरकनी शिक्षा भोगववी तो पंडेज, एमां क° चालेज नहि. आ वात सहु कोइने एक सरखी बीते लागु पडे एवी छे. तेथी पाणी पहेलांज पाळ वांधवा जेवी अ- गमती वापरी स्वपर हित साधनवडे शास्त्रोक्त दश दृष्टांते दुर्लभ मानवभव सफळ करी लेवा चूक, नहि, जेथी पाछळथी पस्तावो करवो पडे नहि. राग द्वेप अने मोहादिक सर्व विकारोथी सर्वथा रहित बीन- भाग परमात्मा होय छे. तेमनां परम हितकर वचन एज आगम बचन छे. ए आगम आपणने सत्य मार्ग वतावे छे. ए मुजव चालबाथी आपणो मानव भव सफळज थाय छे.

सजनोनी बलिहारी.
सज्जनोनी बलिहारी.
(सज्जनोनां लक्षण अने तेथी सधातो स्वपर उपकार.)
सदय मन सदाइ, उखियां जे सदाइ,
परहित मति दाइ, जात वाणी मिग;
गुणकरी गहराइ, मेरु ज्युं धोरताइ,
सुजन जन सदाइ, तेद आनंद दाश. १५
जइ उरजन लोके, उहव्या दोष दे,
मन मलिन न पाये, सऊना तेह ते;
पद जनक पुत्री, अंजना कष्ट योगे,
कनक जिम कसोटी, ते तिसी शीळ अंगे. १२
"जेओ सदा मन, वचन अने कायामां पुण्य अमृतथी भरेल
होय छे, उपकारनी अनेक काटियोवडे जेओ त्रिभुवनने- सदा सं-
तोप उपजावे छे अने परना परमाणु जेटला (अल्प) गुणने पण,
पर्वत जेवा समान लेखी पोताना मनमा प्रमोद धारे छे तेवा वि-
रल सज्जनो जगतने पावन करी रह्या छे."
" जेमर्नु सद्वर्तन जगत्ने हितरुप होवाथी अनुकरण करवा
योग्य होय छे, जे सदाय गुणग्राही होय छे, परना गुण मात्रने
ग्रहण करनारा होय छे; वळी जे परना दोष तरफ दृष्टि देता नथी;
पोतानामां गमे तेवा सद्गुणो होय छतां तेनो लगारे गर्व करता.
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सूक्त मुक्तावळी. नयी पण सदाय लघुता धारण करता रहे छ, तेवा सजनो खरे- खर जगत् मात्रने आशिर्वादरुपज गणाय छे." सज्जनानुं दील सदाय दयाई-पारकां दुःख देखी पीगली जाय एवं होय छे, दुःखी जनोनां दुःख निवारवा सजनो सदाय बननी महाय आपवा नन्पर रहे है. जेम तेमनां दुःखनो अंत आवे तेम जीवा अने ते माटे बनतुं करवा नेओ उत्कंठित होय छे. तेमनी बाणीमां एवी मिठाश अने हितबुद्धि होय छे के एथी अन्य जीवोनुं अचूक हित थाय के तेमज तेओ फिदा फिदा थइ जाय छे. तेश्रो समुदनी जेवा गंभीर आशयवाला होय छे, जेथी तेओ अनेक गुण- रत्नोन अंतरमा धारण करसां छतां छलकाइ जना नथी. तेओ हवी उत्तम मर्यादा जाळचे छे के जेथी वीजा चकित थइ जाय छे, अने तेमना जेवी उत्तम मर्यादा (आचार-विचार) पाळवा सहेजे ललचाय छे. कळी सज्जन पुरुषो सदाय मेरु पर्वत जेवू निथळ धैर्य धारण करी रहे छ एटले तेश्रो गमे तेवा अनुकूळ-अतिकूळ मंयोगोमां ममभाव धारी शके ले (सम-विषम ममये हप-खेद नहिं करना तेमां ममचिने रहे छे) विपत्ति समये नेओ दीनता दाखवना नथी, नेमज मुख-संपनि समये गर्व-उत्कर्ष करता नथी. सज्जन पुरुषोनी वृत्ति सहाय सिंहनी जेवी पराक्रमवाळी होय . तेओ हरेक प्रसंग डहापणथी काम ले छे. सजनतानी वानो घणां करें छे, नेमां केटलाकन तेमां प्रीनि पण होय छे परंतु सम्मन पुरु- योना पवित्र मार्ग चालबार्नु बहुज थोडानां भाग्यमांहोयछे सजनना- श्री विरुद्ध वर्नन तेज दुर्जनमा छ. नेवी दुर्मनना दाखवनारा दुर्जनो सजनोनी बलिहारी. तेमना जातिस्वभावने लही सजन पुरुषोने संतापे पण छे. सज्जन पुरुषोमां जे उत्तम अनुकरणीय गुणो होय छे ते तेमने रुचना नथी: तेथी कइक जातना दोष दइ दुर्जनो सज्जनोने वारंवार दुहव्या करे के. पण एथी सज्जनो तेमना उपर द्वेष धारता नथी. सज्जनो तो समभावे पोताना विहिन मार्गेज चास्या करे छे. कडं पण छे के- “जेम जेम कांचनने अग्निवडे तपाववामां आवे के तेम तेम तेनो वान वधनो जाय छ: शेरडीने जेम जेम छेदवामां आवे छे तेम तेम ते सरस रस समर्प छ, अने चंदनने जेम जेम घसवामां (घ- सारा देवामां के छेदवामां) आवे छे तेम तेम ते सुगंधज आपे है. परीते उत्तम सज्जनाने प्राणान्त कष्ट आवी पडे तोपण तेओ पो- तानी रुडी प्रकृतिने बगडवा देता नथी." ते आपत्ति समये घणीज धीरज अने अभ्युदय वखते घ- गीज क्षमा राखे छे. तेश्रो पोतानां कार्य बहुज प्रमाणिकपणे करें छे, छतां स्वोत्कर्ष एटले आपवडाइ या आत्मश्लाघा करता नथी. तेओ पारका छतां के अछतां दुपण (अपवाद) बोलताज नथी, पण पोतानाथी बनी शके तेटलो परोपकार कइ पण स्पृहा राख्या बगर सदाय करता रहे छे. तेओ पोताना मनने निर्विकारी राखे छे. जूओ ! द्रपद राजानी पुत्री द्रौपदी (सनी), जनक राजानी पुत्री सीता (सती) अने अंजना (सनी)! एओए आपत्ति समये केवी उत्तम धीरज राखी पोतार्नु पवित्र शील साचव्यु छे? सज्जनोनी खरी कसोटी-परीक्षा कटाकठीना वखतेज थाय के गमे तेटलुं कष्ट आनी पडे तोपण तेवा सज्जनो पोतानो सन्मार्ग लोपता नथी. बळी 7 सूक्त मुकावळी. उपर चढावे छे, ज्या ते ताज (सुगटोनी पैरे बहु मान पामे छे. कई छे के गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिंगं न च वया” एटले गुणो ज-सद्गुणोज पूजापात्र छे. गुणीजनो जे पूजायमनाय छे ते तेमना सद्गुणोने लइनेज. सद्गुणो. वगरनु केवळ लिंग (वेश ) के वय कंइ कामनां नथी. सद्गुणो होय तोज ते वधां लिंग अने क्य ममुख लेखे थाय छे, ज्यां त्यां सद्गुणोनीजं बलिहारी छे. लघुता- • धारी (उगता बीजना) चंद्रने लोको जेम बहु माने छे तेम पूर्ण गारवता गौरव-पामेला (पूर्णिमाना) चंद्रने लोको वहु मानता नथी. श्रीमान् चिदानंदजी महाराजे.एक ललित पदमा लघुता (नम्रता)ना भारे वखाण कयों छे. अने आठ प्रकारना मदनी भारे निभ्रंछना पण करी छे, ते वात यथार्थन के. ( लघुता मेरे मन मानी, इत्यादि पदमां). जे कोइ भव्यात्मा गुणी जनोनुं बहुमान (विनय-सत्कार- सन्मान) करे छे तेथी सद्गुणोनुज बहु मान कय लेखाय छे, अने एवा सद्गुणोने लक्षीनेज ज्यां ज्यां उचित प्रवृत्ति करवामां आवे छे त्या त्यां तेवा-सद्गुणोनी प्राप्ति अथवा योग्यता सहज थाय छे. चेतनजी (भव्यात्मा) ए भावुक द्रव्य होवाथी उत्तम संगयोगे तेनामां उत्तमता सहेजे आवे छे. जे दुर्भव्य के अभव्य होय छे तेनेज तेवो उत्तम.संग उपकारक थइ शकतो नथी. विषहर-झरने टाळनार मणि विषधरना मस्तक उपरज, छतां तेने तेनी कशी शुभ असर थती नथी, त्यारे तेज मणियी धीजा कइक मनुष्यादिकनो उपगार थइ पके है, ए सहज समजाय ने छ. सहृदय मनुष्योनतो कई- ( गुणरागी अने गुणग्राही थवानी जरुर अने अनिवार्य फायदा. ३५ बुंज शुं पण जडरुप देखातां जंबु लिंवादिक वृक्षो जे मलयगिरिनी सानिध्यमा आवी रयां के ते पण शुद्ध चंदन वृक्षना संगथी चंद- नरुप थइ जाय छे. एम समजी सुज्ञ भाइ व्हेनोए हर्ष सहित सद्गुणी एवा वडीलोनो सदाय समागम सेववो जोइए. वळी नी- तिशास्त्रकार कहे के के "बालादपि हितं ग्राह्यं" एटके लघुश्य- वाळा बाळक पासेथी पण हित वचन ग्रहण करी लेवु जोइए. वयथी बाळक छतां जो बुद्धि विशाळ होय तो तेनुं समयोचिन वचन वयोवृद्धने पण उपयोगी थाय. छतां जो तेने बाळरुप समजी तेना वचननी अवगणना करवायां आवे छे तो ते प्रासंगिक लाभथी वैचितज रहेवाय छे.जे सायरनी जेवा गंभीर हृदयवाला हाय के ओ पोते अनेक गुण रत्नोना निधान होवा छतां गुणानुरागीप- णाथी अन्य अनेक पदार्थोमांथी गुण ग्रहण करी शके छे. एम छतां तेओ पोतानी योग्यतानो के माप्तिनो विलकुल गर्व करता नथी. ए बयो प्रभाव सत्संगथी प्रगटतागुणानुरागनी अने गुण ग्रहण कर- बानी कळानो समजवो. बळी जुओ ! डाभना अग्रे रहेल जळबिंदु जे मोतीनी आभाने धारण करे छे अने मेरुपर्वत उपर रहेलुं तृणखलं पण सुवर्णनी शोभाने धारण करे छे. ए आदि कुदरती बनावी आपणने शुभ आशयथी (चोख्खा दीलथी) सत्संग करवा मेरे छे. अने सद्गुणना रागी थवा तेमज सद्गुण ग्रहण करवा शिखवे के एक बकरी जेई गरीव. जानवर सिंहना संग हाथी जेवा मातवरना माथे चडी बेसे छे. एमां शु. आर्य ? ।

૩૨
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सूक्त मुक्तावळी..
" सज्जनोने क्रोध (कपाय) होय नहि, कदाच वीजाना भला-
भाटे तेवो देखाव करवो पडे तो ते लांबो वखत रहे नहि अने कदि
लांबो वखत राखवानी जरुरज पडे तो तेनुं माटुं फळ बेसवा पामे
नहीं एटलो जागृति एमनामा अवश्य होय छे."
आ वात बहु अजब अने वखाणवा लायकज छे. सज्जनोनां
वचन अमृन जेवां मीठां अने हितकारी होय छे, तेथी ते सहुने
प्रिय-आदेय थइ पडे छे. आपणे पण आपणा पोताना, आपणा
वाळवच्चांना, कुटुंवना, ज्ञातिना, देशना तेमज समाजना भलाने
माटे अनिष्ट दुर्जनता दूर करी श्रेष्ट सज्जनता आदरवा सदाय उद्यमी
य, जोइए.
गुणरागी अने गुणग्राही थवानो जरुर अने
एथी नपजता अनिवार्य फायदा.
" आपगुणीने वळी गुणरागी, जगमा तेहनी कीरति
गाजी, लालन, की" (श्री यशोविजयजी.)
गुण ग्रहो गुण जेमा, ते बदु मान पावे,
नर सुरनि गुणे ज्यु, फूल शिशे चढावे;
गुणे करी बदु माने, लोक ज्युं चंमाने,
अति कश जिम माने, पूर्णने त्यु न माने,
मलयगिरि को जे, जंबु लिंबादि सोहे,

1 गुणरागी भने गुणपाही थवानी जरुर अने अनिवार्य फायदा. ३३ मलयज तरु संगें, चंदना ते दोहे; मसहिय वायु, कीजिये संग रंगे, गज शिर चमी बेरी, ज्यु अजा सिंह संगे. १४ जेओनामां गुणरागीपणानो अने गुणग्राहीपणानो महान् सद्- गुणवर्ते छे, तेओनी यशकीति प्रतिष्ठादिकमां घणो वधारो थाय छ ए महान् सद्गुण तेमनामांज आवी शके छे के जेओ मद्-मत्सर- द्वेष-इर्षा-अदेखाइ नामना महा विकारथी वेगळा होय छे. जेमर्नु अंतर द्वेषरुप अग्निथी सदाय प्रज्वलितज रहे छे तेमनामां उपरना सद्गुणनी योग्यनाज होती नथी. क्रोध अने अभिमान ए द्वेषनाज अंगभूत परिणाम छे. ते ज्यांसुधी चेतनजीमां वास करे चे, त्यांमुधी घेतनजीधी सामामां गमे एवा उत्तम सद्गुणो होय तोपण ते ग्रहण करीने आदरी शकाता नथी; एटलुन नहिं पण त्यांमुधी चेतनजीने ए सद्गुणसंबंधी वात पण रुचती नथी. ए वो ज्यारे क्षमा सम- वादिक प्रधान सत्संगयोगे देषामि अथवा एना अंगभूत क्रोधादिक परिणाम शमी जाय के अने चेतनजीमां शान्तिनुं साम्राज्य स्थपार्नु जाय छे त्यारे अने त्यारेज सद्गुणोनी वात रुचे छे. सद्गुण प्रत्ये रागबुद्धि प्रगटे के अने सद्गुणोने ग्रहण करी चेवनजी पोते पण सद्गुणी वने छे. इथे ज़्यारे चेतनजी पोते सद्गुणी, सद्गुणरागी अने सद्गुणग्राही बने के त्यारे तो ते देवनी पेरे पूजाय छे, मनाय के, अने तेनां वचन पण बहु मान्य थवा लागे छे. जुओ ! मुगंधी- पणाना गुणने लीधे म्होता:भूपतियो पण पुष्पोने पोवाना मस्तक सूक्त मुकावली. . उपर चढावे छे, ज्या ते ताज (सुगड)नी पेरे बहु मान पामे छे. का छे के गुणा: पूजास्थानं गुणिषु न च लिंग न च वय एटले गुणो ज-सद्गुणोज पूजापात्र छे. गुणीजनो जे पूजायमनाय छे ते तेमना सद्गुणोने लइनेज. सद्गुणो वगरनु केवळ लिंग (वंश) के वय कइ कामनां नथी. सद्गुणो होय तोज ते बधा लिंग अने क्य भमुख लेखे थाय छे. ज्यां त्यां सद्गुणोनीजं बलिहारी छे. लघुता- धारी (उगता वीजना) चंद्रने लोको जेम बहु माने छ तेम पूर्ण गारवता गौरव-पामेला (पूर्णिमाना) चंद्रने लोको बहु मानता नथी. श्रीमान् चिदानंदजी महाराजे.एक ललित पदमा लघुता (नम्रता)ना भारे वखाण कयौं छे. अने आठ प्रकारना मदनी भारे निभ्रंछना पण करी है, ते वात यथार्थन. के. ( लघुता मेरे मन मानी, इत्यादि पदमां). जे कोइ भव्यात्मा गुणी जनोनुं बहुमान (विनय-सत्कार- सन्मान) करे छे तेथी सद्गुणोनुज बहु मान कर्यु लेखाय छे, अने एवा सद्गुणोने लक्षीनेज ज्यां ज्यां उचित प्रवृत्ति करवामां आवे के त्या त्यां तेवा सद्गुणोनी माप्ति अथवा योग्यता सहज थाय छे. चेतनजी (भव्यात्मा) ए भावुक द्रव्य होवाथी उत्तम संगयोगे तेनामा उत्तमता सहेजे आवे छे. जे दुर्भव्य के अभव्य होय छे तेनेज तेवो उत्तम संग उपकारक .थइ शकतो नथी. विपहर-झरने टाळनार मणि विषधरना मस्तक उपरज, छतां तेने तेनी कशी शुभ असर .थती नथी, त्यारे तेज मणिथी बीजा कइक मनुष्यादिकनो उपगार थइ सके है, ए सहज समजाय तेवू छे. सहृदय मनुष्यो, तो कहे- गुणरागी अने गुणग्राही थवानी जरुर अने अनिवार्य फायदा. ३५ वुज शुं पण जडरुप देखातां जंडुलिंवादिक वृक्षो जे मलयगिरिनी सानिध्यमा आवी रह्यां के ते पण शुद्ध चंदन वृक्षना संगथी चैद- नरुप थइ जाय छे. एम समजी सुज्ञ भाइ व्हेनोए हर्ष सहित सद्गुणी एवा वडीलोनो सदाय समागम सेववो जोइए. वळी नी- तिशास्त्रकार कहे के के "बालादपि हितं ग्राह्यं" एटके लघुवय- वाला बाळक पासेथी पण हित वचन ग्रहण करी लेवु जोइए. वयथी बाळक छतां जो बुद्धि विशाळ होय तो तेनुं समयोचित वचन वयोवृद्धने पण उपयोगी थाय. छतां जो तेने बाळरुप समजी तेना वचननी अवगणना करवामां आवे छे तो ते प्रासंगिक लाभथी वैचितज रहेवाय के. जे सायरनी जेवा गभीर हृदयवाळा होय के ते पोते अनेक गुण रत्नोना निधान होवा छतां गुणानुरागीप- णाथी अन्य अनेक पदार्थोमांथी गुण ग्रहण करी शके छे. एम छतां तेओ पोतानी योग्यतानो के प्राप्तिनो बिलकुल गर्व करता नथी. ए बधो प्रभाव सत्संगथी प्रगटतागुणानुरागनी अने गुण ग्रहण कर- चानी कलानो समजवो. बळी जुओ ! डाभना अग्रे रहेलं जळबिंदु जे मोतीनी आभाने धारण करे छे अने मेरुपर्वत उपर रहेलं तृणखलं पण सुवर्णनी शोभाने धारण करे छे. ए आदि कुदरती बनावो आपणने शुभ आशयथी (चोख्खा दीलथी) सत्संग करवा प्रेरे छे. अने सद्गुणना रागी थवा तेमज सद्गुण ग्रहण करवा शिखवे के एक बकरी जेधुं गरीव जानवर सिंहना संगै हाथीं जेवा मातवरना माथे चही बेसे के. एमां | आश्चर्य ?

३६
१५
सूक मुक्तांवळी.
मार्गानुसारीना ३५ गुणो पैकी प्रथम गुण.
(न्यायाचरण आदरवानी आवश्यकता.)
जग सुजस सुवासे, न्याय लच्छी नपासे,
व्यसन पुरित नासे, न्यायथो लोक वासे;
इम हृदय विमासी, न्याय अंगीकरोजे,
अनय परिदरीजे, विश्वने वश्य कोजे.
पशु पण तप्त सेवे, न्यायथी जे न चूके,
अनय पत्र चले जे, ना ते तास मूके,
कपि
कुळ
मिळि सेव्या, रामने शीश नामी,
श्रनय करो तज्यो ज्यु, नाइए संकस्वामी. १६
दय गय न सहाइ, युद्ध किर्ति सदाइ,
रिपु विजय विधाइ, न्याय ते धर्मदा,
धरम नयधरा जे, ते सुखे वैरी जीपे,
धरम नयविदूणा, तेहने वैरो गोपे.
धरम नय पसाये, पांडवा पंच ते,
करी युइ जय पाम्या, राज्यलोला लहे;

मार्गानुसारीना ३५ गुणा पैकी प्रथम गुण. धरम नय विहुणा, कौरवा गर्व माता. रण समय विगूता, पांमवा तेह जीता. न्याय-नीति-प्रमाणिकता ए सर्वे एकार्थवाचक पर्याय वचनो गणाय छे. अने न्याय-नीति- अवलंबन करीने जे व्यवसाय करको ते न्यायाचरण कहेवाय छे. दयाळु दीलवाला बुद्धिशाळी होय हे न्यायाचरण करी शके छे. कठोर दीलचाळाथी बीजाने यथार्थ इनसाफ आपी शकानो नथी तेथी ठीकज कई के के न्यायसाय दयानु मिश्रण यवुज जोइए. समर्थ शास्त्रकारो पण कहे छे के- "आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् । अर्थात् जे कह आचरण आपणने पोताने पण विवेक-बुद्धिथी विचारतां प्रतिकूळ- विरुद्ध जणातु-समजातु होय तेवू आचरण (वर्तन) आपणे वीजा प्रस्थे अजमावबुं नहि. केमके मुख दुःखनी,मान अपमाननी, यावत् जीवित मरणनी लागणी सहुने समान होय छे. ज्यारे आम छे त्यारे जे आपणने पोतानेज न गमे प्रतिकूळ लागे ते बीजाने पण केमज गमे के अनुकूळ पडे ? तेनो विचार प्रथम करवो जोइए. एथीज बीजा पण दयाल लोको आ वातनुं समर्थन करतां कहे छ के 'Do unto others as you would be done by' एनी मतलव एवी छे के वीजा पासेथी जेवा अद्दल न्यायनी तमे इच्छा राखता हो तेवोन अद्दल न्याय तमे अन्यने आपो. आपता रहो. तमने कोइ अधि- कारी अन्याय आपे ते तमने रुचे खरो ? नहिज रुवे तो पछी तमे अन्यने गेरइन्साफ आपोते तेने पण केमज रुचे? नज रुचे. बीजाना ३८ सूक्त मुक्कावळी, अन्याय आचरणथी जेम तमारी लागणी दुभाय तेम तमारा अन्या- याचरणथी सामानी लागणी पण दुभाया वगर केमज रहे ? आ वातनो ख्याल दयालु जनो दीलयां लावी परने प्रतिकूळ थइ पडे एवां अन्यायाचरण करतां सहजे अटकी शके, अने सहुने आत्मस- आन लेखी तेमना प्रत्ये बहुज भलमनसाइ राखी प्रमाणिकपणे- न्यायाचरणथीज वर्ती शके. एवाज उदार आशयथी कहेवामां आव्यु छे के, “जे परस्त्रीने मातातुल्य लेखे छे, परद्रव्यने पथ्थर तुल्य लेखे छे, अने सर्व प्राणीवर्गने आत्मतुल्य लेखे छे, एज खरा ज्ञानी- पंडित छे.” आ रीते न्याय-नीति-प्रमाणिकताना मार्गे चालनारा भव्य जनोज मार्गानुसारी गणाय छे. गमे तेवाना संबंधमां कशा संकोच वगर निर्भयपणे न्याय-नीतिना विहित मार्गे चालवु ए मा- र्गानुसारीपणानुं प्रथम अंग छे. न्यायाचरणथी जगत्मां आपणो मुजश विस्तरे छे, लक्ष्मीलीला वाधे छे अने स्थिर थइ रहे छे. पाप- लाप अने आपदा दूर टळे छे. तेमन वळी सहेजे लोको वशवी थाय छे, एम समजी-हृदयमां विमासण करीने न्याय नीतिनो मार्ग मक्क- मपणे आदरी अनीतिनो मार्ग सर्वथा तजवो घटे छे. जगत्ने वश करवानो-आपणा तरफ आकर्षवानो ए अद्भुत उपाय छे. जे गमे तेवा संयोगमां पण न्यायाचरण तंजतीनथी अर्थात् अनीतिना मार्गने तिलांजलि दइ दृढपणे न्यायनोज मार्ग आदरे छे तेने सत्य न्यायना प्रभावथी पशुओ (निर्दय जानवरो) पण आवीने पगमां पडे छे, अने जे जाणी जोइने अनीतिनो मार्ग आदरे छ तेनो सगा भाइ पण पक्ष (महाय) करतो नथी. न्यायवतमां रामचंद्र अने युधिष्ठिरादिक महा- मार्गानुसारीना ३५ गुणो पैकी प्रथम गुण. पुरुषोनां तेमज सीता सुभद्रादिक महासतीओनां चरित्रो मुमसिद्ध छे. जूओ! न्यायमूर्ति एवा रामचंद्रजीनी सेवामां कपिकुळ-गण अति नम्रता सहित हाजर थइ रह्या भने अन्यायकारी रावणने तेनों संगो सहोदर (बंधु विभीषण)तजीने चाल्यो गयो. अने तेणे जइने न्यायवंत रामचंद्रजीनोज आश्रय लीधो. आथी स्पष्ट थाय छे के सत्य-न्या- यमार्गने मक्कमपणे सेवनारनो शत्रु पण मित्र थइ जाय छे, त्यारे जाणी जोइने अन्याय आदरनारने तेना बंधु-मित्र पण छोडीने चाल्या जाय छे. आ तो अंगट न्याय-अन्यायन जैहिक-आ लोक संबंधी किंचित् मात्र फळ का. परलोकमां वो एथी अत्यंत गर्दा फळ स्वर्ग-नरकादिकमां भोगबवू पडे छे. आटला मेरक शब्दो पण अन्यायाचरण तजीने न्यायाचरण आदरवा मुज्ञ जनो माटे तो वस कहवाय, न्यायमार्गने एक निष्ठाथी सेवनार वधी रीते सुखी थाय छे. तेने रिद्धिसिद्धि मळे छे. जशकीर्ति वाधे छे. अने जयकमळा'बरे छे, त्यारे तेथी विरुद्ध वर्तन सेवनार सर्व प्रकारे हानि पामे छे, 'परा- भव पामे छे अने दुःखीदुःखी थइ जाय छे. वळी जुओ ! न्याय- नीति अने सत्य धर्मना पसाये पांचे पांडवो युद्धमा जय पाभ्या, राज्यलीला पाम्या अने छेवटे सकळ कर्मनो अंत करी तेओ अक्षय अव्यावाध एबुं मोक्षनु मुख पाम्या त्यारे अन्याय-अनीति अने अधर्मना मार्गेज चालनारा दुर्योधन प्रमुख कौरवो रणसंग्राममा परा- भव पामीने भुंडा हाले मुवा अने मरीने महा माठी गति पाम्या, एम समजी सहे सुज्ञ भाइ बहेनोए आज क्षणथी अन्यायाचरण तजी दइने शिष्ट पुरुषोए सेवित न्यायाचरणनुज हट आलंघन लेवा प्र-

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सुक्तमुक्तावळी.
तिज्ञा करवी उचित छे. स्वकर्तव्यकर्म ने प्रमाद रहित निष्कामपणे
करनार न्यायीनी पंक्तिमा आवे छे.
प्रतिज्ञापालन.
कुशळ मतिज्ञा करीने कुशळताथी पाळवा हितवचन.
• शुक्ल प्रशुल जि कार, आदर्यु ते निवाई,
रवि पण तस जोवा, व्योम जाणे वगाहे
करि गहित निवाहे, तासने सत्त आपे,
मलिन तनु पखाले, सिधुमा सुर प्रापे.
पुरुष रयण मोटा, ते गणिजे धराए.
जिरा जिम पनिवज्यु, ते न मे पराये;
गिरीश विष धर्यो जे, ते न अद्यापि नारख्यो,
उरगति नर लेर, विक्रमादित्य राख्यो. २०
"शुभ के अशुभ जे कोइ आदए-कबुल क तेने जे निर्वहे के
तेने जोवा माटे जाणे सूर्य आकाशमा अवगाहन करे के (फरे छे).
पळी तेज सूर्य गृहित करीने जे निर्वहे छे तेने सच्च (वळ) आपे छे.
अने मलिन शरीरने पखाळे छे (स्वच्छ करे छ) तेमज-सिंधुमा सुर
बापे के अर्थात् शूरवीर माणसने प्रतिज्ञा पाळवा प्रेरणा करे के.
१९ आ.धरा जे पृथ्वी तेमां मोटा पुरुषरत्न तो तेनेन गणवा के
वे जेवी रीते अंगीकार फयु होय तेने पाये छोडे नहीं (निर्वहे ).

प्रतिज्ञापालन. 50 . जुओ ! गिरीश जे शिव तेणे विषने अंगीकार कयु तो ते इजु सुधी नाखी दीधु (तजी दीधु) नथी अने दुर्गत के० दुर्भागी नर जे पुरुष तेने लइने विक्रमादित्ये पण राख्यो छे (तजी दीपो नथी). आवेने दृष्टांतो लौकिकना छे." २० सुबुद्धिवंननु ए कर्तव्य छे के प्रथम तो जे केइ प्रतिज्ञा करवी ते दक्षताथी-डहापणथी-दुरंदेशी राखीने तेनुं परिणाम अने पोतानु सामर्थ्य-शक्ति विचारीनेज करवी. जे करवाने पोते शक्त होय, जे कर, हितरुप होय अने जेनुं परिणाम सुंदर आववा संभव होय एज कार्य करवा डहापणथी निश्चय करवो अने पछीथी सेवा करेला निश्चयथी गमे तेवा भोगे पण डगर्बु नहि, दुनियामां त्रण प्रकारमा प्राणीओ मळी आवे छे-अधम, मध्यम अने उत्तमः तेमां जे अधम कोटिना जीवो छ तेओ तो अज्ञान अने मोहनी प्रबळताथी केवळ कायरता धारीने गमे तेवां शक्य कार्य-अनुष्ठानने आदरताज नथी बीजा जे मध्यम कोटिना जीवो छे ते जो के कोइ ज्ञानी पुरुषोनां मुंखथी केइ कार्य-अनुष्ठाननो प्रभाव-महिमा सांभळीने तेनो आदर करे छे खरा, पण ते करतां कई विघ्न आवी पडतां आदरेला कार्य- नो अनादर करी तेने तजी दे छ, अने जे उत्तम कोटिना जीवो होय छे तेओ तो पूर्व महापुरुषोनी पेठे दीर्घ दृष्टिथी हितकारी कार्यने ज निज शक्ति-सामर्थ्यनो पूरतो ख्याल राखीने आदरे छे अने आदरेला कार्यनो प्राणांत कष्ट आव्ये छते पण पूर्णोत्साहथी निर्वाह करे छे. तेओ आदरेला कार्यने गमे तेवा पतिकूळ संयोगोमां अध- वच लटकतुं मूकता नथी. आवा उत्तम पुरुषोनी द्रढ टेक निरखवाने ४२., सूक्त मुक्तावळी. माटेज होय तेम सूर्य अने चंद्रादिक आकाशमां फरता रहे छे, शा- त्रकार कहे जे के सात्विक प्रकृतिना जीवो जेनी स्वीकार करे - जे कार्य करवानो निश्चय करे 2 ते कार्यने पूर्ण करता सुधी तेने निर्वहे छे. तेमनुं संकल्प वळज एई मुद्रह होय छे के गमे तेवां विघ्न -अंतराय मार्गमां आव्या छतां लगारे डग्या वगरं तेओ पोते आद- रेलु कार्य पूरु करी शके छे. तेमनी आवी द्रढ धारणा अथवा टेकथी तमनु सत्व वधारे ने बधारे प्रमाणमा खोलतुं जाय छे. तेथी तेओ गमे तेवां दुष्कर-कठण काम करवा हाम भीडी शके छे अने ते पार पाडे पण छे. साहसिकपणाथी तेओ घणां अगत्यनां काम आद- रीने पार उतारी शके छे, अने बीजा अनेक जीवाने तेमना जीवता दाखलाथी बोध आपता रहे छे. जे जीवो पोतानी छती शक्ति छुपावीने कायरपणु धारी बेसी रहे छे तेओ कशु स्वपर हितरुप कार्य करी शकता नथी पण जेओ निज शक्तिने फारवी तेनो जेम जेम सदुपयोग करता रहे छे तेम तेम तेमने कार्यनी सफलताथी प्रनीति आवती जाय छे के पोते पोताना वीर्य-पुरुषार्थवडे जे कइ कार्य करवा इच्छशे ते कार्य सुखेथी करी शकशे. शास्त्रकार आगळ वधीने कहे छे के तेओज दुनिआमा म्होटा पुरुषरत्नो गणाय छे के जेओ पोते समजपूर्वक आदरेलं अंगीकार करेल गमे ते कार्य अधवच तजी देतां नथी पण तेने पार पहोंचाडवा संपूर्ण श्रम उठावे छे. फक्त ज्यारे लाभने बदले गेरलाभ अथवा हितने बदले अणहित थतुंजणाय त्यारेज पोताना कार्यआग्रहने शिथिल करी नांखे छे. ते वगर तेओ मक्कमपणे स्वकर्तव्य कर्मने बजाच्याज करे छे. ते उपर शास्त्रकारो अनेक दृष्टांत प्रतिज्ञापालन. ४३" बतावी आपी आपणने शक्यारंभमां उत्साहित थवा, हितरुप कार्य आदरखा अने ते करतां नडतां विघ्नोथी डर्या चगर इच्छित कार्यने पार पाडवा उत्तम प्रकारनो वोध आपे छे. देव गुरुनी साक्षीए व्रत नियमादिक समजपूर्वक आदरी लेवा माटेनो शास्त्र उपदेश हितबु- द्धिथीज योजायेलो छे. केवळ आपणी मेळे आदरेलां व्रतनियम पाळवामां शिथिलता थवा पामे अने तेने तजी पण देवामां आवे छनां आदरलां वन नियम पाळवामां-सेववामां आवतो प्रमाद दूर करवा भाग्येज कोइ प्रेरक मळे. पण पंच साक्षीए आदरेलां व्रतनि- यमो पाळवामां ज्यारे शिथिल परिणाम थयेला जोवामां आवे त्यारे तेमां थती शिथिलता दूर करवा प्रेरणा करनारा गुरु प्रमुख मळी आवे अने फरी सावधान थइ आदरेलां व्रतनियमो प्रमादरहित.पा- ळवा शक्तिवान् थवाय. आवो लाभ पंच साक्षीए व्रतनियय आदर-- वामां रहेलो छे. ज्यारे तीर्थंकर देव जेवा समर्थ पुरुषो सिद्ध भगवा- ननी साक्षीए महावत उच्चरे छे त्यारे शुं आपण ए कर्तव्य नथी के शुद्ध देवगुरुनी साक्षीए आपणे पण आदरवा योग्य व्रतनियम आ- दरीने ते बर्षा प्रमाद रहित थइ पाळवां केटलाएक सत्पुरुषो सिंहनी पेरे शुरवीरपणे व्रत नियमो अंगीकार करीने सिंहनी पेरेज शूरवीर- पणे ते बधाय निषि रीते पाळे छे. केटलाएक शीयाळनी पेरे शि- थिल परिणामथी व्रतनियमने आदर्या छतां पाछळथी सद्गुरुना अनुग्रहथी निर्मळ ज्ञान अने श्रद्धानुं बळ मेळवी आदरेलां व्रत निय- मोने सिंहनी पेरे शूरवीरपणे पाळे छ केटलाएक बळी शरुआतमां शुभ वैराग्यादिकना बळ्थी सिंहनी पेरे व्रतनियम आदरे के पण सूक्त मुक्तावळी. पाछळथी विषय सुखनी लालचमां लपटाइने अथवा क्रोधादिक कपायने वश थइने आदरेलां व्रतनियम पाळवामां शियाळनी पेरे केवळ शिथिल परिणामी वनी जाय छे. त्यारे केटलाएक मंद परि. णामी जीवो प्रथमथीज शियाळनी पेरे व्रतनियम आदरीने छेवट सुधी तेवीज मंदता अथवा शिथिलता धारे छे. छेल्लो प्रकार वील- कुल आदरवा योग्य नथी पहेलो अने बीजो प्रकार आदरवा लायक छे, अने बीजो प्रकार पण जेओ मंद परिणामथी व्रत आदरताज नयी ते करनां घणोज चढीआतो छ. केमके शरुआतमां शुभ वैरा- ग्ययोगे व्रतनियम शूरवीरपणे आदरतां ते घणां एक कर्मनो क्षय करी शके छे; आ वधी वात लक्षमा लइ सर्व साधु तेमज श्रावकज- बोए निज निज अधिकार उचित व्रतनियम सिंहनी पेरे आदरी तेनो सिंहनी पेरे शूरवीरपणे निर्वाह करवा लक्ष राखq. प्रतिज्ञा घणा प्रकारनी होय छे, तेम घणी रीते ते प्रतिज्ञा कर- वामां आवे छे. कोइ पण कार्य मनथी, वचनथी के कायाधी करवानी कबुलात आपवी, संकल्प करवो, निश्चय वांधवो ए ते कार्य संबंधी प्रतिज्ञा करी कहेवाय छे. प्रतिज्ञा करी एटले ते कार्य करवुज. पछी जे शरतथी जेटला समये (काळ मर्यादाथी) जेवी रीते करवा कवु- ल्यु होय तेम ते कार्य करवुज जाइए; अने एथीज कोइ पण कार्य करवानी कबुलात थाप्या पहेलां आ कार्य के छ ? करचुं शक्य के के अशक्य छ ? वळी आसपासना स्थिति संयोगो केवा छ ? अनु- कूल के प्रतिकूळ ? ए वधी वात लक्षमा राखबी जाइए. दीर्घदर्शी, विचारशील अने शक्य आरंभने करनार पोतानी आदरेली प्रतिज्ञा प्रतिज्ञापालन. पूरी करी शके छे, अने एथी पण आगळ वधी शके छे. तीर्थकर जेवा समर्थ ज्ञानी पुरुषोना चरित्रोमां प्रस्तावे कहेवामां आव्यु छ के तेओ 'दख्खे दश पइन्ने' एटले डाह्या अने डहापण भरेली म- तिज्ञाने करनारा हता. तेओ जेमतेम जेवी तेवी (पाछळ्थी पोताने वणी कफोडी स्थितिमा लावी मूके एबी गांडी) प्रतिज्ञा करता नहि, अने ग्रहण करेली (निपुणताथी दीर्घदर्शीपणे शक्य जाणीने आद- रेली) प्रतिज्ञाने गमे तेटलो आत्मभोग आपीने पण पूर्ण करता. उत्तम प्रतिज्ञा एवी होवी जाइए. च्हाय तो महा भगीरथ प्रतिज्ञा होय के अल्स प्रतिज्ञा होय. गमे तेवी शुभ प्रतिज्ञाथी लगारे डग्या वगर आदरेली प्रतिज्ञाने पूर्ण करवा पूरतो प्रयत्न प्राणांत सुधी कर्या करवो ए उत्तम कोटिवाळानुं लक्षण छे. मध्यम कोटिवाळा कई पण कार्य विशेष लाभवालं जाणी करवा प्रतिज्ञा ले छे पण उक्त कार्य करतां आवी पडेलां विघ्नोथी डरी जइ ते कार्य पडतुं मूकी दे के. त्यारे जे निकृष्ट कोटिना कायर जनो होय छे ते तो गमे तेवां लाभकारक कार्य संबंधी प्रतिज्ञा करतां पहेलांज कंपी उठे छे. आवा कायर-निबळ मननां माणसो कंइ महत्वनी प्रतिज्ञा करवाने लाय- कज नथी. अन्यना आग्रहथी के दाक्षिण्यतादिकथी कदाच ते कंड शुभ कार्य करवा प्रतिज्ञा करे छे तो ते बहुधा पूरी करी शकताज नथी. जो के गमे ते शुभ कार्य करवा प्रतिज्ञा करीने ते पोतानेज पाळवानी छे, परंतु ग्रहण करायेली प्रतिज्ञार्नु विस्मरण न थाय, कदाच दैवयोगे विस्मरण थर्यु तो तेनु संस्मरण करावी शकाय ए आदि अनेक शुभ हेतुथी पंच साक्षिक प्रतिज्ञा करवा-कराववानो सूक्त मुक्तावळी. , व्यवहार प्रचलिन छे. लौकिक पण महत्वना काम पंच साक्षिक करवां पडे छे तो पछी लोकोत्तर शुभ कार्यनूं कहेवून भुं.१ तेमा तो' 'अरिहंत, 'सिद्ध, साधु, 'शासनदेवता अने प्रतिज्ञा करा- वनार आत्मा' ए पंच साक्षिक प्रतिज्ञा करवामां आवे छे. अने प्रतिज्ञा करनार गुरुने साथे गणतां षट् (छ) साक्षिक प्रतिज्ञा थाय छ. शास्त्र वचनने मान आपी उक्त साक्षि पूर्वक जे शुभ प्रतिज्ञा कर- वामां आवे छे ते पाळवामां घणी सरलता थइ जाय छे अने जे कोइ आप इच्छाथी केवळ आत्मसाक्षिकज प्रतिज्ञा कर छे तेने ज्यारे कर्म- योगे प्रतिज्ञाथी चूकी जवानो प्रसंग आवे छे त्यारे तेने उद्धरनार एटले योग्य टेको आपी पाछो प्रतिज्ञामां जोडनार के स्थिर करनार भाग्येज मळे छे. तेथी कइक जीवो नीचे लबडी पडे छे, ए दोप व्य- वहार मार्गनो अनादर (उपेक्षा) करवाथी प्राप्त थाय छे. तेथी सुज्ञ जनो व्यवहार मानो अनादर करता-करावता के अनुमोदता नथी केमके एम करतां तो व्यवहारनो लोपज थइ जाय अने एथी सर्वज्ञ- आज्ञानी पण विराधना करी कहेवाय. एम होवाथीज जो के सहु आत्माओ सत्ताए समान छे तो पण गुरु शिष्यादिकनो तेमज व्रत पच्चखाणादिक लेवा देवानो पण व्यवहार प्रवर्ते छे, अने ए रीते व्यवहार धर्मर्नु सरलपणे सेवन करतांज आत्मा अनुक्रमे अनादि विषय वासनाने तेमज मिथ्यात्व कषायादिक दोपजाळने छेदी शुद्ध स्फटिक समान निज शुद्ध स्वभावने प्रगट करी शके छे माटे ठीकज कई-हे के- प्रतिवापालन. ४७ “ मारंग अनुसारी क्रिया, छेदे सो मतिहीन; कपट क्रिया बळ जग ठगे, सोभि भवजल मीन." (समाधि तंत्र) ३ “निश्चय दृष्टि हृदय धरीजी, पाळे जे व्यवहार; पुन्यवंत ते पामशेजी, भव समुद्रनो पार. मनमोहन जिनजी!" ए आदिक प्रमाणो निर्दभपणे शास्त्र वचनानुसारे शुद्धा लक्षा पूर्वक शिष्ट जनोए कहो के श्री तीर्थकर गणधर प्रमुखे आचरेलो अने प्ररुपेलो व्यवहार मार्ग स्वहित रुप समजी निष्काम बुद्धिथी सेववा योग्य छ एम पूरवार करे छे. आटलं प्रसंगोपान उपयोग-जा- णीने कही करी मूळ मुद्दा उपर आवशुं. प्रविज्ञा ग्रहण करवाना संबंधमां नीतिशास्त्रमा कहेवामां आव्यु के के “जे कार्य करवू शक्य न होय अथवा तो ते करवा पूरतुं आपणुं वीर्य उत्थान कहो के सामर्थ्य पण न होय तो तेनो आरंभज न करवो ए बुद्धिन प्रथम लक्षण छे अने आरंभेला कार्यनो यथार्थ निर्वाह करवो ए बुडिर्नु चीजें लक्षण छे." मतलब के सहुए यथाशक्ति-स्वशक्ति गोपन्या वगर स्वस्व उचित शुभ कार्य करवाज जोइए. कोइपण कार्य गजा उपरांत करवाथी मूलतः क्षति न आवे एटला माटे उपकारी एवा ज्ञानी पुरुषो आपणने सावचेतपणे हितकार्य करवा शिखामण आपे छ के-जे कार्य परमार्थ समजीने योग्य विधिथी करवामां आवे के ते आपणने परिणामे रसदायी अने लाभदायी-नीरडे के.जे सजनी" , सूत मुक्कावळी. स्वपतिज्ञामा सुदृढ रहे छे तेओ महापुरुपनी पंक्तिमा लेखाय छै. तेमनी प्रसंगे कसोटी पण थाय छे. तेवे प्रसंगेज पोतानी अटल टेक- नी खात्री थइ शके छे. उत्तम कोटिना जनो तो पोतानी प्रतिज्ञामां बहुज अडग रहे छे. खरेखर एओ प्रशंसचा योग्यज छे. आ प्रसंगे कहे उचित छे के नीतिशास्त्रमा तेमज धर्मशास्त्रमा कुशळ होय छे तो स्वोचित प्रतिज्ञा ग्रहण करवामां तथा तेनु काळ- जीथो पालन करवामां कुशलता दाखवी शके छे, अन्यथा ग्रहण कोली प्रतिज्ञामां स्खलना थइ जवानो भय कायम रहे छे. प्रतिज्ञा करवामां जेटला पुरुषार्थनी जरुर के तेथी अधिक पुरुषार्थनी जरुर प्रतिज्ञाने कुशळताथी पाळवामां रहे छे. तेथी जे भव्यात्माओ पोताना पुरुषार्थना उपयोग उपकारी-ज्ञानी गुर्वादिकनी हितशिक्षा अनुसारे करवा तत्पर रहे छे ते स्व उचित प्रतिज्ञाने आदरी सुखे पाळी शके के. अने एम करीने अन्य अनेक आत्मार्थी सज्जनोने उत्तम दृष्टांत- रुप पण थइ शके छे. आपण सहुकोइने एवी सद्बुद्धि अने एवं आत्मवळ प्राप्त थाओ ! छेवटे सत्य (कुशळ) प्रतिज्ञा करीने तेने कुशलताथी पाळनारा पुरुषार्थी 'सज्जनोने आपणो पुनः पुनः नमस्कार !!! उपशमगुण आदरवा आश्री उपदेश. नपशम हितकारी, सर्वदा लोकमाही, नपशम धर प्राणी, ए समो सौख्य नाही; १ संयम धुरनार भने निर्वहनार महा सत्त्वशाळी साध्यादिक.

. ." . उपयमगुण-भादरवा भाभी उपदेशः तप. जप सुरसेवा, सर्व जे आदरे , उपदामविण जे ते, वारि मंख्या करे . # उपशम रस लीला, जासं चित्ने चिराजी, किम नरनव केरी, ऋद्धिमा तेह राजी; गज मुनिवर जेहा, धन्य ते ज्ञान गेहा, तप करी का देहा, शांति पियुख मेहा. २ "उपशम आ लोकमां सर्वदा हितकारी , तेथी हे पाणी! तुं. उपशमने धारण कर. ए समान बीजु कोइ सुख नथी. उपशम विना तप, जप, सुरसेवा एटले देवभक्ति-ऐ सर्व जे आंदरे ते फोगट पाणी वलोवे छे. २१ उपशम रसनी ल्हेजत जेना चित्तमा विराज-- मान थइ होय छे ते प्राणी नरभवनी ऋद्धिमा केम राजी थाय ? जुओ ! गजमुकुमाळ मुनि ! धन्य छ ज्ञानना घर एवा ते मुनिने ! के जेमणे तपे करीने देहने कृश ( दुर्बळ) करी नाखी. अने शांति रुप पियुषंजे अमृत तेनो मेघ (वरसाद) पोताना आत्मामा वर- साव्यो, २२". क्रोधादिक कषायना कटुक विपाक विचारीने ते ते क्रोध, मान, माया अने लोभ थवा पामे तेवां नवळां कारणोथी समजीने दूर रहे, तेवां खोटां कारणोज न सेवां अने तेम छतां के निमित्त पामीने ते-क्रोधादि कषाय उदयमां आवे तो तेमने तरत दवावी, देवा जेथी तेनां माठां फळ-वेसवा, पामे नहि, श्रीमान्-उपाध्यायजी कोष संबंधी पापस्थानकनी समायमां कहे -के- . - सूक्त मुक्तावळी.. 'न होय होय तो चिर नहि, चिर रहे तो फळ छेहोरे, सनन क्रोध ते एहवो, जेहवो दुर्जन नेहोरे.' इत्यादि सूक्त वचनोमां बहु उत्तम रहेस्य रहेलं छे. तेओश्री स्पष्ट जणावे छे के सज्जन पुरुषोने क्रोध (उपलक्षणथी मान, माया अने लोभ ) होय नहि; कदाच केइ प्रशस्त कारणसर तेवो क्रोधा- दिकनो देखाव थवा पामे तोपण ते वधारे वखत टके नहि, तेम छतां तेवाज कारण विशेषथी कंइ वधारे वखत सुधी टकवा पामे तो तेना- थी कशु माहुं फळ तो बेसवा नज पामे, केमके ते कइ प्रशस्त कार- णसर बहारना देखाव रुपेज-अंतरमा सावधानपणुं साचवीने सेवेलो होवाथी तेर्नु अनिष्ट परिणाम आववा पामे नहि. फळ-परिणाम आश्री दुर्जनना स्नेहनी तेने उपमा आपवामां आवी छे ते खरेखरी वास्तविक छे. केमके दुर्जनने खरा स्नेह-राग-प्रेम प्रगटेज नहि- तेनो स्नेह स्वार्थ पूरतोज होय; कदि तेवा स्नेह थाय तो ते अल्प काळज रके, तेम छतां खास तथा प्रकारना स्वार्थने लइने लांवो बखत देखावरूपे तेनो स्नेह जणाय तोपण तेनुं फळ कंइ शुभ परि- णामरुपे थवा पामेज नहि. तेवीज रीते सज्जनाने कूडा क्रोधादि कषाय थायज नहि अने कदाच केइ प्रशस्त कारणसर थवा पामेतो ते कारण पूरतो वखत रही कंइ पण अनिष्ट फळ-परिणाम उप- जान्या वगर जेमना तेम पाछा शमाइ जाय. कषाय वगरनी शान्त त्ति सदा सर्वदा. हितकारीज छे, एवी शान्त वृत्तिनुं सेवन करवा समान बीजु मुख नयी. एम समजी हे मुझ जनो! तमे जरुर शान्त वृत्ति सेवो. एवी शान्त-उपशान्त-प्रशान्त इति वगर जे कंइ तप , उपशमगुण आदरवा आश्री उपदेश. जप प्रभुपूजादिक करणी करवामां आवे छे ते बराबर लेखे थती नथी, परंतु जो ते सघळी करणी समता राखीने स्थिरत्तिथी करवामां आवे छे तो सफळ थडू शके छे. स्थिर-शान्त चित्तथी करवामां आवती करणीमां कोई अपूर्व रस, लहेजत या मीठाश ोय छे. समता रसमां लीन चित्तवालाने कशुं दुख स्पर्शी शकतुं नथी. समता रशमां निमग्न चित्तवंतने सर्वत्र गाम अने अरण्य नेमज दिवस अने रात समान लागे छे. ज्यारे नाना प्रकारना राग, द्वेष अने मोहवश उपजता विकल्पो शमी जाय छे, अने सघळो विभाव या परभाव तजीने सहज स्व- रुपने अवलंबी रहेवाय छे-ए, परिपक्व ज्ञान प्राप्त थाय छे त्यारेज चेतन खरो शमवंत या समतावंत थयेलो लेखाय छे. कर्मनी विचि- त्रताथी थती अवस्थानी विचित्रता तरफ दुर्लक्ष करी शुद्ध स्वरुपना लक्षथी सहु प्राणीवर्गने समान लेखनार समतावंतनुज खरेखर श्रेय थाय छे. उपशमजनित आवी आत्मलीला या सहज सुख समृद्धि जे महानुभाव मुनिजनोने प्राप्त थइ छे तेमनी पासे सुरपति असुरपनि के नरपतिर्नु पौद्गळिक सुख शा हिसाबमा छ ? ते सघळां मुख करतां निरागी अने नि:स्पृही एवा शम साम्राज्यवंत महामुनिओर्नु सुख खरेखर अलौकिकज छे. केमके ए वां उपर जणावेला इन्द्रा- दिकना सुख संयोगिक होवाथी अवश्य वियोगशील होय छे. त्यारे मुनिजनोने प्राप्त थयेल शम-उपशम-प्रशम जनित सहज स्वाभाविक मुखशान्ति अलौकिक अने चिरस्थायी होय छे. तेथीज श्रीमान् उपाध्यायजीए ठीकंज कर्ष के केः- : सूक्र मुक्तावळी.. ' क्षमा सार चंदन रते, सिंचो चित्त पवित्त; दया वेल मंडप तले, रहो लहो सुख मित्त 'देत खेद वर्जित क्षमा, खेद रहित सुखरांज; नामें नहि अचरिज कछु, कारण सरिखो काज.' मुज्ञ जनोए जे जे कारणोथी क्रोधादि कषायनो उदय थाय ते ते कारणोथी अलगा रहेg अने जे जे कारणोथी कषाय उपशान्त थाय तेवां कारणोर्नु सेवन करवू जरुरतुं छे. (गजमुकुमाळादिक महामुनिओनी पेरे.) ज्यां क्रोध प्रगटे छे त्यां तेनो सहचारी मान पण प्रगटे छे अने ज्यां ए क्रोध मान रुप द्वंद्व प्रगट थाय छे त्यां माया अने लोभ ए द्वंद्व पण साथे प्रगटे छे. उक्त चारे कषायना तापथी परितप्त जीवने क्यांय लगारे सुख-शान्तिनी प्राप्ति थइ भकती नथी. एटलुज नहि पण अनेक प्रकारना कुविकल्पोथी तेने भारे अशान्ति रह्या करे के अने तेने वश थइने ते एवां पाप कर्म आचरे छे के जेथी जीवने वारंवार जन्म मरणनां दुःख सहेवां पडे के आवा अनंत असा दुःख उक्त कषायने शान्त-उपशान्त-प्रशा- न करवाची उपशमे छे. तेथी दुःख मात्रनो अंत करवा अने सुख पात्रने स्वाधीन करवा इच्छनारे अवश्य उक्त कपाय मात्रने उपश- गावो देवा जोइए. कपायमात्र शान्त थइ जवाथी विकल्प मात्रनो अंत आवशे, अने सहज निर्वीकल्प समाधिने.पामी परम समतार- समां निमग्न थइ शकाशे, एवो महापुरुषोनो अनुभव छे. तेवा सत्य भाभाविक मुखना अर्थी जनोए पूर्व महापुरुषोना विहित मार्गे

५३
उपशम-सरळतागुणज सर्व गुणमा सारभूत छे.
अवश्य प्रयाण कर जोइए के जेथी निर्विकल्प समाधिजनित परम
समतारसनी प्राप्ति थाय.
उपशम-सरळतागुणज सर्वगुणमा सारभूत छे.
उवसम सार खु सामन्न"-उपशम प्रधानज चारित्र
वखाण्यु छे. अथवा “उपशम सार के प्रवचने" जैनशासनमा
उपशम-निष्कपायतानेज प्रधान गुण तरीके वखाणेलं छे तेथी एं
उत्तम गुणनी प्राप्ति करवी, तेनुं यत्नथो रक्षण करवं, तेमज तेनी
पृष्टि करवी अगत्यनी छे. श्रीमान् उपाध्यायजी समता शतकमां
कहे छे के:-
क्षमा सार चंदन रसे, सिंचो चित्त पवित्त;
दया वेल मंडप तळे, रहो लहो सुख मित्त.
देत खेद वर्जित क्षमा, खेद रहित सुख राज;
तामे नहिं अचरज कछु, कारण सरिखो काज.
भावार्थ-हे भव्य जनो! क्षमा (Tolerance) रुप श्रेष्ठ
चंदन रस तमारा पवित्र चित्तने सिंचो, तेमज दयारुप मनोहर
लतामंडप तळेज रहो अने हे मित्रो! स्वभाविक शान्तिने अनुभवो.
जे भव्यात्मा कइ पण कचवाट विना स्वकर्तव्य समजी सहनशीलता
राखे छे ते अखंड सुखशान्तिनो अद्भुत लाभ मेळवी शके छे. तेमां
कइ आश्चर्य नथी. केमके जो उत्तम कारणर्नु यथाविध सेवन करवाने
आवे छे तो तेथी-उत्तम कार्यज निपजे छे.
कदाच कोइ अज्ञान प्राणी आपणने गालो आपे के एवीज

सूक्त मुक्तावळी. बीजी उन्मत्त माय चेष्टा करे तो तेथी लगारे चित्तने खिन्न थवा देवु जोइए नहि. एम करवाथी पेलो अज्ञान प्राणी छेवटे थाकीने विरमी जशे, जो एवा प्रसंगे क्षमा-शान्ति राखवाने वदले आक- लाश अधीरज व्याकुळता के क्रोधादिक कषाय रुप अशान्ति आदर- बामां आवे तो एथी प्रथम आपणुंज बगडशे अने सामाने पण कशो फायदो थवा पामशे नहि. ज्ञानी पुरुषो तो त्यां सुधी कहे छे के "गाळ देतेने आशिष दइए." एक अग्निरुप थाय त्यारे वीजाए जळरुप थर्बु जोइए. समता रुप जळना प्रवाहथी क्रोधाग्नि तरत शान्त थइ जशे. पण जो प्रज्वलित थयेला क्रोधाग्निमां अधिक इंधन होमवामां आवशे तो तेथी जोतजोतामां म्होटो भडको थशे अने ते कोइ रीते शान्त थवाने बदले अनेक जीवोने अपार हानि करे एवं म्होर्यु रुप पकडशे. तेथीज शास्त्रकार ए क्रोधाग्मिने उपशमावी देवानो उपाय वतावे छ के- क्षमाखड्गः करे यस्य, दुर्जनः किं करिष्यति; अतृणे पतितो वह्निः, स्वयमेवोपशाम्यति." भावार्थ-क्षमारुप साचु अने बलवान् साधन आत्म रक्षार्थे जेनी पासे के तेने क्रोधी दुर्जन शुं करी शके ? कशें करी शके नहि. तृणा- दिक रहित खाली भूमि उपर पडेलो अग्नि आपोआपज बुझाइ जाय छे,तेने बुझववा माटे वीज़ी कशीज महेनत करवी पडती नथी. तेने कशी पुष्टी नहि मळवाथी ते सहेजेज शान्त थइ जाय छे. अने प्रसंगे अद्भुत शान्ति-समता राखवाथी सामा क्रोधी पाणीने पण क्व- चित् भारे पश्चात्ताप प्रगटे छे, अने पोते करेली म्होटी कसुरनो. , उपशम-सरळतागुणज सर्व गुणमा सारभूत छे. ५५ ख्याल करी वखते शुभ मार्गे चढी पण जाय छे. आ रीते साया क्रोधी जीवने, पण जे क्वचित् लाभ थइ शके छे ते तेवे प्रसंग धीर- ज-शान्ति-सहनशीलसा राखवामां आवे छे तेनुं रुटुं परिणाम जां- शवं. आपणा एकान्त हितने माटे ज्ञानी पुरुषो पोकारीने कहे के के:-" खमिए ने खमाविए, साहेलडी रे! ए जिनशासन रीत तो" एनी मतलब एवी छे के आपण छमस्थ जीवोथी कंड ने कंइ कसूर थइ जाय अने तेथी सामा कोइ जीवनी गमे ते कारणे लागणी दुःखाय तो आपणी फरज छे के ते वातनो ख्याल करी पोताथी थयेली कसूर कबुल करी लई, नमृता दाखवी, मीठा वच- नथी पोते करेली भूल माटे माफी मागी लेवी अने फरी एवी भूल जाणीजोइने नहि करूं एम कही सामार्नु मन शान्त कर ए आपणे सामाने खामणां कयों कहेवाय-तेवीज रीते सामा कोइए एवीज कोई कसूर करी आपणी लागणी भावी होय, पछी तेने करेली कसूरनो ख्याल आववाथी ते आपणी पासे उपर जणान्या मुजब माफी मागे सारे बदलामा आपणे पण तेनी माफी आपवी ए आपणी फरज के. एम करवाथी आपणे पण खम्या कहेवाइए. ए रीते क्वचित् कर्मयोगे थयेली कसूर माटे अरसपरस खामणां करवां ए जग जय- बंता जिनशासननी खास रीत-पर्यादा ज छे. ए उत्तम खामणां सफळ त्यारेज लेखाय के के ज्यारे निखा- लस दिलथी नम्रपणे पोते करेली कसूरनी पश्चात्ताप पूर्वक माफी मागी लही फरी तेवी कसूर नहि करवा पूरतुं लक्ष राखवामां आवे के एम करवायीं स्वपरं उभयने लाभ थाय के. अरसपरसाखामा सूत मुक्ताबळी. करता शास्त्रमर्याद लक्षमा राखी लघु घयवाळाए म्होटी वयवाला- बडीलने प्रथम खमावबुं जोइए. लघु वयवाळानु मन एम करवा संकोचा होय तो वडीले लघु वयवाळाने प्रथम समाववा लक्ष रा- खवु. एथो लघु वयवाळो शरमाइने जलदी खामी देशे जे सरल- पणे खमे के अने खमावे हे ते उभय (खमनार अने खमावनार) आराधक कया छे. जे जाणी जोइने खमता के खमावता नथी तेने आराधक कया नथी. सामो माणस क्षमा करे के न करे पण आरा- धक थवा इच्छनारे पोते तो जरुर मान मूकीने निखालसरणे सामा जीवने खमावर्बुज जोइए, जे आ रीते खमावा खमे छ (माफी आपे छे-पोतानो रोप तजी दे ) ते आराधक थइ शके छे अने जे खमतो नयी-रोप राखी रहे छे ते आराधक थतो नथी. एथीन मुक्तिकारे ठीक कयु छे के उपशम गुण सेवनारर्नु सर्वत्र हितज थाय छे. ए सवीजु श्रेष्ठ मुख नथी. ए उपशम गुण वगर जे कई तप जप प्रमुख कठण करणी करवामां आवे छे ते सर्व निष्फळ प्राप्त थाय छे, अने उपशम भावपूर्वक जे कइ धर्म करणी करवामा आवे छे ते सघळी परम हितकारी थाय छे. जेणे उपशम रस चाख्यो छे तेने बीजां राजऋद्धि प्रमुखनां सुख निरस लागे छ, अने तेथीज म्होटा चक्रवर्ती प्रमुख विशाळ ऋद्धिवाळा पण पोताने प्राप्त थयेला राज्यादिक सुखने तृणवत् तजी दइ शम साम्राज्यने आपनारुं चारित्र अंगीकार करी तेने सेवे छे. जेमने परम उपशम - भाव प्रगटे छे ते गजसुंकुमाळ, मेतार्यमुनि अने खंधकमुनिनी पैरे माणान्त कष्ट आन्ये छते पण,परम प्रान्तिमा झीली रहे छे. तेओ

५७
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त्रिकरण शुदि साचबवा हितोपदेश,
देहनी कशी दरकार नहि करतां एक उत्कृष्ट समतानेज सार लेखे
है. परम क्षमावंत श्री अरिहंतादिकनां पवित्र चरित्रने अनुसरी
उत्तम जनोए निर्मळ ज्ञानदृष्टिथी क्रोधादिक दोषोने दर करी उपशम
प्रमुख उत्तम गुणनो आदर करवा सदाय उजमाळ रहेवु उचित छे.
त्रिकरण शुद्धि साचववा हितोपदेश.
जगजन सुखदाई, चित्त एवं सदाई,
मुख अति मधुराई, साच वाचा सुहाई;
वपु परहित हेते, त्रण्य ए शुद्ध जेने,
तप जप व्रत सेवा, तीर्थ ते सर्व तेने. २३.
मन वच तनु त्रण्ये, गंग ज्युं शुद्ध जेने,
निज घर निवसंतां, निर्जरा धर्म तेने;
जिम त्रिकरण शुद्ध, द्रौपदी अंब वाव्यो;
घर सफळ फळंतो, शीळधर्म सुहाव्यो. २४
आखी आलमने सुखरुप थाय एषु उत्तम भावनामय जेर्नु
चित्त सदाय वर्ते छे, सहुने हितरुप थाय एवी मिष्ट-मधुरी वाणी
जेना मुखमाथी नीक छे, अने पर हितकारी कार्यामां जेनी कायां
सदाय प्रवत छे, ए रीते जेनां मन वचन अने काया एत्रणे वानां
शुद्ध-पवित्रपणे प्रवर्ते छे तेने सघळां तप, जप, व्रत, पूजा अने.
नीर्थसेवा सहेजे फळे छे. अर्थात् ए बधाय मुंकतोनो लाभ तेने

सुक्त मुक्तावळी. 'कुवलय सुरभाइ, इक्षुमां ज्युं मीठाइ, कुळज' मनुष्य केरी, त्युं सुभावे भलाइ. २५ जिण घर वर विद्या, जो हुवे तो न ऋद्धि, जिणघर दुय लाभे, तो न सौजन्य वृद्धि सुकुळ जनम योगे, ते त्रणे जो लहीजे, अभयकुमर ज्युं तो, जन्म साफल्य कीजे. २६ जेम स्वाभाविक रीतेज शंखमां श्वेतता-उज्वळता होय छे, अमृतमां मिष्टता-मधुरता होय छे, चंद्रमा शीतळता होय छे, कम- ळमां खुशबो-सुगंध होय छे, अने शेलडीमां मीठाश होय छे तेम मुकुळमां उत्पन्न थयेला-कुलीन मनुष्योमा सहज स्वभावे ज भला- इ-हितस्विता या चित्तनी उदारता होय छे. कदाच कोइने सद्- 'विद्या प्राप्त थइ होय छे तो तेने द्रव्यसंपत्ति (लक्ष्मी) होती नथी, अने कदाच दैवयोगे ते बने मळ्यां होय छे तो सज्जनतानी खामी होय छे, एटले विनय, विवेकादिक गुण होता नथी. परंतु उत्तम कुळयोगे जो ए त्रणेवानां प्राप्त थइ शके तो अभयकुमारनी पेरे 'मानव भवनी सफळता थइ शके छे. मतलब के सद्विद्या, संपत्ति अने सज्जनता ए सहु वानां उत्तम कुळयोगे प्रायः सहेजे लाभी शके छे. तेमां पण सज्जनता (भलाइ) वगरनी विद्या अने लक्ष्मी , १ कमळ २ शेरडीमां.३ कुळमां उत्पन्न थरल , बंने वाना. (विद्या ने लक्ष्मी) विनयगुण- सेवन करवा बिपे हितोपदेश. . . . ११ लगमग नकामी छे, स्वंपर हितरुप थती नथी, पण उलट्री अनर्थ- दायी नीवडे के. ते भलाइ या सज्जनता मुख्यपणे उत्तम कुळमांज लाभे छे. केमके उत्तम कुर्नु ए खास लक्षण लेखाय छे. सज्जनता एज खरेखर सुकुळ- भूषण गणाय छे. अने सज्जनता योगेज खरी कुलीनता लेखी शकाय छे. सज्जनता योगेज विनय विवेकादिक गुणो आवे छे अने तेनावडेज प्राप्त थयेली विद्या अने लक्ष्मीनी सार्थकता थइ शके छे, माटेज सजनतावालं सुकुळ वधारे.प्रशंसनीय छे. अने एना प्रभावथी अनेक प्रकारनां स्वपरहितनां कार्यों करी शकाय छे. विनय गुण- सेवन करवा विषे हितोपदेश. निशिविण शशि सोह, ज्यु न सोळे कळाइ, विनयविण न सोहे, त्युं न विद्या वडाइ3B विनय वहि सदाइ, जेह विद्या सहाइ, विनयविण न कांइ, लोकमां उच्चताइ. विनयगुण वहीजे, जेहथी श्री वरीजे, सुरनर पति लीला', जेह हेला लहीजे; परतणय* शरीरे, पेसवा जे सुविद्या, विनयगुणथी लाधी, विक्रमे तेह विद्या. २८ १ लक्ष्मी. २ संपत्ति ३ उतावळा. ४ पारका.

६२ सूक्त मुक्तावळी. जेम रात्री वगर चंद्र सोळे कळाए संपूर्ण होय तेम छतां शोभे नहि-शोभा पामे नहि, तेम गमे तेवी अने गमे तेटली विद्या आर- डती होय पण नम्रता गुण वगर ते शोभे नहि. विनय गुणवडे मेळवेली विद्या सफळ अने सहायरुप थाय छे, अने विनय वगर लोकमां लाज-प्रतिष्ठा के आवरु वधती नथी. विनय गुणवडे आ- लोक संबंधी अने परलोक संबंधी लक्ष्मी-लीला प्राप्त थइ शके छे. विनय गुणथी निःस्पृही महात्मा पुरुषो पण प्रसन्न थइ विनीत- शिष्य उपर तुष्टमान थाय छे. विक्रमादित्ये जे परशरीरप्रवेश विद्या प्राप्त करी अने नागार्जुने जे आकाशगामिनी विद्या प्राप्त करी ते विनय गुणनोज प्रभाव जाणवो. विनय गुणवडे गमे तेवो कट्टा शत्रु पण वश थइ जाय छे. विनय ए एक अपूर्व वशीकरण लेखाय छे. ते माटे ठीकज कयु छ के- मृदुता कोमल कमलथे, वज्रसार अहंकार, छेदत है एक पलकमें, अचरिज एह अपार' तेनो भावार्थ ए छेके मृदुता-नम्रता-लघुता-विनय गुण कमळ जेवो कोमळ छे अने अहंकार-अभिमान वज्रवत् कठण छे. तेम छतां एवा कठण अहंकारने पण एक पलकमां विनयगुण गाळी नाखे छे ए अपार आश्चर्यजनक वात के. सपळा गुणानु मूळ विनय छे. तेथी धर्म पण विनय मूल को के.विनय योगेज विद्या विवेक अने समकित रत्ननी माप्ति थाय के अने तेना प्रभावेज चारित्रनी अने छेवट मोक्षनी पण प्राप्ति याय छे.

