Central Archaeological Library, Asi
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कलकत्ता-निवासी बाबू पूरणचन्दजी नाहर, एम्०९० बी० एल०की धर्मपत्नी श्री इन्द्रकुमारीजीके ज्ञानपंचमी तपके उद्यापनार्थ वितीर्ण खरतरगच्छ-पट्टावली-संग्रह 3111 Jam- SURPr संग्राहक श्री जिनविजयजी, अधिष्ठाता-सिंघी जैन ज्ञानपीठ शान्ति नि के त न 8 17413 Isaq Tin Rela 929.2 Jaim 2425 mantra प्रकाशक बाबू पूरणचन्द नाहर, एम्. ए. बी. एल. नं०४८, इंडियन मिरर स्ट्रीट, कलकचा Liais OFFICE HAIR NDIA वीर निसं• २४५८] [विक्रम सं.१९८८
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CF THE DISC निवेदन आज खरतरगच्छकी कई प्राचीन पट्टावलियोंका यह संग्रह पाठकोंके सम्मुख उपस्थित करते हुए हर्ष होता है। इस विषयकी सब बातें प्रवीण इतिहासवेत्ता श्री जिनविजयजी महोदयके 'किञ्चित् वक्तव्य' से बात होंगी। जैनशासनके इतिहास-सम्बन्धी साधनों में पट्टावलीका स्थान उच्च है ; अतः जैन और जैनेतर इतिहास-प्रेमी., सज्जनों को हुन पट्टावलियोंसे विशेष लाभ होगा, इस भावनासे ही इन्हें प्रकाशित किया गया है। यह छोटासा संग्रह पुरातत्त्वज्ञोंके लिए अधिक उपयोगी हो, इसलिए साथमें अकारादि क्रमसे नामोंको तालिका भोदे दी गई है। आशा है कि भविष्यमें ऐसे २ जो कुछ साधन मिलेंगे, उन्हें हमारे धर्मवन्धु प्रकाशित करनेका उद्यम करते रहेंगे। कलकत्ता ४८, इंडियन मिरर स्ट्रीट } -प्रकाशक 2013
सूची
...
...
क-घ
...
१
...
६
...
१ किश्चित् वक्तव्य
२ खरतरगच्छ-सूरिपरम्परा-प्रशस्ति
३ खरतरगच्छ पट्टावली [१]
४ पुनः (क्षमाकल्याणजी कृत) [२]
५ बृहत्पट्टावलोकी मनुपूर्ति
६ परिशिष्ट
७ खरतरगच्छ पट्टावली [३]
८ अनुक्रमणिका
१५
...
३६
४३
...
५७
किंचित वक्तव्य लगभग ६७ वर्षसे खरतरगच्छीय पट्टावलियोंका यह छोटा सा संग्रह छपकर तैयार हुआ था लेकिन विधिके किसी अज्ञेय संकेतानुसार आजतक यह योंही पड़ा रहा और यदि विद्वद्वर बाबू पूरणचंदजी नाहर की उपालंभ भरी हुई मीठी चुटकियोंकी लगातार भरमार न होती तो शायद कुछ समय बाद यह संग्रह साराका सारा ही दीमकके पेटमें जाकर विलीन हो जाता। पूनामें रहकर जब हम 'जैनसाहित्य-संशोधक' का प्रकाशन करते थे उस समय अहमदाबाद -निवासी साहित्य-रसिक विद्वान् श्रावक श्री केशवलाल प्रे० मोदी B. A. LL. B. ने खरतरगच्छ को एक पुरानी पट्टावलीकी प्रति हमें लाकर दो-जिसमें इस संग्रहकी प्रथम ही में छपी खरतरगच्छ-सूरिपरंपरा-प्रशस्ति' थी। उस समय तक खरतरगच्छ की जितनी पट्टावलियां हमारे देखने अथवा संग्रह करनेमें आइ उन सबमें यह प्रशस्ति हमें प्राचीन दिखाई पड़ी इसलिये हमने इसकी तुरंत नकल कर, 'जैन सा० सं०' के परिशिष्ट रूपमें छपवा देनेके विचारसे प्रेसमें दे दिया। कुछ समय बाद मोदोजीने एक और पट्टावलो भेजी जो गद्यमें थी और साथमें उन्होंने यह भी इच्छा प्रदर्शित की कि इसे भी यदि उसी प्रशस्तिके साथ छपवा दिया जाय तो अच्छा होगा। हमने उसकी भी नकल कर प्रेसमें दे दिया। जब ये प्रेससे कंपोज होकर आई तो इसके पूरा फार्म होनेमें कुछ पृष्ठ खाली रहते दिखाई दिये तब हमने सोचा कि यदि इसके साथ ही साथ छपा उपाध्याय श्री क्षमाकल्याणजी की बनाई हुई बृहस्पट्टावलि भी दे दी जाय तो खरतरगच्छके माचार्योंकी परंपराका १६ वीं शताब्दि पर्यंतका वृत्तान्त प्रकट हो जायगा और इतिहास प्रेमियोंको उससे अधिक लाभ होगा। इस पट्टावलीकी प्रेस कापी की हुई हमारे संग्रहमें बहुत पहले ही से पड़ी हुई थी अतः हमने उसे भी प्रेसमें दे दिया। इसी तरह की, लेकिन इससे प्राचीन एक और पट्टावलो मेरे पास थी उसे भी, प्रत्यंतर होनेसे विशेष उपयोगी समझ कर इसी संग्रहमें प्रकट करनेका हमें लोभ हो आया और उसे भी छपने दे दिया। इस प्रकार चार पट्टावलियोंका यह छोटा सा संग्रह जब तैयार हो गया तब हमने इसे 'जैन सा० सं०' के परिशिष्टरूपमें न देकर स्वतंत्र पुस्तकाकार प्रकट करनेका विचार किया और यह स्वतंत्र पुस्तकका विचार मनमें घुसते ही हमारे दिलमें एक नया भूत आ घुसा। हम सोचने लगे कि जब पुस्तक ही बनाना है तब फिर क्यों नहीं विशेष रूपसे एक संकलित ऐतिहासिक प्रथके आकारमें इसे तैयार कर दिया जाय और खरतरगच्छके इतिहासका जितना मुख्य मुख्य और महत्वके साधन हों उन्हें एकत्र रूपमें संगृहीत कर दिया जाय क्योंकि हमारे संग्रहमें इस विषयकी कितनी ही सामग्रो - इन पट्टावलियोंके अतिरिक्त कई और भाषाकी पट्टावलियां, ग्रंथप्रशस्तियां तथा ख्यात आदि विविध प्रकारकी ऐतिहासिक सामग्री इकट्ठी हुई पड़ी थी। उन सब सामग्रियोंको संकलित कर ऐतिहासिक ऊहापोह करनेवाली विस्तृत भूमिका और टीका टिप्पणी आदि साथमें लगाकर इस संग्रहको परिपूर्ण बना दिया जाय तो श्वेताम्बर जैन संघका एक बड़ा भारी [ ख ] शाखा-समुदायका अच्छा और प्रामाणिक इतिहास तैयार हो जाय। इस भूतके आवेशानुसार हमने उन सब सामग्रियोंका संकलन करना शुरू किया। ऐसा करनेमें हमें कुछ अधिक समय लग गया और अहमदाबादके पुरातत्त्व मंदिरके आचार्यपदके भारने हमारी पूनाकी विशेष स्थितिको अस्थिर बना दिया। इसलिये इस संग्रहके विस्तृत-संकलनका जो विचार हुआ था वह शिथिल होने लगा और चिरकाल तक कुछ कार्य न हो सका। इधर जिस प्रेसमें यह संग्रह छपा उसके मालिकने छपाईके खर्च आदिका तकाज़ा करना शुरू किया। जिस विस्तृतरूपमें इसे प्रकाशित करनेके लिये सोचा था उसमें बहुत कुछ समय और अर्थव्ययकी आवश्यकता थी और शीघ्र ही इस कार्यको परिपूर्ण करने जैसे संयोग दिखाई न देनेसे हमने अंतमें उस विचारको स्थगित किया और यह संग्रह जो इस रूपमें छप गया था, इसे ही प्रकाशित कर देना उचित समझा। इसी बीचमें बाबूवर्य श्री पूरणचंदजी नाहरके अवलोकनमें यह छपा हुआ संग्रह आया और आपने इसे अपने खर्चसे प्रकाशित कर अपनी धर्मपत्नी श्रीमती इंद्रकुमारीजीके ज्ञान पंचमी तपके उद्यापन निमित्त वितोर्ण कर देनेका अभिप्राय प्रकट किया। तदनुसार पूनेसे यह छपा हुआ ग्रंथ-भाग कलकत्ते मंगवा लिया गया और प्रेसका बिल इत्यादि चुकता किया गया। इस संग्रहके साथमें हम कुछ दो शब्द लिख दें तो इसे प्रकाशित कर दिया जाय ऐसो बाबूजीको इच्छाको हमने सादर स्वीकार कर हम इस विषयमें कुछ सोचते ही थे कि कुछ ऐसे प्रसंग, एकके बाद एक, उपस्थित होते गये जिससे वर्षों तक हम उनकी उस आज्ञाका पालन नहीं कर सके और २४ घंटेके कामको रा४ वर्ष तक ठेलते रहना पड़ा। सन् १६२८ के प्रारम्भमें महात्माजीने गुजरात-विद्यापीठको पुनरुर्घटना की, और विद्यापीठका ध्येय 'विद्या' नहीं सेवा' निश्चित किया और साथमें कई प्रतिज्ञामोंका बन्धन भी लगाया। हमारा उसमें कुछ विशेष मतभेद रहा और हमने अपने विचारोंको स्थिर करनेके लिए कुछ समय तक विद्यापीठके वातावरणसे दूर रहना चाहा। इसीके बाद तुरंत हमारा इरादा युरोप जानेका हुआ। युरोपके सामाजिक और औद्योगिक तंत्रोंका विशेषावलोकन करनेका हमें अधिक मौका मिला और उसमें हमें अत्यधिक रुचि उत्पन्न हुई। हमारा जो आजीवन अभ्यस्त-विषय संशोधनका है, उसमें तो हमें वहां कोई नवीन सीखनेकी बात नहीं दिखाई दो, क्योंकि जिस पद्धति और दृष्टिसे युरोपियन पण्डितगण संशोधन-कार्य करते हैं, वह हमें यथेष्ट ज्ञात थी और उसी पद्धति तथा दृष्टिसे हम बहुत समयसे अपना संशोधन-कार्य करते भी माते थे, केवल वहाके विद्वानोंका उत्साह और एकाप्रमाव विशेष अनुकरणीय मालुम हुमा। हमें जो खास अध्ययन करनेके विशेष विचार मालुम दिये, वे वहांके समाजवाद-विषयक थे। इन विचारोंका अध्ययन करते हुए हमारा जीवनाभ्यस्त जो संशोधन-रुचि है, वह शिथिल हो चली। समाज-जीवनके साथ सम्बन्ध रखनेवाली बातोंने मस्तिष्कमें अहा जमाना शुरू किया। इन बातोंका विशिष्ट अध्ययन करनेके लिये हमारी इच्छा वहांपर कुछ अधिक काल तक ठहरनेकी थी, लेकिन संयोगवश हमको जल्दो ही भारत लौट आना पड़ा। इधर आनेपर बाबूजोने इस संग्रहको सर्वप्रथम ही याद दिलाई, लेकिन सत्याग्रहके नूतन युद्धमें जुड़ जानेके कारण और फिर जेलखाने जैसे एकान्तवासके अनुभवानन्दमें निमग्न हो जानेसे इन पुरानी बातोंका स्मरण करना भो कब अच्छा लगता था। एक तो योंही मस्तिष्कमें समाज-जीवनके विचारोंका आन्दोलन घुड़दौड़ कर रहा था, मोर उसमें फिर भारतकी इस नूतन राष्ट्रक्रान्तिके आंदोलनने सहचार किया। ऐसी स्थिति में हमारे जैसे - [ गं ] मित्य परिवर्तनशील प्रकृतिवाले और क्रान्तिमें हो जीवनका विकाश अनुभव करनेवाले मनुष्यके मनमें वर्षों तक पुराने विचारोंका संग्रह कर रखना, और फिर जब चाहें तब उन्हें अपने सम्मुख एकदम उपस्थित हो जानेकी आदत बनाये रखना दुःसाध्य-सा है। जेलमुक्ति होनेपर विधाता हमें शान्तिनिकेतन खींच लाया। विश्वभारतीके ज्ञानमय वातावरणने हमारे मनको फिर ज्ञानोपासनाकी तरफ खींचना शुरू किया और हमारी जो स्वाभाविक संशोधन-रुचि थी, उसको फिर सतेज बनाया। वर्षोंसे हमने २।