Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner

Kshma Kalyan Charitram

Kalyan Ji · 2011/07

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हमारे प्रकाशन .... १. जिनगुरूगुणसचित्र पुष्पमाला २. पैतीस वोल विवरण ३. अजंना चरित्र ४. सती मयणरेहा ५. पीपध विधि (गुजराती) ६. प्रतिमा बहार ७. जिन गुरू गुरण पुष्पमाला ८. जैनाचार्य प्रतिबोधित गौत्र एवं जातियाँ ६. •क्षमाकल्याण चरित्रम् १०. चमकती दिव्य ज्योतियाँ (प्रेस में - SUSNERप्रस्तुत पुस्तक के अर्थ सहयोगी SEX खरतरगच्छ जैन श्री संघ,बाड़मे ASSAIRASARASTRIBaa पुस्तक प्राप्ति स्थान- श्री जिन हरि सागर सूरि ज्ञान भंडार जिन हरि विहार, पालीतागा-३६४२७०

(१)
मुपिहितयोगिजनानिम-. ::
पदविः परतरवराचारः।
प्रमाधम गुरूणामन्तवासी जनाधिपारोव्यः ।।
(२)
.
क्षमाधरपटतमो गरिष्ठः,
कन्यारणमूतिगुणरत्नमानिः।
श्री यमानस्य जिनेश्वरस्य,
पदप्रमायी विषुधेपपूज्यः ।।
(३)
समाकल्यागमूर्तात्मा, नित्यकल्याणकारकः ।
जय गज्जयतालप, क्षमापल्याणपाठमाः ।।
-स्व. जिनकवीन्द्रसागरसूरिः

( ii )
प० पू०, प्रातः स्मरणीय, जं. यु. प्र. भ. जैनाचार्य
१००८ स्व. श्रीमज्जिनहरिसागरसूरीश्वर
महाराज साहब
के कर कमलों में
*सादर समपंगा *
सौभाग्यसौन्दर्यगते तरूण्याः, वक्षःस्थले राजति हारयहि
तथैव श्री जोधपुरे प्रदेशे,श्री'रोहिणा'ग्राम मनोहरोऽस्ति।
श्री प्राकृतिकसौम्यसुन्दरतया ग्रामोऽति स सुन्दरः,
तस्मिन्नगरे ज्ञातवंशझुरियागोत्रे पवित्र शु
आसीत् श्री हनुमंतसिंह इति नामेन ख्यातो बहुः,

पद्धय, विभाते स्मरणीय आचार्य देव
| जिनहरिसागर सूरीश्वरजी
म. सा.

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भिनिधन प्राप्त दीपा-प्रताप, प्रीति प्रयातिप्रतिगमगानां प्राणिनां क्षमागा:॥५॥ नीति शुभ गुहसंमग नाम महंमारनं, माध्यमाणादिनीवनिपुरगो अनागमे सो हरिः । वागमनारगुरुगना सम्ममा सदगुणी, सीतामंगमानिभिकामयनं सापास मापनम् ॥६॥ श्री रराव्योमप्लोगनयने माने सहन्ये शुभे, मास्यामित स प्रसामना पासमायानाम् । या श्री जिनपूतपायकमनं गाल प्रभाते तथा, धरा दिव्यन माधिमनियरः गुरीवर यो हरिः ।।७।। यस्तु हरिसागरस्य गुमनस्यामिनरेभोः, श्रीमत्परतरसंहिते मुंगवरः प्राचागंयद्धापते । दयविधः मुगृतीयती गुण परश्चारिखनामग्गिः, निध्येण रचितम मष्णुपपदेश्टन्तु प्रभेगामुना ।।। धमाफल्याणचरितम् भक्तिभावनपासमर्पितम् भवते। . है ! हन्धि सूरीश्वर। माम् "मगि"यत् प्रकाशयान पुर्यात् ।।६।। -मणिप्रभसागरः . ।

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१९ मे :: :
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उगोभी fift.।
चातुर्माग दोगमा पाश्री गिर निगर
मणिप्रभसागरजी गे मार्गः वटा । सन विधान TEE
शिष्य भी विद्वान होते हैं। मणिप्रभगागरजी म.
साहित्य सृजन में अनुपम विद्यता रखते है। उनके पागत
पाण्डुलिपियों में मुझे यह चरित बेहद पगन्द पाया
ऐगे चरित्र की कमी का भी अहसास हुप्रा । इमी निमित्त
लेकर मेंने गुरुवर से इसके प्रकाशन की अर्ज की और
प्रसन्नता हैं कि आज उपाध्याय श्री क्षमाकल्याणजी म.

(v)
द्वारा
-
.
रा रचित संस्कृत के १२१ श्लोकों का हिन्दी में सरल,
शोधित एवं अनुवादित रुपं जो उनकी १७ वर्ष की अल्पायु
उनके जन्म दिन के अवसर पर ही यह कार्य पूर्ण हुआ
पिके सम्मुख है । इस पुस्तक को सभी प्रकार से श्रेष्ठ
रने के लिए इसमें क्षमाकल्याणजी म. सी.
चत चैत्यवन्दन भी सम्मिलित किये गये हैं।
पः पू. विदुपी आर्या श्री सज्जन श्री जी म. सा. का
गी वन्दन सहितः आभारी हुँ जिन्होंने इस पुस्तक के लिए
कथन लिख भेजा।
पुस्तक को और अधिक महत्वपूर्ण बनाने में माननीय
की अंगरचन्दजी नाहटा का विशेष सहयोग रहा। जिनके
यासों से हमें क्षमाकल्याणजी में: सी. के जीवन चरित्र के
वषय में उपयोगी 'भूमिका' स्वरूप सामग्री प्राप्त हुई है मैं
हाननीय नाहटांजी का हृदय से आभार व्यक्त करना अपना
तव्यं समझता हूँ।
आशा करता हूँ यह चरित्रे आपके लिए उपयोगी एवं
विष्य के लिए संग्रहणीय बन सकेगा।
जय वीर!
वैजया दशमी-बाड़मेर
शुभेच्छु
२०३६
बंशीधर तातेड़.
.....

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(ix)
जन का रक्षक बना हुआ है। अपनी विशिष्टता तथा
निकता के कारण श्रमण संस्कृति के सिद्धान्त विश्वधर्म
की योग्यता से समन्वित है.1
: भगवान महावीर प्रभु के परिनिर्वाणानन्तर भी
संस्कृति की पीयूपधारा को प्रवाहित करने वाले महान
न-प्रभावक प्राचार्य हुए हैं । उन्हीं का यह भगीरथ
न हैं कि आज भी वह धारा अजन्न रूप से वहती हुई
व के मानस क्षेत्रों का सिंचन करती रही है. और उन्हें
प्रमोद, कारूण्य आदि के पुष्प पत्र फलोत्पत्तिः से
न कर भाव जीवन प्रदान करती हुई अमरता की ओर
रण करने योग्य बना रही है।
उन्हीं प्रभावक पुरुषों में प्रस्तुत ग्रंथ के चरित्रनायक
महोपाध्याय श्री क्षमाकल्याणजी महाराज का भी अपना
विशिष्ट स्थान है।
....... उनके चरित्र के मूल लेखक, अनुवादक का
इस स्तुत्य है, एवं वह प्रयास स्तुत्य से उठकर अंतिस्तुत्य
अजमेर
पाश्विन कृ. १३
व. सं. २०३६
- इन्हीं शुभाकांक्षाओं के साथ,
चीर शासन सेविका
आर्या संजजन श्री

हुए.शता
दो शब्द
1
संसार एक रंग शाला है । उस रंगशाला के विं
प्रांगण में अनेक महापुरुप'जन्म ले चुके हैं।
ऐसे भी अनेक रत्नं हो चुके हैं, जिन्होने अपने व
का निष्ठी के साथ पालन किया, एवं चले गये । परन्तु
ऐसे अनासक्त योगी हो चुके है जिन्हें दिवंगत
व्यतीत हो गई, फिर भी सूर्य की
तरह उनका नाम
भी चमक रहा है, और श्रंद्धा के साथ स्मरणीय ही रह
धर्म की स्थापना तीर्थकर करते हैं किन्तुं उनके
कथित एवं प्रतिपादित सिद्धान्तों का प्रचार प्रसार
महापुरूपों की प्रोजस्वी वाणी एवं सशस्त कलम से
है। उनकी ही प्रोजस्वी वाणी एवं सशक्त कलम से
संसार के पतित प्राणियों का उत्थान हो रहा है । भान
ग्राज ऐसे ही महान पुरुषों के कारण अन्य देशों के
गौरवान्विता है। ये पृथ्वी के सूर्य है जिनमें प्रकाश में
बाग के पन्ने पाज भी चमक रहे है । परम प्रसन्नत
शिग है कि हमारे परमोपकारी श्रद्धेय गुरुदेव जिनने
को नागोग गे दीक्षित होते ही हमारा मम्बा पावर
जाता है उनका जीवन चरित्र प्रकाशित हो रहा है।
ग्रप की उपयोगिता लेगा के मधुर छन्दा
नाद लोग मारमा स्वत. गिद्ध है।
(ले० विदुषी भार्या प्रयतिनो जो श्री प्रमोद श्र
म. सा. की शिष्या प्रार्या विद्युत् प्रभाश्री)

... मिका : उपाध्याय क्षमाकल्याणजी : लैड अगरचन्द नाहटा श्वे. जैन संघ में खरतरगच्छ की सेवाएं चिरस्मरणीय गी। समय समय पर अनेक प्राचार्यो, मुनियों व श्रावकों दि ने जैनाशासन की विविध प्रकार की महान उल्लेखनीय ाये की हैं। १९ वीं शताब्दी में खरतर गच्छ एक गीतार्थ विद्वान ऐसे हो गये हैं. जिनकी समाज एवं हित्य को विशिष्टः देन रही हैं । उनका नाम है उपाध्याय माकल्यारण जी। म. नित्यानंदजी विरचित क्षमाकल्यारंग चरित (संस्कृत (घ) के अनुसरि आपने बीकानेर के समीपवर्ती गांव केसर- सर के प्रोसवाल वंशीय मालु गौत्र में सं6: १८०१ में जन्म हण किया था जन्म नाम खुशालचन्द था । । क्षा नित्यानन्दजी के लिखित चरितानुसार आपने संवत् १८१२ ग्रहण

(ii)
में अमृतमजी रो दोधा गागा की। परीन:
अनुगार सं० १८१५-१६ भागनदी :
प्रासाद बदी.२ जैसलमेर में गार गनानायो ।
सूरिजी के समीप मापने दीक्षा ग्रहण की थी। प्राण
प्रतिबोधक पीर गुण्यानक श्री अमृतधर्मजी थे । प्रा
शिष्य से प्राण प्रसिद्ध है।
(1) जिन
-गुरु-परम्परा-
श्री जिनभक्ति सूरिजी के प्रीतिसागरजी नामक
थे, उनके विद्वान शिप्य अमृतधर्मजी थे जिनका उसमें
किया जा चुका है । क्षमाकल्याणजी उन्हीं के सुणिप्य
अव उपरोक्त तीनों का संक्षिप्त परिचय दिया जाता
भक्ति सूरि-
जिनसुखसूरि के पट्ट पर श्री जिनभक्ति सूरि पासीन
इनके पिता सेठ गोत्रीय साह हरिचन्द्र थे, जो इन्द्रपा
नामक ग्राम के निवासी थे। इनकी माता थी हीरसुर
सम्वत् १७७० ज्येष्ठ सुदी.तृतीया को आपका जन्म
था। जन्म नाम आपका भीमराज था और सम्बत् १
माघ शुक्ला नवमी को दीक्षा ग्रहण करने के बाद
नाम भक्ति क्षेम डाला गया। सम्बत् १७८० ज्येष्ठ

(xiii) के दिन-दिनसीपुर में श्री संघाकृत महोत्सव से गुरु- पने हाथ से इन्हें-पट्ट पर बैठाया:था । तदनन्तर ग्रा- देशों में विचरण किया । सादड़ी आदि नगरों चयों को (हस्तित्रालनादि प्रकार से !:]) परास्त जयलक्ष्मी को प्राप्त करने वाले, सब शास्त्रों में श्री सिद्धाचल आदि सब महातीर्थों की यात्रा करने श्री गूढा नगर में अजित-जिनचैत्य के प्रतिष्ठापक वी, सकल विद्वज्जन शिरोमणिं प्राचार्य श्री जिन के (श्री राजसोमोपाध्याय श्री' रामावजयोपाध- श्री प्रीतिसांगरोपाध्याय यादि कई शिष्य देश मंडन श्री मांडवीविंदर में संवत् १८०४ में चतुर्थी को दिवंगत हुए। उस रात्रि को आपके र की भूमि (श्मशान) में 'देवों ने दीपमाला की सागरजी जाता है कि आप संविग्न पक्षी (वैराग्यवान् यति), दी सूचीके अनुसार सं० १७८८ में आपकी दीक्षा पिका जन्म का नाम प्रेमचन्द या । सं० १८०१ नभक्ति सूरि के साथ,' श्री जिनला सूरि के सं० सुजनगर, सं० १८०५ में गूढा, सं१८०६ में आप भी साथ थे। संवत् १८०८ काती वदी १३

