Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Hadsa

Raja Ram Singh · 2011/03

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हादसा

मूल्य : चालीस रुपये (40.00)
संस्करण: 19899 राजाराम सिंह
राजपाल एण्ड सन्ड, कश्मीरी गेट, दिल्ली द्वारा प्रकाशित
HADSA (Short Stories) by Raja Ram Singh
ISBN 81-7028-066-4

हादसा
राजाराम सिंह
राजपान एण्ड सन्ज़

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प्रिय बेटी राजलक्ष्मी को सस्नेह समर्पित

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क्रम
बंधक/
9
रक्तवीज | 24
कुआं | 40
सुराज / 54
चक्रव्यूह / 65
फौजी/ 80
घात / 94
टिकट / 108
उन्माद/122
हादसा / 135

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बंधक "पानी''दो घूट पानी दे दो। हलक सूख गया है।" धनुष-बाण एक तरफ फेंककर, हांफते हुए बागुन झोंपड़ी के सामने पसर गया। सेमा नन्हे बच्चे को छाती से चिपकाये झोपड़ी में लेटी थी। बिना उठे ही, हथेली का टेक लगाकर सिर उठाते हुए उसने पूछा-- "कुछ मिला?" "कुछ नही।" "कोई छोटा-मोटा शिकार भी नही ?" "मिलता तो मैं छिपा लेता क्या, या कि रास्ते में ही गटक जाता?" बागुन चिडचिड़ा हो गया। "तुम तो नाहक उखड़ रहे हो। बच्चों को क्या कहेंगे? क्या देंगे उनको? आज तीन दिन हो गये। क्या कोई गोह-गिरगिट भी नहीं दीखा?" "पहाड़ पर लावा फूट रहा है, सारा जंगल सुलग रहा है, आकाश में लपटें लपलपा रही हैं। ऐसे में बड़े-बड़े जीव-जन्तु तक तो बच नहीं सकते, तुम गिरगिट-गोह की बात कर रही हो। जो रहे, वे या तो पहाड़ छोड़कर नीचे चले गये, मा इस आग में भस्म हो गये। एक साल हो तो एक साल, यहां तीन साल मे लगातार मौसम भाय-भांय कर रहा है। पानी की एक बूंद नही पड़ी । धरती का क्लेजा सूख गया है, माटी की छाती पर दरारें ही दरारें उग आई है। ऐसे में कौन शिकार मिल सकता है भला।" "कोई पंछी-परिंदा भी नहीं रह गये।" "बस गिद्ध-कौवे ही दीखते हैं, जंगल में कंकालो को नोचते हुए । कोवे साले तो तीर-धनुप हाथ में देखते ही कोवारोर करके पूरा जंगल सिर पर 10: हादसा उठा लेते हैं और आगे-आगे उड़ते हुए इतना हल्ला मचाते हैं कि कोई जीव- जन्तु या शिकार कही भूल से भी हो तो भाग जाये, या दुवककर छिप जाये। ये हरामी तो जनम के दुश्मन हैं, जैसे सारे जानवरों को रखवाली का इन्होंने ही ठेका ले रखा हो।" "उस दिन जो जाघिल लाये थे, वह भी नही दीखी कहीं।" बागुन चुप रह गया। एक पीडा उसके चेहरे पर उभरी और अन्दर तक बेधती चली गई, जैसे दुखती रग पर अनजाने मे उंगली रख दी हो, किसी . "कुछ दुख रहा है क्या? ऐसे वेचन क्यों हो रहे हो?" "वही भूल तो मां को लील गई। तभी से पूरा परिवार भी किसी न किसी बीमारी से बिलविला रहा है।" लम्बा उच्छ्वास छोड़ते हुए वागुन ने कहा। "तो क्या वह जापिल चिड़िया नहीं थी ?" "इस अकाल में जांघिल या टरं कहां मिलते हैं, सेमा । ये सब तो पानी के जीव हैं।" "तो वह क्या था? तुम तो उघर से ही छोल-छालकर लाये थे कि पहचान में भी न आये।" वह फिर चुप रह गया। "बताते क्यों नहीं । कुछ बोलो भी। वही खाने के बाद मा जी को के- दस्त जो शुरू हुई तो जान के साथ ही गई। छोटा बच्चा अभी तक नहीं उठ पाया । आज सुबह से उसका भी मुह-पेट चल रहा है । बदन बुखार से तप रहा है । छाती ही नहीं पकड़ी, रात से।" "नहीं"नही ऐसा मत कहो सेमा" मेरे बच्चे को कुछ नहीं होगा" कुछ नहीं होगा मेरे वेटे को "दोहाई बनदेवी को, शक्ति माता, भूल-चूक माफ कर दो मैया । जोड़ा मुर्गा चढाऊंगा, मेरा बेटा ठीक हो जायेगा तो।". "क्यों झूटी मन्नत मानते हो । कही पूरी न हुई तो उलटी पड़ जायेगी। बेटा-बेटी की बात है, कोई बकरी-भेड़ की नहीं। यहां तो एक दाने की हाही पो है, तुम जोड़ा मुर्गा चढ़ा रहे हो । कहां से लाओगे इतना?" बागुन फिर चुप कर गया।

'बंधक: 11 "बताया नहीं, क्या लाये थे उस दिन।" सेमा ने फिर खोदा। "अब बम भी करो, क्यो दवी आग को कुरेद रही हो।" उसने मुंह दूसरी तरफ फेर लिया। "अब उठो भी, दो घूट पानी तो दे दो । कलेजा सुलग रहा है।" "पानी तो है नही, क्या दू तुमको।" "क्यों ? तुम गई नही पानी लेने । क्या करती रही सुबह से ?" "कसे जाती, बच्चा छोड़े तब न।" वांहो के बल धीरे-धीरे उठते हुए उसने कहा । मां की गोद से हटते ही बच्चा चीख पड़ा । वह फिर लेट गई और बच्चे को छाती से चिपकाकर थपकियां देने लगी, पर बच्चे का रोना बंद नहीं हुआ। उसने अपना स्तन उसके मुंह में डूंस दिया। स्तन उगलकर बच्चा रोता रहा। रोते-रोते हिचकिया लग गई। थोड़ी देर में पस्त होकर वह शांत हो गया। "देख रहे हो न, बच्चे की हालत । मेरा जी तो पत्ता पर टंगा है । मैं तो कहती हूं, नीचे उतर चलो। एक-एक कर पूरी बस्ती के लोग चले गये, पहाड़ छोड़कर । तुम हो कि मा-बाप के लिए बैठे हो। नीचे बस्ती-बाजार में कही भी कोई काम मिल जायेगा। दिन फिरेंगे तो फिर लौट आयेंगे पहाड़ पर । कभी तो बारिश होगी।" "कसे चलू सेमा, बूढे बापू को अकेले पीछे छोड़कर । चल-फिर भी नहीं मकते, वरना साथ ही ले लेते । मा के जाने के बाद से तो वह जैसे अधमरे हो गये हैं। अब तो उठ-बैठ भी नहीं पाते ठीक से।" "मैं सब समझती हूं । बूढ़े वाप के आगे हमारे बच्चे कुछ नहीं हैं । भर जाय तो मर जाय, तुमको क्या है ? बड़ी बेटी को तो खा ही गये । अब'.. अब""सेमा मिसकने लगी। "तुम कैसी बात करती हो, सेमा, कुंटी के मरने का मुझे गम नहीं है क्या। पर करें तो क्या करे । बुढे वाप को कैसे छोड़े पोछ, अकेले। अगर कही कुछ हो गया तो मुह आग देने वाला भी कोई नहीं रहेगा। वह भी तो बीमार हैं । लगता है, अब अधिक दिनों तक नहीं चल पायेंगे। फिर तो हम कही भी जा सकते हैं।" "मैं कहती हूं, वह हम सबको चाटकर हो जायेंगे। तुम बैठकर उनको । - 12: हादसा ठठरी अगोरो। मैं तो बच्चों को लेकर आज ही नीचे उतर जाऊंगी। एक गवा चुकी हूं। अब इन दोनों को नहीं मरने दूगी ।" “कहां हैं बापू ?" "वो क्या लेटे हैं सामने पेड़ के नीचे।" "जरा देख लू, क्या हाल है, उनका।" वह उठकर चला गया। कमर मे लंगोटी लपेटे, नंगे बदन वुड्ढा दरम्त को सोर पर सिर टेके उतान सो रहा था । उसका पोपला मुंह खुला हुआ था, जिससे फुकुर-फुकुर सांस मा-जा रही थी। पेट कोही की तरह धंस गया था और शरीर गलकर कंकाल हो गया था । गले की नीली नसे तनी हुई थी। "बाबू'बाबू।" बुड्ढा सुगबुगाया, मुचमुचाती आँखे मलमलाई और करवट धूमकर उठने की कोशिश करने लगा। बागुन ने लपककर सहारा देकर बैठा दिया। "कसी तबीयत है, बावू?" "ठी.ई.ई."क है..."वेटा..."आ.. आ..." खोय-पोय-खोप- आक-खोंय-खोंय-खीय । खासी जो शुरू हुई तो वह लोट-पोट हो गया । दम उखड़ गया । नाक-आंखो से पानी चलने लगा। बार-जार होकर वह घुटने छाती में समेटकर गठरी की तरह फिर जमीन पर ढेर हो गया । वागुन पास बैठकर उसकी पीठ सहलाने लगा। थोड़ी देर बाद थिर होने पर उठकर बैठते हुए बुड्ढे ने पूछा-- "बया लाये बेटा, बच्चों के लिए?" "अब जगल में कोई शिकार रह नहीं गया वापू : मीलो तक गया, पर न कही कोई कंदमूल फल दीखा, न जीव-जन्तु ही।" "बेटा, जिन पेड़ों पर दीमक लगे होते हैं उनके आसपास विपतया (छिपकली), गिलगिटान (गिरगिट) चपड़ें जरूर होते है। लेकिन, बेटा, में सब शिकार अकारी के हैं, तीर-धनुप के नही । भालू भी वहा आते हैं।" "बापू, अब तो कही कोई दीमक-चूटारी नहीं दीपती । सब भस्म हो गये, इस अगिन में।" "शेरघटा का पानी कभी नहीं सूखता वैटा । लेकिन है बहुत दूर। वहां जाने पर कुछ न कुछ जरूर मिल जाता। शाम तक जानवर पानी पीने तो बंधक: 13 आते ही हैं।" "वह तो कब का सूख गया है, बापू ।" "आय, क्या कहा "शेरघटा भी सूख गया । तब तो परलय आने वाला है, बागुन बेटा। मेह देवता एकदम कुपित लगते है। फिर तो जितना जल्दी हो, बच्चों को लेकर नीचे उतर जाओ, जगल छोड़कर।" "कैसे छोड दू बापू जंगल । तुम तो चल-फिर भी नही सकते । कैसे चलोगे हमारे साथ ।" "अब मेरी माया छोड़ बेटे। मेरी तो कट गई । अब अंतिम है । नन्हका बीमार है। कही कुछ हो गया तो कुनवे की सोर ही कबर जायेगी। तुम जाओ बेटे, जितना जल्दी हो, जंगल छोड़ दो।" "नहीं बापू नही । मैं नहीं जाऊगा, इस बीमारी-बेहाली की हालत में तुमको अकेले छोड़कर।" "मैं अकेले नहीं हैं, मेरे लाल । तुम्हारी मां जो है, मेरे साथ । तुम लोगों के लिए न वह मर गई है । मेरे तो हर समय वह पास रहती है, उठते- बैठते, सोते-जागते, हमेशा बातें करती रहती है । उसको छोड़कर मैं कहीं नही जा सकता वेटे । तुम जाओ मैं "मैं "दिल से कह रहा हूं। मेह बरसने पर वापस आ जाना । मैं तुम्हारी राह देखूगा। एक काम कर, जाते समय अपने हाथ मे दो बूंट पानी पिलाता जा बेटे"गला सूखकर कांदा हो गया "पानी तो है नहीं बापू, नीचे से लाना पड़ेगा। अभी लाता हूं, जाकर ।" "अरे सुनो सेमा, लगता है, बापू तुम्हारी बात सुन लिए।" लोटकर वागुन ने कहा। "सो कैसे?" "तुम्हारी ही बात कह रहे थे।" "का कह रहे थे?" "इहै कि बच्चों को लेकर नीचे बस्ती-बाजार में चले जाओ। अभी किसी प्रकार जान बचाओ। मेह माने पर लौट आना।" "वह कोई तुम्हारी तरह बोंका मनई योड़े ही हैं। सब जानत हैं।

14: हादसा उनकी तो बीत गई। अब लाश के पीछ बाल-बच्चन को क्यों बधे । चलो उठा लो वारो को । डेगची-थाली भी ले लो। में छोटे को ले लेती हूं।" "कैसे चले सेमा, बीमार बाप को पीछे छोड़कर । अगर कुछ हो गया तो गिद्ध-कौवे ही नोचेगे।" "तो तुम बैठे रहो बाप का कंकाल अगोरने के लिए। मैं तो अब नहीं रुकती । अगर मेरे बच्चे को कही कुछ हो गया तो मैं तो मैं..." वह फिर सिमकने लगी। "अरे रे रे तुम तो नाहक बिगड़ रही हो। बच्चे को मोह-माया मुझे नहीं है क्या । मैं भी चलता हू, जरा वापू के लिए एक घड़ा पानी तो लाकर रख दू । तुम लोगो को कोई ठाव धराकर देख लिया करूंगा बापू को आकर।" वागुन ने दोनो मटका उठाया और पानी के लिए नीचे चल पडा। ऐमा बज्ज अकाल कि पहाइ के सारे सोते-झरने दम तोड़ गये थे। झील-झोर मे भी कही एक बूंद पानी नहीं था। पीने के पानी के लिए पहाड़ के लोगों को दो मील नीचे तमवा नदी पर जाना पड़ता था, जिसमे पानी की जगह नांव के रग का बालू भर गया था। कई हाथ गहरा वालू खोदने पर गड्ढे में नीचे पसीने को तरह धीरे-धीरे नदी पमीजती थी। अंजुली से उलीच-उलीचकर लोग अपने बरतनों मे भरते थे पानी। घड़ा भर पानी इकट्ठा करने में आधा-आधा दिन लग जाता था। कभी-कभी तो दो-दो, तीन-तीन गड्डे बोदने पर भी पानी की पमई तक नहीं दीखती थी। बागुन का मन वेचन था। नन्हका की बीमारी को लेकर उसके दिमाग मे तरहतरह की शकाएं उठ रही थी। दोनो वाही मे मटके लटकाए वह भागे चला जा रहा था। नदी पर पहुंचकर पहले मे किमी और द्वारा योदे हुए गड्डे में पानी भरकर वह ताबरतोर पर लोट माया । तब तक समा भोपड़ी का मामान ममेटकर एक गट्टर में बाध चुकी थी और चलने के लिए जैसे घोड़े पर मवार पड़ी थी। बागुन, बापू को पेड़ के नीचे से उठाकर ले आया और झोपड़ी में मूरो पत्त के रिटायन पर गुदही डालकर लिटा दिमा। पानी से भरा घड़ा उसके गिरहाने रप दिया । रोमा ने एक टुटही हेगची और कटोरा बुहा के लिए छोदिया पानी में सौटते समय बागुन पापुर को हाल भी मेता आया बंधक : 15 था । छाल सिरहाने सहेजकर रखते हुए उसने बता दिया कि भूख लगने पर वह छाल उबालकर भूख मिटा सकता है । हालांकि वह अच्छी तरह जानता था कि छाल के पानी से बापू को दस्त लग सकती है। सव कुछ जानते हुए भी वह बापू के प्रति सहानुभूति दिखा रहा था। बापू भी खुश-खुश उसको ढेर सारी आशी दे रहा था। बाप-वेटे जानबूझकर एक-दूसरे द्वारा छले जा रहे थे, लेकिन इस छलावे के अलावा उनके पास और कोई विकल्प भी तो नहीं था। सेमा नन्हें बच्चे को कंधे से चिपकाए आगे बढ गई थी। बागुन गठरी सिर पर उठाये वारो को गोद लेने के लिए ज्यों ही लपका, बारो जमीन पर पसरकर हाथ-पैर पीटने लगा और बाबा को भी साथ ले चलने के लिए जिद करने लगा। बागुन ने बहुत दुलराने, समझाने की कोशिश की, लेकिन बारो किसी तरह भी बाबा को छोड़कर जाने को तैयार नहीं हुआ। वह दौड़कर बाबा से लिपट गया और उसकी बाहें पकड़कर अपने साथ चलने के लिए खीचने लगा। बुड्ढे ने बच्चे को अपनी सूखी बांहो मे भर लिया और सीने की ठठरियों से चिपकाकर बच्ची की तरह पुक्का फाड़कर रो पड़ा। वह खूब जानता था कि उसकी जिन्दगी अब चन्द दिनो की रह गई है। जीतेजी अब फिर-फिर बेटे और पोतों से मुलाकात नहीं होनी है । आत्मा हाहाकार कर रही थी, फिर भी दिल पर पत्थर रखकर उसने बारो को पुचकारा, प्यार किया और समझा-बुझाकर बिदा कर दिया। अगले डेढ घंटे में वे पहाड के नीचे से गुजरने वाली सड़क पर थे। हालाकि दुपहरी ढल चुकी थी, लेकिन आकाश मे अभी भी आग बरस रही यी और हवा मे लपटे उठ रही थी। सड़क पर इक्की-दुक्की गाड़िया फर्राटे से उनके पास से गुजर जाती थी। दो घूट पानी और दो टूक रोटी की तलाश में वे मुह उठाए मंदानी धरती और बस्तीबाजार की ओर भागे जा रहे थे । ठांव कहां मिलेगा, मुकाम कहां होगा, यह उन्हें भी मालूम नहीं था। एक अनिश्चय, निराश और अंधकार भरा रास्ता उनके सामने था, पर उस निराशा में भी आशा की एक क्षीण किरण उनको खीचे लिये जा रही थी कि अन्न-जल से भरीपूरी धरती पर सभ्य लोगो के बीच वे जा रहे हैं। उन्हें क्या मालूम कि जगल से निकलकर भेड़िये अब मैदानों में बस गये हैं।

16: हादसा पहाड के नीचे मे आने वाली सड़क मशानी इलाके में आकर एक बडी सड़क में मिल जाती थी । वहां तिराहे पर झोपड़ियों में कुछ चाय-पान की दुकाने और एक होटल था, जहां इधर-उधर से आने वाली बसें-ट्रकें अक्सर रुक जाती थी। रास्ते में तेज धूप और लू के ताप से, नन्हें बच्चे की हालत और बिगड़ गई थी। रह-रहकर वह चीख पड़ता था और रोते-रोते हिचकिया लग जाती थी। होटल के मामने एक चांपाकल था, जहां बैठा होटल का एक लड़का जूठे वर्तन धो रहा था। पानी देखकर उनको प्यास भभक उठी । गठरी- पोटरी एक तरफ फेंककर वे चापाकल पर टूट पड़े। लड़के को उनकी बेअदबी अच्छी नहीं लगी। उसने दरदराकर ऐसा डांटा कि वे हक्के-बक्के रह गये और बिना पानी पीये ही पीछे हट गए । बागुन डरकर बच्चों के साथ सडक से दूर एक बवूल के दरख्त के नीचे जाकर बैठ गया। पानी देखकर प्यास और धुधुआने लगी । दम निकला जा रहा था। पेड़ के नीचे दुबके वे सब चापाकल और होटल-मालिक को और टुकुर-टुकुर देखते रहे । कल काफी देर से खालो थी, पर वागुन की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह कल पर जाकर प्यास बुझा ले। साहस करके वह होटल-मालिक के पास गया और हाथ जोड़कर इशारे से पानी पीने की इजाजत मांगी। स्वीकृति में मुस्कराते हुए होटल-मालिक ने हाथ हिला दिया। पानी पोकर पूरा परिवार तृप्त हो गया। सेमा ने तो मल-मलकर हाथ- पर भी धोये, चेहरे और आंखों में छोटे मारे और बाल संवारे। वह घुटने तक एक टुकड़ा लपेटे थी। ऊपर बण्डी डाले थी, जिसकी बांहें नहीं थी। गले में सतरगी पुरिया और लाल मूगो की दो मालाएं पहने यो । खुले अंगों पर गोदने के निशान स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। ठोड़ी और दोनो गालों के बीच काले तित जैसे गोदने गुदे थे। माथे पर टिकुली की जगह गोदने की गोल विन्दी थी। बाहों मे मछलिया फडक रही थी। एक बाह पर शृंगार करती युवती और दूसरी पर नाचते मोर के गोदने के निशान थे । गोल चिकनो दोनो पिण्डलियो पर अहेरी और उन्मत्त हिरनी के चित्र उकेरे गये थे। अनायाम ही लोगो को नजरें कल पर टिक गई। होटल-मालिक टक्टको याँधे पूरे जा रहा था। ऐसा यौवन, ऐसी कद-काठी, तीखे नाक-नक्श और वधक: 17 गठीला बदन, उसने आज तक वनवासियों में नहीं देखा था। पानी पी लेने पर होटल वाले ने इशारे से बागुन को अपने पास बुला लिया। सेमा गठरी के पास चली गई। बातचीत के दौरान भोले-भाले बागुन से उसने सारी बातें पूछ ली। उसे यह भी मालूम हो गया कि इनकी मजबूरी बच्चे की बीमारी है, जिसके तुरन्त इलाज के लिए उन्हें रुपये चाहिए। लेकिन इस बात पर उसे यकीन नहीं हो रहा था कि लड़की उसकी पत्नी और तीन बच्चों की मां है। देखने मे अभी भी वह कममिन अनछुई कुंआरी लगती थी । उम्र कोई सोलह-सत्रह साल से अधिक नहीं दीखती थी। लड़की उसकी निगाहों में गड़ गई। उसे हासिल करने के लिए उसका दिमाग जाल बुनने लगा। उसने बागुन को बताया कि बच्चे का इलाज कोडीघाट अस्पताल में हो सकता है, जो यहा से दस मील दूर है। इलाज मे कम-से-कम दो-तीन सौ रुपये तो लगेगे ही। बागुन उसके हाथ-पैर जोडने लगा, मिन्नतें करने लगा कि वह उसे तीन सौ रुपये दे दे। बदले में उसका शरीर बंधक रख ले । वह जब तक रुपया चुका नहीं देगा, उसके यहां काम करता रहेगा। होटल वाले को लगा, उसका तिकड़म काम कर रहा है। शिकार खुद- ब-खुद जाल में फंस रहा है। उमने उदासीनता दिखाते हुए कहा- "मैं तुझ जैसे जंगली को बंधक रखकर क्या करूगा। काम-धंधा भी बंद करवाना है क्या । हो, तुम्हारे पास कोई सोने चांदी का जेवर हो तो रख सकता हूं।" "हम जगलियों को गुरिया-मूगा के अलावा सोना-चादी कहां मिले सरकार।" "तब भाग जा यहां से। कोई और रास्ता देख । ऐसे फोकट में कोई रुपये नही देगा। तेरे जैसे रोज छत्तीम उतरते हैं, पहाड़ से, ऐसे ही मरते- खपते । जा भाग जा, मेरा वक्त मत जाया कर, खामखां में।" बागुन मुंह लटकाये भारी कदमो से वापस अपने बच्चो के पास लौट आया और गठरी सिर पर उठाकर आगे चल दिया। सैमा का योवन, उसके बदन का कसाव, हिरनी-सी चंचल बड़ी-बड़ी आंखें, कानों तक खिचे हुए बांके कोर, होटल वाले के दिल में फिर सालने 18: हादसा लगे । वागुन कुछ कदम ही आगे बढ़ पाया था कि होटल वाले ने हांक लगाई और हाथ के इशारे से उसे पुनः अपने पास बुलाया । बागुन की आंखें चमक उठी। गट्ठर नीचे रखकर भागता हुआ वह उसके पास पहुंच गया। "तेरे बच्चे को बीमारी मुझसे देखी नही जाती। अगर जल्दी इलाज नही हुआ तो बचना मुश्किल होगा । तू तो मेरे किसी काम का है नहीं । एक उपाय है । अगर तू चाहे तो मैं पैसे दे सकता हूं।" "बोलो मालिक, मैं जरूर करूगा। मुझे पैसे चाहिए, चाहे मेरी जान भी ले लो।" "सोच लो। इतना आसान नहीं है, मान लेना। मैं तो तेरे बच्चे की जान की खातिर कह रहा हूं।" “मैं सब कुछ करने को तैयार हूं सरकार । आप बताओ तो सही।" "अपनी घरवाली को यदि तुम बंधक रख दो तो मैं पैसे दे सकता हूं। बागुन का खून खौल उठा। शिराएं तन गई। रगो का सारा लहू खोपडी में घटकर उबलने लगा। जी में आया आखें निकाल ले इसकी। अगर अनुप-वाण पास रहा होता तो अब तक कलेजे के पार होता बाण । क्रोध से तिलमिलाकर पैर पटकता हुआ वह तेजी से वापस लौट गया। "क्या हुआ? इतना क्यो उवल रहे हो ? गाली-वाली दी क्या ?" सेमा "बकवाम बन्द करो और भाग चलो यहां से।" उसने लपककर गठरी उठाई और वारो को बांह पकडकर घिरतेि हुए तेज-तेज चल दिया। भूख से बिलविलाता नन्हा बारो उसके साथ चल नहीं पा रहा था और बार-बार खाने के लिए कुछ मांगता हुआ जमीन पर पसर जाता था। क्रोध मे बागुन ने उसे पीट दिया। वारी जमीन पर पधारा खाकर चीखने लगा। घसीटते हुए वह तिराहे से आगे, बड़ी सडक के पार, उसको ले गया और वहया के मुरमुटों के बीच पटक दिया । गठरी एक तरफ फेंककर वह खुद भी पसर- कर बैठ गया। उसकी आयो मे अभी भी खून चढ़ा हुआ पा। मूरज ढल रहा था, लेकिन मौसम में अभी भी तपिश थी। तेज गर्म लू चल रही थी। सड़क पर गाड़ियों का आना-जाना बढ़ गया था। उसने देखा, सवारियों से भरी बसें, जीपे आते ही दो नौजवान छोकर मिट्टी की होती ने आश्चर्य मे पूछा।

बंधक: 19 में पानी और गिलास लेकर दौड़ पडते है और प्यासे लोगो में पानी की लूट हो जाती है। एक गिलास का वे अठन्नी लेते हैं। उसके दिमाग में आया, यदि वह भी दो-एक डेगची पानी वेच ले तो शाम रोटी मिल सकती है। गठरी से उसने पुरानी फूटी-पिचकी काली-कलूटी एक डेगची निकाली, जिसका गला कटा हुआ था। पानी भरकर बस आने के इन्तजार में वह सड़क के किनारे खड़ा हो गया । पानी पिलाने के लिए उसने टीन का डिब्बा ले लिया था। एक बस आते ही वह दौड़कर उसमे चढा ही था कि कंडक्टर ने धक्के मारकर नीचे ठेल दिया। इतने मे वे दोनो छोकरे बस में घुसकर पानी पिलाने लगे । वह हक्का-बक्का-सा नीचे खहा देखता रह गया। बस चले जाने पर पानी वाले छोकरे गालिया देते हुए उस पर टूट पड़े और लात- घूसो से कचूमर बना दिये। उसकी डेगची भी पत्थरो से मारकर तोड दिये। पहर-भर रात जा चुकी थी। चारों तरफ मनहूस अंधेरा फैल गया था। बागुन अपने बच्चों के साथ वेहया के झुरमुटो मे पड़ा था। वह बेहद डरा हुआ था और अपने-आपको असुरक्षित महसूस कर रहा था। उसे लगता, रात के अंधेरे में उसके साथ कुछ भी अनहोनी हो सकती है। जगल मे खखार जानवरो के बीच भी उसे कभी ऐसा भय महसूस नहीं हुआ था। बारो रोटी के लिए रिरिया रहा था और बार-बार उसका मुह नोच रहा था । सेमा छोटे बच्चे को सीने से चिपकाये लेटी थी। छोटे बच्चे की बीमारी बढ़ गई थी। अब वह रह-रहकर चिहुक उठता था और रोते-रोते उसके हाथ- पर ऐंठ जाते थे। बच्चे के साथ सेमा भी सिसकने लगी थी। बच्चे के इलाज के लिए वह बार-बार बागुन को कोंच रही थी । बागुन चुप था। तंग आकर मैमा ने कहा, "यदि तू कुछ नहीं कर सकता तो मुझे ही कही बेच दे, या गिरवी रख दे, लेकिन मेरे बच्चे को बचा ले । मैं इसके लिए अपना तन भी बेचने के लिए तैयार हूं। तू बोलता क्यो नही? कैसा कठबाप है ?" बागुन फिर भी चुप था। इतने मे दो आदमियो की छाया उनके पास आती हुई महसूस हुई। बागुन अदककर एकदम उठ बैठा । "हा-हा-हा "डर गये"अरे भाई जगली लोग तो बड़े बहादुर होते हैं । अच्छा खैर, देख । तेरे को एक बात कहने आये हैं अपन लोग । ये धंधे ।

20: हादसा वी बात है । धंधे में वाप, बेटे का नहीं होता। अगर तुमने यहां पानी पिलाने की कोशिश की तो बताये देते हैं, तुम्ही या हमों। बहुत बड़ी दुनिया है । तू और कोई जगह ढूंढ ले । और फिर तेरे को पानी बेचने को क्या जस्रत है । तेरे पास तो टकसाल है टकसाल । बस भुनाता जा और मौज- मस्ती करता जा। ऐसा कड़क माल नही मिलता है, देशवासियों को।" इतने में छोटा बच्चा कराहने लगा। "च.''च'च लगता है, तेरा बच्चा बीमार है। लू लग गई है क्या ? आज ही उतरा है न पहाड़ से । कुछ पाया-पिया कि नहीं? देव भाई एक बार फिर कहे देते हैं, तू बाल-बच्चे वाला है। हमारे धंधे में टांग अड़ायेगा तो ठीक नहीं। हम पानो जरूर बेचते हैं, लेकिन यहां के बादशाह हैं, बादशाह । सेरे को देखना है तो चल हमारे साप।" "अरे यार, इसका बच्चा बीमार है। कहां घसीटेगा इसे ।" दूसरे ने . । "एँ"अच्छा रहने दे भाई । हम अभी आते हैं।" दोनों छोकरे हंडिया (धायन को शराब) पीकर टन धे और नशे में झूमते हुए पागुन को डराने- धमपाने आये थे। पोड़ी ही देर में ये दोनों फिर लौट आपे । माप में एक गधी भात भी मे माये । डेगची उमके गामने रयते हुए, एक ने कहा, "से भाई, तू हमारा भाई है। कभी हम भी भूगे थे, तुम्हारी तरह । पा से भर पेट । तू भी गया पार करेगा।बापो को भी गिना। मेकिन एकमात याद रखना, धंधे में भाई, माईमा नहीं होता। ये मे पाय पये किराये के । गुयह होते ही यही मे भाग नाना मनांगपो भी रण मे। मेरी गपी हम सोगों ने तोड़ सीपी म।" पहने हुए ये दोनों समोए यहाँ में चले गये। गरी रोगपी पर टूट परा। बागुन ने भी दो-चार कोर जोराचा पा मदरोमा, मेरिन मेमा नही उठो मामुन ने यात गमाया, मनाया कि गरपागे, मनोभी रोना गिया, मेक्निमा में कोई समा मोहापात और हिमाली बान देना पाराशर मनमो धरही दीm.गार पर गोपना, पर बंधक: 21 सेमा खुद अपने को बेचने की बात कह रही है, तो क्यों न होटल वाले की बात बता दे। लेकिन शब्द उसके मुह से नहीं फूट रहे थे । वहुत हिम्मत करके उसने कहा, "सेमा 'सेमा "सुन रही हो 'क्या सचमुच तुम तुम अपना "मेरा मतलव है अपने को।"चुप क्यो हो बोलो''वह भी मेरे.. मेरे जिन्दा जी.. सेमा.?" "हां"हा 'हो''मैं तन वेचूगी, अपने को गिरवी रखूगी। तेरे को इतनी ही शर्म है, तो क्यों नही बच्चे के इलाज का इन्तजाम करता । लाज लगती है, तो जाकर कहीं डूब मर । में बेचूगी अपने को और चारा ही क्या है "।" वह हिचक-हिचककर सिसकने लगी। बागुन काफी देर तक चुप रहा। फिर धीरे-धीरे बोला, "सेमा 'तुम नाराज मत हो""मैं 'मैं खुद अपने को बेचने को तैयार हू, यदि कोई खरीदे तो वह होटल वाला है न "वह कह रहा था कि यही दस मील पर कोई अस्पताल है.."इलाज हो जायेगा'"बच्चा एकदम ठीक हो जायेगा, लेकिन "लेकिन 'दो-तीन सौ रुपये लगेंगे 'सुन रही हो न दो-तीन सौ रुपये"। वह देने को भी तैयार है"खुद कह रहा था लेकिन अगर धनुष-बाण रहा होता तो मैं वाण उसके कलेजे के पार कर दिया होता।" उसकी नसें फिर तन गई। काफी देर चुप रहने के बाद वह फिर बोला, "वैसे वह भी वही कह रहा था "जो तुम कह रही हो"सुन रही हो न।" "क्या कह रहा था? साफ-साफ क्यों नहीं बताते। बुझौवल क्यो बुझाते हो?" "कह रहा था "कह रहा था कि' 'कहते-कहते वह गला साफ करने लगा जैसे गले में कोई भारी चीज अटक गई हो।".. अब मैं क्या बताऊँ... वही जो तुम कह रही हो। लेकिन तीन सौ देगा और बच्चा ठीक हो जायेगा"फिर तीन सौ जुटाकर छुड़ा लेंगे। कोई हमेशा की बात थोड़े ही ..." । "साफ-साफ क्यों नही कहते कि तीन सौ में तुम मुझे उसके हाथ बेचना चाहते हो।" "च"च.."च "वेचने की बात कोन करता है"बात धंधक को है।

22 : हादसा जब तीन मौ होगे, देकर छुड़ा लायेंगे"वच्चे का इलाज तो हो जायेगा। तुम भी तो यही चाहती हो।" "ठीक है, मैं तैयार हूँ । उठो चलो, अभी चलो।" "नहीं"नहीं"अभी नहीं "सुबह होने दो। रात के अंधेरे में जाने पर, जो देखेगा, क्या मोचगा।" "तुमको रात के अंधेरे का डर है । अब तो न जाने कितनी अधेरी रातें उसके यहा गुजारनी पड़ेगी। क्या तुम यह नहीं जानते। तव कहां मुंह दिखाओगे। लेकिन मैं तैयार हूं। मेरा बच्चा ठीक तो हो जायेगा न । उठो, और देर मत करो, चलो, मैं तैयार हू।" कहते हुए वह उठ बैठी और बच्चों को उठाकर चलने के लिए तैयार हो गई। यागुन चुपचाप उठकर उसके साथ चल दिया। "अभी पहर-भर रात गई होगी। पैसा मिलते ही कोई सवारी करके बच्चे को अस्पताल ले जाना। देर मत करना । ठीक हो जाने पर, मुझे खबर कर देना।" बागुन सिर झुकाये चलता रहा। होटल खुला था । कुछ ग्राहक बैठे थे । सामने सड़क पर दो-चार ट्रकें खड़ी थी। वे सब जाकर होटल के पीछे खड़े हो गये । उनको देखते ही होटल वाला लपक कर उनके पास आ गया। उस समय वह शराब के नशे में धुत था। बिना कुछ बोले ही उसने लुगी को मुर्गी से नोटों का बंडल निकाला और सो-मो की तीन नोटें बागुन की तरफ बढा दी। कापते हाथों से बागुन ने नोटें थाम ली ! उस समय उसका बदन पसीने से नहा बाया था, जैसे गोले कपड़े की तरह किसी ने उसे निचोड़ दिया हो। "देखो भाई यह तुम्हारी अमानत है। जमे गहना-गोठो रखते हैं, वैसे हो इमको भी अमानत समझकर रख लिया। काम कोगी, खायेगी। मूल पर व्याज तो लगेगा ही। सब दस परसेंट महीना लेते हैं । मैं तुमसे पाच ही लूगा। हिसाब-किताब जेठ की पूर्णमासी के माथे । छुहाना हो तो साल. भर का एक सौ अम्मी रुपये सूद और तीन सौ मूल, यानी पूरे चार सो अस्सी लेकर आना, लेकिन बीच मे नही । बोलो ठीक है न । तो बच्चों को पकड़ लो और भेज दो अन्दर।" सेमा ने नन्हें बच्चे को ज्यो ही बागुन को पकड़ाकर अन्दर जाने के बंधक:23 लिए कदम उठाया, बच्चा चोख पड़ा। सेमा वही ठिठक गई और पुन: बच्चे को गोद में लेकर पुचकारने लगी। वारो भी मां-मां करते हुए उसको टागो से लिपट गया और जोर-जोर से रोने लगा। "देखो भाई यह सब नौटको करनी हो तो भाग जाओ यहां से । मेरा "पैसा वापस कर दो, वर्ना बच्चे पकड़ो और चंपत हो जाओ।" होटल वाला बिगड़ गया। सेमा ने बच्चे को फिर बागुन को बाहो में दे दिया, लेकिन बच्चा देते समय वह फूट-फूटकर रो पड़ी। होटल वाले ने वारो को उसकी टांगों से खोचकर अलग कर दिया और बाह पकड़कर सेमा को अन्दर खीचकर सिटकनी चढा दी। बच्चे बाहर रोते-चीखते रहे। अन्दर सेमा बिलखती- 'बिलबिलाती रही। धीरे-धीरे बच्चों के रोने-चीखने की आवाजें दूर होती रक्तबीज देवेन भोजपुर स्टेशन उतरा तो एक बज रहा था। गर्मी के दिन थे। तेज लुक्कड़ चल रहा था। रह-रहकर बवंडर के साथ हवा मे धूल के बगूले उठ रहे थे। रेल की चमचमाती पटरियों और नंगे प्लेटफार्मों पर चिलचिलाती दुपहरी कमर लपलपाती हुई नाच रही थी। पूरे बारह वर्षों बाद वह ससुराल जा रहा था। गाव करीब छ: कोस दूर बीहड़ देहात मे पड़ता था। साथ में पत्नी और दोनों बच्चे भी थे। स्टेशन पर कदम रखते ही बारह साल पुरानी यादे ताजा हो उठी। लगा, अभी कल की ही बात है। यही पर मेंहदी-महावर रचे, पाजेब मे झनर-झनर झनकते पत्नी के पाव, पहली बार उसने देखे थे, जब गाड़ी चढने के लिए उसने डोली से बाहर कदम रखे थे। चुनरी-पिछौरी मे छुईमुई-सी सिकुडो-सिमटी पत्नी को गाड़ी मे उसकी बगल में बैठाते हुए, नाइन ने आखों ही आंखों मे, इशारों से, ढेर सारी बातें कह दी थी। वह रोमांच से सिहर उठा था। रास्ते-भर कितनी बेताबी थी, चूंघट के पीछे छिपे मुखड़े की एक झलक पा लेने की। वह कमलिनी की नाल-सा नाजुक छरहरा बदन अब फूलकर बैलट बन गया था। उसने पत्नी की ओर भेदभरी नजरों से देखकर मुस्करा दिया। "ऐसे क्यो घूर रहे हो जी।" पत्नी ने टोका । वह झेप गया, जैसे चोरी करते पकडा गया हो । देवेन को इस इलाके से, यहां के लोगो से, धरती-आकाश और आवोहवा से, ताल-तलैया, बाग-बगीचे और चिड़िया चुनमुन से एक विशेष प्रकार का रागात्मक लगाव था। ससुराल का नाम लेते ही सलहन-सानियों की यादें बरबस ही दिल मे हिलोरें लेने लगती थी और एक भीनी-भीनी मिठास अन्दर ही अन्दर घुलती चली जाती थी । मन .