, सदविवेक प्राप्त करवा हितोपदेश. ६३ मातापितादि वडील वर्गनो, विद्यागुरुनो, शुद्ध देव गुरुनो अने श्रीसंघ-स्वधर्मीवधु प्रमुखनो यथायोग्य विनय भक्तिबहुमानादिक- बंडे अवश्य साचववो जोइए. सद्विवेक प्राप्त करवा हितोपदेश. १४ विवेक. हृदयघर विवेके, प्राणी जो दीप वासे, सकळ भवतणो तो, मोहअंधार नासे; परम धरम वस्तु-तत्त्व प्रत्यक्ष भासे. करमभर पतंगा, स्वांग तेने विधंसे. विकळ नर कहीजे, जे विवेके विहीना, सकळ गुणभर्या जे, ते विवेके विलीना, जिम सुमति पुरोधा, भूमिगेहे वसंते, युगति जुगति कीधी, जे विवेके उगते. ३० जो हृदयरुपी घरमां विवेकरुपी रत्नदीपक जगाववामां आवे तो भवभ्रमण करावनार-संसारअटवीमां अरहापरहा अटवावनार मोहअंधकार रकी शके नहि, अने जे कंइ अलख अने अगोचर तत्त्व-चस्तु नरीआंखे नजरे आवती नथी ने परमतत्त्व प्रत्यक्ष जोइ १ पुरोहित. २ मोयरामां.

६४ मुक्त मुक्तावली. शकाय, तेमज समस्त कर्मसमूह समूळगो नष्ट थइ जंवा पामे. सद्- विवेक कळा वगर गमे तेवा अने गमे तेटला गुणवाळो जीव विकळ कहेवाय छे अने जेनामां सद्विवेक कळा खीली रही छे ते संपूर्ण- गुणवान् लेखाय छे..शास्त्रकार ठीकज कहे छ के- 'रवि दूजो तीजो नयन, अंतर भावी प्रकाश; करो धंध सब परिहरी, एक विवेक अभ्यास.' तेनो एवो भावार्थ के के सदविवेक ए. एक बीजो अपूर्व सूर्य अने अपूर्व लोचन छ, केमके एथी शुद्ध प्रकाश मेळवी तेवढे अंतर- घटमां जे जे दिव्य वस्तुओ (सद्गुण रत्नो) विद्यमान छे, तेनुं यथार्थ भान थाय छे. अने तेनी द्रढ़ प्रतीति आवे छे. पछी अज्ञान तथा मिथ्यात्व अंधकारजनित भ्रान्ति टली जाय के अने निर्मळ ज्ञान अने श्रद्धारुप दिव्य नयनयुगल प्रगट थाय छे. एवो अपूर्व लाभ सद्विवेक जागवाथी मळे छे. माटे शास्त्रकार कहे छे के हे भव्य जनो! नमे अन्य दिशामां तमारा पुरुषार्थनो जे गेरउपयोग करी खुवार थायोछो त्यांची निवर्तीने सद्विवेक जागे एवा, विहित- मार्ग तमे पुरुषार्थ करो. परमतत्त्व पामेला शुद्ध देवगुरुर्नु शरण ग्रहो अने तेमां एकनिष्ठ रहो, तेमनीज आज्ञा अंगीकार करो. : विद्या संपादन करवा विषे हितोपदेश. १५:विद्या. अगम मति प्रयुंजे, विद्यये कोण गंजे, . रिपुदळ बळ भंजे, विद्यये विश्वरंजे . r , - विद्या संपादन करवा विषे हितोपदेश. धनथी अखंयविद्या, शिख एणे तमासे, गुरुमुख भणी विद्या, दीपिका जेम भासे. सुरनर सुप्रशंसे, विद्यये वैरी नासे, जग सुजस सुवासे, जेह विद्या उपासे; जिणकरी नृप रंज्यो, भोज बाणे मयूरे, जिणकरी कुमरिंदो, रीझव्यो हेमसूरे. ३२ श्री विनय गुणवड़े गुरुर्नु दील प्रसन्न करीने विद्या मेळवी होय छे तो ते मेळवेली विद्या सफळ थाय के, तेवडे मति निर्मळ थाय छे अने तेथी अगम वात पण मुखे समजी शकाय एवी सुगम थइ पडे छेसूक्ष्मबुद्धिना प्रभावथी कोइ पराभव करी शकतुं नथी. शत्रुनी सेनानुं बळ तेना उपर चालतुं नथी पण ते उलटुं निवळ- नकामुंथइ जाय छे. विद्याना वळथी सहुकोइ रंजित थइ फीदा थाय छे, पैसानुं वळं विद्याना वळ पासे कांइ विसातमा नथी. विद्यानुवळ अ- खूट छे, तेथी पैसानो लोभ तजी, मिथ्या माया ममता मूकीने अक्षय विद्या मेळववा उद्यम करो. जो विद्वान् गुरुनी पासेथी विनय सहित अखूट विद्या मेळवशी तो ते तमने खरेखर मार्गदर्शक थशे अने अन्य अनेक जीवोने पण आलंबनरुप थइ शंकशे विद्याना बळ्थी देवता- ओ तथा मनुष्यो खुब प्रशंसा करे छ, तेनाथी वैरीलोको दूर भागे के अने आखी आलममा तेनो यश-डंको वागे छे. एवो अतुल प्र- भाव विद्यामाप्तिनो छे. जुओ! ए विद्याना प्रभावथीज वाण अने सूक्त मुकावळी. मयूर कविए भोजराजाने रंजित कों हतो अने श्री हेमचंद्रसूरीश्वरे कुमारपाळ भूपाळने रीझव्यो हतो अने अनेक परोपकारनां काम कया-कराव्यां हता. तेथीज शास्त्रकारे विद्याबळने घणुंज वखाण्यु के. सर्व विद्यामां आत्म-अध्यात्मविद्या शिरोमणिभूत छे. ए विद्यानी उपासनाथी अंते दुःखमात्रनो अंत करी अक्षय अव्याबाध एवं मोक्ष- सुख मेळवी शकाय छे. परोपकार करवा हितोपदेश. १६ उपकार. तन धन तरुणाइ, आयु ए चंचळा छे, परहित करी लेजे, ताहरो ए सगो छ, जब जनम जरा ज्यां, लागशे कंठ साही, कहेने तिणसमे तो, कोण थाशे सहाइ. ३३.. नहि तरु फळ खावे, ना नदी नीर पावे, जस धन परमार्थ, सो भलो जीव जीवे; नळ करण नरिंदा, विक्रमा राम.जेवा, परहित करवा जे, उद्यमी दक्ष तेवा. ३४ हे भव्यात्मा ! आ शरीर, लक्ष्मी, यौवन अने आयुष्य सपळा आणविनाशी है, जोत जोतामा खुटी जाय छे तेथी तेमनी ए-पकडशे. ९ परोपकार करवा हितोपदेश. उपर मोह-ममता करी विश्वास राखी बेसी रहेवार्नु नथी. आ समये सघळी अनुकूळ सामग्री पाम्यो हुं तेने सफळ करी लेवानी छे, तेने एळे गुमावी देवी जोइती नथी. त्हाराथी बनी शके तेटलं परहित-परोपकार करीलेवा विलंब करीश नहि. ज्यारे जरा आवी पहोंचशे अने जालम जमर्नु तेथु आवशे ते वखते हे भोळा ! त्हारी सहाये कोण आवशे ? वळी ते वखते तुं शुं करी शकीश ? अथवा दव बळे त्यारे कूवो खोदवो शा कामनो ? ते माटे शास्त्रकारे ठीकज कडं छे के-'ज्यांमधीमां जरा आवीने पीडे नहि, विविध व्या- घिओ वधीने घेरी ले नहि अने इन्द्रियो क्षीण शक्तिवाळी थइ जाय नहि त्यां सुधीमां ओ भद्रक! त्हारुं हित-श्रेय-कल्याण थाय तेवु- तेटलं करी ले-भूलीश नहि.' जो ! आम्रादि वृक्षो पोतानी शीतळ छाया अने अमृत जेवां मीठां फळ आपी केवो-केटला लोकोपकार करे ले ? तेमज गंगा जेवी नदीओ पोतानां निर्मळ नीर अढळक रीते आपी केटली परोणागत करे ? जेओ आ मानवदेहादिक रुडी सामग्री पामीने तन मन अने धनथी परमार्थ साये-नि:स्वा- र्थपणे परहित करे छे तेओज स्वजीवन सार्थक करे छे. पूर्वकाळमां जे जे नळ, कर्ण, विक्रम, राम अने युधिष्ठर जेवा सात्त्विक पुरुषो साविकपणे प्राप्त सामग्रीनो सदुपयोग करे छे, तेमनां पवित्र चरि- त्रने लक्षमा राखीने जो तुच्छ स्वार्थवृत्तिने तजी निःस्वार्थपणे तन मन अने धनथी परहित-परोपकार करवामां आवे छे तो तेथी स्व मानवजीवन सार्थक करीने अलौकिक सुखसमृद्धिने स्वाधीन करी अंतें अक्षय अनंत मोक्षपद पमाय छे.. , , दुःखसमय सूक्त मुक्तावळी. सद् उद्यम-पुरुषार्थ सेववा माटे हितोपदेश. १७ उद्यम. स्यणनिहि तरीने, उद्यमे लच्छी' आणे, गुरुभगति भणीने, उद्यमे शास्त्र जाणे; सहाइ, उद्यमे छे भलाइ, अति अळस तजीने, उद्यमे लाग माइ. ३५ नृपशिर निपतंती, वीज झात्कारकारी, उद्यम करी सुबुद्धि, मंत्रीए ते निवारी; तिमि निजसुत केरी, आवती दुर्दशाने, उद्यम करी निवारी, ज्ञानधर्म प्रधाने. उद्यमवंत लोको हिमत धरी योग्य साधन भेळवी दरीओ खेडीने पुष्कळ लक्ष्मी कमाइ लावे छे. तेमज उद्यमवंता शिष्यो वि- नयगुणवडे गुरुने प्रसन्न करीने अखुट शास्त्र (ज्ञान) धन पाप करी शके छे. आपत्तिसमये उद्यम ए एक अच्छो सहायकारी मित्र थाय छ, अने उद्यमवडे आवी पडेली आपत्तिने उल्लंघी वीजा, पण भलु करी शकाय छे, एम समजी आपदा आपनारुं आळस दूर करी नांखीने एक सुखदायक एवा उद्यमनोज आश्रय लेवोजोइए. उद्यमवडे ज आपणे उदय पामी शकीशुं. जेम सुबुद्धि मंत्रीए बुद्धिव- १ लक्ष्मी.

. AM n दानधर्मनो प्रभाव.. कथी विचारपूर्वक उद्यम करीने पोताना स्वामी-राजा उपर आवती आपदा दूर करी हती अने ज्ञानधर्म प्रधाने पोताना पुत्रनी उपर आवती दुर्दशाने योग्य उद्यमवडे निवारी हती. एथी सद् उद्यमनी प्रधानता सिद्ध थाय जे. वळी का छे के-'उद्यमेन हि सिध्यन्ति, कार्याणि न मनोरथैः उद्यम करवावडेज खरेखर कार्यसिद्ध थाय छे, केरळ मनोरथ करवा मात्रथी ते सिद्ध थता नथी. केटलाक आ- कसु लोको बोले के के भाइ ! नसीबमा हसे तोज अथवा भावीभाव (भवितव्यता वळवान्) हशे तोज कार्य बनशे तेनुं समाधान ए छे के उद्यम कर्या छतां धारेलू इष्ट कार्य थइ न शके तो पछीज भवि- तव्यताने के नसीबने दोष देवो योग्य (परिपक्व) काळ, स्वभाव, नियति (भवितव्यता), पूर्वकृत कर्म अने उद्यम ए सघळां कारणो मळतां कार्यनी सिद्धि थाय छे, तोपण तेमां उद्यम करखो आपणे आधीन छे अने वीजां कारणो ज्ञानीगम्य छे. उद्यम करवाथी बीजा वधाय कारणो मळ्यां छे के केम तेनी खात्री थइ शके छे तेथीज आपण छद्मस्थने उद्यम विशेषे आदरवा योग्य छे. माटे ज कहे छे के “ Try try and try, एटले उद्यम करो,. उद्यम करो, उद्यम अने - As you will sow so you will reap' एटले तमें जेवू वावशो एबुंज लणशो. १८ दानधर्मनो प्रभाव. थीर नहीं धनराख्यो, तेम नांख्यो न जाये, इणिपरे धन जोतां, एक गत्या जणाये; " 4 , .

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७०
सूक्त मुक्तावळी.
इह सुगुण सुपात्रे, जेह दे मक्ति भावे,
निधि जिम धन आगे, साथ तेहीज आवे.
नळ बळि हरिचंदा, भोज जे जे गवाये,
प्रह समय सदा ते, दान केरे पसाये;
इम हृदय विमासी, सर्वथा दान दीजे,
धन सफळ करीजे, जन्मनो लाह लीजे. ३८
भावार्थः-लक्ष्मीनो एवो चपळ स्वभाव के के ते एकज
स्थळे लांबो वखत टकी रहे नहि, तेम छतां लक्ष्मी उपरनो मोह
पण एटलो बधो भारे जीवने लागेलो होय छे के तेने हाथे करी
छोडाय पण नहि एटले के ज्यां सुधी लक्ष्मी देवी सुप्रसन्न होय त्यां
सुधी समजीने तेनो मोह तजी तेने सत्पात्रे खर्ची पण शके नहि. ए.
वात पण एटलीज स्पष्ट छे. जो के कृपणता दोषथी लक्ष्मीनो सदु-
पयोग करी शकातो नथी पण तेनो संवैध तो सयौं होय एटलोज
वखत रहे छ, पछी तेनो वियोग थाय ज छे. च्हायतो कृपणदास
परलोक सवावे तेथी के तेना पुन्यनो क्षय थयो होय तेथी लक्ष्मीनो
संबंध तुटे छेज. आम समजीने जे सुज्ञजनो उदार दीलथी मळेली
लक्ष्मीने सुपात्रे आपी तेनो ल्हावो ले छे तेमने तेथी अनेक गुणी
लक्ष्मी अन्य भवमा सहेजे आवी मळे छे. तेमने कशी वावनो तोटो
रहेतो नथीज. नळराजा, बलिराजा, हरिचंद्र अने भोजराजा प्रमुख
१ लाहो-लाभ.
.

दानधर्मनो प्रभाव. ७१ जे जे पुन्यश्लोक (प्रशनीय) पुरुषोनु प्रभातमा नाम लेवामां आवे के ते दानधर्मनाज प्रभावे. एम समजी विवेक आणी उदार दीलथी अनेक प्रकारे दान दइ निज द्रव्यसंपत्तिने सार्थक करी आ दुर्लभ मानव भवनो लाहो लेवो जाइए. जे तेम करवामां प्रमाद करे के तेमने पाछळथी पस्तावु पडे छे. ज्ञानी पुरुषोए अनेक प्रकारना दा- नमां अभयदान, सुपात्रदान, अनुकंपादान, उचितदान अने कीर्ति दान ए पांच मुख्य दान कह्या छ जेमांना प्रथमना वे मोक्षदायक के अने पाछळना त्रण दान भोगफळने आपे छे. निस्वार्थपणे योग्य पात्रने यथाअवसरे दान देवाथी अमित-अपार लाभ मळे छे. दान देतां संकोच, अनादर, अनुत्सार, खेद, अविश्वास प्रमुख दोषो अवश्य वर्जवा योग्य छे अने उदारता, आदर, उत्साह, अनुमोदन, प्रमोद हर्ष अने फळश्रद्धा प्रमुख भूषणो सेबवा योग्य छे. कुपात्रने पोषवाथी लाभने बदले हानि थाय छे अने सुपात्रने पोषवाथी भारे लाभ मळे छे. ते गाय अने सर्पने द्रष्टान्ते समजी शकाय एम छे. गायने केवळ घास-चारो नीरवामां आवे छे तो- पण तेना बदलामां ते अमृत जेवू दूध आपे हे अने सर्पने दुध पा- वामां आवे छे छतां ते दूध पानारना पण जीवितनो अंत करे छे. काची माटीना पात्र जेवा नजीवा हलका पात्रमा दान देवाथी दी- घेली वस्तु अने पात्र बने विणसे छे, तथा दाताने पाछळ्थी पश्चा- तापज करवानो वखत आवे छे एम समजी दाताए पात्रापात्रनो विवेक कर्तव्य छे. ज्ञानदान, सम्यक्त्वदान अने चारित्रदान सर्वो- चमके; परंतु जो ते परीक्षापूर्वक योग्य पात्रनेज देवामां आवे है ७२ सूक्त मुक्तावळी. , तो अनंत लाभफळने आपे छे. अन्यथा तो ते अस्थाने अपायाथी शस्त्ररुप थवा पामे छे. जेथी जीवने वस्तुस्वरुपर्नु यथार्थ भान थाय, तेनी द्रढ प्रतीति थाय अने परिणामे आचार विचारनी शुद्धि थ- बाथी चारित्र निर्मळ थाय, जेथी जीव सकळ कर्म बंधनथी-जन्म भरणना फेरामांथी मुक्त थइ शाश्वत सुखनो भागी थइ शके तेज ज्ञान, श्रद्धा अने चारित्रथी श्रेष्ठ दान वीजुं कयु होइ शके ? एवा उत्तम दानना दाता तीर्थंकरो, गणधरो, आचार्यवरो, उपाध्यायो अने संत सुसाधुजनो खरेखर धन्य कृतपुण्य छे. एवा उत्तम पा- त्रोने निर्दोप अन्न पानादिकाडे पोपनार सुश्रावक जनोने पण धन्यवाद घटे छे. केवळ मोक्ष माटेज देनार अने मोक्ष माटेज लेनार ए वनेनी सद्गतिज थाय छे. ए उपरान्त दीन, दुःखी, अनाथ जनोने योग्य आश्चय आपनार गृहस्थजनो पण भवान्तरमा सुखी थाय छे. अरे ! सीदाता स्वजनोने योग्य सहाय आपीने उद्धरनार अने इष्ट देव गुरु प्रमुख पूज्यननोनी स्तुति करनाराने संतोषनार पण सुखी थाय छे अने यश पामे छे. १९ शील धर्मनो प्रनाव. अशुभ करम गाळे, शीळ शोभा दीखाळे, गुणगण अजुवाळे, आपदा सर्व टाळे तस नर वहु जीवी, रुप लावण्य देइ, : परभव शिव होई; शीळ पाळे जी केइ. ३९ . . .

शील धर्मनो प्रभाव.. ७३ १ . इण जग जिनदाल-श्रीष्टि शीळे सुहायो, तिम निरमळ शीळे, शीळ गंगेव गायो; कळि करण नरिंदा, ए समा छे जिकेइ, परभव शिव पामे, शीळ पाळे तिके इ. ४० भावार्थ:-जे सुज्ञजनो शुद्ध आचार विचारनुं सेवन करी स्वपर हित साधे छ, स्वस्नीमां संतोषवृत्ति धारी परस्त्रीने माता तुल्य अने स्वपतिमां संतोष धारी परपुरुषने पिता तुल्य लेखे छे, तेमज पर द्रव्यने पथ्थर तुल्य अने सर्व कोइ प्राणी वर्गने स्वात्म तुल्य लेखे छे ते उत्तम भाइ व्हेनो निर्मळ शील शोभाने धारे छे; संतोष- वृत्ति बडे दुष्ट विषयवासनाने मारी आत्माना स्वाभाविक गुणोने प्रगटाने छै; अने प्रारब्ध योगे आवी पडेली सकळ आपदाने नि- वारी शके छे. बळी तेओ निजवीर्य संरक्षण बडे दीर्घायुषी बने छ रुप लावण्यादिक शुभ शारीरिक संपत्तिने पामे छ; अने अंते सकळ कर्म उपाधिने टाळी अजरामर पदवीने पण पामे छे. आ जगतमा निर्मळ शीलधर्मना प्रभावे जिनदास श्रेष्ठी, सुद- र्शन श्रेष्ठी अने गांगेय प्रमुख निर्मळ यशोवादने पाम्या छे. तेमज विजय शेठ अने विजया शेठाणी जंबूकुमार, स्थूलभद्रजी, वज्रस्वा- मीजी, अने ब्राह्मी, सुंदरी प्रमुख कइक सताओ अने सतीओ शीलनी खरी कसोटीमाथी पसार थयेल छ, तेमनी पेरे जे निर्मक शीलं पाळे छे ते सकळ आपदाने वमी अंते अक्षय सुख पामे छे. १ गांगेय-भीष्म पितामह. , ७६ सूक्त मुक्तावळी. तेथी शास्त्रकार ठीक ज कहे छे के 'तपना प्रभाव बडे सर्व कंइ कामना सुखे सिद्ध थाय छे. जे कइ दूर, दुराराध्य अने देव- ताने पण दुर्लभ होय छे ते सघल्लं तपना प्रभावे समीपगत, सुसाध्य अने पाम, सुलभ थाय छे. दुष्कर तपर्नु तेज कोइनाथी सही श- कातुं नथी: जीती के पराभवी शकातुं नथी. जे तप निराशंसभावे ( निष्काम वृत्तिथी-निस्पृहताथी) सशास्त्र करवामां आवे छे ते तप सकळ कर्ममळने वाळी नांखी आत्म-सुवर्णने शुद्ध निर्मळ करी शके छे. समता सहित तप निकाचित कर्मने पण बाळी नांखे छे. उपवास, छट्ट, अष्ठमादि वाद्य तप करवानो हेतु, निज दोपर्नु शो- धन करी विनय, वैयावच्च, स्वाध्याय, ध्यान अने ममता त्याग करवा रूप अभ्यंतर तपनो लाभ भेळपवानो छे. कारण वडेज कार्य नीपजे छे. इन्द्रियादिकर्नु दमन करवा वडेज वाह्य तपनों अने बाह्य तप वडे ज अभ्यंतर-तपनो लाभ मळी शके छे ते वडेज कर्मनी निर्जरा-कर्मक्षय थाय छे अने ते वडेज जन्म मरण रहित मोक्ष पद प्राप्त थाय छे. एम समजो सुज्ञ भाइ बहेनोए उक्त प्रभावशाळी तप सेववा अधिक आदर करवो युक्त छे. २१ भाव धर्मनो प्रभाव, मनविण मळवो ज्यु, चाववो दंत हीणो; गुरुविणं भवो ज्युं, जीमवो ज्युं अलुणो', . 4 . १ लूण विना.

भाव धर्मनो प्रभाव. ७७ - जसविण बहु जीयी, जीव ते ज्युं नं सोहे, तिम धरम न सोहे, भावना जो न होहे. ४३ भरतनृप इलाची, जरिण श्रेष्टि भावे, वळी वलकलचीरी, केवळज्ञान पावे; हळधर' हरिणो जे, पांचमे स्वर्गे जाये, इहज गुण पसाये, ताल निस्तार थाये. भावार्थ:-जेम मन बगर मळवू, दांत वगर चाव, गुरुगम वगर भणवू, अलूणुं धान जमवू, अने जश वगर घणु जीवq ए शोभतुं नथी तेम हृदयना भाव वगर धर्म पण शोभतो नथी. हृद- यनी साची भावनाथीज भरतमहाराजा आरीसाभुवनमा निज स्वरुप अवलोकन करता करतां निर्मळ केवळज्ञान पाम्या हता. इलाचीकुमार वंशाग्रे चढी राजाने रीझववा नाटक करतां करतां समीपस्थ घरमां गोचरी वहोरवा पधारेला स्वरुपस्थ मुनिना अपूर्व दर्शन बडेज स्वदोष देखी-समजी अपूर्व वीर्योल्लासथी त्यांज रह्या सता केवळज्ञान पाम्या इता. जीरण शेठ वीर प्रभुने चार मास पर्यंत प्रामुक आहार पाणीनी लाभ देवा माटे प्रतिदिन, विनंति करता अने पारणाने दिवसे श्री वीर प्रभु जरुर लाभ आपशे एम समजी प्रभुनी राह जोतो हता. १ बळभद्र-वळदेव.

सूक्त मुक्तावळी. संपूर्ण शीलांग रथना धोरी तो पंच महाव्रतधारी संत-सुसा- धुजनो गणाय छे. आहार, भय, मैथुन अने परिग्रह रुप चार संज्ञाने. जीती लइ, रसना (जीम) आदिक पांच इन्द्रियोने बरावर नि- यममा राखी क्षमा, मदुता (नम्रता), ऋजुता (सरलता), संतोष- वृत्ति, इच्छानिरोध (तप), संयम, शौच (मनःशुद्धि), निःसं- गता-निस्पृहता, अने ब्रह्मचर्य रुप दशविध यति-धर्मनी शिक्षाने यथार्थ धारण करी जे महाशयो मन वचन कायावडे त्रस स्थाव- रादि दश जीवभेदो पैकी कोइ पण प्रकारना जीवोनी हिंसा करता, करावता के अनुमोदता नथी, तेभोज खरेखर संपूर्ण (४४५४१० x१०४३४३) १८००० शीलांग रथना धोरी लेखावा योग्य छे. तेम बनी न शके तो गृहस्थाश्रममा रहीने पण जे शुभाशयो, स्वपति पत्नीमां संतोष राखी, पूर्वोक्त आचारने यथाशक्ति आदरे छे अने शीलधर्मने पोताना प्राण करतां प्रिय लेखी गमे तेवा विकट संयोगो वच्चे पण पाळे छे ते भव्यात्माओ अनुक्रमे आत्म उन्नति साधी जन्म मरणनां दुःखथी मुक्त थइ शके छे. ० तप धर्मनो प्रनाव. तरणी' कारणथी ज्यु, सर्व अंधार जाये, तप करी तपथी त्युं, दुःख ते दूर थाये; वळी मलिन थयुं जे, कर्मचंडाळ तीरे, किम तनु न पखाळे, ते तप वर्णनीरे. ४१ १ सूर्य. २० तप धर्मनो प्रभाव. १ तप विण नवि थाये, नाश दुष्कर्म केरो, तप विण न टळे जे, जन्म संसार फेरो; तप बळे लही लब्धि, गौतमे नांदिषेणे, तपबळे वपु कीg, वीष्णु वैक्रिय जेणे. ४२ भावार्थ:-जेम सूर्यनां किरण प्रकाशतां सर्व अंधकार दूर थाय छे तेम तपना प्रभाव वडे सर्व दुःख दूर थाय छे. वळी कर्म रुपी चंडालना योगे जे संयमशरीर मलीन (दोषित) थयु होय तेने तपरुपी गंगाजळथी शा माटे न पखाळg ? तप रुपी निर्मळ नीरवडे संयम शरीर-शुद्ध-निर्मळ थइ शके छे. समता सहित तप कर्या वगर पूर्व करेलां दुष्ट कर्मोनो नाश, थतो नथी अने दुष्कर तप तप्या वगर वारंवार जन्ममरण करवा रुप भवनो फेरो टळतो नथी. जिनेश्वर देवोए आचरेला अने उप- देशेला तपना प्रभाव बडे ज श्री गौतमस्वामीजी अक्षय महानसी प्रमुख अनेक उत्तम लब्धिओ पाम्या हना, नंदिषेण मुनिजी एज तपना प्रभाव वडे एवी लब्धि पाम्या हता के जेना वडे पोते अनेक. जीवोने प्रतिबोधी सन्मार्गगामी करी शक्या हता अने विष्णुकुमार मुनि पण एज तपना प्रभाव वडे वैक्रिय लब्धि पामी एक लक्षयो- जन प्रमाण शरीर विकुर्वी, दुष्ट नमूचि प्रधानने दाबी देवा शक्ति- वान थया हता. १ विष्णुकुमार मुनि. . .

७६ सूक्त मुक्तावळी. तेथी शास्त्रकार ठीक ज कहे छे के 'तपना प्रभाव वडे सर्व कंइ कामना सुखे सिद्ध थाय छे. जे कइ दूर, दुराराध्य अने देव- ताने पण दुर्लभ होय छे ते सघलु तपना प्रभावे समीपगत, सुसाध्य अने पामबुं सुलभ थाय छे. दुष्कर तपर्नु तेज कोइनाथी सही श- कातुं नथी: जीती के पराभवी शकातुं नथी. जे तप निराशंसभावे (निष्काम वृत्तिथी-निस्पृहताथी) सशास्त्र करवामां आवे छे ते तप सकळ कर्ममळने वाळी नांखी आत्म-सुवर्णने शुद्ध निर्मळ करी शके छे. समता सहित तप निकाचित कर्मने पण वाळी नांखे छे. उपवास, छट्ट, अष्ठमादि बाह्य तप करवानो हेतु, निज दोपर्नु शो- धन करी विनय, वैगावच्च, स्वाध्याय, ध्यान अने ममता त्याग करवा रूप अभ्यंतर तपनो लाभ भेळववानो छे. कारण वडेज कार्य नीपजे छे. इन्द्रियादिकनुं दमन करवा वडेज वाह्य तपनो अने वाह्य तप वडे ज अभ्यंतर-तपनो लाभ मळी शके छे ते वडेज कर्मनी निर्जरा-कर्मक्षय थाय छे अने ते वडेज जन्म मरण रहित मोक्ष पद प्राप्त थाय छे. एम समजी सुज्ञ भाइ बहेनोए उक्त प्रभावशाली तप सेवचा अधिक आदर करवो युक्त छे. २१ भाव धर्मनों प्रभाव. मनविण मळवो ज्यु, चाववो दंत हीणो, गुरुविण भणवो ज्यु, जीमवो ज्युं अलुणो'; १ लूण विनो. r- ७७ , १ भाव धर्मनो प्रभाव. जसविण बहु जीयी, जीव ते ज्युं न सोहे, तिम धरम न सोहे, भावना जो न होहे. ४३ भरतनृप इलाची, जरिण श्रेष्टि भावे, कळी वलकलचीरी, केवळज्ञान पावे; हळधर' हरिणो जे, पांचमे स्वर्गे जाये, इहज गुण पसाये, तास निस्तार थाये. भावार्थ:-जेम मन बगर मळवू, दांत वगर चाबवू, गुरुगम वगर भणचं, अलूणुं धान जमवं, अने जश वगर घणु जीवq ए शोमतुं नथी तेय हृदयना भाव वगर धर्म पण शोभतो नथी. हृद- यनी साची भावनाथीज भरतमहाराजा आरीसा वनमा निज स्वरुप अवलोकन करता करतां निर्मळ केवळज्ञान पान्या हता. इलाचीकुमार वंशाग्रे चढी राजाने रीझववा नाटक करतां करतां समीपस्थ घरमा गोचरी वहोरवा पधारेला स्वरुपस्थ मुनिना अपूर्व दर्शन वडेज स्वदोष देखी-समजी अपूर्व वीर्योल्लासथी त्यांज रह्या सता केवळज्ञान पाम्या हता. जीरण शेठ वीर प्रभुने चार मास पर्यंत प्रामुक आहार पाणीनी लाभ देवा माटे प्रतिदिन, विनंति करता अने पारणाने दिवसे श्री वीर प्रभु जरुर लाभ आपशे एम समजी प्रभुनी राह जोता हता. 1- १ बळभद्र-वळदेव..

सूक मुक्तावळी. तेवामा प्रभुए अन्यत्र पारणुं कयु अने जीरण शेठ भावनारुह थइ बारमा देवलोकना अधिकारी थया. जो के पतितपावन एवा प्रभुए तो पूरण शेठना घरे पारणु कीपण जीरण शेठनेज भावनावडे खरो लाभ थयो, वल्कलचीरी नामनो वाळ तपस्वी जेर्नु चरित्र कंडक विस्तारथी परिशिष्ट पर्वमां कहेलं छे ते घणे काळे विरही न- अस्वी पिता पासे ज्यारे आव्या त्यारे स्वपात्रादिकने अवलोकतां विशुद्ध भावना योगे केवळज्ञान पाम्या हता. तेमज वळी गिरिनिवासी श्री बलिभद्र मुनिवरनी पासे सेवक- रुप बनेलो मृगलो ते तपस्वीमुनिनी परिचर्या करतो. एक वखते पारणाना दिवसे गुरुमहाराज माटे निर्दोष आहार पाणीनी चिंता करतो फरतो हतो. तेवामां एक रथकार जंगलमा लाकडां लेवा - वेल अने एक वृक्षनी शाखा अर्षी कापी भोजनवेळा थइ जवाथी भोजन निमित्ते नीचे उतरेल अने रसोइ तैयार थये नमवा बेसवा पहेलां काइ अतिथिनी राह जोतो बेठेल तेने जोइ गुरुमहाराज पासे आवी मृग इसारो करवा लाग्यो. एटले मृगलाए बतावेला मार्गे गुरु महाराज ज्यां रथकार राह जोइ रह्यो हतो त्यां पधार्या. गुरु तपस्वीने जोइ रथकार बहु राजी थयो अने ते आहार वहोराववा जायछे अने हरणीयो तेनुं अनुमोदन करे छे एवामां एकाएक अर्वी कापेली डाळ तूटी पडतां शुद्ध भावनाथी त्रणे जणा काळ करीने पांचमा देवलोके गया.त्यांथीच्यवी महा विदेहमांमाक्षे जशे.

क्रोधं कषायनो त्याग.
१
२२ क्रोध कषायनो त्याग,
तृण दहन दहतो, वस्तु ज्युं सर्व बाळे,
गुणरयण भरी त्युं, क्रोध काया प्रजाळे;
प्रथम जळद धारा, वन्हि ते क्रोध वारो,
तप जप व्रत सेवा, प्रीतिवल्ली वधारो. ४५
धरणिः फरसुरामे, क्रोधे निःक्षत्री कीधी,
धरणि सुभूमराये, क्रोधे निब्रह्मी कीधी;
नरक गति सहाई, क्रोध ए दुःखदाइ,
वरज वरज भाइ ! प्रीति देजे वहाइ. ४६
भावार्थ:-जेम तृणाग्नि उठ्यो सनोसर्व वस्तुने बाळी नांखे
के तेम कोधाग्नि प्रज्वळ्यो सतो अनेक गुण-रत्नथी भरेली कायाने
बाळी खाख करी नांखे छे. जो तेने शान्त करवा चाहता ज हो तो
तेना उपर समता रसनी धारा धौषबंध वरसावा, जेथी कषायरुप
अग्नि ठरी जशे अने तप जप व्रत आदरवा प्रत्ये प्रीति रुपी वेल
विस्तरशे. १
क्रोध-कषायन परिणाम जोशो तो ते बहुज कूड़े छे. परशुराम
क्रोधवडे पृथ्वीने नक्षत्री करी अने सुभूम चक्रवर्तीए पृथ्वीने नब्राह्मणी
कीधी. आवां अति अनर्थकारी कार्य करवाथी जीवनी नरकगति
१ भग्नि, २ वरसाद, ३ पृथ्वी.

सूक्त मुक्तावळी. थाय छे. क्रोधने एवो दुःखदायी जाणी हे भाइ ! तुं तेनो त्याग कर अने सहुने आत्मसमान .गणी मैत्रीभाव धारी तेमना प्रत्ये प्रीति राखी रहे. २ क्रांवरुप विपक्षनां फूल, फळ अने छांया विगेरे वर्षा विषम- यज छे. कोइर्नु भुंदु-अनिष्ट चिन्तव, ए क्रोध-कपायनां पुष्प सम- जवां अने तेमनुं तक साधी अनिष्ट कर ए तेनां कडयां फळ सम- जबां. नरकनां महा कड़वां दुःख वेठवां ए तेनो रस समजवो क्रोध युक्त वातावरणमां आववाथी आवनारने क्रोधन विष व्यापी जाय के माटे जेम वने तेम क्रोधना प्रत्येक अंगथी न्यारा ज रहेवा प्रयत्न करवो युक्त छे. क्षमा-समता-सहनशीलता गुणवडे ते विपर्नु निवा- रण थइ शके छे. उपशम जळनी धारावडे ए क्रोध-अग्नि सहेजे औ• लवी शकाय छे. क्रोधी माणसने वोध लागता नथी अने ते अंध वनी अकार्यो आचरी नीची गतिमां जाय छे. गमे तेटलो तप जप संयम सेवनार पण क्रोधवश बनी तेनु फळ क्षणवारमा हारी जायछे. उत्तम पुरुपने (सज्जनने) क्रोध थता नथी अने कोइ तेवांज निमित्त योगे थाय तो ते लांवो वखत टकता नथीअने खास निमित कारणे लांवो वखत टके तो तेनु माटुं फळ बेसवा पामतुं नथी; अर्थात् सावधान- पणु राखवाथी काइनु अनिष्ट थतुं अटके छे. तेवा सज्जनो सावचे- तपणु साचवे छेज. वाकी दुर्जनो ता क्रोधवश वनी गमे तेवां कटुक वचन बदी सज्जनोने पण संतापे छे. तेमनाथी तो सदतरं दूर रहे 'दुरस्त छे. कूरगड मुनिनी पेठे गमे सेवा प्रसंगे जे समतारसमां जे झीले छे तेनाज मोक्ष थाय छे.

मान कषायनो त्याग.
स
-
,
२३. मान कषायनो त्याग.
विनय वनंतणी जे. मूळ शाखा विमोडे,
सुगुंण कनक केरी, शृंखलाबंध तोडे,
उनमद करी दोडे, मान ते मत्त हाथी,
निजवंश करी लेजे, अन्यथा
दूर एथी.
विपद विष समो ए, मॉन ते सर्प जाणो,
मनुष्य विकळ होवे, एण डंके जडाणो;
इह न परिहयों जो, मान दुयोधने तो,
निजकुळ विणसाड्यो, मानने जे वहतो. ४८
भावार्थ:--विनयरुपी वडक्षनी मूळ सुधी नेमेली नम्रता
रुपी शाखाओ जे मरंडी नांखे , अने सद्गुण रुपी सोनोनी सां-
कळना बंध तोडी नांखे छे ते उन्मादथी दोडता मानरुपी मदोन्मत्त
हाथीने अंकुशवडे, दमीने वश करी लेवो जोइए. सर्वथा वश करी
न शकाय तो तेनाथी दूर तो रहेQ ज. पण तेने वश तो थइ न ज
जवू. मानने वश थनारना मुंडा हाल थाय छे, लोकमां अपवाद
थाय छे अने गति पण वगडी जायछे. १
मानने एक महान् मेरी सर्प-उग्र विषधर-अजगर समजो जेना
एक डंक मात्रथी मनुष्य मूछित थइ जाय छे. जो ए दुष्ट माननो
त्याग दुर्योधने कर्यों नहि अने पोतानो पूज्य जनोनां हितवचननो

सूक्त मुक्ताबळी. अनादर करी पांडवोनो योग्य सत्कार करवाने बदले तेमनो विनाश करवा युद्ध मचाव्यु तो तेथी पोतानाज कुळनो क्षय कर्यों. २ ज्ञानी पुरुषो मानने उंचा डुंगरनी उपमा आपे छे. तेने आठ प्रकारना मदरुपी ऊंचा ऊंचा आठ शिखरो आवी रहेला छ, मेथी जीवने सुखकारी प्रकाश मळी शकतो नथी. मानरुपी विषम गिरिराजने ओलंघवो बहु कठण छे. तेना उपाय शास्त्रकार बतावे . मृदुता कोमल कमलथे, वनसार अहंकार; छेदत हे एक पलकमें, अचरिज एह अपार. नम्रता-नरमाश कमळ करतां पण कोमळ छे अने अहंकार बज करतां पण कठण छे, तेम छतां नम्रता अहंकारने एक पलका गाळी नांखे के ए भारे आश्चर्यकारी के. एथीज कयुं छे के ‘नमे ले प्रभुने गमे, ' सद्गुणो सज्जनो तो सफळ आंबानी जेम नमी पडे के. फक्त सूका साग जेवा अभिमानी लोको ज नमता नथी-अक- उवाज रहे छे. मानवश थयेला रावण जेवा राजवीना पण माठा हाल यया तो पछी बीजा अल्प सत्ववंतनुं तो कहे, ज शुं ? विभीषणे भो अभिमानी रावणना त्याग करी न्यायमूर्ति श्री रामचंद्रनो आ- भयं कर्यों तो सपळी वाते सुखी थयो, तेमजे दुष्ट संग तजी सत्संग करते ते उभय लोकमां मुख समृद्धि पामशे.

माया-कपटनो त्याग. . २ २४माया-कपटनो त्याग. निठुरपणुं निवारी, हियडे हेज' धारी, परिहर छळ माया, जे असंतोषकारी; मधुर मधुर बोले, तोहि विश्वास नाणे, अहिगलण प्रमाणे, मायीने लोक जाणे. ४९ म कर म कर माया, दंभ दोषद्रुछाया, नरय तिरिय केरा, जन्म जे देह माया; बळिनृप छळवाने, विष्णु माया वहंता, लहुयपगुं लघु जे, वामना रुप लेता. भावार्थ:--हे भाइ ! निर्दयपणु तजी, निज हृदयमा सहु प्रत्ये हेत धारी अन्यने असंतोष उपजावे एवी माया-कपट करवानी टेव तु मूकी दे, मीठा बोला मायावी माणसना विश्वास कोई करतुं नथी. जेम मीठा बोला मोरनो विश्वास सर्प करता नथी, केमके ते सर्पने जीवता ने जीवताज गळी जाय छे, एवी निर्दयता मारमा रहेली छे, तेम मायावी माणस गमे तेवु मीटुं मीटुं बोले पण लोकने तेनो विश्वास आवतो नथी, केमके मायावी माणसर्नु हृदय घणु क- ठोर होय छे, १ दम (मिथ्या आडंबर ) रुपी दोष वृक्षनी छांया जेवी मायाने . १ हेत. २ दंभरुप वृक्षनी छाया जेवी.

सूक्त मुकावळी. हे भव्यात्मन् ! तुंम कर म कर, जे कोइ देहधारी माया कपट करें छ, ते नरक के तिर्यंचना भवमा जइ अवनरे के अने पछी पराधीन- मणे भारे कष्ट सहे छ, ते करनां प्रथमथीज समजीने संरलता आद- पवी युक्त छे, बळीराजाने छळवाने माटे माया करी वामननुं रुप धारण करतां विष्णुजी लघुपणुं पाम्या. सरलपणामां जे मुख समायु के तेनो गंध पण मायामां नथी.२ जे विचारमा तेवुन वाणीमां अने आचारमां आवे तो ते स- लता लेखाय छे; परंतु विचारमा जुदै अने क्रियामां जू दूंज वर्तन होय तो ते कुलटा नारीनी जेवी कुटीलता या मायाज. कहेवाय. बीणा-तंत्रीना त्रण तार एक सरखा ओर्डरमा होय छे, तो ते मजानो स्वर काही सांभळनारने आनंद उपजावे हे, पण जो तेमांथी एकपण तार तूटेलो के अव्यवस्थित थयेलो होय तो ते तंत्री नकामी थइ जाय छे; तेम मन, वचन अने काया अथवा विचार, वाणी अने आचार जो एक तार-एकतावाळा-पूर्वापर विरोध व- भरना होय छे, तो आत्मसाधनमां सरलता योगे अपूर्व आनंद उपजे छे, ए अति अगत्यनी वात निज लक्षमा राखी सहु सुखार्थी जनोए पूर्वापरविरोधी विचार, वाणी अने क्रियारूप कुटीलतानो त्याग करी अविरुद्ध विचार, वाणी अने आचारने सेववा रुप सर- लतानो आदर करवा उजमाळ थर्बु उचित छे. आखी आलमने खानारी मायाने निवारवानी खरो उपाय सरलतान है.

लोम कवायनो त्याग करवा हितोपदेश.
८५
२५ लोज़ कषायनो त्यांग करवा हितोपदेश.
सुण वयण सयाणे', चित्तमा लोभ नाणे,
सकळ 'व्यसनकेरो, मार्गए लोभ जाणे;
इक खिण पण एने, संगरंगे म लागे,
भव भव दुःख दे ए, लोभने दूर त्यागे ५१
कनकगिरि कराया, लोभथी नंदराये,
निज-अरथ न आया, ते हर्या देवताए;
सबळ निधि लहीजे, स्वायते विश्व कीजे.
मन तनह वरीजे, लोभ तृष्णा न छीजे, ५२
भावार्थ-हे शाणा ! तने हिनवचन कहुं ते तुं सांभळ,
मुझ सज्जन होय ते लोभने सकळ आपदानो धोरी मार्ग. जाणी
सेने मनमर्मा, पेसवा देता नथी. एक क्षण मात्र एनो संग करवायी
जीवने भवोभव दुःख सहेवां पडे छे एम समजी तुं पण एंनो संग
न कर. एना संगथी कोण सुखी थयु छ ? जो! नंदराजाए लोमा
वश सोनाना डुंगर कराव्या पण ते तेना कंइ उपयोगमा न आल्या.
देवताए ए सघळा हरी लीधा. ज्यां सुधी तनमनथी लोभ-तृष्णा
तूटे-छुटे नहि त्यां सुधी च्हाय तो सकळ निधान हस्तगत थापा
अथवा आलु जगत स्व वश थाय तोपण लगार मात्र सत्य मुखा
१ सज्जन २ कष्ट ३ सोनानी डुंगरीओ ४ पोताने कबजे.

८६ सुक्त मुक्तावळी. ' मळतुं नथी शास्त्रकारे ठीकज कहुं छे के 'लोभ मूलानि दुःखानि'- बघाय दुःखचें मूळ लोभज छे. लोभवश पडेला पाणीओ सुख धामी शकता नथी. "आगर सबही दोषको, गुणधनको बड चोर; व्यसनवेलीको कंद हे, लोभ पास चहुं ओर." लोभ सर्व दोषनी खाण छे, गुणधन हरी लेनार भारे चोर के. दुःखवेलीचें मूळ हे अने पाणीओने फसाववा चारे बाजु रचेलो पास छे. जेम जेम इच्छित लाभ मळे छ तेम तेम लोभ वचतो जाय के.प्राणीओनी इच्छा आकाशनी जेवी अनंती छे-अंत वगरनी है, मनोरथ भटनी खाड पूरवा जतां ते ऊंडी जती जाय छे, ते कोइ रीते पूरी शकाती नथी-अधूरी ने अधूरीज रहे छे. बळी शा- स्वकारे लोभने सर्वभक्षी दावाग्मिनी उपमा आपी छे. संतोषदृष्टिथी ज ते शान्त थइ शके छे. वळी तेने अगाध समुद्रनी उपमा आपेलीछे, संतोष रुप अगस्तिज तेने अंजलीरुप करी शके छे. लोभ महा भयंकर उपाधिरुप छे. लोभरुप वादळां वर्षे छे त्यारे प्रचुर पापरुप कादव थाय छे, जेथी त्यां धर्महंसने रहेQ गमतुं नथी अने अज्ञान अंधकार छवाइ जवाथी ज्ञान-प्रकाश पण रहेतो नथी. लोभ-तु-: छणाने शान्त करवा संतोष-अमृत सेववानी बहु ज़रुर छे. जेम सारा मजबूत कांटावडे नबळो कांटो काढी शकाय छे तेम प्रशस्त धर्मलो- भवडे अप्रशस्त-खोटो लोभ दूर करी काय छे. ए वात सर्वत्र लागु wom दयाधर्मचं सेवन करवा सदुपदेश. २६ दयाधर्म- सेवन करवा सदुपदेश. सुकृत कलपवली, लच्छी विद्या सहेली, विरति रमणी केळी, शांति राजा महेली; सकळ गुण भरेली, जे दया जीव केरी, निज हृदय धरी ते, साधिये मुक्ति शेरी. ५३ निज शरण पारेवो, श्येनथी जेण राख्यो, षट दशम जिने ते, ए दयाधर्म दाख्यो; तिण हृदय धरीने, जो दयाधर्म कीजे, भवजळधि तरीजे, दुःख दूरे करीजे. ५४ भावार्थ-पुन्य फळने पेदा करवा कल्पवेली तुल्य, लक्ष्मी अने विद्यानी साहेली (व्हेनपणी) चारित्रमा रमण करवाना सा- धनरुप, अने.शान्त रसराजने रहेवा उत्तम स्थानरुप सकळ गुण- भरी जीवदया जो निज दिलमांधारीए तो तेथी आगळ जतां मोक्ष- पदने पामी शकीए.१ जेवी रीते सोळमा जिनेश्वर श्री शान्तिनाथजीए सींचाणाथी पराभव पामता पारेवाने निजशरणे राखी दयाधर्मने दाखव्यो, तेम १ सोळमा प्रभु शांतिनाये.

८८ सुक्क मुकापली. स्वहृदयमा करुणाभाव राखीने जो दयाधर्मर्नु सेवन करवामां आवे तो भवसमुद्रने तरी निश्चे सर्व दुःखने दूर करी काय. २ जे विषय कषायादि प्रमादवश यह स्वपर प्राणनी हानिरुप हिंसा करे छे तेने अंत वगरना-अनंत जन्म मरणनां असा दुख सहेवां पडे छे. स्वार्थवश जो परने परिताप उपजाववामां आवे तो तेथी अनंत गुणो परिताप पामवांनो प्रसंग पोताने ज आवी पडे छ; आ लोका ज एथी वधर्वधन छेदन भेदन प्रमुख अने परम- वमा नरकादिनां दुःख सहेबां पडे छे. परंतु जो कोइ मानी गुरुनी कृपाथी विवेक द्रष्टि खुल्ले अने क्षमागुण मगटे तो दुष्ट हिंसादोषयी बची अमृत जेवी अहिंसा या दयानो लाभ मेळवी शकाय, सर्व पाणीवर्गने स्वात्मतुल्य लेखी सुखशावा उपजाववामां आवे छे तो परिणामनी विशुद्धिथी पोवाने ज आ लोकमां तेमज परलोकमां अनेक गुणी सुखशाता उपजे के. जेवां वीज वावे के तेवांज फळ मळे. छे एम समजी सुज्ञजनोए हिंसारुप विषबीज़ नहि वावतां अ- हिंसारुप अमृतपीज ज वाववां जोइए. संक्षेपमा 'परोपकार: पुण्याय, पापाय परपीडनम्-परोपकार पुन्य फळने माटे अने परपीडन पापफळने माटे थाय छे. सत्य, प्रमाणिकता, शील अने संतोषादि व्रत नियमो आदरी पाळवानो अंतरंग हेतु दयाधर्मनी रक्षा अने पुष्टि अर्थ ज छे. ए मुद्दानी वात निज लक्षमा राखी शास्त्रवचनने अनुसरवा प्रमादरहित प्रयत्न करवी उचित है.

सत्यवाणी धवानो प्रभाव,
२७ सत्य वाणी वदवानो प्रस्ताव समजी प्रिय
अने हितवचनज उच्चारवा हितोपदेश.
गरल' अमृत वाणी, साची अग्नि पाणी,
सृज सम अहिराणी, साच विश्वास खाणी;
सुप्रसन सुर कीजे, साचथी ते तरीजे,
तिण अलिक तजीजे, सांच वाणी वदीजे. ५५
जग अपजश वाधे, कूड वाणी वदंता,
वसुनृपति कुगत्ये, साख कूडी भरंता;
असत वचन वारी, साचने चित्त धारी,
वद वचन विचारी, ज सदा सौख्यकारी. ५६
भावार्थ:-प्रिय पथ्य अने तथ्य (मिष्ट-मधुर लागे अने
हितरुप थाय एवं) यथार्थ वचन बद-चदवा सदा सर्वदा निज
लक्ष राखनार आ लोकमां अने परलोकमां बहु सुखी थाय छे. आ
भवमा विश्वासपात्र बनी भारे प्रतिष्ठा पामे छे अने परभवमा स्वर्गा-
दिनां सुख पामे छ; तेथी सत्य वचन ज वदवा द्रद प्रतिज्ञा करवी
घटे छे. सत्य व्रतना द्रढ अभ्यासथी वचनसिद्धि थवा पामे छे. तेना
प्रभावथी झेर अमृतरुपे परिणाम पामे छे, अनि जळरुप थइ जाय छे,
१ झेर अमृत थाय. २ सापण पुष्पमाळा थाय. ३ असत्य.

सूक्त मुक्तावळी. काळी नागण पुप्पनी मालारुप थाय छे, लोकमां भारे विश्वास बेसे के, देवताओ बहु प्रसन्न थइ शके छे अने अंते भवसमुद्रनो पार पमाय छे. एम समजी असत्य वाणीनो त्याग करी अन्य जनोने प्रिय अने हितरुप थाय एवी ज सत्यं वाणी बदवी घटे छे. ? असत्य वाणी वदतां दुनियामां अपजश वाधे छे. कूडी-खोटी साक्षी भरतां वसुराजानी पेरे लोकमां भारे अपवाद अने दुर्गति थाय छे. आ अति अगत्यनी वात निज लक्षमां सदाय धारी राखी कूडा बोल, कूडी साक्षी, कूडां आळ अने परतांत-परनिंदा कर- वानी कूडी टेव सदंतर दूर करी सत्य प्रतिज्ञा द्रढपणे धारी तेनो एवी सारी रीते निर्वाह करवो के जेथी आ लोकमां तेमज परलो- कमां सदाय आत्म उन्नति ज थवा पामे. २. सत्यव्रतधारी जनोए शास्त्र अविरुद्ध बोलवा सदाय लक्ष राखg जोइए. उत्सूत्र भाषण समान कोइ भारे पाप नथी अने सशास्त्र भाषण तुल्य कोइ भार पुन्य या धर्म नथी. ए अपेक्षाए सत्य व्रत पाळवामां घणी साव- चेती राखवानी जरुर छे. श्री कालिकाचार्य महाराजे प्राणान्त कष्ट वखते पण जो शास्त्रविरुद्ध वचन का नहि तो तेमनो सर्वत्र यशो- वाद थयो अने ते सद्गति पाम्या; तेम गमे तेवा विषम संजोगों बच्चे पण जेओ मक्कमपणे उक्त व्रत- सेवन-आराधन करे के ते. उभय लोकमां सुखसंपदा पामे छे अने अन्य अनेक भव्य जनोने पण मार्गदर्शक वने छे. सत्यना प्रभाव उपर अजवाळु पाडे एवा अनेक उत्तम द्रष्टांतो मळी आवे छे ते निज लक्षमां राखी आत्म- उमति अर्थ सुज्ञजनोए सत्य व्रतनुं पालन कर ज जोइए.

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चोरी करवानी कुटेवथी थती खुवारी.
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२८ चोरी करवानी कुटेवथीथती खुवारीसमजी
नीति आदरवा हितोपदेश.
परधन अपहारे, स्वार्थने चोर हारे,
कुळ अजस वधारे, बंधघातादि धारे;
परधन तिण हेते, सर्प ज्युं दूर वारी,
जग जन हितकारी, होय संतोष धारी.
निशदिन नर पामे, जेहथी दुःख कोडी,
तज तज धन चोरी, कष्टनी जेह ओरी;
परविभव हरंतो, रोहिणी चोर रंगे,
इह अभयकुमारे, ते ग्रह्यो बुद्धि संगे.
भावार्थः-द्रव्यना लोभथी कुच्छंदवश कुबुद्धि धरीने चोर
लोको पारकां धनने गमे ते छळ-कपट करीने अपहरी ले छे, तेथी:
तेमनो स्वार्थ उलटो बगडे छे. तेओ पोतानो वखत भयाकुळ स्थि-
तिमा ज पसार करे छे. क्यांय पीने बेसी के शयन करी शकता
नयी, मुखे खाइ पी शकता नथी; पण रातदिन पकडावा के दंडा-
वाना ज भयमां रझळता रहे छे. तेमना मनने क्याय चेन पडतुं नर्थी.
तेनी साथे तेमना कुटुंब.कवीलाना पण भोग मळे छे. कुळनी की--
तिनो लोप थइ जाय छ, अने वध बंधनादिक कष्ट सहवां पडे छे..

सूक्त मुकावळी.. चोरीना अपलक्षणधी सर्पनी जेम कोई तेमनो विश्वास करता नथी. आ भारे दोष निवारवानो खरो उपाय संतोष ज छे. १ जेथी जीवने रात दिवस अनेक दुःखनो कडवो अनुभव करवो 'पडे छे ते कष्टनी खाण जेवो चोरी करवानो दोप जरुर तजवा जेवो ज छे. रोहिणी चोर पारका द्रव्यने खुब दमथी अपहरी लेतो हतो, तेने अभयकुमारे बुद्धिबळथी पकडी लीधो हतो. श्री वीरप्रभुनां वचनथी ज ते बचवा पाम्यो हतो. पछी छेवटे तेणे वीरमभुर्नु ज शरण स्वीकार्य इतुं. २ पराइ नजीवी वस्तु उचकवानी के छीनवी लेवानी देव आ- गळ उपर भारे भयंकर रूप पकडे के अने जीवलेण व्याधिनी पेरे तंना प्राण पण हरी ले छे. जो शरुआतथी ज बाळको उपर नीति- ना अने धर्मना शुभ संस्कारो पाडवामां आव्या होय तो प्राय: आंवी भयंकर भूलो पाछळनी वयमा भाग्ये ज थवा पामे छे. संत- तिनुं भलं इच्छनार मावापोए तेवी दरकार राखवी जोइए अने पोतानां वाळकोने सारा नीतिवंत अने धर्मशोल शिक्षक पासे के नववां जोइए. वाळको जेवू देखे.तेवं सहेजे शीखे के तेथी तेमनी समीपे-दृष्टिए एक पण अनीतिभयुः आचरण न आवे एवी संभाळ राखवी जोइए, क्वचित् दैवयोगे वाळक एवी कंइ भूल करे तो ते मावापोए के तेना शिक्षके तेने समजावो सुधरावी लेवी जो- इए. केटलाक सुधरेला देशोमां केदी-चोरोने पण सदुपदेशवडे सु- धारी शकाय छे तो पछी वीजाओगें तो कहेवन ? उद्यम अने कुशील तजवा हितोपदेश. खंतथी गमे तेवां कठण काम पण थइ शके छे. गमे तेवां व्यसन दूर करी शकीय छे अने स्वपर हित साधी शकाय. छे. २९ कुशील तजवा हितोपदेश-परस्त्रीगमनथो थता गेरफायदा. अपयश पडह वागे, लोकमां लीह भागे दुरजन बहु जागे, ने कुळे लाज लागे; सजन पण विरागे, मा रमे एण रागे, परतिय रस रागे, दोषनी कोडि जागे. ५९. परतिय रस रागे, नाश लकेश' पायो, परतिय रसं त्यागे, शीळ गंगेय गायो; द्रुपद जनक पुत्री', विश्व विश्वे विदीती, सुर नर मिली सेवी, शीळने जे धरती. भावार्थ-कामान्ध बनी परखीगमन के वेश्यागमन करवाधी अपयश वाधे छे, कुळ कलंकित थाय छ, लोकमर्यादानो लोप थाय छे-स्वपरस्त्रीनी के स्वपरपति प्रमुखनी मर्यादा रहेती नथी, दुर्ज- नोनुं जोर वधे छे-दुर्जनता वधती जाय छे. सजनोनुं मन जेयी विरक्त वनी जाय हे तेवा परस्त्री संबंधी विषयरसमां हे मुग्ध ! तुं १ आबरु जाय. २ परत्रिया-परस्त्री. ३रावण. द्रौपदी. ने सीता. ५ आखा विश्वमा प्रसिद्ध था. . .

२६ सुक्त मुकावळी. ममताने तुं दूर कर. अनित्य अने असार द्रव्यनी अधिक प्रीति तुं कर. न कर, १. • द्रव्य ममतावडे दुर्लभ मानव भव एळे हारी जवाय छे, कोडो गमे दुःख आवी पडे छे, अने स्वर्गनां सुखथी बेनशीव ज रहेवाय छे. प्राप्त छ खंड राज्यथी असंतुष्ट रहेला सुभूम चक्रवर्तीए, धातकी खंडनी पृथ्वी स्ववश करवा जतां, पापी ममता योगे तेना सेवक यक्षोए एकी साथे उपेक्षा करवाथी, छती ऋद्धि हारी, सर्व साये समुद्र तळे जइ, नीच नरक गतिज साधी-प्राप्त करी. २ जेम अत्यंत भारथी भरेलु नाव डुबी दरीया तळे जाय छे तेम अति लोभ वश परिग्रह-ममताथी जीव भवसमुद्रमा डुबी जाय छे. आ दुर्लभ मनुष्य भवादि शुभ सामग्री गमावी देनार फरी ते सामग्री पामी शकता नथी. फरी फरी एवी सामग्री पामवी अति दुर्लभ छ, एम समजी सुज्ञजनोए परिणामे दुःखदायी द्रव्य ममतानो त्याग करी-द्रव्य लोभ सजी, सुखकारी धर्मनोज लोभ करवो युक्त के. अनेक प्रकारनी द्रव्य-संपत्ति लोभवश एकठी करी सती छेवटे ते छेह दइ जती रहे छे अथवा तेने तजी पोताने जतुं रहे, जमशरण थर्बु पडे के एम विचारी जे धर्मसंपत्ति (गुण संपदा) सदाय साये रहे है तेनो संचय करवा शामाटे प्रयत्न न करवो ? मम्मण. शेठनी पेरे अनर्गल लक्ष्मी एकठी कर्या छतां कृपणता दोषथी ते लक्ष्मी मुखने माटे नहि पण मिथ्या ममतावडे दुःखने माटेज थाय छे. जेम जेम लक्ष्मीनो लाभ थतो जाय के तेम तेम लोभ पण वधतो जाय संतोष गुण धारवा-आदरवा हितोपदेश. छे, लोभवश जीव अधिक लक्ष्मी मेळववा जीवनां जोखम खेडे छे, महा आरंभ समारंभ वाळां पापव्यापार करे के अने हायवोय करतां मरोने छेवटे नरकादि दुर्गतिने पामे छे. लोभांध जीव नीति-धर्मनो अनादर करीने अनीति-अधर्मने मार्ग चाले छे अने अनेक अधम कार्य करी आ लोकमां अपवाद अने परलोकमां परमाधामीना मार खाय छे. एम समजी सुज्ञ जनोए एवी अधम लोभवृत्ति तजी, संतोषवृत्ति धारी बने जन्म सुधारी लेवा योग्य छे. ३१ संतोष गुण धारवा-आदरवा हितोपदेश. सकळ गुण भराये, विश्वता' वश्य थाये, भवजळधि तराये, दुःख दूरे पळाये; निज जनम सुधारे, आपदा दूर वारे, नित धरम वधारे, जेह संतोष धारे. ६३ सकळ सुख तणो ते, सार संतोष जाणे, कनक रमणि केरी, जेह इच्छा न आणे; रजनि कपिल बांध्यो, स्वर्णनी लोलताए, भ्रमर कमळ बांध्यो, ते असंतोषताए. ६४ भावार्थ:-जे सुज्ञ जनो संतोष गुणने धारे छे ते सकळ गुण- गौरवने पामे छे, सकळ विश्ववर्ती जनोने वश करे छ, भवसमुद्रने १ मा विश्व.

a सूक्त मुक्तावळी. • "तरी शके छ, दुःख मात्रने दूर करी शके छ, निज जन्मने सुधारी दाके छे, आपदा मात्रने निवारी शके छे अने नित्य नित्य धर्मनी दुन्हि करी शके छे, संतोष गुणनो महा प्रभाव छे. १ कनक अने कामिनीना संगनी इच्छा जे करता नथी तेज नखरेखर संतोपने सकळ सुखनुं धाम समजे छे. संतोष गुण वगर जनक कामिनीनी इच्छा तजाती नथी. सुवर्णनी लोलुपताए कपिल माहरण राजानी पासे मध्य रात्रीएं जतां मार्गमां कोटवालना हाथमा पकडाइ गयो, पछी प्रभाते तेने राजा पासे रजु करतां सत्य हकी- 'फत कहेवाथी राजाए तेने छोडी दीधी अने जोइए नेटल सुवर्ण मागी लेवा जणाव्यु. ते विचार करीने मागवा उपर राखी ज्यारे पाने विचार करवा बेठो त्यारे तेनी इच्छा आकाश जेवी अनंती युती गइ-इच्छानो अंतज न आल्यो, तेथी छेवटे ते पनिवोध पाम्यो, एम समजीने के सुख आखर संतोषमा ज छे. वळी भमरा से फुलमां बंधाइ रहे.छे ते पण असंतोपवडे ज एम समजी मुज्ञज- नोए परस्पृहा-विषयतृष्णा तजी संतोपगुण सेववा आदर करवो सुल छे. २ शास्त्रकारे ठीक ज का छे के 'परस्पृहा महा दु:खरुप छे अने निस्पृहता महा सुखरुप छे.' ए वचननु उहुँ रहस्य विचारी नि:स्पृ- *हता आदरची युक्त छे. लोभवश नंदराजाए सोनानी डुंगरीओ करावी पण ते तेना कशा काममां न आवी, देवताए ते अपहरी लोधी अने पोते नाहक ममना वांधीने दुःखी.थयो. लोभ सर्वभक्षक .

Dhana विषय तृष्णा तजवा हितोपदेश. अग्नि समान छे, ते सर्व सुखनो नाश करी प्राणीने दुःख मात्र आपे छे. जेम इन्धणथी आग तृप्त थती नथी तेम जीवने गमें तेटली द्रव्यसंपत्तिथी संतोष वळतो नथी. जीव उन्मत्तंनी पेरे गमे तेम बकता फरे छे अने गमे तेवी पापचेष्टा-क्रिया करे छे, आवा जीवनी अंते बूरी गति थवा पामे छे. जेम जळवडे अग्नि शान्त थाय छे तेम ज्ञान वैराग्यवडे तृष्णा-दाह उपशमे छे अने शान्ति-संतोष प्रगटे छे. भूमि उपर शय्या, भिक्षावृतिथी आहार, जीर्णपाय वस्त्र अने एकांत बनवास छतां निःस्पृही साधु-महात्माने चक्रवर्ती करतां पण संतोषगुणवडे अधिक सुख होय छे. तेओ शम-साम्राज्यवडे ज खरे- खर सुखी छे; त्यारे परिग्रह-ममताथी भरेला इन्द्र के नरेन्द्र असंतु- ट्रपणावडे उलटा दीन-दुःखी ज देखाय छे. धन धान्य पुत्र परि- वार उपर के शरीरादिक संयोगिक वस्तुओ उपर नाहक ममता राखी जीव दुःखी ज थाय छे एम समजी शाणा जनोए संतोषवृत्ति ज सेववी युक्त छे. ३२ विषय तृष्णा तजवा हितोपदेश. शिवपद यदि वांछे, जेह आनंददाइ, विषसम विषया तो, छांडि दे दुःखदाइ; मधुर अमृतधारा, दूधनी जो लहीजे, अति विरस सदा तो, कांजिका शुं ग्रहीजे. ६५ .

१०० सूक मुक्तावळी. . विषय विकळ ताणी, कीचके भीमभार्या, दशमुख अपहारी, जानकी' रामभार्या; रति धरी रहनेमि, क्रीडवा नेमिभार्या, जिण विषय न वा, तेह जाणो अनार्या. ६६ भावार्थ:-हे भव्यात्मन ! जो तुं परम आनंददायक मोक्ष- मुखने चाहतो ज होय तो परिणामे परम दुःखदायक विष जेवा विषयभोगने तुं तजी दे; अने निर्वाछ कता अथवा निःस्पृहता आ- दरी, ज्ञान वैराग्यने जगावी, समता चारित्रनुं शुद्ध-निर्मळ भावं सेवन करी लेवा रुप अमृतनी धारा पी ले. ए तो देखीतुं सत्य के के जो दूधनी मधुर अमृतधारा मळती होय.तो पछी अति विरस- खाटो कांजीका-छाशनो शा माटे आदर करवो जोइए ? नज करखो जोइए, संतोष ए खरं अमृत छे अने असंतोष अथवा विष- यतृष्णा ए खरेखर प्राणहारक उग्र विष समान होवाथी तजवा योग्य ज छे.१ विषयतृष्णाथी विकळ बनेला कीचके सती द्रौपदीनां चीर- 'हतां अने दशमुख-रावणे सती सीताजीनुं अपहरण शास्त्रकार रहनेमीए राजीमती संगाने रति-क्रीडा करवा निःस्पृहता महा सुरु भोगप्रार्थना पण करी हती. परंतु शील 'हता आदरवी युक्त छे. लेना चीर पूरायां-(नवनवां वस्त्र करावी पण ते तेना कशा काम जोधी अने पोते नाहक ममना वार राजिमती.

विषय तृष्णा तजवा हितोपदेश. १०१ तेणोना देह उपर थवा पाम्यां), एकान्त स्थळ छतां रावण, सती सीनांना शीलनो ताप सहन करी नहि शकवाथी छेटो ज रह्यो, अने सती राजीमतीनां सद्बोध भयाँ वचनथी रहनेमी शीघ्र ठेकाणे आवी स्वदोषनी आलोचना निंदा करी अविचळ पद पाम्या. जे मोहांध बनी, इन्द्रियवश धइ विषयक्किळताथी अधर्मने मार्गे चाले तेमने तेमनां तेवां अधर्म-कार्यने लइने अनार्य प्राय ज समजवा.२ इन्द्रियोना विषयोमा लुब्ध बनी क्षणिक अने कल्पित सुखनो 'खातर जीव नित्य-स्वाभाविक सुखने गुमावीदेछे. विषयसुखमा स्व- शक्तिनो क्षय करी नांखनार सहज स्वाभाविक सुख मेळववा स्वत्री- थैनो क्योथी खर्च करी शके ? इन्द्रियोने वश नहि थवा तेमने ज स्ववश करवा प्रयत्न करी लेवाय तो स्वल्प काळमां महान् लाभ मेळधी शकाय. फक्त दिशा बदलवानी ज प्रथम जरुर छे. स्वेच्छा मुजब गमे तेवा दुःखदायक विषयोमा दोडी जती इन्द्रियोने दमी तेमने सुखदायक साचा मार्गे वाळवी जोइए. चक्षुवडे वीतराग दे- बनो अने संतजनोनी शांत मुद्रा नीरखी निज आत्मविचारणा करवो, श्रोत्रवडे सद्उपदेश अमृतनुं पान करवू, जीभवडे शुद्ध देव शुरु अने धर्मनी स्तुति करवी, सुगंधी पदार्थ देवगुरुनी भक्तिमा निःस्वार्थपणे वापरवा अने निज देह वडे वने तेटली सेवा-भक्ति उत्तम जनोनी करवी अने परमार्थ परायण था, १०२ . १ ३ . सूक्त मुक्तावली. ३३ यि पराजय आश्री हितोपदेश, गज मगर' पतंगा, जेह भुंगा' कुरंगा, इक इक विषयार्थे, ते लहे दुःख संगा; जस परवश पांचे, तेहनुं शुं कहीजे, इम हृदय विमासी, इंद्री पांचे दमी जे. ६७ विषय वन चरंतां, इंद्री जे उंटडा ए, निज वश नवि राखे, तेह दे दुःखडा ए; अवश करण मृत्यु, ज्युं अगुप्तेंद्री पामे, खवश सुख लह्यो ज्युं, कूर्म गुप्तेंद्री नामे. ६८ भावार्थ:-हाथी, मच्छ-मगर, पतंग, भ्रमर अने हरीण ए बयां प्राणीओ एक एक इन्द्रियना विषयमा आशक्त बनवाथी प्रा- णान्त दुःखने पामे छे, तोपछी जे पांचे इन्द्रियोना विषयोमा आ- सक्त बनी रहे तेमनुं तो कहेवू ज शुं ? एम हृदयमां विचारी सुज्ञ- जनोए पांचे इन्द्रियोनुं दमन कर, युक्त छे, अन्यथा द्रव्य अने भाव उभय प्राणनी हानि थवा पामे छे. १ विषयरुपी वनमा स्वेच्छाए चरता इन्द्रियोरुपी उंटडाओने जो स्ववश करी लेवामां न आवे तो ते दुःखदायक नीवडे छे. जे अज्ञ- जनो इन्द्रियोने स्ववश नहि करता तेमनेज वश थइ पडे थे, तेओ १ मत्स्यो. २ भमराओ. ३ हरणो. ५ काचवा.