( xiv )
बी
.
वीकानेर में पाप स्वर्ग सिधारे । पापकी पादुनाणं ज
की
अमृत धर्म स्मृतिशाला में प्रतिष्ठित है (दे. हमारा
ने जैन लेख संग्रह २ (४४) इसके अतिरिक्त आपके -
में ज्ञातव्य अन्य कोई प्रमाण नहीं मिला। सं० १९७५
सर वदी १४ का पापको लिखित प्रति क्षमा कल्याण म
में है।
(३) वाचक अमृतधलं जी
कच्छ देश के प्रोशवंशीय वृद्ध शाखा में आपका
हुअा था । आपका नाम अर्जुन था । दीक्षा सं० १०
फागण सुदी १ में जिनलाभ सूरिजी ने भुज में दी। शन
यादि तीर्थो की आपने यात्रा की थी। सिद्धान्तों के य
द्वहन किये थे । आपका चित्त संवेग रंग से प्रापूरित थ
फलतः आपने
ग्रहण किये थे जिसका विव
नियम पत्र में मिलता है । उसके अन्त में लिखा है कि स
१८३८ माघ सुदि ५ को आपने सर्वथा परिग्रह का ।
कर दिया था।
सम्बत् १८२६ में श्री जिनलाभसूरिजी ने अपने पास बु
कर सं० १८२७ में आपको वाचनाचार्य पद से
किया था । इसके बाद यानि सं. १८२६ से १८४० -
कुछ नियम

(xv) छनायक श्री जिनलाभसूरि और श्री जिनचन्द्रसूरिः रहे थे। संवत् १८४३ में आप पूर्व प्रान्त में पधारे हां के पवित्र तीर्थों की यात्रा की एवं धर्म-प्रचार वहां आपके उपदेश से कई नवीन प्रासाद बने थे । पर स्वर्ण के दंड-ध्वज-कलशादि चढाये गये थे। १८४८ में पटना में सुदर्शन श्रेष्ठि के देहरे के समीप वेश्या की) जगह २००) में जमींदार से खरीद की ह में स्थूलिभद्रजी की देहरी भी आपके उपदेश से [ । आपने ही उसकी प्रतिष्ठा की थी। सम्वत् १८५० निर चौमासा किया। सम्बत् १८५१ में जैसलमेर स किया और वहीं माघ सुदि ६ को आपका स्वर्ग- या । आपका रचित 'विशेष संग्रह संक्षेप" व कई दि और कई लिखित प्रतियां बीकानेर के ज्ञान भंडारों त हैं। लमेर में "श्री अमृत धर्म स्मृति-शाला' है। उसमें क्ति सूरि, प्रीतिसागरजी वं अमृतधर्मजी की पादुकाएँ मृतधर्मजी सम्बन्धी क्षमा कल्याण रचित व लिखित * वाला लेख विशेष महत्व का है (देखिये हमारा तेर जैन लेख संग्रह लेखोंक २८४१) उपरोक्त अष्टक ऐतिहासिक जैन काव्य संग्रह के पृष्ठ ३०७ पर भी का है।

( xvi. )
विद्या गुरू-
आपका विध्याध्ययन उपाध्याय राजसोम और ३५
रूपचन्द (रामविजयजी) के तत्वावधान में हुआ था
समय ये दोनों पाठक.बडे प्रख्यात विद्वान थे. इनक
जात संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-
उपाध्याय राजसोमजी-
खरतरगच्छ की क्षेमकी निशाखा में १८.वीं,श
उ० लक्ष्मीवल्लभ अच्छे विद्वान और सुकवि, हो.ग
उनके गुरू भ्राता वाचक सोमहर्षजी के शिष्य वाचव
समुद्र के शिष्य उ० कपूरनियजी के श्राप शिष्य थे।
१७५४ में आप दीक्षित हुए.! जन्म नाम: राजू,था
१८०१ के पूर्व प्रापको गच्छसायक की ओर से उपा
प्रदान किया गया था । सम्वत् १८२५ में अाप तत्कार
समस्त उपाध्यायों में वृद्ध होते के कारण 'महोपाहर
से समलंकृत:थे ।.
- आपकी शिष्य परम्परा. १९८० तक अविछिन्
श्रा,रही थी, अब कोई विद्यमान नहीं रहा. 1 आपले
कृतियें इस प्रकार है-

XVII
P0
m
2
RTERri (:)
श्रुतज्ञान पूजा (संस्कृत
सिंद्धाचल स्तवन, गा० ४० सं०१७६७ फा०व०७
नवकार वाली (१०८ गुण) स्तवन
सांगानेर पद्मभास्तवन गाता ::
उंदरारांसों; गाथा ३४. minine
ग्रहलाघव सारणी टिप्पणी (पत्र) Flor or
सम्वत १७६४:१८०४ में लिखित प्रापकी प्रतियें भी
गनेर भण्डारी में है । Time (THREE : F. Pit
ध्याये रामविजयजी(रुपचन्द):-
(TETAILS
खरतरगच्छ की.क्षेमकीति शाखा में कविवर : जिनहर्ष
वीं शताब्दी के प्रसिद्ध कवि हो गये है। उनके शिष्य
चिन्द(सुखवर्द्धन) के शिष्य दयासिंहदी के आप सु-
य संस्कृत, प्राकृत, राजस्थानी एवं हिन्दी भाषा के
सुकवि और मर्मज्ञ विद्वान थे । आपके रचित कृतियों
संक्षिप्त सूची ईसें प्रकार है-TE F = }
(ARIET Fird' TREETI
11) मत हरि-शतक वय-वालावोथ-सम्वत्-१७८८-.....
तो वदी १३ सोजत में रचित (अभयसिंह राजा के मंत्री
जेड़ गोत्रीय जीवराज' के पुत्र मनरुप के प्राग्रह से)

पागतात) २
.
संवत् १५FIPTET.वीकानेर
( xviii)
(२) गणरा नालासोगा ? 3:१ :
वन शुगला १५ (उपरोत गंगो
पुन
(३)समयगार (नाटा) वालागयोग-गंगा .
आश्विन, स्वर्णगिरी [गणगर (गोपा) गोडीग
हेतवे प्रकाशित
. :(४) गीतमीय : महा काव्य ( ११.सर्ग )सं० १
जोधपुर (रामसिंह राज्ये) प्रकाशित : ; : ...,
(५) गुणमाला. प्रकरण, संवत् १८१४ (. ..
सूरि की आज्ञा से)
(६) चिसेन पद्मावती चौपाई संवत् १८११
(५). चविशति दिन स्तुति पंचाशिका (गाथा
१४ भाद्रवा.
(८) भक्तामर टवाः संवत्-१८९१ जेठ,
काला ऊना (शिष्य पुण्यशील* विद्याशील के आग्रह ने
*संवत्-१६३३ श्राव-म०.५ मुनरा बंदरा में !
पास कई नियम ग्रहण किये थे ....
TIFI

ही) नतत्व टवा-संवत् १८३४, अंजीमगज, सवल- नाथ। ००० १.) लावू यात्रा-स्तवन सम्वत् १६२१ (जिनलाभ र ८५ यतियों के साथ) ११) फलोधीमावास्तवन-संवत् । १८२३ मिगसर (जितलाभ सूरि साथ):- २३. साधु ससातारी संवत् १११ (शिष्य, विद्या- प्रजार्थ) : FIRST (:: १३) नेमि नव रसो!! mi ::) १४ सिद्धांत: चंद्रिका वृत्ति (सुबोधनी पूर्वाद्ध) FE TITEffin ! (१५): अल्पावहुत्वा स्तवन गाथा १४.११) (१६) साध्वाचार पत्रिशिका : 15 (१५)विवाह पढल भाषा (पत्र) (वीरीयु स्पिष्टीकरण से १८३४ प्रा० सु० ता नागोर (?) जयदत्त के पत्र में अभप्रस्थेन श्री.पाठक: रुपचंद्रारक पटु सहस्त्र प्रमिता चंद्रिका वृति लिष्यतिबीकानेर तसे पं देवदाति :

(१६) पानि सोक (17 १ महिमा भनि
गाथा)
(२०) नेगि नाम माला भाग दी गं
स्थान काला ऊना
..(२१) लपुस्तय टच्या, सं० १७६८
(२२) सप्तश्लोकी टवा, सं० १८३१, पाली
-T7 (२३) सनिंपातकलिका टवा, १८३१, पाली
(२४) कल्पसूत्र बालावबोध सं० १८११, यं
(२५) मुहूर्त मणिमाला सं० १८०१ (?)
((२६) समुद्रबद्ध, कवित सं० १७६७, बोला
(२७) गौड़ी पार्श्व छद गाथा १२३
(२८) जिन सुख सूरि मजलस सं०१७७२
(२६) कल्याण मन्दिर टब्बा, सं१८११
(३०) दुरियर स्तोत्र टका सं० १९१३ विल
० रुपचन्दजी के सम्बन्ध में मेरा स्वतन्त्र शेख..
व सप्तसिंधु में छप चुका है।
-अन्य साधनों से ज्ञात होता है कि सम्वत् १
पूर्व प्रोपको वाचक पद् प्राप्त था और सम्वत्
उपाध्याय पद से अलंकृत हो चुके थे सर्वत् १८१
तक प्राप जिनचन्द्रसूरीजी के साथ ही बिहार में रं

(xxi) प्राध्ययन- मेरे अनुमान से संवत् १८१८-२२ 'तक आपने उपा- । राजसोमजी के पास विद्याध्ययन किया। फिर राम य जो श्री'जिनलाभमूरि के साथ थे उनके पास संवत् १५ तक या पीछे भी विद्याध्ययन किया होगा । सम्वत् १८२६ से १८४० तक वाचक अमृतधर्मजी श्री लाभ सूरिंजी एवं श्री जिनचन्द्र सूरिजी के साथ विचरे यथासम्भव आप उस समयं भी अपने गुरु के साथ थे। जनलाभ सूरि के बिहार स्थानों के के लिये 'ऐतिहासिक काव्य संग्रह में ३४ दोहे पृ० ४१४-१६ में छप चुके हैं। म्वत् १८२४ में बीकानेर में थे । तदनन्तर १८२६ से १३ तर्क गुजरात-काठियावाड़ ' घूमै । सम्वत् १८३४ व मारवाड़ के तीर्थों की यात्रा करके सं० १८३६ से तक पाप जैसलमेर में रहे। विद्याध्ययन के अनन्तर अधिकांश अपने गुरु वाचक अमृतधर्मजी के साथ ही हार करते थे। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है। बत् १८४३ में पूर्व देश की और विहार भी आपने अपने श्री के साथ ही किया था। सम्बत् १८४३ में बालचर

।
पूर्व प्रांत में ही
.
गोचर होता है। इसके पश्चात् वहां से विहार कर
(सम्वत् १८५९:म) पधार गये थे। सम्वत् १८५०
(xxii)
में आपका चौमासा हुआ । और वहां भगवती जैसे
गम्मीर सूत्र की वाचना (व्याख्यान) की थी। सम्वत
तक आप अपने गुरु श्री के साथ
करते हुए धर्मोपदेश व धर्म प्रचार करते रहे । पूर्व
में विहार करने से आपकी भापा में हिन्दी का प्रभाव
चातुर्मास बीकानेर कर सम्वत् १८५१ का
गुरु श्री के साथ ही जैसलमेर किया और वहीं सम्बत् ।।
माघ शुक्ला ८ को वाचक अमृतधर्मजी का स्वर्गवास
इसके पहले पीर पश्चात् आपने अनेकों स्थानों में
कर धर्म प्रचार किया, ग्रन्थ निर्माण किया, तीर्थो
यात्राये की, जिनालय, जिनविम्वों की प्रतिष्ठायें की।
संवतानुक्रम से भिन्न भिन्न सूचि-मय निर्देश किया गया
अतः यहां समुच्चय आदि से आपके विहार की सम्वत्ता
रो यथाज्ञात सूचि दी जाती है जिससे आपके उद्यत
का भली-भांति परिचय मिल जायगा।
चातुर्मास
।
प्रब रां० १८२८ से आपके विहारानुक्रम को सूचि
जाती है-

