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Gyan-pradipika

Pandit,.jyoti Achariya · 2012/08

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। - प्रस्तावना। प्रस्तुत (ज्ञान प्रदीपिका) पुस्तक जोतिष के उस भाग से सम्बन्ध रखती है जिसमे प्रश्न लग्न पर से फल बताया जाता है। उसे प्रश्नतन्त्र कहते हैं। नीलकण्ठ ने अपनी पुस्तक के अन्तिम अध्याय में इसी विषय का वर्णन किया है। और भी कई प्रश्नतन्त्र की पुस्तकें प्रचलित है प्रश्वतन्त्र के विषय मे यह एक स्वतन्त्र और पूर्ण पुस्तक कही जा सकती है। इस प्रन्थ के रचयिता के नाम आदि के बारे में जानने के लिये हमारे पास साधन नहीं है पर प्रारभिक मगलाचरण से इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि वे जैन थे। श्रस्तु- जो प्रति हमारे सामने है वह अत्यन्त अशुद्ध है। पाठ शुद्ध करने का काई भो साधन नहीं है। इस विषय के अन्य प्रन्यो से मिलान करने पर कुछ कुत्रशुद्ध करने का प्रयत्न किया गया है। पर उसमे भी कठिनता यह है कि इस प्रन्य मे फल कहने का प्रकार कहाँ कहाँ अन्य प्रन्यों से बिलकुल निराला है। यह वात एक प्रकार से मान ली गई है कि वर्षफल और प्रश्न फल इस देश मे यरनों के ससर्ग से प्रचलित हुये हैं। फिर भी इस ग्रन्थ में स्थान स्थान पर को विशेषताओ के देखने से जान पड़ता है कि इस शास्त्र का विकास भी अन्य शास्त्रों की तरह जैनो मे स्वतन्त्र और विलक्षण रूप से हुआ है। व्याकरण को अशुद्धियाँ ता प्रस्तुत प्रति में इतनी अधिक है कि उससे शायद ही कोई लोक बचा हो। उनके शुद्ध करने में इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि प्रत्यकार का भार न बिगडने पावे। पदो के शुद्ध करने से जिस स्थान पर लाक को घन्दिश टूटती दिखाई दी वहां उसे वैसा ही छाड दिया गया। इसका कारण परम्परागत अशुद्धि समझो गई और उन्हें ज्या का त्यों विद्वानों के सम्मुख रखने का प्रयत किया गया। एक बात और। लग्न की जगह पर हर जगह प्रचलन समझना चाहिये। ग्रहों को स्थिति से प्रश्नकालिक प्रहों की स्थिति से प्राशय है जिस प्रकार इस बात को बार बार कहना ग्रन्यकार ने ठोक नहीं समझा उसी प्रकार अनुराद फर्ना ने भी। कई स्थान पर लोक के श्लाक छूट और टूट गये हैं। यथासाध्य अन्य प्रन्या से मिला कर उन्हें पूर्ण करने की चेष्टा की गई। फिर भी जा रह गये उन्हें विद्वान् पाठक । -- सुधार लें। शीघ्रता, प्रमाद, पालस्य आदि कारणों से अशुद्धि रह जाने की सभावना ही नहीं निश्चय है। गुणमाही पाठक यदि सूचना देंगे ता सुधारने का प्रयत्न किया जायगा। - -अनुवादक विशेष-वक्तव्य । ---ज्योतिष शास्त्र। . जिस शास्त्र के द्वारा सूर्य, चन्द्र, मंगल आदि प्रहों को गति, स्थिति प्रादि एवं गणित जातक, हारा आदि का सम्यक् बोध हो उसे ज्योतिषशास्त्र कहते है। विद्वानों का मत है कि मिन्न भिन्न शास्त्री के समान यह शास्त्र भी मनुष्य जाति की प्रथमावस्था में अङ्कुरित हो ज्ञानोन्नति के साथ साथ क्रमश. संशोधित तथा परिवर्धित हाकर वर्तमान अवस्था को प्राप्त हुआ है। सूर्य चन्द्रादि अन्यान्य ग्रहों का स्वभाव ऐसों अदभुत एवं बलौकिक है कि उनकी ओर प्राणिमान का मन आकर्षित हो जाता है। प्राचीन समय से हो इसकी भोर सभी जातियों का ध्यान विशेषत आकृष्ट हुआ था और अपनी २ बुद्धि के अनुसार समो लागां को इस लारोपयागो शास्त्र का यत्किञ्चिन ज्ञान भी अवश्य था। इसो लिये चीन, प्रोक, मित्र आदि सभी जातियां अपने का ज्यातिषशास्त्र का प्रपतक मानती है। भारतीय प्राचीन विद्वानों ने ज्यातिष शास्त्र का सामान्यत दो रिभागा में विभक किया है। एक फलित और दूसरा सिद्धांत अया गणित । फलित के द्वारा प्रह नक्षत्रादि की गति या सञ्चारादि देख कर प्राणियों की भावो दशा ( अवस्था) और कल्याण तथा अकल्याण का निर्णय किया जाता है। दूसरे सिद्धान्त अयया गणित के द्वारा स्पष्ट गणना कर के ग्रह नक्षत्रादि को गति, एवं सस्थानादि क नियम, उनका भार और तजन्य फलाफलों का स्पष्टीकरण किया जाता है। आम्लेय विद्वान् फलित ज्यातिष को Astrology और गणित ज्यातिष का Astronomy कहते है। पर यहां एक बात में कहे देता है, गणितज्ञ फलितों को सदा उपेक्षा दृष्टि से देखने आये है। इस धारणा की पुष्टि में भारतीय गणकशिरोमणि डाकर मणेशी जो का कथन है कि जन्मकालीन प्रहनत. लादि को स्थिति देख कर अनुक समय में हमें सुख और अनुक समय मे दुख होगा इसको जानना न काई करसाध्य बात है और न उसमे कोई विशेष लाम ही है। खेर, यह एक विविश्य है, प्रत यहाँ मै इस विषय में विशेष उलझना नहीं चाहता हूँ। अब सामुद्रिक शास्त्र को लीजिये। सामुद्रिक भी फलित ज्यातिष का एक सास विमान है। इस शास्त्र के द्वारा हस, पाद, और ललाट को रेखा ए मिन्न २ शरीरस्य विह देख कर मनुष्य का भूत, भविष्य और वर्तमान काल सम्बन्धी शुभाशुभ फल जाना - (ख) जाता है। इस विद्या का अंग्रेजी में Palmispy भयया Chiromaney कहते हैं। मुख्यतया हस्ताङ्कित रेखादि देख कर ही इस शास्त्र के द्वारा शुभाशुभ फलों का निर्देश किया जाता है। विद्वानों ने सामुद्रिक शास्त्र को अधिक महत्व क्यों दिया है, इसका खुलासा नीचे किया जाता है। यद्यपि शरीर के प्रत्येक अङ्ग में शुभाशुभयोधक चिह्न विद्यमान है। किन्तु वे चिह्न विशेष रूप से स्पष्ट हथेली में ही पाये जाते है। समावतः हस्त को विशेष महत्व देने का हेतु एक और भा है। हमार सभा काम हाथ से ही हाते है। मगल और कार्या का करनेवाला यही है। अतः इसो हाथ पर शुभाशुभ चिट्ठों का चित्रण करना उपयुक्त हो है। इसके साथ २एक ओर भी बात है, अगर मनुष्य में इस विद्या का ज्ञान और अनुभा हा वह अपना हाथ स्वयं अन्य अंगा को अपेक्षा आसानी से देख सकता है। यह कार्य अन्य किसी अड्डू से मुलभ नहीं हो सकता। इसी से हस्त का रेखा परिधान के लिये विशेष स्थान प्राप्त है। विद्वाना का मत है कि इसके आविष्कारक हाने का.सौभाग्य भारत को ही प्रात है। यहां से चीन भार प्रोक में इस विद्या का प्रवार हुमा। पचाइ प्रोक से यारप के अन्यान्य भागों में यह विद्या फैली। पेतिहासिक विद्वानों का यह भी अनुमान है कि ईसा के लगभग ३००० वर्ष पूर्व चीन में एवं २००० वर्ष पूर्व प्रोक में इसका प्रवार हुआ। अतः निम्रान्तरूप से यह जाना जा सकता है कि भारत में इसके पहले से ही इसका प्रवार रहा हागा। हाथ में जितनो ही कम रेखायें हागो और हाथ साफ रहेगा यह पुरुष उतना ही अधिक भाग्यशाली समझा जाता है। हथेली के प्रधानतः सात रेखामा पर हो विचार हाता है। () पितरेखा (२) मातृ. रेखा (३) भायूरेखा () भाग्यरेखा (४) चन्द्ररखा (६) स्वास्थ्यरेखा और धनरेखा। इनमें प्रादि के चार प्रधान है। इनके अतिरिक्त सम्बान, शन, मित्र, धर्म, अधर्म प्रादि और भी कई रेखायें होती है। अस्तु इस विषय को यहां अधिक बढ़ाना अप्रासंगिक होगा। प्रम मुझे यहां पर यह विचार करना है कि ग्रहों के शुभाशुभ फलकथन के सम्बन्ध में लोगों की क्या धारणा है। वैज्ञानिकों का कथन है कि मनुष्य अपने अपने फर्मानुसार ही समय समय पर सुखी या दुःखी हुमा फरते हैं। उनके उस सुख-दुःख में सूर्य चन्द्रादि पोल के प्रह कारण नहीं है। हाँ, प्रहों की स्थिति के अनुसार प्राणियों के भावो कल्याण पाभकल्याण का मनुमान किया जा सकता है। महों के अनुसार भविष्य में विधि की सम्भावना होने पर उसको दूर करने के लिये शान्ति का अनुमान करने से माणियों को फिर उस विपत्ति का प्रास नहीं होना पड़ता मादि। प्रस्तु, घेशानिकों का प्रइसलसमन्धी या मन्तव्य जैनधर्म के प्रहालसम्बन्धी मन्तव्यों .

से सर्वथा मिलता है। विद्वानों का कथन है कि जैनधर्म एक वैज्ञानिक धर्म है। उल्लिखित मन्तव्य की एकता मुझे तो नितान्त ही उचित जचती है। किसी किसी ज्योतिषी का यह भी मत है कि अन्यान्य कारणो के समान प्रहों का अवस्थान भी मानव के सुख- दुख में अन्यतम कारण है। जो कुछ हो, ग्रहों की स्थिति से भी मनुष्यों को शुभाशुम फलों की प्राप्ति होती है इससे तो सभी सहमत होंगे। २-दिगम्बर जैन साहित्य में ज्योतिषशास्त्र का स्थान । प्रथमानुयोगादि अनुयोगों में ज्योतिषशास्त्र को उच्च स्थान प्राप्त है । गर्भाधानादि अन्यान्य सस्कार एवं प्रतिष्ठा, गृहारभ, गृहप्रवेश आदि सभी मांगलिक कार्यो के लिये शुभ मुहर्त का ही आभय लेना आवश्यक बतलाया है। तीर्थङ्करों के पांचों कल्याण एवं भिन्न भिन्न महापुरुषों के जन्मादि शुभमुहूर्त में ही प्रतिपादित है। जैन वैधक तथा मंत्रशास्त्र सम्बन्धी अन्यों में भी मंगल मुहूर्त में ही औषध सम्पन्न एव ग्रहण और शान्ति, पुधि, उच्चाटन आदि कर्मों का विधान है। कर्मकाण्ड सम्बन्धी प्रतिष्ठापाठ आराधनादि अन्यों में भी इस शास्त्र का अधिक आदर दृष्टिगोचर होता है। यहीं तक नहीं प्राधाएकादि जो फुटकर स्तोत्र है उनमें भी ज्योतिष की जिक्र है। बल्कि नवप्रहपूजा अन्यान्य पाराधना आदि अन्यों ने प्रहशान्त्यर्थ ही जन्म लिया है। मुद्रारातसादि प्रावीन हिंदू एवं बौद्ध प्रयों से भी जैनी ज्योतिष के विशेष विज्ञ थे यह बात सिद्ध होती है। प्रसिद्ध चीनी यात्री हुवेनच्चांग के यानाविवरण से भी जैनियो की ज्योतिषशास्त्र की विशेषज्ञता प्रकटित होती है। उल्लिखित प्रमाणों से यह बात निग्विाद सिद्ध होती है कि जैन साहित्य में ज्योतिष- शास्त्र कुछ कम महत्व का नहीं समझा जाता था! ३--दिगम्बर जैन ज्योतिष ग्रन्थ, मायज्ञान तिलक आदि दो एक अन्य को छोड फर अाज तक के उपलब्ध दिगम्बर जैन ज्योतिष प्रन्यों में मौलिक अन्य नहीं के बराबर है। हां, संख्यापूर्ति के लिये निनेन्द्रमाला, केवलज्ञानहोरा, भहन्तपासाकेवली, चन्द्रोन्मीलन प्रश्न प्रादि कतिपय छोटी मोटी हतियाँ उपस्थित की जा सकती है। परन्तु इन उलिखित रचनाओं से न जैन ज्योतिष प्रन्यो की कमी की पूर्ति ही हो सकती है और न जैन साहित्य का महत्त्व पर गौरख हो व्यक्त हो सकता है। यहो पात जैन वैपक के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है। सचमुव दर्शन, न्याय, व्याकरण, काव्य अलङ्कारादि विषयों से परिपूर्ण जैन साहित्य के लिये यह सुदि स - (घ) विशेष सटकती है। हाँ, प्राकृत एवं संस्कृत साहित्य की अपेक्षा जैन कन्नड साहित्य ने इस विषय में कुछ भागे पैर पढ़ाया है अवश्य। फिर भी वह सन्तोषप्रद नहीं है, क्योंकि तद्विषयक वे अन्य संस्कृत ग्रन्थों की छायामात्र हैं। अर्थात् यहां भी मौलिकता की महक 'नहीं है। इस त्रुटि का कारण मुझे तो और ही प्रतीत होता है। जैन साहित्य में मौलिक ग्रन्थों के लेखक ऋषि महर्षि ही हुए है। साथ ही साथ जैन धर्म निवृत्तिमार्ग को प्रतिपादक सर्वोच लक्ष्य को लियो हुआ एक उत्कृष्ट धर्म है। इसी से ज्ञात होता है कि विषय-विरक्त एवं आध्यात्मिक रसिक उन ऋषि महर्षियों का ध्यान इन लौकिक प्रन्यों की ओर नहीं गया। या उन्होंने सोचा होगा कि हिन्दू धधक तथा ज्योतिष प्रन्यों से भी जिज्ञासु जैनियों का कार्य चल सकता है। क्योंकि धर्मविरुद्ध पुछ बातों को छाड कर हिन्दू एवं जैन वैयक तथा ज्योतिष मन्र्यों में विशेष अन्तर नहीं पाया जाता है । फन्नड़ माहित्य के लेखक अधिक संख्या में गृहस्य ही थे। अत' उनकी रुचि उस और अधिक पार होना स्वाभाविक ही कहा जा सस्ता है। अन्तु फिर भी खोज करने पर इस विषय ये मौरिफ प्रन्य भश्य ही उपलब्ध हो सकते है। अतः साहित्यप्रेमियों को इस कार्य की और अरश्य ध्यान देना चाहिये। ग्वास कर र्णाटक प्रांत के ग्रामों में खोज करने में इस सम्बन्ध में विशेष मारता मिल सकती है।

- ज्ञानप्रदीपिका के सम्बन्ध में पगिडत जी के प्रतिपादित उक्त विचारों के अतिरिक्त "जैन मित्र" वर्ष २४ अङ्क १२ में प्रकाशित 'केरल प्रश्नशास्त्र" शीर्षक लेख का कुछ अंश भी अन्वेषक विद्वानों के लामा निनादित किया जाता है इस लेख में लेखक ने सम्बत् १९३१ में काशी से मुद्रित "कैरल प्रश्नशास्त्र" नामक एफ पुस्तक के कुछ वाक्मों को उद्धत कर लिखा है कि ये वाक्य उमास्वामिकृत तत्वार्थ सूत्र के है, अत यह अन्य किसी जेनाचार्य का ही प्रणीत होना चाहिये। बल्कि अपनी इस धारणा को पुष्ट करने के लिये लेखक लिखते हैं कि इसी नाम का ( केरल प्रश्नशास्त्र ) एक और पुस्तक सम्बत् १९८० में वेक्टेश्वर रेस धम्बई में प्रकाशित हुआ है। इसके रचयिता पं० नन्दराम है। पण्डित जी ने अपनी कृति के प्रारंभ में लिखा है कि "यद्यपि मिथ्या पण्डिताभिमानी श्वेताम्बरों के द्वारा एतद्विषयक बहुत से प्रवन्ध रने गये हैं, परन्तु छन्द व्याकरणादि दोषों से दूषित वे प्रबन्ध प्ररम्य हैं। इसी लिये सक्षिप्त रूप में मैं इस प्रन्य की रचना करता है।" यही पण्डित जी आगे फिर, लिखते हैं कि "वेतवस्त्रधारी एवं बद्धोस्य (मुंहढके हुए ) ऐसे नास्तिक, कुज, अन्ध, बधिर, बन्ध्या, विकलांग पर कुठादि रोगग्रस्त प्रादि व्यक्तियों को छोड़ कर ही अन्यान्य लोगों से पण्डित प्रश्न कहे।" मल्कि इन्होंने एक जगह यह भी लिखा है कि "श्वेताम्बर जैनी ने जो चन्द्रोन्मीलन नामक रखा है वह छन्द व्याकरणादि से दूषित है, अत यह रिद्वन्मान्य नहीं हो सकता है" इस अन्य को समाप्ति इन्होंने १८२५ आश्विन शुक्ल सप्तमी को की है। जैन मित्र के लेखक अन्त में लिखते हैं कि उपर्युक्त कथन से इस "केरल प्रश्न शास्त्र" के मूल लेहक ग्वेताम्बर स्थानकवासी ही स्पष्ट सिद्ध होते है । मैंने इस बात का उल्लेए यहाँ पर इसलिये कर दिया है कि इस ज्ञानप्रदीपिकाको मैसोर की प्रति के प्रारम्भिक पृष्ठ में ज्ञानप्रदीपिका' इस नाम के नीचे कोटक में "केरलप्रश्नग्रन्य" ट मुद्रित है। परन्तु ज्ञानमहोशिका और जैनमिन के लेखक के द्वारा प्रतिपादित केरल प्रश्न शास्त्र ये दोनों एक नहीं कहे जा सकते, क्योंकि इस मुद्रित भवन की शान प्रदीपिका' में कहीं भी तत्वार्थ सूव के सूत्र या उनके भाग नहीं पाये जाते। हाँ, इससे इतना अवश्य ज्ञात होता है कि जेन विद्वानों ने केरल प्रश्नशास्त्र के नाम से भी पतद्विषयक अन्य रचा है। उल्लिखित कथन से यह भी ज्ञात होता है कि भारतीय अन्यान्य ज्यातिधिदों के द्वारा फेरेल प्रश्न शास्त्र के नाम से कई अन्य रचे गये है। उक्त लेस से यह भी मालूम होता है कि ज्ञानप्रदीपिका और चन्द्रामोलन इन दाना फे कर्ता श्वेताम्बर जैन है। किन्तु इस सम्बन्ध में जब तक कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता तब तक इसे पेताम्बर त निन्ति नहीं कहा जा सकता। क्योंकि दिगम्बर विद्वान् इसे दिगम्बर रचित्त हो मानते है।

१८ " " । खैर, श्वेताम्बर हो या दिगम्बर जैन साहित्य हो, इसे जैनीमात्र को अपनाना चाहये । परन्तु यहां पर यह प्रश्न उठ सकता है कि मुद्रित वे अन्य अगर जैन है तो मंगलाचरण का परिवर्तन कैसे ? मंगलाचरण एवं अन्तरंग फलेबर को कुछ उलट-पुलट फर जैनेतर विद्वानों के द्वारा प्रकाशित त्रिविक्रमदेवकृत प्राप्तभ्याकरणादि कुछ जैनग्रन्थ हमलोगों के सामने उपस्थित है, अतः संभव है कि उन्हों की तरह इसमें भी कुछ उलट पलट कर दी गयो हो। राय बहादुर होरालाल एम० ए० ने भी स्वसम्पादित "Catalogue of Sanskrit and Prakrit Manuscripts in the central province and Berar" नामक विस्तृत प्रन्यसूची में इस ज्ञानप्रदीपिका को जैन ग्रन्थों में ही शामिल किया है। अब इस सम्बन्ध में प्रस्तुत प्रन्यों के अन्दर भी स्थूलदृष्टि से एकबार नजर दौडाना आपल्या प्रतीत होता है। "निर्दिष्ट लक्षणं चैव सामुद्रवचनं यथा"। (सा शा०पू०१ श्लोक ३) "शतवर्षाणि निर्दिष्ट नारदस्य बचो यथा"।। "४, २१) "पुरुषत्रितयं हत्वा चतुर्थे जायते सुखम्"। ( इसी प्रकार- "आदित्यारौ पुनर्भूः स्यात्पने वैवाहिके वधूः (शा०प्र० पृ० ४६ श्लोक १५ श्रादि) मैं समझता हूँ कि उक्त श्लोकान्तर्गत कुछ सिद्धान्तों से कतिपय जैन विद्वान प्रस्तुत भन्यों को जैनाचार्यों के द्वारा प्रणीत मानने को प्रायः तैयार नहीं होंगे। किन्तु इसीके उत्तर में अन्यान्य कई जैन विद्वानों का ही कहना है कि ज्योतिष, वैद्यक, मन्त, नीति आदि विषय लौकिक एवं सार्वजनिक है। अतः तद्विषयक ये प्रन्थसर्वथा जैन दर्शन के अनुकूल ही नहीं हो सकते अर्थात् कुछ बातें प्रतिकूल भी हो सकती हैं। इस बातको पुष्ट करने के लिये ये विद्वान् भद्रासंहिता अर्हन्नीति मावि प्रन्यों की उपस्थित करते हैं। उन्हीं विद्वानों का यह भी कहना है कि शतद्विषयक इन लौकिक प्रन्यों में भिन्न भिन्न प्रहों के योग से पुरापान पती, वेश्या, म्रया, व्यभिचारिणी, परपुरुषगामिनी आदि होती है, ऐसा भी उल्लेख मिलता है। इससे यह बात सिद्ध होती है कि सार्वजनिक लौकिक प्रन्यों में ये सब बात उपलब्ध होना स्वाभाविक है। खैर, मतविभिन्नता सदा से चली या रही है और घलती ही रहेगी। इस विषय में मुझे नहीं पहना है । प्रा अन्येक विद्वानों से मेरो यही प्रार्थना है कि मेरे द्वारा उपस्थित की हुई प्रस्तुत ये सामप्रिया उक्त प्रन्य जैनागर्ग-प्रणोत निन्त सिद्ध करने के लिये पर्यात नहीं है, प्रतः इस सम्बन्ध में विशेष साज करके सरल प्रमाणों को विद्वानों के सामने उपस्थित कर इस विषय को हल कर।

(छ) ५---मूल ग्रन्थ तथा अनुवाद । "श्रीजैन सिद्धान्त भवन" के सुयोग्य मंत्री एवं साहित्यसेवी जिनवाणीभक्त स्वगीय षाबू देवकुमार जी के आदर्श सुपुत्र श्रीमान् वावू निर्मल कुमार जी के द्वारा अपने पूज्य पिता जो के स्मारक रूप में संचालित "श्रीदेवकुमार प्रन्थ-माला" में कतिपय मौलिक एवं लुप्तप्राय जैन वैद्यक तथा ज्यातिष ग्रन्या का उद्धार करने को आप की उत्कट अमिलापा चिरकाल से सञ्चित थी। किन्तु तत्सम्बन्धी कोई मौलिक ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होने से अपनी उस प्रबल शुभेच्छा का उन्हें कुछ समय तक दवा रखना पडा। विशेष अन्वेषण करने पर भी जब काई महत्वपूर्ण उद्दिष्ट प्रन्य प्राप्त नहीं हुआ। तब उन्होंने कहा कि इस समय भवन में रक्षित सामुद्रिक शानपुदीपिका और चन्द्रोन्मोलन प्रश्न सम्मिलित इन्हीं प्रन्थों का सानु वाद समाज के सामने समुपस्थित करना श्रेयस्कर होगा । बस, इसो निर्णयानुसार इन प्रथा के अनुवाद तथा संपादन का भार इस विषय के विशेषज्ञ एव सुयोग्य विद्वान् ज्याति- पाचार्य पडिस रामन्यास तो पापडेय अध्यापक हिंदू विश्वविद्यालय बनारस का सौंपा गया। अवकाशाभाव के हेतु उक्त वे पंथ दीर्घकाल तक उन्हों के पास पड़े रहे। अंततोगत्वा 'चन्द्रान्मोलन' का छाडकर शेष दा ग्रंथ सानुवाद उनसे प्राप्त हा गये जा आप सबों के सम्मुख उपस्थित है। ज्योतिषाचार्य जी के कथनानुसार उक्त प्रथ उनसे विशेष अशुद्ध थे.अयथ्य, फिर भी मैं यही कहूंगा कि पण्डित जी इनके सम्बन्ध में कुछ अधिक छानबीन करते तो ये प्रथ कुछ और ही आकार में आप सबों के सामने उपस्थित किये जाते। खेद की बात है कि मूल एवम् अनुवाद में बहुत सो त्रुटियां रह गयो है। प्रस्तु, जिस समय इन अन्यों को प्रकाशित करने का विचार पका हुमा तभी से इनको अन्यान्य प्रतियों को खोज ढूंढ करने का क्रम जारी रहा। परन्तु अनेक प्रन्य भागडरों की सूवियाँ टटोलने पर भी इस सामुद्रिक शास्त्र का पता कहीं भी नहीं लगा। हाँ, सौभाग्य से कारंजा एवं मैसोर राजकीय पुस्तकालय को प्रन्यनामावली में ज्ञानप्रदीपिका का नाम दृष्टिगत हुआ। इसके बाद ही कारंजा के प्रन्थभाण्डार के प्रबन्धक को दो पन दिये गये। पर खेद को बात है कि प्रत्य भेजना ता दूर रहा पत्रात्तर तक. नदारद । मेसोर से भी पहले कोई सन्तोषजनक पत्रोतर नहीं मिला। किन्तु भवनस्थित इसी अशुद्ध प्रति को ज्यों स्यों कर छप जाने के उपरान्त श्रीमान् श्रद्वय न्यायतीर्थ ए० शान्तिराज शास्त्रीजी की रुपा से केवल दो सताह के लिये मौसार को प्रति प्राप्त हो सको। यह प्रति मुद्रित थी । इसो का मूल पाठ फिर पोछे छपाकर प्रारंभ में जाइ दिया गया। मन को प्रति से यह प्रति कुछ विशेष शुद्ध है। किनु जहाँ पर मेतार को प्रति में भी सन्देह जान पड़ा .