इंद्रिय पराजय आश्री हितोपदेश. १०३ परवश इन्द्रियवाळा काचवानी पेरे मरणान्त कष्ट पामे छे अने जेलो - इन्द्रियोने सारी रीते दमी स्ववश करी. लेय छे तेओ गुप्तेंद्रिय कार. बानी पेरे खरेखर सुखी थइ शके छे. २ शास्त्रकार स्पष्ट जणावे छे के 'इन्द्रियोने इच्छित विषयोमा मोकळी मूकी देवी ते आपदा व्होरी लेवानो राजमार्ग छे, अने एज इन्द्रियोने नियममा राखी सन्मार्गे दोरवी ए सुख संपदा पाम- वानो श्रेष्ठ मार्ग छे.' हवे ए बेमांथी तमने पसंद पडे ए मार्गने तमे ग्रहण करो सुखी थQ के दुःखी, थ, एनो आधार आपणा सारा के नरना. वर्तन उपरज रहे छे. इन्द्रियोरुपी उद्धृत घोडाओने दुर्गतिना मार्गमा घसडी जतां अटकाववाज. होय तो तेमने जिनेश्वर प्रभुनां वचन रुपी लगामवडे अंकुशमां राखो. विवेकरुपी हाथीने हणवाने केसरी- सिंह जेवी अने समाधिरुपी धनने लुंटी लेवामां चोर जेवी इन्द्रियों जे अजित रहे तेज धीर-वीरमा धुरंधर छे एम जाणवू. तृष्णारूपी जळथी भरेला इन्द्रियोरुपी क्यारावडे वृद्धि पामेला विषयरुपी विष-. वृक्षो प्रमादशील प्राणीओने आकरी मूर्छा उपजावी विटंबना करें छे. विषयसुख भोगवतां तो प्रथम मीठां-मधुर लागे छे, पण परि- णामे ते विषयभोग किंपाकना फळनी पेरे अनर्थकारी नीवडे है, जेम जेम प्राणी विषयर्नु अधिक अधिक सेवन करे छे.. तेम तेक तृष्णाने वधारी संताप उपजावे छे. जेम इन्धनथी अग्नि तृप्त धतों नथी, तेम गमे तेटला विषयभोगथी जीवने वृप्ति थती नथी, अनै ते (संतोष) वगर सुख पण प्राप्तः यतुं नथी. तेथी मोक्षना अर्थी,

१०४
सूक्त मुक्तावळी.
सुजनोए संतोष गुण धारवा निज मन अने इन्द्रियोने नियममा
राखी सन्मार्ग वाळवा प्रयत्न करवो जोइए.
३४ प्रमाद परिहरवा हितोपदेश.
सहु मन सुख वांछे, दुःखने को न वांछे,
नहि धरम विना ते, सौख्य ए संपजे छे,
इह सुधरम पामी, का प्रमादे गमीजे,
अति अळस तजीने, उद्यमे धर्म कोजे. ६९
इह दिवस गया जे, तेह पाछा न आवे,
धरम समय आळे, कां प्रमादे गमावे;
धरम नवी करे जे, आयु आळे वहावे,
शशि नृपतिपरे त्युं, सोचना अंत पावे.
भावार्थ:-जगतना सहु जनो सुखनीज वांछना करतां जणाय
छ, दुःखनी वांछना करतां कोण नजरे पडे छे ? कोइज नहि. तेम
छतां दुःखनो अने सुखनो खरो मार्ग जाणे छे कोण ? अथवा
जाणवानी दरकार करे छे कोण ? धर्म-दान, शील, तप, भावमा
आदर करवाथी मुख अने तेमां अनादर-अमाद करवाथीज दुःख
प्राप्त थाय छे. प्रमाद रहित साधुधर्म के गृहस्थधर्मनु सेवन कर्या वगर
मुख संभवतुंज नथी. उक्त सद्धर्मने सारी रीते सेवन करवा योग्य
रुडी सामग्री मळ्यां छतां तेनो लाभ लइ लेवामां शा माटे उपेक्षा
७०

प्रमाद परिहरवा हितोपदेश. करवी जोइए ? अंगथी आळसने आळगुं करी नांखी सुखना अर्थी भाइव्हेनोए पवित्र धर्म सेवन करी लेवा खसुस उद्यम करवोंज जोइए. उद्यम जेवो कोइ बंधु नथी अने प्रमाद जेवो कोइ शत्रु नथी जे जे क्षणो, जे जे दिवस, मास, वर्षादिक आपणा आयुष्यमांथी ओछा थाय छे-चाल्या जाय छे ते कंइ पाछा आवतां नथी. आद- रथी धर्मसेवन करनारनां ते सघळां लेखे थाय छे अने आजसथी धर्मनो अनादर करनारनां ते बंधाय अले वे जाय छे. एम समजीने हे भोळा जनो ! धर्म साधा जे अमूल्य समय हाथ लाग्यो के तेने प्रमाद वश थइ जइ केम व्यर्थ गुमायो छो? धर्मनु सेवन करवामां आळस-उपेक्षा करनारनुं आयुष्य नका चाल्यु जाय छे अने छेवटे तेने शशीराजानी पेरे शोच करवो पडे छे. ते शशीराजाने तेना बंधुए प्रथम बहु परे बोध आपी धर्म सेवन करवा प्रेरणा करी हती, पण ते वखते तेने ए वात गळे उतरी नहोती अने उलटो आई अबल्लं समजाची पोताना बंधुने पण मोह जाळमा फसावया चाहतो इतो; तेम छतां तेना बंधु धर्मर्नु रहस्य सारी रीते समजता होवाथी लगारे डग्या नहि अने चारित्र-धर्मने आदरी देवगतिने पाम्या. पछी ज्ञानवडे पोताना भाइ शशीराजानो शी स्थिति थई छ ? ते तपासतां ते देवने समजायु के भाइ तो विषयादिक प्रमादमां लपटाइ नरकगतिमा उत्पन्न थया छे. एटले तेने प्रबोधवा पोते तेना स्थानके जइ अने तेने पूर्व भवर्नु स्मरण कराव्यु एटले ते कहेंवा लाग्यो के 'हे बंधो ! तमे मृत्युलोकमां जइ म्हारा पूर्व शरीरने खूब कदर्थना उप- जावो, जेथी हुँ आ दुःखमांथी मुक्त थइ शकुं.' देवे उत्तर आप्यो १०३ सूक्तं मुक्तावळी. के 'भाइ ! तेम करवाथी हो कांइ वळे नही. समजीने स्वाधीन पणे प्रमाद तजी जे धर्म साधन करे छे तेज सुखीथइशके छे, अन्यथा नहि.' ३५ साधु धर्मना स्वरुप, संक्षेप कथन. (शार्दुलविक्रिडित). जे पंचत्रत मेरुभार निवहे निःसंग रंगे रहे, पंचाचार धरे प्रमाद न करे जे दुःपरिसा सहे; पांचे इंद्री तुरंगमा वश करे जे मोक्षार्थने संग्रहे, एवो दुष्कर साधु धर्म धनते जे ज्युं ग्रहे त्युं वहे.७१ (मालिनी). मयणरस' विमोडी, कामिनी संग छोडी, तजिय कनककोडी, मुक्तिशुं प्रीति जोडी; भव भव भय वामी, शुद्ध चारित्र पामी, इह जग शिवगामी, ते नमो जंबुस्वामी. ७२ भावार्थ:-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य अने अपरिग्र- हरुप पांच महाव्रतो रात्रिभोजननो सर्वथा निवेध सह पालन करवा रुप मेरुपर्वतनो भार जेओ निर्वहे छे, द्रढ वैराग्यना रंगथी जेमन हृदय रंगाइ गयेलं होवाथी निस्पृहभावे जे आनंदमांगरकाव रहेछ, ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप अने वीर्यने अनुकूळ आचार-विचारने १ आकरा परिसहो. २ धन्य, 1 कामदेव संबंधी रस.

१ साधु धर्मना स्वरुपर्नु संक्षेप कथन. १०७ जे धारण करी रहे छ, मद्य, विषय, कषाय, आळस अने विकथा- रुपी पांच पापी प्रमादनो जे चीवटथी त्याग करे छे, क्षुधा तृषा शीत उष्णता प्रमुख बावीश परिसहो पैकी जे जे परिसहो आवी पडे के ते ते अदीनपणे समभावे जे सहन करे छे, अने चक्षु श्रोत्रादिक पांचे इन्द्रियोरुपी अवळा घोडाओने ज्ञान लगामवडे निज वशमां राखी जे महानुभाव मुनिजनो संयममार्गने सावधा- नपणे सेवे छे ते अनुक्रमे सकळ कर्म-मळनो क्षय करी मोक्ष- पदने मेळची शके छे. आवो दुष्कर साधुधर्म द्रढ वैराग्यथी आदरी जे तेने सिंहनी पेरे शूरवीरपणे पाळे छे ते भाग्यशाली भाइ व्हेना खरेखर धन्य-कृतपुन्य छे. शंगार रसना अनादर करी, आठ पत्नीनो संग छाडी, ९९ क्रोड सुवर्णनो त्याग करी, केवळ मुक्ति साथेन लय लगाडी अने शुद्ध चारित्र-धर्मने सद्गुरु पासेथी प्राप्त करी, जन्म मरणनो भय दूर करी एज भवमा जे परमानंदपद-मोक्षने प्राप्त थया एवाश्री जं- बूस्वामी महामुनिने अमारो वारंवार नमस्कार हो!! ए महामुनि साधुधर्मना एक उत्तम आदर्श ( Ideal ) रुप होवाथी एमर्नु उत्तम चारित्र मुमुक्षुजनाए वारंवार मनन करीपरिशीलन करवा योग्य छे. धन्य छे ए महामुनिने के जेमणे पोताना पवित्र चारित्रना प्रबळ प्र- भावधी मभवादि पांचसो चोरोने पण मतिबोधी परमार्थ मार्गमा प्रयोजी दीघा. जो आवा पुरुषार्थी महामुनिओनां पवित्र चारित्र तरफ मुमुक्षुजनो सदाय द्रष्टि राखे तो आजकाल द्रष्टिगत थती सा- १ वे टंक प्रतिक्रमण. - Proom SH

१०८
सूक्त मुक्तावळी.
धुधर्ममां शिथिलता शीघ्र दूर थवा पामे अने पुनः प्रबळ ज्ञान वैराग्य
जागृत थनां साधुधर्म दीप्तिमान् थवा पामें. २
३६ श्रावक धर्मना स्वरुपर्नु संक्षेप कथन.
(शार्दूलविक्रिडित).
जे सम्यक्त्व लही सदा व्रत धरे सर्वज्ञ सेवा करे,
संध्यावश्यक आदरे गुरु भजे दानादि धर्माचरे;
नित्ये सद्गुरु सेवनाविधि धरे एवो जिनाधीश्वरे,
भाख्यो श्रावकधर्म दोय दशधाः जे आदरे ते तरे. ७३
(मालिनी.)
निशदिन जिनकेरी, जे करे शुद्ध सेवा,
अणुव्रत धरी जे ते, काम आनंद देवा;
चरम जिनवरिंदे, जे सुधर्मे सुवासा,
समकित सतवंता, श्रावका ते प्रशंस्या.
इम अरथ रसाळा, जे रची सूक्तमाळा,
धरमनृपति वाळा, मालिनी छंद शाळा;
धरममति धरता, जे इहां पुण्य वाध्यो,
प्रथम धरमकेरो, सार ए वर्ग साध्यो. ७५
१ यार प्रकारनो. २ आनंद ने कामदेव श्रावक.
,

श्रावक धर्मना स्वरुपर्नु संक्षेप कथन. १०९. शुद्ध देव गुरु अने सर्वज्ञ वीतराग कथित धर्म उपर द्रढ श्रद्धा- रुप समकित ग्रहण करी जे व्रत नियमोने आदरे, सर्वज्ञ देवनी सेवा भक्ति करे, संव्यावश्यक (प्रतिक्रमण सामायिक प्रमुख) आदरे, पूज्य-वडील जनोनी भक्ति करे, दानादि धर्मनु सेवन करे, अने सदाय सद्गुरुनी विधिवत् सेवना करे, ए रीतेश्री जिनेश्वर भाषित द्वादश व्रतरुप धर्म जे महानुभाव श्रावको आदरे ते स्वार्गादिकनां मुख अनुभवी अनुक्रमे मोक्षसुख पामे. १ जे सदाय शुद्ध भावथी जिनेश्वर देवनी सेवा भक्ति करे अने प्रभुना पवित्र उपदेश अनुसारे गृहस्थ योग्य अणुव्रत, गुणव्रत अने शिक्षाबतने धारे, ते चरम तीर्थंकर श्री महावीर देवे प्रशंसेला, अने सद्धर्म वासित थयेला आनंद कामदेव प्रमुख उत्तम समकितवन अने सत्वत श्रावकानी पेरे प्रशंसापात्र थाय छे. २ जे सद्गुरुनो समागम करी विनय-बहुमान पूर्वक तत्त्व श्रवण करे छे अने निज हित कर्तव्यनो निश्चय करी सन्मार्गर्नु सेवन करे छे ते श्रावक कहेवाय छे. अथवा शुद्ध श्रद्धा, सद्विवेक अने सत् क्रियान जे यथाविधि सेवन करे छे ते शुभाशयो श्रावकनी खरी पंक्तिमा लेखाय छे. तथाप्रकारनां सद्गुण वगर ते मात्र द्रव्य श्रावक योग्य उत्तम गुणोथी अलंकृत होय ते भाव श्रावक गणाय छे. जे गृ- इस्थाश्रममा रह्या छतां स्वस्व अधिकार अनुसारे वीतराग शासननी उन्नति-प्रभावना करवा तन मनथी प्रवर्ते छे ते परम श्रावकनी पंक्तिमा लेखाचा योग्य छे. सामान्य श्रावकोए पण व्यवहार शुद्धि राखवा, मिथ्यात्व वृद्धिकारक क्रिया तजवा अने गुणमा आगळ

११०
सूक्त मुक्तावळी.
वधवा अवश्य लक्ष राखq जोइए. दश द्रष्टान्ते दुर्लभ मनुष्य जन्मादि
उत्तम सामग्री पामी प्रमादवश पडी तेने निरर्थक करी नहि देतां जेम
तेम विपय कपायादि प्रमादाचरण तजीने सुश्रावकने छाजे एवा
आचार विचार सेववा उजमाळ थर्बु घटे छे. पूर्व पुन्य योगे पवित्र
धर्मना शुभ मनोरथ थाय तो तेने सफल करी लेवा जरुर काळजी
राखवी घटे छे, जेथी अत्यारे करेली हित करणी आगळ उपर घणी
ज उपयोगी थइ शके.
अर्थ वर्ग.
उपेंद्रवज्रा.
अथार्थवगै हितचिंतनश्री-मितपचार्थ्यस्व महीशसेवा।
खलादिमैत्रीव्यसनादिचैव-मिहावधार्याः कतिचित्मसंगा:
३७अर्थ विषे.
(न्याय नीति अने प्रमाणिकपणाथीज द्रव्य उपार्जन करवा.
हितोपदेश.)
मालिनी वृत्त
अरथ अरज जेणे, स्वायते विश्व होके,
जिणविण गुण विद्या, रुपने कोण जोवे;
अभिनव सुखकेरो, सार ए अर्थ जाणी,
सकळ धरम जेथी, साधिये चित्त आणी. १

अर्थ विषे. . अरथ विण केवन्नो,' जेह वेश्याए नांख्यो, अरथ विण वशिष्टे, राम जांतो उवेख्यो; सुकृत सुजसकारी, अर्थ ते ए उपाजों, कुवणज उपजतो, अर्थ ते वों. २ भावार्थ:-गृहस्थ वेषे संसार व्यवहारमा रहेतां पगले पगले द्रव्यनी जरुर पढ़े छे द्रव्य वगर पोतानामां गमे तेवा गुण विद्या के रुप होय तेने कोण जोवे छे-तेनी कदर के परवा कोण करे छे कोइ नहि. तेथी स्वबाहुबळथी न्याय, नीति अने प्रमाणिकपणुं राखी- साचवीने तमे एवो अर्थ उपार्जन करो के जेवडे सहु काइ तमने अ- नुसरीने चालेजो एमकरशा तो तमे स्वस्थ चित्तथीदानादि सकळ धर्म साधी शकशी अने एथी अपूर्व सुख समृद्धिने सहेजे प्राप्त करी शकशो.१ जुओ के अर्थ वगर कयवना शेठनो वेश्याए अनादर क. अर्थ वगर वशिष्ठे रामने जातो उवेख्यो. एम समजी हे सुज्ञजनो! सुकृत अने सुयशने पेदा करनार अने वृद्धि पमाडनार अर्थने खरी नीतीथी निर्दोष मार्गे उपार्जन करी अने कुरणजथी (नीच एवा पापव्यापारथी) प्राप्त थता गमे नेटला द्रव्यनी पण उपेक्षा करो दरकार न करो. २ मार्गानुसारीपणाना ३५ हित बोलोमां प्रथमज आ वात कहे- वामां आवी के के हे भव्यजनो! जो तमे श्री दीतरांग धर्म पामवानी १ कयवन्ना शेठ.

११२ सूक्त मुक्तावळी. चाहना राखताज हो तो अनीति अन्याय अने अप्रमाणिकपणाना द्रव्यनी उपेक्षा करीने शुद्ध नीति-न्यायथीज जेम वने तेम निर्दोष व्यापारवडेज द्रव्य उपार्जन करवानुं राखो. एथी तमने सुबुद्धि मुझशे. जेवो आहार एवो ओडकार आये ए न्याये जो नीती- द्रव्य पेटमां जाय तो बुद्धि सारी-निर्मळ थशे अने अनादिक धर्ममां प्रवृत्ति करवा अने ए अस्थिर द्रव्यथीस्वपर हित करी लेवानु मुझशे. पूर्वे अनेक साहसिक पुरुषो पुरुषार्थवडे अनर्गल लक्ष्मी कमाइ लावीने उंची स्थिति उपर आवी पोताना अनेक सीदाता-दुःखी थता मा- नवबंधुओनो उद्धार करी, पवित्र धर्मने दीपावी स्वजन्म सफळ करता हता. पूर्वे थयेला महा समृद्धिवंत आनंद कामदेवादि श्राव- कोनी वार्ता तो शास्त्रप्रसिद्ध छे, पण आ कलिकालमां पण एवा कइक निःस्वार्थ दानेश्वरी थया छे के तेमनां पवित्र चरित्र वाचतां चित्तमां चमत्कार पेदा थाय छे. ३८ हितचिंतन विषे. परहित करवा जे, चित्त उच्छाह धारे, परकृत हित हैये, जे न कांइ विसारे;. प्रतिहित परथी जे, ते न वांछे कदाइ, पुरुषरयण सोइ, वंदिये सो सदाइ. निज दुःख न गणे जे, पारकुं दुःख वारे, तिहतणी बलिहारी, जाइये कोडी वारे, . , ३ हितचिंतन विषे. जिम विषभर जेणे, डंक पीडा सहीने,. विषधर जिनवीरे, ब्रूझव्यो ते वहीन. भावार्थ:-परहित करवा जे सदाय चित्तमा उत्साह धरे के, एवाज सद्विचार जेना मनमां सदाय जागृत रहे छे, एवीज मिष्ट- मधुरी हितवाणी रुप अमृतरस जेनी मुख-गंगामाथी वहे छे, अने एवीज हितकरणी करवा सदाय चीवट राखी प्रवते छ; बीजा परो- पकारशील पुरुषोए करेलां हित-कार्यों (परोपकारनां काम) जे कदापि विसरी जता नथी, अने करेला उपकारनो बदलो मेळववा जेमने इज्छा थतीज नथी तेवा पुरुषरत्नो सदा सर्वदा सत्कार-स- न्मान करवा लायकज छे. १ जे पोतार्नु दुःख गणकारता नथी अने पारकुं दुःख दूर करवा कायम प्रयत्न करे छे तेवा पुरुषार्थी पुरुषरत्नोनी कोडोवार बलि- हारी . जूओ चरम तीर्थंकर श्री महावीरदेवे चंडकोशीया नागनी इंकपीडा सहीने पण केवळ परमार्थ दृष्टिए तेने प्रतिबोध कयों ए वात मशहूर छे. आवा आदर्श पुरुषोनां पवित्र वर्तनन बनी शके तेटलं अनुकरण करचु जोइए, के जेथी आपणुं पण जीवन सार्थक थइ शके. २ पवित्र आदर्श पुरुषोना हृदयनी एवीज भावना होय छे के सहु कोइ सुखी थाओ ! सहु कोइ रोग-पीडा रहित थाओ ! सहु कोइ कल्याणने पामो अने पापाचरणथी दूर रहो. एवा महान् पुरुषोना मनमा 'आ. म्हारु अने आँ परायु' एवो भेदभाव होतो नयी.

सूक्त मुक्तावळी. तेमना उदार दीलमां तो आखी दुनीया कुटुंब रुप मनाय छे. नेओ सदाय इच्छे छे के आखी आलमनुं भलं थाओ-आखी दुनीयामा मुख-शान्ति प्रसरो! सहु कोइ जनो परर्नु हित (परोपकार) करवा तत्पर बनो! अहितकारक पाप-दोष मात्र दूर थाओ! अने सर्वत्र सहु कोइ सुखी थाओ! सहु साथे आवी उदार मैत्रीभाव उप- रांत सद्गुणीना गुण नीहाळी तेमने अनुमोदन अने पुष्टि आपवा- रुप प्रमोद्भाव अने अल्पगुणीने के दुःखीने देखी तेमने योग्य सहाय करवारुप करुणाभाव तथा तदन कठार अने सुधारी न शकाय एवा निर्गुणी के दुष्ट जीवो तरफ पण रागद्वेष वगरनी तट- स्थता राखवा तेओ उपदिशे छे. ३९ लक्ष्मी विषे. (लक्ष्मी प्रभाव वर्णन). हरिसूत रति रंगे, जे रमे रात सारी, शिवतनय कुमारो, ब्रह्मपुत्री कुमारी; हित करी हग लीला, जेहने लच्छी जोवे, सकळ सुख लहे सो, सोइ विख्यात होवे. ५ लखमिवळे यशोदा-नंदने विश्व मोहे, लखमि विण विरुपी, शंभु भिक्षु न सोहे; , 4 4 लक्ष्मी विषे. १११ १ ६ लखमि लहिय रांके,जे शिलादित्य भंज्यो, लखमि लहिय शाके, विक्रमे विश्व रंज्यो. भावार्थ:-हरि जे इन्द्र देनो मुत-पुत्र नामे जयंत अ- थवा हरि जे कृष्ण वासुदेव तेनो मुत-प्रद्युम्न ( अपर नाम कामदेव) ते रति (अप्सरा जेवी रुपवंती स्त्री) संगाते बधी रात रमण-क्रीडा (संभोग) करे छे, तेमज 'शिव जे महादेव तेनो तनय-पुत्र नामे कार्तिकेय अथवा गणपति ते ब्रह्मानी पुत्री साथे संयोग पाम्यो ते लक्ष्मीना प्रभावथी, टुंकाणमां जेना तरफ लक्ष्मी कृपाकटाक्षथी (प्रसन्न थइ) जोवे ते सकळ सुख-संपदा पामे. १ लक्ष्मी-देवीना बळ-सहचार्य-सदा सहवासथी यशो- दानो नंदन-पुत्र जे कृष्ण वासुदेव तेना उपर सहु कोइ मोही पडया अने ए लक्ष्मी वगरना शंभु-शंकर महादेव जे विरुप-रौद्र- विभत्स रुपने धारता हता, ते भिक्षु-भीखारीनी जेम कशी शोभा पाम्या नहि. वळी लक्ष्मीना प्रभावथी एक रांक नामना शेठे शि- लादित्य जेवा नरपति-राजानो पण पराभव कर्यो, तेमज विक्र- मादित्य राजाए ए लक्ष्मीनीज प्रसन्नताथी दुनियाना लोकोने अनृण (रणमुक्त) करी, सहुने राजी करी पोताना' नामनो संद- त्सर चलान्यो. (आमांना प्रथम छंदमां कहेला दाखला लौकिक शास्त्रमा प्रसिद्ध जाणीने कहेला जणाय छे. बोध लेवा माटेज ते उपयोगी लेखवाना छे.)२ परमार्थ-गृहस्थाश्रम सारी रीते चलाववा इच्छनारा गृह- सूक्त मुक्तावळी. स्थोने लक्ष्मी (धन)नी डगले अने पगले जरुर पडे छे. कहो के ते- नोज आधारे नेनो सपळो संसार व्यवहार चाली शके छे. पुरुषार्थ फोरवी, न्याय-नीति-प्रमाणिकता साचवी, यथायोग्य व्यवसाय करनारनी उपर लक्ष्मीदेवी प्रसन्न थाय छे-तेने लक्ष्मी स्वयमेव वरे, कहो के तेनी डोकमां पोतेज वरमाळानांखे छे. समर्थ शास्त्रकारोए ल- क्ष्मीने पेदा करवातेमज तेने स्थिर करी(टकावी)राखवानोअफसीरउ- पाय, न्याय नीति के प्रमाणिकनाथी सावधपणे व्यवसाय करवा रुपज बखाणेलो छे. तेम छतां कडक अज्ञानी अने लोभी जनो ते लक्ष्मीने अनीति-अन्यायथी ज पेदा करी लेवा मये छे, पण पुन्य वगर ते प्राप्त थनी ज नथी अने कदाच प्राप्त थइ होय तो ते अनीति-अ- न्याय, उपासन करनार पासे वधारे वखन टकनी नथी. वळी जे सारां सुकृत्य करे छे तेमने लक्ष्मीनी इच्छा न होय तो पण ते गमे त्यांथी सहेजे आवी मळे छे. अत्यारे जेमने लक्ष्मी प्राप्त थइ होय ते पूर्व करेलां सुकृत्यना प्रभावथो ज थइ होय छे परंतु लक्ष्मीने पाम्या छतां जे मदमत्त बनी सुकृत्य करतां नथी तेमने प्रथमं करेलुं पुन्य खलास थतां दुर्दशाज भागववी पडे छे; तेथी सुज्ञ जनोए न्याय, नीतिथी बने तेटली लक्ष्मीनु उपार्जन करी, तेनो सदुपयोग ज करवो घटे छे. कहेवाय छे के 'त्यागे तेनी आगे' अने 'मागे तेथी बासे' ते हकीकत बहुज अर्थसूचक छे. जे कोइ महानुभाव ल- क्ष्मीने अस्थिर-(चपळ स्वभावी) अने असार समजी, वेनी उपरनी अमता-मूर्छा तजी, परमार्थ दावे तेने सारा क्षेत्रोमा विधिपूर्वक वावे लक्ष्मी विषे. -- . के तेने तेथी अनंत गुणी द्रव्य अने भाव लक्ष्मीअनायासे मळी आवे छे ए वात खरी छे. तेमज जे कोइ योग्यता वगर ते लक्ष्मीनी याचना करे छे, विविध प्रकारना व्यवसाय करे छ, काळां धोळा करेछे अने तेने माटे मरी फीटेछ तेमने ते मळतीज नथी, एटले तेम- नाथी ते दूरने दूर भागतीफरे छे. दान, भोग अने नाश ए लक्ष्मीनी त्रण गति कही छे. जे मुग्ध जनो कृपणनाथी छती लक्ष्मीए दान देता नथी तथा तेनो रीतसर उपभोग पण करता नथी तेमनी ते लक्ष्मी छेवटे नाशज पामे छे. अथवा तो ते कृपण एवा मम्मण शेठनी जेम लक्ष्मीने अहींज अनामत मूकी मरी जाय छे. दान दानमां पण फेर छे. जे दान विधिपूर्वक बहु मानथी स- त्पात्रने देवामां आवे छे तेनाथी पुन्यानुबंधी पुन्य उपार्जन थाय छे. तेवू दानदइने प्रमुदित थवाने बदले पाछळथी खेद करनारने फळनी हानि थवा पामे छे; तथा अज्ञानपणे कुपात्रनुं पोषण करवाथी अने कुव्यसनादिनुं सेवन करवामां उडावी देवाथी तेनो नाश पण थाय छे. अज्ञान भयो तपजप कायकष्टादिक करवाथी पापानुबंधी पुन्य उपार्जन करनारने जोके लक्ष्मी मळे छे, परंतु तेनो ते दुरुपयोग करीने दुर्गति पामे छे. जे सद्भागी द्रव्य-लक्ष्मीनो माह तजी तेनो विवेकथी सदुप- योगज करे छे ते आंतर (भाव) लक्ष्मीने प्राप्त करी अंते परमपदने पामे छे. .

११८
सूक्त मुक्तावळी.
४० कृपणता दोषं तजवा अने उदार दिल
करवा हितोपदेश.
कणकण जीम संचे, कीटिका धान्य केरो,
मधुकर मधु संचे, भोगवे को अनेरो;
तिम धन कृपि केरो, नोपकारे देवाये,
इमहि. विलय जाये, अन्यथा अन्य खाये.
कृपणपणुं धरता, जे नवे नंदराया,
: कनकगिरि कराया, ते तिहां अर्थ नाया;
इम ममत करता, दुःख वासो वसीजे,
कृपणपणुं तजीने, मेघज्युं दान दीजे.
भावार्थ:-जेमकीडी कण कण संचीने अनाजने एकटुं करें
के अने मधमाख पुष्पना पराग एकठा करी करीने मध वनांवे छे.
पछी 'कीडीनुं संच्यु तेतर खाय अने पापीर्नु धन एळे जाय' ए
न्याये कृपीनुं धन कोइ सारां काममां वपरातुं के देवातुं नथी.
'तेना हाथ उपर जमडा बेठेला होय छे.' जेथी 'चमडी तूटे पर्ण
दुमडी तूटती (छूटती) नथी.' आम होवाथी कृपणतुं धन कांतो
जमीनमा दाटयुंज. रहे.छे अथवा कोइ नशीवदार तेनो भोगवटो
,
.
१ सोनानी डुंगरीओ.

von कृपणता दोष तजवा हितोपदेश. करे छ, अथवा तो एना पुन्यनो क्षय थये ते धन पग करी नाशी जाय छे. पछी कहेवाय छे के, आव्यो हतो बांधी मुठे अने जाय के खाली हाथे. श्रीमान छतां कृपण लोको लक्ष्मीनी चपळतानो कंडक विचार करी तेनो सठेकाणे उपयोग करी लेवा धारे तो तेथी तेओ अपार लाभ भेळवी शके. कोइ सद्गुरु निःस्पृही महा- स्मानां अनुग्रहथी कदाच एवी सद्बुद्धि जागे पछी केटलं बधु स्व- परहित थइ शके? करकसरना नियमोने द्रढपणे पाळनार उपर कोई कोई वखते-कृपणतानो आरोप लोको ठोकी बेसाडे छ पण ते व्या- जबी नथी. खरी रीते तो आवाज माणसो वधारे डाह्या अने दीर्घ- दर्शी होवाथी ते पोताना उपार्जित द्रव्यनो खरी तके सदुपयोग करवा चूकता नथी. कृपण अने करकसरथी काम करनारमा आवो महान् अंतर छे. कृपण द्रव्य उपर खोटी ममता राखी तेनो संयम करवामांज सार समजे छे, ज्यारे करकसरना नियमोने समजनार मुज्ञ जनो संचित धनना सारामां सारे उपयोग करवामां सार समजे छे. कृपणपणाथी नव नंद राजाओए सोनाना डंगर कराव्या हता, ते कइ तेमना काममां आव्या न हता. देवताए ते अपहरी लीधा हता; अने उलटा ममतावडे ते घणां दुःख पाम्या हता. एम समजीने कृपणता दोषने तजी उदार दीलथी मेवनी पेरे दान दई लोकनुं दारीद्र दूर करी पासलक्ष्मीनो अने स्वजन्मनो लाहो लइ लेवो युक्त छे. ६

--
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सूक्त मुक्तावळी.
४१ पारकी आशा-स्पृहा या याचना नही
करवा हितोपदेश.
निरमळ गुण राजी, त्यां लगे लोक राजी,
तब लग कहे जीजी, त्यां लगे प्रति झाझी;
सुजन जन सनेही, त्यां लगे मित्र तेही,
मुखथकी न कहिजे, ज्यां लगे देहि देहि.
जइ वडपण वांछे, मागजे तो न कांइ,
लहुपण जिण होवे, केम कीजे तिकांड;
जिम लघु थइ शोभे, वीरथी दान लीg,
हरि बनिनृप आगे, वामनारुप कीg......
भावार्थ:-ज्यां सुधी जीव लोभ-लालचने वश थइ निज
मान (Self-Respeet) मूकी मने आपो आपो एवां दीन वचन
मुखथी उच्चारतो नथी त्यां सुधीज तेनामां रहेला कंइक निर्मळ
गुणोनो प्रभाव सामा उपर पडे छे, त्यां सुधीज तेना उपर लोको
राजी राजी रहे छे-फीदा थइ जाय छे, त्यां सुधीज सहु तेने जी
जी एवां आवकार भरेलां वचनथी बोलावे छे, त्यां सुधीज लोको
तेना उपर वधारे प्रीति राखे छे, अने त्यां सुधीज स्वजन स्नेही
अने मित्र मानसन्मान करवा सन्मुख थाय छे. १.
१ गुणनी श्रेणि. २ हलकापणुं.
.

पारकी आशा-स्पृहा करवा हितोपदेश.
१२१
44
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शास्त्रकार कहे छे के जो तुं वडाइ-म्होटाइ-गुरुता-प्रभुता
चाहतो होय तो कदापि कोइनी पासे दीनता दाखवी कंइ द्रव्य
याचना करीश नहि. जेनाथी उलटी लघुता-हलकाइ थाय तेवी
दीनता-याचना शा माटे करवी जोइए ? याचना करनारने लोक
तृणथी पण हलको लेखी काढे छे, तेथी गमे ते रीते निज जीवन
निर्वाह करी लेवो, पण नजीवी वावत पारकी याचना करी हलका
पडवु उचित नथी. २.
आपणा जीवनव्यवहारमां आवा अनेक प्रसंगो आवी पडे
छे पण जे आत्मबळ-जात महेनत ( Sel -Help) उपरज द्रव
आधार राखी, बीजा उपर आधार नहि राखतां स्वजीवन निर्वाह
करी ले छे ते पोतानी आवरु (Self-Respect) साचवी सारूं
नाम काहे छे.
आ वात पर पौद्गलिक वस्तुनी चाइनाना अंगे कहेवामां
आवी छे. तेवी तुच्छ आशा तृष्णानो अनादर करी जो आत्माना
स्वभाविक गुणनीज चाहना थाय, ज्ञान दर्शन अने चारित्रादिक
निज गुण प्रासिनी ज प्रबळ इच्छा थाय नी तेवा आत्मगुणो माटे
ज संत महाशयोनी पासे दीनता (नम्रता) पूर्वक ते ते गुणोनी
ओळखाण कराय-समज मेळवाय-तेनीज ह प्रतीति-श्रद्धा कराय
अने अन्य मोहजाळ मृकी तेमांज एकनिष्ठ थवाय ए तो अत्यंत
हितकारक छे, केमके एथी अनुक्रमे स्वाभाविक पूर्ण प्रभुता पामी
सिद्ध बुद्ध अने मुक्त-थवाय छे.

૬૨૨
.
सूक्त. मुक्तावळी.
४२ सदुपायवमे निर्धनता दूर करी सव्य
प्राप्त करी लेवा हितोपदेश.
धनविण निज बंधु, तेहने दूर छंडे,
धनविण गृहभार्या, भातृसेवा न मंडे;
निरजळ सर जेवो, देह निर्जीव जेवो,
निरधन तृण जेवो, लोकमां ते गणेवो. ११
सरवर जिम सोहे, नीरपूरे भरायो,
धन करी नर सोहे, तेम नीते' उपायो;
धन करिय सुहंतो, माघ जे जाण हुँतो,
धन विण पग सूजी, तेह दीठो मरतो. ૧૨
भावार्थ:-द्रव्यप्राप्ति वगर निर्धन माणसने कोइ आवकार
आपतुं नथी. बंधु-सहोदर पण तेनो संग-प्रसंग राखता नथी-ते-
नाथी अलगा थइ रहे छे, अने घरनी भार्या (गृहिणी) पण भा-
वथी तेनी सेवा चाकरी करती नथी, तो पछी पुत्र परिवारनुं तो
कहे ज शुं? धन-संपत्ति वगरनो, निर्धन माणस जळ वगरना
मुका तर-सरोवर जेवी, जीव वगरनी निर्माल्य काया जेवो अने
अहीं नहीं अथडाता असार तृणखला जेत्रो जगतमां हलको देखाय
-गणाय छे...
१ नीतिए उपार्जन करेल. २ माघ पंडित दाता हतो.
-

सदुपायवडे निर्धनता दूर करी लेवा हितोपदेश. १२३ जेम निर्मळ जळसमूहथी सरोवर शोभे छे तेम मनुष्य पण न्याय नीति अने प्रमाणिकपणाथी उपार्जित करेली.लक्ष्मीवडे शोभा पामें छे. जेम सुंदर शाखा, पत्र, पुष्प अने फळवडे वृक्ष शोभे छ तेम सुंदर नीतिथी उपार्जन करेला द्रव्यवडे मनुष्य घणी शोभा पामे छे; पण जेम जल वगरनुं सरोवर पत्र पुष्पादिक वगरनुं वृक्ष, तीलक वगरनुं कपाळ, न्याय वगरनुं राज्य, अने शील वगरनी युवती-स्त्री शो- भतां नथी तेम द्रव्य वगर गृहस्थ पण शोभा पामतो नथी. माघ जेवा म्होटा पंडित कविओ पण द्रव्य वगर छेवटे टळवळता मरे छे; तेथी सद्गृहस्थे भविष्यनो विचार करी सारा मार्गे द्रव्य उपार्जन करी राखq उचित छे. पोतानी आवरु छेवट सुधी साचवी राखी संसारमा सुखी थवानो एज सारो रस्तो छ. २. २. - सद्उपाय सेवन करता छतां पूर्वकृत अंतराय कर्मना उदयथी द्रव्य-आप्ति न थाय अथवा अल्प थाय तो ते शोचवा योग्य नथी. भाग्यमां होय तेटलुंज द्रव्य उद्यम करतां सांपडे छे, तो पछी नी- तिनो मार्ग तजी शा माटे अनीतिनो मार्ग लेवो जोइए ? अनी- तिनुं द्रव्य लांबुं टकतुं पण नथी अने.सुखे खवातुं के सन्मार्गे वव- रातुं पण नथी, उलटी बुद्धि बगाडी ते उन्मार्गे दोरी दइ जीवने दुःखी. करी मूके छे. कोइ प्रकारनां कुव्यसन (परस्त्री-वेश्यागम- नादि) सेवा ए पण द्रव्यहानिवडे शीघ्र निर्धनता पेदा करवाना ज उपाय छे एम समजी जल्दी एथी अलगा थइ जवू.

सूक्त मुक्तावळी.
१४
,
४३ राजसेवा वर्णन-अधिकार.
सजनशुं हित कीजे, दुर्जना शीख दीजे,
जग जन वश कीजे, चित्त वांछा वरीजे;
निज गुण प्रगटीजे, विश्वना कार्य कीजे,
प्रभु सस विचरीजे, जो प्रभु सेव कीजे.
भगति करी वडानी, सेव कीजे जिकांई,
अधिक फळ न आपे, कर्मथी ते तिकांड;
जळधि तरीय लंका, सीत संदेश लावे,
हनुमंत करमे ते, राम कच्छोट पावे. १५
भावार्थ:-जो तथा प्रकारनी योग्यता प्राप्त करीने कोइ
समर्थ राजा-महाराजा के स्वामीनी सेवा करी तेनी प्रसन्नता मेळवी
शकाय तो पोतानी बुद्धि-शक्तिथी पोते पण पोताना स्वामीनी
जेम स्वतंत्रपणे धार्यां काम करी शके. ते धारे तो अनेक सज्जनोर्नु
हित करी शके छे, दुर्जनोने दंड-शिक्षा आपी शके छे, सहुने निज
चश वर्तावी शके छे अने मनोवांछना पूरी शके छे. पोतानी शक्ति
खोलवी शके छे तथा कइक परोपकारनां काम करी शके छे. गमे
तेटला आदरथी गमे एवा समर्थनी सेवा करवामां आवे तो पण पो-
ताना नशीवमां होय एथी अधिक कशुं ते आपो शके नहि अने

राज सेवा वर्णन-अधिकार. १२५ पोते मेळवी शके नहि. जुओ ! हनुमानजी समुद्र तरीने लंकामां जइ सीता सतीनो संदेशो लइ रामचंद्रजी पासे आव्या त्यारे ते बक्षीस (इनाम) तरीके रामचंद्रजी पासेथी स्नान करती वखते पहेरवानो कच्छोट ज पाम्या हता. ते अनुमानथी बधुं जाणवू. परमार्थ:-माणसो कंइ कई प्रकारनी होंशो करे के न करे, पण पुन्य वगर के पुरुषार्थ कर्या वगर ते होंशो पूरी थइ शकती नथी. घणीवार घणा एकना प्रसंगमां तो मननी होश मनमा ज रही जाय छे. जो होंश पूरी करवी ज होय तो तेवो योग्य प्रयत्न पण करवो ज जोइए. पोतानी शक्ति खीलववा जरुरी साधननो उपयोग करवो घटे ते करवो जोइए. जेमणे आगला जन्ममा सुकृत्य कर्यो होय तेमने तेमना शुभ कृत्यथी के पुन्यना मभावथी एवी स्थिति सहेजे प्राप्त थाय छे के ते पोतानी बधी होशो पूरी करी शके 2. मोटुं जैश्वर्य, विशाल बुद्धि, लोकप्रियता, कार्यदक्षता अने परो- पकार वृत्ति विगैरेनी प्राप्ति सारां पुन्य वगर थइ शकती नथी. पूर्व जन्ममा शुद्ध भावथी अल्प पण दानादिक शुभ करणी करी होय छे तो तेना प्रभावथी अन्य जन्ममां जीव एवी विशाळ सामग्री पामी शके छ के ते शुभ सामग्री साथे सुबुद्धिना योगे धारे तेटलां सारां काम करी शके छे. शालिभद्र जेवां विशाळ भोग, अभयकुमार जेवी विशाळ बुद्धि अने चक्रवर्ती जेवू साम्राज्य पामी जो तेनी साथे सद्- बुद्धिनो उत्तम योग थयो होय तो बाकी शुं रहे ? आ लोकमा प्राप्त- सुख संतोषथी भोगवी, स्वपरहित करवा साथे जे उलटभर्यों प्रयास कयों होय छे तेथी भवान्तरमा पण ते अवश्य सुखी थाय छे. दुःख , १२६. सूक्त मुक्तावळी. ए आपणे ज करेली भूलनी शिक्षा रुप छे अने ते आपणने जाग्रत् करवा-सचेत बनाववा माटे जरुरनु पण छे. दुःखमा घणे भागे आ- पणुं भान ठेकाणे आवे छे; परंतु सुखमां अने दुःखमा जेमने सरखी जागृति रही शके छ तेमनी तो बलिहारी जछे. तेमनो वैराग्य उत्कृष्ट छे. जो सेवाज करो तो एवा शाणा अने उदार स्वामीनी करी के जे तमारी खरी सेवानी यथार्य कदर करी तमने निवाजी शके बेक- दर स्वामीनी सेवा करवाथी हित थवं मुश्केल ज छे. जेना प्रसादथी राजा, महाराजादिक उंची पदवी प्राप्त करी शकाय छे ते धर्म-म- हाराजानी ज सेवा जो शुद्ध निष्ठाथी करी शकाय तो पछी बीजा कोइनी सेवा करवानी क्यारेय जरुर रहे नहि. एक धर्मकळा ज प्राप्त करो शकाय तो बीजी वधी कळा सेहेजे प्राप्त थइ शके. ४४ खळता-जनता वर्णन. रस विरस भजे ज्युं, अंब निंब प्रसंगे, खळ मिलण हुवे त्युं, अंतरंग प्रभंगे; सुण सुण ससनेही, जाणीले रीति जेही, खळ जन निसनेही; तेह' शुं प्रीति केही... १६ मगर जळ वसंतो, ते कपीराय दीठो, मधुर फळ चखावी, ते कयों मित्र मीठो; . . - - - खळता-दुर्जनता वर्णन. १२७ :- कपि कलिज भखेवा, मत्स्य खेलि खळाइ, जळ महीं कपि बुद्धि, छांडी दे ते भलाइ. १७ भावार्थ:-जेम कडवा लींबडाना प्रसंगी आंवो पातानो स्वाभाविक रस तजी, विरसता-कटुकताने पामे छे तेम सारो मा- णस खळ-दुर्जनना प्रसंगथी बगडी खळना-दुर्जनताने धारण करी ले छे. अहो अहो प्रेमी सज्जनो! ए वात दीलमां चोकस करी राखो के खळ लोको केवळ स्वार्थ अंध अने प्रेमशून्य होय छे. तेमनी संगाते प्रीति करंची नकामी छे; एटलुंज नहि पण दखते ते भारे अनर्थका- रक पण थाय छे. ए वातनुं समर्थन करवा अत्र एक कथानक कहे छे. जळमां वसनार। एक मगरमच्छने एक वानरे दीडो अने तेने मीठां स्वादिष्ठ फळ चखाडीने पोतानो मनमान्यो मित्र बनाव्यो. परिणाम ए आव्यु के ते वानरर्नुज काबर्जु खादा मगरे बाजी रची तेने फसाव्यो; परंतु पछीथी खरी हकीकन जगातां वानर तेमांथी रची गयो. पेलो मगर कोइ वखत थोडां मधुरां फळ-पोतानी स्त्री (मगरी) पासे लइ गयो अने तेने वधी हकीकत कही दीधी; ए- टले मगरीए कयु के हमेशां आवां मीठां फळ खानारा वानरर्नु का- ळजु केवं मीटुं हशे ? मारे तो ए वानरर्नु काळर्जुज खावा जोइए, गमे तेवी चतुराइ करीने मने तेनुं काळजु खास आपो. मगरे तेते बहु बहु समजावी पण ते बीजी काइ रोते समजी नहि, त्यारे मगरे वानर पासे बखतसर आवी प्रपंच रची नेने आई. अबल्ल समजावी पोतानी स्त्री मगरीनु मन मनावा वानरने पोतानी पीठ उपर बेसा- ?

. सूक्त मुक्तावळी. डीने ते जळमा तरतो चाल्यो. मार्गमां खरी हकीकत मगरे जगावी दीधी, तेथी बुद्धिबळ वापरी वानर वची गयो. परमार्थ:--आंबाना अने लींवडानां मूळ साथे मळ्यां होय तो ते नींबना प्रसंगयीं आंवो विणसी जाय छै; एटले कींबडानी जेबा कडवो बने छे. अर्थात् आंबामा कडवाश आवी जाय छे एटले तेना म्वाभाविक मीठो रस नष्ट थइ जाय छे-तेमाथी मीठाश जती रहे. जड जेव लेखाता आ वृक्षोमा पण नवळी सोवतथी आवं विपरीत परिणाम प्रगटपणे आवतुं जगाय छे, तो पछी जेनामां अ- नेक दुर्गुणां प्रगटपणे देखाता होय एवा नवळां (दुर्जनो) नो वा- रंवार मंगप्रसंग करवाथी सारां ( सजना) ने पण अनिष्ट परिणाम आवे एमां आश्चर्य शुं ? हीणानी सोवतथी हीगुंज परिणाम आवे. जेवी मावत एवी असर ए कहेवन अत्रे लागु पडे छे. जे भा- बुक द्रव्य होय तेने गुण दोपनी असर अवश्य थाय छे. आपणे जो दोपथी वचवू ज होय तो तेवी नवळो सोवतथी सदंतर दूरज रहे. तेमज आपणा गुणनी रक्षा तथा पुष्टि करवा माटे आपणे आपणा निष्कारण बंधु समान उपगारी संत-मुसाधुजनोनी सेवा-उपासना जरुर करवी. दुर्जन-खल लोको कोइना मित्र न होय अने जो होय तो ने स्वार्थ पूरताज होय, तेथी तेमनी मित्रताथी कदापि हित संभवे महिज. सज्जनोनी मित्रता खरी के जे केवळ हितरुपज होय छे. गमे तेटली कसोटी करी जुओ.पण सज्जन पोतानी सजनताज दा- खोके त्यारे दुर्जन पोतानी दुर्जनताज दाखवे छे. जेम फणी धरना भाथा उपर रहेला मणिमां.फणीधरनुं विषसंक्रमी शकतुं नथी, ते तो विश्वास विषे. १२४ उल? विषविकारने टाळी शके छे.तेम परिपक्वं शनि. (अनुभव) दशावालाने तेवा दुर्जननी पाश न लागे, केमके ते तो उलटा राग- देषादिक विकारने दूरज करें छे, परंतु काचापोचाओए तो नंबळी- सौवतथी सदाय चेतता रहेवानी जरुर छे; केमके तेमने तेनों चेप- जलदी लागी शके छ अने परंपराए ते वधतो जाय छ'एम' समजी ऑपणे तो अधिक चेतता रहे ४५ अविश्वास विषे. इन्द्रवजा विश्वासी साथे न छळे रमीजे, न वैरी विश्वास कदापि कीजे; जो चित्त ए धीरगुणे धरीजे, तो लच्छी लीला जगमा वरीजे. १८ चाणायके ज्युं निज कार्य सार्यों, जे. राजभागी नृप तेह मार्यो;. जों घुअडे काग विश्वास कीधों, तो बायसे घूकने दाह दीधों. १९ भावार्थ अने परमार्थः सहज स्वभावथी के धर्मबुद्धिथी आपणा उपर श्रद्धा-विश्वास राखी रह्या होय, औरणे तेनु क- .

१३० सूक्त मुक्तापळी. दापि अहित करीए के तेने अहित मार्ग दोरीएं एवं जे स्वममा पण समजता न होय अर्थात् जेने आपणा संबंधी कशी गेरविश्वास नज होय तेवा भोळा भद्रिक श्रद्धावंत विश्वामुने कदापि छेतरवानो -दगो देवानो स्वममां पण विचार करवो नहि; केमके विश्वास- घात करवा जेवू एके उग्र पाप नथी. जे.वीजा कोइनो विश्वास करता न होय ते पण धर्म के धर्मीजनोनो तो विश्वास करे छेज, तेवा श्रद्धालु जनोने छेतरवा, भ्रष्ट करवा, तेमने उधे रस्ते दोर- ववा अने तेमर्नु अहित कर ए धर्मना व्हाने चोखी ठगाइ के वि- श्वासघात ज कहेवाय. तेवु पापी अने हीचकारु कार्य कदापि करवू नहीं. तेमज जे सदाय छळ ताकीनेज रहेता होय अने तेवी तक म- लतांज छेतरपिंडी करवा चूकता न होय एवा बने प्रकारना (बाह्य अने अभ्यंतर) शत्रुओनो शाणा माणसोए कदापि विश्वास करवो नहि. मन, वचन के कायाथी अद्वितज करनार, करावनार तथा अनुमादनार वाह्य शत्रु लेखाय छे, ज्यारे काम, क्रोध, मोह, मद, लोभ अने हादिक आंतर शत्रु कहेवाय छे. तेमनो विश्वास क- दापि करवो नहि. अर्थात् तेमनाथी सदाय चेतना-जागता-साव- धान ज रहे. तेमां कदापि गफलन करवी नहि वळी 'बृहस्पति- रविश्वासा-वृहस्पति कहे छ के कोइनो विश्वास राखवो नहि, तेनो आशय एवो लागे छे के कोइना विश्वास उपर थोभी न रहे. स्वाश्रयी बनवू. परनी आशा राखी बेस नहीं. वने नेठलं वधु काम जाति महेनतथी ज कर, दरेक कार्यमा वने नेटली जाति देखरेख राखवी. जेधी काम बगडे नहि पण धार्या प्रमाणे वने अने अविश्वास विषे. १३१ बीजा उपर विश्वास राखी रहेवाथी कोइ वखत पस्तावानो वखत आवे छे ते आवे नहि. चळी सतत् अभ्यासथी कार्थ दक्षता आवे छे, आत्मश्रद्धा द्रढ थाय छे अने वीर्योल्लास वधतो जाय छे. मोजशो- खमां पडी जो जोखमदार काम बीजाने सुप्रत करी देवामां आवे छेतो वखत जतां बहु नुकशानीमां उतरी जर्बु पडे छे अने लांबो वखत सोस, पडे छे. 'सगा बापना पण विश्वास करवो नहि ' ए आवा आशयथी कहेवायु लागे छे, बाकी तोमातपितादिक वडील जनाना, विद्यागुरुनो तथा धर्मगुरु विगेरे उपकारी अने गुणी जनानो यथा- योग्य विश्वास करवो पडे छे, अने करवो जोइए ज. जो स्थिर चित्त थी धीरज राखी ए नैतिक गुणर्नु पालन करवामां आवे, नैतिक हिंमत हारवामां न आवे, सर्व वाते सावधानपणुं साचवामां आवे, उक्त नीतिवचनोनो प्रमादथी भंग करवामां न आवे तो जगतमा मनमानी लक्ष्मी सुखे पामी शकाय छे. जेम महेल उपर चढनारने कंइ पण द्रह आलंबन ग्रहण करी राखवानी जरुर पडे छे, सावधा- नपणे ज उंचे चढनार सहीसलामन चढी शके छे, तेमा जो ते गफ- लत करे छे तो नीचे पटकाइ पडे छ, पछी तेने उंचे चढवू कठण थइ पडे छे तेम अत्रापि यथायोग्य समजी लेबु. एटले के पातानी उन्नति इच्छनारे सर्व वाते सावधान रहेQ जोइए. सर्वमान्य नीतिना मार्गर्नु अतिक्रमण (उल्लंघन) न ज करवु जोइए. तोज तेनी उन्नति सधाइ शके छे. अन्यथा उन्नतिने बदले अवनति ज थवा पामे छे. आ वात धर्म-कर्म बनेमां लागु पडे छे. सरल व्यवहारी वन, सरलनी सं- गाते सरलताथी ज वर्तवं तेनीसाथे शठताभूलेचूके पण करवी नहि.

- १३२ सूक्त मुक्तावळी. हा, 'शठं प्रति शकयं कुर्यात्'-शंठ' (मायावी) शत्रु प्रत्ये प्र- संग पडतां शठता-माया करवी पडे तो जूदी वात. तेनों हेतु पण एवो होय के ते. आपणी आंखमा धुळ नांखी चाल्यो न जायं तेटला पूरती सावधानता राखवी. गमे . ते रोते सुधारी शकाय एम होय तो तेने सुधारवा दया-अनुकंपा पण करवी. तेने केदार्च शिक्षा ज करवी पडे तोपण तेने सुधारवानी अवकाश रहे तेवीज दया दीलथी करवी, कंशो उपाय न ज चाले त्यारे ज तेंनी उपेक्षा करवी. गमे तेवा अपराधीनुं पण अंतरथी. अहित करवानी बुद्धि तो दयालु दीलने नहिं ज जोइए. जे जे दुर्गुणने लइने गमे ते जीव अपराधी ठरे छे ते दुर्गुणोने ज.दूर के- रखा द्रढ प्रयत्न करवो एज उत्तम नीतिवंतनुं खास कर्तव्य छे, अने एवां सदाचरणथी ज मोक्ष पर्यंतनी अक्षय लक्ष्मी लीला अनायासे प्राप्त थइ शके छे. आ वति जेने विवेकद्रष्टि जागी होय तेज सम- जीने आदरी शके छे; बाकी तो लोभाधपणे चाणाक्ये खरा रा- ज्येना हकदार राजा पर्वतने मारी पोतानो स्वार्थ साध्यो तेम बने 2. तुच्छ स्वार्थ सांधवा आवी हत्या करवी ए बहादुरीनुं काम न कहेवाय. खरुं छे के लोभाधनो विश्वास करतो ते हितकर नज थाय. एक घुवडे प्रपंची कागडाओनो भोळपणथी विश्वास कों हत्तो, जथी बधा कपटी कागडाओए. मळीने युक्तिथी तेनो अने वीजा पाइक घुअडोनों घाण काढची हतो. तेम न. थाय एवी साव- धानंता तो अवश्य राखंवी ज जोइए उक्त भोळा घुअडनी पेरे जे ३ अविश्वास विषे. समयोचित सावधानता राखता नथो, स्वकर्त्तव्य कर्ममा प्रमाद के शिथिलता करे के तेमना पण तेवा हाल.थाय तो तेमां कंइ नवाइ जेवू नथी. ज्यारे स्वहित साचववामां असावधान या बेफोकरा रहे- वाथी अन्य कोइने हानि थवा पामे छे त्यारे तेनो टीका करतां आवडेछे ने “परोपदेशे पांडित्यं बीजाने इहापण देवा शूरापूरा थइ जाय छे पण ज्यारे एज डहापण प्रोतानी जातने आ. पवानी जरुर पडे छे त्यारे ते केवळ आळसु-प्रमादी बने छ एज खेदनी वात छे. एक समर्थ विद्वान् ग्रंथकार पवित्र बोधवाक्य रुपे जणावे छे के 'अन्यने शिखामण देवामां ज विचक्षणता-डहापण बतावनारा लोकोने मनुष्यनी पंक्तिमां कोण लेखे छे ? जेओ पोतानी जातने ज खरी शिखामण दइ जाणे छे तेमने ज अमे मनुष्यनी गण- श्रीमां गणीए छीए. अर्थात तेमने ज खरेखरा मनुष्यनी पंक्तिमां लेखवा योग्य छे के जेओ पोतानी जातनेज खरी हितशिक्षाथी जामत राखता रहे छे. दोषग्राही नहि थतां गुणग्राही थर्बुज हित- कारी छे. तेम छतां अनादि मिथ्यात्व योगे जीव दोष तरफज वधारे ढळी जाय छे अने गुण-गुणीनी,बहुधा ते उपेक्षा ज करतो रहेछ, जेथी वापडा जीवर्नु हित थइ शकतुं नथी. भाग्ययोगे गुरुकृपाथी शामा स्वहित रहेलं है ते यथार्थ समजी के समजबानो खप करी, तेमां वरावर श्रद्धा-प्रतीति राखी, ते प्रमाणे आचरण करवा जोव सावधान बने तो उभय. लोकनी लक्ष्मीलीला तेने सहेजे आवी मळे अने ते अनेक जीवोनु हित पण करी शके. . .

One
सूक्त मुक्ताबळी.
४६ मैत्री (मित्रता) वर्णन अधिकार.
करी कनक संरीसी, साधु मैत्री सदाइ,
घसि कसि तप वेधे, जास वाणी सवाइ;
अहव करह मैत्री, चंद्रमा सिंधु जेही,
घट घट वध वाधे, सारिखा ३ सनेही. २०
इह सहज सनेहे, जे वधे मित्रताइ,
रविपरि न चळे ते, कंज ज्युं बंधुताइ;
हरि हळधर मैत्री, कृष्णने जे छ मासे,
हळधर निज खंधे, लै फों जीव आशे. २१
भावार्थ-अहो भव्यात्माओ! मित्रताइ करवी तो शुद्ध
सुवर्ण जेवा निर्दोष साधु-सज्जन संगाते ज करवी, केमके जेम
सोनाने कसोटीए चढाववामां आवे छते तेनी खरी किंमत थाय के
अने तेने सख्त अग्निनो ताप आपवाथी मळनी शुद्धि थतां तेनो
सवायो वान वधे छे, एटले तेनी किंमत पण वधे , तेम खरा मि-
त्रनी परीक्षा कहो के किंमत पण कष्ट के आपदा पडतांज थइ शके
है. तेवा प्रसंगे खरो मित्र जूदाइ वतावतो नथी, एटलं नहि पण
प्रसन्न चित्तथी-उदार दीलथी बनती वधी सहाय करवा तत्पर रहे
के अने पोतानी फरज वरावर बजावे छे..खरो मित्र सुखमां अने
दुःखमा समभागी बने छ. अथवा चंद्रमा अने सागर जेची गाद

मैत्री (मित्रता) वर्णन अधिकार. प्रेमभरी मैत्री करवी. जेम पूर्ण चंद्रकळाना योगे समुद्रनी वेल वधे छे अने तेनी शोभायां पण वधारो थाय छे तेम संत सुसाधुजन संगात मैत्री करवाथी सुयोग्य जीवमा गुणनो पुष्कळ वधारो थवा पामे छे. एटलं ज नहि पण तेथी तेनी प्रतिष्ठा पण बहु सारी वधवा पामे छे. १ जे शुद्ध निष्ठाथी (साफ अंत:करणथी) मित्रता बांधे के ते चळती के विछडती नथी; अर्थात् ते कायम नमे छे. जेवी प्रीति पंकज अने सूर्य बच्चे छे-मूर्यनो उदय थतां पंकज-कमळ-विकसे छे- खीले छे अने सूर्यास्त थतां पार्छ कमळ संकोचाइ जाय छे, तेवी पीति सज्जनो बच्चे होय छे. ते एक बीजानो उदय-उन्नति थतां विकसित-प्रमुदित थाय छे अने एक बीजाने आपदा पडतां खित्र थाय छे-संकोच पामे छे. वळदेव अने वासुदेवनी एवीज गाढ प्रीति होय छे. ज्यारे कृष्णवासुदेव कालवश यया त्यारे बळदेवजी केवळ गाढ स्नेह-मोहवश तेने जीवता जाणी छ मास सुधी तेना देहने पोनाना खभा उपर लहीने फर्या हता. केटलीक वखत एकबीजानो वियोग थतां दारुण दुःख थवाथी प्राण त्याग पण थइ जाय छ, जेथी दूध-जळ जेवी मैत्री.वखाणी छे. २ परमार्थ-मित्रनी खरी परीक्षा कष्ट आवी पडतां थाय छे. सख्त अमिनो ताप लागतां सोनु चोख्खं थाय छे त्यारे पितळ श्याम थाय छे-झांटुं पडे छे. खरे सज्जन मित्र जेम मुखमां भाग ले छे तेम दुःखमां पण पूरती मदद करे छे. खरा निःस्वार्थी मित्रनां लक्षण आ प्रमाणे वर्णव्यां छ:-ते आपणने पापथी (पाप-कर्मथी) सूक्त मुक्तावळी. निवारे छे,बपावे के अने, सत्कर्ममा जोडे , आपणी एव ढांक छे अने सद्गुण वखाणे छे-विस्तारे छे, ते कष्टमासने तजी देतो नथी पण तेने अवसरोचित मदद, ट्रेको के आलंबन आपीने तेनो उद्धार करवा मथे छे. अभयकुमार जेवा बुद्धिशाळी अने धर्मचुस्त सज्जन मित्रो जगत्मा विरलाज होय छे. पूर्वक्ति लक्षणोथी तेमनी सज्जनता स्पष्ट थइ शके छे. गृहस्थ-मित्रो करवा तो एवानेज करवा, के जेओ बने तेटलो स्वार्थ त्याग करीने परहित करवामां ज तत्पर रहे. सो- नाने गमे तेटलु तपावे तोपण तेनो वान वधतोज जवानो, शेलडीना शत खंड करे तोपण ते तो सरस रसज आपे: अने चंदनने गमे तेटलं घसे, छेदे, कापे, पीले के वाळे तो पण ते खुशबोदार सुगंधीज आपे: केमके तेज तेनो मूळ जातिस्वभाव छे..तेवीज रीते उत्तम स- जनोने पण प्राणान्त कष्ट आवी पडे तो पण ते पोतानी सज्जनता तजे नहींन. सन्त महात्माओ एवाज उत्तम होय छे. तेओ-चंद्रमानी जेवा शीतळ, सागरनी जेवा गंभीर अने भारंड पंखी जेवा प्रमादर- हित होय छे. तेओ हिंसादिक पापमानना त्यागी अने अहिंसा, सत्यादिक महाव्रतना धारक होय छे. राजा अने रंक, तृण अने मणि, कनक अने पथ्थर एमने समान भासे छे. ममतारहित थवाथी तेमने सहुना उपर समान भाव होय छे. वळी मान-अपमान, निंदा -स्तुति तरफ निज लक्ष देता नथी, तेथी ते हर्ष-शोकने प्राप्त थता नथी, दुनियामा सघळी शुभ उपमा एमने छाजे छे. एवा निःस्पृही, सत्यनिष्ट साधु-महात्मानु एकनिष्ठाथी शरण लेनार मुभागी जनोर्नु श्रेय थायज़. - - pan

an
२२
जुगार प्रमुख दुर्व्यसनो टाळी चालवा हितोपदेश. १३७
४७ जुगार प्रमुख जुर्व्यसनो टाळी सुमार्गे
चालवा हितोपदेश.
मलिन मलिन शोभा, सांजथी जेम थाये,
इह कुविसनथी त्युं, संपदा कीर्ति जाये;
कुविसन तिणि हेते, सर्वथा दूर कीजे,
जनम सफळ कीजे, मुक्तिकांता वरीजे.
द्रुतविलंबित.
सुगुरु देव जिहां नवी लेखव,
सहुए
जिण खेलवे;
भवभवे भम, जिण उवटे,
कहोने कोण रमे तिण जूवटे. २३ (द्युत.)
उपजाति.
जे मांतलुब्धा नर ते न होहे,
ते राक्षसा मानुष रुप सोहे; (मांसभक्षण)
जे लोकमां नर्क निवास ओरी,
निवारिये ते परद्रव्य चोरी-
२४ (चोरी)
धन विणा

, -~ .१४० सूक्त मुक्तावळी. जुओ सिंहगुफावासी मुनि जे महा तपस्वी हता अने,जेना प्रभावथी विकराल सिंह पण तेने काइ उपद्रव करी-शकतो नहोतो-शांत थइ जतो हतो, तेज मुनि स्थळिभद्रनी इर्ष्याथी कोश्यावश्याने त्यांचा- तुर्मास करवा आव्या. कोश्याना एक कटाक्ष मात्रथीज घायल थइ गया अने कामसेवानी प्रार्थना करी. कोश्याए द्रव्यनी आवश्यकता पहेली बतावी, तेथी लक्षमूल्यनु रत्नकंबळ लेवा मुनिपणाने बाजुपर मूकीने चोमासामा नेपाळ देशे गया. वेश्यागमन आटलुं वधु हानि- कारक छे, तेथी ते.अवश्य तजवा लायक छ. ६.छ? दुर्व्यसन शि- कार करतो ते छे. शास्त्रकार कहे छे के हे. उत्तम प्राणी! तुं.मृगया- शिकार के जे जीवघात रुप छे तेने तजी दे .अने सर्व जीवपरनी दयाने सदा-निरंतर भज-अंगीकार कर. जुओ मृगयाथी कृष्ण रा: मचंद्रादि जेवा महान् रांजा पण अनेक प्रकारनां दुःख पाम्यां है. सातमु दुर्व्यसन परस्त्रीगमन करवु ते छे. उत्तम पुरुषो निरंतर स्व- दारासंतोषीज होय छे. शास्त्रकार कहे छे के-जो तने स्वर्गनां सुख मेळंववानी इच्छा के आशा होय तो तुं परनारीना विलासने तेना संसर्गने सर्वथा तजी दे. परदारागमनथी आ जन्ममां पण दुःख छे अने परलोकमां पण सर्वथा मुखनी प्राप्ति थती नथी. दुःखज प्राप्त थाय छे. शार्दूलविक्रिडीत वृतम. जूवा खेलण पांडवा वन भम्या, मद्ये बळी द्वारिका, "मांसे श्रेणिक नारकी दुःख लह्यां, in- -- Droom Ans , जुगार प्रमुख दुर्व्यसनो टीळी चालवा हितोपदेश. ६४१ बाँध्यान के चौरिकी; आखेट दशरथ पुत्र विरहीं, केवन्नो वेश्या घरे, लंकास्वामी परत्रिया रस रमे, जे ए तजे ते तरें. जुगार, मांस, दारु, वेश्या, आहेडो (शिकार), चोरी अने परस्त्री सेवा ए सांत कुव्यसनो सेव्या छतां जीवने अति घोर नरक गतिमां लइ जाय छे अने अहीं पण प्रगटपणे लक्ष्मीनी अने कीर्ति- नी भारे हानि करे छे. एम समजी शाणा जनोए उक्त सात कुव्य- सनोने सर्वथा तजवां जोइए. ए कुव्यसनो तजवाथीज पवित्र धर्म- करणी करवानी सुबुद्धि सूझे छे अने स्वजन्म सफळ करी परिणाम मोक्षलक्ष्मी सहेजे माप्त थाय छे. तपास करो ! जुगारथी पांडवोने १४ वर्ष सुधीं आमतेम राजपाट तजी भटकवू पडद्यु, सुरापानथी यादवोनी द्वारिकानो अग्नियोगे विनाश थयो, मांसभक्षणवडे श्रेणि- कराजाने नरकनां दुःख भोगवां पंडयां, चोरीवडे अनेक चोरो प्रगट वध बंधनादिक पामे छे, आहेडा कर्मवडे रामचंद्रजीने सती सी- तानो वियोग थयो, वेश्यागमन वडे कैवन्नो शेठ धन रहित थइ अ- पंमान पाम्यो, अने रावण परस्त्रीना विषयरस वडे लंका नगरीनु . राज्य हारी, मरण शरणं थइ नरकगतिमां गयो, जेथी दुनियामा तेनी भारे अपकीर्ति थइ. एमं समजी जे सुज्ञ जनो ए कुव्यसनो

१३८
सूक्त मुक्तावळी.
भुजंगप्रयात.
सुरापानथी चित्त संभ्रांत थाये,
गळे लाज गंभीरता शीळ जाये;
जिहां ज्ञानविज्ञान मुंझे न सुझे,
इशुं मद्य जाणी न पीजे न दीजे. २५ (मद्यपान)
कहो कोण वेश्यातणो अंग सेवे,
जिणे अर्थनी लाजनी हाणि होवे;
जिणे कोश सिंहगुफाए निवासी,
छळ्यो
साधु
नेपाळ गयो कंबळाशी. २६
वेश्यागमन.
रथोडता वृत्त.
मृगयाने तज जीवघात जे,
सघळा जीवदया सदा भजे;
मृगयाथी दुःख जे लह्यां नवां,
हरि रामादि नरेंद्र जेहवां. २७ (शिकार.)
चोपाइ.
. स्वर्ग सौख्य भणि जो मन आशा,
छांडे तो परनारी विलासा;

जुगार प्रमुख दुर्व्यसनो टाळी चालवा हितोपदेश. १३५ जेण एण निज जन्म दुःख ए, सर्वथा न परलोक सुख ए. २८ (परनारी गमन.) भावार्थ:-जेम जेम सांझ पडती जाय तेम तेय वस्तुनी शोभा मलिन थती जाय-झांखी पडती जाय तेम दुर्व्यसनोथी संपत्ति अने कोर्ति बने नाश पामे ते माटे कुन्यसनो सर्वथा तजवा अने सदा- चरणबडे जन्म सफळ करवी के जेथी परिणामे मुक्तिवधुने वरी शकाय. आ कुव्यसनो मुख्य सात प्रकारना छे. ते सातेने माटे पृथक् पृथक् हानि बतावे छे. १ प्रथम दुर्व्यसन जुगटुं रम, ते छे. जे रम- वामां धन विना वीजा कोइनी गणना नथी. देवगुरु पण ज्यां हिसावमां नथी अने जे व्यसनथी भवभवमा उवटे-उन्मार्गे दुर्गतिमा भम, पडे-छे तेवू जुगटुं कोण सज्जन रमे १२ बीजुं दुर्व्य- सन मांसभक्षण करवं ते छे. जे मनुष्य मांसभक्षण करे छे ते मनुष्य नथी पण मनुष्यरुपे राक्षसज छे. ३ त्रीजुं दुर्व्यसन चोरी करवी ते छे, चोरी आ लोकमां ज नर्कनिवास जेवी छे, एवी चोरी उत्तम पुरुष कदी करे नहीं. ४ चोथु दुर्व्यसन मद्यपान करवू ते छे. मदिरा पीवाथी चित्त भ्रांतिवार्छ-भ्रमित थाय छे, लाज नाश पामे छे, गै- भिरता अने सदाचार पण नष्ट थाय के. ज्ञानविज्ञान तो मेळवेल होय ते पण मुंझाइ जाय छे-मूझतुं नथी. एम जाणीने पोते मद्य पीई. नहीं अने वीजाने पीवा देवू नहीं-पावू नहीं. ५ पांचमुं दुर्लसन वेश्यागमन कर, ते छे. उत्तम पुरुषो कदी पण वेश्याग करता नयी. वेश्यागमनथी लाजनी अने द्रव्यनी बनेनी शनि थाय छे.