(xxili)
(१८२४ बीकानेर (क्षमाकल्याण लिखित प्रति)
१८२५ पार्श्वनाथ यमक बद्ध स्तव
१८२६ माधव वदि ३ शंसेश्वर यात्रा स्तवन
१८२७ माधव सुदि १२ सूरत, शीतल गिन स्तवन
१८२८ (सत्यपुर), तर्क संद्रह फक्तिका
१८२६ चेन बहुल, राजनगर, भू धातु वृति
१८२६ राजनगर, गौतमीय काव्यवृति प्रारम्भ ।
१८३०फागरण सुदिर,जोरणंगढ़,खरतरगच्छ पट्टावली।
घोचा स्तवन
.
१८३० पो०
१६३१ मांडवी
--
१८३३ सायण सुदि ५, मुनरावंदिर, क्षमाकल्याण
पाश्र्वे पुण्यघोर नियम ग्रहण
१८३३ काती सुदि ५, मनरावंदर, में स्वयं लिखित
प्रति
१८३४ जेट सुदि १ अावू यात्रा स्तवन
१५३४ वैशाख वदि ५ महेवा यात्रा स्तवन
१८४५ नभ-सुदि ५, पाटोधी, चौमासी व्याख्यान
१५३६ फागरण वदि ,लोद्रवा स्तवन
१८३८ जैसलमेर श्रावक विधि प्रकाश
साधु विधि प्रकाश

(xxiv),
१.८३६ नभ मुदि. ५, यशोधर चरित्र, जेसलमेर
१८४२ बालूचर चौमासा, भगवती सज्झाय
१८८३ फागण वदि ११, समेत.शिखर यात्रा
१८८४ वैशाख मुदि ५, बालोचर,
सम्भव
-
f.
प्र
.
चौपई
"
१८४४.भादमा वदि ७ वालोचर, अमृतक्षमा.
१८८५ माघ.मुदि ११ महिमापुर, सुविधि स्तव
१८४७ माघ बदि २ प.वापुरी यात्रा स्तवन
१८४७ माधब मुदि ५ महाजन टोली. पार्श्वस्त
१८४७ विजय दशमी महिमापुर, थावच्चा.
श्रु० बहल ११ मकसूदाबाद, मुक्त रत्नाव
१८४८ चं. मुरि पानीपुर तीर्थयात्रा स्तव एलोप
१८४८ पादलीपुर म्यूलिभद्र थापना मभाय गाथ
१८४८ काती वदो ५. पटना, अमृत धर्म क्षमा ।
१८४८ पो गुदि १५ पायापुरी हरजीलाल मुन
महायात्रा सावन
१८८८ विपुलाचन अहमता स्थापना गयुक्त ७
१८५० मा गुदि १, बीकानेर
10 भादवा , बीकानेर
१९५० नागरिक, बीकानेर, गाय विचार वृति
पन

{xxv))
शासाठं वैदिजेसलमेर के लिये प्रोदेश पत्र
१८५२ नभ सुदि ११, जैसलमेर,गौतमीय काव्य टीका
१८५३ श्रावण सुदि १, बीकानेर पत्र
१८५३ वैशाख वदि १२, बीकानेर प्रश्नोतर सार्द्ध
.
शतक भापा
१८५४ मिगसर सुदि । ६: गिरनारस्तव, घाणेराव
संघ सह
पत्र
१६५४चत्र सुदी ६ शत्रुजय स्तवन
१२५४ सा• सुदि ३, पालीताणा, अम्बड चरित्र
१८५५ भादवा सुदि ११ सूरत
.१८५५ फागण वदि १२ श्रीपुर अंतरिक्ष स्तवन
१८५६ जेठ सुदि.१३. नागपुर चित्य.वंदन: चोवीसी
१८५६ भादवा सुदि. १५ नागपुर: से: वाचकः नमा-
कल्याणजी का पत्र।
१७५5:जेठ वदि.४, जसलभैर, जितहर्ष सूरि पत्र
१९१८ भादवा, सुदि १०, बीकानेर
१८५८ चैत वदि.१० लोद्रवा स्तदन,
१८५६ जेसलमेर विज्ञान-चन्द्रिकाः
१८६० श्रावण सुदिरचीकानेर, जैसलमेर अष्टाह्निका
...व्याख्यान
".
i

. - (xxvi) १८६० फा0 सु० ७, बीकानेर, जैसलमेर अावेदन १८६० पो० वदि १.१, जैसलमेर । १८६० वैशाग्य सुदि.७, देवीकोट स्तवन, . १९६१ यापाढ़ सुदि: ६, बीकानेर ".. १८६१ माघ वदि ११, देसगोक, प्रतिष्ठा १८६१, फागण सुदी २, जयपुर, सुपार्श्व स्तवन १८६२ पा० सुदि १५, जयनगर, पत्र में उल्लेख १८६२ चैत सुदि ८, जयपुर, क्षमाकल्याण " . " . -- लिखित " . . १८६६ फाल्गुण सुदि १५, शंखेश्वर मारवाड़ ... संव सह यायावर १८६६ चैत सुदि १५, गिरनार स्तवन १८६६ काती जय नगर (श्रा० वत ग्रहण) १८६६ साख सुदि २, शत्रुजय यात्रा स्तवन १८६७ फागण वदि १३ कृष्णागढ़ । १८६७ मा ....... वन'सुदी ५, पाली,' १८६७ माघ । मंडोर प्रतिष्ठा स्तवन १८६७ ग्राश्विन , पत्र: १८६७ फागण मुदि ८ किशनगढ़ पत्र १८६८ चैत मुदि ८ किशनगढ़

1)
.
.
•..
१८६८ भादवा व. ३ किशनगढ़
१८६८ वैशाख वदि १४, जोधपुर गोडा दुखने का पत्र
१८६९ जेठ वदि ३, देशणोक
पत्र
१८६९ पो वदि , बीकानेर
".
१८६६ माघ वदि , देसणोक,
८६९ मिगसर वदि १०, बीकानेर,
१८७० श्रावण सुदी ११, बीकानेर,
१८७० फागण सुदी १०, देसणोक
१८७० वैसाख सुदी ८, अजमेर
१८७० भादवा सुदी ७ बीकानेर
८७१ माघ सुदी ७ वीकानेर ,
".
२७१ भादवा बंदी २ बीकानेर
•७१ मिगसर वदी ८, बीकानेर
१८७२ भादवा वदि १२, बीकानेर
१८७२ मिगसर वदी १४, बीकानेर
१८७३ मि० व० ८, बीकानेर
१८७३ जेठ वदि २,
७३ आ० वदि १४,
पद प्राप्तिः-
वत् १८५५ में गच्छनायक जिनचन्द सूरिजी ने
-
19

जिनचन्द सूरिजी का सम्वत् १८५६ में स्वर्गवान (xxviii) आपको अपने निकट बुलाकर 'बाचक' पद प्रदान उपाध्याय पद प्राप्ति । के अनन्तरं श्री जिन हर्पसूरि उनके पद पर स्थापित गये। उन्होंने गच्छा में आपकी योग्यता सविशेष देख । १८५८ के पूर्व) आपको उपाध्याय पद से. अलंकृत नि सम्वत् १८५८-५६ में आप गच्छ नायक के साथ जैन में ही थे। ग्रन्थ निर्माण- व्याकरण, न्याय प्रादि में प्रापका अच्छा पांडिय ही पर जैन सिद्धांतों (आगमों के गूढ रहस्यों को भी में आपकी असाधारण गतिं थी। खरतरगच्छ में उस : आप सर्वोपरि गीतार्थ माने जाते थे । अनेकों विद्वान प्रश्नों या सन्देहों का समाधान प्राप से करते थे नायक प्राचार्य भी प्रापको सैद्धान्तिक सम्पति को.' समझते थे। कई यतियों ने आपके पास , विद्याध्ययन पांडित्य और गीतार्थता प्राप्त की थी। प्रश्नों के सम उत्तर देने में या निराकरण करने में पाप सिद्धहस्त ।

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स्तवन गाथा १८५५ फाल्गुन कृपणा १२, श्रीपुर-, अंतरिक्ष "८२६ ज्यप्ठ शुक्ला १३, नागपुर, चैत्यवंदन- (xxxii) जिन नम १८५८ चैत्र वदि १. लोद्रवा, पार्श्वनाथ स्तवन १८५६ जैसलमेर, विज्ञान चन्द्रि १८६० सूचि (श्रावण) सुदि २, जैसलमेर, अ व्यात १८६० फाल्गुन शुक्ला ११, बीकानेर, मेरू, अक्षय तृतीया होरिका व्या १८६० नैणाग णुाला ७, देशीकोट, पण ( १५६१ गाप गुगला ५, देशनोक मुविधि । १:३१ गुणाला २, जयपुर, गुगारांना १२. णना ११, शोर, न गरधा गर गह ..... म, गिरनार नमिमान प्रक गाजिदीपा गमागम 11. मला नागा मा गद गाना

(xxxiii)
८६६ वैशाख सुदी २, शेत्रुजय स्तवन गाथा १५ प्र०
८६७ माघ वदिः ६, मंडोवरे, पाव प्रतिष्ठा
स्तवन प्र०
5६६ विजय दशमी,वीकानेर, श्रीपाल चरित्र वृति
ग्र०५०२२ प्र०
१८६६माघ शुक्ला १३, अजमेर, संभव (प्रतिष्ठा)
स्तवन प्र
१८७१ माघ सुक्ला १, बीकानेर, सुपाव (प्रतिष्ठा)
.
'..
स्तवन प्र०
१८७३
बीकानेर, समरादित्य, चरित्र
(अपूर्ण)
समाकल्याणजी के रचित-संस्कृत और राजस्थानी की
'लधु रचनाए महिमा भक्ति ज्ञान भंडार में है इनमें से
दि का एक संग्रह ४० वर्ष पूर्व श्री हरिसागरजी ने
न्दन स्तवन संग्रह के नाम से प्रकाशित किया था। ,
बिना संवत के उल्लेखनीय ग्रन्थ
जिन स्तुति श्लोक ७७ ग्रन्याग्रन्यू १४८
चतुर्विशंति चैत्यवन्दन (श्लोक७३) २
प्रतिक्रमण हेतवा भापा, विक्रमपुर

(xxxiv)
है
४)
५)
प्र
६)
७
१
श्राद्ध प्रायश्चित विधि, बालूचर
पर समयसार विचार संग्रह (?)
विचार शतक बीजक
जयतिहुअण भापा बद्धकाव्य, पद्य ४१, म.
(कातेला
गूजरमल भ्राता तनसुख
हित शिक्षा द्वात्रिशिका (सं. १८६८ पूर्व)
संग्रहणी सपर्याय (प्रति महिमा भक्ति भंडार
पार्श्व स्त्रोतवृति आदि
८)
६)
१६)
..
अनुपलब्ध
१ चौबीसी काव्य की गेय पद्धति
२ पंच तीर्थी स्तोत्र
३ प्रश्नोत्तर शतक
४ नग्न पाखण्ड मत स्वरूपाप्टक
५ मुक्तावलि फविकका प्रश्न
६ समाप्ततंत्र सेग
७ मूक्ति रत्नावली भाषा
८ अलोयगा विधि भाषा

(xxxv)
"".
चौबीसी यति
(उल्लेख पुगनी ग्रन्य मुनी में)
तिष्ठाएं
1. : प्रापने अनेक जिनालय व जिन-विनों की प्रतिष्ठा
थीन में कतिपय ये है
) १८४४ वैगाम मुझे ५. जीमगंज, मंगय
) सं. १८४५. माय गुदि ११, महिमापुर, मुषिधि
) मं १८४३ यशान गुदि ५, महाजन टोली, पान
:). १८८८ पालीपूर, रमित स्यान
.)सं. १८६० गारर मुदि ७, देवीट, अपन
1). १८६१ माघ गुदि ५, देगलोर मुधिषि
3.) सं. १८६६ माप सुदि १३. प्रगगेर, संजय
:) सं. १९७१ माप गुदि ११ बीकानेर, मुहावं
1). १८६८ शाम मुदि १२, नागपुर,
१०). १९६७ मा, मंदोदर,
प्रायन प्रतिनिॉर मनी परत है।
बत ग्रहण
RAN

