Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Ramalnavratna
Front matter
मुद्रम और मकाफ- खेमराज श्रीकृष्णदास, अध्यक्ष-"भीधेटेश्वर" स्टीम्-प्रेस, यम्मई पुनर्मद्रमादि सर्वाधिकार "श्रीवेहटेवर" मुद्रणयाममाप्पक्ष अमीन है।
श्री। अथ रमलनवरत्न विषयानुक्रमणिका । " २ ३ तथा नियम विषय पृष्ठांक विषय. पृष्ठांक. मङ्गलाचरणम् भाषाकारसमति १७ अवसानसिह व उसके पुत्रोंसे लब्ध. शकलोंके एकादशक्रमका चक्र १९ प्रतिष्ठत्व शकलोका संज्ञाचक्र २० स्वज्ञाति और वशवर्णनपूर्वक अवन्ती शकलोंकी मृदुकाठिन्यादिसंज्ञा- पुरीमें ग्रन्थका निर्माण करना ऑका चक्र २१ ग्रन्थशोधकका नाम नवरत्नोंके नाम शकलोंकी आतशीखाफी आदिसंज्ञा- नवरत्नोंके कंठमें धारणकरनेका फल ऑका चक २२ नवरत्नोंको गोप्य रखनेकी आज्ञा शकलोकी अन्धचिपिटआदिसंज्ञा- पाशे बनानेका काल और क्रम ओंका चक्र २३ पाशोंका चित्र पाँशा गेरनेमें काल शकलोंकेबलाबल २४ खण्डोंका मैत्र्यादिचक्र २५ पाशा अभिमन्त्रित करनेका मन्त्र ५ सप्तग्रहोंका वर्णन प्रस्तारप्रकार शकुनअव्दहादिक्रम प्रस्तारका सचित्र उदाहरण उदाहरण २६ सोलह शकल होनेमें कारण गुप्ततत्त्वोंकी स्थापन विधि शकुनक्रमसे शकलोंके नाम अब्दहविजदहकी परिभाषा अब्जद परिभाषा २८ खारिज दाखिल आदिसज्ञा और दिन मीजानकम २९ रात्रिमें बलाबलत्व स्त्री पुरुषआदि फक्रिमपरिभाषा ३० संज्ञा और शुभाशुभादिकथन अस्सहपरिभाषा शकलोंके तत्त्व वर्ण और दिशावर्णन ९ सातों पक्तियोंका प्रयोजन शकलोंके राशि स्वामी और दिशावर्णन १० दृष्टिबल शकलोंके राशि स्वामी और चरस्थिर प्रश्नोपकरण ३२ आदि संज्ञा छाप्रकारके लक्षणोंके नाम और लक्षण लधानसे जमाततक गुणवर्ण ११ पाशोंके विना प्रस्तार बनानेकी विधि ३३ फरहासे अतवेखारिजतक गुणवर्ण १३ । इन्किलावकी विधि नकीसे तरिखतक गुणवर्ण १५ / मरातिवउपकरणके भेद उम्महाँतादिसज्ञा १६ इमतियाजउपकरणके भेद ३५ स्थानोंकी केंद्रादिसज्ञा तसीरउपकरणके लक्षण शकलोंके साक्षी १७ । तकरारसज्ञउपकरणके लक्षण ३६ ६ 3 २७ शकलोंके स्वरूप " - , ८ " -- ३१ FA " । . ।
भनुममणिका। । " मार्गका प्रमाण प्रस्तार कपन विषय पृष्ठान विषप प्रहार उपकरणों के विना मभ कहना व्यर्थ ३६/ पाठमवनका पिशपविचारमें रोगान ७१ मरम परसे म्ठे परतफ कहने मोम मम ३७ रोगी जीवनमरणका धाम सप्तमसे मारह परोंसक प्रम ३९/ सप्तमममनमें विशेपसे पौरमनर इसीप्रकार मन्यमहाका बानना १० पोर अपना है वा दूसरा यह भान मम मर्म रटदेवनति ११ चौरस्थान भाविधान प्रच्यकोंका सख्याका विचार ५२/ प्रामस्थ भौर विदेसम और शान सन्सकोंके मम कस्सितका मान चौरके गमनमें विसाका मान मभोंमें चार मुख्य कारण समीरस्म मोर मामस्व पोरके प्रभ पार भरणोंका उदाहरण ७६ मुफ प्रभो पनि प्रकार भौर पर दूरगत पौर भौर पनी मध्यमवर्ती १५ प्रामोंकी संख्याका कपन सप्रस्वारप उग्रटन मर्मात सोग्ना ५१ पौरस्पहचान भून्यवासन सामाधाममम मावरमनिरूपण ५३ मटममननमें विशप भाग एनेकापन ७९ निर्गमागमप्रश्न सिदि ५५ नवममपनमें विशेषनर्मक गीते स्पिरमश्न मरेका प्रश्न ८० संश्ममें नियममभर पवममननमें वादियोक बयपरा इनिकायका ममोमन ૫૮ मात्र विचार प्रथमभावमें विसपविचार ५९ मोमनपस्नमें रस बादिका मन समयावधि मानने पक्रोवर ६० सममें विशेषकरन ८२ विमवहायक ६१ म्मममें विश्पकपन द्वितीयमावमें विक्षेपकमन ६२ । सम्पूर्णप्रश्नोन भवधियान कर्णमार्ग दसनेका क्रम ६३/ उम्महान्त मादि संधामोसे निवपटी तृतीयमाघमें विशेषकान माविको भवपिका पन ८६ पतुपमाबमें विशेषकाम ८७ पप्रममावमै विपकमन ६६ / नबधिमादिमप्यमन्तधर्मसिदि गर्मा निमय उम्महान्कारपोवन सन्तानकी संस्साका विचार ६७ / मुष्टिकप्रश्नालनमसकामदुलारमाष८९ गर्भ या या पुत्रका सम ६८ सपानामादिकोकायन सन्ततिसल्मामें ममनोक मन्यमरण अफ्ठोंने भारुति सततिका मन्मय सबा बायुस कपन ६९ सालोफेनिवासस्थान सन्ततिके पननिर्मनसाका प्रश्न सफ्लोरे मौश्वममोस्त - ६५ उम्महान्स पर " - y 11 ९४ ११२ अनुक्रमणिका । (६) पृष्ठांक विषय. विषय. पृष्ठांक. लघुत्वगुरुत्व, अन्यसंज्ञा ९१ ग्रहोंके योगवशसे फल १०७ शकलोंकीपूर्णआदिसंज्ञा बहुतप्रकारोंसे सम्वत्सरफलकथन १०८ शकलोंके रस, भूमिकथन ९२ मासखण्डगृहखण्डोंसे शुभाशुभ शफलोंकी धातुआदिसज्ञा फल कथन १०९ शकलोंकाशकुनक्रमसे रूपआदिचक्र ९३ | मासखण्डतत्त्वोंसे शुभाशुमकथन मुष्टिगतवस्तुकाप्रश्न सावितशकलके वशसे दशा और मुष्टिप्रश्न सूक्ष्म दशाफल ११० वस्तुकी कठोरता कोमलता आदिका कथन९५ मासखण्ड और दशाखण्डसे खण्डयोगसे मुष्टिगतवस्तुमें छिद्रादि उत्पन्नहुई शकलसे फल विशेषकथन अब्देशप्रकार ११३ नामबन्ध ९८ मासेशप्रकार ११४ नामवर्णसंख्याका कथन दिनफलप्रकार ११५ वर्णकथन जगद्वर्षसाधन ११६ चौरआदिक नाम निकाल- लहानफल १०० कव्जुल खारिजसे जमाततकका फल ११७ नामाक्षर निकालनेकी विधि १०१ फरहासे अकीशतकका फल ११८ नामाक्षरका उदाहरण १०२, हुम्रासे बयाज तकका फल ११९ अन्यप्रकारसे नामाक्षरका कथन १०३ | नुसुत्खारिजसे नुसुदाखिलतक १२० चोरका प्रकट करना १०४ अतवेखारिजसे तरीकतक फल १२२ अन्यमनसे विभागकथन विद्वानोंसे प्रार्थना वर्षफलविचार १०६ ग्रन्थकर्ताके पितृपितामहादिकोंका नाम १२३ प्रथमआदिखण्डसेद्वादशभाव- ग्रन्थसमाप्ति १२४ इति रमलनवरत्नानुक्रमणिका । रमलप्रश्नावली-अनुक्रमणिका । दैवी व परोक्षवार्ता प्रकट करनेवाली ईकारसे सोलह शकलोंका फल १२९ जन्त्री उसारसे उत्तर निकालनेकी रीति ऊकारसे उपरोक्त चिहोंमें उदाहरण १३१ १२६ ऋकारसे १३२ प्रश्नके दिन ऋकारसे १३३ अकारसे सोलह शकलोंका फल आकारसे १२८ लूकारसे १३४ इकारसे एकारसे 'नेका चक्र १०५ पर्यन्त फल १२५ १३० ३ -- १२७ / लकारसे " १३५ विषय, ३ पटांग " । " " " " " " मनुभमणिका। प्रष्ठांक विषय ऐकास्से सोम सकलोंका फर १२६ खीरूसकर पठी सो कौनविभागई १५१ भोकारसे १३७ } मेरी पतु लोगई है ओरसे - १०८ पोरने वस्तु कहा परी है भकारसे 'परवेशमें बाना पाइलाई कामदा है ॥ मकाररो १३९ मेरा कौन विशामें बामा मध्य १५६ इतिरमलमग्नावस्यनुमणिमासमाता। मेरा मिना फिन गेगोंसे होगा अथ रमलदानियाल महपापमुसपर प्यारकरता है कि नहीं मेरे हायमें क्या मस्तु है १५७ मेरा कार्य सिने दिनोंम स्गा परदोषीने सी की है कि नहीं मन होगा कि मही रावा बादशार मुसको नाम मानेके पास मेरावानाशुभहेमामाम" पोरसहरमदममवाबाहिरनिकसाया मेरीमवस्मामबसेमागेकसीपीवेगी गतमा निकलेगी कि नहीं भेरामाई मुसपरखुशी है या नहीं १०२ मुझको फसानेरे पाससे० औरतसे विवाह प्रम मुष्टिप्रश्मरूपन मेरी सोई पस्त मिलेगी या नहीं ११२ मुरुपश्नका विचार पो होगी या नहीं मुरुमन काहनेका सरा प्रभार १६० बम मगा मा सस्ता कमसे सोम सकसके नाम उवासरूप, मेरा बाप मुझेसा पाहता है १९० मपानके भामस्त. मेरा रोमगार होरेगा या नहीं, मुत्यालिसके नाम स० परदेशीका सरचा पायेगा या नहीं कबसारियके माम स० फसाना मांगी वस्तु देगा या नरी ममात्रके नामस्व. मासूकदाम मानेगा या नहीं गर्भवती मम उपना नामस० सोया मा पनुका प्रम पोरफा प्रभ हुमराके नामस्म० रोगीफे प्रम ममुकलीफो यह पुरुष छोरेगा कि मही१५१ गयापरवेशीमरगयासुमीयादु'सीई" नुसुरसारिबके नामम्य भमानत (परोर) सोपदेवेगापानी" मुसहामिस सगा मरन मतयेसारिमके नामस्स० मूमम १५२ मुक्तीरे नामस्य. मुशको फिसबस्तुमें कापरा होगा १५० मतदाखिसके मामास भने मिमीजगह मामी मेगाहसो इजरमा रीनामस्परूपमावि पहुँगा या नहीं इति रपसवानिमारमनुक्रमणिका समासा । " ॥ ११५ फरहाके नामस्व० " १५० मायके नामस्व० " बयाज नामस० " श्रीगणेशाय नमः। रमलनवरत्न भाषाटीकासहित । प्रथमं संजारत्नम् । यस्य प्रसादमधिगम्य सुराः समस्तास्तिष्ठन्ति सद्मसुनिजेषुगतारिशंकाः। ध्यायन्तियं मुनिगणाः प्रणमामिशश्वल्लंबोदरंसकलविघ्नविनाशहेतुम् ॥१॥ यस्यांघ्रिश्रीः सुश्रियं सन्तनोति तं श्रीनाथं श्रीगणेशं च नत्वा । भाषा कुर्वे खेमराजाज्ञयांकरत्नस्य प्रीत्या धरांतो मही सन् ।। जिस (श्रीनाथ) लक्ष्मीपति विष्णु यद्वा निज गुरुकी (चरणलक्ष्मी) पादपद्मशोभा ससा- रमें मंगल यद्वा ऐश्वर्य शोभा भलेप्रकार विस्तारित करती है ऐसे निजेष्टको तथा विघ्नविना- शक गणेशजीको भी नमस्कार करके (सन् ) साधु मैं महीधर नामा "टीहरीगढवाल निवासी" श्रीसेठ खेमराजजीकी आज्ञासे रमलके नवरत्नग्रन्थकी भाषाटीका करता हूं- टीका-ग्रन्थकर्ता निर्विघ्नतापूर्वक ग्रंथसमाप्त्यर्थ अपने इष्ट देव- ताको प्रणाम करता है कि, जिसके प्रसाद पायके समस्त देवता दानवादि शत्रुओंका भय दूर करके अपने २ (स्थान) अधिकार वा लोगोंमें स्थित रहते हैं और मुनिजन अपने तपःसिद्धयर्थ जिसका ध्यान करते हैं ऐसे (लंबोदर ) गणेशको मैं ग्रन्थकर्ता ग्रन्थरचनामें विघ्नविघातार्थ वारंवार प्रणाम करता हूँ॥१॥ वाराणसीटपतिगौतमवंशमुख्यबलवंतसिंहसचि- वादवसानसिंहात् ॥ लब्धात्मवृत्तिपरमाद्यसुखः सनाढयोरम्लेंकरत्नमकरोन्निवसन्नवन्त्याम् ॥२॥ टीका-श्रीकाशिराजबलवंतसिंह (जो गौतमऋषिके वंशमें मुख्य हैं)का मन्त्री तिन अवसानसिहसे पाई है आजीविका जिसने ऐसा (२) रमलनवरत्ल- अवतिदेशमें वसता हुआसनाढयकुलोद्भव परमसुखनामा पण्डित नवरत्ननाम रमलग्रन्थ बनाया ॥२॥ तदस्त्यशुद्ध नितरां समतान्नतत्रविद्वज्जनचित्त- मोद ॥ विज्ञार्थितः संप्रति तस्य शुद्धये तद्रङ्ग- लालो विशदीकरोति ॥ ३ ॥ टीका-वह ग्रन्थ सब जगह अत्यन्त अशुद्ध है उसमें विद्वानोंका चित्त प्रसन्न नहीं होता तव इस समय विद्वज्जनोंसे उसके शुद्ध कर- नेके हेतु प्रार्थित किया गया ऐसा ग्गलालनामा उस नवरनको प्रगट करता है ॥३॥ अथ तावनिर्मितनवरत्नाना नामानि क्रमं चाह। सज्ञावलावलदलोपकराणिमूकप्रश्नोत्तराऽवधिक- मुष्टिहराख्यवन्धा ॥४॥ सवत्फलंचनवरत्नमिद मनोजस्वान्तेचमत्कृतिकर मुविसज्जनानाम् ॥ ५॥ टीका-अब ग्रन्थकर्ताके बनाये नवरनाफे नाम एवं कमभी कहते हैं कि, यहां रनमानक अध्याय है प्रथम मजाग्न है, इसग बलावल, तीसग प्रश्नोपकरण (प्रश्नके साधन बतानेवाला), चौथा प्रश्न कहना.पाचवाँ ( अवधि) मियाद बताना, छठा मुष्टिगतद्रव्य बताना, मातों (मूकप्रश्न) प्रकट किये प्रश्न बताना, आठवा चोरका नाम बताना, नवम वर्पपत्र बनाना, इन नवरनासे पद ग्रन्थ मनोज तथा ममाग्मं सजनांके मनमें चमत्कार करनेवाला ॥९॥ कृत्वासाठगममुनवरतसघप्रोतस्वबुद्धिव्रतती- प्रमरप्रतान ॥ सप्राप्तमृरिमहिमामलकीर्तिछत्रो विहान विभातुधराजसभास्वभीक्ष्णम् ॥ ६ ॥ टीका-इम नवरत्नके ममृदको अपनी बुद्धिरतार विस्तारित भाषाटीकासहित । (३) सूत्रमें ग्रथित करके अपने कंठमें धारण करके अर्थात् बुद्धिसे विचारपूर्वक कंठोपस्थित करके विद्वान् बडी महिमा पाके निर्मल कीर्तिरूपी छत्र धारण करके पंडित राजसभामें वारंवार शोभाय- मान होवै ॥६॥ नवरत्नमदोऽतिगोपनीय नहि देयंकुहचित् सुदु- र्जनेभ्यः॥ न गुरुद्विजदेवनिन्दकाय नहि नष्टाय वदेदिदं सुगोप्यम् ॥ ७॥ टीका-यह नवरत्न अतिगुप्त रखनेयोग्य यद्वा अतिरक्षा करने- योग्य है, दुर्जनोंको कदाचित् भी न देना, तथा गुरु, ब्राह्मण और देवताकी निन्दा करनेवालेको तथा नटवुद्धि, नास्तिक, नष्टधर्म- कर्मवालेको भी सुगोप्य यह नवरत्न न कहना ॥ ७ ॥ अथास्मिन् शास्त्रे पाशकप्राधान्यात् प्रथम पाशक- निर्माणविधिरुच्यते । वस्वागुरुसायनेसुललितस्निग्धरवौमेषगे कृत्योर्व श्रुतिगुन्यलक्षितमधःशून्यहयाङ्कितम् । पार्श्व- ब्वेकखचिह्नितंव्ययनभानौत्वचतुष्केश्लथं प्रात्वालो- हशलाकयोरथचतुस्तत्त्वात्मिकेमावयेत् ॥ ८॥ टीका-अब इस रमलशास्त्र में पाशेकी प्रधानता होनेसे पहिले पाशा बनानेकी विधि कही जाती है कि, सायन सूर्य मेष राशिपर जिसदिन आवे अर्थात् रा० अंक ० वि० स्पष्ट सूर्य उस दिनहोता है जिस दिन दिनरात्रि चैत्रके महीनेमें बराबर हों उस दिन पाशा ' बनावै.किसी ग्रन्थमें अष्टधातुका बनाना लिखा है, चतुरन चौपहल ८ टुकडे भारी और सुहावने चिकने बनायके ऊपरकेतर्फ ४ बिन्दु नीचेके ओर २ बिन्दु और बगलोंमें ३-३ बिन्दु बनावै ऐसे आठों 1 (४) रमलनवरत्न- खण्डोंको बनायके दो शलाका लोहेकी बनायके एक एकमें चार चार टुकडे ऐसे पिरोवे कि, निकलें नहीं परन्तु परस्पर घूमते चलते अर्थात टीले रहें ऐसा पाशा बनायके प्रथम हाथमे लयान शकल बनायके पाशा फेंकनेका नियम है ॥८॥ पाशकस्वरूपम्। 0 0 0 ० . ० .. . . . अथ पाशक्षेपणकालमाह । चन्द्रोदयादहनिवहिशराष्टविश्वेशक्रेधृतिप्रकृति- वेदकराष्टितत्त्वे ॥ भौमेभृगौरविमुतेऽथचसार्द्ध- यामाद्ववंदिवानिशिचपाशयुगं क्षिपेज्ज्ञः ॥९॥ टीका प्रथम पाशा फेंकनेका समय कहते हैं कि, हिजरीसन् (मुसलमानी तारीख) चौदकी गिनती की ३।५।८।१३। १४ । १८५२१ । २४ । १६१२५ । इन तारीखोंमें तथा मगल शुक्र, शनिवारमें डेढपहर दिनसे ऊपर और रात्रिमें भी विद्वान् प्रथम पाशा फेंके ॥९॥ अप पाशकक्षपणविधिः। प्रातः स्नात्वा शुद्धवस्त्रावृतो. स्वेष्टं ध्यात्वा सस्मरन् गौरवांनी ॥ लगानं प्राक् पाशयुग्मे निधाय मंत्र जप्त्वा सप्तवार क्षिपे? ॥ १० ॥ टीका-अब पाशा फेंकनेकी विधि कहते हैं कि, प्रातकाल मानकरके शुद्ध वन परनके विद्वान् अपने इष्टदेवताका ध्यान करके तथा गुरुके चरणकमलोंका स्मरण करता हुआ दोनों - " - - भाषाटीकासहित । (५) पाशकोंमें प्रथम अपने हाथमें लह्यानशकल में बनायके सातवार मंत्र जपके पाशा पट्टीमें फेंकै ॥ १० ॥ तत्र जपनीयमंत्रमाह । ॐ नमोभगवतिकूष्माण्डिनिसर्वकार्यप्रसाधिनि सर्वनिमित्तप्रकाशिनिएहि.२ त्वर २ वरदेहिहिलि २ मतङ्गिनिसत्यं ब्रूहि २ स्वाहा ॥ यह मंत्र पाशा मंत्रनेका है। अथ प्रस्तारप्रकारमाह। पतितपाशकयुग्मयुतौ पुरः स्थितसुधांशुखतोविलि- खाशुखम् ॥ खयुगतस्तुतिरोगतरेखिकां पुनरमु विधिमूर्ध्वमुखात्कुरु ॥ ११॥ खण्डमेकं विधाया- दावेकंकृत्वाचतुष्टयम् । तिर्यक्क्रमेणतेभ्यश्चपंच- मावेदसंख्यकम् ॥ १२॥ रेखयोः शून्ययोर्योंगे रेखांकुर्यात्खरेखयोः । शून्यमेवं भवेद्योगः सर्व- त्रैवंयुतिं कुरु ॥१३॥ आद्यहितीययोरइंदशमंत्रि- चतुर्थयोः ॥ पंचमेहिषतोलाभं व्ययंचनगनागयोः ॥ १४॥ नवांशयोर्विश्वमथायरिष्कयोोंगेनचैन्द्रं च तिथिस्तयोर्भवेत् ॥ तन्निघ्नमायेनचषोडशंदलं प्रस्तारएवंयवनैः पुरोदितः ॥ १५॥ टीका-अब (प्रस्तार )जायञ्चा बनानेकी विधि कहते हैं, जब पट्टीमें पाशा फेंक दिया तब दोनोंको बराबर मिलाके रक्खे तब अपने दाहिने ओरके प्रथमखण्डके ऊपरका बिन्दु लिखे तब नीचेका लिखे ऐसेही आठों खण्डोंके बिन्दुओंको लिखे इसमें इतना विशेष है कि, एक बिन्दुका बिन्दु और दो बिन्दुकी एक -- . .. . ००००० .. .. ०.०० . D .. . . लेके पचम १ फरहा ऐसेष्ठ रमलनवरत्न- आठी (-) रेखा लिखे ॥ ११॥ प्रथम खण्डका ऐसा चिह्न करके अन्य ३ खण्डोंके भी ऐसेही करे ऐसे ४ खण्ड होगये जैसे प्रथम पाशा ऐसा पड़ा तो प्रथम खडमें उपरके २ उदाहरण बिंदुकी रेखा दूसरे पारोमें प्रथम खडके ऊपर २ बिंदुकी रेखा नीचे एक बिन्दुका बिन्दु भया तब चार मिलके एक सकल = अकी-. शहुई ऐसेही चारों खंडोंके रूप बनायते ऐसा स्वरूप भया अब चारोंके ऊपर उपरके पहिले अतवेश दूसरे दूसरे लेके छटा = अकीश तीसरा तीसरा लेके 23 सकलरूपम् अकीश और चौथा २ लेके १/३/२ शफल और भये ये सब ८ हुए ॥ १२॥१३॥ इनका नियमहै कि,जहा रेखा रेखा मिलाई जावें - वहीं रेखा और बिंदु बिन्दुसे भी रेखा होती है विन्दु रेखाके मेलसे बिन्दु होता है ऐसा सर्वत्र योग करना ॥१४॥अब १२ शफल = = मिलाके , लमान नवम शकल हुई ऐसेही ३१४ शकल, मिलाके अतवे दाखिल दशम शकल भई ५। ६ = से - इयत्तमा ग्यारहवीं ७८ = - के योगसे नसुत स्वारिज बारहवीं ९:१० = के प्रस्तारोदाहरणम्। मेलसे तारीख तेरहवीं ११११२- से- फजुल खारिज चौदहवीं १३ -से- कम्जुल दाखिल पद्रहवीं ऐसेही १५१ - 3 से : हुम्रा सोलहवीं शकल हुई इस प्रकार प्रस्तार यवनोंने पहिले कहा है कम चक्रमें देखो ।। १६॥ टम १० १४ भाषटीकासहित । (७), : अग्निवाताविलाऊर्ध्वादधःक्रमगताः क्रमात् । व्युत्क्रमाचापि तद्देदाः षोडशैव गृहाईकम् ॥१६॥ टीका-अब १६ घरोंके खंड संख्या नियम कहते हैं कि,खंडोंके ऊपर चिह्न अग्नितत्व,दूसरा वायुतत्त्व,तीसराजलतत्त्व,चौथापृथ्वी तत्त्व होतेहैं. इन्हींको फारशीमें आतसी, खाखी, आबी, बादी भी कहते हैं । उधिःक्रम कहा है परंतु उनके कभी उलटे क्रमसेभी गणना होतीहै जिससे १६ भेद और कभी दो भेद भी होतेहैं।॥१६॥ लह्यानकब्जुलदाखिनाख्यकब्जुल खारिजमाता- ह्वयाः फहाँक्लांकिशहम्रिकाश्च शकुनेचाग्रेवयाजाह्व- यम्॥नुस्रुतखारिजदाखिलाख्यअतवेखारिज नकी चातवेदाखिलखण्डमिहेन्तमाश्वतरिखाः प्रोक्ताः क्रमे हेतुके ॥ १७॥ टीका-अब खडोंके नाम और शकुनक्रम कहते हैं कि, प्रथम शकल लह्यान में दूसरी कब्जुल दाखिल = तीसरी कब्जुल खारिज-चौथी जमात = पंचम फरहा -छठी उकला में सातवी अंकीश E अष्टम हुम्रा =नवम बयाज दशम नुखु- तखारिज = ग्यारहवीं नुसहाखिल बारहवी अतबेखारिज : तेरहवीं नकी-: चौदहवीं अतवे दाखिल : पंद्रहवीं इज्जतमा सोलहवीं तारीख य सोलह शकल हैं यह क्रमोंमेंसे मुख्य शकुन: क्रम है अन्य क्रम आगे चक्रमें लिखेंगे ॥ १७॥ अथ शकलरूपाणि । लह्यान में मुच्चैर्गतखंत्रिरेखंव्यस्तांकि = शं कब्जुलदाखिलं स्यात् । रेखाखयुग्मं = च तथा (८) रमलनवरत्न- विलोमतत्वारिज - रेखयुगं जमात है ॥ १८॥ व्यस्ततरीका भ्रयुगंचरेखाशून्य - च फोन कि तहिलोमम् । उल्लाखमध्यस्थितरेखयुग्म व्यस्तेज्तमा - रेखनमोहिरेख - ॥१९॥ हुम्रिकाप्यस्तमेतहयाज = द्विखरेखिका यूड्नुसूत्खारिज नुमुदाखिलं व्यस्तमुच्चै- त्रिखा - प्रत्यरेखातवेखारिजाख्यं भवेत् ॥२०॥ अतवतुदाखिन व्यस्तमेतन्मतं रूपमुक्तं मया पूर्वधीरोदितम् ॥ २१ ॥ टीका-ऊपर शून्य नीचे तीन रेखा = लयान शकल इसका विपरीत में अकीश रेखा शून्य रेखा शून्य - फजुल दाखिल इसका विपरीत - फजुलखारिज चाररेखाओंकी जमात चार दो शून्यरेखाशून्य- फरहा इससे विपरीत -नकी दो रेखा शून्योंके बीच उकला = इससे विपरीत. इजतमा रेखा शून्य दो रेखा हुम्रा = इससे विपरीत क्याज दो शून्य दो रेखानुखुत्वारिज = इससे विपरीत नुखत दाखिल तीन शुन्य एक रेखा अतवेखारिज .. विपरीत अतवेदाखिल इस प्रकार १६ राकलोंके रूप पूर्वपडितोंके बताये मैंने कहे हैं१८-२१ यस्य चोर्ध्वाधरौशून्यरेखान्विता खारिजं दाखिल तहिलोमाद्भवेतारेखयासंयुतौतौयदासावित तद्वि- लोमान्वितो मुन्कलीव भवेत् ॥ २२॥ शुन्योंकी तरीख
भाषाटीकासहित ।
(९)
टीका-जिनके उपर बिन्दु नीचे रेखा हैं वे !
खारिज उपररेखा नीचे बिन्दुवाले = = = दाखिल
ऊपर नीच रेखावाले E === सावित ऊपर नीचे बिन्दु-
वाले मुन्कलीव
संज्ञक होते हैं ॥ २२॥
लह्यानातवखारीजनुस्रुत्कब्जुलखारिजाः॥ पुंखारि-
जाधुवीर्याश्च क्रमतः स्युः शुभाशुभाः॥ २३ ॥ क-
ब्जुदाखिलअङ्कीशावतबेनुसूदाखिलौ ॥ योषिन्नि-
शाबलाशेषाविनांकीशशुभास्त्रयः ॥ २४ ॥ जमाते-
जत्तमाहुम्रावयाजासाविताह्वयाः ॥ क्लीवाः संध्या-
बलामध्यावशुभश्च शुभस्तथा ॥ २५॥ पुक्लीबः
स्यादधुम्रा स्त्रीक्लीवस्याब्यस्तम् ॥ २६ ॥ नकी-
तरीकफरहोक्लामुन्क्लीबसंज्ञकाः ॥ संध्यावेलामध्य-
संतः पुमान् फर्दाऽपरेस्त्रियः॥ २७॥
टीका-लह्यान, अतवेखारिज, नुस्खत्खारिज, कब्जुलखारिज,
पुरुषसंज्ञक हैं तथा खारिज हैं दिनमें बलवान हैं और क्रमसे एक
शुभ एक अशुभ है॥२३॥ कब्जुलदाखिल, अंकीश, अतवेदा-
खिस, नुस्रुतदाखिल स्त्रीसंज्ञक, रात्रि बली बाकी अंकीशको छोडके
तीनो शुभ हैं॥२४॥ जमात, इज्जत्तमा, हुम्रा, वयाज, सावित
संज्ञक, नपुंसक, संध्यामें बली, मध्यमबली और क्रमसे शुभाशुभ हैं
॥२५॥ हुम्रा पुरुष तथा नपुंसक है इसका विपरीत वयाज स्त्री
और नपुंसक है ॥ २६ ॥ नकीतरीक, फरहा, उक्का, ये मुन्कीब
हैं तथा संध्याबली शुभ अशुभ कुछ नहीं मध्यम हैं इनमें फरहा
पुरुष अन्य स्त्रीसंज्ञक हैं ॥२७॥
रमलनवरत्न- (१०) लह्यानातवखारीजनुसत्कव्जुलखारिजाः ॥ आग्ने- यांदिशिपूर्वस्यांबलाढया पीतवर्णकाः ॥ २८ ॥ हुम्राफरहेज्तमा आतवेदाखिलतथा ॥ वायवीयाश्च वारुण्यांबलाढयारक्तवर्णकाः ॥२९॥ वयाजाख्यु- नकीनुद्दाखिलंतरिखाभिधम् ॥ आप्यं च बलस- युक्तमुत्तरे श्वेतवर्णकम् ॥ ३० ॥ कन्जुदाखिल अडीशोकलाख्याश्चजमातकम् ॥ पार्थिव दक्षिणा- शायांबलाढयश्यामवर्णकम् ॥३१॥ टीफा-लयान, अतवेखारिज, नुमुत्खारिज, कञ्जुलखारिज, अमितत्त्व पूर्व दिशामें बली पीले रंगके हैं ॥ २८॥ हुम्रा, फरहा, इजत्तमा, अतवेदाखिल, वायुतत्व पश्चिम दिशा बलीलालरगके हैं ॥२९ ।। वमाज, नकी, नुस्नुदाम्बिल, तरीक, जलतत्त्व उत्तर दिशा बली चतरगके हैं ॥३० । कम्जुलदाखिल, अकीज, उशा, जमात, पृथ्वीतत्त्ववाले दक्षिणदिशा वली श्याम रगके हैं ॥ ३१ ॥ नुसुदाखिललयानौचापमीनौचगौरवौ। नुसूत्वारि- जंकजुदाखिलंचहरीरखो ॥ ३२॥ जमातेजतमे युग्मकन्यज्ञेयेवुधस्यच ॥ तरीकाख्यव्याजाख्यौकु- लीरौचद्रदेवतौ ॥ ३३ ॥ फर्हातवेदाखिलचतुलागा- वौचमार्गदौ ॥ हुमराचनकीशेयोमोमेयोमेपश्चि- को॥३४॥उल्लांकीशनकीनककुमौज्ञेयौतथाशनि ॥ कब्जुलातवखारीजौराहुकेत्वोघंटेणको ॥ ३५ ॥ मुन्क्लीवचरसज्ञस्यात्स्थिरस्यात्सावितंदलम्॥ द्विस्व- भावविधैव स्यात् खारिजंचापिदाखिलम् ॥ ३६॥ - , भाषाटीकासहित। (११) टीका-नुदाखिल लह्यानकी ९ । १२ राशि बृहस्पति स्वामी है तथा नुनुत्खारिज, कब्जुलदाखिल ५ राशि सूर्य स्वामी ॥३२॥ जमात इज्जतमा ३॥ ६ राशिबुध स्वामी तरीक वजायके ४ राशि चंद्र स्वामी॥३३॥फरहा, अतवेदाखिल ७१२ राशि शुक्र स्वामी हुम्रा, नकी, १८ राशि भौम स्वामी ॥३४॥ उवा,अकीश,नकी १० । ११ राशि शनि स्वामी, कब्जुलखारिज, अतवेखारिज १०॥ ११ राशि राहु केतु स्वामी हैं ॥ ३५ ॥ जो शकल मुन्कीव हैं उनकी चर संज्ञा हैं सावित स्थिर दल होते हैं द्विस्वभाव दोनहूँ प्रकारके खारिज और दाखिलभी होते हैं ॥३६॥ अथ शकलान जातिवर्णस्वभावाकृत्यादिस्वरूपाणि । मुखजगौरसुधर्मकृतीष्टवाअधुरभुक्तनु-कण्ठसु- नीलहक् ॥ अमरपाठतपास्थितिमाणिकतनुसु- गंधिमवेहिदलादिम् ॥ ३७॥ क्षत्रः कब्जु- लदाखिलोमधुरगीगोंधूमभाः श्यामकदक्षोवि- क्रयाशिल्पकर्मसुसुरागारः सुरथ्यापणामध्यो- चोमधुराशनश्चधनपोद्रव्यालयः स्यात्सुधी- माणिक्यं धनकर्मठोऽतिचतुरः सौगन्धिकश्वा- कृतिः ॥३८॥म्लेच्छोव्रणोऽतिनयनोऽतिर- वोऽनयीचपीतासितोतिपिशुनांऽशुभतुंगदन्तः॥ तिक्तप्रियोतिमलिनालयदेहवासा निंद्योश्मयु- ग्मवनिकब्जुलखारिजार्धम् ॥३९॥गोधूमभाः सांध्यसुवर्णचित्रीशूद्रोगुणीकृष्णगास्यदीर्घः ॥
- , (१२) रमलनवरत्न- मिष्टाशिहिंस्रव्ययिवैद्यवंद्यो गारुत्मक पाठयह जमातम् ॥४०॥ टीका-अब शकलोंके जाति, रग, स्वभाव, आकारआदि स्वरूप कहते हैं। लमान = शकल, ब्राह्मण, गौरवर्ण, धर्म करनेवाला, मीठीवाणी, मीठाभोजन,सूक्ष्मकठवाला,नीलेनेत्र,देवताओंका पाठ तपस्या करनेवाला, स्थिर कार्यकर्ता, मुगधि प्रिय है ॥३७॥ क. दा० = क्षत्रिय, मीठीवाणी, गेहूँकासा रग, श्याम नेत्र, चतुर, सौदा बेचनेवाला, शिल्पविद्या जाननेवाला, देवतामदिर, बाजार- दुकानोंमें रहनेवाला, मध्यम, उचा, मोठामोजन, धनपति, खजा- नची, बुद्धिमान,माणिक्य धातु धनके कामों में निपुण, अति चतुर सुगधिवाला, कुत्तका आकार ॥ ३८॥ फजुलखारिज-म्लेच्छ दागरहित, गहरे नेत्र,वठा शब्दवाला, न्यायवान नहीं, पीत कृष्ण रँग, चोर, अशुम, उचेदांत, कदमोजी, देह, घर, वस्त्र, मलिन, निंद्य, पत्थर सहित पृथ्वी तत्त्व, अदमाग॥३९॥ जमात = गेह- कासा रंग, सन्यावली, सुवर्ण धातु, चित्रकारी, शूद, गुणवान, कृष्णनेत्र, घडा मुख मीठा खानेवाला, हिंसक, खर्च करनेवाला, वैद्यश्रेष्ठोंसे भी वदनीय, गारुत्मक धातु, पाठशालामें वास ॥१०॥ फरहाख्य सुभगोऽतिदीर्घहोगौराभोलिपिहास्यचि- त्तवृत्तिः ॥ भिन्नभूःशुमलोचनोल्पकोष्ठोमुक्ताढ्य शुभम मुमिष्टमुकूस्यात् - ॥ ४१ ॥ कृष्णाङ्ग' कृपिकारकोतिमलिनोव्यादीर्घदेहाश्रमी स्वल्पाक्ष- स्तमसारतांबुपरिखाकारगृह पेशन. ॥ उलाख्य. कुशलश्थशाकविपणेकृष्णात्मवाणात्मक साल- स्य परिखागृहोगतमतिरिवहश्चात्यजः ॥ ४२ ॥ - .
भाषाटीकासहित। (१३) टीका-फरहा सुन्दर बडा लम्बा शरीर, गौरवर्ण, लिखने तथा (ठट्ठा)मसखरी करनेमें चित्तवृत्ति रहे, भ्रुकुटि अलग २ हों, नेत्र सुहावने, पेट छोटा, मोतियोंसे युक्त अच्छी भूमिमें रहे, मीठा भोजन करे ॥४१॥ उक्का -श्याहरंग खेती करनेवाला अति मलीन लम्बाशरीर, परिश्रम करनेवाला, छोटे नेत्र, तमोगुणसे युक्त जलकी शहरपनाह तथा कैदखानेमें रहने वाला, चोर,शागभाजीकी दुकान करनेवाला,काला शरीर,बाणके समान आकार,आलस्य युक्त,सहर पनाहमें रहनेवाला,बुद्धिहीन,भारढोनेवाला और चाण्डालभी४२॥ म्लेच्छोङ्कीशो तिकृष्ण कृषिकरणरतःकृष्णह- ग्ग्रामवासोमिथ्याभाष्यल्पनेत्रः सुदृढनखरदश्चा- म्लभुक्सालसः स्यात् ॥ दीर्घास्योगेहसेवी सुवि- पुलनिनदो भीषणोनिर्दयश्च कृष्णाश्मायोतिदी? विभतनुवदनोदास्यकृत्येऽतिदक्षः ॥४३॥ हुम्रा : हरोनापितलोहकारकः क्षत्रोणीहेतिभिषक् समो- चकः ॥ पीताल्पनेत्रः कलिकृहिहिंसकोऽरण्यादि- गस्तिक्तरसोहच्छिरः॥४४॥ श्वेतोगौरः समुच्चा- कृतिगमनमतिः सिद्धियुग्वर्तुलास्यश्यामाक्षः प्रेष्ठ- भाषीसजलतरुलतास्थानवासः सुगंधिः ॥ मुक्ता- ढ्यः स्फाटिकाढ्यः शुभललितरुचिर्दुग्धमिष्टान्न- मुक्चदेवार्चासक्तचित्तो व्यवहृतिविभवः सौख्ययु- तोबयाजः ॥४५॥ राजकीयः शुमोदीर्घच- क्षुस्तनुः क्षत्रधर्मान्वितोगौरभाः स्वर्णहत् ॥ माणि- कस्वर्णरत्लापणी मिष्टभुक्सुस्वर-काश्यदोनुस्तुल-
(१२)
रमलनवरल-
मिष्टाशिहिंस्रव्ययिवैद्यवंद्यो गारुत्मक पाठराई
जमातम् ॥४०॥
टीका-अब शकलोंके जाति, रग, स्वभाव, आकारमादिस्वरूप
कहते हैं । लहान = शकल, ब्राह्मण, गौरवर्ण, धर्म करनेवाला,
मीठीवाणी, मीगमोजन,सूक्ष्मकठवाला,नीलेनेत्र,देवताओंका पाठ
तपस्या करनेवाला, स्थिर कार्यकत्ता, मुगधि प्रिय है ॥३७॥ क.
दा० = क्षत्रिय, मीठीवाणी, गेहूँकासा रंग, श्याम नेत्र, चतुर,
सौदा बेचनेवाला, शिल्पविद्या जाननेवाला, देवतामदिर, बाजार-
दुकानोंमें रहनेवाला, मध्यम, उचा, मीठाभोजन, धनपति, खजा-
नची, बुद्धिमान,माणिक्य धातु धनके कामोंमें निपुण, मति चतुर
सुगधिवाला, कुत्तका आकार ॥ ३८॥ कम्जुलखारिज म्लेच्छ
दागरहित, गहरे नेत्र,बछा शब्दवाला, न्यायवान नहीं, पीत कृष्ण
रंग, चोर, अशुम, उचेदांत, कटुमोजी, देइ, घर, वस्त्र, मलिन,
निय, पत्थर सहित पृथ्वी तत्त्व, अदभाग॥३९॥ जमात E गेहू-
कासा रग, सन्याबली, सुवर्ण धातु, चित्रकारी, शूद्र, गुणवान्,
कृष्णनेत्र, बड़ा मुख मीठा खानेपाला, हिंसक, खर्च करनेवाला,
वेयश्रेष्ठोंसे भी बदनीय, गारुत्मक धातु, पाठशालामें वास ॥१०॥
फरहाख्य मुमगोऽतिदीर्घहोगौरामोलिपिहास्यचि-
त्तत्तिः ॥ मिन्नभू शुभलोचनोल्पकोष्ठोमुक्काढय
शुम सुमिष्टमुक्स्यात् - ॥ .४१ ॥ कृष्णाङ्ग.
कृषिकारकोतिमलिनोव्यादीर्घदेहः श्रमी स्वल्पाक्ष-
स्तमसारतांबुपरिखाकारण्हः पैशनः ॥ उक्लाख्य.
= कुशलश्वशाकविपणेकृष्णात्मबाणात्मक साल
स्य परिखाग्रहोगतमतिरिवहश्चात्यजः ॥ ४२ ॥
. । भाषाटीकासहित । (१५) धनमें श्रेष्ठ और कांसी धातु देनेवाला ॥४६॥ नुसुदाखिल ब्राह्मण, श्वेतवर्ण, तपस्वी, सुवर्णधातु, गोल और बडा मुख, शरीर और नेत्र बडे, समुद्रसेवी, अच्छे वस्त्रवाला, स्फटिक यद्वा चांदीके समान कांति, अच्छे पदार्थ खानेवाला, उत्तम सुगन्धधारी, वेदसे विराजमान चित्त ॥४७॥ अतबे खारिज वन पर्वत कूआँ ऊंची जगहोंमें रहनेवाला,किलामें घर,कृषिसे निर्बल, पीतरंग,काला देह ( खोट ) दागयुक्त, नेत्ररोम, भूरेरंग, म्लेच्ल, दीर्घ शरीर, दुर्गधि, ऊन वस्त्र पहिने ॥४८॥ नकी गौरः क्षत्राकृशतनुसुपीताल्पनयनःस- शास्त्रो मांसाशी हरितवसनोलोहितकचः।भटः स्थूलग्रीवः सतिमिरजलपांत्यवसतिः पराधीनो हिंस्रोविततदशनोबालभृतकः॥४९॥ सुदीर्घः क्लिष्टाङ्गःसुमुखभ्रकुटीभिन्नतिलयुक्सुवस्तूयत्प्रे- मातवदखिलमाकुंतिकटहः सनीरक्षौधेस्यकि- लवसतिः कांतनयनः सुगोधूमात्वासःसुललित- तनुर्भाग्यविभवः ॥५०॥ नरेन्द्रलेखीगणकोगुण- स्पृहः सुलोचनः श्मश्रुमुखोऽद्रिधातुकः॥विचि- वस्त्वंशुकपाठभूषितः शूद्रोमृदुलाजवतीज्तमा भवेत् ॥५१॥ वैश्यः सितासक्ततनुर्महायों दीर्घागनेत्रश्वरराजगेहः ॥ मार्गासहाम्ब्बद्रिण- इष्टसुक्स्यात् सुचारुवासास्तरिखंदलं च ॥५२॥ इति शकलस्वरूपस्वभाव जात्यादयः । टीका- गौरवर्ण, क्षत्रियजाति, कृशशरीर, पीले और छोटे नेत्र, शास्त्रसहित, मांसभक्षी, सबज रंगके वस्त्र, सुर्खकेश, योषा; .
- (१४) रमलनररल- खारिजः = ॥४६॥ मुखजसिततपस्वीस्वर्णवृत्ता- स्यदीर्घः प्रवितततनुनेत्रः सिंधुसेवी सुवासाः॥ स्फटिकरजतकान्ति सदमुजि श्रेष्टगधि श्रुतिवि- लसितचेतानुसतुदाखिलं स्यात्॥४ाविपिनगि- रिसकूपोचाश्रितोदुर्गसमकृषिविवलसपीत. कृष्ण- देहोव्रणांकः ॥ कपिलनयनरोमाम्लेच्छदीर्घः कुर्ग- धिर्मवतिवसनपूर्णाचाऽतवेखारिजस्य - ॥४८॥ टीका-अकीश: म्लेच्छ, अतिस्याहरग, खेतीके काममें तत्पर, स्याइनेत्र, ग्रामवामी, झूठ बोलनेवाला, छोटे नेत्र, नखुन तथा दांत मजबूत, थोडा भोजन करे, आलसी, वहामुग्व, घरका सेवन करनेवाला, बहा शब्द कहे, भयानक रूप, निर्दयी, काले पत्थर एवलोहा धातु, वडा लम्बाशरीर और मुख कांतिहीन दास- कर्म करनेमें चतुर ॥४३॥ हुम्रा = चोर, हजाम, लुहार, क्षत्रिय, भरीर दागरहित, डडा हाथमें, वेद्यविद्या जाननेवाला, सम तथा ऊचा नागर,पीलारग, छोटेनेन, कलह करनेवाला, जीवघाती, वन पर्वतादिका जानेवाला, कडुआ रसखानेवाला,बडाशिर॥४४॥ वयाज = श्वेतवर्ण, गौरग्ग, ऊची आकृति, चलनेमें बुद्धिरहे, मिडिवाला, गोलमुग्व, कालेनेत्र, मनोनुकूल वचन कहनेमाला, जलयुक्त स्थान, वृालनाआके स्थानमें निवास करनेवाला, सुगधि हाय, मोती,स्फटिकसे, युक्त,सुन्दर रमणीय कांति,दूध तथा मिटान खानेवालाभी, देवताके पूजनमें आसक्तचित्त, व्यापारसे ऐश्वर्य पावे और सुगमे युक्त॥ ४५ ॥ नुनुत्सारिज = राजाका आदमी,शुभ, दीपने, दीपेशगर, भत्रियोके धर्ममे युक्त, गीग्वण, सुवर्ण शारी, माणिस्य सुवर्ण रत्नाकी दुकान करनेवाला, मीग खानेवाला, - . भाषाटीकासहित । (१५) धनमें श्रेष्ठ और कांसी धातु देनेवाला ।।४६॥ नुसुदाखिल ब्राह्मण, श्वेतवर्ण, तपस्वी, सुवर्णधातु, गोल और बडा मुख, शरीर और नेत्र बडे, समुद्रसेवी, अच्छे वस्त्रवाला, स्फटिक यहा चांदीके समान कांति, अच्छे पदार्थ खानेवाला, उत्तम सुगन्धधारी, वेदसे विराजमान चित्त ॥४७॥ अतबे खारिज वन पर्वत कुंआँ ऊंची जगहोंमें रहनेवाला,किलामें घर,कृषिसे निर्बल, पीतरंग,काला देह (खोट ) दागयुक्त, नेत्ररोम, भूरेरंग, म्लेच्ल, दीर्घ शरीर, दुर्गधि, उन वस्त्र पहिने ॥ १८ ॥ नकी- गौरः क्षत्र कृशतनुसुपीताल्पनयनःस- शास्त्रो मांसाशी हरितवसनोलोहितकचः।भटः स्थूलग्रीवः सतिमिरजलप्रांत्यवसतिः पराधीनो हिंस्रोविततदशनोबालभृतकः॥४९॥ सुदीर्घः क्लिष्टाङ्गःसुमुखभ्रकुटीभिन्नतिलयुक्सुवस्तूयत्प्रे- मातवदखिलमाकुंतिकटहासनीस्वक्षौधेस्यकि- लवसतिः कांतनयनः मुगोधूसात्वासःसुललित- तनुर्भाग्यविभवः ॥५०॥ नरेन्द्रलेखीगणकोगुण- स्टहः सुलोचनः श्मश्रुमुखोऽद्रिधातुकः॥विचि- वस्त्वंशुकपाठभूषितः शूद्रोमृदुलाजवृतीज्तमा भवेत् ॥५१॥ वैश्यः सितासक्ततनुर्महायो दीर्घागनेत्रश्वरराजगेहः ॥ मार्गीसहाम्बद्रिग- इष्टसुक्स्यात् सुचारुवासास्तरिखंदलं च ॥५२॥ इति शकलस्वरूपस्वभाव जात्यादयः। टीका- गौरवर्ण, क्षत्रियजाति, कृशशरीर, पीले और छोटे नेत्र, शास्त्रसहित, मांसभक्षी, सबज रंगके वस्त्र, सुर्खकेश, योधा .
