Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Vichar Vaibhav

Sharma,prabhunarayan · 2011/04

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विचार-वैभव
प्रणेता-
पलिवेदी, प्रेमसमाधी, पत्तव्यपथ,
कल्याणी कृष्णा, वणीसहार (हिन्दी)
साहित्य मणि माला, पद्य प्रपात अादि
अनेकों अधों क रचयिता और मम्पादक
प० प्रभुनारायण शर्मा चतुर्वेदी
'सहृदय'
साहित्यरत्न, नाट्याचार्य
भूतपूर्व मुख्याध्यापक तथा अध्यक्ष,
साहित्य पाठशाला
जयपुर।
प्रकाराम
वा० कन्हैयालाल एण्ड सन्स
चुकसेलर्स एण्ड पब्लिशर्स
जयपुर
प्रथम सस्करण
}
सवत् १६४१ वि०
{ मूल्य

अवध प्रिंटिग वर्क्स, चारबाग लपनऊ प्राणिविद्या के अनुसार "हृदय" शब्द से शरीर क एक पतले, सूक्ष्म और कोमल मास के टुकड़े का बोध होता है, परन्तु जहाँ तक काव्य जगत् से इसे शद का सवध है, हम इस मानसिक वृत्ति, भाव और अनुमाव का सश्चित भाण्डार वायवा स्नेहशीलता, प्रेम, साहस, शक्ति, गुस भावना और अभिप्राय मा वास-स्थान कह सकते हैं । प्रकृति का पहिला प्रतिबिम्ब पड़ने पर उसकी व्यापकता से प्रभावित होकर मानव मस्तिष्क के प्रतिमा तत्व-सम्बधी अथवा सैद्धान्तिम भाग को अन्यपण प्रवृत्ति, गतिशील होकर कैसे वाय्य परती है और हृदय में काव्यरचना की भावना का किस प्रकार उद्रेक करती है । कल्पना एव अनुभघ के स्पष्टीकरण से काव्य में "रस" वा सञ्चार किस प्रकार होता है और रसों का प्रवाह श्रात्मा का परमा- न द या रसायस्था की सीमा तक कैसे पहुंचा देता है । इस "विचार वैभव” नामक पुस्तक में एस सर प्रश्नों का उत्तर दिया गया है। इस पुस्तक में, मेंने काव्य के मूल रागात्मा, मातात्विक और दार्शनिक सिद्धातों को पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करन का प्रयाम किया है। कविता को तुच्छ एर अवहेलना की वस्तु न समझना चाहिए, कावता के सम्बन्ध विना समझ बूझे अपनी राय देना सर्वथा अनुचित है। "विचार वैभव" में काव्य सम्बधी प्राय सभी प्रारश्यक विषयों का समावेश किया गया है और करिता के समस्त प्रचलित रूपों पर प्रकाश डाला गया है। प्रस्तुत पुस्तक में निम्नलिपित परिच्छेद हैं (१) काव्य मे पल्पना। (२) रसोद्रा । (३) साहित्य का श्राधार । (४) कविता का विकास सिद्धान्त (Theory of Er olution) -- (५) काव्य में श्रनकार का स्थान । (६) कविता और उसका प्रभाव । (७) हमारे साहित्य का सौ दय्य । (८) नाटक की मनोवैज्ञानिकता । (६) वादत्रयी ( रहस्यवाद, छायाराद और मकेतवाद)। अधिकाश में, हिदी का यतमान साहित्य, पाश्चात्य विचारों का एक असगत रूपक मात्र है, हिंदी साहित्य के भिन्न भिन्न प्रमुख विषयों की विवेचना करते हुए "पिचार धैभव" में यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया है कि हमारी मातृ भाषा हिन्दी, स्वतन और मौलिक अथरची या सारे विश्व के सामने अनुपम श्रादर्श रसने में समय हो सकती है। पुस्तक में, सस्कृत और अगरेजी के कुछ प्रसिद्ध मयों से उद्धरण दिये गये हैं और "हृदय" के फाय्य की परिवर्तनशीलता तथा प्रकृति के भिन्न भिन्न रूपों के दशन से उत्पन्न होने वाली शानतत्व सम्बधी एवं मानसिक शक्ति कारचना क्रम सरल रेखा चित्रों द्वारा समझाया गया है। इसी विषय की प्रचालित पुस्तकों के देखते हुए मुझे नाशका है कि मेरी पुस्तक में बहुत बड़ी कमी और ध्रनेको श्रुटियाँ मिलेगी मुझे, अपने उन पाठकों से, जो मेरी श्रुटियों को खोजने में समर्थ हो, गविनय प्रार्थना करना है कि "मनुष्य से ही भूल होती है" ऐसा समझ कर, मेरी अल्पज्ञता और युटियों से मुझे सूचित करें जिसके लिये मैं उनका चिर श्रामारी रहूँगा । मुझे आशा है, कि इस पुस्तक पर साहित्य मर्मजों और का पालोचकों की सम्मति पाकर, यह चाहे जिस रूप में हो, मेरी आगामी पुस्तक "काव्य कौस्तुम" कारचना में मुझे पर्याप्त सहायता मिलेगी। श्रीजमाष्टमी स. १६६१ प्रभुनारायण शर्मा

INTRODUCTION
The word heart' 18 a Physiological
tcrm, means a fabric slice of mert; but
80 for as it concerns thc poctic-world it
an better bc expressed as the trensure
trove of cmotions, sentiments (HI) and
attitudes (310077 ) or it can be defined as
the seat of affection, love, courge,
vigour, eccrct inenning and design
How the enquiring activity of the
Intellectual ( fa ) or Thcoretical
(सैद्धान्तिक) part of the mind works when
the first imnge of
nature effects nnd
impresses it and hon far it then stirs up
the so defined heart to produce poetry
(Pirot)? How the expression of senti
ments in poetry (169) creates relish
( 7 ) and how this all important relish
( 7 ) tends to elevate the soul to the
stage of Parmapind ( TAITETT)? "Vichar
Vaibhava", the present book deals with
all these questions
I have chosen in this booklet to
present before the reader hory Aesthetic
(रागात्मक), Psychological (मनस्तात्विक)

and Philosophical ( दार्शनिक) theornes (सिद्धान्त ) centre in Poetry Poetry ( 97627 ) 18 not insignificant and negligible Lack of judgement regarding poetry usually leads to digaster "Vichar Vaibhara" touches nearly all the important points and throts light on all the various aspects of poetry The book consists of the following Chapters 1 काव्य में कल्पना 2 रसोद्रेक 3 साहित्य का आधार 4. कविता का विकास सिद्धान्त ( Theory of Evolution ) 5 काव्य में अलङ्कार का स्थान 6 कविता और उसका प्रभाव । हमारे साहित्य का सोंदर्य 8 नाटक की मनोवैज्ञानिकता 9 वादनयी (रहस्यवाद, छायावाद और सतवाद) Brost of the present day Hindi literature 19 nothing but a picture of western ideas "Vichar Vaibhava" dealing with its ( Hindi Literature's ) various

important topics right confirm the fiele
that our mother tongue Hinds 13 capable
of produang independent and original
Works of the lughest standard
Singkrit and English quotations from
standard authors have been given nnd
the changes in the working of heart and
the concoption of nervous and mental
Energ} produced at the sight of the
images of nature have been illustrted by
diagrains
lly book, I amn afmid, will seem to
many lacking in the condiments usually
expected in such books To those whom
at does I may appeal nnd hope that com
missions and oidmissions being the
frailties of hunnn nature will be inti
inated to me ns an obligation Tlus will
be a great encouragement and help in
the production of my next work haryn
Kaustubh"
Sna Janmashtami } P N SHARYA

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* श्रीहरित "नवर्ष भारत नाम भारतीयन सन्तति" 'देशका साहित्य पढाना होशिताफा अन्तिम लक्ष्य है। "हिन्दी माहित्य के प्रचार और प्रोत्साहन यो प्रायश्यकता फो हम भली प्रकार अनुभव करते है, हिन्दी साहित्य का निर्माण ही हमारे ममम्त प्रयत्ना पा लक्ष्य, हमारे जीवन का उद्देश्य और हमारा आध्यात्मिक ध्येय होना चाहिये" "llenre deeply sensible of the importance of encouraging the cultivation of vernacula language conceuse the forination of a crnacular Literature to be the ultimate object to shich all oure fforts must be directed" General Committee of Education, Calcutta, 1835

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काव्य में कल्पना
कल्पना हृदय का विस्तार और मस्तिष्क की
आँस है
सजा
नव-हदय की
रागास्मिका यत्ति
और अपनी मनोगत यात को
दृश्य
प्रति
मा दूसरे पर प्रकट करन की अन
वरत चेष्टा ही फाव्य और
पिंकी
कल्पना के मूलतत्त्व है। मनुष्य
पालRANAANANEI जिस बात को स्वय समझता
ल्पना है-उसे दूसरे को भी सभमाने के लिए स्वभावत
तस्व
उत्सुक रहता है । इस कार्य के सम्पादनार्थ वह ऐसे
यदि
साधनों का उपयोग करना चाहता है, जिससे अपर
व्यक्ति भी उसी रूप में उसे समझ ले-जैसे स्वयम्
उसने उसे समझ रक्सा है। बस, इसी साधन को
काव्य क्षेत्र में कल्पना कहते हैं।
* Cobridge's distinction between IMAGINA
TION and FANCI was in part the same as this
But he introduced value considerations also,
Imagination being such combination or fusion
of mental elements as resulted in certain valu
able states of mind, and Fancy being a mere
trinal playing with these elements

(
मनुष्य के मानसिक भावों में एक प्रकार की
अदृश्य तथा अविरल चेष्टा हाती है, जिसका सम्बन्ध
काल द्वारा प्रभावित मन से होता है । मनुष्य की
भावना का काम बहुत-से हृदयों में घुम कर, उन्हें
अपनेपन का अनुभव करा देना ही है। ससार में
चिरन्तन काल से, नाना प्रकारों से अनेक भाषाओं,
लिपिया और सक्ती द्वारा यही कार्य होता चला श्रा
है और न जाने क्य तक यह प्रयत्न चलता
रहेगा। मनुष्य का मस्तिष्क आज कल्पना के रूप
में कहीं भूधरो के हृदयपट पर, कहीं प्राचीन भग्ना
वशेषों के अङ्क में, कहीं भूगर्भ की अदृश्य तहों में
अपरिचित अक्षरी के रूप में एक हृदय को अनेक
इदया से मिला देने का काम कर रहा है। प्राचीन
पात्मानों का भाव कल्पना के सहारे सौंदर्यमय
होकर दूसरों के हृदय तक पहुँचने के लिए उक्त
स्थानों में आज भी कभी-कभी मिल ही जाता है।
यह मनोवृत्ति मनुष्य में अनादिकाल से है और
अनन्तकाल तक रहेगी। इसी का नाम कविता को
जन्म देनेवाले या भाव (विचार) है, और इस
भाव को सौन्दर्य प्रदान करनेवाली कला का नाम
कल्पना है।
काल और कल्पना का अभिन्न सम्बन्ध है। कवि-
हृदय काल का प्रतिविम्य है, और काव्य कवि-हृदय
का प्रतिविम्य । ऐसी दशा में कल्पना, जो कवि थे
गत भावों को सौंदर्यमय बनाकर प्रकट करने का
साधन है, अवश्य काल की गति पर निर्भर रहेगी।
+4

।
कवि या लेसक भावो को रुचिकर बनानेवाले
साधन को अति कोमल सूक्ष्म श्रीर प्रद्भुत रूप देकर
अपने विषय के प्रतिपादन के लिए उपयुक्त बनाता
है। किन्तु इसका यह अर्थ कभी नहीं होता कि इसमें
सत्य का कोई भी अश न हो । 'कल्पना' तो
सधी बात को याकवि द्वारा अनुभूत विपय को सुन्दर
ढग से व्यक्त करने का साधन-मान है । इसका अर्थ
झूठ और ऊटपटॉग हाँफना नहीं है। जिनरा यह
विश्वास है कि कल्पना जमीन और आसमान के
कुलाबे मिला देने का नाम है, मेरे विचार में वे अन्ध
कार में है। यदि कल्पना का अर्थझूठी लनतरानी है,
तो हमारे नजदीक कवि का भा कोई महत्त्व नहीं।
कवि श्रीर कल्पना, दोनों शब्द एकही भाव को
वहन करते हैं। समाज में कवि और कलाकार की
बड़ी भारी जिम्मेदारी है। यदि इतने बडे उत्तरदायित्व
कोवहन करनेवालाव्यक्ति इस प्रकार जमीन आसमान
फे निराधार फुलाये मिलाने पर सन्नद्ध हो जाय, तो
हमारे विचार में वह देश, वह जाति और वह साहित्य
जिसका पथ प्रदर्शक वह कवि है, अवश्य अवनति
के गर्त में पहुंचे बिना नहीं रह सकते।
कविफरपना की जीसे वर्ण्य विषय की पिटारीको
सोलकर ससार के ममक्ष आदर्श स्थापित करने
का दायित्वपूर्ण भार लेता है । यथा भक्तवर तुलसी
ने 'समाज-शास्त्र विषय को कल्पना के पारदर्शी
यत्र के पीछे रस कर लोकनीति और समाज
विज्ञान के आलम्बन भगवान् मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम

केजीवन के बहाने-प्राकृत रूप में सड़ा कर दिया है।
ससार पीअभिरुचि श्राज तुलसी की कल्पना के धागे
में लिपटो हुई अखिल विश्व को अपनी अपनी रुचि
के अनुसार जो दर्शन दे रही है यह कल्पना का ही
काम है।
फल्पना यह साधन है, जिसके द्वारा कवि साधारण
से साधारण रिपय में देवी और अलौकिक सौंदर्य
का दर्शन करा सकता है, तुच्छ-से-तुच्छ विषय को
लोकापकारी यना दे सक्ता है और इसी में कवि
की महत्ता भी है। यदि यह ऐसा नहीं कर सकता
तो ससार नेता के नाते उसे 'कवि' शब्द से अलकृत
फरना महा पाप है।
कल्पना मस्तिष्क की और है। हृदयोद्धत भाव
को कवि जर तक कल्पना को आँस से नहीं देसता,
वह उसकी सूक्ष्मता तक नहीं पहुँचता । यहाँ पर कल्प
ना को मस्तिष्क की आस पतलामे से हमारा दुसरा
तात्पर्य यह भी है कि मस्तिष्क शरीर का सर्वश्रेष्ठ
स्थान है और इसी में ज्ञान-कोषगदर भी है, जिसे
चैतन्प-कोप भी कहा जा सकता है। ऐसी दशा में
यह सिद्ध हो जाता है कि कल्पना चैतन्यकोष की
अभिरुचि है, और काव्य का प्राण यस, चैतन्य कोप
का अधिष्ठाता है-अर्थान् कल्पना भी उसको एक
देशस्थचिर-सगिनी होने के नाते काव्य को अन्तरात्मा
बन जाती है। वह यहाँ तक बढ़ जाती है कि कल्पना
शून्य साहित्य या काव्य, काव्य ही नहीं कहा जा
-
सक्ता।

यदि कल्पना का अर्थ अनोसी सूम' से लिया जाय,
तो उसका सम्बन्ध फेवल अद्भुत रस से ही रह जाता
है। शेप आठ रसों में उसका कोई समावेश नहीं हो
पाता । तो कान्य में फेवल अद्धत रस ही रहना
चाहिए, यही अर्थ हुआ न? लेकिन ऐसा कदापि
नहीं है । कल्पना का सथा अर्थ है 'सौंदर्य' जो कि
काव्य का मूलतत्त्व और हृदय का प्रधान गुण है।
'सौंदर्य काव्य फेनवो रसों में व्याप्त रूप से दिखाई
पडता है। 'सौंदर्य' शब्द का काव्य में वह अर्थ
व्यसहन नहीं होता, जो साधारणत लिया जाता है
कारण, उस अर्थ की रौद्ररस, भयानकरस तथा
वीभत्सरस में प्रति व्याप्ति हो जायगी। काव्य में तो
इस शब्द का अर्थ किसी भी विषय या वस्तु की
उन्नततम अवस्था से लिया जाता है-अर्थात् काव्य
में जो भी विपय वर्णित हो, वह अपने पूर्ण उत्कर्ष
और उन्नत रूप में होना चाहिए, तभी उसका सौं-
दर्य है । इस दृष्टि से 'सौंदर्य' की समालोचना हो
चुकने पर जब हम आगे दृष्टि फेंकते हैं तो नवो रस
"सौंदर्य प्राण" दिसायी पडते हैं। काव्य में 'रस' ही
उस अवस्था का नाम होता है, जिसमें पहुँच कर यह
विषय 'सौंदर्य प्राण' होकर पाठक की आत्मा को
सौंदर्याभास देता है, और उस विषय के लिए पाठक
के हृदय में स्थायी स्थान बना देता है। कल्पना का
महत्व भी इसी में है कि वह विपय को चिरस्थायी
रूप दे सके। यही कारण है कि कल्पना प्रसूत बात
सदा नवीन और स्थायी रहती है। विज्ञान प्रसूत बात

को तथ्य मममने पर भी, एक यार जान चुक्ने परमी
हम पुरानी समझने लगते हैं। यथा "अग्नि उपण है"
यह जान लेन पर उत्सुकता मन्द हो जाती है, किन्तु
फरपना के मधुर पराग से परिवष्टित विपय में सदा
सोंदर्य घना रहता है । इसीमे वह सदा रहस्यमय प्रतीत
होती है । तुलसी का मानस आज तक वैसा ही चि
कर हे श्रीर अनन्तकाल तक ऐसा ही रहस्यमय सोंदर्य
उसमें विद्यमान रहेगा । बस, यही विज्ञान और
पपनाप्रसूत विषयों में अन्तर है। यही कारण है कि
कल्पनौजन्य साहित्य का विषय चिरन्तनकाल पर्यन्त
मनुष्य पे सामने समुज्जल तथा नवीन रूप में बना
रहता है और इसी लिए कल्पना का काव्य में इतना
ऊँचा स्थान है। कहन का अर्थ यह है कि कल्पना हीन
काव्य स्थायी और रुचिकर नही हो सकता।
कवित्तत्व थड़ी ही फोमलतर यस्तु है। इसकी कोई
सीमा नहीं हो सकता। अनादिकाल से बड़े-बड़े
काव्यमर्मज्ञ इसी योजफे पीछे मर मिटे और अनन्त
काल सक न-जाने कितने मिटते रहेंगे। किन्तु इसका
अमर रहस्य कदाचित ही उद्घाटित हो । इस कठि
नाई का सबसे बड़ा कारण यह है कि यह मानव
हत्य की वह वृत्ति है, जो काल और कर्म के सयोग
सेचैतन्यशक्ति द्वारा उपस्थित होकर क्षण भर में क्या
से क्या हो जाती है। यदि जीवन, प्रेम तथा ईश्वर
की व्यापकता का रहस्य जाना जासकता है, तो इसका
भी, अन्यथा असम्भव है। जिस प्रकार प्रात कालीन
स्निग्ध उपा-लालिमा को विलीन होते देस यह अनु

।
सन्मान करना कठिन ही नहीं, असम्भव हो जाता
है कि यह लालिमा कालिमा में विलीन हुई अथवा
प्रकाश-पट में, उसी प्रकार हृदय प्रदेश में कवित्व
कहाँ में प्रकट होता है धीर किस प्रकार क्या रूप
धारण कर लेता है, इसका पता लगाना भी कठिन ही
नहीं, असम्भव है। इसीलिए कवि इस अति सूक्ष्म
व्यापार प्रसूत कवित्व को करपना फ अणुवीक्षण-यन
द्वारा मसार के समक्ष बृहद्रप में उपस्थित करता है।
कल्पना का काव्य में कवित्व के जनक हृदय से कम
महत्त्व नहीं है । कवि अमरत्व का अलौलिक आनन्द
दिसलाने के लिए प्रात्मा के कपाटों को कल्पना की
फुजी मे खोलता है । कवि शेप सृष्टि से हमारा
अभेद सम्बन्ध स्थापित करता है । कवि हमारे लिए
पडे-यडे रहस्य कल्पना के आधार पर सरल करके
ममझा देता है।
दृश्यमान जगत् का प्रतिविय चक्षुरिन्द्रिय के सन्नि
फर्प से सभी के हृदय पर पड़ता है, भाव भी सभी
फे हृदय में उद्भूत होते है, किन्तु कवि का स्वरूप
कल्पना-कौशल में, जो पवि का अपना होता है,
सुरक्षित रहता है। अनुभूत विपय-जन्य भावो को
अपनाकर उन्हें ससार का बना देने का नाम ही
साहित्य या काव्य अथवा कवित्तत्व है।
इसी कार्य का सम्पादन करनेवाली सुललित कला
का नाम कल्पना है। जैसे शरीर प्राणों का एक
मान आधार है, वैसे ही कवित्तत्व का अन्तिम आधार
कल्पना है। कल्पना का दूसरा अर्थ करना काव्य,

को तथ्य समझने पर भी, एक यार जान चुकने पर भी
हम पुरानी समझने लगते हैं। यथा "अग्नि उपण है"
यह जान लेने पर उत्सुकता मन्द हो जाती है, किन्तु
कल्पना
के मधुर पराग मे परिपेष्टित विषय में सदा
मौदर्य बना रहता है। इसीमे वह सदा रहस्यमय प्रतीत
होती है। तुलमी का मानस अाज तर वैसा ही रुचि
पर है और अनन्तकाल तर प्रेमा ही रहस्यमय सौंदर्य
उममें विद्यमान रहेगा । बस, यही विज्ञान और
कल्पनाप्रसत विषया में श्रन्तर है। यही कारण है कि
फ्ल्पनोजन्य साहित्य का विपय चिरन्तनमाल पर्यन्त
मनुष्य के सामने समुज्ज्वल तथा नवीन रूप में बना
रहता है और इसी लिए फरपना का कान्य में इतना
उँचा स्थान है। कहने का अर्थ यह है कि कल्पना-हीन
काव्य स्थायी और रुचिफर नहीं हो सकता।
कवित्तत्व पड़ी ही कोमलतर वस्तु है। इसकी कोई
सीमा नहीं हो सकती। अनादिकाल से बडे-बड़े
काव्यमर्मज्ञ इसी योन के पीछे मर मिटे और अनन्त
काल तक न-जाने कितने मिटते रहेंगे। किन्तु इसका
अमर रहस्य कदाचित् ही उद्घाटित हो। इस कठि-
नाई का सबसे बड़ा कारण यह है कि यह मानव
हृदय फी वह वृत्ति है, जो काल और कर्म के सयोग
सेचैतन्यशक्ति द्वाग उपस्थित होकर क्षण-भर में क्या
से क्या हो जाती है। यदि जीवन, प्रेम तथा ईश्वर
की व्यापकता का रहस्य जाना जासकता है, तो इसका
भी, अन्यथा असम्भर है । जिस प्रकार प्रीत कालीन
स्निग्ध उपा-लालिमा को विलीन होते देस यह अनु