४ ऐतिहासिक प्रन्थोंके सम्पादन और संशोधनका संकल्प कर रखा था और उसका कुछ काम हो भी चुका था, इसलिये रह-रहकर यह तो मनमें आया ही करता था कि यदि इस संकल्पके पूरा करनेका कोई मनःपूत साधन सम्पन्न हो जाय, तो एक बार इसको पूग कर लेना अच्छा है। बाबू श्री बहादुरसिंहजी सिंघीके उत्साह, औदार्य, सौजन्य और सौहार्दने हमारे इस संकल्पको एकदम मूर्तिमन्त बना दिया और हम जो सोचते थे, उससे भी कहीं अधिक मनःपूत साधनकी संप्राप्ति देखकर परिणाममें हमने सिंघी जैन ज्ञानपीठ और सिंघी जैन ग्रन्थमाला का भार उठाना स्वीकार किया। जबसे हम यहां आये, तभीसे इस संग्रहके लिये श्री नाहरजीका बराबर स्मरण दिलाना चालू रहा। हम भी आज लिखते हैं, कल लिखते हैं, ऐसा जवाब देकर उन्हें आशा दिलाते रहते थे। बहुत समय बीत जानेके कारण इस विषयमें जो कुछ हमारे पुराने विचार थे और जो कुछ हमने लिखना सोचा था, वह स्मृति-पटपर से अस्पष्ट हो गया। जिन प्रतियोंपरसे यह संग्रह मुद्रित हुआ था, वे भो पासमें नहीं रहनेसे, इस विषयमें क्या लिखें, कुछ सूझ नहीं पड़ती थी । विज्ञप्ति त्रिवेणि', 'कृपारस कोष', 'शत्रुजय तीर्थोद्धार प्रबन्ध इत्यादि पुस्तकोंके प्रणयनके बाद हमारा हिन्दी-लेखन प्रायः बन्द-सा ही है। पिछले कई वर्षोंसे निरन्तर गुजराती भाषा ही में चिन्तन, मनन, लेखन, और वाग्व्यवहार चलते रहनेसे हिन्दी-भाषाका एक तरहसे परिचय ही छूट गया, इस कारणसे कुछ हिन्दी लिखनेका ठोक-ठीक चित्तैकाभ्य न हो पाता था, लेकिन इन दिनोंमें हमारा साहित्य-संग्रह हमारे पास पहुंच गया और वर्षों से संदूकोंमें बंद पड़े हुए पुराने कागज़ों और टिप्पणोंको उथल पुथल करते हुए इस विषयके कुछ साधन भी हाथमें आ गये, जिससे ये पंक्तियां लिखनेका मनमें विचार हो आया। बस यही इस संग्रहके बारेमें हमारा किश्चित् वक्तव्य है। श्वेताम्बर जैन संघ जिस स्वरूपमें आज विद्यमान है, उस स्वरूपके निर्माणमें खतरतरगच्छके आचार्य, यति और श्रावक-समूहका बहुत बड़ा हिस्सा है। एक तपागच्छको छोड़कर दूसरा और कोई गच्छ इसके गौरवकी बराबरी नहीं कर सकता। कई बातोंमें तपागच्छसे भी इस गच्छका प्रभाव विशेष गौरवान्वित है। भारतके प्राचीन गौरवको अक्षुण्ण रखनेवालो राजपूतानेकी वीर भूमिका पिछले एक हजार वर्षका इतिहास मोसवाल जातिके शौर्य, औदार्य, बुद्धि-चातुर्य और वाणिज्य-व्यवसाय-कौशल आदि महद् गुणोंसे प्रदीप्त है और उन गुणोंका जो विकाश इस जातिमें इस प्रकार हुआ है, वह मुख्यतया खरतरगच्छके प्रभावान्वित मूल पुरुषोंके सदुपदेश तथा शुभाशीर्वादका फल है। इसलिये खरतरगच्छका उज्ज्वल इतिहास यह केवल जैन संघके इतिहासका ही एक महत्त्वपूर्ण प्रकरण नहीं है, बल्कि समप्र राजपुतानेके इतिहासका एक विशिष्ट प्रकरण है। इस इतिहासके संकलनमें सहायभूत होनेवाली विपुल साधन-सामग्री इधर-उधर नष्ट हो रही है। जिस तरहको पट्टावलियां इस संग्रहमें संगृहीत हुई हैं, वैसी कई पट्टावलियां और प्रशस्तियां [ घ ] संगृहीत की जा सकतों हैं और उनसे विस्तृत और शृंखलाबद्ध इतिहास तैयार किया जा सकता है। यदि समय अनुकूल रहा, तो 'सिंघो जैन ग्रंथमाला' में एक-आध ऐसा बड़ा संग्रह जिज्ञासुओंको भविष्यमें देखनेको मिलेगा। बाबु श्री पूरणचंदजी नाहरने बड़ा परिश्रम और बहुत द्रव्य व्यय करके जैसलमेरके जैन शिलालेखोंका एक अपूर्व संग्रह प्रकाशित कर इस विषयमें विद्वानों और जिज्ञासुओंके सम्मुख एक सुन्दर आदर्श उपस्थित कर दिया है। इसके अवलोकनसे, राजपुतानेके जूने पुराने स्थानों में जैनोंके गौरवके कितने स्मारक-स्तंभ बने हुए हैं तथा उनसे हमारे देशके ज्वलन्त इतिहासकी कितनी विशाल-स्मृद्धि प्राप्त हो सकती है इसकी कुछ कल्पना आ सकती है। इस प्रथमें प्रायः खरतरगच्छके ही इतिहासकी बहुत सामग्री संगृहीत है जो इस पट्टावलिवाले संग्रहकी बातोंको पुष्टि करती है तथा कई बातोंकी पूर्ति करती है। इन सब बातोंके दिग्दर्शनकी यह जगह नहीं है। ऐसे संग्रहोंके संकलन करनेमें कितना परिश्रम आवश्यक है वह इस विषयका विद्वान् ही जान सकता है विद्वानेव जानाति विद्वज्जनपरिश्रमः'। जैसलमेरके लेखोंका ऐसा सुन्दर संग्रह प्रकाशित कर तथा इस पट्टावली संग्रहको भी प्रकट करवाकर श्रीमान् नाहरजीने खरतरगच्छकी अनमोल सेवा की एतदर्थ आप अनेक धन्यवादके पात्र हैं। आपका इस प्रकार जो स्नेहपूर्ण अनुरोध हमसे न होता तो यह संग्रह योंही नष्ट हो जाता और इसके तैयार करनेमें जो कुछ हमने परिश्रम किया था वह अकारण ही निष्फल जाता अतः हम भी विशेष रूपसे आपके कृतज्ञ हैं। शान्तिनिकेतन सिंघी जैन ज्ञानपीठ जिनविजय पर्युषणा प्रथम दिन, सं० १९८७ "
नमोऽस्तु श्रमणाय भगवते महावीरायं
॥ खरतरगच्छ-सुरिपरंपरा-प्रशस्तिः ।
श्रियेऽस्तु वीरस्त्रिशलाङ्गजातः सेवागतानेकसुरेन्द्रबातः ।
दुष्टाष्टकर्मक्षयबद्धकवस्तिरस्कृताशेषविपक्षलक्षः ॥१॥
यदीयसन्तानमवा मुनीश्वराः कुर्वन्ति धर्म विमलं कलावपि ।
अद्यापि कालेज स पञ्चमेऽपि, श्रिये सुधर्मा अपमृदरोऽयम् ॥२॥
येनाष्टौ नवबालिका नवनवस्नेहानुगा बन्धुराः
सौवर्णों नवकोटयो दशगुणास्त्यका नवाधिस्यकाः।
अन स्वेन कुटुम्बकेन सहितेनाग्राहि दीक्षा गुरोः
सोऽयं केवलिपुङ्गवोऽप्यूषमभूर्जम्बूमुनिः पातु का ॥३॥
चोरोऽपि प्रश्रितो, विहाय सकलचौर्याचव, सुधी-
शास्त्रीय परिपाई कोषिकनृपाध्यक्षं तदागच यः।
पौराणां शतपत्रकेन कलितः प्रव्रज्य सर्वश्रुत-
बान्मासीत्प्रभवोऽथ सरि कुटः सोऽस्तु श्रिरे विडियः॥४॥
भुत्वा साधुमुखाद्विनिर्गतवचोहो कष्टमित्यादिक
जैनीमूर्तिनिरीक्षणेन तरसा त्यक्त्वावरं बन्धुरम् ।
संसाराद्विरतो व्रतं समाधिया बादाय सरिपर्द
लेमे सार्थभुतज्ञतास्सदमसौ शय्यंभवः सोऽवतात् ॥ ५ ॥
बावसात्विा निजमुतमनकस्य चाचचरणस।
दसवैकालिकमकरोत् स्वल्पदिनानल्पसुखडेनुः ॥६॥ .
संशयमबसूरि प्रणमत भक्त्या गुणाजकासारम् ।
जिनशासनशृङ्गार योगिमनःसरसिजे ईसम् ॥ ७॥
तत्पस्सूपणमामिगत यशोभद्रसूरिधोरेयः।
गुरुमाक्तिशालिहदा सुखकार संघमाधारः॥८॥
मतिविजयसरिः सकलश्रुतकेवली अगद्विदितः।
निखिलश्रीसरिशिरस्तिलकसमो जयतु योगीशः॥९॥
प्राचीनगोपखिलको जिनशासनेप्रस्मिन् मार्तण्डमण्डलवदद्भुतमास्करोऽयम् ।
दमप्रकाशचरमश्रुतकेवलीशो बेजीयते व इह सूरिंगणावतंसः ॥१०॥
संयोपोचाशतोऽखिलदुष्टकारविमापहासुपसर्गहरं चकार ।
नितिनिखिलसूत्रकादम्बाकस या सोस्तु दुर्गतिहरो गुरुद्वा॥११॥
॥ खरतरगच्छ सूरिपरंपरा-प्रशस्तिः ॥ भूतो न कोऽपि न भविष्यति भूतलेऽस्मिन् श्रीस्थूलिभद्रसदृशो मुनिपुङ्गवेषु । येनेष रागभुवनेऽपि जितोहि कामः पण्याङ्गनावरगृहे वसता निकामम् ॥१॥ ताते स्वर्ग गतेऽपि क्षितिपतिमणिना नन्दभूपेन राज्य- मुद्रामस्याlमाणामपि च विगणयन् मोक्षदुर्गस्य मुद्राम् । भोगान् भोगीशतुल्यान् परिणतिविषमाः पण्यनारीर्विचार्य त्यक्त्वैवं सर्वमेतद्वरचरणभरं यो दधार स्वदेहे ॥१३॥ धन्यो हि सोऽपि जनकः शगडालमन्त्री लक्ष्मीश्च सा जनिकरी युवतीषु धन्या वंशोऽपि धन्य इह नागरवाडवीयो यत्राजनिष्ट मुनिरेष मुनीन्द्रवन्धः ॥१: शिष्यौ च स्थूलिभद्रस्य महागिरि-सुहस्तिनौ । दशपूर्वधरावेतौ प्रवीणौ पुण्यशालिनौ ॥१५ जिनकल्पतुला विभ्रत्तयोरेको महामुनिः। द्वितीयसंप्रतिक्ष्माप-प्रतिबोधकरोऽभवत् ॥१ः तस्योपदेशतोऽनेके विहाराः कारिता भुवि । तेन संप्रतिभूपेन यथा भूर्जिनमण्डिता ॥१५ वजः प्रवचनाधारस्तत्पट्टानुक्रमादभूत् । सुनन्दाकुक्षिसंभूतो जातमात्रो विरागवान् ॥१ पालनके स्वपमेकादशाप्यङ्गानि लीलया। योऽपठद्धालभावेऽपि साध्वीनां वसतौ स्थितः॥१॥ प्रवर्धमानः क्रमशः शशावद ददत्प्रमोद सकलेअपि सके। मातुर्विवादेऽपि गृहीतवाहपरजोइति वाचमभूषयपितुः ॥ २० ॥ अयो गुरुः सिंहगिरिनिजायुः पर्याप्तिमालोक्य पदं स्वकीयम्। सभित्रपञ्चद्विक-पूर्वधारिणे मुनीन्द्रवजाय ददौ समाहितः ॥२१॥ श्रीवज्रसूरिर्गुणलन्धिभूरिः कुर्वन् विहारं विविधेऽपि देशे। प्रोत्सर्पणां श्रीजिनशासनेऽस्मिन् नानाविधां प्रातनुत प्रभुः ॥ २२ ॥ स्वयंवरे तां धनरलकोटिसमन्वितां श्रेष्ठिसुतां त्यजन्तम् । अपि स्वरूपेण जितस्वरङ्गनां तं वज्रसूरि प्रणमामि सादरम् ॥ २३॥ श्रीदृष्टिवादपठनाय गतेन मातुर्वाचा सुपूर्वनवकं च पपाठ सार्द्धम् । भीआर्यरक्षितगुरु स मुदे शमानाः संबोधिताखिलपरीतिरेस भयात् ॥६ बीमालिकादिपुष्पमुगुरू श्रीआर्यनन्दिर जीयामागकरिप्रभुध विजयी श्रीरेवतीसरिराट् । प्रमद्वीपिगुरुः सदार्यसमितेः संप्राप्तदिक्षविरं खण्डिल्लो हिमवान् गुरुर्विजयते नागार्जुनो वाचकः ॥ २५॥ गोविन्दाभिधवाचकं गुरुवरं संभूतिदिमायं भीलोहित्यमुनि सदा प्रणिदधे श्रीपोप्याच गोषम् । भाष्यायेषु (१) विधायकं मुनिवरोमावातिसद्वाचक बन्दे श्रीजिनभद्रसूरितिलक निलं उतालिः ॥२६॥ त्रिखण्डमेदिनीराज्य पालयन् सर्वतःमः। अवन्त्यां विक्रमादित्या प्रबोध्य भावकी कता M N खरतरगच्छ-परिपरंपरा प्रशस्तिः ॥ मिथ्यात्विसंगृहीतः प्राग महाकालजिनालय आत्मसाद्विहितो येन जिनशासनमास्वता॥२८॥ नव्यस्तोत्रप्रभावेण पार्श्वमातिः प्रकाशिता । त्रिनेत्रपिण्डिकामध्यात् स्फटाटोपैविभूषिता ॥२९॥ श्रीवृद्धवादिसूरीन्द्र-पड्नुपरजभास्करम् । संतोष्टुवीमि ते भक्त्या सिद्धसेनदिवाकरम् ॥३०॥ चतुर्मि:कलापकम् । यैर्याकिनीभगवतीवचनात्प्रघुबैस्त्यक्त्वामिमानमखिलं जगृहे चरित्रम् । यैः सोगवा विधिबलेन बघोपनीतास्ते सागसोऽपि यतिनीवचनाच्च मुक्ता॥३१॥ तापतेः समीहोद्भवदुरितामिदे खाधिवेदेन्दुसंख्या जैना ग्रन्थाः कृताः स्युपनतिमिरमिदो नव्यगाथाप्रबंधैः । बैरप्यात्मीयशिष्यव्यपगमनभवदुःखतापामृतौध- अके ग्रन्थो रसालो धुरिकृतललिवो विस्तराख्यो नवीनः ॥ ३२ ॥ ते हरिभद्रमुनीन्द्रा निस्तन्द्राश्चन्द्रकिरणसंकाशाः। श्री आवश्यकलघुगुरुविवृतिकराः संघजयकाराः ॥३३॥-त्रिमिः कुलकम् । पन्देऽहं देवसूरीशं नेमिचन्द्रगुरुत्तमम् । नमः सुविहितायाथ श्रीउद्योतनसूरये ॥३॥ तत्पदेवाचलकल्पवृक्षा मव्याजिना कल्पितदानदवाः । सूरीश्वरास्ते सुमनोमिरामा श्रीवर्षमाना गुरवो विरामाः॥३५॥ ये अर्बुदाद्रावृषभेश्वरस्य मणीमयीमूर्तिमतिप्रभावाम् । प्रकाशयामासुरथोरगेन्द्रासंप्राप्तसानायकसरिमन्त्राः ।। ३६ ॥ तत्पद्वपकेरुहराजहंसा जैनेश्वरा सूरिशिरोवतंसाः । जयन्तु ते ये जिनशैवशासनश्रुतप्रविणा भववासमक्षिपन् ॥ ३७॥ श्री पत्तने दुर्लभराजराज्ये विजित्य वादे मठवासिसूरीन् । वर्षेन्धिपक्षानशक्षिप्रमाणे लेमेऽपि यैः खरतरो पियुग्मं (१)॥३८॥ संवेगावाला विहिता प्रस्तावकुसुमवरमाला । संजिनचन्द्रमुनीन्द्र नमत जनानन्दवितिचन्द्रम् ॥ ३९ ॥ वृतिबके नवाझ्या ललितपदयुता देवतादेशतो 2- नव्यस्तोत्रेण येषां प्रकटतनुरभूद् भूमितो दिव्यरूपी । पार्थः पूर्जत्फणालः कलिमलमथनः स्तम्भनाधीश्वरोऽय- मस्य लाइसेकाहिगतगदतनौ दिव्यरूपं यदीयम् ॥ ४०॥ सानिध्यकारा सकलातिहारिणी पथावती यत्पदपजे भिता । ते पूज्यराजाभयदेवसूरयो यच्छन्तु संघे सकलार्थसम्पदम् ॥४१॥ मूदुपक्षीयसूरेः प्राशिष्यः कच्चालवर्षिणः। जिनवल्लमनामामृद्विरागी कर्मभेदतः ॥४२॥ तस्यामयगुरोः पार्थादुपसंपचतोऽभवत् । जिनवल्लभशिष्योऽय सर्वसिद्धान्तपारगः ॥४३॥ क्रमशोऽमयसूरीणां पट्टकन्दरकेसरी । जिनवल्लमसूरीन्द्रो द्रव्यलिङ्गगजाईनः ॥४४॥ हो ॥ सररण सरिपरंपरा प्रशस्ति । दुर्गे मैचित्रकूटे विकटभृकुटिका पण्डिका प्रत्यकोधि, अहे मानोवतश्रीकरणसदभरः सत्यवान वैभवेनः । मानिस्खो यत्प्रसादाद् धनपतिरभवत्सोऽपि सहारणो वै पके तेनापि जैने जिनगृहकरणाधुमतिः शासनेऽस्मिन् ॥ ४५ ॥ पिण्डविशुद्धिप्रकरण-कर्मग्रन्थाधनेकशास्त्रकृते । तस्मै श्रीजिनवल्लभगुरखे सततं नमस्कुर्वे ॥४६॥ तत्पढे मेरुश सुरतस्सदृशो जैनदत्तो मुनीन्द्रो दुर्गे श्रीचित्रकूटे ग्रहरसशशभृश्चन्द्रसंख्ये हि वर्षे । भूतप्रेताः पिशाचा ग्रहगणनिवहा कुग्रहास्ते गृहीता येनासाध्येष (१) मन्त्रप्रबलबलतया योगिनीचक्रवालम् ॥४७॥ यत्पूर्व चै [व] पट्टे विनिहितमभवद् केनचिदैवतेन तस्मात्याकाशि मन्त्रस्तदपि हि गुरुणा पुस्तकं मन्त्रगर्मम् । अनाथो विक्रमाख्ये विपुलपुरवरेऽवारि मारिः प्रबोध्य लोका माहेश्वरीयास्तदपि हि गुरुणा स्थापिता जैनधर्मे ॥४८॥ पलिमेव पुरेशसमगुणितं साधुवंतिन्योः पृथग् एकस्यामर्षि दीक्षितं समभुवमन्या क्षणात्सो पव। सिन्धोर्मण्डलमाससाद च गुरु पूर्णेन्दुवत्साधुमिः संसेव्यो जनचक्रवाकनयनानन्दं ददत शुद्धधीः ॥४९॥ सत्र श्रीसोमराजः सुरपतिसदृशो यत्पदाम्भोजभृङ्ग, स्तुष्टस्तस्मै स दत्ते प्रवरमिति वरं प्रामदेशे पुरेप। भाद्धः श्रीमास्त्वदीयो नरपतिसदृशः सत्प्रधानो गुरुवा भाव्यैकैकः स एष प्रकटतरमिहाद्यापि जागति गच्छे ॥५०॥ यो योगीन्द्रनिषेक्तिक्रमयुगः प्राचीनपुण्योदया- देवोक्तेश्च युगप्रधानपदवी प्राप्तो जगद्विश्रुताम् । यस्योपान्तमुपासते सुरगणा दासा इवाहर्निशं कल्पद्रुमरुमण्डले स जयति श्रीजैनदत्तो गुरुः ॥५१॥ तेषां नामग्रहणाद्विपरितां यान्ति सकलविपदोऽपि । अहिदष्टमृत्य्वभावो विद्युदपातो भवेद् मविनाम् ॥ ५२ ॥ विस्फुरति कान्तिरतुला सुकला देहेपि मन्दिरे सकला। कमला विस्मयजननी वदने वाणी सुघोगिरणी ॥ ५३ ।। भीअजयमेरुदुर्गे स्वर्गे गमनं च जातमिव येषाम् । स्तूपं तिलकसुरूप प्राचीदिक्तरुणीमालतले ॥ ५४॥ - - तत्रैष काले स्वयं निर्गतो गणः भीरुद्रपल्लां जिनशेखर हि। श्रीरुद्रपल्लीप इति प्रसिद्धो प्रहर्तुचन्द्रेन्दुमिते च य ॥५५॥ वर्षे पाणपक्षचन्द्रसुमिते श्रीविक्रमाख्ये पुरे यस्पोदारमहोत्सवः समभवत् पहाभिषेकक्षणे। बचञ्चन्द्रनिभाननो नरमणी भालो विशालो गुणैः सोऽयं श्रीजिनचन्द्रसूरितिलको जीयान्मनोऽभीष्टदः ॥५६॥ योगिस्तमितविम्बमोचकतरस्तेषां पुनः स्थापक- बैत्ये यः समभन्मृतेर्वशतयोभ्याशु तं योगिनम् । तोपातेन समर्पितामपि ललौ विद्यां न यः स्तमिमी- मुत्सिष्टेत्यघनन सा क्षितौ विनिहिता तेन क्रुध्यस्वानिनी (१)॥६॥ गुरुणा पापमुक्तेन मुक्तो योगी गतोऽपि सः। सोऽयं जिनपतिः सूरिः सुरमरिसमप्रमः ॥१॥ जीयाश्चिरं चिरायुष्का षट्त्रिंशद्गुणशेवधिः। षट्त्रिंशद्वादजेता च विधिमार्गनमोमणिः ॥६२॥ भीजावालपुरे महोत्सवयुतो वस्वर्षिपक्षणभूत- माने वर्ष इलावले समभवत्पामिरेको महान् । भीजैनेयरसरिराजमकटो वानिर्जिवों स्वर्गुरोः श्रीमाडारिकनेमिचन्द्रतनयः स पातु वो वान्छितम् ॥ ६३ ॥ भीमनाहारकाख्येऽखिलनगरवरे थामिपक्षद्वयेन्दु- संख्ये वर्षे विशालद्रविणवितरणे श्रावकैदीयमाने । पूज्यैर्विज्ञाय योग्यं स्वपदमलमचीकारि यः शैशवेऽपि तं श्रीमत्सरिराज जिनपतिसुगुरु संस्तुवे पूज्यपादम् ॥ ५७॥ प्रतिष्ठासमयेऽन्येदुर्योग्येकस्तत्र चामतः । प्रतिष्ठितानि बिम्बानि स्तंमयामास विषया५८|| अत्रान्तरे सरिगुणानमिक्षा महत्तरोवाच स नर्मवाचम् । पालेन चन्द्रेण तु चन्द्रिमा कति विमो प्रकार कुलो कर नहि ॥५९ ॥ [ति महतरापपनेन गुल्मता पाए। शिखिशिखिलोचनशक्षिामितवर्षे जिनसिंहसरिराजगुरोः। लघुखरतरीयगणो जातो जावालपुरनगरे । ६४॥ चन्द्रागिनयनानिमितवर्षे जावालपुरमहादुर्गे। जैनप्रबोधमुगुरोरमवत्सहोत्सको रम्यः ॥ ६५ ॥ शशिवदनयनशशिमितवर्षे जिनचन्द्रसरिराजस्य । श्रीमज्जावालपुरेञ्जनिष्ट पट्टाभिषेकमहः ॥६६॥ मुनिमुनिनयनैणांकप्रमाणे हि वर्षे विपुलधनसमृद्धे पचनाख्ये पुरेऽस्मिन् । पदमहमहिमोचैविस्तृता यस्य शस्या स जिनकुशलसरिमरिसौभाग्यकारी॥६७॥ विमलगिरिवरेऽस्मिन् यस्य शश्योपदेशाद् धनतरघनकोव्या मानतुङ्गो विहारः। सत्तरवसवः सुप्रतिष्ठाकरोऽभूदपहतदुरितोषः प्राणिनां सर्वकालम् NH • Kissa . + , १५.१ ५.५. . . * evelf hp vishesh ॥सरतरगच्च भरिपरंपरा प्रशस्तिः ।। रंगतरंगा सदने तुरंगा विशालनेत्रा युवती सरंगा। वाणीतरंगा वदने रसाला यस्य प्रसादाकिल संभवन्ति ॥ ६९॥ देवराजपुरे यस्य स्वर्गतस्य गुरोरथ । पूज्यमानं जनैः स्तूपं ददाति सकलं सुखम् ॥ ७॥ तपथा-निर्धनाय धनं दयाद नेत्रहीनाय लोचनम् । विद्याहीनाय सद्विद्यामश्रोतृणां च सुश्रुतिम् ॥ ७१ ॥ राज्यार्थिनां च यद्राज्यं सुखं सुखार्थिनामपि । प्रयच्छत्युत्तमं भोग भोगार्थिम्यो विशेषतः॥७२॥ कछिनां हरते कुष्ठ रोग रोगवतामपि । कष्टं कष्टवतां पुंसां दौर्भाग्यं दुर्भगात्मनाम् ।।७३ चतुर्मिः कलापकम् अन्य प्रहामीदुमितेच वत्सरे श्रीदेवराजाख्यपुरे पदोत्सवः । जज्ञे च यस्याविरभूत्सरस्वती श्रिये स क श्रीजिनपचसरिराट् ।।७४ ॥ खखवेदचन्द्रमाने वर्षे पट्टाभिषेचनं यस्य । गुणलन्धिरत्नजलधि याजिनलब्धिसूरिगुरुः ॥७५ ॥ पच्छन्यवेदेन्दुमिते हि वर्षे पट्टोत्सवो जेसलमेरुदुर्गे । यस्याभवद् द्रव्यपनव्ययेन सोऽस्तु श्रिये श्रीजिनचन्द्रसूरिः ॥७६ ॥ बाणेन्दुरेदयविमलामि च वर्षे श्रीस्तंमतीर्थनगरे समभूद् यदीयः। पहामिकमहिमा गरिमालयोऽसौ जेजीयते गुरुजिनोदयसरिराजः ॥७७ ॥ भीजिनेवरसूरीणां तदैव निर्गतो गणः । वैकट इति नामासीदिश्रुतोऽयं महीतले ॥ ७ ॥ नेत्राक्षिनीरनिधिचन्द्रमिते च वर्षे श्रीपत्तने पुरखरे पदमाविरासीत् । श्रीमज्जिनोदयगुरोः पदपङ्कजालीभृङ्गापितं नमत तं जिनराजसूरिम् ॥७९ तत्पनन्दनवने विभाति जिनमद्रसूरिसुरफलदः । सकलमनोमतदाता शतशाखावर्धितो वाढम् ॥ ८॥ अत्रान्तरे देवकुलादिपाटके चन्द्रर्तुवेदेन्दुमिते च वत्सरे । शाखा गुरुश्रीजिनवर्धनानां शुक्राद्यपक्षे दशमीदिनेऽभूव ॥ ८१॥ वाणर्षिवेदेन्दुमिते च वर्षे माषस्य राकादिवसेजनिट। पट्टोत्सवो माणसपल्लिकायां ननौमि तं श्रीजिनभद्रसूरिम् ॥ ८२ ॥ गुरोः श्रीजिनमद्रस्य महिमावयेते कियान्। यद्भाले मासते माग्यलक्ष्मीविस्मयकारिणी वामेतरे यत्करपङ्कजेऽस्मिन् चेक्रीयते सिद्धिरमामुकेलिम् । विहारनीरोर्मय एव येषां संपत्तिशस्यानि समेधयन्ति ।। ८४ ॥ दारिच क्षीयते येषां सौम्पदृष्टिविलोकनात् । चन्द्रोदयाद्ययापैति संकोचः मुदाकरे ॥८ तत्पशकासनेदवराजो विराजते श्रीजिनचन्द्रसूरिः। श्रीपत्तने यस्य पदोत्सवोऽभूदाणेन्दुबाणेन्दुमिते च वर्षे ॥८६ ॥ श्रीमग्रेसलमेरो समराकारिवाविहारमध्येअस्मिन् । जिनचन्द्रसरिगुरुवाचक विम्वप्रतिष्ठा सा॥८७
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1-05-भीमेवावविशेष प्रतिषिपुले भीगाकराल्ले रे ।
॥ खरतरगच्छ सेरिपरंपरा-प्रशस्तिः ॥
तत्पट्टपङ्कजयुगे भ्रमरायमाणं ननम्यते जिनसमुद्रगुरुं तमेनम् ।
नेत्रेक्षणेषुशशमृत्ामिते च वर्षे पट्टोत्सवो विपुलपुञ्जपुरे यदीयः ८८ ॥
दाने वितीर्यमाणे प्रवरां चक्रिरे प्रतिष्ठां ये।
वाग्भटमेरुविहारे सारेऽस्मिन् भूतले सुतराम् ॥ ८९ ॥
आदेशानृपसातलस्य मुदितो जाटामिधः श्रीवरो
रत्नाधीषुशशिप्रमाणशरदि प्रोद्भुतपुण्योत्सवे ।
श्रीमण्डूकवराभिधानविषयेऽप्यानीतवान् माघवे
श्रीमज्जेसलमेरुतः पुरवरे योधानके श्रीगुरून् ॥ ९॥
करसरोरुहसिद्धिरमाधरान् सकललब्धिमहोदधिसुन्दरान् ।
गुरुगुणावलिभूषितविग्रहान् जिनसमुद्रगुरुममतादमून् ॥११॥
-~-चतुर्मिः कलापकम् ॥
तेषां पहाम्भोजलीलामरालाः सूरीशाः श्रीजैनहंसा रसाला
कामवसे नीलकण्ठोपमाना जेजीयंता निजितापमाना॥९२ ॥
श्रीविक्रमाख्ये नगरे विशाले बाणेषुवाणेन्दामती समायाम् ।
ज्येष्ठस्य शुक्ले नवमीदिनेऽथ वारे गुरौ चारु शुमे पि लगे ॥ ९३ ॥
श्रीकमसिंहेन कृतोद्यमेन धनव्ययात्प्रीणितसर्वलोकः।
येषां गुरूणां नतनागराणां पट्टोत्सवोऽकारि सविस्तरोऽयम् ॥९४ ॥
अत्रान्तरे श्रीजिनदेवसूरे श्रीआद्यपक्षीयगणो विभिनः।
स्वामिधाने नमरेजनिष्ट वाणर्तुवाणेन्दुमिते च वर्षे ॥९५॥
इर्वन्तः क्रमशो बिहारमनवं देशवनेकेन्वय
नमस्तत्र शकन्दरो नरपावित्वदायमारपी
भीमडूंगरपचासिंहसचिवो भीमालामणी ॥२६॥
सौखमीफलाडिणी वितरणैरत्यद्रताडम्बर-
भाते नगरसवेशनमहं श्रीमद्गुरूणां मुदा ।
तेषां तत्रसतामयो गुणवतां प्राचीनकर्मोदयाद
कोऽप्योको प्रतिकसुट दुष्टमतिकः पश्यन् संदौतथूलम् (१)॥९॥
सोऽन्येषुः क्षणमाप्य पापहृदयः समाष्टवारं कुधीः
साहीनस्य पुरोरदासिमखिला (१) चक्रे तदा तामथ ।
१४. १० नो मन्पेत नपस्ततश्च किमपि प्रोद्राव्य कूटाशय-
मेका वेतपटों महानविश्यीहास्तीति संसापते ॥ ९८॥
rakhpur ki Aayo d: 4:19shiverhead in diyasise
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॥खरतरगच्छ मरिपरंपरा-प्रशस्तिः ।।
तस्यैवं कथया तया हयपतिश्चित्ते स विस्मापितः
किञ्चित् प्रष्टुमतः स्वधाग्नि कुतुकाव सूरीभिनाय द्रुतम् ।
तत्पृष्टैर्गुरभिश्च सत्यवचनेषूक्तेषु रोषादसौ
चिक्षेपाहियुगे तदा नयवतां जंजीरमेषां हहा ॥ ९९ ॥
तावत्तस्य हदि भ्रमे भवति नो स्वं चापरं वेल्यसा-
बुद्रावन्त्वथ पश्यति स्म भयदं किंचित्ततो चिन्तयन् ।
ज्ञातं सैष सिताम्बरः कलयतीतीकलां तद्भिया
द्राग्भीतो गुरुमोक्षणाय नृपतिश्चादिक्षदारक्षकान् ॥१०॥
जीरापल्लिपुरीशपार्थकृपया प्राचीनपुण्योदया-
दहध्यानवशासदा जयजयारावे प्रवृत्ते सति ।
सार्थ दु:स्थितबन्दिपञ्चकशतैः श्रीसूरयो निर्ययुः
श्रीराहोर्वदनाद शशाङ्कवदतः साहीनकारोदराव ॥१०१॥
अमन्दानन्दजांकुरा उदगच्छन्मनोवनौ । विवेकिश्राद्धलोकानामुद्दीप्तं जिनशासनम् ॥१०२॥
मीतनतनवादित्रमालध्वनिपूर्वकम् । वर्धापनं च सर्वत्र गुरूणां मोचनेजनि ॥१०॥
ते मेघराबालनन्दनकल्पवृक्षाः निम्शेषजन्तुहृदभीप्सितदानदधाः ।
श्रीजैनहंसगुरवोजघसंघलोके यच्छन्त्वमी सकलसिविमदारबुद्धिम् ॥१०॥
श्रीसूरयोऽप्यय परंपरया विहारं कुर्वन्त एव नगरं वरपत्मास्यम् ।
प्राप्ताश्चिरण करवस्विषुचन्द्रसंख्ये वर्षे समाहितधियोनच ते खरापुः॥१०५॥
तेषां पड़सरोजे श्रीजिनमाणिक्यसूरिगुरुहंसाः।
विशदोभयपक्षधरा जयन्तु जगतीवराभरणाः ॥१०६॥ .
येषां पट्टमहोत्सवो जबजयारावा प्रवृत्तो महान्
श्रीबालाहिकगोत्रभूषणमणिः श्रीदेवराटुकारितः।
पवान्देषुशशिप्रमाणशरदि श्रीपत्तनाख्ये पुरे
माघस्योज्ज्वलपञ्चमीवरदिने खोपार्जितार्थम्पमात् ॥ १०७॥
तेऽमी राजकुलाङ्गजाः सुगुरवः सूरीधराः साम्प्रतं
रमादेव्युदरांबुधौ शशधराः पुण्याजपायोधराः ।
सौमाम्याइतमालभाम्यतिलकापूर्वपिरेखांगताः
नन्दन्त्वम्बरसंस्थिताश्चिरतरं यावद्रवीन्दुधुवाः ॥१०८॥
भीमन्जिनावाप्रतिपालकाय तीर्थकरैर्वन्यपदाम्बुजाय ।
संपाय भूयाच्छिवसाधकाय मद्र जगज्जन्तुहिताव नित्यम् ॥ १०९।।
श्रीचन्द्रमच्छगगने जिनसरिराज्ये कराष्टवरचन्द्रमितेऽय वो।
पके प्रशस्तिरिति पोषयोधिनता किचिन्मया स्वविररिपसरावाः ॥११॥
॥ खरतरगच्छ पट्टावली। ve- [१] श्रीगौतमस्वामी गौरिग्रामवासी वसुभूति वज्रस्वामी दशपूर्वधरः। तच्छिष्यात् नागेंद्र, ब्राह्मण-पृथ्वीभार्या तयोः पुत्रः। गौतमगोत्रः। चंद्र, निवृति, विद्याधर; गच्छ ४ स्थापना । तस्य गृहस्थत्वे वर्ष ५०, छमस्थत्वे वर्ष ३०, कालिकाचार्यः । आर्यश्यामापरनामा । ततः श्रीवीरनिर्वाणसमये केवलमासाद्य १२ वीरात् ४१३ । वः सिद्धः। एवं सर्वायुः ९२॥ गर्दभिल्लोच्छेदको कालिकाचार्यों वीरात् श्रीवीरपट्टे सुधर्मास्वामी। ५०० वर्षेः। अग्निवैश्यायनगोत्रः । कुलागसंनिवेसे शान्तिसूरिः। धम्मिल्लपिता महिला माता । तस्य ५० वर्षान्ते हरिभद्रसूरिः। याकिनीधर्मपुत्रो होमानीत- दीक्षा, ४२ वर्ष छद्मस्थत्वं, ८-वर्षाणि केवलं, बौद्धप्रायश्चित्तार्थ १४४४ प्रकरणकर्ता वीरात् सर्वायुः १००, श्रीवीरात् २० वर्षेः सिद्धः। ५८५ वषैः । तत्पद्वे श्रीजंबूस्वामी। संडिल्लसूरिः। काश्यपगोत्रः, श्रीराजगृहीनगरी, ऋषभ- आर्यसमुद्रसूरिः। दत्तपिता, धारिणी माता, तयोः पुत्रत्वेन आर्यमंगुः । पंचमस्र्गात् च्युत्वा समुत्पन्नः। ८ कन्या आर्यधर्मः ९९ कोटिकांचनत्यागी । गृहे वर्ष १६, व्रते आर्यमद्रः। २०, केवले ४४; एवं वर्ष ८० परमायुः। आर्यवयरादिः। पीरात् ६४ वषैः सिद्धः। दुलिकापक्षः। ततः प्रभवः कात्यायनगोत्रः। ततः शय्यंभवः । वीरात् ९८ वर्षेः स्वर्गतः। लेखनात वलम्यां वीरात् ९०० वर्षेः । देवङ्किगणिक्षमाश्रमणः । सकलसिद्धान्त- श्रीयशोभद्रः। आर्यसंभूतविजयः। गोविंदवाचकः । उमास्वातिवाचकः। मशमरतिप्रकरणकृत् । भद्रवाहस्वामी । उवसग्गहरंकावीराद१७० थलिमद्रः। कोश्याप्रतिवोधकः २१४ वर्षेः देविंदवाचका। १४ पूर्वधरः। जिनभद्रगणिक्षमाश्रमणः। सर्वमाष्यकर्ता आर्यमहागिरिः । दशपूर्वधरो जिनकल्पतु- ९८० वरैः । लनात् वीरात् २७० । शीलांगाचार्यः। प्रथमद्वितीयांगवृत्तिकर्ता । आर्यसुहस्तिः । अत्रांतरे सिद्धसेनप्रति श्रीदेवसरिः। पोषितो विक्रमादित्योऽजनि। भीनेमिचंद्रसरिः।