१४० mamin , सूक्त.मुक्तावळी. जुओ सिंहगुफावासी मुनि जे महा तपस्वी हता अने,जेना प्रभावथी विकराळ सिंह पण तेने काइ उपद्रव करी शकतो नहोतो-शांत थइ जतो हतो, तेज मुनि स्थळिभद्रनी इर्ष्याथी कोश्यावेश्याने त्यां चा- तुर्मास करवा आल्या. कोश्याना एक कटाक्ष मात्रथीज घायल थइ गया अने कामसेवानी प्रार्थना करी. कोश्याए 'द्रव्यनी आवश्यकता पहेली बतावी, तेथी लक्षमूल्यनु रत्नकंवळ लेवा मुनिपणाने बाजुपर मूकीने चोमासामा नेपाल देशे गया. वेश्यागमन आटलं वधुं हानि- कारक छे; तेथी ते अवश्य तजवा लायक छे. ६ छठे दुव्र्यसन शि- कार करतो ते छे. शास्त्रकार कहे छे के हे उत्तम प्राणी.! तु-मृगया- शिकार के जे जीवघात रुप छे तेने तजी.दे अने सर्व जीवपरनी दयाने सदा-निरंतर भज-अंगीकार कर. जुओ मृगयाथी कृष्ण रा: मचंद्रादि जेवा महान् राजा पंण अनेक प्रकारनां दुःख पाम्यां . सात, दुर्व्यसन परस्त्रीगमन करवु ते छे. उत्तम पुरुषो निरंतर स्व- दारासंतोषीज होय छे. शास्त्रकार कहे छे के-जो तने स्वर्गनां मुख मेळंचवानी इच्छा के आशा होय तो तुं परनारीना विलासने तेना संसर्गने सर्वथा तजी.दे. परदारागमनथी आं जन्ममा.पण दुःख छे अने परलोकमां पण सर्वथा मुखनी प्राप्ति थती नथी. दुःखज प्राप्त थाय छे. शार्दूलविक्रिडीत वृतम. जूवा खेलण पांडवा वन भम्या, मद्ये बळी द्वारिका, से श्रेणिक नारकी दुःख लह्यां, 1 जुगार प्रमुख दुर्व्यसनो टाळी'चालवा हितोपदेश. १४१ . बाँध्यान के चौरिका; आखेट दशरथ पुत्र विरही, केवन्नो वेश्या घरे, लंकास्वामी परत्रिया रस रमे, जे एं तजे ते तरे. २९ जुगार, मांस, दारु, वेश्या, आहेडो (शिकार), चोरी अने परस्त्री सेवा ए सांत कुव्यसनो सेव्या छतां जीवने अति घोर नरक गतिमां लइ जाय छे अने अहीं पण प्रगटपणे लक्ष्मीनी अने कीर्ति- नी भारे हानि करे छे. एम समजी शाणा जनोए उक्त सात कुव्य- सनोने सर्वथा तजवां जोइए. ए कुव्यसनो तजवाथीज पवित्र धर्म- करणी करवानी मुबुद्धि सूझे छे अने स्वजन्म सफळ करी परिणामे, मोक्षलक्ष्मी सहेजे प्राप्त थाय छे. तपास करो ! जुगारथी पांडवोने १४ वर्ष सुधीं आमतेम राजपाट तजी भटकवू पढथु, सुरापानथी यादवोनी द्वारिकानो अग्नियोगे विनाश थयो, मांसभक्षणवडे श्रेणि- कराजाने नरकनी दुःख भोगवां पडयां, चोरीवडे अनेक चोरो प्रगट वध बंधनादिक पामे छ, आहेडा कर्मवडे रामचंद्रजीने सती सी- तानो वियोग थयो, वेश्यागमन वडे कैवन्नो शेठ धन रहित थइ अ- पमान पाम्यो, अंने रावण परस्त्रीना विषयरस चडे लंका नगरीनुं राज्य हारी, मरण शरणं थइ नरकगतिमा गयो, जेथी दुनियामां तेनी भारे अपकीत्ति थइ. एम समजी जे सुज्ञ जनो ए कुव्यसनो ર सूक्त मुक्तावळी. सर्वथा तजे छ तेओ सर्व रीते सुखी थाय छे. आ सात कुव्यसनो उपरांत शरीरनी पायमाली करनारा अने लक्ष्मी प्रमुखनी हानि करनारा अफीण, गांजो अने तमाकु विगेरे जे जे कुव्यसनो-अप- लक्षणो होय तेने स्वपर हित इच्छनाराओए जल्दी तिलांजलि देवी जोइए. स्वपर हितमा हानि थाय ए, एक पण कुव्यसन राखवु न जोइए. स्वसंतति अने देशनी आबादी इच्छनारे पण एम ज करवू जोइए. ४ज निर्मळ यश-कीर्ति प्राप्त करवा हितोपदेश. मालिनीवृत. दिशि दिशि पसरती, चंद्रमा ज्योति जेसी, श्रवण सुणत लागे, जाण मीठी सुधासी; निशिदिन जन गाये, राम राजिंद जेवी, इण कलिं वहु पुण्ये, पामिये कीर्ति एवी. ३० भावार्थ:-पूर्णिमाना चंद्रनी शीतळ चांदनी जेवी निर्मळ यश-कीर्ति दश दिशामां प्रसरेली श्रवणे सांभळतां अमृत जेवी मीठी लागे छे. जेवी राजा रामचंद्रनी यशकीर्तिने लोको रातदिवस गाया करे छे तेवी निर्मळ यशकीर्ति आ कलिकाळमां बहु पुन्ययोगे कोइक विरलाज प्राण करी शके छे. राजा रामचंद्रनी पेरे कलंक गहित न्माय, नीति अने प्रमाणिकपणुं आदरी स्वकर्तव्यनिष्ठ रहे- , निर्मळ यश-कीर्ति प्राप्त करवा हितोपदेश, १५३ नारा राजाभो, प्रधानो, शेठ साहुकारो, संत साधुजनो तेमज अन्य अधिकारी लोको खरेखर निर्मळ यश-कीर्तिने संपादन करी शके छै; एटलुज नहि पण स्वार्थत्यागी परमार्थद्रष्टि जनो आगळ उपर पण स्वर्ग अने मोक्षनां सुख मेळवी शके छे. एवा अनेक द्रष्टान्तो शास्त्रोमां मोजुद छे. केवळ यशकीर्तिने माटेज लोकरंजन करवानी बुद्धिवडे भला धर्मनां काम करवामां मजा नथी. एवी बाह्यद्रष्टिवडे कराती धर्मक- रणीचें फळ अल्प मात्र छे. खरी परमार्थ द्रष्टियोगे जे करणी कराय छे तेनुं फळ घणुं महत्वभर्यु होय छे. खेडुलोको धान्य पेदा करवा माटे काळजीथी अवसरे खेड करी खातर नारखी जमीनने सरखी करी तेमां सारुं वीज वावे छे, तो तेथी पुष्कल धान्यनी पेदाश थवा उपरांत पलाल (घास) पण तेनी साथेज पाके छे. परंतु कंइ पला- लनी खातरज खेड करवानी जरुर होती नथी; तेम जे महाशयो स्वपरर्नु कल्याण करवाना पवित्र आशयथी उत्तम करणी स्वकर्तव्य समजीने करे छे तेथी स्वपर आत्मानुं कल्याण थवा उपरांत निर्मळ यशकीति पण सहेजे-अनायासे प्राप्त थइ शके छे. ते माटे जुदो प्र- यास करवानी कशी जरुर रहेतीज नथी. कयु छ के 'जन मन रंजन धर्मर्नु, मूल्य न एक बदाम'-जे केवळ बाह्यद्रष्टिथी लोकदेखावो करवा माटेज शुभ करणी करे छे तेमां कशुं महत्व नथी. खरु महत्व परमार्थद्रष्टिमांज के.

१४४
.
.
सूक्त मुक्तावळी.
पए प्रधान (मुख्य राज्याधिकारी) वर्णन.
सकळ व्यसन वारे, स्वामीशुं भक्ति धारे,
स्वपरहित वधारे, राज्यनां काज सारे,
अनय नय' विचारे क्षुद्रता दूर वार,
चणिसुत' जिम धारे, राज्यलक्ष्मी वधारे. .३१
भावार्थ अने परमार्थ-अभयकुमार जेवो उत्तम अधिकारी
(प्रधान) होय ते पोते बंधा व्यसनोथी वेगळो रहे, जेथी राजांमजा
उपर सारी छाप पडे अने तेमने पण व्यसनथी दूर रहेवा बुद्धि थंवा
पामे, अने अनुक्रमे आखा राज्यमांथी कुव्यसन मात्र दुर थवा पाभे.
आधी समजी शकाय छे के अधिकारी-प्रधान पुरुषे खास, पोतार्नु
वर्तन उंचा प्रकारचं राखवुज जोइए. वळी ते पोताना स्वामी (राजा
-महाराजादिक) उपर आदर-बहुमान राखे, जेथी वीजी वधी
प्रजा पण तेमना तरफ तेवा आदर-बहुमाननीज नजरथी जोवे. वळी
उत्तम प्रधान स्वपरहितमां वधारो थाय एबु'लक्ष राख्या करे तेमज
राज्यना काममां पण खलेल आववा दे नहि-राज्यकाम पण वरा-
बर व्यवस्थासर कर्या करे. न्याय-अन्यायनों वरावर निजबुद्धिधी
तोल करी अदल इन्साफ करें-उतावळा थइ कोइने गेरइन्साफ थाय'
तेय न करे. वळी इन्साफ आपतां दयान तत्त्व जरुर पूरतु आमेज
करे (उमेरे,) क्षुद्रता निर्दयता-कठोरता-तुच्छता वापरे नहि, पण
१ अन्याय ने न्याय. २चाणाक्य.

HOM
कळावर्णनाधिकार.
२५५
गंभीरता अने सहृदयतानों साथे साथे उपयोग करी राज्यलक्ष्मीनो
वधारो करे तथा प्रजानी आबादी सचवाय अने वृद्धि पामे तेवी
पण पूरती काळजी अभयकुमार मंत्रीनी पेरे राखे, ते राजा अने
प्रजा उभयर्नु हित वखतोवखत साचवी छेवटे पोतार्नु आत्महित
करी लेवा भाग्यशाली बन्यों तेम अन्य अधिकारी जनोए पंण ची-
घट राखी स्वपर हित कार्यमा 'सावधानता राखवी. 'बुद्धिबळथीज
मंत्रीपणुं शोमे छे अने तत्त्वातत्त्वनो विचार करवो तथा 'सारतत्व
आदरी स्वमानवभवनी सफलता करवी एज सद्बुद्धि पाम्यानु
शुभ फळ छे.
५० कळावर्णनाधिकार.
चतुर करी कळाने, संग्रहो सौख्यकारी,
इण गुण जिण लाधी, द्रोण संपत्ति सारी;
त्रिपुर विजय कर्ता,'जे कळाने प्रसंगे,
हिमकरः मनरंगे, लै धयों उत्तमांगे.'
३२
भावार्थ- अहो चतुरजनो ! सुखकारी -एवी कळाओनो
संग्रह करो-(अभ्यास-परिचय सारी रीते राखो) केमके ए कळा-
संग्रहना प्रभावथी द्रोणाचार्य सारी रीते संपत्ति प्राप्त करो हती.
वळी त्रिपुरविजय-कर्ता जे महादेव तेणे ते कळाना प्रभावधीज
हिमकर एटले चंद्र तेने पोताना उत्तमांग-मस्तक उपर आनंदथी
धारण करी राख्यो हतो.. तेथीज ते चंद्रशेखर अने त्रिलोचन
१ शिव. २ चंद्र. ३ मस्तके.

' . . सूक्त मुक्तावळी. - श्वा प्रसिद्ध नामने प्राप्त थयो. (आ वात लौकिक मतानुसारें लौ- किंकशास्त्रमा प्रसिद्ध थयेली जाणवी. परमार्थ-सकळ कळामां निपुणता कोइकज मेळवी. शके छे. पूर्व स्त्रीपुरुषो तेनो अभ्यास विशेषे करता. पुरुषनी ७२ कळा अने स्त्रीनी ६४ कळाओ शास्त्रप्रसिद्ध छे. .चंद्रनी.१६ कळा- कहेवाय के. पूर्ण कळावाठा स्त्रीपुरुषोने संपूर्ण १६ कळावाळा चंद्रनी उपमा आपवी ए हीन उपमा कहेवाय छे. मतलब के चंद्र करतां तेम- नामां अधिकता ठरे छे. कळा मात्र उपयोगी छे.ते.बंधी. नहि तो बने तेटली स्त्रीपुरुष उभयने उपयोगी कळानो अभ्यास-परिचय अवश्य कर्तव्य छे. गमेतेवो व्यवसाय कळाथी खोली शके छ, क- ळाथी बने तेवू बळथी बनतुं नथी. एक शिक्षणकळाथी लाखो बाळको केळवाई हीरा जेवा किंमती बनी शके छे. युद्धकळा, रंधनकळा, नृत्यकला, संगीतकळा,, धर्मकळा, अर्थ- कळा अने कामकळादिक अनेक कलाओ के परंतु ते सर्वमा शिरो- मणि कळा एक फक्त धर्मकळाज छे एक सत्यधर्मकळा बीजी वधी कळाने जीती ले छे. एक धर्मकळावडे वीजी बधी कळा कामनी छै; ते वगरवीनी बधी कळा'नकामी जेवी कहीं केमके धर्मक- ळाथींज मोक्ष छे.. १.५१ मुर्खता वर्णनाधिकार. वचनरस न भेदे, मूर्ख वार्चा न चेदे', 5 , . - १ जाणे.

- . मुखता वर्णनाधिकार. तिम कुवचन खेदे, तेहने शीख जे. दे, नृपशिर रजःनाखी, जेण-मूर्खे वहीने, हित कहतहणी ज्यु, वानरे सुग्रहीने. ३३ भावार्थ-शास्त्रवचन के ज्ञानीनां वचनो अमृत जेवां मीठां छतां मूर्ख अज्ञान-जीवने भेदता-असर करतां नथी-तेना हृदयने 'पीग़ळावी, शकता नथी, केमके मूर्ख-अज्ञान जीव तेतुं रहस्य-सम- जतो नथी. तेम तेनो गुप्तभेद मेळववा ते प्रयत्न पण, करतो नथी. बळी तेवा अज्ञान जीवने जो कोइ शिखामण देवा जाय तो तेना उपर ते खीजवाय छे अने तेने गाळो भांडे छे.'मूर्ख माणस वच- नना परमार्थने समजतो नथी, तेथी ते ओडनु चोड वेतरी नांखे छ. कडं होय. छे काइ अने समजे छे कांइ तेथी काइने काइ करी नांखे छे. वखते विवाहनी वरसी. पण करी नांखे के. एवा एक अज्ञान वणिकपुत्रने तेनी अज्ञानताथी (अणसमजथी) बहु बहु कर पडयुं छे. तेने घj घणुं वखतोवखत सहन करत पडयु छे. तेने घणा- एक कड़वा अनुभव थया छे तोपण ते कइ समज्यो नहि. प्रसंगो- पात एक राजानी राणीए तेने दयाथी पोतानी पासे नोकर राख्यो. 'एक वखत राजमहेलमा आग लागी हती ते हकीकत 'राजाने -जल्दी कहेवानी हती ते तेणे धीमे -रहीने राजाना. कानमा कही. राजाए तेने शिखामण साथे उपकी आप्यो अने कई के एवे वखते -धुमाडो देखतांज तेनापर धूळ विगेरे नाखएकदा. राणी स्नान करीने माथानी वेणीने धूपती हती, तेनो, धुमाडो. ज़ोइ ते मूर्ख - - १४८ सूत मुक्तावळी. धुळनी पोट भरी राणीना मस्तक उपर नाखी. आवी मूर्खाइ जोइने राजाए तेने काढी मूक्यो. आयु अज्ञानपणुं दूर करवा दरेके प्रयत्न करवी, केमके तेथी स्वपरने बहु हानि थाय छे. एकदा एक सुघ- रीए गढथी कंपता एक वानरने जोइ तेवी टाढनुं निवारण करवा भाटे एक घर बांधी तेमां रहेवा तेने शिखामण दीधी, तेथी रीस करी कुदको मारी तेणे ते बापडी मुघरीनो माळो चुंथी नांख्यो. 'मूर्खने शिखामण देवा जतां उलटुं पोता, पण जाय छे.' अम समजी समयोचित वर्तवं. ५२ लज्जावर्णन अधिकार. निज वचन निवाहे, लाज ग्युं राज वाळे, व्रत नय कुळ रीते, मातज्यु लाज पाळे; सकळ गुण सुहाये, लाजथी भावदेवे, व्रत नियम लह्यो जे, भाइ लज्जा प्रभावे. भावार्थ-लज्जावंत (लाज-शरमवाळो-मर्यादाशीळ) होय नीता, प्रतिज्ञा-वचन संभारी राखीने साचवे छे. जातिवंत घो- . हानी झेम सुमार्गे चाले के-उन्मार्ग चालतो नथी, तेथी प्रथम गयेलं-स्पोत्रायेलं राज्य पण पार्छ वाली शके छे. वळी मानानी जेम • कुळमर्यादा सुशव लाज साचवे के तेम लज्जाल माणस यथायोग्य व्रतनियम लहीने साथ छे, ते व्रतनियमने खंडित करतो नथी; .

लज्जावर्णन अधिकार पण वरावर लक्ष राखीने तेने साचवे छे-नभावे छे. जेम पोताना भाइ भवदेवनी लाज-शरम के दाक्षिण्यनाथी भावदेवे पण गुरुस- मीपे दीक्षा ग्रहण करी, (प्रथम द्रव्यथी अने पछी भावथो) साधु- योग्य व्रतनियम पाळ्या हता शोभाव्या हता तेम उत्तम लज्जा- मर्यादा अने दाक्षिण्यतावाळा सजनो निज कर्तव्यपरायण रही अंते सकळ गुणथी अलंकृत बने छे. परमार्थ-सर्वज्ञ वीतरागोक्त सत्यधर्मनी प्राप्ति माटे जे उत्तम एकवीश गुणनो अभ्यास (आसेवन) करवानी जरुर जणावी के तेमां रुडी लज्जागुणनो पण समावेश थाय छे. आगुण बीजा अनेक गुणने खेंची लावे छे तेथीज सर्वज्ञ भगवाने तेनी आवश्यकता अने उपयोगिता माटे भार मूकेलो छे. तेम छतां धृष्टताधारी स्वच्छंद- ताथी कोइ तेनो अनादरज करे तो ते हतभागी सत्य धर्मरत्ननी प्राप्तिथी बेनशीव रही जवा पामे छे. कदाच जडवादीओने आ गुण नजीवो लागतो हो, परंतु ते तेवो नजीवो नथीज. ते अनेक गु- णोने प्रगट के परोक्ष रीते मेळवी आपे छे, तेथीज तेनी आवश्यक्ता अने उपयोगिताने लइने तेनु महत्व घटे छे. आजकाल पश्चिमनों पवन लागवाथी कइक मुग्ध भाइबहेनो नवी रोशनीमां अंजाइ जइ, लाज शरम के मर्यादा मूकी दइ भक्ष्याभक्ष्य, पेयापेय, गम्यागम्य के हिताहितनो विवेक भूली जइ धर्मनिष्ट थइ जाय.छे. तैमनो अ- विवेक जोइ लेखकने दया-घृणा आवे छे, ते तेश्रो विचारी लेशे.

। १५० सूक्त मुकावळी.. (शालिनी) एवा जे जे, रुयडा भाव राजे, एणे विश्वे, अर्थथी तेह-छाजे, एवं जाणी, सार ए सौख्य केरो; ते धीरो जे, अर्थ अर्जे भलेरो. इति अर्थ-वर्ग:समाप्त: ३५. अथ सुक्तमुक्तावळी ग्रंथे. तृतीय-कामवर्ग: ३ कामवर्ग: उपजाति... ग्राह्या कियंतः किल कामवर्ग, कामो नृनार्यों-गुणदोषभाजः। सल्लक्षणयोगवियोंग युक्तः समातृपितृप्रमुखा प्रसंगाः ॥१॥ आ कामवर्गमा काम, स्त्री ‘अने पुरुषना गुण.अने दोष, सुलक्षणी स्त्रीओ, संयोग ने वियोग, माता प्रत्येनी, फेरज, पिता प्रत्येनी फरज अनें प्रमुख शब्दे पुत्र केवा' होय-आदला प्रसंगो (विषयो ग्रहण करवा)२

.
१५१
कामविषे
१ कामविषे.
कंदर्प पंचाननः तेज आगे,
कुरंग, जेवा-जग-जीव लागे
स्त्री शस्त्र लेइ जग जे वदीता,
ते एण 'देवा, जन बंद जीता...
(मालिनी)
मनमथ जंगमर्माहे, दुर्जयी जे अद्यापि,
त्रिभुवन सुरराजी, जास शस्त्रे सतापि;-
विधि जळज उपासे, वार्षिजा विष्णु सेवे;
हर हिमगिरिजाने, जेह-अर्धाग देवें.
३ :
(शार्दूलविक्रीडित)
भिल्ली भाव छळ्यो महेश,उमया, जे काम सगे करी;
पुत्री देखी चळ्यो चतुर्मुख हरि आहेरिका आदरी;
इंद्रे, गौतमनी प्रिया विलसीने संभोग ते ओळव्या,
कामे एमःमहंत देव जग.जे ते भोळव्या-सेळव्याः ४ :
,

सूक्त मुक्तावळी. (मालिनी) नळनृप दवदंती, देखी चारित्र चाळे, अरहन रहनेमि, ते तपस्या विटाळे चरम जिनमुनि ते, चिल्लणा रुप मोहे, मयण शर व्यथाना, एह उन्माद सोहे. ५ भावार्थ:-कामदेवरुपी केशरी सिंहना तेजथी अंजाइ जइ जगतना जीवो कुरंग-हरणीया जेवा कायर बनी तेने वश थइ जाय छ अथवा तो तेनाथी डरी जाय छे. ए एकला कामदेवे जगतमां प्रसिद्ध एवं पोतानुं स्त्री रुपी शस्त्र हाथमा लइ देवो अने मान- वोना बंदो (टोळे टोळा ) ने जीती लीधा छे. हजु सुधी दुनिया- मां ए कामदेव दुर्जयी-भारे कष्टे जीती शकाय एवो बहु पराक्रमी जणायो छे; केमके त्रोभुवन वतीं देवोनी पंकित तेना स्त्रीरुपी शस्त्रथी घाइ-खस्ट थइ-हारी तेने शरणे थइ गइ जणाय छे. जुओ! विधि-विधाता-ब्रह्मा तेनाथी हारी जइ जळज-कमळनी उपासना करे छे, तेथी ते कमलासन कहेवाय छे. विष्णु-कृष्ण लक्ष्मीदेवीनी उपासना करे छे अने हर-शंकर-महादेवे हिमगिरिजा-पार्वतीने, पोतार्नु अर्धाग अर्पण कयु छे. आ प्रमाणे लोकमां लेखाता मुख्य देवो हरि हर अने ब्रह्मा पण कामदेवने वश थइ जवाथी तेमनी विडंवना थइ छे. भीलडीनुं रुप लइने उमयाए शंकरने छळ्या हता. ए भीलडीर्नु अद्भूत रुप देखीने वनमा तपस्या करवा गयेला म- हादेव कामवश चलायमान थइ गया हता. चतुर्मुख-ब्रह्मा पोतानी 2 .

कामविषे. १५३.. पुत्रीनुज.रुप देखी चलित थया हता. हरि-विष्णु गोपीमा लुब्ध थया हता. 'इन्द्रे गोतमनी स्त्री संगाते भोगविलास कों हतो. एवी रीते कामदेवे आ जगतमां मोटा महंत लेखाता एवा देवोने पण भोळवी नांख्या अने तेमने कायर जनोनी जेम रोळवी दीधा, एटले तेमनी आवरुना कांकरा करी नांख्या. आ बधी वात लौकिक शास्त्रोना आधारे सिद्ध थइ शके छे. मतलब एवी छे के ज्यारे दुनी यामां नामीचा लेखाता मोटा महंत देवो पण कामना सपाटामा आवी गया अने जोतजोतामां स्त्रीवश थइ गया, तो पछी बीजा. सामान्य जनोर्नु तो कहेज शुं? कामदेवर्नु एवं भारे पराक्रम सम- जवा जेवूछे. वळी लोकोत्तर शास्त्रना आधारथी पण जणाय छे.के नळराजा दीक्षा लीधा पछी दमयंती साध्वीनुं रुप देखी चारि- त्रमा चळायमान थया. श्री नेमिनाथ प्रभुना भाइ रहनेमी गिरनार उपर गुफामा ध्यानस्थ रह्या हता छतां वर्षादथी भींजायेला राजी- मती साध्वीजीने एज गुफामां (अगजाण्या) पेसी पोतानां भीनां भीनां वस्त्र मूकवतां नवखा देखीने ध्यानथी चूक्या हता, तेमज राजा श्रेणिकनी राणी चेल्लणानुं अद्भूत रुप जोइने महावीर प्रभुना मुनियो व्यामोह पाम्या हना. ए बधो कामबाणनी व्यथाथी थतो उन्मादज जाणवों-कामवश थयेली विव्हळतानुं परिणाम समजवू. भवितव्यता या भावीभावनी वात जुदी छे, परंतु तेवं मानी लइने शास्त्रोक्त पुरुषार्थ नजी देवानो नथी. एटलुज नहि पण तेने द्रढपणे सेवबो-आदरवो जरुरनो छे. कामदेवने जीतवा अथवा तेनाथी पोताना ब्रह्मवतनुं रक्षण करवा-पोतानो वचाव करवा माटे ज्ञानी सूक्त मुक्तावळी. mini पण राखी न शक्या. तेमज नळ राजाए पोतानी प्राणप्रिय राणी -दमयंतीने रात्रे एकली वनमा तजी दीधी. आवा मोटा उत्तम पुरुषो पण आवी गंभीर भूल करे छे तो बीजा सामान्य मनुष्यनी तो शी बात करवी? स्त्री गुण वर्णनम्. ३.. सुशिख आले प्रियचित्त चाले, जे शिळ पाळे गृहचिंत टाळे दानादि जेणे गृहधर्म होइ, ते गेही नित्ये घरलच्छी सोइ. उत्तम स्त्री पोताना पतिने दरेक उपयोगी कार्य प्रसंगे एक स- लाहकारक उत्तम मंत्रीनी पेरे सलाह आपे छे. पोताना पतिना आ- शयने अनुसरोने चाले छे. मन वचन कायाथी स्वपतिसंतोपरुप निर्मळ शीळ पाळे के निर्दोष वर्तनथी सावधानपणे गृहदोष अथवा घर चिन्ता दूर करे छे अने घरे आवेला अतिथि (साधु महात्मा- दिक) तथा अभ्यागत-मेमान परोणादिकनो यथायोग्य सत्कार करी गृहस्थधर्म दीपावे छे. तेवी सौभाग्यवंती कुलीन पतिव्रता स्त्री पोताना पवित्र गुणोवडे गृहलक्ष्मी लेखाय छे, पति अने कुटुंब परि- वारमा ते सारं मान पामे के अने गृहव्यवस्था उत्तम रीते चलाववा साथे पोतार्नु तथा पोताना कुटुंब परिवारर्नु भली रीते हितरक्षण करवाथी ते गृहदेवी तरीके -मनाय छे, सती स्त्रीओ आवीन होवी घटे छे. 41. -- an

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स्त्री दोष वर्णनम्,
4
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स्त्री दोष वर्णनम्. ४.
भर्ता हण्यो जे पतिमारिकाए,
नांख्यो नदीमां सुकुमाळिकाए;
सुदर्शन श्रेष्टि सुशीळ राख्यो,
ते आळ देइ अभयाए दाख्यो. ११
(वसंततिलका.)
मार्यो प्रदेशी.सुरिकंत विषावळीए,
राजा यशोधर हपयो नयनावळीए;
दुःखी को स्वसुर नूपुरपंडिताए,
दोषी त्रिया इम भणी इण दोषताए.. १२
पतिमारिका सुकुमालिकाए, पोताना पतिने मारी नदीमां
नांखी दीपो हतो अने सुदर्शन शेठे निर्मळ शील (स्वस्त्रीसंतोष
व्रत) पाळ्यु हतु, तेना उपर अभया राणीए खो? आळ-कलंक
चढाव्युं हतुं वळी सूरिकांता राणीए पोताना पति प्रदेशी राजाने
कामांध बनीने भोजन प्रसंगे. झेर दी, हतुं तेमज नयनावळीए पो-
ताना पति यशोधर राजाने गळे फांसो दइने मार्यों हतो अने नुपू.
पंडिताए पोतानुं खोटुं चरित्र पाववा माटे पोताना पतिने भो-
ळवी वृद्ध ससराने कपटरचनाथी हेरान कयों हतो. आवां दुष्कृत्यो-
थीज स्वीओने दोषित लेखवी छे. कामान्धपणे स्वीओन करवानां

१५४
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सूक 'मुक्तावळी.
पुरुषोए नव प्रकारनी ब्रह्म गुप्ति (नव वाडो) कही छेतेनुं यत्नथी'
पालन करचु..
५ पुरुष स्त्री गुण दोषोदलावन अधिकार::
(रथोडतावृत्तः).
उत्तमा पण नरा न संभवे, मध्यमा तिम न योषिता हुवे,
एह उत्तमिक मध्यमीपणो, बेहुमांही गुण दोषनो गिणो.६
पुरुष एटले उत्तंमज होय एम न समजवु अने स्त्री होवाथी
तेने मध्यम न समजवी स्त्री पुरुष होवा मात्रथी उत्तम मध्यमपणुं
आवतुं नथी, पण पुरुषमा के स्त्रीमा उत्तम ने मध्यमीपणुं गुण ने
दोपथीज आवे छे." तेथी ते बने जातिनी गुण दोष अंगट करता
सता कर्ता कहे -
पुरुष गुण वर्णन-१.
जे नित्ये गुणदले परतणा, दोषो न जे दाखवे,
जे विश्वे उपकारीने उपकरे, वाणी सुधा जे लवे;
पूरा, पुनमचंद जेम सुगुणा, जे धीर मेरुसमा,.
उडा.जे गंभीर सायराजिश्या, ते मानवा उत्तमा.-७
रूप सौभाग्य संपन्ना, सत्यादि गुण शोभना;
ते लोके विरला धीरा, श्री राम सदशा नरा. . . .
,
Mara
-
२

अथ पुरुष दोष वर्णनम्,
१५५
--
भावार्थ:- जे सज्जनो सदार्य 'परना गुणगणने ग्रहण करे
छे-गुणनी प्रशंसा करे , तेमज बनी. शके तेटलुतेर्नु अनुकरण पण
करे है; परंतु'परना दोषों उघाडा करी विगोवणा (निंदा-लधुता)
कदापि करता नथी: बळी जेओ उपकारी जनो-छे तेमनो''उपकार
भूलता नथी; कृतज्ञपणे तेमना प्रत्युपकार करवा तक मळे तो जे
चूकता नथी, मुखधी अमृत जेवां मीठां वचन ज बोले छे, जेओ
शरदऋतुना संपूर्ण चंद्र -जेवी शीतळता वर्षावनास मेरुपर्वत जेवी
धीरता-निश्चळता जेने सागर जेवी गंभीरता.धारनारा,छे तेवा मा-
नवोज उत्तम पंक्तिना लेखाय छे. रुप सौभाग्यथी शोभित अने
सत्व-पराक्रमादि गुणोचडे अलंकृत श्री रामचंद्रजी जेवा धीर वीर
गंभीर विरला मनुष्योज होय छे.
अथ पुरुष दोष वर्णनम् ...
लंका स्वामीहरंतिराम तजी ते सीतातणी ए थकी
स्त्री वेची हरिचंद पांडव नृपे कृष्णे न राखी शकी;
रात्रे छांडी निज.त्रिया नळं नृपे ए दोष मोटा भणी,
जोवो उत्तममाहिं दोष:गणना का वात बीजातणी.
रावण जेवा प्रतिवामदेखें सीता जेवी सेतीनुं हरण कयुः।
रामचंद्रजी जेवानिमुनेदार नीतिवंत राजाए सीतां सतीनों त्यागी
कर्यो हरिचंद राजाए पोतानी राणीने वेची, पांडवो पोतानी
पत्नी द्रौपदीने जूगारमा हारी गया, जेने कृष्ण जेवा समर्थ राजा
.
M

१५६ सूक मुक्कावळी. 'पण राखी न शक्या. तेमज नळ राजाए पोतानी माणमिय राणी -दमयंतीने रात्रे एकली वनमां तजी दीधी. आवा मोटा उत्तम पुरुषो. पण आवी गंभीर भूल करे छ तो बीजा सामान्य मनुष्यनी तो शी वात करवी? स्त्री गुण वर्णनम्. ३. सुशिख आले प्रियचित्त चाले, जे शिळ पाळे गृहचिंत टाळे दानादि जेणे गृहधर्म होइ, ते गेही नित्ये घरलच्छी सोइ. १० उत्तम स्त्री पोताना पतिने दरेक उपयोगी कार्य प्रसंगे एक स- लाहकारक उत्तम मंत्रीनी पेरे सलाह आपे छे. पोताना पतिना आ- शयने अनुसरोने चाले छे. मन वचन कायाथी स्वपतिसंतोषरुप निर्मळ शीळ पाळे छे. निर्दोष वर्तनथी सावधानपणे गृहदोष अथवा घर चिन्ता दूर करे छे अने घरे आवेला अतिथि (साधु महात्मा- दिक) तथा अभ्यागत-मेमान परोणादिकनो यथायोग्य.सत्कार करी गृहस्थधर्म दीपावे छे. तेवी सौभाग्यवती कुलीन पतिव्रता स्त्री पोताना पवित्र गुणोवडे गृहलक्ष्मी लेखाय छे, पति अने कुटुंव परि- वारमा ते सारं मान पामे के अने गृहन्यवस्था उत्तम रीते चलाववा साथे पोतार्नु तथा पोताना कुटुंब परिवारर्नु भली रीते हितरक्षण करवाथी ते गृहदेवो तरीके पूजाय-मनाय छे, सती स्त्रीओ आवीन होवी घटे छे.

स्त्री दोष वर्णनम्,
१५७७
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स्त्री दोष वर्णनम्. ४.
भर्ती हण्यो जे पतिमारिकाए,
नाख्यो नदीमां सुकुमाळिकाए;
सुदर्शन श्रेष्टि सुशीळ राख्यो,
ते आळ देइ अभयाए दाख्यो.
(वसंततिलका.)
मार्यो प्रदेशी.सुरिकंत विषावळीए,
राजा यशोधर हण्यो नयनावळीए;
दुःखी को स्वसुर नूपुरपंडिताए,
दोषी त्रिया इम भणी इण दोषताए.. १२
पतिमारिका सुकुमालिकाए पोताना पतिने मारी नदीमां
नांखी दीपो हतो अने सुदर्शन शेठे निर्मळ शील (स्त्रस्त्रीसंतोष
व्रत) पाळ्यु हतुं, तेना उपर अभया राणींए खोई आळ-कलंक
चढाव्युं हतुं. वळी मूरिकांता राणीए पोताना पति प्रदेशी राजाने
कामांध बनीने भोजन प्रसंगे झेर दीधुं हतुं तैमज नयनावळीए पो-
ताना पति यशोधर राजाने गळे फांसो दइने मार्यों हतो अने नुपू.
रपंडिताए पोतानु खोटुं चरित्र छुपाववा माटे पोताना पतिने भो-
ळवी वृद्ध ससराने कपटरचनाथी हेरान,कयों हतो. आवां दुष्कृत्यो-
• थीजस्त्रीओने दोषित लेखी छे. कामान्धपणे स्त्रीओन करवानां

n- सूंक मुक्तावळी. काम करे छे, साहस खेडे छे, कुळलज्जा लोकलज्जादिक तजी अना- चार सेवे छे; परंतु मुकुलीन सती स्त्रीओ तो प्राणान्त कष्ट सहन करीने पण पोताना.पवित्र शीलनुज रक्षण करे छे, तेवी स्त्रीओ स- द्गुणी-मुलक्षणी लेाय छे. ५ अथ सुलदाणी स्त्री वर्णनम्, (शार्दूलविक्रीडित.) रूडी रुपवती सुशील सुगुणी लावण्य अंगे लसे, लज्जालु प्रियवादिनी प्रियतणे चित्ते सदा जे वसे; लीला यौवन उल्लसे उरवशी जाणे नृलोके वसी, एवी पुण्यतणे पसाय लहीए रामा रमा सारसी. १३ सीता सुभद्रा नळराय राणी, : जे द्रौपदी शीळवती वखाणी; जे एहवीं शीळ गुणे समाणी, सुलक्षणी ते.जगमांही जाणी. रुडी रुपाळी, सुशीलवती, सद्गुणी, लावण्यनी, शोभावाली, -लज्जावती, प्रिय-मिष्ट, वचन-वोलनारी-पतिना मनमा, वसी-रहे- नारी विनीत अने, यौवन वयनी शोभाणी जाणे, उर्वशी आ मृत्यु- लोकमा:आत्री बसी होय एवी, लक्ष्मीना-अवतार-जेपी सानुकूळ स्त्रीनों संबंधःपूर्वना पुन्ययोगे-माप्त थइ नाके छे. आत्री सीना योगे . . ..

अथ सुळक्षणी स्त्री वर्णनम्, १५९ .-गृहस्थधर्म सारी-रीते पाळी शकाय छे, तेथी तेवी पवित्र गुणवंती स्त्रीने धर्मपत्नी कहेवामां आवे छे. सीता, सुभद्रा, दमयंती अने द्रौपदी विगेरे अनेक सतीश्री पोताना पवित्र शीलगुणवडे जगप्रसिद्ध थयेली छे. एचा पवित्र शीलगुणवडे जे कोइ स्त्री अलंकृत होय ते जगतमां सुलक्षणी गणावा योग्य छे. अत्रे समजवानी जरूर के के केवळ विषयवासनानी क्षणिक तृप्ति करवा माटेज स्त्री संबंध (लग्न) कर्तव्य नथी. लग्ननो आशय घणो विशाळ-गंभीर छ, ते कामांघ जनो समजता नथी. लेवो संबंध तो पंशु पक्षीओ पण करे छे, छतां तेमनामां पण प्रेम- मर्यादा जोवामां आवे छे. पशु पंखीओ करतां मनुष्य स्त्री पुरुषोमां बुद्धिबळ वधारे होवू घटे छे. ते वडे धारे तो तेओ.लमनी उची नेम समजी, विवेक-मर्यादावडे तेने सफळ करी शके छे. ते तो ज्यारे कोइ सद्गुरुनी कृपाथी के पूर्वना शुभ संस्कारथी ते उभयमां दैवी प्रेम प्रगटे. एटले तुच्छ विषयभोगनी, वांछना तजी अथवा कमी : करी अर्थात् तेने पुंठ दइ, लोकोत्तर सुखनी प्राप्ति थाय एवं साधन एक रागथी करवा उज़माळ बने अने तेवां हितसाधनमा एक वीजा स्वार्थत्याग करी केवळ परमार्थ द्रष्टिथी एकबीजाने मदद करता रहे त्यारेज बनी सके, अने खरी रीते जोता तेज व्याजबी छे. पारब्ध योगे स्त्री पुरुष योग्य जूदा जूदा देह प्राप्त थया छतां सद्गुरुकृपाथी विवेकदष्टि खुलता संमजी शकाय छै के 'आत्मतत्त्व उभयमा "समान के ने शक्तिरुपे तो परमात्मा समान छे. जे आत्म- पच पूर्ण परमात्मरुपे मगटयु नी तेनेज प्रगट करवा बने तेटली M - १६० सूक्त मुक्तावळी. सानुकूळता मेळवी विवेकथी प्रयत्न करवा जोडा, एज उभयने हितकारी कर्तव्य है. ६ संयोग वियोग विषे. (मालिनी) प्रिय सखी प्रिययोगे, उल्लसे नेत्र रंगे, हसित मुख शशी ज्युं, सर्व रोमांच अंगे; कुच इक मुज वैरी, नमृता जे न दाखे, प्रिय मिलण समे जे, अंतरो तेह राखे. १५ दिन वरस समाणे, रेणि कल्पांत जाणे, हिमरज कदली जे, तेह झाळा प्रमाणे शिशिर सिकरसो,जे, सुरशो सोइ लागे, प्रिय विरह प्रियाने, दुःख शुं शुं न जागे. भावार्थ-खरी पतिव्रता स्त्रीने पोताना पाणप्रिय मुगुण प- तिनो समागम थतां जे हर्षप्रकर्ष के प्रमोद थाय-छे तेनुं वर्णन एक स्री पोतानी प्रिय सखी समोपे करे छे. जेवी रीते शुद्ध चेतना पोताना आत्माराम प्रभुने भेटतां (शुद्ध अनुभवद्वारा तेनी' साथे भेटो थर्ता) पोतानी सुमति सखी पासें पोताना हृदय उद्गार काढे के अने पोतानामां प्रगटेलो प्रेम के प्रेमनां चिन्ह जणाये छे तैम अत्र पण समजी लेवू. हे प्रिय सखि ! म्हारा माणप्रिय पतिना योगे १ अथ सुलक्षणी स्त्री वर्णनम्, १६१ . म्हारा उभय नेत्र आनंद-हर्षथी उभराइ जाय छे, मुख-मुद्रां चंद्रनी जेम स्मित हास्यथी शोभी-चमकी रहे छे अने आखा शरीरमा हर्ष मातो-समातो नथी, तेना मिषथी बधां रोमांच रुबाडां खडां थइ जाय छे. प्राणपतिनी साथे भेटो करतां (एकमेक थइ जता) फक्त एक स्तनयुगल ज अंतरायरुप थाय छे-नम्रता दाखवता नथी अने उभडक रही जाय छे, एटले वचमां आंतरो राखेछ, जे मने इष्ट नथी. हूं तो म्हारा पतिथी लगारे अंतर रहे तेवं इच्छती या पसंद करती नथीज. आ लौकिक प्रेमनी बात कही तेनी अवधि (मर्यादा) बतावी. ए करतांशुद्ध चेतनानो पोतानो आत्माराम प्रभु संगाते भेटो थतां जे अपूर्व अलौकिक के लोकोत्तर प्रेम प्रगटे छे ते तो अवधि-मर्यादा वगरनो अनवधि-अमर्याद-अखंड अने अनंत होय छे. हजी सुधी तेवा अनवधि प्रेमनो तो वियोग छे ते दूर करवाना पवित्र लक्षथीज सुगुण दंपतीए एकतार बनी सावधानपणे स्वधर्मसाधना करवी घटे छे. आई पवित्र लक्ष शुद्ध सम्यग् द्रष्टिवंत दंपतीमांज संभवे छे, जे अन्य शाणा दंपती वर्गने पण अनुकरण करवा योग्य छे. प्राणप्रिय पतिनो विरह खरी पतिव्रता नारीने केटलो पीडे के तेनु अत्र वर्णन करे छे के-मुगुण पतिना विरहनो एक दिवस वरस जेवडो मोटो थइ पडे छे अने एक रात्रि जाणे कल्पांत जेवी मोटी भयंकर लागे छे. विनोदी दंपतीने ठंडक उपजावनाएं कदली-के- वन पण तेणीने शान्ति उपजावी शकतुं नथी अने चंद्रन शीतल किरणोथी तेना आंतर तापनी शान्ति थइ शकती नथी. उलटांते बधां तेणीने तापकारी थइ पंडे छै. आ वात पण फक्त.

१ १६२ सूक्त मुक्कावळी. लौकिक प्रेमपात्र पतिना विरहे पतिव्रता स्त्रीने केवी व्यथा-पीडा याय के तेनोज कइ चितार आपे छे; बाकी शुद्ध चेतनाने पोताना आत्माराम पतिना विरहे केटलं दुःख थवा पामतुं हशे तेनी कल्पना करवी पण मुश्केल छ केमके तेणीनो प्रेम लौकिक नहि पण लोको तर (अलौकिक-असाधारण) होय छे. आ वातनी कंडक झारखी श्री आनंदघनजी महाराज जेवा अद्भूत योगी-अध्यात्मी पुरुषे । हृदयंथी गायेली पदो वांचवाथी के विचारवाथी तेना रसज्ञने थोडा वणा अंशे थइ शके छ. जेमा चेतना पोतार्नु विरहदुःख सुमति सखी पासे अथवा अनुभव मित्र पासे निवेदन करी ते दुःख निवारवा. आत्माराम प्रभुनो भेटो कराववा कहे छे. ७ स्वमाता प्रत्ये सुपुत्रनुं कर्तव्य. (इंद्रवज्रा) जे मातनो बोल कदा न लोपे, ते विश्वमा सूरज जेम ओपे; ज्यां धर्मचर्या वहुधा परीखी, त्यां मात पूजा सहुमां सरीखी. . जे मातमोहे जिन एम कीधो, गर्ने वसंता व्रत नेम लीधो; जे मात भद्रा वयणे प्रबुद्धो, शीला-तपते अरहन्न सिद्धो. . NA d. १७. . . .१८ स्वमाता' प्रत्ये सुपुत्रनुं कर्तव्य. १६३. भावार्थ-वाळक उपर मातानो उपकार अमाप छे. तेने माटे ते केटलां केटलां कष्ट उठावे छे ? तेनो ख्याल बारीकीथी. अवलो- कन करनारने ज फक्त आवे छे. पोतानां बाळक बधी रीते सुखी. थाय एवी काळजी करूणाल माता अने पिता जेटली राखे छ तेटली बीजा कोण राखी शकवाना छे ? ए वात पशु जेवा विवेक वगरना कंइक बाळको अने जुवानो पण विसरी जाय छे अने पोतानां उप-, गारी मातपितानी खरी तके सेवा चाकरी करवाने बदले उलटा तेओने संतापे छे, गाळो भांडे छे, वगोवे छे अने तेमनो आ लोक तेमज परलोक उभय बगडे तेवां काम करे छे. आवां नबळां बोल बोलनारां तथा हलकां-हीचकारां काम करनारा कपुतोनीज पंक्ति मां लेखाय छे; परंतु जेओ पोतानां मातपितानो पोताना उपरनो अमाप उपगार संभारी संभारी तेमने हरेक रीते संतोषवा-प्रसन्न राखवा पोतानी पवित्र फरज़ समजता होय अने एक पळ पण ते विसरता न होय तेज खरा सपुत होइ प्रशंसापात्र लेखाय छे. जे सपुतो पोताना परोपकारी मातपिताना हितकारी बोल कदापि उत्थापता नथी. तेमनी प्रत्येक हितकर आज्ञाने शेषानी जेम पोताना माथे चढावे छे अने तेनुं खंतथी परिपालन करे छे तेओ आ जगत- मां सूर्यनी जेवा प्रतापने पामी शोभी नीकळे छे, सर्वत्र तेमनो यश गवाय छे अने ठेकाणे ठेकाणे मान प्रतिष्टा पामे छे. गमे ते धर्म- पैथमा मातपितानी सेवा भक्ति करवा अने तेमनी हितकारी आज्ञान परिपालन करवा एक सरखी रीते फरमावेलं जणाय छे. तेम छतां तुच्छ विषयादिक सुखने वश बनी पशु जेवा विवेक वगरना कंइक सूक्त मुक्तावळी. यामर जनो पोतानां मावापनी प्रगट अवगणना करता देखाय छे, ए खेदनी वात छे. तेमने कपुत कहीने बोलावनार उपर ते डोळा काढी लडवा धाय छे, तेने बदले जो तेओपोतानां आचरण सुधारी खरी नीतिना मार्गेज चाले तो तेओ बदनाम नहि थनां जलदी स- पुतोनी पंक्तिमा दाखल थइ सर्वत्र प्रशंसा पामी शके. भारतवासी आर्यजनोनुं ए प्रथम ज कर्तव्य छे. प्रथमना वखतनां आर्यसंतानोनी आदर्श भक्तिर्नु यथार्थ भान करी चेतवू जोइए. आपणे नगुणा थर्बु न जोइए, माताना गर्भमां वसतां भगवान वर्धमान स्वामीए तथा प्रकारनो संयोग जोइ 'माता पिता जीवता रहे त्यां सुधी म्हारे व्रत-दीक्षा न लेवी' एवो अभिग्रह (निश्चय) कर्यो ते शुं आदर्श भक्तिनो नमुनो नथी? वळी भद्रामातानो पुत्र अरहन्न (अरणिक- मुनि) कर्मवश व्रतथी चलित थयो हतो, ते वात तेनी माता (साध्वी) ने जणातां ते पुत्र-साधुने जे बोधवचन कह्यां हतां तेनो यथार्थ आदर करवा पोताथो बीजी रीते बनी शके एवं नहि हो- बाथी तेणे तापथी धगधगती शिला उपर अनशन करी लीधुं अने ए रीते स्वात्मार्पण करवाथी ते पार पामी गया ए शुं ओर्छ अर्थ- ? सूचक छे? G पितृवात्सल्य वर्णन. जे वाळभावे सुतने रमाडे, विद्या भणावे सरसुं जमाडे, पितृवात्सल्यवर्णन. १६५ , ते तातनो प्रत्युपकार एही, जे तेहनी भक्ति हिये वहेही.. (मालिनी). निषध सगर राया, जे हरिभद्र चंद्रा, तिम दशरथ राया, जे प्रसन्ना मुनींद्रा; मनकजनक जे ते, पुत्रने मोह भार्या, स्वसुत हित करीने, तेहना काज सार्या. २० भावार्थ-जे पोतानां बाळ-संतानने पोतेज ‘भाइ बापु' कहीने रमाडे छे, उमर थतां तेमने योग्य विद्या भणावे के अने ते- मने सारं सारं मनगमतुं भोजन जमाडे छे एवा उपकारी पितानी कंड पण प्रत्युपकार करी शकाय तो ते एज के पोताना उपकारी पितानी सेवा भक्ति चीवट राखीने करवी अने तेमनी आज्ञानु य- थार्थ पालन करी तेमनुं दील प्रसन्न राखq. वळी परलोकचें साधन करवामां जे प्रकारनी सहायनी जरुर होय ते कृतज्ञताथी विलंब कर्या वगर आपी तेमनु हित करवा कदापि चूकवु नहि. वळी आ- पणे पोते एवं पवित्र आचरण सेवचु के जे देखी मातपिताना दील- मां प्रमोद थाय. टुंकाणमां पितार्नु कुळ दीपी नीकळे एवं रुडं प्रव- तन आळस-प्रमाद तजीने सावधानपणे करवू. वळी आगळ उपर थयेला निषध, सगर, हरिभद्र, चंद्र, दशरथ अने प्रसन्नचंद्र मुनि नथा मनक मुनिना पिता श्रीशय्यभवसूरि जेवाओने जो के पुत्रमोह सूक्त मुक्तावळी. ओछो नहोतो; परंतु जेमनी द्रष्टि सम्यग् होय छे ते पिताओ जेथी स्वपरहितनी सिद्धि थवा पामे एवं आचरण 'करवा चूकता नथी. खरा पुत्रवत्सल मातपिता एवुज पवित्र लक्ष राखीने पोतानी संत- तिने केळवे छे के ते संतति आगळ जतां तेमन पोतार्नु, मातपिता- दिक कुटुंबी जनोनुं अने अनुक्रमे ज्ञातिनुं तथा समाजनुं पण पारमार्थिक हित सधाय तेवी बुद्धि शक्तिवाळी थाय. ९ सुपुत्र वर्णन, (स्वागता) मात तात पदपंकज सेवा, जे करे तस सुपुत्र कहेवा; जेह कीर्ति कुळलाज वधारे, सूर्य जेम जग तेज सधारे. २१ (शालिनी) गंगापुत्रे विश्वमा कीर्ति रोपी, आज्ञा जेणे तात केरी न लोपी; ते धन्या जे अंजनापुत्र जेवा, जेणे कीधी जानकीनाथ सेवा. २२ भावार्थ-जे सदा मातपिताना चरणनी सेवा करे अने कु- ळनी लाज प्रतिष्ठा तथा यश वधारे तेने सुपुत्र लेखवा. जे सुपुत्रो मातापितानी सेवाभक्तिपूर्वक तेमनी.उचित आज्ञानु सदा परिपालन करता रहे छे तथा न्याय-नीतिथी प्रमाणिकपणे चाले के तेमनो सुपुत्र वर्णन. १६७ यश-प्रताप सूर्यनी पेरे दिन दिन तपतोज रहेछे. जेणे कदापि मा- तापितानी आज्ञा लोपी नथी एवा विनीत गंगापुत्र (गांगेय-भी- अपिता)नी कीर्ति अद्यापि सर्वत्र गवाय छे. तेमज जेणे जानकी- नाथ श्री रामचंद्रजीनी साचा दीलथी सेवा करी ते श्री अंजनापुत्र- हनुमानजी जेवा नररत्नोने पण धन्य छे. मातपितादिक उपगारी वडीलजनो प्रत्ये जे जेटल निरभिमानपणे स्वात्मार्पण करे छे ते ते- मने पोताने तेमज अन्यने पण परंपराए अतुल लाभदायक थाय-छे, ए हस्ताकमल जेवू सुस्पष्ट छे. आगळना वखतमा भारतसंतानो बहु पवित्र-आदर्शजीवन गुजारता. तथा राजाप्रजा, पितापुत्र सा- सुबहु अने स्वामीसेवक सहु प्रायः पवित्र भावनाथी पोतपोतानो कर्तव्य-धर्म यथार्थ समजी उंडी श्रद्धा राखी तेनुं बराबर पालन क- रता हता, तेथी तेमनी कोर्ति सर्वत्र गवाती हती. ते वखते भारतनो उदय सर्वोत्कृष्ट लेखातो हतोः जेम जेम. लोकोनी भावना-निष्टा नबळी-निकृष्ट थती गइ अने तेमनां आचरण हलकां थतां गयां तेम तेम तेमनी साथे भारतनी पण अवनति थती चाली. जे कोइ महा- शय भारतनो तेमज भारतवासी जनोनो अंत:करणथी उदयज इ- च्छता होय ते सहुए प्रथम पोतानुज वर्तन पवित्र भावनामय करी अन्यने दृष्टान्तरुप थयु जोइये. (त्रोटक.) इम काम विलास उलासत ए, रसरीति रुचे अनुभावत ए;

१६८ सूक्त मुक्तावळी. जिम चंदन अंग विलेपत ए, हिय होय सदा सुख संपत्ति ए. इति काम वर्ग समाप्त. २३ अथ सूक्त मुक्तावळी ग्रंथे चतुर्थ.मोक्ष वर्ग. ४ मोक्ष वर्ग. उपजाति. ग्राह्या कियंतोप्यथ मोक्षवर्ग, कर्म क्षमा संयम भावनाद्या। विवेक निर्वेद निज प्रबोध-इत्येवमेते प्रवर प्रसंगा॥१॥ १ मोदार्थविषे. (मालिनी) इह भव सुख हेते, के प्रवर्ते भलेरो, परभव सुख हेते, जे प्रवर्ते अनेरो; अवर अरथ छंडी, मुक्तिपंथा आराधे, परम पुरुष सोइ, जेह मोक्षार्थ साधे. २ * मोक्षार्थ विषे. ३ तजिय भरत केरी, जेण छ खंड भूमि, शिवपथ जिण साध्यो, सोळमा शांतिस्वामी; गजमुनि' सुप्रसिद्धा, जेम प्रत्येकबुद्धा, अवर अरथ छंडी, धन्य ते मोक्ष लुद्धा. परमपद-मोद माटे पुरुषार्थ फोरववाहितोपदेश. जगतना भिन्न भिन्न रुचिवाळा जीवो पैकी कोइ आ लोकना मुख माटे के कोइ परलोकना सुख माटे प्रवृत्ति-प्रयत्न करतां दे- खाय छे; पण ए बधी आशातृष्णा तजी जे केवळ कर्ममुक्त थइ मो- क्षपद प्राप्त करवा प्रयत्न करे छे, तेज खरेखर परमपुरुषनी पंक्तिमा लेखावा योग्य छे. आत्मज्ञाननो उंडो प्रकाश जेने थयो छे ते भर- तादिक चक्रवर्तीओ, तीर्थंकरो, नमि प्रमुख प्रत्येकबुद्धो अने गज- सुकुमालादिक मुनिवरो बीजो बधोय अर्थ तजी दृढ श्रद्धा अने शुद्ध चारित्रने सेवी मोक्षनाज अधिकारी थया तेमने धन्य छे. उत्तम क्षमादिक धर्मर्नु सेवन करवाथी दुरित-पाप दूर थाय छे; करेलु तप वधु लेखे थाय छे; कर्मनो अंत थाय छे, पुन्य लक्ष्मी- नी वृद्धि थाय छे अने श्रुत ज्ञान- आराधन थाय छे. उत्तम क्षमा- समता योगेज खंधक सूरिना शिष्यो, दृढ प्रहारी, कूरगडु, गज- मुकुमाल अने मेतार्य प्रमुख महा मुनीश्वरो सकल कर्मनो क्षय करी मुक्तिपदने प्राप्त थया छे. आत्मसंयम (Self Pestraint) वडे आ- १ गज सुकुमार.

१७० सूक्क मुक्तावळी. त्मामा नवा कर्म आवी दाखल थइ शकतां नथी अने समता सहित तीव्र तप करवाथी पूर्वलां कर्म बळी जळी नष्ट थाय छे. एथी स्व-- आत्मसुवर्ण शीघ्र शुद्ध थवा पामे छे, एटले अत्यार सुधी कर्मबळ- वडे ढंकाइ रहेला सकळ स्वगुणो प्रकाशमान थाय छे एज खरेखरी स्वदया छे अने एवीज रीते अन्य भव्यात्माओने निज निज आ- मगुणो प्रकाशमान करवा सम्यग् ज्ञान, श्रद्धा अने चारित्रनो सत्य मार्ग बताववो तेज खरी परदया छे. आ भावदयाने अडचण न. आवे पण पुष्टि मळे एवा पवित्र लक्ष्यथीज द्रव्यदया (स्वपर माण रक्षा) करवा, वीतराग परमात्मा शास्त्रद्वारा आपणने फरमावे छे. 'अहिंसा, संयम अने तप लक्षण धर्मने परम मंगळ रुप शास्त्रमा व- खाण्यो छे. अनित्यादि द्वादश भावना अने मैत्री, मुदिता, करुणा 'अने मध्यस्थता रुप भावनारुपी रसायणर्नु सेवन करनार भावित आत्मा सकळ अशुभ कर्मरोगने टाळी क्षमादिक उत्तम गुणोनु सेवन करी स्वात्मगुणनी पुष्टि करवा समर्थ थाय छे. स्वात्म गुणोनो संपूर्ण विकास थाय एज खरो मोक्ष छे. २ कर्म विषे. करम नृपति कोपे, दुःख आपे घणेरा, नरय तिरिय केरा, जन्म जन्मे अनेरा; शुभ परिणति होवे, जीवने कर्म तेवे, सुर नरपति केरी, संपदा सोइ देव.

कर्म विपाक वर्णनाधिकार. १७१ , करम शशि कलंकी, कर्म भिक्षु पिनाकी, करम बळि नरेंद्रे, प्रार्थना विष्णुरांकी; करम वश विधाता, इंद्र सूर्यादि होइ, सबळ करम सोइ, कर्म जेवो न कोइ. कर्म विपाक वर्णनाधिकार. कर्म राजानो कायदो एवो सख्त छे के जे कोइ खोटा विचार, खोटा वचन, खोटा उच्चार के खोटा आचार आचरे छे-एवा स्व- च्छंदपणे चालेछे तेनी ते पूरी खबर ले छे. तेने अनेक तरेहनां दुःख. भवोभव नरक अने तिर्यंच गतिमां आपीने रझळावे छे. आ रीते दुष्ट कर्म दुष्कृत्यो करनारा नीच जीवोने शिक्षा आपे छे, तेम जे रुडा परिणामथी सारा विचार, सारी वाणी अने सारा आचरण सेवे छे तेमने इन्द्र तथा चक्रवर्ती जेवी मोटी संपदा आपीने निवाजे. छे. सुकृत्यो करनारा अने सद्गुणी जीवो उपर पूरतो. अनुग्रह क- रवा पण ते कर्म राजा चूकनो नथी. एक प्रतापी महाराजानी पेरे ते दुष्ट जीवोनो निग्रह अने शिष्ट-उत्तम जीवोनो अनुग्रह तेमना विचार वाणी अने आचारना प्रमाणमा करवा ते सदाय सावधान रहे छ विशेषमा ए शिक्षा के अनुग्रहनुं फळ संपूर्ण ते ते जीवो मेळवी रहे त्यांसुधी तेनी पूरी तपास राख्या करे छे अने तेंवे प्रत्येक प्रसंगे तेमनी वृत्तिनुं सुक्ष्म रीते निरीक्षण करतो रहे छे, अने तेमना शुभा शुभ, वर्तन (हर्ष, खेद, उन्माद के समभाव ) प्रमाणे तेममुं हिता- हित निष्पक्षपणे करवा ते प्रवत छे. कर्म महाराजानी जेमना उपर ~... सूक्त मुक्तावळी. भ्यंतर तपने सार्थक करे छे अने पुन्य लक्ष्मी कहो के शुभ कर्मने पोषे छे. क्षमा-समता योगे सकळ श्रुत-शास्त्रनुं सेवन-आराधन थइ शके छे अने सकळ कर्मबंधनथी मुक्त थइ शकाय छे. जे समताथी सदाय स्वगुणनी वृद्धि-पुष्टि थवा पामे छे तेनाथी कइ वस्तु साधी न शकाय ? अपितु सकळ इच्छित वस्तु समतावडे सहेजे मली आवे छे; परंतु एवी अपूर्व समता-क्षमाज आववी मुश्केल छे. जे महानु- भाव आत्मज्ञान, आत्मश्रद्धा अने आत्मस्थिरता अभ्यास बळे य- थार्थ प्राप्त करी शके छ तेज पुरुषार्थवंत आत्मा तेवी समनाने पामे छे. वीजा पण धारे तो वधारे नहि तो तेवा समर्थ समनतवंत नि- कटभवी जनोनी प्रशंसा करी अने ते ते कारण कार्यगुणमां बने ते- टलो अभ्यास करी पोताना आत्मामा तथा प्रकारनी योग्यता पेदा करी शके. एपण ठीकज छे. उपकार-अपकार-विपाक-वचन अने असंग-एम क्षमाना पांच प्रकार छे. प्रथमनी त्रण प्रकारनी लौकिक क्षमा छे, ज्यारे बीजी चे प्रकारनी लोकोत्तर क्षमा छे. जिनेश्वर दे- वनां के जिन आगम-शास्त्रनां वचन-अनुसारे स्वच्छंदनो त्याग करी क्षमा आदरवी ते वचन क्षमा. तेनी सतत् सेवा (अभ्यास) वडे मोक्षदायक असंग समान लाभ मळे छ. ए अलौकिक क्षमायोगे पूर्व खंधकमरिना पांचसो शिष्यो, द्रढमहारी, कूरगड, गजमुकुमाळ अने मेतार्य मुनि प्रमुख मुनीश्वरो अनेक अघोर परिसह उपसर्गो समभावे सहन करी परमानंद पदने पाम्या तेम आपणे प्रयत्न क- रवो घटे छे.