(xxxvi)
किये थे जिनमें से कुछ ये है-
..
मूलचंदादि
१) संवत् १८३३ श्रावण सुदि ५, मनराबंदिर, पं. पुण्य
गणि नियम पत्र
२) संवत् १८४७ मिगसर वदि : ५, श्रावक
आपका नित्य स्मरण करने का
३) संवत् १८५० आपाद वदि १३, श्राविका लालां बा
४) संवत् १८५० फाल्गुण वदि ३, श्राविका फूलां बाई
५) संवन् १८५६ पापाढ़ सुदि ५, श्राविका चम्पेली
१८५४ अ. व. जयनगर सुराणा मगनीराम यत:
६) संवत् १८६६ काती जयनगरे, बाफरणा गोडीदास
परमानन्द १२ व्रत।
१८६६ जे, वः ३ सिद्धि लूणिया तिलोकचन्द
'व्रत ग्रहण
७) संवत् १८६६ मिगसर वदि १०, बीकानेर, श्रावि
चंपा
तीर्थयात्रा-
-
पापके रचित स्तवनादि से प्रापने अनेक तीर्थो
यात्रा की, ज्ञात होता है जिनमें मुख्य ये है-
-

(xxxvii)
!) 'शत्रुजय सम्बत् १८५४ चैत्र सुदि ८, सं. १८६६
खि सुद २
२) गिरनार सवत् १८५४ मिगसर सुदि ६ सवत् १८६६
चंत्री पूनम.
३) श्रावू, सं० १८३४ जेठ सुदि १
४संलेश्वर, सं० १८६६ फाल्गुण सुदि. १५, सं० १८२६
घ वदि ३
५) नाकोड़ा (महेवा) संवत् १८३४ वैशाख वदि ५
६) घोघा नवखंड पार्श्वनाथ सवत् १८३०
७) लोवा, संवत् १८३६ फाल्गुन वदि ६, सवत्त् १८५८
८) पावापुरी, सवत् १८४७ माघ वद २ सवत् १८४८
पौ मुदि १५
६) सम्मेत शिखर, सवत् १८४३ फाल्गुण बदि ११
१०):श्रीपुर अतरिक्ष पाश्र्वनाथ, सयत् १८५५ फाल्गुन
*दि १२
११) जैसलमेर, देवीकोट, जोधपुर, अहमदाबाद, सूरत,
लुचर, महिमापुर, पाडलीपुर, महाजनटोली, मकसूदाबाद,
सगोक, बुरहानपुर, अजमेर, दिल्ली, अजीमगज, फलवृद्धी
भात, गौड़ी, जीरावली,पावं, क्षत्रियकुड, राजगही
आदि स्थानों की यात्रा भी स्तवनों से भलिभांति सिद्ध है।
-4
1
.
.

रेल्वे हाग पर्यटन प्रारम्भ होने के पूर्व शत्रु (xxxviii) गिड़िये राजराम संघवी लूणिया का संघ- तोर्यो की पात्राए करना अति दुष्कर था । जब कभी धनाढ्य लाखों रुपयों का खर्च व मार्ग का पूर्ण की योजना करता तभी ये यात्राएं की जा सकती थी। मुअवसर बहुत समय के पश्चात और महान् पुण्य प्राप्त होता था। अत: उस समय सभी धार्मिक सम्मिलित होकर यात्रा का परम लाभ प्राप्त करने को नहा करते थे। महीनों के महीनों मार्ग में व्यतीत हो उस समय के धामिक जनों के तीर्थ यात्रा के भावोलल अाज पना करना ही कठिन हो गया है। पूर्ण प्रबन्य गंधपति शुभ मुहर्न निश्चित करने के बाद श्र ''यी ग्थानों में आमन्त्रण पत्रिकाए भेज मान के भावुर जन हमारों की ही नहीं पर ल inा में कम हो जाते । सा-माध्वियां भी गोमाग की गंगा में पास होते । दूरवर्ती (र T) मांगे पायोटा गंध लेकर (xxxix) तानुसार बड़े संघ के साथ सम्मिलित होते । इस एक बड़े संघ के साथ अनेकों स्थानों के सैकड़ो या छोटे छोटे संघ मार्ग में प्रांकर सम्मिलित हो जाते। संवत् १८६६ में भी ऐसा ही. विशाल संघ सघवी चद लूणिया और जोधपुर निवासी राजाराम गिड़िये पतित्व में निकला था। उसका ज्ञातव्य संक्षिप्त वृतांत कार है :- जयपुर से पं: चरित्र विजय पं. चरित्र नन्दन आदि ने पुर के वाचनाचार्य चन्द्रभारंगजी को संवत् १८६५) वदि १ को पत्र दिया उसमें लिखा है कि- तथा इहां थीं श्री सिद्धाचलजी की यात्रा निमित्ते संघ हज़ार १० या १५ लोक हुसी। उपाध्याय श्री क्षमा- गजी जावसी और पिरण बीकानेर रा साधु वर्ग: जाव- अर म्हारे पिण परिणाम है जी । पर तुम्हारे पत्र निस्तूक पडसीजो । अर आपरे पिण यात्रा रा परिणाम हो मगसर सुद्रि ताई तथा ११ तांइ आया रहिज्यो साथ हगाम रो छ जी । सिंघवी तिलोकचन्द लूणिया राम गिड़ीया जोधपुर वालों एवं दोय जणां सिंघ ने सैं । लाख रुपोरणा तेवड्या छे जात्रा निमते सो

मिगसर वदी २ के रोज तो सर्व सहर निजीक है
(xxxx)
कंकोत्री मेलसी अर पोह सुदी १५ किसनगढ सुचा.
भूला पाली होसी तिहां सु माह सुदी ५ मी पाली में
चलजी नै गिरनारजी प्रमुख कु विदा होसी जो !
श्रावक श्राव (कणी घणा साथ होसी जी ।
(पत्र के ऊपर)
उपाध्याय श्री क्षमाकल्याणजी गरिग की वंदन
ज्यो पर कह्यो छ श्री सिद्धगिरिजी रा यात्रा सा
आवेज्यो।"
पत्र हमारे संग
..
उपाध्याय क्षमाकल्याएजी रचित शत्रुञ्जय
ज्ञात होता है कि-
जयपुर के बोहरा धर्मसी के पुत्र कपूरचन्द
परिवार एवं स्वधर्मी केसाथ संघ प्रयाण कर किश:
विशाल संघ के साथ या मिले, मार्ग में श्री गि
पार्श्वनाथ एवं फलवर्दी पार्श्वनायजी की यात्रा की
भनी पूजा की।
मथर प्रान के फलवद्धि नगर निवासी रा

.(xxxxi) गड़ीया राजाराम एवं संघवी तिलोकचन्द लुणीया काला । कुकमपत्री भेज संघ को आमन्त्रित किया। प्रथम रथ जात्रा की वहां मिरजापुर, जयपुर, 5, बीकानेर, मेड़ता, सौझत, नागोर, जैसलमेर, पाली, जालोर, पालणपुर, भिनमाल के संघ त हुए । मार्ग में जिनदर्शन, चैत्योद्धार, देव द्रव्य धर्म प्रभावना करते हुए पाटण पाये । वहां ख्य आपके संघ सन्मुख आये और संघ ने वहां न,देव-द्रव्य वृद्धि की। वहां के शंखेश्वर पार्श्वनाथजी गुण सुदि १५) यात्रा की। पाटण, राधनपुर, अह- का संघ भी साथ हो गया और गिरनार पर संवत् के चैत्र शुक्ला १५ को सर्व संघ ने यात्रा की। इस वरतर भट्टारक श्री जिनहर्ष सूरिजी, खरतराचार्य चंद सूरिजी, (उपकेश) कंवले थी पूज सिद्धसूरि सम्भवतः पाली के खरतर श्री पूज्य कुल ४ प्राचार्य समाकल्याण जी मुनि साथ थे । हाथी, घोड़े, रथ, नेक साथ थे और संघ को रक्षा के लिए सैनिकों का न्धि था। र्ग के जिन मन्दिरों के दर्शन और धर्म प्रभावना करता

(xxxxii)
हुअा संघ शत्रुञ्जय के समीप पाया । गिरिराज को
1
M
दर्शन होने मात्र पर माणिक मोतियों से बचाया,
आने पर खूवं महोत्सव हुमा
और वैशाख शुक्ला
ने थी शत्रुञ्जय तीर्थाधिराज की यात्रा कर अपने
कृत्य माना।
इस संघ का वर्णन जसराज भट ने निमार्ण
दे० मुनि हजारीमल
इन दोनों संवधियों के विषय में प्रोसबाल
इतिहास में लिखा है कि
राजाराव गिडीया
(पृ० ६५३) "गिडोया परिवार में सेठ रा
गटिया जोधपुर में बढ़त
नामी
माहकार हुए ! इ.
१८७२ में मोरगा को गिट्टा चकाने में समर
मागितगी को बहुत गली मार दी थी।
MT TET पिणाल गंध भी निलगा था।'
है
है
गगनको र निवासी श्रीराम
f.nif. जिम काराग, भान पर
'... मुन की यायोगापार मा
.! दारानगे। पं

भी
.
.
(xxxxiii)
आपने नवीन पार्श्व जिनालय भी बनाया है और
प्रतिष्ठा भी उपाध्यायजी के हाथों से ही सम्वत्
। माधवः "को कराई थी। यह उन्हीं के रंचित
से स्पष्ट है । सम्वत् १८६८ के वैशाख शुक्ला को
र में उपाध्यायजी ने प्रतिप्का कराई थी.
वह
तः इन्हीं के निर्मित जिनालय की होगी । यथा स्मरण
'गिरनार के पगथिये भी बनवाये थे जिसका. शिला
हिां रास्ते में लगा हुया है।
की तिलोकचन्दजी लेणीया
आपके विषय में प्रोसवाल जाति के इतिहास में लिखा
(पृ०३३४) “सेठ तिलोकचन्दजी ने अजमेर से शत्रु-
का संघ निकाला । यह संघ हजारों श्रावक, सैकड़ों
पाध्वियों तथा फौज पलटन इत्यादि से सुशोभित था।
घ के निकालने में आपने हजारों लाखों रुपये खर्च
थे। उस समय शत्रुजयजी के पहाड़ पर आगार-शाह
का बहुत उपद्रव था जिससे
शगुब्जय
की गामा बन्द
ई थी पापने ही सबसे पहले इस यात्रा को पुनः चालू
'। इसके स्मारक में आज भी उनके लूगीया वंशज
और के नाम की एक सफेद चादर चढ़ाते हैं। सेठ

-- सेठ थान (xxxxiv) तिलोकनन्दजी लूगीगा के हिम्मतरागजी तथा मुः।" नामक दो पुत्र हुगे । इनमें सेठ हिम्मत रामजी के गां. तथा जेठमलजी नामक २ पुत्र हुये । इन बन्धुओं में से मलजी अपने काका मुखरामजी के नाम पर दत्तक गर्य चांदमलजी लूगीया के पुत्र दीनान वहादुर लूणीया थे।" विद्यादान- आपके शिष्य प्रशिष्य तो ग्रापके पास पढते ही अन्य शाखा के यति गरा भी आपके तत्वाधान में कर विद्वान थे। जिनमें से सुमतिवर्द्धन व ७ विशेष उल्लेखनीय हैं । सुमति वद्धन- आप जैन तत्वज्ञान के विशिष्ट ज्ञाता थे। रचनाएं निम्नलिखित है- १. समरादित्य चरित्र, स'वत् १८७४ माघ सु जयमेरु नगरे । २. उत्तमकुमार चरित्र । ३. नवतत्व स्वरुप यंत्र । ४. कम ग्रन्थ यंत्र ।

XXXXV
vi
चत्यवंदनै भाप्य यंत्र ।
FIR
जीव विचार यंत्र ।
दण्डक यंत्र।
. संघयणी यंत्र।
क्षेत्र समान यंत्र
नवकार यम
इन, शिंप्य चरित्र मागैर ने क्षमाकल्याणजी रचित
वैवि प्रकाश का भावानुवाद यवत् १८९६ में नागोर
(उपाध्याय समीकर धागोजी नमादित्य चत्रि की
रच क र स्वर्ग सिधारे अंत. आपने उक्त गन्थ को
१६७४ मा शुक्ला को पूर्ण किया)
उचन
श्रो जिनमक्ति मूरि जाग्वा के गर्मचन्द जी के प्राप
नापने भी उपाध्यायजी के पास विद्याध्ययन
था अतः अपने ग्रंथ में विद्यागुरु का से उनकी प्रशंमा
है। प्राप्फे रचित गंध द्वय और एक स्तवन प्राप्त है-
१, प्रश्नोत्तर सारं शतक संवम् १८८४ (3) जयपुर ।
२. दीवाली व्यायान, सांवत् १८६६. ज्येष्ठ शुला
१३, अजीमगज।
-
1