(१६) रमलनवरत्न- मोटीगर्दन, अधेरा, जलाशय और नगरके अतमें बसनेवाला,पराया तावेदार, जीवहिंसक, वडे दांतवाला, वालकोंके पालनेवाला।॥४९॥ ल्वाशरीर,कहे अग,सुन्दर मुख और सजीली झुकुटी,अलग होरहा अग जिससे ऐसे तिल चिगसे युक्त,अच्छीवस्तुवाला, प्रेममें तय्यार, लुहार वा शस्त्रागारमें रहनेवाला, अतवेदाखिल शकल॥५०॥ इमत्तमा - राजाका लेखक, ज्योतिपी, गुणचाइनेवाला, सुहाउने नेत्र, दाढीवाला, पर्वत धातु, अनेक रगके वस्तु एव वस्त्रधारी पाठशालामें रहनेवाला, शूद्रवर्ण, कोमलस्वभाव, लजायुक्त॥५१॥ तरीख वैश्यजाति, खेतवर्ण, शिथिल शरीर, बदपनवाला प्रत्येक अगोंमें विशेषता, नेत्र वडे, राजभवनमें रहनेवाला, चर, रास्ता चलने, जलपर्वतचारी, उत्तम वस्तु भोगनेवाला, रमणीय वस्त्रपहिने द्विस्वभावमी है ॥५२॥ अप उम्मदातादिसज्ञामाह । आधुम्महान्तंचततोवनांतमुन्मुल्ल्दातचतथात- तीयम्॥ तुरीयमेपांचजवायदातचतुश्चतुण्केष्वि- तिनामसज्ञा ॥५३ ॥ आयतुर्यसप्तमदिग्मितच स्यादवतादकेंद्रसजं तदेव ॥ द्विपचनागेशमित चमायल ज्ञेयधुधस्तत्खटपण्फराख्यम् ॥ ५४॥ तृतीयपष्टोकदिवेशतुल्यमापोक्तिमजायलसज्ञक च ॥ विश्वादिक्स्यापि चतुष्टयस्य सदल्युतं स्यादवतादसज्ञम् ॥५५॥ टीका-अब मम्मदातादि सना कहते है, पहिला उम्मदान, दूसरा वनांत, नीसरा मुनुरदात, चीपा जायदात ये 8 घरोकी सज्ञा भाषाटीकासहित । (१७) हैं ॥५३॥ प्रथम चौथा सप्तम दशम १।४।७।१०घर केन्द्र हैं इन्हींको अवताद कहते हैं तथा २।५।८।११ पणफर एवं मायल संज्ञक पण्डितोंने जानने ॥५४॥ ऐसेही ३।६।९।१२ आपोक्लिम एवं जायल संज्ञक हैं अब शेष १३ । १४।१५।१६ स्थानोंकी सदल एवं अवताद संज्ञा है ॥५५॥ विश्वाष्टकंतनोरस्तशकंचधनसद्मनः ॥ सहजस्ये- पुषट्चसुखस्यनृपसंख्यकम् ॥ ५६ ॥ पुत्रस्य नन्दं दशमं रिपोश्च सदस्यलाभव्ययभंचमृत्योः । शरेन्दुनन्दस्य रिपुः खभस्य लाभस्यकामोपिगजो व्ययस्य ॥ ५७ ॥ विश्वस्यायंशक्रगेहस्यवित्तपंचे- न्दोनिंदसंख्यं नृपस्य ॥ तुर्य ज्ञेयं साक्षिणे गृहाणां सर्वेषां स्यात्साक्षिणेहं शरेन्दुः ॥५८ ॥ इति श्रीरमलनवरत्ने संज्ञारत्नं प्रथमम् ॥ १॥ टीका-अब साक्षिस्थान कहते हैं कि, १३८1१७१४।३। दा६४।१०१६।९।१०६७।११॥८॥१२॥९॥१५॥१०॥६॥ ११॥७॥ १२।८॥ १३॥१॥१४॥२॥१५॥९॥१०॥४॥ अर्थात् तेरहवेंका साक्षि- गृह अष्टम है प्रथमका सप्तम है इत्यादि लिखित अंकोंसे जानना इस प्रकार सभी घरोंके साक्षि घर हैं और पंद्रहवां घर तो सभी घरोंका साक्षिस्थान है ॥५६-५८ ॥ इति महीधरकृतायां रमलनवरत्नभाषायां प्रथमं रत्नम् ॥ ३॥ भाषाकारसंमतिः। रमल शास्त्रमें ११ प्रकारके क्रम अलग अलग कामोंके देखनेके लिये कहे हैं यहां छोटा ग्रंथ होनेसे सात क्रम कहे हैं उनमें भी सर्वो- पयोगीशकुन क्रमही लिखा है, यद्यपि यही क्रम मुख्य है तथापि २ (१८) रमलनवरल- औरके जो मुख्य कार्य हैं वे उन्हीसेजेसे सगे ऐसे अन्यसे नहीं इसलिये मैं अन्य ग्रन्थोंका मत लेकर ग्यारह क्रम उनके मुख्य कार्य भी लिखता हूँ- (१)शकुनक्रम ॥ स्वभाव सिद्धि है सभी कार्य प्रथम इससे देख- जाते हैं। (२) अब्दहक्रम ॥ जोरकास्वरूप और सन्तानके निर्णयमें विशेष काम आता है। (३) विजदहक्रम ॥कार्यकी (अवधि) मियाद बतानेमें । (१)अजदइक्रम ॥ वस्तुका नाम तथा अग बतानेमें। (५) मिजाजक्रम ॥ कार्य सिद्धिके काममें। (६) हकिम ॥ खण्डोंकी पुष्टता बलाबल विचारमें । (७) असहक्रम ॥ न सुनी न देखी बात बतानेमें। (८) हुम्रा क्रम ॥ हुक्म लेना, आर्यलब्धि । विनापरिश्रम कार्य- सिद्धिके काममें। (९)अर्जक्रम ॥ विनाश्रम लाभ और आर्यलब्धि । (१०)माआदक्रम ॥ विना परिश्रम कार्य सिद्धि जग फतम। (११) मुसल्लसक्रम ॥ त्याग विमर्जन आदि कार्य सिद्धि निर्णय ये ग्यारह कम है इनके रूप आगे-पाठकोंके सुगमताके हेतु चक्राकारमें लिखे है और सज्ञारत्नमें जो सज्ञा शकलोंकी कही है वे भी पाठकोंके सुगमताके हेतु आगे चक्राकारमें लिखी जाती हैं इममेंभी ग्रन्थकर्नाने छोटे ग्रथ होनेसे थोडी थोडी मुख्य सज्ञा कही है इसमेंभी पाठकोंके हितार्थ अन्य वृहत् ग्रन्थोंमे उद्धृत करके और भी विशप सज्ञायें लिखता है- भाषाटीकासहित । (98) oo | unl und | ။ ။ ။။ ၀၀၀၀၀၀၀၀၀၀၀၀၀၀၀၀၀၀၀၀ 6, tool too 110 아이 1001 1000 1000 크이 은 मतवेवा 000 oo ono 111 Moo 0111 1000 이이이 0100 …. o llll ooo 이 이에 이 이에 loll 11 ool lol खारिज, दाखिल खारिज नको नमुत } 이이이 1 이 a loo lol이 이이 oo Ill 이 o 이이 100 이 001 이이 1000 10 이를 oo 100 이 이이이이이이 0000 이00 이 | 000 AA1 belke le ton do 000 이 이 이이 0 0 0 이 이 भकोश lotu 100이 이 0 1000 이이 le 이 이이 100 Hoo I 10 1000 lol 10 000 이이 ollo lo nooo00 ou lono looo 이이 फारहा 1111 जमान Kl lol ll 1 10이 이이이이이 100 खारिन 00|0|100 I loll 101 000 이 110 R OR 이이 101 खिल lll 100 1000 이 이이이이 이이 1이 은 정 IA 01101 이이이이 이이이 (lo loo 06 110 000 이 또 : ~ राकुनक्रम अपदहक्रम Reth मप पापानामापत्रम् । १ ५ ५ २ . - ។ (२०) भर ADP पराब मा. 13 प.. 12 भमा । मामनि - a + म म । I F ३ - मकर मिथुन THA उम पुम मेर मयम न समि ममा को در تعلزاد شد प्रम नाममा म धम गुम मपुमा मुमममम . . न रमलनवरत्न- न न बर्मा मुर साम नेत (पाम बरचारपरिष राशिजवादि चापित मत मुम्ही नापिकाबाविबारिम राब चारिक मनमाविम सारिक सम्मान स्वातिर रिपर स्पिर हिस्परिक रिस विरपिर पर म. म. ब पंचक सौ. म म म पा १m. ' पाकिस्तान मार माप दुहिम साक्षी साधी गमीचा मार समिा महापामारमा मपुर पारमि मपमानित माययारिमायाम भावस्पिामविपमतिमाभरिमा मश्मि मूब मू ब स . १ A मार मूप मपिम मरिण भूत शिवम . .८ 1- मूग मूग मूग मूमपातु बीप बीप मिण व ग दि..समय 11 पब १० भंध ~ अध चिपिट कोण चिपिट मैलापी मि. त 와 अकोरे खारीजे १४ १२ १५ ६ ८ ९ | सख्या २ दिव्य दिव्य दिव्य चिपिट काण चिपिट काण अध ५० अंधादिस काण अंध चिपिट चक्षु चक्षु चक्षु वदति | वियो | वियो. मैलापी अवलो. मैलापी | पति मैलापो भवलो. वदति वदति अवलोक वियोगी/भवलो वियो ५१/ अवस्था यति मिश्र मि मि. मि मि. मि मि ल लघु ५२ लघुभार वृहमार ल . भार हत्वमौल्य न खान दा अ खा, नका अदा इ व ५३ अवीनामा फ कदा कखा. ह मोकजा जकीरे भात कौस नामक | अपका पुनर्नि भकी| भम भोकजा सेताम मकाह आजाद ५४ इकाम काश्मी जकारदा देशना करान मसू लाग मस् कत पत्थर नगीना पिरोजा ककर पीक ककर हकीक पिरोजा पाषाण कोदर | पिरोजा पत्थर ५५ ककर मूल लाल माणिक शीशा रूपाशीसा पचधातु | सोना लोहा | लोहा / तांबा रूपा | काँशा सोना पीतल सोना पचधातु ५६' धातु साना लकटी मखखुशुष्क खेलक पान फावसा सोप्पारी मेवा. मेवा रोमा [५७ पदार्थ पान भनार धान्य लाल टी लकडो अलू सहतूत अगूर भमरूव काकडी कदलालु. १८ मेवा | खडभुजा नारगी ककही| नारगी । खजूर भालु | कन्द अनार कदलालु.| भगूर वास मालिन | नदो | हवे. जामिन उच्च- लुसता ५९ पद्वभुपर | वाडे में माममै भोयरमे भासमान विलायत खाडेमें जमीनमें बाजारमें स्यान स्थल कोड जगेम ऊपर लोम | उपर आड वालानु हास्त घोटेक रशम गोवरी पसम मोती किरमत पसम रेशम. मोतो रेशम कागा चर्म नख ७ घोडा हाथी खबर भस खचर खच्चर खचर गाय गाय ६१ जानवर घोडा बकरा रोश घोडा सट गधा गधा गधा गधा मह मृग मिडो घोडा वकरी खचर हेशन सल पोपट ६२ व्याघ्र गौ | भैस चकरा जबुक रीछ स्वाना बकरा कुमरी कुलिन कागडा होला मैना मरगा जानवर ६३/ पक्षी चाम्ली तीतर कार्लंग | तमरा तोता कावर बदक काग दिला घोटा वानर वानर चाची पाकर हरिण बदक ६४/ वनजीव | हरिण | सिंह शशक चीता घुड वोलीश मयूर सिंह | पोय | सर्प काछवा करेणी गाहर मार्जार अल यरोद रेती. पा दर्खत वृक्ष. शाफतालु नदीकि नारयर शर्करा | वेत्र भाषाटीकासहित । चमडा ६० जिन्स मोती कस्तूरी रोक्ष वकरा वगा सपेद कुत्ता कुकडा बोलावु हरिण (२३) बल हरिण.
। ४ -- ' " (४ ६ भ भागी HAYRANA ४ बम म . म . " -- सामानहाना। To Hal . ५ १२ भागापा भानी पादि पारीच पसरूमा बतानमा माता ममा मत मवत कोक भवनिमीमाव भावाप मलम बाराब अपरोद सम्मान तमा मरमा ममीन मराफर पकारमावरम पर स्विबिम बदिशमी एमबी मा गरम प प स १९ ससावा. पाम्मी पीमा निगम साकिसम मरि मरिन र गुम पर मार दीवार विपमा निर्यम पा पपा सिव रिय विर्यप की निर्मम मिम मोश मिम गिरम्या सागरामविकाससम्माविमा मसिनलिस सम समा पा सम L हिमा सौम्म प t साम्प F दीक्ष नाम माना उपाय पुष मी पौष मपिता का मापार प्रमाण पुरण मरपुरष पारमा पनि पर मा बामावर भरव मा पापा पाएका रममा मरमा समापिम्म तनावरमा सामोरम्बार बीमार में मी बोली पप भमा परमिग मिहिन मारम स्थापना तामासिवाव परे सोम म्मि मुवा पापाव पापाप स क क स ५ मामा भा. नव मा बा म. पा में रमलनवरत्न- TAT HWAL SANS L 124 Ay PI म .
३ चिपिट काण अंध ५० अधादिस वदति वदति मेलापा अ. मि. मि. मि मि ल त. भौकजा अदा भोकजा जकारदा पिरोजा सोना यरोद. रेती पत्थर पचधातु मेवा. १० ११ १२ १६ ८ ४ ५ ३ । सख्या दिव्य दिप दिव्य कोण चिपिट, अंध काण चिपिट अध चिपिट अंध चिपिट काण चा सक्ष चक्षु अवलोक वियो | वियो. मैलापी अवलो. मैलापी वदति मैलापोभवलो. वियोगीभवलो वियो पदति अवस्था यति मिश्र मि लघु मि. मि (५२॥ लघुभार वृहदार ल भ इत्वमौल्य भार नको न खान दा अ खा व ५३ अर्वीनामा में फ कदा क खा. जकीरे भारत कोस नामक अपका भकी भम | पुनर्नि इकाम काश्मी अकोर मकाद सेताम आजाद खारीजे करान देशना मस जस लाग कत कीदक पत्थर नगीना पिरोजा ककर पकीक ककर हकीक पिरोजा, पाषाण ५५ ककर मूल लाल माणिक रूपाशीसापचधातु सोना लोहा लोहा | तांबा | रूपा काँशा सोना शाशा पीतल सोना ५६ धातु लकटी मखखाशुष्क शकरा वेन खेलक पान फापसा सोप्यारी पान भनार धान्य लाल टी लकडो ५८ मेवा खडभुजा नारगी ककही| नारगी खजर| आलू | वन्द अलू सहतूत अगूर भमरूव काकडी | कदलालु वास उच्च- लुसती मलिन नदा हवे. जामिन आसमान वाहे ग्राम में भोयरम विलायत खाडेमें पद्मपर स्थल | कोड स्यान नगेम | कपर लोम | उपर भाड वालानु हास्त घोटेक पसम गोवरी मोती किरमत पसम रेशम. कागा चर्म नख घोडा हाथी खबर मस खबर खच्चर खबर ६११ जानवर रंट घाडा बकरा घोडा गधा गधा गधा गधा मृग मिडा घोडा हेशन जल ६२ व्याघ्र गौ भैस बकरा जबुक रीछ स्वान बकरा सपेद होला कुमरी कुलिन| कागडा जानवर मनी कुत्ता ६३/ पक्षी कुालैंग | तमरा चाल्ली। कुकडा तीतर कावर बदक काग विलाउ घोडा वानर वानर तोना | चाची वाकर बदक ६५) वनजीव । हरिण | सिंह शशक चीता घुड वालीश मयूर वल सिंह । पोय | सर्प काउदा कणा मेवा रोमता पा दखेत वृक्ष. शाफतालु नदीकि नारयर ५७ पदार्थ भाषाटीकासहित । अगर अनार CN जमीनमें | बाजारमें मोतो ६० जिन्स चमडा रेशम ७ मोती कस्तूरी राझ रोक्ष गाय चकरी पोपट गाय खचर बकरा बगला मुरगा मैना हरिण बोलावु | हरिण मार्जार (२३) गाहर हरिण, अपारमाना समापनम्। प ४ (२०) 1. a -1 11. HA FA MER म . । . । 74Saal TOPEN- भकीय पुरा पशाम मराम 1 T + म . भीन मार मेष समिपुत्र ममय प १.मा गुर एस गुम प्रभ पु भग धम मापम प्रम राम गा . साल अपाम देव मुर ताम गवन प प्पाम व एम.पा बनवताना नामग पास चारित वारिन मुसमी निवास पि. स्पिर सिरह रिपरिपरार प्रो म पो म म. प म मा म । १ गुपियर तर र परिव साली हासीमापीमा राम वामित्र पदधारमा बामपुर मपुर बारमि पभापति मरियमपरिसरम प मिरियमविष्म मूब कता . १ ८ रमलनवरत्न- . पा . H . ALAL , । । AL 4 मूर मूर ادمها بدم 14 R..मार IA r - १ म मृ. म. ल युता ख ८ १० ११ ५ सण्या २ ३ मि. का. मृटुका का. का. मि. का. मृ मृ मित्र. काठिन्य का. ठिन्पादि दावि दीर्घवि पर्व दीर्घ । दीर्घ दी वि. वर्तु. वर्तुल वर्तुल वीर्घ २० आकृति घर्तल पर्तुल दीर्घ वर्तुल | चतुर चतुरस्र स्तृत स्तृत ध सम सम मिकोण नि वर्तु. नि. व. धतु वतु. चतु. २१ तंत्रमते. पतु. पो पु. । पु. पो. पु. पु पु पु. पु पोषणे पु पु. पुष्टिके पाप २२ पु एका यता, पका. एका एका एका एका एका युता. | एका | युता युवा एका युता एका. २३/ एकायुता खं. ख ख पू २४ पूर्णखंडित खं पू. पूर्ण. पू. कोमा तरुण अतिवा| तरुण भतिबा तारुण्य कौमा. कोमग. कौमार. तारुण्य २५ वय-प्रमाण भतिबल अतिबळ वृद्ध वृद्ध वृद्ध वृद्धा स्वर्णरूपये अध हिंसा क्षेत्रारा) नगरा पाठशा-नगरा नपर्ववे स्व रू इट्टे नृपारामे वनग्रामे. चिनहट्टे पनवृक्षे । चित्र २६ वासस्थान नगरारण्ये चित्र | कृषिमाग हो कारे मे रएपे लोद्याने रण्ये सममा- मौल्य स्वल्प मध्यम आति | भति | मौल्प २७ रुपामा अतिमौल्प सममौल्प | मौल्यहीन | मौल्पहीन स्वल्पमौल्य स्वल्पमौल्य स्वल्पमूल्प, स्वल्पमी. सममौल्प क्ष्य छीन मल्य त्य मौल्य मौल्यहीन २८ कार्यहेतु. | निर्माण भूमिशिल्प | शिल्पकार मूमिशिल्ल शिल्पकार शि का निर्माण शि का निर्माणशि का निर्माण शि का./ शिल्पका. | शिल्पकार शिल्पका. | शिल्पका, नेशम २९/ सादादि. साद नेशमु नेशमु नेश. साद नेशमुमुजी सादमु | नेशमु नेशमु साद, साद साद नेश. सादमु. युजोज चिंतामणि ३० मुमुनीष मु. मु. मु. मते मु. काविळ मसळात मस. मस. भासलास भनादि साकेत सा. सा. भसली १३, .. सम्मवहा भाषाटीकासहित । मेश नेश . म . मु. . 44 . मु. . 0 . . . . . . सा ० 0 . . . (२१) स . . . . .
१ । A १ . प प्राम पत्पर मेष A मा भाग मापी करना कमवता कि महाभयभीडा गाव भामाम मामा बाराव म्यान समापनमा भावा परमाममायः बार बार मवरण कि भरत FAC रिवासिवमा प्रय मार भावित मुर माम पर. म पी मम म 4 । 4 ब बातमीमा पाकिमसमोर बीज मिस पर मार वापर बपा विमा मित्र जिम मिम मोदी F . . A . و قطعا " . जीवा मिष By والمطر (الدا | مرسل له الطعام معما * समा सम साम्ब सौ सोर मनीष कर नाज lat पुरवा ( साप्रपथ गुरुप पुरबागा बाप भार ज ELETELETE En रसभा रमममाला समिरमानामा रमा मादरमर पमा पर नमा, मिमीन मेहरम गानों खीर (पिसावरे सोम मा बाम्म. मुत पापाव पावावमा r मा भा बरवा म प प मा. . से में ६ काण । अध चिपिट मि ब ल मि यू भ हु औकजा जस् ८ ९ १२ १० | सख्या ३ दिव्य दिव्य अंध काण चिपिट दिव्य चिपिट काण चिपिट अंध ५० अंधादिस अंघ चिपिट काण चक्षु चक्षु सक्षु मेलापी भवलो. वदति वदति । मेलापी वदति | वियो | वियो. मैलापो अवलो मैलापी वदति अवलोक वियोगी भवतो वियो ५१] अवस्था यति मिश्र मि. मि. मि मि मि लघु ५२) लपुभार वृहदार ल १ भार हत्वमौल्य न खान दा अ खा, नको भदा ६ ५३ अवीनामा कदा.कखा फ स औकजा जकीरे मलव मा कौस नामक भपका पुनर्नि भकी| भम कोरे सेताम इकाम काश्मी म काह आजाद जकारदा ग्वाराजे पराद. देशना करान रस कत मस पत्थर नगीना पिरोजा ककर पीक | ककर हकीक पिरोजा पाषाण कोदर | पिरोजा पत्थर नी. ५५ ककर मूल लाल माणिक शीशा रूपा | शीसा पचधातु | सोना लोहा | लोहा | ताँवा | रूपा काँशा सोना पीतल. सोना तपा पचधातु ५६' धातु सोना दर्खत लकटी मखख शुष्क खेलक पान फापसा सोप्यारी मवा. मेवा रोमती ५७ पदार्थ शकरा यंत्र पान अनार धान्य लाल टी वृक्ष. लकडा अनार खडभुजा नारगी ककही। नारगी अलू सहतूत | अगर भमरूद काकडी | कदलालु | भगूर खजूर आलु कन्द शाफतालु वास सच- लुसती नदोकि हवे. जामिन मलिन नदी पदभुपर | वामें माममे भोयरमे विलायत खादेमें जमानमें | बाजारमें ५९ आसमान स्थान नारयर स्थलकोट जगेमे पर लोम | उपर भाड वालानु हास्त घोटेक मोती कस्तूरी रशम पसम गोवरी मोती किरमत पसम रेशम. मोती रेशम चमडा कागा चर्म नख घोडा हाथी खबर भस रोक्ष खधर खचर खबर गाय गाय ६१ जानवर घाडा बकरा रोश | पोडा वक्रा ਟ गधा गधा गधा मृग मिडी घोडा वकरी खचर हेशन जल पोपट ६२ व्याय बकरा बुक गौ भैस रीछ स्वान वकरा कागडा होला वगग मुरगा जानवर मैना मुर्गी ६३/ पक्षी तीतर कुलिंग तमरा चाल्लो। कुकडा कावर बदक | काग विलाउ घोरा वानर वानर वाकर, बाला हरिण तोना चीचटी हरिण. बदक ६४ वनजीव । हरिण । सिंह शशक चीता घुड वोलीश मयूर वल सिंह | पोय | सर्प काउवा करणा गाहर मार्जार हरिण. भाषाटीकासहित। ५.४ मेवा ६०/ जिन्स रांझ गधा मू S कुमरो कलिन सपेद | कुत्ता . (२३) (२४) रमलनवरल- अथ बलावलरत्न द्वितीयम् । शुभाशुभप्रदातारः सबलाः स्वफलप्रदाः ॥ निर्वला निष्फला ज्ञेयास्तस्माज्ज्ञेयं चलावलम् ॥१॥आग्नेयं वायवं चाप्य पार्थिवं च मुहुः क्रमात् ॥ प्रस्तारे स्थर्ग्रहाण्येतद्योगातखण्डवलावलम् ॥२॥ आग्ने- यादीनिखण्डानित्वाग्नेयादिगृहेषु च ॥ गतानि सवलानिस्युमित्रगेहेतथैवच ॥ ३ ॥ उदासीनग्रह- स्थानां वलस्यसमताभवेत् ॥ शत्रुगेहेवलाभाव एवंज्ञात्वाफलंवदेत् ॥ ४॥अग्निवायूनीरभूमीमित्र- शत्रूजलानलो ॥ तथामूम्यनलावन्यथोदासीना. परस्परम् ॥५॥ एवंतत्त्ववशाहीय खण्डानांप्रथम भवेत्॥पंक्तिसप्तक्रमेणायद्वितीयबलमुच्यते॥६॥ टीका-अब दूसरे रत्नमें शकलोंका बलाबल कहते हैं कि, सपूर्ण खण्ड शुम अशुमके देनेवाले सबल निर्बलताके अनुसार अपना फल खण्ड देते हैं बलवान् अपना पूर्ण फल देताही है निर्वल निष्फल होताहे इसलिये प्रथम बलाबल विचार जानना चाहिये ॥१॥सो ऐसा है कि अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी जिनको कमसे आतशी,बादी, आवी, खाकी कहते हैं, कमसे प्रत्येक घर इन तत्वोंके होते हैं इनके योगसे बलावल विचारना।२।अनि खण्ड (अग्नि)आतशी घरमें वायु खण्ड वायुस्थानमें ऐसे जल जलमें पृथ्वी पृथ्वीमें सबल होतेहैं और मित्रस्थानमें भी सपल होते हैं ॥३॥ समके स्थानमें बलभी सम और शस्थानमें निर्बल होता है इस प्रकार जानके फल कहना॥४॥ अमि वायु तथा जल भूमि परस्पर मित्र हैं भाषाटीकासहित। (२५) जल अग्नि भूमि वायु.शत्रु अन्य सम हैं | मित्रामित्र चक्रम्. प्रकट चक्रमें हैं॥५॥ इस प्रकार शक - आवाज भू लोंके तत्त्व वशसे प्रथम वलाबल होता मित्र अ वा ज भू है दूसरा, बल सात, पक्ति क्रम कहा शत्रु ज अभू वा जाता है॥६॥ समभूज वा अ शकुनाब्दीविज्दहमब्जदाख्यमिजाजको ॥ होसहेतिसप्तानां क्रमाणां स्थापनं ब्रवे॥७॥ अहैतुको विनिर्दिष्टः पुरस्ताच्छकुनक्रमः ॥ इदानीमब्दहाख्यस्य स्थापनेकारण ब्रुवे ॥ ८॥ टीका-शकुनक्रम १ अब्दहक्रम २ विज्दहक्रम ३ अब्जदक्रम४ मिजाजक्रम ५ हाक्रम ६ असहक्रम ७ इन सातों क्रमोंका स्थापन कहतेहैं ॥ ७॥ सबसे प्रथम शकुन क्रम विना कारणही सर्वोप- योगी है सभी कामोंमें सुख्य है अन्यक्रम अपने २ कामोंमें प्रधान हैं इस समय अब्दहमके स्थापन करनेका कारण कहते हैं॥८ खण्डैककेस्थितत्वानां वह्नयादीनां चतुष्टयम् ॥ ऊर्ध्वादधः क्रमस्तेषांव्यक्तिगुप्तीखरेखयोः॥९॥ अवदाहाश्ववेदार्णःकुद्वयब्धिगजसंख्यकाः॥ युक्ताव्यक्तिविमागेषुतदैक्यास्थितिरब्दहे ॥१०॥ टीका-सभी खडोंमें अग्न्यादि ४ तत्त्वोंकी स्थिति होतीहै सो ऊपरसे नीचे तक क्रमसे जहां बिंदु तहां तत्त्व प्रकट जहां रेखा तहां तत्त्व गुप्त जानना ॥ ९॥ अब्दह क्रममें ४ वर्ण हैं इनके अंक ऐसे हैं कि, अ० १ब २६४ह ८ इनके योग प्रकट तत्त्वका करके १ ।
(२६) रमलनवरत्न- जितनी सख्या हो उतने स्थानमें उस खडकी स्थिति जाननी इसीसे यह अ० ब० द० इ० क्रम हैं।॥ १० ॥ यथालह्यानके वह्नितत्त्वेनाकारसंयुतिः ॥ तत्सं ख्येचाब्दहेत्वाद्योलह्यानस्यस्थितिर्भवेत् ॥११॥ तरीखवेदतत्त्वानां व्यक्तिस्तत्त्वाव्दहार्णजाः ॥ स- ख्यायुक्तास्तदैक्येनाव्दहेत्तरिखास्थितौ ॥ १२॥ व्यक्तिनयत्रतत्त्वस्यतर्दक नव लभ्यते ॥ शेषगेहे च तत्वण्डं जमातं षोडो यथा ॥ १३ ॥ स्तेय- रूपकृतेगर्भसतत्योर्गणनेऽब्दहः ॥ ज्ञेयस्तथैव विज्ञेयाविज्दहेखण्डसस्थितिः ॥ १४ ॥ टीका-जैसे कि, ल्यान खण्डमें ऊपर अमितत्व प्रकट अर्थात् बिंदु है और अब्दह प्रथमवण अ१ है तो इसका १ एक अकही होनेसे इस क्रममें प्रथम गृहमें लद्यान शकल आई ॥ ११ ॥ तथा तरीख शकलमें चारों तत्त्व प्रकट हैं तब अ११२८४ ६८ समीअक पाये इनका योग १६ है इस कारण पन्द्रहवें घरमें तरीख शकलको स्थान इस क्रममें मिला ॥ १२ ॥ जहां कोईभी तत्व प्रकट नहीं है तहां अकभी नहीं मिलता इस कारण जमात में शकलने सोलहवें घरमें स्थान पाया अर्थात् जहाँ तक अक इस क्रममें मिलते हैं तहां तक योग१५ ही पहुंचता है जमात बिना अक होनेसे १६ वें घरमें गयी यह अब्दह क्रम है ॥ १३ ॥ यह क्रम चोरके रूप और गर्म विचार सतान विचारमें गिना जाताहै ऐसेही विजदद कममेंमी खण्डोंकी स्थिति जाननी ॥ १४॥ जकारेतत्रशैलाङ्कशेषे स्तब्दहवर्णजा ॥ पूर्वव- युतिसंख्यैक्यविज्दहेखण्डसंस्थिति ॥ १५ ॥ - 1 भाषाटीकासहित । (२७) यथा लह्यानकेवह्रिबिन्दोवस्यहिसंख्यके ॥ युक्त तत्रैवलयानस्थितिः स्याहिज्दहेक्रमे ॥ १६ ॥ अत्यष्टिसंख्याफरहेपेनोर्वारितेतनौ ॥ फरहस्य स्थिति यातरीखेखिलवर्णजाः ॥ १७ ॥ प्रकृति- नृपोनितेशेषपंचमेतरिखास्थितिः ॥ अबदंक य विज्ञानमस्यचान्यत्प्रयोजनम् ॥ १८॥ टीका-विज्दह क्रममें जकारके७ अंक अन्योंके पूर्ववत् अर्थात् ब २ द ४ ह ८ हैं पहिले अब्दहके तरह संध्या जोडनेसे इसमें भी खण्डोंकी स्थिति है ॥ १९॥ जैसे लह्यान् शकलमें अग्नि बिंदुके वकारके २ अंक होके दूसरे घरमें लह्यानकी स्थिति है ॥ १६ ॥ फरहा शकलमें अग्नि वायु पृथ्वीके ३तत्त्व प्रकट हैं इन वके २ जके७ हके ८ अंकलिये इनका योग १७ भया १६ से अधिक होनेसे १६ कम किये १ बाकी रहा इससे प्रथम घरमें फरहाकी स्थिति जाननी। तरीखमें सभी तत्त्व ग्रगट होनेसे सभी अंक वर ज ७८४६८ लिये योग २१ इसमें १६ कम किये ५ बाकी रह-, नेसे पंचम गृहमें तरीखकी स्थिति है इसका अंक क्रम कहा इसका अन्यप्रयोजन है। १७॥ १८॥ अथाब्दहविन्दहयोः परिभाषे । लह्यानंहुम्रातथाचनुसूत्खारिज्ब्याजाभिधाकब्जुल खारिज मिज्तिमाख्यमतवेखारिज्तांकीशकम्॥ उल्काकब्जुलदाखिलंच फरहाख्यानुस्रतुल्दाखिलं नक्याथोतवदाखिलंतरिखजामातेब्दहेषोडश१९॥ विज्दहेचाहंफथिलह्यातवदं वयाजंतरीखंचकब्जु- (२८) रमलनवरत्न- लखारिजम् ॥ हम्राअनीशचनखवथोक्लेज्तिमनदं चातवख नकीच ॥२०॥ कदंजमात किलविज्द- हेस्मिन् वण्डानि वै पोडशकीर्तितानि ॥२१॥ टीका-इन १९/२०।२१ श्लोकोंमें अब्दह विज्दहक्रम को हैं इनका स्पष्ट अर्थ रूप सख्या सहित पूर्वोक्त चक्रमें है पाठक देख लेवें ॥ १९-२१ ॥ अयाजदपरिभाषा। रूपाक्षिरामाब्धिमिरब्जदस्यदशालयोत्पत्तिरिहक मेण ॥ पूर्व परस्ताच्छकुनालयाभ्यां पूर्वापराभ्यां तनुतोराहाहा ॥ २२ ॥ अस्मिन्दशाङ्का वरिखा स्थितिः खे नृपेजमातंयवने प्रदिष्टम् ॥ लयानहन वयज नकीशावुल्लाभिध कन्जुलदाखिल च ॥२३॥ फनिकीचातवदं तरीख नुसत्सक कब्जुलखारि- जेस्तिमा ॥ अतवेखनुसूदखिलेजमातमख्याण- संख्येत्वमुनाविधेये ॥२४॥ टीका-अब्जदक्रमकी परिभाषा कहते हैं कि, अ१२ जर द येअक इस क्रमसे इनका योग १० होनेसे कम करके १० गृहोमें इन अकोंके क्रमसे लिखे हैं इससे ऊपर १६ पर्यंत शकुन क्रमके पूर्वापर देखके घरसे स्थापन होते हैं ॥२२॥ इसमें १० अक होनेसे दो घरमें तरीखकी स्थिति है और इससे ऊपर ९ छोडके एकसे गिनती करनी ११ घरके वास्ते ६ अक सख्या ९छोडके घरमें सरेंती घयाज है यहाँ ३ सल्या नुसत्खारिजकी भी है परन्तु शकुन पक्तिम पहिले बयाजहै इसलिये यहाँ ३ घरमें बयाजही
भाषाटीकासहित ।
(२९)
आया ऐसे सब जानना इस क्रममें १६घरमें जमात यवनोंने कही
है और लह्यान हुम्रा बयाज अंकीश उक्का कब्जुलदाखिल ॥२३॥
फरहा नकी अतवेदाखिल, तरीख, १० नुस्रुत्खारिज, कब्जुल
खारिज, इस्तिमा, अतवेखारिज, नुसुदाखिल जमात, १६ ऐसे
नाम इस क्रममें जानने ॥२४॥
अथ मीजानक्रममाह।
सूर्यतःषष्टषष्टग्रहाणां क्रमाच्छाकुनेयादिहिमात्रा-
हुखंडान्तिमान् ॥ भूयएवंपुरानन्दतः संलिखेत्
केतुखण्डान्तिमान्स्यान्मिजाजक्रमः ॥ २५ ॥
कव्जुदाखिलफरही जमातवयजौ कलाश्चलह्या-
नम् ॥ हुम्राकब्जुलखारिजनुसुत्खारिजात वेदा-
खिलाः ॥ २६ ॥ इस्त्यातरीखेकीशानुसुदाखिल-
नकीतथातवेखारिजम् ॥ अस्यान्योोंज्ञेयोवार-
ज्ञानेविधातुकार्याणाम् ॥ २७॥
टीका-मिजाज व मिजान क्रममें सूर्यसे ६।६ ग्रहोंके क्रमसे
स्थापन हैं जिनके आदिमें शकुनऔर अंत्यमें राहु खण्ड हैं ये सब
८ स्थान हुए पीछे ९से ऊपर भी ऐसेही ८ लिखे जाते हैं जिनके
अंत्यमें केतु खण्ड होता है इसको मिजाजक्रम कहते हैं ॥२५॥
इनका न्यास ऐसा है कि कल दाखिल, फरहा, जमात, क्याज,
उवा, लहान, हुम्रा, कब्जुलखारिज, नुसुत्खारिज, अतवेदाखिल,
॥ २६॥ इस्तिमा, तरीख, अंकीश, नुसुदाखिल, नकी, अतवे-
खारिज १६ इस क्रमका और प्रयोजन है कि वार जानने तथा
कार्यका समय जानने में काम आता है ॥२७॥
(३०) रमलनवरत्न- अथ फरहाक्रमपरिमापा। येचाव्जदाद्याः किलयावजार्णअष्टाधिकाविंशति- रत्रतेषाम् ॥ लहानमंकी हमरावयाजी नुसुदखि- लनुस्नुतखारिजौच ॥२८॥ तथातवेदाखिलखा- रिजौचफनिकीकन्जुलदाखिल स्यात् ॥ कव्जुल खरीजंच जमातमुक्लाज्तमातरीखा फरहकमेस्यु. ॥ २९ ॥ फाद्यांकवर्णप्रभवोपियोलह्यानतोद्वाद- शखण्डकानि ॥ पृष्टिगिरावर्णचतुष्कखण्डै प्रस्ता- रमसति पूर्ववत्स्यात् ॥ ३० ॥ टीका-अव फरहाकम कहते हैं कि, जो अब्जद क्रममें पारसीय अक्षर हैं उनकी सख्या यहाँ २८ होती है तव प्रथम तत्त्वमें शुन्य आधवर्ण अकार होनेसे पहिले घरमें लझान हैं दूसरेमें इसका विरोधी अकीश है, तीसरेमें पकारका पायुविंदु होनेसे छुम्रा, चौथेमें उसका विरोधी बयाज हे ऐमे क्रमसे लम्यान, हुम्रा, अकीश, वयाज, नुनु दाखिल, नुस्मृतखारिज ॥२८॥अतवेदाखिल,अतखारिज,फरहा, नकी, कञ्जुलदाखिल, कञ्जुलखारिज, जमात, उका, इजतमा, तरीख यह फरहा क्रम है ॥२९॥ फकारके १२ अक होनेसे बारह घरोंमें लयान आदि अपने अपनेतत्त्वोंके अकक्रमसे स्थापन पाते है पीछे ४ गिर यारोंसे हैं प्रस्तार पूर्ववत् जानना ॥३०॥ अयास्सहपरिमापा। अदृष्टिखण्डस्थितिवीजकोऽसौक्रमोस्सहाख्योलि- खित पुराणे ॥ यथातथैवाहममुविधास्येवयो- धिकाध्यानुगतोविशक ॥ ३१ ॥ लह्यानातवदा- तोखरिजकाजामातफहाभिधो हुनानक्युकला- - , - . भाषाटीकासहित । (३३) याश्चनुस॒त्खारिजदाखीलकौ ॥ कब्जुलूदाखिल- खारिजौच वयुजोंकीशायौ चाग्रतः इज्जत्मा तरिखातथैवयवनस्क्ता क्रमेणास्सहे ॥ ३२ ॥ टीका-अस्सह क्रममें खण्डोंकी स्थितिका कारण न देखा गया इसलिये पहिले आचार्यों के लिखनेके अनुसार जैसेका तैसा यहां लिखा जाता है इसमें उमरकी अधिकता मार्गका विचार निःशंक- ताका विचार होता है, क्रम इसका ऐसा है कि, लहान अ० दा० अ० खा जमात, फरहा, हुम्रा, नकी, उकला, नु० खा० नु० दा. क० दा० क० खा वयाज, अंकीश, इज्जतमा, तरीखा ऐसे अस्सह क्रममें यवनोंने कहे हैं ॥३१॥३२॥ एवं पंक्तिक्रमाः सप्त सार्थाः प्रोक्ता मया पृथक् ॥ पंक्तिगेहैक्यभेदन द्वितीयं बलमुच्यते ॥ ३३॥ खण्डप्रस्तारगहानि पंक्तिगेहसमानि चेत् ॥ बलप्रदानिहित्याये गेहैक्ये बलवत्तरम् ॥ ३४ ॥ अभावपंक्तिगेहानां प्रश्नाई निर्बलं भवेत् ॥३५॥ टीका-इस प्रकार मैंने यहां सात क्रम पंक्तियोंके अलग अलग कहे है पंक्ति एवं स्थानके ऐक्यताके भेद करके दूसरा बल कहा जाताहै ॥३३॥ शकल, प्रस्तार और घर तीनों तुल्य हों तो बल- वान होते हैं दो तीन आदि घरोंकी ऐक्यता होने में विशेषबलवान् होता है ॥ ३४ ॥ यदि पंक्ति तथा घरकी ऐक्यतामें भेद होतो प्रश्न खण्ड निर्बल हो जाता है ॥ ३५ ॥ अथ दृग्बलम् । मिथः पश्यन्ति खण्डानि सप्तमं रविसासु ॥ नाग्रेषु ग्भव वीर्य तृतीयं प्रोच्यतेऽधुना ॥ ३६॥ दृष्टं यच्छुभमित्राभ्यां खण्डं तद्वलसंयुतम् ॥
(३२)
रमलनवरत्न-
निर्बलं पापशत्रुभ्यामदासीनेनमध्यमम् ॥ ३७॥
एवं हि पृच्छालयखण्डतत्महत् साक्ष्यर्द्धकानां
चलमाशु चिन्त्यम् ॥ कार्यस्य सिद्धिस्सवलैन
हीनर्यान्विते शत्रुदलेन तद्वत् ॥
इति रमलनवरले बलाबलनिरूपण द्वितीय रत्नम् ॥२॥
अब दृष्टिबल कहते हैं, वारह खण्डपर्यंत सप्तम स्थानमें पूर्ण
दृष्टि होती है १२ से उपर सृष्टिबल नही होता यहाभी ताजिकोक्त
दृष्टि ली जाती है। अब तीसरा बल कहतेहैं ॥३६॥ जो शकल शुभ
तथा मित्रसे दृष्टहो यह बलवान् पाप तथा शत्रुसे निर्बल और समसे
सम मध्यबली होता है ॥३७॥ इस पृच्छा प्रश्नखण्हसे उसका मित्र
साक्षिखडौंका बल प्रथम विचारना बल-
वानसे कार्यसिद्धि होती है हीनबलीसे नहीं
शकलानांमित्रादिचक
होती शखण्डमें बलवान मी हो तो भी अचाज भूसना
वेसी कार्यसिद्धि नहीं होती सुगमताको मूज का आसम
मित्र शव सम चक्रमें लिखे हैं ॥ ३८॥ ज भू अवा शव
वा अमूज मित्र
इति रमलनयरले माहीभरीमापाटीकायां वालावलनिरूपणं नाम
द्वितीय रत्नम् ॥ २॥
अथ प्रश्नोपकरण तृतीयम् ।
प्रश्नोपकारेणविनात्रसिद्धि प्रश्नस्यनस्याद्गुरुवाक्य-
तोऽपि । तस्मात्प्रवक्ष्येखिलसिद्धिहेतंप्रश्नोपकारलघु
पट्रप्रकारम् ॥१॥आदीन्किलावंचवलावलंयंतृती-
यमनास्तिमराविवाह्वयम् ॥ तूर्येम्तियाजनिगम
ततीरकशरोन्मितं स्यात्तकरारमातवम् ॥ २॥
भाषाटीकासहित । (३३) टीका-अब तीसरे रत्नमें प्रश्नके उपकरण कहते हैं विना उप- करणोंके यहां गुरुके शिक्षा कियेमेंभी सिद्धि नहीं होती. इस लिये समस्त प्रश्नसिद्धिके हेतु सूक्ष्म छःप्रकार प्रश्नोपयोगी कहता हूँ॥१॥ इमतियाज पांचवां निगमतासीर छठा तकरार आर्तव है ॥२॥ मूलीभृते तु सर्वत्र पाशके तदसंभवे॥यवनोक्तविधि वक्ष्ये शकुनोत्पादनेऽधुना ॥ ३ ॥ श्वासं नियख्या- स्तरवर्तुलाकृति रेखास्तदुच्चैर्विगणय्य ताः पुनः ॥ तदंकतुल्यं शकुनं तनुस्थितं नृपाधिकाश्चन्द्रपपा- तितेऽर्द्धकम् ॥ ४॥ तस्मान्नग युग्मगृहे विधाय तन्न च्छैलमग्रं तु नगं तुरीयम् ॥ एवं विधायार्द्धचतुष्टयं वा प्रस्तारमायुक्तविधः प्रसाध्यम् ॥ ५॥ टीका-प्रस्तारका प्रथम मूल कारण पूर्वोक्त पाशा है, कदाचित पाशा न हो तो शकुन उत्पन्न करने में इस समय यवनोक्त विधि कहता हूं ॥३॥ प्रश्नकती अपना श्वासा बंद करके गोल आकार एक वृत्तमें जितने बिन्दु श्वासा छूटनेतक हो सके उतने लिखने,तब गिलने १६ से अधिक हों तो १६ का भाग देकर शेष जो अंक१६ के भीतरका बचे उतनेही शकल शकुन क्रमकी प्रथम लेनी॥४॥ उससे सातवीं दूसरीमें इससे भी सातवीं तीसरी और तीसरीके भी सातवीं चौथे घरमें लेनी,पंचम आदि शकल पूर्वोक्त रीतिसे तयार करनी तो प्रस्तार होजाता है ॥६॥ कृत्वा कथंचित्प्रस्तावमिन्किलावमनन्तरमा कुर्वीत तक्रियां वक्ष्ये तनुपंचमयोस्तथा ॥६॥ व्यङ्ग- - योस्त्रिसप्तयोस्तूर्यनागयोर्योगतो दलान् ॥ चतुरो विनिधायादौ तेभ्यः प्रस्तारमाचरेत् ॥७॥ इन्कि ३ - (३४) रमनपरत्न- लावोऽथ प्रस्तारे तिथिगेहे सदैव हि ॥जमातमेव हि भवेत्तन्मूले च विलोकयेत् ॥ ८॥ तलान्निगदता प्रश्नस्तथा तामुपयाति हि ॥ इन्किलावाह्वया दद्याद्गणवर्णा इतोऽन्यथा ॥९॥ टीका-प्रथम किसीप्रकार प्रस्तार बनायके तब इन्किलाव करना उसकी विधि कहताहूँ कि, पहिले पांचवेंका ॥६॥ दूसरे छठेका तीसरे सातवेंका और चौथे आठवेंका योग पूर्वोक्त रीतिसे करके ४ शकल तयार करनी तब उन चारोंसे प्रस्तार बनाना॥७॥ इस सस्कारका नाम इन्किलाप कहते हैं इसके पद्रहवें घरमें सर्वदा जमात आतीहै उसका मूल देखना ॥ ८॥ उसके (तल) मूलमे प्रश्न कइनेवालोंकी सत्यता होती है इन्किलाव नाम सस्कारसे गण वर्ण व्यवस्था देनी इससे सिवाय औरसे ऐसा नहीं होता ॥९॥ वलावलविचारः स्यादुपकरण द्वितीयकम् ॥ मरा- तिवं पञ्चविधं सज्ञया तत्क्षणेन च ॥ १० ॥ रुवा- ई खुमासी सुदासी सवाई समानीतिसंज्ञाः पुरो- ताः पुराणः ॥ हियुग्माभ्रतोऽष्टांतखानां क्रमेणा- त्रपूर्वेपु नेत्राधिकं स्यात्सुवैरम् ॥११॥स्वल्प तु जिद्दति तथा लोक कार्ये च विघ्नदम् ॥ निर्वेर त्रितय त्वत्र विज्ञेय मुविचक्षणः ॥ १२ ॥ प्रस्ता- रसर्वखण्डानि स्थितानि जिद्दके गृहे ॥ ज्ञेयानि विघ्नकर्तृणि शकुनक्रमतस्विह ॥ १३ ॥ टीका-बलावल विवेक दूसरा उपकरण पूर्वोक्त है तीमरेको मरातिर सना हे पाँच प्रकारकी सजासे तत्काल प्रस्तारसे भी , भापाटीकासहित । (३५) जानना ॥ ३० ॥ चार बिंदुका रुबाई, पांचका खुमासी, छःका सुदासी, सातका सवाई और आठ बिन्दुका समानी ये संज्ञा पूर्वा- चार्योंने चार बिन्दुसे आठ बिन्दुतक कही हैं पहिले पाँचवें तथा दूसरे चौथेका जिद्द संज्ञक स्वल्पवैर होता है ॥ ११॥ यद्यपि यहां (जिद्द) स्वल्पवैर है तथापि संसारके कार्यावसरमें विघ्नही देते हैं इनमें तीसरा निर्वैर है यह शुभ होता है ऐसा बुद्धिमानोंने जानना ॥ १२॥ प्रस्तारमें सभी खण्ड (जिद्द ) शत्रु घरमें हों तो विघ्न करनेवाले जानने यह बिधि शकुन क्रममें देखनी ॥ १३ ॥ अथेम्तियाजम् । इम्तियाज तुरीयं यद् विखण्डोत्थ दलं भवेत् ॥ तत्सिद्धिदं शुभाभ्याचाशुभाभ्यामतिविनदम्॥१४॥ शुभाशुभाभ्यां तज्जातमादौ शुभमसत्परम् ॥ असच्छभाभ्यां तज्जातमसदादौ शुभं परम् ॥ १५॥ टीका--अब इम्तियाज चौथा उपकरण कहते हैं, यह दो शक- लोंसे मिलके जो शकल हो उसकी संज्ञा है इसमें इतना विचार है कि, जो दोनहूँ शुभ शकलोंके मेलसे बनी हो तो वह कार्य सिद्धि देती हैं जोअशुभोंसे बनी हो वह कार्यमें अति विघ्न करती है।।१४॥ जो एक शुभ दूसरी अशुभसे बनीहो वह प्रथम शुभ पीछे अशुभ देती है जो अशुभ और शुभसे निकली हो वह प्रथम अशुभ पीछे शुभ देती है ॥ १५॥ अथ तसीरम् । सम्बन्धाद् गृहविज्ञानंतसीरं प्रोच्यतेऽधुना॥ प्रष्टुरा- द्यं गृहं तत्तत्सम्बन्धादपराणि च ॥१६॥ ममात्मज- श्यालकवित्तलाभः कदेति प्रष्टुः प्रथमं गृहंस्यात्।। - (३६) -रमलनवरत्न- तस्माच पुत्रं च ततोऽङ्गनाख्यंलामं त्वतो वहिमित तनुः स्यात् ॥१७॥ तनोद्धितीयं धनमुक्तमेवमाद्या दनाहा , तनुवित्तसौख्यम् ॥ तसीरमेतच्छरसंख्य मुक्तमनेन पृच्छालयभिन्नकोशः ॥ १८॥ टीका-सबधवश स्थान जाननेको तसीर कहते हैं सो कहा जाता है कि प्रश्न करनेवालेको प्रथम घर है उसके सम्बन्धसे अन्य घर जानने ॥१६॥ जैसे कोई पूछे कि, मेरे बेटेके शालेको धनलाभ कब होगा तो पूछनेवालेका तो प्रथमही घर ठहरा उससे पांचवी शकल उसके पुत्रकी उससे सप्तम पुत्रवधूकी उससेभी तीसरा घर प्रश्न कर्ताके पुत्रके शालेका ठहरा उस घरसे दूरसे घरमें उसका धनलाम देखना अथवा उस शालेके घरसे देखना यह तीसग नाम पचम उपकरण है इस विधिसे प्रश्नका स्थान अलग निकाला जाता है ॥ १७ ॥१८॥ खण्डयत्पुनरुक्तं स्यात्तकरारं तदुच्यते ॥ प्रश्नगेह- स्थित खण्डं पुनरुक्तं यदा भवेत् ॥ १९॥ तदशेन फलं वाच्य पूर्वोक्तेनैव वर्मना ॥ शुभस्थाने शुभ ज्ञेयमशुमे चाशुभं वदेत् ॥ २० ॥ जिद्दस्थानेऽशुमं प्रोक मरातिश्वशादिदम् ॥ ज्ञात्वैव प्रवदेविहान नैवं प्रश्नो वृथा मवेत् ॥ २१ ॥ इति भीरमलनवरत्ने प्रभापकरण तृतीपरत्नम् । टीका-जो एक सफल पुनरुक्तिसे हो उसे तकरार कहते हैं प्रश्न घग्में स्थित खण्ड जो किसी दूसरे घरमें भी हो तो इसके वशमे पूर्वोक्त प्रकारसे फल कहना, जैसे धनभाव रह्यान दे धनका अथ तकरारम्।
