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Vaidya Ratna

Pandit,.jwalaprashad · 2012/08

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भूमिका। इस संसारमें शरीरका आरोग्य रहना भी धर्मअर्थका साधन कहा है, यतः-"धर्मार्थकाममोक्षाणां शरीरं साधनं स्मृतम्" कारण कि, शरीरमें व्याधिके होनेसे मनुष्य किसी कार्यके करनेको समर्थ नहीं रहता है, इसीसे शरीरको आरोग्य रखना परम पुरुषार्थ है, लोकमें प्रसिद्ध है क्ति, 'एक तन्दुरुस्ती हजार न्यामत' इस शरीरको नीरोग रखनेकेही निमित्त भगवान् धन्वन्तरिने प्रगट होकर आयुर्वेदका प्रचार किया उनके ग्रंथको अवलम्बन कर ऋषिमुनियोंने अनेक ग्रंथ रचे जिनकी चिकित्सासे आरोग्य हो प्राणी सुखसे कालयापन करने लगे । आयुर्वेदके प्राचीन ग्रंथोंमें चरक, सुश्रुत और वाग्भट हैं । यह ग्रंथ परिश्रमसाध्य और दीर्घकालमें पाठमें आतेहैं इसकारणं ऋषि मुनि और महात्माओंने सुखसे वोध होनेके निमित्त सबके संक्षेपसे सार लेकर छोटे छोटे ग्रंथ निर्माण किये जिनके पठन पाठन कर थोडेही कालमें मनुष्य सुवोध हो सक्ते हैं इसप्रकारके ग्रंथ संख्यामें थोडे नहीं है परन्तु कालक्रमसे ऐसा समय आनकर प्राप्त हुआ कि जिसके पास जो पुस्तक थी उसने अपने जीते जी उस ग्रंथका प्रकाश न किया, बहुत क्या? दूसरोंको दर्शनतक भी न कराया। उनके उपरान्त वह पुस्तक या तो पानीमें गलगई या कहीं पसारीकी दुकानकी पुडिया वाँधनेके काममें आई इस प्रकारसे अच्छी २ विद्याओंकी सहस्रों पुस्तकें नष्ट होगई हैं जिनका नाममात्र ग्रन्या- न्तराम पाया जाता है, और रहीसही और भी लोप होजाती परन्तु जबसे यन्त्रालयका प्रचार हुआ तबसे जो पुस्तक जहां सुनी- गई यत्नपूर्वक व्ययद्वारा लाकर पन्नाधीशोंने ग्रंयोका छापना आरंभ किया और लोप होतेहुए ग्रयांको बचाया, अभी थोडे दिनकी बात है कि, वैद्यकके तीनचारही ग्रन्य लब्ध होतेथे परन्तु यन्त्राधिपne ॥ श्रीः॥ अथ वद्यरत्नविषयानुक्रमणिका . ... ... ... .. ... ... ... ... " ... " ... ... ... ... " विषय. पृष्ठांक. विषय. पृष्ठांक. प्रथम प्रकाश १. द्वितीय प्रकाश २. नाडीपरीक्षा १ . अतिसार नि० चि०... लिहापरीक्षा ७ | संग्रहणी मि०चि०... ४१ हवपरीक्षा ८] अनिचि० भसाम्यव्याधिनिरूपण १० । अजीर्ण निचि० ४६ ज्वराधिकार विचिकानि०चि०... चातज्यरपित्तन्या ११ क्रिमिनि०चि० ५३ लेप्मग्वरचिकित्सा... १२ | पाण्डुरोगनि० चि०... वातपित्तथरचि० रक्तपित्तानेदान चि० पातम्लेग्मज्वरचि०... १३ (कासनिक चि० पित्तोमज्वरचि० वासनि.चि. যনিয়ন্ত্রনে हिचकीनि.चि.... ..... ज्धरमपनविधि १५ क्षयनिचि० चौथियातिजारिग्वरचि०... २४ कुमुदेश्वररक्ष... ६५ चूर्ण तृतीय प्रकाश ३. ज्वरमंट भरुचिनिचि० ६७ परमेरस २९ | कृष्णानि.चि. सन्निपाचि०... ३० | उर्दिनि० चि० ज्वरमभवदेह... ३२ | मुछानिक चि० माधिस्छ दाहनि चि०... ३३ ] उन्मादनि० चि० सन्निपातरस ३५ | अपस्मारनि० वि० उघरके दराटपद्य मात्रासचि० ... ... ... ... ... " ... ... " .. ... ७. ... .. ... ... ... ... ... 13 ... .

वैद्यरत्न विपय, पृष्टाक. विषय, पृष्ठाक. ... ... ... ... ... ... ... ... ८४ ... .. ... ... an ०० ... .. ... ... गूगल ७६ | विसर्पनि० चि० ७. स्नायुनि० चि० ११३ मसुरिकानि० चि०... ११४ आमवातरक्तनि० चि० अम्लपित्तनिचि० भामघातनि०चि० ८२ | उर्दनि० चि० शुलनिक चि० पुष्ठनिक चि० ११८ परिणामशूलनि. चि. " | सिमपामादम्तिय- गुस्म नि० चि० मादिनि० चि० १० हदोगनि० चि. ८१ चतुर्थ प्रकाश४. उदररोगनि०वि०... प्टीदोदरनि० चि०... शिरोरोगनि०नि० मबफर नि० चि०... नेत्ररोगनि चि० पणंरोगनि० चि० भरमरीनि० चि० प्रमेहनि चि० नासारोगनिचि०.. १०८ मेदनि० चि०... १०० मुरारोगनि चि० श्वपधुनिक चि० १०१ | खीरोगनिचि० मुरद्धिनि० चि १०० गर्भस्थितिवि० मभनि चि०... १०३ | गर्भसंरक्षण गलगदनि० चि. १०४ मुगमयोपचार प्रन्पिनिक चि० अपपपाटन गंदमाटानिक चि.... सतियारोगनिचि मीपदनि० मि० १०५ तारपिबद्धन पिदधिनि०वि० प्रदरनिशि० प्रणानि.चि... १०६ म्हनढीपरण सपोमणनि. चि.... १०. योनिकोचीपरण... वितखोरणनिचि०... ०८ पोनिनिट्रोमीररण... अमिदग्धनिचि बादमरोगनिचि. भगन्दरनिनि মেলাঘাম उरदेशनिक पिक धूपविधि ... ... ... ... ... ... ... " ... ... ... " ... ... ... ... ... ... " ... ... . ... ...

विषयानुक्रमणिका। पृष्ठाका ... " .. ... ... " .. . 24 ... ... ... ... " ... ... ... " ... १५६ । मण्डविधि .. १७९ १८० ... ... " १८१ १८२ " " विषय. पृष्ठांक. विपय. पचम प्रकाश ५. पंचलवण पाजीकरण १४८ कामदेवचूर्ण युक्तायुक्तकथन पेठापाक सतम प्रकाश मश्विनीकुमारयोग कापविधि पिप्पलीखण्ड १५३ अवलेहिका मोशदार लक्ष्मीविलासरस... चूर्णविधि चन्द्रोदयरस सर्पदंश चि० १६० पूष वृश्चिकादशचि० धातुशोधनमारण वरटीदंशचि० सुवर्णशो० शतपदीदंश चि० বৌ০ कुत्ते के काटेकोचि० ताम्रशो० लूताविप चि० पीतलकांसीशो० भक्षितविषचि. कोहशो० क्षुद्ररोग किशो० मुहासचि० बंगशो० कक्षादोषन्त्रि० जस्तशो० पाददारीचि०... सीवाशो० गुदभ्रंश चि० उपधातुशो. अभ्रको षष्ठ प्रकाश६. सोनामाखीयो० त्रिफलाविषि १६६ | तारमाक्षिकशो० हरीतकीयोग हरितालशोधन बिकट १६७ | मनशिलशो०... ... पटक खपरशो शृंठीयोग १६८ / नीलायोधाशो० चातुर्जात नीलाअनशो० पंचक्षीरीयक्ष पारदशो० दशमूली १६९ गंधकसो० " ... " " १८३ " ... " ... ... ... १ ..१८४ ... ... ... .. ... ... ... ... १८७ " ... ... " ... " " ... ... १८८ ... ... ...

(८) वैद्यरत्नविषयानुकमणिका विषय, पृटार विषय पृष्टार १९ ... ... " " ... ... ... " ... ... सिन्दूरशो० १८९ अफीमथो० समुद्रफेनशो० धतूराशो० हिंएलशोधन... फुचलाशो० Bo जमालगोटाशो० शिलाजितशो० घमनविधि विपशो० वमनमे अनधिकारी... उपविषयो विरेचनविधि... पलिपारीयो० मानपरिभाषां... चोटलीशो० अजीर्णग्रण्ड इति वै०र० विषयानुक्रमणिका समासा । १९४ ... ... ... ... " ... ... ...

॥ श्रीः॥ अथ वैद्यरत। भाषाटीकासमेत। . . योगेश्वरंशिवनत्वापार्वतीवल्लभंहरम् । सजनानांविनोदायवैद्यरत्नंकरोम्यहम् ॥ १॥ नाडीपरीक्षा। रोगाकान्तशरीरस्यस्थानान्यष्टौपरीक्षयेत् । नाडीमूत्रमलंजिह्वांशब्दस्पर्शहगाकृतिम् ॥ १ ॥ अर्थ-वैद्य रोगीमनुष्योंके आठ स्थानोंकी परीक्षाकरें. नाडीपरीक्षा, मूत्रपरीक्षा, मलपरीक्षा, जिह्वापरीक्षा, शब्दपरीक्षा, स्पर्शपरीक्षा, नेवपरीक्षा और आकृतिकी परीक्षा करें ॥१॥ नाडीज्ञानविनावेद्योनलोकेपूज्यतांबजेत् । अतश्चातिप्रयत्नेनशिक्षयेन्मतिमानरः॥२॥ अर्थ-नाडीज्ञानके विना वद्य लोकमें पूजित नहीं होता है इसकारण बुद्धिमान् प्रयत्नसे नाडीशिक्षा करें ॥२॥ त्यतमूत्रपुरीपस्यसुखासीनस्यरोगिणः । अन्तर्जानुकरस्यापिसम्यङ्नाडीप्रबुध्यते ॥३॥ अर्थ-मृत्रपुरीषत्यागे हुए, सुखसे बैठे हुए, भीतर घुटनो के हाथ किये, रोगी की नाडी सुखसे जानी जाती हैं ॥३॥ सव्येनरोगधृतिकूपरभागभाजा । पीड्याथदक्षिणकरांगुलिकात्रयेण ॥

वैद्याला अंगुष्ठमूलमपिपश्चिमभागमध्ये । नाडीप्रभञ्जनगतिसततंपरीक्षेत ॥ ४ ॥ अर्थ-जो पहुँचेकी नाही रोगकी धारण करनेवाली है उसको दहनी हायकी तीन उंगलियांसे दबाकर रोगीके हाथकी कोहनीको दूसरे हाथसे अच्छीतरह पकडकर अं. गुठेकी जडके नीचे वातगतिनाडीकी भलीप्रकार परीक्षा करे आशय यह कि दहने हाथ कोहनी पकड फिर पायें हाथको हटाय नाडी देखे ॥४॥ स्त्रीणांभिपग्वामहस्तेवामपादेचयनतः । शास्त्रेणसंप्रदायेननथास्वानुभवेनच ॥ परीक्षेद्रनवचासावभ्यासादेवजायते ॥ ५ ॥ अर्थ-वैद्यको उचित है कि नियोंके घामहाय और पायें पैर, शामक अनुसार और अपने अनुभवद्वारा रत्नकी समान नाडीपरीक्षा को यह परीक्षा अभ्यास करनेसे दो सकती है ॥ ५॥ करस्यांगुष्ठमूलंयाधमनीजीयमाक्षिणी। तचेष्टयातुखंदुःखंज्ञेयंकायस्यपण्डितः ॥६॥ मर्ध-हाथ अंगृटेकी जद जीवनाक्षिगाधमनी (नाटी) है उसकी चेष्टास विद्वादको शरीरका सुग दुःप जानना चाहिये ॥६॥ अंगुलिपितयःस्पृष्ट्वाक्रमादोपत्रयोद्भवः । मन्दामध्यगतांतीक्ष्यांत्रिभिद्रपिस्तुलनयेत ७॥ अर्ध-नाडीकी नीन अंगुलियों सशर्म तीनों दोष. द्वारा मन्द मध्प और तीक्ष्ण गनि जान अर्थात पहली अंगु.

भाषाटीकासमेत। ली में मध्यस्पर्श होनेसे वातकी, बीचकी अंगुलीम लीक्षण स्पर्शसे पित्तकी, अन्तकी अंगुलीमें मन्दस्पर्श होनेसे कफकी माडी जानी ॥ ७ ॥ पित्तनाडीभवेदुष्णाकफनाडीतुशीतला । वातनाडीभवेन्मध्याचैवस्पर्शविनिर्णयः ॥ ८॥ अर्थ-पित्तकी नाडी स्पर्शकरनेसे गरम, कफकी शीतल, घातकी नादी का स्पर्श मध्यम होता है यह स्पर्शका निर्णय है।॥ ८॥ वातावकगतानाडीचपलापित्तवाहिनी । स्थिराश्लेष्मवतीज्ञेयामिश्रितेमिश्रिताभवेत् ॥ ९ ॥ अर्थ-वात तिरछी घहती है इसकारण उसकी नाडी टेढी चलती है अग्नि चंचल होनेसे ऊपरको चलनी है इस कारण पित्तकी नाडी ऊपर चलती है तथा चंचल होती है जल नीचेको जाता है प्रबल नहीं है. इसकारण कफकी नाही स्थिर है और दोपोंकेमिलनेसे नाडी मिश्रित चलती है ॥९॥ सर्पजलोकादिगतिवदन्तिविबुधा प्रभञ्जनेनाडीम्। पित्तेचकालावकमेकादिगतिविदुःसुधियः ॥१०॥ अर्थ-सर्प जोंककी गतिसे वातकी तथा विच्छूकी गतिसे भी. वातकी नाडी जानी, पित्तकी नाडी कोए, लवा और मेंडककी गतिसे चलती है ।। १० ।। राजहंसमयूराणोपारावतकपोतयोः । कुकुटस्यगतिधत्तेधमनीकासंगिनी ॥ ११ ॥ अर्थ-राजहंम, मोर, पागवत, करसर और फुटकी ग. तिसे यदि नाडी चले तो कफक विकारवाली जाननी॥११॥ - (४) वैद्यरत्न मुहुःसर्पगतिंनाडीमुहुभंकगतितथा । वातपित्तसमुद्भूतांतांवदन्तिविचक्षणाः ॥ १२ ॥ अर्थ-यदि नाडी वारधार सर्पगति और वारंवार मेंढ- ककी गतिसे चले तो बुद्धिमानोंने उसको वातपित्तसे उ. त्पन्न हुई नाडी कहा ॥ १२ ॥ सर्पहंसगतिंतद्वद्वातश्लेष्मगतांवदेत् । हरिहंसगतिधत्तेपित्तश्लेप्मान्विताधरा ।। १३ ।। अर्थ-सर्प, हंसकी गतिसे चलनेवाली नाडी वात और कफकी कहनी और इसकी गतिसे चले तो पित्त और कफकी जाननी ॥ १३ ॥ • काप्टकुट्टोयथाकाष्ठंकुट्टतेचातिवेगतः । स्थित्वास्थित्वातथानाडीसत्रिपातेभवेद्धवम् ॥१४॥ अर्थ-जिस प्रकार काठका फूटनेवाला काष्ठकुहनाम पक्षी बडे वेगसे काठको कूटताह इसमकार टहर टहरकर नाडी भयंकर सन्निपातमें चलती है। १४ ॥ वाताधिक्येभवेत्राडीप्रव्यतातर्जनीतले । पित्तेब्यक्तामध्यमायांतृतीयांगलिगाकफे ॥ १५॥ अर्थ-वातकी अधिकता नाडी तर्जनी अंगुलकि नीचे चलती है, पित्तमें मध्यमाभंगुलीके नीचे और कफमें ती- सरी अंगुली के नीचे चलनी है. तीन अंगली धरकर नाही देसी जाती है उससे यह क्रम जान्ना ॥ १५ ॥ तर्जनीमध्यमामध्येवातपित्तेषिकेम्फुटा। अनामिकायांतर्जन्यांव्यक्तावातकफेभवत् ।। १६ ॥ अर्थ-तर्जनी लौर मध्यमाके नीचे चलनसे वातपि- भापाटीकासमेत। तकी अधिकता कहनी; अनामिका और तर्जनीके मध्य में वात और कफकी नाडी जानी।। १६ ॥ मध्यमानामिकामध्येस्फुटपित्तकफेधिके। अंगुलिचितयेपिस्यात्प्रव्यक्तासन्निपातिनः ॥ १७॥ अर्थ-मध्यमा और अनामिका अंगुलीके मध्य में पित्त और कफकी नाडी जात्री तीसरी अंगुलीके मध्य में सन्नि- पातकी नाडी जान्नी ॥ १७॥ वातावकगतिर्नाडीपित्तादुत्प्लुत्यगामिनी । कफान्मन्दगति यासनिपातादतिद्रुता ॥ १८॥ अर्थ-वातकी अधिकतामें नाडी पक्रगतिसे चलती है, पित्तकी अधिकतामें नादी कूदतीहुई चलती है, कफसे मंद- गति और सन्निपातमें वही शीघ्रतासे चलती है ॥ १८ ॥ वक्रमुत्प्लुत्यचलतिधमनीवातपित्ततः। बहेरचमंदंचवातश्लेष्माधिकत्वतः ॥ १९ ॥ अर्थ-वात आर पितकी अधिकतासेटेढी और कूदती चलती है वात और कफकी अधिकतासे टेडी और मं. दगतिसे चलती है ॥ १९ ॥ उत्प्लुत्यमंदंचलविनाडीपित्तकफेधिके । स्पन्दतेचैकमानेनत्रिंशद्वारंयदाघरा ॥२०॥ अर्थ-पित्तकी और कफकी अधिकतामें नाही कूदती हुई मन्द २ चलती है जब कि नाही एकही मानसे बराबर तीसवार चले ॥ २० ॥ स्वस्थानेनतदानूनरोगीजीवतिनान्यथा । स्थित्वास्थित्वावहतियासाज्ञेयाप्राणघातिनी २१॥

वैयरल। अर्थ-और अपने स्थानपर स्थितरेहै तो रोगीका जी- बन जाना, अन्यथा नहीं और जो नाडी रुक रुक कर चले वह प्राणघातिनी जान्नी ॥ २१ ॥ जिलंजिलंकुटिलकुटिलंव्याकुलंव्याकुलंवा । स्थित्वास्थित्वावहतिधमनीयातिनाशंचसूक्ष्मा ।। नित्यंकंटेस्फुरतिपुनरप्यंगुलीनांस्पृशेद्रा । भावैरेवंबहुविधितरेःसन्निपातादसाध्या ॥ २२ ॥ अर्थ-टेढी टेढी कुटिल पारंवार व्याकुलतासे युक्त ठहर ठहरफर चले फिर सूक्ष्म रूपसे लय होजाय नित्य कंठमें स्फुरायमाणहो फिर कुछ कालमें अंगुलीको स्पर्श करे इसप्र. कारके अनेक भावोंसे चलनेवाली माडी सन्निपातकी जानी यह असाध्य है ।। २२ ।। पूर्वपित्तगतिप्रभंजनगतिश्लेप्माणमाविभ्रती । स्वस्थानाद्रमणंमुहुर्विदधतीचक्राधिरूढेवया ॥ भीमत्वंदधतीकलापिगतिकामूक्ष्मत्वमातन्वती। निःसाध्याधमनींवदन्तिमुनयोनाडीगतिज्ञानिनः२३ अर्थ-पहले पित्तकी गति फिर पयनकी गति फिर फफकी गति को धारण करे अपने स्थानसे वारंवार भ्रमती हुई चक्र की समान मयंकरपना धारण करती हुई मोरकी चाल चल ती हुई कमी अत्यन्त मृत्म होठी दुई नाडीके जानवाले धेय मुनि असाध्य कहते हैं ॥ २३ ॥ गंभीरायाभवेत्राडीसाभवेन्मांसवाहिनी । स्वरवेगेनधमनीसोणाकोपवतीभवेत् ।। २ ।।

भाषाटीकासमेत
(७)
अर्थ-गंभीरा नाडीमांसवाहिनी जानी और ज्यरके
वेगसे नाडी उष्णता लिये कोपवाली होतीहै ॥ २४॥
कामकोधाद्वेगवहाक्षीणाचिन्ताभयप्लता।
मन्दाग्नेः क्षीणधातोश्चनाडीमन्दतराभवेत् ॥ २५ ॥
अर्थ-कामक्रोधसे वेगवाली, चिन्तासे क्षीण और भय-
से कूदतीदुई चलनी है, मन्दाग्नि और क्षीण धातुबालेकी
नाडी अत्यन्त मन्द चलती है ॥ २५ ॥
असृक्पूर्णाभवेत्कोष्णागु-सामागरीयसी।
लघ्वीवहतिदीप्तास्तथावेगवतीमता ॥ २६ ॥
अर्थ-रुधिरसे पूर्ण कुछ गरम होतीहै आमयुक्त होनेसे
भारी चलती है प्रदीप्त अग्नि होनेसे हलकी और वेगवाली
होती है ॥२६॥
चपलाक्षुधितस्यापितृप्तस्यवहतिस्थिरा।
शीघ्रानाडीमलापातेमध्याह्नेऽग्निसमोज्वरः ॥२७॥
अर्थ-भूखेकी चपल और तृतहुएको स्थिर चलती है
मलपातमें शीघ्रगतिसे मध्याह्नमें जिसको अनिकी समान
प्रबल ज्वरहो ।॥ २७ ॥
दिनैकंजीवितंतस्यद्वितीयेम्रियतेध्रुवम् ।
मरणेडमरूकाराभवेदेकदिनेनच ॥२८॥
अर्थ-वह एक दिन जीता है, दूसरे दिन अवश्य मरजा.
ता है. हमके आकारवाली नाडी होनेसे पाणीका दि.
नमें मरण होजाता है ।। २८ ॥
भय जिह्यापरीक्षा।
पीताजिह्वाखरस्पर्शास्फुटितामारुताधिके ।
रक्ताश्यामाभवेत्पित्तेकफेशुभ्रातिपिच्छिला ॥२९॥

(८)
वैद्यन्न ।
अर्थ-जिह्वापरीक्षा कहते हैं। पीली खरखरे स्पर्शवाली
और स्फुटित जीभ वातकी अधिकतामहोती है लाल का.
ले रंगकी पित्त और कफके विकारमें श्वेत और चिकनी
जीभ होती है ॥ २९॥
कृष्णासकंटकांशुप्कासन्निपाताधिकेतुसा ।
मिश्रितेमिश्रिताञयारिऐलक्षणवर्जिता ॥ ३० ॥
अर्थ-सन्निपातकी अधिकतामें काली कांटोंसे युक्त
और शुष्क होती है मिश्रितदोष में मिश्रित लक्षणवाली
होती हे अरिष्ट में लक्षणहीन होती है ॥३०॥
अप परीक्षा।
सूक्षाधूम्रातथारौद्राचलाचांतवलत्यपि ।
दृष्टिर्यदातदातस्यवातरोगविदोविदुः ॥ ३१ ॥
अर्थ-जिस समय दृष्टि रूखी धुमैली रौद्र चलायमान
अन्तरसे जलतीहुई हो तो जान्नेवालाने इसको वातरोग
कहा है ॥ ३१ ॥
दीपद्धपिचसंतप्तंपीतपित्तेनलोचनम् ।
जलाईज्योतिपाही स्निग्धमन्दंकफेनतत् ॥ ३२ ॥
अर्थ-पितके विकारमें दीपक अच्छा नहीं लगता, सं.
न्तापयुक्त पीले नेत्र होजाते हैं और कफकी अधिकनामें
जलमे गीले ज्योतिसे हीन स्निग्ध और मन्द होने हैं ॥३२॥
इन्द्रदोपेभवन्मिश्रवणतृणविलोचनम् ।
श्यामवर्णश्चनिर्भगंतन्द्रामोहसमन्वितम् ॥ ३३ ॥

" भापाटीकासमेत। (९) अर्थ-द्वन्द्वदोषमें नेत्रोंका रंगभी मिलाहोता है, श्याम- वर्ण टेठे तन्द्रा और मोहसे युक्त ।। ३३ ।। रौद्रचरक्तवर्णचभवेञ्चक्षुखिदोपतः । एकचक्षुर्यदाभीमंद्वितीयंमीलितंभवेत् ।। ३४ ।। अर्थ-रोद्र लालवर्णके नेत्र त्रिदोषसे होते हैं जब एक नेत्र भयंकर और दूसरा मुंदाहुआ हो मिचा रहे ।। ३४ ।। विभिर्दिनैस्तथारोगीसयातियममन्दिरम् । ज्योतिर्विहीनंसहसारोगिणोयस्यलोचनम् ॥३५॥ अर्थ-ऐसा रोगी तीन दिनमें मरजाता है, जिस रोगी के नेत्र सहसा प्रकाशहीन होजॉय ॥ ३५ ॥ ईपत्कृष्णंसनियतंप्रयातियमशासनम् । सरक्तंकृष्णवर्णचरौद्रंचप्रेक्षतेयदा ॥ ३६॥ अर्थ-कुछएक श्यामवर्ण हो वह अवश्य मरजाताहै जब रक्तवर्ण कृष्णवर्ण और रौद्र दृष्ट होने लगे अर्थात् लाल, काला और रौद्रवर्णके रूप वस्तुओका दीखने लगे॥३६॥ एतेर्लिंगैर्विजानीयान्मृत्युमेवनसंशयः । एकटिरचैतन्योभ्रमस्फुरिततारकः ।। ३७ ।। अर्थ-तो इन चिह्नोंसे रोगीकी मृत्यु जाननी इसमें संदेह नहीं जिसकी एक हष्टि होजाय अर्थात् टकटकी पांधकर देखनेलगे, भ्रनहो, नेत्रकी तारका स्फुरायमान होजाय (अचेतनता प्राप्त होजाय) ॥ ३७॥ एकराणनियतपरलोकपदव्रजेत् ॥ ३८ ॥ अर्थ-तो ऐसा रोगी एकही रात्रिमें मरजाता है ।। ३८ ॥

(१०) वैद्यरत्न। अथवायव्याधिनिरूपणम् । निद्रानाशोनिशायांप्रभवतिवतथाकंठकूपेबलासो । देहेदाहोतिसूक्ष्मोलघुतरधमनीप्रस्खलंतीचजिह्वा ।। हीयंतेयस्यशीगंबलदहनमनःशक्तिध्वंसेन्द्रियांगा- स्तरेपज्यंवदन्तिस्मरणमिहवुधाः केवलंरामना- माम् ॥ ३९॥ अर्थ-रातमें नींद न आवे कंठमें घरघर शब्द श्वास रुकै देहमें दाह हो नाडीकी गति मूक्ष्म और मन्दतर हो जाय जिहा स्खलित होजाय जिसका बलसे रहित मन हीन होजाय व्याकुलहो इंद्रियोंकी शक्ति ध्वंस होजाय विद्वा. नों और पद्योंने ऐसे रोगीकी औषधि केवल रामनामका स्मरणही कही है अर्थात् ऐसा रोगी चिकित्साके योग्य नहींहै ॥ ३९ ॥ यतस्समस्तरोगाणांज्यरोराजेतिविश्रुतः । अतोज्वराधिकारोवप्रथमंपरिलिख्यते ॥४०॥ अर्थ-सम्पूर्ण रोगोंका राजा ज्यर कहा है इस कारण सव रोगोंसे पहले ज्वरका अधिकार लिखतहैं ॥ ४० ॥ वेपथुर्विपमोवेग कंठोप्टमुखशोपणम् । निद्रानाशःक्षवस्तम्भोगात्राणांरीक्ष्यमेवच ॥४१॥ अर्थ-कंप विपमवेग कंठ ओष्ठ और मुखका सम्बना निद्राका नाश ठीकका रुकना शरीरमें मवापन ॥ ४१ ।। शिरोरुग्गावरुग्वत्रवेरस्यंगाढविता। भवन्तिविविधावातवेदनावातसुप्तता ॥ ४२ ॥ मथ ज्यराधिकारः। अथ चातापरः।

. भापाटीकासमेत । (११) अर्थ-शिरपीडा, शरीरमें हडफूटन, विरसना, मलका गाढा होना, नींद तथा औरभी अनेक प्रकारकी वेदना बातसे होतीहैं ॥ ४२ ॥ पिडिकोद्वेष्टनंकणस्वनोवऋकपायता। उरुसादोहनुस्तम्भोविश्लेपःसंधिजानुनोः ॥ १३ ॥ अर्थ-फुनसी निकलना, कानोंमें गुन गुन शब्द सुनाई आना, मुख कसैला होना, हृदयमें पीडा, ठोढीका रहजाना, जंघाकी संधियोंका विश्लेषहोना ॥ ४३ ।। शुष्ककासोवमिर्लोमदन्तहश्रिमभ्रमौ । अरुणनेत्रमूत्रादितृदप्रलापोष्णकामिता ॥४४॥ अर्थ-सूखी खांसी, वमन, रुयेंखडे होजाना, दंतहर्ष, श्रम, भ्रम, नेत्र और मूत्रादिका लाल वर्ण होजाना, प्यास लगना, बेसमझे बक उठना ॥ ४४ ॥ शूलाध्मानौजूभणंचभवत्यनिलजेज्वरे ॥४५॥ अर्थ-शूल, अफारा, जंभाईका आना, यह लक्षण वात. ज्वरमें होतेहैं ।। ४५ ॥ भय पित्तस्परः। वेगस्तीक्ष्णोतिसारश्चनिद्राल्पत्वंतथावमिः। कण्ठोष्ठमुखनासानांपाकःस्वेदश्चजायते ॥४६॥ प्रलापोवक्रकटुतामू दाहोमदस्तृपा। पीतविण्मूत्रनेत्रत्वक्पैत्तिकेभ्रमएवच ॥ १७ ॥ अर्थ-तीक्ष्णग, अतिसार, निद्रा, थोडा धमन, कंठ, भोष्ठ, मुख, नासिका इनका पकना और प्रस्वेदका होना, (१२) वैद्यान । . प्रलाप, मुखका स्वाद कटु होना, मूर्छा, दाह, मद, तपा, 'विष्ठा, मूत्र, नेन, त्वचाका पीलाहोना,भ्रम यह लक्षण पित्त- ज्वरमें होते हैं ॥ १६ ॥ ४७॥ अधमपरस। स्तैमित्यंस्तिमितोवेगआलस्यमधुरास्यता। शुकमूत्रपुरीपत्वस्तम्भस्तृप्तिरथापिवा ॥ १८ ॥ गौरवंशीतमुत्तेदोरोमहर्कोतिनिद्रता। अंगेपुपिडकाःशीताःप्रसेकछर्दितंद्रिके ॥४९॥ कण्डूःप्रलापउष्णाभिलापितावह्निमार्दवम् । प्रतिश्यायोरुचिःकासःकफजेऽणोश्चशुक्लता ॥५०॥ अर्थ-स्तम्भपन, थमताहुआ घेग, आलस्य, मुखका स्वाद मधुर, मूत्र पुरीष श्वेतवर्ण, शरीरका जकहना तृप्ति सीहोनी॥४८॥शरीरमें भारीपन, शति लगना,उल्लेद (सच लई ), रुका खड़ा होजाना, यहुत नींदका आना, अं. गों में छोटी २ पिडिकाओंका उत्पन्न होना, शीत, प्रसेक, वमन और तन्द्राका होना ।। ४९ ॥ तुजली, प्रलाप (समझे घक उठना), गरम वस्तुकी अभिलापा होनी,अग्निका द्रव होना (मन्दाग्नि), श्वास, अरुचि, पोसी,नयोंमें श्वेतता यह लक्षण कफश्वरके हैं॥ ५० ॥ अपघातवितर तृष्णामूंछाभ्रमोदाहःस्वप्ननाशशिरोरुना। कंठास्यशोपोवमथूगेमहपोस्चिम्तमः ।।५१॥ पर्वभेदश्चजृम्भाचवातपित्तज्वराकृतिः।। अर्थ-तृष्णा, मृच्छ, श्रम, दाह, निद्राका नाश, शिरमें भाषाटीकासमेत । पीडा, कंठ मूखना, वमन होना, रुएका खडा होना, अरुचि, तम ॥५१ ॥ ग्रंथियोंमें पीडा, जंभाईका आना यह वात पित्तज्वरके लक्षण हैं। मथ वातम्लेष्मश्वरः। स्तैमित्यपर्वणांभेदोनिद्रागौरवमेवच ॥ १२ ॥ शिरोग्रहःप्रतिश्यायःकासःस्वेदाप्रवर्त्तनम् । सन्तापोमध्यवेगश्चवातश्लेष्मज्वराकृतिः ॥ ५३॥ अर्थ-स्तंभपना, हडफूटन, निद्रा, भारीपन, ॥५२॥ शिरमें पीडा, जुकाम (पीनस), खांसी, पसीनेका न आना, सन्ताप और मध्यवेगका होना, वातकफज्वरके लक्षण हैं ॥ ५३ ॥ अप वित्तमन्धरः। लिप्ततिक्तास्यतातन्द्रामोहःकासोरुचिस्तृपा । मुहुदाहोमुहुःशीतपित्तश्लेष्मज्वराकृतिः ॥ ५४॥ अर्थ-लित और तीखा मुख, तन्द्रा, मोह, खांसी, अरुचि, तृपा, वारंवार गरमी और वारंवार सरदी लगे यह पित्तकफज्वरके लक्षण हैं ॥ ५४॥ अप सन्निपातन्यर। क्षणेदाहःक्षणेशीतमस्थिसन्धिशिरोरुजा। सस्रावेकलुपेरक्तेनिर्भुग्नेचापिलोचने ॥ ५५ ॥ अर्थ-क्षणमें दाह, क्षणमें शीत, हड्डीसंधि और शिरमें पीडा आंसू सहित कालेलाल भीतरको घुसे नेत्र होने॥५५॥ सस्वनौसरुजीक कण्ठःशूकैरिवावृतः ।। तन्द्रामोहोप्रलापश्चकासःश्वासोरुचिर्भमः ॥५६॥ अर्थ-कानों में पीडा, और गुन २ शब्द सुनाई आना

वैद्यरत्न।
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सथा कंठके भीतर सीकरोमरेकी समान घिरजाने, तन्द्रा,
मोह, प्रलाप, कास, श्वास, अरुचि, भ्रम, होने ॥ ५६ ॥
परिदग्धाखरस्पर्शाजिह्वास्त्रस्तांगतापरम् ।
टीवनरक्तपित्तस्यकफेनोन्मिश्रितस्यच ॥१७॥
अर्थ-सब ओरसे दग्धरूप और खरखो स्पर्शवाली जी.
भका होना तथा अंगोंका स्खलित होना, कफसे मिलेहुण
रक्त पित्तका थूकना ॥ ५७ ।।
शिरसोलोठनंतृष्णानिद्रानाशोहदिव्यथा ।
स्वेदमूत्रपुरीपाणांचिरादर्शनमल्पशः ॥५८॥
अर्थ-शिरका डुलाना, तृष्णा, निद्राका नारा, हृदय
पीडा, स्वेद, मत्र, पुरीषका बहुतकालमें किञ्चित् दर्शन ५८
कृशत्वंनातिगात्राणांसततंकण्ठकूजनम् ।
कोठानांश्यावरक्तानांमण्डलानांचदर्शनम् ॥ ५९॥
अर्थ-शरीरका अतिकृश न होना, कण्ठमें निरन्तर
शब्द होना, कोठोंके काले लाल मण्डलोंका दीखना (अर्थात
शरीर में मंडलाकार काले लाल मण्डलोंका होजाना)॥५९॥
मूकत्वंस्रोतसांपाकोगुरुत्वमुदरस्यच ।
तरच्छीतमहानिद्रादिवाजागरणनिशि।। ६० ॥
ध्यर्थ-मकपन, सोतीका पकना, पेटमें भारीपन, इसी
प्रकार शीतका लगना, दिनमें महानिद्रा और रात्रिम
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जागना ॥६०॥
सदावानेवदानिद्रामहास्वेदोतिनववा ।
गीतनर्तनहास्यादिविकृतहाप्रवर्तनम् ॥ ६ ॥
चिरात्पाकश्चदोपाणांसनिपातन्वराकृतिः ॥ ६२ ॥

भाषाटीकासमेत। अर्थ-सदा सोना, अथवा निद्राका किंचित् भी न होना महापसीनकाआना अथवा नहीं आना, गीत, नाच, हा- स्यादिमें, बुरी चेष्टा करलेना।।६१॥दोषोंके चिरकालमें पाक हो जानेसे ज्वरकी आकृतिवाला सन्निपात होता है ॥६२।। भय ज्वरे इंघनकरणम् ज्वरेलंघनमेवादावुपदिष्टमृतेज्वरात् क्षयानिलभयकोधकामशोकश्रमादिजात् ॥ ६३ ।। अर्थ-क्षय, पवनविकारी,भय, क्रोध, काम, शोक, श्रम इन कारणोंसे जो ज्यर न हुआहो तो और ज्वरों में प्रथम लं- धन कराना चाहिये ॥ १३ ॥ नलंघयेन्मारुतजेज्वरेचक्षयोद्भवेतिक्षुधिमानसेच । नयुर्विणीदुर्बलवालवृद्धभीरूंस्तृपा नपिसोर्द्धवातान् ।। अर्थ -वातज्वर, क्षय, बुभुक्षित, गर्भवती, दुर्बल, बालक, युद्ध, भीरु, तृषासे आर्त तथा उर्ववातवाले पुरुषोंको लंघन न कराश ॥ ६४ ।। दोपाणामेवसाशक्तिलंघनेयासहिष्णुता। नहिदोपक्षयेकश्चित्सहतेलंघनक्कचित् ।। ६५ ।। अर्थ-जो मनुष्य लंघनको सहन करलताहै यह शक्ति दोषोहीको है दोपक्षय होनेपर कोईभी कभी लंघनको नहीं सहसता है ॥ ६५ ॥ वातिकःसप्तरात्रेणदशरात्रेणपैत्तिकः । श्लैष्मिकोद्वादशाहेनज्वरःपाकप्रपद्यते ॥ ६६ - (१६) वैद्यरत्न। " अर्थ-सातरातमें वातज्वर, दशरातमें पित्तज्वर और बारहदिनमें कफज्वरका पाक होजाताहै ।। ६६ ॥ आसप्तरातरुणज्वरमाहुर्मनीपिणः । मध्यद्वादशरात्रंतुपुराणमतउत्तरम् ॥ ६७ ॥ अर्थ-बुद्धिमानोंने ज्वरको सातरावितक तरुण कहाहै बारहदिनतक मध्य और इसके उपरान्त पुराना (जीर्ण) कहाहे ॥ ६७ ॥ तृष्णागरीयसीघोरासद्यःप्राणहरीयतः । तस्माद्देयंतृपा यपानीयंत्राणधारणम् ॥ ६८ ॥ अर्थ-प्यास सयके अधिक महाघोर होके शीघ्रही प्रा. णोंको हरतीहै इसकारण प्यासेको प्रागधारणके निमित्त अवश्य पानी देना चाहिये ॥६८॥ तृपितोमोहमायातिमोहात्प्राणान्विचति । अतःसर्वास्ववस्थासुनकचिद्वारिवारयेत् ।। ६९ ॥ अर्थ-प्यासा मोहको प्राप्त होताहै और मोहित होनेसे प्राण छोडदेताहे इसकारण सपही अवस्याओंमें जल देना निषेध करना नहीं ॥ ६९॥ क्षीणेचमधुमेहेचपानीयंमंदमाचरेत् । मूर्छापित्तोप्मदापुविपोत्थेचमदात्यये ।। ७० ॥ अर्थ-क्षीण और मधुप्रमेहवालेको थोडा पानी पीना उचित मूछो, पित्तोष्ण, दाह, विषक उपद्रव, मदात्यय (उन्माद),90 श्रमकमपरीतेपुमागोत्येवमथौतथा। उर्द्धगेरक्तपित्तेचशीतमभःप्रशस्यते ।। ७१ ॥

भाषाटीकासमेत । (१७) अर्थ-श्रम और क्लेदसे व्याप्त मार्गचलनेसे उत्पन्नहुए व. मनमें रक्तपित्तके ऊर्ध्व प्राप्त होने में शीतलजल देना उचित है ।।७१ ॥ उष्णजलाधिकार। नवज्वरेप्रतिश्यायेपार्थशूलेगलग्रहे । सद्य शुद्धौतथाध्मानेव्याधौवातकफोद्भवे ॥ ७२ ॥ अर्थ-नवीन ज्वर,' जुखाम, पार्श्वशूल, गलग्रहरोग, शीघ्रशुद्धि, अफारा, वातकफसे उत्पन्न हुई व्याधिौ ॥७२॥ अरुचिंग्रहणीगुल्मश्वासकासेषुविधौ । . हिकायांस्नेहपानेचपिबेदुष्णजलंनरः॥ ७३ ॥ अर्थ-अरुचि, संग्रहणी, गुल्म, श्वास, कास, विद्रधि (वद), हिचकी और स्नेहपानमें मनुष्यको गरम जल पीना चाहिये ।। ७३ ॥ यत्वाथ्यमानंनिगनिःफेनंनिर्मलंजलम् । अविशिष्टंभवतितदुष्णोदकमुच्यते ।। ७४ ।। अर्थ-जो औटाया हुआ वेगरहित फेनरहित निर्मल जल है और औटते २ आधा रहगया है वह उष्णोदक कहाता है ॥ ७४॥ कफमेदोनिलामनंदीपनंवस्तिशोधनम् । कासश्वासज्वरहरंपथ्यमुष्णोदकंसदा ।। ७५ ॥ अर्थ-उष्णोदक कफ, मेद और वातरोगका हरनेवाला, दीपन, वस्तिशोधक, काप्त, श्वास, ज्वरका हरनेवाला सदा पथ्य है ।। ७५ ॥ अष्टमेनांशशेपेणचतुर्थेनार्धकेनवा । अथवाक्कथनेनैवसिष्टमष्णोदकंवदेत् ॥ ७६ ॥ .

(१८) वधग्ला अर्थ-आठवाँअंश शेषरखनेसे चौथा अंश अथवा माधा शेपरखनेसे अथवा औटानेसेही उष्णोदक सिद्ध होताहै ७६ तत्पादहीनंवातघ्नमर्द्धहीनंतुपित्तजित् । त्रिपादहीनंश्लेष्मनपाचनंदीपनलघु ।। ७७ ॥ अर्थ-चौथाई कम होजानेसे वातको दूर करता है आधा रहनेसे पित्तको जीनता है त्रिपाद हीन होनेसे कफनाशक, पाचन, दीपन और लघु होजाता है ॥ ७७ ॥ द्वन्द्वजेसन्निपातेचज्वरेपथ्यंतदार्तिजित् ॥ शारदंचाईपादोनंपादहीनंतुहेमनम् ॥ ७८॥ अर्थ-द्वन्द्वज और सन्निपातज्वरमें उष्णोदक पथ्य और रोगनाशक है, शरदऋतुमें अईपादहीन हिमऋतुमें चौथाई कम ॥ ७८॥ शिशिरेचवसन्तेचनीप्मेचा वशेपितम् । विपरीतेतीतद्वत्मावृष्यावशेपितम् ।। ७९ ।। अर्थ-शिशिर वसन्त और ग्रीष्ममें आधारहाहुआ पथ्य है,कतुके बदलनेमें और वर्षाऋतु में अष्टमांश शेष रहा जल देना चाहिये ॥ ७९ ॥ ज्वरादौलंघनप्रोक्तंज्वरमध्येतुपाचनम् । ज्वरान्तरेचनंदद्यादेतब्बरचिकित्सितम् ॥ ८० ॥ अर्थ-ज्वरकी आदिमें लंघन करावे, मध्यमें पाचन दे, ज्वरान्तमें रेचनदे यह ज्वरकी चिकिरता है ॥ ८ ॥ नागरदेवकाप्टंचधान्याकंबृहतीदयम् । दद्यात्पाचनकंपूर्ववरितानांवगपहम् ।। ८१ ॥ .

भापारीकासमेत ।
अर्थ-सोंठ, देवदारु, धनियाँ, दोनों कटेरी यह वरावर
भाग छदाम २भर लेकर ज्वरपाचनको ज्वरवालोंको इसका
पाचन देना चाहिये, यह ज्वर दूरकरताहे ॥ ८१ ।।
किराताव्दामृतोदीच्यबृहतीदयगोक्षुरैः ।
सस्थिराकलसीविश्वकाथोवातज्वरापहः ।। ८२॥
अर्थ-चिरायता, नागरमोथा, गुरच, नेत्रवाला, दोना
कटेरी, गोखरू, शालपर्णी, पिठवन, सोंठ यह सब बरावरले
इनका काढा देनेसे वातवर दूर होता है ॥ ८२॥
कट्फलेन्द्रयवारितिक्तामुस्तेः शृतंजलम् ।
पाचनंदशमेह्निस्यात्तीवेपित्तज्वरेनृणाम् ॥ ८३ ॥
अर्थ-कायफल, इन्द्रजौ, नीमकी छाल, कुटकी, नागर
मोथा यह जलमें औटाकर देनेसे दशमें दिन तीव्र पित्तज्वर
भी शान्त होजाता है ।। ८३ ॥
गुडूचीनिंबधान्याकंपद्मकंचन्दनान्वितम् ।
एपसर्वज्वरहन्तिगुडूच्यादिस्तुपाचनः ॥ ८४॥
अर्थ-गिलोय, नीमकी छाल, धनियाँ, पद्माक, लाल-
चन्दन यह गुहूची आदिका पाचन देनेसे सम्पूर्ण बरको
हर करता है॥८४ ॥
हल्लासारोचकच्छर्दिपिपासादाहनाशनः ।
वीजपूरशिफापथ्यानागरग्रन्थिकःशृतम् ॥ ८५ ।।
समारंपाचनंश्लेष्मज्वरेद्वादशवासरे ॥ ८६॥
अर्थ-विजारेकी जह, सौंफ, छोटीहरड, मांठ, पीप.
लामल इनका काढाकर जवायार मिलाय चारह दिनके
उपरान्त कफन्वरमें, देनेसे ग्वर पचता है.॥ ८५॥८६॥

(२०) वद्यरत्न दुरालभापर्पटकप्रियंगु- भूनिम्बवासाकटुरोहिणीनाम् ॥ काथंपिवेच्छर्करयासमेतं तृष्णान्वितेपित्तभवज्वरेऽपि ॥ ८७ ॥ अर्थ-जवासा, पित्तपापडा, फूलप्रियंगु भनिम्ब, अडूसा, कुटकी इनका काढा मिश्री डालकर पिये तो तृष्णा और पित्तज्वरकी शान्ति होती है ।। ८७॥ पटोलपत्रनिकाथोमधुनामधुरीकृतः । तीव्रपित्तज्वरामर्दीपित्ततृड्दाहनाशनः ॥ ८८॥ अर्थ-पटोलपत्रके काढेमें शहद डालकर पीनेसे तीव्र पित्तज्वर, पित्त, तृषा, दाहका नाश करताहे ।। ८८ ॥ गुडूंच्यामलकैर्युक्तः केवलोवापिपर्पटः । पित्तज्वरहरेत्तूर्णदाहशोपंभ्रमान्वितम् ।। ८९ ॥ अर्ध-गिलोय आमलेके साथ केवल पित्तपापडा पान करनेसे शनिही पित्तज्वर, दाह, शोष और भ्रम नष्ट हो जाता है। ८९॥ लोधामृतोत्पलापद्मसारिवानांसशर्करः । क्वाथः पित्तज्वरंहन्यादथवापर्पटोद्भवः ॥९॥ अर्थ-लोध, गिलोय, नीलोफर, पुहकरमल, सारिवा इनका काय कर मिश्री डालकर पानकरनसे पित्तज्वर नष्ट होताहे अथवा पित्तपापडके साथ मिश्री पान करे ।। ९० ।। पर्पटामृतधात्रीणांकाथः पित्तज्वरंजयेत् । द्राक्षारग्वधयोश्चापिकाश्मयस्याथवापुनः ॥ ९१ ।।

भाषाटीकासमेठ । . अर्थ-पित्तपापडा, गिलोय, आमला इनका काढ़ा कर पीनेसे पितज्वर नष्ट होताहै। दाख अमलतास अथवा खंभारीके काढेसे पित्तज्वरका नाश होता है ।। ९१ ।। एपपर्पटका श्रेष्ट पित्तज्वरविनाशनः। किंपुनर्यदियुंजीतचंदनोदीच्यनागरैः ॥ ९२ ॥ अर्थ-एक पित्तपापडाही पित्तज्वरको नाश करताहै। यदि लाल चंदन नेत्रवाला और सोंठ साय दिया जाय तो क्या कहना है ॥ ९२ ।। विश्वपर्पटकोशीरधायचंदनसाधितम् । दद्यात्सुशीतलंवारितृदछर्दिज्वरदाहनुत् ।। ९३ ।। सोंठ, पित्तपापडा, उशीर (खस), धनियां, लाल चंद- नसे सिद्ध किया काढा . शीतलकर देनेसे प्यास, छर्दि, ज्वर, दाह दूर होना ।। ९३।। पर्पटाव्दामृतोदीच्यकिरातैस्साधितंजलम् । पंचभद्रमिदंप्रोक्तंवातपित्तज्वरापहम् ॥ ९४॥ अर्थ-पित्तपापडा, नागरमोथा, गिलोय, नेत्रवाला भू- निबसे साधित किया जल पंचभद्र कहलाता है । यह वात- पित्तज्वरका दूर करनेवाला है ॥ ९४॥ त्रिफलाशाल्मलीरानाराजवृक्षाटरूपकैः । शृतमंबुहरेत्तूर्णवातपित्तोद्भवंज्वरम् ।। ९५ ।। अर्थ-त्रिफला, सेमल, रायसन, अमलतास, अडूसा इनको बराबरं ले काहा कर पिलानेसे वातपित्तज्वर दूर होता है ।।९५॥ क्षुद्राशुण्ठीगुडूचीनांकपायःपौष्करस्यच । कफवातादिकेपयोज्वरेवापित्रिदोषजे ॥ ९६ ।।

(२२) वैद्याल। अर्थ-भटकटैया, सौंठ, गिलोय तथा पुहकरमूलका काढा कफवातकी अधिकतामें तथा, त्रिदोषज्वरमें देना चाहिये ॥ ९६ ॥ आरग्वधकणामूलमुस्तातिक्ताभयाकृतः । काथःशमयतिक्षिप्रंज्वरंवातकफोद्भवम् ॥ २७॥ अर्थ-अमलतासका गृदा, पीपलामूल, नागरमोथा, कुटकी, बडी हरड, इनका काढा पान करनेसे शीघ्रही वातकफज्वर दूर होता है ॥९७।। अमृतारिएकटुकामुस्तेन्द्रयवनागरैः । पटोलचंदनाभ्यांचशृतंपिप्पलिचूर्णयुक् ॥ ९८ ॥ अर्थ-गिलोय, नीमकी छाल, कुटकी, नागरमोथा, इन्द्रजी, सोंठ, पटोलपात, लाल चन्दन इनका काढा पीपलके चूर्ण सहित पीनेसे ॥ ९८॥ अमृताटकमेतत्तपित्तश्लेष्मज्वरापहम् । पटोलंचंदनंमूर्वापागतिक्तामृतागणः ॥ ९९ ॥ अर्थ-यह अमृताष्टक पित्त कफ ज्वरका दूर करनेवाला है। पटोलपात, लालचन्दन, मृा, पाठा, कुटकी, गिलोय यह लेकर ॥ ९९ ॥ पित्तश्लेष्मज्वरच्छर्दिदाहकंडूविपापहः । पटोलंपिचुमंदंचत्रिफलामधुकंबला ॥१०॥ अर्थ-इन औषधोंका काढा पित्तश्लेष्मज्वर, छर्दि, दाद सुजली और विपका दूर करनेशला है । पटोलपात, नीम की छाल, त्रिफला, मुलेटी, बरेटी ।। १०० ॥ साधितोयंकपायःस्यात्पित्तश्लेप्मोद्भवेज्वरे ॥ १०१॥ अर्थ-इनका काढा पित्तश्लेष्मज्यरमें देना चाहिये ।।१०१॥

भापाटीकासमेत।
(२३)
रामायणे लंकाकोडे।
लंकायामुत्तरेकोणेकुमुदोनामवानरः।
तस्यस्मरणमात्रेणनश्यत्येकाहिकोज्वरः ।। १०२॥
अय-मंत्र । लंकाके उत्तर कोनमें कुमुद नाम वानरहै उस
के नामस्मरणमात्रसे प्रतिदिन आनेवाला ज्वर नष्ट होता
है ।। १०२ ॥
अयंश्लोकःपिप्पलपत्रपृष्ठभागेसमतया
मण्डलाकारेणलिखित्वावरदिवसेज्वरा
गमनात्पूर्वमेवप्रदर्शनीयः ॥ १०३ ॥
अर्थ-यह श्लोक पीपल के पत्तेकी पीठपर समानतासेमण्ड-
लाकारसे लिखे, ज्वरके दिन ज्वर आनसे पहले दिखलाना
चाहिये ॥ १०३ ॥
पटोलारिष्टमृद्वीकाशम्याकत्रिफलावृपैः ।
क्वाथएकाहिकहन्तिशर्करामधुसंयुतः॥ १०॥
अर्थ-पटोलपत्र, नीमकोछाल, दाख, साया, त्रिफला,
अडूसा इनका काढा मिश्री, शहत मिलाकर पीवै तो
एकाहिक ज्वर दूर होता है ॥ १०४ ॥
द्राक्षापटोलनिम्बाब्दशक्राह्वत्रिफलाशृतम् ।
जलंजंतुःपिबेच्छीतमन्येधुज्वरशान्तये ॥ १०५ ॥
अर्थ-मुनक्का, पटोलपत्र,नीमकीछाल, नागरमोथा, इन्द्र-
जौ, हरड, बहेडा, आमला इनका काढा कर पीनेसे दूसरे
दिन आनेवाला ज्वर शान्त होता है ॥ १०५ ॥
पटोलेन्द्रयवानंतापथ्यानंतामृताजलम् ।
ज्वरसततकंपानानिहन्त्याशुप्रयोजितम् ॥ १०६ ॥

