Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Sahitya Chintan Avam Samixa Drasti

Dr. Jagdish Sharma · 2011/03

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

प्राचार्य रामचन्द्र शुक्ल
साहित्य-चिन्तन एव समीक्षा-दृष्टि
डॉ. जगदीश शर्मा
हिदी विभाग
जोधपुर विश्वविद्यालय
तथा
डॉ. रमाकात शर्मा
हिदी विभाग
राजकीय महाविद्यालय
मिरोही
किताब
महल

---
प्रथम सस्करण १९८६
मुख्य वितरक
१
२
किताव महल एजे सोज
८४, ३० पी० क्वड गड,
इलाहाबाद-३
क्तिाब महल एजेन्सीज,
अशोक राजपथ, पटना-४
किताव महल डिस्ट्रीब्यूटम,
२८, नेताजी सुभाष माग, दरियागज
नई दिल्ली-२
किताव महन एजेसीज,
मनोज बिल्डिंग सेण्ट्रन बाजार रोड,
रामदास पेठ, नागपुर-१०
३
४
मूल्प पच्चीस रुपये
प्रकाशक किताब महल, १५ पानहिल रोड, इलाहाबाद
मुटक सुभाष प्रिटस, १५ नेवादा सी०एस०पी० सिंह माग, इलाहाबाद

.
अति अपार जे सरित बर जो नृप सेतु कराहि ।
चढि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं ।।
(रामचरितमानस, बालकाण्ड)
-

No text on this page.

प्राक्कथन ऐतिहामिक दृष्टि से हि दो आलोचना का विकास आचाय रामचद्र शुक्ल के पहले से माना जा सकता है, रितु उसे गति शुक्लजी ने ही दी। साहित्य व सम्बध मे उनको अपनी एक दष्टि भी। उनके माहित्य सम्बन्धी मतव्य एक गहरे आत्मविश्वास और अपूर्व दढता से सम्पन है। इमीनिए शुक्नजी के साहित्यालोचन म उन आग्रह दुराव रहित दिसनाई देन है, लेकिन वे आग्रह उनकी साहित्य समानोचना का सवस्व नही है । साहित्यानुशीलन का एव मश्लिष्ट अभिगम म गुक्लजी ने दिया है। इस अभिगम का वैशिष्टय यह है कि यह साहित्य का जीवन सम्बद्ध मानने का आग्रह रखत हुए भी उसकी साहित्यिक मूल्यक्ता प्रति समर्पित रहा है । शुक्लजी के बाद हिदी आलोचना मे एकाधिक प्रकार से जो एकागिता पनपी उससे गुक्लजी मुक्त थे। परवर्ती आलोचका ने अपने अपने दृष्टिकोण का समथन जुटान के लिए शुक्लजी की साहित्य दष्टि की जो व्याख्याएँ को है उनसे उनब मत की सरिलष्टता खडित हुई है । प्रस्तुत पुस्तक म उनके साहित्य चितन और समीक्षा दष्टि की उस सश्लिष्टता को रेखाक्ति करन का प्रयत्न किया गया है। इस पुस्तक र अतिम दो लेख डा. रमाकात शर्मा द्वारा लिये गए हैं । शेप लेख मेरे हैं। इस पुस्तक के प्रकारान का दायित्व अपन ऊपर लकर किताब महल, इलाहाबाद हम दोनो लेखको को चितामुक्त रिया, इसके लिए मैं दोनो पी आर सविताव महत ये स्वत्वाधिकारी श्री इद्रीश कुमार अग्रवार तथा उनरे साहित्य-सलाहकार श्री नम- देश्वर चतुर्वेदी के प्रति हार्दिक तज्ञता ज्ञापित करता हूँ। २८ मई, १९८५ मगीगार्मा ने

क्रम
२
२
१ साहित्य चितन का विकास
२ शुक्लजी का सौदयशास्त्र
३ रस दृष्टि
४ आचाय शुक्ल की साहित्याशसा
५ समीक्षा पथ
६ समीक्षा के आग्रह
६

अध्याय साहित्य-चिन्तन का विकास माहित्य के मबध मे आचाय गुक्ल १९०१ ई० मे १९३९ ई० तक निर तर मोचते विचारते रहे। उनके इस मोच-विचार को उनकी अध्ययनशीलता से नये-नये आयाम भी मिलते रहे। यही कारण है कि उहोने जहा मे प्रस्थान किया और जहां वे पहुंचे, उमवे बीच निर तरता बनी रहने पर भी यह लगता है कि उहोंने एक लम्बी चितन-यात्रा तय की थी। उनके आगे बढ़ते जाने के क्रम को यदि ध्यान से देखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि शुक्मनी के माहित्य-चिनन का विकास एक निश्चित दिन म हुआ है। गुक्तजी वे 'पविता क्या है' शीपक लेग्य का पहला रूप १९०९ म सरस्वती म प्रकाशित हुआ था, १९२२ म उमवे आरम्भ म उहोने एक नया अश जोडा और १९२९ म उमम बहुत परिवतन पर एक लगभग नया ही लेख तयार कर दिया। 'कविता क्या है के इन तीनो मस्करणा की यदि तुलना की जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा वि इस दौरान काव्य व सवध म अनक नय विचारविदु शुक्लजी के सामने आए है जिनसे उनकी काव्य चेतना के नये आयाम उदघाटित होने के साथ ही उन जनक बलो मे भी सशोधन हुआ है जिनको उनके काव्य-चिन्तन के आरम्भिक काल म प्रमुखता मिनी थी। बाद के अनेक लखामकाव्य के विपय म भले ही समग्रत विचार न किया गया हो, फिर भी विचार के नये मुद्दे निरतर मामने आते रह और विचारणीय ममस्याआ म परिवतन के साथ नय सरोकारो समावेश न उनके अवधान वा केद्र बदल दिया। कविता क्या है शीपक से निखे गए पहले लख का स्वर उपयोगितावादी है। इस लेख के पहले ही वाक्य म कविता की सायक्ता 'मनुष्य भाव की रक्षा' म मानी गई है । यद्यपि आग चलकर यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य-भाव या मनुष्यता की रक्षा 4 सवध म शुक्लजी की परिकल्पना नितान नतिक न होकर सो दयपरक भी है, फिर भी पविता को मनुष्य भाव की रक्षा का साधन मानन से उसकी उपयोगिता की २/ साहित्य नि तन या विभाग भावना प्राट हाती है । नपिता ना विनाम की मामग्री माना ग निषेध परत हुए शुक्नजी ने इग य म निसा है कि महान कविया वो रचनाला ग मनारजन होगा तो चरित्र सशोधन भी अवश्य ही होगा।' उनवी मा यताह नि"नरित्र चित्रण द्वारा जितनी मुगमता मशिक्षा दी जा मरती है, उतनी मुगमता म विगी और उपाय द्वारा नहीं।'' यह इमत्रिण कि 'हत्या को द्रवीभूत परी उह अपन स्वाभाविक धम पर लाने का मामथ्य कायम ही है। इम लव म गुक्तजी न कविता का दम मीमा तक एक उपयोगी वस्तु माना है कि वे उम 'ओपधि' तक कर गए है।' 1 फिर भी शुक्नजी न काव्य का प्रयानन 'मनुष्य भाव' की रक्षा मानकर मनुष्य को मवेदनातय होने में बचान म उसकी भूमिका रेखाक्ति की है। मवेदना यता का जो उदाहरण शुक्रजी न इस प म दिया है, उसमे स्पष्ट है कि मनुष्य भाव की रक्षा से उनका नाय सहृदयताको रक्षा भी है । यह उदाहरण मिमी उप याम व एक प्रसग का है जिमम जपने पुत्र द्वारा अपनी पती पत्नी को घर म निकाले जान का विरोध किया जान पर एक बनिया कहता है चल चल, भोली सूरत पर मरा जाता है। इस पर टिप्पणी परत हुए शुक्लजी न तिम्वा है "माह । वसा अमानुषिक बर्ताव है | सामारिव वधनो म पमकर मनुष्य का हृदय इतना कठोर और बुठित हो माता है कि उसकी चेतनता---उनका मानुष भाव-यम हो जाता है। न उस पिसी का रूप माधुय देखकर उम पर उपकार करने की इच्छा होती है, न उस किमी दीन दुपिया की पीडा देपपर करणा जाती है न उस अपमानसूचक बात मुनकर श्रोध जाता है। एसे लोगा मे यदि मिमी नोभहपर अत्याचार की बात कही जाए तो, मनुष्य के स्वाभाविक धर्मानुसार, व गोर या घणा प्रकट करन के स्थान पर रवाई के माथ यही कहेगे, जान नगे हम से क्या मतलब, चला अपना काम देखो ।' ५ इम टिप्पणी म यह बात बहुत माफ हो जाती है कि अमानुपिक बर्ताव से गुक्लजी का अभिप्राय आत्मके िद्रत हृदयहीन व्यवहार से है। इस प्रकार के व्यवहार की प्रेरख मनोवत्ति को उहोन महाभयानक मानसिक रोग की सना दत हुए यह माना है कि कविता इमी मरज की दवा है। ६ इस उक्ति म यह निहित है कि १ चितामणि भाग ३, पृ०९३ २ वही, पृ० ९३ ३ वही पृ० ९२ ४ वही, पृ० ९४ ५ चितामणि, भाग ३, पृ०९४ ६ यही, पृ० ९४ D साहित्य चिन्तन वा विकाम/३ मानसिक रूप से स्वस्थ होने वा अथ महृदय होना है। सहृदयता मनुष्य का स्वाभा- विक घम है और सहृदयता म सौदर्यानुरक्ति तथा लोक्मम्पक्ति दोनो अतभूत है। लकिन यह नहीं कहा जा सकता है कि इस लेख म कविता को स्थन म्प से उपयोगी कतई नहीं माना गया है। इस लेख म कविता को चरित्र की शिक्षा दने और काय म प्रवत्ति बढ़ाने का माधन भी बतलाया गया है । इसके माथ ही वपना की चर्चा काव्य की प्रभाव गक्ति के स्रोत र स्पम की गई है "मप्टि के पदाथ या व्यापार विशेष मो कविता इस तरह व्यक्त करने लगती है, मानो वे पदाथ या व्यापार विशेष नेत्रों के सामने नाचने लगते हैं। व मनिमान दिखायी देन लगते हैं। पविता की प्रेरणा से मनोवेगो का प्रवाह जोर से बहने लगता है। तात्पय यह कि कविता मनोवेगो को उत्तेजित करने का एक उत्तम साधन है। १ कल्पना को कविता की प्रभाव गक्ति का स्रोत मानते हुए भी इस लेख मे गुननजी न रचना सौदय की बात न करके सृष्टि सौदय का ही उल्लेख किया है और भौतिक मोदय की उपे ा न करते हुए भी मानमिक मोदय पर बल दिया है तथा मोदय को नैतिक प्रयोजन का माधन माना है 'सदाचार म एव अलौविक सौन्दय और माधुय होता है। अत नोगा को सदाचार की ओर जापित करने का प्रस्त उपाय यही है कि उनको उमका मौन्दय और माधुय दिवाकर लुभाया जाय जिसमे ये चिना आगा-पीछा मोचे मोहित होकर उसकी ओर ढर पडें ।' २ इम लेख म शुक्लजी न काव्यभापा लाक्षणिक मौदय श्रुति मुखदता और जनकारो के विषय म भी विचार किया है, वितु इस तरह कि मर मानो वाव्य के अतवर्ती घटव न होर उमदे मी दय को बढाने वाले तत्व हा, मानो काव्य म उनी स्थिति जानुष गिक हो। इमके माथ ही यह भी उखनीय है कि इस लेख म वाय पर विचार करते ममय उसके प्रभाव पथ को प्रमुखता दी है, रचना-पा को नहीं। प्रश्न नाहे मानुप भाव पा हो, चाहे मोदय का, चाह नतिकता का चाहे कल्पना का पाह भापा सा, चाहे जनवारा का शुक्रजी का ध्यान वात्य व प्रभाव पक्ष पर प्राय रहा है। इस प्रकार प्रस्थान काल म रजीवी दष्टि म रचना या कवि यम या वसा महत्व नहीं रहा है, जमा उम्फे मानवीय प्रयोजन का। 'कविता यादवीपर रेस अगले मस्य रण (१० ) म भी यली पी -टि-पयोगिताया रही है, लेकिन उपयोगिता परिवरपना पहले पी पुसमाग १ चितामणि, भाग ३, पृ०९९ २ वही,पृ. ९३ ४/साहिरप चितामा विकाम . गूधम हो गई है । इस गमरण ग भी सविता मी नमा प्रवायाम' (फानन )म्प म आरम्भ हुई है और अभी ना क्लजी कविता को गाधन मानवर ही धन हैं । इस बार पविता का वाय 'रागा मक मम्मध की रक्षा और निवा' बताया गया है। यहाँ आवर 'मानुप भाव की रक्षा का आशय स्पष्ट हो गया है और मनोवगा वो उत्तेजित परने जैसे उद्बोधनात्मय काय ग ययिता को बचाया गया है। उगये स्थान पर यहाँ शुक्लजी ने पविता द्वारा मनोवगा व परिवार की बात कही है 'वह (कविता) जिस प्रयार प्रेम, गोष, वाणा, घृणा आदि मनोवगा या भावा पर सान चढाकर उह तीक्ष्ण वरती है उमी प्रवार जगत ये नाना रूपा और व्यापारा माथ उनका उचित मम्ब प स्थापित करना भी उद्योग परती है। स्पष्ट है रि यहाँ भी कविता वी मोद्देश्यता की धारणा बनी रही है, किन्तु उमये स्वरूप म मुधार हुआ है। इस बीच अध्ययन के विस्तार व पतस्वरूप क्जी वविना का विचार एवं य परिप्रेक्ष्य म करते दिखनाई रते हैं। विधामवादी मिदा त स परिचय हो जाने पर वे मप्य के मनोज विष विकाम प्रकाश में पिता को दखन लग थे। इम नय परिप्रेक्ष्य म उह पविता महत् यता को मार प्रतीत हान वे स्थान पर मनोज विर' विकाम के फ्लम्वरूप आस्वाद्य जान पडी। अब कविता मानुष भाव की रक्षा के प्रयोजन का भी अतिरमण पर गई। जाहिम मानवीय भाया की तुष्टि र माथ पर नि और मनुष्य ये आदिम गाहपय व मरवारापी भी बाहर बनकर वह शुक्रजी मे समक्ष आर्ट। परिवर्तित दृष्टि व अनुमार कविता 'उन मूल और आदिम वृत्तिया का ध्यपसाय है जो मजीव मष्टि के बीच सुख-दुख की शुभूति म विरुप परिणाम द्वारा अत्यत प्राचीन काल म प्रकट हुइ और जिनके मूत्र से मेष सृष्टि के साथ तादात्म्य वा अनुभव मनुष्य जाति आदिकान मे करती चली आई है । २ स्पष्ट है कि शुक्लजी की *प्टि म कविता जब मनुष्य वे भावा की उत्तेजक और सहृदयता की साधक न रहकर तादात्म्य व अनुभव को विरामलब्ध प्रक्रिया बन गई। शुक्लजी को इस मोड पर प्रतीत हा वि कविता तादात्म्य की दिशा म प्रयोजित नही होनी प्रत्युत गप सृष्टि वे माथ तादात्म्य की आनिम मनोवति स उद्भूत होने और विकास के भीतर उस सस्वार को वहन करन को फ्लस्वरूप काव्य की प्रक्रिया म तादात्म्य की प्रवृत्ति अनायास ही अतनिहित होती है। कविता से असम्पक्त रहने वाला मनुप्य तादात्म्य की प्रवत्ति स अता रहकर आत्मप्रस्त, हृदयहीन और जड हा जान का खतरा मोल लेता है १ धावाय शुक्ल प्रतिनिधि निबध (स० मुधार र पहिय), पृ०६६ २ प्रतिनिधि निबंध, पृ० ९१ साहित्य चितन मा विकास / "रागो या वेगम्यम्प मनोवृत्तियो का सृष्टि के साथ उचित सामजस्य स्थापित कर कविता मानव जीवन व व्यापपत्र की अनुभूति उत्पन करन का प्रयास करती है। यदि इन वत्तिया को समेटकर मनुष्य अपने अत करण व मूल रागारमा अश को शेष सृष्टि से किनारे कर ले, तो फिर उसव जड हा जान म क्या सदेह ह ? यदि वह लहलहाते हुए खेता और जगला, हरी घास के बीच घूम-घूम कर वहत हुए नाला, काली चट्टानो पर चांदी की तरह ढलते हुए झरनो, मरियो स लदी अमराइया, पटपर के बीच खडे झाडा को देखकर क्षणभर लीन न हुआ, यदि कलरव करते हुए पभिया के आनदोत्सव मे उसने योग न दिया यदि खिल हुए फलो को देख वह न सिला, यदि सुदर रुप देख पवित्र भाव से मुग्ध न हुआ, यदि दीन- दुखी का आतनाद सुन न पसीजा, यदि आआथो और अबलाआ पर अत्याचार होत दख श्रोध से न तिलमिलाया,यदि हाम्य की अनूठी उक्ति पर न हँसा, तो उसके जीवन म रह क्या गया? ' इस लख म शेप सष्टि का साथ जिम रागात्मक सम्बन्ध का प्रतिपादन किया गया है, वह 'मानुप भाव म आग की चीज है क्याकि इसम प्रकति वणन के साक्षात्कार रो उत्पन आनद भी सम्मिलित है। यह रागात्मक सम्बध कविता का उद्दिष्ट न होकर उसका प्रात धम है। इस प म कविता का उपयोग यही रह जाता है कि वह सहृदयता को माघती है। 'कविता क्या है इस सस्करण म १९०९ वाल संस्करण में समान ही एक उपशीप' 'काय म प्रवत्ति' दिया गया है । इम उपगीपन के अधीन १९०९ के सस्करण की सामग्री तो रमी ही गई है, आरम्भ म कुछ नये वाक्य भी जोडे गय है जिनम काय की प्रवृत्ति बढान मे कविता की भूमिका की व्याख्या सौ दयानुभूति और आत्मप्रसार व सम्बध से की गई है "कविता हमारे मनोभावा को उच्छ्वसित करक हमारे जीवन म एक नया जीवन डाल देती है, हम सष्टि सोदय को देखकर मुग्ध हाने लगते हैं हम जान पडता है कि हमारा जीवन कई गुना अधिक होकर ससार मे व्याप्त हो गया है। इस प्रकार कविता की प्रेरणा से काय म प्रवत्ति बढ जाती है।' शुक्लजी न इस लेख म 'रागात्मक सम्बघ' का विचार 'रम स्पम भी किया है । ऐसा करत समय उहीन 'रस' की अवधारणा को नवरस की रूढिबद्ध परि- कल्पना की सकीणता से मुक्त पारन की वाह भी प्रक्ट की है। प्रकृति वर्णन क सोय! ज १ प्रतिनिधि निबंध, २ वही, पृ० ६५ २ मल - पृ०६५-६६ ६/साहित्य चितन का विकास के लिए नवरस की परिमिति म अवकाश होत हुए भी शुक्लजी न उमम रस मानने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि हिंदी वाला न "रस की नौ नालियों के भीतर एसे शुद्ध वणन के लिए कोई गडदा न पाकर 'रसात्मव वाक्यम' म असतोष प्राट किया है । पर अस ताप नाली वनान वाला के प्रति हाना चाहिए था, रम के सिद्धात व प्रति नहीं । प्राकृतिक दश्या के वणन मे एक प्रकार का रस अवश्य है चाह उस अभिवचनीय कहिए, चाह उसका काई नाम रखिए, चाह उस किमी रस के भीतर कीजिए। १ लगता है कि शुक्लजी सौ दर्यानुभूति को 'रम का नाम देन का आग्रह कर रह है जिसका मूल म शप सप्टि क साथ मनुष्य रे गगात्मा मम्बर की रक्षा और निवाह की भावना निहित है। कविता क्या है' के तीसरे सस्वरण म शुक्लजी का काव्य चितन अधिव सश्लिष्ट रूप म सामने आया। अब तक शुक्लजी न काव्य की पहचान सहृदयता र सम्बध से की थी, किन्तु सहृदयता को अभिव्यक्ति जितनी काव्य क प्रसग म हाती है, उससे अधिक उसक बाहर होती है । यहाँ तक पहुँचकर शुक्लजी का लगा कि काव्य म सहृदयता विशेपित होनी चाहिए। इसलिए इस लख म उहान काव्य के सम्पक मे व्यक्त सहृदयता को रस दशा' कहकर उसे पारिभाषिक रूप दिया । अब 'मानुष भाव और 'रागात्मक सम्बव ने 'हृदय की मुक्तावस्था का स्प ले लिया। इस मोड पर शुक्ल जी ने इस अवस्था को व्यक्तिवद्धता से मुक्ति ही नहीं कहा, उस अद्वतवाद की भूमि पर भी प्रतिष्ठित किया सम्पूण सत्ताएँ एक ही परममत्ता और सम्पूण भाव एक ही परम- भाव में अतभूत है । अत बुद्धि की क्रिया से हमारा नान जिस अद्व त भूमि पर पहुँचता है, उसी भूमि तक हमारा भावात्मक हृदय इस सत्त रस र प्रभाव से पहुंचता है। काव्य म सहृदय को शब्द विधान ही इस भूमि तक ले जाता है, यह बात उहोन पहली बार जब अनुभव को। इसलिए इस बार शुक्लजी न व्यक्तिबद्धता से मुक्ति की माधना वे साथ उसमे शद विधान की भूमिका का उल्लख भी विया 'हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य को वाणी जो शब्द विधान करती आई है, उस कविता कहत है।' कविता की इस परिभाषा म आस्वाद पक्ष ( रस दशा या हृदय की मुत्ता वस्था) के साथ उसके सजन पर ( शब्द विधान ) का भी ममावश है। काय का प्रयोजन व्यक्तिबद्धता स मुक्ति मानन के बावजद इस मोड पर भी शुक्लजी का दष्टिकोण एकातत आध्यामिक नहीं रहा है। काव्य द्वारा अद्वैतवादी भूमि पर पहुँचाय जान की बात कहन के साथ ही उदोन व्यक्तिबद्धता स मुक्ति के १३ - १ प्रतिनिधि निबध पृ० ६७ २ वही, पृ०६५ चितामणि, पहला भाग पृ० १५१ ४ वही, पृ० १४१ जाती है। १ साहित्य चितन का विकास/७ सौकिन अभिप्राय की भी चर्चा की है। उनकी मायना है कि पाविना "मनुष्य के हृदय को म्वाथ सम्बधा मचिा मडन म ऊपर उठावर लोक सामा य को भूमि पर ले इस भूमि पर पहुंचे हुए मनुष्य को कुछ काल के लिए अपना पता नहीं रहना । वह अपनी सत्ता को लोकसत्ता मे लोन किए रहता है । शुक्लजी की दृष्टि म 'हृदय की मुक्तावस्था का अथ 'हृदय वा प्रगार' है। यह अवस्था नदतिय होन क माथ ही नतिर भी है। उन्हान इसका सम्बध मौदय की ध्यापन अनुभूति मे मानते हुए उसे मनुष्यता को उच्च भूमि कहा है। इस सम्र मे उहोने लिखा है 'वदर को शायद बंदरिया के मुह म ही सौदय दिखाई पड़ता होगा, पर मनुष्य पशु-पक्षी, फूल पत्ते और रन-प पर म भी सौन्दय पाकर मुग्ध होता है । इस हृदय प्रसार या स्मारक स्तम्भ काव्य है जिसको उत्तेजना से हमार जीवन म एक नया जीवन आ जाता है। हम सृष्टि के सोदय को देखकर रस-मग्न होने लगते हैं, कोई निष्ठर काय हमे असा लगने लगता है। २ यह अवस्था शुक्लजी की दृष्टि म, कोई असाधारण अवस्था न होकर हृदय को प्रकृत दा है। इसी नाते उहोन उस मनुष्यत्व की उच्च भूमि पर पहुँचन का माधन माना है "विता ही हृदय को प्रकृत ,दशा म लाती ह और जगत् के बीच उसका अधिकाधिक प्रसार करती हुई उसे मनुष्यत्व को उन्च भूमि पर ले जाती है । '३ शुक्लजी न रस दशा का अद्वैत भूमि पर पहुंचान पाली मानत हुए भी 'अद्वैत को भावयाग कहकर लौविक अभिप्राय म परिणत कर दिया है "भावयोग की मवरो उच्च क्क्षा पर पहुँच हुए मनुष्य का जगत के साथ पूर्ण तादात्म्य हो जाता है उसकी लग भाव मत्ता नहीं रह जाती, उसका हृदय विश्व- हृदय हो जाता है। * इम लख म क्लजी न मनुप्यन की व्यापक अनुभूति का यद्यपि अद्वैत को अनुभूति वे सम्मथ स भी देखा है, फिर भी विकास सिद्धात स प्राप्त साहचय क पुरातन सस्कार की धारणा छोडी नहीं है। १९०२ म शुक्लजी न जादिम सस्वारा की चचा सवदनशीलता या रागात्मव सम्बध की दृष्टि मे की नी, १९२९ म उनका यह मत अधिक विकमित रूप म सामन जाया। १९२० म कायगत प्रपति वणन मे उद्गुद्ध मोदयानुभूति को उहान 'रग' के अतगत रखन का आग्रह किया था १९२१ म उहाने उमे 'साहचय-मम्भूत रम'' कहा । १ चितामणि पहला भाग, पृ० १०१ - वही, पृ० १५९-६० ३ वही, पृ० १६० ४ वही, पृ० १६० ६१ । वही, पृ० १५० ८/साहित्य चितन का विवास । और इम साहवय म भावा और स्पो की अतनिबद्धता के स्रोत की खोज की "जिन रूपो और व्यापारो स मनुष्य आदिम युगो से ही परिचित है, जिन स्पा और व्यापारी को सामन पाकर वह नर जीवन के आरम्भ से ही लुब्ध और क्षुब्ध होता आ रहा है, उनका हमार भावो के साथ मूल या सीधा सम्बय है। अत काव्य के प्रयोजन के लिए हम उह मूल रूप और मूल व्यापार यह मक्ते है।"१ शुक्लजी ने अनक स्थलो पर रसानुभूति के लिए 'भावो के विषयो के मूल और आदिम रूपा तक जाना आवश्यक माना है । उनका कहना है कि 'जब तक भावो से सीधा और पुराना लगाव रखने वाले मूत और गोचर रूप न मिलेग, तव तक काव्य का वास्तविक ढाँचा खडा न हो सकेगा। रमानुभूति के लिए वाव्य का वास्तविक ढाँचा खडा करन और उसके लिए मूत और गोचर रूपा को उपलब्ध करन की बात कहकर शुक्लजी न वाव्यास्वाद का मजन पक्ष से सम्बद्ध कर दिया है। पहल क 'कविता क्या है शीपन लेखा म जहाँ काव्य चर्चा व कद्र म सहृदयता निप्पन्न जास्वाद हो था, वहाँ १९२९ के इसी शापर के लख म आस्वाद की काव्य वस्तु पर निभरता और काव्य वस्तु की सजन सापाता पहली बार तीना पपा के परस्पर गुथाव के साथ सामन आइ। इस सश्लिष्ट विचार प्रप्रिया कापलस्वरूप उहोन इस लख म यह स्वीकार किया कि "उक्ति ही काव्य होती है, यद्यपि यह मान लेन । बावजूद उक्ति की विलक्षणता को वे काव्य मूल्य मानन व विरुद्ध रह । उस उहोंने 'उक्ति चमत्कार' कहकर निम्नतर श्रेणी की वस्तु माना। सहृदय का आत्म प्रसार ही उनकी प्टि म अन तक काव्य का प्रयोजन रहा । उक्ति वी साथरता उहोन इसा म मानी "हृदय पर जो प्रभाव पड़ता है, उसके मम का जा स्पा होता है, वह उत्ति ही के द्वारा। पर उक्ति के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह सदा विचित्र, अद्भुत या लोकातर हो-एसी हो जा मुनन म नहीं आया करती या निगम बडी दूर की गूश होती है। एमी उक्ति जिसे सुनत ही मन विसी भाव या मार्मिक भावना (जस प्रस्तुत वस्तु का सौन्दय आदि) मलीन होकर एकबारगी क्थन में अनूठे ढग, वण वियाम या पद प्रयोग की निशपता, दूर की मूझ, पवि की नातुरी या frपुणता इत्यादि का विचार करन सग, वह काव्य नहीं मूक्ति है। पविता क्या है पहले दो मस्परणो म कल्पना की पचा काव्य की प्रभाव तिम साधन प म दी गई थी तीगरे संस्करण म उमरा विचार पहली बार १ चितामणि, पहला भाग, पृ० १४२ वही, पृ. १४५ वही, पृ.१७० ४ वही, पृ० १७१ साहित्य चिन्तन वा विकास/९ - . राजन के कोण में किया गया है "कवि म विधायक कल्पना अपेशित होती है और श्रोता मा पाठक में अधिकतर ग्राहक !"१ शुक्लजी की महृदयता-चेन्द्रित काव्य दृष्टि म विधायक कल्पना रस-सचार का माधन ही वनकर रही, उसका अपना महत्त्व उन्होन स्वीकार नहीं किया "क्सिी प्रमग वे अतगत मा ही विचित्र मूतिविधान हो, पर यदि उसम उपयुक्त भाव सचार की क्षमता नहीं है तो वह काव्य के अन्तगत न होगा। कविता की भाषा पर विचार करते ममय वे अधिर वस्तून्मुख अवश्य दिखलाई देते है । अयत्र उन्होंने जहा विम्ब प्ररण की ही बात कही है, वहाँ भाषा के प्रसग म बिम्ब विधान या मूनि-विधान की बात भी उन्होंने कही है "मूति विधान के लिए वह (कविता) भाषा की लक्षणा शक्ति से काम लेती है ।" फिर भी भाषा की चचा उहोने इस प्रकार की है जसे वह काव्य वस्तु का अविच्छेद्य अग न हाकर उससे जुडी हुई वस्तु हो। शुक्लजी की काव्य-दृष्टि म जो अद्वैतवाद अतभूत था, उमम वह द्वैत सप नही सपता था जिसम आस्वादक अपनी स्वतत्र सत्ता बनाए रम्बार काव्य-वस्तु का सौदप -उसका रचना-विधान---का अवलोकन और आकलन कर मके। यही कारण है कि कान्य वस्तु की विलक्षणता का महत्व उन्होन स्वीकार नहीं दिया। उनका कहना था "केवल अमाधारणता की रुचि सच्ची महृदयता की पहचान नहीं।"३ फिर भी 'कविता क्या है' के तोमर मस्करण म शुक्लजी काव्य मौ दय के सम्म प म पहले की अपक्षा अधिक उदार दिखलाई देते है। इस लख म उ हाने 'रमणीयता' का काव्य मूल्य के रूप म स्वीकार किया है (इसलिए भी कि रमणीयता म तादात्म्यपरव' सो दयानुभूति के लिए नवकारा या) और काय को क्ला मानते हुए सगीत और चित्रकला से उसका सम्बध स्वीकार किया है "काव्य एक बहुत ही व्यापक कला है। जिस प्रकार मूर्तिविधान के लिए कविता चित्र-विद्या की प्रणाली का अनुमरण करती है, उसी प्रकार नाद सौष्ठव के लिए वह सगोत का सहारा लेती है।' इसके साथ ही गुवाजी न एक महत्वपूर्ण बात यह कही है कि काव्य मे वणन प्रणालिया के सौन्दय की सम्भावनाएँ अनत है। अनादि काल से अब तक उसके असभ्य रूप हमारे सामने आए हैं और आग भी आते रहगे फिर भी उमम नित्य न्तनता के लिए अवका रहेगा । इसीलिए गुलजी न अलवारा की गिनती करना अनुचित माना है "कोन वह मक्ता है कि पाया म जितन रमणीय म्पल है मब ढढ निकाल गए है वणन की जितनी सुदर प्रणानियां हो सकती हैं, मव निम्मपित हो गई, आदि काव्य P १ चिन्तामणि, पहला भाग, पृ० १६१ २ दही,१० ११२ १०/साहित्य नितन का विकास १ रामायण मे लवर इधर ता य वाच्य मन नातिनी विवि प्रणारियां भरोपी हैं जान निर्दिष्ट की गई है, जिनके कुछ नाम रखे गा है । गुपनजी का मत बहुत स्पष्ट है। वणन प्रणानिया T गोदय पी जात गम्भावनाआ की बात करते हुए भी वे काय व मौन्य को गन प्रणालिया--जिर वे जलकारा पा पयाय मानते है- गौत्य म निहित मानन व पिए तयार नहीं है। लकिन यह बात अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। अधिय महत्व इग वात का है कि पारिता क्या है य तीमर और अतिम मस्करण तक पहुँच र गुनजी न पाव्य रा सम्बन्धित मुद्दा पर ही ध्यान बद्रित किया है । इसम पहल नर उनकी काव्य चर्चा जहा पाव्य को जीवनानुपगा क मध्य रखबर उमर आम पाम की गमस्याआ पर मँडराती रहती थी वहाँ कविता क्या है ीपक स लिये गए अतिम लय म मानो पविता का 'क्लाज अप प्रस्तुत किया गया है जिसम कविता का स्वाप विस्तार के साथ उपलब्ध है, जबकि जानुपगिव मुद्दे विचार क्षेत्र व वाहर चल गए हैं । माहित्य चितन का अतिम चरण म गुक्तजी क जवधान ना कद्र याव्य वस्तु बन गया। पहले शुक्लजी जहाँ लोक क म भ म काव्य का विचार रत थ, अब वहाँ व काव्य म अवतीण लोक की चचा करन नग। उहान यह मान लिया कि 'कविता अभिव्यजना है, वह अभिव्यक्ति या विकास को लकर चलती है।' यह दष्टि उम दप्टि से स्पष्टतया भिन है जो काव्य को सवेदनशीलता के उदवोधा या रम व नात ही महत्व दती थी। काय कोजभिव्यजना या विशाम के रूप म लन का फरिताथ यह है कि काय की सत्ता उसके शरीर म है भले ही उमा प्राण उमकी रमवत्ता म निहिन हा । इस चरण म पहुँचान पर शुक्रजी व माहित्य चिन्तन म कल्पना का विचार अपनाकत अधिक प्रखरता पा गया। हिदी माहित्य सम्मेलन र चौबीमव अधिवशन क यक्ष-पद म दिय गये भाषण म शुक्लजी न भापा के चार प्रकार यो अर्थो- प्रत्यन, जनुमित आप्तापन और कल्पित की चचा करते हुए कहा कि "कल्पित अथ का प्रधान क्षेत्र का य है ।' २ यह मानत हुए भी कि "काय को हम जावन स जलग नहा कर सक्त', उहाने का य म जीवन की अवतारणा म कवि की कल्पना की भूमिका रेखाक्ति की है "बुद्धि जपनी सूक्ष्म प्रिया द्वार, विशेष मनन और चितन द्वारा उमका (जगत का) निम्पण करती है और कवि की प्रतिमा या कल्पना द्वारा उसे गोचर और मार्मिक स्प मे सामने रखती है।" १ चितामणि, पहला भाग, पृ० १८० २ वी भाग २ पृ० १२७ ३ वही, पृ० १४७ ४ वही, पृ० १५७ साहित्य चिता का विकास /११ लोव और काव्य ये बीच वि पर दष्टि पडन पर शुक्लजी न काव्य म लार व भावा वो भी अव कवि के भाव की दष्टि मे दमा। इसव फलस्वरूप अब शुक्नजीव काव्य चिंतन म बीजमाव की अवधारणा न जम लिया और उहोन काव्य-विधान वा भेदकर उस मून म निहित वीजभाव में मम्बध से भी रस क सम्बध म विचार विया । उहोन लक्ष्य दिया कि काव्यास्वाद की प्रक्रिया म कई वार हमारा तादात्म्य पात्र विशेष स नहीं होता, हम उसब शीन वैचित्र्य से ही प्रभावित होत है। काव्यास्वाद की इस कोटि को भी उहान 'रम क अन्तगत रया और उसका सम्बध भी तादात्म्य तथा साधारणीकरण से माना। इस प्रकार वी रमा मकता को मध्यम कोटि की मानत हए उन्होंने लिखा "इम दशा म भी एक प्रकार का तादात्म्य कवि वे उस भाव के साथ होता ने जिमय अनुरूप वह पात्र का स्वम्प सघटित करता है। जो स्वरूप कवि अपनी कल्पना मे लाता है, उसके प्रति उसका कुछ न कुछ भाव अवश्य रहता है, वह उमर किमी भाव का आलम्बन अवश्य होता है । अत पात्र का स्वम्प कवि क जिस भाव का जालम्बन रहता है पाठर या दा के भी उमी भाव का आलम्बन प्राय होता है।। स्पष्ट है कि जब शुक्तजी के लिए वाव्य प म कवि की सृष्टि विचारणीय बन गई यद्यपि इस नात कल्पना की नूतन और विलक्षण सप्टि का महत्त्व उहान अत तव स्वीकार नहीं किया। फिर भी इतना तो हुआ कि उहान काय पर कवि कम मम्बध मे विचार करना आरम्भ क्यिा । ऐसा होने म उन्हान काव्य की चचा जनक बार क्ला म्प म की है । इसम सदेह नही कि अनेक बार उहान काव्य को 'कला मानन का विरोध भी किया है, लेकिन इस विरोध का लक्ष्य या तो इस शब्द का क्लावादी अथ म प्रयोग रहा है या कारीगरी के जथ म प्रयोग अथवा काममूत्र का वह दष्टिकोण जिसके अनुसार क्ला भोग-विलास की वस्तु है । भापिक मजना व म्प म शुक्लजी न का य को नना माना है और अनक बार 'काव्य क्ला शद का प्रयोग उहाने दिया है। उहान इटन + उस वर्गीकरण का भी विरोध किया है जिसके अनुसार एक प्रकार का काव्य 'शक्ति काय है और दूसरे प्रकार का 'कला काय । इस प्रमग म उहाने लिखा है "डटन न शक्ति-काव्य से भिन जो क्ताचाव्य (Poetry as an art) कहा है, वह कला का उद्देश्य क्वल मनारजन मानकर । वास्तव म क्ला को दष्टि दोना प्रकार के काव्यो मे अपेक्षित है । माधनावस्था या प्रयत्न पक्ष कालकर चलन वाल काव्या म भी यदि कना म चूक हुई, तो लोकगति का परिचालित करन वाला स्थायी प्रभाव न उत्पन हा सकेगा।" १ प्रतिनिधि निबंध, पृ० १२२ २ वही, पृ० १०६ ३ वही, पृ० १०३ १२/साहित्य-चितन का विकास जमा कि उनकी चितन प्रणाली स स्पष्ट है, शुक्रजी की दष्टि म काश्य या अधिक गम्भीर श्रेणी का प्रभाव भाव-जगत से सबधित था । इमलिए उहोन भाव मोदय की चचा जी भरकर की है । यह तथ्य उल्लखनीय है कि अतिम चरण के लखन म शुक्लजी की रुचि लोकमगल और सौ दय के समीकरण म व्यक्त हुई है। काव्य म लोकमगल की साधनावस्था और सिद्धावस्था, दोना म आनद क्ला की अभिव्यक्ति मानत हुए उहोन लिखा है कि काव्य म लोकमगल की प्रतिष्ठा "धमशासक की हैमियत से डरान के लिए नही . "कला को दष्टि म मोदय का प्रभाव डालन व लिए होती है। इसी आधार पर शुक्लजी ने पि मोदय और कम मोदय के अत सम्बध का प्रतिपादन करत हुए तिखा नै "आज भी किसी कवि स राम की शारीरिक मुदरता कुम्भवण को और कुम्भकण की कुरूपता राम को देत न बनगी।"२ अतिम चरण में पहुंचकर शुक्लजी न 'सौ दय व स्वरुप की व्याख्या म रुचि लत हुए लक्षणा क बल पर उहान उसका व्यापक अथ किया है। सोदयको मूलत 'दशन वृत्ति की रागात्मक दशा कहकर 'कम सौ दय , 'नाद मौदय आदि म उहोन लक्षणा से इस शब्द के अथ विस्तार की व्यारया की है। यह करत हुए उहोन प्रयत्न तथा उपयोग पक्षा मे 'मी दय के स्थिर और गतिशील भेद किये है। कला से सौन्दय के सबध पर प्रकाश डालत हुए उहाने लिखा है 'रूप जोर गति दोनो दृष्टि का विषय है। अत दशन वत्ति को तुष्ट करने वाले दो प्रकार के विषय ठहरते है, रूप और गति । प्रयत्न पभ म गति की रचिरता का वणन माधनावस्था के अतगत आ चुका है। उपभाग पप म गति की रचिरता हम नत्यकला आदि म दिखाई पड़ती है । इस प्रकार दशन और श्रवण दोनो वे उपभोग पक्ष को लेकर कई क्लाओ का प्रादुर्भाव हुआ- दान की तुष्टि का लिए चित्रकला, मूर्तिकता और नत्यक्ला का श्रवण की तुष्टि व लिए मगीत का। ३ इसके माथ ही उहोने यह चेतावनी भी दी है कि "यह न समझना चाहिए कि उपभाग पक्ष की तुष्टि ही काव्य का एकात ल य है । रसात्मक तुष्टि का क्षेत्र उपयोग वनि के और जाग तक है।' ४ . क्ला ये माथ काव्य व सबव को लेकर गुक्लजी न जिम प्रकार कई बार अप्रमन्नता प्राट की है, उमी प्रकार मोदय के साथ काव्य के सबध को लेकर भी वे कई १ प्रतिनिधि निबध, पृ० १०५ २ वही, पृ० १०६ ३ वही, पृ० ११० ४ वही पृ० ११०११ १ साहित्य चितन का विकाम | १३ स्थानो पर नाराज दिखलाई देते हैं, लक्नि एमा प्राय वहाँ हुआ है जहा उहे सो दय सजावट का स्थानापन जान पड़ा है। उदाहरण कनिए, जब ग्वीद्रनाथ ठाकुर ने माहित्य के धम को कोठार और रसोईघर के विपरीत टाइगम का बम कहा, तो शुक्नजी न उनक मत य को 'मजावट की रचि कहकर अस्वीकार कर दिया। शुक्लजी के साहित्य-चितन के अतिम चरण की एक देन यह है कि उहाने वाव्य म रम की स्थितियो को रुप रचना के साथ जोड कर रखा। रम मिद्धात के इतिहाम म गायद पहली बार शुक्नजी न रम और स्पक मबध को सामन रखकर रस के विधान म कल्पना की भूमिका को समझा “समार मागर की रूप-तरगो से ही मनुष्य की कल्पना का निमाण और इसी को रूप गति से उमके भीतर विविध भावो या मनो विकारा वा विधान हुना है। पाश्चात्य साहित्य चर्चा म कल्पना को अत्यधिक महत्त्व दिया जाने मे म्प्ट होते हुए भी गुक्तजी ने इतना अवय माना कि "काय वस्तु पा गारा रूप विधान कल्पना की क्रिया स होता है।' वस्तुत शुक्लजी का रोप कल्पना को जीवन स विच्छिन जोर क्ल्पना-मष्टि को जीवन निरपक्ष मानन के प्रति था। कान्य म जो वाल्पित म्प विधान दखन म आता है, उस शुक्लजी जीवन से प्राप्त या प्रत्यक्ष स्प विधान पर निभर मानत थ 'प्रत्यक्ष Pए विधान के उपादान से ही पल्पित प विधान होता है। प्रत्यक्ष रुप विधान से स्वतत्र कल्पना की अपनी सृष्टि की विलक्षणता की लाशमा के पक्ष में वे अत तक नहीं बोले । नूतन सप्टि के निर्माण व मिदात का उहोन मदा उपहास किया । काव्यगत प विधान का प्रत्यक्ष म्प विधान वा अनुवर्ती मानन म शुक्रजी मही थे या गनत, इम प्रश्न ग अधिव महत्त्वपूण यह है कि अपनी माहित्य चिता व अतिम चरण म रूपक प्रश्न या मामना करते हुए उहाने अपना पक्ष दढतापूर्वक प्रस्तुत किया है । मही यात यह ह पि गुरजी ने अपन माहित्य कितन व अतिम चरण म कनावाद की चुनौती का सामना किया था और इस स्थिति म व कई वार वचन हो उठे थे। क्लावाद का प्रवक्ताओम उनके मामन पोचे और रवीद्रनाथ ठाकुर थे। नूतन मप्टि के निर्माण की विणता और उपयोग निरपेक्ष मोदय की माधना मवधी दप्टिकोण मे वे आहत हुए थे। इस दष्टिकोण के विरोध म उहोन माधारणीकरण और सजनात्मक कल्पना की जीवनो मुखता का प्रतिपालन किया था। 'रमात्मय बोध के विविध रूप इसी प्रकार पीचिता या परिणाम है। १ पितामणि, पहला भाग, पृ० २६४ २ प्रतिनिधि निबंध, पृ० १०१ १४/माहित्य चितन का विकास फिर भी इतना निश्चित है कि शुक्लजी के मन म साहित्य का बशिष्टय कमिक गति म स्पष्ट होता गया। 'मानुप-भाव , 'रागात्मक सम्बध और 'हृदय की मुक्तावस्था' की चचा धीरे धीरे साहित्य व अपन मुद्दा की ओर मुड चली। काव्य को शब्द विधान और उक्ति के स्प म चीन के साथ उनके माहित्य चितन का नया युग आरम्भ हुआ जिसम रम और 'सोदय को प्रभूत महत्त्व मिला । काव्य को 'कता' मानन की ओर भी शुक्मती मा रझान वट चला-यद्यपि कतावाद को उहोन अत तक स्वीकार नही किया और इमी कारण वे काय को कला मानन का विरोध भी बीच वीच म करत रहे । 'भाव की महिमा वे जारम्भ से मानते लाए थ, लकिन आग चलकर उहान उस मार म्प और कल्पना के सम्ब च की भी व्यारया की और लोरमगन की धारणा को भाव मौदय और कम सौ दय मे ममीक्त कर साहित्य की जीवनो मुखता और जीवनपरायणता वे भीतर उसकी क्लात्मकता की प्रतिष्ठा की। गुक्लजी के प्रस्थान-स्पन को दष्टि म रग्वत हुए उनके काय चिंतन की अतिम स्थिति पर विचार किया जान पर यह स्पष्ट हो जाता है कि तीम वप के ममय म उहान एक लम्बी यात्रा तय की थी। - अध्याय २५ शुक्लजी का सौन्दर्यशास्त्र आचाय रामचद्र शुक्न ये मोदयशास्त्र की वात ररना पहनी दृष्टि म असगत प्रतीत हो मक्ता है। यही नहीं कि वे काय की उपयोगिता और उसके नैतिक पान वे प्रबन ममथर थे, काव्य की मंदातिव चचा करते समय उहोन मोत्यपरक दृष्टिकोण, पगा और कनावाद पर प्रहार भी किया है। चिन्तामणि पहला भाग म सगहीत लेख 'वविता क्या है' म मौन्ययादी का य दृष्टि को उडात हुए उहान निखा है "भारतीय का समीक्षा म यह (मौदर्य) एष बडी ऊँची उडान या दूर की कौडी ममझी गई है। पर वास्तव मय भापा के गडबडयान के सिवा और कुछ नही ।" मोत्यशास्त्र का यो क्तानाम से एक मानत हुए उमक मजनात्मव उत्कप को विचारये येद्र म रखता है। आचाय तुक्त न 'रमात्मक बोध के विविध रूप' शीषक लख म कान्य पर्याय जतगत 'कला' शब्द के प्रयोग पर आपत्ति की है 'कता शब्द के प्रभाव से वविता का स्वम्प ताहुना मनावट या तमाशा और उद्देश्य हुमा मनोरजन या मन बहाव । यह कला गब्द आजवन हमारे यहाँ भी साहित्य चर्चा म बहुत जारी मा हो रहा है । इसमे न जान कब पीछा छुटैगा।" इतना ही नहीं, 'श्रद्धा भक्ति शीपक निबध म उहान विभिन्न क्ताओ की अभ्यामजय सूक्ष्मता का उपहाम किया है। स्थापत्य के क्षेत्र म बारीक कारीगरी को लेकर उन्हान पिसा है "मममन की बात है कि इमारत हाथ पर रखकर देखन की चीज ननी है, दम पाच हाथ दूर पर खडे होकर खन की चीज है।' चित्रकला की बारीकी भी खिल्ली उडान के लिए उन्होंने राधा वण ने सूक्ष्मतापूर्ण चित्र का एक कल्पित उदाहरण मामने रखकर त्रिखा है "देखने धान को यह नहीं जान पड़ता कि वह कुछ दूर खडा होकर बदम्म और राधा काण यो एवमाथ देख रहा है, कि यह जान पता है कि कभी तो पत्तियां गिनन ये कि वह पेड १२६ता - और व भी नमुना - वे एि चुनरी हाथ म लेता है । गगीरा का उल्लेख उहनि और भी उपहासपूण म्वर म किया है 'मगीत व पेंच पारपार भी हव्योग याद ता है । जिम र य का वो क्लाव त पवना गाना गाय लिए पाठ अगुल मुह फ्लाता है और 131 व दिनल होता, मममम यहे घडे धीरामा घय हट जाता --दिन दिन भर चपाप बट रहन थाले बरे बड आसियो आसन डिग जाता है। - १६/पनतजी मा सोदयशास्त । गुरजी की टिप्पणियो मिनादपूण हात ?" भी यहत तीखी है।ता प्रेमिया को क्षध बरामाि व पयान हैं। फिर भी इगमे या प्राट नहीं होता कि आचार्य गुरत को सता मोदय म पनि नही थी, या व उमरा सम्मान नहीं परत थे। उनकी इन उत्तियो के आधार पर यह भी नही पा जा माता पिवे मान्य म बलात्मकता के विरोधीथ, या या य पागोटयग सम्बध नहीं मानत 21 उनके इन दोगे इतना ही प्रकट होता है कि पारीगरी और नाम अतर बरत थे और पाय यो अ य वसाआ य ममान गिरी प समृद्धि यो तुना पर तोतना पमद नहीं करत थे। पश्चिम पे मोय मितन ममता कीम्बापतता विषयक धारणा को मामन पाकर ये क्षुब्ध हुए थे। इस समय म पलायी जीवन निरपेभता का गिडात उह कतई पस नही था। चितामणि पहला भाग म मगहीत कविता क्या है। लेप म गुलजी न म्पष्ट पागम मोदय माथ कवि कम वे सम्बध पर प्रकाश डाला है। उनका कहना है कि "यवि की दष्टि तो मोदय पी आर जानी ही है, ह वह जहाँ होवस्तुमी वे कप ग म अथवा मनुप्या ये मन वचन और पम म । उसप मापन के लिए, प्रभाव को वृद्धि के लिए पवि तोग कई प्रकार व सौदयों का मर विया वरत हैं। 'काव्य म लोकमगल और माधुय गीपक नाम भी इस प्रकार को मा यता ने दान होत है वयि सौदय स प्रभावित रहता है और दूसरा को प्रभावित करना चाहता है। विमी रहस्यमयी प्रेरणा में उसकी कल्पना मे कई प्रकार व सौदय का जो मन आपगे आप हो जाया करता है उमे पाठक के मामने भी वह प्राय रख देना है ।' गुक्तजी न पाय व विधानगत सौदय की चर्चा भी की है। मुधापर पाडेय द्वारा सम्पादित आचाय शुक्ल प्रतिनिधि निब म मम्मिलित कविता क्या है गीपर लख म उहान काव्य सोय तो पभा--भाव सौदय और नाद सौदय-या उल्लेख दिया है। लगता यह है कि शुक्लजी न काय मे सौटय को सम्बध को अमा य न कर पना और मौल्य के माथ काय के उम सम्बध निम्पण का विरोध किया है जो उह पश्चिम म और वहां के प्रभावम्वरूप रवीद्रनाथ ठाकुर आदि की साहित्य दष्टि म लोकमगल की उपेक्षा करता प्रतीत हुआ था। कान्यास्वाद को गोर्यानुभूति मानन म उह यह खटवा हुनावि काय उपभोग्य बनकर रह जा सकता है। इस खतरे से सावधान करते हुए उ होन का य म लोव मगल और माधुय शीपक लखम लिखा यह न समझना चाहिए कि उपभोग पक्ष की तुष्टि ही काय का एकात लक्ष्य है । रसात्मक तुष्टि का क्षेत्र उपभाग वृत्ति स और आगे जाता है। दूसरी बात यह है कि तालस्ताय जिह व कलावादी मानत थे, काय म प्रेम के ही मौन्दय के कायल थे शुक्लजी इस प्रकार की भाव सोदय परिमिति के विरुद्ध थे। उहान सपए की ।