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26 : हादसा "स्साला जवान लड़ाता है, हमरा सामने । तीन फाल (कदम) का एक रुपया लेगा रे हरामजादा । भाग जा इहवां से।" झपटते हुए वह सज्जन बस की ओर बढे ही थे कि पीछे से उसने अंगरखे का खूट पकड़ते हुए एक बार फिर चवन्नी मांगी। उलटकर उस सज्जन ने ऐसा हाथ मारा कि वह विल- बिलाकर दूर जा गिरा। "स्साला चोरकट, जेबे मां हाथ डालता है रे ।" वह पलटकर खड़े हो गये और शोर मचाते हुए गालियों की झड़ी लगा दी। इतने में कुछ लोग वहां इकट्ठे हो गये और जेब में हाथ डालने के लिए सब के सब छोकरे को फटकारने लगे। छोकरे के मुंह और नाक से खून बह रहा था। वह धीरे-धीरे उठा और उस सज्जन की ओर धूरते हुए दूर चला गया। उस समय उसकी आखों में अंगारे सुलग रहे थे। शादी-ब्याह का समय होने के कारण बस अड्डे पर भीड़ काफी थी। देहात के लोग बोरा-बोरी, गठरी-बकुचे में तरह-तरह का सामान बाधे बस के इन्तजार में बैठे थे। बस आते ही भरं से भागकर लोगबाग अन्दर, बाहर, ऊपर, नीचे जहां जगह मिली, चमगादड़ की तरह लटक गये । वह खड़ा देखता रह गया। इतने में बस का खलासी उसके पास आया और डबल रेट पर आगे की एक पूरी सीट का सौदा करके उसका सूटकेस लेकर बस के ऊपर रख दिया और अन्दर की भीड़ को धकियाते हुए अगली सीट खाली करवाकर उसको बैठा दिया। पहले से बैठे लोग हिकारत से उसकी तरफ देखते हुए भुनभुनाकर रह गये । ज्योंही बस बाजार से बाहर पोखरे के मोड़ पर पहुंची, एक सिपाही ने डंडा हिलाते हुए बस को रुकने का इशारा किया। भद्दी गाली देते हुए ड्राइवर ने ब्रेक लगा दी। सिपाही के साथ उसकी बीवी, पांच बच्चे, टाट मे बंधे दो गट्ठर और एक बक्सा था । बीवी का पेट भारी था। शायद छठा नागरिक देश को कृतार्थ करने वाला था। "मेम साहब के तकलीफ न होय दीवान जी। जगह त नइसे देखात ।" खलासी ने डरते-डरते कहा। "करे स्साला हेतना पबलीग वास्ते जगे है, हमरी मेमिन वास्ते नाही ! का बूझता है गड़िया जायेगा आगे हीया से, बिना हमरा लिये । अगली सीट समुच्चे खाली कराओ नहीं तो ठीक नाही । चला हो मलकिनी, उठ जा धीरे-धीरे । हई समान चढ़वाव रे स्साला, मुंह का ताकता मुञ्चड़ नाई।"

सतबीज: 27 सिपाही ने खलासी को डाटते हुए कहा । "अगली सिटिया पर त एगो हाकिम बइठल वानी दीवान जी। तहरा मैमिन के दुसरो सिटिया पर बैठा दी।" "समुच्चे देश के चराई हम, आ तू हमही के चरावताड़ा। हई लउरिया देखताड़ा कि ना । जौने घरी हतना ढासब न, त छीक ना आई। पूरी-पूरी बसीये खाली हो जाई, भन्न से । करे साला हाकिम-हुकुम हेही खटहरा से चली कि अपना जीप में जाई रे। कवना हाकिम है, तनी हमहूं देखी त ।" कहते हुए उचककर वह अगली सीट पर देवेन की सरफ क्रोध से घूरने लगा। "एगो पेंट पहिरला से हाकिम बन जाता रे, तहरा बहिनी के। हमरा पेंटवा नइखों देखात । हमरा से बढ़ के हाकिम भइल बा । साला लोग जिनकी भर चटकल मिल में 'घसीटता औ कलकाता से जब मुलुक आता तो पेंट डटा के हाकिम बन जाता । इनकी छोकरी के"।" देवेन पानी-पानी हो गया। उसने पत्नी की ओर देखा। पत्नी ने शर्म से नजरें झुका ली। दोनों बच्चे उसका मुंह ताकने लगे। "हेजी बहिर-बाण है का जी। सुनाई नइखे देत त अबहीयें कनवा खुल जाई। सीट खाली करता है कि नाही।" देवेन को खिड़की के रास्ते से डंडे से कोंचते हुए सिपाही ने कहा । अपमान से देवेन का चेहरा लाल हो गया। पर उसने सीट खाली कर देने में ही खैरियत समझी। बीवी-बच्चों सहित उठ कर वह खड़ा हो गया। बस में बड़े लोग हस दिये । कुछ मनचले जले पर नमक छिड़कने के लिए वोली-ठोली बोलने लगे। किसी प्रकार लटकते- मूलते, धक्का खाते वह गोला पर पहुंच गया। सड़क का साथ यही तक था। आगे देहात का बीहड़ शुरू हो जाता था। बस रुकते ही लोग खमखमा- कर उतरने लगे। सवारियों के उतर जाने पर खलासी ने एक बूढे आदमी को बुलाकर उसका सूटकेस पकड़ा दिया और गांव तक पहुंचाने की हिदायत दे दी। खलासी की मेहरबानी के प्रति वह मन-ही-मन कृतज्ञ हो उठा। पूरी बस खाली हो चुकी थी। लेकिन एक बूढा आदमी परेशान-सा बार-बार बस के अन्दर-बाहर, ऊपर-नीचे चढ-उतर रहा था। कभी वह अपना मापा पीट ।

20 हादसा रहा था तो कभी छाती धुन रहा था। एकाएक बड़ा भागार मार कर रोने लगा और "हाय हम लुट गईनी, हाय हम तुट गईनी चिलाते हुए ड्राइवर के पास जाकर वितधने-बिलविलाने लगा। बीच-बीच में नयापर वह कूदने लगता जैसे उसके पैर जगारों के ढेर पर पड़ गोहीं। उसकी बातों मे तगा, कल उसकी बेटी की शादी है। वारात के स्वागत के लिए यह दो टीन घी, तेल, मसाला, साग-सन्जी, कपडालना और शादी का सारा अनवाय बाजार से खरीदकर लौट रहा था। पलामी ने जवरदस्ती उसका मारा मामान बस के ऊपर रपवा दिया था। यहा उतरा तो सामान गायय था। वह बार-बार ड्राइवर को झकझोरकर अपने मामान के बारे में पूछ रहा था । एकाएक डायवर उठा और उमे धकियाते हुए तेजी से जाकर बस में बैठ गया । सलामी एक अद्धा हाथ में लिये मस्ती से झूमता गुनगुनाता हुआ बम की ओर बढ़ रहा था । डारवर ने पो-पो भोपू बजाते हुए बस का इजन स्टार्ट कर दिया। इतने में बूडा आदमी जिवह किये जा रहे वारे की तरह घिधियाना हुआ पीछे से दौडकर आग और बम के आगे पसर गया। भर-भर्र करते हुए ड्राइवर ने घरघराकर तेजी से वस चला दी, जो वूडे की धड से कुछ इच की दूरी पर किरिच किरिच करती हुई, कराहकर रुक गई । क्षण-भर के लिए देवेन का प्राण सूख गया, दिल धडक उठा। बुढा बाल-बाल बचा था। गालियो की बौछार करता हुआ पलासी नीचे उतरा और वुड्ढे की टार्ग पकडकर धूलभरी कंकडीली सडक पर ठरठर ठरठर घसीटते हुए नीचे खाई में उछाल दिया। वस फर्राटे में आगे बढ़ गई। यह बर्बरता देखकर देवेन को रूह काप गई। वहां मौजूद लोगों मे इस घटना की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, जैसे उनके लिए यह आम बात हो । देवेन देखकर हैरान था। बस की भीड और रास्ते क धचको में उसका पुर्जा-पुर्जा हिल गया था। प्याम भी लगी थी। सोचा, कही बैठकर चाय-पानी कर ले, तो चले आगे। गोला से अभी चार कोस आगे जाना था। रास्ता भी खेतो-मेड़ो, नालो-बाहो और पोह-याइयो के बीच में था। गोला पर अब गल्ले का कारबार तो रह नहीं गया था, लेकिन गोले का खण्डहर, पोखरा, भीट और उस पर बडा बगीचा अभी भी सलामत थे । खण्डहर के साथ पुआल की झोपड़ियो में रक्तवीज: 29 चाय-पान आदि की छोटी-छोटी हकाने मल गई थी। एक बड़ी झोपड़ी के मामने, भट्टी के ऊपर, रखी चाय की केतली और चुक्कडो का डेर देखकर, उमने जाकर दूकान के सामने पड़े बेच पर बैठते हुए पांच चाय का आदेश दिया । दुकान के अन्दर उड़े आदमी को देखकर, क्षण भर के लिए, वह सहम गया । यह तो दूकानदार नही हो मकता । उसके सीने तक मफेद दाटी लटक रही थी। गले में तुननी, नदन और रुद्राक्ष के बडे-बड़े कण्ठो वाली तीन मालाए पड़ी धी। माये पर चदन और त्रिपुण्ड लगा था। दुकान- दार ने मुस्कराकर कहा, "इहवा पर खारी चाय मिलत हो, हाकिम । तबीयत होय त अन्दर मावल जाय ।" उसने देखा, झोपडी के बीच में ताडपतरी को एक टाटी पड़ी थी। बाग उसके पीछे पीकर, मुह पोछते हुए बाहर निकल रहे थे। वह शर्म मे पानी-पानी हो गया । तब नक वही पुलिस वाला हवा में डण्डा भाजते हुए, वहा आ पहुचा। उमकी मेमिन और चूजे भी पीछे-पीछे थे । उनको देखते ही वह झटके में उठ गया। मिपाही ने औरत-बच्चो को बेच पर बैठा दिया और खुद टाटी के पीछे चला गया। विना चाय-पानी किये ही देवेन आगे चल पड़ा। "कवना गाव चले के होई हाकिम ।" वुड्ढे की आवाज से देवेन का ध्यान उमकी ओर गया। देवेन उसको देखता ही रह गया। उन कोई सत्तर के आमपास रही होगी। कमर और फधे सिकुडकर झुक गये थे । मीने की ठठरिया बाहर झाक रही थी। पेट पीठ से सटकर कोही हो गया था। हाथ-पैरो को चमडी मूखकर झूल गई थी। चेहरे पर मकड़ी के जाले- मी असंख्य झुरिया पड़ी थी। मुचमुचाती आंखे कोटरो मे घम गई थीं। नाक हुक्के की निगाली-मी बाहर निकल आई थी। कान सुपेती जैसे खड़े थे। मुंह पोपला था और दादी झल गई थी। चेहरे पर ऊसर के घास की तरह सफेद खूटिया उगी थी। पैरों में फटी देवाय के कारण वह पनो पर उचक-उचककर चल रहा था। मिर पर नूटकेम लिये उसकी गर्दन डुगुर- हुगुर हिल रही थी । देवेन को लगा, यह कमाल का ढांचा तो चल-फिर भी नही सकता, सूटकेम कैसे पहुंचायेगा! कही बीच रास्ते में पसर गया तो वह कहीं का नहीं होगा।

30: हादसा "कर्मा चलना है वाया। यहां से शायद चार कोस पड़ता है। तुम पल पाओगे इतनी दूर।" "मा-आ-आ-लिक । रउआ का बुझीला । अबही एक सांसी दस कोस" हाकिम दस कोस"एहिमें दागी नाय, बुननी नूं । अरे एक जमाना मे बीस- बीस कोस डोली लेहले हमनीके हुमचत चल जाई जा, चाहे कइसनो डापुट दुलहा होय । हई ''चार कोस देखी"ताकी तनी हमरा ओर"हइसे दुलकिया पहुंच जाइब ।" डोली ढोने वालों की तरह केहुनी आगे-पीछे हिलाते हुए वह खुटुर-खुटुर दौड़ने लगा। देवेन मन-ही-मन हंस पड़ा। गोला से बाहर भोटे से पार हुआ, तो देवेन ने देखा, कतार से खड़ी मिट्टी की पतली दीवारें झुलसी पड़ी थी, जैसे सिरकटी, अर्धजली लाशे हों। दो पक्तियों में आमने-सामने बनी पूरी बस्ती जलकर खाक हो गई लगती थी। मिट्टी के टूटे-फूटे चूल्हे, आले-तासे, हाड़ियां-चुक्कड़, सील-बट्टे, जानवरों को वाधने के खूटे, नाद-चरन अभी भी मौजूद थे। "यह कैसे हुआ बाबा ? लगता है, पूरी बस्ती जलकर राख हो गई है ।" "इहे नू हमनी के घर रहे हाकिम, मुसहर टोली। गांव के बबुआन लोग फूक देनी, सरकार।" "वो क्यों?" देवेन स्तब्ध रह गया। "खेत में काम करे खातिर । कमवा त हमनी के करते रहली। बाकी दिन भर खटला पर, उहे सेर भर सांवा कि धान, उहो कटकर-पइया, गोबर-माटी वाला । रउये बताई, सरकार, येह महगाई के जमाना मे सेर- भर परखटला पेट भरी। छौड़ा लोग बोलली कि, मालिक, मजूरी बढा दी। बस एतनाबात पर मालिक लोग बिगड़ गईली। छोड़ा लोग भी ठन गइनी। वस काम बन, खेती वन । एक रोज रात में बाबुआन लोग के गुंडा माटी क तेल चोभ के फूंक देनी हमनी क झोपड़ी। अपने बगइचा में पेड़न के पीछे छिप के बइठ गइली। जब भगदड़ भइल, मालिक, तब जिन पूछी, धांय- घांय गोली से भुन देनी कुल जवनका छोडन के। आउर जिअ घिर्राप (घसीटकर) के वोही आग में फेंक देनी। जल गइलें ललवा लोग, सुअरी के वेहरू अस, छनछनायके। जे बाचल से जान ले के भाग गइल ।" कहते- कहते बुड्ढा सिसकने लगा। देवेन का दिल थरथरा गया। कुछ क्षण तक रक्तबीज:31 उसकी आवाज नहीं निकली। "कुछ हुआ बाबा, पकड़-धकड़, जेल-फासी।" "किच्छ ना मालिक किच्छ ना। किछ दिन हल्ला-गुल्ला भइल, पुलिस गारद गिरल, नेता-फेता, मंतरी-फंतरी आइल-गइल, फिर सब ठंडा । होई कइसे, हाकिम, केहू गवाह मिली तब नू । के जाई अलले जान बधवावे।" देवेन ने देखा बुड्ढे के पीछे-पीछे एक चार-पांच साल की नंगधडंग लड़की तुलबुल-तुलबुल दौड़ती चल रही है । उसकी कमर में चीथड़े की एक बिहटी है, बाकी पूरा शरीर नंगा। आंखों से कीचर और नाक से नकटी- पोंटा वह रहा है । धूल और गर्द से भरे सिर के बाल घास के जुट्टे की तरह आपस में लटिया गये हैं। उसने हैरत से पूछा, "बाबा, वह नन्हीं बच्ची कौन है ? तुमको जानती है क्या?" "अपनी पोती हवे न मालिक । इहे त निशानी बचल गिया, हमरा खानदान क।" "सो कैसे?" "कहनी न सरकार । वोही अगिया में एकरा बाप मारल गइल । खूब गवरू जवान पट्ठा रहल मालिक रउये नाई। गोली से भून देनी गुण्डा सब मालिक बुड्ढा फिर सिसकने लगा। "बेटा गइल से गइबे कइल, इजतियो न लूट लेहले सब, राछछ। एकरा माई के उठा ले गइलें चंडाल सब। आज तक पता ना चालल, सरकार, कहां बिया । केहू कहे ला मुखिया के हथेली में बन्द विया त केहू कहे ला पटना के बजारी में बिक गइल । इहो मर-खप गइल रहत, मालिक, त सन्तोप हो गइल रहत । अब जहां- जहा जाइला, कुकुरन के पिलवन नाई डुगुर-डुगुर पीछे-पीछे लगल राहे से। येही से त लाचार वानी हजूर, नाहीं कत्तों नारा-पोखरा मे मर-खप जातीं। अब जिनगी बिरथा वा मालिक।" वह बिलख रहा था। "हमरा दू गो बेटा अउर रहले मालिक, उहो लाल अइसी मारल गइलें।" "कब? कैसे?" 'दस बरिस भयत होई हाकिम, एगो बिनवा (विनोबा) जी आइल ..."

32. हादसा रहनी मत-महतमा, गरीवन के जमीन दिआवे वास्ते । उहे पकिया वाला गाव देवनानी मालिक, कोनिया हवे । उहा के बाबू साहब लोग अपना ऊमर-नाल दान कय देहनी। हमरा भी वोही में दस कट्ठा दान मिलल, हाकिम । हमनी के मुसहर क जात, एक पथलफोर । असर काटपोट, ताल पाट-पूट के हमनी के एक लवर क जमीन बना दोनी। जब छाती भर धान लागल त बा लोगन के आख मे काटा गड़े लागल। फसल काट वदे चढा. चढी हो गइल । मनियों के लौडा सब ठन गइलें । वहरियो जगह से मुसहर जुटले । बाकी वनूक, रफ्फल के समने गोजी-डण्डा का करी, मालिक । हमनी के गारह भवान उलट गइले। वोही मा हमरा दूनो छोड़ा मारल गइले । बाबू लोग लहास पीच के गांव के गोइड़े ले गईले और उनहन के हाय मे पाइप बनूक आउर फिटफिटी (कट्टा) थमाय के केस बनवले कि सबै नक्मली गाव लूटन वास्ते आयल रहें। घाना-पुलुस, दरोगा-मुसी सर्व दर परले । मुसहर के छोडन के पकर-धकर होने लागल। तब्ये मे अडोलन जोर पकडलम, मालिक । फिर त अइसन अंडोलन चलल कि बाबू लोगन क कुल काम वन, गेती-वारी बन, डोली-डंडा बन, मिटिन, जलसा-जुलूम, भाखन तब्ब से चलत ही मालिक । देखी कब नियाव मिला।" "एक बात ही मालिक," थोड़ा रुककर वह आगे बोला, "बाबू लोग अब खाली अजोरवे क शेर वानी । सुरूज डुवले, झाडा-पेसाव वन । अडोलन में नीक-नोक पनिहार छोडा बाटन मालिक । बहुत गिपान क बात करें ल मष । उनहन क कहना था कि ठाकुर-बाभन त में हर जोते आउर उनहनी क मेहराम मब रोपनी-मोहनी, लवन-विनियां कर तब त जमीन उन कर, नाही त जय मरा अडा-बच्चा काम करिह त जमीन हमीन क । कवनो वैजाय बाउ बा मालिक, रउये बोली। अंडोलन खूब जोर पकडले बानी। लगन वा कि कहीं न कहीं इ अनियाव मेटाय के रही।" कहते-कहते उमकी टागे फरफर-फरफर उठने लगी थी और आंखें चमकने लगी थी। "मुनते है, बाबा, यहा मैनाए बहुत बन गई है। क्या करोगे तुम लोग उनके मामने।" "एगो बात मोली मालिक,रिमियाश्य मान।" "हा-हा, बोली-चोलो।"

रंक्तबीज-3 "हमरा के वुधना बोली मालिक, बुधनी । रउआ बाबा-बाबा करतानी त बड़ा अनकुम वरता । रउआ बड बानी न।" "नही, नहीं बाबा, उम्र मे तुम मेरे बाबा के, वराबर तो हो.. " "हा त कवन बाति पुली मालिक "हां"हां फउद-गारद वाली। हे मालिक, जब गरीब लोग मजूरी वढावे बदे अडोलन करे लगली तब जमीदारन के लागल कि उनकर खेत-बधार कवजियाय लीह सब । से छत्तिसो जात अपने जात-भाई क फउद खडी करे लागल । वाकी जानतानी मालिक, उ फउद उनही के जान क जवाल वन गइल बिया, बुझनी नू । उनहीं के मारत-खात विया। पूछी कइमे इ जवन पलटन वाय नू इनकर खर्चा-पानी, तर-तनहा, हरवा-हथियार, गोला-वारद मब चन्नै से आवे के बा, मालिक । जहा पलटन के गारद गिरत विया, हुआ खाना-पीना, मुरगा- मछली, बोतल कुल न चाही। उप्पर मे रतिया मा उहो चाही, लखनानी न । आपन वेटी-बहिन दी, नाही तोहई के फउद मारे-बा हे लागी।" वोलते-बोलते वह देवेन के पास सट गया और कान के पाग धीरे-धीरे फुसफुसाकर कहने लगा, "अवही दुइये दिन क वात हवे। वोही बहेरी गउआ मे लोरिक फउद आइल रहे। खइला-पियला के बाद मुराई लोग एहर-वोहर करे लगली । बस कुल मरदन के फउद क कमंटर (कमाडर) पेड़ मे वन्हवाय देहलम । रात भर घर के मरद बहरे त फउद अन्दर । त ये सरकार, अइसन पलटन फजद से कवन फयदा । धनो दी, धरमो दी। अइमन मउग हमनी क का करीहे स मालिक।" देवेन उसकी बातो में ऐसा खोया कि रास्ता मालूम ही नहीं हुआ। गांव समीप आ गया। बीवी-बच्चे कुछ पीछे रह गए थे। वह ककर उनके आने का इन्तजार करने लगा। पर पहुंचने पर वह मर्दाना दालान मे रक गया। पत्नी, बच्चों के साथ, बखरी में चली गई। मुनते ही सामजी ने आदमो भेजकर उसे भी अन्दर बुलवा लिया और बीच जांगन में पलंग डालकर तोसक-तकिमा लगा दी। बड़ो थाल मे खुद पानी ले आई और जूता-मोजा खोलकर मल-मलकर उसके पैर धोने लगी। पर धोते समय वह बोले जा रही थी, "हाय-हाप 34 : हादसा । फूल को नाई हमरे दमाद जी बनाइन झुलस गइलें लू में "च-च पैरवा से आग निकलतिया । मरे छालो पड़ गइल बिया"हाय दइया कइसे चलत रहनी एतना घाम में बवुआ जी। भला चीठी-पतरी भेज देले रहीत रवा, तार के देले रहीत, मालिक बयलगाड़ी भेज देहले रहती । मुह कइसन शउं- साय गइल बिया:च-च अरे तनी तेल लिआवा स रे, कपार पर सोझे घाम लागल बिया, पिरात होई."अरे अंवरा क लो आवरे मुनिया"हमरा मुह का ताकतानी।" तेल की शीशी आते ही, सास जी पसर भर तेल जबर्दस्ती सिर पर रखकर चपर-चपर दबाने लगी। सास जी का नेह-छोह देखकर उसका जी भर आया, आंखें छलछला गई। बुधना पनारे की बगल में दीवार के साथ उकडू बैठा उसकी तरफ टुकुर-टुकुर ताक रहा था । नन्ही बच्ची उसके घुटने से सिर टेककर लुढक गई थी। तब तक साली मलाईदार दूध का भरा गिलास ले आई। सास जी ने बेटी के हाथ से गिलास ले ली और उसके मुंह मे लगाकर पीने के लिए मनुहार करने लगी। ना-नुकुर करने पर जबर्दस्ती मुंह में गिलास ठेल दी। साली ने बुधना और उसकी बच्ची को एक-एक रोरी गुह देकर ऊपर से पानी पिला दिया। सलहज भोजन की तैयारी मे लग गई। तुरत-फुरत में पूडी, भुजिया, अचार, दही चीनी से भरी थाली उसके सामने आ गई। पत्नी और बच्चों के लिए एक कमरे में परोसा लग गया । सास जी ने बुधना को बाहर निकाल दिया। कहीं इस बंगले की नजर लग गई तो दमाद जी का पाना जहर हो जायेगा। देवेन को बुधना का बाहर निकालना अच्छा नहीं लगा। वह चाहता था कि उसी आंगन में उसे भी खिलाया जाता। बाहर जाते समय बुधना और नन्ही बच्ची की सूनी मांखों में छटपटाती भूख को उसने भांप लिया था, पर संकोच के मारे कुछ कह नहीं पाया । वह खाना यतम भी नही कर पाया था कि बुधना आंगन के दरवाजे पर खड़ा होकर बोला- "अच्छा मालिक, अव छटी दी हमनीके, पलतानी।" "नयों ? तुमने खाना खा लिया क्या?" उत्तर में उसका पोपला मुंह खुला रह गया और योपली आंखों में बांसू छलक आये। "मजूरी मिल गईम विया मालिक, अब चलतानी।" आंखों के कोर रक्तवीज:35 पोंछने हुए उसने कहा। "क्या मिला, देखें?" चोपड़े गमछे के सूट में बंधी पोटली दिखाते हुए उसने कहा, "इ का विया मालिक । धान दीन्ही ह मलकिनी । कूटि-खानि के आज सक्षा के मुह क अहार लागि जाई मालिक, रामराम ।" बुड्ढा जाने लगा। देवेन ने देखा, करीब आधा सेर धान रहा होगा। ससुराल वालों की जलालत पर वह सुलग उठा । सामने का खाना माहुर हो गया। पलग से उठकर दरवाजे की तरफ लपकते हुए उसने कहा, "रुको बाबा, रुको, खाना खाकर जाओ । मजदूरी भी और लेते जाओ।" बुड्डे के पैर जहा के तहा ठिठक गये । उसने मुड़कर देवेन की तरफ देखा और फिर नन्ही बुचिया के कारण विवश होकर भारी कदमो से लौटकर बाहरी चौखट के पास जमीन पर बैठ गया। खुद की भूख तो वह दबा जाता पर नन्ही पोती भूख से बिल- विला रही थी और रोटी के लिए बार-बार उसे नोचते हुए पैर पटक-पटक कर ठुनक रही थी। 'दीपू.ऊ." "दीपू, अरे भई, इस बीचारे बूढे बाबा को कुछ खाना-बाना दिलवाओ। वैचारा भूखा होगा। उसके साथ वह बच्ची भी तो है, अपनी पिंकी जैसी।" उसने पत्नी को हांक लगाई। "रउआ का बोलतानी पाहुन जी, मजूर-धतूर क बेटा-बेटी हमनी क बेटा-बेटी बराबर होई जी? आ राउर, हे मुसहर-चमार के बाबा बोल- तानी जी, लतमरूआ के। हमनी के देश में पनही सिर पर ना ढोआत, बुझतानी न।" सास जी की आवाज ऊची हो गई थी। फिर स्वयं ही अस्फुट स्वर में भुनभुनाने लगों, "सुनत रहनी ह कि आजकल पढ़निहार कुलबोरन होले सब, तवन कपरे पर गइल।" फिर ऊंची आवाज में उन्होंने कहा, "हरे दिपवा, कुल थरियन क जूठन बटोर के दे दे कंगला के ।" "कसी बात करती है, मां जी। सत्तर साल के बूढ़े बाबा को जूठन खिलायेंगी?" देवेन ने आश्चर्यमिश्रित क्रोध से कहा। "ना त मुसहर-मजूर के परोसा न दियाता जी, येह मुलुक मे। इनहनी के एक जून रोटी मिलले पर त नाकिन दम कइले बानी सब। पेट भर मिलला पर त रहे दीहे हमनी के । फूंक न दोहें दिन दुपहर सबके।"

36 हादसा देवेन माम की बात पर निलमिलाकर रह गया। कंसे जाहिल लोग हैं कि इनसान को जानवर ने भी बदतर समझते हैं । इस बीच सबको यालियों का जूठन बटोरकर एक फुटही हाडी मे साली ने खाना दे दिया। छोटी बच्ची मरभक की तरह हाडी पर टूट पड़ी और बिना मुंह इलाये ही पूड़ी के टक. निगनने लगी । भूम तो बुड्डे को भी खूब लगी थी, पर हाडी की तरफ उमने काका तक नहीं । जिन्दगी भर तो जूठन चाटता रहा । अव चौथापन क्यो बिगाड़े। भोजन हो गया वाया। थोड़ी देर बाद देवेन ने अन्दर से आवाज दी। "हा मालिक ।" उमने झुठला दिया। सोचा सही बता देने पर शायद मालिक दुखी हो। “अच्छा तो अदर आना जरा।" अदर बुलाकर उमने जबर्दस्ती वीस को नोट उसे पकडा दी। दो रपये उपकी पोती को भी दिये। "ई का करतानी बबुआ । ऐतना रुपया। यहीं से न इनहनी क मन बदल जाता जी, कपार पर चढ़ के । हे बुढऊ खवरदार, जे लोट मिहा । तुम्हरी मजूरी त दे देनी न जी । अब होया खडा बकर-बकर मुह का ताकता, भागता की नाय हीया मे । मालिक लोग जनीह त माल पीच लोह।" "मा जी, क्यों बूढे बाबा को फटकार रही है। दिन भर खराब हुआ बेचारे का, बीस रपये कोई ज्यादा थोड़े ही है ।" देवेन कुढ गया था। "अरे बबुआ तहरा का मालूम । बीस रुप इश्रा त हमनी के महीना भर खटाइला मजूरन के । रउआ एक ठे वक्सी ढोवले क हेतना देतानी। हे बुड्ढा, लोट दमाद जी के लवटाता की नाहीं। बोलाई मालिक के ! मारत- मारत खाल खीच लीहैं। बताय देतानी।" बुढा सकते में पड़ा रहा। न जाते बनता था न रुकते ही। तब तक देवेन का छोटा साला आगन मे आ गया । सारी बात मालूम होने पर वह आगबबूला हो गया और नोट लोटाने के लिए बुड्ढे को डाटने लगा। देवेन दुखी हो गया और चुप मारकर बैठ गया। दमाद की चुप्पी से सास जो थोड़ी महम गई। माला भी चुप हो गया। कुछ पल वाद वुड्ढा उसकी ओर बड़ा और नोट उमके कदमो में रखकर बाहर जाने लगा । देवेन ने लपककर नोट फिर उसे पकड़ा दी और दरवाजे तक छोड़ आमा । सास और साला रक्तवीज: 37 - एक-दूसरे का मुह ताकते रह गये । थोडी देर बाद उसने पत्नी मे कुर्ता-पायजामा निकालने के लिए कहा, ताकि कपड़े बदलकर आराम से लेट सके। पत्नी सूटकेस का ताला खोलने लगी, लेकिन ताला टूटा हुआ था । हाथ तगाते ही सूटकेस खुल गया। अदर का सब माल गायब था। वोरे के गूदड़ो मे ईट के कुछ टुकडे लपेटकर सूटकेस में रखे हुए थे। कपड़ों की तो कोई बात नहीं थी, लेकिन गहनो के लिए बीवी माथा पटकने लगी और छाती पीट-पीटकर रोने-चिल्लाने लगी। वह स्तन्ध रह गया। खलासी ने जब बुधना को बुलाकर सूटकेस सीधे उसे पकड़ा दिया, उस समय उसे कुछ खटका जरूर हुआ था। बुड्डे का सामान गायव होने पर भी उसके मन मे शका उपजी थी। वह मन ही मन पछताने लगा कि उसी समय सूटकेस क्यो नही जाच लिया। खलासी ने उसे भी चूना लगा दिया। घर के सब लोग जुट गये ! पत्नी के माथ सास और सालिया भी हायतौबा मचाने लगी, जैने कोई गमी पड़ गई हो । साम जी बह रही थी, "उस कलमुहे बुड्डे की ही कारस्तानी है । आख वचाकर निकाल लिया होगा। ये मब नक्सली हैं । बड़े लोगों को उजाउने पर तुल गये हैं । मुसहर- चमार तो जनम के चोट्टे होते हैं।" थोडी देर रो-पीटकर पली शान्त हो गई, लेकिन औरतों का कचर-पचर बन्द नहीं हुआ। इतने में छोटा माला बाहर से आया और मुस्कराते हुए बीस रुपये की वही नोट उसको ओर फेक दिया। देवेन के मुंह पर जैसे तमाचा लगा और वह तिलमिला उठा । "आपने यह अच्छा नहीं किया।" वह अंदर से सुलगने लगा था। "पाहुन, उस साले को बीस रुपया देकर इलाके का रेट बिगाड़ना है जी, एकरा बहिन के। अरेइ शहर ना न है जी, दिहात है, दिहात । हैतना दतो सेत-बधार न बिक जायेगा जी। अरे इनहनी के दू मुठी फाकी पर हमनोके दिन भर पटाला जी।" "कुछ भी हो, आपने वापस क्यो मांगा?" "कोन स्साला मांगा जी। अरे एकक फंट में त धूल चाटने लगा। उपर से दो लात लगते ही लोट पकडा दी अपने आप।" "एक बूड़े पर हाथ उठाया आपने।" "पाहुन, रउआ ना वूशब इनहनी क भेद । सब साले नक्सली है। दिन । ।

38 : हादसा में मेउआ बने रहते हैं, और रात में बाप वनकर दहाड़ते हैं। गोला-बारूद ते के लोगन पर हमला करते हैं, गाव का गांव लूट लेते हैं। इन हरामियों को तो ओतना ही देना चाहिए कि एक शाम रोटी मिल जाय बस । कुछ बचे नही इनके घर में, दूसरे दिन के लिए, ताकि अगले दिन सुबह फिर हमारे दरवाजे पर हाजिर रहें। घर में खाने को रहेगा तो ये नीच काम पर आयेगे जी? ये साले सब लतियाये ही सोश रहते हैं। पेट भरने पर बात सुनेंगे।" देवेन तिलमिलाकर रह गया, लेकिन उसके अंदर एक उद्वेग उमड़ रहा था, मिजाज खौलने लगा था। भीतर से यही हो रहा था कि यह जोरों से चीख पड़े। वह बता दे कि मजदूरी कोई भीख नहीं, बुधना का हक है । दो जून की रोटी जुटाना कोई पड्यंत्र नही, उसका अधिकार है । वही पेट, वहीं मुह उसके भी पास है। उसे भी वैसी ही भूख लगती है। उसके बच्चे कोई इंट-पाथर के नही, सबके बच्चों को ही तरह हाड़-मांस के बने हैं। उसे भी अपने बच्चों का उतना ही दर्द है, अपनी टाटी-मड़ई और हांडी-परई उतना ही मोह है । उसका एक-एक बूंद खून, जो तुम चूस रहे हो, एक दिन रक्तबीज की तरह असंख्य बुधना के रूप मे तुम्हारे सिर चढ़कर चिल्लायेगा, छाती पर दलदलायेगा। अब बहुत हो चुका। अब से भी चेत जाओ और आदमी को आदमी समझकर पेश आओ। दिन की एक-एक घटना किमी हादसे की तरह उसकी आंखो के सामने तिरने लगी। उसकी समय में नही आ रहा था, क्या हो गया है, पूरे इलाके को? आजादी के चालीस वर्षों बाद भी चवन्नी पर मजदूरी कराना और मांगने पर मुह तोड़ देना, ना करने पर घर फूक देना, बहू-बेटियों की अस्मते लूट लेना, आवाज उठाने पर खाल खीच लेना, लवे सड़क पर दिन-दहाड़े राहगीरो को लूट लेना, जबर्दस्ती उनकी गठरी-मोटरी उतरवा लेना, हरवा- हथियारों की खेती करना, गोला-बारूदी की फसले उगाना असलहों का भंडार जमा करना, जातीय सेनाओ के दस्ते खड़े करना, यह सब कैसी आजादी है । कसी आजादी है यह, जहां हर तरफ संगीने तनी हुई हैं, लोगों के गर्दनों पर लपलपाती तलवार लटक रही हैं, आदमी आदमी के लहू का प्यासा हो गया है । गरीब पिस रहा है, असहाप मिट रहा है, दरिदे उनकी लाशों रक्तबोज: 39 पर जश्न मना रहे हैं। चारों तरफ अन्याय-अत्याचार का जंगल उग आया है। पूरे इलाके में आग लगी हुई है। एक ऐसी भाग, जो न धुआं छोड़ती है, न लपटें उगलती है, बस अदर-ही-अदर सबको भस्म करती जा रही है। दिशाए सुलग रही हैं । वायुमंडल में जहर घुल गया है। उसे लगा, पूरा इलाका बारूद की ढेर पर बैठा है, जो किसी भी क्षण फट सकता है। उसका दम घुटने लगा, माथा फटने लगा, सांस लेने में तकलीफ महसूस होने लगी, जैसे कलेजे में शूले चुभ रहो हों। वहां एक पल भी रुकना उसके लिए मुश्किल हो गया। ससुराल यातना शिविर लगने लगी, सास-ससुर, साले- सालियां जल्लाद दीखने लगे। उसका दिल वेचैन हो उठा, मन छटपटाने लगा। वह स्वयं को कोसने लगा कि बुधना के साथ ही क्यों नहीं लौट गया। वह फनफनाकर उठा, पत्नी-बच्चों को साथ लिया और जल्लादों के लाख मना करने के बावजूद, उल्टे पाव वापस लौट पड़ा। .

कुआं हथौड़े की हर चोट के माय, लगता था, उसका कोजा हुलककर मुंह को आ जायेगा, फिर भी ठांय'ठाय: "ठायऽऽ''वह हथौडा बरसाये जा रहा था, किसी उन्मादी की तरह, पर चट्टान दरकने का नाम नहीं ले रही थी । उसको लगता था हथौड़ा चट्टान पर नहीं उसके सिर पर पड़ रहा है और खोपड़ी चटयकर चूर-चूर हो गई है। खून मे सना क्षत-विक्षत भेजा बाहर छिटक आया है और वह चट्टान नहीं, अपना भेजा कूट रहा है । कुछ हाथ और चलाने के बाद हथौड़े का बेट मुट्ठी की पकड़ से सरकने तगा, बाहे उठन से जवाब देने लगी और कमर बैठने लगी। एकाएक हथौड़ा उसके हाथ से सरककर दूर जा गिरा। वह पस्त हो चुका था । क्षण-भर तक दूर पडे हथोडे को वह धूरता रहा फिर झुकी कमर पकड़कर सीधी करने लगा। उस समय उसकी आंखों के सामने चकमक-चकमक चिनगारिया उड़ रही थी और काले धब्बो के गुबार उठ रहे थे। उसकी सासे भाथी को तरह हकर-हकर तेज चल रही थी और वदन दोहरा हुआ जा रहा था । दीवार के साथ पीठ टेककर वह धम से बैठ गया और आंखें भीच ली। थोडी देर दम लेने के बाद, जव धोकनी कम हुई और वदन थोड़ा ठंडा हुआ, घुटने की चोट हरी होने लगी और उसमे टीस उठने लगी। सुबह- सुवह पहले हथौड़े के साथ ही चट्टान का एक छोटा टुकडा चटखकर टूटा था और उडकर उसके घुटने के बीचोबीच चाकी की हड्डी से जा टकराया था। उसका बदन झनझना उठा था जैसे गोली लग गई हो । लगा, चाकी की हड्डी छटककर दूर जा गिरी है। रगें बिनविना उठी थी और बदन पसीने से तर-बतर हो गया था, जैसे शरीर का समूचा लहू निचुड़कर पानी बन गया हो। - की कुमारी चोट की जगह सूज आई थी। उसके ऊपर का चमड़ा फट गया था और खून चुहचुहा आया था। बदन का चूता पसीना धावपूर पड़ते ही दर्द लहरने लगता था । उसकी हथेली के घभी छिल गये थे, जो मुट्ठी बांधने में दुख रहे थे। हाथो की उगलियो के नाखूनो के ऊपर की चमड़ी चीथड़ा हो गई थी। उसमें रेशे उग आये थे, जो काटो की तरह चुभ रहे थे मिट्टी- धूल से सने बदन मे जगह-जगह पसीना काट रहा था। खुजलाते समय नाखूनों के ऊपर की फटी चमड़ी मे पसीना लगने पर मिर्च लग जाती थी और वह सिसिया उठता था। कुछ समय दम लेने के बाद, उठते समय, घुटना चिल्हक उठा। कमर भी सीधी नहीं हो रही थी । लगता था, रीढ़ की हड्डियो के बीच लोहे का सरिया डालकर किसी ने तान दिया है । हिम्मत करके धीरे-धीरे वह उठा और कमर पर हाथ रखकर आगे-पीछे झुकने लगा। झुकते समय कमर, रीढ़ और पसलियो मे मीठा-मीठा दर्द हो रहा था, जो अच्छा लग रहा था और उसे राहत महसूस हो रही थी। हथेली के छिल गये घट्ठों को उसने पूरकर देषा, बार-बार मुठिया बन्द को, खोली, चाकी के घाव को आहिस्ते- आहिस्ते उगलियो से सहलाया, घुटने को कई बार मोड़कर हवा में झटकारा और हथौड़ा उठाकर फिर चट्टान पर पिल पड़ा ठांय 55"ठाय... ठाय"| उसको पूरा यकीन था, चट्टान के ठीक नीचे अमृत-कुड लहरा रहा है । चट्टान टूटते ही उसका मुह खुल जायेगा और पानी का फव्यारा फूट पड़ेगा। देखते-देखते कुआ ठहे-ठडे मीठे जल से भर जायेगा। फिर वह वर्षों से जलते अपने खेतो की प्यास बुझा पायेगा और एक बार फिर से उसके खेत हरी- भरी फसलो से लहलहा उठेगे । अगल-बगल के सेतो को भी पानी मिलेगा। किसान एहसान मानें न माने, धरती मैया तो ठडे दिल आशीप देगी ही। इस अकाल मे चिड़िया-चुरमुन, राही बटोही को भी पानी मिलेगा। कितना पुण्य होगा उसको, इस अकाल मे, कुआ खोदकर। लोग कहते हैं, भगत की 'वानी कभी खाली नहीं जाती। बहुत पहुचे हुए और आगमजानी हैं, भगत भी। ऊपर की माटी देखकर धरती के गर्भ की बात बाच लेते हैं । भगत जी ने पहले ही बता दिया था कि पच्चीस हाथ के बाद, तीसरी चट्टान के नीचे 42 हादमा जल-धारा उमड़ रही है। चट्टान टूटते ही झरना फूट पड़ेगा। सहसा उसको लगा, ठडी-ठडी फुहारों से उसका तपता बदन शीतल हो गया है । वह हुमककर और जोरो से हपौड़े चलाने लगा-ठायss."ठांय 5s. ठाय551 चट्टान ठीक वीच से दरककर दो दान हो गई । खुशी से उसकी आंखें चमक उठी। उसने हथौड़ा फेककर रम्भा उठा लिया और दरार मे पेश कर हुमचने लगा, ताकि कांक चौड़ी हो जाय और उसके नीचे कंद झरना ऊपर फूट पड़े। लेकिन रम्भे का पतला शिरा एक इच से अधिक दरार में नही घुस पाया । उसने रम्भा परे झटक दिया और फिर हथौड़ा उठाकर आधी चट्टान पर बरसाने लगा-ठांय 55."ठाय 55."ठांयss."। कुछ हथौड़ो में ही चट्टान टुकड़े-टुकड़े हो गई। वह नीचे का पानी देखने के लिए बेताब हो रहा था। गैता उठाकर उसने टुकड़ों को एक तरफ समेट दिया। नीचे वही भूरी घरती झाक रही थी। कही अमृत कुड, न जलधार, न पानी की एक बूद । रेगिस्तान में भटकते प्यासे मृग की तरह वह तड़प उठा । उसको बड़ा सदमा लगा और गश आ गया। वह पत्थर के टुकड़ो के बीच सिर पकड़कर बैठ गया। "अरे क्या हुआ 55 ? कुएं में ही बैठे रहोगे या ऊपर भी आओगे 55। दोपहर होने को आई। लपटें उठने लगी हैं । प्यास से कलेजा सूख रहा है मो अलग और तुम अभी तक कुएं में बैठे करम कूट रहे हो।" ऊपर से कुएं मुह डालकर उसकी घरवाली ने हांक लगाई। कुएं में पत्नी की गूजती आवाज से पताली जैसे मूळ से जाग उठा। उसने ऊपर देखा। सूरज सिर पर लटक रहा था। लगता था, उसकारण सीधे कुएं में उतर भायेगा । तेज किरणों से उसका बदन जल रहा था, जैसे दहकती भट्टी मे झोंक दिया गया हो। उसने उठना चाहा, परहाथ-पैर जवाब दे गये, भरीर बेकाबू हो गया। उसने एक बार फिर हिम्मत की और उठकर गते से सारे टुकड़ों को समेटकर एक किनारे लगा दिया। यह सोचकर उसे हैरत हो रही पी कि भगत जी को 'वानी' खाली कैसे गई। जैसे-जैसे उन्होंने बताया था, उसने पूजा-पाठ करने के बाद ही कुएं की साइत की थी। बरावर पांच नीबू काटे थे, पांच नारियल फोड़े थे, पांच जीवों की वन देवता कुआं:43 को बलि दी थी। कही कोई भूल-चूक तो हुई नहीं, फिर भगत की 'बानी' कटी कैसे । जब मे कुएं की खुदाई शुरू हुई है, भूलकर भी उसने गूजरी को नही छुआ था । फिर कहा क्या खोट रह गया । वह हैरान था। ऊपर निकलने के लिए उसने कुएं में लटक रहे बरहे को हिलाया। "ठहरो ऽऽ, जुगाड बना लेने दो, तब कहूगी 55।" गूजरी ने ऊपर से आवाज दी। उसने धुरई-बड़ेरा, आजमाकर ठीक किया, धुरई के दोनों बासों को अलग-बगल के ओटो (मिट्टी के खम्भों) में रस्सी से कसकर बांधा, गड़ारी पर बरहा चढ़ाकर घुमाया, मोट खींचने वाले दोनों आदमियों को सजग किया, जुए मे बरहे की गाठ कसी और फिर झुककर हांक लगाया, "सब ठीक है ऽऽ । खांची में बैठ जाना तो आवाज देनाssi" पताली ने खांची में बैठकर, अपना बदन रस्सियों से खांची के साथ बाधा, खाची की रस्मी की गुल्ली बरहे के फांस में डालकर कसी और फिर बरहा हिलाकर ऊपर सकेत भेज दिया। "अरे मुंह से तो बोलो, खाचो-यांची ठीक से बांध ली न551" गूजरी ने फिर आवाज दी। "खोंचो भी, क्यों सिर खा रही हो।" "जय वन देवता" की आवाज के साथ चू चरर मरर'चू चरर मरर गड़ारी चलने लगी और वह ऊपर आ गया। "तुम लोग घर जाओ। मैं भगत के यहां जा रहा हूं।" ऊपर आते ही उखड़ी आवाज में उसने कहा। "अरे इम दुपहरिया में भूखे-प्यासे कहा नाहक हलकान होगे। घर चलो, दो टूक रोटी खाकर नेक आराम कर लो । बेर ढरकेगी तब चले जाना।" गमछे से उसका बदन पोछते हुए गूजरी ने कहा। "तू मेरा भेजा मत चाट। भगत की वानी खाली कसे गई, इसका बिनायता लगाये में दाना-पानी नही करूंगा।" "मैं तो कहती हूं, छोड़ो इस कुआ-फुत्रा के चक्कर को। सीधी बात तुम्हारी समझ में क्यों नही आती, जब ऊपर पानी नहीं तो धरती के नीचे कहां से भा जायेगा ! तुम तो नाहक भगत-सगत के चाकर में सिर पीट- 44: हादसा पिटवा रहे हो । अरे सूखा अकेले हमारे लिये ही तो पड़ा नहीं है । जैसे सब रहेगे वैमे हम भी काट लेंगे मर-खपकर। आग लगी तो तुम कुआं खोदने चले हो।" "कहा न, मेरा दिमाग मत चाट । तू घर चल, मैं भगत से मिलकर आता हूँ।" कहते हुए लंबा डग भरता हुआ वह चल दिया। लगातार यह तीसरी साल सूखा पड़ा था। पिछले दो सालों में तो आगे- पीछे कुछ पानी पड़ भी गया था, सावा-कोदो कुछ उपज गया था। जानवरो के लिए भी जंगल मे कुछ घास-वास उग गई थी। लेकिन इस वर्ष तो पूरा असाढ़ और सावन कोहार के आवा की तरह तपते ही बीत गये । लगता ही नहीं कि बरसात का महीना है । बादल के एक टुकड़े के लिए आसमान तरस गया और पानी की एक बूद के लिए धरती। वहीं आग उगलती सूरज किरणे, सुलगती घरती, धुलसती हवाएं और तपता आकाश, जैसे चारों तरफ आग लगी हो और खेत-खलिहान, जंगल-बियावन, भादमी-जन, पशु- पक्षी सब उसमे धू-धू कर जल रहे हो। पताली ने सोचा खेतों पर एक कुआं खोद ले तो शायद इस आग से बच जाये। इसलिए पूरा असाढ़ आकाश का मुंह ताकने के बाद सावन चढते ही उसने कुआ खोदवाना शुरू किया था। साइत-लग्न उसने भगत से पूछ लिया था और पूजा-पाठ भी कर दिया था। तीस हाथ गहरा कुआ खोदने के बाद भूलकर भी एक सितुही पानी नहीं निकला था। चिकनी, सपाट, नगी तलहटी में दरारें ही दरारें उग आई थी। मुंह बाये प्यासे खेत पानी के लिए हाफ रहे थे। तलहटी पार करने पर जगल शुरू हो जाता था। पेड़ों की ठूठ डालिया आकाश की और वाहे फैलाये उसका मुह ताक रही थी। जगह-जगह जंगली पशुओ के ककाल पड़े थे । न कही हरी पत्ती पी न घास का एक तिनका। बचे-खुचे जानवर कही और गये थे। जगल से आगे पहाड़ी पर नंगी दुपहरी नाच रही थी । गर्म हवाएं साय-साय करती हुई पत्थरो से सिर धुन रही थी। पहाड़ी से आप भगत का पुरवा पड़ता था। वह दौड़ा चला जा रहा था। ऊपर पहाड़ी से एक अधेड़ उम्र का राही दुलविया नीचे भागा चला आ रहा था। साथ में एक आठ-नौ साल का लड़का भी था, जो करीब- कुआं 145 करीव दौडता चल रहा था । पहाड़ की उतराई पर वह उनके साथ हो लिय था। आदमी अधनगा था । सिर्फ कमर मे एक लंगोटी और सिर पर चीथडे का एक टुकड़ा था । लड़के के कमर में सिर्फ लगोटी थी। आदमी के कंधे पर एक दाव रखा था और लड़का हाथ में लकडी का डंडा लिये था, जिसके सिरे पर खी जमी लोहे की तेज सुम्मी लगी थी। शायद असुर जाति का आदिवामी था। घर से बाहर निकलते समय आदतन ये लोग, जगली पशुओं से रक्षा के लिए, कुछ न कुछ हथियार ले लेते हैं । "कहां जा रहे हो वीर ?" पताली ने पूछा। जगली लोगों को मैदानी लोगो में 'वीर' कहकर पुकारने की परम्परा है। "बुधवा हाट मालिक ।" "कुछ खरीद-फरोख्त करनी है क्या?" "कहा की बात मालिक । फूटी कौड़ी मयस्सर नही । जगल में पत्ते भी नहीं रहे कि दोना-पतरी वना लें।" "फिर क्यो जा रहे हो।" "इस बच्चे को कहीं ठांव धराने। मुनते है, शहर के लोग आजकल वहा आते है, छोटे बच्चों की तलाश मे, घरों में काम करने के लिए।" "विना जाने-समझे ऐसे ही दे दोगे, अपने बच्चे को, किसी अनजान को।" "क्या करूंगा मालिक । घर में रखकर भूखा मारने से तो अच्छा है । अब तो जगल-पहाड़ पर कंदमूल फल भी नहीं रह गये। शिकार भी मर- विलाय गये । कही कुछ तो नहीं मिलता, खाने को । कम से कम एक खाने वाला मुंह तो कम होगा। और फिर जहां कहीं भी रहेगा, अनाज तो मिलेगा इसको।" "तो क्या बेच दोगे?" "कुछ न कुछ, सौ पचास तो मिल ही जायेगा।" आगे उसका रास्ता अलग हो गया था। वह भगत के यहा पहुंचा तो चौकी पर कम्बल बिछाये वह सो रहे थे। दरवाजे पर ढेर सारे कलगीदार मुर्गे चर रहे थे और सात बकरे दंबरी में बंधे थे । शायद पूजा के लिए, चढावे में, उस जैसे भक्तो ने दिये होंगे । वह 46 : हादसा । पैताने की ओर हाथ जोड़कर बैठ गया। घटे-भर वाद भगत जी उठे। दंड-प्रणाम के बाद जब उसने सारी बात सुनाई तो भगत जी मौन रह गये। फिर आसन से उठकर उन्होंने हाथ-पैर धोये, बदन पर पानी छिडककर शुद्ध किया, धूनी से चिटकी मे राख उटाई और पजो पर उकड़ बैठकर सुमिरन करने लगे। थोड़ी देर तक आँखै बन्द किये वह लय में गुनगुनाते रहे फिर पनो पर आगे-पीछे झूमने लगे और रह- रहकर बदन झकझोरने लगे । शून्य में आंखें गड़ाकर हवा मे पंजे फैलाये वह जैसे किसी को बुलाने लगे, फिर अधमुड़ी तनी अंगुलियों से हवा को पकड़कर अपनी तरफ खीचने लगे। इस दौरान उनके होठ लगातार चल रहे थे। शात होने पर वह थोडी देर तक पालथी मारकर मीन बैठे रहे, फिर अध- खुली नजरो से उसकी तरफ देखते हुए गम्भीर स्वर में बोले- "वनदेवी अप्रसन्न है। बड़ी पूजा माग रही हैं । कुए के नीचे पानी की धारा उमड़ रही है, पर जब तक देवी प्रसन्न नहीं होती, चाहे जितना खोद लो, एक बूद पानी कुएं मे नही आयेगा।" "लेकिन भगत जी, आप तो।" "लेकिन वेकिन कुछ नहीं। यह देवी-देवताओं का मामला है । हम कुछ नही कर सकते।" "ठीक है, जैसा आप कहे।" "पूजा बड़ी होगी। अगर तुम्हारी हिम्मत पड़े तो देवी को मनाऊँ।" "क्या मांगती हैं वनदेवी?" "नरवलि।" "नरवलि ?"वह चौक गया, जैसे उसके कानों में खौलता तेल पड़ गया हो। "हा, हां, नरबलि । बच्चे से भी काम चल जायेगा।" वह सन्न रह गया। पथराई नजरो से वह भगत का मुंह ताक्ता रह गया। "और कोई पूजा?" थोड़ी देर बाद उसने वापत स्वर में पूछा। "और कोई पूजा देवी स्वीकार नहीं करेंगी।" जमीन पर आये गड़ाये वह काफी देर तक सोचता रहा। उमका माया कुआं:47 चाक की तरह घूम रहा था । सहसा रास्ते में मिला नादियाती उसकी आबों में तैर गया । सोचा, यदि सौ-पचास मे ही आदिवासियो के बच्चे मिल रहे है तो क्या बुरा है । बकरे की भी तो कीमत नही लग रही है। "ठीक है भगत जी। लेकिन कोई जान गया तो।" घबराये स्वर मे उसने कहा। "तुम निश्चित रहो। केवल तुम, मैं और देवी जी रहेंगी वहां पर ।" "तो क्या देवी जी का भी दर्शन हो जायेगा?" "तुम्हारे जैसे मानुप नहीं देख सकते। तो फिर अगली पंचमी को रात में बारह बजे साइत है । तुम तैयारी करो।" पूजा की सारी सामग्री भगत ने बता दी। वह वापस लौट आया। उसका मन उचाट था और पाव सीधे नही पड़ रहे थे। घर लौटने पर उसने पत्नी से कोई बात नहीं की। दिन-रात वह गुम- सुम रहने लगा । पंचमी आज से ठीक बारहवें दिन पड़ रही थी, तब तक उसे पूजा के लिए मब व्यवस्था कर लेनी थी। उसने सोच लिग था, अगले बुधवार को उसी हाट मे जायेगा। शायद गरीब-दुखिया का कोई लड़का मिल जाय। हाट के दिन वह बुधवा बाजार पहुंच गया। मेले में हर तरह की चीजें बिक रही थी पर कही भी लड़के-लड़की की बिक्री दिखाई नहीं दी। वह एक छोर से दूसरे छोर तक कई बार घूमते-घूमते थककर चूर हो गया और फिर मेले से बाहर आकर एक ठूठ पेड़ के पास बैठ गया। दोपहर ढलते- दलते वही आदिवासी एक लडके के साथ मेले की ओर आता दिखाई दिया। पास आने पर दुआ बन्दगो के बाद उसने पूछा--- "यह भी तुम्हारा हो लड़का है ?" "हां, अपना ही समझो मालिक !" "क्या इसे भी वेचने लाये हो?" "क्या करे, मजबूरी है।" "कितने बच्चे हैं तुम्हारे ?" "सब अपने ही समझो मालिक । पहाड़ों पर वेचारे इधर-उधर भटकते 48 : हादसा . फिरते हैं। इनके मां-बाप भी छोड देते हैं या पनीम-पनाम लेकर किमी के हवाले कर देते हैं। सोचा, मैं ही कहीं ठांव धरा दिया करूं।" "तो बोलो क्या लोगे इसका?" "गुल्ली की सरह ठोस लौडा है, कद-काठी भी अच्छी है, हर तरह का काम कर लेगा। अव आपमे कीमत क्या कहें, जहां रहे सुखी रहे, आप दो सौ रुपये दे देना।" "नहीं-नही, में काम-वाम के लिए नहीं ले जा रहा हूं।" उसके मुंह मे बरबस ही निकल गया। उसने जीभ दांतों-तले काट ली। "मतलब!" "मेरा मतलब "मेरा मतलब है खाली ढोर-डंगर घुमा-फिरा दिया करेगा।" वात सम्हालते हुए उसने कहा। "लेकिन 'लेकिन, वीर, दो सौ ज्यादा है, वच्चा ही तो है । अभी तो खेलने-खाने की उमर है, इमको । सो ठीक रहेगा।" काफी हीला-हवाली के बाद सौ रुपये देकर बच्चे को उसने ले लिया और घर की ओर चल दिया। बच्चा उसके पीछे-पीछे चल रहा था। उसको लगता था बलि के बकरे की रस्सी थामे वह आगे-आगे चल रहा है। रास्ते- भर न तो उसने बच्चे से कोई बात की और न ही उससे नजरें मिलाई। घर पहुंचने पर, साथ मे बच्चा देखकर, गुजरी भडक उठी। इस सम्बे में अपने ही पेट को दाना दुस्वार है और यह मुआ एक और ठलुआ उठा लाया। अब एक और मुंह के लिए चारा कहा से आयेगा । वह पति पर तुनककर झनकने-पटकने लगी। लेकिन पताली चुप ही रहा। उसने सोच रखा था, लड़के को छिपाकर घर में रख देगा और पूजा की रात ही निकालेगा, लेकिन पत्नी का रुख देखकर उसको लगा, सब गृड- गोबर हो जायेगा । सोचा, गूजरी को सारी बात साफ-साफ समझा दे, पर कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी। दिन-भर वह इसी ऊहापोह मे वेचन रहा, रात होने पर उसने घुमा-फिरा कर घरवाली को लडका लाने का मकमद बता दिया । गूजरों उसकी बात सुनकर भडक उठी और जोर-जोर से चीखने-चिल्लाने लगी। बहुत हथजोड़िया-गोड़धरिया करने पर तो वह ठंडी हुई थी।