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क्ला के महत्व को क्षीण करने के सिवा और कुछ
नहीं । कवि कल्पना में ही जीवित रहता है कवित्व
और विषय में नहीं। कारण, कवित्व और विषय पर
तो मसार का एकाधिपत्य होता है, किन्तु कल्पना
ही पक वह वस्तु है, जिसके द्वारा कवि का स्वरूप
अक्षण्ण रहता है। दूसरे शब्दों म कहा जा सकता
है कि कल्पना के आदर्श में कवि का शुद्ध स्वरूप
कवित्व पट पर सदा सर्वदा मुस्थिर रहकर अनन्त
काल तक संसार के सामने समुज्ज्वल रूप में समु-
पस्थित रह सकता है । अतएर कल्पना काव्य में
सजीवनी शक्ति भर देने के कारण अत्यन्त आवश्यक
पस्तु सिद्ध होती है। यदि कल्पना न हो, तो कवित्व की
क्षीण ज्योति कवि हृदयाकाश पे अलक्ष्य क्षितिज
प्रदेश में चमककर ही मन्द पड़ जाय तथा साहित्य
निर्माण के भाव विनिमय वाले सिद्धान्त को पूरा
करने में समर्थ न हो सके। कल्पना ही वह साधन
है जिसके द्वारा कवि अपने हृदय को यात को शक्ति-
संपन बना कर, दूसरे के हदय में प्रवेश कराकर
उसके हृदय को वशीभूत करता है। यही कारण है
कि कवि सृष्टिकर्ता, पथप्रदर्शक आदि उपाधियों मे
विभूपित रहता है, अन्यथा यह इनमें से एक भी
उपाधि के योग्य नहीं । काव्य सत्य, शिव और
सुन्दर तीनों गुण कल्पनाप्रसूत ही हैं। अत यह
निर्विवाद है कि यदि कवित्त व कवि का स्वभाव है, तो
कल्पना कवित्व का स्वभाव है। दूसरे के बिना पहले
का कोई रूप ही नहीं बन सकता। इसलिए अवश्य

ही कल्पना कवित्व के लिए स्वाभाविक पोपण पदार्थ
फे तुल्य कोई सत्य देश से ध्वनित होकर ससार को
रागमय बना देनेवाली अदृश्य किन्तु अनुभवज्ञा
तव्य वस्तु है।
रसोद्रेक
रसो चै मा-उपनिपद्
दय और सस्कार - समष्टि में
कोई पार्थक्य नहीं। वास्तव
में दोनों वस्तुएँ एक ही है।
हृदय का स्वतत्र अस्तित्व
कुछ नहीं है । मानव निर्माण
कला विशारद परमात्मा ने
हृदय को एक ऐसी वस्तु बनाया है जिसका वैचित्र्य,
अनेकों मनोवैज्ञानिकों द्वारा अनेकों प्रकार से समीक्षा
करने पर भी समझ में नहीं आया।
काव्य-कला का इसी हृदयेन्द्रि' से सम्बन्ध है।
ससार की जितनी भी ललित कलाएँ हैं उनकी अपेक्षा,
काव्य-कला का सम्बन्ध हृदय से कहीं अधिक है।
हृदयेन्द्रि यहाँ चित्त, मन या भावना कोष का पर्यायवाची
है। इद्रिय विशेष का नहीं।

हृदय भावमय कोष है, जबकि मस्तिष्क विवेक- मय । हृदय सोंदर्योपामक है और मस्तिष्क तथ्या तथ्य का निर्णायक | हृदय काव्य-मय है एव मस्तिष्क विज्ञानमय । अस्तु हृदय में मुग्ध होने की स्वभाव सिद्ध शक्ति मस्तिष्क की अपेक्षा कैई गुणा अधिक है। वेसे तो ज्ञानकोष के बिना अानन्दकोष का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता है, परन्तु काव्य क्षेत्र में हदय का आसन ज्ञानकोप मे बहुत ऊँचा उठ जाता है । हृदय की वासना सामने मस्तिष्क के विवेक तन्तुओं को लड़सडा कर ही रह जाना पड़ता है। हमने हृदय को सस्कार समष्टि बतलाया है । हृदय के निर्माण निकास के सम्बन्ध में दो मत हो सकते है-(१) उसका निर्माण गर्भ में ही हो जाता है। (0) गर्भ में केवल उसका ढाँचा मात्र धनकर तैयार होता है, एव उसका विकास फिर जैसी जैसी परिस्थितिया में वह पड़ता है.घेसे ही वेसे संस्का रानुकूल होता रहता है। प्रथम मत के अनुसार हृदय का निर्माण एक ही धार हो चुकना सिद्ध होता है। और दूसरे मत के अनुसार हृदय का विकाम क्रम जीवन की सध्या होने तक घराबर चलता रहना बत लाता है। हमारे विचार से हृदय का निर्माण इन दोनों मतों का समिश्रण है। हृदय का गर्भ निर्मित स्वरूप और परिस्थितिगत विकास भाव वास्तव में पृथक्-पृथक नहीं है । अस्तु, दोनो ही मतो के अनुसार हृदय की सस्कारमयता पुष्ट होती है। हृदय पट पर सस्कारों का अस्फुट जाल-जो शरीर- निर्माण के साथ ही बन चुकता है -वाह-जगन के नत्रेन्द्रिय द्वारा पडे हुए प्रतिविम्ब के ससर्ग से उसी प्रकार विकास पान लगता है जैसे (sult swash ) मसाले के ससर्ग से प्लेट पर लिया हुआ चित्र । (जब तक यह प्लेट धुल नहीं जाता चित्र का सस्कार मान इसके गर्भ में निहित रहता है, चित्र का सुट आकार पीछे ही नज़र पडता है)। काव्यशास्त्र के प्राचायों ने मानव स्वभाव का पूर्ण पर्यालोचना करके उसकी गति विधि की समीक्षा करते हुए विश्लेषणात्मक दृष्टि से उसके नर भेद कर दिये हैं। मनुष्य का हृदय नव प्रकारेण विकास पाता है। भावना-चैचित्र्य से मनोवृत्ति के जितने भेद हो सकते हैं उन सबका समावेश इन नव भेदो में हो जाता है चित्तवृत्ति का दूसरा नाम है भाव । निविकार हृदय की प्रथम विक्रिया को भाव कहते हैं-निर्विका रात्मके चित्ते भाव * प्रथमविक्रिया" परन्तु यहाँ प्रश्न उठता है कि हृदय तो कभी निर्विकार रहता ही नहीं । सत्य है, किन्तु प्रत्येक क्षण में होनेवाला हृदय विकार अपने भविष्यत् में आनेवाले विचार- विकार के लिये सदैव निर्विकार रहता है -- * निर्विकार जो चित्त में उपजन प्रथम वेवार । मालम्बन उद्दीपले भाव ताहि निधार ॥

( १२ ) भाव या चित्तवृत्ति का विकास किसी आश्रय विशेष को पाकर ही हो सकता है। यह आश्रय पालम्बन यो उद्दीपन अथवा दोना ही स्पा में दृश्य विषयका स्मृति विपयक अथवा वृत्त विपयक बनकर सस्कारमय हृदय कोष पर चक्षुरेन्द्रिय या कर्णेन्द्रिय के सन्नि फर्प मे जन अपना प्रभाव डालता है तब हृदय में विकार उत्पन्न होता है। और इस प्रकार जो भाव- नाएँ हृदय में सस्कार रूप से सन्निविष्ट रहती हैं परिस्थिति की रश्मि मे पिघल पिघल कर रस का रूप धारण कर लेती है। प्रत्येक ही भान रस रूप में परिणित हो जाय सो भी वात नहीं है। नाटयशास्त्र के प्रणेता और रस विज्ञान के पारगत भरत मुनि ने प्रत्येक भाव को रस दशा में पहुँचने के लिये चिचवृत्ति के प्रम विकास + का परिस्थिति के अनुकूल रहना अथवा परिस्थिति का क्रम विकास के अनुकूल रहना आवश्यक माना है। यहॉ अनुकूल श द का आशय है सस्कारानुकूल विभावों द्वारा भावोत्पत्ति होकर अनुभाव एव सचारी भावों की सहायता से चित्तवृत्ति को स्थायी करने के उचित साधन का उपस्थित होना ही सस्कारा नुकूल शब्द की व्याख्या है। हृदय का स्वभाव, दृश्य, स्मृति एव वृत्तिा किसीभी प्रकार का पालम्बर पाकर विकृत हो जाना है। परन्तु जबतक यह आलम्बन इदयास्थित सस्कारो T'विमावानुभाव व्यतिचारि सयोगाद्रम निष्पत्ति -भरतमुनि वृचमूलक मालम्बन शम ही हो सकता है। + फे अनुकूल न होंगे भाव अपना सणिक हास दिया- फर विलीन हो जायगा। और यही हाल संचारी (व्य- भिचारी) भावों का भी होगा।ये मी सम्कार के प्रति कुल अपना कार्य करने में सर्वथा असमर्थ ठहरेंगे ऐमी अवस्था में रस दशा बहुत दूर जा पड़ती है। घहुधा देसा जाता है कि एक ही दृश्य पालम्पन स्वरूप में दो व्यक्तियों के माममे आता है और दोनों के हृदय में भिन्न भिन्न प्रकार की भावनाएँ उठती है। इसका फारण उम दृश्य विशेष को सस्कारानुफूलता है। क्योंकि जिस भायना का वह आलम्पन हो सकता है उस भावना के अनुकूल संस्कार जिस हदय में अधिक प्रथल होंगे उस इदय में इसे देसकर जो भावना मादुर्भूत होगी यह उस दूसरे इदय में कभी नहीं हो सकती जिसमें इस (उपस्थित) पालम्पन मे सम्यन्ध रसनेवाले 'रस' के अधुरों का संस्कार नहीं है। क्योकि हदय पट पर धन हुए सस्कार-जाल पर दृश्य प्रतिबिम्ब-ज्योति अपने अनुयूल संस्कार फोहो जागरित करती है। दूसरे संस्कार फभी उसके ससर्ग से उत्तेजित नहीं हो पाते। अस्तु, नय चित्तवृत्तियों ही अनुकूल समय स्थिति पाकर रस (relish) रूप धारण कर लेती हैं। इन्हीं चित्तवृत्तियों के सुविकसित स्वरूप 'नर रस' पाह- लाते हैं। यहाँ तक के विवेचन से पता चल चुक्ता है कि 'रस' इदय का सस्कारमयता का मोहताज है। और "भाव विभावो का। विभाव के काव्याचार्यों ने बालबन Rani , और सद्दीपन नाम मे दो भेद कर दिये है। यहां दोनों विमाव पास्तव में रस के कारण हैं। हम पहिले यत्तला पुके हैं कि हृदय की प्रथम विक्रिया, जिसे भाव कहते है, दृश्य विपयफ,स्मृति विषयक या वृत्त विपयर या विश्व के तीन प्रकारी में से किसी एक या एक से अधिक पर अयलयित है। और इन्ही प्रकारों को काव्याचार्यों ने विभाव नाम से सूचित किया ।श्रत पिप रूप में कह सकते हैं कि भावोत्पत्ति के कारण को ही विभाव कहते हैं। विषय से वृत्ति का संसर्ग होकर विपयाकार- यत्ति जहाँ हो, वहाँ प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। अथवा विषय चेतन या पृत्ति चेतन से अभेद होना ही प्रत्यत् ज्ञान है। यह अभेद जिन परिस्थितियों में होता है वे दो प्रकार की होती है- -एक तो वे जिन फे बिना विभाव उत्पन्न होते ही नहीं। जैसे नायिका नायक प्रेम का आधार है। रिना नायिका नायक फे हृदय में प्रेम-भाव उठ ही नहीं सकता। और दूसरी वे जो प्रथम प्रकार की परिस्थितियों द्वारा उत्पन किये गये भावों को उत्तेजना देने का कार्य करें। जैसे-प्रेमिका का चित्र, एकान्तस्थान में प्रेमालाप की स्मृति, अथवा प्रेमिका की कोई प्रिय वस्तु इत्यादि। इन दोनों प्रकार की परिस्थितियों का मिलित नाम 'विभाव'। प्रथम प्रकार की परिस्थिति को 'पाल म्बन और दूसरे प्रकार की परिस्थिति को उद्दीपन कहते है क्योकि प्रथम में भाव को आधार मिलवा है एय दूसरा उसे उद्दीप्त करके और भी प्रपल कर देती है।

-
दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जो विशेषरूप मे
रस को भावित करे वह विभाव कहलाते हैं-"विशे
पेण भावयन्त्युत्पादयन्ति ये रसास्ते विभावा"
* कविता हृदय की महीन मनकार है। इसी
कारण इसका सम्बन्ध चित्तवृत्तियो और भावो से
अधिक है। तर्क फे फर्कश सिद्धान्तो से इस कथन
का कोई सम्बन्ध नहीं । रस हृदय का कौन सी सुकु
मार और परिवर्तनशील क्रिया का फल है-यही
य हमारे लेख का प्रतिपाद्य विषय है।
ही
यहाँ पर एक प्रश्न होता है कि जब हृदय सस्कार
समष्टि है तब सभी में सरकार काव्यमय हो ऐसा
क्योंकर हो सकता है ? सच है परन्तु, काव्य की
रसमयता तो हृदय की प्रतिकृति है। हृदय तो एक
ऐसी वस्तु है जिसके बिना मनुष्यत्व का कोई अस्तित्व
ही नहीं रह जाता। बल्कि र व्यक्तियों को बहुधा
कह दिया जाता है-बडा हृदय हीन व्यक्ति है।
यद्यपि उस क र व्यक्ति के पास भी हृदय अवश्य
परन्तु हृदय का सथा गुण-~आर्द्रत्व जयतक
उसके हृदय में न हो उसके हृदय का कोई मूल्य
नहीं। अस्तु, वाघजगत् का अन्तर्विश्व से सम्ब
न्ध होने पर जो मूक किन्तु मधुर प्रतिध्वनि होती है
वही रस का अनुभवगम्य स्वरूप है । अस्तु, हृदय के
है
* कविता का अथ पद्यातकरसना ही नहीं है। बल्कि विना एक
वह गुण है जो गद्य-पद्य सभी प्रकार की रचनाओं में रह सकता
है। यहाँ कविता का अर्थ है याव्यमयता भथवा आन्दमया।

"
गुण आर्द्रत्व मे सयुक्त हृदय का और काव्यमयता
का अभिन्न सम्बन्ध स्वभासिद्ध हो जाता है।
प्रकृत में रस के कारण भाव हो है। और भाव
मन फ विकार है। जैसा कि अमरकोपकार ने कहा
है--विकारो मानसो भाव" यही भाव इदय से
; पाणी का सहारा पाकर या दृश्य काव्य में नद का
श्राश्रय पाकर अंग-रचना और अन्तरानुमिति प्रचे-
टन विधि द्वारा काव्याथों की भावना कराते है-
"वागगसत्योपेतान् कान्यार्थान भावयन्तीति भावा
भाव का जीवन बहुत ही थोड़ा होता है। इसी
लिये विभाव, अनुभाव और सचारी भावों की सहा-
यता उसे रस दशा तक पहुँचा देने के लिये अनि
वार्य होती है। इस प्रकार भाव जय सस्काराउकूल
परिस्थितियों को पाकर समृद्ध और परिपुष्ट हो जाता
है, तय यह स्थास्तु मनोविकार अथवा स्थायी भाव
कहलाता है।
यह स्थायीभाव दृढ सस्कार या घासना के रूप
में हृदय में दरे पड़े रहते है और जप कभी अनुकूल
अवसर पाते हैं उखड़ पड़ते हैं। परन्तु इनफे संस्कार
दृढ होते है इसीलिये यह शीघ नष्ट न होकर रस
अवस्था पयत उपस्थित रह जाते हैं। इनकी सख्या
भीनय रसों के अनुसार अलग अलग रस का एक एक
स्थायी भाव होने के कारण नव ही है। किन्तु भाव
को स्थायीभाव की दशा तक पहुँचाने के लिये यथेष्ट
उद्बोधक मिलते रहने की परमावश्यकता होती है।
नाटक या दृश्य काव्य में, आगिक (कायिक) घाचिक,

श्राहार्य और सात्विक चतुर्विध अभिनय प्रधानत उद्योधक का काम करते हैं। इसीलिये प्राय दृश्य काव्य में बहुत शीधू और सहज में ही रसोद्रेक हो जाता है। दृश्य काव्य में भाव का आलम्बन नट, जिसको देखकर हमारे मन में भावना का संचार होता है, उक्त चतुर्विध अनुभावा द्वारा अपने हृद्गत भाव को हमारे हृदयस्थित भाव से टकरा कर जाग- रित कर देता है । परन्तु अन्य काव्यो में यही कार्य शब्द-शक्तिमान करती है। यही कारण है कि नाटक में अन्य काव्या की अपेक्षा रस-सचार शीघू और स्थास्तु होता है। भरत मुनि ने स्थायी भाव की प्रधानता का उप- पादन करते हुए बनलाया है- "यथा नराणा नृपति शिष्याणां च यथा गुरु । एवहि सर्व भावाना भाव स्थायी महानिह ।।" अर्थात् मे मनु'या में राजा और शिष्यों में गुरु है वैसे ही सब भावो में स्थायी भाव प्रधान होता है। और यही मत लगभग प्रदीपकार का भी है- "विरुद्धा प्रविरद्धवार्य तिरोधातुमक्षमा । आनन्दाकुर कन्दोमी भाव स्थायि पदास्पदम् ॥" अर्थात् जिस भाव को विरुद्ध अथवा अविरुद्ध भाव तिरोधान न कर मो अर्थात् जो दूसरे भावों में निर्मग्न और तिरोहित न हो सके वही आनन्दाकुर उद्भूत करनेवाला भाव स्थायी भाव होता है। न्य का धर्म द्रनित हो उठना ही है।

आलम्बन-उद्दीपन विमाया के कारण चित्तवृत्ति में
विकार उत्पन्न हो जाता है तब हदय अपनी स्वाभा-
रिक प्रवस्था को छोडपर एक विशेष दशा में हो
जाता है। यहीं पर हृदय को पासना फी तीनता का
पता चलता है।
इस दशा पर पहुंचने पर मूक्ष्म जगत् का व्यापार
स्थूल शरीर पर प्रकट हो जाता है। और इस प्रकार
उबुद्ध चित्तवृत्ति का अनुभव प्रत्यक्ष रूप में होने
लग जाता है। श्रस्तु, सूक्ष्मशरीर को स्थूलशरीर से
मिला देनवाली, अथया मनोभावनाओं को चेक्षा
निरोप द्वारा प्रफट कर देनेवाली विशिष्ट क्रिया का
नाम अनुभाव है। अथवा या समझ लीजिये फि
भावनात्रा को अनुमावित करानेवाले, उनके कार्य
स्वरूप महावलोकन, भ्रूविक्षेप आदि विभिन्न रसों
में अपने अपन स्वभार के अनुकूल नायक नायिका
के व्यापार काल्य और नाटक में अनुभाष नाम से
प्रसिद्ध होते है।
अनुभाव क्रिया फेस्वभाव विश्लेषणात्मक चार भेद
होते हैं- विक्षेप, स्नेहावलोकनादि फायिक,
प्रमोद, शोक, दैन्य, उत्साहादि मानसिफ, एवं
चेपभूपा सम्वन्धी रचना आहार्य। अप रह जाता
है सात्विक।
हदय का सस्कार जम भाव की परिपकता
का रूप धारण कर लेता है तब उसका प्रत्यक्षीकरण
सात्विक अनुभाव द्वारा होता है। सात्विक मनुभाव
इसका प्रत्यक्षीकरण आठ प्रकार से कराता है-

(१६) स्तम्भः, कम्प, स्वरभद्ग, स्वेद, रोमाच, वेपथु, धैवर्य, अनु, और प्रलयो । यह भाव सत्व से निष्पन्न होने के कारण ही सात्विक कहलाते हैं। हृदय की एकान्त घामना जय अपना विपय पाकर भटक उठनी है तो उसे कई आपत्तियों का मामना करना पड़ता है। येनकेन उपायेन हदय अपनी वासना फी एप्ति चाहता है। इसी विषय की प्राप्ति का अविरल प्रयन जो हदय को करना पड़ता है, पान्य में सचारी भाव कहलाता है। क्योंकि हदयो को इस अवस्था में कई प्रकारमे मचरण करतापता है। ऐसे अवसर पर विभिन्न रसों के अनुकूल, चित वृत्ति को विभिन्न प्रकार से विकृत हो जाना पड़ता है। और ये प्रकार मंचारीभाय फे कहलाते हैं। सवारी शब्द की व्युत्पत्ति है-मचरतीति सचारी' अर्थात् साथ चलनेवाला भान मचायभाव होता है। और उसके ३३ प्रकार होते है-निर्वेद, आवेग, देन्य, मद, श्रम. जडता, उप्रता, मोह, विवोध, स्वत, अपस्मार, गर्व, मरण, आलस्य, श्रमर्प, निद्रा, अव- हित्या, औत्सुक्य, उन्माद, शहा, स्मृत्ति, मति, व्याधि, * मद्रों की निष्क्रियता यो स्तम्भ कहते है। और +निरचनना को प्रलय। 'यहाँ हदय वा भाव है चित्तपत्ति। xभयभी मंचारी भाव 'निवेदप्रादि स्थायी भाव वे महायक रूप नहीं, स्वमत्र रूप से प्रभााहोपर आते है । तब इनकी प्रधानता भावरूप से होने के कारण 'मावभारी' कहलाती है।