(२४) वैद्यरत्न । अर्थ-पटोल (परवल), इन्द्रजी, जवासा,हरड, जेवासा, गिलोय इनका काढा कर पीनेसे शीघ्र निरन्तर आनेवाला ज्वर शान्त होजाताहै ॥ १०६ ॥ उशीरंचन्दनंमुस्तंगुडूचीधान्यनागरम् । अम्भसाकथितंपेयंशर्करामधुयोजितम् ॥ ज्वरेतृतीयकेपुंसांतृष्णादाहसमन्विते ॥ १० ॥ अर्थ-खस, लाल चन्दन, नागरमोथा, गिलोय, धनियाँ, सोंठ इनका काढाकर मिश्री और शहद मिलाकर पीवै तो तृष्णा दाहवाली तिजारीको शान्त करता है ।। १०७ ॥ लंकाधीश्वरदर्पहाजनकजाशोकांतल्लक्ष्मण- प्राणवाणकरोजितेन्द्रियगणःसश्रीहनूमान्भटः। एतैर्नामभिरादरादुपसियोनिद्रालयेकीर्तये- तस्यैवोत्तरतिद्रुतंक्षणगतोनित्यंतृतीयज्वरः १०८॥ अर्थ-अथवा यह लिग्बा श्लोक विचारकर पढे । राव- णके दर्पहरनेवाले, जानकीके शोकनाशक लक्ष्मणके माणदाता, जितेन्द्रिय, महावीर इन नामोसे जो आदरपः वैक प्रातःकाल और रात्रिको सोते समय कीर्तन करता है उसका तीसरे दिन आनेवाला घर शान्त होता है ॥१०८।। प्रातश्लोकाश्चपाठेनतृतीयज्वरनाशकाः। स्थिरासामलकीदारुशिवावृपमहीपधेः ।। १०९।। शृतशीतंजलंदद्यात्सितामधुविमिश्रितम् । चातुर्थिकज्वरेतीप्रेमदेवेवाथपावके ।। ११०॥ जवासा और मौरधियोंसे मारे।

भाषाटीकासमेत । (२५) 'अर्थ-अथवा प्रानाकालमें पठनीय श्लोकोंके पाठ करनेस तिजारी नष्ट होती है.शालपर्णी, आंवला, देवदारु, हरड, अडूसा और सोंठ इनका काढाकर शहत और मिश्री मिलाकर पीनेसे कठिन चौथिया ज्वर और मन्दाग्नि दूर होती है ।। १०९ ॥ ११ ॥ अगस्तिपत्रस्वरसेननस्यनिहन्तिचातुर्थिकमुग्रवीर्यम् ॥ अर्थ-अगस्त वृक्षके पत्तेकी नस्य देनेसे कठिन चातुर्थिक स्वर नष्टहोजाता है ॥ ११ ॥ मुस्ताक्षुद्रामृताशुण्ठीधात्रीकाथःसमाक्षिकः । पिप्पलीचूर्णयुक्सर्वविपमज्वरनाशनः ॥ १२ ॥ अर्थ-नागरमोथा, कटेरी, गिलोय, सोंठ और आमले इन पांच औषधोंका काढा शहत और पीपलका चूर्ण डालकर पीवे तो विपमज्वर दूर होय ॥ १२ ॥ जीरकंगुडसंमिश्रविपमज्वरनाशनम् ॥ अग्निमांचंजयच्छीघ्रंवातरोगापहंमतम् ॥ १३॥ मधुनावाभयालीढाहन्त्याशुविषमज्वरम् । क्षीरेणपंचवृद्ध्याचदुग्धान्नाशीकणांपिबेत् ॥ १४ ॥ अर्थ-जीरा और गुड मिलाकर खानेसे विषमज्वर दूर हो- ता है इससे मन्दाग्नि और वातरोगदूर होताहे ॥१३॥ शह- दके साथ हरड खानेसे विषमज्वर दूरहोताहै दूधके साथ, क्रमसे बढाताहुआ पाँचसे प्रारम्भकरके, पीपलको 'पानकरे ॥ १४॥ यावत्पूर्णशतंतस्यास्तावतैवापकर्पयेत् ॥ वातास्रश्वासपङ्किोगुल्मशोथोदरापहम् ॥ १५ ।

वैद्यरल। - (२६) अर्थ-पीपल सौतक बराबर बढाता जाय सो पूर्णही जानेसे उसीप्रकार क्रमसे कमतीकरता जाय तो बात अस्त्र, श्वास, पाण्डु, बवासीर, गुल्म, शोथ, और उदररोग दूर "होताह ॥ १५॥ विषमज्वरजिदृष्यंपिप्पलीवर्द्धमानकम् । भृङ्गराजजटाबदाकणेरात्रिज्वरापहा ॥ १६॥ अर्थ-यह वर्द्धमान पिप्पली विषमज्यरको दूर करनेवाली और बलको बढाती है भांगरेकी जटाकानमें बांधनेसे रात्रिमें आने वाला ज्वर नष्ट होताहै ॥ १६ ॥ सर्वज्वरहरीश्वेतमंदारस्यचमृलिका । तुरंगरिपुमूलंवाश्वेतंशीतज्वरापहम् ॥ १७॥ अर्थ-धेत मन्दारकी जड भी सम्पूर्ण ज्वर दूर करती है तथा कनेरकी जड वा श्वेत कनेरकी जड शतिज्वरको हरने वाली है।। १७ ।। विवस्त्रेणोद्धृतादेवीमूलिकाकर्णबंधनात् । चातुर्थिकज्वरंहन्तिद्रोणपुप्पीरसांजनात् ॥ १८॥ अर्थ-नग्नहोकर सहदेवीकी जढको कानमें बांधनेसे वा गूमा घासका रस आंखोंमें आंजनेसे चौथियावर नष्ट होताहे ॥ १८॥ कटुकारोहिणीमुस्तंपिप्पलीमूलमेवच हरीतकीचतत्तोयमामाशयगतेवरे॥ १९॥ अर्थ-कुटकी, हरड, नागरमोया, पीपलामूल, हरडका काढा आमाशयमें प्राप्तहुए ज्वरको दूरकरता है ॥ १९॥ पाकलाह्यश्वगंधाचशतपुष्पासर्पपेन्समम् । एतदुडूलनंश्रेष्ठंबातपित्तज्वरापहम् ।। १२० ॥

मापाटीकासमेत ।
(२७)
अर्थ-कूठ, असगंध, सौंफ, सरसाका उद्धलन (अर्थात
इनका चूर्णकर शरीरमें मलना) वातपित्तज्वर नाशकरने
में श्रेष्ठ है ॥ १२० ॥
कट्फलंपौष्करंकृष्णाशृंगीचमधुनासह ।
श्वासकासज्वरहरःश्रेष्ठोलेहकमांतकृत् ॥२१॥
अर्थ-कायफल, पुष्करमल, पीपल, काकडासौंगी इनका
चूर्ण बनाकर शहद के साथ चाटनेसे श्वास खाँसी ज्वर
और कफ दूर हाता ह ॥ २१॥
शृतशीतमथितपेपितमदनफलालेपनंसद्यः ।
अपनयतिदाहमुग्रंज्वरजंहस्तांत्रिमूर्द्धतले ।। २२ ॥
अर्थ-मेनफलको पीसकर औटावे फिर उसे ठंडाकरके
लेप करे तोज्वरका अतिदाह, नष्ट होता है इसका मालिस
हथेली तलुए और शिरमें करना चाहिये ॥ २२ ॥
उत्तानसुप्तस्यगभीरमध्यं
कांस्यादिपात्रंविनिधायनाभौ ॥
तत्रांवुधाराबहुलापतन्ती
निहन्तिदात्वरितंसुशीता ॥२३॥
बदरीपल्लवोत्थेनफेनेनारिएकेनवा ॥ २४ ॥
अर्थ-पुरुषको सीधा लिटाकर उसकी नामीपर बीचमें
गहरी इसप्रकारका एक कांसीका पात्र रखकर उसके ऊपर
शीतलजलकी धारा छोडे तो बहुत शीघ्र दाह दूर होकर
शीतलता होती है ॥ २३ ॥ तथा बेरीके पत्ते पानीमें
डालकर मथै उससे उठे फेन को अंग लगावे तो दाद
शान्तहो ॥ २४॥

(२८)
वैद्यरत्न।
अथ चूर्णानि।
धात्रीशिवासन्धवचित्रकाणां
कणायुतानांसमभागचूर्णम् ॥
जीर्णज्वरारोचकवद्विमान्ये
सविद्महेशस्तमितिप्रतिज्ञा ॥२५॥
अर्थ-(चूर्ण) आमला, हरड, सेंधानमक, चीता, पीपल
यह, सब औषधि बराबर भागलेकर इनका चूर्ण बना ले
यह जीर्णज्वर, अरुचि, मन्दाग्नि, दस्तका न होना इतने
रोगोंको दूर करता है यह प्रतिज्ञा है ॥ २५ ॥
तालीसोपणविश्वपिप्पलिनुगाः कभिवृद्धास्युटिः
कत्त्विगपिप्रकामधवलाद्वात्रिंशकासिता ॥
तालीसायमिदंसुचूर्णमरुचावाध्मानमन्दानल:
श्वासच्छतिसारशोपणसरप्लीहवरेशस्यते ॥२६॥
अर्थ-नालिसपत्र १ तोला, कालीमिर्च २ तोले, सोंठ ३
ताले, पीपल ४ तोले, वंशलोचन ५ तोले, दालचीनी छोटी
इलाची छ: छ:मासे, मिश्री ३२ तोले इनसबको कूट पीस
चूर्णकरे यह तालीसादि वर्ग है यह अरुचि, अफारा,
मन्दाग्नि, श्वास, छोई, अतिसार, शोप, संग्रहणी, प्लीहा
और ज्यरको शान्त करना है ॥ २६ ॥
बप तेलम्।
लाक्षाहरिद्रामंजिष्टाकल्कैस्तेलंविपाचयेत् ।
पड्गुणेनारनालेनदाहशीतज्वरापहम् ॥ २७ ॥

भाषाटा अर्थ-लाख, हल्दी, मँजीठ इनकी लुगदीकर औषधि- योले चाँगुना तेल ले छा गुनी कांजीमें सिद्ध करे यह मल- नेसे दाह और शीतज्वरका नाश करता है ॥ २७ ॥ लाक्षामूर्वाहरिदेवमंजिष्टाचेन्द्रवारुणी । वृहतीसैन्धवंकुष्टरास्नामांसीशतावरी ॥२८॥ आरनालाढकेनात्रतैलप्रस्थंविपाचयेत् । तैलमंगारकंनामसर्वज्वरविनाशनम् ॥ २९ ॥ अर्थ-लाख, मूर्वा, हलदी. दारुहलदी, मँजीठ, इन्द्रा, यन, भटकटैया, सेंधा, कूठ, राना, जटामांसी, शतावरी यह औषध कूट २५६ तोले काजीमें६४ तोले तेल सिद्ध करले यह अंगारकनामतेल सब ज्वरोंका नाश करताहै २८॥२९॥ अथरस। शुद्धसूतविपंगंधंधूतबीजत्रिभिः समम् । चतुर्णाद्विगुणंव्योपहेमक्षीरीविभावितम् ॥ १३०॥ चतुरिंधर्मशुष्कंचूर्णगुंजाद्वयोन्मितम् । जम्बीरकस्यमजाभिगाईकस्यरसेनवा ॥३१॥ महाज्वरांकुशोनामसमस्तज्वरनाशनः । एकाहिकंद्वयाहिकंवाच्याहिकंवाचतुर्थकम् । विषमंचत्रिदोपंचहन्तिसद्योनसंशयः ॥ ३२॥ अर्थ-शुद्ध पारामासे, शुद्ध कराहुआविष तीन मासे,गं. धक तीन मासे, धत्तूरेके बीज नौमासे इन चारासंदूना त्रिकु- टाले चूकेकी भावना दियाहुआ यह चार बार धूपमें सुखा- वे इन सबको एकत्र कर चूर्ण करे जम्बीरी अथवा अदरख

(३०)
वेद्यरत्न ।
,
रसमें दोरत्ती दे यह महाज्वरांकुश रस सम्पूर्ण ज्वर दूर कर
ता है एकांतरा, तिजारी, चातुर्थिकज्वर, विषमज्वर विदो.
षज्वर सब नष्ट होजाते हैं इसमें संदेह नहीं ॥१३०॥३॥३२॥
अप सनिपातचिकित्सा।
त्रिरात्रंपंचरात्रंवादशरात्रमथापिवा।
लंघनसनिपातेपुकुर्यादारोग्यदर्शनात् ॥ ३३ ॥
अर्थ-तीनदिन पांचदिन दशदिन सनिपातमें लंघन
कराने चाहिये जवतक आरोग्यता नहो ॥ ३३ ॥
शालिपीपृश्निपर्णीवृद्धतीद्वयगोक्षुरैः।
विवामिमंथस्योनाकपाटलाकाश्मरीयुतैः ॥३४॥
दशमूलमिदंग्यातंकथितंतज्जलंपिवेत् ।
पिप्पलीचूर्णसंयुसक्तंसन्निपातज्वरापहम् ॥ ३५ ॥
अर्थ-शालपणी, पिठवन, छोटी कटेरी, पडी कटेरी,
गोखरू, बेलगिरी, अरनी, टैटू, कमारी, और पाढल यह
दशमूलका काढा पीपलीका चूर्ण डालकर पीव तो सन्नि-
पातज्यर दूर होता है ।। ३८ ॥ ३५ ॥
भूनिवदारुदशमूलमहापधाह-
तिक्तेन्द्रबीजधनिकेभकणाकपायः।
तन्द्राप्रलापकसनारुचिदाहमोह-
श्वासादियुक्तमखिलंज्वग्माशुहन्यात् ।। ३६॥
अर्थ-भूनिम्ब (चिरापता), देयदारु, दशमूल, मॉट,
कुटकी, इन्दो, धनियाँ, गजपीपल इनका फाढा पर
पिलानेसे तन्ना, प्रलाप, पांमी, अरुचि, दाद, मोह,
श्वास और सम्पूर्ण वर शीन दृर होनेहे ॥३६॥

.
भाषाटीकासमेत ।
भाभूनिम्बनिर्जलदकटुवचाव्योपवासाविशाला
रास्नानंतापटोलीसुरतरुरजनीपाटलाटिंटुकीभिः ।।
ब्राह्मीदा-गुडूचीत्रिवृदतिविषयापुष्करत्रायमाणैः
पाठाव्याघ्रीकलिंगैस्त्रिफलसठियुतैकल्पितैस्तुल्यभागः
अर्थ-भारंगी, चिरायता, नीमकी छाल, नागरमोथा,
कुटकी, बच, त्रिकुटा, (सोंठ, मिर्च, पीपल), अडूसा,
इन्द्रायन,राना, जवासा, पटोलपात, देवदारु,हलदी, पाढ-
•ल, जलसिरस, ब्राह्मी, दारुहल्दी, गिलोय, श्वेत निशोथ,
अतीस, पुष्करमूल, वायमाण, पाठ, इन्द्रजौ, हरड, बहेडा,
आमला और कचूर यह सब बराबर भागले काढाकरे ॥३७॥
काथोद्वात्रिंशकाख्यस्त्रिकदशकलितान्सन्निपातान्निति
वासंशूलंचहिकांश्वसनगुदरुजाध्मानमन्यारुजश्च ।।
ऊरुस्तंभांत्रवृद्धीगलगदमरुतंसर्वसंधिग्रहाति
हन्यादेकोपिसिंहोगजनिवहमिवप्रस्फुरद्वारिधारम् ३८
अर्थ-यह द्वात्रिंशक नामवाला काथ तेरह प्रकारके
सन्निपातोंको दूर करता है, श्वास, शुल, हिचकी, गुद-
रोग, अफारा तथा दूसरे रोग, ऊरुस्तंभ, अंत्रवृद्धि, गल-
रोग, वातरोग, संधिपीडा इत्यादि रोगोंको यह एकही
छाथ इसप्रकार दूर करता है जैसे एकही सिंह अनेक
हाथियोंको नष्ट करता है ॥ ३८॥
दायवुदौतिक्तफलनिकंच.
क्षुद्रापटोलीरजनीसनिबम् ।।
कार्थविद्याज्ज्वरसन्निपाते
निश्चेतनपुंसिविवोधनाय ॥ ३९ ॥

(३२) वैद्यरल। अर्थ-देवदारु, नागरमोथा, कुटकी, त्रिफला, कटेरी, दारुहलदी, नीमकी छाल, इनका काढा कर सनिपातसें अचेत हुए पुरुषके ज्ञानके निमित्त देना चाहिये ॥ ३९ ॥ अथावलीहिका। कदफलंपौष्करंशृंगीव्योपंजासश्चकारवी।' श्लक्ष्णंचूर्णीकृतोतन्मधुनासहलेदयेत् ।। १४० ॥ एपावलेहिकाहंतिसन्निपातंसुदारुणम् । हिकांश्वासंचकासंचकण्ठरोधंचवर्षरम् ॥ ४१ ।। एतद्योज्यंकफोद्रेकेचूर्णमाकजैरसैः । किरातनागरंमुस्तंगुडूचीचेत्ययंगणः ॥ ४२ ॥ अर्थ-कायफल, पुष्करमूल, काकडासींगी, त्रिकटु (सोंठ मिर्च पीपल), अजवायन इनका चूर्णकर शहतके साथ चाटै । यह अवलेहिका दारुण सन्निपातको दूर कर तीहे. हिचकी, श्वास, कास, कंठरोध, घर्धरको दूर करती है, जय कप.की अधिकता हो तो इन औपधियोंका चूर्ण कर अद्रख के रसमें चाटे अथवा चिरायता, सोंठ, नागर मोथा गिलोय यह औपपी सेवन करे ॥ १४०॥४१॥ ४२॥ अपोडलनमा भानवकारवीतितावचाकदफलजरजः। उद्धलनंत्रिदोपोत्येस्वेदाभिप्यंदिनिज्वरे ॥ १३॥ अर्ध-चिरायता, अजवायन, गुटकी, यच, कायकल इनका चूर्ण कर टहलन करनेसे त्रिदीप, स्वंद, अमिप्य दि ज्यरमें हितकारक है ।। ४३ ॥

भाषांटीकासमेत । मरीचंपिप्पलीशुण्ठीपथ्यालोभ्रंसपुष्करम् । भूनिबंकटुकाकुठंकारवीन्द्रयवाःशटी ॥४४॥ अर्थ-काली मिर्च, पीपल, सोंठ, हरड, लोध, पुष्करमू- ल, चिरायता,कुटकी, कूठ, अजवायन, इन्द्रजौ, कचूर ४४ ॥ एतानिसमभागानिसूक्ष्मचूर्णानिकारयेत् । प्रस्वेदेकंठरोधेचसंधिमईनमिष्यते ॥ एतदुर्दूलनं श्रेष्टंसन्निपातहरंपरम् ॥ ४५ ॥ अर्थ-यह बराबर भाग लेकर इनका बारीक चूर्ण करले प्रस्वेद, कंठरोध, संधिपीडामें हितकारी है यह उद्धलन अत्यन्त श्रेष्ठ और सन्निपातका हरनेवाला है ॥ ४५ ॥ स्वेदोद्मेभ्रष्टकुलत्थचूर्णैरुलूलनंशस्तमितिब्रुवन्ति ४६॥ अर्थ-जब बहुत पसीना आवै तौ भुनी कुलथीके चूर्णसे उठूलन करना परम श्रेष्ठ है ॥ ४६ ॥ मधूकसारसिन्धूत्थवचोपणसमंकृतम् । श्लक्ष्णमपिचनस्यहिकुर्यात्संज्ञाप्रबोधकम् ॥ ४७॥ अर्थ-महुएका सार, संधानिमक, वच, मिर्चकाली इन सबको बराबर ले गरम पानीमें पीस नस्य देनेसे अचेतन मनुष्यको संज्ञा प्राप्त होती है ।। ४७ ॥ अथ कर्णिकसन्निपातः। ज्वरस्यपूर्वज्वरमध्यतोवा ज्वरांततोवाचतिमूलशोथः । क्रमादसाध्यःखलुकृच्छ्रसाध्यः सुखेनसाध्योमुनिभिःप्रदिष्टः ॥ १८ ॥ अथ नस्यम्। .

(३४)
वैद्यरत्न ।
अर्थ-कर्णिक सान्निपातका लक्षण-सन्निपात क्यरसे पहले
मध्यमें वा अन्तमें कर्णके मूलमें सूजन होती है, यह क्रम
से असाध्य कष्टसाध्य और सुखसाध्य होती है, ऐसा मुनि-
जन कहते ह ॥४८॥
कुलत्थंकट्फलंशुण्ठीकारवीचसमांशका ।
सुखोष्णलेपनंकार्यकर्णमूलेमुहुर्मुहुः ॥ ४२ ॥
अर्थ-कुलथी, कायफल, साठे, अजवायन यह सब
बराबर किंचित् गरम जलके साथ कानकी जडमें वारंवार
लेप करें ॥ ४९॥
बीजपूरकमूलानिअग्निमंथस्तथैवच ।
नागरदेवकाष्ठंचरानाचित्रकशितम् ॥ १५ ॥
प्रलेपनमिदंश्रेष्टंकर्णशोथविनाशनम् ॥५१॥
अर्थ-विजारा, नींबूकी जह, अरणी, सोंठ, देवदारु,
राना, चित्रक इन सबको पीसकर कर्णमृलपर लेप करें तो
सूजन दूरहो ॥ १५० ॥ ५१ ॥
अथ सन्निपातरम ।
ब्यूपणंपंचलवणंशतपुष्पाद्विजीरकम् ।
क्षारत्रयंसमांशेनचूर्णमेपांपलत्रयम् ॥ ५२ ॥
अर्थ-सोंठ, मिर्च, पीपल, पांचौलोन, सोंफ, दोनों
जीरे, तीनों क्षार यह सब बराबर भाग लेकर इनका
चूर्णकर तीन पल ले ॥ ५२ ।।
शुद्धमृतंमृतंचा_गंधकंचपलंपलम् ।।
आर्द्रकस्यरसेखल्बेदिनमेकंविमईयेत् ॥ ५३॥
अर्थ -शुद्धपारा, अभ्रककी भस्म, गंधक यह एक २ पल
एक दिन पर्यन्त अखके रसमें सरल कोरे ॥ १३ ॥

भाषाटीकासमेत।
वीरभद्रोरस ख्यातोमापैकःसन्निपातजित् ।
चित्रकाकसिंधूत्थमनुपानजलैःसह ॥५४॥
अर्थ-यह वीरभद्ररस है एक उरदके बराबर खानेसे
सन्निपात दूर होता है इसके ऊपर चित्रक, अदरख,
सेंधा-
नोंन जलके.साथ पिये ॥ ५४॥
पथ्यंक्षीरोदनदेयंद्विवारंचरसोहितः ॥५५॥
अर्थ-तथा दूधभातका पथ्य दोबार दे तो हितकर ५५॥
ज्वरस्प दशोपद्रवाः।
श्वासोमू रुचिछर्दिस्तृष्णातीसारविड्ग्रहाः ।
हिकाकासांगभेदाश्चज्वरस्योपद्रवादश ॥५६॥
अर्थ-श्वास, मी, अरुचि, छर्दि, तृष्णा, अतिसार,
दस्तका न आना, हिचकी, खांसी, हडफूटन यह ज्वरके
दश उपद्रव हैं ॥ ५६॥
त्रिकटुशटीघनशृंगीगर्दभशाकंचपौष्करंसपदि ।
श्वासंजयति पयोधरसुधालतामूलजलपीतम् ॥१७॥
अर्थ-त्रिकुटा, कपूर, नागरमोथा, काकडासौंगी, गर्द-
भशाक (भारंगी)पुप्कामृल यह कोरु, गिलोय, मालकां-
गनी, पीपलामूलके साथ पीनेसे श्वास ठीक होताहै ॥५७॥
मूर्छायामिहकृतमालहारहूराकट्टीभिस्सन-
लदपर्पटाभयाभिः । संशीतंजलमिति सिद्ध-
मिष्टभुक्तं लेहोवामधुनिवृतासिताभयाभिः ॥१८॥
अर्थ-मृछीमें अमलतासका गूदा, मुनका, कुटकी,
खस, पित्तपापडा, हरड इनका चूर्णकर शीतल जलके
साथ सेवन करनेसे अथवा शहत, निशोथ, मिश्री हरड
यह चाटनेसे मूळ दूर होती है ॥ ५८ ॥

वैद्यरत्न। अरुचीतुतिक्तकरसेरसकृत्कवलग्रहस्तथाम्लरसेः ॥ मधुलवणमातुलुंगीफलकेसरधारणंवक्त्रे ॥ ५९॥ अर्थ-अरुचिौ तिक्तरस अथवा अम्लरसफा कवल (ग्रास) धारण करना, अथवा शहद, लवण, विजौरा, नीयू और नारियलकी छाल मुखमें 'धारण करनी चा- हिये ।। ५९ ॥ मयूरपिच्छस्यमपीसुकृष्णा मध्वन्वितावाकतुकासधातुः । काथोगुडूच्याः समधुः सुशीतः पीतः प्रशान्तिवमनस्यकुर्यात् ।। १६० ॥ अर्ध-मोरपंखकी चन्द्रिकाको जलाकर शहदके मा चाटे अथवा कुटकीका सेवन करे अथवा शहद डाल कर गिलोयका काढा शीतल कर पिये तो यमनक शान्ति होतीहै ॥ १६० ॥ दंतशठवीजपुरकदाडिमबदः सचुककेर्वदने । लेपोजयतिपिपासामथरजतगुटीमुखांतःस्था॥६१। अर्थ-जम्भीरी नींद, विजोगनींद, अनार, घेर, चा (अम्लन) इनका लेप मुम्बमें करनेसे पिपासादर तीद अथवा चादीकी हेली मुग्यौ डालनेस प्यास शान्त होतीहै ।। ६१ ॥ पागमृतापर्पटमुस्तविश्वाकिगततिक्तेन्दयवा- विपाच्य । पियअयत्येवजयेनसर्ववरातिसारान- तिदुर्निवारान ।। ६२॥ अर्थ-पाद, गिलोय, पिनपापडा, माथा, सोट, चिरा यता, कुटकी, इन्द्रजी इनको यरामर ले दनया काढाय. रदनसे कठिन और दुनियार ज्यरातिसार दर होना, र नीमर, गिलोय, महल मादि। . .

भापाटीकासमेत ।
(३७)
विवंधेवातजित्कमकुर्यादत्रानुलोमनम् ।
मलंप्रवर्तयेदाशुतीक्ष्णाभिःफलवर्तिभिः ॥ ६३ ।।
अर्थ-यदि विबंध अर्थात रोगीको दुस्त न आताहो वात
पेटमें घुमट रहीहो तो वातजित् और बातको नीचेकी
सोर प्रवृत करनेवाले कर्म करने चाहिये और फलवर्ती
अर्थात हाथके अँगूठेके प्रमाण मोटी और चिकनी मलके प्र.
वृत्त करनेवाली वर्ती गुदामें घी लगाकर प्रवेश करें । ती.
क्ष्ण फलवर्ती द्वारा शीघ्र मलको बाहर निकाले ।। ६३ ।।
नीरेणसिंधूत्थरजोतिसूक्ष्म
नस्येननूनविनिहन्तिहिकाम् ॥ ६४ ॥
अर्थ-जलमें थोडा समुद्रलवण डालकर नास लेनेसे हि.
चकी दूर होतीहै ।। ६४ ॥
कामेकणाकणामूलकलिंगफलजरजः ।
सविश्वभेपलिह्यान्मधुनावावृपाइसम् ॥ ६५॥
अर्थ-खांसीमें पीपल, पीपलामूल, इन्द्रजो, बहेडा और
सोंठ इनको बराबर ले शहदके साथ अथवा विसोंटेके
रससे सेवन करनेसे खांसी दूर होती है ॥ ६५ ॥
दाहेज्वराविरोधेनययाशास्त्रंहिमोविधिः ।
ज्वरेशान्तप्रणश्यन्तिसद्यःसर्वेप्युपद्रवाः ॥६६॥
अर्थ -ज्वरदाहमें ज्वर विगह न जाय इस प्रकार शास्त्रा-
नुसार हिम (शीतल औषधी) की विधि करनी चाहिये
ज्वरकै शान्त होने में सर उपद्रव शान्त होजातेहैं ॥६६॥

(३८) वैद्यरत्न। विष्णुसहस्रमूर्धानंचराचरपतिप्रभुम् । स्तुवन्नाम्नांसहस्रेणज्वरान्सर्वानपोहति ॥१६७ ॥ इतिश्रीगोस्वामिशिवानंदभट्टविरचिते वैद्यरत्ने प्रथमः प्रकाशः ॥ १ ॥ अर्थ-विष्णु सहस्र शिर चराचरपति प्रभु नारायणकी सहस्रनामसे स्तुति करनेसे सब ज्वर नष्ट होजाते हैं १६|| इति श्रीगोस्वामिशिवानदाविरचिते वैद्यरत्ने पण्डितज्वालाप्रमाद- मिश्रानभाषाटीवायां प्रथम प्रकाशः ॥१ अथातीसारः। संशम्यापांधातुरनिंप्रवृद्धः शकृन्मिश्रीवायुनाधःप्रणुनः । सरत्यतीवातिसारंतमाहु- याधिघोरंपविधंतंवदन्ति ॥ १॥ अर्थ-जलके धातु जो कफ, रस, मत्र, स्वेद,मेद,पित्त और रक्त इत्यादि अधिक बढ़कर जठराग्निको मन्दकर घायुसे प्रेरित मलको वारंवार गिराते हैं इस घोर व्याधिका नाम वैद्योंने अतीसार कहाहै. एक एक दोपते तीन, एक सन्निपात से, एक शोकसे, एक आमसे इस प्रकार छः प्रकारका है॥१॥ नागरंधान्यमुस्तंचवालकविल्वमेवच । आमशुलविवंधनंपाचनंवह्निदीपनम् ॥ २॥ अर्थ-सॉट,धनियाँ, नागरमोथा, नेत्रयाला,येलगिरी इन औषधोंका पाचन देनसे नामाल विबन्ध दृर होताहै, यह पाचन और अग्नि दीन करनेवाला है ॥२॥ -- भाषाटीकासमेत । (३९) - पित्तेधान्यचतुष्कंतुशुंठीत्यागाद्वदंतिहि । हीबेरातिविपासुस्तविल्वनागरधान्यकम् ॥३॥ अर्थ-यदि पित्तसे अतिसार हो तो धनियां आदि चार औषधी लेनी सोंठ न डालनी हीबेर, अतीस, नागरमोथा, बेलकी गिरी, सोंठ, धनियाँ ॥३॥ पिवेत्पिच्छाविबंधनंशुलदोषमपाचनम् । सरक्तंहन्त्यतीसारंसज्वरंवाथविज्वरम् ॥४॥ अर्थ-इसके पान करनेसे विवंध, शुलदोष और अपाचन दूर होताहै, रक्तातीसार ज्वरके सहित अथवा बिनाज्वरके हो वह दूर होताहै ॥४॥ कुटजोवह्निचूर्णञ्चमधुनासहलेहितम् । चिरोत्थितमतीसारंपकंपित्तास्रजंजयेत् ॥ ५॥ अर्थ-कुरैया, चीतेका चूर्ण कर शहद के साथ चाटनेसे चिरकालसे हुए अतिसार और पक पित्तातिसार को दूर करता है ॥ ५॥ कुटजातिविपामुस्तंवालकलोध्रचंदनम् । धातकीदाडिमपाठाकायंक्षौद्युतंपिबेत् ॥६॥ अर्थ-कुरैया, अतीस, नागरमोथा, सुगंधवाला, लोध, लाल चन्दन, धवईके फूल, दाडमी, पाढ इनका काढा कर शहद के साथ पीनेसे ॥६॥ दाहेरक्तेसशुलेआमरोगेचदुस्तरे । कुटजाप्पमिदंब्यास ती सारनाशनम् ॥ ७॥ अर्थ-दाह, रक्तशुल, दुस्तर आमरोग दूर होते हैं, यह कुटजाष्टक सब अतीसारोंका नाश करनेवाला है।॥ ७॥ स्निग्धंधनकुटजवल्कमजंतुजग्ध- मादायतत्क्षणमतीवचपोथयित्वा।

(४०)
वैद्याल ।
जंबूपलाशपुटतंडुलतोयसिक्तं
बद्धंकुशेनचबहिर्वनपंकलिप्तम् ॥ ८॥
अर्थ-कुरैयाकी छाल चिकनी मोटी कठिन कीडे आ-
दिकी खाई न होय वह ताजी लेकर कूटे फिर उसके गूदीको
जामुनके पत्तों में लपेट उसपर ढाक के पत्ते लपेटकर चावल-
के धोवनसे पसे और लुगदीको छिडकर फिर लपेट बाहर
कुशसे लपेट ऊपर गाढीमट्ठीका लपेट करे ॥ ८ ॥
सुस्विन्नमेतदवपीडयरसंगृहीत्वा
क्षौद्रेणयुक्तमतिसारवतेप्रदद्यात् ।
कृष्णात्रिपुत्रमतपूजितएपयोगः
सर्वातिसारहरणेस्वयमेवराजा ॥९॥
अर्थ-फिर इस गोलेको पुटपाकके अनुसार पकावै जब
पक जाय तब उसको निचोड के रस निकाल ले और सहद
मिलाकर परिभाषामें कही मात्रा अनुसार अनिसारवाले
को देना यह कुटजपुटपाकका योग सर अतिसारोंके हर-
नेमें स्वयं राजा है यह कृष्णात्रिपुनका श्रेष्ठ मत है ॥ ९ ॥
एरण्डमूलस्वरसेनशुण्ठ्याः
कल्कंसुपिष्टपुटपाकयोगे।
क्षोद्रेणलीविनिहन्तिशीन-
मामातिसारारुचिशूलमुग्रम् ।। १० ॥
अर्थ-अण्डकी जडके स्वरसमें सीटका कल्क पुटपाकके
योगसे पीसकर बनाये यह महदके साथ चाटनेसे आमाति-
सार अरुचि और गलको दृरःकरना है ॥ १० ॥
यथाशृतं भवेद्यारितथानीमारनाशनम् ॥ ११ ॥

भापाटीकासमेत । (४१) अर्थ-जितना औटाहुआ जलहो इसी प्रकार अतिसा. रका नाश होता है ॥ ११ ॥ अथ संग्रहणी। अतीसारेनिवृत्तेपिमंदागेरहिताशिनः। भूयःसंदूपितोवह्निर्ग्रहणीमपिदूपयेत् ॥ १२ ॥ सादुष्टाबहुशोभुक्तमाममेवविमुचति । पकंवासरुजपूतिमुहुर्बदमुहुवम् ॥ १३ ॥ अर्थ-अतीसार निवृत्त होने पर अथवा मध्यहीमें जो मन्दाग्निवाला पुरुष अहित पदार्थोंका सेवन करलेता है, तो उस आहारसे दूषितही अग्नि ग्रहणीको दूषित करता है, (पक्काशय और आमाशयके बीच में एक अन्न ग्रहण करने वाली आंतको ग्रहणी कहते हैं ) वह वातादि दोषसे दुष्ट हुई ग्रहणी मोजन किये आहारको कच्चाही बहुतसा बा- हर निकला देती है, अथवा पीडा और दुर्गन्धि सहित पकेको भी कभी बँधा और कभी पतला गिराती है इस ग्रहणी कहते हैं।॥ १२ ॥ १३ ॥ धान्यबिल्ववलाशुण्ठीशालिपर्णीशृतंजलम् । स्यादातग्रहणीदोपे सानाहेसपरिग्रहे ॥ १४॥ अर्थ-धनियाँ,बेलगिरी वरिआरी,सोंठ, शालपर्णी इनका काढाकर देनेसे वात अतिसार आनाह रोग दूरहोते हैं१४।। मुस्तावालकलोप्रवत्सकवृकीविश्वारलश्रीमदा- लज्जामोचरसाम्रकौटजविपाचूर्णस्तुगंगाधरः । पीतस्तंदुलवारिमाक्षिकयुतःकपोन्मितोवाहिका- . सुग्रांचग्रहणीनिहन्तिसहसासर्वातिसारामयान् १९॥ अर्थ-नागरमोथा. नेत्रपाला.लोध करयाकी छाल.पाठा.

(४२) वैद्यरत्न । सोंठ(अरल) ₹ट, येलकी गिरी, लज्जालु, मोचरस, आमकी गुठली ,इन्द्रजौ, अतीस, इनको बरावर ले गंगाधर चूर्ण बनाये यह चूर्ण चावलोंके धोबनके साथ शहद मिलाकर एककर्ष मात्र पान करनेसे तीक्ष्ण संग्रहणी और सब अती. सारके रोगोंको शान्त करता है ॥ १५ ॥ नागरातिविपासुस्तंधातकीसरसांजनम् । वत्सकत्वक्फलंबिल्वंपाठाकटुकरोहिणीम् ॥ १६ ॥ पिवेत्समांशतभूर्णसौदंतंदुलांबुना। पैत्तिकेग्रहणीदोपेरक्तंयच्चोपवेश्यते ॥ १७ ॥ अशांस्यथगुदेशूलंजयेच्चैवप्रवाहिकाम् । नागरायमिदंचूर्णकृष्णात्रेयेणपूजितम् ॥ १८॥ अर्थ-सौंठ, अतीस, नागरमोथा, धवईके फूल,रसोत, कु- रैयाकी छाल, इन्द्रजो, पाठ, बेलगिरी और क्रुटकी इनका चूर्ण चावल के धोवन और शहदके साथ पिये तो रक्तसः हित पित्तग्रहणी नष्ट हो यह नागरादिनूर्ण कृष्णापर्ने कहा है ॥ १६ ॥ १७ ॥ १८ ॥ शुद्धाहिफेनवलिसूतकपर्दभस्म- हालाहलोपणविशुद्धसुवर्णवीजैः ॥ अभोधिपंक्तिकरशैलपराष्टविंश- त्यशर्विर्णिततमैग्रहणीकपाटः ।। १९ ॥ अर्थ-शुद्ध अफीम भाग, गंधक १० माग,पारा २ माग, कौडीकी भस्म ७ भाग, हालाहल १ भाग, शुद्ध धरके बीज २० मागले सयका नृणं करे तो यह ग्रहणीकपाटरस दो ॥ १९॥ .

भाषाटीकासमेत। वल्लोस्यहन्तिमधुनासहजीरकेण भुक्तोतिसारमपिसंग्रहणीमुदग्राम् । आमंविपाच्यसहसाजनयत्यवश्यं वैश्वानरंजठरवर्त्तिनमार्तिभाजः ॥ २०॥ अर्थ-दो रत्ती रस शहद और जीरेके साथ सेवन कर- नेसे प्रबल संग्रहणी और आतिसारको दूरकर आमको पचाय अग्निको प्रज्वलित करता है ॥ २० ॥ भैषज्यमकतःसर्वग्रहण्यांतकमेकतः । पथ्यंमधुरपाकित्त्वानचपित्तप्रकोपनम् ॥ २१ ॥ अर्थ-संग्रहणीमें सब औषधि एक ओर और तक एक ओर है यह पथ्य पचनेमें मधुर और पित्तका कोप करनेवालाभी नहीं है ॥ २१॥ कपायोष्णविपाकित्वाद्वैशयाच्चकफेहितम् । वातेस्वादम्लसांद्रत्वात्सद्यःकमविदाहिततः॥२२॥ अर्थ-यह कषाय उष्णविपाकी होने तथा विशद हो. नेसे कफमें हितकारक है, वासमें स्वादु तथा अम्ल सान्द्र होनेसे तत्काल क्लम और दाहको दूर करता है ॥ २२ ॥ तावत्संवर्द्धयेत्तक्रयावत्स्याद्वद्धविकता। ततस्तद्धासयित्वातदन्नसंभोजयेत्क्रमात् ॥ २३॥ अर्थ-तबतक मढेको बढाता रहे जबतक मल- बन्धहो फिर उसे न्यून करताहुआ क्रमसे अत्रका से- वन करे ॥ २३ ॥ पृथग्दोपैःसमस्तैश्चशोणितासहजानिच । अशॉसिपदप्रकाराणिविद्याद्दवलित्रये ॥ २४ ॥ भयारी।

(४४) वैद्यरत्न । अर्थ-पृथक् २ तीनों दोष तीनों मिलके एक चौथा तथा रक्तसे पांचवा और सहज छटवाँ इस प्रकार बवासीर रोग छः प्रकारका है ॥ २४ ॥ दोपास्त्वङ्मांसमेदांसिसंदूष्यविविधाकृतीन् । मांसांकुरानपानादौकुर्वत्यासितानगुः ॥ २५ ॥ अर्थ-त्वचा मांस और मेदको दषित करके वातादि दोष अनेक प्रकारके मांसके अंकुरोंको गुदाआदिमें उत्पन्न करतेह उन अंकुरोंको अर्श कहते हैं यह नासिका आदिमें भी होता है ॥ २५ ॥ मरिचमहीपधिचित्रकसूरणभागायथोत्तरंद्विगुणाः । सर्वसमोगुडभाग-प्रोक्तोयंमोदकःप्रसिद्धफलः ॥ ज्वलनंज्वलयतिजाठरमुन्मूलयतिप्रभूतिगुल्मगदान् । निःशेपयतिश्लीपदमर्शासिचनाशयत्याशु ॥२६॥ अर्थ-कालीमिर्च १ भाग, सांठ २ भाग, चित्रक ४ भाग जिमीकंद ८ भाग ऐसे एकसे एक दृना लकर सबके समान १५ भाग गुड लेकर लड्डू बना सेवन करे। यह सूरण मो- दक जठराग्निको प्रदीप्त करता है गुल्म और शलादिश्लीपद और अर्शरोगोंको दूर करता है ॥ २६ ।। शुण्ठीकणामरिचनागदलत्वगेलं चूर्णीकृतंक्रमविवदितमेतदंत्यात । खादेनरःसमसितंगुदजाग्निमान्य- गुल्मारुचिश्वसनकण्ठहदामयेषु ॥२७॥ अर्थ-सोंठ १ भाग, पीपल २ माग, कालीमिर्च ३ भाग, गागकेशर४माग, तेजपात ५, दालचीनी, नज ७, इला भाषाटीकासमेत । (४५) यची छोटी ८ भाग इसप्रकार क्रमसे बढायेहुए इन औष- धोंका चूर्णकर उसकी बराबर मिश्री मिलाकर खाय तो बवासीर, मन्दाग्नि, गुल्म, अरुचि, श्वास, कंठरोग, हृदयरोग यह दूर होते हैं ॥ २७ ॥ चूर्णीकृताःपोडशसूरणस्यभागास्तदर्द्धनवचित्रकस्य । महौषधाईमरिचस्यकोगुडेनदुर्नामजयायपिण्डी २८ अर्थ-जिमीकंद चूर्णकिया हुआ १६ भाग, चीता आठ भाग, सोंठ २ भाग, काली मिर्च एकमाग यह एकत्र कर गुडके साथ खानेसे बवासीर रोग दूर होता है ॥ २८ ॥ तकंसकृष्णंपिवतांनराणांदुर्नामनामश्रवणंकुतःस्यात् । यथासर्वाणिकुष्ठानिहतःखदिरवीजको । तथैवाशांसिसर्वाणिवृक्षकारुष्करौहतः ॥ २९ ॥ अर्थ-जो मनुष्य मढेमें काली मिर्च डालकर पीते हैं उनको बवासीर नहीं रहती जिस प्रकार खैरसार, विजय. सार, सब कुष्ठोंको दूर करते हैं, इसीप्रकार कुडे और भिला- वेका प्रयोग सब प्रकारसे अर्शरोग दूर करता है ॥ २९ ॥ हरिद्रायाःप्रयोगेणप्रमेहाइवपोडश । क्षारामिभ्यांनिवर्ततेतथादृश्यागुदोद्भवाः ॥३०॥ अर्थ-जैसे हरिद्राके प्रयोगसे सोलह प्रमेह नष्ट होते हैं इसीप्रकार क्षार और अग्निके प्रयोगसे बवासीरके मस्से नष्ट होजाते हैं ॥ ३०॥ मृल्लिप्तंसारणकन्दंपक्त्वानीपुटपाकवत् । दद्यात्सतैललवणंदुर्नामविनिवृत्तये ।। ३१ ॥

वैद्यरत्न ।
अर्थ-जिमीकंदको मिट्टीमें लपेटकर पुटपाककी विधिसे
पकावे उसमें तेल और लवण मिलाकर देने से गुदाके मस्ते
नष्ट होते हैं ॥ ३१॥
नवनीततिलाभ्यासात्केशारनवनीतशर्कराभ्यासात् ।
केशरदधिमथिताभ्यासाद्दजाः शाम्यंतिरक्तवहाः ३२॥
अर्थ-काल तिल और मक्खनके नित्य अभ्याससे तथा
नागकेशर मक्खन मिश्रीके नित्य अभ्याससे अथवा दहीके
पानी और मट्टाके नित्य अभ्याससे बवासीरके मस्से
शान्त होते हैं ॥ ३२ ॥
देवदालीकपायेणशीचमाचरतांनृणाम् ।
किंवातळूमसेवाभिःकुतःस्याद्दजांकुरः ॥ ३३ ।।
अर्थ-अथवा बन्दालीके काटेसे शौच करनेसे अथवा
उसका धूम देनेसे यवासीरके मस्से नहीं रहते ॥ ३३ ॥
सिन्धूत्थं देवदाल्याश्चवीजंकांजिकपेपितम् ।
गुदांकुरान्प्रलेपेनपातयेदुल्वणानपि ॥३४॥
अर्थ-संधालवण वन्दालके बीज कांजीके साथ पीसकर
लेप करनेसे कठिन बवासीरके मस्से भी नष्ट होजातेहैं ३४
भपानीर्णम् ।
प्रकृत्यारसशेपाद्वात्रिभिदापेरपाकृतः।
भवन्तिपडजीर्णानिवेपम्यादशनस्यच ॥ ३५॥
व्योपसिंधूत्थवलिभिरेकद्वित्रिलवे कृतः।
निवाम्धुमर्दितंगाढंनानाशुद्रोधनोरसः ॥ ३६॥
सपाटकमात्रोयंभुक्ताक्षुत्कारकोभृशम् ।
आलिप्यजठरंप्राज्ञोहिंगुन्यपणसैन्धवेः ॥ ३७॥

भाषाटीकासमेत । .
(४७)
पथ्यापिप्पलिसंयुक्तंचूर्णसौवर्चलंपिबेत् ।
मस्तुनोष्णोदकेनाथमत्वादोपगतिभिषक् ॥३८॥
अर्थ-स्वभावसे रस शेष रहनेसेत.गेंदोषोंके विकारसे
अथवा भोजनके विपरीत पनेसे अजीण होता है, वह
अजीर्ण छः प्रकारके हैं सोंठ, मिरच, पीपल, तीनों एक
तोला,सैंधानोन २ तोले गंधक ३ तोले,इन सबको कूट पीस
'नींबूके रसमें खरल कर यह क्षुद्रोधन रसहै इसके खानेसे
भूख बढती है ३मासेकी मात्रा है इससे बहुत भूख लगती है
बुद्धिमान पेटके ऊपर हींग, सोंठ, मिरच, पीपल, सेंधानोन
गरम पानीसे पेटके ऊपर लेप करके दिनमें सो रहै तो सब
अजीर्ण शान्त होजाता है । हरड,पीपल,सौचरलौनका चूरन
दहीकेपानीसे अथवा गरम पानीसे दोषका बलाबल देख
पीनेको दे ॥ ३५ ॥ ३६॥ ३७ ॥ ३८ ॥
चतुर्विधमजीर्णंचमंदानलमथारुचिम् ।
आध्मानंवातगुल्मंचशूलंचाशुनियच्छति ॥ ३९ ॥
अर्थ-इससे चारों प्रकारका अजीर्ण मन्दाग्नि अरुचि
अफारा वात गुल्म और शुलका शीघ्र ही नाश होताहै ३९
त्रिकटुकमजमोदसैन्धवंजीरके दे
समधरणिधृतानामष्टमोहिंगुभागः।
प्रथमकवलभुक्तंसर्पिपाचूर्णमेत-
जनयतिजठराग्निंवातरोगानिहति ॥ ४०॥
अर्थ-सोंठ, मिर्च, पीपल, अजमोद, सेंधानमक, दोनों
जीरे यह समान भाग ले इनसे आठवाँ भाग भूनी हींग
ले यह चूर्ण घृतके साथ पहले प्रासमें खाय तो जठराग्नि
तीव्र होकर वातरोगों को दूर करती है ॥ १०॥

(५०) वैद्यरत्न । हिंगुभागोभवेदेकोवचाचद्विगुणामता। पिप्पलीत्रिगुणाज्ञेयाशृंगवेरंचतुर्गुणम् ॥ ५१ ॥ यवानीस्यात्पंचगुणापड्गुणाचहरीतकी। चित्रकंसप्तगुणितंकुष्ठंचाप्टगुणंमतम् ॥५२॥ एतद्वातहरंचूर्णपीतमामप्रशान्तये । पिवेध्नामस्तुनावासुरयाकोप्णवारिणा ।। ५३ ॥ अर्थ-हींग एकभाग, वच दो भाग, पीपली तीनभाग, अदरख चारभाग, अजवायन पांचभाग, हरड छ:भाग, चीता सातभाग, कूठ आठभाग, यह औषधी एकत्र फर चूर्ण बनावै, यह चूर्ण वातहर, आमनाशक है. इसको दही- के पानी अथवा गरम जलके साथ ले अथवा सुरा या लह सनके साथ ले ॥५१॥ ५२ ॥ ५३॥ सोदावर्त्तमजीर्णचप्लीहानमुदरंतथा । अंगानियस्यशीर्यन्तेविपंवायेनभक्षितम् ॥ ५४॥ अर्थ-उदावर्त,अजीर्ण,प्लीहा,उदररोग नष्ट होते हैं, जिसके अंग विशीर्ण होते हों अथवा जिसने विषभक्षण क्रिया हो५४ : चूर्णमनिमुखनामसर्वोपद्रवमाहरेत् । हरीतकीभक्ष्यमाणानागरेणगुडेनवा ॥५५॥ अर्थ-यह अग्निमुखनाम चूर्ण सव उपद्रव दूर करता है। जोंठ और गुडके साथ हरड खानेसे ॥ ५५ ॥ सेन्धवोपहितावापिशीतत्वेनाग्निदीपनी । शुंठीचूर्णसमायुक्तंयवक्षारंसमालिहेत् ॥ ५६ ॥ अर्थ-वा सैधवके साथ खानेसे शीतमें अग्निदीप्त करती है। जो सोंठके चूर्ण के साथ जवाखार ।। ५६ ॥ .

भापाटीकासमेत ।
(५१)
*
सर्पिपाप्रातरुत्थायनरोवह्निप्रदीपनम् ।
विजयापिप्पलीशुंठीत्रिसमंपरिकीर्तितम् ॥
अग्निसंदीपनंनृणांविदोपामयनाशनम् ॥ ५७ ॥
सैन्धवसमूलमगधाचव्यानलनामहरीतक्यः॥
क्रमवृद्धाग्निविवृद्धिंकरोतिवडवानलंचूर्णम् ॥ ५८॥
अर्थ-धीके साथ प्रातःकाल उठकर खाय तो अग्नि प्रदीप्त
होतीहै, भंग, पीपल, सोंठ यह मनुप्योंके त्रिदोष शान्त करने
वाली हैं और अग्नि दीप्त करती हैं. यह तीनों बराबर लेकर
संवन करे. सैंधानिमक १ भाग, पीपलामूल २ भाग, पीपल
३ भाग, चव्य ४ भाग,चीतेकी छाल ५ भाग और जंगी हरड
६ भाग, इस क्रमसे इन औषधियोंका चूर्ण बनावे. यह
वडवानल चूर्ण अग्निको बढाता है ॥ ५७ ॥ ५८ ॥
पथ्यानागरपिप्पलीसरुचकैःश्यामान्वितैःपंचभि-
शूर्णपंचसमंसमस्तरुचिकृत्कामाग्निसंदीपनम् ॥
प्राणोत्साहविवर्द्धनरुचिकरप्लीहापहंगुल्मनुत् ।
प्रत्याध्मानगरोदरार्शशमनंचामेनिलेपूजितम् ।।१९।।
अर्थ-हरड, सोंठ, पीपल, काला नोग, पीपलमूल यह
पांचो वस्तु बराबर ले इनका चूर्ण कर सेवन करनेसे रुचि
करनेवाला तथा कामाग्निको दीप्त करनेवाला है. प्राणमें उ.
साह बढानेवाला,रुचि करनेवाला, प्लीहा गुल्म हरनेवाला
प्रत्याध्मान गर उदर अर्शको शान्त करता, आम और वात
रोगमें श्रेष्ठहै ।। ५९ ॥
शुद्धंसूतंगंधकंचपलमानंपृथक्पृथक् ।
हरीतकीचद्विपलानागरस्त्रिपलास्मृतः ॥ ६॥

(५२)
वैद्यग्ल।
कृष्णाचमरिचंतत्सिधूत्थंत्रिपलंपृथक् !
चतुष्पला विजयामईयेन्निम्वुकद्रवैः ॥ ६१ ॥
पुटानिसप्तदेयानिधर्ममध्ये पृथक्पृथक् ।
अजीर्णारिरयंप्रोक्तःसद्योदीपनपाचनः ॥
भक्षयेहिगुणंभक्ष्यंपाचयेद्वेचयेदपि ॥६२॥
अर्ध-शुद्धपारा४ तोले, गंधक५तोले,हरडतोले,सोंठ १२
तोले, पीपल, मिर्च, संधानोन प्रत्येक बारह २ तोले, भांग'
१६ तोले इन सबका चूर्णकर धृपमें नींबू के रसकी सात पुटदे
यह अजीर्णारिरस दीपन पाचन है इसके सेवनसे मनुष्य दूना
भोजन करनेलगताहै यह दस्तावर भी है ॥ ६० ॥६१॥२॥
अथ विसूचिमा
सूचीभिरिवगात्राणितदन्सतिष्ठतेऽनिलः ।
यस्याजीणेंनसावैद्योर्विसूचीतिनिगद्यते ॥ १३॥
अर्थ-जिस अजीर्ण अंगमें वायु रहकर सुई छेदनेकीमी
पीडा करे, वद्य उसको विसूचिका कहते . इस रोगमें
अपरिमित आहारवाल प्रमित होते हैं। ६३ ।।
दुष्टतुभुतंकफमारुनाभ्यां
प्रवर्तते नोर्द्धमधश्चयस्य ।
विलंविकांतांभृशदुश्चिकित्स्या-
माचक्षतेशास्त्रविक्षःपुगणाः ॥ ६४ ॥

भापाटीकासमेत । - कुष्टसैन्धवयो कल्कचुक्रतैलसमन्वितः। विसूच्यांमई नंकोणंखलीशूलनिवारणम् ॥ ६५ ॥ अर्थ i-कूठ और सैधवके कल्कमें चूका और तेल मिला कर विसूचिका रोगमें गरम २ मर्दन करे, यह खल्ली और झूलका नाशक है ॥ ६५ ॥ मातुलुंगीजयाव्योपनिशाबीजंकरंजकम् । कांजिकेनांजनहन्याद्विसूचीमतिदारुणाम् ॥६६॥ अर्थ-विजारेकी जड, सौंठ, मिर्च, पीपल, हलदी, करंजके चीज इनका चूर्णकर कांजीके रसकी भावना दे गोलीकर छाया में सुखाय नेत्रोंमें अंजन करनेसे दारुण विसूचिकारोग शान्त होता है । ६६ ।। पथ्यावचाहिंगुकलिंग गैः सौवर्चलै सातिविपैःसुचूर्णम् । तुपांबुपीतंविनिहंत्यजीर्ण शूलं विसूचीमरुचिंचसद्यः ॥ ६७ ॥ अर्थ-हरड, वच, हिंगु, इन्द्रजी, भांगरा, सोंचरलोन और अतीस, धानकी भूसीके जलके साथ इस चूर्णको सेवन करनेसे शूल विसूचिका और अरुचि दूर होती है६७॥ अथ कृमि. ज्वरोविवर्णताशूलंहृद्रोगःश्वसनंभ्रमः । भक्तद्धपोतिसारश्वसंजातकृमिलक्षणम् ॥ ६८ ।। अर्थ-पेटमें कृमि हुओंका लक्षण कहते है:-अंगमें ज्वर, शरीरका रंग बिरंग, शूल, हृदयमें पीडाके भ्रम, अन्नमें द्वेष तथा अतिसार यह पेटमें कृमि होनेके लक्षण हैं ॥ ६८॥ .