कुआं : 49 रात भर गूजरी की पलकों पर आपको नहीं आई। उसके अन्दर एक युद्ध चल रहा था, जिसमें बार-बार मा की ममता, शिशु का स्नेह और दया, धर्म विजयी होता । लड़के की बलि के विचार मात्र से उसका बदन सिहर उठता । उसने तय कर लिया कि किसी भी कीमत पर नरबलि नहीं होने देगी। सुबह होते-होते पति को बिना जानकारी के उसने लड़के को डरा- धमकाकर घर से भगा दिया। पताली को जब मालूम हुमा तो वह तिलमिलाकर रह गया । हाट उठ चुकी थी। आज के चौथे दिन पूजा देनी थी। वह इधर-उधर बहुत भागा- दौड़ा पर कहीं किसी बच्चे का जुगाड नहीं बन पाया । घबडाकर वह भगत के पास भागा गया । यदि पूजा की तिथि अगले बुधवा वाजार तक टल जाय तो शायद कोई इन्तजाम हो जाय । उसकी बात सुनकर भगत जी बिगड़ गये और माफ कह दिया कि पूजा की तिथि किसी कीमत पर नहीं टल सकती। उन्होने उसी दिन के लिए वनदेवी को मन्नत मान दी है और सुमिरन करके कुएं पर स्थापित कर दिया है । वनदेवी अपना थान छोड़ चुकी हैं । अब खप्पर लेकर ही वह अपने थान को वापस लौटेंगी। यदि उसने पंचमी की रात बारह बजे पूजा नहीं दी तो अनर्थ हो सकता है। उसकी या उसके परिवार की जान खतरे मे पड़ सकती है । देवी तो नरमुंड लेकर ही रहेंगी। "तुम्हारे कितने बच्चे हैं ?" भगत ने वेरुखी से पूछा। "जी, दो बेटे, दो बेटियां," हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए उसने कहा। "तो ठीक है, अपने बड़े बेटे की बलि दो। देवी की इससे बड़ी और क्या पूजा होगी। तुमको तो मुहमागी मुराद मिलेगी। हो सकता है, प्रसन्न होकर, देवी तुम्हारा बेटा भी वापस लौटा दे।" वह चुप रहा। "तुमको मालूम है न, राजा मोरध्वज की कहानी । उन्होने अपने ही बेटे के सिर पर आरा चलाकर उसका आधा शरीर शेर को अपित किया था और भगवान ने प्रसन्न होकर उसके बेटे को फिर मे जिला दिया था। वैसे ही यदि तुम स्वयं अपने हाथों से बड़े पुत्र का गला काटकर देवी का खप्पर भरो तो तुम्हारा पुत्र भी देवी वापस कर देगी और मन की मुराद भी 50: हादसा पूरी हो जायेगी।" भगत की बातें सुनकर पताली का कलेजा कांप उठा और शरीर पर- थराने लगा। न चाहते हुए भी देवी के भय से उसने हां कर दी। दिन के उजाले में घर लौटने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। देर रात- गये वह लड़खडाता हुआ घर लौटा और दालान के एक कोने में पड़ी चार- पाई पर औधे मुह गिर पड़ा। उस समय उसके दिल-दिमाग पर अनगिनत हथौड़े बरस रहे थे ठाय "ठांय"ठाय। पूजा अगले दिन बारह बजे रात को थी। उसने पूजा की सारी सामग्री एकत्रित कर ली। पटनी पर रखा हुआ। बकरा काटने वाला खजर भी उतार लिया। उसमें जंग लगा हुआ था। पत्थर पर रगड़-रगड़कर उसने जंग छुडाया, उसकी धार तेज की, धार के ऊपर अंगूठा फेरकर आजमाया और जब आश्वस्त हो गया कि एक बार में गर्दन उतर जायेगी, तब पूजा की सामग्री के साथ खजर को भी नई चुदरी मे गठिया लिया। सोते हुए बड़े बेटे को गोद में उठाया और सेतो को पार करता हुआ कुएं पर जा पहुचा । भगत जी वहा पहले से मौजूद थे। बेटे को मिट्टी के नये घड़े के जल से नहलाया, नया वस्त्र पहनाया, उसके बदन पर चंदन-गुगुल लगाया, माथे पर लाल रोरी का टीका किया, गले में मालाएं पहनाई और बलि के लिए तैयार कर दिया। इस दौरान भगत मन पढते रहे और अक्षत-फूल बलि पर छिड़कते रहे। नहलाते समय, नया वस्त्र पहनाते समय, चंदन-गुगुल लगाते समय, माला-फूल चढ़ाते समय, हर कदम पर उसका बेटा भोलेपन से पूछता रहा, "यह क्या कर रहे हो बापू, क्यों कर रहे हो?" पर उस समय उस पर देवी का भूत सवार था। वह एक ही उत्तर देता रहा, "सब तुम्हारे भले के लिए कर रहे हैं बेटे।" अबोध बालक टुकुर-टुकुर उसका मुह ताकता रहा और कठपुतली की तरह हर आदेश मानता रहा, लेकिन भगत की आखो की तरफ देषकर वह भय से कांप जाता था। पुजारी के आदेश पर उसने बेटे को वेदी के पास लेटा दिया और उसके सामने खाली खप्पर रख दिया। ज्यो ही उसने वेटे का सिर परपर के ठीहे पर रखकर खंजर उठाया, लड़का घोषकर भाग खड़ा हुमा । "बचाओ, बचाओ" चिल्लाते हुए वह जान छोड़- कुआं:51 कर भागने लगा। पताली ने दौड़कर लड़के को पकड़ लिया। लड़का हाथ- पर पीटते हुए जमीन पर पसर गया और बेतहासा चिल्लाने लगा। उसने लड़के के मुह मे कपड़ा ठूस दिया और घसीटकर वेदी के पास ले आया। भगत ने एक बार फिर बलि पर जल छिड़क कर पवित्र किया और मन्त्र पढने लगा। पताली लड़के को पटककर उसके सीने पर चढ बैठा। उसकी गर्दन उसके पत्थर के ठीहे पर रख दी और खंजर उठाकर 'खच्च' एक ही वार में घड़ से अलग कर दी। 'फस्स' की आवाज के साथ अन्दर की हवा उड़ गई और छटपटाते धड़ से गर्म-गर्म खून का फव्वारा फूट पड़ा। सामने रखा देवी का खप्पर ताजे लहू से लबालब भर गया। उसने देखा, सिर में पुतलियां अभी भी नाच रही थी और होंठ फड़फड़ा रहे थे । जीभ बाहर झूल आई थी। पूजा के बाद, भगत के आदेश पर पालथी मारकर वह बैठ गया और सिर को धड़ से जोड़कर, लाश को उठा कर गोद में रख लिया। उसे भगत की बातों पर पूरा विश्वास था कि राजा मोरध्वज के पुत्र की तरह उसका बेटा भी जी उठेगा। भगत मन्त्र पढते रहे और अक्षत माला लाश पर छिड़कते रहे । उनके कहने पर आखे बन्द करके वह देवी का ध्यान करने लगा। उसका मन वेचन था, दिल हाहाकार कर रहा था, अपने लाल के लिए आत्मा बिलख रही थी पर भगत के डर से आखें मूदे वह निश्चल बैठा था। बीच-बीच मे उसे लगता बेटे की लाश हवा में उड़ गई है। उसका प्रेत कंकाल के वेष मे उसके सामने अट्टहास कर रहा है और ललकार कर पूछ रहा है, 'बाप बनकर तुमने मेरे साथ विश्वासपात किया है, अपने स्वार्य के लिए झूठ बोलकर मेरा बध किया है। हम तुमको कभी माफ नही करेंगे । इस छल का बदला लेकर रहेंगे और तुमको एवं तुम्हारे खानदान को कच्चा चबा जायेंगे।' उमे लगता, हवा में तैरता हुआ कंकाल उसको गर्दन पर भूलने लगता और अपनी लम्बी उंगलियों से उसका गला दाबने लगता । रह-रह कर भय से वह कांप उठता पा मोर गोद में पड़ी बेटे की लाश टटोलने लगता था। रात बीत चुकी थी। अंधेरा छटने लगा था। जंगल के ढूंठ पेड़ों के पीछे, 52 : हादसा पूरब दिशा में, धीरे-धीरे लाल धब्बा उभरने लगा था। उसने आंखें खोली तो भगत गायब थे और पुलिस ने उसे चारों ओर से घेर रखा था। उसने चीख कर भागना चाहा, पर पुलिस ने दौड़कर पकड़ लिया और जजीरों में बांध कर जमीन पर घसीटने लगी। जिस रास्ते से पुलिस उसे घसीट रही थी, वह ऊबड़-खाबड़ और कंकरीला-पथरीला था। रास्ता टूटे काच, पत्थर और लोहे के नुकीले टुकडों से भरा था। उसका पूरा बदन छलनी की तरह बिंध गया और शरीर लहूलुहान हो उठा। रास्ते के दोनों ओर लोगों की भीड़ जमा थी। "खूनी "खूनी" कहकर भीड उसके ऊपर थूक रही थी और जूते-चप्पल, ककड़-पत्थर बरसा रही थी। पुलिस उसे फासीघर में ले गई जहां लम्बा-चौडा, काला-कलूटा विशाल जल्लाद फासी का फन्दा लिये खड़ा था। उसके लम्बे चमकीले दांत बाहर निकले हुए थे और बडी-बड़ी आखे डरावनी लग रही थी। जल्लाद ने उसे फांसी के कुए पर रखे पटरे पर खड़ा कर दिया और उल्टी मुसुक चढ़ाकर दोनो हाथ पीछे बाघ दिये। उसने उसके ऊपर काला कपड़ा डाल दिया और आखों पर काली पट्टी बाध दी। उसके गले में फासी का फन्दा डालकर जल्लाद ने आजमाया, हुच्च-हुच्च तीन बार फन्दे को खीचा और एक-दो-तीन बोलते ही 'खड़क' को आवाज के साथ पटरा उसके पैरो के नीचे से हट गया | उसका बदन कुएं में झूल गया, गला कस गया और दम घुटने लगा। हवा मे पैर पीटते हुए वह छटपटाने लगा और जान बचाने के लिए गोय-गोंय चिल्लाने लगा। सहसा फासी का फन्दा उसके गले से सरक गया और वह धडाम से गहरे कुएं में, नीचे जा गिरा । उसे लगा, यह वही कुआं है, जिसे वह खोद रहा था। जल्लाद ने अपनी काली लम्बी भुजाएं कुएं में डाल कर उसके सिर के बाल पकड़ लिये और अट्टहास करता हुआ वाहर खीच लाया। उसी वेदो के पास पटक कर वह उसके सीने पर चढ़ बंठा और उसी पत्थर के ठीहे पर उसकी गर्दन रख कर काटने के लिए वही पजर हवा में तान दिया। वह 'बचाओ, बचाओ' चिल्लाने लगा। बगल में सोई उसकी पत्नी हड्बडाकर उठ बैठी। उमने देखा, उसका आदमी नीद मे घिधियाते हाप-पर पीट रहा है, जैसे उसके सीने पर बैठा कोई गला घोंट रहा हो।

कुआ:53 उसने झिझोड़कर पताली को जगाया। पताली जग तो गया लेकिन उसका बदन थरपर कांप रहा था, सासे तेज चल रही थी और मुह से साफ आवाज नहीं निकल पा रही थी। बदन पसीना-पसीना हो गया था। गूजरी ने दौड़ कर आले पर रखी ढिबरी जला दी और उसके पास आकर सिर पर हाथ फेरने लगी। ढिबरी की टिमटिमाती रोशनी में पताली की फटी-फटी भयभीत आखे चारो तरफ नाचने लगी जैसे किसी को ढूढ रही हों। बड़ी मुश्किल से उसकी आवाज निकली, "मैं''मैं''कहां हूं? जल्लाद कहा हैं ? पुलिस वाले कहां गये ? मेरा बेटा "मेरा वेटा"सलामत तो है, उसका खून तो किसी ने नहीं किया। कहा है। कहा है मेरा बेटा?" गूजरी हैरान थी, एकाएक उसके आदमी को हो क्या गया है ? वह रुमासी हो उठी। पति का बदन सहलाते हुए उसने कहा, "तुम कैसी बातें करते हो? कौन जल्लाद, कैसी पुलिस, किसने किसका खून किया, यह सब तुम क्या बकझक कर रहे हो? सम्हालो अपने आपको। लगता है कोई बुरा सपना देखा है।" "सपना''नहीं-नही गूजरी, इसे सपना मत समझो। मेरा बड़कुआ कहा है ? उसे मेरे पास से आओ।" इस दौरान उसके चारों बच्चे उसकी चारपाई के इर्द-गिर्द खड़े हो गये थे । उसने बड़े लड़के को बांहों में भर लिया और सीने से लगाकर देर तक हिचक-हिचक कर रोता रहा। "कुछ बताओगे भी, तुम तो एकदम बच्चो की तरह डर गये । ऐसी कौन-सी खौफनाक बात हो गई ?" "बात तो बहुत खौफनाक थी गूजरी, पर होते-होते बच गई । अब मुझे कोई कुआं-फुआ नही चाहिए और न ही मैं इसके लिए भगत के पास जाऊगा।"

52: हादसा पूरब दिशा में, धीरे-धीरे लाल धब्बा उभरने लगा था। उसने आंखें खोली तो भगत गायब थे और पुलिस ने उसे चारों ओर से घेर रखा था। उसने चीख कर भागना चाहा, पर पुलिस ने दौड़कर पकड़ लिया और जजीरों में बांध कर जमीन पर घसीटने लगी। जिस रास्ते से पुलिस उसे घसीट रही थी, वह ऊबड़-खाबड़ और कंकरीला-पथरीला था। रास्ता टूटे कांच, पत्थर और लोहे के नुकीले टुकडों से भरा था। उसका पूरा वदन छलनी की तरह बिंध गया और शरीर लहूलुहान हो उठा। रास्ते के दोनों ओर लोगों की भीड़ जमा थी। "खूनी "सूनी" कहकर भीड़ उसके ऊपर थूक रही थी और जूते-चप्पल, कंकड़-पत्थर बरसा रही थी। पुलिस उसे फांसीधर में ले गई जहां लम्बा-चौडा, काला-कलूटा विशाल जल्लाद फासी का फन्दा लिये खड़ा था। उसके लम्बे चमकीले दांत बाहर निकले हुए थे और बड़ी-बड़ी आंखे डरावनी लग रही थीं। जल्लाद ने उसे फासी के कुएं पर रखे पटरे पर खड़ा कर दिया और उल्टी मुसुक चढाकर दोनो हाथ पीछे बाध दिये। उसने उसके ऊपर काला कपड़ा डाल दिया और आखो पर काली पट्टी बांध दी। उसके गले में फांसी का फन्दा डालकर जल्लाद ने आजमाया, हुच्च हुच्च तीन बार फन्दे को खीचा और एक-दो-तीन बोलते ही 'खडक' की आवाज के साथ पटरा उसके पैरों के नीचे से हट गया । उसका बदन कुएं में झूल गया, गला कस गया और दम घुटने लगा। हवा में पैर पीटते हुए वह छटपटाने लगा और जान बचाने के लिए गोंय-गोंय चिल्लाने लगा । सहमा फांमी का फन्दा उसके गले से सरक गया और वह धड़ाम से गहरे कुएं में, नीचे जा गिरा । उसे लगा, यह वही कुआं है, जिमे वह खोद रहा था। जल्लाद ने अपनी काली लम्बी भुजाएं कुए मे डाल कर उसके सिर के बाल पकड़ लिये और अट्टहास करता हुआ चाहर खीच लाया। उमी वेदी के पास पटक कर वह उसके सीने पर चढ़ चंठा और उसी पत्थर के ठोहे पर उसकी गर्दन रख कर काटने के लिए बही गंजर हवा में तान दिया। वह 'बचानो, बचाओ' चिल्लाने लगा। बगल में मोई उसकी पत्नी हावड़ाकर उठ बैठी। उमने देखा, उसका आदमी नीद मे पिपियाते हुए हाथ-पैर पीट रहा है, जैसे उसके सीने पर बैठा कोई गला घोंट रहा हो।

कुआं:53 उसने झिंझोड़कर पताली को जगाया। पताली जग तो गया लेकिन उसका बदन थरथर काप रहा था, सासे तेज चल रही थी और मुह से साफ आवाज नहीं निकल पा रही थी। बदन पसीना-पसीना हो गया था। गूजरी ने दौड़ कर आले पर रखी ढिबरी जला दी और उसके पास आकर सिर पर हाथ फेरने लगी। ढिबरी की टिमटिमाती रोशनी मे पताली की फटी-फटी भयभीत आखें चारो तरफ नाचने लगी जैसे किसी को ढूढ रही हों। बड़ी मुश्किल से उसकी आवाज निकली, "मैं''मैं कहां हूं? जल्लाद कहां हैं ? पुलिस वाले कहां गये ? मेरा बेटा "मेरा बेटा' 'सलामत तो है, उसका खून तो किसी ने नहीं किया। कहां है। कहा है मेरा बेटा?" गूजरी हैरान थी, एकाएक उसके आदमी को हो क्या गया है ? वह रुमासी हो उठी। पति का बदन सहलाते हुए उसने कहा, "तुम कैसी बाते करते हो? कौन जल्लाद, कैसी पुलिस, किसने किसका खून किया, यह सब तुम क्या बकझक कर रहे हो? सम्हालो अपने आपको। लगता है कोई बुरा सपना देखा है।" "सपना "नहीं नहीं गूजरी, इसे सपना मत समझो। मेरा बड़कुआ कहा है ? उसे मेरे पास ले आओ।" इस दौरान उसके चारों बच्चे उसकी चारपाई के इर्द-गिर्द खडे हो गये थे। उसने बडे लड़के को बांहों में भर लिया और सीने से लगाकर देर तक हिचक-हिचक कर रोता रहा। "कुछ बताओगे भी, तुम तो एकदम बच्चो की तरह डर गये । ऐसी कौन-सी खौफनाक बात हो गई ?" "बात तो बहुत खौफनाक थी गूजरी, पर होते-होते बच गई । अब मुझे कोई कुआं-फुआ नहीं चाहिए और न ही मैं इसके लिए भगत के पास जाऊगा।"

सराज आजादी की चालीसवी वर्षगांठ थी। सड़के और चौराहे लाल-पीली झंडियो और झालरों से सजे थे। बिजली के खभों पर लाउडस्पीकर टगे थे। सुबह से ही देश-भक्ति के गाने आ रहे थे । मुह-अंधेरे मेहतरो का झुंड सड़के साफ कर गया था। वर्ष-भर की गन्दगी खुरच-खुरच कर छुड़ाई गई थी। भोर से ही पुलिस की गाडिया, सी० आर० पी० के जवान, एन० सी० सी० के छोकरे बन्दोबस्त मे सडको पर इधर से उधर दौड़ रहे थे। आम लोगों का आमदरफ्त आज सड़कों और फुटपाथों पर नहीं था। आठ बजे चौराहे के मामने सरकारी भवनो पर तिरगे झंडे फहराये गये, 'जन गण मन' दोहराया गया, भाषणो मे आजादी की कीमत और उसके अर्थ समझाये गये, शहीदों के बलिदानों को याद किया गया, पुलिस की परेड और स्कूली बच्चो के जुलूस निकाले गये। साढ़े नौ बजते-बजते सब कुछ समाप्त हो गया। डेढ़ घंटे के लिए सुराज जागा, फिर सो गया, माल-भर के लिए। सडके-चौराहे वीरान हो गये। न आदमी, न जन, न रोज की भीड़-भाड। बस्तिया चुप, बाजारें बन्द, आम लोगों में न कही कोई उत्माह, न उमंग। लगता था, जैसे पूरा नगर मुर्दा हो गया है । केवल बिजली के खंभो पर टगे लाउडस्पीकर अकेले चिचिया रहे थे। सुगज अपनी ठेगनी और जस्ते का टूटा कटोरा लिये, मूत्रालय के पास रोज की जगह बैठा, चुपचाप यह सब देखता साडे-नौ बज गये थे, पर उसके कटोरे मे अभी तक एक पैसा नही पडा या। रोज अब तक रुपया आठ आना मिल जाता था और वह एक कप चाय पी लेता पा, लेकिन आज अभी तक वह वासी मुंह बैठा शख मार रहा था। सहसा उसे अपना बचपन याद आने लगा। उम्र के चालीस वर्ष परत .

सुराज:55 दर परत उसकी नजरों के सामने खुलते चले गये। आज से चालीस माल पहले, आजादी के दिन ही वह जन्मा था। मारे खुशी में बापू ने उसका नाम स्वराज कुमार रखा था, जो बाद में पल कर सुराज और फिर सुरजवा बन गया । उसके जन्म के साथ ही, उसके बापू ने, अपने बेटे के लिए, ढेर सारे सपने सजोये थे, स्वाबों के महल बनाये थे, लेकिन उसके बड़ा होने के साथ- साथ उनके सपने बिखरते गये, ख्वाबों के महल ढहते गये और उनकी जगह अंधेरा और खोखलापन उभरता गया। उसको याद है, जब वह नन्हा मुन्ना था, बापू लेट कर अपनी टांगों पर उसे 'घुघुआ गाना, उपजे घाना' खेलाते थे और अपने आप ही बोलते जाते थे- 'बड़ा होकर मेरा बेटा क्या बनेगा?' 'मुशी बनेगा, मुंशी । नहीं, नही, दरोगा बनेगा, दरोगा। कड़क वर्दी और बूट पहन कर ठकठक, लेफ्ट राइट करता हुआ जब घर आयेगा तो सारा गाव देख कर चिढ़ा जायेगा।' 'नहीं-नहीं, मेरा बेटा कलक्टर बनेगा कलक्टर।' 'हां, लाट साहब क्यों नहीं ?' उसकी मां मुंह चिढ़ाकर कह देती। 'लाट साहब नहीं, नहीं, गांधी जी बनेगा, गाधी जी। लाट साहब को भी गांधी बाबा के सामने झुकना पड़ा था।' कहकर वह ठठाकर हंस देते। उलाहने के रूप में उसकी मा कहती-'देखो जी, मेरे बेटे के बारे में कोई ऐसी-वैसी बाते मत किया करो। कही नजर न लग जाय ।' वह कज- रोटा लेकर आती और उसके माथे पर डिठौना लगाकर, उसका मुह चूम लेती। धीरे-धीरे वह बड़ा होता गया। बढती उम्र के साथ एक तरफ खर्च बढ़ने लगा और दूसरी तरफ महंगाई। कर्ज के बोझ से उसका वापू दवता गया। गांव के स्कूल से कस्बे के स्कूल और कस्बे के स्कूल से शहर के कालेज में वह पहुंच गया। बड़ा आदमी बनाने की ललक मे उसका बापू जमीन बेच कर उसको पढ़ाता रहा। जब वह बी० ए० करके निकला, तब तक उसका बापू किसान से मंजदूर वन चुका था और घर की एक-एक इंच 56 : हादसा जमीन बिक चुकी थी। पपरलों के घर की जगह फूस की मोपड़ी ने ले ली पी। इस दौरान उसने महसूस किया, आजादी के बाद देश में बड़ी तेजी से परिवर्तन आया था। गांव के लोग शहरों की तरफ भागने लगे थे। गांव उजड़ रहे थे और शहर सुरसा के बदन की तरह बढ़ रहे थे। चारों तरफ एक अजीव आपाधापी और भागम-भाग मची थी। इस भाग-दौड़ में एक तरफ कुछ लोग देश की सारी दौलत और वैभव बटोर रहे थे, तो दूसरी तरफ असख्य लोग रोटी के टुकडों के लिए मोहताज होते जा रहे थे, एक तरफ आखो को चुधिया देनेवाली रोशनी का चकाचौंध फैल रहा था, तो दूसरी ओर अंधेरा और खोखलापन बढ़ता जा रहा था, एक और गगनचुंबी अट्टालिकाएं खड़ी हो रही थी, तो दूसरी ओर फूस के मोपड़े भी मयस्सर नहीं हो रहे थे। यह सब कुछ उसे बड़ा अजीव लगता था, पर वह अपने धुन मे जुटा था और बापू के सपनों को साकार करने पर तुला था। अपने इलाके का वह पहला बी० ए० या। बापू के सपनो को असलियत में बदलने और उनकी खोई जमीन और मकान वापस दिलाने के लिए वह बेचैन था । अधिकारी से नीचे उसने कभी सोचा नहीं था। दो वर्षों तक वह आई० ए० एस०, पी० सी० एस० की परीक्षाओ मे बैठता रहा, पटना, दिल्ली दौड़ता रहा, पर सब वेकार । हर बार वही निराशा, वही मायूसी हाथ लगती। धीरे-धीरे उसका जोश ठडा पडने लगा, आशाएं धूमिल होने लगी, और उनकी जगह निराशा और अंधेरापन उभरने लगा, फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी। वह कोई भी नौकरी करने पर उतारू हो गया। क्लक से लेकर चपरासी तक, बेलदार से लेकर कुली, खलासी तक किसी भी नौकरी के लिए उसने रोजगार दफ्तर में अपना नाम दर्ज करा दिया। अगले पांच वर्षों तक, वह रोजगार दफ्तर का चक्कर लगाता रहा, दर-दर की ठोकरे खाता रहा, पर नौकरी मृगमरीचिका की तरह उसे छलती रही। हर जगह पैसा और पैरवी का बोलवाला था। यहा तक कि रोजगार दफ्तरवाले भी बिना कुछ लिये नाम नहीं निकालते थे। सात वर्षों की भाग- दौड़, सघर्ष और बेरोजगारी के आलम ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया । उसका मोह भंग हो गया। उसके बापू के सपने टूट गये, स्वाव विखर गये ।

सुराज : 57 J थककर वह घर बैठ गया। उसके अंदर एक अजीब परिवर्तन आने लगा। दिन-रात झोंपड़ी के एक कोने में बुत बना बैठा, वह सोचता रहता और कुछ बड़बड़ाता रहता। कभी-कभी एकाएक वह उठता और घर से गायब हो जाता। कई-कई दिनो तक वह शहर की सड़कों, चौराहों, कल- कारखानो, दफ्तरों-दुकानों का चक्कर लगाता रहता, फिर थक कर, चेहरे पर वही निराशा और मायूसी ओड़े, वापस घर लौट आता। धीरे-धीरे उसके जीवन में अंधेरा और गहराता गया और खोखलापन बढता गया। उसे लगता, इस अंधेरे से निकलने के लिए वह जितना ही छटपटाता उतना ही अंधी गलियों में भटकता आता । जब भी प्रकाश की खोज मे नजरें दोडाता, ढेर सारा अंधेरा उसकी आंखो में भर आता। जहां भी कुछ पाने के लिए हाथ बढ़ाता, महज खालीपन उसकी मृट्टी में समा जाता। तब कब कर इस अंधेरे और खोखलेपन से बाहर निकलने के लिए, जब भी वह भागता, कदम दर कदम पर ठोकरें खा-खाकर अंधी गलियों मे, औंधे मुह गिर-गिर पड़ता। ठोकर लगने से वह जगह-जगह से टूट जाता और टुकड़ो- टुकड़ों में बिखर जाता। अन्त मे मायूस होकर, टुकड़ों में बिखरी जिन्दगी समेट कर, परत-दर-परत छिल गई अपनी खाल में वह बाध लेता और अपने कमजोर कन्धों पर लाद कर फिर उसी अंधेरे और खोखलेपन में रंगने लगता। इस दर्द-भरी गठरी से निरंतर लहू रिसता रहता और दर्द कसकता रहता है, लेकिन वह उफ तक नहीं कर पाता क्योकि देश आजाद था। अब वह इस जिन्दगी का आदी हो गया था। उसकी भावनाए मर चुकी थी, इच्छाएं दफन हो चुकी थी। वह गम खाता था, आसू पीता या, धरती बिछाता था और ऊपर लटका आसमात ओढ लेता था। अब उसकी धरती पर सूर्य की रोशनी अभी नहीं उतरती थी, उसके आकाश मै चाद-सितारे कभी नही चमकते थे। बस हर समय वही गहरा अधेरा छाया रहता और उसमें वहीं खोखलापन समाया रहता। उसे लगता, आजाद हिन्दुस्तान के अंदर एक और हिन्दुस्तान है, जिनके बीच एक मजबूत दीवार खडी होती जा रही है। दीवार के उस पार दौलत और वैभव बढ़ता जा रहा है और इस पार अधेरा और खोखलापन । उसके पिता को लगा, बैटा गया हाथ से। दिन-भर गुमसुम बैठा स्ट- 58 हादमा पटाग की बाते सोचता रहता है और अपने आप न जाने क्या-क्या बड़- बडाता रहता है । उसने मोवा, किमो प्रकार, एक बार यह घर से बाहर कही मही जगह निकल जाय, तो शायद सब ठीक हो जाय । इस दौरान दिल्ली से बहू घर आया था। गाव वालों को उसने बताया था कि वह वाचमन का काम करता है। उसके दोनों कधों पर बड़े-बड़े काले घट्टे पडे थे । उमे वह राइफल रखने का निशान बताता था। उसके पिता ने सोचा, यदि मिल जाय तो यह काम भी बुरा नही है । लड़का संभल जायेगा। उमने बह के माथ बेटे को दिल्ली भेज दिया। वह जमुनापार गाजीपुर डेयरी फार्म में दिन-भर वहंगी पर भैसों का गोबर फेकता था। पांच रुपये महीना फी भैस के हिसाब से, महीने मे दो- ढाई सौ रुपये कमा लेता था। दूसरे दिन सुबह बहू ने उसे बहंगी पकड़ा दी। दिन-भर के बाद शाम को जब वह डेरे पर लौटा तो उसका बुरा हाल था। दोनों कंधे सूज गये थे और दर्द से फट रहे थे। उसे लगता था, सिर से पैर तक उसका पोर-पोर हथोडों से कूच दिया गया है। पूरा बदन लकड़ी की तरह अकड गया था और सिर फट रहा था । उठने बैठने में शूले उठ रही थी। सास लेने में पसलियां करक उठती थी। उसे जोरो का ज्वर चढ गया और हफ्ता भर वह ज्वर में तड़पता रहा। उसके गांव के कुछ लोग डेयरी फार्म के पास से बहते गंद नाले पर वसी झोपड़पट्टी में रहते थे और गाजियावाद एव नोएडा में कारखानो में मजदूरी करते थे। ठीक होने पर, वह उनके पास चला गया। एक बार फिर से उसने अपना भाग्य आजमाना और बापू के अधूरे सपनों को साकार करना चाहा। डिग्री हाथ में लेकर वह दिल्ली के चारों तरफ फैले कारखानो मे दौड़ने लगा। एक-एक कारखाने का दरवाजा उसने खटखटाया; मालिकों, प्रबंधकों के मामने रोया-गिड़गिडाया, पर चूकि कही से वह कोई मोस-सिफारिश नहीं जुटा पाया, इस बार भी चारों तरफ से उमे निराशा ही हाथ लगी। खोजकर उसने डिग्री फाड़ दी और अनपढ बन कर गाजियाबाद के मैटल कारखाने में मजदूर का काम करने लगा। मई-जून का महीना था। सूरज आग उगल रहा था। धरती अंगारे की सुराज •59 तरह तप रही थी। तेज पछिवा हवा चल रही थी। शाम को वह कारखाने से लौटा तो देखा, उसका हिन्दुस्तान जलकर राख हो गया था। छाती पीटती औरते और रोते-बिलखते बच्चे नाले के वाध पर छिछियाये फिर रहे थे। कुछ लोग अपनी झुग्गियो की राखो में बचा-खुचा मामान ढूंढ रहे थे। थोडी दूरी पर लोगों की भीड़ जमा थी। उनके बीच पहुचने पर उसने देखा, बच्चो और औरतो की चार अधजलो लाशें पड़ी थी। उनके वारिस लाशों पर सिर धुन रहे थे। भौचक्का-सा आखे फाड़े वह भी राखो की ढेर में अपनी झुग्गी की जगह ढूढने लगा। वहां पुलिस का पहरा वैठा दिया गया । सुनने में आया कि प्रशासन ने वह जमीन किसी उद्योपगति को, कल-कारखाना लगाने के लिए, दे दी है। झोपडियों की राख अभी ठंडी भी नही हो पाई थी कि अफरा-तफरी में लोगवागों ने, दिन का हादसा भूलकर, रातोरात नयी झोपड़िया खड़ी कर ली। दूसरे दिन सुबह नगरपालिका के अधिकारी, दो ट्रक पुलिस के साथ, आये, और उन लोगों को वहा से खदेड़ने लगे, लेकिन झोपड़पट्टी के लोग भी मरने-मारने पर उतारू हो गये । अन्त मे नगरपालिका वाले, पुलिस के माथ, वापस लौट गए। थोडे दिनों बाद ही, अब मूसलाधार वर्षा हो रही थी, और परिंदो का घोसला भी उजाडना नागवार था, उसके हिन्दुस्तान पर फिर हमला हुआ और सगीनों के साये में, पूरी झोपड़पट्टी पर बुलडोजर चलने लगा। पुलिस के ड्डो को मार से बच्चे-बूडे और औरते अपनी जान लेकर इधर-उधर भागने लगे। इतने में कुछ गाड़िया आयी और पुलिस वालों ने भागते लोगों को पकड़ कर, लावारिम कुत्तो की तरह, उन गाड़ियो में ठूस दिया और शहर मे बाहर काफी दूर, अरावली की पहाड़ियों मे छोड़ दिया, लेकिन उन्हें अपनी धरती मे इतना मोह था, अपने देश में इतना प्रेम था कि रेगते. रिरियाते, लुढकते घिसटते फिर वे अपने हिन्दुस्तान मे वापस लौट आये। तब तक वहा 'राक पास्ट्री फार्म का वोर्ड लग चुका था और मुर्गियों के दरबे बनने शुरू हो गये थे। सुराज ने सोचा, देश आजाद है, रहने का सबको समान अधिकार है, चाहे आदमी हो या मुगियां, यही सच्चा समाजवाद है। इस बार शहर से दूर, जहां कई नालों का सगम होता था और जो आगे 60: हादसा जाकर गदी नदी का रूप ले लेता था, उनके बीच के डेल्टा पर उसने अपनी झुग्गी लगाई। देखते-देखते कीचड़ के कंधो पर पोलिथिन और प्लास्टिक के चीथड़ो, कागजों, गतो, टिन जस्तों के छाजना वाला उसका हिन्दुस्तान फिर बस गया। इसी दौरान, कारखाने के पते पर, उसके घर से एक खत आया, जिसमें लिखा था- "खत लिखा ऊंचडीह से सूरज भइया के मालूम कि तोहरे घर में गमी हो गइल बा। आगे मालूम करना कि तोहार बापू गुजर गइले । सावन सुदी सप्तमी के दसवा आउर दस्सिमी के तेरही परल बा । तोहार भाई लिखावत बाटी कि खत के तार समक्षीहा, उहा खइहा इहा अचइहा । खत पढत गाड़ी पकड़ लोहा। आवत के कुछ दाम-दोगानी काम-किरिआ वदे लेत अइह । आउर कुल ठीक था। खत लिखावे वाली तोहार माई खत लिखै वाला खिचड़ी राम वाकलम खुद अब तक उसने जो कुछ भी कमाया था, वह सब आग मे स्वाहा हो गया था। नयी झोपड़ी बनाने में कुछ कर्ज भी चढ़ गया था। उसने पठान से दो रुपये रोजाना सूद पर सौ रुपये कर्ज लिये और गाड़ी चढ़ गया। पर से लौटते समय वह अपनी पत्नी और दोनों बच्चों को भी लेता आया। अंधी मां अकेली गाव में पीछे रह गई। मन रखने के लिए उसने एकाध चार मां से भी चलने के लिए कह दिया था, फिर चुप हो गया था। उसने सोचा, मा को गाव मे तीस रुपये महीना भेज दिया करेगा, जो वह कभी नहीं कर पाया। दिल्ली वापस पहुचा तो मेटल कारखाने मे छटनी हो रही थी ।वह वेकार हो गया । पत्नी पहले से ही प्रसून को बीमारी से पीड़ित थी। दूसरे बच्चे के जन्म के साथ उसको हल्का-हल्का बुगार रहने लगा था। उसका इलाज कराने के लिए वह यहा लाया था, पर अब दवा-दारू तो दूर, बच्चो के लिए एक वक्त की रोटी भी मुहाल थी।

सुराज : 61 दिन-ब-दिन पत्नी की हालत बिगड़ती गई। उसका शरीर गल कर ककाल बन गया। चेहरा मरघट की तरह उदास और भयानक लगने लगा। आंखें खोखलो में धंस गई। नग-धड़ा बच्चे भी हर समय भूख से रिरियाते रहते और रोटी के लिए उसको नोचते रहते । उनकी नाकों में दलदल और आखो मे दरिया हर समय छलकता रहता। जब से ये जन्मे थे, उसने कभी इन्हे हंमते नहीं देखा था। झोपडी में हर समय मनहूस अधेरा छाया रहता था। धूप और हवा न आने से मीलन और चिपचिपापन हमेशा बना रहता था। झोपड़ी के एक कोने मे जस्ते, टिन और मिट्टी के कुछ टूटे-फूटे बर्तन और दूसरे कोने में कुछ चीथड़े और दो टूटी चटाइया पड़ी थीं। बरसात में जब रात को पानी बरसता, झोपड़ी का छाजन छलनी की तरह चूने लगता, तब रात-भर भीगते बन्दर की तरह वह इधर-उधर उछलता रहता। वीवी का कराहना तव और तेज हो जाता और बच्चे बिलखने-विलबिलाने लगते । तब दोनो चटाइयां मिर पर ओडे, एक में एक गुथे बैठकर वह रात काट देता। बरसाती पानी से गंदे नाले उफन कर झोंपड़ियो के बीच से बहने लगते, जिनमें गटर की गदगी ऊपर तैरने लगती । वह भी गटर की गदगी के बीच कीड़ो की तरह तरता रहता। इधर कुछ दिनों से भोर होते ही वह बोरा लेकर कचरा चुनने निकल जाता। एक दिन वह शाम को लौटा तो देखा, झोपड़ी मे सन्नाटा है, पत्नी का कराहना बद है । पास जाकर देखा, पत्नी का शरीर निर्जीव पड़ा था। ढेर सारी चीटिया और तेलचट्टे उसके बदन मे चिपके थेऔर कई जगहों से माम चाट गये थे। वडा बच्चा गायब था। छोटा बच्चा डर के मारे सिर घुटनो मे छिपाये, आंखे मूंदे, एक चटाई पर पड़ा था। मां के अभाव और भूख के कारण छोटा बच्चा भी बीमार रहने लगा और अगले कुछ ही दिनों में उसका पूरा परिवार उजड गया। इस दौरान वह कारखाने का वरावर चक्कर लगाता रहा । थोड़े समय बाद ही उसकी फैक्टरी वित्कुल बन्द हो गई थी। हजारों मजदूर वेकार हो गये थे । कारखाने के गेट पर धरना, प्रदर्शन बराबर चल रहा था। नगर निगम का चुनाव नजदीक था। उनकी मजबूरी का फायदा उठाने के लिए 62 हादसा उनके बीच विरोधी दल का एक नेता आटपका।नेता ने उनके दर्द को समझा, उनको आह को महसूसा और उनके स्वर में स्वर मिलाकर उनकी मांगें दोहराने लगा। वह मजदूरी के साथ इतना पुलमिल गया कि उनकी समस्या नेता की समस्या बन गई, उनका पेट नेता का पेट हो गया, उनकी भूख नेता की भूय हो गई। उसने, उनके सारे दर्द-दुखों को, अपनी टोपी में समेट कर सिर पर ओढ लिया। एक दिन नेता उन लोगो को धिक्कारने लगा कि आदमी होकर भी वे कोडे-मकोडो की तरह जी रहे हैं, कुत्तो को मौत मर रहे हैं। उसने कहा, "जागो, उठो और चलो हमारे साथ। हम तुमको जीने का अधिकार दिलायेंगे, रोटी, कपडा और मकान मुहैया करवायेंगे।" नेता की बातें सुनकर उसकी वुक्षी-बुझी आंखें चमक उठी, भुर्तेदार चेहरे आशाओ से खिल उठे। उसने पहली बार महसूस किया कि वह भी इनसान है। उमे भी भरपेट रोटी मिल सकती है, कपड़ा मिल सकता है, मकान मिल सकता है। नेता नारे लगाते हुए आगे-आगे चल रहा था और भीड दोहराते हुए उसके पीछे चल रही थी । देखते-देखते जुलूस बढता गया और उसका मारा हिन्दुस्तान नेता के पीछे, सडकों पर रेंगने लगा। नेता उन लोगो को एक ऐसी जगह ले गया, जहां बहुत सुदर शीशे का महल बना था। उस महत के बीचोबीच एक बडा मंच रखा था। मंच पर ढेर सारे जमूरी जैसे चेहरे बैठे थे। उनकी शक्ल और पोशाक अजीबोगरीब थी। वे तरह-तरह की करिश्माई कलाबाजियां दिखा रहे थे। सबके मिर पर टोपिया थी। टोपियों के आकार और रंग अलग-अलग थे। लाल टोपी, नीली टोपी, पीली टोपी, हरी टोपी,काली टोपी, मफेद टोपी, टोपी ही टोपी और रंग ही रंग । उनकी टोपियां बोलती, हंसती, हवा में उछल जाती, तर जाती, दूसरी टोपियों से लड़ जाती और फिर अपनी या किसी और जमूरे की नंगी खोपड़ी पर जाकर चिपक जाती थी। सुराज को लगा, ये दूसरे हिन्दुस्तान के लोग हैं, जिनके पीछे "मदारी के भेष में मेटल कारखाने के मालिक बैठे है। उन मालिको के इशारों पर ये जमूरे तरह-तरह की कलावाजिया दिखा रहे है। इसी बीच एकाएक डम.