१० ॥ खरतरगच्छ पहावलो-१॥ १. श्रीउद्योतनसूरिः। १२ कुलकप्रेषणेन दशसहस्रवागडी प्रति- २.श्रीवर्धमानसूरिः। गाजणादि १३ पाति- बोधकः स्वक्रियागुणप्रबोधितचित्रकूटीयचा- साह-च्छत्रोद्दालक चंद्रावती-नगरी-स्थापक मुंडः। नास्य परपक्षीयस्य पदं देयमिति सर्वस- विमल दंडनायक निर्मापित श्रीविमलवसतौ घोक्त्या श्रीअभयदेवोक्तमेनं मुक्त्वा नान्यस ध्यानबलवीकृतः वालीनाहक्षेत्रपालप्रकटित ददामीति देवभद्राचार्योक्त्या च १२ वर्षाषि वज्रमय आदीश्वरमूर्तिस्थापकः षण्मासाना- पट्टे शून्ये षद् मास ममायुरस्तीत्यगृह्नतोपि प्रद- चाम्लैः प्रकीकृतधरणेन्द्राव सूरिमंत्रशुद्धिकारी। तं संवत् ११६७ पदं । संवत् ११६८ चि- ३.श्रीजिनेश्वरसूरिः। सरसापत्तनवासीविप्रः कूटे स्वर्गप्राप्तिः। शिरसि मच्छिकादर्शनात् प्रतिबुध्दो गृहीत ७. श्रीजिनदत्तसूरिः। संवत् ११३२जन्न। दीक्षः पत्तनमागतः । तत्र सोमपुरोहितगेहे वाचकमंत्रीपिता । वाहडदे माता । संवत् ११४१ स्थितः । वेदऋचासत्यापनेन रंजयित्वा दीक्षा गृहीता, ११६९पाटि वैशाषवदि६दिने। तत्साहाय्येनैव संवत् १०८० दुर्लभराजस- श्रीजिनदत्तसूरिः ज्योतिर्बली विक्रमपुरे मारि- भायां ८४ मठपतीन् जित्वा प्राप्तखरतरबिरुदः। निवर्तनद्वारा प्रबोधित ५०० शिष्य दीक्षक एक ४. संवेगरंगशालाप्रकरणकारी श्रीजिन- नद्या, उज्जयिन्यां महाकालप्रासादे स्तंभमध्या चंद्रसरिः। अन्यदा श्रीजिनेश्वरसूरयः मालव- दौषधबलेन प्रथमानुयोगपुस्तकाकर्षकः । ६४ देशे धारापूर्या प्राप्ताः तत्र महाधनश्रेष्ठी-धन- योगिनी, ५२ वीर क्षेत्रपालादिसाधकः। ओसी- देवीपुत्रः अभयकुमाराख्यो देशनां श्रुत्वा प्रबु- यानगरे ओसवंशीय लक्ष श्रावकप्रतिबोधका । दो दीक्षा जग्राह । क्रमेण अभयदेवसूरयो जाताः १५०० साधु, १००० साध्वीदीक्षकः । नाम- गीतार्थाः। देवश्राद्धाराद्धांबिकालिखित 'दासानुदासा इव ५. अभयदेवाचार्यों बहाचाम्लकरणजात- एतत्काव्यवाचनात् ज्ञातयुगप्रधानपदः । कुष्ठरोगो धवलकेनशनप्रतिपत्तये आहूतासन्न- जिनदत्तसूरीणां सप्तवराः योगिनीभिः प्रदचा- संघो पि निशि शासनसुरी ज्ञापितस्य स्तंभनक- प्रामे २ एकः श्रावको दीतिमान् भवति । प्रामे सेढीनदीतटस्थ पंपरापलाशाधः स्थित श्रावकाः प्रायेण निर्धना न भवन्ति ।२। था. सर्वदुग्धकपिलाषेनुपयःसिच्यमान श्रीपार्श्व- बकस्य कुमरणं न भवति । ३ । साध्व्या खि- स 'जयतिहुअण'द्वात्रिंशतावृत्तैः प्रकटीकारको नायाति । ४ । गुरुनाना शाकिनी न प्रभवति गतष्ठो नवांगीवृत्यादि महाकुत्यकरणाः ।५। विद्युम पराभवति । ६। खरतर मा. दानीतगुर्वावलीमध्यनामा च। वको यो भूलताणे याति स पंच टंककान ६.श्रीजिनवल्लभसूरिः।चैत्यवासि सुवर्णक- लात्वा समायाति । ७। एते समवराः । र चोलकवर्षि जिनचंद्रसूरिशिष्यो दशवकालिक- योगिनीमिः सप्तवराः श्रीगुरुपात मागिता:- सूत्रवाचनाद्वैराग्यवान् स्वयं गुरुं पृष्ट्वा अभयदे- यः आचार्यों भवति स पंचनंदी साधयति । बसूरिमुपसंपनः। तदनु पिंडविशुद्धि-सार्ध- ।१ । सूरिमंत्र साधयति । २। सामान्यसा शतक-पडशोतीत्यादिप्रयकृत लेखरूपलिखित- दिसाइली जापं करोति ।३। भावा उमा ॥जरतगड पहावी-१॥ सा स्मरणगुणनं कुर्वन्ति । ४। भाविका त्रिश ११. श्रीजिनप्रबोधसरि दुर्गपदमपोषण सीप्रभृती: गुणति । ५। मासं प्रतिगृहे आचा- व्याख्याता सं० १३४१ स्वर्गः । म्लद्वयं करोति ।६। यती शक्त्या एकाशन १२. श्रीजिनचंद्रसूरिः । छाजहरया करोति।७। एते सप्त वराः योगिनीनां दत्ताः। शतवर्षायुः चतुर्नुपप्रबोधकः कलिकालकेवलीति दिल्ली १, उझेणी २, भरुअच्छि ३, अजमेरु ४,ए बिरुदः। सं १३३६ जापालपुरे स्वर्गतः। ओठपीठ । तत्र गच्छेशेन नागंतव्यमिति वक्ता -तदानीं राजगच्छ इति ख्यातिः। घसंवत् १२११ आसाढ सुदि६ तिथौ अजय १३. श्रीजिनकुशलसूरिः। छाजहरगोत्रा मेस स्वर्गगमनं । मरुदेशे समीयाणउग्रामः । मंत्रीजील्हागर जय- संवत् १२०५ रुद्रपल्ल्यां छबना सूरिपदं सीरीमाता । सं० १३३० जन्म, सं० १३४७ पहीतं जिनशेखरेण ततो रुदेलियागणो जातः। दीक्षा, सं० १३७७ पाटणनगरे पाटः। शई- ८.श्रीजिनचंद्रः। नरमणिमंडितमाल|श्रीजि- जये २२ वर्षाणि यावत् प्रतिदिनभोजित श्राद्ध नदत्तरिमः स्वहस्तेन पट्टे स्थापितः। पूर्वस्यां पंचशत भीमपल्ली जेसलमेरुकारित श्रीवारपा- दशवर्षाणि स्थित्वा मुहतीयाण भाद्ध प्रतिबो- र्श्वनाथप्रासाद सा० तेजपालपुत्र सा० धरणा, पायथगौर्जरत्रायै आगच्छत् अंतरा आयात सा. कडूआ कारित खरतर-पसहीति नाम भीमाल मदनपाल श्रीचंदादि दिल्लीसंघम- प्रसिद्ध श्रीमानतुंगप्रतिष्ठाकारकः । उच्चा:- हाग्रहेण तत्र गच्छन् प्रतोल्या रजोहरणपाताजा- ध्वनि मागितजलदाता सं० १३८९ देवराज- तच्छलस्तत्रैव सं० १२२३ स्वर्गगामी । पोडी- पुरे स्वर्गतः। माक्षेत्रपालस्तत्स्तूपे अधिष्ठाता तन्मणिश्च यो १४. श्रीजिनपथसरिः। भीतरुणप्रभैरष्टम- मिना गृहीतः । मदनपालेन गुरुमृतौ अनशनं गृ- वर्षेपि दत्तसूरिपदो वाग्मटमेरौ गरिष्ठ श्री- हीत। तुर्ये २ पट्टे श्रीजिनचंद्र सूरिनामस्थापनं। वीरचैत्यालोकजाताचर्यपृष्टविवेकसमुद्रोपाध्याय ९. श्रीजिनपत्तिसूरिः। प्राप्त १५ वर्ष पट्टो 'बूहाणंदा वसही वडी अंदरि किडं मागी' बनेकपत्तने ३६ वादजेता माहूगोत्रः । आ- इति वचनेन प्रगटितमूर्खभावः पतनसमीपव- सानगरे श्रीमालहाजीप्रतिष्ठायां योगिस्तमित- तिस्वरस्वतीनदीतीरे निशि प्रातर्मया संघ- प्रतिमायाः स्ववासक्षेपादुत्थापकः । तदीयमान- समक्षं कथं व्याख्याकर्तव्येति चिंतासमनंतर- विद्याद्वयाग्राहकः तांबूलास्वादनात् । खरतर- मेव प्रत्यक्षीभूतसरस्वतीलब्धवरः अहंतो गच्छसूत्रधारः। परीक्षभंडारीनेमिचंद्रदतांबड- भगवंत इंद्रमहिता' इति काव्यं निर्माण व्या- पुत्रः। संव० १२७७ प्रल्हादनपुरे दिवं जगाम। ख्यानमकारि। बालघवलकूर्चालसरस्वतीविरुदः १०. श्रीजिनेश्वरसूरिः । मंडारीनेमिचंद- श्रीजिनपचसरिप्रमुखसाधु १८ सर्वसंघोपि स्तं- पुजः। सर्वदेवाचार्यतः प्रामसूरिपदः। सं० मतीर्थे मांबे पतितः। तत्र चैत्ये पुरा श्राद्धी- १३३१ स्वर्ययो। भूत पुण्यवीरयक्षप्रतिमा केनचिच्छ्राद्धेन माक्तिः अान्तरे श्रीजिनप्रमगुरु-श्रीजिनसिंहस्रे- लपनश्रीलंटक मक्षणे किं सुगम, न संपचिता ? लघु खरतरगणो बढे। वेदोक्त किंचिदसाहाय्यं करोषिक्दा समीकरो- १२ - . ॥ खरतरगड पहावडी-१॥ मि, ख भीअजितकायोत्सर्ग घटी ४५ निरंतरं दुर्थासा.कोचरभावकृतप्रवेशोत्सवापत्तने डागा अस्खलितं कुरु अन्यथा आगंतुं न शक्यते। तेन आसाधीर स्तंभतीर्थे सा०कर्मसीगृहस्थितहस्ति- तथा प्रतिपने अष्टापदे गत्वा प्रासादखालके शालः । पत्तने सं०१४३२ स्वः प्राप्तः उपविश्य, तदा प्रस्तावे देवैः स्नात्रं प्रारब्धं व १८. तदानीं सतीोमानिताप्तपदो पिमं० तते केनचिन्मृन्मयं कलशं स्नात्रकरणाय गृहीतं वेगडभ्राताधर्मवल्लभसहजज्ञानगणी सा० उदय- स तस्य नालको भन्नः मुक्तश्च तेन तद्गृहीत्वा करणवचसा उत्कटतया परित्यक्तः, स्थापितश्चर पुनः खालं प्रविशता कलशमुखं भग्नं तथाविधं लोकहिताचार्यः श्रीजिनोदयैः । ततो मं. समानीय श्राद्धस्य दत्तं श्राद्धेन हसितं 'जेह- त्रादिशक्तिमान् सरस्वतीपत्तनं गत्वा रूदेली- बउ बोषउ छइ, तेहवउ बोषउ आण्यउ' तच्छ- यागणेशपार्श्वे प्राप्तमंत्रो जिनेश्वरनामा सं. टया सर्वेपि सज्जा जाता तन्मध्यैकेन गणी- १४२२ जज्ञे । यतो वेगडागच्छः । शेन श्रीजयसागरपाठकानामिदं सर्व प्रोक्तं १९. श्रीजिनराजसूरिः। मुखाधीत ३६ तच्छटागंधो वार ६७७ वस्त्रधौते पि न गतः। सहस्रन्यायग्रन्थः स्वर्णप्रभाचार्य१, भुवनरत्ना- ततः तच्चैत्यस्थपुण्यवीरयक्षक्षेत्रपालाभ्यां अन्य- चार्य २, सागरचंद्राचार्य ३ स्थापका, श्री भुज्यते चैत्यमध्ये अन्यत्री अन्यपाधै सं० १४६१ देवलवाटके स्वर्गगतः । मुच्यते स्वस्वामीग्रंया तस्य चपेटादिना मुख- -सं०१४६१देवलवाटके सा० नाल्हाकारित पक्रादिकरणं संघविज्ञतेन श्रीविनयप्रमपाठकेन नद्यां सागरचंद्राचार्य स्थापितेभ्यः कृतप्राच्यादि कालिकया चैत्ये कीलितो; पुण्यवीरमूर्तिरद्यापि देशविहारेभ्यः संघगणोन्नतिकारिभ्यो जैसलमेरो वर्तते । श्रीजिनपद्मसूरिः सं १४०० स्वः प्राप्तः उत्थापित क्षेत्रपालदर्शित तुर्यव्रतशंकया तैरेव पत्तने। पृथक्कृतेभ्यः श्रीजिनवर्धनमरिम्यः पीपलि- १५.श्रीजिनलब्धिसूरिः। नवलखाशाखाणं- यागणो जातः । गारः सैद्धान्तिकोऽवधानपूरको नागपुरे स्वर्ययौ। ततश्च वा०शीलचंद्रगणिपार्थे पाठतानेकाता १६. श्रीजिनचंद्रमूरिः । उद्यतविहारी भाणशोलियाग्रामे सा नाल्हाकारितनंद्या साग- स्तंमतीर्थे सं० १४१४ स्वर्गतः। रचंद्राचार्यैरेव स्थापिताः आबूगिरिनारजेसल- १७. श्रीजिनोदयपूरिः। माल्हूसा रूदपाल- मेर्वादिषु प्रासादोपदेशकाः भावप्रभ-कीर्ति- धारलदेपुत्रः। समरनामा। प्रल्हादनपुरतो यज्ञ- रत्नाचार्यादि स्थापकाः भांडागारादि लेखका: यात्रांकृत्वा भीमपल्लयां कील्हभगिन्या सह श्रीजिनभद्रसूरयः कुंभलमेरौ सं० १५१४ स्व: गृहीतदीक्षः। सोमप्रमनामा। तरुणप्रभाचार्यतः प्राप्ताः । प्रासादः पंचतिधिकृतोपवासः ।२८ साधुभिः २०. श्रीजिनचंद्रसूरयः। चम्मगोत्रीयाः । कृतसर्वदेशविहारः। क्रमेण शिष्यशिष्यणीसंघ- पत्तने सा. समरसिंह करितनद्यां श्रीकी- पतिबाहुल्यकृत् कृतानेकपदस्थः सलपणपुरे तिरत्नाचार्यैः स्थापिताः। अर्बुदाचले नवफण- १२ ग्रामाऽमारिघोषणाकारि। मुरत्राण सनापत पार्श्वप्रातष्ठापकाः । श्रीधर्मरत्न-श्रीगुणरत्ना- देसलहरासारंगसर्षया शर्बुजये यात्राकारी मह- चार्यादिमहाप इकर्तारः कर्मग्रन्थवेचारश्च । ५० । ..