घास, लग्ना, हर्प, असुया. विपाद, धृषि, चपलता, लानि, चिन्ता और पितर्क। हदय का मसार समष्टि और परिस्थितियों का पूक्ष्म चिरलेपण ही इम उपयुत मरया फाजना है। निस प्रकार सागाव शानिमा स्वर-लहरी के प्रक- म्पन का श्रुनि और मूर्खन गत भेद क्यिा है येमे हो हदय की भाव दशा से रसावस्या पर्यन्त जो गति निधि रहती है उसमा दाव्य-शास्त्रियों ने मूक्ष्म समी क्षण करणे सचारी-मरया नियत की है। यहा तक विभावयुग्म, अनुमाय, सचारी और स्थायी भावों का विवेचन हो चुका है। परन्तु यह याद रहे इन छ प्रकार के भावों का पृथक-पृथक दशा में फोई मूल्य नहीं रह जाता है। रस, जिसके आस्वादन से हमें परमानन्द प्राप्त होता है वह यह सय नहा-यह है पूर्वोक्त सस्कार जन्य चित्तवृत्ति का विकास । और इसी विकास की विभिन्न परिस्थितियों का मीमाविभाजक है भाव । अस्तु, भाव, विभाव, अनुभाव,स्थायी भाव प्रारमचारी भार से पुष्ट हुई जो श्रलक्ष्य किन्तु अनुभव सिद्ध वस्तु है, वही 'रस' है। परन्तु इन सन का द्भय समिश्रण और प्रत्यक्षीकरण कब और किस प्रकार हो जाता है इसकी प्रमिक चपलता का कोई पता नहींचलता कि-रस-जो इस प्रक्रिया का फल है, हृदय में लहरें मारने लगता है। रस नव होते है-शृगार, वीर, करुणा, श्रद्मुत, हास्य, भयानक, वीभत्स, रौद्र और शान्त । * आलम्बा और उद्दीपन ।

( २१ )
अब प्रश्न उठता है कि काव्याचार्यों ने काव्य में
इस व्यञ्जना' से क्या तात्पर्य लिया है। कविता या
काव्य जिसे हम कहते हैं वह हदय का धर्म और
मन का एकान्त किन्तु सरस व्यापार हृदय कोप के
अलक्ष्यस्थल में सस्कार रूप- जो चित्तवृत्तियों समृत
होती हैं, वे ही बाह्य जगत् और अन्तर्जगत् के अन्तर
द्व द्व के फलस्वरूप कपि द्वारा भापा, शैली, अलकार
और कल्पना के सहारे हृदय की प्रतिकृति के रूप में
पाठको के समक्ष श्रव्य काव्य के रूप में और द्रष्टाओ
के समक्ष दृश्य काव्य के रूप में उपस्थित होती हैं।
अब विचारणीय यह है कि रस फयि के हृदय के
आश्रित होता है या पाठक और द्रष्टा के हृदय में ?
दृश्य-काव्य में कवि का व्यापार-अधिकतर नहीं
तो कतिपय अशा में ही-नट करता है। नट के द्वारा
ही कवि के भाव उसके अभिनय-पटुत्व के सहारे
द्रष्टाश्री पर विदित होने हैं। तब यह एक और भी
अडचन पेदा हो जाती है कि क्या रस नट के हृदय
का भी विपय बनता है ?
क्योकि अदृश्य-काव्य (श्रव्य काव्य ) में तो रस
का प्राधार रूप कवि हृदय काव्य अन्य के रूप में
उपस्थित होता है । परन्तु दृश्य काव्य में तो कवि
का चैतन्य हृदय नट फे चेतन्य हृदय से टकर सा
कर कविता का हृदय में हृदय मिला देने का जो
कार्य है उसे सम्पादन करने
एक कुशल नट कवि के भावो को अपने हृदय
की विशेपता से द्रष्टायो पर इस प्रकार प्रकट करता
लगता
।

(२२)
है कि रगभूमि स्तब्ध, रोमाचित और करुण प्लावित
हो जाती है। ऐसा क्यो ? अदृश्य काव्य का प्रभाव
इतना क्यों नहीं पड़ता दृश्य काव्य का प्रभाव
मूर्ख पर भी वेसा हो क्यों पड़ता है जैमा एक
पडित पर ? यह साम्य भावना को लहर रङ्गमञ्च में
कहाँ से उमड पड़ती है ? आदि प्रश्नों का उत्तर
'नट में रस नहीं रहता' इस कथन के आधार पर
देते हैं तब तो श्रव्य-काव्य के क्षेत्र में कवि को भी
इसी नट कोटि में श्रा जाना पड़ेगा। और यदि
हदय की रागात्मिका-वृत्ति को शक्ति का अनुभव
फरके विचार करते हैं तो नट में भी रस मानना
पडेगा।
भाव ( Emotions or Sentiments) जय 'रस'
रूप में आते हैं तब उनका अनुभव कायिक मान
मिक, आहार्य और सात्विक अनुभावों द्वारा ही तो
होता है। अव जरा सोचें, किसी कवि फा इदय
समझे बिना भला आप उसके भाव को अनुभावों
द्वारा जीवित रूप में व्यक्त कर सकते हैं ? असभव है
गेमा करना। अच्छा, जन श्राप कवि का हदय
समझ लेते हैं तय अवश्य आपका हृदय उछल पडता
है। नस यह उछल पडना ही नट में अभिनय-पाटव
का सूत्रपात करता है । श्रत मेरे निकट तो जिस
प्रकार कवि बाह्यजगन् और अन्तर्नगत् के समिश्रण
को हदय वृत्तियों के रंग से रंगकर काव्य का स्वरूप
देता है उसी प्रकार नट, कवि निर्मित अन्तर-बहि
र्जगत् के मिश्रण को अपने अन्तर्जगत् से मिलाकर

अभिाय का स्वरूप देता है। यदि ऐसा न हो तो अभिाय निनीय हो जाने, उसमें सरसता हूँ दी न मिले। यह एक अनुभूत यात है कि जब तक हमारे हृदय में भाव जागरित न होगे, हमें किसी भी काव्य या नाटक में रचक भी आनन्द न मिलेगा। यह एक साधारण सी बात है कि जय तक नट रस का अनुभव न फर सफेगा उसफे भाव केसे प्रवृद्ध होंगे ? और जब उसके भाव प्रवृद्ध नहीं होंगे तब वह चतुर्विध अनुभायो का जीवित उपयोग किये यिना कवि के भावों को द्रष्टामण्डली के भावो तक कमे पहुँचा सगा? इन प्रश्नो का उत्तर जो कुछ हो सकता है वही रस का आधार क्या है इस प्रश्न को हल कर देने का साधन है। इतने विरेचन के पश्चात् उसी सिद्धान्त पर फिर पहुँचते हैं कि 'हदय सस्कार-समष्टि है।' पाठक या द्रष्टा के जैसे सस्कार हागे उनके अनुकूल काव्य या नाटक ही उसके भावों को जागरित कर सकेंगे। सस्कार विरुद्ध काव्य या दृश्य किसी भी पाठक या द्रष्टा पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकता। परन्तु एफ बात अवश्य है। मानव संसार की जीवन सम्बन्धिनी उछ घटनाएँ आपस में बहुत चुछ साम्य रसती हैं और इसका कारण है मानव- प्रकृति का सभी जगह सभी समय एक ही प्रकार से पोपण पाना । यस, जहाँ तक काव्य या नाटक इस सीमा के भीतर रहता है, जनसाधारण की

( २४ )
चित्तवृत्ति के सन्निकट रहने के कारण समान रूप
मे रससचार करता है। और जहाँ इस सीमा के
थाहर हुआ कि उसकी रसव्यान्जमा शक्ति ढीली
पड़ जाती है।
इसी मीमा का दूसरा नाम वर्तमानयुग के
"प्राचार्या न रक्या है 'स्वभाव' । कहने का प्राशय
है कि स्वाभाविक सिद्धान्तो का अनुसरण करके लिखा
हुश्रा काव्य श्रधना नाटक सर्वसाधारण के हित की
बात होती है। क्योंकि शोक, भानन्त, प्रेम, उत्साह
"प्रादि भावनाएँ लगभग एक में ही कारणो का श्राश्रय
पाकर जागा करती है। श्रन्तु-
अब हम रस दशा पर दो शवपाकर इस विषय
को समाप्त करते हैं।
रस की अभिव्यक्ति सहदय के ही हृदय में हुआ
करती है। प्रपटु, हृदयहीन (शुष्प) मनुष्य का
रसवस्तु मे कोई सम्बन्ध नहीं है । रसायस्थिति के
पश्चात् या उसके होने के साथ - साथ सहदय के
रोम रोम में उसका परिपुरण होने लगता है। रसा
स्वादक इस समय अपने को इस लोक से परे किसी
अलौकिक स्थल पर बैठा पाता है लोकोत्तर श्रानन्द
का अनुभव क्षणभर के लिये उसे आत्मविस्मृति
करा देता है। परन्तु यह सबकुछ होता क्षणिक ही है।
क्योंकि रस के उद्रेककारण विभावादि-जोलौकिक
होते हैं-जहाँ श्रानन्द का प्रारभ हुआ नहीं कि
अलग से हो जाते हैं। श्रात्मा एक रस क्षेत्र की मह
मान बन जाती है। बस, यही रसदशा, यही रस

मयता और यही प्रमानन्द सहोदर अलोक्कि विश्व
का प्रानन्द-कोप मरित सीरम और मनुष्यत्व का
अन्तिम लक्ष्य है।
३
साहित्य और उसका आधार
ला मानव हृदय का विकास, कला
फार की अन्तरात्मा का सौंदर्य
क
पीर मस्तिष्क का उपयोगी
निकार है।
प्रानद में पार्थक्य नष्ट हो जाता
है, इसीलिएसमस्तमसार के साथहमारा अभिन्न सयध
स्थापित हो जाता। प्रासद में मनुष्य विश्व को
श्रात्मरूप समझपर, यहवार मेदुरहोकर क्षुद्रता और
दोनन्य का कोई विचार फरके नि सकोच अपने
को पानदलहरियों पर छोट देता।।
थानद एयीकरण का महामन तथा माहित्य की
प्रतिम सीमा है। जब धीरे धीरे साहित्य द्वारा
आनद आत्मा की भीतरी तहो में मिल जाता है
तो मनुष्य अपने प्रापको सत्य की मुनिशाल परिधि
में सड़ा पाता है। किंतु प्रश्न होता है कि वह
पानद-जिसमें मनुष्य को महापुरुष यना देने की,
मसार को स्वर्ग और प्रात्मा को महात्मा बना देने
की शक्ति रे-कैसे प्राप्त होता है ?

लक्षण और मोक्ष मनुष्य की उन्नति तथा अत्यंत
विकास की अवस्था है। मोक्ष प्राप्त करने का अर्थ
परमानद में क्षय हो जाना या प्रात्मा का परमात्मा
स्वरुप हो जाना ही है । ससार में मनुष्य के विकास
के दो ही साधन है. -एक तो फर्म और दूसरा
साहित्य । पहिले फा प्राधार व्यवहार है, जब कि
दूसरे का आधार है भाव रचना । यह दोनों साधन
एक दूसरे के साथ साथ चलते हैं। और, इन दोनों
के बीच में जो समीर बहता है उसमें इन दोनों ही
की सुगध रहती है तथा वह कहलाता है इतिहास ।
मनुष्य का इतिहास क्या -भाव और कर्म की
कहानी ही तो।
कर्मक्षेत्र में मनुष्य अपने को देखता है, दिसाता
नहीं; और भाव क्षेत्र में वह अपने को दूसरों को
दिखलाता और देवता भी है। किंतु स्वय अपने
नहीं, दूसरे के हृदय के आदर्श में देसता है। बस,
दोनों क्षेत्रों के दायरा में इतना ही अतर है।
जो व्यक्ति अपने को जितना ही अधिक व्यापक
रूप में देख सकता है, वही महापुरुष और महात्मा
कहलाता है।
| अस्तु, 'भाव विश्व' का आनन्द और
ससार से अधिक निकट सबध स्थापित होता है।
भावां को समष्टि ससार है, और व्यष्टि प्रलय । तब
फर्मक्षेत्र तो समार और प्रलय की सीमा के बीच का
स्थानविशेष मात्र रह जाता है।
कर्मक्षेत्र की सीमा सीमित है तदनुसार उसका
आनन्द सीमित है। किन्तु भावक्षेत्र असीम और

( २७ )
व्यापक है, श्रतएव उसका आनन्द भी अलौकिक
और नि सीम है। उदाहरणार्थ-जव आपके यहाँ
कोई उत्सव होता है तब एक ओर तो आप उत्सव
की तैयारी में व्यस्त, कर्मक्षेत्र में सडे होते हैं और
दूसरी ओर निमत्रण द्वारा अपने हृदय के आनद को
व्याप्त और सत्य स्वरूप देकर अन्य हृदयों में अपने
हृदय को मिला देने की उत्कट चेष्टा करने हैं। इसका
क्या कारण है ? यही कि मनुप्य का यह स्वभाव है.
कि वह अपने को जितना अधिक प्रकाशित कर सके,
करे। बस, इसी भावना कामानव हदय के किसी कोने
मे स्राव होता है और उसे हम 'भाव' कहते हैं। भाव
की परिभापा साहित्य शास्त्रियों ने यह को हे-
निर्विकार जो चित्त में, उपजत प्रथम विकार ।
पातम्यन उद्दीप तें, भार ताहि निरधार ॥
अर्थात् दृश्यमान् ससार फ विभिन्न दृश्यो की
जो छाप चक्षुरेन्द्रिय के सन्निकर्ष से हृदय पट पर
पडती है, वह एक प्रकार की ऐसी अलक्ष्य चेष्टा पैदा
करती है, जिसमें सामारिक दृश्यो का सार आत्मा रूप
से समुपस्थित रहता है । फिर यही चेष्टा 'भाव' रूप
से साहित्य का आधार बन जाती है
मनुष्य के जीवन में एक घडी आती है, जय यह
अपने हृदय के वेग को भाजावेग में मिलाकर सौदर्य
सृष्टि का साधन बना देता है, हृदय स्थित उत्साह
को मुधरिमा के प्रकाश में प्रकट करने को विवश हो
उठता है। यही घडी वह घडी होती है जब भाव की
शिलाभित्ति पर साहित्य का भव्य भवन निर्मित हो

( २८ )
जाता है, हृदय का अनायास प्रमूत भावेग याह्य जगत्
के साथ एक हो जाता है । यो कहिए कि ससार का
सूक्ष्म रुप साहित्यकार फेहदय में जाकर फिर अपने
विराट रूप को प्राप्त कर लेता है। साहित्य - निर्माण
की गति में यह चेष्टा लगातार होती रहती है। भाव'
आलम्बन और उद्दीपन से उत्पन्न होता है, फिर इन्हीं
दोनो से टकराती हुई काव्य की श्रात्मा 'रस' में परि
णत होकर सत्यानद के लोल लहरिजाल पर उतराने
लगता है। तभी उमे माहित्य का रूप प्राप्त होता है।
मानव-हृदय में भाव के साथ ही साथ एक बाद सी
आती है वह इस समय अपना आन्तरिक स्वरूप
उजाले में रसदेने को व्याकुल हो उठता है। वह अपने
सत्यमय भाग को सहसा बाहर फेंक देने को तेयार हो
जाता है। ऐसा क्यो ? इसीलिए कि वह अपने भव्य
स्प को ससार के सामने वृहत् रूप में देखना चाहता
है। उसकी यही चाह साहित्य का आधार बनकर
ससार के लिए पथ निर्देश करती हैं।
इस उक्त कार्य का सम्पादन करने के लिए हृदय
से
भावनपमें विकसित मनोवृत्ति प्रथम ससार का स्थूल
स्वरप बनती है, और फिर उस स्थूल स्वस्पको अपना
बनाकर, साहित्य का रूप लेकर उसी को लौटा
देती है। इसीलिए साहित्य को ससार के मस्तिष्क का
इतिहास माना है।
कभी-कभी हमारी चिरप्रवीण बुद्धि कार्य कारण
क्षेत्र में एक निर्णायक की तरह सडी होकर ससार की
विभिन्न चेष्टायो को देख देस हँसी उडाती है, तब
।

( २६ )
हृदय उछल पड़ता है धार मागुराग कह देता है कि
यही तो यह मय , निसफ कारण मैं, मैं हूँ और
तू, तू है। यदि यह सब कुछ न हो तो न तेरे निर्णय
का कोई मूल्य हो. न मेरे रागमय होन का। सच
है,हृदय जानता है, वही विशाल रुप में बाहर और
वही पदमस्वरूप में भीतर थाहरपासय सामान उसके
लिए है, और भीतर की मुस्निग्ध एव सुकोमल चेष्टा
पाहर के लिए एदय का यही याहर-भीतर का
प्रादान प्रदान साहित्य का प्राधार पनकर मसार
को रममय बना देता है। आज भा या मीकि
श्रीर व्यास के हत्य के रग में रंगा हुआ प्रेता और
द्वापर युग का ससार रामायण-महाभारत के रूप में
विश्य फो हृदय सुधा का पान करा रहा है। छोटे से.
छोटे और बड़े में यड़े व्यक्ति के पोछ श्राज भी
महाकवि वारमीकि फे माय मे प्रेरित राम और
लक्ष्मण रहे दिसायी पढ़ रहे हैं। गरीय को पर्णा
च्छादित कुटीर के वैभव शून्य प्रांगन अन्धकार
में आज भी पनपटी का पयन माकोरे मार रहा है।
आज भी पुन विछोह पे समय साधारण-से-साधारण
के मे कौशल्या का इदय निकल पड़ता
है । कहना न होगा कि मनुष्य का हृदय समस्त
ससार को अपने प्रकाश मे प्रकाशित किये हुए है तथा
अनादि और अनन्त का सम्मेलन फरा रहा है।
समस्त साहित्य को अथवा हृदय प्रसृत भावो को
एक घार सारे विश्व में इसी रप में देखना पड़ेगा।
तमी साहित्य फे घाधार या समा ज्ञान हो सफेगा।
माता
हृदय

भाव-जो साहित्य का एकमान आधार है-हृदय
के सहारे तथा मनुष्य की अपने को दूसरे पर प्रका
शित करने की भावना के सहारे साधारण मनुष्यों
के
सुख-दु सो की कहानी को महलों की और महलों
की गाथाओं को साधारण सहस्र छिद्र विभूषित
कुटियात्रा की बना दे सकने में समर्थ है। आज
इमी दृष्टि से जब हम महाकवि बाल्मीकि और
व्यास की ओर सते हैं, तो घे न केवल भारत के
किन्तु असिल ससार के सामने सबसे ऊँचे आसन
पर बेठे दिसाई पड़ते हैं। इसका क्या कारण है-
यहो कि उनके हृदय भाव ने अपने को असिल
निश्व के हृदय भाव से मिला दिया है।
यह 'भाव रचना' का क्षेत्र स्थूल रूप से यद्यपि कर्म
क्षेत्र की अपेक्षा सकीर्ण दिसायो पढता है, तो
भी वास्तव में मनुष्य का हदय भाव-रचना के क्षेत्र
में जितना स्वतंत्र और मुक्त है उतना कर्मक्षेत्र में
नहीं। आज कवि अपनी सकीर्ण कुटिया में बेठकर
ससार को अपना और अपने को ससार का बना
सकता है, यना रहा है। अथवा यों कहिए कि इस
दृश्य-ससार के चारों ओर वह एक भावमय संसार
की नवीन रचना कर इमे उसमें और इसे इसमें
देख रहा है-देश ही नहीं बल्कि सत्य सिद्ध
कर रहा है। इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं आदि कवि
वाल्मीकि और सिद्धवाद व्यास ।

कविता का विकास-सिद्धान्त
( Theory of evolution )
Universal truth is the object of Poetry
अर्थात् सार्वभौमिक सत्य ही कविता का लक्ष्य है
घर्प में बिजली पैदा करने की शक्ति
समृत है । परन्तु सपर्प के लिये दो
सं
भिन्न दार्थों का अस्तित्व अनिवार्य
है। ससार की परिभाषा या उसका
मूर्त स्वरूप है सघर्ष । सपर्प
को रूढिगत अर्थ हे युद्ध या द्वन्द ।
परन्तु इसका व्युत्पत्ति सिद्ध अर्थ
दो वस्तुओं का या शक्तियों का परस्पर समिश्रण ही
होता है। किन्तु यह बात अवश्य है, जब यह समि
श्रण साधारण न होकर असाधारण रूप धारण कर
लेता है तभी 'सघर्ष-सत्रा' को प्राप्त होता है।
सपर्प का अर्थ हुआ अच्छी तरह टक्कर साना । यह
अर्थ न केवल वस्तुगत ही है वरन् सामाजिकक्षेत्र
में पहुँचने के पश्चात् यह शब्द अपने व्यापक अर्थ
व्यवहार में भी प्रयुक्त होने लगता है। अस्तु, हृदय
का हृदय पर जोप्रभाव पड़ता है उसका मुख्य कारण है
पारस्परिक सघर्प । इस प्रकार दो हृदयों का सघर्ष
जन्य प्रभाव ही विनिमय नाम से प्रख्यात होता है।

( ३२ ) रिनिमय का अर्थ है अदल बदल । जय दो हृदय सघर्प ( contnet ) में आते हैं, अवश्य एक का दूसरे पर कुछ न कुछ प्रभाव अशत भाविष्ट रह जाता है। और इस प्रकार दोनो योर संस्कृति - निनिमय का श्रीगणेश हो जाता है। जो फिर अपनी अपनी ओर अपनी स्वतन्त्र मनोवृत्ति के रस मे अभिसिक होकर प्रौढत्व प्राप्त करता रहता है। साहित्य को यदि समाज की भावना-समष्टि कहा जाय तो सस्कृति विनिमय या भावना-विनिमय को उसका साधन कहन को वाध्य होना पडेगा। कारण, साहित्य का प्रारम्भ दो मनुष्यों दोजातियो, दो देशों अथवा वस्तुओं के पारस्परिक सम्बन्ध से होता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अपने हृदय को दूसरे फे हृदय मे बिना मिलाये जीवित नहीं रह सकता । और सच पूछा जाय तो मनुष्य को मनुष्यत्व ही इस बात में है कि वह अखिल ससार से अपना अभिन्न सम्बन्ध स्थापित करे। और मनुष्य के इसी कृत्य की समाप्ति को आचार्यों ने ससार की परि भाषा माना है। क्योकि समाज का व्यष्टि और समष्टि रूप केवल इसी आधार पर निर्भर है। अत सघर्पसंचार म ससार प्रारसघर्प सवरण मे प्रलय है। किसी जाति का भावना-कोप, उसके स्वय के व्य- क्यिोके और दूसरोजातियां फेव्यक्तियों के पारस्परिक सघर्प-जन्य भाव विनिमय का फल ही तो है, बस इसी आधार पर भावना-मन्दिर (काव्य) की परिभाषा परने के लिये दो वस्तुश्री फे अस्तित्व की आवश्यकता।