(ज) यहाँ पर सन्दिप पाठ का छोड कर मान की प्रतिका या स्वतन्त्र शुद्ध पाठ रखने की ही चेष्टा की गयी है। इसी से मूल पाठ और अनुयाद में सर्वत्र एकीकरण होना असभव है। अस्तु मै अब विक्ष पाठको का विशेष समय नहीं लेना चाहता हूँ। आगे इस प्रन्य माला में श्रीमान् बाबू निर्मल कुमार जी की शुभभावनानुकूल हो वैपसार" "अकलङ्क संहिता" (वैद्यक) "आयलान तिलक" (ज्योतिष) ये अपूर्व मौलिक जेन अन्य प्रमश प्रकाशित होगे। संघसार का अनुवाद जारी है। इसके अनुवादक आयुवेदाचार्य पगिडत सत्यन्धर जी जैन काव्यतीर्थ छपारा है। आप का फहना है कि यह प्रन्य बडा ही महत्त्वपूर्ण है और इसम करीब डेढ सो प्रयाग प्राप्त स्मरणीय प्राचार्यप्रवर पूज्यपाद जी के हैं। इसका कुछ विशेष परिचय मुरादाबाद से प्रकाशित होने वाले सर्वमान्य पत्र "वैद्य" मैं शीघ्र ही प्रकाशित हागा। पूर्व निश्चयानुसार 'च द्रोन्मीलन प्रश्न ज्यातिष प्रन्थ का भी प्रकाशित करने का विचार पहले था। परन्तु इसकी शुद्ध प्रति के अभाव से इस विचार को अभी स्थगित करना पड़ा। अन्त में विज्ञ पाठकों से मेरा यहा नम्र निवेदन है कि इस साहित्यसेवा कार्य में समुचित सहायता प्रदान कर इस प्रथमाय के सञ्चालक श्रीमान् निमल कुमारजी का उत्साह बढ़ायेंगे कि जिससे समय समय पर भवन से उत्तमातम प्रय रन प्रकाशित होता शान्ति ! शाति !! शान्ति !!! भयन-फाल्गुन एपण पञ्चमी रविवार वि०स०१० पीर सं०२४० साहित्य संघक- के. भुजवली शास्त्री पुस्तकारयाध्यक्षा

ज्ञान-प्रदीपिका
(ज्योतिपशास्त्रम्)
श्रीमवीरजिनाधीशं सर्वशं त्रिजगद्गुरुम् ।
प्रातीहार्याप्टकोपेतं प्रकृप्टं प्रणमाम्यहम् ॥१॥
त्रलोक्यनायक, सर्वज्ञ, अशोक वृक्षादि आट मातिहार्यों से युक्त, प्रकृष्ट श्रीमहावीर-
स्वामी को मैं प्रणाम करता है।
स्थित्युत्पत्तिव्ययात्मीयां भारतीमाईती सतीम् ।
अतिपूतामद्वितीयामहर्निशमभिष्टुवे ॥२॥
स्थिति, उत्पति और प्रलयापिणी, पूज्या सनी, अत्यन्त पनि और अद्वितीय
धोजिनवाणो देवी को मैं ( अन्यकार ) रातदिन स्तुति करता है।
ज्ञानप्रदीपकं नाम शास्त्रं लोकोपकारकम् ।
प्रश्नादर्श प्रवक्ष्यामि पूर्वशास्त्रानुसारतः ॥३॥
पहले के कहे हुए शास्त्रों के अनुसार लोक के उपकारक ज्ञानप्रदापिका नामक
प्रभतंत्र के मादर्श शास्त्र को कारगा।
भूतं भव्यं वर्तमानं शुभाशुभनिरीक्षणम् ।
पंचप्रकारमागं च चतुप्केन्द्रबलाबलम् ॥४॥
आरूढछत्रवर्ग चाभ्युदयादिवलाबलम् ।
क्षेत्रं दृष्टिं नरं नारी युग्मरूपं च वर्णकम् ॥५॥
मृगादिनररूपाणि किरणान्योजनानि च ।
आयूरसोदयायञ्च परीक्ष्य कथयेद बुधः ॥६॥

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न-प्रदीपिका
भूत, भविष्य, वर्तमान, शुभाशुभ दृष्टि, पांच मार्ग, चार फेन्द्र, यलाएल, आरूढ़, छत्र,
घर्ग, उदय पल, यस्तयल, क्षेत्र, दृष्टि, नर, नारी, नपुंसक, वर्ण, मृग तथा नर आदि रूप
किरण, योजन. मायु, रस, उदय आदि की परीक्षा करके बुद्धिमान् को फल कहना
चाहिये।
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चरस्थिरोभयान् राशीन तत्प्रदेशस्थलानि च ।
निशादिवससंध्याश्च कालदेशस्वभावतः ॥७॥
चर, घिर, द्विस्वभाव राशियां, उनके प्रदेश, दिन, रात, सन्ध्या का कालादेश, राशियों
का स्वमाय:-
धातुमूलं च जीवं च नष्टं मुप्टिं च चिन्तनम् ।
लाभालाभं गदं मृत्यु भुक्तं स्वप्नं च शाकुनम् ।।८।।
धातु, मूल, जोर, नष्ट, मुधि, लाभ, हानि, रोग, मृत्यु, भोजन, शयन और शकुन
सम्बन्धी प्रश्न
जातकर्मायुधं शल्यं कोपं सेनागमं तथा ।
सरिदागमनं वृष्टिमध्यं नौसिद्धिमादितः ॥६॥
जन्म, कर्म, मस्त्र, शल्य (एड़ी), कोप, सेना का आगमन, नदियों की बाद, वर्षा,
भवर्षा नौकासिद्धि आदि,---
कमेण कथयिष्यामि शास्त्र ज्ञानप्रदीपके।
इन पातों को इस ज्ञानप्रदीपक शारम में मामशः फहगा।
इत्युपोद्घातकागडः
अथ वक्ष्ये विशेषेण ग्रहाणां मित्रनिर्णयम् ।।१०।।
मप प्रदोंकी मैत्री का वर्णन परेंगे।
भौमस्य मित्रे शुक्रज्ञो भृगोर्खारार्किमंत्रिणः ।
आदित्यस्य गुरुमिन्नं शनेविगुरुभार्गवाः ॥१॥
भास्करण विना सर्वे बुधस्य सुहृदस्तथा ।
चन्द्रस्य मित्रे जीवज्ञो मित्रवर्गमुदाहृतमः ॥२॥

सूर्येन्दोः परिधेर्जीवा धूमज्ञशनिभोगिनाम् ।।८il - ताप-प्रदीपिका। मंगल के मित्र शुक्र और बुध, शुक्रके वुध, मंगल, शनि और बृहस्पति; सूर्य के वृह- स्पति, शनि के बुध, वृहस्पति और शुक्र, बुध के मित्र सूर्य को छोड कर समी तथा चन्द्रमा के मित्र वृहस्पति और धुध हैं। सिंहस्याधिपतिः सूर्यः कर्कटस्य निशाकरः । मेषवृश्चिकयोभौमः कन्यामिथुनयोर्बुधः ॥३॥ धनुमीनयोमंत्री तुलावृपभयो गुः । शनिर्मकरकुंभयोश्च राशीनामधिपा इमे ॥४॥ सिंह राशि का स्वामी सूर्य, कर्क का चन्द्रमा, मेप वृप का मंगल, कन्या और मिथुन का बुध, धनु और मीन का वृहस्पति, तुला और वृष का शुक्र, मकर और कुंभ का स्वामी धनुर्मिथुनपाठीनकन्योक्षाणां शनिः सुहृत् । रविश्चापान्त्ययोरारः तुलायुग्मोक्षयोपिताम् ॥५॥ धनु, मिथुन, मोन, कन्या, वृष राशियों का मित्र शनि है। धनु मौन का मित्र रवि है। तुला, मिथुन, वृप और कन्या को मित्र मंगल है । कोदण्डमीनमिथुनकन्यकानां शशी सुदृत् । वुधस्य चापनकालिकय॑जोक्षतुलाघटाः ॥६॥ धनु, मौन, मिथुन और कन्या का मित्र चन्द्रमा है । धनु, मकर, वृश्चिक, कर्क मेष, वृष, तुला और कुंभ का मित्र पुध है । क्रियामिथुनकोदण्डकुंभालिमकरा भृगोः । गुरोः कन्या तुला कुंभमिथुनोक्षमृगेश्वराः ॥७॥ राशिमां ग्रहाणां च मैत्रमेवमुदाहृतम् । मेष, मिथुन, धनु, फुभ वृश्चिक, मकर फा मित्र रक तथा पन्या, तुला, कुंभ, मिथुन, और मकर का मित्र गुरु है। इस प्रकार राशि योर प्रद्दों को मैत्री बताई गयी है। शरुचापकुजेणानां शुक्रस्योच्चास्त्वजादयः ।

? शान-प्रदीपिका। सूर्य का मेप, चन्द्रमा का वृष, परिधि का मिथुन, घृहस्पति का कर्फ, धूमका सिंह, घुध का कन्या, शनि का तुला, राहु का वृश्चिक, इन्द्र धनु का धन, मंगल का मकर, केतुका और शुक्र का मीन यह उच्च राशियां क्रमसे होती है। 'अत्युच्चं दर्शनं बहिर्मनुयुक् युक च तिथीन्द्रियः ॥६॥ सप्तविंशतिकं विंशभागाः सप्तग्रहाः क्रमात् । सूर्य मेप में दश अंश पर, चन्द्रमा वृप में ? अंश पर, मंगल मकर में २८ अंश पर, धुध कन्या में १५ अंश पर, बृहस्पति कर्क में ५ अंश पर, शुक्र मीन में २७ अंश पर, और शनि तुला में २० अंश पर उच्च के होते हैं। बुधस्य वैरी दिनकृत् चन्द्रादित्यौ भृगोररी ॥१०॥ बृहस्पते रिपुभौमः शुक्रसोमात्मजो विना । शनेश्च रिपवः सर्वे तेषां तत्तग्रहाणि च ॥११॥ घुघ का घेरी सूर्य, शुक्र के शनु सूर्य और चन्द्र, वृहस्पति के मंगल, शनि के शत्रु बुध, शुक्र को छोडकर सभी ग्रह है। वर्वणिगलिस्त्विन्दोः कुलीरोंऽगारकस्य च । बुधस्य मीनोऽजः सौरेः कन्या शुक्रस्य कथ्यते ॥१२॥ सुराचार्यस्य मकरस्त्येतेषां नीचरराशयः । रवि फी नीच राशि तुला, चन्द्रमा की वृश्चिक, मंगल की पई, बुध की मोन, घृह. स्पति की मार, शुक्र, की कन्या और शनि की मेप नीच राशि है। राहोपयुगशक्रधनुप्केण मृगेश्वराः ॥१३॥ परिवेशस्य कोदण्डः कुंभो धृमस्य नीचभूः । मित्रस्तुला नककन्यायुग्मचापझपास्त्वहेः ॥९॥ कुंभक्षेत्रमहेः शत्रुः कुलीशे नीचभूः क्रियाः । राहु का वृष, इन्द्र धनु पासिंद, परिवेशका धनु धून पा पुम्म पे नीच राशियां होती है। राहु के लिये तुला मपर धन्या मिथुन धनु और मौन ये मित्र राशियां होती है और कुंभ राशि शक राशि पहो जाती है तथा पर्फ मैप ये नीच राशियां होती है। ..

1 शान-प्रदीपिका। उदयादिचतुष्कं तु जलकेन्द्रमुदाहृतम् ॥१५॥ तच्चतुर्थ चास्तमयं तत्तुर्य वियदुच्यते । तत्तुर्यमुदयं चैव चतुप्केन्द्रमुदाहृतम् ॥१६॥ लम से चौथे स्थान को जलकेन्द्र कहते हैं। चतुर्थ स्थान से जो स्थान चौथे हैं उसे अस्तमय कहते हैं। सप्तम स्थान से चतुर्थ स्थान को 'वियत्' यानी दशम कहते है। उससे भी चौथे को उदय या लग्न कहा जाता है। ये चारों स्थान केन्द्र फहे जाते हैं। चिन्तनायां तु दशमे हिवुके स्वप्नचिन्तनम् । ने मुष्टिं चयं नष्टमात्येश्चारूढतोऽपि वा ॥१७॥ चिन्ता के कार्य में दशम स्थान से और स्वाचिन्तन में चतुर्थ स्थान से तथा छत्र मुष्टि वृद्धि नष्टपाप्ति इत्यादि यातों का ज्ञान रन से होता है। चापोक्षकर्किनकास्ते ‘पृष्ठोदयराशयः। तिर्यदिनबलाः शेषा राशयो मस्तकोदयाः ॥१८॥ धनु, वृष, पर्क, मकर-ये राशियों पृष्ठोदय है। ओर दिघावली अर्थात् सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक और कुंभ ये शीर्षोदय है। शेष राशियां भी शीपर्योदय हैं (वृहना तक के अनुसार मीन और मिथुन उमयोदय है।) अर्काकारकमन्दास्तु सन्ति पृष्ठोदया ग्रहाः । राहुजीवभृगुज्ञाश्च ग्रहाः स्युर्मस्तकोदयाः ॥१६॥ उद्यतस्तिर्यगेवेन्दुः केतुस्तत्र प्रकीर्तितः । सूर्य, मंगल और शनि पृष्ठोदय प्रह, राहु, वृहस्पति, शुक्र और युध मस्तफोदप तया केतु और चंद्र तिर्यगुदय प्रद है । उदय यलिनो जीवधौ तु पुरुषो स्मृतौ ॥२०॥ अन्ते चतुष्पदो भानुभूमिजो वलिनो ततः । चतुर्थे शुक्रशशिनौ जलराशो बलोत्तरी ॥२१॥ अर्यही घलिनो चास्ने कीटकाश्च भवन्ति हि ।

६ शान प्रदीपिका। A . । बुध और बृहस्पनि पुरुष ग्रह है और लग्न में पलयान होते है। सूर्य और मंगल चतुष्पद प्रह है और अन्त में बलवान होते हैं । शुभ और चन्द्र जलचर है और चतुर्थ तथा जल राशि में (कर्क मीन ) बलवान् होते हैं। शनि और राहु कीट ग्रह है और मस्त यानी सप्तम में बलवान होते हैं। युग्मकन्याधनुःकुंभतुला मानुपराशयः ॥२२॥ अन्त्योदयौ मीनमृगो अन्ये तत्तत्स्वभावतः। मिथुन, कन्या, धनु, कुम्भ और तुला ये मनुष्य राशि है । मकर और मीन अन्त्योदय राशि है। शेष अपने अपने स्वभाव के अनुसार चतुप्पादो मेषवृपो सिहचापो भवति हि ॥२३॥ कुलीशाली बहुपादौ प्रक्षीणो मृगमीनभौ । द्विपादाः कुंभमिथुनतुलांकन्या भवंति हि ॥२४॥ मेष, वृष, सिंह और धनु ये चतुष्पद कर्क और वृश्चिक ये बहुपाद, मकर और मीन -ये क्षोण पाद तथा कुंभ, मिथुन, तुला और कन्या ये द्विपाद राशि है । द्विपादा जोववित्शुक्रा' शन्यप्राश्चतुष्पदाः । शशिसो बहुपादो शनिसौम्यो च पक्षिणी ॥२५॥ शनिसर्पो जानुगतो पदभ्यां यान्तीतरे ग्रहाः । बृहस्पति घुघ शुक इनकी द्विपद सहा है तथा शनि सूर्य मंगल हन ग्रहों की चतुष्पद संझा कही गई है, चन्द्रमा राहु ये पहुपद तथा शनि घुध ये पक्षिसंज्ञक यह जाते है। शनि और राहु की बानु गति होती है और न से मिन्न प्रह पैर से चलते है। उदीयतेऽजवीथ्यां तु चत्वारो वृषभादयः ।।२।। युग्मवीच्यामुदीर्यन्ते चत्वारो ठिचकादय । उक्षवीथ्यामुदोर्यन्ते मीनमेपतुलास्त्रियः ॥२७॥ पृष, मिथुन, पर्ष सिंह ये मेप पीधी में वृधिष, धन मपर गौर पुम मिथुन पीयो में, मौर मीन, मेप तुला भोर कन्या पृष घीधी में बहे गये है। - भान-प्रदीपिका राशिचक्र समालिख्य प्रागादि वृपभादिकम् । प्रदक्षिणक्रमेणैव द्वादशारूढसंज्ञितम् ॥२८॥ वृषश्चैव वृश्चिकस्य मिथुनस्य शरासनम् । मकरश्च कुलीशस्य सिंहस्य घट उच्यते ॥२६॥ मोनम्तु कन्यकायाश्च तुलायो मेप उच्यते । राशिवक्र लिख कर उसमें पूर्वादि कम से वृपादि गशियों को लिखे। धूप दाहिने मिथुन और मिथुन के दाहिने कुर्क इत्यादि। इस पर से कम से मारूढ़ इस प्रकार समझे। वृष का वृश्चिक, मिथुन का धनु, कर्क का मकर, सिंह का कुंभ, कन्या का मीन और तुला का मेष। प्रतिसूत्रवशादेति परस्परनिरीक्षिताः ॥३०॥ गगनं भास्करः प्रोक्तो भूमिश्चन्द्र उदाहृतः । ग्रह एक सूत्रस्य एक दूसरे को देखते हैं। सूर्य को आकाश और भूमि को चन्द्रमा समझना चाहिये। पुमान् भानुवधूश्चंद्रः खचकप्रणवादिभिः ॥३१॥ भूचकूदेहश्चन्द्रः स्यादिति शास्त्रविनिश्चयः । सूर्य पुरुष प्रह, चन्द्रमा स्त्री प्रह, सूर्य स्वचा और चन्द्रमा भूमिचा देह कहा जाता है, पह निर्णय शास्त्र का निर्णय है। खेः शुकः कुजस्यार्कः गुरोरिन्दुरहिर्विदुः ॥३२॥ उदयादिकमेणैव तत्तत्कालं विनिर्दिशेत् । सूर्य के लिये शुक, माल के लिये सूर्य, वृहस्पति के लिये चन्द्रमा और गहु के लिये दुध समादिक्रम से तात्कालिक मारूढ होते हैं, ऐसा आदेश करना। इत्याख्टचत्राः प्रष्टुरारुढभं ज्ञात्वा तद्विद्यामवलोक्य च । आरुदायावति विधिम्तावती रुदयादिका ॥१.

८ झान-प्रदीपिका। पूंछने वाले फी आकढ़ राशि का शान कर के फिर उसकी विद्या का ज्ञान करना चाहिये, मारूढ़ पर से उदय आदि का यथोक्त फल कहना चाहिये। तदाशिच्छत्रमित्युक्त शास्त्र ज्ञानप्रदीपके। आरूढां भानुगां वीथीं परिगण्योदयादिना ॥२॥ इसी को इस शास्त्र में राशि छत्र कहते हैं । 'लग्न (उदय) से सूर्य को जाने वाली यीथी की गणना फरफे- तावता राशिना छत्रमिति केचित् प्रचक्षते । जितनी राशि आये उसी को छत्र कहते हैं--ऐसा किसी किसी का मता है। मेषस्य वृपभं छत्रं मेपच्छत्रं वृपस्य च ॥शा युग्मकर्कटसिंहानां मेपच्छत्रमुदाहृतम् । कन्यायाश्च परं छनं तुलाया वृपभस्तथा ॥४॥ वृपभस्य युगच्छत्रं धनुपो मिथुनं तथा । नकस्य मिथुनच्छन्नम् मेपः कुंभस्य कीर्तितम् ॥५॥ मीनस्य वृपभच्छत्रं छत्रमेवमुदाहृतम् । 'मेष का छत्र वृष, घृष का मेष, मिथुन, कफ मोर सिंह पा मेष, कन्या भोर तुला का मेष, वृश्चिक और धनु फा मिथुन, मकर का भो मिथुन, कुंभ का मेष मोर मोन का पृष पत्र राशि है। उदयात् सप्तमे पूर्ण अधं पश्येतिकोणभे ॥६॥ चतुरस्त्रे त्रिपादं च दशमे पादएव च ॥ भपने से सप्तम स्थानीय प्रहयो प्रहपूर्ण दृष्टि से देखना है, धनुरनपा अर्थ केय है। पर, यहाँ देपल चतुर्थ मात्र में तात्पर्य है। तीन घरण से त्रिकोण (५,६)ो माया पानी दो धरण से और दाम पो एफ दी परण से देता है। एकादशे तृतीये च पदार्थं वीक्षणं भवेत् ॥७॥ ग्यारह और तीसरे स्थान को प्रभाधे चरण से देखना है।

मोर सिंह अग्नि कोण, वृप दक्षिण, मकर और फन्या नेत्य पोण #; मियुन ६ ज्ञानप्रदोपिका। रवीन्दुसितसौम्यास्तु बलिनः पूर्णवीक्षणे अर्धक्षणे सुराचार्य्यस्त्रिपादपादार्धयोः कुजः । ८॥ पादेक्षणे वली सौरिः वोक्षणे वलमीरितम् सूर्य, चंद्र, शुक्र और बुध पूर्ण दृष्टि में यली होते हैं, वृहस्पति आधी में, मंगल त्रिपाद और अर्द्ध में तथा शनि पाद द्वष्टि में वली. होते हैं -ऐसा दृष्टिवल कहा गया है। तिर्यक् पश्यन्ति तिर्यञ्चो मनुष्याः समदृष्टयः ॥६॥ ऊर्द्ध वेक्षणे पत्ररथाः अधोनेत्रं सरीसृपः । तिर्यग् योनि के ग्रह तिरछे देखते हैं, मनुष्यसंज्ञक ग्रह समष्टि अर्थात् सामने देखने वाले होते हैं। परथ ऊपर की ओर देखते हैं और सरीसृप संज्ञक ग्रह नीचे देखते हैं। ग्रहों की इस प्रकार की संज्ञायें पहले ही बता दी गयो हैं। अन्योऽन्यालोकिती जीवचन्द्रो ऊर्द्ध वेक्षणो रविः ॥१०॥ पश्यत्यर कटाक्षेण पश्यतोऽथ कवीन्दुजौ । एकदृष्ट यार्कमन्दी च ग्रहाणामवलोकनम् ॥११॥ बृहस्पति और चंद्र एक दूसरे को देखते हैं। सूर्य कार को देपता है । मंगल, और बुध फटाक्ष से देखते हैं, सूर्य थोर शनि एक दृष्टि से देखते हैं -इस प्रकार ग्रहों मेपः प्राच्यां धनुःसिंहावग्नावुक्षश्च दक्षिणे। मृगकन्ये च नै त्यां मिथुनः पश्चिमे तथा ॥१२॥ वायुभागे तुलाकुम्भौ उदीच्यां कर्क उच्यते । ईशभागेऽलिमीनौ च नष्टद्रव्यादिसूचकाः ॥१३॥ नष्ट व्यादि के सूचन के लिये राशियों को दिशायें इस प्रकार है। मेष पूर्य, धनु पश्चिम, तुला, कुंभ पायव्य कोण, पकं उत्तर तथा वृधिक मोर मी में अर्कशुकाररातर्किचन्द्रज्ञगुरयः क्रमात् । पूर्वादीनां दिशामीशाःकमान्नप्टादिसूचकाः ॥१४॥ सूर्य, शुर, मंगल, राहु, शनि, चंद्रमा, पुध मोर पृहस्पति ये प्रट प्रमश पूदि. दिगमों के स्वामी। का अवलोकन है।

१० शानप्रदीपिका। .. मेषयुग्मधनुःकुम्भतुलासिंहाश्च पुरुषाः ।। राशयोऽन्ये स्त्रियः प्रोक्ता ग्रहाणां भेद उच्यते ॥१५॥ मेप, मिथुन, धनु, कुंभ, तुला और सिंह ये पुरुपराशियाँ हैं याको स्त्रीराशि । पुमान्सोऽकारगुरवः शुकन्दुभुजगाः स्त्रियः । मन्दज्ञकेतवः क्लीया प्रभेदाः प्रकीर्तिताः ॥१६॥ ग्रहों में सूर्य मंगल, बृहस्पति, ये पुरपग्रह, शुक्र, चंद्र और राहु स्रोग्रह तथा शनि बुध और केतु ये कीव ग्रह है तुलाकोदण्डमिथुना घटयुग्मं नराः स्मृताः । एकाकिनी मेषसिंही बृपकलिकन्यकाः ॥१७॥ एकाकिनः स्त्रियो प्रोक्ताः स्त्रीयुग्मौ सकरान्तिमौ । एकाकिनोऽन्दुकुजाः शुक्रज्ञाोहिमन्त्रिणः ॥१८॥ एते युग्मग्रहाः प्रोक्ताः शास्त्र ज्ञानप्रदीपके । तुला, धनु, मिथुन, कुंभ, मिथुन (?) ये पुरुषप्रद है, मेप सिंह ये एकाकी पुरुष हैं। वृप फर्फ घृश्चिक फन्या ये एकाकी स्त्रीराशि है । सकर और मीन ये स्त्रीयुग्म कहे जाते हैं। सूर्य चन्द्रमा मंगल ये एकोबी प्रह ई और शुभ बुध शनि राहु वृहस्पति ये ग्रहयुग्म ग्रह के नाम से इस ज्ञान प्रदीपक में पहे गये है। विप्राः कालिमीनाश्च धनुःसिंहकिया (2) नृपाः ॥१६॥ तुलायुग्मघटा वैश्याः शूद्रा नक्रोक्षकन्यकाः । फर्क, धिक, और मीन ये ब्राह्मण, धनुः सिंह भोर मेघ ये क्षत्रिय, तुला मिथुन और कुंभ ये घेश्य तथा वृप मपार और पाया ये राशियां हैं। नृपो अर्ककुजी विश्री बृहस्पतिनिशाकरी ॥२०॥ वुधा वैश्यो भृगुः शूद्रो नीचावर्कभुजङ्गमों । प्रहों में भी सूर्य मंगल क्षात्रय, वृहस्पति और चन्द्र प्राहाण, पुप पैश्य, शुन र मोरनि सपा राहु नीच है। ..

. ज्ञानप्रदीपिका। रक्ता: मेषधनुःसिंहाः कुलोरोक्षतुलास्सिताः ॥२१॥ कुम्भालिमीना. श्यामाः स्युः कृष्णयुग्मांगनामृगाः । मेष, धनु और सिंह ये लाल, कर्क वृष और तुला ये सफेद, कुंभ वृश्चिक और मोन ये श्याम तथा मिथुन कन्या और मकर ये कृष्ण वर्ण के हैं शुकः सितः कुजो रक्तः पिङ्गलाङ्गो बृहस्पतिः ॥२२॥ बुधः श्यामः शशी श्वेतः रक्तः सूर्योऽसितः शनिः । राहुस्तु कृष्णवर्णः स्यात् वर्णभेदो उदाहृताः ॥२३॥ शुक्र का वर्ण श्वेत, मंगल का लाल, गुरु का पिंगल, बुध का श्याम, चंद्रका श्वेत, सूर्य का लाल, शनि का कृष्ण, राहु का वर्ण काला है। चतुरस्त्रं च वृत्तं च कृशमध्यंत्रिकोणतः । दीर्घवृत्तं तथाष्टाख चतुरतायतं तथा ॥२४॥ दीर्घायेते क्रमादेते सूर्याद्याः क्रमशो मताः । सूर्य आदि नव ग्रहों का स्वरूप प्रामश: इस प्रकार है-चौकोना, घृत्ताकार, बीच में पतला, त्रिभुज, दीर्घवृत्त (अंडाकार ) मष्टभुत, चौकोना गायत और लंगा। पञ्च कविंशयो दृष्टी नवदिक पोडशाब्धयः ॥२५॥ भास्करादिग्रहाणां च किरणाः परिकीर्तिताः । २१, २, ६. १०, १६ और ४ ये कमश सूर्यादि प्रहों की किरणें है। वसु रुद्राश्चरुद्राश्च वहिपटकं चतुर्दशम् ॥२६॥ विश्वाशा शतवेदाश्च चतुरित्रंशदजादिना । कुलीराजतुलाकुम्भकिरणो बसुसंख्यया ॥२७॥ मिथुनोक्षमृगाणां च किरणा तुसंख्यया। सिंहस्य किरणाः सप्त कन्याकार्मफयोस्तथा ॥२८॥ चत्वारो वृश्चिकस्योक्ताः सप्तविंशत् झपरय च ।

ज्ञानप्रदीपिका। फिरणों की संख्या ८ हैं। मिथुन वृप और मकर को ६, सिंह फन्या और मकर को ० यूधिक फी ४ और मोन की फिरणसंख्या २७ है। सप्ताप्टशरवहयद्रिरुद्रयुग्धाब्धिपड्वसु ॥२६॥ सप्तविंशतिसंख्याञ्च मेपादीनां परे विदुः । कुछ याचार्य ऐसा भी मानते हैं कि मेषादि राशियों की संख्या क्रमशः, ७ ८५३ ७ ११२४४६८ और २७ ये हैं। कुजेन्दुशनयो हवा दीर्घा जीवबुधोरगाः ॥३०॥ रविशुक्रो समौ प्रोक्तो शास्त्र ज्ञानप्रदीपके। मंगल चन्द्रमा और शनि ये हस्व , बृहस्पति दुध राहु ये लंबे पदके तथा सूर्य शुक्र ये समान फदके इस ज्ञानप्रदीपक में बहे गये हैं। आदित्यशनिसौम्यानां योजनं चाप्टसंख्यया ॥३१॥ शुक्रस्य पोडशोक्तानि गुरोश्च नरयोजनम् । सूर्य, शनि मोर बुध इनके योजन की सख्या ८ होती है। शुक्र की योजन संख्या १६ और की नन है। भूमिजः पोडशवयाः शुक्रः सतबयास्तथा ॥३२॥ विंशवयाश्चन्द्रसुतः गुरुस्त्रिशद्वयाः स्मृतः । शशांकः सप्ततिवयाः पञ्चाशद भास्करस्य वै ॥३३॥ शनैश्चरस्य राहोश्च शतसंस्यं वयो भवेत् । मंगल को माया १६ वर्ष फी, शुक्र पो सात की, बुध पो पोस फो, गुरु की तीस फी, चन्द्रमा पो सत्तर पी, सूर्य को पचास की, शनि और राहु की अवस्था सौ वर्ष की है। तिक्तो शनैश्चरो राहुः मधुरस्तु बृहस्पतिः ॥३॥ अम्लं भृगुर्विधुः क्षारं कुजस्य क्रूरजा रसाः । तवरः (१) सोमपुत्रस्य भास्करस्य कटुर्भवेत् ।।३५॥ शनि गौर राहु निक, यह मधुर, शुक मा, मंगल पाग बुध पमैला मोर रवि वने चापि कुलिगक्षनक्रमीनाः जलस्थिताः ॥४शा मेष, पृधिक, धनु गौर सिंद पर में राधा, फाएं पृर, मकर मोर मोन पेसमें पते हैं। सो प्रकार शनि, मोम भोर सूर्य पन में, गुम मोरपंद्रमा जल में- ज्ञानप्रदीपिका। वृपसिंहालिकुंभाश्च तिष्टन्ति स्थिरराशयः । कर्किनक्रतुलामेयाश्चरन्ति चरराशयः ॥३६॥ युग्मकन्याधनुर्मीनराशयो द्विस्वभावतः । वृष, सिंह, वृश्चिक और कुंम ये स्थिर राशियाँ है। वर्क, मकर, तुला और मेष ये चर राशियां हैं। मिथुन कन्या धनु और मीन ये द्विस्वभार हैं। धनुर्मेपवनं प्रोक्तं कन्यका मिथुनं पुरे ॥३७॥ हरिगिरी तुलामीनमकराः सलिलेषु च । धनु और मेप इनका स्थान वन है, कन्या और मिथुन का नाम, सिंह का पर्वत और तुला मीन और मकर का स्थान जल में है। नद्यां कुलीरः कुल्यायां वृपः कुंभः पयोघटे ॥३८] वृश्चिकः कूपसलिले राशीनां स्थितिरीरिता । पर्फ का स्थान नदी में, धूप का कुल्या (क्षुद्धजलाशय ) में कुंभ फा जल के घड़े में, वृश्चिक का स्थान कुए के पानी में है-यही राशियों की स्थिति है। वनकेदारकोद्यानकुल्याद्रिवनभूमयः ॥३६॥ आपगादिसरिद्वापि तटाकाः सरितस्तथा । धन, क्यारी, यगीचा, फुल्या (क्षलाशय) पर्वत, धन, भूमि जलाशय या नदी, तहाग (तालाघ) तया नदियां- जलकुंभश्च कृपश्च नष्टद्रव्यादिसूचकौ ॥४॥ घटककन्या युग्मतुला ग्रामेऽजालिधनुर्हरिः । अल कॅम, फूप, ये ऊपर के घनाये अनुसार स्थान नष्ट यस्तु के सूचक है। कुम कन्या, मिथुन और तुला राशियां गांव में- विपिने शनिभौमार्कि भृगुचन्द्रो जले स्थिती १४ शानप्रदीपिका। बुधजीवौ च नगरे नष्टद्रव्यादिसूचकौ ॥४२।। भौमे भूमिर्जलं काव्ये शशिनो सुधागिनः । घुध और वृहस्पति नगर में नष्ट द्रव्य के सूचक होते है । इसी तरह मगल के पलपान होने पर भूमि, शुक पे पली होने पर जल चंद्रमा और बुध के बलवान होने पर- निष्कुटश्चैव रंधश्च गुरुभास्करयोर्नभः ॥४३॥ मंदस्य युद्धभूमिश्च घलोत्तरखगे स्थिते (१)। गृहोद्यान बृहस्पति से छिद्र, सूर्य से भासमान, शनि के बरवान होने पर युद्ध की भूमि-ये मष्ट द्रव्य के सूचक होते हैं । सूर्याारवले भूमो गुरुशुक्रवले खगे ॥४॥ चंद्रसौम्यवले मध्ये कैश्चिदेवमुदाहृताम् । सूर्य, मगल और शनि के पलपान होने पर भूमि में गुरु और शुक्र के यली होने पर आकाश में चन्द्रमा और युध के वली होने पर यीच-ये शिनहीं किन्हीं का मत है। निशादिवससन्ध्याश्च भानुयुग्राशिमादितः ॥४५॥ चरराशिवशादेवमिति केचिताचक्षते । कुछ लोग घर, स्थिर और द्विस्वभाव राशियों के पश से रात, दिन और सन्ध्या या क्रमश निर्देश करते है। ग्रहेषु बलवान्यस्तु तद्वशाहलमोरयेत् ॥१६॥ शनवर्ष तद, रयानानार्मासदयं विदुः । ग्रहों का पल रिचार करते समय जो बलराम हो उसो दे अनुसार उसायला चाहिये। शनि पा हद वर्ष पाल है, सूर्य या दो मास- शुक्रस्य पक्षो जीवस्य मासो भौमस्य वासरः ॥४७॥ इंदोर्मुहूर्तमित्युक्तं ग्रहाणां बलतो वढेत् । शुक या एक पक्ष, वृहस्पति का एक माम, मगर पा एक दिक्ष चन्द्रमा पा एक मुर्त फाल है। प्रश्न विचारते समय प्रदों पापरावल विचार पर तदनुसार फर पदना चाहिये।