वैद्यरत्न। । दाडिमीत्वकृत काथस्तिलतैलेनसंयुतः । त्रिदिनात्पातयत्येवकोप्टतःक्रिमिजालकम् ॥ ६९ ॥ अर्थ-दाडिमीके छिलकेका काथ, तिलके तेलसे संयुक्तकर पानकरनेसे तीन दिनमें पेटसे कीडा निकालदेता है ॥६९।। पारसीकयवानीका पीताःपर्युपितवारिणाप्रातः । गुडपूर्वा कृमिजालंकोप्टगतंपातयंत्याशु ॥ ७० ॥ अर्थ-प्रातःकाल उठकर गुड खाना फिर कुछ देरमें बासी पानी में बांटकर खुरासान अजवायन पिये ता को: ठेसे उत्पन्न हुए कृमिको गिरा देता है ॥ ७० ॥ पालाशबीजस्यरसंपिवेदामधुसंयुतम् । लेह्यात्क्षीद्रेणवैडंगंचूर्णवाकिमिळूतनम् ॥ ७१ ॥ अर्थ-पालाशके बीजोंका रस शहदके साथ पिये अथवा बीजोंको बांटकर मटेके साथ पिये तो कृमिरोगका नाश होगा ॥ ७ ॥ भय पाण्डुरोगः। . “पाण्डुरःश्वासकासात पीतत्वङ्नखलोचनः । वम्यग्निसादश्वयथुसहित पांडुरोगवान् ॥ ७२ ।। अर्थ-श्वास काससे आर्तहुआ, पीतशरीर, नख और पाले नेत्रवाला, वमी, अग्निकी मन्दता, शोधयुक्त पुरुष पाण्डुरोगी कहाजाता है, वातादिदोष रक्तमें प्राप्तहो त्व- चाको पाण्डुरंगको करदेते हैं ।। ७२ ॥ द्विपञ्चमूलीकथितंस विश्वं कफात्मकेपाण्डुगदेपिवेत्तम् ।

भापाटीकासमेत ।
,
ज्वरेतिसारेश्वयथौग्रहण्यां
कासेऽरुचौकंठहदामयेषु ॥ ७३ ॥
अर्थ-दशमूलको लेकर उसमें सोंठ मिलाय इनका
काढा कर कफसे उत्पन्न हुए पाण्डुरोगमें पानकरे तो यह
ज्वर, अतिसार, सूजन, संग्रहणी, कास, अरुचि, हृदयादि
दोगों में हितकारी है ।। ७३ ॥
त्रिफलायागुडूच्यावादाानिम्बस्यवारसम् ।
प्रातःप्रातमधुयुतंकामलाःपिवेन्नरः ॥७४॥
अर्थ-त्रिफला, गिलोय, दारुहलदी, नीमका रस, प्रातः
काल शहत मिलाकर पीनेसे कामलारोगनाश होता है ७४॥
अथ रक्तपित्तम्।
क्षारकट्सम्लतीक्ष्णादेर्दग्धपित्तंदहत्यसृक् ।
तदूर्द्धाधोविलैर्यातिरक्तपित्तदुच्यते ॥ ७ ॥
अर्थ-कटु अल्म पदार्थ तथा तीक्ष्णक्षार आदिके सेवन
करनेसे दग्ध होकर पित्त रुधिरको जलाता है तब वह रक्त
ऊर्ध्व वा अधो अथवा दोनों मार्गसे निकलने लगता है,
ऊर्ध्वगामी नासिका नेत्र कान मुखसे और अधोगामी
लिंगयोनि गुदासे निकलता है ॥ ७५ ॥
पकोदुबरकाश्मर्यपथ्याखजूरगोस्तनी।
मधुनाईतिसंलीढारक्तपित्तंनसंशयः ॥ ७६॥
अर्थ-पक्के कठुमरके फलका रस शहदके संम पिये खंभारी
हरड, छुहारा अथवा दान इनको शहदसे चाटे
तो अवश्य रक्तपित्त शान्त होगा इसमें सन्देह नहीं ॥ ७६॥

(५६) वैद्यरत्न। मध्वाटरूपकरणैर्यदितुल्यभागी कृत्वानरःपिबतिपुण्यतरःप्रभाते ! तद्रक्तपित्तमतिदारुणमप्यवश्य- माशुप्रशाम्यतिजलैरिवह्निपुंजः ॥ ७७ ॥ अर्थ-शहद, अडूसा इन दोनोंको बराबर भाग लेकर जो मनुष्य प्रात:काल में पान करता है उसका दारुण रक्त पित्तभी अवश्य शीघ्रतासे शान्न होजाता है, जैसे जलसे अग्नि शान्त होजाती है ॥ ७७ ॥ चन्दनंनलदंलोप्रमुशीरंपद्मकेशरम् । नागपुप्पंचवित्वंचभमुस्तंसशर्करम् ।। ७८॥ हीवरचैवपाठाचकुटजोत्पलमेवच । शृंगवेरंचातिविपाधातकीसरसांजनम् ॥ ७९ ॥ आम्रास्थिजम्बूसारास्थितथामोचरसोपिच । नीलोत्पलंसमंगाचसूक्ष्मेलादाडिमीत्वचम् ८०॥ चतुर्विंशतिरेतानिसमभागानिकारयेत् । तंडुलोदकसंयुक्तंमधुनासहयोजयेत् ॥ ८१ ॥ अर्थ-लालचन्दन, जटामांसी, लोध, खस, कमलफूलका केसर नागकेमर बेलगिरी, नागरमोथा, मिश्री,हीबेरसोना. पाठा, कुरैया, कमल, सोंठ, अतीस, धवके फूल, रसौत आमकी गुठली, जामुनकासार गुठली, मोचरस, नीलक मल, मंजीठ, छोटीइलायची, अनारका छिलका, इन चौ. वीस औषधियोंको बराबर मागले और चावलके जलके संग शहदके साथ चाटे ७८॥१॥ ८० ॥ ८१ ॥ योगंलोहितपित्तानामर्शसांज्वरिणांतथा । मूमिदोपसृष्टानांतृष्णागनांप्रदापयेत् ॥ ८२ ।। -

अथ कासः।
भापाटीकासमेत ।
(५७)
अतीसारंतथास्त्रीणांचापिरजोरहे ।
प्रच्युतानांचगर्भाणांस्थापनंपरिशिष्यते ।
अश्विनोःसंमतोयोगोरक्तपित्तनिवर्हणः ।।८३।।
अर्थ-यह योगरक्तपित्त, अर्श,, व्यर, मूर्छा, मद, तृष्णाको
दूर करता है। अतिसार, छर्दि, स्त्रियोंको रजोधर्म न
होता हो तथा गर्भ गिरताहो तो उसका स्थापन होजाता
है, यह आश्विनेय संमत रक्तपित्तविनाशी योग रक्तपित्तका
नाशकरनेवाला है ।। ८२ ॥ ८३ ।।
प्राणोधुदानमन्वेत्ययदोर्द्धमुपसर्पति ।।
तदासंजायतेकास कंठहनाभिकर्षणः ॥ ८४॥
'अर्थ-जब अपने दोषोंसे कोपको प्राप्तहो प्राण उदानको
साथ मिलकर ऊपरको गमन करताहे तब कंठ हृदय नाभि
को आकर्षण कर खांसी उत्पन्न होतीहै ।। ८४ ॥
पंचमूलीकृतःकाथापिप्पलीचूर्णसंयुतः॥
रसानमनतोनित्यंवातःकासश्चनश्यति॥८॥
अर्थ-शालपर्णी, पृष्ठपर्णी, छोटीकटेरी, बडीकटेरी और
गोखरू इन पांचोंकी जडको कूट पीपलीका चूर्ण मिलाय
खानेसे वातकी खांसी दूर होती है ।। ८५ ॥
हरीतकीकणाशुंठीमरिचंगुडसंयुतम् ।
कासन्नोमोदकाप्रोक्त सचानलप्रदीपनः।। ८६॥
अर्थ-दरड, पीपल, सोंठ, मिर्च, गुड इनको बरावर
लेकर मोदक बना ले यह कासहर मोदक है और अग्निको
दीप्त करता है ।। ८६ ॥
कटफलंकत्तृणंभाजीमुस्तधान्यंवचाभया ।
शुंठीपर्पटकंशृंगीसुरालुचजलेशृतम् ॥ ८७॥

(५८) वैद्यरत्न । मरिचंकपमानस्यात्पिप्पलीकर्पसंमिता। अर्द्धकर्पोयवक्षारकर्पयुग्मंचदाडिमान् ॥ ८८ ॥ एतच्चूर्णीकृतयुंज्यादष्टकर्षगुडेनहि । शाणप्रमाणांगुटिकांकृत्वावक्रेविधारयेत् ॥ अस्याःप्रभावात्सर्वेपिकासायांत्येवसंक्षयम् ॥८९॥' अर्थ-कायफल, पिठवन, भारंगी, मोथा, धनियाँ, वच, हरड, सोंठ, पित्तपापड़ा, काकडाभंगी, देवदारु इन को जल में औटाकर फिर उसमें मिर्च १ कप, पिप्पली एककर्ष, जवाखार आधा कर्ष, दाडिम दोरर्प, यह सब चूर्णकर आठकर्ष गुड मिलावै, शाण (४ मासे) प्रमाण गुटिका बनाकर मुखम धरै, इसके प्रभावसे सब कास क्षय होजाती है ॥ ८७ ॥ ८८ ॥ ८९ ।। लवंगजातीफलपिप्पलीनां भागान्प्रकल्प्याक्षसमानमानान् । पलाईमेकंमरिचस्यदत्त्वा पलानिचत्वारिमहौषधस्य ॥ ९० ॥ अर्थ-लौंग, जायफल, पीपल इनको बराबर भाग लें उसमें आधे पल काली मिर्च और चार पल सांठ डाले२०॥ सितासमंचूर्णमिदंप्रसा रोगाननेकान्प्रथलानिहन्ति । कासज्वरारोचकमेहगुल्म- श्वासानिमांद्यग्रहणीप्रदोपान् ॥ ९१ ॥ फप एकतोला। २ पल ४ तोला। 7

भापाटीकासमेत !
(५९)
अर्थ-इनकी बराबर मिश्री लेकर चूर्ण बनाले तो यह
कास, ज्वर, अरोचक, प्रमेह, गुल्म, श्वास, मंदाग्नि, ग्रहणी-
आदि अनेक प्रबल रोग दूर करता है ।। ९१ ॥
अथ श्यासः।
यैनिमित्तैर्भवेदिकाश्वासस्तैरेवजायते ।
हरीतकीकणाशुण्ठीमरिचंगुडसंयुतम् ॥ ९२ ।।
श्वासनोमोदकःप्रोक्तः परंचानलदीपनः ।
दशमूलीकृत काथःपौकरेणावचूर्णितः॥ ९३॥
अर्थ-जिन कारणोंसे खांसी होताहे उन्हींसे श्वास होजी-
ताहै । हरड, पीपल, सोंठ, कालीमिर्च, गुड यह सम भाग
लेकर इनके मोदक बनाकर खानेसे कास दूरकर आग्निं
दीप्त होती है । अथवा दशमूलका काढाकर पुष्करमूलका
चूर्ण डालकर पिये तो ॥९२ ॥ ९३ ।।
श्वासकासप्रशमनःपार्श्वशूलनिवारणः ।
गुडगुंठीशिवामुस्तेारयेटिकांमुखे ॥ ९४ ॥
अर्थवास, कास, पार्धशल दूर होता है, गुड़, सौंठ,
हरड, नागरमोथा. इनकी गुटिका मुखमें धरै ९४ ॥
श्वासकासेपुसर्वेपुकेवलंवाविभीतकम् ।
कूष्माण्डकशिफाचूर्णपीतकोणेनवारिणा ॥ ९५ ॥
अर्थ-अथवा सप श्वासकासके रोगोंमें केवल मुग्यमें
यहेडा रखना परमाहितहै, पेटा और जटामांसीका चूर्ण
भरमजलके साथ पीनेस ॥ ९५ ॥

.
,
(६०)
वैद्यरत्न ।
शीघ्रंशमयतिश्वासंकासंचैवसुदारुणम् ।
सुरसंशृंगवेरस्यमाक्षिकेणसमन्वितम् ॥
पाययेच्छ्वासकासनंप्रतिश्यायकफापहम् ॥ ९६॥
अर्थ-दारुणकास श्वास शीघ्र नष्ट होजाताहै, अथवा
अदरखका सुरस शहदके साथ पिलानेसे श्वास, कास,
प्रतिश्याय, पीनस और कफरोग दूर होतेहैं ॥ ९६ ॥
शृंगीकटुबयफलात्रयकंटकारी
भाङ्गीसपुष्करजटालवणानिपंच ।
चूर्णपिबेदशिशिरेणजलेनहिका-
श्वासोर्द्धवातकफमारुतपीनसेषु ॥ ९७ ॥
अर्थ-काकडासींगी और हरड, बहेडा, आमला, सोंठ,
मिर्च, पीपल, भटकटैया, भारंगी, पुष्करमूल, जटामांसी
इन पांचोंका चूर्ण कर ठंडे जलके साथ लेनेसे हिचकी,
श्वास, ऊर्द्धवात, कफवात, पीनसादि रोग दूर होने हैं।९७॥
गुडंकटुकतैलेनमिश्रयित्वासमंलिहेत् ।
त्रिसप्ताहप्रयोगेणश्वासंनिःशेपतोजयेत् ।। ९८॥
अर्थ-गुड और कडुआ तेल बराबर मिलाकर चाटनेसे
यह प्रयोग तीन सप्ताहमें श्वासरोग को सम्पूर्णतासे नष्ट
करदेता है ।। ९८ ॥
रसंगंधविपंचैवटंकणंचमनःशिला।
एतानिटकमात्राणिमरिचंचाप्टटंककम् ॥ ९९॥
अर्थ-पारा, गंधक, विष, सुहागा और मनसिलको
समान भाग ले अर्थात् एक एक टंक ले और काली मिर्च
आठ टंक ले ॥ ९९॥

भापाटीकासमंत ।
ता,
एकैकमरिचंदत्त्वाखल्वेसूक्ष्मविमर्दयेत् ।
त्रिकटुकटुपळूचदत्त्वापश्चाद्विचूर्णयेत् ॥ १० ॥
अर्थ-एक एक मिर्च इसमें डालकर- खरलकरताजाय
पछि विकुटा और पीपल, पीपलामूल, चव्य, सोंठ, ची
कालीमिर्च, डालकर इसका चूर्ण करे ॥१००।।
सर्वमेकत्रसंयोज्यकाचकुप्यांविनिक्षिपेत् ।
खासेकासेचमन्दामौवातश्लेष्मामयेपुच ॥ १॥
अर्थ-फिर यह सब एकत्र कर कांचकी मीसी में रख-
छोडे श्वास, कास, मन्दाग्नि, वात लेप्मा रोगमें ॥ १ ॥
गुंजामाप्रदातव्यपर्णखंडेनधीमता।
सन्निपातेपुमूर्छायामपस्मारेतथैवच ॥ २ ॥
अतिमोहत्वमापन्नेनस्यंदधाद्विचक्षणः।
रसःश्वासकुठारोऽयंसर्वश्वासगदप्रणुत् ॥ ३॥
अर्थ-चोटली (गुंजा) मात्र पान के साथ देना चाहिये,
सन्निपात, म ,अपस्मार, अधिक मोह होजाय तो इसकी
नास देनी चाहिये, यह श्वासकुठाररस सम्पूर्ण श्वासरो.
गका दूर करनेवाला है ॥२॥३॥
अप दिया।
विदाहिगुरुविष्टंभिरूक्षाभिष्यंदिभोजनः ।
शीतपानाशनस्थानरजोधूमातपानिलैः ॥ ४॥
व्यायामकर्मभाराबणाचातापतः।
दिकाश्वासश्चकासश्चनृणांसमुपजायते ॥५॥
मधुसावर्चलोपेतमातुलुंगरसंपिवेत् ।
हिकात्तोंमधुनालियाच्छंठोंधानीकणान्विताम् ॥६॥

वैद्यरत्न । . अर्थ-जो पदार्थ दाहकारक, भारी, कम्ज करनेवाले तथा रूखे और कफकारक हैं उनके पीने खानेसे तथा बहुत ठंढे स्थानमें बैठनेसे धूरि धुआं घाम और पवनके सेवनसे मेहनत, बोझ उठाना, रस्ता चलना, मलमूत्रादि के वेगको रोकना, तथा उपवासादिके करनेसे मनुष्यों को हुचकी, कास, श्वास यह रोग उत्पन्न होतेहैं. शहद और सोंचरलोनके साथ विजौरेनींबूका रस पिये अथवा शह- दके साथ सोंठ आमला और पीपलका चूर्ण चाटे॥४॥५॥६॥ तृणामलकशुंठीनांचूर्णमधुसितायुतम् । मुहुर्मुहुःप्रयोक्तव्यंहिकावासनिवारणम् ॥ हिवाश्वासीपिवनाङ्गीसविश्वामुष्णवारिणा॥७॥ अर्थ-सुगन्धि तृण, आमले, सोंठ इनका चूर्ण कर मिश्री डाल शहदके साथ चाटे, यह वारंवार चाटनेसे हिका और श्वासरोग दूर होताहै. भारंगी और सोंठ गरम जलके साथ सेवन करनेसे हिचकी और श्वासरोग दूर होता है॥७॥ श्लेष्माधिक्याव्यवायाःपीडितोयःप्रशुष्यति । कासश्वासार्दितोरक्तंवमेच्छुकेक्षणोज्वरी ॥८॥ अर्थ-श्लेष्मा अधिक होनेसे व्यवायादिसे पीडितहोसखता जाय कासश्वाससे अदितही रक्तकी यमन कर शुक्ल नेत्र हो जाय, ज्वर हो जाय ॥ ८ ॥ अग्निमांद्यतृपायुक्तोरिरंसुसिलोलुपः। विस्वर छर्दिमान्दीनस्सज्ञेयःक्षयपीडितः ॥९॥ तालीशोपणविश्व पिप्पलितुगाकपीमिवृद्धाबुटिः भथ क्षयः ।

. , भापाटीकासमेत । कात्विगपिप्रकामधवलाद्वात्रिंशकासिता । तालीशाद्यमिदंसुचूर्णमरुचावाध्मानमंदानल- श्वासच्य॑तिसारशोपकसनप्लीहज्वरेशस्यते ११०॥ अर्थ-मन्दाग्नि, प्यास, विहारकी इच्छा, मांसलोलुपता, स्वरभंग, छर्दिमान, दीनमन यह लक्षण क्षयवाले मनुप्यके जानने, तालीशपत्र १ कालीमिर्च २ सोंठ ३ पीपल ४ वंशलोचन ५ तोले,दालचीनी छमासे,मिश्री ३२ तोले यह तालीशादिचूर्ण अफारा मंदाग्नि, वास, छथि, अतिसार, शोप, कास, प्लीहा ज्वररोग इसके चूर्ण सेवन करनेसे दूर होते हैं ॥ ९॥ ११०॥ शर्करामधुसंयुक्तंनवनीतंलिहेत्क्षयी। पिवेनागबलामूलंसाईकर्पविवर्द्धितम् ।। ११ ॥ पलक्षीरयुतमांसंक्षीरवृत्तिरनन्नभुक् । एपप्रयोगःपुण्यायुर्वलारोग्यकर परः ॥ १२ ॥ अर्थ-अथवा क्षयरोगवाला मिश्री, शहत और मक्खन यह तीन चीजें मिलाकर चाट तो क्षयरोग जाय छः छ: मांसे बढाता हुआ ककहीकी जडका चूर्ण पिये तो जाय अथवा चारतोले दुग्धयुक्त मांस स्वाय, क्षीरवृत्तिसे रहे, अन्न भोजन नकरे, यह प्रयोग आयु, वल और आरोग्यका करनेवाला है ॥ ११ ॥ १२ ॥ कुकुभत्वङ्नागवलावानरिबीजंसुचूर्णितपकम् । भुक्तंमधुघृतयुक्तंससितंयक्ष्मादिकासहरम् ।। १३ ॥ चूर्णस्वदंनाफलवाजिगन्धा- समन्वितमाक्षिकसंयुतंच। - '. . - (६४) वैद्यरल। क्षीरेणसाईपरिपीयमानं क्षयंचकासंविनिहंतिपुसाम् ॥ १४ ॥ लवंगंशुद्धपूरमेलात्वङ्नागकेसरम् । जातीफलमुशीरंचनागरंकृष्णजीरकम् ॥ १५॥ कृष्णागुरुतुगाक्षीरीमांसीनीलोत्पलंकणा । चंदनंतगरंवालंकंकोलंचेतिचूर्णयेत् ॥ १६॥ समभागानिसवाणिसर्वेभ्योऽसिताभवेत् । लवंगाद्यमिदंचूर्णराजाईवह्निदीपनम् ॥ १७॥ अर्थ-कोहवृक्षकी छाल, ककहीकी जड, शकशि के बीज,चूर्णकर पक्क करके इनको मधु घृतसे युक्त मिश्री ढालकर खाय तो यक्ष्मा और कासरोग दूर होता है. गोखरू, मनफ- लका चूर्ण असगंधका चूर्ण कर इसमें शहद डालकर दूधकै साथ पिये तो क्षय और कासरोग दूर होते हैं. लांग, भीमसेनी कपर, इलायची, दालचीनी, नागकेशर, जाय- फल, खस, सोंठ, कालाजीरा, काली अगर, वंशलोचन, जटामांसी, नीलाकमल, पीपल, वेतचन्दन, तगर, नेत्र- वाला और कंकोल इन अठारह औषधियोंको समान भाग लेकर चूर्ण करे, चूर्णसे आधी मिश्री मिलावे, यह लवंगादिचूर्ण है, यह राजोंके योग्य अग्निको प्रदीप्त करने वाला है ॥ १३ ॥ १४ ॥ १५॥ १६ ॥ ॥ १७॥ रोचनंतर्पणवृप्यंनिदोपानंवलप्रदम् । हृद्रोगकंठरोगंचकासंदिकांचपीनमम् ॥१८॥ यक्ष्माणंतमकंश्वासमतीसारमुरम्मतम् । प्रमेहारुचिगुल्मादिग्रहणीमपिनाशयत ॥ १९॥ अर्थ -यह मचिकर, शगेम्पुष्टिकरना, ग्रीमोगकी शक्ति- - रोग नाश होते हैं।॥ २१ ॥ २९" . . - सतताभ्यासयोगेनवलीपलितनाशनम् ॥ २४॥ अर्थ-सयसे आधी लोहभस्म ले, इन सबकी खरल कर शतावरीके रसकी सात भावना दे, इसको दो या तीन चोटली काली मिर्च और मिश्रीक चूर्णसे दे, यह कुमुदेश्व- ररस राजयक्ष्मा, वातरोग, पित्तरोग, ककरोग और सब ज्वरादिरोगोंका नाश करता है, जैसे देत्योंको जनार्दन नाश करतेहैं। निरन्तर अभ्यास करनेसे वली और भाषाटीकासमेत । ताहै, वात पित्त कफसे दोषोंको दूर कर बल करताहै,हद- रोग, कंठरोग, खांसी, हिचकी, पीनस, खई, तमक, स, अतीसार, अरुचि, प्रमेह, गोला, संग्रहणी, सब रोग दूर होते हैं ॥ १८ ॥ १९ ॥ कुमुदेश्वररसः। पारदंशोधितंगन्धमभ्रकंचसमंमतम् । तदुईदरदंदद्यात्तद‘चमनःशिला ॥ १२० ॥ अर्थ -शुद्धपारा, शुद्धगंधक, अभ्रकमस्म, यह सब समान भाग ले इससे आधा हिंगुल,हिंगुलका आधा मनसिल १२० सर्वार्द्धमृतलोहंचखल्बमध्येविनिक्षिपेत् । दिःसप्तभावनादेयाशताव-रसेनच ॥ २१॥ ततःसिद्धोभवत्येपकुमुदेश्वरसंज्ञकः। सितयामारिचेनाथगुंजाद्विचिप्रमाणतः ॥२२॥ भक्षयेत्प्रातरुत्थायपूजयेदिष्टवताम् । यक्ष्माणमुग्रहन्त्येववातपित्तकफामयान् ॥ २३ ॥ ज्वरादीनखिलानोगान्यथादैत्याजनार्दनः । मा वैद्यरत्न। रसेनतुल्यंकनकंतयोस्तु साम्येनयुंज्यानवौक्तिकानि ।। रसप्रमाणोवलिरंध्रभागः क्षारश्चसर्वतुपवारिणातु ॥ २५ ॥ संमर्थवयंसुविधायगोलं दिनेपचेत्तंलवणेनपूर्ण ॥ भाण्डेमृगांकोयमतिप्रगल्भः क्षयाग्निमांद्यग्रहणीगदेपु ॥ २६ ॥ अर्थ-पारेकी यगावर सोनेके वर्क और दूने मोती परिकी बराबर गंधक और सुहागा जवाखार इन सबको धान्यकी भूमीके जलम एकदिन गरल कर गोला यनाव फिर एक पात्र में निमक भरकर पात्रका मुग्य मंद कर गुन्हे पर बढ़ाये चार पहरकी आग दे नो यह मृगांकरस यने, माद क्षय, मंदाग्नि, संपदणीरोगको दर फरै ॥ २५ ॥ २६ ॥ साज्योपणाभिर्मधुपिप्पलीभि- लोस्वदेयोनततोधिकन्तु । पथ्यंहितंशीनलमेवयोज्यं त्याज्यंमदापित्तकरविदाहि ।। १२७॥ नियोगाम्यामिशिवानंदमहरिगन चन्ने हनीपःमकामः ॥०॥ अर्थ-चारनी फाली मिर्च के चकमंग पाप अथवा पीपल के नृगं और शहदचे माप मक्षण करे यसमय पर पाय हलके पदायोंका भोजन को परन्तु दाह घरनवाले, भापाटीकासमेत । (६७) - पदार्थ न खाय (बैंगन बेलफल तेल करेले न खाय) स्त्री. संग और क्रोधका त्याग करे ॥ २७ ॥ इति श्रीगोस्वामिशिानदभट्टविरचिते वैद्यरस्ने पण्डितज्वालाप्रमाद मिश्रक्तभाषाटीमाया द्वितीयः प्रकाशः ॥ १ ॥ अथारुचिः। अरोचकोभवेद्दोपैर्जिबाहृदयसंश्रयैः ॥ सन्निपातेनमनसःसन्तापेनचपंचमः॥१॥ अर्थ-वातादिदोष, जिह्वा और हृदयमें आश्रित हो मनको विगाडते हैं तब अरुचि होती है अर्थात् शोक भय लोभ और क्रोध आहार तथा गंध इन भेदोंसे. अरुचि पांच प्रकारकी है ॥१॥ अम्लिकागुडतोयंचत्वगेलामरिचान्वितम् ।। अभक्तच्छन्दरोगेपुशस्तंबलावुधारणम् ॥२॥ अर्थ-इमली और गुडके शरबतमें तज इलायची और काली मिर्चका चूर्ण मिलाकर मुखमें धारण करनेसे असनि दूर होती है ॥२॥ कारव्यजाजिमरिचन्द्राक्षावृक्षाम्लदाडिमम् ॥ सीवर्चलंगुडंसीमेपांकार्यावटीशुभा ॥ ३ ॥ अर्थ-करोंजी, जीरा, मिर्च, मुनका, दाग्व, दाडिम, साँचरलोन, गुड और शहद यह सवप्रकारकी अरुचिको दूर करता ॥३॥ बदरास्थिमितासास्येधृताऽरोचकनाशिनी ।। अर्थ-येरकी मींगीकी परावर गुटिका मुयमें धरनेसे अरुचि दूर होती है।

(६८)
वैद्यरल।
अप तृष्णा।
सततंयःपिवेदारिनतृप्तिमधिगच्छति।
पुनःकांक्षतितोयंचतंतृष्णार्दितमादिशेत् ॥ ४॥
अर्थ-जो निरन्तर जलपान करता जाय और उसकी
मृत्ति न हो और वारंवार जलकी इच्छा कर उसे तृष्णासे
अर्दित जाने ॥ ४॥
लाजोदकमधुयुतंपीतश्वेताविमिश्रितम् ।
द्राक्षाखजूरसंयुक्तंपिवेत्तृष्णार्दितोनरः ॥५॥
अर्थ-खीलोके पानीमें शहद और श्वेत कटेरी डालकर
पिये अथवा दाख और खजुरके साथ पान करनेसे तृष्णारोग
शान्त होता है ॥ ५ ॥
नीलाजकुष्ठमधुलाजवटावरोहे:
श्लक्ष्णीकृतैर्विरचितागुटिकामुखस्था ॥
तृष्णांनिवारयतितत्क्षणमेवतीत्रां
मर्यस्पृहामिवयतेःपरमार्थचिंता ॥६॥
अर्थ-नीलोफर, कूठ, शहद, खील, वडके अंकुर इनको
कूटकर इनकी गुटिका कर मुखमें रखनेले तत्काल तीक्ष्ण
तृष्णा दूर होती है यह यतिको परमार्थकी चिन्ताकी समान
तृष्णावाले मनुष्यों को प्रार्थनीय है ॥६॥
अय चर्दिः।
दुप्रैदोपैःपृथक्सर्वेर्वीभत्सालोकनादिभिः ।
छर्दयःपंचविज्ञेयास्ता:पृथग्लक्षणर्मताः ॥७॥
अर्थ-दुष्ट हुप वातादि दोषोसे पृथक २ तीन, एक प्रदी-
पसे और पांचवीं यीमत्स (जिसके देखनेसे मय हो) यह
पोचमकारके लक्षणांवाली छर्दि होती है ॥७॥

भाषाटीकासमेत। कोमलकरंजपत्रंसलवणमम्लेनसंयुक्तम् ॥ याखादतिदिनवदनेछर्दिकथातस्यकुत्रेह ॥ ८॥ अर्थ-कोमल करंजके पत्ते, सेंधानोन यह इमलीके साथ प्रातःकाल प्रतिदिन खानेसे छर्दिका नाम नहीं रहता ॥८॥ एलालवंगगजकेसरकोलमज्जा- लाजाप्रियंगुघनचंदनपिप्पलीनाम् ॥ चूर्णसितामधुयुतमनुजोविलिा छर्दिनिहन्तिकफमारुतपित्तजाताम् ॥१॥ अर्थ-इलायची, लौंग, नागकेशर, वेरकी मींग, खोलें, प्रियंगु, नागरमोथा, लालचन्दन, पीपल इनका चूर्ण कर शहद और मिश्रीके साथ मनुष्य चाटे तो कफवातपित्तसे उत्पन्न हुई छर्दि नष्ट होतीहै ॥९॥ जब्वाम्रपल्लवशृतंझौद्रूदत्त्वामुशीतलंतोयम् ॥ लाजैरखचूर्ण्यपिबेच्छद्यतिसारे पलंसिद्धम् ॥ ३०॥ अर्थ-जामुन और आमके पत्तोंका काढा कर उसमें शहद मिलायं ठंढा कर पिये तो वाखीलोंका चूर्ण कर पिये तो छर्दि अतिसार रोग दूर हो ॥१०॥ अथ मूछा। सुखदुःखव्यपोहाचनरपततिकाप्टवत् । मोहोमू,तितामाहुःपद्विधासाप्रकीर्तिता ॥ ११॥ अर्थ-जय चेतनाकी बहनेवाली नाडी वातादि दोषसे बंद होती है तब एकाएकी सुखदुःखका दूर करनेवाला तमोगुण प्राप्त होता है उसके न जाननेसे मनुष्य काठकी समान गिरजाता है उसको मोह और मृझै कहते हैं वह तीन वातादिदोष चौथी रक्तपांची मदिरा और छठी विषसे होती है ।। ११ ।।

वेद्यरत्न । सेकावगाहोमणयःसुहाराः शीतोपचाराव्यजनानिलाश्च ॥ पुष्पाण्यनेकानिचगंधवन्ति विसानिशस्तानिचमूर्छितेषु ॥ १२ ॥ अर्थ-संपूर्ण मूरोिगमें सेचन, स्नान, मणिहार, लेप, पंखेकी पवन, सुगंधियुक्त शीतलपान तथा कमलनाल शी- तल यह उपचार श्रेष्ठ हैं ॥ १२ ॥ कोलमज्जोपणोशीरकेसरशीतवारिणा। पीतमूर्छाजयेल्लीद्धाकृष्णांवामधुसयुताम् ॥१३॥ अर्थ-बेरकी मींगी, कालीमिर्च, खस, नागकेशर, यह शीतल पानीके साथ पीसकर शहदके और पीपलके चूर्ण- के साथ चाटनेसे मूर्छा दूर होती है ॥ १३ ॥ नासावदनरोधेननस्यै मरिच निर्मितैः ॥ नरंजागरयेद्भूमौमूर्छितंमंदमारुतैः ॥ १४ ॥ अर्थ-मुख और नासिका बंद करनेसे तथा काली मिर्च- की नाश देनेसे तथा पवन करनेसे मूर्छा दूर होती है ॥१४॥ त्वचंप्राप्तःसमानोष्मापित्तरक्ताभिमूर्छितः । दाहंप्रकुरुतेघोरंपित्तवत्तत्रभेषजम् ॥ १५ ॥ अर्थ-समानवायुकी उष्णता पित्तरक्तसे पढकर त्वचामें प्राप्त होकर दाहको उत्पन्न करती है, पित्तकी औषधिकी समानं उसका उपचार करना चाहिये ॥ १५ ॥ शतधौतघृताभ्यक्तोलियात्सतसितावृतम् । पीत्वावेणुत्वचःक्वार्थसौद्रशिशिरंनरः ॥१६॥ अय दाहा।

भापाटीकासमेत ।
(७१)
रक्तसंपूर्णकोष्ठोत्दाहंजयतिदुस्तरम् ।
वाप्याकमलहासिन्योजलयन्त्रगृहाःशुभाः।.
नार्यश्चचंदनाग्यःपित्तदाहहरामताः ॥ १७॥
अर्थ-सौबार पानीसे धोये घृतको शरीरमें मलना अ.
थवा जौके सत्तू मिश्रीके साथ खाना घृतका सेवन करें
अथवा रक्तजदाहमें बांसकी छालका काढा कर शहद मि-
लाकर पिये तो जिसके कोठेमें रक्त भरनेसे दाह हुआ है
वह शान्त होजाताहै काढा ठंडा कर पिये अथवा कमल
फूली हुई बावडी और फुहार छुटते हुए घरोंमें बैठने तथा
चन्दनादि लगाये त्रियों के दर्शनसे दाह दूर होताहै १६॥१७
अधोन्मादः।
मदयंत्युद्गतादोपायस्मादुन्मार्गगामिनः ।
मानसोयमतोव्याधिरुन्मादइतिकीर्तितः ॥ १८॥
अर्थ-अपने २ कारणोंसे बढेहुए वातादि दोष जय
सरल मार्ग छोडके उन्मार्गी होते हैं तब मनको उन्मत्त करते-
हैं इस कारण इस रोगका नाम उन्माद है ॥ १८ ॥
कुष्ठाश्वगंधालवणाजमोदंद्रेजीरकेत्रीणिकटूनिपाठा।
मंगल्यपुष्पीचसमानचूर्णकृत्वाथचूर्णेनवचोद्भवेन १९॥
अर्थ-कूट, असगंध,संधानोन,अजमोद,दोनोंजीरे,सोंठ,
मिर्च, पीपल, पाढ इनकोबराबर ले और इन सबकी बराबर
वच लेय औरोंकी समान शंखाहूलीकी मात्रा ले ॥ १९॥
तुल्येनयुक्तंबहुशोरसेनतद्भावितंब्रह्मविनिर्मितायाः।
सर्पिर्मधुभ्याञ्चततोक्षमात्रंलिह्यान्नरःपष्टिदिनंहिताशी ॥
अर्थ-इनसबका चूर्ण करवामीके रसकी भावनादेइसको
घत अथवा शहदसे ४ टंक साठदिन तक स्वाय तो ॥२०॥

वैद्यरत्न । T (७२) ऐश्वर्यवान्वामनसश्चर्यमेधांचविदेहिगुणंचकालम् । पठेन्नरःश्लोकसहस्रमसातद्वत्प्रयोज्योद्विगुणंक्रमेण ॥२१॥ अर्थ-ऐश्वर्यवान् मनमें धीरता प्रबलता हो सहस्र श्लोक १ दिनमें पठन करनेकी शक्ति हो जाती है, यह दूनी मात्राभी क्रमसे दी जा सकती है ॥ २१ ॥ सारस्वतंचूर्णमिदंप्रदिष्टस्वयंभुवालोकहितार्थमुञ्चैः । दुर्मेधसामुन्मदमानसानामपस्मृतिग्रस्तहृदांसुखाय २२ अर्थ-ब्रह्माने लोकके हितके निमित्त यह सारस्वत चूर्ण बनाया है । कुवाद्विता, उन्माद, अपस्मृति आदि मन- के रोगों में हितकारी है ।। २२ ॥ वद्धंसर्पपतैलाक्तमुत्तानंचातपेन्यसेत् । कपिकच्छ्वाथवातप्तैोहतैलांबुभिःस्पृशेत् ॥ २३ ॥ कशाभिस्ताडयेद्रद्धंस्थापयित्वाऽजनेगृहे । रुध्यात्ततोतिविभ्रांतमेवव्रजतिसत्सुखम् ॥ २४॥ अर्थ-इसमें रोगीको बांधनाचाहिये और तेलका मालिश कर धूपमें खडा करे, कौंचके बीजोंका स्पर्श करावे अथवा तप्तलोह तेल और जलका स्पर्श करावे वा बांधकर मर्मस्था- न बचाकर चाबुकसे ताडन कर बन्दकर रक्खे अप्रिय समा. चार सुना तो उन्मादी आरोग्य होता है ॥ २३ ॥ २४ ।। तमःप्रवेशःसंरम्भोदोपोद्रेकोहतस्मृतिः । अपस्मारइतिज्ञयोगदोवोरश्चतुर्विधः ॥ २५ ॥ अर्थ-अकस्मात अंधकारनेत्रोंके सामने आजाना नेत्र टेढे रना हायपांवका कंपना वातादि दोौके पढनेसे स्मृति अयापस्मारः।

भापाटीकासमेत । (७३) का नाश होना इस प्रकार इसरोगका नाम अपस्मार है यह वात पित्त कफ और सन्निपातके भेदसे चार प्रकारका है२५॥ पुप्योद्धृतंशुनःपित्तमपस्मारघ्नमंजनम् । तदेवसर्पिपायुक्तंधूपनंपरमस्मृतम् ॥ २६ ॥ अर्थ-पुष्य नक्षत्र में कुत्तेका पित्त निकालकर अंजन करना अपस्मार रोग दूर करता है, इसीको घृतमें मिला. कर धूप देनेसे आरोग्यता होती है ।। २६ ।। यः खादेत्क्षीरभक्ताशीमाक्षिकेणवचारजः । अपस्मारंमहाघोरंसुचिरोत्थजयेद्धवम् ॥ अपस्मारविनाशाययट्यासपिवेश्यहम् ॥ २७॥ अर्थ-जो केकल दूधका पान करताहुआ शहदके साथ वचका चूर्ण कर खाय तो महाघोर अपस्मार अवश्य दूर हो जाता है अथवा अपस्मारके नाशकरनेको तीन दिन मुलहटी पान करे ॥ २७ ॥ स्वहेतुकुपितोवातोयद्यदंगग्रहोबली। . तत्तदाख्योबहुरुचःकुरुतेऽशीतिमामयान् ॥ २८ ॥ मापवलाशुकर्शिवीकत्तृणरास्नाचगंधोरुबुकाणाम् । काथोनश्यतिपीतोगमठलवणान्वितःकोष्णः २९॥ अर्थ-अपने कारणसे क्रोधित हुआ वायु जिस जिस अंगको प्रहण करे उस रोगका वही वही नाम होता है। वातव्याधि ८० प्रकारकी है ।। उरद परियारी शकशिम्बी पिठवन रास्ता असगंध परण्ड इनका काढा कर हींग और सेंधानोंन डाल गरम गरम पान करनेसे ॥ २८॥ २९ ॥ अथ यातव्याधिः।

(७४) वैद्यरत्न । अपूहरतिपक्षघातमन्यास्तंभंसकर्णनादरुजम् । दुर्जयमर्दितवातंसप्ताहाजयतिचावश्यम् ॥ ३० ॥ अर्थ-पक्षाघात मन्यास्तंभ कर्णनाद अर्दितवातादि रो. गोंको सात दिनमें अवश्य दूर कर देता है ॥ ३० ॥ सहचरामरदारुसनागरं कथितमंभसितैलविमिश्रितम् । पवनपीडितदेहगतिः पिबन् द्रुतविलंबितगोभवतीच्छया ॥३१॥ अर्थ-वेतकुटक (पियावासा देवदारु सोंठ इनका काढा कर उसमें तेल डालकर वातरोगसे पीडित देहवाला मनु- प्य पान करनेसे शीघ्र रोगरहित हो जाता है ॥३१॥ हिंग्वम्लत्रिकटूग्रपदकटुसटीवृक्षाम्लदीप्याल्लका- पाठाजाज्यजगंधमूलहपुपाद्विक्षारसाराभयम् ॥ हिमाध्माननिबंधव कसनश्वासाग्निसादारुचिप्ली हाशेखिलशूलगुल्मगलहदोधाष्मपांडुप्रणुत् ॥३२॥ अर्थ-हींग अम्लवेत और सोंठ मिर्च पीपल वच पीपल पीपलामूल चव्य सोंठ चीता कालीमिर्च कचूर मामला अजवायन श्वेतआक पाठ कालाजीरा सफेद जीरा अ- सगंध पीपलामूल हाऊवेर सज्जीखार जवाखार वव. खार हरड इन सबको बराबर ले सबका चूर्ण कर सेवन करनेसे हिम आध्मान (अफारा) विबंध, वर्मक, कास- श्वास,मन्दाग्नि, अरुचि, प्लीहा, बवासीर, शल, गुल्म,गल- रोग, हृदयरोग, अश्म (पथरी) और पांदुरोगको दूर करता है ॥ ३२॥ १ जो औषधि दोबार काही जाय सो दुनी भेनी। -

भाषाटीकासमंत ।
तैलमेरण्डजवापिगोमूत्रेणपिवेन्नरः ।
मासमेकंप्रयोगोयंगृध्रस्यूरुग्रहापहः ॥३३॥
अर्थ-जो अंडके तेलमें गोमूत्र डालकर एक महीनेतक
पान करें तो यह गृध्रसी और ऊरुग्रह रोग दूर करता है ३३
तैलंघृतंचाईकमातुलुग्योरसंचचुकंसगुडंपिवेद्या ।
कट्यूरुपृष्टत्रिकगुल्मशूलगृध्रस्युदावर्तहनुग्रहेषु ३४॥
अर्थ-तेल घी अखका रस मातुलुंग (विजॉरेनींबू)
का रस वा अमलवेत और गुड जो इनका पान करै तो
इसके पृष्ठ हंसली त्रिक (पीठका वांसा) गुल्म शल गृध्रसी
उदावर्त हनुग्रहादिरोग दूर होते हैं॥३४॥
हनुग्रहेहनुस्तंभेमन्यास्तंभेदितेपिवेत् ।
दशमूल्यंभसाकृष्णांपिप्पल्या स्वरसेनच ॥ ३५ ॥
अर्थ-हनुग्रह हनुस्तंभ मन्यास्तभ वातरोगमें दशमूलका
काढा कर वा कालीमिर्च और पीपलका स्वरस कर पान
करना चाहिये ॥ ३५॥
रास्माद्विगुणभागास्यादकभागास्तथापरे ।
धन्वयासवलैरंडदेवदारुशटीवचाः ॥३६ !
वासकोनागरंपथ्याचव्यमुस्तापुनर्नवाः ।
गुडचीवृद्धदारुश्चशतपुष्पाचगोक्षुरः ॥ ३७॥
अश्वगंधाप्रतिविपाकृतमालःशतावरी।
कृष्णासहचरश्चैवधान्यकंबहतीद्वयम् ॥ ३८ ॥
एभिःकृतंपिवेत्काथंशुण्ठीचूर्णेनसंयुतम् ।
कृष्णाचूर्णेनवायोगेराजगुग्गुलुनाथवा ॥ ३९॥

वैद्यरत्न । अर्थ-१ रासना दो तोले २ धमासा ३ खरेंटी ४ अंडकी जड ५ देवदारु ६ कपूर ७ वच ८ अडूसेका पंचाङ्ग ९ सोंठ १० हरडकी छाल ११ चव्य १२ नागरमोथा १३ सोंठकी जड १४ गिलोय १५ विधायरा १६ सौंफ १७ गोखरू १८ असगंध १९ अतीस २० अमलतासका गूदा २१ शतावर २२पीपल छोटी २३पियावासा २४धनियाँ २५-२६ छोटीबडी दोनों कटेरी इन छब्बीस औषधोंक काढे में सोंठका चूर्ण मिलाकर अथवा पीपलका चूर्ण मिलाकर अथवा योगराज गूगलके साथ ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ अजमोदादिनावापितैलेनेरंडजेनवा । सर्वांगकंपकुब्जत्वेपक्षवातेचबाहुके ॥ ४० ॥ गृध्रस्यामामवातेचश्लीपदेचाऽपतानके। अंबवृद्धौतथाध्मानेजंघाजानुगतेर्दिते ॥ ११ ॥ शुकामयेमेदरोगेवंध्यायोन्यामयेषुच । महारास्नादिनाख्यातोब्रह्मणागर्भकारणम् ॥ ४२ ॥ अर्थ-अथवा अजमोदादि चूर्णके साथ अथवा अण्डीके तलके साथ इस काढेको पिये तो सर्वाङ्गकंप कुमडापन पक्षाघात अपयाहुक गृध्रसी आमवात श्लीपद अपतानक वायु अण्डवृद्धि अफारा जंघाजानुपीडा शुक्रदीप लिंगरोग वन्ध्यायोनि गर्भाशयके रोग दूर होते हैं । यह महारानादि काथ ब्रह्माजीने गर्भस्थापनके कारण बनायाहै४०॥४१॥४२॥ मथ गुग्गुलुः। रास्नामृतैरंडसुराहविश्वंतुल्येनगाढंपुरुणाविमर्थ । खादेत्समीरीसशिरोगदीचनाडीव्रणीचापिभगंदरीच४३ गिलोय एरण्ड देवदारु सोंठ यह सब ब...

