Shree Abhya Jain Granthalya,bikaner

Vrihad Dravya Sangrah

Shri Nemichand Sidhantidev · 2011/07

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प्रशासक- गवनीमाई छगनमाई देसाई ऑस्यवस्थापक, परम प्रमावरुमंडल श्रीमद्राजचन्द्र जैनशाखमाला दाजचन्द्र आक्षम. स्टेदान अगास, पोस्ट बोरीआ. हाया आगंद (गुजरात) PLE 7 Mave मेन्द्र प्रेम aara (Tririt) ..

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[६] निरही धान्मा द्वारा दिए गए निरपृहापूर्ण विचार भी मैंने किए हैं। अमरत्वको सिद्धि और मणिरत्यकी सिद्धि पर मैंने खूब मनन किया है। अल्पवयमें ही मैंने महान् विचार हर साले हैं. और महान पिचित्रताकी प्राप्ति हुई है। यहां तो अपनी समुच्चय क्य- पयां लिखता जन्मसे मान वर्षकी बालवय नितान्त खेल कूदमें ही व्यतीत हुई थी। उस समय मेरी आमा अनेक प्रकारकी विचित्र कल्पमाएं उत्पन्न हुआ करती थीं । खेल कूद में भी नमन और राजराजेश्वर जैसी ऊँची पदवी प्राप्त करने की मेरी परम अभिलाषा - . है , मी अधिक प्रयल दी कि बैंसी स्मृति इस कालमें, इस क्षेत्रमें बहुत ही थोड़े होगी। मैं पड़ने में प्रमादी या. यात बनाने में होशियार खिलाड़ी और बहुत यस समय शिक्षक पाठ पढ़ाता था उसी समय पढ़कर मैं उसका २. दिरा गा; यस. इतने से मुझे छुट्टी मिल जाती थी । मुझमें प्रोति और p :: :: .. म मिाता पाहता था। सबमें मातभाव हो तो सुख यह TETो सामाणिक रूप में रहता था । मनुष्यों में किसी भी प्रकार १३. मेरा पन्तःकरण रो पड़ा था। आठवें वर्ष में मैंने कविता ... करने पर बादशात्र के नियमानुकूउ थी । ४. काय सोये अनेक प्रकार के और भी बहुत से अन्य देय १. विद्या था ! :: :: :: : : मायने । म वयमें मैंने उनके कृष्ाकीर्तन ." RET पाकर गरे थे. निममे मुझे उन अवतारों में " , :. ? ..: मी, भोर महामजी नामो साधुसे मैंने बार- ..:: :: :: ५१ . # या दर्शन करने जाता था, अनेक .:..:... मापा मार र मुग्यानीमाया करता " ... ६. ! x x x गुजराती मा पारशालाको ii१४... व्यापार मोहन हो गया था। 1 * 12 पायता बनाम नहीं बन सकता, .:: Art! 21 रिमा-पूजन अमद्धालु ....... मन मियाको मनिता * :: :: riti मद नई यो । ६.. - " -

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[१०] । उनका करना बन्द कर दिया था। इससे सहज ही अनुमान किया जा सकता है शि. वे कौति आदिसे कितने निरपेक्ष थे। उनके जीवनमें पद पद पर सच्ची धार्मिकता प्राय दिलाई देती थी। वे? वर्ष की उम्र में व्यापारार्थ क्वाणिया से बम्बई आए । वहां सेठ रेवाकर जगजीवनदास की दुकान में भागीदार रहकर जवाहरातका धन्धा करते रहे । ने व्यापार में अत्यन्त कुशल थे। ज्ञानयोग तथा कर्मयोगका इनमें यथार्थ गन्दर देना जाता था। व्यापार करते हुए भी श्रीमद्जीका लक्ष्य आत्माकी ओर गिरना। इनके ही कारण उस समय मोतियोंके बाजार में श्रीयुत रेवाशंकर जगजीवनदास की पेली नामी पंडियों में एक गिनी जाती थी। स्वयं श्रीमद्जीके भागीदार श्रीयुत मानिसका लामाई को इनकी व्यवहारकुशलताके लिये अपूर्व बहुमान था। उन्होंने सपने क प रसगमे मझा था कि "श्रीमद राजचन्द्र के साथ लगभग १५ वर्ष तक परिचय 1. सममें सात आठ वर्ष तो मेरा उनके साथ अत्यन्त परिचय रहा था। लोगोंमें refraiपयो परम्परका महत्त्व कम हो जाता है, परन्तु मैं कहता हूं कि उनकी १RRER की कि उनके प्रति मेरा श्रद्धामात्र दिन प्रतिदिन बढ़ता ही गया। ने प्रकारको कठिनाइयां भावी थीं, उनके सामने श्रीमद्जी एक अडोल mer हो । मैंने उन्हें जद यस्तुओंकी चिन्तासे चिन्तातुर नहीं देखा । ximer भोर रहते थे। किसी विषयमें मतभेद होने पर भी हृदयमें REETE 27 । स एवंगा महार करते थे।" HTTEनिमम अत्यन्त अधिक आत्मतत्वमें निष्णात * : ? मामा को महसा नहीं थी। वे मोचते थे कि धन पार्थिव * है. भयापीया आमाको शाशन शान्ति प्रदान करनेवाला 1. मी रामा, राग्य-गंगा का भाण्ड प्रवाह ! "यो । म RT मागको से अमूल्य गमाते थे । ::.:.: + * : पार हो जाते। x .'' " र प्राविधित जिममें उनकी बार - am - Rs. 41 भारत ने मारे * , *. १२६, 4:18. मन भाया -

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[१६] - इस श्लोकके अनुसार श्रोचामुण्ड नामा राजा महा अमात्य (बहे मंत्री य मुपादित हुए। एक दिन राजमल श्रीचामुण्ड सहित सभामें विराज रहे थे। उस समय किसी सेठो मार प्रणाम करके कहा कि, “महाराज ! उत्तरदिशामें एक पोदनापुर नगर है, यहाँपर श्रीभरतामयी द्वारा स्थापित कायोत्सर्ग श्रीबाहुबलीका प्रतिबिम्ब है, जोकि वर्तमानमें 'गोमट्ट इस नवीन नामो भूपित है।" इत्यादि । इस वृत्तान्तको सुनकर राजा व श्रीवामुण्ड मंत्री दोनों अत्यंत हगित हुए। श्रीचामुण्ड उक्त प्रतिबिम्बको भावनमस्कार करके घर गये और सब वृत्तान्त अपनी माता कालिका को कह सुनाया। जिसको श्रवण कर वह बहुत आनंदित हुई और तत्काल अपने गुम नामुण्डसहित जिन- मंदिरमें जाकर श्रीजिनेन्द्रकी स्तुति करने के पश्चात् अपने गुर(अगितसेन) के गुरु श्रीसिंहनन्दी आचार्यको नमस्कार किया। तदनन्तर- पश्चात्सोऽजितसेनपण्डितमुनि देशीगणाग्रेसरं स्वस्याधिप्यसुखाधिवर्द्धनशशी श्रीनन्दिसङ्घाधिपम् । श्रीमद्भासुरसिंहनन्दिमुनिपाध्यम्भोजरोलम्यक चानम्य प्रवदत्सुपौदनपुरोश्रीदोर्वलेवृत्तकम | वा.व.च. २८ ।। इस श्लोकके अनुसार श्रीचामुण्डने देपोयगणमें प्रधान श्राअजितसेन मुनिको नमस्कार करके श्रीवाहुवलीके प्रतिविम्व संबंधी समाचार कहे । और "मैं जबतक श्रीवाहुवलीके प्रतिबिंबका दर्शन न करूंगा तबतक दूध नहीं पीऊंगा" इस प्रकारकी प्रतिज्ञा उनके समक्ष धारण की। वहाँसे आकर राजाको अपनी यात्राका मनोरथ प्रकट किया, और- "सिद्धान्ताम्भोधिचन्द्रः प्रणुतपरमदेशीगणाम्भोधिचन्द्रः स्याद्वादाम्भोधिचन्द्रः प्रकटितनयनिक्षेपवाराशिचन्द्रः। एकश्चक्रौपचन्द्रः पदनुतकमलबातचन्द्रः प्रशस्तो जीयाज्ज्ञानाधिचन्द्रो मुनिपकुलवियञ्चन्द्रमा नेमिचन्द्रः ॥ वा.व.च. ६२ ॥ सिद्धान्तामृतसागरं स्वमतिमन्थक्ष्माभृदालोड्य यः लेभेऽभीष्टफलप्रदानपि सदा देशीगणाग्रेसरः । श्रीमद्गोमटलब्धिसारविलसत्त्रैलोक्यसारामर- क्ष्माजश्रीसुरधेनुचिन्तितमणीन् श्रोनेमिचन्द्रो मुनिः ।। वा. ब. च. ६३ ।। इत्यादि गुणोंके धारक श्रीनेमिचन्द्रस्वामी सहित श्रीचामुण्डने अपनी माताको, अनेक नोंको तथा चतुरंगसेनाको साथ लेकर गोमट्टस्वामीकी यात्राके निमित्त उत्तर दिशाको गमन किया। कितने ही योजन गमन करके विध्याचल पर्वतके समीप पहुंचे। वहाँ किसीसे पर्वतपर स्थित जिनमंदिरका (१) 'सेठको पोदनपुरमें गोमट्टस्वामीका अस्तित्व कैसे मालूम हुआ ?' इस शंकाका समाधान नहीं हुना (२) गोमट्टसारकी एक गाथासे विदित होता है कि श्रीअजितसेनके विद्यागुरु श्रीमार्य मुनि थे । (३) पूर्व जैनमतागमाधिविधुवच्छोनन्दिसंघे भवन् , सुज्ञानद्धितपोधनाः कुवलयानन्दा मयूखा इव । सत्सङ्घ भुवि देशदेशनिकरे श्रीसुप्रसिद्ध सति, श्रोदेशीयगणो द्वितीयविलसन्नाम्ना मिथः कथ्यते । वा.व.च. ८७ ॥” इसके अनुसार जब नंदिसंघके आचार्य और मुनि संपूर्ण देशोंमें व्याप्त तथा प्रसिद्ध हो गये, तव नंदिसंघ "देशीयगण" इस नामसे कहा जाने लगा।

[ १७ पता पाकर वहां गये और श्रीजिनेन्द्रकी पूजा स्तुति करके रात्रिको उसी जिनमन्दिरके मंडपमें निवास किया । रात्रिके चतुर्थ प्रहरमें धोनेमिचन्द्र, चामुण्ड और चामुण्डकी माता इन तीनोंसे कूष्माण्डीने' स्वप्नमें कहा कि, "पोदनपुर जानेका मार्ग कठिन है। इस पर्वतमें रावणद्वारा स्थापित श्री बाहुवलीका प्रतिविम्ब है। वह धनुषमें सुवर्गके बाण चढ़ाकर उनसे पर्वतको भेदनेपर प्रकट होगा ।" प्रातःकाल चामुण्डने मुनिको स्वप्नका वृत्तान्त निवेदन किया। जिसको सुनकर मुनिने स्वप्न के अनुकूल प्रवृत्ति करनेका उपदेश दिया । तदनुसार चामुण्ड ने स्नान करके भूप- जोसे भूपित होकर, मुनिके समक्ष उपवास धारण करके, दक्षिणदिशामें खड़े होकर धनुपदारा सुवर्णका याण चलाया । जिससे पर्वतमें छिद्र होकर वहांपर-- "द्विपश्चतालसमलक्षणपूर्णगात्रो, विंशच्छरासनसमोन्नतभासमूचिः । सन्माधवीव्रतविनागलसत्सुकायः, सद्यः प्रसन्न इति बाहुबली बभूव ।। वा.व.च. ४३ ।। इस श्लोकके अनुसार दशतालसम, लक्षणोंसे पूर्ण शरीरका धारक और २० धनुप परिमाण ऊंचा श्रीबाहुबलीका प्रतिविम्ब प्रकट हुआ । राजाने बड़ी भक्तिसे दर्शन किये और विधिपूर्वक १००० कलशोंसे श्री बाहुबलीके मस्तकपर पंचामृताभिषेक किया। और पूजन तथा नमस्कार करके धन्य हुआ। फिर वहाँसे दक्षिणमें आकर- कल्क्यन्दे घशताख्ये विनुतविभवसंवत्सरे मासि चैत्रे पञ्चम्यां शुक्लपक्षे दिनमणिदिवसे कुम्भलग्ने सुयोगे । सौभाग्ये मस्तनाम्नि प्रकटितभगणे सुप्रशस्तां चकार श्रीमच्चामुण्डराजो वेल्गुलनगरे गोमटेशप्रतिष्ठाम् ॥ वा.ब.च. ५५ ।। इसके अनुसार कल्की (शक)के संवत् ६०० (वि. सं. ७३५) में श्रीचामुण्डने चैत्र शुक्ला पंचमी रविवारके दिन श्रवणवेल्गुल नगरमें श्रीगोमटस्वामीकी प्रतिष्ठा की, और "भास्वद्देशोगणाग्रेसरसुरुचिरसिद्धान्तविन्नेमिचन्द्र- श्रीपादाने सदा पण्णवतिदशशतद्रव्यभूप्रामवर्यान् । दत्त्वा श्रीगोमदेशोत्सवसवननिमित्तार्चनावैभवाय श्रीमच्चामुण्डराजो निजपुरमथुरा संजगाम झितीशः ।। वा.व.च . ६१ ॥". इस श्लोकके अनुसार श्रीचामुण्डने श्रीनेमिचन्द्रस्वामीके चरणोंकी साक्षीपूर्वक ध्यान हजार दीनार (मोहर)के गांव श्री गोमटस्वामीके उत्सव, अभिषेक व पूजन आदिके निमित्त देकर वहाँसे गमन करके (१) 'कूष्मांडो' यह एक जिनशासन देवी है अर्थात् २२ वें तीर्थंकर श्रीनेमिनाथस्वामीको यक्षिणी है और नामकुमांडिका, चण्डी, अम्बिका, इत्यादि इसीके नामान्तर हैं। (२)ताल (हस्त) यह प्रतिमाके निर्माणमें परिमाणविशेषताका नाम है । क्योंकि, अन्यमतियोंके सूर्य- सिद्धान्तमें "भवबीजाकुरमथना अष्टमहापातिहार्यविभवसमेताः। ते देवा दशतालाः शेषा देवा भवन्ति..नवताला: 1" अर्थात् श्रीजिनेन्द्रको प्रतिमा दश १० तालको होती हैं और अन्य सब देवोंको प्रतिमा नौ ९ तालकी होती है । ऐसा लिखा हुआ है। (३) यहाँ कल्की व कलिके संवत्से शक संवत् को ग्रहण करना चाहिये । (४) दीनार यह ३२ रत्ती भर सुवर्णका सिक्का है । ऐसा कोपोंपरसे जान पड़ता है। - [१८] .. - - गाजे वाजे सहित.अपनी मथुरापुरीमें प्रवेश किया । और अपने स्वामी राजमल्लसे सब वृत्तान्त गाहा। जिसको श्रवण, कर महाराजा राजमल्लदेवने.भी श्रीनेमिचंद्रस्वामीके समीप टेढ़ लारा १५०००० दीनारोंके गांव श्रीगोमटस्वामीको सेवा आदिके निमित्त प्रदान किये। और चामुण्डमंत्रीको धन्य धन्य कहकर जिनमतके प्रभावनार्थ राय पद दिया। उसी दिनसे चामुण्ड "श्रीचामुण्डराय" रा नामसे आज तक प्रसिद्ध हैं । . इस उक्त कथापरसे निस्सन्देह विदित होता है कि, श्रीनेमिचंद्रस्वामी नंदिसंघस्थ देशीयगणके मुनीश्वर थे । शक सं० ६०० (वि० सं० ७३५) में द्राविडदेशस्थ मथुरा नगरी किंवा दक्षिणप्रान्तकी भूमिको अपने चरणकमलोंसे पवित्र करते थे। तत्कालीन महाराजा राजमल्लदेव तथा श्रीचामुण्ट- रायराजाके अतिशय माननीय थे। श्रीसिंहनन्दी और श्रीअजितसेन नामक दो आचार्य भी आपने समकालीन थे । गोमट्टसार लब्धिसार और त्रिलोकसार आदि परमादरणीय सिद्धान्तशास्त्रों के निर्माता भी ये ही श्रीनेमिचंद्र' थे। इत्यादि, इत्यादि । परंतु आजकलके समयमें एक कथासे इतिहाससंवन्धी विषयपर सर्वसाधारणको विश्वास नहीं होता है। अतः इस उक्त विषयको सिद्ध करनेके लिये यथाप्राप्त अन्य प्रमाण दे देना भी हम उचित समझते हैं। वे प्रमाण ये हैं :- १. गोमट्टसारशास्त्रके अन्तमें स्वयं श्रीनेमिचंद्राचार्यने निम्नलिखित गाथायें दी हैं :- "जहि गुणा विस्संता गणहरदेवादिइडिपत्ताणं । सो अजियसेणणाहो जस्स गुरू जयउ सो राओ ॥१॥ सिद्धंतुदयतडुग्गयणिम्मलं वरणेमिचंदकरकलिया । गुणरयणभूसणम्बुहिम इवेला भरहु मुअणतलं ॥२॥ गोमट्टसंगहसुत्तं गोमट्टसिहरुवरिगोमट्टजिणो य । गोमट्टरायविणिम्मिय दक्षिणकुक्कुडजिणो जयउ ।। ३॥ . नेण विणिम्मिय पडिमावयणं सव्वदृसिद्धिदेवेहिं । सम्वपरमोहिजोगिहिं दिट्ट सो गोम्मटो जयउ ।।४॥" इत्यादि । गोमट्टसारकी संकृतटीकानुसार इन गाथाओंका भावार्थ यह है कि-"गणघर तथा ऋद्धिधारी मुनियोंके गुणोंके धारक श्रीअजितसेन जिसके व्रत गुरु हैं, वह चामुण्डरायराजा जयवंता रहो । १ । सिद्धान्तरूपी उदयाचलसे उदयको प्राप्त हुए ऐसे श्रीनेमिचंद्ररूपी चंद्रमाकी वचनरूप किरणोंसे स्पर्शित गुणरलभूपण (श्रीचामुण्डराय) समुद्रको बुद्धिरूप वेला ( तट व किनारा ) भुवनतलको पूर्ण कर ।.२ । गोमट्टसार, चामुण्डरायके. मंदिरमें विराजमान एक हाथ परिमाण ऊंची इन्द्र- नीलमणि ( नीलम ) की श्रीनेमिनाथजिनेन्द्रकी प्रतिमा और चामुण्डराय द्वारा बनवाया हुआ दक्षि- (१) सुनते हैं कि नेमिचंद्रसंहिता अथवा नेमिचंद्रप्रतिष्ठापाठके कर्ता भी ये नेमिचंद्र हैं ! (२) श्रवणवेल्गुलकी गुफाके दक्षिणपार्श्वमें शाके १०५० का खुदा हुआ जो शिलालेख है, उसमें श्रीजितसेनके विषयमें "गुणाः कुन्दस्पन्दोइमरसमरा वागमृतवाः, प्लवप्रायःप्रेयः प्रसरस- रसा कीतिरिव सा । नखेन्दुर्योत्स्ना पचयचकोरप्रणयिनी, न कासा श्लाघानां पद्म- जितसेंनो प्रतिपतिः ॥१॥" इत्यादि पद्य लिखे हुए हैं । (३) इस एक हाथकी नीलमफी प्रतिमाका वर्तमानमें कहीं भी पता नहीं लगता है। अतः प्रतीत होता है कि, दुष्ट राजाओंके समयमें यह भी खंड खंड हो गई [१९] . कुक्कुड जिन' ये तीनों जयवंते रहें। ३ । जिसकी बनाई हुई प्रतिमाके मुखको सर्वार्थसिद्धिके देवोने बोर परमावधिज्ञानके धारक मुनियोंने देखा, वह गोमट्ट (चामुण्ड) राजा जयवंता रहो । ४ ।" : .. .२. गोमट्टसारको कर्णाटकवृत्तिके अनुसार संस्कृतटीकाकारने टीकाके प्रारंभमें निम्नलिखित गद्य दिया है:- श्रीमदप्रतिहतप्रभावस्याद्वादशासनगुहाभ्यन्तरनिवासिप्रवादिसिन्धुरसिंहायमान-सिंह- नन्दिनन्दितगङ्गावंशललाम-राजसवैज्ञाधनेकगुणनामधेयभागधेय- श्रीमद्राजमल्लदेवमहीव- लममहामात्यपदविराजमान-रणरङ्गमल्ल-असहायपराक्रम-गुणरजभूपग-सम्यक्त्वरत्ननि- लयादिविविधगुणनामसमासादितकीर्तिकान्त -श्रीमचामुण्डरायप्रश्नानुरूप गोमट्टसारनाम- धेयपश्चसंग्रहशास्त्रं प्रारममाणः श्रीमान्नेमिचन्द्रसैद्धान्तिकचक्रवर्ती समस्तसैद्धान्तिकजन- प्रख्यातविशदयशा विशालमूर्तिरसी भगवान् गोमट्टसारप्रथमावयवभूतं जीवकाण्ड विर. चयंस्तदादी मलगालनादि फलजननसमर्थ मङ्गलं कृतवान् । इसका संक्षिप्त भाव यह है कि, स्याद्वादमतरूपी गुफामें सिंहके समान विराजमान और श्रीसिंह- नन्दी आचार्यके प्रभावसे वृद्धिको प्राप्त ऐसा जो गंगवंशतिलक राजमल्लदेव महाराजा है, उसके महामात्य श्रीचामुण्डरायके प्रश्नके अनुसार गोमट्टसार बनाने के इच्छुक श्रीनेमिचन्द्रसैद्धान्तिकचक्र- वर्तीने निर्विघ्न समाप्तिके अर्थ मंगल किया। ३. थॉमस सी राईसने मलबारकाटली रिव्यू में जो "कर्णाटकमें जैनियोंका निवास" नामक लेख छपाया है, उसमें लिखा है कि, “मैसूरके जैनराजोंमें अतिप्रसिद्ध विल्लालवंसके राजा थे। जो कि, पहिले द्वारासमुद्रमें राज्य करते थे । पीये शृङ्गापटामके बारह १२ मील उत्तरको तोनूरके शासक हुए । इनका आधिपत्य पूर्ण कर्णाटकटमें था । अर्थात् जहाँ जहाँ कनाडी मापा बोली जाती थी, उन्हीं प्रदेशोंके ये शासनकर्ता (राजा) थे। इस बिल्लाल वंशके स्थानक चामुण्डराय थे । जिनका कि राज्य सन् ७१४ ईस्वीमें था। ४. मराठी भापाके तत्त्वप्रसारक नामक समाचारपत्रमें जो श्रवणवेलगोलाका इतिहास नामक लेख छपा है, उसमें स्थलपुराणके आधारसे यह लिखा हुमा है- दक्षिण मयुराका राजा चामुण्डराय जैनी था। वह क्षत्रियकुलके प्रसिद्ध पांडुवंशमें उत्पन्न हुआ था। एक बार वह अपने परिवारसहित राज्यचिन्होंको धारण किये हुए पोदनापुरके गोमटेश्वरकी वंदनाके लिये चला। और उस समय उसने भागमें मिलकेवाले १२५४ जिनदेवोंके दर्शन करने का भी निश्चय किया। तदनुसार जब, वह अनेक क्षेत्रोंकी वंदना करके मार्गातिक्रम कर रहा था, उस (१) 'दक्षिण कुक्कुड जिन' यह श्रवणवेल्गुलमें विराजमान श्रीगोमट्टस्वामीकी विशाल प्रतिमाका ही नामान्तर प्रतीत होता है । (२) गोमट्टस्वामीकी प्रतिमा बनवानेसे लोगोने चामुण्डरायका 'गोमट्ट' यह नाम प्रसिद्ध कर दिया। ऐसा अनुमान होता है। । (३) इस चतुर्य प्रमाणसे पूर्वोक्त कयाके कई अंशामें विरोध आता है। परंतु इन दोनों में कौन सत्य है, इसका निर्णय करनेके लिये अभी हमारे पास कोई साधन नहीं है। (४) शास्त्रोंने आगरेके पास जो मयुरा है वह रनर मयुरा लौर द्राविर देशको मथुरा दक्षिण मथुरा के नामसे प्रसिद्ध है।

। । । बृहद्रव्यसंग्रहः। शिष्टो जीवः । "विस्ससोडगई" यद्यपि व्यवहारेण चतुर्गतिजनककर्मोदयवशेनोर्ध्वाधस्ति- र्यग्गविस्वभावस्तथापि निश्चयेन केवलज्ञानाद्यनन्तगुणावाप्तिलक्षणमोझगमनकाले विस्रसा स्वभावेनोर्ध्वगतिश्चेति । अत्र पंदखण्डनारूपेण शब्दार्थः कथितः, शुद्धाशुद्ध नयद्वयविभागेन नयार्थोऽप्युक्तः । इदानीं मतार्थः कथ्यते । जीवसिद्धिश्चार्वाकं प्रति, ज्ञानदर्शनोपयोगल- झणं नैयायिक प्रति, अमूर्तजीवस्थापन भट्टचार्वाकद्वयं प्रति, कर्मकर्तृत्वस्थापनं सांख्य, प्रति, स्वदेहप्रमितिस्थापनं नैयायिकमीमांसकसांख्यत्रयं प्रति, कर्मभोक्तृत्वव्याख्यानं बौद्धं प्रति, संसारस्थव्याख्यानं सदाशिवं प्रति, सिद्धत्वव्याख्यानं भट्टचार्वाकद्वयं प्रति, ऊर्ध्वग- तिस्वभावकथनं माण्डलिकग्रन्थकारं प्रति, इति मतार्थो ज्ञातव्यः । आगमार्थः पुनः "अस्त्यात्मानादिवद्धः"नाभावःसिद्धिरिष्टाइत्यादि प्रसिद्ध एव ।शुद्ध नयाश्रितं जीवस्वरूपमुपादेयं, शेष च हेयम् । इति हेयोपादेयरूपेण.भावार्थोऽप्यवबोद्धव्यः । एवं शब्दनयमतागमभावार्थो यथासम्भवं व्याख्यानकाले सर्वत्र ज्ञातव्यः । इति जीवादिनवाधिकारसूचनसूत्रगाथा ॥२॥ अतः परं द्वादशगाथाभिर्नवाधिकारान् विवृणोति, तत्रादौ जीवस्वरूपं कथयतिः- "विस्ससोडगई" स्वभावसे ऊर्ध्वगमन करनेवाला है । यद्यपि व्यवहारसे चारगतियोंको उत्पन्न करनेवाले कर्मों के उदयके वशसे ऊंचा, नीचा तथा तिरछा गमन करनेवाला है तथापि निश्चयसे केवलज्ञान आदि अनंत गुणोंकी प्राति स्वरूप जो मोम है उसमें जाने के समय स्वभावसे ऊर्ध्वगमन करनेवाला है। यहां पर पदखंडना रूपसे (खंडान्वयकी रीतिसे) शब्दका अर्थ कहा और शुद्ध तथा अशुद्ध इन दोनों नयोंके विभागसे नयका अर्थ भी कहा है । अब मतका अर्थ कहते हैं । चार्वाकके प्रति जीवकी सिद्धि की गई है, नैयायिकके प्रति जीवका ज्ञान तथा दर्शन उपयोगमय लक्षण है यह कथन है, भट्ट तथा चार्वाकके प्रति जीवका अमूर्त स्थापन है, सांख्या के प्रति आत्मा कर्मका कर्ता है ऐसा व्याख्यान है, आत्मा अपने शरीर प्रमाण है यह स्थापन नैयायिक, मीमांसक और सांख्य इन तीनोंके प्रति है, आत्मा कर्मोंका भोक्ता है यह कथन बौद्धके प्रति है, आत्मा संसारस्थ है ऐसा व्याख्यान सदाशिवके प्रति है, आत्मा सिद्ध है यह कथन भट्ट और चार्वाकके प्रति है, जीवका ऊर्ध्वगमन करना स्वभाव है यह कथन इन सव मतोंके ग्रंथकारोंके प्रति है । ऐसा मतका अर्थ जानना चाहिये । और अनादिकालसे कर्मोंसे बँधा हुआ आत्मा है इत्यादि आगमका अर्थ तो प्रसिद्ध ही है । शुद्धनयके आश्रित जो जीवका स्वरूप है वह तो उपा- देय (ग्रहण करने योग्य) है और बाकी सर्व हेय है । इस प्रकार हेयोपादेयरूपसे भावार्थ भी समझना चाहिये । ऐसे शब्द नय मत आगमार्थ भावार्थ यथासंभव व्याख्यानके समयमें सवं जगह जानना चाहिये । इस प्रकार जीव आदि नव अधिकारोंको सूचना कर- नेवाली गाथा समाप्त हुई. ।। २॥ अब इसके आगे द्वादश. (१२) गाथाओंसे नव अधिकारोंका विवरण करते हैं, उनमें प्रथम ही जीव का स्वरूप कहते हैं। बृह०२ - -- ओमद् राजचन्द्रजैनशानमालायाम् तिकाले चदुपाणा इंदियबलमाउआणपाणो य । ववहारा सो जीवो णिच्छयणयदो दु चेदणा जस्स ॥३॥ व्याख्या-"तिक्षाले चदुपाणा" कालत्रये चत्वारः प्राणा भवन्ति । ते के "इंदियबळ- माउआणपाणो य" अतीन्द्रियशुद्धचैतन्यप्राणात्प्रतिशत्रुपक्षभूतः क्षायोपशमिक इन्द्रियप्राणः, अनन्तवीर्यलक्षणवलप्राणादनन्तैकभागप्रमिता मनोवचनकायवलप्राणाः, अनाद्यनन्तशुद्धचै- तन्यप्राणविपरीततद्विलक्षणः सादिः सान्तश्चायुः प्राणः, उच्छ्वासपरावर्तोत्पन्नखेदरहितवि- शुद्धचित्प्राणाद्विपरीतसश आनपानप्राणः । “ववहारा सो जीवो" इत्थंभूतैश्चतुर्भिर्द्रव्य- भावप्राणैर्यथासंभवं जीवति जीविष्यति जीवितपूर्वो वा यो व्यवहारनयात्स जीवः द्रव्ये- न्द्रियादिव्यप्राणा अनुपचरितासद्भूतव्यवहारेण, भावेन्द्रियादिः क्षायोपशमिकभावप्राणाः पुनरशुद्ध निश्चयेन । सत्ताचैतन्यवोधादिः शुद्धभावप्राणाः निश्चयनयेनेति "णिच्छयणयदो दु चेदणा जस्स" शुद्धनिश्चयनयतः सकाशादुपादेयभूता शुद्धचेतना यस्य स जीवः, एवं "वच्छरक्खभवसारिच्छ, सग्गणिरयपियराय । चुल्लयहंडिय पुण मडठ, णव दिटुंता जाय ॥ १ ॥” इति दोहककथितनवदृष्टान्तैश्चार्वाकमतानुसारिशिष्यसंवोधनार्थ जीवसिद्धि- व्याख्यानेन गाथा गता ॥ ३ ॥ । गाथाभावार्थ:-तीनकालमें इन्द्रिय, बल, आयु, और आनपान इन चारों प्राणोंको जो धारण करता है वह व्यवहारनयसे जीव है और निश्चयनयसे जिसके चेतना है वही जीव है ॥३॥ व्याख्यार्थः--"तिकाले चदुपाणा" तीनकालमें जीवके चार प्राण होते हैं। वे कोनसे "इंदियबलमाउआणपाणो य" इंद्रियोंके अगोचर जो शुद्ध चैतन्य प्राण है उसके प्रति शन्नुपक्षभूत झायोपशमिक ( क्षयोपशमसे उत्पन्न ) इंद्रिय प्राण है, 'अनन्त वीर्यरूप जो बलप्राण है उसके अनन्त भागोंमेंसे एक भागके प्रमाण मनोबल, वचनवल और काय- बलरूप प्राण हैं, अनादि, अनन्त तथा शुद्ध जो चैतन्य (ज्ञान ) प्राण है उससे विपरीत ( उलटा) एवं विलक्षण सादि (आदिसहित ) और अन्तसहित आयु प्राण है, श्वासो- च्वासके आवागमनसे उत्पन्न खेदसे रहित जो शुद्ध चित् प्राण है उससे विपरीत. आन- प्राण अर्थात् श्वासोच्छ्वास प्राण है। "ववहारा सो जीवो" इस पूर्वोक्तप्रकार रूप धार द्रव्यमाणों और भावप्राणोंसे जो जीता है, जीवेगावा पहले जिया है यह व्यवहारनयसे जीव है। अनुपचरित असद्भत व्यवहारनयसे द्रव्येन्द्रिय आदि द्रव्य प्राण हैं, और भावेन्द्रिय मादि भायोपशमिक भावमाण अशुद्ध निश्चयनयसे हैं, तथा सत्ता, चैतन्य बोध आदि शुद्धभाव प्राण जो हैं वे निश्चयनयसे हैं । "णिच्छयणयदो दु चेदणा जस्स" शुद्ध- निमयनयके मवसे उपादेयभूत (ग्रहण करने योग्य ) शुद्धचेतना जिसके हो वह जीव माना गया है। इस प्रकार ""वच्छ रक्समवसारिच्छ सग्गणिरय पियराय । चुल्लय हरि- १. बोईना भारारं समझ में नहीं मारा (अनुवादक) sa - बृहद्रव्यसंग्रहः। अथ गाथात्रयपर्यन्तं ज्ञानदर्शनोपयोगद्वयं कथ्यते । तत्र प्रथमगाथायां मुख्यवृस्या दर्शनोपयोगव्याख्यानं करोति । यत्र मुख्यत्वमिति वदति तत्र यथासंभवमन्यदपि विव- मितं लभ्यत इति ज्ञातव्यम् :- उवओगोदुवियप्पो दसणणाणं च दंसणं चदुधा । चक्खु अचक्खू ओही दंसणमध केवलं गेयं ॥४॥ ध्याख्या-"उवओगो दुवियप्पो” उपयोगो द्विविकल्पः "दसणणाणं च" निर्विकल्पक दर्शनं सविकल्पकं ज्ञानं, च पुनः “दसणं चदुधा"दर्शनं चतुर्धा भवति"चक्खु अचक्खू ओहो इंसणमध केवलं णेयं” चक्षुर्दर्शनमचक्षुदर्शनमवधिदर्शनमथ अथो केवलदर्शन मिति विज्ञे- यम् । तथाहि-आत्मा हि जगत्त्रयकालत्रयवर्तिसमस्तवस्तुसामान्यग्राहकसकलविमलकेव- लदर्शनस्वभावस्तावत् पश्चादनादिकर्मबन्धाधीनः सन् चक्षुर्दर्शनावरणक्षयोपशमावहिरङ्गद्र- व्येन्द्रियालम्बनाच मूर्तसत्तासामान्यं निर्विकल्पं संव्यवहारेण प्रत्यक्षमपि निश्चयेन परो- क्षरूपेणैकदेशेन यत्पश्यति तच्चक्षुर्देर्शनम् । तथैव स्पर्शनरसनघ्राणश्रोत्रेन्द्रियावरणक्षयोपश- मत्वात्स्वकीयस्वकीयबहिरङ्गद्रव्येन्द्रियालम्वनाञ्च मूत्तं सत्तासामान्य विकल्परहितं परोक्ष- य पुण मडउ णव दिटुंता जाय १" इस दोहेमें कहे हुए नव दृष्टान्तोंद्वारा चार्वाकमतानुयायी शिष्योंको समझाने के लिये जीवकी सिद्धिके व्याख्यानसे यह गाथा समाप्त हुई ।। ३ ।। अब तीन गाथा पर्यन्त ज्ञान तथा दर्शनरूप दो उपयोगोंका वर्णन करते हैं। उनमें भी प्रथम गाथामें मुख्यतासे दर्शनोपयोगका व्याख्यान करते हैं। जहांपर यह कथन हो कि अमुक विषयका मुख्यता (प्रधानता ) से वर्णन करते हैं, वहाँपर गौणतासे अन्य विषयका भी यथासंभव कथन मिलेगा, यह जानना चाहिये - गाथार्थः-दर्शन और ज्ञान इन भेदोंसे उपयोग दो प्रकारका है। उनमें चक्षुर्दर्शन, अचक्षुर्दर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन इन भेदोंसे दर्शनोपयोग चार प्रकारका जानना चाहिये ॥४॥ . .. व्याख्यार्थः-दर्शन और ज्ञान इन भेदोंसे उपयोग दो प्रकारका है। उनमें दर्शन तो निर्विकल्पक है और ज्ञान सविकल्पक है । और दर्शनोपयोग चक्षुर्दर्शन, अचक्षुर्दर्शन, अवधि- दर्शन तथा केवलदर्शन इन भेदोंसे चार प्रकारका होता है, यह जानना चाहिये। इसका विशेप वर्णन इस प्रकार है कि प्रथम तो आत्मा तीनलोक और भूत, भविष्य तथा वर्त- मानरूप तीनों कालोंमें रहनेवाले संपूर्ण द्रव्यसामान्यको ग्रहण करनेवाला जो पूर्ण निर्मल केवलदर्शन स्वभाव है उसका धारक है, पश्चात् (फिर ) अनादि कर्मबंधके आधीन होके चक्षुर्दर्शनावरणके क्षयोपशमसे अर्थात् नेत्रद्वारा जो दर्शन होता है उस दर्शनको रोकनेवाले कर्मके क्षयोपशमसे तथा बहिरंग द्रव्येन्द्रियके आलम्बनसे मूर्त सत्तासामान्यको जो कि संन्यवहारसे प्रत्यक्ष है तो भी निश्चयसे परोक्षरुप है उसको एक देशसे विकल्परहित । - १२ - श्रीमद् रांजचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् रूपेणैकदेशेन यत्पश्यति तदचक्षुर्दर्शनम् । तथैव च मनइन्द्रियावरणश्योपशमात्सहकारि- कारणभूताष्टदलपद्माकारद्रव्यमनोऽवलम्बनाञ्च मूर्त्तामूर्तसमस्तवस्तुगतसत्तासामान्यं वि- कल्परहितं परोक्षरूपेण यत्पश्यति तन्मानसमचक्षुर्दर्शनम् । स एवात्मा यदवधिदर्शनाव- रणक्षयोपशमान्मूतवस्तुगतसत्तासामान्यं निर्विकल्परूपेणैकदेशप्रत्यक्षेण यत्पश्यति तदव- विदर्शनम् । यत्पुनः सहज शुद्धसदानन्दैकरूपपरमात्मतत्त्वसंवित्तिप्राप्तिबलेन केवलदर्शना- वरणक्षये सति मू"मूर्तसमस्तवस्तुगतसत्तासामान्यं विकल्परहितं सकलप्रत्यक्षरूपेणैकस- मये पश्यति तदुपादेयभूतं क्षायिक केवलदर्शनं ज्ञातव्यमिति ॥४॥ अथाष्टविकल्पं ज्ञानोपयोगं प्रतिपादयतिः- णाणं अट्ठवियप्पं मदिसुदिओही अणाणणाणाणि । मणपजवकेवलमवि पञ्चक्खपरोक्खमेयं च ॥ ५ ॥ व्याख्या-"णाणं अट्ठवियप्पं" ज्ञानमष्टविकल्पं भवति । “मदिसुदिओहोअणाणणा- णाणि" अत्राष्टविकल्पमध्ये मतिश्रुतावधयो मिथ्यात्वोदयवशाद्विपरीताभिनिवेशरूपाण्यज्ञा- जैसे हो तैसे जो देखता है वह चक्षुर्दर्शन है; वैसेही स्पर्शन, रसन, व्राण तथा श्रोत्रेन्द्रि- यके आवरणके क्षयोपशमसे और निज निज बहिरंग द्रव्येन्द्रियके आलम्बनसे मूर्च सत्तासा- मान्यको परोक्षरूप एकदेशसे जो विकल्परहित देखता है वह अचक्षुर्दर्शन है और इसी- प्रकार मन इन्द्रियके आवरणके क्षयोपशमसे तथा सहकारी कारणभूत जो आठ पांखड़ीके कमलके आकार द्रव्य मन है उसके अवलम्बनसे मूर्त तथा अमूर्त ऐसे समस्त द्रव्योंमें विद्यमान सत्तासामान्यको परोक्षरूपसे विकल्परहित जो देखता है वह मानस अचक्षुदर्शन हे और वही आत्मा जो अवधिदर्शनावरणके क्षयोपशमसे मूर्त्तवस्तु में प्राप्त सत्तासामान्यको एकदेशप्रत्यक्षसे विकल्परहित देखता है. वह अवधिदर्शन है और जो सहज शुद्ध चिदा- नन्द रूप एक स्वरूपका धारक परमात्मा है उसके तत्त्वज्ञानके बलसे केवल दर्शनावरणके क्षय होनेपर मूर्त अमूर्त समस्त वस्तुमें प्राप्त सत्तासामान्यको सकल प्रत्यक्षरूपसे एकसम- यमें विकल्परहित जो देखता है उसको दर्शनावरणकर्मके झयसे उत्पन्न और ग्रहण करने योग्य केवलदर्शन जानना चाहिये ॥४॥ अब आठ विकल्प (भेद ) सहित जो ज्ञानोपयोग है, उसका कथन करते हैं:- गाथाभावार्थ:--कुमति, कुश्रुत, कुअवधि, मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवल ऐसे आठ प्रकारका ज्ञान है। इनमें कुअवधि, अवधि, मनःपर्यय तथा केवल ये चार प्रत्यक्ष हैं और शेष चार परोक्ष हैं ॥५॥ व्याख्यार्थः-"णाणं अट्ठवियप्" ज्ञान आठ प्रकारका है। "मदिसुदिओही अपाणणाणागि" उन आठ प्रकारके भेदोंके मध्यमें मति, श्रुत तथा अवधि ये तीन मिथ्या- त्यो रदयके वासे विपरीत अभिनिवेशरूप अज्ञान होते हैं (इसीसे कुमति, कुश्रुत तथा 1.4 बृहद्रव्यसंग्रहः। 'नानि भवन्ति, तान्येव शुद्धात्मादितत्त्व विषये विपरीताभिनिवेशरहितत्वेन सम्यग्दृष्टिजीवस्य सम्यग्ज्ञानानि भवन्ति । "मणपन्नवकेवलमवि" मनःपर्ययज्ञानं केवलज्ञानमप्येवमष्टविध ज्ञानं भवति, "पञ्चक्खपरोक्खभेयं च" प्रत्यक्षपरोक्षभेदं च अवधिमनःपर्ययद्वयमेकदेशप्र- त्यक्षं, विभङ्गावधिरपि देशप्रत्यक्षं, केवलज्ञानं सकलप्रत्यक्षं शेषचतुष्टयं परोक्षमिति । इतो विस्तर:-आत्मा हि निश्चयनयेन सकलविमलाखण्डेकप्रत्यक्षप्रतिभासमयकेवलज्ञानरूपस्ता- चत् । स च व्यवहारेणानादिकर्मबन्धप्रच्छादितः सन्मतिज्ञानावरणीयक्षयोपशमाद्वी- र्यान्तरायक्षयोपशमाञ्च बहिरङ्गपञ्चेन्द्रियमनोऽवलम्बनाच मूर्तीमूर्त वस्त्वेकदेशेन विक- ल्पाकारेण परोक्षरूपेण सांव्यवहारिकप्रत्यक्षरूपेण वा यज्जानाति तत्झायोपशमिकं मति- ज्ञानम् । किञ्च छद्मस्थानां वीर्यान्तरायक्षयोपशमः केवलिनां तु निरवशेषक्षये ज्ञानं चारि- त्राद्युत्पत्तौ ‘सहकारी सर्वत्र ज्ञातव्यः । संव्यवहारलक्षणं कथ्यते--समीचीनो व्यवहारः संव्यवहारः । प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणः संव्यवहारो भण्यते । संव्यवहारे भवं सांव्यवहारिक प्रत्यक्षम् । यथा घटरूपमिदं मया दृष्टमित्यादि। तथैव श्रुतज्ञानावरणक्षयोपशमानोइन्द्रि- यावलम्बनाच प्रकाशोपाध्यायादिबहिरङ्गसहकारिकारणाच मूर्तीमूतवस्तुलोकालोकव्याप्ति- कुअवधि [विभंगावधि)) ये इनके नाम हैं तथा वे ही मति, श्रुत तथा अवधि ज्ञान शुद्ध आत्माआदि तत्त्वके विषयमें विपरीत अभिनिवेशके अभावके कारण सम्यग्दृष्टि जीवके सम्य- रज्ञान हो जाते हैं (इस रीतिसे मति आदि तीन अज्ञान और तीन ज्ञान उभयस्वरूप होनेसे ज्ञानके ६ भेद हुए ) तथा "मणपज्जवकेवलमवि" मनःपर्यय और केवलज्ञान ये दोनों मिलके ज्ञानके आठ भेद हुए। “पञ्चक्खपरोक्खभेयं च' इन आठोंमें अवधि और मनःपर्यय ये दोनों तथा विभंगावधि तो देशप्रत्यक्ष हैं और केवलज्ञान सकल प्रत्यक्ष है, शेप (वाकीके ) कुमति, कुश्रुत, मति और श्रुत ये चार परोक्ष हैं। अब यहांसे विस्ता- रपूर्वक वर्णन करते हैं। जैसे-आत्मा निश्चयनयसे संपूर्णरूपसे विमल. तथा अखंड जो एक प्रत्यक्षज्ञानस्वरूप केवलज्ञान है उस ज्ञानस्वरूप है और वही आत्मा व्यवहारनयसे अनादिकालके कर्मबंधसे आच्छादित होकर, मतिज्ञानके आवरणके क्षयोपशमसे तथा वीर्या- न्तरायके क्षयोपशमसे और बहिरंग पांच इन्द्रिय तथा मनके अवलम्वनसे मूत्त और अमूर्त्तवस्तुको - एक देशसे विकल्पाकार परोक्षरूपसे अथवा सांव्यवहारिक प्रत्यक्षरूपसे जो जानता है वह क्षायोपशमिक मतिज्ञान है। अब यहॉपर विशेष यह जानना चाहिये कि छद्मस्थोंके तो वीर्यान्तरायका भयोपशम सर्वत्र ज्ञान चारित्र आदिकी उत्पत्तिमें सहकारी कारण है और केवलियोंके वीर्यान्तरायका सर्वथा क्षय जो है वह ज्ञान चारित्र आदिकी उत्पत्तिमें सर्वत्र सहकारी कारण है। अव सांव्यवहारिक प्रत्यक्षका लक्षण लिखते हैं-समीचीन अर्थात् प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप जो व्यवहार है वह संव्यवहार कहाता संव्यवहार में जो हो सो सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष है। जैसे-यह घटका रूप मैंने देखा : इत्यादि ।. ऐसेही श्रुतज्ञानावरण कर्मके झयोपशमसे और नोइन्द्रियके अवलम्बसे प्रकाश ।

: - - . है १४ भीमद् राजपन्द्रजैनशाखमालायाम् ज्ञानरूपेण यदस्पष्टं जानाति तत्परोक्षं श्रुतज्ञानं भण्यते । किरच विशेपः-शब्दात्मकं श्रुत- शानं परोक्षमेव तावत्, स्वर्गापवर्गादिबहिर्विषयपरिच्छित्तिपरिज्ञानं विकल्परूपं तदापि परोक्षं, यत्पुनरभ्यन्तरे सुखदुःख विकल्परूपोऽहमनन्तज्ञानादिरूपोऽइ मिति वा तदीषत्परो- मम् , यञ्च निश्चयभावश्रुतज्ञानं तच्च शुद्धात्माभिमुखसुखसंवित्तिस्वरूपं स्वसंवित्त्याकारेण सविकल्पमपीन्द्रियमनोजनितरागादिविकल्पजालरहितत्वेन निर्विकल्पम् , अभेदनयेन तदे- पात्मशब्दवाच्यं वीतरागसम्यक्चारित्राविनाभूतं केवलज्ञानापेक्षया परोक्षमपि संसारिणां झायिकज्ञानाभावात् क्षायोपशमिकमपि प्रत्यक्षमभिधीयते । अत्राह शिष्यः-आद्ये परोक्ष- मिति तत्त्वार्थसूत्रे मतिश्रुतद्वयं परोक्षं भणितं तिष्ठति कथं प्रत्यक्षं भवतीति । परिहारमाह- तदुत्सर्गव्याख्यानम्, इदं पुनरपवादव्याख्यानं, यदि तदुत्सर्गव्याख्यानं न भवति तहिं मतिज्ञानं कथं तत्त्वार्थे परोक्ष भणितं तिष्ठति । तकैशाखे सोन्यवहारिक प्रत्यक्षं कथं जातं । यथा अपवादव्याख्यानेन मतिज्ञानं परोक्षमपि प्रत्यक्षज्ञानं तथा स्वात्माभिमुखं भावभूत- ज्ञानमपि परोक्षं सत्प्रत्यक्षं भण्यते। यदि पुनरेकान्तेन परोक्षं भवति तर्हि सुखदुःखादिसं- और अध्यापक आदि सहकारी कारणके संयोगसे मूर्त तथा अमूर्त वस्तुको लोक तथा अलोककी व्याप्तिरूप ज्ञानसे जो अस्पष्ट जानता है उसको परोक्ष श्रुतज्ञान कहते हैं और इसमें भी विशेष यह है कि शब्दात्मक (शब्दरूप ) जो श्रुतज्ञान वह तो परोक्ष ही है तथा स्वर्ग, मोक्ष आदि वाह्य विषयमें बोध करानेवाला विकल्परूप जो ज्ञान है वह भी परोक्ष है और जो आभ्यंतरमें सुख दुःख विकल्परूप है मैं अनन्त ज्ञान आदिरूप हूं इत्यादि ज्ञान है वह ईपत् (किंचित् ) परोक्ष है तथा जो भावश्रुत ज्ञान है वह शुद्ध आत्माके अभिमुख (सन्मुख ) होनेसे सुखसंवित्ति (ज्ञान) स्वरूप है और वह निज आत्मज्ञानके आफारसे सविकल्प है तो भी इन्द्रिय तथा मनसे उत्पन्न जो विकल्पसमूह है उनसे रहित होने के कारण निर्विकल्प है और अभेद नयसे वही आत्मज्ञान इस शब्दसे कहा जाता है। तथा वह रागरहित जो सम्यक्चारित्र है उसके विना नहीं होता है। यद्यपि यह केवलज्ञानकी अपेक्षा परोक्ष है तथापि संसारियों को क्षायिक ज्ञानको प्राप्ति न होनेसे झायोपशमिक होनेपर भी प्रत्यक्ष कहलाता है। यहांपर शिष्य आशंका करता है कि हे गुरो, "आये परोक्षम् " इस तत्त्वार्थसूत्र में मति और श्रुत इन दोनों ज्ञानोंको परोक्ष कहा है फिर आप इसको प्रत्यक्ष कैसे कह्ते हो? अब शंकाका परिहार इस प्रकार करते है कि "आये परोक्षम्" इस सूत्र में जो श्रुतको परोक्ष कहा है सो उत्सर्ग व्याख्यान है थोर यह जो हमने कहा है कि भाव श्रुतज्ञान प्रत्यक्ष है सो उस उत्सर्गका बाधक जो अपवाद है उसकी अपेक्षा से है। यदि तत्त्वार्थसूत्रमें उत्सर्गका कथन न होता तो तत्वार्थसूत्रमें मतिज्ञान परोक्ष कैसे कहा गया है ? और यदि वह सूत्र में परोक्ष ही कहा गया ६ तो तफैशानमें सौव्यवहारिक प्रत्यक्ष कैसा हुआ? इसलिये जैसे परोक्षरूप भी मतिज्ञानको प्रत्यक्ष ज्ञान कहा गया है वैसेही निज आत्माके सन्मुख अथवा . अपवाद व्याख्यानसे बृहद्रव्यसंग्रहः। १५ वेदनमपि परोक्षं प्राप्नोति न च तथा। तथैव च स एवात्मा अवधिज्ञानावरणीयक्षयोपश- मान्मूर्त वस्तु यदेकदेशप्रत्यक्षेण सविकल्पं जानाति तदवधिज्ञानम् । यत्पुनर्मनापर्ययज्ञा- नावरणक्षयोपशमाद्वीर्यान्तरायक्षयोपशमाञ्च स्वकीयमनोऽवलम्बनेन परकीयमनोगत मूर्त- मर्थमेकदेशप्रत्यक्षेण सविकल्पं जानाति तदोहामतिज्ञानपूर्वक मनापर्ययज्ञानम् । तथैव निजशुद्धात्मतत्त्वसम्यक्श्रद्धानज्ञानानुचरणलक्षणकाप्रध्यानेन केवलज्ञानावरणादिधातिचतु- ध्यक्षये सति यत्समुत्पद्यते तदेव समस्तद्रव्यक्षेत्रकालभावग्राहकं सर्वप्रकारोपादेयभूतं केवलज्ञानमिति ॥५॥ अथ ज्ञानदर्शनोपयोगद्वयव्याख्यानस्य नयविभागेनोपसंहारः कथ्यते:- अट्ट चदु णाण देसण सामण्णं जीवलक्खणं भणियं । ववहारा सुद्धणया सुद्धं पुण दंसणं गाणं ॥६॥ व्याख्या-"अट्ठ चदु णाण देसण सामण्णं जीवलक्खणं भणियं" अष्टविधं ज्ञानं चतु- विधं दर्शनं सामान्य जीवलक्षणं भणितम् । सामान्यमिति कोऽर्थः संसारिजीवमुक्तजीव- भावश्रुतज्ञान है वह परोक्ष है तो भी उसको प्रत्यक्ष कहते हैं । और यदि एकान्तसे ये मति, भ्रत दोनों परोक्षही होवें तो सुख दुःख आदिका जो संवेदन (झान ) है वह भी परोक्षही होगा और वह संवेदन परोक्ष नहीं है। इसी रीतिसे वही आत्मा अवधिज्ञानावरणके झयोपशमसे मूर्त वस्तुको जो एकदेश प्रत्यक्षद्वारा सविकल्प जानता है वह अवधिज्ञान है। और जो मनःपर्ययज्ञानावरणके क्षयोपशमसे और वीर्यान्तरायके झयोपशमसे अपने मनके अवलम्बनद्वारा परके मनमें प्राप्त हुए मूर्त पदार्थको एकदेश प्रत्यक्षसे सविकल्प जानता है वह ईहामतिज्ञानपूर्वक मनःपर्यय ज्ञान कहलाता है। इसी प्रकार अपना जो आत्मद्रव्य है उसका भले प्रकार श्रद्धान करना, जानना और आचरण करना इन रूप जो एकाग्र ध्यान उससे केवलज्ञानावरणादि चार घातिया कर्मों का नाश होनेपर जो उत्पन्न होता है वह एक समय में समस्त द्रव्य, क्षेत्र, काल तथा भावको ग्रहण करने- वाला और सब प्रकारसे उपादेयभूत ( प्रहण करने योग्य ) केवलज्ञान है ॥५॥ अब ज्ञान तथा दर्शन इन दोनों उपयोगोंके व्याख्यानका नयके विभागसे उपसंहार कहते हैं:- गाथोभावार्थ: :--आठ प्रकारके ज्ञान और चार प्रकारके दर्शनका जो धारक है वह जीव है। यह व्यवहार नयसे सामान्य जीवका लक्षण है और शुद्ध नयसे शुद्ध जो ज्ञान दर्शन है वह जीवका लक्षण कहा गया है। व्याख्यार्थ:--"अट्ठ चदु णाण दंसण सामण्णं जीवलक्षणं मणियं" आठ प्रका- रका ज्ञान तथा चार प्रकारका दर्शन जो है सो सामान्य रूपसे जीवका लक्षण कहा है। वहांपर सामान्य इस कथनका यह तात्पर्य है इस झगमें संसारी जोव व मुक्त जोकको . .

बृहद्व्यसंग्रहः। २७ , -- - ., वणरस पंच गंधा दो फासा अह णिच्छया जीवे। णो संति अमुत्ति तदो ववहारा मुत्ति बंधादो ||७| व्याख्या-“वण्ण रस पञ्चगंधा दो फोसा अट्ठ णिच्छया जीवे णो संति" श्वेतपीत- नीलारुणकृष्णसंज्ञाः पञ्च वर्णाः, तिक्तकटुककषायाम्लमधुरसंज्ञाः पञ्च रसाः, सुगन्धदु- गन्धसंज्ञौः द्वौ गन्धौ, शीतोष्णस्निग्धरूक्षमृदुकर्कशगुरुलघुसंज्ञा अष्टौ स्पर्शाः, "णिच्छया" शुद्ध निश्चयनयात् शुद्धबुद्धकस्वभावे शुद्धजीवे न सन्ति । “अमुत्ति तदो” ततः कारणाद- मूतः, यद्यमूर्तस्तर्हि तस्य कथं कर्मबन्ध इति चेत् “ववहारा मुत्ति" अनुपचरितासद्भूतव्य- वहारान्मूतॊ यतस्तदपि कस्मात् "बंधादो" अनन्तज्ञानाद्युपलम्भलक्षणमोक्षविलक्षणादनादि- कर्मबन्धनादिति । तथा चोक्तं-कथंचिन्मू"मूर्तजीवलक्षणम्-"बंध पडि एयत्तं लक्खणदो, हवदि तस्स भिण्णत्तं । तम्हा अमुत्तिभावो गंतो होदि जीवस्स । ११" अयमत्रार्थ:- यस्यैवामूर्तस्यात्मनः प्राप्त्यभावादनादिसंसारे भ्रमितोऽयं जीवः स एवामूर्तो मूर्तपञ्चे- न्द्रियविषयत्यागेन निरन्तरं ध्यातव्यः । इति भट्टचार्वाकमतं प्रत्यमूर्तजीवस्थापनमुख्यत्वेन सूत्रं गतम् ॥७॥ उसके उदयसे व्यवहार नयको अपेक्षासे जीव मूर्त है तो भी निश्चयसे अमूर्त है ऐसा उपदेश देते हैं; गाथाभावार्थ:-निश्चयसे जोवमें पांच वर्ण, पांच रस, दो गंध, और पाठ स्पर्श नहीं हैं इसलिये जीव अमूर्त है और बंधसे व्यवहारकी अपेक्षा करके जीव मूर्त है ॥ ७॥ व्याख्यार्थः - "वण्ण रस पंच गंधादों फासा अट्ट णिच्छया जीवे णो संति" श्वेत, नील, पीत (पोला), रक्त (लाल) तथा कृष्ण ( काला ) ये पांच वर्ण; चरपरा, कडुवा, कषायला, खट्टा और मीठा ये पांच रस; सुगन्ध और दुर्गन्ध नामक दो गंध तथा ठंडा गरम, चिकना, रूखा, मुलायम, कठोर. (कड़ा), भारी और हलका यह आठ प्रकारका स्पर्श शुद्ध निश्चय नयसे शुद्ध, बुद्ध एक स्वभावका धारक जो शुद्ध जीव है उसमें नहीं है। "अमुत्ति तदो" इस हेतुसे यह जीव अमूर्ति है अर्थात् मूर्तिरहित है। शंका-यदि जीव मूर्तिरहित है तो मूर्तिसे शून्य जीवके कर्मका बंध कैसे होता है ? उत्तर-“ववहारा मुत्ति" यद्यपि अमूर्त है तथापि अनुपचरितअसद्भतव्यवहारसे मूर्त हैं अतः कर्मबंध होता है। शंका---यह मूर्तभी किस कारणसे है ? उत्तर "बंधादो"अनंतज्ञानादिको प्राप्तिरूप जो मोक्ष है उस मोझसे विपरीत अनादिकोंके बंधनसे है । और कथंचित् मूर्त तथा अमूर्तका लक्षण कहा भी है; जैसे-"बंधके प्रति जीवको एकता है और लक्षणसे उसकी भिन्नता है इसलिये जीवके अमूर्तभाव एकान्तसे नहीं है ।१।” यहांपर तात्पर्य यह है कि जिस अमूर्त आत्माको प्राप्तिके अभावसे इस जीवने अनादि संसार में परिभ्रमण किया है उसी अमूर्त शुद्धस्वरूप आत्माको मृर्त्त पांचों: इन्द्रियों के विषयोंका त्याग कर ध्याना चाहिये । इसप्रकार भट्ट और चार्वाकके मतके प्रति जीवको मुख्यतासे, अमूर्त स्थापन करनेवाला सूत्र समाप्त हुआ,७} : ?

१८ - - श्रीमद् राजचन्द्रजैनशानमालायाम् अथ निष्कियामूर्तटबोत्कीर्णज्ञायकैकस्वभावेन कर्मादिकर्तृत्वरहिवोऽपि जीवोन्यवहा- रादिनयविभागेन कर्त्ता भवतीति फथयति;- पुग्गलकम्मादीणं कचा ववहारदो दुणिच्छयदो। चेदणकम्माणादा सुद्धणया सुद्धभावाणं ॥८॥ व्याख्या-अत्र सूत्रे भिन्नप्रक्रमरूपव्यवहितसम्बन्धेन मध्यपदं गृहीत्वा व्याख्यानं क्रियते । “आदा" आत्मा "पुग्गलकम्मादीणं कत्ता ववहारदो दु" पुद्गलकर्मादीनां का व्यवहारतस्तु पुनः, तथाहि मनोवचनकायव्यापारक्रियारहितनिजशुद्धात्मतत्त्वभावना- शून्यः सन्ननुपचरितासद्ध तव्यवहारेण ज्ञानावरणाविद्रव्यकर्मणामादिशब्देनौदारिकवैकि- यिकाहारकशरीरत्रयाहारादिषट्पर्याप्तियोग्यपुद्गलपिण्डरूपनोकर्मणां तथैवोपचरितासद्भूव- व्यवहारेण बहिर्विषयघटपटादीनां च कर्त्ता भवति । "णिच्छयदो चेदणकम्माणादा" निश्च- यनयतश्चेतनकर्मणां तद्यथा रागादिविकल्पोपाधिरहितनिष्क्रियपरमचैतन्यभावनारहितेन यदुपार्जितं रागाद्युत्पादकं कर्म तदुदये सति निष्क्रियनिर्मलस्वसंवित्तिमलभमानो भावकर्म- शब्दवाच्यरागादिविकल्परूपचेतनकर्मणामशुद्धनिश्चयेन कर्ता भवति । अशुद्धनिश्चयस्यार्थः अब क्रियारहित, अमूर्त, टंकोत्कीर्ण (शुद्ध), ज्ञानरूप एक स्वभावसे जीव यद्यपि कर्म आदिके कर्त्तापनेसे रहित है तथापि व्यवहार आदि नयके विभागसे कर्ता होता है ऐसा कथन करते हैं;- गाथाभावार्थ: -आत्मा व्यवहारसे पुद्गल कर्म आदिका कर्ता है, निश्चयसे चेतन फर्मका कर्ता है और शुद्ध नयसे शुद्ध भावोंका कर्ता है ॥८॥ व्याख्यार्थः- इस सूत्रमें भिन्न प्रक्रमरूप व्यवहित संबंधसे मध्य (बीचके) पदको ग्रहण करके व्याख्यान किया जाता है । "आदा"आत्मा"पुग्गलकम्मादीणं कत्तावव- हारदोदु" व्यवहार नयको अपेक्षासे पुद्गल कर्म आदिका कर्ता है.। जैसे-मन,वचन तथा शरीरके व्यापाररूप क्रियासे रहित निज शुद्ध आत्मतत्त्वकी जो भावना है उस भावनासे शून्य होकर उपचरित असद्भत व्यवहार नयसे ज्ञानावरण आदि द्रव्य कोका तथा आदि- शब्द से औदारिक, वैक्रियक और आहारकरूप तीन शरीर तथा आहार आदि ६ पर्याप्ति- योंके योग्य जो पुद्गल पिंडरूप नो ( ईषत् ) कर्म हैं उनका तथा उसी प्रकार उपचरित अमदत व्यवहारसे याह्य विषय घट, पट आदिका भी यह जीव कर्ता है। "णिच्छयणयदों पेदणकम्माणादा" और निश्चय नयको अपेक्षासे तो यह आत्मा चेतन काँका कर्ता है । सो ऐसे है कि रागआदि विकल्परूप उपाधिसे रहित निष्क्रिय, परमचैतन्यभावनासे रहित ऐसे जोक्ने जो राग आदिको उत्पन्न करनेवाले कर्मोंका उपार्जन किया उन कोका उदय होनेपर निष्क्रिय और निर्मल आत्मज्ञानको नहीं प्राप्त होता हुआ यह जीव भावकर्म इस सदमे वाच्य जो रागादि विकल्परूप चेतन कर्म हैं उनका अशुद्ध निश्चय नयसे कर्ता बृहद्रव्यसग्रहः। १९ कथ्यते-कर्मोपाधिसमुत्पन्नत्वादशुद्धः, तत्काले तप्तायःपिण्डवत्तन्मयत्वाच निश्चयः, इत्युभ- यमेलापकेनाशुद्धनिश्चयो भण्यते । “सुद्भणया सुद्धभावाणं" शुभाशुभयोगत्रयव्यापाररहि- तेन शुद्धबुद्धकस्वभावेन यदा परिणमति तदानन्तज्ञानसुखादिशुद्धभावानां छमस्थावस्थायां भावनारूपेण विवक्षितैकदेशशुद्धनिश्चयेन कर्त्ता, मुक्तावस्थायां तु शुद्धनयेनेति । किन्तु शुद्धा- शुद्धभावानां परिणममानानामेव कर्तृत्वं ज्ञातव्यम् , न च हस्तादिव्यापाररूपाणामिति । यतो हि नित्यनिरञ्जननिष्क्रियनिजात्मस्वरूपभावनारहितस्य कर्मादिकर्तृत्वं व्याख्यातम् ,तत- स्तत्रैव निजशुद्धात्मनि भावना कर्त्तव्या । एवं सांख्यमतं प्रत्येकान्ताकर्तृत्वनिराकरणमुख्य- त्वेन गाथा गता l अथ यद्यपि शुद्धनयेन निर्विकारपरमाादैकलक्षणसुखामृतस्य भोक्ता तथाप्यशुद्धनयेन सांसारिकसुखदुःखस्यापि भाक्तात्मा भवतीत्याख्याति;- ववहारा सुहदुक्खं पुग्गलकम्मप्फलं प जेदि । आदा णिच्छयणयदा चेदणभावं खु आदस्स ॥९॥ व्याख्या-"ववहारा सुहदुक्खं पुग्गलकम्मप्फलं पभुजेदि" व्यवहारात्सुखदुःखरूपं पुद्ग- होवा है। अब अशुद्ध निश्चयका अर्थ कहते हैं। कर्मरूप उपाधिसे उत्पन्न होनेसे अशुद्ध कहलाता है और उस समय अग्निमें तपे हुये लोहके गोलेके समान तन्मय ( उसीरूप ) होनेसे निश्चय कहा जाता है, इस रोतिसे अशुद्ध और निश्चय इन दोनोंको मिलाके अशुद्ध निश्चय कहा जाता है। "शुद्धणया सुद्धमावाणं" जीव जव शुभ तथा अशुभ मन, वचन, और कायरूप तीनों योगोंके व्यापारसे रहित शुद्ध, बुद्ध, एक स्वभावसे परिणमता है तव अनंत ज्ञान, सुख आदि शुद्ध भावोंका छद्मस्थ अवस्थामें भावनारूप विवक्षित एकदेश शुद्ध निश्चय नयसे का होता है और मुक्त अवस्थामें तो शुद्ध निश्चय नयसे अनंत ज्ञानादि शुद्ध भावोंका कर्ता है । यहाँ विशेष यह है कि शुद्ध अशुद्ध भावोंका जो परिणमन है उन्हीं- का कर्तृत्व जीवमें जानना चाहिये और इस्त आदिके व्यापाररूप परिणमनोंका न समझना चाहिये। क्योंकि नित्य, निरंजन, निष्क्रिय ऐसे अपने आत्मस्वरूपकी भावनासे रहित जो जीव है उसीके कर्म आदिका कर्तृत्व कहा गया है। इसलिये उस निज आत्मामें ही भावना करनी चाहिये । ऐसे सांख्यमतके प्रति “एकान्तसे जीव कर्चा नहीं है" इस मतके निराकरणकी मुख्यतासे गाथा समाप्त हुई || अब यद्यपि आत्मा शुद्ध नयसे विकाररहित परम आनंदरूप एक लक्षणका धारक जो सुखरूपी अमृत है. उसको भोगनेवा है तथापि अशुद्ध नयसे संसारमें उत्पन्न हुये जो सुख दुःख हैं उनका भी भोगनेवाला है ऐसा कथन करते हैं;- गाथाभावार्थ:--आत्मा व्यवहारसे सुख दुःखरुप “पुद्गल कर्मोंको भोगता है और निश्चय नयसे आत्मा चेतन स्वभावको मोगता है ॥२॥ - - । वृहद्रव्यसंग्रहः। ...., व्याख्या- "अणुगुरुदेहपमाणो" निश्चयेन स्वदेहाद्भिन्नस्य केवलज्ञानाद्यनन्तगुणराशेर- भिन्नस्य निजशुद्धात्मस्वरूपस्योपलव्धेरभावात्तथैव देहममत्वमूलभूताहारभयमैथुनपरिप्रहसं- ज्ञाप्रभृतिसमस्तरागादिविमावानामासक्तिसद्भावाच्च यदुपार्जितं शरीरनामकर्म तदुदये सति अणुगुरुदेइप्रमाणो भवति । स कः कर्ता "चेदा" चेतयिता जीवः। कस्मात् "उवसंहार- पसप्पदो" उपसंहारप्रसर्पतः शरीरनामकर्मजनितविस्तारोपसंहारधर्माभ्यामित्यर्थः । कोऽ- त्र दृष्टान्तः, यथा प्रदीपो महद्भाजनप्रच्छादितस्तद्धाजनान्तरं सर्व प्रकाशयति लघुभाजन- प्रच्छादितस्तद्भाजनान्तरं प्रकाशयति । पुनरापि कस्मात् "असमुहदो" असमुद्घातात् वेदना- कषायविक्रियामारणान्तिकतैजसाहारककेवलिसंज्ञसप्तसमुद्धातवर्जनात् । तथा चोकं सप्त- समुद्भातलक्षणम्- "वेयणकसायवेउब्वियमारणंतिओसमुग्धादो। तेजाहारो छट्ठो सत्तमओ अव यद्यपि आत्मा निश्चय नयसे लोकप्रमाण असंख्यात प्रदेशोंका धारक है तथापि व्यवहारसे देहप्रमाण है यह कथन करते हैं;- : गाथाभावार्थ:-व्यवहार नयसे समुद्धात अवस्थाके विना यह जीव संकोच तथा विस्तारसे छोटे और बड़े शरीरके प्रमाण रहता है और निश्चय नयसे जीव असंख्यात प्रदेशोंका धारक है ॥१०॥ व्याख्यार्थः- "अणुगुरुदेहपमाणो" निश्चय नयसे अपने देहसे भिन्न तथा केवलज्ञान आदि अनन्त गुणोंकी राशिसे अभिन्न जो अपना शुद्ध आत्मस्वरूप है उसकी प्राप्तिके अमावसे तथा इसी प्रकार देहकी ममताके मूल कारणस्वरूप आहार, भय, मैथुन, परिग्रह रूप जो संज्ञा उनको आदि ले जो समस्त राग आदि विभाव हैं उनमें आसक्तिके होनेसे जो जीवने शरीर नाम कर्म उपार्जन किया उसका उदय होनेसे सूक्ष्म ( छोटा) तथा गुरु (बड़ा.).जो देह उसके प्रमाण होता है । वह शरीर प्रमाण होनेवाला कौन है ? "चेदा" चेतनावाला यह जीव है। किस निमित्तसे?"उवसंहारप्पसप्पदो"उपसंहार तथा प्रसर्पण स्वभा- वसे अर्थात् संकोच तथा विस्तार स्वभावसे । तात्पर्य यह कि शरीर नाम कर्मसे उत्पन्न जो विस्तार तथा संकोचरूप जीवके धर्म हैं उनसे यह जोव देहप्रमाण होता है। इसमें दृष्टान्त क्याहै ? कि जैसे दोपक किसी बड़े पात्रमें रख दिया जाता है तो वह उप्त पात्रके अभ्यन्तर (अन्तर्गत ).जो पदार्थ हैं उन सबको प्रकाशित करता है और जो छोटे. पात्र में रख दिया जाता है तो उस.पान के अन्तर्गत जो पदार्थ हैं.उनको प्रकाशित करता है। फिर किस निमित्तसे यह जीव देहप्रमाण है ? "असमुहहो" समुद्धातके न होनेसे अर्थात् वेदना, कपाय, विक्रिया, मारणान्तिक, तैजस, आहारक और केवली. नामक जो सात समुद्रात हैं उनको छोड़नेसे अर्थात् समुद्धात अवस्थामें तो जीव देहप्रमाण नहीं रहता है और असमुद्धात दशामें देह प्रमाणही रहता है और सप्त ( सातः) समुद्धातोंका लक्षण इस प्रकार कहा है कि "वेदना.१ कृपाय २-विक्रया ३ मारणान्तिक ४ वैजस ५ आहार ६और केवली ये सात समुद्धात २२ : श्रीमद् राजचन्द्रजैनशानमालायाम् केवलीणं तु ।१।" तद्यथा 'मूलसरीरमछंडिय उत्तरदेहस्स जीवपिंडस्स । णिग्गमणं देहादो हवदि समुग्धादयं णाम ॥१॥" तीव्रवेदनानुभवान्मूलशरीरमत्यक्त्वा आत्मप्रदेशानां वहि- निर्गमन मिति वेदनासमुद्बातः । तीव्रकषायोदयान्मूलगरीरमत्यक्त्वा परस्य घातार्थ मात्म- प्रदेशानां वहिर्गमनमिति कषायसमुद्रातः ।२। मूलशरीरमपरित्यज्य किमपि विकर्तुमात्मप्र- देशानां बहिर्गमनमिति विक्रियासमुद्धातः ।३। मरणान्तसमये मूलशरीरमपरित्यज्य यत्र कुत्रचिद्धमायुस्तत्प्रदेशं स्फुटितुमात्मप्रदेशानां बहिर्गमनमिति मारणान्तिकसमुद्रातः ।४। स्वस्य मनोनिष्टजनकं किश्चित्कारणान्तरमवलोक्य समुत्पन्नक्रोधस्य संयमनिधानस्य महामुनेर्मूलशरीरमत्यज्य सिन्दूरपुञ्जप्रभो दीर्घत्वेन द्वादशयोजनप्रमाणः सून्यनुलस- सत्येयभागमूलविस्तारो नवयोजनाप्रविस्तारः काहलाकृतिपुरुषो वामस्कन्धा निर्गत्य वा- मप्रदक्षिणेन हृदये निहितं विरुद्धं वस्तु भस्मसात्कृत्य तेनैव संयमिना सह स च भस्म व्रजति द्वीपायनवत् , असावशुभस्तेजःसमुद्धातः। लोकं व्याधिदुर्भिक्षादिपीडि- तमवलोक्य समुत्पन्न कृपस्य परमसंयमनिधानस्य महर्मूलशरीरमत्यज्य शुभ्राकृतिः प्रागुक्तदेहप्रमाणः पुरुषो दक्षिणप्रदक्षिणेन व्याधिदुर्भिक्षादिकं स्फोटयित्वा पुनरपि है" सो ऐसे हैं कि "अपने मूल शरीरको न छोड़कर जो आत्माके प्रदेश देहसे निकलकर उत्तरदेहके प्रति गमन करते हैं उसको समुद्भात कहते हैं" इन सातों समुद्धातोंको क्रमसे दर्शाते हैं। जैसे-तीव्र वेदना (पीडा ) के अनुभवसे मूल शरीरका त्याग न करके जो आत्माके प्रदेशोंका शरीरसे बाहर जाना सो वेदना समुद्धात है । १। तथा तीव्र क्रोधादिक कपायोंके उदयसे मूल अर्थात् धारण किये हुए शरीरको न छोड़कर जो आत्माके प्रदेश दूसरे को मारनेके लिये शरीरके बाहर जाते हैं उसको कषाय समुद्घात कहते हैं । २। किसी प्रकारकी विक्रिया (कामादिजनित विकार) उत्पन्न करने वा करानेके अर्थ मूल शरी- रको न त्यागकर जो आत्माके प्रदेशोंका बाहर जाना है उसको विकुर्वणा अथवा विक्रिया समुद्रात कहते हैं। ३ । तथा मरणान्त समयमें मूल शरीरको न त्याग करके जहां कहीं इस आत्माने आयु बाधा है उसके स्पर्शनेको जो प्रदेशोंका शरीर से बाह्य गमन करना सो मारणान्तिक समुद्धात है । ४। अपने मनको अनिष्ट (बुरा) उत्पन्न करनेवाले किसी कारणको देखकर उत्पन्न हुआ है क्रोध जिसके ऐसा जो संयमका निधान महामुनि उसके बाम (यायें) कंघेसे सिंदूरके ढेरकोसी क्रान्तिवाला, बारह योजन लम्बा,सूच्यंगुलके संख्येय भाग प्रमाण मूल विस्तार और नव योजनके अप्र विस्तारको धारण करनेवाला काहल विलाय) के आकारका धारक पुरुप निकल करके वाम प्रदक्षिणा देकर मुनिके हृदयमें स्थित जो विरुद्ध पदार्थ है उसको भस्म करके और उसी मुनिके साथ आप भी भस्म होजाय; जैसे द्वीपायन मुनिके शरीरसे पुतला निकलके द्वारिकाको भस्म कर उसीने द्वीपायन मुनिको भस्म किया और वह पुतला आप भी भस्म होगया, उसीको तरह जो हो सो अशुभ जस समुद्भात है। तथा जगतको रोग अथवा दुर्भिक्ष आदिसे पीडित देखकर उत्पन्न हुई .