भाषाटीकासहित। (३७) प्रश्न है और दशम भावमें भी लहान हो तो राजपक्ष संबंधि धन प्राप्ति जाननी परंतु इसमें इतना विशेष विचार है कि,जो वह शकल शुभ स्थानमें हो तो शुभफल अशुभमें होतो अशुभ फल कहना ॥ १९ ॥२०॥ यदि जिद्दस्थानमें होतो अशुभ अन्योंमें शुभ मरा- तिवके वशसे जानना इस प्रकार तकरार संज्ञक अनुकरणसे जो विद्वान प्रश्न कहे उसका व्यर्थ नहीं जाता॥२१॥ इति रमलनवरत्ने माहीधरीभाषाटीकायां तृतीयं रत्नम् ॥ १३ ॥ अथ चतुर्थरत्नम् । मूलीभूतानि सर्वत्र प्रश्नप्रश्नालयानि हितेन तन्वा- दिभावानां प्रश्नभेदान ब्रुवेऽधुना ॥१॥ तनोः सुख- जनिष्फलावयवजीव्यजीवायुषां प्रयत्नबलकार्य- कं नृपतिनीतिशान्तिस्तनोः ॥ वराकधनिवित्तदा- गमनसाहपार्श्वस्थिताःक्रयेतरधनोद्यमाः कृपणदा- तृजीव्याधनात् ॥२॥ टीका-प्रश्नोंके मूलभूत प्रश्नालयहैं इसलिये तनु आदि भावोंके भेद यहाँ कहे जाते हैं ॥१॥ प्रथम घरमें शरीर सुख दुःख जन्म- स्थान, शरीरके अंगुलि आदि अवयव, आयु, मृत्यु, उद्यम (यत्न) बल, कार्यबल, राजनीति, शांति इतने प्रश्न प्रथम घरसे विचारने तथा कंगाल, धनवान, धन देनेवाला, धनागमन, सहायक पार्श्वमें बैठे मनुष्यका,(पडोसीका, खरीदसे सिवाय धनके उद्यम(पूंजी)का दाताका और आजीविका इतने विचार दूसरे घरसे करने ॥२॥ तार्तीयके स्वजनसेवकबन्धुमित्रसंतोषसोदरभ- गिन्युरुचेष्टितानि ॥ विद्यापराक्रमविनोदसमी- पयात्रास्वप्नेक्षितानि च मिलंति विलोकितानि (३६) रमलनपरत्न- तस्माच्च पुत्रं च ततोऽङ्गनाख्य लाभ त्वतो वहिमितं तनुः स्यात् ॥१७॥ तनोद्धितीयं धनमुक्तमेवमाद्या हुनाहा तनुवित्तसौख्यम् ॥ तसीरमेतच्छरसंख्य मुक्तमनेन पृच्छालयभिन्नकोशः ॥ १८ ॥ टीका-सबधवश स्थान जाननेको तसीर कहते हैं सो कहा जाता है कि प्रश्न करनेवालेको प्रथम घर है लसके सम्वन्धसे अन्य घर जानने ॥१६॥ जैसे कोई पूछे कि, मेरे बेटेके शालेको धनलाम कब होगा तो पूछनेवालेका तो प्रथमही घर ठहरा उससे पांचवीं शफल उसके पुत्रकी उससे सप्तम पुत्रमधूकी उससेमी तीसरा घर प्रश्न कर्ताके पुत्रके शालेका ठहरा उस घरसे दूरसे घरमें उसका घनलाभ देखना अथवा उस शालेके घरसे देखना यह तीसग नाम पचम उपकरण है इस विधिसे प्रश्नका स्थान अलग निकाला जाता है ॥ १७ ॥१८॥ अय तकरारम्। खण्डयत्पुनरुक्तं स्यात्तकरारं तदुच्यते ॥ प्रश्नगेह- स्थित खण्ड पुनरुक्तं यदा भवेत् ॥ १९॥ तदशेन फलं वाच्य पूर्वोक्तेनैव वर्त्मना ॥ शुभस्थाने शुभ ज्ञेयमशुमे चाशुभ वदेत् ॥ २०॥ जिवस्थानेऽशुमै प्रोक्त मरातिश्वशादिदम् ॥ ज्ञात्वैव प्रवदेहिद्वान् नैवं प्रश्नो वृथा भवेत् ॥ २१ ॥ इति भीरमलनयरल प्रभापकरण तृतीपरलम । टीका-जो पक सक्ल पुनरुक्तिसे हो उसे तकरार कहते ६ प्रश्न घरम स्थित खण्ड जो किसी दूसरे घरमें भी हो तो इसके पशसे पूर्वोक्त प्रकारसे फल कहना, जैसे धनभावमें लद्यान है धनका भाषाटीकासहित। (३९) उहाहनष्टवनितोन्मुखशववादयुग्मोद्यमागमध वारतिचौरभेदाः॥ स्थानान्तरस्थितिजयस्वपर- प्रवेशा वाणिज्यमार्गरणचिन्तनमद्रिगेहे ॥७॥ शोकर्णदानभयमृत्युहराहृतार्थप्राग्रजीव्यदुःस्थि- तिमृतार्थगतार्थदुःखम्॥दुर्नीतिकोटिगिरिशून्य- विषादचिन्तानिद्रालसप्रहरणानि तथाष्टमेऽपि ॥८॥ भाग्याईधर्मव्यभिचारदानरेगतिस्वग्न- यति त्वविद्या ॥ पितृव्यवित्तेष्टरतिश्रमाणि भाग्येऽपि विश्वासकथा विलोक्याः ॥९॥ टीका-सप्तमस्थानमें विवाह, खोईगयी वस्तु, स्त्री आदिका विचार,शस्त्रसे कलह, युद्ध आदि, संधि, उद्यम, प्रवासिकाआगम स्त्रीका पति, रति, चोरके भेद, अन्यस्थान गमन, स्थिति, युद्धमें जय, स्वचक्रपरचक्र, व्यापार,मार्गसफर, रणका विचार करना॥७॥ अष्टमस्थानमें शोक, ऋण, दान, भय, मृत्यु, गया आया द्रव्य- पूर्वाजीविका, दुष्टस्थिति मृत्युसंबंधि कार्य, गया धन, दुःख, दुष्ट नीति, किला, पहाड, शून्यस्थान. विषाद,चिंता, निद्रा, आलस्य, चोट इतने विचारना ।। ८॥ नवमभावमें भाग्य, वृद्धि,धर्म,व्यभि- चार, दान, यात्रा,स्वप्न,संन्यासी,अज्ञान,चाचा(ताऊ)का वित्त, इष्ट रति,श्रम और विश्वासकी कथा विचारनी चाहिये ॥९॥ राज्याधिकारजनकीर्तिबलप्रतापवृष्टयुद्यमागद्- जनित्रिभिषग्गुरूणाम् ॥ स्वामिस्वजातिसलि- लागममन्त्रयन्त्राः सेवेष्टपूर्तिविशदा दशमे विलोक्याः॥१०॥मुहन्मती सात्विकराजको- J (३८) रमलनवरत्न- ॥३॥ तुर्ये गृहस्थितिकृपीः पितृमातृवित्तपाता- लभुगततस्स्वपरप्रदेशाः॥ कार्यावधिः परिणति- म॒तिममिचिंताक्षेत्रागदे तरणिवाइजलाश्रयाणि ॥४॥ बुद्धिप्रसादमृतमोदमुहृत्सुशिल्पमांगल्य- मादककुतूहलपैतृकाणि ॥ दूतागमप्रमदपात्रशु- भांशुकानिस्यु पंचमे कुशलपत्रिकगर्भचेष्टा॥५॥ दासर्णपाचनहरापहतार्थरोगदोपाल्पदेहपशुपक्षि- गणार्थचिंता ॥ सतोपचेटकशुचो रिपुगर्भचष्टे प्रच्छन्नदोपकृयणावगती रिपो स्युः॥६॥ टीका-तृतीय घरमें अपने आदमी, दास, वधु, मित्र, सतोपिता भाई, बहिन, विशेप चेष्टा, कार्यारम, विद्या, पराक्रम, विनोद, नजदीक यात्रा, स्वप्न, देखनेके फर्म, इतनी वात तृतीयमाव देख नेसे मिलती है ॥३॥चौथे घरम, एडकी स्थिति, ग्वेतीका काम, पिता, माता, धन, खत्ता आदिभूमिगतकर्म, वृक्ष, स्वदेश परदेश, कार्यकी अवधि,कार्यका परिणाम, मृत्युविचार, भूमिविचार,खेती, फसल, नेरुज्य,सुखवान, जलकृत्य, जलाश्रय, वाहन इतने विचार देखना ॥ ४॥ पचममें घुद्धिका प्रसाद, पुत्रपिचार, प्रसन्नता, मित्र, शिल्पकर्म, मगलकर्म, मादककर्म, खेल, पिताका द्रव्य, वा ताळ चाचा इतका आगमन, प्रमाद, पार, शुभवस्त्र, कुशलवार्ता, चिट्ठीपत्री और गर्भ सबधि चेष्टाओंका विचार करना ॥५|| छठे घरमै दास ऋण, परिपाक आपतहरणकरी वस्तु, दूसरने हरण- फरी फस्त, चोरीगया धन,रोग, दोप, देहदुर्बलता, पशुपक्षिसमूह, धन, चिंता, सतोप, चेटक गोक, श, गर्मचेरा, गुप्तदोप, कृप- णगति इतने विधारने ॥६॥ " - " -- भाषाटीकासहित । (३९) उहाहनष्टवनितोन्मुखशत्रुवादयुग्मोद्यमागमध- वारतिचौरभेदाः॥ स्थानान्तरस्थितिजयस्वपर- प्रवेशा वाणिज्यमार्गरणचिन्तनमद्रिगेहे ॥७॥ शोकर्णदानभयमृत्युहराहतार्थप्रागूजीव्यदुःस्थि- तिमृतार्थगतार्थदुःखम्॥दुनीतिकोटिगिरिशून्य- विषादचिन्तानिद्रालसप्रहरणानि तथाष्टमेऽपि ॥८॥ भाग्याईधर्मव्यभिचारदानद्रेगतिस्वग्न- यति त्वविद्या ॥ पितृव्यवित्तेष्टरतिश्रमाणि भाग्येऽपि विश्वासकथा विलोक्याः ॥९॥ टीका-सप्तमस्थानमें विवाह, खोईगयी वस्तु, स्त्री आदिका विचार,शस्त्रसे कलह, युद्ध आदि, संधि, उद्यम, प्रवासिकाआगम स्त्रीका पति, रति, चोरके भेद, अन्यस्थान गमन, स्थिति, युद्धमें जय, स्वचक्रपरचक्र, व्यापार,मार्गसफर, रणका विचार करना॥७॥ अष्टमस्थानमें शोक, ऋण, दान, भय, मृत्यु, गया आया द्रव्य- पूाजीविका, दुष्टस्थिति मृत्युसंबंधि कार्य, गया धन, दुःख, दुष्ट नीति, किला, पहाड, शून्यस्थान. विषाद,चिंता, निद्रा, आलस्य, चोट इतने विचारना ॥ ८॥ नवमभावमें भाग्य, वृद्धि,धर्म,व्यभि- चार, दान, यात्रा,स्वप्न,संन्यासी,अज्ञान,चाचा(ताऊ)का वित्त, इष्ट रति,श्रम और विश्वासकी कथा विचारनी चाहिये ॥९॥ राज्याधिकारजनकीर्तिबलप्रतापदृष्टयुद्यमागदू- जनित्रिभिषग्गुरूणाम् ॥ स्वामिस्वजातिसलि- लागममन्त्रयन्त्राः सेवेष्टपूर्ति विशदा दशमे विलोक्याः॥१०॥सुहृन्मती साविकराजको - रमलनवरत्न- (४१) शा भाग्योदयामात्यनिजेप्सिताप्तिः॥ आशा स्तुतिः सत्यवितथ्यचिन्तारौद्रे नृपन्यायकृतो नु- तिश्च ॥ ११॥ करिपायरिवन्धविमुक्तयोर्निगड- गेहमृणस्य विमोचनम् ॥ अलघुरुग्रिपुदमभय- क्षितिव्यवहरप्रसरा रविसद्मनि॥१२॥पृच्छकस्य गुणवर्णचिन्तनं साक्षिताग्निसदनत्रयस्यचाउम्म- हम्मगृहसाक्षितांच केचिद्वदन्तिभवनेत्रयोदशे१३ टीफा-दशमस्थानमें राज्याधिकार, राजकीय मनुष्य, कीर्ति, वल, प्रताप, वर्षा, उद्यम, निरोगिता, माता, वेद्य, गुरु स्वामी, स्वजाति, जलागम, मन्त्र, यन्त्र, सेवा, इटापूर्ति, विशदको विचा- रना ॥१०॥ मित्र मति, सात्विकमाव, राजपक्ष, खजाना, माग्यो- दय, मत्री, अपनी इच्छाके कार्यकी प्राप्ति, अमिलापा, स्तुति, सत्य झुठका निर्णय, राजपक्षाधिकारी न्यायकरनेवालेका विचार, नम्रता ग्यारहवें भाव में विचारने ॥ ११॥ हाथी, बेल आदि, शत्रुके वधनसे छूटना, फेदखानेका विचार, ऋणनिर्मुक्ति,बडारोग, श, दम, भय, पृथ्वी, व्यापार, व्यय इतने विचार बारहवें घरसे दखना ||१२||प्रश्न पूछनेवालेके गुण रग आदिका विचार साक्षि- स्थान १३।११।१५ में देग्वना, इसमें भी उम्मदा घरकी साक्षि- का भी कोईपक तेरहवें घरमें कहते हैं ।। १३ ।। प्रोच्यते सदसतो द्वयोमिया कार्यकारणमिद च- तुर्दशे ॥ आनिलालयवनातसाक्षिताऽऽदर्श एत- दुपनामत. स्मृतम् ॥ १४॥ प्राइविवाकसदने शुभाशुभ प्राणिकार्यमय निश्चयो मतेायदत्र -- भाषाटीकासाहत। (४१) खलु पञ्चचन्द्रकमुत्पलस्य सलिलस्य साक्षिणि ॥ १५ ॥ षोडशेतुसुखदुःखसमुत्थंचिन्त्यमेवपरि- णामफलंयत् ॥ विश्वविग्रहहराविव सर्व भूगृहा- दिशकलैकसाक्षिणि ॥१६॥ इति षोडशगृहविचार्य्यवस्तुभेदः ॥ टीका-कार्य एवं उसका कारण दो मुख्य विचार्य होते हैं चौद- हवें घरसे इन दोनोंका परस्पर संबंधसे विचार करके शुभाशुभ कहा जाता है अग्नितत्त्व स्थानके वश बनात क्रममें इस घरका साक्षिता है इसीका उपनाम आदर्श भी कहा है क्योंकि, यह कार्य कारणको प्रतिबिंब सदृश दिखा देता है ॥ १४॥ पंद्रहवां घर सर्वसाक्षी है इससे इसको (प्राविवाक) सिरिस्तेदार वा न्याय विचार कहते हैं।इस घरमें प्राणीके कार्यका शुभाशुभनिश्चय होता है। बुद्धिकाभी निश्चय इसीसे होता है निश्चय है कि, जैसे फल एवं कमलकी साक्षिता है ऐसे ही यह पंचदशम घर सभी स्थानोंका साक्षी है १६॥ सोलहवें घरमें सुख दुःखसे उत्पन्न जो परिणाम फल उसका विचार करना जैसे तेरहवेंसे मुख्य शकल और उसके गुणकसे साक्षीखण्ड निकाल कर कार्य लिया जाता है ऐसे ही भूमितत्त्व आदि करके साक्षितामें यह खण्ड काम देता है। यह इन १६ शकलोंमें विचार- णीय वस्तुभेद कहा ॥ १६॥ प्रश्नार्थमिष्टदेवप्रार्थना। निधाय हृदि मंजुलं गणपपादपङ्केरुहं प्रमथ्य रम- लाम्बुधिं सकलमत्र भूमीतले ॥ चमत्कृतिकरं परं विबुधमण्डलीमण्डन प्रकारमधुना ब्रुवे सकलर- म्लविद्गोपितम् ॥१७॥ - , (४१) रमलनवरत्न- शा माग्योदयामात्यनिजेप्सिताप्तिः॥ आशा स्तुतिः सत्यवितथ्यचिन्तारौद्रे नृपन्यायकृतो नु- तिश्च॥ ११॥ करिषायरिबन्धविमुक्तयोर्निगड- गेहमृणस्य विमोचनम् ॥ अलघुरुग्रिपुदमभय- क्षितिव्यवहरप्रसरा रविसमनि॥१२॥पृच्छकस्य गुणवर्णचिन्तनं साक्षिताग्निसदनत्रयस्यच॥उम्म- हम्मगृहसाक्षितांच केचिद्वदन्तिभवनेत्रयोदशे१३ टीका-दशमस्थानमें राज्याधिकार, राजकीय मनुष्य, कीर्ति, बल, प्रताप, वर्षा, उद्यम, निरोगिता, माता, पेय, गुरु स्वामी, स्वजाति, जलागम, मन्त्र, यन्त्र, सेवा, इष्टापूर्ति, विशदको विचा- रना ॥३०॥ मित्र मति, सात्विकमाव, राजपक्ष, खजाना, भाग्यो- दय, मत्री, अपनी इच्छाके कार्यकी प्राप्ति, अमिलापा, स्तुति, सत्य झुठका निर्णय, राजपक्षाधिकारी न्यायकरनेवालेका विचार, नम्रता ग्यारहवें भावमें विचारने ॥ ११॥ हाथी, बैल आदि, शत्रुके बधनसे छूटना, केदखानेका विचार, ऋणनिर्मुक्ति,बडारोग, शत्रु, दम, भय, पृथ्वी, व्यापार, व्यय इतने विचार बारहवें घरसे खना ॥१२॥प्रश्न पूछनेवालेके गुण रग आदिका विचार साक्षि- स्थान १३ । १81 १५ में देखना, इसमें भी उम्मदा घरकी साक्षि- का भी कोई एक तेरहवें घरमें कहते हैं ॥ १३ ॥ प्रोच्यते सदसतो योमिथः कार्यकारणमिदं च- तुर्दशे ॥ आनिलालयवनातसाक्षिताऽऽदर्श एत- दुपनामतः स्मृतम् ॥ १४॥ प्राइविवाकसदने शुभाशुभ प्राणिकार्यमथ निश्चयो मतेायद्वदंत्र
भाषाटीकासहित ।
(४३)
प्रष्टुः करगतो धातुस्तत्खण्डे त्वग्निखे भवेत् ॥
जीवोत्थं वायुजेऽम्भोजे मूलं भौमे मणिं वदेत् ॥ २३॥
इत्थमागामिसंख्याधं कृत्वाद्यात्क्रमतः पृथक् ॥
तत्तत्प्रस्तारकानादौ कृत्वा प्रश्नं विलोकयेत् ॥२४॥
टीका-पाशाके अनुसार प्रस्तार करना तहाँ यदि विजूदह घरमें
वे खण्ड हों तो प्रश्न करनेवाले आयेंगे जानना उक्त घरमें न हो
तो नहीं आवेंगे जानना जैसे प्रस्तारमें जो शकल प्रथम घरमें हो
वह विज्दह क्रममें भी प्रथम घरकी हो ऐसेही जो खण्ड जिस
स्थानमें वह विजुदह क्रमके उतनेही घरकाहो ऐसे जितने खंड मिलें
उतने प्रष्टा अविगे कोईभी ठीक अपने स्थानमें न हो तो कोई
नहीं आवेगा॥ १९॥ इसमें भी विशेष विचार है कि, जितने खंड
मिलें उतने मनुष्य तो आगे परंतु उन खण्डोंमें भी जितने पुरुष
खण्ड हैं उतने मर्द, जितने स्त्री खण्ड हैं उतनी स्त्री और नपुंसकों
तुल्य नपुंसक प्रश्न पूछनेवाले आवेंगे ॥२०॥ यह क्रम अथवा
अबजद खडसे उक्त प्रकारसे देखना और पहिले तेरहवेसे, ग्यारह
चौदहसे दो शकल निकालके फिर उनसे एक बनायके देखे कि,
वह खंड प्रश्न प्रस्तारमें हैं तो पूछनेवाला हाथमें कुछ लेके आयेगा
यदि वह शकल प्रस्तारमें न हो तो प्रष्टा खाली हाथ आवेगा।
अब यह विचार करना कि, प्रश्न कर्ताके हाथमें क्या है ॥२१॥
॥२२॥ जो वह एक खण्ड निकाला है उसमें ऊपरके स्थानमें
अग्नितत्त्व हो तो प्रष्टाके हाथमें धातु वस्तु है वायुतत्त्व हो तो जीव
है जलतत्त्व हो तो मूल है,भूमि तत्त्व हो तो मणि है कहना ॥२३॥
इस प्रकार आगामी संख्या आदि जानके क्रमसे पृथक् २ विचार
करना जिसमें जैसा प्रस्तार कहा है वैसा बनायके प्रश्न
देखना ॥२४॥
(४२)"
रमनदरल-
टीका-अव अथकर्ता प्रश्नचमत्कार कहनेके वास्ते प्रथम अपने
इए देवताको प्रणाम करते हैं कि, अपने हृदयमें गणेशजीके रम-
णीय चरण कमलको धारण करके इस ससारमें सपूर्ण रमल रूपी
समुद्रको मथन करके, परम चमत्कार करनेवाला विद्वानोंकी मड-
लीको भूपित करनेवाला प्रकार, जो समस्त रमलशास्त्र जानने
वालोंसे गुप्त है, उसे प्रकट करके इस समय कहता हूँ ॥ १७॥
प्रागुत्थितो रमलविस्वगुरुं प्रणम्य
ध्यात्वा पदाम्बुजयुगं सुशुचिमुरारे ॥
प्रश्नार्थिनः कति ममान्तिकमागमिष्य-
न्तीत्थं विवित्सू रमलाक्षयुग क्षिपेज्ज्ञः ॥१८॥
टीका-पात काल रमल जाननेवाला, शयनसे उठके शौचादि
नित्य कर्मसे पवित्र होके अपने गुरुको प्रणाम एवं श्रीविष्णु भग-
वादके चरण कमल मुगलोंका ध्यान करके आज मेरे पास कितने
प्रश्न पूछनेवाले आयेंगे इसके जानने के प्रथम पाशाओंकी जोडी
पट्टी में फेंके ॥ १८॥
प्रस्तारमाधवकुर्यादत्र चेद्विज्दहालये ॥
खण्डानि स्यूस्तदा प्रष्टा गन्तानो चेन्नचा व्रजेत्॥१९॥
यावन्ति तानि खण्डानि तावत्संख्यागमो नृणाम् ॥
पुंखण्डे स्त्रीदले. स्त्रीणां क्लीवः क्लीवागमो भवेत्॥२०॥
अयमजदुखण्डेर्वाद्यागमः प्रोकवहलैः॥
आधविश्वौ रुद्रशको हत्वा तत्रैकमेतयोः ॥२१॥
कुर्यात्तत्प्रश्नगं चत्स्यात्प्रष्टा पूर्णकरोऽन्यथा ॥
रिक्तपाणिश्च तत्पाणी किमस्तीति विचिन्तयेत् ॥२२॥
.
भाषाटीकासहित ।
(४३)
प्रष्टुः करगतो धातुस्तत्खण्डे त्वग्निखे भवेत् ॥
जीवोत्थं वायुजेऽम्भोजे मूलं भौमे मणिं वदेत् ॥ २३॥
इत्थमागामिसंख्याधं कृत्वाद्यात्क्रमतः पृथक् ॥
तत्तत्प्रस्तारकानादौ कृत्वा प्रश्न विलोकयेत् ॥२४॥
टीका-पाशाके अनुसार प्रस्तार करना तहाँ यदि विजूदह घरमें
वे खण्ड हों तो प्रश्न करनेवाले आयेंगे जानना उक्त घरमें न हो
तो नहीं आवेंगे जानना जैसे प्रस्तारमें जो शकल प्रथम घरमें हो
वह विज्दह क्रममें भी प्रथम घरकी हो ऐसेही जो खण्ड जिस
स्थानमें वह विदह क्रमके उतनेही घरकाहो ऐसे जितने खंड मिलें
उतने प्रष्टा अर्विंगे कोईभी ठीक अपने स्थानमें न हो तो कोई
नहीं आवेगा॥ १९॥ इसमें भी विशेष विचार है कि, जितने खंड
मिलें उतने मनुष्य तो आगे परंतु उन खण्डोंमें भी जितने पुरुष
खण्ड हैं उतने मर्द, जितने स्त्री खण्ड हैं उतनी स्त्री और नपुंसकों
तुल्य नपुंसक प्रश्न पूछनेवाले आवेंगे ॥२०॥ यह क्रम अथवा
अबजद खडसे उक्त प्रकारसे देखना और पहिले तेरहवेसे, ग्यारह
चौदहसे दो शकल निकालके फिर उनसे एक बनायके देखे कि,
वह खंड प्रश्न प्रस्तारमें हैं तो पूछनेवाला हाथमें कुछ लेके आयेगा
यदि वह शकल प्रस्तारमें न हो तो प्रष्टा खाली हाथ आवेगा।
अब यह विचार करना कि, प्रश्न कर्ताके हाथमें क्या है ॥२१॥
॥२२॥ जो वह एक खण्ड निकाला है उसमें ऊपरके स्थानमें
अनितत्त्व हो तो प्रष्टाके हाथमें धातु वस्तु है वायुतत्त्व हो तो जीव
है जलतत्त्व हो तो मूल है,भूमि तत्त्व हो तो मणि है कहना ॥२३॥
इस प्रकार आगामी संख्या आदि जानके क्रमसे पृथक् २ विचार
करना जिसमें जैसा प्रस्तार कहा है वैसा बनायके प्रश्न
देखना ॥२४॥
(४४) रमलनवरत्न- मनोगतं किं किमु तत्र वीज को वास्तिभेदः किम सिद्धयसिद्धी ॥ इत्थं विमर्शायततोद्यमानांतत्प्रा तये संप्रवदामि युक्तिम् ॥ २५ ॥ टीका-पूछनेवालेके मनमें क्या है उसका बीज क्या प्रश्नका मेद क्याहै इसमें सिद्धि असिद्धि क्या होगी इस विचारके वास्ते और उयम तथा उसके प्राप्तिके वास्ते युक्ति कहता हू ॥ २५ ॥ मनोगत स्यात्प्रथम द्वितीय तत्कारण भेदमथो तृतीयम् ॥ तुरीयमत्रास्ति च सिद्धयसिद्धी सर्वेषु प्रश्नेषु चतुष्प्रकाराः॥२६॥ तेषां क्रमाच्छा- कुनकेंद्रगा विश्वान्नृपाता किलपाशकोत्थाः॥ तत्साक्षिणस्तैः क्रमतो विनिनास्तज्जाब्धिखंडा- स्तुपृथग्विधेयाः ॥ २७ ॥ प्रस्तारकेन्द्राणि तथा पराणि तत्पंचमाः साक्षिण एव तेषाम ॥ मिथो विनिनाश्चतदुत्थखण्डाश्चत्वार एवं पुनरत्रकार्याः ॥ २८ ॥ पूर्वागतस्तं क्रमतो विनिनाश्चत्वारि चेभ्यः प्रकटीकृतानि॥ प्रश्नो हृदुत्थाद्यखिलप्रमे- दास्तेषां ग्रह स्युः शकुना. क्रमेण ॥ २९ ॥ टीका-प्रश्नमें मुख्य कारण पहिला मनकी बात दूसरा उस प्रश्नका कारण तीसरा उसका भेद चौथा कार्यकी सिद्धि वा असिदि हैं। ये चार कारण चार प्रकारके सभी प्रश्नोंमें हैं।॥२६॥ इनकी युक्ति कहते हैं कि,शकुन कमसे केन्द्र ११७१०के शकल = = =इनके साक्षीप्रस्तारमें १३।११।१५/१६घरे हैं इन- घरों में जो शकल हों उनसे उक्त केन्द्र खडोंको गुनके चार शकल
भाषाटीकासहित ।
(४५)
वनायके पृथक् रखनी ॥२७॥ तब प्रस्तारमें जो केंद्र १।४।
७। १० शकल हैं उनकी पंचमपञ्चम, अर्थात् ५।८।११।१४
साक्षी हैं, इनमें स्थित शकलोंसे केन्द्र स्थित शकलोंको शुणके ४
शकल होती हैं तब पूर्वानीत पृथक्स्थ खण्डोंसे इन चार शक-
लोंका मेल करके चारही शकल तयार करनी ॥२८॥ पूर्वगत
४ खण्डोंसे कम करके पहिलेसे पहिली दूसरेसे दूसरी इत्यादि क्रमसे
जब केवल ४ शकल प्रकट हो जावें तब इन चारोंसे पूर्वोक्त मनकी
बात आदि कहना अर्थात् पहिली शकलसे मनकी बात जिसे पार-
सीमें जमीर कहते हैं दूसरीसे उस प्रश्नका कारण तीसरीसे उसका
भेद ये तीनोंका हाल शकुन क्रमसे जानना और चौथी शकलके
शुभाशुभादि विचारसे कार्यकी सिद्धि असिद्धि कहनी ॥ २९॥
अथैषामुदाहरणम् ।
केनाप्यथागत्य कृतेति पृच्छा रम्लज्ञ मे मानसहेतु-
भेदात् ॥ प्रश्नेनैव हि सिद्धयसिद्धीदाशुचित्र
यदिहास्ति सम्यक् ॥ ३० ॥ क्षिप्तेक्षयुग्मे तनुगोऽत्र
हुम्राधनेविशवैत्रिचतुर्थयोश्च॥स्यात्कब्जुलूतुखारि-
जखंडमेभ्यःप्रस्तारमायुक्तविधेःस्फुटं स्यात्॥३१॥
शकुनादिमलवानप्रश्नविश्वकदाख्ययोः ॥ योगे
फर्याङ्गहुम्रातपंचमस्थानदाख्ययोः ॥३२॥ योगा
दतबदं तस्य फर्हा तकरवं भवेत् ॥ तृतीयशकुने
तस्य गृहं स्यान्मानसेक्षिते ॥३३॥
टीका-प्रश्ननेष्टकारणोंका उदाहरण है कि,किसीने आयके पूछा
कि, हे रम्माल ! मेरे मनके कारणके भेदोंको एकही प्रश्नमें सिद्धि
असिद्धि सहित शीघ्र कहो यदि इसमें तात्पर्य अच्छा है तो॥३०॥
फरा- - (४६) रमलनवरत्न- ऐसे प्रश्नहुयेमें पाशा डाला तो प्रथमस्थानमें हुम्रा = दूसरेमें अकीश= तीसरे और चौथेमें भी फजुल्खारिज - आया इससे प्रस्तार घनाया ॥ ३१ ॥शकुन क्रममें प्रस्तार प्रधम घरमें लदान है तेरहवें प्रस्ता- रमें कबजुलदाखिल - है इनका योग किया तो-फरहा भया, प्रथममें हुम्राहे इसका साक्षी पाँचवों नुस्मुदाखिल हे इनके योगसे भया तव पूर्वागत फरहासे इस अतवेदाखिलका योग कियातो - कबजुल खारिज भया यह शकल शकुन क्रममें तीसरे घरकी है इससे तीसरे घर- सबधी प्रश्नप्रष्टाके मनमें कहना स्थानोंके विचार पूर्वोक्त है तीस- रेंमें भाई पा समीप गमनका प्रश्न कहना यह प्रथमकेन्द्र १ घरसे कार्य भया ॥ ३२ ॥ ३३॥ शकुनाब्धी जमातं तत्साक्षिप्रश्नेन्द्रग नखम् ॥ तयोर्योगान्नखजातं भृयः प्रश्नेब्धिगकखम्॥३४॥ तत्पचमेऽष्टमे हुम्राऽत्तवेख स्यात्तयोयुतः ॥ नखा- तवेखयोोगावयाजं शकुनेऽङ्ककम् ॥ ३५॥कारण नंदगेहस्थ वर्त्तते तत्र चिन्तते ॥ ३६॥ टीका- अब दूसरा केन्द्र चौथा घर हे शकुन कममें चौथे घर जमात = हे उसका साक्षी १४ वें प्रस्तारमें नुसुत्खारिज - है इनके योगमे = न खा ही भया॥२४॥ इस चौथेसे पचमशकु- नमें अटम हुम्रा दे फिरभी प्रश्नमें चौथे केन्द्रमें : क० खा. दे इनके योगमे अतरेखारिज ! भया नु० खा० और अखा के
भाषाटीकासहित।
(४७.)
योगसे बयाज भया यह शकुन क्रममें नवमघरमें है इससे
प्रश्नका कारण नवमघर सम्बन्धी जानागया॥३५॥३६॥
शकुनेऽद्रिगृहेकीश स्थितं प्रश्ने तिथौ तथा ॥
उक्लातद्घातसंभृतं लह्यानं प्रश्नशैलगम् ॥ ३७॥
तदंतस्येषुरुद्रस्थनक्यालयानकंयुते॥
तद्गृहं शकुने चाचं तदेदे तस्य चिंतने ॥ ३८ ॥
टीका-शकुन क्रमके सातवें घरमें अंकीश: है ऐसेही प्रस्ता-
रके पंद्रहवें घरमें उठा है में इनके घातसे लह्यान में हुआ अब
प्रश्नप्रस्तारके सप्तमकेन्द्रमें नुस्रुतदाखिल है इससे पंचम ग्या-
रहवें घरमें नकी है इनके योगसे लह्यान = भया यह खण्ड
शकुनके प्रथम घरमें है इससे प्रथम घर प्रश्नके भेदका है प्रथमगृह
सम्बन्धी भेद प्रश्नका कहना ॥३७॥३८॥ ..
सिद्धयसिद्धयोहं व्योमशकुने तत्र खान्वितम्।।
तस्याः साक्षीनृपेफर्ता - प्रश्ने तद्घातजाङ्किशम्
॥३९॥ पुनः प्रश्ने जमातं स्याहयोन्नितत्पं-
चमैन्द्रगम् । नख तयोर्योगजातं नख तन्निघ्नम-
किशम् ॥४०॥ तत्र फर्हादलं सौम्यं जातं कार्यार्थ-
सिद्धिकृत्॥शकुने पञ्चमे गेहे सिद्धिस्तस्य सहायता
॥४१॥ भो पृच्छक त्वमिहवाञ्छसि सोदरस्य देशां-
तरेऽत्र वसनात् सततं सुखाप्तिम् । द्रव्योद्यमाद्य-
खिलकार्यविधानसिद्धिं तत्ते भविष्यति सुहृत
सुतसाहचर्यात् ॥ ४२॥
(४८) रमैलनवरत्न-- टी-कार्यसिद्धि असिद्धिका दशम केन्द्र है शकुनकममें दराम स्थानगत नुसत्खारिज = है उसका साक्षी सोलहवां घर प्रस्तारमें फरहा है इनके घातसे अकीशमया ॥ ३९॥ फिर प्रस्ता रमें दशम घरमें जमात E है इसका साक्षी इससे पचम प्रथमसे चौदहवा नुसत्खारिज - है इनके योगसे='नु० खा० भया अब अकीश और नु खा ० के योगसे - फरहा मया यह खर सौम्यहै इससे कार्यसिद्धि होती है यह शकल शकुन कमके पचम घरमें है इससे पञ्चमभाव सम्बन्धी पुत्रकी सहायतासे कार्य होगा कहना ॥४०॥४१॥ ऐसे चारों मेद खोलके पृच्छकसे कहना कि हे पूछनेहारे । तू इस वक्त देशांतरवासी अपने भाईके सुखके लिये पूछता है और द्रव्यमे उयम आदि समस्त कार्य विधानोंकी सिद्धि मित्र एव पुत्रकी सहायतासे होगी॥४२॥ आद्यविश्वोद्भवं खण्डं प्रस्तारे स्यात्तदा ध्रुवम् ॥ स्वार्थप्रश्नस्तदा पाच्यो नो चेत्प्रश्नः परार्थकः॥४३॥ प्रस्तारे तद्गृहे प्रश्नो नो चेत्तच्छकुनालये ॥ मूकप्रग्ने द्वितीयोऽयं प्रकार परिकीर्तितः॥४४॥ टीका-दूसरा प्रकार कहते हैं कि, प्रथम और तेरहयों खह जोडके जो शफल हो यह प्रस्तारके किसी घरमें हो तो यह प्रश्न निश्चय अपने अर्थ है।यदि यह शकल प्रस्तारमें कहीं भी न हो तो दूसरेके वास्ते प्रश्न पूछता है कहना ॥४३॥ प्रस्तारके जिस घरमें वह शकल मिले पर शकुन कमसे जिस घरकी हो उस घरका प्रश्न जानना यह मुकमश्नमें दूमरा प्रकार कहा है ॥१४॥ मूकप्रश्ने तृतीय तु प्रकारमधुनोच्यते ॥ कृत्वा प्रस्तारविन्देक्यं पोडशाप्तावशेषतः॥४५॥ - भाषाटीकासहित। (४९) मूकप्रश्नालयज्ञेयंविश्वाद्यैस्तनुतोऽब्धिषु ॥ अन्यन्मतांतरंवक्ष्येमूकप्रश्नेतुरीयकम् ॥ ४६॥ टीका-अब मूकप्रश्नमें तीसरा प्रकार कहा जाता है कि,प्रस्ता- रमें जितने बिन्दुहें सबको संख्या करके १६ से भागलेना जो शेष रहै ॥ १५॥ वह १३ । १४ । १६। और १ से ४ तक भावोंमें देखना जहाँ उतनी शकल शकुन क्रमकी मिले उसमें उसका साक्षी मिलायके जो हों वह शकुनमें जिस घरकी हो उसके संबंधी प्रश्न कहना। अब चौथा प्रकार मूकप्रश्न बतानेका मतांत- रसे कहते हैं ॥ ४६॥ तिथिविश्वनन्दचंद्रप्रमितालयशकल भूमिभागे- भ्यः ॥ आद्यहित्रितुरीयशकलस्थितिवह्निमा- गेभ्यः ॥ ४७॥ पञ्चमरससप्तमवसुगेहस्थित- शकलसलिलभागेभ्यः॥ वस्वर्कालयशकलानि- लभागाभ्यां मनोश्च शकलस्य ॥४८॥ जलभा- गात्षोडशगृहशकलस्यवह्निभागाच ॥ आदाय शून्यरेखाः क्रमतोब्धिखण्डकान्कुर्यात्॥४९॥ चतुभ्योडेसमुत्पाद्य द्वाभ्यामेकं च साधयेत् ॥ तत्खण्डवशतः प्रश्नविश्वादौ पूर्ववद्वदेत् ॥५०॥ टीका-कि १५ । १३।९।१ इन स्थानोंके शकलोंके भूमि भागसे तथा १।२।३।४ शकलोंमें स्थित अग्नि भागसे॥१७॥ एवं ५।६।७।८घरोंमें स्थित शकलोंके जलभागसे ८। १२ शकलोंके वायु भागसे तथा१४ वीं शकलकेभी जलभागसे॥४८॥ और १६ वें घरमें स्थित शकलके अग्निभागसे कमसे शुन्य रेखा - १ । ! (४८) । रमलनवरल-- टी-कार्यसिद्धि असिद्धिका दशम केन्द्र है शकुनकममें दराम स्थानगत नुसत्खारिज = है उसका साक्षी सोलहवां घर प्रस्तारमें फरहा है इनके घातसे अकीश भया ।। ३९ ॥ फिर प्रस्ता रमें दशम घरमें जमात है इसका साक्षी इससे पचम प्रथमसे चौदहवा नुस्रुत्खारिज = है इनके योगसे नु० खा० भया । अब अकीश और नु खा ० के योगसे - फरहा भया यह खड सौम्यहै इससे कार्यसिद्धि होती है यह शकल शकुन क्रमके पचम घरमें है इससे पञ्चमभाव सम्बन्धी पुत्रकी सहायतासे कार्य होगा कहना ॥४०॥४१॥ ऐसे चारों भेद खोलके पृच्छकसे कहना कि हे पूछनेहारे ! तू इस वक्त देशांतरवासी अपने भाईके मुखके लिये पूछता है और द्रव्यके उद्यम आदि समस्त कार्य विधानोंकी सिद्धि मित्र एव पुत्रकी सहायतासे होगी॥१२॥ आद्यविश्वोद्भवं खण्डं प्रस्तारे स्यात्तदा ध्रुवम् ॥ स्वार्थप्रश्नस्तदा वाच्यो नो चेत्प्रश्नः परार्थकः॥४३॥ प्रस्तारे तद्गृहे प्रश्नो नो चेत्तच्छकुनालये॥ मूकप्रश्ने द्वितीयोऽयं प्रकार परिकीर्तितः॥४४॥ टीका-दूसरा प्रकार कहते हैं कि, प्रथम और तेरहवाँ खड जोसके जो शकल हो यह प्रस्तारके किसी घर में हो तो यह प्रश्न निश्चय अपने अर्थ है।यदि यह शकल प्रस्तारमें कहीं भी न हो तो दूसरेके वास्ते प्रश्न पूछता है कहना ॥४३॥ प्रस्तारके जिंस घग्में यह शफल मिले वह शकुन कमसे जिस घरकी हो उस घरका प्रश्न जानना यह मूकप्रश्नमें दूसरा प्रकार कहा है ॥१४॥ मूकप्रश्ने तृतीय तु प्रकारमधुनोच्यते ॥ कृत्वा प्रस्तारबिन्देक्यं षोडशाप्तावशेषतः॥४५॥ , भाषाटीकासहित । (५१) तो मूकप्रश्न नहीं कहा जासकता न उसका फलही मिलता तस्मात् १५ वे घरमें दो शून्योंका साधन उद्घाटन ज्ञान विधिमें तत्पर ज्योतिषी उद्घाटन करे ॥ ५४॥ अथोद्घाटनम् । आधविश्वेतुर्य्यशक्रेसप्तपंचदशे तथा ॥ खनृपे च मिथोहन्यात्क्रमात्कृत्वाऽब्धिखण्डकान् ॥ ५५ ॥ तभ्यः प्रस्तारमुत्पाद्य तस्माच्छ्न्ये प्रचालयेत् ॥ पुनस्तत्र जमात चेत्तदा कुर्यादमु विधिम् ॥५६॥ लह्यानहुम्राबयजांकीशानां तु चतुष्टयम् ॥ क्रमे- णोद्घाटितस्याद्यैः शकलैयोजयेत्सुधीः ॥ ५७ ॥ चत्वार्युत्पाद्य खण्डानि तेभ्यः प्रस्तारमाचरेत् ॥ शून्यलाभो भवत्येव तस्मात्तत्तु प्रचालयेत् ॥५८ ॥ टीका-अब बद्धप्रस्तार (बंदजायचा)का उद्घाटन (खोलना) कहतेहैं कि, प्रथम शकलमें तेरहवीं चौथी में १४ वीं सातवीमें१५वीं दशवीमें १६ वीं शकल गुणके क्रमसे ४ खण्ड तैयार करने ॥१५॥ इन ४ से प्रस्तार बनायके तब बिन्दु चालन करना यदि फिरभी १५३ घरमें जमात आजावै तो तब यह विधि करनी ॥५६॥ कि लह्यान, हुम्रा, बयाज, अकीश, इन ४ को पहिले जो खोला हुआ जायचा है उसके प्रथमके ४ शकसै क्रमसे जोडदेना।।५७॥ ऐसे ४ शकल करके इनसे विस्तार बनाना इस विधिसे अवश्य १५ वे घरमें शून्य मिलेंगी तब बिन्दु चालन करना ॥१८॥ गमागमाभ्यां वियतोगती स्तः स्वजन्मखण्डस्थ निजाभ्रयुक्तिम् ॥ शरेन्दुगेहादिहवामदक्षतन्वष्ट अथ शून्यचालनम् । ।