Ban . ॥सरत पडावकी-१॥ पसर्वायुषः । स्वयंज्ञातावसाना जेसलमेरौ आचार्षीयाः । ततो बहुकालं स्वगच्छ प्रभाव्य सप्रमावस्तूपा अभुवन् सं० १५३७ । वर्ष ५७ सर्वायुषः श्रीपत्तने सं० १५८२ साव- २१. श्रीजिनसमुद्रसूरयः। परीक्षगोत्रे धाना एव स्वर्ययुः। वाग्भटमेरौ देका-देवलदेसुताः। पुंजपुरे मंडपतः २३. तत्पढे श्रीजिनमाणिक्यसूरयः। चोपं. समागतः। मउठीया श्रीमालसोनपालकारित- डागोत्रे सं. राउलरयणादे तनयाः तरेवे(?). नंद्यां श्रीजिनचंद्रसूरिस्थापिताः। साधितपंच- १५८२ स्वहस्त कमल स्थापिता मलाहीदेवरा- नदिसोमरादियक्षाः। महाचारित्रिणोऽहम्मदा- जेन कृतसविस्तरनंदीमहसः । कृतगुर्जराधने- पादे सं० १५५५ स्वर्ग ययुः। कदेशविहाराः संस्थापितानेकोपाध्यायवाचना- २२. तपढे श्रीजिनहंससूरयः। संघवी- कार्यवराः । सातिशयाः। ध्यानबलेन जेसल-. मेघराज भार्या महिगलदे नंदनाः। श्रीजेसल- मेर्वागतमुद्गलसैन्योपद्रवनिवारकाः । क्रमेण मेरौ गृहीतदीक्षाः। तदनुक्रमेण सं० १५५६ देवराजपुरस्थ श्रीजिनकुशलसूरियावां विधाय ज्येष्ठसुदि ९ रवी श्रीविक्रमपुरे मंत्रीश्वरफर्म- परावर्तमाना देवराजपुरात् पंचविंशति क्रोशे सिंहप्रेषिताः कारणवशतः श्रीराजधान्यास्तत्र- स्वयं दर्शितस्वोपद्रयाः कृत्तानशनाः तत्रैव सं० प्रभूताः पीरोजीलक्ष १ व्ययनिर्मितमहावि- १६१२ वर्षे आषाढसुदि ५ स्वर्गलोकं प्राप्ताः। स्तरनंधां श्रीशांतिसागराचार्यदत्तरिमंत्रास्तदा २४. तत्पट्टे श्रीजिनचंद्रसूरयः। रीहडगोने नीमकालजलदवर्षणसंतुष्टसर्वलोकेभ्यः प्राप्त- सा. सिरिवन्त सिरियादे सुताः। सं० १५९५ श्लाघाः। पूर्व वा. धर्मरंगाभिधाः श्री- जन्म । सं० १६०४ दीक्षा। सं० १६१२ वर्षे जिनहंससूरयस्ते चाऽन्यदा आगरातो भ्रातृ- भाद्रपद ९ दिने गुरुवारे श्रीजेसलमेरुनगरे वेगराज पोमदत्तालंकृता सं० डूंगरसीप्रहिता राउल श्रीमालदेकृत महोत्सवे भट्टारक श्री- कारणेन विहरंतःप्राप्ता आगरास्थाने।तत्रचतेन जिनचंद्रसूरिः स्थापितः । सं० १६१३ वर्षे संमुखानीताऽनेकसिंधुरसर्वसंघमालक-उंबराव. श्रीविक्रमनगर चैत्रमासे सप्तमीदिने क्रियो- वाधमाननिःस्वनाधातोद्यादिविस्तारपूर्व प्रवे. द्धारः कृतः। तेषां त्वेतेऽवदाताः श्रीफलुपा ता- शोत्सवे कृते पिशुनकृतविकृत्या पातिसाहि. ध-चैत्यतालकोद्घाटकृत, पुनः सं० १६४३वर्षे शकंदराऽऽदेशतो धवलपुरे ३६ मासान् रोधेन ताद्य-धर्मसागरकृतग्रंथच्छेदकृत, श्रीअकबर- रक्षिता अपि स्वध्यानवलेन समागतक्षेत्रपा- साहिप्रतिबोधकारी, तत् साहिवचसा युगप्रधा- लश्रीजेसलमेवीय संभवनाथाधिष्टायककृतसा- नपदधारी, सं० १६५२ वर्षे नानगानीकृत हाय्याः तेनैव स्वयं ५०० बंदिजनैः सह महोत्सवेन पंचनदीनां साधकः । सिंधु१, वयष मुक्ताः स्थापितानेकपाठकवाचनाचार्याः प्र- २, वनाह ३, रावी ४, धारउ ५, इति पंच तिष्ठात्रयकर्तारः । तदवसरे सं० १५६६ नद्यः, तथा स्तंभीर्थे वर्ष यावत् मीनरक्षाकृत ; वर्षे वेनापि हेतुनाहूतैर्गीतार्थशिरोमणिभिरपि श्रीज्येष्ठपर्वणि सर्वत्राष्ट दिनानि यावदमारि श्रीशांतिसागराचायैरेव स्थापिताः स्वशिष्याः प्रवर्तकः; श्रीशत्रुजयादि तीर्थेषु चैत्यप्रतिमा श्रीजिनदेवसूरयः । तद्गच्छः पृथग जज्ञे वडा- प्रतिशकृत् । श्रीविक्रमपुरे ऋषमविवादिप्रभूत- ॥सरतरगा पहावली-१॥ विवप्रतिष्ठाकत भीसाहिसलेमराज्ये तापकृत् श्री कोटिद्रव्यव्ययेन मैत्रिराज श्री कर्मचंद्रेण जिनशासनमालिन्यतः श्रीसाधुविहारो निषि- कृतनंदीमहोत्सवः श्रीलामपुरे। तभिर्वाणं तु बासाहिना तत्रावसरे श्रीउग्रसेनपुरे गत्वा साहिं श्रीमदतटे सं० १६७४ वर्षे पोसवदि १३दिने। प्रतिबोध्य च साधूनां विहारः स्थिरीकृतः। २६.तत्पद्वे गुरुश्रीजिनराजसरिः।सं.१६७४ तदा लब्धसवाई युगप्रधान वडागुरुरितिबिरुदो वर्षे फागुणसुदि ७ दिने संघपति श्री आसक- येन गुरुणा । एवमवदाता भूयांसः संति सुप्र- ऐन कृतनंदीमहोत्सवः । तस्मिन्नेव दिने श्री सिद्धाः तेषां निर्वाणं श्रीबीलाडापुरे सं०१६७० जिनसागरसूरीणामाचार्यपदस्थापनेति । कीयद वर्षे आसूवदि २ दिने स्तूपस्थापना। तस्य काले निर्वासिताः। श्रीमजिनराजसूरिः। वारके श्रीसागरचंद्रसूरिसंताने अनुक्रमेण भाव २७.तस्य पट्टे श्रीजिनरत्नसूरिः। श्रीजिनर- हर्षसूरयो निर्गता इति । लसूरिवारके श्रीरंगविजयो निर्वासितः । २५. तत्पढे श्रीजिनसिंहमूरिः। चोपडागोत्री २८. श्रीजिनचंद्रसूरिचिरं जीयात् ।। : . -- - .
॥ खरतरगच्छ पट्टावली॥ [२] प्रणिपत्य जगन्नाथं वर्धमानं जिनोत्तमम् । गुरूणां नामधेयानि लिख्यन्ते स्वविशुद्धये ॥ १. इह तावत् त्रिभुवनजनोपकर्ता, सकलपापसंतापहर्ता, परमशिवकरः, चरमतीर्थकरः, पञ्चमगतिगामी श्रीमहावीरस्वामी संजातः। स च इक्ष्वाकुकुलसमुद्भवः, काश्यपगोत्रीयः, क्षत्रियकुण्डग्रामनगराधीश्वरः, सिद्धार्थस्य राज्ञः त्रिशलाराश्याश्च पुत्रः, चैत्र शु० दि० त्रयोदश्यां जातजन्मा । तस्य महावीरस्य चतुर्दशसहस्रपामताः साधवः, पत्रिंशत्सहस्रपमिताः साध्व्यः, एकोनषष्टि (५९) सहस्राधिकैकलक्षप्रमाणाः श्रावकाः, अष्टादशसहस्राधिकलक्षत्रयप्रमाणा: श्राविकाच बभूवुः । तथा पुनर्नव गच्छाः, एकादश गणधराः संजाताः । स भगवान् त्रिंशद् वर्षाणि यावत् गृहवासे स्थित्वा, एकपक्षाधिकानि सार्घद्वादश (१२) वर्षाणि छद्मस्थपर्या- यम्, पक्षाधिकषण्मासन्यूनानि त्रिंशद् वर्षाणि केवलिपर्यायं च प्रपाल्य-सर्वायुर्दिसप्तति (७२) वर्षाणि पूरयित्वा चतुर्थारकस्य त्रिषु वर्षेषु सार्धाष्टमासेषु शेषेषु विद्यमानेषु पापायां नगर्या कार्तिकाऽमावास्यायां मुक्ति प्राप्तः । -तत्पढे गौतमस्वामी, स च इन्द्रभूतिनामा गौतमगोत्रीयः, वसुभूतिबामणम पृथ्व्याच ब्रामण्याः पुत्रः, पञ्चाशद् वणि गृहवासे स्थित्वा, त्रिंशद् वर्षाणि छद्मस्वप- र्यायम्, द्वादश वर्षाणि केवलिपर्यायं च प्रपाल्य-सर्वायुर्द्विनवति (९२ ) वर्षाणि प्रयित्वा वीरनिर्वाणाद् द्वादशवर्षव्यतिक्रमे मोक्ष प्राप्तः । किश, गौतमस्वामिदीक्षिताः सर्वेऽपि साधवः केवलज्ञानं संप्राप्य मुक्तिमेव गताः न पश्चादेकोऽपि स्थितः तेन अग्रे गौतमस्वामिपरंपरा न व्यूढाः, अत एवाऽयं पद्धेषु न गण्यते । तथा 'पशमारकमान्ते दुअसहसूरि पावत् सुधर्मणः परंपरा स्थास्यति' इति वीरवाक्याद् अन्यैरपि सुधर्मस्वामिवर्जितैनवगणधरैर्निजनिजशिष्यस- न्तति सुधर्मस्वामिन समर्प्य अनशनं कृत्वा मुक्तिश्रीर्वता । इह परिज्ञानोत्पत्तितचतुर्दश वर्षेः जमालिनामा प्रथमो निहनवो आता, तथा पोरन- बस्तिष्पगुमनामा द्वितीयो निहनवो जातः । २. अथ वीरस्वामिपढे सुधर्मस्वामी संजातः, कोलाकग्रामवासी, अग्निपैश्यामनगोत्रा, पम्मिलस्य पितुमहिलापाथ मातुः पुत्रः । पञ्चाशद् (५०) वर्षाणि गृहे, द्विचत्वारिंशद् (४२) वर्षाणि छमस्वभावे, अष्ट (८) वर्षाणि केवलित्वे च स्थित्वा-सर्वायुर्ववत (१००)प्रपाल्य वीरनिर्वाणाद् विंशति (२०) वर्षव्यतिक्रमे शिवप्रिय प्राप। ३. तत्पले श्रीजम्बूस्वामी, सच पत्रमस्वर्गान्युत्वा राजगृहनगर्या काश्यपगोत्रीय- नामदचनामा श्रेष्ठी, धारणी मार्या, तयोः पुत्रत्वेन उत्पनः । एकदा समये सुधर्मस्वामिपा धर्म श्रुत्वा, पैराग्य प्राप्य, स्वगृहं चागत्य रात्रौ नवपरिणीता अष्टौ कन्या। प्रतियोमपन्, पालोपाटिभीविधासपर्व औरपजावीपरिवृतं चौर्याय २ प्रषिई प्रभवनामानं राबमारे ॥ खरतरगच्छ पट्टावली-२॥ प्रतिबोधितवान् । ततः प्रभाते अष्टौ (८) कन्याः, अष्टौ (८) तासां मातरः, अष्टौ (८) च पितरः, स्वस्य मातापितरौ (२) च-एवं २६, तथा चौरपञ्चशतीसहितः प्रभवः (५०१) सर्वे (५२७), तैः सह जम्बूकुमारो दीक्षां जग्राह । तथा नवनवति (९९) कोटिस्वर्णमुद्राणाम् , अष्टकन्यानां च परित्यागी बभूव । स च षोडश (१६) वर्षाणि गृहे, विंशति (२०) वर्षाणि छद्मस्थभावे, चतुश्चत्वारिंशद् (४४) वर्षाणि केवलिपर्याये च स्थित्वा-अशीतिवर्षाणि (८०) सर्वायुः प्रपाल्य, वीराच्चतुष्पष्टि (६४) वर्षव्यतिक्रमे मोक्षं गतः, चरमकेवली जातः । तथा जम्बूस्वामिनि मुक्ति गते दशवस्तुविच्छेदो जातः । तथाहि-१. मनः पर्यायज्ञानम्, २. परमावधिज्ञानम्, ३. पुलाकलाब्धिः, ४. आहारकशरीरम्, ५. क्षपकश्रेणिः, ६. उपशमश्रेणिः, ७. जिनकाल्पमार्गः, ८. परिहारविशुद्धिः, सूक्ष्मसंपरायम्, यथाख्यातचरित्रम् , ९. केवलज्ञानम्, १०. सिद्धिगमनं चेति । ४. तत्पढे प्रभवस्वामी, स च जयपुरवासिनो विन्ध्यस्य राज्ञः पुत्रः, कात्यायनगोत्रीयः, त्रिंशद् (३०) वर्षाणि गृहे, चतुश्चत्वारिंशद् (४४) वर्षाणि सामान्यव्रते, एकादश (११) वर्षाणि आचार्यादे स्थित्वा-सर्वायुः पश्चाशीति (८५) वर्षाणि प्रपाल्य वीरात् पञ्चसप्तति (७५) वर्षव्यतिक्रमे स्वर्ग जगाम । ५.