संयम प्रभाव वर्णनाधिकार.
१७५
,
४ संयम विषे.
(स्वागता.)
पूर्व कर्म सवि संयम वारे,
जन्म वारिनिधि पार उतारे,
तेह संयम न केम धरीजे,
जेण मुक्ति रमणी वश कीजे.
तुंग शैल बळभद्र सुहायो,
जेण सिंह मृग बोध बतायो;
तेण संयम लहीय अराध्यो,
जेण पंचम सुरालय पायो.
संयम प्रत्नाव वर्णनाधिकार.
सम्यग्-यथार्थ रीते यम-नियमनुं पालन करवू, पांचे इन्द्रि-
योनुं विवेकथी सारी रीते दमन करवू, क्रोधादिक चारे कषायोनो.
क्षमादिक गुणना अभ्यासवडे सारी रीते निग्रह करवो, तेमज मन
वचन कायाने कबजे राखी तेनो सदुपयोगज करवो तेने ज्ञानी पु-
रुषो संयम कहे छे. तेवो अद्भुत संयम कहो के आत्मनिग्रह करवो
ते इन्द्रादिक देवोने पण दुर्लभ छे. कायर अने सुखशील जनो तेथी
कैपे है. तलवारनी धार उपर नाचवा करता पण संयम सेवन, अति
कठीन छे, तलवारनी धार उपर तो नट-बाजीगरी नाची शके के
९
,

१७२ सूक्त मुकावळी. कृपा नजर थाय छे ते उंची पायरी उपर चढी शके के अने तेनी अवकृपा थाय छे तेनो विनिपात (विनाश) थतां वार लागती नथी. जेवु जेमर्नु वर्तन तेवु तेमने फळ मळी रहे छे. लौकिक शास्त्र मुजब चंद्र कलंकित थयो, शंकरमहादेवे भीख मांगी, बलीराजा पासे वि- ष्णुए दीनपणे प्रार्थना करी ए कर्म वशवर्तीपणाथी. वळी ब्रह्मा, इन्द्र अने सूर्यादिक देवो पण कर्मयोगे उंची पदवी पाम्या अने कर्मवश पोतार्नु भान भूली पाछा स्त्री-मोहनीमां मुंझाइ फसी पड्या. कर्म राजा जेवू कोइ बळियु जणातुं नथी. आ कर्मनुं वर्णन थोडं घणु लौकिक शास्त्रोमां करेल देखाय छे; परंतु तेर्नु आबेहुब यथार्थ वर्णन तो सर्वज्ञदेशित जिन आगम-ग्रंथोमांज करेलं छे, तेमां वस्तुतः कर्मनो कर्ता, भोक्ता, संसारमा संसर्ता अने संसारनी अंत करनार जीव पोतेज कह्यो छे. जेवां शुभाशुभ कर्म जीव करे छे तेवां तैनां फळ ते संसारमा भोगवे छे, मिथ्यात्व-बुद्धि विपर्यास, अविरति-स्वच्छंद वर्तन-हिंसा असत्यादिक पापर्नु सेवन, क्रोध मान माया लोभ रुप कषाय अने मन वचन कायना योगव्यापार वडे जे कइ करवामां आवे छे तेज कर्म. शुभाशुभ परिणामवडे शुभा शुभ कर्म कराय छे अने तेनुं तेवु शुभाशुभ फळ जीवने भोगवq पडे छ. शुभ कर्मनुं फळ मीटुं अने अशुभ कर्मचें फळ कडq होय छे. तीन राग द्वेष के कषाय वडे अशुभ कर्म-फळ अने मंद राग द्वेष के कषायवडे शुभ कर्म-फळ थवा पामे छे. त्यां सुधी जीवने संसार परिभ्रमण कर, पडे छे. वस्तुत: जीव-आत्मा स्फाटिक जेवो निर्मळ छे, परंतु कर्मरुपी उपाधिने योगे ते मेलो जणाय है. जो तथा W4 क्षमागुण वर्णनाधिकार. , प्रकारनी अनुकूलता पामी, यथार्थ ज्ञान, श्रद्धा अने पुरुषार्थ जे निज आत्मामांज ढंकाइ रह्या छे तेमने जाग्रत करी ए अनादि कर्म उपाधिने टाळी देवाय तो संसार परिभ्रमणनो अंत आवी जायः अने अनंत-अक्षय शाश्वत सुखरुप मोक्ष पामी शकाय. ३ दमा विषे. दुरित भर निवारे, जे क्षमा कर्म वारे, सकळ तप सधारे, पुण्य लक्ष्मी वधारे; श्रुत सकळ आराधे, जे क्षमा मोक्ष साधे, जिण निज गुण वाधे, ते क्षमा कां न साधे. ६. सुगति लही क्षमाए, खंध सुरीश शिष्या.' मुगति दृढप्रहारी, कूरगडु मुनीशा; गंजमुनिय क्षमाए, मुक्ति पंथा अराधे, तिम सगति क्षमाए, साधु मेतार्य साधे. दमागुण वर्णनाधिकार. क्रोधादिक कषायनी के राग द्वेषनी शान्ति, समता, धीरज ए बधा क्षमाना रुपांतर-पर्याय छे. तेनो प्रभाव खरेखर अलौकिक छ, 'ते अशुभ-पाप कर्मने दूर करे छे. करवामां आवता बधा बाह्य-अvo ५ , १७४ सूक्त मुक्तावळी. भ्यंतर तपने सार्थक करे के अने पुन्य लक्ष्मी कहो के शुभ कर्मने पोपे छे. क्षमा-समता योगे सकळ श्रुत-शास्त्रनुं सेवन-आराधन थइ शके छे अने सकळ कर्मवंधनथी मुक्त थइ शकाय छे. जे समताथी सदाय स्वगुणनी वृद्धि-पुष्टि थवा पामे छे तेनाथी कइ वस्तु साधी न शकाय ? अपितु सकळ इच्छित वस्तु समतावडे सहेजे मळी आवे छे; परंतु एवी अपूर्व समता-क्षमाज आववी मुश्केल छे. जे महानु- भाव आत्मज्ञान, आत्मश्रद्धा अने आत्मस्थिरता अभ्यास वळे य- थार्थ प्राप्त करी शके छे तेज पुरुषार्थवंत आत्मा तेवी समनाने पामे छे. वीजा पण धारे तो वधारे नहि तो तेवा समर्थ समतावंत नि- कटभवी जनोनी प्रशंसा करी अने ते ते कारण कार्यगुणमां बने ते- टलो अभ्यास करी पोताना आत्मामां तथा प्रकारनी योग्यता पेदा करी शके. ए पण ठीकज छे. उपकार-अपकार-विपाक-वचन अने असंग-एम क्षमाना पांच प्रकार छे. प्रथमनी त्रण प्रकारनी लौकिक क्षमा छे, ज्यारे वीजी के प्रकारनी लोकोनर क्षमा छे. जिनेश्वर दे- वनां के जिन आगम-शास्त्रना. वचन-अनुसारे स्वच्छंदनो त्याग करी क्षमा आदरवी ते वचन क्षमा. तेनी सतत् सेवा (अभ्यास) वडे मोक्षदायक असंग समान लाभ म छे. ए अलौकिक क्षमायोगे पूर्व खंधकमरिना पांचसो शिष्यो, हमहारी, कूरगड, गजसुकुमाळ अने मेतार्य मुनि प्रमुख मुनीश्वरो अनेक अघोर परिसह उपसर्गों समभावे सहन करी. परमानंद पदने पाम्या तेम आपणे प्रयत्न क- रवो घटे छे. -

संयम प्रभाव वर्णनाधिकार.
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४ संयम विषे.
(स्वागता.)
पूर्व कर्म सवि संयम वारे,
जन्म वारिनिधि पार उतारे,
तेह संयम न केम धरीजे,
जेण मुक्ति रमणी वश कीजे.
तुंग शैल बळभद्र सुहायो,
जेण सिंह मृग बोध बतायो;
तेण संयम लहीय अराध्यो,
जेण पंचम सुरालय पायो.
संयम प्रत्नाव वर्णनाधिकार,
सम्यग्-यथार्थ रीते यम-नियमनु पालन करवं, पांचे इन्द्रि-
योनुं विवेकथी सारी रीते दमन करवू, क्रोधादिक चारे कषायोनो.
क्षमादिक गुणना अभ्यासवडे सारी रीते निग्रह करवो, तेमज मन
वचन कायाने कबजे राखी तेनो सदुपयोगज करवो तेने ज्ञानी पु-
रुषो संयम कहे छे. तेवो अद्भुत संयम कहो के आत्मनिग्रह करवो
ते इन्द्रादिक देवोने पण दुर्लभ छे. कायर अने सुखशील जनो तेथी
कपे छे. तलवारती धार उपर नाचवा करता पण संयम सेवन. अति
कठीन छे, तलवारनी धार उपर तो नट-बाजीगरी नाची शके के
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- १७६ सूक्त मुक्तावळी. पण संयमनो महिमा अद्भुत छे. एक रांक जेवो पण पूर्वोक्त संयमना प्रभावे देवेन्द्र अने चक्रवर्ती जेवाने पण पूजा-सत्कार यो- ग्य बने छे. पूर्वलां अने नवा आवतां कर्मर्नु निवारण करी जे आ भयंकर भवसागरथी पार उतरे छे अने अनंता शाश्वत सुख साथे कायम माटे जोडी आपे छे, तेवा शुद्ध संयमनु सेवन-आराधन क- रखा शा माटे आपणे आळस-प्रमाद सेवी बेनशीव रहेवू जोइए ? स्वच्छंद आचरणवडे जीव स्वहितथी चूकी अहितनेज आदरी अंते दुःखी थाय छे. माठां आचरण करवाथी ज्यारे जीव पराधीन थइ दुःखी थाय छे त्यारे तेने कोइ रक्षी शकतुं नथी. कृष्णवासुदेवनुं अवसान थया पछी तेना अति प्रियवंधु बळभद्रजीए वैराग्य जाग्रत थवाथी संयम लईने तेनुं यथार्थ सेवन-आराधन कयु. पोताना अ- दभृत रुपथी कोइ मोहान्ध बनो अनर्थभागी न थाय एवी पवित्र बुद्धिथी एकान्त तुंगगिरी उपर निवास करी तप जप ज्ञान ध्यान- नो वळदेव मुनिए एवो अभ्यास कर्यों के तेना प्रभावथी हिंसक जानवरो.पण शान्त बनी गया, अने पोते पांचमा ब्रह्मदेवलोकमां सिधाव्या.. ५ बादश नावना विषे. प्रथम अनित्य भावना. (मालिनी..) धणकणं तनुजीवी, वीज झात्कार जेवी, सुजन तरुण मैत्री, स्वप्न जेवी गणेवी;

प्रथम अनित्य भावना. १७७ १० , - अंह मम ममताएं, मूढता काइ माचे, अथिर अरथ जाणी, एणशुं कोण राचे. धरणि तरु गिरीदा, देखीए भाव जेइ, सुरधनुष परे ते, भंगुरा भाव तेइB इम हृदय विमासी, कारमी देह छाया, तजीय भरतराया, चित्त योगे लगाया. ११ लक्ष्मी अने जीवित वीजळीना झंबकारा जेवां क्षणभंगुर-जोत जोतामा अदृश्य थइ जनार छे, वळी स्वजन कुटुंबी साथेनो मेळो तथा जुवानीनो संग स्वप्न जेवो क्षणिक छे, तो पछी खोटी माया ममता करी तेमां शा माटे मुंझाइ रहो छो ? वस्तुनी असारता अने क्षणिकता विचारी शाणा जनोए ते ते वस्तुमा राचवु जोइए नहि. पृथ्वी, तरु-वृक्षो अने पर्वतादिक पदार्थों इन्द्रधनुष्यनी जेवा सुंदर जणाना छतां ते बधा विनाशशील छे. तेमनी शोभा कारमी (का- यम ईको नहि रहेनारी) छे. वळी जळने ठेकाणे स्थळ अने स्थळने ठेकाणे जळ थइ जाय छे. सुंदर घटादार वृक्षो पण एक वखते शोभा वगरनां बनी रहे छे, अने डंगर पण छेटेथी रळीयामणा दीसे छे. एवीज रीते आ शरीरादिकनी उपरनी शोभा पण कारमी (जोत- जोतामा जतीरहेनारी)छे, एमः समजीभरतचक्रवर्तीए वैराग्यने जाग्रत करी मोक्षमार्गनों स्वीकार.कयों, तेम मुझ जनोए पण का- यांनी माया तजी, हितकार्यमा मनने' जोड जोइए. जेनी साथे सूक्त मुक्कावळी. आपणो घणो निकट संबंध छे, जेने माटे जीव कई कंइ-पापारंभ करी दिन रात चिन्ता कर्या करे के अने जोतजोतामां काळ जेनो कोळीयो करी जाय छे ते कायाज गमे तेटली ममता राख्या छतां आपणी थती नथी तो पछी एथी जुदां (दूर-अळगा) रहेता स्व- जन लक्ष्मी प्रमुख पदार्थों तो पोताना शी रीते थइ शकवाना हता? तेम छतां भ्रान्तिवश मूढ जीव ते ते पदार्थोमा ममता राखी मरे छे. अनित्य, अशुचि अने जड एवा आ देहादिक उपरनी ममता तजी वैराग्य जगावी, धन्य-कृतपुन्य जनोज ते द्वारा नित्य ( शाश्वत), पवित्र अने स्वाभाविक धर्म-प्राप्त करी ले छे. ३ बीजी अशरण भावना. परम पुरुष जेवा, संहाँ जे कुतांते, अवर.शरण केनु, लीजीए तेह अंते; प्रियः सुहृदः कुटुंबा, पास बेठा जिकोइ, मरण समय राखे, जीवने ते'न कोइ. १२ सुरगण नर'कोडी, जे करें भक्त सेवा, मरण भय न छुट्या, ते सुरेंद्रादि देवा; जगत.जेन हरंतो, एम जाणी अनाथी, वते पहिय विछुट्यो, जह' संसारमाथी. व्हाला मित्रों अने स्वजनो पासे बेठा होय तेम छतां काळ जी- बीजी'अखरण भावना. १७९ वने झडपी जाय छे; ते वखते तेने कोइ रोकी शकतुं नथी. परम पुरुषोने पण काळ संहरी जाय छे. तो पछी बीजा साधारण जी- वोर्नु तो कहेवुज शुं ? काळ तो अविश्रान्तपणे पोतार्नु काम करतो ज रहे छे. आ बाळगोपाळ कोइने काळ छोडतो नथी-छोडवानो पण नथी. जेनी सेवामां करोडों देवो अने मानवो हाजर रह्या करे छ एवा इन्द्रो अने चक्रवर्ती जेवा पण काळना झपाटामांथी बची श- क्या नथी. (मोतना भयथी मुक्त थइ शकता नथी.) जेम नाहर बकरीने पकडी जाय छे, तेम काळ पण जीवने उपाडी जाय छे. ते कोइने छोडतो नथी ए रीते आखी दुनियाने काळवश जाणी, म- नां वैराग्य जगाडी, अहिंसादिक उत्तम व्रत आदरी, आ दुःखदा- यक संसारनी उपाधिमाथी अनाथी मुनि छुटी गया. श्रेणिक राजा अने अनाथी मुनिनो संवाद प्रसिद्ध छे. जन्म जरा अने मरणना दुःखथी लोको त्रासे छे-बीहे छे खरा, पण तेटला मात्रथी तथा प्रकारनो पुरुषार्थ फोरव्या वगर तेवां अनंत दुःखमांथी कोइ छुटी शकता नथी. जो ए दुःखथी छुटवूज होय तो जेओ परम पु- रुषार्थ फोरवी ए बधां दुःखमाथी छुटी गया छे एवा अरिहंत, सिद्ध अने साधु जनोनुं तेमज तेओना कहेला पवित्र धर्मर्नु शुद्ध मनथी शरण करो. तेमनामांज अनन्य (एकतार) श्रद्धा राखो, तेमना पवित्र गुणोर्नु सदाय चिन्तवन करो अने तेवा पवित्र गुणो प्राप्त करवा तमे लायक बनो-तेवु शुभ आचरण सेवता रहों. सारं काम करी लेवा विलंब-वायदों न करो. काल करवु होय ते आज करो,

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सूक्त मुक्कावळी.
एक घडीनो पण विश्वास राखी न रहो. रखे मननी वधी मनमांज
रही जाय, माटे चेतो-समजो.-
३ त्रीजी संसार नावना.
(शार्दूल विक्रीडित.).
तिर्यंचादि निगोद नारकीतणी
जे नीची योनि रह्यां,
जीवे दुःख-अनेक दुर्गतितणां,
कर्मप्रभावे लह्यां;
आ संयोग वियोग रोग वहुधा,
आ जन्म जन्मे दुःखी;
ते संसार असार जाणी,
इहवो जे ए तजे ते सुखी.
(इन्द्रवज्रा.)
जे हीन ते उत्तम जाति जाये,
जे उंच ते मध्यम जाति थाये;
ज्यु मोक्ष मेतार्य मुनींद्र जाये,
युं मंगुसूरि पुरयक्ष थाये. १५.
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त्रीजी संसार भावना. १८१ कर्मवश जीव तियेचादि नीची गतिनां तेमज नरक अने नि- गोद संबंधी कमकमाटी उपजावे एवां अबोर दुःख वारंवार सहन करतो संसारनी चारे गति संबंधी ८४ लक्ष जीवायोनिमा वारंवार भमतो (परिभ्रमण करतो) रहे छे. एटले तेमां बखतो वखत सं- योग, वियोग, आधि, व्याधि, उपाधि तथा जन्म, जरा अने मरण संबंधी अनंत दुःखदावानळमां ते वापडो जीव सदाय पचाया करे छे. एवा दुःखदायी संसारनी असारता कोइक विरल जीवोनेज भाग्ययोगे तथा प्रकारना ज्ञानीगुरुनी कृपाथी समजाय छे; अने जे- मने संसार-मोह ओछो थयो होय ते महानुभावोज वैराग्यथी तेनो त्याग करे छे-करी शके छे. बाकीना अज्ञान अने मोहवश पडेलाजीवो तो बापडा चारे गतिमां अरहां परहां अथडायांज करे छ, तेमनों केमे पार आवी शकतो नथी. जीव जेवी सारी के नवळी करणी करे छे तेवी ते उत्तम, मध्यम के अधम गतिमां जन्म लेतो फरे छे. सर्वज्ञ वीतरागनां वचनानुपारे उत्तम प्रकारनी क्षमा-समना ज्यारे सेवन करवामां आवे छे त्यारे हीन जातिमां जन्मेल जीव पंण मे- तार्य अने हरिकेशी मुनिनी पेरे परम पदने पामी शके छे; परंतु उंची गतिमां (देव मानव भवमां) जन्म्या छां जे विषयादिकमां लुब्ध बनी, क्रोधादिक कषायने वश थइ, मन वचन कायाने मोक- की मूकी दइ, स्वछंदी बनी जइ, मोहांपगे हिंसादिक पापर्नु से- वन करता रहे छे ते मंगुआचार्यनी पेरे दुर्योनिमां उपजे है. जो के पाछळथी ते पोतानी भूल समजाना पस्ताय छे खरो, परंतु मू- खपणे करेली भूलनी वगर तेनो छुटको . .१८२ सूक्त मुक्तावळी. ४ चोथी एकत्व नावना. पुण्ये अकेलो जीव स्वर्ग जाये, पापे एकेलो जीव नर्क थाये; ए जीव जा आव करे एकेलो, ए जाणीने ते ममता महेलो. १६ ए एकेलो जीव कुटुंब योगे, सुखी दुःखी ते तस विप्रयागे; स्त्री हाथ देखी वलयो अकेलो, नमि प्रबुध्यो तिणथी वहेलो. जीव जेवी सारी नरसी (भली भुंडी) करणी करे छे तेनुं. तेवू सारुं नरमुं फळ पण पोताने भोगव, पडे छे. जोते शुभ धर्मकरणी करे छे तो ते पुन्य-फळने भोगववा स्वर्गनां सुख पामे.छे अने.जो ते दुष्कृत्य करे छे तो-ते पाप-फळने भोगववा नरकादिकनां दुःख पामे छे. जेवी शुभाशुभ करणी करे छे ते, सुख दुःख तेनेज भोग- बवानो प्रसंग आवे छे. ए वात सहेजे समजाय एवी.छ. अही पण जे सारां सारां परोपकारनां काम करे छे.तेनी तथा जेना-विचार, वाणी अने' आचार-पवित्र होय छे तेनी लोकमां पुष्कळ प्रशंसा थाय छे अने जेनां आचरण अवळा होय छे,तेनी.पुष्कळ निंदा थाय छे. आने जो प्रगट रोकडं-फळ मानवामां आवतुं होय तो ते.भविष्यमां - पांचमी अन्यत्व भावना. १३ थनार मुख्य मोटा फळनी अपेक्षाए-केवळ गौण वा अल्प समज- वार्नु छे. जेवा फळनी तमारे चाहना होय.तेवु शुभ के अशुभ आ- चरण करतां तमारे एकलाएज संभाळ राखवानी छ, केमके तेनुं तेवू फळ तमारे ज भोगव, पडे एम.छे, -खोटी ममता राखवाथी कशु वळे.एम नथी. कोइनी सीफारस एमां काम आवे एम नथी. धन कुटुंबादिकना संयोगे के वियोगे ममताथीज जीव पोताने मुखी के दुःखी मानी (कल्पी) ले छे; परंतु जो आत्मज्ञान के तत्वज्ञानना योगे खरा वैराग्यथी ते खोटी ममता-मारापणुं मूकी दे छे तो.पछी तेने संयोग वियोगमा तेवा सुख दुःखनी कल्पना थती नथी. नमि राजाने सख्त मांदगी थइ त्यारे कंइ खडखडॉट तेनाथी सहन थइ शकतो नहोतो, ते जाणी राणीओए वधाराना कंकणादिक काढी नाख्या अने फक्त एकेक वलयज राख्यु, जेथी अवाज थतो बंध पडयो तेनु कारण विचारतां एकाकीपणामांज़ हित समजी तरत सर्व प्रसंग तजी दइने ते सुखी थया, ५ पांचमी अन्यत्व नावना, जो आपणो देहज ए न होइ, तो अन्य को आपण मित्र कोइ; जे सर्व ते अन्य इहां भणीजे, केहो तिहां हर्ष विषाद-कीजे, सूक्त मुक्तावळी. देहादि जे जीवथकी अनेरा, इयां दुःख कीजे तस नाश कर ते जाणीने वाघणीने प्रवोधी, सुकोशळे स्वांग न सार कीधी. नित्यमित्र समान आ देहनी सेवा चाकरी हमेशां कइक पापा- रंभ साथे करीए छीए तोपण अंते ते छेद दइ जाय छे तो पछी एथी अळगा रहेनारा पर्व मित्र समान स्वजन कुटुंवो विगेरे आप- गने अवसान वखते क्यांथी सहाय आपी आपणु रक्षण करी शके ? नज करी सके ए उपरथी एवो निश्चय करवानो छे के आपणा आत्माथी जूदा जे कोइ देह, लक्ष्मी, स्वजन मित्रादिकनो संयोग वियोग बने ते वधा आत्माथी न्यारा होवाथो ते ते प्रसंग ते संबंधी हर्ष खेद करवो उचित नथी. तेम छतां बनी शके तो ते ते प्रसंग- माथी कइ पण बोधदायक गुण मेळवी, वैराग्य जगावी, आपणा आत्मानुं अधिक हित थाय तेम करी लेवु ते उचित छे. जेवो संयोग संबंध शरीर अने वस्त्रने छ तेवोज संयोग-संबंध आत्मा अने शरीरने जाणवो. जेम वस्त्र जीर्ग थतां के फाटी जमां के तेनो नाश थतां शरीर जेई ने तेवु वनो रहेछ तेम शरीर जीर्ग थतां, रोगाविष्ट थतां के नाश पामवा छतां आत्मा तो जेवो.ने तेयो गमे तेवी गति-स्थि- तिमा कायम रहे छे. आ रीते ज्यारे देहथी आत्मा जूदोज सिद्ध थाय छे त्यारे तेनो वियोग था खेद के शोक करवो सुज्ञजनोने . छठी अशुचि भावना. उचित नयोज. मोह मायाथो के ममताथी तेवो खेद के शोक कर- नार जीव फोगट चीकणां कर्म वांधी दुःखी थाय छे. आत्मानु अ- धिक हित थाय तेम करवा देहादिक क्षणिक वश्तु उपरथी ममता तजी (ओछी करी) यथाशक्ति तप जप संयमनु सेवन करवुज उचित छे, एम समजी सुकोशळ मुनिए शरीरममता तजी, विकराळ वाघणीने अंते जातिस्मरण पूर्वक बोधथाय तेवु हिन-प्रवर्तन कयु, ६ छही अशुचि लावना. काया महा एह अशुचिताइ, जिहां नव द्वार वहे सदाइ। कस्तुरी कर्पूर सुद्रव्य सोइ, ते कायसंयोग मलीन होइ. अशुचि देहि नरनार केरी, म राचजे ए मळसूत्र शेरी; ए कारमी देह अंसार देखी, चतुर्थ चक्री पण ते उवेखी. २१ आ काया महा मलीन अशुचिथी भरेलीज छे. तेमां पुरुषने नव द्वारे अने स्त्रीने द्वादश द्वारे सदा अशुचि बहेती रहे छे. कस्तु- री, कार, चंदनादिक सुगंधी वस्तुओ पण एना संयोगे दुर्गंधी बनी जाय छे. गमे तेवू स्वादिष्ट सुंदर भोजन कां होय पण ते ब- २० M - 1 सूक मुक्तावली. धार्नु परिणमन विष्टादिकमां थाय छे. गमे तेवां सुंदर किंमती वस्त्र पहेर्या ओढयां होय ते. वर्धा कायाना संगथी मलीन अने नमूला- नमालां थइ जाय छे. मळ मूत्रादिक अशुचिथीज भरेली आ स्त्री पुरुषोनी काया अशुचिथी.ज पेदा थयेली छे. तेने जळादिक शौचथी शुद्ध करवानो प्रयास केवळ नमरुप छे. आ अथुचिमय कायानी असारता यथार्थ समजी जे समताना कुंडमां यथेच्छ स्नान करी पापमेलने वरावर पखाली साफ करी नांखी फरी मलीनताने पा- मना नथी (पापाचरणमा प्रवृत्त थता नथी)ते अंतरआत्माज परम पवित्र समजवा. खरा ज्ञानी विवेकी साधु-महात्माओ तो उपरोक्त भावस्नान करीने ज सदाय पोताना आत्माने पवित्र करे छे. अहिंसा, सत्य, अचौर्य ब्रह्मचर्य अने असंगतादिक सदाचरणवडे ज भावस्नान कर्यु लेखाय छे. ते सिवाय तो मच्छनी पेरे दिनरात जळमां निम- ज्जन करवा मात्रथी कशुं वळतुं. नथी.. शरीरममता अने हिंसादिक पापाचरणवडे तो आत्मा अधिकाधिक मलीनताज पामीने अधो- गति (अवनति) ने प्राप्त थाय छे एम यथार्थ समजी सनतकुमार चक्रवर्तीए जेम कायानो माया तजी, वैराग्य पामीने आत्महित साध्यु तेम भव्यात्माओए करवू घटे छे. ७सातमी आश्रवभावना. (मालिनी) इह अविरति मिथ्या-योग पापादि साधे, इण उणभव जीवा, आश्रवे कर्म बांधे; .. - , १८७ . - सातमी आश्रव भावना. करमज़नक जे ते, आश्रवा जेन, रुंधे, समर समय आत्मा, संवरी सो प्रबुद्धे. २२ (इंद्रवज्रा.) . जे कुंडरीके.व्रत छांडी दीg, भाइतणुं ते वळी राज्य लीg. ते दुःख पामे नरके घणेरा, ते हेतु ए आश्रय दोष केरा. २३ अविरति (स्वच्छंदाचरण), मिथ्यात्व (विपरीत श्रद्धा), मन बचन कायानी मोकळी वृत्ति अने क्रोधादिक कषाय के जेनावडे जीवमा वारंवार कर्म आवतां रहे-छे ते आश्रव कहेवाय छे. आ रीते थतां कर्मसंचयथी जीवने भवभ्रमण थयां करे छे. सम्यग् दर्शन ज्ञान अने चारित्ररुप रत्नत्रयीन सेवन करवाथी उपरोक्त कर्म आ- वतां अटके छे; तेथो सुज्ञ जनोए मिथ्यात्व, अविरति प्रमुख दोपर्नु सत्वर निवारण करी आत्माने कर्मना भारथी हळवो करवो जोइए आत्मनिग्रह करवा रुप संयमवडे ,सहेजे कर्मनिरोध थइ शके छे. मन अने इन्द्रियरुप उद्धत घोडाने ज्ञानुरुप लगामवडे बराबर काजे राखवा. क्षमा-समतादिकना अभ्यासवडे .क्रोधादिक कषायने दूर करखा, सम्यक्त्ववडे मिथ्यात्वने धमी.देव, सम्यग् ज्ञानवडे अज्ञान तिमिरने नष्ट करवं, अने उत्तम व्रत, नियमोवडे हिंसादिक आश्रवनां द्वार बंध का पवित्र विचार, वाणी अने-आचारवडे मन वचन -- Frames । aanise M HA , सूक्त मुक्तावळी. अने कायानी मलीनता दूर करी देवी. जो जीवने जन्म जरा अने, मरणनां अनंता दुःखथो बर्चवानी खरेखरी इच्छाज होय तो खरी, तक पामीने पोतानीज मेळे स्वतंत्रपणे गमे तेटलां कष्ट समभावे सहन करी पवित्र रत्नत्रयीन आराधन करी लेवं. पुंडरीक राजाना बंधु कुंडरीके प्रथम पोते वैराग्यथी आदरेला व्रत नियमो सुखशीलता (शिथिलता)थी तजी दइ बंधु पासेथी राज्य लही भोगविलास करवो पसंद कों, तो तेथी चीकणां कर्म बांधी थोडा दिवसमाज मरीने ते सातमी नरके गयो, ज्यारे पुंडरीक राजा दीक्षा लइ, आ- राधो अनुत्तर सुख पाम्या. G आठमी संवर नाश्ना (इंद्रवज्रा.) जे सर्वथा आश्रवने निरंधे, ते संवरी संवर भाव साधे; ते भाव वंदो गुरु वज्रस्वामी, जेणे त्रिया कंचन कोडी वामी. आश्रवनो निरोध करवो तेनु नाम संघर छे. तेना ५७ भेद कया छे. पांच समिति अनेत्रण गुप्तिरुप अष्ट प्रवचन मातार्नु पालन कर, क्षुधा तृषादि २२ परिषहोने सम्यक् प्रकारे (दीनता रहित- अदीनताथी-समभावे) सहन करवा, क्षमा मृदुता सरलनादिक दश विध यतिधर्मर्नु यथाविधि पालन करवू, अनित्यादिक द्वादश भा- , - आठमी संवर भावना. १८९.' 3 बना (उपलक्षणथी मैत्री प्रमुख चार भावना तथा पांचे महाव्रतनी पचवीश भावना) दिनपत्ये भाववी, तथा सामायिक, छेदोपस्थाप- नियादिक चारित्रनी यथायोग्य आराधना करवी. जे उक्त ५७ प्रकारना संवरवडे सर्वथा आश्रवनो निरोध करे छे ते महात्मा अनु- क्रमे सर्वोत्कृष्ट संवरने पामो शके छे. मूळ तो आत्मा स्फटिक रत्न जेवो निर्मळ निष्कषायी छे, परंतु ते विविध आश्रवोदारा कर्मसं- चयवडे मलीन थयेलो दिसे छे. संवरवडे ए मलीनता अटकावी शकाय छे, अने तीव्र तपना प्रभाव स्फटिक रत्न जेवु निर्मळ-उज्वळ स्वरुप प्रगट करी शकाय छे. पछी ते संशुद्ध थयेलं आत्मस्वरुप कदापि मलोनताने पामी शकतुं नथीज. जेम सुवर्णमा रहेली मली- नता तीव्र तापना योगे दूर करी देवाथी ते संपूर्ण शुद्ध बनी जाय थे, पछी पार्छ ते मेलु थवा पामतुं नथी, तेवीज रीते आत्मा उपर लागेलो कर्ममळ तथा प्रकारना तीव्र तप तेमज संयमना.प्रभावे दूर कायइ गया बाद फरी, आत्मा कर्मथी लेपातो नथी. आवा पवित्र आशयथीज कोटिगमे सुवर्ण युक्त रुकमिणी कन्यानो जेमणे त्याग कों एवा वज्रस्वामी तेमज जंबुस्वामी, स्थूलिभद्रजी प्रमुख महा मुनिओने सदाय नमस्कार हो. ४ ए,नवमी निर्जरा जावना. (मालिनी.) हन दोय दश तप भेदे, कर्म ए निर्जराये, उतपति थिति नासे, लोक भावा भराये . .

१९०, सूक्त मुक्तावळी. , 'दुरलभ जग बोधि, दुलंभा धर्मबुद्धि, भवहरणी विभावो, भावना एह शुद्धि. २५ (उपजाति.). बे निर्जरा काम सकाम तेही, अकाम जे ते मरुदेवी जेही; ते ज्ञानथी कर्मह निर्जरीजे, दृढप्रहारी परे तो तरीजे. २६ आत्मप्रदेश साथे क्षीर नीरनी पेरे जे कर्मदळ लाग्या छ तेने आत्माथी जुदा-पाडवा-क्षय पमाडवा तेनु नाम निर्जरा. तेवी निर्जरा अथवा कर्मनो क्षय वाह्य अने अभ्यंतर एवा वार प्रकारना तपवडे थइ शके छे. तप संबंधी तीव्र तापवडे करी आत्मप्रदेशथी कर्मनां दलीयां जुदां पडी क्षय पामी जाय छे. एम करतां ज्यारे सर्व कर्म- दळनो क्षय थइ जाय छे त्यारे जन्म मरणनो भय सर्वथा टळी जाय छे. पछी,आत्मा अजरामर थइ रहे छे. सत्य सर्वज्ञोकत धर्मनी प्राप्ति खरेखर दुर्लभज . तेवो दुर्लभ धर्म प्राप्त करवानी बुद्धि पेदा थवी पण दुर्लभ छे. तेवी धर्मबुद्धि अने धर्मप्राप्ति आ नवमी निर्जरा भा- वनावडे सुलभ थवा पामे छे. आ.भावनाना वळथी भव-संसारनो जलदी अंत आवे छे. बे प्रकारनी निर्जरा कही छे. एक सकाम अने बीजी अकाम मरुदेवी माताए पूर्वना (केळनां) भवमा (करीना झाइयकी) जे

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दशमी लोकस्वरुप भावना.
अज्ञान कष्ट-दुःख सहन कयु: हतुं तेनी परे पराधीनपणे अनिच्छाए
अथवा ज्ञान-विवेक वगर कष्ट-क्रिया करवाथी जे कर्म निर्जरा
(कर्मनी ओछाश) थवा पामे छे तेनुं नाम अकाम निर्जरा अने.
समज साथे विवेक पूर्वक सत्याग्रहथी जे तप जप संयम ध्यानादिक
सत्करणी करवामां आवे तेथी जे कर्म निर्जरा थाय छे ते सकाम
अकाम निर्जरा अज्ञान कष्ट क्रियाथी थाय छे.ज्यारे सकाम निर्जरा
यथार्थ ज्ञान सहित आत्म लक्ष-उपयोग पूर्वक तप जप संयम ध्या-
नवडे थवा पामे छे. जेवी रीते द्रढमहारी साधुए संयम ग्रहण करीने
आत्मद्रढताथी तीव्र तपस्या साथे परिषहो अने उपसर्गों अदीनपणे
सहन कयौं हतां, तेवी जागृतिथी आत्म साधन करनार शिघ्र
स्वहित साधी, आत्मऋद्धि प्राप्त करी अनेकने हितरुप थाय छे.
१० दशमी लोकस्वरुप नावना.
(मालिनी)
जिम पुरुष विलोवे, ए अधोलोक तेवो,
तिरिय पण विराजे, थाळशो वृत्त जेवो;
उद्यर मुरज जेवो, लोकनाळे प्रकाशो,
तिमज भुवनभानु, केवळी ज्ञान भाषो.
जेमां जीवाजीवादिक पदार्थो अवलोकवाता प्राप्त थतां. होय ..
ते लोक अने जेमां तेवा.पदार्थों अवलोकवाना प्राप्त थतां न होय .
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. .. १९२ सूक्तमुक्तावळी.. ते अलोक कहेवाय छे.. असंख्यान योजन प्रमाण चौदराजलोक लेखाय छे, ज्यारे वाकीनो वधो (अनंवो) अलोक लेखाय छे. धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाश, पुद्गल, जीव अने काळ ए छ द्रव्यो छे. तेमां वस्तुना नवा पुराणा पर्यायना हेतुरुप काळ ए एक उपचरित द्रव्य छे. वाकीना पांच द्रव्यो अस्तिकाय (पदेशोना समुदाय) रुप छे. जीव अंने पुद्गलने चलन क्रियामां हेतुरुप धर्मा स्तिकाय, अने स्थिर रहेवामां हेतुरुप अधर्मास्तिकाय, ए सर्वने अवकाश आपनार आकाशास्तिकाय, चेतना लक्षण जीव, अने शब्द, रुप, रस, गंध तथा स्पर्शादिक सर्व पुद्गल छे. आ पांचे अस्तिकायो जेमा विद्यमान छे तेनुं नाम लोक. ते उर्ध्व अधो अने तीरछो असंख्यात योजन प्रमाण मोटो छे. वलो' बलोववानी पेरे ने पग पहोळा करेला अने वंने हाथ केडउपर स्थापेला पुरुषनी जेवो लोकाकार छे. सहुथी नीचे ते अत्यंत पहोलो छे. तीरछो लोक स्थान जेवा आकारे गोल छे अने उर्ध्वलोक मुरज (वाजींत्र) जेवा आकारे छे. देरासरादिकमां कोइ कोइ स्थळे आ लोकाकार चित्रेलो होय छे ते उपरथी तेनु कंडक विशेष भान थइ शके छे. आमा मृत्युलोक मध्यमां एटले नाभिना स्थळे.जाणवो. आ वस्तु- स्थिति अनादि छे ते कोइए नवी रची,नथी. आ चौद राजलो- कमाँ कर्मवश जीवमात्र परिभ्रमण कर्या करे छे. अनुक्रमे रत्नत्रयी- नो दुर्लभ योग थतां तेनु यथाविधि आराधन करी-सकळ कर्मनो अंत आणी मुक्त थई लोकांतमा स्थिति करे .. , 1 1 ते अग्यारमी बोधिदुर्लभ भावना. १ अग्यारमी बोधिलन नावना. (स्वागता) वोधिबीज लही जेह अराधे, इलासुत परे शिव साधे; सर्वज्ञ वीतराग परमात्माए स्वानुभवथी जगतना कल्याणार्थे कहो के हरकोइ भव्यात्माना उद्धार-माटे जे पवित्र धर्ममार्ग बताव्यो छे ते सम्यग दर्शन (सम्यक्त्व), ज्ञान अने चारित्ररुप रत्नत्रयीनी प्राप्ति खरेखर दुर्लभ छे; केमके प्रथम तो तथाप्रकारना प्रवळ पुन्यना योग वगर मनुष्यपणुं, कर्मभूमि, आर्य देश, उत्तम कुळ-जाति, निरोगता, दीर्घ आयुष्यनी प्राप्ति थवा साथे रुडी श्रद्धा, हितोपदे- शक गुरु अने शास्त्र श्रवणनो लाभ मळतो नथी. ते बधुं सद्भाग्ये मळ्या छतां यथार्थ तत्व श्रद्धा-प्रतीति बेसवी बहु दुर्लभ है, सेंकडो भव भमतां मळवू दुर्लभ एवं समकित रत्न पाम्या छतां मोहादिकनी प्रबळताथी चारित्र रत्न पाम, दुर्लभ छे, ते पण भा- ग्ययोगे पाम्या छतां इन्द्रिय, कषाय, गौरव अने परिषहादिक शह वर्ग वच्चे द्रढ वैराग्य वळ धारण करी तेनुं मक्कमपणे पालन (आराधन) करवू अत्यंत कठण छे. एम छतां कोइ धीर वीर (बिरला) उत्तम प्रकारनी क्षमा-समता, मृदुता-नम्रता, ऋजुता- सरलता अने संतोषनी सहायवडे उक्त चारित्रनु यथार्थ आराधन करी शके छे,.जो के आवी उंची स्थितिए क्रमसर अभ्यासवडे चढी क्वचिंतशकाय छे, तोपण भरत के इलाचीपुत्रनी जेम एकाएक-गृह- , १९४ सूक्त मुक्कावळी. स्थपणामांज कैवल्य पर्यन्तनी अति उंची हद प्राप्त थइ जाय तो तेमां तेमणे पूर्व भवमा करेलो तथापकारनो पुरुषार्थ भरेलो अभ्या- सज कारणभूत समजवो. एवा एवा दाखला सांभळी धर्म साधना प्रमाद करवानो नथी. उलटो अधिक उमंग लावी सावधानपणे आत्महित साधन करवु घटे छे, केमके जोइए एबी सघळी शुभ सा- मनी तथाणकारना प्रबळ पुन्य वगर वारंवार मळवी सुश्केल छे, तेथी जे काले करवान होय ते आजेज करी लेवु. १३ बारमी धर्म जावना. धर्म भावना लही भवि भावो, रायसंप्रति परे मुख पावो. २८ उक्त रत्नत्रयीरुप धर्म अथवा क्षमादिक दशविध (यति) धर्म अथवा दान शील तप भावनारुप धर्म जेमणे राग द्वेष अने मोहा- दिक दोषमात्रने जीती लीधा छे एवा जिनेश्वरोए जगतना हित- श्रेय अथैन सारी रीते स्पष्टतापूर्वक सहु पर्षदा समक्ष स्वानुभवथी कही बतान्यो छे. ते सर्वोत्कृष्ट अहिंसा, संयम अने तप लक्षण मंग- ळकारी धर्मसाधनमा जे भव्यात्माओ सावधानताथी लागी रहेछे ते मुखे समाधे आ भवसागरनो पार पामे छे. सर्वोत्कृष्ट अहिंसादिक महावनो पाळवा रुप साधुधर्म पामवा जेटली योग्यता अने सामर्थ्य जेनामां न होय तेवा मंद अधिकारी जीवो माटे पांच अनुव्रत, त्रण गुणवत अने चार शिक्षाबत.रुप. ग्रहस्थधर्म पण वताव्यो छे. शुद्ध तत्त्वश्रद्धारुप सम्यक्त्व पूर्वकसेवन करातो साधुधर्म के ग्रहस्थधर्म

मोक्ष वर्ग.
११५ ।
आत्मकल्याणने माटे थाय छे. मिथ्यात्वनो त्याग करवायी अने
मार्गानुसारी थवाथी प्रायः सद्गुरुनी कृपावडे सम्यक्त्वनो उदय
थवा पाये छे. समकितसहित करवामां आवतो हीत करणी यथार्थ
फळदायक वनी शके छे; तेथी गमे तेटलो स्वार्थत्याग करीने पण
समकित रत्न प्राप्त करो लेवा ज्ञानी पुरुषो भार दइने कहे छे ते
यथार्थन छे. तत्त्व अश्रद्धा अथवा अतत्व श्रद्धा रुप मिथ्यात्व
ज्यांसुधी कुसंग न तजाय त्यांसुधी टळे नहि; तेयी प्रथम स्वहितार्थी
ए कुगुरु-कुसंगनो त्याग करी सद्गुरुनोज संग सजवो जोइए.
जेनी रहेणी करणी निर्दोष-उत्तय होय एने कशी लालच वमरना
सद्गुरुनुज शरण हितकारी छे. सर्वज्ञ वीतराग सर्वोत्कृष्ट योग्यता-
बाला होवाथी ते जगद्गुरु छे. तेमनु शरण सदा कर्तव्य छे.
मोद वर्ग.
६ राग-द्वेष विषे.
(इंद्रवज्रा)
रागे न राचे भव बंध जाणी,
जे जाण ते राग वशे अनाणी;
गौरी तणे राग महेश रागी,
अर्धाग देवा निज बुद्धि जागी. २९
रे जीव! तुं द्वेष मने म आणे,
विद्वेष संसार निदान जाणे;

१९६ सूक्त मुक्तावळी. सासु नणंदे मळी कूड कीg,. जूटुं सुमद्रा शिर आळ दीg, ३० ६ राग-क्षेष दूर करवा हितोपदेश. आत्मानेरंगी दे, रुपांतर करी दे, विकारी वनावी दे अने तेने विभाववाही करीने संकलेश उपजावे तेनुं नाम राग. एवा दुष्ट रा- गने भवभ्रमणकारी कर्मबंधननु मुख्य कारण जाणीने अहो भव्या- स्माओ! तमे तेमां राचो नहीं. तेने निवारवा वनतो प्रयत्न करो. तेनो जय करवा माटे जेमणे तेनो सर्वथा जय कर्यो छे एवा .परम कृपालु अने समर्थ श्री जिनेश्वर देवोनुं शरण ग्रहो ! वीतरागना द्रढ आलंवनथी तमे पण दुष्ट रागनो जय करवा समर्थ वनी शकशो. शुद्ध देव गुरु अने धर्म प्रत्येना शुद्ध पवित्र निस्वार्थ रागवडे अशु- हने मलीन एवा स्वार्थी रागनो तमे पराजय करी शकशो. दुष्ट रागने जीतवानो ए सरल उपाय छे. 'तेम छतां जे कोइ मोहातुर बनी दुष्ट स्वार्थी रागने वश थइ रहे थे ते अज्ञानी छे अने ते हाथे करीने जन्म मरणना दुःखने वहोरी ले छे. जो महादेव गौरी- पार्वतीना रागथी रंगाया अने तेने वश थया तो तेने अर्धांगना (स्त्री) वनावी लेवानी कुबुद्धि थइ. कामवश विकळ वनी जनारने महादे- वनी संज्ञा घटती नथी-तेमां ते सार्थक (चरितार्थ) थती नथी. ज्यां दुष्ट कामरागादिक केशरीसिंहनी जेम जोरथी ताडुका करता रहे छे त्यां स्वाभाविक शान्ति-समाधि टकी शकती नथी. अने

संतोष विषे.
१९७
.
तेना कार्यमा सहज अंतराय पडतां देषाग्नि जागे के अने प्रजळे के.
ते वळी अवशेष सुखशान्तिनो लोप करी नाखे छे. एटले राग-द्वेषने
वश थयेला पामर जीवोने संसार चक्रमां भमकुंज पडे छे अने जन्म
मरण करवांज पडे छे जो जन्म मरणना दुःखथी डरताज हो तो द्वेष
इर्षा वश थइ जेम सुभद्रा उपर तेनी सामु अने नगदे कुटुं आळ मूक्यु
तेवां कुकृत्यो खोटा आवेशमा आवी कदापि करशो नहि.
संतोष विषे.
(वसंत तिलका.)
संतोष तृप्त जनने सुख होय जेवू,
ते द्रव्य लुब्ध जनने सुख नांहि तेवं,
संतोषवंत जनने
सहु
लोक सेवे,
राजेंद्र रंक सरिखा करी जेह जोवे.
श्री सिद्धसेन गुरु राय गंभीर वाणी;
संतोषता जिहतणी जगमांही जाणी;
भावे करी जिह भणी सुणी वाणी रंगे,
जे साय विक्रम धरी जिन आण अंगे. ३२
संतोष गुण सेवन करवा हितोपदेश.
जेना वडे सारी रीते संतोष-तृप्ति जनित सुख बनी रहे एर्नु
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,
1

•१९८ सूक्त मुक्कांवळी. नाम मंतोष एवा संतोषी जनो पासे पुणीया श्रावकनी पेरे अल्प द्रव्य होय तो पण ते जेवू सुख पामे छे तेवु तो शुं पण तेना क्रोडमा भागनुं मुख पण मम्मण शेठ जेवा द्रव्यलुब्ध जनने प्राप्त थइ शकतुं नथी. एटलाज माटे राजा अने रंकने जे समभावथी जुए छे-तेमना तरफ दाग-द्वेष रहित मध्यस्थ भावे निस्पृहताथी जे वर्ते छे एवा त्यागी संतोषी निस्पृही जनोने तेमना निर्मळ आदर्श जीवनने ल- हीनेज सहु कोइ बहुमाननी नजरथी जुए छे, तेमना तरफ अत्यंत प्रेम राखे छे अने पूज्यभाव दाखवे छे. एटलंज नहिं पण तेमन निर्दोष उज्वळ जोवन जोइ वने तेटलं तेनुं अनुकरण पण करे छे अने सादा निर्दोष जीवनवडे पोते पण सुखी थाय छे. संतोष-नि- स्पृहतादिक गुणवडे जगतमां सर्वत्र प्रसिद्ध पामेला- गुरु महाराज श्री सिद्धसेन दिवाकरनी अति अर्थ गंभीर (उदार) उपदेशवाणी अति आदरपूर्वक श्रवणे सुणीने श्रीविक्रमादित्ये पोताना हृदयमां परिणमावी तो तेथी ते जिनआज्ञा रसिक थयो. तेने सत्य पारमा- र्थिक दीतरागोक्त धर्मवचन रुच्या अने ते वळी पच्या. तात्पर्य के त्यागी निःस्पृही महात्मा पुरुषोना निर्दोष जीवन-वर्तन अने वच- ननी छाप सहृदय द्रष्टा अने श्रोता उपर अजव पडे छे. तेवा उत्तम जनोनी प्रकृति अने प्रवृत्ति स्वार्थ-दोष वगरनी होवाथीज ते अ- न्यने भारे असर करी शके छे. आवा उत्तम जनो स्वपर हित-सु- खमां अधिकाधिक वृद्धिज करता रहे छे. खरा सुखना अर्थी जनोए एवा त्यागी निःस्पृही महात्माओनुज शरण लेवु उचित छे.

विवेक विषे. विवेक विषे. (उपजाति.) जो जेह चित्ते सुविवेक भासे, तो मोह अंधार विकार नासे; विवेक विज्ञान तणे प्रमाणे, जीवादि जे वस्तुस्वभाव जाणे. ३३ (इंद्रवज्रा.) बाळापणे संयम योगधारी, वर्षाऋते काचली जेण तारी; श्री वीरकेरो अयमत्त तेइ, सुज्ञान पाळ्यो सुविवेक लेइ. ३४ विवेक विषे हितोपदेश. जेम हंस दूध-पाणीने जुदा करी दूध मात्रने ग्रहण करी ले छे तेम जेनावडे गुण-दोष, हित-अहित, कृत्य-अकृत्य, भक्ष्य-अ- भक्ष्य, पेय-अपेय, तथा गम्य-अगम्यने सारी रोते ओळखी, पृथक् करी, तेमांथी साररुप गुणादिनेज ग्रहण करी दोषादिकने तजी शके छे तेनुं नामज यथार्थ विवेक छे. अंतरमां ज्यारे सत्य ज्ञाननी प्रकाश थाय छे अने खरी तत्त्वश्रद्धा जागे छ त्यारेज यथार्थ वि- २०० सूक्तं मुक्तावळी. क प्रगटे छे-उदय पामे छे. एनुं महात्म्य अपूर्व अने अचित्य छ, ते अंतरमा प्रकाश करतो बीजो. (अपूर्व) सूर्य अने त्रीजु (अपूर्व) लोचन छे. उत्तम शास्त्रकारों कहे के वीजी बधी धांधल करवी मूकी दइ एक विवेकनोज खरी खांतथी अभ्यास (सेवन) करो जेथी मोह अंधकार-राग-द्वेषादिक विकार नष्ट थाय. जेम जेम वि- वेक अने विज्ञान कळा वधती (खीलती) जशे तेम तेम स्व-पर (जीव-अजीवादि) जड-चेतन्यनु यथार्थ स्वरुप ओळखाशे, तेमां यथार्थ प्रतीत (श्रद्धा-आस्था) बेसशे अने प्रथम जे मोहादिक योगे मुंझवण थती हशे ते विलय जशे अथवा ओछी थइ जशे. राग द्वेषा- दिक कर्मबंधनो तूटी जशे अथवा ढीला-पातळा पडशे अने आ- त्मानी उपर आवेलां कर्मना आवरणो दूर थतां-नष्ट थइ जतो आत्मा स्फाटिक रत्न जेवो उजळो (कर्म-कलंक वगरनो-निर्मळ ) थयेलो के थतो साक्षात् अनुभवमा आवशे. आ कंइ जेवो तेवो लाभ नथी. अपूर्व अने अचिन्त्य महा लाभ छे. वाळपणामाज संयम योगे, वर्ष- काळ आवतां रमतमां काचली पाणी उपर तरती मूकनार बाळ अइमत्ता मुनि, इर्यावही पडिक्कमतां (पापनी आलोचना करतां) केवळज्ञान पाम्याः कर्मबंधनथी मुक्त थया ते सद्विवेकनाज प्रभावे जाणो सहुए सद्विवेक अवश्य आदरवो. ए वैराग्य (निर्वेद) विषे. (शार्दूलविक्रीडित.) जे बंधुजन कर्मवंधन जिशा भोगा भुजंगा गिणे, : ( : .

वैराग्य वर्णनाधिकार. २०१ जाणतो विष सारिखी विषयता संसारता ते हणे, जे संसार असार हेतु जनने संसार भावे हुवे, भावो तेह विरागवंत जनने वैराग्यता दाखवे. ३५ (वसंततिलका.) निर्वेद ते प्रबळ दुर्भर बंदिखाणो, जे छोडवा मन धरे बुध तेह जाणो; निवेदथी तजिय राज विवेक लीधो, योगींद्र भर्तृहरी संयम योग सीधो. ९ वैराग्य वर्णनाधिकार. संसारमा जकडी राखनारा स्वार्थी स्वजन कुटुंबीओने जे कर्म- वैधनना हेतुरुप समजे छे, विषयभोगोने जे भुजंग जेवा भयंकर (रोग-विकारजनक) गणे छे, अने विषय सुखने विष जेवा दुःख- दायक लेखे छे तेवा खरा वैराग्यवंत जनोज आ सांसारिक दुःखनो अंत करी शके छे. आ संसारना जे जे असार क्षणिक एवा जड पदार्थों मोहविकळ (मूह ) जनोने संसार परिभ्रमण (जन्ममरण) ना हेतुरुप थाय छे तेज असार पदार्थों वैराग्यवंत जनोने वैराग्य भावनुं पोषण करनारा थाय छे. ते ते क्षणिक (जोत जोतामां नाश पामी जनारा), अशुचि (अनंत जीवोए प्रथम भोगवी भोगवीने छडेला होवाथी उच्छिष्ट रुप) अने जड (लगारे चैतन्य वगरना)

सूक्त मुक्तावळी.
देहादिक पदार्थोनी उत्पत्ति, स्थिति अने लयना कारण कार्यनो
वारीकीथी विचार करतां वैराग्यवंत जनोनो वैराग्य वन्यो बन्यो
रहे छे, एटलुंज नहि पण तेमां उत्तरोत्तर पुष्टि मळवाथी ते वैराग्य
परिपक्क थवा पामे छे. जेथी पछी “अनासंग मति विषयमें,
राग द्वेषको छेद; सहज भावसे लीनता, उदासीनता भेद."
वैराग्यना फळ रुप औदासिन्य-उदासीनता-उन्मनी भावना प्रगट
थाय छे. जेवडे मुज्ञजनो आ अनि आकरा दुःखदायक संसार
काराग्रहमांथी छुटी जवा धारे छे तेज वैराग्य समजो राजा भर्तृ-
हरिए एकदा भेट दाखल आवेल एक उत्तम आम्र फळ पोतानी
राणीने पोते मोह वश खावा आप्यु, ते तेणीए पोताना यार (जार)
महावतने आप्यु; तेणे ने पोतानी व्हाली वेश्याने आप्यु, ते वेश्याए
पाछु तेज फळ सारा विचारथी राजाने भेट कयु, राजाए ते वरा-
बर ओळखी लीधुं अने राणीने ते बाबत खरी हकीकत पूछी खात्री
करी लीधी, तेमांथी वैराग्य जाग्यो अने पीते राजपाटनो विवेकथी
त्याग करी संयम योग लइ योगी वन्या. आ वधो प्रभाव वैरा-
ज्यनो समजवो.
१० आत्मबोध विषे.
( वसंततिलका.)
ए मोह निंद तजी केवळ बोध हेते,
ते ध्यान शुद्ध हृदि भावन एक चित्ते;
.

आत्मबोध संबंधी हितोपदेश. २०३ ." ज्युं निःप्रपंच निज ज्योति स्वरुप पावे, निर्बोध जे अक्षय मोक्ष सुखार्थ आवे. (मालिनी.) भव विषय तणा जे, चंचळा सौख्य जाणी, प्रियतम प्रिय योगा, भंगुरा चित्त आणी; करम दळ खपेइ, केवळ ज्ञान लेइ, धन धन नर तेइ, मोक्ष साधे जिकेइ. इति मोक्ष वर्गः (इति सूक्त मुक्तावळी समाप्त.) १० आत्मबोध संबंधी हितोपदेश. जे महात्मा मोह निद्रा-मोह विकळता-मोहान्धतानो त्याग करे छे तेज आत्मबोध पामी शके छे, एटले तेनेज आत्मज्ञान प्रगट थइ शके छे. तेथी हृदयमा शुद्ध सात्त्विक विचारो (शुभ चिन्तवन- रुटुं ध्यान)नो उदय थवा पामे छे अने हृदयनी भावना पण पवित्र बने छे. पूर्वोक्त द्वादश भावना, अथवा मैत्री, मुदिता, करुणा अने माध्यस्थ्य भावनानी प्रबळताथी आत्मानी शुद्ध निरुपाधि ज्योति जागे के अने तेमां अन्य सर्व भाव भूलीने लीन-एक रस थइ जवाधी अंते अक्षय मोक्षपदनी माप्ति थइ शके छे. मोहनिद्रा तज- २०४ सूक्तं मुक्तावळी. वाथी (मोह मदिरानो छाक उतरवाथी) अंतरमा ज्ञान प्रकाश थतां शुद्ध ध्यान अने भावनानुं बळ वधतां निर्मळ आत्मज्योति (स्वरुप स्थिरता) प्रगटे छे अने तेमां समरस थइ (निर्विकल्प थइ) समाइ जतां सकळ कर्मना क्षयरुप-परमानंद-मोक्षपद प्राप्त थाय छे. तेथी सकळ सुखना हेतुरुप आत्मबोध मेळवा जरुर प्रयत्न करवों अने ते मोहाधीनता तजवाथीज वनी शके एम होवाथी पछी अहंता, ममता तथा विषयवासना टाळया जरुर लक्ष राखवू. 'संसार संबंधी गमे तेवा अनुकूळ शब्द रुप रस गंध स्पर्शरुप पंच विषय सुख क्ष- णिक-अस्थिर छे. तेमन स्त्री पुत्र लक्ष्मी अने यौवनांदिक इष्ट वस्तु- ओनो संयोग क्षणभंगुर छे; एम चित्तमा चोकस ठसावीने निर्मळ आत्मवोध आत्मश्रद्धा अने आत्म रमणता रुप पवित्र रत्नत्रयीनी यथाविधि आराधना करी जे धन्य नरो परम पुरुषार्थ वडे क्षपक- श्रेणि उपर आरुढ थइ सकळ कर्म खपावी केवळज्ञान पामीने पर- मानंद-मोक्ष पद प्राप्त करे छे तेओज खरेखर प्रशंसवा अने अनुक- रण करवा योग्य छे. इति मोक्ष वर्ग. नपसंहार, धर्मादिक चारे वर्गनुं संक्षिप्त स्वरुप वर्णन. तत्र प्रथम धर्म वर्ग. अज्ञान, मोह अने प्रमादवश (स्वच्छंद आचरणथी) दुर्गतिमा पडता पाणीओने हस्तावलंबन आपी धारण करी राखे अने तेमने

उपसंहार.
२०५
W
सद्गति साथे जोडी आपे ते रुडो धर्म संयमादिक दश प्रकारनो
शास्त्रकारे कह्यो छे. अहो भव्य जनो ! तेनुं स्वरुप सुगुरु मुखथी
सांभळो ! दश विध धर्म आ प्रमाणे--
१ क्षमा-समता-सहनशीलता राखवी.
२ मृदुता-कोमळता-सभ्यता-नम्रता-धारण करवी.
३ ऋजुता-सरलता-प्रमाणिकतानुं सेवन करवं.
४ निर्लोभता-संतोष वृत्ति सदाय आदरवी.
५ बाह्य अने अभ्यंतर बंने प्रकारनो तप सेववो. ज्ञान, ध्यान,
विनय, वैयावच्चमां खलेल न.आवे-तेमां वधारो थवा पामे तेवो
उत्तरोत्तर तप करवा लक्ष राखq.
६ पांच इन्द्रियोनो निगृह करवो. (इन्द्रियोने कबजामा रा-
खबी) शब्दादि पंच विषयसुखमां गृद्ध-आसक्त बनवू नहि. क्रो-
धादिक कषायोने वश थर्बु नहि. हिंसादि दोषोथी दूरज रहे.
सहु
जीवने आत्म समान लेखवा तथा मन वचन कायाने सारी
रीते केळवी कबजे राखवा-मोकळा मूकवा नहिं. चपळता निवारी
स्थिरता आदरवी. ए रीते आत्मानुं संयमन करवं.
७ हित मित अने प्रिय एवं तथ्य-सत्य वचन वदवू.
८ राग द्वेष-कपाय मळने टाळी आंतर शुद्धि करवी. एटला
माटे सावधानपणे देवगुरुनी आज्ञा मुनव चालवू अने चारे प्रकारर्नु
अदत्त यत्नथी परिहरवं.
९ परिग्रह-ममता-मूर्छा टाळी नि:स्पृह-निःसंग रहेg..

૨૦૨ सूक्त मुक्तावळी. ........ । १० सर्व अवह्य-मैथुननो त्याग करी मन वचध कायाथी पवित्र शील-ब्रह्मचर्य पाळवा पूरी काळजी राखवी. द्वितीय अर्थ वर्ग. जो प्रथम सुकृत्य कया होय, दानादिक धर्य करणी उल्लासथी करी होय, दुःखी उपर अनुकंपा आणी अर्थ-द्रव्यनो मोह नजी तेनुं दुःख निवारण कयु होय, अतिथि (साधु-साध्वी प्रमुख धर्मा- त्माओ)नी यथोचित सेवा-भक्ति करी होय, पूर्ण प्रेमथी स्वधर्मी वात्सल्य कयु होय, पवित्र तीर्थोनी यात्रा पूजा करी होय, देव गुरुनां वहुमान कर्या होय, गुणीजनोनो योग्य सत्कार को होय, शास्त्र-आगमनी सेवा करी होय, चाळ तपस्वी, वृद्धादिकनी वैया- वच (तजवीज) करी होय, टुंकाणमां बनी शके एटलो पैसानो लाहो पैसो पामीने लीधो होय तो ते रीते पैसानो सदुपयोग कर- नारने सहेजे (अनायासे) पार वगरना अर्थनी प्राप्ति थाय छे. वळी पुन्यानुबंधी पुन्यवडे लक्ष्मी साथे सरस्वतीनी पण कृपा थाय छे. पटले एथी ज्ञानसंपदा-सद्युद्धि-न्यायबुद्धि-धर्मबुद्धि-आत्मकल्या- णबुद्धि स्वाभाविक थाय छे अने धारेला अर्थ सिद्ध थाय छे. म- नोरथ फळे के. धर्म अने कर्न (व्यवहार)- पालन रुडी रीते थाय छे. परोपकारनां रुडां काम थइ शके छे. गुयश प्राप्त थइ शके छे. एरीते न्याय-नीनि अने प्रमाणिकताथी उपार्जन करेलां द्रव्यनो सदुपयोग करवाथी धर्म अर्थ अने काम (मननी अभिलापा)नी सहेजे सिद्धि थाय छे. बळी लक्ष्मीनी अस्थिरता-चपळता समजीतेना उपरनो मोह उपसंहार. २०७ जंबुकुमारनी पेरे तजी उत्तम क्षेत्रमा तेनो सद्व्यय करी, संयम ग्रही सावधानपणे तेनु सेवन करे छे ते मोक्षलक्ष्मीने पण वरी शके छे. एम समजी अर्थ उपरनो मोह उतारी तेनो सद्व्यय करवो. तृतीय काम वर्ग. अत्र काम शब्दनो मनोरथ-चित्त अभिलाष जेवो पारमार्थिक अर्थ करवानो छे, तुच्छ विषय भोग एवो अर्थ करवानो नथी. एवो काम, धर्म अने अर्थथी वेगळो नथी. धर्मनी कामना-अभि- लाषा करनार अथवा धर्मना काम करनार जीवो जगतमां भला (भव्य ) लेखाय छे. एवी धर्म कामना अथवा धर्मनां काम करवा- बडे जीवो सुखीया थाय छे. परमार्थ साधवामां एवी कामना खास जरुरनी छे. चतुर्थ मोक्ष वर्ग. जो जन्म मरणनां दुःखथी सर्वथा मुक्त थवा तीव्र इच्छा थइज होय तो प्रथमना त्रणे वर्ग करता चढीयातो (श्रेष्ठ) एवो मोक्षार्थ साधवा हे भव्यात्मा ! तुं तत्पर था. केमके ते सर्वोत्कृष्ट अक्षय अनंत सुखरुप के अने पवित्र रत्न त्रयीनुं यथाविधि आराधन कर- बाथी ते मळे छे. ए रीते धर्म अर्थ काम अने मोक्ष संबंधी जे कंड लेशमात्र उपदेश अपायो ते सन्मार्गगामी जनोए लक्षपूर्वक धारी- अवगाही तेनुं तत्त्वस्वरुप विचारवं अने तेमाथी यथायोग्य-आप- आपणी योग्यता अनुसारे आदर करता रहे. प्रसिद्ध धर्म अर्थ काम अने मोक्ष ए चार वर्गवी विभूषित करेली आं सूक्तमाळा सूक्त मुक्तावळी. साचा मोतीनी पेरे कंठे करी थकी भव्य जनो प्रत्ये अधिक शोभा- आनंद-सुखने विस्तारो. श्रीतपागच्छ नायक श्रीविजयप्रभसूरिनी पाटे श्रीविजयरत्नमूरि थया. तेमना राज्यमां श्रीशान्तिविमळ नामे पंडित थया. तेमना गुरु भाइ श्रीकनकविमळ नामना थया. तेमना बे शिष्यो थया. एक पंडित कल्याणविमळ अने. वीजा केसरविमल ते पंडित केसरविमळे विक्रम संवत् १७५४ मां वाळ जीवोना मनो- विनोदार्थ भापानिवद्ध आ मनोहर-सूक्तमाळानी रचना करी छे. इति सूक्तमुक्तावळी समाप्त. . सिंदुर प्रकर अपर नाम. मंगळाचरणरुप पार्श्वप्रभुनी स्तुति. सूक्तमुक्तावली सुगम भाषा अनुवाद. १ तपरुप हस्तीना कुंभस्थळ उपर सिंदूरना समूह समान (शोभाकारी), क्रोधादीक कपायरूप अटवीने निर्दग्ध करवा दा- वानळ जेवा (देदीप्यमान) तत्त्ववोध रुप दिवसनो प्रारंभ करवा सूर्योदय समान (तेजस्त्री), मुक्तिरुपी स्त्रीना उच्च-उन्नत स्तन उपर केशरना विलेपननी जेवां (अलंकारभूत ) अने कल्याणरुप वृक्षनां कुंपळ समान (शीभारुप) श्री पाचप्रभुनां चरणनी नख- प्रभा तमारं रक्षण करो. प्रस्तुत ग्रंथनो प्रचार करवा सज्जनो प्रत्ये विज्ञप्ति. २ वाणीनो विवेक करवामां चतुर (परिक्षावंत) सज्जनो २०९ सूक्तमुक्तावली सुगम भाषा अनुवाद. म्हारा उपर प्रसन्न थाव (जेथी आ ग्रंथनो प्रचार विशेष प्रकारे थवा पामे); केमके जलकमळोने पेदा करे छे, परंतु तेनी खुशवोने पवन विस्तारे छे. अथवा आवी दीनता करवा वडे | जो आ. वाणीनो गुण तेमने समजाशे, तो तेओ स्वयं तेनुं मथन करशे अने जो वाणीमां तथा प्रकारनो गुण नहिं जणाय तो अपयशकारी एवा प्रचार वडे शुं? ग्रंथकार त्रण वर्गमां धर्मनुं प्रधानपणुं जणावे छे. ३ " धर्म, अर्थ अने काम ए त्रण वर्गने पूर्वापर विरोध रहित साध्या वगर मनुष्यनुं आयुष्य पशुनी जेवू निष्फळ समजवु ते त्रणे वर्गमा धर्मने श्रेष्ठ प्रधान.कयो छे. केमके ते धर्मने सेव्या वगर बीजा बे-अर्थ अने कामनी सिधि प्राप्ति थइ शकती नथी. शास्त्रकार मनुष्य भवनी दुर्लभता बतावे छे. ४ दश दृष्टान्ते दुर्लभ मानव भव पामीने जे मुग्धजनो चिवट राखीने धर्म-साधन करतां नथी मंद बुद्धिजनो भारे कष्ट सहीने प्राप्त करेल चिन्तामणि रत्नने प्रमादथी दरियामां पाडी दे छे. ५ जे दुर्लभ मनुष्यभवने प्रमादवश थइ व्यर्थ गुमावी दे छे, ते सोनाना थाळमां धुल भरे छे, अमृत वडे पग प्रक्षालन करे छ श्रेष्ठ हाथी पासे इंधन (लाकडां) बहेवरावे छे, अने कागडाने उडाडवा माटे चिन्तामणी रत्न फैकी दे छे. ६ जे पामर जनो असार भोगनी आशा बड़े धर्मनो अनादर करी स्वच्छा मुजब फरे छे ते जड लोको घरना आंगणे उगेला २१० सूक्त मुक्तावळी, कल्पक्षने उखेडी नांखी तूरो वावे छे. चिन्तामणी रत्नने फेंकी दइ काचनो कडको स्विकारे छे, अने पर्वत जेवा महान् हस्तिराजने वेची दइ गर्दभने खरीदे छे. ७ आ अपार संसारमा महा मुशीवते मनुष्य जन्म पामीने जे कोइ विषयसुखनी तृष्णामां तणायो छतो धर्म साधन करतो नथी, ते मूर्खमां शिरोमणी (मूर्खराज) समुद्रमा डुबतो छनो श्रेष्ठ वहाणने सुकी दइ पथ्थरने झालवाने प्रयत्न करे छे. प्रस्तुत ग्रंथमा कहेवा धारेलां द्वारोनां नाम." . ८ हे भव्य आत्मन् ! जो तुं मोक्षपद मेळववाने इच्छतोज होय वो श्री तीर्थंकर देवनी गुरुमहाराजनी, जिनप्रवचननी, अने श्री संघनी सद्भावथी सेवा-भक्ति कर. वळी हिंसा, असत्य, अदत्त, (चोरी), अब्रह्म (कुशील) अने ममता मूर्छादिकनो त्याग कर. क्रोधादिक अंतरंग शत्रुओनो जय कर, सज्जनतानो आदर कर. सद्गुणानी संगति कर. इन्द्रिओर्नु दमन कर. तेमज दान, तप, भावना अने वैराग्य वृत्तिनुं सेवन कर. मोक्षपद दायक जाणी उक्त पदोनो यथाविधि आदर कर. हे भाग्यशालिन् एथी तुं मांगलिक पालाने पामीश. 'श्री तीर्थंकर महाराजनी भक्तिनो अलौकिक प्रभाव." अरिहंत भगवाननी यथायोग्य पूजा अर्चा करी छती पापने लोपे छे; दुर्गतिने दळी नांखे छे, आपदानो नाश करे छेपुन्यनो जमाव करे छे, लक्ष्मीने वधारे थे, नीरोगतानी पुष्टि करे है, . सूक्तमुक्तावली सुगम भाषा अनुवाद. २११ सौभाग्य (लोकप्रियता) निपजावे छे, प्रीतिने वधारे छ, यशने विस्तारे के तेमज स्वर्ग अने मोक्ष पण मेळवी आपे छ एम समजी श्री जिनेश्वर देवनी भाव भक्ति करवी. १० जे पूर्ण श्रद्धा राखी श्री जिनेश्वर प्रभुनी पूजा करे ? नेने स्वर्गनी प्राप्ति घरनां आंगणां जेवी हुँकडी छे, विशाळ राज्य लक्ष्मी तेनी साथे रहेनारी छे, सौभाग्यादिक गुणो स्वतः तेनामां आवी विलास करे छ, संसारसागर तरवो तेने सुगम थाय छे अने मोक्ष जल्दी तेनी हथेलीमा आवी लुंठन करे छे. प्रभु पूजानो महिमा अगम अपार छे ११ जिनपूजा करनारने रोग कोपीने नाशी गयो होय तेम कदापि सामु जोतो नथी; दारिद्रभयभ्रान्त थयुं होय तेम सदाय दूरने दूरज नासतुं फरे छे, रीसायेली स्त्रीनी जेम दुर्गति तेनो संग तजी देय हे, अने सन्मित्रनी जेम प्रताप जैश्वर्यादिक अभ्युदय तेनी साथेज सदा रहे छे. १२ जे उत्तम पुष्पो वडे प्रभुने पूजे छे, ते देवांगनानां विकस्वर नेत्री वडे पूजाय छे (देव पळ उत्पन्न थइ त्यां देवांगनाओ बडे सादर अवलोकाय छे.) जे एकवार (आगम रीते) प्रभुने वंदे छ ते त्रण जगत् वडे सदाय. बंदाय छे. जे प्रभुने स्तुति स्तवनादिक वडे स्तवे छे ते परलोकमां इन्द्रोना समुदायवडे स्तवाय छे, अने जे.प्रभुनुं ध्यान धरे छे ते समस्त कर्मनो क्षय करीने योगीजनों बड़े ध्यान,करवा योग्य बने छे.