गुवनजीन वान्य म मोदय की सत्ता मुम्यत रचना या मजन मन मानकर 'सामग्री म मानी है। वाध्य के प्रसग म सोदय की चचा उहान अधिवाशत वण्य विपयो 'नूतन सप्टिक निमाण' का विरोध करन की एक परिणति यह हुई है fr सोदय च सम्बध से की है। आचाय शुक्ल प्रतिनिधि निब ध म सकलित 'वयिता क्या है ? लेख व द्वितीय अनुच्छेद में प्राकृतिक और मानवीय सौदय पर मुग्धता में मध मे गुक्लजी ने सोदय के अधिष्ठाना की जो सूची दी है उममे तो यह प्रपट होता ही है बिनविता म विस प्रसारवी विषय वस्तु सौदय भावना नी तुष्टि करती है। शुक्लजी वा सो दयशास्त्र | १७ भीपणता म भी सौन्दय की मत्ता मानी है । इमी नान अग्रेजी के सुप्रसिद्ध कवि दोनी को प्रासावरत हुए न्हाने लिगाई तीन भी यायन ना TT मूत तत्त्व प्रेम भाव ही माना था, पर अपन मुग मोरयमय माय भाव ता हो बद्ध न रखकर प्रबध-क्षेत्र में भी अच्छी तरह घुमपर भायो शो अनेररपता या वियाम किया था। स्पिर (Static) सौन्दय और गयात्मा मौन्दय, उपभोग पा और प्रयत्न पन, दोना उनमें पाये जान हैं।" लेविन मौन्दय सृष्टि के नाम पर अद्भुत, अपूप, अद्वितीय, विचित्र और विरमण की रचना उह साधारणीवरण म वाधर प्रतीत होती थी, इसलिए उहोन एसी रचनाआ या विरोध किया है। पश्चिमी गौ दय चिता की दृष्टि म 'अनामा य की प्रतिष्ठा का विरोध वरते हुए उहोने विचार प्राट दिया है यि "असामा यता या चमत्कार के रचि वाल पवि वाह्य प्रति या चित्रण उमयो असाधारण विभूति यो- उमसी चमर-दमय, मजावट, निय, अनोपन इत्यादि को ही-लेकर चलते है । इसा रुचि को बहुत से लोग पला रचि मानन है। उनके मत से जगत् वे माधारण और यरुचिकर के वीर से अमाधारण और रचिर को छोट-छोट परमजाना ही और क्लाआ व समान ही पाय-यला का भी काम है । १४ x वाव्य था यह अमामा यता वाद धीरे धीरे उम लोकोत्तरवाद ता पहुंचा जिमका प्रतिपादन काव्य वो आध्यात्मिक क्षेत्र म स जान के लिए किया गया। xxविभाव पदम शोभन और दीप्त को चुनकर उनकी नमामा य योजना द्वारा अद्भुत रजन की सामग्री तैयार करना चाव्य म नावाद वे नए और पुरान आयायियो का लक्ष्य रहा है।" मोदयमूलक काव्य दृष्टि की परिणति अतत रचना यो स्वायत्तता वी प्रतिष्ठा म होती है जो शुक्लजी यो स्वीकार नहीं थी। इमे उहोने 'नतन निमाण वाली कल्पना कहार इसका प्रतिवाद किया है। इसे लेकर वे उटन के विरद्ध उठ खडे हुए है “एमी मनोवृत्ति का प्रदर्शन जो किसी दशा म क्मिी की नहीं हो सकती, वेयर ऊपरी मन वहाव से लिए खडा किया हुआ कृत्रिम तमाशा ही होगा। पर डटन नाहर न अनुसार एमी मनोवत्ति का चित्रण नूतन मप्टियारिणी यल्पना मा सयरो वडा उज्ज्वत उताहरण होगा। (माधारणीकरण और यक्ति वैचि ययार') १८/गुलजी या गो-यशास्त्र इगा अधिरित भी भार ग्याना पर उन मान्य-गोय की TI विषय वस्तु राबधी मोमट गया। उस यता है नि "कविता गृष्टि-सौ क्या गुमय पराती है और गुदर परतुओ मे अनुरक्त और पुसित वस्तुओं से विरक्त परती है । गयिता जिग प्रकार विकसित ममल रमणी के मुख आदिका सौदय नित म अक्ति परती है, उसी प्रशर औदाय धीरता, त्याग, क्या इत्यादिका सौदय भी रियाती है। 'काय म लाममगर और माधुय गीपा मम भी इग दष्टिकाणमा ममथन मिलता है 'भीषणता और मरगता, योमतता और कठोरना, कटुता और मधुरता, प्रनता और मृटता । मामजस्य ही सोरथम मा सोदय है। आदिकवि पाल्मीकि यी वाणी इसी सोदय र उद्घाटन महोमव या दिव्य मगीत है। मोप पा यह उद्घाटन अमोदय का जावरण हटाकर होता है। वस्तु म सोदय की प्रतिष्ठा का विस्तार मगन भावना म मोदय साक्षात्कार तक हुआ है। लोसमगन की मापना ये निरा किय जान वाले सघप म गुक्तजी न मोदय के दशन किए है। उनके विचारानुगार मनुष्य य गरीर व जसे दक्षिण और वाम दो पक्ष हैं व में ही उसके हृदय वे भी कोना और कठार, मधुर और तीक्ष्ण, दो पक्ष हैं और वरावर रो। काव्य-क्ला की पूरी रमणीयता इन दोना पक्षा के मम वय ये वीच मगल या सौदय व विवाम म दिखाई पडती है (वाय म लोकमगल और माधुय)। उहान इस धारणा मा प्रतिवाद किया है वि काव्य म लोक्मगत के विधान से उपदेशात्मयता या नीरमता जाती है । का य म मधप की मफनता उपदे या शिशावाद से मुक्त रहती है, क्योवि उमया अपन 'बम-सौटय के रूप म होता है । गुलजी के जपन शब्दो म, कवि कम सौदय व प्रभाव द्वारा प्रवत्ति या निवत्ति अत प्रकृति मे उत्पन करता है, उसका उपदेश नहीं देता। इसलिए "मगल अमगल व द्वद्ध म कवि लोग त म मगन शक्ति की जो सफलता दिखा दिया करत है उमम सदा शिक्षावाद ( Didacticism ) या स्वाभाविक्ता की गव ममझकर नाक मा सिकोडना ठीक नही। कान्य म यदि कभी मगल गक्ति का पराभव देखन म आए, तो भी सौ दय अक्षुण्ण रहता है क्योकि 'गति मे भी सुदरता है और सफलता मे मी । यह बात नहीं है कि जब यह गति सफल होती है, तभी इसम सुदरता जाती है। (काय मे लोकमगल और माधुय) वाव्य म लोकमगल का समावेश सदा न मही कई वार शिक्षावाद और उपदेश म परिणत होकर उसके सौदय की क्षति वरताह-गुवलजी न यह अस्वीकार नहीं क्यिा है, बल्कि यह बतलाया है कि रसा वि स स्थिति म हाता है । उनका विचार है कि 'जस्वाभाविक्ता तभी आएगी जब बीच का विधान ठीक नहीं हागा (काव्य म लाव मगन और माधुय) । यहा शुक्लजी न पाय-सौदय के विपय म यह स्वीकार किया है कि काव्य म विषय वस्तु का अपना सोदय 'चीच वे विधान पर बहुत-कुछ निभर सुक्नजी का सौदयशास्न/ १९ रहता है । वस्तु-मोदय की प्रतीति तभी होगी जव 'बीच का विधान' ठीक हागा, अयथा विषय वस्तु की सुदरता के व्यक्त न हो पान का खतरा पैदा हो जाएगा। इस महत्त्वपूर्ण विदु का शुक्लजी ने यहाँ एक वाक्य म चलता कर दिया है। उस पर यहा जितने विस्तार से लिखना चाहिए था, नही लिखा है। इसका कारण शायद यह है कि उनकी रुचि मुख्य रूप से वस्तु-मौन्दय म थी, विधानगत सौदय म नही। शुक्लजीने काव्य म कल्पना की भूमिका को यदि समुचित महत्त्व दिया होता, तो वे विधानगत सौदय को गौण नही मानते । यह मानते हुए भी कि "काय वस्तु का सारा रूप विधान कल्पना की क्रिया मे होता है, उहोन कल्पना के काय को प्रस्तुत और अप्रस्तुत के विधान म विभाजित कर दिया है। कल्पना की मस्लिप्टता प्रस्तुत अप्रस्तुत जसे विभाजन का अतिरमण कर सकती है-यह बात शुक्लजी ने ध्यान म होत हुए भी उह स्वीकाय नही थी। जहा वे अलकारो को बाहरी सजावट की चीज मानते रहे, वही 'रुप को मृष्टि को सम्प्रेषण का साधन मानकर चल । कवि की कल्पना स्वप्न के निकट पहुँच भक्ती है, इस सम्भावना को अस्वीकार न करते हुए भी शुक्लजी इम सम्भावना के निहिताथ को स्वीकार नहीं कर पाए है। उहोन लिखा है कि "काव्य सयथा स्वप्न के रूप की वस्तु नही है। स्वप्न के साथ यदि उमका कोई मत है तो केवल इतना ही कि स्वप्न भी हमारी बाह्य इद्रिया के सामन नही रहता और काव्य वस्तु भी।" म्पप्ट है कि स्वप्न और कल्पना का यह सादृश्य बहुत स्थून और मतही है । दोनो तक का अति प्रमण वर जो अपूर्व दश्य उपस्थित करत है, वह शुक्नजी को अमा य था। इसलिए उहान कल्पना को प्रत्यक्ष जगत की परछाई मानन पर जोर दिया। उनके मतानुसार "प्रत्यक्ष रूप विधान के उपादन से ही कल्पित रूप विधान होता है। प्रत्यक्ष रूप विधान का आधार लेते हुए भी कल्पित म्प विधान तक का जतिनमण कर अनगलाभासी रुप म ढल मक्ता है और उस स्थिति म वह काव्य के काम की चीज बना रह सकता है, शुक्लजी यह मानन को तैयार नहीं जान पडते । काव्य म अनगलाभासी कल्पना की सम्भावना को लक्ष्य कर उहान निसा है "इन ढ'चा को कर हम विलक्षण रग रूप की वस्तुएँ खडी कर सक्त है पर यह स्पष्ट समझ रखना चाहिए कि उन वस्तुओ का रूप रंग प्रकृति से जितना ही दूर घसीटा जाएगा, उतनी ही वे वस्तुएं कल्पना मे कम देर टिपगी । घोडे के मुह वाले किलर, पुखराज की चट्टाना और सोन की रेत के बीच बहती हुई नतियां, आग के बने हुए शरीर एक क्षण के लिए मन म आ सक्त है, पर मोन की चिडियो की तरह चट उड जायेंग" ('काय का रूप विधान और कल्पना') । शुक्न जीपी दृष्टि मे वाच्य ये काम की कल्पना वही है जो 'सच्ची और गहरी अनुभूति' उत्पन्न कर सके । उन्होने लिखा है कि "काव्य के प्रयोजन की कल्पना वही होती है जो हृदय की प्रेरणा से प्रवत्त होनी है और हृदय पर प्रभाव डालती है' (माव्य का रूप विधान और कल्पना)। ।