तत्पडे शय्यंभवसूरिः,सच राजगृहवास्तव्यो वात्स्यगोत्रीयः, एकदा यज्ञं कुर्वन् श्रीप्रभव- स्वामिप्रेषितसाधुद्वयमुखाद् 'अहो ! कष्टं २, तत्त्वं न ज्ञायते परम्' इति वचनं श्रुत्वा संजातसंशयः स्वगुरु प्रति खड्गमुत्पाट्य तत्त्वं पप्रच्छ । तदानीं तेन गुरुणा प्रोक्तम् 'यज्ञस्तम्भस्य अधो वर्तमान शान्तिनाथविम्बमस्ति, इति तत्त्वम् ' ततस्तदर्शनाद् जैनधर्मे संजातरुचिः शय्यंभवभट्टः संगर्मा स्त्रियं मुक्त्वा प्रभवस्वाभिपार्श्वे व्रतं जग्राह । क्रमेण 'योग्योऽयम्' इति ज्ञात्वा गुरुभिराचार्यपदे स्थापितः । अथ प्रश्चात् संजातजन्मनः, कदाचित् स्वपार्श्वे समागतस्य मनकनानो निजपुत्र स्व. षण्मासावधि आयुर्ज्ञात्वा तमिमित्तं सिद्धान्तादुद्धृत्य दशवैकालिकशास्त्रं कृतवान्, ततः संघान: आगामिकालभाविप्राणिनामनुकम्पया च सूरिभिः स ग्रन्थो न पश्चात् प्रक्षिप्तः। तथा शि: स्यभवसूरिरष्टाविंशति वर्षाणि गृहे, एकादश (११) वर्षाणि सामान्यव्रते, त्रयोविंशति (२३) वर्षाणि सूरिपदे स्थित्वा-सर्वायुर्द्विषष्टि (६२) वर्षाणि प्रपाल्य वीराद् अष्टानवति (९८) व.. स्वर्गमाग जातः। ६. तत्पढे श्रीयशोभद्रसूरिः, स च तुङ्गीयायनगोत्रीयो द्वाविंशति (२२) वर्षाणि गृहे, चतुः-- देश (१४) वर्षाणि सामान्य व्रते, पञ्चाशद् (५०) वर्षाणि आचार्यपदे-सर्वायुः षडशीति (८६) पाणि प्रपाल्य वीराद् अष्टचत्वारिंशदधिकशत (१४८) वर्षव्यतिक्रमे स्वर्गभार । ७. तत्पडे सप्तम श्रीसंभूतिविजया, सच माठरगोत्रीयो द्विचत्वारिंशद् (४२) वर्षाणि गृहे, चत्वारिंशद् (४०) वर्षाणि सामान्यव्रते, अष्टौ (८) वर्षाणि युगप्रधानत्वे स्थित्वा सर्वापुर्नवति (९०) वर्षाणि प्रपाल वीरान पदपञ्चाशदधिकशत (१५६) वर्षातिक्रमे दिवंगतः। ८. तत्पड़े द्वितीयो लघुगुरुमाता भद्रबाहुस्वामी तुप्राचीनगोत्रीयः, प्रतिष्ठानपुरवासी, था म WA ॥ खरतरगच्छ पट्टावली-२॥ व्यन्तरीभूताऽविनीतनिज-बन्धुवराहमिहिरकृतसंघोपद्रवनिवारणार्थमुपसर्गहरस्तोत्रकरणेन प्रवच- नस्य महोपकारकृत्, तथा पुनश्चतुर्दशपूर्ववित, कल्पसूत्र-आवश्यकनियुक्त्यादिप्रभूतग्रन्थकार- संजातः। स च पञ्चचत्वारिंशद् (४५)वर्षाणि गृहे, सप्तदश (१७) वर्षाणि सामान्यते, चतुर्दश १४ वर्षाणि युगप्रधानत्वे स्थित्वा-सर्वायुः षट्सप्तति (७६) वर्षाणि प्रपाल्य वीरात् सप्तत्य- धिकैकशत (१७०) वर्षव्यतिक्रमे स्वर्गभाक् । ९. तत्पट्टे नवमः स्थूलभद्रस्वामी, स च पाटलिपुत्रनगरे नवमनन्दभूपस्य मन्त्री शकडाला, भार्या लाछलदेवी, तयोः पुत्रः, गौतमगोत्रीयः, कोश्याप्रतिबोधकः, सर्वजनप्रसिद्धः, चतुर्दश- पूर्वविदां चरमः, तत्र दश पूर्वाणि वस्तुद्वयेन न्यूनानि सूत्रतोऽर्थतश्च पपाठ, अन्त्यानि चत्वारि पूर्वाणि तु सूत्रतएव अधीतवान् नाऽथतः, इति वृद्धवादः। स त्रिंशद (३०)वर्षाणि गृहे, विंशति (२०) वर्षाणि सामान्यव्रते, एकोनपश्चाशद् (४९) वर्षाणि सूरिपदे स्थित्वा-नवनवति (९९) वर्षाणि सर्वायुः प्रपाल्य वीराद् एकोनविंशत्यधिकद्विशतवः (२१९) स्वर्ग प्राप्तः । -अत्रान्तरे वीरनिर्वाणात् चतुर्दशाधिकद्विशत (२१४) वर्षेः आषाढाचार्याद् अव्यक्तनामा हतीयो निड्नवो जातः । तथा विंशत्यधिकद्विशत (२२०) वरश्चभित्रात् सामुच्छेदिकनामा चतुर्थों निह्नवः। तथा पुनरष्टाविंशतिअधिकद्विशत (२२८) वः गङ्गनामा एकस्मिन् समयेऽनेकक्रियोपयोगवादी पञ्चमो निह्नवोऽभूत् । १०. तत्पढे दशम आर्यमहागिरिः, एलापत्यगोत्रीयो जिनकल्पिकतूलनामारूढः, पुनस्त्रिंशद् (३०) वर्षाणि गृहे, चत्वारिंशद् (४०) वर्षाणि सामान्यव्रते, त्रिंशद् (३०) वर्षाणि सरिपदे- सर्वायुर्वर्षशतं (१००) प्रपाल्य स्वर्गभाक् । ११. तत्पवे आर्य हस्तिसूरिः। वासिष्ठगोत्रीयः। तेन किल पूर्वमवे द्रमकीभूतः संप्रतिजीव: प्रचाज्य त्रिखण्डाधिपतित्वं प्रापिता, बेन संप्रतिना श्रीवीराव पञ्चत्रिंशदधिकद्विशतवर्षे राजपद प्राप्य सपादलक्षप्रतिमा-नवीनजिनप्रासादाः कारिताः, सपादकोटिबिम्बानि कारयित्वा प्रतिष्ठा- पितानि, त्रयोदशसहस्रपमितजीर्णोद्धाराः कारिताः, पञ्चनवतिसहस्रप्रमाणाः पित्तलकाः प्रतिमा कारिताः, सप्तशतानि सत्रागारा मण्डिताः, द्विसहस्रप्रमिता धर्मशालाः कारिताः, पुनर्यः प्रति- दिन नवीनोत्पादितैकचैत्यवर्धापनिका श्रुत्वा दन्तधावनं कृतवान् । किंबहुनोक्तेन, यत्रिखण्डा- मपि मेदिनीं जिनगृहप्रतिमादिभिर्मण्डितामकरोत् । तथा साधुवेषधारिनिजकिंकरजनप्रेषणेन अनार्यदेशेऽपि साधुविहारं कारितवान् । श्रीश्रेणिकस्य राज्ञः सप्तदशे पट्टे संजातः । तथा श्रीगु- स्वमिरन्येऽपि अवन्तीसुकुमालाद्या बहवो भव्याः प्रतिषिताः। ते च गुरवः त्रिंशद् (३०) वर्षाणि गृहे, चतुर्विशति (२४) सामान्यत्रते, षट्चत्वारिंशत् (४६) वर्षाणि सूरिपदे-सर्वायुरेक वर्षशत (१००) प्रपाल्य श्रीवीरान पश्चाष्टयधिकवर्षशतद्वये (२६५) व्यतिक्रान्ते स्वर्गमाजो जाता। १२. श्रीबार्यसुहस्तिपढे श्रीसुस्थितसूरिः, स च कोटिशः सूरिमन्त्रजापात् 'कोटिका,' पुनः माकन्यां नगर्या जातत्वात् ' काकन्दिकः' इति विरुदप्रायं विशेषणद्वयम् । तथा व्याधापत्य- गोत्रीमा, सच एकत्रिंशद् (३१) वणि रहे, समदश (१७)वषि सामान्याते, अपत्यारिखदे . .
|| खरतरगच्छ पट्टावली-२॥ (४८) वर्षागि सूरिपदे-सर्वायुःषण्णवति (९६) वर्षाणि प्रपाल्य वीरात् त्रयोदशाधिकवर्षशतत्रये (३१३) व्यतीते स्वर्गभाग जातः । तत एव अस्माकं संप्रदायः 'कोटिकगच्छ.' इति प्रसिद्धः। १३. सुस्थितसूरिपढे इन्द्रदिनसूरिः १४. तत्पट्टे श्रीदिबसूरिः। १५. तत्पढे श्रीसिंहगिरिर्जातिस्मरणज्ञानवान् । -अत्रान्तरे पादलिप्ताचार्यो वृद्धवादिसूरिश्च बभुवतुः, तथा सिद्धसेनदिवाकरोऽप्यासीव, येन उजयिन्यां महाकालप्रासादे रुद्रलिङ्गं स्फोटयित्वा कल्याणमन्दिरस्तवेन पार्श्वनाथविम्ब प्रकटीकृतम् । विक्रमादित्यश्च प्रतिबोधितः । विक्रमराज्यं तु श्रीवीरात् सप्तत्यधिकवर्षशतचतुष्टये (४७०) व्यतीते संजातम् । विक्रमादित्यराजा वीरान (४७०) वर्षे जातः । १६.तत्पदे श्रीवज्रस्वामी,यो बाल्यादपि जातिस्मरणमाक्,गौतमगोत्रीयः,तुम्बवनग्रामवासी धनगिरि-सुनन्दयोः पुत्रः, श्रीसिंहगिरिसूरीणां हस्ताद् दीक्षां गृहीत्वा, तत्पार्धे एकादशाङ्गानि अधीत्य, द्वादशस्य दृष्टिवादाङ्गस्य अध्ययनाय दशपुरान उजयिन्यां श्रीभद्रगुप्ताचार्यसमीपं ययौ। तत्र गुरुभिर्दश पूर्वाणि पाठितानि । पुनर्य आकाशगामिविद्यया संघरक्षाकृत, दक्षिणस्यां दिशि बौद्धराज्ये जिनेन्द्रपूजानिमित्तं पुष्पाद्यानयनेन प्रवचनप्रभावनाकृत, देवाऽभिवन्दितः, दशपूर्ववि- दामपत्रिमः, तथा षण्णवत्यधिकचतुश्शत (४९६) वर्षान्ते जातः, अष्टौ वर्षाणि गृहे, चतुश्चत्वा- रिंशद् (४४)वर्षाणि सामान्यव्रते, षट्त्रिंशद् (३६)वर्षाणि सूरिपदे-सर्वायुरष्टाशीति (८८) वर्षाणि प्रपाल्य श्रीवीरात् चतुरशीतिअधिकपञ्चशत (५८४)वर्षान्ते स्वर्गभाक् । इतो पजशाखा संजाता। तथा वज्रस्वामितो दशएर्व-चतुर्थसंहननादिव्युच्छेदः । -अत्र श्रीवीराद (५४४) वर्षे रोहगुप्ताद त्रैराशिकः षष्ठो निनवो जातः । -तथा वीरात् सपादपञ्चशतवर्षातिक्रमे (५२५) शत्रुञ्जयोच्छेदो जाता, ततः ससत्य- विकपञ्चशत (५७०) वर्जावडोद्धारोऽभूत् । १७. तत्पद्वे श्रीवज्रसेनाचार्यः,स च उत्कोशिकगोत्रीयः। एकदा द्वादशदुर्मिक्षान्ते श्रीवज- स्वामिवचनात् सोपारके गत्वा जिनदत्तश्रेष्ठी, तद्भार्या ईश्वरीनाम्नी, तया लक्षमूल्येन धान्यमानीय पाकार्थमग्नौ स्थापितायां हण्डिकायां विषनिक्षेपं क्रियमाणं दृष्ट्वा, 'प्रातः सुकालो भावी' इत्य- क्त्या विषनिक्षेपं निवार्य नागेन्द्र-चन्द्र-निवृति-विद्याधर-नामकांश्चतुरः सकुटुम्बानिम्यपुत्रान् प्रवाजितवान् । तेभ्यश्च स्वस्वनामाङ्कितानि चत्वारि कुलानि जातानि। स श्रीवजसेनसूरिः प्रान्ते चन्द्रमुनि स्वपदे निश्यि, अनशनं च विधाय स्वर्गभाक् । १८.तत्पद्वे श्रीचन्द्रसूरिः स च सप्तत्रिंश (३७)वर्षाणि गृहे,त्रयोविंशति(२३)वर्षाणिसामन्य- वते, सत (७)वर्षाणि सूरिषदे-सर्वायुःसप्तवष्टिवर्षाणि(६७)प्रपाल्य स्वर्गमात् । इतथान्द्रकुलामिति प्रसिद्धम्, अत एवाऽस्माकं गच्छेऽधुनाऽपि बृहहीक्षावसरे "अम्हाणं कोडिओगणो, क्यरी साहा, चई कुलं, अमुगगणनायगा, अमुगमहोज्झाया संति, महत्तरा नत्वि' इति पाठ नवीनविन प्रति आचार्यवार्थस्थिता द्धा श्रावन्ति' इति संप्रदाया। .