(xxxxiv) तिलोकचन्दजी लूणीया के हिम्मतरामजी तथा मुखराम नामक दो पुत्र हुये। इनमें सेठ हिम्मतरामजी के चांदमल तथा जेठमलजी नामक २ पुत्र हुये । इन बन्धुओं में,सेठ चाँ मलजी अपने काका सुखरामजी के नाम पर दत्तक गये । चांदमलजी लूगीया के पुत्र दीनान वहादुर सेठ थानमल लूरणीया थे।" विद्यादान- आपके शिष्य प्रशिष्य तो आपके पास पढते ही थे प अन्य शाखा के यति गरण भी आपके तत्वाधान में अध्यय कर विद्वान हुए थे। जिनमें से सुमतिवर्द्धन व उमेदचर विशेष उल्लेखनीय हैं । सुमति वर्द्धन- आप जैन तत्वज्ञान के विशिष्ट ज्ञाता थे। प्रापर्क रचनाएँ निम्नलिखित है- १. समरादित्य चरित्र, स'वत् १८७८ माघ सुदि १३ जयमेरु नगरे । २. उत्तमकुमार चरित। ३. नवतत्व स्वरुप यंत्र । ४. कम ग्रन्य यंत्र।

Amri
17.
XXXXV)
CTEE
१६चत्यवंदनं भाष्य यंत्र ।
-जीव विचार यंत्र ।
9. दण्डक यंत्र।
DIRITTO
८. संघपणी यंत्र।
मक्षेत्र समास यंत्र
नकार यंत्रणा
इन शिष्याच स्त्रि'सागर ने क्षमाकल्याणजी रचित
वियि प्रकाश का भावानुवाद संवत् १८९६ में नागोर
नाया
(उपाध्याय क्षमीकल्याण जी समगदित्य चत्रि की
रच। केर स्वर्ग मिधारे अंतः आपने उक्त गन्थ को
१६७४ माघ शुक्ला ३ को पूर्ण किया)
Reds
रामचन्दजी के प्राप
'श्री जिनक्ति सूरि शाखा
पिने भी उपाध्यायजी के पास विद्याध्ययन
Tथा अतः अपने ग्रंथ में विद्यागुरु रुप से उनकी प्रशंसा
है । आपके रचित नथ द्वय और एक स्तवन प्राप्त है-
प्रश्नोत्तर सार शतक संवम् १८८४ (?) जयपुर ।
३. दीवाली व्याख्यान, सांवत् १८६६. ज्येष्ठ शुक्ला
Form
१३, अजीमगज ।
---
-

(xxxxvi) ३. सम्मेत शिखर स्तवन, गा० १० संवत् । माष an बुलाया स्वर्गवास- संवत् १८६८ में प्रापको वृद्धावस्था के कारण रिक अस्वस्था का विशेषत; अनुभव होने लगा संवत् के चैत्र शुक्ला ८ को कृष्णगढ से बीकाने प्रार्या खुस्याल श्री को पत्र में लिखा है , कि- की शिथिलता है । राजाराम ने प्रतिष्ठार्थ फिर वैसाख वदि १४ जोधपुर से उन्हों को पत्र । उसमें लिखा है कि वैसाख बदि १ को पिछले विहार कर अजमेर, मेड़ता, बड़लु होते हु (द्वादशी) को यह! पाये है, सुदि १२ को प्रतिक ज्यष्ठ तक यहां रह फिर बीकानेर प्राने का. प है. गोडों में बहुत दर्द है । शारीरिक शिथिलता है" इत्यादि । संवत् १८६६ में पाप बीकानेर पधार गये थे। १८६६ में प्रापको हरस रोग को बहुत अशाता हुई। पर आपको शारीरिक महत्व नहीं था ।

(xxxxvii) औषधादि उपचार विशेष नहीं किया करते और शरीर के ऐसो अस्वस्थता (वेदना) पर भी नित्य भांडारारजी नेमिनाथ जी के मन्दिरं (दूर होने पर भी) दर्शनार्थ जाया करते थे। इसके लिये संवत् १८७१ के कार्तिक कृष्णा ३ को देशनोक से पं0 ज्ञाने ने पत्र दिया है उसमें लिखा है "आपके हृदस की तकलीफ असाता पणी सुणो सो दुखी भया । सरीर का जतन मूल करावो नहीं सो ठोक नहीं बगसी रामजी वठे है उना पासे जतन करावसी वृद्ध है आप भाँडासरसी न मिनायजी पधारोसो भली न छे चोवीसढ़ा, आदिसरजी प्रमुख देहरा सोइ नेमीनाथ है, पाप उतनी खेचल न करावसो" इत्यादि - । सरीर संमत् १८५३ के धावण कृष्णा. ६ को आपने जैस- लमेर ज्ञानानंदादि को पत्र दिया था उसमें लिखते है- "हमारे फोडा-फुन्सो की अशाता बहुत रहती है। मुकीम भीखरणदास हर्शोपशमन की पुडियो देते है भव लेहु नहीं जाता है। अव-हरस को साता है पुडी:२१ ली, फोहों की कुछ कसर है सो(ठोक) हुय- जासी" इत्यादि । मिति भादव कृष्ण:५ को उपरोक्त स्थान और मुनियों के दिये पत्र में

(xxxxviii)
यांने
..
सं
"हरगना लेहु वाहमा को दिन १०-१२६,
गो.२/३ रहा है. गो मिट जागी । पिर को दरद तथा
वगको या जा (जो ? र ती सागी तर । लेह बन गया।
सरोर सुस्त है, व्याख्यान उत्तराध्ययन १४ वां अध्ययन
है, समादित्य चरित्र पाना ८५ भया, चौथे भव के १. पानी
बागीहै" इत्यादि।
इन पत्रों से प्रापकी शारीरिक परिस्थिति पर काफी
प्रमाण पड़ता है। इस प्रकार शारीरिक अस्वस्थता वश
१६७३ के पोप कृष्णा १४ मंगलवार को बीकानेर में आपका
स्वर्गवास हुप्रा । दादाजी के स्थान में प्रापको चरण पादुकाएं
और श्रीमधर स्वामी मदिर, में अापकी मूर्ति है, जिनके लेख
हमारे बीक नेर जैन लेख संग्रह के लेखांक ११८२, २०२
में छप चुके है । अापकों एक सुन्दर मूर्ति सुगनजी के उपास
में भी है।
चित्रः
यापके कई तत्कालीन चियं भी प्राप्त है।
*शः बृहत् ज्ञान भण्डार मे समुंदाय-संह-इसका ब्लो
तक संग्रह-पविकका" में छिपवा दिया है।
रिलो से मापक रचित "सुमंतिनाथ स्तवन
.

(xxxxix) स्तक में वहुत वर्ष पूर्व रंगीन चित्र छपा था जिसका छोटा क हमारे "ऐतिहासिक जै1 काव्य संग्रह" में छापा गया । ३. नवपद यंत्र व शान्तिरत्न के साथ आपका एक वत्र प्राप्त है जिसमें से आपके चित्र का ब्लांक "सूक्तरत्ना- ली" ग्रन्थ में छप चुका है। ४. तरुण वय का एक चित्र मुनि मंगलसागरजी से खने को मिला है। हस्ताक्षर- आपकी लिखी हुई अनेकों प्रतियां बीकानेर व जैसलमेर नादि मे प्राप्त है. जैसलमेर के अमृत-धर्म-स्मृति-शाला को लेख भी आपके हस्ताक्षरों पर खुदा हुअा है । आपके लिखित कई पत्र भी हमारे संग्रह एवं ज्ञान- भंडार में हैं। प्रतिष्ठा लेख- - आपने कई मंदिर, मूर्तियों, यन्त्रों आदि की प्रतिष्ठा की थी जिनके लेख नाहरजी के 'जैसलमेर जैन लेख संग्रह' व हमारे "वीकानेर जैन लेख संग्रह" आदि में छप चुके है । कई प्रकाशित भी है उपाश्रय- बीकानेर में ग्रांपने एक उपाश्रय व ज्ञान भंडार स्थापित

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|| ॐ प्रहं नमः !! श्री नाभिपुत्रादि जिनेश्वर क्रमा-, च्छोमांश्चतुर्विशजिनो महामहाः । कमयागारगरिष्ठ दीपको, देवा सुरेन्द्राचित पाद पङ्कजः ॥१॥ सदायं राजात्मजनुमहामनाः, शान्तस्तपोदान्ति निधिमहोदयः प्रासोन्महावीर इति श्रत पुरा- ऽनङ्गोल्मातङ्ग विभङ्गकेसरी ॥ २॥ युग्मम् ।। -अनुवादक मङ्गलाचरण- प्रणम्य श्री महावीर, सर्वज्ञान विभूपितं । मौक जिनमक्तानाम्, विधातून विज्ञपूजितान् ॥१। एतनुशलचन्द्राश्न, श्री जिन हरि सागरान् । अन्तर्याणिस्तुतमिप्यो, निर्वायर्यो हाटगानमः ।।२।। . याचोयुक्तिपटुः क्षन्ता, शासनस्य प्रभावयाः । .

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.
एकादशं पट्टमितः परं मुनि-
रध्यास्त सूरीश्वर आर्यसुस्थितः ।
यः सूरिमन्त्रं परिजप्य कोटिशो,
लेंभे पदें कोटिक इत्युदोरितम् ।।४।।
: सुधर्मा स्वामो से ग्यारहवें पट्ट पर आर्यसुस्थित सूरि
विराजमान हुए जिन्होंने एक करोड़ वार सूरिमन्त्रे नपकर
'कोटिक" पद प्राप्त किया था।।४।।
स्मात्परं पञ्चदशेऽथ पट्टके,
श्री वज्रनामा मुनिचन्द्र आबभौ।
स्मात् प्रजाती किल भूमिमण्डले,
श्री वत्रशाखा शुभेतीव कौमुदी ।। ५ ।।
जिस प्रकार प्राकाशे में चन्द्रमा सुशोभित होता है ठीक
सी प्रकार इस पृथ्वी पर मुनियों में श्री वज्रस्वामी १५वें
ट्ट पर शोभायमान हुए; जिनसे उत्पन्न बज्रशाखा" आज
को ज्योत्स्ना के समान भूमण्डल पर खिल रही है ।।५।।
एकाधिके षट्शतके परागते,
: ऽब्दानां महावीर जिनेन्द्र मुक्तितः ।

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उपाध्याय श्री राजसोमजी से कहा कि "इन सारे थियों में केवल यही विद्यार्थी (क्षमाकल्याण.जी) समग्र [ रूप समुद्रों का मंथन कर सकेगा ॥ १७ ॥ दि विद्वद्विहितं प्रशंसनं, नो मन्यमानो बहुलं स तत्ववित् । गिम व्याकरणादि पारंगो ऽल्पेनैव कालेन बभूव संयमी ॥ १८ ॥ तत्वज्ञ संयमी क्षमाकल्याण जी महाराज ने उस पण्डित ो हुई प्रशंसा को अधिक नहीं मानते हुए समय में न्याय, व्याकरण अागमादि शास्त्रों में पारंगत ये ॥१८॥ श्वरी देव्युपसिद्ध विद्यया, वित्तः स प्रासीत् सुतरां महातपाः । द्र कल्पोऽयम कल्प्यनल्पधी, लौकरतः कल्पितकाम जल्पनात्.॥१६॥ उन महामुनिराज ने स्वप्नेश्वरी देवी को सिद्ध कर था, अत एव इस विद्या के वे एक अच्छे जानकार थे लिए चाहे हुए मनोरथों के वतला देने के कारण जनता कल्पवक्ष के समान समझती थी ॥१६॥ वे. बहुत ही .-

:
।
तत्ववेत्ता श्री अमृत धर्म जी ने अपने शिष्य के
विद्याओं के जानने वाले एवं अच्छे शास्त्रज्ञ जानक
(१०)
पालोक्य विद्याचरण मेन मुन्मना ,
सच्छास्त्र चुञ्चु प्रमदेन सद्गुरू ।
प्रादादुपाध्यायपदं पदार्थविद्,
योग्याय योग्यं ददते पदं बुधा
प्रसन्नता पूर्वक उपाध्याय पद दिया क्योकि विद्वा
योग्य व्यक्ति को योग्य पद दिये बिना नहीं रहते ।।
प्रादीक्षि कल्यारराजयो महात्मना,
शिष्यो विवेकादि जयस्तत: परम्
समर्थि साहाय्य कती दशाविय,
तो तरय बाहू इव या व्यराजताम् ।।
1 गटामा परी कमाणन जी ।
11. नी । गाम प्रदान
निदान
का न मानी नागों मेगा