तद्वशात्प्रष्टुरारुढं ज्ञात्वा चारुढ़केश्चरात् ॥५५॥ + ज्ञानप्रदीपिका । १५ एतेषां घटिका प्रोस्ता उच्चस्थानजुषां क्रमात् ॥४॥ स्वगृहेषु दिनं प्रोक्तं मित्रभे मासमादिशेत् । यदि ग्रह अपने उच्च के हों तो घटिका, स्वगृही हों तो दिन, मित्र गृह हों तो मास का आदेश करना-- शत्रुस्थानेषु नीचेषु बत्सरानाहुरुत्तमाः ॥४६॥ शत्रु गृही होने पर या नीच राशि में होने पर एक वर्ष होते हैं ऐसा उत्तमों का कहना है सूर्यारजीवविच्छुक्रशनिचन्द्रभुजंगमाः । प्रागादिदिक्षु क्रमशश्चरेयुर्यामसंख्यया ॥५॥ प्रागादीशानपर्यन्तं वारेशाद्य तगा ग्रहाः । सूर्य, मंगल, वृहस्पति, बुध, शुक्र, शनि, चंद्र राहु ये आठ ग्रह क्रमशः पूर्वादि दिशाओं के स्वामी होते हैं। प्रभाते प्रहरे चान्ये द्वितीयेऽग्न्यादिकोणतः ॥५१॥ एवं याम्यतृतीये च क्रमेण परिकल्पयेत् । कुछ लोगों की राय में दिन माठ पहरों में प्रथम प्रहर में पूर्व की ओर उसी दिन का वारेश रहता है, द्वितीय में अग्नि कोण में उससे दूसरा, तृतीय में दक्षिण में तीसरा इस प्रकार से दिगोश रहते हैं। भूतं भव्यं वर्तमानं वारशाद्या भवंति च ॥५२॥ तदिने चंद्रयुक्तक्ष यावद्भिरुदयादिकम् । तावद्भिर्वासरः सिद्ध केचिदंशाधिपाटु विदुः ॥५॥ उक्त प्रकार से भूत भविष्य और वर्तमान फल द्योतक पारश होते हैं। प्रश्न के दिन चांद नझर जितने अंशादि से उदित हुमा है उतने दो दिन में कार्य सिम होता है। पर इसरों के मत से नवमांश के स्वामी के मंशादि पर से इसे निकालते हैं। सार्धहिनाडिपर्यंतमंकलन' प्रचक्षते । प्रश्ने निश्चित्य घटिकाः सार्धद्विघटिकाःक्रमात्॥४ तद्यथाकाललग्नतु तदा पूर्व दिशा न्यसेत् । आरुढाधिपतिर्यन प्रभाते नष्टनिर्गमः।

ज्ञानप्रदीपिका। मेपकर्कितुलानकाः धातुराशय ईरिताः ॥५६॥ कुंभसिंहालिवृषभाः श्रूयते मूलराशयः । धनुर्मीननृयुकन्या राशयो जीवसंज्ञका; ॥५७॥ मेष, पर्क, तुला और मकर ये धातुराशियाँ है। कुंभ, सिंह, वृश्चिक और वृष मूलराशियाँ हैं। धनु, मीन, मिथुन और कन्या ये जीवराशियाँ है । कुजेंदुसौरिभुजगा धातवः परिकीर्तिताः । मूलं भृगुर्दिनाधीशो जीवौ धिषणसौम्यजौ ॥८॥ इसीप्रकार मंगल, चन्द्रमा शनि और राहु ये धातु ग्रह, शुक्र और सूर्य मूल ग्रह घुध और वृहस्पति ये जीव ग्रह हैं । स्वक्षेत्रभानुरुच्चंद्रो धातुरन्यश्च पूर्ववत् । स्वक्षेत्रभानुजो वल्ली स्वक्षेत्रधातुरिन्दुजः १५६।। (?) विशेषता यह है कि, सूर्य अपने गृह का, और चन्द्रमा उच्च का धातु होते हैं। शनि स्वक्षेत्र में मूल और बुध पक्षेत्र में धातु होता है, शेष ग्रह पूर्ववत् ही रहते हैं। ताम्रो भौमस्त्रपुश्च कांचनं धिपणो भवेत् । रौप्यं शुकः शशी कांस्य: अयसं मंदभोगिनौ॥६०॥ मंगल, तामा, युध्र प्रपु (पीतल ?), गुरु सोना, शुक्र चादी, चद्रमा पासा, शनि मोर राहु लोहे होते हैं। भौमार्कमंदशुकास्तु स्वस्वलोहस्वभावकाः । चन्द्रज्ञागुरवः स्वस्वलोहोः स्वक्षेत्रमित्रपाः ॥१॥ मिश्रोमिश्रफलं ज्ञात्वा ग्रहाणां च फलं कमात् । मंगल सूर्य शनि शुक्र ये अपने २ भाव में लोइकार के होते हैं, चन्द्रमा युध हरपति अपने क्षेत्र तथा मित्र क्षेत्र में होने से रोहमारप पहे गए मिश्र में मिश्रित फलमा भादेश प्रम से करना चाहिये। + शिला भानोवुधस्याहुः मृत्पात्रं चोपरं विदुः ॥६२॥ सितस्य मुक्तास्फटिके प्रवालं भूसुतस्य च । अयसं भानुपुत्रस्य मंत्रिणः स्यान्मनःशिला ॥६॥ नीलं शनेश्च वैय्यं भृगोर्मरकतं विदुः । सूर्यकान्तो दिनेशस्य चंद्रकान्तो निशापतेः ।।६४॥ तत्तद्ग्रहवशान्नित्यं तत्तदाशिवशादपि । सूर्य को शिला, बुध का मृत्पात्र और उपर, शुक्र का मोती और स्फटिक मणि, मगल का मूंगा, शनि का लोहा, गुरु का मन शिला, ( धातु विशेष ) शनि का नीलम और वैडूर्य, शुक का मरकत. सूर्य का सूर्यकान्त, चंद्र का चद्रकात, ये रन प्रश्न विचारते समय तत्तद्ाशि और ग्रह पर से बताने चाहिये। बलावलविभागेन मिश्रे मिश्रफलं भवेत् ॥६५॥ नृराशो नृखगेष्टे युक्ने वा मर्त्यभूषणम् । तत्तद्राशिवशादन्यत् तत्तद्रूपं विनिर्दिशेत् ॥६६॥ बली, निर्मल का विचार करके दृढ और अदृढ फल बताना चाहिये। यदि मिश्रयल हो तो फल भी मिन होता है। यदि नरराशि मनुष्यग्रह द्वारा इष्ट किंवा युक्त हो तो धातुसंबंधी प्रश्न में मानवभूषण बताना चाहिये। शेष राशि और ग्रह के स्वरूपयश इति धातुचिता मूलचिन्ताविधौ मूलान्युच्यन्ने पूर्वशास्त्रतः। क्षुद्रसस्यानि भौमस्य सस्यानि बुधजीवयोः ।।६७॥ कक्षाणि ज्ञस्य भानोश्च वृक्षश्चन्द्रस्य वल्लरी। गुरोरिक्षु गोश्चिचा भूरुहाः परिकोर्तिताः ॥६॥ शनेरिगस्यापि तीक्ष्णकण्टकभूरुहाः । चन्द्रमा कोलतायें, वृहस्पति की ईख, शुक की इमली, शनि पादारु, राहु के तीखे कोटेदार मानप्रदीपिका! x अब x सूर्य का वृक्ष, x। x x पूर्णशास्त्रानुसार मूलचिन्ता का वर्णन करते हैं। x x मङ्गल के छोटे सस्य, बुध और वृहस्पति के यहे सस्य, x इस येवृक्ष कहे गये हैं।

२.१८ मानप्रदीपिका। -- . मंगल X xx॥ अजालिक्षुद्रसस्यानि वृपकर्कितुलालता ॥६६ कन्यकामिथुने वृक्षे कण्टद्रुमघटे मृगे । इक्षुर्मानधनुःसिंहाः सस्यानि परिकीर्तिताः ।।७।। मेप वृश्चिक इनके क्षुद्र सत्य, वृप कर्क और तुला इनकी लतायें, कन्या और मिथुन इनके वृक्ष, कुंभ और मकर इनके काँटेदार वृक्ष, मीन, धनु और सिंह इनके सस्य ईख हैं। अकंटंद्रुमः सौम्यस्य क्रूराः कण्टकभूरुहाः । युग्मकण्टकमादित्ये भूमिजे ह्रखकण्टकोः ॥७१|| वक्राश्चं कण्टकाः प्रोक्ताः शनैश्चरभुजंगमौ । पापग्रहाणां क्षेत्राणि तथाकण्टकिनो द्रुमाः ॥७२॥ 1 ॥ बुध के बिना कॉट के वृक्ष, क्रूर ग्रहों के भी काँटेदार वृक्ष सूर्य पादो काँटों घाला, मा छोटे कांटों वाली, शनि राहु का टेढे कांटों वाला वृक्ष कहा गया है,x, सूक्ष्मकक्षाणि सौम्यस्य भूगोर्निष्कंटकद्रुमाः । कदली चौपधीशस्य गिरिवृक्षा विवस्वतः ॥७३॥ वृहत्पत्रयुता वृक्षा नारिकेलादयो गुरोः । ताला: शनेश्चराहोश्च सारसारौ तरू वदेत् ॥७४ : सारहीनशनीन्द्ववन्तरसारो कपित्थको बहुसाराः स्वराशिस्थशनिज्ञकुजपन्नगाः ७५।। बुध का मूक्ष्म वृक्ष, शुक्र का निष्कंटक वृक्ष चंद्र का कदली वृक्ष, सूर्य का पर्वन वृक्ष, वृहस्पति का नारियल आदि बडे पत्तों पाले वृक्ष, शनि का ताल वृक्ष और राहु का सारवान् वृक्ष कहा गया है x x x x अपने राशिस्थ शनि ,युध मंगल और राहु के यहुसार वृक्ष बहे गये हैं। अन्तस्सारो परिस्थाने पहिस्सारस्तु मित्रगे। स्वकन्दपुप्पछदनाः फलपक्वफलानि च ॥७॥ मूलं लता च सूर्यायाः स्वस्वक्षेत्रेषु ते तथा । शत्रुस्यानस्थ गृह मन्तःसार पक्ष और मित्रस्यानस्य पहिसार वृक्ष यो पहते हैं। अपना अपनी गाशि में स्थित सूर्य मादि ग्रह प्रमश त्व, मूल, पुष्प, छाल, फल, पके फल, मूल, और स्ता इनके पोषक होते हैं। । htt २० - शानप्रदीपिका। चन्द्रो माता पिताऽऽदित्यः सर्वेषां जगतामपि । गुरुशुक्रारमंदज्ञाः पंच भूतस्वरूपिणः ॥१॥ सारे जगत् को माता चन्द्रमा गोर पिता सूर्य है। बृहस्पति शुक्र मंगल प्रानि और बुध ये पांचो पंच महाभूत हैं। श्रोत्रत्वचक्षरसनाघ्राणाः पञ्चेद्रियाण्यमी । शब्दश्पर्शी रूपरसो गंधश्च विषया अमी ॥२॥ श्रोत्र ( कान ) त्यक ( चर्म ) आख, जीम, घाण (नाक) ये पाव इन्द्रिय हैं। और शब्द स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये क्रमश इनके विषय है। ज्ञानं गुर्वादिपंचानां ग्रहाणां कथयेक्रमात् । गुरोः पञ्च भृगोश्चाब्धिः त्रयं हास्य कुजस्य द्वे ॥३।। एकं ज्ञानं शनेरुवतं शास्त्र ज्ञानप्रदीपके । गुरु, शुक्र, मंगल, बुध और शनि इनका ज्ञान कमश ५४, २, १, और ३ हैं। ऐसा ज्ञान प्रदापक शास्त्र का कहना है । भौमवर्गा इमे प्रोक्ताः शंखशुक्तिवराटकाः॥४॥ मत्कुणाः शिथिलायूकर्माक्षकाच पिपोलिकाः । शंख, शुकि, पौडी, खटमल, जू, पिपया, चीटिया-ये मोमवग अर्थात् मंगल के जीय हैं। बुधवर्गा इमे प्रोनाः पटपटा ये भृगोस्तथा ॥५॥ देवा मनुष्याः पशवो विहगाः गुरोः । (१) तथेकज्ञानिनो वृक्षाः शनिवृक्षा. प्रकीर्तिताः ॥ एकहित्रिचतु.पंचगगनादिगणाः स्मृताः । मोरे घुधपर्ग में, देव मनुष्य शुक्र वर्ग में, पशु और पक्षी गुरु वर्ग में, और पृक्ष शनियर्ग में पहे गये ६४ . x X अपने राशि पर सूर्य हो तो गरुड, वृहस्पनि हो तो श्वेत यक तथा राहु हो तो पक्षो कहना। बुध अपनी राशि पर हो तो मुगा, मगल दोनो प्रहों के लिये उन राशियों का स्थल करना चाहिये। २१ ज्ञानप्रदीपिका। घोंघा x x॥ कहना चाहिये ४ मरदूल और अन्य राशिल देहो जीवस्सितो जिह्वा बुधो नासेक्षणं कुजः ॥७॥ श्रोत्रं शनैश्चरश्चैव ग्रहावयवमीरितम् । बृहस्पति देह, शुक्र जीभ, बुध नाक, मगल आँख, और शनि कान ये ग्रहों के शारीरिक अवयव है। द्विपाच्चतुष्पाद वहुपादिहगो जानुगः क्रमात् ॥८॥ शंखशंबूकसंधश्च वाहुहीनान् विनिर्दिशेत् । दो पैर वाला, चार पैर वाला, बहुत पैर वाला, पक्षो, जघा से चलने वाला, शंख, संघ और बाहुहीन ये सूर्यादि ग्रह के भेद हैं। यूकमत्कृणमुल्याश्च बुहुपादा उदाहृताः ॥६॥ गोधा. कमठमुख्याश्च बहुपादा उदाहृताः । यूक (जू) मत्कुण ( खटमल ) वगैरह ये बहुपाद पहे जाते हैं, सपिणो, कच्छर आदि भी इस तरह स बहुपाद कहे जाते हैं। मृगमोनौ तु खचरौ नत्रस्थो मंदभूमिजौ ॥१०॥ वनकुक्कुटकाको च चितिताविति कीर्तियेत् । तद्राशिस्थे भृगौ हंसः शुक. सौम्यो विधौ शिखी ॥११॥ वीक्षिते च तदा ब्रूयात् ग्रहे राहो विचक्षण । प्रश्नल्न यदि मकर या मोन हो मोर उस पर शनि या मगल हो तो क्रमश धनकुषकुट और काक कहना। अपने शिशुक्र हो तो हस, बुध हो तो शुक, चद्रमा हो तो मोर x x x x x x तदाशिस्थे वो तेन दृष्टे यात् खगेश्वरं ॥१२॥ बृहस्पतो सितवका भारद्वाजस्तु भोगिनि । कुक्कुटो ज्ञस्य भौमस्य दिवांधः परिकीर्तितः ॥१३॥ अन्यराशिस्थखेटेषु तत्तद्राशिस्थलं भवेत् ।

पूप में शुमदो तागाय, मंगरदासोपामुग, युपहातोपदर मार कद पिगर,द्र तो गाय, पूर्णहो तोबारदक्षिा निदोवा मेंसमोर शतामीमत बताना चाहिया - 7 - कबाट शानप्रदीपिका। राहोगरजचांडालस्तस्कराः परिकीर्तिताः । गहु से युक या दृष्ट होने पर जिप देने वाला चाण्डाल यताना x x x x ! शनेस्तरुच्चिदः प्रोक्नः राहो(वरनापितो ॥२१॥ शंखच्छेदोनटः कारुनर्तकः शशिनस्तथा । इसके अतिरिक्त शनि से वृक्ष काटने वाला, राहु से धीवर या नाई, चंद्र से शवछेदो, किरोग, नर्तक मादि महना चाहिये। यह ग्रहों या यली होना बताया गया है। 'चूर्णकृन्मौक्तिकग्राही शुक्रस्य परिकीर्तितः ॥२२॥ तत्तद्वाशिवशातीततत्तद्राशिस्थितं ग्रहम् । तत्तद्राशिस्थखेटानां बलातु नष्टनिगमो ॥२३॥ इसी प्रकार शु के यली होने से चूना बनाने वाला, मोता का ग्रहण करने वाला "raint वाहिये। जन को राशि रतनो धीन चुकी हो निनी याको हो, उस पर प्रह साहो उसके अनुसार प्रतिगम का अनोत मादि पहना । इति मनुष्यकाण्डः मेपराशिस्थिते भौमे मेपमाहुर्मनीषिणः । तस्मिन्न स्थिते व्याघ्र गोलांगूलं बुधे स्थिने, ॥२४॥ शुकण वृपभश्चन्द्रगुरखश्च ततः परं । महिपीसूर्यतनये पणो गाय उच्यते ॥२५॥ । मेष राशि में मंगल हो तो मेर सूर्प हो तो ध्यान, युर हो तो गोलागल, शुभ हो तो । वृष (येल), x x x x न हो तो मेस, हो तो गाय (घोडपरास} माना चाहिये । वृषभस्थे भगो धेनुः कुजन्यं कुरुदाहृताः । (१) । बुधे कपिगुरावञ्च (१) दाशांके धेनुरुष्यते ॥२६॥ आदित्ये भरमः प्रोक्को महिपी शनिसर्पयोः । । T -- । 44 २४ झानप्रदीपिका। x x x x कर्किस्थे च करो भौमे महिपी नक्रगे कुजे ॥२७॥ वृपभस्थे हरियुग्मकन्ययोः इवा च फेरवः । हरिस्थे भूमिजो व्याघो रवींद्यास्तत्र केसरी ॥२८॥ शुक्नो जीवा कटः सौम्ये वन्ये स्वाकृतयो मृगाः । मंगल यदि षर्क में हो तो कर, मकर में हो तो भैंस, वृष में हो तो सिंह, मिथुन में हो तो कुत्ता, यन्यो में हो तो शृगाल, सिंह में हो तो व्याघ्र, उसी में रवि चन्द्र हो तो सिंह फाइना चाहिये ४ तुलागते भृगोवत्सश्चंन्द्रे गौः परिकीर्तिता ॥२६॥ धनुस्थितेषु जीवेषु कुजेपु तुरगो भवेत् । शनौ वक्र स्थिते तत्र मत्तो गज उदाहृतः ॥३०॥ शुक्र तुला में हो तो पछडा और चन्द्रमा तुला में हो तो गाय, धनु में वृहस्पति या कुज हों तो घोडा और शनि यदि यत्रो होकर उसी में हो तो मत्त हस्ती बनाना चाहिये । सर्पस्थे सत्र महिपो वानरो वुधजीक्योः । शुकामृतांशुसौम्येषु स्थितेषु पशुरुच्यते ॥३१॥ जीवसूर्येक्षिते गर्भ ध्यास्त्री च शनीक्षिते अंगारकेक्षिते शुक्रस्तन ज्ञात्रा वदेत्सुधीः ॥३२॥ वक्ष्येऽहं चिंतनां सूक्ष्मजनेस्तु परिचिंतिताम् । उसी (धनु ) राशि में यदि राहु हो तो भैंस घुध और वृहस्पति हो तो यानर, शुन चाद्र मोर बुध साथ ही हो तो पशु पनामा चाहिये । उक्त राशि को यदि वृहस्पति और सूर्य देखते हों तो गर्भ नया शनि देखता हो । यन्ध्या बनाना ४ धिपणे कुंभराशिस्थे त्रिकोणस्थे वास पश्यति ।।३।। मृगराजे स्थिते सौम्य धनुपि वीक्षिते शुभे । स्मृतः कपिर्मेपगते शनौ चूयान्मतङ्गाजम् ॥३४॥ पुग्म राशि का वृहस्पति हो या त्रिकोण में पैठ पर देखता हो, अथया चन्द्रमा पुस्म राशि में बैठा दो और धनु राशिम्प शुम मह देखता हो तो बानर भोर मेप में शनि पठा दो तो दापी होता है। x x xxx1 ज्ञानप्रदोपिया। x x x x कुजे मेपगते व्यंगं वुधे नर्तकगायको । गुरुशुक्रदिनेशेषु वणिजो वस्त्रजीवितः ॥३५।। चन्द्रे तथागते मन्दे सिंहस्थे रिपुचितनम् । वृपस्थे महिषी तौले वक्रण वृश्चिके गतम् (१) ॥३६॥ मेप में कुज हो तो अगहीन, सुध हो तो नर्तक और गायक, गुरु हो तो पणि, शुक्र है। तो वस्त्रजीवी, xxxxचन्द्र हो तौभी नही, शनि यदि सिंह में हो तो शत्रु, युप में हो तो भंस, ४ मेपगे सूर्यतनये मृत्युः क्ल शादयस्तथा । मित्रादिपञ्चवर्गश्च ज्ञात्वा ब्रूयात्पुरोक्तित. ॥३७॥ शनि मेप में हो तो, मृत्यु तथा फष्ट होता है। ग्रहों का फल मिनादि पचवर्ग का बल बना के कहना चाहिये। इति चिन्तनकाण्ड x x धातु राशियदि धातु खग से दृष्टदो और धातु छर से युक्त हो तो धातु विता होतो मूल धातुराशौ धातुखगे दृष्टे तच्छनलंयुते । धातुचिता भवेत्तद्वत् मूलजीने तथा भवेत् ॥१॥ धात्वृक्षस्थे मूलखगे जीवमाहुर्विपश्चितः । जीवराशौ धातुखगे दृष्टे या यदि मूलिका ॥२॥ मूलराशो जीवखगे धातुचिंता प्रकीर्तिता । x X x x X धातु राशि में यदि मूर ग्रह है। तो जीव, जीय राशि में धातु प्रद हो या उसमे दृष्ट और मूल राशि में जीर ग्रह हो तो धातु फी चिन्ता पहनी चाहिये फहनी चाहिये, इसी प्रकार जोर और मूल चिन्ता मी जाननी चाहिये। निवर्गखेटकदृप्टे युक्त वलपशावदेत् । पश्यन्ति चन्द्रं चेद्दन्ये वदेत्तत्तद् हातिम् ।।३।।

२६ झानप्रदापिका। x X xxxx xx x xxxx धातुमूलश्च जीवञ्च वंशं वणं स्मृति वदेत् । कंटकादिचतुष्केषु स्याच्छत्रुनित्रग्रहर्युते ॥४॥ दृप्टे वा सर्वकार्याणां सिद्धि वयाच चितनम् । धातु मूल और जीव राशियों पर से वश वर्ण और स्मृति बताना चाहिये। विचार करते समय फण्टकादिम चतुष्टय आदि तथा शत्रु मित्र राशि और ग्रह का पूर्ण विचार कर सिद्धि यानी चाहिये। उदये धातुचिंता स्यादारूढे मूलचिंतनम् ॥५॥ छन्ने तु जीवचिंता स्यादिति कैश्चिदुदाहृतम् । केन्द्र फणपरं प्रोक्तमापोलीवं क्रमात्रयम् ॥६॥ चिन्ता तु मुष्टिनानि कथयेत्कार्यसिद्धये ॥ लग्न से धानु चिन्ता आन्ढ से मूलचिन्ता और छत्र ले जीवचिन्ता की जाती है ऐसा कुछ लोग मानते है। केन्द्र, (३, ४, ७ १० ) पणफर (२,५ ५, ११) आपोक्कोर (३, ६, १, १२,) ये क्रम से हैं, इन पर से न मुष्टि बादि का विचार किया जाता है। इति धातुकाण्डः तत आरूढगे चन्द्रे न नष्टं रुक च शाम्यति । आरूढादशम वृद्धिश्चतुर्थे पूर्ववद्वदेत् ॥१॥ नष्टद्रव्यस्य लाभश्च सनहानिश्च सप्तमे । उदयाद्वादशे पप्ठे अप्टमारुढगे सति ॥२॥ चिंतितार्थो न भवति धनहानिईि पट्यलम् । तनुं कुटुम्वं सहजं मातरं जनक रिपुम् ॥३॥ कलनं निधनं चैव गुरु कर्म फलं व्ययम् । दृष्टे विधिनमादा तस्य तस्य फलं वदेत् ॥ भाद्रमा यदि गारूद राशि में होतो उत्तर इस प्रकार देना-पातु नट नहीं हुई, रोग शान्त -माढ से दाम में हो तो पढ गया हैं चतुर्थ में हो तो नए घस्तु गिल या स्पिति २७ ज्ञानजदीपिका। पूर्ववत् है, सप्तम में हो तो सर नष्ट हो गया। यदि आरुढ नसे द्वादश, पाठ और अष्टम में हो तो जिसकी चिता है वह नहीं होगा, धनहानि, शत्रुरल, अपना, पलत्र का माता का, पिना चा, निधन अनिष्ट, व्यय आदि फल कहना। ग्रहों की शुभाशुम दृष्टि आदि का विचार भी करना । रवीन्दूशुक्रजीवज्ञा नृराशिपु यदि स्थिताः । महँचिन्ता ततः शौरिदृष्टेनाथं कुजे (?) तथा ॥५॥ कुजस्य कलहः शारेस्तरकर गरलं भवेत् । रविदृष्टेऽथवा युझ्ने चिंतनादेव भूपतेः ॥६॥ यदि, नि, चन्द्र, शुक, बृहस्पति और बुध मनुष्य राशि पर हों तो मत्य की चिंता, शनि यदि देवता हो तो अर्थ निन्ता चहा। मनुपाशि पर मंगल हो तो कलह, शनि हो तो चोर या जहर की चिन्ता, रवि से दूर अथवा यक हो तो राजा की विन्ता कहनी चाहिये । इत्यारूदकाग द्वितीये द्वादशे छो सर्वकार्य विनश्यति । गुरौ पश्यति युक्ने वा तत्र कार्य शुभं वदेत् ॥१॥ तस्मिन्पापयुते दृष्टे विनाशो भवति ध्रुवम् । तस्मिन्सौम्ययुते दृष्टे सर्व कार्य शुभं वदेत् ॥२॥ मि मिश्रफलं ब्रूयात शास्त्र ज्ञानप्रदोपिके। यदि छत्र द्वितीय किंधा द्वादश हो तो सारा काय नष्ट होता है। किन्तु यदि वृहस्पति से युक्त किंवा दृष्ट हो तो सिद्धि होती है। पापग्रह से दूध रिचा युक्त होने से विनाश तया सौम्य प्रद से दृष्ट अथवा युक्त होने पर शुभ कार्य होता है। पापग्रह से नाश शुम ग्रह से सिद्धि होती है। दोनों है तो मिश्रफल होता है। पञ्चमे नवमे छत्रे सर्वसिद्धिर्भविष्यति । तस्मिन् शुभाशुभेद्दष्टे मिश्र मिश्रलं वदेत् ॥३॥ पक्षा और नयम छत्र में सब पार्यों की सिद्धि होती है । शुम से दृष्ट या युज होने पर शुभ, पाप ग्रह से अशुम गौर मिश्र से मिस फल होता है। चतुर्थे चाष्टमे पठे द्वादशे छत्रसंयुते। नष्टद्रव्यागमो नास्ति न व्याधिगमनं भरेत् ॥४॥ ।

x x x x x X x ज्ञानप्रदीपिका। न कार्यसिद्धिः सर्वेषां शनिग्रहवशाद वदेत् । वृहरपत्युदये स्वर्णाधनं विजयमागमः ॥५॥ देपशांतिः सर्वकार्यसिद्धिरेव न संशयः । यदि छा ४, ८ ६, या १२ वा हो तो गट वस्तु नहीं मिली, रोग शान्त नहीं हुआ, फार्य सिद्धि नहीं हुई इत्यादि फल शनि से युक्त होने पर बताना। वृहस्पति के उदय होने पर स्वर्ण, धन, विजय, उपशान्ति एच सय कार्यों की सिद्धि नि सन्देह होती है। सौम्योदये रणोद्योगी जित्वा तद्धनमाहरेत् ॥६॥ पुनरेप्यति सिद्धिः स्यात् छत्रसंदर्शने तथा। व्यवहारस्य विजयं छत्रेऽप्येवमुदाहृतम् ॥७॥ छत्र यदि शुम युक्त या दृष्ट हो तो युद्ध में निन्य, फार्य की सिद्धि आदि शुभ फल फहना चाहिये। चन्द्रोढयेऽर्थलाभश्चेत् प्रयाणे गमने तथा । चिंतितार्थस्य लाभश्च चन्द्रारूढे स्थितेऽपि च ॥८॥ शुक्रोदये बुधोऽपि स्यात् स्त्रीलाभोव्याधिमोचनम् । जयो यान्त्यरयः स्नेहं चन्द्रेऽप्येवमुदाहृतम् ॥६॥ चंद्रमा लग्न में हो तो यात्रा आदि में सोची हुई यस्तु मिल जाती है। यह यात तम भी संभव है जब चन्द्रमा भारुढ में हो। शुक्र या युध लग्न में हो तो नीलाम जय, च्याधि नाश एवं शत्रु धा स्नेहपात्र होना बताना चाहिये । लनस्थ चन्द्रमा होने पर भी यही पल कहना चादिये। उन्यारूदछनेषु शन्यकांगारका यदि । अनाशं मनरतापं मरण व्याधिमादिशेत् ॥१०॥ उदय, भार" और छत्र में यदि शनि सूर्य और मगल हों तो अर्थ (धन ) का नाश मानसिक व्यथा मरण और प्याधि यना चाहिये। एतेषु फणियुक्तेपु बुधश्चोरभयं ततः । मरणं चेव देवज्ञा न संदिग्धो वदेत् सुधीः ॥११॥ न्ही यानो ( रग्न, आम और छत्र में ) में यदि राहु के साथ युध घेटा हो तो नि होकर निमार ज्योनियो को atr का भय भोर मरण पनाना चाहिय । और ज्ञानप्रदीपिका। निधनारिधनस्थेषु पापेष्वशुभमादिशेत् । तन्वादिभावः पापैस्तु युक्तो दृष्टो विनश्यति ॥१२॥ अष्टम, पठ, द्वितीय में पाप मद हो तो फल अशुभ होता है। रायमहाकान्त तन्वादि भाष अशुभ फल दायक है। शुभदृष्टो युतो वापि तत्तदभावादि भूपणम् । मेपोदये तुलारूढ़े नष्टं द्रव्यं न सिध्यति ॥१३॥ शुम से दृष्ट किंवा युक्त होने पर भाव शुभ फलद होते हैं। मेष लग्न हो और तुला भारुढ़ हो तो नष्ट द्रव्य की सिद्धि नहीं होती। तुलोदये क्रियारूढ़े नष्टसिद्धिन संशयः । विपरीते न नष्टाति पारुढ़े ऽलिभोदये ॥१॥ किन्तु यदि तुला लग्न दौर मेष आरूढ़ हो तो अवश्य सिद्धि होती है। वृष भागढ़ और वृश्चिक लग्न हो तो महा लाभ होता है । नष्टसिद्धिर्महालाभो विपरीते विपर्ययः । चापारूढ़ भष्टसिद्धिर्भविता मिथुनोटये ॥१५॥ विपरीते न सिद्धिः स्यात् कारूढ़े मृगोदये । सिद्धिश्च विपरीते तु न सिध्यति न संशयः ॥१६॥ किन्तु यदि वृप ला और वृश्चिक मान्द हो तो सिद्धि नहीं होती। मिथुन लम में हो धनु मारूढ़ हो तो नए सिद्धि होती है। उल्टा होने से फल उल्टा होता है। फर्क भारुद हो मकर का उदय हो तो सिद्धि होती है। उल्टा होने से सिदि नहीं होनी। सिंहोदये घटारूढ़े नष्टसिद्धिर्न संशयः । विपरीते न सिद्धिःस्यात् झपारुढेगनोदये ॥१७॥ नष्टसिद्धिविपर्ये (2) स्यात् दृष्टादृष्टेर्निरूपणम् । रासिंद हो आसंद्र सुध हो तो सिद्धि मोर उन्दा दोने से प्रसिद्धि होती है। मोन भारद हो गौर पाया Pा हो तो गए सिदि गदी दोनी है।