वृहद्रव्यसंग्रहः। २३ स्वस्थाने प्रविशति, असौ शुभरूपस्तेजःसमुद्रातः । समुत्पन्नपदपदार्थभ्रान्तेः परम- दिसंपन्नस्य महर्षलशरीरमत्यज्य शुद्धस्फटिकाकृतिरेफहस्तप्रमाण: पुरुषो मस्तकम- मानिर्गत्य यत्र कुत्रचिदन्तर्मुहूर्त्तमध्ये केवलझानिनं पश्यति तदर्शनाच्च स्वाश्रयस्य मुनेः पदपदार्थनिश्चयं समुत्पाद्य पुनः स्वस्थाने प्रविशति, असावाहारसमुद्भातः। सप्तमः केवलिनां दण्डकपाटप्रतरपूरणः सोऽयं केवलिसमुद्धातः । नयविभागः कथ्यते । "ववहारा" अनुपचरितासद्भुतव्यवहारनयात् “णिच्छयणयदो असंखदेसो वा" निश्चयनयतो कोकाकाशप्रमितासंख्येयप्रदेशप्रमाणः वा शब्देन तु स्वसंवित्तिसमुत्पन्न केवलज्ञानोत्पत्तिप्र- स्तावे ज्ञानापेक्षया व्यवहारनयेन लोकालोकव्यापकः न च प्रदेशापेक्षया नैयायिकमीमांस- कसांख्यमतवत्। तथैव पञ्चेन्द्रियमनोविषयविकल्परहितसमाधिकाले स्वसंवेदनलक्षणयो- भसद्भावेऽपि वहिर्विषययेन्द्रियबोधाभावजडः न च सर्वथा सांख्यमतवत् । तथा रागादिवि- भावपरिणामापेक्षया शून्योऽपि भवति न चानन्तज्ञानाद्यपेक्षया बौद्धमतवत् । किञ्च अणु- मात्रशरीरशब्देनात्र उत्सेधधनाङ्गुलासंख्येयभागप्रमितं लब्ध्यपूर्णसूक्ष्मनिगोदशरीरं ग्राह्यं है कृपा जिसके ऐसा जो परमसंयमनिधान महाऋषि उसके मूल शरीरको नहीं त्यागकर पूर्वोक्त देहके प्रमाणको धारण करनेवाला अच्छी सौम्य आकृतिका धारक पुरुष दक्षिण स्कंधसे निकलकर दक्षिण प्रदक्षिणाकर रोग दुर्भिक्ष आदिको दूर कर फिर अपने स्थानमें प्रवेश कर जाय यह शुभ रूप तैजस समुद्घाव है ।५। उत्पन्न हुई है पद और पदार्थमें भ्रान्ति (संशय ) जिसके ऐसा जो परम ऋद्धिका धारक महर्षि उसके मस्तकमेंसे मूल शरीरको न छोड़कर निर्मल स्फटिक (बिल्लोर ) की आकृति (रंग) को धारण करनेवाला एक हाथका पुरुष निकलकर अन्तर्महूर्त्तके चोचमें जहां कहीं भी केवलीको देखता है और उन केवलीके दर्शनसे अपना आश्रय जो मुनि उसके पद और पदार्थका निश्चय उत्पन्न कर फिर अपने स्थानमें प्रवेश कर जाय सो यह आहार समुद्धात है। ६ । केवलियों के जो दंड कपाट प्रतर पूरण होता है सो सातवां केवलि समुद्धात है। ७। अव नयोंका विभाग कहते हैं। "ववहारा" यह जो गुरुलघुदेहप्रमाणता जीवको दर्शाई गई है वह 'अनुपचरित असद्भूत व्यवहार नयसे है तथा “णिच्छयणयदो असंखदेसो वा" निश्चय- नयसे लोकाकाश प्रमाण जो असंख्येय प्रदेश हैं उन प्रमाण अर्थात लोकाकाश प्रमाण असंख्यात प्रदेशोंका धारक यह आत्मा है और "असंखदेसो वा' यहां जो गाथाके अंतमें वा शब्द दिया गया है उस वा शब्दसे ग्रंथकर्त्ताने यह सूचित किया है कि स्वसंवित्ति (आत्मज्ञान ) से उत्पन्न हुआ जो केवलज्ञान उसकी उत्पत्तिके प्रस्तावमें अर्थात् केवल ज्ञानावस्थामें ज्ञानको अपेक्षासे व्यवहारनयद्वाराआत्माकोलोक और अलोकमें व्यापक माना है और जैसे नैयायिक, मीमांसक तथा सांख्य मतवाले. आत्माको प्रदेशोंको अपेक्षासे व्यापक मानते हैं वैसा नहीं । इसी प्रकार पांचों इन्द्रियों और मनके विषयोंके जो विकल्प -उनसे रहित जो समाधिकाल (ध्यानका समय) है उसमें आत्मज्ञानरूप ज्ञानके विद्यमान " बृहद्रव्यसंग्रहः। दयेन जीवा भवन्ति । कथंभूता भवन्ति “पुढविजलतेयवाओवणफदी विविहथावरेइंदो" पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयः। कतिसंख्योपेता, विविधा आगमकथितस्वकीयस्वकीयान्तर्भेदैर्व- हुविधाः स्थावरनामकर्मोदयेन स्थावरा एकेन्द्रियजातिनामकर्मोदयेनं स्पर्शनेन्द्रिययुक्ता एके- न्द्रिया, न केवलमित्थंभूताः स्थावरा भवन्ति । “विगतिगचदुपंचक्खा तसजीवा"द्वित्रिचतुः- पञ्चाक्षात्रसनामकर्मोदयेन त्रसजीवा भवन्ति । ते च कथंभूताः "संखादी' शङ्खादयः स्पर्शनरसनेन्द्रियद्वययुक्ताः शङ्खशुक्तिकृम्यादयो द्वीन्द्रियाः, स्पर्शनरसनवाणेन्द्रिययुक्ताः कुन्थुपिपीलिकायूकामत्कुणादयत्रीन्द्रियाः, स्पर्शनरसनघ्राण चक्षुरिन्द्रियचतुष्टय युक्ता दशम- शकमक्षिकाभ्रमरादयश्चतुरिन्द्रियाः, स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुःश्रोत्रेन्द्रियपञ्चयुक्ता मनुष्यादयः पञ्चेन्द्रिया इति । अयमत्रार्थ:-विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभाव निजपरमात्मस्वरूपभावनोत्पन्नपा- रमार्थिकसुखमलभमाना इन्द्रियसुखासक्ता एकेन्द्रियादिजीवानां वधं कृत्वा त्रसस्थावरा भवन्तीत्युक्तं पूर्व तस्मात्त्रसस्थावरोत्पत्तिविनाशार्थतत्रैव परमात्मनि भावना कर्तव्येति ।११।। तदेव सस्थावरत्वं चतुर्दशजीवसमासरूपेण व्यक्तीकरोति;- सुख है उसकी अभिलाषा करते हैं और अज्ञानतासे उस इन्द्रियजनित सुखमें आसक्त होकर एकेन्द्रिय आदि जीवोंका घात करते हैं, उस घातसे उपार्जन किया जो त्रस तथा स्थावर नामकर्म उसके उदयसे होते हैं। "पुढविजलतेयवाऊवगप्फदी विवियावरेइंदो" पृथिवी, जल, तेज, वायु, तथा वनस्पति जोव, कितने-अनेक प्रकारके अर्थात् शास्त्र में कहे हुए जो अपने २ भेद हैं उनसे बहुत प्रकारके, स्थावर नाम कर्मके उदयसे स्थावर, एकेन्द्रिय जाति नामकर्मके उदयसे स्पर्शन इन्द्रिय सहित एकेन्द्रिय होते हैं। केवल इस प्रकारके स्थावर ही नहीं होते हैं; किन्तु "विगतिगच उपंचक्खा तसजीवा" दो, तोन, चार तथा पांच इन्द्रियोंके धारक त्रस नामकर्मके उदयसे त्रस जीव होते हैं। वे कैसे हैं कि "संखादी" शंख आदिक अर्थात् सर्शन और रसन इन दो इन्द्रियों सहित शंख, कृमि आदि दो इन्द्रियों के धारक जीव हैं; स्पर्शन, रसन, तथा घ्राण (नासिका) इन तोन इन्द्रियां सहित कुथु, पिपीलिका (कीड़ी), यूका (जू), मत्कुण (खटमल ) आदि त्रीन्द्रिय हैं; स्पर्शन, रसन, प्राण और चक्षु ( नेत्र ) इन चार इन्द्रियों सहित दंश ( डासर), मशक (माछर ), मक्षिका (मक्खी ) और भौंरा आदि चतुरिंद्रिय जीव हैं; स्पर्शन, रसन, प्राग, चक्षुः और श्रोत्र ( कर्ण ) इन पांच इन्द्रियों सहित मनुष्य आदि पंचेद्रिय हैं। यहापर तात्पर्य यह है कि निर्मल ज्ञान तथा दर्शन स्वभावका धारक जो निज परमात्मस्वरूप उसकी भावनासे उत्पन्न जो पारमार्थिक सुख है उसको नहीं प्राप्त होते हुए जोव इन्द्रियोंके सुखमें आसक्त होकर जो एकेन्द्रियादि जीवोंका वध करते हैं उससे त्रस तथा स्थावर होते ऐसा पहले कह चुके हैं, इसलिये त्रस और स्थावरोंमें जो उत्पत्ति होती है उसके नाशके लिये उसी पूर्वोक्त प्रकारसे परमात्मामें भावना करनी चाहिये ।।११।। अब उसी त्रस तथा स्थावरपनेको चतुर्दश १४ जीवसमासोंद्वारा व्यक्त(प्रकट करते हैं;- . वृह ४ बृहद्रव्यसंग्रहः। २७ - एवं चतुर्दशजीवसमासा ज्ञातव्यास्तेषां च "इंदियकायाऊणिय पुण्णापुण्णेसु पुण्णगे आणा । वेइंदियादि पुण्णे सुवचिमणोसण्णि पुण्णेय । १। दस सण्णोणं पाणा सेसे- गूणति मण्णवे ऊणा। पजत्ते मिदरेसुयसत्तदुगे सेसगेगूणा । २." इति गाथाद्वयकथित- क्रमेण यथासंभवमिन्द्रियादिदशप्राणाश्च विज्ञेयाः । अत्रैतेभ्यो भिन्नं निजशुद्धात्मतत्त्वमुपा- देयमिति भावार्थः ॥१२॥ अथ शुद्धपारिणामिकपरमभावग्राहकेण शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन शुद्धबुद्धकस्वभावा अपि जीवाः. 'पश्चादशुद्धनयेन चतुर्दशमार्गणास्थानचतुर्दशगुणस्थानसहिता भवन्तीति प्रति- पादयति;- मगगणगुणठाणेहि य चउदसहि हवंति तह असुद्धणया । विण्णेया संसारी सव्वे सुद्धा हु सुद्धणया ।। १३ ।। व्याख्या-"मग्गणगुणठाणेहि य हवंति तह विण्णेया" यथा पूर्वसूत्रोदितचतुर्दशजी- वसमासैर्भवन्ति मार्गणांगुणस्थानैश्च तथा भवन्ति संभवन्तोति विज्ञेया ज्ञातव्याः । कति- होती हैं, संक्षी पंचेन्द्रियोंके चार ये पूर्वोक्त, और भाषा तथा मन ये छहों पर्याप्तियें होती हैं और शेष जीवोंके मनरहित पांच पर्याप्तिये होतो हैं।" इस गाथामें कहे हुए क्रमसे वे सब हरएक अपनी २ पर्याप्तियोंके होनेसे सात तो पर्याप्त हैं और सात अपर्याप्त हैं। ऐसे चौदह जीवसमास जानने चाहिये।" पर्याप्त अवस्थामें सन्नी पंचेन्द्रियोंके १० प्राण, असंज्ञी पंचेद्रियोंके मनके बिना ९ प्रांण, चौइंद्रियोंके मन और कर्णके विना ८ प्राण, तेइंद्रि- योंके मन, कर्ण और चक्षुके विना ७ प्राण; दोइंद्रियोंके मन, कर्ण, चक्षु और घाणके विना ६ प्राण और एकेंद्रियोंके मन, कर्ण, चक्षु, घ्राण, रसना तथा वचनवलके विना ४'प्राण होते हैं । अपर्याप्त अवस्थाके धारक जीवोंमें संज्ञी तथा असंज्ञी इन दोनों पंचेन्द्रियोंके श्वासोश्वास, वचनवल और मनोवलंके बिना ७ प्राण होते हैं और चौइंद्रिय आदि एकेन्द्रियपर्यंत शेष जीवोंके क्रमानुसार एक एक प्राण घटता हुआ है । २ । इन दो गाथाओंद्वारा कहे. हुए क्रमसे यथासंभव इन्द्रियादि दश प्राणे समझने चाहिये । यहांपर कथनका अभिप्राय यह है कि इन पूर्वोक्त पर्याप्तियों तथा प्राणोंसे भिन्न जो अपना शुद्ध आत्मतत्त्व है उसको ग्रहण करना चाहिये ॥१२::: अंब शुद्ध पारिणामिक परम भावका ग्राहक जो शुद्ध द्रव्यार्थिक नय है उससे सब जीव शुद्ध बुद्ध एक स्वभावके धारक हैं तो भी अशुद्धनयसे चौदह मार्गणात्यान और चौदह गुणत्वानोंसहित होते हैं ऐसा कथन करते हैं; गाथाभावार्थः - संसारी जीव अशुद्ध नयसे चौदह मार्गगास्थानोंसे क्या चौदह गुणस्यानोंसे चौदह २ प्रकार के होते हैं और शुद्धनयसे तो सब संसारो जीव शुद्ध हो है। व्याख्यार्थ:--"मगणगुणठाणेहि य हवंति तह विष्णेया" जिस प्रकार "समणा २८ -- श्रीमद् राजचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम सख्योपेतैः "उदसहि" प्रत्येकं चतुर्दशभिः । कस्मात् "असुद्धणया" अशुद्धनयात् संकाशात् । इत्थंभूताः के भवन्ति । "संसारी" सांसारिजीवाः । “सव्वे सुद्धा हु सुद्ध- णंया" त एव सर्वे संसारिणः शुद्धाः सहजशुद्धज्ञायकैकस्वभावाः । कस्मात् शुद्धनयात् शुद्धनिश्चयनयादिति । अथागमप्रसिद्धगाथाद्वयेन गुणस्थाननामानि कथयति । "मिच्छो सासणमिस्सो अविरदसम्मो य देसविरदोय । विरया पमत्त इयरो अपुत्व अणियहि सुहमो य । १ । उवसंतखीणमोहो सजोगिकेवलिजिणो अजोगीया। चउ दसगुणठाणाणि य कमेणं सिद्धा य णायव्वा ।२।" इदानीं तेपामेव गुणस्थानानां प्रत्येक संक्षेपलक्षणं कथ्यते । तथाहि-सहजशुद्धकेवलज्ञानदर्शनरूपाखण्डैकप्रत्यक्षप्रतिभासमयनिजपरमात्मप्रभृतिषड्व्- व्यपञ्चास्तिकायसप्ततत्त्वनवपदार्थेषु मूढत्यादिपञ्चविंशतिमलरहितं वीतरागसर्वज्ञप्रणी- तनयविभागेन यस्य अद्धानं नास्ति स मिथ्यादृष्टिर्भवति । पापाणरेखासदृशानन्तानुव- धिक्रोधमानमायालोभान्यतरोदयेन प्रथममौपशमिकसम्यक्त्वात्पतितो मिथ्यात्वं नाद्यापि गच्छतीत्यन्तरालवर्ती सासादनः । निजशुद्धात्मादितत्त्वं वीतरागसर्वज्ञप्रणीतं परप्रणीतं अमणा” इत्यादि पूर्व गाथामें कहे हुये चतुर्दश १४ जीवसमासोंसे जीवोंके चतुर्दश १४ भेद होते हैं उसो प्रकार मार्गणा और गुणस्थानोंसे भी होते हैं, ऐसा जानना चाहिये । कितनी संख्याके धारक मार्गणा और गुणस्थानोंसे होते हैं? "चउदसहि" प्रत्येक चतुर्दश १४ संख्याके धारकोंसे । किस अपेक्षासे ? "असुद्धणया" अशुद्ध नयकी अपे- मासे । चतुर्दश मार्गणा और चतुर्दश गुणस्थानोंसे अशुद्ध नयकी अपेक्षा चौदह चौदह प्रकारके होनेवाले कौन हैं ? “संसारी" संसारी जीव हैं। "सब्वे सुद्धा हु सुद्धणया" वेही सब संसारी जोव शुद्ध निश्चय नयकी अपेक्षासे शुद्ध अर्थात स्वभावसे उत्पन्न जो शुद्ध झायक (जाननेवाला) रूप एक स्वभाव उसके धारक हैं। अब शास्त्रों में प्रसिद्ध जो दो गाथा हैं, उनके द्वारा गुणस्थानों के नाम कहते हैं। गाथार्थः- "मिथ्यात्व १ सासादन २ मिश्र ३ अविरतसम्यक्त्व ४ देशविरत ५ प्रमत्तविरत ६ अप्रम- त्तविरत ७ अपूर्वकरण ८ अनिवृत्तिकरण ९ सूक्ष्मसांपराय १० उपशान्तमोह ११ क्षीणमोह १२ सयोगि केवलि जिन १३ और अयोगि केवलि जिन १४, इस प्रकार क्रमा नुसार चौदह गुणस्थान जानने चाहिये । २।" अब इन गुणस्थानोंमेंसे प्रत्येकका संक्षेप लक्षण कहते हैं;-जैसे स्वाभाविक शुद्ध केवल ज्ञान और केवल दर्शनरूप जो अखंड प्रत्यक्ष प्रतिमास हे तादृश प्रत्यक्ष प्रतिभासमय जो निजपरमात्मा (अपना शुद्ध जीव) वह है आदिमें जिसके ऐसे जो पट् द्रव्य, पांच अस्तिकाय, सात सत्त्व और नव पदार्थ उनमें वोन मूढता आदि पचीस २५ मल (दोप) रहितत्वपूर्वक वीतराग.सर्वज्ञ द्वारा कहे हुये नयविभागसे जिस जीवके श्रद्धान नहीं है वह जीव मिथ्यादृष्टि होता है । १ । पागानरेखा (पत्यरमें की हुई लकार) के समान जो अनन्तानुबंधी क्रोध, मान, माया और सोम ये चार कपाय है; उनमेंसे किसी एकके उदयसे प्रथम जो औपशमिक सम्यक्स्व ।

२९ बृहद्रव्यसंग्रहः। च मन्यते यः स दर्शनमोहनीयभेदमिश्रकर्मोदयेन दधिगुडमिश्रभाववत् मिश्रगुणस्थान- वर्ती भवति । अथ मतं येन केनाप्येकेन मम देवेन प्रयोजन तथा सर्व देवा वन्दनीया न चं निन्दनीया इत्यादिवैनयिकमिथ्याष्टिः संशयमिथ्यांदृष्टिा तथा मन्यते तेन सह. सम्यग्मिथ्यादृष्टेः को विशेष इति । अत्र परिहार:--"स सर्वदेवेषु सर्वसमयेषु च भक्ति- परिणामेन येन केनाप्येकेन मम पुण्यं भविष्यतीति मत्वा संशयरूपेण भक्तिं कुरुते निश्चयो नास्ति । मिश्रस्य पुनरुभयत्र निश्चयोऽस्तीति विशेषः । स्वाभाविकानन्तज्ञाना- घनन्तगुणाधारभूतं निजपरमात्मद्रव्यमुपादेयम् , इन्द्रियसुखादिपरद्रव्यं हि हेयमित्यह- सर्वज्ञप्रणीतनिश्चयव्यवहारनयसाध्यसाधकभावेन मन्यते परं किन्तु भूमिरेखादिसश- क्रोधादिद्वितीयकपायोदयेन मारणनिमित्तं तलवरगृहीततस्करवदात्मनिन्दादिसहितः सन्नि- न्द्रियसुखमनुभवतीत्यविरतसम्यग्दृष्टेलक्षणम् । यः पूर्वोक्तप्रकारेण सम्यग्दृष्टिः सन् भूमिरेखादिसमानक्रोधादिद्वितीयकपायोदयाभावे सत्यभ्यन्तरे निश्चयनयेनैकदेशरागादि- रहितस्वाभाविकसुखानुभूतिलक्षणेषु बहिर्विषयेषु पुनरेकदेशहिंसानृतास्तेयाब्रह्मपरिग्रहनि- है उससे जीव गिरके जवतक मिथ्यात्वको प्राप्त न हो तबतक सम्यक्त्व और मिथ्यात्व इन दोनोंके वीचमें विद्यमान जो जीव है वह सासादन है । २ । जो अपने शुद्ध आत्मा आदि तत्त्वको वीतराग सर्वज्ञका कहा हुआ भी मानता है और अन्य मतके आचार्योद्वारा कहा हुआ भी मानता है वह दर्शनमोहनीय कर्मका भेद जो मिश्रकर्म है उसके उदयसे दही और गुड़ मिले हुए पदार्थकी भांति तीसरा जो मिश्र गुणस्थान है उसमें रहनेवालाजीव है। ३ । अब कोई शंका करे कि चाहे जिससे हो मुझे तो एक देवसे प्रयोजन है अथवा सव देवोंकी वन्दना करनी योग्य है, निन्दा किसीभी देवकी न करनी चाहिये" इस प्रकार वैनयिक मिथ्यादृष्टि और संशयमिथ्यादृष्टि मानता है तब उसके साथ मिश्रगुणस्थानवर्ती सम्यग मिथ्यादृष्टिका क्या भेद है अर्थात् वैनयिक वा संशयमिथ्यादृष्टि में और सम्यगमिथ्या- दृष्टि में क्या भेद है जिससे उसको जुदा कहा ? इस शंकाका खण्डन यह है कि-वैनयिक मिथ्यादृष्टि अथवा संशयमिथ्यादृष्टि तो संपूर्ण देवोंमें तथा सब शात्रोंमें किसी एककी भक्तिके परिणामसे मुझे पुण्य होगा अर्थात् इन सबकी सेवा करनेसे किसी एककी तो सेवा सफल होगी ऐसा मानकर संशयरूपसे भक्ति करता है; क्योंकि, उसको किसी देवमें निश्चय नहीं है कि यह सत्य है और मिश्रगुणस्थानवी जीवके दोनोंमें निश्चय है। बस, यही विशेष है। जो स्वभावसे उत्पन्न जो अनन्त ज्ञान आदि अनन्त गुण हैं उनका आधारभूत निज परमात्मद्रव्यं तो उपादेय है और इंद्रियोंके सुख आदि परद्रव्य हेय (त्याज्य ) हैं ऐसे अर्हत् सर्वज्ञ देवसे प्रणोत निश्चय तथा व्यवहारनयको साध्य साधक भावसे मानता है, परन्तु भूमिको रेखाके तुल्य क्रोध आदि द्वितीय कषायभेदके अर्थात् प्रत्याख्यानपायके उदयसे मारनेके लिये कोतवालसे पकड़े हुए चोरकी भांति आत्मनिन्दादि सहित होकर इन्द्रियोंके सुखोंका अनुभव करता है वह अविरत सम्यग्दृष्टि नामक चतुर्थ गुणस्यानवी बृहद्व्यसंग्रहः। ३१ द्वितीयकपायाद्यकविंशतिभेदभिन्नचारित्रमोहप्रकृतीनामुपशमक्षपणसमर्था नवमगुणस्थान- वर्त्तिनो भवन्ति । ९ । सूक्ष्मपरमात्मतत्त्वभावनावलेन सूक्ष्मक्लिष्टगतलोभकपायस्योपश- मकाः क्षपकाश्च दशमगुणस्थानवर्तिनो भवन्ति । १०। परमोपशममूर्तिनिजात्मस्वभाव- संवित्तिबलेन सकलोपशान्तमोहा एकादशगुणस्थानवर्तिनो भवन्ति । ११। उपशमश्रेणि- विलक्षणेन क्षपकनेणिमार्गेण निष्कषायशुद्धात्मभावनाबलेन क्षीणकपाया द्वादशगुणस्था- नवत्तिनो भवन्ति । १२ । मोहक्षपणानन्तरमन्तर्मुहूर्त्तकालं स्वशुद्धात्मसंवित्तिलक्षणैकत्व- वितर्कविचारद्वितीयशुक्लध्याने स्थित्वा तदन्त्यसमये ज्ञानावरणदर्शनावरणान्तरायत्रयं युगपदेकसमयेन निर्मूल्य मेघपञ्जरविनिर्गतदिनकर इव सकलविमलकेवलज्ञानकिरण- लोकालोकप्रकाशकांखयोदशगुणस्थानवर्तिनो जिनभास्करा भवन्ति । १३ । मनोवचन- कायवर्गणालम्बनकर्मादाननिमित्तात्मप्रदेशपरिस्पन्दलक्षणयोगरहिताश्चतुर्दशगुणस्थानवर्ति- नोऽयोगिजिना भवन्ति । १४ । ततश्च निश्चयरत्नत्रयात्मककारणभूतसमयसारसंक्षेन परमयथाख्यातचारित्रेण चतुर्दशगुणस्थानातीताः ज्ञानावरणाद्यष्टकर्मरहिताः सम्यक्त्वा- यष्टगुणान्तर्भूतनिर्नामगोत्राद्यनन्तगुणाः सिद्धा भवन्ति । अत्राह शिष्यः- केवलज्ञाना- परस्पर पृथक्का करनेमें नहीं आतो वे वर्ण तथा अवयवरचनाका भेद होनेपर भी अनि- वृत्तिकरणौपशमिक क्षपक संज्ञाके धारक, द्वितीय कपाय आदि इक्कीस २१ भेदोंसे भिन्न अर्थात् इकोस प्रकारकी चारित्रमोहनीय कर्मको प्रकृतियोंके उपशमन और क्षपणमें समर्थ नवम गुणस्थानवर्ती जीव हैं।९। सूक्ष्म परमात्मतत्त्वको भावनाके वलसे जो सूक्ष्म क्लिष्ट गत लोभ कपायके उपशामक और क्षपक हैं वे दशम गुणस्थानवर्ती हैं । १० । परम उप- शममूर्ति निज आत्माके स्वभावके ज्ञानके बलसे संपूर्ण मोहको उपशान्त करनेवाले ग्यार- हवें गुणस्थानवर्ती जीव होते हैं । ११ । उपशमश्रेणीसे विलक्षण (भिन्नरूप) जो आपक श्रेणीका मार्ग उसके द्वारा कपायोंसे रहित शुद्ध आत्माकी भावनाके वलसे क्षोण (नष्ट) हो गये हैं कपाय जिनके ऐसे वारहवें गुणस्थानव जीव होते हैं । १२ । मोहके नाश होनेके पश्चात् अन्तर्मुहूर्त काल में ही निज शुद्ध आत्माके ज्ञानरूप एकत्र वितके विचार संज्ञक द्वितीय शुक्ल ध्यानमें स्थित होके उसके अंतिम समयमें ज्ञानावरण, दर्शनावरण तथा अन्तराय इन तीनोंको एक कालमें ही सर्वथा निर्मूल करके मेघपटलसे निकले हुए सूर्यके सदृश संपूर्ण रूपसे निर्मल केवलज्ञान किरणोंसे लोक तथा अलोकके प्रकाशक तेरहवें गुण- स्थानवर्ती जिन भास्कर (सूर्य) होते हैं । १३ । वेहो मन, वचन और कायवर्गणाके आलम्बनसे कोंके प्रहण करने में कारण जो आत्माके प्रदेशोंका परिस्पन्द (संचलन ) रूप योग है उससे रहित चौदहवें गुणस्थानवर्ती अयोगि जिन होते हैं । १४ । और इसके पश्चात् निश्चय सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक् चारित्ररूप रत्नत्रयका कारणभूत समयसार संक्षक जो परम यथाख्यात चारित्र है. उससे पूर्वोक्त चौदह गुणस्थानोंसे रहित, शानावरण आदि अष्ट कोसे वर्जित तथा सम्यक्त्व आदि अष्ट गुणों में गर्भित निनाम - बृहद्रव्यसंग्रहः ।... ३३.. पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतित्रसकायभेदेन. पड्भेदा कायमार्गणा ॥३॥ निर्व्यापारशुद्धात्म- पदार्थविलक्षणमनोवचनकाययोगभेदेन त्रिधाः योगमार्गणा; अथवा विस्तरेण सत्यासत्यो- भयानुभयभेदेन चतुर्विधो मनोयोगो वचनयोगश्च,औदारिकौदारिकमिश्वक्रियिकवैक्रियिक- मिश्राहारकाहारकमिश्रकार्मणकायभेदेन सप्तविधो काययोगश्चेति समुदायेन पञ्चदशविधा वा योगमार्गणा ।४। वेदोदयोद्भवरागादिदोषरहितपरमात्मद्रव्याद्भिन्ना बी'नपुंसकभेदेन त्रिधा वेदमागणाः । ५। निष्कपायशुद्धात्मस्वभावप्रतिकू क्रोध लोभमायामानभेदेन चतु- विधा कषायमार्गणा, विस्तरेण कषायनोकषायभेदेन पञ्चविंशतिविधा वा।६। मत्यादि- संज्ञापञ्चकं कुमत्याद्यज्ञानत्रयं चेत्यष्टविधा ज्ञानमार्गणा ।७। सामायिकच्छेदोपस्थापन- परिहारविशुद्धिसूक्ष्मसापराययथाख्यातभेदेन चारित्रं पञ्चविधम् , संयमासंयमस्तथैवा- संयमश्चेति प्रतिपक्षद्वयेन सह सप्तप्रकारा संयममार्गणा । ८। चक्षुरचक्षुरवधिकेवलदर्श- नभेदेन चतुर्विधा दर्शनमार्गणा । ९ । कपायोदयरञ्जितयोगप्रवृत्तिविसदृशपरमात्मद्र- व्यप्रतिपन्थिनी कृष्णनीलकापोततेजःपद्मशुक्लभेदेन पड्विधा लेश्यामार्गेणा । १० । स्वरूपकी धारक पृथिवी, जल, तेज, वायु, वनस्पति और प्रेस कायभेदसे कायमार्गणा छै प्रकारको होती है । ३ । व्यापाररहित शुद्ध आत्मतत्त्वसे विलक्षण मनोयोग, वचनयोग तथा काययोग इन भेदोंसे योग मार्गणा तीन प्रकारको है । अथवा विस्तारसे सत्यमनोयोग, असत्यमनोयोग, सत्यासत्यमनोयोग और सत्यासत्यमनोयोगसे विलक्षण मनोयोग इन भेदोंसे चार प्रकारका मनोयोग है। ऐसेही सत्य, असत्य, सत्यासत्य तथा सत्यासत्यविलक्षण इन चार भेदोंसे वचनयोग भी चार प्रकारका है। एवम् औदारिक, औदारिकमित्र, वैकि- यिक. चैक्रियिकमिन, आहारक, आहारकमिश्र और कार्मण इन भेदोंसे काययोग सात प्रकारका है। सब मिलके योगमार्गणा पन्द्रह प्रकारको हुई । ४। वेदके उदयसे उसन्न होनेवाले रागादि दोपोंसे रहित जो परमात्मद्रव्य है उससे भिन्न स्त्रीवेद, पुंवेद और नपुं- सकवेद इन भेदोंसे वेदमार्गणा तीन प्रकारको है । ५। कपायोंसे रहित शुद्ध आत्माके स्वभावसे प्रतिकूल ( विरुद्ध) क्रोध, मान, माया तथा लोभ इन भेदोंसे चार प्रकारकी कपायमार्गणा है। और विस्तारसे अनन्तानुबंधी, प्रत्याख्यान, अप्रत्याख्यान तथा संज्वलन भेदसे कपाय १६ और हास्यादि भेदसे नोकपाय नव ९ सब मिलके पचोस २५ प्रकारको कपायमार्गणा है । ६। मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवल ये पांच ज्ञान तथा पुमति. कुश्रुत और विभंगावधि ये तीन अज्ञान ऐसे ८ प्रकारको ज्ञानमार्गणा है।७। सामायिक, छेदोपस्थापन, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसांपराय तथा यथाख्यात भेदसे पांच प्रकारका चारित्र और संचमासंयम तथा असंयम ये दो प्रतिपक्ष ऐसे संयममार्गणा सात ७ प्रकारकी है । ८ । चक्षुः, अचक्षुः, अवधि और केवलदर्शन इन भेदोंसे दर्शनमार्गणा चार प्रकारको है।९। कपायोंके उदयसे रंजित (रंगी हुई ) जो काय आदि योगोंकी प्रवृत्ति है उससे भिन्न जो शुद्ध आत्मतत्त्व है उससे विरोध करनेवाली कृष्ण, नील, वृहत ५ . - श्रीमद् राजचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम मन्यामध्यभेदेन द्विविधा भव्यमार्गणा । ११ । अत्राह शिष्यः-शुद्धपारिणामिकपरम- भावरूपशुद्धनिश्चयेन गुणस्थानमार्गणास्थानरहिता जोवा इत्युक्तं पूर्वम्, इदानी पुनर्म- ज्यामव्यरूपेण मार्गणामध्येऽपि पारिणामिकभावो भणित इति पूर्वापरविरोधः। अत्र परिहारमाह-पूर्व शुद्धपारिणामिकभावापेक्षया गुणस्थानमार्गणानिषेधः कृतः, इदानीं पुनर्भव्याभव्यत्वद्वयमशुद्धपारिणामिकभावरूपं मार्गणामध्येऽपि घटते । ननु-शुद्धा- शुद्धभेदेन पारिणामिकभावो द्विविधो नास्ति किन्तु शुद्ध एव नैवं-यद्यपि सामान्यरूपे-- णोत्सर्गव्याख्यानेन शुद्धपारिणामिकभावः कथ्यते तथाप्यपवादव्याख्यानेनाशुद्धपारिणा- मिकभावोऽप्यस्ति । तथाहि~-"जीवभव्याभव्यत्वानि च" इति तत्त्वार्थसूत्रे त्रिधा पारि- णामिकभावो भणितः, तत्र-शुद्धचैतन्यरूपं जीवत्वमविनश्वरत्वेन शुद्धद्रव्याश्रितत्वाच्छु. द्धद्रव्यार्थिकसंज्ञः शुद्धपारिणामिकभावो भण्यते, यत्पुनः कर्मजनितदशप्राणरूपं जीवत्वं, भव्यत्वम् , अभव्यत्वं चेति त्रयं, तद्विनश्वरत्वेन पर्यायाश्रितत्वात्पर्यायार्थिकसं- ज्ञस्त्वशुद्धपारिणामिकभाव उच्यते । अशुद्धत्वं कथमिति चेत्-यद्यप्येतदशुद्धपारिणामि- कत्रयं व्यवहारेण संसारिजीवेऽस्ति तथापि "सव्वे सुद्धा हु सुद्धणया" इति वचनाच्छु: कापोत, पीत, पद्म और शुक्ल इन भेदोंसे ६ प्रकारकी लेश्यामार्गणा है । १० । भव्य और अभव्य भेदसे भव्यमार्गणा दो प्रकारकी है । ११। यहां शिष्य प्रश्न करता है कि "शुद्ध- पारिणामिक परमभावरूप जो शुद्ध निश्चयनय है उसकी अपेक्षासे जीव गुणस्थान तथा मार्गणास्थानोंसे रहित हैं" यह पूर्व प्रकरणमें आपने कहा है और अब यहां भव्य अभव्य रूपसे मार्गणामें भी आपने पारिणामिक भाव कहा सो यह पूर्वापरविरोध है। अब इस शंकाका परिहार (खंडन ) कहते हैं कि पूर्वप्रसंगमें तो शुद्ध पारिणामिक भावको अपेक्षासे गुणस्थान और मार्गणास्थानका निषेध किया है और यहां अशुद्ध पारिणामिक भाव रूपसे भव्य तथा अभव्य ये दोनों मार्गणामें भी कहे हैं सो नयभेदसे यह कथन घटता ( संगत) ही है। अब कदाचित् यह कहो कि "शुद्ध अशुद्ध भेदसे पारिणामिक भाव दो प्रकारका नहीं है किन्तु पारिणामिक भाव शुद्ध ही है" सो योग्य नहीं; क्योंकि यद्यपि सामान्यरूप उत्सर्गव्याख्यानसे पारिणामिक भाव शुद्ध है ऐसा कहा जाता है तथापि अपवाद व्याख्या: नसे अशुद्ध पारिणामिक भाव भी है। इसो हेतुसे "जीवभव्याभव्यत्वानि च" अ.२ सू. ७) इस तत्त्वार्थ सूत्र में जोवत्व, भव्यत्व तथा अभव्यत्व इन भेदोंसे पारिणा- मिक भावको तीन प्रकारका कहा है। उनमें शुद्ध चैतन्यरूप जो जीवत्व है वह अविनाशो होनेसे शुद्ध द्रव्यके आश्रित है इस कारणसे शुद्ध द्रव्यार्थिकनामा शुद्ध पारिणामिक भाव कहा जाता है। और जो कर्मसे उत्पन्न दश प्रकारके प्राणों स्वरूप जीवत्व है वह जीवत्व, भव्यत्व तथा अभव्यत्व भेदसे तीन प्रकारका है और ये तीनों विनाशशील होनेसे पर्यायके आभित हैं इसलिये पर्यायार्थिफ संज्ञक अशुद्ध पारिणामिक भाव कहा जाता है। "इसको अमुद्धता किस प्रकारसे कहते हो" ऐसा कहो तो उत्तर यह है कि यद्यपि ये तीनों अशुद्ध पारिगामिक व्यवहारनयमे संसारो जोवमें हैं तयापि "सचे सुद्धा हु सुदणया" इस वृहद्रव्यसंग्रहः। द्धनिश्चयेन नास्ति अयं, मुक्तजीवे पुनः सर्वथैव नास्ति, इति हेतोरशुद्धत्वं भण्यते । तत्र शुद्धाशुद्धपारिणामिकमध्ये शुद्धपारिणामिकभावो ध्यानकाले ध्येयरूपो भवति ध्यानरूपो न मवति, कस्मात् ध्यानपर्यायस्य विनश्वरत्वात्, शुद्धपारिणामिकस्तु द्रव्यरूपत्वादवि- नश्वरः इति भावार्यः। औपशमिकक्षायोपशमिकक्षायिकसम्यक्त्वभेदेन त्रिधा सम्यक्त्व- मार्गणा मिथ्यादृष्टिसासादनमिश्रसंज्ञविपक्षत्रयभेदेन सह षड्विधाज्ञातव्या । १२ । संझि- त्वासंज्ञित्वविसदृशपरमात्मस्वरूपाद्भिन्ना संझ्यसंज्ञिभेदेन द्विधा संशिमार्गणा । १३ । आहारकानाहारकजीवभेदेनाहारकमार्गणापि द्विधा । १४ । इति चतुर्दशमार्गणास्वरूपं ज्ञातव्यम् । एवं "पुढविजलतेयमाऊ" इत्यादिगाथाद्वयेन, तृतीयगाथापादत्रयेण च "गुणजीवापजत्ती पाणा सण्णा य मग्गणाओय । उवओगो विय कमसो वीसं तु परुवणा भणिया। १।" इति गाथाप्रभृतिकथितस्वरूपं धवलजयधवलमहाधवलप्रवन्धाभिधान- सिद्धान्तत्रयवीजपदं सूचितम् । “सम्वे सुद्धा हु सुद्धणया" इति शुद्धात्मतत्त्वप्रकाशकं तृतीयमाथाचतुर्थपादेन पञ्चास्तिकायप्रवचनसारसमयसाराभिधानप्राभृतत्रयस्यापि वीज- पदं सूचितमिति । अत्र गुणस्थानमार्गणादिमध्ये केवलज्ञानदर्शनद्वयं क्षायिकसम्यक्त्व- - वचनसे ये तीनों भाव शुद्ध निश्चयनयको अपेक्षासे नहीं हैं, और मुक्त जीवमें तो सर्वथा हो नहीं हैं। इसी कारण उनको अशुद्धता कही जाती है। उन शुद्ध तथा अशुद्ध पारिणामिक भावोंमेंसे जो शुद्ध पारिणामिक भाव है वह ध्यानके समयमें ध्येय (ध्यान करने के योग्य ) रूप होता है और ध्यानरूप नहीं होता। क्योंकि ध्यान पर्याय विनाशशील है और शुद्धपारिणामिक द्रव्यरूप इस कारण अविनाशी है यह भावार्थ है। औपशमिक, क्षायो- पशमिक तथा क्षायिक सम्यक्त्वके भेदसे सम्यक्त्वमार्गणा तीन प्रकारको है। तथा मिथ्या- दृष्टि, सासादन और मिश्र इन तीनों विपक्ष भेदोंसहित छे प्रकारको भी सम्यक्त्वमार्गणा जाननी चाहिये । १२ । संज्ञित्व तथा असंज्ञित्वसे विलक्षण जो परमात्माका स्वरूप है उससे भिन्न संघी तथा असंज्ञी भेदसे दो प्रकारकी संज्ञिमार्गणा है । १३ । और आहारक तथा अनाहारक जीवके भेदसे आहारमार्गणा भी दो प्रकारको समझनी चाहिये । १४ । ऐसे चौदह मार्गणाओंका स्वरूप जानना योग्य है। इस रीतिसे "पुढविजलतेयवाऊ" इत्यादि दो गाथाओंसे और तीसरीगाथा जो "णिकम्मा अट्टगुणा" इत्यादि है उसके तीन पादोंसे "गुण जीवापज्जत्ती पाणासण्णायमगणाओय ।उवओगोविय फमसोवीसंतु परूवणाभणिया" इत्यादि गाथामें कहा हुआ स्वरूप धवल, जयधवल और महाधवल प्रबंध नामक जो तीन सिद्धान्त हैं उनके वीज पदकी सूचना ग्रंथकारने की और "सवे सुद्धा हु सुद्धणया" इस तृतीय गाथाके चौथे पादद्वारा शुद्ध आत्मतत्त्वको प्रकाश करनेवाले जो पंचास्तिकाय, प्रव- चनसार तथा समयसार नामक तीन प्रामृत.(पाहड़). उनका भी बीजपद सूचित किया । इन गुणस्थान और मार्गणाओंके मध्यमें केवलज्ञान..और. केवलदर्शन ये दोनों तथा क्षायिक सम्यक्त्व और अनाहारक शुद्ध आत्माका स्वरूप ये तो साक्षात् उपादेय हैं और . ३६ श्रीमद् राजचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम् मनाहारकशुद्धात्मस्वरूपं च साक्षादुपादेयं; यत्पुनश्च शुद्धात्मसम्यश्रद्धानज्ञानानुचर- णलक्षणं. कारणसमयसारस्वरूपं तत्तस्यैवोपादेयभूतस्य विवक्षितैकदेशसुद्धनयेन साधक- त्वापारम्पर्येणोपादेयं, शेपं तु हेयमिति । यच्चाध्यात्मग्रन्थस्य बीजपदभूतं शुद्धात्मस्वरूप मुक्तं तत्पुनरुपादेयमेव । अनेन प्रकारेण जीवाधिकारमध्ये • शुद्धाशुद्धजीवकथनमुख्यत्वेन सप्तमस्थले गाथात्रयं गतम् ।। १३ ।। अथेदानी गाथापूर्वार्द्धन सिद्धस्वरूपमुत्तरार्द्धन पुनरूर्ध्वगतिस्वभावं च कथयति;- णिकम्मा अढगुणा किंचूणा चरमदेहदो सिद्धा । लोयग्गठिदा णिचा उप्पादवएहिं संजुत्ता ॥१४॥ व्याख्या-सिद्धाः सिद्धा भवन्तीति क्रियाध्याहारः। किं विशिष्टा: "णिकम्मा अढगुणा किंचूणा चरमदेहदा” निष्कर्माणोऽष्टगुणाः किञ्चिदूनाश्चरमदेहतः सकाशादिति सूत्रपू- र्द्धिन सिद्धस्वरूपमुक्तम् । ऊर्ध्वगमनं कथ्यते “लोयग्गठिदा णिचा उप्पादवएहिं संजुत्ता ते च सिद्धा लोकाग्रस्थिता नित्या उत्पादव्ययाभ्यां संयुक्ताः । अतो विस्तरः। कर्मारिवि- जो शुद्ध आत्माका सम्यक् श्रद्धान, ज्ञान और आचरण करनेरूप लक्षणका धारक कारण समयसार है वह उसी पूर्वोक्त उपादेय भूतका विवक्षित एकदेश शुद्धनयसे साधक है इस- लिये परंपरासे उपादेय है, इनके विना सब त्याज्य हैं; और जो अध्यात्मग्रंथका वीज पदभूत शुद्ध आत्माका स्वरूप है वह तो उपादेय हो है । इस प्रकारसे जीवाधिकारके मध्यमें शुद्ध तथा अशुद्ध जीवके कथनकी मुख्यतारूप जो सप्तम स्थल है उसमें तीन गाथा समाप्त हुई ॥ १३ ॥ अब इसके पश्चात् गाथाके पूर्वाद्धसे तो सिद्धोंके स्वरूपका और उत्तरार्द्धसे उनका जो ऊर्द्धगमन स्वभाव है उसका कथन करते हैं;- गाथाभावार्थ:-जो जीव ज्ञानावरणादि आठ कर्मोंसे रहित हैं, सम्यक्त्व आदि आठ गुणोंके धारक हैं तथा अन्तिम शरीरसे कुछ कम हैं वे सिद्ध हैं और ऊर्ध्वगमन स्वभावसे लोकके अप्रभागमें स्थित हैं, नित्य हैं तथा उत्पाद और व्यय इन दोनोंसे युक्त हैं ॥ १४ ॥ व्याख्याथैः- "सिद्धा" सिद्ध होते हैं इस रीतिसे यहां "भवन्ति" इस क्रियाका अध्याहार करना चाहिये । किन विशेषणोंसे विशिष्ट सिद्ध होते हैं "णिकम्मा अट्टगुणा किंचूणा चरमदेहदो" कर्मोंसे रहित आठ गुणोंसे सहित तथा अन्तिम शरीरसे किंचित् ऊन (कुछ छोटे) ऐसे सिद्ध होते हैं । इस प्रकार सूत्रके पूर्वार्द्धसे सिद्धोंका स्वरूप कहा। अब उनका ऊर्ध्वगमन स्वभाव कहते हैं। लोयग्गठिदा णिचा उप्पादवयेहिं संजुत्ता" और ये सिद्धलोकके अग्रभागमें स्थित हैं, नित्य है तथा उत्पाद और व्यय इनसे संयुक्त हैं ।। थप यहाँसे विस्तारपूर्वक इस गायाकी व्याख्या करते हैं: कर्मरूपी शत्रुओंके विध्वंस करने में समर्थ अपने शुद्ध आत्माके बलसे झानावरण आदि समस्त मूल प्रकृति और वृहद्रव्यसंग्रहः। ध्वसकस्वशुद्धात्मसंवित्तिवलेन ज्ञानावरणादिमूलोत्तरगतसमस्तकर्मप्रकृतिविनाशकत्वादष्ट' कर्मरहिताः "सम्मत्तणाणदसणवीरियसुहुमं तहेवं अवगहणं । अंगुरुलहुअववाहं अट्ठ- गुंणा हुति सिद्धाणं । १ ।" इति गाथाकथितक्रमेण तेपामष्टकर्मरहितानामष्टगुणाः कथ्यन्ते । तथाहि-केवलंज्ञानादिगुणास्पदनिजशुद्धात्मैवोपादेय इति रुचिरूपं निश्चयस- म्यक्त्वं यत्पूर्व तपश्चरणावस्थायो भावितं तस्य फलभूतं समस्तजीवादितत्त्वविपये विपरी- ताभिनिवेशरहितपरिणतिरूपं परमक्षायिकसम्यक्त्वं भण्यते । पूर्व छमस्थावस्थायां भावि- तस्य निर्विकारस्वसंवेदनज्ञानस्य फलभूतं युगपल्लोकालोकसमस्तवन्तुगतविशेषपरिच्छेदक केवलज्ञानम् । निर्विकल्पस्वशुद्धात्मसत्तावलोकनरूपं यत्पूर्व दर्शनं भावितं तस्यैव फलभूतं युगपल्लोकालोकसमस्तवस्तुगतसामान्यग्राहक केवलदर्शनम् ॥ कस्मिंश्चित्स्वरूपचलनकारणे जाते सति घोरपरीपहोपसर्गादौ निजनिरञ्जनपरमात्मध्याने पूर्व धैर्यमवलम्बितं तस्यैव फलभूतमनन्तपदार्थपरिच्छित्तिविपये खेदरहितत्वमनन्तवीर्यम् ।। सूक्ष्मातीन्द्रियकेवलज्ञा- नविपयत्वात्सिद्धस्वरूपस्य सूक्ष्मत्वं भण्यते । एकदीपप्रकाशे नानादीपप्रकाशवदेकसिद्ध- क्षेत्रे सकरव्यतिकरदोपपरिहारेणानन्तसिद्धावकाशदानसामर्थ्यमवगाहनगुणो भण्यते । उत्तरप्रकृतियोंके विनाशक होनेसे अष्टविध कर्मोंसे रहित सिद्ध होते हैं। तथा “सम्यक्त्व, ज्ञान, दर्शन, वीर्य, सूक्ष्म, अवगाहन, अगुरुलघु और अव्यावाध ये आठ गुण सिद्धोंके होते हैं।" इस गाथोक्त क्रमसे उन अष्टकर्मरहित सिद्धोंके आठ गुण कहे जाते हैं। अब उन गुणोंको विस्तारसे दर्शाते हैं:-केवलज्ञान आदि गुणोंका स्थानरूप जो निज शुद्ध आत्मा है वही ग्राह्य है इस प्रकारको रुचिरूप निश्चयसम्यक्त्व जो कि पहले तपश्चरण करने की अवस्थामें उत्पादित किया था उसका फलभूत, समस्त जीव आदि तत्त्वोंके विप- यमें विपरीत अभिनिवेश (जो पदार्थ जिसरूप है उसके विरुद्ध आग्रह) से शून्य परिणाम- रूप परम क्षायिक सम्यक्त्व नामा प्रथम गुण सिद्धों के कहा जाता है। पूर्व कालमें छमस्थ अवस्थामें भावनागोचर किये हुये विकाररहित स्वानुभवरूप ज्ञानका फलभूत एकही समयमें लोक तथा अलोकके संपूर्ण पदार्थों में प्राप्त हुए विशेपोंको जाननेवाला दूसरा केवल शाननामा गुण है । संपूर्ण विकल्पोंसे शून्य निजशुद्ध आत्माकी सत्ताका अवलोकन (दर्शन) रूप जो पहले दर्शन भावित किया था उसी दर्शनका फलभूत, एक कालमें ही लोक अलों- कके संपूर्ण पदार्थोंमें प्राप्त हुए सामान्यको ग्रहण करानेवाला केवलदर्शन नामा तृतीय गुण है। अतिघोर परीपह तथा उपसर्ग आदिके आनेके समय में जो पहले अपने निरंजन पर- मात्माके ध्यानमें धैर्यका अवलम्बन किया उसीका फलभूत अनन्त पदार्थोके ज्ञानमें खेदके अभावरूप रक्षणका धारक चतुर्थ अनन्ववीर्यनामक गुण है । सूक्ष्म अतीन्द्रिय केवल- ज्ञानका विषय होनेसे सिद्धोंके स्वरूपको सूक्ष्म कहते हैं। यह सूक्ष्मत्व पंचम गुग है । एक दीपके प्रकाशमें जैसे अनेक दीपोंके प्रकाशका समावेश हो जाता है उसी प्रकार एक सिद्धके क्षेत्रमें संकर तथा व्यतिकर दोपके परिहार पूर्वक जो अनन्त सिद्धाको अवकाश ३८ श्रीमद् राजचन्द्रजैनशानमालायाम् यदि सर्वथा गुरुत्वं भवति तदा लोहपिण्डवदधः पतनं, यदि च सर्वया लघुत्वं भवति तदा वाताहतार्कतूलवत्सर्वदैव भ्रमणमेव स्यान्न च तथा तस्मादगुरुलघुत्वगुणोऽभिधीयते ! सहजशुद्धस्वरूपानुभवसमुत्पन्नरागादिविभावरहितसुखामृतस्य यदेकदेशसंवेदनं कृतं पूर्व तस्यैव फलभूतमव्यायाधमनन्तसुखं भण्यते । इति मध्यमरुचिशिष्यापेझ्या सम्यक्त्वा- दिगुणाष्टकं भणितम् । मध्यमरुचिशिष्यं प्रति पुनर्विशेषभेदनयेन निर्गतित्वं, निरिन्द्रि- यत्वं, निष्कायत्वं, निर्योगत्वं, निर्वेदत्वं, निष्कषायत्वं, निर्नामत्वं, निर्गोत्रत्वं, निरायुप- त्वमित्यादिविशेपगुणास्तथैवास्तित्ववस्तुत्वप्रमेयत्वादिसामान्यगुणाःस्वागमाविरोधेनानन्ता ज्ञातव्याः । संक्षेपमचिशिष्यं प्रति पुनर्विवक्षिताभेदनयेनानन्तज्ञानादिचतुष्टयम् , अनन्त- ज्ञानदर्शनसुखत्रयं, केवलज्ञानदर्शनद्वय, साक्षादभेदनयेन शुद्धचैतन्यमेवैको गुण इति । पुनरपि कथंभूताः सिद्धाः चरमशरोरात् किश्चिदूना भवन्ति तत् किञ्चिदूनत्वं शरीरोपा- गाजनितनासिकादिच्छिद्राणामपूर्णत्वे सति यस्मिन्नेव क्षणे सयोगिचरमसमये त्रिंशत्प्रक- त्युदयविच्छेदमध्ये शरीरोपाङ्गनामकर्मविच्छेदो जातस्तस्मिन्नेव क्षणे जातमिति ज्ञातव्यम् । देनेका सामर्थ्य है वही छठा अवगाहन गुण कहा जाता है। यदि सिद्धस्वरूप सर्वथा गुरु (भारी) हो तो लोहपिंडके समान उसका अधःपतन ( नीचे गिरना) ही होता रहे और यदि सर्वथा लघु (हलका) हो तो वायुसे ताडित आक वृक्षको रुईके समान उसका निरन्तर भ्रमण ही होता रहै, परन्तु सिद्धस्वरूप ऐसा नहीं है इसलिये सातवा अगुरुलघुगुण कहा जाता है। स्वभावसे उत्पन्न और शुद्ध जो आत्मस्वरूप है उससे उत्पन्न तथा राग आदि विभावोंसे रहित ऐसे सुखरूपी अमृतका जो एकदेश अनुभव पहले किया उसीका फलरूप अव्यावाध अनन्त सुख नामक अष्टम गुण सिद्धोंमें कहा जाता है । ये जो सम्यक्त्व आदि अष्ट गुण कहे गये हैं सो मध्यमरुचिके धारक शिष्योंके लिये हैं और विस्तार में मध्यमरुचिके धारक शिष्यके प्रति तो विशेष भेदनयका अवलम्बन करनेसे गतिरहितता, इन्द्रियरहितता, शरीररहितत्व, योगरहितत्व, वेदरहितता, कपाय- रहितत्व, नामरहितत्व, गोत्ररहितत्व तथा आयुरहितत्व आदि विशेष गुण और इसी प्रकार अस्तित्व, वस्तुत्व, प्रमेयत्वादि सामान्य गुण ऐसे अपने जैनागमके अनुसार अनन्त गुण जानने चाहिये । और संक्षेपरुचि शिष्यके प्रति तो विवक्षित अभेद नयसे अनन्त सान, अनन्न दर्शन, अनन्त सुख तथा अनन्त वीर्य ये चार गुण अथवा अनन्त ज्ञान, दर्शन सुखरूप तीन गुण वा केवल ज्ञान और केवल दर्शन ये दो गुण हैं और साक्षात् अभेदनयसे शुद्ध चैतन्य यह एक ही गुण सिद्धोंका है। पुनः वे सिद्ध कैसे हैं इसलिये कहते हैं कि वे सिद्ध चरम ( अन्तके) शरीरसे कुछ छोटे होते हैं और वह जो किंचित् उनता है सो शरोराङ्गोपाङ्गकर्म से उत्पन्न नासिका आदि छिद्रोंके :अपूर्ण होनेपर जिस क्षागमें सयोगोके अन्त समयमें त्रिंशत् प्रकृतियोंके उदयका नाश हुआ. इनमें: शरीरांगोपांग कमका मी विच्छेद होगया अतः उसी समय हुआ है. यह जानना चाहिये। अब यहां बृहद्रव्यसंग्रहः। - कश्चिदाह-यथा प्रदीपस्य भाजनाद्यावरणे गते प्रकाशस्य विस्तारो भवति तथा देहामारे लोकप्रमाणेन भाव्य मिति । तत्र परिहारमाह-प्रदीपसंबन्धी योऽसो प्रकाशविस्तारः पूर्व स्वभावेनैव तिष्ठति पश्चादावरणं जातं जीवस्य तु लोकमात्रासंख्येयप्रदेशत्वं स्वभाषो भवति यस्तु प्रदेशानां संवन्धी विस्तारः स स्वभावो न भवति । कस्मादिति चेत्, पूर्व लोक मात्रप्रदेशा विस्तीर्णा निरावरणास्तिष्ठन्ति पश्चात् प्रदीपवदावरणं जातमेव । तन्न, किन्तु पूर्वमेवानादिसन्तानरूपेण शरीरेणावृतास्तिष्ठन्ति ततः कारणात्प्रदेशानां महारो न भवति, विस्तारश्च शरीरनामकर्माधीन एव न च स्वभावस्तेन कारणेन शरीराभावे विस्तारोन भवति । अपरमप्युदाहरणं दीयते-यथा हस्तचतुष्टयप्रमाणवस्त्रं पुरुषेण मुष्टौ वद्धं तिष्ठति पुरुपाभावे सङ्कोचविस्तारी वा न करोति. निष्पत्तिकाले साद्रं मृन्मयभाजनं वा शुष्क सजलाभावे सति; तथा जीवोऽपि पुरुपस्थानीयजलस्थानीयशरीराभावे विस्तारसंकोची न करोति । यत्रैव मुक्तस्तत्रैव तिष्ठतीति ये केचन वदन्ति तनिषेधार्थ पूर्वप्रयोगादमङ्ग- स्वाइन्धच्छेदात्तथागतिपरिणामाचेति हेतुचतुष्टयेन तथैवाविद्धकुलालचक्रवद् व्यपगतले कोई शंका करता है कि जैसे दीपकके आवरण करनेवाले पात्र आदिके हटा लेनेसे उस दीपकके प्रकाशका विस्तार हो जाता है उसी प्रकार देहका अभाव होनेपर सिद्धोंका आत्मा लोकप्रमाण होना चाहिये । अब इसका परिहार कहते हैं-जो यह दीपकसंबंधी प्रकाशका विस्तार है वह तो पहले स्वभावसे ही दीपकमें रहता है और पीछे उस दीपकके आवरण होता है; और जीवके तो लोकमात्र असंख्यात प्रदेशत्व स्वभाव है और जो प्रदेशोंका विस्तार है वह स्वभाव नहीं है। कदाचित् यह कहो कि जीवके पहले लोकमात्र प्रदेश विस्तृत हुए आवरणरहित रहते हैं और फिर जैसे प्रदीपके आवरण होना है वैसेही जीव- प्रदेशोंक भी आवरण हुआ है; सो नहीं, किन्तु जीवके प्रदेश तो पूर्वकालसे ही अनादिका- से सन्तानरूप चले आये हुये शरीरसे आवरणसहितही रहते हैं। इस हेतुसे जीवके प्रदेशोंका संहार तथा विस्तार शरीर नामक नामकर्मके आधीन ही हैं और जीवका स्वभाव नहीं है इस कारणसे जीवके शरीरका अभाव होनेपर प्रदेशोंका विस्तार नहीं होता है। इस विषयमें और भी उदाहरण देते हैं कि जैसे पुरुषको मुहीमें चार हाथका वन्न धंधा हुआ है, अब वह वस्त्र यदि पुरुष हो तब हो तो उसकी प्रेरणासे सकोच व विस्तार कर सकता है और पुरुष के अभाव में संकोच तथा विस्तार नहीं कर सकता; जैसा उस पुरुषने छोड़ा वैसाही रहता है। अथवा गीला मृत्तिकाका भाजन बनते समय तो संकोच तथा विस्तारको प्राप्त हो जाता है और जब वह शुष्क हो जाता है तब जलका अभाव होनेसे संकोच व विस्तारको नहीं प्राप्त होता है, इसी प्रकार जीव मी पुरुपके स्थानभूत अथवा जलके स्थानभूत शरीरके अभावमें संकोच विस्तारको नहीं प्राप्त होता है। अब फितनेही कहते हैं कि “जीव जिस स्थानमें कमोसे मुक्त होता है वहाँही रहता है।" इसके निषेधके लिये कहते हैं। पूर्वप्रयोगसे, असंग होनेसे, बंधका नाश होनेसे क्यागतिके परि- .

- वृहद्रव्यसंग्रहः। ४१ स्वशुद्धात्मसंवित्तिसमुत्पन्नवास्तवसुखात्प्रतिपक्षभूतेनेन्द्रियसुखेनासक्तो बहिरात्मा, तद्विलक्ष- गोऽन्तरात्मा। अथवा देहरहितनिजशुद्धात्मद्रव्यभावनालक्षणभेदज्ञानरहितत्वेन देहादि- परद्रव्येष्वेकत्वभावनापरिणतो वहिरात्मा, तस्मात्प्रतिपक्षभूतोऽन्तरात्मा । अथवा हेयो- पादेयविचारकचित्तनिर्दोपपरमात्मनो भिन्ना रागादयो दोपाः शुद्ध चैतन्यलझग आत्मन्यु- कलक्षणेपु चित्तदोषात्मसु त्रिपु वीतरागसर्वक्षप्रगीतेषु अन्येयु वा पदार्थपु यस्य परस्पर- सापेक्षनयविभागेन श्रद्धानं ज्ञानं च नास्ति स वहिरात्मा, तस्माद्विसदृशोऽन्तरात्मेति रूपेण वहिरात्मान्तरात्मनोलक्षणं ज्ञातव्यम् ।। परमात्मलक्षणं कथ्यते-सकलविमलकेवल- ज्ञानेन येन कारणेन समस्तं लोकालोकं जानाति व्याप्नोति तेन कारणेन विष्णुर्भण्यते । परमब्रह्मसंज्ञनिजशुद्धात्मभावनासमुत्पन्नसुखामृततृप्तस्य सत उर्वशीरम्भातिलोचमाभिर्देव- फन्याभिरपि यस्य ब्रह्मचर्यव्रतं न खण्डितं स परमब्रह्म भण्यते । केवलज्ञानादिगुणैश्वर्ययु- कस्य सतो देवेन्द्रादयोऽपि तत्पदाभिलाषिणः सन्तो यस्याज्ञां कुर्वन्ति स ईश्वराभिधानो भवति । केवलज्ञानशब्दवाच्यं गतं ज्ञानं यस्य स सुगतः, अथवा शोभनमविनश्वरं मुक्ति- ( यथार्थ ) सुख उससे विरुद्ध जो इन्द्रियसुख उससे आसक्त वहिरात्मा है; उससे विलक्षण अन्तरात्मा है । अथवा देहरहित जो निजशुद्ध आत्मारूप द्रव्य उस आत्मा- द्रव्यकी भावनारूप जो भेद-शान है उससे रहित होनेके कारण देह आदि पर (अन्य ) द्रव्योंमें जो एकत्व भावनासे परिणत है अर्थात् देह आदिमें यह भावना करता है कि देह आदि में ही हूं वह वहिरात्मा है । और इस वहिरात्मासे विरुद्ध अर्थात् निज शुद्ध आत्मा- हीको आत्मा नाननेवाला अन्तरात्मा है । अथवा हेय तथा उपादेयका विचार करनेवाला जो चित्त तथा निर्दोप परमात्मासे भिन्न राग आदि दोप और शुद्ध चैतन्यरूप लक्षणका धारक आत्मा ऐसे इन पूर्वोक्त लक्षणोंके धारक जो चित्त, दोप और आत्मा हैं इन तीनोंमें अथवा पीतराग सर्वज्ञकथित अन्य पदार्थों में जिसके परस्पर अपेक्षाके धारक नयोंके विभा- गसे श्रद्धान और ज्ञान नहीं है वह वहिरात्मा है और उस वहिरात्मासे भिन्न लक्षणका धारक अन्तरात्मा है,। इस प्रकार वहिरात्मा और अन्तरात्माकालक्षण जानना चाहिये। अब परमात्माका लक्षण कहते हैं-संपूर्ण तथा निर्मल ऐसे केवलज्ञान द्वारा जिस कारणसे समस्त लोक अलोकको जानता है अर्थात् व्याप्त होता है, इस हेतुसे वह परमात्मा विष्णु फहाता है । परब्रम नामक निज शुद्ध आत्माको भावनासे उत्पन्न सुखामृतसे तृप्त होनेसे उर्वशी, तिलोत्तमा तथा रंभा आदि देवकन्याओंने भी जिसके ब्रह्मचर्य व्रतको खंडित नहीं किया वह परमनन कहलाता है। केवटज्ञान आदि गुणरूप ऐश्वर्य युक्त होनेसे जिसके पदको अभिलापा (चाह) करते हुए देवोंके इन्द्र आदि भी जिसकी आज्ञाका पालन करते हैं, इसलिये वह परमात्मा ईश्वर इस नामका धारक होता है। फेवलज्ञान इस शब्दसे वाच्य (कहने योग्य ) है सु (उत्तम) गत (ज्ञान) जिसका वह सुगत है । अयवा सु : कहिये शोभायमान अविनश्वर (नाशरहित ) मुक्तिके स्थानको जो प्राप्त हुआ सो सुगत 'वृह० ६ वृहद्रव्यसंग्रहः। ४३ रात्मावस्थायां तु बहिरात्मा भूतपूर्वन्यायेन घृतघटवत्, परमात्मस्वरूपं तु शक्तिरूपेण भाविनेगमनयेन व्यक्तिरूपेण च । परमात्मावस्थायां पुनरन्तरात्मवहिरात्मद्वयं भूतपूर्वन- येनेति । अथ त्रिधात्मानं गुणस्थानेषु योजयति । मिथ्यासासादनमिश्रगुणस्थानत्रये तार- तम्यन्यूनाधिकभेदेन बहिरात्मा ज्ञातव्यः, अविरतगुस्थाने तद्योग्याशुभलेश्यापरिणतो जघन्यान्तरात्मा, क्षीणकपायगुणस्थाने पुनरुत्कृष्टः, अविरतक्षीणकपाययोर्मध्ये मध्यमः, सयोग्ययोगिगुणस्थानद्वये विवक्षितैकदेशशुद्धनयेन सिद्धसदृशः परमात्मा, सिद्धस्तु साक्षा- त्परमात्मेति । अत्र वहिरात्मा हेयः, उपादेयभूतस्यानन्तसुखसाधकत्वादन्तरात्मोपादेयः, परमात्मा पुनः साक्षादुपादेय इत्यभिप्रायः । एवं पड्द्रव्यपश्चास्तिकायप्रतिपादकप्रथमा- धिकारमध्ये नमस्कारादिचतुर्दशगाथाभिर्नवमिरन्तरस्थलैर्जीवद्रव्यकथनरूपेण प्रथमोऽन्तरा- धिकारः समाप्तः ॥१४॥ अतःपरं यद्यपि शुद्धबुद्धकस्वभावं परमात्मद्रव्यमुपादेयं भवति तथापि हेयरूपस्या- जीवद्रव्यस्य गाथाष्टकेन व्याख्यानं करोति । कस्मादिति चेत्-हेयतत्त्वपरिज्ञाने सति पश्चादुपादेयस्वीकारो भवतीति हेतोः । तद्यथा- समान और परमात्माका स्वरूप शक्ति रूपसे तथा भावी नंगम नयकी अपेक्षासे व्यक्तिरूपसे समझना चाहिए । और परमात्माको अवस्थामें अन्तरात्मा तथा बहिरात्मा ये दोनों भूतपूर्व नयसे जानने चाहिये। अब तीनों प्रकारके आत्माओंको गुणस्थानों में योजित करते हैं- मिथ्यात्व, सासादन और मिश्र इन तीनों गुणस्थानों में तारतम्य न्यूनाधिक भावसे वहिरात्मा जानना चाहिये, अविरत नाम चतुर्थ गुणस्थानमें उसके योग्य अशुद्ध लेश्याओंसे परिणत जघन्य अन्तरात्मा हे और क्षीणकपाय नामक बारहवें गुणस्थानमें उत्कृष्ट अन्तरात्मा है। अविरत और क्षीणकपाय अर्थात् चतुर्थ तथा यारहवें गुणस्थानोंके मध्यमें जो सात गुण- स्थान हैं उनमें मध्यम अन्तरात्मा है तथा सयोगी और अयोगी इन दोनों गुगस्थानों में विवक्षित एकदेश शुद्धनयसे सिद्धके सदृश परमात्मा है और सिद्ध तो साक्षात् परमात्मा ही है। यहां बहिरात्मा तो हेय है और उपादेयभूत अनन्त सुखका साधक होनेसे अन्तरात्मा उपादेय है तथा परमात्मा साक्षात् उपादेय है, यह अभिप्राय है। इस प्रकार पट् द्रव्य और पंच अस्तिकायका प्रतिपादन करनेवाले प्रथम अधिकारमें नमस्कार गायाको आदि ले चौदह गाथाओंसे नव ९ अन्तर (मध्य) स्थलोंद्वारा जीव द्वन्यके कथन रूपसे प्रथम अन्तर अधिकार समाप्त हुआ. ॥१४॥ अब इसके पश्चात् यद्यपि शुद्धबुद्ध एक स्वभावका धारक परमात्मा द्रव्य ही उपादेय है : तथापि हेयरूप जो अजीव द्रव्य है उसका आठ गाथाद्वारा व्याख्यान (निरूपण) फरते हैं। क्योंकि पहले हेयतत्त्वका ज्ञान होनेपर पीछे उपादेय पदार्थका स्वीकार होता है। यह इस प्रकार है- श्रीमद् राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् अजीवो पुण णेओ पुग्गलधम्मो अधम्म आयासं । कालो पुग्गल मुत्तो स्वादिगुणो अमुत्ति सेसा हु ॥ १५ ॥ व्याख्या-"अज्जीवो पुण णेओ" अजीवः पुनर्जयः । सकलविमलकेवलज्ञानदर्शन- द्वयं शुद्धोपयोगः, मतिज्ञानादिरूपो विकलोऽशुद्धोपयोग इति द्विविधोपयोगः, अव्यक्त- सुखदुःखानुभवनरूपा कर्मफलचेतना, तथैव मतिज्ञानादिमनःपर्ययपर्यन्तमशुद्धोपयोग इति, स्वेहापूर्वेष्टानिष्टविकल्परूपेण विशेपरागद्वेपपरिणमनं कर्मचेतना, केवलझानरूपा शुद्धचेतना इत्युक्तलक्षणोपयोगश्चेतना च यत्र नास्ति स भवत्यजीव इति विज्ञेयः । पुनः पश्चाजीवाधिकारानन्तरं "पुग्गलधम्मो अधम्म आयासं कालो" स च पुद्गलधर्माधर्मा- काशकालद्रव्यभेदेन पञ्चधा । पूरणगलनस्वभावत्वात्पुद्गल इत्युच्यते । गतिस्थित्यवगा- हवर्तनालक्षणा धर्माधर्माकाशकालाः, "पुग्गलमुत्तो" पुद्गलो मूर्तः । कस्मात् “रूवादि- गुणो" रूपादिगुणसहितो यतः। "अमुत्ति सेसा हु" रूपादिगुणाभावादमूर्त्ता भवन्ति पुद्गलाच्छेपाश्चत्वार इति । तथाहि-यथा अनन्तज्ञानदर्शनसुखवीर्यगुणचतुष्टयं सर्वजीव- गाथाभावार्थः- और पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश तथा काल इन पांचोंको अजीव द्रव्य जानना चाहिये । इनमें पुद्गल तो मूर्तिमान है, क्योंकि रूप आदि गुणोंका धारक है, और शेप (बाकी के ) चारों अमूर्त हैं ॥१५॥ व्याख्यार्थः-अब जीवाधिकारके "अज्जीवो पुण णेओ" अजीव पदार्थको वक्ष्यमाण प्रकारका जानना चाहिये । संपूर्ण रूपसे विमल अर्थात् संपूर्ण द्रव्य पर्यायका प्रकाशक केवलज्ञान तथा दर्शन ये दोनों शुद्ध उपयोग हैं और मतिज्ञान आदिरूप विकल अशुद्ध उपयोग है । इस रीतिसे शुद्ध तथा अशुद्ध भेदसे उपयोग दो प्रकारका है। अव्यक्त (अस्पष्ट) सुखदुःखानुभवस्वरूप कर्मफलचेतना तथा मतिज्ञानसे आदि लेकर मनः- पर्यय पर्यन्त चारों ज्ञानरूप अशुद्ध उपयोग तथा निजचेष्टापूर्वक इष्ट तथा अनिष्ट रूपसे संपूर्ण रागद्वेष रूपसे जो परिणाम हैं वह कर्मचेतना है, केवल ज्ञानरूप शुद्ध चेतना है । इस प्रकार पूर्वोक्त लक्षणका धारक उपयोग तथा चेतना ये जिसमें नहीं हैं वह अजीव है इस प्रकार जानना चाहिये । “पुग्गल धमो अधम्म आयासं कालो" और वह अजीव पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल द्रव्यके भेदसे पांच प्रकारका है । पूरण तथा गलन स्वभाव सहित होनेसे पुद्गल कहा जाता है, अर्थात् पूर्ण करने और छोजनेका स्वभाव जिसमें है यह पृथिवी आदि सय पुद्गल पर्याय है। तथा क्रमसे गति, स्थिति, अवगाह और वर्तना लक्षण सहित धर्म, अधर्म, आकाश तथा काल ये चारों द्रव्य हैं; अर्थात् गतिलक्षण धर्म, स्थितिलक्षण अधर्म, अवगाह देनेके लक्षणका धारक आकाश तथा वर्त्तना लक्षण युक्त कारद्रव्य है। "पुग्गल मुत्तो" पुद्गल मूर्त है। क्योंकि वह “रूवादिगुणो" रूप आदि गुणोंसे सहित है । "अमुत्ति सेसा हु" पुद्गलके विना वाकी धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये चारों रुप आदि गुणोंका अभाव होनेसे अमूर्त हैं। जैसे अनन्त झान, अनन्त अनन्तर ।

४५ - बृहद्रव्यसंग्रहः।.. .. साधारणं तथा रूपरसगन्धस्पर्शगुणचतुष्टयं सर्वपुद्गलसाधारणं, यथा च शुद्धबुद्धकस्व- भावसिद्धजीवे अनन्तचतुष्टयमतीन्द्रियं तथैव शुद्धपुद्गलपरमाणुद्रव्ये रूपादिचतुष्टयमती- न्द्रियं । यथा रागादिस्नेहाणेन कर्मवन्धावस्थायां ज्ञानादिचतुष्टयस्याशुद्धत्वं तथा स्निग्ध- रुक्षत्वगुणेन द्वयणुकादिवन्धावस्थायां रूपादिचतुष्टयस्याशुद्धत्वं । यथा नि.स्नेह निजपरमा- स्मभावनावलेन रागादिस्निग्धत्वविनाशे सत्यन तचतुष्टयस्य शुद्धत्वं तथा जघन्यगुणाना वन्धो न भवतीति वचनात्परमाणुद्रव्ये स्निग्धरूक्षत्वगुणस्य जघन्यत्वे सति रूपादिचतु- प्यस्य शुद्धत्वमवबोद्धव्यमित्यभिप्रायः ॥१५॥ अथ पुद्गलद्रव्यस्य विभावव्यञ्चनपर्यायान्प्रतिपादयति;- सद्दो बंधो सुहुमो धूलो संठाण भेद तम छाया । उजादादवसहिया पुग्गलदव्यस्स पजाया ॥१६॥ व्याख्या-शब्दबन्धसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमश्छायातपोद्योतसहिताः पुद्गलद्रव्यस्य पर्याया भवन्ति । अथ विस्तर:-भाषात्मकोऽभायात्मकश्च द्विविधः शदः । तत्रा- क्षरानक्षरात्मकभेदेन भाषात्मको द्विधा भवति । तत्राप्यक्षरात्मकः संस्कृतप्राकृतापभ्रंशपेशा- दर्शन, अनन्त सुख और अनन्त वीर्य ये चारों गुण सब जीवोंमें साधारण हैं; उसी प्रकार रूप, रस, गंध तथा स्पर्श ये चार गुण सव पुद्गलोंमें साधारण हैं। और जैसे शुद्ध बुद्ध एक स्वभावके धारक सिद्ध जीवमें अनन्त चतुष्टय अतीन्द्रिय है; उसी प्रकार शुद्ध पुद्गल परमाणु द्रव्यमें रूप आदि चतुष्टय अतीन्द्रिय है। जैसे राग आदि स्नेह गुणसे कर्मवन्धा- वस्थामें ज्ञान, दर्शन, सुख तथा वीर्य इन चारोंको अशुद्धता है; उसी प्रकार स्निग्ध सूक्मत्व गुणसे द्वषणुक आदि बंधावस्थामें रूप आदि चतुष्टयकी अशुद्धता है । जैसे स्नेहरहित निज परमात्माकी भावनाके वलसे राग आदि स्निग्धताका विनाश होनेपर अनन्त चतुष्टयका शुद्धत्व है, वैसे "जघन्य गुणोंका वन्ध नहीं होता है", इस वचनसे परमाणु द्रव्यमें स्निग्ध रूक्षत्व गुणकी जघन्यता होनेपर रूप आदि चतुष्टयका शुद्धत्व समझना चाहिये, यह अभिप्राय है ॥१५॥ अब पुद्गल द्रव्यके विभाव व्यंजन पर्यायोंका प्रतिपादन करते हैं- गाथाभावार्थः-शब्द, बन्ध, सूक्ष्म, स्थूल, सस्यान, भेद, तम, छाया, उद्योत और घातप इन सहित जो हैं वे सब पुद्गल द्रव्यके पर्याय हैं ॥१६॥ व्याख्यार्थः :-शब्द, बंध, सूक्ष्मता, स्यूरता, संस्थान, भेद, तम, छाया, उद्योत और आतप इन सहित पुद्गल द्रव्यके पर्याय होते हैं। अब इस विषयको विस्तारसे कहते हैं- भापात्मक तथा अभापात्मक इस प्रकार शब्द दो प्रकारका है। उनमें भाषात्मक शब्द अक्षरात्मक और अनक्षरात्मक भेदसे दो प्रकारका है। उनमें भी संस्कृत, प्राकृत तथा उनके अपभ्रंशरूप पेशापी आदि भापाऑके भेदसे आर्य, म्लेच्छ मनुष्यों के व्यवहारका कारण 1 श्रीमद् राजचन्द्रजैनशाणमालायाम् चिकादिभाषाभेदेनार्यम्लेच्छमनुष्यादिव्यवहारहेतुर्वहुधा । अनक्षरात्मकस्तु द्वीन्द्रियादि- तिर्यगजीवेषु सर्वज्ञदिव्यध्वनौ च । अभापात्मकोऽपि प्रायोगिकवैधसिकभेदेन द्विविधः । "ततं वीणादिकं ज्ञेयं विततं पटहादिकम् । घनं तु कांस्यतालादि वंशादि सुपिरं विदुः ।१।" इति श्लोककथितक्रमेण प्रयोगे भवः प्रायोगिकञ्चतुर्धा भवति । विश्रसर स्वभावेन भवो वैश्नसिको मेघादिप्रभवो बहुधा । किञ्च शब्दातीतनिजपरमात्मभावनाच्युतेन शब्दा- दिमनोज्ञामनोज्ञपश्चेन्द्रियविपयासक्तन च जीवेन यदुपार्जितं सुस्वरदुःस्वरनामकर्म तदु- दयेन यद्यपि जीवे शब्दो दृश्यते तथापि स जीवसंयोगेनोत्पन्नत्वाद् व्यवहारेण जोव- शब्दो भण्यते, निश्चयेन पुनः पुद्गलस्वरूप एवेति । बन्धः कथ्यते-मृत्पिण्डादिरूपेण योऽसौ बहुधा बन्धः स केवलः पुद्गलबन्धः, यस्तु कर्मनोकर्मरूपः स जीवपुद्गलसंयोग- वन्धः । किञ्च विशेष:-कर्मबन्धपृथग्भूतस्त्रशुद्वात्मभावनारहित जोवस्यानुपचरितासद्भू - तव्यवहारेण द्रव्यवन्धः, तथैवाशुद्धनिश्चयेन योऽसौ रागादिरूपो भावबन्धः कथ्यते सोऽपि शुद्वनिश्चयनयेन पुद्गलबन्ध एव । बिल्वाद्यपे झया बदरादीनां सूक्ष्मत्वं, परमाणोः साझादिति । बदराद्यपेक्षया बिल्वादोनां स्थूलत्वं, जगद्व्यापिनि महास्कन्धे सर्वोत्कृष्ट- अक्षरात्मक भेद भी अनेक प्रकारका है । और अनक्षरात्मक भेद द्वीन्द्रिय आदि त्रस जीवोंमें तथा सर्वनको दिव्य ध्वनिमें है। अभाषात्मक शब्द भी प्रायोगिक तथा वैसिक भेदसे दो प्रकारका है। उनमें "वीणा आदिसे उत्पन्न शब्दको तत, ढोल आदिसे उत्पन्न शब्दको वितत, मंजीरे तथा तालसे उत्पन्न हुए शब्दको घन और बांस के छिद्र..आदिसे अर्थात् वंशी आदिसे उत्पन्न शब्दको सुपिर कहते हैं," इस श्लोकमें कथित क्रम के अनुसार प्रायो- गिक (प्रयोगसे उत्पन्न होनेवाला) शब्द चार प्रकारका है, और विरसा अर्थात् स्वभावसे उत्पन्न वैश्रसिक शब्द जो कि मेघ आदिसे उत्पन्न होता है वह अनेक प्रकारका है । विशेप यहां यह है कि शब्दसे रहित जो निज परमात्मा है उसकी भावनासे गिरे हुए और शब्द आदि जो मनोज्ञ तथा अमनोज्ञ पांचों इन्द्रियोंके विपय हैं उनमें आसक्त हुए जीवने जो सुस्वर तथा दुःस्वर नामकर्मका उपार्जन किया उस कर्मके उदयसे यद्यपि जीवमें शब्द दीख पड़ता है तथापि वह शब्द जोवके संयोगसे उपन्न होने के कारण व्यवहार नयसे जीवका शब्द कहा जाता है और निश्चयन पसे तो वह शब्द पुद्गल स्वरूप हो है । अब बंधका निरूपग करते हैं-मृत्तिका आदिके पिंडरूपसे जो घट, गृह, मोदक आदि बंध है वह तो केवल पुद्गलबंध ही है और जो कर्म नोकर्म रूप बंध है वह जीव तथा पुद्गलके संयोगसे उत्पन्न बंध है। और यहांपर विशेष यह जानना चाहिये कि कर्म- पंधसे भिन्न जो निज शुद्ध आत्मा है उसको भावनासे रहित जीव के अनुपचरित असन्त न्यवहार नयसे द्रव्य बंध है, और इसी प्रकार अशुद निश्चय नयका अपेझासे जो यह रागादिरूप भावबंध कहा जाता है वह भी शुद्ध नियनयसे पुद्गलका हो बंध है । विल्व- फल (बल) आदिको अपेक्षा बदर (वेर) आदि फलोंमें सूक्ष्मता है और परमाणुमें साक्षात् - .