૨૨૨ सूक्त मुक्तावळी. 'सद्गुरुनी सेवा, भक्ति अने आज्ञानो अद्भुत महिमा." १३ जे दोषरहित निदेष मोक्ष मार्गमा पोते प्रवते छे अने कशी स्पृहा वगर अन्यजनोने पण प्रवर्ताव छे तथा स्वयं भव-जे समुद्रने तस्ता सता अन्य भव्य जनोने तारवा समर्थ छे, तेवा सद्- गुरुज स्वहित इच्छनाराओए सेववा योग्य छे. १४ जे मिथ्यात्वने फेडी नांखे छे, आगम अर्थनो बोध करे छे, वळी सद्गति अने दुर्गतिना मार्ग रुप पुन्य अने पापनो फोड करी बतावे छे, तेमज कृत्याकृत्य संबंधी विवेक समजावे छे, तेवा सद्गुरु विना वीजा कोइ भवसमुद्नो पार पमाडी शकता नथी. १५ नरकना खाडामां पडता प्राणीने वचाववाने पुन्य-पापर्नु स्वरुप स्पष्ट रीते समजावी बतावनारा गुरु विना बोजो कोइ- पिता, माता, बंधु, प्रिय स्त्री, पुत्र समुदाय, मित्र, स्वामी, मदोन्मत्त हाथी, घोडा, रथ अने पाळानो परिवार समर्थ थइ शकता नथी. १६ हे भव्यात्मन् ! श्री गुरु महाराजनी' आज्ञा वगर ध्यान, समस्त विययनो त्याग, तप, भावना, इन्द्रिय दमन, अने आप्त आगमोनो अभ्यास करवा बडे शुं? आज्ञा वगरनां ते वांय नकामां समजवां; एम निर्धारी खूब प्रेम-प्रीतिथी संसारतारक गुरु महारा-'. जनी आज्ञानु पालन कर. केमके ते वंगर वोजा सघळा गुणो नायक वगरना सैन्यनी जेम स्वइष्ट सिद्धि करवा समर्थ थइ शकता नथी. एम समजी विवेक आणी श्री गुरुमहाराजनी सेवा करवी. १७ जिन वचन रुप नेत्र वगरना लोको सुदेव-कुदवने, मुगुरु-कुगुरुने, सुधर्म-कुधर्मने, गुणवंत-गुणहीनने, सुकृत्यने तेमज -- AAN श्री संघनी भक्ति अने तेनो प्रभाव. २१३ स्वहित अहितने सारी रीते चतुराइथी जाणी जोइ शकता नथी. 'श्री प्रवचन सिद्धान्तनो अतुल प्रभाव. १८ वीतराग देवे भाखेलो दयामय सिद्धान्त जेमणे सांभळ्यो नथी तेमर्नु मनुष्यपणु निष्फळ छे. हृदय शून्य छे; श्रवण (काननी) रचना नकामी छे, गुण दोष संबंधी विवेक तेमने असंभवित छे. नरक रुप अंध कूवामा पतन दुर्निवार के अने भव भ्रमणथी छुटवू ते तेमने मारे दुर्घट-दुर्लभ छे. जिन वचननीज बलिहारी छे. १९ जे मुग्ध जनो करुणानिधान श्री जैन शासनने अन्य दर्शन समान लेखे छे, तेओ अमृतने विष तुल्य, जळने अग्नि तुल्य, प्रकाशने अंधकारना समूह तुल्य, मित्रने शत्रु तुल्य, पुष्पमाल्यने सर्प तुल्य, चिन्तामणि रत्नने पथ्थर तुल्य, चंद्रनी चांदणीने उना- छाना ताप तुल्य लेखे छे. विवेकवान सुज्ञजनो तो एवी भूल करे नही. २० पंडित पुरुषो जे जिन प्रवचनने पूजे छे, फेलावे छे, चि- न्तवे छे, अने भणे छे ते धर्मने दीपावे छे, पापने दूर करे छे, उन्मा- मैने निवारे छे, गुणी मत्येना द्वेषभावने भेदी नांखे छे, अन्यायनो उच्छेद करे छे, कुबुद्धिने टाळे छे, वैराग्यने विस्तारे छे, दयाने पोषे के, अने लोभने निवारे छे एम समजी सुज्ञजनोए श्री वीतराग सर्वज्ञोक्त प्रवचननुं सम्यग् आराधन कर, युक्त छे. " श्री संघनीनक्ति अने तेनो प्रनाव." २१ जेम रोहणाचळ पर्वत रत्नोनुं स्थान छे, आकाश तारा- ओनुं स्थानछे, स्वर्ग कल्पवृक्षोनुं स्थान छे, सरोवर कमळोवें स्थान २१४ सूक्त मुक्तावळी. छे, समुद्र जळनुं स्थान छे अने चंद्रमा तेजनुं स्थान छे, तेम साधु, साध्वी, श्रावक अनै श्राविकारुप चतुर्विध संघ गुणोनुं स्थान छे, एम समजी पूज्य संपनी पूजा-भक्ति करवी. २२ जे श्री संघ भव भ्रमण निवारवानी बुद्धिथी मुक्ति मेळ- बवा सावधान रहे छे, पवित्रपणा वडे जेने जंगम तीर्थ कहेवामा आवे छे, जेनी होड वोजो कोइ करी शकतो नथी, जेने तीर्थंकर महाराज पण प्रणाम करे छे, जेनाथी सज्जनोनुं श्रेय थाय छे, जेनो महिमा अपरंपार छे, अने जेनामां गांभीर्य, धैर्य, ओदार्यादिक अनेक गुणो निवसे छे ते पूज्य संघनी हे भव्यात्माओ ! तमे भक्ति करो. २३ जे धर्म-कल्याणनी रुचिवाळा सज्जनो अनेक गुणोना स्थानरुप श्री संघनी सद्भावथी सेवा-भक्ति करे छे तेमने लक्ष्मी शीघ्र आवी मळे छ; यशकीर्ति चोतरफ वाधे छे, प्रेम भजे छ, सुमति उत्सुकताथी आवी मळवा प्रयत्न करे छ, स्वर्गनी लक्ष्मी वारंवार भेटवा इच्छे छे अने शिवसुंदरी तेमना मुख सामु जोयाज करे छे. २४ जेम खेड करवानु मुख्य फळ धान्य प्राप्ति छे, तेम जे पूज्य संपनी भक्तिर्नु मुख्य फळ तीर्थकरादिक पदवीनी प्राप्ति थवी एछे, अने चक्रवर्तीपणुं तथा इन्द्रादिकपणुं प्राप्त थर्बु तेनो घास- पलालनी पेरे साथे लागेल-गौणफळ कहेवाय छे. बळी जे संघनो महिमा गावा बृहस्पतिनी वचनकळा पण समर्थ नयी ते पापनाशक श्री संघ पोतानां पवित्र पंगलांकरवावडे सज्जनोनां घरने पवित्र करो!

' " श्री संघनी-भक्ति अने तेनो प्रभाव. २१५ हिंसानो त्याग अने अहिंसानो आदर करो.' २५ हे भव्यात्माओं ? बीजां बधां कायाने कष्ट करनारा अ- नुष्ठानो भले म करो पण पुन्यना क्रिडा स्थानरुप, पापरजने संहरवा वंटोळीया समान, भवसायर तरवा नाव समान, कष्ट तापने शान्त करवा मेघघटा समान, मुक्तिनी प्रिय व्हेनपणी समान अने दुर्गतिना द्वारने बंध करवा अर्गला समान एक अनुकंपा तो सर्व जीवो उपर तमे अवश्य करो. दया वगरनुं बधु फोगट छे. २६ जो कदाच पथ्थर पाणीमां तरे, सूर्य पश्चिम दिशामा उगे, अग्नि शीतळपणुं भजे, अने कोइ रीते पृथ्वीमंडळ आखा वि- श्वनी उपर थइ जाय तो पण प्राणी वधथी क्यांय कदापि सुकृत न थाय. २७ जे मुग्धजन प्राणीवधथी धर्म इच्छे ते अग्नि थकी कमळर्नु बन, सूर्यास्त थकी दिवस, सर्पना मुख थकी अमृत, कलह. थकी कीर्ति, अजीर्ण थकी रोगनो नाश, अने काळकूट झेर थकी जीवि- तने वांछनारनी जेवो घेलो छ एम चोकस समजवु. २८ जेनु चित्त-अंतर कृपा रसवडे सारीरीते भींजेलुं छे, तेने घणु लांबु आयुष्य, अति प्रधान शरीर, अति उत्तम कुळ (उच्च गोत्र) अतिघणुं धन, विशाळ बळ, सर्वोत्कृष्ट प्रभुख-जैश्वर्य, अखंड आरोग्य, सर्वत्र घणी श्लाघा-प्रशंसा अने संसारसमुद्र तरवो सार मुलभ थवा पामे छे, एम समजी दयाई बनो. 'असत्यने तजी प्रिय अने पथ्य अने तथ्य वचन वदो.' २९ हे भव्यो ! विश्वासन स्थान, कष्टने कापनार, देवो वडे १ .

२१६ सूक्त मुक्तावळी. सेवायेल मुक्तिनु भातु, जळ तथा अग्नि उपद्रवने शमावनार, सिंह अंने सोने थंभी देनार, कल्याणर्नु (मोक्षy ) वशीकरण, सम- डिने उत्पन्न करनार, सुजनताने उपजावनार, कीर्तिनुं क्रीडावन अने महिमाचें घर एवं पवित्र सत्य वचन ज तमे वदो. ३० बुद्धिशाळी पुरुषे गमे तेवा कष्ट प्रसंगे पण एवं असत्य वचन नं बोलg के जेथी दावानळ्थी वननी जेम यश-कीर्तिनो वि- नाश थाय, जळ जेम वृक्षोने उत्पन्न करे छ तेम जेथी अनेक दुःखो उत्पन्न थाय अने जेम तडकामां छाया होनी नथी तेम जे वचनमा तप अने चारित्रनी वात पण न होय आq वचन त्याज्यज छे. ३१ अविश्वास करवाचें मूळ कारण, कुवासना-कहो के मलीन विचारनुं घर, लक्ष्मीविनाशक, कष्टानु कारण, परवंचन करवामां समर्थ अने अपराधकारी एवू असत्य वचन पंडिताए वज्यु छे. ३२ जे महाशय हित मित सत्य वचन वदे छे, तेने अग्नि ज- ळरुप थाय छे. समुद्र स्थळरुप, शत्रु मित्ररुप, देव-दानवो किंकर- चाकररुप, अटवी-अरण्य नगररुप, पर्वत घररुप, सर्प फूलनी मा- लारुप, सिंह मृगरुप, पाताळ दररुप, तीक्ष्णशस्त्र कमळना पत्ररुप, 'मदोन्मत्त हाथी शीयाळरुप, विष अमृतरुप अने विषम-दुर्गम्य मार्ग सम-सुगम थइ रहे छे. अर्थात् सत्यवादीने संकटस्थान पण संपद- रूप थाय छे. वसुराजा, पर्वत अने नारदमुं तेमज दत्त अने कालि काचार्यनुं दृष्टान्त विचारी सदाय सत्य ज वदवू. : "अदत्तने तजी न्याय-नीति प्रमाणिकताज आदरो." ३३ जे भव्य आत्मा अणदीधु कइ पण परायु लेनो नथी तेने श्री संघनी भक्ति अने तेनो प्रभाव. २१७ , भेटवा मुक्ति वांछछे, लक्ष्मी वरमाळा नांखे छे, सद्गति तेनी चाहना करे छ, यश-कीर्ति वळगती आवे छे, संसारनी पीडा दूर टळे छे अने दूर्गति तेना सामु पण जोती नथी-दूर जाय छे. ३४ जे पुन्याभिलाषी कंइ पण पराइ चीज ग्रहण करतो नथी ते महानुभावमां कल्याण परंपरा, कमळने विषे राजहंसीनी पेरे, नि- वास करे छे. वळी जेम सूर्य थकी रात्रीनी रे तेनाथी विपदा दूर जाय छे, अने विनयवंतने विद्यानी पेरे स्वर्ग अने अपवर्ग-मोक्ष संबंधी लक्ष्मी तेने स्वाभाविक रीते भजे छे. ३५ जे अदत्तद्रव्य ग्रहण करवाथी कीर्ति अने धननो नाश थाय छे, सर्व दोष-गुन्हा पेदा थाय छे, वध बंधनो प्रगटे छ, मलीन अ- ध्यवसाय उत्पन्न थाय छे. बळी जे दारिद्रने अवश्य उपजावे छे, अने सद्गतिनी प्राप्तिने अटकावे छे. तथा मरणान्त कष्ट नीपजावे छे, तेंदु अदत्तधन बुद्धिशाली होय ते न ज ग्रहण करे. ३६ अन्यजनोना मननी पीडाने पुष्टि आपनार, गेद्रध्यान- घर, जगतमा प्रसरी रहेली विविध आपदाओ रुपी वेलडीओने मे- घमाळानी जेम वृद्धि पमाडनार, कुगति-नरग, निर्यचतिमा दोरी जनार अने स्वर्ग-अपवर्ग (मोक्ष) नगर तरफ जतां अटकाव कर- नार एई अदत्त स्वहिताभिलाषी जनोए अवश्य तजवा योग्य छे. एम समजी सुज्ञजनोए न्याय-नीनिनोज आदर करवो. 'विषय लुब्धता तजी सुशीलता सेवो.' ३७ कामांध बनी जे स्वस्त्रीनो अनादर करी, परतीमा लुब्ध बने है, (अथवा जेणे त्रैलोक्य चिन्तामणि एवं शीलरत्न समस्त- २१८ सूक्त मुक्तावळी. पणे विणसाडयु छ.).तेनों अप यशनो होल जगत्मा वागे छे, पो- ताना उत्तम वंशमां मशोना कूचो देवाय छे, देशविरति के सर्वविरति चारित्रने जलांजलि देवाय छे. सद्गुणोरुपी वगीचामां आग लगा- डाय छ, सघळी आपदाओने आववा निमंत्रण अपाय छे, अने मो- क्षनगरना वारणे मजबूत कमाड वासवामां आवे छे. ३८ जे महानुभावो शील-ब्रह्मचर्यने धारे छे, तेमने सिंह, हाथी जळ अने अग्नि प्रमुख उपद्रवो क्षय पाम छे, कल्याण परंपरा वृद्धि पामे छे, देवताओ सहाय करे छे, कीर्ति विस्तरे छे, धर्ममार्गमा पुष्ट थाय छे, पाप अगष्ट थाय छे, अने स्वर्गनां तथा मोक्षनां सुखा न- जदीक आवतां जाय छे. ३९ निर्मळ शील कुळना कलंकने हरे छे, पाप पंकनो उच्छेद करे छ, पुन्यनी वृद्धि करे छे, प्रतिष्ठानो वधारो करे छे, देवताओने नमावे छे, भारे उपसर्गोने संहरे छे, अने हेला मात्रमा स्वर्ग अने मोक्षना सुख मेळवी आपे छे. ४० निर्मळ शीलना प्रभावथी मनुष्योने निश्चे करी अग्नि पण जळरुप थाय छे, सर्प पण फलनी माळरुप थाय छे, सिंह पण हरिण समान थइ जाय छे, पर्वत पण पथ्थरनी शिल्ला जेवो थइ जाय छे, झेर पण अमृत जेवू, विघ्न-आपदा पण संपदारुप, शत्रुपण मित्ररुप, समुद्र पण नानकडा तळाव तुल्य अने अटवी पण घर-महेलरुप थइ जाय छे. निर्मळ शीलनो आवो प्रभाव समजी सुज्ञ भाइ बहेनोए उक्त शीलनन-ब्रह्मचर्य पाळवामां द्रह प्रयत्न करचो घटे छे.

" श्री संघनी भक्ति अने तेनो प्रभाव. 'माया-ममता तजी संतोष वृत्तिने धारण करो.' ४१ परिग्रहरुप नदीनु पुर वृद्धि पाम्युं छतु जह-जळनी क- लुषताने पेदा करतुं, धर्म-वृक्षनु उन्मूलन करतुं, नीति कृपा अने क्षमादिक कमलिनीओने पीडा करतुं. लोभ-समुद्रने वृद्धि पमाडतुं, मर्यादारुप कांठाने भांगतुं, अने शुभ मनरुप हंसने उडाही मूकतुं शीशी विटंबना पेदाकरतुंनथी? अपितु परिग्रहवृद्धि क्लेशकारीज छे. ४२ परिग्रह उपर अत्यंत राग-मूर्छा, कलहरुप हाथीओने कू- दवा-रमवा विन्ध्याटवी समान छे, क्रोष-कषायरुप गीधडांने रमवा श्मशान तुल्य छ, कष्टोरुप सोने रहेवाने बिल समान छे, द्वेषरुप चोरने फरवा माटे संध्यासमय समान छे, पुन्यरुप वनने वाळी नां- खवा दावानळ समान छे, मृदुता-नम्रतारुप वादळांने वेरी नाखवा वायरा समान छे, अने न्याय-नितिरुप कमळनो नाश करवा हिम संमान छे. ४३ वळी वैराग्य-उपशमनो शत्रुरुप, असंतोपना मित्ररुप मो- हनो सखाइ, पापनी खाण, आपदानुं स्थान, कुध्यान- क्रिडावन, व्याकुळता-संकल्पनो विकल्पनो भंडार, अहंकारनो वजीर, शोकनो हेतु, अने कलेश-कंकासन क्रिडागृह एवो परिग्रह- विवेकी जनोए परिहरवा योग्यज छे. ४४ जेम इन्धणां वडे अग्नि तृप्त थतो नथी अने जळ समूह वडे समुद्र तृप्त थतो नथी, तेम अत्यंत मोहमां मुंझायेल प्राणी घणां धन वडे पण तृप्ति पामतो नथी. वळी मुग्ध एम पंण जाणतो २२० सूक्त मुक्तावळी. -विचारतो नथी के समस्त द्रव्य-संपदाने अहींज अनामत मूकीने आत्मा तो (पोते करेली करणीने अनुसारे) परभवमां जाय छे तो पछी हुँ फोगट शा माटे घणां पापनो संचय करूं हूं. आवां विचार कराय तो तेथी पण जीव पापथी पाछो ओसरी शके, अने कंडक संतोष वृत्तिने धारी परभव पण सुधारी शके. “क्रोधनो त्याग करी क्षमागुणने सेवो." ४५ जे क्रोध, प्रकृति बगाडवा मदिरानो मित्र छे, भय बतावी -सामाना काळजां फफडाववा-अत्यंत त्रास उपजाववा काळा नाग जेवो छे, शरीरने वाळवा अग्नि समान छे, अने ज्ञानादिक गुणनो नाश करवा अत्यंत विष वृक्ष समान छे, तेवा दुष्ट क्रोधने आत्म- कल्याणनी खरी इच्छावाळा सज्जनोए मूळमाथीज उखेडी नाखको जोइए-तेनी उपेक्षा नज करवी. ४६ तप अने चारित्ररुप वृक्षने जो शान्त-वैराग्य-समतारूप जळ वडे सिंच्यु होय तो ते कल्याणनी परंपरारुप अनेक पुष्पोथी व्याप्त बनी मोक्ष फळ आपे छे, परंतु जो ए उत्तमनने-क्रोध- अग्निनी आंच लागे छे, तो ते फळोदय रहित बनी भस्मीभूत थइ जाय छे. - ४७ जे क्रोध संतापने वधारे छे, विनयने लोपे.छे, मित्रताने नष्ट करे है, उद्वेग उपजावे छे, असत्य वचन बोलावे छे, कलेश- कलह करावे छे, यशनो उच्छेद करे छे, मति बगाडे छे, पुन्योदयनो नाश करे छ, अने नरकादि नीच गति आपे छे, ते दुष्ट रोष सज्ज- नोए तजको योग्य छे.

" श्री संघनी भक्ति अने तेनो प्रभाव. २२१ , ४८ वळी जे अग्निनी जेम धर्म-वृक्षने बाळी नांखे छे, हाथीनी जेम नीति-लताने उखेडी नांखे छे, राहुनी जेम मनुष्योनी कीर्ति- कळाने कलंकित करे छे, वायरानी जेम स्वार्थरुपी वादळांने वेरी नांखे थे, अने ज्वरनी जेम तापरुषी आपदाने विस्तारे छे, एवो निर्दय कोप करवो योग्य होय ? " अहंकार तजी विनय-नम्रता आदरो." ४९ विनयादि उचित आचरणना सेवन वडे हे भव्यात्मन् ! तुं अति दुर्गम एवा मान पर्वत उपर चढवान हवे मृकी दे. केमके तेमांथी अति भारे आपदारुपी नदीओनी श्रेणि नीकळे छे, वळी जेमा उत्तम जनोने मान्य एवा ज्ञान, औदार्य, धैर्यादिक गुणोर्नु नाम पण नथी-लवलेश मात्र पण गुण नथी, परंतु हिंसा बुद्धिरुपी धुमाडाना गोटा वडे व्याप्त अने योग्य वृत्तिने अगम्य एवा क्रोध दावानळने जे धारण करे छे. ५० अहंकारथी अंध थएलो प्राणी मदोन्मत्त हाथीनी पेरे. तप-नियमरुप बंधन स्तंभने भांगतो, निर्मल बुद्धिरुप सांकळने तोडतो, दुर्वचनरुप धुळना समूहने उडाडतो, आगम-वचनरुप अं- कूशने अवगणतो पृथ्वी उपर यथेच्छ फरतो, अने नम्रतावाळा न्याय मार्गने लोपतो कया कया अनर्थ नथी करतो? अपितु अहं- कारी माणस सघळा अनर्थ पेदा करे छे. ५१ जेम नीच माणस अन्यकृत उपगारोनी अवगणना करे के तेम अभिमानी अहंकारी पुरुषो त्रणे वनो लोप करे छे, जेम -

૨૨૨
सूक्त मुक्तावळी.
वायु वादळांने वेरी नांखे छे तेम मद योग्य आचारनो लोप करे
छ; जेम विषधर प्राणीओना जीवितनो नाश करे छे तेम मान वि-
नयनो नाश करे छ; अने जेम हाथी कमलिनीने उखेडी नांखे छे,
तेम मद-अभिमान यश-कीर्तिनो नाश करे छे.
५२ प्राणीओना सकळ वांछितार्थने पूरनार, विनयजीवितने
जे हरी ले छे, ते जात्यादिमान-विपथी उत्पन्न थयेला विषयविका-
रने तु विनयरुप अमृतरसवडे शान्त कर.
'माया कपटने मूकी तमे सरलता आदरो.'
५३ कल्याण करवामां वांझणी, सत्य-सूर्यनो अस्त करवा
संध्या समान, दुर्गतिरुप स्वीनी वरमाळा, मोहरुप हाथीने रहेबानी
शाळा, उपशमरुप कमळने वाळवा हिम समान, अपयशनी राजधानी
अने सेंकडो गमे कष्टो जेनी पुंठे रहेलां छे, तेवी दुष्ट मायाने तुं
तजी दे.
५४ अनेक प्रकारना उपायोवडे जे कपट करी अन्यने छेतरे
छे, ते महा अज्ञानयुक्तजनो पोतानेज स्वर्ग अने मोक्षना खरा सु-
खथी बेनशीव राखे छे-पोते पोतानेज छेतरे छे.
५५ जे दुर्बुद्धि धनना लोभथी अविश्वासना विलासस्थानरुप
कपटने केळवे छे, ते दूधने पीतो विलाडो जेम डांगने देखतो नथी
तेम आवी पडती अनर्थ परंपराने देखी शकतो नथी.
• ५६ जेम अपथ्य भोजन परिणामे रोग पेदा कर्या वगर झरतुं
नथी, तेम कपट केळववामां तत्पर चित्तवाला मुग्धजनने छेतरवा जे

श्री संघनी भक्ति अने तेनो प्रभाव, कळा-कौशल्य (चतुराइ.) केळवे छे ते आ लोकमां पण कइपण नुकशान कर्या वगर रहेज नहि, कंइने कंइज नुकशान करे,छेज, अने परभवमां नरकादि नोच गति या स्त्री अवतार प्राप्त थाय छे, माया-कपट उपर श्री मल्लीनाथना जीव महाबलनुं दृष्टांत विचारी धर्मकार्यमां पण कपट केळवबानी कुटेव सर्वथा नजी देवी. 'लोम-तृष्णा तजी संतोषतुं सेवन करो.' ५७ जे बडे जीवो लोभांध बनी भयंकर अटवीमा भने छे, विकट देशान्तरमा फरे छ, अथाग समुद्ने उल्लंघे छे, बहुमट साध्य खेती करे छे, कृपण स्वामीथी सेवा करे छे, अने हाथीओना समू- हना संबवडे जेमां चालवू दुःशक्य छे, एवा युद्धस्थानमां पण जाय छे. ए सर्व लोभनोज प्रभाव समजी तेनो जय करवा प्रय- त्न करतो. ५८ मोहरुप विक्षना मूळरुप, पुन्यरुप समुद्रनुं शोषण कर- नार, क्रोध अग्मिने पेंदा करनार, प्रतापरुप सूर्यने आच्छादन करवा मेघ जेवा, कलहनु क्रीडास्थान, विवेकरुप चंद्रने राहुतुल्य, आप- दारुपी नदीने मळचा समुद्र तुल्य अने कीर्तिरुप लताओने नाश करवा हरती तुल्य एवा लोभनोज पराभव करो. ५९ समस्त धर्मरुप बनने वाली नांखवाथी वृद्धि पामतो दुःख- रुप भस्मवाळा, विस्तरता अपयशरुप धूमाडावाला, अने धनरुप इन्ध- ननो समागम थतां अत्यंत वधता एवा लोभाग्निमां सर्वे गुणो पतं- गनी पेरे भस्मीभूत थइ जाय छे, एम समजी सुशजनोए दुःखदायी

२२४
....
सूक्त मुक्ताचळी.
लोभ तृष्णानो त्याग अने संतोपनो आदर करवो युक्तं छे. हे
संतोपनो प्रभाव शास्त्रकार पोतेज वतावे छे.
६० समस्त दोष रुप अग्निने उपशमाववा मेघवृष्टि समान सं-
तोषने महानुभावो धारे छे, तेमनी आगळ कल्पक्ष उग्यो-प्रत्यक्ष
थयो जाणवो. कामधेनु तेमना घरे आवी, चिन्तामणि रत्न हथे-
लीमां आव्यू, द्रव्य निधान नजदीक आव्यो, वळी आखं जगत
निश्चे का ययुं अने स्वर्ग तथा मोक्षनी लक्ष्मी पण मुलभ बइ जा-
णवी. आवा हेतुथी संतोपज सेववो उचित छे.
सुखदायी सङनता आदरो.
६१ कोपायमान थयेला काळा नागना मुखमां हाथ पालो
सारो, जाज्वल्यमान अमि कुंडमां झपापात खावो सारो, अने भा-
लानी अणी जल्दी पेटमा खोसी देवी सारी, परंतु मुज्ञ ‘जनोए
सकळ आपदाना स्थानरुप दुर्जनपणुं आदरवं सारु नहि.
६२ मजनताज जशनो जमाव करे छे, तेमज स्वश्रेय, लक्ष्मी
अने मोक्ष पण मेळवी आपे छे. तेम छतां हे पामर जीव ! हुँ जे दु-
जनता आदरे छे ते तो उलटुं लेवानुं देवू करे छे. एटले जळ सिंचवा
बडे मेळवी शकाय एवा धान्यना क्षेत्रमा अग्नि मूके छे. सज्जनता
बडे मेळवी भकाय एवा यश लक्ष्मी अने मोक्षादिकनी प्राप्ति दु-
जनता आदरचा वडे कदापि प्राप्त थइ शकेज केम ?,
६३ सजनतावंत जनाने कदाच निर्धनपणुं होथ, तो पण
सारु पमु. दुर्जनतावाळा निंद्य आचरणबडे 'विशाल लक्ष्मी पैदा
-

. “श्री संघनी भक्ति अने तेनो प्रभाव. રરંવ करी होय ते सारी नयीज केमके परिणाम सुंदर-सुखदायी एवं स्वाभाविक दुर्वळपणु पण शोमै छ परंतु परिणामे दुःखदायी एवी सोजा प्रमुख विकारजनित शरीरनी स्थूलता शोभती नथी. सोजा प्रमुख विकारजनित स्थूलता जेवी निंद्य ऑचरणबडे प्राप्त करेली अने स्थूल द्रष्टिवडै देखवामा-मानवामा आवती विशाळ लक्ष्मी प- रिणामे अति दुःखदायी नीवडे छे. ६४ सज्जनतानु लक्षणं शृं.एम पूछ्वामां आवे तेनुं समाधान के जे पारका दूंपण खोले (कये) नहि, अल्प मात्र पंण अन्यना गुण उच्चरै-अनुमोदे, पारकी समृद्धि जोई संतोष धरै (राजी थाय); अने. परपीडाने देखी शोच धरे (दीलगीर थाय); आप प्रशंसा न करे, न्याय-नीति न तजे, उचिवतार्नु उल्लंघन न करे, वळी कटुक- कठोर वचन कोइए कयां छतां तेना उपर रीस न करे-क्षमा राखे. एवं उदार चरित्र सज्जनोर्नु होय छे. उक्त लक्षण जेमनामा लामे ते- मने सज़न समज़वा. सज्जनतावडेज जीव धर्सने योग्य बने छे; ज्यां- मुधी संजननाज औवी,नथी त्यांसुधी धर्मकरणी लेखे लागवी मु- केंल छे एम समजी सर्व सुखना मूळंरुप शुद्ध धर्मनी योग्यता प्राप्त करवी माटे पण सजनता प्राप्त करवी उचित छे. 'जेंवा तेवानी संग तंजी मुणीजनीनों संगं करों.' ६५ गुणीजनौनी संग तंजी, जे मंतिहीन कल्याणनी इच्छा करें ते दयाहीनने जेम धर्मनी इच्छा, नीति रहितने यशनी इच्छा, अमा- दीने पैसानी इच्छा, मज्ञान्बुद्धि रहितने काव्य करवानी इच्छा, स- . ૧૫ ૨૨ सूक्त मुक्तावळी. मता अने दया रहितने तपनो लाभ लेवानी इच्छा, बुद्धि रहितने शास्त्रपठननी इच्छा, चक्षु रहितने वस्तु देखवानी इच्छा अने अ- स्थिर चित्तवाळाने ध्याननी इच्छा थाय तेना जेवी (सत्संग रहित ने कल्याणनी इच्छा) व्यर्थ समजवी. ६६ उत्तम गुणीजनोनो समागम मनुष्योने शुं शुं इच्छित लाभ नथी पेदा करी आपतो ? सत्संग कुमतिने हरे छे, मोहने भेदे छे, विवेकने जगाडे छे, संतोष आपे छे, नीतिने पैदा करे छे, गुणोने विस्तारे छे, (विनीतता नम्रता लावे छे), यश कीर्तिनो फेलावो करे छे, धर्मने धारे छे अने दुर्गतिने फेडे छे. आ बधो प्रभाव सत्सं- गनो जाणवो. ६७ हे शाणा चित्त ! जो तु बहु बुद्धि मेळववा, आपदाने दुर करवा, न्यायमार्गमा प्रवर्त्तवा, जश पामवा, पापफळने रोकवा अने स्वर्ग तथा मोक्षनी संपदा अनुभववा इच्छतुं होय तो गुणीजनोनी , संग आदर. ६८. जे निर्गुणी-गुणहीननो संग महत्वनो लोप करे छे, उद- घनो अस्त करे छे, दयारुप उद्यानने फेंदी नाखे छ, कल्याणने भेदी नाखे छे, दुर्बुदिने वधारे छ भने अन्यायने उत्तेजन आपे छे, तेनो पाश्रय कल्याणना अर्थीजनोने करवा योग्य केम होय? नज होय, नीच-नादाननी संगतिथी अनेक प्रकारे हानिज थाय छे. एम स- अली नीच संगति तजी सत्संगतिज सेक्वा लक्ष राखq. इन्द्रियोने मोकळी नाहि मूकतां काबूमा राखता रहो.' .-६९ जे इन्द्रियो आत्माने..उन्मार्ग लइ जवा .उद्धत घोडाभी श्री संघनी भक्ति अने तेनो प्रभाव. जेवी छे. कृत्याकृत्य संबंधी विकरुप जीवितने हरवा काळा नाग जेवी छे, अने पुन्यरुप वृक्षने खंडोखंड करवा तीक्ष्ण कुहाडा जेवी के ते व्रतनी मर्यादा तोडी नांखनारी इन्द्रियोने जीती तुं कल्या- णभागी था. ७० जे इन्द्रियो प्रतिष्ठानो लोप करे छ, नीतिनुं धोरण वगा- डी नांखे छे, अकृत्य करवा बुद्धिने मेरे छे, स्वेच्छा मुजब वर्तवामा राग वधारे छ, विवेकनी उन्नतिनो विनाश करे छे, अने आपदा - पजावे छे, ए रीते अनेक दोषना स्थानरुप ते इन्द्रियोने तुं वश कर. ७१ च्हाय तो मौन भजो, गृहवास तजो, सर्व आचार चा- तुर्य सेवो, गच्छवासमा रहो अथवा वन मध्ये वसो, सिद्धान्त पठन करो, अथवा तप तपो, परंतु ज्यां सुधी कल्याणरुप वनरक्षोने भां- गवा महावायु समान इन्द्रियोना समूहने जीतवा लक्ष आव्यु नथी त्यां सुधो पूर्वोक्त मौन व्रतादिक सघल्लं राखमा होमेला जेवू जाणवू. ७२ धर्मनो ध्वंस करवामां मुख्य, सत्य ज्ञानने आच्छादन क- रनार, आपदाने विस्तारवा समर्थ, दुःख उसन्न करवानी कळामां पारगामी, वळी निश्चे सर्व अन्नभक्षक, आत्माने अहिनकारो, अ- न्याय मार्गे अत्यंत गमन करनार, यथेच्छ वर्तनार. अने अवले मार्ग चालनार एवी इन्द्रिय समूहने जीत्या वगर जीवर्नु कल्याण यवान नथी. लक्ष्मीनो चपळ स्वभाव समजी तेनो सद्व्यय करो.? ७३ लक्ष्मी, नदोनी पेरे नोचो वाटे वहे छे, निद्रानी पेठे ज्ञान- , .. . ૨૨૮ सुक्त मुक्ताचळी. चैतन्यने मंछित करे छे, मदिरानी परं मद-अहंकारने बंधारे छ, धू- माडाना गोटानी पेरे अंध करी मृक छे, वीजळीनी परे चपळताने भजे छे, अग्नि जवाळानी पेरे तृष्णा वधारे छे, अने कुलटा नारीनी पेरे स्वेच्छा मुजब फर्या करे छे. -७४ गौत्रीया जेनी स्पृहा करे छे, चोर लोंको चोरी करे छे, राजाओं छळ जोइ खंचवी ले छे, अमि क्षणमात्रमा वाळी नांखे है, पाणी डुवावी दे छे, धरतीमा दादयु यक्षी हठथी हरी ले छे, अने दुराचारी दीकरा वणफी नांखे छे तेवा परतंत्र धनने धिक्कार पडो. ७५ द्रव्यना अर्थी एवा पंडितजनो पण शुशुं कष्ट सहन कर- ता नथी ? तेओ नीचनी पण खुशामत करे छे, तथा तेमने नीचा वळीने नमन करे छे. निर्गुणी शत्रुना पण मुक्तकंठे गुण वर्णवे छे, अने कदर वगरना स्वामीनी पण सेवा करवामां खेद लावता नथी. ७६ जाणे समुद्ना जना संसंगथीज होय तेम लक्ष्मी नीचा प्रत्ये जाय छे, कमलिनीना संसर्गथीज पगमा कांटो वाग्यो होय तेम कोइ स्थळे पग मूकती नथी (टकती नथी), अने विष साथे वस- वाथीज होय तेम मनुष्योना ज्ञान चैतन्यनो एकाएक नाश करे छे, एम समजी गुणी जनोए लक्ष्मीने धर्मस्थानमा जोडीने (पुन्य मार्गे खर्ची) तेनुं फळ लेवू. 'पात्र-सुपात्र दाननो प्रभाव.' ७७ सुपात्रमा दीधेलं उत्तम न्यायोपार्जित द्रव्य संयमनी वृद्धि कर छ, विनय गुणने खीलवे छे, ज्ञानने अजेवाळे छ, समता रेसने " - * श्री संघनी भक्ति अने तेनो प्रभाव. ૨૨ पोषे छ, तपने प्रबळ करे , शास्त्र पटनने जोर आपे छे, पुस्यने उ- स्पन्न करे छे, स्वर्गनां सुख आपे छे अने अनुक्रमे मोक्ष लक्ष्मी पण भेछ्त्री आपे छे. ७८ उपद्रवने दूर करनारुं अने संपदाने आपनारु सुपात्रदान जे महानुभाव आपे छ तेने दारिद्रय आवर्तुज नथी. दुर्भाग्य तैनाथी दूरज रहे थे, अपयश थवा पामतोज नथी अने पराभव करचा कोई ईच्छतुं नथी: व्याधिनु जोर फतवतुं नथी, दीनता आवती नथी, भय पीडतो नथी अने कष्टो नडतां नथी. ७९ जे पुरुषो पोतान द्रव्य कल्याणार्थ आप छ, 'तेने लक्ष्मी मळवा इच्छे छे. मति, कीर्ति अने प्रीति तेने शोधती आवे छ, सौ- भाग्य अने नीरोगता लेने मेटे छ, कल्याण परंपरा सन्मुख आवे छे, स्वर्गनी मुख साहेबी सहेजे मळे छे अने मुक्ति तेनी राह जोया करेछ. ८० जे पुरुष पोतार्नु पुष्कळ धन प्रसिद्ध एवां सात क्षेत्रमा वापरे तेने सुखसंपत्ति साव सुलभ थाय छे, यश स्वाधीन थाय छे, लक्ष्मी मळवा उत्कंठित रहे छे, मति निर्मळ थाय छे, चक्रवर्ती प्रणानी समृद्धि निकट आवी रहे छे, स्वर्गसंपदा हस्तगत थाय के अने माक्षसंपदा मेळववाने ते भाग्यशाळी थाय छे. 'सुखशीलता तजी कल्याणकारी तपर्नु सेवन करो." ८१ जे (तप) पूर्वकृत कर्म-पर्वतने चूरवा वज्ररुप छ, विषय अभिलाषरुप दावानळनी ज्वालाने शमाववा जळ वर्षणरुप छे, भयं- कर इन्द्रियोरुपी सोने दमवा जांगुली मंत्र समान छे, विनरूप , २३० सूक्त मुक्तावळी. अंधकारना समूहने फेडवा सूर्योदय समान छे, तेमज अनेक प्रकारनी लब्धि-शक्तिरुप संपदाने पेदा करे छे ते वाह्य अने अभ्यंतर एम बने प्रकारनां तप कोइ पण जातनी वांछा-आशा तृष्णा राख्या वगर शास्त्रोक्त रीते करवां जोइए. ८२ जे तपना प्रभावथी विघ्न मात्र विसराळ थइ जाय छे, देवताओ सेवा करे छे, विषय-अग्नि शान्त थाय छे, इन्द्रियो दमाय छे, कल्याण अचूक थाय छ, तीर्थंकरादिक संबंधी महा ऋद्धिओ सांपडे छे, कर्मोंना क्षय थायछे, अने स्वर्ग अपवर्गनां मुख स्वाधीन थइ शके छे ते तप प्रशंसवा योग्य केम न होय ? अपितु होय ज. ८३ जेम दावानल वगर बनने बाळवाने कोइ समर्थ नथी. व- दि वगर दावानळने ठारवा कोई समर्थ नथी अने पवन वगर वर्षा- दने खाळवा कोई समर्थ नयी तेम तपस्या वगर, कर्मसमूहने हणवा कोइ समर्थ नथी. ८४ संतोषरुप पुष्ट मूळवाळो, क्षमारुप परिवारवाळो, आचा- रांगादि श्रुतस्कंधनी रचनारुप विस्तारवाळो, पंचइन्द्रिय निग्रहरुप भाखावाळो, देदीप्यमान अभयदानरुप दळवाळो (अथवा विनयरुप प्रगट पत्रवानो),ब्रह्म व्रतरुप नवपल्लव (कुंपळीयां) वाळो, श्रद्धा जळ समूहना सिंचनथी विशाळ कुळ, बळ, अश्वर्य अने सौन्दर्यरुप भोग विस्तारवाळो, तथा वार देवलोक नव ग्रैवेयक अने पांच अनुत्तर विमाननी प्राप्तिरुप (सुगंधि) पुष्पवाळो उक्त तपरुप कल्पवृक्ष मोक्ष सुखरुप फलने आपवावाळो थाय है, “श्री संधनी भक्ति अने तेनो प्रभाव, २३१ , - , 'शुभ भाव-रसायणर्नु सदा सेवन करो,' ८५ नीरोगी पुरुष उपर जेम स्त्रीनां कटाक्ष बाण नकामां छे, कृपण स्वामी पासे करेलु सेवा कष्ट जेम नकामुंछे, पथ्थरमां कमळ उगाडक्वानो श्रम जेम नकामो छे, उखरभूमिमां थयेलो बर्षाद जेम नकामो छे, तेम शुभ भावना वगर दान, प्रभु पूजा,तप, स्वाध्याय- शास्त्र पठनादिक अनुष्ठान पण सघळां नकामां अफळ छे. ८६ जो कोइ मनुष्य सर्व वस्तुने जाणवा इच्छतो होय, पुन्या । प्राप्त करवा चाहतो होय, तथा दया धारण करवा, पापने भेदवा (टुंका करवा), क्रोधने खंडवा, दान, शीळ अने तपने सफळ करवा, पुन्यनी वृद्धि करवा, भवसायरनो पार पामवा, अने सिद्धि रमणीने आलिंगवा इच्छताज होय तो तेणे शुभ भाव (शुभ वीर्योंलास) आदरवोज जोइए. ८७ विवेकरुपी वनने विकसित करवा (अम्रतनी)नीक तुल्य, उपशम सुखने माटे संजीवनी तुल्य, भवसमुद्र तरवामहानौकातुल्यं, काम अग्मिने शमाववा मेघमाळा तुल्य, चपळ इन्द्रियोने किवा पाश बंधन तुल्य, भारे कषायरुप पर्वतने भेदवा वज्रतुल्य, अने मोक्षमा- गैनो भार बहेवा खच्चरी जेवी समर्थ भावनाने तमे सेवो बीजें वर्षा करवायी सयु; बीजुं बधुं करेलु भावना वडेज लेखे छे. भावना वगरनु वधुंय फोगट जेवु छ. ८८ पुष्कळ दान दीधु होय, समस्त जिन आगमोनो अभ्यास कों होय, बहु आकरी क्रिया-करणी करी होय, अनेकवारभूमि- - ૨૨૨ न्यूँक तुक्तावली. शयन कयु होय, बहु आकरां तप तप्यां होय, अने घणो लांवो व- खत चारित्र पाण्यु होय परंतु जों चित्तमां रुडो भाव (शुभ भा- वना) पेदा थयेल नथी तो ए सपलं फोतरां वारबानी जेवू फो- गटज छे. शुभ भावनायुक्त पूर्वोक्त सपळु लेखे थाय छे. 'विषय लोलुपता तजी वैराग्य वृत्ति भजो.' ८९ पापरुप रजने शमाववा जळ समान, मान्मत्त इन्द्रियरुप हाथीने दमवा अंकुश समान, कल्याणरुप पुष्पना बागीचा समान, छकेला मनरुप वांदराने बांधवा सांकळ समान, चारित्ररुप स्मणीने रमवा क्रिडागृहसमान, कामरुप तापने टाळवा औषध समान, अने मोक्षमार्गमां रथ समान एवा वैराग्यने विचारी देन सेवन करी तु निर्भय था. ९० जेम प्रचंड पवन वाधेली मेघ घटाने वीखरी नाख छ, अग्नि जेम वृक्षोने वाली मांखे छे, सूर्य जेभ अंधकारना समुहने फेडी नांखे के अने वज्र जेम पर्वनना समूहने भेदी नांखे छे तेम एकलो वैराग्यज सघळां कर्मानो संहार करी शके छे. वैराग्यनी तीक्ष्ण धारावडे जल्दी कर्म क्षय थाय छे. ९१ कठोर पापने कापवा कुगळ एवों वैराग्य जो हृदयमा प्र- गटे तो देववंदन, उत्तम गुरुनी चरण सेवा, अंतिओकरी तपस्या; गुणवंतनी उपासना,जंगलमां निवास, अने ईन्द्रियोने दमवानी विद्या मोक्षदायी थाय है. उत्तम वैराग्य वगरनी ए वी करणी लुखी (भीटाश वगरनी) लागे छ, " " श्री संघनी भक्ति 'अने तेनो प्रभाव. २३३ ३ ९२ विषय भोगने काळा नागना शरीर जेवा विषम समजी, राज्यने रंज (धूळ) जेवू असार संमजी, स्वजनाने कर्म बंधनां का- रंण रुप समजी, विविध विषयने विष मिश्रित अन्न समान समजी, ऋद्धिने राख समान समजी अने स्त्रीओने तृण समान तुच्छ समजी ते वायमा आसक्तता तजी, शुद्ध हृदयवाळो वैरागी पुरुष सिद्धि पदने पामे छे. 'भव्यात्माओने सामान्य हितोपदेश,' ९३ जिनेश्वर देवनी पूजा; गुरुमहाराजनी सेवा, सहु जीवो उपर अनुकंपा-दया. शुभपात्रमा दान, गुण-गुणी उपर अनुराग (गुणग्रहण बुद्धि) अने शास्त्रश्रवण ए छ मनुष्य भंवरुप वृक्षनों ८ शुभ फळ छे. ९४ त्रिकाळ प्रभु पूजा-भक्ति करो, निर्मळ यश-कीर्ति बंधारो, सठेकाणे धन, वाचो, मनने नीतिना मार्गे दोरो, काम क्रोधादिक शत्रुीने संहारो, सहु पाणी उपर दया करो, अने जिनांगमने साँ- भळो, अने अंमे करी शीघ्र मोक्षलक्ष्मीने वरो ! ९५ वीतराग देवनी पूजा करी, निग्रंथ-मुनिजनोने नमस्कार करी, सिद्धान्त सांभलो अधर्मी जनोनी संगति तजी, पात्रमा द्रव्य आपी, उत्तम (शिष्टजनो)ना मार्गे चाली, अंतरंग शत्रुआने जीती, अने नमस्कार मंत्रने संभारी (नमस्कार महामंत्र- ध्यान करी)हे भव्यो ! इच्छित सुखने स्वाधीन करो. ९६ जे रीते चंद्रसमान उज्वल यश दशे दिशामा प्रसरे, उद- २३४ सूक्त मुक्कावळी. कारी गुणश्रेणि विस्तार पामे, अने कुकर्मनो क्षय करवा समर्थ धर्म वृद्धि पामे ए रीते चतुर पुरुषोने मुलभ एवा न्यायमार्गमां सुज्ञ जनोए प्रवर्तन करवु. भाग्यशाली जनो धारे तो एवं प्रवर्तन सुखे करी शके. ९७ हाथे प्रशंसवा योग्यदान, मस्तके गुरुचरणने प्रणाम, मुखे सत्य (प्रिय पथ्थने तथ्थ) वाणी, काने शास्त्र श्रवण, हृदये स्वच्छ- निर्मळ वृत्ति, भुजामां विजयवंतु शौर्य, अहो ! आटलां वानां अश्चर्य वगर पण स्वभाववडे उत्तम पुरुषोने अलंकार-आभूषणरुप छै; केमके सुपात्र दानवडे हाथ जेवा शोभे छे तेवां कंकणादिक बडे शोभता नथी; मस्तक मुरुचरणे लगाडवाथी जेवं शोमे छे तेवु मुगटादिकथी शोभतुं नथी इत्यादिक आशय स्पष्ट छे. ९८ जो आ भव अटवी वटायो, मोक्ष नगरे जवाइच्छाज होय तो विषयरुप विष वृक्षोनो आश्रय करवो नहि, केमके एमनी छाया पण शीघ्र महा मूर्छा उपजावे एवी छे, जेथी आ जीव एक पगलं पण आगळ चालवा समर्थ थइ शकतो नथी; तो पछी ते विषय विष - सोनां पत्र, पुष्प, फळ अने रसनु ता- कहेवू ज शुं ते वांय महा हानिज करे छे. 'उपसंहार.' ९९ चंद्रप्रभा अने सूर्य प्रभा मनुष्योना जे अंधकाररुप काद- वने दूर करी शकती नथी ते ( अज्ञान-पाप) आ अल्प उपदेश सदाय श्रवण करतां सदंतर दूर करी दे छे. अत्यंत आदरपूर्वक श्र- श्रावक धर्माचित आचारोपदेश भाषान्तर. २३५ वण, मनन अने-निदिध्यासन करवानुं बहु उत्तम परिणाम आवे छे, मूळ काव्यमां ग्रंथकारे 'सोम प्रभाचार्य एवं स्वनाम पण गभिंत- पणे जणावेलं छे. ग्रंथ प्रशस्ति. १०० अजितदेव आचार्यना पट्टरुप उदयाचळ उपर प्रगटेला सूर्य समान विजयसिंह आचार्यना चरण कमळमां भ्रमरनी पेरे रमता सोमप्रभा आचार्य आ सूक्त मुक्तावळी रची. (भव्यात्मा- ओ तेने कंठाग्रे करी निज हृदयने शोभावो पावन करो. इतिशम्, श्रावकधर्मोचित आचारोपदेश भाषान्तर- 3 (प्रथमो वर्ग:) मंगलाचरण. १-२ केवळ ज्ञान अने आनंद स्वरुप, रुप रहित, जगत्त्राना, अने परम ज्योतिवंत श्री परमात्माने नमस्कार! योगी पुरुषो मन- नी शुद्धिने धारण करना ध्यान चक्षुवडे जेनु स्वरुप जोवे छे, ते प्र- भुने हुँ स्त, . ग्रंथ ग्रंथन हेतु. ३-५ सहु कोइ जीव सुखने इच्छे छ, शुद्ध-निर्दोष सुख मो- समां रां 2. मोक्ष मुख ध्यानथी मळे छे, ध्यान मननी शुद्धिथी सूत मुक्ताबळी. याय छे, अने मननी शुद्धि कमायने जीतकाथी पाय है. कंपायनो जयं इन्द्रियोने दमवाधी थाय छे. अने इन्द्रियोनुं दमन सदाचारथी थाय छ, अने एवो गुणकारी सदाचार रुडा उपदेश थकी पाणी- योने प्राप्त थइ शके . रुडा उपदेशथी सुबुद्धि थाय छे. अने मुचुद्धिधी सद्गुणोनो उदय थाय छे. एवा शुभाशयथी आ आचारोपदेश नाममा ग्रंयनों हूँ प्रारंभ कर छ. ग्रंथ श्रवण पाळ-धर्म प्राप्ति. ६-९ सदाचार संबंधी विचारवडे मनोहर अने चतुरने उचित एवो आ देवताने पंण आनंदकारी ग्रंथ शुभाशेयवादा सज्जनोए श्र- वण करवो युक्त छे. अनंतकाळे पण पामवो दुर्लभ एवो आ मनुष्य जन्म पामीने विवेकवंत जनोए धर्मने विषे परम आदर करवो जो- इए. धर्म श्रवण कर्यों छतो, देख्यो छतो, कराब्यो छतो अने अ- नुमोद्यो छतो पण प्राणीओने सातमा कुळ पर्यंत पवित्र करे छे. धर्म, अर्थ अने कामरूप त्रण वर्गने सम्यक् प्रकारे सेव्या वगर मनुष्य आयुष् पशुनी जेवू नका, समजवं. ते त्रण -वर्गमा पण धर्म उत्तम छे. केमके ते धर्म मेवन कर्या वगर बीजाचे अर्थ अने काम सघातां नथी. सत्सामग्री अने तेनी सफलता.करवा शास्त्र प्रेरणा. १०-१३ मनुष्यपणु, आर्यदेश, उत्तम जाति-कुळ, अखंड इ- न्द्रिय कुशलता, शरीर आरोग्य, अने दीर्घ आयुष कथंचित् कर्मनी श्रावक धर्मोचित आचारोपदेश भाषान्तर. २३७ लघुताथी मके छ ए सपर्छ पुन्य योगे प्राप्त थये छते श्रद्धा आववी दुर्लभ छेतेथी पण दुर्लभ सद्गुरुनो संयोग म्होटा भाग्ययोगे मळे के. आ संघको सामग्री स्वाधीन ज होय पण ते जेम स्यायवडे राजा, मुंगंध बंड फूल अने घी बडे भोजन शोमै छे; तेम सदाचार बडे शोभा पामै -सफळे थइ शकै छे. संदांचार सेवामा तत्पर मनु- ध्ये शास्त्रोक्त विधि वडै धर्म, अर्थ अने काम रुप श्रेण वर्गने परस्पर विरोध रहित (अविरुद्ध पणे) सदाय साधवा जोइए. श्रावक योग्य शास्त्रोक्त अविरुद्ध आचार विचार. नमस्कार मैत्रनी स्तुति. १४-२१ रात्रिनों चौथा पहोरमां ब्राह्म मुहूर्त बखते काळजी राखी, सुज्ञ पुरुष पंच परमैष्टि मंत्रनी स्तुति करती छतो निद्रानो त्याग करे. सदाय शय्यामाथी उठया (जाग्या) बाद डावी के ज- मणी जे नाडी बहेती होय तेज डांबो के जमणो पग भूमि उपर (धीमेथी) राखवी. शयन संबंधी वस्त्रो मुकी बीजां (स्वच्छ) व- खौ धारण करी रुडा स्थानके रहीने बुद्धिवाने धीरजथी पंचपरमेष्ठी नमस्कार मंत्रनुं ध्यान करचु. पवित्र थई पूर्व दिशा के उत्तर दिशा सन्मुख पवित्र स्थाने रही स्थिर मनथी नमस्कार मंत्रनो जाप करवी. स्नान कर्यु होय के न कयु होय. सुखी होय के दुःखी होयं ते नम- स्कार मंत्रनु एकाग्रमने ध्यान करतो छंती संच पापथी मुक्त थाय छे. अर्थात् धर्मना अर्थी जनोए सर्व देश काळमां श्री पंच परमेष्ठी नमस्कार मंत्रनुं चिंतवन कर जोइए, आंगनीने अंगे जे जाप क- सूक्त मुक्तावळी. राय, मेरुनु उल्लंघन करीने जे जाप कराय अने उपयोग रहित सं- ख्याहीन जे जाप कराय, ते प्राय: अल्प फळ आफ्नार थाय छे. उ. स्कृष्ट, मध्यम अने जघन्य एम त्रण प्रकारे जाप थाय छे. तेमा जे ह- दयकमळमां विधिवत् नवपदजीनो जाप कराय ते उत्कृष्ट अने जप- माळावडे कराय ते मध्यम जाप समजवो. मौन राख्या वगर, सं- ख्यानुं लक्ष राख्या वगर अने चित्तनी एकाग्रता वगर तेमज पना- सनादिक आसन लगाव्या वगर अने ध्येय-परमात्मादिकमां वृत्तिने जोडया वगरनो जाप जघन्य छे. आवश्यक-करणी. २२ त्यारपछी (प्रभात सारी रीते थये छते) उपाश्रये के पो- तानी पोषधशाळामां पापनी विशुद्धि करवा माटे बुद्धिवंते आवश्यक करणी करवी. २३ रात्री संबंधी, दिवस संबंधी, पाखी, चउमासी अने आ- खा वर्ष संबंधी पाप दोषने दूर करवा अने. आत्माने निर्मळ करवा जिनोए पांच प्रकारना आवश्यक कह्यां छे, ते प्रत्येकमां सामायक प्रमुख छ आवश्यकनो समावेश थाय छे. करेलां पापने फरी नहि करवानी बुद्धिथी पश्चात्ताप सहित श्री सद्गुरु समीपे आलोचाय- निंदाय ते अतिक्रमण आवश्यक आत्माने उपकारक थइ शके छे. जा- णतां के अजाणतां लागेलां पापनी शुद्धि सरलपणे-शीघ्र करवी जोइए. २४ आवश्यक करणी करीने पूर्व कुळ मर्यादा संभारी अत्यंत श्रावक धर्मोचित आचारोपदेश भाषान्तर. आनंदित चित्तथी मंगळ स्तुति कहेवी (आवश्यक करणी पहेला अने पछी ए रीति छे.) संगल स्तुति अष्टक. २५ महावीर भगवान् , गौतम गणधर, स्थूलभद्रादि मुनिवरो अने जिनेश्वरोए कहेलो धर्म ए सघळां मुझने मंगळरुप थाओ! २६ ऋषभादिक जिनेश्वरो, भरतादिक चक्रवर्तीओ, बळदेवो. वासुदेवो अने प्रतिवासुदेवो ए सघळा म्हारुं श्रेय-कल्याण करो! २७ नाभि अने सिद्धार्थभूप प्रमुख सघळा जिनेश्वरोना पिता- ओ, जेमणे अखंड साम्राज्य भोगवेल छे, तेश्रो मुझने जय आपो. २८ जगत्रयने आनंद करनारी मरुदेवी अने त्रिशला प्रमुख जिनेश्वरोनी प्रसिद्ध माताओ मुझने मंगळ करो. २९ श्री पुंडरीक अने इन्द्रभूति प्रमुख सघळा गणधरो अने वीजा श्रुत केवळीओ (चौद पूर्वधरो) पण मुझने मंगळमाळा आपो. ३० अखंड शीलनी शोभाथी भरेली ब्राह्मी अने चंदनबाळा प्रमुख महा सती-साध्वीओ मुझने मंगळ आपो. -३१ समकितीनां विघ्न हरनारी चकेश्वरी अने सिद्धायिका प्र- मुख ऋषभादि तीर्थकरोना शासननी अधिष्ठात्री देवीओ मुझने ज- पलक्ष्मी आपो. ३२ जैनोना विनोने हरनारा कपर्दी अने मानंग प्रमुख प्रसिद्ध पराक्रमवाला अधिष्ठायक यक्षो मुझने सदा मंगळ आपो.

૨૪ सूक्त मुक्तावळी. मुकुनबडे भावित चित्तवृत्तिवाळो, अने सौभाग्य भाग्यवंडे भरेलो एवो जे शुभ मतिवंत पुरुष आ मंगलाष्टकने प्रभाव समय भगे छे, ते सर्व विघ्नोने हणीने जगतमां मनमान्या मंगळने मेळवे छे. ३४ न्यारपछी निस्सिही कहीने जिन मंदिरे जावू अने सघ- ळी आशातना तजीने जिनेश्वर भगवानने त्रणवार प्रदक्षिणा देवी ३५ भोगविलास, हास्यचेष्टा, नासिकादिकनों मळ काइयो, निद्रा, कलेश अंने दुष्ट एवी विकथा करवी तथा चार प्रकारंनो अ- शनादिक आहार करवो एटलां वर्धाय वानां आशातनारुप समजी जिन भुवनमा अवश्य तजवां. आ उपरांत बीजी पण नानी म्हो- टी अनेक आशातनाओं देववंदन भाष्यांदिकमां जणांवेली सुज्ञोएं तजवी. ३६ हे जगन्नाथ ! आपने नमस्कार (नमो जिणाणे) इत्यादि स्तुति पर्दैन कहता, फळ अक्षत, प्रमुख प्रभुनी ऑगळ ढोकचु-मूकबु, ३७ खाली हाथे राजा, देव अने गुरु तथा विशेषे निमित्ति- यानी पासे दर्शनार्थे जर्बु नहि. कइक पण सरंस फळ प्रमुख राखीने ज जावं केमके फळ बडे ज फळनी प्राप्ति करी शकाय. ३८ प्रभुनी जमणी अने डांवी बाजुए अनुक्रमें रही पुरुष अने स्वीओए-उत्कृष्ट ६० हाथनो अने जघन्य ९ हाथनो अवग्रहं ( अंतर राखq) शक्य होय तो राखीने' श्री जिनेश्वर प्रभुने वैदन करें घरदेरासरमां.पणे वनी शके.एटलो अवग्रह जरुर साचंचवो. (गुरु महाराजनो पण योग्य अवग्रह साचवत्री खसि फरमान छै) . १ श्रावक धर्मोचित आचारोपदेश भाषान्तर, ३९ पछी उत्तरासंग करी, रुही, योगमुद्वार स्थित्त थइ मधुरी वाणीवडे भाविक आत्मा मभु समीपे पोतानी दृष्टि स्थापीने - त्यवंदन करे. ४० पेट उपर हाथनी बे कोणीओ राखी, कमळना कोशनी जेवी बे हाथनी आकृति करी, अन्योन्य (माई मांहे ) आंगळीयो आंतरवाथी योगमुद्रा थाय छे, ४१ त्यार पछी स्वस्थानके जइ प्रभात संबंधी क्रिया करे, अने भोजन आच्छादन प्रमुख परचिंता करे. ४२ स्वबंधुओने अने.नोकर चाकरोने स्वस्वकार्य करवा ज- णात्रीने पछी पोते बुद्धिना आठगुणोवडे युक्त छतो श्री गुरु पासे उपाश्रये आवे. ४३ शास्त्र श्रवण करवानी इच्छा, २ शास्त्र श्रवण, ३ ग्रहण, ४ धारणा, ५ उह, ६ अपोह, ७ अर्थविज्ञान अने ८ तत्वज्ञान ए बुद्धिना आठ गुणो छे. ४४ शास्त्र श्रवण करे ते धर्मना मर्मने जाणे, दुर्मतिने तजे, ज्ञानने पामे (अज्ञानने वामे) अने विषय कषायादि प्रमाद तजीने वैराग्य पामे. ४५ पंचांग प्रणामवडे गुरुमहाराजने तथा बोजा साधुजनोने वांदी-प्रणमी गुरुमहाराजनी आशातनाने तजता छतां विधि र्यादा साचवी गुरु सन्मुख बेसबुं, * विशेष अधिकार देववंदन भाग्यथी जाणवा योग्य छे:: ૧૬ . ૨૨ सूक्त मुक्तावळी. ४६ मस्तक, बेहाथ, अने बे ढींचणवडे भूमितळने विधि स- हित ठीक पूजी प्रमार्जीने स्पर्शवाथी पंचांग प्रणाम कर्यों कहेवाय छे. ४७ पलांठी न वाळवी, पग न प्रसारवा, पग उपर पग न चढाववो अने काख न वताववी. ४८ गुरुमहाराजनी पुंठे के तदन नजदीक के वैने पडखे बे- सवु के उभा रहेQ के चालवू नहि. तेमज पोताथी पहेला आवेलाना साथे बातचीत करवी नहि. टुंकाणमा गुरुनो अविनय थाय तेवू क/ कर्तुं नहि. ४९ उत्सर्ग, अपवाद, निश्चय व्यवहारादिक शास्त्रना भाव अने भेद (अपेक्षित वचनो)ने समजी शके एवा विचक्षण पुरुषे गुरुना सुख सामे दृष्टि । एकाग्र चित्तथी धर्मशास्त्रो श्रवण करवां. ५० व्याख्यान वखत थये छते रुडी बुद्धिवाळाए स्वसंदेहो बगळवा अने देवगुरुना गुणगान करनार भोजक विगेरेने यथा- शक्ति-दान देवु. • ५१ जेणे प्रतिक्रमण कयु न होय ते (पण) व्रत-नियम करवा रुचिर्वत छतो गुरुमहाराजने वंदन करे (वांदणां आपे) अने यथा- शक्ति व्रत नियम आदरवा संबंधी गुरुमहाराज समक्ष प्रतिज्ञा करी पछी तेनुं पालन करे. ५२ उदार दीलयी दान आपनार-दाता छतां पण व्रत नि- यम वगरना मनुष्यो तिर्यंचनी योनिश्रोमा उत्पन्न याय छ भने श्रावक धोंचित आचारोपदेश भाषान्तर. ૨૩ . हाथी घोडादिकना भवमां बंधनादिक सहित भोग भोग- वता रहे छे. ५३ दाता-दानेश्वरी नरक गतिमां जतो नथी, व्रत नियम पाळनार-विरतिवंत तिर्यंचपणुं पामतो नथी. दयालु अल्प आ- युषी थतो नथी अने सत्यवक्ता-सदाय साचुं हित प्रिय बोलनार- दुःस्वर थतो नथी, पण सुस्वर थाय छे. तप-प्रभाव. ६४ तप, सर्व इन्द्रियोरुपी हरणयांने वश करवा मजबूत जाळ तुल्य छे. कषायरुप तापने शांत करवा द्राक्ष तुल्य छे अने कर्मरुप अजीर्णने टाळवा हरीतकी-हरडे तुल्य छे. आत्मानुं श्रेय करनार नपछे, ५५ जे कंइ दूर अने साधी न शकाय अने देवताने पण दु- लभ होय ते सघल्लं तपवडे साधी शकाय छे. तपनो प्रभाव अ- चित्य छे. सख्त तापवडे जेम सुवर्णनी शुद्धि थाय छे, तेम बाह्य अभ्यंतर बने प्रकारना तीव्र तपवडे कर्ममळनो क्षय थनां आत्मा शुद्ध-निर्मळ थाय छे. एम समजोने ज तीर्थकर जेवा ज्ञानी-पुरुषो पण उक्त उभय तपY आसेवन करे छे. मोक्षार्थी मुमुक्षु जनोए तो शीघ्र मोक्षपदनी प्राप्ति माटे उक्त तपY सेवन अवश्य करवु घटे के एवी श्रद्धा राखी यथाशक्ति तप, जप, व्रत, नियम सदाय आदरवा. ५६ उपर मुजब धर्मविधि आदरीने पछी सुबुद्धि पुरुष, चौ- टामां जाय अने द्रव्य उपार्जन थाय, एवो यथोचित व्यवसाय करे. शास्त्र श्रवण करनार सुबुद्धिवंत न्यायोपार्जित द्रव्यने ज पसंद पण परिणामे दुःखदायी एवा अन्याय द्रव्यनी इच्छा न ज करे.

. मुक्त मुक्तावळी. ५७ सजन-मित्रोना उपकार माटे अमें स्वजन बंधुभोना उदय माटे उत्तम पुरुपो अर्थ उपार्जन करे छे. अन्यथा स्व उदर पो- पण तो कोण करतुं नथी? जे परोपकारना मार्ग ख़र्चाय तेज खरुछे. ५८ व्यापार योगे चलावातो आजोविका उत्तम, खेड करी आजीविका चलावाय ते मध्यम, पारकी सेवा चाकरीवडे आजो- विका चलाववी ते जघन्य अने भिक्षा (भिख) मांगी आजीविका करवी ते अधमाधम जाणवी. ''.५९ आवा हेतुथी कदापि नीच व्यापार करवो नहि, तेमज कराववो नहि. केमके पुन्यथी प्राप्त थनारी लक्ष्मो पापथो कोई दिवस वधती नथी. पण उलटुं पार करनारने पाछळथी बहु कष्टः सहन कर पडे छे. ६० पापभीरु अने विचक्षण होय ते बहु आरंभ-समारंभ- वाळां, भारे पापवाळां, लोकोपवादवाळां अने उभय लोक विरुद्ध होय एवां काम (अंगार कर्मादिक १५) आचरे नहि. ६१ गमे तेटला पुष्कळ द्रव्यनी प्राप्ति थती होय, तोपण लोहार, चमार, मोची, कलार अने घांची तथा वाघरो विगेरे साथे व्यवसाय करवो नहि. नीच द्रव्यथी जयवारो न ज थाय. ६२ एवी रीते प्रथम पहोर संबंधी समग्र विधिने सेवतो वि- शुद्ध हृदयवाळो, न्याय-नीतिथी शोभतो, अने विज्ञान (Discriniinative Pover) मानप्रतिष्ठा (Self-respect; Prestige) तथा जनप्रियता ( Popularity) मेळववा सदा सावधान एवो श्रावक पोतानां उभय जन्मने सफल करे. ॥ इति प्रथमोवर्ग:

श्रावक धर्मोचित आचारोपदेश भाषान्तर. २४५ अथ द्वितीयोवर्गः श्री श्रावकधर्मोचित- आचारोपदेश. "दिवसना बीजा पहोरे करवा योग्य श्रावकनी करणी." १ हचे बीजे पहोरे मुबुद्धिवंत स्वस्थाने जाय अने जीवजंतु वगरनी भूमि उपर पूर्व दिशा सन्मुख बेसीने स्नान आचरे-शरीर भुद्धिं करे. २ स्नान करवा माटे जळ नीकळचाना नाळवावाळो एक म- जानो बाजोट करावे के जेथो एमांथी नीकलताजळमां जीव विरा- धना थवा न पामे ३ रजस्वला स्त्री संबंधी मलोन स्पर्श थये छते, सूतक लाग्ये छते अने स्वजननें मृतकार्य कय छने सर्वांग स्नान आचरे-आखे " अंगे न्हाय. ४ अन्यथा सुज्ञ जन देवपूजा निमित्ते कंइक उष्ण (स्हेवाय तेवा) अने थोडा जळबडे उत्तमांग-मस्तकनो भाग वर्जीने वीजे बधे शरीरे स्नान करे. ५ चंद्र अने सूर्यनां कीरणोना स्पर्शथी जगत् वधुं पवित्र थाय छे तो तेना आधारे रहेल्लु मस्तक सदाय पवित्र छ एम योगी जनो माने छे-कहे छे. ६ धर्म निमित्ते जे सघळा सदाचार सेववामां आवे छे ते दया प्रधान होय छे. सदाय मस्तक धोवाथी तो तद्गत जीवोनो उपद्रव 1- थाथ छे.

२४६ सूक्त मुक्तावळी. ७ नित्य निर्मळ ज्योतिने धारग करता एवा आत्मानी स्थिति होवाथी कायम वस्त्रवडे वेष्ठित एवं पण मस्तक पवित्र ज छे. ८ जे बाह्य दृष्टिवाळा लोको स्नान करतां अति घणा जळने डोळबाथी जंतुओनो नाश करे छे ते शरीरने शुद्ध करता जीवने मलीन करे छे. ९ न्हावां पहेरेलु पोतोयुं मूकी, बोजु वस्त्र पहेरी, ज्यां सुधी पग भीना होय त्यां सुधी जिनेश्वरनुस्मरण करता त्यांज उभा रहे. १० नहितो वळी पगने मळ संस्पर्श थवाथी मलीनता थाय अथता तेनी साथे लागेलाजीवनो घात थवावडे म्होटुं पातक लागे. ११ पछी ग्रह चैत्य (घर देरासर ) पासे जइ, भूमि शुद्धि कर्या वाद पूजा सेवा करवा निमिते वस्त्रो पहेरीने मुखकोश आठ- बडो वांधे. १२ देवपूजाना प्रसंगे मन, वचन, काया, वस्त्र, भूमि, पूजो- पगरण अने विधि शुद्धता संबंधी सात प्रकारनी शुद्धि साचववो जोइए. " १३ पूजाविधि साचवतां पुरुष कदापि पण स्त्रीचें वस्त्र पहेरवू नहि तेमन स्त्रीए पुरुषर्नु वस्त्र पणं पहेरवु नहि. केमके ते काम रागने वधारनार छे. (एम दरेक वावतमां पण समजी लेबु.) १४ विशाळ अने सुंदर चोख्खा कळसामां आणेला जळवडे जिनेश्वरना अंगने अभिषेक करी, उत्तम वस्त्रवडे तेने लूंछी पछी अष्ट प्रकारे प्रभुनी पूजा करवी.