२०/ शुक्लजी का सा दयशास्त्र वल्पना वा तन सष्टि क निमाण की दष्टि म महत्त्व न देकर गुक्लजी न उम प्रत्यक्ष जोया की अनुगामिनी माना इमम उह काय मौन्य का रहस्य 'मूल और आदिम भावा के उदघाटन म दियताई दिया। 'भार शीपक लख म उहान लिया है कि सभ्यता का विकास होन व फलम्वस्प "उत्तेजित योघ आदि को भी अपना रूप कुछ बदनना पडता है-यह भी कुछ कपडे-नने आदि पहनकर समाज में जाता है जिमसे मार पीट, छीन-खसाट जादि भद्दे समये जान वाने व्यापारा का कुछ निवारण होता है। xxy पर यह प्रच्छन म्प उतना ममस्पर्शी नही हो सकता। इसी से इस प्रच्छनता का उदघाटन बाय का एव मुन्य काय है। चितामणि, पहला भाग में सकलित कविता क्या है ? गीपक लेख म तो वे यहा तर कह गए है 'आदिम रूपो और व्यापारो मे वशानुगत वासना की दीप परम्परा के प्रभाव से, मावा के उदयोधन की गहरी शक्ति सचित है अत इनव द्वारा जैसा रस परिपाक सम्भव है वैसा क्ल कारखाने, गोदाम, स्टशन, ऐंजिन हवाई जहाज ऐमी वस्तुआ तथा जनाथालय के लिए चैक काटना, सवस्व हरण के लिए जाली दस्तावेज बनाना, मोटर की चरखी घुमाना या एजिन म कोयला झाक्ना आदि व्यापारा द्वारा नहीं । इस दष्टिकोण का विस्तार इम सीमा तक हुआ है कि रूप की काव्य प्रेषणा शक्ति का स्रोत भी शुक्लजी को उमर 'आदिम होने में दिखलाइ दिया है "जिन स्पो और व्यापारो से मनुष्य आदिम युगो से ही परिचित है, जिन रूपा और व्यापारो को सामने पाकर वह नर जीवन के आरम्भ से ही लुध और क्षुब्ध होता आ रहा है, उनका हमारे भावो के साथ मूत्र या सीधा सम्बध है। अत काव्य के प्रयोजन क लिए हम उह मूल रूप और मल यापार कह सकते है। इस विशाल विश्व के प्रत्यक्ष स प्रत्यक्ष और गूढ से गूढ तथ्यो को भावो के विषय या आलम्वन बनाने के लिए इही मूल रूपो और मूल व्यापारो मे परिणत करना पडता है। जब तक वे इन मून मार्मिक स्पो म नही लाए जाते, तब तक उन पर वाय दप्टि नहीं पड़ती। (कविता क्या है ?, चिता मणि, पहला भाग) 'रसात्मक बोध के विविध रूप म शुक्लजी न यह स्वीकार किया है कि "मना वत्तिया या भावो की मुदरता, भीषणता जाति की भावना भी रूप होकर मन मे उठती है।" इसके जाग नूतन मष्टि के निमाण की वात उहान नहीं मानी है । उपयुक्त लेख म अनुभूति से करपना की स्वतत्रता की चचा पूवपक्ष के रूप म ही की गई है 'उपर गिनाए हुए तीन प्रकार के स्प विधाना मे से अतिम (कल्पित) ही का य समीक्षको और साहित्य मीमास्वो के विचार क्षेत्र के भीतर लिये गए और लिये जाते हैं।" वात यह है कि काय गब्द व्यापार है। वह शब्द सक्तो द्वारा ही अतम ग वस्तुआ और यापारोका मूतिविधान करने का शुक्लजी का सौदयशास्त्र /२१ प्रयत करता है । अत जहाँ तक काव्य की प्रतिया का सबब है, वहाँ तर म्प और व्यापार कल्पित हान है। परि जिन वस्तुआ और व्यापारा का वर्णन परन बैठता है, ये उम समय उमा सामन नहीं होत, कल्पना म ही होत है। ऐसी दगा मे यह स्वामाविर ही था कि रवि-कम का निरूपण करने वालो का ध्यान स्प विधान के कल्पना पक्ष पर हो रहे, स्पो और व्यापारी के प्रत्यक्ष बोध और उससे सम्बद्ध वास्तविक भावानुभूति को बात अलग हो रखी जाए।" गुक्तजी काव्य म कल्पना की प्रतिष्ठा व पक्ष म नहीं थ, यह बात उनके इसी लस म जाए इम वाक्य से भी प्रक्ट हाती है "आजकल तो भाव की बात दर सी गई है क्योकि कवि की नूतन सृष्टि इसी (क्ल्पना) की वृति समझी जाती है। कल्पना पर अधिक बल दन से कला या वान्य की स्वायत्तता व प्रतिपादन का रास्ता खल जाता है, जो शुक्लजी को स्वीकार नहीं था। इस स्थिति की मम्भावना का विराध करते समय उनकी वाणी व्यग्य से तीखी हो उठी है 'तिम प्रकार प्रत्यक्ष अनुभूति से कलानुभूति या काव्यानुभूति को एकदम अलग कहने को चाल योरप म चली उसी प्रकार प्रत्यक्ष रूप विधान से कल्पित स्प विधान को असम्बद्ध घोषित करने की रूढि प्रतिष्ठित हुई। कल्पना को एक निराली दुनिया कही जाने लगी और कवि लोग दूसरी सृष्टि बनाने याले विश्वामित्र हुए।" काव्य वस्तु की द्वितीयता के भान को गुगलजी न व्यक्ति वचिग्य कहते हुए उसे काव्य के षण्य के माथ तादात्म्य की अनुभूति की तुलना म हीन माना है । उहान कहा है कि "शीन विशेष के परिज्ञान मे उत्पन भाव की अनुभूति और आय के साथ तादात्म्य दशा की अनुभूति (जिसे आचार्यों न रम रहा है) दो भिन काटि की रमानुभूतियां है।' दोनो प्रकार की रमानुभूतिया म उन्हाने जो भिनता बतलाई है उससे स्पप्ट हो जाता है कि वास्तविर रसानुभूति का सवध तादात्म्य की स्थिति में है, अद्वितीयता की अनुभूति म नहीं । शील पचिय और उदात्तवत्ति वाल पात्रो के साक्षात्कार म भिनता यह रहती है वि "प्रथम म श्रोता या पाठा जपनी पृथक सत्ता अलग सँभाले रहता है, द्वितीय म अपनी पृषक मत्ता का कुछ क्षणो के लिए विसजन कर आश्रय की भावात्मर मताभ मिल जाता है ।' 'भाव यजना के स्वरूप पर प्रकाश डालत हुए उहाने उसे मध्यम कोटि को रस दगा रहा है "क्सिी भाव की व्यजना करने वाला, काई प्रिया या व्यापार करन वाला पान भी शील की दृष्टि से श्रोता (या दाक) व रिमी न किमी भाव का-जमे श्रद्धा, भक्ति घणा, रोप, जाश्चय, वुदहन या जनुराग पा-आलम्बा होता है। इस दशा म थाता या दशक उमी भाव वा जनुभव नहीं करता जिगसी व्यजना पात्र नपन आतम्मा ने प्रति परता है, कि न्यजना करने वाल उम पाम के प्रति किसी और भार का अनुभव करता है। यह दसा २२ / क्लजी वा सौदयशास्त्र भी एक प्रकार की रस दशा ही है। पर इस रमारमवता को हम मध्यम कोटिका ही मानेग।' शीन वैचिभ्य का भान उसर व्यजव पान व साथ पाठर या दशक का तादात्म्य नहीं होने देता इमलिए उमवे साधारणीकरण का प्रश्न ही नहा उठता, जबकि शुक्लजी न काव्य की जो परिभाषा की है, उनका के द्रविदु 'साधारणीकरण है। चितामणि पला भाग वे 'कविता क्या है?' लस म उहाने कविता को परिभाषित करते हुए लिखा है 'जिस प्रकार जात्मा की मुक्तावस्था ज्ञान दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रस-दशा कहलाती है। हृदय की इमी मुक्ति की साधना के लिए मनुप्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है, उमे कविता कहते है ।" काय के प्रति इस अभिगम म नूतन सप्टि का निर्माण करन वाली कल्पना के उत्पप का न खप सक्ना स्वाभाविक ही था। लेकिन 'आत्मा की मुक्तावस्था' का मादृश्य पर 'हृदय की मुक्ति की साधना की परिकल्पना म जाध्यात्मिक्ता पी जो गध जाती है, वैसा कुछ भी शुक्लजी की मिद्धात व्यवस्था म नही था। गुक्लजी की दप्टि म हृदय की मुक्ति का अभिप्राय पाठा या दशक का लोक सामा य की भूमि पर पहुच जाना है "कविता मनुष्य के हृदय को स्वाथ- सबधा के सकुचित मडल म ऊपर उठाकर लोक सामा य की भूमि पर ले जाती है जह । जगत की नाना गतिया + मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियो वा संचार होता है। इस भूमि पर पहुंचे हुए मनुष्य को कुछ काल के लिए अपना पता नहीं रहता । वह अपनी सत्ता को लोक्सत्ता मे विलीन किए रहता है। उसकी अनुभूति सब की अनुभूति होती या हो सकती है।" सही बात यह है कि काय या क्ला की चर्चा म 'अध्यात्म' का हस्तक्षेप शुक्लजी को पसद नहीं था। काय म लोकमगल और माधुय' शीपक लेख म उहोंने स्पष्ट शब्दो मे कहा है जध्यात्म शब्द की मेरी समझ मवाय या कला के क्षेत्र म कोई रही जरूरत नहीं है। इस दृष्टि से गुक्लजी न रस सिद्धात को एक महत्त्वपूर्ण मोड देते हुए कल्पना और विम्वग्रहण मे-इस प्रकार काय के एप पर से रस का सम्बध उदघाटित किया। क्ल्पना सप्टि की स्वायत्तता का विरोध करते हुए भी उहाने इस बात पर जोर दिया है कि "हृदय के ममस्थल का स्पर्श तभी होता है जब जगत् या जीवन का कोई सुदर स्प, मार्मिक दशा या तथ्य मन म उपस्थित होता है ' ('का य कास्प विधान और कल्पना')। यह मानते हुए भी कि "रस और भाव ही कविता के प्राण है उहाने यह कहा है कि "कविता म कही गई बात चित्र स्प मे हमारे सामने आती है, राकेत रूप म नहीं । अत उमम गोचर स्पा याही विधान अधिकतर होता है ' (कविता क्या है', आचाय शुक्ल प्रतिनिधि निवध)। चितामणि, पहला भाग मे सगृहीत ॥ - L न्नाकाजीका सौदयशास्त्र का 'यविता क्या है ?' 'लख से शुनिजी का यह वाक्य बहुश, उद्धत रहा है - "काव्य म अथ ग्रहण मात्र से काम नहीं च तातबिम्व ग्रह्ण अपक्षित होती है। लेकिन इस प्रकार के वाक्या स इस भ्रषम नहीं पड़ना चाहिए कि शुक्लजी यनोमा पिम्ब को सीधे उसी की हैसियतमान न विझा सम्बश उनका इन वाक्यों को याद रखना होगा "यूरोपीय माहित्य मीमासा म कल्पना को बहुत प्रधानता दी गई है । है भी यह काव्य का अनिवाय साधन, पर है माधन ही, साध्य नहीं' (उपयुक्त)। धनानद और सुमित्रानदन पत की कविता से लाक्षणिक प्रयागा के जनक उदाहरण देकर शुक्लजी न यह समझाया है कि अभिव्यक्ति की वरता के मूल म कल्पना ही काय करती है। मिद्धा तत उन्होंने यह प्रतिपादित किया है कि 'भापाशैली को अधिक मार्मिक और चमत्कारपूर्ण बनान म भी कल्पना ही काम करती है। साधन म्प म कल्पना को पूरा मान देते हुए उहाने लिखा है "काव्य की पूण अनुभूति के लिए कल्पना का व्यापार कवि और श्रोता दोना क निए अनिवाय है ! ('रसात्मक वोव क विविध स्प) शुक्लजी के सौदयशास्त्र क प्रमुग्प पक्षा को लालाक्ति परन पर यह प्रतीत होता है कि उहोन भारतीय रम मिद्धात और पाश्चात्य कल्पना सिद्धात को परस्पर मिलान का प्रयत्न किया है। इसके लिए उन्हान रस सिद्धात वा अध्यात्म से हटाकर विशुद्ध मानवीय भूमि पर स्थापित किया है और कल्पना की स्वायत्त सष्टि का निषेध करते हुए रमानुभूति के साधन प म उसकी अनिवायता का प्रतिपादन क्यिा है। सम वय क प्रयत्न व वावजूद गुक्लजी भारतीयता की आर झुक हुए जान पडते है । अपने लेखो म उहोन 'हमारे यहा' का उल्लख रह रह कर दिया है । इमी आग्रह के फलस्वरूप उहाँने काव्य को क्ला मानन से भी वही कही इकार किया है। 'काव्य का स्प विधान और कल्पना' म कताआ के काम वामना मम्बधी सिद्धान्त के सदभ म उहोंने लिखा है "उपयुक्त सिद्धात का ही एक अग काम वामना का सिद्धात है जिसके अनुसार काव्य का सम्बध और क्लाआ के ममान काम वासना की तृप्ति से है। यह मत काव्य को ललित कलाओ मे गिनने का परिणाम है। कलाओ के सम्बध मे, जिनका लक्ष्य केवल सौंदय को अनुभूति उत्पन करना है, यह मत कुछ ठीक पहा जा सकता है । इसी म चौसठ क्लाआ का उल्लेख हमारे यहाँ कामशास्त्र के भीतर हुआ है । पर काव्य की गिनती क्लाओ म नहीं की गद है।' लेविन गुक्लजी भारतीय चितन परम्परा से बंधे नहीं है । पाव्य को वला मानने या न मानन के विषय म जपना मत म्धिर वरन मे पूना ने विषय म भारतीय और पाश्चात्य अवधारणाआ वाजतर ममा लने व बाद उहाने अपना मत निश्चित क्यिा है "यदि क्ला वा वही अथ लेना है जो बामशास्त्र की चौसठ क्लाआ म है- शुक्लजी का सौदयशास्त्र २४ / पात् मनोरजन या उपभोग मात्र या विधायक,तो वाव्य के सबध म दूर ही से इस जानमस्कार करना चाहिए।" इस परम्परागत अथ को अस्वीकार कर शुक्लजी न पान्दका कला माना है । डटन ने शक्ति-काव्य और क्ला काव्य म जो भेद क्यिा था, स्वीकार कर उहोन लिखा “वास्तव म क्ला वी दष्टि दोनो प्रकार के काया याव्य उसे अअपशित है । साधनावस्था या प्रयत्न पक्ष का लेकर चलने वाले कान्या में भी यदि म यह चूर हुई ता लोवगति का परिचालित करने वाला स्थायी प्रभाव न उत्पन हो ('काव्य म लोमिगल आर मायय)। 'क्ला के कामशास्त्र मम्मत अय का चला सवेगामण कर शुक्लजी ने 'काव्य-वला जैसे पद का प्रयोग एकाविक यार किया है जो अति पृष्ठा म दिए गए उद्धरणा म से कुछ म उपलब्ध है। पिछले परम्परा का अतिनमण उनके रस मिद्धा त म भी दिखलाई देता है जहाँ । 'रस' का अस्तित्व काव्य म परिरद्ध न मान कर लोक म भी माना है । 'रसात्मक उहाके विविध रूप म रस यो लाकोत्तर मानन व विषय में उनकी असहमति बहुत " वोध है। स्पष्ट इसी प्रकार क्लावाद को अस्वीर ति भी उनके सौदयशास्त्र म खुलकर सामन । जीवन निरपा और अपने आप म पूर्ण कल्पना मप्टि का व काव्य का सम्मान तैयार नहीं हुए हैं। उनकी अनक स्थापनाआ क मूल म कलावाद का निषेध देन सहित है, लेकिन इस निषेध की सर्वाधिक मुसर परिणति नैतिकता मे सौदय के अरि म दिखलाई देती है जिसका सबसे भास्वर स्प काव्य म लोकमगल की आई विस्ताता है। स्थाप आचाय शुक्ल का मोदयशास्त्र इस बात का प्रमाण है कि परम्परा चाह कितनी मद्ध हो, वह द प्टिकोण की स्वतनता का अपहरण नहीं कर सकती। प्रतिभाशाली हीस व परम्परा म काट-छाट करते हुए उसके बल पर आग वढता है और स्वय चित हुए परम्परा को भी जागे ने जाता है। कई बार एकाधिक परम्पराएँ भी उसकी बढते ति व्यवस्था म एकावित हो जाती है । गुक्लजी का सौदयशास्त्र इसका जीव त सिद्धहरण है। उदा मध्याय रस-दृष्टि आचाय रामचंद्र गुपनवे रम-मम्वधी विचारा म एन आर रीतिकालीन पविया की शब्द श्रीडा वा ता दूसरी आर पश्चिमी साहित्य चितन म क्लावाद की प्रतिष्ठा का विरोध निहित है, फिर भी यह सोचना गलत होगा कि उनका रम सिसात निषेध के गभ से जनमा है। रीतिकविया की गद पीडा और पश्चिमी साहित्य चि तन म रूपवाद व उत्थान को निरस्त करन के प्रयाजन से उहान रस की प्रतिष्ठा नहीं की है, प्रयुत उसके पीछे काव्य के मम का खोजन की वही प्रेरणा रही है जिसन उनस 'कविता क्या है शीपक मे तीन तीन लेख लिखवाय । 'रमदशा' की चर्चा गुलजी ने वाव्य की सिद्धि वा प म करवे यही प्राट विया है कि उनक मतानुसार कान्य रचना का प्रयोजन रस दशा का निष्पादन है। 'पविता क्या है ? शीपक से लिखे गए अपने अतिम लेख के प्रथम परिच्छेद म गुक्लजी ने 'रस दशा के रूप म हृदय की मुक्ति को काव्य का प्रयोजन माना है "जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रमदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जा शब्द विधान करती आई है, उस कविता वहते हैं।" गुक्लजी के उपर्युक्त गन्दा पर ध्यान दने से यह स्पष्ट हा जाता है कि उहान काव्य की साथकता उसकी रसात्मपता म मानी है और 'रमात्मकता' की परिकल्पना म उहीन मानवीय तथा कलात्मक अभिप्राया को परस्पर समृक्त रूप म प्रस्तुत किया है। 'हृदय की मुक्तावस्था का उहोन जो प्रतिपादन किया है, वह रस को मानवीय अथवत्ता प्रदान करता है क्यावि हृदय की मुक्ति की उनरी धारणा वस्तुत निजबद्धता की विरोधी है । उहाने पहल हृदय के बद्ध स्वरूप की चर्चा की है, उसके बाद हृदय की मुक्ति की बात कही है "जब तक पाई अपनी पृथक् सत्ता की भावना को ऊपर लिए इस क्षेत्र से (अर्थात् जगत से) नाना रूपा और व्यापारा को अपन योग भ, हानि- लाभ, सुख-दु स आदि से सम्बद्ध परवे देयता रहता है, तर तक उसका हृदय एक प्रकार से बद्ध रहता है । इन रूपा और व्यापारा के सामने जब कभी वह अपनी पृथक् सत्ता की धारणा से छूटकर-अपन-आपको बिलकुल भूलकर-विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्तहृदय हो जाता है ।"२ १ चितामणि, भाग १ (१९३९), पृ० १४१ २ वही, पृ० १४१ २६ / रस दृष्टि १ इस मानवीय अभिप्राय के साथ शुक्लजी न कलात्मक अभिप्राय जोड दिया है। 'रसात्मक बाध के विविध स्प' शीपक निवध म गुक्लजी न प्रतिपादित किया है कि कविता के बाहर भी हृदय की मुक्ति सम्भव है और उस स्थिति म भी रसानुभूति होती है। लेकिन कविता के मम्बध म रस की प्रामगियता ग्चनाधर्मिता पर निभर रहती है। यही कारण है कि 'हृदय की मुक्ति के सिद्धात का काव्य के क्षेत्र म उपस्थित करते ही शुक्लजी शद विधान को सामने ले जाए हैं "हृदय की इम मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है, उसे कविता कहते है। शुक्लजी न मानवीय और क्लात्मक अभिप्राया का रम' म जिस सश्लिष्ट स्प म पाया, उसके विराध की जाशका उह क्लावाद की ओर स हुई और रीतिकालीन कविया की शब्दनीटा उह क्लावाद के निकट प्रतीत हुई। उहान क्लावाद के साथ अनक बार रीतिकालीन कविया की शादिक कलाबाजी के उदाहरण प्रस्तुत किए है। क्लावाद और शब्दक्रीडा म मानवीय पक्ष का जभाव पाकर उहाने उमक विरोध म 'रस का प्रतिपादन किया है। भारतीय क्ला दप्टि ने तो 'रस के ही सबध से विभिन कताआ को एक ही धरातल पर रखा था, फिर भी गुकनजी न अपन अनक लेखा म प्रकटत 'कला' पर आश्रमण किया है, तो इसका कारण यह है कि 'कला' के सबध म उनकी अपनी एक धारणा थी। उनकी मा यता थी कि कलाआ का सबध मुख्यत बोध से होता है जिसके कारण क्लाएँ रूप सौदय के सबध से आस्वाद्य होती हैं। कला की रूप रचना कलाकार की अपनी कल्पना से निप्पन होती है, जीवन के सरकारो के लिए उनम स्थान नहीं होता । इसलिए क्ला एक स्वायत्त रूप रचना म साथक हो सकती है, लेकिन रूप रचना की यह स्वायत्तता साहित्य के लिए हितकर नही हो सकती। उनकी दष्टि म साहित्य को साथकता, भाव सवेदन की प्ररिया से व्यापकतर मानवीय अनुभूति से सम्पन हाना है। इसी कारण उह रस सिद्धात और क्लावाद म विरोध दिखलाई दिया है । रस मीमासा म उहान क्लावादिया के दप्टिकोण को चचा करते हुए लिखा है 'भावा की सच्ची और स्वाभाविक अनुभूति Sentimentality कहकर टाली गई और क्लानुभूति उससे सवथा भिन्न और स्वतत्र अनुभूति बतलाई गई । मतलब यह कि जिम अनुभूति से मनुष्य हाथ पैर हिलाता है, जिम अनुभूति से गुभाशुभ कर्मों का प्रवतन होता है, जिम अनुभूति से मानवी प्रकृति का उत्तरोत्तर उत्कप होता है, वह इन क्लाविदा के अनुसार काव्य क किमी उपयोग की नहीं।' २ काव्य म इम विचार दष्टि वे प्रवेश पर चिता व्यक्त करते हुए उहान लिखा कला शद की बढती हुई पुराद १ चितामणि, भाग १, पृ० १४३ २ रम मीमासा, पृ० ३३० रस दृष्टि/२७ के माप उहतो यह कहना आरम्भ किया कि याव्य मा कोई विषय या व्यग्य वस्तु (या भाव) नहीं होना, अयात जिम रूप म कोई वाव्यात्मर वाक्य हमारे सामन आता है, उसमे अलग पाई आधार वस्तु दूढना व्यथ है ।"१ क्ला म रूपी स्वायत्त मष्टि की महत्त्व उहोन इमीलिए स्वीकार नहीं दिया कि उसम भाव-मवेदन की अनिवायता नहीं रह जाती। जिम वान्य-रचना म भाव- निमग्नता अपक्षित न हो, यह गुरुजी की प्टि म 'मिरपच्ची ही थी और जिम तरह यह "सिरपच्चों की जाती है, उसे उहाँने 'वावनापन आर 'दिमागी कमरत' कहा है "मो ही मिरपच्ची करके-विना विमी भाव म मग्न हुए-जुछ अनोखे म्प खडे करना या कुछ का कुछ कहन नगना या तो मावलापन है या दिमागी कमरत, सच्चे कवि की कल्पना नहीं।"२ 'कना की इसी धारणा क फ्तस्वरूप वाव्य को क्लाआ के अतगत रखना उह नवाशी और वनबूटा तथा मजावट या मनोरजन पी सामग्री बना देना प्रतीत हुआ। अपन लेखन म यह आरोप उहाँने बार बार उन लागा पर लगाया है जो काव्य को क्लाआ के अतगत रखते थे। जहाँ भाव सवेदन और रूपवोध मे सहयोग हो, वहाँ वे मतुष्ट जान पड़ते है, लेकिन उन लिए इस महयोग का अर्थ यह है कि रूप रचना रसानुभूति का माधन बन जाए । उ हाने लिखा है "हमारे यहाँ बाल्पनिक रूप विधान साधन की कोटि म रखा गया है, माध्य वस्तु रमानुभूति ही रखी गई है । भारतीय काव्य दृष्टि के अनुसार कवि की कल्पना भावा की प्रेरणा से ही रूप- विधान म प्रवत्त होती है और श्रोता या पाठन की कल्पना उम स्प विधान का ग्रहण कर भावो को जगाती है।"३ जब-जब शुक्लजी इस विषय म मजग हुए है विमोचे जमे विचारको न कला मे स्प मष्टि को साध्य मानकर उसकी स्वायत्तता का जा प्रतिपादन किया है, उसके कारण कला जीवन निरपेश मानी जान लगी है, तब तब उन्होंने साहित्य का क्लाआ से बाहर रखन पर बत्र दिया है । लकिन जब जब वे इस चिता से मुक्त हुए है, तब तब उहाँन न केवल 'काव्य क्ला' जसे पद का प्रयोग किया है, साहित्य की समझ और मूल्याक्न के लिए क्ला दृष्टि की प्रासगिकता भी स्वीकार की है और एमा करने समय उन्होंने एक सीमा तक कोचे के मत को भी स्वीकार किया है "यह भी समझ रखना चाहिए कि काव्य का विषय सदा 'विशेष' होता है, मामाय नहीं, वह व्यक्ति सामने लाता है, 'जाति नहीं। यह बात आधुनिक कला-समीक्षा के क्षेत्र मे पूर्णतया स्थिर हो चुकी १ रम मोगामा, पृ० २ वही, पृ० ३४८ ३ वही, पृ० ३०३ २८/रस दष्टि . ३ है।"१ स्पष्ट है कि गुगतजी न यह विचार आधुनिर कला ममीशा से ग्रहण किया है। इम मत वा योत 'पोच' है, यह इस आधार पर कहा जा सकता है कि उहान वान्य म विम्ब ग्रहण के महत्व का प्रतिपादन करा के साथ का य म 'विचार' या 'अवधारणा' का निषेध भी किया है और पादटिप्पणी म इम सिद्धात के सदभ म 'अभिव्यजनावाद वे प्रवतन प्रोचे द्वारा मम्प्रतीत्यात्मा नान जोर तारिक जाम किये गय भेद का उल्लव क्यिा है । शुकाजी न काव्य म बिम्न ग्रहण पर न देत हुए भी रूप रचना और भाव- सवेदन के नाते बता और काय म भेद क्यिा है तो इसका कारण यही है कि निरीप सप्टि और उसकी स्वायत्तता उह जीवन व माय बनावे मवध म बाधक प्रतीत हुई, जववि भाव सवेदन, जो उनकी रस दप्टि वा कद्र है, पाव्य को जीवन से जोड़ता है। इसलिए जिस विदु पर विम्ब रमानुभूति म योग दता है, उस वितु पर उहीने याचे को स्वीकार कर लिया है 'काव्य का काम है कल्पना म विम्ब (Images) उपस्थित परना, बुद्धि के मामने कोई विचार (Concept) नाना नहीं। यह सिद्धात गुक्लजी का अपना नहीं है, आधुनिक कला समीता के क्षेत्र स गहीत है लकिन उहाने इसम सार पाया है, जैसा कि उनके इन गास प्रकट हो रहा है "इस सिद्धात का तात्पय यह है कि गुद्ध काय की शक्ति मामा य तथ्य-क्थन या मिद्धात के स्प भ नही होती है । कविता वस्तुआ और व्यापारा का विम्ब ग्रहण कराने का प्रयत्न करती है अथ ग्रहण मात्र स उसका काम नहीं चलता। जपन लेखन मे यह मतन्य उहाने अनर बार प्राट क्यिा है। फिर भी शुक्लजी न यह कभी नही माना कि बिम्ब सप्टि अपन आप म काव्य- रचना का लक्ष्य हा सकती है। यही वह सीमा है जहां से नोच उहे स्वीकाय नही रह जाते । कोच का मत उहान यही तक अगीकार किया है जहा तक यह रस के साथ उह सगत प्रतीत हुआ है जहा तक साधारणीकरण स उना मत का विरोध न हो । इसी लिए उहान अपन सामन यह समस्या रखी है "जब यह देखना चाहिए कि हमारे यहा जो 'साधारणीकारण कहा गया है, उसके विरुद्ध तो यह सिद्धात नहीं जाता। प्रश्न का उत्तर देते हुए उहान लिखा है 'विचार वरन पर स्पष्ट हो जाएगा कि दोना म कोई विरोध नही पडता । विभावादिक साधारणतया प्रतीत होत है, इस कथन का १ रस मीमासा, पृ० ३०९ २ वही, पृ० ३१० ३ वही, पृ० ३१० ४ वही, पृ० ३१० ५ वही, पृ० ३११ । ५ रम दृष्टि /२९ अभिप्राय यह नहीं है कि रसानुभूति के समय श्रोता या पाठव ये मन म आलम्बन आदि विरोष वस्तु या मूत भावना के स्प म न आकर व्यक्तिमात्र या वस्तुमान (जाति) के अथ सरेत के रूप म आने है।" इसके विपरीत "कल्पना में मूर्ति तो विशेष की होगी, पर वह मूर्ति ऐमी होगी जो उमी भाव को पाठक या थोता वे मन में जगाए जिसकी व्यजना आश्रय अथवा कवि करता है।" इन शब्दो मे रम मिद्धात के साथ मोचे मत की सगति की मीमा योजने का प्रयल झलक रहा है। यहां यह स्पष्ट दिखना देता है कि रस निस्पण भी बैंची-वैधाई लीक से हटकर शुक्रजी ने उसे आधुनिक बला- मिद्धात के प्रकाश में प्रस्तुत किया है। ऐमा करते समय शुक्लजी का गा है कि काव्य मदा माधारणीकरण की प्रक्रिया से ही जास्वाध नही होता और तरह से भी काव्यास्वाद मम्भव है। आधुनिक कला चितन मे परिचित होन के परिणाम स्वरूप उहाने यह भी स्वीकार मरनिया जिकई बार श्रोता या पाठक का तादात्म्य आश्रय स नहीं हो पाता, उम स्थिति में काव्य का आलम्बन महृदय ने उमी भाव का आनम्वन नही बन पाता जिम भाव का आलम्बन वह आश्रम के लिए है। गम मथरा को दुर्भावना रे आलम्बन है, लेक्नि वै पाठक या श्रोता के उस भाव के आलम्बन नही हात । इस स्थिति का समाधान यह है वि वाव्य या कोई पात्र सहृदय के उमी भाव का आलम्वन होता है जिस भाव का आलम्बन वह रचनाकार Tनिए रहा है। गुबनजी ने स्पष्ट गन्दो म यह विचार प्रकट किया है। लक्नि यह मान लेन पर एक दूसरी समस्या उत्पन होती है। कुछ मात्र कवि ने अपने भाव के वाब न होकर उसके प्रेशण के विषय होते हैं । उदाहरण के लिए 'मानस' की मथरा कवि की भावना की वाहक न होकर उसने धिक्कार की पात्र है। वह पाठव' या माता के भी धिक्कार का जालम्बन बनती है, लेकिन वाल्मीकि रामायण की मथरा न तो कवि की भावना की बाहर है, न उस धिक्कार का आलम्बन । वाल्मीविन मथरा के प्रति प्रशसा या निंदा की भावना से उपर उठकर उनका स्वभाव वी परतें सोलो है एव प्रेक्षक के रूप म परम तटस्थ भाव मे उसका चरित्र नकित किया है। फलत वालीदि रामायण के पाठ को मथगये चरिय का ज्ञान होता है, उसके प्रति कोई भाव उसके मन म नही जागता । ऐसी स्थिति में पार वे चरित्र का विम्व तो उभरता है, लेकिन रमानुभूति भी होती है, यह कहना पठिन है। इस वठिनाई को स्वीकार क्रत हुए भी गुकरजी न इस स्थिति को रम- दशा मानन का आग्रह किया है। उनका कहना है कि 'यह दशा भी एक प्रकार की रस १ रस मीमांसा, पृ० ३११ २ वही, पृ. ३१२ ३ वही, पृ० ३१४ ३०॥ रस प्टि दशा ही है-~यद्यपि इमम नाथय व माय तादात्म्य और उसके लालम्बन वा साधारणीकरण नहीं रहता।"" यहाँ जार शुक्लजी रम मिद्धात की मीमा का लांघन प्रतीत होत है । रम की परम्परागत धारणा का जतिप्रमण परत हुए उहान 'गोल विप र परिज्ञान से उत्पन्न भाव को भी 'रस' के भीतर ममेट लिया है, लेकिन ऐसा करते समय यह स्पष्ट कर दिया है कि यह एक अलग तरह की ही रसानुभूति होती है 'शील विशेष व परिनान से उत्पन भाव की अनुभूति और आश्रय के साथ तादात्म्य दशा की अनुभूति (जिमे जाचार्यों न रम कहा है) दो भिन्न कोटि की रसानुभूतियां है।'२ गुनिजी के इन शब्दा म यह बात पलक रही है कि शील विरोप के परिपान म उत्पन्न रसानुभूति का सिद्धात परम्पराविहित और शास्त्रानुमोदित नहीं है इसलिए उहाँने इम 'रम की एर नीची जवस्था' तक कह दिया है। जयावर 'प्रमाद' न अपन 'रस' सवधी लेख म इम अवस्था वो रस को नीची अवस्था मानने का प्रतिवाद करते हुए लिखा है कि वस्तुत यह रम दशा तक पहुँचन का मोपान है ।' मही वात यह है कि रस का आश्रय के साथ तादात्म्य और जालम्बन के माधारणीकरण के सबध स देखन पर यह बात हमारे ध्यान म नही आती कि रमानुभूति स्थिति मजना पर निभर करती है-आश्रय और आलम्बन रस स्थिति के अग ही होने के नात प्रासगिक होत हैं। लेकिन यह मान लेने पर इम प्रश्न का उत्तर देना कठिन हो जाता है कि मसार की जनक माहित्यिक कृतियां रस स्थितिया के बिना ही महृदया का कठहार रही हैं तो क्या रम के विना भी कोई कृति साहित्यिक या काव्यात्मक हो सकती है। यदि कोई कायकति पात्र विशेष के शील का परिज्ञान ही कराए या किसी समस्या को हमारी सवेदना म भावावग को उद्दीप्त किए बिना उभार दे, तो शास्त्रीय दष्टि स रसात्मक न होने पर ऐमी कृति को माहित्यिक या कायात्मक स कहा जाए? इस समस्या से निपटने के लिए गुक्लजी को रस की एक नीची जवस्था की कल्पना करनी पडी' जिससे उन कृतिया को भी काव्य के अतगत रखा जा सके जिनम परम्परागत अथ म रस उपलब्ध नहीं है। लेकिन इसस यह तो प्रकट हो ही गया कि गुक्लजी के सामन ऐसी कृतियों को भी रसात्मक मानने का सवाल आ गया था जिनसे पात्र विपके गील का परिज्ञान ही हाता है । इसी आवश्यकता न माव विधायक' काव्य से भिन्न 'भाव प्रदशक वाव्य की १ गम मीमामा, पृ० ३१३ २ वही, पृ० ३१५ ३ वही, ३१३ ४ अभिषेक म.रम विषयक लेख इष्टध्य है । ५ रस मीमासा, पृ० ३१३ रस दृष्टि/३१ नई कोटि की मल्पना परन के लिए उह प्रेरित किया। कहन की आवश्यकता नहीं कि अतत गुपनजी ने भाव सवदन व पेरे मे निकलकर 'बोध' के महत्व का भी स्वीकार करनिया, लेकिन वे 'भाव मे हटकर 'म्प को मा यता देने के लिए तैयार नहीं हुए। निश्चय ही आधुनिक व नाबोध ने उह प्रभावित किया था, लक्नि एर सीमा के आगे नहीं। 'रम' यी र अवधारणा को अपयाप्त पाकर शुक्लजी ने कई प्रकार में उमे नई अथवत्ता प्रदान करने का प्रयत्न किया है। प्रकृति वणन व सौदय वोरम वे अतगत रखने का आग्रह भी एव ऐमा ही प्रयत्न था। 'कविता क्या है ? के द्वितीय आलेख (१९२२) म उहाने लिखा "जिनकी आंबा व आग कुमारसम्भव का हिमालय- वणन और 'मयदूत का नाना प्रदेश वणन नाच रहा था, वे स्पष्ट दख मरे कि प्रकृति पा वह सूक्ष्म निरीक्षण श गार व उद्दीपन विभाव की दृष्टि से नहीं है शुद्ध वणन वे निमित्त, दृश्य अक्ति करन के निमित्त है । उहाने रस पी नौ नातियाक भीतर एमे शुद्ध वणनो के लिए कोई गड्ढा न पारर 'रमात्मव वाक्य काव्य मे असतोप प्रस्ट किया। पर असतोप नानी बनाने वाला के प्रति होना चाहिए था रम मिदात व प्रति नहीं । प्राकृतिक दश्या व वणन म एष प्रकार का रस अवश्य है, चाह उसे अनिवचनीय पहिरा चाहे उसका कोई नाम रखिए, चाह उसे विमी रम के भीतर कीजिए।"२ आचाय शुक्ल की दृष्टि म 'रम काव्यानुभूति वा दूसरा नाम है, वात्र्यानुभूति का एक प्रकार नहीं । इसलिए उहाने लक्षण निधारण और वर्गीकरण का रास्ता छोडकर विवेचन और विदलेपण का पथ ग्रहण किया है । उहाँने ग्म को अध्यात्म दान वे धरातल से हटाकर ऐहिक स्तर पर उसका विचार किया है। यही कारण है कि उहोंने उसे आत्मा को मुक्तावस्था न कहर उसवे समातर हृदय की मुक्तावस्था पहा । एक स्थान पर उन्हान यह अवश्य लिखा है कि "इस मुक्त हृदय को व्यापर आत्मा का ही अश समथना चाहिए। लेकिन उनका यह कथन रस चर्चा के प्रसग म 'आत्मा' की परम्परानुमोदित प्रतिष्ठा म अपन मत की सगति बिठान की जावासा मे प्रेरित प्रतीत होता है। 'रम' को कान्यास्वाद के रूप म लत हुए भी गुक्लजी न उमका विचार रसाय वे कोण से उतना नही दिया है जितना काव्यगत विधान की दृष्टि से । रस मीमासा का एक बडा भाग 'भाव की चर्चा को समर्पित है तो दूसरा बडा भाग रस विधान म कल्पना की भूमिका का। 'रम' व मम्बध म अप्रस्तुत विधान की चचा उहोंने विस्तार से की है और रस योजना म उसकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी है। इससे यह समेत भी १ चितामणि, भाग १, पृ० २२७ २ सुधाकर पाडेय, आचाय शुक्ल प्रतिनिधि निवध, पृ० ६७ (१९८३) ३ रस मीमासा, पृ० ३३५ ३२/रस दप्टि मिलता है वि ननजी वाव्य ति की सघटना से रमा गहरा सरथ मानन थे। साध्य उहान रम कोही माना है, जमिन उम उमरे विधान के माय रसवर'देगा है। गुकरजी न रम को मनुप्य स मनुष्य का जाइन वानी गति के म्प म देखा है, इमनिए उह नई ममीक्षा का वह सिद्धात आपत्तिजनव' लगा है जिमरे जनुसार "पृति ही प्रधान वस्तु वही जान लगी है और उसकी मत्ता पवि और श्रोता (या पाठक) दोना से स्वतय ठहराई जान नगी है। उनकी आपति इस बात को लकर है कि यह मा यता स्वीकार करने मे काय पी सम्प्रेषणवामिता ये म्मान पर उमनी रूप रचना की प्रतिष्ठा होती है जिमम मनुष्या के बीच 4 भाव-सम्बध के लिए कोई अववाश नही रह जाता। इम स्तर पर गुस्तजी की दप्टि म 'रस' काव्याम्वाद मे उपर उठार मनुप्यता मा माधव बन जाता है । ध्यान दन की बात है कि उहान 'रमा मम्मघ पात्र वे गीत मे जाडा है "उच्च तक्ष्य रखने वाने, मनुष्य की प्रकृति का मस्वार या निमाण पग्ने की मामथ्य रखने वाल प्रवध-काव्य या नाटक के चरित्र चित्रण का साधार 'शीनदा ही है। रामायण म राम की धीग्ता और गम्भीरता, लक्ष्मण की उग्रता और असहनशीलता, बटा के प्रति भरत पी श्रद्धा भक्ति इत्यादि का चित्रण भिन भिन अवसरा पर भिन्न भिन्न व्यक्तिया के प्रति दिए हुए व्यवहारा के मेल से ही हुआ है। आलम्बन का स्वरूप सघटित करन म उपादान म्प हार 'शीनदशा रसोत्पत्ति म पूरा योग देती है। जाश्रय की दष्टि जिस प्रकार जानम्वन के वाह्य रूप पर जाती है, उमी प्रकार उसके जाभ्यतर स्वम्प पर भी जाती है। इस जाभ्यतर म्वम्प की योजना भिन्न भिन गीला में ही होती है।"२ इस मोड पर शुक्रजी की रस दष्टि मूल्य भावना ग मम्मृक्त हो गई है। का य म ही नही, जीवन म भी गुक्तजी न रसानुभूति की सता मानी है । जब जब व्यक्ति अपन निजी याग भेम की भावना के मकीण घेरे से निकल कर लोकहित माधय व्यक्ति के प्रति उसी अनुभूति मे आटोलित हाता है जिमस दूसरे लोग जादालित है, तो उसे भी शुक्लजी रसना मानत है। जब जीवन म किमी ऐसे यक्ति के प्रति हमारे भाव उदबुद्ध होत है जो सभी व-कम स वम महदयो के समान भाव का आलम्बन हो सकता है, तव, शुवलजी के अनुसार, वह साधारणीकरण की ही स्थिति १ रस मीमासा, पृ० ३३४ २ वही, पृ० १८९ रस-दृष्टि | ३३ होती है और उस स्थिति मे हमारी अनुभूति काव्यानुभूति न होने पर भी- रसानुभूति ही होती है। शुक्लजी ने प्रत्यक्ष या व्यावहारिक जीवन म सभी रसा की अनुभूति की समान सम्भावना न मानकर अलग-अलग रसो की अनुभूति जलग-अलग माना मे सम्भव मानी है । वीर रस के सम्बध मे उन्होने प्रत्यक्ष जीवन की रसानुभूति का सम्बध लोककल्याण की भावना मे जोड दिया है 'अपने निज वे लाभ वाले विक्ट वम की और जो उत्साह होगा वह तो रसात्मक न होगा, पर जिस विक्ट कम को हम लोककल्याणकारी समझेंगे, उमके प्रति हमारे उत्माह की गति हमारी व्यक्तिगत परिस्थिति के सकुचित मण्डन से सम्बद्ध न होकर बहुत व्यापक होगी। स्वदेशप्रेम के गीत गाते हुए नवयुवको के दल जिस माहसभरी उमग के साथ कोई कठिन या दुष्पर काय करने के लिए निकलते हैं वह वीरत्व की रसात्मक अनुभूति है ।"२ इम विदु पर आर रमात्मकता और नोकमगल एक-दूसरे में समा जाते हैं। शुक्लजी ने इन दोनो को एक स्तर पर रखने हुए लिखा है "मनुष्य के शरीर में जैसे दक्षिण और वाम दो पक्ष है वैसे ही उसके हृदय के भी कोमल और कठोर, मधुर और तीक्ष्ण दो पक्ष है और वराबर रहेंगे। काव्य कता की पूरी रमणीयता इन दोनो पक्षो के मध्य ममवय के वीच मगल या सोदय के विकास मे दिखाई पड़ती है।' ऊपर उद्ध त शब्दो म शुक्लजी ने मगल और मौन्दय या समीकरण करने के माथ ही रम के जीवन सदभ की व्यापकता पर भी प्रकाश डाला है। शुक्लजी की मायता थी कि रम की अपनी शक्ति उसके जीवन सदभित होने म ही निहित है। कल्पना की स्वतत्र सप्टि के विरोध में उहोने इसी कारण मे भाव जगा सकने वाले रूपो की सृष्टि करने वाली कल्पना के पक्ष में अपना मत व्यक्त किया है 'कल्पना की वही रूप योजना काव्य के अतगत आ सकती है जो श्रोता या पाठन के मन म काई भाव जगा सक्ने मे समय हो, भाव जगान मे वही रूप योजना समय होगी जो जगत या जीवन का कोई गूढ या मामिन तथ्य सामने लाएगी जो विश्व के किसी अनुरजनकारी, क्षोभकारी या विस्मयकारी विधान का चित्र होगी। काव्य के जीवन सर्भित होने पर बल देते हुए जव शुक्लजी ने 'रस की सत्ता मा विस्तार काव्य क्षेत्र से आगे ले जाकर प्रत्यक्ष या व्यावहारिक जीवन तक कर दिया । १ चिन्तामणि, भाग १, पृ० २४८ २ रस मीमासा, पृ० २७२ ३ वही, पृ० ६४२ ४ वही, पृ० ३०३-४ ३४ / रस दृष्टि तो उनके सामने कठिनाई यह आई कि जीवन की अनुभूतियाँ मुख दुखात्मक होती है, जबकि रसानुभूति प्राय आनदात्मक मानी जाती रही है। इस उलझन से मुक्ति के लिए उहोने रमानुभूति की प्रक्रिया की व्याख्या अपने ढग से करते हुए रसात्मक अनुभूति के दो लमण बतलाए है "(१) अनुभूति काल मे अपने व्यक्तित्व के सबष की भावना का परिहार और (२) किसी भाव के आलम्बन वा सहृदयमात्र के साथ साधारणीकरण, अर्थात उस आलम्बन के प्रति सारे सहृदयो के हृदय मे उसी भाव का उदय।" फिर भी शुक्लजी की यह परेशानी दूर हो नही पाई कि यदि प्रत्यक्ष जीवन मे भी रसानुभूति हो सकती है,तो उसे आनदात्मक कैसे माना जाए । रस मीमासा म पृष्ठ ८९ पर उहोंने 'रस' को 'प्रत्येक दशा मे आनदस्वरूप बतलाया जबकि उसी प्रथ मे पृष्ठ १०१ पर उन्होने निखा मेरी समझ मे रसास्वादन का प्रकृत स्वरूप 'आनद शब्द से व्यक्त नहीं होता । पृष्ठ २७३ पर उहोने यह कहकर इस विरोध का परिहार करने का प्रयत्न क्यिा है "आनद शब्द को व्यक्तिगत मुख भोग के स्थूल अथ मे ग्रहण करना मुझे ठीक नहीं जंचता। उसका अथ मैं व्यक्तिबद्ध दशा से मुक्त और हलका होकर अपनी किया मे तत्पर होना ही उपयुक्त समझता ।" लेकिन अगले ही क्षण क्रुण रस की बात उठाते हुए वे 'शोर' को आनदात्मक कहन में हिचक गए है "करुण रस प्रधान नाटको के दशका के आंसुआ के सम्बध म यह कहना कि 'आनद मे भी तो आसू आते है केवल बात टालना है। दशक वास्तव मे दुए का अनुभव करते हैं।" इस स्थिति में उहोंने करुण रस की अनुभूति आनदात्मक न मानवर रसात्मक' ही मानी है । इस विचार प्रणाली म “रस की आध्यात्मिक्ता के लिए कोई अवकाश नही था । शुक्लजी इस दष्टि से सम्वृत आचायों के पथ से हटे हुए दिखलाई देते हैं कि उन्होंने रम निष्पत्ति की व्याख्या के लिए न तो किसी अध्यात्म दशन का सहारा लिया है न रस के स्वरूप पर विचार करते हुए 'आत्मम विद और स्वप्रकाशानद चि मय जैसे शब्दो का प्रयोग किया है। इसके विपरीत उहोन स्पष्ट शब्दो मे पहा है "रसानुभूति प्रत्यक्ष या वास्तविक अनुभूति से सवथा पृथक कोई अनुभूति नहीं है, बल्कि उसी का एक उदात्त और अवदात स्वरूप है। 'रस' को वास्तविक या लौविक अनुभूति के स्तर पर रखकर शुक्लजी ने उसे एक नया आयाम प्रदान किया है। 'रस के स्वरूप विश्लेषण के लिए उन्होंने मनो १ रस-भीमासा, पृ० २७.