अन्यख। (५०) रमलनवरत्न लेके चार शफल तैयार करनी॥४९॥ इन चार खण्डोंको मिला- यके दो खण्ड करने इन दोसेभी एक करनी उसके अनुसार के इवें आदि साक्षी देखके पूर्ववत् प्रश्न कहना ॥५०॥ पुनरन्यविधिवक्ष्य मूकप्रश्नेतु पश्चमम् ॥ नवाशारुद्रसूर्याणांखण्डानांवहिमागतः ॥५१॥ पूर्वक्रमेणकखण्डं रचयेद्दवचिंतकः ॥ तस्याब्दहरहाहाच्यः प्रश्नोरमलकोविदैः॥५२॥ टीका-अन्ययुक्ति मूकप्रश्न बतलानेकी पुन पचम प्रकार कहते है कि ९।१०।११। १२ खण्डोंके अमि मागसे पूर्वोक्त विधिसे देवज्ञने एक शकल तैयार करनी वह शकल अब्दह कमसे जिस घरमें दो उस घरसबन्धि प्रश्न रमलज्ञने कहना ॥५१॥५२॥ अपतिथिगृहास्न्पचालनद्वाराविलम्फशिरोमणि मूकमकारमाह। विषमशन्यदलंनतिथोमवेत् कुइचिभ्रमदर्श- कमानिगमरेखवियद्दलमत्रतत्कुस्तदोघटनंखयु- गाप्तये ॥५३॥ पचेन्दुगेहांवरयुग्ममंतरानमूकसि- दिर्नफलोद्गमोपिच ॥ तस्मात्तियो शन्ययगंप्रसा- घयदुद्घाटनेज्ञान विधानतत्पर ॥५४॥ टीका-अब पद्रहवें घरसे शून्य पालन करके सपूण मूकप्रश्नों का शिरोमणि प्रकार कहते हैं कि जो पद्रहवें घरमें विपम शून्य खण्ड न होतो भ्रम दिखाताई अर्थात् जमात शफल १५३ में होतो वद्धप्रस्तार (जायचापद) कहतेहैं इससे प्रश्न नहीं हो सकता। रेखाविंदु होने में विदुचालन होता है इसवास्ते उसके उद्घाटन (खोलने) के निमित्त युक्ति करो॥५३॥ पदहवें घरमें दोशून्य नहीं भाषाटीकासहित । (५१) -- तो मूकप्रश्न नहीं कहा जासकता न उसका फलही मिलता तस्मात् १५ वे घरमें दो शून्योंका साधन उद्घाटन ज्ञान विधिमें तत्पर ज्योतिषी उद्घाटन करे ॥५४॥ अथोद्घाटनम् । आधविश्वेतुर्य्यशक्रेसप्तपंचदशे तथा ॥ खनृपे च मिथोहन्यातक्रमात्कृत्वाऽब्धिखण्डकान् ॥ ५५ ॥ तभ्यः प्रस्तारमुत्पाद्य तस्माच्छ्न्ये प्रचालयेत् ॥ पुनस्तत्र जमातं चेत्तदा कुर्य्यादमु विधिम् ॥५६॥ लह्यानहुम्राबयजांकीशानां तु चतुष्टयम् ॥ क्रमे- णोद्घाटितस्यायः शकलर्योजयेत्सुधीः ॥ ५७॥ चत्वार्युत्पाद्य खण्डानि तेभ्यः प्रस्तारमाचरेत् ॥ शून्यलाभो भवत्येव तस्मात्तत्तुप्रचालयेत् ॥५८ ॥ टीका-अब बद्धप्रस्तार (बंदजायचा)का उद्घाटन (खोलना) कहते हैं कि, प्रथम शकलमें तेरहवीं चौथी में १४ वीं सातवीमें १५वीं दशवीमें १६ वीं शकल गुणके क्रमसे ४ खण्ड तैयार करने॥५५॥ इन 8 से प्रस्तार बनायके तब बिन्दु चालन करना यदि फिरभी १५३ घरमें जमात आजावे तो तब यह विधि करनी॥५६॥ कि लह्यान, हुम्रा, बयाज, अकीश, इन ४ को पहिले जो खोला हुआ जायचा है उसके प्रथमके ४ शकलै क्रमसे जोडदेना॥१७॥ ऐसे ४ शकल करके इनसे विस्तार बनाना इस विधिसे अवश्य १५ वे घरमें शून्य मिलेंगी तब बिन्दु चालन करना ॥५८॥ गमागमाभ्यां वियतोर्गती स्तः स्वजन्मखण्डस्थ निजाभ्रयुक्तिम् ॥ शरेन्दुगेहादिहवामदक्षतन्वष्ट अथ शून्यचालनम् । 4 (५०) 'रमलनवरल- खंडांतरगे क्रमेण ॥ ५९॥ आधहितीयाभ्रगता लयाभ्यां प्रश्नोत्तरेप्रष्टुरथोविचित्य ॥ तात्काल साक्ष्यर्द्धवलंतथायज्ञयंदये साक्षिचतुष्कवीर्यम् ॥ ६० ॥ आद्यशून्यस्थिते खण्डात्प्रश्नोवाच्यो व्दहकमात् ॥ प्रश्नावधिश्चतत्सिद्धिढितीयेभ्रे समुच्यते ॥ ६१॥ इति रमलनवरत्नेमूकपणनिरुपणञ्चतुर्यरत्नम् । टीका-विन्दुचलाना कहते हैं कि पद्रहवें घरमें जो शून्य वायु आदि तत्त्वके स्थानोंमें स्थित हैं उनका उत्पत्तिस्थान देखना कि किस किस घरसे ये आये हैं जहाँसे उसकी पैदायश है यहाँ वह स्थिति जाननी १५ घरसे वॉये वा दाहिने जहाँ चले पहिले घरसे ऊपर आठवेंके भीतर उसकी स्थिति मिलनी चाहिये जैसे १५३ घरमें वायु आदि तत्त्वकी जगह जहाँ शून्य हो उसी स्थानमे१३ १४ मैसे किसीमें वह शुन्य चली जावै वह वहाँही स्थित जाननी यदि तेरहवें घरमें जावेगी तो नवेंषा दश घरमें उसी तत्त्वकी जगह शून्य जावेगी जो चौदहवें घरमें जावे तो१५३ घरमें तत्त्वकी शुन्य जायेगी यदि ११वें भावमें स्थिति हो तो पांचमें तथा छठेमें शून्य जावेगी वहाँ जिस घरमें इस शून्यके स्थानमें शून्य हो उसी जगह स्थित जाननी यदि शून्य १२३ घरमें जावे तो७३ आठ- वेमें उसी तत्त्वके स्थानमें जो शुन्य जावे वह उसके स्थानमें स्थित जाननी यह विधि शून्य पालनकी है ऐसेही दूसरे शून्यको चलावे बद्द १ से ८ भीतर जिस घरमें ठहरे षही घर प्रश्नोंमें माक्षी जानना ॥ ५९ ॥ पहिले और दूसरे विन्दु २५ वै घरके चलायोमें जो घर स्थितिके मिलें उन्दीसे प्रश्नका उत्तर विचा भाषाटीकासहित । (५३) रना उसवक्त जो साक्षिखण्ड है और जो पहिला बिन्दु चालनसे पाया घर है इनके बलाबलसे ४ प्रकारके प्रश्न कहने ॥६० ॥ आय शून्य स्थित शकलसे तो प्रश्न अब्दह क्रमसे कहना और दूसरे शून्य चालनसे जो स्थिति घर पाया इससे प्रश्नकी अवधि कार्यकी मियाद कहनी । सभी प्रश्नोंमें ४ काल ऐसे होते हैं कि भूत १ भविष्य २ वर्तमान ३ और आकस्मिक ४। आकस्मिक वह है जो कुछ स्वतः सिद्ध हो परंतु अचानक कुछ उसमें और मिलाहो इसका प्रयोजन है कि वह साखीखण्ड उन्महांत पक्तिमें जिस पंक्तिमें जिस घरमें हो उसी घरकी पूर्व पंक्तिमें हो तो आक- स्मिक यदि अपनी पंक्तिमें पिछली पंक्तिमें होतो भूतकाल जो अपने आगे हो तो वर्तमानकाल और जो अपनी पंक्तिके नीचे अपने ही घरमें हो तो भविष्यकालका फल कहना । यहाँ औरभी स्मरण रखना चाहिये कि यही पंक्तिका आकस्मिककाल बतानेवा- ली शकल चौथी पंक्ति में जाननी अर्थात् इसके पूर्व भागमें नीचेकी पंक्तिको समझे और चौथी पंक्तिका भविष्यकाल पहिली पंक्तिसे कहना पंक्तिके आदिमें भूतकाल ८ वीं शकलसे कहना, ८ वींका वर्तमान काल पहिली शकलसे कहना.अर्थात् इनके जिस भागमें आगे कोई शकल न हो तहाँ सन्मुख भागकी अंतिम पंक्तिको ही आगे समझना ॥ ६॥ इति रमलनवरत्ने माहीधरीभाषाटीकायां मूकप्रश्ननिरूपणं नाम चतुर्थ रत्नम् ॥४॥ अथ पञ्चमभावप्रश्ननिरूपणम् । नरस्तनौ यो वदने करीन्द्रो बालार्कदीप्तिवल- नाक्षिभालः॥ कोसावितिप्राहसमुत्स्मयंती शिवै- क्ष्यसूनुसददातुवाचम् ॥ १॥ यद्गमादानुकूल्या- २ (५२) रमलनवरत्ल- खडांतरगे क्रमेण ॥ ५९॥ आद्यद्वितीयाभ्रगता लयाभ्यां प्रश्नोत्तरेप्रष्टरथोविचिंत्य ॥ तात्काल साक्ष्यर्द्धवलतथाद्यज्ञेयंहये साक्षिचतुष्कवीर्यम् ॥ ६० ॥ आद्यशून्यस्थिते खण्डात्प्रश्नोवाच्यो व्दहकमात् ॥ प्रश्नावधिश्चतत्सिदिद्धितीय, समुच्यते ॥६१॥ इति रमलनयरलेमूकपअनिरूपणचतुर्यरत्नम् । टीका-विन्दुचलाना कहते हैं कि पद्रहवें घरमें जो शून्य वायु आदि तत्त्वके स्थानोंमें स्थित हैं उनका उत्पत्तिस्थान देखना कि किस किस घरसे ये आये हैं जहाँसे उसकी पैदायश है वहाँ वह स्थिति जाननी १५ घरसे वॉये वा दाहिने जहाँ चले पहिले घरसे ऊपर आठवेंके भीतर उसकी स्थिति मिलनी चाहिये जसे १५३ घरमें वायु आदि तत्त्वकी जगह जहाँ शून्य हो उसी स्थानमें१३ १४ मेंसे किसीमें पद शून्य चली जावे वह वहाँही स्थित जाननी यदि तेरहवें घरमें जावेगी तो नवें वा दश घरमें उसी तत्त्वकी जगह शून्य जावेगी जो चौदहवें घरमें जावेतो१५३ घरमें तत्वकी शून्य जावेगी यदि ११वें भाव में स्थिति हो तो पांच में तथा छठेमें शून्य जावेगी वहाँ जिस घरमें इस शून्यके स्थानमें शून्य हो उसी जगह स्थित जाननी यदि शून्य १२ वें घरमें जावे तो ७ वे आठ- वेमें उसी तत्त्वके स्थानमें जो शुन्य जावे वह उसके स्थानमें स्थित जाननी यह विधि शून्य पालनकी है ऐसेही दूसरे शुन्यको चलावे बद्द १ से ८ भीतर जिस घरमें ठहरे वही घर प्रश्नामें मासी जानना ॥ ५० ॥ पहिले और दूसरे विन्दु २५ वे घरके चलाययेमें जो घर स्थितिके मिलें उन्हींसे प्रश्नका उत्तर विचा भाषाटीकासहित । (५३) रना उसवक्त जो साक्षिखण्ड है और जो पहिला बिन्दु चालनसे पाया घर है इनके बलाबलसे ४ प्रकारके प्रश्न कहने ॥६० ॥ आद्य शून्य स्थित शकलसे तो प्रश्न अब्दह क्रमसे कहना और दूसरे शून्य चालनसे जो स्थिति घर पाया इससे प्रश्नकी अवधि कार्यकी मियाद कहनी । सभी प्रश्नोंमें ४ काल ऐसे होते हैं कि भूत १ भविष्य २ वर्तमान ३ और आकस्मिक ४ । आकस्मिक वह है जो कुछ स्वतः सिद्ध हो परंतु अचानक कुछ उसमें और मिलाहो इसका प्रयोजन है कि वह साखीखण्ड उन्महांत पंक्तिमें जिस पक्तिमें जिस घरमें हो उसी घरकी पूर्व पंक्तिमें हो तो आक- स्मिक यदि अपनी पंक्तिमें पिछली पंक्तिमें होतो भूतकाल जो अपने आगे हो तो वर्तमानकाल और जो अपनी पंक्तिके नीचे अपने ही घरमें हो तो भविष्यकालका फल कहना । यहाँ औरभी स्मरण रखना चाहिये कि यही पंक्तिकाआकस्मिककाल बतानेवा- ली शकल चौथी पंक्तिमें जाननी अर्थात् इसके पूर्व भागमें नीचेकी पंक्तिको समझे और चौथी पंक्तिका भविष्यकाल पहिली पंक्तिसे कहना पंक्तिके आदिमें भूतकाल ८ वीं शकलसे कहना, ८ वींका वर्तमान काल पहिली शकलसे कहना.अर्थात् इनके जिस भागमें आगे कोई शकल न हो तहाँ सन्मुख भागकी अंतिम पंक्तिको ही आगे समझना ॥६॥ इति रमलनवरत्ने माहीधरीभाषाटीकायां मूकप्रश्ननिरूपणं नाम चतुर्थ रत्नम् ॥४॥ अथ पञ्चमभावप्रश्ननिरूपणम् । नरस्तनौ यो वदने करीन्द्रो बालार्कदीप्तिवल- नाक्षिमालः॥ कोसावितिप्राहसमुत्स्मयंती शिव- क्ष्यसूनुंसददातुवाचम् ॥ १॥ यद्गमादानुकूल्या- . - D - -- (५४) रमलनवरत्न- प्तिस्तं प्रश्न निर्गमं विदुः॥ यदागमातस्वरुत्पत्तिः सप्रश्नो दाखिलो मतः॥ २॥ स्याद्यत्सत्त्वेकतः श्रेयस्तप्राहः स्थिरसज्ञकम् ॥ खारिजंनिर्गमदा- खिलागमंसावित स्थिरम् ॥ ३ ॥ पूर्वोदितप्र- भागृहाणिबुद्ध्वात्रीन्निर्गमाद्यानपि तत्र भेदान् ॥ शुमेपि कालेऽक्षयुगक्षिपेज्ज्ञः स्मृत्वेष्टरम्लज्ञपदा- रविन्दे॥४॥प्रस्तार पूर्ववत्कृत्वा सर्व ज्ञात्वा वला- वलम्।।मरातिवादिकमपिज्ञात्वा प्रश्नान विचार- येत् ॥ ५॥ प्रश्नोत्यश्चेत्किलायोत्थोद्विधा प्रश्न विधि स्मृतः ॥ तत्रादौपाशकप्रश्नात्प्रश्नसिद्धि रिहोच्यते ॥६॥ प्रश्नालयंतुमुख्यस्यान्मुकुरचच- तुर्दशम्॥प्राइविवाकंपञ्चदशसर्वत्रेतत्त्रिस्मरेत् ७ टीका-जो शरीरमें तो मनुष्य है मुखमें हाथी हे वालसूर्यके समान कांति और भालनेत्रमें अमि जिसके, ऐसा यह कौन है, श्रीपार्वतीजी अपने पुत्र गणेशजीको देखके मुसकाती हुई कहती मयी पद गणेश वाणी देवे, यह अथकर्ताने भाव प्रश्रादिमें अपने इए देवको प्रणाम रूप मगलाचरण कहा ॥१॥जिसके गमनसे प्रश्न पकड़ा जाताहे उस प्रश्नको निर्गम और जिसके आगमसे शून्यकी उत्पत्ति होती उस प्रश्नको दाखिल कहते हैं ॥ २ ॥ जो एकही तत्त्वसे शुभ हो जाता है उसको स्थिर सज्ञक कहते है, खारिज, निर्गम, दाखिल, आगमन,सावित स्थिर ये प्रश्नमें मुम्न्य भेद हैं इनके सुलासे पूर्वलिखित चक्रोम ई ॥३॥ पूर्वोक्त प्रकारसे प्रश्नालय और उनके निर्गम आदि मेदोंको समझके परितने अच्छे सम-
भाषाटीकासहित ।
(५५)
यमें अपने इष्ट तथा रमलज्ञ गुरुके चरणोंका स्मरण करके पाशोंकी
जोडी फेंकनी॥४॥उससे पूर्वोक्त विधिसे प्रस्तार बनायके संपूर्ण
बलाबल जानके मरातिब आदि भेदोंको भी जानके प्रश्न विचा-
रने ॥५॥एक प्रश्नसे दूसरा इन्किलावसे प्रश्नविधि है इसमें प्रथम
पाशक प्रस्तारसे प्रश्नविधि कही जाती है ॥ ६॥ मुख्य प्रश्ना:
लय पहिला है तब १४ वां मुकुर और १५ वां मन्त्री है सर्वत्र इन
तीनोंका मुख्य स्मरण रखना ॥७॥
अथ निर्गमागमप्रश्नसिद्धिमाह ॥
. प्रश्नो यदि स्यादिह निगमाख्यस्त्रिष्वेषु गेहेषु च
खारिजा?ः ॥ स्यात्कार्यसिद्धिश्च शुभैश्च सम्यक
श्रमेण पापैश्च मरातिवाद्यः॥ ८॥ दाखिलैस्तेष्व
सिद्धिःस्यान्नाश्रमोऽपि शुभैश्च तस्याददभ्रश्रमा- ,
द्वापि कार्यसिद्धिर्नचाशुभैः ॥ ९॥ सावितैः काय-
सिद्धयाशाकायं न स्यात्कदपि च ॥ मुन्कलीवै-
श्चिरात्सिद्धिः शुभैः पापैस्तनीयसी॥१०॥इत्थं वदे-
निर्गमभेदपृच्छां विज्ञाय संभाव्यबलं विपश्चित् ॥
स्यादागमप्रश्नइहात्रकंचेत्सद्दाखिल सिद्धिकृदश्र-
मेण ॥११॥ चिराददभ्रश्रमतोऽशुभं स्यान्न खारिजे
सिद्धिरथाश्रमोऽपि॥शुभे च पापे श्रमतोप्यसिद्धिः
सत्सावित सिद्धिकरं विलम्बात् ॥ १२॥ पापेन
सिद्धिः किलसावितेस्मान्मध्ये च मध्यागदितापु-
राणैः ॥ सन्मुन्कलीवेपि न सिद्विरुक्ताशुभन्तुपापे :
श्रमतोऽथ सिद्धिः॥१३॥
रमलनवरत्म-
टीका-अब निर्गमागम प्रश्न सिद्धि कहते हैं कि, यदि निर्गम
प्रश्नहो तो जो तीनों स्थानोंमें खारिजखट हो तथा शुभशकल हों
तोभी कार्यसिद्धि अच्छी होगी और मरातिव आदिशकल हों अथवा
पाप शक्ल हों तो बडे श्रमसे कार्यसिद्धि होगी॥८॥ उन तीनों
स्थानों में दाखिल शकल हों तो कार्य सिद्धि न होगी यदि वेदाखिल
शकल शुभ भी हों तो बहुतश्रम करनेसे विकल्पसे कार्यसिद्धि होगी
कहना और वे शकल अशुभ हों तो बड़े श्रमसेमी कार्यसिद्धि न
होगी॥९॥जोवे शकल सावित हों तो कार्यसिद्धिकी आशा मात्र
होगी पूर्ण सिद्धि कदापि न होगी, यदि मुन्कलीव हों तो बहुत
दिनोंमें और कोई शुम कोई पाप हों तोथोडीसी कार्यसिद्धि होगी
॥१०॥इस प्रकार उन तीनों शकलोको निर्गमादि जानके उनका बल
विचारके विद्वानने प्रश्न कहना जो आगम प्रश्न ऐसे तीनों स्थानोंमें
शुभदाखिल होतो विनाही श्रमसे कार्य सिद्धि करता है॥१॥अशुम
खड इनमें होनेसे वडे श्रमसे तथा विलबसे कार्यसिद्धि होती है
खारिजसे श्रम करने परमी कार्यसिद्धि नहीं होती शुभपाप मिश्रित
हों तो श्रम करने परमी असिद्धि होती हे जो वे सावित हों तो विल-
वसे सिद्धि होती है ।। १२॥ जो साक्ति शक्ल हों तो पाप खण्ड
होनेमें भी सिद्धि होती है और मध्यममें मध्यम फल प्राचीन रम-
लाचार्योंने कहा है यदि वे मुन्कलीव हों तो कार्य सिद्धि नहीं कही
है शुभ हुएमें पाप (निर्बल) हो तो मिद्धि होती है यह मतान्तर
फहा है बुदिमानने (शुभपाप) बलावलके तारतम्य देखके
युक्तिसे फल कहना शुभपापता बलावल विचार मुख्य है जिघर
वल अधिक देखे उघरका फल मुख्य कई इसमें इतना स्मरण
रखना कि, खारिज शकल निर्गम दाखिल आगम और सावित
स्थिररूप है ॥ १३ ॥
भाषाटीकासहित । (५७), अथ स्थिरप्रश्नः। स्थिरप्रश्ने यदास्यातांशुभौ साबितदाखिलौ ॥ तदा कार्यस्थिरसौख्यात्सिद्धयेदानेष्टयोःश्रमात्॥१४ खारिजमुन्कलीवचस्थिरकायस्य नाशकृत् ॥ एवं प्रश्नचयंसर्व निगदेद्रस्लवित्तमः ॥१५॥ टीका-अब स्थिरप्रश्न कहते हैं कि, स्थिरप्रश्नमें यदि शुभ- शकल साबित दाखिल हों तो स्थिरकार्य सिद्धि होगी, यदि वही साबित दाखिल अशुभ होतो कष्टसे कार्य सिद्धि होगी॥१४॥ -खारिज तथा मुन्कलीव स्थिर कार्यके नाशक हैं इस प्रकार रमल जाननेवालोंमें श्रेष्ट रम्मालने प्रश्नसमूह कहना ॥ १९ ॥ अथ संशये नियामकम् । इयोस्त्रयाणां चविरोधसंभवे फलावरोधिन्यपि काय- खण्डके ॥ प्रश्नार्धनिनेन्द्रतढुत्थिते च घातोद्भवाद- जवदेत्पुरावत् ॥ १६॥ प्रश्नेऽपितञ्चदिहतद्वलेन स्था- नस्वभावादपिखारिजादेः॥ प्रष्टुर्वदेनिर्गमनादिभेदा- छुभाशुभः साख्यपरिश्रमाभ्याम् ॥ १७॥ इत्थवदे- निगमनादिसर्व प्रश्नान्पुरः प्रष्टुरसंदिहानः ॥ विश्व- स्तचेतारमलेगुरौस्वचेतोविशुद्धिर्यदितत्रसिद्धिः॥१८ टीका-प्रश्न जानने में तथा फलसें यदि दो प्रकारके शकल हों जिनमें आपका विरोधहो अथात् एकसे स्थिर दूसरेसे चर यद्वा एकसे खारिज दूसरेसे खारिज तथा एक शुभ दूसरा अशुभकार्य शकल हो तो प्रश्न खंडसे चौदहवाँ खंड गुणके जोखंड उत्पन्न हो उससे पूर्वोक्त प्रकार करके प्रश्न कहना ॥ १६॥प्रश्नमेंभी यह देखलेना कि जो शकल उत्पन्न हुई है उसका बल कैसा है स्थान- ॥
- (५८) रमलनवरत्न- स्वभाव और खारिज आदि कैसा है इतना निश्चय करके पूछनेवालेके निर्गमादि भेद इसका शुभाशुभ परिणाम सुखसे वा परिश्रमसे कहना ॥ १७॥ इस प्रकार निर्गमनादि सब प्रश्नविचारके पूछने वालेके आगे कहै इसमें रम्मालकी चित्तवृत्ति स्थिर रमलशास्त्र एवं गुरुमें विश्वास और चित्तकी शुद्धिहो तब प्रश्नसिद्धि होतीहै॥१८॥ इति निर्गमादिप्रकार ॥ अपेन्किलापमयोजनम् । इदानीमिन्किलावोत्थात्प्रश्नाचापि फल ब्रुवे ॥ तिथौतत्रजमातस्यात्तन्मूलाभ्यांफलंवदेत् ॥ १९ ॥ खारिज विश्वशक्राख्ये शुभेनिर्गम सिद्धिदे ॥ दाखिलवागमस्यैव शुभेस्यातां तुसिद्धिदे ॥२०॥ सावितेचशुभेतहत्स्थिरकार्यस्यसिद्धिदे ॥ मध्य मेसवलेसिन्दिरल्पसिद्धिश्चनिर्वले ॥२१॥ विषय- येनसिद्धि स्याच्छुभाधनापि पूर्ववत् ॥ सविचा- यंवदेत्सर्वप्रश्नखण्डोपिपूर्ववत् ॥ २२ ॥ मुष्टि- मूकशरत्पत्राऽवधिप्रश्नहराभिधाः ॥ इन्किलावं विनासिद्धास्तस्मादेषु न तद्भवेत् ॥ २३ ॥ एव सामान्यत प्रोक्त सर्वगेहेपु निणय ॥ यद्यद्रोहे विशेप च तत्तद्गृहेऽधुना वे ॥ २४ ॥ टीका-अब इन्किलावका प्रयोजन कहते हैं कि इस समय इन्कि लावसे उत्पन्न प्रश्नसे कहने में यदि १५ वे घरमें जमात हो तो उसके मूल १३ । १४ से फल कहना ॥ १९ ॥ सो ऐसाई कि १३३१४से शकल खारिज और शुभ होतो निर्गम प्रश्रकी सिद्धि देते हैं यदि वेदाखिल और शुम हो तो आगम प्रश्नकी सिदि - (५९) भाषाटीकासहित । होती है ॥२०॥ यदि साबित और शुभ हों तो स्थिरकार्यकी सिद्धि देता है बलवान् और मध्यममें कार्यकी सिद्धि निर्बलमें कार्यकी असिद्धि होती है ॥२१॥ उलटे होनेमें कार्यसिद्धि नहीं होती जो शुभहो तोभी ऐसे प्रश्नखण्ड पूर्वोक्त विधिसे विचारके फल कहना ॥२२ ॥ मुष्टिप्रश्न मूकप्रश्न वर्पपत्री बनानेका प्रश्न कार्यकी अव- धिका प्रश्न और चोरके नाम बतलानेका प्रश्न ये पांच प्रश्न बिनाही इन्किलाव किये साधारण प्रथम जायचेसे हो जाते हैं इनमें इन्कि- लाव नहीं होता ॥२३॥ सर्व प्रकार सभी घरों में निर्णय कहा है अब जिन २ घरों में विशेषता विचार की है उनको कहता हूँ॥२४॥ अथाद्यगेहे विशेषमाह। आद्यगेहे विशेष यत्तत्फलप्रश्नगं वे॥शिष्टमायुः कियन्मेस्यादितिप्रश्नेकृतेसति ॥ २५ ॥ प्रस्तारे प्रथमं खण्डं तेन हन्याच्चतुर्थकम् ॥ तदुत्थखण्ड- तोवाच्य फलं चायुष्यक बुधैः ॥ २६ ॥ तदाखिलं सावितंचमुन्कलीवंच खारिजम् ॥ पूर्णार्द्धपादस्व- ल्पायुः शेषं सौम्ये शुभाईयुक् ॥ २७ ॥ तस्मिन् पापे विपर्यस्तंतत्संख्यापि निगद्यते॥ अवध्यङ्कश्च सर्वेषु प्रश्नेष्वेव प्रकीर्तितः ॥२८॥ टीका-प्रथम घरमें विशेष विचार जो है उसका फल कहता हूँ कि जो कोई पूछे कि, मेरी आयु अब कितनी बाकी है।॥ २५ ॥ तो प्रस्तारके प्रथम शकलसे चौथा खण्ड गुनना जो खंड उत्पन्न हो उससे पंडितोंने आयुका फल कहना ॥२६॥सो ऐसे है कि जो वह शकल दाखिल हो तो पूर्ण आयु साबित होतो आधा मुन्कलीब ।
(६०) रमलनवरत्न- होतो चौथाई,खारिज होतो और भी थोडा आयु शेप कहना इसमें भी यह विचार है कि वह खण्ड सौम्य होतो शेप आयु शुम और समृद्धि युक्त होकर जायगा ॥ २७ ॥ वह खण्ड पाप होतो. दुख दरिद्रतासे आयुके शेप दिन कटेंगे अब उसकी सख्या जान- नेके लिये अवधिके अक चक्राकार कहे जाते हैं जो सभी प्रकारके प्रश्नोंमें काम आनेवाले हैं ॥२८॥ अथ सद चक्रोद्धार। अथोर्ध्वतिर्यग्धृतिरेखिकंस्याचक्रतवाह्यक्षिगृहंत दूर्ध्वम् ॥ तियालिखेद्विजपंक्तिमकादारभ्य दक्ष्यतमिताद्वयोश्च ॥ २९ ॥ सांकसद्मस्थ- युतित्वधस्तादेवहिसर्वेपुगृहेषुका- ॥प्रस्तारगा दद्योतदलामसंख्यकोष्ठांकतुल्यायुरिह प्रदिष्टम् ॥ ३० ॥ तत्संख्यदाखिलवर्षमासास्ते सावित तथा ॥ मुन्कलीवेद्रिघनास्तेखारिजेतदहगणः ॥३१॥ उत्पन्नाधन प्रस्तारयदातद्विज्दहालयात्।। तिर्यमूर्द्धगतात्कोप्टज्ञेयमकंसदाबुध ॥ ३२ ॥ इति प्रथम विशपः। टीका-समयके अवधि जाननेका चक है कि ऊपर और सीधे १६।१६। रेखाका चक्र लिखके उपरके घरमें सीधे विजदह पक्तिके खण्डपकसे सोलहतफ लिखे दूसरे किनारे १ से १६ तक अकलिखे दूसरे आदि कोष्ठम ११२।३ । आदिक्रम वृद्धिको लिखे ॥२९॥ घरकी सम्ब्याका अक और घरमें स्थित अंकको जोडके उसके नीचे देखना जैसे प्रस्तारमें ११४ घरको जरवदेके ल्यान शकल हुई यह शकल प्रस्तारमें छठा घर तो अंकचक्रमें भाषाटीकासहित । (६१) लह्यानके नीचे ६ के सामनेका १७ अंक पाया ऐसीही बिधि सभी घरोंमें करनी प्रस्तारमें पूर्वोक्त खण्डसे पाई गई संख्याके कोष्ठके अंक तुल्य आयु यहाँ कहींहै ॥ ३० ॥ वह शकलदाखिल हो तो उतने वर्ष साबित होतो महीने मुन्कलीव हो तो सप्ताह (हफ्ता) और खारिज हो तो दिन जानने ॥ ३१ ॥ यदि १४ घरके मेलसे उत्पन्न शकल प्रस्तारमें न होतो बिजदह क्रमके ऊपर तथा सीधेकोष्ठसे पंडितोंने अंक लेना यहाँ भाषाकारकी युक्ति है कि, जब वह शकल प्रस्तार नहीं है तो उसका स्वामी कौन ग्रह है उसकी दूसरी शकल कौनहै उससे काम लेना जैसे यहाँ लह्यानका स्वामी बृहस्पतिहै और नुस्रुतदाखिलका भी बृहस्पति है तो इसी नुदा० से कामलेना इसमें औरभी युक्ति है ॥३२ ॥ बिजदहांक चक्रम् । - 7 ||-1 a 1-1[ur १ १० . mr ४ ७ ८ ४ ७ ८ ५/ ११ ६] १६ है। | F TE १ २ ३ ५ ९ ११ १२ १३ १४ १५/१६ २ ५ ६ ९ १० ។។ १२ / १२ / १४ १५ १६ १७ ५ ६ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १८५९ ९ १० . ११ १२ | १३ १३ १४ १५ १५ १६ १७ १८ १९ २० ०१ /२२ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५ २६ १८ १९ २० २१ २२ | २३ | २४ | २५ २६ २७ २८ २९ ३० ३१ ७२२ २३ २४ २५ २६ २७ ૨૮ २९ ३० ३१ ३२ / ३३ | ३४ ३५/३६ ३७ ८ २९ ३० ३१ ३२ | ३३ | ३४ | ३५/३६ | ३७ ३८ ३९/४० ४१ ४२ ४३ ४४ ९/३७ ३८ ३९ ४० ४१ ४२४३ | ४४|४५/४६ ४७ ४८ ४९ ५० | ५१५२ १०४६ ४९/५०५१/५२५३५४५५/५६/५७ ५८/५९/६०६१ ११/५६ ५७ ५८६५६० ६१६२/६३/६४ ६५६६ ६७ ૬૮ ७०७१ १२/६७६८६९ ७१ ७२ ७३ ७५ ७६ ७९ ८११८२ ८२८३ ८४ ८५८६ ८९ ९१ ९२ १४ ९२ ९३ ९४ ९८ ९९१००१०११०२/१०३/१०४.१०५/१०६/१०७ १५/१०६/१०७/१००१०१११०१११/११२/१३३/११४११५/११६११७/११८/११९/१२०/१२१) १६१२१२२१२३३१२४/१२५/१२६/१२७४१२८१२९/१३०१३११३३/१३३/१३४/१३५/१३६ ७० ८० १३७९ ९३९ - (६२) रमळनवरत्न- भय द्वितीय विशेषमाह। द्वयोः पुरुपयोर्मध्येकोभवेद्ववित्तवान् ॥ एवं प्रश्नपुरोद्देशोमुख्यः सम्बन्धतोपरः ॥ ३३ ॥ मुख्य- स्यप्रथमतसीरादितरस्यच ॥ तदहितीये धने स्यातामुभयो खिल शुभम् ॥ ३४ ॥ सावित वाधनन्तस्य वडस्यात्तद्वयेसमम् ॥ शुभेचखारि- जेकिंचिदशुभेखारिजेनहि ॥ ३५ ॥ शुभाशुमेमुन्क लीवे त्वल्पं नास्तीति च क्रमात् ॥ संख्या प्रश्ने विजूदहस्य स्वगृहाधस्य पूर्वषत ॥३६॥ कर्णमार्गे- णाङ्कसंघ ज्ञात्वा सख्यां वदेवुधः॥ वराटकात्स्वर्ण मुद्रापर्यन्तस्वमनीषया ॥ ३७ ॥ एकादिकोटि पर्यन्तां सख्यां पात्रानुसारतः ॥हित्र्यायेपि च तद्योगात्संख्यामावेन तद्भवेत् ॥ ३८॥ टीका-अब दूसरे घरमें विशप कहते हैं कि दो पुरुषोंमेंसे कौनसा अधिक धनवान है ऐसा प्रश्न होने में एक मुख्य उद्देश्य दूसरा उसके संबधसे नियत कर लेना॥३३॥तब प्रस्तारमै देखना कि मुख्य तो शका प्रथम घर दूसरे सबधीका दूसरा घर जाननाउन घरोंके दूसरे घर उनके क्रमशः धनस्थान जानना दोनोंके धनमाष दाखिल तथा शुभहों ॥ ३४ ॥अथवा साबित हों तो दोनोंको धन बहुत है तथा समान है शुभ और खारिज हों तो थोडा धनहे और अशुभ तथा खारिज हों तो धन नहीं है॥३५॥शुममें पछुत अशुममें भल्प घन मुन्कलीवमें धन नहींहि ऐसा क्रमसे जानना । जिसकी धन शफल जैसी हो उसके पास पैसा धन पतलाना और संख्या पूँजी जावे।
भाषाटीकासहित ।
(६३)
तो विजदह क्रमके स्वगृही खंडसे पूर्ववत् अंकलेना ॥ ३६॥ जैसे
वह धनवाली शकल विजदह क्रममें जिस घरकी हैं प्रस्तारमेंभी
उतनेही संख्याके घरमें हो तो अंक चक्रमें कर्णमार्गसे अंक जानना
तब संख्या कहनी इसमें पंडितने कौडीसे लेकर मोहरतक अपनी
बुद्धिके बलसे कहना ॥ ३७॥ एकसे लेकर करोडपर्यन्त संख्या
कण माग दखने का क्रम एस है बजदह में।
३
९ १० ११ १२ १३ १४/१५/१६
IFE
३६ १०/१०/२२ २८३४५/५६६७८/९१/२२५/१२०/१३६
E
•
1-11-
11
• ॥
.
जैसा वह मनुष्य पात्रहै वैसा स्वबुद्धिसे कहना जो दो तीन संख्या
मिल जावे तो उनको जोडके कहना संख्याका अभाव होतो धन
नहीं है कहना ॥ ३८॥
अथ तृतीये विशेषमाह ।
तार्तीयके स्वप्नजातं फलं वक्ष्ये विशेषतः॥
शाकुनप्राश्निके व्यमिथोनिनेतदुद्भवे ॥ ३९ ॥
शुभेशुभमथोपापेत्वशुभंचशुभेसमम् ॥
फलं तखंडवशतो भेदं स्वप्ने वदेबुधः॥ ४०॥
टीका-अब तृतीय भावमें विशेषहै कि इसमें विशेष करके स्वप्न-
जात फल कहते हैं शकुन क्रममें तथा प्रस्तारमें तीसरे घरोंकेशक-
लोंको मिलायके ॥३९॥जो शकल हो वह शुभ हैं स्वप्नका शुभ
पाप है तो अशुभ और अशुभशुभ होतो समफल उस खण्डके
वशसे पंडित स्वप्नका कहै विशेष विचार उस खण्डके तत्त्वादि-
कोंके अनुसार विचारके कहे ॥४०॥
- (६४) रमलनपरल- अप चतुर्थं विशेपमाह। काचित्समागत्य ब्रवीतिनारीशं मेधवादद्यचद्विती यात् ॥ पृच्छत्सुमुख्यास्तनुसाचाद्यमर्तुः सुखं खद्वितयस्य चिंत्यम् ॥ ४१ ॥ तनोस्तुरीयात्प्रथमे नसौम्ये तनोर्दशाख्यादितयेनचार्द्धम् ॥ वाच्यंशुभं चेदुभयत्रसौम्यंबलाचपुंसस्तुखतर्ययोर्वदेत्॥ ४२ ॥ टीका-चतुर्थ भावमें विशेष कहते हैं कि , कोई स्त्री आयके पूछे मेरी भलाई पहिले पतिसे होगी अथवा दूसरे मर्ता करनेसे तो पूछनेवालीका घर प्रस्तारमें पहिला जानना, पहिले भर्ताका चतुर्थ और दूसरे भर्ताका दशम भाव जानना ॥४१॥ तब पहिले घरमें चतुर्थ जोडना जो शकलहो उसके शुभाशुम बलाबलके अनुसार पहिले मासे शुमाशुभ कहना और दशमसे प्रथम घरका मेल करके जो शफल बने उसके शुभाशुभके तुल्य दूसरे भर्तासे शुभाशुभ और दोनईम तुल्यता हातो दोनह भताओंसे तुल्यही मुखामुख कहना ॥४२॥ अथान्यदपितुर्येचप्रश्नवक्ष्ये विशेषतः ॥ अस्मि- न्भूमितले द्रव्यमस्तिनास्तीतिचितयेत् ॥४३॥ तुरीयरिपुरखण्डाभ्यां जातं चेटुकला भवेत् ॥ दाखिलं वातदा द्रव्यमुन्कली वेस्तिपाल्पकम् ॥ ॥४४ ॥ अन्यथाद्रविणामावइतिपूर्वसमादधेत् ॥ ततः संभावितस्थानेचतुरस्रदिरेखिते ॥ ४५ ॥ याम्यपश्चिमयोर्मध्यात्साध्येपूर्वोत्तरांतिके चतुर्भागान्प्रकल्प्यैवपूर्वास्येसयुगांतदिक् ॥ ४६ ॥ ॥
- भाषाटीकासहित । (६५) वामेचैन्द्रीतथाधस्तात्तयोः पश्चिमकोत्तरे॥ तत्र क्षिप्त्वाक्षियुग्मंचप्रस्तारंतनुयात्सुधीः॥४७॥ टीका-अब और चौथे घरमें विशेष प्रश्न कहताहूंकि,उस भूमिके नीचे धन है वा नहीं ऐसा विचार करता हुआ॥४३॥ पाशा डालके प्रस्तार बनावै तब चौथे और छठे खण्डसे एक शकल पैदा करै जो वह उकला शकल अथवादाखिल शकल हो तो उस जगह धन जो मुन्कलीव शकल होतो थोडा धन है ॥४४॥ यदि इनमेंसे कोईभी न हो तो वहां धन नहीं है ऐसा पहिले समझ लेना तब संभावित स्थानमें चतुरस्त्र दो रेखासे ऐसा करना ॥४५॥ इसकेभी बीचसे दक्षिण पश्चिम और पूर्वोत्तर भाग - ऐसे करने यहां पूर्वके सन्मुख बाम भागमें पूर्व दिशा और दाहिने ओर दक्षिणदिशा जाननी पूर्वके नीचे उत्तर दक्षिणके नीचे पश्चिम जाननी अब फिर पाशा डालके प्रस्तार बुद्धिमानने करना४६॥४७ तुरीयालयखण्डस्यदिशायांद्रविणस्थितिः ॥ एवं पुनः पुनः कुर्याद्यावद्धस्तोन्मितं स्थलम् ॥४८॥ ततोब्दहस्थितानङ्कान रेखाद्विगुणसंयुतान् ॥ तुरीयार्धेस्यसंयोज्य तत्रागाधंविचिन्तयेत् ॥ ४९॥ अङ्गुल्याः करपर्यन्तकल्पनांस्वमनीषया॥ एवं भूक्षिप्तवित्तार्थ प्रकारः कथितो मया॥५०॥ टीका-उस प्रस्तारमें चौथे घरके शकलकी जो दिशा है उस दिशामें उक्त चतुरस्रके भूमिगतद्रव्यकी स्थिति जाननी ऐसेही वारं- वार पाशा डालके प्रस्तार बनावै और चौथे घरमें जो शकल हो उसकी दिशा जानता जाय अर्थात् एक चतुरस्र जोप्रथम प्रस्तारसे (६६) रमलनवरल- ज्ञातमया उसकेभी चतुरस्र करे फिर प्रस्तार बनावे जबतक केवल १ हाथ भूमि निश्चित होतीहै ॥४८॥ तब अब्दहस्थित अर्को मेंसे रेखा द्विगुण करके उसीमें जोडके चौथे खण्डके योगसे गहरा- यश यद्वा दीवार आदिके ऊँचाईमें गडाधन समझ अब्दह क्रममें जितने घरकी वह शकल है उसमें रेखा द्विगुण करनी स्पष्टताके लिये चक्राकारमें दीया है ॥४९॥ एक अगुलसे लेकर १ हाथ पर्यंत तो कल्पना अपने मनसे करनी इस प्रकार भूमिगत द्रव्यक निकालनेमें यह प्रकार मैंने कहा है ॥ ५० ॥ चतुर्यस्थानकी शफलके नीचेकी सन्या कही जाती है। DFIDE E= २/२०२५३०१९२१२२२८२६२७१८२३१७१६२४१५ अप पक्षमे विशेषः। इदानींपञ्चमेगेहेप्रश्नंवक्ष्येविशेषतः ॥ मे भविष्य- तिसन्तानमथवानमविष्यति ॥५१॥ इति प्रश्न चप्रथमपञ्चमौरससप्तमौ ॥ हत्वाखण्डवयंकार्य ताभ्यामेकन्तदादलम् ॥५२ ॥ यत्तत्सन्तान- संज्ञहितत्स्याचेच्छुमदाखिलम् ॥ तदातुसन्तति- र्भाव्याघशुभेसन्ततेर्मतिः ॥५३॥ सावितेमु- न्कलीवेचशुमेस्याचिरकालतः ॥ अशुभेमुन्क- लीवेडिंगर्मपातोनसंशयः ॥५४॥ अन्यथास- न्ततिर्नस्यादेवलग्नरसोद्भवात् ॥ मुविमृश्यवदे- प्रश्न वितथ नहि जायते ॥५५॥ टीका-अब पञ्चम घरके विशप प्रश्नकदताह कि, जब कोई पूछे कि, मेरे सन्तान होयेगी या नहीं ॥५१॥ इस प्रश्नमें पहिलापांचवाँ भाषाटीकासहित। और छठा सातवाँ खड परस्पर गुणके जो शकलहों उन्हें भी आप- समें गुणके एक शकल बनाय लेवै ॥५२॥ वह जो संतान संज्ञक शकल भईहै वह यदि शुभ और दाखिल होतो संतान होनेवाली है जो वह अशुभ होतो संतान होके मरजायगी॥५३॥ जो सावित मुन्कलीव शुभ होतो सन्तान बहुतदिनोंमें होगी और अशुभ मुन्क- लीव होतो निस्संदेह गर्भपतन हो जावैगा ॥ ५४ ॥ इनसे अन्य शकल होंतो संतान नहीं होगी ऐसा लग्न पंचम छठे सप्तमसे भले प्रकार विचार करके प्रश्न कहना वह झूठा नहीं होता ॥५५॥ गर्भभ्रांतौचसन्तानसंख्यायांतनुशलजे ॥ दाखिलेसाबितेवापिजातेगर्भोऽस्तिनिश्चितम् ॥ ५६ ॥ खारिजे मुन्कलीवे च तस्मिन् गर्भो न विद्यते ॥ षष्टाद्योद्भुतखण्डाहाफलमेतहिचारयेत् ॥ ५७॥ टीका-गर्भ है वा नहीं ऐसे सन्देहमें सन्तानकी संख्यामें भी पहिले तथा सप्तम खडसे एक खंड बनायके देखे वह दाखिल वा साबित होतो निश्चय गर्भ है॥५६॥खारिजवामुन्कलीव होतो गर्भ नहीं है अथवा छठे और प्रथम घरके मेलसे यह फल बिचारना५७॥ अथ संततिसंख्यामाह। तस्मिन्नेवरवेः खण्डेवेदसंख्याचसन्ततिः ॥ षटशौक्रेडेबुधेचान्द्रपंचसौरतथैकिका ॥५८ ॥ गौर्वे तिस्रः कुजेवेदाश्च्युतिराहवकैतवे ॥ एवं विचाय मतिमान् संख्यांसांतानिकी वदेत्॥५९॥ टीका-अब सन्तान संख्या कहते हैं कि, वही सन्तान प्रश्नमें पूर्वागत सकल जो १७ स्थानसे बनी है सूर्यकी होतो ४सन्तान एवं शुक्रकी होतो वुधकी होतो २ चन्द्रमाकी होतो५ शनिकी (६८) रमलनवरत्न- होतो १ बृहस्पतिकी हो तो ३ मंगलकी हो तो४और राहु केतुकी हो तो गर्भहानि होगी ऐसा बुद्धिमानने विचारके सतानोंकी सस्या कहनी॥२८॥२९॥ मय गर्मसंमये किमविप्पतीति प्रमे। समवेगर्भसन्तत्योः सप्तमाद्यभवंदलम् ॥ पञ्चम- स्थेनसंगुण्यतत्रोत्पन्नेक्रमावदेत् ॥ ६० ॥ पुस्खण्डे पुत्रजननं स्त्रीखण्डे कन्यकाजनिः ॥ क्लीवेपि कन्यकाजन्मक्लीवजन्मोच्यतेऽधुना ॥६१॥ सशरे पूर्वजे खण्डेक्लीवक्लीवजनिप्रदे ॥ पार्थिवे पुनरुक्ते च तदा जातो नपुंसक.॥६२॥ टीकामा में कन्या पुत्र क्या होगा ऐसे प्रश्नमें जब पूक्ति मफारसे गर्भसतति निश्चय होजाय तब १७ से उत्पन्न शकलको पञ्चमस्थ कलसे गुणके जो शकल उत्पन्न हो उम करिके क्रमसे कहना ॥६०॥ कि वह खण्ड पुरुष है तो पुत्र जन्म वीसज्ञक है तोत्रीजन्म कहना नपुसक हो तो भी कन्या जन्म कहना और नपुमक जन्मभी कहा जाता है कि॥६॥ पूर्वोक्त ११७ से तथा १६ मे उत्पन खण्ड और पचम घरकी शक्ल तीनों नपुसक हा और पृथ्वी तत्त्वके घरमें पुनरुक्त हो तो अवश्य नपुमक उत्पन्न होगा 'पुनरुक्त' जो खण्ड कार्यकारी प्रम्तारमें है वही किमी दूसरे घाम भी दो उसे पढ़ते है ॥ १२ ॥ अथान्यतकारणवक्ष्येसंख्यायांयवनोदितम् ॥ पचमस्थस्यखण्डम्ययत्मल्यापुनरागतिः ॥६३॥ तत्सम्यासततिस्तत्र पहियावो मुतोद्भव ॥
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भाषाटीकासहित ।
(६९
'आप्ये कन्यागर्भपातः पार्थिवे चेदलान्वितम
॥ ६४॥ शुभंयोषिजनिभृमावेवंज्ञात्वावदेबुधः ॥
प्रकारान्तरम्-नचेत्तत्पुनरुक्तस्यात्तदातस्याब्दहा-
लयात् ॥६५॥ यावत्संख्याशरांता स्यात्
सन्ततिस्तावती भवेत् ॥ पुंस्त्रीभेदः पुरोक्तः स्या-
दितिरम्लज्ञभाषितम् ॥ ६६ ॥
टीका- अब संख्या बताने में यवनोक्त और कारण कहताहूं कि,
पंचम गृहस्थित खंडकी जितने स्थानमें पुनरुक्ति हो अर्थात जितने
घरमें प्रस्तारमें वही शकल आवे उतनी संख्या संतान कहनी जैसे
१ में हो तो संतान १० में हो तो१० संतान. इसमें यह विशेष
है कि,वह खंड अग्नि वायुतत्त्व की हो तो पुत्र होगा, जलतत्त्वकी हो
तो कन्या,पृथ्वी तत्व की होतो गर्भपात और पृथ्वी तत्त्व बलवान
शुभ होतो कन्या होगी, ऐसे पृथ्वीतत्त्वको विचारके पंडितने कहना
इसमें प्रकारांतर भी है कि, यदि वह बालक प्रस्तारमें पुनरुक्त न
हो तो वह अब्दहालयमें जिस घरमें हो वह अब्दहके प्रस्तारकी
पांचवीं शकलसे जितनी संख्यापर हो उसके उतनीही संतान
होंगी. पुरुष और स्त्रीका भेद पहिलेकाही कहा जानना यह रमल-
ज्ञोंका कहा है ॥६३-६६॥
तत्रैव कालमाह।
युवीयैदिवसेनक्तंबलरात्रौचसन्ध्ययोः ॥ सवले.