भापाटीकासमेत । (७७) रावर लेअच्छी प्रकार वारीक करके सेवनसे वातरोग शिर- पीडानाडीव्रण भगन्दरादि रोग इससे दूर होते हैं ॥४३ ॥ अथ तेलानि । तैलाढकंसमतुपावुयारिहेम- निर्गुण्डिभास्करशिफाशृतसाधुसिद्धम् । धत्तूरकुटफलिनीविपहेमदुग्धा- रास्नाहयारिकटभीमरिचोपचित्राः ॥४४॥ अर्थ-तिलका तेल ४ सेर इसीकी बरायर भूसीका जल कनेर धतूरा संभालू आक जटामांसी इनका रस निकाल. कर तेलमें औटावे जब तेलमात्र रहजाय और रस जल- जाय तब धतूरा कूठ फूलप्रियंगु विष स्वर्णक्षीरी (पीले दुग्धकी कटेरी) रास्ना कनेरकी जड मालकांगनी काली मिरच गूगल मंजीठ ॥ ४४ ॥ मांसीवचादहनसर्पपदेवदारु- दानिशोरुबुककात्रिफलासमांगाः। पिट्याक्षिपेत्पलमिताविपगर्भमेतत् तैलंसमस्तपवनामयनाशनस्यात् ॥ १५॥ अर्थ-जटामांसी वच चर्चाता सरसों देवदारु दारुहलदी अण्डकी जद त्रिफला यह सप परावर ले पीसकर इसमें डालदे यह औषधी चार २ तोले डाले यह विषगर्मल समस्त वातके रोगोंको दूर करता है ॥ ४५ ॥ विल्बोनिमन्यास्योनाकःपाटलापारिभद्रकः । प्रसारिण्यश्वगंधाचबृहतीकंटकारिका ॥४६॥ पलाचातिवलाचेवश्वदंष्ट्रासपुनर्नवा । एपदिशपलान्भागांश्वतणांभसापचेत 18७॥

(७८):
वैद्यरत्न ।
+
.
पादशेपंपरिस्राव्यतेलपात्रेप्रदापयेत् ।
शतपुष्पादेवदारुमांसीशलेयकंबलाः॥१८॥
चदनंतगरंकुष्ठमेलापर्णीचतुष्टयम् ।
रास्नातुरगगंधाचसैन्धवंचपुनर्नवा ॥ १९ ॥
एपद्विपलिकान्भागान्पेपयित्वाविनिक्षिपेत् ।
शतावरीरसंचैवतैलतुल्यंप्रदापयेत् ॥ ५॥
अर्थ-बेल अरणी अरलू पाढल, नीमको छाल, गंध.
असारणी, असगंध, केटेरी, खरैटी, गंगेरन, गोखरु, सोंठ
यह सब १० पल लेकर ६४सेर पानीमें औटावै जब चौथाई
रहजाय तब १०२४ टंक तेल डाले, सोंठ, देवदारु, बाल-
छड, छारछबीला, वच, चन्दन, तगर,कूट, इलायची, शाल-
पर्णी, माषपणी, मुद्गपर्णी, पीलवनी, रास्ना, असगंध,
संधानोन, यह सब दोदो पल ले पीसकर डाल देव और
शतावरीका रस तेलके बराबर अर्थात चार सेर
डाले ॥ ४६-५० ॥
आजकंयदिवागव्यंक्षीरंदत्त्वाचतुर्गुणम् ।
पानेवस्तौतथाऽभ्यंगेभोज्येनस्येप्रयोजयेत् ॥२१॥
अश्वोवावातभमोवागजोवायदिवानरः ।
पंगुवाभग्नहस्तोवाभमपादोथवानरः ॥ १२ ॥
अधोभोगेचयेवाता:शिरामध्यंगताश्चये।
दन्तशूलेहनुस्तम्भेमन्यास्तम्भेऽपतंत्रके ॥ ५३॥
एकांगग्रहणेवापिसर्वांगग्रहणेतथा ।
क्षीणेन्द्रियानएशुक्राज्वरयस्ताश्चयेनराः ॥ ५४॥

भापाटीकासमेत ।
(७९)
ललजिह्वाश्चबधिराविस्वरामंदमेधसः।
मंदप्रजाचयानारीयाचगर्भनविंदति ॥५५॥
वातात्तावृपणीयेषामंत्रवृद्धिश्चदारुणा।
एतन्नारायणतैलंशस्तंसर्वत्रसर्वदा ॥५६॥
अर्थ-बकरी या गायका चौगुना दूध डालकर मन्द अग्निसे
औटावे सब सिद्ध होजाय तव उतारले इस तेलको
पिये वा मर्दन कर भोजनके प्रथम तेलका लेप करे. घोडे
हाथीके वातरोग मनुष्यके पंगु पीठभग्न वायुआदि रोग
इस तेलसे नाश होतेहै, अर्थात् नीचे के अंगकी वायु, माथेकी
वायु, दन्तशल हनुस्तंभ जावडास्तम्भ गलग्रहइन्द्री,
इन्द्रीक्षीण, नष्टवीर्य, तथा जो मनुष्य ज्वरसे ग्रस्त है,
जीभ फूलना, विकलता मंदबुद्धि, स्त्रीके संतान न होना,
अण्डकोषमे वातरोगहोना, दारुण अंत्रवृद्धि होनी इतने
रोगामें नारायण तेल सब प्रकारसे श्रेष्ठ है ॥ ५१-५६ ॥
चतुःशेरमितेतैलेतिलानांशोधितेमृदा ।
महानिंबार्कनिर्गुण्डीधत्तूरैरंडकस्नुहाम् ॥ १७ ॥
भुंगराजहयार्योश्चरसंशेरमितंपृथकू ।
विपाच्यसाधितं तत्सर्ववातव्यथापहम् ॥५८॥
अर्थ-चारसर तिलौका तेल लेकर, वकायन आक सँभाल
धतुरा अण्ड सेहूंड ॥ ५७ ॥ भाँगरा और कलेर इनके
पत्तोंका एकसेर रस निकाले इनको मिलाय अग्निपर चढ़ा
देजनरसमान जलकरतेल रहजाय तब उतारले यह मालिस
करनेसे सम्पूर्ण वातकी व्यथाको दूर करता है ॥५७॥ ५८॥

(८०) वैद्यरत्न अथ स्वरछन्दभैरवरसः। शुद्धसूतमृतंलोहंताप्यंगंधकतालकम् । पथ्याग्निमंथनिर्गुण्डीयूपणंटंकणंक्षिपेत् ॥ २९ ॥ तुल्यांसमईयेत्खवेदिननिमुण्डिकावैः । मुंडीद्रवैर्दिनैकंतुद्विगुंजांचवटीकृताम् ॥ ६॥ भक्षयेद्वातरोगा?नाम्नास्वच्छन्दभैरवः । रानामृतादेवदारुशुण्ठीवातारिजशृतम् । सगुग्गुलंपिवेत्कोष्णमनुपानसुखावहम् ॥ ६ ॥ अर्थ-शुद्धपारा १ लोहभस्म २ स्वर्णमाक्षिककी भस्म ३ गंधक हरताल जंगीहरड अरणी निर्गुण्डी सोंठ काली मिर्च पीपल सुहागा यह समान भाग लेकर निर्गुण्डीके रसमें १ दिन खरल कर, दोदो रत्तीकी गोली बनाये, इस. को स्वच्छन्दभैरवरस कहतें हैं,यह रस और राना गिलोय देवदारु सोंठ अंडकी जड इन पांच औपधियोंका काढा करके उसमें गूगल मिलाय सेवन करे तो वातरोग दूर होताहे ॥ ५९॥ ६० ॥ ६१ ॥ अथ वातरक्तम्। वाहनाभिरतस्यासृग्दूपयित्व निलोवली। स्पर्शाज्ञत्वमण्डलानिस्फोटनानिविसूचिकाम् ६२॥ अर्थ-दाथी घोडे ऊंट आदिपर सवारी करनेवालेके, तथा दाहक पदार्थ खानेवालेके आहार दग्ध होनेपर देहका रुधिर दूपित हो उठता अर्थात् गरम होजाता है तब त्व. चाका स्पर्श खरखरा और विसचिकाकेसे फोडे पहजाते हैं अर्थात् शरीरमें चकत्ते पहजाते हैं। ६२ ।।

भापाटीकासमेत । (८१) करोत्यंगुलिवैकल्यंवातरक्तमिदंस्मृतम् । कालातिकान्तमेतत्तुकुष्टंभवतिदुर्द्धरम् ॥ ६३ ॥ अर्थ-यही वातरक्त अंगुलीकी विकलता करता है और उपेक्षा करनेसे कालांतरमें दारुण कुष्ठरोग करता है ॥६॥ दा-गुडूचीकटुकोग्रगंधा- मंजिष्ठनिबत्रिफलाकपायः॥ वातास्त्रमुच्चैनवकार्षिकाख्यो जयेच्चकुष्ठान्यखिलानिनृणाम् ॥ ६४ ॥ अर्थ-दारुहलदी गिलोय कुटकी वच मँजीठ नीमकी छाल हरड बहेडा आमला इनका काढा कर पान करनेसे वातरक्त और संपूर्ण कुष्ठरोग दूर होते हैं ॥ ६४ ॥ मंजिष्टारिष्टवासात्रिफलदहनकंटेहरिद्रेगुडूची भूनिम्बोरक्तसारःसखदिरकटुकावाकचीव्याधिघातः। मूर्वादन्तीविशालाकृमिरिपुजटिलावायसीरासपाठा । श्यामानंतापटोलीसमरिचमगधासाधितोऽयंकपायः पीतोहन्यात्समस्तान्सकलतनुगतानतजातान्विकारा- कंडूविस्फोटकादीनलसकविषमश्चित्रपामादिदोपान् अर्थ-मंजीठ नीम अडूसा हरड. बहेडा आमला चीता हलदी दारुहलदी गिलोय चिरायता लालचंदन झेरसार कुटकी वाकुची (सोमराजी) अमलतासका गूदा मूर्वा दन्ती इन्द्रवारुणी वायविडंग जटामांसी काकमाची और पाढ निसाथ धमासा पटोल मिर्च पीपल इन औषधि. योको बराबर ले इनका काढा कर पिये तो सम्पूर्ण शरी. रके रक्तपित्तविकार कण्डू विस्फोटकादि अलसक काठिन चित्रकोढादि सम्पूर्ण विकार दूर होते हैं । ६५ ।। ६

चैधरत्न।
अध स्वस्छन्दभैरवरसः।
शुद्धसूतंमृतंलोहंताप्यंगंधकतालकम् ।
पथ्याग्निमंथनिर्गुण्डीयूपणंटंकणंक्षिपेत् ॥ ५९॥
तुल्यांसमईयेत्खल्वेदिनंनिर्गुण्डिकावैः ।
मुंडीद्रवैर्दिनैकंतुद्विगुंजांचवटीकृताम् ॥ ६ ॥
भक्षयेद्वातरोगात्तॊनाम्नास्वच्छन्दभैरवः ।
रानामृतादेवदारुशुण्ठीवातारिजंशृतम् ।
सगुग्गुलुपिबेत्कोष्णमनुपानसुखावहम् ॥ ६१ ॥
अर्थ-शुद्धपारा १ लोहभस्म २ स्वर्णमाक्षिककी भस्म
३ गंधक हरताल जंगीहरड अरणी निर्गुण्डी सोंठ काली
मिर्च पीपल सुहागा यह समान भाग लेकर निर्गुण्डीके
रसमें १ दिन खरल करै, दोदो रत्तीकी गोली बनाये, इस-
को स्वच्छन्दभैरवरस कहते हैं,यह रस और रास्ना गिलोय
देवदारु सोंठ अंडकी जड इन पांच औपधियांका
काढा करके उसमें गूगल मिलाय सेवन करे तो वातरोग
दूर होताहै ॥ ५९॥ ६० ॥ ६१॥
अध वातरक्तम् ।
वाहनाभिरतस्यासृन्दूपयित्व निलोवली।
स्पर्शाज्ञत्वमण्डलानिस्फोटनानिविसूचिकाम् ६२॥
अर्य-हाथी घोडे ऊंट आदिपर सवारी करनेवालेके,
तथा दाहक पदार्थ खानेवालेके आहार दग्ध होने पर देहका
रुधिर दूपित हो उठता अर्थात् गरम होजाता है तब त्व
याका स्पर्श खरखरा और विसचिकाकसे फोडे पडजाते हैं
-र्धात् शरीरमें चकत्ते पहजाते ६॥ ६२॥

भाषाटीकासमेत । (८१) करोत्यंगुलिवैकल्यंवातरक्तमिदंस्मृतम् । कालातिक्रान्तमेतत्त्कुष्टंभवतिदुर्द्धरम् ॥ ६३ ॥ अर्थ-यही वातरक्त अंगुलीकी विकलता करता है और उपेक्षा करनेसे कालांतर में दारुण कुष्ठरोग करता है ॥६॥ दा-गुडूचीकटुकोग्रगंधा- मंजिष्ठनिवत्रिफलाकपायः॥ वातास्त्रमुच्चैनवकार्षिकाख्यो जयेच्चकुष्ठान्यखिलानिनृणाम् ॥ ६४ ॥ अर्थ-दारुहलदी गिलोय कुटकी वच मँजीठ नीमकी छाल हरड बहेडा आमला इनका काढा कर पान करनेसें वातरक्त और संपूर्ण कुष्ठरोग दूर होते हैं ॥ ६४ ॥ मंजिष्ठारिटवासात्रिफलदहनकंटेहरिद्रेगुडूची भूनिम्बोरक्तसार सखदिरकटुकावाकचीव्याधिघातः। मूर्वादन्तीविशालाकृमिरिपुजटिलावायसीरासपाठा। श्यामानंतापटोलीसमरिचमगधासाधितोऽयंकपायः पीतोहन्यात्समस्तान्सकलतनुगतानतजातान्विकारा- न्कंडूविस्फोटकादीनलसकविषमश्वित्रपामादिदोपान अर्थ-मजीठ नीम अडूसा हरड. बहेडा आमला चीता हलदी दारुहलदी गिलोय चिरायता लालचंदन खैरसार कुटकी वाकुची (सोमराजी) अमलतासका गूदा मूर्वा दन्ती इन्द्रवारुणी वायविडंग जटामांसी काकमाची और पाढ निसोथ धमासा पटोल मिर्च पीपल इन औषधि योंको बराबर ले इनका काढा कर पिये तो सम्पूर्ण शरी. रके रक्तपित्तविकार कण्डू विस्फोटकादि अलसक काठिन चित्रकोढादि सम्पूर्ण विकार दूर होते हैं।। ६५ ।। ६ (८२) वैद्यरत्न अथामवातः। कनकभुजगवल्लीमालतीपत्रमूर्वा- रसगदकुनटीभिर्मर्दितस्तैलयोगात् ।। अपहरतिरसेन्द्र कुष्ठकण्डूविसर्प- स्फुटितचरणरंध्रस्थामलत्वंनराणाम् ॥ ६६॥ अस्यतैलस्यलेपेनवातरक्तंप्रशाम्यति ॥ अर्थ-धतूरेके पत्ते नागवेलके पत्ते, चमेलीके पत्ते मूर्वा इनका रस तथा कूठ और मनशिल इनके संगमें पारा और तेल खूब मर्दन करके लेप करनेसे यह रसेन्द्र कुष्ठ कण्डू विसर्प चरणोंका फटना आदि रोगोंको दूर करता है और शुद्ध शीर होजाता है ॥ ६६ ॥ इस तलके लेप करनेसे वातरक्त रोग शान्त होजाता है। वृद्धेनवायुनानन्नआमोयातिकफाशयम् ॥१७॥ लभ्येतसचनाडीभिरामवातोयमीरितः ॥ कटयूरुजानुजंघासुपृथुशूलरुजाकरः ॥ ६८ ॥ अर्थ-जी मनुष्य प्रकृति वा कालसे विरुद्ध आहार चेष्टा आदि करताहे उस मनुष्यके स्निग्धादि भोजन करने उप- रान्त कसरनआदि करनेसे वायुसे प्रेरित हुआ आम कफा. शयमें प्राप्त होताहै अर्थात छाती कंठ मस्तककी सन्धि प्राप्त होताहै और विना पके नाडियोंमें प्राप्त होता है इसको आमवात कहते हैं कटि अरु जानु जंघामें सूजन शुल होतेहैं ।। ६७ ॥ ६८॥ रास्नांगुडचीमेरंडदेवदारुमहोपधम् । पिवेत्सवांगगेवातेसामेसंध्यस्थिमज्जगे ।।६९ ॥ अर्थ-रास्नागिलोय एरण्डकी मूलदेवदारु सांठका काढा

भापाटीकासमेत ।
(८३)
सर्वांगवात आमवात संधि अस्थि और मज्जामें प्राप्त
'वातरोगमें पिये ॥ ६९ ॥
विशोध्यरण्डवीजानिपिष्वातपायसंपिवेत् ।
आमवातेकटीशूलेगृध्रत्यांचौपधपरम् ॥ ७० ॥
अर्थ-अण्डके बीज शोधकर उन्हें दूध पीसकर पिये
तो आमवात कटिशल और गृध्रसी रोगकी यह परम
औषधी है ॥ ७०॥
एरण्डबीजमज्जासमविश्वाशर्करासहितः ।
गुटिकीकृतःप्रभातेभुक्तःसामानिलंजयति ७१ ॥
अर्थ-अण्डके बीजकी मींग और सोंठ बराबर ले मिश्री
सहित ८ गुटिका कर प्रभातकालमें पिये तो आमवात
रोग दूर होता है ।। ७१ ॥
नागरस्यपलान्यष्टौघृतस्यपलविंशतिः।
क्षीरदिप्रस्थसंयुक्ताखण्डस्याईतुलांन्यसेत् ॥
व्योपत्रिजातकद्रव्यात्प्रत्येकंचपलंपलम् ॥ ७२ ॥
अर्थ-सोंठ आठ पल घी २० पल दो सेर दूध और खांड
पांचसेर लेकर इसकी चासनी करे और सोंठ, मिर्च,पीपल,
तज, पत्रज, इलायची यह प्रत्येक एक एक पल ले ॥७२॥
निदध्याच्चूर्णितंतत्रखादेग्निवलंप्रति ।
आमवातप्रशमनंबलपुष्टिविवर्द्धनम् ।।
वर्ण्यमायुष्यमोजस्यंवलीपलितनाशनम् ।। ७३ ।।
अर्थ-इसका पूर्ण कर सेवन कर तोअग्निवृद्धि हो आम,
वातकी शान्ति और बल पुष्टिकी वृद्धि करनेवाला है
सुन्दर वर्ण करनेवाला मायुष बढानेवाला वली और
पलित नाश करनेवाला है॥७३॥

(८४) वैद्यरत्न अथ शूलम्। दोपै पृथक्समस्तामद्वन्दैःशूलोपधाभवेत् । सर्वेष्वेतेपुशूलेपुप्रायेणपवन प्रभुः ॥ ७४ ॥ अर्थ-वातादि दोषसे पृथक् २ तीन सन्निपातसे एक द्वंद्वज तीन आमजन्य एक इस प्रकार आठ प्रकारका शूल हैं परन्तु आठोंमें वायु सर्वत्र बलवान है बहुधा यह वायुके विना नहीं होता है महादेवके शूलसे इसकी उत्पत्ति है ७४|| अथ परिणामशूलम् । अन्नजीर्यतियच्छूलन्तदेवपरिणामजम् । साध्मानाटोपविण्सूत्रंबंधमष्टविधंतथा ॥ ७९ ॥ अर्थ-और कोप करानेवाले पदार्थोसे कुपित हुआ वायु कफ पित्तम व्याप्त हो शूलरोग उत्पन्न करताहै वह शुल भोजन पचनेके समय होता है इस कारण इसको परिणाम शल कहते हैं उसमें पेटमें अफारा पेटका गुडगुडाना मल मूत्रका रोध विश्राम न पाना इत्यादि लक्षण होते हैं ॥७५॥ करंजीवर्चलनागराणांसरामठानांसमभागिकानाम् । चूर्णकटूष्णेनजलेनपीतंसमीरशूलं विनिहन्तिसद्यः७६॥ अर्थ-करंजुआ, काला नोन, सोंठ और हींग समान भाग लेकर इनका चूर्ण कर गरमजलसे ले तो वातशल .शीघ्र नष्ट होता है ॥ ७६ ॥ चूर्णतुम्बुरुरामठविलवणक्षाराजमोदाभया- वेल्लन्यूपणपुष्कराह्वयकृतकुंभत्रिभागान्वितम् ॥ मन्दोष्णेनजलंनपीतमखिलंशलेसगुल्मोदरा- ध्मानाजीर्णविबंधमामपवनानाहीचशीघ्रजयेत् ७७ अर्थ-नुम्बुरु, हींग,संधानोन,सौचरनोन,विडनोन, जवाः भापाटीकासमेत । खार, अजमोद, हरड, वायविडंग, सोंठ, मिर्च, पीपल, पुष्करमूल, यह सर्व समान भाग ले, इन सबका तीसरा भाग निशोथ लै, इसका चूर्ण कर गरम जलके साथ ले तो सम्पूर्ण शूल गुल्मोदर अफरा अजीर्ण विबंध आमवात अनाहरोग शीघ्र दूर होजाता है ॥ ७ ॥ चूर्णसमरुचकहिंगुमहौपधीनां शुण्ठ्यम्युनाकफसमीरणसंभवासु । हत्पार्श्वपृष्ठजठरातिविसूचिकासु पेयंतथायवरसंनचविइविबन्धे ॥७८॥ अर्थ-कालानौन, हींग, सोंठ, सफेद कटेरीका चूर्ण जलसे सेवन करनेसे कफवात हत्पार्श्वशुल पृष्ठशल जठररोग विसूचिका दूर होती है, यदि मूत्ररोध न हो तो यवके पानीसे इसे सेवन करे ॥ ८ ॥ तुपवारिविनिप्पिएतिलकल्कोप्णपोटली। भाजिताजठरस्योर्ध्वमुट्ठःशुलंविनाशयेत् ।।७।। अर्थ-धानकी भूसीके जलमें तिलका कल्क कर पीसें और उसकी पोटली कर गरम गरम सेक कर तो पेटका शुल दूर हो ॥ ७९ ॥ नाभिलेपानयेच्छूलंमदनंकांजिकादितम् । विल्बरण्डतिले थपिटेरम्लेनपोटली ८० ॥ गिलितहिंगुसघृतंसद्यःशूलंविनाशयेत् । फरंजबीजमजावाभृष्टाशुलंनिकृन्तति ॥ ८ ॥ अब-मेनफलको फोजीमें पीसकर मामिपर लेप करे अथवा येलपत्र और अण्डके पत्ते और तिल इनको का. .

वैद्यरल। जीमें पीस पोटली करे इसका सेक कर और हींग और घी खानेसे शीघ्र शलका नाश करता है करंजुएके बीजोंकी मींगी भूनकर सेवन करे तो शुलको दूर करता है॥ ८०॥ ८१॥ कृष्णाभयालोहचूर्णलिह्यात्समधुशर्करम् । परिणामभवंशूलंसद्योहन्तिनसंशयः ॥ ८२ ॥ अर्थ-पीपल हरड और लोहचूर्ण, इनको वारीक पीस मधु और शर्कराके साथ चाटै तो परिणामशूल शीघ्रही नष्ट होजाता है इसमें सन्देह नहीं ।। ८२॥ नागरतिलगुडकल्कंपयसासंसाध्ययःपुमानद्यात् । उग्रंपरिणामभवंशूलंसप्ताहाजयतिचावश्यम् ॥८॥ अर्थ-तोंठ, पीपल और गुडका कल्क करके दूधमें सिद्ध कर जो नित्य खाय तो सात दिनमें कठिन परिणामशूल नष्ट होजाता है ।। ८३ ।। एरण्डबह्निशम्बूकवर्षाभूगोक्षुरंसमम् । अंतर्दग्धापिवेदद्भिरूप्माभिःपक्तिशूलजित ॥८४॥. अर्थ-अरण्ड, चीता, शंख (घोंघा), पुनर्नवा, गोखरू यह तीनों औषधि समान ले इनमें घोंघेकी भस्म करके गरम जलसे पान करनेसे पक्तिशूल दूर होताहे ॥ ८४ ॥ रसविपगंधकपर्दक्षारोपणसिंधुपिप्पलीविश्वैः । अहिवल्यंबुनिष्टेःशुलेभहरिर्द्विगुंजोऽयम् ।। ८५ ।। अर्थ-पारा, गंधक, विप, यह तीनों वस्तु शोधीहुई कौडीका चूर्ण, जवाखार, पिपलामृल, सुहागा, पपिल, ठ, यह पानके रसमें खरल कर दो रत्ती मात्रा देनेसे ल दूर करता है यह शूलगजकेसरस है ।। ८५ ॥ , भापाटीकासमेत । अथ गुल्मम्। हृद्धस्त्योरंतरेग्रंथिर्जायतेयश्चलाचलः। सगुल्म-पंचधादोपैःसर्वैश्वासृग्भवोपिच ।। ८६ ।। अर्थ-हृदयकमल, वस्ती और पेड़के बीच में चलनेवाली अथवा अचल तथा घटने बढनेवाली जो गांठ होती है उसको गुल्म कहते हैं यह गुल्म पृथक् वातादि दोषसे तीन भकाररका सन्निपातसे चौथा और केवल स्त्रियों के रक्तसे पांचवाँ ऐसे पांच प्रकारका है।॥ ८६ ॥ कुमार्यापक्कपर्णानिद्रोणार्धानिविनिक्षिपेत् । जीर्णागडात्तुलान्तबजलद्रोणद्वयंतथा ॥ ८७ ।। अर्थ-पक्के घीकुवारके पढेका रस आधे द्रोण पुराना गुड १०० पल जल दो द्रोण ॥ ८७ ॥ लोहचूर्णत्रिकटुकंत्रिफलाचयवानिका । विडंगंमुस्तकंचित्रंचतुःसंख्यापलंपृथक् ॥ ८८॥ अर्थ-लोहचूर्ण, सोंठ, मिर्च, पीपल, हरड, बहेडा, आमला, अजवायन, वायविडंग, चीता, दालचीनी, परज, इलायचीके दाने, नागकेशर, यह एक एक पल ले ।। ८८ ॥ चूर्णीकृत्यतताक्षौद्रंचतुःपटिपलंक्षिपेत् । घृतांडेविनिक्षिप्यनिदध्यान्मासमात्रकम् ॥ ८९॥ अर्थ-इन सबका चूर्ण कर ६४ पल शहद मी डाले यह सय औषधी घीके धर्तनम भरकर एक महीनेपर्यन्त धरा रहने दे ।। ८९ ॥ कुमार्यासवमेततुपिवेदह्निकरंपरम् । पांडुश्वयधुगुल्मानिजठराण्यर्शसांरुजाम् ॥ ९ ॥ अर्थ-यह कुमारी मासव एक पल अथवा आधे पल -

वैद्यरत्न
(८८)
पीनेसे अग्नि दीप्त करताहै पाण्डुरोग शोथ गुल्म जठर रोग
गुल्म अर्शरोग ॥ ९०॥
कुष्टप्लीहामकंकंडूंकासंश्वासंभगंदरम् ।
अरोचकंचग्रहणीहद्रोगादींश्चनाशयेत् ॥ ९१ ॥
अर्थ-कुष्ठ प्लीहा आमरोग कण्ड कास श्वास भगन्दर
अरोचक अहणी हदोग यह कुमारी आसव दूर करताहे ९१
वचाभयाविडंशुण्ठीहिंगुकृष्णाग्निदीप्यकान् ।
द्वित्रिपदचतुरेकाएपंचसप्तपलांशकान् ॥ ९२ ॥
चूर्णयबस्नगलितंचूर्णचैतद्यथाबलम् ।
मद्येनोष्णांनावापिपीतंगुल्मानपोहति ॥ ९३ ॥
अर्थ-वच २ भाग हरड ३ भाग वायविडंग ६ भाग
सोंठ ४ भाग हींग १ भाग पीपल ८ भाग चीता ५ भाग
अजवायन ७ भाग इन सब वस्तुओंका चूर्ण कर कपडेसे
छान ले मद्य वा गरम जलके साथ पान करनेसे गुल्मराग
दूर होता है ॥ ९२ ॥ ९३ ॥
शूलार्शःश्वासकासनंग्रहणीदीपनंपरम् ।
हिंगसैन्धववृक्षाम्लराजिकानागरैः समः॥ ९४ ॥
चूर्णगुल्मप्रशमनंस्यादेतद्धिंगुपंचकम् ।
सूक्ष्मंगंधकणापथ्यास्तुल्याआरग्वधांबुभिः ॥१५॥
अर्थ-शूल अर्श श्वास, कास रोगका दूर करनेवाला
ग्रहणीका दूर करनेवाला अग्नि दीप्त करनेवाला है हींग
एक भाग सोंचरनोन अम्लवेत अनारदाना राई सोंठ यह
सब समान ले चूर्ण करे यह हिंगपंचक चूर्ण गुल्मरोगको
दूर करताहे निर्मली, गंधक, पीपल, हरड, अमलतासके
फलका गूदा यह बराबर ले ॥ ९४ ॥ ९५ ॥

भापाटीकासमेत । (८९) मईयेदज्रदुग्धैश्वतन्मापंमधुनालिहेत् ॥ ९६ ।। स्त्रीणांजलोदरंहन्तिपथ्यंशाल्योदनंदधि ।। चिंचाफलरसंचानुपिवेत्संशीलितरसे ।। ९७ ॥ अर्थ-इन सबको थूहरके दूधम खरल करे एक मासे शह- दके साथ चाटे तो यह स्वीका जलोदर रोग दूर करता है दही भात खाना इसपर पथ्य है इसके ऊपर इमलीके फलोंका शीतल रस पान करना चाहिये ।।९६ ॥९७ ।। अथ हृद्रोगः। शोपयित्वारसंदोपाविगुणाहृदयंगताः। हदिवाधांप्रकुर्वन्तिहृद्भोगतंप्रचक्षते ॥ ९८ ॥ अर्थ-वातादि दोष अन्नरसको दृपित करके फिर कुपित हुए हृदययको प्राप्त होकर जो हृदयमें पीडा करते हैं उसको हृद्रोग कहते हैं ॥ ९८॥ घृतेनदुग्धेनगुडांभसावापिबन्तिचूर्णककुभत्वचोये। हृद्रोगजीर्णज्वररक्तपित्तंहत्वाभवेयुश्चिरजीविनस्ते ९९ अर्थ-घृत दृध गुड वा जलके साथ जो कोई अर्जुनवृक्षकी छालका चूर्ण खाय उसके हृद्रोग जीर्णज्वर रक्तपित्त दूर होकर वह चिरजीवी होता ॥ ९९ ॥ चूर्णपुष्करमूलस्यमधुनासहलेहयेव । हल्लासश्वासकासनंहदामयहरंपरम् ॥ १० ॥ अर्थ-पुष्करमूलका चूर्ण शहदके साथ चाटे तो हलास कास श्वासादि तथा हृदयरोग दूर होतेहैं ॥ १०० ।। अयोदरम् । रुद्धास्वेदावाहीनिदोपाःस्रोतांसिसंचिताः । प्राणाश्यपानान्संदूष्यजनयंत्युदरंतृणाम् ॥ १०१।। अर्थ-संचित हुए वातादि दोप पसीने और जलके बहाने वैद्यरत्न । वाली नसोंको रोककर प्राणवायु जठराग्नि और अपान वायुको दूषित करके उदररोगको उत्पन्न करते हैं ।। १०१ ॥ आध्मानंगमनेशक्तिीर्बल्यंदुर्बलाग्निता। दाहस्तंद्राचसर्वेपुजठरे भवतिहि ॥२॥ अर्थ-पेटमें अफारा चलनेमें अशक्ति दुर्बलता मन्दाग्नि दाह तन्द्रा यह सब लक्षण उदररोगमें होते हैं ॥२॥ अथ प्लीहोदरम्। विदाह्मभिष्यंदिरतस्यजन्तोःप्रदुष्टमत्यर्थमसृकफश्च । प्लीहाभिवृद्धिंकुरुतःप्रवृद्धौप्टीहोत्थमेतज्जठरंवन्ति ।। सव्यान्यपाइँयकृतिप्रवृद्धज्ञेयंयकृदाल्युदरंतदेव ॥३॥ अर्थ-जो मनुष्य दाहकारक कफकारक पदार्थीका अति सेवन करता है उसके रक्त कफ अत्यन्त दूषित होकर पढ़ें हुए प्लीहाकी वृद्धि करते हैं उसको प्लीहोदर कहते हैं यह लीहा अर्थात् तापतिल्ली वाई पसलीफे निकट बढती है इसीका भेद यकृदाल्युदर है यह दाहिनी ओर यकृतके दृषित होनेसे यकृतदाल्युदरके नामसे होती है ॥३॥ कुष्ठंदन्तीयवक्षारंपाठविलवणंवचाम् । अजाजींदीप्यकंहिंगुस्वर्जिकांचव्यचित्रकम् ॥४॥ शुण्ठींचोष्णाम्भसापीत्वावातोदररुजापहम् । हिंगुत्रिकटुकंकुष्टंयवक्षारोथसेन्धवम् । मातुलुंगरसोपेतंप्लीहशूलहरंपरम् ॥ ५॥ शरपुंखमूलकरकापीतस्तकेणनाशयत्यचिरात् ।। चिरतरकालसमुत्थंप्लीहानरुद्धमवगाहम् ॥ ६॥ अर्थ-कुठ दन्ती जवाखार पाठा सैंधानोंन कालानॉन सी भापाटीकासमेत। चरनोन वच जीरा अजवायन हींग सजीखार चव्य चीता और सोंठ यह महीन पीस गरम जलके साथ पीनेसे वातो. दर रोग दूर करता है हींग सोंठ मिर्च पीपल कूठ जवा. खार सेंधा इनका चूर्ण विजौरेनींबूंके साथ सेवन करनेसे प्लीहा और शूलरोग दूर होताहे यह बहुत दिनोंके प्लीहाको भी दूर करता है शरफोकाकी जडका कल्क छाछके साथ सेवन करनेसे बहुत पुरानीभी तापतिल्ली दूर होतीहै ४-६॥ सौवर्चलंयवक्षारसामुद्रकाचसैन्धवम् ।। टंकणस्वर्जिकाक्षीरंतुल्यमेकत्रचूर्णयेत् ॥७॥ अर्थ-सोचरलोन,जवाखार, समुद्रलोन, कचलोन, सैन्धव सुहागा, सज्जी, इन सयको बराबर ले चूर्ण कर ॥ ७ ॥ अर्कदुग्धैःस्नुहीदुग्धैर्भावयेदातपेत्र्यहम् ।। ऊर्ध्वाधास्थैःक्रमात्तस्यतत्तुल्यैरर्कपल्लवैः ॥ ८॥ भाण्डेसंस्थाप्यमुल्लिप्तेरुद्धागजपुटेपचेत् । स्वांगशीतंतुसंचूर्ण्यचूर्णमेपांतुमेलयेत् ॥ ९॥ म्यूपर्णसविडंगंचराजिकांत्रिफलामपि ॥ चव्यंचहिंगुसंभृष्टंतकेणायाधथाफलम् ॥ १० ॥ वनक्षाराभिधंचूर्णमुदराणिविनाशयेत् ॥ शोथंगुल्मतथाठीलांमन्दाग्निमरुचिंतथा। पीहायकवाल्याग्या मुदरंचविशेषतः ॥११॥ अर्थ-मन्दारके दूधकी तीन भावना देकर धूपमें सुखावे इसी प्रकार सेहुँडके दूधी तीन भावनादेफिर चूर्णको बरा वर मंदारके पत्ते लेकर थोडे एक हाडीमरखकर उसपर वह चूर्णघरे फिर पत्ते फिर चूर्ण इसप्रकार जमायकर हंडियाका वैद्यरत्न मुख बंद करके कपरोटी करे और सुखाकर गजपुट दे जब स्वयं ठंढा होजाय तब उसे निकालकर आगे कही औषधि- योंका चूण डालै सोंठ मिर्च पीपल वायविडंग राइ हरड आमला बहेडा चवक भूनी हुई हींग इन सबका चूर्ण कर क्षारके साथ मिलावै इस वजक्षारको शक्तिके अनुसार मटेके साथ पिये तो सब उदररोग गुल्म अष्टीला मन्दाग्नि अरुचि प्लीहा यकृत् दाल्युदरादि रोगा का नाश करता है।८-११।। अथ मूत्रकृच्छ्रम्। पृथक्समस्तैस्तैःशुक्रवेगरोधातिघाततः । अश्मयाश्चाप्रतिस्यान्मूत्रकृच्छ्रोरुजाकरः ॥१२॥ अर्थ-पृथकू पृथकू निदानोंसे कुपित हुए वातादि दोष वा सर्वदोष एक साथ कुपित हुए मूत्राशयमें प्राप्त होके मूत्रके मार्गको पीडित करते हैं तब मनुष्य बढे कष्टसे मृत्र करता है ॥ १२॥ मूत्रकृच्छ्र:सयःकृछ्रान्मृयत्रेदस्तिरोधकृत् । काथोगोक्षुरवीजानांयवक्षारयुतः सदा ॥ मूत्रकृच्छ्रेसकृज्जातंसद्यःपीतोनिवारयेत् ॥ १३ ॥ अय-जबकि इसका वस्तिस्थान रुद्ध होजाता है तब यह बहे कष्टसे मृत्र करता है इसी कारण इसको मूत्रकृच्न कहते हैं अय औषधी लिखते हैं गोखमका काढा जवा- खार युक्त पीनेसे मूत्रकृच्छ नत्काल दूर होता है ॥ १३ ॥ एलाश्मभेदकशिलाजपिप्पलीनां चूर्णानितंडुलजलेललितानिपीत्वा । ६

भापाटीकासमेत ।
(९३)
यागुडेनसहितान्यवलोव्यधीमा-
नासन्नमृत्युरपिजीवतिमूत्रकृच्छी ॥ १४ ॥
अर्थ-इलायची पापाणभेद शिलाजीत पीपल इनका
चूर्ण कर चाक्लके जलसे पान कर अथवा गुडके साथ मिला-
कर दे जो निकट मृत्यु आई हो तो भी मूत्रकृच्छ्वाला
जी सकता है ॥ १४ ॥
सितातुल्योयवक्षारःसवकृच्छ्रविनाशनः ।
गुडेनमिश्रितंदुग्धकटूष्णंकामतःपिवेत् ।
मूत्रकृच्छेपुसर्वेपुशर्करावातरोगजित् ॥ १५ ॥
अर्थ-मिश्रीयुक्त जवाखारके खानेसे सवप्रकारके मूत्रकृ.
च्छोंका नाश होता है गुडके साथ दूध मिलाकर कुछ गरम
कर इच्छा पूर्वक पिये तो सम्पूर्ण मूत्रकृच्छ्र और वातरोग
दूर होते हैं ॥ १५॥.
गोकंटकसदलमूलफलंगृहीत्वा
संकुटयतंपलशतंकथिताकपायः ।
पादस्थितेनचजलेनपलानिदत्त्वा ॥
पंचाशतंपरिपचेदपिशर्करायाः ॥ १६ ॥
अर्थ-गोखरू दल मूल और फलके सहित ग्रहण करक
और कूटकर सौ पलका काढा करै जब चौथाई रहजाय
तब ५० पल शकरकी चासनीमें इसको औटावै ।। १६ ।।
तस्मिनघनत्वमुपगच्छतिचूर्णितानि
दद्यात्पलद्धयमितानिसुभेषजानि
शुण्ठीकणात्रुटियवागजकेसराणि
जातीफलंचककुभत्रपुसीफलानि ॥ १७ ॥

(९४) वैद्यरत्न । वंशंपलाष्टकमितिप्रणिधायनित्यं लिह्यात्सुसिद्धमसृतंपलसंमिततत् । हन्यातुमूत्रपरिदाहविबंधकृच्छ्रे मृत्राश्मरीरुधिरमेहमधुप्रमेहान् ॥ १८ ॥ अर्थ-जब यह गाढा होजायतो आगे लिखी औपधिदोपल चूर्ण कर डाले सोंठ पीपल छोटी इलायची इन्द्रजी नाग- केशरजायफल कोहवृक्षकी छाल इन्द्रफला यहसम्पूर्ण औषधि मिलाकर वंशपलाष्टक है इसको सेवन करनेसे अमृतकी समान फल होता है एक पल इसको लेना चाहिये इससे मूबरोध परिदाह मूत्रकृच्छ भूत्राश्मरी रुधिरविकार प्रमेह मधुप्रमेहादि रोग दूर होते ह ॥ १७ ॥ १८ ॥ कुशाकाशःशरोदर्भइक्षुश्चेतितृणोद्भवः । पित्तकृच्छ्रहरंपंचमूलंवस्तिविशोधनम् । एतत्सिद्धपयःपीतंमेदोहंचातिशोणितम् ।।:१९ ॥ अर्थ-कुशा और काशकी जडरामशरडाभईख इन पांचों का काढा कर पीनेसे मूत्रकृच्छ रुधिरविकार दूर होता है १९॥ भधारमरी। निरुध्यमूत्रमार्गयायातनांजनयेदृशम् । कटिवस्तिप्रदेशेषुसाश्मरीतिनिगयते ॥ १२०॥ अर्थ-जो मूत्रमार्गको रोककर बहुत कष्ट देती है काटि और बस्तिदेशमै पीडा देती है वह पथरीकी पीडा जाननी ॥ १२०॥ पीत्वापापाणमित्कार्थसशिलाजतुशर्करम् । पित्ताश्मरीनिहन्त्याशवृक्षमिंद्राशनिर्यथा ।। २१ ।। अर्थ-पापाणभेदका काय शिलाजीत और शर्करा डा.

भापाटोकासमेत ।
लकर पीये तो पित्तकी अश्मरी (पथरी ) दूर होतीह
जैसे वृक्षको वज नष्ट करता है ।। २१ ।।
यवक्षारगुडोन्मिधरसंपुष्पफलोद्धवम् ।
पिवेन्मूत्रविबंधनशर्कराश्मरिनाशनम् ॥ २२ ॥
अर्थ-जवाखार और गुड मिलाकर नारियलके रससे
संयुक्त कर पिये तो भूत्रविबंध शर्करा अश्मरी नाश
होतीहै ॥ २२॥
पापाणभितरुणगोक्षुरकोरुबूक-
क्षुद्रायंक्षुरकमूलकृतःकपायः ।
दनायुतोजयतिमूत्रविधमुग्र-
मुग्राश्मरीमपिसशर्करयासमेताम् ॥ २३ ॥
अर्थ-पाषाणभेद वरुणा वसना गोखरू अण्डकी जड़
भटकटैया दोनों तालमखाना इनको बारीक पीसकर दही-
के साथ पान करनेसे मूत्रविबंध महाअश्मरि शर्करा-
दिरोग दूर होते हैं ।। २३ ।।
यःपिवेगजनीसम्यक्सगुडांतुपवारिणा।
तस्याशुचिरगूढापियात्यस्तंमेटशर्करा ।। २४ ॥
अर्थ-जो गुडसहित तुपके जल (काजी) से हल्दीको
पिये उसकी चिरकालको पथरीभी दूर होती है अर्थात्
चूर्ण होकर निकल जातीहै ॥ २४ ॥
एतैरुपायोंगच्छेदश्मरीयायमोपमा।
तास्थानायुक्तितोनीत्वाछेथेस्थानेविचक्षणः ॥२६॥
अर्थ-यदि,अश्मरी इतने उपायोंसे भी न जाय उस स्था-
नसे युक्तिपूर्वक लेजाकर छेदन करना चाहिये ॥ २५ ॥

(९६) शस्त्रवेत्तासमुच्छिद्यशस्त्रेणोक्तेनदेहिनः । निष्कासयेत्प्रयत्नेननिर्वातंरक्षितस्यच ॥ एवंप्रयातिदुःसाध्याश्मरीदेहक्षयंकरी ॥२६॥ अर्थ-शस्त्रका जाननेवाला युक्तिसे इसको छेदन करें और यत्नपूर्वक उसको निकाल निर्वातस्थानमें रक्षित कर इस प्रकारसे देहकी क्षय करनेवाली पथरा दूर होतीहै ॥ २६ ॥ अथ प्रमेहः। दशपड्वापिचत्वारःकफपित्तसमीरजाः। साध्यायाप्याअसाध्यास्तेप्रमेहाःक्रमशोनृणाम् २७॥ अर्थ-कफसे जो दशप्रकारके प्रेमह होते हैं वे साध्य हैं कारण कि इनकी औषधिक्रिया सम है. छाप्रकारके कफक प्रमेह याप्य है. कारण कि इनमें औषधिक्रिया विषम हैं जैसे कि शीतोपचार पित्तशमनकारक और मांसादिकके बढानेवाले हैं तथा चार प्रकारके वातप्रमेह असाध्य हैं कारण कि वायुविनाशकारक है जिस्से कि यह वायु मजा- दिक गंभीर धातुओंको आकर्षण करनेसे वहुव्याप्तिकारी और शीघ्रकारी है ॥ २७ ॥ चूर्णफलनिकभवमधुनावलीढं हन्तिप्रमेहगदमाशुचिरप्रभूतम् ।। २८ ।। अर्थ-विफलेका चूर्ण मधुके साथ चाटेतो बहुत दिनोंका प्रमेहरोग दूर होता है ॥ २८॥ न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थश्योनाकारग्वधासवम् ।। आनंकपित्थंजबूंचप्रियालंककुभंधवम् ।। २९ मधूकंमधुकंलोघंवरुणंपारिभद्रकम् ।

भाषाटीकासमेत ।
(९७)
करंजत्रिफलाशकभल्लातकफलानिच ।
एतानिसमभागानिश्लक्ष्णचूर्णानिकारयेत् ॥ ३०॥
अर्थ-बडकी छाल गूलरकी छाल पीपलकी छाल सोना-
पाठा अमलतास आम कैथा और जामुनकी छाल, चिरोंजी
अर्जुनकी छाल नागरमोथा मधुयष्टी (मुलेठी) महुएकी
छाल लोधकी छाल वरनाकी छाल कूठ करजुआ हरड बहेडा
आमला कुडा भिलावेके फल यह सव बराबर भाग
लेकर बारीक चूर्ण करै ॥ ३० ॥
न्यग्रोधाद्यमिदंचूर्णमधुनासहलेहयेत् ।
फलत्रयंचानुपिवेत्तेनमूत्रंविशुद्धयति ॥ ३१ ॥
अर्थ-यह न्यग्रोधादि चूर्ण है इसको मधुके साथ चाटै
पीछे त्रिफलेको पान करे इससे मूत्र शुद्ध होताहे ॥ ३१ ॥
एतेनविंशतिर्महामूत्रकृच्छ्राणियानिच। -
प्रशमंयांतियोगेनपिडकाचनजायते ॥ ३२॥
अर्थ-इससे बीस प्रकारके प्रमेह और मूत्रकृच्छ्र शान्त
होजाते हैं और पिडका मी नहीं होतीहे ॥ ३२ ॥
चूर्णनिशायामधुनासमेतंधात्रीफलानांस्वरसेनमिश्रम् ।
प्रलीढमल्पैदिवसैनिहन्तिप्रमेहसंज्ञानखिलान्विकारान
अर्थ-हल्दीका चूर्ण कर उसमें शहद डाल और उसीमें
आमलका स्वरस मिलावै इसको चाटनेसे थोडेही दिनों:
में प्रमेहके सब विकार दूर होजाते हैं ॥ ३३॥

(९८) वैद्यरत्न । पीत्वासक्षौद्रममृतारसंजयतिमानवः । प्रमेहविंशतिविधंमृगेन्द्रइवदंतिनम् ॥ ३४ ॥ अर्थ-शहद और गिलोयका रस पान करनेसे वीस प्रका. रके प्रमेह ऐसे दूर होजाते हैं जैसे मृगेन्द्र हस्तीको मारता. है॥ ३४॥ शाल्मलित्वग्रसःक्षौद्ररजनीक्षौदसंयुतः। पीतोनिहन्तिनिखिलान्प्रमेहानल्पवासरैः ॥३५॥ अर्थ-सेमलकी छाल का रस शहद और हलदीके चूर्णके साथ खानेसे थोडेही दिनों में सब प्रमेहरोग दूर होतेहैं ॥ ३५ ॥ शाल्मलित्वग्रसोपेतंसक्षौद्ररजनीरजः। वंगभस्महरेन्मेहान्पंचाननइवद्विपान् ॥३६॥ अर्थ-सेमलकी छालके रसमें शहद और हल्दीका चूर्ण कर वंगकी भस्मकेसाथ सेवन करे तो सब प्रमेह ऐसे दूर हो. जाते हैं कि जैसे सिंहके सामने हाथी नहीं ठहरता ॥ ३६ ॥ निश्चन्द्रमाभ्रकंभस्मसवरारजनीरजः ।। मधुनालीढमचिरात्प्रमेहान्विनिवृतति ॥ ३७॥ अर्थ-निश्चन्द्र अनकभस्म त्रिफला और हल्दीके साथ शहदसे चाटे तो प्रमेहरोग दूर होते हैं ।। ३७ ॥ हेमांभोघरचदंन त्रिकटुकंधात्रीप्रियालाकुहू । मजानस्त्रिसुगंधिजीरकयुगंशृंगाटकंवंशजम् ।। जातीकोशलवंगधान्यकयुतंप्रत्येककर्पद्वयम्। मूगस्याटप्लंविचूर्ण्यचपय प्रस्थत्रयेसर्पिपः ॥३८॥ अर्थ-नागरमोथा चंदन सोंठ मिरच पीपल आँवला चिरोंजी वेरकी मींगी तज इलायची. तालीसपत्र काला भापाटीकासमेत । (९९) जीरा सफेदजीरा सिंघाडेकी गिरी वंशलोचन जायफल लोंग धनियाँ कपूर दालचीनी यह सब बरावर आठ २ टंक ले सबको कूट पीस कपडछान कर रख छोडे दक्षिणकी चिकनी सुपारी १२८ टंक ले ॥ ३८॥ दद्यागोकुडवंसिताईकतुलांधात्रीवरीद्वयंजली। मन्दामौविपचेद्भिपक्छुभदिनेसुस्निग्धभांडेक्षिपेत् ।। यःखादेदिनशःप्रभातसमयेमेहांश्चजीर्णज्वरम् । पित्तंसाम्लममुक्तुतिगुददृशोर्वक्राक्षिनासामुच॥३९॥ अर्थ-गौका नवीन घृत ४८ टंक ले सफेद मिश्री ८०८टंक पीछे सुपारियोंको खरलमें डाल कूटकर कपरछान कर १२४ टंक दूधमें डालकर मावाकरे पीछे उस मावेको घृत मिला- कर भून पूर्वोक्त सुपारीपाककी विधिसे इसे बनाले अर्थात मन्दाग्निमें इसको पकाले और अच्छे दिन में इसे सुन्दर बर्तन: में रखछोडे जो इसे प्रातःकालको खाय उसको प्रमेह जीर्ण- ज्वर पित्त अम्ल रुधिरविकार गुदरोग दृष्टिरोग मुखरोग नेत्ररोग नासारोग दूर होते हैं ॥ ३९ ॥ मन्दाग्निंचविजित्यपुष्टिमतुलांकुर्याच्चशुक्रप्रदम् । पूगंगर्भकरंपरंगदहरंस्त्रीणाममृग्दोपजित् ॥ ४० ॥ अर्थ-यह मन्दाग्निको जीतकर महापुष्टिवीर्य देताहै यह सुपारीपाकगर्भ करनेवाला रोगहारी.तथा स्त्रियोंके रुधिरः विकारको दूर करता है ॥ ४० ॥ एलांसक'रसितांसधात्रीजातीफलांसक्षुरशाल्मलीकम् । सताभ्रवंगायसभस्मचैतत्संमईयेनुल्यलवंमनीपी १३॥

(१००) वैद्यरत्न । अर्थ-छोटी इलायची भीमसेनीकपूर मिश्री आमले जायफल गोखरू सेमलकी छाल पारा गंधक वंग लोहभस्म सबको समान भाग ले खुब खरल करै ॥४१॥ ततोभवत्येपरस प्रमेहकुठारनामाविदितप्रभावः। निष्काईमात्रोमधुनावलीढोनिहंतिमेहानखिला- नुग्रान् ॥४२॥ अर्थ-तो यह प्रमेहकुठाररस सिद्ध होवे इसमेंसे दो मासे शहदके साथ सेवन करे तो यह सम्पूर्ण प्रमेहरोगोंको दूर करें ॥ ४२ ॥ अथ मंदः। अव्यायामदिवास्वप्नश्लेष्मलाहारसेविनः । मधुरानरसात्प्रायःनेहान्मेदोविवर्द्धते ॥ १३ ॥ अर्थ-कसरतआदि परिश्रमका न करना दिनको सोना कफकारक आहारोंका सेवन मधुर अन्नरस और स्निग्ध सेवनसे बहुधा मेद बढता है ॥ ४३ ॥ मेदोमांसविवृद्धित्वात्स्थूलस्फियुदरस्ततः । अपथोपचयोत्साहोनरोतिस्थूलउच्यते ॥१४॥ अर्थ-मेद और मांसके बढनेस स्थल स्फिक्र उदर धातुः मोके उपचय होनेसे अर्थात सब धातुओंके वढनसे मार्ग बंद होजाते हैं इस कारण धातु पुष्ट नहीं होते और मेद बढता है इससे मनुप्य सय कामकाज करने में असमर्थ - जाता है। ४४॥

भापाटीकासमेत । १०१) मस्तुनासक्तवः पीता मेदोवृद्धिविनाशनाः। विल्वपत्ररसोवापिगात्रदौन्ध्यनाशनः ॥४५॥ अर्थ-दहीके जलके साथ सत्तू पान करनेसे मेदवृद्धिरोग दूर होताहै और बिल्वपत्रका रस गात्रदोर्गध्यको नाश करताहै ।। ४५॥ तिलसर्पपसठीभाङ्गोकुष्टसमंगाभयान्दजलैः। साम्रत्वग्भिर्लेपोमेदोदोर्गन्ध्यनाशनः पुंसाम् ४६।। अर्थ-तिल सरसों सठी भारंगी कूट मंजीठ जंगीहरड नागरमोथा सुगंधवाला इनका आमकी छालसहित लेप कर नेसे पुरुषोंका मंद रोग और दुर्गन्धि रोग दूर होता है ४६ अथ वयथुः । रक्तपित्तकफान्वायुःशिराप्रावाहयेदहिः । शोथंकरोतिनवधादीपक्ष्वेडाभिवाततः ॥४७॥ अर्थ-रक्तपित्त और कफको अपने कारणोंसे दूपित होकर बायु बाहरकी नसोंमें प्राप्त करती है वह नौ प्रकारका शोय होता है वह दोष ताडन और घातसे होता है ॥४७॥ गुडपिप्पलिशुण्ठीनांचूर्णश्वयथुनाशनम् । आमजीर्णप्रशमनंशूलनंवस्तिशोधनम् ॥ १८॥ अर्थ-गुड पीपल सोंठ इनका चूर्ण शोथ रोगका नाश करता है तथा आम अजीर्णको दूर करताहे शुलनाशक और वस्तिशोधक है।॥ ४८ ॥ गुडाकंवागुडनागरंवागुडाभयांवागुडपिप्पलींचा। कर्पाभिवृद्ध्यात्रिपलप्रमाणंखादेन्नरःपक्षमथापिमासम्॥ अर्थ 4-गुड अद्रख वा गुड सोंठ वा गुह जंगीहरड वा गुड पीपली इनको समभाग मिलाकर दोतोले प्रथम दिन खाने-,

(१०५)
वैद्यरल।
से दूसरे दिन चार तीसरे दिन छै चौथे दिन आठ इस प्रकार
दो दो तोले नित्य बढाते जाय जब तीन पलकी मात्रा
होजाय तबसे बीसदिन पर्यन्त उतनाही खाते रहना इस
प्रकार एक मास पर्यन्त यह मात्रा पचजाय तब दूधभात
अथवा यूषभात अथवा मांसरस खाय तब सब प्रकारका
शोथ जाय ॥ ४९॥
शोफप्रतिश्यायगलास्यरोगान्
सश्वासकासारुचिपीनसादीन् ।
जीर्णज्वराग्रिहणीविकारान्
हन्यात्तथान्यान्कफवातरोगान् ॥५०॥
अर्थ-सृजन जुखाम गलेके रोग श्वास कास अरुचि
पीनस जीर्णज्वर बवासीर संग्रहण के विकार तथा दूसरे
कफ वातरोगोंको भी दूर करता है ॥ ५० ॥
कृष्णाग्निविश्वधनजीरककंटकारी-
पाठानिशाकरिकणामगधाजटानाम् ।।
चूर्णकवोप्णसलिलेन विलोड्यपीतं
नातःपरंश्वयथुरोगहरंनराणाम् ॥ ५१ ॥
अर्थ-पीपल चित्रक सोंठ नागरमोथा जीरा भटकटैया
पाठा हलदी गजपीपल पीपली जटामांसी इनका चूर्ण
कर गरमजलके साथ मिलाकर पीनेसे इससे अधिक
शोथ रोगको दूर करनेवाली और औषधि नहीं है ॥५१॥
भय मुष्पवृद्धिः।
अधोगतिवंक्षणतोमुष्कीप्राप्यकरोतिहि ।
दोपात्रमेदोमूत्रांसे सप्तधांडोन्नतिमरुत् ॥ १२ ॥

भाषाटीकासमेत। (१०३) अर्थ-अपने कारणोंसे कुपित हो नीचेको गमन करने वाले शोथ और शूलको करनेवाले जांधकी संधिमें प्राप्त होकर अंडकोशकी चलानेवाली नाडीको पीडित कर उन अंडकोशीको बढाता है उसको अंडवृद्धि कहते हैं वह वातादिदोषसे तीनप्रकार रक्तसे चौथी मेदसे पांचवीं मूत्रसे छठी आंतोंसे सातवीं है ।। ५२ ॥ चन्दनंमधुकंपद्ममुशीरनीलमुत्पलम् । क्षीरपिटैःप्रलेपःस्यादाहशोथेवणापहः ॥५३॥ अर्थ-लालचन्दन महुआ पद्माख खस नीलोफर इनको ले दूधके साथ लेप करनेसे दाह और शोथ दूर होताहै५३॥ रास्नायटयमृतैरंडरलागोक्षुरसाधितः । क्वाथोंचवृद्धिहत्याशुरुवुतैलेनमिश्रितः ॥५४ ॥ अर्थ-रास्ना मुलैठी गिलोय एरण्ड खरेटी गोखरू इनका काढा कर अण्डके तेलमें मिलाय अण्डीके तेलके साथ मलनेसे अंत्रवृद्धि दूर करता है ।। ५४ ॥ वक्षणेदोपजःशोथोत्रनइत्यभिधीयते । भृष्टधेरंडतैलेनकल्कःपथ्यासमुद्भवः ॥ ५५ ॥ कृष्णान्धवसंयुक्तोबनरोगहरःपरः । सद्योमृतस्यकाकस्यमलेनपरिलेपनात् ॥५६॥ अर्थ-जांघकी संधिमें जो दोषोंसे शोथरोग होजाता है उसे न कहते हैं हरडका कल्क कर अण्डके तेलमें भून- ले॥ ५५ ॥ उसमें पीपल और सेंधा डालकर लेप करनेसे अनरोग दूर होता है अथवा तत्काल मरे काककी वीटका बदपर लेप करें ॥५६॥ अथवनः।