सुराज : 63 डम डम डम डम बजने लगा। सारेजमूरे कनकना कर खड़े हो गये और डमरू को तान पर उछलने-कूदने और तान तोड़ने लगे । डमरू की तान बदली, तव सारे जमूरे गाने लगे और फिर दूसरी तान पर रोने लगे। सहसा डमरू का बजना बन्द हो गया। मदारी की आवाज पर एक-एक जमूरा अपना जादुई करिश्मा दिखाने लगा। किसी ने मुह से आग उगला, चारो तरफ लपटें ही लपट फैल गई, तो दूसरा मुंह से पानी के फव्वारे छोड़ने लगा, पल-भर मे आग गुल हो गई । कोई देखते-देखते महल पड़ा कर देता, तो दूसरा सारा महल निगल कर डकार मार लेता। कोई उड़कर आसमान में गायब हो गया और ऊपर से हाथ-पैर, धड़ काट-काटकर जमीन पर फेंकने लगा। धरती पर खून की दरिया वह निकली, तो कोई उसको एक ही चुल्लू मे आचमन कर गया। देखते-ही-देखते किसी ने मिठाइयों से भरी तश्तरियां सबके सामने रख दी और सब लोग ताजी-ताजी देशी घी की मिठाइया खाने लगे। यह सब देखकर उसे लगा, वह असली जगह पहुंच गया है, जहा रोटी क्या, भर पेट मिठाइयां मिलेगी। उसके मुह में पानी भर आया । वह अधीर हो उठा और बार-बार मुह मे आये पानी को अन्दर सुड़कते हुए, जीभ चट- पटाने लगा। नेता ने जोश में आकर कहा, नारे लगाओ। वे हवा में बाहें उछाल- उछाल कर नारे लगाने लगे- "इनकलाब जिन्दाबाद ! मजदूर एकता, जिन्दाबाद हम सबकी है एक जवान, रोटी कपड़ा और मकान डमरूवाला हाय, हाय, टोपीवाला हाय, हाय, 64 : हादसा पीली टोपी, हाय, हाय नीली टोपी, हाय, हाय, हाय, हाय, हाय, हाय, इतने में चारो तरफ से संगीनों ने उन्हें घेर लिया और तड़ातड़ लाठियां उन पर बरसने लगी, धाय-धांय गोलियां चलने लगी। देखते ही देखते चारों तरफ लाशे ही लाशें बिछ गई। सूखा मुंह लाठियो से तोड़ दिया गया। भूखा पेट गोलियों से भर दिया गया । नेता जमूरे की तरह अदृश्य हो गया। मुर्दा लाशे श्मशान और जिन्दा लाशें अस्पताल पहुंचा दी गई। अस्पताल में, गोलियों से घायल उसके हाथ-पैर काट दिये गये, टूटी हड्डियों को निकाल कर उनकी जगह लकड़ी या बास की खपच्चिया सगा दी गई। फटी चमड़ी की जगह फटे चीथड़ों की चिप्पियां टांक दी गई। खून की जगह नसों में पानी भर दिया गया और फिर मलवे के ढेर की तरह उठाकर चौराहे पर फेक दिया गया। तब से वह ढूंठ की तरह इसी चौराहे पर पड़ा रिरिया रहा है। हर साल पन्द्रह अगस्त को, आजादी की रश्में पूरी होते वह देखता है, तब सहसा उसका घाव हरा उठता है और टप-टप खून उसमे से चूने लगता है। वह सोचता है, काश उसका हिन्दुस्तान भी सचमुच आजाद हो पाता। दिन के बारह बज रहे थे। उसका कटोरा अभी भी साली या। उसे लगा, शायद भूखे ही मोना पड़े, क्योकि आज आजादी का दिन है।

चक्रव्यूह "क्या अभियुक्त को कुछ कहना है ?" 'अभियुक्त' शब्द मुन कर लाल साहव तिलमिला उठ, पर चुप रहे । उन्हें जो कुछ कहना था, उनकी सुलगती आखें कह रही थी, तमतमाया चेहरा बोल रहा था। कठघरे के हत्थे को पकड़ कर वह ऐमे कस रहे थे, मानो किसी का गला घोंट रहे हो। "अभियुक्त अपनी सफाई मे कुछ कहना चाहता है ?" इस बार जज ने पहले से ऊंची आवाज में पूछा। "हुजूर, अभियुक्त औवल दर्जे का धूर्त, मक्कार और जालसाज आदमी है । कहने को तो वह कुछ भी कहानी गढ सकता है, पर अव कहने-सुनने के लिए रह ही क्या गया है। सब कुछ तो सावित हो चुका है, अभियुक्त के खिलाफ ।" सरकारी वकील ने व्यंग्य से मुस्कराते हुए कहा । लाल साहब का अंतः भभक उठा । जी में आया, उछल कर वकील का मुह नोच लें, गर्दन भरोड़ दें और सट्ट से जीभ कबार ले। हलाहल झूठ बकते हुए इसकी जीभ भी नहीं एंठ रही है । मुह उठाकर उन्होंने एक लंवा उच्छ्वास छोड़ा, मानो अदर धधकता ज्वालामुखी बाहर उड़ेल रहे हों, और फिर जज की तरफ मुखातिफ होकर बोले, "अव क्या कहना है जज साहब, जब सब कुछ कहा जा चुका है।" "कोटं एक मौका सबको देती है। आपको भी अपनी सफाई पेश करने का मौका दिया जाता है।' " "मफाई । कैसी सफाई ? और फिर सफाई देने से होगा भी क्या? होगा तो वही जो कानून के पहरेदारों के रूप में बैठे ये दरिदे चाहेगे।"

66: हादसा "मी लार्ड, अभियुक्त कोर्ट पर शक कर रहा है। सरकारी यकीत ने कहा। "अभियुक्त वहक रहा है । उसे अपनी सफाई में कुछ कहना है तो कोर्ट एक मौका देती है।" जज ने लाल साहब के वकील की ओर संकेत करके कहा। "लाल साहब, आप निडर होकर बोलिए। बता दीजिए सब घटनाएं सच-मच ।" उसके वकील ने पास आते हुए कहा। "घटनाएं । कैसी घटनाएं? कौन-सी घटनाएं ? अव तो बस दुर्घटनाएं रह गई है."एक नही अनेक 'कई-कई दुर्घटनाएं, एक से एक भयावह जिनके बारे मे कल्पना भी नहीं की जा सकती थी! धरती का भी कलेजा एक वार दहल जाएगा, इनसान तो इनसान है।" "अभियुक्त फिर बहक रहा है।" टेबुल पर मुंगरी मारते हुए जज ने चेतावनी दी। "अभियुक्त नही, मी लार्ड, अपराधी, एक शातिर बदमाश, जो एक प्रतिष्ठित धधे का मुखौटा लगा कर घिनौने अपराध करता रहा है, और इस प्रकार समाज की प्रतिष्ठा और देश की नीव को खोखला करता रहा है, दीमक की तरह चाटकर।" सरकारी वकील ने टेवुल पर मुट्ठी मारते हुए कहा। लाल साहब के अंदर जैसे आग की लुकारी जल उठी। एक बार फिर भभक उठे। "आब्जेक्सन मी लार्ड । सरकारी पक्ष के वकील एक इज्जतदार व्यक्ति पर कीचड़ उछाल रहे हैं। कौन कमा है, इसका फैसला कोर्ट को करना है, हमारे विद्वान साथी को नहीं।" बचाव पक्ष के वकील ने कहा। "कोर्ट का वक्त जाया न किया जाय।" जज ने आदेश दिया। "लाल साहब असली मुद्दे पर आइए। मुझे विश्वास है, आपको न्याय अवश्य मिलेगा।" उनके वकील ने कहा। "कसी बात करते हैं वकील साहब, आज के समाज में न्याय, और वह भी इन लोगों के रहते हुए । कभी नहीं । क्या आप नहीं जानते कि यह कोर्ट भी इन्ही की व्यवस्था को एक कड़ी है, इनके जुल्मों और अत्याचारो ।

चक्रव्यूह : 67 पर मुहर मारने की एक दुकान है।" पुलिस और विरोधी पक्ष की ओर इशारा करते हुए लाल साहब ने कहा । "मी लार्ड, यह कोर्ट की मानहानि है, आपकी तौहीन है । अभियुक्त ने इस पवित्र मंदिर को दुकान कहा है, शक की उंगली उठाई है । क्यों न इसके खिलाफ कोर्ट की मानहानि का मुकदमा चलाया जाय ।" सरकारी वकील ने ऊची आवाज मे जज की ओर देखते हुए कहा । "हा, हा, चला लो, एक नही अनेको, जहां इतने सारे जाली मुकदमे खडे कर दिये वहा एक और सही। मैं डरता नहीं। लेकिन एक बार बाहर निकल आया तो तुम सबको एक-एक कर देख लूगा।" कठघरे के हत्थे पर मुक्का मारते हुए लाल साहब ने कहा। "मी लार्ड, मैंने कहा न, अभियुक्त परले दर्जे का बदमाश और छटा गुडा है । देखा जाय, कोर्ट के सामने भी देख लेने की धमकी दे रहा है । ऐसे बदमाशों को समाज में रहने का कोई हक नहीं है। जहां रहेगे वही अव्यवस्था और बदअमनी फैलायेंगे । इनकी जगह तो वस जेल के सीखचों में है, जहां जिंदगी- भर बद पड़े तिल-तिल घुटते रहे, ताकि समाज और आने वाली पीढी को सीख मिल सके। "मी लार्ड, जैसा कि मैंने पहले कहा, अभियुक्त एकखतरनाक अपराधी है । वह न केवल समाज, बल्कि इस देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए भी गम्भीर खतरा है । अपने स्वार्थों के लिए, मौका पाने पर यह देश को भी बेचने मे नहीं हिचकेगा। मैं कोर्ट से दरख्वास्त करूंगा कि अभियुक्त को सख्त से सख्त सजा दी जाय । अपराध तो पहले ही साबित हो चुके हैं।" सरकारी वकील ने एक मुकदमे का कागज हाथ से दूसरे हाथ की हथेली पर पटकते हुए कहा । "आब्जेक्सन मी लाई। अभियुक्त को सफाई का मौका दिये बिना निर्णय ले लेना न्यायसंगत नही है।" लाल साहब के वकील ने आगे बढ़कर कहा। "ठीक है, ठीक है। अगला अभियोग पढा जाय।" जज ने आदेश दिया। "अभियोग नही मी लार्ड, अपराध जो सावित हो चुके है।"

68 : हादसा - वकील ने फिर टोका। जज ने टेवुल पर मुगरी मारी और तन कर बैठ गया। "पुआरी लाल, पुत्र कोदई लाल, साकिन मुहल्ला डकतान, खालकट- गंज, मोवल दर्जे का धूर्त, मक्कार और चार सौ बीस आदमी है, जो समय और मौसम के अनुसार गिरगिट की तरह रंग बदलने में माहिर है ।" "आब्जेक्सन मी लार्ड, किसी भी शरीफ आदमी के बारे में, जब तक अभियोग साबित न हो जाय, इस तरह के अल्फाज इस्तेमाल करना गैर- वाजिब है।" बचाव पक्ष के वकील ने बीच में बोला। "हा, हा, देश में सिर्फ दो ही शरीफ आदमी बचे हैं, एक आप और दूसरा आपका यह धूर्त मुवक्किल।" सरकारी वकील ने व्यंग्य से कहा। "यह चरित्रहनन है, मी लार्ड।" "हो तो आगे पढा जाय।" "पुआरी लाल, पुत्र कोदई लाल"" "वह तो हो चुका । आगे चलो।" "आगे यह कि पुआरी लाल एक वेरोजगार, बददिमाग, बदतमीज और उलटी खोपडी का आदमी है। हर सीधी चीज को टेढी निगाह से और अच्छी बात को बुरे खयाल से देखना इसकी आदत है। इसकी निगाह पर एक ऐसा चश्मा चढा हुआ है, जिसके अंदर से सभी लोग इसे चोर-बदमाश, उचक्के, पटिया और लिजलिजे दीखते हैं। पूरे देश मे केवल यही एक सच्चाई और ईमानदारी का पुतला बच रहा है, युधिष्ठिर की तरह "नहीं, नही, युधिष्ठिर में भी खामिया थी, वह भी जुआड़ी थे और जुआ में अपनी बीवी तक हार गये थे। अभियुक्त की पत्नी तो अभी सही-सलामत इसके पास है।" "यह क्या मजाक है। यह कोटं है या भांड़ों की नौटंकी।" लाल साहव चिल्ला उठे। "मी लार्ड, नोट किया जाय, अभियुक्त ने कोर्ट को भांडों की नौटंकी कहा है । यह कोर्ट की तौहीन है।" "आर्डर, आर्डर ।" "जज साहब, मैं अश्लील बातें सुनने का आदी नहीं हू।" लाल साहब चक्रव्यूह : 69 ..." ने सरकारी वकील की तरफ जलती आंखो से देखते हुए कहा। "वाह, वाह । अश्लील बातें सुनने के आदी नहीं हैं, लेकिन अश्लील हरकत करने में माहिर जरूर है।" "क्या वेतुकी बाते करते हैं ।" लाल साहब ने सरकारी वकील को फटकारा। "बेटी की कमाई खाना अश्लील नहीं तो और क्या है।" सरकारी वकील ने हाथ चमकाते हुए कहा । “खबरदार, मेरी बेटी पर लाछन लगाया तो अच्छा नहीं होगा।" लाल साहब चीख उठे। उस समय उनकी आखे सुर्ख हो आई थी। "आहाहा, जब घर में शोहदों को बुलाते रहे तब बुरा नहीं लगा सरकारी वकील अपनी बात पूरी नहीं कर पाया। "जज साऽऽहऽऽव""इन्हे रोकिएsss. जोरों से चीखते हुए लाल साहब कांपने लगे और कटघरे के अदर ही ढर हो गये । उनकी अप्रत्याशित चीख से कमरे की दीवार चिहुक उठी और खिड़कियां दरवाजे झनझना गये। कोर्ट में खलबली मच गई। कुछ आदमी कटघरे की ओर दौड़कर लाल साहब को सभालने लगे । जज साहब, आधे घंटे के लिए कोर्ट स्थगित कर अपने चैबर मे चले गये। लाल साहब को कोर्ट के अंदर पड़े बेंच पर सुला दिया गया और एक आदमी पानी लेने के लिए दौड़ गया। थोड़ी देर बाद लाल साहब को होश आ गया, लेकिन सिर अभी भी चक्कर कर रहा था। पूरा बदन पसीने से तरबतर हो गया था। सीने की घुकधुकी तेज चल रही थी। उन्होंने आंखे खोली तो लगा, पूरा कमरा और उनके इर्द-गिर्द खड़े लोग घूम रहे हैं । आंखो के सामने अभी भी रग-बिरगी चिनगारियो के बीच काले धब्बों के छल्ले उछल रहे थे। लाल साहब पुराने क्रांतिकारी थे। देहात से हाई स्कूल करने के बाद, आगे पढ़ने के लिए, ज्योही वह शहर आए, उनका संपर्क क्रांतिकारियों से हो गया। पढ़ाई अधूरी छोड़, वह आजादी की लड़ाई में कूद पड़े । सरकारी खजाना लूटने, पोस्ट आफिस जलाने, टेलीफोन का तार काटने और चलती गाड़ी में चढ़कर हथियार लूटने वाले गिरोह के वह सरगना बन गये।

70: हादसा राष्ट्रीयता और देशभक्ति उनकी रग-रग में कूटकूट कर भर गई। आजादी के बाद अपने स्वतंत्र विचार, प्रखर व्यक्तित्व और ईमानदारी के कारण वह किमी दल में खप नही सके और सभी से किनारा काटकर 'एकला चलो रे' की नीति पर आजीवन एकाकी चलते रहे और अन्याय, अत्याचार, शोपण और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करते रहे। उन्होंने न ही कभी कोई नौकरी की और न कोई हाल रोजगार । दो पन्ने का 'त्रांतिदूत' नामक अखवार निकालते थे, जो उम शहर एवं आसपास के इलाकों में काफी लोकप्रिय था। लाल साहब बिना किसी दवाव के सच्ची और खरी खबरें छापने मे जरा भी नहीं हिचकते थे । चोरी, बदमाशी, वेईमानी, भ्रष्टाचार और घूस- खोरी की खबरें तो विशेप सुर्षी देकर पहले पृष्ठ पर छापते थे। इसीलिए पुलिस, प्रशामन, ठेकेदार और नम्बर दो का धन्धा करने वालों की आंखो मे वह किरकिरी की तरह चुभते रहते थे। पिछली बरसात में पानी की निकासी एकाएक रुक जाने के कारण कई दिनों तक पूरा नगर झील बना रहा । मोरियों और नालों की गंदगी, सड़कों और चौराहों पर तैरने लगी। नगर प्रशासक की ओर से बताया गया कि जिस नाले मे पानी की निकासी होती थी, वह चार किलोमीटर तक घस गया है। लेकिन वास्तविकता कुछ और थी। उसी नगर के कुख्यात गुंडा और नये धनी लाउन चौधरी ने, प्रशासक से मिलकर, नाले का मुंह बंद करवा दिया था, जिससे शहर में वनावटो बाद आ गई थी। चार किलोमीटर नाले की फिर से खुदाई-सफाई करने के लिए दो लाख का आपातकालीन ठेका लाठन चौधरी को दिया गया और जनता का पैमा प्रशासक और ठेके. दार ने मिलकर बाट लिया । लाल साहब को किमी प्रकार इसका सुराग मिल गया। उन्होने इसका भण्डाफोड़ 'कातिदूत' में किया और लगातार खबर छापकर लाठन चौधरी की नीद हराम कर दी। पहले तो चौधरी ने माम, दाम से लाल माहव को पीटने की कोशिश की, पर उनकी लेखनी की धार और तेज होती गई। अन्त में स्थानीय पुलिस से मिलकर उन्होने लाल माहब को तबाह करने की योजना बना डाली। लाल साहब के दो वैटिया हो यो । पहली अपने घर जा चुकी थी।

चक्रव्यूह दूसरी का गौना देना बाकी था। दिन पड़ चुका था। किसी प्रकार तिनका- तिनका चुनकरलाल माहब ने जेवर तो बनवा लिया था, लेकिन धोती-कपड़ा। व साज-सामान की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी। कुछ पैमे के जुगाड़ में वह... अपने पुराने साथी और स्वतत्रता सेनानी के पास, जो अब विधायक थे, इलाहाबाद गए थे। रात को ग्यारह बजे जब वह अंतिम बस से लौटे तो अपने घर के सामने खड़ी ट्रक देखकर भ्रम मे पड़ गए कि कही गलत जगह तो नही आ गए है। उनका घर लूटा जा रहा था, गुण्डे घर का सामान लूटकर ट्रक पर लाद रहे थे। थोड़ी देर के लिए तो उनकी समझ मे नही आया कि यह सब क्या हो रहा है । ज्यों ही वह दरवाजे पर पहुंचे, दो मुस्टंडो ने झपट कर उन्हें धर दबोचा और पटक कर सीने पर पिस्तौल रख दी । लाल साहब ठक्क रह गए। अंदर के एक कमरे में गुण्डों के चंगुल में फंसी उनकी बेटी तड़प और चीख-चिल्ला रही थी, लेकिन उसको आवाज साफ नही निकल रही थी। लूट के बाद बदमाश उनकी बेटी को भी घसीट कर अपने साथ लेते गए। विक्षिप्त और बदहवास लाल साहब रपट लिखवाने के लिए थाने पहुंचे। बड़े दारोगा पहले से ही जले-भुने बैठे थे। मौका-मुआयना और तहकीकात के बाद ब दारोगा ने मारपीट कर लाल साहब को अंदर कर दिया । बाद में तस्करी करने, नशीली दवाएं वेचने और चकला चलाने का उन पर मुकदमा खड़ा कर दिया गया । लाठन चौधरी ने भी अंटशंट खबरें छापने के लिए उनके अखबार पर दो लाख का मानहानि का दावा ठोंक दिया । दोनो मुकदमे एक साथ चल रहे थे। तस्करी के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत लाल साहब की जमानत भी नही हो पाई और वह जेल में सड़ते रहे। आधे घंटे बाद कोर्ट फिर लगी! एक सिपाही ने लाल साहब को पंखुरी पकड़कर वैच मे ठिर्राते हुए ले जाकर कठघरे में फिर खड़ा कर दिया। वह ठीक से खड़ा नहीं हो पा रहे थे। उनकी टागें अभी भी कांप रही थी, जैसे किसी ने ऐठ कर निचोड दिया हो । उनकी कमर तड़क रही थी और सिर फट रहा था । वह बेहद कमजोरी महसूस कर रहे थे । "मी लार्ड, अभियुक्त न केवल एक खतरनाक बदमाश और पेशेवर 72:हादसा अपराधी है, बल्कि परले दर्जे का नाटकी भी है। वेहोशी का नाटक करके वह न केवल मूल मुद्दे को बहकाना चाहता है, बल्कि कोटे की हमदर्दी भी हासिल करना चाहता है।" सरकारी वकील ने फिर चाबुक लगाया। लाल साहब एक बार फिर तिलमिला उठे। "आगे की कार्रवाई शुरू की जाए।" जज ने आदेश दिया। "पुआरी लाल वल्द कोदई लाल पर पड़ोसी देश से तस्करी करने और नशीली दवाओं का चोरी-छिपे व्यापार करने का भी जुमं है, जो तहकीकात के दौरान उनके घर से बरामद माल के आधार पर साबित हो चुका है। इस प्रकार अभियुक्त न केवल एक चोर और तस्कर है, बल्कि देश की आर्थिक स्थिति को खोखला करने और यहां की भावी पीढ़ी को नशीली दवाए बेच कर अपंग करने का भी अपराधी है। इतना ही नहीं, अभियुक्त पर अन्तर्राष्ट्रीय तस्करों के गिरोह का सदस्य होने का भी अंदेशा है, जिसके बारे में तहकीकात अभी भी जारी है।" "मिस्टर लाल, इस बारे में आपको कोई सफाई देनी है।" जज ने पूछा। "लाल नही, मी लार्ड, मिस्टर काला । हूंह, नाम रखा है लाल और धंधा करते हैं काला।" "आर्डर, आर्डर।" "हा तो आपको कुछ कहना है, मिस्टर लाल।" "यह राब सरासर झूठ है । चोर और स्मगलर तो यह दारोगा जी हैं जो इस वर्दी की आड़ में खुद तस्करी और नशीली दवाओं के व्यापार में आकंठ डूबे हैं और इस धधे मे लगे लोगों की रक्षा करते हैं।" "आरजेक्सन मी लार्ड, एक निष्पक्ष और निर्भीक अधिकारी पर यह आरोप एकदम वेहूदा और बेबुनियाद है । बड़े दारोगा जी एक निष्ठावान और ईमानदार अधिकारी हैं। इसके लिए इन्हें कई राजकीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं । ऐमे निराधार आरोपों से पुलिस का मनोवल गिरेगा । लगता है, अभियुक्त का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। इसे कुछ दिनों के लिए पागलयाने भेज दिया जाए।" सरकारी वकील आवेग मे आ गया था। "हो तो मिस्टर साल, सच क्या है ?"

अनर्गल प्रलार किए जा रहे हैं।" जज मै नाराजगी जाहिर की। बदतमीजी पर रखरमाए और मारने-पीटने लगे। आप मेरी उसकी तरफ ध्यान देंजज साहब । अपनी इज्जत की डर से मैंने हस्ताक्षर कर दिया। चन्यूहः "सच तो यह है, उर माय, कि अपने अखबार के जरिए दारोगा जी के कुकृत्यों का मरना शुरु किया, इनकी काली करतूते बानी शुरू की, जिसमें दोदया के पक्ष तो इन्होंने पंसो से मेरा मुंह पर करना चाहा, मित्र-दोनों में पहलवाया, पर जब कोई असर नहीं हुआ तो यह घिनौना मेसोमाय गया। भापही यताए जज साहब, बबने कानून के तथाकथित रक्षा और जनता के संयका ही दरिदे हो जाए तो यह समाज "बाहर, बार्डर । मैं मपाई जागने की कोशिश कर रहा हूँ और आप "वही तो मैं दवा रहा हूं, जज साहब, चोरी की रात दारोगा जी दो सिपाहियों के साथ तहकीकात के लिए मेरे घर आए और जाप-पसारा करने के बाद मुझे भी पाने से गये। वहां सादे कागज पर मुझसे हस्ताक्षर करने के लिए दवाव देने लगे। जद मैंने इनकार किया तो मेरे साथ और देश कसे चल सकता है?" दद से मैं जल के सौखचों के अंदर सड़ रहा हूं । जब मुस्दमा बाहुभावब मालूम हुआ कि इस तरह का घटिया आरोप मुक्त जैसे स्वतनता सेनानी और राष्ट्रवादी पर लगाया गया है ।" लास साहब को भाये नन गई पी। "आगे पढ़ा जाए।" जज ने गंभीर मुद्रा मे कहा। "आगे यह कि अभियुक्त एक बेरोजगार और निखारनेई. आजीवन समाज पर एक बात मना रहा । मजे की बात कहकरिना कोई रोजी-रोजगार के भी वह मौज की जिंदगी जीडा साई।" "सोकसे?" जज मे पूष्ण। "ब्लैकमेलिंग रो मी सार । अपराधी एक कविता के शहर के इज्जतदार और प्रतिष्ठित लोगो के बारे माग उनसे पैसा ऐठता है और इस प्रकार लक्मेड की गई: है।" सरकारी पीस मे पूछा। "प का गनगा पेश किया जाए।" रसिता Human 74:हादसा "यह रहा मी लाई । देखा जाए, कैसी-कैसी शर्मनाक बातें छापता है अभियुक्त, 'नगर पालिका के दफ्तर मे घोटाला, प्रशासक द्वारा लाखो रुपयो की लूट, सड़क नही बनी और ठेकेदार लाखों रुपये डकार गया। तस्करी मे पुलिस का हाथ, पुलिस द्वारा डकंती और बलात्कार, विधायक की कार से चार किलो चरस पकड़ा गया, अनाथालय में अनाचार, नाली में नवजात शिशु फेंका मिला' मादि-आदि ढेर सारी मनगड़त खबरों से भरा रहता है इसका पर्चा।" अखबार उलट-पलट कर मुखिया पढ़ते हुए सरकारी वकील ने कहा। । "इतना ही नही मी लार्ड, सरकारी कोटे से अखवारी कागज लेकर यह चोर बाजार मे वेचता है और सरकारी कागज पर ही सरकार, व्यवस्था एवं समाज के प्रतिष्ठित लोगो को गालिया देता है और बदनाम करने के लिए वेबुनियाद औरसरासर झूठी खबरें छापता है। मैं कहता हू यदि प्रशासक, पुलिस या ठेकेदार भ्रष्ट हैं तो इसके लिए सतर्कता विभाग है, गुप्तवर पुलिस है, सरकार है, न्यायालय है, उनके खिलाफ जांच-पड़ताल करने और दंड देने के लिए। यह दो कौड़ी का फटीचर आदमी कौन होता है, उगली उठाने वाला, ऐसी अनर्गल खबरें छापने वाला ।" सरकारी वकील तैश में आ गया था । अखबार उसने जज को पकड़ा दिया। उलट-पलट कर अखबार देखने के बाद जज ने लाल साहब की ओर मुखातिब होकर पूछा, "अभियुक्त इस बारे में कुछ कहना चाहता है ?" "मैं ऐसे लिजलिजे और सड़े दिमाग वाले चाटुकारो की परवाह नही करता । घटिया और छिछोरी बातों से सत्य को तोपा नहीं जा सकता। मैं आपसे ही पूछता हूं। जरा आंखे खोल कर देखिए, आज आपके इर्द-गिर्द हो क्या रहा है ? कदम-कदम पर सत्य का गला घोटा जा रहा है, सरेआम नैतिकता और ईमानदारी की होली जलाई जा रही है, परंपराओ एव मान्यताओं को रौंदा जा रहा है। आज बीच चौराहे पर सीता-सावित्रियो का शील हनन हो रहा है, नन्ही बस्वियो के साथ बलात्कार किया जा रहा है, दिन दहाड़े लोगों को कुत्तो की तरह गोलियों से भूना जा रहा है, गरीबों- निःसहायों को गाय-बकरियों की तरह वाघ कर दूहा जा रहा है और वे उफ तक नहीं कर पाते हैं."

चक्रव्यूह : 75 "आर्डर, आर्डर । अभियुक्त बहक रहा है। यह कोई भाषण देने का मन नहीं है । जितना पूछा जाए उतना ही जवाब दिया जाए।" "मी लार्ड, अपराधी अपने-आपको सत्यवादी हरिश्चन्द्र और युधिष्ठिर की औलाद साबित करने की कोशिश कर रहा है, जबकि खुद स्वतंत्रता सेनानी का झूठा प्रमाण-पत्र पेश करके पेंशन ऐठ रहा है । इससे बढकर बेईमानी की बात और क्या हो सकती है।" सरकारी वकील ने कहा। "आब्जेक्सन मी लार्ड। लाल साहब एक तपे-तपाए स्वतंत्रता सेनानी है। इन्होने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व त्याग कर दिया है।" बचाव पक्ष के वकील ने कहा । "यदि खजाना लूटना त्याग है तो फिर चोरी किसे कहेगे।" "देश के लिए सरकारी खजाना लूटा था।" "इतना ही नही मी लार्ड, अभियुक्त चोर होने के साथ-साथ दुराचारी भी है। अपने जवानी के दिनो मे, जब यह चोरी-छिपे इधर-उधर मारा फिरता था, तब उस समय के एक देशभक्त ने इसको अपने घर में छिपने की शरण दी। बाद में यह नमकहराम उनकी ही बेटी को ले भागा।" "बस वहुत हो चुका । बद करो यह बकवास।" लाल साहब गुस्से से कापने लगे थे। "अच्छा । वह कैसे?" जज ने पूछा। "जज साहब, मेरो पत्लो जाने-माने स्वतत्रता सेनानी कुंवर बहादुर सिंह की बेटी है, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में अपनी रिपासत होम कर दी थी और दोनो वेटो की बलि चढा दी थी । आज भी उनका स्मरण इस महान त्याग का साक्षी है।" "सो तो ठीक है, मी लार्ड । कौन नहीं जानता कुंवर साहब के त्याग को। लेकिन ऐसी महान आत्मा के साथ भी अभियुक्त ने गद्दारी को।" सरकारी वकील ने मुह विचकाते हुए कहा । "यह सरासर झूठ है । कुवर साहब की वेटी भूमिगत होकर काति- कारियो के साथ काम करती थी." "और तुम उनके साथ क्राति करते थे।" मरकारी वकील ने टिप्पणी की।

76: हादसा "मी लार्ड, इन बातों का इस मुकदमे से कोई ताल्लुक नहीं है।" वचाव पक्ष के वकील ने आगे बढकर कहा । "सीधा ताल्लुक है, मी लाई। इससे साफ जाहिर होता है कि अभि- युक्त बचपन से ही उचक्का, लोफर और चरित्रहीन है।" सरकारी वकील ने ऊची आवाज में कहा। "ठीक है, ठीक है, अगला अभियोग पढ़ा जाए।" जज ने आदेश दिया। "आगे यह कि पुआरी लाल वल्द कोदई लाल ने हलके के थाने मे रपट दर्ज कराई थी कि वाकयात की रात करीब 11.00 बजे लाठन चौधरी ने अपने गुडी के साथ अभियुक्त के घर पर डाका डाला और सामान लूट कर ले गए। आगे यह भी कि ताठन चौधरी के गुंडो ने न केवल अभियुक्त की बेटी के साथ दुर्व्यवहार किया बल्कि उसे उठा भी ले गए।" "फिर, फिर क्या हुआ?" जज ने पूछा। "पुलिस तहकीकात के दौरान पाया गया कि यह रपट सरासर झूठ, मनगढत और सत्य से परे है। असल में पुआरी लाल वल्द कोदई लाल ने नगर के इज्जतदार और प्रतिष्ठित व्यक्ति लाठन चौधरी को ब्लैकमेल कर ने के लिए ऐसा घटिया आरोप लगाया था। तहकीकात के दौरान यह भी पाया गया कि अभियुक्त बहुत ही गिरा हुआ और पतित इनसान है, जो अपनी बेटी की कमाई की रोटी खाता"" "नहीं नहीं नहीं "यह सरासर झूठ है, भगवान के लिए मेरी बेटी के बारे में ऐसी बात मत करो। मेरी बेटी 'मेरी बेटी गगा की तरह पवित्र थी।" लाल साहय बीच मे ही चीख पड़े। क्रोध से उनका बदन कापने लगा था । ग्लानि और क्षोभ के कठघरे में हत्ये पर उन्होंने सिर पटक दिया था। "तो सच क्या है ?" जज ने साल साहब की ओर देखते हुए पूछा। "सच यह है जज साहब, कि वास्मात के दिन करीब चार बजे शाम को ही एक ट्रक माकर हमारे दरवाजे के सामने एका । उम पर कुछ सामान भदा हुआ था। हाइवर के अलावा छ. मुस्ट खसासियों की तरह गर्दै फो पीपा कर पहने ट्रक से उतरे और लदा सामान उतार कर नीचे रण चक्रव्यूह : 77 दिया । ड्राइवर बोनट खोलकर उस पर झुक गया । कुछ लोग ट्रक के ऊपर नीचे आते-जाते रहे, ट्रक को ठेलते, धक्का लगाते रहे। इस दौरान बराबर ट्रक भर्र-भरं की आवाज करता रहा। यह सब नाटक इसलिए रचा गया कि पास-पड़ोस वालों को यह मालूम हो जाए कि चलता हुआ ट्रक अचानक खराब हो गया है । रात को ग्यारह बजे, जब मैं घर लौटा तो सामने खडा ट्रक भर-भर की आवाज कर रहा था। घर का सामान लूटकर ट्रक में लादा जा रहा था। लाठन चौधरी अपने दो मुस्टंडों के साथ मेरी बेटी को .." आगे लाल साहब के मुंह से कोई शब्द नहीं निकल पाया और वह फूट-फूट कर रो पड़े। "पानी 'पानी'अभियुक्त को पानी दिया जाए।" "कहिए''कहिए, यह न्यायालय है। यहा आपको पूरा न्याय मिलेगा। हां तो फिर, क्या आपने लाठन चौधरी को जोर-जबर्दस्ती करते देखा?" "मैंने इतना ही देखा कि मेरी बेटी दो-तीन गुडों के चंगुल में फंसी छटपटा रही है।" "और आप दरवाजे पर बैठे पहरा दे रहे है ।" सरकारी वकील ने व्यंग्य से कहा। "बीच में टोका-टाकी न की जाए। हां तो क्या आपकी बेटी उस समय चुप थी या चीख-चिल्ला रही थी?" "गोंय-गोंय की आवाज कर रही थी, लगता था बदमाशों ने उसके मुंह में कपडालूंस दिया था।" "क्या आपने वह कपड़ा देखा?" "कैसे देखता जज साहब । दो गुंडे मुझे पटककर सोने पर चढ़ बैठे थे । फिर बदमाशों ने मेरी बेटी को भी उठाकर ट्रक में डाल दिया और फिर और फिर मेरी बेटी कभी लौट कर नही आयी।" "क्या कहती है पुलिस रपट इस बारे मे?" जज ने पूछा। "पुलिस रपट से सावित होता है कि डकैती और दुव्र्यवहार की घटना झूठी है । असलियत यह है कि पुमारी लाल वल्द कोदई लाल की बेटी मोहिनी एक पेशेवर लड़की थी। शहर के बदमाशों से उसका ताल्लुक था। तरह-तरह के लोगों का उसके घर आना-जाना या वाक्यात की राज लेन- 78 :हादरा देन के सवाल पर अभियुक्त और ग्राहको मै तू-तू, मैं-मैं हो गई, मारपीट भी हुई। बाद मे बदमाश अभियुक्त की बेटी को उठा कर ले गए। दो दिनों बाद कुमारी मोहिनी की नगी लाश जयगढ के जंगलो में मिली, जो तस्करो और बदमाशों के छिपने का अड्डा है।" "क्या पोस्टमार्टम किया गया?" "जी मरकार।" "क्या कहती है, पोस्टमार्टम रपट ।" "रपट से यह जाहिर होता है कि अभियुक्त की बेटी के साथ बलात्कार हुआ था, लेकिन पहली बार नहीं, क्योकि रपट मे लिखा है कि वह इसकी भादी थी और.." "बन्द करो यह बकवास। ऐसी घृणित बात बोलते हुए तुम्हारी जीभ क्यों नहीं गलकर गिर जाती, आंखे क्यों नहीं उलट जाती, तुम्हारा विकृत मस्तिष्क विगलित क्यों नहीं हो जाता। तुम वकील नही, वकील के वेश में जल्लाद हो जल्लाद, जिसका पेशा ही गला घोंटना है, कसाई हो कसाई, जिसका धंधा ही खाल उतारना है। सूकर की तरह तुम्हारा स्वभाव ही गंदा खाना और गंदगी फैलाना है । मैंने अच्छी तरह समझ लिया । तुम सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हो। उसी सडी-गली लिजलिजी व्यवस्था के गंधाते अंग, जिसमे सत्य और न्याय भ्रष्टाचार और अन्याय के जबडों में फंसा तडफड़ा रहा है । तुम सब मगरमच्छ हो मगरमच्छ, कमजोर मछलियों को चुन-चुन कर निगलने वाले, घडियालों की तरह पानी के नीचे से छिप- कर टाग खीचने वाले। जानवर से भी गयावीता है वजूद तुम लोगों का! जानवर की शक्ल से उसका स्वभाव मालूम हो जाता है, लेकिन तुम्हारी इस आदमी की खाल मे कौन जानवर छिपा बैठा है, यह किसी को नहीं मालूम । लेकिन एक बात सुन लो, नाटक-नौटंकी वालो नकाबपोशो, तुम्हारा यह नकाब एक न एक दिन जरूर उतरेगा और तब तुम्हारी एक- एक बोटी का पता नहीं चलेगा। ऐमा झझावात आयेगा, ऐसा तूफान उठेगा कि झूठ, फरेब, अत्याचार, जुर्म और भ्रष्टाचार की नीव पर खड़ी तुम्हारी यह वोगली मीनार बालू के लोदे वी तरह ढह जायेगी और तुम, ये, वो, सभी उसके मलबे के नीचे सदा-सदा के लिए दफन हो जाओगे ।

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78 : हादरा देन के सवाल पर अभियुक्त और ग्राहको मे तू-, मैं-मैं हो गई, मारपीट भी हुई । वाद में बदमाश अभियुक्त की बेटी को उठा कर ले गए। दो दिनो बाद कुमारी मोहिनी की नंगी लाश जयगढ के जंगलों में मिली, जो तस्करों और बदमाशो के छिपने का अड्डा है।" "क्या पोस्टमार्टम किया गया?" "जी मरकार।" "क्या कहती है, पोस्टमार्टम रपट ।" "रपट से यह जाहिर होता है कि अभियुक्त की बेटी के साथ बलात्कार हुआ था, लेकिन पहली बार नहीं, क्योकि रपट में लिखा है कि वह इसकी आदी थी और..." "बन्द करो यह बकवास । ऐसी घृणित बात बोलते हुए तुम्हारी जीभ क्यो नही गलकर गिर जाती, आंखे क्यों नही उलट जाती, तुम्हारा विकृत मस्तिष्क विगलित क्यो नहीं हो जाता। तुम वकील नही, वकील के वेश में जल्लाद हो जल्लाद, जिसका पेशा ही गला घोंटना है, कसाई हो कसाई, जिसका धंधा ही खाल उतारना है। सूकर की तरह तुम्हारा स्वभाव ही गंदा खाना और गंदगी फैलाना है । मैंने अच्छी तरह समझ लिया। तुम सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हो। उसी सड़ी-गली लिजलिजी व्यवस्था के गधाते अंग, जिसमे सत्य और न्याय भ्रष्टाचार और अन्याय के जबडों मे फंसा तडफड़ा रहा है । तुम सब मगरमच्छ हो मगरमच्छ, कमजोर मछलियों को चुन-चुन कर निगलने वाले, घड़ियालों की तरह पानी के नीचे से छिप- कर टाग खीचने वाले। जानवर से भी गयावीता है वजूद तुम लोगों का। जानवर की शक्ल से उसका स्वभाव मालूम हो जाता है, लेकिन तुम्हारी इस आदमी की खाल मे कौन जानवर छिपा बैठा है, यह किसी को नहीं मालूम । लेकिन एक बात सुन लो, नाटक-नौटंकी वालो नकाबपोशो, तुम्हारा यह नकाब एक न एक दिन जरूर उतरेगा और तब तुम्हारी एक- एक बोटी का पता नहीं चलेगा। ऐसा झझावात आयेगा, ऐमा तूफान उठेगा कि झूठ, फरेव, अत्याचार, जुर्म और भ्रष्टाचार की नीव पर बड़ी तुम्हारी यह खोखली मीनार वालू के लोंदे की तरह ढह जायेगी और तुम, ये, वो, सभी उसके मलबे के नीचे सदा-सदा के लिए दफन हो जाओगे।