पञ्चमेखण्डेतजनिनिश्चितंवदेत् ॥ ६७ ॥ तत्रापिन
वमाईस्य तत्रिकोणस्य वा तनौ॥ आयुर्ज्ञाने तु
स्वल्पदीर्घायुषोःप्रश्नसन्तानस्यास्तपञ्चमौ॥६८॥
(७०) रमलनवरत्न गुण्यौवजनितेसौम्येपुनरुत्तेशुमे गृहे ॥ दीर्घ जीवी तथामध्येमध्यायुरशुभेऽल्पकम् ॥ ६९॥ टीका-वह शकल दिवाबली हो तो दिनमें रात्रिवली हो तो रात्रिमें और सन्ध्याबली हो तो सध्यामें जन्म पचम खडसे निश्चय कहना ऐसेही शकल बलसे सभी प्रश्नोंमें दिन रात्री कहनी ॥ ६७ ॥ इसमें और भी विचार है कि, प्रस्तारमें नवम खडकी जो राशि है वह राशि जन्मलम होगा । अब सन्तानका आयुर्ज्ञान कहते हैं कि, सतानके अल्पायु दीर्घायु प्रश्नमें सातवीं पांचवीं शकल गुणके जो शकल हो वह शुभ हो तथा उस प्रस्तारमें पुनरुक्तभी हो तो दीर्घायु होगा वह शकल मध्यबली हो तो मध्यमायु और हीनबली अशुभ हो तो अल्पायु होगा ॥१८॥६९ ॥ अप धनाढया निर्दना दाति प्रमे। किंवादरिद्रात्वथवाधनाढ्यामेसन्ततिः स्यादिति पृच्छते तु ॥ पञ्चाष्टयोगोस्यशरेन्दुयुक्त्याजाते शुमेरिधनां वदेत्ताम् ॥ ७॥ तस्मिन्समेमध्य धनाऽशुमेस्यादत्यल्पवित्ता पुनरुक्तियोगात् ॥ मुखन सौम्ये ह्यशुमे च कष्टात्तज्जीवनं पूर्वमुनी- श्वरोक्तम् ॥७१॥ टीका-वह सतति दरिद्री वा धनान्य केसी दोगी? ऐसे प्रश्नमें पचमाष्टम खडोंको गुणके जो शकल हो उससे १५ वीं शकलका गुणके एक खंड उत्पन्न करना यह शुभ हो तो सतान बहुत धन- वान होगी॥७०॥ सम हो तो मध्यम धन और अशुभ हो तो थोडा वित्तवाली होगी इसमें भी पद शकलपस्त पुनरुक्त हो तो भाषाटीकासहित। (७१) धन सुखसे आवेगा सौम्य होने में भी सुखसे और अशुभ हो तो कष्टसे जीवन होगा यह पूर्व मुनीश्वरोंने कहा है ॥७१ ॥ स्याद्रोगिणो गेहमथाद्यमुक्तं षष्टरुजस्तुर्यमथौष धस्य ॥ वैद्यस्य चाकाशमरोगिताया रौद्रतथा दीर्घरुजस्त्विनाख्यम् ॥ ७२॥ द्वितीयमासामित मौषधस्यकुत्रापितन्वादिगृहेषुसौम्ये ॥ तत्तच्छुभं वाच्यमतोन्यथात्वेस्यादन्यथावीर्ययुतेविशपात्७३ टीका-अब छठे भावमें विशेष विचार कहते हैं कि, प्रस्तारमें प्रथम घर रोगीका कहा है ऐसेही छठा रोगका चौथा औषधीका दशम वैद्यकाआराम होनेका एकादशवॉ और दीर्घ रोगका बारहवाँ घर कहा है ॥ ७२ ॥ किसीके मतसे दूसरा एवं दशम औषधीके कहे हैं इन लग्न आदि घरों में शुभ शकल हों तो उन उन स्थान सम्बंधि कार्य शुभ होंगे इसके विपरीत हों तो फलभी विपरीत कहना इसमेंभी बलाबल विचारसे विशेषता है ॥ ७३॥ सामान्यमेवंप्रविचार्यवाच्यं भूयोविशेषप्रवदामि तुर्ये ॥ सदाखिलंसाबितमत्रयोग्यसमुन्कलीवंशु भखारिजंच॥ ७४ ॥ षष्ठेद्रुतं रोगहरसुखेनपापे च तत्क्लेशविलंबिताभ्याम् ॥ स्यादाखिलरोगविवृद्धि हेतुस्तत्तुल्यमत्रास्तिचसावितार्द्धम् ॥ ७५॥ आ- ग्नेयादिषुखण्डेषुषष्टस्थेषुक्रमाद्वजः ॥ पित्तवातक- फोद्भूतास्तथाजीर्णोद्भवागदाः ॥७६॥ रुधिरास्थ्नो- विकारेणत्वगस्थ्यन्तर्गतं क्षतम् ॥ पार्थिवेऽपिच विज्ञेयं रिपौ वह्नयादिख तथा ॥ ७७॥ ॥
(७२) रमलनवरत्न- टीका-यह विचार सामान्यतासे कहाहै अपनी दिसे विधारके फहना, अब विशेष कहते हैं कि, चौथे घरमें दाखिल और खारिज शकल शुम होती है और छठेमें शुभ मुन्कलीप अथवा शुभ खारिजा७४॥ होतो सुखपूर्वक शीघ्रही रोग इट जायगा,यदि पाप शकल वे मुन्कलीव वा खारिज होतो कटपूर्वक विलबसे आराम होगा जो दाखिल शकल होंतो रोग बढनेका हेतु होता है ऐसेही यहाँ साबित शकलमी रोग बढानेवाली जाननी ॥ ७५ ॥ छठे स्थानमें अग्नितत्त्व आदि जैसे खडहों वेसेक्रमसे पित्त वात कफ और अजीणंगेगोत्पत्ति कहनी ॥७६॥ और पृथ्वीतत्त्वमें इतना विशेष है कि, रुधिर विकार, हड्डीका विकार, त्वचा और हडीपर चोटका विचार छठे मापसे जानना ऐसेही अग्नि आदि तत्वोंमें रोग विचार दशमस्थानमें भी करना यह मतांतर है ॥ ७७॥ रोगिणो जीवनमरणशाने । रोगिजीवितमृत्यर्थेप्रश्नेतनुरिपूद्भवम् ॥ सौरस्य चबुधस्यापि रोगिणोमृत्युकृद्भवेत ॥७८॥ अन्यखण्डेनरुणस्यमृत्युच्योविचक्षणः ॥ आद्यतार्तीययोर्जाते खण्डेप्येवस्मृतवुधैः ॥७९ ॥ टीका-अब रोगीके जीने मरनेके प्रश्नमें प्रथम और छठेके गुणके जो शफलहो वह शनिकी हो तो अवश्य रोगी मरजायगा ऐसेही पुधकी मी मृत्युकारक होती है ॥७८॥ अन्य ग्रहोंकी शकल होतो रोगी नहीं मरेगा ऐसा चतुर रम्मालने कहना ऐसेही पहिले और तृतीय शकलके योगसेमी फल विद्वानोंने कहा है।॥ ७९ ॥ (अप सप्तमे विशेषतमोरमश्ननिरूपणम् ।) सप्तमेचरहे चौरप्रश्नं वक्ष्ये विशेषतः। नकीहम्रात वेखारिज्कन्जुल्खारिजकानचेत् ॥८०॥ + भाषाटीकासहित। (७३) प्रस्तारे स्युनचौरेणहृतस्याहस्तुतद्गृहे ॥ सत्येष्वेकतमेवापि वस्तु चौराहृतं वदेत् ॥ ८१॥ टीका-अब सप्तम घरमें विशेष चौरीके प्रश्नका विचार कहता हूँ कि,, नकी-हुम्रा = अतवेखारिज कब्जुलखारिज शकल प्रस्तारमें न हो तो॥ ८० ॥ चोरी नहीं हुई गया द्रव्य घर हीमें है यदि इन चार शकलोंमें कोईभी प्रस्तारमें हो तो चोरने वस्तु हरण करी कहनी ॥ ८१॥ चौरः स्वकीयः परकीयो वेति ज्ञाने । द्विघ्नरेखांकसंयुक्तबिन्दैक्यवह्निभाजितम् ॥ एका- दिशेषतः स्वीयः पार्श्वस्थोदरदेशजः ॥ ८२॥ अन्यच्च-तनुतुयॊसप्तनृपौहत्वाहावेकमेतयोः ॥ कुय्यात्तत्साबितचेदादाखिलग्राममध्यगः॥८३॥ खारिजेचबहिर्जातोमुन्क्लीवेगमनोद्यतः ॥ ८४॥ टीका--चोर अपना है वा दीगर (पर )है! ऐसे प्रश्नमें प्रस्तारमें संपूण बिंदुओंका जोड करना तथा जितनी समस्त रेखाहैं उनको दूना करके बिन्दुयोगमें जोड देना “दोबिन्दुसे एक रेखा उत्पन्न हुई है इसलिये यहाँ रेखाके दो अंक लिये जाते हैं"सबका योग(जोड) जोहो उसको तीनसे शेष करना जो एक शेष रहेतो चोर अपना मनुष्यहै दो शेष रहे तो पडोसी (नजदीक रहनेवाला व संबंधी)है यदि तीन बचे तो परदेशी चोर जानना॥ ८२॥ अब और विचार चोरकी स्थितिमें है कि, पहली चौथी और सप्तम सोलहवीं शक- लोंको मिलायकै दो शकल बनावै तब उन दोकी भी एक बनाए वह शकल साबित अथवा दाखिल होतो चोर ग्रामहीमें वे बाहर नहीं गया खारिज होतो ग्रामसे बाहर चलागया है और (७४) रमलनवरत्न- मुन्कलीव होतो प्रामसे बाहर नहीं गया किंतु जानेको तय्यार है जानना ।। ८३ ॥ ८४॥ चौरस्पित्पादिज्ञाने। चौरः स्यात्कनुतहासः केपांचसन्निधोहरः ॥ इति प्रश्नेष्टमेहीन्दोशपंचेन्दुखण्डके ॥८५॥ पूर्वस्थवि- न्दूरेखामिः कुर्यादेकंततस्तनौ ॥ स्यान्चेस्वकीय स्वगृहेतिष्ठतीतितदावदेत् ॥८६॥ धनेसम्बन्धिपाव- स्थस्त्रयेवंधस्तदालये ॥ सुहृद्भ्रातृमगिन्यश्व पिता ब्धौवातदंतिके ॥८॥दूतवेश्यानर्तकेष्टकलागुणवतां सुते ॥ दासातवैरिणांपप्टेदायादैणीदृशांतगे॥ ८॥ मार्गाद्यातिप्रेत्यमुजामिंद्रजालकृतांमृती ॥ तापसा तिथिमार्गस्थास्तपार्श्वस्थोनवालये ॥८९॥ नृपा णांश्रेष्ठपुंसांवात्वधिकारवतांखमम् ॥ मित्राणांच तथाप्तानां भवेस्याद्वादशेपिच॥९० ॥ टीका-चोर कौन कहीं ठहराई किसके समीप रहताहै ऐसे प्रश्न में ८।१२। १४ । १५ वीं शकलोंके ऊपर २ भागके बिन्दुरेखा यथाक्रम लेके एक शकल बनावे ॥८॥ पूर्वस्थ बिन्धुरेखाओंसे बनी शकल प्रस्तारमें देखनी कहाँ ठहरी है जो यह प्रथम घरमें होतो चोर अपना मनुष्यहै अपने घरमें ठहरा है ।। ८६ ।। दूसरे घरमें होतो अपना सबधी वा पडोसी चोर वा उनके घरमें निकासपोरका है ऐसेही तीसरेसे माई मित्र गोत्री या बहिन चौथे घरसे पिता या उसके पास रहनेवाला या चाचा ताठ दादा इत्यादि ॥८॥पचमसे दूत (प्यादा ) वेश्या नाचनेवाले वेलकूदके गुणी लोगोंमेंसे छठेसे दास दासी शव सातवेसे हिस्सेदार और स्त्रीजन ॥ ८८॥ आएमसे 1 भाषाटीकासहित.। (७५) मार्गमें लूटनेवाले डाकू इन्द्रजाली, वाजीगर आदि; नवमसे मार्गमें स्थित तपस्वी अभ्यागत उनके समीप, दशमसे राजा आदि श्रेष्ठ पुरुष वा अधिकारी मनुष्य, ग्यारहवेंसे मित्र पंडित मंत्री आदिके घरमें चोर है ॥ ८९ ॥ ९ ॥ बंधस्थनीचवृत्तीनां जनवैनिद्रयकारिणाम॥गृहे चौरस्थितिर्वाच्या बुद्धयाचालोच्य सर्वदा॥९१॥ विश्वादिगेतिदूरस्थोदेशांतरगतो भवेत् ॥ प्रश्ने- चतद्दलाभावेवदेहाशकुनालयात् ॥ ९२ ॥ गृह वृत्तिकृतोवापिगृहोक्तप्राणिनस्तथा॥ विज्ञेयास्त- स्करान्नंतदंतिकजनास्तथा ॥ ९३ ॥ दूरांतिक- गतिस्तस्यधर्माग्नौखारिजाद्भवेत् ॥ उभयत्रवला धिक्यात्स्वग्रामेचोभयोर्नचेत् ॥ ९४॥ टीका-बारहवें घरसे कैदी नीचवृत्ति और लोगोंकी निद्रा भंग करानेवाले चौकीदार सिपाही आदिकोंके घरमें चोरकी स्थिति कहनी विशेष अपनी बुद्धिसे विचारके सर्वदाही कहना ॥ ९१ ॥ तेरहवें आदि घरमें वह शकल पड़ी होतो अति दूरस्थ चोरहै और दूसरे देशमें चला गया होवै यदि प्रस्तारमें वह खण्ड किसी घरमें भी न होतो शकुनालयकी संख्या गृहकी जानके उससे कहना ॥१२॥ इस प्रकार जिस घरसंबंधी चोर जानागया वा ऐसा नहीं वही चोरहै उस उसके घरमें रहनेवाला अथवा उससे पालित वा उसका सम्बन्धी वा उसका पडोसी तस्कर जानना ॥९३॥ चोर दूर चला गया वा समीपहै ऐसे विचारमें नवमस्थानमें खारिज शकल होतो दूर चला गयाहै और तीसरे घरमें खारिज शकल हो तो समीपके देशमेंहै यदि दोनहूं घरोंमें खारिज शकल हो तो जिसका बल (७६) रमनपरल- अधिक हो उसका फल कहना यदि १३ दोनोंहीमें खारिज शकल नहो तो अपनेही ग्राममें चोरहे कहना ॥ ९ ॥ बोरगतो विग्ज्ञानं गृहदारंप। यद्दिश्यदशमखण्डंगतिश्योरस्यतदिशि ॥ तस्करस्य गृहद्वारं नवमाच्छकलादेत् ॥ ९५ ॥ टीका-चोरके गमनमें दिशा और चोरके घरका द्वार कहते हैं कि,वस्तारमें दशम खण्डकी जो दिशा है उस दिशामें चोर गया है और नवम खण्डकी जोदिशा है उस दिशामें चोरके घरका दर- वाजा है कहना ।। ९५॥ अप सभीपस्ये स्वमामस्मे षा बोरे मार्गमानम् । कियघ्रगतश्चौरः प्रश्नेत्वेवंविधकृते ॥ विज्दहे पूर्वखण्डकितुल्यमध्वानमादिशेत् ॥९६॥क्षेत्रा दियोजनांतत्रकल्पनास्वमनीषया ॥ धनिचौरी यदेकत्रस्यातांचेत्तद्ग्रहांतरे ॥९७॥ कत्योकांसी तिपृच्छायांपञ्चपदसप्तनंदके ॥ निरेखाकाऽब्द- हांकसंख्यापंचाईसंख्यया ॥९८॥ भाज्यः शेषां कतुल्यानिगृहाणिधनचौरयोः ॥ गृहं ग्रामश्च दे- शाश्च सर्वमेवं विचारयेत् ॥ ९९॥ टीका-चोर समीपहो अपनेही माममें होतो उसके रास्ताका माप कहते हैं चोर कितने दूग्गया ऐसे प्रश्न हुएमें विज्दह क्रममें पूर्वोक्त नवमखण्ड देखना कि उस नवम खडका और विदह क्रमके घरके अकका जितने घरोंका फासला है उतनाही मार्गका प्रमाण कहना ॥ ९६॥ खेतसे लेकर योजन पर्यंत न्यूनाधिक कल्पना अपनी बुद्धिसे फरनी,धनी और चोर एक माममें हैं तो उनके घरोंके भाषाटीकासहित । (७७) बीच कितने घर हैं और वे अन्य ग्रामोंमें हैं तो उनके बीच कितने ग्राम हैं ऐसे विचारमें ॥९७॥ प्रस्तारके ५६७९ घरोंके शक- लहों उनके शून्योंकी और रेखाओंकी संख्याको अब्दह पंक्तिके क्रमसे करके जोडै यहां रेखाओंकी शून्य दूनी लेनी अर्थात् रेखाके स्थानमें अब्दह क्रमके अंक मिले हों उनको दुगुना लेना फिर उन सबको इकट्ठाकरके प्रस्तारके पांचवीं शकलके ( उसी प्रकारसे बनाये) अंकसे भागदेवै तब जितने अंक शेषरहैं उतनेही घर वा ग्राम धनी और चोरके घरोंके वा अन्तरमें जानने इसीप्रकार गृह ग्राम देश आदि विचारने ॥९८॥ ९९ ॥ अथ दूरगते चौरे धनिचौरांतरालस्थप्रामादिमानमाह । यदादूरगतश्चौरस्तत्रयुक्तिवदाम्यहम् ॥ चंद्रो १ वही३रसाश्चाज्ञातिथिःप्रकृतिरुत्कृतिः॥ १०॥ षटत्रिंशत्पंचवेदाश्चपंचेष्वर्तुरसास्तथा ॥ नागा- ब्धयःकुनन्दाश्चपंचशून्यदवस्तथा ॥१॥ विय- दुद्दीन्दुरसस्त्रीन्दुविज्दहक्रमतोध्रुवाः ॥ प्रश्ने तु शैलनागाशाखण्डानामंकसंस्थितिः ॥२॥ पंचाष्टांकाप्तावशेषैामाः स्युर्द्धनिचौरयोः ॥ विशेषमत्र कथितं दूरगस्य हरस्य च ॥ ३॥ टीका-जब चोर दूर गया होतो धनी और चोरके बीच कितने ग्राम हैं इसमें कहते हैं बिज्दह क्रममें १ से १६पर्यंत कर्णक्रममें जो अंक लिखे हैं अर्थात् ११३।६।१०।१५।२१।२८।३६।४५।५।६६ ७८१९१।१०५।१२०॥३३६ ये अंक हैं इसीक्रम करके प्रस्तारकी दशवीं आठवीं सातवीं शकलोंके अंकोंका जोड करना फिर ऐसेही प्रकारसे प्रस्तारमें जो पांचवीं और आठवीं शकलं है उनके अकोंको - (७८) [ रमलनपरले- जोटके इससे भागदेवे तब जो बाकी अक रहैं उतनेही आम चोर और धनीके मध्यमें हैं यह विशेषता करके दूरस्थित चोरका मार्ग मान कहा है ॥ १००-१३० ॥ चौरस्वरूपज्ञाने। चौररूपंजगादास्यचान्दहालयगादलात् ॥ जातिवर्णाकृतिस्यादिस्वभावाद्यखिलवदेत् ॥ ४॥ टीका-चोरके रूपादि जानने के लिये प्रस्तारमें सातवें घरकी शकल अब्दह कमके जिस घरमेंहो उतनी सस्थाके प्रस्तारके घरमें जो शकल हो उसके अनुसार चोरकी जात रग आकार स्त्री पुरु पादि पूर्वोक्त सज्ञा प्रकारोक्त कहने ॥४॥ लामालामप्रश्ने । धनायोतनुशकाख्योहत्वाद्वेचेकमेतयोः।। कुय्या त्तद्दाखिलचेतिवयाजहतवस्तुनः॥५॥शीघ्रलामो न्यथानैवतिथ्युल्कायांविपर्ययः॥दाखिलसावित सोम्यधनेचेदखिलाप्तिकृत् ॥६॥ मुन्क्लीवेचाशुमे वित्तमदलभ्यनखारिज॥ अष्टमेखारिजेचाराद्ध नमन्यत्रगच्छति ॥७॥ एवंचीरस्यपृच्छार्या भेदा. प्रोक्ता सुसप्तम ॥ स्वर्णकय॑मराश्चवविधि नानेनलक्षयेत् ॥ ८॥ तेषां भौमस्य खण्डाभ्यां समव सविचित्य च ॥ संवदेशिकालज्ञ शेप मत्रापि पूर्ववत् ॥९॥ इति सप्तमविशेष । टीका-चोरित द्रव्य मिलेगा वा नहीं ऐसे प्रश्नमें २।३१ और 91१४ खण्डोंको मिलायके दोशकल फिर उन दोकीभी एक बनाये भाषाटीकासहित । (७९) वह दाखिल हो अथवा बयाज हो तो गयी वस्तु शीघ्रही लाभ होगी और प्रकारसे न होगीतथा १५३ घरमें उक्ला हो तोभीलाभ न होगा और यदि दूसरे घरमें दाखिल साबित सौम्यखण्ड हो तो चोरित धन पूरा मिल जायगा॥५॥६॥सुन्कलीब हो अशुभ होतो आधा द्रव्य मिलेगा खारिज हो तो कुछ नहीं मिलेगा अष्टम घरमें यदि खारिजशकल हो तो चोरीका माल चोरकेपासमी नहीं रहा अन्यत्र चला गया ॥७॥ऐसे भेद चौर विचारमें सप्तम स्थानसे कहे हैं सुवर्ण बनानेवाले (रसायनी) और देवताओंकोभी इसी प्रकार देखना कि, किस देशमें किस ग्राममें किस घरमें हैं॥८॥सोमंग- लकी शकलोंसे है वा नहीं है ऐसा संभव विचारकर कहना देशका- लके जाननेवालेने अपनी बुद्धिसे विचारके कहना और शेष सब बात चोरके उक्तवत् विचारनी ॥ ९ ॥ अथाष्टमे विशेषः। ममर्णमुक्तिस्त्वथवापि वृद्धिः साम्यंचवास्यादिति चिंतयेज्ज्ञः ॥ आद्यगृहेकब्जुलदाखिलंस्याडनेऽ तवेदाखिलमष्टमेतत् ॥ ११० ॥ तदर्णमुक्तिस्त्व- रितंधनाष्टेसत्खारिजेसाचिरकालतः स्यात् आद्याक्षितार्तीयगृहेषु हुम्रांकिशोकलारद्धिरतो- ऽन्यथा स्यात् ॥११॥ टीका-अब अष्टम भावमें विशेष कहते हैं कि, मेरे ऊपरका ऋण छूट जायगा वा बढेगा वा ऐसे ही रहेगा ऐसे प्रश्नमें पंडितने विचारना कि, जो प्रथम घरमें कब्जुल दाखिल शकल और दूसरे घरमें तथा आठवें घरमें अतवेदाखिल हो ॥११०॥ तो शीघ्र ऋण उतर जायगा जो २८ घरोंमें शुभ खारिज हो तो बहुत दिनोंमें (८०) रमलनपरल- करजा उतरेगा यदि प्रथम घरमें हुम्रा दूसरेमें अकीश तीसरेमें उक्छा होतो ऋण बढेगा ।। ११ ॥ अप नवमे विशेषः। तबविदेशगतस्य जीवनमरणज्ञानम्-वाय्वान्यो- जीवितानिस्युर्मुतानिचधराम्बुनोः ॥ खानित- च्छेषतोवाच्यफलकष्टतुतत्समम् ॥ १२॥ तत- स्तिथ्यतविन्द्वक्येजीवेन्नष्टो रदाधिके ॥ रदाल्पे च मृतः कष्टी रदतुल्योविशेषतः ॥ १३ ॥ आद्येच नवमेखंडेशुमेनुचिरजीवितः ॥ विपरीतेन्यथावा च्यफलंपुंसिविदेशगे ॥१४॥ टीका- नवममें विशेषतः परदेशगयेके जीते मरेके प्रश्नमें प्रथम और नवम घरमें वायु तथा अमितत्त्वके बिन्दु हों तो जीवित और पृथ्वी तत्त्व तथा जल तत्त्वके हों तो मृत जानना और प्रथमसे पनवें घरपर्यंत जितने विन्दु हों सबको जोडके ३२ से अधिक हों तो जीवित, ३२ से कम हों तो मर गया और ठीक ३२ ही हों तो अत्यन्त कष्टमें है जानना । इसमें यह भी स्मरण रखना चाहिये कि, प्रथम एव नवम शकल शुभहों तो वह मनुष्य बहुत दिन जियेगा विपरीत, फल भी परदेश गये मनुष्यको विपरी- तही कहना ॥ ११२-११४॥ दशमे वाधिनोजेयपराजयो। अथप्रष्टुर्विवदतोराचंगेहचसप्तमम् ॥ द्वितीयस्य नृपस्यापिगृईस्यादशमं तथा ॥ १५ ॥ नृपखण्ड स्ययद्योगाच्छु खण्डअदृश्यते ॥ तज्जयः सधि- रुमयोः साम्यस्याद्वलवजयः ॥ १६ ॥ पराजयः
भाषाटीकासहित ।
(८१)
पापखंडेवादिनोईनधामगौ ॥ हानिलाभप्रदौ
स्यातांक्रमात्खारिजदाखिलौ ॥ १७ ॥ यद्योगा-
द्यादिखण्डाभ्यां शुभं तस्माचतजयः ॥ पापेपरा
जयश्चैव विमृश्य प्रवदेत्सुधीः॥ १८॥
टीका-अब दशम भावमें लडनेवालोंकी जीत हारका विचार
है कि विवादवालोंमें पूछनेवालेका प्रथम घर दूसरे वादीका सप्तम
स्थान और राजाका दशम स्थान जानना ॥१५॥ राजाके खण्डमें
जिसके खण्डका योग करनेसे शुभ शकल हो उसकी जीत कहनी
जैसे १।१० के योगसे शुभ शकल आवै तो पूछनेवालेकी और
१०१७ के मेलसे शुभ आवै तो दूसरे की विजय होगी, यदि दोनहूँ
शुभ वा अशुभ हों तो संधि ( राजीनामा) होगा अथवा जिसका
बल अधिक हो उसकी जय कहनी ॥ १६॥ जिसके पाप शकल
हो उसकी पराजय जिसके धन स्थानमें खारिज शकल हो उसकी
धनहानि जिसके दाखिल हो उसका धनलाभ होगा।॥ १७॥ सप्तम
आदि जिस खंडके योगसे शुभशकल आवै उसके सहायतासे जय
और पापखण्ड जिसके संमेलसे आवै उसके संबंधसे पराजय (हार)
होगी ऐसा विचारके बुद्धिमानने प्रश्न कहना ॥ १८॥
अथ भोजनचिंता तत्रादौ तत्त्वरसानाह.।
मिष्टो वह्निः क्षीरभेदाः समीरआप्यं मूलं की-
तितं वा फलायम् ॥ रूक्ष चूर्ण पार्थिवं खंडमत्र
मुख्यं भोज्यं ज्ञेयमाकाशखण्डात् ॥ १९॥ भुक्तं
न भुक्तं च मयेति प्रश्ने नृपाईकं पापमथारि-
गेहे ।। तथा न भुक्तं च तथा कृताशं विपर्यये-
ऽस्मात्प्रवदेन्मनस्वी ॥ १२०॥
(८२) रमलनवरत्न- टीका-अब भोजन प्रश्नमें प्रथम रस कहते हैं कि, अमितस्वसे मीठा, वायुतत्त्वसे दूधके भेद दधिषी माषा आदि,जलतत्त्वसे कर मूल वा फल आदि, पृथ्वीतत्त्वसे रूखा चूर्ण सब आदि जानने मुख्य भोजनका पदार्थ यहां मुख्य आकाशखडसे जानना ॥ १९॥ मैंने भोजन किया है या नहीं ऐसे प्रश्नमें प्रस्तारके दशम वा छठे घरमें यदि पाप शफल होतो भोजन नहीं किया जो इससे अन्यथा हो तो मोजम करलिया है जानना।।१२० ॥ पहिस्खण्डनृपेचत्स्यात्पुनरुक्तं गृहे स्वके ॥ केवलं चेक्षवं मुक्तं दधिक्षीरान्वितं भवेत् ॥ २१॥फला- द्यान्वितमाप्येस्याच्चूर्णाद्यादयश्चपार्थिवे ॥ एवं वाय्यादिखण्डानां पुनर्वयादिकालये ॥ २२ ॥ तत्तद्विमिश्रितं वा स्याइद्विन्यायेदित्रियुक्तथा । यदान पुनरुकं स्यात्तदा तद्वविन्दुमिः ॥ २३ ॥ तत्तहिमिश्रित खस्थेजत्मासर्वरसान्वितम् ॥ अथचान्यत्प्रकारेण प्रवक्ष्ये भोज्यमत्रहि ॥२४॥ टीका-दशमस्थानमें यदि अमि तत्त्वकी शकलदो और पुन रुतमी अपने घरमें हो तो केवल ईखका विकार पीनी मिश्री आदि दूध दहीके साथ खाया है ॥२१ ॥ जलतस्व हो तो फल आदिसे सयुक्त मीठा खाया है पृथ्वीतत्त्व होतो मीठा सयुक्त संजूषा आटेके पदार्थ खाये हैं ऐसेही वायु आदिखड फिर अग्न्यादि घरोंमें पडे हों तो उन उनके उक्तरस मिले हुये कहना ॥ २२॥ तैसेही दो तीनकी प्राप्तिमें दो तीन प्रकारके भोज्य कहने जो उक्त शकल प्रस्तार पुनरुक्त (दूसरीजगे) न होतो उसके बिन्दु जिस जिस तत्त्वके हों उसके मित्र मोज्य जानना ॥२३॥ यदि दशम घरमें भाषाटीकासहित । (८३) इज्जत्तमा हो तो सभी रसोंसे युक्त विचित्रभोज्य कहना। अब यहाँ और प्रकारसे भोज्य कहा जाता है ॥२४॥ सतैलकटुकं सौरे चान्द्र च लवणान्वितम् ॥ शाल्योदनं तथा भौमे तिक्ताढयंचणकोद्भवम्॥२५॥ मौद्गसर्वरसं सौम्येसेक्षुगोधूमजं गुरौ ॥ साम्ल यवोद्भव काव्ये माषकाषाययुक्शनौ ॥ २६ ॥ राहुकेत्वोस्तथादेश्य भोज्य खण्डे नभस्थिते॥२७॥ टीका-दशम घरकी शकल सूर्यकी होतो तिल,तेलयुक्त कटुक- पदार्थ, चन्द्रमाकी होतो सलोना, मंगलकीसे भात और चनेकी (तिक्त तीखेवस्तु)॥२५॥ बुधकीसे मूंग आदिका सर्वरस, बृहस्प- तिकी होतो मीठा और गेहूंका पदार्थ,शुक्रकीसे जौका पदार्थ खट्टा रस सहित, शनिमें उडद और कढी आदि जानने ऐसेही राहुकेतु- केसे भी शनितुल्य कहना इस प्रकार दशम घरमें जिस ग्रहकी शकल है उसका भोज्य कहना ॥२६॥२७॥ अथ लाभे विशेषः। ममाशा पूर्णतामेति न वेति प्रश्नसंभवे ॥ तन्वाया वाद्यशक्रौचहत्वाहेचैकमेतयोः ॥२८॥ कार्य च तद्गृहे तस्य गृहस्याशास्मृताबुधैः ॥ न प्रश्ने तद्दलचेत्स्यात्तदाशानैतिसिद्धिताम् ॥ २९॥ सौम्या सौम्यःपुरावस्यादाशाचशकुनालयात्।३०॥ टीका-अब ग्यारहवें घरमें विशेष है कि, मेरी आशा पूर्ण होगी वा नहीं ऐसे प्रश्नमें प्रस्तारके पहिली तथा ग्यारहवीं और पहिली चौदहवीं शकल क्रमसे गुणके दो शकल बनावै तब दोकी एककरके
(८४)
रमलनवरत्न-
देखे कि, वह शकल प्रस्तारमें हैं तो आशा पूर्ण होगी प्रस्तारमेन
होतो आशा पूर्ण नहीं होगी यदि प्रस्तारमें है तो जिस घरमें पड़ी
हो उसी घर सबधी आशा जाननी ॥२८॥ २९ ॥ उसके शुमा-
शुभ विचार पूर्ववत करके शकुन क्रमसे आशा प्रश्न कहना।।१३०॥
अय ध्यये विशेषः।
हादशे बंधमुक्तिस्तु विशषणोच्यतेऽधुना ॥
द्वादशे खारिजे वंध मुक्तिः स्यान्नचदाखिले॥ ३१॥
समीतिस्थिरतो वाच्या मुन्क्लीवे बंधन पुनः॥
खारिजेऽब्धौव्ययेवापितिथ्युल्कायांन मोचनम्॥३२॥
स्थानान्तरे गतिस्तत्र मृत्युरेव न सशयः ॥
एवं तन्वादिभावानां विचारः कथितोमया ॥१३३॥
इति रमलनवरत्ने भावप्रश्नकथन नाम पञ्चम रलम् ॥ ५॥
टीका अव वारहवें भावमें वघन ( कैद आदि) से छूटनेका
विचार विशेप यहाँ कहा जाता है कि, बारह घरमें यदि खारिज
शकल होतोबधनसे छूट जायगा दाखिल हो तो नहीं छूटेगा॥३॥
जो वह खण्ड स्थिर होतो भय होकर छूटेगा मुन्क्लीव होतोछूटके
फिरभी बधनमें पडेगा और चौथमें तथा वारहमें खारिजशफल
और पद्रहवेमें उल्का होतोवधनसे नहीं छूटेगा ॥३२॥ एक जगहसे
दूसरी जगा चला जायगा और नि सदेह मरभी जायगा इस प्रकार
तनु आदि भावोंका विचार मैंने कहा है ॥ १३३ ॥
इति रमलनवरले माहौधरीमापार्या भावपश्ननिरूपण
नाम पश्चम रत्नम् ॥ ५॥
भाषाटीकासहित । (८५) अथ षष्ठे अखिलप्रश्नष्ववधिज्ञानम् प्रश्नगेहं स्वसंख्यन्नं स्वाङ्केनाढयं तदर्धकम् ॥ यावत्स्याविज्दहागारे स्वस्मिन्खण्डेऽवधिर्भवेत् ॥१॥ प्रस्तारे स्वगृहाभावे पुरःपृष्ठे च विज्दहात् ॥ शोध्यं योज्यं च हित्र्याचे पुनरुक्तेप्ययं विधिः॥२॥ कुर्याद्यसिद्धमङ्कं स्यात्प्रश्नकालावधिस्तु सः ॥ तदत्रायुष्यचक्रोत्थतुल्यमकं भवेत्सदा ॥३॥ टीका-प्रश्नका घर अपनी संख्यासे गुण देना और विजदहोक्त अंक जोड देना उसके प्रमित जोखण्ड हो वह विजदहमें अपनेस्थान उसी घरोंमें हो तो वही अवधीजाननी । सारांश इसका यह है कि, प्रश्न घरमें जोशकल है वह विजदहपंक्तिमें अपने घर अर्थात् जितने घरमें प्रश्नमें हैं उतने ही घरमें विजदहमें भी हो तो उस विजदह पंक्तिके अंक समान समयमें कार्य होगा,विजदह पंक्तिके अंक पूर्वोक्त चक्रमें १।३।६।१० आदिकरणगत लेने जो १ से १३६ पर्यंत है जब प्रस्तारमें व विजदहमें खंड स्वगृही न हो तब विधि है कि, प्रश्न घरसे पिछले घरोंमें विजदहमें हो तो विजदहांकमें प्रस्तारोक्त प्रश्न घरकी संख्या घटाय देवै यदि प्रश्नघरसे आगेके किसी घरमें विजद- हमें हो तो विजदहांक संख्यामें प्रस्तारोक्त गृहसंख्यांक जोड देवेजब प्रस्तारमें वह खण्ड पुनरुक्त हो तो उसमें भी यही विधि करनी। यदि २।३ आदि घरोंमें पुनरुक्त हुई हो तो सब घरोंके अंकको ऐसेही गतमें हीन गम्यमें योग करना।यदिप्रश्न खण्डविजदहमें अपने घरमें न हो तो पहिले कहे आयुचक्रमें जहाँ प्रश्नकी शकल हो उसके नीचे प्रश्न घरके तुल्यकोष्ठक अंकको अवधि जाने. समझनेके सुगमार्थ यह अर्थ दुबारे लिखा इस प्रकार जो अंक सिद्ध बैठे वह प्रश्न समयकी अवधी जाननी। यहां सर्वदा पूर्वोक्त आयुष्यचक्र मिले अंकके तुल्य अवधी होती है ॥ १-३॥
(८६)"
। रमलनवरल-
सदक किस्पादित्याह।
अथोम्महान्तादि चतुश्चतुष्के नृपाप्तखण्डस्य च
पौनरुक्तिः ॥ घस्राश्च घसाद्रिकमासवर्षाः क्रमात
स्युरेते शकुनालयाहा ॥ ४ ॥ दिनादीनां च
नियमः प्रायशो विपलादि च ॥ आसन्नप्रसवादी
तु विपलानिपलानि च ॥ ५ ॥ घटिकाः प्रहरा-
श्वापि क्रमेणोत्यामनीषया ॥ दृष्टिप्रश्ने च वर्षायां
घटिकाश्च मुहूर्तकाः ॥६॥ प्रहरादिवसाश्चा-
पिवाच्या संभावनावलात् ॥ अय स्थूलो विधिः
सर्वप्रश्नानां परिकीर्तितः ॥७॥
टीका-प्रस्तारकी सोलहवीं शकल उम्महांत सज्ञक पहिले ४
घरों में हो तो दिनोंकी संख्याका वह अक जानना यदि पांच आदि
चार घर वनात सज्ञकोंमें हो तोसप्ताह (हप्ता)जानने,जो९ आदि
घर मुत्तछव सज्ञकोंम हो तो महीने जानने और १३ आदि ।
जवादातोंमें हो तो वर्ष जानने अथवाशकुन क्रमसे यह जानना॥४॥
दिन आदमियोका नियम विशेपत विपलादि नियमशीघ्र होनेवाले
प्रसव आदिमें पला विपला बताई जाती हैं॥६॥घडी पहर मी
कार्य समावना देखके अपनी बुद्धिसे देशकालादि विचारके कहना
ऐसेही वर्षाकालमें वर्षाप्रश्नकेभी घटीमुहूर्त अन्यदिनोंमें दिनादि
कहने ॥६॥ प्रदर दिवस आदि समावनाके पलसे कहने, जैसी
जिस वक्त समावना हो वैसाही विचार अपनी वृद्धिसे करना यह
स्यूल विधि समी प्रश्नोंकी कही है॥७॥
तदन्तरे पुन सूक्ष्माऽवधि वक्ष्ये विशेषतः ॥
तदथमुम्महाताख्यं लिखे.पंक्तिचतुष्टयम् ॥ ८॥
भाषाटीकासहित । ( ८७) । । अग्नि वायु वह्नयादिगतशून्यानां खण्डानामब्दहक्रमात् ॥ पृथगष्टाष्टसंख्यानां लिखेत्पंक्तिचतुष्टयम् ॥ ९॥ लह्यानहुम्रावयजां कीशानांतुचतुष्टयम् ॥ शुद्धोम्महांतसंज्ञं स्यात्कमेणाधगतं किल ॥ १० ॥ टीका-कार्यावधि निकसमें उस अवधिके आदिमें वा मध्यमें वा अंत्यमें कब कार्य होगा ऐसे विचारमें पुनः विशेषतासे सूक्ष्म अवधि कहते हैं कि, इसके लिये उम्महांतनाम ४ पंक्ति लिखनी ॥८॥ अग्निस्थानमें जिनके शून्य हैं उम्महातचक्रम्। ऐसे खण्ड अब्दहक्रमसे प्रथम शशादा६७८ पंक्तिमें लिखने । द्वितीयादि पंक्तियोंमें वायु आदि तत्त्वोंके खण्ड पृथक् ८। ८ लिखके EEEEEEE जल ४ पंक्ति लिख ॥९॥ लह्यान,EETE पृथ्वी हुम्रा, बयाज, अंकीश ये शुद्ध उम्महांत हैं प्रथम पंक्तिमें लिखने । ऐसेही क्रमसे ४ पंक्तियोंमें ८८शकल लिखनी ॥१०॥ अथ तत्प्रयोजनम् । चलद्वितीय स्वमथाक्ष चन्द्रादाद्याष्टखण्डांतरगामि यत्र ॥ प्रश्नेषुसाक्ष्यर्द्धमदस्तथास्मात्पृष्टाऽग्रनी- चोर्ध्वगतं क्रमेण ॥ ११॥ गत वर्तमानं भविष्य सुधीभिस्तथाकस्मिकं साक्षिखण्डं विलोक्य ॥ दलं यत्र सौम्यं प्रपश्यच्च कार्यमवध्यग्निभागे निजे सिद्धिद स्यात् ॥ १२॥ वह्निभागसमकालो विलोक्य पृष्ठगाबुधैः ॥ मिजाजस्वगृहाहाच्य- महाकायें नृपादपि ॥ १३ ॥ पंक्त्यादेम॑तिकालं . ।
(८८) रमलनरल- च शकलादष्टमावदेत् ॥ वर्तमान त्वष्टमस्य प्रथमाच्छकलावदेत् ॥ १४॥ भविष्य तूर्यपंकेश्व प्रथमापंक्तितो वदेत् ॥ आकस्मिकयथाद्याया' प्रथमावलिनो वदेत् ॥ १५ ॥ प्रकारोऽयं मया प्रोक्तः सर्वप्रश्नावधी परः ॥ कार्यसंभावनामादौ विचार्य निगदेवुधः ॥ १६ ॥ इति श्रीरमलनयरलेऽवधिकपन नाम पष्ठ रत्नम् ॥ ६ ॥ टीका-उम्महातका प्रयोजन है कि, पदहवें घरसे बिन्दु एकपा दो जैसे प्राप्ति हों चलकर प्रथमके सखण्डोंके बीच जहाँ पहुंचे वह खड प्रश्नोमें साक्षी जानना, बिन्दु चालन विधि पहिले कह आये हैं उस साक्षीके पीछे आगे नीचे ऊपर क्रमसे अवधिके अक लेने ॥शायद तीन प्रकार होते है कि, प्रथम प्रवर्तमान दूसरा मविष्य तीसरा (आकस्मिक) कहक स्वतः सिद्ध और अकस्मात् ऐसा मिश्रित विद्वानोंने फलमें देखना जहाँ सौम्य हो तहों कार्यसिद्धि जाननी जो शकल अग्निमागमें स्वगृही हो उससे कार्यविधिकी सिदि होती है प्रगट यह है कि, उम्महान्त नामके पक्तिमें साक्षि खह जिस घरमें हो उसी घरमें पूर्वपक्तिमें हो तो आकस्मिक यदि अपनी पक्तिमें पिछले घरमें हो तो भूतकाल और अपने आगे होये तो भविष्यफलका फल कहै ॥ १२॥ तहाँ भी अग्नि भागके समान पिछले घर होनेमें पडितोंने देखके कहना और मिजाज पक्किमें अपने घरमें हो तो उसी स्वगृहसे कहना जो बड़ा भारी कार्य हो तो दशम स्थानसे भी कहना ॥ १३ ॥ पक्तिके आदिमें भूतकाल आठवीं शकलसे कहना माठवींका वर्तमानकाल प्रथम शकलसे फहे अर्थात् इनके जिस भागमें आगेको ही शकल भाषाटीकासहित । (८९) न हो तहां सन्मुख भागकी अंतिम पंक्तिही आगे समझना और प्रथम पंक्तिको आकस्मिक काल बतानेवाली शकल चौथी पंक्तिमें जाननी अर्थात् इसके पूर्व भागमें नीचेकी पंक्ति जाननी और चौथी पंक्तिका भविष्यकाल पहिली पंक्तिसेकह।ग्रन्थान्तरोंमें वार निकाल- नेकी विधि है कि, प्रस्तारम प्रश्न शकल जिस घरमें है मिजाज पंक्तिमेंभी उसी घरमें हो तो उसके वार में कार्यसिद्धि होगी यदि २।३ घरोंमें पुनरुक्त हो तो उनम जो बलवान हो उसके वारमें और अपने घरकी होके मिजाजमें स्वगृही न हो तो प्रश्न शकलके वारम कहना ॥१४॥१५॥ यह अन्य प्रकार मैंने समस्त प्रश्नोंकी अवधिके लिये कहा है इसमें भी कार्यकी संभावना प्रथम देखके अपनी बुद्धिके विचारसे समझके विद्वानने कहना ॥१६॥ इतिरमलनवरत्ने माहीधरीभाषाटीकायां प्रश्नविधिकथनं नाम षष्ठरत्नम्॥६॥ अथ सप्तमे मुष्टिप्रश्नप्रकारमाह । तत्र तावत्खण्डानां मृत्यूपयोगिस्वरूपाण्याह ॥ गुरुभार्गवयोः खण्डाबयाजेज्जतमायुताः ॥ . मृदुला कुजशिखीनानां निष्ठुराः सजमातकाः॥१॥ शनिराहोस्तरीकं च खण्डाः समृदुनिष्ठुराः ॥ निर्वीर्यं च सवीर्य च क्रमेणाग्न्यादितत्त्वतः॥२॥ टीका-अब सातवें रत्नमें मुष्टिप्रश्न कहते हैं. जिसमें प्रथम खण्डोंके मुष्टि प्रश्नोपयोगिस्वरूप कहते हैं कि, बृहस्पति शुक्रके शकल बयाज और इज्जतमा सहित मृदु हैं मंगल, केतु, सूर्यके खंड और जमात- (निष्ठुर) कहे हैं ॥ १॥ शनि राहुके खण्ड और (९०), रमलनपरत्न- तरीक ( समृदुनिष्ठुर) कोमल भी और कडे भी है इनमें निर्य और सवीर्य अमि आदि तत्वोंके क्रमसे जानना ॥२॥ भय वर्णानाह शकुने। पीतो रक्तश्च श्वेतश्च रक्तकृष्णसिवासितः॥ गोधूमामः श्वेतपीतः कृष्णं चात्यंतकृष्णरुक् ॥ ३॥ कृष्णरक्तं तथा श्वेतं पीतं श्याम सितासितम् ॥ हरितश्यामपीतं च हरितश्वेतकृष्णकम् ॥ ४॥ हरितं हरितश्वेतश्याम लह्यानत. क्रमात् ॥ शकुनक्रमतो वर्णा ज्ञातव्याः सर्वदा बुधैः ॥५॥ भाकृति। दीर्घ च वर्तुल दीर्घ चतुरसं सदीर्घकम् ॥ व्यर्तुल वर्तुलं व्यसं वर्तुलं दीर्घविस्तरम् ॥ ६ ॥ दीर्घविस्तीर्णदीर्घ च दीर्घविस्तीर्णदीर्घकम् ॥ वर्तुलं वर्तुलं दीर्घ विस्तरं शकुने क्रमात् ॥७॥ स्पानाग्यादा नुत्खारिजलह्यानावतषेखारिजस्तथा ॥ नगरा- रण्यवासानि तरीख कृषिवर्त्मनि ॥८॥ स्वर्णरी- प्यापणस्थाने कव्जुदाखिलजमातके ॥ अङ्की- शश्च तथा चित्रहठेस्यादिजतमायहम्॥९॥नकी स्थानं नवग्राममतवेदाखिलं वने ॥ वृक्षे च पाठ- शालायां स्वारामे नुनुदाखिलम् ॥१०॥ क्षेत्रप्र- वाहारामेपु चयाजस्य गृह स्मृतम्।।कब्जतुलखा- भाषाटीकासहित । (९१) रिजशैलवनेषु फरहाभिधम् ॥ ११॥ नृत्यारामे तमिस्राढयं मुक्तास्थानं प्रकीर्तितम् ॥ हिंस्रास्त्रवैद्य- सदनं हुम्रायाः स्थानमीरितम् ॥ १२॥ अथ मौल्यामौल्यमाह। लह्यान्नुस्रुत्खारिजनुसुदाखिलदलानि भूरिमौ- ल्यानि ॥ सममौल्यकंबयाज तरिखोक्लाकब्जदा- खिलाः समौल्यानि ॥ १३ ॥ नक्यकीशातवखा कब्जुलखारिजजमाताख्याः॥ स्युहीनमौल्याअरत वेदहुनेफर्हेज्तमेतिमौल्यानि ॥ १४ ॥ अथ लघुत्वगुरुत्वमाह । अग्निवायुदलानिस्युर्बहुभारयुतानि हि ॥ जलभृमिदलानिस्युः सघनानि गुरुणि च ॥१५॥ अथान्या संज्ञा। वह्रिखण्डानि चत्वारि परपोषणहेतवः ॥ पराणि परपोषेण कथितानि मुनीश्वरैः ॥ १६ ॥ अथान्या संज्ञा। लह्यानं फरहोक्लाख्यौहुम्रानुसतखारिजौ । अतवेद्यौनकीजत्मान्येन्येन्ये च युताः स्मृताः॥१७॥ अथ खण्डानां शवादिकमाह । खारिजानां रिपुर्वह्निः पार्थिवानां तथादृषत् ॥ जलायानां जलंशत्रुः शेषाश्चाधारशत्रवः ॥ १८॥ f
(९२)
रमलनवरत्न-
पूर्णादिसंशामाद!
जमातेजतमेनुमुदुल्लाकन्जुलदाखिलाः ॥
एतानि पूर्णखण्डानि खंडितान्यपराणि च ॥ १९ ॥
अय सण्डाना रसात
आग्नेयानां तिक्तकटुर्मिष्टाम्लवायुस्खण्डके ॥नुमुद्दा-
खिलवयाजाख्यनकीप च तरीकके ॥२०॥ मिष्ट-
क्षार तथा तिक्तमसतक्षार प्रकीर्तितम्॥कजुदाखि-
लके वापि जमातोक्लिकयोस्तथा ॥ २१ ॥मिष्टाम्लं
च तथाङ्कीशेनिकृष्टाम्लं प्रकीततम् ॥ रसायेते
समाख्याताः खण्डानां मुनिमाषिता.॥२२॥
भूमिमा।
निर्माणहेतवो वह्निः खण्डानि निखिलान्यपि ॥
विनोकापार्थिवानिस्युर्मूमिशिल्पमयानि च॥२३॥
कारणानि च शिल्पस्य शेषखंडानि सतिहि ॥
एवं विचार्य मुधियावदेत्प्रश्न समाहित ॥२४॥
अप सरगना धात्वाविसंज्ञा।
धातुर्मूलं च धातुश्च मूलजीवी च मूलकम् ॥
मुलजीवी तथा मूलं धातुमूल च धातुकम् ॥ २५॥
मूलजीवी जीवमूले भवति शकुनक्रमात् ॥
उपयोगिहि मुष्टचादावेषां तस्मादिहोदिताः ॥२६॥
। भाषाटीकासहित । (९३) यहां तीसरे श्लोकसे लेकर २६ श्लोकपर्यंत शकलोंकी अनेक प्रकारकी संज्ञाकही हैं जो इस ग्रंथके प्रथम रत्नके अंतमें मैंने चक्ररूप लिख दिये हैं परंतु पाठकोंके सुबोधार्थ यहाँभी इन २४ श्लोकोंकी टीका चक्राकार लिखी जाती है पाठकगण इसी चक्रमेंसमझ सकते हैं- शकलानांनुपादिचक्रम् शकुनक्रमतः ॥ 115 - चिह्न ॥1- . त कठि कठिन मृद 'मृद्ध मद मृदु CG श्याम क र वेत धुसर धूसर वर्ण श्यामा रक्त श्वेत शुक्ल व ૨ विस्त मित्र भा A नाम ल कदाकखा ज फ उ०म० हु० व. नु खान दा अ खनका अदा ३० कठि कठि कठिकठि कठि कठिकाठ रूप | मृदु मिश्र मृद्ध मृदु मृद्ध न न निमदु विचि बह श्या वर्ण १ पीत धसर श्याम पांडुर श्याम श्वेत भाकृति चतुर चतु दीर्घ दीर्घ वर्तुल दीर्घ दीर्घ वर्तुल वर्तुल वर्तुळ दीर्घ दीर्घ वर्तुल वर्तुदीई० स विस्तृ म्ती वास नगरा स्वर्ण वन स स मृत्या अध चित्र हसा क्षेत्रा नग पार नगग वन वन | चिकृषि स्थान३ रण्ये रूप्य पर्वते यह राम कार हमारे रामे रण्ये शालो रपये | ग्रामे | वृक्ष ] हे मागे मौल्प अति समोमिल्य मौल्य स्वल्प समौ मील्य स्वल्प मध्य भति मति मौल्य मान्य स्वल्प स्वर समे मौ ल्न हीन हीन मौल्य हीन मौल्य मौ. मी मौकीनन | मौ मी ल्य लघु बह मार५ मिश्र लघु वृह वृ.मा.व.मा.मि मा लघु मिश्र लघु मिश्र मिश्र मिश्र मिश्र भारद्धार मार हेतु६ पोषकापुष्टिका पो० पु० पु० पु० पु० पु० पु०पो० पु. पो. पु० पु० पु.पु. योग एक युत | युत युतएक एक युव एक युत प्रक | युत। एक | एक एक एक युत भग्नि पाषा पाषा पाषा आग्नि अधर पाषा. मघर जल भग्नि जल माग्नि जल अधर अधर जल न पूर्णा खडि खडि खटि खडि खांड खाखटि खहि पूर्ण८ पूर्ण पूर्ण पूर्ण पूर्ण पूर्ण त त त त कटु कटु कटु क्षार | कटु क्षार कटाक्षा क्षार कटु मधुर मधुर अम्ल मम्लाभम्क मिष्ट| क| मिष्ट कारिष्ट कार्यहेश निर्मा गनिर्माि भूमि शिल्स मामि शिल्प शिल्प निर्मा शिल्प निर्मा शिल्प शिल्प शिरूप शिलशिल्प १० ण शिष ण शिल्प कार शिल्पकार कार ण किार ण कार का कार कार कार धात्वा दि ११॥ धातु | मूल धातु मल- जीव मूल मूल | जीव मूल | धातु मूळ धासु | मूल बीव जीव मूल भठारहवें सोफका भय इस चक्र है, १८ श्रीकका भई जो चीसो ऐसाई कि. भप्ति वायु भूमि पारिव शकलोंका मनिषा जमात होतो मुटिकी । भमि वायु अनि स्तुका पत्थर शाहै अकोष उल्ला. क. दा कामी माग्न वायु शत्रु पाषाण शत्रुहे. फरहा हुम्रा इजतमा.म.पा. का भी वाए भाग्न मुमि मित्र भन्य सब पकलोंका शत्रु जी । त त त व रस कटु कट्व मधुर मधुर मिए सम है (९४) मलनवरत्न- मुष्टिप्रमकपनम् । हम्रानकीभ्यां च तथैककेन मुष्टौ ध्रुवं वस्तुविचि- न्त्यमादौ ॥ प्रश्नेषु ते चेहषु स्थलेषु मुष्टौ तदा- वस्तुकदंवमूह्यम् ॥२७॥ द्वयोरभावेऽपि चशून्य- मुष्टि विचिंत्य पूर्वनिगदेन्मनस्वी । तुयॆरिपौसा- वितदाखिलेचमतांतरेमुष्टिषु वस्तुवाच्यम् ॥२८॥ टीका-मुष्टि प्रश्न विचार है कि, जब कोई पूछे कि, मेरी मुष्टिमें क्या हौइसमें पहिले यह विचारना फि,मुट्टीमें कुछ वस्तु है या नहीं ऐसे विचारमें प्रस्तार बनायके देखे, यदि उसमें सुम्रा और नकी शकल हो अथवा इनमेंसे एकमी हो तोनिमय मुट्टीमें कुछ वस्तु यदि वे शकल बहुत घरोंमें होतो बहुत वस्तु मुट्ठीमें हैं कहना ॥२७॥यदिउनदोमकोई भीशकल प्रस्तारमें न हो तो सुट्टीखाली है ऐसा विचारके बुद्धिमानने कहना और चौथे तथा छठे घरमें सा- वित और दाखिल शकल हो तो मुट्ठीमें वस्तुहै यह मतांतरहे॥२८॥ यदि मनुजसमूहेमुष्टिविज्ञानटच्छासपदिदशज- नानापंक्तिरेकाविधया ॥ तदितरमनुजानचिणि- मन्यांप्रकुर्यान्मुरितिकुजवण्डयत्रतत्रास्तिमुष्टिः ॥२९॥ कृत्वा प्रश्नमयात्र शैलदलगा संख्याज- दोत्याचयासादेयानवमे चसावितदलंचदाखिलंद- क्षवः ॥ वामाचेन्नवमेपिखारिजमयोमुलीनकंवा कराधनस्यात्परिपूतिरेखमवलावेकापुमानमुष्टिवान ॥३०॥ एवं समुष्टी पुरुष मियातेक्षाकर्तवोदाखिल साविताढचा ॥ स्यादक्षिणामुष्टिरतोन्ययान्या -- भाषाटीकासहित । (९५) वेषां विरोधे बलवत्तरार्द्धात् ॥ ३१ ॥ अथवा पञ्चष ष्ठोत्थाच्छकलात्पूर्ववडदेत् ॥ वामायां दक्षिणायां वा तन्नदोद्भवतोऽपिवा- ॥ ३२॥ टीका-जो बहुत मनुष्योंके समूहमें मुष्टिज्ञानका प्रश्न हो तो अपने सामने १० दश मनुष्यकी एक पंक्ति बिठलावै अन्योंकी दूसरी पंक्ति करे ऐसेही जितने अधिकहों उतने १०१० के अलग पंक्ति करे अब इन दशोंमसे किसकी मुट्ठीमें वस्तु है इस विचारके वास्ते ॥ २९ ॥ प्रस्तारके सातवें घरमें जो शकल है उसकी अब्जद क्रममें जो संख्याहै उतनवें मनुष्यकी मुष्टिमें वस्तु है इसमेंभी मनुष्य गणनाका क्रम है कि, उसी प्रस्तारके नवमघरमें सावित अथवा दाखिल खण्ड होतो अपने दाहिने हाथके ओरसे मनुष्य गिनने यदि नवममें खारिज अथवा मुन्क्कीवदल होतो बायें हाथके तर्फसे गिनना जिसपर वह संख्या पूरी हो उसके मुष्टिमें वस्तु कहनी ॥ ३० ॥ इस प्रकार जब मुष्टिवाला पुरुष जाना जानेमें देखना कि, पांचवें छठे और नवमें घरमें दाखिल वा साबित शकल हों तो उस मनुष्यके दाहिनी मुष्टिमें और उन घरोंमें खारिज वा मुन्कलीव शकल होतो बाँई मुष्टिमें वस्तु है यदि उक्त ३ घरोंमें परस्पर विरोधी शकल हों अर्थात् किसीमें साबित दाखिल किसीमें खारिज मुन्कली हो तोउनमेंसे जोशकल बलवान हो उससे वामदक्षिण कहना ॥ ३१ ॥ अथवा पांचवीं तथा छठी शकलको मिलायके जो शकलहो उससे पूर्वके तरफ विचार करके महना अथवा नवमहीसे वामदक्षिण मुष्टीका विचार करना॥३२॥ इदानीं वस्तुकथने प्रकारं च ब्रवीम्यहम्॥काठिन्य- मार्दवे चाद्याद्वर्णं च द्वितीयालयात् ॥३३॥ स्वरूपं त्रितयात्तुादीर्घ वृत्तादिसद्म च ॥ मौल्यं च पंच- .