वृहद्रव्यसंग्रहः। मिति । समचतुरस्रन्यग्रोधसातिककुञवामनहुण्डभेदेन पटप्रकारसंस्थानं यद्यपि व्यवहा- रनयेन जीवस्यास्ति तथाप्यसंस्थानाच्चिञ्चमत्कारपरिणतेभिन्नत्वान्निश्चयेन पुदगलसंस्थान- मेव । यदपि जीवादन्यत्र वृत्तत्रिकोणचतुष्कोणादिव्यक्ताव्यक्तरूपं बहुधा संस्थानं तदपि पुद्गल एव । गोधूमादिचूर्णरूपेण धृतखण्डादिरूपेण बहुधा भेदो ज्ञातव्यः । दृष्टिप्रतिष- न्धकोऽन्धकारस्तम इति भण्यते । वृक्षाद्याश्रयरूपा मनुष्यादिप्रतिविम्बरूपा च छाया विज्ञेया। उद्योतश्चन्द्रविमाने खद्योतादितिर्यगजीवेषु च भवति । आतप आदित्यविमाने अन्यत्रापि सूर्य कान्तमणिविशेपादौ पृथ्वीकाये ज्ञातव्यः । अयमन्नार्थः-यथा जीवस्य शुद्धनिश्चयेन स्वात्मोपलब्धिलक्षणे सिद्धस्वरूपे स्वभाव व्यखनपर्याये विद्यमानेऽप्यनादि- कर्मवन्धवशात् स्निग्धरूक्षस्थानीयरागद्वेपपरिणामे सति स्वाभाविकपरमानन्दैकलक्षण- स्वास्थ्यभावभ्रष्टस्य नरनारकादि विभावव्य खनपर्याया भवन्ति तथा पुद्गलस्यापि निश्चय- नयेन शुद्धपरमाण्ववस्थालक्षणे स्वभावव्यञ्जनपर्याये सत्यपि स्निग्धरूत्वादन्धो भवतीति वचनाद्रागद्वेपस्थानीयबन्धयोग्यस्निग्धरूक्षत्वपरिणामे सत्युक्तलक्षणाच्छब्दादन्येऽपि आग- - सूक्ष्मता है अर्थात्-वह किसीकी अपेक्षासे नहीं है ऐसी सूक्ष्मता है। वदर आदि फलोंकी अपेक्षा विल्व आदि फलोंमें स्थूलत्व (बड़ापना) है और तीन लोकमें व्याप्त महास्कन्धमें सर्वोत्कृष्ट (सबसे अधिक) स्थूलत्व है । समचतुरन (चतुष्कोण), न्यग्रोध, सातिक, कुज, वामन और हुंड इन भेदोंसे पट ६ प्रकारका संस्थान यद्यपि व्यवहारनयसे जीवके है तथापि संस्थानशून्य जो चेतनचमत्कार परिणाम है उससे भिन्न होनेके कारण निश्चयकी अपेक्षासे पुद्गलका ही संस्थान है; और जो जीवसे अन्य स्थानों में गोल त्रिकोण, चौकोर आदि प्रकट तथा अप्रकट रूप अनेक प्रकारका संस्थान है वह भी पुद्गल में ही है। गोधूम (गेहूं ) आदिके चून रूपसे तथा धी: खांह आदि रूपसे अनेक प्रकारका भेद जानना चाहिये । दृष्टिका प्रतिबन्धक (रोकनेवाला) जो अंधकार है उसको तम कहते हैं। वृक्ष आदिके आश्रयसे होनेवाली तथा मनुष्य आदिके प्रतिविम्बरूप जो है वह छाया जाननी चाहिये । चन्द्रमाके विमानमें तथा खद्योतं (जुगनू व आग्या) आदि तिव जीवोंमें उद्योत होता है। सूर्यके विमानमें तथा और इससे भिन्न जो सूर्यकान्त आदि मणिक भेद हैं उन रूप पृथ्वोकायमें आतप जानना चाहिये । यहाँपर यह आशय है कि जैसे शुद्धनिश्चयनयसे जीवके निज आत्माकी प्राप्तिरूप सिद्ध स्वपमें स्वभाव व्यञ्जन- पर्याय विद्यमान है तो भी अनादि कालके कर्मबंधनके वशसे पुद्गलके स्निग्ध तया रून गुण के स्थानभूत राग द्वेप परिणाम होनेपर स्वाभाविक परमानन्दरूप स्वास्थ्य भावसे भ्रष्ट हुए जीवके मनुष्य, नारक आदि विभाव व्यंजन पर्याय होते हैं; उसी प्रकार पुद्गलके भी निश्चय नयसे शुद्ध परमाणु अवस्यारूप स्वभाव व्यंजन पर्यायके विद्यमान होते हुए भी "स्निग्ध तथा रूझतासे बंध होता है," इस वचनसे राग और उपके स्थानको प्राप्त हुए स्निग्धत्व तथा रूझत्व परिणाम होनेपर पूर्वोक्त लक्षण मन्द आदिके अतिरिक अन्य मी . श्रीमद् राजचन्द्रजैनशानमालायाम् मोक्तलक्षणा आकुञ्चनप्रसारणदधिदुग्धादयो विभावव्यञ्जनपर्याया ज्ञातव्याः । एवम- जीवाधिकारमध्ये पूर्वसूत्रोदितरूपादिगुणचतुष्टययुक्तस्य तथैवात्र सूत्रोदितशब्दादिपर्याय- सहितस्य संक्षेपेगाणुस्कन्धभेदभिन्नस्य पुद्गलद्रव्यस्य व्याख्यानमुख्यत्वेन प्रयमस्थले गाथा- द्वयं गतम् ॥१६॥ अथ धर्मद्रव्यमाख्याति गइपरिणयाण धम्मो पुग्गलजीवाण गमणसहयारी । तोयं जह मच्छाणं अच्छंताणेव सो णेई ॥१७॥ व्याख्या-गतिपरिणतानां धर्मो जीवपुद्गलानां गमनसहकारिकारणं भवति । दृष्टान्त- माह-तोयं यथा मत्स्यानाम् । स्वयं तिष्ठतो नैव स नयति तानिति । तथाहि-यथा सिद्धो भगवानमूर्तोऽपि निष्क्रियस्तथैवाप्रेरकोऽपि सिद्धवदनन्तज्ञानादिगुणस्वरूपोऽहमि- त्यादिव्यवहारेण सविकल्पसिद्धभक्तियुक्तानां निश्चयेन निर्विकल्लसमाधिरूपस्वकीयोपा- दानकारणपरिणतानां भव्यानां सिद्धगतेः सहकारिकारणं भवति । तथा निष्क्रियोऽमूर्तो शास्त्रोक्त लक्षणके धारक आकुञ्चन, प्रसारण, दधि, तथा दुग्ध आदि विभावव्यंजन- पर्याय जानने चाहिये ।। इस प्रकार अजीव अधिकारके मध्यमें "अज्जीवों" इत्यादि पूर्वसूत्र में कथित रूप, रस आदि चार गुणोंसे युक्त तथा इस "सद्दो वंधो” इत्यादि सूत्रमें कथित जो शब्द बंध आदि पर्याय हैं उन सहित तथा अणु, स्कन्ध आदि भेदोंसे भिन्न जो पुद्गलद्रव्य है उसका संक्षेपसे मुख्यपनेसे निरूपण करनेके द्वारा प्रथम स्थलमें दो गाथायें समाप्त हुई॥१६॥ अब धर्मद्रव्यकी व्याख्या करते हैं;- गाथाभावार्थ:-गति (गमनमें) परिणत जो पुद्गल और जीव हैं उनके गमनमें धर्मद्रव्य सहकारी है,-जैसे मत्स्योंके गमनमें जल सहकारी है । और नहीं गमन करते हुए पुद्गल और जीवोंको वह धर्मद्रव्य कदापि गमन नहीं कराता है ॥१७॥ व्याख्यार्थः-गतिमें परिणत अर्थात् गमनक्रियासहित जीव तथा पुद्गलोंके धर्म- द्रव्य गमनमें सहकारी कारण अर्थात् गतिमें सहायक होता है। इसमें दृष्टान्त देते हैं कि जैसे मत्स्योंके गमन करनेमें जल सहायक है । परन्तु स्वयं ठहरे हुए जीव पुद्गलोंको वह धर्मद्रव्य गमन नहीं कराता है। अब इस विषयको अन्य दृष्टान्त द्वारा पुष्ट करते हैं। जैसे सिद्ध भगवान् अमूर्त हैं, क्रियारहित हैं तथा किसीको प्रेरणा करनेवाले भी नहीं हैं; तो भी "मैं सिद्धोंकी भांति अनन्त ज्ञान आदि गुणरूप हूं" इत्यादि व्यवहारसे सविकल्प सिद्ध- मतिके धारक और निश्चयसे निर्विकल्प ध्यानरूप अपने उपादान कारणसे जो परिणत हैं ऐसे मव्यजीयोंके वे सिद्ध भगवान् सिद्ध गतिमें सहकारी कारण होते हैं। इसी प्रकार क्रिया- रहित, अमूर्त और प्रेरणारहित जो धर्मास्तिकाय हे वह भी अपने अपने उपादान कार- ।

- : बृहद्न्यसंग्रहः। निष्प्रेरकोऽपि धर्मास्तिकायः स्वकीयोपादानकारणेन गच्छतां जीवपुद्गलानां गतः सहका- रिकारणं भवति । लोकप्रसिद्धष्टान्तेन तु मत्स्यादीनां जलादिवदित्यभिप्रायः ।। एवं धर्म- द्रव्यव्याख्यानरूपेण गाथा गता ॥१७|| अथ धर्मद्रव्यमुपदिशति;- ठाणजुदाण अधम्मो पुग्गलजीवाण ठाणसहयारी । छोया नह पहियाणं गच्छंता व सो धरई ॥ १८ ॥ व्याख्या-स्थानयुक्तानामधर्मः पुद्गलजीवानां स्थितेः सहकारिकारणं भवति। तत्र दृष्टान्तः-छाया यथा पथिकानाम् । स्वयं गच्छतो जीवपुद्गलान्स नैव धरतीति । तया-स्वसंवित्तिसमुत्पन्नसुखामृतरूपं परमस्वास्थ्यं यद्यपि निश्चयेन स्वरूपे स्थितिका- रणं भवति तथा "सिद्धोऽहं सुद्धोऽहं अणतणाणादिगुणसमिद्धोऽहं । देहपमाणो णिचो असंखदेसो अमुत्तो य । १।" इति गाथाकथितसिद्धभक्तिरूपेणेह पूर्व सविकल्पावस्थायां सिद्धोऽपि यथा भन्यानां बहिरङ्गसहकारिकारणं भवति तथैव स्वकीयोपादानकारणेन स्वयमेव तिष्ठतां जोवपुद्गलानामधर्मद्रव्यं स्थितेः सहकारिकारणम् | लोकव्यवहारेग तु छायावद्वा पृथिवीवद्वेति सूत्रार्थः ॥ एवमधर्मद्रव्यकयनेन गाथा गता ॥१८॥ णोंसे गमन करते हुए जीव और पुद्गलोंके गमनका सहकारी कारण होता है। लोकमें प्रसिद्ध ऐसे दृष्टान्तसे तो जैसे मत्स्य आदिके गमनमें जल आदि सहकारी कारग हैं वैसे हो जीव पुद्गलक गमनमें धर्मद्रव्य सहकरो कारण है ऐसा जानना चाहिये। यह अभिप्राय है ।। इस प्रकार धर्मद्रव्य के व्याख्यान रूपसे यह गाथा समाप्त हुई ॥१७॥ अब अधर्मद्रव्यका उपदेश करते हैं;- गाथाभावार्थ:-स्थितिसहित जो पुद्गल और जीव हैं उनको स्थितिमें सहकारी कारण अधर्म द्रव्य है, जैसे पथिकों (बटोहियों ) की स्थितिमें छाया सहकारी है। और गमन करते हुए जीव तथा पुद्गलोंको वह अधर्म द्रव्य नहीं ठहराता है ।।१८।। व्याख्यार्थः-स्थितिसहित जो पुद्गल तथा जीव हैं उनकी स्थितिमें सहकारी कारण अधर्म द्रव्य है। उसमें घटान्त-जैसे छाया पथिकोंको स्थिति में सहकारी कारण और स्वयं गमन करते हुए जीव पुद्गलोंको वह अधर्म द्रव्य कदापि नहीं ठहराता है । सो ऐसे है-यद्यपि निश्चयसे अपने आत्मज्ञानसे उत्पन्न सुखामृतरूप जो परमस्वास्थ्य है वह निजरूपमें स्थितिका कारण होता है; परन्तु "मैं सिद्ध हूं, शुद्ध हूं, अनन्त ज्ञान आदि गुणोंका घारफ हूं, शरीरप्रमाण हूं, नित्य हूं, असंख्यात प्रदेशोंका धारक हूं तथा अमूर्त हूं। १।" इस गाथामें फहीहुई सिद्धभचिके रूपसे इस संसार में पहले सविकल्ल अद- स्थामें सिद्ध भी जैसे भव्य जीवोंके बहिरंग सहकारी कारण होते हैं उसो प्रकार अपने २ उपादान कारणसे स्वयं ही ठहरते हुए जीव पुद्गलोंके अधर्म द्रव्य स्थितिका सहकारी है।

- - - वृहद्रव्यसंग्रहः। तिष्ठन्ति तथाप्युपचरितासद्धृतव्यवहारेण लोकाकाशे तिष्ठन्तीत्यभिप्रायो भगवतां श्रीने- मिचन्द्रसिद्धान्तदेवानामिति ॥१९|| तमेव लोकाकाशं विशेषेण दृढयति;- धम्माऽधम्मा कालो पुग्गलजीवा य संति जावदिये । आयासे सो लोगों तत्तो परदो अलोगुत्तो ॥२०॥ व्याल्या-धर्माधर्मकालपुद्गलजीवाश्च सन्ति यावत्याकाशे स लोकः । तथा चोक्तं- लोक्यन्ते दृश्यन्ते जीवादिपदार्या यत्र स लोक इति । तस्मालीकाकाशात्परतो बहिर्भाग पुनरनन्ताकाशमलोक इति । अत्राह मोमाभिधानो राजश्रेष्ठो । हे भगवन् ! केवलज्ञान- स्यानन्तभागप्रमितमाकाशद्रव्यं तस्याप्यनन्तभागे सर्वमध्यमप्रदेशे लोकस्तिष्ठति । स चानादिनिधनः केनापि पुरुपविशेपेण न कृतो न हतो न धृतो न च रक्षितः । तथैवासं- ख्यातप्रदेशस्त त्रासंख्यातप्रदेशे लोकेऽनन्तजीवास्तेभ्योऽप्यनन्तगुणाः पुद्गलाः, लोकाकाश- प्रमितासंख्येयकालागुद्रव्याणि प्रत्येकं लोकाकाशप्रमाणं धर्माधर्मद्वयमित्युक्तलनणा: पदार्थाः कथमवकाशं लभन्त इति ? भगवानाह-एकप्रदीपप्रकाशे नानाप्रदीपप्रकाशव- गमन कर मुक्त जीव जिस हेतुसे लोकके अग्रभागमें जाके निवास करते हैं उस हेतुसे लोकका जो अग्रभाग है वह भी उपचारसे मोक्ष कहलाता है । जैसे कि तीर्थभूत पुरुपोंकरके सेवित भूमि तथा जल आदिरूप स्थान भी उपचारसे तीर्थ होता है। यह वर्णन यहांपर शिष्योंको सुखसे समझाने के लिए किया गया है। जैसे सिद्ध निजप्रदेशोंमें रहते हैं उसी प्रकार निश्चयनयसे यद्यपि सभी द्रव्य अपने अपने प्रदेशोंमें स्थित रहते हैं, तथापि उप- परित असद्धत व्यवहार नयसे लोकाकाशमें सब द्रव्य तिटते हैं ऐसा यहाँपर भगवान् श्रीनेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्तीका अभिप्राय जानना चाहिये ।।१९।। अव उसी लोकाफाशको विशेषगरूपसे हद करते हैं;- गाथोभावार्थ:--धर्म, अधर्म, काल. पुद्गल और जीव ये पांचों द्रव्य जितने आका- शगे हैं वह तो लोकाकाश है और उस लोकाकाशके आगे अलोकाकाश है ॥२०॥ व्याख्यार्थः-धर्म, अधर्म, काल, पुद्गल तथा जीव ये पांचों द्रव्य मितने आकाशके भागमें रहते हैं उतने आकाशके भागका नाम लोक अथवा लोकाकाश है। ऐसा कहा भी है कि-जहांपर जीव आदि पदार्थ देखनेमें आते हैं वह लोक है। उस लोकाकाशसे परे अर्थात् या भागमें जो अनन्त आकाश है वह अलोक अथवा अलोकाफाश है। अब सदापर मोम है नाम जिसका ऐसा राजश्रेष्टो प्रश्न करता है कि हे भगवन् ! केवल जानका जो अनन्त भाग है उस प्रमाण तो आकाश द्रव्य है और उस आकाशके अनन्त भागों- मैले एक भागमें सबफे विचले भागमें लोकई और वह लोक आदि तथा अन्तले रहित है न किसी पुरुषका बनाया हुआ न किसीसे विनाशित है, न किसीसे धारण किया - +- ५२ - , श्रीमद् राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् देकगूढरसनागगद्याणके बहुसुवर्णवद्भस्मघटमध्ये सूचिकोटदुग्धवदित्यादिदृष्टान्तेन विशि- टावगाहनशक्तिवाशदसंख्यातप्रदेशेऽपि लोकेऽवस्थानमवगाहो न विरुध्यते । यदि पुनरि- त्थंभूतावगाहनशक्तिर्न भवति तीसंख्यातप्रदेशेष्वसंख्यातपरमाणनामेव व्यवस्थानं, तथा सति सर्वे जीवा यथा शुद्धनिश्चयेन शक्तिरूपेण निरावरणाः शुद्धबुद्धकस्वभावास्तथा व्यक्तिरूपेण व्यवहारनयेनापि, न च तथा प्रत्यक्षविरोधादागमविरोधाचेति । एवमाकाश- द्रव्यप्रतिपादनरूपेण सूत्रद्वयं गतम् ॥२०॥ अथ निश्चयव्यवहारकालस्वरूपं कथयति;- दव्यपरिवरूवो जो सो कालो हवेइ ववहारी । परिणामादीलक्खो वट्टणलक्खो य परमट्ठो ॥२१॥ व्याख्या-“दव्वपरिवहरूवो जो" द्रव्यपरिवर्तरूपो यः “सो कालो हवेइ ववहारो" स कालो भवति व्यवहाररूपः। स च कथंभूतः “परिणामादीलक्खो” परिणामक्रिया हुआ है और न किसीसे रक्षा किया हुआ है। और असंख्यात प्रदेशोंका धारक है । उस असंख्यात प्रदेशोंके धारक लोकमें अनन्तों जीव, अनन्त गुणे पुद्गल, लोकाकाश-प्रमाण- असंख्यात कालाणु द्रव्य, लोकाकाश प्रमाण धर्मद्रव्य तथा लोकाकाश प्रमाण ही अधर्मद्रव्य इस प्रकार पूर्वोक्त लक्षणके धारक पदार्थ कैसे अवकाशको प्राप्त होते हैं ? इस शंकाका उत्तर कृपा कर दीजिये। अव भगवान् इसके उत्तर में कहते हैं कि जैसे एक दीपकके प्रकाशमें अनेक दीपोंका प्रकाश अवकाशको पाता है उस तरह, अथवा जैसे एक गूढ़ रसविशेषसे भरे हुए शीशेके भांडमें बहुतसा सुवर्ण अवकाश पाता है उस प्रकार. अथवा भस्मसे भरे हुए घटमें जैसे सूई और ऊंटनीका दूध आदि समाजाते हैं उस प्रकार विशिष्ट अवगाहन शक्तिके वशसे असंख्यात प्रदेशवाले लोकमें पूर्वोक्त जीव पुद्गलादिकोंका रहना प्राप्त नहीं होता । और यदि इस प्रकार अवगाहनशक्ति न हो तो लोकके असंख्यात प्रदेशोंमें असंख्यात परमाणुओंका हो निवास हो। और ऐसा होनेपर जैसे शक्तिरूप शुद्ध निश्चयनयसे सब जीव आवरणरहित तथा शुद्ध बुद्ध एक स्वभावके धारक हैं; वैसेही व्यक्ति- रूप व्यवहारनयसे भी हो जाँय; और ऐसे हैं नहीं। क्योंकि इस मानने में प्रत्यक्षसे और आगमसे विरोध है । इस प्रकार आकाश द्रव्यके निरूपणसे दो सूत्र चरितार्थ हुए ॥२०॥ अब निश्चयकाल तथा व्यवहारकालके स्वरूपका वर्णन करते हैं;- गाथामावार्थ:-जो द्रव्योंके परिवर्तन रूप, परिणाम रूप देखा जाता है वह तो व्यवहारकाल है और वर्त्तना लक्षणका धारक जो काल है वह निश्चयकाल है॥२३॥ व्याख्यार्थः- "दच्वपरिवहरूषो जो" जो द्रव्य परिवर्तरूप है "सो कालो हवे वबहारो" वह व्यवहाररूप काल होता है । और वह कैसा है कि "परिणामादीलक्खो" विरोधको . . - बृहंद्राव्यसंग्रहः। परत्वापरत्वेन लक्ष्त्यंत इति परिणामांदिलक्ष्यः । इदानी निश्चयकालः कथ्यतेः- "वट्टण- बखो ये परमट्टो' वर्तनालझणश्च परमार्थकाल इति । तद्यथा-जीवपुद्गलयोः परिवर्तों नवजीर्णपर्यायरतस्य या समयघंटिकादिरूपा स्थितिः स्वरूपं यस्य स भवति द्रव्यपर्याय- रूपो व्यवहारकालः। तथा चोक्तं संस्कृतप्राभृतेन-"स्थितिः कालसंज्ञका" तस्य पर्या- यस्य संबंधिनी यांऽसो समयघटिकादिरूपा स्थितिः सा व्यवहारकालसंज्ञा भवति न च पर्याय इत्यभिप्रायः । यत एव पर्यायसंबन्धिनी स्थितिर्व्यवहारकालसंज्ञां भजते तत एव जीवंपुद्गलसंबन्धिपरिणामेन पर्यायेण तथैव देशान्तरचटनरूपया गोदोहनपाकादि- परिस्पन्दलक्षणरूपया वा क्रियया तथैव दूरासन्नचलनकालकृतपरत्वापरत्वेन च लक्ष्यते ज्ञायते यः स परिणामक्रियापरत्वापरत्वलक्षण इत्युच्यते । अथ द्रव्यरूपनिश्चयकालमाह स्वकीयोपादानरूपेण स्वयमेवपरिणममानाना पदार्थानां कुम्भकारचक्रस्याधस्तनशिलावत् , शीतकालाध्ययने अग्निवत् , पदार्थपरिणतेयंसहकारित्वं सा वर्तना भण्यते । सैव लक्षणं यस्य स वर्त्तनालक्षणः कालाणुद्रव्यरूपो निश्चयकालः । इति व्यवहारकालस्वरूपं निश्रय- कालस्वरूपं च विज्ञेयम् । कश्चिदाह "समयरूप एव निश्चयकालस्तस्मादन्यः कालाणुद्र- व्यरूपो निश्चयकालो नास्त्यदर्शनात् ।" तत्रोत्तरं दीयते-समयस्तावत्कालस्तस्यैव पर्यायः । - परिणाम, क्रिया, परत्व, अपरत्वसे जाना जाता है, इसलिये परिणामादिलक्ष्य है। अब निश्च- चकाटका कथन करते हैं। "वट्टणलाखो य परमट्ठो” जो वर्त्तनालक्षण काल है वह परमार्थ (निश्चय) काल है। अब इस व्यवहार तथा निश्चयकालका विस्तारसे वर्णन इस प्रकार है, जैसे-जीव तथा पुद्गलका परिवर्त जो नूतन तथा जीर्ण पर्याय है उस पर्यायको जो समय, बटिका आदिरूप स्थिति है वही जिसका स्वरूप है वह द्रव्यपर्यायरूप व्यवहार- फाल है। सोही संस्कृतप्राभृतने कहा भी है कि "स्थिति जो है वह कालसंज्ञक है"। तात्पर्य यह है कि उस द्रव्य के पर्यायसे संबन्ध रखनेवाली जो समय, घटिका आदिरूप स्थिति है वह स्थिति ही "व्यवहारकाल" इस संज्ञाकी धारक होती है और वह जो द्रव्यका पर्याय है सो व्यवहारकाल संज्ञाको नहीं धारण करता। और जो पर्यायसंबंधिनी स्थिति "व्यवहारकाल' इस नामको धारण करती है इसी कारणसे जीव तथा पुद्गल संबंधी परिणाम रूप पर्यायसे, तथा देशान्तरमें संचलन रूप अथवा गोदोहन, पाक आदि परिस्पन्द लाणको धारक क्रियाले तथा दूर वा समीप देशमें चलन रूप कालकून परत्य तथा अपरत्वसे यह फाल जाना जाता है. इसीलिये वह काल, परिणाम, क्रिया, परत्व तथा अपरत्व सगका धारक कहा जाता है। अब द्रव्यरूप निश्चय कालका कथन करते हैं। अपने अपने उपादानरूप कारणसे स्वयं हो परिणमनको प्राप्त होते हुए पदार्थों के जैसे ९मफार चक्र (चाफ) के भ्रमणने उसके नीचेको शिला सहकारिणो है उस प्रकार, अथवा शीतकाल (जाड़े) के पढ़ने में अग्नि सहकारी है उस प्रकार जो पदार्थपरिणति में सहकारिता है उसोको वर्तना कहते हैं और यह वर्नना हो है न्झग जिसका सो वर्तना -- वृहद्रव्यसंग्रहः। पुद्गलपरमाणुनयनपुटविघटनजलभाजनपुरुषव्यापारादिदिनकरविम्वरूपैः पुद्गलपर्यायैरु- पादानभूतैः समुत्पन्नानां समयनिमिपघटिकादिकालपर्यायाणामपि शुक्लकृष्णादिगुणाः प्राप्नुवन्ति न च तथा । उपादानकारणसदृशं कार्यमिति वचनात् । किं बहुना । योऽसा- चनाधनिधनस्तथैवामूर्तो नित्यः समयाद्युपादानकारणभूतोऽपि समयादिविकल्परहितः कालाणुद्रव्यरूपः स निश्चयकालो, यस्तु सादिसान्तसमयघटिकाप्रहरादिविवक्षितव्यवहा- रविकल्परूपस्तस्यैव द्रव्यकालस्य पर्यायभूतो व्यवहारकाल इति । अयमत्र भावः- यद्यपि काललब्धिवशेनानन्तसुखभाजनो भवति जीवस्तथापि विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावनि- जपरमात्मतत्वस्य सम्यकश्रद्धानज्ञानानुष्ठानसमस्तवहिर्द्रव्येच्छानिवृत्तिलक्षणतपश्चरणरूपा या निश्चयचतुर्विधाराधना सैव तत्रोपादानकारणं ज्ञातव्यं न च कालस्तेन स हेय इति ॥२१॥ अथ निश्चयकालस्यावस्थानक्षेत्रं द्रव्यगणनां च प्रतिपादयति;- लोयार्यासपदेसे इफिक जे ठिया हु इकिका । रयणाणं रासी इव ते कालाणू असं खदव्वाणि ॥२२॥ - . तन्दुल (चावल) रूप उपादान कारणसे उत्पन्न जो ओदन (भात ) पर्याय है उसके निन उपादान कारणमें प्राप्त गुणोंके समान ही शुक्ल, कृष्ण आदि वर्ण, अच्छा वा पुरा गन्ध, चिकना अथवा रूखा आदि स्पर्श, मधुर आदि रस, इत्यादि विशेष गुण देख पढ़ते हैं; वैसे ही पुद्गल परमाणु, नयनपुट विघटन, जलभाजन, पुरुपव्यापार आदि तथा सूर्यका बिम्ब इन रूप जो उपादानभूत पुद्गलपर्याय हैं उनसे उत्पन्न हुए समय, निमिप, घटिका, दिन आदि जो कालपर्याय हैं उनको भी शुक्ल, कृष्ण आदि गुण प्राप्त होते हैं, परन्तु समय घटिफा आदिमें उपादान कारणोंके कोई गुण नहीं देख पढ़ते । क्योंकि उपादानकारणके समान कार्य होता है ऐसा वचन है। अब यहां अधिक कहना व्यर्थ है। जो आदि तथा अन्तसे रहित है, अमूर्त है, नित्य है, समय आदिका उपादानकारणभूत है तो भी समय आदि भेदोंसे रहित है, और कालाणु द्रव्यरूप है वह तो निश्चय काल है । और जो आदि तथा अन्तसे सहित है, समय. घटिका तथा प्रहर आदि विवक्षित व्यवहारके विकल्पोंसे युक्त है. वह उसी द्रव्यकालका पर्यायभूत व्यवहारकाल है। यहाँ तात्पर्य यह है कि यद्यपि यह जीव काटलब्धिके वासे अनन्त सुखका भाजन (पान ) होता है, तथापि विशुद्ध शान दर्शन स्वभावका धारक जो निज परमात्माका स्वरूप है उसके सम्यक् अद्वान, ज्ञान. आप- रण और संपूर्ण बाहा द्रव्योंको इच्छाको दूर करनेम्प लगका धारक तपश्चरणरूप पे दर्शन, शान, चारिन क्या तपरूप जो निधयसे चार प्रकारको आराधना है यह आराधना ही उस जोरफे अनन्त सुनकी प्राप्तिमें उपादान कारण है ऐसा जानना चाहिये । और फाल उपादान कारण नहीं है, इसरिये वह फाल हेय (त्याग्य ) है ॥२॥ .

ममा कहो तो उत्तर यह है कि आकाश अखंड द्रव्य है, इसलिए. जैसे चाकके एक देश में . हैं ॥२२॥ पुद्गल परमाणु द्वारा प्रकट किये हुए और कालाणुरूप उपादान कारणसे उत्पन्न हुए ऐसे उत्पाद, व्यय तथा प्रौव्यरूप लक्षणके धारक काल द्रव्यकी सिद्धि है। शंका-"लोकके बाह्य भागमें कालाणु द्रन्यके अभावसे अलोकाकाशमें परिमाण कैसे हो सकता है?" यदि ५६ श्रीमद् राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् व्याख्या- "लोयायासंपदेसे इफिक जे ठिया हु इशिया" लोकाकाशप्रदेशेवेकैकेयु ये स्थिता एकैकसंख्योपेता "हु" स्फुटं । क इव ? "रयणाणं रासी इव" परस्परतादात्म्यप- रिहारेण रत्नानां राशिरिव । "ते कालाणू" ते कालाणवः। कति संख्योपेताः ? "असं- खव्वाणि" लोकाकाशप्रमितासंख्येयद्रव्याणोति । तथाहि - यथाङ्गुलिद्रव्यस्य यस्मिन्नेव क्षणे वनपर्यायोत्पत्तिस्तस्मिन्नेव क्षणे पूर्वप्राखलपर्यायविनाशोऽगुलिरूपेण ध्रौव्यमिति द्रव्यसिद्धिः। यथैव च केवलज्ञानादिव्यक्तिरूपेण कार्यसमयसारस्योत्पादो निर्विकल्पस- माधिरूपकारणसमयसारस्य विनाशस्तदुभयाधारपरमात्मव्यत्वेन ध्रौव्यमिति वा द्रव्य- सिद्धिः । तथा कालाणोरपि मन्दगतिपरिणतपुद्गलपरमाणुना व्यक्तीकृतस्य कालापादा- अव निश्चयकालकी स्थितिका क्षेत्र तथा कालको द्रव्यों में क्यों गिनागया, इस विषयका प्रतिपादन करते हैं;- गाथाभावार्थ:-जो लोकाकाशके एक एक प्रदेशमें रत्नोंको राशिके समान परस्पर भिन्न होकर एक एक स्थित हैं वे कालाणु हैं और असंख्यात द्रव्य व्याख्यार्थः- "लोयायासपदेसे इकिके जे ठिया हु इक्किका" एक एक लोकाकाशके प्रदेशों में जो एक एक संख्यायुक्त स्पष्ट रूपसे स्थित हैं। किसकोसी तरह ? "रयणाणं रासी इव" परस्पर अभेदको त्याग कर रनोंको राशिके सदृश अर्थात् रत्नराशिकी भांति भिन्न २ स्थित हैं । "ते कालाणू" वे कालाणु हैं । कितनी संख्याके धारक हैं ? "असंखदव्याणि" लोकाकाश परिमाण असंख्यात द्रव्य हैं। अव द्रव्यसिद्धि प्रमाण कहते हैं। जैसे जिस क्षणमें अंगुलिरूप द्रव्यके वक्र (बांके) पर्यायको उत्पत्ति होती है उसी क्षणमें उसके सरल पर्यायका नाश होता है और अंगुली रूपसे उस अंगुलीमें ध्रौव्य है, इस रीतिसे उत्पत्ति नाश तथा ध्रौव्य इन तीनों लक्षणोंसे युक्त होनेसे द्रव्यसिद्धि होगई । और भी जैसे केवल ज्ञान आदिको व्यक्ति ( प्रकटता ) रूपसे कार्य समयसारका अर्थात् केवलज्ञानादि रूपसे परिणत आत्माका उत्पाद होता है उसी समय निर्विकल्प ध्यानरूप जो कारण समयसार है सका नाश होता है और उन दोनोंका आधारभूत जो परमात्मा द्रव्य हैं उस रूपसे प्रौव्य है, इस रीतिसे भी द्रव्यको सिद्धि है। उसी प्रकार कालाणुके भी जो मन्द गतिमें परिणत और उन वर्तमान तथा अतीत दोनों समयोंका आधारभूत कालद्रव्यपनेसे ध्रौव्य है। ऐसे हुए .

- वृहद्रव्यसंग्रहः। नकारणोत्पन्नस्य य एवं वर्तमानसमयस्योत्पादः स एवातीतसमयापेक्ष्या विनाशस्तदुभ- याधारकालाणुद्रव्यत्वेन ध्रौव्यमित्युत्पादव्ययध्रौव्यात्मककालद्रव्यसिद्धिः । लोकवहिर्भागे कालाणुद्रव्याभावात्कथमाकाशद्रव्यस्य परिणतिरिति चेत् ; अखण्डद्रव्यत्वादेकदेशदण्डा- हतकुम्भकारचक्रभ्रमणवत्, तथैवैकदेशमनोहरस्पर्शनेन्द्रियविपयानुभवसर्वाङ्गसुखवत् , लोकमध्यस्थितकालाणुद्रव्यधारणकदेशेनापि सर्वत्र परिणमनं भवतीति. कालद्रव्यं शेप- द्रव्याणां परिणतेः सहकारिकारणं भवति । कालद्रव्यस्य किं सहकारिकारणमिति । यथा- काशद्रव्याणामाधारः स्वस्यापि, तथा कालद्रव्यमपि परेप परिणतिसहकारिकारणं स्वस्यापि । अथ मतं यथा कालद्रव्यं स्वस्योपादानकारणं परिणतः सहकारिकारणं च भवति तथा सर्वव्याणि कालद्रव्येण किं प्रयोजनमिति । नैवम् । यदि पृथग्भूतसहकारिकारणेन प्रयोजनं नास्ति तहिं सर्वव्याणां साधारणगतिस्थित्यवगाहनविपये धर्माधर्माकाशद्रव्यैरपि सहकारिकारणभूतैः प्रयोजनं नास्ति । किञ्च कालस्य घटिकादिवसादिकार्य प्रत्यक्षेण श्यते धर्मादीनां पुनरागमकयनमेव प्रत्यक्षेण किमपि कार्य न दृश्यते । ततस्तेषामपि कालद्रव्य- स्येवाभावः प्राप्नोति । ततश्च जीवपुद्गलद्रव्यद्वयमेव । स चागमविरोधः। किञ्च सर्वद्र- • व्याणां परिणतिसहकारित्वं कालस्यैव गुणः, नाणेन्द्रियस्य रसास्वादनमिवान्यद्रव्यस्य गुणोऽन्यद्रव्यम्य कत्तुं नायाति द्रव्यसंकरदोपप्रसंगादिति । कग्निदाह-यावत्कालेनैका- विद्यमान दंडकी प्रेरणासे संपूर्ण कुंभकारके चाकका परिभ्रमण हो जाता है, उस तरहसे अथवा जैसे एक देश में प्रिय ऐसे स्पर्शन इन्द्रियके विपयका अनुभव करनेसे समस्त शरी- रमें सुखका अनुभव होता है उस प्रकार लोकके मध्यमें स्थित जो कालाणु द्रव्यको धारण करनेवाला एकदेश आकाश है उससे भी सर्व आकाशमें परिणमन होता है। शंका-जैसे कालद्रव्य, जीव पुद्गल आदि द्रव्योंके परिणमनमें सहकारी कारण है वैसे ही कालद्रव्यके परिणमन में सहकारी कारण कौन है ? उत्तर-जैसे आकाश द्रव्य संपूर्ण द्रव्योंका आधार है और अपना आधार भी आप ही है, इसी प्रकार काल द्रव्य भी अन्य सब द्रव्योंके परिणम- नमें और अपने परिणमनमें भी सहकारी कारण है। अब कदाचित् कहो कि जैसे काल- द्रव्य अपना तो उपादान कारण है और परिणमनका सहकारी कारण है, वैसे ही जीव आदि सय द्रव्योंको अपने उपादान कारण और परिणति के सहकारी कारण मानो । उन जीव आ- दिके परिणमनमें कालद्रव्यसे क्या प्रयोजन है ? समाधान-ऐसा नहीं । क्योंकि यदि अपनेसे भित यहिरंग सहकारी कारणसे प्रयोजन नहीं है तो सब द्रव्यों में साधारण रूप (समानता)- से विद्यमान जो गति, स्थिति तथा अवगाहन हैं उनके विषय में सहकारी कारणभूत जो धर्म, अधर्म तथा आकाश द्रव्य हैं उनसे भी कोई प्रयोजन नहीं है। और भी, कालका तो घटिका (पढ़ी) दिन आदि कार्य प्रत्यासे देख पड़ता है और धर्म क्रय आदिका कार्य तो केपल आगम (शाख) के कपनले हो माना जाता है। उनका कोई कार्य प्रत्यक्षसे नहीं दीख पड़ता। इसलिये, जैसे कालयका अभाव मानते हो उसी प्रकार उन धर्म, अधर्म .

श्रीमद् राजचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम् फाशनदेशं परमाणुरतिकामति ततस्तावत्कालेन समयो भवतीत्युक्तमागमे एकसमयेन चतुर्दशरजुगमने यावंत आकाशप्रदेशास्तावन्तः समया प्राप्नुवन्ति । परिहारमाह- एकाकाशप्रदेशातिक्रमेण यत्समयव्याख्यानं कृतं तन्मन्दगत्यपेक्षया, यत्पुनरेकसमये चतुर्दशरज्जुगमनव्याख्यानं तत्पुनः शीघ्रगत्यपेक्षया। तेन कारणेन चतुर्दशरजुगमनेऽप्ये- कसमयः । तत्र दृष्टान्तः कोऽपि देवदत्तो योजनशतं मन्दगत्या दिनशतेन गच्छति । स एव विद्याप्रभावेण शीघ्रगत्या दिनेनैकेनापि गच्छति तत्र किं दिनशतं भवति । किन्त्वेक एव दिवसः । तथा चतुर्दशरज्जुगमनेऽपि शीघ्रगमनेनेक एव समयः। किञ्च स्वयं विष- यानुभवरहितोऽप्ययं जीवः परकीयविषयानुभवं दृष्टं श्रुतं च मनसि स्मृत्वा यद्विषया- भिलाषं करोति तदपध्यानं भण्यते तत्प्रभृतिसमस्तविकल्पजालरहितं स्वसंवित्तिसमुत्प- असहजानन्दैकलक्षणसुखरसास्वादसहितं यत्तद्वीतरागचारित्रं भवति । यत्पुनस्तदविना- भूतं तन्निश्चयसम्यक्त्वं चेति भण्यते । तदेव कालत्रयेपि मुक्तिकारणम् । कालस्तु तद- भावे सहकारिकारणमपि न भवति ततः स हेय इति । तथाचोक्तं "किं पल्लविएण बहुणा जे सिद्धा णरवरा गए काले । सिद्धिहं हि जेवि भविया तं जाणह सम्ममाहप्पं ॥” इदमत्र तथा आकाश द्रव्योंका भी अभाव अवश्य प्राप्त होता है । और जब इन काल आदि चारोंका अभाव मानलोगे तो जीव तथा पुद्गल ये दो ही द्रव्य रह जायेंगे । और दो द्रव्योंके माननेपर आगमसे विरोध होगा । और सब द्रव्योंके परिणमनमें सहकारी होना यह केवल काल द्रव्यका ही गुण है। जैसे घाण इंद्रिय (नासिका ) से रसका आस्वाद नहीं हो सकता, ऐसे ही अन्य द्रव्यका गुण भी अन्य द्रव्यके करनेमें नहीं आता। क्योंकि ऐसा माननेसे द्रव्यसंकर दोपका प्रसंग होगा (अर्थात् अन्य द्रव्यका लक्षण अन्य द्रव्यमें चला जायगा, जो कि सर्वथा अनुचित है)। अव यहां कोई कहता है कि जितने कालमें एक आकाशके प्रदे- शको परमाणु अतिक्रम करता है अर्थात् एक प्रदेशसे दूसरे प्रदेशमें गमन करता है उत्तने कालका नाम समय होता है यह शास्त्रमें कहा है, और इस हिसाबसे चौदह रज्जु गमन करनेमें जितने आकाशके प्रदेश हैं उतने समय ही लगने चाहिये; परन्तु शास्त्र में यह भी कहा है कि पुद्गल परमाणु एक समय में चौदह रज्जु पर्यन्त गमन करता है सो यह कथन कैसे संभव हो सकता है ? इसका खंडन कहते हैं कि आगममें जो परमाणुका एक समयमें एक आकाशके प्रदेशमें गमन करना कहा है सो तो मन्द गमनकी अपेक्षासे है, और जो परमाणु का एक समयमें चौदह रज्जुका गमन कहा है वह शोघ्र गमनकी अपेक्षासे है, इस कारण परमाणुको शीघ्रगतिसे चौदह रज्जु प्रमाण गमन करनेमें भी एकही समय लगता है। इस विषयमें दृष्टान्त यह है कि जैसे जो देवदत्त मन्द गमन (धोरो चाल) से सौ योजन सौ दिनमें जाता है, वहीं देवदत्त विद्या प्रभावसे शीघ्र गमन आदि करके १०० सो योजन एक दिनमें भी जाता है तो क्या उस देवदत्तको शीघ्रगतिसे सौ योजन गमन करनेमें सौं दिन लगेंगे ? किन्तु एक ही दिन लगेगा। इसी प्रकार शीघ्र गतिसे चौदह रज .

- दृहद्रव्यसंग्रहः । मात्पर्य कालद्रव्यमन्यद्वा परमागमाविरोधेन विचारणीयं परं किन्तु वीतरागसर्वज्ञव- पनं प्रमाणमिति मनसि निश्चित्य विवादो न कर्त्तव्यः । कस्मादिति चेत्-विवादे राग- देपो भवतस्ततश्च संसारवृद्धिरिति ॥२२॥ एवं कालद्रव्यव्याख्यानमुख्यतया पंचमस्थले सूत्रद्वयं गतम् । इत्यष्टगाथासमुदायेन पंपमिः स्थलेरजीवद्रव्यन्याख्यानेन द्वितीयांतराधिकारः समाप्तः ।। अतःपरं सूत्रपश्चकपर्यन्तं पञ्चास्तिकायन्याख्यानं करोति । तत्रादौ गाथापूर्वार्द्धन पड- द्रव्यल्याख्यानोपसंहार उत्तरार्धन तु पञ्चास्तिकायव्याख्यानप्रारम्भः कथ्यते;- एवं छम्मेयमिदं जीवानीवप्पमेददो दन्न । उत्तं कालविजुत्तं णादव्या पंच अस्थिकाया दु ॥२३॥ व्याख्या-"एवं छन्भेयमिदं जोवाजीवप्पभेददो दव्वं उत्तं" एवं पूर्वोक्तप्रकारेण पड़- भेदमिदं जीवाजीवप्रभेदतः सकाशाद्रव्यमुक्कं कथितं प्रतिपादितम् । “कालविजुत्तं गमन करने में भी परमाणुको एक ही समय लगता है। और भी यहां विशेष जानने योग्य है कि यह जीव स्वयं (निज स्वभावसे ) विषयोंके अनुभवसे रहित है तथापि अन्यके देखे हुए अथवा सुने हुए विपयके अनुभवको मनमें स्मरण करके जो विषयोंकी इच्छा करता है उसको अपध्यान (बुरा ध्यान ) कहते हैं। उप्त विपयको अभिलापाको आदि ले, संपूर्ण विकल्पोंका जो समूह है, उससे रहित और आत्मशानसे उत्पन्न स्वाभाविक आनंदरूप सुखके रसके आस्वादसे सहित जो है वह वीतराग चारित्र है । और जो उस वीतराग चारित्रसे व्याप्त है वह निश्चय सम्यक्त्व तथा वीतराग सम्यक्त्व कहलाता है। वह निश्चय सम्यक्त्व ही भूत, भविष्यत्, वर्तमान इन तीनों कालों में मुक्तिका कारण है। और फाल तो उस निश्चय सम्यक्त्व के अभाव में सहकारी कारण भी नहीं होता है, इस कारण वह कालद्रव्य हेय (त्याग करने योग्य ) है। सोही कहा है कि "बहुत कयनसे क्या प्रयोजन है ? जो श्रेष्ठ मनुष्य भूत कालमें सिद्ध हुए हैं तथा अब होंगे, वह सब सम्यक्त्यका माहात्म्य है"। अब यहाँ तात्पर्य यह है कि कालद्रव्यके तथा अन्य द्रव्यों के विषय में जो फुछ विचारना हो वह सब परम आगमके अविरोधसे ही विचारना चाहिये और"वीतराग सर्वशका वचन प्रमाण है" ऐसा मनमें निश्चय करके उनके कथनमें विवाद नहीं करना पाहिये। क्योंकि विवादमें राग तथा द्वेष उत्पन्न होते हैं और उन रागद्वेषोंसे संसारको पृद्धि होती है ॥२ ऐसे कालद्रव्यके व्याख्यानको मुख्यतासे पंचम स्यलमें दो सूत्र समाप्त हुए। और उक्त रीतिसे आठ गाथाओंके समुदायसे पांच स्थलोंसे पुद्गल आदि पांच प्रकारके अजीव द्रव्यके निरूपण रूपसे दूसरा अन्तर अधिकार समाप्त हुआ । अब इसके पश्चात् पांच सूत्र पर्यन्त पंचास्तिफायका व्याख्यान करते हैं। और उनमें भी प्रथम गायाफे पूीर्घसे छहों द्रव्योंके व्याल्यानका उपसंहार और उत्तरार्ध से पंचास्ति- कायफ व्याख्यानका आरंभ करते हैं:- । -- - .. . t ६० श्रीमद् राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् णादवा पंच अस्थिकाया दु" तदेव पडविधं द्रव्यं कालेन वियुक्तं रहितं झातव्याः पञ्चास्तिकायास्तु पुनरिति ॥ २३ ॥ पञ्चेति संख्या ज्ञाता तावदिदानीमस्तित्वं कायत्वं च निरूपयवि- संनि जदो तेणेदे अत्थिति मणंति जिणवरा जमा । काया इव वहुदेसा तमा काया य अत्थिकाया य ॥२४॥ व्याख्या-“संति जदो तेणेदे अस्थित्तिः भणंति जिणवरा" सन्ति विद्यन्ते यत एठे. जीवाद्याकाशपर्यन्ताः पञ्च तेन कारणेनैतेऽस्तीति भणन्ति जिणवराः सर्वज्ञाः । “जह्मा काया इव बहुदेसा तह्मा काया य" यस्मात्काया इव बहुप्रदेशास्तस्मात्कारणात्कायाश्च भणति जिनवराः। "अस्थिकाया य" एवं न केवलं पूर्वोक्तप्रकारेणास्तित्वेन युक्ता अस्ति- संज्ञास्तथैव कायत्वेन युक्ताः कायसंज्ञा भवन्ति किन्तूभयमेलापकेनास्तिकायसंज्ञाश्च :-इस प्रकार एक जीव द्रव्य और पांच अजीव द्रव्य ऐसे छह प्रकारके द्रव्यका निरूपण किया। इन छहों द्रव्योंमें से एक कालके विना शेष पांच अस्तिकाय जानने चाहिये ॥२३॥ व्याख्यार्थः- "एवं छन्भेय मिदं जीवाजीवप्पभेददो दवं उचं" ऐसे पूर्वोक्त प्रकारसे जीव तथा अजीवके भेदसे यह द्रव्य छह प्रकारका कहा गया। "कालविजुत्तं णादव्या पंच अस्थिकाया दु" और कालरहित वही छह प्रकारका द्रव्यं अर्थात् कालके विना शेप पांच द्रव्योंको पांच अस्तिकाय समझना चाहिये ।।२३।। अब अस्तिकायसंवन्धिनी पांच यह संख्या तो जानी हुई है ही, इसलिये अस्तित्व तथा कायत्वका निरूपण करते हैं;- गाथाभावार्थः- पूर्वोक्त जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म तथा आकाश ये पांचों द्रव्य विद्यमान हैं इसलिये जिनेश्वर इनको 'अस्ति' (६) ऐसा कहते हैं और ये कायके समान बहु प्रदेशोंको धारक करते हैं इसलिये इनको 'काय' कहते हैं। अस्ति तथा काय दोनोंको मिलानेसे ये पांचों 'अस्तिकाय' होते हैं ॥२४|| व्याख्यार्थः- "संति जदो तेणेदे अत्थिति भणंति जिणवरा" जीवसे आदि लेके आकाश पर्यन्त ये पूर्वोक्त पांच द्रव्य विद्यमान हैं इसलिये सर्वज्ञ देव इनको "अस्ति" (ह) ऐसा कहते हैं। "जमा काया इव बहुदेसा तमा काया य" और काय अर्थात् शरीरके सदृश ये वहुत प्रदेशोंके धारक हैं इस कारणसे जिनेश्वर इनको 'काय' कहते हैं। "अस्थिकाया य" पूर्वोक्त प्रकार अस्तित्वसे युक्त ये पांचों केवल अस्तिसंज्ञक ही नहीं हैं, तथा फायत्यसे युक्त केवल काय संशाके धारक हो नहीं हैं; किन्तु अस्ति और काय इन दोनोंको मिलानेसे "अस्तिकाय" संज्ञाके धारक होते हैं । अव इन पांचोंके संझा, लक्षण नया प्रयोजन आदिसे यद्यपि परस्पर भेद है तथापि अस्तित्व के साथ अभेद है यह दर्शाते वृहद्रव्यसंग्रह। ६१ भवन्ति ॥ इदानीं संज्ञालक्षणप्रयोजनादिभेदेऽप्यस्तित्वेन सहाभेदं दर्शयति । तथाहि- शुद्धजीवास्तिकाये सिद्धत्वलक्षणः शुद्धद्रव्यव्यवनपर्यायः, केवलज्ञानादयो विशेषगुणाः अस्तित्ववस्तुत्वागुरुलघुत्यादयः सामान्यगुणान्न: । तथैवाव्यावाधानन्तसुखाद्यनन्तगुण- व्यक्तिरूपस्य कार्यसमयसारस्योत्पादो रागादिविभावरहितपरमस्वास्थ्यरूपस्य कारणस- मयसारस्य व्ययस्तदुभयाधारभूतपरमात्मद्रव्यत्वेन ध्रौव्यमित्युक्तलक्षणैर्गुणपर्यायैरुत्पाद- व्ययध्रौव्यैश्च सह मुक्तावस्थायां संज्ञालक्षणप्रयोजनादिभेदेऽपि सत्तारूपेण प्रदेशरूपेण घ भेदो 'नास्ति । कस्मादिति चेत्-मुक्तात्म सत्तायां गुणपर्यायाणामुत्पादव्ययधोव्याणां चास्तित्वं सिद्धपति, गुणपर्यायोत्पादव्ययध्रौव्यसत्तायाश्च मुक्तात्मास्तित्वं सिद्धपतीति परस्परसाधितसिद्धत्वादिति । कायत्वं कथ्यते-बहुप्रदेशप्रचनं दृष्ट्वा यथा शरीरं कन्यो भण्यते नथानन्तज्ञानादिगुणाधारभूतानां लोकाकाश प्रमितासंख्येयशुद्धप्रदेशाना. प्रचयं समूह. संघातं मेलापकं दृष्ट्वा मुक्तात्मनि कायस्वं भण्यते । यथा.. शुद्धगुणपर्यायोत्पादव्य- यधीयैः सह मुक्तान्मनः सत्तारूपेण निश्चयेनाभेदो दर्शितस्तथा यथासंभवं संसारिजीवेषु पुद्गलधर्माधर्माकाशकालेषु च द्रष्टव्यः । कालद्रव्यं विहाय कायत्वं चेति सूत्रार्थः ॥२४॥ है:-जैसे शुद्ध जीवास्तिकायमें सिद्धत्व लक्षण शुद्ध द्रव्य व्यञ्जन पर्याय है, केवल मान आदि विशेष गुण हैं, तथा अस्तित्व, वस्तुत्व और अगुरुलघुत्व आदि सामान्य गुण हैं, और जैसे मुक्तिदशामें अव्यावाघ अर्थात् वाधारहित अनन्त सुख आदि अनन्त गुणोंकी व्यक्ति (प्रकटता ) रूप कार्यसमयसारका उत्पाद, राग आदि विभावोंसे शून्य परम स्वास्थ्य स्वरूप कारणसमयसारका व्यय (नाश), और इन दोनोंके अर्थात् उत्पाद तथा व्ययके आधारभूत परमात्मारूप जो द्रव्य है उस रूपसे ध्रीव्य (स्थिरत्व ) है । इस प्रकार पूर्व- फथित लक्षणयुक्त गुण तथा पर्यायोंसे और उत्पाद, व्यय तथा धौव्यके साथ मुक्त अवस्थामें संशा, लमण तथा प्रयोजन आदिका भेट होनेपर भी सत्तारूपसे और प्रदेशरूपसे फिसीका फिसीके साथ भेद नहीं है। क्योंकि, जीवोंकी मुक्तिअवस्था में गुण, द्रव्य तथा पर्यायोंकी और उत्पाद व्यय तथा धौव्यरूप लक्षणोंकी विद्यमानता (सत्ता ) सिद्ध होती है और गुण, पर्याय, उत्पाद, व्यय तथा श्रीव्यकी सत्ताके अस्तित्वको मुक्त आत्मा जो है, वह सिद्ध करता है। इस प्रकार गुण. पर्याय आदि मुक्त आत्माकी और मुक्त आत्मा गुण पर्यायको सत्ताको परस्पर सिद्ध करते हैं। अब इनके काययका निरूपण करते हैं, बहु- उसे प्रदेशों में व्याप्त होफे स्थिति को देख के जैसे शरीरको कायत्व कहते हैं अर्थात जैसे शरीर में अधिक प्रदेश होनेसे शरीरको काय कहते हैं; उसी प्रकार अनंत मान आदि गुणोंके आधारभूत जो लोकाकाशके प्रमाण असंख्यात शुद्ध प्रदेश हैं उनके समूह. संघात अयया मेलफो देखफे, मुफ जीव में भी काययका व्यवहार अथवा कथन होता है। जैसे गुद्ध गुण, पागोंसे नया उत्पाद, व्यर और धोव्य सागसे सहित रहनेवाले मुज आत्मा निश्चय नयसे सत्तारूपसे अभेद दशाया गया है, ऐसे दो संसारी जीवों में तया पुद्गल, -- वृहद्रव्यसंग्रहः। ६३ मन्दगत्या गच्छतः पुद्गलपरमाणोरेकाकाशप्रदेशपर्यन्तमेव कालद्रव्यं गतेः सहकारिका- रणं भवति ततो प्रायते तदप्येक प्रदेशमेव । कश्चिदाइ-पुद्गलपरमाणोतिसहकारिकारणं धर्मद्रव्यं तिष्ठति, कालस्य किमायातम् । नैवं वक्तव्यं-धर्मद्रव्ये गतिसहकारिकारणे विद्यमानेऽपि मत्स्यानो जलवन्मनुष्याणां शकटारोहणादिवत्सहकारिकारणानि बहून्यपि भवन्तीति । अथ मतं कालद्रव्यं पुद्गलानां गतिसहकारिफारणं कुत्र भणितमास्ते ? तदु- ज्यते । “पुग्गलकरणा जीवा खंधा खलु कालकरणादु" इत्युक्तं श्रीकुन्दकुन्दाचार्यदेवैः पश्चास्तिकायप्राभृते । अस्यार्थः कथ्यते । धर्मद्रव्ये विद्यमानेऽपि जीवानां कर्मनोकर्मपु- द्गला गतेः सहकारिफारणं भवन्ति, अणुस्कन्धभेदभिन्नपुद्गलानां तु कालद्रव्यमित्यर्थः।।२५।। अथैकप्रदेशस्यापि पुद्गलपरमाणोरुपचारेण फायत्वमुपदिशतिः- एयपदेसो वि अणू णाणाखंधप्पदेसदी होदि । यहुदेसो उवयारा तेण य काओ भणंति सबण्हु ॥२६॥ एक प्रदेशी होनेमें युक्ति कहते हैं । जैसे-अन्तिम शरीरसे किंचित् न्यून प्रमाणके धारक सिद्धत्व पर्यायका उपादान कारणभूत जो शुद्ध आत्मा द्रव्य हे वह सिद्धत्व पर्यायके प्रमाण हो है। अथवा जैसे मनुष्य, देव आदि पर्यायोंका उपादान फारणभूत जो संसारी जीव द्रव्य है वह उस मनुष्य, देव आदि पर्यायके प्रमाण ही है, उसी प्रकार फालद्रव्य भी समयरूप जो फालका पर्याय हे उसका विभागसे उपादान कारण है तथा अविभागसे एक प्रदेश ही होता है। अथवा मन्द गतिसे गमन करते हुये पुद्गल परमाणुके एक आकाशके प्रदेश पर्यन्त ही कालद्रव्य गतिका सहकारी कारण होता है. इस कारण जाना जाता है कि वह काल द्रव्य भी एक ही प्रदेशका धारक है । अब यहां कोई कहता है कि पुद्गल- परमाणुकी गतिमें सहकारी कारण तो धर्म द्रव्य विद्यमान है ही, इसमें कालद्रव्यका क्या प्रयोजन है ? सो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि धर्म द्रव्य के विद्यमान रहते भी मत्स्योंकी गतिमें जलके समान तथा मनुध्योंकी गतिमें गाड़ीपर बैठना आदिके समान पुद्गलकी गति में बहुतसे भी सहकारी फारण होते हैं। अब कदाचित् कहो कि "कालय पुद्ग- लोकी गतिमें सहकारी कारण है" यह कहां कहा हुआ है ? सो कहते हैं। श्रीकुन्दकुन्द आचार्य देवने पंचास्तिकाय नामक प्राभृतमें "पुग्गल करणा जीवा खंधा खलु कारकरणादु" ऐसा कहा है। इसका अर्थ करते हैं कि धर्म द्रव्य विद्यमान होते भी जीवोंकी गतिमें फर्म, नोक पुगत सहकारी कारण होते हैं और अणु तथा स्कन्ध इन भेदोंसे भेदको प्राप्त हुए पुद्गरोंके गमन में कारद्रव्य सहकारी कारण होता है । यह गाथाका अर्थ 1 अब पुद्गल परमाणु यद्यपि एकप्रदेशी है तथापि उपचारसे उसको काय कहते ऐसा उपदेश करते हैं- वृहद्रव्यसंग्रहः। ६५ कयमिति चेत् तत्रोचरम्-अणुशब्देन व्यवहारेण पुद्गला उच्यन्ते, निश्चयेन तु वर्णादि- गुणानां पूरणगलनयोगात्पुद्गला इति वस्तुवृत्त्या पुनरणुशब्दः सूत्मवाचकः । तद्यथा- परमेण प्रकर्षणाणुः। अणु कोऽर्थः सूक्ष्म इति व्युत्पत्त्या परमाणुः। स च सूक्ष्मवाच- कोऽणुशब्दो निविभागपुद्गलविवक्षायां पुद्गलाणुं वदति । अविभागिकालद्रव्यविवक्षायां तु कालापुं कथयतीत्यर्थः ॥२॥ अथ प्रदेशलमणमुपलक्षयति;- जावदियं आया अविभागीपुग्गलामुउद्धं । तं तु पदेसं जाणे सवाणुहाणदाणरिहं ॥२७॥ व्याख्या-"जावदियं आयासं अविभागोपुग्गलाणुउद्धं तं खु पदेस जाणे" याव- प्रमाणमाकाशमविभागिपुद्गलपरमाणुना विष्टब्धं व्याप्तं तदाकाशंखु स्फुट प्रदेशं जानीहि हे शिष्य ! कथंभूतं "सम्वाणुट्टाणदाणरिह" सर्वाणूना सर्वपरमाणना सूक्ष्मस्कन्धानां च स्थानदानस्शवकाशदानस्याई योग्यं समर्थमिति । यत एवेत्यंभूतावगाइनशक्तिरस्त्याका- शस्य तत एवासंख्यातप्रदेशेऽपि लोके अनन्तानन्तजीवास्तेभ्योऽप्यनन्तगुणपुद्गला अव- फायत्व नहीं सिद्ध होता । कदाचित् कहो कि अणु यह पुद्गलको संज्ञा है। कालकी अणु संझा कैसे हुई ? तो इसका उत्तर सुनो-"अणु" इस शब्दसे व्यवहारसे पुद्गल कहे जाते हैं. और निश्चयसे तो वर्ग आदि गुगों के पूरण तथा गलनके संबंधसे पुद्गल कहे जाते हैं; और यथार्य में तो अणु शब्द सूरमका वाचक है, जैसे परम अर्थात् प्रकर्प (अधिकता)से जो अणु हो सो परमाणु है । इस व्युत्पत्ति से परमाणु शब्द जो है वह अति सूक्ष्म पदार्थको कहनेवाला है। और यह सूक्ष्म वाचक अगु शब्द निर्विभाग पुद्गलको विवामें तो पुद्गल अगुको कहता है और अविभागि (विमागरहित ) फालद्रव्य के कहनेको जब इच्छा होती तय कालाणुको कहता है. ॥२६॥ अद प्रदेशका लक्षण दिखाते हैं- गायीभावार्थ:--जितना आकाश अविभागी पुद्गलागुसे रोका जाता है टमको सय परमाणुओंको स्थान देनेमें समर्थ प्रदेश जानो ॥२७॥ च्याल्यार्थ:-"नावदियं आयासं अविमागीपुरगनाणुउदं तं खु पदेस जाणे" हे शिष्य ! जितना आझाा विभागरहित पुद्गलपरमाणुसे व्यात हे उसको सष्ट रूपसे प्रदेश जानो। वप्रदेश कैसा है कि "सब्याणुहाणदाणरिह" सब परमागु और सूक्ष्म स्कन्धोंको अवकाश (त्यान ) देनेके लिये समर्थ है। इस प्रकारको अवगाहन सक्ति जो बाकाशमें है, इसी हेतुसे असंत्यात प्रदेश प्रमाण लोकाकासमें अनन्तानन्त जीप तमा सन जीयोंसे भी अनन्त गुणे पुद्गल सबकासको प्राप्त होते हैं। सोहो जीय तथा पुद्गलक विपरमें इस फे अवकाश देनेका सामर्न आगममें कहा है। "एक निगोद शरीर में इल्म- - वृहद्रव्यसंग्रहः। . द्वितीयोऽधिकारः ।। २ ॥ .. अवापरं पूर्वोक्तपद्रव्यागां चूलिकारूपेण विस्तरव्याख्यानं क्रियते । तद्यथा- परिणामि-जीव-मुचं, सपदेस एय-खेत-किरिया य । णिचं कारण-कत्ता, सव्वगदमिदरंहि यपवेसे ॥ १ ॥ दुणिय' एवं एयं, पंच-त्तिय एय दुणि चउरो य । पंच य एयं एयं, एदेसं एय उत्तरं यं ॥ युग्मम् ॥ २ ॥ व्याख्या-"परिगामि" इत्यादिव्याख्यानं क्रियते । परिणामपरिणामिनी जीवपुद् स्वभावविभावपर्यायाभ्या कृत्वा. शेपचत्वारि न्याणि विभावव्यञ्जनपर्यायाभावा ख्यवृत्त्या पुनरपरिणामोति । “जीव" शुद्धनिश्चयनयेन विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावं शुरू तन्यं प्राणशब्देनोच्यते तेन जीवतीति जीवः। व्यवहारनयेन पुनः कर्मोदयजनित भावरूपेशतुभिः प्राणजीवति, जीविष्यति, जीवितपूर्वो वा जीवः पुद्गलादिपञ्चद्रः अब इसके पश्चात् पद्रव्योंको चूलिका (परिशिष्ट अथवा उपसंहार ) रूपसे । व्याख्यान करते हैं। सो इस प्रकार है- गाथामावार्थ:-पूर्वोक्त पद्रव्योमसे परिणामी द्रव्य जीव और पुद्गल ये दो हैं, न्य एफ जीव है, मूर्तिमान् एक पुद्गल है, प्रदेशसहित जीव, पुद्गल, धर्म, = स्या आकाश ये पांच द्रव्य हैं, एक संख्यावाले धर्म, अधर्म और आकाश ये तीन कर क्षेत्रवान् एक आकाश द्रव्य है, क्रियासहित जीव और पुद्गल ये दो द्रव्य हैं, नित्य: धर्म, धर्म, आकाश तया काल ये चार हैं. कारण द्रव्य-पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश फाल ये पांच हैं. कर्ताद्रव्य-एक जीव है, सवंगत (सर्वमें व्यापनेवाला) द्रव्य-एक अ है, और ये छहों द्रव्य प्रवेझरहित हैं अर्थात् एक द्रव्यमें दूसरे द्रव्यका प्रवेश नहीं ॥२॥ यहा इन दोनों गायाओं को मिलाके अर्थ कहा गया है। व्याख्या:-"परिणामि इत्यादि गायाफा व्याख्यान करते हैं-स्वभाव नया पर्यायोंकरके परिणामसे परिणामी जीव और पुगर ये दो द्रव्य है और शेष (वार पार द्रव्य अर्थात् धर्म, अधर्म, आकाश तथा काल में चार अन्य विभावव्यंजना अमावसे मुग्यतासे अपरिणामी हैं । "जीव" नियनयसे निर्मल ज्ञान तथा स्वभावका धारफ जो शुद्ध तन्य है, उसीफो प्राण शब्दसे कहते हैं। उस शुद्ध चैत भागसे जो जीपना है वह जीप और व्यपहारनयसे ककि उदयसे उत्पन्न द्रव्य (१) यद मापा परि मासटोयको प्रगिनों में नही पारि टीकाकारने मरा आगर रिया है और जपनंद्रजीत पसंड्यो पनि नका मन मुसि पुस्तक में नम होगी। उपयोगी गमभकर, महानिग दी गई है। (२) दे दोनों पापा वन्य प्रशासनिक मामा संस्था नहीं समाई है वृहद्रव्यमंग्रहः । ६६ सरीरवाल्मनःप्राणापानादिगतिस्थित्यवगाहवर्तनाफार्याणि कुर्वन्तीति कारणानि भवन्ति । जीवद्रव्यं पुनर्यद्यपि गुरुशिष्यादिरूपेण परस्परोपग्रहं फरोति तथापि पुद्गलादिपञ्चद्रव्याणां किमपि न फरोतीत्यकारणम् । "फत्ता" शुद्धपारिणामिकपरमभावनाइकेन शुद्धद्रव्या- थिंकनयेन यद्यपि चन्धमोक्षद्र व्यभावरूपपुण्यपापघटपटादीनामकचर्चा जीवस्तयाप्यगुद्ध- निश्चयेन शुभाशुभोपयोगाभ्यां परिणतः सन् पुण्यपापयन्धयोः कर्ता फलमोक्ता भवति । विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावनिजशुद्धात्मद्रव्यस्य सम्यकद्धानज्ञानानुष्ठानरूपेण शुद्धोपयोगेन तु परिणतः सन् मोक्षस्यापि कर्ता तत्फलभोक्ता चेति । शुभाशुभशुद्धपरिणामानां परिण- मनमेव फत्वं सर्वत्र सातव्यमिति । पुद्गलादिपनद्रव्याणां च स्वकीयस्वकीयपरिणामेन परिणमनमेव कर्तृत्वम् । वस्तुवृत्त्या पुनः पुण्यपापादिरूपेणाकर्तृत्वमेव । "नव्यगदं" लोकालोफल्याप्यपेक्षया सर्वगतमाकाशं भण्यते । लोकव्याप्त्यपेक्षया धर्माधर्मी च । जीव- द्रव्यं पुनरेकजीवापेक्षया लोकपूरणावस्थां विहायासर्वगतं. नानाजीवापेक्षया सर्वगतमेव भवति, पुद्गलद्रव्यं पुनलोफरूपमहास्कन्धापेक्षया सर्वगतं, शेपपुद्गलापेक्ष्या मर्वगतं न भवति. कालद्रव्यं पुनरेफकालाणुद्रव्यापेक्षया सर्वगतं न भवति । लोकप्रदेशप्रमाणना- उनकी अपेक्षासे तथा विभावव्यंजन पर्यायफी अपेक्षासे अनित्य हैं। "कारण" पुद्गल, धम, अधर्म, आकाश और काल ये जो द्रव्य हैं इनमेंसे व्यवहारनयकर जीवके शरीर, वचन, मन, प्राण,अपान आदि कार्य तो पद्गल द्रव्य करता है और गति,स्थिति.अवगाह तथा वर्त- नारूप फार्यको प्रगसे धर्म आदि चार द्रव्य करते हैं; इसलिये पुद्गलादि पांच द्रव्य कारण हैं, और जीवद्रव्य यद्यपि गुरु, शिष्य आदि रूपसे परस्सर एक दूसरेका उपकार करता ६ तथापि पुद्गल आदि पांच द्रव्योंके प्रति यह जीप कुछ भी उपकार नहीं करता इसलिये अकारण है। "कत्ता" शुद्ध पारिगामिक परमभावका प्राहक जो शुद्ध द्रव्यार्थिक नय है उसकी अपेक्षा यद्यपि पंध मोक्ष के कारणभून द्रव-भाव र जो पुण्य पाप, घट पट आदि है उनका फर्चा जीव नहीं है तथापि अशुद्ध नित्रयनय से शुभ और अशुभ उपयोगोंसे परिणत हुआ पुण्य तथा पापघंधका कसी और उनके फलका भोका होता है । तथा विशुद्ध शानदर्शनस्वभावका धारक जो निज शुद्ध यात्मा द्रव्य है उसके सम्यक श्रद्धान, तान और आचरण रूप शुद्धोपयोगसे परिगत हुमा यह जोध मोअका भी फर्ता और उस मोक्षक फलका भोका (भोगनेवासा) दोता है। यहां सब जगह शुभ, अशुम तया शुद्ध परिणामोंका जो परिणमन है उसोको को जानना चाहिये । और पुद्गल मादि पाच प्रन्योफ तो अपने अपने परिगान जो परिणमन चहो कश्य है तथा पयार्य में तो पुण्य पाप लादि रूपसे अमवा हो है। "सन्धगर्द" लोफ और अलोक इन दोनों में स्पारिको अपेक्षा आफाशको ही सवंगत कहते हैं तथा लोको ज्यातिको अपेक्षा धर्म और अधर्म सर्यगत एवं जीव दत्य जो है सां एक जीपको अपेक्षासे लोकपूरकल्प जो मरस्यारे उसके बिना असर्वगत है और बने जोपोंको पेशाले सांगत होता है, ७१ ६ " ::. बृहद्रव्यसंग्रहः। मिथ्यात्वरागादिसमस्त विभावरहितत्वेन शुद्ध इत्युच्यते । केवलज्ञानाधनन्तगुणसहितत्वा- दुद्धः। इति शुद्धबुद्वैकलक्षणं सर्वन ज्ञातव्यम् । इति पद्रव्यचूलिका समाप्ता। चूलिका- शब्दार्थः कथ्यते-चूलिका विशेषव्याख्यानम्, अथवा उत्तानुक्तव्याख्यानम् , उक्तानु- कसंकीर्णव्याल्यानं चेति ॥ .. अतः परं जीवपुद्गलपर्यायरूपाणामानवादिसप्तपदार्थानामेकादशगाथापर्यन्तं व्याख्यान फरोति । तत्रादौ "आसवबंधण" इत्याद्यधिकारसूत्रगाथैका, तदनन्तरमास्रवपदार्थव्या- ख्यानरूपेण "आसव दि जेण" इत्यादि गाथात्रयं, ततःपरं बन्धव्याख्यानकथनेन "वझदि फम्म" इति प्रमृतिगाथाद्वयं, ततोऽपि संवरकचनरूपेण "चेदणपरिणामो" इत्यादिसूत्रद्वयं, ततश्च निर्जराप्रतिपादनरूपेण "जएकालेण तवेण य" इति प्रभृतिसूत्रमेकं, तदनन्तरं मोक्षस्वरूपकयनेन "सम्वत्स कम्मणो" इत्यादि सूत्रमेकं, ततश्च पुण्यपापद्वयकथनेन "सुहअसुर” इत्यादि सूत्रमेकं चेत्येकादशगायाभिः स्थलसप्तकसमुदायेन द्वितीयाधिकारे समुदायपातनिका अत्राह शिप्यः-ययेकान्तेन जीवाजीवी परिणामिनी भवतस्तदा संयोगपर्यायरूप एक एव पदः, यदि पुनरेफान्तेनापरिणामिनी भवतस्तदा जीवाजीवद्रव्यरूपी द्वायेव पदार्थके विशेप व्याख्यानको अथवा उक्त ( कहे हुए) विषयमें जो अनुक्त (नहीं कहा हुआ) है. उसके व्याख्यानको तया उक्त तथा अनुक्तसे मिला हुआ जो कथन है उसको फहते हैं। अब इस चूलिकाके पश्चात् जीव और पुद्गल द्रव्यके पर्याय रूप जो आनय आदि सप्त ७ पदार्थ है उनका एकादश ११ गाथाओंद्वारा इस द्वितीय अधिकारमें व्याख्यान करते हैं। उसमें प्रथम "आसवबंधण" इत्यादि २८ वीं एक गाथा अधिकार सूत्ररूप है और उसके अनन्तर आस्रवपदार्थके व्याख्यानरूपसे "आमवदि जेण" इत्यादि २९६३०॥३१ वो तीन गाथायें हैं। उसके अनन्तर "वज्झदि कम्मं जेण" इत्यादि ३२ वी ३३ वीं दो गाथाओंमें बंध पदार्थका निरूपण है। उसके पश्चात् "चेदणपरिणामो" इत्यादि २४१३५ को दो गाथाओंमें संवर पदार्थका कयन है। फिर निर्जरा पदार्यके प्रतिपादन रूपमे "जह कालेण तवेग य" इत्यादि ३६ वीं एक गाया है। उसके अनन्तर मोजके स्वरूपनिरूपणरूपसे "सब्यस्स कम्मणो" इत्यादि एक ३७वीं गाया है। उसके पत्रात् पुण्य, पाप इन दो पदाकि कयन रूपसे "सुहानुह" इत्यादि एक ३८ वी गाया है ।। ऐसे एकादश ११ गाथाओं द्वारा सप्त स्थलोर समुदाय सहित द्वितीय अधिकारको सनु- दाप-पातनिका समझनी चाहिये। अप यहाएर शिष्य प्रश्न करता कि गुरो! यदि जीव तया अजीक ये दोनों हत्य एकान्तसे (सर्यया). परिणामी हो हैं तो. मंयोगपीयर एक हो पदार्य सिद्ध होता है; और दिसर्वया अपरिणामो हैं तो बीए, बजीव द्रल्प रूप दोहो पदार्य सिद्ध होते हैं;