भानप्रदीपिका। -- - स्थिरोदये स्थिरच्छन्ने स्थिरलग्नो भवेद्यदि । न मृतिर्न च नष्टं च न रोगशमनं तथा ॥१८॥ खिर लम हो और स्थिर छन हो और स्थिर उदय हो तो फल 'नहीं' कहना चाहिये। भर्थात् 'मृत्यु नहीं हुई ' 'नष्ट नहीं हुआ 'रेगशान्ति नहीं हुई 'इन्यादि इत्यादि कहना समुचित है। द्विदेहबोधया (2) रूढे छत्रे नष्टं न सिध्यति । न व्याधिशमनं शत्रुः सिद्धिविद्या नच स्थिरा ॥१६॥ द्विस्वभाव रन, द्विस्वभाव छन्न और द्विस्वभाव आहढ़ हो तो 'नए सिद्धि नहीं हुई 'व्याधि शमन नहीं हुआ' शादि निषेधात्मक उत्तर देना। चरराश्युदयारूढ़नपु स्यादिति स्थिता । नष्टसिद्धिन भवति व्याधिशांतिन विद्यते ॥२०॥ सर्वागमनकार्याणि भवन्त्येव न संशयः । ग्रहस्थितिवलेनैव एवं वृ यात शुभाशुभम् ॥२१॥ घर राशि ही लग्न, छत्र और मारुढ़ हो तो भो नहीं, अर्थात् नष्ट पिद्धि न हुई, रोग- शान्ति नहीं हुई, आदि बनाना। आगमन सम्बन्धी प्रश्नों के उत्तर में कहना चाहिये। इस प्रकार शुभाशुभ फल ग्रहों पर से बहना चाहिये। चरोभयस्थिताः सौम्याः सर्वकामार्थसाधकाः आरूढछनलग्नेषु करेवस्तं गतेषु च ॥२२॥ परेणापहृतं ब्रूयात तत सिध्यति शुभेपु च ।।२३।। घर गोर हिमाघ राशियों पर यदि शुभ ग्रह हो तो कार्य सिद्ध होता है छत्र गौर लग्न में यदि भस्त होकर र प्रह पढे हों तो दूसरे ने चुराया है' ऐसा फल फहना। पर, यदि शुभग्रह हों तो मिल जायगा, ऐसा पहना । पंचमो नवमस्तेन नष्टलाभः शुभोदये। येषु पापेन नष्टाप्ती रूट्यादित्रिकेषु च ॥२४॥ पंचम, नयम और सप्तम (१) शुम से युक्त हों तो नष्ट घस्तु मिलेगी, अशुभ ग्रह से युद्ध हों तो न मिलेगी। यदो दाल रस, चतुर्य और दशम का भी जानना ।

३१
शनप्रदीपिका।
भ्रातृस्थानयुते पापे पंचमे वाऽशुभस्थिते ।
नष्टद्रव्याणि केनापि दीयन्ते स्वयमेव च ॥२५॥
तृतीय स्थान में पाप ग्रह हों या पंचम में हो पाप ग्रह हों तो कोई स्वयं नष्ट द्रव्य
दे जायगा।
प्रश्नकाले शकचापे धूमेन परिवेष्टिते।
ग्रहे द्रष्टुर्न भवति तत्तदाशासु तिष्ठति ॥२६॥
x
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पृष्ठोदये शशांकस्ट नष्टं द्रव्यं न गच्छति ।
तद्राशिःशनिदृष्टश्चेन्नप्टं व्योन्नि कुजे न तत् २७॥
पृष्टोदय राशि लग्न में हो, उसमें चंद्रमा बैठा दो तो नए द्रव्य कहीं गया नहीं है ऐसा
कहना। किन्तु वह पृष्ठोदय राशि यदि शनि से दृष्ट हो x
बृहस्पत्युदये स्वर्ण नष्टं नास्ति विनिर्दिशेत् ।
शुक्र चतुर्थके रौप्यं नष्टं नास्ति वदेध्रुवम् ॥२८॥
सप्तमस्थे शनी कृष्णलौहं नष्टं न जायते
वुधोदये त्रपुर्नष्टं नास्ति चन्द्रे चतुर्थके ॥२६॥
लग्न में गुरु हो तो सोना नष्ट नहीं हुआ। चतुर्थ में शुक हो तो चान्दी नए नहीं हुई।
सप्तम में शनि हों तो लोहा नष्ट नहीं हुआ। रन में बुध हों ताया नष्ट नहीं हुआ। चंद्रमा
चतुर्थ में हो तो कांसा नष्ट नहीं हुआ ऐसा पताना चाहिये।
कांसं नष्टं न भवति वंगं राहौ च सप्तमे।
आरकूटं पंचमस्थे भानौ नष्टं न जायते ॥३०॥
राहु सप्तम में हो तो रागा गौर फासा नहीं नष्ट हुए। पंचम में सूर्य हो तो पित्तल
नष्ट नहीं हुआ।
दशमे पापसंयुक्ते न नष्टं च चतुष्पदं ।
वन्धनादि भवेयुः स्यात्तत्तद्विपदराशयः ॥३१॥

रन से विषम राशि में यदि पुपर प्रादोनो चोर पुष्प दोना समराEिF ३२ भानप्रदीपिका। पापग्रह दशम में हों तो पशु नष्ट नहीं हुआ। यदि यह राशि नरराशि हो तो स्तिो ने घाघ लिया है ऐसा यताना चाहिये। बहुपादुदये राशौ बहुपान्नष्टमादिशेत् । पक्षिराशौ तथा नष्टे एतेषां बंधमादिशेत् ॥३२|| यापात् गशि यदि लग्न हो तो यहुपाद जीना हुआ है ऐसा बताना । यदि ये पक्षि राशि में नष्ट हुए हैं तो फिसो फे वधन में पड गये हैं ऐसा बताना चाहिये। कर्कवृश्चिकयोलग्ने नष्टं सद्मनि कीर्तयेत् मृगमीनोदये नष्ट कपोतान्तरयोर्वदेत् ॥३३॥ फर्क और वृश्चिक यदि लगा हो तो घर में ही नष्ट वस्तु है ऐसा बताना। मकर या मीन होतो फ्यूतरों के पासस्थल के पास पहीं पड़ा है। कलशो भूमिजे सौम्ये घटे रक्तघटे गुरुः । शुक्रश्च करके भन्ने घटे भास्करनन्दनः ॥३४॥ आरनालघटे भानुश्चन्द्रो लवणभाण्डके । नष्टद्रव्याश्रितरथानं सदमनीति विनिर्दिशेत ॥३५|| मगलकारक होने से घटे में और बुध पागी घडे ही में तथा घृहरपति का लाल घरे में, शुभ, होतो टूटे फूटे परफ में, शनिश्चर हो तो घटे में फमरघट में सूर्य पा, चन्द्रमास नमक के घर में अपने घर में नए द्रव्य पाखान धिय परना। पुंग्रहे संयुते दृष्टे पुरुपस्तस्करो भवेत् । स्त्रीराशी स्त्रीग्रहेप्टे तस्करी च पधूपेत् ॥३६॥ लम पुराशि पा हो, पुपर प्रद से युक्त और दृष्ट हो तो चोर पुगप है। पा, पदि स्त्री राशि न हो मोर स्त्री पद से युन चौरदृष्ट हो तो स्नी चोर है। उदयादोजराशिस्थे पुंग्रहे पुरुषो भवेत् । समरायुदये चोरी समस्तैः स्वीग्रहर्वधः ॥३६॥ में दो और उससे समापान परलो प्रहदो चोरतो चोर होगी।

ज्ञानप्रदीपिका। - उदयारूढयोश्चैव वलावलवशाद वदेत् । कर्किनकपुरंधीषु नष्टद्रव्यं न सिष्यति ॥३७॥ और भारूढ़ परसे जो फल कहा गया है उसे कहते समय बलोरल का विचार करके कहना। कके मका और कन्या में भूला माल नहीं मिलता। पश्यन्ति खे खगेश्चन्द्रः चौरास्तद्वतस्वरूपिणः द्रव्याणि च तथैव स्युरिति ज्ञात्वा वदेत सुधीः ॥३८॥ आकाश में जो ग्रह चन्द्र को पूर्ण दृष्टि से देखना हो उसी के स्वरूप का चोर बताना, द्रव्य भी वैसा ही होगा। यस्य आरूढभं यात। तस्यां दिशि गतं वदेत । तत्तद्ग्रहांशुसंख्याभिस्तत्तदिनाधिकं वदेत् (१) ॥३॥ जिसके आगढ़ में वस्तु नष्ट हुई है उसी को दिशा में गई है और उस ग्रह की किरणों के पार दिन भो बताना चाहिये। खभावकवशादेवं किंचिद्वदृष्टिवशाद बदेत् । चन्द्रः स्वर्भादुदयभं यावत्तावत् फलं भवेत् ।।४०] चरस्थिरोमयः पश्चादेकद्वित्रिगुणान् वदेत् । स्वभाव और दृष्टि का ध्यान रण कर पास पहना चाहिये । चन्द्रमा के अपनी राशि से जितनी दूर लग्न हो उतना ही पल होता है। वर्गस्थिर और द्विस्वभाव राशियों से कमश: एक दो और तीन गुना काल आदि बनाना। इति नाटकाण्डः सुवस्तुलाभं राज्यं चे राष्ट्र ग्रामं स्त्रियस्तथा । उपायनांशुकोधानलाभालामान् वदेत् सुधीः ॥१॥ इस प्रकरण में कथित नियमों के अनुसार वस्तुलाम, राज्य, राष्ट्र, ग्राम, स्त्री, पत्र, लाम, मोर हानि को बुद्धिमान बनायें। - ३४ ज्ञानप्रदीपिका उदयादित्रिकान् खेटाः पश्यन्त्युच्च‘गा यदि । शत्रुमित्रत्वमायाति रिपुः पश्यति चेद्रिपुम् ॥२॥ यदि उच्च ग्रह लग्न द्वितीय और तृतीय को देखते हो तो शत्रु मी मित्र हो जाता है। उदयं छत्रलग्नं च रिपुः पश्यति वा युतम् । आयुर्हानिः रिपुस्थानं गतश्चेद बन्धनं भवेत् ॥शा यदि शत्रुग्रह अपने शत्रु को देखना हो अथवा, गनेश का शत्रु लग्न या छत्र से युन या द्रुष्ट हो तो आयु का हानि होगी। रिपुस्थान गम होने से बन्धन भी होता है । गतो नायानि नष्टं चढहिरेव गति वदेत् । गलवच्चन्द्रजीवाभ्यां खेन्टेषु सहितेषु च ॥४॥ अथवा ( उसी परिस्थिति में ) गया हुआ धन नहीं लोटता अथवा बाहर,पी ही गति करनी चाहिये । पाप ग्रह से युक्त चन्द्रमा और सूरपनि का यह फल बनाना है । नष्टप्रउने न नष्टं स्यात् नृत्युप्रने न नश्यति । पापदृष्टियुने खेन्द्रे भानुयुक्तं विपर्ययः ॥५॥ खोये हुए प्रश्न में खोयाहुना नहीं कहना एव मृत्युरे प्रश्न में भी मरता नहीं। यदि पाप ग्रह का दृष्टियोग हो तो यह फर होता है, किन्तु स्या दृष्टियोग में इसका उल्टा होता है। शत्रोगगमनं नास्ति चतुर्थे पापसंयुते । दशमेकादशे सौन्यः स्थितश्चेत्सबकायकृत् ।।६।। यदि लग्न से चौथे स्थान में पाप ग्रह बैठे हों तो शत्रु का आगमन नहीं दाना एवं और शुम प्रहस्पिन तो सब कामों को सिद्ध करता है। विपपीडा प्रश्न तु रोगिणां सरण भवेत् । गमनं विद्यने प्राटुर्नास्तीलि कायेद बुधः ॥७॥ प्रारख्यकार्यहानिश्च धनस्यायतिरीहिता । पूर्वोक्त स्थिति में पिपीहा तो रोगो या मरण हो जाता है और प्रश्नपा की यात्रा नहीं होती तथा ग्राम दिये हुए पार्य पाहानि तथा पनि होती है ऐसा . दशम एकादश में पहा गया है।

ज्ञानप्रदापिका। ऊपर । चन्द्राव्योनस्थिते शुक्र जोवादव्योमस्थित खो॥ तल्लन कार्यसिद्धिः स्यात् पृच्छतां नान संशयः । चन्द्र गशि से दशम में शुक्र हो और वृहस्पति की गशि से दशम में सूर्य हो के बताये हुए लग्न में पूछने वाले सो निसन्देइ सिद्धि होनो है। उदयात्सप्तमे व्योन्नि शुक्रश्चेत् स्त्रीसमागमः ॥६॥ धनागमं च सौम्ये च चन्द्रेऽप्येवं प्रकीर्तितम् । लग्न से सनम में शुरु हो तो सोममा, बुध हो तो धनागम और चन्द्रमा भी हों तो धनागम बनाना चाहिये। अन्य शुभाहों पर मे भी यही फल कहा जायगा। मित्रः त्वाम्युच्चमायाति नताखेताश्च यष्टिका. ॥१॥ शन्यारयोगवेलायां सर्वकार्यविनाशनम ।। मित्र म्बामो उच्च का ज्योति ग्रह हो नो खींचना है. शनि मंगल योग वेला में हो तो सम्पूर्ण कार्यों का नाश करता है। पूर्वशास्त्रानुसारेण मृत्युव्याधिनिरूपणम् ॥११॥ पूर्व फथिन शास्त्र के अनुसार मृत्यु और व्याधि का निरूपण करता है। उदयात् पष्टसे (?) व्याधिः अष्टने मृत्युसंयुतम् । तत्रारूडे व्याधिचिन्ता निधने (१) मृत्युचिन्तनम् ॥१२॥ लन से पष्ठ स्थान से व्याधि और अष्टम स्थान से मृत्यु का विचार परना चाहिये। इसी प्रकार आरुढ से भी क्रमश. पष्ठ और अष्टम हो नो व्याधि मोर मृत्यु का विचार करना चाहिये। तत्तद्ग्रहयुने दृष्टे व्याधि मृत्यु वदेत् क्रमात् । पापनीचारयः खेटाः पश्यन्ति यदि संयुताः ॥१३॥ न व्याधिशमनं मृत्युं विचाय बदेत् क्रमात् । ध्याधि भोर मृत्यु को इस प्रकार बनाना चाहिये-यदि पष्ट स्थान और अष्टम स्थान पाप ग्रह, नौव ग्रह या शानु ग्रह से दृष्ट या युन हो सोशघि मोर मृत्यु मनाना चाहि। इनका शमन नहीं हुमा यह पिवार यरके बनाना चाहिये।

मानप्रदापिका । । एतयोश्चंद्रभुजगौ तिष्ठतो यदि चोटये ॥१४॥ गरादिना भवेदव्याधिः न शाम्यति न संशयः । पृष्ठोदये क्षेत्रछत्रे व्याधिमोक्षो न जायते ॥१५॥ यदि इन्हीं पष्ठ या अष्टम स्थान में चन्द्रमा और राहु या लग्न में एक हो और अन्य इन स्थानों में तो पिप देने से व्याधि हुई है और यह शान्त न होगी। पृष्ठोदय रन हो और लग्नेश की राशि हो छन हो तो व्याधि का शमन नहीं हुआ है । व्याधिस्थानानि चैतानि मूर्धा वक्र भुजः करः । वक्षःस्थलं स्तनौ कुक्षि कक्ष मूलं च मेहनं ॥१६॥ उरू पादौ च मेपाया राशयः परिकीर्तितो. । मेपादि राशियों के लग्न होने से क्रमश इस प्रकार व्याधि स्था1 जानना चाहिये- सिर, मुह, बाहु, हाथ ( इथेली ), छाती, स्तन, कोख काय, मूल उपस्थ, Fधा मौर चरण। कुजो मूर्ध्नि मुखे शुक्रो गण्डयोर्भुजयोर्बुध ॥१७॥ चन्द्रो वक्षसि कुक्षौ च हनौ नाभी रविर्गुरु । उों शनिरहिः पादो पहाणां स्थानमीरितम् ॥१८॥ ग्रहों को स्थान इस प्रकार है-मंगल मूर्द्धा में शुम मुह में गण्डस्थल और भुज में बुध, चन्द्र यक्ष स्थल में और कोख में, हनु (दोही) भोर नामि में कमश सूर्य और गृह स्पनि, अधों में शनि, चरणों में राहु । स्थानेवेतेषु नष्टं च भदेतेषु राशिपु । पापयुम्नेषु दृष्टेपु नीचसम्नेषु सम्भवः ॥१६॥ न स्थानों में अथवा इन राशियों में पाप हो पा दृष्टियोग हो और उस समय में मष्ट हुमा हो तो तथा नोवासक में हो तो रोग फा सम्भर जानना चाहिये। पश्यति चेटु ग्रहाश्चंटू' व्याधिस्थानागलोकनम् । पूर्वोत्तमासवर्षाणि दिनानि च वढेत्सुधीः ॥२०॥ पदि व्याधि स्थान को देखने याले बद्रमा पर ग्रहों को हरि को तो पहले बताए दिन, मास मोर य पानिर्देश परना चाहिय।

ज्ञानप्रदीपिका।
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पष्ठाष्टमे पापयुते रोगशान्तिन जायते ।
पष्ठापटमे शुभयुते रोगः शम्यति सर्वदा ॥२१॥
षष्ठ और अष्टम स्थान यदि पापाकान्त हों तो रोगशान्ति नहीं होती पर, यदि शुम
युक हों तो होता है।
किचित्तत्र विशेयोक्तो रोगमृत्युस्थलं शुभम् ।
यावद्भिर्दिवसान्ति तावद्धी रोगमोचनम् ॥२२॥
विशेषता यह है कि, पष्ठ या अष्टम स्थान में जितने दिनों में शुभ ग्रह पहुचेगा उतने हो
दिनों में रोग छूटेगा।
रोगस्थानं भवेदस्ने पापखेटयुत तथा ।
तत्वष्ठचंद्रसंयुक्ते रोगिणां मरणं भवेत् ॥२३॥
यदि रोगदान अस्त लग्न पाप ग्रह से युक्त हो और उससे भी छठा स्थान चंद्रमा
से युक्त हो तो रोगी की मृत्यु निश्चिन होगी।
रोगस्थानं कुज. पश्येत् शिरस्तोऽधो ज्वरं भवत् ।
भृगुर्विसूची सौम्यश्चेत् कक्ष थिभविष्यति ॥२४॥
मंगल यदि पष्ठ स्थान को देखें तो शिर के नीचे अर, शुन देखे तो हैजा और बुध,
देखे तो कक्ष ग्रंथि (लंग) होगा।
राहुर्विषू शशी पश्येन्नेत्ररोगो भविष्यति ।
मूलव्याधिगुः पश्येच्च'द्रवत् स्याद भृगोः फलं ॥२५॥
राहु से हैजा, चद्रमा के देखने से नेत्ररोग और चंद्र को भृगु देखना हो तो शुक्र का
मो फल चंद्रसा ही होगा।
परिधी चंद्रको दण्डष्टिः प्रजने कृते सति ।
कुष्ठव्याधि मृतिं ब्रूयात् धूमे भूताहतं भवेत् ॥२६॥-
सर्वापस्मारमादित्ये पिशाचपरिपीड़नं ।
श्वासः कासश्च शृलश्व शनी शीतज्वर कुजे ॥२७॥

ज्ञानप्रदीपिका । . एतयोश्चंद्रभुजगौ तिष्ठतो यदि चोदये ॥१४॥ गरादिना भवेदव्याधिः न शाम्यति न संशयः। पृष्ठोदये क्षेत्रछत्रे व्याधिमोक्षो न जायते ॥१५॥ यदि इन्हीं पष्ठ या अष्टम स्थान में चन्द्रमा और राहु या रन में एक हो और अन्य इन स्थानों में तो विप देने से व्याधि हुई है और वह मान्त न होगी। पृष्ठोदय न हो और लग्नेश की राशि हो छत्र हो तो व्याधि का शमन नहीं हुआ है। व्याधिस्थानानि चैतानि मूर्धा वक्र भुजः करः । वक्षःस्थलं स्तनो कुक्षि कक्ष मूलं च मेहनं ॥१६॥ उरू पादौ च मेषाद्या राशयः परिकीर्तिताः। मेषादि राशियों के लग्न होने से क्रमश. इस प्रकार व्याधि स्थान जानना चाहिये- सिर, मुंह, बाहु, हाथ ( हथेली ), छाती, स्तन, कोख, काख, मूल, उपस्थ, धा और चरण। गएडस्पल कुजो मूर्ध्नि मुखे शुक्रो गण्डयोर्भुजयोर्बुधः ॥१७॥ चन्द्रो वक्षसि कुक्षौ चहनौ नाभी रविर्गुरुः । उवों. शनिरहिः पादौ ग्रहाणां स्थानमीरितम् ॥१८॥ ग्रहों को स्थान इस प्रकार है-मंगल मूर्ती में, शुक्र मुह में, और बुध, चन्द्र वक्षस्थल में और कोख में, हनु (डोदी) और नाभि में मश. सूर्य और यह ..स्पति, अंघों में शनि, चरणों में राहु । स्थानप्वेतेपु नष्टं च भवेदेतेषु राशिपु । पापयुक्तेषु दृष्टेषु नीचसम्नेषु सम्भवः ॥१६॥ न स्थानों में अथवा इमीशयों में पाप ग्रहों का दाटयोग हो और उस समय में नष्ट हुमा हो तो तथा नोचासत में हो तो रोग पा सम्म जानना चाहिये। ‘पश्यति चेट् ग्रहाश्चंद्र' व्याधिस्थानावलोकनम् । पूर्वोक्तमासवर्षाणि दिनानि च वदेत्सुधीः ॥२०॥ पदिध्याधि स्थान को देखने वाले चंद्रमा पर पहों पी दृष्टि हो तो पहले पता हुए, दिन, मास और धर्ष पानिर्देश पाना चाहिये।

ज्ञानप्रदीपिका। से पष्ठाष्टमे पापयुते रोगशान्तिन जायते । पष्ठाण्टमे शुभयुते रोगः शाम्यति सर्वदा ॥२१॥ षष्ठ और अपम स्थान यदि पापाकान्त हों नो रोगशान्ति नहीं होती पर, यदि शुभ युक हों तो होता है। किचित्तत्र विशेयोको रोगमृत्युस्थलं शुभम् । यावद्भिर्दिवसान्ति तावद्भी रोगमोचनम् ॥२२॥ विशेषता यह है कि, पष्ठ या अपम स्थान में जितने दिनों में शुम ग्रह पहुचेगा उतने हो दिनों में रोग छूटेगा। रोगस्थानं भवेदस्ते पापखेटयुत तथा । तत्वष्ठचंद्रसंयुक्ते रोगिणां मरणं भवेत् ॥२३॥ यदि रोगस्यान अस्त लग्न पाप ग्रह से युक हो और उससे भी छठां स्थान चंद्रमा युक्त हो तो रोगी की मृत्यु निश्चित होगी। रोगस्थानं कुजः पश्येत् शिरस्ताऽधो ज्वरं भवेत् । भृगुर्विसूची सौम्यश्चेत् कक्षम थिभविष्यति ॥२४|| मंगल यदि पष्ठ स्थान को देखे नो शिर के नीचे उतर, शुक्र देखे तो हंजा और बुध, देखे तो कक्ष प्राधि (लग ) होगा। राहुर्विषू शशी पश्येन्नेत्ररोगो भविष्यति । मूलव्याधिगुः पश्येचंद्रवत् स्याद् भृगोः फलं ॥२५॥ राहु से हैजा, चंद्रमा के देखने से नेत्ररोग और चंद्र को भृगु देखना हो तो शुक्र का भो फल चंद्रसा ही होगा। परिधौ चंद्रको दण्डदृष्टिः प्रश्ने कृने सति । कुष्ठव्याधि मृतिं ब्रूयात् धृमे भूताहतं भवेत् ॥२६॥: सर्वापस्मारमादित्ये पिशाचपरिपीड़न । श्वासः कासश्च शृलन शनो शीतचरं कुजे ॥२७॥ ) a १३८ ज्ञानप्रदीपिका। - परिधि चन्द्रमा धनुष की दृष्टि में प्रश्न हों नो कुष्ठ रोग किंचा मृत्यु बनाना । केतु से भूतबाधा और सूर्य से सब प्रकार की मिरगो या पिशाचयाधा, शनि से वास कास और ल तथा मंगल से शीत ज्वर यतामा । इन्द्रकोदण्डपरिधौ दृष्टे प्रश्ने तु रोगिणां । नव्याधिशमनं किंचिदायं पश्यति चेत् शुभा॥२८।। इन्द्र धनुष परिधि दृष्टि में यदि रोगीका प्रश्न हा तो रोग यी कुछ भी शांति नहीं हो तो यदि स्थान को कभी रातु नहीं देखता हो यह स्थिति होनी है। (?) रोगशान्तिर्भवेच्छीघ्र मित्रस्वात्युच्चसंस्थिताः । यदि शुभ नह उच्च मिन मोर स्वगृही हो तो रोगशांति शीन बनाना चाहिये। शिरोललाटे भ्र नेत्रे नासाश्रु त्यधराः स्मृताः ॥२६॥ चिबुकश्चांगलिश्चैव कृत्तिकायु डवो नव । सिा, एलाट, मौं, आन, ना फोन होंट, चिवुक और अंगुलि ये कृतिकादि नर नक्षत्रों के स्थान है। कंटवक्षः स्तनं चेव गुदमध्यनितंबकाः ॥३०॥ शिश्नमेद्रोरयः प्रोक्ता उत्तगया नयोडवः। कंठ, छाती, स्तन, गुदा, टि, नितंश, दपस्य, पेद्र और उसमें उत्तरादि नघ नक्षत्रों स्थान है। जानुजंघापादसंधिपृष्टान्तस्तलगुल्फकं ॥३१॥ पादाम नाभिकांगुल्यो विश्वर्भाधा नवोडवः । जानु, जंघा पायघि, पोठ, अन्तस्तर गुम पर पंचागे धा भाग, नाभि, अंगुलि येत्तरांगादादि गर नक्षत्रों के म्यान हैं। उदयर्भवशादेवं वात्वा तत्र गर्द वदेत् ॥३२॥ अंगनक्षत्रकं ज्ञात्वा नप्नद्रव्यं तथा वदेत tr .