रमलनवरत्न- मात्तस्य गुरुत्वादीस्तथारिपोः ॥ ३४॥ युक्तायुक्तं पुष्टिहेतु नगात्तत्पुनरुक्तिः ॥ तत्संख्यामष्टमात स्य शत्रुतां च वदेवुधः॥३५॥ नंदात्खण्डितपूर्ण- वेदशमात्वादुमेव च ॥ निर्मितं लामतस्तस्य धातुमूलादिक व्ययात ॥ ३६ ॥ तहदेद्येनखण्डेन तस्मात्खण्डाच्च सप्तमम्॥निरीक्ष्य तत्पदार्थ च वदे- सम्भावित बुधः ॥३७॥ विरोधे तत्र वान्योन्यं तत्र द्वाभ्यां ससुद्धरेत् ॥ खण्डमेक तस्य गुणा वाच्या मुष्टिगवस्तुनि ॥ ३८॥ टीका-अब वस्तु बतलानेका प्रकार कहता हूँ कि वस्तुकी कठोरता वा कोमलता प्रथम घरसे वर्ण (रंग), दूसरे घरसे ॥३३॥ स्वरूप, तीसरेसे वहा छोटा गोल आदि आकार और स्थान, चौथेसे मूल्य, पञ्चमसे हलका भारीपन, छठेसे ॥३॥ युक्त एका- की पुष्टि देत, सप्तमसे तथा सप्तमस्थ खण्ड जहाँ पुनरुक्त हो उस घरसे सख्या, अहमसे राहता पडितने कहनी ॥ ३५॥ नवमसे खण्डित और पूर्णता, दशम भावसे स्वाद, जायका, ग्यारहवेंसे निर्माणसा, बारहवेसे घातुमूल आदिजानने ॥ ३६॥ जिस खण्ड जो कहे उसका समय सप्तमसेमी अपनी बुद्धिसे विचार लेना असमय बात न कहनी ॥ ३७॥ यदि प्रथम सप्तम शकलोंके फलमें विरोध पाया जावे तो उन दोकी एक शक्ल बनायके उसके अनुसार मुष्टिगत वस्तुके गुण कहने ॥ ३८॥ अय स्वपयोगन मष्टो विशेपमाह। विशेपंखण्डयोगेन प्रोच्यते पूर्वसमतम् ॥ वहिखण्ड हितीयेस्याणकांतियुत तदा ॥ ३९ ॥ वयाज चेत - न- २ भाषाटीकासहित । (६७) तृतीये स्याच्छून्यांतं मुष्टिवस्तु यत्॥सरन्ध्रतत्प्र- वक्तव्यं तरीके त्रिनवस्थिते ॥४०॥ अथवोत्की- र्णचित्राढ्यं सूक्ष्मचिह्नाङ्कितं तथा ॥ नकीफ- रहौ तृतीयैके त्रिकोणं छिद्रसंयुतम् ॥ ४१ ॥ तृतीये प्रथमे चोक्लावस्त्रवल्कलवेष्टितम् ॥नवमे वायुखण्डं चेद्वस्तुलोमान्वितं वदेत् ॥ ४२॥ इन्द्रखण्डं यदोक्लाचेदग्निदग्धं तदा वदेत् ॥ आ- द्यगेहे यदाप्यं स्यातूलभृत्कन्दुकादिकम्॥४३॥ एवं प्रोक्तो मुष्टिभेदः पुराणैः सम्यग्रम्ले पूर्वर- म्लानुसारी ॥ दैवज्ञानां कीर्तिसन्मानहेतोर्लो- कानां वै रंजनाय प्रकुर्यात् ॥ ४४ ॥ इति रमलनवरले मुष्टिप्रश्नकथनं नाम सप्तमं रत्नम् ॥ ७ ॥ टीका-और प्रकार है कि, मुष्टि प्रश्नमें विशेषतर शकलोंके योगसे वस्तु लक्षण कहते हैं जो पूर्वोचार्योंको संमत है कि, दूसरे स्थानमें अग्नि खण्ड हो तो वस्तु वर्ण कांतिमान ( चमकीला) जानना ॥ ३९॥ तीसरे घरमें बयाज शकल हो तो मुष्टिके वस्तु शून्यांतः (पोली) वा खोखरी है तीसरे वा नवम घरमें तरीक हो तो उस वस्तुमें छिद्र है॥४०॥ अथवा अनेक प्रकारके चित्रोंसे युक्त वा सूक्ष्म चिह्नोंसे युक्त है यदि३।९ स्थानमें किसीमें भी नकी वा फरहा हो तो वह वस्तु त्रिकोणाकार छिद्र सहित है ।। ४१ ॥ तीसरे पहिले घरमें उक्ला होतो वह वस्त्र वा किसी वृक्षादिके वल्कल (त्वचा) से वेष्टित है जो नवम वायुखण्ड हो तो वस्तु केशयुक्त r
(९८)
रमलनारल-
कहनी॥४२॥चौदहवें स्थानम उवा हो तो वस्तु अभिसे दग्ध सनी
प्रथम घरमें जलतत्त्वकी शकल हो तो वस्तु रूईमरा गेंद आदि
है॥४३॥ इस प्रकार प्राचीन आचार्योंने पूर्व रमल शास्त्रानुसार
मुष्टिगत वस्तुका भेद कहा है ऐसा प्रश्न ज्योतिषियोंके कीर्ति
एव सन्मानका हेतु कहा है लोगोंके सुश करनेको ऐसा
प्रश्न करना॥४४॥
इति रमलनयरस्ने माहीपरीमाषायां मुष्टिप्रमकपर्न
नाम सप्तम रत्नम् ॥७॥
अथ नामवन्धप्रकरणमटम रत्नम् ।
नामान्तरासर्वमन प्रसादो न कायसिद्धिः मुलमा
च यस्मात् ॥ तस्मात्प्रवक्ष्येखिलनामवन्धं जन-
प्रतीतिः सुयशोऽपि यस्मात् ॥ १॥ आदावे वि-
निश्चित्य कतिनामाक्षराणि हि ॥ चौरादीनां
ततः कुर्यादक्षरानयनं मुधीः ॥२॥ चौरादीना-
मवणानां प्रश्न च फरहालयात् ॥ संख्या स्याद्र-
म्लवित्तस्मादादौ फहीं विलोकयेत् ॥ ३ ॥
टीका-सम्पूण रूपसे मनकी प्रसन्नता नाम प्रगट बतलानेसे है
क्योंकि प्रश्नकार्य सिद्धि सहज नहीं इस पास्ते सपूर्ण नामवध
कहता हू जिससे मनुष्योंको प्रतीति और रम्मालका सुयश भी
होता है ॥ १॥ प्रथम ऐसा निश्चय करे कि, नामके कितने अक्षर
हैं ऐसे चोर आदिके नामाक्षर लानेका यत्न बुद्धिमान् करे॥२॥
चोर आदिके नामाक्षरोंसे जाननेका प्रश्नमें फरहा शकलसे अक्षर
सख्या होती है इसलियरमलानेप्रथम फरदा शाल देखनी॥२॥
. भाषाटीकासहित । (९९) नामवर्णसंख्यामाह। द्वाभ्यामथैकड़ियुतार्णनामफर्हास्थिते स्याहि- तयादिषदत्सु । वसोस्तथैकाद्धसितं क्रमेण सप्ता- र्णमाद्यव्ययसंस्थिते स्यात् ॥ ४॥ विश्वोदयास्या- हुनधामगार्ड्सब्जदांकतुल्यार्णमथेन्द्रराज्ञोः वेदार्णकद्यादि गृहे यदा स्याहीर्यान्विताहापि वदेत्पुरावत् ॥ ५ ॥ या यदाप्रश्नगाफतिदावा- द्यदलस्य तु ॥ या संख्याचाब्जदांकोत्थातत्तु- स्याङ्गतदाह्वयम् ॥६॥ टीका-नामाक्षर संख्या कहते हैं कि प्रथम घरमें फरहा हो तो नामके ७ अक्षर होंगे दूसरे घरसे ७ उपर्यंत १ । १ बढायके और ८ वेसे ११ पर्यंत १।३ घटायके जानने जैसे दूसरेमें २ तीस- रेमें ३ चौ० ४ पं०५ छ० ६ स० ७ पुनः आठवेंमें ६ नौ०६ द० ४ ग्या० ३ और बारहवेमें ७ अक्षर जानने ॥४॥जो तेरह- वेमें फरहा हो तो दूसरे भावमें जो शकल है उसका अब्जदमें जो अंक हैं उतने अक्षर और १४ तथा १६वेंभी हो तो ४अक्षर जानने यदि बहुत जगह फरहा हो तो बलवानकी संख्या पहिलेके तुल्य कहनी ॥५॥ प्रस्तारमें फरहा न हो तो प्रथम घरकी शकलके अब्जदांकसे जो संख्या निकले उतने अक्षर नामके जानने ॥६॥ अथ वर्णानाह ॥ तदर्थ चक्रम्- अधुनाखिलवर्णानामानयार्थ विधिं ब्रुवे ॥ आद्यत्र- योदशाभ्यां तु खण्डमेकं समुद्धरेत् ॥ ७॥ चके नवाह्यक्षिगृहेब्जदाद्याः साबिज्दहायेक्रमतोविले-
(१००)
रिमलनवरत्न-
ख्याः ॥ अग्र्याग्र्यगार्णाश्च तथायधस्तात्सर्वेषु
कोष्ठेष्वियमेवरीतिः ॥ ८ ॥ अबजदव्बजहत्ती
कलमनसफलकरशतससशखजजजजदह ॥
अब नामाक्षर निकालनेके लिये चक्र कहते हैं उपरोक्त ७।८
श्लोकोंका अर्थ इसी चक्रमें जानना-
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यह चक चोर आदिके नाम निकालनेका है इसमें पूर्वोक
उदाहरण मिलाके स्पर मिलता है यह उपरका क्रम है ॥ तिर्यक
कम दक्षिणसे पामको तिच्छा देखना है ॥७॥ ८॥
( १०३), भाषाटीकासहित । आद्यत्रयोदशाभ्यां च शकलं कारयेत्सुधीः ॥ प्रस्तारे यद्गृहे खण्डं तत्तुल्यं चोर्ध्वपंक्तिके ॥९॥ अङ्कं चैव ततस्तस्योत्पन्नस्य शकलस्य च ॥ विज- दहस्यमतेनाङ्कगेहस्यचतङ्ककम् ॥ १०॥ तिर्य- क्रमेण देयानि चक्रे वर्णांकके द्वयोः । अङ्कयोश्च तलेयैश्च वर्णस्तत्प्रथमाक्षरम् ॥ ११ ॥ तुरीयश- क्रकोद्भूतादेववर्णहितीयकम् ॥ नगतिथ्युद्भवा- चापि वर्णमेवं तृतीयकम् ॥ १२॥ षोडशांशा- जनेस्तुर्यवर्णमेवं समुद्धरेत् ॥ विषमाईखसंख्या- तखण्डेनार्णतुपंचमम् ॥ १३ ॥ केन्द्रस्थशून्यसं- ख्याकाहिन्नरेखाङ्कसंयुतात् ॥ यत्खण्डं तस्य पूर्वोक्तमार्गेणार्णरसोन्मितम् ॥ १४ ॥ विश्वा- चतुष्कस्य नभोगणेन तथैव वर्ण नगसंख्यक स्यात् ॥ एवं हराख्यार्णकदंबमुक्तमत्रापिमात्रा स्वमनीषयोह्या ॥ १५॥ यस्य कस्यापिनामैवं तथा सृष्टयादिगस्य च ॥ नामानि कल्पयेदि- द्वान्देशज्ञातिवशाच्छनैः ॥ १६ ॥ टीका-अब अक्षर निकालनेकी विधि कहते हैं कि, प्रस्तारके प्रथम और तेरहवें शकलोंको जब देकर एक शकल बनावै वह शकल प्रस्तारके जितने घरमें हो उतने अंक कोष्टचक्रकी ऊपरकी पंक्तिके कोष्टमें सीधे नीचे और वही शकल विजदह क्रमके जितने घरमें हों उतने संख्यांक तिछ कोष्ठमें देखे, ऊपरके और तिर्छ संख्याके कोष्ठोंके सीधे जिस अक्षरपर मिले वह नामका पहिला --
(१००)
रिमलनवरत्न-
ख्याः ॥ अग्र्याग्र्यगार्णाश्च तथायधस्तात्सर्वेषु
कोष्ठेष्वियमेवरीतिः ॥ ८॥ अबजदव्बजहुत्ती
कलमनसफलकरशतससशखजजजजदह ॥
अब नामाक्षर निकालनेके लिये चक्र कहते हैं उपरोक्त ७।८
श्लोकोंका अर्थ इसी चक्रमें जानना-
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यह चक चोर आदिके नाम निकालनेका है इसमें पूर्वोक्त
उदाहरण मिलाके स्पष्ट मिलता है यह ऊपरका क्रम है ॥ तिर्यक
क्रम दक्षिणसे घामको तिछा देखना है ॥७॥ ८॥
+M भाषाटीकासहित । (१०१) आद्यत्रयोदशाभ्यां च शकलं कारयेत्सुधीः ॥ प्रस्तारे यद्गृहे खण्डं तत्तुल्यं चोर्ध्वपंक्तिके ॥९॥ अङ्कं चैव ततस्तस्योत्पन्नस्य शकलस्य च॥ विज- दहस्यमतेनाङ्कगेहस्यचतङ्ककम् ॥ १०॥ तिर्य- कुक्रमेण देयानि चक्रे वर्णीकके द्वयोः । अङ्कयोश्च तलेयैश्च वर्णस्तत्प्रथमाक्षरम् ॥ ११ ॥ तुरीयश- क्रकोतादेवंवर्णहितीयकम् ॥ नगतिथ्युद्भवा- चापि वर्णमेवं तृतीयकम् ॥ १२॥ षोडशांशा- जनेस्तुर्यवर्णमेवं समुद्धरेत् ॥ विषमाईखसंख्या- प्तखण्डेनार्णतुपंचमम् ॥ १३ ॥ केन्द्रस्थशून्यसं- ख्याकाहितरेखाङ्कसंयुतात् ॥ यत्खण्डं तस्य पूर्वोक्तमार्गेणार्णरसोन्मितम् ॥ १४ ॥ विश्वा- चतुष्कस्य नभोगणेन तथैव वर्ण नगसंख्यक स्यात् ॥ एवं हराख्यार्णकदंबमुक्तमत्रापिमात्रा स्वमनीषयोह्या ॥ १५॥ यस्य कस्यापिनामवं तथा सृष्टयादिगस्य च ॥ नामानि कल्पयेहि- द्वान्देशज्ञातिवशाच्छनैः ॥ १६ ॥ टीका-अब अक्षर निकालनेकी विधि कहते हैं कि, प्रस्तारके प्रथम और तेरहवें शकलोंको जब देकर एक शकल बनावै वह शकल प्रस्तारके जितने घरमें हो उतने अंक कोष्ठचक्रकी उपरकी पंक्तिके कोष्ठमें सीधे नीचे और वही शकल विजदह क्रमके जितने घरमें हों उतने संख्यांक तिछ कोष्ठमें देखे, ऊपरके और तिर्छ संख्याके कोष्ठोंके सीधे जिस अक्षरपर मिले वह नामका पहिला . -- -
(१०२)
। 'मलनरल-
अक्षर जाननो ॥१1110117 अब दूसरे अक्षर लानेकी विधि है कि,
चौथी और चौदहवीं शकल मिलायके जो शकल हो उससे पूर्वोक्त
क्रम करके दूसरा अक्षर नामका जानना ऐसेही सप्तम तथा पन्द्रह-
वीसे उत्पन्न शफलसे तीसरा अक्षर जानना ॥ १२ ॥ ऐसेही १६
१७शकलोंसे उत्पन्न खण्डसे चौथा अक्षर लेना पचमाक्षर जान-
नेके अर्थ कहते हैं कि, प्रस्तार जितने विपम १।३।५।७।९।
११।१३ । १५ स्थान हैं इसके भी बिन्दु जोडे १६ से भाग देके
जो शेप रहे उतनेही घर प्रस्तारमै जो शकल हो उससे पूर्वोक्त क्रम
करके पाचवा अक्षर जानना ॥ १३॥ प्रस्तारके केन्द्र १।४।७॥
१० मावोंके शफलोंके जितने रेखा हों उनको दूना करके जितने
उन चारोंमें विन्दु हों उन्हें जोडके जो सख्या हो उसमें १६ का
भाग देके जो अफ शेप रहे उतने घरमें जो शकल हो उससे छठा
अक्षर जानना और १३ । १४ । १५1१६ घरोंके शून्य जोड़के
पूर्वोक्त क्रमसे सातवां अक्षर जानना इसमें यह स्मरण रखना चाहिये
कि, यदि वह शकल प्रस्तारमें न हो तो वह शकल विज्दहके जिस
घरकी हे उतने घर प्रस्तारमें जो शकल हो उससे कार्य करे ऐसी
विधि अक्षर निकालनेकी कही है यहाँ (मात्रा)स्वर उन अक्षरोंके
अपनी बुद्धिसे जानने॥ १४ ॥१५॥ जिस किसीका नाम एव मुष्टि-
गत वस्तुका नाम विदानने देश और जातिमें नामोंकी जैसी
प्रथा प्रचलित हो ऐसा अपनी बुद्धिसे पिचारके कहना ॥ १६ ॥
प्रथमविश्वयुतेस्कलादलविजदहेदशम गृहमस्य
च ॥ तदनुविस्तरपष्टगृहाश्रितं तदुभयोन्मुखमर्ण-
सकारकम् ॥ १७ ॥ तूर्यशकोत्थकदीशप्रश्नेतन्नव-
मेगृहे ॥ तिर्यगष्टगृहानदप्राप्तवर्णमकारकम् ॥१८॥
भाषाटीकासहित। (१०३) टीका-अब नामाक्षरका उदाहरण कहते हैं कि, प्रस्तारमें पहिले और तेरहवीं शकलको मिलायके उकला शकल हुई इसका घर विजदहमें दशम १० है और यही उक्ला प्रस्तारके छठे ६घरमें है तो अब चक्रमें देखा कि, ऊपरकी सीधी पंक्ति (जो विजदहकी है) के दशमके सीधे नीचे और प्रस्तार क्रमांकज़ो किनारे हैं उन- मेंसे छठे घरके तिर्यपंक्तिमें जहाँ इन दोनों अंक कोष्ठोंका मेल होता है तहाँ सकार है यह (स) अक्षरनामका आद्याक्षर जानना ॥ १७ ॥ पुनः उसी प्रस्तारके ४ । १४ शकल मिलायके अंकीश शकल हुई यह प्रश्नके नवम घरमें है विजदहके आठवें घरमें है इन ऊपरके ८ तिर्छ९घरोंके सीधेका कोष्ठ जहाँ मिलता है तहाँ (अ) अक्षर है यह नामका दूसरा अक्षर जानना इसी प्रकार सभी अक्ष- रोंके उदाहरण जानने ॥ १८॥ अधुना प्रश्नवर्णानामानयं प्रोच्यते मया ॥ तन्वादिषोडशांत्यस्थैः खण्डैर्वर्णान्समुद्धरेत् ॥१९॥ नवाह्यक्षिगृहे चक्र पुरावडरफ लिखेत् ॥ तस्मिनस्वीयालयात्खण्डाज्ज्ञेयंवर्णमिहोक्तवत्॥२०॥ प्रश्नेचेत्स्वगृहाभावः पुरः पृष्ठ च यावति ॥ गेहे त्वनुक्रमात्तावत्पुरः पृष्ठार्णमुन्नयेत् ॥ २१ ॥ एवं व्यब्ध्यष्टिगेहांतखण्डैर्वर्णास्तुषोडश॥ रचयेद्रम्लविद्धीरोमात्राश्चापि मनीषया ॥ २२ ॥ टीका-अब अन्य प्रकार नामाक्षर लानेका कहा जाता है कि, एकसे १६ पर्यंत शकलोंसे अक्षर लेने ॥ १९ ॥ सो ऐसा कि ९॥ ७।५ घरोंमें प्रेस्तार चक्रके जो खंड हों उनको हरफो क्रममें गिनना इनमेंसे जो शकल अपने घरकी हो उससे पूर्वोक्त क्रम करके - (१०४), रमझनवरत्न- नामाक्षर जानना ॥२०॥ यदि स्वराही कोई भी न हो उन ९ ७१६ के पहिले और पीछे देखना जहाँ प्रस्तार एक होममें स्वयही हो उसके अनुसार पूर्वमा परेका अक्षर जानना बहुत जगा हो तो उतनेही लेने ॥ २१॥ इसी प्रकार २१वा १६ ही घरोंसे १६ अक्षर लेले नाम रचना रमलजानने वाले पडितने करनी उन अक्षरोंमें मात्रा अपनी पुद्धिसे जहाँ जैसी लगती हों युक्तकर लेनी यहाँ देश एव जाति प्रथासे नाम कहना ॥ २२ ॥ भय धारस्फुटीकरणम् । यदानपुंजेहरमक्षिगोचरं विधातुमिच्छास्तितदा- हरंकुरु ।। तथेन्किलावं च विधाय चिंतयेजमात- मवास्तिचयगृहाश्रितम् ॥ २३ ॥ तस्मिन्गृहे सावितदाखिलेचेत्पूर्वेडरे चास्ति जनेषु चौरः ॥ नचान्यथैवं नरयुग्ममागे चाद्याद्विधरत्रहरोविस- श्य ॥ २४ ॥ तच्छेपस्याप्येवमेवयुगमागे च पूर्ववत् । विधिं कुर्यात्सुनश्चैव यावत्स्यादेकस ख्यकम् ॥ २५॥ अथेन्किलावेरिगतजमातव्यंके नकीशं नकिचाष्टमांग ॥ प्रष्टास्तिचौरः स्वयमेष चैवं वाच्यंप्रकारैरिपुमिर्विचिंत्य ॥ २६ ॥ टीका-चोरस्फुटीकरण कहते हैं कि, जब बहुत मनुष्योंकेवीच चोर प्रत्यक्षमें है तो उसको प्रकट करनेके लिये प्रस्तार करके उसका इन्किलाव करना इसमें जिस घरमें जमात हो उसी घरमें प्रथम प्रस्तारफेमें सावित दाखिल हो तोस जन समूहमें चोरहै खारिज मुन्शीव हो तो उनमें चोर नहीं है जब चोर उस जनसमू- छमें ज्ञात हो तो उन मनुष्योंकी दो पक्ति करना पुन पूर्वोक्त विधि
भाषाटीकासहित ।
(१०५)
करके पंक्ति तब ऐसेही विधिसे एक मनुष्य निश्चय करलेना॥२३॥
॥२४ ॥२५॥यदि इनकिलाबके छठे घरमें जमात हो दूसरे वा
नवममें अंकीश अष्टममें नकी हो प्रश्न पूछनेवालाही चोर है कहना
ऐसे पाँच प्रकारसे चोरका विचार निश्चय करना ॥२६॥
मतान्तरम् ।
हुम्रानकीभ्यां चतथा विपश्चिन्निरीक्षयद्भूरिज-
नेषु चौरम् ॥ भागद्वयं तत्र पुनश्च तहत्पुरोक्त-
रीत्यैकमितं हि यावत् ॥ २७॥
टीका-अन्यमत कहते हैं कि, प्रस्तारमें यदि हुम्रा और नकी
शकल हों तो उस जन समुदायमें चोर देखना उन मनुष्योंके दो
भाग करके पूर्वोक्त विधिसे एक मनुष्य निश्चय करना ॥२७॥
मतांतरम् ।
श्रेणीजनानां स्वपुरे निधायक्षिप्ताक्षयुग्मेषु रसा
द्रिखंडे ॥ याचाब्जदोत्थात्रहिसंख्यकास्यात्सा
दक्षहस्तेन जनेषु देया ॥ २८ ॥ यस्मिन्समा
प्तामनुजे सचौरोभूयाग्रिमाचेदधिकापुरावत् ।
तमेव चौरं रमलार्थवेत्तास्फुटं वदेदेवमसंदिहानः२९
इति रमलनवरत्ने अष्टमं रत्नम् ।
टीका-अन्यमत है कि, मनुष्योंकी पंक्ति अपने आगे बैठायके.
पाशा दो फेंकके प्रस्तार बनावैतब ५।६।७ भावोंमें जो खण्ड
है उनके अबजद क्रममें जो संख्या कहो उस संख्याको अपने
दाहिने हाथसे गिने॥२८॥ जिसपर वह संख्या समाप्त होवहचोर
जानना यदि मनुष्य थोडे हों अंक संख्या अधिक हो तो पुनर्दुबारा
पूर्ववत् क्रमसे गिने इस प्रकार निश्चय करके रमलार्थ जाननेवालेने
निःसंदेह स्पष्ट कहना ॥ २९ ॥
इति रमलनवरत्ने माहीधरीभाषायां चौरनामकथनं नामाष्टमं रत्नम् ॥ ८ ॥
"-
(१०६)
रमलनवरत्ने-
अथ वर्षफलसाधन नवमम् ।
सायनार्कजगेहर्षयुकस्वाकृतिःस्वेष्टदेवं च मन्त्रं
स्मरन् । सप्तधाप्राग्दलेहोजगहर्षसिद्धयैशुचिः
पाशकौमुस्थिरात्मावुधः सक्षिपेत् ॥ १॥ सर्वेषां
मनुजानों च तद्दिनेचाब्दवेशने ॥ दिनेचान्य
दिने शुभ्रे शरदां फलसिद्धये ॥२॥ एवंद्विधा वर्ष
फलं जगन्मानवयोरिह ॥ तत्रादौ मनुजानां
फलमाब्दं विरच्यते ॥३॥
टीका-अब नवमरत्नमें पर्पका विचार है कि, सायनमेपसना-
तिकेदिन पूर्वाहमें ज्योतिषी स्नानादिसे शुद्ध होके प्रसन्नतासे युक्त
अच्छी आकृति (सूरत वा वेप)बनायके अपने इष्टदेवता तथा
मन्त्रको स्मरण करता हुआ मन्त्रसेसातवार पाशोंकामभिमन्त्रण
पूर्वक स्थिर आत्मा करके पट्टीमें फेंके ॥ १॥ तव प्रस्तार वना-
यके उसी वर्षप्रदेशके दिन सपूर्ण मनुष्योंके शुभाशुभ मुखपुख
देशमें अन्न रोग सुखादि विचारे तथा प्रत्येक मनुष्यके ऐसे विचा-
रके लिये उसीके जन्मदिन (वर्षप्रवेश) में विचारे अन्यभी शुभ
दिनमें साल भरके फल सिद्धिके लिये विचारे ॥२॥ इस प्रकार
एक तो जगत्का एक प्रत्येक मनुष्यका सालभरका फल दोप्रकार
यहाँ विचारना चाहिये इसके प्रथम मनुष्योंकापर्पफलकी रचना
फरी जाती है ॥३॥
प्रथमादिदलैस्तत्र व्ययांतेश्च फलपृथक् ।।
तनुद्र-
व्यादिमावानां पुष्टिं हानि शुभाशुभैः ॥ ४ ॥
अशुभस्याऽपि शकुने स्वालयस्थस्य पुष्टिदम् ॥
फल ज्ञेयं विशेपेण सवलस्य तथा बुधैः ॥ ५॥
भाषाटीकासहित । (१०७) खारिजादिभिरत्रापि निर्गमादिफलं भवेत् ॥ पुनरुक्त्यादिखण्डानां तन्वादीनां शुभाशुभम् ॥६॥ टीका-तहांप्रथम आदिखण्डसे बारहवें भावपर्यंत तनु १ धन २ आदि स्थानोंका विचार शुभसे पुष्टि, अशुभसे हानि पृथक कहना ॥ ४ ॥ जो शकल अशुभ भी है परन्तु शकुन क्रमके स्व- गृही होतो उस भावकी पुष्टि देती है विशेष करके पंडितोंने बल- वान् शकलका फल कहना ॥५॥ खारिजादिखण्डसे निर्गम (नि- कलजाना) सावित आदिसे आगम ( प्रवेश करना ) फल होता है यहाँ आदि पदसे खारिजके समान मुन्कलीव और सावितके समान दाखिल भीजानना जिस भावकी शकल पुनरुक्त हो उसका फल विशेषतर कहना अर्थात् शुभ शकल शुभस्थानमें पुनरुक्त पडी हो तो शुभफल विशेष अशुभ शकल अशुभस्थानमें पुनरुक्त होतो अशुभफल विशेष और मध्यमें मध्यम जैसे अशुभ शकल शुभस्थानमें शुभशकल अशुभस्थानमें हो यहाँ मध्यफल होता है॥६॥ अथ योगा। . प्रथमपञ्चमनन्दपालयैरविकवीज्यदलंसुखक- न्मतम् ॥ तनुधनानुजबंधुसुहन्नपैः सुखमिहार- तमः शनिजैर्नच॥७॥शुभदलैर्युतकेन्द्रमथादिशे- त्सपदिसौख्यमचिंतितवैभवम्॥ मृतिगृहेगुरुमा- र्गवखण्डयुकशुभदमारशनिज्ञदलैर्मृतिः ॥ ८ ॥ यदि च दाखिलमत्रधनायगं शुभमिहोत्सव- वित्तसुखाप्तिकृत् ॥ रिपुगृहं शनिभौमतमोदलै- (३०८) रमळनपरल- युतमिहारिंगदान्तकरं भवेत् ॥९॥ सहजगेर- विभौमदलेऽनुजमुखमिहैनितमः शकलैर्नशम् ।। व्ययगृहं शुमखारिजयुक्शुमव्ययकरत्वशुमैयु- तमन्यथा ॥ १०॥ अप योगा। टीका-पहिले पांचवें नवमें सोलहवें भावों में सूर्य शुक्र वृहस्प- तिके शकल होतो सुखकारी कहे हैं और १।२।६।३।४।१६ इन भावोंमें मगल, राहु, शनिके खण्ट होतो मुख नहीं होगा ॥७॥ यदि केद्रों ( 9181७/१०) में शुभ शकल होतो तत्काल मुख पूर्व विना विचारित ऐश्वर्य होगा कहना यदि अष्टम स्थान पृहस्पति शुक्रके शकल होतो शुम और मगल, शनि, धके शकल होतो मृत्युफल कहना ॥ ८॥ यदि २।११स्थानोंमें दाखिल शकल होतो शुभफल धन मुखको करते हैं छठे स्थानमें शनि मगल राहुके दल होतो शत्रुभय रोगमयका नाश करनेवाले होवें॥९॥ यदि तीसरे स्थानमें सूर्य वा मगलकी शकल होतो भाईका मुख होगा यदि तहाँ शनि राहुके खण्ड होतो शुम न हो, जो बारहवाँ घर शुम खारिज शकलसे युक्त होतो शुभकार्य में और पापखण्ड होतो अशुभ कार्यमें धन खर्च होगा ॥ १० ॥ इत्थं प्रकारैर्बहुमिःप्रयत्नात्समाफलं वाच्यमथान्य- दूधम् ॥मासाश्वतत्त्वादिदलैर्विचिन्त्या श्रेष्ठाःशु- भा.रशुभाश्च पापैः ॥ ११॥ यन्मासखण्डं यद्गेहे पुनरुक्तं यदा भवेत् ॥ तदेहोत्थं फलं तस्मिन्मासे योज्यं विचक्षणः ॥ १२ ॥ टीका-ऐसे बहुत प्रकारोंसे संवत्सरफल कहना अब और कहते हैं कि, महीनोंके फलके लिये प्रथमादि द्वादशभाष पर्यंत बाहर भाषाटीकासहित । ( १०९) महीने जानने जिस महीनेका खण्ड शुभ हो उस महीनेमें शुभफल और जिसमें अशुभ खण्ड हो उसमें अनिष्टफल विचारना ॥११॥ जिस महीनेका खण्ड जिस घरमें पुनरुक्त हो उस घर संबंधी फल उस मासमें चतुर मनुष्योंने योजित करना ॥१२॥ मासाद्धगेहखण्डाभ्यामुत्पन्नं चेच्छुभ दलम् ॥ तदा शुभं च पुनरुक्ते स्थाने क्रमतः फलम् ॥ १३॥ मासखण्डं शुभाभ्यां चेदुत्पन्नं स्यात्तदाशुभम् ॥ मध्याभ्यां मध्यमं चैव पापाभ्यां नेष्टमीरितम्॥१४॥ टीका-मासखंड और गृहखण्डसे उत्पन्न यदि शुभ शकल हो तब शुभफल होगा ऐसेही पुनरुक्त स्थानमेंभी क्रमसे फल जानना ॥१३॥ यदि मासखण्ड शुभ शकलोंसे उत्पन्न हुआ है तो शुभ फल होगा मध्यमोंसे उत्पन्न हुएमें मध्यम और पापखंडोंसे उत्पन्न हो तो अनिष्ट (बुराफल ) कहा है ॥ १४ ॥ मैत्र्यामासाईतद्हतत्त्वयोश्च शुभं भवेत् ॥ मास- . तत्स्वामित्यर्द्ध चत्वेवं व्यस्तेविपर्ययः॥१५॥पुनरू- क्तिगृहेप्येवमूह्यं रमलकोविदैः ॥ पुनरुक्त्यर्द्धमासा- योगोत्थंशुभमिष्टकृत् ॥ १६ ॥माससाक्ष्यद्धयो- मैत्र्यासर्वमेवशुभं भवेत् ॥ अशुभं वैपरीत्येस्यान्म- ध्यम मध्यमे स्मृतम् ॥ १७॥ मासखंडप्रकारेण साक्षिखण्डं विचिंतयेत्॥ खंडेशितुर्दितीयस्य खण्ड- स्याप्येवमेव च ॥१८॥ विधिं कुर्यात्पुरोक्तंतुफलन्ते- नोक्तवदेत्॥खंडस्थविपरीतं यत् खंडंतस्यांगसंभ- - रमख्नवरत्न- (१,१०) वम् ।१९। तस्यापि पूर्ववत्सर्वसाक्षिरीत्याफलं वदेत.॥ एवं खण्डैश्चतुर्मिस्तु फलं मासे विचिन्तयेत् ॥२०॥ टीका-यदि मासखडोंकी और तत्वोंकी परस्पर मंत्री हो तो शुभफल उस मासका होगा जानना ऐसेही मासखड और उसके स्वामीके शकलोंके मित्रतामी शुभफल होता है, मित्रता उनके पर- स्पर न हो उत शत्रुता हो तो अनिष्ट फल जानना ॥१६॥ ऐसेही रमल जाननेवालोंने पुनरुक्त घरोंके मित्रता शत्रुतासे फल कहना।। पुनरुक्तिखण्ड मासखण्डके परस्पर मेलसे जो शुभ शकल हो तो शुभफल अशुभसे अशुभफल करता है ॥ १६॥ मासखण्ड और साक्षिखडकी मैत्रीसे सभी शुभफल होता है विपरीत (शवता) होने में अशुभ और मध्यमें, मध्यम होता है ॥ १७॥ मासखण्डके सरह साक्षिखण्डभी जानना खण्डकेस्थामीका और दूसरे खण्डकी भी इसी प्रकार पूर्वोक्त विधि करनी तब उसके अनुसार उक्त फल कहना ॥१८॥१९॥ इसकामी पहिले सासिके रीतिसे फल कहना इस प्रकार उक्त चार खण्डोंसे महीनेमें फल जानना ॥२०॥ अथात्र वक्ष्ये विधिवदशासूक्ष्मदशा अपि ॥ साद- शासाविताधीनातस्मादादौतुसावितम् ॥ २१ ॥ कर्तव्य तद्विधि वक्ष्ये पूर्वशास्त्रानुसारतः ॥ प्रस्ता- रात्पाशको ताविश्वकर्मायशककै. ॥ २२ ॥ दले- श्चतुर्मि प्रस्तार पूर्ववद्रचयेत्सुधीः॥ सदृशीतनुविश्वौ चेदहि खेआयेऽधिशकके ॥ २३ ॥ तदातत्सा वित ज्ञेयं प्रस्तारं त्वीहशे बुधैः ॥ नचेद्यदापुनस्त- स्माद्विश्वादिकचतुष्टयात् ॥ २४ ॥प्रस्तार पूर्व-
भाषाटीकासहित ।
(१११)
वत्कृत्वा तत्र तच विलोकयेत् ॥ एवं पुनःपुनःकुर्या
द्यावन्न स्याञ्च साबितम् ॥ २५॥
टीका-अब यहाँ विधिपूर्वक दशा और सूक्ष्मदशा भी कहताहूं
कि, वह दशा साबितके आधीन है. इसवास्ते प्रथम साबित करना
चाहिये इसकी विधि पूर्व शास्त्रानुसार कहताहूँ कि, पाशा फेंकनेसे
जो प्रस्तार बना उसके १३।१०।११ | १४ खण्डोंको प्रथम
आदि ४ स्थानमें स्थापन करके प्रस्तार बनाना उसमें पहिलेके
समान तेरहवाँ और दूसरेके तुल्य दशम तीसरेके सदृश ग्यारहवाँ
और चौथेके समान चौदहवाँ हो तो वह प्रस्तार पंडितोंने साबित
जानना साबितका यही लक्षण है यदि प्रथम प्रस्तारमें साबित न
हो तो फिर उसी प्रस्तारके १३ । १४।१५। १६ खंडोंको प्रथम
आदि ४ स्थानोंमें स्थापन करके फिर प्रस्तार बनावै उसमें साबित
मिलेगा इसमेंभी न मिले तो १३।१४।१५/१६से प्रस्तार बनावै जब
तक साबित न मिले तब तक ऐसीही विधि करतारहे ॥२१-२५॥
षष्ठादूर्ध्व न तद्याति सावितं रसमध्यगम् ॥
एकाद्येमुखसंपत्तीलाभं सौख्यं च मध्यमम् ॥ २६ ॥
कष्टं मृत्युश्च विज्ञेयो रसांते साबिते क्रमात् ।।
साबितक्रममेतद्धि विज्ञेयं सर्वदा बुधैः ॥ २७ ॥
टीका-इस प्रकार विधि करनेमें छः के भीतर अवश्य साबित
आजाता है छःसे ऊपर प्रस्तार साबित लानेमें नहीं करने पडते इस
लिये छवोंके फल कहते हैं कि, प्रथम प्रस्तारमें साबित आवे तो
सुख संपत्ति होती है दूसरेमें आवे तोलाभ होवे तीसरेमें आवे तो
सुख चौथेमें आवे तोमध्यम फल पांचवेमें आवे तो कष्ट मिले और
छठेमें आवे तो मृत्यु जाननी ऐसे क्रमसे छःपर्यंत साबितके फल
हैं ऐसा साबित क्रम पंडितोंने सर्वदा जानना ॥२६॥ २७ ॥
(११६) मलनवरल- स्थिरप्रस्तारसख्येन भजेहर्षमिति दिनैः । प्रस्ताराणां दशालब्धा क्रमतः परिकीर्तिता॥२८॥ सादशारविभक्तास्याल्लब्धासूक्ष्मदशाख्यका ॥ फलेवेकैकशकले सूक्ष्मभुक्त्यनुसारतः ॥ २९ ॥ पूर्वोक्तविधिना ज्ञेयं मासखण्डोतवम॑ना॥ साबितायेथप्रस्तारेदशात्वाद्याफलप्रदा ॥ ३० ॥ एवं ह्याद्यादिके ज्ञेया द्वितीयाचादशावुधैः॥ एवं दशाफलं वाच्य पुनरन्यविधि त्रुवे ॥ ३१॥ टीका-स्थिर प्रस्तार (जिसमें साबित पाया है) के सुख्यासे वर्ष मिती ३६० दिनोंमें भाग देना लब्धांकको साबित प्रस्तारकी दशा मानना ॥२८॥ उस दशामें १२ का माग देनेसे सूक्ष्म दशा होती है तब प्रत्येक शकलके सूक्ष्म दशाके अनुसार पूर्वोक्त कम करके कहै ॥२९॥ जिस महीनेका जो खड है उसके अनुसार उस मही- नेमें फल कहना पहिले प्रस्तारमें सावित आये तो पहिली दशाका दूसरेमें दूसरी का ऐसे क्रमसे फल जानना । इसका उदाहरण है कि जैसे चौथे प्रस्तारमें सावित आया हो तोचारसे वर्ष समिति ३६० दिनोंमें भाग लिया लब्ध ९० मये प्रत्येक प्रस्तारमें ९०९०दिन आये ऐसे १ विमागोंमें वर्ष मरका फलफदना ।। अतर्दशाके लिये विधि है कि,उक्त९० दिनकी दशामें १२ का भाग देनेसे ७दिन ३० घटीकी एकएक अतर्दशा मई। एकएक शकलोमेंदिन घटीका फल कहना ऐसे प्रथम प्रस्तारसे पहिले ९० दिनका दूसरेसे दूसरे ९०का तीसरेसे तीसरे और चौथेसे चौथे ९० दिनका कहना ऐसेही जितनी संख्या पर ३६०में भाग दिया हो उतनेही दशाओंका फल कहना छः अधिक संख्या यहाँ नहीं होती इस रमलमतमें वर्षप्रवेश भाषाटीकासहित । (११३) मेष संक्रांतिसे माना जाता है वर्षभी सभी उसी संक्रांतिसे जानना यह दशाफल कहा अब फिर और विधि कहीजाती है॥३०॥३१॥ मासखण्डदशार्धाभ्यामुत्पन्नं स्यात्फलाह्वयम् ॥ तस्मात्सूक्ष्मदशायां तु फलं ज्ञेयं विचक्षणैः ॥ ३२॥ तचेच्छुभं शुभे गेहे पुनरुक्तं सवीर्यकम् ॥ तदा फलं शुभं वाच्यमशुभं वन्यथा भवेत् ॥ ३३ ॥ फलं गेहानुसारेण देहवित्ताद्यनुक्रमात् ॥ खारिजादिप्रभेदैस्तु निर्गमादिवदेद्बुधः ॥ ३४॥ टीका-मासखण्ड दशाखण्ड जो शकल उत्पन्न हो उसे फला- हृय कहते हैं उसके अनुसार सूक्ष्मदशाका फल चतुर ज्योतिषियोंने जानना जैसे पहिले प्रथम मासके पाशकोत्थ प्रस्तारमें कोईसी शकल हो तहाँ अंतर्दशा देखनी हो तो पहिले साबितकी शकल देखे वहाँ जोशकल हों उन्हें एक करे तब शुभाशुभ जैसी वह शकल बनी हो वैसा फल कहै ॥३२ ॥ वह शकल शुभ हो तथा शुभ घरमें पुनरुक्त हो बलवान हो तो शुभफल कहना अशुभहो अशुभ घरमें हो बलहीन हो तो अशुभ फल कहना ॥३३॥ तन धन आदि पूर्वोक्त भाव विचारके अनुसार शरीर १ धनरआदि क्रमसे फल कहना खारिज आदि भेदोंसे निर्गमादि कहना जैसे खारिज हो तो घटना दाखिल हो तो बढना ऐसा संपूर्ण विचारके प्रत्येक फल पंडितने कहने ॥३४॥ अथाब्देशप्रकारः। इदानीं सर्वजन्तूनां चमत्कृतिकरं परम् ॥ विधिं च वक्ष्ये येनाऽब्दे फलं सर्व स्फुटं भवेत्॥३५॥ प्रस्तारे साबिताख्ये तु तनुविश्वौ श्रुतीन्द्रकौ ॥
(११४) रमलनवरत्न- तिथिशैलौ दशाष्टौच हत्वा कृत्वाब्धिखण्डकम्॥३६॥ चतुर्यों हे तथा द्वाभ्यामैक स्यावर्षपश्च सः ॥ तस्य पूर्वोक्तमार्गेण फलं ब्रूयादिचक्षणः ॥ ३७ ॥ खारिजादिमिरस्यव मैदवा गमनादिकम् ॥ पुनरुक्त्यापि तस्यैव तत्तद्देदान् वदेवुधः ॥ ३८॥ टीका-अब यहाँ समस्त जीवोंको परम चमत्कार करनेवाली विधि कहता हू जिससे वर्पमें फल स्पष्ट हो जाता है । साबित नाम प्रस्तारमें १ । १३ तथा ४ । ४१ तथा १५१७और १०१८ भावोंके शकलोंको हनन करके ४ शकल करने ॥ इन 8 सेमी दो फिर दोसे भी एक बनायके जो आवे वह वश होता है इसके पूर्वोक्त मार्गसे चतुर ज्योतिपी फल कहे। इसके खारिज आदि भेदोंसे अथवा गमनादि भेदोंसे और पुनरुक्ति करके भी विद्वान उन उन भेदोंको कहे ॥ ३५-३८॥ यदि मासफलानीह ज्ञातुमिच्छा भवेत्तदा ॥ सावितप्रस्तरोमृतै' पुरोक्तैर्वेदखण्डकै. ॥ ३९ ॥ कुर्यात्प्रस्तारमस्मात्तु पूर्वोक्तादिदलेबुधः ॥ कृत्वाहेचैतयोरेकंयत्तत्स्यादाद्यमासिकम् ॥ ४० ॥ अनेनादिममासेतु पूर्ववत्कथयेफलम् ॥ आद्यमासोद्भवैर्वेदखण्डकैश्च पुनस्तथा ॥४१॥ द्वितीयमासप्रस्तारस्तस्मात्तद्वत्तृतीयके ॥ एव पुन पुन कुर्य्याद्यावन्मासाश्च द्वादश ॥४२॥ तेभ्य फल च मासाना पूर्वोक प्रवदेत्सुधी ॥४३॥ टीका-अव मासेश प्रकार कहते हैं कि यदि मासफल जाननेकी अथ मासप्रकारः।
भाषाटीकासहित ।
(११५)
यहाँ इच्छा हो तो साबित प्रस्तारके पूर्वोक्त १।१३।४।१४।१५॥
७ । १० । ८ खंडोंसे प्रस्तार बनावै इस प्रस्तारके पूर्वोक्त ४
दलोंसे क्रमशः एक शकल लेवे उससे पूर्वोक्त विधि करके प्रथम
मासका फल कहे ऐसेही प्रथममास प्रस्तारके ४ खंडोंसे पुनः दूसरे
महीनेका प्रस्तार बनावै इससे भी उसी विधि करके तीसरा
तीसरेसे चौथा ऐसे फिर फिर करके बारह महीनाके १,२
प्रस्तार बनावै उनसे पूर्वोक्त खारिजादि क्रम करके मास फल
पंडित कहै ॥ ३९-४३॥
दिने फलेच्छुः प्रथमाच मासात्पूर्वोदितैर्वेददलैः
प्रकुर्यात् ॥ प्रस्तारकं वायदिनस्य तत्स्यात्तस्मात्पु-
रावद्वितयस्य मासः ॥ ४४॥ तस्मात्तृतीयस्य
पुरोक्तमेवं खूयोऽपि यावद्गगनत्रिसंख्यम् ॥ मासेषु
तेभ्योऽब्धिदलैर्डिखण्डे ताभ्यामथैक पुनरेषु कार्य
॥ ४५ ॥ तत्तन्मासेष्वनेनैव खण्डेन फलमीर्यते ॥
एवं डादशमासेषु खण्डानां चिन्तयेत्फलम् ॥४६॥
टीका-मासफलसे उपरांत दिनफल चाहनेवाला पूर्वोक्त ४
खंडोंसे प्रस्तार बनावै,प्रथम दिनका होगा उससे तीसरेका तीसरेसे
चौथेका क्रमसे दिनेश खण्ड निकाले जैसे एक महीनेसे दूसरा उससे
तीसरा इत्यादि पहिले कहा है इसी प्रकार प्रत्येक दिनकीभी विधि
करनी जबतक ३० दिन स्पष्ट होते है तबतक यही विधि करता
रहै जो प्रस्तार आया है उसके पूर्वोक्त खण्डों ४ से दो फिर एक
करना ॥४४॥ १५॥ ऐसा करनेसे उन महीनोंमें मासफल दिन-
खण्डोंसे दिनफल पूर्वोक्त खारिजादि भेदोंसे विचारके कहना ऐसे
बारह महीनोंके फल वर्षमें विचारने ॥४६॥