( ३३ )
है। क्योफि फान्य भीतर की वस्तु को बाहिर की,
भार की वस्तु को भापा की, क्षणिक को चिरकाल की
एव एक हृद्य की को दूसरे हदय की, छोटी को पड़ी
और मीमित को व्याप्त बना बनाकर सघर्प शन्द की
पर्यालोचना करता रहता है। दूसरे शन्दी में यो
समझलीजिये कि कत्ल का वैतभाव होना ही काव्य
भावना का आविर्भाव होना है।
हृदय और दृश्य जगन् जन तक एक है तब तक
साहित्य निर्माण का सूत्रपात असम्भव है। परन्तु
जहाँ एक दूसरे से पृथक् होकर रागात्मिका-वृत्ति को
प्रेरणा से अपन पार्थक्य को फिर अभिन्नत्व में परि
णत कर देते हैं वही कविता का प्रादुर्भाव हो जाता
है। इसी पारस्परिक सचरण को विनिमय कहते हैं।
यहाँ यह ध्यान अवश्य रसना चाहिये कि यह
सचरण वस्तु का वस्तु में नहीं होता, भावना का
भावना में होता है । मनुष्य का हृदय सासारिक
भावनाओं से प्रेरित होकर अपना जो रूप उपस्थित
करता है यही तो कवित्व नाम से प्रग्यात होता है।
मानवजाति के स्वभाव में एक विशेष प्रकार की
समता है। वह स्वभाव से ही जाति या समाज का
निर्माता है और इसी समता का फल समाज की
आवश्यक्ता का जनक है । ससार की विवेक पूर्ण
स्थिति ही का दूसरा नाम समाज है।
समाज का व्यापक अर्थ है दृश्य जगत्
प्रत्येक मामाजिफ के लिये, दूसरा सामाजिक दृश्य
जगत् का विषय बनता रहता है। इसी महत्वपूर्ण

( ३४ )
सम्बन्ध में जो कवित्व सन्निविष्ट है, भावना सघर्ष के
रूप में प्राविभूत हो पड़ता है।
दृश्य शब्द के अन्तर्गत, क्वल नेत्रों के विषय फा
ही नहीं, अन्य ज्ञानेन्द्रियों के विषयों का भी (जैसे
शब्द गन्ध, रस ) ग्रहण समझना चाहिये । परन्तु इस
शब्द का अधिकतर सम्बन्ध नत्रा से ही सिद्ध होता
है । इसीलिये दृश्य-जगा का चतुरेन्द्रिय के सन्निकर्ष
से
हृदय पटल पर पड़ा हुमा प्रतिविम्ब ही, हृदय
की मौलिक भावनाओ से टकरार जो रूप धारण
करता है वही दृश्य-जगत् का वह रप हे जो क्षण
भंगुर न रहार चिरकाल का विषय बन जाता
है । अर्थात् कवित्यकोटि को प्राप्त कर लेता है।
काव्य-क्षेत्र का अस्तित्व दृश्य-जगत् पर ही निर्भर
है। काव्य समीक्षकों न वयं विपय के दो पक्ष
माने हैं । ज्ञातृ पक्ष ( subjective) और ज्ञेय पक्ष
(objective ) जो वस्तुएँ वाह्य-जगत् का विषय है,
ये है ज्ञेय पक्ष में और जो अन्तर्जगत् का अर्थात्
हमारे हृदय में भावम्प धारण किये हुए हैं, ज्ञात
पक्ष में में ऐसी अवस्था में काव्य की सामग्री के
दो भेद हो जाते हैं (१) भावनाप्रधान और
(२) वस्तुप्रधान।
भावना प्रधान सामग्री यह है जो हमें हमारे पूर्वजा
की काव्य कृतियों से प्राप्त होती है। जैसे महाकवि
भवभूति एव कालिदास मादि फेहदय वृत्ति के रस में
रंगा हुआ ससार जब हमारे सामन आता है-हृदय
उनके हृदय से टकराता है, तुरन्त एक नयी भावना का

आविर्भाव हो जाता है। इसका क्या कारण है ? यही
कि मानव हृदय में एक ऐसी विचित्रता है कि वह
जितना ही अधिक नये नये हृदयों से टकरायगा,
नवीनता प्राप्त करता चला जायगा ।
जिससमय हम किसी काव्य को पढते हैं, कविसे-
उस काव्य के रचयिता से हम साक्षात्कार सा अनु
भव करने लगते हैं। ऐसा क्यो ? इसलिये कि हमारा
हृदय उसप हृदय से अलक्षित किन्तु अनुभव सुलभ
एक्त्व प्राप्त कर लेता है । यही अलक्षित किन्तु अनु-
भव सिद्ध एकता कवित्व है जो दृश्य जगत् को क्षण
भारता को चिरकाल की वस्तु पना देती है।
काव्य की वस्तुगत सामग्री क्षणभंगुर है और
भावगत सामग्री चिरस्थायिनी । इसका कारण यह है
कि कवित्व दृश्य-वस्तु की सजीवनी शक्ति को हदय
वृत्ति की सुधा पिलाकर अनन्त काल के लिये स्थायी
वना देता है । कवित्व के इस कार्य की विवेचना
बडी कठिन एव सूक्ष्म हैं।
एक हदय में जो बात समा जाती है उसे दूसरे
हृदय तक पहुंचाने के लिये जिन साधनों का अव
लम्ब लेना पडता है, उनकी विवेचना ही काव्य-कला
कहलाती है।
वैमे तो समस्त ससार ही काव्य क्ला का हेतु है,
परन्तु मुख्य रुप से यह सौभाग्य, सौंदर्य को ही प्राप्त
है । ससार की सुन्दर वस्तुओं का दृश्य कविता की
भावना का जनक है । एक सुन्दर वस्तु का प्रति-
विम्ब हदय पर पहुँचकर दो प्रकार के भाव उत्पन्न

.
( ३४ )
सम्बन्ध में जो कवित्व सग्निविष्ट है, भावना-सघर्ष के
रूप में आविर्भूत हो पड़ता है।
दृश्य शब्द के अन्तर्गत, पयल नेत्रों के विषय फा
ही नही, अन्य ज्ञानन्द्रिया के विपया का भी (जैसे
शब्द, गन्ध, रस )महण समझना चाहिये । परन्तु इस
शब्द का अधिकतर सम्बन्ध न मे ही सिद्ध होता
है । इसीलिये दृश्य-जगा का चतुरेन्द्रिय के सन्निकर्ष
से हल्य पटल पर पडा हुदा मतिविम्य ही, इदय
की मौलिफ भायगाओं से टकराकर जो रूप धारण
करता है वही दृश्य-जगत् का यह रूप हे जो क्षण
भंगुर न रहर चिरकाल का विषय बन जाता
है । अर्थात् कवित्यकोटि को प्राप्त कर लेता है।
काव्य-क्षेत्र का अस्तित्व दृश्य-जगत् पर ही निर्भर
। पाव्य समीक्षको । वर्य-विषय के दो पक्ष
माने हैं। ज्ञातृ पक्ष ( subjective) और झेय पक्ष
(objective) जो वस्तुएँ वाद्य-जगत् का विषय है,
ये है ज्ञेय पक्ष में और जो अन्तर्जगत् का अर्थात्
हमारे हृदय में भावप धारण किये हुए हैं, ज्ञात
पक्ष में हैं। ऐसी अवस्था में काव्य की सामग्री के
दो भेद हो जात हे (१) भावनाप्रधान और
(२) वस्तुप्रधान।
भावना प्रधान सामग्री वह है जो हमें हमारे पूर्वजों
की काव्य कृतियों से प्राप्त होती है। जैसे महाकवि
भवभूति एव कालिदास आदि केहदय वृत्ति के रस में
रँगा हुआ ससार जब हमारे सामन पाता है हदय
उनके हदय से टकराता है। तुरन्त एफ नयी भावना का

FREETIftion
बERExii लिये किया
हामी पर
रसी इसका धारण
आगो
रनन्तपाललvon
httमित साधनों
बायब हो tarwal
नाtients
.
-
प्रणाली, " बुद्धिकेन्द्र मानसपट, १० शानके द्रया चैतन्यकाप,
प्रणाली, ४ मन, रागात्मक तत्व , ६ सय
कल्पना केन्द्र, ११ प्राकारकोष, १३ वाणी केंद्र,
सर्वप्रथम दृश्य दिम्ब का मामास"
के साथ वही है जो दूर
इस पवि
में विपना
"
गएँ जहाँ जहाँ हुई
के प्रति शीपक
१९
पर यह क्रिया
नहीं लगाया जा
"
मुन्न

करेगा । (१) विम्व प्रधान भाव और (२) अर्थ- प्रधान । विम्ब प्रधान भावना से काव्य में उपमादि सादृश्य मूलक अलकारी का प्रादुर्भाव होता है। इतना हो चुक्ने पर भी एक हृदय के भाव को दूसरे हृदय तक पहुंचाने के लिये भावना उत्कर्षक साधना को काम में लाना पडता है। क्योंकि हमारे हृदय के भाव चित्र को दूसरे हदय तक पहुँचाने के लिये कुछ बडा करना पडता है तब कहीं दूसरा हृदय उस चित्र का सौदर्य अनुभव कर पाता है। इस सूक्ष्म को विराट और विराट को हृदय में स्थान देने के लिये सूक्ष्म करने की क्रिया का निरन्तर द्वन्द, सघर्ष-मूलक भावना विनिमय है । यह भावना विनि भय एक जाति से दुमरी जाति में, एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट में, एक साहित्य से दूसरे साहित्य में अनादि से होता आ रहा है और अनन्तकाल तक होता रहेगा। इसी में विश्व का अस्तित्व सिद्ध होता है। कविता की दार्शनिकता बडे सूक्ष्म विवेचन की अपेक्षा रसती है । भावना जो प्रत्येक समय प्रत्येक मनुष्य के हृदय में उठती है संस्कारो की अनु- फूलता न पाकर विनष्ट हो जाती है। परन्तु एक कवि * *That he is the wikest tbe happiest & the best in a mach as he is a poet, is equally incontroveitible the greatest puets hure been men of the most spotless virtue of tbe most consumente prudence and if we wall look into the interior of their lives the most fortunate of med Tbe Defence of foetry -- tra है)xष्टि बिम्ब (वस्तु या दृश्य का अनुभव यहीं से होता है) कम से इतनी सत्वर होती हैं कि काल का परिमाण नहीं लगाया जा है । किसी भी दृश्य को देखकर या विषय को सुनकर यह क्रियाएँ मितिम परिणाम यह अगले पृष्ठ पर दी हुई 'प्रपात के प्रति शीषर दवियाम या कविता (प्रस्तुत दृश्य को देखकर जो जो क्रियाएँ जहाँजहाँ एई Halculius hue. चित्र-परिचय १ चतुरेद्रिय, १ क श्रावण केद्र (इसका उपयोग भव्य-विषय के साथ वही है जो दृश्य के साथ चतुपा),२ चतुपिण्ड (तहाँपर सर्वप्रथम दृश्य विम्ब का आमास पड़ता है), ३ सौषुम्न मविदनिकतन्तु प्रणाली, मन रागात्मक तत्व सरकारकोप, सविदनिक प्रणाली, ८ बुद्धिवेद्र, ६ मानसपट, १० ज्ञानकेंद्र या चैतन्यकोष, कल्पना केन्द्र, १२ प्रकारकोप, १३ वाणी केन्द्र, चित्रकार चित्र-व्याख्या मवप्रथम वहिगत् का प्रतिदिन चन्नु । प्रणाली में हाता हुआ हृदय या मन पर पड़ता है। यहाँ भावना को प्रेरण के में बदलकर मस्कार का दृश्य के अनुकल नहीं होत ती सारी किया यहीं का जाल फैल जाता है, और यदि मत्कार दृश्य में सहयोग से उत्पन्न विचारधारा प्रेरया बनवर न०७ पहुँचवर बुद्धिकेन्द्र मानसपट, चैतन्यकोप, कल्पना भमरा भाकारकेन्द्र के ततु का सहयोग प्राप्त करती म्पनशील सन्तुओं द्वारा शम्द में परिणत हो जाती है।। 'कविता' नाम देते हैं। प्रपात के प्रति ! सुदशिलोर भगहृदय का सा उहार, गमन प्रागमन का न विचार। अविरल बहती तेरी-धार, तनिक नहीं है तुझमें हार । सुन से थोड़ी प्रपल प्रपात चणिक टहरमन कीयात ॥ मानव हृदय विश्व विरह यहाँ बनाया यही पि A रे उन्मत्त हे प्रपात तर सुन्दर गात, स्वेत कान्ति यश साविण्यात, विशामस्थल है लेकर संगम यालाकिराता। विमे मोजने जाता भाग! लिये गर्भ में शीतल धाग।। विनुस्ति हुम गा उदधि १-विरानों के बालयों को।

फे मकेत से उहत ) विकार
हो शुकने में विसना सा पाल
' असंभर है। यह मभी निया
गताश भाग में ही पदाचित हो चुफती
रा या अन्त ही भावना का प्रथम
-
१
प्रादुर्भाव जहा माफार होने लगता
ना का प्रत्यक्ष स्वरप स्वयंसिद्ध हो जाता
कार कथिता फा विश्लेषणात्मक विवेचन
' पर हम अय यह निचय कर सकते हैं
अपने याम्नचिफ म्पप में आने से पूर्व
स्थाथा का आश्रय लेती है.
दरयात्मफ विकार
-मस्कारात्मक विचार • यह समधारणा
-समंतात्मक विकार
४-भावात्मक-स्वरूप
पिर कविता ( फाव्य)
इस प्रकार से प्राप्त कविता रूपी सार पदार्थ का
दिनध्यातध्य निर्राय किया जाय तो पदाचित्
“ारा प्रयास निप्पर जायगा। क्योंकि कविता का
से चाहे असत्य सिद्ध हो जाय
: जन तक उसमें हृदय को
का सरकार है वह परम
सिद्धान्तो का सत्य
मूलक है
-

है
( ३८ )
चलता है वह है मौन्दर्य तत्त्य। हमने घतलाया है कि
कवि *. समस्त विश्व में पूर्व मौन्दर्य की स्थापना
फरमेवाला होता है। पीर यह सोंदर्य तत्व कवि के
हृदय और मस्तिष्क की मिलित तथा विशिष्ट भावना
फा विकार । वास्तव में वह वस्तु या पदार्थ जिसके
प्रति करि के मस्तिष्क में एक विशेष स्थान प्राप्त है-
स्वय तो जैसा कुछ वैसा ही है परन्तु कवि का
हृदय उसे सौदर्ययुक्त सममता है, इसलिये वह सुन्दर
। एक पाण्डुरोगी व्यक्ति को समस्त पदार्थ पीताभ
दिसाई पड़ते है, यद्यपि पदार्थों के रंग में कोई विकार
नहा है, विकार हे केवल दृष्ट-सन्तया में । इसीलिये
समस्त पदार्थ पोले भासते हैं।
यही यात सासारिक पदार्थों के साथ विचारक की
है। एक ही वस्तु एक व्यक्ति के लिये सुन्दर और
मुसरे के लिये अमुन्दर हो सकती है । अस्तु, निष्कर्ष
निकलता है कि सादर्य पदार्थगत नहीं वासनागत
है। परन्तु यह वात प्राश्य
कि यही वासनागत
मोदर्य काव्य क्षेत्र में पहुँचकर भाव की वस्तु के
स्वम्प में पदार्थगत हो जाता है।
वाघजगन् के पदार्थो का दृश्यात्मक विकार
हृदय या मस्तिष्क में थामेवालाप्रथम विकार है। जैसे
ही यह विकार अन्तर्जगत से मिलता है सस्कार-कोप
प्रबुद्ध हो उठता है । संस्कारों के प्रबुद्ध होने पर
* Beauty is no quality in things themselves, it
exists merely in the mind u lich contemplates
them-----Hume

(३६)
सातिक ( संस्कारो के सकेत से उबूत ) विकार
होता है। इतना हो चुकने में कितना सा काल
लगता है यह कहना असभव है। यह सभी क्रिया
एक क्षण के भी राताशभाग में होक्दाचित् हो चुकती
होगी। इस क्रिया का अन्त ही भावना का प्रथम
स्वरूप है।
भावना का प्रादुर्भाव जहा साकार होने लगता
है वही कविता का प्रत्यन स्वस्प स्वयसिद्ध हो जाता
है। इस प्रकार कविता का विश्लेपणात्मक विवेचन
कर चुकने पर हम अब यह निश्चय कर सकते हैं
कि कविता अपने वास्तविक स्वरप में आरे से पूर्व
चार अवस्थायी का आश्रय लेती है
१-दृश्यात्मक विकार
२-सस्कारात्मक विकार
यह सवधारणा
३-सपेतात्मक विकार
४-भावात्मक-स्वरूप
फिर कविता ( काव्य)
इस प्रकार से प्राप्त. कविता रूपी सार पदार्थ का
यदि तथ्यातथ्य निर्णय किया जाय तो कदाचित्
सारा प्रयास निष्फल ही जायगा । क्योकि कविता का
विषय परीक्षा पर रसने से चाहेशसत्य सिद्ध हो जाय
परन्तु उस समय तक कि जब तक उसमें हृदय को
वश में करने की सत्यता का सस्कार है वह परम
सत्य ही है। तर्क के फर्कश सिद्धान्तो का सत्य
कविता की 'सतचित् आनन्दमयता' की परीक्षा पर
धारणा मस्तिष्क की भात्मा और सरकारों की पिटारी है।
क

।
.
लागू नहीं हो सकता । कविता का सत्य अनुभव
ज्ञातव्य पदार्थ है।
५
काव्य म अलङ्कार का स्थान
भावना को मूर्त स्वरूप देने का साधन ही अलङ्कार है
व्य एक हृदय का दूसरे हृदय से
मूक-सम्मिलन है भीतर की
वस्तु के प्रकाश और वाद्य पदार्थ
के अन्तर्वास सम्बन्धिती प्रक्रिया
हो काव्यशास्त्र का कार्य है। विश्व
बधुत्व की स्थापना का सरल से
सरल एवं शीघ्र से शीघ्र साधन
हेरना ही काव्य का एकान्त उद्देश्य है।
काव्य की रूपरेसा, कार्य और उद्देश्य जान लेने
पर स्वभापत यह प्रश्न होता है कि वे कौनसे उपाय
हैं जिनके द्वारा काव्य हृदय का हदय से मेल करा
कर विश्व नधुत्व की स्थापना करने में समर्थ होता
है? हृदयोद्भूत भावना का जो मजा और पानन्द
फरि को पा रहा है वह कैसे कहा जाय और क्यों
कर दूसरों को समझाया जाय ? इसी प्रश्न का
उत्तर हमारे लिये विवेचनीय है।
अच्छापन और बुरापन एक चालक के लिये भी
अनुमवगम्य विषय है। प्रेम और वैर-थोड़ी सी भी
बुद्धि का निरास जिसमें हो जाता है-वह बालक

१ (४१ ) भली भॉति समझ लेता है । परन्तु वह यह नहीं कह सकता कि इसके अच्छा और बुरा होने का या प्रेम और वेर करने का क्या कारण है ? इसका कारण है उसकी बुद्धि, वाणी और सासारिक ज्ञान माना के विकास की कमी। इसी प्रकार एक कवि और समाज में बुद्धि, हृदय और अनुभव के नाते यही अनुपात चलता है। भगवान् श्रीराम का चरिन फिसने नहीं सुना फिर भवभूति के हृदय में हो तो क्यो दूसरी भार नाएँ उठ सकी और दूसरे मामाजिको में उस चरित्र का प्रभाव दूसरे ही प्रकार से क्यो पडा ? बस इसी प्रश्न का उत्तर हमारी उपयुक्त पक्तियाँ हैं। काव्यशाख दो तत्त्वों का मेल है- १) उत्कर्ष और (२) सौंदर्य । इन्हीं दो तत्त्वों के कारण काव्य में जीवन पाता है। उच्चता (Stature) और सौंदर्य (Charm) यही दो तत्त्व काव्य पिपामा को कभी शान्त नहीं होन देते । श्रीरामचरित्र को हजारो वर्षों से वरावर सुनते, पढते और प्रत्यक्ष दृश्यों के द्वारा देखते चले पाने पर भी आज तक उसके सुनने, पढने और देखने की रुचि मे शिथिलता नहीं पाई । यही उत्कर्प श्रीर सौंदर्य की चिरस्थायिनी शक्ति है। काव्य रचना की पहिली सीढी कवि हृदय पर पड़ने वाली वह वाह्य पदार्थों की छाप है जो अन्त- त्तियों के प्रभाव से पकी होकर वर्णनशैली के मज- चूत ढाँचे में ढलकर भापा फेमच पर अनन्तकाल लिये काव्यरूप में उपस्थित हो जाती ।