ज्ञानप्रदापिका। लग्न में जो नक्षत्र हो उसी के अनुसार इन अंगों में रोग बताना चाहिये। इसी प्रकार शारोर नक्षत्र नक्षत्र के पर मे नष्ट द्रव्य भी बताना चाहिये। त्रिकोणलग्नदशमे शुभश्चेदु व्याधयो नहि ॥३३॥ तेपु नीचारियुक्तेषु व्यधि-पोड़ा भवेन्नृणां । पंवम नरम, लग्न और दशा में यदि शुभ ग्रह हो तो व्याधि नहीं होनी और पाप या शत्रु ग्रह हों तो होता है। इति रोगकाण्डः अथ मरणकाण्डः मरणस्य विधानानि ज्ञातव्यानि मनीपिभिः । वृपस्य वृपभच्छन सिंहच्छत्रं हरेर्भवेत् ॥१॥ अलिना वृश्चिकन्छनं कुंभच्छत्र घटस्य च । मरण का विधान भी विदसानों का जाना चाहिये। वृष का छन वृप, सिंह या सिंह, वृश्चिक का वृश्विन और भाछा बुभ है। उच्चस्थानमिति ज्ञात्वा उच्चः स्यादुदये यदि ॥२॥ मरणं न भवेत्तरय रोगिणो नात्र संशयः । यदि प्रश्न यान में लग्न (गोत्र ) उच्च का हो तो रोगी को मृत्यु नहीं हुई। तुलाया कार्मुकन्छन नोचमृत्युविपर्यये ॥३॥ संपरय मिथुनच्छन नीचमृत्युविपर्यये नकस्य मिथुनन्छन नीचमृत्युविपर्यये ॥४॥ कन्याछत्र कुलोरस्य नीचमृत्युविपर्यये। तुला का धन, मेप का मिथुन, मकर का मिथुन और कन्या का पर्व छत्र होता है किन्तु नीच मृत्युविर्य में ही उसका शमी धाम करता - धानप्रदीपिका . नीचे चेद व्याधिमोक्षोन मृत्युर्मरणमादिशेत् ॥५॥ ग्रहेपु बलवान् भानुर्यदि मृत्युस्तदाग्निना । मंदः क्षुधा जलेनेन्दुः 'शीतेन कविरुच्यते ॥६॥ बुधस्तुपारवाताभ्यां शस्त्र णोरो बली दि । राहुर्विषेण जोवस्तु कृमिरोगेण नश्यति ॥७॥ यदि लग्नेश नीच में हो तो मृत्यु यताना। यदि ग्रहों में यली सूर्य हो नो माग से, शनि हो तो भूव से बद्र हो तो जल से, शुक्र हो तो शोर से, वध हो तो तुपार और वाससे केतु हो तो हथियार से राहु होतो विषसे और वृहस्पति हो तो कुक्षिराग मे मृत्यु होती है। विधाः पाठाप्टमे पापः सप्तमे वा यदि स्थितः । रोगमृत्युस्तलाभ्यां (2) वा रोगिणां मरणं भवेत् ॥८॥ यदि चद्र के छठे या आठवें स्थान में पाप ग्रह हों तो रोगी की मृत्यु होगी। आरूढान्मरणस्थानं तरमादप्टमगः शशी । पापाः पश्यंति चेन्मृत्युं रोगिणां कथयेरसुधीः ॥६॥ भागढ़ से अष्टम स्थान को उससे अष्टम स्थान स्थित चद्रमा और पाप ग्रह देखते हो, मोरोगो मरेगा। द्वितीये भानुसंयुक्त दशमे पापसंयुले । दशाहान्मरणं ब्रूयात् शुक्रजीवौ तृतीयगौ ॥१०॥ सप्ताहान्मरणं व्रयात् रोगिणामहि बुद्धिमान् । दिनीय में सर्य हो दशा में पाप हो तो दश दिन के भीतर ही गेगी मरेगा। और यदि शुक्र और बृहस्पति हों तो सात दिन मानर दिन में ही गेगी मरेगा। उदये चतुरस्त्र वा पापास्त्वष्टदिनान्मृतिः ॥११॥ लग्नद्वितीयगा. पापाश्चतुर्दशदिनान्मृतिः । त्रिटिनान् मरणं किन्तु टशने पापसंयुते ॥१२॥ तस्मात्सप्तगे पापे दशाहान्मरणं भवेत् ।

४१ ज्ञानप्रदीपिका। उदय या चतुरस्र में यदि पाप ग्रह हों तो आठ दिन में, ला और द्वितीय में हों तो १४ दिन में, दशम में पाप ग्रह स्थित हो ते ३ दिन में और चतुर्थ में हों तो दश दिन में मृत्यु होगी। निधनारूढगे पापडप्टे वा मरणं भवेत् । तत्तद्ग्रहदशादेव दिनमासादिनिर्णयम् ॥१३॥ मृत्यु और आरूढ स्थान यदि पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो मरण बनाना। दिन मदीने आदिको निर्णय नहों पर से कर देगा। इति मरणकाण्ड ग्रहोच्च. स्वर्गमायाति रिपौ मृगकुले भवः । नीचे नरकमायाति मित्रे मित्रकुलोद्भव ॥१॥ स्वक्षेत्रे स्वजने जन्म मित्रं ज्ञात्वा वदेत् सुधीः । मृत्यु के समय मृत प्राणी को ग्रहों के उश के रहने पर स्वर्ग होता है शत्रु स्थान में रहने पर पशुयोनि में जन्म मित्र गृह में रहने पर मिश्र कुल में जन्म और स्वक्षेत्र में रहने पर स्वजनों में जन्म घताना चाहिये। इति स्वर्गकाण्ड. कथयामि विशेपेण मूकद्रव्यस्य लक्षणम् । पाऊभाण्डानि भुक्तानि व्यंजनानि रसं तथा ॥१॥ मय में रिशेष करके मूक व्यों का निर्णय करता है। इस प्रकरण में पाफ माण्ट भुक्त, व्यंजन भोर इममा वर्णीदोगा।

४२ शानप्रदीपिका। सहभोक्ता भोजनानि तत्तथानुभवो रिपून् । (१) मेपराशो भवेच्छाकं वृपभे गव्यमुच्यते ॥२॥ धनुमिथुनसिंहेषु मत्स्यमांसादिभोजनम् । नक्रालिकर्किमीनेषु फलभक्ष्यफलादिकम् ॥३॥ तुलायां कन्यकायाश्च शुद्धानमिति कीर्तयेत् । x x X X x x मेप रन यदि यली हो तो शाक भोजन बताना चाहिये। वृष हो तो दहो दूध घो भादि धनु मिथुन और सिंह हों तो मछली मांस, गपर, वृश्चिक, पर्फ मोर मोन हो तो फलाहार और तुला फाया हो तो शुद्ध भन्न बताना चाहिये।

ज्ञानप्रदीपिका। ओजराशौ शुभैप्टे स्वेच्छया भोजनं भवेत् । समराशौ पापदण्टे भुंक्तेऽल्पं पापवीक्षिते ॥६॥ यदि विषम राशि को शुभ ग्रह देखते हों तो अधिकता से और सम राशि को पाप- ग्रह देखते हों और युक्त हों तो कमो के साथ भोजन बनाना चाहिये। किंचित्पश्यति पापश्चेत् पुराणान् मधुभोजिनः । (१) अर्कारी मांसभोवतारौ उशनश्चन्द्रभोगिनां ॥१०॥ नवनीतधृतक्षीरदधिभिभोजनं भवेत् । पाप ग्रह की साधारण दृष्टि हो तामधुर भोजन घताना। सूर्य और मंगल मास- भक्षी, शुक्र, चन्द्र और राह मक्खन धो दूध और दही के साथ खाने वाले हैं जलराशिपु पापेषु सौम्येषु च दिनेषु च ॥११॥ सतैलं भोजनं चादिति ज्ञात्वा विचक्षणः । पाप ग्रह जलराशि में हों और सौम्य ग्रह दिनवाला होता सतल भोजन यताना चाहिये। पूर्वोक्तधातुवर्गेण भोजनानि विनिर्दिशेत ॥१२॥ मूलबर्गेण शाकादीनुपदेशाद वदेद्बुधः । जीववर्गेण भुक्त्वा च मत्स्यमांसादिकानपि ॥१३॥ सर्वमालोक्य मनसा धदेन्नृणां विचक्षणः । पूर्व कथित धातुर्ग से मोजन, मूल वर्ग से शाक सब्जी भादि, और जीवर्ग से मास मछली मादि का भोजन बुद्धिमान पुरुष सब देख सुन के यताये। इति भोजनकाण्डः ४४ मानप्रदीपिका । + स्वप्न यानि च पश्यन्ति तानि वक्ष्यामि सर्वदा । मेपोदये देवग्रहं प्रसादान् संवदंति च ॥१॥ वृपोदये दिनाधीशं ज्ञातिदेशस्य दर्शनम् । वृश्चिकस्योदये क्रूर व्याकुलं मृतदर्शनम् ॥२॥ स्वप्न में मनुष्य जो देखता है उसे भी पताता ह-मेप रन में देवग्रह देखता है और प्रसन्नता की यातें सुनता है और कहता है। चूप में सूर्य को, जाति को देश को और वृश्चिक में कर, व्याकुल और मृतक को देखता है। मिथुनस्योदये विप्रान् तपस्विवदनानि च । कुलीरस्योदये क्षेत्रं 'पुनः ॥३॥ तृणान्यादाय हस्ताभ्यां गच्छन्तीरिति निर्दिशेत । सिंहोदये किरातं च महिषीभिर्निपातितम् ॥४॥ मिथुन लग्न में विप्र गौर तपस्वियों के मुंह फर्क में खेत... तथा हाथों में तृण लेकर जते हुओं को देखा जाता है। सिंह में किरात को और भैस से अपने को निपातित या उसी किरात को निपातित देखा जाता है। कन्योदयेऽपि चारूद (1) मुण्डस्त्रीभिदि पादयः । तुलोदये नृपान् स्वणं वणिजञ्च स पश्यति ॥५॥ वृश्चिकस्योदये स्वप्न पश्यन्त्यलिमृगादयः । वृपभश्च तथा भ्रूयात् स्वनदृष्टो न संशयः ॥६॥ उदये धनुपः पश्येत् पुप्पं पक्वफलं तथा । मृगोदये दिनेन्दुं च रिपुं स्वप्न पु पश्यति ॥७॥ कुंभोदये च मकरं मीनस्वप्न जलाशयः । कम्घा में स्वप्न देखे तो मुण्डित स्त्री हापी आदि, तुला में राजा, स्वर्ण, धनिया आदि वृश्चिक में भौरा मृग, बैल आदि, धनु में फूल, पक्क फल आदि, मकर में दिन का चाँद शत्रु, कुंभ में घड़ियाल ( मगर), मीन में जलाशय दिखाई देता है।

ज्ञानप्रदोषिका। . चतुर्थे तिष्ठति भृगौ रजतं वस्तु पश्यति ॥८॥ कुजश्चेन्मांसरतांश्च सशुक्रफलमंगनाम् । चतुथं में शुक्र हो तो चांदी की चीज, मंगल हो तो मांस, रक और सफेद फल लिये हुई औरत दिखाई पड़ती हैं। मृगं शनिश्चेत् सौम्यश्चेत् शिलां स्वप्ने तु पश्यति । 'आदित्यश्चेन्मृतान् पंसः पतनं शुकशालिनाम् । चंद्रश्चेत् वदनं शीतं राहुमध्यविषं भवेत् ॥१०॥ शनि चतुर्थ में हो तो मृग, बुध हो तो शिला, सूर्य हो तो मरे हुए मनुष्यों को अयया सूखे धान्यों को, चन्द्रमा हो तो शीतबदन और राहु हो तो मध्य विष का दर्शन स्वप्न में अत्र किंचित् विशेषोऽस्ति छनारूढोदयेषु च। छत्रस्थितश्चेत सौम्यश्चेत् सोधसौम्यामरान वदेत् ॥११॥ इस प्रश्नाध्याय में ला राशियों के पक्ष विशेष यह है कि शुभग्रह कभी छत्रासद हो तो "सुन्दर गृह अथवा देवतादिक का दर्शन होता है। चतुर्थभवनात् स्वप्नं ब्रूयात् ग्रहनिरीक्षकः । तत्रानुक्त यदखिलं ब्रूयात् पूर्वोक्तस्तुना ॥१२॥ चतुर्थ भवन से ग्रहों को स्वप्न फल कहना चाहिये। जो कुछ न भी कहा गया है उसे भी पूर्व कथित वस्तु पर से समझ लेना चाहिये। इति स्वप्नकाण्डः अथोभयः पथिको दुर्निमित्तानि पश्यति । स्थिरोदये निमित्तानां निरोधेन ने गछति ॥१॥ चरोदये निमित्तानां समायातीति ईरयेत् ।

शानप्रदापिया। यात्री द्विस्वभाव लन में जाने से दुगन देवता है। स्थिर लग्न में शकुनों के प्रभाव स यात्रा को स्थगित कर देता है और चर रम्न में शुभ शकुनों के प्रभाव से सफ लतापूर्वक लौट आ है। चन्द्रोदये दिवाभीतचपपारावनादयः ॥२॥ शकुनं भविता दृष्ट (2) इति वृयाद्विचक्षणः । ल्म में यदि चन्द्र हो तो गस्ते में उल्लू कबूतर आदि का शकुन होगा-यह बताना चाहिये। राहूदये तथा काकभरद्वाजाटय. खगाः ॥३॥ मन्दोदये कुलिग स्यात् बोढये पिगलस्तथा । लन में राष्ट्र हो तो काक भरदूल अ दि शान हा वो नटक और बुध हा तो धन्दर । सूर्योदये च गरुड. सव्यासव्यवशाद वदेत् ॥४॥ स्थिर राशौ स्थिरान् पश्येत चरे तिर्यग्गता यदि । उभयेऽवनि वृत्तस्य ग्रहस्थितिवशादमी ।।५।। सूर्य लग्न में हो दाहिने चाय को विचार के गरुड ता चाहिये । सिर में स्थिा यस्तु, घर में चर-पक्षो आदि-और द्विस्वमात्र में रास्ते से लौटते हुए आदमी दिखाई पडते हैं। यही बात ग्रहस्थिति के वश से इस प्रकार है। राहोगौलिविधोश्चात्र ज्ञस्य चुन्नधरी भवेत् । दधि शुक्रस्य जीवस्य क्षीरसर्पिरुदाहरेत् ॥६॥ भानोउच येतगरुड शिवा भौमस्य कीर्तिताः । शनैश्चरस्य बहिच निमित्त दृष्टमादिशेत् ॥७॥ शुक्रस्य पक्षिणी बुयात् गमने शरटा धका । जीवकाण्डप्रकारेण वीक्षणस्य विचारयेत् ॥ राहु का गौ और पिच्छी चन्द्रमा का युध का चुग्नधरी (पशि मिशेष) शुक्र का दही, वृहस्पति का दूध घी, ये कारन गरुड, मगल का शगालिया, शनि पर ज्ञानप्रदोपिया। आग, शुक्र का दो पक्षो शाट और थक-ये शकुन होते हैं। जीव काण्ड में कहे हुये प्रकार से शकुन दर्शन का विचार कर लेना चाहिये। इति निमित्तकाण्डः x x x x x x x x प्रश्ने वैवाहिके लग्न कुजः स्यादुदये यदि । वैधव्यं शीध्रमायाति सा वध नोंत संशयः ॥१॥ x प्रभ लग्न में, यदि विवाह सबधी प्रश्न हो तो, यदि मंगल हो तो शीघ्र विना सदेह वधू विधा हो जायगी। उदये मन्दरे नारी रिकाम्गसुता भवेत् । (१) चन्द्रोदये तु मरणं दम्पत्योः शोधमेव च ॥२॥ शुक्रजीवबुधा लग्ने यटि तो दोर्घजीविनी । x x x x x लम में चन्द्रमा हो तो दोनों सो पुरुष शीघ्र मर जायगे, शुक्र वृहस्पति या बुध के ला मे रहने से वे दीर्घजीनो होंगे। द्वितीयस्थे निशानाथे बहुपुत्रवती भवेत् ।३।। स्थितिमध्यर्कमन्दाराः मनःशोफो दरिद्रता । यदि द्वितीय में चंद्र हो तो बहु पुत्रयता और दशम में सूर्य मंगल और शनि हो तो मानसिक षट और दारिद्रय प्राप्त होता है। द्वितीये राहसंयुक्ता सा भवेत् व्यभिचारिणी ॥४॥ शुभग्रहा द्वितीयस्था मांगल्यायुष्यवर्चना । द्वितीय स्थान में राहु हो तो पन्या व्यमित्रारिणी और शुभ ग्रह हो तो मंगल और आयु से पूर्ण होती है।

४८ भानप्रदीपिका होगी। तृतीये राहुजीयो चेत्सा बन्ध्या भवति ध्रुवम् ॥५।। अन्ये तृतीयराशिस्था धनसोभाग्यवर्द्ध ना ! राहु और वृहस्पनि यदि तृतीय में हों नो स्त्री बन्ध्या होगी। उसी स्थान में अन्य ग्रह हो तो धन और सोहाग से भरपूर नाथा दिनेशस्तिप्ठतो यदि तुर्ये ततोऽशुभः ॥६॥(2) शनिश्च स्तन्यहोना स्यादहिः सापत्न्यवत्यसो । बुधजीवारशुक्राश्चत् अल्पजीवनवत्यसौ ॥७॥ चतुर्थ में सूर्य हो तो ( अशुभ फल ), शनि हो तो सन्तानहीना, राहु हो सोत वाली होगी। वहीं बुध वृहस्पति, मंगल या शुक्र हो तो सम्पायु होगा। पंचसे यदि सौरिः स्याद् व्याधिभिः पोडिता भवेत् । शुक्रजीवबुधाश्चापि पशुउचेत बहुपुत्रवत् ।।८।। चन्द्रादित्यौ तु बन्दी स्यात अहिश्चत मरणं भवेत् । आरश्चेत् पुत्रनाशः स्यात् प्रश्ने पाणिग्रहोचिने ॥६॥ पंचम में यदि शनि हो तो रोगिणी, शुक, पृहस्पति और बुध हो तो बहुत पशु और पुत्र से युक्त, चन्द्रमा और सूर्य हो तो बन्दी, गहु हो तो मरण और मंगल हो तो पुत्रनाश यह चैवाहिक प्रश्न में बताना । पप्ठे शशो चेद्विधवा बुधः कलहकारिणी । पष्ठे तिष्ठति शुक्राचेदीर्घमांगल्यधारिणी ॥१०॥ अन्ये तिष्ठन्ति चेन्नारी सुखिनी वृद्धिमिच्छति । चन्द्रमा हो तो विधवा घुध हो मो कारहो, शुक्र हो नो सर्व मांगल्य धारिणी और अन्य ग्रह हों तो सुखा और वृद्धिमतो धन्या होती है। सप्तमस्थे शनी नारों तरमा विधवा भवेत् ॥११॥ परेणापहता याति कुजे तिष्ठति सप्तमे । बुधजीवी सन्मतिः स्यादाहुश्चेद् विधवा भवेत् ॥१२॥ व्याधिग्रस्ता भवेन्नारी सप्तमस्थो रविर्यदि । पास्यान ४६ .. शानप्रदीपिका सप्तमस्थे निशाधीशे उबरपोडावती भवेत् ॥१३॥ शुकश्चेत्सप्तमे स्थाने सा वधर्मरणं ब्रजेत् । ससम में यदि शनि हो तो शीघ विधवा मगल हों तो दूसरे से हरी जाकर आय- गामिनी, बुध और बृहस्पति हों तो सद्बुद्धि वाली, राहु हो तो निधा, सूर्य हो तो व्याधि प्रस्त, चन्द्रमा हो तो बुखार को पीहा से आकुल और शुक्र हो तो मृत्यु को प्राप्त ह तो है । अष्टमस्थाः शुक्रगुरुभुजगा नाशयति च ॥१४॥ शनिझी वृद्धिदौ भोमचंद्रो नाशयतः स्त्रियम् । (2) आदित्यारौ पुनर्भूः स्यात्प्रउने वैवाहिके यधृ ॥१५॥ अष्टम में शुरु गुरु और राहु नाश करने वाले शनि और बुध वृद्धि करने वाले, मंगल और चंद्र मारक, प्य और मगल पुनर्विवाह कारक हाते है । नवमे यदि सोम. स्यात् व्याधिहीना भवेद् वधूः । जीवचंद्रौ यदि स्यातां बहुपुत्रवती वधू ॥१६॥ अन्ये तिष्ठन्ति नवमे यदि वंध्या न संशयः । नयम में यदि बुध हो तो बधू नीराग, बृहस्पति और चन्द्रमा हों तो बहु पुनपानी और अन्य प्रद हो तो क्या हाती है-इसमें सन्देह नहीं । दशमे स्थानके चंद्रो वन्ध्या भवति भामिनी ॥१७॥ भार्गवो यदि वेश्या स्यात् विधवा किकुजादयः। रिक्ता गुरुश्चेंजादित्यौ यदि तस्या. शुभं वदेत् ॥१८॥ दशम में चन्द्र हों तो बाम शुक्र हो तो वेश्या, शनि मगल आदि हो तो विधरा, गुरु होतो रिका और बुध सूर्य हो तो अशुभ (1) फल वाली होती है। लाभस्थानगताः सर्वे पुत्रसौभाग्यवर्द्धकाः । लग्नद्वादशगश्चंद्रो यदि स्यान्नाशमादिशेत् ॥१६॥ एकादश स्थान में सभी ग्रह पुत्र और सौभाग्य के पर्द्धक तथा लश और द्वादश में यदि चंद्रमा हो तो नाशकारक होता है ।

५० ज्ञानप्रदीपिका। शनिभौमौ यदि स्यातां सुरापानवती भवेत् । सदित्यो स्थितौ वन्ध्या शुक्र सुखवती भवेत् ॥२०॥ द्वादश में यदि शनि और भौम हों तो मदिरा पान करने वालो, राहु और सूर्य हो तो पन्ध्या और शुक्र हो तो सुखो होगी। इति विवाहकाण्डः प्रह क्षुरिफालक्षणं सम्यक् प्रवक्ष्यामि यथा तथा । राहुणा रहिते चन्द्रे शत्रुभंगो भविष्यति ॥१॥ अप क्षुरिफा-युद्ध संपन्धो-रक्षणों को कहता ह यदि चंद्रमा राहु से रहित हो तो शत्रु अवश्य नष्ट होगा यही उत्तर प्रानिक को देना चाहिये । नीचारिक्तास्तु (2) पश्यति यदि खड़गस्य भंजनम् । शुभग्रहयुते चन्द्रे दृप्टे चास्त्रशुभं वदेत् ( भवेत् ) ॥२ । चन्द्रमा को यदि नीच और शत्रु ग्रह देखते हों तो तलपार का टूटना और के युन और दृष्ट होने पर उसकी सफलता घतानो चाहिये। पापग्रहसमेतेपु छनारुढोदयेषु च । येषु प्रष्टा स्थितः किंतु तदत्रंण हतो भवेत् ॥३॥ छत्र, मारुट और एन यह पाप प्रा ट युक हो और जिसमें मलित हो उसके शाणानुसार उस पर पा माण पदना । अथवा कलहः खगः परेणापहना भवेत् । एपु स्थानेषु सौम्येषु खड्गस्तु शुभदो भवेत् ॥४॥ पा पसा होगा पासलपार पो दूसरा पुरा ले जायगा नदी पानों में शुम प्रह हतोपएग गुम फल तथा पिय.पा दाना होगा।

ज्ञानप्रदीपिका। 5621 प्रदेशे तस्य लग्नस्य लग्ने वा पापसंयुते । खड्गस्यादाणं बेचात् त्रिकोणे पापसंयुने ॥५॥ (इस लोक के चौथे चरण का अर्थ नीचे के श्लोक को टोका में सम्मिलित है) लग्न में यदि पाप हों तो तलवार के प्रारंभ में ऋण लेना पड़ा होगा। तस्करो भंगतो व्योन्नि चतुर्थे पापसंयुते । खड़गस्य भंगो मध्ये स्यादिति ज्ञात्वा वदेसुधीः॥६॥ यदि त्रिकोण ( १, ५, ६) पाप युत हों तो चारा हो जाती है, "वतुर्य में पायग्रह हो तो लडाई के घोच में ही तलवार के टूटने की संभावना रहती है। एकादशे तृतीये च पापे शस्त्रस्य भंजनम् । मित्रखाम्युचनीचादिवर्गेनादि (?) गताः ग्रहाः ॥७॥ एकादश और तृतीय में यदि पप ग्रह हों तो शन्न टूट जायगा। मित्र, स्वामी, उश, नीव आदि वर्गों में गत प्रह- तत्तवर्गस्थलायां तु शस्त्रमित्यभिधीयते । संमुखे यदि खगः स्यात्ततीर्यग्ग्रहमुच्यते । उन उन वर्गों के स्थल के सामुख शत्रपान का भय करते हैं, यदि सन्मुख में तिमाह हों तो खड्डपात का भय करते है। तिर्यग्मुखश्चत्तच्छत्रं अन्यशस्त्र वदेत्सुधीः । अधोमुखश्चेत्संग्रामे च्युतमाहत्मुच्यते ॥६॥ तिर्यग् मुख की राशि हो बहुत चोटीला (?) हथियार है, यदि अधोमुन राशि हो तो संग्राम में वह पुरुष मारा जायगा ऐसा उपदेश करना चाहिये । तत्तच्चेष्टानुरूपेण तस्य वै मरण स्मृतम् । उनकी चेष्टा क अनुरूप हो उस पुरुष का संग्राम में मरण पयवा जय पराजय का निर्देश करना। इति क्षुरिका काण्डः ५२ प्रकार शुभ भानप्रदीपिका। स्त्रीपुंसो रतिभोगौ च रनेहोऽरनेहः पतित्रता। शुभाशुभी क्रमाप्रोक्तो शास्त्र ज्ञान-प्रदीपिके ॥१॥ इस शानभदीपक शास्त्र में स्त्री पुरुष का पारस्परिक प्रम पातिव्रत्य और द्रोह, इस और अशुभ होते है वह कहा गया ~~ तीव्रता (2) उदयारूढो (2) खेडेषु भुजगो यदि । तेषां दुष्टस्त्रियः साक्षादवानामपि संशयः ॥२॥ लग्न, आरुढ, दशम में यदि राह हो नो स्त्रों दुए होगी चाहे यह देवता के घर ही पयों न हो। लग्नादेकादशस्थाने तृतीये दशमे शशी । जीवदृष्टियुतस्तिष्ठेत् यदि भार्या प्रतिव्रता ॥३॥ लग्न से एकादश तृतीय और दशम में यदि चद्र हो और गुरु की द्रष्टि से युक्त हो तो भार्या पतिव्रता होगी। चन्द्र पश्यन्ति पुंग्वेटारतेन युक्ता भांति चेत् । सदभाया दुर्जनां ब्रूयादिलि शास्त्रविदो विदुः ॥४ चन्द्रमा को पुष्प प्रइ देखो हो या युत हो तो निश्चय हो भार्या दुजन होगो। यही शास्त्रों का पहना है। सप्तमस्थो द्विपरवेटे नीचारिगशशी तथा । बंधुनिपिणी लाके भ्रष्टा मा तु शुभाशुभैः ॥५॥ नीच विया शत्रुम्पारगत ममा यदि माम शत्रु प्रा से युन विपाइए हो तो स्त्री भ्रश दोगा। भानुजोगो निशाधीनां पश्यंती च युतो यटि । पतित्रता भन्नारी पिणाति वदेह बुध ॥६॥ सूर्य और गुग यदि चन्द्रमा का देनत ों या युत दो गो गह ना पापती मोर पतिमता होगो।

ज्ञानप्रदीपिका। शुक्रण युक्तो दृष्टो वा भौमश्चेत्परगामिनी । बृहस्पतिर्बुधाराभ्यां युक्तश्चेत्कन्यका यदि ॥७॥ शुक से यदि भौम ( मंगल ) युन या दृष्ट हो तो पापुरुषगामिनो और गुरु यदि बुध और मंगल से युत दृष्ट हो तो कन्या भी स्वैरिणी होती है। शुक्रवर्गयुते भौमे भौमवर्गयुते भृगौ। पृथके (१) विधवा भर्ता तस्या दोषान्न विंदते ।।८।। शुक्र वर्ग से भोम या मोम वर्ग से यदि शुक्र युत हो तो पति से पृथक् वह स्त्री विधया की भांति रहती है और वह उसके दोप नहीं जानता। भानुवर्गयुते शुक्र राजस्त्रोणां रतिर्भवेत् । जीववर्गयुते चंद्रे स्नेहेन रतिमान्भवेत् ॥६॥ सूर्य धर्ग से यदि शुक्र हो तो राजस्त्रियों से रति बताना चाहिये। गुरुवर्ग से यदि चन्द्रमा युत हो तो प्रेम पूर्वक रतिमान् कहना चाहिये। चंद्रस्त्रिवर्गयुवतश्चेत् स्त्री सुतलवती भवेत् । शनिश्चंद्रेण युक्तश्चेत् अतीवव्यभिचारिणो ॥१०॥ चन्द्र यदि त्रिवर्ग से युत हो तो स्त्री पुरवती और शनि चंद्र से युत होतो अधिक ध्यभिचारिणो होती है । पापवर्गयुते दृष्टे शुक्रश्चेत् व्यभिचारिणी। अरिवर्गयुतश्चन्द्रो यद्यमित्रं वधूनरः (१) ॥११॥ यदि शुक्र पाप वर्ग से युन या हृष्ट हो तो व्यभिचारिणी और शत्रु गमे यदि चंद्र- युन हो तो स्त्री पुरुष में स्नेह नहीं होता। नीचवर्गयुतश्चंद्रो न च स्त्रीभोगकामुकः । मित्रवर्गयुतश्चंद्रः मित्रवर्गवधूरतः ॥१२॥ यदि चन्द्र नोव घग से युत होनो स्रोमोग से मनुष्य कामुक नहीं होता। मित्र धर्म से यदि युत हो तो पुरुष मित्र की स्त्री से रत है-यह पताना चाहिये।

५४ ज्ञानप्रदापित । स्वक्षेत्रे यदि शीतांशुः स्वभार्यायां रतिर्भवेत् । उच्चवर्गयुतश्चंन्द्रः स्वच्छवंशस्त्रियां रतिः ॥१३॥ यदि चन्द्रमा अपने क्षेत्र में हो तो अपनी स्ना में रति रताना चाहिये । किन्तु यदि उच्च वर्ग से युत हो तो अपने से ऊचे खान्दान की स्त्रा में रति बतानी चाहिये। उदासीनग्रहयुतो दृष्टो वा चदि चन्द्रमाः । उदासीनवधूभोगमिति प्राहुर्मनीपिणः ॥१४॥ यदि समग्रह ( न मिस न शत्रु ) से बद्र युत विघा दृष्ट हो तो वधू से उदासीन प्रेम (न अत्यधिक न कम होगा। लग्ने च दशमस्थेऽत्र पञ्चमे शनियुक शशी । चोररूपेण कथयेत् रात्री स्वर्गवधूरतिः ॥१५॥ लग्न में दशम में और पंचम में चन्द्रमा शनि स युक्त होना चोरी से चारागना गमन पताना चाहिये।

ज्ञानप्रदापिका। चतुर्थ, तृतीय, पंचम या सप्तम भाव में यदि चंद्र शुक्र योग हो तो स्वस्त्री से कलह बताना चाहिये। तटीयवसनच्छे (१) कलह परिकीर्तयेत् । सप्तमे पापसंयुक्ते दशम भौमस्युने ॥२०॥ तृतीये बुधसंयुक्त स्त्रोविवादस्थले शयः । सप्तम में पाप ग्रह हो दशम में मंगल तथा तृतीय में बुध हो (चन्द्रमा युत दृष्ट हो तो) स्त्री से विवादपूर्वक भूशयन बताना । लग्ने चन्द्रयुते भौमे द्वितीयस्थे तथा यदि ॥२१॥ जागरश्चोरभीत्या च राशिनक्षत्रसंधिपु। पृष्टश्चेद्विधवाभोगः संकटादिति कीर्तयेत् ॥२२॥ लग्न में या द्वितीय में यदि मंगल और चंद्र का योग हा तो जागरण चोर के डर आदि से संकटपूर्वक विधवा से रति बताना। यह फल राशिसधि और नक्षत्रसंधि में भी घटेगा। है तत्संधौ शुकसौम्यौ चेत् तत्तज्ज्ञातिपतिं वदेत् । यत्र कुत्रापि शशिनं पापाः पश्यन्ति चेत्तथा ॥२३॥ राशि संधि नक्षत्र संधि में शुक्र या चंद्र हो तो स्वजातीय स्त्री से रति तथा x x x x x x x नपुंसो (2) सेव्यति (१) वः शुभश्चेत्युरुपप्रिया । सास्विकाश्चन्द्रजीशर्का राजसौ भृगुप्तोमजी ॥२४॥ तामसो शनिभूपुत्रौ एवं स्त्रीपुंगणाः स्मृताः॥२५॥ यहीं पर स्थित चन्द्रमा को यदि पापग्रह देखते हों तो रो पति की सेना नहीं करती। चंद्र, गृहस्पति सूर्य ये सत्वगुणी शुमा घुर रजोगुणी, शनि, मंगल तमोगुणी है। श्री पुरुष का गुण इन्ही के पायल से रिचार लेना चाहिये। इति कामकाण्डः ।