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फौजी कोस-भर जमीन चलने में ही सूरज थक गया। हंफनी छूट गई और टागें थरथराने लगी। ऊबड़-खाबड़ रास्ते और टेढी-मेढी मेड़ी पर कदम ठीक से नहीं पड़ रहे थे। ढेला-दुक्कुर पर पैर पड़ते ही वह लड़खड़ा जाता था और सिर का बोझ डगमगाकर एक ओर झूल जाता था । बक्से में वजन भी अधिक हो गया था। वह बक्से को कभी कंधे पर तो कभी सिर पर बार-बार बदलता रहता था। कंधे और सिर बथने लगे थे और रीढ की हड्डी तड़कने लगी थी। टांगें बेलगाम हो गई थीं। कदम डालो इधर तो पड़ता था उधर । चलने मे पैर थपर-थपर कर रहे थे और कमर तक टांगे हवर-हचर हिल जाती थी। वह मन-ही-मन अपनी हालत पर कुढने लगा। यही शरीर था कि पचास किलो का पिठू बाधे, राइफल लिये, यह मीलों दौड जाता था। इतना दमखम था बदन में, कि कचे-मे ऊंचा पहाड़ भी आनन-फानन में फादने का हौसला रखता था। आज यही शरीर कंकाल बन गया है, जैसे कद्र से उठकर मा रहा हो। अपना ही चेहरा खुद को भकसावन लग रहा है। चलते समय, हर कदम पर जोड़ों की हड्डियां ठकर सकर बज रही हैं। हिम्मत पस्त हो गई तो बगीचे के बाहर बक्सा उतारकर, वह जमीन पर पसर गया। सहसा जेल की यातनाएं भयावह दुःस्वप्न की तरह उसके दिमाग में उभरने लगी। वह क्षण भर के लिए आतकित हो उठा। अतः कांप गया। दुश्मनों पर उसे गुस्सा आने लगा। हरामी जान से मार दिये होते तो टंटा ही खतम हो गया होता, लेकिन कमीनों ने अपंग करके छोड़ दिया, सारी उन कोड़ों की तरह घिसटने के लिए। पता नहीं उसके साथियों का क्या हुआ। हो सकता है, वे भी उसी की तरह घायलावस्था मे दुश्मनों के हाथ फौजी:81 पड़ गये होंगे और सड़ रहे होंगे उनकी जेलो में, या फिर बर्फीली पट्टानों के नीचे आज भी दबी पड़ी होंगी उनकी लाशें । वापस कम्पनी में आने पर भी कुछ पता नहीं चल पाया था, उनका । कितना खौफनाक था वह दिन। याद आते ही एक ठंडो सिहरन दौड़ गई उसकी हड्डियों में 1 सियाचीन ग्लेसियर की ऊपरी चौकी से वह अपने दो जवानो के साथ वेस कंप में वापस लौट रहा था। एकाएक आसमान में अंधेरा छाने लगा। शान्त सोता हिमनद सहसा भड़क उठा और सिसियाती आवारा हवाएं दिशाओं से सिर धुनने लगी। बर्फीला अंघड़ चलने लगा। आकाश से बर्फ के बड़े-बडे टुकड़े ठाय-ठांय बरसने लगे। उनके चेहरे और बदन बुरी तरह धुन गये। बर्फ की मार से बिलबिलाकर वे तीनों जान बचाने के लिए वेतहाशा भागने लगे। अंधेरे में रास्ता भटक गया। पैर फिसलने से वह हजारों फीट नीचे जा गिरा। जब होश आया तो उसने दुश्मन की सगीनों के बीच अपने को घिरा पाया। फिर पाकिस्तान की जेलों में यातनाओं का जो सिलसिला शुरू हुआ तो अपाहिज करके ही छोडा। एक से एक रोंगटे खड़े कर देने वाले हादसो से उसे गुजरना पड़ा। लाहौर जेल तक तो फिर भी गनीमत थी। शुरू-शुरू मे पूछताछ के दौरान मार-पीटकर और मामूली यातना देकर छोड़ दिया था दुश्मनों ने, लेकिन जब अटक के किले में वह गया तब तो बस हर क्षण यही दुआ करता रहा कि किसी तरह मालिक उठा ले इस नरक से । वहां पहुंचते ही दुश्मनो ने एक बीस फीट गहरे सकरे कुएं में उसे डाल दिया, जिसकी गोलाई डेढ़ फीट व्यास की थी । कुएं के ऊपर एक छोटी घण्टी टंगी थी, जिसकी पतली डोर अन्दर-नीचे तक लटक रही थी। उसे बताया गया कि जब दिशा- फराकत महसूस हो, वह डोरी खीचकर घण्टी बजा दिया करे । उसे कुए से बाहर निकाल दिया जायेगा। कुएं में हर समय घुप्प अंधेरा छाया रहा था और उसकी दीवारों की दरारों में बडे-बड़े पंखों वाले चमगादड़ चिपके रहते थे या अन्दर उड़ा करते थे। कभी-कभी कोई चमगादढ़ उसके सिर, घेहरे या बदन से भी टकरा जाता था या आकर चप से चिप जाता था । रात मे उनके उड़ने और चीखने का मिलाजुला शोर इतना तेज हो जाता था कि लगता, कुएं मे बड़े-बड़े पावर के कई इंजन ही एक माथ हरहरा रहे

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फौजी:83 - होश लौटने पर, उसने देखा, कमरे का दरवाजा खुला है। दो सिपाही उसके मुंह पर पानी छिड़क कर उसे झकझोर रहे हैं। आखें खोलते ही उनमें से एक ने कहा, "देखा, साला काफिर नाटक कर रहा था। कैसे घूर रहा है, उल्लुओं की तरह । छोड़ो-छोड़ो, हट जाओ। एक डोज और छोड़ते है । अभी इसमें काफी दम-खम लगता है।" "अभी नही । साहब के जाने के बाद एक खुराक और दे देगे। अभी साहब को बुला लाओ। बोलो कैदी ठीक-ठाक और पूरे होशोहवाश में है।" "पहले फिट कर लें।" दूसरे सिपाही ने कहा और उसको घसीटकर टिकटिकी (शिकंजा) के पास ले गया । उतान करके उसने उसका धड़ टिक- टिकी में इस तरह फंसाया कि सिर नीचे झुलता रहा। पहला सिपाही साहब को बुलाने चला गया। "फोकस ।" अन्दर घुमते ही साहब ने कहा। एक साथ बैसाख-जेठ के असंख्य तपते सूर्य उसके चेहरे पर झूल आये। सिर सुलगने लगा और आखों के गोले कोटरों के बीच उबलने लगे । उसे लगा, सिर भट्ठी में डाल दिया गया है और धू-धू कर जल रहा है। भेजा खोल रहा है । खोपड़ी चटखने लगी है। किसी भी क्षण सिर फटकर टुकड़े- टुकडे हो जायेगा। अपने को रोकते-रोकते वह जोरों से चीख उठा और चीखता ही गया । वेदम हो जाने पर सारे सूर्य एक साथ भक से बुझ गये । वह लम्बी-लम्बी सांसे भरने लगा। उसे टिकटिकी से उतारकर उसी जमीन पर बैठा दिया गया। "नाम ?" अधिकारी ने कडक कर पूछा ! वह चुप रहा। अभी भी असत्य तेज किरणे काच के नुकीले टुकड़ो की तरह उसकी आखों में चुभ रही थी। "नाम बोलो?" - "रेक?" "हवलदार।" "रेजिमेन्ट ?" "जाट।"

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फौजी: 85 धीरे समीप आने लगा। अगले कुछ क्षणों मे वंग के झूलने की रफ्तार तेज हो गई और वह उसके बदन के साथ टकराने लगा। उसको लगा, बंग के अन्दर बड़े-बड़े हथौड़े और नुकीले राड फिट किये हुए है, जो बार-बार एक ही स्थान पर चोट कर रहे हैं और चुभ रहे है। झूलते बैग की बढ़ती रफ्तार के साथ उसकी मार भी बढती जा रही थी। उसका सिर, नाक, मुह और शरीर युर गया और पोर-पोर तड़कने लगा। पास आते हर बैग के साथ उसकी सांसे टग जाती और दिल काप उठता । कुछ समय तक तो वह तड़पता-कराहता रहा, फिर उसका बदन ढीला पड़ गया और जिन्दा लाश पिटती रही। उसकी आख खुली तो वह एक तहखाने के अन्दर छोटे से कमरे में जमीन पर पड़ा था। थोड़ी देर बाद प्रकाश के साथ सीढ़िया उतरने की भारी बूटो की आवाज समीप आने लगी। वही दोनो सिपाही उसके सेल के सामने आये और टिन का एक ट्टहा मग सामने फेरते हुए कड़ककर बोले, "रोटी-पानी ले ले। कोई तेरे बाप के नौकर नहीं हैं कि रात-भर बैठे रहे और तू मजे से सोता रहे। ये ले पकड़।" एक ने दो सूखी रोटिया उसके मुंह पर फेंक दी। दूसरे ने मग सीधा करके पानी उड़ेल दिया और मोटी- मोटी गालियां बकते हुए वापस लौट गये। काफी देर तक वह उसी स्थिति में पड़ा रहा। भूख तो थी नहीं, पर प्यास के कारण गले मे कांटे चुभ रहे थे । रोटिया उसने सेल से बाहर झटक दी, परपानी का मग उठाकर पीने लगा । ज्यो ही पहला धूट भरा, बदबूदार नमकीन और कडुए पानी से जी गिनगिना गया। उसको लगा, पानी की जगह घोड़े की पेशाब दे गये, म्लेच्छ । मुह मे भरा पानी फर से उसने बाहर फेंक दिया और उल्टी करके गला साफ करने लगा। उल्टिया करने से मातो मे फिर ऐंठन होने लगी और दर्द से वह तड़पने लगा। अगले दिन फिर उसे गंस वाले कमरे में ले जाया गया। इस बार पहले से ही वहा दो अधिकारी मौजूद थे। उन लोगो ने ढेर सारे प्रश्न करने शुरू किये । उत्तर में वह वास्तविक घटना बार-बारदोहराता रहा। अधिकारियों ने आपस मे कुछ खुसुर-फुसुर की और चार नम्बर मे ले जाने का आदेश देकर बाहर निकल गये।

84: हादसा "कंपनी?" "बावन ।" "टास्क?" "टास्क" अधिकारी ने बेंत से कोंचते हुए पूछा। "कुछ नहीं।" "ठोय" एक बेत उसके सिर पर बजा।खोपड़ी झनझना पड़ी। "हराम- जादा, झूठ बोलता है। रिपीट।" अधिकारी ने आदेश दिया। दोनों सिपाहियों ने लपककर उसको पकडा और घसीटकर फिर टिक- टिको के पास ले जाने लगे। "मुझे छोड दो कुत्तो । बता ही तो रहा हूं।" "माला गाली बकता है।" कसकर एक बूट उसके घुटने पर जमाते हुए पहले सिपाही ने कहा। "ठीक है, छोड़ दो। इधर लाओ, मेरे पास।"अधिकारी ने आदेश दिया। "देखो मगर सच-मच बता दोगे तो छोड़ देंगे, वर्ना। हां तो बताओ, तुम क्या कर रहे थे. हमारी सीमा में।" वह सारी घटना सच-सच बता गया। "स्सा-आ-आ-ले पिल्ले, वक्फ बना रहा है. कहानी गढ कर। इसे तीन नम्बर में ले जाओ। कोई बहन घटा जासूस लगता है।" कहकर अधिकारी कमरे से बाहर निकल गया। उसके पीछे-पीछे वे दोनों सिपाही भी चले गये । जाते समय उन्होंने दरवाजा बन्द कर दिया। पोडी देर में वही दोनों सिपाही लौटे और घसीटकर उसे तीन नम्बर में ले गए। यह कमरा पतला और लम्बा था। बीच-बीच मे खम्भे थे। दीवारो के साथ किस्म-किस्म के लोहे और लकडी के अडगडे, टिकटिकी और औजार रखे थे। उसे एक खम्भे के साथ मटाकर खडा कर दिया गया और हाथ-पर खम्भे के माप पीछे की ओर बांध दिये गये। सिर, छाती, पेट और कमर को भी सम्भे के साथ जकड़ दिया गया। उसके सामने छत से एक बोरे जैसा लम्बा बैग लटक रहा था, जिसमें बर्फ कूटकर भरा हुमा पा। यटन दवाते ही बिगाल बैंग उसकी नाक के सामने हवा में मूलने लगा और धीरे. । ।

फौजी.85 धीरे समीप आने लगा। अगले कुछ क्षणों में बंग के झूलने की रफ्तार तेज हो गई और वह उसके बदन के साथ टकराने लगा। उसको लगा, बंग के अन्दर बड़े-बड़े घोड़े और नुकीले राड फिट किये हुए है, जो बार-बार एक ही स्थान पर चोट कर रहे हैं और चुभ रहे है। झूलते बंग की बढ़ती रफ्तार के साथ उसकी मार भी बढ़ती जा रही थी। उसका सिर, नाक, मुह और शरीर युर गया और पोर-पोर तड़कने लगा। पास आते हर बैग के साथ उसकी सासे टग जाती और दिल काप उठता । कुछ समय तक तो वह तड़पता-कराहता रहा, फिर उसका बदन ढीला पड़ गया और जिन्दा लाश पिटती रही। उसकी आख खुली तो वह एक तहखाने के अन्दर छोटे से कमरे में जमीन पर पड़ा था। थोड़ी देर बाद प्रकाश के साथ सीढिया उतरने की भारी बूटो की आवाज समीप आने लगी। वही दोनो सिपाही उसके सेल के सामने आये और टिन का एक टुटहा मग सामने फेरते हुए कड़ककर बोले, "रोटी-पानी ले ले । कोई तेरे बाप के नौकर नहीं हैं कि रात-भर बैठे रहे और तू मजे से सोता रहे। ये ले पकड़।" एक ने दो सूखी रोटिया उसके मुह पर फेंक दी। दूसरे ने मग सीधा करके पानी उड़ेल दिया और मोटी- मोटी गालियां बकते हुए वापस लौट गये। काफी देर तक वह उसी स्थिति में पड़ा रहा। भूख तो थी नही, पर प्यास के कारण गले में काटे चुभ रहे थे। रोटियां उसने सेल से बाहर झटक दी, पर पानी का मग उठाकर पीने लगा । ज्यो ही पहला घूट भरा, बदबूदार नमकीन और कडुए पानी से जी गिनगिना गया। उसको लगा, पानी की जगह घोड़े की पेशाब दे गये, म्लेच्छ । मुह में भरा पानी फर से उसने बाहर फेंक दिया और उल्टी करके गला साफ करने लगा । उल्टिया करने से आतो मे फिर ऐंठन होने लगी और दर्द से वह तड़पने लगा। अगले दिन फिर उसे गैस वाले कमरे में ले जाया गया। इस बार पहले से ही वहाँ दो अधिकारी मौजूद थे। उन लोगो ने ढेर सारे प्रश्न करने शुरू किये । उत्तर मे वह वास्तविक घटना बार-बार दोहराता रहा । अधिकारियों ने आपस में कुछ खुसुर-फुसुर को और चार नम्बर मे ले जाने का आदेश देकर बाहर निकल गये।

86 : हादसा चार नम्बर में लोहे की एक कवी कुर्सी पर उसे बैठा दिया गया। हाथ कुर्सी के पीछे और धड उसके साथ वांध दिये गये। दोनो पैरों को एक साथ बाधकर कुर्सी की टागो को जोड़ने वाले राड के साप जकड़ दिया गया और एक बड़ा हीटर जलाकर रोके नीचे रख दिया गया। धीरे-धीरे जव ताप अमह्य होने लगा, वह हलाल होतो गाय की तरह डकारने लगा और छट- पटाने लगा, पर कुर्सी ने ऐसा जकड रखा था कि टस से मस नहीं हो पा रहा था। थोड़ी ही देर मे उसके तलुवै मुलगने लगे और कमरे में चिरायध बू भर गई। दोनो सिपाही नाक दबाकर कमरे से बाहर निकल गये । उसको लगा, रगो का खून खलखल-खलखल खौलने लगा है और खोपड़ी के अंदर भेजा भगभज चुर रहा है। हाथों-पैरों मे अकडन होने लगी और पूरा बदन ऐंठ गया । आधे घंटे बाद दोनो आदमियो ने उसे कुर्सी से उतारकर तहखाने में डाल दिया। हर तरह की यातनाए देने के बाद भी जब उससे कुछ नहीं मिला, तो दुश्मनो ने छोड़ दिया और कुछ दिनो वाद, जेल के काम में लगा दिया। कहते हैं, अटक किले की जेल पाकिस्तान की सबसे खौफनाक जेल है, जहां आ जाने के बाद शायद ही कोई साबुत निकल पाता है । यहा आते ही हैं खतरनाक कैदी, जिनसे देश की सुरक्षा या शासकों को खतरा हो । वह देखता था, कर्नल, जनरल, ऊचे तबके के अफसर और बड़े-बड़े सियामी नेता भी इम जेल में आते थे । जो एक बार आ गया, कुछ दिनों मे या तो अल्ला को प्यारा हो जाता था, या पागल अथवा अपग होकर ही बाहर निकल पाता था । किले में एक बड़ा तहखाना था, जिसमे शातिर किस्म के विदेशी और सियासी कैदी रखे जाते थे। पुराने जमाने के शासक अपने विरोधियो को इसी तहखाने में हाथियो के पैरों तले कुचलवाकर मार डालते थे। कंदियों के सिर कुचलने के लिए बड़े-बड़े शिलाखह और हाथियो को बांधने के खम्भे अभी भी मौजूद थे। धार नम्बर की यातना से वह काफी हिल गया था। उसके तलवो और घुटनो तक की साल उतर गई थी और उसकी जगह कोड़ी की तरह बदरंग साल उग आई पी। सिर के बाल भी उड़ गये थे और जरा-सी धूप लगने परपोपड़ी पोलने लगती थी।

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88 : हादसा होश आया तो उसके दोनों पैरों में कार पुट्टियों के पास पट्टिया बंधी थी और टागे असह्य ददं से फट रही थी। सगता या, पर काट कर अलग कर दिये गए हैं। पाव कुछ भरने पर, जय यह उठा तो अपने ही पर मन-मन भर के लग रहे थे और ठीक से जमीन पर नहीं पढ़ रहे थे । सो घर तो परते उघर थे, जैसे अलग से टांगों में बाघ दिये गये हो । हरामजादों ने घोड़ा नस ही काट दी थी कि वापस जाने पर सेना के काविस न रह पाये । अब न वह ठीक से उठ-बैठ पाता है और न दौड़ पाता है। बस धीरे-धीरे केवल पस सकता है थपर-यपर, रेग सकता है, घिसट-पिसटकर। छूटने पर वापस लौटकर जब वह अपने रेजिमेट में आया तो अपंग होने के कारण सेवानिवृत्त कर दिया गया। उसे यह भी बताया गया कि दुर्घटना के बाद उसका कुछ अता-पता न मिलने के कारण छ. साल तक इन्तजार करने के बाद, सेना के नियम के अनुसार, उसे मृत घोषित कर दिया गया और उसके परिवार को सूचित कर दिया गया। दरस्तों की ओट मे सूरज छिपने लगा था। दहकसा आग का गोला थक कर लाल टिकिया बन गया था।झुंडों में उड़ते परिदे अपने बसेरों को लौटने लगे थे। रंभाती हुई गाय-भैसें अपने-अपने घरन-खूटों पर वापस जा रही थी । कुछ चरवाहे भंसों की पीठों पर बैठे कानो मे उंगलियां डाले विरहे की तान अलाप रहे थे। सामने के तालाब में बैठे बगुले उड़कर पेड़ों की टुनगियो पर बैठने लगे थे, लेकिन किलकिली चिरया अभी भी पेड़ो पर से उड़ कर चिड़िक-चिड़िक करती हुई आती और पानी के ऊपर खूटा गाड़कर उड़ने लगती और छपाक से पानी में फूदकर कोई नन्ही मछली चोच में दबाये फिर पेड़ पर जाकर बैठ जाती थी। सामने मटर के खेत की मेड़ पर कौवों की पचायत बैठी थी। तरह-तरह की आवाज निकालते हुए वे आपस में बोल-बतिया रहे थे। धीरे-धीरे हरे-भरे खेतो मे कुहासे का हल्का धुध उभरने लगा था, लेकिन ऊपर आकाश में अभी भी झिलमिल लाल चादर फैली थी। कोस-भर जमीन अभी और बाकी थी। वह उठने ही वाला था कि पास से मजदूरो का एक जोडा गुजरा। आदमी अकवार मे एक लेहनी गहगह फूली सरसो दबाए मटक-मटक कर औरत से बतिया रहा था और औरत आधे गाल से मुस्की काटते हुए और आधे गाल से शरमाते हुए 'हट्ट फाजा:४५ हट्ट' कर रही थी और रंह-रहकर आदमी की पीठ पर एक धौल जमा देती थी। सहसा उसकी आंखो में पत्नी का चेहरा कौंध गया । उसके साथ बीते क्षणो की मधुर यादें गुदगुदाने लगी। गौने के बाद एक महीना छुट्टी बाकी रह गई थी, जो पलक झपकते खतम हो गई । जाने वाले दिन, पूरी रात अमरी उसके सीने में मुंह छिपाये सुबकती रही। उसका भी दिल भर आया। आखे पनीली हो उठी। कलेजे में पता नही कैसी-कैसी हूके उठने लगी। दिल पर पत्थर रख कर, छः महीने के बाद वापस आने का वायदा करके उसने पत्नी को ढाढस बंधाया, लेकिन वह छ महीना कभी नहीं लौटा। अब तो उसके लिए वह भर ही चुका है । उसकी दुनिया उजड़ चुकी है । खनकती चूड़ियों से भरी कलाइयां अब सूनी होंगी, माथे की बिंदिया और मांग का सिंदूर मिट चुके होगे। फुलना-चोटी वाले सजे-सवरे बाल बिखर कर सूखी घास बन गये होगे । बाजू-बेरवा और पंजेब भी उतर गये होंगे। छोट की साड़ियां और चुनरी मोहाल हो गई होंगी। अब तो बेचारी मोटिया मारकीन पहन कर रणापा काट रही होगी। घर की देहरी पर सुबह-शाम अपने करम पर एक धार रो लेती होगी और हर समय उसको कोसती होगी कि भरी जवानी मे दगा देकर उड़ गया, सुगना की तरह । उसका जीवन तपते रेगिस्तान की तरह वीरान हो गया होगा। प्यासी हिरनी की तरह तड़पती वह भटक रही होगी। एक अन्तहीन मनहूस अंधेरा फैल गया होगा उसके चारों तरफ और कुहुक-कुहुक कर पल-पल काटती होगी वह, उसके बिना । कौन सुनता होगा, उसका दुख-दर्द और वाटता होगा अकेला- पन । कैसा उपहास किया नियति ने उसके साथ । सहसा उसे लगा अभी भी ड्योढ़ी, पर बैठी वह उसकी राह देख रही है । उसको सूनी आखों मे उसके लौट आने का अभी भी विश्वास है । पली के प्रति उसका जी भर आया। दिल में के उठने लगी। मन बेचैन हो उठा कि कितना जल्दी घर पहुंच कर वह भर ले उसको अपनी गोद में, समा ले अन्दर छाती फाड़ कर एक बारतो चिहा उठेगी देखकर । विश्वास ही नही होगा उसे अपनी जाखो पर, कि स्वप्न देख रही है या सचाई। हहाकर दौड़ आयेगो उमको बांहो मे, फिर सीने में मुह छिपा कर देर तक 90:हादसा हिचक-हिचक कर रोयेगी, दुख-दर्द कह-कह कर। देर सारे उलाहने देगी, रूठने का नाटक करेगी और फिर सुद्धक जायेगी उसकी गोद में, निढाल होकर। वह ढेर सारा प्यार उड़ेल देगा अपनी अमरी पर। दुलरायेगा, मनायेगा और अपने हाथों से सुहागरात की दुलहन की तरह सजायेगा। शृंगार की एक-एक चीज चुन-चुन कर पहनायेगा । चलते समय उसने बड़े अरमान से अपनी अमरी के लिए ढेर सारा सामान खरीदा था। जोधपुरी घाघरा, राजस्थानी चुनरी, बूटेदार छीट, झालरदार साटन का साया, चमकौआ चोली, झुनझुन बजने वाले रेशमी फुलना-चोटी, चाद-सितारो वाली चम- धम टिकुली, गमकोआ क्रीम-पाउडर और लाल सैटिल। एकदम नई- नवेली दुलहन लगेगी अमरी उसकी, सज-धज कर, जैसे अभी-अभी डोली से उतरी हो। एकाएक वह हुमक कर उठा और कंधे पर बक्सा रखकर हचर-हचर हुमयता हुआ घर की ओर चल दिया। धरती पर भरपूर अंधेरा उतर चुका था, लेकिन उसकी आंखो में एक साथ न जाने कितने बल्ब जल उठे थे और उनकी चकाचौंध रोशनी मे वह सजी-सवरी दुलहन के रूप मे अपनी अमरी के साथ सुहागरात की मधुर यादो मे खो गया था। वह थपर-थपर चला जा रहा था। गाव समीप आने वाला था । एका- एक स्यारों की हू-हू से रात काप उठी। गांव के कुत्ते सिवानों की ओर मुंह उठा कर भूकने लगे। पहर-भर रात जा चुकी थी। उसका घर गाव एक छोर पर गड़ही के पास था, जिसके सामने बांस का पना सुरमुट था। पास पहुंचने पर उसने देखा, झुरमुट की जगह अब बांसों के ढूंठ आकाश की ओर मुंह उठाये मौन खड़े थे और उन पर उल्लू बैठे रिरिया रहे थे। उसको अपना घर पहचानने मे कठिनाई नहीं हुई। खपरैल के घर की जगह खंडहर खडा था। बाहरी दीवारो का कुछ हिस्सा भी ढह गया था। ढही दीवारों की जगह पतई को टाटी खड़ी थी। दरवाजा वही था, जो बन्द था! "खटखट"खट" । दरवाजे पर पहुंच कर उसने दस्तक दी। "कौन है ? अन्दर आ जा। विलारी बन्द नहीं है । कुकुर-बिलार के डर से वैसे ही भेड़ दिया है।" अन्दर से एक स्त्री की आवाज आई। अमरी की फौजी:91 आवाज इतनी बदल गई है, सुन कर उसे अटपटा लगा। दरवाजा खोल कर वह भीतर घुस गया। अन्दर से भी मब पर गिर चुके थे। पिछली दीवार के साथ एक टुटही झोंपड़ी लटक रही थी। औरत झोंपड़ी के बाहर बैठी मिट्टी के चूल्हे पर लकडी-झुनखुन झोंक कर एक काली डेकची में खदखद-पदखद कुछ पका रही थी। शायद बाजरे का भात था । चार-पांच साल का एक अधनंगा लड़का टा फैलाये चूल्हे के पास बैठा आग ताप रहा था। दूसरा बच्चा उसकी गोद में लेटा दूध पी रहा था। यह सब देखकर क्षणभर के लिए उसे अपनी स्मृतियों पर विश्वास नहीं हुआ। सोचा, कहीं गलत घर में तो नहीं घुस आया। चूल्हे से कुछ दूर वह ठिठक गया और बक्सा जमीन पर रखकर हाका-बक्का-सा औरत को घूरने लगा। औरत के कपड़े अस्तव्यस्त थे। सिर खुला हुआ और टांगें अधनंगी थी। उसने झटके से दूध पीते बच्चे को गोद से उतार दिया और अपने आपको समेटते-संभालते हुए खड़ी हो गई। बच्चा जमीन पर मसर कर रोने लगा। "कौन हो तुम?" सकपकाते हुए औरत ने पूछा। "पहचाना नही।" अमरो को पहवानते हुए धीरे से उसने कहा। उसकी आवाज अपने को ही अजनबी लग रही थी जैसे किसी गहरे कुए से निकल रही हो। "तुम"तेकिन तुम तो मर चुके हो। कही तुम्हारा भूत तो नहीं है।" औरत भय से कांपने लगी और अपने दोनों बच्चों को बाहों मे समेटते हुए आहिस्ते-आहिस्ते पीछे खिसकने लगी, जैसे जान बचाने के लिए भागने को तयारी कर रही हो। "तुम अमरी ही हो न, मेरी"मेरी घरवाली।" पहचानते हुए भी, गोद में बच्चों को देखकर, अपना शक दूर करने के लिए, उसने हिचकिचाते हुए पूछा। "नहीं"नही "तुम वो नहीं हो "तुम भूत हो भूत । वह तो भाब के मर चुके हैं."भूत भूत ।" चीखते हुए औरत बच्चों के साप दरपाने की ओर लपकने लगी, ताकि बाहर निकलकर शोर मचा दे। "सुनो तो सही। मैं भूत नहीं हूं पगली। मैं यही हूं, यही 92: हादसा सूरज । डरो नही। लेकिन यह तुमने क्या किया?" आगे बढ़कर रास्ता रोकते हुए उसने कहा। "नही 'नही हमारा सूरज मर चुका है । तुम उसकी रूह हो, प्रेत हो। मुझे डराने "वरवाद करने के लिए रात में आये हो।" औरत हांफने लगी थी। "विश्वास मानो अमरी, मैं मरा नही है । मैं क्या करता, मजबूर था। तुम यकीन करो मुझ पर।" "अगर तुम असली सूरज भी हो तो अब इससे क्या फर्क पडता है। अब तो."अब तो...।" "यही देखकर तो मुझे ताज्जुब हो रहा है । तुमने यह क्या कर लिया। ऐसी भी जल्दी क्या थी कि इन्तजार करते नहीं बना तुमसे ।" "इन्तजार तो मैं जीवन-भर कर लेती पर कोई आस होती तब तो, और फिर तुम्हारे गाव-घर, समाज ने करने दिया होता तब न । तुमको क्या मालूम, अकेली औरत का क्या हाल होता है, बिना मर्द के । रास्ता निबहना मुश्किल हो गया था गांव में । जिस गली से भी गुजरती, आंखें फाड़े लीलने के लिए तैयार मिलते मनचले। गिद्ध-कौवों की तरह मडराने लगे थे आगे-पीछे लोगबाग । तूने कभी यह भी सोचा कि पेट-तन कैसे चलता होगा । छः साल तक तो बैठी रही तुम्हारे इन्तजार में । आयें पथरा गईं तुम्हारी राह देखते-देखते। सरकार से भी नोटिस आ गई कि तुम्हारा कोई अता-पता नहीं है । शायद मर गये। बहुत दौड़ी-धूपी, यहा- वहीं, पर एक फूटी कौड़ी तक नहीं मिली, तुम्हारे नाम पर। अपर से जहा जाओ, वही पूरती आखे, वही गिद्ध-कौवे घात लगाये बैठे मिलते। किससे-किससे मांस नोचवाती । मजबूर होकर इस अधम पेट और गुडो- बदमाशो के चंगुल से बचने के लिए करना पड़ा यह सब।" अमरी सिसकने लगी थी। "लेकिन अब तो मैं लौट आया हूं।" "बहुत देर कर दी तुमने । छः महीने का वायदा करके गये और पता नही किस जादूगरनी की जाल में फंस कर सुध-बुध खो बैठे। भूल पर भी कभी खबर नही ली, पीछे मुडकर । कहकर दगा किया, मेरे साप ।"

फौजी:93 "दगा तो तूने किया, अमरी। कारा तू मेरी मजबूरी समझ पाती।" आवाज में थरथराहट थी। “जो हो गया सो हो गया । अब तुम मेरे लिए मर चुके हो। भगवान के लिए चले जाओ यहाँ से । अभी इसी वक्त चले जाओ। अगर कहीं उन्होने देख लिया तो"।" "यह कैसी हालत हो गई है तुम्हारी "मुझसे तो "मुझसे तो"।" "मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो। मैं जैसी भी हूं, बहुत सुखी हूं, अपने बाल-बच्चों मे । तुम निकल जाओ यहा से।" दरवाजे की ओर इशारा करते हुए ऊचे स्वर में उसने कहा। "अमरी मेरी बात तो सुन लो मैं मैं." ।" "अब मुनने-सुनाने के लिए वचा ही क्या है । बस तुम चले जाओ यहां मे, जल्दी से जल्दी । वह आते ही होंगे। तुम अब मेरे लिए मर चुके हो" भर चुके हो।" धक्का देकर औरत ने उसे बाहर कर दिया और अन्दर से सांकल चढ़ा दी। तिरस्कार और ग्लानि से सूरज तिलमिला उठा, फिर भी वह एक बार अमरी को सचाई बता देना चाहता था। वह जता देना चाहता था कि दगा उसने नही, तुमने किया है । वह तो लाचार था, वरना अपना वायदा जरूर पूरा किया होता। "एक बार सिर्फ एक बार"तुम मेरी बातें तो सुन लो।" बाहर से दरवाजा पीटते हुए उसने कहा । "कह दिया न, मेरे लिए तुम मर चुके हो । मेरे ऊपर नहीं, तो इन बच्चो पर तो रहम करो। एक बार फिर से क्यों उजाड़ने पर तुले हो, मेरी वसी-बसाई जिन्दगी।" योडी देर तक सूरज हारे जुआरी की तरह ठगा-ठगा-सा बन्द दरवाजे को पूरता रहा । उसके अरमान बिखर चुके थे । आहत मन घायल कबूतर को तरह फडफड़ा रहा था । क्षोभ से उसकी शिराएं तन गई। खून उबलने लगा। चश्मा उठाकर उसने दरवाजे पर दे मारा। अन्दर का सारा माल- अमवाब जमीन पर बिखर गया । उनको रौंदते हुए यह उल्टे पांच लोट गया, जिदगी के अन्तहीन अंधेरे रास्ते पर । १ घात वह स्टेशन पर उतरातो सन्नाटा था। न कही कोई यात्री दीख रहा था न गिद्ध के डनों की तरह काली कोट लटकाये टीटी-फीटी। पंजों पर उचक- उचक कर उसने चारों तरफ देखा, सूना-सपाट प्लेटफार्म एक छोर से दूसरे छोर तक पसरा पड़ा था। इक्का-दुक्का आवारा कुत्ते मुह उठाये इधर-उधर फिर रहे थे। बाहर बला की गर्मी थी । उमस से दम घुट रहा था । एकाएक उसकी पीठ की घमौरियां चुनचुनाने लगी। उसने बगल में दवाई धोरे की गठरी नीचे रख दी और पीठ को खभर-खभर खुजलाने लगा। पूरी पीठ भमा उठी, जैसे मिर्च लग गई हो । वह छनछना गया । प्लास्टिक के जूते मे टुसा पैर उबल गया था। जूते से पर निकालते ही ऐसा भभका उठा कि नाक सिकोड़कर उसने बगल में पिच्च से थूक दिया और जूता परे घटक दिया। कल दोपहर को जब वह काशी-दादर एक्सप्रेस से बनारस से चला था, तब से न जूता पर से निकाला था और न गठरी छोड़ कर पानी-पेशाब के लिए अपनी जगह से उठा था। उसे डर था कि चाई-चोर मार देंगे। घर से चलते समय पड़ाइन ने चार ठोकवा और एक पाव सत्तू रास्ते के लिए अलग पोटली मे बांध दिया था, वह ज्यो का त्यों बधा पड़ा था। पूरी सफर में टांगें मोड़ कर एक ही बल बैठे-बैठे घुटना अकड़ गया था और कमर पिराने लगी थी। उसने टांगें झटक कर, बाहों को मरोडते हुए, वदन खीच कर जोरो को अगडाई ली। नस-नस पडपड़ा उठी। रात का कुछ अंदाज नहीं मिल रहा था । आकाश की ओर ताका, तो सतहला सिर पर राडा या। लगता है, आधी रात होने को है, मन ही मन उसने सोचा । बल सुबह का अन्न-जल मुह मे गया था, सो भी ठीक से खा नही पाया था। चलते समय पड़ाइन और बच्चे रोने-धोने लगे थे, जैसे वह ससुराल गवन जा पात:95 - रहा हो। ऐसे में कोर कसे मुंह में पहता। आगे की पाली माहुर हो गई यो। विन खाये ही मुंह धोरर वह आंगन से उठ गया था। सोचा, बोली पर सव सोग या-पी कर सो गये होंगे। यही गमछा में सत्तू सानकर या ले, तव चले यहां से। इस दौरान गाड़ी जिधर से आयी थी, उधर को ही वापस चली गई थी। आज गाड़ी ने जी रकत-रोवाइन कर दिया था। इगतपुरी के बाद तो छानल गदही बन गई थी साली, इच्च हुच्च कर हर कदम पर किरकिरं"किरिष.."किरिव करके एक जाती थी, जैसे इंजन को हवा ही निकल गई हो। पेट में घूहे कूद रहे थे। पोटली खोलकर उसने गम में सत्तू निकाला और क्षोली बनाकर नल की ओर चल पड़ा 1 पड़ाइन ने एक चिरकुट में टोर्रा नमक और एक लाल मिर्च भी गठिया दी थी। वाह ! कितना ध्यान रखती हैं पड़ाइन, उसका । मन ही मन वह गद्गद हो उठा था। नल खोलने पर फुस्स से हवा निकली, लेकिन एक बूंद भी पानी नहीं गिरा । शायद खराब होगा। वह दूसरे नल की तरफ गया । पानी वहां भी नहीं था। उसे आश्चर्य हुआ। मामला क्या है । उसने एक बार फिर पूरे स्टेशन पर नजर डाली। सन्नाटा ओढे, मरघट की तरह खामोश, स्टेशन भाय-भाय कर रहा था। प्लेटफार्म के किनारे अपनी लाल- लाल आंखें फाड़े सिग्नल प्रहरी की तरह तना खड़ा था, मानो कह रहा हो, खबरदार, इसके आगे बढ़ना मना है । वह वापस गठरी के पास लौट आया और सतू पुन: पोटली मे वांधकर गठरी सिर पर उठा ली और जूता पहन कर चल दिया। सोचा, लाइन पार कर वीच से निकल जायेगा, खोली तो पास मे ही है। दो कदम ही चल पाया होगा कि जूता कटहे कुत्ते की तरह काटने लगा। तिलमिला कर उसने जूता निकाल कर हाथ में टाग लिया। गांव जाते समय भी, काटने के कारण, उसने जूता गठरी में बांध लिया पा और गांव के गोइडे जाकर ही पैर मे डाला था। गलियां लांघ कर वह सडक पर आ गया। सड़क भी सूनी और वीराण थी। चारों तरफ ईट-पत्थर के टुकडे, टूटी बोतलें, कांच, यल्य, ट्यूय me, टिन, बस्तों, उखड़ पलस्तरो के टुकड़े, रद्दी कागज और अधणले कपड़ों में पुलिंदे बिखरे पड़े थे । कुछ जली हुई गाड़ियों, स्कूटरों, साइकिलों में जो जगह-जगह कंकाल की तरह खड़े थे। कई जगहो पर सड़फ फे पर मग 96: हादसा थे और मिट्टी, रोरी, डामर के चप्पड़ गड्ढों के इर्द-गिर्द फैले थे। उसने अगल- बगल देखा, कुछ दुकानें जली-उजड़ी खड़ी पी। दुकानों के ऊपर के मकान भी झुलसे लग रहे थे। फुटपाथों पर सोने वालों का कहीं पता नहीं था। उनकी जगहों पर कुत्तै टार्गे फैलाये सो रहे थे। चालों और घरों के अन्दर से भी किसी के खोखने-खंखारने या सुगबुगाने की कोई आहट नहीं आ रही थी। गलियों और सड़कों पर गर्म हवाएं सायं-सायं चल रही थी। सन्नाटा ऐसा था कि एक कंकडी गिरने पर भी रात चिहुंक उठे। वह हैरत में या कि एकाएक हो क्या गया बंबई को । रात-दिन भागने वाला शहर एकाएक पंगु कैसे हो गया, शोर-शराबों और हंसी-ठहाकों वाली बस्तियां गूंगी कैसे हो गयी, चढती रात के साथ जवान होती अंबई अपाहिज क्यो हो गई। कौन-सा विषधर या प्रेत की छाया छू गई, इस शहर को। किस जादूगर ने मन्तर मार कर सुला दिया गहरी नीद में सबको, या फिर शीतला माई की सेना तो नही टूट पड़ी, हैजा, प्लेग, पेचक लेकर, बस्ती बालों पर । हैरत में दातों-तले अगुली दबाए वह कफन की तरह खामोशी ओहे मुर्दा नगर को देखता रह गया। कही कोई गडबड़ जरूर है। शायद मौवालियो (गुंडो) ने एक बार फिर लूटा-जलाया है, भैया लोगों को दुकानों-मकानो को। पता नही उसकी चाल का क्या हुआ होगा । उसमें रहने वाले माथी कैसे होगे । वह आशका से कांप उठा। उसका कलेजा धकधकाने लगा। एक बार तो जी में पाया, लौट चले वापस गाव को। जान-परान बचा रहेगा तो कही भी मेहनत- मजदूरी करके जी-वा लेगा। पर जाये कैमे, किरावा तो है नही, टेट में। पड़ाइन का वेरवा बंधक रख कर तो किरावा जुटाया था। पीछे घर में बच्चों को पाने को भी कुछ नही रह गया था। यही मे संगी-सायियो से कुछ ले-देकर भेजेगा तो बच्चों के मुंह अहार | उसने मन- तीन देखा तय किया, जव आ ही गया तो वापस नां वदा होगा वह तो होगा ही। मतू को पो डालकर गठरी के साथ कस कर बांध दवा ली, ताकि भागने-पराने की नौबत करने के। . कर । ज्यों ही उमने घात: 97 सरह कड़कती आवाज आई। “खबरदार, आगे कदम बढ़ाया तो गोली मार देंगे।" वह लड़खड़ा कर जहां था, वहीं खड़ा हो गया। पास आती भारी बूटों की खट-खट आवाजें सुन कर वह सिहर उठा। क्षण-भर में संगीने चमकाते हुए खम्- खम् आकर चार सिपाहियों ने चारों ओर से घेर लिया। "गोली मार दो साले को।" पीछे से हवलदार ने ललकारा । "लगता है, गोला-बारूद भरा है साला वोरे में । हूल दो हरामी को।" उनमें से एक सिपाही ने संगीन उसके सीने पर भिड़ाते हुए कहा । वह एक- दम सकपका गया। बगल को गठरी उसने और कस कर दबा ली और भौचक्का-सा सिपाहियों का मुंह ताकने लगा। "अवे हरामखोर भागने की कोशिश कर रहा है ।" कहते हुए दूसरे सिपाही ने राइफल का कंदा उसकी गर्दन पर दे मारा। वह मुंह के बल जमीन पर देर हो गया। गठरी दूर जा गिरी। संभल कर उसने उठने की कोशिश की कि पीछे से बूट का एक ठोकर लगा और वह गेद की तरह उछल कर आगे जा गिरा। उसके बाद चारो ओर से सिपाही फुटबाल खेलते रहे, जब तक वह अधमरा नहीं हो गया। इतने में एक हथगोला आकर एक सिपाही के पीछे, थोड़ी दूर पर फटा। उसके टुकड़ों की चोट से एक सिपाही जोरों से चीखते हुए जमीन पर फैल गया, जैसे गोली ही लग गई हो। गको तीन मिपाही अपने घायल साथी को पीछे छोड़, बिजली की तेजी से भागकर एक दुकान के वारजे के नीचे जा छिपे । उनका साथी सड़क पर गिरा तड़पता रहा। पायल पांचू में न जाने कहां की शक्ति आ गई। उसने सिर उठाकर इधर-उधर देखा और झटके से उठकर अपनी गठरी समेटते हुए इतनी तेजी मे मागा, मानो उसके पीछे पलीता लगा हो और किमी भी क्षण बारूद फट मकता है। उसको जमे पंख लग गये थे। वह वेतहाशा भागे जा रहा था। मेरबान को गली पार करने पर ही उसने रुतकर पीछे देखा था। उसका दम उखड़ गया था और वह हकर-हकर हांफने लगा था। नुक्कड़ पर मुड़ का फुटपाथ पर पैड़ के छापे में उसने गठरी उतार दी और चोट लगी जगहों को सहला कर देखने-परखने लगा। नाक की जगह लगता था, दर्द 96: हादसा । थे और मिट्टी, रोरी, डामर के चप्पड़ गड्ढों के इर्द-गिर्द फैले थे। उसने अगल- बगल देखा, कुछ दुकानें जली-उजड़ी खड़ी थीं। दुकानों के ऊपर के मकान भी झुलसे लग रहे थे। फुटपाथों पर सोने वालों का कहीं पता नही था। उनकी जगहों पर कुत्ते टांगें फैलाये सो रहे थे। चालों और घरों के अन्दर से भी किसी के खोखने-खंखारने या सुगबुगाने की कोई आहट नहीं आ रही थी। गलियो और सड़कों पर गर्म हवाएं सायं-सायं चल रही थी। सन्नाटा ऐसा था कि एक कंकड़ी गिरने पर भी रात चिहुंक उठे। वह हैरत मे था कि एकाएक हो क्या गया बंबई को । रात-दिन भागने वाला शहर एकाएक पंगु कैसे हो गया, शोर-शराबो और हंसी-ठहाकों वाली बस्तियां गूंगी कैसे हो गयी, चढती रात के साथ जवान होती बंबई अपाहिज क्यों हो गई। कौन-सा विपधर या प्रेत की छाया छू गई, इस शहर को। किस जादूगर नै मन्तर मार कर सुला दिया गहरी नीद में सबको, या फिर शीतला माई की सेना तो नही टूट पड़ी, हैजा, प्लेग, चेचक लेकर, वस्ती वालो पर । हैरत में दातों-तले अंगुली दबाए वह कफन की तरह खामोशी ओढे मुर्दा नगर को देखता रह गया। कही कोई गड़बड जरूर है। शायद मौवालियो (गुंडो) ने एक बार फिर लूटा-जलाया है, भैया लोगों की दुकानों-मकानो को। पता नहीं उसकी चाल का क्या हुआ होगा। उसमें रहने वाले साथी कैसे होगे । वह आशंका से काप उठा। उसका कलेजा धकधकाने लगा। एक बार तो जी में आया, लौट चले वापस गाव को। जान-परान बचा रहेगा तो कही भी मेहनत- मजदूरी करके जी-खा लेगा। पर जाये कैमे, किरावा तो है नही, टेट में। पडाइन का बेरवा बंधक रख कर तो किरावा जुटाया था। पीछे घर में बच्चों को पाने को भी कुछ नहीं रह गया था। यही मे संगी-साथियों से कुछ ले-देकर भेजेगा तो बच्चों के मुंह अहार लगेगा। उसने मन-ही-मन तय किया, जब आ ही गया तो वापस नहीं जायेगा । देखा जायेगा, जो बदा होगा वह तो होगा ही। सत्तू की पोटली और जूता उसने बोरे के अदर डालकर गठरी के साथ कस कर बांध लिया और गठरी बगल में ठीक से दवा ली, ताकि भागने पराने की नौबत आने पर वह भाग सके, टांग झाड़ कर । ज्यो ही उमने सड़क पार करने के लिए आगे कदम बढ़ाया, गोली की घात:97 तरह कड़कती आवाज आई। "खबरदार, आगे कदम बढ़ाया तो गोली मार देंगे।" वह लड़खड़ा कर जहां था, वहीं खड़ा हो गया। पास आती भारी बूटो की खट-खट आवाजे सुन कर वह सिहर उठा। क्षण-भर में संगीनें चमकाते हुए खम्- खम् आकर चार सिपाहियों ने चारों ओर से घेर लिया। "गोली मार दो साले को।" पीछे से हवलदार ने ललकारा। "लगता है, गोला-बारूद भरा है साता बोरे में । हूल दो हरामी को।" उनमें से एक सिपाही ने संगीन उसके सीने पर भिड़ाते हुए कहा । वह एक- दम सकपका गया। बगल की गठरी उसने और कस कर दबा ली और भौचक्का-सा सिपाहियों का मुंह ताकने लगा। "मवे हरामखोर भागने की कोशिश कर रहा है ।" कहते हुए दूसरे मिपाही ने राइफल का कुंदा उसकी गर्दन पर दे मारा। वह मुंह के बल. जमीन पर ढेर हो गया। गठरी दूर जा गिरी। सभल कर उसने उठने की कोशिश की कि पीछे से बूट का एक ठोकर लगा और वह गेद की तरह उछल कर आगे जा गिरा। उसके बाद चारों ओर से सिपाही फुटबाल खेलते रहे, जब तक वह अधमरा नहीं हो गया । इतने मे एक हथगोला आकर एक सिपाही के पीछे, थोडी दूर पर फटा । उसके टुकड़ों की चोट से एक सिपाही जोरों से चीखते हुए जमीन पर फैल गया, जैसे गोली ही लग गई हो। माकी तीन सिपाही अपने घायल साथी को पीछे छोड, बिजली की तेजी से भागकर एक दुकान के बारजे के नीचे जा छिपे । उनका साथी सड़क पर गिरा तड़पता रहा। घायल पाचू मे न जाने कहा की शक्ति आ गई। उसने सिर उठाकर इधर-उधर देखा और झटके से उठकर अपनी गठरी समेटते हुए इतनी तेजी मे भागा, मानो उसके पीछे पलीता लगा हो और किमी भी क्षण बारुद फट सकता है । उसको जैसे पंख लग गये थे। वह बेतहाशा भागे जा रहा था। मेरबान की गली पार करने पर ही उसने रुककर पीछे देखा था। उसका दम उखड़ गया था और वह हर-हकर हाफने लगा था। नुक्कड़ पर मुड़ कर फुटपाथ पर पेड़ के छाये मे उसने गठरी उतार दी और चोट लगी जगहो को सहला कर देखने-परखने लगा। नाक की जगह लगता था, दर्द 98: हादसा का गोला उग आया है, जिससे टप-टप खून चू रहा था। ऊपर का होंठ फट गया था। मुंह सूज कर टेढा हो गया था । पीठ, पेट और सीने में भी बूट लगे थे पर कटा-फटा नहीं था। दोनों पैरों में घुटने के नीचे नरिहर की हड्डियां कई जगहों पर आलू की तरह फूल आई थी। ऊपर की चमड़ी चीथड़ा हो गई थी और खून रिस रहा था । घाव से दर्द की लहरें उठने लगी । आह भरते हुए सिर पकड कर वह वही बैठ गया और अपने करम पर रोने लगा। 'न जाने किस सईती' घर छोड़ा था। डीह-देवता, काली- शीतला सवको तो मना लिया था उसने, चलते समय । हो तंगी के कारण इस बार सतनारायण स्वामी की कथा नही वंचवा पाया था और न बामन ही खिलाया था। चलते समय मन खटका जरूर था, पर बीच रास्ते में जब कतला तेली मिला तब तो उसका माथा ठनक गया था। एक तो तेली, ऊपर से काना । हो न हो, उस साले कनवा तेली के आगे पड़ने से ही आज यह भोगदंड सिर पड़ा है। चलो बाल-बच्चों के भाग से जान बच गई, यही बहुत है। शरीर की रग-रग तहकने लगी थी। उठते समय घुटना और कमर अकड़ गये। वह उठ नहीं पाया और आह भर कर फिर बैठ गया । थोड़ी देर दम लेने के बाद जमीन पर हाय टेककर धीरे-धीरे उठा, गठरी सिर पर रपी और ज्यो ही चलने को हुआ कि सामने नजर पड गई। दो आदमी एक भारी-भरकम बोरा टागे उधर ही आ रहे थे । डर कर वह पेड़ के तने की आड़ में छिप गया। नुक्कड़ के पास पहुच कर उन्होंने बोरे का मुह खोला, उसमें से एक आदमी की लाश निकली और गटर का मुंह खोल कर सिर के बल पूरी लाग अंदर डाल दो। ऊपर से बोरा डाल कर गटर का मुंह बन्द कर दिया और क्षण भर में छूमन्तर हो गये। वह एपबारगी मिहर उठा । उमका पूरा बदन परयराने लगा 1 पेड तने में और सट कर यह बैठ गया और हनुमान चालीसा का पाठ करने लगा। काफी देर तर यह उम्मी में बैठा रहा। बदन की परपराहट रक ही नहीं रही थी। फिर से टीमने सगा और गरीर बेकाबू होने लगा, तब वह धीरे से उठा, पठरो संभाली और घोसदमों से करीव भागता हुआ अपनी पोली के दरवाजे TT TITETIT घात:99 । । बाटलीवाला चाल में रमजान मियां की खोली में वह रहता था। रहता क्या था, कहने के लिए एक ठाव था। उसके अलावा गांव और आस- पास के इक्कीस आदमी और रहते थे। खोली के अन्दर एक कील पर उसकी एक धोती और कमीज टंगी रहती थी, जो साल-आघ साल पर गांव जाने के वक्त ही वह पहनता था। बाकी खाना-पीना, सोना फुटपाथ पर ही होता था। बरसात के दिनों में दुकानों और मकानों के बारजो के नीचे उठ-बैठ कर रात काटनी पड़ती थी। बाकी साथियों का भी यही हाल या। केवल रमजान मास्टर की एक टुटही चौकी खोली में पड़ी रहती थी। रमजान रहमदिल आदमी थे। गांव-घर के नाते किसी को मना, नहीं करते थे। वह बंबई के किसी प्राइवेट स्कूल में मास्टरी करते थे। "खटखट "खट", एक उंगली के नाखून से उसने आहिस्ते से दरवाजा खटखटाया । अन्दर से कोई आहट नही आई। खट'"खट उसने फिर खटखटाया । कोई संकेत नहीं। इस बार उसने भड़"भड़ दरवाजा भडभडा दिया। अन्दर जैसे खलबली मच गई । कई फुसफुसाती आवाजें आपस में टकराने लगीं। "उठो-उठो सब लोग"लगता है दंगाई यहां भी आ गये • अब जान नही बचेगी "कुछ सोचो "कुछ करो, मास्टर जी।" सबके प्राण पता पर टंग गये, रूहें कांपने लगीं, बदन पसीना-पसीना हो गया। "ऐसा करो, सब लोग दरवाजे के साथ पीठ टेककर खड़े हो जाओ। दरवाजा ही नहीं खोलेंगे।" उनमें से एक ने कहा । “अबे बुद्ध, एक बम में दरवाजे और सबकी पीठों के चीथड़े उड़ जायेंगे।" दूसरे ने कांपते स्वर मे कहा "तो क्या "तो क्या करे" ? ऐसा करो, दरवाजा खोलकर सब एक साथ भर से भाग जाते हैं." दौड़ा कर मारने में कुछ चोटचाट खाकर बच निकलेंगे" जान तो बची रहेगी।" सब लोग कनकना कर खड़े हो गये और अपनी-अपनी लुंगी-जांघिया कस कर बांधने लगे। "अरे खोलो भैया दरवाजा, नही पुलिस गोली मार देगी।" घिघियाते हुए पाचू पांडे ने दवे स्वर में कहा। "अरे, ये तो पाचू पाड़े की आवाज लगती है। खोलो-खोलो दरवाजा।' फेकू ने कहा। "नही, नहीं, ऐमी गलती मत करना। साले खूनी लोग बड़े फरेबी 100: हादसा होते हैं। कोई आवाज वदल कर बोल रहा होगा।" मगनू ने हाथ के इशारे से मना करते हुए कहा। "तुम्हारे पैर पड़ता हूं भैया, खोल दो दरवाजा, मैं पांचू हूं।" "हरे फेकुआ, अरे पांडे जी हैं सारे, खोल खोल जल्दी ।" गोपी ने डाटते हुए कहा । पांचू पांडे को अदर करके फेकू ने फिर बिलारी चढा दी। सबकी जान मे जान लोट आई। "अरे पाड़े जी थाप कैसे आये इस कपy में?" रमजान मियां ने आश्चर्य से पूछा। "कुछ मत पूछो भया, जान बच गई बस "तुम लोगन से भेंट बदा रहा।" कराहते हुए पाडे ने कहा। "अरे रे इ का हुआ, तोहार त मुहवे फूल के टेढ होगा है । अरे नाक से खूनो वहा बा" च-च'इत ओठवो" इ देखो हो लोगन, पांडे जी का कवन हाल भइल बा''हे राम' हे राम'" इ का हो गया हो पाड़े जी तोहरे साथ।" गोपी ने आश्चर्यमिश्रित दुख से कहा । "का कहै भया "आपना भोगडड"जवन लिखा रहा उतो भोगही का न पड़ी।" कहते हुए पाड़े सुबकने लगे। "क्या कोई मोवाली-सोवाली मिल गये थे?" रमजान ने हमदर्दी से पूछा। "पुलिस, भैया पुलिस मार-मार के चोखा बनाय दिहा." उत वम ना फटल होता तो मारी डालते सब, जान से।" "पुलिस, पुलिस तो सीधे गोली मारती है कप' में । भाग्यवान हैं आप । ब्राह्मण समझ कर छोड़ दिया होगा।" रमजान मियां बोले । "अरे ई गोड़वा तनी देखो, हाय "हाय'"वनाइन यूरे वाडेन साले सब।" फेकू ने घाव सहलाते हुए कहा। खोली के सभी साथी घावों को सहला-सहलाकर हमदर्दी जतलाते रहे और पांचू पांडे रो-रोकर सव हाल बयान करते रहे। "गलती आपकी है पाई जी। जब जानते हैं कि पाहर में आग लगी है तब जान-बूझकर क्यों कूदे, आग के समुंदर मे।" रमजान ने तनिक उपा.. 14 लम से कहा।