काव्य का स्थायित्व उसके सौंदर्य और उत्कर्ष के
अनुपात पर निर्भर होता है। जिस काव्य में जितना
ही ज्यादा चमत्कार और तथ्य होगा वह उतना ही
अधिक स्थायी और सर्वप्रिय होता जायगा। उसके प्रति
समाज की पिपामा कभी भी शान्त नहीं हो सकेगी।
भाव का विशिष्ट शब्द सचयन द्वारा प्रकाशन ही
काव्य है। यहाँ विशिष्ट' का अर्थ ऐसे शब्द समूह
सनिवेश मे है, जिसमें ऐसा चमत्कार हो कि दिल
मान जाय।
चमत्कार, शद पार अर्थ की अपेक्षा अवश्य
रखता है परतु शब्द और अर्थ में चमत्कार हो हो हो
यह कोई पदरी बात नहीं। इसीलिये चमत्कार वर्णन
करन की शैली विशेष का मोहताज हो जाता है।
वर्तमान हिन्दी साहित्य में शैली का आदर तो
बहुत है । बडे-बडे पाश्चात्य शैली के अनुसार हिन्दा
साहित्य का मनन करमेनाले विद्वान् शैली के नाम
पर नयारा पीट पीटकर शली की कपालकिया
करने पर उतार रहते हैं, परन्तु मनोगत भावना का
मम्यक् प्रकारान जिन सिद्धान्तों के आधार पर हो
मफता है उनसे उनका रचक भी परिचय नहीं।
शब्द और अर्थ जिस प्रकार चमत्कार उत्पादन
कर सके उस प्रकार उनका प्रयोग ही काव्य में अल
वार को स्थान नेने का मूल हेतु है।
चमत्कार भी शन्द में, कभी अर्थ में एव
कभी कभी उभयन होता है। जब शन्द में होता है,
तो वह शब्दालङ्कार' कहलाता है। अर्थगत होने से

अर्थालवार और शब्दार्थ दोनों में इसके चमत्कार) के रहने पर 'उभयालद्वार कहलाता है। इन तीन प्रकार के अलङ्कारों की सभेद उपपत्ति करके कई भेदोपभेट बना डाले गरे है। अलवार शास्त्र बडा गहन और रोचक है। एक बात के कहने के कई ढग हो सकते हैं इसी प्रकार 'प्रलदार भी एक नही अमेक हो सकते हैं। काव्याचायों ने वर्णन शैली के चमत्कारोत्पादक देंगी को अलवार नाम देकर उनका श्रेणी विभाजन और प्रकार निरू- पण करके एक भिर शास्त्र-अलझार शारन' यना डाला है। हृदय की भावमयी अस्फुट चित्रायली पाहर पैसे श्रावे ? इस प्रयास की सफलता अलमारो द्वारा सम्पादन की जाती है। भाव-जगत् का हदय से मू -सम्मेलन होते ही मनोवृत्ति की सुकोमल तृलिका अतिरजना फे रंग का सहारा पाकर जो चित्र सींचती है वही साल- कारी रचना के रूप में हमारे सामने कवि के हृदय की प्रतिकृति उपस्थित होती है। इसका कारण यह है कि एक बात जिसे हमने समझ रक्सा है, दूसरे फे हृदय पर घेसा ही प्रभाव डाल सकने में भी समर्थ हो सकती है कि जय उसका आकर्पण, रूप, प्रभाव और चमत्कार हमारे और दूसरे के दृदयान्तर मार्ग में वैसे का पैसा बना रहकर उसक हृदय में पहुँच सके कि जिसके पास हम पहुँचना चाहते हैं।

( ४४ ) हृद्य अपने स्वरूप को दूसरे पर प्रकट करने के लिये सदेव सचेष्ट रहता है। इस कार्य में उसे कल्पना शक्ति-जो मस्तिष्क की आँस है-उसका सहारा लेना पड़ता है। भावना का आधार हृदय (जिस में प्रथम भावना उत्पन्न होती है ) दूसरे हृदय पर अपने स्वरूप को प्रकट करते समय-देवल इसलिये कि उसको भावना का यथावत् स्वरूप दूसरे हृदय तक पहुँच जाय अपने स्वरूप को द्विगुण कर लेता है। एक तो मूल भावना का स्वरूप होता ही है और दूसरा उसी भावना के अनुरूप ऐसा स्वरूप कल्पित करता है जिसके द्वारा उसको मूल भावना का सौदर्य विस्तार सादृश्य-सूचक रहते हुए द्विगुण होकर मूल भावना को दूसरे हृदय तफ अपने मी लिक स्वरूप में पहुँचा सके। हृदय की यह क्रिया उपमादि सादृश्य मूलक अलकारी की सृष्टि करती है। हृदय चित्र के प्रतिबिम्ब को सफेतग्रहण क्रिया, विम्बग्रहण क्रिया, या अर्थग्रहण क्रिया द्वारा दूने परिमाण का बनाकर दुमरे हृदय के समीप पहुँचा देने तक तो अलकार गेली के साधक एव वर्णन-शैली के एक प्रकार से भेद स्वरूप रहते हैं। और जहाँ इनका प्राधान्य होकर वास्तविक अर्थात् हृदय की मूल भावना का सत्य-स्वरूप बिल्कुल ही नष्टप्राय हो जाता है, वहाँ इनका कोई मूल्य नहीं रह जाता है । बल्कि काव्य का जो चरम लक्ष्य सर्वभूत को आत्मभूत और आत्मभूत को सर्वभूत । ।

उपरक विवचन मे गटाशुपमा कि पाप
प्रकार की गणपदीका फारामा परमादय
फे विकास और अचार दोनों में पया अतर।
यह जाने पिना पर निकायों में दाहाफार मपाना
काव्य के गुण एमत्कार पर परोपजातिरिक
से लेपर इम मध्यता पी पादरी की उन्नतिशीच
र सृष्टि धादिकाल में जगली जातिगों
जातियोंपाचा सरदयीभावाने
कालीन विशनाप-नही-नहीं-उसमेटे
धारा का महत्व न सममकर-पयल उनके रीति
स्वरूप को पकर जमकी मालिस उपादेयता के प्रति
अश्रद्धा प्रकट करना अत्यन्त निन्दनीय कार्य नहीं
फरा के भय इरान, amil भी हानि पहुँ
चागे न जाने कि मनमाया
फा यानिवि PE RATE यामाविरमा
में सारसमीरयस्तु कामाय ने
मूल-पस्तुपा म निरोपान हा पाई।
অব ম না যা যা ল চ ব্য?
जहाँ यक यमायाम मायोकाविला में से
समर्थ होमकते हैं।
चमत्कार से भेदको नारा पारस
विक बम्प को न डानर दी लोग इन विरोध में
थागज उगते हैं रिमी भी पिया बाया इम
२.
और फुट मी नहीं।
वो परकार
मूर्त रूप देने के मान और
तो क्या है।

।
'अलङ्कार' नाम उपमादिअलबारों तक ही सीमित
नहीं है। बल्कि वह प्रत्येक साधन, जिसके कारण
क्सिी रचना में चमत्कार आता है-अलङ्कार ही है.
अस्तु, अलङ्कार का काव्य में वही स्थान है जो
मुख में जिह्वा का हृदय में उठनेनाले भाव, तद्र प
दूसरी भावना का स्वरूप गदे बिना कभी मान्य क्षेत्र
में चमारोत्पादर नहीं हो सकते अर्थात् काव्यरूप
नहीं पा सकते, तर! मसार की सर्वश्रेष्ठ कला,
काव्य क्ला का क्या हन होगा?
हॉ यह यात अवश्य है कि अलकार मूलभावना
के पोपक जहाँ लकहा वहा तक शैली के अन्तर्गत
परिगणित हो सकते हैं। इसके बाहर निकलने पर
वेही दुर्गुण, हेय और त्याज्य हो जाते हैं।
६
*कविता और उसका प्रभाव
करिता हृदय की प्रतिकृति है
प्रेरित
विता क्या है, उसका प्रारभ कब
मे और कहाँ मे हुआ तथा
हीच
इसका उद्देश्य क्या है ? आदि
मनोद्भव प्रश्नो पर कई बार
कितने ही विद्वानों ने विचार
*Poetry is the record of the best & happiest
moments of the bapptest # best minde --The
भान
का
।
Defence of Poetry

। • किया है और प्राय नित्य नये २ ढग से विचार होता • भी जा रहा है । परन्तु अभी तक यह निर्णय नहीं हो सका है कि इस मनोज काव्य-माधुर्य में वह कौन सा जादू है जो पडित, मूर्ख, उनत, अवनत, विजयी, विजेता, राजा प्रजा, स्वामी, सेवक और । मित्र-शत्रु सभी हृदय रसने वाले मनुष्य-जीवों को समान रूप से मुग्ध कर लेता है। कविता की शक्ति न असिल-मानव विश्व को मत्र- मुग्ध (spell charmed ) बना रक्सा हे । इस पर विचार करने से अनुभव होता है कि मानव मनोभाव का मूल तत्व 'राग' एक ऐसा तत्व है जिसका मानव जाति के उत्तरोत्तर विकास के साथ साथ हमेशा परिवर्तन होता जाता है। इसी कारण मानव जाति को सामुहिक भावनाएँ किसी विशेष लक्ष्य की ओर प्रेरित रहती है। इसी लक्ष्य के अनुस्प जो एक वातावरण तैयार होता है, वही कविता का उज्ज्वल किन्तु रागमय क्षेत्र है, जहा हत्य के अलक्ष्य पट के किसी अज्ञात कोने से अह रह-मूक-भावनाएँ सुस और विष्ट सवाक् होने की चेष्टा में अनुरक्त विश्व बधुत्व का उज्ज्वल उद्देश्य कवि की अन्तरात्मा में गुजाने लगती है। बम, वहीं से कविता की स्निग्ध रश्मि का प्रथम प्रकाश होता है। कविता किसी नवीन तत्व की सृष्टि है, जो में कवि - हृदय के सहारे प्रकृति में भिन्नता की सृष्टि करती है । सभव है हमारा यह कथन दुस सपुट में सन्नि T T

(४८)
को विपरीत सा प्रतीत हो, परन्तु "कविता शेष
सृष्टि से हमारा रागात्मक सम्बन्ध स्थापित करती
है अथवा Poetry is the true means which
creates direct touch 11th life in true
sense" अर्थात् कविता हो एक वह साधन है जो
जीवन मे हमारा सत्य सम्बन्ध स्थापित करती है।
इन परिमापाश्री का विरोध स्वरूप नहीं है ।
किसी भी कलाकार का पहिला कर्तव्य तो यही
होना चाहिये कि प्रकृति में भिनता प्रकट करे । क्यों
कि प्रकृति में कभी कभी समय की गतिविधि के कारण
रूसापन और अरोचकता यढ जाती है तब कलाकार
जिस तत्व की सृष्टि करता है वह इम सूसी और श्राक
पणहीन प्रकृति में परिमार्जित सीष्ठर के द्वारा नया
जीवन-सचरित कर देता है, तभी वह पुरानो प्रकृति
हमें नई सी भासने लगती है। श्रीर हमारा आकर्षण
उसके प्रति पुन उत्तेजित हो उठता है। यह है प्रकृति
में भिन्नता लाने का आशय । मरी हुई आत्मा में
जीवन-वासना-स्कृति तभी हो सकती है जब कला के
प्रधान तत्त्व-सौंदर्य, उपयोगिता और नवीनता तीनों
मिलकर वर्तमान को भविष्यत् और भविष्यत् को
धर्तमान बनाती रहें। जय तक वर्तमान से भिन्नता
न होगो भविष्यत् असभव है। इसीलिये नवीनता
को जन्म देकर ससार का उससे अछेद्य सम्बन्ध
स्थापित बनाए रसमे का प्रयत्न करता रहे तभी तो
वह (कलाकार) अखिल विश्व से हमारा रागात्मक
सम्बन्ध स्थापित करने को समर्थ होगा।

(४६) कविता की एक पक्ति में भावना की वह लहर सनिहित रहती है जिसके द्वारा विश्व-मानव के हृदय में एक समान उत्साह जागरित हो उठता है। इसका कारण है उसकी सत्यता, शिवता और । सुन्दरना। कविता के दो क्षेत्र है। एक भावात्मक और दूसरा दृश्य जगत विषयक । पहिले हम दृश्य-जगत् विषयक क्षेत्र पर विचार करेंगे । इम क्षेत्र में हम अपने देनिक जीवन की विभिन्न दशाओ-हर्ष, शोक, प्रेम, वेर, देन्य-दौत्य, जन्म-मरण, न्याय अत्याचार, शाति थोर क्रान्ति आदि के व्यावहारिक स्वरूपो की पारम्बार उतरणी सी किया करते हैं। परन्तु फिर भी हमारी इन दृश्यो को देसने की पिपासा बुझ नहीं पाती। इसका क्या कारण है ? यह द्वन्द्व सृष्टि के आरभ से इसी प्रकार चलता आ रहा है और इसी प्रकार अनन्तकाल तक चलता रहेगा ऐसा ज्ञात होता है। परन्तु हमारी उत्कण्ठा इस मंघर्ष के प्रति एकसी ही क्यों बनी हुई है ? बस इन्हीं प्रश्नो का उसर कविता के घोज को अपने गर्भ में स्थान दिये हुए हमारे उपयुक्त कथन से सिद्ध होता है कि अन्त- जंगत् और बहिर्जगत् के मिलित रूप की अनादि पाल से अनन्तकाल तक सतत् उद्धरणी करते रहना ही कविता का स्थिर उद्देश्य है। आकस्मिक घटनाओं के विचित्र चित्र, भावात्मक क्षेत्र की सीमा में पहुँचकर चित्तवृत्तियो के बहुरगे (५०) मूत्रनाल से प्रभावित होकर विश्व धुत्व का सून- पात करनेवाली कविता का जीवन धाम करते हैं। मसार दो प्रकार की वस्तुओं के सामञ्जस्य का नाम है-चैतन्य और जड़ | और कविता इन दोनों में एकत्व स्थापित करने वाली शक्ति का | कविता के क्षेत्र में जद भी चैतन्य रूप हो जाता है क्याकि कविता का काम ही चैतन्य में जड और जड में चेतन्य का प्रतिबिम्न दिसावर जडत्व का नाश करके लोकोत्तर श्रानन्द को सृष्टि करना है। कविता एक प्रकार मे जड़ पदाथों में जीवन स्कृति करती है देखिये- दल राशि उठी खरे आतप में, हिल अचल आँध मचाती जहाँ। उस एक हरे रंग में हलकी, गहरी लहरी पड़ जाती जहाँ । कल करता मम की प्रतिबिम्बित, खजन के मम माती जहाँ । कविता यह हाय उठाये हुए- पलिये कवि वृद बुलाती यहाँ। (मो. रामचन्द्र शुक्र) कवि का हृदय सि जड प्रदेश में पहुँचकर कम उमे चेतन्य बनाकर चेतन्य विश्व के साथ उसका मुदृढ-सम्बन्ध स्थापित करके लोकोत्तर आन न्द की सृष्टि कर देता है। कवि हृदय भावना मन्दिर है । यहाँ पहुँचकर जड़ चेतन्य का पार्थक्य नष्ट हो जाता है। चैतन्य- - । विश्व जड़विश्व के जडत्व को नष्ट करके अपने सदृश्य संजीवनी शक्ति देकर उसके एक-एक परि- माणु को अपन जीवन के उतार चढार के साथ २ मिलाकर राग-तत्व की अनन्त श्राराधना में तल्लीन हो जाता है। देसिये - क्षितिज पूल पर क्षणिक खेलकर किया मधुरतम हास, फिर क्यों समानयी रननी संग किया शीय सायास, दिये सय स्वर्ण प्रसून पिपेर । श्ररी सन्ध्या ! यह क्या धन्धेर । मेरे ही क्रीडास्पल में कर नित नित नव गार, सारक-माल यनाकर रजनी करती दिव्य विहार, यही शुचि-स्वर्ण मसून निवर । अरी मन्ध्या । यह क्या अधेर ! अस्थिर सुख-सौभाग्य प्राप्त कर विश्य विवर्ण पनाया, इसीलिये समया, इठलाने का तूने फल पाया, गया यह था जो दिन का पेर । इसी का है यह अय अन्धेर । सूने रवि का, निशि मे तेरा लूटा सारा देरा, प्रबल नियल का धातक जग में-यह है रैन बसेरा, नहीं है तनिक परी प्रय हो । लूटगी-अन्धेर । (सहृदय) इस कविता में यही सासारिक संघर्प जड पदार्थों में भी जीवन डाल रहा है। प्रसिल विश्व को अपने राग में चिरकाल के लिये बाँध रहा है। प्रकृति के जीवन में मानव-जीवन का प्रतिबिस्य और मानव- उपा मय

जीवन में प्रकृति की छवि को छाया एकाकार हो रही
है। मानव-जीवन का अकाण्डताण्डव प्रकृति नेत्र का
प्यारा बन रहा है । रागतत्य पुजीभूत होकर विश्व
मानव का हदय बनने जा रहा है।
कविता की यह एक में अनक और अनेक में एक
को दिपलाने की शक्ति मार्वभौमिक है। कविता का
काम है अपनी वस्तु को विश्व की और विश्व की
वस्तु का अपनी बनाना । श्राप किसी भाषा के
साहित्य को उठार नेस लें-निस्सन्देह कविता को
सर्वदा इसी लक्ष्य पर चलती हुई पाइयेगा। देखिये
पागल भाषा का सुप्रसिद्ध कवि शेली क्या राग
अलाप रहा है
AMRP Amr from tuentowns
To the wild vox & the domas
Totta lept wil 'erne s
Where the sonir el uit repreke
Ito nuri lest i should not fin 1
An exho in another & mind
bude the ouch of 04tnres Art
Harnonites leart to benrt
यद्यपि एकान्त प्रियता का भाव स्पष्ट है। परन्तु
उममें भी हदय की हृद्य क माथ मामञ्जस्यता लगी
होहुई । प्रकृति की कलात्मक्ता कवि हृदय की
कुशलता मे रागरद्ध हुई अलोक्कि मुम्ब की प्राप्ति
पर मुग्ध जान पड़ती है। विन्देद-वासना में कैसा
मीटा किन्तु स्थायी राग उपस्थित है। जिघर देखिये
रागात्मक-सम्यघ मस्थापनार्थ प्रयन हो रहा है।

जडत्व में चैतन्यामास व्यापता चला जा रहा है। हृदय का एकान्त आनन्द विश्व विडम्बनाओं मे हट- कर भी ससार अकाएटताण्डय कोएकान्त आनन्द फा स्वरूप देने का अविरल प्रयत्न कर रहा है। फविता का मुरय उद्देश्य, एकान्त सत्य की सोज, विभिन्नता मे एकीकरण और मादर्य-संयुक्त राग का प्रसरण करना मान है। जरा देखिये - kmg-Shull I be nble to understand the sense of what you live written ? Poet-No, hing nhnta poet writes is not meant to have any scosc hing-IWhat then ? Poetlo hrve the true itself इस (True itself) पद में विश्व-मानव' को एक प्रेमसून में गुम्फित करने की भावना ओत प्रोत है। करिता का इतना विवेचन कर चुकने पर एय उमका मानव जीवन से सम्बन्ध स्थापित कर चुकने पर अब हम यह कह सकते हैं कि आनन्दमय कोप (हृदय) कविता धारा का उद्गम स्थल है । दृश्य पदार्थों के ससर्ग से सरकारात्मक भावना पु ज का विस्फोटन होने पर उपस्थित होने वाला चित्र विशेष ही स्वय कविता है । अथवा चक्षरेन्द्रिय की मीनो चद्दर की ओट से कविमानस और विश्व मानस का मान - मिलन और मधुर हास ही हृदय क्षितिज पर एक श्रमणिमप्रभा के रूप में कविता के सस्कार अङ्कित करने का प्रधान हेतु वनकर रागतत्त्व की

अनन्त श्राराधना में लीन हो जाता है। और यहीं से
कवि ससारी झमटा में भी मुक्त हो जाता है । इसका
कारण यही है कि कविता ईश्वर के पास तक पहुंचाने
फा सरलतम साधन है अथवा दूसरे शब्दों में कह
सकते हैं कि शद, जो काव्य के आधार है सरसता
का सम्पर्क पाते ही ब्रह्ममय होकर कवि को भी
ब्रह्मानन्द निमग्न कर देते हैं। यही कविता का सबसे
बड़ा उद्देश्य और यही कविता की सबसे सूक्ष्म परि
भाषा है। कहा है
अक्षर परम प्रह्म सनातनमज विभुम्,
घेदान्तेषु वदन्त्येक चैतन्य ज्योतिरीश्वरम् ।
धानन्द सहजस्तस्य घ्यज्यते स कदाचन,
व्यानि सा तस्य वैतन्य चमरकार-पसावया॥
(अग्निपुराण)
हमारे साहित्य का सौंदर्य
तरद्वन्द्व न केवल नाट्य साहित्य
की ही अन्तरात्मा है, बल्कि
सपूर्ण साहित्यको सजीवनी शक्ति
है। समार का माहित्य, सौंदर्य
और असादर्य के नाटक के सिवा
श्रार है क्या ? मानव स्वभाव
की रुचि को दो भागों में बाँटने
वाला यही सौंदर्यासोंदर्य का भाव है जिस पर क्या