श्रावक धर्मोचित आचारोपदेश भाषान्तर. " अष्ट प्रकारी पूजा प्रसंगे बोलवानें पूजा अष्टक. १५ घनसार भेळवेला अने (केशर) कस्तूरीना रसयुक्त मनोहर उंचा .चंदनबडे, देवेन्द्रोए पूजाएला अने रागादि दोष रहित त्रिभुवनपति जिनेवर देवने हुँअर्चुछ-पूजु छु-१ चंदन पूजा. १६ जाइ, जुइ, बकुल, चंपक अने पाटलादि पुष्पो वडे तेमज कल्पवृक्ष, कुंद अने शतपत्र कमळादि अन्य अनेक पुष्पो वडे, संसार कलेशोनो नाश करनारा अने करुणा प्रधान एवा जिनेश्वर देवने यजु-पूजु छु.२ पुष्प पूजा. १७ कृष्णागरु, शर्करा अने पुष्कळ कपूर सहित सारी रीते काळजीथी बनावेलो धुप श्री जिनेश्वर देवनी पासे पोतानां पापनो नाश करवा माटे खूब आनंदथी हुँ भक्तिवडे उखेबुं हुं ३ धुप पूजा. १८ ज्ञान, दर्शन अने चारित्रनु चिन्तवन करी उजवळ. अने अक्षत-तंदुलवडे भक्तिथी प्रभु पासे त्रण ढग करीने तेमज वीजां साधन वडे पण श्री जिनेश्वर देवने हुं अचु-पूजु छु-४ अक्षत पूजा. १९ उत्तम नाळीएर, पनस, सामळां, बीजोरां, जंबीर, सो- पारी, अने आम्र (आंबा) दिक फळो वडे असाधारण शान्तिवाळा अने स्वर्गादिक भारे फळने आपनारा श्री देवाधिदेवने हुँ अत्यंत हर्षथी पूजु छ-५ फळ पूजा. २० उत्तम मोदक, वडां, मांडा (मालपूड़ा) अने भात दाळ प्रमुख अनेक रसवाळां अन्नभोजन वडे, क्षुधा तृषानी व्यथाथी मुक्त थयेला तीर्थपतिने स्वहित करवा माटे हुँ सदाय आदर भावथी यजु- पूजु छु.-६ नैवेद्य पूजा.

सूक्त मुक्कावळी.
.
२१ जेणे पार पडल भेदी नांख्या 2. अंने आखा ब्रह्मांडने
अवलोकन करवानी ज्ञानकळा ( केवळ ज्ञान) युक्त, सदोदित
अने समताना सागर एवा जिनेश्वर पांसे म्हारा अज्ञान अंधकारने
राळवा हुं भक्ति बडे दिपक प्रगटुं छु. ७ दीपक पूजा.
२२ गंगादिक शाश्वती नदी, नंद, सरोवर अने सागरना
निर्मळ तीर्थ जळ वडे, निर्मळ स्वभाववाळा अने दुर्घर काम मद अने
मोहरुपी अजगरने दमवा गरुड जेवा श्री जिनेश्वर देवने संसारनी
ताप समाववा माटे हुँ यजूं छु. ८ जळ पूजा.
२३ आ असाधारण पूजाष्टक स्तुतिनो पाठ भणी जे 'शुभा-
शयं सजन, आ मनोहर विधि प्रमाणे श्री जीनेश्वर देवनी पूजा करे
हे ते धन्य-कृतपुन्य महाशय देव अने मनुष्य संबंधी अखंडित
सुखोने अनुभवी, नजदीकना वखतमा अक्षय अने अव्याबाध एवां
मोक्षनां सुख पण मेळवे छे.
'गृहचैत्य (घरदेरासर) अथवा भक्ति चैत्यनुं स्थान
अने तेमां पूजा विधि
२४ स्वभुवन (महेल) मा जतां डावे हाथे (डाबो बाजुए)
पवित्र अने शल्य वगरनी दोढ हाथ उंची भूमि उपर सुंज्ञ नर
देवालय करे.
२५ पूर्व दिशा के उत्तर दिशा सन्मुख रही पूजा करनारे
विदिशाओ साथे अग्निकोण अवश्य वर्जवी ते तरफ पूजा करनारे
नं उभा रहे.
२६ पूर्व दिशा सन्मुख पूजा करतां लक्ष्मीनो लाभ-थाय,

२४९ श्रावक धोचित आचारोपदेश भाषान्तर. 1 - अग्निकोण सन्मुख रहेतां संताप थाय, दक्षिण दिशा सन्मुख रहेतां मृत्यु थाय अने नैरुत्यकोण सन्मूख पूजा करता उपद्रव थाय. . २७ पश्चिम दिशामां पुत्र दुःख वोव्यकोणमा प्रजो हानि, उ- त्तर दिशामा महा लाभ अने इशानकोणमां धर्मवासना थाय. २८ विवेकी जनोए जिनेश्वर देवनी पूजा प्रथम बने चरण, जानू (ढींचण) हस्त-भूजा, खभा अने मस्तक उपर अनुक्रमे करवी. २९ पछी ललाठ, कंठ, हृदय अने जठर उपर तिलक अनु- क्रमे करवां. केशर सहित उत्तम चंदन वगर प्रभु पूंजा थइ न शके. ३० प्रभातमां शुद्ध सुगंधी चूर्ण (वासक्षेप) वडे, मध्यान्ह वखते पुष्पोवडे, अने संध्या वखते धूप दीपकवडे सुज्ञोए प्रभु पूजा करवी. ३१ फूलना बे टुकडा न करवा तेमज काची कळी पण छेदवी- तोडवी नहि पत्रने के पुष्पने छेदवा-भेदवाथी हत्या जेवु पातक लागे. ३२ हाथथकी पडी गयेलं, पगे के भोंयपर लागेल तेमज मस्तक उपर रहेलं फूल कदापि प्रभु पूजामा लेवा योग्य न गंणाय. ३३ नीच जनोए नहि स्पर्शलं, कीडाए नहि खाधेलं, (करडेल) खराब वस्त्र-पात्रवडे नहि धरेल, साव सुगंध वगरनुं तेमज उग्र गं- धवालं जे जे पुष्प होय, ते ते प्रभु पूजामा उपयोगी न समजवं. ३४ प्रभुनी डावी वाजुए धूप उखेववो अने बीजोरु के जळ कुंभ तो सन्मुख होय. नागरवेली पान अने फळ प्रभुना हाथमा राखवा ३५ (एकवीश प्रकारनी पूजा) स्नात्र-अभिषेक, चंदन, दीप, धूप, फल नैवेद्य, जळ, ध्वजा-पताका, वासक्षेप, अक्षन- ८ +

२५०
सूक्त मुक्तावळी.
चोखा, सोपारी नागरवेली पन, रोकडनाणु, फळ, वाजिंत्र, ध्वनी,
गीत, नृत्य, स्तुति उत्तम छत्र, चामर अने आभूषणोवडे अरिहंत
देवनी पूजा एकवीश प्रकारे थइ शके छे..
३६ सुपर्व दिवसे तथा तीर्थयोग समये भव्य जनो उपरोक्त
एकवीश प्रकारनी पूजा रचे अने पूर्वोक्त रुडी रीते अष्टपकारी पूजा
तो सदाय करे. भाव सहित जे जे रुडं वने ते बनाववं, स्वहित
कार्यमा प्रमादवश शिथिलता करवी नहि.
३७ पछी सविशेषधर्मनो लाभ मेळववानी इच्छाए (भव्यात्मा)
स्वच्छ वस्त्रवडे शोभित छतो अशुचि मार्गने तजतो गाम चैत्ये-
नगर चैत्ये जाय.
३८ हुँ जिन मंदिरे जइश ए रीते हृदयमा ध्यातां चतुर्थ
(उपवास)- फळ पामे. जवा उठये एटले छठ (बे उपवास) अने
जिन मंदिरे जवा निमित्त मार्गे चालतां अहम (त्रण उपवास) नुं
फळ पामे.
३९ जिन मंदिर देख्य चार उपवास अने द्वारे आवतां पांच
उपवासनुं फळ पामे. मध्ये आवतां १५ उपवास अने प्रभु पूजन
करतां एक मास उपवासनुं फळ पामे (दृढ निश्चयथी प्रभु
सन्मुख जइ विधि सहित प्रभु दर्शन, वंदन. पूजन अने स्तुति
स्तवनादिवडे प्रभु साथे तन्मयता करनार महाशय महा म्होटो लाभ
सहेजे मेळवी शके छे.
४० त्रण निस्सिही कही सुज्ञ जन चैत्यनी अंदर पैसे, अने
चैत्य संबंधी संभाळ करी पछी हर्ष पूर्वक श्री जिनेश्वरनी पूजा करे,

. २५१ श्रावक धर्मोचित आचारोपदेश भाषान्तर. ४१ मूळनायक प्रभुनी अष्ट प्रकारी पूजा करी अंदर अने ब- हार रहेली बीजी बधी प्रतिमाजीओने मार्जन करी पुष्पोना समू- होवडे पूजे-पुष्पोना पगर भरे. ४२ अवग्रहथी बहार जइने अरिहंत प्रभुने आदर सहित वंदन करे अने विधियुक्त प्रभु सन्मुख रहीने (उल्लसित भावथी) चैत्य- वंदन करे. चैत्यवंदन विधि. ४३ एक शक्रस्तव (नमोथ्थुणे) वडे, जवन्य बे वडे मध्यम अने पांच शक्रस्तव वडे उत्कृष्ट उत्तम चैत्यवंदन जाणवू, ए रोते जघन्य, मेध्यम अने उत्कृष्ट एम त्रण प्रकारर्नु चैत्यवंदन थाय छे. अथवा एक नमस्कार वडे जघन्य, बे आदि वडे मध्यम अने १०८ नमस्कार वडे उत्कृष्ट चैत्यवंदन थाय छे. स्तुति श्लोकादिक रुप नमस्कार समजवो. ४४ शक्रस्तवादिक स्तुति करतां योगमुद्रा, वंदन करतां जिनमुद्रा अने 'जय वीयराय,' 'जाति चेइयाई' अने 'जावंत केविसाहू' ए त्रण प्रणिधान कहेती बखते मुक्ताशुक्तिमुद्रा करवी जोइए. ४५ पेट उपर हाथनी कोणीओ स्थापी, कमळना डोडानी जेम हाथ करो, अन्योअन्य आंगळीओआंतरवाथी ए योगमुद्रा थाय छे.. ४६ चार आंगळ आगळ अने कंइक न्यून पाछळ ए रीते बे पग वच्चे अंतर राखी रहेg (उमा रहेg) तेने जिनमुद्रा कही छे. ४७ बन्ने हस्त सरखा अने पोला' राखी ललाटने लगता र- , २५२ सूक्त मुक्तावळी: खाय ते मुक्ताशुक्तिमुद्रा पूर्वोक्त त्रण-प्रणिधान कहेतां करवाना छे. भोजन विधि. ४८ पछी जिनेश्वर प्रभुने नमी, आवस्सही, कहेतो घरे जाय अने भल्याभक्ष्यमा विचक्षण छतो स्वजन-बंधुओ मंगाथे भोजन करे. ४९ पग धोया वगर, क्रोधांध छतो दुर्वचनो बोलतो दक्षिण दिशा सन्मुख बेशी भोजन करें तो ते राक्षसभोजन जाणदु. ५० शरीर शुद्धि साचवी, शुभः स्थळे निश्चळ आसने बेसी दे- वगुरुर्नु स्मरण करी जमे तो ते मानवभोजन लेखाय. ५१ स्नान करी, देव पूजा सारी रीते करी अने पूज्य गुरु- जनोने हर्षयुक्त नमी-वंदन करी, सुपात्रोने दान दइ पछी जमे ते उत्तमभोजन कहेवायः ५२ भोजन, विषयभोग, स्नान. वमन तथा दातण करतां, दिशा जंगल जातां (वडी नीति करतां) अने श्वासादि निरोध प्रसंगे-सुज्ञजन मौन धारण करे. ५३ भोजन करतां अग्नि अने नरुत्य कोण तथा दक्षिणं दिशा वर्जवी, तेमज संध्या समय (सांज, सवार, अने मध्यान्हं) चंद्र सुर्य संबंधी ग्रहण समय अने स्वजनादिकनु:शव (महदं) पडयु होय त्यांसुधी भोजन वर्ज.. ५४ छने पैसे जे भोजनादिकमां कृपणता करे छे, तेने ९ मंद- -मति (मतिहीन) मार्नु छ. ते अहीं कोइ बोजाना नशीब माटे धन पेदा करे के. - श्रावक धर्मोचित आचारोपदेश भाषान्तर. २५३ भक्ष्याभक्ष्य विचार. ५५ अजाण्या पात्रमा अने ज्ञाति भ्रष्ट होय तेने त्यां भोजन करवु नहि. तेमज अजाण्यां अने निषेधेलां अन्य फळ खावां नहि. ५६ वाळ, स्त्री, मर्म अने गौहत्या करनारा, आचार लोप- नारा अने स्वगोत्रमा क्लेश करावनारनी पंक्तिमां जाणी जोइने मुज्ञजने बेसवु नहि. ५७-५८ मदिरा, मांस माखण, मध, वड आदिना टेटा (फळ) अनंतकाय (कंदमूळ विगेरे) अजाण्यां फळ तथा रात्री समये भोजन, काचा गोरस (दूध दहीं के छाश) साथे कठोळ ज- मवानु, वासी चोखा विगेरे धान्य, बे दिवस उपरांत राखेलं दही, अने जेना वर्ण गंध रस स्पर्श बदलाइ गयो होय, एवां बगडेलां अन्न वर्जवां. ५९ जिन धर्म पाळवामां तत्पर होय, ते. श्रावक-श्राविकाओ जीवातवानां फळ फुल पत्र के वीजु जे कांइ होय ते तथा बोळ- आथ' पण खाय नहि जीभना रसमां गृद्ध बनीने क्षण मात्र दे- खातां नजीवां सुखनी खातर आत्माने मलीन करे नहि. ६० आहार अने निहार करतां घणी वार लगाडची नहि तेमज जळपान तथा स्नान बहु उतावळां करवां नहि-स्थिरताथी करवा. ६१ भोजन पहेला जळपान करवू ते विष 'जेवं, भोजन कर्या पछो उपर जळपान करवू ते प्रथ्वर जेवू अने भोजन करतां वच्चमां जळपान करचुं, ते अमृत समान परिणाम आपे के.

२५४ सूक्त मुक्तावळी. ६२ अजीर्ण जणातुं होय तो भोजन न करवू, अजीर्ण मटया बाद प्रकृतिने माफक आवे एवं ( सादु-हळवू ) भोजन करवू अने भोजन करी रह्या पछो पान सोपारीवडे मुखशुद्धि करवी. तेनो (पान सोपारीनो) त्याग होय तेणे वीजी निर्दोष रीते मुख- शुद्धि करवी. ६३ विवेकवंत होय ते मार्गमा हालता चालतां तांबूल न खाय तेमज पुन्य मार्गनो जाण होय ते सोपारी प्रमुख आखं फळ दांतवडे दळी नांखे नहि, पण जोइ तपासीने ज खाय. ६४ भोजन कर्या वाद ग्रीष्मऋतु न होय तो विचारवान् (बुद्धिशाली-परिणामदर्शी) दिवसे उघे नहि केमके दिवसे उघना- रना शरीरमां व्याधि थवानो संभव रहे छे. इति द्वितीय वर्ग. अथ आचारोपदेश तृतीयो वर्ग: १ पछी गृह शोभाने जोतो छतो, विद्वानोनी गोष्ठो करवा तत्पर रही पुत्रादिक परिवारने हित शिखामण देता मुखे बे घडी सुधी (घरेज) स्थिरता, करे-विश्रान्ति लेय. २ अनेक सद्गुणो समाप्त थये छते अने धनादिक संपदाने पुन्याधीन लेख्ये छते, समस्त तत्व (हिताहित )ने सारी रीते सम्- जनार विवेकी नरो सद्गुणथी च्यवता-पडी जता नथी. ३ वंश (जाति-कुळ) हीन मनुष्य पण सद्गुणो बडे उत्त- मता-श्रेष्ठता-पूज्यताने पामे छे. जुओ पंक-कादवमांयी पेदा थ- 6

श्रावक धर्मोचित आचारोपदेश भाषान्तर. २५५
येलपंकज-कमळ माथा उपर चढावाय छे,अने कादव पगे कचराय के.
४ उत्तम स्त्री पुरुषोनी खाण कंड होती नथी, तेमज एवं कुळ
पण जगतमां भाग्येज होय छे. स्वभाविक रीते मनुष्योज स्वगुणो
वडे जगतमां सर्व ठेकाणे प्रशंसापात्र थयेला छे.
५ जेम सत्वादिक गुणो वडे संपूर्ण होय एवो मनुष्य राज्य
पालन करवा योग्य कहेवाय छे, तेम आगळ कहेवाता एकवीश
गुणो वडे युक्त मानव सर्वज्ञोक्त (सत्य पवित्र) धर्मने लायक
गणाय छे.
" पवित्र धर्म प्राप्तिनी योग्यतामाटे प्रथम आदरवा लायक
२ गुणोतुं वर्णन.
६-८
(१) क्षुद्रता वगरनु-अक्षुद्र-गंभीर हृदय, जेथी परायां छिद्र
नहि जोतां गुण ज ग्रहण करवान बने.
(२) शीतळ प्रकृति-आचार, विचार अने वाणीनी मीठाश,
जेथी सहुने शान्ति-समाधि उपजे.
(३) भव्य आकृति-ईन्द्रिय पटुता, शरीर आरोग्य अने सुंदर
बंधारण, जेथी धर्म संबंधी धायु काम थइ शके.
(४) लोक प्रियता-स्वार्थ तजी लोकोपकारी कार्य करवानी
डंडी लागणीथी सहु संगाते मेंळवेली मीठाश-व्हालप.
६) मननी अकठोरता-मृदुता-कोमळता, जेथी कोइ पण
पाप कार्य तीव्र परिणामे करी नशके; मन कुशु राखे.
.

२५६ सूक्त मुक्तावळी. . (६) पापनो या परभवनो डर अथवा गुरुजनोनी या वडी- लोनी व्हीक, जेथी कोइ पण अकार्य करतां पाछो हठे, (७) निष्कपट-निखालस वृत्ति, जेथी करवू कइ अने कहेy काइ एवी कपट क्रियाथी वेगळ रहेवाय. (८) सुदाक्षिण्य-पीतानी इच्छा नहि छतां, जेथी सामान संपादन थइ शके एवी अली निर्दोष दाक्षिण्यता... (९) लज्जलुता-अदव अथवा मर्यादा, जेथी अकार्य तजी सत्कार्यमां सहेजे जोडाइ शके. (१०) दयालुता-दयार्द्रता, जेथी गमे तेनु दुःख देखी पोतानुं दोल दवे अने तेना उपर अनुकंपा करे.. (११) मध्यस्थता-निष्पक्षपात बुद्धि, जे वडे गमे तेना गुण दोपने स्वबुद्धि तुला वडे तोळी-मापी शके. (१२) सौम्यद्रष्टि-सहु उपर समभाव, अमो भरी नजर, जेथी सहुने प्रिय लागे, कोइने अप्रीति न उपजे, कचित् आ उपर जणावेला बे गुणने एक साथे गणी आगळं विशेषज्ञता गुण उमेर- वामां आवेलां. २३ गुणानुराग-सद्गुण के सद्गुणी उपर निःस्वार्थ प्रेम, जेथी एवा उत्तम गुण आपणामां संक्रान्त थाय. (१४) सत्कथारुचि-विकथा या नकामी कुथली नहि करता सत्पुरुषोनां हितवचनो के चरित्रो वखाणवानी प्रीनि.. (१५) सुपर-धर्मिष्ट कुटुंब जाडे बळीयु होवाथी धर्ममार्गमा कोइ पराभव करी शके नहिं-करतां डरे.

भावक धर्मोचिंत आचारोपदेश भाषान्तर. २५७. . , ..) दीर्घद्रष्टि-शक्याशक्य, हिताहित अने लाभ हानिनो विचार करी शक्य कार्यनी आरंभ करे, सहसा न करे... (१७) वृद्धसेवा-आचार विचारमा कुशळ एवा शिष्ट पुरुषोने अनुसरी चालचानो निरभिमान वृत्तिः, - (१८) विनय-गुणांधिकर्नु उचित गौरव-सन्मान साचव, जेथी विद्या, विवेकादिक गुणोनी सहेजे प्राप्ति थाय.. (१९) कृतज्ञता-अन्य उपकारी जनोए आपणा उपर करेला उपकारने विस्मरण नहि करतां तेनुं सदोदित स्मरण राखी तेनो बदलो वाळवा तक मळे तो ते. जवा नहि देवानी चीवट. (२०) परोपकार शीलता-निःस्वार्थपणे स्वकर्तव्य समजीने अन्य जीवोने उदारवानी उत्कट इच्छा अने तत्परता. (२१) लब्धलक्ष-कोइपण कार्यने मुखे साधी शके एवी का- यदक्षता, चंचलता अने सावधानता. उक्त एकवीश गुणोनो द्रढ अभ्यास करवा बडे आपणी हृदय- भूमि शुद्ध निर्दोष वनी सत्धर्म योग्य थवा पामे छे., ,, ९ घणु.करीने राजकथा, देशकथा, स्त्रीकथा अने भोजनकथा, जेथी अर्थलाभ कशी न होय अने, उलटो अनर्थ थवा संभव होय ते बुद्धिशोळी तजे..नकामी कुंथलीओ करी कालक्षेप कदापि न करे. २० सुमित्र बंधुओ संगांते माहोमांहे धर्मकयों करें अने शास्त्र- अर्थना जाण एवा विद्वानो संगाते शास्त्रार्थ संबंधी रहस्यों-खरी खूबीओं विचारे, एवी रीते पोतानो वखत सार्थक करे. ૧૭ २५८ सूक्त मुक्तावळी. ११ जेनी सोवतथी पाप बुद्धि थाय (बुद्धि मलीन थाय) तेवानी संगति वर्जे अने तन, मन, वचनथी कोइ रीते पण न्याय- नीति प्रमाणिकतानुं धोरण कदापि न तजे. १२ ते सज्जन कोइना पण अवर्णवाद न बोले मात, पिता, गुरु, स्वामी अने राजादिकना तो नज बोले. १३ मूर्ख, दुष्ट-हीणाचारी, मलीन, धर्मनिंदक, दुःशील, लोभी अने चोरो साथे सोवत सर्वथा वर्जे. १४ मूर्खना चिन्हो अजाण्यानी प्रशंसा करवी, तेने रहेवा माटे तथा प्रकारचं स्थान आपq, अजाण्या कुळनो संवैध करवो, अने अजाण्यो नोकर राखवो, म्होटा वडिल उपर कोंप करवो व्हाला साथे विरोध करवो, गुणी जनो साथे विवाद करवो अने पोताथी उंचा दरज्जाना नोकर राखवा, पारकुं देवु करीने धर्मकृत्य करवां (छतुं लेणु न मागq), छते पैसे कृपणता करवी, स्वजनो सांथे विरोध करवो अने परायां साथे मित्रता राखवी. मोक्ष (छुटी जवा) माटे ऊंचा चठी भेरवजप करवो, नोकरने दंडी भोग विलास करवो, दुःखी हालतमा कर्म उपर आशा राखी बेसी रहे, अथवा बंधुनो आश्रय मागवो, ‘अने पोते पोताना गुणर्नु वर्णन करतुं, बोलीने पोतेज हसवू, जेनुं तेनुं जे ते खावु, आ उपर वर्णवेला विरुद्ध काम करवां ए सघळां मूर्खनां चिन्हो समजी सुज्ञ- जनोए अवश्य तजवां-परिहरवां. १९ न्याय उपार्जित गुन्यनो खेप करे, देश विरुद्ध अने काळ . ' श्रावक धोचित आचारोपदेश भाषान्तर. २५९ विरुद्ध चर्चा-गमनागमनने तजे, राजाना दुश्मनो साथे संगति न करे अने (गमे तेवां नवळां पण) घणा लोको साथे विरोध न करे, २०-२४ सरखा कुळ अने आचारवाळा अन्यगोत्रीया साथै विवाह करे अने मला पडोशमां घर बांधी स्वजन कुटुंबी जनो साथे रहे. उपद्रववाल्लं स्थान तजे, आवकना प्रमाणमांज खर्च करे, स्वसंपत्ति अनुसारे पहेरवेश राखे अने लोक विरुद्ध काम न करे. देशाचारर्नु सेवन करे, स्वकर्तव्य धर्मने न तजे, आश्रये आवेलार्नु हित करे, स्वशक्तिनो ख्याल राखी उचित कार्य करे, अने हिता- हितनो विशेष ख्याल राखे, इन्द्रियोने सारी रीते नियमोमा राखे, देव गुरु प्रत्ये खूब भक्तिभाव राखे तेमज स्वजन, अनाथ अने अ- तिथि-साधुसंतनी सेवाचाकरी करे. एवी रीते चतुर जनोनी सं- गाते विचारचातुर्य रचतो, शास्त्रोने सांभळतो.के भणतो केटलोक वखत व्यतीत करे. नकामो काळक्षेप नज करे. २५ पछी द्रव्य उपार्जन करवा उपाय करे पण नसीव उपरज आधार राखीने बेसी न रहे, केमके रीतिसर उद्यम व्यवसाय कर्या वगर कदापी मनुष्योर्नु भाग्य फळतुं नथी. २६ शुद्धि व्यवहार वडे सदाय व्यवसाय करतो कूड तोल, मान के लेख दस्तावेज करवा वर्जे. २७-२८ अंगारकर्म, वनकर्म, शटक (स्थ-गाडवि.) कर्म, भाटक (भाडा) अने स्फोटक (धरती फोडवानु) कर्म वडे आ- जीविका तजे, तथा दांत, लाख, रस, केश अने विष संबंधो कुवा- , 4 २६० सूक्त मुक्तावळी. णिज्यनो त्याग करे, तेमज-यंत्रपीलन, निलछिन (खांसी करवान) असती पोषण (दुष्ट पालन), देवदान (वाळी मूक,) अने तळाव विगैरे सूकाववा ए उपर जणावेला संघळा १५ कर्मादान धर्मार्थी जनोए अवश्य वर्जवा. २९ लोखंड, महुडानां फूल, मदिरा, अने मध तेमज कंदमूळ तथा पत्र शाखांदिक बुद्धिशाळी होय ते व्यापार अर्थ आंदरे नहि. उपर जणावेला सघळा पाप व्यापार सुज्ञजनो-करें नहि. ३० फागुणं चोमासी उपरांत तल अने अलशी राखे नहि तेमज जंतुनाशक गोळ तथा टोपरी प्रमुख चोमांस (अपाढो) आवे छते राखे नहि. जे जे वस्तुनी संग्रह करवाथी सादि जीवोनो संहार थाय ते वस्तुनो संचयं सुबुद्धिवंत होय ते लोभवश बनी करे नहि. ३१ चोमासामा गाडी अथवा वळदोने हकावे नहिंज, तेमज अनेक सादिक जीवोनी हिंसाकारक कृषिकर्म (खेड) पंण प्रायः करावे नहि. "व्यापार-व्यवसाय करवानी कुनेह अने स्वधर्म रक्षा." ३२ व्याजवी मूल्य मळ्तु होय तो वस्तु वेची देवी पूर्ण अधिक अधिक मूल्य इच्छवु नहि, केमके अति मूल्य करनार लोभी माण- सनां नाणां समूळगां नाश पण पामी जाय . ३३ भारे म्होटो लाभ मळतो होय तो पण उद्धारे आपवू नहि तेमज लोभवश थई सां, घरेणु राख्या वगर व्याजदुं धनं आपy .

" श्रावक धर्मोचित आचारोपदेश भाषान्तर. २६१ नहि. जेश्री चिन्ता व्हारी लेवी न पडे तेम करवू. ३४ धर्मनो मर्म समजनार ज़ाणी जोइने चोरीनो माल ग्रहण करेज नहि, अने. विवेकवंत होय. ते व्यापारमा सरस नरस वस्तुनी सेळमेळ करीन्दगलवाजी-भयों धंधो करे नहि. ३५ चोर, चंडाक, धूर्त-ठग, मलीन अने पतित-पापीजनो साथे, आ लोक पस्लोक, संबंधी सुखनी यांछाराखनारे कशो.व्यव- हार (व्यापार-व्यवसाय) करतो नहि, ३६ विचक्षण होय-परभवथी या पापथी,डरतो होय, ते वे- चाण करतो वस्तुनु जू टुं मूल्य करे नहि; व्याजबी मूल्यज करे, अने अत्यनी वस्तुने तां जे करार कर्यों होय ते-लोपे नहि. कोइ • वस्तु देतां के लेतां लोभवंश नहि थतां प्रमाणिकपणुं बराबर साचवी राखे. ३७ सुबुद्धिवंत होय ते अणदीठेली वस्तुनु साटुं न ज करे. अने सुवर्ण रत्नादिक किंमती चीजो प्रायः परिक्षा कर्या वगर ग्रहण न करे. -३८ राजाना प्रताप चगर अनर्थ अने आवी पडेल आपदार्नु निवारण थवा न पामे तेथी स्वतंत्रपणु साचवी राखी राजाओने यथायोग्य अनुसरे. ३९ तपस्वी, कवि, वैद्य, मर्मना जाण, रसाइ करनार, मंत्र- वादी अने पोताना पूज्य-वडिलोने कदापि कोपाववा नहि. तेमने कोपाववाथी द्रव्यभावथी आपणुं अनिष्ट थइ जवा पामे छे. . -- ર सूक्त मुक्तावळी. ४० अर्थ उपार्जन करवा तत्पर थएलाए अति क्लेश, धर्मर्नु उल्लंघन, नीचजनोनी सेवा अने विश्वासघात एटलावानां करवानहि. ४१ लेतां अने देतांपोतानुं वोल्यु लोपवु नहि, पोतानुं वचन यथार्थ रीते पाळनार म्होटी प्रतिष्ठा पामे छे. माणसन मूल्य तेना पोताना वचनथीज थवा पामे छे. ४२ पीतानी वस्तुनो सर्वथा नाश थती होय तो पण धीर पुरुषो पोतानु बोल्युंज पाळे, परंतु जे नजीवा लाभनी खातर पोतार्नु वचन लोपे ते वसुराजानी पेरे द्रव्यभावथी दुःखी थवा पामे. ४३-४४ एवी रीते व्यवसाय करतो चोथो पहोर व्यतीत करे अने वाळु करवा माटे पोताना मंदिरे जाय पण जेणे एकाशना- दिक पच्चखाण कयु होय ते तो आवश्यक-अतिक्रमण करवा नि- मिचे सायंकाळ थतां मुनिराज विराजता होय ते स्थळे जाय, ४५ दिवसना आठमे भागे-चार घडी दिवस रह्यो होय त्यारे बुद्धिशाळी होय ते वाळ करी लेय. विचक्षण होय ते संध्या समये तेमज रात्री समये भोजन नज करे. ४६ संध्या समये आहार, मैथुन (विषय विलास ) निद्रा अने खास करीने विद्या अभ्यास ए चार वानां चीवट राखीने वर्ज. अन्यथा एथी अनर्थ थवा पामे है. ४७ संध्या समये खानपान करवाथी व्याधि उत्पन्न याय छे, मैथुन थकी गर्भस्थ वाळक दुष्ट थवा पामे छे, निद्रा करवायी भूत- पीडा अने विद्याभ्यासथी बुद्धिहीनता थवा पामे के.

श्रावक धर्मोचित आचारोपदेश भाषान्तर.
२६३
४८ वा कर्या पछी दिवस चरिम दुविहार, तिविहार के चो-
विहार- पच्चखाण करी ले,
४९ रात्रीभोजन संबंधी दोषना जाण होइ जे कोइ दिवसनी
आदिनी अने अंतनी बेबे घडी सुधी रात्रीभोजन तजे तेने
पुन्यशाळी जाणवा.
५० जे कोइ भाग्यशाली रात्रीभोजननो सर्वथा त्याग करे छे,
वेपोतानी जींदगीना अर्धाभागना उपवासनो लाभ अवश्य मेळवे छे.
टेकीला नतधारी जनो आवो उत्तम लाभ हांसल करी(शके) शके छे.
५१ दिवसे अने रात्रे जे खातों पांतोज रहेछे ते शींगडा अने
पुंछडा वगरनो पशुज छे, एम स्पष्ट रीते ते पोतानी मोकळी वृत्तिथी
पूरवार करी आपे के.
५२ रात्री भोजनना दोष पातिकथी प्राणीयो घूड, काग,
मार्जार, गीध, शांबर, सूअर (मुंड), साप, वींछु, अने गीरोली जेवा
नीच अवतार प्राप्त करे छे, (अने धर्मभ्रष्ट थाय छे.)
रात्री समये होम-आहूति, स्नान, देवपूजा, दान अने खास
करीने भोजन करवानुं वर्जेलं छे. आटला वानां रात्रे करवानी
शास्त्रकारनी मना छे.
५४ एवी रीते न्याय-नीतिवडे शोभतो जे पुरुष दिवसना चारे
पहोरने निर्गमे छे. ते न्याय युक्त अने विनय विचक्षण होइ अंते
अक्षय सुखनो भागी थाय छे. इति त्रितीयो वर्ग:
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सूक्त मुक्तावळी. . श्रावकर्धम-आचारोपदेश अथ चतुर्थो वर्गः १ थोडा पाणी वडे पोताना पग; हाथ अने मुखनु प्रक्षालन करी, पोताना आत्माने धन्य कृत्य पुन्य मानतो छतों श्रावक-सांज समये वळी हर्षथी श्री जिनेश्वर देवनी पूजा करे (धुप दीपादिक वडे द्रव्यपूजा अने चैत्यवंदन बडे प्रभुनी भावपूजा समयोचित्त करे.) २ सम्यक् क्रिया सहित ज्ञान वडे मोक्ष सुख प्राप्त थाय छ एम जाणतो श्रावक सांजरे षड् आवश्यक करणी (प्रभातनी पेरे) पुनः करे. ३ लोकमां क्रियाज-फळदायक मनाय छे, पण ज्ञान फळदायी मनातुं नथी. केमके स्त्री अने भक्ष्य-भोजन संबंधी भेदनो जाण छतां तेवा ज्ञान मात्रथी सुखी थनो नथी. ज्यारे तेनो भोगवटो करे छे त्यारेज तेनुं अनुभवात्मक सुख मळी शके छे. ४ गुरुना विरहे स्थापनाचार्य के नवकारवाळीनी स्थापना करी बुद्धिशाळी पोताना घरमां (अनुकुळ स्थान होय तो) आवश्यक करणी-अतिक्रमणादि क्रिया करे. ६ धर्मना प्रभावथी सर्व कार्य सिद्ध थाय छे एम हृदययां जाणतो सदा सर्वदा धर्ममांज चित्त राखनार पुरुष धर्म साधन क- रवानो समय व्यर्थ वितावी दे नहि, मतलब के अवसर उचित धर्मकरणी अवसरेज करवा वरावर लक्ष राखे-भूले नहि. ६ वखत वित्या पछी के समय थयां पहेला जे जप प्रमुख धर्मकरणी करवामां आवे छे, ते उखर क्षेत्रमा वावेला धान्यनी पेरे श्रावक धर्मोचिंत.आचारोपदेश भाषान्तर. । निष्फळ थवा पामे. अवसरनी करणी अवसरेज़ करनी. शोभे अने फळदायक थाय एम समजी धर्म समयनु उल्लंघन करवू नहि. .. ७ धर्मक्रिया करता बुद्धिशालीए विधि बराबर साचववो. तेमां हिनाधिकना करता मंत्र साधनारनी पेरे दूषित याय छे. ( आ संबंधी अन्यत्र खुलासो कराएलो छे.) ८ जेम औषध प्रयोग करवामां दुरुपयोग थयो होय तो तेथी भयंकर चांदा प्रमुख पेंदा थाय छे, तेम धर्मक्रियामां आई अवलु विपरीत घेतरवाथी उलटो अनर्थ थवा पामे के. एम समजी सुज्ञजनो सावधानपणे विधिवत् धर्मकरणी करवा लक्ष राखे छे. शरुआतमां करणी संपूर्ण शुद्धन होइ शके पणशुद्धिनो खप तो जरुर राखखोज. ९ यावच्च योगे पोतार्नु अक्षयश्रेय. समजीने विचक्षण श्रावक आवश्यक करणी करी रह्या बाद श्रीगुरु महाराजनी सेवा-भक्ति करे. १० मुखकोश वांधी (मुखे वस्त्र ढांकी राखी) मौन धारी, पोताना पगनो स्पर्श गुरुश्रीने तेमज तेमना वस्रादिकने न थाय नेम तैमनो सघळो शरीर संबंधो श्रम.दूर करतां श्रावक गुरुमहाराजनी विश्रामणा करे. - ११ त्यांथी गाम-नगरमां आवेला चैत्यमा जिनेश्वरने नमी- स्तवी पछी निजघर प्रत्ये जाय अने त्यां पग पखाळोने पंचपरमेष्ठी मंत्र- स्मरण करे (अने चिंतवे के) ' १२ मुजने सदाय अरिहंतोतुं शरण होजो, सिद्ध-परमात्मा- ओनुं शरण होजो जिन धर्मनुं शरण होजो अने आत्मसाधन करवा शूरा-साधुजनोर्नु शरण होजो. .

, २६६ सूक्त मुक्तावळी. १३ मंगळकारी, दुःखदारक (सुखदायक) अने शीलसन्नाह (वखतर)ने धारनारा श्री स्थूलभद्र मुनिवरने म्हारो नमस्कार हो! १४ गृहस्थ छतां जेनी शीललोला बहु भारे हती अने जेना दर्शन समकित्वडे शोभा वाधेली छे एवा श्री सुदर्शन श्रेष्ठीने नम- स्कार हो ! १५ जेमणे कामदेवने जीती लीधो के अने जीवितपर्यंत जेओ.. निदोप ब्रह्मचर्यने पाळे छे, एवा मुनिजनो खरेखर धन्यकृत पुन्य छे (तेवा शम दमवंत संत साधुजनोने पुनः पुनः नमस्कार हो!) १६ सत्वहीन, भारेकर्मी, अने इन्द्रियोने मोकळी मूकी सदा चालनारो होय ते एक दिवस पण उत्तम शीलव्रतने धारवा समर्थ यतो नथी. १७ रे संसार सागर ! जो वच्चमां स्त्रीओरुपी खरावा न होत हारो पार पामवो दुर्लभ न थात पण मुलभ थवा पामत. १८ असत्य बोलवू, साहस करवू, माया केळववी, मुग्धता, अति लोभ-असंतोष, अपवित्रता अने निर्दयता ए दोषो स्त्रीओमां स्वाभाविक होय छे, स्त्री जातिमा उक्त दोष वगरनी कोइ विरला स्त्री होय छे. १९ जे रागी उपर विरक्त रहे छे ते स्त्रीओनी कामना-इच्छा कोण करे ? मुज्ञ होय ते तो मुक्ति कन्याने ज इच्छे के जे विरक्त उपर राग धरे छे. २० ए रीते चित्तमा चिन्तवनी मुज्ञ पुरुष आनंदमां झुलतो.

आवक धर्मोचित्त आचारोपदेश भाषान्तर. ૨૬૭ योडो वखत निद्रा भजे (लहे) पण धर्म पर्वमां कदापि मैथुन सेवे नहि. २१ सुज्ञ होय ते घणो वखत निद्रा सेववामां कदापि काढे नहि. केमके अति घणी निद्रा धर्म, अर्थ अने सुखनो नाश कर- नारी थाय छे. २२ अल्पअहार, अल्पनिद्रा, अल्पआरंभ, अल्पपरिग्रह अने अल्पकपायवंत होय तेने अल्पभव भ्रमण अवशेष जाणवू. २३ निद्रा, आहार, भय, स्नेह, लज्जा, काम, क्लेश, अने क्रोध एमने जेटलां वधारीए तेटलां वधे छे अने घटाडीए तेटलां घटे छे. २४ शयन करती वखते विघ्न मात्रने चूरवा ‘समर्थ श्री नेमी- श्वर प्रभुनु स्मरण करनारने खोटां स्वनो आवबा पामतां नथी. २५ अश्वसेन राजाना अने वामाराणीना पुत्र श्री पार्थप्रभुर्नु सदाय स्मरण करनारने खोटां स्वमा आवतांज नथी. २६ श्री लक्ष्मणा माताना अने महसेनराजाना पुत्र श्री चंद्रप्रभ स्वामीनु स्मरण चित्तमां कर्या करे छे तेने सुखे निद्रा आंवी जाय छे. २७ सर्व विनने चूरनार अने सर्व सिद्धिने आपनार श्री शांतिनाथप्रभुनुं ध्यान करनारने चोर, रोग अने अनि प्रमुखथी भय थतो नयी २८ श्रावक समुदायने सुख संतोषकारी एवी सघळी दिन- कृत्य करणी सारी रीते समजी आ लोक अने परलोकमां संचरतो पुरुष दोषरहित बनी निर्मळ यश पामे , इति चतुर्थों वर्ग:

२७० सूक्त मुक्तावळी. १६ वळी अरिहनादिक विशस्थानक पदाने भव्यात्माओ आराधे अने एकाशनादिक तपवडे भाग्यवंत जनो तेनो विधि साचवे. १७ विधि अने ध्यानयुक्त जे उक्त वीशश्थानकोर्नु, आराधन करे, ते महानुभाव आत्मा दुःख विदारक एवं श्रेष्ट तीर्थंकर नाम कर्म उपार्जे छे. १८ साडा पांच वर्षपर्यंत जे उजवळ पंचमीन आराधन करे छे, ते पांचमीगती जे मोक्ष तेने प्राप्त करे छे. १९ व्रत पूर्ण थये छते उजमणुं करे, तेवी शक्ति न होय तो वमणु बेवडं व्रत करे अने तपना दिवस जेटलां माणस जमाडे. २० पंचमीना उजमणामां पांच पांच उत्तम ज्ञाननां उपकरणो ते- मज चैत्यनां पण पांच पांच सुंदर उपकरणो करावे, २१ बळी पाक्षिक (पाखी) प्रतिक्रमण- अने चतुर्दशीनो उपवास करे छे ते श्रावक पोतानां उभय पक्ष (पिताना तथा माताना) विशुद्ध करे . २२ बुद्धिशाली श्रावक त्रणे चोमासीमां छतप करे अने सर्वोप- री संवत्सरी पर्व दिवसे अहमतप करे साथे प्रतिक्रमणादिक आवश्यक पण साचवे. २३ सपळी (छए) अट्टाइओमां अने विशेषे पर्व दिवसे पोताना घरे खांडवार्नु दळवार्नु विगेरे आरंभर्नु काम करवानू परिहरे. २४ पर्युषण पर्वमां स्वच्छ मनयी कल्पसूत्र सांभळे अने शासननी उन्नति करतो पोताना शहरमा अमारी (जीव दया) पळावे. * श्रावक धर्मोचित्त आचारोपदेश भाषान्तर. २७१ २५ श्रावक रुडां धर्मनां काम करतो संतोष न पामे, तेतो पति- दिन अधिकाअधिक प्रीति-भक्तिथी धर्मकार्यो करतोज रहे. २६ पर्युषणपर्वमा सावधानपणे जे कल्पसूत्र श्रवण करे ते आठभव- नी अंदर महा मंगळकारी मोक्षपदने पामे. २७ सदाय सम्यक्त्वरत्ननु सेवन करवाथी अने ब्रह्मवत (शीलव्रत) ने पाळवाथी लोकमां जे पुन्य प्राप्त थाय छे, ते श्री कल्पसूत्र सांभळवाथी प्राप्त थाय छे. २८ विविध दान देवा वडे अने तप तपवा वडे तथा सारांतीनी सेवना करवा वडे जे पापक्षय थाय, पापक्षय थाय, ते कल्पसूत्र सांभळया वडे जीवना पापनो क्षय थाय. २९ मुक्ति एटले मोक्ष उपरांत कोइ उंचं पद-स्थान नथी. श्री शत्रुजय तीर्थ उपरांत कोइ उचुं तीर्थ-स्थान नथी अने सम्यग दर्शन-सम्यक्त्व उपरांत उंचु तत्व नथी तेम श्री कल्पसूत्र उ- परांत कोइ अधिक सूत्र नथी. ३० दीवाळीनी अमावास्यामां श्री वीर प्रभुनु निर्वाण थयेल के अने दीवाळीना पडवाने दिवसे श्री गौतम गणधरने केवळ- ज्ञान उपन्यु छे तेमनुं तेवे वखते अवश्य स्मरण कर. ३१ दीवाळीना दीवसे ये उपवास करीने जे गौतमस्वामीनु स्मरण ध्यान करे छे, ते निश्चे आ लोकमां तेमज परलोकमां भारे सुखसंपदा (महोदय) ने पामे छे. २२ घरदेरासरमा अने गामना देरासरमा विधि सहित श्री जिनें- - सूक्त मुक्तावळी. in श्रावक धमोंचित आचारोपदेश अथ पंचमी वर्ग. १ सकळ जन्मोमा सारभूत एवो मानव भव पामीने सदाय सु- कृत्य करणी वडे सुज्ञ जनोए तेने संपूर्ण रीते सफल करी लेवो जोइए. २ निरंतर धर्मकरणी कर्याथी सदाय आत्मसंतोष थाय छे, एम समजी सुज्ञ जनोए दान, ध्यान, तप अने शास्त्र अभ्यासवडे सफ़ळ दिवस करवो. ३ पोताना आयुष्यनो त्रीजो भाग वाकी रह्ये छते अथवा छेवटे छेल्ले समये जीव परजन्म संबंधी शुभाशुभ आयुष्य प्राये क- रीने बांधे छे. ४ आवखानोत्रीज़ो भाग वाकी रहेतां पांच पर्व श्रेणी प्रसंगे शुभ करणी करतो. छतो जीव पोतार्नु परभव- संबंधी आवखं नक्की वांधे छे. ५. बीज तिथि :आराधन करतां बे प्रकारनो ( साधु अने गृ- . हस्थ संबंधी.) धर्म आराधी शकाय छे, तेमज सुकृत्या करतां राग अने द्वेषने जीती शकाय छे. ६ पंचमीठे पालन करतां पांच ज्ञान, पांच चारित्र अने पांच वतनी प्राप्ति थाय छे अने पांच प्रमादनो पराभव निश्च थाय छे. ७ अष्टमीनुं आराधन कर्याथी आठ कर्मनो क्षय थाय छ, आठ ' प्रवचन माता ( समिति, गुप्ति) नी.शुद्धि थाय छे अने आठ मदनो पराजय थाय छे. . . 1 श्रावक धर्मोचित्त आचारोपदेश भाषान्तर. , ८ एकादशीन सेवन कर्याथी अगीयार अंगीनु निश्चे आराधन थाय छे तेमज श्रावकनी अगीयार पंडिमानु पण आराधन कराय-छे.. ९ अहो ? चतुर्दशी आराधन करनार चौद राजलोकनी उ- पर मोक्षमा जइ वसे छे, वळी ते चौद पूर्वोर्नु पण आराधन करी शके छे. १० आ उपर जणावेलां पाँच पौं अधिकाधिक फन्दायक है. तेथी एमां करेली सुकृत करणी अधिक फळदायक बने हैं. ११ एम समजी सुज्ञ जनो पर्व दिवसे विशेष करी धर्मकरणी करे अने पोषध प्रतिक्रमणादिकने आराधतां स्नान मैथुनने परिहरे. १२ मुक्तिने वर्श करवाने परम औषध समान पोषधवत पर्व दिवसे सुज्ञजन आदरे, तेम करीन शंकाय तो सीमायक व्रत विशेष आदरें, १३ वळी च्यवन, जन्म, दीक्षा, केवळज्ञान अने निर्वाण ए पांचे अरिहंत देवोनों कल्याणको छे, तेर्नु आराधन मुझजनाए करवं १४ १५ एक कल्याणक होय त्यारे एकाशन, बे होय त्यारेनीवी, त्रण होय त्यारे पुरिमट्ट सहित आयंबिल अने चार कल्या- णको होय त्यारे उपवास करे, पांच कल्याणको होय त्यारे पूर्वाध (पुरिमट्ठ) सहीत उपवास करे. आ कल्याणक तप पांच वर्षे मुज्ञजना पूर्ण करे. (उपर-जणावेला पूर्वाधनो अर्थ. अन्यत्र एकासणरुप करेला देखाय छे.)

--- २७० सूक्त मुक्तावळी. १६ वळी अरिहंतादिक विशस्थानक पदाने भव्यात्माओ आराधे अने एकाशनादिक तपवडे भाग्यवंत जनो तेनो विधि-साचवे. १७ विधि अने ध्यानयुक्त जे उक्त वीशश्थानकोर्नु आराधन करे, ते महानुभाव आत्मा दुःख विदारक एवं श्रेष्ठ तीर्थकर नाम कर्म उपार्जे छे. १८ साडा पांच वर्षपर्यंत जे उजवळ पंचमीन आराधन करे छे, ते पांचमीगती जे मोक्ष तेने प्राप्त करे छे. १९ नत पूर्ण थये छते उजमणुं करे, तेवी शक्ति न होय तो वमणु बेवडं नत करे अने तपना दिवस जेटलां माणस जमाडे. २० पंचमीना उजमणामां पांच पांच उत्तम ज्ञाननां उपकरणो ते- मज चैत्यनां पण पांच पांच सुंदर उपकरणो करावे, २१. वळी पाक्षिक (पाखी) प्रतिक्रमण- अने चतुर्दशीनो उपवास करे छे ते श्रावक पोतानां उभय पक्ष (पिताना तथा माताना) विशुद्ध करे छे. २२ बुद्धिशाळी श्रावक त्रणे चोमासीमा छठतप करे अने सर्वोप- री संवत्सरी पर्व दिवसे अहमतप करे साथे प्रतिक्रमणादिक आवश्यक पण साचवे. २३ सघळी (छए) अठाइओमां अने विशेषे पर्व दिवसे पोताना घरे खांडवानुं दळवार्नु विगेरे आरंभर्नु काम करवानुं परिहरे. २४ पर्युषण पर्वमां स्वच्छ मनथी कल्पसूत्र सांभळे अने शासननी उन्नति करतो पोताना हेरमा.अमारी.(जीव दया) पळावे, श्रावक धर्मोचित्त आचारोपदेश भाषान्तर. २७१ २५ श्रावक रुडां धर्मनां काम करतो संतोष न पामे, तेतो पति- दिन अधिकाअधिक प्रीति-भक्तिथी धर्मकार्यो करतोज रहे. २६ पर्युषणपर्वमा सावधानपणे जे कल्पसूत्र श्रवण करे ते आठभव- नी अंदर महा मंगळकारी मोक्षपदने पामे. २७ सदाय सम्यक्त्वरत्ननु सेवन करवाथी अने ब्रह्मव्रत (शीलवत) ने पाळवाथी लोकमां जे पुन्य प्राप्त थाय छे, ते श्री कल्पसूत्र सांभळवाथी प्राप्त थाय छे. २८ विविध दान देवा वडे अने तप तपवा वडे तथा सारांतीर्थोनी सेवना करवा वडे जे पापक्षय थाय, ते कल्पसूत्र सांभळया वडे जीवना पापनो क्षय थाय. २९ मुक्ति एटले मोक्ष उपरांत कोइ उंचं पद-स्थान नथी. श्री शत्रुजय तीर्थ उपरांत कोइ उचुं तीर्थ-स्थान नथी अने सम्यग दर्शन-सम्यक्त्व उपरांत उंचु तत्व नथी तेम श्री कल्पसूत्र उ- परांत कोइ अधिक सूत्र नथी. ३० दीवाळीनी अमावास्यामां श्री वीर भभुनें निर्वाण ययेल के अंने दीवाळीना पडवाने दिवसे श्री गौतम गणधरने केवळ- ज्ञान उपन्यु छे तेमनुं तेवे वखते अवश्य स्मरण कर. ३१ दीवाळीना दीवसे बे उपवास करीने जे गौतमस्वामीनुं स्मरण ध्यान करे छे, ते निश्चे आलोकमा तेमज परलोकमां भारे मुखसंपदा (महोदय) ने पामे छे. ३२ घरदेरासरमां अने गामना देरासरमा विधि सहित श्री जिने- २७२ - सूक्त मुकावळी. श्रर प्रभुनी पूंजा भक्ति करोने पछी मंगळदीवो उतारीने सुज्ञ श्रावक पोताना भाइ भांडुओनी संगाते भोजन करें. ३३ जिनेश्वरोना पांच कल्याणक दिवसोने मोटका लेखीने तेवे प्रसंगेसाराअर्थी जनोने स्वशक्ति अनुसार यथोचित दान आपे. ३४ आ रीते रुडा पर्व दिवसे करेला उत्तम कृत्य अने रुडा ऑ- चारना प्रचार वडे कर्मनां द्वार जेणे बंध कया छे, एवा श्रावक उत्तम विधि वडे शुद्ध बुद्धिने पुष्ट करी स्वर्ग संबंधी सुखने भोगवी मुक्तिना सुखने पामे छे. श्रावक धमोंचित आचारोपदेश अथ षष्ठों वर्गः १ श्रावक रुडां धर्मनां काम करोने संतोष मानी तो नथी. ते तो प्रतिदिन अधिकाधिक रुचि सहित धर्मनां कामो कर्या करेछे. २ धर्मना प्रभावथीज जैश्वर्य-सुख संपदाने पामी में धर्मनोज लोप करे छे ते स्वस्वामी द्रोही पातकीर्नु भविष्य केमजं सुंधरे ? ३ दान, शील, तप अंने भाव भेदे करीने धर्म चार प्रकारको के सदाय भुक्ति (स्वर्गादिक भोग-सुर्ख) अने मुक्ति सुखदायक एवा उक्त धर्मर्नु सेवनं सुबुद्धिजनाए आदरथी कर. ४ थोडामाथी पंण थाडे देवु (दान) म्होटा उदयनी अपेक्षा न राखवी. (घणी संपदा थांशै त्यारे वहाँलं दान आपी एम स- मजी राखी, थोडामाथी थोडं आपवानो प्रसंग: जती न करवो.) मनमानंती लक्ष्मी-संपदा काने क्यारे थवा पामे हैं? . E श्रावक धर्मोचित्त आचारोपदेश भाषान्तर. ૨૭૩ ", - दान फळ ५ ज्ञान- दान देवा वडे झानी थवाय छे, अभयदान वडे नि- भैय-भय रहित थवाय छे, अन्नदान वडे सुखी थवाय के अने औ- षध भेषज आपवा वडे सदाय ब्याधि रहित थवाय छे. ६ कीर्ति पुन्य थकी यवा पामे छे, पण दान थकी नहि. एम छता जे कोइ कीर्तिने माटेज दान आपे छे, तेने मुज्ञजनोए व्यसन समजवू. ७ व्याजे देतां (बहुतो) द्रव्य बमणुं थाय, व्यवसाय (व्यापार) करतां चोगणुं थाय, क्षेत्रमा वावतां सोगणुं थाय, परंतु सारा पात्र (सुपात्र) मां आपवाथी तो अनंतगणुं थवा पामे छे. ८ (जीर्ण) देरासर, प्रतिमा (पूजा-भक्ति,) पुस्तक प्रका- शनादि, अने साधु, साध्वी, श्रावक अने श्राविका रूप चतु- विध श्री संघनी यथायोग्य सेवा भक्ति (संभाळ) ए सात क्षेत्रोमा अमाप फळनी पासि माटे यथाशक्ति द्रव्य व्यय करवो घटे छे. ९ जिनेश्वर प्रभुनी भक्तिथी भावित जे भाग्यशाळी श्रावक खास जरुरी स्थळे चैत्य करावे छे ते ए चैत्यनां परमाणु जेटला कल्पोसुधी देवलोकनां सुख पामे छे. (जीर्णोद्धार करवामां आठ- गणो फायदो शाखमां को छे.): १० करावेल देरासर जेटला दिवस के तेना जेटला समयो याय, तेटला वर्षांपर्यंत ते देवगतिनां सुख भोगवे है, ११ सोनानी, रुपानी, रत्ननी, पापणनी के माटीनी जिन- पडिमा जे विधिवत् करावे छे, ते वीकर पद पामे के. ५ ૧૮ २७४ सूक्त मुक्तावळी. (आ बाबतमा आजकाल घणोज-अविधि दोष चालतो देखाय छे अने वगर समजे आशातनामां धारो थाय छे, ते वात खास लक्षमा राखी ज्या देशकाळमां आ कार्य करावq वधारे लाभदायक होय त्यांने माटे उक्त उपदेशनी सार्थकता समजवी.) १२ एक अंगुठा जेवडी पण प्रभुनी प्रतिमा - जे महानुभाव विवेकथी करावे छे, ते इंद्रनी पदवी पामीने अंने परमपद' मोक्षने पामे छे. १३ धर्मरुपी वृक्षनां मूळरूप उत्तम शास्त्र मोक्षफळने आपनार के एम समजी सुज्ञजनो भावशुद्धिने करनारां शास्त्र पोते लखे, ल- खावे, वांचे-बचावे अने सांभळे-संभळावे. १४ जे श्रावको धर्मशास्त्रो लखी-लखावी सद्गुणी (पात्र- जनो) ने आपे छे ते शास्त्रना अक्षर जेटलां वर्षों सुधी स्वर्गनां सुखने पामे छे. १५ ज्ञान-विज्ञानवडे शोभित जे सुज्ञजनो ज्ञानभक्ति करे के ते अंते जेनो कदापि क्षय न थाय, एवं सर्वज्ञपद पामे छे. १६ सर्व सुखनुं कारण अन्नदान छे, एम जाणतो श्रावक सा- धर्मीवात्सल्य शक्ति अनुसारे प्रतिवर्ष करे. १७ पोताना भाइभांडु वीगेरे कुटुंबीओने घणा हेतथी (स्वा- थेवुद्धिवडे) ज़माडवा ए संसार वृद्धिर्नु कारण छे त्यारे (निःस्वार्थ- पणे) साधर्मी बंधुओने प्रेमपूर्वक जमाडवा ते संसारसमुद्र तरवाने साधनरुप छे. (वस्तु एकज़ छतां आशयभेदयी फळमां म्होटो तफा- वत प्रगट समजाय एवो छ.. --

श्रावक धर्मोचित्त आचारोपदेश भाषान्तर.
१८ एम समजी सुज्ञ श्रावको प्रतिवर्ष शक्ति अनुसारे श्री
संघने पोताना घरे पधरावी तेनी यथोचित्त सेवाभक्ति करे अने श्री
गुरु महाराज प्रत्ये शुद्ध-निर्दोष वस्त्रो भक्तिपूर्वक आपे.
१९ वसती (रहेवानुं स्थान ) आहार, पाणी, पात्र, वस्त्र,
औषध भेषज प्रमुख साधु जनोने खपे तेवी निर्दोष वस्तुओ पोते
संपूर्ण सुखी न होय तोपण ते यथाशक्ति आपे.
२० सुपात्रमा जे निर्दोष दान अपाय छे, तेथी कशी हानि
थती नथी पण कुवा, आराम (बगीचा) अने गाय प्रभुखनी पेरे
संपदानी वृद्धि थवा पामे छे.
(कुवो पाणी आपे छे, बगीचो फळ आपे छे, अने गाय वीगेरे
दूध प्रमुख आपे छ, तेने कशी हानी थती देखाती नथी, पण तेथी
घणानो उपगार सधाय छे ए लाभ मळे छे अने खरी शोभा पण
एमांज छे.)
२१ दान अने भोगमा मोटुं अंतर छे. खाघेली वस्तु विष्टारुप
(मळरुप) थइ जाय छे पण दीधेली (सत्पात्रमा अपायेली) वस्तु
अक्षय थवा पामे, छे.
२२ हजारो परिश्रम वेठीने मेळवेल अने प्राण करतां पण
अधिक व्हालां द्रव्यनुं खरं फळ दानज छे.
२३ पूर्वोक्त सात क्षेत्रोमां पोतार्नु न्याय द्रव्य जे विवेकथीवावे
छे ते श्रावक पोताना धन अने जन्म बन्नेनी सफलता करे के.
इति षष्ठो वर्ग
अथ श्रीमान चारित्रं सुंदरगणिविरचित आचारोपदेश
ग्रन्थy भाषांतर समामा.

२७६
सूक्त मुक्तावळी.
अथ
॥ श्रीसिंदूरप्रकरः प्रारन्यते ॥
50506
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प्रथम ग्रंथना प्रारंभमां ग्रंथकर्ता पोताना जे इष्टदेव तेना चर-
णस्मरणरूप मंगलाचरण पूर्वक आ ग्रंथ सांभलनाराओने
आशीर्वाद कहे छे.
सिंदूरपकरस्तपःकरिशिरःकोडे कपायाटवी,
दावाचिनिचयःमवोधदिवसमारंभसूर्योदयः ।।
मुक्तिस्त्रीकुचकुंभ (वदनैक) कुंकुमरसः श्रेयस्तरोः पल्लव,-
प्रोल्लास: क्रमयो खद्युतिभरः पार्थप्रभोः पातु वः ॥ १॥
हवे कवि सज्झन पुरुपं प्रत्ये पोतानी विज्ञप्ति करे छे.
संतः संतु मम प्रसन्नमनसो वाचां विचारोद्यता
मृतेऽम्भः कमलानि तत्परिमलं वाता वितन्वंति यत् ॥
किंवाऽभ्यर्थनयाऽनया यदि गुणो ऽस्त्यासां ततस्ते स्वयं ।
कारः प्रथनं न चेदय यशः प्रत्यर्थिना तेन किम् ॥ २॥
हवे करी.छे सकल मुरासुरे सेवा जेमनी एवा जे श्रीवीतराग
तेमना आगमना अनुसारें भव्य जनना हितने माटे
धर्मोपदेश कहे छे.
॥ उपजातिवृत्तम ॥
त्रिवर्गसंसाधनमंतरेण, पशोरिवायुविफलं नरस्य ॥
तत्रापि धम्मै प्रवरं वदति, नतं विना यद्भवतोऽर्थकामौ ॥३॥

२७७ श्रीसिंदरप्रकरः मूल. हवे आ नरभवनुं दुर्लभपणुं छे, ते कहे छे. ॥ इंद्रवज्रावृत्तम् ।। यः प्राप्य दुःमाप्यमिदं नरत्वं, धर्म न यत्नेन करोति मूढः ।। क्लेशप्रबंधन सलब्धमब्धौ, चिंतामणिं पातयति प्रमादात् ॥४॥ हवे मनुष्यभवनो सर्वोत्कृष्ट जय कहे छे. ॥ मंदाक्रांतावृत्तम् ॥ स्वर्णस्थाले क्षिपति सरजः पादशौचं विधत्ते । पीयूषेण प्रवरकरिणं वाहयत्यैधभारम् ।। चिंतारत्न विकिरति कराद्वायसोड्डायनार्थम् । यो दुःपापं गमयति सुधा मर्त्यजन्म प्रमत्तः ॥५॥ हवे जे संसारना विषय माटे धर्मनो त्याग करे छे, ते मूह पुरुष जाणवा ते कहे छे. ।। शार्दूलविक्रीडितवृत्तम् ॥ ते धत्तूरतरुं वपति भवने प्रोन्मूल्य कल्पद्रुमम् । चिंतारत्नमपास्य काचशकलं स्वीकुर्वते ते जडाः॥ विक्रीय द्विरदं गिरींद्रसदृशं क्रोणंति ते रासभं । ये लब्धं परिहत्य धर्ममधमा धावति भोगाशया ॥६॥ हवे मनुष्यजन्मनु तथा धर्मसामग्रीन दुर्लभपणु कहे छे. ॥ शिखरिणीत्तम् ।। अपारे संसारे कथमपि समासाद्य नृभवम् । न धर्मं यः कुर्याद्विषयसुखतृष्णातरलितः ।।

२७८ . सूक्त मुक्तावळी. ब्रुडन् पारावारे प्रवरमपहाय प्रवहणम् । स मुख्यो मूर्खाणामुपलमुपलब्धुं प्रयतते ॥ ७ ॥ हवे आ ग्रंथमां जेटलां उपदेशनां द्वारो कहेवानां छे ते उपदेश- द्वारे करी सर्व द्वारो कहे छे. ॥ शार्दूलविक्रीडितवृत्तत्रयम् ॥ भक्तिं तीर्थकरे गुरौ जिनमते संघेच हिंसानृतं । ? स्तेया ब्रह्मपरिग्रहाद्युपरमं क्रोधाधरीणां जयम् ॥ सौजन्यं गुणिसंगमिद्रियदम दानं तपोभावनां । वैराग्यं च कुरुष्व निर्देतिपदे यद्यस्ति गंतुं मनः ॥ ८॥ हवे जेवो उद्देश तेवो निर्देश एवं वचन छे माटें प्रथमना श्लोकमां कहेला जे द्वारो तेने यथाक्रम विवरे छे, तेमां प्रथम चार श्लोके करी श्रीतीर्थंकरनी भक्तिनुं द्वार कहे छे. पापं लुपति दुर्गतिं दलयति व्यापादयत्यापदम् । पुण्यं संचिनुते श्रियं वितनुते पुप्णाति नीरोगताम् ॥ सौभाग्य विदधाति पल्लवयति पीति प्रमूते यशः, स्वर्गं यच्छति निर्वृतिं च रचयत्यर्चाऽहतां निर्मिता ॥ ९ ॥ वली पण श्रीजिनवरनी भावपूजाना फलने कहे स्वर्गस्तस्य गृहांगणं सहचरी साम्राज्यलक्ष्मीः शुभा। सौभाग्यादिगुणावलिविलसति स्वरं वपुर्वेश्मनि ।। संसारः सुतरः शिवं करतलकोडे लुठत्यंजसा। यः श्रद्धाभरभाजनं जिनपतेः पूजां विधत्ते जनः ॥ १० ॥ - +ra श्रीसिंडूरप्रकर:-मूल. , वली पण भावपूजानु फल कहे छ। ॥ शिखरिणी वृत्तम् ॥ कदाचिन्नातकः कुपित इव पश्यत्यभिमुखम् । विदूरे दारिद्रयं चकितमिव नश्यत्यनुदिनम् ।। विरक्ता कांतेव त्यजति कुगतिः संगमुदयो, । न मुंचत्यभ्यण सुहृदिव जिनाची रचयतः ॥ ११ ॥ वली पण श्रीजिनपरमेश्वरनी भावपूजार्नु महात्म्य कहे छे. ॥ शार्दूलविक्रीडितवृत्तम् ॥ यः पुष्पैजिनमर्चति स्मितसुरस्त्रोलोचनैः सोऽयते, । यस्तं वंदन एिकशस्त्रिजगता सोऽहनिशं बंधते ।। यस्तं स्तौति परत्र दमनस्तोमेन स स्तूयते । यस्तं ध्यायति क्लुप्तकम्मनिधनः स ध्यायते योगिभिः ॥ १२ ॥ हवे चार श्लोके करी गुरुभक्तिर्नु द्वार कहे छे. गुरु सेवा-भक्तिः-1॥ वंशस्थवृत्तम् ।। अवद्यमुक्ते पथि यः प्रवर्तते प्रवर्तयत्यन्यजनं च नि:स्पृहः ॥ स एव सेव्यः (सेवितव्य) स्वहितैषिणा गुरुः, स्वयं तरंस्तारयितुं क्षमः परम् ॥१३॥ वली फरीने पण गुरुसेवानुं फल कहे छे. ॥ मालिनीवृत्तम् ।। विदलयति कुवोध बोधयत्यागमार्थम् ।

. सूक्त मुक्तावळी. सुगतिकुगतिमाग्गौं पुण्यपापे व्यनक्ति ।। अवगमयति कृत्याकृत्यभेदं गुरुयों, भवजलनिधिपोतस्तं विना नास्ति कश्चित् ॥ १४ ॥ वली पण गुरुसेवार्नु फल कहे छे. । शिखरिणीवृत्तम् ॥ पिता माता भ्राता प्रियसहचरी सूनुनिवहः । मुहृत्स्वामी माद्यत्करिभटरथाश्वः परिकरः ।। निमजतं जंतुं नरककुहरे रक्षितुमलम् । गुरोधर्माऽधर्मप्रकटनपरात्कोऽपि न परः॥ १५ ॥ हवे गुरुनी आज्ञानुं महात्म्य कहे छे. ॥-शार्दूलविक्रीडितवृत्तम् ॥ कि ध्यानेन भवत्वशेषविषयत्यागैस्तपोभिः कृतम् । पूर्ण भावनयाऽलमिंद्रियदमैः पर्याप्तमाप्तागमैः ।। किं त्वेकं भवनाशनं कुरु गुरुप्रीत्या गुरोः शासनम् । सर्वे येनविना-विनाथवलवत् स्वार्थाय नाऽलं गुणाः ॥ १६ ॥ इति द्वितीयगुरुसेवनप्रकमः ॥२॥ हवे चार-श्लोकोयें करीने जिनमत जे जिनोक्त सिद्धांत तेनु-माहात्म्य कहे छे. ॥ शिखरिणीवृत्तम् ॥ न देव नादेवं न शुभगुरुमेवं न कुगुरुम् ।

श्रीसिंदूरप्रकरः मूल. ૨૮૨ न धर्म नाधम न गुणपरिणद्धं न विगुणम् ॥ न कृत्यं नाऽकृत्यं न हितमहितं नाऽपि निपुणम् । विलोकंते लोका जिनवचनचक्षुविरहिताः ॥ १७ ।। ॥शार्दूलविक्रीडितवृत्ताष्टकम् ॥ मानुष्यं विफलं वदति हृदयं व्यर्थ वृथा श्रोत्रयो- निर्माणं गुणदोषभेदकलनां तेषामसंभाविनीम् ।। दुरि नरकांधकूपपतनं मुक्तिं बुधा दुर्लभाम् । सार्वज्ञः समयोदयारसमयो येषां न कर्णातिथिः ॥ १८ ॥ पीयूषं विषवज्जलं ज्वलनवत्तेजस्तमः स्तोमव- न्मित्रं शात्रववत् सज भुजगवत् चिंतामणि लोष्ठवत् ।। ज्योत्स्नां ग्रीष्मजघर्मवत् स मनुते कारुण्यपण्यापणम् । जैनेंद्र मतमन्यदर्शनसमं यो दुर्मतिर्मन्यते ॥ १९ ॥ धर्म जागरयत्य, विघटयत्युत्थापयत्युत्पथम् । भिन्ते मत्सरमुच्छिनत्ति कुनयं मथ्नाति मिथ्यामतिम् ॥ वैराग्य वितनोति पुष्यति कृपां मुष्णाति तृष्णां च य- त्तज्जैन मतमर्चति प्रथयति ध्यायत्यधीते कृती ॥ २०॥ हवे चार श्लोकेयें करीने संघना महिमाने कहे छे. रत्नानामिव रोहणक्षितिधरः खं तारकाणामिव । स्वर्गः कल्पपहीरुहामिव सरः पैके रुहाणामिव ।। पाथोधिः पयसामिदुमहसां (शशीवमहसां) स्थानं गुणानामसा- वित्यालोच्य विरच्यतां भगवतः संघस्य पूजा विधिः ।। २१ ॥

२८२ F सूक्त मुक्तावळी. यः संसारनिरासलालसमतिर्मुक्त्यर्थमुत्तिष्ठते । यं तीर्थ कथयति पावनतया येनाऽस्ति नाऽन्यासमः ॥ यस्मै तीर्थपतिनमस्यति सतां यस्माच्छुभं जायते, । स्फूतिर्यस्य परावसंति च गुणा यस्मिन्स संघोऽयतां ॥२२॥ लक्ष्मीस्तं स्वयमभ्युपैति रभसा कीर्तिस्तमालिंगति । प्रीतिस्तंभजते मतिः प्रयतते तं लब्धुमुत्कंठया ॥ स्वश्रीस्तं परिरब्धुमिच्छति मुहुर्मुक्तिस्तमालोकते । यः संघ गुणराशिकेलिसदन श्रेयोरुचिः सेवते ॥ २३ ॥ यडूक्तेः फलमहँदादिपदवीमुख्यं कृषः शस्यवत् । चक्रित्वं त्रिदशेंद्रतादि तृणवत् प्रासंगिकं गीयते ॥ शक्तिं यन्महिमस्तुतौ न दधते वाचोऽपि वाचस्पते । संघः सोऽघहरः पुनातु चरणन्यासैः सतां मंदिरम् ॥ २४ ॥ इति संघप्रक्रमः ॥ ४॥ हवे हिंसाना निषेधे करीने सर्व प्राणियोने विषे स्वसमानतानुं ध्यान करो, ते कहे छे. क्रोडाभूः सुकृतस्य दुःकृतरजासंहारवात्या भनो- दन्वनौयसनाग्निमेघपटली संकेतदुती श्रियाम् ।। निःश्रेणित्रिवौकसः प्रियसखी मुक्तेः कुगत्यर्गला । सत्वेषु क्रियतां कृपैव भवतु क्लेशैरशेषः परैः ॥ २५ ॥ ॥ शिखरिणीवृत्तम् ॥ यदि ग्रावा तोये तरति तरणियादयति । प्रतीच्यां सप्ताचियदि भजति शैत्यं कथमपि ॥

२८३ श्रीसिंदूरप्रकरः मूल. यदि मापीठं स्यादुपरि सकलस्याऽ पि जगतः। प्रसूने सत्त्वानां तदपि न वधाकाऽपि सुकृतम् ॥ २६ ॥ । मालिनीतम् ॥ स कमलवनमनेर्वासरं भास्वदस्ता- दमृतमुरगवक्रात्साधुवाद विवादात् ॥ रुगपगममजीर्णाजीवितं कालकूटा-। दभिलपति वधाद्यः प्राणिनां धर्ममिच्छेत् ॥ २७ ॥ ॥ शार्दूलविक्रीडितवृत्तद्वयम् ॥ आयुर्दीर्घतरं वपुर्वरतरं गोत्रं गरीयस्तरम् । वित्तं भूरितरं बलं बहुतरं स्वामित्वमुच्चैस्तरम् ॥ आरोग्य विगतांतरं त्रिजगतः श्लाध्यत्वमल्पेतरम् । संसारांबुनिधिं करोति सुतरं चेतः कृपान्तिरम् ।। २८ ।। इत्यहिंसापक्रमः ॥५॥ हने चार श्लोकें करीने सत्यबोलवाना प्रभावने कई छे. विश्वासायतनं विपत्तिदलनं देवैः कृतारांधनम् । मुक्तेः पथ्यदनं जलाग्निशमनं व्याघोरगस्तंभनम् ।। श्रेयःसंवननं समृद्धिजननं सौजन्यसंजीवनम् । कीर्तः केलिवनं प्रभावभवनं सत्यं वचः पावनम् ॥ २९ ॥ ॥ शिखरिणीवृत्तम् ।। यशो यस्माद्भस्मीभवति वनवन्हेरिव वनम् ।

सूक्त मुक्तावळी. निदानं दुःखानां यदवनिरुहाणां जलमिव ।। न यत्र स्याच्छायातप इव तपःसंयमकथा। कथंचित्तन्मिथ्यावचनमभिधचे न मतिमान् ॥ ३०॥ वंशस्थवृत्तम् ॥ असत्यमप्रत्ययमूलकारणम्, कुवासनासमसमृद्धिवारणम् ।। विपनिदानं परवंचनोजितम्, कृतापराधं कृतिभिर्विवर्जितम् ।।३।। वली पण सत्यवचननो प्रभाव कहे छे. शार्दूलविक्रीडितवृत्तम् ।। नस्याऽग्निर्जलमर्णवः स्थलमरिमित्रं सुराः किंकराः। कांतारं नगरं गिरिगृहमहिर्माल्यं मृगारिमंगः ॥ पाताल बिलमस्त्रमुत्पलदलं व्यालः शृगालो विषम् । पीयूपं विषमं समं च वचनं सत्यांचितं वक्ति यः ॥ ३२ ॥ इति अनृतप्रक्रमः ॥ ६॥.. हवे अदत्तादान व्रत कहे छे. मालिनीवृत्तम् ॥ तमभिलपति सिद्धिस्तं वृणीते समृद्धि- स्तमभिसरति कीर्तिमुच्यते तं भवातिः ।। स्पृहयति सुगतिस्तं नेक्षते दुर्गतिस्तम् । परिहरति विपत्तं योनगृह्णात्यदत्तम् ॥ ३३ ॥ .