ज्ञानप्रदीपिका। पुत्रोत्पत्तिनिमित्ताय त्रयः प्रश्ना भवन्ति हि । उदयारूढछ्नेषु राहुश्चेद् गर्भमादिशेत् ॥१॥ पुत्रोत्पति के लिये तीन प्रश्नों का उत्तर वर्णन किया गया-हन आरूढ और छत्र में यदि राहु हो तो गर्भ बताना । लग्नाद्वा चन्द्रलग्नाद्वा त्रिकोणे सप्तमेऽपि वा। वृहस्पतिः स्थितो वापि यदि पश्यति गर्भिणी ||२|| लग्न किंवा चन्द्र से त्रिकोण (५६ या सप्तम में बृहस्पति स्थित होकर प्रश्न म को देखता हो तो गर्भिणी होगी। शुभवर्गेण युक्तश्चेत् सुखप्रसवमादिशेत् । अरिनीचग्रहाश्चेत् सुतारिप्टं भविष्यति ॥३॥ शुम वर्ग से युक्त हो नो प्रसव सुख से और नव और त्रु ग्रह से युत इष्ट हो ने पर बालारिष्ट होता है। प्रश्नकाले तु परिधी दृष्टे गर्भवती भवेत् तदन्तस्थग्रहवसात् पुंस्त्रीभेदं बटेदयुध ॥४॥ प्रश्न लन परिधि ग्रह दृष्ट हो तो यह खा गर्भरती है ऐसा उपदेश करना और परिधि लग्न के बीच में स्नीकारक अथवा पुरुष पारक जो मह बलगन हों उनके अनुसार स्थी पुरुष का जन्म बताना चाहिये। यत्र तत्र स्थितश्चन्द्र. शुभयुक्ते तु गर्भिणी । न लग्नानि न भूतेषु शुक्रादित्येन्दनः क्रमात् ॥५!! तिष्ठन्ति चेन्न गर्भ चेत्स्यादेक्त्रेते (१) स्थितेन वा । जादा पानी भी चन्द्रमा शुभ युग हा नो गम है ऐसा निर्देश पाना भोर रस भूतादि में भपने युक्त सर्प नादमा पृथक् दो गया एरपदी जद कहीं भी हो तो गर्म नहीं है ऐसा उपदेश परना चाहिये। स्त्रीपंनिलोके गर्भिपय. प्रष्टुर्ग तत्र कालिके ॥६॥ परिवपाटिके दृष्टे तस्या गर्भ विनश्यति । ७

ज्ञानप्रदीपिका।
प्रश्न फाल में स्त्री-पुरूर ग्रहों में जो बलवान होका देखना है, उसी के अनुसार स्त्री
अथवा पुरुष का जन्म कहना किन्तु लग्न यदि परिवषादि दुष्ट प्रक्षों से देखा जाना हो तो
गर्म का नाश हो जाता है।
लग्नादोजस्थिते चंद्रे पुत्रं सूते समे सुताम् ।
क्शान्नक्षत्रयोगानां तथा सूते सुतं सुतां ॥७॥
लम से विषम गृह में चंद हो तो पुत्र सम में हो तो पुत्री उत्पन्न होती है। नक्षत्र
योग आदि के यश से भी पुत्र पुत्री का विचार किया जाता है ।
लग्नतृतीयनवमे दशमेकादशेऽपि वा ।
भानुः स्थितश्चेत् पुत्रः स्यात्तथैव च शनैश्चरः ॥८॥
PA, तृतीय, नयम, दशम, एकादश में यदि सूर्य या शनि हो ता पुत्र पैदा होगा।
ओजस्थानगताः सर्वे ग्रहाश्चेत्पुत्र संभवः ।
समस्थानगताः सर्वे यदि पुत्री न संशयः ॥६॥
रूम से विषम स्थान में यदि समी ग्रह हों तो पुत्र और सम स्थान में हो तो पुत्री
इसमें सन्देद नहीं।
आरूढात्सप्तमं राशिं यावतीं तां सुरेश्यति (१)॥१०॥
तावन्नक्षत्रसंख्याकः सुतःस्यादिवसः सुतम् ।
माद से सप्तम राशि पर्यन्न जितने नक्षत्र होंगे उतने ही दिनों में पुत्र उत्पन्न होगा।
इति पुत्रोत्पत्तिकापडः
सुतारिष्टमथो वक्ष्ये सयः प्रत्ययकारणम् ।
लमपप्ठे स्थिते चंद्र तदस्ते पापसंयुने ॥१॥
मातुः सुतस्य मरणं किंतु पंचमपष्टगाः।
पापाः तिष्ठन्ति चेन्मातुर्मरणं भवति ध्रुवम् ॥२॥

५८
१
यदि रन
M
។
ज्ञानप्रदीपिका।
भय शीघ्र विश्वास दिलाने का कारणस्वरूप सुनारिष्ट को बनाता हू ।
चौर पष्ट में चंद्रमा हो और उन से सप्तम मे पापग्रह हों तो माता और पुत्र दोनों का मरण
होता है। किंतु यदि पंचम और पाठ में पाप ग्रह हों तो माता का मरण निश्चय होगा।
द्वादशे चंद्रसंयुक्ते पुत्रवामाक्षिनाशनम् ।
व्ययस्थे भास्करे नश्येत् पुत्रदक्षिणलोचनम् ॥३॥
द्वादश में चंद्रमा हो तो पुत्र की घाई मान और सूर्य हो तो दाहिनी आख नष्ट होती है।
पापाः पश्यन्ति भानुं चेत् पितुर्मरणमादिशेत् ।
चन्द्रादित्यो गुरुः पश्येत् पित्रोः स्थितिरितीरयेत् ॥४॥
पाप-प्रद यदि सूर्य को देखते हो तो पिना का मृत्यु और गुरु यदि चंद्र सूर्य को देख
ते हों तो मा-पाप को पिति बनाना चाहिये।
यदि लग्नगतो राहु वदृष्टिविवर्जितः ।
जातस्य मरणं शीघ' भवेदन न संशयः ॥५॥
यदि हम में राहु यिना घृहस्पनि पी दृष्टि पे हो नो पुत्र शीघ्र दो मरेगा-इसमें सराय
महीं।
द्वादशस्थौ अर्किचंद्रो नेत्रयुग्मं विनश्यति ।
पप्ठे वा पंचमे पापाः पश्यन्तीन्दुदिवाकरो ॥६॥
पिनोर्मरणमेवाम्ति तयामंटः स्थिता दि ।
भ्रातृनाशं तथा भौमे मातुलस्य मृति वदेत् ॥७॥
द्वादश स्थान में यदि तिमोर दोनो नादानों मोल मारी जाती।
पंचम विपाप में यदि पाप-प्रदर, मोर पन्द्र सूर्य को देने और मम और पा में
नि मी पहा होतोमो पाप मर भागे। मनिपटा दामो माई पा गाग, मंगोको
मामा की मृत्यु मामा धादिये।
उदयादिनिकस्थेषु कण्टकेषु शुभा यदि ।
मिनस्यात्युचवर्गपु सारिष्टं दिनव्यति ॥८॥

शानप्रदीपिका। लग्नं च चन्द्रलग्नं च, चन्द्रो यदि न पश्यति । पापाः पश्यन्ति चेत्पुत्रो व्यभिचारेण जायते ॥६॥ लग्न, पञ्चम नवम में यदि शुभ ग्रह हों और मित्र और उच्च तथा निज गृह में हो तो सब आरिण नष्ट होते हैं। । चन्द्र लग्न को पाप नह तो देखते हों पर चन्द्र नहीं देखते हों तो पुत्र व्यभिचार से उत्पन्न होता है। इति पुत्रप्रश्नकाण्डः लग्न और शल्याइने तु तत्काले पादभावसुतेऽत्र युक् । अर्काभ्यस्तान्नपापं च शेपाणां फलमुच्यते ॥१॥ (2) शल्य के प्रश्न में प्रश्नकाल में प्रश्न लग्न से चतुर्थ में जो भार पहा हो उसको जो संख्या हो उसे १२ से गुणा कर नव को भाग देने से जो शेष बचे उपका फल जानना। कपालोस्तीष्टकालोष्ठा काठदेवविभूतयः । सवासारष्टधान्यानि धनपापाणदुर्धराः ॥२॥ (2) सूर्यादि अंश में कम से कपाल ईटानका काष्ट देवता की सामग्रो सवस्त्र मष्ट धान्य धन पाषाण ये दुर्धर से होते हैं। गोस्तिश्वाचाचपेशामाधीक्रमात् पलानि पोडश । येषु शल्येषु मंडूकस्वर्णगोस्थिसुधादिकं ॥३॥ (2) दृष्टाश्चेदुत्तमं चान्ये सर्वेस्युरशुभस्थिताः । अष्टाविंशतिकोष्ठेषु वह्निदिष्टयादिकं न्यसेत् ॥४॥ यदि गृह उक्त स्थान में स्थित हों और अशुमान्चित हो तो पूर्व काल को कहते हैं। महा- इस कोष्ठ में कृतिका नक्षत्रों को लिखना चाहिये। च्छत्रभे तिष्ठति शशी तत्र शल्यमुदाहृतम् । उदयादिकं न्यस्येदप्टाविंशतिकोष्ठ के ॥५॥ x x x x x x x ज्ञानप्रदीपिका। जिस नक्षत्र में चन्द्रमा हो वहा पर शल्य कहना चाहिये। उदय नक्षत्रादिक का न्यास २८ अठ्ठाइसों कोष्ठ में रखना चाहिये। गणयेच्चन्द्रनक्षत्रं तत्र शल्यं प्रकोर्तितम् । शंकास्ति शल्यविस्तारयामावन्योन्यताडितम् ॥६॥ विशत्यापहृत पष्ठमरनिरिति कीर्तितम् । यहा पर चन्द्रमा के नक्षत्र तक गणना करके शल्य का निर्देश करना चाहिये। इस रीति से जितने कोष्ठ के मातर शत्य की शमाहा उसको ल्याई चौडाई का परस्पर गुणा करके बीस से भाग देकर फिर से भाग देना उसको सजा कही गई है।

ज्ञानप्रदीपिका। यदि पाप ग्रह और शुभ ग्रह दोनों का योग केन्दु स्थान में हो तो अवश्य शल्य है ऐसा फहना चाहिये। यदि शनैश्चर देखता हो तो देवता का निधास पहना, मंगल देखता होतो राक्षस का और यदि केन्द्र में चन्द्रमा मंगल के साथ मंगल कोष्ठ में पड़ा हो तो घोड़े का शल्य घहां पर है ऐसा कहना चाहिये। शुक्रस्थे तक्षके कोष्ठे रौप्यश्वेतशिला पिता (?)। पञ्चषड्वसुभूतानि सपादेकं तथैव च ॥१२॥ सार्धरूपाक्षोरवक्ष (2) सूर्यादीनां क्रमात् स्मृताः । स्वशल्यगादनैव (2) क्रूरेण कथयेत् सुधीः ॥१३॥ यदि केन्द्र में शुम चन्द्रमा संयुक्त होकर तक्षक कोष्ठ में शुम बैठा हो तो चांदी घा सफेद पत्थल उस भूमि में होता है। सूर्यादि ग्रहों के लिये कम से पांच छः माउ पांच सवा एक डेढ़ और चार यह अंक होते हैं । शल्य विचार में इतनी इतनी गहराई पर शल्य का निर्देश करना चाहिये। इति शल्यकाण्डः अथ वक्ष्ये विशेषेण कूपकाण्डविनिर्णयम् । आयामे चाष्टरेखास्युस्तिर्यग्रखास्तु पंच च ॥१॥ अब इसके बाद कूपकाण्ड के निर्णय को कहते है खडी माठ रेखा और पडी पांच रेखायें करनी चाहिये। एवं कृते भवेत् कोष्ठा अष्टाविंशतिसंख्यकोः । इस रीति से करने से अठाइस काष्ठ का एक चक्र बनाया जाता है। प्रभाते प्राङ्मुखो भूत्वा काप्ठेप्येतेषु बुद्धिमान् । चक्रमालोकयेद्विद्वान् राना दुत्तराननः ॥२॥ बुद्धिमान् को चाहिये कि प्रातः काल से आधी रात तक प्रश्न देखना हो तो चा को पूर्वाभिमुख और आधा रात के बाद उत्तराभिमुख हो पर इस चक्र को देखना चाहिये।

ज्ञानप्रदीपिका। मध्येन्दुमुखमारभ्य मैत्रभाद् भानिशामुखाः । (? ईशकोप्ठद्दयं त्यक्त्वा तृतीयादित्रिपु कमात् ॥३॥ कृतिकादित्रयं न्यस्यं तदधो रौद्रभं न्यसेत् । तदुत्तरं त्रयेप्येव पुनर्वस्वादिकं त्रयम् ॥४॥ बीच से मृगशीप से लेकर लिनना और अनुराधा से तथा मामिमुख लिखना शान फोण में दो कोष्ठ छोडकर तीनों पतियों में कम से कृतिकादिनीन तीन न्यास फर उसके नीचे आय का लिम्वना उसके बाद तीनों में पुनयेस्गदि तीन नक्षत्रों को लिखना चाहिये। तत्पश्चिमादियाम्येपु मघाचित्रावसानकं । तत्पूर्वकाप्ठयोः स्वातीविशाखे न्यस्य तत्परम् ॥५।। इससे पश्चिम दक्षिण क्रम में मघा से लेकर पित्रा नफ लिपना । उसके पूर्वपोष्ठों में स्याती और विशाखा को रचना ।

ज्ञानप्रदीपिका। में यन्नक्षत्रं तथा सिद्ध प्रश्नकाले विशेषतः । कृतिकास्थानमारभ्य पूर्ववद्गणयेत्सुधोः ।।६।। इस गैति से जो नक्षत्र आवे और प्रश्न साल में विशेष कर इस रीति से देखकर कृतिका के स्थान से लेकर पहले कही हुई रीति में गणना करनी चाहिये। यत्रेन्दु श्यते तत्र समृद्धिस्टकं भवेत् । शुक्रनक्षत्रकोष्ठेषु तत्तत्स्वर्णमुदाहरेत् ॥१०॥ जहा पर चन्द्रमा दाख पडे वहा पर बहुत ज्यादे जल होता हैं और शुक्रादि नक्षत्र कोष्ठक में वहा वहा पर स्वर्णादिक का कहना चाहिये। तुलोक्षनककुंभालिमीनकालिराशयः । जलरूपास्तदुदये जलमस्तीति निर्दिशेत् ॥११॥ तुला, वृष, मकर कुंभ वृश्चिक मौन और कक ये जल राशियां है अतः इनके उदय प्रचुर जल वहाना चाहिये। तत्रस्थौ शुक्रचंद्रौ चेदस्ति तत्र बहूदकम् बुधजीवोदये तत्र किंचिजलमितीरयेत् ॥१२॥ उसमें यदि शुक्र और चन्द्र हो तो पानी ज्यादा और घुध वृहस्पति हों तो कुछ कुछ जल बताना चाहिये। एतान् राशोन् प्रपश्यंति यदि शन्यर्कमिजाः । जलं न विद्यते तत्र फणिदृष्टे वहूदकम् ॥१३॥ इन राशियों को यदि शनि सूय और मंगल देखते हों तो जल नहीं और राहु देखें तो बहुत जल होता है। अधस्तादुदयारूढं छत्रयोरुपरि स्थिते । जलग्रहयुते दृष्टे अधस्तात्पाढदो जलम् ॥१४॥ उदय लग्न से नीचे और उत्र से ऊपर यदि जल ग्रहों का दृष्टि योग हों तो नीचे देर तक हो जल बताना चाहिये।

६४ ज्ञानप्रदीपिका। उच्चे दृप्टे ग्रहे राशौ उच्चमेवोदकं भवेत् । ऊर्ध्वादधस्थलयोः तिष्ठति नोदमधोजलम् ॥१५॥ जल राशियां उच्च ग्रह से युत दृष्ट हों तो पानी ऊँचे और नीत्र प्रह से युत दृष्ट हो तो नीचे होता है। (१) चतुःस्थाननाधस्तान् नागमं वदेत् । दशमे नवमे वर्षे केचिदाहुर्मनीषिणः ॥१६॥ (?) जलाजलग्रहवशात् जलनिर्णयमादिशेत् । केन्द्रेपु तिष्ठतश्चन्द्रो जीवो यदि शुभोदकम् ॥१७|| जल प्रह और मजल ग्रह गर से पानी का विचार करना चाहिये। केन्द्र में यदि चंद्र योर गुरु हों तो पानी अच्छा होगा। चन्द्रशुकयुने केन्द्र पर्वतेऽपि जलं भवेत् । चन्द्रसौम्ययुते केन्द्र जीर्णालाधरणोदकम् ॥१८॥ पेन्द्र में यदि चन्द्र और शुम हो तो पर्वत में मो जल मिले। पेन्द्र में यदि चंद्र बुध हो तो पुराने पंडहरों में भी अल मिले । आरूदारकेन्द्रके चन्द्र परिध्यादिविवीक्षिने । अधो जलंततोऽगाचं पूर्वोक्तमहराशिभिः ॥१६॥ भारूद से कान पान में चन्द्र हो और प्यादि से हट दो तो नीचे पहले बहे हुये ग्रहों की राशि से भगाध जल जानना । शुक्रेण सौम्ययुक्त न कपायजलमादिशेत् । कन्यामिथुनगःसौम्या जलं स्यादन्तरालकम् ॥२०॥ पूर्षोंक जल ग्रह मोर जल राशि में पुप शुम पा योग होता हो तो पानी बसेरा होगा। पदियुप पन्या मोर मिपान में होना जर मार दी मौतर होगा। भास्करे क्षारसलिलं पग्वेिपं धनुर्यदि । राहुणा संयुने मंदे जलं स्वादतरालसम् ॥२१॥ -

ज्ञानप्रदीपिका।
S
उन राशियों में सूर्य हो तो पानी खारा और परिवेष धनुराशियों में राहु शनैश्चर का
योग होतो अन्तराल में जल होता है।
बृहस्पतो राहुयुते पाषाणो जायतेतराम्
शुक्र चन्द्रयुते राही अगाधजलमेधते ॥२२॥
यदि वृहस्पति और राहु युक्त हो तो नीचे खोदने पर पत्थल निकलता है शुक्र ()
चन्द्रमा राहु का योग हो तो अगाध जल वहां पर होता है।
अर्कस्योन्नतभूमिः स्यात् पापाणा कांडकस्थले 1 10240PAL
नालिकेरादिपुन्नागपूगयुक्ताक्षमा गुरोः ॥२३॥
काण्डकस्थल-निर्जन स्थान में सूर्य की पाषाण मयी उग्नतभूमि होती है। नारियल
पान सुपारी इत्यादि से युक्त भूमि वृहस्पति की होती है।
शुक्रस्य कदलीवल्ली बुधस्य फलिता वदेत् । ५
वल्लिका केतकी राहोरिति ज्ञात्वा वदेवुधः ॥२४॥
शुक के लिये केले का वृक्ष और बुध के लिये फली हुई लना होती है। केतकी की
बल्ली राहु की होतो यह सब जान फर विद्वान् को आदेश करना चाहिये।
शनिराहूदये कोण्ठे रङ्गबल्लीकदर्शनम् ।
स्वामिदृष्टियुते वाऽपि स्वक्षेत्रमिति कीर्तयेत् ॥२५॥
शनि राहु का उदय कोष्ठ में होतो रङ्ग बल्ली को दिखलाता है यदि लम स्यामो से
इष्ट पा युत हो तो अपनी जमीन में अपना वृक्ष फहना चाहिये।
अन्ये (2) युक्तेऽथवा दृष्टे परकीयस्थलं वदेत् ।
यदि दूसरे का दृष्टि योग हो तो दूसरे की भूमि पनानी चाहिये।
इति कूपकाण्डः
सेनस्यागमनं चैव प्रवक्ष्याम्यरिभूभृताम् ।
चरोदये च सारुंढे पापाः पञ्चगमा यदि ॥१॥

शानप्रदीविका सेना के भागमन के विषय में भी, जो शत्रु राजा समय समय पर आया करते है, कहताह-घर रन हो चर पारद हो और पाप ग्रह यदि पञ्चम स्थान में हों। सेनागमनमस्तीति कथयेत् शास्त्रवित्तमः । चतुप्पादुदये जाने युग्मे रायुदये पिता (2) ॥२|| तो शास्त्रज्ञ को सेना का आगमन पताना चाहिये। चतुष्पद राशि का उदय या युग्म राशि का उदय हो, लग्नस्थाधिपतौ वक्र सेना प्रतिनिवर्तते । चरोदये चरारूढे भौमार्किगुरवो रविः ॥३॥ भी और लग्नेश चक्र हो तो सेना लौट जायगी। यदि लम भी चर हो और मारुढ चरहो और उसमें मगल शनि और गुष एव सूर्य, तिष्ठति यदि पश्यति सेना याति महत्तरा । आरूढ़े खामिमित्रोच्चग्रहयुक्तेऽथ वीक्षिते ॥४॥ पड़े हो या देखते हों तो पड़ी भारी सेना भी लौट जाती है। आमट यदि स्वामी, मित्र या प्रश्य ग्रह से युक हो अथवा दृष्ट हो, स्थायिनो विजयं व यात यायिनो रोगमादिशेत् । “एवं छत्रे विशेपोऽस्ति विपरीते जयो भवेत् ॥५।। तो स्थायी की जीत होगी और यायी रोगाकान्त होगा । विशेषता है। इसके विपरीत होने से यायो की जय होगी। आरूढ़े वलसंयुक्ते स्थायी विजयमाप्नुयात् । यायी पलं समायाति छन्ने पलसमन्विते ॥६॥ मारूद यदि पली हो तो स्थायी थी और छत्र यदि यली हो तो यायी की जीत बतानी चाहिये। आरूढ नीचरिपुभिर्य हेर्युक्तेऽथ वीक्षिते । स्थायी परगृहीतस्य छोप्येवं विपर्यये ॥७॥ भारुढ यदि शत्रु नीच आदि ग्रहों से युक्त किया दा हो तो स्थायी दूसरे द्वारा गिर फ्तार कर लिया जाता है। इससे उता अर्थात् उच्च मादि प्रदों से यदि उन युक्त हर होतो मी यही फल होता है। छत्र में भी यही ज्ञानप्रदीपिका। शुभोदये तु पूर्वाह्न यायिनो विजयो भवेत् । शुभोदये तु सायाह्न स्थायी विजयमाप्नुयात् ॥८॥ लम में शुभ ग्रह हों तो पूर्वाह्न में आक्रमणकारी को विजय और शुम लग्न में ही अपराक्ष में खापो की विजय बताना । छनारूढ़ोदये वापि पुंराशौ पापसंयुते । तत्काले पृच्छतां सद्यः कलहो जायते महान् ॥६॥ छत्र भारूढ के उदय में या पुरुष राशि के पापयुत होने पर यदि कोई पूछे तो शीघ्र हो कलह बताना चाहिये। पृष्ठोदये तथारूढ़े पापैर्युक्तेऽथ वीक्षिते । दशमे पापसंयुक्ते चतुप्पादुदयेऽपि च ॥१०॥ कलहो जायते शीघ्र संधिः स्याच्छुभवीक्षिते । भारुढ यदि पृष्ठोदय राशि हो और पाप से युत या दृष्ट हो दशम में पाप ग्रह हों या लग्न में चतुष्पद राशि हा तो शीघ्र कलह होगा पर यदि शुम ग्रह देखने हों तो संघि होती है। . उदयादिपु षष्ठेषु शुभराशिपु चेत् स्थिताः ॥११॥ स्थायिनो विजयं ब्रूयात् तदूध्वं चेद्रिपोर्जयम् । लन से लेकर छ मानों में शुम रोगियों में 'यदि ग्रह हों तो स्थायी को मन्यथा आक्रमणकारी की विनय होतो है पापग्रहयुते तदाग्मित्रे (१) संधिःप्रजायते ॥१२॥ उभयत्र स्थिताः पापाः बलवन्तः सतोजयम् । यदि उन्हीं ६ राशियों में पाप ग्रह हो तो संधि और यदि दोनों यलो पाप ग्रह हों तो यायो और स्थायी में जो सजन हो उसो को विजय यतानी चाहिये । तुर्यादिराशिभिः पभिःस्थायिनो बलमादिशेत्॥१३॥ एवं ग्रहस्थितिवशात् पूर्ववत्कथयेट बुधः ।

ज्ञानप्रदीपिका। यदि चतुर्थ से लेकर नपम पर्यन्त ६ राशियों में शुम प्रह हों तो स्थायी की अप होती है,-युद्धिमान ग्रहों के यश से फल पहें। । ग्रहोदये विशेषोऽस्ति शन्यकांगारका यदि ॥१४॥ आगतस्य जयं वयात् स्थायिनो भंगमादिशेत् । विशेषता यह है कि प्रश्न लस में शनि सूर्य या मंगल हो तो यायो को जय और स्थायी की हार होगी। बुधशुक्रोदये संधिः जय स्थायी (9) गुरूदये ॥१५॥ पंचाप्टलाभारिग्वेषु तृतीयेऽर्किः स्थितो यदि । आगतः स्त्रीधनादोनि हृत्वा वस्तूनि गच्छति ॥१६॥ उत्तो प्रश्न लग्न में यदि बुध और शुभ हों तो सन्धि हो जाती है पर गुरु हो तो त्यायो की विजय होती है। ५ ८ ११ ६ इनमें या तृतीय में यदि शनि हो तो आगत राज्ञा स्त्री धन आदि ले कर चला जायगा। द्वितीये दशमे सौरिः यदि सेनासमागमः । यदि शुक्रः स्थितः पष्ठे योग्यसंधिर्भविष्यति ॥१७॥ यदि २, या १० में शनि दा तो सेना मायेगी पर यदि षष्ठ में शुक्र हो तो सन्धि हो जायगी। चतुर्थे पंचमे शुको यदि तिष्ठति तत्क्षणात् । स्त्रीधनादीनि वस्तूनि यायो हृत्वा प्रयास्यति ॥१८॥ यदि ४ या ५ चे स्थान में शुक हो तो शीघ्र ही यायी ( नढाई परने पाला,) खी धन मादि को हरण परके चल जायगा। सप्तमे शुकसंयुक्त स्थायी भवति दुर्लभः । नवाप्टसतसहजान्वितान्या कुजी यदि ॥१६॥ स्थायी विजयमातोति परसेनासमागमे । सप्तम में यदि शुक्र हो तो स्थाया मुश्किल से पचता है। यदि ६, ८, ९, ३ल से मन्पत्र मंगल हो तो शत्रु की सेना का याप्रमण होग पर स्थायी की विजय होगी।

ज्ञानप्रदीपिका। F चतुर्थे पंचमे चन्द्रो यदि स्थायी जयो भवेत् ॥२०॥ तुतीये पंचमे भानुः यदि सेनासमागमः । मित्रस्थानस्थितः संधिनोचरस्थायी जयी भवेत् ॥२१॥ ४, या ५ में यदि चन्द्रमा हो तो स्थायो की जय होगी, ३ या ५ में यदि सूर्य हो और वह यदि मित्र स्थान में हो तो सधि, अन्यथा स्थायी की जय बतानो चाहिये। चतुर्थे वित्तदः स्थायी अष्टमे यायिनो मृतिः । यदि सूर्य धर्थ में हो तो स्थायी को धनद और ८ में हो तो यायी की मृत्यु बतानी चाहिये। उदयात् सहजे सौम्यो द्वितीये यदि भास्करः ॥२२॥ स्थायिनो विजयं वयात व्यत्यये यायिनो जयं । ससौम्ये भास्करे युक्ते समं ब्रूयात द्वयोस्तयोः ।।२३।। लम से तृतीय में यदि शुभ ग्रह हो द्वितीय में यदि सूर्य हो तो स्थायी की अन्यथा यायो की विजय होती है। किन्तु यदि सूर्य शुभग्रहों से. युन हो तो दोनों को बरायर पहना चाहिये। म H उदयात् पंचमे सौम्ये स्थायो भवति चार्तिकः । द्वित्रिस्थे सोमजे यायी विजयी भवति ध्रुवम् ॥२४॥ लम से यदि पंचम में बुध हो तो स्थायी कातर होगा। यदि धुध २ २, ३२ स्थान मैं हो तो यायो निश्चय विजयी होता है। एकादशे व्यये सौम्ये स्थायी विजयमेष्यति । एकादशे रवी यागी हतस्त्रीपतिवांधवः ॥२५॥ यदि बुध ११, या १२ स्थान में हो तो स्थायी की विजय होती है। रवि यदि १९वें स्थान में हो तो यापी फाली धन आदि सर्वस नष्ट होगा। शत्रुनीचस्थिते सूर्ये स्थायिनो भंगमादिशेत् । उदयात्पंचमे शत्रुव्ययेषु विषये यदि ॥२६॥ - + होगा। शागप्रदीपिका। विपरीतेपु युद्ध स्यात् भानो द्वादशके यदि । तत्र युद्ध न भवति शास्त्रे ज्ञानप्रदीपिके ॥२७॥ सूर्य यदि शत्रु या नीच राशि में हो तो स्थायी की हार होती है। रश से पवम, पष्ठ और १२ चे में युद्ध होता है। यदि सूर्य द्वादश में हो तो युद्ध नहीं होता। चरराशिस्थिते चन्द्रे चरराश्युदयेऽपि वा । आगतारेहि सन्धान विपरीते विपर्ययः ॥२८॥ चन्द्रमा चर राशि में या चर लग्न में हो तो आगत शत्रु से सधि और अन्यथा युद्ध “युग्मराशिगते चन्द्रे स्थिरराश्युदयेऽपि वा । अर्द्धमार्ग समागत्य सेना प्रतिनिवर्तते ॥२६॥ चन्द्रमा यदि द्विस्वमार गशि में हो और लग्न में स्थिर गशि हो तो सेना आधे रास्ते से भाकर लौट जायगी। सिंहाद्याः राशयः पट' च भास्करः स्थायिरूपिणः । कर्कायु स्क्रमेणैव चन्द्रो वै यायिरूपिका. ॥३०॥ सिंह से लेकर मिथुन तक ६ राशियां और सूर्य ये स्थायो के रूप है। और बाकी मोर चन्द्रमा यायो के स्वरूप है । स्थायी (2) यायो (2) क्रमेणेवं यादग्रवशावलम् । इस प्रकार स्थायो,मोर यायो के बल को विधेचना मम से होनी चाहिये। इति सेनागमनकाण्डः। mar यात्राकाण्डं प्रवक्ष्यामि सर्वेषां हितसाम्यया । गमनागमनं चैत्र लाभालाभौ शुभाशुभौ ॥१॥ विचार्य कथयेद्विद्वान् पृच्छतां शास्त्रवित्तमः । A ७१ शानप्रदीपिका। - - सब के हितार्थ यात्रा काण्ड कहता है। इस फाण्ड से गमन आगमन लाम हानि, शुभ, अशुभ मादि चाते रियार कर पहनी चाहिये। मित्रक्षेत्राणि पश्यन्ति यदि मित्रग्रहास्तदा ॥२॥ , मित्राय गमनं ब्रूयात् नीचं नीचयहाणि (2) च । नीचाय गमनं ब्रूयात् उच्चानुञ्चग्रहाणि (?) च ॥३॥ यदि मित्रक्षेत्र को मित्रग्रह देखते हों तो मित्र के लिये गमन कहना चाहिये। योही यदि नीच ग्रह नीच स्थानों को देखते हों तो नीच के लिये और उच्च ग्रह देखते हों तो अपने से उच्च के पास यात्रा बतानी चाहिये। खाधिकाये(?)ऽतिगमनं पुराशिं पुंग्रहा यदि । स्त्रियो गमनमित्युक्तमन्येप्येवं. विचारयेत् ॥४॥: पुरुष राशि को यदि पुंग्रह देखते हों तो स्त्री के लिये गमन होता है। अन्य परिस्थि- तियों में भी ऐसे ही विचार लेना चाहिये चरराश्युदयारूढ़े तत्तद्ग्रहविलोकने । तत्तदाशासु तिष्ठन्ति पृच्छतां शास्त्रनिर्णयः ॥५॥ पर राशि यदि लग्न या मारूढ में हो तो जो ग्रह उन्हें देखता हो उसी को दिशा का प्रम कहना चाहिये ऐसा शास्त्रीय सिद्धान्त है। स्थिरराश्युदयारूढे शन्याहारकाः स्थिताः । अथवा दशमे वा चेद् गमनागमने न च ॥६॥ खिर राशि उदय या आरूढ में हों और शनि, सूर्य और मगल हो या दशम में मो ये हों तो गमन या प्रागमन नहीं होता। शुक्रसौम्येन्दुजीवाश्चेत् तिष्ठन्ति स्थिरराशिपु । विद्य ते स्वेष्टसिद्धयर्थ गमनागमने तथा ॥७॥ यदि स्थिर राशि में शुक्र, युध, चंद्र या वृहस्पति हों तो अपनी एसिद्धि के लिये गमनागमन बताना चाहिये। - शानदी विका। । स्थितिप्रश्नेति (2) तं ब्रूयान्मस्तकोदयराशिः । पृष्ठोदये तु-गमनं तथा गमनमेधते ॥ यदि ये शोर्पोदय राशि में हों तो प्रश्न, स्थिति का बताना चाहिये। पृष्ठोदय राशि में हों तो सिपूर्वक गमग बताना । द्वितीये च तृतीये च तिष्ठन्ति यदि पुंग्रहाः । त्रिदिनात्पत्रिका याति शोपितस्य च द्वितीय तृतीय में यदि पुरुष ग्रह हों तो दो या तीन दिन में. विदेशस्थ व्यक्ति का पर -- आता है।" लग्नस्थसहजव्योमलाभेबिंदुज्ञभार्गवाः । तिष्ठन्ति यदि तत्काले चावृतिः घोषितस्य च ॥१०॥ यदि चंद्र, बुध और शुक्र, १, ३, १० या ११ स्थान में हो तो प्रवामी शीघ्र ही लौटेगा। चतुर्थे वारि वा पापाः तिष्ठन्ति चेत् शुभग्रहाः । पत्रिका प्रोपितस्याशु समायोति न संशयः ॥११॥ यदि धर्थ और पष्ठ में क्रमशः पाप ग्रह और शुभ ग्रह हो तो प्रवासी की पत्रिका नि: सन्देश शीघ्र आवेगी। चापोक्षछागसिंहेषु यदि तिष्ठति चन्द्रमाः। '. चिन्तितस्तत्तदाऽऽयाति चतुर्थे चेत्तदागमः ॥१२॥ धनु, पृष, मेष और सिंह में यदि चन्द्रमा हो तो चिन्तित आयेगा पर फर्फ में हो हो उसका बागमन हो गया है। स्वस्वक्षेत्रेषु तिष्ठन्ति शुकजीवेन्दुसोमजाः । प्रयाणे गमनं ब्रूयात् तत्चदाशासु-सर्वदा ॥१३॥ पदि शुमा, वृदस्पति, चंद्र और घुय अपनी राशि में हो तो उनको दिशाओं में पात्रा पतानी चाहिये।