(११) लीलामुभौ तौ त्यजत : स्म मानवीम् यतस्तद्वियुतो गुरुश्च स, संवेगव िभजता मुभावपि ।। २२ ॥ अपने गुरु के द्वारा शिक्षित हो कर वे दोनों शिष्य ही समय में स्वर्ग सिधार गये । उनसे वियोग पाकर गुरु और वे (क्षमाकल्यारण जी) इन दोनों ने सवेग ग्रहण कर लिया ।। २२ ।। ऽथकल्याणजयस्य नामतो, ज्ञानादिकानन्द इति व्यधीयत । विवेकादिजयस्य नामतः, शिष्यो गुणानन्द इति हृकल्प्यत ॥२३॥ ज्ञाता श्री क्षमाकल्याणजी ने ज्ञानानन्द जी को कल्या- जी का एवं गुणानन्दजी को विवेकजयजी का शिष्य T॥२३॥ दिकानन्द मुने य॑जायत, शिष्यो मयाचन्द्र इतीरितो भुवि । द् गुरणानन्द मुनेश्च संवभौ, शिष्यो मुनि मैििक्तकचन्द्र नामकः ।।२४।।

दित्यादि तत्तद्यतीना परम्परा ॥२॥
(१२)
मुनि ज्ञानानन्द जी के मयाचन्द जी एवं गुणानन्द
मोतीचन्दजी नामक शिष्य हुए ।। २४ ।।
प्रास्तामुभौमौक्तिकचन्द्रधीनिधे-,
शिष्यौ पनालाल मुकुन्दचन्द्रको
श्रीमन्मयाचन्द्रमुनेश्च कोऽप्यमू-
बुद्धि निधान श्री मोतीचन्दजी के पनालालजी एवं मुद्र
चन्दजी नामक शिष्य हुए । मुनि मयाचन्दजी के भी
शिष्य थे।इत्यादि उन२ मुनियों की परम्परा जानना ।।'
संवर्ण्यते किञ्चन किञ्चन क्षमा--,
कल्याणसाधो विलसत्प्रभावक
वृत्तं प्रवृत्तं प्रथमं प्रथान्वितं,
त्याज्यं यतो न प्रकृतं किया विदा ॥२
कार्य के जानकार विद्वान को प्रकरण की बात नहीं छो
चाहिये, अतः अब क्षमाकल्याणजी के प्रभावशाली चरित्र
वर्णन किया जा रहा है ॥२६॥

(१३) क्रयन्त वतिना चतुर्दश, पूर्णप्रभावा जयशल्यमेरूके। घ्नकं मासचतुष्टयासनाः, पार्थक्यरीत्यासकले स्वजीवने ॥२७॥ क्षमाकल्याणजी म. ने अपने जीवन में चौदह प्रभाव- चौमासे जैसलमेर में निर्विघ्न समाप्त किये ।।२७।। टभूलोकपभूमितेऽदके, पाण्मासिको योग इहादधेऽमुना । तदीयः परमोत्सवो जन-, रहन्समर्हादिभवो व्यधीयत ॥२८॥ सलमेर में उन्होंने विक्रम सं. १८१८ में ६ मास के योग पूर्णाहुति. पर वहाँ के संघ ने जिनेन्द्र पूजादिक से बड़ा उत्सव किया ॥२८॥ भैरवाङ्गारिकल तत्र सर्वतो- भद्रं सुयन्त्रं जगृहे महामुनिः । .. चातुर्मास स्थितयः ।

राजा के वचन सुनकर समर्थ क्षमाकल्याण जी ने र इस प्रकार के उत्माह वर्धक उन मनि श्रीक वन कल्याणजी ने उरा धोसे पर गन्न लिग कर रामनर्ज (२०) ढक्कां समानाययतु द्रुतं भवान्, यन्नादतो यान्ति विपक्षपक्षिण- हे राजन् ! सुनिए, आप शीघ्रता से नगाड़ा मंगवाईये, बजाने से शत्रु रूप पक्षी भाग जायेंगे ।।४२।। श्रु त्वैवमुत्साहकमेतदीरितं, ढक्कां स आनाययति स्म तत्क्ष उल्लिख्य यन्त्रं तदुपर्यमुक्षमा- फल्यामा प्राण्यादिति रावलंनृपम् ॥ गुनार राजा रावल ने उसी क्षगा धौंसा मंगवाया । महा। ॥४३॥ प्रारमोशतो भूपतिवर्ष ! घातां, TT प्रगाढं गुहट चेतर पा प्रभावात् किन काविशीकतो,' दुहा यागति, गाल मंगा: ॥४ - राधिपति ! इन घासे को शत्रु स्थान से एक कोम चित होकर बजेवाईये । यन्त्र के प्रभाव से गारी तितर-बितर हो नायगी, इसमें संदेह नहीं ।।४४।। . पाचं कथिता महात्मना, राजा तथव प्रमदादंनुष्ठितम् । न्यो रणभूमितो प्रयात, चाभूतिकुर्वाण नृपो यदातदा ॥४५॥ मनिराज के इस प्रकार के वचन सुनकर रावलजी र किया, तत्क्षण ही शत्रु-संन्य रण भूमि से भाग तव राजा रावल को अत्यन्त हर्ष हुआ ॥४५|| दारभ्य स रावलों नप, आसीत् कृतश्रद्धं उरूप्रभे मुंनौं। वे मण्डल ईक्षित वरं, लोकः प्रकाशे न हि कि प्रतीयते ॥४६।। से राजा रावल उन महा प्रभावशाली, सूर्य समान मुनि श्री पर पूर्ण श्रद्धा रखने लगे । जब सूर्य को ति देख लिया जाय तो जन समूह उसके प्रकाश में देख सकते ? ॥४६.

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(२३)
द्र संवत्सरसप्तकं खतु,
।
स्वायुः समाप्तौ प्रतिपद्यतां पुरः॥४६॥
-मण्डल-श्रेष्ठ, गुणी उस ज्योतिषी ने राजा के यचन
र गणित करके कहा कि महाराज ! अपनी
! अपनी प्रायु
की
प्त में सात वर्ष और जानिए ॥४i:....
३ति तं चारू परीक्षितुं क्षमा-
कल्यारंपमाप्रष्ट मुनि महीश्वरः ।।
नो प्रसुप्तस्तत एव निश्यसो,
स्वप्नेऽशृणोत् सप्तदशेति भाषितम् ॥५०॥
रह सुन रावलजी ने पूर्ण परीक्षा के लिये क्षमाकल्याणजी
से पूछा! रात को ध्यानी बनकर सोये हुए उन महामुनि
स्वप्न में "सत्रह" ऐसा सुना ॥५०॥
पाण्डुवस्त्राणि दधत् प्रगे.मुनिः,,
को च धर्मध्वजमुद्वहन् दृढन् ।
कत्र हस्ते मुखवस्त्रिका दध-
दन्यत्र दण्ड विपुलं ययौः नृपम् ॥५१॥

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(२५) मा ने यह सुनकर अपनी सभा में उन मुनिराज की प्रशंसा की। तव से लेकर राजा ने उन्हीं को ही नाना, अपितु उनकी वाणी को भी मान्य किया एवं १७ वर्ष ही जीवित रहकर स्वर्ग-सिंधारे ।।५३।। कदा प्रार्थनयाऽथ मादा-- बादं ययौ, तत्र निजोपदेशनः । मध्य सद्भक्त जनानतोषय, च्चन्द्रश्चकोरानमृतद्रवैखि ॥५४॥ -सी समय मक्षुदावाद संघ की विनती को स्वीकृत कर श्री वहाँ पधारें। जिस प्रकार चन्द्रमा चकोरी को अमृत रसों से प्रसन्न करता है, ठीक उसी प्रकार भावभित उपदेशों से मुनि श्री ने भक्त जनों को धर्म न समझाकर प्रसन्न किया ॥५४॥ वाष्टेन्दुमितेऽथ वत्सरे, वालोच्चरे मास चतुष्टय स्थितिम् । नीशो भगवत्यभिख्यया, ख्यातं च तत्राऽऽख्यत सूत्रमुत्तमम ॥५५॥ ।

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(२७) 1 बनाया तत्पश्चात राजस्थान देश में पधारे, वहां वार जोधपुर भी पधारे ॥५॥ व संप्रार्थनयांनृणां चतु: माधि वासं द्रढयाञ्चकार सः । ख्यान दानादिभिरवितोषयः तत्रत्य लोकानितरां महामुनिः ॥५८।। वहीं पर (जोधपुर में.) लोगों की प्रार्थना मे चौमासा श्चत कर लिया। उन्होंने व्याख्यानादि से वहां के लोगों खूव ग्रानन्दित किया ॥५८ ।। प्राय पूर्व गुणगन्यमुत्तमम्. श्रीमानसिहोऽलिरिव क्षितीश्वरः । सोदमेतत्सुसनो!ऽन्तिकाश्रयं, स्वं पण्डितं चित्तमिव व्यसर्जयत् ॥५६॥ वहां के राजा श्रीमान् मानसिंहजी ने इनके गुण-गन्ध त कर अपने पण्डित को इनके पास भेजा। जैसे- भौंरा न्ध पाकर अपने जी को सुगन्धित पुष्प के पास भेज है ।। ५६ ॥ प्रत्र सुमनः शब्देन सहृदयो मुनिः, सुमनसः पुष्पं चेत्यर्थद्वयं .

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तो विक्रमपत्तनं ययौ, श्री शूरसिंहश्च तदोशितैकदा । मैहिष्ट, पर स सूरतं, प्रातिष्ठताऽहो बलवत्तरो विधिः ॥६२।। गत् मुनि श्री का बीकानेर में आगमन हुआ। वहां के पी शूरसिंहजी आपसे मिलना चाहते थे किन्तु मुनि उसी दिन प्रातःकाल में सूरत की ओर रवाना हो । अहो ! देव बड़ा बलवान है।।६२॥ बहानोपपदे पुरे स्थिते, पावं मनोमोहनमैच्छ दीक्षितुम् । भूयान् सहगाम्यभूज्जनो, धर्मे हि साहाय्यलभा सतां भवेत् ॥६३॥ ते में आये हुए ब्रहानपुर में मुनिराज को मनमोहन Tय का दर्शन करने का मन हुआ. गांव से थोड़ा दूर... बलते समय बहुत से लोग साथ हो गये क्योंकि धर्म- । सज्जनों को सहायता मिल ही जाती है ।।६।। ..

Orden श्चित्तेऽचिचिन्तादिति चिन्तिततापसान्तः । हि श्चतुष्कमपि दृष्टवतोऽद्य तं मे. ग्राश्चर्यमितं. नग्रमूति मामजी ने इन दं:न्वित समा- गरों को पार विनार नारने मंग, मन मुनि श्री यो गम गार दिन पूर्व ही देना था, फिर इतने प्रत्पन्समय में पनि भी करो जीशानेर पधार सयत है? ॥५॥ (४५.) प्वेव गतेप्वहः सु सहसायातं पुराद्वैक्रमाद, यास: पत्रमवाप्य योवर्दचिरात् संवाचयत्युत्तमम् । दत् स प्रकटाक्षरं धृतमनाः सम्यग् बुबोध क्षमा- खाणस्य महामुनेः सुरपुरप्रस्थानवृत्तं महत् ॥१४॥ व्यासजी को स्वगृह पहुंचे दो-तीन दिन ही बीते थे कि गनेर से एक पत्र प्राया। पत्र के द्वारा जैव उनको मुनि । क्षमाकल्याणजी म. के स्वर्गगमन के समाचार भिले, तब विचार करने लंगे | इत्त मेवमवगम्य स नम्रमूर्ति- मोतं, स विश्रामपुर पथमाप्य शाम्येत् ? 161 १ (५०) कारण पिताजी एवं अन्यान्य बन्धुओं के द्वारा काफी स झाने पर भी मैंने विवाह नहीं किया ।।१०३।। अतीतवत्यथ समये कियत्यपि, स्वसु श्चिराद् विहितमहागृहा दहम् समागमं जयपुरमेतदुत्तमा- पणावलीविपरिणगृहाध्वंशोभितम् ।। १०४ मेरी बहिन का निवास स्थान यहाँ है, एवं उसी अाग्रह वश, बाजारों, दुकानों और मकानों से सुशोभित जयपुर नगरी में मैं आया हूं ॥१०४।। स्थितो भवान् क्व सुकृतवान प्रकृष्टधी- रहं पुनः क्व कलुषवान् निकृष्टधी मया महामरिगरिव संगतो भवान्, पुरा कृतं फिल सुकृतं शुभ फलेत् ॥१०॥ कहां तो पुण्यवान एवं उच्च बुधि धारक आप, र कहां पापी एवं अधम बुद्धि वाला मैं ! 1. स्वसा भगिनी तस्य । 2. प्रकृप्टा वीर्यस्य सः । 3. निकृष्टा धीर्यस्य सः ।