(११६) रमलनवरत्न अथ जगढसाधनम्। यदा विश्वफलं वक्तुं रम्लवित्कुस्ते मनः ॥ तदा पूर्वोदिते काले संक्षिपेत्पाशको सुधीः॥४७॥ कुर्यात्पूर्वविधिं तत्र रम्लविद्वर्षपावधि । विधायवर्षपं तेन वक्ष्यमाणं फलं वदत् ॥४८॥ टीका-अब सारे ससारका वर्प साधन कहते हैं कि, जब दुनि- यांका शुमाशुम फल सालभरके कहनेकी इच्छारम्लनकी हो तो पूर्वोक्त मेप सक्रांतिके दिन पडितने पासा फेंकना ॥४७॥ तिससे पूर्वोक विधि ४ शकलोंसे उक्त क्रमसे एक शकल निकालके साल भरका फल जो आगे कहा जाता है कहना ॥४८॥ अय वर्षपतिमण्यानो फलानि । लयानं = यदि तद्दलशलिनः सर्वे नितांत जनाः स्वाचाराः शुभकर्मिण प्रतिदिनं कृष्यन्न- दिर्मुहः ॥ ईते' स्वल्पमयेऽपि मृः मुखवती वेदांघ्रिदासोद्भवं किश्चित्कष्टमिहेशदिग्जनपदेष्वे- तत्फलं कूर्मतः ॥ ४९ ॥ खण्डंकब्जुलदाखिलं- च बहुधा व्यापारलाभो नृणां पुण्यर्द्धिस्तरुजामृ- तोपमफलानां मक्षणं श्वस्करम् ॥ भूपानीति रता प्रजावनरताः स्वस्थ जगन्निर्मयं वृद्धिश्चो- त्तमवस्तुन फलमिद प्राच्या भवेत्कूर्मत ॥५०॥ टीका-चपेश शकलोंके प्रत्येक फल कहते हैं कि यदि लयान शकल वश हो तो सभी मनुष्य निरतर मुखी रहेंगे अपने अपने आचारोंमें तत्पर रहेंगे शुभकर्ममें प्रवृत्त रहेंगे वारवार प्रतिदिन खेती एव अन्नकी वृद्धि होती रहेगी अतिवृष्टि अनावृष्टि प्रभृति भाषाटीकासहित । (१७) सात ईतियोंका स्वल्प भय होगा तौभी पृथ्वीसुखी रहेगी. चौपाये और दासजनोंको थोडा कष्ट होगा, (कूर्म) पृथ्वीके बीचसे ईशा- नदिशाके देशमें यह फलविशेष जानना, कूर्म यहां चक्र जानना तिस कूर्म चक्रसे दिशा साधन करना ॥ ४९ ॥ कब्जुल दाखिल शर्मलन में मनुष्योंको व्यापारमें लाभ बहुत होवे पुण्य बढे वृक्षके अमृतसमान फलोंका भक्षण करना मिले श्रेय होवे राजा न्यायमें तथा प्रजाके पालनमें तत्पर रहे संसारमें स्वस्थ्यता एवं निर्भय रहे उत्तम वस्तुकीवृद्धि होवे यह फल कूर्मचक्रके पूर्व दिशामें जानना५० कब्जुलखारिजकं यदा च जनता चोहिग्नचि- त्ता भृश ग्रीष्मोष्णत्वमनीतिवर्तिकुभुजोष्टिर्भवे- द्भूयसी ॥ नीचस्तेयविषाग्निदंशककृतं चास्वा- स्थ्यमहोमिथोवारांतश्चमृतिर्नृणांकमठतो नैर्ऋत्य- देशे फलम् ॥५१॥ जमात में मिहतद्भवेबहुपदा- र्थद्धिर्नृणां सुनीतिसुखयुग्जनाकफरजोत्थपीडा- क्वचित् ॥ धराभवति भूरुहाः सुफलपुष्पपत्रांकुरा- स्तथोत्तरगतंफलंकमठतश्च पाश्चात्यगम् ॥ ५२ ॥ टीका-कजुल खारिज शकल में हो तो संसारमें सब मनु- प्योंके चित्त उद्विग्न विशेष करके रहैं ग्रीष्मऋतुमें गर्मी ज्यादा पड़े राजा अन्यायमें प्रवृत्त हैं वर्षा बहुत होवै नीचजन, चोरी, विष, अग्नि, डसनेवाले जानवर इनसे (दुःख) अस्वास्थ्य रहे परस्पर बुराई करते रहे 'मृत्युसमाचार बहुत मिले यह फल कूर्मचक्रके नैर्ऋत्य दिशामें जानना ॥५१॥ जमात 3 'शकलका फल है कि, बहुतसे पदार्थोंकी वृद्धि होवे मनुष्योंकीभी वृद्धि होवे मनुष्य अच्छी नीति एवं सुखसे युक्त रहें कहीं कफ रोगसे पीडा होवे,
(१८)
रमलनवरत्न-
पृथ्वी, वृक्ष उत्तम फल, पुष्प अकुरोंसे युक्त रहे यह फल कूर्मच-
ऋके उत्तर और पश्चिम दिशामें जानना ॥१२॥
स्याञ्चेत्तत्फरहा प्रजासुखमुतोत्पत्तिर्महर्घान्तरं
ह्यन्नादेश्च समर्घमर्थनिचयः शश्वक्षितौ मङ्गलम् ॥
कार्याभ्रन्पा सुदृष्टिरतुलापारीक्षजारद्धय काबुल
रोमकमिश्रकेषु कमठात्स्यात्पश्चिमेऽदः फलम्
॥ ५३ ॥ जनाकानल्पांतनुसलिलवर्षातिपवनं
महर्घोडेगोवाभृतककुहकानीतिपतिः ॥ तथा
मध्ये देशे विपुलबलिनो भूमिपतयोयदोक्लाख्यं
= मध्ये कमठपरतो भूमिचलनम् ॥ ५४॥
टीका-चपेश फरहा हो तो प्रजा सुखी रहे पुत्र पैदा हों भाव
बदले अन्नादि मंद बिके धनसंचय होवे वारवार दुनिया मगलहो
राजा बहुतसे उबम शुभ कार्यकरें अच्छी वृद्धि होवे रत्नादिकोंके
परीक्षक (जौहरी) एवं (जार) परस्त्रीगन्तामोंकी वृद्धि होवे
काबुल, रूम मिश्र देशों तथा कूर्मचक्रके पश्चिमदिशामें यह फल
विशेष जानना ॥५३॥ रक्ला = शकल होतो मनुष्योंको बहुत
केशमिले पानी कम वर्षे वायु अधिक चले अन्नादिकोंका मात्र तेज
होवे अथवा मनुष्योंको उद्वेग रहे रोग रहे दास गुलाम मादिकोसे
उपनयहो राजा अन्याय करे मध्य देशके राजा बलवान रहें और
भूकम्प होवे यह फल कूर्म चक्रमें मध्यम देशमें जानना ॥५४॥
अनीश = स्वल्पदृष्टिविफलघनचयोरोगवृद्धि-
नराणां काठिन्यं कार्यसिद्धावरिजनवशगोडिन-
चित्ता नृपाः स्युः ॥ स्यादन्नं वै महर्घ कुमतिजन-
मुखं श्रष्ठपुंसां क्षयः स्यादेतत्कूर्मात्प्रतीच्या
फलमखिलमतश्चान्यदेशेल्पक स्यात् ॥ ५५ ॥
भाषाटीकासहित । (११९), हुम्रा = ख्यात्स्वल्पदृष्टिविणचयहरोनिर्णय- श्चौरचारो धैर्याभावः प्रचण्डानिलगतिरवनीशाः कुमार्गा नृमृत्युः ॥ दुःसाध्यं कर्मपुंभिस्तरुषु फल- चयोर्थाप्तिहर्षों नृणां च कारूका हर्षयुक्ता दहन- दिशि फलं कूमतो मध्यमेऽपि ॥५६॥ टीका-अंकीश= शकल आवै तो वर्षा कम होवे, मेघ बहुत घिरे रहे परंतु व्यर्थ जावें मनुष्योंको रोग वृद्धि होवे कार्य सिद्धिमें कठिनाई पडे, राजालोग शत्रुजनोंके वशमें होकर उद्विग्नचित्त रहें, अन्नका भाव तेज होवे, दुर्बुद्धिवाले मनुष्योंको सुख मिले श्रेष्ट मनुष्योंका क्षय होवे यह संपूर्ण फल कूर्म चक्रके पूर्वदेशोमें विशेष अन्य देशोंमें थोडा होवेहै ॥५५॥हुम्रा = शुकल हो तो वर्षा अल्प होवे जगे जगे चोरीके अनुसंधान होते रहैं चोरनिर्भय होके फिरें। धैर्य सभीका जातारहे, वायु अति कठोर चले, राजा कुमा- में चलें, मनुष्य बहुत मरे, कार्यकरना पुरुषोंको कठिनहोजावे ॥ वृक्षोंमें फल बहुत लगें और मनुष्योंको धनकी प्राप्ति एवं हर्षभी होवे (कारु) शिल्पज्ञराज बढई आदि खुशरहें यह फल कूर्म चक्रके आगेयदिशा तथा मध्य देशमें भी जानना ॥ ५६॥ स्यात्खण्डं तहयाज = प्रवसितमनुजाः सिद्ध कार्या मुदाढ्या द्रव्यांधोनीतिविद्याभ्यसनतरि जला जीविनां शश्वदृद्धिः॥मिष्टान्नानां च भोज्य प्रमुदितनरपाश्चातियष्टिर्जनोयं सौख्याढयःसन्ततं स्यात्फलमितिगदितं कूर्मतो वायवीय ॥ ५७ ॥ टीका-बयाज होतो परदेश गये मनुष्योंके कार्य सिद्ध होवें और खुशरहें तथा धनके व्याज खानेवाले (साहूकार)नीति विद्याके अभ्यासी और नाव जहाज आदि जल कर्मसे आजीवन (१२०) रमळनपरल- करनेवाले इतनोंको वारवार समृद्धि मिलती रहे, मीठे अनोंक पदार्थ भोजनको मिलें राजा प्रसन्न रहेवा बहुत होवे मनुष्य सुख युक्त बरावर रहें फल कूर्मचकके वायव्य दिशामें जानना ॥५॥ नुसत्खारिजकं यदा नृपकृतं दण्डं च तज भय दृष्टयल्पाहरहर्षचण्डपवनातंकाई वित्तक्षयम् ॥ मध्यान्धो बलिपूर्वभूपसलिलांतर्मनभ्यस्तरीसा- सदनिशारखोखरगतं स्यात् कूर्मतः प्रागिदम् ॥ ५८ ॥ नुस्रदाखिलमन्नलोकमुखसंपत्त्यबुदृष्ट्य- ईयोस्रक्षेष्विष्टफलदिंसस्यविमवाभीत्युग्रविक्तईयः॥ धर्मढिर्जनतामुनीतिरवनीपालेषु सर्वत्रशे तुर्कि- स्वाननिशारवोखरगत ज्ञेय च कूर्मोत्तरे ॥ ५९॥ टीका-नुसत्खारिज = से राजासे दंड पडे राजासे भय होवे वर्षा थोडी होवे चोर खुशरहें घायु कोर चले रोग बढे धननाश होवे मध्यदेश एव पूर्व देशके राजा बलवान होवे नाव जहाज बहुधा जलमें डूबें समर कन्द, बुखारा, नेशारपुर औरकूर्म चक्रके पूर्वदि- शामें यह फल पूर्ण जानना ॥५८॥ नुमुदाखिल शकल हो तो अन्नका सुख होवे लोग सुखी रहें सपत्ति वढे जलकी वृद्धि होवे वृक्षोमें मनमाने फल सपत्ति होवें अन्न बहुत होवे मनुष्य निर्मय रहें उग्र कर्मोसे वित्तसमृद्धि होवे धर्म वढे मनुष्योंकी वृद्धि होवे राजाओंमें नीति अच्छी रहे, सर्वत्र (शुभ) मगल होये तुकिस्तान निशारय, समरकद इन देशोंमें यह फल विशप तथा कूर्मचक्रके उत्तरमें जानना ।। ५९॥ खण्ड चातवखारिज खरतरो वातोरुजचोष्णजाः शीतोष्णाधिकतातथाल्पविमवो लोकेऽल्पवृष्टिः भाषाटीकासहित । (१२१) कुवाक् ॥ कैऱ्यांफलभूपकोपमलिनाश्चोपडताः स्युः प्रजा मज्जन्तोतनुतोयकूपहरिभीत्याद्यं च कूर्मान्तरे ॥६०॥ दृष्टिः स्वल्पतरानकीयदिभ- वेदीर्घाःस्वनेविद्युतां पातोन्नादिमहघतावकरी चौरादिभीतिस्तथा ॥ नैराश्यंत्रपशत्रुद्धिजनता- ऽस्वास्थ्यतथोद्विग्नता तुर्कस्तानसुजंगवालगफल कूर्माङ्गतश्चोत्तरे ॥ ६१॥ टीका-अतवेखारिज शकल हो तो प्रचंड वायु चलै गर्मीसे रोग पैदा होवै शीत तथा गर्मीकी अधिकता रहे लोगोंका ऐश्वर्य कम रहे वर्षा कम होवै दुर्वचनता बढे सेवा निष्फल होवै प्रजा राज- कोपसे मलिंन एवं भयभीत रहे जल थोडेहों तालाब कूप आदियोंमें वस्तु डूबे सप आदिकोंका भय होवे यह फल कूर्म चक्रके मध्य देशमें जानना ॥६०॥ नकी शकल हो तो वर्षा अल्प होवे मेघोंके बडे शब्द होवें बिजली बहुधा गिरै अन्नभाव तेज होवे डाकू चोर आदिकोंका भय होवे निराशता होवे राजाओंके शत्रु बढें मनु- प्योंका स्वास्थ्य अच्छा न रहे उद्विग्नता रहे तुर्कस्तान एवं जंगवाल देशमें और कूर्म चक्रके उत्तरमें यह फल विशेष होगा॥ ६१ ॥ भवेदतवदाखिलं जनमुदोतिभव्यापामही जलपरिप्लुतोद्वहन वित्तधान्यर्द्धयः ॥ सुधोपम- फलर्डियुक्तरुलतातिवर्ष फलं प्रतीचीदिशि कूर्मतो रुमककेचशामे भवेत् ॥ ६२॥ रत्नामात्य- सुगंधिलेखकजनानां हर्षद्धिः क्षितौ स्वामित्वं च नृपेषु सेवकजनाः कष्टभुजाश्चानिशम् ॥ स्या- देतद्दलमिज्तमाख्य ३ ,मवनीसत्कर्मलाभा- (१२२), रमलनवरत्न- न्विता भूपास्तत्फलमुत्तरेतुबहलंकूर्मात्तथापश्चि- मे ॥ ६३ ॥ तरीक मिहतद्दलं ह्यतुलदृष्टिवायू पुरोजना कलपकर्मिणः पिशुनदूतमिथ्यागिरः ॥ प्रमृतविभवावणिग्वहुविद्धिभूमिभ्रमः फलं त्व- निलदिग्दले भवति कूर्मतश्चोत्तरे ॥६४ ॥ टीका-अतवेदाग्विल शकल होतो मनुष्य खुश रहे राजा ऐश्वर्य वृद्धि पावें पृथ्वीजलसे भीगी रहे अर्थात वर्षा उत्तम होवे तथा फल धन धान्यकी समृद्धि रहे वृक्ष एव लता अमृत समान फल समृद्धिसे युक रहें यह फल विशेषतःकूमचक्रके पूर्वदिशा और स्म देश एव शामदेशमें जानना ॥ ६२ ॥ इज्जत्तमा शकलसे रन (अमात्य वजीर लोगसुगधि वस्तु लिखनेसे आजीवन करनेवाले इतने वृद्धिको प्राप्त पृथ्वीमें होवें राजाओंमें स्वामित्व वढेसेवक जन नित्य कष्ट भोग पृथ्वीमें शुभ कार्य होवें जिनका लाभ राजा लोग उठावें यह फल कूर्म चक्के उत्तर तथा पश्चिम दिशामें विशेष जानना ॥ ६३ ॥ तरीक शकल हो तो वर्षा तथा वायु बहुत होने परोंके मनुष्य पापकर्मी चोर होवत जन झूठ बोलें व्यापारी लोगोंका ऐधर्य वढे बहुत वृद्धि होवे पृथ्वी कपि यह फल आमेय तथा उत्तर दिशा कूर्म चक्रमें विशेष जानना ॥ ६॥ प्रोक्तं मयैतत्फलमब्दपस्य रम्ले नृणां चापि वदेत् स्वबुद्धया ॥ यदस्त्यशुद्धं च निगर्हितार्थ तद्रागमु- त्सृज्य बुधैः सुशोध्यम् ॥६५॥ न पदच्छेदपदार्थ- विग्रहार्यान्वयसद्भावनिरुक्त्यलंकृतीश्च ॥ परिवे- मि तथापि मे शिशुत्वमार्या प्रीतिपरा सदा क्षमध्वम् ॥ ६६ ॥ रम्लांबुधे सारमिहार्यवयें भाषाटीकासहित । (१२३) हीतमस्यापि च सारसारम् ॥ कृतं मयैतन्नवर- नसंज्ञं प्राज्ञैः सयत्नैः सततं विचिन्त्यम् ॥६७॥ टीका-ग्रंथकर्ताकी उक्ति है कि,मैंने यह वर्षेशका फल कहा,इस रम्लशास्त्रमें मनुष्योंने अपनी बुद्धिसेभी विचारके युक्तिसे कहना इस ग्रंथमें जो अशुद्धिहो तथा निन्ध अर्थ हो वह पंडितोंने राग अमर्ष छोड़के संशोधन करना॥६६॥ मैं पदच्छेद, पदार्थ,समास, व्युत्पत्ति, सद्भाव, निरुक्ति, अलंकारभी कुछ नहीं जानताहूँ तौभी मेरी बाल्यताको श्रेष्ठजन सर्वदा क्षमा करें॥६६॥यह ग्रंथ रम्लरूपी समुद्रका सार मैंने किया है इसमें बडे शास्त्रोंसे सारकाभी सार लेके नवरत्न संज्ञक किया है इसे बुद्धिमान् यत्नसे वारंवार विचारें।६७॥ ग्रन्थकर्तृवंशवर्णनम् । आस्ते यद्ब्रजभूककुद्धरिपदे ध्यानावधूतांहसो यस्मिन्नंदसुतं स्मरंति सुधियो वृंदावनं सहनम् ॥ आसीत् कुञ्जविहारिसेवनरतस्तत्रावनीशार्चितो गोस्वामीललिताप्रसादविलसन्नाम्नासतां मण्डनः ॥ ६८ ॥ यस्तस्यात्मजतामियायभगवद्भक्तो मदन्मोहनः सोवात्सीकिल नारनौलनगरे काय- स्थवन्दार्चितः ॥ तत्सूनुर्मतिमान बुधार्चितपदो ज्योतिर्विदां. भास्करो विद्यासक्तमनास्त्रयीधु- तमलः श्रीचंद्रलालोऽभवेत् ॥ ६९॥ तत्पुत्रेष्ववर- श्वषट्रसुवयसासंपद्गुणैश्चाऽसमः शब्दाऽलंकृति काव्यसज्जविलसच्चताः सतां सेवकः॥ सोऽय संप्र- तियाचितोहिजवरैः श्रीरङ्गलालः कृतीसत्तै नवरत्नमेतदमलसत्प्रीतये संव्यधात् ॥ ७० ॥ -- (१२४) रमलनयरल- नागामिनन्देन्दुमितेन्दद्वन्दे माघे सितेऽनङ्गतिथौ सभौमे ॥ संपूर्तिमाप्तनवरत्नरम्लविद्वजनास्तं सतत विमान्तु ॥७१॥ इति रमलमपरले वर्षफलवर्णन नाम नषम रत्नम् ॥९॥ टीका-जो ब्रज भूमि पृथ्वीकी गर्दन है, जहांके निवासी श्रीकृ प्णके चरणारविदोंके ध्यानसे निष्पाप रहते हैं जिसमें नन्दसुत श्रीकृष्णको सद्बुद्धिवाले स्मरण करते रहते हैं जहां वनोंमें सुदर वन वृन्दापन है तहां कुजविहारी श्रीकृष्णकी सेवामें तत्पर तत्रत्य राजासे मुजित सानोंको शोमा देनेवाला ललिताप्रसाद नाम करके विख्यात हुआ ॥६८॥ जिसका पुत्र भगवानका भक्त जो मदनमोहन भया वह नारनौल नगरमें निवास करता मया तहां कायस्थ समूहसे पूजित रहा तिसका पुत्र बुद्धिमान् पण्डितोंके पूजित हैं घरण जिससे तथाज्योतिपियों में सूर्य विद्यामें आसक्त मन, तीन वेदों करके निर्मल श्रीचन्द्रलाल हुआ ॥ ६९ ।। तिन छ पुत्रोंमें छोटा कम उमरखाला जो संपत्ति एष गुणोंमें समान नहीं था तथापि शब्द, अलंकार, काव्योंसे सजा है चित्त जिसका और सबनोंफा सेवक रहा यहां इस समय प्राझणश्रेष्ठोंक प्रार्थना करनेसे यह रंगलालपण्डितसुदर श्लोकों करके निर्मल इस नवरत्नकोसब- नोंके प्रीत्यर्थ रचता भया ॥ ७० ॥ विक्रम संवत् १९३८ माघ शुक त्रयोदशी मगलवारको यह नवरत्नरमल सपूर्ण भया इसे विद्वान लोग वारपार शोभा युक करें ॥७१ ॥ इसिरमलनयरत्नेमाहीपरीमापायर्या वर्षविचारवर्णम नाम नवम रस्नम् ॥९॥ संवत्सरे दशकममिते बिपी विवृति पकार । महीधरो योधिपरखेमराजाममा नवीनेरमलेफरते। शुदाशुदभिंतने नूलामा पापारपफामुखीस्पात् । पस्मादेप पारसीपः प्रसिद सिदि प्रश्न मापते मापमापि।
कम १/२ सकळ नामानि Japse . . . । . . . ज्यादेहों (४) पंक्तियोंमें चिह्न करो जब चिह्न प्रष्टासे कर: उत्तर निकालनेकी रीति ॥ ऊपर लिखे मुतावित कमहों अथवा शकलरूपाणि १/ मनोभिलषितकार्य २ कार्येसफलताभविष्यतिनवा ३/ विवादेनयःपराजयोवा ४) परदेशेसर्वकास्पितिर्भविष्यतिनवा ५ पायोगृहेआगमिष्यतिनवा ६/ चोरितद्रव्यंलभ्यतेनवा ७/ मित्रस्यमैत्रीसत्यावासकपटा वाममयात्राभविष्यतिनवा ९/ अमुकोस्माकंनेहमानचकरोतिनवा १० विवाहःकीहभविष्यति ११/ विवाहितास्त्रीवरोवाकीहक् २२/ गर्भिण्या:फन्यावापुत्रोभविं० १३/ रोगीसुखीभविष्यतिनवा मतवेखारिज 4374ammar/Ran.1 पयान AARA | Saamana [...तरीख 28.20AMAR RAHAawunlan| कजलदाखिल 28.1A1AR 2 | Saamann... नको HAMAARBalamil इज्जत्तमा AmmansaAAA23 Hall अंकीश Hatanjarat AssRAISA | 32]... मतवेदाखिल HIMALAI नसुतुळदा० 1941ajmmon लहान फरहा कन्जुलखारज नमात RIAARE | ॐsalim s/AAABHar HIBur |ne १ देवी, परोक्षबाव प्रकट करनेवाली जंत्री। . रमलप्रश्नावली। . . . १५ अद्याहोऽस्माफकीहरभविष्यति ६/ मदीयस्वमस्यकिफळम् SI उ ०० . ० ० . . . . ० . . . . . 0 D . . . . . .० ० ० . ० . . 0 0 0 . ० . . ००० ० ० . 0 . 0 ०० ० . (१२६) रमनपरल- वाय दिये जायें, तो बाये ओरके अर्थात् दाहिने हाथसे बाप हाथके ओर गिनो यदि विषम हो तो (१) बिन्दु सम हो तो रेखा लिखो ऐसे चारहों पक्तियोंके (१) चिह्न (रेखाबिन्दु) लेलो, वह एक प्रकार पाशक शकलके नाई हो जायगा इसमेंमी स्मरण चाहिये कि, जब किसी पक्तिमें चिह्न ९ से अधिक हो तो ९ से तट (शेष) करना जो शेप रहे उसका सम विषम जानना टपरोक्त विद्यम उदाहरण । प्रथम पक्तिका विपम० दूसरीका सम तीसरीका विपम. चौथीका सम ऐसे चिह्न करना-तब आगे उत्तर देखनेको आगेकी जन्त्रीको देखो जिसके शिरपर वही चिह्नदो जो (१) पक्तियोंसे उक्त विधि करके मिला है तब उसके नीचे प्रश्नके शिरपर जो असर चिह्न हो उसे देखो तदनतर उस कोप्टकको (अग्रिम ) देखो जिसके शिरपर वही अक्षर हो, वही शकल चिह्नभी हो वहां अपने प्रश्नका उत्तर देख ले मदन करनके दिन। जन्वरी । ११२18181११।१२।२० । फर्मरी १११७ । १८ मार्च । १४ । १६ अप्रेल १०।१७११८ मई ७।८ जून १७ जोलाई १७१२१ अगस्त २०१२१ सितबर १० ११८ अक्तूबर ६ नवम्बर ६।१० दिसम्बर ६ । १११ १५ एकही प्रश्न एकही दिनमें दृमरेवार न होना चाहिये । इति ।।
भाषाटीकासहित ।
(१२७)
هه له م
अ.
जो तुम्हारी इच्छा है थोड़े दिनमें मिलजायगी.
२ कष्ट और पश्चात्ताप होगा,
जो काम आजके दिन करते हो खबरदारीसे करो ऐसा
न हो कि, कोई आपत्ति तुम्हारे ऊपर आपड़े.
४ : कैदी मरता है और उसके मित्र रंज करेंगे.
५ ६इसवक्त शरीर बच जायगा मृत्युके मिलापकरनेकी तय्यारी
है इस कष्टसे शरीर बच जायगा दूसरेमें आशा नहीं.
६ = एक अच्छी रूपवती लडकी किंतु कष्टकी भरी हुई मिलेगी.
तुमको धर्मात्मा और धर्मज्ञ स्त्री वा पुरुष तुम्हारी स्त्री वा
पुरुषको मिलेगा
2 = यदि तुम इससे विवाह करोगे तो जहाँ कुछ तुम आशा
करोगे शत्रु पैदा हो जायेंगे.
९ में बेहतर है कि, तुम इस प्रीतिको छोडदो क्योंकिल यह
हमेशा रहनेवाली है न सच्ची है.
१० : अपनी यात्राको छोडदो क्यों कि, इससे तुम्हें कुछ फायदा
न होगा.
११ = तुम्हारे बीच सच्ची मैत्री है.
१२ में तुम्हें चोरीका धन नहीं मिलेगा.
१३ । विदेशी खुशीसे शीघ्र लौट आवेगा
१४ - तुम वहांसे नहीं जावोगे जहां इस समय हो अर्थात्
स्थिर रहोगे.
१५ :- तुम्हें अच्छे सुकदमें मामले में हाकिमसे मदद मिलेगी
१६ = तुम भाग्यवान् नहीं हो प्रारब्ध रहित हो परमेश्वरसे
सहाय मांगो.
।
(१२८) रमलनवरत्न- १ ४ आ तुम्हारे प्रारब्धमें जो कुछ लिखा गया उसको लोग (ई) मत्सर करेंगे २ - जो कुछ इसवक्त तुम्हारी इच्छा है उसे छोडदो ३ - किसी मनुष्यकी कृपा जाहिर करता है दुश्मन हैं,जो तुमसे दगा करेंगे और तुम्हें असतोप दिखावेंगे ५ में वही कठिनतासे उसे माफी मिलेगी और छूटेगा ६ : वीमार मर जायगा उसके एक विद्वान् और बुद्धिमान पुत्र उत्पन्न होगा एक धनवान मनुष्य तुम्हारे लिये नियत किया गया = इस विवाइसे तुम्हें अच्छा सौभाग्य होगा यह प्रीति स्वच्छ चित्तकी है, ११- परमेश्वर तुम्हारा रक्षक होगा और तुम्हें उन्नति देगा १२ - दगाबाज और झुठे मित्रोंसे खबरदार रहो १३ = अस्माव तुम्हारी जायदात तुम्हें मिलजायगी १४ इस वक्त मुदलतके सवव वह घर नहीं आ सकता १५सुम यहाँ नहीं रहोगे इसलिये दूसरी जगे जानेको तैयार रहो १६ = तुम्हें कुछ फायदा न होगा इसलिये खबरदार प छुशियार हो - इ परमेश्वरकी कृपासे तुम्हें बडा लाम होगा २ - यथार्थ मन्द प्रारब्ध है परमेघरसे सहायता मांगो यदि तुम्हारी इच्छा वेहद नहीं है तो ही मजूर होगी ४- इसके बीच मेवी होगी - 10
भाषाटीकासहित ।
( १२९)
५ = आजके रोज अच्छी तरहसे प्रस्तुत रहो कदाचित तुम्हें
कुछ कष्ट होगा.
कैदी कठिनतासे छूटेगा.
७रोगी आराम होगा.
८ उसके लडकी होगी किंतु उसकी खबरदारीकी जरू-
रत होगी.
९ इस मनुष्यके पास अधिक धन नहीं है किंतु मध्यम धन है.
१० .इस विवाहको इनकार करदो नहीं तो पश्चाताप उठाना
पडेगा.
११ ऐसी मुहब्बतको छोडदो जिससे कि, तुम्हारी हानि होगी.
१२. तुम्हारा गमन निरर्थक है चाहिये कि, तुम घरमें रहो.
१३ है सच्ची और शुभमैत्री पर विश्वास रख सकते हो.
१४ -तुमको फिर वह नहीं मिलेगा उम्मेद मत रक्खो.
१५बीमारीके कारणसे वह पंथ तुमको नहीं देख सकता.
१६ = तुम्हारे भाग्यमें यहीं ठहरना लिखा है.
(ई.)
१ तुमको दूसरे मुल्कमें खूब धन मिलेगा.
२: निर्भय चले जानेसे तुम्हें जरूर दुगुना फायदा होगा.
३ : परमेश्वरकी दयासे तुम्हारे दुर्दिन अच्छे हो जायंगे.
४. अपनी इच्छा बदल दो नहीं तो तुम्हें कष्ट मिलेगा.
५ = तुम्हारी मनोकामना प्राप्त होने में जरूर बिलंब है,
६ = जिस जिस बात पर तुम्हारा चित्त आज लगे उन्हें छोड़ दो.
७ कैदी फिर छूट जायगा.
F
९
रमलनयरत्न- (१३०) ८- रोगीका रोग बहुत दिन तक रहेगा और आरामीमें सन्देह रहेगा ९ उसके सुशील और सुरूप लहका होगा १० - यह मनुष्य धनसे दुर्बल है परन्तु चित्तसे स्वच्छ व सच्चा है, ११ = व्याइ जिससे करते हो उससे सौख्य होगा १२ तुम ऐसे मनुध्यसे प्रीति करते हो जो तुम्हारा निंदक है १३ = यदि होशियारीसे चलोगे तो गमन सफल होगा १४ जो कुछ वह कहताहै यह उसकी इच्छा नहीं क्योंकि उसका चित्त युग है १५ - कुछ कष्ट यो खर्चसे तुम्हारा धन तुमको मिल सकता है १६ = तुमको परदेश देखनेकी आशा करनी चाहिये (उ) १ परदेशी की जितनी शीम सुम आशा करते हो लौटना नहीं होगा २- अपने दोस्तोंमें रहो तुम अच्छा करोगे ३ - तुम जिसकी ढूँढमें हो अब मिल जायगा १ - तुम्हारा भाग्य नहीं परमेभरकी प्रार्थना करो और शुद चित्तमे कोशिश करो ५% मित्रोंकी सहायतासे तुम्हारी मनोकामना सफल होगी ६ - तुम्हारे शत्र हैं जो तुम्हागसर्वनाश और दुःखी करनेका उयोग करेंगे खबरदार, एक शन्नु तुमको तगी व वरवादीमें लानेका उयम करता है, -
--
.
भाषाटीकासहित ।
(१३१)
८ = कैदीकोचिंताव शोक बहुत है और छूटना उसका कठिन है.
९. रोगीकी नैरुज्यताशीघ्र होगीऔर कुछ भय नहीं.
१० । उसके लडकी उत्पन्न होगी और भाग्यवती होगी.
११ , तुम्हारा मित्र उन्मादी होगा और उसीके द्वाराहानि होगी.
१२ में इस विवाहसे कुछ दुर्बलता आवेगी इस लिये होशियार
रहना चाहिये
१३ में यह प्रीति तुमसे झूठी और शोककी है.
१४ अपने गमनको इसवक्त बंद करो क्योंकि, तुम्ह कठिनता
होगी.
१५ यह मनुष्यअच्छाऔर सरल है परंतु इज्जतका मुश्तहक है.
१६ चोरीका धन तुमको नहीं मिलेगा.
१ उद्यमभी करते रहो तुम्हारी वस्तु मिलजायगी.
२ = अपूर्व मनुष्य लौटनेसे असमर्थ है.
३- तुम विदेशमें लाभ उठाओगे और कार्य योग्य होगे.
४'धैर्य रख तेरी किस्मतमें अच्छा धन है.
५ = इस समय इस कामके योग्य होनेमें विलंब है.
६= इस समय तेरीइच्छा व्यर्थ है.
७: कष्ट और शोक तुम्हारे सन्मुख आवेगा.
८ आजका दिन तेरे लिये अच्छा नहीं, अपनीइच्छाछोडदे.
९ कैदी छूट जायगा.
१० : रोगीको आराम होनेमें संदेह है.
११= उसके एक अच्छा लडका पैदा होगा.
१२ में एक योग्य मनुष्य और बड़ा धन मिलेगा.
{११२) रमलनवरत्न- १३ = तुम्हारे कामोंको नाश करेगा १४- यह प्रीति सञ्ची और नित्य रहनेवाली है.इसे छोडोमत १५ - अपनी यात्रामें जाओ, तुम्हें कुछ हानि न होगी १६ = यदि तुम इस मित्रका भरोसा करोगे तो तुम्हें केश F उठाना पड़ेगा . । १ यह मित्र तुमको सर्वदा तुमसे उत्तम रहेगा २- तुम्हें अपनी हानि दृढ चित्तसे सम्हालनी चाहिये ३ -, विदेशी अचानक लौट आवेगा १- अपने घरमें अपने मित्रों के साथ रहोतेराकष्ट दूर होगा ५ = सुमको अपने काममें कुछ लाम न होगा ६ = परमेश्वर तुम्हें उन्नति देगा ७- नहीं ८ ने अपने शत्रुओंके हायसे थोडे दिनोंमें मुक्त होजाओगे, ९ - तेरी पुर्भाग्यता आनेवाली है और उससे बचना कठिन ड्रोगा कैदी मरके छूटेगा ११ परमेश्वरकी कृपासे रोगी आराम होगा १२ = एक लडकी, किन्तु कमजोर १३ = तुझे महानुभाव एवं जवान और खूबसूरत (मित्र).सह- योगी मिलेगा इस विवाहको अगीकार न कर नहीं तो तुझे केश उठाना पडेगा १ १४
R
२
भाषाटीकासहित ।
१५ = इस मैत्रीको छोडदे.
६ = शीघ्रही यात्राको उद्यत रहो तुम अचानक बुलायेजाओगे.
(ऋ)
१ अपने सफरका आरंभ करो और जहाँतक इच्छा करोगे.
जासकतेहो.
तुम्हारा बनावटी मित्र परोक्षमें तुमसे घृणा करता है.
तुम्हारी आशा धन पुनः पानेकी व्यर्थ है.
४ पाथ किसी कामके कारण वक्र शीघ्र नहीं होसकता है.
५ = विदेशमें तुझे बहुत धन मिलेगा.
अपने यनको छोड दो तुम्हें अच्छा होगी.
: तुम्हारी आशा व्यर्थहै तुम कार्य योग्य न होओगे.
८ जो तुम्हारी इच्छा है प्राप्त हो जायगी.
९ * खुश हो तुम्हारी खुश किस्मती.नजदीकहै.
१० : आजके दिन तुम्हारेवास्ते अच्छा होगा.,
बाद बहुत कैद भुगतनेके उसकी रिहाई होगी:
१२ बीमारको आरामी होगी.
१३ = उसका नीरोग लडका.उत्पन्न होगा.
१४ - थोडे दिनोंमें तुम्हारा विवाह होगा.
१५ - और तुम प्रसन्न होना चाहते होतो इससे शादीमत करो
१६ : यह प्रेम दिली है और ताजिस्त रहोगी.
(ल)
१ स्नेहतो बडा है परंच बडी डाह पैदा होगी.
२- तुम्हारी यात्रा कमी निष्फल न होगी.
॥
P
--
3 - (१६४) रमलनवरत्न- ३- तुम्हारा ऐसा मित्र होगा जैसा कि, तुम चाहोगे : ४. चोरित द्रव्य दृशको किसी चालाक शख्सके जरियेसे मिलेगा ५ = पथिक शीघ्र प्रसन्नतासे लौटेगा १६ : विदेशमें तुम कोई योग्य न होमोगे परमेश्वरपर भरोसा करो जोकि खुशीका देनेवाला है ८ = सुम्हारी भलाई थोडे दिनोंमें बुराईमें तब्दील होजायगी ९ तुम्हारी अपनी इच्छानुसार योग्यता होवेगी बदवस्ती जोकि मय सुचक है रुक जायगी अपने वेरियोंसे खबरदार रहो जो कि तुम्हें हानि पहुंचा. नना चाहते हैं चररोजबादतुम्हाराफिककैदीके निस्बत करके होजायगा १३ = परमेभर स्वीकार कर तपुरुस्ती और ताकत कर देगा १४ - उसकी एक बहनकी खूबसूरत लडकी होगी १५ - तुम ऐसे विवाह करोगे कि जिससे तुमको आराम बहुत कम मिलेगा १६ = इस विवाइसे तुम्हारी इच्छा पूरी न होगी (लू) बाद पहुत फट तुम्हें आसायश माराम मिलेगा २- सादिक दिलकी पाक मुख्यत होगी तुम्हारा सदर कामयाब होगा ४- इस आदमीकी दोस्तीपर भरोसा मत करो . ।। ३ -- , १
-
-
--
भाषाटीकासहित ।
(१३५)
५ माल मशरुका दश्तयाव न होगा मगरचोर सजायाव होगा.
६ : मुसाफिर बहुत दिनमें आवेगा.
७ तुम्हें नेकवख्ती आराम परदेशमें मिलेगा.
८. फिलहाल तुम्हें कोई कामयाबी न होगी.
९ = जिस काममें तुम लगेहो उसमें कामयाब होजाओगे.
१० अपने इरादेको तबदील करो और तुम अच्छा करोगे.
११ = नहीं.
१२ - सबर करो चन्द्ररोजमें तुम्हारी हालत दुरुस्त होजायगी.
१३ = कैदीको रिहाई होगी.
१४ बीमार मर जायगा
१५. उसको लड़का पैदा होगा.
१६ = तुम्हें मुशकिलसे तुम्हारा शरीक मिलेगा.
(ए)
१ . तुम्हारा ब्याह अच्छे खूबसूरत आदमीसे होगा.
२- इस शादीमें बहुत किस्मकी आफतें पेशआवेगी.
३- यह मुहब्बत तबदील होनेवाली है.
४ तुमको सफर नेक बख्त न होगा.
५ = इसशख्सकी मुहब्बतसही वरास्म है तुम भरोसा कर
सकते हो.
६ : तुम्हारा नुकसान होगा मगर चोरको बहुत तकलीफ
वरदाश्त करना होगा.
७: मुसाफिर जल्दी मयमालके वापस होगा.
८ = अगर तुम घरमें रहोगे तो तुम्हें कामयाबी होगी.
1
(१३६) रमलनवरत्न- -- १२: १ ९- तुम्हारा फायदा कम होगा १० तुम्हें रज तकलीफ होगी ११- तुम इस्व दिलख्याह कामयाब होओगे, तुम्हें रुपये मिलेंगे १३ = बावजूद दुश्मनोंके तुम अच्छा करोगे १४ कैदी बहुत दिनतक जेलमें रहेगा १५ - बीमारको सेहत होगी १६. उसके लहकी पैदा होगी (ऐ) उसको लहका पैदा होगा दो खिताब व इजत उसको मिलेगी २-वडीलगातारकोशिशऔर रुपयेसे उसकोशदीक मिलेगा ३- यह शादी कामयाव होगी १ वह अभी तुम्हारा होना चाहता है; ( मर्द या औरत) ५ = तुम्हें सफरमें फायदा होगा ६- उस शख्स पर ज्यादे एतकाद मत रक्खो तुम्हें किसी वक्त तुम्हारी जायदाद मिल जायगी मुसाफिरका वापस होना बसवव उसके चाल चलनके शकदार है = इस्व दिलरूबाह कामयावी तुम परदेशमें होगी १० - फायदेकी उम्मेद मत करो यद ये फायदा होगा : ११ = पनिस्वत मुम्हारी उम्मेदके तुम्हारे तई ज्यादा नेक पख्ती होगी ८ - - . -- -
भाषांटीकासहित।
(१३७)
१२= जो कुछ तुम्हारी ख्वाहिशें हैं जलदी हासिल होंगी.
१३ तुम शादीमें बुलाये जाओगे.
१४ - बदबख्तीकी शिकायतका तुम्हें मौका न मिलेगा.
१५- कोई रहम करेगा और कैदीको रिहाई होगी.
१६= बीमारकी सेहत ठीक नहीं.
(ओ)
१ : बीमारको सेहत होगी मगर उसकी उमर कम है.
२= उसके लडकी होगी.
३२ तुम्हारी शादी इज्जतदार खानदानमें होगी.
४ : इस शादीसे तुम्हें कुछ हासिल न होगा.
५३ वक्त आनेदो तुम बडी मुहब्बत पाओगे.
६३ घरसे खतरेमें मतं पडो.
७ : यह शख्स सच्चा है या पाकदोस्त है.
८ = तुम्हें माल मशरुका कभी नहीं मिलेगा:
९% मुसाफिर वापस होगा मगर जल्दी नहीं.
१० : जब परदेशमें रहते हो तब बंदऔरतसे परहेज रक्खो.
नहीं तो उससे नुकसान पहुंचेगा.
११%= जिसकी तुम कम उम्मेद करते हो जल्दी मिलजायगा.
१२५ तुम्हें बड़ी कामयाबी होगी.
१३ में हमेशा उसपर खुश रहो जो तुमको दिया गया है.
१४- रंज दूर होगा और खुशी आवेगी.
१५ तेरी किस्मत मानिंद गुलके खिलनेकों है चंदरोजमें खिल
जायगी.
-
LAN
(१३८) रमलनवरल- १६= मौत केदको झूठा करेगी (औ) १ कदी खुशीके साथ रिहा होगा २- वीमारीकी सेहतमें शक हे उसको लडका पैदा होगा और उम्रदराज होगा। ४- तुम्हें पूरा सवाव ख्वाविंद या जौजद मिलेगी। ५- इस शादीमें देर मतकर तुझे बडी सुशी होगी। इस पुनियामें तुमसे कोई अच्छी मुहब्बत नहीं करता। तुम मरोसेके साथ जा सकते हो। ८- दोस्त नहीं वलि पोशीदा दुश्मन है। ९= माल मशरुका तुम्हें जल्दी मिलेगा। १०- मुसाफिर वापस न होगा एक विदेशी औरत तेरी दौलतको ज्यादे बढायेगी। १२%D तुम्हारे फायदेमें तुम्हें दगा मिलेगी। १३%= तुम्हारी मुसीबतें दूरहोंगी और तुम खुश होओगे । १४- तुम्हारी उम्मेद वेफायदा है दौलत तुमसे नफरत करतीहै। १५- तुम जल्दी दिलख्खाइ खवर सुनोगे। १६ मुमीवतै सुमको ताफरही है। (अं) आजका रोज तुम्हारी सुशीको न पावेगा। २- अपने दुशमनोंसे कैदी बचेगा। ३- बीमार आराम होगा और बहुत जीवेगा। ४- उसके दो लडकी होंगी।
भाषाटीकासहित । (१३९)
५ = एकदौलतमंदनौजवान आदमी तुम्हारा ख्वाविन्द होगा.
६- शादी जल्दी करो इसमें तुम्हें बडी खुशी होगी.
७ 7 यह शख्स सच्चे दिलसे तुमसे मुहब्बत करता है.
८ घरसे तुम कामयाब न होगे.
९ में यह दोस्त सोनेसे ज्यादे कीमती है.
१० तुमको तुम्हारा माल कभी नहीं मिलेगा.
११ = वह शख्स बीमार है और अभी वापस नहीं आसकता.
१२ - अपनी मेहनतपर भरोसा रक्खो और घरमें रहो.
१३ । खुश हो क्योंकि आयदेको तुम्हें कामयावी बख्शीगई है.
१४ + अपनी नेकवख्तीपर बहुत भरोसा मत कर.
१५ जो तुम्हारी ख्वाहिश है वह मंजूर होगी.
१६ = आजके रोज तुम्हें बडा खबरदार रहना चाहिये ऐसा न
हो कि, कोई आफत तुम्हारे ऊपर आ पडे.
(अ)
१ दरमियान दोस्तोंके बडी खुशी होगी.
२८ आजका दिन अच्छा नहीं बल्कि बुरा है.
३- अगर्चे वह आजकल तकलीफ बरदाश्त करता है वह
अबभी इज्जत पायेगा.
४': सेहतमें शुबहा है इस लिये उसकी दूसरी दुनियाका
सोचान करो.
५. उसको लडका पैदा होगा मगर बेअदब होगा.
६ : दौलतमंद ख्वाविन्द या जोरू मिलेगी मगर बदमिजाज.
-
(१४.)