वैद्यरल। (१०४) धरोगःप्रयात्याशुरविणेक्तमश्चयः । पकेंत्रदारणंकृत्वाप्रकर्त्तव्यावणक्रिया ।। ६७ ॥ अर्थ-तो तत्काल बदका नाश होजाता है जैसे सूर्यके सामने अंधकार दूर होजाता है और जो पक जाय तो उसे चीरकर व्रणक्रिया करें ॥ ५७ ॥ अथ गलगंडः। निबद्धःश्वयथुर्यस्तुमुष्कवल्लम्बतेगले। महान्वायदिवास्वोगलगंडंतमादिशेत् ॥१८॥ अर्थ-जो सूजन बढकर गले में अण्डकोशकी समान लटकती है वोह महान् वा द्वस्व किती प्रकारका हो उसे गलगण्ड कहते हैं ॥ ५८॥ अथ ग्रंथिः। वातादयोमांसमसृक्प्रदुष्टाः प्रदूष्यमेदश्चतथाशिराश्च ॥ वृत्तोन्नतंग्रंथिमरुक्सशोफ कुर्वन्त्यतोग्रंथिरितिप्रदिष्टः ॥ ५९॥ अर्थ-अतिशय दुष्ट हुए वातादिदोप मांस रक्त मेद और नसोंको दूपित करके गोल ऊंचा गांठसा बंधा हुआ शोष उत्पन्न करते हैं वैद्य उसको ग्रंथि कहते हैं ॥ ९॥ अय गंडमारा। कर्कधुकोलामलकप्रमाणे कक्षांसमन्यागलक्षणेपु । मेदःकफाभ्यांचिरमंदपाकै स्याद्वंडमालाबहुभिस्तुगण्डैः अर्थ-जो मेद और कफ काके कांस्त्र कंधे गरदन गला जंघा और कमरकी संधिमें बडे घेर तथा छोटे बेरके प्रमाण-

भापाटीकासमेत ।
वा आमले सरीखी बहुत दिनों में धीरेधीरे पकनेवाली
बहुतसी गठिं होतीहैं उनको गंडमाला कहते हैं ।। ६० ।।
सर्पपाञ्छणबीजानिशिबीजातसीयवान् ।
मूलकस्यचबीजानितकेणाम्लेनपेपयेत् ॥
गंडानिग्रंथयश्चैवगंडमालाःसुदारुणाः ।
प्रलेपनात्प्रशाम्यन्तिविलयंयान्तिचाचिरात् ॥६॥
अर्थ-सरसों सहजनके बीज सनके बीज अलसी जव
और मूलीके बीज इनको खट्टे मढेमें पीसकर लेप करै तौ
गलगंड ग्रंथि गंडमाला शीघ्रही शान्त हो जाती है ॥ ६१ ॥
अथ श्लीपदः।
श्लीपदःपादशोथास्यान्मेदःकफसमुद्भवः ।
नासाकर्णाक्षिहस्तादावप्याहुःकेप्यमुंपुनः ।। ६२ ।।
अर्थ-अपने २ चिह्नोंको प्रगट दिखानेवाले वातादिक
दोषोंसे मेदमासके आश्रित शोथ उत्पन्न होताहे वह चर-
णमें होनेसे श्लीपद कहाताह कोई कहते हैं कि यह नाक
कान आंख और हाथमें भी होताहै ।। ६२ ॥
धत्तूरैरंडवभूनिर्गुण्डीशिसर्पपैः।
प्रलेपःश्लीपदंहन्तिचिरोत्थमपिदारुणम् ।। ६३ ।।
अर्थ-धतरा एरण्ड संमाल् पुनर्नवा और सहेजना
इनकी जड और सरसोंका लेप दीर्घकालके हुए दारुण
श्लीपदको दूर करताहै ॥ ६३ ॥
अथ विद्रधिः।
पृथग्दोपैःसमस्तैश्चक्षतेनक्षतजेनच।
गुल्मवाद्विदधिःप्रायःस्त्रीस्तनेरक्तविद्रधिः ॥ ६४॥

(१०६)
अय व्रण।
अर्थ-अपने कारणोंसे कुपित हुए वातादि त्वचा मसि
मेदको दूषित कर वेदनायुक्त गोल अथवा लम्बी सूजन उत्पन्न
करते हैं वैध उसको विद्रधि कहते हैं वह वात पित्त कफ सन्नि-
पात क्षतज और रक्त भेदोंले छाप्रकारकी है वह गुल्मवद
होतीहै प्रायः स्त्रीके स्तनमें रक्तविद्रधि होताहै ॥ ६४ ॥
यवगोधूममुद्रुश्चस्विन्नैःपिरैःप्रलेपयेत् ।
विलीयतेक्षणेनैवमपक्कश्चैवविधिः॥६५॥
अर्थ-जो गेहूं मूंग इन्हें पीस गरम कर लेप करनेसे क्षण
मात्रमें अपक्क विद्रधि नष्ट होजातीहै ।। ६५ ।।
एकदेशोत्थितःशोथोत्रणानांपूर्वलक्षणम् ।
दोपैःपृथक्समस्तैश्चरक्तजागंतुजैश्चपट् ॥ ६६ ॥
अर्थ-जो शोथ देहके किसी अंगमें उत्पन्न होताहै वह
व्रणोंका पूर्वरूप है वात पित्त कफ सन्निपात रक्तज और
आगन्तुज इन भेदोंसे छाप्रकारका है ।। ६६ ।।
न्यग्रोधोदुंबराश्वत्थप्लक्षवेतसवल्कलैः।
समर्पिभिःप्रलेपःस्याच्छोथनिर्वापणापरः॥६७॥
अर्थ-बड़ गूलर पीपल पाखर और बेत इनकी छाल
लेकर पानी में पीस उसमें घृत मिलायकुछ गरम कर सुहाता.
२ लेप करें तो व्रण बैठ जायगा ।। ६७ ॥
तैलेनसर्पिपायापिताभ्यांबासक्तपिंडिका ।
सुखोप्णःशोथवान्कार्य उपनाह प्रशस्यते ।। ६८ ॥
अर्थ-अथवा सरसोंके तेलसे वा तसे या दोनोंसे
सकी पिंडी बनाकर कुछ गरम कर लेप का पसीना ले।
रावण दर हो॥६८॥

भापाटीकासमेत । (१०७) रसगंधकयोश्शूर्णतत्सममूढशंखकम् । सर्वतुल्यंतुकंपिल्लंकिंचितुत्थसमन्वितम् ॥ ६९ ॥ अर्थ-अथवा पारे और गंधकका चूर्ण कर उसकी बराबर मुरदासंग ले इन सबकी बराबर कवीला ले उसमें कुछ तूतिया डाले ॥ ६९ ॥ सर्वसंमेलयेद्दत्त्वाघृतसर्वचतुर्गुणम् । पिचुप्लुतंप्रदातव्यंदुप्पत्रणविशोधनम्॥ ७० ॥ अर्थ-इन सबको मिलाकर इससे चौगुना घृत डाले और नीमके पत्ते डालकर यह सिद्ध करके घावपर लगानेसे७०॥ नाडीव्रणहरंचैवसर्वत्रणनिपूदनम् । येवणानप्रशाम्यन्तिभेपजानांशतेनच ॥ अनेनतेप्रशाम्यन्तिसर्पिपास्वल्पकालतः ॥ ७१ ॥ अर्थ-यह नाडीव्रण हरता और सम्पूर्ण व्रण दूर करता है जो व्रण शत औषधियोंसेभी दूर नहीं होते इस घृतसे वह थोडेही कालमें शान्त होजाते हैं। ७१ ॥ सद्योत्रणः । नानाधारामुखैःशस्त्रैर्नानास्थाननिपातितः । भवन्तिनानाकृतयोत्रणास्तांस्तान्निबोधमे ॥ ७२॥ अर्थ-जो अनेकप्रकारके धारामुखशस्त्र शरीरके अनेक स्थानों में लगने से उनसे नाना प्रकारके व्रण होते हैं उनका वर्णन सुनो ॥ ७२ ॥ पट्टसूत्रेणसंपीड्यनिर्वातभवनेस्थितः। लोप्तिकारचयित्वातसमिताया:कलोवामा १३ ॥

(१०८) वैद्यरत्न । अर्थ-तत्काल व्रण होनेपर पवन रहित स्थानमें स्थित ही उसे सूबसे, पीडित कर अर्थात रेशमसे लपेटकर किञ्चित उष्ण आश्चोतनादिक उपाय कर मैदाकी किञ्चित् गरम पुलटिस कर उसपर रक्खे ॥ ७३ ॥ अथवादीप्यलवणपोटल्यास्वेदयेन्मुहुः । संतप्तयातप्तलोहपात्रसंयोगतःक्रमात् ॥ ७ ॥ अर्थ-अथवा अजवायन और लोनकी पोटली कर अग्नि- पर तपेहुए तवेपर उस पोटलीको तपाकर उस व्रणको शोध. न करे ।। ७४ ॥ मुहुर्मुहुर्यथादुःखनप्राप्नोतित्रणीनरः । दूस्विरससिद्धतैलंकंपिल्लकेनवा ॥ ७९ ॥ अर्थ-और वारंवार इस विधि ले सके जिससे व्रणी मनु- ष्यको दुःख न हो अथवा दूर्वाके रसमें सिद्ध किये तेलमें कवीला मिलाकर ।। ७५॥ दात्विचश्चकल्केनप्रधानन्त्रणरोपणम् । तिक्तासिक्यनिशायष्टीनताहफलपल्लवः ।। पटोलमालतीनिंवपण्यशृतंवृतम् ॥ ७६॥ अर्थ-अथवा दारुहलदी,तजके कल्कले प्रधान व्रण रोपण होता अर्थात भरजाता है अथवा कुटकी, मोम, दारुहलदी, मुलहटी, करंजके बीज और पत्ते पटोलपत्र चमेलीके पत्ते नीमके पते इनसे तयार किया तव्रणको भर देता है ७६।। अथ विदीगंसोमणः। आदौभग्नविदित्वातसेचयेच्छीतवारिणा। पंकनालेपनंकुर्याद्रधनंचकुशान्वितम् ।। ७७॥ अर्थ-प्रथम व्रणको भग्नहुआ देवकर शीतल जलसे सेचन करे उसपर कीचका लेप करे और कुशका यंधन दे ।। ७७॥

भापाटीकासमेत ।
आलेपनार्थमंजिष्टामधुकंचाम्लपेपितम् ।
शतधौतघृतोन्मिश्रंशालिपिष्टंचलेपनम् ॥ ७८ ॥
अर्थ-आलेपनके निमित्त मजीठ, मुलहटी, कांजीसे
पीस लगावे अथवा सौबार धोया घृत शालीचावल पीस
उसमें घृत मिलाय लेप करे ॥ ७८॥
अथाग्निदग्धव्रणः।
अमिदग्धेवणेदेयंधातकीचूर्णमुत्तमम् ।
अतसीतैलसंमिश्रंवह्निदग्धव्रणापहम् ॥ ७९ ॥
अर्थ-अग्निदग्धत्रणपर धवका चूर्ण कर लगावे अथवा
उसको अलसीके तेल में मिलाकर लगावे तो अग्निदग्ध
व्रण रोपण होजाय ॥ ७९ ॥
अंतर्धूमविदग्धत्रिफलाचूर्णविमिश्रितंतैलैः।
शोमैःशीघ्रंशमयत्यग्नित्रणमाशुलेपेन ।। ८० ॥
अर्थ-घरका धुआं और जलाकर त्रिफलेका चूर्ण कर
तेलमें मिलाय और उसमें रेशम मिलाकर अग्निवणपर
लेप करनेसे शीघ्र व्रण शान्त होता है ।। ८०॥
अय भगंदरः।
गुदस्यद्वयंयुलेक्षेत्रेपार्श्वतःपिडकार्तिकृत् ।
भिन्नोभगंदरो ज्ञेयः स च पंचविधो मतः ॥ ८ ॥
अर्थ-गुदासे दो अंगुल एक बाजूपर पीडायुक्त फुडिया
होती है वही फूटनेसे भगन्दर होताहे वह पांच, प्रकारका
है, यह रोग भगाकार विदीर्ण करता है इससे, भगन्दर
कहतेहैं ॥ ८॥

वैद्यरत्न। (११०) वटपत्रेष्टकाशुंठीगुडूच्यासपुनर्नवाः । सुपिटा-पिडकोपस्थे लेपः शस्तो भगंदरे ॥ ८२॥ अर्थ-वरगदके कोमल पत्ते पुरानी ईट,सोंठ, गुडूची और पुनर्नवा इनको पारीक पीस भगन्दरकी कच्ची फुलसीपर लेप करे॥८२॥ तिलत्रिवृन्नागदन्तीमंजिष्टाज्यैःससैन्धवैः । सक्षौदैश्चप्रलेपोयंभगंदरकुलांतकृत् ॥ ८३ ॥ अर्थ-तिल, निशोथ, नागदन्ती, मंजीठ, घृत, सेंधव और शहद यह प्रलेप भगन्दरको नाश करता है ।। ८३ ।। करवीरनिशादंतीलांगलीलवणानिभिः । मातुलिंगार्कवत्साद्वैःपक्वतैलंभगन्दरे ॥ ८४ ।। अर्थ-श्वेतकनेर हलदी दन्ती करिहारी संधानोन चीता बीजपूर आक इन्द्रायण इनको तेलमें पाकर भगन्दरपर लेप करें ।। ८४ ॥ अयोपदेशः। हस्ताभिघातान्नखदंतपातादधावनाद्वात्युपसेवनाच्च । योनिप्रदोपाच्चभवन्तिशिश्ने पंचोपदंशा विविधोपचारः अर्थ-उपदंशका लक्षण कहतेहैं कि हाथसे मथन कर नेसे जो झटका लगा है उससे तथा नख और दांतके लग- नेसे तथा अच्छी प्रकार न धोनेसे अतिमैथुन करनेसे और योनिदोपस (गरमी प्रदर रोगवाली) रजस्वला ब्रह्मचा रिणी प्रसंगसे तथा औरमी अनेक प्रकार पांच प्रकारकें उपदंश होतेहैं।। ८५ ॥

भापाटीकासमेत। (१११) त्रिफलांमापसंयुक्तांसमांशांमधुसंयुताम् । उपदंशेप्रलेपोयंसयोरोपयतिव्रणम् ॥ ८६ ।। अर्थ-त्रिफला उडद बराबर कढाईमें जलाय उसकी राख शहदमें मिलाकर लेप करनेसे उपदंशके व्रण भर जाते हैं ।। ८६॥ करंजनिंबार्जुनशालजंबू- वटादिभिःकल्ककपायसिद्धम् ॥ सर्पिनिहन्यादुपदंशदोपं सदाहपाकस्तुतिदाहयुक्तम् ॥ ८७ ॥ अर्थ- करंज नीम अर्जुन शाल जामुन वटादि वृक्षोंकी छालका कल्क कर काढा बनाय घृत डालकर सिद्ध करें इसके सेवनसे उपदंश दोष दाह पाक स्रुति दाह सब दूर होते हैं ।। ८७ ॥ रसआकारकरभोलवंगंमरिचंतथा । विडंगमस्तकीचैतत्प्रत्येकंबिलवंमतम् ।। ८८ ॥ अर्थ-पारा और अकरकरा लौंग काली मिरच वाय- विडंग मस्तकी यह प्रत्येक ३ तीन भाग ले ।। ८८॥ अरुष्कराणांदातव्याद्विगुणात्वेकविंशतिः। दीप्यस्यद्वादशलवागुडस्यापितथामताः ॥ ८९ ॥ अर्थ-और उससे दुगुने भिलावे इक्कीस ले अजवायन बारह भाग और इतनाही गुड ले ।। ८९ ।। युत्त्यासंमेल्यगुटिकांखादेत्कर्पद्वयोन्मिताम् । पथ्यंदुग्धोदनरम्यतांबूलंपरिशीलयेत् ॥ घसाणामेकविंशत्यामुच्यतेतूपदंशतः ॥९०॥ .

(११२) वैद्यरत्न । अर्थ-इनकी युक्तिसे गुटिका बनाकर प्रतिदिन एक कर्ष खाय दूध चावल भात इसमें पथ्यहै तथा ताम्बूल भी पथ्य है २१ इक्कीस दिन सेवनसे उपदंश रोग दूर होताहै ॥ ९०॥ अथ विसर्पः। क्षुद्रपामाकृतिदेहेपरितःपरिसर्पणात् । विसोजायतेजतोस्तोदस्रावरुजाकरः ॥ ९१ ॥ अर्थ-क्षुद्र पामारोगकी समान देहमें सर्वत्र फैलनेसे विसर्परोग कहलाता है इसमें सुई चुभनेकीसी पीडा और नाव तथा पीडा होतीहै ॥ ९१ ॥ अग्निदग्धइवस्फोटादेहिनस्स्युर्वराननाः। क्वचित्सर्वत्रदेहेपु रक्तपित्तसमुद्भवाः॥ ९२॥ अर्थ-अग्निसे दग्ध हुएकी समान फोडे शरीरमें होते हैं और ज्वरयुक्त रक्तपित्तसे उत्पन्न हुए कभी सवदेह में होतेहैं९२ विसर्पआदावुचितोखप्तेकोवमिविरेकञ्चविरूक्षणंच । तथापतृप्ति विसर्परोगेसंस्नेहनंशस्तमितिठ्ठवंति ९३ अर्थ-विसर्पकी आदिमें रक्तका सेक उचित है यमन विरेचन तथा रूखापन शरीरमें लाना चाहिये यदि इस्से तृप्ति न हो तो स्नेहन क्रिया करनी उचित है ॥९३ ।। प्रच्छईनंराट फलंकलिंगंपथ्यान्वितंसर्वविसर्पहारि। शिरीपयष्टीनतचंदनैलामांसीहरिद्राद्रुमकुष्ठवालेः॥९॥ लेपाससर्पिःप्रणुदत्यवश्यविस्फोटदाहज्वरकान्विसन्ि अर्थ-वमन विसर्पको नाश करती है पटोल कुडा छोटी हरड सहित लेप करनेसे सब विसर्परोग दूर होते हैं शिरः

भापाटीकासमेत।
स मुलेठी तगर चन्दन इलायची बड़ी जटामांसी हल्दी
दारुहलदी कूठ सुगंधवाला इनको कूटकर लेप करनेसे
विस्फोटक दाहबर और विसर्परोग दूर होताहै ॥ ९४ ॥
अमृतवृपपटोलमुस्तकंसप्तपर्ण
खदिरमतिसवेत्रनिवपत्रहरिद्र ।
शृतमितिसविसर्पकुष्टविस्फोटकंडू-
सपनयतिमसूरीशीतपित्तज्वरंच ॥ ९५ ॥
अर्थ-आमला वासा पटोलपत्र नागरमोथा सप्तपर्ण
विजयसार खेर कालावेत नीमके पत्ते दोनों हलदी इनका
चूर्ण कर धीमें सान लेप करे तो विसर्प कुष्ठ विस्फोटक
कण्डू मसूरिका शीत पित्तज्वरको दूर करता है ॥ ९५ ॥
अथ स्नायुः।
शाखासुकुपितादोपाःशोथंकृत्वाविसर्पवत् ।
कुर्युस्तंतुनिभान्कीटान्नायवस्तेनिरूपिताः ॥१६॥
अर्थ-शाखा (हाथ पैर ) में कुपित हो वातादि दोष
विसर्पकी समान तन्तुके आकार कीटको उत्पन्न करते हैं
उनसे स्राव होताहे यह स्नायुरोग है ।। ९६ ।।
बब्बलबीजंगोमूत्रपिटइंतिप्रलेपनात् ।
मायुकानिसमस्तानिमशोथसरुजानिच ।। ९७ ॥
अर्थ-पालके पीज गोमूत्रमें पीसकर लेप करे तो सम्पूर्ण
म्नायु और शोधरोग दूर होताहे ॥ १७ ॥
गन्यंसर्पिम्यहंपीत्वानिर्गुण्डीस्वरसंत्र्यहम् ।
पिवसायुकन्यायः ॥२४॥

वैद्यरल। अर्थ-तीन दिन गौका घी और निर्गुण्डीका स्वरस पान करनेसे अवश्य महास्नायुरोग दूर होता है इसमें सन्देह नहीं ॥ ९८॥ अहिंस्रामूलकल्कस्यप्रलेपनायुकंजयेत् । पारावतपुरीपस्यमधुनाकल्कितस्यच ॥ गिलितागुटिकाहन्तिनायुकामयमुद्धतम् ॥ ९९॥ अर्थ-कलाज के मूलका कल्क (पीसकर शीतल जलसे ) लेपना स्नायुरोगको दूर करता है अथवा कबूत- रकी विष्ठामें मधुका कल्क कर गुटिका सेवन करनेसे स्नाय रोग सर्वथा दूर होताहे ॥ ९९ ।। अथ मरिका। मसूराकृतिसंस्थानाःपिडकास्युर्मसारकाः । आसां पूर्व ज्वर-कंडूर्गात्रभंगोऽरतिभ्रमः ॥ १०० ।। अर्थ-दुष्ट पवन और जल तथा क्रोधित ग्रहकी दृष्टिसे देहमें बढे हुए दोष दुष्टरक्तसे मिलकर मसूरके आकार फफोलोंको उत्पन्न करते हैं उनको मसृरिका कहते हैं इनके होनेके समय ज्वर खुजली शरीरमें ऐंठन अरुचि भ्रम त्वचाम सूजन और भ्रम होता है ।। १०० ॥ वानीरविल्वजनितंकथितंपयुपितमुत्तरेदिवसे । चैत्रस्यपापरोगोनभवतिपिवतांकचिन्नृणाम् १० ॥ अर्थ-वेत और वेलका काय कर उसे वासी कर दूसरे दिन पान करनेसे मनुप्पको कमी ममूरिका रोग नहीं होता ॥ १०१॥ चिंवाफलेनसहितांरजनींप्रपेष्य येशीतलेनसलिलेनसत्पिवन्ति ।

भापाटीकासमेत। (११५) तेपाभवन्तिनहिशीतलिकाःशरीरे कार्यत्विदंप्रथममेवतदुद्भवस्य ॥ २॥ अर्थ वा चिचा (तिन्तिडी) के फलके साथ हलदी पीसकर जोकवारभी शीतल जलसे पान करते हैं उनके शरीरमें शीतला नहीं होती यह माता निकलनेसे पहले ही करना चाहिये ॥ २ ॥ स्तवपाठःसिद्धमंत्रजपैहविधानतः । शीतलाराधनैश्चंडीपाठेश्चैतामुपाचरेत् । अयमेवविधिःकार्य कोदवाख्यामयेपिच ॥३॥ अर्थ-स्तुतिपाठ सिद्धमंत्रजप ग्रहके विधानसे शीतला आराधन तथा चण्डीपाठसे उपचार करना चाहिये यही विधि कोद्रव नामक रोगमें करे ॥ ३ ॥ अभ्यंगधौतांबरधारणानिश्मश्रुक्रियामंगललेपकृत्यम् । वाधारवादीनिचतद्दासँगेहेऽप्रशस्तानिवदंति संतः४॥ अर्थ-तेल मलना धुए वस्त्र पहरना हजामत करानी मंगल लेपकृत्य बाजोंके शब्दादि करने इसमें अच्छे नहीं हैं ऐसा सन्त कहते है ॥ ४॥ अथाम्लपितम्। अविपाककुमक्लेदतिक्ताम्लोद्वारगौरवैः । दाहोद्गलयोश्चैवारुचिःस्यादम्लपित्तके ॥५॥ कूष्माण्डमथचानीयपकंतत्खंडकानिच । निस्त्वचानिविधायाथरससेरमितेबुनि ॥६॥ पाचयित्वाततःकुर्यात्कसारंतस्यगोघृते । नालिकेरस्यमज्जानप्रस्थमात्रमहोज्ज्वलम् ।। पिष्ट्वागोपयसातस्यकसारंगोघृतेचरेत् ॥ ७॥ वेदसेरमितेदुग्धेमस्थद्वयमितासिताम् । -

वैद्यरत्न ।
निक्षिप्यपाककृत्वातुकसारीतवनिक्षिपेत् ।
शृंगाटकंत्रुटिंचोरमुस्तंचतजपत्र ॥ ८॥
कसेरुपर्पटीशीरधान्यकंगोस्तनीमपि ।
श्रीखंडंचूर्णितंकृत्वापंचटकमितपृथक् ॥९॥
तच्चूर्णनिक्षिपेत्पाकेखादेत्तंपल सम्मितम् ।
यदम्लपित्तनगतंयुतैर्नानाविधीपधैः ॥
असाध्यमपितत्तूर्णनश्यत्यस्यनिपेवणात् ॥ ११०॥
अर्थ-मोजनका न पचना एकसाथ घबराहट होनी
कडवी और खट्टी डकारोंका आना देहमें गुरुता हृदय
और कंठमें दाह अरुचि इन लक्षणोंसे अम्लपित्त जाने
पेठेको ले उसे छीलकर छम्सेर जलमें पकाव उसे पकाकर
गांके धीमें उसका पाक करे फिर उसमें नारियलकी मींग
(गोला) एक सेर डाले गौके दूधसे पीसकर उसका पाक
गांके वीमें मिलादे फिर चार सेर गौके दूधको ले दोसेर
मिश्री ले उसकी चासनी कर उस पाकको उसमें डालदे पीछे
सिंघाडेके मींग छोटी इलायची काली सठी नागरमोथा
तज पत्रज कसेरु पर्पटी खस दाख और चन्दनका चूरा
यह सब औषधी पांच पांच टंक लेकर इस चूर्णको उस
चासनी में डाले एक पल: प्रतिदिन इसका सेवन करे जो
अम्लपित्त अनेक प्रकारकी औषधियोंके करनेसे न गया हो
वह इसके सेवनसे असाध्य अम्लपित्त भी नष्ट होजाता
है।५॥६॥७॥ ८॥ ९ ॥१०॥
अभयापिप्पलीदाक्षासिताधन्वयवासकम् ॥
मधुनाकंठहृद्दाहमूश्लेिप्माम्लपित्तनुत् ॥ ११॥
गुडकूष्माण्डकचैवतथाखण्डामलक्यपि ।
गुडक्षीरकणासिद्धसपिरत्रप्रयोजयेत् ॥ १२॥

भाषाटीकासमेत । (११७) . अर्थ-हरड पीपल दाख मिश्री जवासा यह शहद के साथ सेवन करनेसे कंठरोग हृदयरोग दाह मूर्छा श्लेम और पित्त- रोग दूर करता है गुड पेटाखांड आमलकी वागुड दुग्ध और पपिलमें सिद्ध किया वृत इसमें प्रयोग करे ॥ ११ ॥ १२ ॥ अधोदई। वरटीदंशवदेहेकंडूलःशीतपित्तजः । उदःसपृथक्प्रोक्तउत्कोठोभूरितोदवान् ॥ १३ ॥ अर्थ-शीतपित्तते शरीर में ततैयाके काटनेकी समान ददोरे चमडेके बाहर होजाते हैं उसमें खाज और सुईछे- दनेकीसी पीडा होतीहै उदई ।। १३ ।। मेथिकांमरिचंरायिवानीकारवीमपि । अहित्थमेतान्यादायपृथक्पल मितानितु ॥ १४॥ वलिंपलद्वयमितंगोसर्पिःक्षीरशोधितम् । चूर्णविधायसर्वेपामाईकस्यरसेनतु ॥ १५ ॥ विधायगुटिकामेकांपा टंकद्वयोन्मिताम् । प्रत्यहंप्रातरश्नीयादुददेविनाशिकाम् ॥ १६ ॥ अर्थ-मेथी, कालीमिर्च, हल्दी, अजवायन, कलोंजी, अहिफेन (अफीम) यह पृथक् पृथक् चार २ तोले ले गन्धक दो पल लेकर गौके दूध वा धीमें शोधकर इन सबकाचूर्ण कर अदरखके रसके साथ इसकी गुटिका बनाय ढाई टंक प्रतिदिन खाय तो उदर्दरोग दूर हो ॥ १४ ॥ १५ ॥ १६ ॥ थासर्पिःसैंधवाभ्यक्तदेहश्चारक्तकंबली। शयीततस्यशाम्यतिशीतपित्तादयोगदाः॥ १७॥ अर्थ-जो सेंधा, वृन मिलाकर देहमें मल काला कम्बल ओढ शयन करे उसके शीतपित्तादि रोग शान्त होतेहैं १७॥

(११८) वैद्यरत्न । घृतगैरिकसिंधूत्थकुसुम्भकुसुमैःसमैः । उद्वर्तनंप्रशंसन्तिकोठोद दिनाशनम् ॥ १८॥ अर्थ घी, गेरु,सैंधानोन,कुसुम्भके फूल इनको बराबरले इनका उद्वर्तन करनेसे कुष्ठ उदर्द आदि नाश होजातेहैं १८॥ सगुडंदीप्यकंयस्तुकिंचित्कटुकतैलकम् । भक्षयेत्तस्य नश्यंतिसोदःकोठसंज्ञकाः ॥ १९ ॥ अर्थ-जो मनुष्य गुड, अजवायन, कुछ कडवे तेलके साथ भक्षण करै उसके उदर्द कोठ आदि रोग दूर होने हैं ॥१९॥ अथ कुष्टम् । अत्युग्रपातकाहारधर्मश्रमविरकिनाम् । कुष्ठान्यष्टादशनृणांजायतेचोग्रकर्मणाम् ।। १२० ॥ अर्थ-उम्रपातक विरुद्धभोजन गरमी धूपमें रहनेसे श्रम और विरेचन अधिक करनेसे उपकर्मवाले मनुष्यों के शरी; रमें अठारह प्रकारके कोढ उत्पन्न होते हैं ॥ १२० ॥ पथ्याकरंजसिद्धार्थनिशावल्गुजसैन्धवः । विडङ्गसहितैःपिटैलेंपोमूत्रेणकुष्टजित् ॥ २१ ॥ अर्थ-हरड, करंजुमा, सरसों, दारुहलदी, लाल न्दन, संधव, वायविडंग, इन सबको चूर्ण कर गोमूत्रके साथ लेपन करनेसे कोढ दूर होतेहैं ॥२१॥.. एलाकुष्ठविडंगानिशताहाचित्रकोवला । दंतीरसांजनचेतिलेपाकुष्टविनाशनः ॥ २२ ॥ अर्थ-बड़ी इलायची,कठ, वायविडंग, सौंफ, चित्रक, ख. रंटी, दन्ती, रसात इनकालेप करनेसे इष्ट दूर होताहे २२ ॥

भापाटोकासमेत।
(११९)
भल्लातकसहकंत्रिफलावारिणाक्षिपेत् ।
द्रोणमात्रेपचेतावद्यावत्पादावशेपितम् ॥ २३ ॥
अर्थ-एक सहस्र भिलावे त्रिफलेके जल में डाले और
१०२४ तोले जलमें पकावे जब चौथाई शेष रहजाय ॥२३॥
शर्करायादशपलान्येकबाकुचिकापलम् ।
तथैवात्रचदेयानिपलानिदशगुग्गुलोः॥२४॥
अर्थ-तब उसमें ४० तोले मिश्री डाले ४ तोले सोमराजि
ले और इसीप्रकार ४० तोले गूगल डालै ॥ २४ ॥
खदिरारिष्टमंजिष्ठाबीजकंचेन्द्रवारुणी।
चित्रकंटेहरिद्रेचदेवदारुहरीतकी ॥ २५ ॥
भाींचेतिचसर्वेषांप्रत्येकंचपलाईकम् ।
प्रक्षिप्यगुटिकाकार्यानानासवांगसुन्दरी ॥ २६ ॥
अर्थ-खरसार नीमकी छाल मजीठ विजीरा इन्द्रायन
चीता दोनों हलदी हरड देवदारु भारंगी यह सब औषधी
दो २ तोले ले उस चासनी में डालकर सर्वांगसुंदरी
नामवाली यह गुटिका बनावै ।। २५ ।। २६ ।।
प्रत्यहंभक्षयेत्कुष्टीत्वेतांबदरमात्रया।
सर्वाण्येवोग्रकुष्ठानिशीघ्रमेवव्यपोहति ॥ २७ ॥
अर्थ-कुष्ठी बेर प्रमाण इसको प्रतिदिन खाय तो बहुत
शीघ्र सब प्रकारके कुष्ठोंको दूर करतीहै ॥ २७ ॥
शरपुंखारणीकृष्णधत्तूरार्कमकोरिकाः।
निर्गुण्डीहिंसिकाशम्यउस्बूकस्तथैवच ॥ २८ ॥
अर्थ-शरफोका धमासा काली मिरचधतुराआक मकोय
सिन्दुवार जटामांसी अमलतास लाल एरण्ड ॥ २८ ॥

(१२०) वैद्यरन । एपांत्वचःसमाश्छायाशुष्का कृत्वाततोभिपक् । तैलंपातालयंत्रेण निष्कास्यप्रत्यतुतत् ॥ २९ ॥ अर्थ-इनकी छाल लेकर छायामें सुखावै और इनका पातालयन्त्रसे तेल निकाल ले ॥ २९ ॥ खादेन्मापमितंकुष्ठीमंडलाव्यिकायवान् । शुद्धसूतसमोगंधोमृतायस्ताम्रगुग्गुलुः ॥ १३० ॥ त्रिफलाचमहानिवश्चित्रकश्चशिलाजतु । इत्येतच्चूर्णितंकुर्यात्प्रत्येकंपलसंमितम् ॥ ३१ ॥ चतुःपष्टिकरंजस्यवीजचूर्णफलानिवै । तावद्देयंमृतानंमध्वाज्याभ्यांविलोडयेत् ॥ ३२॥ * स्निग्धभांडेस्थितंखादेधिनिष्कंसर्वकुष्टनुत् । रसःकुठकुठारोऽयंगलत्कुष्ठनिवारणः॥३३॥ अर्थ-कुष्ठी माषभर इसको खाय तो मण्डलकुष्ठ दूर होकर दिव्यकाया होजातीहै । पारेकी भस्म गंधक लोह- भस्म ताम्रभस्म गूगल हरड वहेढा आमला पकायनकी छाल चीतेकी छाल शिलाजीत यह ग्यारह औषध सोलह २ शाण ले करंजेके वीज ६४ शाण सबका बारीक चूर्ण कर अभ्रककी भस्म ६४ शाण लेकर चूर्णमें मिलादेव, यह छष्ठः कुठार रस, गलित कुष्ठको दूर करता है॥ १३०-३३ ।। अथ कच्टु सिमपामादहस्तिचर्मादयः । निशासुधारग्वधकाकमाचीपत्रे सदावर्वीप्रपुनाबीजेः । तकेणपिटे कटुतैलमिथै पामादिपूद्वर्तनमेतदिष्टम् ३४॥

भापार्टीकासमेत । (१२१) अर्थ-हलदी मूर्वा अमलतास काकमाची देवदारु चक- वडेके बीज इनको मटेके साथ पीस कडया तेल मिलाकर लेप करनेसे पामा ददुरोग दूर होताहै ॥ ३४ ॥ व्योपमूलकवीजानिघपुन्नाटफलानिच । एतान्यम्लप्रतिष्ठानिकुप्टेपूर्त्तनंपरम् ॥ ३५ ॥ अर्थ-सोंठ मिरच पीपल मूलीके बीज चकवडेके फूल यह कांजीके साथ कुष्ठरोगमें लेप करनेसे परम आरोग्यता करते हैं ॥ ३५॥ सिध्मानांकिटिभानांचद्रूणांचविशेषतः। अर्कपत्ररसेपकंरजनीकल्कसंयुतम् ॥ कटुतैलंहरेत्तूर्णमासात्कच्छू विचर्चिकाम् ॥ ३६॥ अर्थ-सिध्म किटिभ और दादरोगमें विशेषकर आकके पत्रके रसमें हल्दीका कल्क कर कडवे तेल में पकाके लेप करनेसे एक महीने में कच्छू और विचिकारोग दूर होता- है ।। ३६ ॥ गुंजाचित्रकशंखभस्मरजनीदूर्वाभयालांगली- सुक्सिन्धूत्थकुमारिकाजलधरार्कक्षीरधूमेंशजैः ॥ दद्रुघ्नैडगजाविडंगमरिचक्षौद्रेश्वखारीयुतै- गोमूत्रैर्गजचर्मदडुरंकसाकण्डूनमुद्वर्तनम् ॥ ३७ ॥ अर्थ-चौंटली चीता शंखकी भस्म हलबी दूर्वा हरड करिहारी सेहुंड संधानोन बढी इलायची घीकुवारवा(मा- लती) नागरमोथा आकका दूध चकवह (चक्रमर्दक ) वा ( दादमर्दक) वायविडंग कालीमिर्च शहद खारीनों (१२२) वैद्यरत्न। यह सब बरावर लेकर गोमूत्र में सिद्ध कर लेप करेतो-गज. चर्म ददु रकस खुजली आदिरोगोंको दूर करताहै ॥ ३७ ।। मृदूनिताम्रपत्राणितैलाधैःशोधितानिच । तच्चतुर्गुणसिन्धूत्थचूर्णलिप्तानिकारयेत् ॥ ३८ ॥ उपर्यधोनिधायाहोरात्र मेकंभिपग्वरः । तैलंताम्राद्विगुणितंनिंबूरसविमर्दितम् ॥ ३९ ॥ निश्चंद्रिकीकृतंतेनतानिपत्राणिलेपयेत् । स्थापयित्वातानिवस्नेततस्तेनैववेष्टयेत्॥४०॥ अर्थ-कोमल ताम्रपत्र तैलादिमें शोधन कर उनसे चौ. गुना संधा उनके ऊपर नीचे लगाकर एकरात्रितक रहनेदे फिर ताम्बेसे दूने तेल और नींबूके रसमें उसे खरल कर जबतक कि तेलकी बूंदोंकी चन्द्रिका न मिटे तबतक नीयू और तेलको खरल करें जब चन्द्रिका मिटजाय तब ताम्के पत्रपर उसे लपेटे फिर उसके ऊपर कपरोटी देकर फिर वह तेल उसपर लेपन कर ॥ ३८॥३९॥४०॥ सप्तवारंतुल्लिप्तवःसंवेष्टयेत्ततः । विधायगोलकंशुष्कंपकंगजपुटेनतत् ॥ ११ ॥ स्वांगशीतंसमुद्धत्यगुंजाइयमितंनरः । सितयाशाणमितयाचतुःपिप्पलियुक्तया ॥ १२ ॥ युक्तंसंभक्षयेत्प्रातःशाकाम्लरहिताशनः । मंडलंवातरक्तंवसभयंचोपदंशकम् ॥ दद्वंकडूविसपंचनिश्चितंनाशयेद्रुतम् ॥ ४३ ।। इति श्रीगौरवामिभिवानंदमहारगवितवैद्यग्ल तृतीयः प्रायः ॥ ३ .

भापारीकासमेत। (१२३) अर्थ-फिर सात वार मृत्तिकाको लपेट फिर उसके ऊपर वस्त्र लपेटे इसप्रकार उसका गोला बनाय सुखाकर गज- पुट में फूंकदे ठंडा होने पर उसको निकालले उसको दो चौटलीमात्र चारमासे मिश्रीके साथ खानेसे और पीपलके साथ सेवन करनेसे अर्थात प्रातःकाल खानेसे शाक और अम्ल पदार्थका सेवन करनेसे मण्डल वातरक्त समय उपदंश दाद खुजली विसर्प पित्ती आदि रोग अवश्य और शीघ्रतासे नष्ट होतेहैं ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ इति श्रीगोस्वामिशिवानदाविरचिते वैद्यरत्ने पण्डितज्वालामसाद- मिश्रवृतभाषाटीवाया तृतीयः प्रकाशः ॥ ३ ॥ अथ शिरोरोगः। अकालपलितंपीडाःसूर्यावर्तार्दभेदकाः । इत्यादयःशिरोरोगास्तान्यथादोपमाहरेत् ॥१॥ अर्थ-अकालमें बालोंका सफेद होना शिरमें दई सूर्या- वर्त आधाशीशी इत्यादि शिरके रोग होते हैं यथादोष उनको शोधन करना चाहिये ॥१॥ कुष्टमेरण्डजंमूलंलेपात्कांजिकपेपितम् । शिरोतिनाशयत्याशुपुष्पंवामुचुकुंदजम् ॥२॥ अर्थ-कूठ अण्डकी जड कांजीके साथ पीसकर लेप करनेसे शीघ्रशिरकी पीडा नष्ट होतीहै अथवा मुचुकंदके फूल पीसकर लगाव ॥२॥ सशर्करकुंकुममाज्यभृष्टंनस्यप्रदेयंपवनामृगुत्थे । भ्रूकर्णनासाक्षिशिरोईशूलेदिनाभिवृद्धिप्रभवेऽपिरोगे ३ (१२४) वैद्यरत्न अर्थ केशरको वृतसे भून उसमें कन्द मिलायकर नास देनेसे वातरक्तविकार भी, कान, नाक, आँखपीडा, आधा- शीशी दुपहरतक शिरका दर्द घटना फिर बढ़ना आदि अनेकपाडा शान्त होतीहैं ॥ ३ ॥ कृष्णाव्दशुंठीमधुकशताह्वोत्पलवातकः । जलपिरैःशिरोलेपःसयःशूलनिवारणः ॥ ४ ॥ अर्थ-कालाजीरा नागरमोथा सोंठ मुलैठी सोंफ नील. कमल असनपर्णी इनको जलमें पीस लेप करनेसे बहुत शीघ्र शिरकी पीडा दूर होती है ॥ ४ ॥ मधुकमधूकविडंगैःसगराजनागरेघृतंसिद्धम् । पबिंदुनस्यदानादेतच्छीमयंहन्ति ॥५॥ अर्थ-महुआ मुलेठी वायविडंग भंगराज सौंठ इनको घृतमें सिद्ध कर छः बूंद नासिकामें टपकानेसे शिररोग दूर होताहै।॥ ५॥ बृहतीफलरसपिष्टगुंजायाःफलमथापिवामूलम् । हेमनिघृष्टंलिप्तंव्यपनयतिमहेन्द्रलुप्ताख्यम् ।। अर्द्धमूर्द्धव्यथाखिन्नःसितांशीतांबुनापिवेत् ॥ ६॥ अर्थ-कटेरीके फलोंका रस पीसकर उसमें चोंटलीके फल वा उसका मूल धतरेके साथ पीसकर लेप करनेसे इन्द्रलुप्तरोग दूर होता है (जो शिरके बाल गिरजाते हैं वह इन्द्रलुप्त कहाता है) जो आधे शिरमें पीडा हो तो मिश्री डाल शीतलजल पिये ॥६॥ मथ नेबरोगः। वातात्पित्तात्कफाद्रतादभिष्यंदश्चतुर्विधः । प्रायेणजायते चोरःसर्वनेत्रामयाकरः ॥७॥ ..

भापाटीकासमेत। (१२५) अर्थ-वात पित्त कफ और रक्तले चारप्रकारका नेत्राभिः ष्यन्द होता है अर्थात् नेत्र दुखने आतेहैं. यह नेत्रोंका भयदायी घोर रोग कहा है ॥ ७॥ घृतभृष्टजलपिष्टवस्त्रनिविष्टतिरीटमपहरति । दावीकाथपरिप्लुतमाश्थ्योतनतोक्षिकोपगदान् ॥ ८॥ अर्थ-धीमें भून जलमें पीस वस्त्रमें छानकर लोध नेत्रों- पर लगानेसे सबप्रकारके रोग दूर करता है अथवा दारु: हल्दीका काथ कर आश्चयोतन करनेसे आंखें अच्छी हों |८|| जात्या पत्रैघृतेभृऐश्चक्षुष्यमुपनाहनम् । अथवानिंबपत्रैःस्यादुपनाहोक्षिरोगजिव ॥ ९॥ अर्थ-अथवा चमेलीके पत्ते धीमें भून नेत्रोंमें बूंद डाले अथवा नीमके पत्तोंका लेप करना नेत्ररोग दूर करता है९॥ यष्टीगरिकसिन्धूत्थदारूताक्ष्य समांशकैः । जलपिष्टपहिलेपःसर्वनेत्ररुजापहः ॥१०॥ अर्थ-अथवा मुलेठी गेरू सेंधानॉन दारुहलदी रसोत इनको बरावर ले जलमें पीस पलकोंपर लेप करनेसे सब प्रकारका नेत्ररोग दूर होताहै ॥ १० ॥ जातारोगाविनश्यतिनभवन्तिकदाचन । त्रिफलायाःकपायेणप्रातर्नयनधावनात् ।। ११ ॥ अर्थ-सब रोग दूर होकर फिर कभी नहीं होते हैं अथवा विफलेके कासे प्रातःकाल प्रतिदिन नेत्र धोवे ।। ११॥ भुक्त्वापाणितलंघृष्ट्वाचक्षुपोर्यदिदीयते । अचिरणवतद्वारितिमिराणिव्यपोहति ॥ १२॥ पोटलीफिराना नेत्रीको उपाढर भंगुलक अन्तरसे नाम दूध माई बादिक संदटालनको भान्योनन कहतह ।

वैद्यरत्न ।
अर्थ-अयवा भोजन करके नेत्रों को हथेलीसे अच्छीतरह
प्रतिदिन मलनेसे वह जल बहुत शीघ्र तिमिररोगको दूर
करता है आचमन कर हथेली घिसके नेत्रोंपर धरै ।। १२ ।।
विगतघननिशीथेप्रातरुत्यायनित्य
पिवतिखलुनरोयोग्राणरंध्रेणवारि ।
सभवतिमतिपूर्णश्चक्षुपातायतुल्यो
वलिपलितविहीनःसर्वरोगैर्विमुक्तः ॥ १३॥
अर्थ-जव अर्द्धरात्रिके समय बादल न हों तब जो
मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर नासिकाके द्वारसे जल
पीताहे उसके नेत्र गरुडकी समान तीक्ष्ण होते हैं बुद्धि बढती-
है वलि और बालोंका पकना यह सब रोग दूर होते हैं।॥१३॥
यौफलंचूर्णमपथ्यवर्जीसायंसमनातिसमाक्षिकाज्यम् ।
समुच्यतेनेत्रगतैर्विकारे त्यैर्यथाक्षीणधनोमनुष्यः १४॥
अर्थ-जो अपथ्यको त्यागकर संध्यासमय वृत और शह-
दके साथ त्रिफलेको खाता है उसके सब नेत्रविकार ऐसे छूट-
जाते हैं जैसे क्षीण धनवाले मनुप्यको नौकर छोड जाते हैं १४
वटक्षीरेणसंयुक्तश्लक्ष्णंकर्परजंग्जः ।
क्षिप्रमंजनतोहन्तिशुक्रवापिघनोन्नतम् ॥ १५ ॥
अर्थ-वडके दूधके साथ कपूरको घिसकर नेत्रमें लगानेसे
कठिन शुक्ररोग दूर होता है ॥ १५ ॥
पिप्पलीत्रिफलालाक्षालोभ्रंसैन्धवसंयुतम् ।
भुंगराजरसे घृष्एंगुटिकांजनमिप्यते॥ १६॥
अमंसतिमिरंकाचंकडूंशुक्रतथार्जुनम् ।
अंजननेत्रजानोगानिहंत्येतन्नसंशयः॥ १७ ॥

भापाटीकासमेत।
(१२७)
अर्थ-पीपली त्रिफला लाख लोध संधानमक इनको
भांगरे के रसमें घिसकर गुटिका बनाय नोंमें लगाये तो
अर्म तिमिर काच कंडू शुक्र फूला अर्जुन तथा अन्यभी
नेत्राके रोगोंको यह अंजन दूर करता है इसमें संदेह नहीं
भय कर्णरोगा।
करोतिविगुणोवायुर्मसंगृह्यकर्णयोः ।
सकफापाकवाधिर्यशूलस्रावाक्षिकान्गदान् ॥ १८॥
अर्थ-कुपित हुआ वायु कानमें प्राप्त हो कानोंका मल
ग्रहण कर कफसे युक्त हो कर्णपाक बहरापन शुल स्राव
तथा नेत्ररोगोंको करता है ॥ १८ ॥
अकस्यपत्रपरिणामपीतमाज्येनलिप्तशिखिनाचतप्तम् ।
आपीड्यतोयंश्रवणेनिपिक्तनिहतिशूलंबहुवेदनंच १९॥
अर्थ-जो जडकी ओरसे पीले होगये हों ऐसे आकके प-
'त्तोंपर घी लगाकर आगके ऊपर सेके फिर उनको मसल-
कर वह अर्क कानम डालनेसे कानका शुल और वेदना
नष्ट होती ॥ १९॥
हिंगुतुम्बुरुशंठीभिःसिद्धतेलंतुसार्पपम् ।
कर्णशूलेपणादेचवाधियेपि. हितमतम् ॥ २० ॥
अर्थ-हिंगु, तुम्युरु, सोंठ इनके साथ तरसोंका तेल
सिद्धकर कानमें डालनेसे कानकी पीडा दर होती है ॥२०॥
समुद्रो नचूर्णतुन्यस्तंश्रवसिससवे ।
पूयस्रावंत्रणंसाहन्तिध्वांतमिवांशुमान् ॥२१॥
अर्थ-यदि कानसे राध पहती हो तो समुद्रफेनका चूर्ण
कर कानमें डाले इससे कानका पकना और यहना ऐसे
दूर होता है जैसे सूर्य अंधकारको दूर करता है ॥ २१ ॥

(१२८) वैद्यरत्न। सूर्यावर्करसंरसंवासिंदुवारजम् । 'लांगलीमूलतोयवान्यूपणंवापिचूर्णितम् ॥२२॥ एतेयोगास्तुचत्वारःपूरणात्कृमिकर्णके ॥ कृमीन्निर्मूलयंत्याशुशतपद्यपादिकान् ॥२३॥ अर्थ-सूर्यावर्तम आकका रस वा सिन्दुवारका रस वा कलिहारीकी जड़का रस वा त्रिकुटा पीसकर यह चार प्रयोग कानोंमें कृमि पडजाँय तो करना चाहिये यह बहुत शीघ्र कानोंके कीडे निर्मूल करता है तथा शतपदी अन्न पादिक को दूर करता है ॥ २२ ॥ २३ ॥ अथ न सारोगः । अऑसिपीनसमावःकचिच्छरेणिवसूययोः। रोगानासोद्भवास्तेपक्षियोनस्यादिभिर्भवेत् ॥ २४॥ अर्थ-अर्श पीनस राधका निकलना तथा रुधिरका निकलना यह ना रोगह नस्यादि देनेले यह रोगनाशको प्राप्त होते हैं ॥ २४ ॥ गुडमरिच विमिश्रपीतमाशुप्रकामं हरतिदधिनराणांपीनसंदुर्निवारम् । यदितुसघृतमन्नश्लक्ष्णगोधूमचूर्णः कृतमुपहरतेसीतत्कुतोस्यावकाशः ॥२५॥ अर्थ-गुड और कालीमिरच मिलाकर दही पीनसे महाकठिन पीनसरोग दूर होता है और यदि घृतसहित गेहूंका चूर्ण प्रतिदिन सेवन किया जाय तो यह किसी प्रकार नहीं दहर सकती॥२५॥ पागविरजनी पिप्पलीजातिपल्लरे । दत्यायत्तेलंसंसिदंनस्यतःपीनसापहम् ॥ २६ ।। .

भापाटीकासमेत । (१२९) अर्थ-पाठा दोनों हल्दी मूर्वा पीपल जाई पत्ते दंती- मृल, इनसे तेल तयार का पके पीनसमें नास देनेसे पीन- सरोग दूर होता है ॥२६॥ नासाशोपेक्षीरपानससितंचप्रशस्यते । सपचंचूर्णमाघ्रायवाससापोटलीकृतम् ॥ कारवीवस्त्रबद्धावाप्रतिश्यायमपोहति ॥ २७ ॥ अर्थ-नासाके शोषमें मिश्री डालकर क्षीरपान करे अथ- वा वचका चूर्ण कर कपडेकी पोटलीमें रख सूंघे अथवा करोंजी कपडे में बांध सूंघनेसे जुखाम दूर होता है ॥ २७ ॥ भय मुरारोगा। सरक्त कुपितःश्लेष्माकरोत्यास्यगदान्वहून् । दौगध्यपिडकापाकजिह्वादोपान्समासतः ॥२८॥ अर्थ-रक्तसहित श्लेष्मा कुपित होकर, मुखमें अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न करता है जैसे दुर्गध, पिडिका, मुखपाक, जिहारोग यह संक्षेपसे कहे हैं ॥ २८॥ मुखरोगेषुसर्वेपुक्षिपेन्मूलंपुनर्नवा । तस्यमूलप्रपातेनमुखरोगःप्रशाम्यति ॥२९॥ अर्थ-सब प्रकार के मुखरोगों में पुनर्नवाकी जड़ मुखमें डाल- नी चाहिये इसके डालनेसे मुखरोग शान्त होते हैं ॥ २९ ॥ जातीपत्रामृतादामादेवदारुफलत्रिकः । कायाक्षोदयुतःशीतोगण्डपोमुखपाकजित् ॥३०॥ अर्थ-जाईके पत्ते, गिलोय, दास्त्र, देवदारु, त्रिफला इनका काढा कर शहदके साथ ठंडा कर पिये तो मुम्ब पकना यंद हो॥३०॥ .