। । - ७२ श्रीमद् राजचन्द्र जैनशाखमालायाम् पदार्थों, तत आनवादि सप्तपदार्थाः कथं घटन्त इति । तत्रोचर-कथंचित्परिणामि- त्याद् घटन्ते । कथंचित्परिणामित्वमिति कोऽर्थः ? यथा स्फटिकमणिविशेपो यद्यपि स्वभा- वेन निर्मलस्तथापि जपापुष्पाशुपाधिजनितं पर्यायान्तरं परिणतिं गृह्णाति । यद्यप्युपाधि गृह्णाति तथापि निश्चयेन शुद्धस्वभावं न त्यजति तथा जीवोऽपि यद्यपि शुद्धद्रव्यार्थिक- नयेन सहजशुद्धचिदानन्दैकस्वभावस्तथाप्यनादिकर्मबन्धपर्यायवशेन रागादिपरद्रव्योपा- धिपर्यायं गृह्णाति । यद्यपि परपर्यायेण परिणमति तथापि निश्चयेन शुद्धस्वरूपं न त्यजति । पुद्गलोऽपि तथेति । परस्परसापेक्षत्वं कथंचित्परिणामित्वशदस्यार्थः । एवं कथंचित्परिणा- मित्वे सति जीवपुद्गलसंयोगपरिणतिनिर्वृत्तत्वादास्रवादिसप्तपदार्था चटन्ते । ते च पूर्वोक्त- जीवाजीवाभ्यां सह नव भवन्ति तत एव नव पदार्थाः। पुण्यपापपदार्थद्वयस्याभेदनयेन कृत्वा पुण्यपापयोर्वन्धपदार्थस्य वा मध्ये अन्तर्भावविवक्षया सप्ततत्त्वानि भण्यन्ते ॥ हे. इस कारण आस्रव आदि सप्त पदार्थ कैसे सिद्ध होते हैं ?। अब इसका उत्तर कहते हैं कि कथंचित् परिणामी होनेसे सप्त पदार्थों का कथन संगत होता है। "कथंचित्परिणामित्व" इसका क्या अर्थ है ? सो सुनो-जैसे मणियोंके भेदरूप जो स्फटिकमणि है वह यद्यपि स्वभावसे निर्मल है तथापि जपापुष्प (जवा अथवा गुड़हलका फूल) आदिकी उपाधिसे उत्पन्न जो रकत्व आदि. अन्य पर्याय है उस रूप परिणमता है अर्थात् सर्वथा निर्मल स्फटिक मणिके साथ जन जपापुष्पका योग होता है तब वह उस पुष्पके समान रक्तवर्गकाही घारक हो जाता है। यहां स्फटिकमणि यद्यपि उपाधिको ग्रहण करता है तथापि निश्चयसे अपना जो निर्मल स्वभाव है उसको नहीं छोड़ता है। ऐसे ही जीव भी यद्यपि शुद्धद्रव्यार्थिक- नयसे स्वभावसे उत्पन्न शुद्ध चिदानन्दरूप. स्वभावका धारक है तथापि अनादि कर्म- बंध रूप जो पर्याय है उसके वझसे राग आदि परद्रव्यजनित जो उपाधिपर्याय है, उसको ग्रहण करता है। यहां यद्यपि जीव परपर्यायके रूपसे परिणमन करता है तथापि निश्चयनयसे जो अपना शुद्ध स्वरूप है उसको नहीं छोड़ता है। इसी प्रकार पुद्गल द्रव्य भी अन्यकी उपाधिसे परिणमनको प्राप्त होजाता है। इस कारण परस्परको अपेक्षासहित होना यही "कथंचित्परिणामित्व" शब्दका अर्थ है। इस रीतिसे कथंचित्परिणामित्र सिद्ध होनेपर जीव और पुद्गलके संयोगकी परिणति (परिणाम ) से रचे हुए आस्रव आदि सप्त पदार्थ घटित होते हैं । और वे आस्रव आदि सप्त पदार्थ पूर्वोक्त जो जीव और अजीव दो द्रव्य हैं उन सहित नव ९ होते हैं इसलिये नव पदार्थ कहे जाते हैं। तथा इन नव पदामेिं जो पुण्य और पाप नामक दो पदार्थ हैं इनका पूर्व सप्त पदार्थोसे अभेद करनेसे अथवा पुण्य और पाप पदार्थका बन्ध पदार्थमें अन्तर्भाव (शामिल) करनेसे सप्त तत्त्व कहे जाते हैं। शिप्य प्रभ करता है कि हे भगवन् ! यद्यपि कथंचित्परिणामित्व मानने के बलसे भेद- प्रधान पर्यायायिकनयकी अपेक्षासे नव ९ पदार्थ तथा सप्त ७ तत्त्व सिद्ध हो गये तथापि इनसे क्या प्रयोजन सिद्ध हुआ ? क्योंकि जैसे अभेदनयसे पुण्य, पाप इन दो पदार्थों का प्रथम - - . वृहद्रव्यसंग्रहः। भगवर, पद्यपि कवित्परिणामित्ववलेन भेदप्रधानरोयार्थिकनयेन नवपदार्याः सप्त- तत्वानि वा सिद्धानि तथापि तैः किं प्रयोजनम् । ययैवाभेदनयेन पुण्यपापपदार्थद्वय- स्थान्वर्माको जातस्तथैव विशेषाभेदनयविवक्षागामास्रवादिपदार्थानामपि जीवाजोवद्वय- मध्येऽन्तर्भावे कृते जीवाजीवो द्वावेव पदार्थाविति । तत्र परिहारः-हेयोपादेयतत्त्वप- 'रिबानप्रयोजनार्थमानवादिपदार्थाः व्याख्यया भवन्ति । तदेव फययति उपादेयतत्वम- मयानन्तसुखं, तन्य फारणं मोमो, मोझस्य कारणं संवरनिर्जराद्वयं, तस्य कारणं विशुद्ध- मानदर्शनस्वभाव निजात्मतत्त्वसम्यकप्रदानानुवरगल मगं निधयरत्नत्रयम्वरूपं, तत्सा- धकं व्यवहाररलायरूपं चेति । इदानों हेयतत्त्वं कारते-आकुलवोत्पादकं नारकादि- दुःख निश्चयेनेन्द्रियमुखं च हेयतत्त्वम् । तस्य कारणं संसारः, संसारकारगमानन्ध पदार्थद्वयं, तस्य कारणं पूर्वोक्तयवहारनिश्चयरत्नत्रयादिलअगं मिण्यादर्शनपानचारित्र- अयमिति । एवं गोपादेयतत्त्वव्याख्याने कते सति सतवत्वनवादार्याः स्वयमेव सिद्धाः । इदानी कस्य पदाथस्य कः कर्तति कथ्यते--निज निरजनयुद्धाममावनोत्पनारमान- न्देकलक्षणसुवामृतरसास्वादपराङ्मुखो बहिरात्मा भण्यते । स पासवबन्ध गापदार्य- सप्त पदार्थोंमें अन्तर्भाव हुआ है उसी प्रकार विरोष अभेदनयकी विवक्षामें आस्रा आदि पदार्योंका भी जीय और अजीव इन दोनों पदार्शमें अन्तर्भाव करलेने से जीव तथा अजीव ये दो ही पदार्थ सिद्ध हो जायेंगे। अब इस शिरको शंकाका परिहार करते हैं कि शिष्य ! फोन तत्व हेय है और कोन तत्व उपादेय है इस विषयका ज्ञान होने के प्रयोजन के लिये आस्रव आदि पदार्थ निरूपण करने योग्य होते हैं। अब इसी विषयको कहते हैं अविनाती अनंत जो है यह उपादेय तत्त्व है। उस अक्षय अनंत सुखका कारण और उस मोमके कारण संघर और निर्जरा ये दोनों पदार्य है। उन नंबर और नि राका कारण, विशुद्ध-शानदर्शनस्वभावका धारक जो निनामा है उसके स्वरूपमा स प्रदान, बान तथा आपरण करने रूप निधारलप्रय स्वरूप है, और उस निधय रल. साधनेवाला व्यवहाररत्नत्रय है। अब देयतत्वका कयन करते हैं-आकुरताको करनेवाला जो नरकति आदिका दुःख तया इन्द्रियांसे उत्पन्न हुमा मुख है ( त्यान्य ) वस्व है, उसका फारण संसार और संसार के कारण आत्र र मया पदार्थ है, और उस आस्रवका तया धका कारग पूर्वकथित जो व्यवहार और प्रय है उससे विपरीत रक्षण के धारक मियादर्शन, मिथ्याान या मिथ्य तीन है। इस प्रकार हेय और उपादेय तत्वका निरूनग करने पर मरतत्व पदार्थ स्वयं ही सिद्ध हो गये । पर किस पदार्थका फोन कदा है इस विषयका उपदेश करते हैं। निज आमा जो है उसको भावना (चितवन) से उत्खन्न जा परम आनन्दरूप गुमायूठा रस है उसके आस्वादसे परामुख (रहित ) जोवई - ७४ श्रीमद् राजचन्द्रजेनशामालायाम् त्रयस्य कर्ता भवति । कापि काले पुनर्मन्दमिथ्यात्वमन्दकपायोदये सति भोगाकालमा दिनिदानबन्धेन भाविकाले पापानुवन्धिपुण्यपदार्थस्यापि कर्ता भवति । यस्तु पूर्वो- तयाहिरात्मनो विलक्षणः सम्यग्दृष्टिः स संवरनिर्जरामोक्षपदाथैत्रयस्य कर्त्ता भवति । रागादिविभावरहितपरमसामायिके यदा स्थातुं समर्थो न भवति तदा विषयकपायोत्स नदुर्ध्यानवञ्चनार्थ संसारस्थितिच्छेदं कुर्वन् पुण्यानुबन्धितीर्थकरनामप्रकृत्यादिविपिष्टपु - ण्यपदार्थस्य कर्ता भवति । कर्तृत्वविषये नविभागः कथ्यते । मिथ्यादृष्टेर्जीवस्य पुद्रलं- द्रव्यपर्यायरूपाणामास्रवबन्धपुण्यपापपदार्थानां कर्तृत्वमनुपचरितासद्भुतव्यवहारेण, जीव- भावपर्यायरूपाणां पुनरशुद्धनिश्चयनयेनेति । सम्यग्दृटेस्तु संवरनिर्जरामोझपदार्थाना द्रव्यरूपाणां यत्कर्तृत्वं तदप्यनुपचरितासद्भूतव्यवहारेण, जीवभावपर्यायरूपाणां तु विव- क्षितैकदेशशुनिश्चयनयेनेति । परमशुद्धनिश्चयेन तु "ण वि उप्पञ्जइ. ण वि मरइ. बंधु ण मोक्खु करेइ । जिउ परमत्थे जोइया. जिणवरु एम भणेइ ॥ १ ॥" इति वचनाद्व- न्धमोक्षौ न स्तः । स च पूर्वोक्तविवक्षितैकदेशशुद्धनिश्चय आगमभापया कि भण्यते- स्वशुद्धात्मसम्यकश्रद्धानज्ञानानुचरणरूपेण भविष्यतीति भव्यः, एवंभूतस्य भव्यत्वसंत्रस्य पारिणामिकमावस्य संबन्धिनी व्यक्तिर्मण्यते । अध्यात्मभाषया पुनर्द्रव्यशक्तिरूपशुद्धपा- कहलाता है । वह बहिरात्मा आस्रव, बंध और पाप इन तीन पदार्थोका कर्चा होता है; और किसी समय जब कषाय और मिथ्यात्वका उदय मंद होता है तब भोगोंको अमिलाषा आदि रूप निदानके वंधसे पापसे संबंध रखनेवाले पुण्यपदार्थका भी कर्ता होता है । तथा जो पूर्वोक्त बहिरात्मासे विपरीत लक्षणका धारक सम्यग्दृष्टि जीव है वह संवर, निर्जरा तथा मोक्ष इन तीन पदार्थों का कर्ता होता है, और यह सम्यग्दृष्टि जीव जिस समय राग आदि विभावोंसे रहित जो परम सामायिक है उसमें स्थित रहनेको समर्थ नहीं होता है उस समय विषयकपायोंसे उत्पन्न जो दुर्ध्यान उसके वंचनार्थ अर्थात् न होनेके लिये संसारकी स्थितिका नाश करता हुआ पुण्यसे संबंध रखनेवाला जो तीर्थकर नाम प्रकृति आदि विशिष्ट पुण्य पदार्थ है उसका कर्ता होता है । अब कर्तृत्व के विषयमें नयों के विभागका निरूपण करते हैं । मिथ्यादृष्टि जीवके जो पुद्गल द्रव्यपर्याय रूप आस्रव, बंध तथा पुण्य, पाप पदा योका कर्त्तापना है सो अनुपचारित असद्भूत व्यवहारनयको अपेक्षासे है और जीव भाव (देव, मनुष्य ) आदि पर्यायरूप पदार्थों का कर्तृत्व अशुद्ध निश्चयनयसे है । तथा सम्यग्द- ष्टि जीव जो द्रव्यरूप संवर, निजरा तथा मोक्ष पदार्थका कर्ता है, सोभी अनुपचारित अस. भूत व्यवहार नयसे ही है । तथा जीव भावपर्याय रूपोंका जो की है सो विवक्षित एकदेश शुद्ध निश्चय नयसे है। और परम शुद्ध निश्चय नयको अपेक्षासे तो "जो परमार्थदृष्टिसे देखें तो यह जीव न उत्पन्न होता है, न मरता है और न बंध तथा न मोक्षको करता है, इस प्रकार श्रीजिनेन्द्र कहते हैं" इस वचनसे जीवके बंध और मोक्ष हो नहीं है । इसलिये विव- मितेकदेश शुद्ध निश्चयनयसे ही जीवभावपर्यायोंका जीवको कर्तृत्व है। अब आगंमभाषासे । - वृहद्रव्यसंग्रहः । . रिणामिकमावविषये मावना भण्यते, पर्यायनामान्तरेण निर्विकल्पसमाधिर्वा शुद्धोपयो- गादिकं वेति । गत एव भावना मुक्तिकारणं तत एव शुद्धपारिणामिकभावो ध्येयरूपो भवति, ध्यानभावनारूपो न भवति । कस्मादिति चेत् ध्यानभावनापर्यायो विनश्वरः स च द्रव्यरूपत्वादविनश्वर इति । इदमन तात्पर्य-मिथ्यात्वरागादिविकल्पनालरहितनिजशुद्धा- त्मभावनोत्पन्नसहजानन्दकलमणसुखसंवित्तिरूपा च भावना मुक्तिकारणं भवति । तां च कोऽपि जनः केनापि पर्यायनामान्तरेण भणतीति । एवं पूर्वोक्तप्रकारेणानेकान्तन्याख्या- नेनानववन्धपुण्यपापपदार्थाः जीवपुद्गलसंयोगपरिणामरूपविभावपर्यायेणोत्पद्यते । संव- रनिर्जरामोक्षपदार्थाः पुनर्जीवपुलसंयोगपरिणामविनाशोत्पन्नेन विवनितस्वभावपर्याये- णेति स्थितम् ।। तद्यया- आमव बंधण संवर णिजर मोक्सो सपुष्णपावा जे । जीवाजीवविसेसा तेवि समासेण पभणामो ॥ २८ ॥ क्या कहते हैं. मो दर्शाते हैं-निज शुद्ध आत्माके सन्या श्रद्धान, ज्ञान तथा आचरण रूपसे जो होगा उसे भव्य कहते हैं । इस प्रकारका जो भव्यत्व संशाका धारक जीव है उसके पारिणामिक भावसे संबंध रखनेवाली व्यक्ति कही जाती है अर्यात् भन्यके पारिणा- मिक भावको व्यक्ति (प्रकटता) है। और अध्यात्मभाषासे द्रव्यशक्ति रूप जो मुद्ध भाग है. उसके विषयमें भावना कहते हैं। अन्य नामोंसे इसी द्रव्य शक्ति रूप पारिणामिक मावको भावनाको निर्विकल्प ध्यान तया शुद्ध उपयोग आदि कहते हैं । भावना मुक्तिका कारण है। इसी कारण जो शुद्ध पारिणामिक भाव है वह ध्येय (ध्यान करने योग्य ) रूप होता है और ध्यानरूप नहीं होता । ऐसा क्यों होता है यह पूछो तो उत्तर यह है कि ध्यानभावना पर्याय है सो तो विनाशका धारक है और ध्येयभाषना पर्याय द्रन्यरूप दोनेसे विनाशरहित है। तात्पर्य यहाँपर यह है कि मिथ्यात्व, राग आदि जो विकल्पोंके समूह हैं उनसे रहित जो निज शुद्ध आत्मा उसको भावनासे उत्पन्न सहज (स्वभावसे उत्पन्न ) आनन्द रूप एक मुसके ज्ञानको धारण करनेवाली जो भावना वही मुजिका कारण है। उसो भावनाको कोई पुरुष किसी (निर्विकार ध्यान, शुद्धोपयोग जादि रूप) अन्य नामके द्वारा कहता है ॥ इम पूर्वोक फारसे अनेकान्त (स्थाहाद ) का आप्रय कर कयन करनेसे मालव, पुण्य और पाप ये चार पदार्थ जीव और पहलके संयोग परिणामरूप जो धिमाव पर्याय है उससे उत्पन्न होते हैं। और संघर, निर्जरा तया मोक्ष ये तीन पदार्थ जीव और पुहटो संयोग रूप परिणाम पिनाशसे उR जो विवक्षित स्वमाद पीय नमसे उत्पन्न होते हैं, यह निश्रित हुआ। मंग - ७६ [ अशुभ कर्मोके आनेका निरोध है वह संवरं है। "णिजर" भीमद् राजचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम् व्याख्या-"आसव" निरानवस्वसंवित्तिविलक्षणशुभपरिणामेन शुभाशुभकर्माग- मनमास्रवः । “बंधण" बन्धातीतशुद्धात्मोपलम्भभावनाच्युतजीवस्य कर्मप्रदेशः सह संश्लेषो बन्धः । “संवर" कर्मास्रवनिरोधसमर्थस्वसंवित्तिपरिणतजीवस्य शुभाशुभकर्मा- गमनसंवरणं संवरः । "णिजर" शुद्धोपयोगभावनासामर्थ्यन नीरसीभूतफमपुद्गलाना- मेकदेशगलनं निर्जरा । "मोक्खो" जीवपुद्गलसंश्लेपरूपवन्धस्य विघटने समर्थः स्वशुद्धा- मोपलब्धिपरिणामो मोक्ष इति । “सपुण्णपावा जे" पुण्यपापसहिता ये "ते वि समा- सेण पभणामो" यथा जीवाजीवपदार्थों व्याख्याती पूर्व तथा तानप्यानवादिपदार्थान् समासेण संक्षेपेण प्रभणामो वयं, ते च कथंभूताः “जीवाजीवविसेसा" जीवाजीववि- शेषाः । विशेषा इत्यस्य कोऽर्थः, पर्यायाः । चैतन्या अशुद्धपरिणामा जीवस्य, अचेतनाः कर्मपुद्गलपर्याया अजीवस्येत्यर्थः ॥ एवमधिकारसूत्रगाथा गता ।। २८ ।। अब पूर्वोक्त पदार्थोंका निरूपण करते हैं, सो इस प्रकार है- :--अब जो आस्रव, बंध संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य तथा पाप ऐसे सात जीव, अजीवके भेदरूप पदार्थ हैं; इनको भी संक्षेपसे कहते हैं ॥२८॥ व्याख्यार्थः- "आमव" आस्रवसे रहित जो निज आत्माका ज्ञान है उससे विलक्षण जो शुभ तथा अशुभ परिणाम है उस परिणामसे जो शुभ और अशुभ कर्मोंका आगमन है सो आस्रव है। "बंधण" बंधसे रहित जो शुद्ध आत्मा है उसको प्राप्तिस्वरूप जो भावना है उस भावनासे गिरे हुये जीवका जो कर्मके प्रदेशोंके साथ परस्पर बंध है, इसको बंध कहते हैं। "संवर" फर्मोके आसवको रोकने में समर्थ जो निज आत्मज्ञान है उस ज्ञानमें उपयोगको भावनाके बलसे नीरसीभूत (शक्तिहीन ) हुए ऐसे कर्मपुद्गलोंका जो एकदेशसे गलन अर्थात् नाश है उसको निर्जरा कहते हैं। “मोक्खो" जीव तथा पुद्- गलका जो परस्पर मेलनरूप बंध है उस बंधको नाश करनेमें समर्थ जो निज शुद्ध आत्माको प्राप्तिरूप परिणाम है वह मोक्ष कहा जाता है । "सपुग्णपावा जे" पुण्य तथा. पाप सहित जो आस्रव आदि पदार्थ हैं "ते वि समासेण पभणामो" उनको भी जैसे पहले जीव, अजीव कहे उसी प्रकार संक्षेपसे हम कहते हैं और वे कैसे हैं कि 'जीवाजीववि- सेमा" जीव तया अजीवके विशेष अर्थात् पर्याय हैं। तात्पर्य यह कि चैतन्य आसव आदि तो जीवके अशुद्ध परिणाम हैं और अचेतन जो कर्मयुद्गलोंके पर्याय हैं वे अजीवके हैं । इस प्रकार आम्नव आदि अधिकारसूत्रकी गाथा गाई (समाप्त हुई) ॥ २८ ॥ अब तीन गायाओंसे आस्रव पदार्थका व्याख्यान करते हैं, उसमें प्रथम ही भावासक दमा द्रव्यामत्र की सूपना करते हैं;- है - बृहद्रव्यसंग्रहः। - - अथ गाथात्रयेणास्रपन्याल्यानं क्रियते, तत्रादो भावास्रवद्रव्यानवस्वरूपं सूचयति;- आसवदि जेण कम्मं परिणामेणप्पणो स विष्णेओ। भावासको जिणुतो कम्मासवणं परो होदि ।। २९ ।। व्याया-"आसवदि जेण कम्मं परिणामेणप्पणो स विण्णेओ भावासवो" आस- वति फर्म येन परिणामेनात्मनः स विज्ञेयो भावासवः। कर्मास्रवनिर्मूलनसमर्थशुद्धात्म- भावनाप्रतिपक्षभूतेन येन परिणामेनासति कर्म करयात्मनः स्वस्य स परिणामो भावा- सवो विशेयः । म च कथंभूतः "जिणुत्तो' जिनेन वीतरागसर्व नोक्तः । "कन्मासवर्ण परो होदि" कर्मासवणं परो भवति । ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्मणामास्रवणमागमनं परः। पर ति फोऽर्थः- भावासवादन्यो भिन्नो भावासनिमित्तेन तेलमृक्षितानो धूलिसमागम इव द्रव्यास्रवो भवतीति। ननु "आस्रवति येन कर्म" तेनैव पदेन न्यास्रवो लब्धः, पुनरपि कर्मास्रवणं परो भवतीति द्रव्यासवव्याख्यानं किमर्थमिति यदुक्तं त्वया । तन्न । येन परिणामेन किं भवति आस्रवति कर्म तत्वरिणामस्य मामर्थ्य दर्शितं न च द्रव्यास- वव्याख्यानामति भावार्थः ||६|| गाथाभावार्थ:-जिस परिणामले आत्माके कमका आस्रव होता है उसको श्रीजिने. न्द्रद्वारा कहा हुआ भावासय जानना चाहिये । और मावानवसे भिन्न ज्ञानावरणादि रूप कोका जो आसव है सो द्रव्यानव होता है ॥ २६ ॥ व्याख्यार्थ:-"आसवदि जेण कम्मं परिणामेणप्पणो ग विष्णेश्री भावासयो" मात्मा जिस परिणामसे कर्मका आस्रव हो वह परिणाम भावालय है, यह जानना चाहिये। भावार्थ यह है कि कांसबके दूर करने में समर्थ जो शुद्ध आत्माकी भावना है उस भाव- नाफे प्रतिपलभूत (विरोधी) जिस परिणामसे अपने आत्माक कर्मका आलब होता है उस परिणामको भावालय जानना चाहिये । वह भावानव कैसा है कि "जिगुनी" जिन जो पीवीतराग सर्वश देव हैं उनसे कहा हुआ है । “कम्मासवणं परो होदि" कोका जो भासवण यह पर होता है अयान ज्ञानावरण आदि द्रव्य कोशा जो आनका (नागमन) हे वह पर है। पर सन्दका अर्थ यह है कि भावासबसे भिन्न 1 भावार्थ-जैसे तेलले गुग्ने हुए पदार्थो धूलका समागम होता है उसी प्रकार भावानरके निमित्त जीरक यात्रय होता है। अब यहां कोई शंका करते हैं कि "आसपदि जेग कम्म" ( जिससे कर्मका मानव होता है) इसी पदसे मानव की प्राप्ति होगई फिर "सम्मामय परामोद" (इससे मिज मात्रय होता) दल पहले ध्यान का व्यापार किड गोजरिये किया समाधान-पह शंका जो तुमने कहीं सो ठीक नहीं। क्योंकि "जिन परिशानसे स्या झवा है कि फर्मका आप्रव होता है" यह जो कपन, उनमे परिणामका सामर्य विसापागाईयाखयकान्याशन नहीं किया गया। यह भागा है।। ।। है - श्रीमद् राजचन्द्रजेनशाखमालायाम् .. अथ भावासवस्वरूपं विशेपेण कथयति;- मिच्छत्ताविरदिपमादनोगकोधादओऽथ विष्णेया । पण पण पणदस तिय चदु कमसो भेदा द् पुनस्स ॥ ३० ॥ व्याख्या । “मिच्छत्ताविरदिपमादजोगकोधादओ" मिथ्यात्वाविरतिप्रमादयोगक्रोधा- दयः । अभ्यन्तरे वीतरागनिजात्मतत्त्वानुभूतिरुचिविषये विपरीताभिनिवेशजनकं, बहि- विषये तु परकीयशुद्धात्मतत्त्वाभृतिसमस्तद्रव्येषु विपरीताभिनिवेशोत्पादकं च मिथ्यात्वं भण्यते । अभ्यन्तरे निजपरमात्मस्वरूपभावनोत्पन्नपरमसुखामृतरतिविलक्षणा वहिर्विपये पुनरव्रतरूपा चेत्यविरतिः । अभ्यन्तरे निष्प्रमादशुद्धात्मानुभूतिचलनरूपः बहिर्विषये तु मूलोत्तरगुणमलजनकञ्चेति प्रमादः । निश्चयेन निष्क्रियस्यापि परमात्मनो व्यवहारेण वीर्यान्तरायक्षयोपशमोत्पन्नो मनोवचनकायवर्गणावलम्मनः कर्मादानहेतुभूत आत्मप्रदे- शपरिस्पन्दो योग इत्युच्यते । अभ्यन्तरे परमोपशममूर्तिकेवलज्ञानाधनन्तगुणस्वभावप- रमात्मस्वरूपझोभकारकाः बहिर्विषये तु परेषां संवन्धित्वेन क्रूरत्वाद्यावेशरूपाः क्रोधाद- अव भावासबके स्वरूपका विशेष रीतिसे कथन करते हैं;- गाथाभावार्थ:-अब प्रथम जो भावास्रव है उसके मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, योग और क्रोध आदि कषाय ऐसे पाच भेद जानने भाहिये; और मिथ्यात्व आदिके क्रमसे पांच, पांच, पन्द्रह, तीन और चार भेद समझने घोहिये । अर्थात् मिथ्यात्वके पांच भेद, अवि- रतिके पांच भेद, प्रमादके पन्द्रह भेद, योगके तीन भेद और क्रोध आदि कपायोंके चार भेद जानने ॥ ३० ॥ व्याख्यार्थः-मिच्छयाविरदिपमादबोगकोधादओ" मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, योग तथा क्रोध आदि वक्ष्यमाण लक्षण तथा संख्यायुक्त भाव आस्रवके भेद हैं । इनमेंसे अन्वरंगमें जो वीतराग निज आत्मतरवके अनुभवमें रुचि है उसके विषय में विपरीत अभि- निवेश (आग्रह) का उत्पन्न करानेवाला तथा बाह्य विषयमें परसंबंधी शुद्ध आत्मतत्वसे आदि लेकर संपूर्ण द्रव्योंमें जो विपरीत अर्थात् उलटे आप्रहका उत्पन्न करानेवाला है, उसको मिथ्यात्व कहते हैं। तथा अभ्यन्तरमें निज परमात्माके स्वरूपकी भावनासे उत्पन्न जो परम सुखरूप अमृत है, उस परम सुखमें जो रति (प्रीति ) है उससे विलक्षण, बाह्य विषयमें व्रत आदिका धारण न करने रूप जो है सो अविरति है। तथा अभ्यन्तरमें प्रमादरहित जो शुद्ध आत्मा है उसके अनुभवसे चलन ( डिगाने ) रूप और वाद्य विषयमें जो मूलगुण तथा उत्तर गुण हैं उनमें अतिचार उत्पन्न करनेवाला प्रमाद है। निनयसे क्रियारहित परमात्माके भी जो व्यवहारसे वीर्यान्तराय कर्मके भयोपशमसे उत्पन्न तथा मन, वचन और काय वर्गणाको अवलम्बन करनेवाला, कर्मोके ग्रहण कारणभूत आत्माके प्रदेशोंका परिस्पन्द (संचलन ) है उसको योग कहते हैं । तया अभ्य- न्वरमें परम उपशम मूर्तिवाला तथा केवलज्ञान आदि अनंत गुणोंरूप स्वभावका धारक तथा करने में वृहद्न्यसंप्रहः। अश्वेत्युक्तलक्षणाः पश्चासवाः "अय" अथो "विण्णेया" विज्ञेया मावळ्याः । कतिभे- दास्ते "पण पण पणदस तिय पदु कमसों भेदा दु" पञ्चपञ्चपञ्चदशत्रिचतुर्भदाः क्रमशो भवन्ति पुनः। तथाहि "एयंतबुद्धिदरसी विवरीओ बझतावसो विणओ । इंदो विय संसइदो सफटिओ घेच अण्णाणी । १।" इति गाथाकथितलक्षणं पञ्चविघं मिथ्यात्वम् । हिंसानृतस्तेयाग्रामपरिग्रहाकाहारूपेणाविरतिरपि पश्चविधा। अथवा मनासहितपनेन्द्रि- .यप्रवृत्तिप्रथिव्यादि पटकाविराधनाभेदेन द्वादशघिधा । "विकहा तहय फसाया इन्दि- यणिहा य वह य पणयो य । चदु चदु पणमेगेगं ति पमादा हु पण्णरसा । १ ।" इति गाथाकथितमामेण पत्रदश प्रमादाः । मनोषचनकायव्यापारभेदेन विविधो योगः, विस्तरेण पादाभेदो वा। क्रोधमानमायालोमभेदेन पायाश्चत्वारः, कपायनोकपा- यभेदेन पत्रविशतिविधा था। एते सर्वे भेदाः कस्य संघन्धिनः "पुयरस" पूर्वसूत्रोदि- तभावानवस्येत्यर्थः ।। ३० ॥ अथ द्रव्यानवस्वरूपमुद्योतयतिः- णाणावरणादणं जोग्गं नं पुग्गलं समासवदि । दवासवो सोमो अणेय मेओ जिणक्वादो ॥ ३१ ॥ जो परमात्मा का स्वरूप है उसमें क्षोभको उत्पन्न करनेवाले तथा वा विपयमें परफे संबंधी- पनेसे फरता आदिके पावेन रूप जो क्रोध आदि हैं उनको कपाय कहते हैं । इस प्रकार पूर्वोकरक्षणके धारक मिध्यात्व,अविरति,प्रमाद, योग तथा कपाय थे पाच भावासव है। ये "अ" पूर्वकथनफे अर्थात २९ वी गाथामें कहे हुए कयन के पश्चात् "विष्णेया" जानने पाहिये । अव इन पांच भावासबोंके कितने भेद हैं सो कहते हैं-"गष पण पणदस तिय चदु कमसो मेदा दु" और उन मिथ्यात्व आदिके क्रमसे पार, पाच, पन्द्रद, तीन और पार भेद हैं। वे इस प्रकार हैं "बौद्धमतवाले आदि एकान्तनिध्यात्वी हैं १. यज्ञ करनेवाले प्राण आदि विपरीतमिवगाव धारक हैं. तापस आदि दिनयमिघ्यावी ३. इन्द्राचाय आदि शामिध्यात्वी ४. और मस्लरी आदि शामियायी हैं।" हिंसा, असाच पोरी, अनार और परिप्रहमें इछारूप अविरति भीपा कारक अयया नही अपिरति मन और पानी इन्द्रियों को प्रतिरूम ६ भेद तथा सहकार चोंको पिराधनारप ६ भेद से दोनकि मिलाने से बारह प्रकारको भी; { " चिकना, पार प.पाय, पाप इन्दिन, निद्रा और गग से पन्द्रह प्रमाद होते हैं। इस माया- फधित कमसे प्रसाद पन्द्रह हैं। मनोव्यापार, वनगार और सासार इन मेट्रोमे योग तीन प्रकारका है अगवा विस्तार में १५ प्रकारकासमोर मान गाया गया लाभ दन भेदोंसे राय चार प्रकारको अगवा पाय और नाम फार फपाय हैं। ६ सय भेद किस आवय संयन्मा है कि "ORE" में का हुआ जो भावार उसके भेद हैं। इस प्रकार, गायाका ६० ८२ श्रीमद् राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् , पय डिडिदिअणुभागपदेसमेदादु चदुविधो धो । जोगा पयडिपदेसा ठिदिअणुभागा कसायदो होति ।। ३३ ।। व्याख्या । “पयडिट्ठिदिअणुभागपदेसभेदादु चदुविधो बंधो" प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदे- शभेदाच्चतुर्विधो बन्धो भवति । तथाहि-ज्ञानावरणीयस्य कर्मणः का प्रकृतिः ? देवतामु- खवस्त्रमिव ज्ञानप्रच्छादनता । दर्शनावरणीयस्य का प्रकृतिः ? राजदर्शनप्रतिषेधकप्रती- हारवद्दर्शनप्रच्छादनता। सातासातवेदनीयस्य का प्रकृतिः ? मधुलिप्तखङ्गधारास्वादनव- दल्पसुखबहुदुःखोत्पादकता । मोहनीयस्य का प्रकृतिः ? मद्यपानवद्धेयोपादेयविचारवि- कलता । आयुःकर्मणः का प्रकृतिः ? निगडवद्गत्यन्तरगमननिवारणता । नामकर्मणः का प्रकृतिः ? चित्रकारपुरुपवन्नानारूपकरणता । गोत्रकर्मणः का प्रकृतिः ? गुरुलघुभाजन- कारककुम्भकारवदुचनीचगोत्रकरणता । अन्तरायकर्मणः का प्रकृतिः ? भाण्डागारिकव- दानादिविघ्नकरणतेति । तथाचोक्तं-"पडपडिहारसिमज्जाह डिचित्तकुलालभंडयारीणं । जह एदेसिं भावा तहविह कम्मा मुणेयव्वा ॥ ५ ॥” इति दृष्टान्ताष्टकेन : प्रकृतिबन्धो गाथाभावार्थः- प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश इन भेदोंसे बंध चार प्रकारका है। इनमें योगोंसे प्रकृति तथा प्रदेशबंध होते हैं और कपायोंसे स्थिति तथा अनुभाग बंध होते हैं ।। ३३ ।। व्याख्यार्थः- "पयडिविदिअणुभागपदेसमेदादु चदुविधो बंधो", प्रकृति- वंध, स्थितिबंध, अनुभागवंध, और प्रदेशबंध इन भेदोंसे बंध चार ४:प्रकारका है । सो ही विशेपतासे दिखलाते हैं-ज्ञानावरणी कर्मकी प्रकृति ( स्वभाव ) क्या है। इस जिज्ञासामें उत्तर यह है कि जैसे देवताको मुखवस्त्र आवरण ( पड़दा ) आच्छादित कर लेता है अर्थात् ढक लेता है उसी प्रकार ज्ञानावरणी कर्म ज्ञानको ढक लेता है । दर्शनावरणीकी प्रकृति क्या है ? राजाके दर्शनकी रुकावट जैसे द्वारपाल करता है उसी प्रकार दर्शनावरणी दर्शनको नहीं होने देता है। सातावेदनी और असातावेदनी नामक दो भेदोंका धारक जो वेदनी कर्म है उसकी क्या प्रकृति है ? मधु (शहद) से लिपटी हुई तलवारकी धार चाटनेमें जैसे अल्प सुख और अधिक दुःख उत्पन्न होता है,वैसे ही वेदनी कर्म भी अल्प सुख और अधिक दुःखको देनेवाला है। मद्य (मदिरा) पान के समान हेयः (त्यागने योग्यः), उपादेय ( ग्रहण करने योग्य.) पदार्थके ज्ञानकी रहितता यह मोहनी कर्मको प्रकृति है । वेडोके समान दूसरी गतिमें जानेको रोकना यह. आयुःकर्मको प्रकृति है। चित्रकार (चितेरा ) पुरुपके तुल्य नानाप्रकारके रूपका करना यह नामकर्मकी प्रकृति है। छोटे बड़े माजन (घट आदि.) को करनेवाले कुंभारकी भांति उच्च तथा. नीच गोत्रको करना यह गोत्र कर्मको प्रकृति है । भंडारीके समान दान आदिमें विन्न करना यह अन्तराय कर्मको प्रकृति है । सो ही कहा है -“पट (वस्त्र ), प्रतीहार ( द्वारपाल), तलवार, मद्य, वेड़ी, घितेरा,कुम्भकार और भंडारी इन आठोंकाजैसा स्वभाव है वैसा ही क्रमसे ज्ञानावरण आदि वृहद्रव्यसंग्रहः। ८३ झातव्यः ॥ अजागोमहिध्यादिदुग्धाना प्रहरद्वयादिस्वकीयमधुररसावस्थानपर्यन्तं यथा स्थितिर्मण्यते तथा जीवप्रदेशेवपि यावत्कालं कर्मबन्धेन स्थितिरतावत्कालं स्थितिबन्धो सातव्यः । यथा च तेषामेव दुग्धानां तारतम्येन रसगतशक्तिविशेषोऽनुभागो भ- प्यते तथा जीवप्रदेशस्थितकर्मस्कन्धानामपि सुखदुःखदानसमर्थशक्तिविशेपोऽनुभागवन्धो विशेयः । सा च धाविकर्मसम्बन्धिनी शक्तिलतादार्वस्थिपापाणभेदेन चतुर्धा । तथैवाशु- भाऽधातिकर्मसंबन्धिनी निम्मकालीरविपहालाहलरूपेण । शुभाघातिकर्मसंबन्धिनी पुन- गुंडखण्डशर्करामृतरूपेण चतुर्धा भवति । एके कात्मप्रदेशे सिद्धानन्तकभागसंख्या अभ- व्यानन्तगुणप्रमिता अनन्तानन्तपरमाणवः प्रतिमणवन्धमायान्तीति प्रदेशबन्धः । इदानी पन्धकारण कथ्यते । "जोगा पयडिपदेसा ठिदिअणुभागा फसायदो हुति ।" योगात्म- कृतिप्रदेशी, स्थित्यनुभार्गी फागतो भवत इति । तथाहि-निश्चयेन निष्क्रियाणामपि शुद्धात्मप्रदेशानां व्यवहारेण परिस्पन्दन हेतुर्योगः, तस्मात्प्रकृतिप्रदेशबन्धद्वयं भवति । आठों फर्माका स्वभाव है ॥ १॥" इस प्रकार गाथामें कहे हुए आठ दृष्टान्तोंके अनुसार प्रकृति बंध जानना चाहिये । तात्पर्य यह कि फर्मपुद्गलोका ज्ञानावरण आदि शक्ति सहित हो जाना ही प्रतिबंध है । तथा चकरी, गो, महिपी ( भैंस ) आदिके दुग्धों में जैसे दो प्रहर आदि अपने मधुर रसमें रहनेकी स्थिति कही जाती है । अर्थात बकरीका दूध पो प्रहर तक अपने मधुर रसमें स्थित रहता है, इत्यादि स्थितिका कथन है उसी प्रकार जीवक प्रदेशों में जितने काल पर्यन्त फर्मसंबंधसे स्थिति है, उतने कालको स्थितिबन्ध जानना चाहिये । और जैसे उन पूर्वोक्त पकरी आदिके दूधोंमें तारतम्यसे (न्यूनाधिक तासे ) मधुर-रसमें प्राप्त शक्तिविरोपरूप अनुभाग कहा जाता है उसी प्रकार जीवके प्रदेशों में स्थित जो कोंके प्रदेश हैं उनके जो सुख तथा दुःश्य देनेमें समर्थ शक्तिविरोप है. ससफो अनुभाग बन्ध जानना चाहिये । और वह वाति कर्मसे संबन्ध रखनेवाली शक्ति लता (येल), काट. हाड़ और पापाग भेदसे चार प्रकारको है, इसी प्रकार अगुभ अया. तिया को संबंधिनी शक्ति निय, काजोर ( पाली जीरी), विष तथा हालाहल रूपसे पार प्रफारकी है। और शुभ अवातिया को संबंधी शक्ति गुड़,खांड, मिश्री तथा अमृत इन भेदोंसे पार रहकी है । एफ एफ आत्माको प्रदेशमें सिद्धोंसे अनन्तकभाग ( अनन्त में से एक भाग) संख्याफे पारफ और अमत्यराक्षिसे अनन्तगुणे परिमाण धारक ऐसे अनन्तानन्त परनागु प्रत्येक क्षण में संघको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार प्रदेशबंधका स्वरूप है। अब चं कारणको पाते है-"जोगा पयहिपदेगा ठिदिअणुमागा क.सायदो हुंति" योगसे प्रकृति गया प्रदेशपन्ध होते हैं और स्पिति तथा अनुभाग चे दो पन्य कपायोंसे होते हैं। इसका स्पष्टी- भरण यह है कि, नियनय से जो किवारहित भी मुद मान्मा प्रदेश ई. मनका व्यय- पारसे जो परिवंदन (पलायनान करनेफा) कारण है उसको योग करते है। र पीने प्रति या प्रदेश नामक दो.बंध होते हैं। और दोपरहित जो परमात्मा ससफो भावना . -- ८६ श्रीमद् राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम वर्तते, तत्रैवं, मिथ्याष्टिगुणस्थाने संवरो नास्ति, सासादनाविगुणस्थानेषु “सोलसप वीसणभं दसच उछक्केशबंधवोछिण्णा । दुगतीसचदुरपुवे पणसोलस जोगिणो एक्को । इति बन्धविच्छेदत्रिभङ्गीकथितकमेणोपयुपरि प्रकर्पण संवरो ज्ञातव्य इति । अशुद्धनित्र यमध्ये मिथ्यादृष्टयादिगुणस्थानेषुपयोगत्रयं व्याख्यातं, तत्राशुद्धनिश्चये शुद्धोपयोगः । घटत इति चेत्तत्रोत्तरं-शुद्धोपयोगे शुद्धबुद्धकस्वभावो निजात्मा ध्येयस्तिष्ठति तेन का णेन शुद्धध्येयत्वाच्छुद्धावलम्बनत्वाच्छुद्धात्मस्वरूपसाधकत्वाच शुद्धोपयोगो घटते । स संवरशब्दवाच्यः शुद्धोपयोगः संसारकारणभूतमिथ्यात्वरागाद्यशुद्धपर्यायवदशुद्धो भवति तथैव फलभूतकेवलज्ञानलक्षणशुद्धपर्यायवत् शुद्धोऽपि न भवति किन्तु ताभ्याम शुद्धशुद्धपर्यायाभ्यां विलक्षणं शुद्धात्मानुभूतिरूपनिश्चयरत्नत्रयात्मकं मोक्षकारणमेकदेश व्यक्तिरूपमेकदेशनिरावरणं च तृतीयमवस्थान्तरं भण्यते । कश्चिदाह-केवलज्ञानं सकलनिरावरणं शुद्धं तस्य कारणेनापि सकलनिरावरणेन इनके पश्चात् अप्रमत्त आदि क्षीणकपाय पर्यन्त गुणस्थानोंमें जघन्य, मध्यम उत्कृष्ट भेदसे विवक्षित एकदेश शुद्ध नयरूप शुद्ध उपयोग वर्त्तता है। इनमें व्यवस्था इस प्रकार है कि-मिथ्यादृष्टि नामक प्रथम गुणस्थानमें तो संवर है ही नई और सासादन आदि गुणस्थानोंमें “सोलसपणवीसणभं दस चउछक्केक बंधयोछिण्णा दुगतीस चदुरपुव्वे पणसोलह जोगिणो एको । १ ।" इस प्रकार बंधविच्छेद त्रिभंगीमें कहे हुए क्रमके अनुसार ऊपर २ अधिकतासे संवर जानना चाहिये। ऐसे अशुद्ध निश्चयनयके मध्यमें मिथ्यादृष्टि आदि गुणस्थानों में अशुभ, शुभ और शुद्धरूप तीनों उपयोगोंका व्याख्यान किया। इस अंशुद्ध निश्चयमें शुद्ध उपयोग किस प्रकार सिद्ध हो सकता है ऐसा प्रश्न करो तो उसमें उत्तर यह है कि स्वभावका धारक जो निज आत्मा है सो ध्येय होता है, इस कारण शुद्ध ध्येय (ध्यान करने योग्य पदार्थ ) होनेसे शुद्ध अवलम्बन (आधार ) पानेसे तथा शुद्ध आत्मस्वरूपका साधक होनेसे शुद्धोपयोग सिद्ध होता है। और वह 'संवर' इस शब्दसे कहे जाने योग्य जो शुद्धोपयोग है सो संसारके कारणभूत जो मिथ्यात्व, राग आदि अशुद्ध पर्याय हैं उन- की सी तरह अशुद्ध नहीं होता है और इसी प्रकार फलभूत जो केवलज्ञान स्वरूप शुद्ध पर्याय है उसको भांति शुद्ध भी नहीं होता है; किन्तु उन अशुद्ध तथा शुद्ध दोनों पर्या- योंसे विलक्षण, शुद्ध आत्माके अनुभवस्वरूप निश्चय रत्नत्रयरूप, मोक्षका कारण, एक देशमें व्यक्तिरूप (प्रकटरूप) और एक देशमें आवरणरहित ऐसा तृतीय अवस्थान्तर: रूप कहा जाता है। अम यहां कोई शंका करता है कि केवलज्ञान समस्त आवरणोंसे रहित और शुद्ध है इसलिये फेवलझानका कारण भी समस्त आवरणों रहित तथा शुद्धा होना चाहिये । क्योंकि, उपादान कारणके समान कार्य होता है ऐसा वचन है। अब इस शंकाका उत्तर शुद्ध उपयोगमें शुद्ध बुद्ध एक - ८७ .. बृहद्रव्यसंग्रहः ।। शुद्धेन भाव्यम् , उपादानकारणसदृशं कार्य भवतीति वचनात् । तत्रोत्तरं दीयते युक्तमुक्त भवता परं किन्तूपादानकारणमपि पोटशपणिकासुवर्णकार्यस्यापत्तनवर्णिकोपादानकारण- बत , मृन्मयफलशकार्यस्य मृत्पिण्डस्यासकोशकुशूलोपादानकारणवदिति च कार्यादेकदे- शेन मिन्नं भवति । यदि पुनरेकान्तेनोपादानकारणस्य कार्येण सहाभेदो भेदो वा भवति वहिं पूर्वोक्तसुवर्णमृत्तिकादृष्टान्तद्वयवत्कार्यकारणभावो न घटते । ततः किं सिद्ध - एक- देशेन निरावरणत्वेन झायोपसमिकहानलमणमेफदेशव्यतिरूपं विवक्षितैकदेशे शुद्धनयेन संपरशब्दवाच्यं शुद्धोपयोगस्वरूपं मुक्तिकारणं भवति । यश लब्ध्यपर्याप्तसूक्ष्मनिगोदजीवे नित्योद्घाटं निरावरणं ज्ञानं भूयते तदपि सूक्ष्मनिगोदसर्वजघन्यक्षयोपशमापेक्षया निरा- परणं न च सर्वथा । कस्मादिति चेत्-तदावरणे जीवाभावः प्राप्नोति । वस्तुत परि- वनमायोपशामकहानापेक्षया कंवलज्ञानापेक्षया च तदपि सावरणं संसारिणा नायिकता- नाभावाच्च क्षयोपशमिकमेव । यदि पुनर्लोचनपटलम्यैकदेशनिरावरणवत्केवलज्ञानांश- दिया जाता है कि आपने ठीक कहा परन्तु उपादान फारण भी सोलह बानीके मुवर्णरूप कार्यके अधोभागवतिनी (पूर्ववर्तिनी) वर्णिकारूप उपादान फारणके समान और मृत्तिकारूप फलशकार्यके प्रति मृत्तिकाफा पिण्ड, स्थाम, कोश, एवं कुशूलरूप उपादान कारणके सहश कार्यसे एक देशसे भिन्न होता है अर्थात् सोलह बानीके सोनेके प्रति जैसे पहलेको सब पन्दरह वर्णिकायें उपादान कारण हैं और घटके प्रति जैसे मृत्तिका- पिंड, स्थास, कोश, पुसूल आदि पादान कारण हैं सो सोर वानीके सुवर्ण और घट- रूप कार्यसे एकदेशभिन्न है (सर्वथा सोलह यानीक सुवर्णस्वरूप तथा घटरूप नहीं है) इसी प्रकार समस्त उपादान कारण कार्य से संदेश मिन्न होते हैं। और यदि सर्वथा पादानकारणका कार्यकं साथ अभेद हो तो पूर्वक्ति जो सुवर्ण और मृत्तिका दो हटान्त हैं उनके समान कार्य और फारणभाव ही नहीं सिद्ध हो अर्गन सोलह पानी के सुपर्णको हो सोला बानी नुवर्णकप कार्य के प्रति उपादान कारण माना जावे अथवा घट. को ही पटके प्रति उपादान कारण माने तो यह इसका कारण है वह इसका कार्य है इस प्रकारका कार्य फारणभाव नही हो सकता । इस कारण क्या सिद्ध हुआ कि एकवेडा निरापरतासे भोपामिक हाम्लाका धारक एकदेश व्यक्तित्र और विवामिन एक दशमें शुद्ध नवस बर" स शब्दसे बाध्य को शुद्ध प्रयोगका स्वरूप ६ सो अधिका कारण हता। और जो लगि अपर्याप्त सूक्ष्म निगोद जीबमें नित्य उदाट (गुला) तथा आवरणहिम शान सुना जाता है वह भी सूक्ष्म निगोद में सर्य जायको यांपाम उसको अपेक्षासे आपरणरदित , नर्वधा नदी । पेसा श्यों है ? इसका सर ना कि यदि भानका आपरग हा हो तो आपका RTE AIR होवाद याने तो परिपनी बायोपामि मानो अपेक्षा और कवल मानको अपेक्षासे यह शान भी आपरलसशिपीर मंसारी जावांकनायिका जमाव - 1 यूहद्दव्यसंग्रहः। हडानमणं परमात्मस्वल्पं तदेवाहं न च खण्डझानरुप इति भावनीयम् । इति संवर- तत्त्वव्याख्यानविपये नयविभागो ज्ञातव्य इति ॥ ३४ ॥ अय संवरकारणभेदान् कथयतीत्येका पातनिका, द्वितीया तु की कृत्या संवरो भव- तीति प्रष्टे प्रत्युत्तरं ददातीति पातनिकाद्वयं मनसि धृत्वा सूत्रमिदं प्रतिपादयति भगवान् -- वदमिदीगुत्तीओ यम्माणुपहा परीसहजओ य । चारिच बहुमेया णायव्वा मावसंवरविसेसा ॥ ३५ ॥ व्याख्या । 'वदसमिदीगुत्तीओ' व्रतसमितिगुप्तयः "धन्माणुपेहा" धर्मस्तथैवानुप्रेक्षाः "परीसहजओ य" परीपहजयश्च "चारित्तं बहुभेया" चारित्रं बहुभेदयुक्तं "णायवा भावसंवरविसेसा" एते सर्वे मिलिता भावसंघरविशेपा भेदा ज्ञातव्याः । अय विन्तरः- निश्चयेन पिशुद्धशानदर्शनस्वभावनिजात्मतत्त्वभावनोत्पन्नसुखसुधास्वादवलेन समस्तगुभा- शुभरागादिविकल्पनिवृत्तितम् , व्यवहारेण तत्साधकं हिंसानृतस्तेयानह्मपरिपहाच्च यावनीवनिवृत्तिलक्षणं पञ्चविधं व्रतम् । निश्चयेनानन्तमानादिस्वभावे निजात्मनि सम् म्वल्प है सोही में हूं और खंड ज्ञानरूप नहीं" ऐसा ध्यान करना चाहिये । इस प्रकार . संबर तरवके व्याख्यानके विषय में नयका विभाग जानना चाहिये ॥ ३४ ॥ अय मंवर के कारणों के भेद कहते हैं। यह तो एक भूमिका है और फिनसे संपर होता है १ इस प्रश्नमें उत्तर देनेवाली दूसरी भूमिका है। इन दोनों पातनिका (भूमिका) ओंको मनमें धारण करके, भगवान् श्रीनेमिचन्द्र स्वामी इस अप्रिम गाथासूत्रका प्रतिपादन करते हैं:- गाथाभावार्थ:--पाच व्रत, पांच समिति, तीन गुप्ति, दश धर्म, वारह अनुप्रेक्षा, बाईम परोषहॉफा जय तथा अनेक प्रकारका पारिन, इस प्रकार ये सब मावसंबर के भेद जानने पाहिये । म्याथ्यार्थ:-"पदममिदोगुनीओ" प्रत,समिति और गुमियाँ, "धम्मामुपेहा"धर्म सगा अनुप्रेक्षा "परीसहजओ य" और परीषदोंका जीतना "चारि बहमेयो" अनेक प्रकारका चारित्र "गायचा मावसंबरविसेना" ये सब मिले हुए भावसंघरके भेद जानने पाहिये । पर इस नक विषयका विस्तारसे वर्णन करते हैं-निश्शयनपसे विमुद्धान और दरांनरूप स्वमावफा धारक जो निज आत्मतत्त्व नसकी भावनासे दलन जो मुखरूपी अमूल उमपं. आस्वाद पलसे संपूर्ण शुभ या अशुभ राग आदि पिकल्लोंसे जो रहित होना मो प्रतधीर व्ययदारसे धन निसय प्रतको साधनेयाला दिमा, अनृत (18), गोरी, मनन और परिणहमें जीवनपर्यन्त रहितवारूप लागा धारक पनि प्रकारका प्रतनियनको पियक्षासे अनन्न आदिस्वभावका धारक जो निज प्रामा उप म' भने प्रकार अयान ममन्त राम आदि विमायाँक त्याग मारा छानाने तीन - वृहद्व्यसंग्रहः। भयमिदं चेत्युक्तलक्षणं तत्सर्वमध्रुवमिति भावयितव्यम् । तद्भावनासहितपुरुपस्य तेपा वियोगेऽपि सत्युच्छिविव ममत्वं न भवति तत्र ममत्वाभावादविनश्वरनिजपरमात्मान- मेव भेदाभेदरत्नत्रयभावनया भावयति, याशमविनश्वरमात्मानं भावयति तादृशमेवा- मयानन्तसुखस्वभावं मुक्तात्मानं प्राप्नोति । इत्यधुवानुप्रेक्षा गता । अथ निभयरत्नत्रयपरिणतं स्वशुद्धात्मद्रव्यं तद्वहिरङ्गसहकारिकारणभूतं पञ्चपरमेष्टया- राधनन शरणम्, तत्माद्वहिर्भूता ये देवेन्द्रचक्रवत्तिसुभटकोटिभटपुत्रादिचेतना गिरिदु- गंभूयिवरमणिमन्त्रामाप्रसादोपधादयः पुनरचेतनास्तदुभयात्मका मित्राय मरणकालादी महाटल्यां व्याप्रगृहीवमृगवालस्येव महासमुद्रे पोतच्युतपक्षिण इव शरणं न भवन्तीति विनेयम् । तद्विनाय भोगाकाउझारूपनिदानपन्धादि निरालम्बेन स्वसंवित्तिसमुत्पन्नमुखा- मृतसालम्बने स्वगुद्वात्मन्येवावलम्बनं कृत्वा भावना करोति । यादृशं शरणभूतमात्मानं भावयति तादशमेव सर्व कालभारणभूतं शरणागतवपरसदृशं निजामुद्धात्मानं प्राप्नोति । इत्यशरणानुप्रेमा व्याख्याता ॥ - पदार्थ इस प्रकार पूर्वोक्त लक्षणासहित जो ये हैं सो सब अध्रुव हैं, इस प्रकार भावना चाहिये। उस भावनासहित जो पुरुष है. उसके उनके वियोग होनेपर भी उच्छिष्ट (जूठ) भोजनों समान ममत्व नहीं होता है । और ननमें ममत्वका अभाव होनेसे अविनाशी निज परमात्माको ही भेद तथा अभेदरूप रत्नत्रयकी भावनासे भावन करता (भावता) है. और जैसे अधिनश्वर आमाको भावता है, वैसे ही अक्षय अनन्त सुखरूप स्वमावका धारक जो गुफ आत्मा है उसको प्राप्त होता है । इस प्रकार अध्रुव भावना पूर्ण हुई। अब अझरण अनुप्रेक्षाफा वर्णन करते हैं। नियरलत्रयमें परिणत जो निजमुद्रात्म- दव्य के मो और उसका बहिरंग सहकारी कारणभूत जो पंचपरमेष्ठियोंका आराधन है सो शरण है। उससे अहिभूत (भिन्न ) जो देव. इन्द्र. चक्रवत्ती, मुमट. कोटिभट और पुत्र आदि चेतन, पर्वत, किला, भूवियर ( भोइरा). मगि. मन्त्र, जाला. प्रसाद और औपध डादि अतन नया चेतन और अचेतन इन दोनोंसे मिग्न. ये सब पदार्य मरण आदि समरमें जैसे महावनमें व्याप्रसे पकड़े हुए. हिरण बच्चेको अथवा महासमुद्र में जहाज न्युन ( रहित ) प पक्षीको फोई शरण नहीं है, उसी प्रकार मरण नहीं होते हैं. या, जानना चाहिये। और अन्य वन्नुको अपना शरण न जानकर, भोगको यांग्रारूप निदानबंध आदियफे अबलम्बन । आधार से शनि नया स्व (आम) द्वानसे उत्पन्न सुखरूप अन्तका धारा जो निजशुद्ध आमा, उमीका अवलंबन करके, उसको भाषनाको करना । और से माफी ना मगगन भाषना है, मेहो सय काळमें रणभूत और में आये हुएफ अर्थ यराफे पीजरेफे समान जो निमुद आमा है, इसको भार होना हैदिनीय आरण अनुप्रेशाका व्याख्यान दुमा।।

१२ श्रीमद् राजचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम् अथ शुद्धात्मद्रव्यादितराणि सपूर्वापूर्वमिश्नपुद्गलद्रव्याणि ज्ञानावरणादिद्रन्यकर्मरूपेण शरीरपोषणार्थाशनपानादिपवेन्द्रियविषयरूपेण चानन्तवारान् गृहीत्वा विमुक्तानीति द्रव्यसंसारः । स्वशुद्धात्मद्रव्यसंबन्धिसहजशुद्धलोकाकाशप्रमितासंख्येयप्रदेशेभ्यो भिन्ना ये लोकक्षेत्रप्रदेशास्तत्रैकैकं प्रदेशं व्याप्यानन्तवारान् यत्र न जातो न मृतोऽयं जीवः स कोऽपि प्रदेशो नास्तीति क्षेत्रसंसारः । शुद्धात्मानुभूतिस्पनिर्विकल्पसमाधिकालं विहाय प्रत्येकं दशकोटाकोटिसागरेण प्रमितोत्सपिण्यवसपिण्येकैकसमये नानापरावर्तनकालना- नन्तवारानयं जीवो यत्र न जातो न मृतः स समयो नास्तीति कालसंसारः । अभेदर- लत्रयात्मकसमाधिबलेन सिद्धगतौ स्वात्मोपलब्धिलक्षणसिद्धपर्यायरूपेण योऽसावुत्पादो भवस्तं विहाय नारकतिर्यग्मनुष्यभवेषु तथैव देवभवेषु च निश्चयरत्नत्रयमावनारहित- भोगाकाङ्क्षानिदानपूर्वकद्रव्यतपश्चरणरूपजिनदीक्षावलेन नवप्रैवेयकपर्यन्तं "सक्को सक्क- महिस्सी दविखणइंदा य लोयवाला य । लोयंतिया य देवा तच्छ चुदा णिचुदि जंदि। १ ।" इति गाथाकथितपदानि तथागमनिपिद्धान्यपदानि च त्यक्त्वा भवविध्वंसकृनि- अब तृतीय संसारानुप्रेक्षाका वर्णन करते हैं। शुद्ध आत्मद्रव्यसे भिन्न जो सपूर्व, अपूर्व तथा मिश्र ऐसे पुद्गल द्रव्य हैं, उनको ज्ञानावरण आदि द्रव्यकर्म रूपसे तया शरीरके पोषण के लिये भोजन पान आदि पांचों इन्द्रियोंके विषयरूप से इस जीवने अनन्त वार. ग्रहण करके छोड़ा है । इस प्रकार द्रव्यसंसार है । निजशुद्ध आत्मारूप द्रव्यसंबंधीजो सहज शुद्ध लोकाकाश प्रमाण असंख्यात प्रदेश हैं, उनसे भिन्न जो लोकरूप क्षेत्रके प्रदेश हैं । उनमें, एक एक प्रदेशको व्याप्त करके, जिस प्रदेशमें अनंत बार यह जीव नहीं उत्पन्न हुआ हो और न मरा हो, वह कोई भी प्रदेश नहीं है। यह क्षेत्रसंसार है । निजशुद्ध आत्माके अनुभवरूप निर्विकल्प समाधि (ध्यान )के समयको त्यागकर, दशकोटाकोटी- सागर प्रमाण जो उत्सर्पिणी काल और दशकोटाकोटिसागर प्रमाण ही जो अवसर्पिणी काल है, उसके एक एक समय में अनेक परावर्तन कालसे यह जीव यहांपर अनन्तबार न जन्मा हो और न मरा हो वह समय नहीं है । इस प्रकार कालसंसार है । अभेद रत्न- त्रयस्वरूप ध्यानके वलसे सिद्धगतिमें निज आत्माकी प्राप्ति लक्षण सिद्ध पर्यायरूप जो उत्पाद (जन्म) है उसको त्यागकर नारक, तिर्यञ्च, मनुष्य और देवोंके भावोंमें निश्चय- रत्नत्रयकी भावनासे रहित भोग वांछादि निदान सहित जो द्रव्यतपश्चरणरूप जिन- दीक्षा (मुनिपना) है उसके बलेसे नव अवेयक पर्यन्त "प्रथम स्वर्गका इन्द्र, प्रथम स्वर्गको महा इन्द्राणी शची, दक्षिण दिशाके इन्द्र, लोकपाल और लौकान्तिक. देव ये सब स्वर्गसे च्युत होकर निर्वृति (मोक्ष)को प्राप्त होते हैं । १।" ऐसे गाथामें कहे हुए पूर्वोच्च पद तथा अन्य अन्य भी जो आगममें निषिद्ध (मना किये हुए) उत्तम पद सन्को छोड़कर, भवका नाश करनेवाली जो निज आत्माकी भावना है उससे रहित तथा भवको उत्पन्न करनेवाले मिथ्यात्व राग आदि जो भाव हैं उनसे रहित हुआ यह जीव वृहद्न्यसमा - अशुद्धात्मभाषनारहितो भवोत्पादकमिथ्यात्वरागादिभावनासहितश्च सन्नयं जीवोऽनन्त- वारान जीवितो मृतश्चेति भवसंसारो ज्ञातव्यः । अथ भावसंसारः कश्यते। तयया. -सर्वतधन्यप्रकृतिबन्धप्रदेशबन्धनिमित्तानि सर्व- जघन्यमनावचनकायपरिस्पन्दरूपाणि श्रेयसंख्यभागप्रमितानि चतु:स्थानपतितानि सर्वजघन्ययोगस्थानानि भवन्ति । तथैव सर्वोत्कृष्टप्रकृतिवन्धप्रदेशबन्धनिमित्तानि सवों- स्कृष्टमनोवचनकायव्यापाररूपाणि तद्योग्य श्रेण्यसंख्येयभागप्रमितानि चतु:स्वानपतितानि सर्वोत्कृष्टयोगस्थानानि च भवन्ति । तथैव सर्वजघन्यस्थितियन्धनिमित्तानि सर्वजघन्यफ- पायाध्यवसायस्यानानि तद्योग्यासंख्येयलोकप्रमितानि पट्स्वानपतितानि च भवन्ति । तथैव च सर्वोत्कृष्टकपायाध्यवसायस्थानानि तान्यप्यसंख्येयलोकप्रमितानि पदस्थानपति- सानि च भवन्ति । वधैव सर्वजघन्यानुभागवन्धनिमित्तानि सर्वजघन्यानुभागाध्यवसा- यस्थानानि तान्यप्यसंख्येयलोकप्रमितानि पदस्थानपतितानि भवन्ति । तथैव च सर्वोत्ता- धानुभागबन्धनिमित्तानि सर्वोत्कृष्टानुभागाध्यवसायस्थानानि तान्यप्यसंख्येयलोकमि- तानि पदस्थानपतितानि च विनेयानि । तेनैव प्रकारेण स्वकीयस्वकीयजघन्योत्कृष्टयोमध्ये तारतम्येन मध्यमानि च भवन्ति । तथैव जपन्यादुत्कृष्टपर्यन्तानि नानापरणादिमूलो- तरमवृत्तीना स्थितिवन्धस्थानानि च। तानि सर्वाणि परमागमकधितानुसारेणानन्तवारान अनन्तवार जन्मा है और भरा है। इस प्रकार यह पूर्वकथित भवसंसारका स्वरूप जानना पाहिये। अब भाव संसारका कथन करते हैं। वह इस प्रकार है-सबसे जघन्य प्रकृति यंध तथा प्रदेश बंधके कारणभूत और उसके योग्य श्रेणी अमंख्येय भाग प्रमाण वृद्धि हानि रूप चार स्थानों में पतित जो सर्व जघन्य मन, वचन तथा फायके परिस्पन्द है; वे सर्वजघन्य योगस्थान होते हैं। इसी प्रकार सबसे अधिक प्रतिबंध नया प्रदेशबंधके निमिच, उन योग देणीके असंख्य भाग प्रमाण चार स्थानों में पतित जो सोशर मन, वचन और कायम व्यापार ,ये सर्वात मोग स्थान होते हैं । इसी प्रकार मजयन्य स्थिति बंधक कारण जोनयंजवन्य रायोके अध्यवसाय स्थान हैं. वे भी नन योग्य असर मोक प्रमाण मा तुहिनिम्प पद न्यानाम पतित होते हैं । नेय जो सदिष्ट फरा- गोरे अध्ययनाय सान है. वे भी अनस्य प्रमाण और पटरवानी में पतित होते है। और इसी प्रकार सबसे अन्य अनुभाग बंधारे, कारण जोमय जवन्य (निकट) अनुभागों के सम्पयसाय दान में भी अमन्यात लोक प्रमाण तथा पदधानी में पकिन हो । तपाइसी प्रकार सपसे अनुभाग मंधा निमिनभूगोवा: अनु- भाग अध्ययला स्थान है, उनकी भी अनंगपाल लाया प्रमागार पद स्थान पनि भागना चाहिये। और लोक प्रकारले दो अपने अपने पद और गोप तारान्य से मापन भेदी । और सेहतनारमादि । ।

- - - जातास्ते - श्रीमद् राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् भ्रमितान्यनेन जीवेन परं किन्तु पूर्वोक्तसमस्तप्रकृतिबन्धादीनां सद्भावविनाशकारणानि विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावनिजपरमात्मतत्वसम्यक्षद्धानज्ञानानुचरणरूपाणि यानि सम्यग्द- शनज्ञानचारित्राणि तान्येव न लब्धानि । इति भावसंसारः । एवं पूर्वोक्तप्रकारेण द्रव्यक्षेत्रकालभवभावरूपं पञ्चप्रकारं संसारं भावयतोऽस्य जीवस्म संसारातीतस्वशुद्धात्मसंवित्तिनाशकेषु संसारवृद्धिकारणेषु मिथ्यात्वाविरतिप्रमादकपाय- योगेषु परिणामो न जायते, किन्तु संसारातीतसुखास्वादे रतो भूत्वा स्वशुद्धात्मसंवित्ति- वलेन संसारविनाशकनिज निरञ्जनपरमात्मन्येव भावनां करोति । ततश्च यादशमेव पर- मात्मानं भावयति ताशमेव लब्ध्वा संसारविलक्षणे मोक्षेऽनन्तकालं तिष्ठतीति । अयं तु विशेषः-नित्यनिगोदजीवान् विहाय पञ्चप्रकारसंसारख्याल्यानं ज्ञातव्यम् । कस्मा- दिति चेत्-नित्यनिगोदजीवानां कालत्रयेऽपि त्रसत्वं नास्तीति । तथा चोक्तं--"अत्यि अणंता जीवा जेहिं ण पत्तो तसाण परिणामो । भावकलंकसुपउरा णिगोदवासं ण मुंचंति । १ ।" अनुपममद्वितीयमनादिमिथ्याशोऽपि भरतपुत्रायोविंशत्यधिकनवशत- परिमाणास्ते च नित्यनिगोदवासिनः क्षपितकर्माण इन्द्रगोपाः संजातास्तेषां च पुञ्जीभूता- नामुपरि भरतहस्तिना पादो दत्तस्ततस्ते मृत्वापि वर्द्धनकुमारादयो भरतपुत्रा मूल तथा उत्तर प्रकृतियोंके स्थितिबंधके स्थान होते हैं । वे सब परमागममें कही हुई आज्ञाके अनुसार इस जीवने अनन्त वार प्राप्त किये हैं, परन्तु पूर्वोक्त संपूर्ण प्रकृतिबंध आदिके सद्भावके नाशके कारण जो विशुद्ध ज्ञान दर्शन स्वभावका धारक निज परमात्मा तत्त्व है उसके सम्यक् श्रद्धान, ज्ञान और चारित्ररूप जो सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र हैं, उन्हींको इस जीवने प्राप्त नहीं किया। इस प्रकार भावसंसारका स्वरूप है। इस पूर्वोक्त प्रकारसे द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भावरूप जो पांच प्रकारका संसार है उसको भावते हुए इस जीवके संसारसे हटानेको कारण जो निजशुद्ध आत्माका ज्ञान है उसका नाश करनेवाले और संसारकी वृद्धिके कारणभूत ऐसे जो मिथ्यात्व, अविरति प्रमाद, कपाय और योग हैं उनमें परिणाम नहीं होता है; किन्तु वह जीव संसारसे अतोत (नहीं होनेवाला ) जो सुख है उसके आस्वादमें रत (तत्पर ) होके, निजशुद्ध आत्माके ज्ञानके बलसे संसारको नष्ट करनेवाला निज निरंजन परमात्मा है. उसीमें भावना करता है। और इसके पश्चात् जैसे परमात्माको भावता है, वैसे ही परमात्माको प्राप्त होके संसारसे विलक्षण जो मोक्ष है, उसमें अनन्त काल निवास करता है । यहाँपर विशेष यह है कि नित्य निगोदके जीवोंको छोड़कर, इस उक्त पंच प्रकारके संसारका व्याख्यान जानना चाहिये, अर्थात् नित्य निगोद जीव इस पंच प्रकार के संसार में परिभ्रमण नहीं करते हैं। ययोंकि-नित्य निगोदवर्ती जो जीव हैं उनके तीन काल में भी त्रसता अर्थात् दोइन्द्रीपने आदिका धारण करना नहीं है । सो ही कहा है-"ऐसे अनंत जीव हैं कि जिन्होंने उस यको प्राप्त ही नहीं किया और भाव कलंकों (अशुभ परिणामों से भरपूर हैं, जिससे वे पर्या- वृहद्रव्यसंग्रहः। । - - प केनचिदपि सह न वदन्ति । ततो भरतेन समवसरणे भगवान् पृष्टो, भगवता च प्राकृतनं वृत्तान्तं कथितम् । तच्छुत्वा ते तपो गृहीत्वा क्षणस्तोककालेन मोक्षं गताः । आचाराराधनाटिप्पणे कथितमास्ते । इति संसारानुप्रेक्षा गता ॥ अर्थकत्वानुप्रेक्षा कथ्यते । तद्यथा-निश्चयरत्नत्रयैकलक्षणेकत्वभावनापरिणतस्यास्य जीवस्य निययनयेन सहजानन्दसुखाद्यनन्तगुणाधारभूतं केवलज्ञानमेवैकं सहज शरीरम् । शरीरं कोऽयः स्वरूपं न सप्तधातुमयौदारिकशरीरम् । तथैवार्तरोद्रदुर्ध्यानविलक्षणप- रमसामायिकलक्षणकावभावनापरिणतं निजात्मतत्त्वमेवैकं सदा शाश्वतं परमहितकारि न च पुत्रफलवादिः । तेनेच प्रकारेण परमोपेक्षासंयमलक्षणकत्वभावनासहितः स्वशु- द्वात्मपदार्थ एफ एवाविनश्वरहितकारो परमोऽर्थः न च सुवर्णाधर्थः । तथैव निर्विकल्प- समाधिममुत्पन्ननिर्विकारपरमानन्दैकलक्षणानाकुलत्वम्वभावात्मसुखमेवैकं मुखं न चाकु- लत्वोत्पाद फेन्द्रियमुखमिति । कस्मादिदं देहबन्धुजनसुवर्णाार्थेन्द्रियसुखादिकं जीवन्य निश्चयेन निराकृतमिति चेत्, यतो मरणकाले जीव एक प्रव गत्यन्तरं गच्छति न च देहा- निगोदके निवासको नहीं छोड़ते हैं। और यह बात अनुपम और अद्वितीय है कि "अ- नादिकालसे मिध्यादृष्टि ऐसे भी नौसी तेईस (९२३ ) भरतजीके पुत्र जो कि नित्य निगो- दके निवासी थे और नित्य निगोद में फौकी निर्जरा होनेसे वे इन्द्रगोप (सावनको टोकरी) नामक फोड़े हुए, सो उन सबफे देरपर भरतके हाथीने पैर रख दिया इससे वे मरकर,भरतजीफे वर्द्धनकुमार आदि पुत्र हुए और वे किसी के साथ भी नहीं बोलते थे। इस कारण,भरतजीने समवसरणमें भगवानसे पूछा तो भगवान्ने पुराना सय मृत्तान्त कहा। मसको सुनफर, टन सय वर्द्धनकुमारादि पुत्रोंने तप ग्रहण किया और बहुत ही अल्प फाल में मोक्ष चले गये।" यह कथा आचाराराधनाकी टिप्पणी कही हुई है। इस प्रकार संमार अनुप्रेक्षाका न्याख्यान समाप्त हुआ। अब एफत्व अनुभवाफा वर्णन फरते हैं। वह इस प्रकार -निधयरत्नत्रयरूप एक रजनका धारक जो एफत्व है उसकी भावनामें परिणत इस जोपये निश्चयनयसे सहज भानन्द, नुप्त आदि अनन्त गुणोंका आधाररूप जो ऐ.वल शान है पद एफ ही महज ( स्वभाव से उत्पन्न शरीर है। यह शरीर' शब्द का अर्थ स्वरूप समझना, न फि लात धातुबासे निर्मित सोदारिफ शारीर । इसी प्रकार आत और रोदन दोनों ध्यानाले पिल- अग (स्टी जो परमसामायिक रूप एफरय भावना उसमें परिणत जो एक अपना आम पदी सदा सविनाशी और परम हितका करनेवाला है और पुत्र, मित्र, घर आदि दिलफे फत्ती नदी। पूर्योफ रोतसे ही परम पेक्षा संचारप जोपरत्व मापना है, उससे सहित सो निज सुदाम पदर्थ है, यह एक ही अविनाशी बया दिन- भारी परम अ (धन). और सुवर्ण मादिक अर्थ (धन) परम अर्थ नही। एवमेव निस्किानसे ETE या निधिकार परमानन्दमयन नीर शाटा- M ९६ श्रीमद् राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् दीनि । तथैव रोगव्याप्तिकाले विपयकपायादिदुनिरहितः स्वशुद्धात्मैकसहायो भवति । तदपि कथमिति चेत् ? यदि चरमदेहो भवति तहि केवलज्ञानादिव्यक्तिरूपं मोक्षं नयति, अचरमदेहस्य तु संसारस्थिति स्तोकां कृत्वा देवेन्द्राद्यभ्युदयसुखं दत्वा च पश्चात् पार- म्पर्येण मोक्षं प्रापयतीत्यर्थः। तथा चोक्तं-"सगं तवेण सम्वो, वि पावए किंतु झाण- जोयेण । जो पावह सो पावद, परं भवे सासयं सोक्खं । १ ।" एवमेकत्वभावनाफलं । ज्ञात्वा निरन्तर निजशुद्धात्मैकत्वभावना कर्तव्यां । इत्येकत्वानुप्रेक्षा गता ॥ ४ ॥ तथान्यत्वानुप्रेक्षां कथयति । तथा हि-पूर्वोक्तानि यानि देहवन्धुजनसुवर्णाद्यर्थेन्द्रियसुः खादीनि कर्माधीनत्वे विनश्वराणि तथैव हेयभूतानि च, तानि सर्वाणि टोत्कीर्णज्ञायकैक- स्वभावत्वेन नित्यात्सर्वप्रकारोपादेय भुतानिर्विकारपरमचैतन्यचिचमत्कारस्वभावानिजपर: मात्मपदार्थानिश्चयनयेनान्यानि भिन्नानि । तेभ्यः पुनरात्माप्यन्यो भिन्न इति । अयमत्र रहित स्वभावका धारक ऐसा आत्मसुख ही एक सुख है. और आकुलताको उत्पन्न करने वाला इन्द्रियजन्य जो सुख है सो सुख नहीं । ये पूर्वोत्त'जो जीवके शरीर, बंधुजन, सुवर्ण आदि अर्थ,और इन्द्रियसुख आदि हैं इनका निश्चयनयसे खंडन क्यों किया है ? ऐसी शंका करो तो समाधान यह है कि जब मरणका समय आता है तब यह जीव एक ( अकेला ) ही दूसरी गतिमें गमन करता है और देह आदि इस जीवके साथ नहीं जाते, किन्तु यहाँ के यहाँ ही रह जाते हैं। और जब यह जीव रोगोंसे व्याप्त होता है तब विषय तथा कषाय आदिरूप जो खोटे ध्यान हैं उनसे रहित एक निजशुद्ध आत्मा ही इसका सहायक होता है। और वह सहायक भी कैसा होता है ? इसका उत्तर यह है कि यदि उस जीवका अंतिम शरीर हो तब तो केवलज्ञान आदिकी प्रकटतारूप जो मोक्ष है उसमें ले जाता है. और यदि अंतिम शरीर न हो तो वह शुभ ध्यानरूप शुद्ध आत्मा उस जीवकी जो संसारकी स्थिति है उसको अल्प करके और देव, इंद्र आदि पर्यायसंबंधी सुखोंको देकर, फिर परंपरासे मोक्षकी प्राप्ति करता है । यह भावार्थ है । सोही कहा भी है-"तपके कर नेसे स्वर्ग सब कोई पाते हैं, परंतु शुभ ध्यानके योगसे जो कोई स्वर्ग पाता है वह अग्रिम भवमें शाश्वत सुख अर्थात मोक्षको पाता है ॥१॥" ऐसे एकत्व भावनाके फलको जानकर, सदा निज शुद्ध आत्माके एकत्वरूप भावना ही करनी चाहिये । इस प्रकार एकत्व नामक चतुर्थ अनुप्रेक्षा समाप्त हुई ॥ ४ ॥ अब पंचम अन्यत्व अनुप्रेक्षाका कथन करते हैं। सो इस प्रकार है-पूर्व एकत्व भाव: नामें कहे हुए जो देह, बंधुजन, सुवर्ण आदि अर्थ और इन्द्रियसुख आदि हैं वे सब कर्मों के भाधीन हैं. इसी कारण विनाश स्वभावके धारक हैं तथा हेय ( त्याज्य ) स्वरूप भी है। इस कारण टोत्कीर्ण एवं नायक रूप एक स्वभावसे नित्य, सब प्रकारोंसे उपादेय. भूत और विकाररहित परम घेतग्य चित् चमत्कार स्वभावका धारक जो निज परमात्मा पदार्थ ।