७
८
१०
रमनवरल मा० टी० ।
इस शससे शादी करनेसे अपनी खुशीको यकीनकर
यह शल्स तुमसे ज्यादे मुहब्बत रखता है मगर छिपानी
चाहता है " ।
९ = तुम अपने सदरमें बडे रजा सकते हो
उसका एतकाद न करो पह दगाबाज है कायम मिजाज
नहीं
११ = एक अजबतरहसे तुम्हारी जायदाद तुमको मिलेंगी
१२ = मुसाफिर जल्दी पापस आयेगा
१३ = परदेशमें मुम चैन व माराममें रहोगे
१४ अगर अच्छीतरहसे कारवाई करोगे तो जरूर कमियाँ
होयोगे
१५ - तुम अवमी शानशौकत 4 मालमतेके साथ रहोगे
६ जो कुछ तुम्हारे पास है उसपर सबर करो
-
2 11-
इति महीधरसंगहीता रमलप्रमावली ।
श्री। श्रीगणेशाय नमः। अथ रमलदानियाल । - 'अथ कार्यावधिप्रश्न । कोई पूछे कि, मेरा काम कितने दिनोंमें और किस वारमें होगा ? तब सोलह १६ शकल निकालै. पहिली और पांचवाको जर्बकरे दूजी २ और छठी ६ को जर्ब करै.३-७ को जर्ब करै ४-८को जब करे शकल निकालै ऐसे इन्किलाब करे. ऐसे ४ चार शकल निकालके इनसे सोलह शकल बनावे फिर इन पर अमल करै.१४ घरकी शकलको देखे, उसके नीचे जितने अंक हों उतनेही दिनमें और उसही शकलके स्वामीके वारको कार्य होगा. जैसे १४ घर लह्यान में हो तो ९ नव दिनमें और बृहस्पति वारको होवे, ऐसे सब कहना इति ॥१॥ धनका प्रश्न-मेरे धन होगा कि नहीं तो इस प्रश्नको दूसरे घरसे विचार.तहाँ प्रस्तारमें१-२-११येशकल शुभ होंतोधन होगा अशुभ हों तो नहीं होगा।तहाँ = = = = = ये शुभ और = = = = ये अशुभ शकल हैं, इति ॥२॥ प्रश्न-नजदीक जाताहूँ सो शुभहै या अशुभ है! इस प्रश्नको ३ घरसे विचारै ३ घरमें शुभ शकल हो तो शुभ फल कहै, अशुभ हो तो अशुभ फल कहै, साबित शकल हो तो वहाँसे उलटा चला आवेगा यह कहो इति ॥३॥ प्र०-मेरी अवस्था अबसे आगे कैसी बीतेगी ! तहाँ १-२-९इन घरोंसे विचारै. तहाँ शुभदाखिल येशकल आवे तो अच्छी गुजरेगीऔर खारिज = == ये हों तोअच्छी नहीं (१४२) रमलनवरत्न- गुजरेगी शुभ सावित आवे तो जैसी पीछे गुजरी वैसीही युजरेगी यदि मुन्कलीव आवे तो खुशवक्तसे गुजरेगी दूसरा प्रकार यह है कि १२ वें घरको विचारे शुमहो तो अभी अच्छी बीतती है आगेभी मली बीतेगी अशुभहो तो आगे बुरी बीतेगी । प्र०-मरी गुजरान कैसी भई । और आगे कैसी होगी ? तहाँ १-४ शकलको जर्बकरे ७-१० को जर्ब करे इनसे शुभ शकल बने तो शुम अच्छी गुजरी, अशुभ हो तो बुरी नाकिस गुजरी है। यदि ये दोनों विपरीत हों अर्थात् एक शुम और एक अशुमहो तो मध्यम गुजरी कहै । फिर १-१-से उपजी और ७-१० शकलसे उपजी हुई राकलको जर्व करके एक बना लेप अशुभहो तो बुरी गुजरेंगी और शुभहो तो अच्छी गुजरेगी, मध्यम हो तो मध्यमही गुजरेगी इति ॥४॥ प्र०-मग भाई मुझपर खुशी है या नहीं। तहाँ तीसरेघरको विचारे यदि दाखिल शकल- ये हों तो भाईका प्यार बहुत है और यदि खारिज अर्थात् - = - य शकल हों तो प्यार नहीं दुशमनाई है, जो सावित शकल हो तो कुछ उपरसे प्यार रखताहै। लोगोंके दिखानेके वास्ते झल्ल मल्ल करता है, जो मुन्कलीव हो तो लोगोंके भयसे प्यार किया चाहताहे दिलमें प्यार नहीं है एसे कहो और इन सबको शुभाशुभ देखकेभी विशेष वा कम हाल कहना इति ॥५॥ प्र.-म जिस औरत (घी) स विषाह कराया चाहता हूँ पह कैसी है। तहाँसातवें घग्को विचारे जो येशकल हों तो पतिव्रता है, यदि = = = इनमसे कोईसी भी हो तो वद औरत कलहकारिणी और व्यभिचारिणी है, दुखदायिनी है 5 - भापाटीकासहित । (१४३) , बहुत होवे जो इनसे बची हुई अन्य कोई शकल हो तो स्त्री जार (छिनाल) है बातोंमें मीठी है, इति ॥ ६॥ प्रल-मेरी वस्तु खोगई है सो मिलेगी या नहीं ? तहाँ रमल डालै प्रस्तार बनाकर,सोलह शकल निकालै फिर सातवीं शकलको देखें तहाँ दाखिल शकलोंमेंसे कोई शकल हो तो शीघ्रही पावे, और खारिज हो तोनहीं पावे।मुन्कलीव हो तो कुछ पता लगे,पावे नहीं शुभ साबित होतो विलंबसे पावे,अशुभ हो तो नही पावे।इति॥७॥ प्र०-वर्षा होगी या नहीं ? तहाँ प्रस्तार दो बनाके, पांचवी और सोलहवी शकलकी एक शकल निकालै यदि दाखिल हो तोवर्षा जमात हो तो नदी बहुत चढे यह शकल हो तो बादल अबर बहुत रहैं। में यह हो तो मेह अँधेरी घटा बहुत हो वर्षा थोडी हो : यह हो तो वायुही चले वर्षा न हो = यह शकल होतो गरम लाली कसीरी वायु आवे जो बयाज होतो मेह थोडा और वायु बहुत चले यह तरिखा शकल होतो मेह बहुत टल टल जाय और खारिज संज्ञक शकल होयतो वर्षा बहुत टल टल जाय इति ॥ ८ ॥ प्र०-अन्न (अनाज ) महँगा होगा? या सस्ता होगा? तहाँ प्रस्तार बनाके, सोलह शकल निकालै फिर पहली और १० शकलको जब कर दूसरी और ११ ग्यारहवी शकलको जब करै, पांचवी और ९ को जब करै सातवी और १२ को जब करे ऐसे चार शकल निकालै पीछे इन चारोंसे सोलह शकल बनावै पीछे इस प्रस्तारका * इन्किलाव बनाके तिससे चार शकल निकाले फिर तिनकी एक शकल बनावै। यदि वह शकल आतशी अर्थात् अग्नितत्त्वकी हो तो अन्न महँगा होने, पृथ्वीतत्त्वकी हो तो थोडा महँगा, बांदी १-५ से, ३-७ से,४-८ से जर्ब करके शकल निकालै इसे इन्किलाब कहते हैं।
- - (१४४) रमलनवरत्न- अर्थात् वायुकी हो तो मध्यम भाव,जल तत्त्वकी होतो बहुत सस्ता होवे इति ॥ ९॥ प्र. मेरा पाप मुझे कैसा चाहता है। तहाँ प्रस्तार करके चौथे घरको विचारे यदि ४ चौथे घरमें शुमदाखिल शकल होतो बहुत प्यार रखता है, सावित होतो मध्यम प्यार है,खारिज होतो प्यार नहीं है, मुन्कलीव हो तोऊपरसे प्यार दिखाता है मनमें प्यार नहीं रखता हे इति ॥ १० ॥ प्रश्न-मेरा रोजगार होवगा कि, नहीं। तहाँ प्रस्तार वनाके दूसरे घरको विचारे जो दाखिल शकल आवे तो शीघ्रही रोजगार हाथ आवे, जो खारिज शकल आवेतो रोजगार नहीं होवे,सावित होतो ढीलमें रोजगार होगा, मुन्कलीव हो तो ढीलमें थोडासा रोजगार होगा अशुभ हो तो नहीं होगा इति ॥ ११ ॥ प्रश्न-परदेशीका सरचा आवेगा कि, नहीं! तहाँ प्रस्तार बनाके पांचवें घरको देखे यदि ५ घरमें दाखिल - 2 ये शकल हों तो खरचा आवेगा परदेशी मनुष्य खुशी है, जो खारिज = = - ये शकल आवे तो खरचा खबर कुछ नहीं आवे। जो शुम सावित आवे तोविलबसे खरचा आवे मुन्कलोव आवे तो खरचा नहीं आवे खवरही आवेगी ॥ १२॥ प्रश्न-मैं फलानेके पाससे कोई वस्तु मांगा चाहता हूं, वह देगा या नहीं 1 तहाँ प्रस्तार वनाके, छठी और दशवीं शकलको जर्व करके एक बना लेवे फिर शुभ दाखिल आवेता देवेगा जो शुभ मुन्क- लीव हो तोशीपही दवेगा, जो अशुभ मुन्कलीव आवेतो देके फिर उलटे ले लेवेणा जो अशुभ खान्जि हो तो नहीं देवेगा जो शुभ मारित होतो दीलसे देगा जो शुभ खारिज होतो दिलासा करेगा देवेगा नदी इति ।। १३॥ - भाषाटीकासहित । (१४५) प्रश्न-माशूक (प्रियजन) हाथ आवे, या न आवे और परदेशीकी खबर सच्ची है या झूठी है आर परदेशी आप आवेगा या नहीं ? इन प्रश्नोंके पाँचवें घरको विचारै तहाँ इनमेंसे कोई शकल होवे तो माशूक हाथ आवे. और परदेशीकी खबर आवे जो कि, पीछे खबर आई थी, सच्ची है, और जो यदि == इनमें कोई शकल आवेतो जहाँ था वहांही है आवे नहीं और माशूक कुछेक दिन हाथ नहीं आवे, यदि = = इनमेंसे कोई शकल आवे तो परदेशी नहीं जीता और माशूक हाथ न आवे खबर झठी है.इति ॥ १४ ॥ प्रश्न-गर्भवती बेटा जनेगी या बेटी जनगी ! तहाँ रमल डाल सोलह शकल निकालै; पहली और दशवींको जर्ब करै फिर छठी शकलसे जब करै. यदि = = = = इनमेंसे आवेतो रूपवाले पुत्रको जनै. जो 3 = = E-इन- मेंसे आवे तो बेटी जनै. दूसरा प्रकार यह है कि, पहिली और पांचवीं शकलको जर्ब करै६-७ को जब करे. फिर इन दोनोंसे एक बनाके उसे देखै. जो अग्नितत्त्व अथवा वायुतत्वकी हो तो बेटा जनेगी, जो पृथ्वी वा जलतत्त्व हों तो बेटी जनेगी. इति ॥ १५॥ प्रश्न-बांके गर्भ है, या नहीं ? तहाँ छठे घरसे विचारै,जो दाखिल साबित हो तो गर्भ है. जो खारिज हो तो गर्भ नहीं. मुन्कलीव हो तो गर्भ है, परन्तु ठहरना मुशकिल है, तहाँ ठहरनेका निश्चय ऐसे करे कि, तेरहवी और सातवी शकलको विचारे, दाखिल सावित हो तो रहै, खारिज मुन्कलीव हो तो न रहेगा इति ॥१६॥ प्रश्न-स्त्री सुखसे बालक जनेगी, या दुःखसे ? तहाँ प्रस्तार बनाके छठे घरको देख, यदि शुभ दाखिल हो अथवा शुभ खारिज हो तो सुखसे जनेगी.शुभ साबित आवे तो अजारसे अशुभ खारिज १० (१४६) रमलनवरल- आवे तो खतरा है शुम मुन्कलीब आवे तो सुखसे अशुम मुन्क लीब आवे तो दुःखसे जनेगी इति ॥ १७ ॥ प्रश्न-पीके कितने महीनेका गम है। तहाँ प्रस्तार वनाके पहली और ग्यारहवीं शकलको जर्व करे ५-५ को जर्व करें फिर इनसे उत्पन्न हुई दोनों शकलोंकी एक शकल बनाके उसके स्वामी अहको विचार जो येसूर्यकी शकल हों तो एक महीनेका गर्म है जो - ये शुक्रकी शकल हों तो तीन महीनेका है, जो मगलकी = हों तो ५ महीनेका जो वृहस्पतिकी हों तो = = छ महीनेका है जो शनिकी = हों तो मही- नेका है राष्ट्रकी - हो तो दश महीनेका है वुधकी आवे तो३-४ महीनेका है इति ॥ १८॥ प्रश्न-स औरवके किस वारम किस वक्त पालक होगा । इस प्रस्ता- रके ग्यारहवें घरमें विचार जो सूर्यकी शकल आवे तो आदित्य- वारमें होगा इसही प्रकार ११ घरमें जिस महकी शकल पडे उसीका वार पतलाना किसषक्त जनेगी। इस प्रश्नमें पहले घरका विचारे जो तहाँ पहले घर - : येशकल आये तो सन्ध्यासमय अथवा अर्धरात्रि समय जनेगी = = = येआवें तो चढते दिन अथवा दुपहरीपीछ जनेगी। ये आवें तो सूर्योदय पर जो यह आवे तो आधी रातके पीछे जनेगी और शकुन पक्तिचक्रमें जो रात दिनकी शकल कही हैं उनसे विचारके भी कहे इति ॥ १९ ॥ प्रश्न-इस पाठकको कौनसा दिन और कौनसा महीना पाप कहा (पुरा) है ? तहाँ प्रस्तार वनाके ८ आठवीं शकलके घरको विचार तहाँ = यह आये तो १४ दिन अथवा वर्ष माफिक है जो - यह आवे तो ३० दिन अथवा तीसौं वर्ष माफिक है E यह आये तो४० दिन अथवा १०वाही वर्प मारह भाषाटीकासहित । (१४७) जो = यह आवे तो १२ दिन अथवा १२ वांही वर्ष भारी है. = यह आवे तो सात दिन अथवा सातवाँ वर्ष भारी है. यह हो तो दो दिन अथवा दूसरा वर्ष भारी है. - यह आवे तो पहला दिन अथवा पहला वर्ष भारी है. जो यह आवे तो ५० दिन अथवा पचासवाँ दिन भारी है. यह आवे तो ६दिन अथवा छठा वर्ष भारी है. जो यह आवे तो भी ६ दिन अथवा छठा वर्ष भारी है.जो यह आवे तो चालिस दिन अथवा चाली- सवां वर्ष भारी है. जो यह हो तो २० दिन अथवा वीसवाँ वर्ष. भारी (माफिक) है. इति ॥२०॥ प्रश्न-मेरा पशु अथवा पक्षी जानवर खोगया है मिलैगा, कि नहीं ? तहाँ प्रस्तार बनाके दूसरे घरको बिचारे, शुभ दाखिल आवे तो जल्दी पावे, अशुभ दाखिल आवे तो बहुत दिनोंमें पावे. खारिज हो तो न पावे. शुभमुन्कलीव आवे तो खर्चलगके विलंब (देरी)में पावे. शुभ साबित आवे तो कुछ थोडासा खर्च लगे.थोडेही दिनोंमें पावे. इति ॥२१॥ प्रश्न-चोरकी सूरत कैसी है ? तहाँ प्रस्तार बनाके सातवें घरको देखै यदि = यह आवे तो चोर जर्द रंग, गौर वर्ण है,मन्द आदमी है. दाढी अच्छी और बडी कद लंबा है. जो = कन्जुल दाखिल आवे तो गेहूंके रंग मध्यम कद और मध्यम बलवाला है, लंबी गर- दुन, गिरदा,बडे रोम इनसे युक्त है. जो यह आवे तो सुर्ख रंग है,लंबा है, मुख पर स्याही है, हाथ पर स्याही है, हाथपर मस्सा या तिलका चिह्न है, हाथमें छडी रखता है. शौक रखता है, टेढा रहता है. जो जमात आवे तो साँवला, छोटी गर्दनवाला, काली भृकुटियोंवाला है. जो - फरहा आवे तो सफेद रंग, खूबसुरत, लंबी या सम गर्दन,स्याह भौंह और कलॉवत ( गानेवाला) है,जो उकला = आवे तो छोटी गर्दनवाला, आकीचोर (बहुत चोरी (१४८), रमलनयरल- करनेवाला) कमीन जाति है, सुनार, लुहार, मनिहार आदि है यह आवे तो लबा, मोटा, काला, लवी गर्दनवाला है, नेत्रों में कुछ निशानी है, दाहिनी तर्फ पांशुमै फोडा या चोट अथवाशस्त्रकी निशानी है, अधम (नीचजाति) है जो = हुमरा आवे तो सुर्ख रग या भूरा रंग है, वाल और नेत्र लाल हैं, मुखपरशीतलाके दाग हैं, फोडा, फुन्सी, जखम आदि निशानी हैं,कमीन जात है जो = यह बयाज आवे तो सफेद रंग है, तिल्लीवाला है, कानोंमें छिद्र हैं, मीठी तबीयत (प्रसन्नचित्त) रहता है, वातें बहुत करता है, मुखपर कुछ निशानी, बूचा कान, मिली हुई मौह हैं, मीठी बोली, गर्दन मोटी, भली नियत जो यह आवे तो लाल रंग कुछ स्याह रग है, लवी गर्दन, लवा पेट, आँखपर मुखपर वायीं तर्फ तिल अथवा मस्साकी निशानी है, शरीरमें गुलझट है जोनकी - यह शकल आवे तो लाल रगवाला है, वैरी है, यह चोर पतला है, चालाक, जवान, जोरावर है, जो यह शकल आवे तोसफेद और जर्दा- ईसे मिला रग है, दाढी लबी है, भौंह मोटीऔर मीगबोलनेवाला है, गाने बजानेवाला और मुल्यजनहै, जो इजतमा- यह शफल आवे तो सफेद रंग है, कपोल लाल हैं, लवीकद, नारियलसरीखा शिर है, पतले ओठ और छोटी नाकहै यदि तरिखा यहशकल हो तो आमेज़ अर्थात् मिला हुआ रगषाला है,पतलाऔरलंबाई, स्याद भौंह हैं, पतली अगुली, हुनरदार ऐसी कोई औरतही चोर है इति ॥ २२ ॥ प्रश्न-चार चाहाल किस वर्फ भाग गया है। तहाँ रमल डाले आठवीं नववीं शकलोको जब करके एक वनावे जो = इन ? मेंसे कोईसी आवे तो पूर्व दिशामें गया, जो इन 8 मेंसे कोईसी आवेती उत्तरकी तर्फ गया जो इन 8 मेंसे कोई आवे तो पश्चिम दिशामें गया, जो भाषाटीकासहित । १(१४९) ==इन ४ मेंसे कोई शकल आवे तो दक्षिण दिशामें गया है. इति॥२३॥ प्रश्न-रोगीके क्या रोग है ? तहाँ रमल डाल प्रस्तार बनाके छठे घरको बिचारै. यदि वहाँ में लह्यान शकल होतो इसके कुछ दिन पहले गरमीका विकार था तिस श्रममें यह न्हाया अथवा कुपथ्य कियाहै, इससे रोग भयाहै ऐसा विचारना, इसको बृहस्पति ग्रहके निमित्त दान पुण्य करना चाहिये. जो कन्जुल दाखिल आवे = सफेद वस्तु खाई है. वह शीतल थी, तिससे आरजा भया है. इसको सूर्यके निमित्त दान करना. जो = कब्जुलखारिज हो तो कहीं गलीजकी जगह स्नान आदि करने गयाथा वहाँ छाया भई है अर्थात् भूत प्रेतनाशक यंत्र बांधना चाहिये और बलिदान करना तथा राहुके निमित्त दान, पुण्य,जप,पाठ करानेसे बीमारी दूर होगी. जो = जमात आवे तो बुध ग्रहके निमित्त दान, पुण्य करनेसे फायदा होगा. - जो फरहा आवे तो सरदीसे आरजा हुआहै रातके वक्त पानी पिया है, बडेफजरमें कुछ वस्तु खाईहै.अजीर्णसे बीमारी हुईहै. इसमें शक्तिके अनुसार दान, पुण्य करना चाहिये. जो उकला आवे तो छाया (भूत प्रेतकी बाधा) है. पेट भारी है. दर्द रहता है, खानेकी इच्छा करताहै. परन्तु गलेसे नीचे नहीं उतरता. इसने अन्नवस्त्रादिकोंका दान करना और शनैश्चरका दान पुण्य तथा जप करना चाहिये. जो = अंकीश आवे तो इसका पेट भारीहै. भूख थोडी लगती है. पितर आदि इष्टदेवका दोष है. तिस अपने इष्टदेवके निमित्त दान पुण्य कर तब सुख होवै. = यह हुम्रा शकल होतो इसके कछु रक्तकी बीमारी है, इसने मंगल ग्रहके निमित्त ब्राह्मणोंको भोजन कराना और जप, पाठ कराना चाहिये. जो यह बयाज शकल आवे तो रोगीको सरदीकी बीमारी अथवा शीतज्वर या शीत आरहाहै अथवा कफकी वृद्धि १ रमलनवरल- है इसने छायादान (कांसे के बरतनमें घृत डाल, तिसमें सोना डालके, दान) करना चाहिये और चन्द्रमाका जप कराना जो = नुनुत् खारिज हो तो कुछ चिकनी चीज खाई है अथवा कोष कियाहै इससे बीमारी भई है इसने पका इलाज करना चाहिये और ब्रह्मभोज करावे तथा भूखोंको भोजन बाँटे तव बीमारी दूर होवेगी जो नुसूदाखिल आवे तो इसने किसी देव पितर निमित्त बोल कबूली कीथी सो याद नहीं रही यह ५ सेर चावल, पांच गज कपडाका दान करें और जिस देवनिमित्त बोलक्यूल करीथी उसको पूरी करे तव आराम होगा जो- अतवे खारिज आवे तो किसी भूत प्रेतकी बाधा है कभी बीमारी ज्यादे कमी कम होती है, इसके गलेमें भूतनाशक यन्त्र बाँधना और केतु ग्रहके निमित्त दान पुण्य तथा जप, पाठ कराना चाहिये आराम होगा जो-नकी आवे तो तापमें न्हाय लिया है कुछ लाल वस्तु खाई है तिसरे बीमारी हुई है अब इसका जीव गोता खाता है इसने मगलमहका जपपाराना और ब्राह्मणोंको भोजन करवाना चाहिये आराम होगा जो यह अतवेदाखिल आवे तो भूतनीप्रेतनीकी छाया है हिया कॉपता है, कफसे छाती रुक रही है, इसको शुक्र प्रहके निमित्त दान,पुण्य करना चाहिये माराम होगा जो - इग्न तमा आवे तो पेटमें दर्द है, कभी दुःख कमी सुख होताहै भूखेगरीब आदमियोंको भोजन खिलावे तब आराम होगा यदि यह तरिखा शकल आवे तो पानीके पीनेसे बीमारीबढी है भूख नहीं लगती है. ब्राह्मणोंको खीर,खांडका भोजन करानेसे आराम होगा-इति॥२४॥ प्रश्न-पह मीमार आराम शेगा कि नहीं ? तहाँ प्रस्तार बनाके पांचवें छठ घरको जर्ष करके एकशकल निकाले यदि = लमान अथवा फजुल खारिज -आषे तो बीमार दूर होये जो
--
E
भाषाटीकासहित ।
(१५१)
इनमेंसे कोई आवे तो बीमार मरे । जो====
इनमेंसे कोई आवे तोआराम हो जायगा। यदि : E
इनमेंसे कोई आवे तो बीमारी बहुत दिनोंतक रहेगी ॥ २५ ॥
प्रश्न-अमुक स्त्रीको यह पुरुष छोडेगा कि नहीं ? तहां प्रस्तार
बनाके सातवें घरको देखै 2 में ये शकल आवे तो
छोडेगा. यदि ==== ये आवे तो नहीं छोडेगा. जो
मुन्कलीव आये तो कभी छोडै कभी नहीं. यह कहै.इति ॥२६॥
प्रश्न-गया परदेशी मरगया है,सुखी या दुखी है रोजगार है या नहीं ?
तहां प्रस्तार बनाके आठवें घरको देखै. यदि आठवें घर शुभ
दाखिल आवे तो सुखी है अच्छी गुजरान करता है. शुभ
मुन्कलीव आवे तो भले हालसे गुजरानहै, आया चाहता है. जो
अशुभ मुन्कलीव आये तो जीता है. परंतु कारबारमें कुछ हल
चली है. अशुभ खारिज आवे तो जीता नहीं शुभखारिज
# = आवे जीता है. मगर हाल अच्छा नहीं है. जो अशुभ
सावित हुमरा आवतो कड़ाई होके मरगया है. इति ॥२७॥
प्रश्न-अमानत सौंपा देवेगा या नहीं ? तहाँ प्रस्तार बनाके दूसरे
छठे घरके जर्व करै. जो शुभ दाखिल और शुभ साबित आवे तो
अमानत देवेगा अर्थात् जामिन होजायगा. और शुभ अथवा
अशुभ मुन्कलीव हो तो देवे नहीं, देकर नटै, जो अशुभ दाखिल
अशुभ साबित तथा अशुभ खारिज आवे तो अमानत देगा नहीं
दिलासा करता रहेगा. इति ॥ २८॥
प्रश्न-मैं लड़ाई झगड़ाको जाता हूं, फते होगी कि नहीं ? तहां रमल
डाले प्रस्तार बनावे जो पहिली शकल शुभ दाखिल आवेतोफते
होगी. जो अशुभ दाखिल आवे तो फते नहीं होगी.जो अशुभ
मुन्कलीव तथा अशुभ खारिज आवे तो फते न हो, जो अशुभ
साबित होवे तो ढीलमें फते होगी इति ॥ २९ ॥
(१५२) रमलनवरत्न- प्रश्न-शत्रुसे लडने जाता हू मेरी फवे(जीव)पाउसकी जीव(फ़वे) होगी। तहां प्रस्तार बनाके आठवें घरको देखे जो शुभ दाखिल अथवा मुन्कलीव हो तो तेरी जीत है जो शुभ खारिज अथवा अशुभ खारिज हो तो दुश्मन (शव) की फते होगी, जो शुम सावित हो तो मेरी फते होगी जोअशुभमुन्कलीव अशुम सावित अशुभ दाखिल होवे तो शत्रुकी जीत होवेगी और १-२-३-४-९- १०-११-१३-१५ इन घरों में शुभ शकल हो तथा जो बहुत रेखा होतो पूछनेवाले तेरीही फते होगी और५-६-७-८-१२-१६ इन घरोंमें शकल हों और बहुत रेखा हों तो पृच्छक तुम्हारे शत्रुकी जीत होगी इति ॥ ३०॥ कोई मूक प्रभकरे तहां रमल डाले प्रस्तार वनावे फिर हुमरा शकलको देखे कि प्रस्तारमें कहां है जो पहिले घर होवे तो कुछ काम किया है लडाईका जवाब दही तुम्हारे जिम्मे होरही है शनका बल अधिक है जो हुमरा दूसरे घर आवे तो रोजगारका प्रश्न है रोजगार अच्छा होगा जो परदेशी होतो फिरजावे चलनेकी नियत है न चले और मिलनकी या व्याहकी नियत है तो न करें और दाश (झगडा) की नियत हे तो न करे और जो तीसरे घर आव भाई मित्रसे लडाई आदि जो तुझसे बुरे हालसे रहता है सो तुझे धुलावे कितनेक दिन पीछे दिन तुझको तकलीफही दिखावगा।जो चौथे घर आये तो कुछ चीज़ न मिल हाथ न आव लड़ाई दोष दुशमन तुझपर कोपहोरदा है क्मिीके पामजाके फरयादकरेगा तो तेरी फरयाद न लगेगी जो परदेशकी वात पूछना है तो ढीलसे आने सफरपी नियत है तो म चले जो काम किया जाता है सो टीक परो यदि पांचवें घर आवे तो दिलगिरी है कुछ जानवर या अन्य कुछ गोक्यी चीज म्वरीदा चादता है सोन कर जो तरी यस्तु गई दे मो पनिंगी और जो पारा चला गया देसोभीआयेगा भाषाटीकासहित । (१५३) यदि छठे घर आवे तो बीमारको पूछताहै सो ढीलसे अच्छा होगा. जो गर्भवतीको पूछता है सो कष्टसे बालक जनेगी और कुछ खरीदा चाहते हो सो नहीं मिलेगा. यदि सातवें घर आवे तो परदे- शीको पूछता है.जो स्त्रीकिया चाहता है तो नहीं करना खतराहै सीर (साझा) किया चाहता है तो न करे. जानवर पक्षी खरीदा चाह- ता है तो न रहेगा आठवें घर आवे तो शत्रुका जोर है और कर्जा लिया चाहता है तोहमेशा दुःख रहेगा. परदेशीकी खबर आवे और आप नहीं आवेगा. जानवर पक्षी खरीदा चाहता है तो खरीद फायदा होगा. बीमारको पूछताहै तो पुण्य धर्म करो आराम होगा. नववे घर आवे तो गमन करना अच्छा नही, परदेशकी खबर आवेगी, जो दशवे घर आवे तो बड़े वृद्ध आदमीसे कुछ हाथ आवे. रोजगार होते. परदेशीकी पत्री आवे. किसीसे मिला चाह- ताहै तो न मिले, बीमार देरीमें आराम होगा, ग्यारहवें घर आवे तो जो तेरी उम्मेदहै सो ढीलसे होगी. दोस्तमित्र नहीं मिलेगा. रोजगार तो मिलैगा,किसीसे कर्जा नहीं लेना. किसी बडेसे कुछ पूछा चाहता है, सो नही सुनेगा. जो बारहवें घर आवे तो दुशमन जोर कर रहा है,होशियार हो जाना और कोई जानवर खरीदा चाहता है, तो किसी दोषसे मरेगा और किसी पर दावा किया चाहताहै, तो न कर. बीमारको पूछताहै तो पुण्य दान करो आराम होगा: जो तेरहवें घर आवे तो तेरे दुशमन लोग बहुत हैं और किसीके पाससे रोजगार चाहता है, तो वहां रोजगार न होवेगा,बीमारको यूछता है तो आराम होगा. परदेशी ढीलसे आवेगा. जो चौदहवें घर आवे तो इल्मकी बात पूछते हो सो ढीलसे होवेगी कुछ धन लिया चाहता है सो हाथ न आवे और तेरे ऊपर किसीने तोहमत लगाई है तो सावधान होके रहना और बीमारको औषधी दिलावो तब आराम होगा. पंद्रहवें घर आवे तो शीघ्रही रोजगार होगा तेरा दोस्त नादान (बेसमझ )है. कुछ मतकर काम तेरा आपही (१५४) रमलनवरत्न- होगा परदेशी आदमी ढीलमें आवेगा गर्भवतीको पूछता है तो कप्टसे बालक जनेगी,जोसोलहवें घर आवे तो तूने जो काम विचार कर रक्खा है,उसमें कोई झगडा टटा उठेगा किसीके पास जावेगा वह मुखसे नहीं बोलेगा, जो कोई तुझसे बुरा हुआ है वह कितनेक दिन पीछे आपही बोलेगा आपही मिलेगा इति ॥३१॥ प्रश्न-मुझको किस वस्तुमें फायदा होगा ! तव रमल डालके प्रस्तार वनावे जो दूसरे घर = यह शकल आवे तो सराफीसे सोना रूपाके लेने देनेसे या लोगोंके झगडे चुकानेसे फायदा होगा यदि दूसरे घर - कजुल दाखिल शकल आवे तो बजाजीसे अथवा खेतीके कामसे फायदा होगा जो - यह हो तो चोरीसे अथवादगावाजीसे अथवाजारीसे रोजगार होगा,जो = यह आवे तो चीजें पालनेसे हकीमीसे फायदा है जो फरहा कलाहेपनेसे, पसारीपनेसे, अत्ताग्पनेसे, अथवा लोगोंके इंसानेसे फायदा है जो यह मावेतो चोरी,दगाबाजीसे, दुपाया, चौपाया जीव वेंचनेसे फायदा है नकी आवेतोशत्रुपनेसे अथवा कूटने पीमनेसे फायदा है जो हमाआवे तो फासदपनेसे, इल्म पढ़- नेसे, सदशा पहुचानेसे,भिक्षा मांगनेसे फायदा है, न्याव चुकावनेसे फायदा होगा जो नुस्मुदाखिल आवे तो विद्या आदि पढनेसे फायदा होगा जो यह शकल आवे तो किसानपनेसे, दलालीसे अथवा दुकानसे फायदा होगा, जो-यह आवे तो कपडा वेच- नेसे अथवा ज्योतिप पढनेसेअथवा सौदागरीसे फायदा होगा जो यह शकल आवे तो गाने बजानेसे अथवा इल्म पढानेसे फाय दा है जो तरीख आवे तो धोबीपनेसे या मेवा वेचनेसे अथवा जासूसपनेसे फायदा होगा इति ॥ ३२ ॥ प्रश्न-मन किसी जगह आदमी भेजाहे सौ वहां पहुंचा है कि, नहीं? तहां प्रस्तार बनाके पहला घर देखे जो अशुभ दाखिल आवे तो - - भाषाटीकासहित । (१५५) आवे तो नहीं पहुँचगया है अभी मिला नहीं जो शुभ साबितहोतो राहबीच मुकाम किया है बहुत दिनोंमें पहुँचेगा; जो शुभ खारिज आवे तो सुखसे पहुँचगया, अशुभ खारिज आवे तो तकलीफसे पहुँचा है; जो अशुभ साबित तथा अशुभ मुन्कलीव आवे तो आदमी भेजा था सो मरगया है । इति ॥ ३३ ॥ प्रश्न-स्त्री लडके रूठके चली गई है, कान दिशामें गई ? तहां प्रस्तार बनाके सातवें घरको देखै तहां कब्जुल खारिज, लह्यान, नुस्नुत्खारिज ये शकल आवे तो पूर्व दिशामें गई है. जो फरहा, जमात, अतवे दाखिल, हुमरा ये आवे तो पश्चिमदिशामें गई है जो = य आवे तो उत्तर दिशामें गई जो जमात कब्जुल दाखिल, नकी, उकला ये आवे तो दक्षिण दिशामें गई है ॥ ३४ ॥ प्रश्न-मेरी वस्तु खोगई है अथवा मैं धरके भूल गयाहूँ सो मिलेगी कि नहीं ? तहां प्रस्तार बनाके बारहवें घरको देखे जो शुभ दाखिल नुस्रदाखिल और अतवेदाखिल तथाअकीश शकल हो,तो घरमेंही खोगई है, जो नकी अतवेखारिज तथा नुस्रुत्वारिज लद्यान ये आवें तो कही रास्ते में खोगई है, जमात, हुमरा, वयाज, इज्जतमा आवे तो गढबीच खोगई, गर्दनपर मिट्टी पडी है. फरहा, कन्जुल, खारिज, तरीखा, उकला ये हों तो राह बीच तुमने निगाह नहीं रक्खी, तहां खोई है इति ॥ ३५ ॥ प्रश्न-चोरने वह वस्तु कहां धरी है ? तो प्रस्तार बनाके ७ सातवें घरको देखे जो = = =य आवे तो ओले आदिमें धरी है. जो ये आवे तो छतमें अथवा धरतीमें गाडी है, जो = = = ये आवे तो पानीपार धरी है३६॥ प्रश्न-परदेशमें जाया चाहता हूँ फायदा है कि नहीं ? तहां प्रस्तार बनाके नववें घरको देखे जो = =: आवे तो गमन करना अच्छा राजी खुशीसे उलटा चला आवेगा. जो नुघुत्खारिज 1 (१५६) रमलनपरत्न- तरीखा फरहा ये आवें तो मेल मिलाप करके आवे, रास्तेमें कोई दोस्त मिले उससे कुछ प्राप्ति होगी जो = यह आवेतोगमन मत कर जानेको खतरा है जमात तथा इज्जतमा आवे तो मत जावो फायदा नहीं होगा तुम्हारा काम यहांही होगा जो हुमराआवे तो मार्ग बीच खतरा हे चोरके हाथ शरीरको केश होगा इति ३७ प्रश्न-मेरा कौन दिशामें जाना अच्छा है। तहां प्रस्तार बनाके नववे घरको देखे जो === ये आयें तो दक्षिणदिशासे फायदा है, जो- = --ये आवे तो पूर्व दिशामें जाना अच्छा है जो ये आवें तो पश्चिम दिशामें फायदा है जो == ये आयें तो उत्तरदिशासेलाम है इति ॥३८॥ प्रश्न-मेरा मिलना फिन लोगोंसे होगा ? तहां प्रस्तारके नवमें घरको देख = आवेतोबडे आदमीसे मिलाप हो जायगा जो आवे तो मिव लोगोंसे फायदा होगा मिलाप होगा कुछ फायदा होगा जो यह आवे तो बड़े लोगोंसे मिलाप होगा जो - यह हो तो धनवतसे मिलाप होगा जो यह हों तोभी किसी इल्मदारसे मिलाप होगा = ये शकल आवेतोबजाजोंसे मेल होगा जो - ये आवे तो चोरोंसे मेलमुलाकात होके फायदा होगा जो = हुमरा आवे तो किसी हिंमक दुएजनसे मिलाप होगा इति ।। ३९ ।। प्रश्न-पह पुरुप मुझे प्यार करता है कि नहीं। तहाँ प्रस्तार चनाके पहले घरको देखे शुभदाखिल शफल आवे तो बहुत प्यार करता है कुछ देवेगा भी जो शुभ मुन्कलीव शकल भावे तो कभी प्यार करता है कभी नहीं करता और जो सावित, जमात, वयाज इनतमा, हुमरा आवेतो मुद्दत( बहुत दिनों पीछे )मेहरवान होगा जो शुम खारिज लयान नुयुत्खारिज आये तो थोडा मेहरखान होगा जो अशुम खारिज हो तो सच्ची प्रीति नहीं करेगा इति ४० %3D % 3D
भाषाटीकासहित ।
(१५७)
प्रश्न-मेरे हाथमें क्या वस्तु है? और कैसा रंग है ? तहाँ प्रस्तार
बनाके पहले घरको देखै. जो यह आवे तो श्वेत रंग कहिये
ल० में आवे तो जर्द रंग है.जो यह आवे तो सादा नेकरंग
है. जो = आवे तो श्वेत रंग है जो ये हों तो जर्द रंगहै
जो में यह होतो लाल रंग है.जो = यह होतो इस वस्तुका
स्याह रंग है पहले घरको देखे जो वहाँ लह्यान, हुमरा आवे तो
जर्द सुफेद रंग है और मीठी तथा कीमतकी वस्तु है जो यह
आवे तो खाकी रंगहै स्वाद मीठा है जो यह आवे तो सफेद
स्याह है स्वादु खट्टा है जो = यह आवे तो मुमुकसे, याने मिला
रंग है बुस्क है. आवे तो श्याम रंग और कडुवा स्वाद है.
जो यह आवे तो स्याह रंग कीमत खुसबोई है जो कब्जुल
खारिज आवे तो सुफद तथा हरा वर्ण है जो बयाज शकल आवे
तो सुफेद तथा सुगंधिवाली वस्तु है जो यह आवे तो लालरंग
है. जो यह आवे तो लाल सुफेद खानेकी वस्तु है. जो-यह
शकल आवे तो जर्द सफेद मीठी कीमतकी चीज है. जो तरिखा
आवे तो नीली वस्तु है. इति ॥ ४१ ॥
प्रश्न-खोईहुई वस्तु कहाँ है ? तहाँ प्रस्तार बनाके चौथे घरको
देखै जो दाखिल वा साबित शकल आवे तो पृथ्वी बीच वस्तु है
और खारिज तथा मुन्कलीव होतो घरमें नहीं है. इति ॥ ४२ ॥
प्रश्न-परदेशीने स्त्री की है कि नहीं ? तहाँ प्रस्तार बनाके सातवें
घरको देखे जोशुभ दाखिल आवे तो स्त्री की है जो शुभ मुन्कलीव
आवे तोकी है अथवा किया चाहता है जो शुभसाबित आवे तो स्त्री
किये बहुत दिन हुए जो अशुभखारिज अथवा शुभ खारिज आव
तो नहीं की है बुरे हालसे है जो अशुभ मुन्कलीव आवे तो करी
नहीं किया चाहता है हाथ नही आती है जो अशुभ साबित तथा
अशुभ दाखिल आवे तो वहाँ परदेशी बुरे हालसे है. ॥४३॥
(१५८)
रमलनवरत्न-५
प्रश्न-राजा पादशाह मुमको इनाम कोई ओहदा, देखेगा कि नहीं।
तहाँ प्रस्तार बनाके दशवे घरको देखे जो शुभ दाखिल आवे तो
इनाम आदि देवेगा शुभ मुन्कलीव आवे तो दिया चाहता है परतु
तुझको अजमायके देगा जो अशुम दाखिल अशुभ मुन्कलीप
अशुभ साबित आवे तो किसी मुखवरने तेरी चुगली करी है जो
खारिज आवे तो तेरामुरातवा या तेरी पहलेकीभी इनाम आदि
खोसी जावेगी इति॥१४॥
प्रश्न-चार शहरम है अथवा बाहिर निकलगया। तहाँ प्रस्तार
बनाके सातवें घरको देखे जो वहाँ शुम दाखिल आवे तो शहरमें
है बयाज, इज्जतमा, हुमरा आवे तो चोर शहरमें नहीं है, जो
जमात आवे तो वह चोर शहरमें है, जो यह शकल आवेतो
चोरबुरे हालसे हे राह ऊपर बैठा है जो- - येआ तो कहीं
कथा होनेकी जगह बैठा है ॥४५॥
प्रश्न-गतषस्तु मिलेगी कि नहीं १ तहाँ प्रस्तार बनाके चौदहवें
घरको देखे जो कम्जुल दाखिल,अतवे दाखिल आवे तो कितनेक
दिनपीछे मिलेगीशीघ्रहीतलाशकरेगातोनहीं मिलेगीजोकरजुल-
खारिज, अतवेखारिज, लयान आवे तो नहीं पाये, जो फरहा
तरीखा आ तथा शुम दाखिल आवे तो पाये जो मुन्कलीव
आवे तो भी न पावे इति ॥४६॥
प्रश्न-चार कितने है और किस दिशाम गये हैं। तहाँ प्रस्तारवनाके
सातवें घरकी शकलको देखे वह शकल प्रस्तारमें जितने घरों में
है उतनेही चोर हैं और प्रस्तारकेसोलहों (१६) घरोंको देखे तिन
सब शकलोंकी शुन्योंको इकट्टी कर चारका भाग देवे एक वचे
तो चोर पूर्व में गया है दो बचे तो पश्चिममें गया है, ३ बचें तो
उत्तरमें गया, चार बचें तो दक्षिणमें गया इति ॥ १७ ॥
भाषाटीकासहित । (१५९) प्र०-मुझको फलानेके पापसे (अमुक जनसे ) कर्जा मिलेगा कि नहीं ? तहां पूछनेवालेका १-२ घर है और जिसके पाससे कर्जा लिया चाहता है उसका ७-८ घर जानना, इनको शुभा- शुभ विचार और प्रस्तारके छठे घरको देखै तहां शुभ खारिजहो। तो कर्जा देवेगा लाभ होगा, जो अशुभ खारिज आवे तो विलंब (देरी) से देवेगा. जो दाखिल साबित हो तो कर्जा न मिले बहुत कष्ट पावे, मुन्कलीव आवे तोभी की नहीं मिले. इति ॥४८॥ अथ मुष्टि-मूकप्रश्नकथनम् । रमल डालके प्रस्तार बनाके सातवें घरको देखें तहां जो अग्नि तत्त्वकी शकल अथवा पूर्वदिशाकी शकल होतोधातुकी वस्तु है जो वायुकी तथा पश्चिम दिशाकी शकल होतो जीवप्रश्न बताना जो सातवें घर उत्तर दिशाकी शकल होतोतृण, काष्ठ फल आदि कहना यदि सातवें घर कोई दक्षिण दिशाकी वा पृथ्वीतत्त्वकी शकल हो तो मुष्टिमें पत्थर, मणि, मोती, मूंगा आदि बताना॥४९॥ इति ॥ अब मूक प्रश्न देखनेका विचार कहते हैं-प्रस्तार बनाके पहले घरको देखै तहाँ जो पहले घरमें दाखिल अथवा साबितशकल आवे तो उसका प्रश्न लाभका कहना, माल अथवा किसी जगहकी प्राप्तिका प्रश्न कहनाऔर किसीसे मिलनेकाहै अथवा उसके पाससे कोई चीज जाती रही है उसकी प्राप्ति होनेका प्रश्न कहना, जो प्रथम घर शुभ दाखिल हो तो चितायुक्त, पराधीन, दुःख संकट है, किसीसे कुछ कह सकता नहीं या किसी जगह जाना चाहता है मगर जाना नहीं होता, जो प्रस्तारमें पहले घर शुभ खारिज पडे तो कोई पदार्थ दूर है उसकी प्राप्ति होनेका प्रश्न है नित्य विचार करता है भली वस्तु तेरे पाससे दूर है अथवा कोई चीज है उससे छूटना चाहता है अशुभ खारिज हो तो द्रव्यको चिन्ता दूर (१६०) रमलनयरल- - होनेका प्रश्न है मैं कुछ कार्य करता हू मला होयगा अथवा पुरा होयगा यह प्रश्न है अशुम साबित होतो शत्रुके भयका प्रश्न हे वाचिंताके भय तथावन्धनका प्रश्न कहना, जो मुन्कलीव हो तो उसका प्रश्न किसी शुभकार्यके बीच है रहनेका अथवा जानेका प्रश्न है अथवा कोई मला काम है ऐसा जानना 1 जो अशुम मुन्कलीव हो तो शुभ चिंतायुक्त है गढ (किला) बीच अथवा अपने घरमें सलाह करता है कोई बनि नहीं आती है ऐसेजानो॥५०॥ इति। अप मूक प्रश्न कहनेका दूसरा प्रकार कहते हैं-कि प्रस्तार धनाके १पहले घरकी शकलको देखे जो वह १ घरकी शकल अमि तत्त्व की हो तो अमितत्त्वही खुला हुआ हो तो उसका प्रश्न द्रव्य संबंधी कहना और वह शकल पुनरुक्त होके प्रस्तारमें जिस घर पड़ी हो उसी घरका हाल कहना और जो वायुकी शकल हो वायुकी बिन्दु खुली हो तो जीव सम्बन्धी प्रश्न कहना स्त्री शकल हो तो श्रीका प्रश्न कहना पुरुप हो तो पुरुषका कहना जलकी हो और जलत- त्विका विन्दु खुला हुआ हो तोखेतीका काम अथवा वाग बगीचा लगाना इत्यादि प्रश्न कहना । पृथ्वीकी शकल पृथ्वीका बिंदु खुला हुआ हो तो घरका मुलकका ग्रामका पृथ्वी प्राप्त होनेका प्रश्न कहना और जितने विन्दु सुले हुये हों तो उन सब तत्त्वोंके प्रश्न मिलायके कहना ॥५१॥ इति मूकपभप्रकार ॥ अप यथाश्मसे सोलहराकलोंके नाम,स्वरूप, सारिजादिक या विस्व- भाषादिक सना, सी पुरुप विचार, दिनरात्री बलवान् शुमाशुभ,दिशा, वत्त्व, राशी स्वामी चर स्थिर सम्रा इन सोको कहते हैं लसान शक्ल खारिज है, द्विस्वभाव पुरुष,दिनमें बली है शुभ है पूर्व दिशाकी दे, अमितत्वकी हे धनराशी है, वृहस्पति स्वामी है, कम्जुलखारिज शकल चर संजक है ॥३॥ , रराशि, शनिश्चर स्वामी है; चरसंज्ञक है ॥६॥ है, स्थिर संज्ञक है ॥९॥ भापाटीकासहित । ( १६१) कजुलदाखिल शकल "-: है, दाखिल है, द्विस्वभाव है. स्त्री है, रात्रिमें बली है, शुभ है, दक्षिण दिशाकी है, पृथ्वीतत्त्व, सिंहराशि, सूर्य स्वामी है, स्थिरसंज्ञक है ॥२॥ है, द्विस्वभाव है, पुरुष है, दिनमें बली है अशुभ है, पूर्व दिशा, अग्नितत्व, कुम्भराशि है, राहुकी है, जमात शकल = है, सावित है, स्थिर है, नपुंसक है, संध्या- समयमें बली है,मध्यम है, दक्षिण दिशाकी है, पृथ्वीतत्त्व, मिथुन- राशि, बुधस्वामी है, स्थिरसंज्ञक है ॥४॥ फरहा शकल है मुन्कलीब है, चर है, पुरुष है, सन्ध्या- समयमें बली है, शुभ, पश्चिमदिशा, वायुतत्त्व, तुला राशि है, शुक्र स्वामी है, चरसंज्ञक है ॥ ५॥ उकला शकल में है, मुन्कलीव है, चर है, नपुंसक है, सन्ध्या- समयमें बली है, अशुभ है, दक्षिणदिशाकी है, पृथ्वीतत्त्व, मक- अंकीश शकल = है, दाखिल है, द्विस्वभाव है, स्त्री है, रात्रिमें बली है, अशुभ है, दक्षिणदिशा, पृथ्वीतत्त्व, शनि स्वामी, कुंभ- राशिहै, स्थिर संज्ञक है ॥७॥ हुमरा शकल ! यह है साबित है, स्थिर, पुरुष तथा संध्या समयमें बली है, अशुभ है, पश्चिमदिशाकी है, वायुतत्त्व है मेष- राशि और मंगल स्वामी है, स्थिर संज्ञक है ॥ ८॥ बयाज शकल = यह है, साबित है, स्थिर है, संध्यासमयमें बली है, उत्तरदिशाकी है, जलतत्त्व है, कर्कराशिहै, चंद्रमास्वामी नुसुतखारिज शकल ... यह है, द्विस्वभाव है, पुरुष है, दिनमें ११ - (१६२) रमलनपरत्न भा दी। पली है, शुभ है, पूर्व दिशा है, अमितत्त्व है, सिंहराशि है, सूर्य स्वामी है, घर सज्ञक है ॥ १० ॥ नुदाखिल शकल- यह है, द्विस्वभाव है, स्त्री है, रात्रिमें बली है, शुम है,उत्तरदिशा है,जलतत्त्व है, मीन राशि है, वृहस्पति स्वामी है, स्थिरसज्ञक है ॥ ११ ॥ अतेवखारिज शकल यह है, द्विस्वभाव है, पुरुप है, दिनमें बली है, अशुभ है, पूर्व दिशा है, अमितत्व है, केतुकी है, घरसज्ञक हे॥१२॥ मुन्कलीप शकल - यह है, चरसजक है, नपुसक है, सन्ध्या- समयमें बली है, अशुम है, उत्तर दिशाकी है, जलतत्त्व है, वृश्चिक राशि है, मगल स्वामी है, चरसझक है ॥ १३ ॥ अवषेदाखिल - यह शकल है, द्विस्वभाव है, स्त्री है, रात्रिमें पली है, शुभ है, पश्चिम दिशा है, वायुतत्व है, धूपराशि है, शुक्र स्वामी है, स्थिरसझक है॥१४॥ इज्जत्मा शकल यह है, सावित है, स्थिर है, नपुसक है, सन्ध्यासमयमें बली है, मध्यम है, पश्चिम दिशाकी है, घायुतत्व है, कन्याराशि है, बुध स्वामी है, स्थिरसज्ञक है ॥ १५॥ । यह मुन्कलीब है, चर है, नपुसक है, सन्ध्यासमयमें चली है, शुभ है, उत्तर दिशाफी हे, जलतत्त है, कर्क राशि है, चन्द्रमा इसका स्वामी है, चरमज्ञक है ॥१६॥ ऐसी मह सोलह शफल जाननी इनफाही सम जगह काम आता है। इति श्रीपक्नमते रमसदानिपाल मापाप समाप्त | पुस्तक.मिनमेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदासा । गमाविष्णु भीकृष्णदास, "शनिटेगरीम मेरा, "मरमीषेपर" सीमण, मा - परीखा शकल
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, , (१६२) रमलनवरत्न भा दी। बली है, शुभ है, पूर्व दिशा है, अमितत्त्व है, सिंहराशि है, सूर्य स्वामी है, चर सज्ञक है ॥ १० ॥ नुमुदासिल गकल - यह है, द्विस्वभाव है, स्त्री है, रात्रिमें वली है, शुभ है,उत्तरदिशा है,जलतत्त्व है, मीन राशि है, बृहस्पति स्वामी है, स्थिरसज्ञक है ॥ ११॥ अवखारिज शुकल - यह है, द्विस्वमाव है, पुरुष है, दिनमें बली है, अशुभ है, पूर्व दिशा है, अमितत्व है, केतुकी है, घरसज्ञक है।॥ १२॥ मुकलीव शकल - यह, चरसज्ञक है, नपुसक है, सन्ध्या- समयमें पली है, अशुम हे, उत्तर दिशाकी है, जलतत्व हे, वृश्चिक राशि है, मगल स्वामी है, चरसज्ञक है ॥ १३ ॥ अववेदाखिल - यह शकल है, द्विस्वभाव , स्त्री है, रात्रिमें पली है, शुम है, पश्चिम दिशा है, वायुतत्त्व है, वृषराशि है, शुक स्वामी है, स्थिरसज्ञक है।॥ १४ ॥ इयत्मा शकल 3 यह है, सावित है, स्थिर है, नपुसक है, सन्ध्यासमयमें बली है, मध्यम है, पश्चिम दिशाकी है, पायुतत्व है, कन्याराशि है, बुध स्वामी है, स्थिरसज्ञक हे ॥ १५ ॥ यह मुन्कलीब है, पर है, नपुसक है, सन्ध्यासमयमें बली है, शुभ है, उत्तर दिशाकी है, जलतत्त्व है, कर्क राशि हे, चन्द्रमा इसका स्वामी है, चरमज्ञक है ।। १६ ॥ एसी यह सोलह शफल जाननी इनकाही सब जगह काम आता है। इति श्रीपत्नयते रमलदानियास मापार्मप समात्र । पुस्तकमिसनका ठिकाना- खेमराज मीकृष्णदास, । गाभिष्णु भीकृष्णदास, "मवारपर" सीम्-प्रेत, "समीपारेपर" सीम-प्रेस, , " तरीसा शकल
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