घात: 101 - H "हम्मै क्या मालूम मैया "आह"" गाव मे कोई भोंपू तो लंगा ना है" अरे भाई रे एए' की बताई । उ त टेशन पर उतरे-तब माथा ठनका अरे बाप रे बड़ा दर्द होता आ आ । अब करीतका करी एक बार मुन में आया कि लौट चली "अरे मैया रे गोड़वा तड़क रहो बान फिर सोचा अद हीया आय ही गये तो का लौटी "किरावो भी तोनाही रहा पसि मग पानी "एक घूट पानी पिलाय देव भैया आ आ कलेजो सूख गया बाण आह।" । सब एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे । खोली मे एक बूंद पानी नहीं था। जब से कपy लगा, नल सूना था। चार दिन से पानी नही आया था चाल में। "तनिक घउवा शेंक दो भइया, बड़ा पिरात बा''आह''बाकी लोग कहां बाट हो रमजान भाई।" "क्या बतायें पांडे जी, आग भड़की तो सब अपने-अपने काम पर बाहर गये थे। रात-बिरात तक किसी तरह लुकते-छिपते यही हम पांच लोग लौट पाये । बाकी लोगों का कुछ मालूम नहीं। मुरारी तो हम लोगो की आंखों के सामने मारा गया। ठेला से कोयला लेकर आ रहा था। नाक के पास पता नहीं किसने बम मार दिया। उसकी देह चिथड़ा-चिथड़ा हो गई। देखा नही जाता था, वह हाल । बिरजूलाल बाग के पास भेलपूरी वेचते समय मारा गया। दूधवाले तिवारी जी बता रहे थे कि फकीरा को मौवाली सब घेरे थे । क्या हुआ मालूम नहीं। बाकी लोग का तो बताया ही कि कोई खैर-खबर नहीं है । जहां भी हो, खुदा खैर करे उनकी।" रमजान का गला भर आया था। "इ तो छन मे परलय हो गया बड़े मिया। इमब भया कइसे?" पांडे ने आश्चर्य से पूछा। "अब कैसे बतायें पाड़े जो । कोई हमने-आपने तो किया नहीं। पलीता लगाया किसी और ने और भुगत रहे हैं हम गरीब लोग। हम मजदूरो को दलबंदी और मजहब से क्या लेना-देना। हमारा मजहब, धर्म-ईमान तो बस दो जून की रोटी है, कि नही पाड़े जी। कोई झूठ कह रहे हैं।" "बिलकुल ठीक कहत हो भया, हम भूखन को त जो रोटी दे उहै 102: हादसा हमरा धरम । लेकिन भया, इ लुत्ती लगल कइसे?" "वही दो दलों के गुडों की लड़ाई, तस्करी, बंदरबाट और कैसे ? एक तरफ बिंदा और दूसरी तरफ काले खा। तस्करी के माल के बंटवारे को लेकर झझट हो गया, बीच मे पुलिस-फुलिस आ गई, पकड़-धकड़ शुरू हुई। पुलिस के चगुल से बचने के लिए लेस दी लुत्ती। एक तरफ से एक हिन्दू काटकर फेंक दिया, दूसरी तरफ से मुसलमान, बस कट मरी भोली जनता उनकी लाशो पर।" "त भैया, इसमें हम गरीब काहे मारल जात हैं ?" "तब कौन मारा जायेगा, सडक, फुटपाथ और खुले आकाश मे तो हम रहते है, तो मारा कोन जायेगा, घर के अन्दर वाला, या वे गुडे जिनके पास हर तरह के खतरनाक हरवा-हथियार और गोले-बारूद हैं।" "पुलिस गुडन के पकडे काहे नही भैया, जव जानता है कि कुल झगड़ा का जड़ इ गुडे हैं ?" "पकड़ेगी कसे, हफ्ता नहीं लेना है, लूट में हिस्सा नही बंटाना है। सब चोर हैं साले । अगर दगा-फसाद, चोरी-डकैती न हो तो इनका पेट कैसे भरेगा।" "हा भैया ठीक कहत हो। आजकल गांवों में इहै होत है । लेकिन बड़े मिया, नेता-फेता कुछ नही करते इमको रोकने वास्ते।" "नेता तो आग में और घी डालने का काम करते है । फूट डालकर मुगों की तरह लड़ायेगे नहीं तो वोट कैसे मिलेगा । उनका उल्लू सीधा कैसे होगा। अब देख लो वक्शो साहब का ! मौका देखकर एकाएक मुसलमानों के रहनुमा बन बैठे। पिछला चुनाव हारने के बाद चार साल पता नहीं लगा कि किम गली में गुम हो गये। अब जब चुनाव मामने है तो 'इस्लाम सतरे में है' का नारा लगाते फिर रहे हैं।" "एकर मतलब सव वदमाग हैं माले, फिर तो एह देश में हम गरोवन का रहतब नाही भया।" इतने में मामने करीम भाई की चाल से किमी औरत के गलमलाने- पिपिचाने की ऐसी बागन आई, जमे उसको हलाल किया जा रहा हो। फिर उठा-पटक करले, गिरने महराने, सीढ़ियों पर घम-धम भागने की मावा घात: 103 आती रहीं। इस दौरान वह औरत रोती-चीखती रही और बचाओ-बचाओ चिल्लाती रही। अगले कुछ ही क्षणों मे भागती हुई वह सड़क पर आ गई और बीच सड़क से चिल्लाती हुई वेतहाशा भागने लगी। उसके कपड़े तार- सार थे, बाल विखरे हुए और शरीर अस्त-व्यस्त था। भागते समय उसके पर ठीक से नही पड़े रहे थे। रह-रहकर वह लड़खड़ा जाती थी। सड़क के आमने-सामने के मकानो की खिड़कियों फटाफट खुल गई और लोग सिर निकालकर बाहर झाकने लगे! औरत सबकी तरफ हाथ जोड़-जोड़कर गुहार करती रही, जान बचाने की भीख मागती रही पर किसी का कलेजा नही पिघला । इतने में बिंदा एक और गुडे के साथ नशे में धुत पीछे से दौड़ता हुआ सड़क पर आया और हवा मे दो-तीन गोलिया दाग दी। खटाखट सबकी खिड़किया-दरवाजे बन्द हो गये। बिदा ने लपककर लड़की को पकड़ लिया और कन्धे पर लादकर वापस चाल में ले गया। लड़की हाथ-पैर पीटती रही, रोती-छटपटाती रही, जान बचाने के लिए अल्लाह और भगवान के नाम पर गुहार करती रही। अन्दर जाने के थोड़ी देर बाद ही उसकी चीखती-चिल्लाती आवाज रात की खामोशी में गुम हो गई। "च'चबड़ा जुलुम हो रहा है।" "यह करीम भाई की इकलौती बेटी है, देख रहे हो न, यही बिंदा बदमाश है, जिसने लड़की को दौड़ाकर पकड़ा । कल से ही करीम भाई का कुंछ अता-पता नहीं है। लगता है, इसने उनको भी कहीं ठिकाने लगा दिया।" "अरे रमजान भाई.''एक बात'"एक बात बतावें, जरा इधर आना "लेकिन हम्मै कुछ होगा तो नहीं"हम जब आ रहा था तो नाके के पास दो आदमी करीम भाई की चाल की ओर से ही आ रहे थे. मैं मैं डर के मारे पेड़ के पीछे छिप गया"नाके पर जो गटर है न, हुआं आकर उन दोनों ने एक आदमी की लाश निकाला और मूड़ के बल गटर में डाल दिया.. वोरा भी उप्पर से फेंक दिया। उसमें से एक तो वहीं था, जिसने लड़की को पाचू पांडे एक बार फिर सिहर उठे थे। "ऐं"क्या आप मच कह रहे हैं"तब तो मेरा सुबहा सही निकला। बिंदा की आंख बहुत दिनों से करीम भाई की चाल पर लगी है। अब इस . पकहा था।"

104:हादसा लड़की को भी किसी गटर मे डाल देगा और चाल पर कब्जा कर बैठेगा, फिर किसकी हिम्मत है, जो उसके सामने चूचा करे?" "लेकिन भया कफ्यू लगा था और बीच सड़क पर दउड़ाय के गुहा मारत हैं और पुलिस बोलता नही।" "क्या बोलेगी पुलिस । इसीलिए तो दगे करवाये जाते हैं । कपy लगाया जाता है कि बन्द दरवाजो के अन्दर लोग लूट सकें, जनता को । सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे है, गुडे पुलिस और नेता सब भोले-भाले लोगो के खून से होली खेलते हैं, अपना उल्लू सीधा करने के लिए।" "आह'अरे पेटवा मार-मार के हलुआ के दिये हैं कसाई सब ठीक । कहत हो भैया'कफ्यू लगल बा और मब्बाली सव मारत-काटत बाई, लूटत बाई। उप्पर से पुलिसो गरीबों को ही मारत बा''आह'इ कइसा कपy ।" "वही तो कह रहा हूं। कपy तो वो होता है कि सबकी हवा बन्द । खाना-पीना टट्टी-पेशाब बन्द। क्या मजाल कि कफ्यूं में एक मक्खी भी घर से बाहर निकल जाय । एक चूहा भी अपने बिल से बाहर झांक ले। कपy तो लगता था अंग्रेज बहादुर के जमाने में, जब हवा भी कापती थी, शहर में घुसने से । जिस इलाके मे एक सिपाही घूम गया, सांप सूध जाता था, वहा के लोगों को। पुलिस-दरोगा भी एकदम कड़क रहते थे। क्या मौवाली और क्या नेता, देखते ही गोली मार देते थे, लेकिन आजकल तो कफ्यूं भी नकली हो गया है, मिलावटी चीजो की तरह । सब नियम-कानून केवल हम गरीबो के वास्ते ही रह गया है। आजादी है न भैया। इसी को कहते है आजादी। कोई किसी का खून कर दे, बहू-बेटी उठा ले, घर फूक दे, गरीबो को राह चलते मार दे, दूकान लूट ले और सरेआम दिन-दहाड़े चौराहे पर गोली चला दे। आखिर क्यो न करे, वह भी तो आजाद है, सब कुछ करने के लिए। अब तो ऐसा जमाना आ गया है कि इस देश में गरीबो और शरीफो के लिए कोई जगह ही नही रह गई है । मेरी तो आखों से खून चू जाता है, कलेजा फट पड़ता है, जब इस तरह का जुलुम देखता हूँ। अब करीम भाई का ही देख लो। पिछले दगे मे उनके वेटे-बहू मारे गए थे, इस दगे मै उनका पूरा परिवार ही स्वाहा कर दिया गुंडो ने, लेकिन बोलने घात: 105 वाला कौन है।" दो दिन बाद तूफान थमने पर कप' उठ गया। मुर्दा शहर मे सासे लौटने लगी। सड़कों, बाजारो मे सुगबुगाहटे होने लगी, लेकिन लोगो के चेहरो पर दहशत और भय की छाया अभी भी स्पष्ट झलकती थी। एक बार फिर में अजनबी हो गए चेहरे एक-दूसरे को पहचानने की कोशिश करने लगे। नफरत की लपटो में झुलस गए रिश्ते फिर मे बुने जाने लगे। गरीव और मजदूर मजहब की दीवारे फादकर अपने-अपने मालिकों के यहा कामों पर आने लगे। धीरे-धीरे जीवन सामान्य होने लगा। पाचू पाहे गाव से रसीद मिया के लिए कुछ सौगात लाये थे। रसूलन भाभी ने अपने मिया के लिए सत्तू, दाना, जो की ढूढी, कच्चा आम आदि सामानो की एक पोटली पकड़ा दी थी और चलते समय गांव के बाहर काली माई के चौरा तक कुशल-हाल कहते हुए पीछे-पीछे आई थी। उनका इक- लौता बेटा रज्जन वीमार था। यह खबर भी देनी थी और रसीद भाई की अमानत भी पहुंचानी थी। रसीद मिया विस्कुट बनाने वाले करखाने मे काम करते थे। रसीद भाई से मिलने के लिए पांचू पांडे वेचैन थे। दंगे में पतामही क्या होगा। रसीद के यहा पाडे पहुचे तो वह माल देने कहीं बाहर गये थे। उनके कुछ साथी वैकरी में काम कर रहे थे। मालिक कारखाने मे ही था। उसने पाचू पांड़े का बहुत आवभगत किया, मिठाई मंगाकर पानी पिसाया, चाय-पान कराया और रसीद भाई का सामान एव समाचार ले लिया। हम दौरान उसने अपने कर्मचारियों के कानो में जहर घोल दिया कि निग इलाके से पाड़े आये हैं, वहा बिरादरी के बहुत लोग मारे गये हैं। परिश अपने आप फंसा है जाल में, लौटकर नहीं जाना चाहिए । कम-ग-यग एक कुर्बानी तो वे लोग कर ही दें, मजहब के नाम पर । कर्मचारियों में प्रयवी मच गई। कोई इसके लिए तैयार नहीं हुआ। काम छोड़कर चुपके ग मव पिछले दरवाजे से बाहर निकल गये। यह देखकर माग्निक नै र यह कान करने की सोच ली और बेकरी दिखाने के बहाने पांव पदि को अन्दर गया। इस दौरान वह उनसे मीठी-मीठी बातें करता रहा और रसीद के बीवी-बच्चो का हाल-चाल पूछता रहा । भट्टीमामा 106: हादसा . झटके से उसने पीछे हाथ लगाकर पाडे को दहकती भट्ठी मै उलट दिया और भट्ठी का मुह बन्द कर दिया। कुछ क्षणो तक तड़फड़ाने-कूदने, चीखने- चिल्लाने, घिघियाने-कराहने के बाद तेज चिरायध गंध उठने लगी। ठीक इसी समय रसोद मियां बाहर से लौट आये। तब तक मालिक दरवाजे पर आ गया था। आते ही उसने रसीद को पोटली पकड़ा दी और लडके की बीमारी की सूचना दे दी। "कौन आया था, गांव से ? कौन लाया यह सब सामान ?" "कोई पाड़े था, वाहर से ही सामान देकर चला गया, जल्दी मे था।" "नही, नही, पांचू पाड़े ऐसा नही कर सकते। मुझसे विना मिले वह जा ही नहीं सकते। किधर गए वे, कुछ कहा नहीं ? कारखाना में यह गध कैसी आ रही है, कुछ मास-वांस जलने जैसी?" रसीद मिया चकपकाये से कार- खाने के अन्दर इधर-उधर ताक-झांक करने लगे। "गंध ? कैसी गध? अच्छा, अच्छा, यह तो अडो की गंध है । कुछ अंडे सड़ गए थे, वही मैंने डाल दिया भट्ठी में।" "अंडे ? अंडे कहा थे? एक हफ्ता हुआ कारखाने मे एक अडा नहीं आया, केक बनाना बन्द हो गया। यह आप कैसी बातें कर रहे हैं। लेकिन यह चड़-चड़ भट-भटसुन-सुन करने की आवाज कैसी आ रही है." अरे यह धमाका कैसा हुआ?" रसीद भाई को शक हो गया, वह दौड़कर भट्ठी को ओर गये और जब तक मालिक उन्हे रोकता, भट्ठी का मुंह खोल दिया । अन्दर आदमी का जलता कंकाल देखकर वह एकदम भड़क उठे और वापस दौड़कर कुरेशी साहब का गिरेबान पकडकर शझोरने लगे, "सच. सच बता दो यह किसकी लाश है ? लगता है, तुम लोगो मे पाचू पाड़े को मार डाला । बाकी "बाकी लोग कहा भाग गए? मैं तुम लोगों को जिन्दा नहीं छोड़ गा, कच्चा चबा जाऊंगा। तुमने पांचू पाड़े को नहीं, मुझे जिबह कर दिया है।" वह बेतहाशा हांफने लगे थे। "रसीद भाई, मेरी बात सुनो, क्यो एक काफिर के लिए इतना दुखी हो रहे हो । तुम्हें मालूम है, उसके इलाके में हमारी विरादरी के कितने लोग मारे गए हैं ? हमने भी अल्ला को एक कुर्बानी दे दी तो क्या गुनाह कर दिया। ये लो कुछ पैसे और घर हो आओ, तुम्हारा लड़का बीमार है ।"

घात.:07 "भाड में जाओ तुम और तुम्हारी बिरादरी, लड़का मर जाये, मुझे कवूल है, लेकिन पाचू पांडे के माथ यह पात क्यों किया? मैं कौन मुंह दिखाऊगा गाव मे "" "रमीद भाई तुम तो खामखा लाल-पीले हो रहे हो । तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि हमने भी अपने मजहब के लिए कुछ किया।" "मजहब, कैसा मजहब ? क्या मजहब यही सिखाता है ? भाई, भाई का गला काट दे, नाहक एक-दूमरे का खून कर दे, किसी की वसी-बसाई गृहस्थी उजाड दे। मैं नहीं मानता ऐसे मजहब को। हमारा मजहब तो बस इनसानियत है, इनसानियत। हम गरीबो को तुम्हारी मजहब की दीवारें बाट नही सकती हैं । पाचू पाड़े हमारे बाप और सगे भाई से बढ कर थे। तुमको क्या मालूम उस गाव मे हम केवल चार पर मुसलमान हैं, लेकिन आज तक कभी बालवाका नहीं हुआ किसी का। कितने तूफान आये और चले गये, लेकिन कभी हमे किसी तरह के खतरे का एहसास तक नहीं हुआ। गैर मजहबी होने के कारण किसी ने कभी हम पर आख तक नही उठाई। हमे एक जगह जनमे, एक ही मिट्टी में खेले-खाये, एक ही आवोहवा मे पले और बड़े हुए और आज मजहब के नाम पर उसी मिट्टी के साथ, वहा के लोगों के साथ गद्दारी करे । यह मुझसे नहीं होगा। आज तुमने विश्वास का गला घोट कर हमारे वजूद को लतकारा है। हम तुम्हें माफ नहीं कर मकते । इस खून का बदला लेकर रहेगे।" "रमीद, भूलो नहीं कि तुम मेरे नौकर हो । ज्यादा बकवास करोगे तो तुम्हे भी उठाकर भट्ठी मे फेक दूगा। बडे आये हो वजूद और उसूल बघारने।" कुरेशी ने डपटकर कहा । उसको लगा, रसीद आपे से बाहर होता जा रहा है । गुस्से मे बाहर जाकर कही वात फैला दी तो अंजाम बुरा हो सकता है । उन्होने झपटकर रसीद को गले से पकडने की कोशिश की। रसीद छटककर दूर हट गये और कोयला खोदनेबाला नुकीला छड़ उठाकर कुरेशी पर वार कर दिया। दो ही छड़ में कुरेशी जमीन पर ढेर हो गये। रसीद ने उठाया और जिन्दा ही उनको भट्ठी में झोंक दिया। कुरेशी गिड- गिड़ाते रहे, मजहब की कसमें देते रहे, लेकिन रसीद ने एक नहीं सुनी। उसने भट्ठी का मुह बन्द किया और तेजी से कारखाने के बाहर निकल गया।

टिकट बाबूलाल ने दूर से देखा, दफ्तर के सामने, लोगों का मजमा जमा था। मुख्यद्वार के दोनो तरफ, खंभो के ऊपर, मजदूर सभा के झंडे हवा में लहरा रहे थे। लोगो मे काफी गहमा-गहमी और उत्तेजना थी । वावूलाल ने सोचा, शायद आज फिर यूनियन वालों को कोई मसाला मिल गया है। जब देखो तब, मामूली-सी बात पर भी ये लोग दफ्तर पर चढ़ आते है और हाय-हाय करने लगते हैं। उसके कदम तेज-तेज उठने लगे और जल्दी-जल्दी वह भीड के पास पहुंच गया । द्वार पर, वगल में एक मंच लगा था, जिस पर दरी के ऊपर सफेद चादरें बिछी थी। मंच पर कादरभाई खादी का झकाझक पायजामा कुर्ता पहने बैठे थे। उनके पास मे बूढे वैजामिन और बदलूराम भी बैठे थे । पीछे छुटभैये किस्म के तीन और नेता आसन जमाये थे । बदलू- राम के गले मे फूलो की मालाएं पड़ी थी और चेहरा गर्व से दपदप कर रहा था। उसने मोचा, शायद बदलूराम का ही कोई मामला है, क्योकि यूनियन वाले, जिसको हलाल करना होता है, उसे पहले खूब सजाते है, उछालते है, हीरो बनाते हैं और फिर आहिस्ता से नश्तर चलाकर उसके गर्म-गर्म खून में अपनी आस्तीने रंग कर नेतागिरी चमकाते हैं । लेकिन बदलूराम तो खुद यूनियन का आदमी है, कादरभाई का खासमखास और खरख्वाह । उसको क्यो बलि का बकरा बनाया जा रहा है, बाबूलाल हैरान था। एक आदमी माइक लगा रहा था, दूसरा लाउडस्पीकर के तार लंबे करके भोपू फिट कर रहा था। मंच के चारो कोनो पर यूनियन के छोटे-छोटे झडे लहरा रहे थे। दफ्तर आने वाले वा लोग हाथ में खाने का डिब्बा और झोला दवाए उत्सुकता से मुंह उठाए, एक-दूमरे से धरने का कारण जानने की कोशिश कर रहे थे। माइक फिट कर लेने पर एक गिट्ठा-सा आदमी फुदक कर मंच टिकट: 109 पर चढ़ गया और "हैलो "हैलो'"टेस्टिग "टैस्टिगवन, टू, श्री, फोर, फाइव फाइव, फोर, श्री, टू, वन टेस्टिग टैस्टिग" बोलने लगा । माइक फिट हो जाने पर स्वयंवर में विजयी योद्धा की तरह कादरभाई हुमक कर उठे, मुंह में घुला पान का पीक, गर्दन झटकते हुए मंच के नीचे फच्च से यूका और दोनों हाथ जोड़कर झुक झुककर भोड़ का अभिवादन किया। आगे आकर उन्होंने तर्जनो से माइक के मुह पर दो बार खट-खट ठोंका और हवा मे हाथ-पैर झटकते हुए, जैसे लडने की मुद्रा में तैयार हो गये। "इनक्ला "आ आ . व जिन्दावा "आ"आ "द मजदूर एकता""आ"आ"आ जिन्दाबा आ "आ"द जो हमने टकराएगा"आ आ चूर-चूर हो जाएगा 'आ आ हर जोर जुलुम के फदे में ए.''एं एं सघर्प हमारा नारा है ऐ ऐ ऐ" भीड़ की गड़गड़ाहट से प्रशासन भवन थर्रा उठा। साथियो, देश आजाद हुआ, लोग आबाद और खुशहाल हुए लेकिन हम गुलाम के गुलाम और कगाल के कंगाल ही बने रहे । मैं आपसे पूछना चाहता हू, क्या आपने अपनी जिंदगी में कभी, कही, कोई आजादी और खुशहाली नाम की चीज देखी, उसका स्वाद चखा, जाना, छूआ, महसूसा या भोगा है । अरे वही रेले, वही पटरिया, वही इजन, वही डिब्बे, वही छक्छक, वही धकधक, वही चाबुक, वही कोडे । हम तागे के घोड़ो की तरह तब भी भागते रहे और अब भी भागते हैं । इन रेलगाड़ियों को चलाने मे, इंजनों को दौड़ाने में बूद-बूंद खून सूखता जाता है, कतरा-कतरा मास चुकता जाता है, हड्डिया घिस जाती है, खाले छिल जाती है, पर हम सी तक नहीं कर पाते हैं और इन आला अफसरो की चाबुको को फटकार के डर से चौबीसो घटे बस दौड़ते ही रहते हैं, भागते ही जाते है । रात हो या दिन, सर्दी हो या गर्मी, आधी हो या तूफान, जंगल हो या पहाड़, नदी हो या कछार, नाग-पानी के - 110 : हादमा फोलादी तूफान को अपनी हथेलियों में संजोये बस हम भागते ही रहते है। करोडो लोगों को अपनी पीठों पर लादकर देश के एक कोने से दूसरे कोने तक ढोते हैं, पर बदले में हमे मिलता क्या है, मुखमरी, कंगाली, दुतकार और फटकार । अंग्रेज चले गए पर हमारी छाती पर मूग दलने के लिए अपनी औलाद पीछे छोड गये। वही जी० एम०, यही सी० एम० ई०, वही सी० पी० ओ०, वही सी० एस० ओ० की फौजें आज भी हमारे सिर पर इंडे भाजने के लिए बैठी हैं । मैं पूछता हू, आज इनकी क्या जरूरत है।" हा-हा-हा "हां जरूरत है हमारा सून चूमने के लिए, हमारे सिर पर डडे बरसाने के लिए और और कमीशन पाने के लिए, जनता को बेवकूफ बनाने के लिए, देश को लूटने-खसोटने के लिए इनकी बहुत जरूरत है । और साथियो, जब हम इनको लूट को पकडते है, इनके खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो हमें फुटबाल के गेंद की तरह लतियाया जाता है, कूड़े-कचरे की तरह झाडकर कूडेदान में फेंक दिया जाता है या कोई मनगढंत चार्ज लगाकर हमारे पेट पर झाड़ फेर दिया जाता है। "आज यह बदलूराम के साथ हुआ है, कल आपके साथ होगा,परसो हम सबके साथ होगा। तो भाइयो, मैं पूछता हूं कि कब तक, आखिर कब तक हम यह जलालत की जिंदगी जीते रहेगे । इसलिए मैं आज आप सबमे अपील करता हूँ कि जागो, उठो, अपने हक और ताकत को पहचानो। अब हम यह अत्याचार और अधिक नही सह सकते 'बहुत "बस बहुत हो चुका अब।" इतने में भीड़ से कोई चीख पड़ा- "कादरभाई.."ई...ई.."ई। जिदाबा"या"आ"द मजदूर एकता"आ"आ"आ जिंदाबाद''आ'"आ"आ 'द" कादरभाई के भाषण में जादू होता है । उनके गले में इतना जोश, वाणी में ओज और स्वर मे लोच है कि जो एक बार सुन लेता है, उनका मुरीद हो जाता है । लच्छेदार भाषा और लचर लहजे में वह उल्टी बात को भी इस तरह पेश करते हैं कि एकदम सीधी और सच्ची लगती है । जोड़-तोड में तो उनका शानी नही । अपनी इसी कला के कारण वह पिछले पद्रह वर्षों टिकट: 111 से संगठन में एकछत्र राज कर रहे हैं । जो उनको खुश कर दिया, उसका उल्टा-सीधा, गलत-सही, चाहे जैसा भी काम हो, अधिकारियो की छाती पर चढकर करवा देते हैं, कादरभाई। बाबूलाल ताड़ गया कि बस-वस बदलूराम के तबादले को लेकर ही यह मोर्चालगाया गया है । वह मन-ही-मन कादरभाई को धिक्कारने लगा। उसी कार्यालय में एक ही छत के नीचे, एक टेबुल से दूसरे टेबुल पर बदल देना भी कोई तबादला होता है, पर चूंकि सवाल बदलूराम का है, इसलिए कादरभाई इतना गला फाड़ रहे है । बदलूराम उसी के सेक्शन मै काम करता है । उसे सबसे महत्वपूर्ण भर्ती की सीट मिली हुई है। मुंह में पान दवाए, सूट-सफारी डाले वह दिन-भर कैन्टीन या बाहर सामने सडक पर बनी खोखेनुमा दुकानों में जाल फैलाये, शिकार की तलाश मे, घूमता रहता है और बिना कुछ लिए-दिए कोई केस आगे बढाता ही नहीं । अगर किसी मामले में कोई दबाव या ऊपर की पैरवी आई तो उस केस को यूनियन के हाथ पकड़ा देता है और फिर कादरभाई दफ्तर के सामने हाय-हाय शुरु कर देते हैं । वह तो खुल्लम-खुल्ला कहता है कि जब पूरी रेल पहियों पर चलती है तो कागज-फाइल पंदल कैसे चलेंगे । कागज में चांदी का पहिया लगाओ और मनचाही जगह पहुच जाओ। अभी-अभी हुई खलासियों की भर्ती में उसने पचासो हजार का वारा-न्यारा किया है, लेकिन इस बार उसकी गोंटी फंस गई। नये रेल प्रबंधक बहुत सख्त आदमी निकले, एकदम नियम कानून के पक्के । जब से आये हैं, यूनियन वालों की नाको मे पानी भर रखा है । सोर्स, सिफारिश और खाने-खिलाने वालों से तो बात तक नहीं करते । खलासियों की भर्ती के मामले को लेकर उन्होंने बदलूराम का तबादला पेंशन सेक्शन में कर दिया और उसके खिलाफ जाच का आदेश भी दे दिया। अब आयेगा मजा बच्चू को। बहुत लूटा-खाया है लोगों को। बाबूलाल मन-ही मन खुश हो रहा था। बदलूराम कादरभाई का खास आदमी है, इसीलिए कोई अधिकारी उस पर हाथ डालने में डरता है । कादरभाई अपने चमचों को चुन-- सभी मौके की जगहो पर रखवाये है। ताकि तरी का निर्रा भी बना • लोग उसके आगे-पीछे दुम भी हिलाते रहें। लेकिन आज 112: हादसा परेशान है । नपे माह मिमी तरह हाय ही नही रचने देते हैं। फादरमाई ने इस मुद्दे पर मरने-मारने की ठान ली। अगर उनका धमया पिट गया तो सारी नेतागिरी हवा हो जायेगी। मी पीच रेल प्रबंधक को गाही दानर को और माती दिखाई दी। फादरमाई ये इशारे पर भीड कनकना कर मजग हो गई। इनस्ताव जिंदाबाद के नारो से दिशाएं गूंज उठी। कादरभाई के पी पीच भीड़ हया मे भुजाएं उछाल-उछाल कर नारे सगाने लगी। गाड़ी द्वार के पास पहुचते ही उतेजित भीड़ ने उसे घेर लिया। फादरमाई मंच से आग उगलने लगे। आवेश में भीड ने रेल प्रबंधक को गाडी से बाहर पींच लिया और धनियाने. मुकियाने लगी। रेल प्रबंधक ठग रह गये । क्षण-भर के लिए वह मोच नही पाये कि यह मब हो गया रहा है। अपने-आपको मंभालते हुए हाय उठा. उठाकर भीड़ को ममझाने की यह नाकाम कोशिश करने लगे, लेकिन भीड तो भीड़ होती है, न उसको सुनने के लिए कान होते हैं. न देखने के लिए आखें और न ही सोचने के लिए दिमाग । उमाकान, आय, दिमाग तो नेता के पाम होते हैं। घोडी देर में भीड को उत्तेजना जव शात हुई तो कादर भाई के आदेश पर बड़े साहब को गोचकर जमीन पर धूल में बैठा दिया गया । मच से एक-एक करके नेताओ का भापण जारी था। पीछे खड़े बाबू- लाल ने मन-ही-मन कहा, 'यह सरासर दादागीरी है, निरी गुडागर्दी। ऐसा करने का कादरभाई को कोई अधिकार नही है। बड़े साहब को फोर्स बुला• कर भुनवा देना चाहिए, इन गुंडों को ठरठर'ठायं."ठायं ।' उसे उनकी हालत पर तरस आ रहा था। मल, मई का महीना था। दस बजते-बजते तेज पछिवा हवा गर्म लूए चलने लगी। धूल का लुक्कड उठने लगा। रह-रहकर तेज बवहर के साथ सड़क की गन्दगी, कचरा, रद्दी, जूठे पत्ते उड-उडकर रेल प्रबन्धक के सिर पर पड़ने लगे। शरीर पसीने से लथपथ हो गया । खोपड़ी सुलगने लगी और आखें मिचमिचा आई। खल्वाट सिर पर लावा फूटने लगा। गर्मी और प्याम के मारे वह हाफने लगे। उन्होने इशारे से पानी मांगा। थोडी देर में खौलते पानी का एक गिलास उनके सामने रख दिया गया। वह तिल- मिलाकर रह गये। उधर मव से कादर का विपवमन जारी था। वह के साथ ।