रस दष्टि/३५ व्यापार के विविध पक्षा पर जो विचार किया है, उससे स्पष्ट है कि वे रस को एक मानसिक प्रक्रिया मानते थे। शुक्लजी के रम चिन्तन के केद्र म मनोविज्ञान के ना जान मे वह परम्परागत शास्त्रीय तक पद्धति से मुक्त हो गया है । आश्रय, 'आलम्बन 'उद्दीपन , 'अनुभाव 'व्यभिचारी भाव जैसे पारिभाषिक शब्दा का प्रयोग शुक्लजीने अवश्य किया है और रसानुभूति की प्रक्रिया की व्यान्या के लिए साधारणीकरण पर विचार करते हुए उसी के आधार पर वे 'रस को काव्य क्षेत्र से बाहर तक खीच ले गये हैं लेकिन उत्तत्तिवाट अनुमितिवाद भुक्तिवाद और अभि यजनावाद के गोरखवधे से वे दूर रहे है । 'विभाव के नाना रूपा पर विचार करने के स्थान पर उहाने रस विधान म विभावन की भूमिका पर विचार किया है तथा अनुभावो और सचारी भावो को परिगणन के स्थान पर उहोने रम के सबध मे भाव मस्थाना में उनकी गतिविधि का विवेचन किया है । इमनिए गुक्लजी के रम सम्बधी विचाग मे ऐमा नहीं लगता कि उहोंने क्सिी बन-बनाए सिद्धात को समझाने का प्रयत्न किया है। इसके विपरीत लगता यह है कि उहोने काव्य-मोदय के मम का अवेषण अपन ही ढग और अपनी ही दृष्टि से क्यिा है । उसका यह काय काव्यास्वाद की समस्या पर विचार करा से आरम्भ हुआ है और उसम माग्यविधान के योगदान को समझने की दिशा म जागे बढा है। यही कारण है कि एक ओर विभाव पक्ष के सबध से प्रकृति वणन में भी उहोंने रम की सत्ता प्रमाणित की है, तो दूसरी ओर प्रस्तुत विधान का विचार भी रस के सदभ मे किया है। रस के लिए प्रयोजित और रस विधान के प्रयोजन से निर्दिष्ट अप्रस्तुत योजना को उहोने काव्य के लिए मूल्यवान माना है। रस के विषय म परम्परागत भारतीय विचार पद्धति से हटते हुए भी गुक्लजी ने अनक बार हमारे यहाँ की दुहाई दी है तो इसका कारण यह है कि पश्चिमी साहित्य- चितन मे 'क्ला के प्रति बढती हुई अभिरुचि उहें उम मानवीय भूमि से हटी हुई दिखलाई दी जिम पर साहित्य की महिमा को वे निभर मानते थे। लेकिन उनके सामने मह बात बहुत स्पष्ट थी कि साहित्य में मानवीय भावना का क्तिना ही महत्त्व क्योन माना जाए क्लात्मक प्रतिफलन के बिना उसका कोई अथ नहीं होता । इसीलिए उहाने काव्य मे हृदय की मुक्तावस्या के लिए गारद विधान वे आयाजन को भीप्ट बतलाया और अथग्रहण को अपर्याप्त वह्नर विम्बग्रहण को महत्त्वपूर्ण माना। लेकिन उनके विचारो मे यह सतुलन अत तक बना नहीं रह सका । उनकी रस- सम्बधी अवधारणा में मानवीय पक्ष के प्रति आग्रह वही-वहीं इस सीमा तक बढ गया वि सौन्दय और मंगल के बीच की सीमारेखा ही उनकी दृष्टि से ओझल हो गई और उहें रस की सत्ता काव्य या शन्द विधान के बाहर भी दिखलाई देने लगी । जो ३६/रस दष्टि सिद्धात याव्यास्वाद की समस्या को समझने में प्रयत्न से उत्पन्न हुआ था, वह अपने मूल से हटाये जाने पर शुक्लजी के लिए एर ऐमी समस्या उत्पन्न कर गया जिसे मुलझाने फा कोई रास्ता उह दिसलाई नहीं दिया। 'रस' की अवधारणा को काव्य-क्षेत्र से वाहर ले जान पर उनके सामने यह समस्या आई मि शोर वरुण रम बनकर आन द मे केसे परिणत हो जाता है। इस प्रश्न न गुफ्लजी को बहुत परेशान किया, विन्तु वे इसका कोई सतोपजनव उत्तर नही सोज पाए क्योकि वे रम को इस अप म भी लोकोतर नही मानते थे कि याव्यगत भाव की परिणति होने के कारण वह हमारे दैनिक जीवन के व्यवहार म उदबुद्ध भावा मे प्रात्या भिन्न हाता है। रस की नौविसता के प्रति शुक्रजी या आयह यनावार की जीवन निरपेश विचार दृष्टि की प्रतिक्रिया मे उदभूत प्रतीत होता है । आधुनिक कला चितन के साथ सम्पर की परिणति उनके काव्य चितन म दोहरी दिखलाई देती है। उसके फलस्वरूप एक ओर वे रस को काव्यास्वाद की व्याख्या से आगे पाग्यविधान के विचार की दिगा म ले गए, तो उमी के फलस्वरूप दूसरी ओर उहान उसकी लोकोतरता का सवथा निषेध किया। इतना ही नहीं रम को मानवीयता के उद्रेक के रूप में उपस्थित कर उहाँने उसमे एक नैतिक अभिप्राय भी जोड दिया। अपनी समग्रता म आचाय गुक्ल की रस दष्टि काव्य तक परिरद्ध नही रही है, वे उसे लोक्मगल से प्रेरित सामूहिन भावक्य की साधारणीकृत अनुभूति और स्मृति जय कल्पना के आनद तक ल गए है, लेकिन इसे उनके काय चितन का विस्तार ही मानना उचित होगा क्योकि उनकी मूल चिता काव्यानुभूति और काव्यविधान से सवधित रही है । 'रस' मे नतिकता सम्बधी उनका आग्रह जहाँ प्रबल हुआ है वहाँ भी भाव की उदात्तता के आग नही गया है। यही कारण है कि नैतिक आग्रह के बावजद शुक्लजी की रस दष्टि नदतिक बनी रही है।

अध्याय ४ आचार्य शुक्ल की साहित्याशसा आवाय रामचन्द्र गुस्न को साहित्य-दृष्टि को समझने के लिए उनके घोषित सिद्धातो का अनुशीलन पर्याप्त नहीं है। किमो भी साहित्य चिन्ता का मत जितना उसके सिद्धान्त प्रतिपादन से प्रकट होता है उतना ही उसकी साहित्यशसा से भी व्यक्त होता है । कभी-कभी तो एसी स्थिति भी सामने आती है कि समीयक समीक्षा सिद्धातो री आवश्यकता और महता को अमाय ठहराते हुए कृति विशेष के आक्लन की व्यक्तिमत्ता मे ही अपना विश्वास व्यक्त करता है, फिर भी कृति-विशेष की वह उसकी आशसा म उसके समीषा सिद्धात झलक जाते हैं। प्रोफसर पाल जिफ न समीक्षा के मंदालिए आधार को आवश्यक्ता का निषेध करते हुए चित्रकार पूसिन के एक चित्र रिप ऑफ द सेवाइन वुमैन की समीक्षा प्रस्तुत की और कहा कि इस चित्र के विषय म जा रहा गया है, वह केवल इसी चित्र के विषय म कहा जा सकता है, किसी और कृति के विषय म नहीं । मॉरिस मे डेलबाम ने प्रोफेसर जिफ की उम टिप्पणी मे से वे बातें छोट ली जो उसकी क्ला के मूल्याकन से सम्बन्धित थी। उन बातो के आधार पर उन्होंने जिफ के क्ला सिद्धात खाज निकाले। इस प्रकार किसी घोपित समीक्षा दप्टि के बिना भी गभित समीक्षा-दृष्टि का अस्तित्व हो सकता है ! इसस जुडी हुई सचाई यह भी है वि घोषित समीक्षा सिद्धाला के माय माथ गभित समीक्षा सिक्षात भी हो सकते हैं। गर्भित समीक्षा मिद्धात घोपित समीक्षा सिद्धातो के अनुरूप भी हो सकत हैं और विरुद्ध भी। अनुरूप होने पर वे घोषित सिद्धातो र पूरक हो सकते है क्योकि घोषित सिद्धातो म जो वातें छूट गई है या जिन पर कम बल दिया गया है, वे गर्भित सिद्धातो म उभर सकती हैं। प्रतिकूल होने पर वे ममीक्षर की क्थनी और करनी के विरोध को उजागर कर सकती हैं । आचाय शुक्ल ने सिद्धान्त प्रतिपादन के अतिरिक्त जो साहित्य- समीक्षा की है, उसके अनुशीलन से ऐसी कुछ महत्त्वपूण मच्चाइयां हमारे हाथ लग सक्ती है जो उनके सिद्धान्त प्रतिपादन में या तो उभरी नहीं हैं या दूसरे दूसरे बलो की अधिक्ता के कारण हमारे अवधान से चचित रह जाती हैं। इसलिए उनके सैद्धातिक क्यनो के अलावा उसकी माहित्यासा मे गभित सिद्धातों को सामने रखकर ही उनकी साहित्य दृष्टि ठीक से समझी जा सकती है।