ज्ञानप्रदीपिका। ग्रहाः स्वक्षेत्रमायान्ति यावत्तांवत् फलं वदेत । शुभग्रहवशात् सौख्यं पीड़ा पापग्रहैर्वदेत् ॥१४॥ प्रह जितने दिन में अपने क्षेत्र में आवे उतने दिन में स्माचार आना चाहिये । शुभ ग्रह होतो और अशुभ ग्रह हो तो अशुभ फल बताना चाहिये। सप्तमाष्टमयोः पापास्तिष्ठन्ति यदि च ग्रहाः । प्रोपितो हृतसर्वस्वस्तत्रैव मरणं व्रजेत् ॥१५॥ यदि सप्तम और अष्टम में पापग्रह हों तो प्रयासो विदेश में ही हृतसर्वस्व हो कर मनाता है। पष्ठे पापयुते मार्गगामी बद्धो भविष्यति । चरराशिस्थिते पापे चिरेणायाति निश्चितम् ॥१६॥ पाठ में यदि पाप ग्रह हो तो प्रवासी पुश्प मार्ग में ही बद्ध हो जाता है। यदि पाप प्रह घर राशि में स्थित हो तो वह चिरकाल में आवेगा। बलावलवशेनैव शुभाशुभनिरूपणम् । इस प्रकार ग्रहों में घलावल के विचार से शुभाशुम फल का निरूपण होता है। इति यात्राकाण्डः जलराशिपु लग्नेषु जलग्रहनिरीक्षणे कथयेद् वृष्टिरस्तीति विपरीते न वर्षति ॥१॥ रस में जल गशि हो मोर जलाह देखते हों तो पुष्टि होगी अन्यथा नहीं। जलराशिपु शुक्रन्दू तिष्ठतो वृष्टिरुत्तमा । जलराशिपु तिष्ठन्ति शुक्रजोवसुधाकराः ॥२॥ आरूढोदयराशि चेत् पश्यन्त्यधिकवृष्टयः । अलाश में यदि एक, तथा चन्द्र हो तो अच्छी पृष्टि होगी । और जल राशि में शुक्र, भापति चन्द्र हो और सन और भारुट को देखते हो तो गधिक पुष्टि होगी। - ०४ शानप्रदीपिका। एते स्वक्षेत्रमुच्च वो पश्यन्ति यदि केन्द्रकम् ॥३॥ त्रिचतुर्दिवसादन्तमहावृष्टिर्भविष्यति । यदि शुक्र वृहस्पति और चन्द्रमा अपने क्षेत्र को उन्ध राशि को या दशम एकादरा को देखते हों तो तीन ही चार दिनों के भीतर महावृष्टि होगी। लग्नाच्चतुर्थे शुक स्यात्तदिने वृष्टिरुत्तमा ॥४॥ चन्द्रे पृष्ठोदये जाने पृष्ठोदयमबोक्षिने । तत्काले परिवेषादिदृष्टे वृष्टिमहत्तरा ॥५।। यदि लग्न से चतुथ में चन्द्रमा हो तो उसी दिन उत्सम वृष्टि होगी पदमा यदि पृष्ठोदय राशि में हो और पृष्ठादय राशि को देखते हो और उस पर परिवेपादि उपग्रहों को दूष्टि हो तो पृष्टि अच्छी होगी। केन्द्रेषु मन्दभौमज्ञराहवो यदि संस्थिताः वृष्टिर्नास्तीति कथयेदथवा चण्डमारुतः ॥६॥ केन्द्र (१,४ ० १०) में यदि शनि मंगल बुध और राहु स्थित हो तो दृष्टिन होगी पा प्रचण्ड पायु पहेगी। पापसौम्यविमिश्च अल्पवृष्टिः प्रजायते। पापश्चेन्मन्दराहुश्चेत् वृष्टिर्नास्तीति कोर्तयेत् ॥७॥ यदि उपर्युक्त स्थानों में पाप और शुभ दोनों प्रकार के ग्रह हों तो वृष्टि पोहो होगो यदि शनि और राहु हो तो पृष्टि नहीं होगी। शुक्रकार्मुकसन्धिश्चेद्धारावृष्टिर्भविष्यति । पदि धनु में शुक्र पडे हो तो मूसलाधार पानो बरसेगा । इति वृष्टिकाण्डः - हानप्रदीपिका। उच्चन दृष्टे युक्ते वा अर्ध्यवृद्धिर्भविष्यति । नीचेन युक्त दृष्टे वा अय॑क्षयमितीरितम् ॥१॥ मित्रवामिवशात् सौम्यामित्रं ज्ञात्वा वदेसुधीः । शुभग्रहयुते दृष्टे वयवृद्धिर्भविष्यति ॥२॥ उच्च से दूर किंश युक्त होने पर मर्य ( अन्न का मार ) को वृद्धि और नीच से युत वा दृष्ट होने पर क्षति होती है। इस विपर में विधान को मित्र, शत्रु, स्वामी, पाप का पूर्ण विचार करना चाहिये । शुभ ग्रह से युन दृष्ट होने पर अर्ध ( दर) की वृद्धि शुम, पापग्रहयुने दृष्टे स्वय॑वृद्धिक्षयो भवेत् । नीचशत्रुवशान्न्यूनमयनिर्णयमोरितम् ॥३॥ लम यदि पार ग्रह से युन या दृष्ट हो तो दर को बढवारी घटेगो नोव और शत्र परा से इसकी न्यूनता का निर्णय कहा जाता है। इत्यध्यकापडा जलराशिपु लग्नेषु जीवशुफोदयो यदि । पोतस्यागमनं जयादशुनश्चन्न सिद्वयति ॥१॥ लग्न में जल राशि हो और उसमें वृहस्पति और शुरु परे हों तो जहाज गोत्र लोटेगा। यदि माम प्रह हो तो फाम सिद्ध नहीं होगा। आरूढकेन्द्रलग्नेषु वीक्षिनेष्वशुभग्रहः पोतभंगो भवति च शत्रुभिर्वा तथा वदेत् ।।२।। (१, ४, ७, १०) को यदि मसुम प्रा देखते हो तो शत्रुओं ने प्रसार हलिया है-ऐसा-ऐसा बनाना। अदृष्टस्योदये लग्ने शुभे नौका प्रजेत्खयम् । तद्महे तु यथा दृष्टे तथा नौदर्शनं भवेत् ॥३॥ मारता भानप्रदीपिका। यदि लग्न शुभ ग्रह से दृष्ट पाप ग्रह से भद्दष्ट हो तो नौका अनायास चलेगी। उन ग्रहों में से प्राह पा दृष्टियोग हो वैसे ही नौका का प्रश्न होगा। चरराशी चरच्छत्रे दूत आयाति नौस्तथा । चतुर्थे पंचमे चन्द्रो यदि नौः शीघ्रमेष्यति ॥४॥ घर राशि में और चर छत्र में यदि चंद्रमा हो तो दूत नौका आ जाती है। चन्द्रमा यदि चौथे या पाचवें स्थान में हो तो नौका शीघ्र आयेगी यह पहना चाहिये। द्वितीये वा तृतीये वो शुकचेन्नौसमागमः । अनेनैव प्रकारेण सर्व वीक्ष्य वदेत्स्फुटम् ॥५॥ यदि द्वितीय तृतीय स्थान में शुक्र हो तो नौका का आगमन शोना ही होगा। इस प्रकार से सब देख भाल चाहिये। काण्डः इति ज्ञान तिषशास्त्रम् समाप्तम् ।

देवकुमार-ग्रन्थमाला कर द्वितीय पुष्प (ख)
सामुद्रिक शास्त्र
(ज्योतिष शास्त्र)
अनुवादक और सम्पादक,
ज्योतिषाचार्य पण्डित रामव्यास पाण्डेय
प्रकाशक,
निर्मलकुमार जैन
मन्त्री
श्री जैन सिद्धान्त भवन, आए।
पौर संवत् २४१० (सन् १६३४)

सामुद्रिक शास्त्र
की
विपय-सुची
पृष्ठ
(१) आयुर्लक्षण पर्व
(२) पुरुषलक्षण पर्व
(३) नीलक्षण पर्व

परिशिष्टम
जिनेन्द्राय नमः
सामुद्रिका-शास्त्रम्
आदिदेवं नमस्कृत्य सर्वज्ञ सर्वदर्शिनम्
सामुद्रिकं प्रवक्ष्यामि शुभांगं पुरुपस्त्रियोः ॥१॥
सबके ज्ञाता, सब कुछ देखने वाले, आदि देव, (मदेव ) परमात्मा को नमस्कार'
करके, पुरुष और स्त्रियों के शुभ लक्षणों को बताने वाले सामुद्रिक शास्त्र को कहता हूँ।
पूर्वमायुः परीक्षेत पश्चाबक्षणमादिशेत् ।
आयुहीननराणां तु लक्षणैः किं प्रयोजनम् ॥२॥
सामुद्रिक शास्त्र के द्वारा शुभाशुभ फलों के विवेचन करने वाले पुरुष को पहले प्रश्न.
कर्ता की आयु की परीक्षा कर अन्य लक्षणों का आदेश करना चाहिये। क्योंकि
जिसकी आयु ही नहीं है वह अन्य लक्षण जान पर क्या करेगा ?
वामभागे तु नारीणां दक्षिणे पुरुपस्य च ।
निर्दिष्ट लक्षणं चैव सामुद्र-वचनं यथा ॥३॥
इस शास्त्र के वचन के अनुसार, पुरुष के दाहिने और सो को वांये भंग के लक्षण
का निर्देश करना चाहिये।
पंचदीर्घ चतुर्हस्वं पंचसूक्ष्मं पहुन्नतम् ।
सप्तरक्त निगम्भीरं त्रिविस्तीर्णमुदाहृतम् ॥४॥
जैसा कि भागे बताया है, मनुष्य के पांच अंगों में दीर्धना (बड़ा होना) चार
अंगों में हस्वता (छोटाई ), पांच में सूक्ष्मना ( बारीकी) छ: अंगों में अचाई, सात में
ललाई, तीन में गंभीरता ( गहराई ) और तीन में रिस्तोर्णता (चौडाई ) प्रशस्त कही
गई है।
वाहुनेत्रनासाश्चैव कर्णदासास्तथैव च ।
स्तनयोरुन्नतिश्चैव पंचदीर्घ प्रशरयते ॥५॥

जन
V
भुजाओं में, नेत्रो में, नपों में कानों में और नाक में दोधना होनी चाहिये। स्तनों में
दीर्घता के माय ही साथ कुछ ऊंचाई होनी चाहिये। इन्ही पाच अंगो को दौता
प्रशस्त यताई गई है।
ग्रीवा प्रजननं पृष्टं हस्वजंघे प्रपूरिते।
हस्वानि यस्य चत्वारि पूज्यमानोति नित्यशः ।।६।।
गर्दन पीठ और भरी हुई जघा ये चार अग जिसके हस्थ (छोटे) होते हैं वह सदा
पूजा पाता है।
सूक्ष्मान्यंगुलिपाणि दन्तकेशनखत्वचः ।
पञ्च सूक्ष्माणि येषां स्युस्तेनरा दीर्घजीविनः ॥७॥
अंगुलों के पोर दांत, केश नख और त्वक् ( चमडा ) ये पांचों जिन पुरुषों के सूक्ष्म
(चारीफ) होते है ये दीर्घजीवी हाते है।
कक्षः कुक्षिश्च वक्षश्च प्राणस्कन्धौ ललाटकम् ।
सर्वभूतेषु निर्दिष्टं पडुन्नतशुभं विदुः ॥८॥
कक्ष ( काख ) कुक्षि, ( कोस ) छाती, नाक कन्धे और ललाट, इन छ भगों का
उवा होना किसी भी जीव के लिये शुभ है।
पाणिपादतले रस्ते नेत्रान्तानि नग्वानि च ।
तालु जिह्वाधरोष्ठौ च सदा रक्तं प्रशस्यते ॥६॥
हथेली, चरणों के नीचे का भाग, नेत्रों
काने नख, तालु जीभ और निचले होंठ
इन सात अगों का सदा राल रहना उत्तम है।
नाभिस्वरं सतमिति प्रशस्त गभीरमन्ने त्रितयं नराणाम् ।
उरोललाटो वदनं च पुंसां विस्तीर्णमेतत् त्रितयंप्रशस्तम् ॥१०॥
नाभि, स्वर और सत ये तीन यदि पुरुषों के गम्भोर हो तो प्रशस्त कहे जाते हैं ।
इसी प्रकार छाती रहार भोर मुल का चौटा होना शुभ होता है।
वर्णात् परतरं स्नेहं स्लेहात्परतरं स्वरम ।
खरात् परतरं सत्वं सौ सत्ते प्रतिष्टिताम् ॥११॥

।
मनुष्य की देह में, रंग से उत्तम स्निग्धता (चिकनाई, भाव ) है, स्निग्धता से
मी उत्तम स्वर है और स्वर ( आवाज़ ) से भी उत्तम सत्त्व है। (सत्त्व वह वस्तु है
जिसके कारण मनुष्य को सत्ता है, जिसके न रहने से मनुष्यत्व ही नहीं रहता)
इसी लिये सत्त्व हो सब का प्रतिष्ठा-स्थान है।
नेत्रतेजोऽतिरक्त च नातिपिच्छलपिंगलम् ।
दीर्घबाहुनिभैश्वयं विस्तीर्ण सुन्दरं मुखम् ॥१२॥
आखों में तेज और गाढ़ी लालिमा का होना तथा बहुत चिकनाई और पिंगल
धर्ण (मांजर-पन) का न होना, भुजाओं का दीर्घ होना, और मुंह का विशाल
और सुन्दर होना, ऐश्वर्य को प्राप्त करते हैं।
उरोविशालो धनधान्यभोगी शिरोविशालो नृपपुंगवः स्यात् ।
कटेविशालो वहुपुत्रयुक्तो विशालपादो धनधान्ययुक्तः ।१३
जिसको छाती चौड़ी हो वह धन धान्य का भोका, जिसका ललाट चौड़ा हो
जिसकी कमर विशाल हो यह बहुत पुनावाला तथा जिसके चरण विशाल
हो वह धनधान्य से युक्त होता है।
वक्षस्नेहन सौभाग्यं दन्तस्नेहेन भोजनम् ।
स्वचःस्नेहेन शय्या च पादस्नेहेन वाहनम् ॥१४॥
वक्षःस्थल (छाती) को चिकनाई से सौभाग्य, दाँत को चिकनाई से भोजन, चमड़े
की चिकनाई से शय्या और चरणों को चिकनाई से सबारी मिलती है।
अकर्मकठिनौ हस्तौ पादौ चाध्यानकोमलौ ।
तस्य राज्यं विनिर्दिष्ट सामुद्रवचनं यथा ॥१५॥
विना काम काज किये भी जिसका हाथ कठिन (कड़ा) हो, और मार्ग चलने पर
जिसके पैर कोमल रहते हों, उस मनुष्य को इस शास्त्र के कथन के अनुसार, राज्य
वह राजा,
मिलना चाहिये।
दीर्घलिंगेन दारिद्र यम् स्थूललिंगेन निर्धनम् ।
कृशलिंगेन सौभाग्यं हस्वलिंगेन भूपतिः ॥१६॥

पतला (४) जिस पुरुष पोलिंग (जननेन्द्रिय ) लंबा हो वह यरिख, मोटा हो यह निर्धन, हो यह सौभाग्यशाल एवं छोटा हो बह राजा होता है। कनिष्टिकाप्रदेशाद्या रेखा गच्छति तर्जनीम् । अविच्छिन्नानि वर्षाणि तस्य चायुविनिर्दिशेत् ॥१७॥ पनिष्ठा अगुली के नीचे से जो रंसा जाती है वह यदि तर्जनी तक चली गई हो तो समझना चाहिये कि इसकी यायु पूर्णायु अर्थात् १२० वर्ष को है। कनिष्ठिका प्रदेशाद्या रेखा गच्छति मध्यमाम् । अविच्छिन्नानि वर्षाणि अशीत्यायुर्विनिर्दिशेत् । यही रेखा यदि मध्यमा अंगुरा तक गई हो तो उसकी आयु विना बाधा के अस्सी घर्ष जानना।

श्रीमान्नृपश्च रक्ताक्षो निरर्थः कोऽपि पिङ्गलः । सुदीप बहुधश्वर्य निमासं न च व सुखम् ॥२६॥ हो तो ऐश्वर्ययान, मोर मासहीन हो (सीपुरंदा सो दुःषी जानना चाहिये। ललाटे दृश्यते यस्य रेखात्रयमनुत्तरम् पष्ठिवर्षाणि निर्दिष्टं नारदस्य वचो यथा ॥२३॥ ललाटे दृश्यते यल्य रेखाद्वयमनुत्तरम् वर्षविंशतिनिर्दिष्टं सामुद्रवचनं यथा ॥२४ जिसके ललाट में तीन रेखायें हो उसको साठ तथा जिसके ललाट पर दो रेखाये हो उसकी वीस वर्ष की आयु समझनी चाहिये-ऐसा नारद का वाक्य है । कुचैलिनं दन्तमलप्रपूरितम् बह्वाशिनं निष्ठुरवाक्यभाषिणम् । सूर्योदये चास्तमयेच शायिनं विमुञ्चति श्रीरपि चक्र-पाणिनम् ॥२५॥ मैले वस्त्र को धारण करने वाले, दांत के मल को साफ न करने वाले, बहुत पाने वाले, कटु चाक्य बोलने वाले, सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सोने वाले पुरूष को-वे चाहे विष्णु ही क्यों न हो-लक्ष्मी छोड़ देती हैं। अंगुष्ठोदरमध्यस्थो यवो यस्य विराजते । उत्तमो भक्ष्यभोजी च नरस्स सुखमेधते ॥२६॥ जिसके अंगूठे के उदर (पीच) में जौ का चिन्ह हो उत्तम भोग को प्राप्त करता हुमा सुख की वृद्धि पाता है। अतिमेधातिकीर्तिश्च अतिक्रान्तसुखी तथा । अस्निग्धचैलि निर्दिष्टमल्पमायुर्विनिर्दिशेत् ॥२७॥ जो मनुष्य अत्यधिक घुद्धिमान, अतिशय कीर्तिमान और अत्यन्त मुखी तथा मलिन वसधारी रहता है-यह अल्पायु होता है ऐसा जानना चाहिये। रेखाभिर्बहुभिः क्लशी रेखाल्प-धनहीनता । रक्ताभिः सुखमाप्रोति कृष्णाभिश्च वने वसेत् ॥२८ हथेली में बहुत रेखायें हो तो मनुष्य दुःपी एवं पम हो सो निर्धन होता है। रेखायें यदि लाल हो तो सुख और फालो को तो पनास होता है ॥२८॥ मांसे लाल हो तो धनयान और राजा, पिल्लवर्ण पी हों तो निर्धन, बड़ी ( पंचरेखा युगत्रीणि द्विरेखा च समास्थितं । नवत्यशीतिः पष्ठिश्च चत्वारिंशच्च विंशतिः ॥३० जिसके क्रमश पांच, चार, तोन, और दो रेखायें हों क्रमशः ६०, ८०, ६०, ४॥ और वर्ष जीता है। इत्यायुर्लक्षणं नाम प्रथमं पर्व २० हितीयं पर्व अथ तत् सम्प्रवक्ष्यामि देहावयवलक्षणम् । उत्तम मध्यम हीनं समासेन हि कथ्यते ॥१॥ अप में संक्षेप में शरीर के उन लक्षणों को कहना हू जिन से उत्तम, मध्यम भौर अधम का ज्ञान होता है। पादौ समांसलो स्निग्धौ रक्तावर्तिमशोभनी। उन्नती स्वेदरहितो शिराहीनों प्रजापतिः ॥२॥ जिस पुरुष के पर मासयुक्त, विकने, रक्तिमा लिये हुये, सुग्दा उन्नन और पसीना में देने पाले तथा शिराहीन ( ऊपर से शिरा न दिम्बाई द-ऐसे) हो यह बहुत मजा (सन्तामों ) का मालिक होता है। यस्य प्रदेशिनो दीर्घा अंगुष्ठादतिबर्द्धिता । स्त्रीभोगं लभते नित्यं पुरुपी नात्र संशयः ॥३॥ जिसकी प्रदेशिनी (पैर के अंगठे के पास याला उंगली ) अंगूठे से भी पडी रे वह पुरुष मिस्सन्देह नित्य ही खोभोग पाता है। तथा च विकृतहक्षेर्नखर्दारिद्यमान यात् । पतिताश्च नग्या नीला ब्रह्महत्यां विनिर्दिशेत् ॥२॥ शित, को मपों घाला पुरुष दरिष्ट होता है। गिरे हुए भार नील पण नस से माहत्या का निर्देश परना चाहिये।

वृपसिंहगजेन्द्राणां गतिभोंगवतां भवेत ॥१०॥ मृगवजह याने(?) च काकोलूकसमा गतिः । द्रव्यहीनस्तु विशेयो दुःखशोकभयकरः ॥११॥ श्वेतवर्णप्रभैः कान्त्या नखैर्वहुसुखाय च । ताम्रवर्णनखा यस्य धान्यपद्मानि भोजनम् ॥५॥ जिनके नख की कान्ति सफेद और प्रकाशमान हो उनको यहुत सुख होता है, जिनके नल की कान्ति लाल ( तामे की तरह) हो उन्हें असंख्य धान्य और भोजन प्राप्त होता है। सर्वरोमयुते जंघे नरोऽत्र दुःखभाग्भवेत् । मृगजंघे तु राजाह्वो (न्यः) जायते नात्र संशयः ॥६॥ जिसके जंघों में (घुटनों के नीचे और फोलों के ऊपर ) अधिक गेये हों वह मनुष्य दुःखी होता है। जिसकी जंधा मृग के समान हो वह राजपुरुष (राज कुमार) होता है इसमें सन्देह नहीं । शृगालसमजंधेन लक्ष्मीशो न स जायते । मीनजंघं स्वयं लक्ष्मीः समाप्नोति न संशयः ॥७॥ स्थूलजंघनरा ये च अन्यभाग्यविवर्जिताः । मियार के समान जंघा वाला धनी नहीं होता, पर मछली के समान जंघा याला पूर्व धनी होता है। मोटी जंधा वाला भाग्यहीन होता हैं। एकरोमा लभेद्राज्यं द्विरोमा धनिको भवेत् । त्रिरोमा बहुरोमाणो नरारते भाग्यवर्जिताः ॥८॥ जिस पुरुष के रोम कूपों से एक एक रोंयें निफ्ले दो वह राजा होता है, दो रोम पाला धनिक मोर तीन या अधिक रोम पाला भाग्यहीन होता है। हंसचक्रशुकानां च यस्य तमु गतिर्भवेत् ॥६॥ शुभदंगाढवन्तश्च (?) स्त्रीणामेभिः शुभा गतिः । यदि चाल ईस, चकया या पुगे पी तरह हो तो यद पुर के लिये मामा पर यही चाल त्रियों के लिये शुभ होती है। ।

घल, सिंह और मस्त हाथी की सो चाल वाले भोगवान् होते हैं। मृग के समान टगाल के समान तथा फौए और उल्लू के समान गति वाले मनुष्य द्रव्यहीन तथा भय. हुन दुःन शोक से ग्रस्त होते हैं। श्वानोष्ट्रमहिषाणां च (?) शुकरोष्ट्रधरास्ततः । गतिर्येषां समास्तेषां ते नरा भाग्यवर्जिताः ॥१२॥ कुत्ते, ऊंट, भैंसे और सूथर की तरह गतिवाला पुरुष भाग्यहीन होता है। दक्षिणावर्तलिंगस्तु स नरो पुत्रवान् भवेत् । वामावर्ते तु लिंगानां नरः कन्याप्रजो भवेत् ॥१३॥ जिस पुरुष का शिश्न (जननेन्द्रिय ) दाहिनी ओर झुका हो वह पुनसान तया जिसकी पांई ओर झुका हो यह फन्याओं का जन्मदाता होता है। ताम्रवर्णमणिर्यस्य समरेखा विराजते । सुभगो धनसम्पन्नो नरो भवति तत्वतः ॥१४॥ जिसके लिंग के आगे या भाग (मणि ) फी फान्ति लाल हो तथा रेखायें समान हो यह व्यकि सोमाग्यशील तथा धनधान होता है। सुवर्णरौप्यसदृशेर्मणियुक्तसमप्रभः । प्रवालसर्गः स्निग्धैः मणिभिः पुण्यवान् भवेत् ॥१५॥ सोना, चांदी, मणि, प्रपाल (मूंगा ) भादि के समान प्रभा घाले. विषगे मणि (शिश्नाप्रमाग) पाले पुरष पुण्यवान् दोने हैं। समपादोपनिष्टस्य गृहे तिष्ठति मेदिनी। ईश्वरं तं विजानीयात्प्रमदाजनवल्लभं ॥१६॥ पद पुरुष सामर्थपान तथा नियों पाप्यार होता है जिस पे पर पृथ्वी पर कराया पेटने है। उसरे पर पृथ्वी भी। द्विधारं पतते मृत्रं स्निग्धशब्दविवर्जितम् । स्त्रीभोगं लभते सायं स नरो भाग्यवान् भवेत् ॥१७॥ पेशाय परते समय जिमराम दो धारो पारि योर उनमें से हर न निपते सो पा पुरुष मायर होता चोर प्रोमोसा गुण यो शाल होना। १ समासगत नियम दिएर जान पहना है, "राष्ट्रमदिवाणा' ऐका दा थादिये था।

( ' मीनगन्धं भवेद्रेतः स नरः पुत्रवान् भवेत् । मद्यगन्धं भवेद्रेतः स नरस्तस्करो भवेत् ॥१८॥ होमगन्धं भवेद्रेतः स नरः पार्थिवो भवेत् । कटुगन्धं भवेद्रेतः पुरुषो दुर्भगो भवेत् ॥१९॥ क्षारगन्धं भवेद्रेत. पुरुषा दारिद्र्यभोगिनः । मधुगंधं भवेद्रेतः पुमान्दारिद्र्यवान् भवेत् ॥२०॥ जिस पुरुष के वीर्य से मछली को गध आती हो वह पुत्रवान्, शरार की गंध आती हो वह चोर, होम की गध आती हो वह राजा, बडुई गंध याता हो वह अमागा, पारी गन्ध आती हो यह दरिद एव मधु की गन्ध हो यह निधी होता है। किचिन्मिभं तथा पीतं भवेद्यस्य च शोणितम् । राजानं तं विजानीयात् पृथ्वशिं चक्रवर्तिनम् ॥२१॥ जिसका रक कुछ पोलापन लिये हुये हो उसे पृथ्वी का मालिक चायनों राजा बनना चाहिये। मृगोदरो नरो धन्यः मयूरोदरसन्निभ । व्याघोदरो नरः श्रीमान् भवेत् सिहोदरो नृप. ॥ २२ ॥ मृग और मोर की तरह पेट घाला मनुष्य भाग्यरान् , पाघ या तरह पेट पाला धम. पान और सिंह के पेट के समान पेट घाला मनुष्य राजा दोना है। सिंहपृष्टो नरो यः स धनं धान्यं विवर्धयेत् । कूर्मपृष्टो लभेद्राज्यं येन सौभाग्यभाग्भवेत् ॥ २३ ॥ सिंह जैसी पीठ पाला धन धान्य से सुन और पाहुये जैसी पाठ याला राज्य सौमा ग्प से युक होता है। पाण्डुरा बिरला पृक्षरेखा या दृश्यते करे। चौरस्तु तेन विज्ञेयो दुखदारिद्र यभाजनम् ॥ २४ ॥ पाण्डर पर्ष की, पिरल, घर पे मार पारेमा जिरारे पाप में दो पदप मोर रविना से पुक योर होता है।