TP:N - दति गुरो ! स्पृहा द्रुतं, पन में अव गृह के प्रति तनिक भी स्पृहातहीं रह 1: मैं प्रवं पापके पास से संयम ग्रहण करना आप परोपकारी है, अंतः मेरी इच्छा शीघ्र ही कुतोऽप्यहो इह खलु विध्न आपतेत् ॥१०७॥ जानता हूं कि हे गुरूदेव ! चौमासा चल रहा है, फिर प श्री "शुभस्य शीघ्रम्" की उक्ति के अनुसार शीघ्र 'स्पृहा वाञ्छा यस्य स तम् । ५१) नये। ॥१०६॥ पि. मुझे प्राप्त हो गये है, इसे मैं कृत पुण्य ही मानूंगा ।।१०।। यतिमे मनो मुनें ! . गृहं त्यजाम्येथ भवतो व्रतं भजे । सुसाधय नयपरहितं हि साधवः ।।१०६॥ जनयतु मे सुमंगला,- न्यपामृतावपि खलु दोयवां व्रतम् । सन, न तु निरयेत् सुकर्मणे,

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(५.५.) दूमतेव पलु शोमेन शभिना ::. समन्वितो मुनि मुषसागरेण सः । द्धिमंती बहनगराणि शोधयन्, फुकर्मतो भयिपुरुपांच मोचयन् ॥११३॥ पोभरंजिनवृषभं प्रतर्पयन् बचोऽमृतः शुभमुपदेशमपंयन् । मनेफशस्तनमत भादिसागरो, गुरुगरणी गुरणमृदयोधयत्तराम ॥११४।। 'युग्मम्' व्य-शिष्य, गान्ति को प्रतिमूर्ति श्री मुगसागरजी क पाय गरिगवर्य श्री शालिसागर जी ग. बागानुग्राम पिहरा करने लगे। नगर २ में अपने निर्मल उपदेगों द्वारा जिन- वागी का प्रनार करते एब लोगों को युकर्मों मे हटाते। म प्रकार महा समन्वी गुणयान गणी गरवाति गुणवान व्यक्तियों के समूह में प्रमुख ऐसे श्री ऋद्धिसागरजी म. ने अनेक प्राणियों को प्रति बोध दिया । ।।११३-११11 रेक्षशामुशशिमितेऽय हायने, फलंधिकापुर इह सन्महापथे ।

(५.६)
तदन्तिके स भगवदादिसागरो,
मुनिव्रतं व्यधरत शान्तमानसः ॥११
जो नगर बड़े २ मार्गों द्वारा सुशोभित हो ऐसे फलं
नगर में वि. सं १६२५. में गरिएवर्य श्री ऋद्धिसागरजी म
पास शान्तचित्त भगवानसागरजी म.
ने दीक्षा ग्रहण
की
1११
।
सुखसागरशिष्यास्तु, भगवत्सागरः क्षमा।
चिदानन्दो राम-रत्न-कल्याणश्च ततोऽभवत्॥११६
श्री सुखसागरजी म. के शिष्यों के क्रमशः ये नाम है
(१) श्री भगवानसागरजी म. (२) श्री क्षमासागरजी ।
(३) चिदानन्दसागरजी म. (४) रामसागरजी म. (५
रत्नसागरजी म. (६) कल्याणसागरजी म. ॥११६।।
भागवत्सागरशिष्या, धनसुमतिगुमानचैतन्याः ।
त्रैलोक्योऽपि तथा, हरिसागर इत्येत प्राख्याता
11१७॥
श्री भगवानसागरजी म. के शिष्यों के मम: ये नाम
है। (१) धनसागरजी म. (२) गुमतिर

सुनानसागरजी म. (४) चैतन्यसागरजी म. (५) त्रैलोक्य- परजी म. (६) श्री हरिसागरजी म. । ले राजसमुद्रस्य शिष्यो यः स्थानसागरः । स्य शिष्यो विनीतात्माऽ भवच्छगनसागरः।।११८।। मुनि श्री राजसागरजी म. के शिष्य मुनि स्थानसागरजी एवं उनके विनयवान् शिष्य तपस्वी छगनसागरजी म. नन्दकविस्तदीयवचसोपाध्यायरत्नक्षमा- गस्य मुनीश्वरस्य चरितं कल्याणमाकल्पयत् श्री कविराजाशुकवि ' श्री नित्यानंदशास्त्रि 'श्री क्षमाकल्या चरित समाप्तम् ।। प्रकार शरद ऋतु वैसे' ही निर्मल खरतरगच्छ में वर्तमान में श्री (५७) स्वच्छतरे वरे खरतरे व्योम्तीव यः शारदे, मोहरिसागरो विजयते चन्द्रो यशोज्योत्स्नया। ॥११॥ है ॥११॥ सा. जिस प्रकार चाँदनी

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व्यन्तादयध्वजोसो जगति जिनपतिवीतरागः सदैव ।।२।। सुपापो दुष्टसत्त्वैः स्फुटगुणनिकरः शुद्धबुद्धिक्षमादिः, कल्याण श्रीनिवानां.स नवति वदताऽन्यनीयोन नेपामा३॥ श्रीसंभवनाथ जिनेन्द्र चैत्यवन्दनम् (३) (नन्धरा-बर) यत्यासक्तचित्ताः प्रचुरतरभवभ्रान्तिमुक्तामनुष्याः, ताः साधुभावोल्लसितनिजगुणान्वैपिणः स एव । श्रीमान् संभवेशः प्रशमरसमयो विश्वविश्लोपकर्ता, दुर्ग दिगोतिः परमपदकृते सेव्यतां भव्यलोकाः ||१|| नध्यानोदकेनोज्ज्दलमतिशयितस्वच्छभावाद्भुनेन, वृत्तं शिवपद निगम कप प्रपञ्चम् । पत्र दूरयित्वा प्रकृतिमुपगति निर्विकल्पस्वरूपः, Tी विद्योतिरत्नप्रकर इव परित्राजते सर्वकाने, मिनि शेषदोपव्यपंगमविशदे श्री जितारेस्तनूजे । श्रीअभिनन्दनजिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् (४) (द्रुतविलम्बित-छन्दः) विशदशारदसोमसमानना, ...' कमलकोमलचारुविलोचनः गुणः सुतरामभिनन्दन!, जय सुनिर्मलताञ्चितभूघनः ॥११॥ पम्मादादत्य

(७४)
श्रीअरनाथ जिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् (१८)
(रामगिरिरागेा गीयते.)
दिव्यगुणधारकं भव्यजनतारकं,
दुरितमतिवारकं सुकृतिकान्तम् ।
जितविपमंसायके सर्वसुखदायकं,
। जगति जिननायकं परमशान्तम् ।। १ ।
स्वगुणपर्यायसंमीलितं नौमि तं; :
विगतपरभावपरिणतिमखण्डम्
सर्वसंयोगविस्तारपारंगतं, ':.
प्राप्तपरमात्मरूपं:प्रचण्डम् ।।दिव्यगुण०।। २ ।
साधुदर्शनवृतं भाविकैः प्रस्तुतं,
.
प्रातिहार्यष्टकोद्भासमान
सततमुक्तिप्रदं सर्वदा पूजितं,
शिवमहीसार्वभौमप्रधानम् ।।दि०॥(विभिविशेपका
.
,
i.
-
श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र, चैत्यवन्दनम्
.: : (गीतती ,चाल.):-
| कुम्भसंमुद्भव संमदाकर गुणवर !
हे मल्लिजिनोत्तमदेव !, जय जय विश्वपते ! ॥

བལཙཝབྷཾ ༔ བྱཱ ཙྪཱ ཙྪཱ ཙཱ༔
ཝཱ ལ ཡཔསཱམཧཱས: '' སཱ བྱཱ ཙྩོ ལ ཙག ; }, ༔ ༔
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1, :ཀུ་མཙཨུཏྟ4?r ཙཎ༔ ༔
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ཤུr:༣ པཎསཱཙྪཱ :rལ:.
''' སཱཝཱརཱ༣:༣༤:: 1*rt:
[༣:ཡཱ པས པ ས 1:.

(७२) निःगेपार्थप्रादुष्कर्ता सिद्धर्भर्ता संधर्ता, दुर्भावानां दूरे हर्ता दीनोद्धर्ता संस्मर्ता सद्भक्तेभ्यो मुक्तेर्दाता विश्वत्राता निर्माता, स्तुत्यो भन्या वाचोयुक्त्या चेतोवृच्या ध्येयात्मा ॥२॥ सम्यग्दृग्भिः साभाद् दृष्टो मोहाऽस्पृष्टो नाकृष्टः, स्रोतोग्रामैः संपज्ज्येष्ठः साधुश्रेष्ठः सत्प्रेप्टः श्रद्धायुक्तस्वान्तर्जुप्टो नित्यं तुण्टो निर्दुप्ट- स्न्याज्यो नैव श्रीवज्राको नष्टातङ्को निःशङ्कम् ।।३। श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् (१६) (द्रुतविलम्बित-छन्दः) विपुलनिर्भरकीतिभरान्वितो, जयति निर्जरनाथनमस्कृतः । लघुविनिजितमोहवराधिपो, जगति यः प्रभुशान्तिजिनाधिपः ॥१॥ विहितगान्तसुधारसमज्जनं, निखिलदुर्जयदोपविवर्जितम् । परमपुण्यवतां भजनीयतां, गतमनन्तगुणः सहितं गताम् ।।२।। नमनिरामजमीणमधीश्वरं, भविकपद्मविबोधदिनेश्वरम् ।

- (६६) सनाथ जिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् (११) (हरिणी-छन्द) त्रेता गाढव्याप्ता सुबुद्धिपराङ्मुखी, निजयलपरिस्फूर्योदना समझतया मम । स्वनिप्ठकुदृष्टिता, अपचितसहा सद्यो भूत्वा यदीयसुदृष्टितः ।।१।। दुखश्रेणीहेतुनिराकृतदुर्दशा, शुचितरगुराग्रामावासो निसर्गमहोज्ज्वला। स भवतु मम श्रेयांसेनः प्रवोधसमृद्धये ॥३॥ वासुपूज्यजिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् (१२) प्टिमभिरामचेष्टितं, शिष्टजन्तुपरिवेष्टितं परम् ॥१॥ टमतिभिर्यमीश्वरं, संस्मरद्भिरिह भूरिभिर्तृभिः ती दूरं दुप्टा 'रथोद्धता-छन्दः) मयादनन्तरा,, प्रापि सत्यपरमात्मरूपता ॥२॥ ले प्रादुर्भूता सुतत्वरुचिर्मम, विदलितभवभ्रान्तिर्यस्याऽप्यजस्त्रमनुस्मृतेः ॥२॥ मतिने दक्षो निरस्तजगहयथः, समुचितकृतिविज्ञानांशुप्रकाशितसत्पथः । गुरोविष्णोर्वशे प्रभाकरसन्निभः, ट्रकमनीयदीधिति-भ्राजमानमुखमद्भुतश्रियम् ।

देवाधिदेव ! तव दर्शनवल्लभोऽहं,
'. शश्वद् भवामि भुवनेश ! तथा विधेहि ।।
श्रीशीतलनाथजिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् ।
(शार्दूलविक्रीडित-छन्दः)
कल्याणाङ्कुरवर्धने जलधरं सर्वाङ्गिसंपरकर,
विश्वव्यापियशः कलापकलितं कैवल्यलीलाधितम् ।
नन्दाक्षिा मुद्भवं दृढरपक्षोणीपतेर्नन्दनं ।
श्रीमत्यूरतवन्दिरे जिनवरं वन्दे प्रभुणीतलम् ।। १ ।।
भज्ञानविशुद्धमिद्धिपदवीहेतुप्रयोवं दधद्,
भागानां वरभक्तिरसामनगां चेत:
समुल्लासयन् ।
निगाननमयः प्रगिलगमय: सद्भुतसोस्याश्रयो,
दुपातमः प्रणाशतरगिर्जीयाज्जिनः शीतलः ।।२।।
गागानिरपरः कलनुनिभस्बिद्गुरणालंकृतिः,
गागागागमति: शुभमनः कल्यागात्गंगतिः ।
यामा मचिम्मिपनमा गृहीत मनो,
नमामि गदेवरमः श्रीगीतलानी ।। ३ ।।,

वासुपूज्यजिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् (१२) (६६) श्रेयांसनायजिनेन्द्र-चत्यवन्दनम् (११) (हरिणी-छन्द) गरनिता गाढव्याप्ता सुबुद्धिपराङ्मुसी, निजवलपरिस्फूर्योदशा समगतया मम । तपती दूरं दुप्टा स्वनिप्पुष्टिता, प्राचितसहा सद्यो भूत्वा यदीयसुदृष्टितः ॥१॥ मनुखश्रेणीहेतुनिगमतदुर्दशा, शुचितरगुणनामावासो निसर्गमहोज्ज्वला। मले प्रादुर्भूता सुतत्वरुचिर्मम, विदलितभवभ्रान्तिर्यस्याऽप्यजलमनुस्मृतेः ।।२।। मितिदनि दक्षो निरस्तजगहयथः, समुचितकृतिर्विज्ञानांशुप्रकाशितसत्पथः । गुरोविष्णोर्वशे प्रभाकरसन्निभः, स भवतु मम श्रेयांसेनः प्रवोधसमृद्धये ।।३।। (रथोद्धता-छन्दः) कमनीयदीधिति-भ्राजमानमुखमद्भुतश्रियम् । टमभिरामचेष्टितं, शिष्टजन्तुपरि मतिभियंमीश्वरं, संस्मर समयादनन्तरा.