- - 1 - वृहद्रव्यसंग्रहः। (७ माव एकत्वानुप्रेक्षायामेकोऽहमित्यादिविधिरूपेण यारूपानं. अन्यावानुमायां तु देहा- दयो मत्सकाशादन्ये मदीया न भवन्तीति निषेधरूपेग । इत्येकत्वान्यत्वानुप्रेक्षायां विधि- निपेघरूप एव विशेषस्तात्पर्य तदेव । इत्यन्यत्वानुप्रेक्षा समाप्ता ॥५॥ अतः परमशुचित्वानुप्रेक्षा कथ्यते । तद्यया-सर्वाचिगुकशोणितकारणोत्सन्नत्वात्त- थैव "वसासग्मासमेदोऽस्थिमज्जामुकाणि धातवः" इत्युक्ताशुचिसप्तधातुमयत्वेन तथा नामिकादिनपरन्धद्वारैरपि स्वरूपेणाशुचित्यात्तथैव मूबरीपाधशुचिमलानामुत्पत्तिस्या- नत्वापाशुचिरयं देहः । न केवलमशुचिकारणत्वेनाशुचिः स्वरूपेणाशुच्युत्पादकत्वेन पाशुचिः। शुचि सुगन्धमाल्यवरादीनामशुचित्वोत्पादकत्वाचाशुचिः । इदानीं शुचित्वं फभ्यते-सहजशुद्धफेवलज्ञानादिगुणानामाधारभूतत्वाल्वयं निश्चयेन शुचिरूपत्वाश पर- मात्मैव शुचिः । "जीवो बना जीवति चेव चरिया हविज जो जदिगो। तं जाण वन- घेरं विमुफपरदेहभत्तीए । १।" इति गाथाकथितनिर्मलमायचयं तव निजपरमात्मनि है, उससे वे सब निश्चयनयको अपेक्षासे भिन्न हैं। और आत्मा भी उनसे भिन्न है। भावार्थ यद्दपिर यह है कि - एकत्व अनुप्रेक्षामें तो मैं एक हूं' इत्यादि प्रकारमे विधिरूप न्याभ्यान है और इस अन्यत्व अनुप्रेश्नामें 'देह आदिक पदार्थ मुझसे भिन्न हैं, ये मेरे नहीं है। प्रत्यादि निषेध स्पसे वर्णन है। इस प्रकार एकत्व और अन्यत्व इन दोनों अनुमेक्षा- ऑमें विधि नया निपेधल्य ही विशेष ( भेद ) है और तात्पर्य तो दोनोंफा एक ही है। ऐसे अन्यत्व अनुप्रेक्षा समाप्त हुई ॥ ५ ॥ अब आगे अनुचित्व अनुप्रेक्षाका कथन करते हैं। वह इस प्रकार है-सबसे अपविय ऐसे शुफ (पिताफा वीर्य) और शोणित (माताका मधिर ) रूप कारणसे उत्पन्न दोनेके कारण तथा "यसा, रुधिर, मांस, मेद, अस्थि (हाइ). मन्ना, और शुक्र ये धातु हैं। इस प्रकार पूर्वोफ अपवित्र जो सप्त ७ धातु हैं इनरूप होनेसे तथा नाक आदि नौ ९ छिद्रोंद्वारा स्वरूपसे भी अशुचि होनेसे और इसी भांतिसे मूघ. पुरीप ( विष्टा ) आदि प्रचि मलोंकी मत्पत्तिका स्थान होने से यह देव अशुचि है। और केवल अगुचि फार- जमे नत्पन्न होने के कारण हो यह अशुचि नहीं है, किन्तु यह शरीर स्वरूपसे भी अमुधि ६ और माघि मल आदिका जनक होने से भी अशुचि है । और पविन जो सुगन्ध, माला पत्र आदि हैं उनमें भी यह शरीर अपने संसर्गसे अपवित्रता उत्पन्न करता है. इस कारण मी अशुधि है। अब पवित्रताका कथन करते हैं सहज मुद्ध ऐसे जो केवलसान लादि गुमानका आधारभूत होने से और निमय अपने साप पपिन होने से यह पर- नारमा हो नि । "जीव माम, जीवही जो मुनिकी पां (प्रवृत्ति ) होये नमको सही परदेहको सेवा टिमने ऐसा प्रसगं जानी।" इस गायाने कहा हुआ डो निर्गल , मो इस परमात्मामें स्थित हुम जीपोंके ही मिलता है। और इस प्रकार - ९८ श्रीमद् राजचन्द्रजैनशाखमालायाम् स्थितानामेव लभ्यते । तथैव "ब्राह्मचारी सदा शुचि" रितिवचनात्तथाविधब्रह्मचारिणामेव शुचित्वं न च कामक्रोधादिरतानां जलस्नानादिशौचेऽपि । तथैव च-"जन्मना जायते शूद्रः क्रियया द्विज उच्यते । श्रुतेन श्रोत्रियो. शेयो ब्राह्मचर्येण ब्राह्मणः । १.।" इति वच- नात्त एव निश्चयशुद्धाः ब्राह्मणाः । तथा चोक्तं नारायणेन युधिष्ठिरं प्रति विशुद्धात्मनदी- स्नानमेव परमशुचित्वकारणं न च लौकिकगङ्गादितीर्थे स्नानादिकम् । "आत्मा नदी संय- मतोयपूर्णा सत्यावहा शीलतटा दयोर्मिः । तत्राभिषेकं कुरु पाण्डुपुत्र न वारिणा शुद्धथति चान्तरात्मा" | १ । इत्यशुचित्वानुप्रेक्षा गता ॥६॥ अत ऊर्ध्वमानवानुप्रेक्षा कथ्यते । समुद्रे सच्छिद्रपोतवदयं जीव इन्द्रियाद्यास्त्रवैः संसारसागरे पततीति वार्चिकम् । अतीन्द्रियस्वशुद्धात्मसंवित्तिविलक्षणानि स्पर्शनरसनधा- गचक्षुःोत्राणीन्द्रियाणि भण्यन्ते । परमोपशममूर्तिपरमात्मस्वभावस्य क्षोभोत्पादकाः क्रोधमानमायालोमकपाया अभिधीयन्ते । रागादिविकल्पनिवृत्तिरूपायाः शुद्धात्मानुभूतेः प्रतिकूलानि हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहप्रवृत्तिरूपाणि पश्चात्रतानि । निष्कियनिर्विकारा- त्मतत्त्वाद्विपरीता मनोवचनकायव्यापाररूपाः परमागमोक्ताः सम्यक्त्वक्रिया मिथ्वात्व- क्रियेत्यादिपञ्चविंशतिक्रियाः उच्यन्ते । इन्द्रियकषायावतक्रियारूपासवाणां स्वरूपमेत- "ब्रह्मचारी सदा पवित्र है" इस वचनसे उन पूर्वोक्त प्रकारके ब्रह्मचारियोंके ही पवित्रता है। और जो काम तथा क्रोध आदिमें तत्पर जीव हैं उनके जलस्नान आदि शौचोंके करनेपर भी पवित्रता नहीं है । क्योंकि, इसीप्रकार "जन्मसे शूद्र होता है, क्रियासे द्विज कहलाता है, श्रुत ( शास्त्र )से श्रोत्रिय जानना चाहिये और ब्रह्मचर्य से ब्राह्मण जानना चाहिये । १।" ऐसा वचन है। इसलिये पूर्वोक्त परमात्मामें जो तत्पर हैं, वे ही निश्चयनयसे शुद्ध ब्राह्मण हैं । और नारायणने युधिष्ठिरसे कहा है कि शुद्ध जो आत्मारूपी नदी है उसमें स्नान करना ही परम पवित्रताका कारण है, किंतु लौकिक जो गंगा आदि तीर्थों में स्नान करना आदि है सो शुचित्वका कारण नहीं। इस विषयमें जो श्लोक है उसका अर्थ यह है-"संयम- रूपी जलसे पूर्ण, सत्यको धारण करनेवाली शीलरूप तट और दयामय तरङ्गोंकी धारक ऐसी जो आत्मारूप नदी है उसमें हे पाण्डुपुत्र (युधिष्ठिर) स्नान कर; क्योंकि, अन्तरात्मा जलसे शुद्ध नहीं होता। १।" इस:प्रकार अशुचिस्व अनुप्रेक्षाका वर्णन समाप्त हुआ ॥६॥ . अब इसके अनन्तर सप्तम आस्रवानुप्रेक्षाको कहते हैं । “जैसे छिद्रसहित नौका (नाव) समुद्रमें डूबती है, ऐसे ही इन्द्रिय आदि छिद्रों द्वारा यह जीव संसार रूप समुद्रमें गिरता है" यह वार्तिक है । इन्द्रियोंके अगोचर जो निज शुद्ध आत्माका ज्ञान है उससे विलक्षण स्पर्शन, रसन (जिला), नासिका, नेत्र और कान ये पांच इन्द्रिया कहलाती हैं। परम एपशम स्वरुपका धारक जो परमात्माका स्वभाव है उसके क्षोभको उत्पन्न करनेवाले क्रोध मान, माया और लोम ये चार कपाय कहे जाते हैं । राग आदि विकल्पोंसे रहित जो - पाका अनुभव है उससे प्रतिकूल ऐसे हिंसा, झूठ, चोरी, अब्रह्म और परिमह इन ९९ - वृहद्रव्यसंग्रहः। द्विज्ञेयम् । यथा समुद्रेऽनेकरनभाण्डपूर्णस्य सच्छिद्रपोतस्य जलप्रवेशे पातो भवति न च वेलापत्तनं प्राप्नोति । तथा सम्यग्दर्शनमानचारित्रलक्षणामूल्यरनभाण्डपूर्णजीवपोतस्य पूर्वोक्तास्रवद्वारः कर्मजलप्रवेशे सति संसारसमुद्रे पातो भवति न च केवलज्ञानान्याया- घसुखाद्यनन्तगुणरत्नपूर्णमुक्तिवेलापत्तनं प्राप्नोतीति । एवमास्रवगतदोषानुचिन्तनमानवा- नुप्रेक्षा सातव्येति ॥७॥ अथ संबरानुप्रेक्षा कथ्यते-यथा तदेव जलपात्रं छिद्रस्य सम्पने सति जलप्रवेशाभावे निर्विघ्नेन वेलापत्तनं प्राप्नोति, तथा जीवजम्पानं निजशुद्धात्मसंविचिवलेन इन्द्रियाद्यान. पच्छिद्राणां झम्पने सति फर्मजलप्रवेशाभावे निर्विघ्नेन केवलज्ञानाद्यनन्तगुणरत्नपूर्णमुक्ति. वेलापत्तनं प्राप्नोतीति । एवं संवरगतगुणानुचिन्तनं संवरानुप्रेक्षा सातव्या ।। ८ ॥ अथ निर्जरानुप्रेक्षा प्रतिपादयति । यया कोऽप्यजीर्णदोषेण मलसञ्चये जाते सत्याहार त्यक्त्वा किमपि हरीतक्यादिकं मलपाचकमग्निदीपक चोपचं गृहाति। तेन च मलपाकेन “पांचोंमें प्रतिरूप पांच अवत हैं। क्रियारहित और निर्विकार ऐसा जो आत्मतत्त्व इससे विपरीत मन, वचन तथा कायके व्यापाररूप एवं शास्त्रमें कहीहुई सम्यक क्रिया, मिथ्यात्य किया इत्यादि पचीस क्रिया कही जाती हैं। इस प्रकार-पूर्वोक इन्द्रिय, कपाय, अग्रत तथा क्रियारूप आस्रवोंका स्वरूप जानना चाहिये । जैसे समुद्र में अनेक रनोंके भोढोंसे भरे हुए छिद्रसहित पोतका (जहाज) जलके प्रवेश होनेपर पतन होता है और यह पोत समुद्रफे किनारे जो पचन (नगर) है उसको नहीं प्रात होना है। इसी प्रकार सम्यग्दर्शन, शान और पारिवरूप जो अमूल्य रनोंके भादे हैं मनसे पूर्ण इस जीव नामा पोतमें पूर्वोक्त इन्द्रिय आदि आत्रयाद्वारा जब फर्मरूपी जलका प्रवेश हो जाता है तब मंसाररूपी समुद्र में हो पतन होता है। और केवलशान, अव्यायाध सुख आदि अनन्त गुणमय रनोंसे पूर्ण जो मुस्विरूप वेलापत्तन (संसार समुद्र के किनारेका शहर) है उसको यह जीव नहों प्रात होता है । इत्यादि प्रकारसे आस्रव में प्राप्त दोपका जो विचार फरना है. यह भावानुप्रेक्षा जानना चाहिये ।। ७ ॥ अय संपर अनुदाफा वर्णन करते हैं। जैसे वही समुद्रका पोत अपने हिमोफ. यंद हो जानसे जल के प्रवेशका अभाव होनेपर निर्विघ्नतापूर्यफ वेलापत्तनको प्रान हो जाता है; घसी प्रकार जीवरूपी पोर अपने गुद आला. ज्ञानर यटसे इन्द्रिय आदि आनवरूप लिट्रोक मुंद जानेसे कर जलफे प्रयाका अभाव होनेपर निर्विघ्न ये पलान आदि अनन्तगुण रॉसे पूर्ण को मुधिरूप सापत्तन ई, उसको प्राम होता है। ऐसे मंथरमें विधमान जो गुण है उनके चितवन स्वरूप मेयर अनुक्षा जाननी पाहिले ।। ८॥ अय निर्जरानुशा का प्रतिपादन करते है जैसे किसी मनुष्य अजीर्ण दापले मटका मंच (पेट मलका जमाव ) हो जाये तो यह मनुष्य माहारको मादपर, मलको बृहद्रव्यसंग्रहः। (०१ धनवाततनुवाताभिधानवायुत्रयवेष्टितानादिनिधनाकृग्निमनिश्चलासंख्यातप्रदेशो लोकोऽस्ति । तस्याकारः कथ्यते- अधोमुखाद्धमुरजस्योपरि पूर्णे मुरले म्यापिते यारशाफारो भवति ताशाकारः परं किन्तु मुरजो वृत्तो लोकस्तु चतुष्कोण इति विशेषः । अथवा प्रसारि- सपादस्य कटिवटन्यस्तहरतम्य पोर्ध्वस्थितपुरपन्य यादृशाफारो भवति तादनः । इदानी तस्यैवोत्सेधायामविस्ताराः फध्यन्ते-चतुर्दशरज्जुप्रमाणोत्सेधस्तथैव दक्षिणोत्तरेण मर्वत्र सरजुप्रमाणायामो भवति । पूर्वपश्चिमेन पुनरधोविभागे सप्तरज्जुविस्तारः । ततसाधो- भागात महानिरूपेण हीयते यावन्मध्यलोक एकरज्जुप्रमाणविस्तारो भवति । ततो मध्य- लोकादू क्रमवृद्धया वर्द्धते यावद् ब्रह्मलोकान्ते रज्जुपनविस्तारो भवति । ततोत्र पुनरपि हीयते यावलोकान्ते रज्जुप्रमाणविस्तारो भवति । तस्यैव लोकस्य पुनन्दूखलन्य मध्याधोभागे छिद्रे कृते सति निक्षिप्तवंशनालिकेव चतुःकोणा प्रसनाटी भवति । सा चैफरज्जुविष्फम्भा चतुर्दशरज्जूत्सेधा विजेया। तन्याम्वधोभागे सप्तरन्नवोऽधोलोकसंव- निधन्यः । ऊ भागे मध्यलोकोत्सेधसंबन्धिलक्षयोजनप्रमाणमेरूत्सेधः सप्तरन्जय उर्व- लोफसंबन्धिन्यः ॥ -- एसके बहुत ही मध्य प्रदेशमें धनोदधि, धनवात और तनुवात नामक तीन पवनोंसे चेष्टिन (घेढा हुआ), आदि और अंतरहित, अकृत्रिम, निमल और असंख्यात प्रदेशका धारक लोक है। उसके भाफारका फयन करते हैं। नीचे मुस किये हुए आधे मृदंगके ऊपर पूरा मृदंग रखनेपर जैसा आकार होता है वैसा आकार लोफका ६. परन्तु मृदंग गोल है और लोक चौकोर है, यह भेद है । अथवा फैलाये है पाद (पैर) जिसने और फटिके तटपर रक्खे हैं हाथ जिसने ऐसे खड़ेहुए मनुष्यका सा आकार होता है वैसा लोकका आकार है। अय 'उसी लोकफी उँचाई. लंपाई तथा विस्तारका निरूपण करते हैं-चौदा १४ रज्जु प्रमाण कंपा तथा दक्षिण उत्तरमें सब जगह साव राजू लम्या यह लोक है और पूर्व पनि- ममें नीष भागमें सात राजू विस्तार हैं और फिर उस अधोभागसे ममहानिरुपले इतना घटता है कि, मश्य ( धीच ) में एक रज्जु विस्तारका धारक होजाता है, फिर मध्यलो- फमे ऊपर ममपृद्धिसे यहना है सो बढ़ता र प्रलोक अर्थात पंरम स्वर्ग अन्त में पाप रब्य विस्तारका धारक होता है। इस पर फिर भी पटता है मां यहानक घटता किस्सोको अन्तमें जाकर. एक रज्जु प्रमाण मिलतारबारा होता है। और इसी लोक मय दूसन्त (अपल) के मध्यभाग नाचेको ओर विन्द्र कर रे एक यासको नाली रखी जाये उसका जैसाकार होताहरनमान एक पोरस नादी: यह एक र व्यासफो धारक और चौदह रन्जु ऊंची जाननी चाहिये। इस प्रम नादार भागको जो सात रजु वे अथारोक नगन्या है और हमारा 4- बकी बाई मंपनी या योजन प्रमाग मेरको ऊंचाई है, इसमदिन सात रराज संकपी॥ ।

बृहद्रव्यसंग्रहः। ६०१ धनवाततनुवाताभिधानवायुप्रयवेष्टितानादिनिधनाकृत्रिमनिश्चतासंख्यातप्रदेशो लोकोऽस्ति । तस्याकारः कथ्यते- अधोमुखाद्धमुरजस्योपरि पूर्णे मुरजे म्यापिते यादृशाफारो भवति तादृशाफारः परं किन्तु मुरजो वृत्तो लोकस्तु चतुष्कोण इति विदोपः । अथवा प्रसारि- तपादस्य कटितटन्यस्तहरतस्य वोर्ध्वस्थितपुरपन्य याशाफारो भवति तादृशः । इदानी सस्येवोत्से घायामविस्ताराः कथ्यन्ते-चतुर्दशरज्जप्रमाणोत्सेधस्तथैव दक्षिणोत्तरेण मर्वत्र ससरजुप्रमाणायामो भवति । पूर्वपश्चिमेन पुनरधोविभागे सप्तरज्जुविस्तारः । ततशाधो- भागात् क्रमहानिरूपेण हीयते यावन्मध्यलोक एकरज्जुप्रमाणविस्तारो भवति । ततो मध्य- लोकादूर्व क्रमयुद्धपा वर्द्धते यावद् ब्राह्मलोकान्ते रज्जुपद्धकविस्तारो भवति । ततश्चोर्ध्व पुनरपि हीयते यावलोकान्ते रज्जुप्रमाणधिरतारो भवति । तस्यैव लोकम्य पुनन्दूखलत्य मध्याधोभागे छिद्रे कृते सति निक्षिप्तवंशनालिफेव चतुःकोणा सनाडी भवति । सा चैकरज्जुविष्कम्भा चतुर्दशरज्जत्सेधा विज्ञेया। तत्यान्त्वयोमागे सप्तरब्बवोऽधोलोकसंब- निधन्यः । ऊर्ध्वमागे मध्यलोकोत्सेधसंबन्धिलक्षयोजनप्रमाणमेरुत्सेधः सप्तरजव उच्च- लोकसंवन्धिन्यः ॥ एसके बहुत ही मध्यके प्रदेशमें घनोदधि, घनवात और तनुवात नामक तीन पवनोंसे वेष्टिन ( वेदा हुआ), आदि और अंतरहित, अकृत्रिम, निश्रल और असंख्यात प्रदेशका धारक लोक है । उसके आफारका कयन करते हैं। नीचे मुख किये हुए आधे मृदंगके ऊपर पूरा मृदंग रखनेपर जैसा आफार होता है वैसा आकार लोफका है, परन्तु मृदंग गोल है और लोफ चीफोर है. यह भेद है । अथवा फैलाये हैं पाद (पैर ) जिसने और फटिफे तटपर रक्खे हैं हाय जिसने ऐसे खड़े हुए मनुष्यका जैसा आकार होता है वैसा लोकका आफार है। अय उमी लोकफी उंचाई, लयाई तथा विस्तारका निरूपण फरते हैं-चौदह १४ रज्जु प्रमाण ऊंचा तथा दक्षिण उत्तरमें सब जगह सात राजू लम्बा यह लोक है और पूर्व पत्रि- गमें नीचे भागमें सात राजू विस्तार है और फिर उस अधोभागसे पमहानिरपसे इतना घटता दे कि, मध्य ( घोच ) में एक रज्जु विस्तारका धारक होजाता है, फिर मध्यलो- फसे ऊपर प्रामपृद्धिसे बढ़ना सो बढ़ता • प्रलोक अर्थात् पंचम स्वर्गक अन्तमें पाप रखर विसारका धारक होता है । उसके अपर फिर भी घटता सो गातिक घटता किलोफरे अन्तमें जाफर, एक रज्जु प्रमाग विस्तारयाताई। और इमी लोकर, मध्य प्रदूबल (आर) के मध्यभागसे नौनेको और लिद करके एक ग्रोसफो नाली रक्सी जाये उसफा जैसा साफार होता है उसके समान एक गोकार उस नादी : या एक रजु मासकी धारक और पीया रज्जु ची जाननी पाहिये। उस प्रस नामक अधोभागको जो सात रजु है वे अचाक मधन्धा हैं. और हमाग - की बाई संबन्धी सब योजन प्रमाग मेरको चाई ६, इससदिन मातर सम्बन्धी॥

वृहद्रव्यसंग्रहः । १८३ - तुरशीतियोजनसहस्रबाहुल्यः पहभागस्तिष्ठति । ततोऽप्यघोमागे अशीतिसहस्रबाहुल्यो अव्यहुलभागस्तिष्टतीत्येवं रनप्रभा पृथिवी निभेदा ज्ञातव्या । तत्र खरमागेऽसुरफुलं विहाय नवप्रकारमवनवासिदेवानां तथैव राक्षसकुलं विहाय सप्तप्रकारल्यन्तरदेवानां आवासा सातव्या इति । पक्षमागे पुनरमुराणा राक्षसाना चेति। अव्यसभागे नार- फास्तिष्ठन्ति । तत्र बहभूमिकप्रासादवदघोऽधः सर्वपृथिवीपु स्वकीयस्वकीयवाहुल्यात् सकाशादध उपरि चैकैफयोजनसहस्रं विहाय मध्यभागे भूमिक्रमेण पटलानि भवन्ति त्रयोदशैकाद- शनवसप्तपश्चन्येकसंख्यानि, तान्येव सर्वसमुदायेन पुनरेकोनपश्चाशत्प्रमितानि । पट- लानि कोऽर्थः ? प्रस्तारा इन्द्रका अन्तभूमय इति । तत्र रवप्रभायो सीमन्तसंने प्रयम- पटलविस्तारे नृलोकवत् यत्संख्येययोजनविस्तारवत् मध्ययिलं तरयेन्द्रसंशा । तस्यैव पतुर्दिग्विमागे प्रतिदिशं पंक्तिरूपेणासंख्येययोजनविस्ताराण्येकोनपशाशद्विलानि । तथैव - योजन उन प्रमाण बाहुल्य (गहराई ) को धारण करनेवाली जो मध्यलोकमें चित्रा पृथिवी है, उसके नीचेके भागमें सोलह हजार योजन बाहुल्यफा धारक सर भाग है। उस खर भागके भी नीचे चौरासी हजार योजन प्रमाण यामुल्यवाला पंफ भाग स्थित है। उसके भी नौके भागमें अस्सी हजार योजनके बाहुल्यका धारक अब्बल भाग ह । इस प्रकार रजममा पृथिवी है सो खरभाग, पंकभाग और अच्चाहुल मागरूपी भेदोंसे तीन प्रकारको जाननी चाहिये । इनमें खर भागमें असुरकुमार जातिके देवोंक समूहको छोड़कर, नव प्रकारके भवनवासी और इसी प्रकार रामतोंफे समूएके विना सात प्रकार के व्यन्तर देवोंके भावास (निवासस्थान ) जानने चाहिये । पंफमागमें अमुर तथा राक्षसोंके निवास है। अन्याहुल मागमें नारक हैं। उनमें बहुतसे वनोंपाले प्रासाद (माल) के समान नीचे २ सय पृथिवियों में अपने २ याहुल्य से नीचे और ऊपर एक एक हजार योजनको छोड़कर, जो पीचका भाग है उसमें भूमि (बाला, ग्यण्ट, अयया मंजिला) के कमसे पटल होते हैं। उनमें प्रथम भूमिमें तेरा, दूसरी में ग्यारह तीसरी में नव, पीपीमें सात, पाचयी पाँच, छही में तीन औरसातवी प्रथि. पोमे एक; से ये सय समुदायसे उनचास ४२ संख्या प्रमाग पटट हैं। यहा पटल शब्दमा पर्थ प्रस्नार (सह ) इन्द्रक अथवा अन्तर्भमि है। उनमें रसरमा नामक प्रथम प्रथियों में नीमत नामक पहले पटल विस्तारमें जो दाई द्वारफे, नमान संख्येव (४१०००००) पोजन विस्तारका भारफ. योरका पिल, उसकी द्रक मंहा। उस इन्द्रयको चानें दि मायक दिशा संस्थय पोजन वितार धारक नपास पिल है। और सो प्रकार का घिदिशामा प्रत्येक विदिशामें पंधिर (नारदार) जो तास (४८) पिस भी असंगा पोजन प्रमास विस्तार धारक इन दोनों प्रकार के बिलोंकी + . १०६ श्रीमद् राजचन्द्रजेनशाखमालायाम् इदानीं नारकदुःखानि कध्यन्ते । तद्यथा--निशुद्धशानदर्शनस्थमावनिजपरमात्मतत्त्व सम्यक्षद्धानज्ञानानुष्ठानभावनोत्पन्न- निर्विकारपरमानन्देकलक्षणसुखामृतरसास्वादरहित, पञ्चेन्द्रियविषयसुखास्वादलम्पटैमिथ्यादृष्टिजीवैर्यदुपार्जितं नरकायुर्नरकगत्यादिपापकर्म तदुदयेन नरके समुत्पद्य पृथिवीचतुष्टये तीव्रोष्णदुःखं, पञ्चम्यां पुनरुपरितनत्रिभागे तीतोष्णदुःखमधोमागे तीव्रशीतदुःखं, पष्ठीसप्तम्योरतिशीतोत्पन्नदुःखमनुभवन्ति । तयैव छेदनभेदनक्रकच विदारणयन्त्रपीडनशूलारोहणादितीबदुःखं सदन्ते । तथा चोक्तं-"अच्छि- णिमीलणमित्तं णत्यि सुहं दुःखमेव अणुबद्धं । णिरये णेरयियाणं अहोणिसं पञ्चमाणाणं ११।” प्रथमपृथिवीत्रयपर्यन्तमासुरोदीरितं चेति । एवं ज्ञात्वा नारकदुःखविनाशार्थ भेदाभेदरनत्रयभावना कर्त्तव्या । संक्षेपेणाधोलोकव्याख्यानं ज्ञातव्यम् । अतः परं तिर्यग्लोकः कथ्यते--अम्बूद्वीपादिशुभनामानो द्वीपाः, लबणोदादिशुभना- मानः समुद्राश्च द्विगुणद्विगुणविस्तारेण पूर्व पूर्व परिवेष्टय वृत्ताकाराः स्वयम्भूरमणपर्य- .- अव नारक जीवोंके दुःखोंका कथन करते हैं। वह इस प्रकार है-विशुद्ध ज्ञान तथा दर्शनरूप स्वभावका धारक जो निज शुद्ध परमात्मतत्त्व है उसके सम्यक् श्रद्धान, ज्ञान और आचरणकी भावनासे उत्पन्न जो विकाररहित परम आनंदमय सुखरूपी अमृत उसके आस्वादसे रहित और पांचों इन्द्रियोंके विषयोंके सेवनमें लम्पट ऐसे मिथ्यादृष्टि जीवोंने जो नरक आयु तथा नरक गति आदि रूप पाप कर्म उपार्जन किया उसके उदयसे वे नरकमें उत्पन्न होते हैं । वहॉपर पहलेकी जो चार पृथिवियें हैं उनमें तीव्र उष्ण (गर्मी) का दुःख, और पांचवीं पृथिवीमें ऊपरके त्रिभागमें अर्थात् पंचम पृथिवीके पहले तीसरे हिस्से में तीव्र उष्णका दुःख और नीचेके जो दो त्रिभाग हैं उनमें तीव्र शीत (ठंड वा जाड़े) का दुःख तथा छठ्ठी और सातवीं पृथिवीमें अत्यन्त शीतसे उत्पन्न हुए दुःखका अनुभव करते हैं । और इसी प्रकार छेदने, भेदने, करोतीसे चीरने, घानीमें पेरने और शूलीपर चढ़ाने आदिरूप तीन दुःखको सहन करते हैं। सोही कहा है कि "नरकमें रातदिन दुःखरूप अग्निमें पचते हुए नारकोंके नेत्रोंके टिमकार मात्र भी सुख नहीं है, किन्तु सदा दुःख ही लगा रहता है। १ ।" और पहली तीन पृथिवियोंतक असुरकुमार जातिके देवोंसे प्रकट किये हुए दुःखको भी सहते हैं। ऐसा जानकर, नरकसंबंधी दुःखके नाशके लिये भेद तया अभेद रूप जो रत्नत्रय है उसकी भावना करनी चाहिये। ऐसे संक्षेप रीतिसे अधोलोकका व्याख्यान समाप्त हुआ । अव-इसके अनंतर तिर्यगलोक अर्थात् मध्यलोकका वर्णन करते हैं। अपने दूने दूने विस्तारसे पूर्वपूर्व द्वीपको समुद्र और समुद्रको द्वीप इस क्रमसे वेढ़ करके,गोल आकारवाले जंबूदीप आदि शुम नामोंके धारक द्वीप और लवणोद आदि शुभ नामोंके धारक समुद्र स्वयंभूरमण समुद्रपर्यन्त विर्य विस्तारसे विस्तृत होकर ( फेल कर) स्थित हैं, इस कार . ।

बृहदायसंग्रहा १८७ नतास्तिर्यविस्तारेण विस्तीर्णास्तिष्ठन्ति यतस्तेन फारणेन तिरंगटोको भग्यते, मध्यलो- कश्च । तद्यथा-तेपु सार्द्धतृतीयोद्धारसागरोपमलोमच्छेदप्रमितेष्वसंख्यातद्वीपसमुद्रेपु मध्ये जम्बूद्वीपस्तिष्ठति । स च जम्बूझोपलक्षितो मध्यभागस्थितमेरुपर्वतसहितो वृत्ता- कारलायोजनप्रमाणस्तद्विगुणविष्कम्भेण योजनलक्षद्वयप्रमाणेन वृत्ताकारेण पहिर्मागे लवणसमुद्रेण वेष्टितः । सोऽपि स्वणसमुद्रस्तद्विगुणविस्तारेण चोजनलक्षचतुष्टयप्रमा- णेन वृत्ताकारेण बहिर्मागे घातकीखण्डद्वीपेन वेष्टितः । सोऽपि धातकीखण्डद्वीपस्तद्धि- गुणविस्तारेण योजनाष्टलझप्रमाणेन बहिर्मागे कालोदकसमुद्रेण वेष्टितः । सोऽपि कालो- दकसमुद्रस्तद्विगुणविस्तारेण पोहायोजनलमप्रमाणेन वृत्ताकारेण वहिमांगे पुष्करद्वोपेन वेष्टितः । इत्यादिद्विगुणद्विगुणविष्कम्भः स्वयम्भूरमणद्वीपस्वयम्भूरमणसमुद्रपर्यन्तो सातव्यः । यया जम्बूद्वीपलवणसमुद्रविष्कम्भद्वयसमुदयाद्योजनलक्षयप्रमितात्सकाशा- द्धातकीखण्ड एकलौणाधिकस्तथैवासंख्येयद्वीपसमुद्रविष्कम्भेभ्यः स्वयम्भूरमणसमुद्रवि- किम्भ एफलक्षेणाधिको ज्ञातव्यः । एवमुक्तलक्षणेप्यसंख्येयद्वीपसमुद्रेपु व्यन्तरदेवानां पर्वताशुपरिगता आवासाः, अधोभूभागगतानि भवनानि, तथैव द्वीपसमुद्रादिगतानि पुराणि च, परमागमोक्तभिन्नलक्षणानि । तथैव सरभागपळूभागस्थितप्रवरासंख्येयप्रमा- - से इसको तिर्यफ लोग कहते हैं और मध्यलोक भी कहते हैं । वह इस प्रकार है-साढे. सोन द्धार सागर समान लोमौके टुकड़ोंके यरायर जो असंख्यात द्वीप समुद्र के मध्य (यीच)- में पंचूद्वीप स्थित है वह जंबू (जामून ) के वृक्षसे चिहित तथा मध्य भागमें स्थित जो मेरु ऐससे सहित है तथा गोलाकार लास योजन प्रमाण है। और गोला- कार दो लास योजन प्रमाण अपनेसे दूने विष्कम (परिधि ) का धारक जो या मागमें रवण समुद्र है उससे वेष्टित (वेढ़ा हुआ) है। पह लवण समुद्र भी अपने विस्तारसे दूने विस्तारपाला जो पार लाग्न योजन प्रमाण गोलाकार या मागमें घातकोखंड नामक लोप है इससे वेष्टित है। यह घातफी खंड दीप भी अपनेसे दूने विस्ताररूप आठ लाख योजन प्रमाण जो याहा भागर्ने फालोदक समुद्र है इससे वेष्टित है । वह कालोदक समुद्र भी अपने दुने विस्ताररूप सोलह लास योजन प्रमाण गोलाकार पाहा भाग जो पुष्करशीप है मससे चेष्टित है। इसको आदि ले, चह दूना दूना विभ स्वयंभूरनग द्वीप तथा स्वयंमू- रमण समुदपर्यन्त जानना चाहिये । और, जैसे चंचूद्रोपका विप्र्फम एफ सास योजन, पण समुद्र का विषम दो लास योजन, इन दोनों समुदायल्प जो तीन लाग्य योजन प्रमान है. उससे घातकीड एक बार योजन अधिक भर्यान, घार ताप योजनासी प्रकार पमन्यात सोप समुद्रों का जो विटभ है उनसे एक सब योजन अधिक न्यभूरनण मनुका विराम जानने योग है। इसे पूर्वोट माग धारक असंन्यान द्वीप मल्हों में मन्दर देशों के पर्व आदिके ऊपर प्रान आवास (स्थान), अमोमूभाग (नारको पुषि- बोरे माग) में प्राम भपन और और राया मनुट आदिमें मिले हुए पुर। देसायाम, । - श्रीमद् राजचन्द्रजेनशाखमालायाम् 'णासंख्येयव्यन्तरदेवावासाः, तथैव द्वासप्ततिलक्षाधिककोटिसप्तप्रमितभवनवासिदेवसंव- धिभवनान्यकृत्रिमजिनचैत्यालयसहितानि भवन्ति । एवमतिसंक्षेपेण तिर्यग्लोकों व्याख्यातः ॥ अथ तिर्यग्लोकमध्यस्थितो मनुष्यलोको व्याख्यायते - तन्मध्यस्थितजम्बूद्वीपे सप्त- क्षेत्राणि भण्यन्ते । दक्षिणदिग्विभागादारभ्य भरतहेमवतहरिविदेहरम्यकहरण्यवतेरावत- संज्ञानि सप्तक्षेत्राणि भवन्ति । क्षेत्राणि कोऽर्थः ? वर्षा वंशा जनपदा इत्यर्थः । तेषां क्षेत्राणां विभागकारकाः षट् कुलपर्वताः कथ्यन्ते-दक्षिणदिग्भागमादीकृत्य हिमवन्म- हाहिमवन्निषधनीलरुक्मिशिखरिसंज्ञा भरतादिसप्तक्षेत्राणामन्तरेषु पूर्वापरायताः पद कुलपर्वताः भवन्ति । पर्वता इति कोऽर्थः । वर्षधरपर्वताः सीमापर्वता इत्यर्थः । तेषां पर्वतानामुपरि क्रमेण हृदा कथ्यन्ते । पद्ममहापद्मतिगिच्छकेशरिमहापुण्डरीकपुण्डरीक- संज्ञा अकृत्रिमा पटू ह्रदा भवन्ति । हृदा इति कोऽर्थः ? सरोवराणीत्यर्थः । तेभ्यः पद्मादि. पड़हदेभ्यः सकाशादागमकथितक्रमेण निर्गता याश्चतुर्दश नयस्ताः कथ्यन्ते । तथाहि- हिमवत्पर्वतस्थपद्मनाममहाहदादर्धकोशावगाहनोशार्धाधिकपट्योजनप्रमाणविस्तारपूर्वतोर- णद्वारेण निर्गत्य तत्पर्वतस्यैवोपरि पूर्वदिग्विभागेन योजनशतपञ्चकं गच्छति, ततो गङ्गा- कूटसमीपे दक्षिणेन व्यावृत्य भूमिस्थकुण्डे पतति तस्माद् दक्षिणद्वारेण निर्गत्य भरत- क्षेत्रमध्यमभागस्थितस्य दीर्घत्वेन पूर्वापरसमुद्रस्पर्शिनो विजयार्द्धस्य गुहाद्वारेण निर्गत्य भवन तथा पुर परमागममें कहे हुए जो भिन्न भिन्न लक्षण हैं, उनके धारक हैं। और इसी प्रकार रत्नप्रभा भूमिके खर भाग और पंक भागमें स्थित प्रतरके असंख्यातवें भाग प्रमाणे असंख्यात व्यंतर देवोंके आवास हैं और सात करोड़ बहत्तर लाख संख्याके धारक भवनवासी देवों संबंधी भवन हैं, वे सब अकृत्रिम जिन चैत्यालयों सहित हैं। इस प्रकार अत्यन्त संक्षेपसे तियेंग लोक ( मध्यलोक) का व्याख्यान किया गया । अब तिर्यग लोक (मध्यलोक ) के मध्यमें स्थित जो मनुष्य लोक '( ढाई द्वीप) 'उसका व्याख्यान करते हैं। उसमें प्रथम ही तिर्यग् लोकके बीच में स्थित जो जंबूद्वीप उसमें जो सात क्षेत्र हैं उनका कथन करते हैं। दक्षिण दिशाके भागसे आरंभित होकर भरत, हेमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत इन नामोंके धारक सात क्षेत्र है। यहाँ क्षेत्र शब्दसे वर्ष, वंश अथवा जनपद अर्थका ग्रहण है। उन क्षेत्रोंको भिन्न भिन्न कर- नेवाले जो छः कुलपर्वत (कुलाचल ) हैं उनके नाम कहते हैं-दक्षिण दिशाके भागको आदि लेकर हिमवत् १, महाहिमवत् २, निपध ३, नील ४, रुक्मी ५ और शिखरी ६, इन नामोंके धारक, पूर्व पश्चिम लंबे कुलपर्वत उन भरत आदि सप्त क्षेत्रोंके बीचमें हैं । पर्वत का अर्थ वर्षघरपर्वत अथवा सीमापर्वत है। उन पर्वतोंके ऊपर क्रमसे जो ह्रद हैं वे कहते हैं। पद्म १, महापद्म २, तिगिंछ ३, केसरी ४, महापुंडरीक ५ और पुंडरीक ६, इन नामोंवाले अकृत्रिम षट् हद है । इदका अर्थ सरोवर है। अब उन पद्म आदि ६ हदोंसे । sho cho --- वृहद्रव्यसंग्रहः ।... तत आर्यखण्डार्द्धमागे पूर्वेण न्यावृत्य प्रथमावगाहापेक्षया. दशगुणेन गल्यूतिपश्चफाय- गाइन तथैव प्रयमविष्कम्भापेक्षया दशगुणेन योजनार्द्धसहितद्विपष्टियोजनप्रमाणविस्ता- रेण प पूर्वसमुद्रे प्रविष्टा गङ्गा । तथा गङ्गावसिन्धुरपि तस्मादेव हिमवत्पर्वतस्यपद्माह- दापर्वतस्यैवोपरि पश्चिमद्वारेण निर्गत्य पश्चादृक्षिणदिग्विभागेनागत्य विजयादग्रहाद्वारेण निर्गत्यार्यखण्डार्द्धभागे पश्चिमेन व्यावृत्य पश्चिमसमुद्रे प्रविष्टेति । एवं दक्षिणदिग्विभाग- समागतगङ्गासिन्धुभ्यां पूर्वापरायतेन विजया पर्वतेन च पटवण्डीकृतं भरतक्षेत्रम् ।। अथ महाहिमवत्पर्वतस्यमहापनदाद्दक्षिणदिग्विमागेन हेमवतक्षेत्रमध्ये समागत्य तत्रस्थनाभिगिरिपर्वतं योजनार्धनास्पृशन्ती तस्यैवार्धे प्रदक्षिणं कृत्वा रोहित्पूर्वसमुद्रं गवा । तथैव हिमवत्पर्वतस्थितपनदादुत्तरेणागत्य तमेव नाभिगिरि योजनानास्पृशन्ती PAAA आगममें कहे हुए. क्रम के अनुसार जो चौहद नदियां निकली है उनका वर्णन करते हैं। वे इस प्रकार है-हिमवन् पर्वतपर स्थित जो पानामक महाहद है, उससे अर्थ फोस प्रमाण गहराई और साद छ. योजन प्रमाण चौड़ाईफी धारक गंगा नामक नदी पूर्वतोरण द्वारसे निकलफर, उसी हिमवत् पर्वतके ऊपर पूर्व दिशामें पपिसी योजनतफ जाती है, फिर पहाँसे गंगाफूट के पास दक्षिण दिशाको मुड़कर, भूमिमें स्थित जो फंड है उसमें वह गंगा गिरती है । वहासे दक्षिण द्वार (दरयाने) से निकलकर, भरत क्षेत्रके मध्यभागमें स्थित जो लंबाईसे पूर्व पश्चिम ममुद्रको स्पर्शित करनेवाला विजयाई पर्वत है उसकी गुदाफे हारसे निफरफर, यहाँसे आर्यखंडके अर्धमागमें पूर्व से लौटकर, प्रथम अवगाहकी अपेक्षा दशगुणी अर्थात् ५ गयूति (फोस ) की गहराई और इसी प्रकार प्रथमो विष्फभसे दशगुण जो साढ़े पासठ गोजन प्रमाण विस्तार है उस सहित गंगानदी पूर्व समुद्र में प्रवेश करती है। और इस गंगाको भाति सिंधुनामफ महानदी भी उसी हिमवत्पर्वतपर विद्यमान पमहदके पधिमदारसे निलफर,पर्वतपर ही गमन फरक फिर दक्षिण दिशाको आकर, विजयालको गुहार द्वारसे निकलकर, पश्चिमको नुकर, आर्य के अर्धभागने आकर, द्रमें प्रवेश करती है। इस प्रकार दक्षिण दिशाको आई हुई जो गंगा और सिंधु नामक दो नदियां हैं, इनसे और पूर्व तथा पशिमके समुदतर लंबा जी विजया पर्वत , उसमें पद संट ( विभागनि घटा)आ भरन क्षेत्र है ॥ अब पूर्वकपनका पनात वर्णन करते हैं-महादिमयन् पवनयर रियत जो महानामा दर. यक्ष पपर.दक्षिणको दिशाफी जोरसे मया शेग्रो मायमें आपर. यापर स्किन को नामिगिरि मामय पर्यतीसको बारे योजना सरा परली. मी पणे- सको मापी पक्षिला फरतो रोहित नागा नदी पूर्वसद की गई है। और इसी प्रकार रोहितासानामा जोनी यह दिनवन पर्यन के पदसे उतरली जापर. इसी नामिग- रिको अर्थ योजनाच सशंकरलो मी पदको सारो माशिमा करके समिर पश्चिम समु- ११० मोगद् राजपन्नजेनशासमालायाम् सस्यैवार्द्धप्रदक्षिणं कृत्वा रोहितास्या पश्चिमसमुद्रं गता । इति रोहिद्रोहितास्यासंझं नदी- द्वन्द्वं हैमवतसंज्ञजघन्यभोगभूमिक्षेत्रे हातव्यम् । अथ निपधपर्वतस्थिततिगिन्छनामह- दाक्षिणेनागत्य नाभिगिरिपर्वतं योजनार्धनास्पृशन्ती तस्यैवार्धप्रदक्षिणं कृत्वा हरित्पूर्व- समुद्रं गता। तथैव महाहिमवत्पर्वतस्थमहापद्मनामहदादुत्तरदिग्विमागेनागत्य तमेव नाभिगिरि योजनार्धनास्पृशन्तो तस्यैवार्धप्रदक्षिणं कृत्वा हरिकान्ता नाम नदी पश्चिम- समुद्रं गता । इति हरिद्धरिकान्तासंज्ञं नदीद्वयं हरिसंज्ञमध्यमभोगभूमिक्षेत्रे विशेषम् । अथ नीलपर्वतस्थितकेसरिनामहदादक्षिणेनागत्योत्तरकुरुसंज्ञोत्कृष्टभूमिक्षेत्रे मध्येन गत्वा मेरुसमीपे गजदन्तपर्वतं भित्त्वा च प्रदक्षिणेन योजनार्धेन मेरु विहाय पूर्वभद्रशाल- वनस्य मध्येन पूर्वविदेहस्य च मध्ये शोतानामनदी पूर्वसमुद्रं गता। तथैव निपधपर्वतस्थि- ततिगिन्छहदादुत्तरदिग्विभागेनागत्य देवकुरुसंज्ञोत्तमभोगभूमिक्षेत्रमध्येन गत्वा मेरुस- मीपे गजदन्तपर्वतं भित्वा च प्रदक्षिणेन योजनार्धन मेरु विहाय पश्चिमभद्रशालवनस्य मध्येन पश्चिमविदेहस्य च मध्येन शीतोदा पश्चिमसमुद्रं गता। एवं शीताशीतोदासंझं नदीद्वयं विदेहाभिधाने कर्मभूमिक्षेत्रे ज्ञातव्यम् । यत्पूर्व गङ्गासिन्धुनदीद्वयस्य विस्ता- रावगाहप्रमाणं भणितं तदेव क्षेत्रे क्षेत्रे नदीयुगलं प्रति विदेहपर्यन्तं द्विगुणं द्विगुणं बात- व्यम् । अथ गङ्गा चतुर्दशसहस्रपरिवारनदीसहिता, सिन्धुरपि तथा, तद्विगुणसंख्यानं । समुद्र में गई है। ऐसे रोहित और रोहितास्या नामकी धारक दो नदियें हैमवत नामक जो जघन्य भोगभूमिका क्षेत्र है उसमें जाननी चाहिये । और हरित नामा नदी निषध पर्वतके तिगिछहदसे दक्षिणको आकर, आधे योजनतक नाभिगिरि पर्वतको छूती हुई उसी पर्वतको आधी प्रदक्षिणा करके पूर्वसमुद्र में गई है। एवमेव हरिकान्ता नामा नदी महाहिमवत् पर्व- तके महापद्म नामक हृदसे उत्तर दिशाकी ओर आकर, उसो नाभिगिरिको आधे योजनतक स्पर्शती हुई उसको अर्ध प्रदक्षिणा देकर, पश्चिम समुद्रमें गई है। ऐसे हरित् और हरिः कान्ता नामक दो नदियां हरि नामका धारक जो मध्यम भोगभूमिका क्षेत्र है उसमें जाननी चाहिये । अब शीता नामा नदी नील पर्वतके केसरी नामा ह्रदसे दक्षिणको आकर, उत्तर- कुरु नामक उत्कृष्ट भोगभूमिक्षेत्रके बीच में होकर,मेरुके पास जाकर, गजदंत पर्वतको भेद- कर और आधे योजन पर्यन्त प्रदक्षिणासे मेरुको छोड़कर, पूर्व भद्रशालवन और पूर्व विदेहके मध्यमें होकर, पूर्व समुद्रको गई है। इसी प्रकार शीतोदा नामा नदो निषधपर्वत पर विद्य- मान जो तिगिंछहद है, वहांसे उत्तरको आकर, देवकुरु संज्ञक उत्तम भोगभूमि क्षेत्रके बीच मेंसे जाकर मेरुफे पास गजदंत पर्वतको भेदकर और आधे योजन प्रदक्षिणासे मेरुको छोड़- फर, पश्चिम भद्रशाल वनके और पश्चिम विदेहके मध्य में गमन करके, पश्चिम समुद्रको गई है। ऐसे शोता और शीतोदा नामक नदियोंका युगल विदेह नामक कर्मभूमिके क्षेत्रमें जानना चाहिये । जो विस्तार और अवगाहका प्रमाण पहले गंगा और सिंधु नामक दो नदियोंका कहा है, उससे दूना दूना प्रत्येक क्षेत्रमें जो नदियोंका युगल है, उसका विस्तार वृहद्रव्यसंग्रहः। १११ रोहिद्रोहितास्याद्वयम्, ततोऽपि द्विगुणसंख्यानं हरिद्धरिफान्ताद्वयमिति । तया पर्पि- शत्यधिकयोजनशतपचकमेकोनविंशतिमागीकृतकयोजनस्य भागपदकं च यद्दक्षिणोत्तरेण कर्मभूमिसंप्रभरतक्षेत्रस्य विष्कम्भप्रमाणं तद्विगुणं हिमवत्पर्वते, तस्माद्विगुणं हेमवतक्षेत्रे, इत्यादि द्विगुणं द्विगुणं विदेहपर्यन्तं ज्ञातव्यम् । तया पद्मावदो योजनसहस्रायामस्तदर्द्ध- विष्कमो दशयोजनावगाहो योजनेकप्रमाणपद्मविष्फभरतस्मान्महापने. द्विगुणस्तस्मा- दपि तिगिब्छे द्विगुण इति ।। अय यथा भरते हिमवत्पर्वतानिर्गतं गङ्गासिन्धुद्वयं तयोत्तरे फर्मभूमिसरावतक्षेत्रे शिखरिपर्वतान्निर्गतं रकारक्तोदानदीद्वयम् । यथा च हैमवतसंक्षे जघन्यभोगभूमिक्षेत्रे महाहिमवद्धिमवन्नामपर्वतद्वयात्ममेण निर्गतं रोहितरोहितास्यानदीद्वयं, ययोत्तरे हेरण्यवत- संझनधन्यभोगभूमिक्षेत्रे शिसरिरुक्मिसंन पर्वतद्वयात्ममेण निर्गतं सुवर्णकूलारूप्यकुरान- दोग्यम् । तथैव यमा हरिसंशमभ्यमभोगभुमिक्षेत्रे निपधमहाहिमवन्नामपर्वतस्यात्क्रमेण निर्गतं हरिद्धरिकान्तानदीद्वयं, तथोत्तरे रम्यकसंझमध्यममोगभूमिक्षेत्रे रुक्मिनीलनाम- पर्वतद्वयात्क्रमेण निर्गतं नारीनरकान्तानदीद्वयमिति विज्ञेयम् । सुपमसुपमादिपटकाल- जानना चाहिये । अब गंगा चौदह हजार परिवारको नदियोसहित है। सिंधु भी पौदद हजार परिवार नदियोंको घारक है। इनसे दूने अर्थात् अट्ठाईस हजार संख्या प्रमाण परिवार फी धारफ रोहित तथा रोहितास्याफोसमझना चाहिये । और हरित् इरिफान्ता ये दो नदियाँ इनसे भी दूने परिपारकी धारक हैं। और पानसी उव्यास योजन तया एक योजनके उन्नीस भागों से ६ भाग प्रमाण दक्षिण और उत्तरसे फर्मभूमि संझफ भरतक्षेपके विप्कंमफा प्रमाण है। 1 उमसे दूना हिमवत्पर्यतमें,हिमवत् पर्वतसे दूना हेमवत क्षेत्र में ऐसे उत्तरोत्तर दूना दूना विष्फंभ विदेह क्षेत्रपर्यन्त जानना चाहिये । और पद्माद जो एक जार योजन लंबा, पापमो चोजन पौड़ा तथा दश योजन गहरा है और जो उसमें एक योजन प्रमाण विष्फ- भका धारफ फमल है, उससे दूना महापाइदमें और उससे दूना तिगिंध सदमें जानना । सय जैसे भरनक्षेत्र में हिमवत् पर्वतसे गंगा तथा सिंधु ये दो नदियां निकली है वेसे हो उसर दिशा में कर्मभूमि संशक जो ऐरावत क्षेत्र नसमें शियरी पर्वतसे निकरीरका सयारसोदा नामक दो नदिया हैं। और जैसे हेमवत नामफ जय भोगभूमिके क्षेत्र में माता- हिमवत् और हिमयन नागको पर्वतोंसे कमानुसार रोहित नया रोहिनास्या ये दो नदिया निकली है। इसी प्रकार उत्तर देण्ययत संशक जोजपन्य भोगभूमि भेग है उसमें शियरी और रफ्मी नामक दो पर्यमोंसे समानुसार मुपर्णपूसा नया रूपारा ये दो नदिया निरी । मी प्रकार हरिमंडक मध्यम भोगभूमि क्षेत्रमें निपर और सहादिया नारा दी गोंसे जैसे प्रमानुसार हरित पारिकान्ताय दोनदिवा निको सो कार - रमें रक नामा मापन भोगभूमि क्षेत्र में नरमी और नोरोगों में नारगया मरकान्वा इन दो नदियों को समानुसार निको हुई जानना पर । सुमनरमा गदि - ११२ श्रीमद् राजचन्द्रजेनंशास्त्रमालायाम् संवन्धिपरमागमोक्तायुरुत्सेधादिसहिता दशसागरोपमकोटि कोटिप्रमितावसर्पिणी तयो- सर्पिणी च यथा भरते वर्तते तथैवैरावते च । अयन्तु विशेषः, भरतम्लेच्छखण्डेषु विज- यार्धनगेषु च चतुर्थकालसमयाधन्ततुल्यकालोऽस्ति नापरः। किं बहुना, यथा खट्वाया एकभागे ज्ञाते द्वितीयभागस्तथैव ज्ञायते तथैव जम्बूद्वीपस्य क्षेत्रपर्वतनदोहदादीनां वदेव दक्षिणविभागे व्याख्यानं तदुत्तरेऽपि विज्ञेयम् । अथ देहममत्वमूलभूतमिथ्यात्वरागादिविभावरहिते केवलज्ञानदर्शनसुखायनन्तगुणस- हिते चं निजपरमात्मद्रव्ये यया सम्यग्दर्शनज्ञान चारित्रभावनया कृत्वा विगतदेहा देह - रहिताः सन्तो मुनयः प्राचुर्येण यत्र मोक्षं गच्छन्ति स विदेहो भण्यते । तस्य जम्बूद्वीपस्य मध्यमवर्तिनः किमपि विवरणं क्रियते । तद्यथा-नवनवतिसहस्रयोजनोत्सेध. एकसह- सावंगाह आदौ भूमितले दशयोजनसहस्रप्रवृत्तविस्तार उपर्युपरि पुनरेकादशांशहानिक - मेण हीयमानत्वे सति मस्तके योजनसहस्रविस्तार आगमोक्तांकृत्रिमचैत्यालयदेववनदे- वावासाद्योगमकथितानेकाश्चर्यसहितो विदेहक्षेत्रमध्ये महामेरुर्नाम पर्वतोऽस्ति । स च गजो जातस्तस्मान्मेरुगजात्सकाशादुत्तरमुखे दन्तद्वयाकारेण यन्निर्गतं पर्वतद्वयं तस्य छहों कालों संबंधी जो परमागममें कहे हुए आयु तथा उत्सेध आदि हैं उनसहित दश- कोटाकोटि सागर प्रमाण अवसर्पिणो तथा उत्सर्पिणी काल जे से भरत में है वैसे ही ऐरावतमें भी है। और यह विशेष है कि भरतके म्लेच्छखंडोंमें और विजया पर्वतोंमें चतुर्थकालकी आदि तथा अन्तके समान काल है, इसके सिवाय दूसरा नहीं। विशेष क्या कहैं जैसे खट्वा (खाट) का एक भाग जान लिया जावै तो उसका दूसरा भाग भी उसी प्रकार समझ लिया जाता है, इसी प्रकार जंवू द्वीपके क्षेत्र, नदी, पर्वत और ह्रद आदिका जो दक्षिण दिशा संबंधी व्याख्यान है वही उत्तर दिशामें भी जानना चाहिये । अव शरीरमें ममत्वके कारणभूत जो मिथ्यात्व तथारागआदि विभाव हैं उनसे रहित और केवलज्ञान, केवलदर्शन, अनन्त सुख आदि अनन्त गुणोंसे सहित जो निज परमात्मा द्रव्य है, उसमें जिस सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्ररूप भावना करके मुनिजन विगतदेह अर्थात् देहरहित होकर अधिकतासे मोक्षको गमन करते हैं उसको विदेह कहते हैं । इस- लिये जंबूद्वीपके मध्यमें वर्तमान जो विदेह क्षेत्र है उसका विस्तारसे वर्णन करते हैं । वह इस प्रकार है-निन्यानवै हजार योजन ऊँचा, एक हजार योजन गहरा और, प्रथम भूमित- लमें दशहजार योजन प्रमाण गोल विस्तारका धारक तथा ऊपर ऊपर एकादशांश (ग्यारहवें हिस्से ) हानि क्रमसे घटते घटते होनेपर मस्तक (शिखर ) पर एक हजार योजन विस्ता- रका धारक और शास्त्र में कहेहुए अकृत्रिम चैत्यालय, देव वन तथा देवोंके स्थान आदि नाना प्रकारके आश्रयोसहित ऐसा विदेह क्षेत्रमें महामेरु नामक पर्वत है। वहीं मानों गज ( हायो ) होगया। अतः उस मेरुरूप गजसे उत्तर दिशामें दो दन्तोंके आकारसे जो दो पर्वत निकले हुए हैं, उनकी 'दो गज़दन्तः यह-संज्ञा है। और वे दोनों उत्तर भागमें जो .

पृह्यन्यसंग्रहः। ११३ गजदन्तद्वयसंमति, तयोत्तरे भागे नीलपर्वते लग्नं तिष्ठति । तयोर्मध्ये यन्त्रिकोणाकारक्षे. प्रमुत्तमभोगभूमिरूपं तम्योत्तरकुरुसंज्ञा । तस्य च मध्ये मेरोरीशानदिग्विमागे शीतानी- टपर्वतयोर्मध्ये परमागमवर्णितानायकत्रिमपार्थिवो जम्यून स्तिष्ठति । तस्या एव शीताया समयतटे यमलगिरिस पर्वतद्वयं विनेयम् । तस्मात्सर्वतद्वयादभिगमागे कियन्तमध्वानं गत्वा शोतानदीमध्ये अन्तरान्तरेण पद्मादिद्वदपञ्चकमस्ति । तेषां हदानामुभयपाश्र्वयोः प्रत्येकं सुवर्णरत्नमयजिनगृहमण्डिता लोकानुयोगव्याख्यानेन दश दश सुवर्णपर्वता भवन्ति । तथैव निश्चयव्यवहाररत्नत्रयाराधकोत्तमपात्रपरमभक्तिदत्ताहारदानफलेनोत्स- माना तियेग्मनुष्याणां स्वशुद्धात्मभावनोत्पन्ननिर्विकारसदानन्देकलझणसुखामृतरमात्वाद- विलक्षणम्य पक्रवत्तिभोगसुखादप्यधिकस्य विविधपञ्चेन्द्रियमोगसुन्यस्य प्रदायका ज्योति- हप्रदीपतूर्यभोजनवस्त्रमाल्यभाजनभूषणरागमदोत्पादकरसागसंगा दशप्रकारकल्पवृक्षाः भोगभूमिक्षेत्रं व्याप्य तिष्ठन्तीत्यादिपरमागमोक्तप्रकारेणानेकाश्चर्याणि प्रातल्यानि । तस्मा- देव मेगजाझिणदिग्विमागेन गजदन्तद्वयमध्ये देवकुरुसंतमुत्तममोगभूमिक्षेत्रमुत्तर- रुवहिनेयम् ॥ - नील पर्वत है उसमें लगे हुए हैं। उन दोनों गजदंतोंके मध्यमें जो त्रिकोण आकारवाला (विकोना ) उत्तम भोगभूमिरूप क्षेत्र है, उसका 'उत्तरकुरु' नाम है। और उसके मध्यमें भेगको ईशान दिशामें शीता नदी और नील पर्वतके योचमें परमागममें फदा हुआ अनादि, अकृत्रिम तथा पृथ्वीका विकाररूप जंबू वृत है। इसी शीता नदीके दोनों किना- रोपर यमलगिरि नामक दो पर्वत जानने चाहिये। उन दोनों यमलगिरि पर्वतोंसे दझिग दिशा फितने ही मार्गफ चले जानेपर शीना नदीके बीच बीच में पन आदि पांच हद है। सन ददोंफे दोनों पायों ( पसबाहों में से प्रत्येक पार्श्वमें लोफानुयोगके व्याख्यान धनु- मार सुपर्ण तया रननिर्मित ऐसे जिन चैत्यालयोंसे भूपित दश दश सुवर्णपर्वत है। इसी प्रकार. नित्रय तथा व्यवहाररूप रजनयकी आराधना करनेवाले जो उत्तम पात्र हैं, उनको परम भफिसे दिया हुआ जो आहारदान उसके फरसे उत्पन्न ऐसे तिचंच और मनु- प्योको निज शुद्ध आत्माको भावनासे उत्पन्न, निर्यिकार एवं सदा आनंदरूप मुम्मामृत रस भावादसे मिलमण और पनवतिके जो मोगमुख हैं सनसे भी अधिक ऐसे नानाप्रकार के पंचेन्द्रियों संपन्यों भोग भुषों को देनेवाले ज्योतिराज, गृहाग, प्रदीपांग, नूयांग, भोजनाग, वांग, माल्योग, माजनांग, भूपांग तथा राग प्रचं मदको उत्पन्न करनेवाले रमाइन V. नामोके धारक या प्रकार किया है। वे भोगभूमि क्षेत्रको ध्यान करणे. भिन्न है। इस्लादिपरमागममित प्रकार अनेक सा समझने पाहिद और मो मेर- गजसे निपलेर दक्षिण दिशा को दो गजदना' जननमें हर गरी समान देवपुर नाम नाम भोगभूमिका भग्न जानने योग्य ।।

११४ श्रीमद् राजचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम् तस्मादेव मेरुपर्वतात्पूर्वस्यां दिशि पूर्वापरेण द्वाविंशतिसहस्रयोजनविष्कम्भं सवेदिक भद्रशालवनमस्ति । तस्मात्पूर्व दिग्भागे कर्मभूमिसंज्ञः पूर्व विदेहोऽस्ति । तत्र नीलकुलप- र्वताइक्षिणभागे शीतानद्या उत्तरभागे मेरोः प्रदक्षिणेन यानि क्षेत्राणि तिष्ठन्ति तेषा विभागः कथ्यते । तथाहि-मेरोः पूर्व दिशाभागे या पूर्वभद्रशालवनवेदिका तिष्ठति तस्याः पूर्वदिग्भागे प्रथमं क्षेत्रं भवति, तदनन्तरं दक्षिणोत्तरायतो वक्षारनामा पर्वतो भवति, तदनन्तरं क्षेत्रं तिष्ठति, ततोऽप्यनन्तरं विभङ्गानदी भवति, · ततोऽपि क्षेत्रं, तस्मादपि वक्षारपर्वतस्तिष्ठति, ततश्च क्षेत्रं, ततोऽपि विभङ्गानदी, तदनन्तरं क्षेत्रं, ततः परं वझार- 'पर्वतोऽस्ति, तदनन्तरं क्षेत्रं, ततो विभङ्गानदी, ततश्च क्षेत्रं, ततो वक्षारपर्वतस्ततः क्षेत्रं, तदनन्तरं पूर्वसमुद्रसमीपे यद्देवारण्यं तस्य वेदिका चेति नवभित्तिभिरष्टक्षेत्राणि ज्ञात- व्यानि । तेषां क्रमेण नामानि कथ्यन्ते-कच्छा १, सुकच्छा २, महाकच्छा ३, कच्छावती ४, आवर्ता ५, लाङ्गलावर्त्ता ६, पुष्कला ७, पुष्कलावती ८ चेति । इदानों क्षेत्रमध्यस्थितन- गरीणां नामानि कथ्यन्ते । क्षेमा १, क्षेमपुरी २, रिष्टा ३, रिष्टपुरी ४, खगा ५, मञ्जूपा ६, औषधी ७, पुण्डरीकिणी ८ चेति ।। अत ऊर्ध्व शीताया दक्षिणविभागे निपधपर्वतादुत्तरविभागे यान्यष्टक्षेत्राणि तानि कथ्यन्ते । तद्यथा-पूर्वोक्ता या देवारण्यवेदिका तस्याः पश्चिमभागे क्षेत्रमस्ति, तदनन्तरं उसी मेरुपर्वतसे पूर्व दिशामें पूर्व पश्चिमको बाईस हजार योजन विष्कभका धारक वेदी- सहित भद्रशाल वन है। उससे पूर्व दिशामें कर्मभूमि संज्ञक पूर्व विदेह है। वहां नील नामक कुलाचलसे दक्षिण दिशामें और शीता नदीके उत्तर भागमें मेरुकी प्रदक्षिणा रूप जो क्षेत्र हैं उनके विभागोंका कथन करते हैं । सो इस प्रकार है-मेरुसे पूर्व दिशाके भागमें जो पूर्वभद्रशालवनकी वेदिका स्थित है, उससे पूर्व दिशाके भागमें प्रथम क्षेत्र है, उसके पीछे दक्षिण उत्तर लंबा वक्षार नामक पर्वत है, उसके पीछे क्षेत्र है, उसके भी आगे विभंगा नाम नदी है, उससे भी आगे क्षेत्र है, उस क्षेत्रके अनन्तर भी वक्षार पर्वत है, फिर क्षेत्र है, फिर भी विभंगा नदी है, उसके अनन्तर क्षेत्र है, उसके पश्चात् वक्षार पर्वत है, उसके आगे क्षेत्र है, उससे आगे फिर विभंगा नदी और फिर क्षेत्र है. उससे आगे फिर वक्षार पर्वत है, फिर क्षेत्र है, उसके अनन्तर पूर्व समुद्र के पास जो देवारण्य नाम वन है, उसकी वेदिका है । ऐसे नौ भित्तियों (दीवारों) से आठ क्षेत्र जानने चाहिये । उनके क्रमसे नाम कहते हैं-कच्छा १, सुकच्छा २, महाकच्छा ३, कच्छावती ४, आवर्त्ता ५, लाङ्गला- वत्ता ६, पुष्कला ७ और पुष्कलावती ८, ऐसे यह क्रमानुसार आठों क्षेत्रों के नाम हैं। अब क्षेत्रोंके मध्यमें स्थित जो नगरियां हैं, उनके नाम कहते हैं। वे क्रमसे ये हैं क्षेमा १, क्षेमपुरी २, रिष्टा ३, रिष्टपुरी, ४, खगा ५, मंझूपा ६, औपधी ७ और पुंडरीकिणी ८॥ इसके आगे शीता नदीसे दक्षिण भागमें निषध पर्वतसे उत्तर भागमें जो आठ क्षेत्र हैं उनको कहते हैं। वे इस प्रकार हैं-पहले कही हुई जो देवारण्यकी वेदी है उसके पश्चिम पृहद्रव्यसंप्रहः। ११५ वझारपर्वतस्ततः परं क्षेत्रं, ततो विभगा नदी, ततश्च क्षेत्रं, तस्माद्वक्षारपर्वतस्ततश्च क्षेत्र, ततो विभाग नदी, ततः क्षेत्रं, ततो वक्षारपर्वतः, ततः. क्षेत्रं, ततो विमगा नदी, तदन- तरं क्षेत्र, ततो वक्षारपर्वतस्ततः क्षेत्र, ततो मेरुदिन्मागे पूर्वभद्रशालबनवेदिका भवतीति नवभित्तिमध्येऽष्टी क्षेत्राणि ज्ञातव्यानि । इदानी तेषां क्रमेण नामानि कन्यन्ते-पच्छा १, सुवच्छा २, महावच्छा ३, वच्छावती ४, रम्या ५, रम्यका ६, रमणीया ७, मजला- पती ८ चेति । इदानीं तन्मध्यस्थितनगरीणां नामानि फथ्यन्ते-सुमीमा १, कुण्डला २. अपराजिता, ३, प्रभाकरी ४, अक्षा ५, पद्मा ६, शुमा ७. रनसंचया ८ चेति । इति पूर्वविदेवक्षेत्रविभागव्याख्यानं समाप्तम् ।। अथ मेरोः पश्चिमदिमागे पूर्वापरद्वाविंशतिसहन्नयोजनविष्कम्मो पत्रिमभद्रशालव- नानन्तरं पश्चिमविदेहतिष्ठति । तत्र निपधपर्वतादुत्तरविभागे .शीतोदानद्या दक्षिणभागे यानि क्षेत्राणि तेषां विभाग उच्यते । तयाहि-मेगदिग्भागे चा पश्चिमभद्रशालवनवे- दिका तिष्ठति तस्याः पश्चिमभागे क्षेत्रं भवति, ततो दक्षिणोत्तरायतो बझारपर्वतस्तिष्टति, तदनन्तरं भेनं, ततो विभंगा नदी, ततश्च भेनं. ततो वक्षारपर्वतस्ततः परं क्षेत्रं, ततो विभंगा नदी, नतः क्षेनं, ततो यझारपर्वतस्ततः क्षेत्रं, तदनन्तरं पश्चिमसमुद्रसमीपे यद्भ. तारण्ययनं तिष्ठति तस्य वेदिका चेति नषभित्तिपु मध्येऽष्टी क्षेत्राणि भवन्ति । तेषा नामानि कथ्यन्ते । पमा १, सुपमा २. महापना ३, पद्मकावती ५, शंखा ५, नलिना , .. - भाग क्षेत्र है. तदनन्तर यभार पर्यत है. उसके आगे क्षेत्र है, फिर विभंगा नदी है, इसके पश्चात् क्षेत्र है, फिर वक्षार पर्वत है और फिर क्षेत्र है. तत्पश्चात् बिभंगानदी है, फिर भत्र है, पुनः यक्षार पर्वत है, फिर क्षेत्र है, फिर विभंगा नदी है. उसके अनन्तर क्षेत्र, फिर बझार पयंत है, फिर क्षेत्र है. इससे आगे मेनफी (उचर ) दिशाके भागमें पूर्वमशाल पनकी बेदी । ऐसे नी भित्तियोंके मध्यमें आठ क्षेत्र जानने योग्य हैं। इन क्षेत्रों के प्रमसे नाम कहते हैं-बच्चा !, सुपन्छा २, महावडा ३. बच्छावती ४, रम्या ५, रम्य का ६, रमणीया और मंगलावती ८ अब अत्रामें स्थित जो नगरिया के नाम सते -गुमामा , मुण्टला २, अपराजिता ३, प्रभाकरी ४, अंका ५, पना ६, शुमा ७ और रजसंगया ८। इस प्रफार पूर्व विदेहरे के विभागोंका व्याख्यान समान हुआ। अब मेरसे पश्चिम दिशा मागमें पूर्व पश्चिममें चाईम हजार योजन विभका धारक पपिनमालयन पसान पतिम विदाई।वह निषध पर्वत चाक विभाग और लोदा नदीक दक्षिा विभाग में जो क्षेत्र का विभाग या जाता है। मांही दिला -दिशा (मगर) मागो पत्रिम मामासयमको दिया है. मपशिम भासे मेक्षित तर या दगार पर है, उसंग मन्तर में पर निगा नदी, और पिर आग बना है, . पान मेत्र ६.शिविगामही है. इस नर, धन त्रय समान यमबार पर्यत श्रीमद् राजचन्द्रजेनशाखमालायाम् ६, कुमुदा ७, सलिला में चेति । तन्मध्यस्थितनगरीणां नामानि कथयन्ति-अश्वपुरी १, सिंहपुरी २, महापुरी ३, विजयापुरी ४, 'अरजापुरी ५, विरजापुरी, ६ 'अशोकापुरी ७, विशोकापुरी ८ चेति ॥ पत ऊवं शीतोदाया उत्तरभागे नीलकुलपर्वताइक्षिणे भागे यानि क्षेत्रात्रि तिष्ठन्ति तेषां विभागभेदं कथयति । पूर्वभणिता या भूतारण्यवनवेदिका तस्याः पूर्वभागे क्षेत्र भवति । तदनन्तरं वक्षारपर्वतस्तदनन्तरं क्षेत्रं, ततो विभङ्गा नदी, ततः क्षेत्रं, ततो वक्षा. रपर्वतः, ततश्च क्षेत्रं, व्रतश्च विभङ्गा नदी, ततोऽपि क्षेत्रं, ततो वक्षारपर्वतस्ततः क्षेत्र, ततो विभङ्गा नदी, ततः क्षेत्रं, ततश्च वक्षारपर्वतस्ततः क्षेत्रं, ततो मेरुदिशाभागे पश्चिम- भद्रशालबनवेदिका चेति नवभित्तिषु मध्येऽष्टौ क्षेत्राणि भवन्ति । तेषां क्रमेण नामानि कथ्यन्ते-वमा १, सुवमा २, महावप्रा, ३, वप्रकावती, ४, गन्धा ५, सुगन्धा ६, गन्धिला ७, गन्धमालिनी ८ चेति । तन्मध्यस्थितनगरीणां नामानि कथ्यन्ते । विजया १, वैज- यन्ती २, जयन्ती ३, अपराजिता ४, चक्रपुरी ५, खङ्गपुरी ६, अयोध्या ७, अवध्या ८चेति ॥ . पश्चात् क्षेत्र है, उसके अनंतर पश्चिम समुद्रके समीपमें जो भूतारण्य नामक वन है उसकी वेदिका है । ऐसे नौ भित्तियोंके मध्यमें आठ क्षेत्र होते हैं। उनके नाम कहते हैं,-पद्मा १, सुपद्मा २, महापद्मा ३, पद्मकावती ४, शंखा ५, नलिना ६, कुमुदा ७, और सलिला ८. उन क्षेत्रोंके मध्यमें स्थित नगरियोंके नाम कहते हैं । अश्वपुरी, १, सिंहपुरी २, महापुरी ३, विजयापुरी ४, अरजापुरी ५, विरजापुरी ६, अशोकापुरी ७ और विशोकापुरी ८॥ अब इसके अनन्तर शीतोदाके उत्तरभागमें और नील कुलाचलसे दक्षिणभागमें जो क्षेत्र हैं उनके विभाग-भेदका वर्णन करते हैं। पहले कही हुई जो भूतारण्यवनकी वेदिका है उसके पूर्वभागमें क्षेत्र है १, और उसके पश्चात् वक्षार नामा पर्वत है, उसके अनंतर पुनः क्षेत्र है २; उसके पश्चात् विभंगा नदी है, उसके पश्चात् पुनः क्षेत्र है ३, उसके पश्चात् पुनः वक्षार पर्वत है, उसके अनंतर पुनः क्षेत्र है ४, उसके पश्चात् पुनः विभंगा नदी है, उसके अनन्तर पुनः क्षेत्र है ५, उसके पश्चात् पुनः वक्षारपर्वत है, उसके पश्चात् पुनः क्षेत्र है ६, उसके पश्चात् पुनः विभंगा नदी है, उसके अनन्तर क्षेत्र है ७, उसके पश्चात् उसके अनन्तर पुनः क्षेत्र है ८, उसके अनंतर मेरुकी दिशाके भागमें पश्चिम भद्रशाळवनकी वेदिका है। इस रोतिसे नौ भित्तियोंके मध्यमें आठ क्षेत्र हैं। अब क्रमसे उनके नाम कहते हैं-वप्रा १, सुवप्रा २, महावप्रा ३, पप्रकावंतो ४, गंधा५, सुगंधा ६, गंधिला ७ और गंधमालिनी ८, ये अष्ट क्षेत्र हैं। अव क्षेत्रोंके मध्यमें वर्तमान नगरियों के नाम कहते है । विजया १, वैजयन्ती २, जयन्ती ३, अपराजिता, चकरी ५, खगपुरी ६, अयोध्या ७ और अगम्या ८,ये कमसें हैं। वक्षारपर्वत है, - .. वृहद्रव्यसंग्रहः।.. अथ भरतक्षेत्रे यथा गङ्गासिन्धुनदीद्वयेन विजयापर्वतेन च म्छेच्छखण्डपनकमा- यखण्डं चेति पट. खण्डानि जातानि । तथैव तेषु द्वात्रिशरक्षेत्रेषु गहासिन्धुसमाननदी- येन विजयापर्वतेन च प्रत्येक घट लण्दानि हावल्यानि अयं तु विशेषः । एतेषु सर्वदेव चतुर्थकालादिसमानकालः, उत्कर्षेण पूर्वकोटिजीवितं; पातचापोत्सेधोति विझयम् । पूर्वप्रमाणं कथ्यते । "पुंज्यस्स हु परिमाणं सदर खलु सदसहरसकोडीसो। छापणं च सहस्साः योधमा बासगणनायो । १।" इति संक्षेपेण : जम्वोपच्याज्यानं समाप्तम् ॥ तदनन्तरं यथा सर्वद्वीपेषु सर्वसमुद्रेषु च द्वीपसमुद्रमर्यादाफारिका बोजनाष्टकोत्सेधा बसवेदिकास्ति तथा जम्बूद्वीपेऽप्यस्तीति विनेयम् । तद्वहिर्मागे योजनामवयवलयवि. कंभ आगमकथित पोहदासह योजनजलोत्सेपायनेफाश्चर्यसहितो लवणसमुद्रोऽस्ति । तस्मादपि बहिर्भागे योजनलमचतुष्टययस्यविकंभो घातकीखण्टखोपोऽस्ति । तत्र प दक्षिणभागे लवणोदधिफालोदधिसमुद्रद्वयवेदिफासी दक्षिणोत्तरायामः सहनयोजनवि- फंभः शतचतुष्टयोत्सेध इत्त्वाकारनामपर्वतोऽस्ति । तयोत्तरविभागेऽपि । तेन पर्वतद्ध- येन खण्डीकृतं पूर्वापरधातकोखण्डतयं ज्ञातव्यम् । तर पूर्वघातकीखण्डशीपमध्ये चतुर- अय भरतक्षेत्र में जैसे गंगा और सिंधु इन दोनों नदियोंसे तथा विजयार्घ पर्वतसे पांच म्टेर मन और एफ आर्य खंट ऐसे छः खंड हुए हैं, उसी प्रकार पूर्वोक जो पचीस विदेह क्षेत्र हैं उनमें गंगा सिंधु के समान दो नदियों और पिजया पर्वतसे प्रत्येक क्षेत्रके प्रखंच जानने चाहिये और यह विरोप ( अधिकता) है कि इस मय क्षेत्रों में सदाही चौथे फालकी आदिमें जैसा काल रहता है पसा ही है । उत्कर्ष (ता) से कोटि पूर्व प्रमाण तो आयु, और पाँचसे धनुप प्रमाग शरीरका उसेध है, या जानना चाहिये । पूर्वका प्रमाण कहते हैं-"सत्तर लाख फोडि रन हजार" ये परनामे पूर्वका प्रमाण जानना पाहिले। से संक्षेपमे जंवृतीफा व्याख्यान समान हुआ। म अशोक पत्रा जैसे सब द्वीप और समुद्रों में होर और नमुद्रकी मर्यादा (सीमा हर ) फरनेपाली साठ योजन ऊंगी यसको पेदिका (दीवार) है. इसी प्रकारसे बाप भी, मह जानना चाहिये। उस वेदिकार पार भागने से राम पोजन प्रमाग गोलाकार पिकमका पारक मात्र समोना हजार योजन नसकी ऊंचाई आदि अनेक आरयों मदिन व्यणममुद्र है । उम स्यगमनु के बाद मागमें चार बाल योञ्जन गांड विष्फम्माधारक धागोगटीर और यहाँपर दक्षिण भागमें सपनोदधि धार कार दपि इन दोनों समुदोको वेदिफाको करनेवारा. लिनसे अगर को कर लंपा. प इजारा धारक या पारमा यो सारनामा मो प्रा. भागमें भी एक कार पर्वत है। इन दोनों पपनाने REET, . गृहद्व्यसंग्रहः। या - स.पर्वताना तु धातकीखण्डफुलपर्वतापेक्षया द्विगुणो विष्कम्म आयामश्च । उस्सेधप्रमाणं पुनर्दक्षिणभागे विजयापर्वते योजनानि पञ्चविंशतिः, हिमवति पर्वते सतं, महाहिमवति द्विशतं निपचे चतुःशतं, तथोत्तरभागे... । मेगसमीपगजदन्तेषु शतप- उफ. नदीसमीपे चमारेषु शान्त्यनिषधनीलसमीपे चतुःशतं च, शेपपर्वतानां च मेरु स्यकत्वा यदेव जम्यूद्वीपे भणितं तदेवार्धतृतीयद्वीपेषु च विज्ञेयम् । तया नामानि च क्षेत्रपर्यतनदीदेशनगरादीनां तान्येव । तथैव मोशद्वयोत्सेधा पञ्चशतधनुर्विरतारा पधरा- गरनमयी बनादीना वेदिका सर्वत्र समानेति । अनापि पकाकारवत्सर्वता आरविवरसं. स्थानानि क्षेत्राणि ज्ञातव्यानि । मानुपोत्तरपर्वतादभ्यन्तरंमाग एय मनुप्यास्तिष्ठन्ति न च यहिभागे । तेषां च जघन्यजीवितमन्तर्मुहूर्तप्रमाणम् , उत्कण पल्यप्रयं, मध्ये मध्य - मविकल्पा बहवस्तथा तिरश च । एवमसंख्येयद्वीपसमुद्रविस्तीर्णनियंग्लोफमध्येऽर्धपती- यद्वीपप्रमाण: संक्षेपेण मनुष्यलोको व्याख्यातः ।। अथ मानुपोत्तरपर्वतसकाशाद हिमागे स्वयम्भूरमणद्वीपार्घ परिमिप्य योऽसौ नागेन्द्र- - धातकोखंडकी अपेक्षा भरत आदि दृने नहीं हैं। और कुलपर्वतोंका विष्फन्म. तथा पायाम धातफीखंडक कुलपर्यतोंकी अपेक्षा हिगुण है। और ऊँचाईका प्रमाण जो दक्षिण भागमें पिजयापर्चत है उसमें पभोस योजन है. हिमवत् पर्वत में सी १०० योजन, महा- हिमयान पर्वतमें दोसी योजन, निपधर्म पारसी योजन प्रमाण है। तथा उत्तर भागमें भी इसी प्रकार मासेध प्रमाण हैं। मेरा समीप भागमें जो गजदंत है धनमें वापसी योजनको ऊँपाई। ना निकटवर्ती जो वनार पर्वत हैं उनमें नथा अन्तिम नौल और निषध पर्यत पात पारसी योजनफी ऊँचाई। और मेरको छोड़कर जो शेष (बाकीफ) पर्यत १ ममें जो जंबूद्वीपमें फही है मोदी ढाई बीपमें जाननी चाहिये । तथा क्षेत्र, पर्यत. नदी, देश, नगर आदि नाम मो वही है जो कि जंबूद्वीप हैं । और इसी प्रकार दो कोम अंदी पापमो धनुष काही पराग नानिमित जो बन आदिका येदिका पद, मम द्वाश समान है। इस पुष्करा दीप नी नकार आकार समान पर हैं और आरोक छिद्रों के समान श्रेय यह समझना चाहिये। नानुचर पर्वतो. अभ्यन्तर (अंदर ) में भाग हो मनुष्य निपान करते और घास भाग नदी, और न गनुप्पांका जघन्य आयु अन्तमान के नया टायु तीन पाय. यावर । मध्य मध्यम विर पानसे * हिफा पातु भी मनुष्यों आचुके सदमही है। इस प्रकार, संन्यात र सगु- से पिसारको प्रारमोनिक. उसो. मयों द्वाप प्रमाग जमिनुप्रयोग ६. मका संप पानपान दिया। अमानुपगर, पपंतसे पास भाग स्वयंभूनन मामा के अभागका ये का जो नागेन्द्र नाम पर है इस पर पूर्व भाग जो असंभमान र मददै सन पनि १२० भीमद् राजचन्द्रजेनशाधमालायाम् नामा पवतस्तस्मात्पूर्वभागे ये संख्यातीता द्वीपसमुद्रास्तिष्ठन्ति तेषु यद्यपि व्यन्तरा निर- न्तरा इति वचनाद् व्यन्तरदेवावासास्तिष्ठन्ति तथापि पल्यप्रमाणायुषां तिरां संव- न्धिनी जघन्यभोगभूमिरिति ज्ञेयम् । नागेन्द्रपर्वताव हिर्भागे स्वयम्भूरमणद्वीपार्धे समुद्रे च पुनर्विदेहवत्सर्वदैव कर्मभूमिश्चतुर्थकालश्च । परं किन्तु मनुष्या न सन्ति । एवमुक्तल- झणतिर्यग्लोकस्य, तदन्तरं मध्यमभागवतिनो मनुष्यलोकस्य च प्रतिपाददेन संक्षेपेण मध्यमलोकव्याख्यानं समाप्तम् । अथ मनुष्यलोके द्विहीनशनचतुष्टयं तिर्यग्लोके तु नन्दी- श्वरकुण्डलरुचकाभिधानद्वीपत्रयेषु क्रमेण द्विपश्वाशचतुष्टयचतुष्टयसंख्याश्चाकृत्रिमाः स्वत- न्त्रजिनगृहा ज्ञातव्याः ॥ अत ऊवं ज्योतिर्लोकः कथ्यते । तद्यथा-चन्द्रादित्यग्रहनक्षत्राणि प्रकीर्णतारकाचेति ज्योतिष्कदेवाः पञ्चविधा भवन्ति । तेषां मध्येऽस्माद्भूमितलादुपरि नवत्यधिकसप्तशतयोजना- न्याकाशे गत्वा तारकविमानाः सन्ति । ततोऽपि योजनदशकं गत्वा सूर्यविमानाः, ततः पर- मशीतियोजनानि गत्वा चन्द्रविमानाः, ततोऽपि त्रैलोक्यसारकथितक्रमेण योजनचतुष्टयं गते - व्यन्तर देव निरन्तर रहते हैं, इस वचनसे व्यन्तर देवांके आवास हैं. तथापि एक पल्य प्रमाण आयुके धारक तिर्यंचों संबंधिनी जघन्य भोगभूमि है ऐसा जानना चाहिये । तथा नागेन्द्रपर्वतसे बाह्य भागमें जो स्वयंभूरमण नामक आधा द्वीप और पूर्ण स्वयंभूरमण समुद्र है, उसमें विदेह क्षेत्रके समान सदा ही कर्मभूमि और चतुर्थ काल रहता है । परन्तु विशेप यह है कि वहाँपर मनुष्य नहीं हैं । इस प्रकार पूर्वोक्त लक्षणके धारक तिर्यग्लोकके तथा उसके पश्चात् उस तिर्यक् लोकके मध्यमें विद्यमान जो मनुष्य लोक है उसके संक्षेपसे निरूपणद्वारा मध्यलोकका व्याख्यान समाप्त हुआ । और मनुष्यलोकमें तीनसौ अट्ठानवे ३६८ और तिर्यक् लोकमें नन्दीश्वर द्वीपमें बावन ५२, कुण्डल द्वीपमें १ तथा रुचक द्वीपमें ४, इस प्रकार सब मिलके मध्यलोकमें चारसौ अट्ठावन ४५८ अकृ. त्रिम स्वतंत्र चैत्यालय जानने चाहिये ।। अब इसके अनंतर ज्योतिष्कलोकका वर्णन करते हैं । वह इस प्रकार है-चन्द्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र, प्रकीर्णकतारा ऐसे ज्योतिष्क देव पांच प्रकारके होते हैं। उनके मध्यमें इस पृथ्वीतलसे ऊपर सातसौ नब्बे ७२० योजन आकाशमें जाकर तारों के विमान हैं, और वहांसे दश योजन ऊपर जाकर सूर्यों के विमान हैं। उसके पश्चात् अस्सी योजन ऊपर जाकर चन्द्रमाके विमान हैं । उसके अनंतर त्रैलोक्यसारमें कहे हुए क्रमानुसार चार योजन ऊपर जाकर अश्विनी आदि नक्षत्रों के विमान हैं। उनके पश्चात् चार योजन ऊपर जाकर बुधफे विमान हैं। उसके अनन्तर तीन योजन ऊपर जाकर शुक्र के विमान हैं । और वहाँसे तीन योजन ऊपर चलकर बृहस्पतिके विमान हैं। उसके पश्चात् तीन योजनपर मंगलके बिमान हैं। और वहांसे भी तीन योजनके अनन्तर शनैश्चरके विमान हैं। सोही कहा है...