पूर्व और क्या पश्निम दोनो का साहित्य निर्भर है। मानव हृदय की सानुराग योधवृत्तियाँ और बाध- रश्य तथा श्रव्य विषया का उन पर पड़ने वाला प्रभाव, इस क्षणिक, स्वभाव प्रेरित कार्य के बीच की सूक्ष्म- किया की तथा तजन्य उत्तर परिणाम की जिस देश ने जितनी ही गरेपणा की है उसका साहित्य उतना ही आदर्श यन मका है। ससार है, इसमें 'भिन्नाचिहिलाक' बाला सिद्धान्त पद पद पर सत्य सिद्ध होता है। कहीं लोगों को फोई वात पसन्द प्राई हे सो किसी को कोई । इसी भिन रुचि के कारण, आज हमें साहित्य फे दो प्रधान आदर्श देखने में आ रहे हैं। इम पूर्व कि इम विपय पर प्रागे चलें, इतना और भी कह दें तो चुछ अनुचित न होगा कि साहि त्योत्पादनी भावना की उत्पत्ति में किसी अश तक स्थान विशेष के नलवायु का भी प्रभाव अवश्य ही रहता है। यदि ऐसा न होता तो फिर क्या कारण है कि पूर्व और पश्चिम दोनों का साहित्यादर्श एक दूसरे मे इतना टूर जा पड़ा ? पश्चिमी साहित्य, पूर्व काही प्रसाद है इसके प्रमाण में प्रसिद्ध फेंच विद्वान् I Lots Jacolliat ( एम लुइस जेकोलिट ) का निम्न लिसित उद्गार देखिये Bible in India "भारत में बाइबिल" नामक पुस्तक में उसने लिखा है- Soil of ancient India, cradle of hum anity, hall ! hull venerable and efficient narae whom centuries of brutal invas -

ions have not yet burier! under the best
of oblivion Hul, Fatherland of faith, of
love, of poetry and of science May we hail
r revival of the past in our restern future
अर्थात् "हे प्राचीन भारत-वसुन्धरा, मानव-जाति
की प्रादिम-जननी, तेरी जय हो । तेरी जय हो।
मान्य ण्व समर्थ धा सदियों पे कर प्राममण
भी आज तेरे अस्तित्व को निस्मृति के गर्भ में विलीन
नहीं कर सके । तेरी जय हो । धर्म, प्रेम, कविता
तथा विज्ञान कीतू मातृभूमि है। प्रतीच्य के भविष्यत्
में तेरे अतीत को पुनरावृत्ति हो और हम उसका
अभिनन्दन करे यही हमारो श्रमिलापा है।" यद्यपि
उक्त क्थनानुमार यह बात स्पष्ट है कि पश्चिम में
प्रान्य साहित्य की पुनरावृत्ति ही हो रही है किन्तु
फिर भी भादर्श में अन्तर अवश्य हो गया है। और
इस अन्तर का कारण है, जलवायु ।
इस समय प्रान्य और पाश्चात्य साहित्य में श्रादर्श
निर्माण की दृष्टि से रात दिन का अन्तर है। एक का
ध्येय मनुष्य की श्राध्यात्मिक वृत्तियों को उन्नत करके
उमे द्वन्दातीत आनन्दमय लोक मे पहुँचा देने की
चेष्टा में व्यस्त रहना है और दूमरे का ध्येय केवल
भौतिक आनन्द Eat drink& he marry"
'साओ, सेलो और खुश रहो" मान है।
असिल उन्नत जगत् आज भी इस बात को माने
धैठा है कि रे साधन जो मनुष्य को आत्मोन्नति
की ओर ले जाने में सहायक हो सकते हैं- उसकी

मवृत्तियो को विकसित कर सकते हैं. उन्हें श्रप- नाना मनुष्यमान का कर्तव्य होना चाहिये । और ऐसे माधन अथवा साधना को जिनसे आत्मोन्नति में बाधा पहुंचे सर्वथा घेय और त्याज्य समझकर छोड देना चाहिये। मनुष्य को अपना वातावरण सदा उन्नत, शुद्ध और शान्तिमय रग्पना चाहिये । विचार, दृश्य और व्यवहार अर्थात् मन, वचन और कर्म से शुद्ध रहना ही मोक्ष का साधन है। पूर्वीय आचार्यों ने मानपात्मा की सबसे नीचे पाली तह में प्रवेश करके मानव-मनोवृत्तियों का पूर्ण परिशीलन करने के पश्चात् अपमे साहित्य का आदर्श नियत किया है । क्योकि ये जानते थे यदि हमारे विचारो म पवित्रता नहीं रहेगी तो अवश्य ही हमारे वचन और कर्म भी, जो विचारों के ही प्रकाशमान स्वम्प है, अहितकर तथा पित ही हागे । अस्तु, उन्होने साहित्य क आदर्श को आत्मोन्नति के मूल मिद्वान्ता पर निमित किया है। ससार में वही वस्तु सुन्दर मानो जाती है जो किसी भी भाति हितकर सिद्ध हो सके। और जो वस्तु अहितकर होती है यह मदव उसने में सुन्दर होते हुए भी असुन्दर की कोटि में ही स्थान पाती है। कहने का तात्पर्य यह कि सौदर्य और असौदर्य दोनो के सघर्प का परिणाम ही अपनी २ रुचि के अनुसार साहित्यादी बन गया है। } साहित्य, विचारा का समूह ही तो है जिसका विचारादर्श होगा,

(५८)
साहित्यादर्श पा सकेगा। और यही कारण है कि
साहित्य को विचारा का परम्परागत इतिहास
माना है।
प्राज्य-माहित्य शास्त्रियो ने मनुष्य स्वभाव का
श्रादर्श बड़ा उँचा माना है श्राप देखते है-स्वभाव
से मनुष्य शुद्ध और सात्विक वृत्ति का पुतला होता
है। किन्तु परिस्थिति और रहन सहन के प्रभार से
पीछे से उसमें विकार उत्पन्न हो जाते हैं।
पूर्वीय आचायों ने अपने साहित्य में मनुष्य का
वह स्वभाव दिखलाया है जिससे ससार का कल्याण
हो और उसके अनुगामी का श्रेयोमार्ग निर्माण हो।
इसका यह अर्थ कभी नहीं कि स्वभाव के दूसरे पक्ष
अवगुण का अथवा असोंदर्य का उन्हाने कोई वर्णन
हो नहीं किया, वर्णन किया है और खूब किया है,
किन्तु इस प्रकार किया है कि सद्गुणा की आड़ में
उसका श्राभासमात्र ही मिलकर विलीन हो जाता
है। इसका अभिप्राय यह है कि उसका चित्रण पाठक
की मनोवृत्ति को अपनी ओर आकपित करन मे प्रथम
पक्ष की पटुतापूर्ण वर्णनरौली के सामने निर्मल-सा पड
जाता है।अधिकाश मनोवृत्तियाँ आत्मसौंदर्य कीलालसा
में दुर्गुणा की अपेक्षा सद्गुणो की ओर ही आकृष्ट
होना चाहती हैं। कारण, सभी अपने आपको अच्छे
रूप में देखना चाहता है बुरे में नहीं। यथा श्रादि कवि
भगवान् वाल्मीकि की लेखनी से प्रसूत रामचरित्र में
सभी राम या राम पक्ष का बनने की चेष्टा करेंगे,रावण
या रावण पक्ष का बनने की नहीं। कदाचितू, प्रारम्भ में

। । ( ६ ) कोई रावण क वेभव पर मुग्ध होकर रावण बनना भी पसन्द कर ले, किंतु, तब भी, जब रावण के उत्तर- जीवन की हीनता का दृश्य उसके सामन आयेगा वह अवश्य ही सदाचारी रहना, प्रभुता पाकर अभि मानान्ध न हो बेठना तथा परनारी पर कुरष्टिन डालना आदि आदि दुर्गुणों के प्रति घृणा भाव से ही देखने लगेगा। यह हे पूर्वी-साहित्य और यही हे उमका सौंदर्य । और वास्तव में साहित्य निर्माण का ध्येय भी ऐसा करन से ही सफल होता है। साहित्य में जीवन को उन्नत बनान की क्षमता तभी श्रा सकती है जब कि उसका आदर्ग उक्त दृष्टिकोण का लेकर स्थिर किया गया हो। अन्यथा नहा । किन्तु पश्चिम, केवल इस आधार पर कि मनुष्य स्वभाव अधिकाश में स्वभाव से ही बुराइयो की ओर झुम्ना है, अपने साहित्य के प्रादर्श को अन्य रूप में चिरित करके प्राच्य साहित्य के आदर्श से कोसो दूर ले जाता है । यर्याप पाश्चात्य साहित्य-शास्त्रियो ने भी स्वभाव का बहुत ही ऊँचा और सचा तथा सजीव चित्रण किया है, किन्तु फिर भी उनका चित्रण आत्मोन्नति का मार्ग निर्माण करन में नितान्त अस मर्थ सिद्ध हुआ है। और इसी कारण साहित्य के इस ध्येय की कि साहित्य, मसार की उन्नति का मार्ग निर्माण कर सकता है, पूर्ति नहीं कर पाता । पश्चिम स्वभाव चित्रण कला में कहाँ सक सफल মুন্স है ? इस प्रश्न का उत्तर, नाट्य समाट शेक्स- पियर की कुशल लेसनी से प्रसूत विभिन्न नाटको । का एक एक अक्षर स्पष्ट रूप से दे रहा आज का सभ्य-ससार एफ मत से यह मानने को तैयार है कि शेक्सपियर मानर प्रकृति के परीक्षण और चित्रण में अपने ढग का एक हो कुशल शिरपी था। इस का प्रमाण है एक समालोचर का यह वाक्य-"0 Nature 1 0 Shahaperre i rhich of ye dren fron the other!" अर्थात् हे प्रकृति ! हे शेक्सपियर । तुम दोना में कौन किमका प्रतिविम्य हो । बात मच शेक्सपियर न मानन प्रकृति पा तत्तुल्य चिन सींचने में कलम तोड़ दी है। किन्तु इस का यह अर्थ कभी नहीं हो सकता कि पूर्व प्राङ्गण में कभी कोई ऐसा प्रति चित्रण करनवाला फयि हुआ ही नहीं। सिये पश्चिम के विशाल-साहित्य क्षेत्र से स्तिो जोर की आवाज पा रही है। प्रोफेसर हेरीन पुकार पुकारकर कह रहे हैं - Ashakantla by halidns 18 incomparable for its beauty and Idelitz to niture and stands at the head of the Dramatic Literature of all nitions अर्थात् कालिदासरत अभिज्ञान शाकु न्तल प्राकृतिक वर्णन भीर नेसगिक भाव सोंदर्य के सजीव चित्रण में ससार की समस्त जातियों के नाम्य साहित्य म सर्व श्रेष्ठ है।" इतना ही नहा और सुनिये, प्रोफेसर विलसा क्या कह रहे है- "Shakuntla by halidus 18 one of the loveliest pieces in dramatic literature of the world ! अर्थात्-"कालिदास का शकुन्तला

(६१)
नाटक अग्निल ससार के नाट्यसाहित्य में एक
अत्यन्त मनोहर कृति है।
इन उद्धरणो से यह तो भली भॉति सिद्ध हो जाता
हे कि पूर्व का स्वभाव चिनण किसी भॉति भी पश्चिम
से कम नहीं। अब विचार पेवल इतना ही करना
है कि -"कवि ससार शिक्षक है। इस दृष्टि से
साहित्य का आदर्श क्या होना चाहिये ? और प्रान्य
तथा पाश्चात्य दोनो दली में से किस दल का
आदर्श वाछनीय और अनुकरणीय है।
इसमें सन्देह नहीं पश्चिम का यह अनुमान कि
जन समाज की प्रवृत्ति सद्गुण तथा पवित्र भाव
नाओं की अपेक्षा दुर्गुण और दुर्भावनाओं की
ओर ही विशेष रूप में अधिक होती है, उनके
मानव प्रकृतिज्ञान का पूर्ण परिचायक है। मानव
प्रकृति का पूर्ण परिशीलन करने के पश्चात्
ही वे इस निर्णय पर पहुंचे थे। किन्तु अब
प्रश्न होता है कि एक ऐसे व्यक्ति का, जो
साहित्य क्षेत्र में कवि के नाते सदा होता है, या
जिस पर कलाकार के नाते साहित्य निर्माण का
दायित्व है, एक शिक्षक की हैसियत से क्या
कर्तव्य है।
जब कनि का कार्य लोक शिक्षक के रूप में हे तो यह
निविवाद है कि उसे ऐसे माधन जुटाने चाहियें जिन
में वह समाज के दोषों को कम कर सकने में समर्थ
हो । यदि वह ऐमा नहीं कर सकता तो इसका यह
अर्थ हो जाता है कि वह अपने उद्देश्य की पूर्ति

में सफत नहीं हो सका। यस, यहीं से यह स्थान
प्रारम्भ हो जाता है, जहाँ प्राच्य और पाश्चात्य
दोनो दल एक दूसरे से मिन २ दिशाओं को ओर
मुड़ जाते हैं।
पाश्चात्य कविगण जिस सृष्टि का निर्माण करते
हैं, प्रान्य कविगण उससे मिन्न किसी दूसरी ही सृष्टि
का चिन देखते हैं। यदि प्रथम समुदाय में मनुष्य
समाज को रजोगुण और तमोगुण का वाहा रमणीय
स्वरूप दिसाया है तो दूसरे न सत्वगुण के दिव्य
अनादि मौन्दर्य का चिनावरण करके उसकी सूक्ष्म
अनुभूति के लिये अखिल-मसार को आहान किया
है। मात्विक-ससार किस प्रकार सुख सागर है,
समान का उसके अपनाने में कहाँ तक भला हो
सकता है, मनुष्य का चरम लक्ष्य क्या है। आदि
प्रश्नो का पूर्ण उत्तर देना ही दूसरे समूह के कवि
गणों का प्रधान कार्य है। सक्षेप में यह कहा जा सस्ता.
है कि यदि पहिले समूह ने प्रासुरो-सृष्टि पर इसे
विस्मय विमुग्ध बना डाला है तो दूसरे दल ने देवी
मृष्टि के दिव्य स्प का दर्शन कराया है।
शेक्सपियर ने अपनी रचनाओं में आसुरी प्रवृत्ति
को ही स्थान देकर दुमलीला दियाते हुए घोर नरक
की सृष्टि कर डाली है। लेडी मैकबेथ, लार्ड मैक
वैथ रोमियो और जूलियट, ब दस और रिचर्ड .
श्रादि उनकी अमानुषि एव नारकीय सृष्टि के
साधन हैं। जो कठोरता, जो विश्वासघात जो नीच
*शक्मपियर के नाटकों के कतिपय प्रधान पात्र ।
.

। मनोवृत्ति जो निर्दय भावना राक्षसोवृत्ति की विभू तियाँ हैं वे ही सब शेक्सपियर के इन उपरोक्त पात्रो की आत्मा में अन्तहित हैं। जो समाज कवि को अपना रहनुमा मानकर उसके पीछे चलता हे-हम नहीं समझते शेक्सपियर के नेसर्गिक स्वभाव चित्रण का अनुसरण करता हुआ वह कहाँ और कौन से गर्त में पहुँचकर विश्राम लेगा । क्याकि सुन्दरी जूलियट का आसुरी प्रेम प्रदर्शन, लेडी मैकबेथ का विश्वासघात तो श्रात्मोन्नति की दृष्टि से सर्वथा अयोग्य साहित्य की श्रेणी के विषय है। यद्यपि ऐमे स्वभाव और चरित्र पूर्वी साहित्य मे भी देखने को बहुत मिलते हैं। किन्तु कवि ने उन्हें देवत्व की दिव्य छटा में ऐसा स्वरूप दे दिया हे जिससे पाठक की मनोवृत्ति उनके चरित्र की ओर आकृष्ट न होकर उस देवी वृत्ति की ओर ही सिंचती है जिसको पवित्रता में वह आसुरी अपवित्रता विलीन हो जाती है और यही कारण है कि व्यास-वाल्मीकि आदि स्वर्गाय-सृष्टि ५ मष्टा माने जाते हैं। उदाहर- णार्य पूर्वी माहित्य की प्रामुरी प्रवृत्ति के साधन राणाटियो ले लीजिये । रायण का घोर फर्म क्या यम क्टोर और गिन था। जिमने अनेको पियों को माग्यर गएकारण्यको प्रापि अस्थियों का फानन पना दिया था। विन्तु गग के पिज्य-जीया पे गाय- माप मगाज के गागा उपस्थित होने के कारण प्रय मायको या मातो गया कि. गग की -- M.गणना में गयण गिनायासन 11 म का तात्पर्य यही है कि पश्चिमी साहित्य में ईश्वरीय- सत्ता का सर्वथा लोप है-उदाहरणार्थ आप मिल्टन फे महाकाव्य को ले लें । इतना बडा प्रन्थ है पर उममें आसुरी सत्ता के सामो ईश्वरीय सत्ता का लेश भी नहीं दिखाई पड़ता। यहाँ तक हुई प्राच्य और पाश्चात्य कवि दृष्टि की समालोचना । अब हमें थोडा-सा प्रकाश समाज और उसना साहित्य से सम्बन्ध इस प्रश्न पर भी डालना है। कवि अतीत की पोट से, मीने पर्दे की बाद में छुपे हुए व्यक्ति की भाँति अपनी कृति के गर्भ में बैठा सदा एक आदर्श-व्यक्ति के समान पाठक के हृदय पर पडनेवाले प्रभाव के सातो का कार्य किया करत । अस्तु, कवि का कार्य बहुत सोच-समझकर अलम उठान का है। आसुरी मनोवृति का चित्र सींचना कोई ऐमी मुश्किल यात नहीं-उमका तो चलता फिरता चिन म्वयम् मसार ही है। कठिन तो है देवी मनोवृत्ति का चित्र चित्रित करना निसे देखकर नसार अपन श्रेय पामार्ग निश्चित कर सके। मान्य पडितों मे इसी कारण अपने माहित्य को देयो विमृति का श्रागार यनाया है । माहित्य ही वह वस्तु है जो भविष्य को अतीत की मलक दिसाकर अतीत को भविष्य में ला देता है। यदि साहित्य का यह कार्य नहीं होता तो श्राज ससार में उसरा महत्व इनिहासमे यदकर कमी नहीं हुआ होता। इसका एक कारण धीर है, माहित्य अपिल मनुष्य समुदाय का कषि के हदय-रम में रँगा हुया चित्र है। इसी

कारण वह ससार को चाहे जिम ओर ले जा सकने
में इतिहास की अपेक्षा अधिक प्रयल है। और
यही कारण है कि साहित्य का प्रादर्श स्थापित
करते समय बहुत ही सोचने समझने की आवश्यकता
होती है । आदी साहित्य की सृष्टि एक साधारण
कार्य नहीं है-इम कार्य का सुचारु रूपेण सम्पन्न
करना मानवेतर व्यक्ति अर्थात् दवो शक्ति में सम्पन्न
प्रपि, महपिगण ही कर सकते हैं। भारत में यह
कार्य ऐसी ही श्रात्मायो द्वारा सम्पादित हुआ है
जिनमें ईश्वरीय सत्ता का अधिक प्रकाश था और
यही कारण है कि प्रान्य साहित्य संमार के सामने
थाज भी आदर्श माहित्य ही माना जाता है।
इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि साहित्य का
उद्देश्य उसक 'प्रादर्श और सौंदर्य पर निर्भर रहता है।
श्रादर्श समाज की स्थापना के लिये, शुद्ध साहित्य के
निर्माण की आवश्यक्ता है। वर्तमान हिन्दी-साहित्य की
निर्माण शेली अधिकाश पाश्चात्य ढग पर चल रही
है जिसका अन्तिम परिणाम मेरे विचार मे हितकर
नहीं कहा जा सकता । उज्ज्वल चरित्र की उसमे दिन
पर दिन कमी होती जा रही है। स्वभार के पीछे पडे
हुए पाश्चात्य ढग के विद्वानगण उसमें उसी आसुरी
वृत्ति और दुस लीला को स्थान देते जा रहे हैं।
आदर्श साहित्य का उद्देश्य मुख्यत आदर्श-समाज
की स्थापना करना ही है और श्रादर्श समाज-स्था
पना का अर्थ देवी सृष्टि मे है, दानवी सृष्टि से नहीं।
वर्तमान हिन्दी साहित्य जिस सृष्टि का निर्माण कर
.

रहा है--यह सात्विकी सृष्टि नहीं कही जा सकती।
अस्तु, हमें अत्यन्त सतर्क होकर साहित्य निर्माण
की ओर अग्रसर होना चाहिय । जिस भाँति शेक्स
पियर आदि पाश्चात्य तथा व्यास, बाल्मीकि इत्यादि
प्राच्य पडितो द्वारा निर्मित समाज आज हमारे सामने
है उसी भॉति श्राज का समाज भविष्यत् में लोगों
के सामने आने वाला है। प्रत भावी समाज के
निर्माण में ऐसे साधन काम में लाये जायें जिनसे व्या-
सादि महाकवियो की देवी सृष्टि का सुन्दर दृश्य
सहसा अलक्ष्य न हो जाय।
साहित्य ऐसा हो जिसमें सारी मानव प्रकतियाँ
और चित्त-वृत्तियॉ स्थान पाते हुए भी सात्विको वृत्ति
की अन्तर प्रेरणा का लक्ष्य तथा अविकल कार्य
मन्द न पडे । प्राय साहित्य ने इसी बात को सिद्ध
कर दिग्पाने के कारण विश्व-साहित्य में ऊँचा आसन
प्राप्त कर लिया है श्रतएव साहित्यकारों में मेरा नम्र
निवेदन यही है कि उन्हें साहित्य निर्माण मे पूर्व अपना
श्रादर्श और उद्देश्य सोचकर नियत कर लेना चाहिये
और तब लेसनी उठानी चाहिये।
-
नोट -इस लेख को लिखने का विचार मेरे हृदय में
वदिवाबू के एफ बैंगला ग्रंथ को पढ़ने के पश्चात ही
उत्पन्न हुआ था।मैं उनका आभारी हूँ। -लेखक

-
नाटक की मनोवैज्ञानिकता
नाटक काव्य, संगीत और चित्रकलाओं का केन्द्र है
किसी भी क्ला का मानव-हदय से अभिन्न सम्बन्ध
होता है । कला हत्तन्त्री के प्रत्येक स्वर को स्फूति
देती है। हृदय में उल्लास के अलक्ष्य प्रकाश की अनु
भूति पराना ही कला का काम है। कला का सौंदर्य
मानव हृदय का प्रतिबिम्ब है। इसी कारण प्राचार्यों
भे कला को परिभाषा, उपयोगिता और सौदर्य का
साधन पतला कर की है।
भारत देश मानवीय-सस्कृति (Human culture)
तथा कला की प्रादिम भूमि है । इस विपय में
समस्त ससार एफमत हे। सभ्यता की प्रथम रश्मि
- इसी पुण्य भूमि में फूटी है । जब ससार अपनी
. बाल्यावस्था में था तभी भारत में विकास-तत्त्व का
प्रभाव प्रत्यक्ष हो चला था । लोग, आनन्द क्या वस्तु
है ? मसार क्या है ? मनुष्य का ससार से क्या
सम्बन्ध है आदि गूढ प्रश्नों की समीक्षा में सलग्न
रहने लग गये थे।
विकास का सचा अर्थ है द्वन्द्व, द्वेप और चैपम्य ।
क्यो ? विकास के साथ तो शान्ति, प्रेम और साम्य
का मेल होता है, फिर यह उलटा भाव कैसा सच
*An artist's personality is involved in his
work