नामा: : :
10
श्रीविमलनायजिनेन्द्र जपचन्दनम् (१०)
(मनाला)
ममारे निमन गनिमतिमा मेगमान,
मामगंगा भिगोगमा
अदना गायग्निमलमलमजमानाम प्रधान,
मंप्राप्नो प्रण माग गंगानगीनिम् ।।
ये तु स्वामिन् ! गुपिशिफारमयोगमाः,
गोम्गाकागं प्रनितिमणि प्रेक्ष्य ते निश्यपूजना
द्वे पोद्भूतेः कनुपिनमनोवृतयः स्युः प्रकामं,
मन्ये तेषां गतशुभदृशां का गति विनीति ।।२
ध्यामासूनो ! प्रतिदिनमनुस्मृत्य बिनानिवाक्यं,
हित्वान्नार्य कुमतिवचनं ये भुवि प्राणभाजः
पूर्णानन्दोल्लसितहृदयास्त्वां समाराधयन्ति,
श्लाघ्याचाराः प्रकृतिसुभगाः सन्ति धन्यास्त एव ।।३
.

नया संरधिमासस्यते ॥ (युगग)
श्रोधमनायजिनेन्द्र-चैत्यबन्दनम् (१५)
सामान पगंगानं मराभानं,
। अनन्तनाथ जिनेन्द्र श्ययन्दनम् (१४)
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(हामीला-द:)
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मानानुभूतिको
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(७५) J गन्नधे सद्गुणनिधे ! Have कृत्याकृत्यविवेकिता जिन समुचिता। हे त्वयि जागति जिनेश! जय जय विश्वपते ! ॥२॥ नित्यानन्दप्रकाशिका भ्रमनाशिका.' ....:. हे तव शुभदृष्टिरनीश.! ; जय जय विश्वपते ! ॥ ३ ॥ शुद्धिनिवन्धनसन्निधे हे वजितसर्वविकार ! जय जय विश्वपते निजनिरूपाधिकसंपदा, शोभित सदा.! हे निर्मलधर्मधुरीण ! , जय जय विश्वपते ! ॥५॥ श्रीमुनिसुव्रतजिनेन्द्र चैत्यवन्दनम् (२०) (अत्यगेयपद्धति-रगः)- ८ उत्तमचेतन धर्मसमृद्ध जगत्पते:!. नित्याऽनित्यपदार्थनिचयविलसन्मते ? .. निज विक्रमजितमोहमहोद्भटभूपते ! :: श्रीपद्मातनुजात सुजातृहरिद्युते ॥१॥ श्रीमुनिसुव्रत:सुव्रतदेशक:! सज्जनाः, -7 कृतसद्गुरुशुभवाक्यसुधारसमज्जनाः ये प्रणमन्तिभवन्तमनन्तसुखाश्रितं: : केवलमुज्ज्वलभावमखण्डमनिन्दितम् ।।२।। ते निःसंशयमेवःजगत्ययवन्दिता:: सद्भावेन भवन्ति सुदृष्ट्यानन्दिताः ।

(७४)
भीअरनाथ जिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् (१८)
(रामगिरिरागेगा गीयते)
दिव्यगुगधारकं भव्यजनतारकं,
दुरितमतिवारकं मुकृतिकान्तम् ।
जितविषमसायकं सर्वसुखदायक,
जगति जिननायकं परमशान्तम् ।।१।।
स्वगुणपर्यायसंमीलितं नीमि तं,
विगंतपरभावपरिगतिमखण्डम् ।
सर्वसंयोगविस्तारपारंगतं, ':
प्राप्तपरमात्मरूपंप्रचण्डम् ।।दिव्यगुण०।। २ ।।
साधुदर्शनवृतं भाविकः प्रस्तुतं,
प्रातिहार्यष्टकोद्भासमानम्
सततमुक्तिप्रदं सर्वदा पूजितं,
शिवमहीसार्वभौमप्रधानम् ।।दि०॥(त्रिभिविशेषकम् )
44
श्रीमल्लिनाथ जिनेन्द्र- चैत्यवन्दनम् (१६)
.! : (गीतती चाल:):-
| कुम्भसंमुद्भव संमदाकर गुणव
हे मल्लिजिनोत्तमदेव !, जयः
i
~
--
.

(७५) प्रत्यापत्यविवेकिता जिन समुचिता। है त्वयि जागति जिनेण!; जेय जय विश्वपते ! ॥ नित्यानन्दप्रकाशिका भ्रमनाशिका, हे तव शुभदृष्टिरनीश,! ; जय जय विश्वपते ! ॥ ३ ॥ शुद्धिनिबन्धनसन्निधे सद्गुणनिधे. ! ! है वजितसर्वविकार ! जय जय विश्वपते । निजनिसमाधिकसंपदा. गोभित सदा। है निमंलवर्मधुरीण!, जय जय विश्वपते ! ॥५॥ श्रीमुनिसुव्रतजिनेन्द्र चैत्यवन्दनम्। (२०.) (अन्यगेयपद्धति-रंगः) उत्तमचेतन धर्मसमृद्ध जगत्पते। नित्यानित्यपदार्यनिचयविलसन्मते.? । निज विक्रमजितमोहमहोटभूपते!...: श्रीपद्मातनुजात सुजातहरिदद्युते ! ॥१॥ श्रीमुनिसुव्रत सुव्रतदेशक ! सज्जनाः, : ::: कृतसद्गुरुशुभवाक्यसुधारसमज्जनाः -:- ये प्रणमन्तिभवन्तमनन्तसुखाश्रितं, केवलमुज्ज्वलभावमखण्डमनिन्दितम् ।।२।। ते निःसंशयमेव जगत्त्रयवन्दिताः;:::.. सद्भावेन भवन्ति सुदृष्टयानन्दिताः।

(७६) - कृत्यं स्वोचितमेव यतः किल कारणं, जनयति नात्मविरुद्धमिहाऽसाधारणम् ।।३।। (निभिविशेषकम्) श्रीनमिनार्थाजनेद्र-चैत्यवंदनम् (२१) (पञ्चचामर-छन्दः) नमीण निर्मलात्मरूप सत्यरूप ? शाश्वतं, परोयसिद्धिसौषमूनि सत्स्वभावतः स्थितम् विधाय मानसाव्जकोशदेशमध्यवर्तिन, स्मरामि सर्वदा भवन्तमेव सर्वदशितम् ।।१।। प्रफुल्लगीञ्चलाञ्छन ! प्रभूततेजसोऽद्य ते, दिवाकरस्य वा महेश्वराऽभिदर्शनेन मे। प्रमादधिनी सुदुर्मतिनिशेव दुभंगा, गता प्रणाशमाशु हत्कजे विनिद्रताऽभवत् ॥२॥ निरस्तदोपदुष्टकष्टकार्यमत्यंसंस्तवो, भवे भवे भवत्पदाम्बुजकसेवकः प्रभो! । भयेयमीणं भृशं मदीयचित्तचिन्तितम्, तव प्रमादतो भवत्ववन्ध्य मेव सत्वरम् ।।३।।

(७७) श्रीनेमिनाथ जिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् (२२) (उपजाति-छन्दः) वेशुद्धविज्ञानभृतां वरेण, शिवात्मजेन प्रशमाकरेण । न प्रयासेन विनैव कामं, विजित्य विक्रान्तनरं प्रकामम् ॥१॥ विहाय राज्यं चपलस्वभाव, राजीमती राजकुमारिकां च । गत्वा सलील गिरिनारशैलं, भेजे व्रतं केवलमुक्तियुक्तम् ।।२।। निःशेपयोगीश्वरमौलिरत्नं, जितेन्द्रियत्वे विहितप्रयत्नम् । तमुत्तमानन्दनिघानमेक, नमामि नेमि विलसद्विवेकम् ॥३॥ (प्रिभिविशेषकम्) श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् (२३) (पञ्चचामर-छन्दः) श्रयामि तं जिनं सदा मुदा प्रमादवजितं, स्वकीयवाग्विलासतो जितोरुमेघगजितम् । जगत्प्रकामकामितप्रदानदक्षमक्षतं, पदं दधानमुच्चकरकेतवोपलक्षितम् ॥१॥ सतामवद्यभेदकं प्रभूतसंपदां पदं, वलक्षपक्षसंगतं जतेक्षणक्षणप्रदम् । सदैव यस्य दर्शनं विशां विदितेनसां, निहन्त्यशातजातमात्मभक्तिरक्तचेतसाम् ।।२।। -- .. 4- (७८) अवाप्य यत्प्रसादमादितः पुरुश्रियो नरा, भवन्ति मुक्तिगामिनस्ततः प्रभाप्रभास्वराः । भजेयमाश्वसेनिदेवदेवमेव सत्पदं, तमुच्चमानसेन शुद्ध बोधवृद्धिलाभदम् ।।३।। श्रीमहावीरजिनेन्द्र चैत्यवन्दनम् (२४ (पृथ्वी-छन्दः) वरेण्यगुणवारिधिः परमनिर्वृतः सर्वदा, समस्तकमलानिधिः सुरनरेन्द्रकोटिश्रितः । जनालिसुखदायको विगतकर्मवारो जिनः, सुमुक्तजनसंगमस्त्वमसि वर्धमानप्रभो! ॥१॥ जिनेन्द्र ! भवतोऽद्भुतं मुखमुदारबिम्बस्थितं, विकारपरिवजितं परमशान्तमुद्राङ्कितम् । निरीक्ष्य मुदितेक्षणः क्षणमितोऽस्मि यद्भावनां, जिनेश जगदीश्वरोद्भवतु सैव मे सर्वदा ॥२॥ विवेकिजनवल्लभं भुवि दुरात्मनां दुर्लभं, दुरन्तदुरितव्यथाभरनिवारणे तत्परम् । तवाङ्ग पदपद्मयोयुगमनिन्द्यवीरप्रभो!, प्रभूतगुणगिद्धये मम चिराय संपद्यताम् ॥३॥ .. -PAN

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जनहरिसागरसूरिज्ञान प्रकाशन-६ क्षमाकल्याण-चरित्नम् जोधपुर निवासिना कविराजाशुकनिया नित्यानंदशास्त्रिणा रचितम् अनुवादक एवं संशोधक -रम पूज्य गुरुदेव, अनुयोगाचार्य १००८ श्री कान्तिसागरजी म. सा. के शिष्य मुनि श्री मणिप्रभसागरजी -संपादक- बंशीधर तातेड़, M.AM.Com.. : : . सावृत्ति मूल्य १-०० वि.सं.२०३६ वीर संवत् २५०५ विजयादशमी + ००

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मनहरिसागररिज्ञान प्रकाशन-६ . क्षमाकल्याण-चरित्नम् जोधपुर निवासिना कविराजा नित्यानंदशास्त्रिया रजिवम् -अनुवादक एवं संशोधक परम पूज्य गुरुदेव, अनुयोगाचार्य १ कान्तिसागरजी म. के शिष्य मुनि श्री मणिप्रभसागरजी -संपादक- -- वंशीधर तातेड़, M.AskM.Corn. प्रथमावृत्ति मूल्य १-०० वि.सं.२०३६ वीर संवत् २५०५ विजयादशमी

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ननहरिसागरसूरिज्ञान प्रकाशन-६ क्षमाकल्याण-चरित्रम् जोधपुर निवासिना कविराजाशुकवि नित्यानंदशास्त्रिरणा रचितम् -अनुवादक एवं संशोधक परम पूज्य गुरुदेव, अनुयोगाचार्य १ कान्तिसागरजी म. के शिष्य मुनि श्री मणिप्रभसागरजी -संपादक- बंशीधर तातेड़, M.AM:Cami.. थमावृत्ति मूल्य १-०० वि.सं.२०३६ वीर संवत् २५०५ विजयादशमी ०००

Kshma Kalyan Charitram

Author
Kalyan Ji
Title
Kshma Kalyan Charitram
File name
Kshma Kalyan Charitram
Text
OCR done
Citation
1966
Published
2011/07
Publisher
Palitana, Jin Hari Sagar Suri Gyan Bhandar
Language
Sanskrit
Pages
108
Library
Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
DLI number
314437
Barcode
99999990313191.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
n2RTK5vALM1
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