३८/आचाय शुक्ल की साहित्याशसा शुक्लजी ने मलिक मोहम्मद जायसी, सूरदास और तुलसीदास के काव्य को विस्तृत समीक्षा की थी। इन समीक्षाओ मे कवि की भावुक्ता, रचना के मामिर प्रसगा, कवि की विचारधारा, चरित्र चित्रण और काव्यरूप विचार से लेकर रस, अलकार, वाग्वदग्ध्य और भापा तक का विचार किया गया है। कवि की लोको मुखता का विचार भी उहोंने आवश्यक्तानुमार किया है । उक्त कवियो की समीक्षाओ म इन पक्षो मे से जहा जो पक्ष उहे विचारणीय प्रतीत हुआ है, वही वहां उठाया गया है, लेकिन हिंदी साहित्य का इतिहास मे उहे उन सभी कवियो और लेसको वे कृतित्व पर अपना अभिमत प्रकट करने का अवसर मिला है जो उनकी जानकारी मे आ चुके थे। ध्यान देने की यात है कि विस्तृत समीक्षा के लिए उहोंने जो तीन कवि चुने थे, वे तीनो भक्तिकाल के थे, जबकि 'इतिहास' मे उहोने जादिकाल से छायावाद तक के कवियो और लेखका के माहित्य की जाशसा की है। स्पष्ट है कि 'इतिहास' म उनके सामने समीक्ष्य सामग्री अधिक वैविध्यपूण रही है । इसलिए 'इतिहास' में उपलब्ध साहित्या शसा म उनकी साहित्य दष्टि के अधिकाधिक पथ भी उमीलित हुए है। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि 'इतिहास' म युग विशेष के साहित्य के समप्टिमत आकलन और एक एक रचनाकार पर व्यक्तिश जो विचार किया गया है, उससे यह बात बहुत साफ हो सकती है कि शुलजी ने साहित्य को विम सीमा तक जातीय अभिव्यक्ति और क्सि सीमा तक व्यक्ति चलाकार के अपने पुरुषाथ के रूप में देखा है तथा उनकी साहित्याशसा के इन दोनो स्तरो म पितनी अनुकूलता, प्रतिकूलता या नानाविधता है । हिदी साहित्य का इतिहास लिखा गया था हि दी शब्दसागर की भूमिका के रूप म। इस इतिहास म गुक्लजी ने अपनी भाषिक परम्परा की खाज साहित्य के सदभ म की है। इसका परिणाम यह हुआ है कि वे एक ओर भाषिक परम्परा को साहित्यगत भाषिक उत्कप के सायामा मे जोडत चले है ता दूसरी ओर साहित्य म व्यक्त सजात्मक अभिप्रेणासो का लोकचित्त पर पड़ने वाले प्रभावा के साथ भी रखते रहे हैं । ऐमा परत समय साहित्य की साहित्यिकना का ध्यान उहोन सवत्र रखा है । सिद्धो और नाथ यागिया की रचनाआ की चर्चा करते समय उन्होन स्पष्ट शब्गे में कहा है कि वे शुद्ध साहित्य वे जतगत नहीं आती। फिर भी उन्होंने दो कारणो से इन रचनाओ की चर्ना की है। पहला कारण है भाषा। "सिद्ध कण्हपा की रचनाओ वो यदि हम ध्यान पूर्वक देखें तो एक बात साफ झलकती है। वह यह कि उनकी उपदेश की भाषा तो पुरानी टक्माली हिदी (कायभाषा) है, पर गीता की भाषा पुरानी बिहारी या पूरबी बोलो मिली है। यही भेद हम आगे चलकर क्वीर की 'साखी और 'रमैनी की भाषा म पात हैं । 'सासी की भापा तो खडीबोली राजस्थानी मिश्रित सामान्य 'सधुक्कडी' १ हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ० २२ आचाय शुक्ल की साहित्याशसा | ३९ । १२ भाषा है, पर रमैनी के पदो की भाषा म काव्य की ब्रजभाषा और कहीं-कही पूरबी बोली भी है। दूसरी बात है भावो और विषय वस्तु की परम्परा की। वक्यानी सिद्धो ने "बाह्य पूजा, जाति-पाति, तीर्याटन इत्यादि के प्रति उपेभा-बुद्धि का प्रचार किया, रहस्यदर्शी बनकर शास्त्रज्ञ विद्वानो का तिरस्कार करने और मनमाने रूपको के द्वारा अटपटी बानी मे पहेलियां बुझान का रास्ता दिखाया, घट के भीतर चक्र, नाडिया, शूय देश आदि मानकर साधना करने की बात फैलाई और 'नाद', 'बिंदु', 'सुरति', 'निरति' ऐसे शब्दो की उद्धरणी करना सिखाया। यही परम्परा अपने ढग पर नाथपथियो ने जारी रखी। आगे चलकर भक्तिकाल म निर्गुण सत सम्प्रदाय-वेदान्त के ज्ञानवाद, मूपिया के प्रेमभाव तथा वैष्णवो के अहिंसावाद और प्रपतिवाद को मिला पर सिद्धो और योगियो द्वारा बनाये हुए रास्ते पर चल पडा शुक्लजी के इन शब्दा से यह प्रकट होता है कि उहाने साहित्य की पूर्वपीठिका जोर साहित्यिक मूल्य वत्ता म भेद किया है । साहित्य की पूर्वपीठिका के रूप में सिद्धा और नाया की 'बानी का सम्बध भाषा तथा विपय वस्तु दोना रूपो म जागे के निगुण सत सम्प्रदाय से मानते हुए भी शुक्लजी ने उनकी बानिया का साहित्यिक मूल्य अस्वीकार कर दिया है। शुक्लजी की उपयुक्त टिप्पणी म यह निहित है कि साहित्य भापिक' रचना की एक परम्परा में विकसित होता है और उसमे विषय वस्तु भी रहती है, फिर भी जो चीज़ साहित्य को साहित्य बनाती है, वह न ता भाषिक रचना की परम्परा है, न विषय- वस्तु । इन दोनो दप्टियो से हिदी का सत साहित्य मिद्धो और नाथो की वानिया से सम्बचित है, फिर भी शुक्लजी ने सिद्धो और नाया की वानिया का साहित्य मानने से इन्कार कर दिया है, जबकि कपीरादि सतो की वाणी के सम्बध म उहाँने ऐमी दो टक बात कही नही कही है । क्वीर के काव्य की साहित्यिकता के विषय म सीधे कुछ न कह पर उन्हाने उनकी उक्तिया के 'विलक्षण प्रभाव' और 'चमत्कार' की बात कहते हुए उनकी प्रतिभा की प्रखरता स्वीकार की है। साथ ही उहोने क्वीर की भाषा के परिष्कृत और परिमार्जित न होने की शिकायत भी की है। इससे लगता है वि माहित्य का उत्कप वे भाषा प्रयोग की निपुणता और प्रतिभा के उ मेप में मानते थे। भापिक' रचना की परम्परा और रचनाकार विशेष द्वारा रचित वृति में भाषिक उत्क्प इन दोना को शुक्लजी ने अलगाया है। भापिक रचना की एक ही १ हिदी-साहित्य का इतिहास, पृ० २३ २ वही, पृ० २३ २४ ३ "भाषा बहुत परिपत और परिमार्जित न होने पर भी कबीर की उक्तिया मे कही-कही विलक्षण प्रभाव और चमत्कार है। प्रतिभा उनमे बडी प्रखर थी, इसमे सदेह नहीं।'–हिदी साहित्य का इतिहास, पृ० ८२ ४० / आचाय शुक्ल की साहित्याससा - परम्परा में रचनाकार-विशेप पे कृतित्व मे भापिय उत्पप उसकी अपनी प्रतिभा के उमेप पर निभर रहता है । पहली वात या सम्पय साहित्य के इतिहास से है तो दूसरी का साहित्य ममीना से। हिन्दी माहित्य का इतिहास म पुस्तजी की साहित्याासा ने भाषा प्रयोग के इन दोनो पक्षो को अगीकार किया है। सिद्धा और नायो को बानियो की साहित्यिक्ता को अमाय ठहराते हुए भी उनकी चर्चा का उहाँने भाषिक परम्परा के नात प्रासगिक बतलाया है और इसी नाते वे साहित्यिक परम्पराओ की चर्चा करते समय हिन्दी की उपभापाआ--ग्रज, अवधी, पडीयोगी-नया पूरबी और पच्छिमी भाषिक परम्पगओ की बात उठात रह हैं। भापिक परम्परा के साहित्यिक विकास का प्रश्न भाषा विशेष के साहित्य के गौरव बोध से भी जुडा हुआ है। यही कारण है कि हिन्दी शब्दसागर' की भूमिका के रूप म लिखित 'हिंदी माहित्य का इतिहास मे गुक्लजीनेतुनमादास कोहिदी के गौरव के रूप म प्रस्तुत किया है 'यह एक कवि ही हिन्दी का एक प्रौढ साहित्यिव भाषा सिद्ध फरन के लिए काफी है। भारतन्दु को भी उहाने हिदी के उद्धारकर्ता के रूप म देसा है भारते दु न जिस प्रकार हिदी गद्य पी भाषा वा परिपार किया, उसी प्रकार ब्रज भाषा का भी। २ इमी सम्बध से उहोंने जयशकर 'प्रसाद की भी प्रशसा की है "सस्कृत को कामलवात पदावली का जैसा सुदर चयन बगभाषा के काव्य में हुआ, वैसा जय देशभापाजो के साहित्य म नहीं दिखाई पडता। उनके परिशीलन से पद लालित्य की जो गूज प्रमादजी के मन म समाई, वह बराबर बनी रही। प्रमाद के मामले मे शुक्नजी ने साहित्य की भापिक' परम्परा मे व्यक्ति कलाकार की प्रतिभा का मूल्याक्न किया है । अपने 'इतिहास मे वे साहित्य की चर्चा के अतगत रचनाकारो की भाषिक क्षमता के मम्बध से उनकी सजनात्मक प्रतिभा का मूल्याकन बरावर करते चले है। सजन की ममीथा म माध्यम के प्रयोग की जनदेखी उहोने शायद ही कही की हो । कोई-काई कवि तो अपनी भाषिक क्षमता के कारण ही उनकी दष्टि मे बहुत चढ गया है और किसी क्मिी कवि के भाषिक अनाचार ने उसे उनकी दष्टि म लाछिन भी किया है। घनानद ने अपने भाषा सामथ्य लिए शुक्लजी की प्रासा अर्जित की है भाषा की पूर्व अजित शक्ति से ही काम न चलाकर उहोने उसे अपनी ओर से नई शक्ति प्रदान की है। घनानद उन विरले कवियो म है जो भाषा, की व्यजकता बढाते है। अपनी भावनाओ के अनूठे रूप रग की व्यजना के लिए भाषा का ऐमा बेधडक प्रयोग करन वाला दूसरा कवि नही हुआ।'' बिहारी भी अपने १ हिदी माहित्य का इतिहास पृ० १४२ २ वही, पृ० ५५६ ३ वही पृ० ६४७ ४ वही, पृ० ३२२ ३ । -- जाचाय शुक्ल की साहित्याशसा/४१ भाषिक अनुशासन के लिए शुक्रजी की प्रशसा अर्जित करने में सफल हुए हैं । शुक्लजी ने लिखा है कि बिहारी की 'वाक्य रचना व्यवस्थित है और शब्दा के रूप का व्यवहार एक निश्चित प्रणाली पर है।"१ शब्दाडम्बररहित और चलती भाषा के लिए उहोंने रसखान की प्रशसा की है। दूसरी ओर भाषा का अगभग करन वाले कवियो के प्रति शुक्लजी का अननु मोदन भी बहुत साफ दिसलाई देता है। केशवदास की तीखी आलोचना उहोंने उनकी हृदयहीनता को लेकर ही नही की है, अनगढ भाषा को लेकर भी शुक्लजी ने उन पर प्रहार किया है "भापा पर जैसा अधिकार चाहिए था, वह उहे प्राप्त नहीं था।"२ केशव की भाषिक अक्षमता के एक एक पक्ष को उठाते हुए उहान लिखा है 'पदो और वाक्यो को न्यूनता, अशक्त, फालतू शब्दो के प्रयोग और मम्बध के अभाव जादि के कारण भापा भी अप्राजल और ऊबड खानड हो गई है और तात्पय भी स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं हो सका है।' केशव के काव्य स शुक्लजी का असताप वहुमुखी है, लेकिन भाषा नैपुण्य का अभाव पाकर वे भूषण और देव के काय से भी सतुष्ट नही हुए है। इन कवियो की भाषा पर टिप्पणी करते हुए उहोंने लिखा है "भूषण और देव ने शब्दो का बहुत अगभग क्यिा है और कही-कही गढत शब्दा का व्यवहार किया है। दो कवियो की तुलना वरत समय भी गुस्तजी न भाषा को उनके रचना- सामथ्य के मूल्यावन का एर प्रतिमान बनाया है । सूर और जायसी की तुलना म तुलसी को बडा कवि सिद्ध करने के लिए उहोन जो तक दिए है उनम भापा की दष्टि से तुलसीदाम का अधिक समय हाना सम्मिलित है। उनका कहना है कि तुलसीदास का 'बज और अवधी दोना भाषाआ पर समान अधिकार था । ब्रजभाषा का जो माधुय हम सूरसागर म पात है वही माधुय और भी सस्कृत रूप मे हम गीतावली और कृष्णगीता- वली म पाने है। ठेठ अवघी की जो मिठास हम जायसी की पदमावत म मिलती है वही जानकोमगल, पायतोमगल वरव रामायण और रामलला नहछ म हम पाते है । यह सूचित करने की आवश्यकता नहीं कि न तो सूर का अवधी पर अधिकार था, न जायसी का ब्रज भाषा पर । शुक्लजी को इतने स सतोप नही हुआ है। उह सजनात्मक दृष्टि से भी तुलसीदास की भाषा सूरदास की भाषा की तुलना म अधिक उत्कृष्ट प्रतीत हुद १ हिदी साहित्य का इतिहास, पृ० २४१ २ वही, पृ० २०१ ३ वही, पृ० २०१ ४ वही, पृ० २४१ ५ वही, पृ० १३० ४२ / आचाय शुक्ल को साहित्याशसा १ ४ है। उनके मतानुसार 'सूरदास की रचना म कोमनकात पदावली और अनुप्रासों की वह विचित्र योजना नहीं है जो गोस्वामी जी की रचना म है। किसी कवि की प्रशसा शुक्लजी ने जिन बातो के लिए की है उनमे शिल्प पर अधिकार भी है । सत साहित्य की पूर्वपीठिका के निर्माण की दृष्टि से सिद्धो और नाथो की वानियो की चर्चा को प्रासगिक मानते हुए भी शुक्लजी ने उह शुद्ध साहित्य के अतगत नही रखा और कवीर जसे सत कवि की प्रतिमा की दाद देते हुए भी उनके कृतित्व की साहित्यिकता पर वे चुप लगा गए, लेकिन सुदरदास के विषय म उन्होंने स्पष्ट शब्दा मे लिसा इनको रचना साहित्यिक और सरस है। ऐसा मानने के लिए उहोन जो जाधार लिया है उमका सम्बध शिल्प पर उनके अधिकार से है। उनके सुदरविलास मे कवित्त सवैयो मे यमक, अनुप्रास और अर्थालकारो की योजना देखकर वे सतुष्ट हए है। सुदरदास के विषय मे उहोने इस बात पर विशेष ध्यान दिया है कि "निर्गुणपथियो म ये ही ऐसे व्यक्ति हुए है जिहे समुचित शिक्षा मिली थी और जो काव्य कला की रीति आदि से परिचित थे।' अय सत कवियो की तुलना में सुदरदास म शुक्लजी को दो विशेषताएँ दिखलाई दी है (१) "अय सतो ने केवल गाने के पद और दोह कहे है पर इहोने सिद्धहस्त कवियो के ममान कवित्त और सवैये रचे हैं, '५ (२) इनकी रचना काव्य पद्धति के अनुसार होने के कारण और सतो की रचना स भिन दिखलाई पड़ती है।' ६ सुदरदाम के विषय म शुक्लजी ने जो य टिप्पणियां की है, उनमे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी के कृतित्व को साहित्यिक मानने के लिए वे उनसे क्या अपेक्षा करत थे। अय अनेक बाता के लिए शिवदास का बसिया उधेडते हुए भी जब वे उनके सवाद रचना-वोशन की प्रशसा करते है तो लगता है कि शुक्लजी को उनकी थोडी बहुत प्रशसा बा आधार काव्यशिल्प म ही मिला है। तुलसीदास की प्रशगा शुक्लजी न जिन बातो के लिए की है उनम उनकी रच नाओ का शवीगत वैविध्य भी सम्मिलित है। हिदी साहित्य का इतिहास में शुक्लजी 1 लगभग चार पृष्ठो मे यही प्रतिपादित किया है। इस शैली वैविध्य को उहोंने सर्वांगपूण कान्यकुशलता' कहा है। १ हिंदी साहित्य का इतिहास पृ० १३१ २ वही, पृ०८० ३ वही, पृ० ८९ ४ वही, पृ. ९८ ५ वही, पृ० १८ ६ वही, पृ०८९ ७ यही, पृ० १४१ .

आचाय शुक्त की साहित्याशसा/४३ फिर भी यह बात समझ रखनी चाहिए कि शुक्लजी ने शिल्प को एक सीमा के आगे महत्व नहीं दिया है। शिल्प के नाम पर चमत्कार प्रदशन या शब्दा का खिलवाड उहे कतई पसद नहीं था। कोरी शिल्पगत निपुणता या कारीगरी उहे कोई बडी उपलब्धि नहीं जान पडती थी। बिहारी के काव्य शिल्प से वे प्रभावित थे, फिर भी बिहारी की उपर्ला घ उहें बहुत नही जची थी। इस सम्बध मे उहोंने लिखा है "बिहारी की कृति का मूल्य जो बहुत अधिक आंका गया है, उमे अधिकतर रचना की बारीकी या काव्यागो के सूक्ष्म वियास की निपुणता की आर ही मुख्यत दष्टि रखने वाले पारखियो के पक्ष से समझना चाहिए जो क्सिी हाथीदांत के टुक्डे पर महीन रेलबूटे देख घटो वाह वाह किया करते है।' १ शिल्प के प्रति जवधान के अतिरेक का प्रतिवाद शुक्लजी ने प्राय मर्वत्र किया है। छायावादी का य शिल्प की रमणीयता को स्वीकार करते हुए भी उन्होंने उसने कमजोर पहलू की ओर ध्यान आकर्षित किया है। पतजी के काव्य का उदाहरण सामने रखकर उहोने छायावादी काव्य शिल्प के विषय में लिखा है 'पतजी की 'छाया', वीचि विलास', 'नक्षत्र' आदि म यहाँ से वहाँ तक उपमानो का ढेर-मा लगा है, उनम से बहुत से तो अत्यत सूक्ष्म और सुकुमार साम्य के व्यजक हैं और बहुत से रग विरगे खिलौनो के म्प में ही है। ऐसी रचनाएँ उस 'कल्पनावाद', 'क्लावाद या 'अभि यजनावाद के उदाहरण मी लगती है जिसके अनुसार कवि-कल्पना का काम प्राति की नाना वस्तुएँ लेकर एक नया निर्माण करना या नूतन सष्टि खडी करना है ।"२ वस्तुपा की क्षीणता के साथ शिल्प की समृद्धि के पक्ष मे वे कतई नहीं थे, यह वात छायावादी काय शिल्प के विषय में उनकी इस टिप्पणी मे झलकती है 'कुछ कविया म वस्तु का आधार अत्यत अल्प रहता है, विशेष लक्ष्य जभि यजना के अधिक विस्तार पर रहा है। इससे उनको रचनाआ का एक बड़ा भाग अधर में ठहराया सा जान पडता है।' ३ छायावाद के अभ्युदय के लिए शुक्लजी ने जो रास्ता सुयाया है, उमम भी उनका ध्यान उसके शिल्प पक्ष पर रहा है "उमे अपनी चपलता और भावभगिमा का प्रदशन नीडा कौतुक की प्रवृत्ति कुछ सयत करनी पडेगी। इम ऊँचे नीचे ममपथ पर चित्रा का बहुत अधिक फालतू बोझ लादकर चलना भी वाणी के लिए उपयुक्त न होगा।' इसमे यह धारणा मिट जानी चाहिए कि शुक्लजी की साहित्याशसा म शिल्प का कोई स्थान नहीं था । यदि उनकी दष्टि म शिल्प का कोई मूल्य न होता तो व चित्रो के 'बहुत अधिक फालतू बोय' की चिता ही न करते। विहारी की कारीगरी पर मुग्ध १ हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ० २४२ २ वही, पृ० ६४४ ३ वही, पृ० ६४४ ४ वही, पृ०६५ ४ ४४/आपाय शुभल मी साहित्यारासा होने पो गाय्य ममगता या परिरायर न मानते हुए भी वे उनरी वल्पना की समाहार क्ति के साथ भापा यी गमारा गति पर रीशे हैं । दूसरी ओर अपो अत्यत प्रिय यदि तुमीदास की रचना म भी उह जहाँ शिल्पगत दुव लता दिसलाई दी है, वहाँ उहाने उसे उपाठा है। उनके लम्बे लम्बे साग रूपका के विषय म उहाने लिखा है "कही- यही लम्बे लम्बे साग पर यायने म अवश्य उहोंने एक भद्दी परम्परा का अनुसरण दिया है। ऐगा लगता है कि गुक्तजी ने शिल्प का महत्व आपगिक रूप म स्वीकार किया है । उनकी दष्टि म गिल्प या उत्वप काव्य के लिए आवश्यक है लेकिन शिल्प अपने- आप म महत्वपूर्ण नहीं है । पथ्य या जन्तवस्तु के महिमामय होने के साथ शिल्प भी ममुन्नत होना चाहिए। क्थ्य या जतवस्तु महिमामय होने पर भी यदि शिल्प अपरि- पाव हो, तो गुनजी उसकी अनदेखी नही करते । उसकी उपेक्षा करव काव्य की प्रशसा वे कभी नहीं करते। गुक्नजी ने शिल्प के विचार का कल्पना रे विचार मे अलग रखा है। अपने माहित्य चिनन म क्ला को कल्पना की निराली दुनिया के रूप म स्वीकार न करते हुए भी शुक्लजी न कभी प्रच्छन म्प म तो भी खुले रूप म साहित्य म कल्पना को महत्त्व पूण माना है । अपनी समीक्षा म जब वे क्सिी कवि रे वविध्यपूण जीवा बाध या जीवन के विविधपक्षीय मायावार की प्रशमा करते हैं, तो वह प्रकारातर से कवि की सजना (मक कल्पना व विस्तार की प्रशमा होती है । तुनमीदास को वडा कवि मानने के पक्ष में उनका एक तक यह रहा है कि तुलसीदास की "वाणी की पहुँच मनुष्य के सारे भावो और व्यवहारो तक है।' २ जिस शुक्नजी ने तुलसीदाम की वाणी की पहुँच कहा है, वह वस्तुत उनकी कल्पना को साक्षात्कार क्षमता का ही दूसरा नाम है। सूरदास को भी उहोन इस बात का श्रेय दिया है कि "जिस परिमित पुण्यभूमि में उनकी वाणी ने सचरण किया है, उसका कोई कोना अछूता न छुटा। इम प्रसग म 'वाणी का सचरण कल्पना का ही सचरण है । यद्यपि शुक्लजी न कल्पना का प्रसार जसी गदावली का प्रयोग नहीं किया है, फिर भी रचना वे क्षेत्र का फलाव जब वे बतलाते है तो उनका जाशय यही होता है। शव के काव्य पर उन्हान जो प्रहार किया है उसम उनकी कल्पना का क्षेत्र सकुचित होन का आक्षेप भी सम्मिलित है "जीवन के नाना और मार्मिक पक्षा पर उनकी दष्टि न थी। ३ ४ १ हिदी माहित्य का इतिहास पृ० १४१ २ वही पृ० १३४ ३ वही पृ० १६४ ४ वही, पृ० २०२ आचार्य शुक्ल की साहित्याशसा/४५ कल्पना के प्रसार को शुक्लनी ने जो महत्व दिया है, उसके पीछे उनी यह मापता रही है कि साहित्य की सापक्ता जीवन के प्रतिनिधान म निहित है। उनकी यह विचार दृष्टि उनी साहित्याशमा म अनक रूपा में नदतिर घेतना मे हती है। उसकी एक परिणति कल्पना के प्रसार को महत्त्व देने में हुई है, दूसरी मार्मिक प्रसगावे चमन म, तीसरी परिणति परिस्थितियो के सागोपाग उपस्थापन में हुई है और चौथी प्रबधकाव्य यो मुतर वाव्य पर वरीयता देने में। मथुरा से गाल की निकटना उह गोपियो की विरह भावना की स्वाभाविकता व विरुद्ध इगोनिए प्रतीत हुई वि वै मुक्तक कायम भी प्रबधमाव्य के समान जीवन की परिस्थितियो के प्रति जागरुक्तानी अपेक्षा करते थे। प्रबधवाव्य मे वल्पना व विस्तार की उनकी आवाभा तुष्ट हाती थी। इसीलिए उहोंने लिखा 'यदि प्रवधवाय एक विस्तृत वनस्थली है तो मुक्तत एव चुना हुआ गुलदस्ता । साहित्य ग प्रतिनिधान को महत्व देन के वारण ही उहान साहित्य सप्टि की स्वायत्तता का कभी स्वीकार नही किया आर नलन मष्टि के निर्माण वाली कल्पना का विरोध वे अत तब करते रहे। फिर भी शुक्लजी ने अपनी माहित्यागमा म उदभावना का मूल्य कम नहीं किया है । तुलसीदास की तुलना म उहें मूरदास म यह वैशिष्टय दिखलाई दिया है कि नवीन प्रसगा की उ'भावना सूर ने काय की अपनी विशेषता है जो तुलसीदास के काव्य मे नही मिलती। उन्होंने इस विषय म लिखा है 'सूर की बड़ी भारी विशेषता है नवीन प्रसगा की उद्भावना । प्रसगोदभावना करने वाली ऐसी प्रतिभा हम तुलसी म नहीं पाते।' २ तुलसीदास की सजनात्मक प्रवृति भिन प्रकार की रही है। उमे शुक्लजी ने इन श दो मे आया है "उसकी कल्पना वस्तुस्थिति को ज्यो को त्यो लेकर उसके मार्मिक स्वरूपो के उद्घाटन म प्रवृत्त होती थी, नई वस्तुस्थिति खडी करने नही जाती थी।" इन टिप्पणियो म यह देखा जा सकता है कि शुक्लजी ने नूतन प्रसगो की उद्भावना और वस्तुस्थिति को ज्यो की त्यो लेकर उनका मार्मिक स्वरूपा के उद्घाटन मे अतर किया है, लेकिन दूसरी स्थिति म भी कवि की कल्पना के योगदान का रेखास्ति दिया है । इस प्रकार उहोंने सजन से कल्पना र सम्बध कामा यता दी है। कल्पना की यह भूमिका नूतन निर्माण से इस अथ म अलग है कि 'नूतन निर्माण की बात उहाने सदा जीवन विच्छिन्न और प्रतिनिधान निरपेक्ष रुप मे ही ली है। इसीलिए वल्पना की उदभावना और उद्घाटना को उन्होने कल्पना की उड़ान से सदा अलग रखा है। प्रतिनिधानमूलक माहित्य दष्टि जीवन से सरोगार रखने के कारण लोकचिता और लोक्मगल की ओर उ मुख हो, यह बहुत स्वाभाविक है। हिंदी साहित्य का १ हिंदी साहि य का इतिहास, पृ० २३९ २ वहीं, पृ० १६४ ३ वही, पृ० १४० ३ ४६ / आपाय गुनि की गाहित्यागमा इतिहास म यह बात दोम्पा म दिगनाई देती है (१) सामानम म परिचिोप की उक्तिया की प्रतिक्रिया रेप मोर (२)ोरमगनोरियान के रूप म। पहली यात क्वीर और तु नसी सम्बधी ममीसाा म देसन को मिलती है जबकि दूसरी बात तुलसीदास मम्बधी गमीना म ही उपन्य है। शुक्लजी विगार है वि गिदा और नायो का अनुसरण करन पाले पबीर वो जटपटी और गूढ उतियोपिय ग लोरमानम आतरित था और तुनगीनाम । उग इस बाता मे मुक्त करने का प्रयत्न विया ।२ गुगलजी ने निगुणपपिया पर नामी उपना जोजाराप गाया है उम आज बहुत कम नाग मानेंगे फिर भी उनमी रा टिप्पणी म जा बात महत्वपूर्ण है वह यह कि उहाने निगणपपिया और नमीटार वे पाय यो नोरमानम के मम्बाप से देखा है । उनी रानाआ मूरयानन को इम गम्मथ की चेतना न प्रभावित किया है लेकिन इस तथ्य ती चर्चा करत गमय यह भी याद रखना होगा कि इतिहास म इतने गारे लेगमा म ग बहुत कम वे प्रमग म गुलजी न गोर की यात उठाई है । गता है वि गुपनजी नोरममक्ति को काव्योत्कर्ष का जतरग अग नही मानते थे। इतना ही नही, तोर चेतना ने जहाँ नदतिा बोर के विन्द्र जार पान्य म उपदा मक्ता का रूप ले लिक है वहाँ गुक्लजी ने अपन प्रिय गे प्रिय वि को भीभमा नहीं किया है। उपदेशात्मकता को लक्ष्य र उहोन तुलसीदाम के विषय मनिया है "रामचरित मानम म तुलसीदास वेवल ववि के रूप म ही नहीं, उपदेश के म्प मे भी मामने आते हैं। उपदेश उहोंने किसी न विमी पात्र के मुख मे यराए हैं, इसगे या य दष्टि में यह कहा जा सकता है कि वे उपदेश पात्र के स्वभाव चित्रण के साधन रूप हैं । पर बात ऐसी नहीं है । वे उपदेश के लिए ही हैं।'' जिन कविया के विषय म गुरुजी ने अपनी अप्रसनता व्यक्त की है, उनम उह प्राय काव्यगुण का अभाव दिखलाई दिया है। जीवन बोध का प्रश्न उहोंने बहुत कम कवियो के प्रसग में उठाया है। प्रखर जीवन वोच का लोरचेता कवि गुलजी की दप्टि मे चढ गया है लेकिन इस गुण से रहित रविया पर वे खीझे नही है । यदि यह देखना हो कि किस प्रकार की वाय रचना ने गुक्लजी के मन मे असतोप पैदा किया है तो 'इतिहास म इस प्रकार की टिप्पणियां उस काव्य के सम्बध म मिलेंगी जिसम या तो भावुक्ता की कमी है या जिसकी भावभूमि मकुचित है या जहाँ काव्य के शिल्प सौदय को इस सीमा तक महत्त्व दिया गया है कि वह सजावटी १ हिंदी साहित्य का इतिहास पृ० २१ २४ और ७९ २ वही, पृ० १३५ से १३७ ३ वही, पृ० १३५ ४ वही, पृ० १४० Wआचाय शुक्ल की साहित्यासमा । ७ यस्तु बन गया है या जहां वल्पना शक्ति क्षीण रही है। पहले प्रकार का असत्तोप उन्होंने मेराव के सम्बप में यह कहते हुए व्यक्त किया है "वेश यो पविहृदय नही मिना है।" दूसरे प्रकार की शिकायत उन्होंने 'छायावाद के मम्बधम की है। छायावाद पी सचित भावभूमि की शिकायत करते हुए उन्होंने लिखा "उसका प्रधान लक्ष्य पाव्य शंली की ओर था, वस्तुविधान की ओर नहीं। अधभूमि या वस्तुभूमि का ता उसने भीतर बहुत सकोच हो गया । गर्मावत विशाल भावनाओ को लेकर चलने की ओर ध्यान न रहा। तीमरे प्रकार की अप्रसन्नता भी बहोंने छायावाद के प्रति प्रकट की है और उसके साथ अभिव्यजनावाद को भी जोड दिया है इन दोनो वादोये अनुसार काव्य या लक्ष्य उसी प्रकार मोदय वो सृष्टि या योजना हो गया जिस प्रार बेलबूटे या नववाशी का। छायावाद के सम्बधम रिए गए इस आक्षेप के साथ अभिमजनावाद को जोड देने से यह स्पष्ट हो जाता है कि शुक्लजी को यह नाराजगी मुख्यत उस काव्य दान के प्रति है जो उहें छायावाद मे जुडा प्रनीत हुआ है। इस विचार की पुष्टि इस बात में भी होती है वि गुक्लजी ने जोर स्याना पर छायावादी भाव्य गिल्प को रमणीयता की प्रशमा की है और उसे द्विवेदी युगीन कविता की नीरसता के विरुद्ध काव्य शिल्प वे उलपकी आवाधाम प्रेरित बतलाया कहा है "द्वितीय उत्थान में काव्य की नूतन परम्परा वा अनेक विषयस्पर्शी प्रसार अवश्य हुआ पर द्विवेदीजी के प्रभाव से एक ओर उमम भाषा की मफाइ आई दूसरी ओर उसका स्वरूप गद्यवत् रूखा, इतिवत्तात्मक और अधिकतर वाहाय-निरूपा हो गया. अत सडीवोली की पविता में पदलालित्य, फ्ल्पना पी उडान, भाव की वेगवती म्यजना वेदना की विकृति, शब्द प्रयोग की विचित्रता इत्यादि अनेक बातें देखने की भाकाक्षा बढ़ती गई। कुछ अग्रेजी ढर्रा लिए हुए जिस प्रकार की पुटकर कविताएँ और प्रगीत मुक्तक (लिरिक्स) बॅगला म निकल रहे थे, उनके प्रभाव से कुछ विश खल वस्तुपियास और अनूठे शीपका के माय चित्रमयी, कोमल और व्यजा' भाषा मे इनमी मए ढग की रचनाएँ सवत १९७० ७१ से ही निस्तन नगी थी काव्य के सम्बध मे इस विचार दष्टि के फलस्वरूप शुक्लजी ने द्विवेदी-बालीन कविता के विषय म जो असतोष प्रक्ट रिया है उसका सम्मघ असतोष के उपयुक्त चार प्रकारो म से अतिम से है "द्वितीय उत्थान की कविता म काव्य का स्वरूप खडा करने वाली दोनों बातों की कमी दिखलाई पड़ती थी-कल्पना का रग भी बहुत कम या पीका रहता था और हृदय का भी सलामटयजित होतापाई १ हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ० २०॥ २ वही, पृ०६१७॥ ३ वही, पृ० ६२३ ४ वही, पृ० ६१७-१८ ५ वही, पृ.६१७ " ४८/ आचाप शुक्ल को साहित्याशसा भाव और कल्पना दोनो को समवित रूप म भी गुक्लजी ने कुछ कवियो की समीक्षा के लिए काम म लिया है। मूरदाम की कविता मे वाग्वदग्ध्य की उहोने जो खोज की है उसम वाणी यी विदग्धता उक्ति चमत्कार से सवथा भिन प्रकार की वस्तु रही है। इसका कारण यही है कि वाणी वी विदग्धता म भाव को भगिमा महत्त्वपूर्ण रहती है जिसे कवि की कल्पना व गति प्रदान करती है । पद्माकर के प्रसग म शुक्रजी ने काव्य म भावाभिव्यक्ति के मम्बध मे क्ल्पना का महत्त्व स्पष्ट शब्दा म प्रतिपादित क्यिा है 'इनकी मधुर कल्पना ऐसी स्वाभाविक और हावभावपूण मूतिविधान करती है कि पाठक मानो प्रत्यक्ष अनुभूति म मग्न हो जाता है। ऐमी सजीव मूतिविधान करने वाली कल्पना बिहारी का छोड जोर विमी कवि म नही पाई जाती। एसी कल्पना के बिना भावुकता कुछ नहीं कर मस्ती, या तो वह भीतर ही भीतर लीन हो जाती है अथवा असमथ पदावली के बीच व्यथ फ्डपडाया करती है। कल्पना और वाणी के माथ जिस भावुकता या सयोग होता है वही उत्कृष्ट काव्य के रूप म विपमित हो मवती है।" पद्माकर के काय के सम्बध म गुलजी को यह टिप्पणी काय वे मम्बध म उनके नदनिक अभिगम की सूचक है । हिदी साहित्य का इतिहास म उहो। बडे पैमाने पर जो साहित्य ममीक्षा की है उसमे विभिन्न रचनाकारो वे सदभ म भापा, शिल्प, भावक्ता कल्पनाशीलता जीवनो मुग्खता नादि का विचार उहोन किया है लेकिन सवत्र यह ध्यान रखा है कि वे जिस वस्तु की समी ना कर रहे है वह माहित्य है जीवन नहीं। साहित्य को जीवन सदर्भित मानकर उसकी ममीक्षा करना एक बात है और साहित्य के बहाने जीवन की हो समीक्षा करना दूसरी । आज ने अना ममीक इस विपर्याम से ग्रस्त है। वे माहि य के नाम पर जीवन सदर्भो म ही उनझे रह जाते हैं। गुकाजी ने इतने बड़े पैमाने पर माहित्य समीक्षा करते हुए भी अपनी माहित्यासा को इम विपर्यास से मुक्त रखा है। हिदी ममीक्षा को यदि भटकाव से मुक्त रहना है तो उसे शुक्रजी के बनाय रास्ते पर चलना होगा। १ हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ. २९५ अध्याय समीक्षा-पथ हिंदी ममीभावे आधुनिक रूप का मूत्रपात गद्य महित्य पी अय विधाओ को भौति भारते दु-वाल म हो गया ना जिमरा चित्राम द्विवेदी युग म देखा जा सकता है, यितु जहा तक आनोचना म गाम्भीय और दृढता आने का प्रश्न है, इसका श्रेय मुख्य रूप म आचाय रामचन्द्र गुगल को मिलना चाहिए । शुक्न पूव हिदी ममीक्षा का स्वरूप बहुत सीमा तक अनिश्चित था। उमम मौनिक चितन, अध्ययन की व्यापकता और अनुभूति की तीव्रता का अभाव मा था। गुफ्तजी न भारतीय वायगास्न को नवीन, मनोवैनाशिक दीप्ति प्रदान की तथा मस्कृत काव्यगास्न और पादनात्य जालोचनाशास्त्र पा गह्न अध्ययन कर अनप नवीन मा यताओ पी प्रस्थापना की जो सैद्धातिव और व्यावहारिक हिदी आलोचना के लिए मागदशक मिद्ध हुई । गुरलजी न अपने व्यापक एव गम्भीर अध्ययन, अपनी अनोखी सूझबूग तल स्पी दृष्टि और मौलिव चितन शक्ति बन परहिदी ममीक्षा को एर ठोम धरातल प्रदान किया। ममीक्षा के क्षेत्र म नाचाय गुफ्त की मंद्धातिप एव विनियोगात्मक उपलघिया का प्रतिफल उनके समीक्षक यक्तिव की पराकाष्ठा तक ही मीमित नहीं है प्रत्युत उनकी देन इम दप्टि मे और भी अधिक महत्वपूर्ण है कि उहोंने समीना का जो राजपथ निर्मित किया उम पर चलने की सुविधा से प्रेरित होकर हिन्दी म गमीक्षका की एक बड़ी संख्या साहित्य यात्रा के लिए निकल पड़ी। गुवनजी हिदी-ममीक्षा वे एप ऐसे प्रयाग स्तम्भ हैं जिनमे प्रवाश लेकर अनन महारथियो ने अपनी ममीक्षा यात्राआ की दिशा निधारित की है। व्यापक परिप्रेभ्य-शुक्न शमीभा की यह विरोपता रही है गि उमम साहित्य ये जग प्रत्यग का अनुशीतन व्यापर परिप्रेक्ष्य म किया गया है । बँधी बधाई परम्परा की कूपमण्डक्ता गुवलजी को स्वीकाय नहीं थी। गुवलजी का दष्टिकोण अत्यत व्यापक था। उ होने सस्कृत की अत्यत सम्पन काव्यशास्त्रीय परम्परा के साथ ही पाश्चात्य ममीक्षा की उयर परम्परा से प्रकाश प्राप्त किया और सस्कृत के काव्य व भव को दष्टिपथ म रखने के साथ ही माथ बाग्ल माहित्य की उच्चकोटि की कृतियों पो अपने ध्यान में रखकर ममीला मान तथा साहित्यिक मादा निर्धारित किये।