- - वृहद्रव्यसंग्रहः। १२१ वन्यादिनक्षत्रविमानाः, ततःपरं योजनचतुष्टयं गत्वा बुधविमानाः, ततः परं योजनत्रयं 7 शुक्रविमानाः, ततो योजनत्रये गते गृहस्पतिविमानाः, ततो योजनत्रयानन्तरं मग- .मानाः, ततोऽपि योजनवयानन्तरं शनैश्चरविमाना इति । तथा चोकं "ण उत्तरस या दस सीदी घउदुगं तु तिचउ । तारारविससिरिक्सा चुहाग्गवअंगिरारसणी " ते च ज्योतिष्कदेवा अर्घतृतीयद्वीपेषु निरन्तरं मेरोः प्रदक्षिणेन परिभ्रमणगति स्ति । तन घटिकाप्रहरदिवसादिरूपः न्यूलव्यवहारकाल: समयनिमिपादिसूक्ष्मव्यव- रकालबत् याप्यनादिनिधनेन समयचटिकादि विवक्षित विकल्परहितेन कालाणुद्रव्यरू- 1 नियकालेनोपादानभूतेन जन्यते तयापि चन्द्रादित्यादिज्योतिकदेव विमानगमना- मनेन कुम्भकारेण निमित्तभूतेन मृस्पिण्डोपादानजनितघट इव व्यज्यते प्रकटीक्रियते यते तेन कारणेनोपचारेण ज्योतिप्कदेवकृत इत्यभिधीयते । निनयकालस्तु वद्विमानग- परिणतेर्वहिरनसहकारिकारणं भवति कुम्भकारचकभ्रमणस्याधस्त नशिलावदिति ॥ इदानीमर्धतृतीयद्वीपेषु चन्द्रादित्यसंख्या कथ्यते । तथाहि जम्बूद्वीपे पन्द्रस्य सूर्य. यं च, लवणोदे चतुष्टय, धातकीख उद्रोपे द्वादश चन्द्रादित्याय, कालोदकस मुद्दे द्विच वारिंशचन्द्रादित्याच, पुष्कराधे द्वीप द्वासमतिचन्द्रादित्यायेति । ततः परं भरतैरावतस्थि- जम्बूद्वीपचन्द्रसूर्ययोः किमपि विवरणं क्रियते । तद्यया-जम्बूद्वीपाभ्यन्तरे योजनाना- "सातसी नब्बे, दस, अस्सी. चार, चार, तीन, नीन, तीन, और तीन योजन ऊपर फ्रमसे तारा, सूर्य, चन्द्र. नत्र, बुध, शुक्र, गृहस्पति, मंगल और शनैश्चर के विमान है। वे ज्योतिष्कदेव ढाई द्वीपमें निरन्तर (सदा) मेककी प्रदक्षिणापूर्वक परिभ्रमण (गमन ) फरते हैं। उन ढाई द्वीपोंमें घटिका, प्रहर, दिवस आदिरूप स्यूल (मोटा) व्यवहार काळ है। समय, निमिष आदि सूक्ष्म कालके समान यद्यपि यह काल अनादिनिधन ( आदि और अन्तरहित ) और समय, घटिका आदि विवाझिन भेदोंसे रहिन जो कालाणुद्रव्यल्प पा. दानभूत निश्चयफा है, उससे उत्पन्न होता है; तथापि जैसे निमित्तभूत कुन्मकारद्वारा मृतिकापिंट है. उपादानकारण जिसका ऐसा पट प्रकट किया जाता है, उसी प्रकार पन्द्र. सूर्य प्यादि ज्योतिष्फदेफि विमानोंफे गमनागमन ( जाने आने से गह कान ज्ञाना जाना है, इस फारण उपचारसे "व्यवहार काल ज्योतिएकदेवाफा किया हुआ ऐसा कहा जाना है। और जो नित्राय फाल, यह तो जैसे गुम्मकार थे. पाम ( पाकक भ्रमणमें पस पक, मनिको शिला बहिरंग महकारी कारण है मन प्रकार उन ज्योतिष्मदेवार, यिमा- नांकी गति-परिणति (गमनाप परिणाम में बहिन महकारी कारण होता है। अय दाई होपोंमें जो पन्द्र और सूर्य हैं, ननको मंगाका कयन करते हैं। या इस मसार - यूरोपमें दो मन्द्रमा और यो सूर्य , सोयरसमुद्र में पार पन्द्रमा और पार सूर्य भाग दाप गारद पन्द्रमा और मारद मूब है, काटोदक मनु, पया- सपमा और पचासी ४: हो या पुरामं वीपमें घार ७२ पन्ना १२२ श्रीमद् राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् मशीतिशतं बहिर्मागे लवणसमुद्रसंबन्धे त्रिंशदधिकशतत्रयमिति समुदायेन दशोत्तरयो- जनशतपञ्चकं चारक्षेत्रं भण्यते तचन्द्रादित्ययोरेकमेव । सत्र मरतेन बहिर्भागे तस्मिंश्चा- रक्षेने सूर्यस्य चतुरशीतिशतसंख्या मार्गा भवन्ति, चन्द्रस्य पश्यदर्शव । तत्र जम्बूद्वीपा- भ्यन्तरे कर्कटसंक्रान्तिदिने दक्षिणायनप्रारम्भे निपधपर्वतम्योपरि प्रथममार्गे सूर्यः प्रथ- मोदयं करोति । यत्र सूर्यविमानस्थं निर्दोषपरमात्मनो जिनेश्वरम्याकृत्रिमं जिनविम्वं प्रत्यक्षेण दृष्ट्वा अयोध्यानगरीस्थितो निर्मलसम्यक्त्वानुरागेण भरतचक्री पुष्पाञ्जलिमुस्मि- प्या ददातीति । तन्मार्गस्थितभरतक्षेत्रादित्यस्यैरावतादित्येन सह तथापि चन्द्रस्यान्यचन्द्रेण सह यदन्तरं भवति तद्विशेपेणागमतो ज्ञातव्यम् ।। अथ "सदभिस भरणी अद्दा सादी असलेस जेट्टमवरवरा । रोहिणिविसहपुणवसु तिउत्तरा मज्झिमा सैसा। १।" इति गाथाकथितक्रमेण यानि जघन्योत्कृष्टमध्यनक्षत्राणि तेषु मध्ये कस्मिन्नक्षत्रे कियन्ति दिनान्यादित्यस्तिष्ठनीति | "इन्दुरवीदो रिक्सा सत्तद्विव. पंचगयणखंडहिया । अहियहिदरिक्खखंडा इन्दुरवीअत्यण्णमुहुत्ता ! १।" इत्यनेन गाथा सूत्रेणागमकथितक्रमेग प्रथक् पृथगानीय मेलापके कृते सति पडधिकषष्टियुतत्रिशतसंख्य- और बहत्तर ही सूर्य हैं। इसके अनन्तर भरत और ऐरावतमें स्थित जो जम्बूद्वीपके चन्द्र तथा सूर्य हैं उनका कुछ थोडासा विवरण करते हैं । वह इस प्रकार है-जम्बूद्वीपके भीतर एकसौ अस्सी और बाह्य भागमें अर्थात् लवणसमुद्रके संबंधमें तीनसौ तीस योजन ऐसे दोनों मिलकर पांचसौ दश योजन प्रमाण सूर्यका चारक्षेत्र (गमनका क्षेत्र ) कहलाता है। सो चन्द्र तथा सूर्य इन दोनोंका एक ही है। इनमें भरक्षेत्रसे बाह्य भागमें उस चारक्षेत्रमें सूर्यके एकसौ चौरासी मार्ग होते हैं और चन्द्रमाके पन्द्रह ही मार्ग हैं। उनमें जंबूद्वीपके भीतर कर्कट संक्रान्तिके दिवस जव कि दक्षिण अयनका प्रारंभ होता है तब निषध पर्वतके ऊपर प्रथम मार्ग में सूर्य प्रथम उदय करता है। जहांपर सूर्यके विमानमें वर्तमान जो निर्दोप परमात्मा श्रीजिनेन्द्र हैं उनके अकृत्रिम जिनबिंवको अयोध्या नगरीमें स्थित भरत- क्षेत्रका चक्रवर्ती निर्मल सम्यक्त्वके अनुरागसे अवलोकन करके, पुष्पांजलि देता है। उस प्रथम मार्ग में स्थित जो भरतक्षेत्रका सूर्य है उसका ऐरावत क्षेत्रके सूर्यके साथ तथा चंद्रमाका चन्द्रमाके साथ और भरतक्षेत्रके सूर्य चन्द्रमाओंका मेरुके साथ जो अन्तर (फासला व दूरी) रहता है वह विशेषतासे आगमोंसे जानना चाहिये । अब "शतभिपा, भरणी, आर्द्रा, स्वाती, आश्लेपा, ज्येष्ठा ये छः नक्षत्र जघन्य हैं । रोहिणी, विशाखा, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, उत्तरापाढा, और उत्तराभाद्रपद उत्कृष्ट हैं । इनके अतिरिक्त शेष जो नक्षत्र हैं वे मध्यम हैं। १। इस गाथामें कहे हुए क्रमके अनुसार जो जघन्य, उकृष्ट तथा मध्यम नक्षत्र हैं, उनमें किस नक्षत्र में कितने दिन सूर्य ठहरता है सो कहते हैं। एक मुहूर्तमें चन्द्र १७६८, सूर्य १८३० और नक्षत्र १८३५ गगनसमें गमन करते हैं, इसलिये अधिकभागोंसे नक्षत्रखंडोंके भाग देनेसे जो मुहूर्त उछालकर, अर्घ ये ६ नक्षत्र वृहद्रव्यसंग्रहः। १२३ दिनानि भवन्ति । तस्य दिनसमूहास्य यदा द्वीपाभ्यन्तरादक्षिणेन बहिर्मागेषु दिनकरो गच्छति तदा दक्षिणायनसंज्ञा; यदा पुनः समुद्रात्सकागादुत्तरेणाभ्यन्तरमार्गेयु समायाति तदोत्तरायणसंशति । तत्र यदा द्वीपाभ्यन्तरे प्रथममार्गपरिधो कर्फटसंक्रान्तिदिने दक्षि- गायनप्रारम्भे तिष्ठत्यादित्यस्तदा चतुर्णवतिसहन्नपञ्चविंशत्यधिकपश्चयोजनशतप्रमाण उत्कर्पणादित्यविमानस्य पूर्वापरेणातपविस्तारो नेयः । तत्र पुनरष्टादशमहत्तैर्दिवसो भवति द्वादशमुहत्तै रानिरिति । ततः क्रमेणातपहानी सत्या मुहत्तद्वयस्यैकपष्टिमागीकृत- स्यैको भागो दिवसमध्ये दिन प्रति होयते यावलवणसमुद्रेऽवमानमार्गे माघमासे मकर- संकान्तायुचरायणदिवसे विपष्टिसहस्राधिकपोडशयोजनप्रमाणो जघन्येनादित्य विमानस्य पूर्वापरेणातपविस्तारो भवति । तयय द्वादशमुहूर्त्तविसी भवत्यष्टादशमुहू रामिति । होपं विशेषव्याल्यानं लोकविभागादो विलेयम् । ये तु मनुष्य क्षेत्राधिर्भागे ज्योतिप्कविमानास्तेषां चलनं नास्ति । ते च मानुषोत्तरप- चताहि गे पञ्चाशत्सहस्राणि योजनानां गत्वा वलयाकार पंक्तिकमेण पूर्व क्षेत्रं परिवेष्टय प्राम होते हैं, उन मुहको चंद्र और सूर्यके आसन्न मुहर्त जानने पाहिये । अर्थात् इतने मुहतों तक चन्द्रमा और सूर्य को एक नक्षत्र पर स्थिति जाननी चाहिये । इस प्रकार इस गाथामें कहे हुए प्रामसे भिन्न भिन्न दिनॉको लेकर, उनको जोड़नेसे तीन सी उपासठ ३६६ दिन होते हैं। जब द्वीपफे भीतरसे दक्षिण दिशाके याहा मागम सूर्य गमन करता है तय तीनसो पासठ दिनो आधे जो एफसी तिरासी ११ दिन उनकी दक्षिणायन संझा होती है, और इसी प्रकार जब सूर्य समुद्रसे उत्तर दिशाको अभ्यन्तर मामि आता देशय शेष जो १८३ दिन हैं उनका उत्तरायण नाम होता है। उनमें जय द्वीपके अभ्यन्तर भागमें फर्कट संक्रान्तिके दिन दक्षिण अयन के प्रारंभ में सूर्य प्रथम मार्गको परिधिमें स्थित होता है तब पौरानवे एजार पाचसी पनीम योजन प्रमाण सूर्य के विमानका पूर्व पश्चिमसे बानप (धूपफा) विस्तार (फैलाष ) होता है यह जानना पाहिये। और उस समय अठारह मुहमि दिन और बारह मुह से रानि होती है। पिर यहाने हम हमसे आतपकी हानि होनेपर दो नाफि इपसट मागोमेसे पफ भाग प्रतिदिन दिवसमें पटता है। यह तबतक पटता है जबतक फि ल्वममुद्र सन्तक मार्ग माघमासमें मकर संशान्ति नाराज दियसमागमें उपन्यताने सूर्य के पिना. नफा आतप विस्तार प्रेसठ हजार सहयोजन प्रमाग | उस समार चा मान दिन और अठारह नाम रानि होती है। इसके अतिरि अन्य जो पिसेर वर्णन है सोलरविभाग आदिमे जानना चाहिये। और जो मनुस्मन (हाई औप) धष्ट्रिभाग श्योतिपिमान मा पम(मान) मोना से गानुपोत्तर पर्ष सने पारमा पास हजार नोउन गमन कर, नयाहार (मगार ) मिस पूर्व ( प ) को वे (और) पर. रमनने वृहद्रव्यसंग्रहः। १३१ लक्षेषु मध्ये परमस्वास्थ्यभावनोत्पन्ननिर्याकुलपारमार्थिकसुखविलमणानि पञ्चेन्द्रियम- ग्वाभिलापजनितव्याकुलत्वोत्पादकानि दुःयानि सहमानः सन भ्रमिनोऽयं जीयो यदा पुनरे- बंगुणविशिष्टन्य धर्मम्प लामो भवति तदा राजाधिराजार्द्धमाण्डलिकमहाराण्डलिक्यलदेव- यासुदेवकामदेवसफलचक्रवत्तिदेवेन्द्रगणघरदेवतीर्थकरपरमदेवप्रथमकल्याणवयपर्यन्तं वि- विधाभ्युदयसुखं प्राप्य पवादभेदरनयमावनायलेनामयानन्तमुग्यादिगुणास्पदमईस्पद सिद्धपदं च लभते तेन कारणेन धर्म पर परमरसरमायनं निधिनिधानं कल्पवृक्षः काम- घेनुमिन्तामणिरिति । किं बहुना, ये जिनेश्वरप्रणीतं धर्म प्राप्य दृढमतयो जातास्त एव धन्याः। नया चोक्तम्--"धन्या ये प्रतिबुद्धा धर्म खलु जिनवरीः समुपदिष्टे । ये प्रतिपन्ना धर्म स्वभावनोपस्थितमनीपाः 1 1 " इति संक्षेपेण धमांनुप्रेक्षा समामा || श्त्युरनगा अनित्याारणसंसारकत्वान्यत्वाशुचित्वासवसंबरनिरागेकयोधिदुर्लभ- धर्मतत्त्वाचिन्तनसंशा निराश्रयदात्मतत्त्वपरिणतिस्पत्य संवरम्य कारणभूता द्वाद- शानुप्रेक्षाः समाप्ताः ॥ ANANAun५.4 . - बमें लाय, प्रत्येक वनस्पति में १० लाग्य, ये इन्दी, ते इन्द्री और ची इन्द्री इनमें दो दो लासा देव नारफी और नियंच इन तीनों में चार चार लाख तथा मनुष्यों में चौदह लाग्य गोनि हैं। १ । इस गाथामें कही हुई चौरामी लाग्य योनियों में परम स्यालयकी भावनासे उत्पन्न व्यापुरतारहित से पारमार्थिक मुखसे पिललग (मिन ) और पापों इन्द्रियों के मुखोंकी अभिलापा ( याला )से उत्पन, व्याकुरताको पैदा करनेवाले से जो हुम्प चनको सहते हुम इस जीवने परिभ्रमग किया। जब हम जीवको पूर्वोन प्रकारके धर्मकी प्रानि होती है, तब राजाधिराज, महाराज.अर्धमंदलेश्वर, महामंडलेसर, बन्टदेव, नारायण, फामदेव, पारुपती, देव. इन्न गणधर देव, नीकर परम देवरे पदों तया तीर्थकरोंक गर्भ, जन्ग नया सप फल्पामको पर्गसक जो अनेक प्रकारय. अभ्युदय मुग, उन मुगाको प्रास होकर, सदनन्तर अभेद रमयकी मायनायरमे प्रदाय और अनंन गुगाका म्यान जो पराईन पद को पीर सिद्ध परको प्रान होना है। इस फार धर्मही परम रमहा रसायन है धर्म ही निधिोका निधान (भंदार)धर्म ही एयरपर्म हो फागण गार और मागितामगि रन । विपया कहें. हो जिनेवर के पर धर्मको प्राम होपर. इस चुनिक भारफ (मगरी) पन्य हैं। मोही कहा-"जिन्होंने जिगरी पदिष्ट पमंकी डाना , और भाग बयर लिग भारजिनका Fr: म भार" TREATर संप riའུག འ ༔ ༔ TREETर पुर्कोटमा कार अनि, अनार, पब, AT य, म. महर, गिजरा, संक, ifug और मदन नका अनुषः .

पृहद्रव्यसंग्रहः। १३३ फारविकल्पभेदेन प्रतच्छेदेन रागादिविकल्परूपसायोभ्यो निवर्त्य निजमुद्धामन्यात्मान- मुपस्थापयतीति खेदोपस्थापनम् । अथवा छेदे नसण्टे सति निपिंफारसंवित्तिरूपनिश्च- यप्रायश्चित्तेन तामाधफवाहिरङ्गव्यवहारप्रायश्चित्तेन वा स्वात्मन्युपत्यापनं छेदोपत्यापन- मिति । अथ परिहारविशुदि कथयति-"तीसं वासा जम्मे वासपुरत्तं च तित्यय- रमूले । पगरयाणं पदिदो संझूण दुगा: अ विहारो । १ ।" इति गायाफधित- कमेण मिण्यारागादिविफल्पमलाना प्रत्याख्यानेन परिहारेण पिशेपेण स्वात्मनः शहि- नमल्यं परिहार विशुद्धिधारित्रमिति । अय सूक्ष्मताम्परायपारिनं कथयति । सूरमातीन्टि- यनिजशुद्धात्ममंपित्तिबलेन सूक्ष्मलोभाभिधानसाम्परायम्य कपायस्य यत्र निरवशेषोपश- मन नपणं वा तत्सूक्ष्मसापरायपारिश्रमिति । अब गधारन्यातचारित्रं कथयनि-प्रया महजमुद्धस्वभावत्वेन निष्कम्पावेन निष्कपायमात्मस्वरूपं तथैवाज्यातं कथितं क्याल्या- तपारिश्रमिति ॥ - और द्वेषका परिदार. ( त्याग ) है उसस्प सामायिक है। अधया शुद्ध आत्माके अनुभवये, चलसे आ तथा रोद्र ध्यानका त्याग करने स्वरूप सामायिक है । अमवा समस्त सुख तया दुःखों में जो मध्यस्य रहना तप सामायिक है । अब छेदोपस्थापन नामक पारियफे द्वितीय भेदफा वर्णन करते है-जय एफही समयमें संपूर्ण विफल्पोंफे त्यागरूप परम सामा- विफमें स्थित होनेको यह जीप असमर्थ होता तय "समस्त दिसा, अन्त ( असत्य ), स्तेय (पोरी), अमर तथा परिमद इन पांचोंसे जो विरति (रहितता) सो प्रत है। इस फयन अनुमार विकल्पभेदले पाच प्रकारफे प्रतोंका छेयान होनेपर जो राग आदि विक- ल्परूप नायनोंसे जीवको सुझाकर निज शुद्ध आनामें उपत्यापन फर सो दोपरयापन है। अपपा छेद अर्थात अलका खंगन मंगघा नाश होनेपर निर्विकार निज आमाके शानरूप নিষ মাদি। ঘরে বা গয়া মামিষ বা নিন সালাম মিয়নি। मो संयोपरयापन है। अप परिहारयिशुदिका कयन करते हैं "जो जन्मसे ३० वर्ष राफी अयस्याफो सुम्पमें व्यतीत करय ययय ( ८ वर्ष ) पर्यन्त नीयकर परतों में प्रयाणामको परफर, तीनों मायाकालको सोहकर, प्रतिदिन दो को गमन करता है. इस मुनिक परिवारविनुदि कम होता है ॥ ६i" म गाया कहे हुए समानुमार मिप्याय. रागस्यादिको विकल-ना प्रत्याभयान (परिहार पपा लगग ) फरसे अधिटना साय जो शामा अदि अपांग, मिटा सो परिवारयिमुदिनामर एनोपारित मुहम माप पारिए। कपन करले-म. इन्द्रियार, गोभर मानी निजमुद्र आत्मा इसके बान से मारने ভুল নাম দাৰু ৰাষা জান তু নে ভয় হন না। रोता र सुमारा पारित है। माया पारितकान परते-जेमा

वृहत्यमप्रहः।
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मंवरानुप्रेोष सारभूता, सा चैव मंवर करिप्यति फि विशेषप्रपश्वेनेति । भगवाना---
निगुप्तिलक्षणनिर्विकल्पममाधिस्यानां यतीनां तथैव पूर्वते तम्रासमांना पुनर्बहुप्रकारेण
मंवरप्रतिपक्षभूतो मोहो विजृम्भते तेन कारणेन प्रतादिपिरतरं कथयन्त्याचार्याः ॥३५॥
"असिदिसदं किरियाणं अफिरियाणं तु होइ चुलसीदी । सत्तट्टी अण्णाणी देणडया टुति
बत्तीस। ।। जोगा पयद्विपदेसा ठिदि अणुमागा फसायदो हुँति । अपरिणदुच्छिण्णेसु अ
बंधो ठिदिकारणं णस्थि । "एवं मंचरतस्यव्याख्याने मूत्रदयेन तृतीयं न्यलं गतम ||
अथ सन्यन्द्रष्टिजीवस्य मंबरपूर्वक निर्जरातत्वं फययति,-
जद कालेण तवेण य भुत्तास कम्मभूगलं जेण ।
माग गडदि णेया तस्माद चेदि णि जरा दुविधा ।। ३६ ॥
ग्यास्या । या इत्यादिव्यायानं मियते-"या"शातल्या । का? "णिज" भाव-
पाप इन दोनों आमयों के संबक कारण होते हैं, यह समझना चाहिये । यहा सोम नामक
राजसेठ पाहता है कि हे भगवान ! ये जो पूर्वोक्त प्रत. समिति आदिक नंबर के कारण है
इनमें नंबरानुना जो है मोदी मारभूत है और यही हम जीवके आरवका मयर कर
देगी फिर आपने जो विशेष प्रपंच ( अधिक विस्तारसे कयन ) किया है, इससे क्या प्रयो-
जन है ? इस प्रश्न का उचर भगयान नेमिचंद्र स्वामी देते हैं कि-मन बचन तथा फाय इन
सोनोंकी गुप्तिस्यरूप जो निर्विकल्प समाधि (ध्यान) है, उसमें स्थित जो मुनि हैं, उनके
तो उस गुप्तिसे दो पत्ति अर्थात् संपर हो जाता है और उसमें असमर्थ जो जीवन
नाना प्रकार से संघरका प्रतिपक्षीभूत मोर उत्पन्न होता है इस कारण आचार्य प्रत
आदिका फयन करते हैं ॥ ३५ ॥ कियायादियोंफ एकता घन्सी १८०, अभियावादियोंकि
पौरामी ८२. अनियों के सडसठ ६७ और बनयिकोंक पत्तीस ३२. ने कुल मिलाकर
सीमा तिरसठ भेद पारियों ।। चोगरसे प्रकृति और प्रदेश बंध होते. कपा-
गोंसे स्थिति तथा अनुभाग बंध होता है और जिस 1 फरारम्यान उदयप नही गया
शांग होगयेने मपशाफपाय भीरपार और मयोग फे.पली है उनमें सन्कार संघ
पिथगिका कारण नदी प्रकार संपर गश्यक व्यायानमें दो सूत्रोद्वारा मनीष
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पर ममी बाब पर पूर्ण निरातो र काल निरा नवा मान
करते हैं।
गाथाभावार्थ:--जिन मामारे परिवार मापसे चम्मको पहल कदर ना
हो यह सीमावनिरा और नपिपार निराकी अपेक्षासेमाकान सदन पर
माया अधिकार निराफी अपेक्षा से जोri zing
होना मोमपानरा ॥३६॥

वृहद्रव्यमंग्रहः। - -- अना शिष्यः सविपाकनिरा नरकादिगतिवधानिनामपि दृश्यते संज्ञानिनामेवेति नयमो नास्ति । तत्रोत्तरं-अव मोडकारणं या मंबरपूर्विका निर्जरा सैव माया | या पुनरमानिनां निर्जरा मा गजस्नानवत्रिफला । यनः लोकं कर्म नियति यदुनरं बध्नाति तेन कारणेन सा न याला या सरागसदृष्टीना निर्जग सा यायशुभकर्मविनाशं करोति नयापि संसारस्थिति लोकां मुमते । न तीर्थकर प्रत्यादिविशिष्टपुण्यवधफारणं भवति पारम्पर्यण मुक्तिकारणं चेति । वीतरागसदृष्टीना पुनः पुण्यपापद्वयविनादो सद्भवेऽपि मुक्तिकारणमिति । उक्तं च श्रीकुन्दकुन्दाचार्यदेवैः " अण्णाणी कन्म खवेदि भवसद- महमकोटीहिं । नं णाणी तिहिं गुत्तो खवेदि उस्सासमित्येण । १ ।" कत्रिदाह-सह- टीना यीनराविझोपणं किमर्थ रागादयो हेवा मदीया न भवन्तीति भेदविधाने जाते सति रागानुभवे ऽपि मानमात्रेण मोशी भवतीनि । तत्र परिहारः । अन्धकार पुम्पद्वयम एकः प्रदीपहनस्तिष्टति, अन्यः गनरेनः प्रदीपरहितस्तिष्ठति । स च कृपे पतनं संपादिक बान जानाति सम्म विनाशे दोषो नान्ति । यस्तु प्रदीपातन्तन्य कृपपतनादिविनारी प्रदीपरल नास्ति । यस्तु कृषपतनादिकं व्यजति नन्य प्रदीपफलमस्ति । नया फोऽपि रामादयो या मदीया न मयन्तीनि भेदविसानं न जानानि स कर्मणा बध्यते तावन , अन्यः कोऽपि रागादिमनविसाने जातेऽपि भावनांशेन गगादिकमनुभयनि नावनाशेन मोऽपि यध्यत उसका साग कहा गया और व्यनिर्जराका कथन नहीं किया गया: 'इदि' इस- प्रफार द्वल्य और भाषम्पसे दो प्रकारको निजग जाननी चाहिये । महा शिष्य कहता है कि जो मविपाक निर्जरा है वह तो नरक आदि गतियों में अशानियोंके भी होती हुई देग्य पड़ती है । इमलिग सन्गगशानियोंके सविपाक निगा होती है यह नियम नहीं है ? इस विषय में कार या फि गदापर जो संवा पूर्वक निगा मौको प्राण करना चाहिये। क्योंकि, वही मोक्षका कारण । और जो लानियों के निरा होती चा, नो गानान (मापी ग्नान नमान निकाल मयोकि. मानी जीव घोडेफाको नो निर्जरा करना है और यान में कामों को बाधता समार निमको परिपाक निगमका को प्राण नही करना चाहिये निभा जो सगा सम्माभिमोफ निर्जरा, या यपि मुभ कमांक नारत और नीका नाममा धरना समाविमारकी स्थिति को अपराग डाव संमा- रको पटाना है। सोमयों नापार प्रगान यादिविशिष्ट पुस्माका करो ना और परपरासमोरको कारगभूम होती और जो योगरामनवमी पुग्स तथा पाप नीका नामपर मामा या माया नमान लागा। माल आनारयो कपन -"अनी जिन RTE ET पोरगी लाई पन्दो मोकी जानी जीप मापनकायको मिका पार होकर राम मा पर देता है ? " हाला वृहद्रव्यमंप्रहः । १३६ - न्तिकम्बामाविकाचिन्त्याहृतानुपमसफलविमलकेवलशानाधनन्तगुणास्पदमवस्यान्तरं मोको मण्यते तयापि विशेषेण भाषद्रव्यरूपेण द्विधा भवतीति वात्तिकम् । तद्यथा--"यो स भाषमुस्खो" णेयो सातव्यः स भावमोक्षः । स कः "अप्पणो ६ परिणामो" निम्नयर- सत्रयात्मफकारणसमयसाररूपो "हु" स्फुटमात्मनः परिणामः । फयंभूतः "सम्बस्स फम्मणो जो खयहेदू" सर्वस्य द्रव्यमावरूपमोहनीयादिधातिचतुष्टयकर्मणो यः क्षयहेतु- रिति । द्रव्यमोमं कथयति । "व्यविमुक्खो" अयोगिचरमसमये द्रव्यविमोक्षो भवनि, फोऽसी "फम्मपुहमावो" टलोत्कीर्णशुद्धबुकस्वभावपरमात्मन आयुरादिशेपाघातिकर्म- णामपि य आत्यन्तिकपृथग्मायो विनरोपो विघटनमिति ।। तम्य मुशात्मनः सुखं कथ्यते । "आत्मोपादानमिदं स्वयमतिदाययोतयाचं विशालं, पृद्धिदासव्यपेतं विषयविरहितं निष्प्रतिद्वन्द्वभावम् । अन्यदल्यानपेनें निरूपमममित शाभतं मर्यकालगुत्कष्टानन्तसारं परममुग्यमतरतम्य सिद्धस्य जातम् । १" कनिदाद- इन्द्रिगमुम्पमेय मुखं गुतात्मनामिन्द्रियशारीरामाचे पूर्वोजमतीन्द्रियसुखं कर घटत इति । नमोगर दीयते - सामारिकसुखं सायन् नोसेवादिपजेन्द्रियविषयप्रभवमेय, यत्पुनः पछे. शरीररहित आत्मा है उसके आत्यंतिक, स्वाभाविक, अचिन्त्य, अद्भुत तथा अनुपम ऐसे जो सफल विमल परान बाटि गुण हैं उन सबका म्यानभूत जो अवस्थान्तर है. वही गोश पहा जातात, तथापि विशेषतासे भाव और द्रव्यरूपसे वह मोक्ष दो प्रकारका होता" यह यातित पाठ है । सो इस प्रकार है-"णेयो म भावमुस्खों" उसको भायमान जानना चाहिये। उमफो फिसको ? "अप्पणा परिणामों" निशयसे नित्रयरमय लग जोफारणसमयसार हे साप आत्मा परिणामको । कैसे आत्मा परिणाम को?"सच्या सम्मणो जो सपहे" जो कि मय अर्थात् द्रव्य नया भावरूप मोहनीय यादि पार पातिया कर्म हैं उन. नाका कारण सफो । अब द्रव्यमोहक म्यापको कहते हैं- "दयविक्खो" बनोगी गुणस्थानयी जीयफ अन्य समयमें दून्यमोसाता। यह त्यमोठा पैसा ? "महमायो" टेगोकाण शुद्ध युद्ध स्वरूप एफ यमायका धारप, जो परमात्मा उसये. आयुः डादि जो (बोर) चार सानिया कामका भी जो अतिशय करणे भिन्न होना गया ना माना कम ग्याप ॥ श्य र शुभारमा नुनका पजन करते हैं। "नि आगाम अपादान कारण निदप अतिशय, पालामा शिक्षा दि नाम (गुनमा) रहिन, विषयों में आग, प्रनित अमान नियतनाम की, अन्य नोंको मे गुर मपगार. RIT (IR :, निधार मयं सान मार मया मनाममारता. सा ममम मोजमसिद्धों या +:"दर की का किनिदि पापमा सो मन्द पहा मुम्बा: और मक नियो गोरा मार मार को दिनमा सिद्धाने में १४० - । श्रीमद् राजचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम न्द्रियविपयव्यापाररहितानां निर्याकुलचित्तानो पुरुषाणां मुखं तदतीन्द्रियमुखमत्रैव दृश्यते । पञ्चेन्द्रियमनोजनितविकल्पजालरहिताना निर्विकल्पसमाधिस्थानां परमयोगिना रागादिरहितत्वेन स्वसंवेद्यमात्मसुखं तद्विशेषेणातीन्द्रियम् । यच्च भावकमंद्रव्यकर्मरहि- तानां सर्वप्रदेशाहादैकपारमार्थिकपरमानन्दपरिणताना मुक्कामनामनीन्द्रियसुखं तदत्य- न्तविशेपेण ज्ञातव्यम् । अत्राह शिष्यः-संसारिणां निरन्तरं कर्मबन्धोऽस्ति. तथैवोद- योऽप्यस्ति, शुद्धात्मभावनाप्रस्तावो नास्ति, कथं मोझो भवतीति ? तत्र प्रत्युत्तरं । यथा शत्रोः क्षीणावस्थां दृष्ट्वा कोऽपि धीमान् पर्यालोचयत्ययं मम हनने प्रस्तावन्ततः पौरपं कृत्वा शत्रु हन्ति तथा कर्मणामप्येकरूपावस्था नास्ति होयमानस्थित्यनुभागत्वेन कृत्वा यदा लघुत्वं क्षीणत्वं भवति तदा धीमान् भव्य आगमभापया "खयध्वसनिय विसोही देसणपाउग्गकरणलद्धी य । चत्तारिवि सामण्णा करणं सम्मत्तचारित्ते । १।" इति नाथा. कथितलब्धिपञ्चकसंज्ञेनाध्यात्मभाषया । निजशुद्धात्माभिमुखपरिणामसंजेन च निर्मलभा. वनाविशेषखङ्गेन पौरुपं कृत्वा कर्मशत्रु हन्तीति । यत्पुनरन्तःकोटाकोटीप्रमितकर्मस्थि- तिरूपेण तथैव लतादारुस्थानीयानुभागरूपेण च कमलधुत्वे जातेऽपि सत्ययं जीव आग- मभाषया अधःप्रवृत्तिकरणापूर्वकरणानिवृत्तिकरणसंज्ञामध्यात्मभापया त्वशुद्धात्माभिमुख परिणतिरूपां कर्महननबुद्धि कापि काले न करिष्यतीति तदभव्यत्वगुणस्यैव लक्षणं है है उसमें हो सकता है ? इसपर उत्तर देते हैं कि सांसारिक जो सुख है वह तो श्रीसेवन आदि रूप जो पांचों इन्द्रियोंके विषय हैं उन्हींसे उत्पन्न होता है और जो पांचों इन्द्रियोंके विप- योंके व्यापारसे रहित तथा व्याकुलताशून्य चित्तवाले पुरुप हैं उनका जो सुख है वह अतीन्द्रिय सुख है । और इस लोक में ही देखा भी जाता है। और पांचों इन्द्रियों तथा मनसे उत्पन्न जो विकल्पोंके समूह हैं उनसे रहित और निर्विकल्प ध्यानमें स्थित ऐसे परम योगियोंके राग आदिको शून्यतापूर्वक जो स्वसंवेद्य (निजके अनुभवसे जानने योग्य ) आत्माका सुख है वह विशेष करके अतीन्द्रिय है । और भावकर्म तथा द्रव्यकर्मोंसे रहित, तथा संपूर्ण आत्माके प्रदेशोंमें आह्लादका जनक ऐसा जो पारमार्थिक परम सुख परिणत ऐसे मुक्त जीवोंके जो अतीन्द्रिय सुख वह अत्यन्त विशेषतासे अतीन्द्रिय जानना चाहिये । अव यहांपर शिष्य कहता है कि हे गुरो! संसारी जीवोंके निरन्तर कर्मोंका बंध होता है और इसी प्रकार कर्मोंका उदयं भी सदा होता रहता है इस कारण शुद्ध आत्माके ध्यानका प्रस्ताव (प्रसंग )ही नहीं है फिर उनका मोक्ष कैसे होता है ? अब इस शिष्यके प्रश्नका उत्तर देते हैं कि जैसे कोई बुद्धिमान् अपने शत्रुकी क्षीण अवस्थाको देखकर, अपने मनमें विचार करता है कि यह मेरे मारने का प्रस्ताव है अर्थात् शत्रु'दुर्बल है इसलिये यह अवसर शत्रुको मारनेका है; और इस विचारके पश्चात् उद्यम करके, वह बुद्धिमान् अपने शत्रुको मारता है, इसी प्रकार काँकी भी सदा एकरूप अवस्था नहीं रहती, इस कारण स्थितिबंध और अनुभागबंधकी न्यूनता होनेसे जब कर्म लघु अर्थात् है - गुद्ध आमा वृहंद्रनमंग्रहः । १४१ ज्ञानव्यमिति । अन्यदपि दृष्टान्तनवक मोमविषये ज्ञातव्यम् - रयगदीवविणयरद हिउ, दुद्धउ धाउपहाणु । मुण्णुगप्पफलिहउ अगणि, गव दिटुंता जाणि | " नवनादिकाले मोरं गच्छता जीवान जगन्नं भविष्यतीति ? तत्र परिहारः। यथा-भाविकालस- मयाना मेण गन्जता यापि माविकारसमथराः मोफत्वं भवति तथाप्यवसानं नास्ति । नया मुक्ति गच्छता जीवानां गद्यपि जीवराशेः स्तोफत्वं भवति तथाप्यवसानं नास्ति, इति पनि पूर्वकाले बहवोऽपि जीया शेनं गता, इदानी जगतः शून्यत्वं किं न श्यते ? फिलामखानामभव्यमानमायानां च मोसो नास्ति, फथं भूयात्रं मय- यतीति ।। ७॥ एवं मंझपेण मात्रतत्यन्यायाननकसूत्रेण पान पलं गनम । Hोण होते हैं नव युद्धिमान भा जीव आगम भाषासे योपनाम रब्धि, विशुद्धिलब्धि. देवानामधि. प्रायोगिलब्धि और पारणलब्धि चे पान लब्धियां हैं। इनमें चार नो सामान्य में और पांच: सम्यक्त्वचारित होती है इस गाथासे काही दुई पाँच लगिया नामक नया गमापानिज सन्मुख परिगाम नामक जो निर्मल भावनाविपरूप खास पौरप करके फर्मशत्रुको नष्ट करना । और जो अन्तः फोटाकोटि प्रमाग फशितिरप नया इसी प्रकार साफाटफे स्थानापन्न अनुभाग रूपसे फफा लय (ोगय) होनेपर भी यह जीप आगमभापासे अधःप्रवृत्तिकरण, अपूर्यफरण और अनिय- सिरण नामक तथा अध्यात्ममापासे निज शुद्ध आन्मा सामुग्ध परिणामस्प जो कोको नष्ट करने की बुद्धि है नमकी फिली समय में नहीं करेगा. या जो कथन है, मो भगन्य गुणका दोसरण जानना चाहिये । और अन्य भी नोटान्त मोरय, विरमें जानने गोय है । रसदीपक श्यादि । म पद कोईका करता कि अनादि कालमेमोका जाते आवाजनकी भुयार हो जाना अयान अनादिकालने जो गोत्रको जोर जा रहे हैं, नो न्यून होत होने मी जगलमे धया नरहंगामशंकाका परिवार को हम ti:༈ བྷཾ ༔ • པ ནཱཀ ཤེ སྨནin a ཙནriii rj गुना नाम समाशिका माविमा मी प्रकार मुनि यो वराको गनना होगा गरिमाको सामी जी कि पूर्ण कामे करम न म जयनानदार पदमपर यह भी R. ARE नाम मगन भाका मोनोरा पनाम TREAM मोरेपानापम पम Rai ! -- १४२ भीमद् राजचन्द्रजेनशारणमालायाम् अत ऊर्व पष्टस्थले गाथापूर्वार्धन पुण्यपापपदार्थद्वयस्वरूपमुत्तरार्धन च पुण्यपापप्रक- विसंख्या कथयामीत्यभिप्रायं मनसि धृत्वा भगवान् सूत्रमिदं प्रतिपादयति;- सुहअसुहभावजुत्ता पुण्णं पावं हवंति खल जीया । सादं सुहाउ णामं गोदं पुण्णं पराणि पावं च ।। ३८ ॥ व्याख्या। "पुण्णं पावं हवंति खलु जीवा" चिदानन्दैकसहजशुद्धस्वभावत्वेन पुण्य पापयन्धमोक्षादिपर्यायरूपविकल्परहिता अपि सन्तानागतानादिकमवन्धपर्यायेण पुण्यं पापं च भवन्ति खलु स्फुटं जीवाः । कथंभूताः सन्तः "सुह असुहभावजुत्ता" "उद्वम मिथ्यात्वयिषं भावय दृष्टिं च कुरु परां भक्तिम् । भावनमस्काररतो ज्ञाने युक्तो भव सदापि । १। पञ्चमहावतरक्षा कोपचतुष्कस्य निग्रहं परमम् । दुर्दान्तेन्द्रियविजयं तपः- सिद्धिविधौ कुरूद्योगम् । २।" इत्यार्याद्वयकथितलक्षणेन शुभोपयोगभावेन परिणामेन तद्विलक्षणेनाशुभोपयोगपरिणामेन च युक्ताः परिणताः । इदानीं पुण्यपापभेदान् कथ- यति “सादं सुहाउ णामं गोदं पुण्णं" सद्वेद्यशुभायुर्नामगोत्राणि पुण्यं भवति "पराणि अब इसके आगे षष्ठ (छट्टे ) स्थलमें गाथाके पूर्वार्धसे पुण्य तथा पापरूप जो दो पदार्थ हैं उनके स्वरूपको और उत्तरार्धसे पुण्य प्रकृति तथा पाप प्रकृतियोंकी संख्याको कहता हूं, इस अभिप्रायको मनमें धारण कर, भगवान् इस सूत्रका प्रतिपादन करते हैं;- गाथाभावार्थ:-शुभ परिणामोंसे युक्त और पापरूप होते हैं। सातावेदनी, शुभ आयु, शुभ नाम तथा उच्च गोत्र नामक कर्मोंकी जो प्रकृतियें हैं वे तो पुण्य प्रकृतियें हैं और सब पापप्रकृतियें हैं ।। ३८ ॥ व्याख्यार्थः- "पुण्णं पावं हवंति खलु जीवा" चिदानन्दरूप सहज शुद्ध पुण्य पाप बन्ध तथा मोक्ष आदि पर्याय स्वरूप विकल्पोंसे रहित भी जीव हैं तथापि संतान ( प्रवाह से प्राप्त जो अनादि कर्मबन्ध पर्याय है उससे पुण्य तथा पाप भी होते हैं अर्थात् पुण्य पापको प्राप्त होते हैं। कैसे होते हुए जीव पुण्य पापको धारण करते हैं ? इसलिये यह विशेषण कहते हैं । सुहअसुहभावजुत्ता" "मिथ्यात्वरूपी विषका वमन करदो, सम्यग्दर्शनकी भावना करो, उत्कृष्ट भक्तिको करो, और भाव नमस्कारमें तत्पर होकर सदा ज्ञानमें लगे रहो । १। पांच महावतोंकी रक्षा करो, क्रोध आदि चार कषायोंका पूर्ण रूपसे निग्रह करो, दुर्दान्त ( प्रबल) इन्द्रियरूप शत्रुओंका विजय करो तथा बाह्य अभ्यन्तर भेदसे दो प्रकारका जो तप है उसको सिद्ध करनेमें उद्योग करो।" इस प्रकार दोनों आर्याछन्दोंसे कहे हुए लक्षणसहित शुभ उपयोगरूप भाव परिणामसे तथा उसके उपयोग रूप परिणामसे युक्त (परिणत ) जो जीव हैं वे पुण्य पापफो धारण करते हैं अथवा स्वयं पुण्य पापरूप हो जाते हैं । अब पुण्य तथा पापके भेदोंको कहते हैं । "मादं मुहाउ णामं गोदं पुण्णं" साता वेदनी, शुभ आयु, शुभ नाम और उच्च गोत्र तथा अशुभ जीव पुण्य भावसे और विपरीत अशुभ वृहद्रव्यसंग्रहः। १४३ पात्र च" तम्मादपराणि कर्माणि पापं चेति । तद्यया-सद्वेद्यमेक, तिर्यन्मनुष्यदेयायु- स्वयं, सुभगयशःकीर्तितीर्थकरत्वादिनामप्रकृतीनां सप्तविंशत् , तथोगोत्रमिति समुदा- येन द्विचत्वारिंशसंख्या: पुण्यप्रकृतयो वियाः शेया द्वयशीतिपापमिति । तत्र "दर्शन- विशुद्धिपिनयसंपन्नता शीलमतेवननिचारोऽभीक्ष्णशानोपयोगसंवेगो शाक्तितस्त्यागतपसी माधुसमाधियावृत्त्यकरणमईदाचार्ययभुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहाणिर्गिप्रभावना प्रवचनवत्सलत्वमिनि तीर्थ करत्वम् न्युरणपोटशभावनोत्पनतीधेफरनामफर्मय विशिष्ट पुण्यम् । पोडशभावनामु मध्ये परमागमभापया 'मृढवयं मदामाष्टो तयानाय- तनानि पद । अष्टी शादयश्चेति दग्दोपाः पञ्चविंशतिः ।।।" इति लोकथितपद्ध- विशतिमररहिता तथाध्यात्मभापया निजमुद्धात्मोपादेशमचिस्पा सम्बकत्वभावनैव मुन्त्येति वियम् ! सम्यग्दष्टे पस्य पुण्यपापद्वगमपि यम् । कथं पुण्यं करोतीनि ? तत्र युक्तिमा । यथा कोऽपि देशान्तरस्थमनोहरम्रोसमीपादागनपुरगाणा तदर्थे दानसन्मा- Lam- - चे कर्म तो पुण्यरूप हैं और इनसे भिन्न जो शेष फर्म व पापफर्म हैं। सो इस प्रकार है- साता वेदनी एक प्रकृति, नियंच, मनुष्य और देव इन भेटोसे शुभ आयुको प्रकृतियें तीन ३, शुभग, यशाकीति तथा तीर्थकरपना आदि रूप नामकमकी प्रकृति संतोस ३७ और उमा गोन एफ १, ऐसे सब मिलके समुदायसे बचालीस ४२. संसायी धारफ पुण्य प्रा- ति जाननी चाहिये। बाफीकी जो बयासी प्रतियां माठों कर्माकी . ये सब पाप- प्रकृति है॥ उनमें "दर्शनविशुदि । विनयसंपनना २ शाल तथा प्रमों में अतिचाररहितता निर- नगर, शान में प्रयोग ५ संवेग ५ शतिपूर्वक स्याग ६ शन्तिपूर्वक तर ७ माधुममाधि ८ यायका करना २. आइनमें भक्ति १० श्रापार्यभाकि । पानपछि १२. प्रधामगि १: आपश्यों में हानि न करना अर्याग पन आवश्यों को निगलर धारण हरमा १५ नागप्रमापना १५ और प्रपनमामलचे तमंदर प्रकृतिक यक {" म पो हालको धार जो मोर मापना में सोनोगकर नाममा विशिष्ट पुण्यद । रमाल भावनाओम परमागम मापाये गाल मृदना, म., (६) अनामनन और आठ गंगा आदि दोष ऐसे पनीर २१ माद- गोष" प्रारक को हुम पोम मदान गररममा निपा)में रदिन सो गया मामे निज पद माहोपर (पान THREE गधि (प्रीलिमाटो REE भावना माद जगपालना ये संका-सपाटो काबरको मापा दोनों हो पर यह पुरम में करना है? सामान कपन करने में साई मनुष्य भर में विमान मनोहर (माया- . - १४६ श्रीमद् राजचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम अथ प्रथमतः सूत्रपूर्वार्धन व्यवहारमोक्षमार्गमुत्तरार्धेन च नियमोक्षमार्ग निरूपयति, सम्मईसणणाणं चरणं मुक्खस्म कारणं नाणं । ववहारा णिच्छयदो तत्तियमइओ णिओ अप्पा ।। ३९ ।। व्याख्या । “सम्मदंसणणाणं चरणं मुक्खस्स कारणं जाणे ववहारा" सम्यग्दर्शन- ज्ञानचारित्रत्रयं मोक्षस्य कारणं हे शिष्य जानीहि व्यवहारनयात । "णिच्छयदो तत्तियः मइओ णिओ अप्पा" निश्चयतस्तत्रितयमयो निजात्मेति । तथाहि-वीतरागसर्वज्ञप्रणीतपड़- द्रव्यपञ्चास्तिकायसप्ततत्त्वनवपदार्थसम्यक्त्रद्धानज्ञानव्रताद्यनुष्ठानविकल्परूपो व्यवहारमो- क्षमार्गः । निजनिरञ्जनशुद्धात्मतत्त्वसम्यकश्रद्धानज्ञानानुचरणैकाग्यपरिणतिरूपो निश्चयमो- क्षमार्गः । अथवा धातुपाषाणेऽग्निवत्साधको व्यवहारमोक्षमार्गः, सुवर्णस्थानीयनिर्विकार: स्वोपलब्धिसाध्यरूपो निश्चयमोक्षमार्गः । एवं संक्षेपेण व्यवहारनिश्चयमोक्षमार्गलक्षणं ज्ञातव्यमिति ॥ ३॥ अथाभेदेन सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि स्वशुद्धात्मैव तेन कारणेन निश्चयेनात्मैव निश्चय- मोक्षमार्ग इत्याख्याति । अथवा पूर्वोक्तमेव निश्चयमोक्षमार्ग प्रकारान्तरेण दृढयति;- अब प्रथमही सूत्रके पूर्वार्धसे व्यवहार मोक्षमार्गको और उत्तरार्धसे निश्चय मोझमा- र्गको कहते हैं;- गाथाभावार्थः- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनोंके समुदायको व्यवहारसे मोक्षका कारण जानो । तथा निश्चयसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और चारित्र स्वरूप जो निज आत्मा है उसको मोक्षका कारण जानो ।। ३९ ॥ व्याख्यार्थः- "सम्मईसणणाणं चरणं मुक्खस्स कारणं जाणे ववहारा" .हे शिष्य ! व्यवहारनयसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, और सम्यक्चारित्र इन तीनोंके समुदायको मोक्षका कारण जानो। "णिच्छयदो तत्तियमइओ णिओ अप्पा" और निश्चयसे सम्य- ग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा चारित्र इन तीनों स्वरूप जो निज आत्मा है वही मोक्षका कारण है । भावार्थ-श्रीवीतराग सर्वज्ञसे कहे हुए जो छः द्रव्य, पांच अस्तिकाय, सात तत्त्व और नव पदार्थ हैं इनका भले प्रकार श्रद्धान करना, जानना, और व्रत आदिका आचरण करना इत्यादि विकल्परूप जो है सो तो व्यवहार मोक्षमार्ग है। और जो अपने निरंजन शुद्ध आत्मतत्त्वका सम्यक् - श्रद्धान, ज्ञान तथा आचरणमें एकाग्रपरिणति रूप निश्चय माझमार्ग है। अथवा धातु पापाणके विषयमें अग्निके सदृश जो साधक व्यवहार मोझमार्ग है तथा सुवर्णके स्थानापन्न निर्विकार जो निजआत्मा है उसके स्वरूपकी प्राप्तिरूप जो साध्य है उस स्वरूप निश्चय मोझमार्ग है । इस प्रकार संक्षेपसे व्यवहार तथा निश्रय मोक्षमार्गके लक्षणको जानना चाहिये ॥ ३९ ॥ अब अभेदसे सम्यग्दर्शन, शान, चारित्र निजशुद्ध आत्मा ही है इस कारण निश्चयनवसे है वह वह तो ดี - वृहद्रव्यसंग्रहः । स्यणत्तयं ण वट्ट अप्पाण मुइत्तु अण्णदवियसि । तमा तत्तियमइट होदि हु मुक्खम्म कारणं आदा ॥ ४० ॥ व्याख्या । "रयणतयं ण व अप्पाण गुइ अण्णदवियाप्ति' रनवयं न वर्तते स्वकी- यादात्मानं मुक्त्वा अन्याचेतने द्रव्ये । "तामा तत्तियमहर होदि हु मुस्वस्त फारणं आदा" तस्मात्तप्रितयमय आत्मैव निश्चयेन मोनस्य कारणं भवतीति जानीहि । अथ विस्तार:---रागादिविफल्लोपाधिरहितचिमत्कारभावनोत्पन्नमधुररसास्वादमुखोऽहमिति नियरूपं सम्यग्दर्शनं, तस्यैव सुखर समस्तविभावेभ्यः स्वसंवेदनशानेन पृथक परिच्छे- दनं सम्यग्ज्ञानं, तथैव दृष्टपुतानुभूतभोगाकारप्रभृनिसमस्तापध्यानरूपमनोरथजनितसंफ- ल्पविकल्पजालत्यागेन तत्रैप सुखे रतम्य सन्तुष्टस्य तृमस्यैकाकारपरमनगरसीमावेन द्रवीभूतगित्तम्य पुनः पुनः स्थिरीकरणं सम्यक्चारित्रम् । इत्युक्तलमगं मिनयरन प्रय शुद्धात्मानं विहायान्यत्र घटपटादिबहिर्द्रव्ये न वर्तते यतन्ततः कारणादभेदनयेनाने कन्द्र- न्यामकमपानरूयत्तदेव सम्पग्दर्शनं, तदेव सम्यगमानं, तदेव चारित्रं, तदेव म्यात्म- तत्वमित्युलमणं निशुद्धात्मानमेष मुफिकारणं जानीहि ॥ १० ॥ आत्मा ही नित्रय मोक्षमार्ग है, इस प्रकार फथन करते हैं । अथवा पहले कहे हुए निमय मोक्षमार्ग को हो अन्य प्रकारसे रद करते। गाथाभावार्थ:-आमाको छोड़कर अन्य द्रव्यमें रखवय नहीं रहता, इस कारण नम रनप्रयमयी जो आग्मा यही निम्नायसे मोक्षका कारण है ।।४।। व्याच्यार्थ--"श्यणतयं पा चट्टइ अप्पाण इत्त अण्णदविय मि" निज शुद्ध भाग्माको छोड़कर अन्य अचेतन द्रव्यमें रतनय नहीं रहना है । "तक्षा तातिय महाड होदि इ मुस्यास कारणं आदा" इस कारण रमणयमय पाराको हो निागसे मोका कारण जानो । अब पिस्तारमे वर्णन करते है. राग आदि विरल्योंकी साभिने रहिन को पिन् पगकारको भायनासे नया गार रस ( अग्रन) के आधार रूप मुम्बका मारक मैं इस प्रकार निरूप मम्गदगंन । खोर इम पू. गुरे, जो गाबादमनन्त मिसाप मनसे यमेवेदनमामिल करना या जानना मो REATE : धार मा प्रकार देगे, मुने तथा अनुपम कि हम जो भोग उनमें करना धादि की समस्त दुमपानर मनोरम हैं उसमें वरना हर मंकर मिया यागमे को मुमदुष्ट राया एक बार का प्रारक जो परम मा मा कम पायमान FREET पार निगर मा मा पारित है। इस प्रकार का पार. जोस, बारा तापट, पद आदि में ! . इस कार को अनेक नर एए. अपामा समान पाम, प. fim grixर बाई समान यह स्मामा दो मम्मदगंगा, यह - १४८ श्रीमद् राजचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम् एवं प्रथमस्थले सूत्रद्वयेन निश्चयव्यवहारमोममार्गस्वरूपं संक्षेपेण व्याख्याय तदनन्तरं द्वितीयस्थले गाथापटकपर्यन्तं सम्यक्त्वादित्रयं कमेण विवृणोति । तत्रादी सम्यक्त्वमाह- जीवादीसद्दहणं सम्मत्तं रूवमप्पणो तं तु । दुरभिणिवेशविमुक्कं गाणं सम्म खु होदि सदि जहि ।। ४१ ॥ व्याख्या । "जीवादीसदहणं सम्मत्तं" वीतरागसर्वन प्रणीतशुद्धजीवादितत्त्वविषये चलमलिनावगाढरहितत्वेन श्रद्धानं रुचिनिश्चय इदमेवेत्थमेवेति निश्चयबुद्धिः सम्यग्दर्श- नम् । “रूवमप्पणो तं तु" तच्चाभेदनयेन रूपं स्वरूपं तु पुनः, कन्यात्मन आत्मपरिणाम इत्यर्थः । तस्य सामर्थ्यमाहात्म्यं दर्शयति । "दुरभिणिवेसविमुकं णाणं सम्मं बु होदि सदि जमि" यस्मिन् सम्यक्त्वे सति ज्ञानं सम्यग् भवति स्फुटं । कथम्भूतं सम्यग्भवति "दुरभिणिवेसविमुकं" चलितप्रतिपत्तिगच्छत्तृणस्पर्शशुक्तिकाशकलरजतविज्ञानसदृशैः संश- यविभ्रमविमोहैर्मुक्तं रहितमित्यर्थः । . . . आत्मा ही सम्यग्ज्ञान है, वह आत्मा ही चारित्र है तथा वही निज आत्मतत्त्व है। इस प्रकार कहे हुए लक्षणवाले निज शुद्ध आत्माको ही मुक्तिका कारण जानो ॥ ४० ॥ इस प्रकार प्रथम स्थल में दो सूत्रोंद्वारा संक्षेपसे निश्चय मोक्षमार्ग और व्यवहार मोक्ष- मार्गके स्वरूपका व्याख्यान करके अब आचार्य छः गाथाओंतक क्रमसे सम्यग्दर्शन,सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र इन तीनोंका विस्तारसे वर्णन करते हैं। उनमें प्रथम ही सम्यक्त्व (सम्यग्दर्शन )को कहते हैं- गाथाभावार्थ:-जीव आदि पदार्थोंका जो श्रद्धान करना है वह सम्यक्त्व है और वह सम्यक्त्व आत्माका स्वरूप है । और इस सम्यक्त्वके होनेपर संशय, विपर्यय तथा अनध्यवसाय इन तीनों दुरभिनिवेशोंसे रहित होकर सम्यग्ज्ञान कहलाता है ॥ ४१ ।। व्याख्यार्थः-- "जीवादीसदहणं सम्मत्त" वीतराग सर्वज्ञ श्रीजिनेन्द्रसे कहे हुए जो -शुद्ध जीव आदि तत्त्व हैं उनके विपें चल मलिन तथा अवगाढकी रहितता पूर्वक जो श्रद्धान अर्थात् रुचि अथवा "जो जिनेन्द्रने कहा वही यह है, जिस प्रकारसे जिनेन्द्रने कहा है उस प्रकारसे यह है" इस प्रकार जो निश्चयरूप बुद्धि है वह सम्यग्दर्शन है । "रूवमप्पणो तं तु" और वह सम्यग्दर्शन अभेद नयसे. आत्माका स्वरूप है अर्थात् आत्माका परिणाम है । अब सम्यग्दर्शनके सामर्थ्य अथवा माहात्म्यको दिखाते हैं "दुरभिणिवेसविमुक्कं गाणं सम्म खु होदि सदि जमि" जिस सम्यक्त्वके होनेपर चलायमान शान अर्थात् यह पुरुष है अथवा स्थाणु (काष्ठका ठूठ ) है. इस रूप संशय, गमन करते हुए जैसा तृणके स्पर्श आदिका ज्ञान होता है उस जानके समान विमोह. अथवा अनध्यवसाय तथा सीपके टुकड़ेमें चांदी विज्ञानके समान जो विभ्रम अर्थात् - वृहद्रत्यसंग्रहः । इतो विस्तर:-सम्याचे सति शान सम्यग्मयोति यदुक्तं नस्य विपरणं लियते तथाहि-गौतमाग्निभूतिवायुभूतिनामानो विप्राः पापाशतनामणोपाध्याया वेदच- तुष्टयं, ज्योतिप्फल्याफरणादिपहङ्गानि. मनुग्मृत्याधष्टादशस्मृतिशास्त्राणि तया भारताद्य- शादापुराणानि मामासान्यायविस्तर इत्यादिलीफिफसर्वशाम्राणि यथापि जानन्ति तथापि नेपा हिमानं सम्पत्यं विना मिच्याानमेव । यदा पुनः प्रसिद्धकथान्यायेन धौवीरव- र्द्धमानस्यामितीर्थकरपरमदेवसमवसरणे माननम्माचलोकनमात्रादेवागमभाषया दर्शन- चारित्रमोहनीयोपशममयसंजनाध्यात्मभापया स्वादात्माभिमुखपरिणामसंवेन च काला- दिलब्धिविशेषेण मिथ्यात्यं विलयं गतं तदा तदेव मिध्यासानं सम्यमानं जातम् । "जयक्ति भगवान हेमाभोजप्रचारविभिनावमरमुष्टीन्दागोद्रीर्ण प्रभापरि- गुम्बितौ । यलुपदया मानोद्धात परस्परवेरिणो विगतकनुपाः पादी या प्रपण विशिश्नमुः।" इति नमस्कार कृत्वा जिनोमा गृहीत्वा कचलोपानन्तरमेव चतुलनमादि- मापनानयोऽपि गणधरदेयाः मंजाताः । गीतमायामी भायोपकारा, द्वादशाहपुनरचना कृतवान । पमानिधयरत्नमयभावनायटेन प्रयोऽपि मोरं गताः । शेषत: पादशशत मिन-- मणा जिनदोमा गृहीत्या यथासम्म वर्ग मोकं न गनाः । अमायन सत्ता - विपर्यय है तीनोंसे रहित हुआ जोहान ६ वह मन्या (समीचीन ) मान होता है। भावार्थ-सम्यक्त्यफे पहले संशय, विपर्यय और अनध्ययसायरूप दोपोंसे दूषित होनेफे फारण मान सम्मान नहीं महलाना है और सम्यक्त्व होते ही उ, दोप शान से चले जाते हैं इस फारण पह सम्यान फलाता है । सो यह सम्यक्स्य (सम्य. ग्दर्शन ) फाहो माहात्म्य है। अय विस्तारसे वर्णन करते हैं। इसमें प्रथम ही सम्यग्दर्शन होनेपर शान सम्यमान होता है या जो कहा गया, उसका विवरण फरते । समाहि-पाच पाचो मान- मोक अध्यापक (पहानयाले ) गीतम, अन्निति और यात्रुभूनि नामक नोन प्रामा पारों वेद, मोतिफ, चाफरण आदि दो अझ, मनुस्मृति धादि अठारस्मृतिमात्र, महामारा आदि RAILE पुराण, नया मोगामा, न्यायिलर इत्यादि ममान लौशिक शासकी जानते तो भी उनका मान, सम्मान र मिना मियान होगा। परन्तु अपये प्रसिद्ध का अनुमार सोपीर पमान (महाबीर ) ग्यानो मार परम पचे. ममपन गरे तर मानमरे देगनेमामे या भागात संग मोनी और पारित मोदनीय योपममें और आप मापासे निज बुद भाना. सन्मुप परिणाम या कालादि वियोंके पिपसे इनका मिपाव नाहाको प्रामपा और ममी समय मनका ही निराहार या नही मम्मान होगा ! र सम्मान होरी हो "पति भगवान" स्याल कर जो मिट कर सर भानको नमरहार कर मोजिमको दोशी धारा सोच विकास पर दो मति, स, अवाम र मनामय गान पार कर १५० श्रीमद् राजचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम् पुनरेकादशाङ्गधारकोऽपि सम्यमत्वं विना मिथ्याज्ञानी सत्रात इति । एवं सम्यक्त्व- माहात्म्येन ज्ञानतपश्चरणव्रतोपशमध्यानादिकं मिथ्यारूपमपि सम्यग्भवति । तदभावे विषययुक्तदुग्धमिव सर्व वृथेति जातव्यम् । तञ्च सम्यक्त्वं पञ्चविंशतिमलरहितं भवति । तद्यथा-देवतामूढलोकमूढसमयमूद- भेदेन मूढत्रयं भवति । तत्र क्षुधाधष्टादशदोपरहितमनन्तज्ञानाद्यनन्तगुणसहितं वीत- रागसर्वज्ञदेवतास्वरूपमजानन् ख्यातिपूजालामरूपलावण्यसौभाग्यपुत्रकलवराज्यादिविभू- तिनिमित्तं रागद्वेषोपहतातरौद्रपरिणतक्षेत्रपालचण्डिकादिमिथ्यादेवानां यदाराधनं करोति जीवस्तद्देवतामूढत्वं भण्यते । न च ते देवाः किमपि फलं प्रयच्छन्ति । कथमिति चेत् ? रावणेन रामस्वामिलक्ष्मीधरविनाशार्थ बहुरूपिणी विद्या साधिता, कोरवैस्तु पाण्डवनि- मूलनार्थ कात्यायनी विद्या साधिता, कंसेन च नारायणविनाशार्थ बह्मयोऽपि विद्याः समाराधितास्ताभिः वृत्तं न किमपि रामस्वामिपाण्डवनारायणानाम् । तैस्तु यद्यपि मिथ्यादेवता नानुकूलितास्तथापि निर्मलसम्यक्त्वोपार्जितेन पूर्वकृतपुण्येन सर्व निर्विघ्नं तथा सात ऋद्धियोंके धारक होकर तीनों ही श्रीमहावीर स्वमीके समवशरणमें गणधर देव होगये। उनमेंसे गौतमस्वामीने भव्यजीवोंके उपकारके अर्थ द्वादशाङ्गरूप श्रुतकी रचना की। फिर वे तीनों ही निश्चयरत्नत्रयको भावनाके बलसे मोक्षको प्राप्त हुए । और एकादश ( ग्यारह) अंगोंका पाठी भी जो एक अभव्यसेन नामक मुनि था वह सम्यक्त्वके विना मिथ्याज्ञानी ही रहा । इन उक्त दोनों कथाओंसे निश्चित हुआ कि सम्यक्त्वके माहात्म्यसे मिथ्यारूप भी जो ज्ञान, तपश्चरण, व्रत, उपशम तथा ध्यान आदि हैं वे सम्यग् हो जाते हैं। और सम्यक्त्वके विना विष (जहर) से मिले दुग्धके समान ज्ञान-तपश्चरणादि सब वृथा हैं, यह जानना चाहिये । और वह सम्यक्त्व पञ्चीस २५ मलोंसे अर्थात् दोषोंसे रहित होता है । वह इस प्रकार है-उन पच्चीस दोपोंमें देवतामूढ, लोकमूढ तथा समयमूढके भेदोंसे तीन मूढता हैं। उनमें क्षुधा, तृषा आदि अठारह दोषोंसे रहित, अनन्त ज्ञान आदि अनंत गुणोंसहित जो श्रीवीतराग सर्वज्ञ देव हैं उनके स्वरूपको नहीं जानता हुआ जीव ख्याति (लोकमें प्रसिद्धता), पूजा, लाभ, रूप, लावण्य, सौभाग्य, पुत्र, स्त्री और राज्य आदिकी संपदाको प्राप्त होने के लिये जो राग तथा द्वेषसे युक्त और आर्त तथा रौद्र ध्यानरूप परिणामोंके धारक क्षेत्रपाल चंडिका आदि मिथ्यादृष्टी देवोंका आराधन करता है उसको देवतामूढ कहते हैं । और ये क्षेत्रपाल, चंडिका आदि देव कुछ भी फल नहीं देते हैं। फल कैसे नहीं देते हैं ? यदि ऐसा पूछो तो उत्तर यह है कि.-रावणने श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजीके विनाशके लिये बहुरूपिणी विद्या सिद्ध को, और कौरवोंने पांडवोंका मूलसे नाश करने के अर्थ कात्यायनी विद्या सिद्ध 1 वृहदव्यसंग्रहः । १५१ जातमिति । अथ लोकमूढत्वं कथयति । गगादिनदीतीर्थस्नानसमुद्रम्नानप्रातालानजला- वेशमरणाग्निप्रवेशमरणगोमहणादिमरणभूम्यग्निवटवृक्ष पृजादीनि पुण्य कारणानि भवन्तीति रद्वदन्ति तल्लोफमृढत्वं विनेयम् । अथ समयमूढत्वमाह । शानिजनचिनचमत्कारो- त्पादक ज्योतिष्कमन्त्रवादादिकं दृष्ट्वा वीतरागसर्वप्रणीतसमयं विहाय कुदेवागमलिगिना भयाशास्नेहलोभर्धर्मार्थ प्रणामविनयपूजापुरस्कारादिकरणं समयमूहल्यमिति । एषमुफल- नणं मूढवयं सरागसम्यग्दष्टयवस्थायां परिहरणीयमिति । त्रिगुमावस्यालमणवीनरागस- म्यक्त्वरताचे पुनर्निनिरञ्जननिदोपपरमात्मैव देव इति निशयबुद्धिदेवतामूहरहितत्वं विशेयम् । तथैव मिथ्याचरागादिरूपमूढभावत्यागेन स्वमुद्धात्मन्येयावधान लोकमृडर- हिन विशेयम् । तथैव च समन्नमुभाशुभमझल्पविकल्परूपपरभाषन्यागेन निर्विकार- तात्त्विकपरमानन्देशलमणपरमसमरनीमावेन तम्मिन्नेव मम्यरूपेणायनं गमनं परिणमनं समय मृदरहितत्वं योदगम् । इनि मूहप्रयं व्यायातम् । Mananawar.M.-4-vi की थी, तथा कंसने श्रोष्ण नारायण नाशके लिये बहुतसी विद्याओंकी आराधना की थी । परन्तु वन विधाओंने श्रीरामचन्द्रजी, पदिय और प्रोकगनारायणका युद्ध भी अनिष्ट नहीं किया । और श्रीरामचन्दजी आदिने इन मिथ्याष्टी देयोंको अनुकूल नहीं किया जात नहीं माराधे तो भी निर्मलसम्यग्दर्शनसे उपार्जित जो पूर्वभयका पुण्य हे पससे उनके सम विप्न दूर होगये । अघ लोकमूढताफा फयन करते हैं । "गंगा पादि जो नदीरूप तीर्थ है ममें स्नान करना. समुद्र में स्नान करना, प्रातः ( प्रभाव ) फालमें स्नान करना, जलमें प्रवेश फरये, मर जाना, मृतफ (मु ) की अग्नि । चिना) में प्रवेश फरये, मरना, गो (गाय ) के पुन्छ, आदिको प्रहण करके मरण करना, प्रधियों अग्नि और पट (पर) गृक्ष आदिकी पूजा करना" ये सब पुण्यके कारण इम प्रफार जो लोग कहते हैं इसको लोकनूदता जानना चाहिये। अब समरभूद समान शास्त्र अपया धर्म-मूढताको फाते हैं। अगानी लोगों के पिप गमत्कार (R) परपस करनेवाले पोतिर अपया मन्त्रवाद आदिला देनर, गयोत. राग मा का हुआ जो समय (धर्म) मको छोरार मिया देश मिया माम मोर मोटा मार करनेवाले पुलिसकमा भयमे, या, नेइसे खोर मया जी मलिक नाम, विनय, पूजा, कार मादिता करमा म मदो माना जानना चाहिये । इन फार पूर्ण सम्मानको धार होगीन हता है नको मसको भयाणा (1) में त्यागना पाहिद और मन, दापन गया कामही गुमिरुप स्वरमा EET देवास ANT १ समरे (KिAR) KTET निरंजना निरोप दो परमात्मा ९ वटी देश २ मा सोनिप्रददि पदमामे निता १५४ श्रीमद् राजचन्द्रजेनशानमालायाम कंसेन प्रार्थना कृता तदा ताभ्यां पार्यालोचित्तं मदीयः पुत्रो नवमो वासुदेवो भविष्यति तस्य हस्तेन जरासिन्धुनानो नवमप्रतिवासुदेवस्य कंसस्यापि मरणं भविष्यतीति जैनागमे भणितं तिष्ठतीति, तथैवातिमुक्तभट्टारकैरपि कथितमिति निश्रित्य कंसाय स्वकीयं बालक दत्तम् । तथा शेपभव्यैरपि जिनागमे शट्वा न कर्त्तव्येति । इदं व्यवहारेण सम्यक्त्वस्य व्याख्यानम् । निश्चयेन पुनस्तस्यैव व्यवहारनिःशकागुणस्य सहकारित्वेनेहलोकात्राणागु- प्तिमरणव्याधिवेदनाकस्मिकाभिधानभयसप्तकं मुक्त्वा घोरोपसर्गपरीपहप्रस्तावेऽपि शुद्धो - पयोगलक्षणनिश्चयरत्नत्रयभावेनैव निःशङ्कगुणो ज्ञातव्य इति । अथ निष्काक्षितागुणं कथयति । इहलोकपरलोकाशारूपभोगाकामानिदानत्यागेन केवलज्ञानाद्यनन्तगुणव्यक्तिरूपमोक्षार्थ ज्ञानपूजातपश्चरणाद्यनुष्ठानकरणं निष्काझागुणो भण्यते । तथानन्तमतीकन्याकथा प्रसिद्धा । द्वितीया च सीतामहादेवीकथा । सा कथ्यते । सीता यदा लोकापवादपरिहारार्थ दिव्ये शुद्धा जाता तदा रामस्वामिना दत्तं . पढ़ा गया है, वह मिथ्या नहीं हो सकता, इस प्रकार शंकारहित होकर अपना वड़ा भाई जो तीन लोकका कंटक रावण था उसको छोड़कर तीस अक्षौहिणी सेना प्रमाण जो अपना चतुरंग (हाथी, घोड़ा, रथ, पयादेरूप ) वल था उस सहित श्रीरामचन्द्रजीके समीप चला गया । इसी प्रकार देवको तथा वसुदेवको भी शंकारहित जानना चाहिये । सोही दिखाते हैं कि, जैसे नव कंसने देवकीके बालकको मारनेके लिये प्रार्थना को तब देवकी और वसुदेवने विचार किया कि मेरा पुत्र नवम (९ वां) नारायण होगा और उसके हाथसे जरासिंधुनामक नवम प्रतिनारायणका और कंसका मरण होगा यह नैनागममें कहा हुआ है, और श्री भट्टारक अतिमुक्त स्वामीने भी ऐसा ही कहा है, इस प्रकार निश्चय करके कंसको अपना बालक देना स्वीकार किया। जैसे इन उक्त पुरुषों ने अपनी शंका रहित प्रवृत्ति की, इसी प्रकार अन्य भव्यजीवोंको भी जैनशास्त्रों में शंका नहीं करनी चाहिये। यह व्यवहारनयसे सम्यक्त्वका व्याख्यान किया । और निश्चयसे उस व्यवहार निःशंका- गुणकी सहायतासे इस लोकका भय १, परलोकका भय २, रक्षाके स्थानके अभावसे उत्पन्न भय ३, मरणभय ४, व्याधिभय ५, वेदनाभय ६ और आकस्मिक भय ७, इन नामोंके धारक जो सात भय हैं उनको छोड़कर घोर उपसर्ग तथा परीषहोंके आनेपर भी शुद्ध उपयोगरूप जो निश्चय रत्नत्रय है उसको भावनाको ही निःशंका गुण जानना चाहिये । अव निष्कांक्षित गुणको कहते हैं। इस लोक तथा परलोकसंबंधी आशारूप जो भोगाकांक्षानिदान है. इसका त्याग करके जो केवल ज्ञान आदि अनन्त गुणोंकी प्रकटतारूप मोक्ष हे उसके अर्थ ज्ञान, पूजा, तपश्चरण आदि अनुष्ठानोंका जो करना है वही निष्कांक्षिता गुण कहलाता है । इस गुणमें अनंतमतीकी कथा प्रसिद्ध है। दूसरी सीता महारानीकी कथा है, उसको कहते हैं। जब. लोकके अपवाद (निंदा)को दूर ।