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( ६७ )
नाटक की मनोवैज्ञानिकता
नाटक काव्य, संगीत और चित्रकलाओं का केन्द्र है
किसी भी कला का मानव-हदय से अभिन्न सम्बन्ध
होता है । कला हृत्तन्त्री के प्रत्येक स्वर को स्फूर्ति
देती है । हृदय में उल्लास के लक्ष्य प्रकाश की अनु-
भूति कराना ही कला का काम है। कला का सौंदर्य
मानव हृदय का प्रतिविम्ब है। इसी कारण आचार्यों
मे कला की परिभापा, उपयोगिता और सौदर्य का
साधन वतला कर की है।
भारत देश मानवीय सस्कृति (Human culture)
तथा कला की आदिम भूमि है । इस विषय में
समस्त ससार एकमत
है
| सभ्यता की प्रथम रश्मि
इसी पुण्य भूमि में फटी है। जब ससार अपनी
बाल्यावस्था में था तभी भारत में विकास तत्त्व का
प्रभाव प्रत्यक्ष हो चला था । लोग, आनन्द क्या वस्तु
है ? ससार क्या है ? मनुप्य का ससार से क्या
सम्बन्ध है श्रादि गूढ प्रश्नों की समीक्षा में सलग्न
रहने लग गये थे।
विकास का सच्चा अर्थ है द्वन्द्व, द्वेप और वैषम्य ।
क्या ? विकास के साथ तो शान्ति, प्रेम और साम्य
का मेल होता है, फिर यह उलटा भाव कैसा। सच
*An artist's personality is involved in his
Work

६, पररवि बनु को-
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( ६ ) यह सब क्या हुआ ? केवल मनोविज्ञान का ऊँचा अध्ययन । ब्रह्मा से बढकर दूसरा आत्मविज्ञानी कौन होगा ? उसने सोचा कि स्वभाव जिस वस्तु का नाम है वह लगभग एक से ही समय में एक सा ही वाता- चरण पाकर एक मे ही प्रकार से बनता, विकास पाता और कार्यरूप में परिणत होता है । इसलिये शुभाशुभ कर्म और भावनाओ का मिश्रित प्रदर्शन जिस प्रक र संसार के सामने उपस्थित हो सके ऐसा कोई साधन सोचा जाय तभी हित हो सकता है। ब्रह्मा का यह विचार नाट्यकलारे स्वरूप में भावो के ( मानसिक, शाब्दिक और कार्मण ) प्रदर्शन का प्रकार बनकर उपस्थित हुआ। यह नाट्यकला समय- समय पर काल नम के अनुसार बदलती सुधरती रही। धीरे धीरे इसने कई प्रकार बदले । किन्तु कहने का तात्पर्य इतना ही है कि सार के मस्तिष्क में एक भारी उथल पुथल मचान का सीधा साधन ब्रह्मा ने नाट्यकला को ही उचित पाया। प्रवल विचार धारा का वेगवान प्रवाह रोक देने की शक्ति इसी कला में पाई। इस प्रकार जिस नाटक का सूत्रपात होता है उस के तीन प्रधान तत्त्व हैं । कथोपकथन, नृत्य और सगीत । नाट्य-वेद की रचना चतुर्वेदान संभव है। इसमें ऋग्वेद से कथोपकथन, सामनेद से सगीत, यजुर्वेद से अभिनय तथा अथर्वण से रस का समावेश किया गया है। जहाँ यह तीन तत्त्व मिलते हैं नाटक का स्वरूप ( ढाँचा। सड़ा हो जाता है। रस तो इन तीनों के मफल समिश्रण का फल है।

। है, परन्तु रिफाग गम ही बिगी यानु को-नी বলি --বৰ আননী-মা মা দুমক है। विपाम का अर्थ थाही देर के लिये बुद्धि में रोलोजिये । हाल घार पर मनुष्य में युद्ध, विजय, भय और बाद मभी दुष्पार यस्तुओं की फामा होगी। पम, या पामा को अपनी पूर्ति को याधफ दुटि को हटाने के लिये माल दृदय मनुष्य को अकारटनारहय पलिये याण कर रेनी। इसीलिये हमा विरामथा द्वन्द्वमा जनप या भाग्नवर्ग में 7 सभ्यता का प्रादिम पुरा इम, सरह का थोता हाँ की प्राचीन जासियों ন য় প্রস্তাব গ ব শ বা था। इसी सपर्प का फल नायकला का जन्म। एप यार जय मानव जाति अत्यन्त अधपता पर परणाई होर देय-नाति पर प्रधान इन्द्र द्वारा परम रिमाणीमा में इम शान्ति के लिये यित परत हा शान्ति स्थापना की प्रार्थना पर वाई । तर प्रक्षा एक सी फ्ला का प्राविर्भाव फरना चाहा जो समस्त जातिया पर एकमा प्रभार हाल मकने में ममर्थ ही सम् । प्रक्षा क म विचार का फल हुधा माणिक पचम येट' नाटायर" की रचना । 14 नाव ५४, गर्व, नारा और नामद करे सोग समय भार बने हुए । गप्पर प्राय- १रभास वारर पर माय गरम् । २ मा सरक समपन् ।

प्रौढ, उन्नत और मनोहर बनकर मनुष्यत्व की रक्षा करती रहती है । इसी प्रनुकरण वृत्ति का परम विकास है नाटक या अभिनय । ब्रह्मा का उद्देश्य नाटक के द्वारा मनुष्य की अनुकरण-वृत्ति का 'वाल्य' छुडाकर उसमें विचार का प्रीदत्त्व स्थापन करना था। नाटक समाज का चित्रण है। सामाजिको का भाव अपना ही चित्र देसकर सहल ही में क्यो बदल जाया करता है इसका सबसे प्रधान कारण है आत्मा- नुभव । एक मनुष्य जिसके मुस पर असावधानी के कारण कालिमा पुत गई और उसे ज्ञात नहीं-उसे कभी नहीं हटा सकता जब तक उसे बतलाया न जाय। और बतलान पर भी उस समय तक कहीन कहीं वह कालिमा रह ही जायगी,जन तक वह दर्पण सामने रसकर उमकी भयङ्करता का और अपने भद्दे- पन का अनुभव खुद न कर ले एव अपनी असाव धानी पर न पछता ले । हाँ दर्पण में अपने कलुपित चहरे को एर बार भी देग लेने पर वह जरा मा भी कालिमाश चहरे पर नहीं छोडेगा, तुरन्त उसे हटा देगा और अपने चहरे के उस कालिमा-कलुपित भोडेपन को सदा हृदय में सुरक्षित रसकर भविष्यत् *The tige plars a prominent part in the growth of a countri It is vot merely a form of 10 crenthun but a thing on which much of a National Socul Inteller tan! Boral cnlture depends- ( ७०) नाटक का रिपय मनोविज्ञान से अभिन्न सम्बन्ध रखता । मानव मस्तिष्क की परिवर्तनशील गति- विधि की पोलोचना का नाम ही नाटक है । नाटक- काव्य फे दृश्य भेद में परिगणित होने के कारण काव्य का मूर्त स्वरूप होता है। किसी भी वस्तु का प्रदर्शन उसके स्वरूप के सम्यक् ज्ञान का द्योतक होता है । सम्यकज्ञान अपेक्षा रसता है तत्वस्तु विषयक-जिसका स्वरूपज्ञान करा ना है-- रूपक व्यवस्था की। श्रर्थात् प्रदर्शनीय वस्तु के अनुरुप स्प निर्माण की कला ही नाटककला है। मनोविज्ञान के पाठक जान सकते हैं कि बालक फ हदय या ज्ञानकोप का विकास दिन २ साधनो से होता है। सर्वप्रथम बालक दृश्य-जगन् के पदार्था को देखकर एक प्रकार का विस्मय करता है। उसके ज्ञानतन्तु परिपक्व न होने के कारण वस्तु निणय नहीं कर पाते । परन्तु वह तत्त्व जो हदय और शरीर को इतना महत्त्व देता है अवश्य अपने अविकसित स्वरूप में हृदय और मस्तिष्क में सन्नि हित रहता है। बस इसीलिये बालक ने जहाँ कोई पदार्थ देसा नहीं कि अनुकरण वृत्ति ने अपना काम श्रारम किया नहीं। सर्वप्रथम बालक का विकास अनुकरण वृत्ति के विकास में होता है। और फिर जीवनपर्यन्त यह अनुकरणवृत्ति उसके स्वभाव के स्वरूप में - - १ मारोपाशुरूपरमाव्यशाख

प्रौढ, उन्नत और मनोहर घनफर मनुष्यत्व की
रक्षा करती रहती है । इसी अनुकरण वृत्ति का
परम विकास है नाटक या अभिनय । ब्रह्मा का
उद्देश्य नाटक के द्वारा मनुष्य की अनुकरण-वृत्ति
का 'बाल्य' छुड़ाकर उसमें विचार का प्रीदत्त्व
स्थापन करना था।
नाटक समाज का चित्रण है। सामाजिको का
भाव अपना ही चित्र देसकर सहज ही में क्यों बदल
जाया करता है इसका सबसे प्रधान कारण है आत्मा-
नुभव । एक मनुष्य जिसके मुस पर असावधानी के
कारण कालिमा पुत गई और उसे ज्ञात नहीं-उसे
कभी नहीं हटा सकता जब तक उसे बतलाया न
जाय । और बतलान पर भी उस समय तक कद्दीन
कही वह कालिमा रह ही जायगी,जब तक यह दर्पण
सामने रसकर उसकी भयङ्करता का और अपने भद्दे
पन का अनुभव जुद न कर ले एवं अपनी असाव
धानी पर न पछता ले । हाँ, दर्पण में अपने कलुपित
चहरे को एक बार भी देय लेने पर वह जरा सा भी
कालिमाश चहरे पर नहीं छोड़ेगा, तुरन्त उसे हटा
देगा और अपो पहरे के उस फालिमा कलुपित्त
भाडेपन को सदा हदय में सुरक्षित रसकर भविष्यत
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growth of n cours It 18 uol meroly a form of
re crention but a thing on which much of a
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में फिर कभी ऐसी असावाधनी न करेगा जिसमें उमे
फिर वैसा ही भीडा वेश बनाना पड़े। ठीक इसी प्रकार
नाटक या अभिनय के आदर्श ( दर्पण) में सामा
जिक, समाज के कुत्सित-वप को देखकर उसे
मुधारने में सचेष्ट हो जाता है। और उसके सौंदर्य
को देखकर उसके अधिकाधिकविकास का साधन
हूँढन लगता है । यह है नाटक का प्रत्यक्ष प्रभाव ।
काव्य यदि दो हदयो की अभिनता का नाम
है तो दृश्यकाव्य । नाटक ) दो हदयो की अभिन्नता
का तीसरे उदय पर या विश्व हृदय पर पड़ने वाले
प्रभाव का।
भाव जो अत्यन्त सूक्ष्म, कोमल और कठिनता से
अनुभव किया जाने वाला तत्त्व है, हदय का विषय
है। हत्य से शन्दों में आकर फिर हृदय पर पहुँचने
में उसका स्वरूप कुछ सण्डित हो ही जाता है। शब्द
तो उसके वाहक मान रहें, यहाँ तक शन्दों का
उपयोग उचित है । श्रव्य काव्य मे यही त्रुटि आती
हे कि वहाँ शब्दाही को भावो का श्राधार बन जाना
पड़ता है । परन्तु नाटक (दृश्य-काव्य ) में कवि
का हगद्त भाव शब्दों की नलिका द्वारा नट के
हृदय में आकर फिर अपनी कमी को पूरा कर लेता
है, और फिर कुछ तो मात्विक अभिनय द्वारा ज्यो
के त्यो नट के हृदय से सामाजिक के हृदय के मूक
मिलन के स्वल्पमें कुछ इङ्गित चेष्टादि कायिक अमि
नयो द्वारा और युद्ध कथोपकथन (शब्दो) द्वारा
पूर्ण रूप से दृष्टा के हृदय में जा पहुँचता है । नाटक

में शब्दो के सहारे दूसरे हृदय तक जाने में भावों
में जो निर्मलता पाती है उसे श्राहार्य अभिनय और
चित्रपटी व्यवस्था पूर्ण कर देती है।
मस्तिष्क निरन्तर क्रिया व्याप्त रहता है । उसके
जानततु जब कभी तनिक भी विश्राम पाते हैं, शरीर
और मन असीम आनन्द का अनुभव करते हैं।
ज्ञान तन्तुओ को विश्रामावस्था या तो घोर निद्रा
कही जा सकती है और या निन्दावस्था । आन
न्दास्वादन का सर्वश्रेष्ठ मावन है काव्य, और
काव्य में भी उसका दृश्य रूप । क्योकि श्रव्य-काव्य
में शब्द रप में उपस्थित भावना का प्रत्यक्षीकरण
मस्तिष्क को स्वय करना पडता है । जहाँ आपने
कोई उपन्यास, कहानी या कथा पढना प्रारभ किया
कि उसमें वर्णित शन्द चिन की मस्तिष्क दृश्य
कल्पना करना प्रारभ कर देगा। ऐसा करने में ज्ञान
तन्तुओ को द्विगुण श्रम उठाना पडेगा। एक पाठन
का और दूसरा दृश्य-करपना का । परन्तु दृश्य काव्य
में न तो उसको पढाना पड़ता है और न दृश्य कल्पना
का कठिन कार्य हो करना पडता, दृश्य काव्य में तो
उमे केवल देखने का कार्य ही रहता है। शेष सारे
व्यापार स्वय उपस्थित होते रहते हैं। ऐसी दशा में
ज्ञान तन्तुओं को एक अजीब विश्राम-सा मिलता है वह
दृश्य फ देखने में और आगन्द में तल्लान हो जाता है।
वस यही दृदय या मस्तिष्क की रसावस्था है।
नाटक जिस वस्तु का नाम हे, वह है मनुष्यो के
विभिन्न कृत्यों की कहानी का प्रत्यक्ष प्रदर्शन या मर्तस्व.

। ७४ ) रूप । नाटक भूत और भविष्यत् को वर्तमानसे मिलाने का साधन है। एक पत्नी-ब्रती राम, चाधर योगेश्वर श्रीकृष्ण, विश्व-वधु युद्ध और विज्योन्मत्त ऐलग्जैन्डर तथा प्रयास पटु नेपोलियन यद्यपिहमसे दूर हो गये हैं परन्तु अभिनय क्षेत्र में वे आज भी हमारेसन्निकट श्रा- कर अपने प्रभाव से श्रात्माको अभिभावित कर देते हैं। इसी विभिन्न कृत्यों की कहानी को वस्तु कहते हैं। वस्तु का विभागक्रम भी मनोविज्ञान के उन सूक्ष्म- सिद्धान्तों के आधार पर किया गया है कि जिनसे हृदय के उद्बोधन और विकास का सम्बन्ध है। वस्तु की दो मीमाएँ हे 'बीज' और 'कार्य'। और उसका मध्य भावना उत्कर्ष की दृष्टि मे 'विन्दु', 'पताका', 'प्रकरी' तीन विभागा में बॉटा गया है। 'बीज' का सम्बन्ध है भावोद्भव से। और 'बिन्दु' का भाव के अकुरित स्वरूप से । इसी प्रकार 'पताका भार 'प्रकरी' का सम्बन्ध उद्दीपन विभावों से है। पताका' और 'प्रकरी' प्रधान वस्तु को अग्रसर । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि बीजस्वल्प भाव को कार्यत्प रसावस्था तक पहुँचाने के लिये पताका' प्रकरी' साधन हैं। 'बीज', 'बिन्दु', 'पताका' और 'प्रकरी' वस्तु को आदि से अन्त तक हृदय के अनुकूल रसने के विकामक साधन है। और नाट्य शास्त्र में इन्हे 'अर्थ- प्रकृति' (Clements of plot) कहते हैं। दृष्टाओं का हृदय विभिन्न विचारों का क्रीडास्थल । होता है। जब तक चित्त एकाम न हो, सामने उप करने के साधन ( ७५ ) स्थित वस्तु का भी ज्ञान असभव हो जाता है। इसी- लिये नाटक में 'वस्तु' की ओर दृष्टानो के हृदय को आकर्पित करने के लिये सर्वप्रथम नान्दो पाठ होता है। नान्दी पाठ से सारी रङ्गभूमि का हल्ला गुल्ला शान्त हो जाता है। धीरे धीरे घटायो की चित्तवृत्ति सासा- रिक अकाण्डताण्डर की ओर मे हटकर नाटक की ओर लगती है। इसी अवसर में प्रस्तावना आरम हो जाती है । नाटक का सार विषय सुनाकर दर्शकों का मन मुग्ध कर लिया जाता है। तब कहीं मुख्य खेल सामने आता है । कहने का तात्पर्य है, नाटक के पूर्व साधन और उसके संचालन नियम सभी मन श्रीर हृदय पर दर्शनीय वस्तु का दर्शकों पर अधिक से अधिक प्रभाव डाले जामे के उपाय है। 'वस्तु' को अधिक उपयोगी और रोचक बनाने के इन साधनों के नाम हैं-नान्दी (choricsong), प्रस्तावना (Prologue , श्रङ्क (Episode) और उप- HET (Exode) हमें यद्यपि नायशास्त्र का इतिहास नहीं देना है, परन्तु यह अवश्य बतलाना है कि वर्तमान हिन्दी मच की श्राज कल क्या दशा है । नाटक जिसका इतना ऊँचा उद्देश्य है, यदि मञ्चोपयोगी न रसा जाकर फेवल पढने के उद्देश्य से ही लिसा जाये तो उसका नाटक रूप में लिसा जाना हमारे विचार में सर्वथा भूल है। क्योंकि पढने के लिये तो उपन्यास ही यहुत है फिर फेवल नाटक के ढंग पर उपन्यास की-सी बातें लिपने से नाटक की क्या प्रमुसता रह ट ।

जाती है। चरित्रचितरण जो नाटक की प्रधान वस्तु
है पाना के व्यापार के स्वरूप में जब तक देखने को
न मिले दृष्टाश्रा सामन नाटफ नाम या कोई
मूल्य नहीं । बल्कि ऐसी रचना तो नाटक नहीं,
नाटक को शैली पर लिसा हुश्रा उपन्यास ही कहला
नेगा।
रग प्रधफ की मनोवृत्ति का नाटक लेखक की
मनोवृत्ति मे जहाँ मोरम माम्य हो मरता है वहीं
नाटक या शुद्ध स्वरप देखने को मिल सकता है।
नाटक प पाना पे चरितचित्रण, नाटक पी यस्तु का
प्रवाह, नाटक में मपर्प मूतफ घटनाओ या समावेश)
उसकी मापा और उद्देश्य तो रसते हैं नाटक्कार
से सम्बन्ध और उसका नश्य-सगठन तथा मच पर
उसके संचालन की दक्षता का सम्बन्ध है रंग
प्रबधक से। दूसरे शब्दो में वह सकते हैं कि नाटक
पार का जय तर रग प्रनय का ज्ञान नहीं, वह
फम में कम-नाटक क रचना प्राध को मचोपयोगी
नहीं बना सकता।
आज कल के नाटक लेसक 'साहित्यिक नाटक'
का ढोल पोट कर नाटक फी अन्त्येष्टि करने में
व्यस्त । अन्छा होता ऐसे लोग उपन्यास लिसने
की कोशिश करते।
हमें यार है हमने एक बार किसी पुस्तक में पढा
था कि माहित्यिक नाटकों में जो गायन फठिन हों,
रंग प्रवधक उन्हें निकाल सकता है और लोक रुचि
फे अनुसार दृमरे गायन चुन पर रख सकता है।

हम पूछते हैं, वह नाटककार ही क्या जो लोकरुचि का अनुभव नहीं कर सकता। फिर क्यो न रग प्रब धक पर ही नाटक लेसन का भार भी डाल दिया जाय। हमने इस निनन्ध के प्रारभ में हो यतलाया है कि नाटक हादिक भावो को मूर्तरूप में प्रकाशित करने का साधन है । श्रव्य काव्य मे नाटक में यही विशेपता है। ऐसी दशा में यह सिद्ध होता है कि नाट्य नियम वे नियम है जिनके द्वारा काव्य का भाव सामाजिको पर प्रत्यक्ष रप में प्रकट किया जा भकता है । इतने बड़े वैज्ञानिक सिद्धान्त का केवल रग नियम न जानने के कारण जो लोग साहित्यिक नाटक लिख र कर सर्वनाश कर रहे हैं वे कहाँ तक उचित मार्ग पर है, यह उत्तर समय ही दे सकेगा। साहित्यिक नाटको ये मुझे कोई आपत्ति नहीं, यदि वे भच पर भी खेले जा सके। साहित्य या काव्य का पहिला सौष्ठव हे 'प्रसादगुण' । और 'प्रसादगुण' का अर्थ ह शब्दो का ऐमा सगठन जिसके सुनते ही हृदय में भावो का चित्र सा खिच जाय । परन्तु वर्त- मान साहित्यिकता का अर्थ इसके विरुद्ध निडम्बना पूर्ण कर्कश एव जटिल शब्द रचना से लिया जा रहा है । फेवल इस कर्कश साहित्यिकता के लिये मनो वैज्ञानिक रग नियमो का अनादर किया जाना किमे रुचिकर होगा, आज दूसरे देशो के मचो को तो देखिये। इतना ही नहीं दूसरी ओर रग प्रबधको की

।
( 7 )
दुनियों में भी अन्धकारमयता का हा स्वराज्य है।
वे लोग भी नाटक प्रदर्शन के महत्व को भूल मे ही
गये है। परन्तु इसमें भी दोष उन्हीं लोगों का है जो
नाटक लेखन का दायित्व पूर्ण कार्य उठाये हुए हैं।
वे लोग यदि स्वय मच के विषय में युछ टूटाफूटा
ज्ञान रसते हो तो ऐसी मनमानी रंग व्यवस्था कभी
न हो सके । अस्तु, हमारा विचार है कि एक नाट्य
कार उस समय तक कुशल नहीं कहा जा सकता,
या उस समय तक उपे नाटक लिखने का कोई अधिकार
नहीं जबतक उसे नाटक के नियम, विभाग, वृचि,
सधि, प्रलंकार, उसकी व्यवस्था करने वाले, तोरिय,
वेपधर, चित्रज्ञ, माल्यकृत, पाभरणकृत्, मुकुटकृत्,
तथा कथावस्तु फे उत्कर्षक अर्थप्रकृति आदि
जिनका मच से ही मुरय सम्बन्ध हे, ज्ञान न
हो एक मोटी बात है, जिन वस्तुओं का वह
उपयोग नहीं जानता उनका अन्ध वर्णन नाटक में
क्याकर उचित रूप में कर सकता है। पाठ्य-नाटक
लिसनेवालों से जरा पृछा जाय, यदि वे इन सबका
उपयोग जानते हैं तो फिर उनके नाटक मच पर क्यो
नहीं खेले जा सकते हैं, और यदि उन्हें फेवल लिसने
से ही काम हे-चाहे कुछ ही लिसें-तो फिर उस
कृति को नाटक नाम क्या देते हैं ?
एक नाटककार का कर्तव्य होता है कि यह नाटक
की रग व्यवस्था को ध्यान में रसकर ही-'नाटक'
जिस रचना का नाम वह रसना चाहता है-उसके
लिये लेखनी उठावे।