५०/समीक्षा पथ पाश्चात्य ममीथवा म आई० ए० रिचड़ म, एवर पाम्मे प्रभति विद्वाना के विचारो स शुक्लजी के समीक्षा मिद्धा त बहुत निस्ट हैं । रिचड म महोदय न जिस प्रकार साहित्य और जीयन मे अविच्छेद्य मम्बध स्वीकार कर मूल्यवादी दृष्टिकोण को अपनाया है, गुक्लजी न भी ऐमी ही वात अनव स्थाना पर कही है-"वविता का अतिम लक्ष्य जगत के मार्मिक पशा या प्रत्यक्षीकरण करके उनके माथ मानव हृदय ना मामन्जस्य स्थापन है। गुक्लजी न अपनी ममी गा मे निगमनात्मक (Inductive) पद्धति अपनाई है जिमम आलोचना के मान, जालोच्य कृति के आधार पर प्रस्थापित किये जाते है। रिचर्ड्स के विचार भी देखिए क्तिना अद्भुत साम्त रखते हैं-"When ever we attempt to Judge poetry from outside by technical details we are putting means before ends and such 15 our ignorance of cause and effect in poetry we shall be lucky if we donot make even worse blunders एवर नाम्वे और शुक्लजी के प्रेषणीयता सम्बपी विचारो म अनोखा सादृश्य अवलोकनीय है। गुक्तजी न जहां-"एक महृदय की अनुभूति को दूसरे सहृदय तक पहुँचाना" काय या वला का लक्ष्य माना है वहां एवर पाम्बे ने भी काय के लिए प्रेषणीयता को अनिवाय तत्त्व माना है, जिससे विना माहित्य माहित्य नहीं होता।" केवल सादश्य की दप्टि मे ही नहीं, प्रतिक्रिया स्पम भी शुक्नजी की विचारधारा का सम्बघ पाश्चात्य विचारला मे दिषलाई देता है। क्रोचे और ब्रेडले के मतो से वे कभी पूणत सहमत नही हुए। रोडले वे कलावाद को लेकर शुक्लजी द्वारा लिखा हुआ यह अश इस दष्टि मे महत्त्वपूर्ण है-"उपयुक्त वाद वेलचूटो और नक्काशियो के सम्बध म 1 There is no such gulf between poetry and life as overliterary persons sometimes suppose There is no gap between our every day emotional life & the material of poetry The verbal expression of this life at its finest is forced to use tachnique of poetry that is the only essential difference -I A Richards Practical Criticism p 319 2 रसमीमामा पृ० २६ 3 Practical Criticism p 17 4 काव्य मे रहस्यावाद-लेखन आचाय शुक्ल, पृ० १०४ 5 Whateverelse literature may be communiaction it must be No communication no hiterature We must always remember tbat language is only the medium of the art The art consists in the communication establish beineen author and reader (or of course hearer ) -Principles of Literary Criticism p 24 समीक्षा पथ/५१ ४ तो बित्तुल ठीर घटना है, पर काव्य की मच्ची मामिर भूमि से बहुत दूर रहता है । उमे दृष्टि म रखकर जो चलेगा, उगवे निक्ट वाव्य या महृदयता, भावुक्ता और मार्मिक्ता मे कोई मम्बध नहीं।"१॥ मेरे देवन म तो हमारे याव्य समीक्षा क्षेत्र से जिला जल्दी यह शब्द निकले, उतना ही अच्छा है । '२ इधर प्रोचे के अभि यजनावाद को 'वितण्डावाद' कहकर गुक्लजी न 'सुदर' शब्द को 'रमणीय सब्द से हीनतर बताया है और वहा है- 'यह 'सुदर शब् काव्या नुभूति के सौदय वो मचित करता है। प्रत्यक कविता का ग्रहण 'मौदर्यानुभूति' के रूप म नहीं होता। कोरे या अपने यहां के-चमत्कारवादी और वनोक्तिवादी के अनुसार, यदि हम अभिव्यजना या कल्पना की उडान को ही सब कुछ मानें तो भी 'मुन्दर व बिना खीचतान के मवत्र काम नहीं देता। वस्तुत गुस्तजी को पाश्चात्य माहित्य में प्रचलित हो रहे नये नये वादो से चिढ-सी थी और जब उहाने सा कि उही वादो का अधानुकरण हिंदी साहित्य म भी बगना के माध्यम मे जोर पक्ड रहा है तो उन्हान स्पष्ट गदो म कहा-"आजवल पाश्चात्य वादवक्षा वे बहुत मे पत्ते कुछ हर नुचे हुए कुछ सूखवर गिरे पाये हुए—यहाँ पारिजात पत्र की तरह प्रदर्शित विय जाने लग है जिमम मादित्य के उपवन मे बहुत गडवडी दिखाई देो नगी है। इन पत्ता की परख के लिए अपनी आँखें खुली रखने और उन पेडा की परीक्षा करन की आवश्यक्ता है जिनके ये पत्ते है। शुक्नजी की समीक्षा मे इस व्यापक पृष्ठभूमि का प्रभाव अनेक म्पा म देवा जा मरता है। इस सम्बध म सवप्रथम उनके समीक्षा सिद्धाता के जतगत भारतीय रम सिद्धात के साथ पाचात्य कल्पना मिद्धान्त का मम वय उल्लेखनीय है, क्योकि इस समवय के परिणामस्वरूप गुक्तजी ने भारतीय काव्य चिनन के मेरुदण्ड को नतन गति प्रदान की है। रसोद्र मे कल्पना का योग-शुक्लजी ही प्रथम नाचाय है जिहोंने रसोद्रक मे पल्पना तत्त्व के महत्त्व के स्वीकार किया। संस्कृत आचार्यों ने रस के अवयवाया उल्लेख करते हुए भाव, विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावा का उल्लेख तो किया, पितु उसके मून म अतहित रसास्वाद की गत्यात्मक (Dynamic) प्रप्रिया को वे स्पष्ट नहीं कर सके। गुक्लजी ने पाश्चात्य ममीभा सिद्धाता मे गहीत कल्पना शक्ति के १ चितामणि- -भाग दूसरा, पृ० १७० २ वही, पृ० १८० ३ वही, पृ० १७९ ४ वही, पृ० १७८ ५ वही, पृ० १६५ ५ ५२ / समीषा पर प्रकाश म उस प्रत्रिया को अधिक विशद रूप म व्याख्यायित दिया। यस्तुत कल्पना ही बह आधारभूमि है जो ग्म के विभिन्न अवयवा का एक गत्यात्मर प्रक्रिया म यतभाय करती है । शुक्लजी ने रस विश्लेषण म वल्पना को उचित भाव देते हुए कहा-“सारा रूपविधान कल्पनाही करती है । अत अनुभाव कहे जाने वाले व्यापारा और चेप्टाओं द्वारा जाश्रय को जो रूप दिया जाता है, वह भी कल्पना ही (वे) द्वारा। पर भावो की द्योतक शारीरिक व्यापार या चेप्टाएँ परिमित होती है, वे रूढ या बंधी हुई होती है। उनमे नयेपन की गुजाइश नहीं, पर जाश्रय के वचनो की अनेक रूपता की कोई सीमा नहीं । इन वचनो की भी कवि द्वारा कल्पना ही की जाती है।'' शुक्लजी ने कवि और भावक दोगा के लिए कल्पना शक्ति को अनिवाय माना। एक मजन प्रनिया म कल्पना का सहाग लेता है तो दूसरा भावन प्रक्रिया म । कल्पना को इतना महत्त्व देन पर भी शुक्लजी पाश्चात्य समीक्षको की भाति कल्पित रूपविधान को ही काय या मूल लक्षण स्वीकार नहीं करते, वरर वे तो उसी कल्पना को साथ मानते है जो श्रोता या पाठक वे मन म कोई भाव जगाने मे समथ हो।"२ शुक्लजी की यह विचारणा कि रमोद्रव म कवि की विधायक कल्पना शक्ति तो काय बरती ही है साथ ही रसास्वादन के लिए पाठय की ग्राहक कल्पना शक्ति का भी समृद्ध होना परमावश्यक है, उनके व्यापर चितन का ही परिणाम कही जा सकती है । शुक्ल जी ने ग्राहक कल्पना का महत्व प्रतिपादित करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि उसके अभाव मे का यास्वाद की सम्भावना समाप्त हो जाती है-'जिनकी भावना या कल्पना शिथिल या अशक्त होती है किसी कविता या सरस उक्ति को पढा सुनाकर उनके हृदय म मामिक्ता होते हुए भी वैसी अनुभूति नहीं होती। बात यह है कि उनके अत करण में चटपट वह सजीव और स्पष्ट मूर्तिविधान नहीं होता, जो भावा को परिचालित कर देता है।"३ सौदय विषयक विचारणा-इसी प्रकार उनकी सोदय विषयक विचारणा भी व्यापक परिप्रेक्ष्य को लेकर चली है । इहोन वस्तुआ के बाह्य रगरूप को ही सौ दय की श्रेणी मे नहीं रखा वरन मनोवत्ति और कम मोदय को भी सौदय के क्षेत्र में समाहित किया और स्थापना दी कि-'कवि की दष्टि तो सौदय की ओर जाती है चाहे वह जहा हो-वस्तुओ के रूपरग म अथवा मनुष्यो के मन, वचन और कम म । उहोने स्पष्ट शब्दो मे कहा है- "कविता केवल वस्तुओ के ही रगरूप मे सौदय की ४ १ रस मीमासा पृ०२७२ २ वही, पृ० ३०३ ३ चितामणि-भाग पहला, पृ० १६१ ४ रस मीमासा, पृ. ३३ समीक्षा पय/५३ छटा नहीं दिसाती, प्रत्युत वम और मनोवृत्ति के सौदय के भी अन्य त मार्मिक दृश्य सामन रसती है। वह जिस प्रकार विकसित कमल रमगीय के मुखमण्डल आदि का सोदय मन म लाती है, उसी प्रकार उदारता, वीरता त्याग, दया, प्रेमोत्वप इत्यादि को जोर मोवत्तियो का सौन्दय भी मन म जमाती है।" शवलजी ने सौ दय के भीतरी और बाहरी,भेदो को निराधार बताकर सौ दय के क्षेत्र की विस्तृत भूमिका प्रस्तुत की जिसे नि सदेह उनके व्यापर दष्टिकोण का परि- चायफ कहा जा सकता है। आचार्य ने सुदर वस्तु से पृथक सौदर्य की सत्ता स्वीकार नही वि और इनके अनुसार तो यूरोपीय कला समी का का यह पहना कि-'सौ दय बाहर की वस्तु नही, मन के भीतर वो वस्तु है-भाषा को गडबडझाल के सिवा और कुछ नही है । २ सच्चे पवियो की सौदय भावना को लेकर लिखा गया यह अश इस दृष्टि से क्तिना महत्त्वपूर्ण है-- 'सच्चे गावि राजाजो को सवारी, ऐश्यय की सामग्री म ही सोदय नहीं ढूढा करत । वे फग के योपडा, धल-मिट्टी म सने विसानो, बच्चा के मुह मे चारा डालते हुए पक्षियो, दौडते हुए कुत्तो जोर चोरी करती हुई विल्लिया मे भी कभी कभी ऐसे सौदय या दशन करते हैं जिसकी छाया महला और दरबारी तक नहीं पहुंच सकती।"३ काव्य विषय को व्यापकता-बाय के वण्य विषय को लेकर शुक्लजी ने अपनी व्यापक दष्टि का परिचय दिया है और इस व्यापक दष्टि की पृष्ठभूमि म उनका व्यापक अध्ययन रहा है । अग्रेजी और सस्तृत की श्रेष्ठ कृतियो के अध्ययन से प्रभावित होकर उहोने सम्पूण दश्य जगत और उसरे नाना तत्वा को वाय विषय के स्प म स्वीकार किया है चाह वह मनुष्य जीवन से सम्बधित हो, चाहे मनुष्येतर जगत से। समस्त चराचर को काय विपय स्वीकार कर पडितजी न वण्य विषय सकाच को दूर किया है। प्रकृति को मात्र उद्दीपन मानना शुक्नजी को स्वीकाय नही, इहोंने स्पष्ट शब्दो म कहा है-"जो प्राकृतिक दश्यो को केवल कामोद्दीपन की सामग्री समझते हैं, उनकी रुचि भ्रष्ट हो गई है और सस्कार सापेक्ष है।" जादिकवि वाल्मीकि, कालिदास, भवभूति, वड् रावथ और शेली प्रति कवियो बेसुदर और मार्मिक प्रति चित्रण से शुक्लजी अत्यधिव' प्रभावित हुए। इसी के परिणामस्वरुप उहोन प्रवृति को आलम्बन रप मे स्वीकार कर साहित्यकारो को चरा- चर जगत के सौदय की आर प्रेरित किया। नाचाय शुक्लजी न सम्पूर्ण विश्व को एक १ चितामणि भाग पहला, पृ० १६६ २ रस मीमासा, पृ० २९ ३ वही, पृ० ५३-५४ ४ वही, पृ० १११ ५४/समीक्षा-पथ अपन काब्यका । - पान्य की सजा देते हुए कहा- इस विश्ववाध्य को रसधारा मजा थोडी देर लिए निमग्न हुआ, उसके जीवन को मरुस्थल की यात्रा समझना चाहिए।" प्रयोजन, विषय विस्तार को ध्यान म रखत हुए बाह्य प्रति में साथ अत प्रतिमा सामजस्य और भावात्मक सत्ता के प्रसार, काही माना है। शुक्रजी वे इस व्यापक परिप्रेक्ष्य का उनकी संदातिक समीक्षा म ही नही, प्रत्युत व्यावहारिक समीक्षा म भी देखा जा सकता है। इहान भारतीय और पाश्चात्य साहित्य का तलस्पी अध्ययन कर अपनी व्यावहारिक समीक्षा म मौलिक चितन के आधार पर अनेक मार्मिक तथ्यो का उद्घाटन किया है । क्लजी क इसी व्यापक दष्टि कोण को उनके साहित्यिक ऐतिहासिक सदभयुक्त विवेचना म स्पष्ट रूप से देखा जा सक्ता है । शुक्लजी न साहित्य के मूल्याकन ये पूध साहित्यकार के परिवश और युगीन परम्परा को विशेष महत्त्व दिया है । रचनावार और उसकी रचना में शुक्लजी अटूट सम्बघ स्वीकार करते है । इसलिए वे रचनाकार के व्यक्तिगत जीवन, उसके मानसिक धरातल तथा सस्कारो को पूर्व अध्ययेय माना है । सूर, तुलसी और जायसी पर लिखी उनकी विस्तृत भूमिकाआ म इस विशेषता को देखा जा सकता है। काव्य सिद्धाता के समान ही काव्य समीक्षा में भी शुक्लजी न स्थूल रसागा के परिगणन के स्थान पर कल्पना सचरण को बल दिया। स्थूल रसागा की लीक को छोड़ने वाल सूर के कवि की पहुँच का उल्लेख करते हुए शुक्लजी लिखत है--"उनकी उमडनी हुई वाग्धारा उदाहरण रचने वाल कविया के समान गिनाय हुए सचारिया सबंधकर चलन वाली न थी। यदि हम सूर के केवल विप्रम्भ Y गार को ही लें,अथवा इस भ्रमरगीत को ही देखे, तो न जाने कितन प्रकार की मानसिक दशाएँ एसी मिलेंगी जिनके नामकरण तक नहीं हुए है । म इसी को कवियो की पहुँच कहता हूँ। इधर विषय विस्तार के भाव को देखकर शुक्लजी ने भारत दु हरिश्च द्र को आलोचना की है क्योकि उनके साहित्य म प्रकृति के विस्तृत क्षेत्र की उपेक्षा सी दप्टि- गत होती है । व लिखते हैं-"मानवी वत्तियो हो के ममरपर्शी अशो को छोटकर उहोन मनोविकारो को तीव्र और परिष्कृत करन का विचार किया, दूसरी प्राकृतिक वस्तुआ और व्यापारों की ममस्पर्शिनी शक्ति पर बहुत ही कम ध्यान दिया। इहोने मनुष्य को सारी सष्टि के बीच रखकर नहीं देखा उसे उसी के उठाए हुए घेरे म रखकर ३ । देखा। १ चिन्तामणि, भाग १, पृ० १४६ २ वही, पृ० १४५ ३ भ्रमरगीतसार (सेवा० रामचद्र शुक्ल), पृ०२ ४ चितामणि, भाग १,पृ० १९४ समीक्षा-पथ /५५ इस प्रकार हम देखते हैं कि शुक्लजी के चितन का व्यापक परिप्रेक्ष्य उनको सैद्धातिर समीक्षा ता ही सीमित नहीं रहा प्रत्युत व्यावहारिक समीक्षा म भी पर्ण स्परो उभर कर आया है। मनोव्यापारात्मक दष्टि-आलोचना मा की प्रस्थापना मे मनोव्यापारात्मक दष्टि का प्रयोग शुक्ल समीक्षा की अपनी विशेषता रही है । इहोने काव्य को हृदय का व्यापार माना है और इसी हृदय-तत्त्व को लेकर काव्य की परिभाषा, उसके प्रयोजन, लक्षण, रस और साधारणीकरण आदि विषयो पर विचार किया है। शुक्ल पूर्व हिदी समीक्षा म इस मनो यापारात्मव दृष्टि या अभाव सा था । वस्तुत शुक्लजी की यह अपनी मौलिक दष्टि है जिस पर कुछ सीमा तक पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र का प्रभाव देखा जा सकता है। काम्य परिमापा-शुक्लजी ही प्रथम नाचाय है जिहोने काव्य परिभाषा मे स्थूल याव्यागो को महत्त्व न देकर मनोव्यापार को महत्त्व दिया है । शुक्ल पूर्व सस्कृत आचार्यों ने काव्य विषयक जो अनेक परिभाषाएं दी थी, उनम शब्दाथ, शब्द या वाक्य वोही काव्य पहा गया था। यथा- शब्दाथो सहितो काव्यम' तददीपोश दाथी सगुणावनलवृति पुन क्वापिर रमीणीयार्थप्रतिपादक शब्द काव्यमर वाक्य रसात्मक काव्यम उपर्युक्त काव्य विषयक परिभाषाएँ काश्य बाह्य पक्ष की ओर सवेत करती है । शुक्लजी न काव्य को मन स्थिति पर केन्द्रित किया तथा काव्य का सम्बध हृदय की मुक्तावस्था से जोडा--"जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहनाती है । हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है, उसे कविता कहत है।' काव्य-लक्षण-काव्य लक्षण पर विचार करते हुए गक्नजी ने 'रमणीयता' शब्द को अधिक महत्ता दी है। वस्तुत कविता हृदय को रमान का काय करती है जिसका सम्बध भावनाआ और अनुभूतियो से है । रमणीय तत्त्व का सम्बध भी हृदय- व्यापार अथवा मनोव्यापार स है इसलिए यहाँ भी शुक्लजी को वही मनोयापारात्मक १ भामह, काव्यालकार २ मम्मट,काव्यप्रवास ३ जगनाथ, रसगगाधर ४ विश्वनाथ, साहित्यदर्पण ५ चिन्तामणि, भाग १, पृ० १४१

No text on this page.

नुकतनी न यहां मनाविधान में महार अपन तस्य पा गिद्ध परत या प्रयरा किया है। रन बनृमार व प्रिय म अपिल दूर्गही नहीं है और न ही माग म एगी- वैसी कोई बाधा दी जा मामला गरयरा, पिर एगा मिरयय प्रताप काई युक्ति- सगत प्रतीत नहीं हाताा मी प्रसार गुलजीन एक और मनाधनानिक सत्य प्रस्तुत करते हुए जायमी की बानोचना की है जिमम पविया द्वारा नायिकाआ के ही विशेष म्प से विरह-जीवन के चित्रण दिय जातका कारण बताया गया है ।-"ध्यान देन की बात यह है कि विरह की व्यानुलता वोर असह्य वेदना स्त्रियो के मत्ये अधिक मढी गई है। प्रेम के वेग की मात्रा स्त्रियो मे अधिक दिम्बाई गई है। नायक वे दिन दिक्षीण होन, विरह ताप म भस्म होने, सूखकर ठठरी हो घणन म कवियो वा जी उता नही ता। बात यह है कि स्त्रियो की गार चेप्टा का वणन परो म पुरषा यो जो वह पुरपो ये दा घणन करने मे नहीं।" भाग ३ ७८ १ ५६ / समीक्षा पथ दृष्टि का परिचय मिलता है। शुक्लजी न पाव्य प्रयोजन पर विचार परत हुए यहा है किवाय का लक्ष्य ता एय महृदय की अनुभूति को दूसरे सहृदय तक पहुँचा दना ही है । गुक्लजी परम्परित काव्य प्रयोजना यो अधिक महत्व नहीं देत, जसे यशअर्थ, व्यवहार, शिवतरक्षतये आदि, वे तो काय का चरम लक्ष्य मवभूत यो जात्मभूत पराके अनुभव कराना मानत हुए कहते हैं- 'यविता मनुष्य के हृदय का व्यक्तिगत मम्मघ ने सवुचित मण्डल से ऊपर उठाकर लोरमामा य भावभूमि पर ल जाती है जहां जगत् क नाना रूपो और व्यापारा के साथ उमये प्रकृत सम्बय का मोदय दिखाई पडता है।' २ हृदय को लोक्सामय भूमि पर ले जाना मना यापारात्मा समेत है जहाँ सहृदय स्व पर की भावना से मुक्त होकर काय का नास्वादन करता है । रस और साधारणीकरण सम्बधी मा यताएं-जिम प्रकार शुक्लजी न स्थल काव्यागा को महत्त्व नहीं दिया, उसी प्रकार उहान स्थूल रमागा को भी महत्ता न देकर उसके मानसिक पक्ष का उदघाटन किया है। गुनिजी विभाव, जनुभाव और सचारिया की गिनती गिना यन को रसनिप्पत्ति सना स भिहित करना युक्तिसगत नही मानते । इहोन रस का मनोवैज्ञानिक धरातन पर अध्ययन किया और सवप्रथम हृदय और मस्तिष्क की भूमिकामा सम्बर से रम पर विचार कर निणय दिया कि हृदयवाद ही रसवाद है और हृदय की मुक्तावस्या ही रसदशा है।' माय ही गुक्लजी का यह कहना कि लोक्हृदय म हृदय के लीन होन की दशा का नाम रसदशा है, उनके मनो व्यापारात्मक दप्टिकोण का परिणाम है। 'साधारणीकरण' की परिभाषा देत हुए गुक्लजी न माधारणीकरण की प्रप्रिया और सहृदय पर पडन वाले प्रभाव की जोर ही विशेष रूप से विचार किया है। यद्यपि शुक्ल पूर्व आचार्यों न रम के विभिन्न अवयवो के साधारणीकृत होन की बात कही थी किन्तु शुक्रजी ने ही मवप्रथम मनोविज्ञान के प्रकाश म आलम्बनत्व धम के साधारणी कृत होन की बात कही। 'माधारणीकरण की परिभाषा देते हुए शुक्लजी ने कहा है कि-"साधारणीकरण का अभिप्राय यह है कि पाठक या स्रोता के मन म जो व्यक्ति विशेप या वस्तुविशेष जाती है, वह जैसे काय म वर्णित 'आश्रय क भाव का जालम्बन १ मम्मट, कायप्रकारा- का यम यासे अथकृत यवहारविदे शिवेतरक्षतय, सद्यपरिनिव तये का तासम्मित तयोपदेश भुजे।" २ चितामणि, भाग २, पृ० ४६ ३ अभिभापष, पृ० ४२ ४ रस मीमासा (प्रथम सस्करण), पृ०५ ५ वही, पृ० २६६ समीक्षा पय|५७ - । होती है, व से ही सहृदय पाठका या सोताआ के भाव वा आलम्बन हो जाता है।' xxxxv इसस सिद्ध हुआ है वि मावारणीकरण आलम्बनत्व धम का होता है। व्यक्ति तो विशेप ही रहता है, पर उसम प्रतिष्ठा एसे सामा य धम की रहती है जिसके साक्षात्कार स सम योताआ या पाठका घे मन म एक ही भाव का उदय थोडा या बहुत होता है।' शुक्लजी की इसी मनोरंनानिक अतद प्टि को उनकी व्यावहारिक समीक्षा म भी देखा जा सकता है। ये जब क्सिी ववि अथवा साहित्यकार की जालोचना करते हैं, उस समय प्रत्यक तथ्य की गहराई तक पहुंचन की उनकी प्रवति रहती है। क्मिी घटना अथवा प्रसग विशेष मे चित्त पर वैमा प्रभाव पडता है । सहृदयो की सवदनाओ को व वितना सवयोर दत है ? इन सभी बातो पर शुक्लजो न विशेष म्प से चितन किया है । मूर के वियोग वणन सम्बधी आलोचना म शुक्नजी की इस प्रवत्ति का देखा जा सकता है ।"परिस्थिति की गम्भीरता ये अभाव से गोपिया के वियोग म भी वह गम्भीरता नहीं दिखाई पडती जो सीता के वियोग म है। उनका वियोग खाली बैठे का काम सा दिखाई पडता है । सीता अपन प्रिय स वियुक्त होकर कई सौ कोरा दूर दूसरे द्वीप म राक्षसा बीच पड़ी हुई थी। गोपियों के गोपाल केवल दो चार कोस दूर के एक नगर मे राजमुख भोग रह थे।' ३ शुक्लजी न यहा मनोविनान के सहार जपन तथ्य यो सिद्ध करने का प्रयत्न दिया है। उनपे अनुसार जब प्रिय से अधिक दूरी ही नहीं है और न ही माग में ऐसी वैसी कोई बाधा ही है जो मागला गडवडा दे, फिर ऐसा तिरथक प्रलाप कोई युक्ति- सगत प्रतीत नहीं होता। इसी प्रकार गुलजी ने एक और मनोवज्ञानिक सत्य प्रस्तुत करते हुए जायसी की आलोचना की है जिसम कवियो द्वारा नायिकाआ के ही विशेष स्प से विरह-जीवन के चित्रण क्यि जान का कारण बताया गया है। -"ध्यान देन की बात यह है कि विरह को व्याकुलता और असह्य वेदना स्त्रियो के मत्थे अधिक मढी गई है। प्रेम के वग की मात्रा स्त्रिया म अधिक दिखाई गई है। नायक के दिन दित क्षीण होन, विरह ताप मे भस्म होन, सूखकर ठठरी होने के वणन म कवियो काजी उतना नही लगता। बात यह है कि स्त्रियो को गार चेप्टा का वणन करने म पुरुषो को जो आनद आता है, वह पुरुपा वे दशा वणन करन मे नहीं।' १ चितामणि, भाग १, पृ० २२९ २ वही, पृ० २३० ३ त्रिवेणी, सवा० कृष्णावेद, पृ० ७८ ४ वही, पृ० २८-२९ ५८/समीक्षा पथ शुक्लजी ने व्यावहारिक समीक्षा में इस बात पर विशेष बल दिया है कि साहित्य म्रप्टाको मार्मिक स्थला की पहचान है या नहीं। इनकी यह धारणा कि मार्मिक स्थल ही स्रोता अथवा पाठक को अधिक प्रभावित कर सकते हैं, मनोवैज्ञानिक दृष्टि का परिणाम है। काव्य समीक्षा में शुक्लाजी ने सदैव परिस्थिति सापता पर बल दिया है इसलिए यदि कही किमी कवि का परिस्थिति निरपक्ष रूप स अतिरजित वणन हुआ है तो वह शुक्लजी को आशसा प्राप्त करने म सफल नहीं हो सका है। शुक्लजी की दष्टि म अतिरजित और परिस्थिति निरपक्ष कल्पना सदव हेय रही है, शायद इसीलिए इहोंने केशव, विहारी आदि कवियो द्वारा वर्णित अतिरजनाओ को खिल्ली स्थान-स्थान पर उडाई है, यहा तक कि सूर जैसे समथ कवि भी इसकी चपेट से नहीं बच सके । यद्यपि सूर द्वारा प्रयुक्त उपमा, उत्प्रेक्षाओ की प्रशसा शुक्लजी ने की है, तथापि जब देखा कि अधे सूर भी व्यथ की उपमा टटोलने में लग गय है तो उनकी आलोचना बडे व्यग्यपूण ढग से की है- "हरिकर राजत माखन रोटी बस इतनी ही सी तो बात है उस पर मनो बारिज ससि बैर जानि जिय गह्यो सुधामुहि छोटी मना बराह भूधर सह पृथिवी धरी दसनन की कोटी एक छोटी सी रोटी की हकीकत ही कितनी, उस पर पहाड के सहित जमीन का बोझा लाकर रख दिया। उपमाएँ यदि न मिली तो हम 'शेप शारदा पर फिरे उनकी इज्जत लेने पर उतारू।' परिस्थिति निरपक्ष अतिरजनाआ से शुक्लजी को चिढ-सी है। बिहारी की अतिरजनालो को लेकर लिखा गया यह अश इसका एक अच्छा उदाहरण है--"बिहारी को उनउक्तियो म जिनमे विरहिणी के शरीर के पास ले जाते ले जाते शीशी का गुलाब- जल सूख जाता है, उसके विरह ताप की लपट के मारे माघ के महीने मे भी पडोसिया का रहना कठिन हो जाता है, कृशता के कारण विरहिणी सांस खीचने के साथ दो चार हाथ पीछे और सांस छोड़ने के साथ दो-चार हाथ आग उड जाती है, प्रत्युक्ति का एक बडा तमाशा ही खडा किया है। वहाँ यह सब मजाक, कहां विरह वेदना । २ शुक्लजी को जहाँ अत्यत स्वाभाविक और परिस्थिति मापक्ष अनिरजनाएं मिली है, उनकी प्रशसा गुक्तजी ने मुक्त कण्ठ मे की है। गोस्वामी तुलसीदास की भावुकता को लेकर लिखा गया यह अश इसी तय्य की पुष्टि करता है-- कवि की पूण भावुक्ता इसप है कि वह प्रत्यक मानव स्थिति मे अपन का डालकर उसके अनुरूप भाव का अनुभव करे । इस शक्ति की परीक्षा का रामचरित से बढकर विस्तृत क्षेत्र और कहां मिल सकता है? जीवन स्थिति के इतने भेद और कहा दिसाइ पडत है ? इस क्षेत्र म जो कवि सवत्र पूरा - १ रस मीमासा, पृ० १३० २ चिन्तामणि, भाग १, पृ० १७३ समीक्षा-पय / ५९ उतरता दिखाई पड़ता है, उसको भावुक्ता पो और कोई नही पहुँच सकता। हिदी के कवियो म इस प्रकार की सर्वागपूर्ण भावुक्ता हमारे गोस्वामी जी म ही है।" परिस्थिति-मापाता यो इतना महत्त्व देना भी शुक्लजी के मनोवैज्ञानिक दृष्टि पोण का परिचायक है। गुवलजी इस तथ्य से भलीभांति परिचित है कि कौन-सी अतिरजना हृदय को छू सकती है और कोर सो व्यय मजाक की सीमा से आगे नहीं बढ सकती। यद्यपि जायसी के विरह-पणन म अना अतिरजनाएँ आई है, किन्तु गुनाजी उह मजाव की हद तक पहुँची नहीं मानते- 'जायसी या विरह वणन वही-वही अत्यत अत्युक्तिपूण होन पर भी मजाक सी हद तक नही पहुँचने पाया है। उसम गाम्भीय बना हुआ है। इनकी जत्युक्यिा बात को करामात नही जान पटती, हृदय की अत्यत तीव्र वेदना ये शन्द मात प्रतीत होती है। इसी प्रकार राम द्वारा सेतुप घ जसी आश्चयजनक घटना का सुनकर शव न रावण के मुख से जो चक्पवाहट पूण उक्तियां पहलाई हैं- बाँधे वन निधि ? नीरनिधि जलधि ? सिधु ? वारीस? सत्य, तोयनिधि ?, कपती, उदधि', पयोधि ? नदीस? गुक्नजी उनसे अत्यधिक प्रभावित हुए है और उह पूण मनोवज्ञानिक मानत हैं, क्योकि यहाँ असम्भव काय एकाएक ही हो जाता है । ऐमी स्थिति म उपयुक्त वचन ओठा पर आ जाना जसगत नहीं। (३) लोरमगल की भावा-गुक्लजी क समीक्षा माना म मनोव्यापारात्मक दृष्टि के साथ लाक्मगल की भावना की भूमिका रही है। वे 'कला कला के लिए' (Art for Art Sake) के समथक कभी नहीं रह, उहोन कला को 'जीवन के लिए' (Art for Life Sake) ही स्वीकार किया है । रस तत्व, सौन्दय तत्त्व और मगल तत्त्व को गुक्लजी न एक-दूसरे के अविच्छेद्य रूप म देखा है। उनके अनुसार मगलमूर्ति म सोदय तत्त्व अवश्य होगा और सौदय तत्व म रस तत्त्व को सत्ता जवश्यभावी है । इस प्रकार इन तीनो तत्त्वो को एक मगल-तत्व म ही समाहित कर शुक्रजी न अपनी लोकमगल भावना को व्यापक आधार दिया है। शुक्लजी ने काव्य को जिन दो भागो म बाटा है, उसके मूल म भी लोकमगल की भावना को देखा जा सकता है- (१) जानद की साधनावस्था या प्रयल पक्ष को लेकर चलने वाले। (२) आनद की सिद्धावस्या या उपभोग पक्ष को लेकर चलने वाले। १ गोस्वामी तुलसीदास, पृ० ९३ ९४ २ त्रिवेणी, पृ० ४० ३ गोस्वामी तुलसीदास, पृ० ११८-११९ ४ चिन्तामणि, भाग १, पृ० २१४ ५८/समीक्षा पथ शुक्लजी ने व्यावहारि म्रप्टा को मार्मिक स्थलो की पह ही स्रोता अथवा पाठक को परिणाम है। काव्य समीक्षा है इसलिए यदि कही किमी की है तो वह शुक्लजी की आश दष्टि म अतिरजित और परिति इहोने केशव, विहारी आदिक पर उडाई है यहा तक कि सूर सूर द्वारा प्रयुक्त उपमा, उत्प्रेट अचे सूर भी व्यय को उपमा र ढग से की है- 'हरिकर राजर मनो बारिज सस मनो वराह भूध एक छोटी सी रोटी की हकीय लाकर रख दिया। उपमाएँ यति लेने पर उतारू ।' परिस्थिति निरपेक्ष अनि अतिरजनामो को लेकर लिखा गय की उन उक्तियो म जिनमे विरहिणी जल सूख जाता है उसके विरह ताप का रहना कठिन हो जाता है, कृशता हाथ पीछे जोर सास छोड़ने के साथ बडा तमाशा ही खडा किया है। कहा या को जहाँ अत्य त स्वाभाविक और परिरि प्रशसा गुक्तजी ने मुक्त कण्ठ से की है। गार लिखा गया यह जश इसी तथ्य की पुष्टि करता कि वह प्रत्यक मानव स्थिति म जपन को डालकर । इस शक्ति की परीक्षा का रामचरित से बढकर विस्तृत जीवन स्थिति के इतन भेद और कहाँ दिखाई पड़ते हैं ? . १ रस मीमासा, पृ० १३० २ चिन्तामणि, भाग १, पृ० १७३ समीक्षा पप/६१ +" अतत यहां तक कहा जा सकता है कि गुवलजी लोकमगल की भावना को इतना "देने लगे थे कि यह उनका एक पूर्वग्रह बन गई। नहीदी की मापेक्षा माव-पक्ष पर बल-गुक्ल समीक्षा की एक विशेषता यह अपने समीक्षा सिद्धातो मे वही भी क्ला पक्ष को भाव-पक्ष वी जो उपेक्षणीय भी नहीं माना । गुक्लजी ने काव्य- } अधिव माय समझा, क्योकि यह भाव पक्ष आत्मा मानता है। आचाय शुक्ल रस को जवकि कला पक्ष मे मस्तिष्क की भूमिका 1 को कम । वेवन चमत्कार और उक्ति है और 'क्ला क्ला के लिए' रहने वाले की साथकता भी वे चमत्वारम अलकार विपयर परिभाषा मे साफ और वस्तुओ के रूप, गुण और क्रिया या होने वाली युक्ति ही जलवार है।"२ वो उडान नहीं मानते, वरन इसवा उस क्थन की और थोता वो आकर्षित विशाती बना देता है। गुक्तजी द्वारा दिया जाना भी उनकी इम विशेपता या म अधिक महत्व प्रदान करते है। 'असाधारणत्व की रुचि सच्ची सहृदयता है। कविता सुनना और तमाशा देखना लेकर चलने वाली उक्ति को गुफ्तजी अभिहित करतेहैं। गुक्तजी ने काव्य पा है वरन उहाने कविता का अतिम वर उनके साथ मनुष्य हृदय का ओर उनके झुकाव या द्योतप है।