(१३०) वैद्यरत्न । कांचनारत्वचवाथ प्रातर्गंडूपकेधृतः । जिह्वादारणकहन्तिस्फोटान पिरुजाकरान् ॥ ३३ ॥ अर्थ-श्वेतकचनारकी छालका काढा कर प्रातःकाल ठंडा कर कुल्ला करें तो जिह्वाका फटना फुनती छाले जो मुखमें होवें सब दूर होते हैं ॥ ३१ ॥ एलामधूच्छिएगुडेनपकंतैलंघृतंवाविनिहन्तिलेपात् । त्वम्भेदपारुष्यरुजोऽधरस्यपूयात्रसंत्रावमपिप्रसह्य३२॥ अर्थ-इलायची मोम यह गुडमें पकाकर तेल वा घृतमि- लाकर लेप करनेसे होठोंका फटना पीडा राधका निकलना रुधिरका निकलना आदि रोग दूर होते हैं ।। ३२ ।। भद्रमुस्ताभयाव्योपविडंगारिष्टपल्लवैः । गोमूत्रपिष्टांगुटिकांछायाशुष्कांप्रलेपयेत् ॥ ३३ ॥ अर्थ-और नागरमोथा, हरड, त्रिकुटा, वायविडंग, नीम के पत्ते इनको गोमूबसे पीसवटी कर छायामें सुखाले ३३ तांनिधायमुखेसुप्याचलदंतातुरोनरः । नातःपरतरंकिञ्चिञ्चलदंतस्यभेपजम् ॥ ३४॥ अर्थ-दांत हिलने में और दातोंकी पीडामें इसको मुग्यः में डाले और सोरहे इससे अधिक दांत हिलनेकी पीडा दूर करनेवाली कोई औषधी नहीं है ॥ ३४॥ जातीपत्रपुनर्नवागजकणाकोरंगकुएंवचा- शुंठीदीप्यहरीतकीसमकृतंचूर्णमुखेधारितम् । वातनंकृमिदन्तशूलशमनंदुर्गघिदोपापहं शैथिल्यक्षयकारिदंतपटुतावीजंचजात्यादिकम् २५ भापाटाका । । । - अर्थ-जाईके पत्ते पुनर्नवा गजपीपल छोटी इलायची कूठ वच सोंठ अजवायन हरड इनको समान भाग ले चूर्ण कर मुखमें रखनेसे वात, कृमि, दन्तशुल, दुर्गन्धिदोष, शिथिलता अर्थात् दांतोंका हिलना आदि रोग दूर होते हैं तथा जाईके बीजभी दांतोंको दृढ करतेहैं ॥ ३५॥ कृष्णजीरककुप्रोन्द्रयवधर्पणतस्यहात् । मुखपाकवणक्छेदंदौध्यमुपशाम्यति ॥ ३६ ॥ अर्थ-पीपल जीरा कूठ इन्द्रजो इनके चबानेसे तीन दिनके मुखपाक मुखव्रण मुखका चिकटापन और दुर्गन्ध यह सब दूर होता है ।। ३६ ॥ तेजोवतींदारुनिशांसकृष्णां यवाग्रजंताय॑गिरिंचपाठाम् । क्षौद्रेणकुर्यादटिकां मुखेन तांधारयेत्सर्वगलामयन्तीम् ॥३७॥ अर्थ-गजपीपल, दारुहलदी, हलदी, पीपल, जवाखार, रसौत, पाठा इनको पीस शहद मिलाकर गुटिका मुखमें रखनेसे सम्पूर्ण मलेके रोग दूर होतेहैं ॥ ३७॥ तांबूलमध्यस्थितचूर्णकेनदग्धंमुखंयस्यभवेत्कथंचिद । तेलेनगंडपमसौविदध्यादाम्लारनालेनपुनःपुनर्वा ३८॥ अर्थ-जिसका मुख ताम्बूलमें चूना अधिक लगनेसे फटगयाहो वह तेलसे कुल्ला कर अथवा इम्ली सिरकेसे वारंवार कुल्ला करै ।। ३८॥ . +

वैद्यरत्न।
अथ स्त्रीरोगाः । तत्रादौ कुसुमजनन विधिः।
सगुङश्यामतिलानांकाथ-पीतःसुशीतलोनार्याः ।
जनयतिकुसुमंसहसागतमपिसुचिरनिरातकम् ॥ ३९ ॥
अर्थ-अब स्त्रीरोग कहते हैं यदि स्त्री रजोवती न होती
हो तो गुडके साथ काले तिलोंका काढा कर ठंढा करके
पिये तो बहुतकालसे रजोवती न होनेवाली स्त्रीभी रजो.
वती होय ॥ ३९ ॥
अथ गर्भस्थितिः।
विधिनामातुलुंगस्यबीजानिसकलानितु ।
ऋत्वंतेदुग्धपिष्टानिपीत्वाप्नोत्यवलासुतम् ॥ ४० ॥
अर्थ-अब गर्भस्थिति कहते हैं विजोर नीचूके बीज
दृधमें पीसकर ऋतुके अनन्तर चौथेदिन पीनेसे स्त्रीके
गर्भकी स्थिति होती है ॥ ४० ॥
नागकेशरमेकंतुपिष्टाक्षीरेणयावलाम् । .
पिवेत्सासुतमानोतिऋत्वतेचिरजीविनम् ॥४१॥
अर्थ-एक नागकेशरही अतिथलाके संग पीसकर दूधके
साथ ऋतुके अन्नमें पीनेसे वी चिरजीवी पुत्र को प्राप्त
होती उसमें संदेह नहीं ॥ ४१ ।।।
पुष्योद्धृतंलक्ष्मणायामूलंपिष्टंचकन्यया ।
ऋत्वतेघृतदुग्धाभ्यांपीत्वाप्नोत्यालासुतम् ॥४२॥
अर्थ-पुष्यनक्षत्रपर लक्ष्मणा (श्वेतमटकटेया कटेरी)
इसके मूल कन्याके हायसे उखाडके लाकर पिसा उसको
प्रवके अन्तमें घी और दूधके साथ पीनेसे अबला पुत्रको
प्राप्त होताह ॥ ४२ ॥
क्वानहयगंधायाःसाधितंसघृतपयः ।
प्रातःस्नात्वावलापीत्वागर्भधत्तेनसंशयः ॥२३॥

भापाटीकासमेत। (१३३३ अर्थ-असगंधके काटेके साथ गायका दूध ओटाकर उसमें घी डाल ऋतुस्नान कर चौथे दिन स्त्री पानकर तो गर्भ धारण करती है इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४३ ॥ शिवलिंगीफलमेकमृत्वतेयावलागिलति । वंध्यापिपुत्ररत्नलभेतसानानसंदेहः ॥ १४ ॥ अर्थ-जो स्त्री ऋतुके अन्त में एक शिवलिंगीके फलश्ये निगलले वह वंध्याभी पुत्रको उत्पन्न कर इसमें संदेह नहीं ॥ ४४ ॥ अथ गर्भसंरक्षणम्। पतंतस्तमयदर्भकुलालकरमृत्तिका । कंकतीमूलमाबद्धकुमारीसूत्रकैदृढम् ॥ ४५ ॥ अर्थ-जो कुम्हार बर्तन बनाते समय हाथ पोंछत्ता जाता है उस मट्टीको पीनेसे गिरता हुआ गर्म थम जाता है ॥४॥ कटिदेशोनितंविन्यागर्भःस्तंभयतिध्रुवम् । कुशकाशोरुबूकाणांमूलैगोक्षुरकस्यच ॥ शृतंदुग्धसितायुक्तंगर्भिण्याःशुलनुत्परम् ।। ४६॥ अर्थ-खोटीकी जड कॉरी कन्याके कते सूवमें कमरमें बांधनेसे गिरताहुआ गर्भ थम जाता है कुश काश लाल एरण्डकी जड और गोखरू यह दूधमें औटाकर मिनी 'डालकर पिये तो गर्मिणीकी पीडा दूर हो ॥ ४६ ॥ हीवरारलुरक्तचंदनबलाधान्याकवत्सादनी- मुस्तोशीरयवासपर्पटविपाकाथंपिवेदार्भिणी। नानाव्याधियुतातिसारगदकत्वस्रसुजीवाज्वरे योगोयंमनिभिःपरानिगढितःठा कामयेप्युत्तमः ॥ . - (१४) यद्यरत्न । अर्थ-हीबेर सोनापाठा लाल चन्दन बरियारा धनिया गिलोय नागरमोथा खस जवाला पित्तपापडा और अतीस इनका काढा गर्भिणी पिये तो अनेक रंगकी पीडासहित अतिसार तथा रक्तप्रवाह ज्वर और मूतिकारोग नाश करने में यह उत्तम प्रयोग है ॥४७॥ अथ सुखप्रसवौषधम् । मातुलुंगस्यमूलानिमधुकंमधुसंयुतम् । घृतेनसहपातव्यंसुखनारीप्रसूयते ॥ १८॥ अर्थ-विजारेकी जड मुलेठीका चूरन शहद घोके साथ पियावे तो स्त्री सुखसे प्रसूति होगी ।। ४८ ॥ गुंजामूलस्यखंडानिसप्तसप्तदलानिच । खंडितानिकटिस्थानिसुप्रसूर्तिप्रकुर्वते ॥ ४९ ॥ अर्थ-चौटलीकी जडके साथ सात टुकडे और सात पत्ते कमरमें बांधनेसे स्त्री सुखसे प्रसववती होगी ।। ४९ ॥ बाणपुंखजटावाथविशल्यं कुरुतेंगनाम् । कलापक्षाऋतुदिङ्मन्वष्टाष्टादशांबुधीन् ॥५०॥ विलिखेनवकोप्टेपुत्रिंशाख्यंयंत्रमुत्तमम् ॥ सुखप्रसूयतेनारीदृष्ट्वावाचक्रवर्धनम् ॥ ११ ॥ अर्थ-अथवा उभयतो तीसका यंत्र लिखकर मिट्टीके शरा. वमें रखकर धूप देकर दिग्वावै तो घी सुखसे प्रसूति होगी यह है कि क्रमसे नो कोटोमा नीचे लिखे पत्रके अनुसार भरे तीसका यंत्रावर होगा इसीका आधा करनेसे पन्द्रहका यंत्र | ...दिसावे वा-चक्रवर्हन यंत्र लिने ।। ५०॥५१ ।। उसका क्रम १६

भाषाटीकासमेत ।
(१३५)
अथ अपरापालनविधिः ।
कचवेष्टितयांगुल्याप्टेकंठेसुर्खपतत्यपरा ।
मूलेनलांगलक्यासंलिप्तेपाणिपादेवा ॥ ५२ ॥
अर्थ-वालोंसे वेष्टन कीहुई अंगुलीसे कंठमें घिसने
अथवा कलिहारीकी जड़को पीस हाथ पैरोंमें लगानेसे
गर्भ मुक्त होताहै ।। ५२ ॥
अय सूतिकारोगः।
अंगमर्दोज्वरःकंपःपिपासागुरुगात्रता।
शोथःशूलातिसारीचमूतिकारोगलक्षणम् ॥ ५३॥
अर्थ-अंगमर्द ज्वर कंप पिपासा शरीरका भारीपन शोथ
शूल अतिसारका होना यह सूतिकारोगके लक्षण हैं ॥५३॥
'दशमूलीशृतंतोयंकवोष्णंपिप्पलीयुतम् ।
पीतंतत्सूतिकारोगमुदप्रमपिकृतति ॥ ५४॥
अर्थ-दशमूलका काढा कर उसमें पीपल डाल कुछ गरम
कर पीनेसे बढा हुआभी सूतिकारोग शान्त हो जाताहै ५॥
नागरस्यपलान्यष्टौघृतस्यपलविंशतिः ।
क्षीराढकेनसंयुक्तखंडस्याईतुलांपचेत् ॥ १६ ॥
अर्थ-सोंठ आठ पल घी बीस पल दूध एक आढक २५६
तोले लेकर इसमें आधी तुला (२०० तोले )पूरा डालकर
पंकावे ॥ ५५ ॥
शनायानगोशिगंलिपपरिकार
कारवीमसिचव्यानिमुस्तानांचपलंपलम् ॥ ५६॥
शुद्धाभ्रकायंसंयोज्यंत्रिपलंचपृथक्पृथक् ।
स्वर्णतारंततोयोज्यंयथाचामिवलंभवत् ॥ ५७॥

वैद्यरत्न
लेहीभूतमिदंसिद्धंघृतभाण्डेनिधापयेत् ।
तद्यथाग्निबलंखादेत्सूतिकातुविशेपतः ॥२८॥
वल्यवर्ण्यतथायुष्यंवलीपलितनाशनम् ।
वयसःस्थापनंहामन्दाग्निदीपनंपरम् ॥ ५९॥
आमवातप्रशमनंसौभाग्यकरमुत्तमम् ।
मकल्लशूलशमनंतिकारोगनाशनम् ॥ ६ ॥
अर्थ-सौंफ जीरा त्रिकुटा तज पत्रज इलायची अजवा.
यन चिरोंजी निर्गुण्डी चव्य चीता नागरमोथा यह सब
एकएक पल ले और शुद्ध अभ्रक ले पृथक् २ तीनतीन
पल ले यह सब वस्तु उसमें डालदे और जब यह लेहीभूत
अर्थात् चाटनेकी समान होजाय तब इसको घृतके पात्रमें
रखले इसको सृतिका अपने अग्नि बलके अनुसार खाय तो
बल वर्ण बढे आयुकी वृद्धि और वली तथा पलित रोगका
नाश होताहे यह अवस्थाकास्थापन करनेवाला दिव्य हृदयको
आनंद बल देनेवाला मन्दाग्निको दीप्त करनेवाला आम
वातका दूर करनेवाला सौभाग्य करनेवाला उत्तम मकल
शुलशान्त करनेवाला और सूतिकारोगनाशक है ॥५६-६०॥
आहेमफलंपिष्ट्वाकटुतेलंचतुर्गुणम् ।
विपचेदटिकायुग्मंतत्तैलंहेमसुन्दरम् ॥
दुटप्रस्वेदशमनंसूतिकारोगनाशनम् ॥ ६१ ॥
अर्थ-गीले धतूरेके फल पीसकर उसमें चौगुना कड़वा
ल डालकर पकावै इसप्रकार दोघडी में यह हेमसुन्दर
तेल वनजायगा यह दुष्ट प्रस्वेद (पसीने) का शान्त करने.
ला तथा सूतिकारोगको दूर करताहै ॥ ६॥

भापाटीकासमेत (१३७) अथ वारमिधर्द्धनम् । शतावरीक्षीरपिष्टापीतास्तन्यविवर्धिनी ! कवोष्णंकर्णयापीतंक्षीरंक्षीरविवईनम् ॥ ६२ ॥ विदारीकंदस्वरसंपिबेदास्तन्यवर्द्धनम् । सहारिद्रंकुमार्यास्तुमूलंपानीयपेपितम् ।। स्तनरोगहन्तिलेपाल्किवाकोटिकाजटा ।। ६३ ।। अर्थ-दूधके बढानेको शतावरीको दूधमें पीसकर पिये अथवा गरम दूधके साथ पीपलका चूर्ण पिये अथवा भुल- भुलाकर मुई कुम्हडा पिये अथवा विदारीकंदका स्वरस पिये हलदीके सहित घीकुवाँरकी जड़ पीस स्ननपर लेप. करनेसे स्तनरोग दूर होतेहैं कर्कोटक जटामांसीका लेप कर तो क्या कहना है ? ॥ ६२ ॥ ६३ ।। अथ प्रदरः। अतिमार्गातिगमनप्रभूतसुरतादिभिः । प्रदरोजायतेस्त्रीणांयोनिरक्ततिःपृथुः ।। ६४ ॥ अर्थ-अतिमार्गमें चलनेसे यहुत मैथा करनेसे स्त्रियों के मदररोग होताहै इसमें योनिमार्गसे रक्त वहताहै ।। ६४ ।। रक्तपूगीफलंमाजूफलंचैवरसांजनम् । धात्रीपुप्पंमोचरसंतंदुलामूलगैरिके ॥ ६ ॥ एतेषांसमभागानांपलार्द्धमितिचूर्णकम् । प्रदरा पिवेनारीप्रत्यहंतंदुलांबुना ॥ ६६ ॥ अर्थ-लालपूगीफल माजफल रसीत पायके फूल मोच- रस चौराईकी जड गेमइनको घरायर लेकर इनका चूर्ण वैद्यरन । करले चावलके जलके साथ आधेपल प्रतिदिन प्रदररोग- वाली स्त्रीको पिलावै तो रोग शान्त हो ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ तंडुलीयकमूलंहितंडुलांबुप्रपेपितम् । सतायशैलंसक्षौद्रप्रपीतंप्रदरंजयेत् ॥ ६७॥ अर्थ-चौलाईकी जडको चावलोंके पानीके साथ पीस: कर उसमें रसोत और शहद डालकर पिये तो प्रदर दूर हो६७ पिरंतंडुलतोयेनकुशमूलंससारघम् । सरसांजनमापीयप्रदरंत्रिदिनाजयेत् ॥ ६८॥ अर्थ-चावलके धोवनके जलसे कुशाका मूल पान कर- नेसे तीन दिन में प्रदररोग दूर हो ॥ ६८॥ जीरकप्रस्थमेकंतुक्षीरंदयाढकमेवच । प्रस्थाईलोध्रवृतयोःपचेन्मंदेनवह्निना ॥ ६९ ॥ लेहीभूतेषशीतेत्रसिताप्रस्थंविनिक्षिपेत् । चातुर्जातकणाविश्वमजाजीमुस्तवालकम् ॥ ७० ॥ दाडिमरसजधान्यरजनीपटवासकम् । वंशजंचतवक्षीरीप्रत्येकंशुक्तिसम्मितम् ॥७१ ॥ जीरकस्यावलेहोयंप्रदरापहरःपरः । ज्वराबल्यारुचिश्वासतृष्णादाहक्षयापहः ।। ७२ ।। भूम्यामलकमूलंतुपीतंतंडुलबारिणा। द्विबैरेवदिने या प्रदरंदुस्तरंजयेत् ॥ ७३॥ अर्थ-जीरा सफेद ? प्रस्थ ( १ सेर) दूध गायका २. आढक ( ८ सेर) आधे प्रस्थ गौका घी और लोध इसको निसे पा.. यह गाढा हो जाय तय इसमें सेरभर भाषाटीकासमेत । मिश्री डाल पीछे तज पत्रज इलायची नागकेशर पीपल सोंठ कालाजीरा नागरमोथा सुगन्धवाला दाडिमीका रस काकजंघा हलदी चिरोंजी अडूसा वंशलोचन तवा- खीर यह प्रत्येक एकएक शुक्ति (४ तोले ) ले यह जीरक अवलेह प्रदररोगका हरनेवाला है ज्वर नैवल्य अरुविश्वास तृष्णा दाह क्षयका दूर करनेवाला है तथा भुइँआमलेकी जड चावलोंक धोवनकेसाथ पीनेसे दोतीन दिनमेंही प्रदर- रोग दूर होजायगा ।। ६९ ॥ ७० ॥ ७१ ।। ७२ ।। ७३ ।। तालीसगैरिकेपीतेबिडालपदमात्रकैः ! शीतांबुनाचतुर्थेविंध्यास्त्रींकुरुतेभृशम् ॥ ७४ ॥ अर्थ-तालीसके पत्ते गेरू यह दोनों दो तोले शीतल जलके साथ चार दिन पीनेसे स्त्री बांझ होतीहै ॥ ७४ ॥ पालाशवीजमध्वाज्यलेपात्सामर्थ्य योगतः। योनिमध्येऋतौगर्भधत्तेस्त्रीनकदाचन ॥ ७९ ॥ अर्थ-ढाकके बीज शहद घृत यह तीनों वस्तु ऋतुके समय स्त्री योनिमें रक्खै तो फिर कभी गर्भ न रहै ॥ ७५ ॥ धत्तूरमूलिकापुष्यगृहीताकटिसंस्थिता। गर्भनिवारयत्येवरंडावेश्यादियोपिताम् ॥ ७६॥ अर्थ-धतूरेकी मूली पुष्यनक्षत्रपर लेकर. कमरमें बांध नेसे रंडावेश्यादि स्त्रियोंका गर्भ निवारण होताहे ॥ ७६ ॥ गूंजनस्यबीजानितिलकारविके अपि । गुडेनभुक्तमेतत्चुगर्भपातयतिध्रुवम् ॥ ७७॥ अर्थ-गाजरके बीज तिल चिरौंजी यह गुडके साथ खानसे अवश्य गर्भका पात करताह ।। ७७॥

(१४०) वैद्यरत्न अथ स्तनदृढीकरणम्। श्रीपर्णीरसकल्काभ्यांतैलंसिद्धतिलोद्भवम् । तत्तैलंतूलकेनैवस्तनस्योपरिदापयेत् । पतितावृत्थितौस्यातामंगनाया पयोधरी ॥ ७८॥ अर्थ-विजौरेके रस और कल्कके रसके संग उसमें तिलोंका तेल सिद्ध कर रूई उस तेलमें भिजोकर स्तनोंके ऊपर लगाये तो गिरे हुए स्तन उठिआतेहैं ॥ ७८॥ अथ योनिसंकोचीकरणम् । भंगापोटलिकांदत्त्वाप्रहरंकाममंदिरे । शतवारंप्रसूतापिपुनर्भवतिकन्यका ॥ ७९ ॥ अर्थ-भंगकी पोटली बनाकर योनिमें एक प्रहरतक धरे सीवारको प्रसूता स्त्रीको योनि कन्याकी समान हो जाय॥ ७९ ॥ मोचरससूक्ष्मचूर्णक्षिप्तंयोनौस्थितंप्रहरम् । शतवारप्रसूतायाअपियोनिःसूक्ष्मरंधास्यात् ॥८॥ अर्थ-मोचरसका चूर्ण कर योनिमें प्रहरतक लगा रख- नेसे सौवार प्रसूना हुई स्त्रीकी योनिभी संकुचिन होजाती है ।। ८०१ अय योनिनिहामीकरणम् । कर्पूरभल्लातकशंखचूर्णक्षारोयवानीमजमोदकंच तलंविपकंहरितालमिथलोमानिनिर्मूलयतिक्षणेन ८॥ अर्थ-योनि निलेम करने की विधि कपर मिलाया शंखका चूर्ण सजीखार अजवायन अजमोद इनको तेलमें पकार हरताल मिलाय सिद्ध कर तो क्षग मात्रमें लगा- नेसे लोम निर्मल होजाते हैं ।। ८१ ॥

भापाटीकासमेत।
(१४१)
अथ बालक्रोगः।
त्रिविधः कथितो वालाक्षीरानोभयवर्तकः ।
स्वास्थ्यंताभ्यामदुष्टाभ्यांदुष्टाभ्यारोगसंभवः ।। ८२ ।।
अर्थ-बालक तीन प्रकारके होतेहैं एक तो केवल दूध
पीनेवाले दूसरे दूध और अन्न खानेवाले तीसरे केवल
अन्न खानेवाले जो अन्न और दूध शुद्ध हुए तो स्वस्थता
होतीहै बालक नीरोगी रहताहै और दुषित होनेसे रोगी
होताहै ॥ ८२॥
भैषज्यंपूर्वमुद्दिष्टमहतायज्ज्वरादिपु ।
देयंतदेवबालेपिमात्राकिंतुकनीयसा ।। ८३॥
अर्थ-ज्वरादिकोंमें जो हमने पहले औषधी कही है वहीं
देनी चाहिये परन्तु बालकोंको थोडी मात्राकी औषधी
देनी ।। ८३ ॥
विडंगफलमात्रंतुज्ञातमात्रस्यभेपजम ।
मासेमासेप्रयोक्तव्यविडंगानां विवर्द्धनम् ॥ ८॥
अर्थ-तुरतके उत्पन्न हुए बालकको विडंगके फलकी
बराबर औषधी देनी चाहिये और जितनी जितनी मही-
नेकी अवस्था उसकी बढती जाय उतनीही मात्रा बढानी
चाहिये अर्थात् दूसरे महीने में दो वायविडङ्ग फलके बरा.
वर दे।। ८४॥
अव्दादू_कुमाराणांदद्यात्कोलास्थिमात्रकम् ।
क्षीरादस्यौपधंधात्र्यांक्षीरानादस्यचोभयोः॥ ८५॥
सर्वनिवार्यतेवालेनस्तन्यंवार्यतेकचित् ।
नाभिपाकेनिशालोध्रप्रियंगुमधुकेशृतम् ।
तेलमभ्यंजनेशस्तमेभिर्वाप्यवचूर्णनम् ॥ ८६॥

(१४२) वैद्यरत्न। वालोयोचिरजातःस्तन्यंगृह्णातिनोतदातस्य ॥ सैन्धवधात्रीमधुवृतपथ्याकल्केनघपयेजिह्वाम् ८७ पीतपीतवमतियःस्तन्यतन्मधुसर्पिपा ॥ द्विवार्ताकीफलरसंपंचकोलंचलेहयेत् ॥ ८८ ॥ सक्षौद्रशर्करातिक्तालीढाबालज्वरंजयेत् ॥ ८९ ॥ अर्थ-एक वर्षको अवस्थासे जिसकी अधिक अवस्था हो उसे बैरकी मींगीके परिमाण औषधि देनी चाहिये-जी केवल दूध पीता हो तो इसकी धायकोभी औषधी देनी चाहिये बालकको दूधमें औषधी दे अन्न खाता हो तो अन्न होके साथ औषधी दे पथ्यमें सर्ववस्तु वर्जित हैं परन्तु माता- का दूध वर्जित नहीं है नाभि पकी होय तो हलदी लोधप्रियंगु मुलैठा इनसे सिद्ध किया तेल उसपर लगाना अथवा इनका चूरन बुरकाना चाहिये जो अल्प कालका उत्पन्न हुआ बालक माताका दूध न पीता होय उसकी जीभपर सेंधा धवईके फूल शहद घी और हरड पीसकर शनैः उंगलीसे लगावे जो बालक माताका दूध पीकर वारंवार वमन करे उसको भटक- टैया और वनभाटेका रस पीपल पीपलामल चव्य चित्रक और सोंठका चूरन शहद और घीक साथ चटाव शहद बुरा यह पाठ संग मिलाकर चाटनेसे वातज्वरको दूर कर- ताहै ।। ८५ ।। ८६ ॥ ८७ ॥८८ ॥ ८९ ॥ शृंग्यव्दकृष्णातिविपांविचूर्य लेहंविदध्यान्मधुनाशिशूनाम् । कासज्वरच्छर्दिभिरदितानां समाक्षिकांवातिविपामर्थकाम् ।। ९० ॥

भापाटीकासमेत । (१४३) अर्थ-काकडासींगी नागरमोथा पीपल अतीस इनका चूर्ण कर शहदके साथ चाटे अथवा एक अतीतहीका चूरन शहद के साथ चटानेसे बालकको खांसी ज्वर और वांति दूर होती है ॥ ९० ॥ नागरातिविपासुस्तावालकेंद्रयवैःशृतम् । कुमारं पाययेत्प्रातःसर्वातीसारनाशनम् ॥ ९१ ॥ अर्थ-सोंठ अतीस नागरमोथा सुगंधवाला इन्द्रजी इ. नका काढा कर प्रातःकाल बालकको पिलावै तौ सम्पूर्ण अतिताररोग दूर होते हैं ।। ९१ ॥ धनकृष्णारुणाशृंगीचूर्णक्षौद्रेणयोजितम् । शिशोवरातिसारनंकासश्वासवमीहरम् ॥ ९२॥ अर्थ-नागरमोथा पीपल अतीस और काकडासींगी इनका चूरन शहदके साथ बालकको चटाव तो बालकका ज्वर आतिसार कास श्वास और वमन दूर होतीहै ॥९२ ॥ पुष्करातिविपायासकणाशृंगीरजोलिहेत् । मधुनामुच्यतेवालः कासे पंचभिरुच्छ्रितैः ॥ ९३ ॥ . तुगाचक्षीसंलीढाकासश्वासोशिशोर्जयेत् । चूर्णकटुकरोहिण्यामधुनासहयोजितम् ॥ ९ ॥ हिकांप्रशमयेक्षिप्रंशिशोछर्दिचदुस्तराम् । कणोपणसिताक्षीद्रसूक्ष्मेलासेंधवैःकृतः ॥ ९५ ॥ मूत्रग्रहप्रदातव्योबालानांलेहउत्तमः। मुखपाकस्यतुश्रेप्टोलेपस्त्वश्वत्थकल्कजः ।। ९६ ॥ अर्थ-पुष्करमल अतीस काकडासींगी पीपल और धमासेका चरन शहदस चाटै तो बालककी पांच प्रकारकी . (१४४) वैद्यन्न । खांसी दूर हो कुटकी वंशलोचन शहद के साथ चाटनेसे बालककी खांसी और श्वासरोग दूर होताहे अथवा कुटकी; का चूर्ण कर शहदके साथ चाटनेसे बालककी हिचकी और कठिन छर्दि दूर होती है पीपल मिरच मिश्री शहद छोटी इलायची और सेंधा इनक्षा अवलेह करके देनेसे बाछकका मूत्राघरोध दूर होताहे चालकके मुखपाकपर पीपलकी छाल पीसकर लेप करें ।। ९३ ॥ ९४ ॥ ९५ ॥ ९६ ॥ मुखपाकेतुवालानामासारमयोरजः। छुच्छन्दरीमलोमापोहरिद्राविल्वपत्रकम् ॥ ९७ ॥ सगुग्गुलुंयवंचैवधूपयःप्रयोजयेत् । निहन्तिरोदनंरात्रौबालकस्पनसंशयः ॥ ९८॥ अर्थ-अथवा आमका रस या गोंद उत्तम है छ दरकी बीट उरद हलदी येलपत्र गूगल इनकी देनेसे जो बालक रातमें रोषे उसका रोना बंद हो ।। ९७ ।। ९८ ॥ अथ ग्रहग्रस्तपालकोपचारः। क्षणादुद्धिजतेवालाक्षणामतिरोदिति । नखैर्दन्तेदारयतिधात्रीमात्मानमेवच ।। ९९ ॥ ऊर्ध्वनिरीक्षतेदन्तान्वादेत्कूजतिजूंभते । क्षामांगोनिशिजागर्तिमन्यांगोभिन्नविड्ज्वरः १०० अर्थ-जो बालक क्षणमें डरनेटने क्षणमें रोनेलगे नाखून और दातोंसे कभी माताको और कभी अपनेको विदीर्ण करनेलगे ऊपरको देखे दांतोंको अजाये रोवे वारंवार जंभाई ले दुबला होजाय रातको जागे शुन्य शरीर भिन्न विट ज्वरसे व्याकुल हो ॥ ९९ ॥ ॥ १०० ।।

भापाटीकासमेत । सामान्यग्रहजुष्टानांलक्षणंसमुदाहृतम् । सभेदकूलद्वयमृत्तिकायामूर्तिविधायककरप्रमाणाम् ॥ त्रिलोचनांशूलकपालपाणिजाधरांरुद्रतनुंदधानाम् । भुजंगभूपांभसितोज्ज्वलांगीमंगीकृताशेषललामलीलां अर्थ-यह सामान्य ग्रहप्रस्तबालकोंके लक्षण हैं(उपचार) नदीके दोनों किनारेकी मृत्तिका लावै उसकी एकहाथ प्रमाण भूर्ति बनावे । तीन नेत्र शूल आर कपाल हाथमें लिये जटाजूटयुक्त रुद्र शरीर धारण किये भुजंगसे भूषित भस्म लगाये सम्पूर्ण मनोहर लीलाको अंगीकार किये ॥ १॥ अत्रमूर्तीसमावाह्यरुद्रसर्वग्रहाधिपम् । नंदादिपूतनायुक्तंपूजयेचंदनादिभिः ॥२॥ निरच्यतण्डुलैचूर्णेश्चतुरस्रंकरोन्मितम् । तत्रसंस्थाप्यपूर्वस्यांतांतदर्चाविधिचरेत् ॥ तत्तन्मत्रैर्विचित्रैश्चनानोपकरणादिभिः ॥३॥ अर्थ-इसमूर्तिमें ग्रहपति रुद्रका आवाहन करै नंद आदि पूतनासे युक्त चंदनादिसे पूजन करे चावलोंका चूर्ण करे चौ. कोन मंडल एक हाथ प्रमाणमें बनावे वहां पूर्वकी और मृत्तिको स्थापित कर उसकी पूजा करे वह वह विधानके मंत्र पढकर अनेक सामग्रीसे पूजन करे उसका क्रम कहते हैं ।। १०२ ॥ १०३ ।। अथ क्रमः। गोमयोपलिप्तायांभूमौतण्डुलचूर्णनयथोक्तं चतु- रसंकृत्वातन्मध्येयथोक्तांमृतिसंस्थाप्यओमद्या.

वेद्यरत्न। मुकनानोवालस्यसर्वग्रहशान्त्यर्थं सर्वग्रहवलिं करिष्ये ॥ तस्यांसर्वग्रहानाबाह्यसर्वग्रहाधिपतये हुँफट्स्वाहेति मंत्रेणगंधादिकोपचारे सम्पूज्यनै- वेद्यसप्तपताकासप्तदीपान्गुडोदकमत्स्यमांस- सुरास्विनगोधूमवटकादिकं वृहदशपासंस्था- प्य ततस्तस्यामग्रेपरिवेष्य ओंनमोभगवते रुद्रायव्यंबकायसत्यसुवसत्यसुवहुंफट्स्वाहेति मंत्रमुक्त्वावालकमुष्टिमात्रमन्नंगायपूर्वपरिवेपि. तेनेत्याजयेत् ॥ ततोन्यमुष्टिमात्रमन्नंगृहीत्वाओं फट्वेनतेयायनमः ॥ ततोन्यदपिह्रींहीक्षः इति वारद्वयंवलिंदत्वाबालप्रमाणांपुप्पमाला गृही- त्वाबालोपरिनिःपरिभ्राम्य ओंकारिणिसुस्थाप- यइतिपूर्वस्यादिशि तास्थापयित्वाऽपश्यन्नेवगृ- हमागच्छेत् । ततोपेनवालंधूपयेत् ॥ १० ॥ अर्थ-चार हाथ भूमिको मायरमे लीप चावल के पूर्णकी वेदी बनाय उसपर यधोक्तमृतिका म्यापन पर नामगं प्रका उच्चारण कर कहे में अमुक पालनहसान अयं प्रत्यालि करता है उनमें सम्पूर्ण ग्रहों का आगमन का सम्पूर्ण महाक अधिपतिको दुफटस्वाहा पदकर गंपादिदपचारम पृजन कर नेयेद्य सान पनाका मान दीप गुर उदक मस्याम सुरास्पिन गेई घरकादि यह बडे यांमक पायकी टॉफर्ग इसकेमागे रपमर ऑनमोमगवन गम्डाय पावसाय

भापाटीकासमेत ।
(१४७)
सत्यसुव सत्यसुव हुंफट्स्वाहा यह मंत्र पढकर बालकके
मुष्टिमात्र अन्नको ग्रहण कर फट् वैनतेयायनमःतथा हीं
ह्रींक्षा यह दोवार पढ बलि देबालककी बराबर लम्बी फूट-
मालाको ग्रहण कर बालकके ऊपर तीनवार घुमाकर ओं
कारिणी सुस्थापय इसप्रकार पूर्वकी ओर बाहर स्थापन
कर फिर उसे न देखताहुआ घरमें आवै फिर धूपले बाल-
कको धूपित करें ॥ १०४॥
धूपविधिः।
कार्पासास्थिमयूरपिच्छवृहतीनिर्माल्यपिंडीतक-
त्वङ्मांसीवृपदंशविघुसकणाकेशादिनिर्मोककैः ।
गोशृंगद्विपदंतहिंगुमरिचैस्तुल्यै कृतंधूपन
कृत्योन्मादपिशाचराक्षससुरावेशग्रहन्नमतम् १०५॥
एवंदिनत्रयंकृत्वाचतुर्थदिनेचतुरोत्राह्मणान्
भोजयेदेवंशुभंभवति ॥
इति श्रीगोस्वामिशिवानंदभट्टविरचिते
वैद्यरले चतुर्थः प्रकाशः ॥ ४ ॥
अर्थ-कपासके बीज मोरका पंख भरकटया शिवनिर्माल्य
मैनफल दालचीनी वंशलोचन बिलारकी विष्टा धानकी
भूसी वच मनुष्यके बाल साँपकी कैंचली गायकी सींग
हाथीदांत हींग और मिरच इनको बराबर भाग लेकर
धूप देनेसे उन्माद पिशाच राक्षस देवताओंका आवेश
और ग्रह दूर होते हैं इस प्रकार तीनदिन करके चौथेदिन
चारब्राह्मणों को भोजन करानेसे मंगल होताहे ॥ १०५ ॥
इति श्रीगोस्वामिशिवानदम विरचिते वैद्यरने पण्डितज्वालाप्रमाद-
मिश्रकृतमापारीराया चदुर्थः प्रकाशः ॥ ४ ॥

(१४८) वैद्यरत्न । अथ वाजीकरणम् । गोक्षुरकाक्षुरकःशतमूलीवानरिनागबलातिवलाश्च ।। चूर्णमिदंपयसानिशिपेयंयस्यगृहेप्रमदाशतमस्ति ॥१॥ अर्थ-गोखरू तालमखाने शतावर ( कोंचके बीज ) गगेरनकी छाल सहदेईकी जड इनका चूर्ण कर रात्रिको दूधके साथ पिये तो सौ त्रियोंके साथ भोग करनेकी सामार्थ्य हो ॥१॥ पलंगोक्षुरवीजस्यद्विपलंकपिकच्छुरम् । पलंनागबलाबीजेपलमेकंशतावरी ॥२॥ विदारीकन्दचूर्णस्यपलद्वयमथापरम् । द्विपलंत्रपुसीबीजवाजिगंधापलत्रयम् ॥३॥ वासाचतालमूलीचगुडूचीरक्तचंदनम् । त्रिसुगंधिकणाधात्रीलवंगनागकेशरम् ॥ ४॥ एतानिकर्पमात्राणिसूक्ष्मचूर्णानिकारयेत् । बालशाल्मलिमूलंचभावयेदेकविंशतिः ॥५॥ कुशकाशीशफासप्तशर्करासमयोजितम् । दुष्टशुक्रवीर्यहानिमूत्रकृच्छ्राणियानिच ॥६॥ मूत्रावातंमूत्रदोपंजयेच्छुकविवर्धनम् । शतंगच्छतिचस्त्रीणांदयतुल्यपराक्रमः ॥ ७॥ वंध्यापुत्रमवाप्नोतिभुक्त्वाचूर्णमिदंक्रमात् । कामदेवाभिधंचूर्णधन्वन्तगिनिरूपितम् ॥ ८॥ अर्थ-गांम्बरके बीज एकपल काँचके बीज दो पल गंगर- नके वीज कपल शतावरी ? पल विदारीकंदका चूर्ण २ भापाटीकासमेत। (१४९) पल ककडीके बीज २ पल इन्द्रवारुणीके बीज २ पल अश्व- गंघा ३ पल अडूसा तालमूली गुडूची लालचन्दन इलाय. ची दालचीनी, तेजपात पीपल आमला लोंग नागकेशर यह सब एक २ कर्ष ले फिर इनका चूर्ण करे इसमें कोमल सेमलके पत्तोंके रसकी इक्कीस भावना दे कुश और कास- के रसकी सात भावना दे फिर बरावर बूरा मिलाले सेवन करनेसे यह दुष्टशुक्र वीर्यक्षय मूत्रकृच्छू मूत्राघात मूत्रदोष रोगोंको दूर करता है यह शुक्रका बहानेहारा है इसके सेव- नसे सौ स्त्रियों के भोगनेकी सामर्थ्य होती है घोडेकी तुल्प पराक्रम होता है इसके सेवन करनेसे वंध्याके भी पुत्र हो- ता है यह धन्वन्तरिका कहा कामदेवचूर्ण है ॥२॥ ३ ॥४॥ ॥५॥६॥७॥८॥ चूर्णविदार्याःसुकृतस्वरसेनैवभावितम् । सर्पिःक्षौद्रयुतंलीवादशगच्छेन्नरोंगनाः ॥९॥ अर्थ-विदारीकंदका चूर्ण कर उसीके रसकी उसमें भावना दे घृत और शहदके साथ उसे चाटे तो दश त्रियोंके संग गमन कर सकताहै परन्तु घृत शहद बराबर न हो ॥९॥ एवमामलकंचूर्णस्वरसेनेवभावितम् । शर्करामधुसर्पियुक्तंलीड्सापयःपिवेत् ॥ १० ॥ एतेनाशीतिवोपियुवेवपरिहष्यति । कपमधूकचूर्णस्य घृतक्षौद्रसमन्वितम् ।। १३ ।। पयोनुपानयोलिह्यात्सगच्छेदशचांगनाः ॥ १२॥ अर्थ-अथवा एक आमलेहीका चूर्ण लेकर उसमें आमलेके स्वरसकी भावना दे फिर उसे कन्द मधु घृतके साथ मिला-

(१५०)
वैद्यरत्न।
.
कर चाटे पीछे दूध पिये ॥ १० ॥ इस प्रयोगले अस्सी
वर्षका पुरुपभी युवाके समान प्रसन्न होताहै । मुलेठीका
चूर्ण एकतोला, घी एक तोला, शहद एक तोलासे कुछ
कमती ॥ ११॥ इन सयको मिलाकर चाटे ऊपरसे दूध
पिये तो दश स्त्रियोंके पास जानेकी शक्ति हो ॥ १२ ॥
प्रस्थंगोक्षुरसूक्ष्मचूर्णमुदितंदुग्धाढकेपाचितं
जायत्रीसलवंगलोहमरिचकर्पूरमामल्लकम् ।
अब्दंशोषमजाजियुग्मरजनीधात्रीकणाकेशर
जातीकोशफलेसदीप्यनलदंशुंठीकुवेराक्षजम् ॥१३॥
तुल्यंशर्करयातदईविजयंप्रस्थाईकंगोघृतं
युक्त्यावैद्यवरेणनिर्मितमिदंप्रोढांगनादर्पनुत् ॥
वीर्यस्तंभनतुष्टिपुष्टिजननवाजीकरंकामिना-
मुक्तोगोक्षुरपाकएपहरिणीनेवाविलासास्पदम् १६।।
अर्थ-छोटे गोखरूका चूर्ण १ सेर एक आढक १०२४ टंक
दूधमें पकायें खैरसार लवंग लोहसार काली मिर्च कपर
भीमसेनी अडूसा समुद्र शोष कालाजीरा श्वेतजीरा दारु.
हलदी आमला पीपल नागकेशर जायफल अजवायन
खस सोंठ करंजुआ यह सब वरावर ले इन सबकी बरा.
बर दूरा और उस्से आधी भाग ले और आधे सेर गोका
घृत ले उसको वद्य युक्तिसे निर्माण कर यह सेवन करनेसे
प्रौढ खीका दर्द चूर्ण करनेवाला तुष्टिपुष्टिका करनेवाला
कामीजनोंको रातिमें प्रवृत्त करनेवाला यह गोम्बम्पाक
आनंद देनेवाला है ॥ १३ ॥ १४ ॥

भाषाटीकासमेत। कूष्मांडस्यतुलांविधायविधिवत्स्विन्नांप्रविष्टांपुन- युक्तांकर्पमितःसुचर्णिततमैव्योपालजीराजिभिः ॥ चातुर्जातवराबलावयवलीकर्पूरमेथीत्रिवृ- दन्तीवारणपिप्पलीक्षुरतिलद्राक्षात्रिकंटाम्बुदेः १५॥ चव्याश्वामयचारवानरिसटीयष्टीतुगापिप्पली- मूलाज्यैःसलवंगशाल्मलिजयाकोलजातीफलैः । जातीकोशविदारिसिंधुमुशलीश्रृंगाटकै सपिः प्रस्थेनाम्रपले नचापिसितयासाईतुलामानया १६॥ युक्त्यासाधुविपाच्यभाजनगतंकृत्वायथानिप्रगे कूष्माण्डस्थरसांजनंसुललितंशुद्धोत्तरःशीलयत् । वृष्यंवर्ण्यमथाग्निदीपनकरंयक्ष्माम्लपित्तापहं पांडुश्वासजिदत्रपित्तशमनंमोहादिरोगप्रणुत् १७ ॥ अर्थ-पेठा पाठसौ तोले ले अर्थात उसको. छीलकर उसके बीज निकाल उसे जोश दे उसमें एकएक कर्ष सोंठ, मिरच, पीपल, लजावन्ती, राई, दालचीनी, इला- यची, तेजपात, नागकेशर, पाठा खरेटी सोमराजी कपूर मेथी निसोथ गजपीपल तालमखाना तिल दाख गोखरू नागरमोथा चव्य असगंध कूठ चिरोंजी कोंचके बीज कचूर मुलहठी तज पीपल शतावर मेढासिंगी लवंग सेमल, शीतलचीनी, जायफल, जायफलकी छाल विदारीकंद, समुद्रशोप, मुशली, सिंघाडे यह सब बरा- बर ले अभ्रक एक पल ले, और घृत एक सेर आधी तुला श्वेत वृरा ले इसकी चासनी कर युक्तिो अग्निपर . .

. (१५२) वेद्यरल। यह सब वस्तु डालकर पका और पेठेका शुद्ध रस रसोत भी उसमें डालेद इसे पाककी समान करले यह बल. कारक व्रणशोधक अग्निका प्रदीप्त करनेवाला यक्ष्मा अम्ल- पित्तको दूर करनेवाला पाण्डु श्वासनाशक रक्तपित्त और प्रमेहको दूर करता है ॥ १५ ॥ १६ ॥ १७ ॥ एतेनातिवलीवलीविरहितःस्रीणांयुवेदव्रजे- इंदंवृद्धतरोनरोतिललितःप्रज्ञाप्रभापूजितः॥ १८॥ अर्थ-इससे बली दूर होती हैं बल बढताह स्त्रियों में युवा की समान इसको खानेवाला प्रवृत्त होताहै वृद्ध मनुष्य भी बली होकर कान्ति बुद्धिसे पूजित होता है ॥ १८ ॥ प्रस्थस्वगुप्तवीजानांसूक्ष्मंचूर्णीकृताभिपक् । पचेत्पंचाढकेदुग्धेमृत्पात्रेमृदुवह्निना ॥ १९ ॥ प्रस्थाद्धंगोघृतंदत्वादिप्रस्थाशर्करामपि । जातीफलंजातिपत्रकंकोलंनागकेशरम् ॥ २० ॥ लवंगंदीप्यमाकल्लमधिशोपत्रिकट्वयः । विजातहेमजीरंचप्रियंगुंगजपिप्पलीम् ।। २१ ।। प्रत्येकंकर्पमादायभक्षयेत्पलमात्रया। प्रमेहक्षण्यकृच्छाश्मगुल्मशूलानिलामये ॥ २२॥ शस्तोयस्त्रीपुगर्भार्थपंढानांशुक्रवृद्धये। प्रसूतानांहितौरक्तविकारविनिवारकः ॥ २३ ॥ पुंसांवाजीकरोवल्यश्चक्षुप्याकामवईनः । कामिनीदर्पविध्वंसक निधुवनेनृणाम् ॥ २४ ॥ अर्थ-कोचके बीज एक आढक लेकर उन्हें अच्छी प्रकार चूर्ण कर पांच आढक गोंके दूध मिट्टीके पात्र में

भापाटीकासमेत
(१५३)
-
रखकर पकावै उसमें आधे प्रस्थ गौका घी और दो
प्रस्थ शर्करा डालै इसकी चासनी कर पीछे इसमें जाय-
फल, जातीपत्र कंकोल, नागकेशर, लवंग, अजवायन
अकरकरा, समुद्रशोष, सोंठ, मिरच, पीपल, दालचीनी,
इलायची, तेजपात, श्वेतजीरा, प्रियंगु, गजपीपल, यह
प्रत्येक वस्तु एक एक कर्ष लेकर इसमें डालदे सिद्ध होने
पर उतारले एक पलकी मात्रासे इसको भक्षण करे तो
प्रमेह क्षीणता कृच्छ, अश्म, गुल्म, शूल, वातरोग दूर हों
इसके सेवनसे स्त्रीको गर्भ रहता है नपुंसकोंका वीर्य बढता
है प्रसूतियोंको हितकारक रक्तविकारका निवारण कर
नेवाला पुरुषोंको वाजीकर बलदाता चक्षुओंको हित-
कारक कामवर्द्धक रतिमें स्त्रियोंका दर्प नाश करनेवाला
है ॥ १९ ॥ २० ॥२१॥ २२ ॥ २३ ॥ २४ ॥
नास्त्यनेनसमोयोगोदनाभ्यांनिर्मितःशुभः ।
कपिकच्छूवीजपाकोदीपनःपाचनःपरः ॥ २५ ॥
अर्थ-इसकी समान और योग नहीं है यह अश्विनीकुमा-
रनिर्मित है यह कौंचमीजपाक परमदीपन और पाचन है२५॥
प्रस्थंपिप्पलिमादायपचेत्क्षीरेचतुर्गुणे ।
अ ढकंघृतंगव्यंशुद्धखंडाढकंतथा ॥२६॥
लोहेपचेद्धृतेतावद्यावत्पाकंसुपाचितम् ।
ततोद्रव्याणिचैतानिश्लक्ष्णचूर्णानिकारयेत् ॥ २७ ॥
एलात्वपत्रकंचैवलवंगनलदतथा।
नागरपिप्पलीमुस्ताश्रीखंडंमारिचंनतम् ॥२८॥
कर्पूरंजातिपत्रंचकुंकुममधुकंतिलम् ।
वंगलोहरजवाथपलमानसमांशकम् ॥ २९॥

(१५४). वैद्यरत्न। मधुनाकुडवंदत्वाखादेदग्निवलंयथा वृष्यपुष्टिकररुच्यचक्षुष्यंवयवर्द्धनम् ।। ३० ॥ बलवीर्यकरंचैवच्छर्दिमूर्छाभ्रमापहम् । दाहतृष्णाप्रशमनमोजःशकविवर्द्धनम् ॥ ३१ ॥ अर्थ-एक प्रस्थ छोटी पीपल लेकर ४ चार प्रस्थ गौके दूधमें पकावे इसमें आधे आढक गौका घी और एक आ: ढक शुद्ध बूरा डाले यह सब लोहपात्रमें डालकर पकावे जब पाक होजाय तय नीचे लिखे द्रव्य चूर्ण कर उसमें डाले इलायची, तज, पत्रज, लौंग, खस, सोंठ, पीपल, नाग रमोथा, लालचन्द, कालीमिरच, तगर, भीमसेनी कपूर, जायफल, केशर, मुलहटी, तिल, वंग, लोहसार यह सब बराबर एक एक पल ले एफ कुडव ( १६ तोले) मधु डाल. कर इनको सिद्ध करे आग्निके बलके अनुसार इसको खाय यह बल पुष्टि करनेवाला रुचिकारक चक्षुओंको हितकारी क्यका बढ़ानेवाला है, बलवीर्य करता, छर्दि, मूळ, भ्रम हरनेवाला, बल और वीर्यका बढानेवाला है ॥ २६ ॥२७॥ २८॥ २९ ॥ ३० ॥ ३१ ॥ बोधनंचेंद्रियाणांचप्रमेहान्हन्तिविंशतिम् । वातान्तककरहृद्यमष्टज्यविनाशनम् ।। ३२॥ अर्थ-इंद्रियोंका बोधक और बीस प्रमेहोंका दूर करने- बाला है वातका अन्त करनेवाला हृदयको हितकाकरक आठ प्रकारका ज्वरनाशक है ॥३०॥ अष्टादशचकुष्टानांवध्यानांपुत्रदंपरम् । पिप्पलीखंडमेतदिवालानांसुहितपरम् ॥ ३३॥ धात्रीफलानिशुप्काणिप्रस्थमात्राणिनिक्षिपेत् ।

भापाटीकासमेत। चतुःप्रस्थगवांदुग्धेस्निग्धभांडेततःपरम् ।। ३४ ।। विवारंदापयेदुग्धंक्षीरंपर्युपितंत्यजेत् । तानिसर्वाणिसंपेष्यशिलायांतुभिपग्वरः ।। ३९ ॥ तन्मध्येतुचतुःप्रस्थंगोक्षुरंचविनिःक्षिपेत् । दृढहस्तेनतत्सर्ववस्त्रपूर्तसमाचरेत् ।। ३६ ।। मृदाण्डेपाचयेद्वह्नौयाववाढत्वमाप्नुयात् । सिताचतुर्गुणंयोज्याऔपधानिततःक्षिपेत् ॥ ३७॥ चातुतिलवंगंचजातीपत्रफलेतथा । मांसीधान्यतुगाशीतंतगरंजीरकद्वयम् ॥ ३८ ॥ अर्थ-अठारह प्रकार के कोढदूर करनेवाला और वंध्याको पुत्र देनेवाला है यह पिप्पलीखण्ड बालकोंको हित करने. वाला है एक प्रस्थ सूखे हुए आमले लेकर चार प्रस्थ गौके दूधमें डाले यह चिकने वरतनमें धरदे और एक दिनके उपरान्त निकालकर वह दूध अलग कर उनमें उतनाही दूध और डालदे पेसा तीनवार करें फिर उन आमलोंको पत्थ- रपर पीसकर उसमें चार प्रस्थ गौका दूध मिलावे, फिर यह सब दृढवस्त्रसे छानेल और अग्निपर मिट्टीके बरतनमें रखकर पकावै, जबतक गाढा होजाय इससे चौगुनी मिश्री डाले और नीचे लिखी औपधी डाले दालचीनी, इला- यची, तेजपात, नागमोशर, लौंग, जातीपत्र, जायफल, जटामांसी, धनियाँ तज, तगर, दोनों जीरे ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ ॥ ३५ ॥ ३६॥ ३७॥ ३८॥ वीजपुष्करजयष्टिंकवावकुंकुमंधनम् । प्रत्येककर्पयुग्मञ्चचूर्णीकृत्वाथमेलयेत् ॥ ३९ ॥ - (१५६) वैद्यरत्न । . अभ्रकवंगसंज्ञंचकर्षमा पुनः क्षिपेत् । सुगंधार्थचकर्पूरंकस्तूरीचांवरंक्षिपेत् ॥ ४० ॥ पलमात्रांमुटींकृत्वास्थापयेद्भाजनेशुभे। नोशदारुइतिख्यातांभिपजानांतुसमताम् ॥ ११ ॥ गुणान्वच्मियथादृष्टान्वलकृद्धीर्यवर्द्धनी। चत्वारिंशत्पित्तरोगाअष्टावुदरजास्तथा ॥ ४२ ॥ नश्यंत्यनेनसर्वेहिकामवीर्यविवादनी ॥ ४३ ।। अर्थ-कमलगट्टे, मुलहटी, कवावचीनी, केशर, नागर: मोथा यह प्रत्येक दोदो कर्ष ले इनका चूर्ण कर इसमें मिलावै अभ्रक और वंग यह एक एक कर्ष डाले सुगंधिके निमित्त कपूर कस्तुरी और अम्बर डाले एक पलमात्रकी गुटिका करके अच्छे बरतनमें रखछोई यह नोशदारु वैद्यलोगोंको सम्मत है यह सब गुणवाली बल और वीर्य बढानेवाली है चालीस पित्तरोग आठ उदरके रोग इससे दूरहोते, काम और वीर्य बढताहै यह गुण देखे हुए हैं ॥ ३९ ॥ ४० ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ अथ लक्ष्मीविलासरसः। पलंकृष्णाचचूर्णस्यतदढेरसगंधके । कर्पूरस्यतदईतुजातीकोशफलेतथा ॥ ४४॥ वृद्धदारुकबीचबीजमुन्मत्तकस्यच । त्रैलोक्यविजयाबीजंविदारीकंदमेव च ॥ ४५ ॥ नारायणीतथावागवलाचातिबलातथा। बीजंगोक्षुरकस्यापिजलधे जमेवच ॥ ४६॥ एतेपांकार्पिकंचूर्णगृहीत्वावारिणापुनः ।