(७)
धान पश्चिम में भी यह विवाद चल रहा है। परतु
अधिकाश लोग नाटक की उपादेयता मचोपयोगी
होन पर ही मान रहे हैं। ऐसे लोग उँगलियों पर
गिनने लायक हागे जो पाठ्य नाटक की भी युथ
मत्ता मानते हा । इसका कारण यह है कि 'नाटक'
जिस कला का सूचा करता है यह है भावना चित्रण
फला। पारा विचारने की बात है, एक इतना पाठिन
एव मूक्ष्मतर काम जिस माधन में सम्पन्न होता है,
उसकी इतनी लापरवाही । और फिर इतना ही नहीं
उसकी उपयोगिता पर फोर्ड विचार न करते हुए
उसकी विन्ती उड़ाना । हमारे विचार में सरासर
भारत की आदिम विभूति पर लात मारने के सिवा
युछ भी नहीं।
श्राज यदि हिन्दी मच की स्थापना घाञ्छनीय है
तो हमें अपनी सारी शक्ति लगाकर-भारत की उसी
प्राचीन भाव चित्रण बलाफ साधन-स्वरूप-अभि
नय शैली की उपयोगिता का प्रचार करता पड़ेगा।
नाटयकार और रग प्रयधफ की आत्मा का एकीकरण
हो हमारे निकट स्वतन हिन्दी मच का निर्माण हो
सफने का साधन हे पार दूसरा नहीं।

-
--
8
वादत्रयी
(रहस्यवाद, छायावाद एव सकेतबाद)
C. Cमाज जिस वस्तु का नाम है वह
तीन वस्तुओं का समष्टि स्वरूप
है । धर्म, नीति और सामा
जिकता ( यहाँ सामाजिकता
शब्द भाव है-ये माधारण
रहन-सहन क सिद्धान्त और व्यवहार जो आमतौर
पर समाज में प्रचलित है ) यही तीन वस्तुएँ जहाँ
एकता ग्रहण कर लेती हैं। ममाज का स्वरूप सम्पूर्ण
हो जाता है।
धर्म, नीति और जीवनचर्या ( सामाजिक्ता) का
यतिस्प जय सार्वजनिक रूप धारण कर लेता
है तभी उसका नाम समाज पडता
जिस प्रकार वायु और जल निस्तध नहीं रह
सकते उसी प्रकार ममाज का हृदय कभी विचार
शून्य नहीं रह सकता । उसमें विचार लहरी का
ताँता कभी टूटने नहीं पाता।
आदान प्रदान का भाव मनातन है। मानव-शरीर
में, सृष्टि के विकास में, समाज को स्थिति में, विश्व
फे संचालन में प्रत्येक में ही यह आदान प्रदान
व्यापार होता आया है।
सामाजिक क्षेत्र में इसी आदान प्रदान विक्रिया को

। (१) 'विचारधारा' नाम दिया गया है । जब यह 'विचार- धारा' शब्द अपने विस्तृत दायरे मे पहुँचता है तो पूर्व और पश्चिम के नेतिक जीवन की पर्यालोचना प्रारंभ हो जाती है। पूर्व और पश्चिम का सम्मेलन या मपर्प हो वर्त मान युग की सबसे बड़ी समस्या है। विश्व-जीवन की प्रगति इसी संघर्प फ प्रतिफल स्वरूप में हमारे समक्ष प्रकट है । जैन जैसे पूर्व और पश्चिम का सामीप्य दृढ होता हभायना परिवर्तन के रूप में आदान प्रदान-बाद परिपुष्ट होता जाता है। वस्तुत यि आध्यात्मयुग और चात्य भौतिकयुग दोनों का एकीकरण ही वर्तमानयुग का विकास सूब है। सर्वप्रथम विकार, भाव में आता है। तब कही कार्यक्षेत्र में उसका फल दिसाई पड़ता हे । अस्तु, फहन का तात्पर्य है कि उस आदान प्रदान प्रक्रिया का सबसे पहिला प्रभाव हमारे साहित्य पर पडा। साहित्य किसी जाति का भावना कोप होन क नाते समाज क व्यष्टि स्वरूप-धर्म, नीति और सामा जिकता सीना का सामंजस्य होता है। अत दो भावनाओं का संघर्प, दो जातियो का सघर्प, दो राष्ट्रो का सघर्ष एक दूसरे के भावना-कोप (साहित्य), जीवन गली, नीति और धर्म तक प्रभाव डालता है । यह बात दूसरी है कि अधिक जीवनी शक्ति जिम जाति के भावों में होगी वह उतनी हो ज्यादा निर्लिप्त रह सकेगी। परन्तु साधारण

( ८२ )
नियम यही है कि विजित जाति पर विजेता जाति
का प्रभाव अधिक पडता है। परन्तु भारत इस
नियम का सर्वथा तो नहीं बल्कि कुछ अशों में
अपनाद स्वरूप ही है।
पूर्व की जीवन-ज्योति का आधार अभी तक
श्राध्यात्मवाद । जब कि पश्चिम विकृत भावुकता
के बल पर व्यवहारवाद के असत्य नाम से जीवन
जागृत करने में सफलता का ठेकेदार बन रहा है।
परन्तु लक्ष्य होना का यही है कि विश्व जीवन में
साँस दीर्घ काल तक अक्षुएण स्प से चलती रहे।
किन्तु वर्तमान में अंधकार दोनों ओर है। पश्चिम
में जीवन का एकमात्र आधार भौतिकवाद है और
पूर्व में धार्मिक भावना का अतिरेक ।
जव पूर्व और पश्चिम में भावो के आदान प्रदान
को माना जोर पकड़ गयी तब पूर्व में एक नवीन
भावनाकोप का जन्म हुआ। और यही नवीन भावना-
कोष है पादत्रयी का विवाद सड़ा करने का हेतु ।
नवीन भावना-कोप को हम नवीन विचारधारा
भी कह सकते हैं । परन्तु विचारधारा एक प्रकार
मे मस्तिष्क का विकार होता है जब कि भावना हृदय
का सस्कृत एव मूर्तम्वरुप ।
प्रस्तुत लेस फ विवेचनीय पादत्रय में रहस्यवाद
का स्थान पहिला है। रहस्यवाद का विकास हृदय
और मस्तिष्क दोनो से सम्बन्ध
रसता है। जहाँ
तक रहस्य का अर्थ शुद्ध आत्मतत्त्व से सम्बन्धित
हैं वहाँ तक रहस्यवाद का क्षेत्र हृदय रहता है।
।

।
( ३ )
और जहाँ इसका हृदय से सम्बन्ध हटने लगता है
वहाँ विचारतत्त्व का प्राधान्य बढने के कारण यही
रहस्यवाद मस्तिष्क का विषय बनने लगता है
मनुष्य की रचना का मूल्य हृदय और मस्तिष्क की
सूक्ष्म किन्तु सरहस्यमय स्थिति पर ही है। इन दोनों
ही अगों में विकार होना ससार मे प्रवर्तित होने
का श्रीगणेश है। भावना हृदय की अयत्नसाध्य
सूक्ष्म क्रिया हे श्रार विचार तत्व (तथ्यातथ्त निर्णय)
मस्तिष्क के विकास क्रम के अनुसार स्वत प्रस्फुटित,
विवेक कोप के ज्ञानतन्तुओ को कोमल प्रकम्पना
है । वस्तुत रहस्यवाद का अधिक सम्बन्ध है हृदय
मे ही । अन्तरात्मा के शुद्ध स्वरूप का सौंदर्य के सहारे
सहसा स्मृतिगम्य हो सकना ही रहस्यवाद कहलाता
है । अथवा ब्रह्म या ईश्वर की काल्पनिक प्रतिमा
का सयोगिक साक्षात्कार तथा स्पष्ट अभेद्य एवं
तात्कालिक अनुभव ही रहस्यवाद
यह तो हुआ रहस्यवाद का वास्तविक स्वरूप ।
रहस्यवाद का यह स्वरूप भारत के प्राचीनकालीन
पि, महर्पियो न खूब समझा है । हिन्दी-साहित्य में
भी दादू, कबीर, नानक और दुसरे-दुसरे भक्त एव
सन्त कवियों ने रहस्यवाद के इसी स्वरूप को सोल
कर समझाने का प्रयत्न किया है। प्रकृति और
परमेश्वर का रहस्योद्घाटन करने में सप्रयत्न रहकर
जहाँ तक हो सका इस ओर पर्याप्त सोज की है।
परन्तु जहाँ हृदय का कृत्रिम स्वरूप मस्तिष्क के
विवेक-कोप पर अपना असत्य आरोप करता है
है

-
( ४ )
वहाँ से जो रहस्यवाद नाम का एक नवीनवाद
निकलता है वह हे वर्तमान हिन्दी साहित्य में
प्रसिद्धि पानवाला 'छायावाद'।
छायावाद ब्राम या ईश्वर के साथ श्रात्मा का
सभवत मयोग-साक्षात्कार और तात्कालिक अनु-
भय का सिद्धान्त है। क्योंकि हृदय का आडम्बर
पूर्ण श्रारोप और मस्तिष्क का विवेक पूर्ण वैशिष्ट्य
हो इसके जनक है।
छायावाद के लिये लजियन कवि मेटरलिंक
कहता
Those institutions, grasps of guese,
1 bich pall the more into the less,
Mahing the finite comprehand infinity
जर मे पूर्व और पश्चिम का भाव-संघर्ष हुश्रा है,
अमेजी भाषा कysticsn' शब्द के रहस्यवाद'
और 'दायावाद' दोना ही पर्यायवाची सममे जाते हैं।
वैसे तो रहस्यवार शन्द अपन मूल अर्थ में
भावना या आन्तरिक अनुभूति का नाम है, जिसमें
मनुप्य दृश्य-जगत् की गुफ प्रेरणा मे अभिभावित
होकर सामान्यसत्ता पी सोकरके उसके माथ
साक्षात् एघ सयोगिक सम्बन्ध की स्थापना कर
लेन पर एक अलाविक वैमर को प्राप्त हो जाता है।
एक सच्चे रहस्यबादी के लिये समार के सभी
पदार्थ नमनन्त मत्ता के द्योतक जो स्वयम् एक
घड़ा भारी रहस्य हैं। जिम प्रकार एक कलाकार
की कृति मा सादर्य उमके स्वय के स्वरूप का

परमा
अनुभव करा देने में समर्थ होती है उसी प्रकार
दृश्य - विश्व उस परम श्रेष्ट कलाकार का भाव
सामीप्य स्थापित कर देन में श्रेष्ठ साधन का कार्य
करता । इसका कारण है कि उस कलाकार की
कला की कलात्मकता पर मुग्ध होकर हम जर अपने
स्वरूप को भुलाते हैं तब हमारा इस कला के-जिसे
देसकर हम निजत्व से परे पड जाते हैं-कलाकार के
साथ तादात्म्य स्थापित होने से साक्षात् सयोगिक एव
स्पष्ट सम्बन्ध स्थापित हो जाता है।
यद्यपि यह सब कुछ होता बाह्य जगत् के ससर्ग
से ही है परन्तु इमको अन्तिम अवस्था~ -जो
नन्द दशा होती है उसका इन पाहा (सामारिक) उप
करणी मे काई मम्बन्ध शेष नहीं रह जाता है। यह
है काल्य में रहस्यवाद का स्थान ।
जहाँ रहस्यवाद को प्राथमिक अवस्था उपस्थित
होकर रह जाती है वहाँ रहस्यवाद का नाम 'छाया-
चाद' होता है। वर्तमान हिन्दी साहित्य ससार में इसी
'छायावाद' की छाया नज़र आती है । बत्कि इतना
भी नहीं। अब तो लोग ऐसी रचना को छायावादी
रचना कहने लगे हैं जिसका कोई अर्थ स्पष्ट नहीं हो,
लिष्टता जिसका आधार हो, अनर्थ जिसकीयात्माहो।
कहाँ वह विश्वात्मभाव जहाँ रहस्त्र का उद्गम
होता है। और कहाँ उमकी वर्तमान परिभाषा ।
यहाँ छायावाद और रहस्यवाद का भेद स्पष्ट करने
के लिये यह कहा जा सकता है निरिश्वात्म का ऐसा
विचन जिसमें विचारतत्त्व का आडम्बरपूर्ण हृदय

से सयोग रहे, वह छायावाद । और जहाँ अनुभूति- पर्ण सयोग रहे यह रहस्यवाद है रहस्यनाद का स्वरूप बदलते पदलते छायावाद और छायावाद का सिद्धान्त फिसलते - फिसलते सफेतवाद का रूप ग्रहण कर लेता है। हिन्दी साहित्य में आजकल या तो छायावादी या सकेत- पादी दो ही प्रकार के कनिया का प्राचुर्य है। सकेतवाद (Symbolism) एक प्रकार का कविता का वह ढंग हो सकता है जिसमें प्रकृत के द्वारा अप्रकृत का बोध समेत रहता है । इस शैली को 'मूर्तवाद' भी कह सकते हैं । हृदय की भावना का इजहार किसी तद्र.प सक्त के सहारे प्रस्फुटित होता है। दृश्य-जगत क पदार्थों का प्रतिविम्य या छाया सकेतवादी कवि के विचरण क्षेत्र की सीमा धनाते हैं। सक्तवादी का कार्य प्राकृतिक पदार्थों की कला- स्मक्ता सोजना है। ससार का कोई भी पदार्थ अनुपयोगी नहीं । प्रत्येक पदार्थ की रचना एक मसलहत~ रहस्य-है । इसी रहस्य को आदर्श दृष्टि से प्रकाश में लाना सतवादी का उद्देश्य होता है। सकेतवाद का क्षेत्र वाह्य विश्व का और विचार तत्त्व का सम्पर्कस्थल है। सफ्तवादी का विचारतत्त्व जब कभी अधिक विकसित हो जाता है, वह सफेव -दृश्य पदार्थों -का लोप करके भावना की ललित-लहरियो पर उतराने लगता है। उपयुक तीनों ही वाद यद्यपि हमारे यहाँ प्राचीन- नया ( ८७ ) काल में भी प्रस्तुत थे, परन्तु हिन्दी साहित्य का वर्तमान स्वरूप-जो निस्सन्देह पूर्व और पश्चिम का टकर से विचारधारा का परिणाम है-आज इसी वादनय का एक अनूठा और विवादास्पदस्वरूप लेकर उपस्थित हो रहा है । अथवा यह हमारे प्राचीन श्राचार्यों के विचार विनिमय मिद्धान्त के स्वाप में हजारों वर्ष पूर्व, ससार के जागने से पहिले ही, उपस्थित हो चुके हैं। यह तो बात ही दुमरी है समय के प्रभाव से उनका विलोप न होकर फिर उद्भव होन का नया साधन पाने के कारण वे स्प, नई परिभाषा और नया विवेचन पाकर पुराने होकर भी नये हो जायें। साधारणतया विचारधारा के दो मुख्य विभाग हो सकते हैं (१) प्राज्ञानिक और (0) वेज्ञानिक । प्राज्ञानिक विचारधारा या घौद्ध विचारो का सम्बन्ध भावना से है। हमें शास्त्रों ने बतलाया है कि असिल ससार एक ऐसे हृदय का भाव चित्र है जिसकार हस्य जानना कठिन ही नहीं दुस्माध्य है। प्राचीन अन्वेषकों ने भाव चित्रों को व्यक्त करने के लिये निदान विद्या से कार्य लिया है। हमारे देवी देवताओं की मूर्तियाँ भावनाओं के व्यक्ति स्वरुप हैं । भाव एक ऐसी सूक्ष्म वस्तु जिसका कोई चित्र नहीं बन सकता । परन्तु फिर भी भाव समीतको ने उनके आकार निश्चित करने की चेष्टा की है।

। ? नगरम के लिये पहिले अध्यायों में घतला चुके हैं कि यह नव प्रकार की चित्त वृत्तियाँ हैं। सभी काभ्याचार्यों ने रस को भावात्मक वस्तु माना है। इन नव भावना प्रधान अवस्थाओं के निदान विद्या के अनुसार रग, स्वरप और कार्य कल्पित किये जाकर इन् चित्ररूप दे दिया गया है। आप देखते हैं, काला रंग शोक का चिह्न है। क्यो? किम सिद्धान्त के आधार पर कालेपन से और शोक से क्या मतलय ? श्वेत रग ही कीर्ति फा द्योतक क्या माना जाय श्रीर दूसरा रंग क्या नहीं। इन विवेचनात्मक प्रश्ना का उत्तर यही है कि निदान विद्याने भावनात्रा को न्यत करने पसाधन- स्वरूप यह सफेत नियत कर दिये हैं।श्राप देख सकते है टो में से दो को शेप करने पर शून्य शेप रह जाता है। यद्यपि शून्य का कोई महत्व नहीं परन्तु 'नास्ति' का भान हृदय में जो विकार उत्पन्न करता है उसका सफेत यह शृन्याकार (0) है । अस्तु, हमार शास्त्री में मक्तवाद का सूत्र इम रप में-जो सकेत का वास्तविक और तथ्यरूप मिलता है। वर्तमान सकेताद का सून यद्यपि वही निदान विद्या है। परन्तु आजकल उममें श्रीर वर्तमान सकेतवाद में रात दिन का अन्तरस्पष्ट है । प्राजकल सतवाद को रहस्यवाद के साथ मिला देने का एकान्त एव अविकल प्रयत्न चल रहा है। और इसका कारण है दो विचार धाराओं का सघर्प। - ।

विचार-वैभव पर कतिपय सम्मत्तियाँ महामहोपाध्याय १० श्रीगिरिधर शर्मा जी चतुर्वेदी व्याकरणाचार्य, प्रिंसिपल महाराजाम मस्कृत-कालेज, जयपुर । श्रीयुत प० प्रभुनारायणजी 'साहित्यरत्न' 'सहृदय' 'नाट्या चार्य विरचित विचार वैभव' पुस्तक के बहुत से अश मैंने अरधान पूर्वक पढे हैं। इसमें सहदयजी ने फरिता सम्बन्धी रस आदि अनक विषयों पर दार्शनिक गति से मार्मिक विवेचना को है । नवीन ढग की लेप शैली में प्राचीन विचारो का समर्थन इम पुस्तक में मिलता है । यह एक नई और महत्त्वपूर्ण यात है। अब तक नवीन ढग से इन विपयों पर लिसी हुई जो पुस्तकं टेम्पो गई हैं, उनमें प्राय शब्द जाल में मिद्धान्त छिप जाता है, मन्थकार का मन्तव्य क्या है--यह कई अशों में दुर्बोध हो जाता है, किन्तु हर्प की बात है कि सहदयजी को इस पुस्तक में यह दोष नहीं है। आपकी भाषा में सिद्धान्तों का स्पष्ट प्रतिभास है। कुछ

(२)
स्थाना में वापसे मेरा मतभेद अवश्य है, किन्तु ऐसी महत्त्वपूर्ण
पुस्तक लिसकर सहृदयजी ने हिन्दी साहित्य को अच्छी सेवा की
है-यह कहने में मुझे कुछ भी संकोच नहीं । सहृदयजी को मनन
शीलता पर मुझे पूर्ण परितोप है। में श्राशा करता हूँ कि हिन्दी
साहित्य क्षेत्र में यह पुस्ता मुयोग्य प्रतिष्ठा का उपयुक्त स्थान प्राप्त
करेगी, और सहृदयजी के द्वारा श्रागे भी ऐमी साहित्य सेवाएँ
होती रहेंगी।
श्रीयुत प्रोफेमर दयाशङ्करजी दुबे, एम०ए०, एल एल वी.
अर्थशाख-अध्यापक, प्रयाग-विश्वविद्यालय,
तथा
भूतपूर्व परीक्षा मन्त्री हिन्दी विश्वविद्यालय
प्रयाग
यह पुस्तक विचारपूर्ण है और बड़े परिश्रम से लिखी गई
है । इस उत्तम पुस्तक के लिसने के लिये मैं सहृदयजी को हादिक
बधाई देता हूँ। सम्मेलन परीक्षाओं के तथा अन्य विश्व विद्या
लयो की उच्च परीक्षाओं के विद्यार्थियों के लिये यह बहुत उपयोगी
सिद्ध होगी।
Shriyut Anand Shanker Bapu Bhar Dhruva, MA,
Pro Vice Chancellor,
Benares Hindu University
Vichar-Vaibhava is a good book It brings
certain new points of view to bear on the principles
of Sanskrit Literary criticism
I wish however, it
had a more modest title

Mr Som Nath Gupta MA,
Lecturer in Hindi Literature
Jaswant College JODHPUR
I have gone through Vichar-Vaibhava of Mr
Prabhu Narain Sharma and the impression his book
has left on me is very good It is a pleasure to see
Mr Sharma putting all the necessary requisites of art.
criticism relating to Literature in such a short volume
His style is decent and expression beautiful combined
with a flow in language-only I wished the language
to have been less difficult
I am confident Mr Sharma will go on enriching
Hindi with his writings which some day are bound
to be real acquisitions in our Literature
I wish him success and hope that his Vichar
Vaibhava will be appreciated by both scholars and
students alike

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Vichar Vaibhav

Author
Sharma,prabhunarayan
Title
Vichar Vaibhav
File name
Vichar Vaibhav
Text
OCR done
Citation
1934
Published
2011/04
Publisher
Jaipur,sahitya Pathshala
Language
Sanskrit
Pages
114
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
552276
Barcode
4990010033023.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
n7KxdNSqhT4
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