६०/समीक्षा पथ काव्यों की इस भेदव रेखा में भी 'आनद को साधनावस्था ही शुक्लजी को अभिप्रेत है क्योकि प्रयत्न पक्ष म ही लोक मगल सम्भव है, उपभोग पक्ष तो मात्र लाक. रजनकारी सिद्ध हो सकता है। शुक्लजी न मगल विधान को ही धम की सना से अभिहिर सरत हुए उसे ही भगवान की आनद कला का विकास रूप माना है- 'वह व्यवस्था या वत्ति जिससे लोक में मगल या विधान होता है, अभ्युदय' की सिद्धि होती है, धम है। अत अधम वत्ति को हटाने मे धमवत्ति की तत्परता-चाह वह उग्र हो और चाह प्रचण्ड हो, चाह कामल और मधुर, भगवान की आनद कला का विकास माना है।" शुक्लजी ने लोकमगल की भावना के प्रसार के लिए लोकधम को स्वीकार करना आवश्यक समझा है जिसके बिना व्यक्ति धम उच्छ खल हा उठता है,जिसे जीवन में किसी भी प्रकार से श्रेयस्कर नहीं माना जा सकता। शुक्लजी ने कहा है-"जहाँ लोक्धम और व्यक्तिधम का विरोध हो, वहाँ कममार्गी गहस्थो के लिए लावधम का हो अवलम्बन श्रेष्ठ है। व्यावहारिक समीक्षा में भी शुक्लजी ने लोक्मगल की भावना को ही अपना आलोचना निकष बनाया है। सूर और तुलसी की तुलनात्मक आलोचना जहाँ जहाँ मिलती है, वही इम तय्य का भी उदघाटन हो जाता है। सूर और जायसी शुक्लजी की दष्टि म वह स्थान नही पा सके जो तुलसी ने पाया, क्योकि सूर के आरा य देव लोक- रजनकारी रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण है, जायसी के काव्य नायक हैं लौकिक जगत के राजा रत्नसेन जो किसी भी प्रकार से तुलसी के आराध्य देव मगल विधायक, मर्यादा पुरुषोत्तम राम की कोटि म नही आ सकते । जो लोकहितकारी न हो, उससे शुक्लजी को अधिक लगाव नहीं, तभी तो स वे कृष्ण के बारे म वे लिखते है-"कस और उसक साथी असुर भी कृष्ण के शत्र के रूप में ही सामन है लोकशत्रु या लोकपीडक के रूप म नहीं। उसके कारण वैसा हाहाकार सुनाई नही पडता, उनका अत्याचार 'सभ्य अत्याचार' सा जान पडता है।"३ तुलसी के राम मे वे मगलत्व को साकार हुमा देखते है, इसीलिए राम का पुल बाधना और रावण जसे प्रचण्ड शत्र को मार गिराना उनकी दष्टि मे वीर धर्मानुसार पृथ्वी का भार उतारने के प्रयत्न रूप मे है।" 'मगलाशा म तुलसीदासजी के प्रति शुक्लनी की लेखनी से निस्मत ये शब्द ध्यातव्य हैं- लाकमगल की आशा से उनका हृदय परिपूण और प्रफुल्ल था। इस आशा का आधार थी वह मगल ज्योति जो धम के रूप मे जगत की प्रातिभासिक सत्ता के भीतर आनद का आभास देती है और उसकी रक्षा द्वारा सत् का -नित्यत्व का बोध कराती १ रस मीमासा, पृ०६० २ गोस्वामी तुलसीदास, पृ० ३६ ३ त्रिवणी, पृ०७९-८० ४ वही, पृ० ३० समीमा पप६१ है। HTTRIT जाता रातो गोरमगामी नाममा गोगना पिर मार दोपरि गराएर पूरा गई। २ सा-पागमापा माव-पग परबल-गुगरासमोगामीएर गिता यह नीरगी। रिसीमा गमी nिariiमपी भी पापापोभाव-गानी असा मागा लागानी और गे उपेगणीय भी नगा । गुगलली नमाम्य पावीर गावों मग मम्माययोगी अपिर माय गमगा, सानिया भाव पर मेरा और गमापार की मामा मासा || आय का गो बासापार मान १ मगित राती जनि पता- मे मस्तिषपी भूमि मपिर समी! मी माग गागाभा की मम । पेपर पमगार और उति पंगिय पात्री ने मायामागपी गगा दी और ' पानि पहोवार मापार्यों पर पुगपर आरमण दिया है। अलारोपी सापाता भी ये पमनार म नहीं, रमायाम माना। पर मारी मार विषया परिभाषा म माप दिगनाईसी-योगा उप दियाो और यग्तुपा रेप, गुम और पिया का अपिर नीच भर पराने मममी नभी गायर होने वाली मुनि ही असगार है। गगी प्रसार गुगाजी ति पिन्य दो पर की उगा नहरी मास, यग्न् दरावा अभिप्राय नी पपा र उगु भाटेग गे' का उग्र समापी आर योग को आरर्षित परसा है क्या उगो विषय को मामिर और प्रभावशाली या देता है। गुमती द्वारा पाप्य म मामिर प्रगगोदभावासापो मारय शिपा जाता भी उनरी ग पिगपताना परिणापर रिपे मार पापमोही पाय म अपिर मरत्व प्रसारते है । गुपनी ने ना पत पा दिया है रिपेयर "जगापारण व योगचि मच्ची गढ्दयता की परपास ही है.पर पृतात तो यायत्ति है। पिता गुना और तमाशा देगना पए ही घात ही है।""मेयर बला-पता पपर पनन पाती उति यो गुपनजी 'माय पी गना मना 'मूति की गना मे अभिहित परतेहैं। गुजी ने वाय्य या अतिम पक्ष्य पमपार या मनारजा नहीं माना है पर उपविमा अतिम पक्ष्य जगा दे मामिर पभा या प्रत्यगीर रण परसे उनो साथ मनुष्य ददय का गाम जम्प म्पापा' माना है जो माय पदवी और उारे मुराय या पोतर है। १ गोग्यामी तुलसीदाग, पृ० १३ २ पही,पृ. १६१ ३ वही, पृ० १८१ ४ पितामणि, भाग १,पृ० १७१ ५ यदी, पृ० १६२ ६२ / समीना पय गुगतजी ने अपनी व्यापारिख ममीला म भी हदय पक्ष प्रधान पविया की प्रशसा की है और चमत्वारवादिया पी भत्मना । तुलमी, सूर और जायमी भाव पक्ष प्रधान पति है, इमलिए उनकी प्रशमा म पुक्रजी न बहुत कुछ किया है। तुलसी की भावुक्ता को लेकर लिया गया यह अश इस बात का एर उदाहरण है "प्रवधकार कपि वी भावुयता का मयमे अधिए पता यह देसने म च तता है कि वह पिसी आग्यान के अधिा ममस्पर्गी स्थतापापहचान सवा है या नहीं। इन स्थला यो गास्वामीजी न अच्छी नरह पहचाना है इनपा उहीन विम्तृत और विशद वणन किया है। लेकिन चेतन जमे अलकारवादी और चमत्वारप्रिय माविया की सित्ती भी अनेर म्याना पर उडाई गइ है। पेशव यो हृदयहीन कहने का कारण भी यही है रिपेगव ने जितना महत्त्व चमत्कार और पाण्डित्य को दिया,उतना अनुभूति और भावना को नही-"वेशव की गमचन्द्रिका म पच्चीसा ऐसे पद्य है जिनम जलकारा की भद्दी भरती के चमत्कारा के सिवा हृदय को स्पर्श करने वाली या विमी भावना म मान करने वाली कोई बात न मिलेगी।' २ शुक्नजी तो काय को मनोरजन और चमत्कार-प्रदशन की भूमि मे उठाकर हृदय की लोकसामा य भूमि पर प्रतिष्ठित करना चाहते है जिसम क्ला जीवन के लिए उपयोगी सिद्ध हो सके। क्वल अनापी और विचित्र विचित्र मामग्री प्रस्तुत करने वाले कवियो व लिए गुक्तजी ने कहा है-"यो ही सिर पच्ची करन-बिना किसी भाव म मग्न हुए कुछ-कुछ जनोखे रूप खडे करना या कुछ को कुछ बहने लगना, या तो बावला पन है या दिमागी कमरत सच्चे कवि की कल्पना नहीं।' स्पष्टयादिता एव निर्भीकता--गुक्लजी के जालोचक व्यक्तित्व को एक बडी विशेषता उनकी स्पष्टवादिता एव निर्भीकता थी। वे जिस विषय पर कुछ लिखत अथवा कहते, उनके पूर्व उस विषय पर गहन चितन मनन किया करते थे। इसलिए आज भी उनकी ठोस स्थापनाओ को अम्वीकार करना अधिकाश विद्वानो के लिए सोचने का विषय बन जाता है। जाज का प्रयक समीक्षक उनकी स्पष्टवादिता एव निर्भीक्ता के लिए श्रद्धा स नतग्रीव हो जाता है। डाक्टर हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी इसी विशेषता वो अपने जीवन्त शब्दा म कहा है-'वेतन पर कहते हैं--'मैं ऐसा मानता हूँ, तुम्हारे मानने न मानने को मुये परवा नहीं। फिर भी शुक्लजी प्रभावित करते है । नया लेखफ उनसे डरता है, पुराना घबराता है, पण्डित सिर हिलाता है । वे पुराने की गुनामी पसद नही करत और नवीन की गुलामी तो उनके लिए एकदम असह्य है। गुक्लजी इसी बात मे बडे है और इसी जगह उनको कमजोरी है।' १ गोस्वामी तुलसीदास, पृ० ८८ २ चितामणि, भाग १, पृ० १६० । ३ त्रिवेणी, पृ० १०० ४ हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य की भूमिका, पृ० १४७ समीक्षा-पथ/६३ निसी की पूठी निदा-स्तुति करना श्रेष्ठ आलोचर का गुण नही हो सकता। गुक्लजी ने इस बात का विशेष ध्यान रखा और जहाँ माहित्य स्रष्टा को अच्छाइया को पाठयो के सम्मुख रसा वही उनकी त्रुटियो और पमिया का भी नि सकोच उद्घाटन किया। पण्डितजी की मूक्ष्म दृष्टि गुण-दोष को ढूढ़ निकालन म सवदा समथ रही है। इहाने सूर, तुलसी जायसी प्रभक्ति कविया की ममीक्षाओ म केवल उनकी काव्य विशेषताओ को ही सामने नाफर नही रमा, प्रत्युत उनको कमिया की ओर भी सहृदय पाठका का ध्यान वेदित किया। इसका सबस बडा प्रमाण तो उनका कुछ खटक्ने पाली बातें दीपा निवप है जिमम उसने अपन आदा कवि गोस्वामी तुनमीदाम की त्रुटिया का उदघाटन किया है। इसी प्रकार जब मूर के वियोग वणन म रहें परिस्थितिया की गम्भीरता नजर नही जाई तो उन्होंने स्पष्ट कह दिया-"सूर का वियोग वणन वियोग वणन के लिए ही है परिस्थिति के अनुरोध से नहीं । कृष्ण गोपियो ने माथ ग्रीडा करत करते क्सिी कुन्ज या झाडी म जा छिपत है या यो पहिए रि थोड़ी देर के लिए तर्धान हो जात हैं, वम गापियां मच्छित हो गिर पडती है। आलोचना के लिए शुक्रजी के अपन मानदण्ड थे जिना निर्भीक्तापूधर प्रयोग उहाने अपनी व्यावहारिव ममीलाआ म किया है। लोकमगत और भयादा की भावना जिन पपिया मे नही पाई गई, ब कभी उनकी दृष्टि म र्शीपस्थ नहीं हो सके । यद्यपि जायमी के पद्मावत को इतने प्रकाश म लान का श्रेय गुलजी को ही है किन्तु इहोन जायसी की घ्यावहारिक घटियो का उल्लेख भी स्थान स्थान पर किया है । देखिए--- कुम्भलनेर का राजा देवपाल रूप, गुण, ऐश्वय पराम प्रतिष्ठा थिमी म भी रत्नसेन की बराबरी का न था, अत उसका दूती भेजकर पद्मावत को वहमाने का प्रयत्न गडा हुआ खम्भा घवेलने का बार प्रयत्न सा लगता है। इस घटना के सनिवेश से पद्मावती के सतीत्व की उज्ज्वल काति म और अधिक ओप चढ़ती दिखाई नहीं देती।"३ २ शुक्लजी ने छापावाद और रहस्यवाद की गुलर मस्जिया उडाई है क्योरि मे साहित्यिक वाद उनकी दप्टि म काव्य को जीवन से दूर हटा ले जाने का काय करते है। फेवल कल्पना लोप में सचरण करने वाले साहित्य को शुक्लजी की आशसा कभी प्राप्त नहीं हो सकी । शुक्लजी को दष्टि म साहित्यकारा का समाज के प्रति विशेष दायित्व होता है जिससे मुकरने वाले तथाकथित साहित्यकारा को शुवलजी ने कभी क्षमा नहीं दिया। साहित्यकार ये गामाजिक दायित्व को लेकर पाश्चात्य संगत के एक विद्वान ने १ गोस्वामी तुलसीदास, पृ० १०८ २ त्रिवेणी, पृ०७० . ६४/रामीमा-पथ भी ऐसी ही बात की है।' माहित्य म प्रतित हो रहे अनेय नये 'यादा मे गुरमजी अत्यत जगतुष्ट थे जिना विरोय म उगने निभीरतापूवर या-"गच्ची मविना पिसी वाद को लेकर नहीं पाती, जगत् की अभिव्यक्तियो पर तती है। वादग्रस्त पाय्य अधिमतर काव्याभाग ही होता है। पाश्चात्य 'नूतन गप्टि निर्माण करने वाली परपना' और 'व्यत्तियार' ये उपम्प को लेकर पता वाले माहित्य क्षेत्र को गुवरजी T 'नरनी हृदया या एक पारपाना कहा है जिगम और हदयो गे अपन हल्यापी भिन्नता और विचित्रता दिखाने के लिए महत से लोग एप एव पारपनिम हृदय तिमित कर दियान लगे हैं।'' लेकिन गुगनजी मी इमी निर्भीरता ने जब-जय और जो जहाँ उग्र रूप धारण किया है, यही यह विपता उनकी गाहित्यिक मीमा बन गई है। -.- 9 Art is not created in y?cume It is the work, not simply of a person fut of an author fixed in time and space, answering to a community of which he is an important, 1 ccause articulate post File Approaches of Literary Criticism, Wilter S Scott, P 123 २ चितामणि, भाग २,पृ० ६७ ३ रस मीमासा, पृ० ३२२ अध्याय ६ समीक्षा के आग्रह गुरुनजी को हिंदी ममी ता के गजपथ निमाण का श्रेय देना मवथा उचित है, रितु इसका अभिप्राय यह नहीं है कि उनकी ममीभा पद्धति सवथा निर्दोष है । उहोन "प ओर हि दी जालोचना को ठोस घरातत्र मनोवैज्ञानिक दृष्टि और नई दिशा प्रदान वो तथा उम स्वरूप निधारण का भगीरथ प्रयत्न कर उसे स्थायित्व प्रदान किया, तो दूमरी जोर व अपने पूनाग्रही रचिवभिनय और एकागी दष्टिकोण से मुक्त नहीं रह मके । अनक स्थलो पर करजी के यक्तिगत जाग्रह उभर आये हैं और निप्पयता का निर्वाह नहीं हो सका है। इतना होन पर भी शुक्रजी यी मीमाएँ उनकी विशेषताओ के मामन छिप मी जाती है। समुद्र म जहाँ असम्घ रत्नादि हुआ करते है वही कुछ घोघे आदि का पाया जाना कोई आचयजनक और असगत बात नही। शुफ्लजी का तुलसी विषयक पूर्वाग्रह-गक्नती की ममालोचक दृष्टि जहा अत्य त व्यापक और ममस्पर्गी थी वही कुछ अपन आग्रह भी थे जो शुक्लजी पर किसी हद तक हावी हो चुव' य । तुनमी और उनमें 'मानस व प्रति गुक्लजी के आग्रह को झुठलाया नहीं जा सकता । तुलमी उनो आदा कवि थे और रामचरितमानम' उनका आदानाय । तुमी के वाव्यादों का उहोंन ानोचना प प्रमुख मानर वे स्पम स्वीकार किया। तुलमी मे बढकर उनकी दप्टि म हिदी साहि य म और कोई रवि नहीं हुआ। उनकी दष्टि म मूर जैसे कवि भी तुलमी स नीचे के दरज वे ही है। उनका न जाने क्सिने 'यम' के नाम म यह दोहा कहाला पि 'मूर मूर तुलसी ममी उडुगन वेगवदास ।' यदि कोई पूछे वि जनता के हृदय पर सवस अधिक विस्तृत अधिकार रखने वाना हिदी का सबसे बड़ा कवि कौन है तो उसका एकमात्र यही उत्तर ठीक हो मक्ता है कि भारतहृदय, भारतीकण्ठ, भक्तचडामणि गोस्वामी तुलमीदास।" पहना है १ गोस्वामी तुलमीदास, पृ० १९१ ६६/समीक्षा के आग्रह शुक्लजी की दृष्टि में केशव बिहारी आदि के साथ ऐसे कवि को मिलान के लिए रखना उसका अपमान करना है।' गुक्लजी ने तुलसी के दुबल पक्षो को सदैव रक्षा की है। तुलसी के मानस मे स्त्रियो की निदा विशेष रप में की गई है जिसे शुक्लजी भी स्वीकार सरते है। किन्तु, वे बडी सरलता और सफाई के साय तथ्य को छिपाने का प्रयत्न करत दिखाई देते है 'उन पर स्त्रियो को निदा का महापातक लगाया जाता है पर यह अपराव उहोन अपनी विरनि की पुष्टि के लिए किया है। उमे उनका वैरागीपन समझना चाहिए १२ जत स्त्रियो के सम्बध में गोस्वामीजी ने कहा है, वह सिद्धात वाक्य नहीं है, अथवाद मात्र है। शुक्नजी की तुलसी विषयक सफाई इससे भी अधिक वहा देखी जा सकती है जहाँ वे ढोन, गँवार, गूद्र, पशु, नारी ये सब ताडन के अधिकारी चौपाइ की व्याख्या कर अपना निक्ष देते है 'चिढने का कारण है 'ताडन' शब्द, जो 'ढोल' श द के योग म आलकारिव चमत्कार उत्पन करने के लिए लाया गया है। स्त्री' का समावेश भी सुरचि विरुद्ध लगता है पर वैरागी समझकर उनकी बात का बुरा न मानना चाहिए।'' और तो और, भरत का अपनी माता के प्रति ऐसा कथन कि 'बर मागत मन भई न पीरा, गरि न जीह मुह परेउ न कीरा-शुक्लजी को मनोहर और सगत प्रतीत होता है । उनका कहना है ग्लानि के साय अमष का सयोग हो जाता है । उसकी पवित्रता के सामन माता के प्रति यह अवज्ञा कैसी मनोहर दिखाई पड़ती है। यह सब शुक्लजी का तुलसी के प्रति पूर्वाग्रह ही है । वैसे तो शुक्लजी ने तुलसीदासजी की कमियो मा उदघाटन 'कुछ खटकने वाली बातें' शीषक निबध म किया है कि तु हम उसमे कोई विशेष पटकने वाली बात नजर नहीं आती। जो वस्तुत खटकन वाली बातें है, शुक्लजी ने उन पर दष्टि ही नहीं डाली है और अगर डाली भी है, तो आग्रह के कुहरे में वह तथ्य को पकडने म असमय सी रही है। एक बात और, शुक्लजी कभी यह स्वीकार नही कर सक्ते कि कोई दूसरा यक्ति तुलसी पर आरोप लगाये । यदि कोई पाठक 'मानस के कुछ प्रसगो मे उब जाता है तो दोप पाठक का ही है, तुलसी का नही। देखिए कुछ लोग 'रामचरितमानस मे राम के प्रत्येक कम पर देवताआ का फूल बरसाना देवकर उबते से हैं। उह समझना चाहिए कि गोस्वामीजी ने राम के प्रत्येक फर्म को ऐसे व्यापक प्रभाव का चित्रित किया है जिस पर तीनो लोक की दप्टि लगी १ गोस्वामी तुलसीदास, पृ० १९० २ वही, पृ०५५ ३ वही, पृ० ५६ ४ वही, पृ० ५८ ५ वही, पृ० १०५ समीक्षा के आग्रह / ६७ रहती है। कृष्ण का गोचारण और रासलीला जादि देखने को भी देवता एकत्र हो जात है, पर केवल तमाशवीन की तरह । गुक्लजी के तुलसी विषयक आग्रह को वहाँ भी देखा जा सकता है जहां वे तुलसी का नाम आने पर उनकी विशेषताओ की झड़ी लगाने लगते हैं अथवा किसी अय कवि की आलोचना करते करत तुलसी की प्रशसा म भी दो चार पक्तियां लिख डालते हैं। सूर की आलोचना म तुलसी की प्रशसा की घुसपैठ देखिए "सूरसागर की पद्धति पर वैसी ही मनोहारिणी और सरस रचना तुलसी की 'गीतावली मौज्द है, पर 'रामचरितमानस और 'कवितावली' की शैली को सूर की कोई कृति नही है । इसके अतिरिक्त, मनुष्य जीवन की जितनी अधिक दशाए, जितनी अधिक वृत्तियों तुलसी ने दिखाई हैं, उतनी सूर ने नहीं। तुलसी न अपन चरित्र चित्रण द्वारा जसे विविध प्रकार को ऊँचे आदश खडे किय है वैसे सूर ने नही। तुलसी की प्रतिभा सवतोमुखी है और सूर की एकमुखी।" जायसी विषयक आग्रह-यद्यपि गुक्लजी का जायसी के प्रति उतना आग्रह नहीं था जितना तुलसी के प्रति रहा है, तथापि बहुत से स्थलो पर जायसी के प्रति उनो आयह की रेखाएँ स्पष्ट नजर आती है, जसे बिहारी के काव्य की अतिरजनाओ फो तो वे मजाक की हद तक पहुंची मानते है और वे स्थान स्थान पर उनकी खिल्ली भी उडाते हैं, किन्तु जायसी की अतिरजनाजा को वे युक्तिमगत और साथक मानत है। जायसी की अत्युक्तियो के सम्बध म व निखते हैं "इनकी अत्युक्तियां बात नी करामात नही जान पडती, हृदय की अत्यन्त तीव्र वेदना के शब्द-सकेत प्रतीत होती हैं। उनके अतगत जिन पदार्थों का उल्लेख होता है, वे हृदयस्थ ताप की अनुभूति का आभास देने वाले होते है। बाहर बाहर से ताप की मात्रा नापन वाल मानदण्ड मात्र नहीं।" जायसी के विरह वणन मे भी अनक वीभत्स चित्र उपस्थित हुए हैं। कई स्थलो पर 'रक्त वे आंसू , 'तोला मांसू और सूमी हडिडया का उल्लेख हुआ है, किन्तु गुक्नजी न उसनी इतनी भीषण और कटु आलोचना नहीं की है जितनी बिहारी और नेगाव की। सगुण भक्ति-विषपर आग्रह-निगुग की अप । सगुण काव्यधारा को गुवाजी को विशेष आशमा प्राप्त हुई। निगुण कविया की विस्तृत आलोचनात्मक टिप्पणियाँ लिखन म शुक्लजी का मन नहीं रम पाया है इसका प्रमाण उनका हिन्दी माहित्य का इतिहास' है। किन्तु सूर और तुलसी पर उनकी लिखी विरोप लम्बी-चौडी भूमिकामा १ भ्रमरगीतसार, पृ०६ २ वही, पृ०२९ २ त्रिवेणी, सपा० कृष्णानद,पृ०४० ६८/ समीया आग्रह २ (जो अपने आप म स्वतन ग्रय रूप भी हो म य? स्पष्ट प्रतीत हाता है कि सगुण काव्य -प्रति उनका आग्रह पा । सगुण भक्ति र महत्त्व का प्रतिपादा गुनजी न बहुत स स्थलो पर किया है। इसी पूर्वाग्रह व कारण तुलसी आर सर उन: प्रिय कवि हा सके। प्रधशाव्य सम्ब भी दष्टिकोण---मी प्रकार, गुलजी का प्रयवाव्या प्रति विशेष आग्रह रहा है। व मुक्तक मा य की अपणा प्रायकाव्य को विशेष महत्व देते हैं। उनका ऐमा विचार है मार्मिक स्थला का जितना युदर और विशद वणन प्रा काव्य म सम्भव है, उतना मुक्ता राय म नहीं। वे प्रपत्र और मुक्त व्य का विश्लेषण करत हुए कहत है कि 'मुक्तक मप्रसव के ममान रम की धारा नहीं रहती जिसम क्या प्रसग की परिस्थिति म अपने मो भगा हुआ पाठन मग्न हो जाता है और हृदय में एक स्थायी प्रभाव ग्रहण करता है। इसम तो रम के एसे छोट पड़ते हैं जिनस हदय कनिका थोड़ी देर के लिए खिल उठनी है। यदि प्रारकाव्य एक विस्तृत वन स्थली है तो मुत्तक एक चना हुआ गुलदस्ता है। तुमनजी की व्यावहारिक समीक्षा म प्रबधकाव्य मम्ब पी आग्रह को स्पष्ट देखा जा सकता है। वैसे तो उ हाने उत्कृष्ट कोटि के मुक्तक काव्य की भी प्रासा की है कि तु जितनी आपसा प्रब वकान्य को उनस प्राप्त हुई है, उतनी मुत्तक काव्य को कहा। प्रबर रचयिता तुनमी और जायसी के काव्य म शुक्लजी का मन अधिक रमा है जबपि मुक्त कवि सूर और विहारी पर उनकी कृपादष्टि उतनी नहीं रही है। प्रकृति प्रेम और तदविषयक आग्रह-गुक्लजी काव्य में प्रकृति तत्त्व की उपेक्षा को दुभाग्यपण मानने ह । प्रकृति चित्रण को केवल उद्दीपन की सामग्री समझने वालो कोवे रुचिभ्रष्ट और सस्वार सापेक्ष बताते है । हिंदी कविता के दुभाग्य का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं 'पेद के साथ रहना पटता है कि हिंदी की कविता का उत्थान उस समय हुआ जब सस्कृत का य लक्ष्यच्युत हो चुका था। इसी स हिंदी की कविताओ मे प्राकृतिक दश्यो का वह मूक्ष्म वणन नहीं मिलता जो सस्कृत की प्राचीन कविताओम पाया जाता है । '२ प्रकृति के खुले विस्तार को शुक्लजी ने आलम्बन रूप में स्वीकार करने का आग्रह किया। जिन कवियो न प्राकृतिक दश्या का मार्मिक चित्रग किया, व हो गुफरतो री दष्टि म कुछ स्थान पा सके और प्रशसा के दो श द डाकी लखनी से लिखवा सरे । तुलसीदामजी प्रति प्रेम के सम्बध मे शुक्लजी लिखत हैं "हिदी कवियो मे प्राचीन संस्कृत कवियो का सा सूक्ष्म सिरण नही है जिममे प्राकृतिक दश्या का पूरा चिन सामने खडा हाता है। यदि किमी में यह बात थोडी बहुत है तो गोस्वामी तुलसीदास म ही। १ १ हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ० २४७ २ चितामणि, भाग २, पृ० २२ ३ गोस्वामी तुलसीदास, ५० १० - पाई नवीन Fप या रग ढग अवश्य खडा हा। पर, कारी नवीनता केवल मरे हुए आदोलन का इतिहास छोड जाय, तो छोड जाये, कविता नही खडी की जा सकती। है और उससे सावधान तया सचेत रहन का आग्रह किया है "आजका पाश्चात्य वाद इन पत्तों की परत के लिए अपनी आँख खुली रखने और उन पेडो की परीक्षा करने चादा वा भारतीय साहिय म जोजषानुपरण हो रहा है, शुक्रजी ने उसकी भत्सना की समीक्षा के आरह /६९ इसी प्रकृति क्षेत्र की उपेक्षा के फलस्वम्प भारतेदु हरिश्चन्द्र को भाताना करते हुए शुक्लजी कहत है "इहाने मनुष्य को सारी सष्टि के बीच रखकर नहीं देखा उमे उसी के उठाय हुए घेरे म रखकर देखा। मनुष्य की मष्टि को उनके फैलाए हुए प्रपचावरण मे बाहर, प्रकृति के विस्तृत क्षेत्र की ओर ले जाने का प्रयात इहान नहीं किया।'' क्लजी न कविता और सृष्टि प्रसार को एक-दूसरे से सम्बद्ध माना है। कविता मै यदि प्रकृति विस्तार का प्राथय नीं मिला तो उसका रचयिता कवि घेउ कोटि म नहीं आ सकता। शुक्लजी के अनुसार तो 'कविना बाह्य प्रकृति के साथ मनुष्य को अत प्रवृति का सामजम्य घटित करती हुई उसकी भावात्मक सत्ताक प्रसार का प्रयास करती है। यदि अपन भावा का ममटकर मनुष्य अपन हृदय को शेष सष्टि स किनार कर ले या स्वाथ की पगुवत्ति म ही लिप्त रखे तो उसकी मनुष्यता पहां रहगी।' प्रकृति व प्रति इतना रागात्मक भाव भी आग्रह को कोटि म आ जाता है और इसी आग्रहपूण दष्टिकाण र कारण यह प्रकृति प्रेम शुक्लजी की समीक्षा-सीमा के नूतन काव्य दष्टि के प्रति असहिष्णुता-गुल्ल समीक्षा की एक सीमा यह भी रही है कि व नवीनता के प्रति उपा-सी रखता है। साहित्य म प्रचलित नये नय वादो, नई नई माहित्यिक प्रवत्तिया और शैलियो काजधिक महत्त्व नही देत । व ऐसे क्षणभगुर प्रवाहा को दास्वन माहित्य के लिए दुभाग्यपूण मानत थे। आजकल चल रह इसी स्थान पर नवीनता के लिए आवुलता मात्र रह गई है। कविता चाह हा, चाह न हो, पवत नवीनता और मौलिता को वही चढी सनय म सच्ची कविता की ओर ध्यान पाश्चात्य माहित्य जगत मे उमडन और मिटते साहित्यिक अन्तगत रखा गया है। रवय की आर सकेत करत हुए गुकाती कहते है काव्य की स्वाभाविक उमग ने यहाँ तक रह सकता है।' . पक्षा बहुत-ने पने कुछ हरे नोचे हुए, युछ सूखकर गिरे पाये हुए यहाँ पारितात पत्र की तरह प्रदान किये जान लगे हैं जिसमें उपवन म यहुत गडबडी दिखाई दन लगी है। को भावश्यकता है जिना ये पत्ते है । पर यह बात हो नही रही है। किसी नई विचार- १ चितामणि, भाग १ पृ० १९४ २ वही पृ० १४६ २ वही पृ० २४०-२४१ । यही, भाग २, पृ० १६५ ७० / समीक्षा के आग्रह धारा के प्रति इस प्रकार का विरोध समीक्षा की सहानुभूतिहीन दृष्टि का परि चायक है। छायावाद एव रहस्यवाद को आलोचना-मानस का अवगाहन करन पाल शुक्लजी शायद छायावाद एव रहस्यवाद को भली भांति समझ नहीं पाये। छायावाद और रहस्यवाद को जो आशसा शुक्लजी से अभिप्रेत थी, वह इह मिल नहीं सकी। छायावादी काव्य की समीक्षा करते हुए शुक्लजी ने खोजकर कहा है "हमारे नवीन हिदी साहित्य क्षेत्र म 'गांव मे नया आया ऊँट हो रहा है। बहुत से रवयुवको को अपना एक नया ऊँट छोडन का होमला हा गया है। जैसे भावा या तथ्यो की व्यजना के लिए श्रीयुत रवीद्र, प्रकृति के क्रीडास्थल से लेकर नाना मूत स्वरूप राडा करते है, वैसे भावो को ग्रहण करने तक की क्षमता न रखन वाले बहुतेरे ऊटपटाग चित्र खडा करने और कुछ असम्बद्ध प्रलाप करने को ही 'छायावाद की कविता समक्ष अपनी भी मुछ करामात दिखान के फेर मे पड गये है। छायावाद को 'ऊटपटाग और 'असम्बद्ध प्रलाप कहना शुक्लजी की कठोर एव सकीण दष्टि का परिचायक है। रहस्यवाद में जिस अज्ञात सत्ता स मिलने की आवुनता का हृदयस्पर्शी चित्रण हुआ है, शुक्लजी उस वकवाम से अधिक नहीं समझते, तभी तो वे लिखते है "अब विचारने की बात है कि किसी अगोचर और ज्ञात के प्रेम म आँसुआ को आकाशगगा म तैरन, हृदय की नसो का मितार बजाने, प्रियतम असीम के सग नग्न प्रलय सा ताण्डव करने या मुदे नयन की पलको के भीतर किसी रहस्य का सुखमय चित्र देखने को हो-~~ भी तक तो कोई हज न था-वविता कहना, कहाँ तक ठीक है ? पारा भोर से बदखल होकर छोट छोटे क्नकोआ पर भला कविता कब तक टिक सकती है।"२ शुक्लजी ने रहस्यवाद म वेवल अप्रस्तुत आरोप और हृदय की लम्बी चौड़ी उछल कूद देखी है वे उसको आत्मा को नहीं पहचान सवे । उनको दष्टि ज्ञात अशात को फेवल एक नोट या बहाना मात्र समय सकी। यदि शुक्लजी का नय प्रचलित वादो में प्रति इतना उपेक्षा का भाव नहीं होता, तो शायद वे एसा नहीं कहत "वगभाषा ये माव्यक्षेत्र पे ता एक काने ही म इम रहस्यवाद-छायावाद की तत्री बजी, मराठी, गुजराती को हर एक विलासी ताल सुर पर नाचने की आदत नही, पर हिंदी में तो इसकी नवल का तूफान सा आ गया । अपनी सीमाआ य यावजूद छायावाद रहस्यवाद ने हिली काव्य पोथीवद्धि में मो योगदान दिया है, उसे इस प्रकार नकार देना उचित नही कहा जा सकता। - १ भ्रमरगीतसार पृ०२० २ चिन्तामणि (भाग २), पृ०५६ ३ दही, पृ० १०८-१२२॥