भाषाटीकासमेत। . निष्षिष्यवटिका कार्यास्त्रिगुंजाफलमानतः॥४७॥ निहन्तिसन्निपातोत्थान्गदान्धोरान्सुदारुणान् । वातोत्थान्पत्तिकाश्चात्तिनास्त्यत्रनियमावचित् ४८ कुष्ठमष्टादशाख्यंचप्रमेहान्विशतितथा। नाडीव्रणंत्रणंघोरंगुदामयभगन्दरम् ॥ ४९ ॥ श्लीपदंकफवातोत्थंचिरजंकुलसम्भवम् । गलशोपंचांत्रवृद्धिमतिसारंसुदारुणम् ॥ ५० ॥ कासपीनसयक्ष्मार्शःस्थौल्यदौर्बल्यमेवच । आमवातंसर्वरूपंजिह्वास्तभंगलग्रहम् ॥ ५१ ॥ उदरंकर्णनासाशिमुखवैजात्यमेवच । सर्वशूलंशिरःशूलंत्रीणांगदनिपूदनम् ॥ ५२ ॥ अर्थ-काले अभ्रककी भस्म ४ तोले पारा गन्धक दोनों २ तोल भीमसेनी कपूर तोले जायफल, जावित्री, विधा- यरेके बीज, धतरेके बीज, भांगके बीज, विदारीकंद शता- वर गुलसकरी गंगेरन गोखरू समुद्रफल इन औषधियोंको समानभाग ले सबको पानके रसमें खरल करे वा जलसे पीसकर तीनतीन रत्तीकी गोलियां बनावे यह गोली सन्नि- पातके घोर रोग वातके रोगपित्तके रोगोंको दूर करेहै इस रसपर किती आहार विहारका नियम नहीं है अठारह प्रकारके कुप.बीस.प्रफारके प्रमेह नाडीव्रण घोर गुदा रोग भगन्दर कफ वातके रोग श्लोपदके रोग गलेकी सुजन आंतोंकी वृद्धि अतिसार खांसी पीनस क्षयी बवासीर स्थूलता देहमें दर्गन्धिका आना आमवातके रोग जिह्वा- +

(१५८)
वैद्यरल।
स्तंभ गलग्रह अदितरोग गलगंड वातरक्त उदररोग कान
नाक नेत्र मुखकी रिसता सब देहके शुल मस्तकाल
स्त्रियोंके रोग यह सब दूर करताहे ।। ४४ ॥ ४५ ॥ ४६॥
॥४७॥४८॥ ४९ ॥ ५० ॥ ५१ ॥ ५२ ।।
वटिकांप्रातरेकैकांखादेन्नित्यंयथाबलम् ।
अनुपानमिदंप्रोक्तंमांसंमिष्टंपयोदधि ॥५३॥
वारितक्रसुधासीधुसेवनात्कामरूपधृक् ।
वृद्धोऽपितरुणस्पर्धीनच शुक्रस्यसंक्षयः ॥५४॥
नचलिंगस्यशैथिल्यंनकेशायांतिपक्वताम् ।
नित्यंशतस्त्रियोगच्छेन्मत्तवारणविक्रमः॥५५॥
दिलक्षयोजनीटिर्जायतेपोटिकापरः।
प्रोक्त प्रयोगराजोयनारदेनमहात्मना ॥५६॥
नानालक्ष्मीविलासस्तुजगन्नाथेजगद्गुरौ ।
अस्यसंसेवनात्कृष्णोलक्षनारीपुवल्लभः ॥ १७ ॥
अर्थ-इसरसकी गोली नियमानुसार भक्षण कर इसपर
मांस मिष्टान्न दूध दही जलमढेसे बने पदार्थ मद्य सीधुमद्य
यह सेवन करना पथ्य है. उसके खानेसे कामदेवके सह-
श हो वृद्धभी तरुण होजाता है वीर्यका क्षय नहीं होता
न लिंग शिथिल होनाहै न बाल श्वेत होते हैं मत्तहाथीकी
समान पुरुपको सौ वियोंसे रमणकी शक्ति होजातीहे,
दो लास योजनकी दृष्टि हो, पुष्ट हो यह प्रयोग महात्मा
नारदजीने श्रीकृष्णसे कहाया जिसके अभ्याससे श्रीकृष्ण
लाख गोपियों के प्रिय हुए यह लक्ष्मीविलास रस है ॥२३॥
॥५४॥ ॥५५॥ ५६ ॥ ५७॥

: भापाटीकासमेत। (१५९) अथ चद्रोदयरसक्रिया। पलंमृदुस्वर्णदलरसेन्द्रात्पलाएकंपोडशगंधकस्य ॥ शोणैस्तुकासमवैःप्रमूनःसर्वविमर्याथकुमारिकाद्भिः तत्काचकूपेनिहितंयथावहढेसुमृत्कर्पटवीतगात्रे । पचेकमानौसिकताख्ययंत्रेदिनत्रयंतसुधीःसुगुप्तम् ॥ तत्स्वांगशीतंचसमुद्धरेतततोरसःपल्लवरागरागः । निगृह्मचैतस्यपलंपलानिचत्वारिकर्पूररजस्तथैव ॥६॥ जातीफलंसोपणमिंद्रपुप्पंकस्तूरिकायाइहशाणएकः । चंद्रोदयोऽयंकथितोस्यमापोभुक्तोहिवल्लीदलमध्यवर्ती । मदोन्मदानांप्रमदाशतानांगर्वाधिकत्वंश्लथयत्यकांडे ॥ अर्थ-सोनेके वर्क ४तोले शुद्धपारा ३२ तोले शुद्धगंधक ६४तोले तीनोंको खरल में डालकर कजली करे फिर नरम कपासके फूलोंके रसमें सबको खरल करे फिर घीकुवॉरके रसमें खरल करके फिर सुखाके एक बड़ी आतशी शीशीमें भरकर ऊपर उसके सात कपडमिट्टी कर वालुकायंत्रमें रख- कर नीचे अग्नि जलावै जब शीशी मेंसे धुआं निकल जाय तब ईटके टुकड़ेसे शीशीक मुखको बंद करदे और कमसे मंद मध्यते तीन दिनरात्रिकी अग्नि देव अर्थात् २४ पहरकी अग्नि देव जब चन्द्रोदय सिद्ध होजाता है तब शीशीकी नाली काले स्याह रंगकी होजातीहै यह सिद्ध असिद्ध होनेकी परीक्षा है सिद्धचन्द्रोदयका रंग नवीन पत्तेकी ललाईके समान लाल रंग होता है यह सिद्ध रंगका चन्द्रोदय सक- लरोगनाशक है इसे सब रोगोंपर देना चन्द्रोदय ४ तोले (१६० वैद्यरत्न भीमसेनी कपूर १६ तोले जायफल काली मिरच लोंग यह १६ तोले ले कस्तूरी ४ मासे सबको खरल कर बारीक एक मासे नागरबेलके पानमें रखकर खाय तो मदमाती सैकडों खियोंके मदको दूर करे ॥ ५८ ॥ ५९ ॥ ६० ॥ ६१ ॥ स्थावरंजंगमंविषं विपमंविपचारिवा। नविकारायभवतिसाधकेंद्रस्यवत्सरात् ॥ ६२॥ अर्थ-स्थावर जंगम विष अथवा जलका विष इसके एक वर्ष सेवनसे मनुष्यको नहीं व्यापताहै ।। ६२॥ मृत्युंजयोयथाभ्यासान्मृत्युंजयतिदेहिनाम् । तथायंसाधकेंद्रस्यजरामरणनाशनः ॥ १३ ॥ अर्थ-जैसे अभ्यास करनेसे मृत्युजंय देहधारियोंकी मृत्युको जीतताहै इसी प्रकार यह साधकके जरामरणका नाश करताहै ॥ ६३ ॥ भय अर्पदंशस्यौपधम्। कार्यासद्यःसर्पदंशेमणिमंत्रीपधक्रिया। अचिन्त्योदिप्रभावोस्तिमणिमंत्रौपधस्ययत् ॥६॥ अर्थ-सर्पके काटेकी बहुत शीघ्र मणिमंत्र औषधी क्रिया करनी चाहिये कारण कि, मणि मंत्र और औपधियोंका प्रभाव अचिन्त्य है ॥ ६४ ॥ वृपराशिस्थेसवितरिशिरीपतरुवीजमेकमश्नुवते । सनरःखगपतितुल्योनदश्यतेसर्पसंचयेःसर्वः ॥६५॥ अर्थ-जिस समय वृपराशिके सूर्य हों उस समय शिर- सका एकवीज खानेसे वह मनुष्य गरुडकी तुल्य होकर सर्प- समृहसे नहीं काटा जाताहे ।। ६५ ।।

भापाटीकासमेत ।
(१६१)
कुलिकामूलनस्येनकालदष्टोपिजीवति ।
तंडुलीयकमूलंहिपिष्टतण्डुलवारिणा ॥
सव्योपंपीतमातुनिर्विपंकुरुतेनरम् ॥६६॥
अर्थ-काकादिनीकी जडका नास लेनेसे कालका काटा-
हुआभी जीजाताहै चौलाईकी जड चावलके जलसे पीस-
कर पान कर तो मनग्य तत्काल निर्विष होता है ॥ ६६ ।।
घृतमधुनवनीतपिप्पलीशृङ्गबेरं
-मरिचमपिचदद्यात्सप्तमसैन्धवंच ।।
यदिभवतिसरोपंतक्षकेनापिदो
गदमिहखलुपीत्वानिर्विपस्तत्क्षणेन ॥ ६७ ॥
अर्थ-घी शहद मक्खन पीपली अदरख मिरच काली
और सैंधा यह सात औषधि बारीककरपान करनेसे क्रोधसे
तक्षकका काटाभी अच्छा हो जाताहै ॥ ६७ ॥
जयपालस्यमज्जानंभावयेनिंबुकद्रवैः ।
एकविंशतिवारांस्तुततोवर्तिप्रकल्पयेत् ॥ ६८॥
मनुष्यलालयावृष्ट्वाततोनेत्रेतयांजयेत् ।
सर्पदष्टविजित्वासाजीवयतिमानवम् ॥ ६९ ॥
अर्थ-जयपाल (जमालगोटे) की मींगीको, नीमके
रसकी भावना दे, ऐसे २१ वार भावनाकी कल्पना करें
और मनुष्यकी लारसे घिसकर नेत्रों में अंजन लगानेसे
समित्विष दूर होकर मनुष्य जीवित होता है .६.१६९
अथ वृश्चिकदंगः।
आरक्तवृत्तापामार्गपत्रभुक्तंतदेवहि ।
वृश्चिकेननरविद्धंकुरुतेसुखिनभृशम् ॥ ७० ॥

(१६२) वैद्यरत्न । पानीयपिएजैपालकल्कलेपेनसर्वथा । विपंवृश्चिकविदस्यभस्मीभवतिसर्वथा ॥७१॥ अर्थ-लाल गोल लटजीरेके पत्ते खानेसे तत्काल विच्छूके काटेका विष उतर जाता है और मनुष्य सुखी होता है तथा जमालगोटेको पानी में पीसकर लेप करनले विका विष उतर जाता है ॥ ७० ॥ ७१ । अथ धरटीदंशः । मरिचनागरोपेतंसिन्धुसौवर्चलान्वितम् । फणिवल्लीरसैलेंपाद्धंतितरिटीविपम् ।। ७२ ॥ अर्थ-काली मिरच सौंठ संधानीन सोंचरनीन इनको नागरवेलपानरसके साथ लेप करे तो ततैयाका विष दूर हो ॥ ७२ ॥ अथ शतपदीदशः। लेपःप्रदीपतैलस्यखजूरविपनाशनः । हरिद्राद्वयलेपोवासगैरिकमनःशिलः॥ ७३॥ अर्थ-दीपकके तेलका लेप करनेसे कानखजूरेका विप दूर होता है वा दोनों हल्दियोंका लेप वा गेरू और मन. शिलका लेप करनेसे विप दूर होता है ।। ७३ ॥ जलवेतसपत्रंतुमूलंकुष्टंपचेजलैः । सक्वाथःशीतल पेयःपरमश्वविपापहः ॥ ७ ॥ अर्थ-जलवेत पत्ते सहित लेकर उसका मूल और कूट यह औषधि लेकर काढ़ा बनाय शीतल कर पीनेसे परम श्वविषको दूर करता है ।। ७४ ॥ असनजटाजलपिष्टय खादतिमातुलुंगफलमेकम् । उन्मत्तसारमेयप्रभवंविषमस्यनाशयति ।। ७२ ।। अथ श्वदशः।

भापाटीकासमेत ।
अर्थ-विजयसार जटामांसी, जल पीस इनके साथ
जो एक मातुलुंगका फल खाता है उसका उन्मत्तश्वानका
विष उतर जाता है ।। ७५ ।।
अथ लूताविषदूरीकरणम् ।
रजनीद्वयमंजिष्टापतंगगजकेसरैः ।
शीतांबुपिष्टैरालेपः सर्वलूताविपापहः ॥ ७६ ॥
अर्थ-हल्दी दारुहल्दी मजीठ पतंगगजकेशर इनको ठंडे
पानीसे पीस लेप करनेसे मकरीका विष उतर जाताहे ७६।।
अय भक्षितस्य विपस्य निराकरणम् ।
शीतोपचारावामेकाःशीताः शीतस्थलस्थितिः ।
विपा-विपवेगानांशांत्यैस्युरमृतंयथा ॥ ७७॥
अर्थ-इसमें शीतल उपचार शीतल सेक शीतल स्थानमें
स्थिति करनी तब विषार्तके विषवेग शान्त होजातेहैं
इसमें संदेह नहीं ।। ७७॥
भूनागताम्रशिखिपिच्छतानं
जहद्विपंवाफणिभृन्मणिवा॥
प्रक्षाल्यतद्वारिनिपीयचात्तों
विजयेत्स्थावरजंगमाख्यम् ॥ ७८ ॥
अर्थ-तीसा ताम्र और मोरपंखका तांचा सेवन कर-
नेसे विष दूर होता है वा सर्पकी मणिको जलसे धोकर
वह जल पीनेसे स्थावर जंगम दोनों प्रकारका विष दूर
होताहे ॥ ७८॥
मरिचीनवपत्राणिसैन्धवमधुसर्पिपी।
निवेगेन विपस्थावरजंगमम् ॥ ७९ ॥

(१६४)
वद्यरत्न ।
गरंविपटंकणमूपर्णचतुत्थंसमांशंकुरुदेवदाल्याः ।
रसेनपिष्टोविषवज्रपातोरसोभवेत्सर्वविपैकहन्ता ८०॥
निष्कास्यसंजीवतिसंप्रयुक्तोनृमूत्रयोगेनचसर्वथैव ।
जयाविपेणाकुलितंतथान्यद्रव्यविपैर्वर्णितमातुरंच ८१
अर्थ-काली मिरच नीमके पत्ते सेंधा शहद घी इनके
पनिसे स्थावर जंगम दोनों प्रकारका विष नाश होजाताहै
वच्छनाग विष सुहागा कालीमिरच मीलाथोथा इन सबको
समान भाग ले इनको वन्दालके रसमें खरल कर चार
चार मापेकी गोली बनावे यह वज्रपातरस सब प्रकारके
विषका नाश करताह यह मनुप्यके मूत्र वा गोमूत्रके साय
सेवन करनेसे घोर सर्पका डसाभी अच्छा होताहै कन्दा-
दिके विषकी पीडा तथा अन्यविपकी पीडा इसके सेव-
नसे शान्त होतीहै ।। ७९ ।। ८० ॥ ८१॥
अथ क्षुद्ररोगः।
तनादी यौवनपिटिवाः ।
शाल्मलीकंटकप्रख्याः कफमारुतरक्तजाः।
यौवनेपिटिकायूनांविज्ञेयामुखदूपिकाः ॥ ८२ ॥
अर्थ-सेमलके कोटेकी समान कफ वातसे तथा रक्तसे
युवा पुरुषों के मुखपर फुन्सी होजाती है वे मुखदूपिका मुहासे
कहलाती हैं। ८२ ॥
वरुणस्यकपायणमुखमावाल्यलेपयेत् ।
जातीफलंचंदनंचमरिचंसहपेपितम् ॥
मुखलेपेनहन्त्याशुपिटिकायौवनोद्भवाम् ॥ ८३ ॥

भापाटीकासमेत । ( १६५ अर्थ-वरनाका काथ कर मुखयर लेप कर अर्थात् जायफल लालचन्दन काली मिरचके साथ पीसकर मुखपर लेप करने से मुहास दूर होजाते हैं ॥ ८३ ॥ अथ कशादोषः। बाहुपाश्वासकक्षासुकृष्णस्फोटांसवेदनाम् । पित्तप्रकोपात्संभूतांकक्षामितिविर्दिशेत् ।। ८४ ॥ सुरदारुशिलाकुणैःस्वेदयित्वाप्रलेपयेत् । कफमारुतसंभूतंकक्षादोपसुदारुणम् ।।.८५॥ अर्थ-माहुके पार्थ अर्थात् बगल में महाकप्टदायक व्रण निकलताहे उसे कंखहारी कहते हैं वह पित्तकोपसे होतीहै देवदारु मनशिल कूठ इनका लेप कखिहारीपर स्वेदित करके करे तो कफवातसे उत्पन्न दारुण कक्षादोष दूर होताहै ॥ ८४ ॥ ८५॥ 'अय पादारी। मधूच्छिएवसामज्जाधृतसर्विमिश्रितैः। स्नेहस्वेदोपपन्नौतुपादौचालेपयेन्मुहुः ॥ ८६ ॥ सर्जाह्वसिंधूनवयोचूर्णमधुघृताप्लुतम् । निर्मथ्यकटुतैलाक्तंहितंपादप्रमार्जनम् ।। ८७ ॥ अर्थ-शहद चरबी हाडके भीतरका मगज घृत रालका चूरन इनको मिलाकर पहले तेल मल और स्वेदित कर पैरोंको चालन कर राल सेंधेनोंनका चूर्ण मधु और घृतमें मिलाय कडवे तेलमें मथन करे यह परमें मलनेसे हित कारक है।॥ ८६ ॥ ८७॥ भय गुदबंगोपधम्। गुदंचगव्यपयसाम्रक्षयेदविशंकितम् । दुप्प्रवेश्योगुदभ्रंशोविशत्याशुनसंशयः ।। ८८॥

(१६६) वैद्यरत्न । मूपिकाणांवसाभिर्वायुदेसम्यक्प्रलेपनम् । चांगेरीकोलदध्यम्लनागरक्षारसंयुतम् ॥ ८९ ॥ घृतमुत्कथितंपेयंगुदभ्रंशरुजापहम् ॥ ९ ॥ इति श्रीगोस्वामिशिवानंदभट्टविरचिते वैद्यरत्ने पंचमः प्रकाशः ॥५॥ अर्थ-गुदभ्रंश (काँचका निकलना) रोगमें गौके दूधसे मर्दन करे तो अत्यन्त बाहर आई हुई कांचभी भीतर प्रवेश कर सक्ती है इसमें सन्देह नहीं अथवा चूहेकी चरबीसे कांचपर लेप करनेसे फिर बाहर नहीं आती है अम्लोनि- याका रस घेरोंका काढा खट्टा इनमें सौंठ और जवाखारके साथ घृत सिद्ध कर पीनेको देना गुदभ्रंशरोग दूर होगा८८-९० इति श्रीगोस्वामिशिानदभाविरचिते पैद्यरत्ने भाषाटीकाया पचम प्रकाश ॥ ५ ॥ अथ त्रिफला। एकाहरीतकीयोज्यादौतुयोज्योविभीतको। चत्वार्यामलकान्याहुःसिताबद्विगुणाभवेत् ॥ १ ॥ त्रिफलामेहशोथनीकुष्ठहीरसायनी। सर्पिर्मधुभ्यांसंयुक्तासैवनेत्रामयापहा ॥२॥ अर्थ-एक हरड दो बहेडे चार आमले दुगुनी मिश्री लेकर सेवन करे यह त्रिफला प्रमेह शोध कुष्टको दूर कर- नेवाला रसायन है घृत मधुके साथ सेवन करनेस नेत्ररो. गका दूर करनेवाला है ॥ १॥२ ।। अय हरीतवीयोगः। चर्वितावर्द्धयत्यग्निपेपितामलशोधिनी। स्विन्नासंग्रहणीप्रोक्ताभृष्टापथ्यात्रिदोपनुत् ॥३॥ अर्थ-चर्वण करनेसे हरड अग्निको पाती ह पीसकर भाषाटीकासमेत ! (१६७) खानेसे मल शोधन करती है स्वेदन कीहुई दस्तावर है और भुनीहुई त्रिदोषको दूर करती है ॥३॥ ग्रीष्मेतुल्यगुडांसुसैंधवयुतांमेघावनद्धेम्बरे तुल्यशिर्करयाशरद्यमलयाशंठ्यातुपारागमे ॥ पिप्पल्याशिशिरेवसंतसमयेक्षौद्रेणसंयोजितां राजन्प्राप्यहरीतकीमिवरुजोनश्यतुतेशत्रवः ॥ ४॥ अर्थ-ग्रीष्म ऋतु में हरीतकीका सेवन बराबर गुड मिला- कर करे वर्षा ऋतु में सेंधानमकके साथ प्रतिदिन दो हरडका सेवन करे शरदऋतु में तुल्प शर्करा (मिश्री) मिलाकर खाय हिमऋतुम सोंठके साथ मिलाकर खाय शिशिर, वसन्तमें शहदके साथ सेवन करे हे राजन् ! इसप्रकार हरडके सेवन करनेसे रोगोंकी समान तुम्हारे शत्रु नष्ट हों॥४॥ अथ विकटु । पिप्पलीमरिचंशुंठीविभिख्यूषणमुच्यते । दीपनंश्लेष्मदोपघ्नंकुष्ठपीनसनाशनम् ॥५॥ अर्थ-पीपली काला मिरच सोंठ इन तीनोंको ज्यूषण कहते हैं यह सेवन करनेसे दीपन है श्लेष्माका दोष दूर करनेवाला तथा कुष्ट और पीनसरोग दूर करता है ॥५॥ पिप्पलीपिप्पलीमूलंचव्यनागरचित्रकः । पंचकोलंकफानाहगुल्मशुलारुचीर्जयेत् ॥ ६॥ पंचकोलंसमारचंपडूपणमुदीर्यते । पंचकोलगुणंततुविशेपावह्रिवर्द्धनम् ॥७॥ अर्थ-पीपल पीपालामुल चव्य सोंठ चीता यह पंचकोल कहलाता है यह कफ आनाह गुल्म शुल अरुचिको अथ षटकटु।

(१६८) वैद्यरल। दूर करता है और इसीमें काली मिरच मिलानसे यह षडूषण कहलाता है पंचकोलसे इसम अग्निवर्द्धनका गुण अधिक ह ॥ ६॥७॥ अथ शुंठीयोगः। साभृष्टासैंधवोपेतात्रिदोपध्न्यामतत्परम् । गुडेनाशेविबंधनीशोफवातविकारजित् ॥ ८ ॥ तक्रणामंपाचयतिपयसारेचयत्यमुम् ॥ ९॥ अर्थ-भूनीहुई संधैके साथ सोंठका सेवन करे तो यह विदोपको दूर करती है गुडके साथ सेवन करनेसे अर्शरोग विबंधको दूर करती तथा शोफ और वातविकार दूर करती है मटेके साथ आमको पचाती और दूधसे रेचन करती है ॥ ८॥९॥ अथ चातुर्जातम् । विगंधमेलावपत्रैश्चातुर्जातंसकेशरम विगंधंचचतुर्जातंरुक्षोष्णंलघुपित्तकृत् ।। वयरुचिकरतीक्ष्णंविपश्लेष्मामयापहम् ॥१०॥ अर्थ-इलायची दालचीनी तेजपात यह विसुगंध कहु- लाताहै इसमें नागकेशर मिलानेसे चातुर्जात होता है त्रिसुगंध और चातुर्जात रूखा है उष्ण है हलका है पित्त- कारक है वर्ण्य रुचिकारक तीक्ष्ण विष श्लेष्मा रोगका दूर करनेवाला है ॥ १०॥ अथ पंचक्षीरीवृक्षाः। न्यग्रोधोदुबराश्वत्थपारिसप्तक्षपादपाः । पंचतेक्षीरिण-प्रोक्तास्तेपांत्वपंचवकलंम् ।। ११ ॥ अर्थ-बड, गूलर, पीपल, पारसपीपल,. पाखर यह पांच वृक्ष क्षीरी कहातेहैं इनकी छाल पंचवल्कल कहलाती.

भापाटीकासमेत ।
(१६९)
केचित्तुपारिसस्थानेशिरीपंतसंपरे ।
स्वपंचकमिंग्राहियोनिदोपत्रणापहम् ॥ १२ ॥
अर्थ-कोई पारिसके स्थानमें शिरस कोई वेतको कहते-
हैं इन पांचोंकी छाल ठंडी, ग्राही और योनिदोप तथा
ब्रणको दूर करती है ॥ १२ ॥
अथ दशमूली।
शालिपर्णीपृश्निपीव्हतीद्वयगोक्षुरैः।
बिल्वामिमंथश्योनाकपाटलाकाश्मरीयुतैः ।
दशमूलमिदंख्यातंकथितंतजलंपिबेत् ॥ १३॥
अर्थ-शालिपर्णी पृश्निपर्णी अर्थात् शरिधन, पिठवन,
छोटी कटेरी, बडी कटेरी, मोखरू, बेल, अरणी, सोना-
पाठा, पाढल, कंभारी यह दशमूल कहाता है, काथ करके
इनका जल पिया जाता है ॥ १३ ॥
अथ पंचलवणम्।
सिन्धुसौवर्चलंचैवविडंसामुद्रिकंगडम्
एकद्वित्रिचतुष्पंचलवणानिक्रमाद्विदुः॥ १४ ॥
अर्थ-संधानान, विरियासोंचरलोन, विडलोन, समुद्र-
लोन, कालानोंन क्रमसे एक, दो, तीन, चार, पांच
लवण तक जानना ॥ १४ ॥
अथ क्षारी।
स्वर्जिकायावशूकश्चक्षारयुग्ममुदाहृतम् ॥ १५ ॥
अर्थ-सजीखार, जवाखार यह दो खार हैं ॥ १५ ॥
अथ युक्तायुक्तकथनम्।
नवान्येवहियोज्यानिद्रव्याण्यखिलकर्मसु ।
विनाविडंगकृष्णाभ्यागुडधान्याज्यमाक्षिकैः॥१६॥

(१७०)
वैद्यरत्न।
और शहद,
अर्थ-सव कर्मके नवीनही द्रव्य प्रयोग करने चाहिये
परन्तु वायविडङ्ग, पीपल, गुड, धान्य, वृत
यह पुराने काममें लाये ॥ १६ ॥
गुडूचीकुटजोवासाकूष्मांडंचशतावरी ।
अश्वगंधासहचरःशतपुप्पाप्रसारिणी ॥ १७॥
अर्थ-गिलोय कुडा अडूसा पेठा शतावर असगंध पीली.
कटसरैया सोंफ पसरन ॥ १७ ॥
प्रयोक्तव्यासदैवा द्विगुणांचैवकारयेत् ।
शुष्कंनवीनंद्रव्यंचयोज्यसकलकर्मसु ॥ १८॥
अर्थ-यह औषधि सदा गीली प्रयोग करनी चाहिये
और यह दुगुनी प्रगोग करे नवीन द्रव्य सब कर्मी में सुष्क
प्रयोग करना चाहिये ॥ १८ ॥
आईचद्विगुणंयोज्यमेपसर्वत्रनिश्चयः ।
कालेनुक्तेप्रभातस्यादंगेनुक्तेजटाभवेद ॥ ११ ॥
अर्थ-परन्तु गीला द्रव्य दूना प्रयोग करना चाहिये यह
सर्वत्र निश्चय है, जिसमें काल नहीं कहा है वहां प्रातःकाल
जानना चाहिये, जहाँ अंग नहीं कहा वही जटा जाननी?९
भागेनुक्तेचसाम्यहिपात्रेनुक्तेतुमृन्मयम् ॥
एवमप्योप,योगेयस्मिन्यत्पुनरुच्यते ॥ २० ॥
मानतोद्विगुणंप्रोक्तंतव्यतत्त्वदर्शिभिः ।
गुणहीनभवेद्वादृर्द्धतद्रूपमौपधम् ॥२१॥

भाषाटीकासमेत । (१७१)
-मासयंतथाचूर्णहीनवीर्यत्वमाप्नुयात् ।
हीनत्वंगुटिकालेहोलभेतेवत्सरात्परम् ॥ २२ ॥
अर्थ-जहां भाग नहीं कहा वहांसमान जानना,जहां पात्र,
नहीं कहा वहां मिट्टीका पात्र जानना और जो एकही औषधि
किसी प्रयोगमें दो वार कही हो उसे दूनी लेना, यह तत्त्व
दर्शियोंका निश्चय है. १ वर्ष बीतनेसे औषधी गुणहीन हो-
जाती है, दो महीनों में चूण हीनवीर्य हो जाता है, एकवर्षमें
गुटिका और लेह हीनवीर्य होजाते हैं ॥२०॥ २१ ॥ २२ ॥
हीना स्युघृततैलायाश्चतुर्मासाधिकास्तथा।
औपध्योलघुपाकाःस्युनिर्वीर्यावत्सरात्परम् ॥२३॥
अर्थ-व्रत और तेल चारमहीने में हीनवीर्य हो जाते हैं,
वर्षसे अधिक औषधी हीनवीर्य, लघुपाकवाली हो जाती-
.
पुराणाःस्युर्गुणैर्युक्ताआसवाधातवोरसाः ।
व्याधियुक्तंतुयद्रव्यंगणोक्तमपितत्त्यजेत् ।। २४ ।।
अर्थ-आसव और धातुरस पुराने होकर गुणयुक्त हो.
जाते हैं, जो द्रव्य व्याधियुक्त हो वह गणमें कहा हो तो भी
त्यागदे ॥ २४ ॥
अनुक्तमपिययुक्तंयोजयेत्तत्रतद्बुधः ।
भल्लातकासाभावेतुपदेयरक्तचंदनम् ॥ २५ ॥
अर्थ-जो द्रव्य कथन नहीं किया है और वह हितकारी
हो तो उसको उसमें डालना चाहिये भिलावे और कासके
अभावमें लालचन्दन देना चाहिये ॥२५॥

(१७२)
वैद्यरत्न ।
तुमाभावेप्रदातव्यात्वक्क्षीरीतद्गुणावुधैः ।
अंतस्संमार्जनऽमोदास्थानेयोज्यायवानिका ॥२६॥
बहिःसंमार्जनेऽमोदाह्मजमोदेवगृह्यते।
कृष्णजीरकयोगोनकर्त्तव्योमक्ष्यभेपजे ॥२७॥
अर्थ-तजके अभाव में वंशलोचन देना चाहिये. अन्तःशु-
दिमें अजमोदके स्थानमें अजवायन लेनी और वही संमा-
र्जन अजमोदाके स्थानमें अजमोदही लेनी, भक्ष्य औषधीमें
काले जीरेका योग न करना चाहिये ॥ २६ ॥ २७ ॥
तस्यस्थानेविधातव्योजीरकः कुशलैः सदा।
अंतःसंमार्जनेयोज्यंवचास्थानेकुलिंजनम् ॥ २८॥
अर्थ-उसके स्थानमें चतुर पुरुषों को सदा सफेदजीरा
प्रयोग करना चाहिये, अंतःसंमार्जनमें वचक स्थानम कुलिं-
जनका प्रयोग करना चाहिये ॥ २८ ॥
सारस्तुखदिरादीनांनिवादीनांत्वचास्मृताः ।
फलंचदाडिमादीनांपटोलादेर्दलंमतम् ।। २९ ।।
अर्थ-सारों में खेरसारादि छालके स्थानमें नीमकी छाल
लेनी, दाडिमादि फलके स्थान में उसका फल और पटो-
लादिके दल लेने चाहिये ॥ २९ ।।
मुक्ताभावेक्षिपेन्नू मुक्ताशुक्तिंचतद्गुणाम् । .
अभावमधुनोयोज्योगुडोजीर्णश्चतद्गुणः ॥३०॥
अर्थ-मोतीके अभावमें मुक्तासीपी उतनीही ढालनी
चाहिये मधुके अभावमें पुराना गुड प्रयोग करना चाहिये३०
सिताभावभवेखंडंशाल्यभावपटिकाः ।
असंभवेतुद्राक्षाया-प्रदेयंकाश्मरीफलम् ॥३१॥

भापाटीकासमेत । (१७३) , अर्थ-मिश्रीके अभाव में खांड, शालिक अभावमें षष्टिक धान्य और दाखके अभाव खंभारीका फल देना चाहिये? वृक्षाम्लंनभवेद्यत्रदाडिमाम्लंप्रयोजयेत् । वेतसाम्लस्यचाभावेहरिमंथाम्लमादिशेत् ॥ अभावेचंदनस्यापिमेलयेद्रक्तचंदनम् ॥ ३२॥ अर्थ-जब इमली न मिले तो खट्टे दाडिमका प्रयोग करना,अमलवेतके अभावमै चणक अम्ल (चूका)प्रयोग कर, श्वेत चन्दनके अभावमें लालचन्दन डालना चाहिये ॥३२॥ अथ विरुद्वाहारकथनम् । विरुद्धमपिचाहारंविद्यान्गुरुविपोपमम् । तद्रोधायभिपस्थाप्योभोजनावसरेनृपैः ॥ ३३ ॥ अर्थ-विरुद्धभोजन गुरु विपकी समान होजाताहै, इस. के ज्ञानार्थ राजाओंको भोजनके समय स्थापन करना चाहिये ॥ ३३ ॥ कालक्रमेणसद्योवाविरुद्धाहारसेवनम् । निहंतिमानवंतस्माद्विरुद्धमशनंत्यजेत् ॥ ३४ ॥ अर्थ-कालक्रमस वा तत्काल विरुद्ध आहारका सेवन करना मनुष्यको मारडालताहै इसकारण विरुद्धभोजन त्यागदे ॥ ३४॥ व्याधिमिद्रियदौर्बल्यंमरणंवाप्रयच्छति । विरुद्धमशनंतत्स्यावर्जयेदात्मवान्नरः ॥३५॥ अर्थ-व्याध, इन्द्रियदुर्बलता वा मरण इससे होताहे इस कारण विरुद्धभोजनको सदा त्याग देना चाहिये ॥ ३५ ॥ दुग्धशाककुलत्थमीनमदिरावल्लीफलक्षारव- दम्लेमासकवीरजांववदधिक्षौद्रैः पृथग्वापृथक् ।।

वैद्यग्ला
(१७४)
दुष्टस्यादधितूष्णलाकुचपयस्तैलासवाध्यायुधै-
स्तालेनाप्यथतक्रमाज्यकदलीधानापयःसलभिः३६
अर्थ-शाक कुलथीके साथ दूध विरुद्ध भोजन है, मछली.
के संग मदिरा अजमोद मैनफल औरक्षार विरुद्ध है अम्ल-
वेतके संग मांस कांजी जम्बूफल दधि शहद पृथक् भोजन
करना विरुद्ध है और दही प्याज बडहरका फल दूध
तेल
आसव यह परस्पर विरुद्ध हैं ताडके फलके साथ मट्ठा धृत
केलकी फलीभूने जो और सत्तुओंक साथ दूध विरुद्ध है३६
मुहूर्तपंचकादूवंक्षीरंभजतिविक्रियाम् ।
तदेवद्विगुणेकाले विपद्धन्तिमानवम् ॥ ३७॥
अर्थ-दूध पांच मुहूर्ततक बसेही धरा रहै तो विकारी
होजाताहै और दश मुहूर्ततक धरा रहनेसे मनुप्यको विप
घढानेवाला होताह ॥ ३७॥
अकथितंदशघटिकाकथितंद्विगुणञ्चतत्पयःपथ्यम् ।
अथवामधुररसाढययावत्तावत्पयःपथ्यम् ॥ ३८ ॥
अर्थ-बिना औटाया हुआ दशघडीतक, औटया हुआ
वीस घडीतक दूध पथ्य है और मीठा मिलाया हुया जय-
तक इच्छा हो रहने दे ॥ ३८ ॥
मत्स्यमांसगुडमुद्गमूलके कुष्ठमावहतिसे वितपयः ।
शाजांयवरासवेःपुनरियत्ययुधमाशुसर्पवत् ३९॥
अर्थ-मच्छीका मांस गुड मंग मूल के साथ सेवन कर।
नेसे कुष्ट करता शाक जम्वृफल आसबके साथ सेयन
करनेसे सर्पकी समान मुर्खको मार डालते हैं।। ३९॥
एणेगर्मयूरेश्चतित्तिरेलावकादिभिः ।
सर्वेजांगलमांसेश्चक्षीरंप्रतिनिपिठ्यते ॥ ४० ॥

भापाटीकासमेत। (१७५) अर्थ-एण मृग मोर तीतरलावा और सब जांगल मांसोंके साथ दूध पीमा वर्जित है ॥ ४० ॥ अम्लेप्वामलकंशस्तंलवणेपुचसैन्धवम् । कपायेष्वभयाशस्ताकटुवर्गेपुनागरम् ॥ ११ ॥ अर्थ-अम्ल पदार्थों में आमला, लवणमें सेंधा, कषायों में हरड, कटुवर्गमें सौंठ ॥ ४१ ॥ पटोलंतिक्तवर्गेषुमधुरेपुचशर्करा। एतैःसहहितंदुग्धमेतदन्यैर्विकारकृत् ॥ ४२ ॥ अब-सिक्त वगामें पटोल मधुरमें शर्करा इनके साथ दूध पीनेसे विकार नहीं करता इनसे अन्यों के साथ विकार करताहे ॥४२॥ उप्णेनदिव्यसलिलेनवराहगोधा- मांसेनयातिविकृतिमधुमूलकैश्च । तक्रेणचोष्णमपितुल्यघृतंघृतंच कांस्येदशाहमुपितंचतथावृतञ्च ।। १३॥ अर्थ-उष्ण दिव्यजल और वराह गोहके मांसके साथ मधु मृलके विकारको प्राप्त होते हैं और तक्रके साथ गरम घृत वा वैसाही वृत खाना वर्जित है और कोसीके बर्तन में रक्खा हुआ घी दशदिनमें खानेके योग्य नहीं रहता है ४३ मोकात्तितिरलपाईपललन्योरंडतेलानिना मत्स्याम्लक्षवमाधवैरथपृपदक्षामिपान्यासवैः ॥ तैलैःसर्पपजःकपोतपटलंसिद्धविरुद्धंतथा वैद्यरन । . (१७६) नानेकनतुपाचितानितरसाव्यापादयंत्यंगिनम् ४४॥ अर्थ-गोधा तीतर लावा मोर इनके मांस अण्डीके तेलके, साथ विरुद्ध हैं, मच्छी इमली ऊख मधुके संग बिन्दुवाले मृगका मांस आसक्स विरुद्ध है तथा सरसोंके तेलसे कबू- तरका मांस सिद्ध करनेसे विरुद्ध होजाता है, इनको एकत्र न पकावै ऐसा करनेसे यह भोजन करनेवालेको भारदेते हैं ।। ४४ ॥ हारीतस्यपलंहिदारुरजनीमूलेनविद्धानिशा वह्नौपाचितमत्तिमानवपलंकीसुंभतेलेरविः ।। प्रोतकेनचिदेवभासपललंशूलेनदुष्टंमतं वासिन्याविसकंटिकासहतथाकुल्मापकैश्वाहिता४५ अर्थ-हारीतका मांस हलदी दारुहलदीके साथ विरुद्ध है मूल (पुष्करमूल) कपूर और हलदी विरुद्ध है और अग्निमें पकाया हुआ नो मसुप्यका मांस कुसुमके तेलसे कुलथी और शलपर रक्खा हुआ मांस पक्षीका मांस निकम्मा हो जाता है और सफेद कटसरेया वनककोडके साथ विरुद्ध है तथा कुलथीके साथमी विरुद्ध है ॥ ४५ ॥ दुष्टंपायसमन्वितंकृशरयाचंद्रस्तुनिंबूरसे- स्तेले सार्द्धमफेनकिटिवसासिदोविरोधोरकः ।। सर्पिःक्षीदवसांवृत्तेलमपृथक्तद्विशोवात्रिशो भिस्सापर्युपितातथामुहरनुप्णोणीतथानोहिता ४६ अर्थ-दृधक वा खीरके साथ खिचडी विरुद्ध है कपूर नि- म्बूके रसके साथ विरुद्ध है और तेलके साथ फेनरहित शक रकी चरवी मिलानेसे विरुद्ध है घृत और शहद वरायर मि- लानेसे विरुद्ध है वसा (चीं जलतेलविरुद्र है इसी प्रकार भापाटीकासमेत । (१७७) दा वा तीन दिनका रक्खा वासी अन तथा बहुत अनुष्ण तथा वारंवार गरम हितकारी नहीं है ॥ ४६ ॥ अत्युष्णंखलुवस्तुमूलकयुतंशूलामगुल्मप्रदं दुएलाकुचमाज्यदुग्धगुडध्याज्यंसमाष्टंपृथक् ४७ सक्तुभक्तपयःपलै समर्थितैर्दुष्टःपृथग्वापृथक तीक्ष्णक्षौद्रकणागुडैस्सहतथास्यात्काकमाचीभृशम स्नेहंनिस्तलनेझपस्यतलिताकिंचोपितायामिनी कंपिल्लस्तुसतत्रएवमहिमैर्भल्लातमन्नादिभिः॥४८॥ अर्थ-अत्यन्त गरम वस्तु मूलीके सहित खानेसे शल आम और गुल्मरोग करती है और बडहरका फल घृत दूध गुड दहीके साथ समांश वा पृथकू २ विरुद्ध है सतुओं- के साथ दूध मिलाकर वा मांसके साथ सत्तू मिलाकर खाना विरुद्ध है जवाखार शहद पीपल विरुद्ध है गुडके साथमें यह तथा काकमाची ( मकोय कबैया) विरुद्ध है जिस तेलमें मछली पकाई हो उसमें हलदी विरुद्ध है बासी त्याज्य है कवीला तक्रके साथ और कपूरको छोड भिलावा अन्नादिके साथ विरुद्ध है इस प्रकार विरुद्ध जान ।। ४७॥४८॥ रावोक्षीरंनसेवेतयदिसेवेतनस्वपेत् । यदिस्वपेद्धरत्यायुस्तस्मात्पथ्यदिवापयः ॥ १९॥ अर्थ-रात्रिमें दुग्ध सेवन करना नहीं और जो सेवन करें तो सोवे नहीं आर जो दुग्ध पीकर तत्काल सोता है तो आयुहरता है इसकारण दिनमे दूध पीना पथ्य है। ४९ ॥

-
(१७८)
वैद्यरल ।
हेमंतेशिशिरेचापिवर्षासुदधिशस्यते ।
शरद्रीष्मवसंतेपुप्रायशस्तद्धिगर्हितम् ॥५॥
इति श्रीगोस्वामिशिवानंदभट्टावरचिते
वैद्यरत्ने पष्ठः प्रकाशः ॥ ६॥
अर्थ-हेमन्त शिशिरऔर वर्षामें दहीका खाना उत्तम
है, शरद ग्रीष्म और वसन्तमें दही खाना वर्जित है ॥५० ।।
इति श्रीगोस्वामिशिवानदाविरचिते वैद्यरत्ने पण्डितज्वालाममाद-
मिश्रकृतभापाटीकाया पष्ठः प्रकाशः ॥ ६ ॥
अथ काथविधिः।
पानीयंपोडशगुणंक्षुण्णद्रव्याद्विनिःक्षिपेत् ।
मृत्पात्रकथितंग्राह्यमष्टमांशावशेपितम् ।
शृत काथाकपायश्चनिय॒हश्चेतिनामभृत् ॥ १ ॥
अर्थ-काथकी विधि कहते हैं-एकपल औषधि चूर्ण और
सोलह पल पानीके साथ मिट्टीके पात्रमें ओटावै जब अष्ट-
मांश शेष रहजाय तब छानले इसको शृत कपाय काय,
और निहभी कहते हैं ॥१॥
अथावलहिका।
काथादेयत्पुनःपकादनत्वंसारसक्रिया ।
सोवलेहश्चतन्मात्रास्यात्तथैवपलोन्मिता ॥२॥
अर्थ-काथादि औषधोंके जो फिर पकानेसे गाढा होता
उसको रसक्रिया और अवलेह कहते हैं इसकी
मात्रा एक पलकी है ॥२॥
अप चूर्णविधिः।
अत्यन्तशुष्कंयव्यंसुपिटवनगालितम् ।
तत्स्याच्चूर्णरजःक्षीद्रस्तन्मात्राकर्षसंमिता ॥
चूर्णेगुडःसमोदेयाशर्कराद्विगुणामता ॥३॥

भाषाटीकासमेत।
(१७९)
अर्थ-जो अत्यन्त सुखी औषधी सुन्दर पीसिके वस्त्रसे
छानी होय इसको चूर्णरज और क्षोद कहतेहैं, उसको
खानेकी मात्रा एक कर्पकी है, जो चूर्णमें गुड मिलाना
होय तो चूर्णके समान शक्कर दूनी मिलावे, हींग भूनके
मिलानी ॥३॥
अथ मंडविधिः।
जलेचतुर्दशगुणेसिद्धोमण्डस्त्वसिक्थकः ॥
शुण्ठीसेंधवसंयुक्त पाचनोदीपनोलघुः ॥४॥
अर्थ-अच्छे चावलोंको चौदहगुणे जलमें सिद्ध करनेसे
मण्ड सिद्ध होता है इसमें सोंठ और सैंधा मिला सेवन
करनेसे दीपन पाचन और लघु होता है, चावलोंके सीज-
नेपर मांड निकाल लेना इसको शुद्ध मण्ड कहते हैं ॥४॥
तण्डुलैरईमुद्गांशैःकिंचिद्धष्टःसुपाचितः ।
धान्यत्रिकटुसिंधूत्थहिंगुतणयोजितः ॥५॥
ज्ञेयःसोटगुणोमंडोज्वरदोपत्रणापहः।
रक्तक्षुद्रर्धनःप्राणप्रदोवस्तिविशोधनः ॥६॥
अर्थ-आधे चावल और मूंग मिलाकर कुछ भूनके
इसमें धनियाँ सोंठ मिरच पीपल सैंधानिमक मुंग चावल
हींग और तक यह इसमें मिलाये हींग भूनले चौदह-
गुने पानी में डालकर पकावे जब चावल सीजजाय तब
उतारकर छानले इसको अष्टगुण मण्ड कहतेहैं, यह ज्वर-
दोष और व्रणदोषका दूर करनेवाला है रक्त और क्षुधाका
बढानेवाला प्राण देनेवाला बस्तिका शोधक है।॥ ५॥ ६॥

( १८०) वद्यरत्न । सुकंडितैस्तथाभृष्टैर्वाट्यमंडोयवैर्भवेत् । कफपित्तहर कंठयोरक्तपित्तप्रसादनः ॥७॥ अर्थ-श्रेष्ठ जौओंको उत्तम रीतिसे कूट फटक कर भूने, फिर बिन फटककर उसमें चौदह गुना पानी चढाकर सिजावे फिर पानी छानकर सेवन करे इसे वाट्यमण्ड कहते हैं इसके पीनेसे कफ पित्तका दोष दूर हा कंठको हितकारक और रक्त पित्तका कोप दूर करनेवाला है ॥७॥ लाजैर्वातंडुलै बजामंडःप्रकीर्तितः। श्लेष्मपित्तहरोग्राहीपिपासाज्वरजिन्मतः ॥८॥ अर्थ-धानकी भूनी खील वा चावलोंको भूनकर उसमें चौदह गुना पानी डालकर औटावै फिर उसको पसाकर मांड निकालले इसे लाजामण्ड कहते हैं यह श्लेष्म पित्त हर- नेवाला पाही प्यास और ज्वर दूर करताह ॥ ८॥ यूपःकृतोद्वेदलानामष्टादशगुणेबुनि। मुद्दामलकयूपस्तुभेदनःकफपित्तजित् ॥ तृइदाहशमनःशीतोमूछाभ्रममदापहः ॥ ९ ॥ अर्थ-यूषविधि द्विदलवाले द्रव्योंको अठारह गुणे जलमें डालकर गाढा होजानेपर यूष कहलाताहै, मूंग और आम- लेका यूष भेदन और कफपित्तका जीतनेवाला है, यह तृषा दाहका शान्त करनेवाला ठंढा मूळभ्रमको दूर करताहै९॥ अथ धातुशोधनमारणे। तबादी हेम्नः। सुवर्णमुत्तमंवह्नौविद्रुतंनिक्षिपेत्रिशः। कांचनारद्रवेशुद्धंकांचनंजायतेभृशम् ॥ १० ॥ अथ यूपः।

भाषाटीकासमेत ।
(१८१)
अथ रजतस्य।
शुद्धसूतंसमंस्वर्णखल्वेकृत्वातुगोलकम् ।
ऊर्ध्वाधोगंधकंदत्त्वासर्वतुल्यंनिरुद्ध्यच ॥ ११ ॥
त्रिंशद्वन्योपलैदेयंपुटमेकंचतुर्दश ।
निरुद्धहेमभस्मस्याइन्धोदेयःपुनःपुनः ॥ १२ ॥
अर्थ-उत्तम सुवर्णको अग्निम तीनवार तपावै जब वह
गरम होजाय तब कचनारके रसका पुट देता जाय तो सुवर्ण
शुद्ध हो जाता है शुद्ध पारा और सोना बराबर लेकर
खरल कर फिर उसका गोला काके उस गोलके समान
नीचे ऊपर गंधक रखकर शरावसंपुट में तीस जंगली कंडोंकी
आँच देना ऐसेही वारंवार मिला मिलाकर चौदह पुट
देना तो निरुद्ध भस्म होगी ।। १० ॥ ११ ॥ १२ ॥
तैलेतवेगवांमूकांजिकेचकुलत्थके ।
त्रिफलाकाथमध्येतुसंशोध्या:सर्वधातवः ॥ १३ ॥
विधायपैष्टींसूतेनरजतस्याथमेलयेत् ।
तालंगंधसमपश्चान्मईयेनिंबुकद्रवैः।।
द्विधःपुटैर्भवेद्भस्मयोज्यमेतद्रसादिपु ॥ १४ ॥
अर्थ-तेल तक गोमूत्र कांजी कुलथी और, त्रिफलेके
छाथमें सम्पूर्ण धातुओंको शोधना चाहिये चांदीके कंट-
कवेधी पत्र कर अग्निमें तपाकर तेल तक गोमूत्र और कुल-
थोके काढेमें तीन तीन वेर बुझावै तो शुद्ध हो पारेके साथ
खरल करके पारा और रजतको मिलावै और हरताल
तथा गंधक बराबर लेकर नींबूका रस डालकर खरल करे
दो तीन पुट देनेसे भस्म हो जाती है इसको रसादिकमें
प्रयोग करें ॥ १३ ॥ १४ ॥

वैद्यरत्न। अथ ताम्रस्य जंबीररससंपिष्टगंधकेनचलेपितम् । ताम्रपत्रंशरावस्थंत्रिपुटैर्यातिभस्मताम् ॥ १५ ॥ अर्थ-ताम्रके अतिसूक्ष्म पत्र करके उसे उपरोक्त औषर्धासे तीन वार बुझाव और जंबीरके रस में पीसकर उसके ऊपर गंधक ळगावे फिर सिकोरेमें रखकर फूंदके ऐसी तीन पुट देनसे ताम्रकी भस्म हो जातीहै ॥ १५ ॥ अथ रीतिकास्पयोः। ताम्रवन्मारणंचापितयोरुक्तंभिपवरैः ॥ १६ ॥ अर्थ-ताम्रकी समान पीतल और कोसीका शोधन कर १६ अथ छोहस्य। द्वादशांशेनदरदंतीक्ष्णंचूर्णस्यमेलयेत् । 'कन्यानीरेणसंमर्चयामयुग्मतुतत्पुनः ॥ १७ ॥ शरावसंपुटेकत्वापुटेदजपुटेन । सप्तधैवकृतेलोहरजोवारितरंभवेत् ॥ १८॥ अर्थ-पोलादके चूर्णका बारहवां हिस्सा हिंगुल मिलाकर धीकुवॉरके पढेके रसमें दो पहर खरल करे पश्चात् शराव. संपुट में रखकर कपडमिट्टी कर गजपुटमें फूंदके ऐसे सात पुट देनेसे लोहकी भस्म पानीपर तैरने लगे ॥ १७॥ १८॥ अथ किदृस्य। अक्षांगारेधमेत्किहमक्षपात्रस्थगोजले। निर्वापयेदृष्टवारंततःसूक्ष्मविचूर्णयेत् ॥ १९ ।। अर्थ-बहेडेकी लकडीके कोयले कर उसम पुरानी कीटकों ब धमावे लाल होनेपर गोमूत्र में बुझाव इसप्रकार आठ बार सूक्ष्म चूर्ण करे ।। १९ ॥