वृहद्रव्यसंप्रदः। - महादेवीविभूतिपदं त्यक्त्वा सकलभूपणानगारकेवलिपादमूले कृतान्तवकादिराजभि- त्या यहुरानीभिन्न सह जिनदीक्षा गृहीत्या शशिप्रभाधार्मिकासमुदायेन सह प्रामपुरखे- कादिविहारेण भेदाभेदरनत्रयभावनया द्विषष्टिवर्षाणि जिनसमय प्रभावना वा पना. वसाने श्रयग्निशदिवसपयेन्तं निर्विकारपरमात्मभावनासहितं संन्यासं कृत्वाऽच्युताभि- पानपोडझास्वर्ग प्रतीन्द्रतां याता । तता निर्मलसम्यक्त्वफलं दृष्ट्वा धर्मानुरागेण नर के राय. गलक्ष्मणयोः संयोधनं कृत्वेदानी स्वर्ग तिष्ठति । अग्रे स्वर्गादागत्य सफलचक्रवर्ती भयि- प्यति । ती च रायण लक्ष्मीपरी तस्य पुत्री भविष्यतः । ततश्च नोर्यकरपादमूले पूर्वभवा- न्तरं दृग्ला पुत्रदयेन सह परिवारण प सह जिनदीझां गृहीत्वा भेदाभेदरनेत्रयभावनया पजानुत्तरविमाने प्रयोऽयह मिन्द्रा भविष्यन्ति । तस्मादागत्य रावणस्तीर्थफरो भयि- प्यति, सीता घ गणधर इति, लक्ष्मीधरो धातकीखण्डद्वीपे तीर्थ करो भविष्यति । इति व्यवहारनिष्कासितागुणो विशातव्यः । नित्रयेन पुनस्तस्यैव व्यवहारनिष्कामागुणस्य महकारित्वेन दृष्टभुतानुभूतपश्वेन्द्रिभोगत्यागेन निशयरत्नत्रयभावनोत्पन्नपारमार्थिकरवा- मोत्यामुवामृतरसे चित्तसन्तोपः स एव निकाला गुण इति । -- P Ramananews करने के लिये सीताजी अग्निकुण्डमें दिव्य (धीज ) लेकर निदोप सिद्ध हुई तब श्रीराम- चंद्रजीने उनको पट्टमहारानीका पर दिया; परन्तु सीताजीने पट्टमहादेवीकी सम्पदाको सोनार येवलानी श्रीमकलभूपण मुनिके घरणमूलमें कृतान्तवा आदि राजा तथा बहुतसी रानियोसहित रोजिनदीमाको प्रहण करके शशिप्रभा आदि आायिकाओं के समूह माहित प्राम, पूर, खेटक आदिमें पिहारद्वारा भेदाभेदरूप रनायकी भावनासे पासठपर्ष पर्यन्त जिनमतको प्रभावना की। फिर अन्य समय में तेतीस दिन पन्त निर्विकार परमात्मा ध्यानपूर्वक मन्यास (समाधि मरण ) फरणे. अच्युत नामक मोलहमें स्वर्ग में । और बहर मनहोंने (सीताजीके जीव प्रीन्द्रने ) अभिमानमें निर्मल मम्यग्दर्शन फरको देग्रफर धर्म अनुरागमे नरफो जाफर रायग और लक्ष्म जीवों को मंधीचा धीर दे (प्रतीन्द्र ) अय पर्गमें विराज रहे हैं। आगे सीनाजका जीव वर्गमे आफर सफल पार्शी होगा और ये दोनों रावण नया लशामक जोब इस पाक पुत्र होगा पास मोदी परमूर में अपने पूगंभवों को देखकर दोनों पुत्र नया परिवार महत माजीका जोब सकर घमपनों मोशाको पहन कर भेदाभेदत्रय - नाने, मीना, रापन तथा मा गोनों हो पार अनुत्तर विमानों में प्रनिन्द्री: पह: जाफर रायन सो कार होगा सौर सोलाश शंव मगर m दम मनायो mpic यम नायर होंगे । इस प्रकार व्यवहार किदामा याना मादि । सोर निदरे वो स्यबहार विगु ला देने, समे समा म विदेश दिया है। - वृहद्रव्यसंग्रहः। १६९ अथ छमास्याना सानं सत्तावलोकनदर्शनपूर्वकं भवति, मुक्तात्मनां युगपदिति प्रतिपा. दयति;- दंगण एवं णाणं उदमत्थाणं ण दाणि उयउगा । जुगवं जमा कंवलिणाहं जुग तु ते दोवि ॥४॥ व्याख्या । "क्ष्मणपुचं जाणं छदमायागं" सत्तावलोकनदर्शनपूर्वक जानं भवति छा. म्यानां संसारिणा । फन्मात् । “ग दोषिय वग्गा जुग जा' शानदर्शनोपयोगवयं युगपन्न भवति यस्मात , "केवलिगाई जुगवं तु ते दोऽवि" फेवलिनाये तु युगपची नदर्शनोपयोगी हो भयत इति । अश विस्तः । पशुरादीन्द्रियाणा स्वफीयम्बकी पनयोपशमानुमारेग तमोग्यदेशस्थिन- भ्यरूपादिविषयाणा पाहणमेव मनिगतः सम्बन्धः मन्निको भण्पते । न प नैयायिकम- सवा गादीन्द्रियाग! स्यरूपादिस्यकोयस्त्रको विषयमा गमन इति मनिषा वकारः । स एव सम्बन्धो ला यम्य सल्लभग निर्विकल्प मत्तापलोकनदर्शनं तत्पूर्व गुमलामिदमि- वाला विफर न करें तपतक तो जो मनामानका , उसको दर्शन इत हैं। और फिर जय यह शुक्ल . या धा इत्यादि रूपसे विकार उत्पन्न होते हैं नय नसको जान करते हैं ।। ४ ।। अय जो सत्य है जो शान होता यह नो सत्तावलोकनार दान पहले ही सेना नय होता है. और जो मुकतोय अधीन केयरमानी है. उमर दर्गा और न एक ही समय में होते है, ऐसा पनि गदन करते हैं:- गापार्थः :--रामस्थ जीयों दर्शनपूर्वक मानहाना है। क्योंकिपारयों के तार और दन ये दोनों उपयोग एक समय नही होते । तया जो फेवली भगवान ६ मनान गया दर्शन ये दोनों ही उपयोग एक मगरमें होते ॥ ११ ॥ व्याख्या:-"दंगणघुवं जाणं बदमत्या" द अयांग संसारी जीयों मलायकान-दर्शन पाले होना तय हान होना । पयोंफि, "ण दोषि उपजग्गा शुवर्ग जाना" उन्मयों नोपयोग खार सनोपयोग ये दोनों पर गरम में नहीं अमरिया "कम्भिणाहे जुग तु ने दोषि" और चली गपागमें ये दोनों हाम, दन पपयोग परमो ममय दो। पिलारमें पान परम आदि दिन अपने अपने मोकामनु. मार ने संप में विमान वियप प्रलपरनार भासको गतिमा दायर और गमाविक मो ममान कर बादि दिनको दिनमा मदिरा मोना मा दिनमा मदि: E - १७० ---- प्रोमद् राजचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम त्यायवग्रहादिविकल्परूपमिन्द्रियानिन्द्रियजनितं मतिज्ञानं भवति । इत्युक्तलमणमतिबान- पूर्वकं तु धूमादग्निविज्ञानवदर्थादर्थान्तरग्रहणरूपं लिङ्गजं. तथैव घटादिशब्दश्रवणरूपं शब्दजं चेति द्विविधं श्रुतज्ञानं भवति । अथावधिज्ञानं पुनरवधिदर्शनपूर्वकमिति । ईहा- मतिज्ञानपूर्वकं तु मनःपर्ययज्ञानं भवति । अत्र श्रुतज्ञानमनःपर्ययज्ञानजनक यदवाहेहादिरूपं मतिज्ञानं भणितम् , तदपि दर्शन- पूर्वकत्वादुपचारेण दर्शनं भण्यते, यतस्तेन कारणेन श्रुतज्ञानमनःपर्ययज्ञानद्वयमपि दर्श- नपूर्वकं ज्ञातव्यमिति । एवं छद्मस्थानां सावरणक्षयोपशमिकज्ञानसहितत्वात् दर्शनपूर्वकं ज्ञानं भवति । केवलिना तु भगवतां निर्विकारस्वसम्वेदनसमुत्पन्ननिरावरणक्षायिकज्ञान- सहितत्वान्निर्मेघादित्ये युगपदातपप्रकाशवदर्शनं ज्ञानं च युगपदेवेति विज्ञेयम् । छद्मस्था जाता है वही सन्निकर्ष है, और नैयायिकमतमें जो नेत्र आदि इन्द्रियोंका अपने रूप आदि विषयों के पास गमन करने रूप सन्निकर्प माना है वह नहीं। वह सम्बन्ध अथवा सन्निकर्ष ही है लक्षण जिसका, ऐसा जो निर्विकल्पक-सत्तावलोकन-दर्शन उसके होनेके पीछे "यह शुक्ल (सफेद ) है", इत्यादि अवग्रह आदि विकल्पोंरूप-पांचों इन्द्रियों तथा अनिन्द्रिय-मनसे उत्पन्न मतिज्ञान होता है। और इस पूर्वोक्त लक्षणका धारक मतिज्ञान पहले हो लेता है तब धूम (धुआं ) से जैसे अग्निका ज्ञान हो जाता है इसी प्रकार एक पदार्थसे दूसरे पदार्थको ग्रहण करनेरूप लिंगज (चिन्हसे उत्पन्न हुआ ) तथा इसी प्रकार घट आदि शब्दोंके सुननेरूप शब्दज (शब्दसे उत्पन्न हुआ), ऐसे दो प्रकारका अतमान होता है । भावार्थ-श्रुतज्ञान दो प्रकारका है एक तो लिंगज और दूसरा शब्दज; उनमें एक पदार्थको जानकर उसके जरियेसे जो दूसरे पदार्थका जान लेना है वह तो लिंगज श्रुतज्ञान है और शब्दोंके सुननेसे जो ज्ञान होता है वह शब्दज श्रुतज्ञान है। और अवधिदर्शन पहले हो लेता है तव अवधिज्ञान होता है। और जो मनापर्ययज्ञान है वह ईहानामक मतिज्ञानपूर्वक होता है । यहाँपर श्रुतज्ञानको उत्पन्न करनेवाला अवग्रह, और मनःपर्ययज्ञानको उत्पन्न करने- वाला ईहा, आदिरूप जो मतिज्ञान कहा है अर्थात् श्रुतज्ञानको उत्पन्न करनेवाला अवा- हरूप मतिज्ञान और मनःपर्ययज्ञानको उत्पन्न करनेवाला ईहारूप मतिज्ञान कहा गया वह मतिज्ञान भी दर्शन पहले हो लेता है तभी होता है। इस लिये मतिज्ञान भी उप- घारसे दर्शन कहलाता है। इस कारण श्रुतज्ञान और मनःपर्ययज्ञान इन दोनोंको भी दर्शनपूर्वक जानना चाहिये । इस पूर्वोक्त प्रकारसे छद्मस्थ जीव आवरणसहित अयोपश. मिक झानसहित हैं, इस कारण छद्मस्योंके दर्शनपूर्वक ज्ञान होता है। और केवली भग- बान् विकाररहित और अपने संवेदन (जानने से उत्पन्न ऐसा जो झायिक ज्ञान है उससे सहित हैं, इसलिये केवळी भगवानोंके जैसे बदलके आवरणरहित सूर्यके एक ही - ।

वृहन्यसंग्रहः। इति कोऽर्थः ? वाशब्देन शानदर्शनावरणद्वयं भग्यते, तत्र तिष्ठन्तीति छदास्थाः । एवं नकाभिप्रायेण सत्तावलोकनदर्शनं व्याख्यानम् । अत ऊर्य सिद्धान्ताभिप्रायेण कथ्यते । तयाहि-उत्तरशानोत्पत्तिनिमितं यत् प्रयन तपं यत् स्वन्यात्मनः परिच्छेदनमवलोफनं तदर्शनं भण्यते । वपनन्तरं यदिपिपये विफल्पम्पेण पदार्थग्रहणं तदमानमिति वार्तिकम् । यया फोऽपि पुरुपो घटविषयवि- कल्पं कुर्वन्नारते, पश्चात् पटपरिमानाचे चिजे जाते मति घटविकल्पाव्यावर्य यत् स्वरूपे प्रयजमवलोकन परिच्छेदन फरोति नदर्शन मिति । तदनन्तरं पटोऽयमिति निभयं यहि- विषयरूपेण पदार्थग्रहणविकल्पं करोति तद् ज्ञानं भण्यते । अत्राह शिष्यः यशात्मप्राहक दर्शनं, परप्राइक शानं मण्यते, तर्हि यथा नंगा- यिकमते प्रानमान्मानं न जानाति, तथा जैनमतेऽपि हानमात्मानं न जानातीति अग्र परिहारः । नैयायिकमते हानं पृथग्दर्शनं पृथगिति गुणद्वयं समय में आनय और प्रकार होते हैं, उसी प्रकार दान और शान ये दोनों एक ही समय में पोतेमा जानना चाहिये । प्रश्न- जो गाया 'साम्य' कहा गया है इसका क्या अ ? उत्तर-उदा शब्दसे शानावरण तथा दर्शनायरण ये दोनों कहे जाते हैं, इस जोरई ने उनस्थ है। इस प्रकार तर्फ (न्याय . अभिप्रायसे सत्तावलोकन यशनका व्याख्यान किया गया । अब इसके आगे सिद्धान्त अभिप्रायले कहते हैं। मोदी दिनाते हैं। आगे काल में होनेवासा जो प्रान उसकी उत्तिका निमित्त जो प्रयन म स्वरूर जो निजामाका परिषदेदन अयान, अवलोकन ( देगना) यह दर्शन कहलाता है, और उसके पोहे जो माम विषय में विकलरूपसे पदार्थका प्रदन है यह मान है; यह पाधिक है। जैसे कोई पुरा पाले घटक शिपका विकास करता हुआ पेठा. फिर सो पुरपका पि जब पटने जाननेक मिसाद व प पुगप पटके विद्यारसे हटकर को रूप में प्रश्न भयान थक्कन (परिमोदन करता है. हमको दर्शन करते हैं। इस अहरन पट: A प्रकार निररूप जो पास शिपमे पदार्य प्रहमाया पिरलको MAIT पा विफस्य, शान कहलाता है। actre free मरागिरी ! यदि बार आमा )हन करनबार कम गंगीरो पर पाको काम करनेागो मोहन पागो After मा आमा हो जाता है, यही जनम मी जान नहीं जाना होता मी मंशा कमि RID YA और दोनदा इस प्रकार से दोगुनही है। सsixो गुः नदो बार ददिरे । M वृहदव्यसंग्रहः। १८५ अथ मतं-यदि दर्शन यहि विपये न प्रवर्तते तदान्धवत सर्वजनानामनात्वं प्राप्नो. तीति नवं वरव्यम् । बाहियिपये दर्शनामावेऽपि मानेन विशेषेण सर्व परिन्दिनीति । अवं तु विशेषः-दर्शनेनन्मनि गृहीते सत्यात्माविनाभूतं ानमपि गृहीतं भवति; शाने प ग्राति सति मानविषयभूतं वहिल्यपि गृहीतं भवतीति । अयोक्तं भयना यशात्मप्राइम दर्शन मण्यते. तहि सामाषणं गहण भावा तरशनमितिगावाः पर पटते? नत्री- तरं, मामान्यग्रहणमान्मग्रहणं नर्णनं । कम्मामिति ग-आमा वस्तुपरिच्छिनि सुर्य हि जानामादं न जानामीति विशेषपमपातं न करोनि, किन्तु सामान्येन वन्तु परि- हिनति । तेन कारणेन सामान्यशब्देनामा मण्यत अनि गायाधः । कियाना, यदि कोऽपि तीर्थ सिद्वान्नार्थ नायकान्नदुराहत्यागेन नावागेन मध्यस्यवृत्त्या व्याख्यानं करोति, तदा द्वयमपि घटत इति । कमिति चेन तर मुख्य पृत्त्या परसमयन्यायानं । तन यदा कोऽपि परसमयी पृच्छति-जैनागने दर्शन पानं । प्रमाण जैसे प्रदीप अपने और परका प्रकाशक है, मी प्रकार अपने में प्रात सामान्यको और पर पदार्थ में प्राप्त विशेषको जानता। इस कारण अभेदसे मानार दी प्रमाणत्य । अब ऐसा हो कि, यदि दर्शन या विषयमें नहीं प्रवर्शताई तो अंपकी तरह सय मनुप्योंग, अंधेपन की प्रामि दोती । नो समाधान यह कि, ऐमा न फइना पाहिये। पयोंकि, यद्यपि पाहा विषय दर्शनमा अभाय. तयारिमात्मा शानद्वारा विशेष रूपमें मय पदाको जानता है। घोर अधिक चाना कि जय पर्शनसे लामाका प्राण होता है मय आमा में काम जो कान ? यह भी दसन फरले प्रदा फिला जावाई. और जय दर्शनने शानकोण किया तो शानी पिपयभून जो पार बन्नु माता मी माग किया । जय कदापित यह मा कि.जी भार आमाको पण करनयालेको भान हो गो को पात सामान्य मदन यह दर्शन पाळता" या जो गाला अक्षर घा आर. कपनों को पटना को मका यार, कि, यहार सामान्य प्राण इस साफा प्राण पर और घर आगनमा fiमी तर मामि, यानुसा काम करतानाजी मारमा 'मैं को जानना , सोनही शाममा .सार की विशेष पानी परमा किनु REMIERसे पातु (पार्थ art. मन मामा Taart TATE TRI | लाई मानार) समिक्षा घर एका जो बुराम परा) ERTAIT, न मा. रपदा भारतमाम REE: मामा और दिलदार १७४ श्रीमद् राजचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम् चेति गुणद्वयं जीवस्य कथ्यते, तत्कथं घटत इति । तदा तेपामात्मप्राइक दर्शनमिति कथिते सति ते न जानन्ति । पश्चादाचार्यस्तेषां प्रतीत्यर्थ स्थूलन्याख्याने न बहिर्विषये यत् सामान्यपरिच्छेदनं तस्य सत्तावलोकनदर्शनसंज्ञा स्थापिता । यम शुक्लमिदमित्यादिवि- शेषपरिच्छेदनं तस्य ज्ञानसंज्ञा स्थापितेति दोपो नास्ति । सिद्धान्ते पुन: स्वसमयन्या- ख्यानं मुख्यवृत्त्या । तत्र सूक्ष्मव्याख्याने कियमाणे सत्याचार्यरात्मग्राहकं दर्शनं व्याख्या- तमित्यत्रापि दोपो नास्ति । अत्राह शिष्यः-सत्तावलोकनदर्शनस्य ज्ञानेन सह भेदो ज्ञातस्ताव दिदानी यत्तत्त्वा- थश्रद्धानरूपं सम्यग्दर्शनं वस्तुविचाररूपं सम्यगज्ञानं तयोविशेपो न झाय ते । कस्मादिति- चेत्-सम्यग्दर्शने पदार्थनिश्चयोऽस्ति, तथैव सम्यग्नाने च को विशेष इति । अत्र परि- - - . - होते हैं । कैसे सिद्ध होते हैं ? ऐसा पूछो तो उत्तर यह है कि, तर्क ( न्याय) में मुख्य- तासे परसमय अर्थात् अन्यमतका व्याख्यान है। इसलिये उसमें यदि कोई अन्यमता- वलम्बी पूछ कि, जैनमतमें जीवके दर्शन और ज्ञान ये जो दो गुण कहे जाते हैं वे कैसे सिद्ध होते हैं ? तब इसके उत्तर में यदि उन अन्यमतियोंको यह कहैं कि, जो आत्माको ग्रहण करनेवाला है उसको दर्शन कहते हैं; तो ऐसा कहनेपर वे अन्यमती नहीं समझते हैं। तब आचार्योंने उनके प्रतीति होनेके लिये विस्ताररूप व्याख्यानसे जो बाह्यविषयमें सामान्य जानना है उसको तो 'दर्शन' ऐसी संज्ञा (नाम) स्थापित की, और जो 'यह शुक्ल (सफेद) है' इत्यादि रूपसे बाह्य में विशेषका जानना है, उसकी 'ज्ञान' यह संहा ठहराई, इसलिये दोष नहीं है । और सिद्धान्तमें मुख्यतासे निजसमय (जैनमत )का व्याख्यान है, इसलिये सिद्धान्तमें जब सूक्ष्म व्याख्यान किया गया तब आचार्योंने जो आत्माका ग्राहक है उसको दर्शन कहा। इस कारण इस कथनमें भी दोष नहीं है। . अब यहां शिष्य कहता है कि हे गुरो ! सत्ताका अवलोकन करनेवाला जो दर्शन है उसका तो ज्ञान के साथ भेद जाना। अब "जो तत्त्वार्थका श्रद्धान करनेरूप सम्यग्दर्शन और पदार्थका विचार करने स्वरूप सम्यग्ज्ञान है" इन दोनोंमें भेद नहीं जाना जाता। क्यों नहीं जाना जाता ? यह पूछे तो उत्तर यह है कि, पदार्थका निश्चय सम्यग्दर्शनमें है, वही सम्यग्ज्ञानमें है। इसलिये सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानमें क्या भेद है अर्थात् कुछ भी नहीं। अब इस शिष्यको शंकाका आचार्य समाधान करते हैं कि, पदार्थके ग्रहण करने में जाननेरूप जो झयोपशम विशेष है, वह ज्ञान कहलाता है। और उस ज्ञान में ही भेदनयसे जो वीतराग सर्वज्ञ श्रीजिनेन्द्रद्वारा कहे हुए. शुद्ध आत्मा आदि तत्त्व हैं उनमें यह ही तत्त्व है, ऐसा ही तत्त्व है, इस प्रकारका जो निश्चय है वह सम्यक्त्व है । और अभेदनयसे अर्थात् अभेदरूपसे तोजो ही सम्यग्ज्ञान है. वही सम्यग्दर्शन है । ऐसा किस कारणसे है ? यह पूछो तो उत्तर यह है कि, तत्त्व नहीं है उसमें तत्त्वकी . * .

पहवल्यमंप्रहः। - wra -- हारः । अर्थमनपरिमिछत्तिरूपः क्षयोपशमविशेषो ज्ञानं मण्यते. तत्रैव भेदनयेन पोन- रागसणीतशुद्धात्मादितत्त्वविदमेवेत्यमेवेति निनयसम्यक्त्यमिति । अपिफल्परूपेणा- भेदनयेन पुनयंदेव सम्यगानं तदेव मन्यस्त्वमिति । फरमादिति चेन्-अतत्त्वे तत्व- धुद्धिर देवे देवबुद्धिरधर्म धर्मयुद्धिरित्यादिविपरीताभिनिवेशरहितम्य बातम्घ मम्गन्यिो- पणवाच्योऽवस्थाविशेषः सम्यक्त्यं मण्यते यतः कारणान । यदि भेदो नास्ति तर्हि फयमात्ररणयमिति चेन-नोत्तरम् । येन कगापरिनि- तिरूपः क्षयोपशमः प्रछापते तम्य मानावरणमा, तस्यैव भयोपशमविशेषम्य यत् कर्म पूर्वोषलक्षणं विपरीताभिनिवेशापादयति तस्य मिथ्यात्यति भेदननावरण- भेदः । नियनयेन पुनरभेदविवक्षायां कर्मत्वं प्रत्यावरणद्वयमप्येफमेव विनम् । एवं दर्शनपूर्वक पानं भवतीति व्याख्यानरूपेण गाथा गना ।। ४ ॥ अय सम्यग्दर्शनशानपूर्वक रजत्रयामा मोहामार्गवृतीयावयय भूतं स्वमुद्वामानुभूतिरू पशुद्धोपयोगटाणयोतरागपारिश्रय पारम्पयन साधर्फ मरागपारि प्रतिपादयति:-- असुदादी विणिविची गुहे पविची य जाण चारित्तं । पदसमिदिगुचिस्वं यबहार गया जिणमणियम् ॥ ४५ ॥ मुद्धि करना, श्व नहीं है उसमें देयकी बुद्धि फरना और अधर्म में धर्मकी बुद्धि परना इत्यादि रूपसे जो विपरीत अभिनिवेश (एसटा भाइ ) ६, उस विपरीतामिनिवेश रहिरा जो हान है, पसीफा जो सम्पग इस विशेपसे कई जानेपाला अयस्यापिनेष है पद सम्परय पलाता है। यही इम अधये, परने हेतु है। सो सम्यग्दर्शन और मानमें भेद नही है तो ला कमि पानाधरण और ज्ञानावरण को आपरण कैसे करे गरे ? यह शंका फरी तो, यहा समाधान मार मद कि, जिम कर्मसे पदापर जानाप नाम Eा जाना, जमकी तो शाना- परम का संहा। और उस शानापरण योपामविशेष जो गर्म पहले करने या विपरीन मिनिसा परता. मी मियालयाम तारक मेनयो मायरा भेद और भदकी पिया कमत्यो प्रतियो धारणा न मानो एक मानन पानि पर होगा नाम पान्यास करनेवाली जोगामा, यह मनाम ॥ ४५ ॥ मम्मान और मदानपानमा बीमा यम और निज शुद्ध आनाई अनुसार गुन्हापांग REET भारतपामे मारी मा. REE प्रनिगदन करते हैं... पापानावरा:- दुरऔर Kripमना मटि ना मिलने भारतको ५ ममि और दहा है ।। ४५ - । -- वृहद्रव्यप्रदः। १७७ प्रावरणं विहायान्यसर्वपरिग्रह निवृचो नवमः, गृहव्यापारादिमवसायद्यानुमतिनो दशामः, अष्टिाहारनिवृत्त एफादाम इति । तेम्बेकादशधावक मध्ये प्रथमपटकं बार- तन्येन जघन्यम् . ततश प्र मध्यमम . नतो हयगत्तममिति मधपेण दर्शनिसमावकादो- फादाभेदाः हातव्याः ॥ अवैकदेशाचारित्रव्याख्यानानन्तरं मकरचारित्रमुपदिशति । "अनुदादो विगिवित्ती मुंई पबित्ती ग जाण चारित्तं" अशुभानिवृत्तिः गुमे प्रवृचित्रापि जानी चारित्रम् । सप कथम्भूतं- "बदमरिदिगुतिम्यं वदारणया जिगमगि तसमिति गुमिरूपं व्यबहारनयाजिनमतमिनि । तथाप-प्रत्याल्यानावग्णनातनायकपापक्षयोपशमे मति "भिनयकमाओगाट दुम्नुदिदुगित्तदुगोटिजुदो । जागो उम्मगपरी योगी अस्स सो अनुहो । ४।" इति गाथाकथिनरमणादशुभीपयोगानिवृत्तिला हिरणे भोपयोगे प्रग- तिमा शिष्य पारि जानीधि । तमाचागराध राधनादिचरणमा प्रकारेण पागदा- FAT दिन में प्राचारण करने नही प्रतिमायाला कालाना नया म. नमो धारण करने मातम प्रनिगाका पाहाता । आरंभ आदि संपूर्ण मामे in गर अष्टम प्रतिमाका धारी का नाम बन्न आन्द्रावनलो- र अन्य मय परिग्रहोंने नसत होताय नवमी प्रतिमा का धाम pani संबंधों न्यापार आदि नपूर्ण मावच (हिंसामाहित ) काम जय ममनि ( मनमा) देने में कि होना । नत्र यामी प्रतिमाफा धारी पालामा ! अपने निगिन फिरे ये भागारका म्याग करनेवाला सारखी प्रतिभाका धारा भावक कहा जाता जन प्रतिमार्गदमे ग्यारद प्रकार. भावको बीचमे जो पाली प्रतिमान रदयाल नागर (होनाधिरना) से जघन्य भाषक हैं। उनके आगे मानी. आठयी और नयी प्रतिमा भारमा गण्यम मारक मानवमी धीर ग्यारवां नदी प्रविमा धारक उम गर है। इस प्रकार महामाग्निये. दनानिफ मामा मंद जागने चाहिये। अम इस पदात्रिय व्यापान पमान मारपारिफा ना ! "अनुहायो मणिविजी पवितीय बाजा" ! म मिति (Anा और शुमने जो प्रति मम पीना यह फैसा ? "द ममिदि गुरूवं वारा नियमनियम श्री गुEि TREATRAI. रसदमे मनिहा। मोनाबरम नाम- महोदाम पर मावियों और पाया Ex- पाली. मारे ཙ དཝནྟ༔ སཎན༔ ཡྻམr THE Feet !!" rip । - - १७८ श्रीमद् राजचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम् व्रतपश्चसमितित्रिगुप्तिरूपमप्यपहृतसंयमाख्यं शुभोपयोगलक्षणं सरागचारित्राभिधानं भवति । तत्र योऽसी वहि विपये पञ्चेन्द्रियविषयादिपरित्यागः स उपचरितासद्भूतव्यव हारेण, यश्चाभ्यन्तरे रागादिपरिहारः स पुनरशुद्धनिश्चयेनेति नयविभागो ज्ञातव्यः । एवं निश्चयचारित्रसाधकं व्यवहारचारित्रं व्याख्यातमिति ॥ ४५ ॥ अथ तेनैव व्यवहारचारित्रेण साध्यं निश्चयचारित्रं निरूपयति;- पहिरमंतरकिरियारोहो मवकारणपणासहूँ । पाणिस्स जंजिणुत्तं तं परमं सम्मचारित्तं ॥ ४६॥ व्याख्या । "त" तत् “परम” परमोपेक्षालझणं निर्विकारस्वसंवित्त्यात्मकशुद्धोपयो- गाविनाभूतं परमं "सम्मचारित्तं" सम्यक्चारित्रं ज्ञातव्यम् । तत्कि ? "वहिरभंतर- किरियारोहो" निष्क्रियनित्यनिरञ्जनविशुद्धशानदर्शनस्वभावस्य निजात्मनः प्रतिपक्षभूतस्य बहिर्विषये शुभाशुभवचनकायव्यापाररूपस्य तथैवाभ्यन्तरे शुभाशुभमनोविकल्परूपस्य च . हुए लक्षणके धारक अशुभोपयोगसे रहितपना और उक्त अशुभोपयोगसे विलक्षण ( उलटा ) जो शुभोपयोग है उसमें प्रवृत्त होना जो है उसको हे शिष्य ! तुम चारित्र जानो और वह चारित्र मूलाचार, भगवती आराधना आदि चरणानुयोगके शात्रोंमें कहे हुए प्रकारसे पांच महाव्रत, पांच समिति और तीन गुप्तिरूप है, तो भी अपहतसंयम नामक शुभोपयोगलक्षणका धारक, सरागचारित्र नामक चारित्र होता है। उसमें जो बाह्य- विषयोंमें पांचों इन्द्रियोंके विषय वगैरहका त्याग है वह तो उपचरित-असद्भूत-व्यवहार नयसे चारित्र है, और जो अन्तरंगमें राग आदिका त्याग है वह अशुद्ध निश्चयनयसे चारित्र है । इस प्रकार नयोंका विभाग जानना चाहिये । ऐसे निश्चयचारित्रको साधनेवाला जो व्यवहारचारित्र है उसका व्याख्यान किया गया ॥ ४५ ॥ अब इसी पूर्वोक्त व्यवहारचारित्रसे सिद्ध होने योग्य जो निश्चयचारित्र है उसका निरूपण करते हैं:- गाथाभावार्थ:-ज्ञानी जीवके जो संसारके कारणोंको नष्ट करने के लिये बाह्य और अंतरंग क्रियाओंका निरोध है, वह श्रीजिनेन्द्रसे कहा हुआ उत्कृष्ट सम्यक्चारित्र है ।।१६।। व्याख्यार्थ:-"त" वह "परमं" परम उपेक्षा ( अनादर ) स्वरूप लक्षणका धारक, और विकाररहित निजसंवेदनरूप जो शुद्धोपयोग है उससे व्याप्त होनेसे उत्कृष्ट "सम्मचारि" सम्यक् चारित्र जानना चाहिये। वह क्या ? “पहिरभंतरकिरियारोहो" क्रियारहित-नित्य-निरंजन और निर्मल ज्ञान तथा दर्शनरूप स्वभावका धारक जो अपना आत्मा है उससे प्रतिपक्षभूत ( प्रतिकूल )-वाह्य विषयमें शुभ-अशुभ-वचन कायके व्यापाररूप, और इसी प्रकार अन्तरंगमें शुभ-अशुभ-मनके विकल्परूप जो क्रियाका व्यापार है उसका जो निरोध अर्थात् त्याग है वह। वह त्याग किस लिये है ? ?

वृहद्दव्यसंप्रहः क्रियाच्यापारस्य योऽसी निरोधस्त्यागः स प फिमर्थ "भवकारणपणाम' पत्रकारम- वातीतनिपिपरमात्मनो विलमणम्य भवस्य मंसारन्य व्यापारकारणभूतो योऽसी गुमा- शुभकर्मान यस्तस्य प्रणाशार्थ विनाशार्थमिनि । इत्युभयक्रियानिरोधलनगपारित्रं फस्य भवति ? "णाणिस्स" निश्चयरनत्रयात्मकाभेदशानिनः । पुनरपि कि विशिष्टं ? " जिणुतं" यजिनेन वीतरागसमेनोक्तमिति ।। ४६ ॥ एवं वीतरागसम्यक्त्यदानाविनाभूतं नित्रयरन प्रयात्मकनित्रयमोक्षमार्गस्तीयावयय- रूपं वीतरागचारित्रं व्याख्यातम् ॥ इति द्वितीयस्थले गाथापटक गतम् ॥ एवं मोक्षमार्गप्रतिपादकतृतीयाधिकारमध्ये निधययवहारमोझमार्गमपफयनेन सूप. द्वयम, तदनन्तरं तस्यैय मोममार्गस्यावयवभूतानां सम्यग्दर्शनानपारिवागा विशेषयि. वरणरूपेण सूत्रपटकं घेति न्यलयसमुदायेनाष्टगाथामिः प्रथमोऽन्तराधिकारः मनामः ।। अतः परं ध्यानध्यायध्येयध्यानफलकथनमुख्यत्वेन प्रथमस्पले गाधान यम्, ततः पर पपरमेष्ठियाण्यानरूपेण द्वितीयम्पले गावापाकम् , सना तस्येय ध्यानस्योपसंहार- "भव कारणपणान" पाच प्रकार के संसार से रहित जो निषि परमात्मा से मिल रक्षणका धारफ जो संमार उसके व्यापारका कारणभुन जाम - अवम-पोका आश्रय ससक विनादाय लिये है। पूर्वोक्त प्रकार से चाहा और अंगरंग भेदसे जादो प्रकारको निया है उनका त्यागरूप पारिन फिस होता है ? "णाणिम' निभाय रजयरयाप मेद- हानके धारक जीव थे । फिर कैसा है यह पारित ? " जिणु" जो जिन प्रर्शत श्रीयोतरामसर्यदेवसे कहा हुआ है । मावार्थ-शानी जोय. संसार, कारणोंको दूर करनेके दिये जो या और अंतरंगकी शुभ-अशुभ झियाओंका त्याग होता है पर सोजिनेन्द्र द्वारा कहा हुना परम सम्यफ पारियो । ४६ ॥ इस प्रकार पोतरागसम्पत्य और शानग. पिना नदीदानेवाला घोर निमाया. रुप जो निगमोक्षमाग, सका तीसरा अवयवरुप जो योगगरि जमा स्पाख्यान किया। ऐसे दूसरं म्यलमें ६ गाया समार। इस प्रकार मोक्षनागको प्रतिपादन पारनेबारा जोगीमरा विकार उसमे fe बोर व्यवहाररूप मोनमार्ग. मनसे दी मून और पम पम पम मो. चार जो सम्पादन, बान और पारित मनोविस त्या , इम गनिसेको ग माय (ओपन)ो मापन - राधिकार ममामा बम धागे SHARE मान या, याममा यी वीर याना, पनी मुसाले प्रधान मोन पाया परमेल ARE AE माया, और MPETE १८२ श्रीमद् राजचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम इदानीं तस्यैव ध्यानस्य तावदागमभापया विचित्रभेदाः कश्यन्ते । तथाहि-इष्टवि. योगानिष्टसंयोगव्याधिप्रतीकारभोगनिदानेपु वाञ्छारूपं पतुर्विधमार्तध्यानम् । ता तार- तम्येन मिथ्यादृष्टयादिपटगुणस्थानवर्ति जीवसम्भवम् । यद्यपि मिथ्यारटोना तिर्यग्गतिका- रणं भवति तथापि बद्धायुष्कं विहाय सम्यग्दृष्टीना न भवति । कस्मादिति चेत्-स्वभुः द्धात्मैवोपादेय इति विशिष्टभावनावलेन तरकारणभूतसंक्लेशाभावादिति । अथ रौद्रध्यानं कथ्यते-हिंसानन्दमृपानन्दस्तेयानन्दविपयसंरक्षणानन्दप्रभवं रौद्रं चतुर्विधम् । तारतम्येन मिथ्यादृष्ट्यादिपञ्चमगुणस्थानवत्तिजीवसम्भवम् । तम मिथ्या- दृष्टीनां नरकगतिकारणमपि बद्धायुष्कं विहाय सम्यग्दृष्टीनां तत्कारणं न भवति । तदपि कम्मादिति चेत्-निज शुद्धात्मतत्त्वमेवोपादेयं विशिष्टभेदज्ञानबलेन तत्कारणभूततीत्रसंक्ले- शाभावादिति ॥ अव प्रथमही आगमभाषाके अनुसार उसो ध्यानके नानाप्रकारके भेदोंका कथन करते हैं । सोही दिखाते हैं-इष्टका वियोग, अनिष्टका संयोग और रोगको दूर करने तथा भोगों और भोगोंके कारणों में इच्छा रखनेरूप भेदोंसे चार प्रकारका आर्तध्यान है अर्थात् इष्टका वियोग चाहना १, अनिष्टका संयोग न चाहना २, रोग न चाहना ३ और भोगनि. दानोंकी वांछा करना ४, इन ४ प्रकारोंका धारक आतध्यान है । और वह आतध्यान न्यूनाधिकभावसे मिथ्याष्टिगुणस्थानको आदि ले प्रमत्तगुणस्थानपर्यन्त जो ६ गुणस्थान हैं उनमें रहनेवाले जीवोंके होता है । और वह आतध्यान यद्यपि मिथ्यादृष्टी जीवोंके तिथेच गतिके बंधका कारण होता है तथापि जिस सम्यग्दृष्टीने पहले तिर्यचगतिके आयुको बांध लिया है उस सम्यग्दृष्टी जीवको छोड़कर अन्य जो सम्यग्दृष्टी जीव हैं उनके तिर्यंच- गतिके बंधका कारण नहीं है । क्यों नहीं है ? ऐसा पूछो तो उत्तर यह है कि सम्यग्दृष्टी जीवोंके “निज शुद्ध आत्माही ग्रहण करने योग्य है" ऐसी जो भावना रहती है उसके वलसे तिर्यचगतिका कारणरूप जो संक्लेश है उसका अभाव है । अब रौद्रध्यानका कथन करते हैं । हिंसानन्द ( हिंसामें आनंद मानना) १, मृपानंद ( झूठमें आनन्द मानना ) २, स्तेयानन्द ( चोरी करने करानेमें खुश होना ) ३ और विषयसंरक्षणानन्द (विपयोंकी रक्षामें आनंद मानना) ४; इन चारोंसे उत्पन्न हुआ रौद्रध्यान ४ प्रकारका है । यह न्यूनाधिकरूपसे मिथ्यादृष्टी गुणस्थानको आदि ले पंचम गुणस्थानपर्यन्त रहनेवाले जीवोंके उत्पन्न होता है। और यह रौद्रध्यान मिथ्यादृष्टि जीवोंके नरकगतिका कारण है तो भी जिस सम्यग्दृष्टीने नरकायु बांधली उसको छोड़कर अन्य सम्यग्दृष्टियोंके नरकगतिका कारण नहीं होता है। ऐसा क्यों है ? इसका उत्तर यह है कि सम्यग्दृष्टियोंके जो "निज शुद्ध आत्माका स्वरूप है वही उपादेय है" इस प्रकारका विशिष्ट भेदज्ञानका बल है, उससे नरकगतिका कारणभूत जो तीव्र संक्लेश है. वह नहीं होता। - वृदयमंग्रहः। -- अतः परमारीद्रपरित्यागलक्षणमाक्षापायविपाकस्यानविचयसंपतुर्भदामिनं, नार- वम्यवृद्धिमन्मेणासंयतसम्यग्दृष्टिदेशविरतप्रमत्तसंयताप्रमत्ताभिधान चतुर्गुणम्यानपत्तिजीयस- मयं, मुख्यवृत्त्या पुण्यबन्धकारणमपि परम्परया मुक्तिकारणं चेति धर्मप्यानं फथ्यते । तथाहि-स्वयं मन्दबुद्धित्वेऽपि विशिष्टोपाध्यायाभावेऽपि शुद्धजीवादिपदायांना सूदनपेऽपि सति "सूक्ष्म जिनोदितं वाक्यं हेतुभिर्यन हन्यते । आशासिद्धं तु तद्मा नान्यथाषादिनो जिनाः ॥ १॥" इति लोककथितकमेण पदार्थ निश्चयकरणमाविचयायानं मण्यते । तथैव भेदाभेदरनयभावनाचलेनारमा परेप वा फदा फर्मणामपायो विनाशो भविष्य. तीति चिन्तनमपायविचयं ज्ञातव्यम् । शुद्धनित्रयेन शुभाशुभकर्मविपाकर हिनाऽव्यय जीवः पश्नादनादिकर्मबन्धवशेन पापस्योदयेन नारकादिदुःस्यविपासफरमनुमय नि. पुण्यो- भयेन देवादिसुखविपाफमनुमवतीति विचारणं विपाकविचयं विशेयम् । पूर्वोचलोकानुप्रे. शाचिन्तनं संस्थानवियम् । इति पतुर्विध धर्मध्यानं भवति ।। अब इमफे आगे आतध्यान तथा रोद्रध्यानके त्यागल्प लाणका घारक, आयाविनय अपायपिचय, विपाकविचय और संस्थान विषय नामक पार भेदोंसे भेदको प्राम हुला, न्यूनाधिकपृद्धिफे क्रमसे असंयतसम्यग्नष्टो, देशधिरत, प्रमत्तसंयत पोर समग इन नामोंके धारफ जो पार गुणस्थान हैं इनमें रहनेवाले जीयोंके उत्पन्न होनेवाला और प्रधानतासे पुण्यवंधका कारण है तो भी परंपरासे मोक्षफा फारणभूत ऐसा जो धर्मम्यान है उसका कयन फरते हैं। सोही फहते है-आप अल्पबुद्धिका धारफ हो नो भी, विशेष सानके धारक गुरुको प्राप्ति न हो तो भी, शुद्ध जीप आदि पदार्योकी सूरमना होने पर भी "सी जिनेन्द्रका पदा हुआ जो सूत्म सत्य है वह हेतुओंसे मंदिन नहीं हो सकता है इसलिये जो सूरमतत्व है सफो पासा. अनुसार पान करना चाहिये पोंफिशोजि. नेन्द्र अन्ययायायो पर्यात हा उपदेश देनेवाले नहीं है ॥१॥" इस भोक पाई हुए कम अनुसार जो पदार्थका निसय करना या प्रामायिय नाम पम पमनान कलावा और हनीप्रकार भेद तथा अमेदाप रसमयसी भावना अमारे यममा अन्यजीयों के धमाका नारा कर होगाम प्रकार जो दिकारनामोय. विग नाम दूसरा धर्मध्यान जाना चाहिये। मुद्ध नियनयाने मा जीप गुम कौर सामने रहित है गो मी मनाविरमांक . या पारदम नार आदि गोकपिपाररूप फरका अनुमान करता है ! और उसमे देश आदि र विपासको भांगा। इस प्रकार विचार करना सही विराम मामा सरा पाना पाहिदेर Tarfa करना है यह नाम पीपा पार इस प्रकार पार sure होगा।

." १८६ प्रोमद् राजचन्द्रजेनशासमालायाम् अथ ध्यानप्रतिबन्धकानां मोहरागद्वेपाणां म्वरूपं कम्यते । शुद्धात्मादितस्त्रे विपरी- ताभिनिवेशजनको मोहो दर्शनमोहो मिथ्यात्यमिति यावत् । निर्विकारस्वसंवित्तिलक्षण- वीतरागचारित्रप्रच्छादकचारित्रमोहो रागद्वेपो भण्येते । चारित्रमोहो रागद्वेषो कथं भण्येते ? इति चेत्-कपायमध्ये क्रोधमानद्वयं द्वेपाङ्ग, मायालोभद्वयं रागाङ्ग, नोकपाय- मध्ये तु स्त्रीपुंनपुंसकवेदत्रयं हास्यरतिद्वयं च रागाङ्ग, अरतिशोकद्वयं भयजुगुप्साद्वयं च द्वेषाङ्गमिति ज्ञातव्यम् । अत्राह शिष्यः-रागद्वेषादयः किं कर्मजनिताः किं जीवजनिता इति । तत्रोत्तरं-स्त्रीपुरुषसंयोगोत्पन्नपुत्र इव, सुधाहरिद्रासंयोगोत्पन्नवर्णविशेष इवोभयसं- योगजनिता इति । पश्चान्नयविवक्षावशेन विवक्षितैकदेशशुद्धनिश्चयेन कर्मजनिता भण्यन्ते । तथैवाशुद्धनिश्चयेन जीवजनिता इति । स चाशुद्धनिश्चयः शुद्धनिश्चयापेक्षया व्यवहार एव । अथ मतं-साक्षोच्छुद्धनिश्चयनयेन कस्यैत इति पृच्छामो वयम् । तत्रोत्तरं-साक्षा- च्छुद्धनिश्चयेन स्त्रीपुरुषसंयोगरहितपुत्रस्येव, सुधाहरिद्रासंयोगरहितरङ्गविशेषस्येव तेषामुः - कि जब ध्यानके प्रतिबंधक अर्थात् रोकनेवाले जो मोह, राग तथा द्वेप हैं उनके स्वरू- पका वर्णन करते हैं। शुद्ध आत्मा आदि तत्वोंमें विपरीत आग्रहको उत्पन्न करनेवाला जो मोह है वह दर्शनमोह अर्थात् मिथ्यात्व है। विकाररहित -निज आत्माके अनुभवरूप जो वीतराग चारित्र है उसको ढकनेवाला जो चारित्रमोह है वह राग और द्वेष कहलाता है। चारित्रमोह-राग द्वेषरूप कैसे कहलाता है ? ऐसा प्रश्न करो तो उत्तर यह कपायोंके बीच में क्रोध और मान ये जो दो कषाय हैं सो तो द्वेष के अंग हैं और माया तथा लोभ ये दोनों कषाय रागके अंग हैं। और नोकपायोंमें स्त्रीवेद, पुंवेद और नपुंसकवेद ऐसे तीनों वेद तथा हास्य और रति ये दोनों, ऐसे पांच नोकपाय तो रागके अंग हैं; और अरति तथा शोक ये दोनों और भय तथा जुगुप्सा (ग्लानि) ये दोनों, ऐसे चार नोकपाय द्वपके अंग जानने योग्य हैं। यहां पर शिष्य प्रश्न करता है. कि-राग, द्वेप आदि क्या कर्मोसे उत्पन्न हुये हैं. अथवा क्या जीवसे उत्पन्न हुए हैं ? इसका, उत्तर यह है कि, स्त्री और पुरुष इन दोनों के संयोगसे उत्पन्न हुये पुत्र के समान और कलई तथा हल्दी इन दोनों के मेलसे उत्पन्न हुए एक प्रकारके रंगको तरह ये राग-द्वेप आदि कपाय जीव और कर्म इन दोनों के संयोगसे उत्पन्न हुए हैं। और जब नयकी विवझाके वश इनका कथन किया जाता है तब विवक्षित एकदेश शुद्धनिश्चयनयसे तो ये कषाय कर्मसे उत्पन्न हुये कहलाते हैं। और इसी प्रकार अशुद्धनिश्चयनयसे जीवननित कहलाते हैं। और यह अशुद्धनिश्चयनय, शुद्धनिश्चयनयको अपेक्षासे व्यवहारनय हो है । शंका-साक्षात् शुद्ध निश्चयनयसे ये राग द्वेप किसके हैं ?: यह हम पूछते हैं । समाधान-तुम्हारे प्रश्नका उत्तर यह है कि साक्षात् शुद्धनिश्चयनयको अपेक्षासे जैसे, स्त्री और पुरुष के संयोग विना पुत्रकी उत्पत्ति नहीं होती और चूना व हलदीके संयोग विना एक प्रकारका रंग उत्पन्न नहीं होता इसी प्रकार लीव तथा कर्म इन दोनोंके संयोगके विना इन राग द्वेषादिकी उत्पत्ति ही नहीं .

वृहद्रव्यसंग्रहः। त्पत्तिरेव नास्ति कयमुत्तरं प्रयच्छाम इति ।। ४८ ।। एवं ध्यातव्याख्यानमुल्यत्वेन तदपा. नन विचित्रध्यानकयनेन च सूत्रं गतम् ।। अत ऊध्वं पदस्थं ध्यान मन्त्रवाक्यम्यं यदुक्तं तस्य विवरणं कथयतिः- पणतीसमोलछप्पणवउदुगमेगं च जवह ज्झाएह । परमेट्टिवाचयाणं अण्णं च गुरुपए सेण ॥ ४९ ॥ व्याख्या-"पणतीस"-'णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, नमो आयरियाणं, नमो उवझायाणं, णमो लोए सब्यसाणं' एतानि पत्रिंशदक्षराणि सर्वपदानि भएयते । "सोल"-'अरिहंत सिद्ध आचार्य अवज्झाय माहू' एतानि पोरशाहराणि नामपदानि भण्यन्ते । "-'अरिहन्तसिद्ध एतानि पहाराणि आसिद्धयो मपदे के मण्यते ।। "पण"-'अ सि आ उसा' एतानि पनामराणि अादिपदानि भण्यन्ते । "पदु",-'परि- हंत' इदमभरचतुष्टयमहतो नामपदम | "दुग"-'सिद्ध' इत्यारद्वयं सिद्धम्य नामपदम । "एगं 1"-'अ' इत्येकामरमहंत आदिपदम् । अथवा 'ओं एकाकरं पत्रपरमेष्टिनामा- होती है। इसलिये हम तुम्हारे प्रश्नका उत्तर की कैसे देखें ? अर्यात जैसे पुत्र न खोसे ही होता है और न पुरुपसे ही होता है किंतु नी तथा पुरुष इन दोनों संयोगले घरमा होमानी प्रकार राग द्वेष आदि न फर्मनित ही हैं और न जीव जनित ही हैं किन्तु जीय पार कर्म इन दोनोंके संयोगजनित ॥४८॥ इस प्रकार प्यासा ( ध्यान करनेवाले ) यस्यास्यानको प्रधानतासे उस प्यालाफे ध्यान तथा विचित्र प्यान यनसे यह गायाध समाम हुआ। अब पहले जो पर आये है कि "मवायोम स्थित ई पद पदस्य पान ", इसी फयनका विस्तारसे वर्णन करते हैं:- गाधामावार्थ: -पंच परमेष्टियोंको पदनेवाले को पैतीस. सोटा, पाप, पार.दो और एक अक्षररूप मन्त्रपद हैं उनका जाप्य करो और यान करो। मियाय अन्यो गन्यपद है उनको मो गुरुके उपदेशानुसार जपो मोर ध्यायां ॥ ४२ ॥ माल्यार्थ:--"पणतीस 'म अमिता १.मोमिलामो सासरिया पमो बहायागं, मोनो मत्वमा ५, ६ पंतीम पर सपना । "मोल" अनि सिद सापार्याय मासे मोला र पारिको नाम- पर कसाठे हैं। "" सिनि बार थान गमा सिद्ध नदी परोहितार दो नाम-पर का, जाते हैं। "a" inामा र पालियो शादि. पदलाती है । "" शरिदे पार मार कान परमेटोरे. नामद है। "दुग' 'मिददो र मिस परमेहर नामद "ए" er' TEE भर परमेष्ठीका आदिम सह था पर - १८८ श्रीमद् राजचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम् दिपदम् । तत्कथमिति चेत् "अरिहंता असरीरा आयरिया तह उवज्झया मुणिणो पढमक्खरणिप्पण्णो उकारो पंच परमेट्टी । १। इति गाथाकथितप्रथमाझराणा 'समानः सवर्णे दीर्घाभवति' 'परश्च लोपम्' 'उवणे ऊ' इति स्वरसन्धिविधानेन ओं शब्दो निष्प: द्यते । कस्मादिति-"जवह ज्झाएह" एतेषां पदानां सर्वमन्त्रवादपदेषु मध्ये सारभूताना इहलोकपरलोकेष्टफलप्रदानामर्थ ज्ञात्वा पश्चादनन्तज्ञानादिगुणस्मरणरूपेण वचनोधारणेन च जापं कुरुत । तथैव शुभोपयोगरूपत्रिगुप्तावस्थायां मीनेन ध्यायत । पुनरपि कथम्भू- तानां “परमेट्ठिवाचयाण” 'अरिहंत' इति पदवाचकमनन्तज्ञानादिगुणयुक्तोऽहंद्वाच्योऽ- भिधेय इत्यादिरूपेण पञ्चपरमेष्ठिवाचकानां | "अण्णं च गुरूवएसेण" अन्यदपि द्वादश- सहस्रप्रमितपञ्चनमस्कारग्रन्थकथितक्रमेण लघुसिद्धचक्र, बृहत्सिद्धचक्रमित्यादिदेवार्चन- विधानं भेदाभेदरत्नत्रयाराधकगुरुप्रसादेन ज्ञात्वा ध्यातव्यम् । इति पदस्यध्यानस्वरूपं व्याख्यातम् ॥४९॥ एवमनेन प्रकारेण "गुप्तेन्द्रियमना ध्याता ध्येयं वस्तु यथास्थितम् । एकाग्रचिन्तनं पदस्वरूप है। 'ओं' यह परमेष्ठियोंके आदिपद रूप कैसे है ऐसा पूछो तो उत्तर यह कि अरिहंतका प्रथम अक्षर 'अ', असरीर (सिद्ध ) का प्रथम अक्षर 'अ', आचार्यका प्रथम अक्षर 'आ',उपाध्यायका प्रथम अक्षर 'उ',मुनिका प्रथम अक्षर 'म्' इस प्रकार इन पांचों परमेष्ठियोंके प्रथम अक्षरोंसे सिद्ध जो ओंकार है वही पंचपरमेष्ठियोंके समान है । इस प्रकार गाथामें कहे हुए जो प्रथम ( अ अ आ उ म् ) हैं, इनमें पहले 'समानः सवर्ण दीर्धी भवति' इस सूत्रसे दीर्घ आ बनाकर 'परश्च लोपम्' इससे पर अक्षरका लोप करके अ अ आ इन तीनोंके स्थानमें एक 'आ' सिद्ध किया, फिर "उवणे ओ" इस सूत्रसे आपके स्थानमें 'ओ' बनाया । ऐसे स्वरसंधि करनेसे 'ओम्' शब्द सिद्ध होता है। इस कारण "जवह ज्झाएह" सब मन्त्रशास्त्र के पदोंमें सारभूत और. इस लोक तथा.परलोकमें इष्ट फलको देनेवाले इन पूर्वोक्त पदोंका अर्थ जान कर फिर अनन्तज्ञान आदि गुणोंके स्मरण- रूप वचनका उच्चारण करके जाप करो और इसी प्रकार शुभोपयोगरूप जो मन, वचन, काय इन तीनोंकी गुप्ति स्वरूप अवस्था है उसमें मौन द्वारा इन पूर्वोक्त पदोंका ध्यान करो। फिर कैसे इन पदोंको जपो-ध्वावो ? "परमेट्टिवांचयाण" अरिहंत इस पदरूप चाचक है और अनन्तज्ञान आदि गुणोंसे युक्त जो श्रीजिनेन्द्र हैं वह इस पदका वाच्य (कहे जाने योग्य) है; इत्यादि प्रकारसे पंचपरमेष्ठियोंके वाचकोंको, "अण्णं च गुरूवएसेण" और इन पूर्वोक्त पदोंसे अन्यका भी जो कि बारह हजार श्लोकसंख्या प्रमाण पंचनमस्कार- माहात्म्य नामक ग्रंथमें कहे हुये प्रकारसे लघुसिद्धचक्र, वृहसिद्धचक्र इत्यादि-देवोंके पूजनके विधानको भेदाभेदरूप रत्नत्रयके आराधक गुरुके प्रसादसे जानकर ध्यान करना चाहिये । इस प्रकार पदस्थ ध्यानके स्वरूपका कथन किया ॥ ४९ 1. इस प्रकार "पांचों इन्द्रियों और मनको रोकनेवाला ध्याता (ध्यानी.) है, यथास्थित पद्व्यसंग्रहः। MANTRA-ne. ध्यानं फलं संघरनिर्जरी ॥ १॥" इति लोकपिनलनणाना पायायायानरूलाना संक्षेपव्याख्यानरूपेण गाथात्रयेण द्वितीयान्तराधिकार प्रथम स्थलं गतम् । अतः परं रागादिविकल्पोपाधिरहितनिजपरमात्मपदार्यभावनोपनसदानन्देकलागन चामृतरसास्वादतिरूपस्य नियध्यानन्य परम्परया कारणभून यन्नुभोपयोगक्षणं व्यवहारध्यानं तद्धयभूतानां पंचपरमेष्टीना मध्ये तावदान्धरूपं कथयामोत्येका पात- निका । द्वितीया तु पूर्वसूत्रोदितसर्यपदनामपदादिपदाना वारकभूनाना पाया ये पा- परमेष्टिनस्तव्याख्याने क्रियमाणे प्रथमतस्तावञ्जिनम्वरूपं निरूपयामि । अथवा सूनीया पातनिका पदस्थापिण्ठस्थरूपन्यध्यानन्नयन ध्येय मृतमहंसात्वरूपं ददायानोति पान- निकायं मनसि धृत्वा भगवान सूप्रमिदं प्रतिपादयतिः पट्टचघाइफम्मो दमणमुहणाणवीरियमईयो । सुहदेहत्यो अप्पा सुद्धो अरिही विचिंतितो ॥ ५० ॥ व्याख्या। "णहचदुघाइफम्मो” निशयरत्नप्रयात्मकशुद्धोपयोगध्यानेन पूर्व पासिमन- जो पदार्थ है पद ध्येव है, एकाम होकर जो विचारका करना है यह ध्यान है और संघर तथा निर्जरा ये दोनों ध्यानके फल हैं ॥ १ ॥' इस शोफ फई. एम. टणफे धारक जी प्याता, ध्येय, ध्यान और फल है उनका संक्षेपसे कयन फरनेल्प तीन गायाओंसे द्वितीय जो अंतराधिकार है उसमें प्रथम स्थट समाम हुआ । अब इसके भागे राग आदि विकल्परूप उपाधिसे रहित जो निज परमात्मारूप पदार्थ है उसकी भावना से उत्पन्न और सदानन्दत्यरूप एक साधारफ मुग्मागर रसके भारवादसे गृप्तिम्वरुप ऐसा जो निमायायान उसका परंपरासे फारणा जो गुमो- पयोगक्षण व्यवहार ध्यान है उसके द्वारा पंप ( प्यान फरने गोर) भूत जो पंच परफेरप्यमंसे प्रथम हो जोआन परनेही न वापर पहली पातनिका है। पूर्वगाधामें कदै हुये जो सर्वपद नामपर आदि धारभूम पद भनरे पाच्य जो पंचपरमेष्ट्री में उनका स्यान करने यादो मोमिनो art- का निमरण करता यह दूसरी पागनिका । आपका पाप सिंहाय नया करान गीन मानोंक प्रयेसा जाना है के स्वाला दिया. मी सानिका इस प्रकार इन द गोनों पानिमा मनोभारमा पाय भगवान विस्थामा म अनिमाका ID :- गावामावार्थ: - यानिट परने, समय दान, ... सौर की ARE. उमर सिजमान और दी है. मका पारमा १८ ! पापा -दुपारी" FRARRIATो - - श्रीमद् राजचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम् मुख्यभूतमोहनीयस्य विनाशनात्तदनन्तरं ज्ञानदर्शनावरणान्तरायसंज्ञयुगपद्धातित्रयवि- शकत्वाच प्रणष्टचतुर्घातिकर्मा | "दसणसुद्दणाणवीरियमईओ", तेनैव घातिकर्माभावेन धानन्तचतुष्टयत्वात् सहजशुद्धाविनश्वरदर्शनज्ञानसुखवीर्यमयः । "सुहदेहत्यो" निश्चये- शरीरोऽपि व्यवहारेण सप्तधातुरहितदिवाकरसहस्रभासुरपरमौदारिकशरीरत्वात् शुभदे. स्थः । “सुद्धो"-"क्षुधा तृपा भयं द्वेपो रागो मोहश्च चिन्तनम् । जरा रुजा च नृत्युश्च खेदः स्वेदो मदोऽरतिः । १ । विस्मयो जननं निद्रा विषादोऽष्टादश स्मृताः । रतैर्दोषैर्विनिमुक्तः सोऽयमाप्तो निरञ्जनः ॥ २ ॥” इति श्लोकद्वयकथिताष्टादशदोपरहि- तत्वात् शुद्धः । “अप्पा" एवंगुणविशिष्ट आत्मा । "अरिहो" अरिशब्दवाच्यमोहनी- पस्य, रजःशब्दवाच्यज्ञानदर्शनावरणद्वयस्य, रहस्यशब्दवाच्यान्तरायस्य च हननाद्वि- नाशात्सकाशात् इन्द्रादिविनिर्मितां गर्भावतरणजन्माभिषेकनिःक्रमणकेवलज्ञानोत्पत्तिनि- र्वाणाभिधानपञ्चमहाकल्याणरूपां पूजामहति योग्यो भवति तेन कारणेन अर्हन् भण्यते । "विचिन्तिज्जो" इत्युक्तविशेषणैर्विशिष्टमाप्तागमप्रभृतिग्रन्थकथितवीतरागसर्वज्ञाद्यष्टोत्तरसह- ध्यान है उसके द्वारा पहले धातियाकर्मों में प्रधान जो मोहनीयकर्म है उसका नाश करने से और पीछे ज्ञानावरण, दर्शनावरण तथा अंतराय इन नामोंके धारक जो तीन घातिया कर्म हैं उनका एक ही समयमें नाश करनेसे नष्ट होगये हैं चार घातिया कर्म जिसके ऐसा "दसणसुहणाणवीरियमईओ" वह जो धातिया कर्मोका नाश हुआ है उसीसे प्राप्त हुआ जो अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत वीर्यरूप अनंत चतुष्टय है उसका धारक होनेसे स्वभावसे उत्पन्न शुद्ध और विनाशरहित शान; दर्शन, सुख और वीर्यरूप ऐसा 'सुहदेहत्थो' निश्चयनयसे शरीररहित है तो भी व्यवहारनयकी अपे- क्षासे सात धातुओंसे रहित-हजारों सूर्योंके समान देदीप्यमान-परम औदारिक शरीरको धारण करता है इस कारण शुभ देहमें विराजमान है। "सुद्धो" "क्षुधा १ तृपा २ भय ३ द्वेप ४ राग ५ मोह ६ चिंता ७ जरा ८ रुजा ( रोग ) ९ मरण १० स्वेद ११ खेद १२ मद १३ रति १४ विस्मय १५ जन्म १६ निद्रा १७ और विषाद १८, ऐसे ये अठारह दोप हैं; इन दोपोंकरके रहित ऐसा वह निरंजन आप्त श्री जिनेन्द्र है ।२।" इस प्रकार दो श्लोकों में कहे हुए अठारह दोषोंसे रहित होनेके कारण शुद्ध है। "अप्पा" इन पूर्वोक्त गुणोंका धारक जो आत्मा है वह “अरिहो" 'अरि' इस शब्दसे कहे जाने- वाले मोहनीयकर्मका, 'रज' इस शब्दसे कहनेयोग्य ज्ञानवरणीय और दर्शनावरणीय इन दोनों कर्मों का तथा 'रहस्य' इसका वाच्य जो अंतरायकर्म हे उसका नाश करनेसे इन्द्र आदि देवोंद्वारा रची हुई गर्भावतार-जन्माभिषेक-तपकल्याण-केवलझानोत्पत्ति और निर्वाणसमयमें होनेवाली जो पांच महाकल्याणरूप पूजा है, उसके योग्य होता है इस कारण अर्हन् कहलाता है। "विचितिजो" इन उक्त विशेषणोंके धारक और आप्तागममें कहे हुए वीतराग सर्वज्ञ आदि एक हजार आठ नामोंको धारण करनेवाले श्री. अहंत जिनम- - वृहद्रव्यसंग्रहः। नमहतं जिनभट्टारकं पदस्थापिंटस्थरूपस्थध्याने स्वित्या विशेषेण चिनायत पायत 1! यूयमिति । पत्रावसरे भट्टचार्वाकमतं गृहीत्वा शिप्यः पूर्वपक्षं करोति । नास्ति मर्ययोऽनुप- खरविषाणवत् । तत्र प्रत्युत्तरं-फिमत्र देशेऽन काले अनुपलब्धिः, सर्वदेशे काले पत्र देशेऽत्र काले नास्ति तदा सम्मत एव । अब सर्वदेशफाले नानोति मग्यते नयं कालत्रयं सर्वनरहितं कथं शातं भवता? मातं पेत्ता भयानेय सर्वशः। अप तिहि निषेधः कथं फियते ? तत्र दृष्टान्तः यया कोऽपि निषेधको घटन्यापार- टरहितं भूतलं चक्षुपा दृष्ट्वा पवादित्यत्र भूतले घटो नातोति युराम । यन्तु पक्ष. तस्य पुनरिदं वचनमयुक्तम् । तथैव यत्तु जगन्प्रयं काल सफारहित जानाति को पदस्थ-पिंढस्य और रूपस्य ध्यान में स्थित होकर हे मध्यजनो ! तुम अधिकनासे न करो॥ अब इस अवसरमें भट्ट और चार्वाक ( नास्तिक) का मल प्रहण करयैः शिष्य पूर्य 7 करता है कि, सर्व नहीं है क्योंकि उसका प्रत्यक्ष अथषा प्राणि नहीं होती, सींगके समान । इस शंकाका उत्तर यह है-तुम जो सर्वाकी अप्रानि मानते हो हम पूछते हैं कि, सर्यकी प्राप्ति इस पेश खोर इस फालमें नही है या मद और सब फालोम साकी प्राप्ति नहीं है ? यदि पदो कि, इस ऐन और इस काम को प्राप्ति नहीं है क्य तो तुम्हारा फाना ठोक है, क्योंकि हम भी ऐसा मानते हैं। तुम कहो कि, सर देशों और सय फालोंमें माको प्राप्ति नहीं है, तो हम पूछो तुमने यह कैसे जाना कि-अधो, ऊर्य और मध्य भेदसे तीनों लोक नया भूत, भधि 1 और वर्तमान ये तीनों फाल सश फरके रहित है ? यदि तुम पर दो कि हमने र लिया कि तीनों लोक और तीनों काल सर्व रहित , यशो दुमही म द हो चुके ।। भावार्थ-जो तीन टोफ तया तीन बार पहागोमो जाममा पही है । और तुमने यह जान ही लिया कि नीनों राक और सीमों का पानी तुम दो सर्वशठहरे। और यदि तुमने तीन लोग कार में मनदी को नहीं जाना तो फिर मर्यानही मानिया में करने ? महार न यह पि.-से कोई मिपंध परनपाना पुरुष परमा आगारमूल माय समान ) है उसफो नेत्रोंसे पटरहिन जान मामय नाहि. मगर हरी है' सो यह कहना गो. सका ठोस । परन्जो नेत्रीने रहित है. पर मदद तबले पर नहीं है, मानो नो छोरा नहीं। रोम और न काल सर्प रवि जानता है या दिन मा गोमा RAT नटी "यह है तो इसका पहना टोपाजो कीमो मंग का Ex- १९२ श्रीमद् राजचन्द्रजेनशाखमालायाम् तस्य जगत्त्रये कालत्रयेऽपि सर्वज्ञो नास्तीति वक्तं युक्तं भवति । यस्तु जगत्त्रयं कालअयं न जानाति स सर्वज्ञनिषेधं कथमपि न करोति । कस्मादिति चेत्-जगत्त्रयकालत्रयपरिक्षा- नेन स्वयमेव सर्वज्ञत्वादिति । अथोक्तमनुपलब्धेरिति हेतुवचनं तदप्ययुक्तम् । कस्मादिति चेत् -किं भवतामनुप- लब्धिः, किं जगत्त्रयकालत्रयवर्तिपुरुषागा वा ? यदि भवतामनुपलब्धिस्तावता सर्वज्ञा. भावो न सिद्धथति, भवद्भिरनुपलभ्यमानाना परकीयचित्तवृत्तिपरमाण्वादिसूक्ष्मपदार्था- नामिव । अथवा जगत्त्रयकालत्रयवर्तिपुरुपाणामनुपलब्धिस्तत्कथं ज्ञातं भवद्भिः ? ज्ञातं चेत्तर्हि भवन्त एव सर्वज्ञा इति पूर्वमेव भणितं तिष्ठति । इत्यादिहेतुदूपणं ज्ञातव्यम् । यथोक्तं खरविषाणवदिति दृष्टान्तवचनं तदप्यनुचितम् । खरे विषाणं नास्ति गवादौ तिष्ठ- तीत्यत्यन्ताभावो नास्ति यथा तथा सर्वज्ञस्यापि नियतदेशकालादिष्वभावेऽपि सर्वथा नास्तित्वं न भवति, इति दृष्टान्तदूपणं गतम् । रहित नहीं जानता है; वह सवैज्ञका निषेध किसी प्रकारसे भी नहीं कर सकता है । क्यों नहीं कर सकता ? यह पूछो तो उत्तर यह है कि, तीन जगत् और तीन कालको जाननेसे वह आप ही सर्वज्ञ है, अर्थात् जब वह आप ही सर्वज्ञ है तब सर्वज्ञ नहीं है ऐसा कैसे कह सकता है ? अब जो 'सर्वज्ञ नहीं है' इस वार्ताको सिद्ध करने के लिये 'सर्वज्ञकी प्राप्ति नहीं है' यह हेतुवचन कहा है वह भी अयुक्त ( ठीक नहीं) है। क्यों अयुक्त है ? ऐसा प्रश्न करो तो हम पूछते हैं कि-क्या सर्वज्ञकी प्राप्ति तुम्हारे नहीं है या तीन लोक व तीन कालमें रहनेवाले जीवोंके सर्वज्ञकी प्राप्ति नहीं है ? यदि तुम लोगोंको सर्वज्ञ प्राप्त नहीं होता है तो इससे सर्वज्ञका अभाव सिद्ध नहीं होता। क्योंकि, जैसे अन्य पुरुषोंके मनके विचार और परमाणु आदि सूक्ष्म पदार्थ तुम्हारे जाननेमें नहीं आते हैं, तो भी वे हैं अर्थात् उनका अभाव नहीं है । इसी प्रकार तुम्हारे जाननेमें नहीं आया हुआ सर्वज्ञ भी है, उसका सर्वथा अभाव नहीं । अब कदाचित् यह कहो कि, तीन जगत् और तीन कालके पुरुषोंके ही सर्वज्ञकी अप्राप्ति है; तो हम पूछते हैं कि, क्या तुमने यह जान लिया ? यदि जान लिया है तब तो 'तुमही सर्वज्ञ हो' यह जो हमने पहले ही कहा है, वही यहां आ ठहरा । इत्यादि अनेक दूषण इस 'अप्राप्ति' रूप हेतुमें जानने चाहिये। और जो तुमने 'सर्वज्ञ नहीं है क्योंकि उसकी प्राप्ति नहीं होती" इसको सिद्ध करनेके लिये गर्दमके सींगके समान यह दृष्टान्तवचन कहा, वह भी उचित नहीं है । क्योंकि, जैसे गर्दभ ( गघे ) के सींग नहीं हैं परन्तु वैल आदिके सींग हैं, इस लिये सींगका अत्यन्त (सर्वथा) अभाव नहीं है। इसी प्रकार यद्यपि सर्वज्ञका किसी नियत ( कायम किये हुए ) देश तथा काल आदिमें अभाव है तो भी उस सर्वज्ञका सर्वथा अभाव नहीं हो सकता है। इस प्रकार दृष्टान्तमें दूषण दिखाया गया ।

वृहद्रव्यसंग्रहः। - इत्यार्याकथितबहिरङ्गचतुर्विधाराधरायलेन, तथैव "ममत्तं सगाणं सभारि हि । चेव । चटरो चिहि आदे तसा आदा टु ने सरणं । १।" इति गापारयिता- रनिश्चयचतुर्विधाराधनावलेन च बाहान्तरमाममार्गद्वितीयनामाभियेन कृत्वा यः वीतरागचारित्राविनाभूतं त्वाद्धात्मानं साधयति भावयति स साधुर्भवति । तस्येव शुद्धसदानन्देकानुभूतिलक्षणो भावनमस्कारस्तथा 'गमो लोए, सब्यसागं द्रव्यनम- म भवत्पिति ॥५४॥ एवमुक्तपकारेण गाथापतफेन मध्यमप्रतिपत्त्या परमेष्टिस्वरूपं शासन्यम् । अथवा येन "अरिहासिद्धायरियाउवझायासाधु पंचरमेट्टो । ते यि चिदि आदे ताहरा मे सरणं । १" इति गायाफयितमामेण मंझेपेण, तथैव विस्तरेण पापरमेष्ठि- कथितक्रमेण, अतिविस्तारेण तु सिद्धचक्रादिदेवार्चनाविधिरूपमन्यवादसंबन्धिपत्र फारमन्ये चेति । एवं गायापनकेन द्वितीयस्यलं गतम् । अथ तदेव ध्यानं विफल्पिननिश्रयेनायिकल्लिननिश्चयेन प्रकारान्तरेणोपदाररुपेण नि, ज्ञान, चारित्र और तपभेदोंसे चार प्रसारकी आराधना के उस पाराधनाफे पलसे या इसीप्रकार "सम्यग्दर्शन. सम्यगमान, सम्यकपारिश और सत्ता में पारों सामा उवास करते हैं, इस कारण आत्मा हो मेरे शरणमन है। १।" इस गाया काही तो नियनयसे अभ्यन्तरको चार आराधना, उनके बलसे अपांन चामा मोशमार्ग और अभ्यन्तर मोक्षमार्ग फरफे जो वीतरागपारियका अधिनाभूत निज पद मामाको मायने र्थात भावते हैं; वे साधु परमेष्ठी कादलाते हैं। उन्होंने लिये मेरा म्यमायसे प्रत्यार-- गुद-ऐसे सदानन्दको अनुभूतिलमण भायनमस्कार नया "णमो लोय मन्बमारणं" हम पदके उभारणरूप द्रव्यनमस्कार दो ॥ ५५ ॥ इस पड़े हुए प्रकारसे पांच गायाओं द्वारा मध्यम मधिक धारक शिष्यों को मान हानी लिये पंच परमेष्ठीय स्वरुपका कयन किया गया है बह जानना चाहि यया - पनयसे "अहंग, सिद्ध, भाषा, आध्यान और साधु पानी परनेटो जो भी आमा हो विष्टले हैं; हम कारण आमा ही मेरे शरणभून हुए कमानुसार संक्षेपसे पंच परमेलिचोंका पर जानना चाहिये। और विस्तार परमेष्टिका रूप पारनेही नाम ना कहे ये अनमे जानना पाया अगलतियारमे मिद पर नियों यदिप जो माया मानाम नमें पंच परमेखिका पराल मिर म समानामा द फिर भी पानी पिसिना मकार बना करो म मामा, '.