टिकट: 113 उंगलियों से नीबू का आकार बनाकर, भीड को समझा रहे थे, "आपने नीबू तो देखा होगा, कितना चिकना और खूबसूरत होता है देखने में, लेकिन क्या बिना काटे रस देता है। उसी तरह ये रेल के अफसरान भी चिकने और गोल-मटोल होते हैं। जब तक इन्हें नींबू की तरह काटकर निचोडा नहीं जायेगा, रस नहीं निकलेगा।" अधिकारी लोग पिछले दरवाजे से दफ्तर आ गये थे और अपने-अपने कमरों की खिडकिया खोल-खोलकर तमाशा देख रहे थे। कुछ अधिकारी मन-ही-मन खुश हो रहे थे। जव से आया है साला, नीद हराम कर रखी है। जो हो रहा है, बहुत अच्छा हो रहा है। थोडी और पडनी चाहिए । अक्ल ठिकाने लग जायेगी बच्चू की। कुछ अधिकारी, जो यूनियन का जलवा झेल चुके थे, आतंकित थे और बडे साहव की हालत पर अश-अश कर रहे थे। बडे माहब को कोई रास्ता नही सूझ रहा था। इस विषय में कादर भाई पहले कई बार उनसे मिल चुके थे। हर बार उन्होने फटकार दिया था। अंत में उन्हे टूटना पडा। धरना खत्म करने पर अंदर बुलाकर कादर भाई से बात करने का उन्होने प्रस्ताव रखा। कादरभाई का तुर्रा और चढ गया। उन्होंने प्रस्ताव ठुकरा दिया और यहीं, मौके पर बदलूराम का आदेश रद्द करने की मांग की। हार कर बड़े साहब ने कार्मिक अधिकारी को बुलवा कर वही आदेश रद्द करवाया। घेराव विजय-जुलूस में बदल गया। लोगो ने दौडकर बदलूराम को कंधो पर उठा लिया और कादरभाई को जय-जयकार करते हुए सडको पर निकल पड़े। बाबूलाल का मनोबल टूट गया। वह पराजित महसूम करने लगा। सरेआम चोरी, घूसखोरी और गुण्डागर्दी की जीत ने उसे झकझोरकर रस दिया। टूटा बाबूलाल बगलें झाकने लगा। अब तक वह वफादार और निष्ठावान कर्मचारी की तरह रोज सुबह नौ बजे दफ्तर पहुच जाता था और दिन-भर अपनी कुर्मी से हिल नहीं पाता था। फाइलो मे सिर गहा माया चकरा जाता था, बाय चुधिया जाती थी। ऊपर मे कामिक अधिकारी दिन-भर पलीता लगाये रहता था और जरा-जरा-सी गलती पर सड़क देता था या मेमो पकड़ा देता था। जो तनस्वाह मिलती थी, उसमे महीने- 114:हादसा भर की रोटी भी नहीं चल पाती थी। हर महीने में कतरब्योंत करनी पड़ती थी। एक पट और एक कमीज थी, जिसे शाम को धोकर सुबह पहन लेता या। पेट की नीचे की मोहरी कट गई थी। जूते का तल्ला घिस कर फट गया था और चलते समय ढेर सारी घूल अंदर भर जाती थी। कितने दिनो से सोच रहा था, पत्नी को एक अच्छी-सी साड़ी खरीद दे, कही आने-जाने लायक, पर जुगाड़ नहीं बैठ रहा था। घर मे पिताजी की भी मांग आती रहती थी, सो अलग। तनख्वाह का मोटा हिस्सा तो मकान-मालिक ले लेता था। वडी कोशिश की कि सरकारी मकान ही मिल जाय, पर नेताओ और उनके चमचों के आगे उसकी दाल नही गल पाई। दूसरी तरफ बदलूराम, उससे जूनियर है, शिक्षा-दीक्षा और अनुभव मे भी कम। काम एक टके का नहीं करता। दिन-भर हरामखोरी करता फिरता है। अधिकारियों को ठेगे पर रखता है। फिर भी उसके पास सरकारी मकान, स्कूटर, रंगीन टी० बी०, सोफासेट और जीवन की सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं। सूट- सफारी से नीचे वह उतरता ही नहीं। जेबें नोटो से हर समय भरी रहती हैं और दस-पांच आदमी हमेशा आगे-पीछे घूमा करते हैं। भ्रष्ट बदलू के खिलाफ कार्रवाई से उसका कलेजा ठंडा जरूर हुआ था और मन-ही-मन सोचकर वह प्रसन्न हो रहा था कि बुरे काम का बुरा ही नतीजा होता है। चोरी एक-न-एक दिन पकड़ी ही जाती है, वहां देर है, अंधेर नही । लेकिन आज की घटना ने उसके अंदर जैसे लुत्ती लेस दी। वह सोचने लगा, क्या वह भी बदलूराम नहीं बन सकता, नेता नहीं हो सकता, कादरभाई से दोस्ती नहीं गांठ सकता । उसमें क्या कमी है । इन सबसे अधिक पढा-लिखा है, अच्छा बोल सकता है, अच्छी तरह संगठन चला सकता है, चुनाव जीत सकता है, फिर क्यों वह यह अभाव और जलालत की जिन्दगी जी रहा है । वह भी क्यों नहीं यूनियन में शामिल हो जाता, नेता बन जाता और फिर खुलेआम बदलूराम की तरह हेराफेरी करके मौज-मस्ती की शान से जिंदगी जीता। सोचते हुए वह अपनी सीट पर पहुंचा ही था कि कामिक अधिकारी ने, लेट आने के लिए, बुलाकर झाड़ दिया। जुलूस के बाद बदलूराम सेक्शन मे वापस लौटा तो अभी भी भीड़ के पीछे लगी थी। यहां भी विजय की खुशी में दावतें दी गई, लड्डू टिकट : 115 बांटे गये, मेजें थपथपा कर खुशियां जाहिर की गई और बदलूराम को माला पहनायी गयी । वह गुमसुम अपनी कुर्सी पर बैठा सब देखता रहा, भीड़ छंटने पर उसने भी जाकर बदलूराम को बधाई दी। सेक्शन में अपने काम से काम रखने वाले बाबूलाल जैसे पामड़बाबू मे यह परिवर्तन बदलूराम को क्षण- भर के लिए अटपटा लगा। मन-ही-मन खुश होते हुए उसने चहक कर बाबूलाल का स्वागत किया और हाथ पकड़कर कटीन ले गया। चाय-पानी के दौरान बाबूलाल ने अपने दिल की बात कह दी। बदलूराम की खुशी का ठिकाना नहीं था। ऐसे पढ़े-लिखे लोगों की उसकी यूनियन मे कमी थी। वह केटीन से बाबूलाल को सीधे कादरभाई के पास यूनियन के दफ्तर ले गया। कादरभाई ने गर्मजोशी से उसका स्वागत किया। उस दिन के बाद बाबूलाल का अधिक समय कादरभाई के साथ संगठन के काम मे बीतने लगा। दफ्तर मे वह बदलूराम के नक्शे कदम पर चलने लगा। अब बाबूलाल पहले वाला दब्बू और आज्ञाकारी बाबूलाल नही रह गया। उसके अन्दर एक खूखार और ढीठ आदमी उभरने लगा, जिसके नाखून बघनखो जैसे तेज थे, बदन के रोयें बछों जैसे नुकीले तन गये थे, आखों मे अगारे सुलगने लगे थे और आवाज मे शेर-जैसी दहाड़ आ गई थी। उधर बडे साहब इस घटना से तिलमिला उठे थे। दफ्तर में आने के वाद वह बेचनी से कमरे मे चक्कर तगाते रहे । इतनी लंबी नौकरी में उन्हें इस तरह से थूककर चाटना नहीं पड़ा था। उन्हें डर था कि अगर ऊपर के अधिकारियों को मालूम हो गया तो अयोग्य करार देकर ऐसी पटखनी देंगे कि सड़ जायेंगे किसी कोने में पड़े-पडे। इस दौरान उनके चेहरे की रंगत पढने के लिए अधिकारी उनके कमरे मे आते-जाते रहे, पर वह गंभीर बने रहे। उन्हे शक था कि इस पड्यंत्र मे इन अधिकारियो का भी हाथ हो सकता है। शायद सब मिलकर उन्हें उखाड़ना चाहते है। उन्होंने निश्चय किया कि जोड़-तोड और कल-बल-छल से एक-एक करके इनसे निपटना ठीक रहेगा। मन-ही-मन उन्होंने व्यूह रचना तयार कर ली और अघोषित युद्ध शुरू कर दिया। कादरभाई के पंख कुतरने के लिए उन्होने बदलूराम को बढावा देने का निश्चय किया। कुछ दिन बाद बदलूराम को अकेले उन्होंने अपने कमरे .

116: हादसा - में वुलवाया। आने पर उठकर तपाक से हाथ मिलाया, चाय पिलाई और बातचीत के दौरान कह दिया कि अपनी समस्या लेकर उसे स्वय उनके पास आना चाहिए था। वह आदेश रद्द कर दिये होते । ऐसी मामूली बात के लिए दूसरों के हाथ की कठपुतली बनने की क्या जरूरत थी। वह उमे अच्छी तरह जानते हैं। असल में आधुनिक प्रबन्ध मे उस जैसे पढे-लिखे और प्रगतिशील विचारो वाले मजदूर नेताओं की आवश्यकता है। कादर भाई जैसे दकियानूसी और पुरातनवादी नेताओ से आज कल के मजदूरों के हितों की रक्षा नही हो सकती। आज नये प्रवन्ध और नई व्यवस्था के अन्तर्गत सब कुछ बडी तेजी से बदल रहा है । जमाना इक्कीसवी सदी में जा रहा है। मजदूर सगठनों और नेताओं में भी समय के अनुसार बदलाव आना चाहिए । यूनियन का नेतृत्व उसके जैसे शिक्षित नौजवानों को करना चाहिए । चलते-चलते उन्होने सकेत कर दिया कि भविष्य में कर्मचारियों के किसी भी मामले को लेकर वह सीधे उनके पास आ सकता है। कादरभाई को बीच में लाने की कोई आवश्यकता नहीं है। बड़े साहव की बातों का बदलूराम पर जादुई असर हुआ। उनके कमरे में निकला तो उसका पर सातवें आसमान पर पड़ रहा था। कादरभाई उसके सामने बोना नजर आ रहे थे । उसके बाद मजदूरों का जो काम लेकर वह बड़े साहब 'के पास गया, उन्होंने कर दिया। उमको साख और लोक- प्रियता बढ़ने लगी। दूसरी तरफ कादरभाई जिस काम मे हाथ डालते, वही उल्टा हो जाता। छोटे-मोटे और मही काम भी वह नही करवा पाते थे। धीरे-धीरे लोग उनका साथ छोडने लगे और बदलूराम के इर्द-गिर्द मंडराने लगे। कादरभाई को बदलूराम का यह बदलाव अटपटा लगा। कई बार इसको लेकर तू-तू मैं-मैं भी हो गई। उनको अपने पैरों-तले में जमीन खिसकती नजर आने लगी। कादरभाई अन्दर-ही-अन्दर बदलूराम को काटने की योजना बनाने लगे और उसकी जगह बाबूलाल को बढावा देने लगे। इधर बडे साहब की मेहरबानी से बदलूराम की गुड्डी चटती गई। वह मजदूर सभा का मडल सेक्रेटरी बनने का स्वाव देखने लगा, लेकिन कादरभाई रास्ते मे रोडा थे। जब तक कादरभाई बीच मे हटते नहीं, उसका मार्ग प्रशस्त नही हो सकता। वह कादरभाई को हटाने को - टिकट : 117 ताक में लग गया। दोनों में उठा-पटक का शीतयुद्ध शुरू हो गया। बड़े साब खुश थे। संगठन का चुनाव समीप था। टिकट को लेकर कादरभाई और बदलूराम में गुत्थमगुत्थी शुरू हो गई। कादरभाई एक निशाने से दो शिकार करना चाहते थे। शाखा मंत्री का टिकट बाबूलाल को देकर, बदलूराम का वह पत्ता साफ कर देना चाहते थे और बाबूलाल को अपना आदमी भी बना लेना चाहते थे। उधर बदलूराम कादरभाई को रास्ते से हटाकर स्वय मंडल सेक्रेटरी बनना चाहता था और बाबूलाल के भी पंख कुतर देना चाहता था। बाबूलाल टिकट के लिए कादरभाई के तलुए चाट रहा था। कादरभाई ने टिकट देने का वायदा भी कर दिया था। कादरभाई के अहसान से वह दब गया था। उसने उनको खुश करने के लिए अपने घर पर दावत दी । उसका लक्ष्य तो टिकट लेना था, जिसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार था। दावत मे मुर्ग-मुसल्लम के साथ बाबूलाल ने पीने-पिलाने का भी इतजाम किया था। शाम को आठ बजे के करीव कादरमाई के आते ही बोतल खुल गई और भुने मास के साथ जाम छलकने लगा। बाबूलाल ने कभी शराब छुई तक नहीं थी। दूसरे पेग मे ही उसको चढ़ने लगी। लेकिन कादरभाई का साथ देने के लिए वह पेग पर पेग चढ़ाता गया। जाम के बाद जब वह खाने पर बैठा तो होशोहवास गुम हो चुका था। नशे मे शरीर लरजने लगा था। वेहोशी के आलम मे वह इतना खो गया कि वही थाली मे ही अललल उल्टी करने लगा। अन्दर की सारी शराब, मुर्गा, चावल, रोटी के टुकड़े फर्श पर चारो तरफ बिखर गये । उल्टी करते-करते बाबूलाल लोट- पोट हो गया। के मे उसका शरीर सन गया। कपड़े लथपथ हो गये । कादर भाई अपनी थाली छोड़कर उठ गये । उसकी पत्नी ने तत्काल कादरभाई के लिए कमरे मे फिर से दूसरी थाली लगाई। याने के दौरान कादरभाई उसकी पत्नी से हंसी-मजाक करते रहे और चुटकिया लेते रहे। इसे औप- चारिकता समझकर बीना हस-हसकर जवाब देती रही, लेकिन कादरभाई की आखो की चमक देखकर वह सहम जाती थी। उनकी नशीली आखों में किसी वहशी जानवर का खूखार चेहरा झलक रहा था। भोजन के बाद । । ।

118: हादसा - हाथ-मुह धोकर जाने के बजाय कादरभाई उसी कमरे मे बैठ गये। वीना ने सोचा शायद दस-पाच मिनट में चले जाये। ज्यो ही वह पान का बीड़ा लेकर उनके पास गई, वह अपने पर उतर आए और लपक कर दरवाजे की कुडी अदर से चढा दी । वह प्रतिरोध करती रही, हाथ-पैर पीटती रही पर बदर के पजे में गिरफ्तार बुलबुल की तरह फड़फडाकर रह गई । बन्द कमरे में बर्बर कसाई ने अमहाय गऊ को हलाल कर दिया। भोर में करीब तीन बजे के लगभग जब ठंड लगने लगी तो बाबू- लाल का नशा टूटा। अपने आपको ऐसी हालत में देखकर वह हैरान रह गया । पूरे शरीर और कपड़ो से के की बू आ रही थी । उसकी समझ मे नहीं आया कि यह सब हो कैसे गया। वह हडबड़ाकर उठा, बाथरूम गया, कपड़े बदले और बाहर निकलकर देखा तो आगन का दरवाजा खुला था। दोनो कमरो के दरवाजे भी खुले हुए थे। पलंग पर पत्नी औंधे मुह पड़ी थी। उसे पत्नी पर गुस्सा आ गया । इसने जगाया तक नहीं। पता नहीं कादरभाई खाना खाकर गए या वैसे ही वेचारे भूखे पेट लौट गये । वह पत्नी के पास जाकर झिंझोड कर जगाने लगा। बीना को रात-भर नीद नही आई थी। पलंग पर पडी-पडी वह अपनी लुटी अस्मत पर बिलखती रही थी। अभी भी वह जगी हुई थी, लेकिन मारे क्षोभ और ग्लानि के कुछ बोल नही रही थी। बाबूलाल पत्नी को झकझोरता रहा, आवाज देता रहा, उसके हाथ, पैर, सिर पकड़कर हिलाता रहा, पर वह आखें बन्द किए मुर्दे की तरह निर्जीव पड़ी रही। तंग आकर उसने कमीनी, जाहिल, गंवार, मूर्ख, अनपढ़ सब कुछ कह डाला पर वीना में कोई हरकत नहीं हुई। रह-रहकर बाबूलाल को एक ही चिन्ता खाए जा रही थी कि यदि कादरभाई नाराज होकर चले गये होंगे तो टिकट नहीं मिलेगा। किसी भी तरह जब बीना में कोई हरकत नहीं हुई तो मारे क्रोध में उसने पलग उलट दी। वीना जमीन पर लुढक गई लेकिन फिर भी उसमे कोई हरकत नहीं हुई। औधे मुह वह पसरी पड़ी रही। उसने एक बाल्टी पानी लाकर उसके सिर पर उड़ेल दिया, फिर भी उसने सी तक नहीं की। वाबूलाल का पारा और बढ़ गया। तड़-तड़-तड़ चार-पांच झापड़ उसने पत्नी के मुंह पर अड़ दिये और सिर के बाल पकड़ mon । । कर, कमरे में कई चक्कर घमीट कर लात-घूसों से हरा बना दिया और तैश में पैर पटकता हुआ दूसरे कमरे मे जाकर सो गाICTs- एक दिन, दो दिन, तीन दिन बीत गये। बीना ऊपर से गुमसुम बर्न रही लेकिन अन्दर ही अन्दर सुलगती रहीं। उसके अन्दर ऐसी आग लग थी, जो न धुआ छोड़ती थी न लपटें उगलती थोपरे वह जलकर खाक हुर जा रही थी। दिल हाहाकार कर रहा था। जब तक भाडय कादर के बोटी-बोटी नही नोच लेगी, मन को चैन नही मिलेगा। उसकी विचित हालत देखकर बाबूलाल को लगा, शायद उसके शराब पीने से वह कह अन्दर तक बहुत आहत हो गई है। उस रात उसने जो मारपीट की थं उसके लिए भी वह शर्मिन्दा था। भूखी-प्यासी पत्नी का उदास चेहरा देख कर उसका जी भर आया। दिल पिघल उठा। उसे अपने व्यवहार प पश्चात्ताप होने लगा। पत्नी को उसने वाहो में भर लिया और रंधे गले माफी मागने लगा। पति का प्यार-भरा स्पर्श पाकर बीना का बाध टूट गय और अन्दर की आग भाप बनकर फूट पड़ी। काफी देर तक पति के सी में मुंह छिपाए वह सिसकती-हिचकती रही। दिल का बोझ कुछ हलका गया पर कंठ के स्वर अभी भी पता नहीं किस कुएं मे डूबे थे । बाबूलाल : भावुक हो उठा। उसने वायदा किया कि अब वह कभी भी शराव ना पियेगा और न ही शरावियों की सगत करेगा। बीती हुई घटना को ए हादसा समझकर वीना भूल जाना चाहती थी। इस सम्बन्ध मे उसने पा को आभास तक नहीं होने दिया। धीरे-धीरे सब सामान्य हो गया। इ वीच वह पति को चुनाव लड़ने और नेतागिरी करने से वरजती रही औ कसमे देती रही। पर बाबूलाल चुनाव लड़ने पर आमादा था। कादरभा का जब से साथ पकड़ा था, उसकी पूछ बढ़ गई थी। दस-पाच आदमी मर पोछे घूमने लगे थे । बदली हुई जिन्दगी उसे काफी चटपटी और रसद लग रही थी। काम-धन्धा टके का नही, बस जबान चलाओ और मो उहाओ। कादरभाई बाबूलाल से खुश थे। टिकट बाटने के लिए संगटन की मडल समिति की बैठक होने वाली पी। बाबूलाल ने इस मौके पर एक बार फिर कादरमाई को घर पर बुलाया। बदलूराम के बढ़ते प्रभाव से दाबूलाल 120: हादसा आतकित था और उसे नाखुश नहीं करना चाहता था। इस बार वह उसे भी बुलाना चाहता था, पर कादरभाई कहने की हिम्मत नहीं पड़ रही: थी। घुमा-फिराकर जब उसने अपनी बात कही तो एक बार तो कादरभाई: भड़क उठे, पर तुरन्त ही कुछ सोचते हुए बोले, "ठीक-ठीक है, बुला लो उसको भी । अपना ही यार है।" उन्होने सोचा वही पीने-पिलाने के दौरान कुछ दे देगे। साला कटाल कट जायेगा। फसे-फसायेगा तो बाबूलाल । वह तो टगरी झाड़कर निकल जायेगे। इससे अच्छा मौका नहीं आयेगा । ठीक समय पर दोनो आ गये। न चाहते हुए भी बीना को सव तैयारी करनी पड़ी। पीने-पिलाने के बाद खाना शुरू हुआ। उस दिन की तरह आज भी बाबूलाल को चढ़ गई था । दो-चार कौर खाने के बाद ही वह टन्न बोल गया और वही चटाई पर लुढ़क गया। बीना सन्न रह गई । उसके मन में चोर कूदने लगा कि कही जान-बूझकर तो इन्होने नाटक नहीं किया है । क्या टिकट के लिए वह इतना गिर गये है ? क्या इसीलिए आज फिर इस राक्षस को बुलाया है ? उसने मन-ही-मन गन लिया कि चाहे कुछ भी हो, उनकी नेतागीरी रहे या जाये, टिकट मिले या न मिले, अगर आज इस म्लेच्छ ने बदतमीजी की तो चौरकर रख देगी। इस जलालत-भरी जिंदगी से तो मर जाना बेहतर है, लेकिन बदलूराम के रहने से उसने सोचा, शायद आज बदतमीजी पर न उतरे। खाना खाते समय, उस दिन की तरह, आज भी कादर ने बोली-ठोली शुरू की पर वीना ठडी बनी रही। बीना का वदला रुख देखकर कादर ने सोचा, शायद बदलूराम के रहने स शरमा रही है। देहाती है न । दो-चार बार आने-जाने से खुल जायेगी। अगुलिया चाट-चाटकर वह एक-एक चीज की तारीफ करते रहे और बेबात को बात छेड़कर चुहुलबाजी करते रहे, पर बीना आंचल समेटे, नजरें झुकाए सिकुड़ी-सिमटी रही। उसके अदर की आग फिर सुलगने लगी थी। बदलूराम कादरमाई को हरकती से पूरी तरह वाकिफ था। इससे पहले कई जगहो पर दोनों एक ही पाली में खा चुके थे। बदलूराम ने सोचा, यह अच्छा मौका ज्यो हो कादरभाई दरवाजा बन्द करें, बाबूलाल को भड़का कर यही खत्म करवा दिया जाय । एक ही गोली टिकट: 121 में दोनो शिकार हो जायेंगे। खाना खत्म करके नशे में धुत्त कादरभाई उसी दिन की तरह कमरे में जाकर बैठ गये । खरिका ढूंढने के बहाने वदलूराम आंगन से बाहर निकल गया । बीना दूसरे कमरे में चली गई। कुछ क्षण इतजार के बाद कादरभाई ने उसके कमरे में घुसकर सिटकनी लगा दी और बीना पर टूट पड़े। बीना पहले से सजग थी। उसने कड़ा प्रतिरोध किया। हाथा-पाई और उठा-पटक होने लगी। बदलूराम लपककर अन्दर आ गया। बाबूलाल को उसने झकझोर कर उठाया और कमरे की ओर इशारा कर दिया । बाबूलाल का खून खौल उठा । क्रोध से वह पागल हो गया । बदलूराम ने जेब से पिस्तौल निकाली और वाबूलाल को पकड़ा दी। जब से कादरभाई से अन्दर-अन्दर चलने लगी थी, तभी से वह बराबर अपने पास हथियार रखता था। उबलता बाबूलाल दौड़कर दरवाजा पीटने लगा। कादरभाई सहम गये। उनको इसकी उम्मीद नहीं थी। दरवाजा खोलकर, बात बनाते हुए, ज्यो ही उन्होने एक कदम बाहर रखा, 'धाय' की आवाज साथ गोली उनके सीने से पार हो गई और फटे पेड़ की तरह कादरभाई दह गये ।

नाद उन्नाडक पर आ गया, तब रसूलन वी ने पर रिक्शे की पहिया हच-हव, सच- चर-हचर हिल रहा था। पेट में हड़बड़ी गली से निकलकर जब रिक्शा रिक्शे वाले पर रमूलन वी का मिजाज राहत की सांस ली । गली के खड़जे गया, उतरकर पैदल ही चली जाय । खच कर रही थी, जिमसे पूरा बदन ह ायेगी। ये मुहझौमे रिक्शेवाले भी बड़े उठने लगी और जी मितलाने लगा। मल गई, तो अफलातून बन जाते है। झुमला उठा । एक बार तो मन में हुए कहा, "भैया, रिक्शा जरा धीमे कही दर्द बढ़ गया तो फजीहत हो ज रेक्शेवाले ने पीछे मुडकर उसके बगल सिरफिरे होते है। जनानी सवारी रो से देखा और मुस्करा दिया। रसूलन सड़क पर आकर उसने गिड़गिड़ाते सफगा लगता है, हरामी। हांकना । तबीयत कुछ नासाज..."। की गजी पहने, गले मे लाल रूमाल में बैठी रेहाना की ओर भेदभरी नजो काला गडा लपेटे लफू अपने आपको बी तिलमिला उठी । परले दर्जे का मझ रहा था। सिर पर ढेर सारा तेल छोट की लुंगी और कालीघाट काढ रखी था। रिक्शा भी लकलक बांधे और दाहिने हाथ की कलाई में ली था, वह । सड़क मिलते ही वह पखेरू किसी फिल्मी हीरो से कम नही स मोनो पैडलो पर झूमते-लहराते, कोई चिपोड़कर उसने देवानन्द कट ककुर साते करने लगा। रिक्शे का टायर सडक व मे ऊचा-नीचा गड्ढा-गुच्ची पड़ने पर करता हुआ एकदम चमचमाता रखर बन गया। सीट से कमर उठाये, : रमूलन वी की जान हथेली पर आ फिल्मी गीत गुनगुनाते, वह हवा से नडा, इधर टकराया उधर टकराया। ने से पेट का दर्द बह गया। पर छरछर उछलने लगा और रास्ते रिक्शा धचाक-धचाक कूदने लगा। गई। लगा, रिक्शा अब लड़ा, तब बदन दलदल हिलने और हिचकोले 124 : हादसा तमन्ना है कि कम-से-कम एक नोडा हो जाय । कोई वारिस तो चाहिए ही, खानदान का चिगग रोशन रखने के लिए। लेकिन वह तो चार मे ही वनाइन निचुद गई । शरीर खोखला हो गया, इसी उमर में। यह भी कोई जिंदगी है, हर समय मुगियो की तरह अई देते रहो और फिर चूजे चराते रहो । जी फेवा हो जाता है, दिन-भर चार-चार बच्चो की चरवाही और गू-मूत करते-करते । ऊपर से रोज उनकी भी तिमारदारी करो। जरा भी नहीं सोचते कि किस हालत मे है । नस-नस दूह लेते है, वोटी-बोटी तराश देते हैं, कसाइयों की तरह, भेड़-बकरी समझकर। रहम और मोरोक्त नाम की तो चीज ही नहीं है, उनके अदर । वह तो ऊब गई है, इस जिंदगी से । समझ में नही आता कसे निजात पाये। अस्पताल में भी डाकदरनी देखते ही कटकटाने लगती है। हर बार कहती है, नसबंदी करवा ले, ये लगवा ले, वो लगवा ले। वह कैसे समझाये कि उसका बस चले तो वह सब कुछ करवा ले, लेकिन वो माने तब न । कई वार डाकदरनी की बात कही, सोते-बैठते भी समझाया, पर वात शुरू करते ही मरकहा बैल की तरह फुकारने लगते है और डाकदरनी को उल्टी-सीधी बकने लगते है। सुबह नो-साढ़े नौ का वक्त था। दुकानें खुल गई यो । बाजार लग गये थे। सड़को पर गहमा-गहमी और भीड़ थी। लफू भीड़ को बचाता, रिक्शा दाय-बाये काटता, घटी टनटनाता हुआ मस्ती में झूमता तेजी से चला जा रहा था । हमीद बाजार में करीम होटल के सामने पहुचते-पहुचते अचानक सामने आई एक नन्ही स्कूली लड़की को बचाने के लिए ज्यो ही उसने रिक्शा दाहिनी ओर काटा, तेज रफ्तार से आती हुई एक मोटर साइकिल ने पीछ से धड़ाम से टक्कर मारी। रसूलन बी गेद की तरह उछल कर बीच सड़क पर जा गिरी। रिक्शा उलट गया । रेहाना रिक्शे के नीच दव गई। रिक्शा- वाला छटक कर दूर जा गिरा। मोटर साइकिल भी दाहिनी तरफ उलट गई। उसका सवार एक नौजवान छोकरा था। वह सरकस के खिलाड़ी की तरह उछलकर बाल-बाल बच गया। रिक्शे की गली और पीछे की दाहिनी पहिया मुडतुड़ गई । रसूलन बी बीच सड़क पर फैली कुछ क्षण तड़पकर ठडी पड़ गई । बुर्का घिसटकर कई जगही से फट गया था और कपड़े अस्तव्यस्त हो गए थे। मुह के बल गिरने से चेहरा धुनकर छिल गया था और छिली उन्माद: 125 जगहो एव नाक से खून बहने लगा था। पेट में गहरी चोट लगी थी और नून जाने लगा था । उसको गश आ गया था। देखते-देखते भीड जमा हो गई। मडक के दोनो ओर सवारी गाडियां रक गई। माइकिलों, रिक्शो, कारो और वनो के भोंपुओं को मिली-जुली चीख से कुहराम मच गया। काफी दूरी तक ठकाठक जाम लग गया। कुछ लोगों ने दौडकर रिसंशा पलट दिया और नीचे दबी रेहाना को निकालकर मड़क के किनारे ले आये। उ मामूली खरोंचे आई थी, लेकिन घबराहट काफी थी। रिकावाले को भी काफी चोटे आई थी। आगे का चिमटा टूटकर उसकी जाघ के अन्दर घुस गया था और तरतर खून बह रहा था। वह सडक पर पड़ा तड़प रहा था। कोई उसके पास नहीं गया था। नौजवान मोटर साइकिल सवार तुरत-फरत अपनी मोटर साइकिल उठाकर नौ-दो ग्यारह हो गया। बुवाली को खून में सना, बीच सड़क पर देखकर एक वर्ग के लोगों का पारा चढ गया। भीड में बाहर निकलते हुए कुछ लोग जोर-जोर से चिल्लाने लगे और हायतोवा मचाने लगे। तब तक भीड और वढ गई। इतने मे बाजार में तैनात दो मिपाही डंडा भागते हुए वहा आ पहुचे और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए हवा में लाठी धुमाने लगे। लेकिन भीड और बढ़ती गई। एक सिपाही ने थाने मे इत्तला कर दी। आन-फानन मे दस आदमियों की टुकड़ी वहां पहुंच गई और भीड़ को खदेडने लगी। लोगों में भगदड मच गई। कुछ लोग सड़क से हटकर गलियों मे जमा हो गये। एक वर्ग के लोग उत्तेजित हो उठे और नारे लगाने लगे। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज कर दिया । भागती भीड़ पुलिस पर ईंट-पत्थर, सोडा-बोतल बरसाने लगी। पुलिस और भीड के बीच लुका- छिमी का युद्ध शुरू हो गया। इस दौरान नारों के जवाब में दूसरे वर्ग के लोगो ने भी नारे लगाने शुरू कर दिये । स्थिति बडी तेजी से बिगड़ने लगी। पुलिस दनादन आसूगैस छोडने लगी। लोगो मे कुहराम मच गया । भागते समय भीड लूटपाट पर उतारू हो गई और दुकानें लूटने लगी । स्थिति पर कावू पाने के लिए पुलिस ने गोलिया चलानी शुरू कर दी। गोली लगने ने कुछ लोग घायल होकर गिर पड़े। भागती भीड़ दूसरे वर्ग की दुकानो- 126 - हादसा मकानो में आग लगाने लगी। जितने मुंह उतनी बाते होने लगी। तरह-तरह की अफवाहो से बाजार गर्म हो गया। देखते ही देखते सारा शहर सुलगने लगा। जगह-जगह से लपटे उठने लगी। तब तक मौके पर पुलिस के आला अफसर और जिला मजिस्ट्रेट पहुच आये । एहतियात के तौर पर पूरे शहर मे कफ्यू लगा दिया गया। हंसी-खुशी और गहमागहमी वाला शहर पुलिस की संगीनो के साये मे सिमकने लगा। सड़कों और गलियों के सीनो पर भारी बूटो की हलचल शुरू हो गई। शहर के ऊपर आकाश मे चील-कोवे मंडराने लगे। शहर के छोर पर, सड़क के साथ बहने वाले गंदे नाले पर बाकर अली की दूकान थी। दुकान क्या थी, लकड़ी का खोखा खडा कर रखा था। मुह अधेरे ही कसाईवाड़े से वह माल ले आता और उजाला होने से पहले ही गिराकर छील-काटकर दुकान लगा देता । रोज की तरह आज भी वह खलील खलीफा से पूरे साडे-सात सौ मे एक बकरा और दो बूढी बकरियाले आया था । आज का माल कुछ फायदे का मिला था । पचास तो खरे थे ही। माल सही उत्तर गया, तो पूरा पता भी बन सकता था। दोनो वरियो को पहले हलाल कर उसने खाल उतार ली और दो खड कर टुकडे ठीहे के पास लगा दिये। पिछली राने उसने छड़ के हुक मे फसाकर लटका दी । रानो के ग्राहक अधिक आते है। बकरे को सबसे बाद में जिबह किया और आधी खाल खीच कर सामने लटका दिया। बकरे के साथ बकरियो का गोश्त भी वह साट देता है । डोमो को तो वह निरी बकरियो का ही गोश्त टिका देता है। डोम राजा के ही कारण उसकी दूकान चलता है। शहर की सफाई करके, दो-दो घुच्चड़ चढाकर जब डोम राजा मस्ती में गाते-बजाते अपनी झोपड़ियो को लौटते हैं, तब वे हवाई घोड़ो पर सवार होते हैं। पाव भर, आध पाव, जिगकी जैसी बिसात हुई, वप्रवाकर ही आगे बढ़ता है । पर्व-त्योहार के दिन तो वह बड़े जानवरो की गोल वोटी भी चला देता है। ऐसे मौकों पर उसकी कमाई अच्छी हो जाती है । आजकल के ग्राहको को सच्चा माल वेचकर तो रोटी नसीव होने से रही । सब साले घटा टुकड़ा मागते है, चाप, तो मछली, तो गर्दन तो चुस्ता, तो गुर्दा । ऊपर से आजकल हाकिम-हुकूम बरसाती मेढको की तरह इतने बढ़ गए । दो पुठ, उन्माद : 127 । हैं कि उनको खुश करने में तो लुट ही जाये । कभी सफाई का दरोगा है, तो कभी बाट का इंसपेक्टर, तो कभी थाने का सिपाही-दीवान तो कभी दरोगा का आदमी, नेता का चमचा, इलाके का गुडा, सव सालों को फोकट का चाहिए। वह भी बड़े जानवरों का दस-पाच किलो टिका देता है साथ में, इन हरामखोरो को। वह दुकान लगाकर बैठा ही था कि, देखा, डोम लोग कंधो पर झाडू लिए बदहवाश से बेतहासा लुडमुड भागे जा रहे है, जैसे जंगली शेर उनका पीछा कर रहे हो। किसी ने मुंह उठाकर उसकी दुकान की तरफ देखा तक नहीं। फिर उसने देखा, गाव से सब्जी-भाजी, गोहठा-गोहरी वाले लोग भी अपनी खचिया-टोकरी सिर पर लादे लदफद दौड़ते-हांफते शहर से गाव की ओर भाग रहे है। उसकी समझ मे नही आया कि मामला क्या है ? क्यो सबके सब एकाएक शहर छोड़कर भागने लगे हैं। उत्सुकतावश वह ज्यो ही सडक को ओर लपका, उधर से भागती भीड़ मे से कुछ लोग चिल्ला उठे, "भागो, भागो, दंगा, कत्लेआम, लूट, आग, लाठी, गोली, पुलिस, कफ्यूं।" उसके होश उड़ गए। कलेजा कांप उठा । बदन थरथराने लगा। पता नहीं बीवी का क्या हुआ होगा ! कही दंगा मे फस गई तो नोच डालेंगे दरिदे । वह छाती पीटता हुआ उल्टे पाव अपनी दुकान की ओर भागने लगा। हबर-हबर माल उतार कर अदर किया और ताला चढाकर अपने घर की ओर दौड़ने लगा। भागते समय वह पीछे मुड़-मुडकर अपनी दुकान की ओर देख लेता था। थोड़ी दूर हो गया होगा कि उसने देखा, कुछ लोग खोखा तोड़कर माल लूट रहे हैं और लूटने के बाद खोखा झोककर आग लगा दी है । धू-धू लपटें उठने लगी है। इस दौरान रसूलन बी होश में आ गई थी और पुलिस ने उसे पास के अस्पताल मे भर्ती करा दिया था। रेहाना भी साथ में थी। तरह-तरह की अफवाहो में गिरफ्तार शहर दो दिनो तक जलता रहा, आगजनी, लूट-पाट और छुरेवाजी की घटनाएं होती रही। दोनो मजहबों के नेता दंगे की आग मे अपनी-अपनी रोटिया सेकते रहे। तीसरे दिन शहर शांत होने लगा । शाम चार बजे कप' मे ढील दी गई। ये तीन दिन बाकर अली के लिए तीन युग की तरह बीते। घर के 128: हादसा अदर वद वह तडपता रहा, छटपटाता रहा, मिर धुनता रहा, छाती पीटता रहा। नन्ही-नन्ही मासूम बच्चियां मा के लिए रोती-बिलखती रहीं, वह उनको क्या बताता, कैसे समझाता कि शहर में उन्मादी भेडिये और आदम- खोर फैल गये है, जो तुम्हारी अम्मी को हवक लिए हैं। इस दौरान वाकर अली की पलकों पर आपकी नहीं आई। बार-बार मन पटकता रहा कि वह साथ क्यों नहीं गया। पदि साथ रहा होता तो शायद वचा लाया होता इस आग से, किसी तरह। वह अपना माथा पीटता रहा और अपने-आपको धिक्कारता रहा। - कफ्यू उठते ही वाकर अली अस्पताल की ओर भागा। गलियां अभी भी सूनी थी। सड़कों पर सन्नाटा था। इक्का-दुक्का लोग वावलों की तरह इधर-उधर दौड़ रहे थे। शायद राख की ढेर में अपने दिलों के टुकड़ों को तलाश रहे थे, उसी की तरह । अस्पताल मै वीवी को सही-सलामत देखकर उमकी आखे छलक आई । दिल भर आया । दौड़कर उसने रसूलन को बाहों में भर लिया और मौला का लाख-लाख शुक मनाने लगा। रेहाना ने जब उसे पूरा हाल बताया तो वह अल्ला-अल्ला कर उठा। कप' पूरी तरह हट गया था। पर लोगों के दिलों में अभी भी दहशत घो। एक-दूसरे के प्रति मन में चोर बैठा था। धीरे-धीरे बाजार और दुकाने खुलने लगी और सब मामान्य होने लगा। दिनों-दिन रसूलन बी की हालत बिगडती गई। पेट में बराबर दर्द रहने लगा। खून जाना वद नहीं हुआ। कमजोरी बढ़ती गई। चेहरा पीला पड गया। होठों पर स्याह पपडी छा गई। आखें कोटरों में धंस गई। वाकर अली परेशान था। दुकान जल चुकी थी। मां के रहते, बच्चे अनाथों की तरह बिलबिला रहे थे। पत्नी उसकी नजरों के सामने ही तिल-तिल कर नाता तोडती जा रही थी। वीवी को बचाने के लिए वाकर ने एड़ी-चोटी का पसीना एक कर दिया। जमीन-आममान छान मारा। जो-जो दवा डाक्टर लिखते गये, यह लाता गया, जो चीज खाने को कहते, जुटाता गमा, पर रमूलन की हालत में कोई सुधार नजर नहीं आया। जिंदगी की सारी कमाई दाव पर लगाकर हार जुजारी की तरह वाकर ठगे-ठने से वीवी को आहिस्ते- बाहिस्ते मौत की गोद में मरकते हुए देयता रहा। दिन-भर वह स्वय रमूलन उन्माद: 129 .. की तीमारदारी मे डटा रहता, पर रात को जनाना वार्ड के कारण रेहाना को रहना पड़ता । एकाएक एक दिन आधी रात के वाद रसूलन की हालत बिगड़ने लगी। रात लटक रही थी। वार्ड में सन्नाटा था । मरीज बुत थे । रह-रहकर पायल पक्षी की तरह किसी मरीज के कराहने की आवाज से सन्नाटा कांप उठता था। कंपोटर माथ के दवा के कमरे में, खर्राटे भर रहा था। आसमान मे उडता हुआ टिटहरी का जोडा रह-रहकर टिट्टी "टिही टिही टिटियाने लगता था। उसकी टिटियाहट तीर की तरह रात की खामोशी को चीर देती थी। रमूलन बी दर्द से लगातार कराहने लगी थी। धीरे-धीरे उसका कराहना तेज होता जा रहा था । बीच-बीच मे वह चीख पड़ती थी। नौद में झूलती हुई रेहाना उसके पैताने लुढ़क गई थी। एकाएक पेट में छुरिया चलने लगी, जैसे अंदर बैठा कोई कतरा-कतरा मास काट रहा हो । छटपटाते वह जोरो से चीख पडी। चिहुककर रात खामोशी का चादर फेंक उठ बैठी। कुछ मरीज जग गए । पर लगने से पैताने सोती रेहाना भी अकबका कर जग गई और उछलकर विस्तर से नीचे खड़ी हो गई। वह अपने आप पर खीझ उठी। इस निगोडी नीद ने न जाने कब धर दबोचा। पता नहीं कब से बिचारी तड़प रही है। पलकों पर अभी भी मन-मन भर का बोझ लदा था और बदन बेकाबू हो रहा था। गुस्से में उसने हथेलियो से पुतलिया मलमला दी और बदन ऐठकर तोड़ दिया पर मुई नीद की खुमार घुडसवार की तरह अभी भी बदन पर जीन कसे चढी बैठी थी। वडी वहन को दर्द से छटपटाते देख वह बेचैन हो उठी, विक्षिप्त रसूलन पेडू पकड़ कर मछली की तरह तड़प रही थी और इस पाटी, उस पाटी पछारा खा रही थी। रेहाना घबडाई-सी बदन सहलाने लगी।ज्योही उसकी नजर कमर के नीचे गई, मुंह से चीख निकल पड़ी। विस्तर खून से तर था और लगातार ताजा-ताजा खून बह रहा था। उसने बत्ती जला दी और डाक्टर के कमरे की ओर भागी। डाक्टर अपने कमरे में नहीं था। वह नर्स की केविन की ओर दौड़ी। वहा भी केविन सूनी थी। उसकी समझ मे नहीं आया, अब क्या करे, इतनी रात में कहा जाये? जी रुमासा हो गया। वह 130: हादसा दौड कर फिर वहन के पास आई। उसका तड़पना और तेज हो गया था। साथ के कमरे में कपोटर की नाक खड़खड़-गडगड़ बोल रही थी। कंपोटर की याद आते ही वह उसके पास जाकर जगाने लगी, पर कपोटर का खर्राटा नही टूटा । वह तो जैसे घोड़ा वेचकर सो रहा था । उसने उसके पैर के अगूठे को पकड कर हिलाया। कोई हरकत नहीं हुई। हाथ पकड़ कर झकझोरने पर कंपोटर जग गया। गिड़गिड़ाते हुए उसने मरीज की बिगड़ती हालत के बारे में बताया और डाक्टर को बुलाने की विनती करने लगी। "अरे काहे को नाटक करती है । तुझको सोना है न, आ जा मेरे पास, सो जा बगल में।" उसका आंचल पकड़ कर खीचते हुए शरारत से कंपोटर कहा। आचल झटककर वह दो कदम पीछे हट गई । गुस्से से उसका बदन कांपने लगा, पर विवशता में गुस्सा पीते हुए उसने फिर घिघियाकर डाक्टर के बारे में पूछा। "बड़ी ऐठ रही है, तो भाड़ में जा। खामखां में इतनी मीठी नीद खराव की। कोई तेरे बाप के नौकर नहीं है कि आधी रात को भागते फिरे । चली जा यहां से।" वह फिर मुह ढक कर सो गया। "भाई साहव "भाई साहब, मेहरबानी करके डाक्टर को बुला दीजिए। मेरी वहन मर रही है, दर्द से तड़प रही है, लगातार खून जा रहा है।" "अरे कुछ नहीं होता, पाच मिनट मे । कह तो रहा हू, आ जा, थोड़ी देर सो ले, फिर बुला लाते हैं डाक्टर को और दवा भी दे देते हैं अच्छी-सी।" मुह खोलकर उसकी ओर बाहें फैलाये शरारत ने कंपोटर ने फिर कहा। लाचार होकर वह वापस वार्ड मे लौट आई। उमे जीजा पर गुस्सा आने लगा। ऐसी हालत में अकेले छोड़कर चले गये । यही वरामदे मे सोगरे होते तो क्या बिगड़ जाता । डाक्टर कोई उनका नौकर है कि बैठा रहेगा, उनकी बीवी की नाड़ी पकड़ कर । उसी क्षण उसकी नजर कोने में पड़ी लाश पर गई। वह सिहर उठी। दगे के दौरान ही यह जली औरत आई थी । आज अचानक जब उसकी हालत बिगड़ने लगी तब डाक्टर और नसं दोनो मौजूद थे। उसको दवा- दारू दिया, पानी चढ़ाया। बारह बजे के आसपास जव मर गई, उसके बाद ।