समीक्षा के आग्रह/७१ 'कलावाद-सम्ब वो दृष्टिकोण-ठायावाद और रहस्यवाद के समान ही कला- वाद की भत्सना शुक्लजी ने बडी निममता के साथ की है 'ना, कला के लिए के प्रवतका और समथको पर उन्होंने बहुत ही तोखे व्यग्य वाण छोडे है । उहाँने नूतन रूप- सजना विषयक वनावादी पिता को अस्वीकार करते हुए लिखा है "'कलावादी जिमे नूतन सृष्टि कहते हैं वह बन्छ और स्थिर दष्टिवालो के निकट वास्तविक का विकृत म मात्र है-रेपा विनमा जो प्राश कुवहन माय उ पन करके रह जाता है । हृदय के ममस्थल का म्पश नहीं करता कोई सच्ची और गम्भीर अनुभति नहीं जगाता। २ शुक्लजी कविता के माध्यम से समाज को स्वप्निल लोर दियाना पसद नहीं परते थे, वरन वे तो साहित्य को जागरण के शवनाद का शाश्वत स्वरूप बनाना चाहते थे। यह सब उनरा आदश था, अपनी मान्यता थी, जिसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता, वितु अपने आदों को इतनी लम्बी डोर दे देना उचित नहीं कहा जा माता जो दूसरे दष्टिकोणा को बांयती चली जाय, अय व्यक्तिया के विचारो को भली भांति समझन म भी वाधक बन जाय । गुरु नजी की दृष्टि मे " 'कता कता के लिए अथवा 'काष्य कल्पना का लोक है ये मब बेल स्टेवाली हनवी धारणा के कच्चे बच्ने है। उहोने रसवाद के आग्रह वे वशीभूत होकर पानावाद की उपेक्षा मी की है । शुक्लजी की समीमा म गुद्ध सौदयवादी दप्टिकोण कम पाया जाता है । इधर 'शिव को उनकी समीक्षा मे इतना अधिक स्थान मिला है कि वह 'सुन्दर' की मीमा ग्न गया है। इसी फलस्वरूप साहित्य जगत् म इनके विरुद्ध एक जस तोप जागरित हुआ जिसने शुरुनजी को मा यताओ को पीछे ढोल देने का साहस दिया। शुक्नजी को 'वला शब्द से ही इतनी चिढ हो गई थी कि वे उसे साहित्य क्षेत्र से बाहर निकालने की बात कहने लगे "सारा उपद्रव काव्य को क्लाआ के भीतर लेने से हुआ है इधर हमारी हिन्दी म काव्य समीक्षा के प्रसग मे 'क्ला शद की बहुत उद्धरणी हाने लगी। मेर दवन म तो मारे काय समीक्षा क्षेत्र म जितनी जल्दी यह शब्द निक्ले, उतना ही अच्छा । इसकी जड परडना ठीक नहीं है।' शुक्लजी को इतना सब कुछ कह देन पर चैन नही पड़ा, तभी तो वे बार बार पुरजार शदा म कहत है "मैं फिर भी जोर के माय कहता हूँ कि यदि काव्य ने प्रकृत स्वरूप की रक्षा इप्ट है, तो उममा 'पीया इम कता गगे अदा तक हो शीव छुडाया जाय। + १ गोस्वामी तुलसीदाम, पृ० ७८ २ चितामणि भाग २, पृ० ११९ ३ वही, १० १८० ४ वही, पृ० २१८ ७०/ समीक्षा के आग्रह धारा के प्रति इस प्रकार का विरोध समीतम की सहानुभूतिहीन दष्टि का परि चायक है। छायावाद एयरहस्ययाव को आलोचना-मानस का अवगाहन करन वाले शुक्लजी शायद छायावाद एव रहस्यवाद को भनी भांति समझ नही पाय । छायावाद और रहस्यवाद को जो आशसा शुक्लजी से अभिप्रेत थी वह इह मिल नहीं सकी। छायावादी वाव्य की समी ना करते हुए गुक्लजी ने सीजकर कहा है 'हमारे नवीन हिंदी साहित्य क्षेत्र म गाव म नया आया ऊँट हो रहा है। बहुत से नवयुवको को अपना एक नया ऊँट छोडन का हीमला हो गया है। जसे भावा या तथ्या की व्यजना के लिए श्रीयुत्त रवीद्र, प्रकृति के पीठास्थल मे लकर नाना मूत स्वरूप खडा करते है, वैसे भावो को ग्रहण करने तक की क्षमता न रखन वाले बहुतेर उटपटाग चित्र वडा करने और कुछ असम्बद्ध प्रलाप करन को ही 'छायावाद की कविता समझ अपनी भी पुछ करामात दिखाने के फेर म पड गय है।'' छायावाद को ऊटपटाग और 'असम्बद्ध प्रलाप कहना शुक्लजी की कठोर एव सकीण दष्टि का परिचायक है। रहस्यवाद म जिस अज्ञात मत्ता म मिलने की आकुलता का हृदयस्पर्शी चित्रण हुआ है शुक्लजी उस वकवास से अधिक नही समयन, तभी तो वे लिसत है " 'सब विचारने की बात है कि किसी अगाचर और जनात के प्रेम म आसुआ की आकाशगगा म तैरने, हृदय की नसा का मिनार बजान, प्रियतम असीम के संग नग्न प्रलय सा ताण्डव करने या मुद नयन की पलको के भीतर क्सिी रहम्य का सुखमय चित्र देखन का ही-- भी तक तो कोई हज न था-कविता कहना, कहा तक ठीक है ? चारा भोर से बेदखल होकर छोट छोट कनकोआ पर भला कविता कब तक टिक सकती है। शुक्लजी ने रहस्यवाद म केवल अप्रस्तुत आरोप और हृदय की लम्बी चौडी उछल कूद देखी है वे उसकी आत्मा को नही पहचान सवे । उनकी दष्टि ज्ञात अज्ञात को केवल एक ओट या बहाना मात्र समय सकी। यदि शुक्लजी का नये प्रचलित वादो के प्रति इतना उपेक्षा का भाव नहीं होता, तो शायद वे ऐसा नहीं कहते बगभाषा के फाव्यक्षेत्र के तो एक कोने ही मे इस रहस्यवाद-छायावाद की तत्री बजी, मराठी, गुजराती को हर एक विलासी ताल सुर पर नाचन की आदत नही, पर हिदी मे तो इसकी नकल का तूफान सा आ गया । अपनी सीमाओं के बावजूद छायावाद रहस्यवाद ने हिदी काव्य को श्रीवद्धि में जो योगदान क्यिा है उस इस प्रकार नकार देना उचित नहीं कहा जा सकता। २ ३ १ भ्रमरगीतसार, पृ० २० २ चितामणि (भाग २) पृ० ५६ ३ वही, पृ० १०८ १२२॥

समीक्षा के आग्रह / ७१ 'पलावाद' सम्बन्धी दृष्टिकोण-छायावाद और रहस्यवाद के समान ही कला- वाद की भरसना गुनजी ने वडी निममता के साय की है 'कता, कला के लिए के प्रवतको और ममयको पर उन्होने बहुत ही तीखे व्यग्य वाण छोडे है । उहोंने नूतन रूप- सजना पिया करावादी विद्वानको मस्यीकार करते हुए लिखा है "'कलावादी' जिमे नूतन सष्टि करते हैं वह पछ और स्थिर दृष्टिवानो के निबट वास्तविक का विन म मात्र हैरेपा विकन का जो प्राय कुन्हा मात्र उपत करते रह जाता है । हृदय के ममम्थन का पा नहीं करता, कोई सच्ची और गम्भीर अनुभूति नहीं जगाता। गुरतजी कविता के माध्यम से समाज को स्वप्निल लोन दिवाना पसद नहीं फरते थे, वरन् वे तो साहित्य को जागरण के शखनाद का शाश्वत स्वरूप बनाना चाहते थे। यह सब उनरा आदा था, अपनी मा यता थी, जिसे अस्वीकार नहीं किया जा सक्ता, रितु अपने आदगों को इतनी लम्बी डोर दे देना उचित नहीं कहा जा सकता जो दूसरे दष्टिकोणा का बायती चली जाय, अन्य व्यक्तिया के विचारो को भली-भांति समथने म भी बाधा का जाप । गुस्तजी की दृष्टि में, " 'कता, कला के लिए' अथवा 'शाध्य कल्पना का लोक है ये मव वेल-बूटेवाली हलकी धारणा के कच्चे बच्चे है।" उहोंने रसवाद के आग्रह के वशीभूत होकर क्लावाद वी उपेक्षा मी की है । शुक्रजी की समीया मे गुद्ध सौदयवादी दप्टिकोण कम पाया जाता है। इधर 'शिव' सो उनकी समीक्षा में इतना अधिक स्थान मिला है कि वह 'सुन्दर' की मीमा बन गया है। इसके फलस्वरूप माहित्य जगत् म इनके विरुद्ध एक असतोष जागरित हुआ जिसने शुक्रजी की मा यताओ का पीछे ढोल देने का साहस किया। शुक्लजी को 'कला शब्द से ही इतनी चिंद हो गई थी कि वे उसे साहित्य क्षेत्र से बाहर निकालने की बात कहने लगे "सारा उपद्रव काव्य को क्लाओ के भीतर लेने से हुआ है इधर हमारी हिंदी में काव्य समोथा के प्रमग म 'कला' गद की बहुत उद्धरणी होने लगी। मेर देखन में तो मारे काव्य समीक्षा क्षेत्र में जितनी जल्दी यह श द निक्ले, उतना ही अच्छा । इसकी जड पकडना दौर नहीं है।' शुक्लजी को इतना सब कुछ कह देन पर चैन नही पडा, तभी तो ये बार बार पुरजोर श दा म कहते हैं "मैं पिर भी जार के साथ महता हूँ कि यदि काव्य के प्रति स्वरूप की रमा इष्ट है, तो उमरा पीछा इम 'काला' गन्द से जहाँ तक हो, गोन डाया जाय।' १ १ गोस्वामी तुलमीदाम, पृ०७८ २ वितामणि भाग २,१०१५९ ३ वही, पृ० १८० ७२/समीक्षा के आग्रह अभिव्यजनावाद और गुलिजी याचे का अभिव्य जनावाद भी गुक्लजी वे आदर्शों की तुला पर ठीक नही उतर मया। इमलिए, उन भी कटु जालोचना का सामना करना पड़ा । वे उक्त वाद की गहराई नक नहीं पहुँच मके। अभिन्यजनावाद म शुक्लजी ने रचना प्रक्रिया और सोदय विधान के स्थान पर केवन वाग्वैचिय और उक्ति वैविध्य ही देवा ! जमा कि उनके इस कथन मे म्पाद? 'अभियजनावाद अनु भूति या प्रभाव का विचार छोर केवन वाग्वैचिश्य को पकडकर चता है पर वाग्वैचित्र्य का हृदय से को सम्बध नहीं । वह केवल कुतूहल उपन करता है । जभि यजनावाद के अनुसार ही यदि कविता बनने लग तो उसम विलक्षण विलक्षण वाक्यो देर के सिवा और कुछ न होना चाहिए न विचारधारा, न भावो की रमधारा । ' उहाने कोचे के अभियजनायाद को 'वितण्डावाद २ तक कह डाला। गुवल समीक्षा का एक सीमा यह भी रही है कि ये प्राय सवत्र शाथ सम्बय और परपना व्यापार का पाथक्य मानकर चले हैं जबकि वस्तुन ये दोना पर एY दूमरे मे अविच्छिन रूप में सम्बद्ध हैं । यदि क पना म ममाहार शक्ति है, तो भाषा म ममास शक्ति स्वत आ जायगी । कल्पना के उद्बुद्ध होने पर भापा म किस प्रकार जीवन मचार होने लगता है इसका उदाहरण स्वय गुवनजी की उन पक्तिया मे मिल माता है जिसम चितन कल्पना म ढल गया है । सूरदास की समीक्षा करते समय वे लिखत है जयदेव की देववाणी की स्निग्ध पीयपधारा, जा काल को कठोरता म दब गइ थी अवकास पाते ही लोकभापा की सरमता म परिणत हाकर मिथिला की जमराइया म विद्यापति के कोक्लि कण्ट में प्रस्ट हुइ और आगे चलकर वरील कुजो के बीच फल मुरयाये मनो को मीचन लगी । आचार्यों को छाप लगी हुइ आठ वीणाएँ श्रीकृष्ण की प्रेमलीला वा कात्तन वरन उठी जिनम सवसे ऊँची मुरी नी और मयुर यकार सधे कवि मूरदास की वीणा पोथी। वे जब जब कल्पना अथवा भाव सौदय की बात करते है, तब तब भाषा सौदय को अलग स व्यक्त करन क प्रयत्न म जुट जाते है। भापा मोदय का व कल्पना सौदर्य के सम्मुख नीचे दरजे का ममझते है। बहुत सम्भव है उनके मन म भाषा चमत्कार की पात आते ही केशव वा काय उना कल्पना नत्रा के ममाना जाता हो। जायसी की नागमनी के विरह वणन म भाव सौदय की बात करत करते व 'सदेमग' द में 'डा प्रत्यय के सुटर प्रयोग की बात कहते है। अभियजनावाद न इमी कल्पना मौदय और अभियजना सोदय को एक दूसरे से सम्बद्ध मानत हुए अपन सिद्धात रखे हैं। ३ १ चितामणि, भाग २ पृ. ९७ २ वही ५० १७९ ३ भ्रमरगीतसार,पृ०१ ममीमा के आग्रह/७३ शुक्ल-समीक्षा की अगतिकता-गुपलजी की समीक्षा पद्धति म परिस्थिति और युगानुरूप परिवर्तन और परिवद्ध न नही दिखाई देता। उनके ममीषा सिद्धात कठोर हैं जिनमे लचर की योइ मुजाइश नहीं। भक्ति-कालीन माहित्य के लिए उन्होंने जिम मर्यादा, नतियता और लोकमगल को आलोचना मान पेम्प म स्वीकार किया उही मानो या प्रयोग उहोरे रीतिकालीन और जाधुनिक साहिय की ममीना के लिए किया, जिसपे फलस्वरुप वे रहम्यवाद और छायावाद का समुचित मूल्याकन नही कर सके। समीक्षय मे ऐमी क्षमता होनी चाहिा कि या तो वह युग ना पथ प्रदशक बने अथवा युग पा यास्तविक चित्र उपस्थित परे। पहले तो शक्लजी न युग का जपने पीछे पीछे चलाया, समीमा-जगत नो नगे नये आयाम और नय नय मोड दिय किन्तु बाद म वे स्वय युग की दौड मे पिछट गये । उनको अपनी ही स्थापनाएं उन पर इतनी हावी हो गई कि वे उनमे हटकर देख ही नहीं मरे । जब ममीक्षा मे 'सोदय तत्व' की अधिक वर्षा होने लगी तव गुवनजी न सौन्दय-तत्व को 'मगल तत्व का ही पयाय बताया। यह उनकी ममीना की अगतिकता है। ये सौदय तत्त्व को अलग मे अस्तित्व देना नहीं चाहते । शुक्लजी लिगते हैं "कहने पी आवश्याता नहीं कि यह सौदय भी मगल का पर्याय है । जो लोग केवल शात और निप्षिय (स्टैटिय) सौदय के जीविक स्वप्न म ही कविता समझते है, वे पविता यो जीवन क्षेत्र के बाहर खदेडना चाहते है। कविता को जीवनोपयोगी बनान का आग्रह उहोंने मरते दम तव नही छोडा । एक सीमा तक वे स्वय उपदेशक बन गये और उह तु नसी को उपदेगारमा वत्ति भी अच्छी लगती थी। 'मानम की उपनात्मक योग्यता को लेकर वे लिखत हैं "इसी ग्रथ म जनसाधारण को नीति का उपदा, सत्यम की उत्तेजना, दु ख म धेय जान दोत्सव म उत्माह, फठिन परिस्थिति को पार करने का बर-सम कुछ प्राप्त होता है । रितु बदलते हुए युग को यह उपदेशात्मव वत्ति अपरने नगी थी, शुक्लजी ने इसकी चिता नहीं की। एकपक्षीय दष्टि-गुकरजी की समीक्षानो मे बहुधा एकपक्षीय दप्टिकोण देखने को मिलता है । वे जब जब भावपक्ष या उदघाटन करने लगते हैं, लोकमगल का गुणगान परने बैठते हैं, तब तब वे भूल जाते है कि लोकरजन भी माहित्य का विषय है और वह लोकमगल के समान ही जीवन म महत्त्वपूण भी है । एकागिता और एकपक्षीय दष्टि को स्वय शुक्लजी न साहित्यिक क्नकोमा उडाना कहा है कि तु वे स्वय इससे असम्पक्त नही रह सके हैं । इधर, गुक्लजी की समीभाआ का क्षेत्र अधिक्तर काव्य जगत रहा है। 'हिदी साहित्य का इतिहास को छोडकर गद्य साहित्य की तो प्राय उपेक्षा मी की है । शुयलजी जसे सुधी और मृद्ध र आलोचक मे यह अपेक्षा की जाती थी कि वे साहित्य १ १ चितामणि, भाग २, पृ० ४७ २ गोस्वामी तुलसीदास, पृ०८० ७४/समीक्षा के आग्रह की विविध वियाओ पर भी प्राता। दिी माहित्य रा इतिहाम' पुस्तर म साहित्य की अय विधाआ पर भी थोडा वदुत पानी मिला है, frवर्ग अधिक विस्तार के लिए अवकाश नहीं था। परम्परा और परिवेग को मत पिया की उपक्षात ममी ना म युगीन परिस्थिनियो यो अविर स्थान मिला है, जबरि परम्परा की ओर बम ध्यान दिया गया है। उन्होंने अपन 'इतिहाम' के गाल विभाजन या जागार साहित्य-गमीक्षा के पूर्व तदयुगीन परिस्थितियो के अययन को माना । रितु ध्यान देन को रात यह है कि परिव एव परिस्थिति के माय माय परम्परा भी जपा विशिष्ट स्थान रखती है। गवलजी भक्ति यग के आविर्भाव के मम्प र म लियत है दि 'देश का वह नैराश्यवान था जिसम भगवान पे मिवा और यो महारा नहीं दियाइ देना था। भनि और प्रेम ये ग म देश ने अपना दुग भुलाया, उसका मन वदना ।" तुकाजी दमी स्थान पर घून गये हैं । भक्ति माहिय तो हम ममृत साहित्य मी धरोहर रेम्प म प्राप्त हुआ है। समय समय पर भक्ति साहित्य भारत म जिम गया है, इसलिए यह पहना निराश्य पान के कारण ही, भनिकान का प्रादुभाव हुना, बतुको वान लगती है । माहित्य मजन तो परम्परा और परिवा की अत त्रिया व फलस्वरूप होता है । इन दोना म मिमी की भी उपेभा बाहित नहीं। इन दोना तथ्या पर समान दप्टि मे विचार करना अपेक्षित है। केवर पप्ठभूमि निरूपण म म्यूल ऐतिहासिकता को महत्त्व देना ममीचीन नहीं कहा जा मक्ता । सम्भवत , शुक्नजी द्वारा स्य्न ऐतिहासिर परिस्थिति को अधिक महत्त्व दिय जान के परिणामस्वरूप ही डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी ने परम्परा और सस्टति का महन्ध जताने हुए माहित्य के इतिहास वा परम्परा विकाम के म्प में नवरूपावन किया है। निष्प-गुक्त समीक्षा यद्यपि इतनी मीमाला से घिरी है कि उमम स्वभावन जपणता रह गई है, तथापि हिदी-समीक्षा उनने दाय से कभी उऋण नही हो साती। जव हि दी समीक्षा घुटनो के बल चलने म भी जपन आपको असमथ पा रही थी गुगनजी ने उसे उँगती पक्डवर चलान का मफल प्रयाम किया । उहाने हिदी आलोचना को नये मान, नई दिशा और नया धरातल प्रदान किया। मनोवैनानिक दष्टि से ममीक्षा के पथ को जालोकित करते हुए उहोन उसने राजपय का निर्माण क्यिा । गुलजी युगद्रप्टा और युगस्रष्टा ममालोचक थ। उन जैसा समालोचा क्सिी भी भाषा साहित्य के लिए दिव्य वरदा सिद्ध हो सकता है। उनकी स्थापनाओ की चट्टान जटूट है। कोई भी साहित्यिक दिग्गज उम ढाहन मे अपने आपको समथ नहीं पाता । उनके पाण्डित्य और अध्ययन के सम्मग सभी नतमस्तक हो जाते है । हिदी समीक्षा म एक बार राआत्यादन के द्वारा अनायास हो गया है। वस्तुत , शुक्लजी की सीमाए उनकी समीक्षा विशेषताओ के सामने धूमिल पड जाती है, गौण हो जाती हैं।

No text on this page.

No text on this page.

Sahitya Chintan Avam Samixa Drasti

Author
Dr. Jagdish Sharma
Title
Sahitya Chintan Avam Samixa Drasti
File name
Sahitya Chintan Avam Samixa Drasti
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/03
Publisher
Kitab Mahal Allahabad
Language
Sanskrit
Pages
89
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551592
Barcode
4990010032317.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
n7d9xivtZ3G
Download PDF

Sahitya Chintan Avam Samixa Drasti