२०२ । श्रीमद् राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् पुनरप्याह । तत्र प्रथमपादे ध्येयलक्षणं, द्वितीयपादे ध्यातृलक्षणं, तृतीवपादे ध्यानलमणं, चतुर्थपादेन नयविभागं कथयामीत्यभिप्रायं मनसि धृत्वा भगवान् सूत्रमिदं प्रतिपादयतिः-- जं किंचिति चिंतंतो णिरीहवित्ती हवे जदा साहू । लघृणय एयत्तं तदाहु तं तस्स णिच्छयं झाणं ॥ ५५ ॥ व्याख्या-'तदा' तस्मिन् काले आहुर्बुवन्ति 'तं तस्स णिच्छयं ज्झाणं' तत्तस्य निश्च- यध्यानमिति । यदा किं 'णिरीह वित्ती हवे जदा साहू' निरीहवृत्तिनिस्पृहवृत्तिर्यदा साधु: भवति । किं कुर्वन् 'जं किंचिवि चिंतंतो' यत् किमपि ध्येयवस्तुरूपेण वस्तु चिन्तयन्निति । किं कृत्वा पूर्व 'लघृणय एयत्त' तस्मिन् ध्येये लब्ध्वा । किं ? एकत्वं एकाग्रचिन्तानिरोधन- मिति । अथ विस्तार:-यत् किञ्चिद् ध्येयमित्यनेन किमुक्तं भवति ? प्राथमिकापेक्षया सविकल्पावस्थायां विषयकपायवञ्चनार्थ चित्तस्थिरीकरणाथै पञ्चपरमेष्ठयादिपरद्रव्यमपि ध्येयं भवति । पश्चाभ्यासवशेन स्थिरीभूते चित्ते सति शुद्धबुद्धैकस्वभावनिजशुद्धात्मस्व- रूपमेव ध्येयमित्युक्तं भवति । निस्पृहवचनेन पुनर्मिथ्यात्वं वेदत्रयं हास्यादिपटककोधा- दिचतुष्टयरूपचतुर्दशाऽभ्यन्तरपरिग्रहेण तथैव क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदास- द्वितीय पादमें ध्याता (ध्यान करनेवाले) का लक्षण कहता हूं, तीसरे पादमें ध्यानका लक्षण कहता हूँ और चौथे पाद (चरण) से. नयोंके विभागको कहता हूं। इस अभि- प्रायको मनमें धारण करके भगवान् श्री नेमिचन्द्रस्वामी इस अग्रिम सूत्रका प्रतिपादन करते हैं;- गाथाभावार्थ:--ध्येय पदार्थमें एकाग्र चित्त होकर जिस किसी पदार्थको ध्यावता हुआ साधु जब निस्पृह वृत्ति (सब प्रकारको इच्छाओंसे रहित ) होता है उस समय वह उसका ध्यान निश्चय ध्यान होता है ऐसा आचार्य कहते हैं ॥ ५५ ॥ व्याख्यार्थः-लद्धृणय एय" उस ध्येय पदार्थमें एकाग्रचिन्ताके निरोधको प्राप्त होकर अर्थात् एकचित्त होकर किंचिवि चिंतंतो" जिस किसी पदार्थका ध्येयवस्तु के रूपसे चिंतवन करता हुआ "णिरीहवित्ती हवे जदा सोहू" साधु जब निस्पृह वृत्तिको धारण करनेवाला होता है "तदाहु तं तस्स णिच्छयं ज्झाणं" उस समय आचार्य महाराज साधुके उस ध्यानको निश्चय ध्यान कहते हैं । अब विस्तारसे वर्णन करते हैं-गाथामें जो 'यत् किंचित् ध्येयम्' अर्थात् 'जिस किसी भी ध्येय पदार्थको' ऐसा पद हे उससे क्या कहा गया है कि ? ध्यानकी प्रथम ही आरंभ करनेकी अपेक्षासे जो सवि- कल्प अवस्था है उसमें विषय और कपायोंको दूर करनेके लिये तथा चिचको स्थिर करनेके लिये पंच परमेष्ठी आदि जो परद्रव्य हैं वे भी ध्येय होते हैं, फिर जब अभ्या- सके वक्षसे चित्त स्थिर हो जाता है तब शुद्ध-बुद्ध एकस्वभावका धारक जो निज-शुद्ध भात्मा है उसका स्वरूप ही ध्येय होता है; यह कहा गया है। 'और निस्पृहवृत्ति होकर' -- .

- . वन्यसंग्रहः । २०३ यभाण्डाऽभिधानदशविधवहिरझपरिप्रदेण च रहितं पाएत्यरूपमुक्तं भवति । एकाम- न्तानिरोधेन च पूर्वोक्तविधिधध्येयवस्तुनि स्थिरत्वं निलयं ध्यान रमण मणिमिति । वियशब्देन तु प्राथमिकापेक्षया व्यवहाररमयानुननिश्चयो प्रातः । निरनयोगनि- 'लपुरुषापेक्षया व्यवहाररसनयानुकूल निनयो प्रायः ॥ निष्पन्नयोगपुरुषापेक्षया तु दोपयोगलक्षणविवक्षितैकदेशशुद्धनिम्नयो प्रातः । विशेषनित्रया पुनरने यन्त्यनागस्ति- नीति सूत्रार्थः ॥ ५५ ॥ अथ शुभाशुभमनोवचनकायनिरोपे ते सत्यात्मनि स्थिरो भवति तदेव परमध्यानमि. त्युपविशति- मा चिट्ठद्द मा नपह मा चिन्तह किवि लेण हो पिरो । अप्पा अपम्मि रओ इणमेव परं हवे हाणं ॥ ५६ ॥ व्याख्या-'मा चिद मा जंप मा निना किंपि नित्यनिरजननिमियनिजमुला- याद जो वचन है इमसे मिथ्यात्य १, वेद २, सायेद ३, ननावेद ५, दान ५, रति ६, अरति ७. शोक ८, भय ९, जुगुप्सा १०, मोघ ११. मान १२, माया १३ और लोभ १४, इन रूप चौदद प्रकार के अनरज परिपाइने रहिल नगा इनामसार क्षेत्र १, वास्तु २, हिरण्य ३, सुवर्ण ४, धन ५. घार ६, पासी ७, दास, गुर १ और मार १८, नाम दाप्रकार. याहिरंग परिग्रहसे रहित ध्यान करनेवाले का पाप हा गया है। और 'एकाघिन्तानिरोधको प्रान होकर इस कथनसे पूगि नाना प्रभार पान परनेयोग्य पदामि जो निनामको यातायात और नियमान फहते है यहाँपर जो नियाद उसमें न्याय करनेवा पुगरको अगारे गो व्यवहारमनप्रफे अनुसार निभय प्रा करना चाहिये और जिम्मान मिद होगमा है ऐसे पुरुषको अपेकाने सुखोपयोगमप मगका भारक यिमितकानि प्रहण करना चाहिये । इससे विशेष (अंबेदका) जो निकम या आगेर मूत्र थाहा। इस प्रकार सूबका अ६ ॥ ५५ ॥ अय पान करनेवाला पुखराम शुमार नन, परन और काया निरोप पर गुफने पर जाना पिरोला पाशामा बिराना पार पान उपदेश देखें:- गायामावार्थ:ोजनोमीठा मा मनापाग- रकम परो, मीनार दोनोमी नाशिमा मामा ने मामा नतिजामानार, रमाया:- नी: "माहिमामा निहि मिन और शिपाल माnिgaarma को पायो २०४ श्रीमद् राजचन्द्रजैनशानमालायाम् त्मानुभूतिप्रतिबन्धकं शुभाशुभचेष्टारूपं कायव्यापारं, तथैव शुभाशुभान्तर्बहिर्जल्परूपं वचनव्यापारं, तथैव शुभाशुभविकल्पजालरूपं चित्तव्यापारश्च किमपि माकुरुत हे विवे- किजनाः ! 'जेण होइ थिरो' येन योगत्रयनिरोधेन स्थिरो भवति । स क 'अप्पा' मारमा । कथम्भूतः स्थिरो भवति 'अप्पम्मि रओ' सहजशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावपरमात्मतत्त्वसम्यक श्रद्धानज्ञानानुचरणरूपाभेदरत्नत्रयात्मकपरमसमाधिसमुद्भूतसर्वप्रदेशाल्हादजनकसुखास्वा- दपरिणतिसहिते निजात्मनि रतः परिणतस्तल्लीयमानस्तशित्तस्तन्मयो भवति । 'इणमेव परं हवे ज्झाणं' इदमेवात्मसुखरूपे तन्मयत्वं निश्चयेन परमुत्कृष्टं ध्यानं भवति । तस्मिन् ध्याने स्थितानां यद्वीतरागपरमानन्दसुखं प्रतिभाति, तदेव निश्चयमोक्षमार्ग- स्वरूपम् । तञ्च पर्यायनामान्तरेण किं किं भण्यते तदभिधीयते । तदेव शुद्धात्मस्वरूपं, तदेव परमात्मस्वरूपं, तदेवैकदेशव्यक्तिरूपविवक्षितैकदेशशुद्धनिश्चयेन स्वशुद्धात्मसम्वित्ति- समुत्पन्नसुखामृतजलसरोवरे रागादिमलरहितत्वेन परमहंसस्वरूपम् । इदमेकदेशव्यक्ति- रूपं शुद्धनयव्याख्यानमत्र परमात्मध्यानभावनानाम्मालायां यथासम्भवं सर्वत्र योज- नीयमिति । मनके शुभ अशुभ चेष्टारूप कायका व्यापार है उसको, इसी प्रकार शुभ अशुभ-अन्तरंग तथा बहिरंगरूप वचनके व्यापारको और इसी प्रकार शुभ-अशुभ विकल्पोंके समूहरूप व्यापारको कुछ भी मत करो "जेण होइ थिरो" जिन मन, वचन और कायस्वरूप तीनों योगोंके रोकनेसे स्थिर होता है; वह कौन ? "अप्पा" आत्मा। कैसा स्थिर होता है । "अप्पम्मि रओ" सहज शुद्ध ज्ञान और दर्शन स्वभावको धारण करनेवाला जो परमात्मतत्त्व है उसके सम्यक् अद्धान-ज्ञान तथा आचरण करनेरूप जो अभेदरत्नत्रय है उस स्त्ररूप जो परम ध्यान है उससे उत्पन्न और सब प्रदेशोंको आनंद पैदा कर- नेवाला ऐसा जो सुख उसके आस्वादरूप परिणति सहित निज आत्मामें परिणत, तल्लीन, तन्मय तथा तच्चित्त होकर स्थिर होता है । "इणमेव परं हवे झोणं' यही जो आत्माके सुखरूप में परिणमन होना है वह निश्चयसे परम अर्थात् उत्कृष्ट ध्यान होता है । उस परमध्यानमें स्थित हुए जीवोंको वीतरागपरमानन्द सुख प्रतिभासता है वहीं निश्चयमोक्षमार्गस्वरूप है। वह दूसरे पर्यायनामोंसे क्या क्या कहलाता है अर्थात् उसको किन किन नामोंसे लोग कहते हैं सो कथन किया जाता है। वही शुद्ध आत्माका स्वरूप है, वही परमात्माका स्वरूप है, वही एक देशमें प्रकटतारूप ऐसे विवक्षित एक देश- शुद्धनिश्चयनयसे निजशुद्ध आत्माके ज्ञानसे उत्पन्न जो सुख वही हुआ जो अमृतजलका सरोवर उसमें राग आदि मलोंसे रहित होने के कारण परमहंस स्वरूप है "इस परमा- मध्यानके भावनाके नामोंको मालामें इस एकदेशव्यक्तिरूप शुद्धनयके व्याख्यानको यथा- संभव सब जगह लगा लेना चाहिये अर्थात् यथासंभव ये सब नाम एकदेशशुद्ध निश्श. यनयको अपेक्षासे है ऐसा समझना चाहिये । .

थाद्रव्यसंग्रहः। तदेव परनामस्वरूपं. तदेव परमविगुस्वरूपं, तदेव परमशिवरपरूपं, तदेव परमबुद्धरव- रूपं, नदेय परमनिजस्वरूपं, तदेव परमन्यात्मोपलब्धिलमण सिद्धम्यरूपं, तदेव निरञ्जन- स्वरूपं, तदेव निर्मलस्वरूपं, तदेव म्पसम्वेदनमान. नदेय परमतत्वयानं. नदेय दात्म- दर्शनं, तदेव परमावस्थास्वरूपं, तदेव परमात्मनः दर्शनं. तदेव परमगत्यशानं, शानं तदेय ध्येयभूतमुद्धपारिणामिकभावस्पं. तदेव ध्यानमायनाम्यरूपं. नदेय गुचारित्रं, तदेवान्तम्नत्यं, तदेय परमतत्त्वं. नदेव दामद्रव्यं. नदेय परमज्योतिः, सेव शुदात्मानुभूतिः, सेवात्मप्रतीतिः, मेवान्ममम्पितिः, सेव स्यपापलब्धिः. म पव नित्योपलब्धिः, स एष परमसमाधिः, म एव परमाननः स एप नित्यानन्दः. म एय महजानन्दः, स एव सदानन्दः, स एव भुदामपदागियनरूपः, म एव परमस्वा- ध्यायः, स एव नियमोझोपायः, स एष चैकाग्रचित्तानिरोधः, स ए परनयोगः, म एवं शुद्धोपयोगः, स एव परमयोगः, स एष भूनाधः. म पद परमायः स एव निय- पद्रवाचारः.स एय समयसारः, स एवाध्यात्मसारः, गदेव समयादिनियायाम- स्वरूपं, वदेवाभेदरममयस्वरूपं, तदेव पोतरामसामायिक, तदेव परमशरणोजमनालं, तदेय फेपलमानोत्पत्तिकारणं, तदेव सकलकर्मभयकारणं, मैव निमयपतुर्विधाराधना, वही परगामस्वरूप है, वही परमयिष्णुरुप है, यही परमशिवस्वरूप है यही परमवुद्र- स्वरूप है, यदी परमनिजस्वरूप है. यही परम निज आत्माकी प्रापिम्प समया मारक जो सिद्ध है उसरूप है, यदी निरजनरूप है. यही निर्मल (फर्ममरहित) पम्पका कारण है. वही स्वसंवेदन शान है. यही परमनत्यमान है. पदो शुद्धामाका पर्शन, नही पाम (E) अयस्यास्वरूप है यही परमात्माका दर्गन पदों परम तस्मानपदी मुद्राममान है, यही ध्यान करनेयोग जो गुद पारिणामिकमाव है उस कप, वदी गानमाम्यरूप है. वही शुद्ध पारित है, यही अलरंगका नस्य है. यही परम (राष्ट ) नस्य है, वही मुद् आत्मा द्रश्य है, यही परम जाति: (धान) है, यही शुद्ध मारमाको अनुभूति है, यही आत्मा द्रव्य है, यही मासी नीमि है, यदी आमाको ममिनि प्रयोग साकार है, यही निजामयापकी नि. नदी नित्य की प्रामि है, पह परम समातिमी पानानंद है, यही नियमान है. यही यामेरा मानन्द है, यही मदानन्द १. वहीं गुद्ध लामा पठन पारमा परम पाण्यान, पदी नियमका पार है. यह Tit. सही परनशान है. पदी मुदwin, पदो परम होना, पदों पर- माई है. यही निमा अनुमान, न. पारित न मारका पागारमार, TETHArt real onferEATRE ETERE? Ret. IT. नही बन ममादिक.पहारमार . १ - . अद्रव्यसंग्रहः। २०७ दा होइ' सस्मान् कारणात् तपभूतरताना संयन्येन यनुप्रितयं तत् मितचे रया सर्वकाले वत हे भव्याः फिनय ? वस्य ध्यानम्य लब्धिस्तलब्धिलदमिति । क्याहि-सनसनाव- दिर्यत्तिपरिसंख्यानरसपरित्यागविविशल्यासनकायक्लेशभेदेन पाय पविध, उष विचिचविनयच्यामृत्यस्वाध्यायन्युत्सर्गप्यानभेदेनाऽभ्यन्तरमपि पपिपं पेनि वारसमिधं पः । तेनैव साप्यं शुद्धात्मस्वरूपे प्रतपनं विजयनं निम्नयतपत्र । तथैवाचाराराधनादि- व्यश्रुतं, तदाधारेणोत्पन्नं निर्यिकार स्वसंवेदनशानापं भायरतं च । तथैय प हिमानून- तेयामापरिप्रहागा द्रव्यभावरूपाणा परिदरणं प्रतपाक पनि । पपगुलमनगपात- पतसहितो ध्याता पुरुपो भवति । एपमेव ध्यानमामग्री पेति । सयानो-"वराज्य उत्वपिसान नभयं समपित्तता। परीपहायोति पोते यानहेतयः । १ । उस ध्यानको प्राप्ति के अर्थ तप भुत और यूतों के संबंधसे जो प्रिनय ६ मम प्रिय अर्थात् तपः भुत तथा प्रत इन तीनोंके समुदाबमें मर्यकान्द (निरन्तर ) तत्पर होगो । अय इसीका विशेष वर्णन करते हैं कि-अनशन (उपवासका करना ) १, सवादी ( फम मोजन करना)२, पृत्तिपरिसंख्यान ( अटपटी पृशियो प्रहण करके भोजन करने जाना) २, रसपरित्याग (छः रसों से एक दो आदि रसों का त्याग करना), वियपसम्पामन (निर्जन और शुद्ध रयलमें शयन करना वा बैठना ) ५. मायाले (हा अनुसार सगरसे परिमम लेना) ६,इन मेदोंसे छः प्रकारका का तप और इसी प्रकार प्रायशिश १, पिन २, चापत्य ३, स्वाध्याय ४, फायोत्सर्ग ५ और पान ६. इन भेदोंने मारा था- रंग तप ऐसे पास तथा अन्यन्वर दोनों नोक भेदी मिलाने में बारह भागका त्यपहारनप है। और इसी पयहारनपसे सिद्ध होने योग्य निज मुद माला मार प्रतपन अर्थान् विजय फरने रूप नियत । इमो प्रकार मूडागार मागको कामना खादि द्रव्यात, सपा न झालो, आधारसे अमान पठन पाठन सा और विकाररहित निज शुद्ध आरमाणे जागनेल नाना पारक भाग दे गया तो- प्रकार द्रव्य वीर मावो हिंसा, अना (3) र (गौरी!, ARE ( ) और पवित्र है. इन त्यागरूप पधारा है। मेरम. पार कर, RI और प्रत इनले सहिद ला पुमा ( भामरागाला ) मा । और इन गगन तथा तालको पानी मानी । माEि. "ine १, सवों कान , RAT F दोनों परिवहन नि . mar पी दिनार साम्यमापामा ४, और परिपोकामा ५, १९४ श्रीमद् राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् इदानीं व्यतिरेकदृष्टान्तः कथ्यते-यन्न कस्यापि प्रत्यक्षं तदनुमानविषयमपि न भवति यथा खपुष्पादि, इति व्यतिरेकदृष्टान्तवचनम् । अनुमानविषयाश्चेति पुनरप्युपनयवच- नम् । तस्मात् प्रत्यक्षा भवन्तीति पुनरपि निगमनवचन मिति । किन्त्वनुमानविषयत्वादि. त्ययं हेतुः सर्वज्ञस्वरूपे साध्ये सर्वप्रकारेण सम्भवति यतस्ततः कारणात्स्वरूपासिद्धभा- वासिद्धविशेषणाद्यसिद्धो न भवति । तथैव सर्वज्ञस्वरूपं स्वपक्षं विहाय सर्वज्ञाऽभावं विपक्षं न साधयति तेन कारणेन विरुद्धो न भवति । तथैव च यथा सर्वस- द्धावे स्वपक्षे वर्त्तते तथा सर्वज्ञाभावेऽपि विपक्षेऽपि न वर्तते तेन कारणेनाऽनेकान्तिको न भवति । अनैकान्तिकः कोऽर्थो व्यभिचारीति । तथैव प्रत्यक्षादिप्रमाणवाधितो न भवति । तथैव च प्रतिवादिना प्रत्यसिद्धं सर्वज्ञसद्धावं साधयति तेन कार- णेनाकिञ्चित्करोऽपि न भवति । एवमसिद्धविरुद्धानेकान्तिकाकिञ्चित्करहेतुदोपरहित- त्वात्सर्वज्ञसद्भावं साधयत्येव । इत्युक्तप्रकारेण सर्वज्ञसद्भावे पक्षहेतुदृष्टान्तोपनयनिगम- नरूपेण पञ्चाङ्गमनुमानं ज्ञातव्यमिति । किं च यथा लोचनहीनपुरुपस्यादर्श विद्यमानेऽपि प्रतिविम्बानां परिज्ञानं न भवति, . । अब व्यतिरेक दृष्टान्तको कहते हैं-'जो किसीके भी प्रत्यक्ष नहीं होते वे अनुमानके विषय भी नहीं होते, जैसे कि, 'आकाशके पुष्प' आदि । यह व्यतिरेक दृष्टान्तका वचन है। और 'राम रावण आदि अनुमानके विषय हैं, यह फिर उपनयका वचन है । इसलिये 'राम रावणादि किसोके प्रत्यक्ष होते हैं', यह फिर निगमन वाक्य है। और 'रामराव- णादि किसीके प्रत्यक्ष होते हैं, अनुमानके विषय होनेसे', यहांपर 'अनुमानके विषय होनेसे' यह जो हेतु है वह सर्वज्ञरूप जो साध्य धर्म है उसमें सर्व प्रकारसे रहता है इस कारण यह उक्त हेतु स्वरूपासिद्ध भावासिद्ध तथा विशेपण आदिसे असिद्ध नहीं है । तथा उक्त हेतु-सर्वशरूप जो अपना पक्ष है उसको छोड़कर सर्वज्ञका अभावस्वरूप जो विपक्ष है उसको सिद्ध नहीं करता है। इस कारण विरुद्ध भी नहीं है। और जैसे “सर्वज्ञके सद्भावरूप अपने पक्ष में रहता है वैसे सर्वज्ञके अभावरूप विपक्षमें नहीं रहता है; इस कारण उक्त हेतु अनेकान्तिक अर्थात् व्यभिचारी भी नहीं है। और प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे बाधित नहीं है; इस लिये कालात्ययापदिष्ट भी नहीं है । तथा सर्वज्ञको न माननेवाले जो भट्ट और चार्वाक हैं, उनके सर्वझके सद्भावको सिद्ध करता है इस कारण अकिंचित्कर भी नहीं है । इस प्रकारसे 'अनुमानका विषय होनेसे' यह हेतु वचन है सो, असिद्ध विरुद्ध, अनैकान्तिक, अकिंचित्कररूप जो हेतुके दूषण हैं उनसे रहित है। इस कारण सर्वझके सद्भावको सिद्ध करता ही है । इस उक्त प्रकारसे सर्वज्ञके सद्भावमें पक्ष, हेतु, दृष्टान्त, उपनय और निगमन रूपसे पांच अङ्गोंका धारक अनुमान जानना पाहिये । और जैसे नेत्रहीनं पुरुषको दर्पण (शीशे) के विद्यमान होनेपर भी प्रतिबिंबोंका पृष्न्यसंग्रहः। -- - 1 लोचनस्थानीयसर्वसतागुणरहितपुरुपम्यादर्शनत्यानीयवेदमारने फपिताना प्रतिविम्य- नीयपरमाण्वाशनन्तसूरमपदार्थाना कापि काले परिशा न भवति । तयाचोरा "पन्न स्त स्वयं प्रला शास्त्रं तस्य फरोति किम । लोचनाम्या विदीनाय दर्पण: किरि- ति ॥ १॥" इति संक्षेपेण सर्वशासिद्भिरण योद्धव्या । एवं पदस्य पिण्यरूपस्य याने यभूतस्य सकलात्मनो जिनभट्टारकस्य व्याख्यानरूपेण गाया गता । अथ सिद्धसशनिजपरमात्मतत्वपरमसमरमीभावलगत्य रूपातोतनियमानत्य म्पर्येण कारणभूतं मुक्तिगतसिद्धभक्तिरूपं णमो सिद्धार्ग' पनि पदोगारणलक्षणं याप- थं ध्यानं तस्य ध्येयभूतं सिद्धपरमेष्टिस्वरूपं कथयतिः- कम्मदेहो लोयालोयम्म जाणी दहा । पुरिमायारो अप्पा सिद्धो झाएह लोयनिहरल्यो । ५१ ॥ व्याख्या । 'ण कम्मदेहो' शुभाशुभमनोवचन फायक्रियाम्पस्य समानामियानः न नहीं होता. इसीप्रकार नेग्रो स्थानभून जो सर्वशताप गुण है इसमें इन पको दपण के स्थानभूत जो वेदनात्र उसमें कोहए जो प्रतिषियोंके गानभूत रमाणु आदि अनन्त सूक्ष्म पदार्थ हैं. उनका किसी भी फामें दान नहीं होगा। । ही कहा है कि-"जिस पुरुपये, म्वयंबुद्धि नहीं है, उसका शान्न त्या मार कर सकता १ क्योंकि नेत्रोंसे रहित पुस्पले दर्पण क्या उपफार फरंगा ? मावार्थ--जैसे नाहीन रुपको दर्पणसे कुछ लाभ नहीं इसीप्रकार बुद्धिमान पुरुषको सारसे कोई काम गर्छ 1१। इस प्रकार यहां संक्षेप से सर्वशकी सिद्धि जानना चाहिये। ऐसे परम्प, पिजन्य और रूपस्य इन तीनों ध्यानोंमें ध्येयभूत (ध्यान करने योग्य ) जो सफल आमा गरको जिनेन्द्र भट्टारक हैं, उनके व्याख्यानरूपसे या, गाममा हुई ||५० ।। अप सिद्धों के समान जो परमात्मत्यापम परमसमरसांमागको पारमा फरार जो रूपातीत नाम निश्चय ध्यान उस सानांत यानी परंपराले बारा-में जो सिद्ध परमेष्ठी, उनकी भकि-"मो मिशा" इस पर भगका धारक जो पदत्यम्यान है. उस परमपानर पानी मिलती है समय स्वरुपका कपन करते है- गाथाभावार्थः :---न होगमा पररूर द. शि. म पासका जानने देगनेवाला, पुरा भागारका भE - और मिनार माजी आमा वा मित परमेष्ट्री फार मुम का मान. इन कार निस्कन (शारीरतिर मिद्ध पाने माना। भारपाय:-ट्टिकामदेवो' -राम मन परून कोर :, न इस सन्दसे को जाने योग्य ete () ध्वन्यसंप्रातः। . पनानाविकल्पजालत्यागेन निगुमिलनणरूपातीतध्याने स्थित्या प्यायन ई भत्या मिति ।। ५१।। एवं निष्करसिद्धपरमेष्ठिन्यान्यानेन गाथा गता ।। अथ निरुपाधिमुद्धात्मभावनानुभूयविनाभूतनिमयपळापारलमणमा निमययानन्य परया कारणभूतं निश्चयव्यवहारपत्राचारपरिणताचार्यमफिरूपं 'जमो आयरियागं' । पदोशारणलक्षणं यत्पदरबध्यानं तस्य ध्येयभूतमाचार्यपरमेष्टिनं फथयतिः- दंसणणाणपहाणे वीरियचारित्तवरतवायारे । अप्पं परं च जुनड़ सो आयरियो मुणी झेमो ॥ ५२ ।। 'दसणणाणपहाणे वीरियचारित्तवरतवायारे' मन्यग्दर्शनशानाने योचारित्रपरगा. परणाचारेऽधिकरणभूते 'अप्पं परं च मुंबई' आत्मानं परं शिष्यजनं च योऽमी जयति सम्बन्धं करोति 'सो आयरियो मुगी क्षेओ', स फरमण भागायों गुनिग्न- धनो ध्येयो भवति । तथा हि-भूतार्थनयविषयभूतः मुद्धममगसारसदपान्यो भाव- द्रव्यकर्मनोकर्मादिसमस्तपरद्रव्येभ्यो भिन्नः परमचैतन्यविलासरणः स्पामुद्रात्लेवो- देय इति रुचिरूपसम्यन्दनं, तत्राचरणं परिणमनं निशयदर्शनापारः । सत्य गुहा- . पूर्ण मनोरथोंरूप अनेक विकल्पोंका समूा उसका त्याग करके और मन, वपन पया य इन तीनोंकी गुप्तिस्वरूप जो रूपातीत प्यान है, उसमें स्थित होकर प्यानो ॥५१॥ अब उपाधिरहित जो शुद्ध आत्माको भावना तया अनुभूति ( अनुभव ) का साना- पर है उसमें व्याप्तिको धारण करनेवाला जो निमय नयानुसार पाच प्रकारका आधार की है लक्षण जिसका ऐसा जो नियध्यान नम नित्रयम्यानका परंपरा कारणभूत, नभय तथा व्यवहार इन दोनों प्रकार पाच आपारो परिणत (शापर या नाहीनामे भाचार्य परमेष्टी उनको भफिरूप और "णमो आपरिया' इम पर समापन रने (बोलने) रूप लक्षणका घारफ ऐसा जो पदमान उस पदापमान यभूत जो मापार्य परमेष्ठी हैं उनके स्वरूपका निरूपा करते हैं- गाथाभावार्थ:-दर्शनाचार. १, सानाचार २, पीयांचा पारिवागार और गर- रजाचार ५ इन पांचों आचारों में जो आप भी करते हैं, जो कि मी गांत है ऐसे आचार्य-मुनि ध्यान करने योग्य ।।५।। व्यापार्थः- "दसणणाणपहाणे वारिपचारि नावाचा मामा रांनादार और सम्माचार प्रधान लियोनार Har- नापारमें "अपरं च जुन भानामा और tarik को आपरिओ मुणी सेना के पूर्व अधार गरेर पानीमा ते हैं। इसका शिलारसे या कि, भूमा fear पर, १६८ श्रीमद् राजचन्द्रजैनशाखमालायाम् - त्मनो निरुपाधिस्वसम्वेदनलक्षणभेदज्ञानेन मिथ्यात्वरागादिपरभावेभ्यः पृथकपरिच्छेदनं सम्यकज्ञानं, तत्राचरणं परिणमनं निश्चयज्ञानाचारः। तत्रैव रागादिविकल्पोपाधिरहित- स्वाभाविकसुखास्वादेन निश्चलचित्तं वीतरागचारित्रं, तत्राचरणं परिणमनं निश्चयचारि- त्राचारः । समस्तपरद्रव्येच्छानिरोधेन तथैवानशनादिद्वादशतपश्चरणबहिरङ्गसहकारिका- रणेन च स्वस्वरूपे प्रतपनं विजयनं निश्चयतपश्चरणं, तत्राचरणं परिणमनं निश्चयतपश्चर- णाचारः । तस्यैव निश्चयचतुर्विधाचारस्य रक्षणार्थ स्वशक्त्यनवगृहनं निश्चयवीर्याचारः। इत्युक्तलक्षणनिश्चयपञ्चाचारे तथैव "छत्तीसगुणसमग्गे पंचविहाचारकरणसन्दरिसे । सिस्साणुग्गहकुसले धम्मायरिए सदा वंदे । १।" इति गाथाकथितक्रमेणाचाराराधना- दिचरणशास्त्रविस्तीर्णबहिरङ्गसहकारिकारणभूते व्यवहारपश्चाचारे च स्वं परं च योजय- - 'शुद्धसमयसार' इस शब्दसे कहने योग्य, भावकर्म-द्रव्यकर्म-नोकर्म आदि जो समस्त पर पदार्थ हैं उनसे भिन्न; और परमचैतन्यका विलासरूप लक्षणका धारक ऐसा जो निज शुद्ध आत्मा है वही उपादेय ( ग्रहण करने योग्य ) है, इस प्रकारको रुचि होनेरूप सम्यग्दर्शन है; उस सम्यग्दर्शनमें जो आचरण अर्थात् परिणमन करना है उसको निश्चयदर्शनाचार कहते हैं । १ । उसी शुद्ध आत्माका जो उपाधि रहित स्वसंवेदन (अपने जानने ) रूप. भेदशानद्वारा मिथ्यात्व राग आदि परभावोंसे भिन्न जानना है वह सम्यग्ज्ञान है; उसमें जो आचरण (परिणमन) करना अर्थात् लगना है वह निश्चयज्ञानाचार है। २। उसी शुद्ध आत्मामें राग आदि विकल्पोंरूप उपाधिसे रहित जो स्वभावसे उत्पन्न हुआ सुख है उसके आस्वादसे निश्चल चित्तका करना है उसको वीतरागचारित्र कहते हैं; उसमें जो आचरण करना है वह निश्चयचारित्राचार कहलाता है । ३ । समस्त परद्रव्यों में इच्छाके रोकनेसे, इसीप्रकार अनशन, अवमौदर्य आदि बारह प्रकारके तपको करनेरूप बहिरंग- सहकारीकारणसे जो निज स्वरूपमें प्रतपन अर्थात् विजयन है वह निश्चयतपश्चरण कह- लाता है । उसमें जो आचरण अर्थात् परिणमन है उसको निश्चयतपश्चरणाचार कहते हैं । ४ । इन पूर्वोक्त दर्शन, ज्ञान, चारित्र और तपश्चरणरूप भेदोंसे चार प्रकारका जो निश्चय आचार है; उसकी रक्षाके लिये जो अपनी शक्ति (ताकत ) का नहीं छिपाना है वह निश्चयवीर्याचार है । ५ । ऐसे कहे हुए लक्षणोंका घारक जो निश्चयनयसे पांच प्रकारका आचार है उसमें, और इसीप्रकारसे "छत्तीस गुणोंसे सहित, पांच प्रकार के आचारको करनेका उपदेश देनेवाले, तथा शिष्योंपर अनुग्रह (कृपा.) रखने में चतुर ऐसे जो धर्माचार्य है उनको मैं सदा वंदता हूं । १।" इस गाथामें कहे हुए क्रमके अनुसार. मूलाचार, भगवती आराधना आदि चरणानुयोगके शास्त्रोंमें विस्तारसे कहे हुए बहिरंग: सहकारीकारणों रूप जो व्यवहारनयसे पांच प्रकारका.आचार है उसमें जो अपनेको तथा परको लगाते हैं अर्थात् आप उस पंचाचारको साधते हैं और दूसरोंको सघाते हैं वे.

पृहद्रव्यसंपा। 'नुष्टाने सम्बन्धं फरोति स प्राचार्यों मवति । स च पदस्ययाने यातयः । इत्यापा- :परमेष्ठिन्याख्यानेन सूत्रं गतम् ।। ५२ ।। अय स्वशुद्धात्मनि सोमनमभ्यागोडम्यामो निगायत्वाप्पायन्तामणनिश्चयायानम्प गरम्पर्यण कारणभूतं भेदाभेदरनमयादिनच्चोपदेश परमोपाध्यायभक्तिरूपं गमो य- ग्लायाणं' इति पदोगारगलाणं या पदध्यानं, नस्य येवभूतमुपाध्याय गुनी कथयति- जो रयणतयजुचो णि धम्मोपदेस किरदी। मो उयज्झाओ अप्पा जदिवरवमही मो तम्स ।। ५३ ॥ व्याया- 'जो रयणतयजुत्तों योऽसौ बाह्याभ्यन्तररसयानुष्ठानेन युग: परिणतः । 'णि धम्मोपदेसणे जिरदो पद्रव्यपारिनकायमातत्यनवरदा गाये स्वमुदाग- द्रव्यं ग्यशुद्धजीवास्तिकार स्वशुद्धात्मनश्च म्बशुद्धात्मपदार्थमेवोपादेवं शेष नहे, नयो- पामझमादिधर्म च नित्यमुपदिशति चोऽसो म नित्यं धर्मोपदेशने निरको भग्यने । 'यो भयज्याओ अप्पा' स अत्यंभूत आत्मा प्रमाणाय इति । पुनरपि फियिशिष्टः- अदियर- पाचार्य कहलाते हैं। और वे आपार्य परमेष्टी पदन्यायानमें ध्यान करने योग्य हैं। इसप्रकार आचार्यपरमेष्टो व्याख्यानसे १ गावातून ममाम हुआ ॥ ५२ ।। अब निज मुद्ध आरमामे जो राम (पारंपार ) अभ्यास करना है नमो नित्रय বাখৰ কট । ন নিমবাযা হয়ঞ্জা , তা নিলাল ঃ परंपरासे कारणभूत, भेद अभेदरूप रक्य आदि तरयांका उपदेश पारनेवा, भीर परम- पायायमतियाप "मो उबताया" स पद पवारणाप पन्यापान के देगभून ( ध्यान करने योग) मे जो पापाय परमेडी हैं उनके पापा कम करते हैं.... गाथाभावार्थ:-जो सम्यग्दर्शन, मान और पारिताप रमप्रय माहिम है; मिरर धर्मका देश भने नयर : यह आमा सुनीबरों में प्रधान पापाय पर Emi है। इसहिद सय अर्थ मैं नमस्कार करना हूं ॥ १३ ॥ ध्याम्पार्थ-"को स्यणचपजुत्तो" जो पाप गा सायगर रे अनुदान (मापने ) में गुरत है या निसरदार सरो ये है, "पिम पम्मोपदेस मिन्दो" शॉप, कदादिः स्य, पाय, सय सरच पोर नो पानी में निभ-गुन सामान्य, नि- सोमालिका मय निज-AMRO परादेव कोमr विका मामधार मा आदि सपका को निन्नाले निय देने जसा पान Mitra "ला" मा Eि" को RE- दुद मासा र रनेलर रिते मरदान - २०० श्रीमद् राजचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम् वसहो' पश्चेन्द्रियविषयजयेन निजशुद्धात्मनि यत्नपराणा यतिवराणां मध्ये वृषभः प्रधानो यतिवरवृषभः। 'णमो तस्स' तस्मै द्रव्यभावरूपो नमो नमस्कारोऽस्तु । इत्युपाध्यायपर- मेष्ठिव्याख्यानरूपेण गाथा गता ।। ५३ ।। अथ निश्चयरत्नत्रयात्मकनिश्चयध्यानस्य परम्परया कारणभूतं बाह्याभ्यन्तरमोझमार्ग- साधकं परमसाधुभक्तिरूपं णमो लोए सव्वसाहूर्ण' इति पादोचारणजपध्यानलक्षणं यत् पदस्थध्यानं तस्य ध्येयभूतं साधुपरमेष्ठिस्वरूपं कथयतिः- दंसणणाणसमग्गं मग्गं मोक्खस्स जो हु चारित्तं । साधयदि णिचसुद्धं साहू स मुणी णमो तस्स ॥ ५४ ।। व्याख्या-'साहू स मुणी' स मुनिः साधुर्भवति । यः किं करोति-'जो हु साध- यदि' यः कर्ता हु स्फुटं साधयति । किं 'चारित्तं' चारित्रं। कथम्भूतं 'दंसणणाणसमग्गं' वीतरागसम्यग्दर्शनज्ञानाभ्यां समयं परिपूर्णम् । पुनरपि कथम्भूतं 'भग्गं मोक्खस्स' मार्गभूतं । कस्य मोक्षस्य । पुनश्च किं रूपं 'णिचसुद्धं' नित्यं सर्वकालं शुद्ध रागादिरहितम् । 'णमो तस्स' एवंगुणविशिष्टो यस्तस्मै साधवे नमो नमस्कारोस्त्विति । तथाहि-"उद्यो- तनमुद्योगो निर्वहणं साधनं च निस्तरणम् । गवगमचरणतपसामाख्याताराधना सद्भिः । प्रधान ऐसे "उवज्झाओ" उपाध्याय परमेष्ठो हैं । "णमो तस्स" उन उपाध्याय परमेष्ठि. योंके अर्थ मेरा द्रव्य तथा भावरूप नमस्कार हो। इस प्रकार उपाध्याय परमेष्ठोके : व्याख्यानसे एक गाथासूत्र पूर्ण हुआ ॥ ५३ ।। अब निश्चयरत्नत्रयस्वरूप जो निश्चयध्यान है. उसके परम्परासे कारणभूत, बाह्य तथा अभ्यंतररूप मोक्षमार्गके साधनेवाले और परमसाधुभक्तिस्वरूप जो "णमो लोए: सब- साहूणं" यह पद है, इसके बोलने-जाप करने और ध्यान करनेरूप लक्षणका धारक जो पदस्थ ध्यान है उसके ध्येयभूत ऐसे जो साधु परमेष्ठी हैं उनके स्वरूपका निरूपण करते हैं- गाथाभावार्थ:-जो दर्शन और ज्ञानसे पूर्ण, मोक्षका मार्गभूत, सदा शुद्ध ऐसे चारित्रको प्रकटरूपसे साधते हैं वे मुनि साधु परमेष्ठी हैं, उनके अर्थ मेरा नमस्कार हो ॥५४॥ व्याख्यार्थः-"जो" जो 'हु'. भले प्रकारसे "दंसणणाणसमग्गं" वीतराग सम्या : ग्दर्शन और ज्ञानसे परिपूर्ण "मग्गं मोक्खस्त" मोक्षका मार्ग' ( कारण ) भूत, "णिञ्च- सुद्धं" सदा शुद्ध अर्थात् र अर्थात् राग द्वेषादि रहित ऐसे "चारित्तं" चारित्रको "साधयदि" साधते हैं "साहू स मुणी" वे मुंनि साधु हैं। णमो तस्स" इन पूर्वोक्त गुणों से सहित जो हैं उन साधु परमेष्ठियोंके अर्थ नमस्कार हो । सो हो स्पष्ट रूप से दिखलाते हैं कि-"दशन, मान, चारित्र और तप इनका जो उद्योतन, उद्योग, निर्वहण, साधन और निस्तरण उसको सन् पुरुषोंने आराधना कहा है। इसे ओछिन्दसे कही हुई जो .. - - --- and- पृव्यसंग्रहः। सत्यवचनपरिहारेऽपि सत्यवचनप्रवृत्तिरस्ति । तथैव पादत्तादानपरिहारऽपि दत्तादाने प्रवृत्तिरलोत्याकदेशप्रमृत्यपेजया देशातानि तेपानेकदेशनताना निगुचिरागनिर्वि- कल्पसमाधिकाले त्यागः । न च समस्त मुभाशुभनियमिलनगन्य नियमनोनि । त्याग: फोऽर्थः । यथैव हिंसादिरूपारवेषु नितिम्तयैकदेशातेप्यादि । कस्मादिनि चेन-निगुना. पत्यायो प्रवृत्तिनिवृत्तिम्पविकल्पन्य स्वयमेवापकानां नास्ति । अयया यानुनदेव निश्रयनतम् । फरमान--सर्वनितिनादिति । गोऽपि पटिकायेन मी गती भरताको मोऽपि जिनदीक्षा गृहीत्वा विषयफायनियत्तिमा नगमानं मनपरिगानं कृत्वा पजा- दोपयोगत्यरूपरमप्रयात्मक निश्चयत्रताभिधानं वीतरागलामायिकमा निर्षिकममाया स्थित्या केबलमा लयवानिति । पर फिन्तु तस्य लोकारत्यासोका सपरिगान जानन्तीति । तदेय भरतम् श्रीराविधानं कम्यते । ६ भगयन जिनोमानानन्ना है उनका स्वीकार ही किया गया है और त्याग नहीं किया गया। प्रमिट जो सादि महासन हैं, वे एकदेवरूप कैसे हो गये ? ऐमी मंशा करो तो समाधान यह फि, अहिंसा महाप्रतमें वापि जीवोंके पास ( मारने ) में निानि (दिलाना ) ६; तथापि जोयोकी रक्षा करने में प्रति मी प्रकार सलमहाग में गामि अमर धनका त्यागी, तो भी सत्यागनमें प्रगति । और अजीमान कायम दिये हुए पदार्थ, पक्षण करने का क्या ना भी दिने र पहायक प्राल करने में प्रति । इत्यादि परदेशप्रशिकी अपेक्षासे ये पापा महामना- मारप प्रतोंफा मन, बगन और कायरी गुभि स्यम्रो विकाररदिन माग नमरे, समय में स्वाग। और नमन मनमा अशुभको निनिकर Eि नमको माग नहीं प्रश्न-यागमनका क्या है ? उत्तर- रूप पारों में निपना मी प्रकार जो महिमा आदि पपEARE मनमें रदिनाना है, ना हा माग समापन Trmir याग रिस कारण होता ? प्रेमा पूती को 7 मा, मि, मन, पवन और न तौनीको गुजिपी अवमा ममें सीमा निरिकर भरत या नहीं है. पांग मन, सपन और रायको गुलिम में प्रकारका मी विकास नहीं होगा सौर आदिमादि महान पर विध रूप न माने ! सोरजी बोला :) HITECीय मोरपान को अना (म) Fewa Tirst कमी पगार पर ET भारत और Aur ART: भारमिदार पार +MASTE " "न २१० श्रीमद् राजचन्द्रजैनशाखमालायाम् भरतचक्रिणः कियति काले केवलज्ञानं जातमिति श्रीवीरवर्द्धमानस्वामितीर्थकरपरमदेव- समवसरणमध्ये श्रेणिकमहाराजेन पृष्टे सति गौतमस्वामी आह-"पत्रमुष्टिभिरुत्पाद्य नोट्यन् बन्धस्थितीन् कचान् । लोचानन्तरमेवापद्राजन् श्रेणिक केवलम । १" अत्राह शिष्यः । अद्य काले ध्यानं नास्ति । कस्मादिति चेत् उत्तमसंहननाभावाद- शचतुर्दशपूर्वगतश्रुतज्ञानाभावाच्च । अत्र परिहारः । शुक्लध्यानं नास्ति धर्मध्यानमस्तीति । तथा चोक्तं मोक्षप्राभृते श्रीकुन्दकुन्दाचार्यदेवैः "भरहे दुस्समकाले धम्मज्झाणं हवेद णाणिस्स । तं अप्पसहावठिए ण हु मण्णइ सो दु अण्णाणी । १ । अजवि तियरणसुद्धा अप्पा ज्झाऊण लहइ इंदत्तं । लोयंतियदेवत्तं तत्थचुदा गिबुदि जति । २१ तथैव तत्त्वानुशासनग्रन्थे चोक्तं "अत्रेदानी निषेधन्ति शुक्लध्यान जिनोत्तमाः । धर्मध्यानं पुनः प्राहुः श्रेणीभ्यां प्राग्विवर्तिनाम् । १ ।" यथोक्तमुत्तमसंहननाभावात्तदुत्सर्गवचनम् ।- कारण लोग श्रीभरतजीके व्रतपरिणामको नहीं जानते हैं। अब उसी श्रीभरतजीकी दीक्षाके विधानका कथन करते हैं । श्री वीर वर्द्धमानस्वामी तीर्थंकर परमदेवके समवसरणमें श्रेणिक महाराजने प्रश्न किया कि 'हे भगवन् ! श्रीभरतचक्रवर्तीके जिनदीक्षाको ग्रहण करनेके पीछे कितने कालमें केवलज्ञान उत्पन्न हुआ' इस पर श्रीगौतमस्वामी गणघरदेवने उत्तर दिया कि "हे श्रेणिक राजन् ! बन्धके कारणभूत जो केश (बाल) हैं उनको पांच मुष्टियोंसे उखाड़कर तोड़ते हुए ही अर्थात् पंचमुष्टी लोच करनेके अनन्तर ही श्री भरतचक्रवर्ती केवलज्ञानको प्राप्त हुए । १।" अव यहांपर शिष्य कहता है कि, भो गुरो! इस पंचम कालमें ध्यान नहीं है। क्यों नहीं है ? इस प्रश्नका उत्तर यह है कि इस कालमें उत्तमसंहननका अर्थात् वज्र, वृषम और नाराच संहननोंका अभाव है और दश तथा चौदहपूर्व पर्यन्त श्रतज्ञानका अभाव है। अब आचार्य महाराज इस शिष्यकी शंकाको दूर करते हैं कि, हे शिष्य ! इस समयमें शुक्लध्यान नहीं है परंतु धर्मध्यान तो है ही है । सोही श्रीकुन्दकुन्द आचार्यस्वामी मोझ. प्राभृत (मोक्षपाहुड )में कहते हैं कि, "भरतक्षेत्रमें जो दुःषमा अर्थात् पंचमकाल है उसमें ज्ञानी जीवके धर्मध्यान होता है। उसको जो कोई आत्माके स्वभाव में स्थित नहीं मानता है वह अज्ञानी है । १ । क्योंकि इस समय भी जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूप रत्नत्रय है उससे शुद्ध हुए जीव आत्माका ध्यान करके इन्द्रप- नेको अथवा लोकान्तिकदेवपनेको प्राप्त होते हैं। और वहांसे चयकर नरपर्यायको ग्रहण करके उसी भवमें मोझको जाते हैं । २।" और इसीप्रकार तत्त्वानुशासन नामक अन्यमें भी कहा है कि, "इस समय (पंचमकाल )में श्रीजिनेन्द्रदेव शुक्लध्यानका निषेध करते हैं; अर्थात् इस समयमें शुक्लध्यान नहीं होता ऐसा उपदेश देते हैं; और उपशम- श्रेणी तथा झपकश्रेणी इन दोनों श्रेणियोंसे पहले रहनेवाले जीवोंके धर्मध्यान होता है. ऐसा कयन करते हैं । १।" और हे शिष्य ! तुमने जो यह कहा कि इस कालमें उत्तम - पृहद्रव्यसंग्रहः। पवादव्यान्यानेन पुनरुपशमक्षपण्योः शुक्लप्यानं भवति. नगोचममंहननेनंय । पूर्वगुणस्थानादधस्तनेषु गुणन्यानेषु धर्मभ्यान, तपादिमग्रिको चमसंहननामायेऽप्यन्ति- रविपसननेनापि भवति । तदप्यु तग्रंथ तत्यानुमासने “यत्युनत्र एकागम्य ध्यान- मेत्यागमे वनः श्रेयोध्यान प्रतीत्योक्तं नन्नोऽधम्तानिषेधकम् । १ । ययोर वाचतुर्दग- बंगलभूतमानेन ध्यानं भवति नदप्युत्सर्गवचनम् । अपवादनपायानेन पुनः परम- मति निगुप्तिप्रतिपादकसारभूतभुतेनापि ध्यानं भवति येवलहान । योवनपयार- गाल्यानं नास्ति नदि "तुसमास घोसन्तो सियदो फेवली जायो" इत्यादिगन्धयां- गपनादिमाणितं व्याख्यानं फचं पटते ? अय मतं-पत्रसमितित्रिगुमिप्रतिपादयं व्यस्तमिति जानाति । २ मा पुनः सर्वमन्ति । नवं वरूयम् । यदि पनसमितिविमिनतिपायक प्रग जानाति गाई 'मा रूमा मा नुमाः इत्येकं पदं किं न जानाति? तत एव जायतेऽपचनमार पनाग- मेय मायभुनं, त्यानं पुनः किमपि नास्ति । इदन्नु गाणयानमरमामिन कल्पिानेय । संहननका अभाव इन फारण ध्यान नहीं होता सो यह उत्सर्गय गन । अपवादान व्याख्यानसे तो उपशमणी तवा पकक्षेणी में शुक्लध्यान होता है और यह उपाममंथना से ही होता है। और अपूर्वकरण नामक ८ गुणस्तानसे नायेफ जो गुणम्यान उनमें धर्मशान होता है। और यह धर्मप्यान यस १, पम २, नाराच ३, इन सादिष नोन उत्तम साहनीका अमाय दोनेपर अन्त के जो बदनारा १, हीटर. २ र स्फाटिक ३ नामक तीन मंहनन परसे भी होता है। यह पिप भी मीशानुसा- सन नामक अन्यमें मारा कि, "और जो पर फार (संघनन) 2. भारगर ध्यान होना"ऐसा आगममें मन पाह परसा मगा पर जोक गाना Mirrit- पर करफ पहा. कारण या गपन नायक गुणयानों में धर्म माना निर- नेवाला नही है । समा जो ऐसा कहा कि 'दया नया पोरापूर्ण न मान यह भी मासमा पनि और पाय यासान irre और मीन गुमिका प्रनिपादन करनेवासा मारभूत MATR समे भी पानगर में RTI am । सो पा याद हास्यान न होनी " मार (स्याम ) ले हर मशिनि मुनि नगदे" inar . सदाचित मा.लि नि पदमति न Trai RTE नेवा( :) हाल में TET High को दिन पर frate ETA ( दोन मामा" arriririt REET म INEM २१२ श्रीमद् राजचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम् तञ्चारित्रसारादिग्रन्थेष्वपि भणितमास्ते । तथाहि-अन्तर्मुह दूर्व ये केलझानमुत्पाद- यन्ति ते क्षीणकपायगुणस्थानवर्तिनो निर्ग्रन्थसंज्ञा ऋपयो भण्यन्ते । तेषां चोकर्पण चतुर्दशपूर्वादिश्रुतं भवति, जघन्येन पुनः पश्यसमितित्रिगुप्तिमात्रमेवेति । अथ मत-मोक्षार्थ ध्यानं क्रियते न चाध काले मोनोऽस्ति; ध्यानेन किं प्रयोजनम् ? नैवं-अद्य कालेऽपि परम्परया मोक्षोऽस्ति । कथमिति चेत्, स्वशुद्धात्मभावनावलेन संसार- स्थिति स्तोकां कृत्वा देवलोकं गच्छति, तस्मादागत्य मनुष्यभये रत्नत्रयभावना लब्ध्वा शीघ्र मोक्षं गच्छतीति । येऽपि भरतसगररामपाण्डवादयो मोक्षं गतास्तेपि पूर्वभवेऽभे- दरत्नत्रयभावनया संसारस्थिति स्तोकां कृत्वा पश्चान्मोक्षं गताः। तद्भवे सर्वेपा मोमो भव- तीति नियमो नास्ति । एवमुक्तप्रकारेण अल्पश्रुतेनापि ध्यानं भवतीति ज्ञात्वा किं कर्त्त- व्यम्-"वधवन्धच्छेदादे?पाद्रागाच परकलबादेः । आध्यानमपध्यानं शासति जिनशा- सने विशदाः । १ । संकल्पकल्पतरुसंश्रयणात्त्वदीयं चेतो निमज्जति मनोरथसागरेऽस्मिन् । जाना जाता है कि पांच समिति और तीन गुप्तियों रूप जो आठ प्रवचन मातायें हैं उन प्रमाण ही उनके भावश्रुत था और द्रव्यश्रुत कुछ भी नहीं था। और यह व्याख्यान हमने ही नहीं कल्पित किया है। किंतु 'चारित्रसार' आदि शास्त्रों में भी यह वर्णन किया हुआ है। सो ही दिखलाते हैं-अन्तर्मुहूर्त के पीछे जो केवलज्ञानको उत्पन्न करते हैं वे क्षीणकषाय नामक १२ वें गुणस्थानमें रहने वाले निम्रन्थ संज्ञाके धारक ऋपी कहलाते हैं, और उनके उत्कृष्टतासे ग्यारह अंग चौदह पूर्वपर्यन्त श्रुतज्ञान होता है, और जघ- न्यरोतिसे पांच समिति तथा तीन गुप्तियों मात्र ही भुतज्ञान होता है। अव कदाचित् तुम्हारा यह मत हो कि, मोक्षके लिये ध्यान किया जाता है और मोक्ष इस पंचम कालमें होता नहीं है इस कारण ध्यानके करनेसे क्या प्रयोजन है। सो यह सिद्धान्त भी ठीक नहीं । क्योंकि, इस पंचमकालमें भी परंपरासे मोक्ष है । परंपरासे मोक्ष कैसे है ? ऐसा पूछा तो उत्तर. यह है कि; ध्यानी पुरुप निजशुद्ध आत्माको भावनाके बलसे संसारकी स्थितिको अल्प करके अर्थात् बहुतसे कर्मोंकी निर्जरा करके स्वर्गमें जाता है । और वहांसे मनुष्यभवमें आकर रत्नत्रयकी भावनाको प्राप्त होकर शीघ्र ही मोक्षको चला जाता है और जो भरतचक्रवर्ती, सगरचक्रवर्ती, रामचंद्रजी तथा पांडव अर्थात् युधिष्ठिर, अर्जुन और भीम आदि मोक्षको गये हैं। उन्होंने भी पूर्वभवमें अभेदरत्नत्रयकी भावनासे अपने संसारको स्थितिको घटाली थी। इस कारण इस भव में मोक्ष गये । उसी भवमें सबके मोक्ष हो जाता है ऐसा नियम नहीं है। ऐसे कहे हुये प्रकारसे अल्पश्रुत- मानसे भी ध्यान होता है । यह जानकर क्या करना चाहिये ? "द्वपसे वष (मारना) वन्ध ( बांधना) छेद (किसी अंगको काटना) आदिका और रागसे परस्त्री आदिका जो चिंतपन करना है, उसको जिनमतमें निर्मल बुद्धिके धारक आचार्य अपभ्यान ( बुरा भ्यान ) कहते हैं । १। हे जीव संकल्परूपी कल्पवृक्षका आप्रय करनेसे तेरा चित्त इस । ।

२.in-maNainitalaminetrimmami.. वृहद्न्यसंप्रदः। २२१ -- - गवना पर्यायो भण्यते तर्हि द्रव्यपीयरूपधर्मद्वयाधारभूतस्य जीवमिंगो मोरपनाये गते मति यथा ध्यानभावनापीयरूपेण पिनाशो भवति, नया ध्येयभूतस्य जीवन युद्धपारिणामिकलक्षणभावद्रव्यरूपेणापि विनाशः प्राप्नोति । न च द्रव्यरूपेण विना- iiऽस्ति । ततः स्थितं शुद्धपारिणामिकमावेन बनामोजो न भयत इति । अधात्मशब्दार्थः कथ्यते । अतधातुः सातत्यगमनेऽयं वा । गमनमदनात्र शान पण्यते 'सर्वे गत्या मानार्धा इति वचनात् । तेन फारणेन यथासंभवं शानमुपादिगु- पु भासमन्तात् अतति वर्तते यः स आत्मा भण्यते । अथवा शुभाशुभमनोयधनकार ज्यापर्यथासम्भवं तीवमन्दादिरूपेण आममन्तादतति वर्ती यःम मामा ! अन्यथा उत्पादव्ययधीत्यरासमन्तादवति वर्तते यः स आत्मा । किा-याकोऽपि चन्द्रमा नानाजलपटेषु दृश्यते व्यकोऽपि जीयो नानागरीरेणु तिष्ठत्तीति पनि त न पटगे । स्मादिति चेत्-चन्द्रफिरणोपाधिवशेन घटस्वजलपुद्गला एव नानापकासारेण परि- अयमोन है वह तो जीवमें पहले ही विद्यमान है। यह परमनियमोन जीपमें स्त्र होगा ऐसा नहीं है। क्या राग आदि विफश्पोंसे रहित मोनका कारणभूत जो प्यान- भावनापर्याय है, उसमें पही मोक्ष ध्येय होता है। और ध्यान भावनापायल्प देश नहीं है । और यदि एकान्त फरके द्रव्यार्थिफनयसे भी यही मोरफारणभूत म्यानमायना पर्याय फहा जावे तो, द्रव्य और पर्यायरुप दो दो धमाका आधार जो जीपना, मोअपर्याय प्रकट होने पर जैसे ध्यानभावनापर्यावरपसे विनाश होता है, सो प्रकार ध्येयभूत जो जीव है. उसफा शुद्धपारिगामिफटनगभावव्यापसे मी विना माना है । और द्रव्यरूपसे विनाश नहीं । इस कारण शुद्धपारिगामिमापसे जागा और मोम नहीं होता है; यह फयन सिद्ध होगया । अय आत्मा शब्दका अर्थ बदते हैं। अव धातु निरनर गमन करने र वर्चता है और 'सप गमनरूप अर्थ भारत र पा वहां पर गमन शब्द करके शान कहा जाता है। इस कारण जो मामय : आदि गुणोंमें पूर्णरूपसे या पट् आमा । भयया म-अनुम वचन कायके व्यापार नफरफ गवामय गीत मन आदि कामे रता है वह लामा फइलाता है। अगया सादस्वर और गोर रुपसे पता उसको आत्मा ६प होत्रमा बनेकज भर पा र नो पा र अनेक रस में रहया सोपा पलायन पो सो सरह है कि में पाप निरमान जोजफे पुगक है में ही अनेक प्रकार ?

पदयमंत्र अयोग्यपरिहार कथयति:- दयसंगहमिणं मुणिणाहा दोगसंचयनुदा मुदपुगा । सोधगंतु तणुमृत्तधरेण णेमिनन्दमुगिणा मणियं ॥ ५८ ॥ व्याया। "सोधयंतु" मुहं गुयन्तु । ऐ. कशी? "मुनिणादा" मुनिनाया मुनि:- धानाः । फिविशिष्टाः "योगसंचय चुना" निदीपपरमात्मनो विरक्षा दे रागादिलोपा- नव शनिदोपरमात्मादितत्यपरिमानविषये मंगविमोनिश्रमायुना दिता दोष संचय युताः । पुनरपि फयरमूनाः १ "मुगा" यमागरमागमाभिधानसरोन नत्र नदाधारोपनिर्विकारस्यसवेदनशानापमान र पूर्णाः मममाः मुगपूनीः । मंशोधयन्नु ? "दव्यांगमि" शुद्ध करवभावपरमासाहित्यात मंदी - पाहन्न द्रव्यम्प्रदाभिधानं अन्धमिमं प्रन्यनोभूनम । मिति ? पनि " प्रतिपादितो यो प्रन्यः । पेन करसेन ? "मिमुणिना" भोने नियमिधानिदेवा-- भिधानेन मुगिना मन्मदर्शनादिनियावासामारोपणापा । न ? "तनुपरेण" गनुराधरेण, मनु लोग बहनामि गनुनपरगना किया- अय प्रकार अपने सीदत्य (अभिमान ) को दूर करने शिमिम छन्द - कर शासको ममाम करते हैं:- काव्यभावार्थ-पान भार नार (नेमियाद ममि ) में सीमा ल्या काहसको दोपांसे रहित और जानने परिपूनमे आया गुड करे ॥ १८ ॥ ॥ इनि सोनेमिचन्द्रसिद्धानिदेयविनिर्मिती पापा मम || व्याख्यार्थ:- "सोधपतु "लोपतु बुद्ध का परनेवाले गान भूमिमा मुनियों में प्रधान प्रगान भाचार्य है । कामे मापा ? "दोलचमना कर परमामाने मितभारक जो रागादि मन आदि गच्या जानने में माय. यि और शिकार हो । सिर ? "दमा" RR विमान पनाम { ME मसे समापन परमागर्म पारमे जो निसार- भाषा, नमसे परिपूर्ण है। नपा निमकी : "Tinter" शुद-गद एकग्यमारमा परम परमामा गमक : समान द्रव्यमान कर !"म" ram : "" हानिदेवनामुमो rina ... གསྨོས" མཱ་ཁམསྶ་ སཱ ཀ ༣ ཨམྦྷཡ༔:':; ཛཱ་ - का PF का होमोसो समरस (पोहा) महल करनेपर" PREVERोसा हो यों ना जाता है। इसकारण यो है देश र समान सहभारि कति जीवराशिमें एक भीगर' राजपन्द्रजेनशास्त्रमालायाम hti, Pr-TET द्वारागार-गथा देवदत्तमुखोपाधिवशेन नानादर्पणत्यपुट्ट ला My भानामा कारण परिणया, गनेक देवदत्तगुग्लं नानारूपेण परिणतम् । परिणमतीति adirlfrineeriनिम्ह पैरान्यं प्राप्नोतीति । न च गया। किन्तु यदोक एव जीवो भनतिPistry गुणयुःखजीषितगरणायिके प्राप्त तस्मिन्नेव काणे सर्वया जीवितमरणा- Fran भानोतिन भागते । मनात गधेडफोपि समुद्रः कापि भारजलः कापि मिटजलस्तथैकोऽपि जीवः को नितीति। पदापि न पटते । फयमिति चेत् -जलराश्यपेझया तत्रैकावं, न च Hariwarमा सवैकल्पम् । यदि जलपुद्गलापेमया भवत्येकत्वं तर्हि स्तोकजले गृहोते पज सहन निसागाति । ततः स्थितं पोदशवर्णिकासुपर्गराशिवदनन्तज्ञानादिलमगं जीराशि प्रतिम कमीषापेक्षयेति । अध्यात्मशब्दस्यार्थः कम्यते । मिथ्यात्वरा- गानिशमन विधालरूपपरिहारेण स्वशुद्वात्मन्यधि यदनुष्ठानन्तदध्यात्ममिति । एवं मानामती मायानोपसंहाररूपेण गाथा गता ॥ ५७ ॥ और एक साइमा शो है पर बनेफरूप नहीं परिणमा है। इस विषयमें दृष्टान्त कहते है कि से देशवाले मुखरूप उपाधि वशसे अनेक दपंगों में स्थित जो पुदर हैं वे ही NART परिगमले हैं और एक देवदत्तका मुख अनेकरूप नहीं परिणमता है भने सो हि देनाका मुख ही अनेक मुखरूप परिणमता है तो दर्पगस्थित जो देव हो मुखमा समिप है वह चेतनताको प्राप्त होवै; परंतु ऐसा नहीं अर्यात् दर्पन हो हा तिमिर है पर मेजन नहीं है । और भी विशेष यह है कि यदि अनेक सस हो जो हो सो बम एक सोषको सुख, दुःख जोवित और मरग होने व सी इममें सब शोषोंको सुख, दुःख, जोषित और मरण आदि प्राप्त होने पर ऐसा देखने में नहीं लाता है। १५. शो ऐसा रहा है कि, 'जैसे एक हो सन्द कहीं तो सारे जलबाला है, Art: Ke है, सो कार एक हो जोर सय देशों में विरानान है सो यह है A. मोर को होला ? को नहीं पता यह पूलो तो उत्तर यह है कि समुद्रमें जब Fa! से एक है और सबसे कोलशाले एकता नहीं है। यदि जा । ११ इसमें एसा नहीं है । वाम ཅ't ཏཔ་ཝེ་ སྨཙནྡྷོ ཙྩལཎྜལཱ ཙྪནྟགསྶཝཔེ HD REPE करना है तो ཎསྶ་ཎཎསཱནྟོ་ སྟབཨཱ་ སྦྱར་བས་ है बनेका सार वृहद्न्यसंप्रदः। .वना पर्यायो भण्यते तहिं द्रव्यपर्यायरूपधर्मद्वयाधारभूतन्य जीवमिनी मोमपये ते मति यथा ध्यानभावनापर्यायरूपेण विनामो भवति, तथा ध्येयभूनम जोपन पारिणामिफलक्षणभावद्रव्यरूपेणापि विनाशः प्राप्नोति । न च त्यापेण पिना- ऽस्ति । ततः स्थितं शुद्धपारिणामिकमावेन धन्धमोझी न भयव इति । अथात्मशब्दार्थः कथ्यते। अतधातुः सातत्यगमनेऽर्य वर्गते । गमनदेना मान ग्यते 'सर्व गत्या मानार्थी इति वचनात्'। तेन कारणेन यथासंभवं माननुपादिनु- उ भासमन्तात् अतति वर्तते यः स आत्मा भण्यते । अथवा शुभाशुभमनोदचनकाप- गपरथासम्भवं तीवमन्दादिरूपेण आसमन्तादतति वर्चते यः म आमा । अयया पादच्ययधीच्यैरासमन्तादतति वर्तते यः म आत्मा । कि-बयफोऽपि पन्द्रमा नाजलपटेषु दृश्यते तथैकोऽपि जीयो नानाशरीरेषु तिष्ठतीति पदन्ति तनु न अटते । स्मादिति चेत्-चन्द्रकिरणोपाधिवशेन घटस्थजलपुद्गला पय नानाचन्द्राधारेण परि- यमोझ है. वह तो जीवमें पहले ही विद्यमान है। यह परमनियमोदर जीपमें सर गिा ऐसा नहीं है । तथा राग आदि विकल्पोंसे रहित मोक्षफा कारणभूत जो ग्यान- विनापर्याय है उसमें वही मोक्ष प्येय होता है। और प्यान भायनापर्यावरच प्रेम दी है। और यदि एकान्त करके द्रव्या गर्थिकनयसे भी यही मोसकारणभूत ध्यानमायना यि कहा जावे तो, द्रव्य और पर्यायरूप दो दो धोका आधार जोजीनी, मये. अपर्याय प्रकट होने पर जैसे ध्यानभायनापीयरूपसे विनाश होता है, मनी प्रहार यभूत जो जीव है उसका शुद्धपारिगामिफलअगभावद्रव्यरूपसे भी पिनास प्रान का । पीर द्रव्यरूपसे विनाश ६ नहीं । इस फारण शुद्धपारिणामिकभावने गावर का और मोक्ष नहीं होता है; यह कयन सिद्ध होगया । अब आत्मा शब्दका अर्थ कहते हैं। अत धातु निरकर गमन करने का चंता है और 'सय गमनरूप अर्थ धारक धातु जान सय भारदम पर पर गमन शब्द करफेशान कहा जाता है। इस कारण जो समान र गदि गुणों में पूर्णरूपसे वर्तता है, यह मामा । अयया गुम-मम मन चन कायफे व्यापार है इनकरके यथासंभव तीन मद शादि पीकर चंठा है यह मात्मा कहलाता है। अस्या उत्पादन और प्रोन्या रूपसे वत्ता है उसको आत्मा करते हैं। और कितने मामले हो चंद्रमा अनेक जल भरे पटमि देखा जाता है इसी प्रकार : मेक इरोरों में रहता है सो वह उनका कथन पटना नहो । प्रदोंनो दो उत्तर यह कि जलपटों में पत्रमा मसिक ५..... दिमान जो उसके पास होनेर प्रसार माल पर २१६ श्रीमद् राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् णता, नचैकश्चन्द्रः। तत्र दृष्टान्तमाह-यथा देवदत्तमुखोपाधिवशेन नानादर्पणस्थपुटला एव नानामुखाकारेण परिणता, न चैकं देवदत्तमुखं नानारूपेण परिणतम् । परिणमतीति चेत् तर्हि दर्पणस्थप्रतिविम्वं चैतन्यं प्राप्नोतीति । न च तथा। किन्तु यद्येक एव जीवो भवति, तदैकजीवस्य सुखदुःखजीवितमरणादिके प्राप्ते तस्मिन्नेव क्षणे सर्वेपां जीवितमरणा- दिकं प्राप्नोति न च तथा दृश्यते । अथवा ये वदन्ति यथैऽकोपि समुद्रः कापि झारजलः कापि मिष्टजलस्तथैकोऽपि जीवः सर्वदेहेषु तिष्ठतीति । तदपि न घटते । कथमिति चेत् -जलराश्यपेक्षया तत्रैकत्वं, न च जलपुद्गलापेक्षया तत्रैकत्वम् । यदि जलपुद्गलापेझया भवत्येकत्वं तर्हि स्तोकजले गृहोते शेषजलं सहैव किन्नायाति । ततः स्थितं षोडशवर्णिकासुपर्णराशिवदनन्तज्ञानादिलक्षणं प्रत्येक जीवराशिं प्रति न चैकजीवापेक्षयेति । अध्यात्मशब्दस्यार्थः कथ्यते । मिथ्यात्वरा- गादिसमस्तविकल्पजालरूपपरिहारेण स्वशुद्वात्मन्यधि यदनुष्ठानन्तदध्यात्ममिति । एवं ध्यानसामग्रीव्याख्यानोपसंहाररूपेण गाथा गता ।। ५७ ॥ है। और एक चन्द्रमा जो है वह अनेकरूप नहीं परिणमा है। इस विषयमें दृष्टान्त कहते हैं कि जैसे-देवदत्तके मुखरूप उपाधिके वशसे अनेक दर्पणों में स्थित जो पुद्गल हैं वे ही अनेकमुखरूप परिणमते हैं और एक देवदत्तका मुख अनेकरूप नहीं परिणमता है । यदि कहो कि, देवदत्तका मुख ही अनेक मुखरूप परिणमता है तो दर्पणस्थित जो देव- दत्तके मुखका प्रतिबिम्ब है वह चेतनताको प्राप्त होवै; परंतु ऐसा नहीं अर्थात् दर्पणमें जो मुखका प्रतिबिंब है वह चेतन नहीं है । और भी विशेष यह है कि यदि अनेक शरीरों में एक ही जीव हो तो जब एक जीवको सुख, दुःख जोवित और मरण आदि प्राप्त होवें तब उसी क्षणमें सब जीवोंको सुख, दुःख, जीवित और मरण आदि प्राप्त होवें और ऐसा देखने में नहीं आता अथवा नो ऐसा कहते हैं कि, 'जैसे एक ही समुद्र कहीं तो खारे जलबाला है, कहीं मीठे जलका धारक है, उसी प्रकार एक ही जीव सब देहोंमें विद्यमान है' सो यह कहना भी घटित नहीं होता। क्यों नहीं घटता यह पूछो तो उत्तर यह है कि, समुद्र में जलरा- शिकी अपेक्षासे एकता है और जलके पुद्गलोंकी अपेक्षासे एकता नहीं है। यदि जल- पुद्गलोंकी अपेक्षासे एकता होती है तो समुद्रमेंसे अल्प (थोड़ा, ) जल ग्रहण करनेपर शेष (बचा हुआ) जो जल है वह भी साथ ही क्यों नहीं आ जाता है । इसकारण सोलह वानोंके सुवर्णको राशिके समान अनन्तज्ञान आदि लक्षणोंके प्रति जीवराशिमें एकता है और एक जीवकी अपेक्षासे जीवराशिमें एकता नहीं है । अब अध्यात्म शब्दका अ कहते हैं । मिथ्यात्व, राग आदि जो समस्त विकल्पोंके समूह हैं उनका त्याग करके जो निज शुद्ध आत्मामें अनुष्ठान ( प्रवृत्तिका करना) है उसको अध्यात्म कहते हैं। इसप्रकार ध्यानकी सामग्री व्याख्यानके उपसंहाररूपसे यह गाया समाप्त हुई ।। ५७ ॥

मंदा . . अयोदयपरिवार यतिः- दयसंगमिणं मुणिणारा दोलसंचयनुदा मुदपुष्णा । मोधयंत तातपरेण गिनन्दमुगिणा मणियं ॥५८ ।। व्याया। "मोधगंतु मुर्द यन्तु ! फे मारिः ? "मुगिजा" मुनिनाया मुनि:- घानाः । हिविशिष्टाः ? "दोमसंपय गुदा" निदीपपरमागनो पिरमना से गागादियोपा- नयय प निषिपरमारमादितत्यपरितानविषय संशयिमो विधमान्यता दिखा दोग. मंचयाताः । पुनरपि फयम्भूताः ? "मुरगा" पनमानसमागमाभिधानमन पर गदापारोपन निर्विकारस्यमवेदनशानापभावभूतेन म पूर्वाः ममपाः मुगाः । शोधयान ! "मंगामिन" अदद मायामादिया - पानं महाभिधान न्यामिग प्रत्यापूनम ! हि विEिr? orfe" for प्रतिपादिलो यो मन्यः । न नूतन ? "मिमगुणिमा" सीनेमियागानिदेया- भिधानेन मुनिगा सम्यदर्शनादिनिमयायमापजापागापाया। पाने ? "सानुगधरा गानाधरेण. मनुष्य को नयीनि कनुभनयनानि प्रिया- अय प्रकार अपने श्रीदत्य ( अभिमान ) को दूर करने शिपिसन्द - कर की मनाम पर :- राममाया-पामा (नमिमा मुनि में जो हत्या रक्षासको दागमे दिन और शानमे परिवार मुद्र की ॥५८ ।। पनि नमिन्द्रमिदानिदेयागनिर्मितीसमरः ।। व्याख्या:-"मोधयंतु"ल गरें । इस सरनेमा ? "अनिनादा" सुनिनो नयांग पापाय हैं । को ये आपान : "दोमनपदा" दोप परमामे भिरमार जोशमादिदोष मनर, नया नियम པར་ལ་ཏཱ་, , ས ས པ ས ས སཱམཱས ༣ ༼ ཧ ཨ ཨཱ ཨ་ घिर में ? "मुरा" र मनन विमान दाम (AE मामा सपना मार मार iiirer-EATRE भाग मा परिपूर्ण है। ये सापार हिमको ! "min" द- माग्यमारका मारमा परमाया नगर पद स्थापन, हा म मान र मोmir: "ifa" fizer Eii : marr" मान्द्र मिहानिदेय मा नि म kais format TRArr : Mar:: HAERMero MEET 1

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Vrihad Dravya Sangrah

Author
Shri Nemichand Sidhantidev
Title
Vrihad Dravya Sangrah
File name
Vrihad Dravya Sangrah
Text
OCR done
Citation
1952
Published
2011/07
Publisher
Aagash, Shri Ramchandr Aashram
Language
Sanskrit
Pages
162
Library
Shree Abhya Jain Granthalya,bikaner
DLI number
314411
Barcode
99999990313168.00
Scanning centre
Banasthali University
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Digital Library Of India
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n3Qvk84CbRm
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