उन्माद: 131 पता नही कहा गायब हो गए। जली औरत की याद आवे ही उसके रोगटे खड़े हो गए और वदन मे झुरमुरी दौड़ गई। औरत को चादर से ढकी लाश अभी वार्ड के कोने में शौचालय के पाम एक वेड पर पड़ी थी। उधर देखते ही उसका कलेजा परपरा जाता था । कंसा खौफनाक रूप हो गया था, एक- दम डायन जैसा। उदास मन वह वहन के पलंग की पाटी से सटकर खड़ी हो गई। रसूलन अव बदहवास-सी छटपटाने और सिर घुनने लगी थी। रेहाना से देखा नही गया। वह फिर डाक्टर की तलाश मे कमरे से निकल पड़ी और सभी कमरो, बरामदों मे देखती रही, असताल के आगे-पीछे भूत की तरह डोलती रही, पर डाक्टर या नसं का कही अता-पता नहीं था। रह-रहकर अधेरे गलियारो मे गुजरते हुए जब जली औरत की याद आ जाती तो भय से उसका पूरा वदन सिहर उठता । थक-हार कर वह वार्ड मे लौटी तो देखा एक कुत्ता रसूलन को खाट के नीचे कुछ चाट रहा था । दोडकर उसने कुत्ते को दुरदुरा कर भगा दिया । पूरा बिस्तर खून से भीग गया था । आखे उलट गई थी और हाथ-पैर ठडे पड़ने लगे थे । पास आकर ज्योंही उसने सहलाने के लिए परों को छुआ, उसको जैसे बिच्छू ने डक मार दिया। चौंककर क्षण-भर के लिए उसने हाथ खीच लिया। आखो की ओर देखकर वह रो पड़ी। जली औरत की मौत वह देख चुकी थी। उसके मुह से चीख निकल पड़ी। वह दौडती हुई फिर कंपोटर के पास गई और उसको झकझोरने लगी, जैसे उमको उन्माद चढ़ गया हो। कपोटर हड़बड़ा कर उठ बैठा और स्थिति की गभीरता को भापते हुए उसने जाकर मरीज को देखा। उसे लगा, यदि जल्दी कुछ नहीं किया गया तो केस हाथ से निकल जायेगा। वह जाकर केबिन नबर एक का दरवाजा भडभड़ाने लगा । डाक्टर ने अदर से ही डाटकर पूछा, "कौन है ?" जब उसने मरीज का हाल बताया तो डाक्टर भुनभुनाते हुए दरवाजा खोलकर बाहर निकल आया। उसके पीछे-पीछे नर्स भी निकल आई। तब तक चार बज चुके थे। डाक्टर ने मरीज को जाचा-परखा। हालत गंभीर थी। रह-रह नाड़ी डूब जाती थी और मरीज वेहोश हो जाता था। डाक्टर ने एक सुई लगाई और तत्काल बड़े अस्पताल ले जाने के लिए पर्चा बना दिया, क्योकि खून मे मांस का कतरा गिरने लगा था। आपरेशन जरूरी 134 हादसा काफिरो ने कत्ल कर दिया। मार डाला किसी मिया भाई को।" यह सुनते ही भीड़ भड़क उठी और आवेश में नारे लगाते हुए अहमक की तरह तोड़- फोड पर उतर आई। थोडा आगे, सड़क के पास सुदरलाल अस्पताल की वही गाड़ी खडी थी। भीड ने गाड़ी पर पथराव शुरू कर दिया और पास पहुच- कर गाडी उलटकर उसमें आग लगा दी। रेहाना चीखते हुए निकलकर भागने लगी। भीड़ ने दौड़कर उसे पकड़ लिया और जलती आग में झोक कर जला डाला। वाकये का पता लगते ही, लाशों के वारिस मौके पर कुछ ही समय मे, आ पहुचे । उनको देखकर दोनो वर्गों के लोग अपनी-अपनी भूलो पर अश- अश कर उठे।

हादसहिम । मैं काशी विश्वनाथ से लखनऊ जा रहा था। ए० सी० टू टायर मे मेरे सामने की सीट पर, खिड़की से सटकर, एक सज्जन बैठे थे। हथेली पर अपनी ठोढ़ी टिकाये, शोश से बाहर कही शून्य में वह नजरें गड़ाये थे। उनका सिर खल्वाट और मूछे खिचड़ी थी। चेहरा उदास और गमगीन था, जैसे कोई पीड़ा अदर-ही-अदर मथ रही हो । ऊपर की दोनों वर्थे खाली थीं। गाड़ी जब चल दी और यार्ड से बाहर निकल गई, तब मैने ही, परिचय जानने की गरज से, बातचीत शुरू की, हालाकि नाम वगैरह मैंने चार्ट में पढ लिया था। "क्षमा करेगे, आप दिल्ली तक जायेगे?" मैंने विनम्रता से पूछा। "आपको कैसे मालूम ?" बड़ी वेरुखी से उन्होने प्रश्न का प्रश्न से ही उत्तर दिया। "आप रेलवे अधिकारी हैं न?" "किसने बताया आपको?" वह थोड़ा चौंके । "पास नंबर बाहर चार्ट पर लिखा है न।" "ओ।" उन्होने सायास हंसने की कोशिश की, पर आवाज फटी खजड़ी की तरह खनखना कर रह गई। "मैं भी रेलवे अधिकारी हू । तखनऊ तक जा रहा हूं, आफिस के काम से।" मैंने आत्मीयता जतलाते हुए कहा । "अच्छा, अच्छा।" वह थोड़ा सामान्य हो गये, जैसे उनके अंदर की गाठे कुछ ढीली हो गई हों। गर्मी का मौसम था। मैंने कुछ संतरे ले लिये थे। लिफाफे से एक सतरा निकालकर उनकी ओर बढाते हुए, मैंने कहा, "लोजिए साहब, संतरा - 136 हादसा खाइए।" वह डरकर एकदम चौक उठे, जैसे सतरा नही, साप रख दिया गया हो उनके सामने । उछलकर दोनों पैर उन्होंने वर्थ के ऊपर रख लिये और हाथ हिलाते हुए कहने लगे, "देखिए साहब यही ठीक नहीं है। सफर में किसी अपरिचित व्यक्ति से कोई खाने-वाने का सामान नहीं लेना चाहिए। मैं भुक्तभोगी है । वो तो ईश्वर की कृपा थी कि किसी प्रकार जान बच गई, वर्ना 'वर्ना तो।" उनके चेहरे से लगा, जैसे किसी बहुत बड़े हादसे से गुजरे हो। मैं झेप गया और अपनी झेप मिटाने के लिए खामखा 'हे. हे 'हे' करते हुए आश्चर्य से पूछा, "अच्छा ! क्या हो गया था, आपके साथ ?" "कुछ मत पूछिए साहब । अभी आज तक उस खौफ का साया मौत की तरह सिर पर महराता रहता है । पता नहीं कब क्या हो जाय ।" "ऐसी कौन-सी बात हो गई थी साहब, आपके साथ कि आप इतने।" “यही साने-पीने को लेकर ही तो हुई थी।" "अच्छा लगता है, चोर-उचक्को के चक्कर मे फस गये थे आप।" "अरे साहब किसी के माथे पर तो लिखा नहीं है । और फिर चोर- उचक्के तो ऐमा रूप बनाते हैं कि आप उन पर शक कर ही नहीं सकते।" "आखिर हुआ क्या था, आपके साथ ?" मैंने हमदर्दी दिखाते हुए पूछा। "हुआ यह कि कुछ साल पहले मैं सपत्नीक एक शादी मे बनारस आया हुआ था। मैं यही का रहने वाला हूं न। जमीन-जायदाद का भी कुछ मामला लटका पड़ा था, जिमे रफा-दफा करना था। सो सब कर-करा कर, मैं पत्नी के साथ, इमी काशी विश्वनाथ से वापस दिल्ली लौट रहा था। आप तो जानते ही हैं, हजार मना करने के बावजूद, शादी-ब्याह के मौकी पर हम लोगो की बीविया कुछ जेपर वगैरह तो रप ही लेती है। सो दो- चार थान जेवर पल्ली के बदन पर भीया। जमीन काजो चालीस हजार मिला था, वह भी मैंने नकद ही मूटकेस मे रण लिया था। सोचा, किसी को क्या मालूम कि पाम में इतनी नकदी है।" "इतनी नकदी लेकर चलनातो यतरे से यासी नहीं होता । आप तो हादमा: 137 पड़-लिखे आदमो है, साहब।" "बस यही तो गलती हो गई। तो उस दिन क्या हुआ कि संयोग से हमें नीचे की दोनों सीटे मिल गई। ऊपर की वर्षा पर कोई यात्री आया नही था, लेकिन गाड़ी चलने के कुछ देर बाद ही ऊपर की सीटो पर एक जोड़ा आ गया। साहब, औरत क्या चीज थी, फन्ने खा कि बस पूछिए मत । लगता था, फिल्म की हीरोइन हो । छरहरा बदन, लवा कद, कमर के नीचे तक लहराते बाल, भरा हुआ सीना, पतली कमर और साहब नैन- नक्श तो ऐसे थे कि अब मै क्या बताऊं । लेकिन आदमी महा खूसट, थुल- थुल और सड़ियल लग रहा था।" "तो क्या मियां-बीवी नही थे वे दोनो?" मैंने जिज्ञासा से पूछा । "भगवान ही जाने साहब । आते ही औरत हमारे सामने की सीट पर बैठ गई और बुलबुल की तरह फुदक-फुदक कर लगी चहकने । बाते करने मे इतनी माहिर कि हम तो उसका मुह ही देखते रह जाते । और साहब बात करते-करते वह एकदम मेरे सामने झुक जाती और क्या बताऊं, बार- बार आचल नीचे सरक जाता या जानबूझ कर सरका देती। इतने मे उसका आदमी कही और जाकर बैठ गया था। वह कह रही थी, 'पहले मैं माड. लिंग करती थी। फिल्म मे भी साइड हीरोइन का काम किया है । लेकिन फिल्म लाइन बड़ी गदी होती है।' हीरोइन बनते-बनते लड़कियां कहां से कहा पहुच जाती हैं। सो साहब कहने लगी कि उसके मां-बाप को फिलिम- विलिम वाली लाइन पसन्द नही आई और उन्होने जबरदस्ती इस व्यापारी के साथ उसकी शादी कर दी। वात करते-करते कभी वह मेरा हाय छू देती, तो कभी कधा । कभी-कभी तो जांघ पर भी हाथ रख देती । क्या बताऊ साहब मेरा तो बुरा हाल हो गया । उधर पली ।ह सब देख-देख कर कुढ़े जा रही थी। उसने यह बात भाप ली।" "बड़े भाग्यशाली थे आप।" मैंने चुटकी ली। "भाग्यशाली नहीं खाक थे । अरे साहब अभागा कहिए अभागा,क्योकि मैं उस चुडैल की चाल पहचान नहीं पाया और उसके जाल मे फसता चला गया। "सोकसे?"

138: हादसा "अरे साहब वह इतनी खिलाड़ी थी कि मुझसे बात करना बद करके एकदम पत्नी की ओर मुड़ गई और बहन जी, वहन जी करके लगी तारीफ करने, उनकी एक-एक चीज की। कलाई की चूड़ियों को छूकर कहने लगी, ऐसा सोना अब कहा मिलता है वहन जी। क्या लहरदार सिकड़ी है, आपकी। तीन तोले से कम नहीं होगी। इस गढन का झुमका तो अब कही दीखता ही नहीं। पत्नी फूल कर कुप्पा हो गई । और साहब, उनकी साडी क्या, ब्लाउज क्या, चप्पल क्या, सव तो सव जब उनके मोटापे की तारीफ करने लगी तो मैं तो पानी-पानी हो गया। लेकिन पत्नी थी कि उसकी बारीक बाते समझ ही नही पा रही थी। लगी अपने मायके का बखान करने कि बचपन की खाई-पीयो देह है। उस समय मायके में दूध-धी की नदी बहती थी। क्या बतायें साहब, खा-खाकर तो उनकी यो तोद निकल आई है, जैसे हर समय नौमासा ही लगा हो।" कहते-कहते वह झेप से गये, जैसे कुछ गलत बोल गये हों। फिर वह चुप हो गये । थोड़ी देर बाद स्वय चालू हो गये। "हां तो मैं कह रहा था, जब खूब घुला-मिला लिया पत्नी को, तब थर्मस से दो कप कॉफी निकाली, एक कप पत्नी को दी, दूसरा मुझे देने लगी। मुझे कॉफी सूट नही करती, सो मैंने माफी मांग ली। फिर अपने आदमी को कॉफी देने के बहाने वह उठकर चली गई। श्रीमती जी बखान कर-करके कॉफी पीती रही। तब तक साहब कोई ढाई-तीन बज गये थे । कॉफी पीने के बाद श्रीमती जी लेट गई। लेटते ही उन्हें नीद आ गई और खर्राटे भरने लगी। थोड़ी देर में हीरोइन लौट आई। उसका पति दूर ही बैठा रहा। आकर बड़ी वेतकल्लुफी से वह एकदम मेरी बगल में बैठ गई और ऐसी-ऐसी बातें करने लगी कि मर्द होते हुए भी मुझे शर्म आने लगी। उसका पल्लू था कि बार-बार सरकता जाये। कितना भी रोकू, पर नजरें थी कि बार-बार उधर को फिसल जायें। मेरी मति मारी गई थी। मैं भी पिघलता गया और उसकी जाल मे फंसता गया। पत्नी खर्राटे भर रही थी, सो मैं भी निश्चित था। पर्दा पड़ा ही था। आप तो जानते ही हैं साहब, कि गाड़ी के सफर में मौका मिलने पर बड़े-बूढ़े भी दायें-बायें आप सेंकने से नहीं चूकते । रेगिस्तान में अचानक बहार आ गई थी। मैंने भी सोचा, लूट हादसा: 139 लो जितना लूट सकते हो। फिर साहब क्या हुआ कि प्रतापगढ़ आने वाला था। चाय वाला आर्डर लेने आया। उमने मना कर दिया। कहा, मेरे पास ढेर सारी कॉफी रखी है। फिर वैग से उसने एक डिब्बा निकाला, जिसमे काजू की बफिया थी। दो टुकडे उस चुडैल ने मेरे हाथ पर रख दिए । नहीं करते नहीं वना । वस वही मेरे विनाश का कारण हो गया।" "काजू की बर्फी नहीं पची क्या ?" बीच में ही मैने टोक दिया। मोचा, कैसा चूमट आदमी है कि ऐसे माहौल का भी फायदा नहीं उठा । पाया। "आप समझे नही," थोड़ा झल्लाकर उन्होने कहा । "बफिया तो मैंने खा ली । एक प्याला कॉफी भी उसकी पी ली। लेकिन कॉफी पीते ही मुझे नशा-सा छाने लगा। सिर घूमने लगा। नजरो के सामने लाल, पीली, हरी, नीली चिनगारिया फूटने लगी। लगा, धूप पीली पड़ती जा रही है । फिर लगा आकाश में एक ओर से घटाटोप अंधेरा छाता आ रहा है। दिमाग में जैसे आधी उठने लगी। कानों मे तेज हवाए सांय-साय सीटिया बजाने लगी । लगा, कान का पर्दा फट जाएगा, खोपडी टुकड़े-टुकड़े उड़ जायेगी। फिर एकाएक सिर में भयकर दर्द उठने लगा । वह दर्द सपोलो की तरह धीरे-धीरे रेंग कर नीचे की तरफ उतरने लगा और लगा एक साथ ढेर मारी सुइया मेरे सीने, कलेजे, फेफड़ों मे, अदर ही अदर धसती जा रही हैं । वाहो, पेट, पीठ और कमर मे भी वैसी ही सुइया चुभने लगी । मैं दर्द से तडपने लगा। मैंने कराहना चाहा पर आवाज नही निकली, चीखना चाहा लेकिन स्वर नहीं फूटा। हाथ-पैर हिलाने की कोशिश की लेकिन, लगा, पूरा शरीर, सलीवो मे जकड़ दिया गया है । आखे खोलनी चाही, लेकिन पलको पर चट्टान पड़ी थी। फिर लगा, मेरी गाड़ी किसी अधी गुफा मे दौडती चली जा रही है । गाड़ी के सारे डिब्बे खाली हैं । इजन को कोई जल्लाद चला रहा है । गुफा के अन्दर बहुत सारी गुफाए हैं । उन गुफाओं मे तरह- तरह के भयावह चेहरे लाल-पीली हरी-नीली बत्तियां लेकर दौड़ रहे हैं और हर डिब्बे में मुझे ढूढ़ रहे हैं । एकाएक गाड़ी एक संकरी गुफा में जाकर फस गई । मैं चुपके से उसरा और गुफा से बाहर निकलने के लिए बेतहाशा भागने लगा । वे भयावह चेहरे मेरा पीछा करने लगे। बाहर निकलने की ।

140: हादसा बजाय मैं और गह्वर गुफाओं मे फंसता गया। एकाएक अधेरे में तैरते हुए ढेर सारे कंकालों ने मुझे घेर लिया। उनके बड़े-बड़े नुकीले दांतों और हाथो की लवी उंगलियो के तेज नाखूनों से ताजा-ताजा लहू चू रहा था, जैसे अभी-' अभी किसी का खून पीकर आ रहे हो। डर के मारे मैं जोरो से चीख पड़ा और कस कर आखें भीच ली।" मैं हक्का-बक्का-सा उनका मुंह देखने लगा। उनकी आंखें वद थी, जैसे अभी भी उन अंधी गुफाओं मे वह उतरते जा रहे हों। वह वोले जा रहे "फिर जब मुझे होश आया तो देखा अस्पताल में पड़ा हूं। कमरे में सन्नाटा था। कुछ मशीनें और औजार मेरे सिर पर औघे लटक रहे थे। बगल मे स्टूल पर कुछ दवाएं पड़ी थी। मुझे लगा, मैं या तो अभी भी बेहोश हू, या कोई स्वप्न देख रहा हूं। आखे खोलते ही दौड़कर एक नर्स मेरे पास आई और मुस्कराते हुए पूछा, 'कसी तबीयत है ?' फिर वह तेजी से कमरे से बाहर चली गई। कुछ ही क्षणो मे एक डाक्टर के साथ वह लौट आई। डाक्टर ने तरह-तरह के औजारो से मेरा सीना, पेट, पीठ, सिर और गला जांचा-परखा और आंखों की पलकें उलट कर देखी। उसने उंगली की टोपी से और फिर एक हथोड़ीनुमा औजार से मेरे जोड़ो को ठोंका-ठठाया और फिर नश्तर जैसी नुकीली चीज लेकर मेरे बदन मे जगह- जगह कोचने लगा । दर्द से मैं सी-सी करता रहा, पर जब उसने मेरे बार्य हाथ और पैर मे नश्तर चुभोये तो मुझे कोई अनुभूति नहीं हुई । एकाएक उसके माथे पर बल पड़ गये और वह जैसे चिंतित हो उठा । मेरा वाया अग मूना हो गया था। उस डाक्टर ने बड़े डाक्टर को बुलवाया । वड़े डाक्टर के आते ही कुछ सलाह-मशविरा करने के बाद एकाएक स्ट्रेचर मगाकर मुझे नीचे लाया गया और एम्बुलेस मे डालकर दूसरे बड़े अस्पताल में भिजवा दिया गया।" यह सब कहते हुए उनके चेहरे पर भय की छाया स्पष्ट दिपायी दे रही थी। बोलते-बोलते उनके होठ थरथराने लगे थे, जने उन यातनाओ से वह पुन: गुजर रहे हो । मैंने सहानुभूति प्रकट करते हुए कहा "च'"""बहुन बुरा हुमा बापके साथ।" ।

हादसा: 141 "अभी क्या हुआ साहब । बुरा तो आगे हुआ। तो मैं कह रहा था, मुझे दूसरे अस्पताल भेज दिया गया । वहा नये सिरे से मेरी जाच-पड़ताल की गई। फिर स्ट्रेचर पर मुझे एक कमरे में ले जाया गया, जिसमे एक वहुत बड़ी मशीन लगी हुई थी। उम मशीन के सामने एक पटरा-सा लगा था। स्ट्रेचर से उठा कर मुझे उस पटरे पर सुला दिया गया। सिर में हेल- मेट जैसी कोई चीज वाध कर मेरा सिर उस मशीन के अंदर डाल दिया गया । एकाएक मेरे सिर के चारो तरफ जैसे कोई बहुत वडा घर्पण यत्र धर- घरं घूमने लगा। मुझे लगा वह मेरी खोपड़ी पोसते हुए अंदर भेजे में घुस जायेगा । दो-तीन मिनट की घरघराहट के बाद, हुच्च-हुच्च मेरे सिर को तीन झटका लगा और सिर मशीन से थोडा बाहर निकल आया। फिर वही घर-घरं घर्षण शुरू हुआ। इस प्रकार मशीन तीन बार मेरे भेजे को पीसती रही। फिर मुझे वहा से निकालकर न्यूरोसर्जिकल वार्ड मे, तीसरे माले पर पहुचा दिया गया।" "शायद दिमाग का फोटो लिया होगा। लेकिन आपको पत्नी का क्या हुआ?" मैंने जिज्ञासा से पूछा । "वो तो केवल कॉफी पी थीं न, सो उन पर असर कम हुआ । दिल्ली पहुंचने पर उनको होश आ गया था। लेकिन मैंने दो जहरीली बफियां भी खाली थी। इसी कारण तो मरते-मरते बचा।" अपनी भूल पर मैं झेप गया। फिर उस औरत को कोसते हुए "बड़ी गदी औरत थी। सामान और रुपये पैसे का क्या हुआ "सो तो सब चला ही गया। पत्नी के सारे जेवर, सूटकेस, रुपये, कपड़े सब ले लिया, उन ठगों ने । केवल वेहोश लाशे पीछे छोड़ गरे थे।" "हां तो न्यूरोसजिकल वार्ड में आप पहुच गये।" मैंने आगे कहा। "ओफ ऐसे-ऐसे रोगी भी होते हैं, यह मैंने पहली बार देखा वहां पर । अरे, साहब, जैसे नर्क में यमराज यातना देते है न, ठीक वही हाल था, उस वार्ड के रोगियों का । पागलखाने से भी बदतर, यातना शिविर से भी दर्द- नाक । एक तो ऐसा भभका उठ रहा था उसके अदर कि जाते ही जाते मुझे मितली आने लगी। पता नहीं किस चीज की बू थी, दवा-दारू की गध थी, 142 हादसा । या मरीजो के कटे-फट सडते अगो की दुर्गन्ध थी, या वार्ड की गदगी थी, या उसमे ऐसी गैस छोड़ दी गई थी। लेकिन साहब, वार्ड में भरती लोगो की हालत देखकर मैं तो इतना घबरा गया कि लगा मेरा दिल ही बैठ जायेगा।" "अच्छा इतना खराब हात था वहा ।" "आपने दवाओं की कोई प्रयोगशाला देखी है कभी, जिसमें बदर, चूहे, मेढक या अन्य किस्म के जानवरो को तरह-तरह की दवाएं खिला कर एक का मस्तिष्क, दिल, फेफडा, नसे, आंतें, हड्डियां या चमडी की चिप्पिया दूसरो मे लगा कर या अंग-भंग करके अलग-अलग तापमानो मे शिकजो मे लटका दिया जाता है, फिर नई दवाए देकर उनके असर का परीक्षण किया जाता है । जानवर दर्द से कराहते रहते है, मिमियाते रहते हैं, पिंजडो के अंदर तडपते और उछलते रहते हैं, लेकिन परीक्षण पारी रहता है, बस वही हाल था, वहा के मरीजो का।" मेरे रोगटे खड़े हो गये । जब जानवरो में इतनी तड़प होती है तो आदमियो का क्या हाल होगा । आगे सुनने के लिए मैं तैयार नहीं था, पर वह बोले जा रहे थे। 'दुर्घटना, चोट, जगभंग, मारपीट, पागलपन, फालिज, मिरगी के जितने भी मरीज थे, सब वहा । मैं तो पगला गया, देख कर। पहली बार मुझे मालूम हुआ कि आदमी की हर तरह की बीमारी का ताल्लुक सीधे मस्तिष्क से होता है । लगा, सारी दुनिया ही मस्तिष्क की किसी न किसी बीमारी से पीड़ित है। लेकिन साहब, कोई भी साबुत आदमी मुझे अन्दर नही दीखा । किसी का पूरा अंग मारा गया था, तो किसी का आधा, किसी की एक टाग नहीं उठती थी, तो किसी के दोनो हाय झूल गये थे । किसी का मुह खुला है तो खुला ही है, जबडा ही नही बन्द होता । मुह से बरावर गदी लार टपकती रहती है, त्रिशकु की तरह। किसी को आखे कौडी की तरह बाहर निकल आई हैं और पलके ही नही बद होती। चौबीसो घटे वह घूरता ही रहता है, शनीचर की तरह । किसी की रीढ़ के अन्दर सरिया डाल कर तखत से जकड़ दिया गया है, तो किसी के घुटने मे राड का टुकड़ा घुसेड़ कर वजनी प्लेट नीचे लटका दी गई है। कोई महीनो से अचेत हादसा: 143 । . पड़ा है, तो किसी को नीद ही नही आई, कई महीनो से । एक-एक आदमी की खोपड़ी चार-चार वार चीरी गई थी। शरीर के अंगों को कई-कई बार चीरा-फाड़ा, काटा गया था, भेड़-बकरियो की तरह । वस साहब यह सम- झिए कि विक्षिप्त लोगों की वह एक अलग दुनिया ही थी। जो एक बार अन्दर चला गया, वह साबुत बाहर नहीं निकल पाया।" बयान करते-करते उनके चेहरे पर पसीना चुहचुहा आया। आखों की पुतलिया नाचने लगी, होठ थरथराने लगे, चेहरा पीला पड़ गया, जैसे मौत का पजा उनके गले पर कसता जा रहा हो। मुझे लगा, मैं भी पागल हो जाऊंगा, ये सब बाते सुन-सुन कर । "छोड़िए साहब, आप सावुत निकल आये न । भूल जाइए उस दुनिया को अब।" मैंने बात टालने की कोशिश की। "आप क्या समझते हैं, मैंने भुलाने की कम कोशिश की। लेकिन डाक्टरो ने जो एक वहम धरा दिया है, वह निकलता ही नहीं, दिमाग से । बस यही लगता है कि कोई काला साया हमेशा मडराता रहता है, सिर पर।" "ओह, यह तो बहुत बुरी वात है । लेकिन मुझे तो लगता है, यह वहम वेबुनियाद है । दिमाग से ये सब बाते निकाल दीजिए। जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं । अब आप भले-चगे दीखते है । छोडिए इस बात को । और कोई बात करिए।" मैंने फिर वात पलटने की कोशिश की, क्योकि धीरे-धीरे मेरे अन्दर भी भय समाता जा रहा था और पहले कभी की गई अपनी ऊल- जलूल हरकतो को मैं अपने दिमाग की खराबी से जोड़ने लगा था। "कोशिश तो मैं बहुत करता हूं। लेकिन उस मशीन की घरघराहट, दिमाग के फोटो उतरते ही नही चित्त से।" "कौन-से चित्र?" अनायास मेरे मुह से निकल गया। "वही जो कंट स्कैन, मेरा मतलब है, घरघराने वाली मशीन से लिये गये थे । जानते हैं, वडे अस्पताल में पहुचते ही मेरे केस की फाइल बन गई। एक डाक्टर भाटिया आये । उनके हाथ मे दिमाग के ढर सारे एक्सरे थे। मेरे वेड के पास खड़े होकर, रोशनी के सामने, वह एक-एक चित्र देखने लगे। इतने सारे चित्र देखकर मैं तो घबरा गया। देखने-परखने के बाद 144 हादसा उन्होने सारे एक्सरे एक लिफाफे में डालकर मेरे पैताने रख दिया। उन्होंने कुछ और डाक्टरो को बुलवाया। दो-तीन नसें कुछ औजार ले आई। मुझे करवट कर दिया गया और घुटनों को नाक से सटा दिया गया। रीढ़ धनुष की तरह बाहर निकल गई। चार आदमियो ने मुझे कस कर पकड़ लिया। फिर मेरी पीठ पर कोई ठडी चीज लगाई गई और रीढ की हड्डियों में कोई मोटी सुई घुसेड़ दी गई। ओफ ! साहब, मत पूछिए, इतना भयंकर दर्द हुआ कि लगा कोई वहुत मोटा जलता हुआ राड मेरी रीढ में डाल दिया गया हो । मेरा तो मेरुदण्ड ही टूट गया। लगा, टूटकर शरीर के दो खण्ड हो गये । मुझे गश आ गया और थोड़ी देर के लिए मैं बेहोश हो गया, होश आया तो डाक्टर जा चुके थे। लेकिन जो भयकर शूल उठनी शुरू हुई, तो बस यही लगे साहब, कि ब्रह्मांड फट जायेगा। न हिलते-डलते बने, न बोलते-खासते बने, न उठते-बैठते बने। शरीर में जरा-सी भी हरकत हो कि शूले बढ जाये। पहली वार लगा साहब, आदमी का पूरा शरीर उसके मेरुदण्ड पर ही टिका है।" "ओफ, बडी तकलीफ उठानी पड़ी आपको।" "अरे साहब, तकलीफ की आप बात कर रहे हैं, तकलीफ तो आगे सुनिए," कहते-कहते उनका मुह खुला का खुला रह गया, जैसे वह कहीं खो गये हो। मुझे तो लगा कोई हादसा न हो जाय उनके साथ । डर के मारे मैं अपने-आपको खीचने का प्रयास करने लगा। "हा माहब, तो मैं कह रहा था कि डाक्टर भादिया ने बताया कि आपके दिमाग की कुछ शिराए निष्क्रिय हो गई हैं या अन्दर गांठ पड गई है, जिसके कारण बाया अंग अपाहिज हो गया है। दिमाग का आपरेशन करना पड़ेगा। लेकिन उसके पहले कल सुवह आपका एंजियोग्राम टेस्ट किया जाएगा। मैं तो साहब, एकदम डर गया। जानते हैं, एंजियोग्राम टेस्ट क्या होता है ? यह जो गला है न, गला, इममे से दो मोटी-मोटी नसें ऊपर दिमाग की ओर जाती । इसी मे एक नस पचर करके, एक फाइवर ग्लास अन्दर दिमाग तक डाला जाता है और वाहर से दिमाग के अदरूनी हिस्से का फोटो लिया जाता है।". "तो क्या हुआ सुबह में, टेस्ट हुआ आपका?"

हादसा: 145 "मैं तो उनके चंगुल में फस ही चुका था। सुबह इंजेक्शन वगैरह लगाकर टैस्ट वेड कर ले गये और साहब सीधा सुलाकर गले में दायीं तरफ करीब पचासों सुइयां भक-भक उन्होंने कोची होंगी । लेकिन डाक्टर अनाड़ी था, नस नहीं मिली। मेरे सिर के ऊपर टी० वी० कमरा लगा हुआ था, जिससे टेस्ट का चित्र डाक्टरो की एक क्लास मे टेलीकास्ट हो रहा था। बड़े डाक्टर वही क्लास में ही थे। सूइया कोंचते-कोंचते जब मेरा गला छलनी हो गया, और मेरे हाथ-पैर तड़पते-तड़पते ठंडे पड़ने लगे, तो बड़ा डाक्टर क्लास से भागा-भागा आया और उस अनाड़ी डाक्टर पर बरस पड़ा। फिर मुझे वार्ड में पहुंचा दिया गया।" "चलिए जान बची और लाखों पाये।" "अरे साहब जान कहा बची? इसके बाद और भी बड़ी आफत आई। क्या हुआ कि शाम को डाक्टर भाटिया फिर आये और कहे कि एंजियोग्राम टेस्ट तो फेल हो गया। बिना दिमाग की अदरूनी हालत जाने आपरेशन करना ठीक नही होगा । सो कल सुबह फोर वेसल टेस्ट होगा।" "यह कैसा टेस्ट होता है ?" मैंने आश्चर्य से पूछा । "यह जो खोपड़ी है न, इसके अन्दर दिमाग के चार हिस्से होते हैं। बाये तरफ का दिमाग, शरीर के दाहिने हिस्से के अगो को नियन्त्रित करता है और दाईं तरफ का दिमाग वाये हिस्से को...।" "अच्छा । यह तो नई चीज बताई आपने।" "हां तो फोर वेसल टेस्ट में ये जो जाघ का पट्टा होता है न, पट्टा, वहा से दो मोटी-मोटी नसे नीचे टांगों को ओर जाती हैं। कमर से ऊपर ये ही नसे जाकर रीढ़ की मोटी नस मे मिल जाती हैं । इसी पट्टे की नस को काटकर, इसमे से रीढ की नस में होते हुए, लम्बा फाइबर ग्लास का पतला पाइप दिमाग तक चढ़ाया जाता है और फिर बाहर से दिमाग के अन्दर का फोटो लिया जाता है। और जानते है, नसों की धड़कन के साथ यह पाइप धीरे-धीरे दिमाग तक, काफी समय में, चढ़ता है । यह बहुत ही घातक और कष्टकर टेस्ट है । इसमे रोगी अपाहिज भी हो जाता है।" कहते-कहते उनके रोंगटे जैसे खड़े हो गये । बदन कापने लगा और गला मान।

146: हादसा ऐसा कष्टकर टेस्ट सुनकर मेरे अन्दर भी झुरझुरी दौड़ गई और एक अदृश्य भय की छाया मुझे ग्रसने लगी। मन मे आया, उठकर कही और बैठ जाऊ या अगले स्टेशन पर गाड़ी से उतर जाऊं। मुझे अपने अंगों के सूने पड़ने की आशंका होने लगी। "मेरे सामने वाले वेड पर एक रोगी तीन महीने पड़ा था।" शून्य मे आखें गडाये वह फिर आगे बोलने लगे, "उसकी बीवी बता रही थी कि छत पर गुड्डी उडाते समय वह सिर के बल नीचे गिर पड़ा और सरिया का एक टुकड़ा सिर मे धस कर एक आख से पार हो गया। अन्दर की गुद्दो क्षत-विक्षत हो गई, जिससे नीचे का सारा शरीर अपाहिज हो गया। उसके दिमाग के चार आपरेशन हो चुके थे, पर वह ठीक नहीं हो पाया था । एक आख तो निकल ही गई थी। उसके गड्ढे से बराबर बदबू- दार पीब का स्राव होता रहता था। जब रोगी होश मे रहता तो दर्द से तड़पता रहता । इसलिए उसको दवा देकर बराबर नीद में रखा जाता था। जानते है, उसका क्या हुआ। एकाएक आधी रात को वह जाग गया और दर्द से तड़पने लगा । चौथा आपरेशन अभी हाल मे ही हुआ था। दर्द के मारे छटपटाते हुए वह बेड की पाटी पर सिर पटकने लगा । बैंडेज खुल गया, खोपड़ी के टाके फट गए और खून-पीव से सना हुआ भेजा बाहर झूल गया। औरत चीखने लगी। नम आई, डाक्टर आए। भेजा अन्दर डालकर फिर मे पट्टी वाधी गई, पर सब बेकार । थोड़ी देर बाद सफेद चादर से लाश ढक दी गई।" मुझे मितली आने लगी, सिर घूमने लगा। मैंने हथेलियो से कस कर आखे बन्द कर ली। जी मैं आया चीख पडू। वस भाई बस । अव और अधिक सुनने की हिम्मत नहीं है । लेकिन मैं कुछ बोल नही पाया। वह बोले जा रहे थे, "मौत की ठडी सिहरन मेरी रगो में दौड़ गई। मुझे विश्वास हो गया कि प्रापरेशन के बाद मेरा भी यही हन होगा। जी में आया उठ कर भाग जाऊ, अस्पताल से, पर अग जैसे निष्प्राण हो गए। मैं मुर्दे की तरह पलग पर पड़ा-पड़ा छत निहारता रहा। दूसरे दिन कोई नेता मर गया । अस्पताल में छुट्टी हो गई । मेरा टेस्ट नहीं हुआ ।" "चलिए अच्छा हुआ। अब आप थोड़ा आराम कर लें। रायबरेली आ हादसा: 147 रही है । यहा कॉफी अच्छी मिलती है। कहिए तो ले आऊं।" मैंने फिर प्रसग बदलने के विचार से कहा । "देखिए साहब, आप फिर कॉफी पिला कर मुझे मेरा मतलब है, वह हादसा दोहराना चाहते हैं।" वह खिन्न हो गए। मैंने अपनी भूल कर दांतों-तले जीभ काट ली। "लेकिन साहब कुछ भी हो। उस नेता ने स्वयं मरकर मेरी तो जिन्दगी बचा ली।" राहत की सांस लेते हुए उन्होने कहा । "सो कसे?" मेरे मुह से अनायास निकल गया। "न नेता मरता, न उस दिन अस्पताल बन्द होता। फिर तो मेरा फोर वसल टेस्ट करके, आपरेशन करके, मार ही डालते डाक्टर लोग।" "तो फिर आप बचे कसे?" "वही तो कह रहा हू । मेरी बगल मे पन्द्रह-सोलह साल का एक और किशोर रोगी था । कभी क्रिकेट खेलते समय उसके सिर मे गेद लग गई थी। कुछ वर्ष बाद उसके दिमाग के अन्दर का घाव पककर फोड़ा बन गया। विपत्ति का मारा वह भी उसी अस्पताल में आ मरा। दो वार सिर का आपरेशन हुआ, पर फोड़ा ठीक नही हुआ । उसको रह-रह कर सिर में भयंकर दर्द उठता और वह उछलने-कूदने लगता । जब पीप की ढेर सारी के हो जाती तो दर्द कम हो जाता । दूसरे दिन शाम को उसको वैसा ही दर्द उठा। छटपटाता रहा। उसकी मा डाक्टरों के पीछे दौड़ने लगी। फिर एकाएक अललल पीप की के होने लगी। पीप के साथ क में खून और मास के लोथड़े भी गिरने लगे। सारा वार्ड सड़ाध की बू से गंधा उठा। पास- पड़ोस के मरीजों को मितली आने लगी। कै करते-करते उसकी आखे उलट गई, जैसे मुझे ही घूर रहा हो, क्योकि चेहरा मेरी तरफ था। फिर उसको दो तीन हिचकियां आई और फिर हाथ-पैर काप कर।" "छोडिए भी साहब, उन बातों को । अब तो भूल जाइए मुझे मितली आने लगी थी। "वही तो मैंने किया। मैंने ठान लिया कि अब वहा से चाहे जैसे हो भाग जाना है, क्योकि वहा रहने का मतलब था मौत । नसं से कहा, डाक्टरों से गिड़गिड़ाया पर किसी ने छुट्टी नहीं दी। करीब आधी रात के बाद, 148 हादसा जब सब सो गए, धीरे से मैं वार्ड से बाहर निकल आया और तीढियो से भागता हुआ जब निचले तले पर पहुचा और गैलरी से पिछली चहार- दीवारी को ओर भागने लगा कि सामने से एक चौकीदार ने कड़क कर आवाज लगाई, 'कौन है।' मैं दाहिनी ओर की गैलरी मे मुड़ गया, जिधर अधेरा अधिक था और भागता हुआ गैलरी के छोर पर बने एक कमरे में घुस गया। वह आदमी मेरा पीछा करता हुआ कमरे तक आया। मैं झट से किसो लम्बी ताबूत जैसी चीज के पीछे जमीन पर लेट गया। उस आदमी ने कमरे में आकर बत्ती जलाई, चारो तरफ नजर दौड़ाई और फिर बत्ती बुझाकर 'साला कर्नल का भूत अभी तक दौड़ रहा है।' कहता हुआ हनुमान चालीसा पढने लगा और जल्दी में दरवाजा भेड़कर तेजी से वहां से चला गया। अन्दर मेरा तो बुरा हाल हो गया । लगा किसी भी क्षण दम निकल जायेगा, दिल की धड़कन बन्द हो जायेगी। मेरी रूह काप उठी, कलेजा पत्ते की तरह हिलने लगा और पसीने से मैं नहा उठा।" "क्यो ऐसा बुरा हाल क्यों हो गया आपका ?" मैंने हैरत से पूछा "अरे साहब वह मुर्दाघर था और में लाशों के बीच लेट गया था । ओफ ! ऐसी बदबू भरी थी कमरे में, लगा कि पूरा फेफड़ा ही सड़ जायेगा।" मेरी घिन्धी बंध गई। रोगटे खड़े हो गये । लगा, उस मुर्दाघर की सड़ाध यहा भी फैल गयी है। मेरे इर्द-गिर्द सड़ी लाशें पड़ी है। वहा बैठना मेरे लिए मुश्किल हो गया । शौचालय के बहाने, उठकर में वहां से जाने को हुआ कि उन्होने फिर कहना शुरू किया। "मैं अधिक देर तक उन मुदों के बीच में रहता तो डर कर मर जाता। मैंने सोचा, जो होगा, देखा जायेगा । कुछ ही क्षणों में दरवाजा खोलकर मैं वाहर की ओर वेतहामा भागा । वही चौकीदार बाहर सहन में जोर-जोर से हनुमान चालीसा पढ़ते हुए डहा पौट रहा था। मुझे भागते देखकर 'भूत- भूत' चिल्लाता हुआ, गिरता-महराता वह दूसरी ओर को भागने लगा। इतने मे में पिछली चहारदीवारी फाद कर सड़क पर आ गया था।" कहते- कहते वह जोरी से हाफने लगे, में कई मोल से दौड़ कर आ रहे हों।

हादसा: 149 शरीर पस्त हो गया था। चेहरा पीला जर्द हो गया था, जैसे मुद्दे का चेहरा हो । आखों की कापती पुतलियों मे मौत की मंडराती छाया स्पष्ट झलक रही थी। मुझे लगा, कही इनको कुछ हो न जाय । मेरा बदन भी वेकाबू हो रहा था । कलेजे की थरथराहट रुक नहीं रही थी। "जानते हैं, अस्पताल वाले टेस्ट केस बनाकर, मुझ पर खोज करना चाहते थे। अपने ट्रेनी डाक्टरो को प्रशिक्षण देना चाहते थे, जैसे प्रयोग- शालाओं मे बन्दरों, चूहो और जानवरो के साथ किया जाता है । गोया मै आदमी नहीं बन्दर हू, जानवर है। लेकिन साहब जब-जब उस नागिन की याद आती है, उसके दश की जहरीली लहर मेरे दिलो-दिमाग पर छाने लगी है । मन मछली की तरह तड़पने लगता है और दिमाग में ढेर सारे सपोले रेगने लगते है। तब यही लगता है, बस मै अब गया तब गया।" कहते-कहते उनकी आवाज डूबती गई और वह आंखें बन्द करके वर्थ पर लेट गये। फिर थोड़ी देर बाद बोले, "यह धूप पीली क्यों हो रही है ?" मुझे वड़ा अजीब लगा । मैंने कहा, "साहब, अब तो अंधेरा हो गया है। धूप कहा है ! लखनऊ आने वाला है। शाम के साढ़े सात बज रहे "ये लाल-पीली हरी-नीली ढेर सारी बत्तिया क्यों जल उठी "गाडी गुफा मे क्यो उतर रही है. मेरा सिर"मेरा सिर फट रहा है-पलके.." पलके नहीं खुल रही है.'च'च'''ओफ ये सुइया क्यों चुभ रही हैं." आह, मेरा कलेजा छलनी हुआ जा रहा है। अरे अरे हाथो-परों में भी सुइयां चुभ रही है साहब"साहब कोई टिकिया-विकिया है "दवा है... मेरी जेब में डायरी "एक डायरी है। आप पढ ले जरूर पढ़ ले मेरा सिर''मेरा हाथ मेरा पैर''अरे-रे कुछ नही उठ रहा है दर्द सुइया "गुफा'"ककाल''मुर्दाघर मुर''दा"घर" "बोलते बोलत वह बेहोश हो गये। मेरे हाथ-पाव फूल गये। मन में आमा, चुपचाप भाग जाऊं, पर रेलवे का अधिकारी भाई होने के नाते मैं ऐसा नही कर सका। इतने में गाड़ी लघनऊ स्टेशन पर पहुच आई। मैंने दौड़कर कडक्टर से कोई डाक्टर बुताने के लिए कहा। कडक्टर डाक्टर की जगह जीबार०पी० को पुलिन

150 हादसा
बुला लाया। पुलिस मे आते ही पहले मुझे पकड़ लिया और फिर उनके जेवों
की तलाशी लेने लगी । उपर की जेब से एक डायरी निकली, जिसमें लिखा
था--
गोपाल तिवारी, सहायक इजीनियर,
उत्तर रेलवे मुख्यालय, बडौदा हाउस,
नई दिल्ली।
अकाल मृत्यु की स्थिति मे, कृपया मूचित करे
श्रीमती गीता तिवारी, पत्नी
श्री महेश तिवारी, पुत्र
कु० रीता तिवारी, पुत्री
एक्स-वाई-22, सरोजिनी नगर,
नई दिल्ली।
मुख्य कार्मिक अधिकारी,
मुख्य लेखा अधिकारी,
उत्तर रेलवे मुख्यालय,
नई दिल्ली।
प्रबन्धक, जीवन बीमा निगम,
कस्तूरबा गांधी मार्ग, नई दिल्ली।
वेतन बिल यूनिट नं0 4578
भविष्य निधि खातान. 11428
जीवन बीमा पालिसी नं. 5266772
स्टेट बैंक एकाउंट नं.-एल सी 5276
बड़ोदा हाउस, नई दिल्ली।

हादसा: 151 पुलिस सारा विवरण नोट करती गई । बीच-बीच मे वह मुझसे भी बेतुके प्रश्न करती रही । मेरे तो हाथ-पाव फूल गये। ये सज्जन खुद तो गये ही, साथ मे मुझे भी लपेटते गये। दिल घबडाने लगा, सिर दर्द से फटने लगा। आखो के आगे लाल-पीली, हरी-नीली चिनगारियां फूटने लगी। लगा, अन्दर दर्द के सपोले रेंग रहे हैं। हाथो-परों में सुइयां चुभ रही हैं। मैं बेचैन हो उठा । कही उनके हादसे की छाया मेरे ऊपर भी तो नही मडरा रही है । इतने में गार्ड ने सीटी दे दी । गाड़ी चलने वाली थी। पुलिस ने लाश नीचे उतार ली और मेरा नाम-पता नोट करने के बाद मुझे छोड़ दिया। लड़खड़ाता हुआ मैं स्टेशन से बाहर जाने की कोशिश करने लगा। मुद्रफ रुचिका प्रिण्टर्स, नवीन शाहदरा, दिल्ली-32 981

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Hadsa

Author
Raja Ram Singh
Title
Hadsa
File name
Hadsa
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/03
Publisher
Rajpal & Sons Kashmiri Get Dehli
Language
Sanskrit
Pages
159
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551124
Barcode
4990010031896.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
n2yMoJLmFrs
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