भापाटीकासमेत । (१८३) - अथ पंगस्य। शुद्धंसतालमर्कस्यपिष्ट्वादुग्धेनतत्पुटेत् । शुष्काश्वत्थमवैवल्कै सप्तधाभस्मतामियात् ॥२०॥ अर्थ-२ -शुद्ध वंगकी समान हरताल लेकर उसे आकके दूध पीसकर रांगेपर लेप करे और सूखे पीपलकी छालको लेकर उससे सातवार दग्ध करनेसे वंगकी भस्म हो जाती- है ॥२०॥ अथ जखदस्य जसदंगिरिजंतस्यदोपाःशोधनमारणे । वंगस्येवहिबोद्धव्यागुणांस्तुगणयाम्यथ ॥ २१॥ जसदंतुवरंतिक्तंशीतलंकफपित्तहृत् । चक्षुष्यपरमंमेहाम्पाण्डुश्वासंचनाशयेत् ॥ २२ ॥ अर्थ-जस्त पर्वतसे उत्पन्न होनेवाली धातु है उसके दोष शोधन और मारणमें वंगकी समान जानने जस्तके पतले पत्र कर अनिमें तपाय सात या तीन वार नींबूके रसमें बुझाव फिर उनकी समान गंधक ले आकके दूधमें खरल फर उन जस्तके पत्रोंपर लेपकर मिट्टीकी मूसामें रखकर दूसरी मू. सासे उसका मुख बंद करदे कपरमिट्टी कर अरनेउपलोमें धर फूंकदे इसप्रकार दो अग्निपुट देनेसे जस्तकी भस्म होजा- य यह जस्त तीखा शीतल कफ और पित्तका जीतनेवाला है चक्षुको हितकारक प्रमेह पाण्टु और श्वास रोग दूर कर- ता है ॥ २१ ॥ २२॥ अथ सीसरस्य। विभिाकंभीपुटे गोवासारसविमर्दितः। सशिलोभस्मतामेतितद्रजःसर्वमेहनुत् ॥ २३ . वैद्यरत्न । अथ उपधातवः। (१८४) अर्थ-शीशा वा मनसिलका चूर्ण अडूसेके रसमें खरल कर गजपुटमें फूंकदे तीन पुटमें शीशेकी उत्तम भस्म होती. है यह सब प्रकारके प्रमेह दूर करतीहै ॥ २३ ॥ अभ्रकमाक्षिकंतालंशिलानीलांजनंतथा। तुत्थकरसंकेचतेप्रोकाःसप्तोपधातवः ॥२४॥ अर्थ-अभ्रक सुवर्णमाक्षिक हरताल मनसिल नीलाथोथा सुरमा रसकपूर यह सात उपधातु है ॥ २४ ॥ तत्रादौ अभ्रकस्य । कृष्णाभ्रकंधमेद्वह्नौततः क्षीरेविनिक्षिपेत् । भिन्नपर्चतुतत्कृत्वातण्डुलीयाभयोवैः ॥ २५ भावयेदएयामंतदेवम_विशुद्धयति । थान्याभ्रकस्यभागकंद्वीभागौटंकणस्यच ॥२६॥ पिघातदंधमूपायांरुद्धातीवाग्मिनापचेत् । स्वभावशीतलंचूर्णसर्वरोगेपुयोजयेत् ॥ २७ ॥ वरांगोघृतंचा_कलापइदिक्समांशकम् । मृदग्निनापचेल्लेहममृतीकरणविदम् ॥२८॥ अर्थ-काले अभ्रकको अग्निमें तपाकर दृधमें युझावे फिर उसके पत्र अलग कर चौलाई और नींबूके रसमें दोनोंको एकत्र करके उनमें उन पत्रोंको आठ पहर पर्यन्त भिगोदे तो अभ्रक शुद्ध हो फिर उस रसमेंसे अभ्रकको निकाल. कर उसकी धान्याभ्रक (कनरी हुई अभ्रक को ले उसमें चतुर्थाश चावलाक धान मिलाकर टसे कम्बलमें पोटली बांध परातमें रक्खे फिर उसपर जल डालता जाय से पोटलीको मर्दता जाय इसप्रकार करनेसे भाषाटीकासमेत। (१८५) उस कम्बलमें जितना अभ्रक होगा वह बहकर उस परातके पानी में आजायगा जब जानै सब अभ्रक परातमें आगया तब परातका पानी निकालकर फेंके और उस अभ्रकके चूरेको धूपमें सुखाले इसे धान्याभ्रक कहते हैं ) कर उसके दो भाग और दो भाग सुहागा इनको पीसकर अंधभूषामें रखकर बंद कर तीव्र अग्निदेवे जब स्वांगशीतल होजाय तब निकाल पीसकर सब औषधियोंके योगमें दे त्रिफलेका जल १६ पल गौका घृत ८ पल मृतअभ्रक १० पल इनको एकत्रकर लोहकी कढाईमें मृदुअग्निसे पचावै जब जल घी जल जाय केवल अभ्रक शेष रहै तब यह लेह्य अमृतीकरण नामवाला होता है इसे औषधियोंके साथ दे।। २५ ॥ २६ ॥ २७ ॥ २८॥ अथ स्वर्णमाक्षिकस्य । माक्षिकस्यत्रयोभागाभागैकंसेंधवस्य च । मातुलुंगद्रवैथिजवीरस्यद्वैःपचेत् ॥ २९ ॥ चालयेल्लोहजेपाचेयावत्पानंसुलोहितम् । भवेत्ततस्तुसंशुद्धिस्वर्णमाक्षिकमृच्छति ॥ ३० ॥ अर्थ-तीनपसेभर सुवर्णमाक्षिक पैसेमर सैंधानिमक, दोनोंको पीस कडाहीमें डाल चूल्हेपर चढाय नीचे तेज आंच दे कडाहीमें बिजोरे अथवा जंभीरीका रस डालता जाय और छलीसे चलाता जाय जब स्वर्णमाक्षिक और कडाही दोनोंका लाल रंग होजाय तम सुवर्णमाक्षिक शुद्ध हुआ जानना ।। २९ ।। ३०। कर्कोटीमेपशृंग्युत्थैवेजबीरजेर्दिनम् । भावयेदातपेतीविमलंशुद्ध्यतिध्रुवम् ॥

(१८६) वैद्यरत्न। स्वर्णमाक्षिकवज्ञयंतारमाक्षिकमारणम् ॥ ३१ ॥ अर्थ-रूपा माखीको ककोडा मेटासींगी जंभीरी प्रत्ये. कके रसमें सातसात वार धूपमें खरल रखकर घोटे तो शुद्ध हो स्वर्णमाक्षिककी समान सुपामक्खीका मारण है ॥३१॥ अथ हरितालस्य। तालस्यकणशकृत्वातच्चूर्णकांजिकेक्षिपेत् । दोलायंत्रेणयामैकंपकंशुद्धयतितालकम् ॥ ३२ ॥ तिलतैलेपचेद्यामंयामंचत्रिफलाजल। चूर्णोदकेनयामैकंपकंशुद्धतितालकम् ॥ ३३ ॥ सदलंतालकंशुद्धपौनर्नवरसेनतु । खल्वेविमईयेदेकंदिनपश्चाद्विशोपयेत् ॥ ३४ ॥ संशोष्यगोलकंतस्यकुर्यात्तचविशीपयेत् । त्तःपुनर्नवाक्षारःस्थाल्याअप्रपूरयेत् ॥ ३५ ॥ तत्रतद्गोलकंधृत्वापुनस्तेनेवपूरयेत् । आकंठपिठरंतस्यपिधानंधारयेन्मुखे ॥ ३६॥ स्थालींचुल्लीसमारोप्यक्रमाद्रह्निविवईयेत् । दिनान्यन्तरशून्यानिपंचवह्निःप्रदीयते ।। एवंतन्मियतेतालंमात्रातस्यैकरक्तिका ।। ३७ ॥ अर्थ-हरतालके छोटे छोटे बारीक टुकडे कर उनको कप- डेकी पोटलीमें बांधकर दोलायंत्रद्वारा एक पहर कांजीमें पचावे तो शुद्ध हो एक पहर तिल के तेल में एक पदर त्रिफलेके में किये जलमें पकावै तो इस प्रकार करने से शुद्ध होताहै शुद्ध किये हरतालको पुनर्नवाके रसमें एक दिन घोटकर

भापाटीकासमंत।
(१८७)
गोला बनाकर मुखावै जब वह गोला सूखजाय फिर एक
होडीमें आधी हांडीतक पुनर्नवाका क्षार भरके उसपर वह
गोला रखकर ऊपरसे वह क्षार मुखतक भरके हांडीका मुख
बंद कर चूल्हेपर चढाय क्रमसे अग्नि बढाताजाय इसप्रकार
बराबर पांच दिन अग्नि प्रदीप्त कर फिर उसको ठंडा करले
अवश्य हरतालको भस्म होजायगी इस मारे हुए हरता-
लकी मात्रा एक रत्तीकी है ॥ ३२॥३३॥३४॥३५॥३६॥३७॥
अथ मनःशिला ।
अगस्तिपत्रतोयेनभावितासप्तवारकम् ।
शृंगवेररसैर्वापिविशुद्धयतिमनःशिला ॥ ३८ ॥
अर्थ-मनशिलको अगस्तियाके पत्तोंके रस अथवा अदर-
खके रसको सात भावना दे तो मनसिल शुद्ध हो ॥ ३८॥
अथ ग्वपरस्या
नृमूत्रवाथगोमूत्रेसप्ताहंरसकंपचेत् ।
दोलायंत्रणशुद्धंस्यात्ततःकार्येपुयोजयेत् ॥ ३९ ॥
अर्थ-खपरियाको मनुष्यके मृत्रम और गोमत्रमें दोला-
यंत्रसे सात दिन पकाधै तो शुद्ध हो ॥ ३९ ॥
भय तुथम् ।
ओतोर्विष्टासमंतुत्थंसौद्रंटंकणांघ्रियुक् ।
विधेवंपुटितंशुद्धवांतिभ्रांतिविवर्जितम् ॥ १० ॥
अर्थ-बिल्लीकी विष्ठाके समान नीलाथोथा ले उसमें
शहद और सुहागा डालकर परल करे फिर शरायसंपुश्में
रख कपडमिट्टी कर फंके से तीन पार करनेसे नीलाधोधा
वमन और भ्रांतिरहित शुद्ध होता है॥४०॥

(१८८) वैद्यरत्न । अथ नीलांजनस्य। स्रोतोजनंतुद्विविधश्वेतकृष्णप्रभेदतः। चिफलावारिणिस्वातद्वयंसिद्धिमृच्छति ।। ४१॥ अर्थ-श्वेत और कृष्णके भेदसे सुरमा दो प्रकारका है यह त्रिफलेके 'जलकी पुट देनसे दोनों प्रकारका शुद्ध होता है ॥ ४१॥ अथ पारदशोधनम्। तत्रशोधनबाहुल्यादथवादरदाकृष्टंस्विन्नम् । लवणांघुभाजिदोलायरिसमादाययथेच्छंकर्त- व्यस्तेनभेपजेयोगइतिवचनादस्यदरदाकृष्टि- लिख्यते । निंबूरसेनसंपिष्टात्प्रहरंदरदादृढम् । ऊर्ध्वपातनयंत्रेणसंग्राह्योनिर्मलोरसः ॥ ४२ ॥ अर्थ-पारेका शोधन बहुत प्रकारसे है अथवा शिंगरफ. से निकाल अत्यन्त खट्टी कांजीमें उसका स्वेदन करना चाहिये व लवणका जल भरे दोलायंत्रसे रस लेकर यथेच्छ प्रयोग करे इसका औषधियाके साथ योग है, इस वचनसे शिंगरफसे पारेके निकालनेकी विधि लिखते हैं । एक पहर- तक शिंगरफको नींबूके रससे खरल करें और ऊर्ध्वपातन यन्त्रके द्वारा पारा निकालले यह निर्मल होता है ।। ४२ ।। अथोपरसाः। तवादी गंधकशोधनम्। सदुग्धभांडस्यपुटेस्थितोयंशुद्धोभवेत्कूर्मपुटेनगंधः ४३ अर्थ-एक होडीमें सेरभर दूध भरकर वम्बसे उसका मुख बांधदे और १६ तोले आमलासार गंधक पीसकर 'घीमें गलावेगलनेपर टस वस्त्रपर डालदे तो गंधक उस कप- भापाटीकासमेत। (१८९) अथ दरदस्य। डेमसे टपककर दूधमें जमजायगी उसे निकाल पानीले धो सुखा रक्खै ।। ४३ ॥ अथ सिंदूरस्य। सिंदूरनिंबुकद्रावैः पिष्वाधर्मविशोपयेत् । ततस्तंडुलतोयेनतथाभूतंविशुद्धयति ॥४४॥ अर्थ-सिंदूरको नींबूके रसम घोटकर धूपमें सुखावै पीछे चावलोंक पानी में घोटकर धूपमें सुखावै तो शुद्ध हो ॥४४॥ अथ समुद्रफेना। समुद्रफेनःसंपिष्टोनिंबूतोयेनशुद्धयति ॥ ४५ ॥ अर्थ-निम्बूके अर्कके साथ खरल करनेसे समुद्रफेन शुद्ध होताहै ।। ४५॥ मेपीक्षीरेणदरदमम्लवगैश्चभावितम् । सप्तवारंप्रयत्नेनशुद्धिमायातिनिश्चितम् ॥१६॥ अर्थ-भेडीके दूधर्म और कोईसीभी खटाई नींबूके रत आदिकी पृथक् पृथक् सात भावना देनेसे हिंगुल शुद्ध होताहै ।। ४६ ॥ अतस्तंशोधयेदेववहाबुत्फुल्लितःशुचिः ॥४७॥ अर्थ-अग्निपर रखनेसे फूलकर सुहागा शुद्ध होजाताहे ४ अथ शिलामतुनः। अथोष्णकालेरवितापयुक्तव्यःनिवातेसमभूमिभागे । चत्वारिपत्राण्यसितायसानिन्यस्यातपेदत्तमनोविधानः शिलाजतुश्रेष्टमवाप्यपाप्रक्षिप्यतोयंद्विगुणंततोस्मात उष्णंतदईशृतमप्सुदत्त्वाविशोपयेत्तन्मृदितंयथावत् ॥ अथ टंकणस्था (१९०) वैद्यस्त्न । अर्थ-गरमीके दिनों में जब कही धूप निकले आकाशमें और वायुसे रहित हो उससमय समान भूमिमें चार लोह. पात्र स्थापन करै उनमेंसे प्रथम पात्रेमें शिलाजीतके टुकडे टुकडे कर डालदे और शिलाजीतसे दुना जल डाले और उससे आधा गरम जल डाल उसे धीरे धीरे हाथसे मल- कर वस्त्रमें छानले उस छने जलको पात्र में भरकर धूपमें रखदे ॥ ४८ ॥ ४९॥ ततस्तुयत्कृष्णमुपैतिचोईसंतानिकावविरश्मियोगात् पात्रात्तदन्यत्रततोनिदध्यात्तस्यांतरेकोष्णजलंनिधाय ततश्चतस्मादपरत्रपात्रेतस्माच्चपात्रादपरत्रतत्र ॥ पुनस्ततोन्यत्रनिधायकृष्णंयत्संहतंतत्पुनरादरेच्च ५१ यदापिशुद्धजलमच्छमूर्द्धप्रसन्नभावान्मलमेत्यधस्तात् तदात्यजेत्तत्सलिलंमलंचशिलाजतुस्याजलशुद्धमेवम् अर्थ-जब उसपर मलाई जमजाय तब उसको उतारकर दूसरे पात्रमें रखता जाय जब मलाई जमना बंद होजाय तब दूसरे पात्रमें जो मलाई जमा की है उसमें गरम जल डालकर धूपमें रखदे उसमें जो मलाई जमती जाय उसे निकाल निकालकर तीसरे पात्र में रखता जाय इसी प्रकार चौथे पात्रमें भी करे जय इसमेंमी मलाई पडती जाय उससे निकाल २ कर प्रथम पात्रमें रक्व इसी प्रकार चार पांच वार करे जब पात्रमें ऊपर पानी स्वच्छ रहे तय जान कि शिलाजीत शुद्ध होगया उस जलको फेंकद शिलाजी तको निकालले ॥५०॥५१॥ ५२ ॥ वह्नौतितंतृनिधूमंपक्त्वालिंगोपमंभवेत् । तृणाgणांभसिक्षिप्तमयोगलतितंतुवत् ।।

भापाटीकासमेत।
गोमूत्रगंधिमलिनंशुद्धंज्ञेयंशिलाजतु ॥ ५३॥
अर्थ-जो शिलाजीत अग्निमें डालने निधूम पक्क होकर
लिंगक समान खडा होजाय और तिनके अप्रभाग पर
रखकर जल में डालनेसे तंतुओंके समान फैलकर नीचे बैठ
गोमूत्रकीसी दुर्गन्धिदे और मलिन हो ऐसे शिलाजीतको
शुद्ध जानना ॥ ५३॥
अथ विषाणि।
खंडीकृत्यविपवस्त्रपरिषद्धंतुदोलया ।
अापयसिसंस्विनंयामतःशुद्धिमाप्नुयात् ।
अजादुग्धाभावतस्तुगव्यक्षीरेणशोधयेत् ॥ ५४॥
अर्थ-विषकी गांठको टुकड २ कर कपडेकी पोटलीमें
बांध बकरीक मूत्र में एक पहर स्वेदन करे तो शुद्ध हो ब-
करीके दूधके अभावम गौके क्षीरमें शोधन कर ।। ५४ ॥
अथोपविषाणि।
अर्कक्षीरस्नुहीक्षीरलांगलीकरवीरकम् ।
गुंजाहिफेनोधत्तूरःसप्तोपविपजातयः॥ ५५ ॥
अर्थ-आकका दूध थूहरका दूध कलियारी, कनेर चोंट-
ली अफीम धतुरा यह सात उपविष हैं ॥५५॥
अथ लांगीशोधनम्।
लांगलीशुद्धिमायातिदिनंगोमूत्रसंस्थिता ।
अर्थ-कलियारीक टुकडोंको एकदिन गोमूबमें मिजोर
तो शुद्ध हो॥
भय गुमाया।
गुंजाकांजिकसंस्वित्राप्रहरंशुद्धयतिध्रुवम् ॥५६॥
अर्थ-गुंजाको कांजीमें डाल एकपहर दोलायंत्रमें पचावै
तो शुद्ध हो ॥५६॥

अथ धतूरस्य।
(१९२)
वैद्यरत्न ।
अथादिफनस्य।
अहिफेनंशृङ्गवररसर्भाव्यं त्रिसप्तथा।
शुद्धयत्युक्तेषुयोगेपुयोजयेत्तद्विधानतः ॥१७॥
अर्थ-अफीमअदरखके रसको २१ भावना देनेसे शुद्ध
हो तदनन्तर योगोंमें डालेद ॥ ५७ ॥
धत्तूरवीजंगोमूत्रचतुर्यामोपितंपुनः ।
कंडितंनिस्तुपंकृत्वायोगेषुविनियोजयेत् ।। ५८ ॥
अर्थ-धतूरेके बीजोंको चार पहर गोमूत्रमें भिजोकर
फिर निकाल सुखाकर भूसी दूर करे तो शुद्ध हो पछि
प्रयोगोंमें डालदे ॥५८॥
अथ विषमुष्टिशोधनम्।
किञ्चिदाज्येनसंभृष्टोविपमुष्टिविशुद्धयति ।। ५९ ॥
अर्थ-कुछ घीके साथ भूनेसे कुचला शुद्ध होताहै वा
कांजीके पानी में कुचलेको दो पहर दोलायंत्रद्वारा स्वे.
दन कर धृतमें भूने तो शुद्ध हो । ५९ ॥
अथ नेपालशुद्धिः।
जैपालंरहितत्वचंकुरुरसज्ञाभिर्मलेमाहिपे
निक्षिप्तंत्र्यहमुष्णतोयविमलंखल्वेसवासोर्दितम्
लिप्तनूतनखपरे विगतस्नेहरजःसन्निभं
निम्बूकांबुविभावितंचबहुशःशुद्धंगुणाढयंभवेत् ६०
अर्थ-जमालगोटेको तीनदिन मलके गोबरमें गाड उसके
वल्कल और जीमको दूर कर गरम पानीसे धो वस्त्र
से पोछ खरलमें डाल मर्दन करे पीछे कोरे खिपटेपर लेप करें
तो उसका तेल सूसजाय पाछै नीबूके रसमें बहुत देरतक
घोटे तो शुद्ध और गुणों में निर्मल हो ॥ ६ ॥

भापाटीकासमेत ।
(१९३)
अथ वमन विधिः।
शरत्कालेवसंतेचप्रावृट्रकालेचदेहिनाम् ।
वमनरेचनंचैवकारयेत्कुशलोभिपक् ॥ ६ ॥
अर्थ-चतुर वैद्यको चाहिये कि शरत्काल वसन्त और
चौमासेमें वमन विरेचन करावे ।। ६१ ॥
बलवंतेकफव्याप्तहल्लासादिनिपीडितम् ।
तथावमनसात्म्यंचधीरचित्तंचवामयेत् ॥ १२॥
अर्थ- बलवान्को कफसे व्यातको हल्लासादिसे निपी-
डितको वमन करावे और धीर चित्तवालेको वमनकरावे ६२
विषदोस्तन्यरोगेमंदाग्नौश्लीपदेऽर्बुदे ।
हृद्रोगकुष्ठवीसर्पमेहजीर्णभ्रमपुच ।। ६३ ।।
विदारिकापचीकासश्वासपीनसवृद्धिषु ।
अपस्मारेज्वरोन्मादेतथारक्तातिसारिपु ।। ६४ ॥
नासाताल्लोष्टपाकेचकर्णस्रावेथ जिह्वके ।
गलशोथातिसारेचपित्तश्लेष्मगदेतथा ॥ ६५॥
मेदोगदेरुचौचैववमनंकारयेद्भिपक् ।
पटोलवासानिश्चपित्तंशीतजलंपिवेत् ॥६६॥
अर्थ-विषदोपमें स्तन्यरोगमें मन्दाग्नि श्लीपद अबुंद.
रोग हृद्रोग कुष्ठ विसर्प मेह जीर्णज्वर भ्रम विदारिका
अपची श्वास कास पीनसवृद्धि अपस्मार ज्वरोन्माद रक्त-
अतिप्तार, नासा तालु ओष्ठ इनोंका पाक,कर्णस्राव जिहा-
रोग गलशोथ अतिसार पित्तश्लेप्मरोग मेदरोग अरुचिरो-
गोंमें वैद्यको वमन कराना चाहिये, पित्त दोपमें पटोलपत्र
अडूसा और कहनिम्बके पत्तोंका चूर्ण कर शीतल जल
मिलाकार पीव तो यमनमें पित्त निकले॥६॥६॥६५॥६६॥

(१९४) वैद्यरल। सश्लेष्मवातपीडायांसक्षीरंमदनपिवेत् । अजीणेकोष्णपानीयंसिधुंपीत्वावमेत्सुधीः॥६७ ।। वमिनंपाययित्वातुजानुमात्रासनेस्थितम् । कंठमेरण्डनालेनस्पृशेत्तवामयेद्भिपक् ॥ ६८॥ अर्थ-तथा कफ वायुकी पीडा होय तो मैनफलके चूर्णको दूधमें डालकर पीवै तो वमन होनेसे प्राणीका अजीर्ण दूर हो मनुष्यको वमन कारक औषधी देकर वोटू ऊंचे मास: नपर बैठावै और अंडकी नालको लेकर उसके मुखमें डालकर हलके हाथसे जसे कफको स्पर्शकरे इसप्रकार कंठको सिरावै इसप्रकार भीतर बाहरसे कंठको सिराय वमन करावे ॥ ६७ ॥ ६८॥ अथ वमनेऽनधिकारिणः। नवामनीयस्तिमिरीनगुल्मीनोदरीकृशः। नातिवृद्धोगर्भिणीचनस्थूलोनक्षतातुरः ।। ६९ ।। अर्थ-वमनके अयोग्य तिमिररोगी गुल्मरोगी उदररोगी कृश वृद्ध गर्भिणी स्थूल क्षत आतुरको वमन न करावे ६९॥ मदात्तॊबालकोरुक्षःक्षुधितश्चनिरूहितः । उदावयूद्धरक्तीचदुश्छद्य केवलानिली ॥ ७० ॥ एतेप्यजीर्णव्यथितावाम्यायेविपपीडिताः । कफव्याप्ताश्चतेवाम्यामधुककाथपानतः ॥७१॥ अजीर्णपीतपानीयंव्यायाममेथुनंतथा । नेहाभ्यंगान्प्रकोपंचदिनकंवर्जयेत्सुधीः ॥ २ ॥ मर्थ-मदपीडित बालक सक्ष भूवा निसहवास्तिदिया हुमा उदायर्तरोगी जिसके नाक इत्यादिक उर्चद्वारोंसेरक्त भापाटीकासमेत। निकलता होय केवळ वातरोगी वाछर्द किये हुए वा अजीर्ण से व्यथित इनको वमन न करावे और जो यह कहें तो अजीर्ण और विषपीडित मनुष्यको वमन करावेजो कफसे व्याप्तहें उनको मधुकाथका पान कराकर वमन करावे अजीर्ण करने वाले भारी पदार्थ शीतलपानी दण्ड कसरत मैथुन देहमें मालिस करना तथा क्रोधकरना यह सब कर्म जिसदिन वमनकारी औषधि ले उसदिन त्यागदे ॥ ७० ॥७१॥ ७२ ।। अप विरेचनविधिः। खिग्धस्विनस्यवांतस्यदद्यात्सम्यग्विरेचनम् । बहुपित्तोमृदुप्रोक्तोबहुश्लेष्माचमध्यमः ॥ ७३ ॥ बहुवातःकूरकोष्ठोदुर्विरेच्यासकथ्यते । जीर्णज्वरोगरव्यातोवातरक्तीभगंदरी ।।७४ ॥ अश:पांडूदरग्रंथिहृद्रोगारुचिपीडिताः। योनिरोगप्रमेहार्त्तगुल्मप्लीहव्रणार्दिताः॥ ७९ ॥ विद्रधिच्छर्दिविस्फोटविसूचीकुष्टसंयुताः। कर्णनासाशिरोवक्रगुदमेद्रामयान्विताः ।। ७६ ।। अर्थ-प्रथम नेहपानसे स्निग्ध और स्वेदनसे स्विन्न और वमनसे वातमनुप्यको रेचन देना, जो मनुष्य पित्ताधिक है बह मृदु (जिसका कोठा कोमल है) जो कफाधिक है सो मध्यकोष्ठ और जो वाताधिक है सो कठिनकोष्ठ है उसको कठिनतासे रेचन होताहै. जीर्ण वरसे क्यात विषसे व्याप्त वातरक्त भगन्दर रोगसे युक्त अशरोगी पाण्डुरोगी अंथिरोगी हृद्रोग अरुचि योनिरोग प्रमहसे व्याप्त गुल्म प्लीह व्रणसे युक्त विद्रधि छर्दैि विस्फोटक विसूचिका कुष्ठ कर्ण नासिका शिरमुखगुद मेद रोगसेयुक्त ॥७३॥७४॥७९॥७६ वद्यरत्न । शीहशोथांक्षिरोगार्ता:कृमिक्षारानिलार्दिताः। शूलिनोमूत्रघातातविरेकानिरामताः ॥ ७७ ॥ अर्थ-पीह शोथ अक्षिरोगसे व्याकुल कृमि क्षार अनिल रोगसे अर्दित शलवाले मृत्राघातरोगसे युक्त यह विरेचनके योग्य मनुष्यहैं ।। ७७ ॥ मरिचंपिप्पलीशुण्ठीपथ्याधात्रीविभीतकम् । विडगंमुस्तकंचलापत्रमेकैकटंककम् ॥ ७८॥ लवंगंटंकदशकंखाधिटंकमितानिवृत् । एपांचूर्णेऽशीतिटंकमितांदद्यात्सितांसिताम् ॥ ७९ ॥ आख्ययाभिमतंचूर्णमितंप्रातस्तुभक्षयेत् । विरेचनमिदंश्रेष्टमामशुद्धिकरंपरम् ॥ ८० ॥ अर्थ-काली मिरच पीपल सोंट हरड बहेडा आमला वायविडंग नागरमोथा इलायची पत्रज यह एकएक टंकले लोग दशटंक और निसोत ७० टक इनसय वस्तुओंका चूर्णकर उसमें अस्सी टंक मिश्री मिलावे यह आस्याना• मक चूर्ण जा प्रातःकाल भक्षणकरें तो इसके शीन विरे- चन होताहै और यह परमशुद्धि करनेवालाहे७८॥७९॥८०।। अभयामरिचंशुण्ठीविडंगामलकानिच । पिप्पलीपिप्पलीमूलत्वपत्रमुस्तमेवच ।। ८१ ॥ एतानिसमभागानिदन्तीचत्रिगुणाभवेत् । त्रिवृताएगुणाञयापडूगुणाचसिताभवेत् ।। ८२ ॥ मधुनामोदकान्कृत्वाकर्षमावान्प्रमाणतः । एकैकंभक्षयेत्प्रातःशीतंचानुपिज्जलम् ॥ ८३ ।। अर्थ-हरड कालीमिरच सोंट वायविडंग आमले पीपल पीपलामल तज पत्रज मोथा यह सब बराबर मागले और भापार्टीकासमेत। ( १९७) दन्तीमूल तीनभाग निसात आठभाग मिश्री छम्भाग इनके शहदद्वारा एकएक तोलेके मोदक बनाव प्रातःकाल एकएक भक्षणकरे और ऊपरसे ठंडा पानी पिये ॥ ८१ ॥ ८२ ॥८॥ तावद्विरिच्यतेजंतुर्यावदुष्णंनसेवते । पानाहारविहारेषुभवेनियन्त्रित सदा ॥ ८ ॥ विषमज्वरमंदाग्निपांडकासभगंदरान् । विदाहप्लीहमेहांश्चयक्ष्माणंनयनामयान् ॥ ८५ ॥ वातरोगांस्तथाध्मानमूत्रकृच्छ्राणिचाश्मरीम् । पृष्ठपार्थोरुजघनंजानूदररुजंजयेत् ॥ ८६॥ सततंशीततादोपंपलितानिप्रणाशयेत् । अभयामोदका तेरसायनमनुत्तमम् ।। ८७ ॥ अर्थ-तबतक विरेचन होता रहेगा जबतक उष्ण जलका पान न करे, पान आहार और विहारमें सदा नियन्त्रित रहे विषमज्वर मन्दाग्नि पाण्डु कास भगन्दर विदाही प्लीहा प्रमेह यक्ष्मारोग नेत्ररोग वातरोग आफरा मूत्रकृच्छ्र पथरी पृष्ठपार्श्व ऊरु जंघा जातु उदररोग निरन्तर शीतता पलित इनको यह अभयामोदक दूर करते हैं यह उत्तम रसायन है ।। ८४-८७ ।। शंभो/जंसटकंवलिमरिचयुतंशृंगवेरंचतुल्यं योज्यं कुंभवीजंसमशिखिसहितंमर्दितंयाममेकम् । भुक्तंगुंजाद्विमात्रंशिशिरजलयुतत्यक्ततप्तत्वमुच्चै- रिच्छाभेदीरसोयंप्रचलमलहर सर्वरोगकहतागा८८॥ अर्थ-शुद्ध मारा सुहागा गंधक काली मिरच यह सब बरापरले और सोंठभी बराबर भागले तथा जमालगोटेके बीज और चित्रक यह इनकी बराबर लेकर एकपहरतक खर ल करे, यह एक रत्ती शीतल जलके साथ सेवन करे जयतक

(१९८)
वैद्यरत्न ।
.
उष्ण जलका सेवन न करे तबतक विरेचन होगा. यह इच्छा
भेदीरस प्रबल मलका हरनेवाला तथा सब रोगोंका हरने
वाला है ॥ ८८॥
जैपालेनसमैःसूतव्योपटंकणगंधकैः ।
नाराचास्यासोमाषमात्रम्सर्पिःसितायुतम् ॥ ८९ ॥
हन्तिसग्रहमानाहमामशुलंनवज्वरम् ।
वेलाज्वरंविरेकेणशीतलांबुनिपेवणात् ॥ ९० ॥
अर्थ-शोधे जमालगोटकी बराबर राले और सोंठ'
मिरच पीपल सुहागा गन्धक यह सब बराबर लेकर खरल
करै यह नाराचरस है, एक मासा घृत और मिश्रीके साथ
सेवन करें तो संग्रहणी आनाह शल नवीन ज्वरको दूर
करता है. वेलाज्वरमें विरेचनके शीतल जलसे सेवन
करें॥८९ ।। ९०॥
अथ परिभापा।
नमानेनविनायुक्तिद्रव्याणांजायतेक्वचित् ।
अतःप्रयोगकार्यार्थमानमात्रोच्यतेमया ॥ ९१॥
मानंचद्विविधप्रोक्तंकालिंगंमाग,तथा ।
कालिंगान्माग,श्रेष्ठमितिमानविदोविदुः ।। ९२ ॥
अर्थ-परिमाणके विनाऔषधियोंकी युक्ति कहीं नहीं होती
इस कारण औपधि बनानेके लिये तोल आदिकी विधि
वर्णन करते हैं. एक कलिंग और एक मागध देशके
भेदमे दो प्रकारकी तोल है. कलिंगसे मागध श्रेष्ठ है ऐसा
मान जान्नेवाले कहते हैं॥९१ ।। ९२ ॥
त्रसरेणुषुधे प्रोक्तस्त्रिंशतापरमाणुभिः ।
असरेणोस्तपर्याय नावंशीनिगद्यते ॥ ९३ ॥

भापाटीकासमेत । ( १९९) . जालांतरगतैःसूर्यकरैवंशीविलोक्यते। पड्वंशीभिर्मरीचिःस्यात्ताभिापभिश्वराजिका ९४ तिसृभीराजिकाभिश्वसर्पपःप्रोच्यतेबुधैः । यवोऽष्टसर्पपैःप्रोक्तोगुंजास्यात्तचतुष्टयम् ॥ ९५ ॥ पनिश्चगुंजिकाभिःस्यान्मापकोहेमधान्यको। मापैश्चतुर्भिःशाणःस्यादरणोनिष्कइत्यपि ॥ ९६॥ अर्थ-तीस परिमाणुका एक त्रसरेणु होताहै इसी सरे- शुका पर्याय बंशी कहते हैं, झरोखों में सूर्यको किरण पड- नेसे जो वडे बारीक कण धूरिके दीखते हैं वह वंशी कहाते हैं. छः वशीकी एक मरीची (जो रेतली जमीनमें धूरिके बारीक कण सूर्यकी किरणोंसे चमकते हैं) छ: मरीचिकी राई और तीन राईकी एक सरसों होती है, आठ सरसोंका एक यवचार जोकीएकचोंटली (रत्ती)छारत्तीका एक मासा उसको हेम और धान्यक कहते हैं, चार मासेका शाण उसको धरण और निष्क कहते हैं ।। ९३ ।। ९४ ।। ९५ ।। ९६ ॥ टंकःसएवकथितस्तद्वयंकोलउच्यते । क्षुद्रभोवटकश्चैवद्रंक्षण सनिगद्यते ॥ ९७ ॥ कोलद्वयंचकर्पःस्यात्सप्रोक्तम्पाणिमानिका । अक्षपिचुःपाणितलांकिंचित्पाणिश्चतिन्दुकम् ॥९८॥ बिडालपदकंचैवतथापोडशिकामता। करमध्येहंसपदंसुवर्णकवलग्रहः ॥९९।। उदुंबरंचपर्यायःकर्पएवनिगद्यते । स्यात्काभ्यामर्धपलं शक्तिरएमिकामता ॥ १०॥ १ इस ग्रंथम छारत्तीका मासा जाना।

(२००)
वैद्यरत्न।
शुक्तिभ्यांचपलंज्ञेयंमुष्टिरानंचतुर्थिकाम् ।।
प्रकुंचापोडशीबिल्वपलमेवप्रकीर्त्यते ॥१॥
पलाभ्यांप्रमृतिज्ञेयाप्रसृतंचनिगयते ।
प्रसृतिभ्यामंजलि स्यात्कुडवोर्द्धशरावकम् ॥ २ ॥
अर्थ-उसीकोटकभी कहते हैं.दोटकका एक कोल होताहै
इसको क्षुद्रभ वटक और द्रंक्षणभी कहते हैं (बेरकी बरा-
बर होनेसे इस तोलकी कोल संज्ञा रखीहै) दो कोलका
एक कप होताहै उसको पाणिमानिका अक्ष पिचु पाणितल
किंचित्पाणि तिन्दुक विडालपदक पोडशिका करमध्य हंस-
पदक सुवर्ण कवलग्रह उदुम्बर यह सब कर्षके पर्यायह,
कर्षका एक अर्द्धपल उसीको शुक्ति और अष्टमिका कहतेहैं
दो शुक्तिका एकपल उसीको मुष्टि आम्र और चतुर्यिका
प्रकुंच षोडशी और बिल्व (बेलका फल ) यह पलके पर्याय
है दो पलकी एक प्रसूति (फैली हुई उंगलियोंवाली)
हथेली और प्रसृत होतीहै दो प्रमृतिको एक अंजली और
उसीको कुडव(पावसेर) और अर्धशराव कहतेहैं ॥९७-१०२।।
अष्टमानंचसंज्ञेयंकुडवाभ्यांचमानिका ।
शरावोप्टपलंतद्वज्ज्ञेयमत्रविचक्षणः ॥३॥
शरावाभ्यां भवेत्प्रस्थश्चतुःप्रस्थैस्तथाढकम् ।
भाजनंकांसपाचचतुःपटिपलंचतत् ॥ ४ ॥
चतुर्भिराढकोण कलशोनल्वणोन्मनौ ।
उन्मानश्चघटोराशिणपर्यायसंज्ञकः ॥ ५॥
द्रोणाभ्यांशूर्पकुंभौचचतुःपटिशरावकाः ।
शुपाभ्यांचभवेद्रोणीवाहोगोणीचसास्मृता ॥ ६॥

भापाटीकासमेत ।
२०१०)
अर्थ-और अष्टमानभी कहते हैं. दो कुडधकी एक मा-
निका होती है उसको शराव और अष्टपलभी कहते हैं
एक शरावके १२८ टंक होते हैं दो शरावका १ प्रस्थ (सेर)
होताहै चार प्रस्थका एक आटक होताहै उसको भाजन
कांसपावभी कहते हैं, यह ६४ पलका होताहै चार आढ.
कका एक द्रोण होताहै उसको कलश नल्वण उन्मान घट
(घडा) और राशिभी कहते हूँ दो द्रोणका शूर्प होताहे
उसको कुंम कहते हैं शूपके ६४ शराव होते हैं दो शुर्पकी
द्रोणी होती है उसको वाह और गोणीभी कहतेहैं ।। ३ ।।
॥४॥५॥६॥
खारीपरिमाणम् ।
द्रोणीचतुष्टयंखारीकथितासुक्ष्मबुद्धिभिः ।
चतुःसहस्रपलिकापण्णवत्यधिकाचसा ॥७॥
अर्थ-चार द्रोणीकी एक खारी होती है उसके ४०९६ पल
होतेहैं ॥७॥
भारतुलापरिमाणम् ।
पलानांद्विसहस्त्रंचभारएकःप्रकीर्तितः।
तुलापलशतंज्ञेयासर्ववैपनिश्चयः ॥८॥
माफ्टंकाक्षविल्यानिकुडवःप्रस्थमाढकम् ।
राशि!णीखारिकेतियथोत्तरचतुर्गुणाः ॥९॥
अर्थ-२००० पलका एक भार होताहै १०० पलकी एक
तुला यह केवल मगध देशमें नहीं किन्तु सब देशमें इसी
तोलका निश्चय जानना मासेसे लेकर खारी पर्यन्त दूसरी
तोल चौगुनी जाननी जैसे चार मासेकार शाण४ शाणका
एकर्ष चार कर्षका एक बिल्व चार बिल्वकी एक अंजली
चार अंजलीका एक प्रस्थ चार प्रस्थका एक माढक चार
आढककी एक राशि चार राशिकी एक गोणी चार गो
णीकी एक खारी इसप्रकार एकसे दूसरी चौगुनी जाने८॥९॥

(२०२) वैद्यरत्न। - कलिंगपरिभाषाकेतोल। यवोद्वादशभिर्गौरसप्पैःप्रोच्यतेबुधैः । यवद्वयेनगुञ्जास्यात्रिगुंजोवल्लउच्यते ।। ११०॥ मापोगुंजाभिरष्टाभिःसप्तभिर्वाभवेत्वचित् । स्याच्चतुर्मापकैःशाणःसनिष्कर्षकएवच ॥ ११ ॥ गयाणोमापकै पभिःकपःस्याद्दशमापकः । चतुष्कर्पे पलंप्रोक्तंदशशाणमितंबुधैः । चतुष्पलैश्चकुडवंप्रस्थायाःपूर्ववन्मताः ॥ १२ ॥ अर्थ-बारह सफेद सरसोंका एक यव दो यवकी एक रत्ती (गुंजा) तीन रत्तीका एक बल्ल (कहीं दो रत्तीका होता है ) आठ रत्तीका १ मासा (कहीं सात रत्तीका- भी होता है) चार मासेका १ शाण उसको निष्क और टंकभी कहते हैं, छमासेका एक गद्याणक दश मासेका एक कर्ष होता है चार कर्षका एक पल उसपलके दश शाण होते हैं चार पलका एक कुडव होता है और प्रस्था. दिकी तोल मागधपरिभाषाके समान जाननी ११०-११२॥ अजीर्णखण्ड । अजीर्णप्रभवारोगास्तदजीणचतुर्विधम् । आमंविदग्धविष्टब्धंरसाजीणचतुर्थकम् ॥ १३ ॥ अर्थ-मनुष्योंको अजीर्ण होनेसे रोग उत्पन्न होते हैं वह चार प्रकारका है आम विदग्ध विष्टब्ध और रसाजीर्ण १३ आमेचोप्णोदकंपेयंदग्धेचोदरस्वेदनम् । विष्टब्धेरेचनचेवशयनंरसशेपके ॥ १४ ॥ अर्थ-आमाजीर्णमें तत्ता जल पिये विदग्धाजीर्णमें स्वेदन * दस्त और रसशेष अजीणम शयन करे।

भाषाटीकासमेत। (२०३) घृताजीणेदिनेपंचतैलेद्वादशकस्तथा । तिथिसंख्यापयस्युक्तादधिजावशतिस्तथा ॥ १९ अर्थ-धीका अजीर्ण पांचदिनमें पचताह तेलका बारह दि- नमें दूधका पन्द्रह दिनमें और दहीका वीस दिनमें पकताहै।। पिटानेसलिलंप्रियालुफलजेपथ्याहितामांसजे खण्डक्षीरभवेतुतकमुचितंकोष्णाम्बुकालिंगजे॥ मास्येचूतफलं त्वजीर्णशमनंमध्वम्वुपानात्यये तैलेपुष्करजेकटुप्रशमनंशेषांस्तुबुद्धयाजयेत् १६ ॥ अर्थ-रोटी पूरीके अजीर्णमें जलका पीना हित है खिर नीके अजीर्णमें हरड खाय मांसके अजीर्णमें खांड दूधके. अजीर्ण में छाछ तरबूजके अजीर्णमें तत्ताजल मछलीके अजीर्णमें आम चूसना, मद्यके अजीर्णमें शहद मिलाजल. कमलगट्टेके खानेमें सरसोंका तेल पिये शेष अजीर्णको वैद्य अपनी बुद्धिसे दूर करे ॥ १६ ॥ उष्णोदकंघृताजीणेंतैलाजीणेचकांजिकम् ॥ गोधूमेकर्कटीश्रेष्टाकदल्याम्रफलेघृतम् ॥ १७ ॥ अर्थ-घोके अजीर्णमें गरम जल तेलके अजीर्णमें कांजी गेहूंके अजीर्णमें ककडी कदलीकेआम्रफलकेअजीर्णमेघृतखाय दाडिमामलकतालतिन्दुकीबीजपूरलवलीफलानि ॥ बाकुलंफलमतीवपाचयत्पाकमेतिबकुलं स्वमूलतः १८॥ अर्थ-अनार आंवला तालफल तिन्दुकी मिजोरा लपली इनके अजीर्णमें मोलसिरिके फल खाने चाहिये मोलसि- रिके अजीर्णमें मौलसिरिके मूल खानेसे पाचन होताहै १८. आम्रातकोदुम्बारिपिप्पलीनांफलानिचप्पक्षवटादिकानां विश्वौषधंपर्युपितोदकेनसौवर्चलेतामफलस्यपाकम् १९.

(२०४) वद्यरत्न । अर्थ-आम्रातक, गूलर, पीपल, पाकर, वड इनके फल खानेसे अजीर्णमें सोंठको पीसकर पीना योग्य है आमके अजीर्णमें सेंधानान खाय ॥ १९ ॥ गोधूममापौहरिमंथमुद्गौयवासतीनांकितवोनिहन्ति ॥ यन्मातुलुंगीफलमेतिपाकंक्षणेनसोयंलवणानुभावः २० अर्थ-गेहूं उडद चना मॅश जो मटर इनका अजीर्ण हो तो धतरेके रससे और विजोरेका रस सँधेनॉनसे दूर होताहै ॥ २०॥ नागरंहरतिविल्वजांबवंपाचयेन्मधुरिकाकपित्थजम् । सर्वथैवसकलामनिहंत्रीप्रीतयेग्निजननीगदितासा २१ ॥ अर्थ-वेलफल तथा जामुनके अजीर्णको साँठ पचाती है कैथके अजीर्णको सोंफ पचाती है यह विशेषकर सब औष- धियोंको पचाती है व्याधिनाशक और अग्निवर्द्धकहै ॥२१॥ पिशितपनसयोःस्यादानवीजेनपाकः कृशरमहिपयोपित्क्षीरयोः संघवेन ।। चिपटपरिणतिःस्यात्पिप्पलीदीप्यकाभ्या- मपहरतितुपाम्बुदैदलानामजीर्णम् ॥ २२ ॥ अर्थ-मांस और कटहरका अजीर्ण आमकी गुठलीसे नष्ट होताहै उडद तिल चावल के मिलानेसे खिचडी हो. तीहभैसका दूध इनका परिपाक संधेलमकस होता है चिरवाका अजीर्ण पीपल और अजवायनसे नष्ट होता और दोदलका अन्न मंग उडद आदिका अजीर्ण काजीसे नष्ट होता॥ २२॥ कर्परपूगीफलनागवल्लीकाश्मीरजातीफलजातिकोपे ॥ कस्तूरिकाशेलुकनालिकेरफलंपचत्याशुसमुद्रफेनः २३ भापाटीकासमेत । (२०५) . अर्थ-कर्पर पूगीफल (सुपारी) ताम्बूल केशर जायफल जावित्री कस्तूरी बहेडा नारियल इनका अजीर्ण समुद्र फेनसे दूर होता है ॥ २३ ॥ श्यामाकनीवारकुलथपष्टि- निष्पावकंगुर्दधिमण्डकस्तु ॥ । चिंचाकुलत्थौतिलतैलयोगो जटाब्दनादस्यनिहन्त्यथाभ्रम् ।। २४ ॥ अर्थ-सनखिया तिन्ती कुल्थी सांठीचावल वनमंग कंगनी इनका अजीर्ण दहीके मद्देसे दूर होता है इमली कुलथीका अजीर्ण तिलके तेलसे आमकां अजीर्ण चौलाई की जडसे नष्ट होता हैं ॥ २४ ॥ कशेरुशृंगाटमृणालमृद्धीखर्जूरखंडायपिनागरेण ।। पलाशभस्मां तथारजोवारसोनिहन्याद्रसमिक्षुजातम् ॥ अर्थ-कसेरू सिंघाडे कमलका कन्द दाख खजूर खांड इनका अजीर्ण सोंठसे नष्ट होताहै गन्नेका अजीर्ण ढालकी राखको पानी में मिलाकर पीनेसे नष्ट होता है ॥ २५ ॥ किमत्रचित्रंबहुमांसमत्स्यभोजीसुखीस्यात्परिपीतसूक्तः इत्यद्भुतंकेवलवह्निपकमांसेनमत्स्य परिपाकमेति २६॥ अर्थ-बहुतमांस और मच्छी खानेवाला पुरुष मद्यपान करनेसे सुखी रहता है यह आश्चर्य नहीं है परन्तु केवल आंचसे भुनेमांससे मच्छीका अजीर्ण पचता है यह बडा आश्चर्य है ॥ २६॥ शाकानिसर्वाण्यपियान्तिपाकंक्षारणसद्यस्तिलनालजेन चंचूकसिद्धार्थकवास्तुकानांगायत्रिसारकथितेनपाकः ।। अर्थ-सव सागमात्रका अजीर्ण तिलके खारसे नाश हो (२०६) वैद्यरत्न । ताहै और चुका सरसों बथुआ इनके खानेसे प्रगट अजीर्ण खैरसारके काढेसे पारिपाक होय ॥ २७ ॥ पटोलवंशांकुरकारवेल्लीफलान्यलावूनिबहूनिजग्ध्वा ॥ क्षारोदकंबहातरोनिपीयनोक्तःपुनवाछतितावदेव॥२८॥ अर्थ-परवल वासकी कॉपल मीठी तूंबी इनके अजीर्णम' पालाश ढाकके खारको जल में पीनेसे तत्काल परिपाक हो और उसी समय उतनेही भोजन करनेकी फिर इच्छा होती है ॥ २८॥ विपच्यतेसूरणकोगड़ेनतथालुकंतंदुलतोयपानात् । जम्बीरनीरेणनिशारसेनमुस्तेनचूर्णपरिपाकमेति ॥२९॥ अर्थ-जिमीकंदकाअजीर्णगुडसे आलूका चावलोंके धोवनसे हलदीका जंभीरीके रससे लहसनका मोथेके चूर्णसे पचे॥२९॥ लवणंतंदुलपेयात्सर्पिणवीरवारिणाचपचेत् ॥ मरिचादपितत्पार्कशीघ्रंयात्येवकांजिकात्तलम् ॥३०॥ अर्थ-लवण तंदुलके पीनेसे वृतका अजीर्ण जम्बीरीके जलसे और कालीमिर्चतेभी इसका पाक होजाताहे का. जीसे तेल पच जाता है ।। ३० ।। रसानंजीर्यतिव्योपखंडंनागरभक्षणात् । फलानिसकलान्याशयवक्षारात्पचन्तिहि ।। मद्यरसानवासाचहरिमंथेनजीर्यति ॥ ३१ ॥ अर्थ-रसान त्रिकुटेसे, खांडका अजीर्ण साँठ भक्षणसे तथा सब प्रकारके फलोंका अजीर्ण जवाखारसे नष्ट होता है मधुरसानका अजीर्ण अडूसा और हारमन्य चनेसे दूर होता है।॥ ३१॥ उष्णेनशीतशिशिरेणचोष्ण- मम्लेनचक्षारगोस ।

नापाटीकासमेत । (२०७)
स्नेहेनतीक्ष्णंवमनातियोगे
सिताहितास्यादितिकाश्यपोक्तिः॥
स्निग्धेपुरूक्षेचतदप्यनेन
स्निग्धंचरूक्षेणचपाकमेति ॥ ३२॥
अर्थ-सरदीके रोग गरम औषधीसे नष्ट होते हैं और गर-
मीके शतिल औषधीसे नष्ट होते हैं सब खार खट्टी वस्तुसे
गुणकारक होती है तीखी मिर्चआदिवस्तु घी तेल
आदिसे गुणकारक होय और वमन करता वस्तुका अवगुण
मिश्रीसे शान्त होताहै. स्निग्ध पदार्थों के अजीर्णमें रूखे
और रूखोंके अजीर्णमें स्निग्ध प्रयोगकरे ॥ ३२॥
तप्तंतप्तहेमवातारमनौतोयेक्षिप्तंक्षिप्तमंभस्सुतच ।
पीत्वाजीणतोयपाननिहन्यात्
चित्राक्षौभद्रमुस्तविशेपात् ॥३३ ॥
अर्थ-सुवर्ण अथवा चाँदीको वारंवार तपाकर जलमें
बुझाये उस जलके पीनेस बहुत दिनका अजीर्ण जाय अथवा
चीता शहद और भद्रमोथा सेवनकरे तो अजीर्ण जाय३३
ताम्बूलजग्धास्थितचूर्णकेनसंदह्यतेयस्यमुखंनरस्य ।
तैलेनवाकेवलकांजिकैनसुखायगंडूपमसौविदध्यात् ३४
अर्थ-जिस मनुष्यका मुख पान खातेही जलने लगे
अथवा चूने और कत्येसे फटजाय वह तेल अथवा सिरकेसे
कुल्ला करे तो आराम हो ॥ ३४ ॥
इत्यजीर्णकुलकंडनोगणोनूनमाहमुनिरत्रिसंभवः ।
सम्यगेनमधिगम्ययोजयेनकचित्स्खलतिजातुतत्त्ववित
इति श्रीगोस्वामिशिवानंदभट्टाविरचिते वैद्यरले
समाप्तोऽयं सप्तमः प्रकाशः ॥७॥

वैद्यरत्न। (२०८) अर्थ-इस प्रकार यह अजीर्णकुलका नाशक गण वर्णन किया यह आत्रेयने कहा है जो इसको अच्छी प्रकार जान कर प्रयोग करता है वह तत्त्ववित किसी प्रकार धोखा नहीं खा सक्ताहै और रोगोंको जीतताहै ॥ ३५ ॥ इति श्रीगोस्वामिशिवानदभ विरचिते वैद्यरत्ने मापाटीकाया सप्तम प्रकाश ॥ ७ ॥ दोहा। संवद्गुणशरअंकविधु, ज्येष्ठ शुक्लगुरुवार । तिथिअष्टमीपुनीतअति, पूयोतिलकविचार ॥३॥ धन्वन्तरिआदिकमहा, सिद्धनकोशिरनाय । वैद्यरत्नटीकासकल, भापालिख्योवनाय ॥२॥ सरितरामगंगानिकट, नगरमुरादाबाद । तहारहतहरिभजनरत, द्विजज्वालापरसाद ॥३॥ सेठशिरोमणिजगविदित; खेमराजगुणखान । तिनकेहितटीकाकियो, सारभूतसुखदान ॥ ४ ॥ नारायणकोसुमरिये, भजियसीताराम। दूरकरहिंभवरोगजो, सिद्धकरहिंसवकाम ॥५॥ !! समाप्तोऽयं ग्रंथः॥ पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीपंकटेश्वर" स्टीम मेस-अम्बई

Vaidya Ratna

Author
Pandit,.jwalaprashad
Title
Vaidya Ratna
File name
Vaidya Ratna
Text
OCR done
Citation
1935
Published
2012/08
Publisher
Mumbai,.kalyan Yantra Adhikari
Language
Sanskrit
Pages
213
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312337
Barcode
99999990321135.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
n7B5soAmrJy
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