श्रीसिंदुरप्रकरः मूल.
ર
वली पण अदत्तादानना परम गुणो कहे छे.
शिखरिणीवृत्तम् ॥
अदत्तं नादत्ते कृतसुकृतकामः किमपि यः।
शुभश्रेणिस्तस्मिन् वसति कलहंसीव कमले ।।
विपत्तस्मादूरं ब्रजति रजनीवांबरमणे-
विनीतं विद्येव त्रिदिवशिवलक्ष्मी जति तम् ॥ ३४ ॥
इवे जे बुद्धिमान् पुरुष अदत्तनो त्याग करे छे, तेपण कहे छे.
शार्दूलविक्रीडितवृत्तम् ॥
यन्नितितकीर्तिधर्मनिधनं सर्वागसां साधनम् ।
पोन्मीलधबंधनं विरचित क्लिष्टाशयोद्बोधनम् ।।
दौर्गत्यैकनिबंधनं कृतसुगत्याश्लेषसंरोधनम् ।
प्रोत्सप्पत्तधन जिघृक्षति न तद्धीमानदत्तं धनम् ।। ३५॥
वली पण अदत्तना दोषो कहें छे.
॥ हरिणीवृत्तम् ।।
परजनमनः पौडाक्रीडावनं वधभावना ।
भवनमवनिव्यापिन्यापल्लताघनमंडलम् ।।
कुगतिगमने मार्गः स्वर्गापवर्गपुरार्गलम् । '
नियतमनुपादेयं स्तेयं नृणां हितकांक्षिणाम् ॥ ३६ ।
॥ इतिस्तेयमक्रमः ॥७॥

૨૮૬
सूक्त मुक्कावळी.
.
हवे मैथुनव्रत आश्रय करीने उपदेश कहे छे.
॥ शार्दूविक्रीडितवृत्तद्वयम् ॥
कामातस्त्यजति प्रबोधयति वा स्वस्त्रीं परस्त्रीं न यो ।
दत्तस्तेन जगत्यकीर्तिपटहो गोत्रे मपीकूर्चकः ।।
चारित्रस्य जलांजलिगुणगणारामस्य दावानलः ।
संकेतः सकलापदां शिवपुरद्वारे कपाटो दृढः ।।
। पाठांतरं ।। शील येन निजं विलुप्तमखिलं त्रैलोक्यचिंतामणिः||७||
वली पण शीलना गुणो कहे छे.
व्याघ्रव्यालजलानलादिविपदस्तेपां व्रजति क्षयम् ।
कल्याणानि समुल्लसंति विवुधाः सान्निध्यमध्यामते ।।
कीर्तिः स्फूर्तिमियत्ति यात्युपचयं धर्मः प्रणश्यत्यघम् ।
स्वनिर्वाणसुखानि संनिदधते ये शीलमाविभ्रते ॥ ३८ ॥
॥ मालिनीकृत्तम् ॥
हरनि कुलकलंक लुपते पापपंकम् ।
मुकृतमुपचिनोति श्लाध्यतामातनोति ॥
नमयति सुरवगै हंति दुर्गोपसर्गम ।
रचयति शुचिशीलं स्वर्गमोक्षौ सलीलम ॥ ३९ ॥
॥ शार्दूलविक्रीतवृत्तद्वयम्॥
तोयत्यग्निरपि सत्यहिरपि व्याघ्रोऽपि सारंगति ।
व्यालोऽप्यश्वनि पर्वतोप्युपलति क्ष्वेडोऽपि पीयूषति ।।
विघ्नोऽप्युत्सवति प्रियत्यरिरपि क्रीडातडागत्यपां।
नाथोऽपि स्वगृहत्यटन्यपि नृणां शीलप्रभावाद् ध्रुवमं ॥४०॥

૨૭ श्रीसिंदूरप्रकरः मूल. हवे परिग्रहना दोषो कहे छे. कालुष्यं जनयन् जडस्य रचयन् धर्मद्रुमोन्मूलनम् । क्लिश्यन्नीतिकृपाक्षमाकमलिनीलाभांबुधि वर्द्धयन् ॥ मर्यादातरमुद्रुजन् शुभमनोहंसप्रवासं दिशन् । किं न क्लेशकरः परिग्रहनदीपूरः प्रद्धिं गतः ॥४१॥ वली पण परिग्रहना दोषो कहे छे. ॥ मालिनीवृत्तम् ॥ कलहकलभविंध्यः क्रोधगृध्रश्मशानम् । व्यसनभुजगरन्धं द्वेषदस्युप्रदोषः ॥ सुकृतवनदवाग्निर्माईवांभोदवायु- नयनलिनतुषारोऽत्यर्थमर्थानुरागः॥ ४२ ॥ बली पण परिग्रहना दोषो कहे छे. ॥ शार्दूलविक्रीडितवृत्तत्रयम् ॥ प्रत्यर्थी प्रशमस्य मित्रमधृतेर्मोहस्य विश्रामभूः । . पापानां खनिरापदा पदमसद्ध्यानस्य लीलावनम् ॥ व्याक्षेपस्य निधिर्मदस्य सचिवः शोकस्य हेतुः कले। केलीवेश्म परिग्रहः परिहतेयॊग्योविविक्तात्मनाम् ॥ ४ वली पण परिग्रहना त्यागने कहे छे. वन्हिस्तृप्यति नेधनैरिह यथानांभोभिरंभोनिधि- स्तदन्मोहघनो घनैरपि धनैर्जतन, संतष्यति ॥

२२८ सूक्त मुक्तावळी. न त्वेवं मनुते विमुच्य विभवं निःशेपमन्यं भवम् । यात्यात्मा तदहं मुधैव विदधाम्येनांसि भूयांसि किम् ॥ ४४ ॥ हवे क्रोधजयने माटे उपदेश कहे छे. यो मित्रं मधुनो विकारकरणे संत्राससंपादने, सर्पस्य प्रतिबिंवमंगदहने सप्ताचिषः सोदरः ।। चैतन्यस्य निषूदने विषतरोः सब्रह्मचारी चिरं, सक्रोधः कुशलाभिलापकुशलैः प्रोन्मूलमुन्मूल्यताम् ॥ ४५ ॥ वली पण क्रोधजयने मारें कहे छे. ॥ हरिणीवृत्तम् ॥ फलति कलितश्रेयः श्रेणिप्रसूनपरंपरः । प्रशमपयसा सिक्तो मुक्तिं तपश्चरणद्रुमः ॥ यदि पुनरसौ प्रत्यासत्तिं प्रकोपहविर्भुजो । भजति लभते भस्मीभावं तदा विफलोदयः॥ ४६॥ ॥ शार्दूलविक्रीडितवृत्तद्वयम् ॥ संतापं तनुते भिनत्ति विनयं सौहाईमुत्सादय- त्युद्वेग जनयत्यवद्यवचनं सूते विधत्ते कलिम् ॥ कीर्ति कृतति दुर्मतिं वितरति व्याहंति पुण्योदयम् । दत्ते यः कुगति सं हातमुचितो रोषः सदोषः सताम् ॥४७॥ वली पण क्रोधना दोषो कहे छे. यो धर्म दहति द्रुमं दवई वोन्मथ्नाति नीति लताम् । दंतीवेंदुकलां विधुतुद इव क्लिभाति कीर्ति नृणाम् ॥

२४९
श्रीसिंदूरप्रकरः मूल.
स्वार्थ वायुरिवांबुदं विघटयत्युल्लासयत्यापदम् । .
तृष्णां धर्म इवोचितः कृतकृपालोपः स कोपः कथम् ॥४८॥
हवे अहंकारना दोषो को छे.
॥ मंदाक्रांतावृत्तम् ।।
यस्मादाविर्भवति विततिर्दुस्तरापन्नदीनाम् ।
यस्मिन् शिष्टाभिरुचितगुणग्रामनामापि नास्ति ।।
यश्च व्यासं वहति वधधीधूम्यया क्रोधदावम् ।
तं मानाद्रि परिहर दुरारोहमौचित्यवृत्तेः ॥४९॥
॥ शिखरिणीवृत्तम् ॥
शमालान भंजन् विमलमतिनाडी विघटयन् ।
किरन् दुर्वापांशूत्करमगणयन्नागमणिम् ॥
भ्रमन्नूया स्वैरं विनयनयवीथीं विदलयन् ।
जनः कं नानथै जनयति मदांधो द्विप इव ॥ ५० ॥
वली पण मानना दोषो कहे छे.
॥ शार्दूलविक्रीडितवृत्तम् ।।
औचित्याचरणं विलुपति पयोवाह नभस्वानिव ।
प्रध्वंस विनयं नयत्यहिरिव प्राणस्पृशां जीवितम् ।।
कीति करविणीं मतंगज इव प्रोन्मूलयत्यजसा ।
मानो नीच इचोपकारनिकर हंति-त्रिवर्ग नृणाम् ॥५१॥

. सूक्त मुक्कावळी. वली पण मानना दोषो कहे छे. ॥ वसंततिलकाहत्तम् ।। मुष्णाति यः कृतसमस्तसमीहितार्थे । संजीवनं विनयजीवितमंगभाजाम् ॥ ! जात्यादिमानविषजं विषमं विकारम् । ने माईवामृतरसेन नयस्व शांतिम् ॥ ५२ ॥ इति मानप्रक्रमः ॥ ११ ॥ हवे मायात्यागनी प्रकम कहे छे. ॥ मालिनीवृत्तम् ।। कुशलजननवंध्यां सत्यसूर्यास्तसंध्याम् । कुगतियुवतिमालां, मोहमातंगशालाम् ।। शामकमलहिमानीं दुर्यशोराजधानीम् । व्यसनशतसहायां, दूरतो मुंच मायाम् ॥ ५३ ॥ वली पण मायाना दोषो कहे छे. ॥ उपेंद्रवज्रावृत्तम् ॥ विधाय मायां विविधैरुपायैः, परस्य ये वंचनमाचरंति ॥ ते पंचयति त्रिदिवापवर्ग-मुखान्महामोहसखाः स्वमेव ॥५४॥ वली. पण-मायाना दोषो कहे थे. ॥ इंद्रवंशावृत्तम् ॥ मायामविश्वासविलासमंदिरं दुराशयो यः कुरुते धनाशया ॥ सोऽनर्थसाथै न पर्ततमीक्षते, यथा बिडालो लगुडं पयः पिबन् ॥५५॥ .

श्रीसिंदूरप्रकरः मूल. २९१ वली मायाना दोषो कहे छे. ॥ वसंततिलकावृत्तम् ॥ मुग्धप्रतारणपरायणमुज्जीहीते, यत्पाटवं कपटलंपटचित्तवृतेः ।। जीर्यत्युपप्लवमवश्यमिहाप्यकृत्वा । नापथ्यभोजनमिवामयमायतौ तत् ॥२६॥ इति मायापक्रमः॥१२॥ हवे लोभत्यागनो उपदेश करे छे. ॥ शार्दूलविक्रीडितवृत्तद्वयम् ॥ यदुर्गामटवीमटंति विकटं कामंति देशांतरम् गाहते गहनं समुद्रमतनुक्लेशां कृषि कुर्वते ।। सेवते कृपणं पति गजघटासंघट्टदुःसंचरम् । सप्पैति प्रधनं धनांधितधियस्तल्लोभविस्फूजितम् ।। ५७ ॥ वली पण लोभना दोषो कहे के. मूलं मोहविषदुमस्य सुकृतांभोराशिकुंभोद्भवः । क्रोधानेररणिः प्रतापतरणिप्रच्छादने तोयदः ॥ क्रीडासन कलेविवेकशशिनः स्वर्भानुरापनदी। सिंधुः कीर्तिलताकलापकलभो लोभः पराभूयताम् ।। ५८॥ फरीने पण लोभना दोषो कहे के. ॥ वसंततिलकावृत्तम् ॥ निशेषधर्मवनदाहविजृभमाणे। दुःखौयभस्मनि होना २९२ सूक्त मुक्कावळी. बाद धनधनसमागमदीप्यमान । लोभानले शलभतां लभते गुणोघः ॥ ५९ ॥ संतो करी लोभ निवारण करवा योग्य छे, मार्ट संतोपना गुणो कह के. ॥ शार्दूलविक्रिडितवृत्तम् ।। जात:कल्पतरु पुरः मुरगवी तेषां प्रविष्टा गृहम् । चिंतारत्नमुपस्थित करनले प्राप्ता निधिः मंनिधिम् ।। विश्व वश्यमवश्यमेव मुलभाः म्बर्गापवर्गथियो। ये संतोषमशेषदोपदहनध्वंसांबुदं विभ्रने ॥ ६० ॥ इति लोभप्रक्रमः ॥१३॥ हवे साजन्यता राखवा विषे उपदेश कर छ. ॥ शिग्वरिणीवृत्तम् ॥ वरं क्षिप्त प्राणिः कुपिनफणिनी वत्रकुहरे । वरं अपापाताज्वलदनलकुंडे विरचितः॥ वरं प्रासमांतः सपदि जठरांतर्विनिहिता। न जन्यं दौर्जन्यं तदपि विपढां सद्म विदुपा ।। ६१ ॥ वली पण माजन्यने मात्रै उपदेश करे छे. ॥ वसंततिलकावृत्तम ॥ सौजन्यमेव विदधाति यशश्चय च । स्वयमं च विभवं च भवभयं च ॥ । " श्रीसिंदूरण करः मुल. २९३ दौर्जन्यमावहसि यत् कुमते तदर्थम् । धान्येऽनलं दिशसि तज्जलसेकसाथ्ये ।। ६२ ।। दारिद्रमा पण सुजनताज श्रेष्ट छे, ते कहे छे. ॥ पृथ्वीवृत्तम्। वरं विभववंध्यता सुजन (स्वनन) भावभाजां नृणा- मसाधुचरिताजिता न पुनरूर्जिताः संपदः ।। कृशत्वमपि शोभते सहजमायतौ सुंदरम् । विपाकविरसा न तु श्वयथुसंभवा स्थूलता ।। ६३ ।। हवे सुजनता युक्तजनोना गुणो कहे छे. ॥ शार्दूलविक्रिडितवृत्तद्वयम् ॥ न ब्रूने परदूषणं परगुणं बत्त्यल्पमप्यन्यहम् । संतोषं वहते परदिषु परावाधासु धत्ते शुचम् ।। स्वश्लाघां न करोति नोज्झति नयं नौचित्यमुलंघय- त्युक्तोऽप्यप्रियमक्षमां न रचयत्येतच्चरित्रं सताम् ।। ६४ ।। इति सुजनमनमः ॥१४॥ हवे गुणिजनना संगर्नु वर्णन करे छ, धर्म ध्वस्तदयो यशश्च्युतनयो वित्तं प्रमतः पुमान् । काव्यं निःप्रतिभस्तपः शमदयाशून्योऽल्यमेवाः श्रुतम् ।। वस्त्वालोकमलोचनश्चलमना ध्यानं च चांछत्यमौ । यः संगं गुणिनां विमुच्य विमतिः कल्याणमाकांक्षति ॥६५॥ .

सूक्त मुक्कावळी. वली पण गुणींना संगर्नु वर्णन करे छे. ॥ हरिणीवृत्तम् ॥ हरति कुमति भित्ते मोहं करोति विवेकिताम् । वितरति रतिं मूते नीति तनोति गुणावलिम् (विनीततां)॥ प्रथयति यशो धत्ते धम्मै व्यपोहति दुर्गतिम् । जनयति नृणां किं नाभीष्टं गुणोत्तमसंगमः ॥६६॥ वली पण गुणीना संगनो उद्देश कहे छे. ॥ शार्दूलविक्रीडितवृत्तम् ॥ लब्धुं बुद्धिकलापमापदमपाकत्तुं विहन्तुं पथि। प्राप्तुं कीर्तिमसाधुतां विधुवितुं धर्म समासेवितुम् ।। रोद्ध पापविपाकमाकलयितुं स्वर्गापवर्गश्रियम् । चेत्त्वं चित्तसमीइसे गुणत्रता संगं तदंगीकुरु ॥ ६७॥ हवे निर्गुणना संगना दोषो कहे छे. ॥ हरिणीवृत्तम् ॥ हिमति महिमांभोजे चंडालनिलत्युदयांबुदे । द्विरदति दयारामे (दमाराम) क्षेमक्षमाभृनि वज्रति ॥ समिधति कुमत्यनौ कंदत्यनीतिलतासु यः । किमभिलषता श्रेयः श्रेयः स निर्गुणसंगमः ॥ ६८॥ ॥ इति गुणिसंगपत्रमः ॥१५॥ - श्रीसिंदूरप्रकरः मूल. २९५ हवे इंद्रियजय करवा आश्रयी उपदेश कहे छे. ॥ शार्दूलविक्रीडितंवृत्तम् आत्मानं कुपथेन निर्गमयितुं यः शूकलाश्चायते । कृत्याकृत्यविवेकजीवितहतौ यः कृष्णसयते ॥ यः पुण्यद्रुमखंडखंडनविधौ स्फूर्जतकुठारायते । तं लुप्तवतमुद्रमिंद्रियगणं जित्वा शुभंयुभव ।। ६९ ॥ वली पण इंद्रियजयनो उपदेश करे छे. ॥ शिखरिणीवृत्तम् ॥ प्रतिष्ठां यनिष्ठां नयति नयनिष्ठां विघटय । त्यकृत्येष्वायत्ते मतिमतपसि प्रेम तनुते ॥ विवेकस्योत्सेक विदलयति दत्ते च विपदम् । पदं नद्दोपाणां करणनिकुरुवं कुरु वशे ॥ ७० ॥ वली पण इंद्रियसमूहना जयनो उपदेश करे छे. ॥ शार्दूलविक्रीडितवृत्तत्रयम् ॥ धचा मौनमगारमुज्झतु विधिप्रागल्भ्यमभ्यस्यता- मस्त्वंतर्गण (स्त्वंतर्वण) मागमश्रममुपादत्तां तपस्तप्यताम् ।। श्रेयः पुंजनिकुंजभंजनमहावातं न चे दिद्रिय- जातं जेतुमवैति भस्मनि हुतं जानीत सर्वं ततः ॥ ७१ ।। वली कांइ विशेष कहे छे. धर्मध्वंसधुरीणमभ्रमरसावारीणमापत्नया- २९६ सूक्त मुकावळी. हकर्मीणमशर्मनिर्मितिकलापारीणमेकांनतः ॥ सर्वानीनमनात्मनी नमनयात्यतीनमिष्टे यथा । कामीनं कुमताध्वनीनमज यन्नक्षौघमक्षेमभाक् ।। ७२॥ इनींद्रियदमपक्रमः ॥१६॥ इवे लक्ष्मीनो स्वभाव कहे छे. निम्नं गच्छति निम्नगेव नितरां निदेव विष्कभते । चैतन्य मदिरेव पुष्यति मई धूम्मेव दत्तेऽधताम् ।। चापल्यं चपलेव चुंवति दवज्वालेव तृष्णां नय- त्युलासं कुलटांगनेव कमला सैरं परिभ्राम्यति ॥ ७३ ।। वली धनना दोषो कहे छे. दायादाः स्पृहयति तस्करगणा मुगंति भूमीभुजो । गृहति च्छलमाकलय्य हुतभुग्भस्मीकरोति क्षणात् ।। भाप्लावयति क्षितौ विनिहितं यक्षा हरने हठात् । दुव॒तास्तनया नयंति निधनं दिग्वधीनं धनम् ॥ ७४ ॥ जे धन छे तेज मोहर्नु उत्पादक छे, ते कहे छे. नीचस्याऽपि चिरं चटूनि रचयंत्याांति नीचै तिम् । शबोरप्यगुणात्मनोऽपि विदयत्युच्चैगुणोत्कीर्तनम् ॥ निदै न विदंति किंचिदकृतज्ञस्यापि सेवाक्रमे । कष्ट किं न मनस्विनोऽपि मनुजा कुवैति वित्ताविनः ॥ ७५ ॥ लक्ष्मीः सर्पति नीचम नवमयः संगादियांभोजिनी ।. संसर्गादिव कंटकाकुलपदा न कापि धत्ते पदम् ।।

श्रीसिंदरप्रकर. मूल चैतन्य विषसनिधेरिव नृणामुज्जासयत्यंजसा । धर्मस्थाननियोजनेन गुणिभिर्ग्राह्यं तदस्याः फलम् ।। ७६ ।। ॥ इति लक्ष्मीस्वभावप्रक्रमः ॥ १७ ॥ हवे दाननो उपदेश कहे छे. चारित्रं चिनुते घिनोति विनय ज्ञान नयत्युन्नतिम् । पुष्णाति प्रशमं तपः प्रबलयत्युल्लासयत्यागमम् ।। पुण्यं कंदलयत्यय दलयति स्वर्ग ददाति क्रमात् । निर्वाणश्रियमातनोति निहितं पात्रे पवित्रं धनम् ।। ७७ ॥ दारिद्यं न तमीक्षते न भजते दौर्भाग्यमालंबते । नाऽकीर्तिने पराभवोऽभिलषते न व्याधिरास्कंदति ।। दैन्यं नाद्रियते दुनोति न दरः क्लिश्नति नैवापदः । पात्रे यो वितरत्यनर्थदलनं दानं निदानं श्रियाम् ।। ७८ ।। वली पण दानना गुणो कह छे. लक्ष्मीः कामयते मतिमंगयते कीनिस्तमालोकने । प्रीतिश्चबति सेवते शुभगता नीरोगनाऽऽलिंगति ॥ श्रेयःसंहतिरभ्युपैति वृणुते स्वर्गोपभोगस्थिति- मुक्तिवाछति यः प्रयच्छति पुमान् पुण्यार्थमर्थ निजम् ।।७९॥ वली पण दाननाज गुण कहे छे. ॥ मंदाक्रांनावृत्तम् ।। तस्यासन्ना रतिरनुचरी कीर्तिरुत्कण्ठिता श्री। निम्या बुद्धिः परिचयपरा .

. सूक्त मुकावळी. पाणी प्राप्ता त्रिदिवकमला कामुकी मुक्तिसंपत् । सप्तक्षेव्यां वपति विपुलं वित्तबीजं निजं यः॥८० ॥ ॥ इति दानप्रक्रमः ॥ १८ ॥ हवे तपनो उपदेश करे छे. ॥ शार्दूलविक्रीडितवृत्तत्रयम् ॥ यत्पूर्वार्जितकर्मशैलकुलिशं यत्कामदावानल- ज्वालाजालजलं यदुग्रकरणग्रामाहिमंत्राक्षरम् ॥ यत्मत्यूहतमः समूहदिवस यल्लब्धिलक्ष्मीलता। मूलं तद्विविधं यथाविधि तपः कुर्वीत वीतस्पृहः ॥ ८१ ॥ वली पण तपनो महिमा कहे छे. यस्माद्विघ्नपरंपरा विघटते दास्य सुराः कुर्वते । कामः शाम्यति दाम्यनींद्रियगणः कल्याणमुत्सर्पति ॥ उन्मीलंति महर्द्धयः कलयनि ध्वस च यः कर्मणाम् । ज्वाधीनं त्रिदिवं शिवं च भजनि श्लाघ्यं तपस्तन्न किम् ॥८॥ कांतारं न यथेतरो बलयित दक्षो दवाग्निं विना । दावाग्निं न यथेतरः शमयितुं शक्तो विनांभोधरम् ॥ निष्णातः पुवनं विना निरसितुं नान्यो यथांभोधरम् । कमौघ तपसा विना किमपरं हतु समर्थस्तथा ॥४३॥ वली पण नपनो महिमा कहे छे. ॥ स्रग्धरावृत्तम ॥ मंतोषस्थूलमूलः प्रशमपरिकरः स्कंधबंध प्रपंचः। - श्रीसिंदूरप्रकरः मूल. पंचाक्षीरोधशाखः स्फुरदभयदलः (स्फुटविनयदलः) शीलसंपत्सवालः॥ श्रद्धांभः पूरसेकाद्विपुलकुलबलैश्वर्यसौंदर्यभोगः । स्वर्गादिप्राप्तिपुष्पः शिवसुखफलदः स्यातपः पादपोऽयम् ॥४४॥ । इति तपः-प्रक्रमः ॥१९॥ हवे शुभभावनो उपदेश करे छे. ॥ शार्दूलविक्रीडितवृत्तद्वयम् ॥ नीरागे तरुणी कटाक्षितमिव त्यागव्यपेतमभौ । सेवाकष्टमिवोपरोपणमिवांभोजन्मनामश्मनि ॥ विष्ववर्षमिवोपरक्षितितले दानादर्चातपः । स्वाध्यायाध्ययनादि निःफलमनुष्ठान विना भावनाम् ॥८॥ वली पण शुभभावोपदेश करे छे. सच झीप्सति पुण्यमीप्सति-दया धित्सत्यघं मित्सति, क्रोधं दित्सति दानशीलतपसां साफल्यमादित्सति ।। कल्याणोपचयं चिकीर्षति भवांभोधेस्तट लिप्सते । मुक्तिस्त्रीं परिरिप्सते यदि जनस्तद्भावयेद्भावनाम् ॥ ८६ ।। वली फरीने पण कांइक विशेष कहे छे. ॥ पृथ्वीवृत्तम् ॥ विवेकवनसारिणी प्रशमशर्मसंजीविनीम् । भवार्णवमहातरी मदनदावमेघावलीम् ॥ चलाक्षमगवागुरां गुरुकषायशैलाशनिम् ।

सुक्त मुक्तावळी. विमुक्तिपथवेसरी भजत भावनों किं परैः ॥ ८७॥ वली पण कहे छे. ॥ शिखरिणीत्तम् ॥ धनं दत्तं वित्तं जिनवचनमभ्यस्तमखिलम् । क्रियाकांड चंड रचितमवनौ मुप्तमसकृत् ।। तपस्तीनं तप्तं चरणमपि चीण चिरतरम् । नचेच्चित्ते भावस्तुषवपनवत्सर्वमफलम् ॥ ८८ ॥ ॥ इति भावनामक्रमः ॥ २० ॥ हवे वैराग्यने कहे छे. ॥ हरिणीवृत्तम् ॥ यदशुभरज माथो सेंद्रियद्विरदांकुशम् । कुशलकुमुमोद्यानं माद्यन्मनः कपिशृंखला ॥ विरतिरमणीलीलावेश्म स्मरज्वरभेषजम् । शिवपथरथस्तवैराग्यं विमृश्य भवाऽभयः (भवाऽभवः) ॥८९॥ वली. पण वैराग्यज कहे छे. ॥ वसंततिलकावृत्तम् ॥ चंडानिलस्फुरितमब्दचयं दवाचि- वृक्षवज तिमिरमंडलमर्कविवम् ।। वत्रं महीध्रनिवह नयते यथांतम् । वैराग्य मेकमपि कर्म तथा समग्रम् ॥ ९० ॥ , 4 he श्रीसिंदूरप्रकरः मूल. . वली पण कहे के. ॥ शिखरिणीवृत्तम् ॥ नमस्या देवानां चरणवरिवस्या शुभगुरो- स्तपस्या निःसीमक्रमपदमुपास्या गुणवताम् ।। निषद्याऽरण्ये स्यात् करणदमविद्या च शिवदा। विरागः क्रूरागः क्षपणनिपुणोंऽतः स्फुरति चेत् ॥ ९१ ।। वली विरक्तगुणो कहे छे. ॥ शार्दूलविक्रीडितवृत्तम् ॥ भोगान् कृष्णभुजंगभोगविषमान् राज्यं रजःसन्निभम् । बंधून् बंधनिबंधनानि विषयग्रामं विषान्नोपमम् ॥ भृति भृतिसहोदरां तृणमिव खैणं विदित्वा त्यज । न्स्तेष्वासक्तिमनाविलो विलभते मुक्तिं विरक्तः पुमान् ॥१२॥ ।। इति वैराग्यप्रक्रमः ॥२१॥ हवे छ काव्ये करी सामान्य उपदेश कहे छ. ॥ उपजातिवृत्तम् ।। जिनेंद्रपूजागुरुपर्युपास्तिः, सत्त्वानुकंपाशुभपात्रदानम् ॥ गुणानुरागः श्रुतिरागमस्य, नृजन्मवृक्षस्यफलान्यमूनि ॥९॥ ॥ शिखरिणीवृत्तम् ॥ त्रिसंध्यं देवाञ्चों विरचय चयं प्रापय यशः। श्रियः पात्रे वापं जनय नयमागै नय मनः ॥ स्मरक्रोधाधारीन् दलय कलय प्राणिषु दयाम् ।

सूक्त मुक्तावळी.
निनोक्तं सिद्धांत श्रृणु तृणु जवान्मुक्तिकमलाम ॥ २४ ॥
॥ शार्दूलविक्रीडितवृत्तम् ॥
कृत्वाऽहत्पदपूजन यतिजनं नत्वा विदित्वाऽऽगमं ।
हित्वा संगमधर्मकर्मठधियां पात्रेषु दत्वा धनम् ॥
गत्वा पद्धतिमुत्तमक्रमजुषां जित्वांडतरारिव्रजम् ।
स्मृत्वा पंचनमस्क्रियां कुरु करोडस्थमिळू सुखम् ॥१५॥
॥ हरिणीवृत्तम् ।।
प्रसरति यथा किर्तिर्दिक्षु क्षपाकरसोदरा ।
ऽभ्युदयजननी याति स्फातिं यथा गुणसंततिः ।।
कलयति-यथा वृद्धि धर्मः कुकर्महतिक्षमः
कुशलसुलभे न्याय्ये कार्य तथा पथि वर्तनम् ॥ १६ ॥
॥ शिखरिणीवृत्तयम् ।।
करे लाध्यस्त्यागः शिरसिगुरुपादमणमनम् ।
मुखे सत्या वाणी श्रुनमधिगतं च श्रवणयोः॥
हृदि स्वच्छा वृत्तिर्विजयि भुजयोः पौरुषमहो ।
चिनाप्यैश्वर्यण प्रकृतिमहतां मंडनमिदम ॥ १७ ॥
भवारण्यं मुक्त्वा यदि जिगमिधुर्मुक्तिनगरीम ।
नदानी मा कार्कीविषयविषवृक्षेषु वसतिम ॥
यतश्चछायाप्येषां प्रथयति महामोहमचिरा-
दयं जंतुर्यस्मात्पदमपि न गर्नु प्रभवति ॥ १८ ॥
॥ इति सामान्योपदेशमक्रमः ॥ २२ ॥

श्रीसिंदूरप्रकरः मुल. ३०३ हवे एक काव्ये करी ग्रंथर्नु समर्थन करे छे. ॥ उपजातिवृत्तम् ॥ सोमप्रभाचार्यममा च यन्न, पुंसां नमःएकमपाकरोति ॥ तदप्पमुप्मिन्नुपदेशलेशे, निशम्यमानेऽनिशमेति नाशम् ॥१९॥ ॥ इति ग्रंथसमर्थनम् ॥ हवे एक श्लोकथी प्रशस्ति कहे के। ॥ मालिनीवृत्तम् ॥ अमजद जितदेवाचार्यपट्टोदयाद्रि-। घुमणिविजयसिंहाचार्यपादारविंदे ।। मधुकरसमतां यस्तेन सोमप्रमेण । व्यरचि मुनिपराज्ञा मुक्तमुक्तावलीयम् ॥ १०० ॥ इति प्रशस्तिः॥ इति सिंदूरमक्रमः समाप्तः ।।

सूरु-मुक्कावळी.
श्री चिदानंदजी कृत.
प्रश्नोत्तरमाळा*
(मंगळाचरण-दोहा.)
परम ज्योति परमात्मा, परमनंद अन्प;
नमो सिद्ध मुग्वकर सदा. कलातीत चिद्-रूप,
पंच महाव्रत आचस्त,
पाळत पंचाचार;
ममनारस सायर -सदा, सत्ताविश गुणधार.
पंच समिति गुपति धरा, चरण कमण गुणधार;
चिदानंद जिनके हिये, करुणा भाव अपार.
मुरगिरि हरि सायर जीसे, धीर वीर गंभीर;
अपमत्त विहारथी, मार्नु अपर समीर.'
इत्यादिक गुणयुक्त जे, जंजम तीरथ जाण;
ते मुनिवर प्रणमुं सदा. अधिक प्रेम मन आण.
लाख वानकी एक बात, प्रश्न प्रश्नमे जाण;
एकशन चौदे प्रश्नको, उत्तर कहुं बखाण.
६
प्रश्नमाळ ए कंटमें, जे धारत नर नार;
तास हिये अति उपजे, सार विवेक विचार.
*अति भारे गंभीर अर्थवाळा १०४ प्रश्नोनी उत्तर बहु
सरल अने मचोट भाषामा भने अपायेलो होइ, सहु कोड
तत्वजिवासु भाइ व्हेनोए स्वदृदय-बोर्ड उपर अवस्य कोतरी
रामबा योग्य हे.
१ मेरु पर्वत. २ सिंह. ३ पवन.

प्रश्नोत्तर:माळा.
३०५
.
३
११४ प्रश्नोनो संग्रह.
देव धरम अरु कहा, सुख दुःख ज्ञान अज्ञान;
ध्यान ध्येय ध्याता कहा, कहा मान अपमान.
जीब अजीव कहो कहा, पुण्य पाप कहा होय;
आश्रव संवर निर्जरा, बंध मोक्ष कहो दोय,
हेय ज्ञेय फुनि हे कहा, उपादेय कहा होय;
बोध अबोध विवेक कहा, फुनि अविवेक समोय.
कौन चतुर मूश कवण, राव रंक गुणवंत;
जोगी जति कहो जीके, को जग संत महंत.
शूरवीर कायर कवण, को पशु मानव देव,
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश को, कहो क्षुद्र कहा भेव.
कहा अथिर थिर हे कहा, छिल्लर कहा अगाध;
तप जप संजम हे कहा, कवण चोर को साध,
अति दुर्जय जगमें कहा, अधिक कपट कहां होय;
नीच उंच उत्तम कहा, कहो कृपा कर सोय.
अति प्रचंड अग्नि कहा,
वो
दूरदम मोतंग;
विषवेली जगमें कहा, सायर प्रवळ तुरंग.
किणथी डरीए सर्वदा, किणथीं मळीए धाय;
किणकी संगत गुण वधे, किण संगत पत जाय.
चपळा तिम चंचळ कहा, कहा अचळ कहा सार;
फुनि असार वस्तु कहा, को जग नरक दुवार.
८
९.

सूक्त मुक्तावळी.
११
१२
१३
अंध बधिर जग मूक को, मात पिता रिपु मित;
पंडित मूढ सुखी दुःखी, को जगमांहे अभीत.
म्होटा भय जगमें कहा, कहा जरा अति घोर;
प्रबळ वेदना हे.कहा, कहा वक्र किशोर.
कल्पवृक्ष चिंतामणि, कामगवी शुं थाय;
चित्राक्ली हे कहा, शुं साध्यां दुःख जाय.
श्रवण नयन मुख कर भुजा, हृदय कंठ अरु भाळ,
इनका मंडन हे कहा, कहा जग म्होटा जाळ.
पाप रोग अरु दुःखना, कहा कारण शुं होय;
अनुचि वस्तु जगमें कहा, कहा शुचि कहा. जोय.
कहा सुधा अरु विष कहा, कहा संग कुसंग;
कहा हे रंग पतंगका, कहा मजीठी रंग.
१८.
१६
उक्त ११४ प्रश्नोनो उत्तर नीचे प्रमाणे-
देव श्री अरिहंत निरागी, दया मूल शुचि धर्म सोभागीः
हित उपदेश गुरु मुसाध, जे धारत गुण अगम अगाध.
उदासीनता मुख जगमांही, जन्म मरण सम दुःख कोइ नाही;
आत्मबोध ज्ञान हितकार, प्रबल अज्ञान भ्रमण संसार.
चित्तनिरोध ते उत्तम ध्यान,
ध्येय वीतरागी भागवान,
ध्याता तास मुमुक्षु वखान, जे जिनमत तत्वारथ जान.
लही भव्यता म्होटो मान, कवण अभव्य त्रिभुवन अपमान;

0
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४
५
७
प्रश्नोत्तर भाळा.
३०७
चेतन लक्षण कहीए जीव, रहित चेतन जान अजीव.
परउपगार पुण्य करी जाण, परपीडा ते पाप वखाण;
आश्रव कर्म आगमन धारे, संवर तास विरोध विचारे.
निर्मळ हंस अंश जिहां होय, निर्जरा द्वादशविध तप जोय;
वेद भेद बंधन दुःखरूप, बंध अभाव ते मोक्ष अनुप.
पर परिणति ममतादिक हेय, स्व स्वभाव ज्ञान कर ज्ञेय,
उपादेय आतम गुणवृंद, जाणो भविक महा सुखद.
परमवोध मिथ्याह रोध, मिथ्याग् दुःख हेत अवोध;
आतम हित चिंता मुविवेक, तास विमुख जडता अविवेक.
परभव साधक चतुर कहावे, मूरख जे ते बंध बढाये:
त्यागी अचळ राज पद पावे, जे लोभी ते रंक कहावे.
उत्तम गुणरागी गुणवंत, जे नर लहत भवोदधि अंत;
जोगी जस ममता नहि रति, मन इंद्रि जीते ते जति. १०.
समता रस सायर सो संत, तजत मान ते पुरुष महत;
सुरवीर ते जे कंद्रप वारे, कायर कामआणा,शिर धारे. ११.
अविवेकी नर पशु समान, मानव जस घट आतम ज्ञान;
दिव्य दृष्टि धारी जिनदेव, करतां तास इंद्रादिक सेव. १२.
ब्राह्मण ते जे ब्रह्म पिछाणे, क्षत्री कमरिषु वश आणे;
वैश्य हाणि वृद्धि जे लखे, शुद्ध भक्ष अभक्ष जे भखे. १३.
अथिर रुप जाणो संसार, थिर.एक जिन धर्म हितकार;
इंद्रिसुख छिल्लर जल जाणो,श्रमण अतिंद्रिअगाध वखाणो १४.
इच्छा रोधन तप मनोहार, जप उत्तम जगमें नवकार;

सूक मुकावळी.
संजम आतम थिरता भाव, भवसायर तरवाको न.व. १५.
छती शक्ति गोपवे ते चोर, शिवसाधक ते साध किशोर
अति दुर्जय मनकी गति जोय, अधिक कपट नारीमें होय. १६.
नीच सोइ परद्रोह विचारे, उंच पुरुष परविकथा निवारे;
उत्तम कनक कीच सम जाणे, हरख शोक हृदये नवि आणे. १७
अति प्रचंड अग्नि हे क्रोध, दुर्दम मान मतंगज जोध:
विषवल्ली माया जगमांही, लोभ समो सायर कोइ नाहि. १८
नीच संगवी डरीए भाइ, मलिए सदा संतकुं धाइ;
साधु संग गुण वृद्धि थाय, नारीकी संगते पत जाय. १९
चपळा जेम चंचळ नर आय, खिरत पान जब लागे
वाय;
छिल्लर अंजळि जळ जेम छीजे, इणविधजाणी ममतकहा कीजे.२०
चपळा तिम चंचळ धनधाम, अचळ एक जगमें प्रभुनाम;
धर्म एक त्रिभुवनमें सार, तन धन योवन सकळ असार. २१
नरकद्वार नारी नित जाणो, तेथी राग हिये नवि आणो;
अंतर लक्ष रहित ते. अंध, जानत नहि मोक्ष अरु बंध. २२
जे नवि सुणत सिद्धांत वखाण,
बधिर पुरुष जगमे ते जाण;
अवसर उचित बोली नवि जाणे, ताकुं ज्ञानी मूक वखाणे. २३
सकल जगत जननी हे दया, करत सहु प्राणीकी मया रहेम;
पालन करत पिता ते कहीए, तेतो धर्म चित्त सद्दहिये. २४
मोह समान रिपु नहीं कोइ, देखो सहु अंतरगत जोइ;
मुखमें मित्त सकळ संसार, दुःखमें मित्त नाम आधार. २५
डरत पापथी पंडितं सोइ, हिंसा करतं मूह सो होइ;
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प्रश्नोत्तर माळा.
३०९
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मुखिया संतोषी.जगमांही, जाकुं त्रिविध कामना नाही. २६
जाकुं तृष्णा अगम अपार, ते म्होटा दुःखिया तनुधार;
थया पुरुष जे विषयातीत, ते जगमाहे परम अभीत.
मरण समान भय नहीं कोइ, पंथ समान जरा नवि होइ;
प्रवळ वेदना क्षुधा वखाणो, वक्र तुरंग इंद्रि मन जाणो. २८
कल्पक्ष संजम सुखकार, अनुभव चिंतामणि विचार;
कामगवी वर विद्या जाण, चित्रावेलि भक्ति चित्त आण. २९
संजम साध्या सबि दुःख जावे, दुःख सहु गयां मोक्षपद पावे;
श्रवण शोभा सुणीए जिणवाणी, निर्मळ जिम गंगाजळ पाणी.३०
नयनशोभा जिनबिंब निहारो, जिनपडिमा जिनसम करीधारो;
सत्य वचन मुख शोभा सारी, तज तंबोळ संत ते वारी. ३१
करकी शोभा दान वखाणो, उत्तम भेद पंच तस जाणो;
भुजावळे तरीए संसार, इणबिध भुज शोभा चित्त धार. ३२
निर्मळ नवपद ध्यान धरीजे, हृदय शोभा इणविध नित कीजे;
मभुगुण मुक्तमाळ सुखकारी, करो कंठ शोभा ते भारी. ३३
सतगुरु चरण रेणु शिर धरीए, भाळ शोभा इणविध भवि करीए;
मोहजाळ म्होटो अति कहीए, ताकुंतीड अक्षयपद लहीए. ३४
पापका मूळ लोभ जगमाहो, रोग मूळ रस दुजा नाही;
दुःखका मुळ सनेह पियारे, धन्य पुरुष तेनाथी न्यारे. ३५
अशुचि वस्तु जाणो निज काया, शुचि पुरुष जे वरमित माया,
सुधा समान अध्यातम बाणी, विष सभ कुकथापाप कहाणी.३६

सूक्त मुक्तावळी. विषयसुखनी कामना-वांछना करतो नथी. जेने कल्पवृक्ष फळ्यो होय ते शुं बीजा तुच्छ असार वृक्षनी वांछना करे खरो के ? नहि ज. ५ आत्मज्ञान (अध्यात्म) मां मग्न बनेलाने नरकादिनां दुःख कदापि वेठवां पडतां नथी. केमके जे (समजपूर्वक) सन्मार्गे ज चाले छे ते शुं कूवामां पडे खरो के ? नहि ज. ६ जेणे आत्माने ओळख्यो नथी-आत्मस्वरुप पिछाण्यु नथी तेमने मोक्ष तो दूर ज छे अने द्रव्य संपदा पण उपाधि-क्लेशना कारणरुप थाय छे अने तेनी आशा-इच्छा-अभिलाषा-मनोरथ- माळा अधूरी ज रहे छे. ७ ज्यांसुधी आत्मबोध थयो नथी त्यांसुधी आ भयसागर वरवो दुर्लभ छे. महासमर्थ मोहने जीतवो दुर्लभ छे अने तृष्णाने तजवी पण बहु आकरी छे. परंतु स्वात्मबोध या स्वस्वरुप प्रकाश थतां ज ए बधां गमे तेवां दुस्तर छतां पण सुलभ थइ शके छे. ८ जेणे सुर अने असुरना इन्द्रोने (पण) अनाथनी जेवी द- शाने पमाडया छे-खुब सताव्या छे-दीन रांक भीखारी जेवा नि- माल्य बनावी दीधा छे ते सबळ काम पण अध्यात्म ध्यानरुप अमिमां. भस्मसात् थइ जाय छे ए कंइ थोडा आश्चर्यनी वात के शु? ९ जेने बांध्यु-सांकळ्युं छतुं छटकी जाय छे-स्थिर थइ शकतुं नयी अने वायु- दम्यु-अटकाव्यु छतां निरंकुशपणे चोतरफ फरतुं श्री आत्मावबोध कुलक-व्याख्या. भटकतुं रहे छे तेवू चंचळ चित्त पण ध्यानबळे पोतानी मेळे-अना- यासे ठरी जाय छे. १० ज्ञानी गुरुनां वचन--बोधथी जेणे शुभ--मुखकारी ध्यान रसायण प्राप्त कयु-पी, तेने ताव 'त्रिदोषादिक बाह्य व्याधिओ तेमज राग द्वेष अने मोहादिक अंतरंग व्याधिओ दुःख देता नथी. विविध व्याधिओ तेनामां प्रगटता के फावना नथी अने प्रथमना होय ते पण शमी जाय छे. ११ स्वस्वरुपर्नु ज चिंन्तवन करवामां तत्पर रहेता महाशयने कोइ पीडा करतुं नथी अने कदाच कोइ कर्मयोगे पीडा करे तो तेना ऋणमाथी पोताने मुक्त थइ जता मानता एवा ते आत्मज्ञा- नीने दुःख समजातुं नथी. १२ दुःखनो खाण जेवा ( भयंकर ) राग द्वेषो चळाचळ चि- त्तमा होय छे. जेम आलान स्थंभे वांधेली हाथी स्थिर थाय छे तेम अध्यात्म योगवडे चित्त पण पोतानी स्वाभाविक चपळता तजी स्थिर थइ जाय छे. २३ प्रसन्न के अप्रसन्न आत्मा (चित्त ) ज मित्र के अमित्र (दुश्मन ) छे. स्वर्ग के नरक तेमज राजा के रंक पण एज छे. १४ आ जीवे ( अनेक वार) देवतानी अने मनुष्योनी ऋ- दिओ प्राप्त करी अने विषय रस पण वारंवार भोगव्या, परंतु यी संतोष पाम्यो नहि अने संतोष वगर क्यांय पण शान्ति बळी? नहि ज.

सूक्त मुक्तावळी.
जिहां बेठा परमारथ लहीए, ताकुं सदाय सुसंगति कहीए,
जिहां गया अपलक्षण आवे, ते तो सदाय कुसंग कहावे. ३७
रंग पतंग दुरजनका नेहा, मध्य धार जे आपतं छेहा,
सज्जन स्नेह मजीठी रंग, सर्व काळ जे रहन अभंग.
प्रश्नोत्तर इम कही विचारी, अति संक्षेप बुद्धि अनुसारी;
अति विस्तार अरथ इण केरा, सुणत मिटे मिथ्यात अंधेरा.३९
कळश.
रस पूर्णनंद सुचंद संवत (१९०६), मास कार्तिक जाणोंए,
पक्ष उज्वळ तिथि त्रयोदशी, वार अचळ वखाणीए;
आदीश पास पसाय पामी, भावनगर रही करी,
चिदानंद जिणंद वाणी, कही भवसायर तरी.
इति प्रश्नोत्तर रत्नमाला समाप्ता.
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14
A

श्री आत्मावबोध कुलक-व्याख्या. ३ २ श्री आत्मावबोध कुलक-व्याख्या. (आत्मार्थी जनोए खास मनन करी निर्धारी राखवा योग्य सुवर्ण वाक्यो.) २ उत्कृष्ट पुन्य प्रभा वडे अथवी स्वाभाविक आत्मज्योति वडे आनंदकारी अने महेन्द्रोए (पण) नमन करवा योग्य श्री जिनेश्वर देवने (त्रिविधे) प्रणाम करी, भवदुःखनो अंत करवा समर्थ एवं आत्मावबोध कुलक हु ( जयशेखर ) वखाणीशं. २ ओम प्रभा वडेन सूर्योदय थयानी खात्री थइ शके के पण वे नगर गमे तेना शपथ ( सोगन) मात्रयी खात्री थती नथी वेम तथा प्रकारना गुण-लक्षणवडे ज आत्मावबोध थंयानी स्वयमेव खात्री थवा पामे छे. पण तेवा गुण वगर वधारे बोलवाथी का वळतुं नथी-खात्री थई शकती नथीं. प्रकरणकार ते गुणोंने वखाणे छे. इन्द्रियोर्नु दमन, मनोविकारर्नु शमन, तत्त्वार्थश्रद्धान, स्व- परहित चिन्तवन, मोक्ष मुखनी ज वांच्छना, गुणदोषनी चोख्खी समज, अने प्रबळ-वैराग्य-विषयमुखीं विमुखता ए बधाय अंत- रमा रहेला आत्मावबोधरुपी बीजना स्पष्ट अंकुर ऊगेला-फणगा फूटेला जाणवा. ४ जे औत्मस्वरुपैन तैना स्वाभाविक सुखने जाणे छ त तुच्छ ३१२ सूक्त मुक्तावली. विषयसुखनी कामना-वांछना करतो नथी. जेने कल्पवृक्ष फळ्यो होय ते शुं बीजा तुच्छअसार वृक्षनी वांछना करे खरो के ? नहि ज. ५ आत्मज्ञान (अध्यात्म) मा मग्न बनेलाने नरकादिनां दुःख कदापि वेठवां पडतां नथी. केमके जे (समजपूर्वक) सन्मार्गे ज चाले छे ते | कूवामां पडे खरो के ? नहि ज. ६ जेणे आत्माने ओळख्यो नथी-आत्मस्वरुप पिछाण्यु नथी तेमने मोक्ष तो दूर ज छे अने द्रव्य संपदा पण उपाधि-क्लेशना कारणरुप थाय छे अने तेनी आशा-इच्छा-अभिलाषा-मनोरथ- माळा अधूरी ज रहे छे. ७ ज्यांमधी आत्मबोध थयो नथी त्यांसुधी आ भवसागर तरवो दुर्लभ छे. महासमर्थ मोहने जोतवो दुर्लभ छे अने तृष्णाने तजवी पण बहु आकरी छे. परंतु स्वात्मबोध या स्वस्वरुप प्रकाश थतां ज ए बधां गमे तेवां दुस्तर छतां पण सुलभ थइ शके छे. ८ जेणे सुर अने असुरना इन्द्रोने (पण) अनाथनी जेवी द- शाने पमाडया छे-खुब सताव्या छे-दीन रांक भीखारी जेवा नि- माल्य बनावी दीधा छे ते सबळ काम पण अध्यात्म ध्यानरुप अमिमां भस्मसात् थइ जाय छे ए कंइ थोडा आश्चर्यनी वात के शुं? ९ जेने बांध्यु-सांकळ्यु छतुं छटकी जाय छे-स्थिर थइ शकतुं नयी अने वायु--दम्यु-अटकाव्यु छतां निरंकुशपणे चोतरफ फरतुं श्री आत्मावबोध कुलक-व्याख्या. ३१३ भटकतुं रहे छे तेवं चंचळ चित्त पण ध्यानबळे पोतानी मेळे--अना- यासे ठरी जाय छे. १० ज्ञानी गुरुनां वचन-बोधथी जेणे शुभ--सुखकारी ध्यान रसायण प्राप्त कयु-पी, तेने ताव 'त्रिदोषादिक बाह्य व्याधियो तेमज राग द्वेष अने मोहादिक अंतरंग व्याधिो दुःख देता नथी. विविध व्याधिओ तेनामां प्रगटता के फावता नथी अने प्रथमना होय ते पण शमी जाय छे. ११ स्वस्वरुपर्नु ज चिंन्तवन करवामां तत्पर रहेता महाशयने कोइ पीडा करतुं नथी अने कदाच कोइ कर्मयोगे पीडा करे तो तेना ऋणमांथी पोताने मुक्त थइ जता मानता एवा ते आत्मज्ञा- नीने दुःख समजातुं नयी. १२ दुःखनो खाण जेवा ( भयंकर ) राग द्वेषो चळाचळ चि- त्तमां होय छे. जेम आलान स्थंमे बांधेलो हाथी स्थिर थाय छे तेम अध्यात्म योगवडे चित्त पण पोतानी स्वाभाविक चपळता तजी स्थिर थइ जाय छे. १३ प्रसन्न के अप्रसन्न आत्मा (चित्त ) ज मित्र के अमित्र ( दुश्मन ) छे. स्वर्ग के नरक तेमज राजा के रंक पण एज छे. १४ आ जीवे ( अनेक वार) देवतानी अने मनुष्योनी ऋ- दिओ प्राप्त करी अने विषय रस पण वारंवार भोगव्या, परंतु तेथी संतोष पाम्यो नहि अने संतोष वगर क्यांय पण शान्ति वळी? नहि ज.

३१४ सूक्त मुकावळी. - १९ जेम वादळां वडे तेजस्वी सूर्य पण पण ढंकाइ जाय छे तेम हे जीव ! त्हारी मेळे उत्पन्न करेला शरीर, धन, स्त्री अने कुटुंबस्नेह वडे, तु पण सत्ताए (शक्तिरूपे) लोकालोक प्रकाशक ज्योतिरुप छतां ईकाइ जाय छे. एटले स्नेहजाळ वढे तारी शक्ति (प्रभाव) लुप्तमाय थइ जाय छे ते तुं जो! १६ हे जीव ! आ त्हारो देह, विविध व्याधिरुप सर्प अने अग्निरुप वैरीओने वश छतां तुं तेना उपर ममत्त्व करतो शुं खा- टवानो के ? १७ उत्तम जातिना भोजन, पान, स्नान, शृंगार अने विले- पनवडे पोषण मळ्या छतां आ शरीर पोताना पोषक-स्वामीने छेह दे छे, तेथी कूतरा जेटली पण कृतज्ञता तेनामा जणाती नथी. तो पछी क्या बाने तेना उपर मोह-ममत्त्व करवो ? १८ हे जीव ! अनेक प्रकारनां कष्टो सहन करीने रहें जे धन उपायु ते तो रहने कष्ट मात्र आपी अंते अन्यनाज भोगमा आवे 2. धनन । ममताथी ते माटे तुं महेनत करो मरे छे अने कशुं खीं शकतो नथी, जेथी त्हारा मृत्यु पछी के पहेलां ते बीजाना हाथमां जाम छेआ रहारी केवी मूर्खाइ ? तेनों कंइ विचार करी, उचित होय तेम कर. १९ जेम जेम मोह-अज्ञानवश तुं धन धान्यादिक परिग्रह (ममत्व ) घणो. करतो जाय छे तेम तैम अधिक भारथी भरेली नावनी जेम आ भवसागरमा तुं जोत जोतामां डूबी जाय छे. तेथी श्री आत्माववोध कुलक-व्याख्या. त्हारे भवभयमा घणुंन संकट वेठवू पडशे, तेनो कंइ विचार कर. २० शरीर अने मननी निवळताने लीधे जेने स्वप्नमां पण देखी छती मनुष्यन वीर्य हरी ले ते स्त्रीने मारी, (जीवलेण व्याधि) जेवी समजीने तुं तेने तजी दे-मोहवश थतो तेनो संग तज. २१ हे मुग्ध जीव ! तु चित्तनी शुद्धि करवा अभिलाषा राखे थे, अने तेम छतां स्त्रीना हाव भावादिक विषयरसमां तुं रक्त बनी जाय छे आते त्हारी केवी मृढता ? अरे! गळीथी मिश्रित करेला वस्त्रमा श्वेतता टकी शके खरी ? कदापि नहि ज. २२ हे जीव ! मोहराजाए रहने स्नेहरुपी बेडीओ वडे झकडी वांधीने, संसाररुपी कारागृहमां नांख्यो छे अने तेमांथी तुं नाशी न छूटे एटला माटे त्हारी उपर पूरती देखरेख राखवा कुटुंब कबी- लादिक स्नेही बंधुओना ब्हाने पहेरगीरो मूक्या छे, तेमना उपर तुं आटलो वधो मोह-राग केम राखे छे ? २३ अहो आत्मा ! तुं आई अंतरंग कुटुंब कर के धर्म एज पिता, करुणा-दया एज माता, विवेक एज भ्राता (भाइ), क्षमा -समता एज प्रिया-स्त्री, अने ज्ञान दर्शन चारित्रादिक गुण - एज सुपुत्र. २४ अति लालन पालन करायेली (चिर परिचयवाळी) कर्म प्रकृतिरुपी स्त्रीए हे जीव ! हारामा पुरुषार्थ छतां रहने बंधनो- थी बांधीने चार गतिमा भमाडयो है तैथी तने कशी लज्जा-श- रम आवती नथी | ३१६ सूक्त मुक्तावली. २५ रे जीव! तुं जातेज कर्म करे के अने ते वडे तु चार ग- तिमां रडवडे छे. तेम छतां अरे! आत्मवैरी ! तुं अन्यने शा माटे दोष आपे छे ? २६ हे आत्मन् ! तुं एबुं काम करे छे, एवां बोल बोले छे, अने एवा विचार करे के के जेथी तुं अनेक कष्टमां आवी पडे छे. आवी आपणा घरनी गुप्त वात अन्यनी आगळ कही शकाय नहि ( एथी पोतानीज जांघ उघाडी थाय अने लोकोमा हांसी थाय. ए रोते अंतरात्मा, वहिरात्माने अथवा सुमति, कुमनिने वश पडेला पोताना स्वामी-चेतनने कहे छे). २७ हे चेतन ! पांचे इन्द्रियोरुपी प्रवळ चोरो दुष्ट मनरुपी युवराजने मळी जइ, पोतपोताना विषयरसमां आसक्त बनी त्हारी मूळगी मूडी-ज्ञान, दर्शन, चारित्र. अने वीर्यादिक स्वाभाविक स्थिति-मर्यादाने लोपे छे. २८ एमणे विवेकरुपी हितस्वो मंत्रीने हणी नांख्यो, दान, शील, तप अने भावरूप चार प्रकारचें धर्मचक्र भेदी-भांगो नांख्युः ज्ञान अने क्रियारुपी धन लूटी लीधुं अने रहने पण कुगतिरुप कूवामां नांखी दीधो. २९ आटलो वधो वखत तुं मोहरुप निद्राने वश, मडदाल जेवो पुरुषार्थहीन बनी गयो हतो ते वात जो हवे तुं गुरुमहाराजनां हितवचनथी जाग्योज़ हो तो नथी जाणतो ? जाणे छेज. ३० हे चेतनराय ! तुं लोकममाण असंख्य प्रदेशनो स्वामो ३१८ सूक्त मुक्तावळी. यती ममता रुपी मोटी शिल्लाओ के एवा संसाररुपी पर्वतने हे केतन ! हवे तुं ध्यानरुपी वज्र वडे भेदी नांख-संसारनो . अंत कर. ३६ जे महानुभावने आत्मज्ञान जाग्युं छे ते मोक्ष सुखने आप- नारं निश्चय ज्ञान जाणQ अने वाकीन ज्ञान गमे तेटलं अधिक प्र- माणमा मेळवेलं होय तो पण ते आजीविका मात्र फळ आप- नारं जाणवु. ३७ जेम यथार्थ वोधरहितपणे प्रयोजायेला हितकारी औषध थकी व्याधि ऊलटो वधे छे अथवा नवो पेदा थाय छे तेम एकान्त हितकारी आत्मवोध रहित मूढ जनो जेम जेम-घj घणु भणे छ । तेम तेम तेमनु चित्त गर्व-अभिमानवडे उभराय छै. मतलब के मूड मोहातुर जीवोने श्रुत ज्ञान पण अज्ञानपणे परिणभे के अने तेथी तेमने लाभ-हित थवाने वदले नुकशान-अणहितज थाय छे. ३८ पोताना आत्माने बोध कर्या वगर एटले आत्मवोध मेळव्या वगर जे कोइ अन्य जनोने वोध आपवा मंडे छे. ते पण जड-मूर्खज जाणवा. कहो के स्वजन वर्ग मूख्यो मरतो होय त्यारे दानशाळा (सदाव्रत) मांडवानु शुं प्रयोजन होय ? कशुंज नहि. ३९ केटलाएक लोको अन्यजनोंने वोध आपे छे अथवा स्व- रोदय, हठयोग के ज्योतिष शास्त्रना अभ्यासथी काळज्ञान जाणे छे. अथवा सूत्र भणे के अने सदाय स्वस्थान (धार बार विगैरे) श्री आत्माववोध कुलक-व्याख्या. ३१९ मूकीने (तजीने ) बहार फरताज रहे थे परंतु आत्मबोध-स्वस्व- रुपनी ओळखाण थया वगर तेमने मोक्ष सुखनी प्राप्ति तो थतीज नथी. ४० कदापि कोइने पण निन्दवो नहि-निंदा करवीज नहि, तेमज पोतानां वखाण करवां नहि एटले आत्मश्लाघा (स्वप्रशंसा) पण करवीज नहि.परंतु समभाव राखवो एटले गमे ते कार्य प्रसंगे कतृत्व अभिमान नहि करतां साक्षीभाषे वर्तवू-वर्तता रहे, एज आत्मबोध अथवा अध्यात्मज्ञान- ऊंडं रहस्य रहेलं छे. ४१ हे चेतनराय ! जो तु आत्मविज्ञान (आत्मानुभव) इ- च्छतो ज हो तो तुं पारकी भांजगड (पंचात) तजी दे, आत्मगु- णना अभ्यासवडे पोताना आत्मानेज राजी कर (संतोष आप) अने नकामी वातो-विकथा करवान पण तजी दे, गमे तेम करीने स्वात्महित संभाळ. ४२ हे विचक्षण ! (चकोर चेतन !) तुं एवं भण, एवं गण, एवं वांच, एबुं ध्यान कर, एवो उपदेश आप अने एवं आचरण कर के जेथी थोडो वखत पण तुं आत्माराममां ( सहज समाधिरुप नंदनवनमां) आनंद-अनुभव करी शके. एज त्हारो परमधर्म-पर- मकर्तव्य समज. ४३ आ प्रमाणे गुरुश्रीए उपदेशेलं श्रेष्ट तत्त्व-स्वरुप समजीने हे महाशय ! तेमां तुं प्रवळ प्रयत्न कर जेथी केवळ लक्ष्मी (सर्वज्ञता) श्री आत्मावबोध कुलक-व्याख्या. मूकीने (तजीने ) वहार फरताज रहे थे परंतु आत्मबोध-स्वस्व- रुपनी ओळखाण थया वगर तेमने मोक्ष सुखनी प्राप्ति तो थतीज नथी. ४० कदापि कोइने पण निन्दवो नहि-निंदा करवीज नहि, तेमज पोतानां वखाण करवां नहि एटले आत्मश्लाघा (स्वप्रशंसा) पण करवीज नहि परंतु समभाव राखवो एटले गमे ते कार्य प्रसंगे कतृत्व अभिमान नहि करतां साक्षोभावे वर्तवू-वर्तता रहे, एज आत्मबोध अथवा अध्यात्मज्ञाननु हुई रहस्य रहेलुं छे. ४१ हे चेतनराय ! जो तुं आत्मविज्ञान (आत्मानुभव) इ- च्छतो ज हो तो तुं पारकी भांजगड (पंचात) तजी दे, आत्मगु- णना अभ्यासवडे पोताना आत्मानेज राजी कर (संतोष आप) अने नकामी वातो-विकथा करवानुं पण तजी दे. गमे तेम करीने स्वात्महित संभाळ. ४२ हे विचक्षण ! (चकोर चेतन !) तुं एवं भण, ए, गण, एवं वांच, ए, ध्यान कर, एवो उपदेश आप अने एवं आचरण कर के जेथी थोडो बखत पण तु आत्माराममा ( सहज समाधिरुप नंदनवनमा) आनंद-अनुभव करी शके. एज त्हारो परमधर्म-पर- मकर्तव्य समज. ४३ आ प्रमाणे गुरुश्रीए उपदेशेलं श्रेष्ट तत्त्व-स्वरुप समजीने हे महाशय ! तेमां तुं प्रवळ प्रयत्न कर जेथी केवळ लक्ष्मी (सर्वज्ञता)

३२०
सुंक्त मुक्तावळी.
मेळवीने तुं जयशेखर-आठे कर्म शत्रुओनो संपूर्ण जय करनारो
थइ शके. (छेवटे प्रकरणकारे स्वनाम निर्देश करेलो छे.)
सारबोध-आपण सहुए आत्मज्ञान संपादन करवा पूरतुं
लक्ष राखqज जोइए. जेनावडे आपणा अनादि राग द्वेषादिक
दोषो दूर थवा पामे अने समतादिक उत्तम सद्गुणोनी प्राप्तिथी
आत्मारूपी सुवर्ण शुद्ध थवा पामे एवा एक पण सार वचननु
वारंवार स्मरण-रटन करवाथी आत्म साक्षात्कार थइ शके छे पण
परमार्थ शुन्य घणु भणवाथी कशुं वळतुं नथी.
इतिशम,
१
.
-
समाप्त.

Sukta Muktawli

Author
Maharaj, Vijay Kumar
Title
Sukta Muktawli
File name
Sukta Muktawli
Text
OCR done
Citation
1921
Published
2010/09
Publisher
Poona, Jain Mandal
Language
Sanskrit
Pages
349
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
326877
Barcode
99999990002442.00
Scanning centre
Banasthali University
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