यस्य मीनसमा रेखा दृश्यते करसंतले धर्मवान् भोगवॉश्चव बहुपुत्रश्च जायते ॥२५॥ जिसके हाथ में मछली की रेखा हो वह धर्मनिष्ठ, भोगवान् और अनेक पुत्रों पाला होता है। तुला यस्य तु दीर्घा च करमध्ये च दृश्यते । वाणिज्य सिध्यते तस्य पुरुषस्य न संशयः ॥ १६ ॥ जिसके हाथ में लंपी तराजू के आकार की रेखा हो वह पुरुष निश्चय ही उत्तम व्यापारी होता है। अंकुशो वाऽथ चक्र वा पदमवज्रौ तथैव च । तिष्ठन्ति हि करे यस्य स नरः पृथिवी-पतिः ॥ २७ ॥ निसके हाथ में अकुश, चक्र, कमल अथवा घन का चिह्न दो घह मनुष्य पृथ्यों का मालिक (राजा) होता है। शक्तितोमरवाणञ्च यस्य करतले भवेत् । विज्ञेयो विग्रहे शूरः शस्त्रविद्येव भिद्यते ॥ २८ ॥ शक्ति, सोमर, वाण के चिह्नों से पंक्ति हाथ घाला पुरुष युद्ध में धूर होता है, पर शल विधा को भेदने पाला होता है रथो वा यदि वा छत्रं करमध्ये तुदश्यते । राज्यं च जायते तस्य बलवान् विजयी भवेत् ॥ २६ ॥ जिसके दाय में एप, उनमाथिहदोयद परयाम् धौर राज्य पर जीतने घाला होता है। वृक्षो वा यदि वा शक्तिः करमध्ये तु दृश्यते । अमात्यः स तु विज्ञोयो राजभेटी च जायते ॥ ३० ॥ बिसफेदाप में वृक्ष या शक्ति पाचह दोपत्री थोर राजा नठहोता। ध्वजं वा यथवा शंखं यस्य हस्ने प्रजायते । तस्य लक्ष्मी समायाति सामुद्रस्य वचो यथा ॥३१॥ शिप्तके हाप में पर पाहिहो उसके पास, सामुदायिमानुसार मो आती। । - कोष्ठाकारस्तथा राशिस्तोरणं यस्य दृश्यते । कृषिभोगी भवेत् सोऽयं पुरुषो नात्र संशयः ॥ ३२ ॥ जिसके हाथ में कोले का आकार, राशि, किंवा तोरण (वन्दनवार ) का विह हो वह पुरुष, निस्सन्देह, कृषिजीवी होता हैं। दीर्घबाहुनरो योग्यः स सर्वगुणसंयुतः । अल्पबाहुभवेद्योऽसौ परप्रेषणकारकः ॥३३॥ जिस पुरुष की बांहे लंबी हों वह योग्य तथा सर्वगुणसम्पन्न होता है इसी प्रकार छोटो बाहुओं वाला दूसरे का नौकर होता है । वामावती भुजो यस्य दीर्घायुप्यो भवेन्नरः । सम्पूर्णवाहवश्चैव स नरो धनवान् भवेत् ॥ ३४ ॥ जिसको भुनायें पाई ओर घुमी हों वह पुरुष दीर्घ आयु वाला तथा धनी होता है। ग्रीवा तु वर्तुला यस्य कुंभाकारा सुशोभना । पार्थिवः स्यात स विशेयः पृथ्वीशो कान्तिसंयुतः ॥३५॥ जिसकी गर्दन घड़े की भांति गोल और सुन्दर हो यह सुन्दर स्वरूप पाला राजा होगा ऐसा जानना चाहिये। शशग्रीवा नरा ये ते भवेयुर्भाग्यवर्जिताः। कम्युग्रीवा नरा ये च ते नराः सुखजीविनः ॥३६॥ जिनकी गर्दन खरगोश कोसी होवे अभागे होते हैं और जिनकी गर्दन शंख जैसा हो वे मनुष्य सुखी होते हैं। कदलीस्तंभसदृशं गजस्कंधसुबन्धुरम् । राजानं तं विजानीयात् सामुद्रवचनं यथा ॥ ३७॥ जिसका कन्धा केले के जंभे की तरह अथवा हाथी के पाधे की तरह भरा पूरा स्यूल होषद राजा होगा ऐसा इस शास्त्र का पचन है। चन्द्रबिम्बसमं वक्त 'धर्मशीलं विनिर्दिशेत् । अश्ववक्त्रो नरो यस्तु दुःखदारिद्र्यभाजनम् ॥ ३८ ॥ - करालवस्तूवरूपो स नरस्तस्करः स्मृतः । बकवानरवक्तश्च धनहीनः प्रकीर्तितः ॥ ३ ॥ यदि मुंह चन्द्रमा के विम्य जैसा हो नो धर्मशील, घोडे के मुह जैसा हो तो दुःखो और दरिद्र, भयानक तथा रूपा हो तो चोर, यगुला या यानर जैसा हो तो मनुष्य निर्धन होता है यस्य गंडस्थलो पुर्णी पदमपत्रसमप्रभो । कृपिभोगी भवेत सोऽपि धनवान् मानवान् पुमान् । ४०॥ जिसका गंडस्थल भरा हुआ तथा फमल के पत्ते के समान हो यह पुरुष धन तथा मान के सहित कृषिजीवी होता है। सिंहव्याघ्रगजेन्द्राणां कपालसदृशं भवेत् । भोगवन्तो नराश्चेव सर्वदक्षा विदुर्बुधाः ॥ ४१॥ सिंह, बाघ, हाथी आदि के सदृश कपाल वाले पुरुष भोगी, चतुर ज्ञानी और श्रेष्ठ रक्ताधरो नृपो शेयो स्थूलोष्ठो न प्रशस्यते । शुष्काधरो भवेत्तस्य नुः सुसौभाग्यदायिनः॥ ४२ ॥ लाल होठों वाला राजा होता है, मोटा होंठ अच्छा नहीं होता शुष्क अधर सौभाग्य के सूचक है । कुंदकुसुमसंकाशः दशनेभोंगभागितैः । यावजीवेत् धनं सौख्यं भोगवान स नरो भवेत् ॥ ४३ ॥ कुन्द फी कोई के समान शुभ्र दानो याला मनुष्य जीवन भर सुख, भोग और धन आदि से युक्त रहता है। रुक्षपाण्डुरदन्ताञ्च ते क्षुधानित्यपीड़िताः । हस्तिदन्ता महादन्ला स्निग्धदन्ताः गुणान्विताः ॥ ४४ ॥ रुखे और पाले दातो धाले मनुष्य सदा भूव से सताये हुए होते हैं। हाथी जैसे दातो चाले, पडे बडे दातो घाले तथा चिकने दांतों वाले मनुष्य गुणी होते हैं । द्वात्रिंशद्दशन राजा एकत्रिंशञ्च भोगवान् । 1 यस्वरनरा ये च धनधान्यसुभोगिनः ॥५१॥ ते भवन्ति नग नित्यं भोगवन्तो धनेश्वराः ॥५२॥ त्रिशंदन्ता नरा ये च ते भवन्ति सुभोगिनः ॥ ४५ ॥ एकोनत्रिंशद्दशनैः पुरुषाः दुःखजीविनः । ३१ दांतों वाला पुरुष राजा, ३१ दांतों वाला सुखी, ३० दांतों वाला भोगी और २. दांतो वाला मनुष्य दुःखी होता है। कृष्णा जिह्वा भवेद्य षां ते नरा दुःखजीविनः ॥ ४६ ॥ श्यामजिह्वो नरो यः स्यात्स भवेत् पापकारकः । स्थूलजिह्वा प्रधातारो नराः परुपमापिणः ॥ ४७ ।। श्वेतजिह्वा नरा ये च शौचाचारसमन्विताः । पद्मपत्रसमा ये तु भोगवमिष्टभोजनाः ॥ ४८ ॥ कालो जोम वाले दुःखी, सांवली ( हल्की फालिमामयो ) जीम वाले पापी, मोटी जीम वाले परुष ( कहा ) बोलने वाले सफेद जीम वाले पवित्र माचार शोल, तथा कमल पत्र के समान विकनी जोम वाले मनुष्य भोगी तथा मिष्ट पदार्थ खाने पाले होते हैं। किंचित्तानं तथा स्निग्धं रक्तं यस्य च दृश्यते । सर्वविद्यासु चातुय्यं पुरुषस्य संशयः॥४६॥ जिसकी जीम कुछ लालिमा के साथ चिकनाई भी लिये हो वह पुरुष निःसन्देह सर विधामों में चतुर होता है। कृष्णतालुनरा ये च संभवं कुलनाशम् । पद्मपत्रसमं ताल स नरो भूपतिर्भवेत् ॥ ५॥ काले तालुषाला पुष्पफुल फानाशक तथा कमल-पत्र के समान तालु याला राजा होता है। खेततालुनरा ये च धनवंतो भवन्ति ते। जिन मनुष्यों का तालु सफेद रंग का दोघे धनयान होते है। मेघगम्भीरनिघोंपो भृगाणां च विशेषतः ।

, है हंसस्वरश्च राजा स्यात् चक्रवाकस्वरस्तथा । व्याघस्वरो भवेत् क्लेशी सामुद्रवचनं यथा ॥५३॥ जिनका स्वर घोड़े के समान होवे धनी होते हैं, मेघ के समान गम्भीर घोष घाले और शांत करके भौग की गुजार सरीखे स्वर घाले पुरुप नित्य भोगवान और गहे धन घान् होते हैं, हंस की तरह स्वर; वाले और चकये की तरह म्घर धाले राजा होते हैं। वाघ के समान स्वर वाले दुःखी होते हैं-ऐसा सामुद्रिक शास्त्र का कहना पार्थिवः शुकनासा च दीर्घनासा च भोगभाक् । ह्रस्वनासा नरो यश्च धर्मशीलाते रतः ॥५४॥ स्थूलनासा नरो मान्यः निंद्याश्च हयनासिकाः। सिंहनासा नरो यश्च सेनाध्यक्षो भवेत्स च ॥५५॥ शुफ कीती नाक वाले राजा, लंबी नाफ थाले भोगी, पतली नाफ पाले धर्मनिष्ठ, मोटी नाक घाले माननीय, घोडे की सो नाफ पाले निंदनीय, और सिंह कीसी नाफ पाले सेनापति होते हैं। त्रिशूलमंकुशं चापि ललाटे यस्य दृश्यते । धनिक तं विजानीयात प्रमदाजीववल्लभः ॥५६॥ जिसके ललाट पर त्रिशूल या अंयुश का चिन्ह दिखाई दे उसे पनी समझना चाहिये। पहली का प्राण-प्यारा होता है स्थूलशीर्पनरा ये च धनवंतः प्रकीर्तिताः । वर्तुलाकारशीपेण मनुजो मानवाधिपः ॥५७॥ घोडे सिर पाले मनुष्य धनी और गोलाकार सिरपाले राजा होते हैं। रुक्षनिर्वाणि वर्णानि स्नेहस्थूला च मूर्द्धजा । निस्तेजाः सः सदा शेयः कुटिलकेशदुःखितः then जिसके बाल रूप और पिपर्ण हों तथा तेल यादि लगाने पर जर पर म्यूल हो जा ते दो पर पुरुष निम्नजदोता है। बुटिल पर पारा मनुष्य दुःखी होता है।

लक्षण माप कर सकते हैं। कृपोदरी च विम्बोप्ठी दीर्घकशी च या भवेत् । दीर्घमायुः समाप्नोति धनधान्यविवर्द्धिनो ॥३॥ शोचालीहोतीषह धन्यधाग्य कोपनानेवालो होतो? भोर पहुन दिनों तकनीती जोली एशोदरी (कमर की पतलो), पिपल के समान मघवाली मोर ससा अङ्कुशं कुंडलं चक्र यस्य पाणितले भवेत् । विरलं मधुरं स्निग्धं तस्य राज्यं विनिर्दिशेत् ॥५६॥ जिसकी हथेली में म'कुश, कुडल या चक्र हो उसको निराले और उत्तम राज्य का जाने वाला बताना चाहिये। इति पुरुषलक्षणं नाम द्वितीयं पर्व ॥२॥ अथ स्त्रीलक्षणम् प्रणम्य परमानन्दं सर्वशं स्वामिनं जिनम् । सामुद्रिकं प्रवक्ष्यामि स्त्रोणामपि शुभाशुभम् ॥१॥ परम आनन्द मय, सर्वज्ञ, श्री स्वामी जिनेश्वर को प्रणाम करके त्रियों के शुमाराम बताने वाले सामुद्रिक शास्त्र को कहता है। कीदृशीं वरयेत्कन्यां कीदृशीं च विवर्जयेत् । किंचित्कुलस्य नारोणां लक्षणं वक्त मर्हसि ॥२॥ कैसी कन्या का परण करना चाहिये, फैसो का त्याग करना चाहिये, कुलधियों का पूर्णचन्द्रमुखी कन्यां वालसूर्यसमप्रभाम् । विशालनेत्रां रक्तोष्ठी तां कन्यां वरयेद् बुधः ॥४॥ पूर्णचन्द्र के समान मुंहवाली, सवेरे के उगते हुए सूर्य के समान कान्ति बाली, 'पड़ी मांखों वाली और लाल होंठोंवाली कन्या से विवाह करना चाहिये । अंकुशं कुण्डलं माला यस्याः करतले भवेत् । योग्यं जनयते नारी सुपुत्रं पृथिवीपतिम् ॥५॥ जिस स्त्री की हथेली में अड्डश, कुण्डल या माला का चिन्ह हो वह राजा होने वाले योग्य को पैदा करती है। यस्याः करतले रेखा प्राकारांस्तोरणं तथा । अपि दाल-कुले जाता राजपत्नी भविष्यति ॥६॥ जिस स्त्री के हाथ में प्राकार या तोरण या चिन्ह हो यदि दास कुल में भी उत्पन हो, तो भी पटगनी होगी। यस्याः संकुचितं केशं मुखं च परिमण्डलम् । नाभिश्च दक्षिणावती सा नारी रति-भामिनी ॥७॥ जिस स्त्री के पेश घुघराले हो, मुख गोला हा नामी दाहनी ओर घुमौ हुई हो, पहली रति के समान है ऐसा समझना साहिये। यस्याः समतलो पादौ भूमौ हि सुप्रतिष्ठितौ । रतिलक्षणसम्पन्ना सा कन्या सुखमेधते lett जिसके घरमा समतल हों और भूमि पर अच्छी तरह पहने हों, (अर्थात् कोई उंगली मादि पृथ्वी को छूने से रह न जाती हों) यह रनिलक्षण से सम्पन्न पन्या सुन पाती है। पीनस्तना च पोनोष्ठी पीनकुक्षी सुमध्यमा। प्रीतिभोगमवाप्नोति पुत्रश्च सह वर्धते ॥६॥ पौन ( मोटे) स्तन फोंग और होठयाली तथा सुन्दर पटियाली नो प्रोनि मोर मोग पांतोहुई पुत्रों के साप पढती है। A जिस स्त्री के जंघों ओर मुख मण्डल पर रोये हो तथा शरीर सूपा हुमा हो उससे जिस स्त्री के पैर के अंगूठे के पास घाली अंगुली अगूठे से यडो छो यद नित्य दो यस्यांस्त्वनामिका पोदे 'पृथिव्यां न प्रतिष्ठते । पतिनाशो भवेत् क्षिप्र स्वयं तत्र विनश्यति ॥१६॥ (१७)" कृष्णां श्यामा च या नारी स्निग्धा चम्पकसंनिभा । स्निग्धचंदनसंयुक्ता सा नारी सुखमेधते ॥१०॥ रुग्णवर्ण की श्यामा स्त्री (जो शीतकाल में उष्ण और उष्ण काल में शीत रहे) मावदार, चम्पा के समान वर्ण वाली चन्दन गंध से युक्त हो वह सुख पाती है। अल्पस्वेदाल्पनिद्रा च अल्परोमाल्पभोजना। सुरूपं नेत्रगात्राणां स्त्रीणां लक्षणमुत्तमम् ॥११॥ पसीना का कम होना, थोडी मींद, थोड़े रोये, थोडा भोजन, नेत्रों तथा अन्य अंगों सुन्दरता,-याह ,स्त्री का उत्तम लक्षण है। स्निग्धकेशी विशालाक्षी सुलोमां च सुशोभनाम् । सुमुखीं सुप्रभां चापि तां कन्यां वरयेद् बुधः ॥१२॥ चिकने केशों वाली, घडी आंखों वाली, सुन्दर लोम, मुख और कान्ति बाली सुन्दरी कन्या का वरण करना चाहिये। यस्याः सरोमको पादौ उदरं च सरोमकम् । शीघ्र सा स्वपतिं हन्यात् तां कन्यां परिवर्जयेत् ॥१३॥ जिसके पैर रोयेदार हों तथा पेट में भी रोंयें हों, यह स्त्री शीघ्र ही पति को मारती है। मतः इसका वरण नहीं करना । यस्या रोमचये जंधे सरोममुखमण्डलम् । शुष्कगात्री च तां नारी सर्वदा परिवर्जयेत् ॥१४॥ सदा दूर ही रहना चाहिये। यस्याः प्रदेशिनी याति अंगुष्ठादतिवद्धिनी। दुष्कर्म कुरुते नित्यं विधवेयं भवेदिति ॥१५॥ पुराचार करती है और विधवा होती है।

जिसकी भनामिका अंगुलो पृथ्वी को नहीं छुती ऊपर ही रहती है उस स्त्री के पनि का शोध ही नाश होता है और वह स्वयं नष्ट हो जाती है यस्याः प्रशस्तमानो यो ह्यावर्तो जायते मुखे । पुरुषत्रितयं हत्वो चतुर्थे जायते सुखम् ॥१७॥ जिसके मुख पर सुन्दर आवर्त (भंवरी) रहता हैं वह तीन पति को नष्ट कर चौथी शादी करती है तप सुख पाती है। उद्वाहे पिंडिता नारी रोमराजि-विराजिता । अपि राजकुले जाता दासीत्वमुपगच्छति ॥ १८ ॥ रोये से भरी हुई खो यदि राजकुल में भी उत्पन्न हों तो विवाहित होने पर यह दासी तरह मोरी मारी फिरती है। स्तनयोःस्तवके चैव रोमराजिविराजते। वर्जयेत्तादृशीं कन्यां सामुद्रवचनं यथा ॥१६॥ जिस स्त्री के दोनों स्तनों के चारो मोर रोंये हो उसे इस शास्त्र के कथनानुसार, छोड देना चाहिये। विवादशीला स्वयमर्थचारिणी परानुकूलां बहुपापपाकिनीम् । आनन्दिनीं चान्यग्रहमवेशिनीं त्यजेत्तु भायां दशपुत्रमातरं ॥२०॥ लहने धाली, अपने मन की पलने पालो, दूसरे के अनुकूल रहने पाली, अनेक पाप कारिणी, रोने घाली, दूसरे के घर में घुसने वाली स्त्री अगर दस लषों की मां भी हो तो भी उसे छोड देना चाहिये। यस्यास्त्रीणि प्रलंबानि ललाटमुदरं कटिः । सा नारी मातुलं हन्ति श्वसुर देवरं पतिम् ॥ २१ ॥ जिसके ललाट पेट और कमर ये तीन बॅग लंबे हो पद स्त्री मामा, सपुर, ऐयर और पति को मारने वाली दोती है। यस्याः प्रादेशिनी शश्वत् भूमों न स्पृश्यते यदि, कुमारी रमते जारः योवने नात्र संशयः ॥ २२ ॥ - जिस स्त्री के हाथ की अंगुलियां छोटी हों, हाथ पैर कोमल हों, शरीर और नख से कृष्णजिह्वा च लंबोष्ठी पिंगलाक्षी खरस्वरा । दशमासैः पति हन्यातां नारी परिवर्जयेत् ॥२६॥ ( १९ ) जिसके अंगूठे के पास वाली अंगुली पृथ्वी को न छुए यह ली कुमारी तथा यौवमा. वस्था में दूसरे पुरुषों के साथ व्यभिवार करती है, इसमें सन्देह नहीं । पादमध्यमिका चैव यस्या गच्छति उन्नतिम् । वामहस्ते ध्रुवं जारं दक्षिणे च पतिं तथा ॥ २३ ॥ जिसके पैर की विवली अंगुली पृथ्वी से ऊपर रहे वह स्त्री, निश्चय ही, यांये हाथ में जार को और दाहिने में पति को लिये रहती है। उन्नता पिण्डिता चैव विरलांगुलिरोमशा । स्थूलहस्ता च या नारी दासीत्वमपगच्छति ॥ २४ ॥ उंची, सिमटी हुई विरल अंगुलियों वाली, रोयें वालो तथा छोटे हाथों वाली औरत दासी होती है। अश्वत्थपत्रसंकाशं भगं यस्या भवेत्सदा । सा कन्या राजपत्नीत्वं लभते नात्र संशयः ॥२५ ॥ जिस स्त्री का जननेन्द्रिय पीपल के पत्ते के समान हो वह पटरानी पद को प्राप्त होती है इसमें सन्देह नहीं । पृष्टावर्ता च या नारी नाभिश्चापि विशेषतः। भगं चापि विनिर्दिष्टा प्रसवश्रीविनिर्दिशेत् ॥ २६ ॥ (2) मण्डूककुक्षिका नारी न्यग्रोधपरिमण्डलो। एक जनयते पुत्रं सोऽपि राजा भविष्यति ॥ २७ ॥ मेढक के समान कोख बाली तथा घर के पत्ते के समान मण्डल वाली स्त्री एक ही पुत्र पैदा करती हैं सोभी राजा। स्थूला यस्याः करांगुल्यः हस्तपादौ च कोमलौ। रक्तांगानि नखाश्चैव सा नारी सुखमेधते ॥२८॥ खन झलकता हो वह स्त्री सुख पाती है।

( २० ) फालो जीम, ल्ये होंठ मंजरी आँख और तीखे स्वर वाली स्त्री दस महीने में ही पति का नाश करती है। उसको छोड देना चाहिये। यस्याः सरोमको पादौ तथैव च पयोधरी। उत्तरोष्ठाधरोष्टौ च शीघ्र मारयते पतिम् ॥३०॥ जिस स्त्री के पैर, पयोधर, ऊपर या नीचे के हॉट रोयेदार हों वह शीघ्र ही पति को मारती है। चन्द्रविम्बसमाकारो स्तनौ यस्यास्तु निर्मलो। बाला सा विधवा ज्ञया सामुद्रवचनं यथा ॥३१॥ जिसके स्तन निर्मल चन्द्रविश्य के समान हों घी विधवा होती है, ऐसा इस शास्त्र का पचन है। पूर्णचंद्रविभा नारी अतिरूपातिमानिनी । दीर्घकर्णा भवेद्याहि सा नारी सुखमेधते ॥३२॥ पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रा पालो अनि रूपशोला अनि मानिती तथा लरे कानों पाली स्त्री सुखी होती है यस्याः पादतले रेखा प्रोकारश्छत्रतोरणम् । अपि दासकुले जाता राजपत्ती भविति ॥३३॥ जिस स्त्री के पैर के तल्धे में प्राकार, छप या तोरण पी रेखा हो यह यदि दासबुल में उत्पन्न हो तो भी पटरानी होगी। रक्तोत्पलसुवर्णाभा या नारी रक्तपिंगला । नराणां गतिराहल्पा अलंकारपिया भवेत् ॥३॥ लाल, पमल, मोर सोने की यालि पाली, और पिगल वर्ण की औरत या पुरुष के समा चरने याली छोटी भुजाओं वाली औरत गहनों को बहुत चाहती हैं। अतिदीर्घा भृशं ह्रस्वां अतिस्थलामतिकृशाम् । अतिगौरां चातिकृष्णां पटेताः परिवर्जयेत ॥३५॥ अत्यन्त स्यो, अत्यन्त घोसा, अहान मोटी, रप त पतली, अत्यन्त गोरी तथा गत्पन्त पाली ये ६ प्रकार पो गौरते छोटती पाहिये। ।

(२१ )
शुष्कहस्तौ च पादौ च शुष्कांगी विधवा भवेत् ।
अमंगला च सा नारी धृत्यधान्यक्षयंकरी ॥३६॥
अरु साथ, सूखे पैर और सूचे शारीर माली की विधवा होती है। यह ममंगला
धान्य को संहारिणी होती है।
पिंगाक्षी कूपगंडा प्रविरलदशना दीर्घजंघोलकेशी ।
लम्बोष्ठी दीर्घवत्रा खरपरुपरवा श्यामत्ताम्रोष्ठजिह्वा ।
शुष्कांगी संगताभू स्तनयुगविषमा नासिकास्थूलरूपा।
सा कन्या वर्जनीया पतिसुतरहिता शीलचारित्र्यदूरा ॥३७॥
जिस कन्या की आंखें पिंगल घर्ण की हों, कपोल घसे हुए हों; दांत सुसजित रूप से
न हों, जंधा लंबी हो, केश खड़े हों;
ओंठ लंबे हों; मुंह लंषा हो; बोली कर्कश हो; तालु,
होंठ और जीम काली हों, शरीर सूखा हो; बात बात पर आंसू गिरता हो; दोनों स्तन
भान न हो; नाक चिपटी हो, उसके साथ विवाह नहीं करना चाहिये। क्यों कि यह
पति और पुत्र से रहित होगी, उसके चरित्र भी दूषित होंगे।
साध्वी और गुरुजनों की सेवा करने वाली है।
कमल के पत्ते के समान हाथी जैसी माखों वाली सुन्दरी रमणी, सुवर्ण मणि
भोर रसों के स्वामी की प्राणप्रिया होती है।
सोपड़ी,अंगुलियो पाली, मोर दीर्घ मेशों पाली भोरत धन धान्य की नाशक तथा
मंगलमयी है।
शृगालाक्षी कृशांगी च सा नारी च सुलोचना
धनहीना भवेत्साध्वी गुरुसेवापरायणा ॥३८॥
सियार की तरह आँखों वाली, पतले शरीर पाली, सुलोचना स्त्री धनहीन होती हुई भी
रक्तोत्पलदला नारी सुन्दरी गज-लोचना ।
हेमादिमणिरत्नानां भर्तः प्राणप्रिया भवेत् ॥३६॥
।
दीर्घागुली च या नारी दीर्घकेशी च या भवेत् ।
अमांगल्यकरी जया धनधान्यक्षयंकरी ॥४०॥

( २२ . शंखपद्मयवच्छन्नमालामत्स्यध्वजा च या। पादयोर्वा भवेद्यत्र राजपत्नी भविष्यति ॥४१॥ जिस स्त्री के दोनों पैर में शंख, पद्म, जौ, छन, माला, मछली, ध्वजा या वृक्ष चिद है वह राजपत्नी होगी। मार्जाराक्षी पिंगलाक्षी विपकन्येति कीर्तिता। सुवर्णपिंगलाक्षी च दु:खिनीति परे जगुः ॥४२॥ बिल्ली की तरह पिङ्गलपर्ण फो आखा बाली स्त्री को 'विषकन्या' कहा गया है। पर सोने के रंग के समान पिगलनेत्रा स्त्री दुखिनी होती है-ऐसा भी किसी आवार का मत है। पृष्ठावर्ता पति हन्यात् ना-यावर्ता पतित्रता । कट्यावर्ता तु स्वच्छन्दा स्कन्धावर्ताऽर्थभागिनी ॥४३॥ पीठ की भरी चाली स्त्री पति को मारने वाली, नामि की भंवरी चाली पतिव्रता, कमर की मैरी वाली स्वच्छन्दचारिणी और कन्धे की भवरी पाली धनी होती है। मध्यांगुलिमणिबन्धनोर्ध्वरेखा करांगुलिम् । वामहस्ते गता यस्या. सा नारी सुखमेवते १४४॥ पाए हाथ फी पलाई से पिचली अगुली तक जाने वाली रेखा, जिसके हाथ में होती है, वह स्त्रो सुख प्राप्त करती है। अरेखा वहुरेखा च यस्या. करतले भवेत् । तस्या अल्पायुरित्युक्तं दुःखिता सा न संशयः ॥४५।। जिस स्त्री को हथेली में बहुत फम रेखायें या पहुत रेखायें हो पद नि सन्दे थोदे दिन नियेगी और दुको रहेगी। भगोऽउवखुररद शेयो विस्तीणं जघनं भवेत् । सा कन्या रतिपली स्यात्सामुद्रवचनं यथा ॥४६॥ जिस कन्या का जननेन्द्रिय घाटे के गुर पे समान हा भोर जिसका जघन स्थान (घुटने के ऊपर का भाग) चौहा हो यह साक्षात् रति के समान होगी-ऐसा इस शास्त्र का पचन।

मोर चित्रिणी का शब्द कोमा के समान होता है। पद्मगन्ध से पद्मिनी, मयगन्ध सेदस्तिनी, मारी गन्ध सशपिनी पर्व ग्ध गन्ध से स्त्रीलक्षणकथनं नाम तृतीयं पर्व समाप्तम् । पद्मिनी बहुकेशी स्यादल्पकेशी च हस्तिनी । शंखिनी दीर्घकेशी च, वक्रकेशी च चित्रिणी ॥४७॥ बहुत केशों वाली स्त्री को पद्मिनी, कम केशोंवालो को हस्तिनो, लंबे फेशों घाली गनी, टेढ़े मेढ़े केशों वाली को चित्रिणी स्त्री कहते हैं। वृत्तस्तनौ च पटुमिन्याः हस्तिनी विकटस्तनी। दीर्घस्तनौ च शंखिन्याः चित्रिणी च समस्तनी ॥४॥ पद्मिनी के स्तन गोल, हस्तिनो के विकट, शंखिनी के लंबे, और वित्रिणो के समान पदमिनी दन्त-शोभा च उन्नता चैव हस्तिनी । शंखिनी दीर्घदन्ता च समदन्ता च चित्रिणी ॥४६॥ पद्मिनी के दांत शोभामय हस्तिनी के ऊंचे, शंखिनी के लंबे और चित्रिणी के HAIR होते हैं। पदिमनी हंसशब्दा च हस्तिनी च गजस्वरी । शंखिनी रूक्षशब्दा च काकशब्दा च चित्रिणी ॥५०॥ पनिनी का शब्द हंस के समान, हस्तिनी, का हाथी के समान, शंखि पद्मिनी पदमगन्धा च नद्यगन्धा च हस्तिनी । शंखिनी क्षारगन्धा च शून्यगन्धा च चित्रिणी ।। चित्रिणी जानी जाती है। ন ক্লিফায়ই (O): .--

BL-17
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from the date last marked below
Date
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Date
27 DEC 1979

Gyan-pradipika

Author
Pandit,.jyoti Achariya
Title
Gyan-pradipika
File name
Gyan-pradipika
Text
OCR done
Citation
1934
Published
2012/08
Publisher
Aara,.shri Jain-sidhantt
Language
Sanskrit
Pages
111
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312356
Barcode
99999990321152.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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