. । खरतरगच्छ पहावी-१ ।। -अत्राऽवसरे श्रीआर्यरक्षितसूरिर्महाप्रभावकः संजातः, स च दशपुरनगरे सोमदेवः पुरो- हिवा, रुद्रसोमा भार्या, तयोः पुत्रः साधिकनवपूर्वाणि वज्रस्वामितोऽधीत्य निजकुटुम्ब समप्रमपि प्रवियोध्य जिनशासनप्रभाषनाकुजातः । तच्छिष्यः श्रीदुर्बलिकापुष्यमित्रसूरिर्वभूव । अत्रान्तरे पीरात (५८४) वर्षे गोष्ठामाहिलः सप्तमो निनवो जातः । तथा (६०९) वर्षदिगम्बरोन्पत्तिः । १९. ततः श्रीसमन्तभद्रसूरिर्षनवासी। २०. ततः श्रीदेवसूरिर्वद्धः। २१. ततः श्रीप्रद्योतनसूरिः। २२. ततः श्रीमानदेवसूरिः शान्तिस्तवकर्ता । २३. ततः श्रीमानतुङ्गसूरिभक्तामर-भयहरणस्तोत्रयोः कर्ता ।२४. ततः श्रीवारसूरिजर्जात: ---अत्रान्तरे श्रीदेवर्द्धिगणिक्षमाश्रमणो महाप्रभावको जातः, स च वीरात् अशीत्यधिक- नवशतवः (९८०) वल्लभीनगर्या समस्तसाधुमीलनेन सर्वसिद्धान्तलेखकारी । देवर्द्धि याषद् एक पूर्व स्थितमिति वृद्धसंप्रदायः । -पुनस्तदैव श्रीकालिकाचार्यो जातः, स च वीरवाक्याद् भाद्रपदशुक्लपञ्चमीतवतुर्या श्रीपर्युषणापर्व आनीतवान्, ततएवाऽद्यापि चतुरशीतिगच्छेषु चतुर्थ्या सांवत्सरिकप्रतिक्रमण क्रियते । अयं च वीरात् त्रिनवत्यधिकनवशतवः (९९३), तथा विक्रमसंवत्सराद अयोर्वि- अत्यधिकपश्चशतवः (५२३) संजातः। -पुनः कालिकाचार्यद्वयं प्राग् जातम् , तत्राऽऽधः प्रज्ञापनाकृद् इन्द्रस्याग्रे निगोदविचा- रवक्ता श्यामाचार्यापरनामा, स तु वीरात (३७६) वर्जातः। द्वितीयो गर्दमिल्लोच्छेदकः, स तु वीराद (४५३) वर्जातः। -पुनस्तदैव श्रीजिनभद्रगणिक्षमाश्रमणो जातः, स च विशेषावश्यकादिभाष्यकर्ता । साच्छिष्यः शीलानाचार्यः प्रथम-द्वितीयावृत्तिकृत् । तदैव पुनः श्रीहरिभद्रसूरिर्वभूव, स च जात्या ब्राह्मणः, सर्वशास्त्रपारगः सन् प्रतिज्ञा चक्रे ' यदुक्तस्यार्थमहं न वेबि तच्छिष्यो भवामि' इति । तत एकदा सावीमुखाद् एका गाथां श्रुत्वा तदर्थमनवबुध्यमानः प्रतिज्ञावशाद साध्वीदर्शितगुरु- समीपे व्रत जग्राह । जैनशास्त्राण्यापि सर्वाणि अधीत्य आचार्यत्वं प्राप्तः। तस्य हंस-परमहं- सनामानौ द्वौ शिष्यो परशासनरहस्यग्रहणार्थ बौद्धाचार्यसमीपं गतो, तत्राऽध्ययनं कृत्वा, स्वपुस्तकं गृहीत्वा स्थानं प्रत्यगच्छन्तौ तौ जैनौ' इति ज्ञात्वा पश्चादागतैबौद्धारिती । बयैतत् स्वरूपं विज्ञाय कोपाक्रान्तेन गुरुणा तप्ततैलपूरितं कटाई स्थापयित्वा मन्त्रबलाचतुइ- स्वारिंशदधिकचतुर्दशशत (१४४४) बौद्धा आकर्षिताः, तदानीं याकिनीमहत्तरावचनैःको- पादुपशान्तेन गुरुणा बौद्धा मुक्ताः। ततः पापशुद्धयर्थमाकर्षितबौद्धप्रमाणानि (१४४४) पूजाप- प्रभावकादिप्रकरणानि कृतानि । एवंविधाः श्रीहरिभद्रसूरयो जाताः। २५. ततः (श्रीवीरसरिपट्टे) श्रीजयदेवसूरिः । २६. ततः श्रीदेवानन्दसूरिः। २७. ततः श्रीविक्रमसूरिः। २८. ततः श्रीनरसिंहमूरिः। २९. ततः श्रीसमुद्रसूरिः। ३०. ततः श्रीमानदेवसरिः। ३१. ततः श्रीविबुधप्रभसूरिः। ३२, ततः श्रीजयानन्दसूरिः।
२. || सरसरण पावली-२॥ २३. ततः भारविप्रभसूरिः। ३४. ततः श्रीयशोभद्रसूरिः । ३५. ततः श्रीविमलचन्द्रसूरिः। ३६. तत्पढे श्रीदेवसूरिः। -तस्य च सुविहितमार्गाचरणात् 'सुविहितपक्षगच्छ' इति प्रसिद्धिर्जाता। ३७. तत्पड्ढे नेमिचन्द्रसूरिः। ३८. तत्पट्टे उद्योतनसूरिः। -अस्माचतुरशीतिगच्छस्थापना जाता। तत्स्वरूपं यथा-एकदा श्रीउद्घोतनसूरि महा विद्वांसं शुद्धक्रियापात्रं च विज्ञाय अपरेषांच्यशीति (८३) संख्यानां स्थविराणां श्यशीतिशिया: पठनार्थ समागताः, तान् श्रीगुरुः सद्रीत्या पाठयति स्म। तस्मिन्नवसरे अम्भोहरदेशे स्थविरम- ण्डल्या वृद्धस्य जिनचन्द्राचार्यस्य चैत्यवासिनः शिष्यो वर्धमाननामा सिद्धान्तमवेगाहमानबत- रशीत्या (८४) ऽऽशातनाधिकारे आगते सति गुरुं प्रत्येवमुक्तवान्-'भोः! स्वामिन् ! चैत्वे निवसतामस्माकमाशातना न टलति, ततोऽयं व्यवहारो मे न रोचते' इत्युक्तं श्रुत्वा गुरुणा यथा यथा विप्रतारितोऽपि अयं स्वश्रद्धातो न परिभ्रष्टः । ततः श्रीउद्योतनसूरि शुद्धक्रियावन्त श्रुत्वा तत्पार्थे समागत्य तस्यैव शिष्यो जातः, तदुपसंपदं च गृहीतवान् । ततः श्रीगुरुभियों- गादिकं वाहयित्वा सर्वे सिद्धान्ताः पाठिताः, क्रमेण योग्यं ज्ञात्वाऽऽचार्यपदं दत्वा, गच्छादयादिलाभं विज्ञाय उत्तराखण्डे विहारार्थमाज्ञा दत्ता। ततो वर्धमानाचार्योऽपि गुर्षादेश स्वीकृत्य तत्र गतः। अथ श्रीउद्योतनसूरिस्त्यशीति (८३) शिष्यपरिवृतो मालवकदेशात् संघेन साधं शत्रुजये गत्वा ऋषमेश्वरमभिवन्ध पश्चाद् वलमानो रात्री सिद्धवर- स्याधोभागे स्थितः, तत्र मध्यरात्रिसमये आकाशे शकटमध्ये बृहस्पतिप्रवेशं विलोक्य एवमुक्त- वान्-'साम्प्रतमीदृशी वेला वर्तते, यतो यस्य मस्तके हस्तः क्रियते स प्रसिद्धिमान् भवति । अथैतत् श्रुत्वा व्यशीत्यापि शिष्यैरुक्तम्-' स्वामिन् ! वयं भवतां शिष्याः स्मः, यूयमस्माकं विद्यागुरवः, ततोऽस्मदुपरि कृपां विधाय हस्तः क्रियताम् ' । ततो गुरुभिरुक्तम्-' वासर्प मानीयताम् ' । तदा तैः शिष्यैः काष्ठच्छगणादिचूर्ण कृत्वा गुरुभ्य आनीय दत्तम्, गुरुभिरषि तन्चूर्ण मन्त्रयित्वा त्र्यशीतेः शिष्याणां मस्तके निक्षिप्तम्, ततः प्रमाते श्रीगुरुभिः स्वस्त अल्पायुर्ज्ञात्वा तत्रैव अनशनं कृत्वा स्वर्गतिः प्राप्ता। अथ ते अशीतिरपि शिष्याः आचार्यपद प्राप्य पृथग् विहारं चक्रु । अथैकः स्वशिष्यो वर्षमानसूरिः, अशीतिब इमेऽन्यदीयाः शिष्या -एवं चतुरशीतिगच्छाः संजाताः। ३९. उद्योतनसूरिपट्टे श्रीवर्धमानसूरिः,सच षण्मासान् यावद् आचाम्लतपः कृत्वा,धरणे- समाराध्य, श्रीसीमन्धरस्वामिपार्श्वे तं प्रेष्य सूरिमन्त्रं शुद्धं कारितवान् । तथा पुनरेकदा विहार कुर्वन् सरसाख्ये पत्तने समाययौ । तस्मिन्नवसरे सोमबामणस्य द्वौ पुत्रौ शिवेश्वर-बुद्धिसागर- नामानौ, एका च कल्याणवतीनाम्नी पुत्री, एवं त्रयोऽप्येते सोमेश्वरमहादेवस्य यात्रा गच्छन्त: सरसामिधाने पचने समाजग्मुः, तत्र सरस्वत्यां नयां स्नात्वा रात्रौ तत्रैव सुप्ताः, ततोऽर्धरा- त्रिवेलायां सोमेश्वरदेवः प्रादुर्भूय तेम्य इत्युवाच-'भोः! प्रसवोऽहम् , मार्गपत मनोवाञ्छितं वरम्; ततस्तैइँकुण्ठे याचिते स पाह-'मो! ममापि वैकुष्ठं नास्ति, ततो मवद्यः कुतो ददामि, ॥सरतरगच्छ पट्टापली-५॥ पर यदि भवतां वैकुण्ठेच्छास्ति, तर्हि श्रीवर्धमानसूरेश्वरणसेवा कार्या, स एव एको छदावा- स्ति' इत्युक्त्वा देवोऽदृश्यो बभूव । ततः प्रातःकाले ते त्रयोऽपि जना नद्यां स्नात्वा उपाश्रय- मागत्य च गुरुभ्यो वैकुण्ठममार्गयन् । ततो गुरुभिरपि एकस्य भ्रातुर्मस्तकशिखायां स्थिता मत्सी दर्शयित्वा, दयामयं श्रीजिनधर्म घोतयित्वा सर्वसिद्वान्तपारगाः कृताः। शिवेश्वरस्य जिनेश्वर इति नाम कृतम् । एकदा जिनेश्वरेण उक्तम्-'स्वामिन् ! यदि गुर्जरदेशे गम्बते तदा भूयसी धर्मोपतिः स्यात् । ततो गुरुभिरुक्तम्-'तत्र हीनाचारिणामसंयमिनी चैत्व- वासिना बहुः प्रचारोऽस्ति, ते उपद्रवं कुर्युः, ततस्तत्र न गम्यते ।' तदा पुनर्जिनेश्वरेष उक्तम्-- स्वामिन् ! यूकाभयात् किं वस्त्रं परित्यज्यते, ततो मह्यम्, बुद्धिसागराय च कत्र गमनार्थमाज्ञा दीयताम् ।' अथ गुरुमिरपि एतत् श्रुत्वा जिनेश्वर-बुद्धिसागराभ्यामाचार्यपदं दखा गुर्जरदेशं प्रति विहाराज्ञा दत्ता । तावपि गुझिया तं देशं प्रति विहारं चक्रतुः । तथा गुरुमिः कल्याणवती साध्वी महत्तरा कृता । तथा पुनः श्रीवर्षमानसूरिमिस्रयोदशसुरत्राणच्छ- मोहालक-चन्द्रावतीनगरीस्थापक-पोरवाडज्ञातीय-श्रीविमलमन्त्रिणं प्रतिबोध्य श्रीअर्बुदाले छिमजेनतीर्थस्य पुनः प्रवृत्त्यर्थमुपदेशो दत्तः परं तत्रत्याशणैरुक्तम्- इदमस्माकं तीर्थ- मास्ति, अत्र जिनप्रासादो न भवति' इति । ततो गुरुभिः पुष्पमाला मन्त्रयित्वा, विमलमन्त्रिणे दत्वा च प्रोक्तम्-'भो ! मन्त्रिन् ! ब्रामणकन्याहस्ते इमां माला प्रदाय ब्राह्मणानामो इति पक्तव्यम्-'अस्मिन् पर्वते य भूमौ एषा माला पतति, तत्र अस्माकं तीर्थमस्ति ।' अयं मन्त्रिणा यया गुरुमिरुक्तं तथैव कृतम् । ततश्च यंत्र माला पतिता सत्र कलश-पलादिपूजोपकरणसहितं प्रतिमात्रर्य प्रादुर्भुतम्-तत्रैका वज्रमयी श्रीआदिनाथप्रतिमा, द्वितीया अम्बिकामूर्तिः, तृतीया वालीनाथक्षेत्रपालमूर्तिः इति । अथैवं कृतेऽपि नाम: पुनरुक्तम्-'भवतां देवोऽस्ति,परं देवगृहं नास्ति, ततो देवस्यैव पूजा कार्या, देवगृहं तु न कारविं- व्यम्'-इति । तदा विमलमन्त्रिणा द्रव्यबलेन विप्रा वशीकृताः, स्वर्णमुद्रास्तरणं विधाय भूमि गृहीत्वा तत्र ऋषमदेवप्रासादः कारितः । अष्टादशकोटि-त्रिपञ्चाशल्लक्षप्रमितं द्रव्यं व्ययीकृतम् । पत्र अद्यापि 'विमलवसही' इति प्रसिद्धिरस्ति । ततः श्रीवर्धमानसूरिः सं० १०८८ प्रतिष्ठा कृत्वा प्रान्तेनशनं गृहीत्वा स्वर्ग गतः।। ४०. तत्पट्टे श्रीजिनेश्वरसूरिः, स च बुद्धिसागरण साध मरुदेशाद् विहारं कृत्वा अनुक्रमेण गुर्जरदेशे अणहिल्लपुरपत्तने समागतः । तत्र दुर्लभराजस्थ पुरोहितः शिवशर्मानामा बामणः समातुलोऽस्ति, तद्गृहं प्राप्तः । अथ स विप्रो बहछात्रान् तर्क-व्याकरणादि शास्त्राणि पाठयन् एकस्य वेदपदस्य अशुद्धमर्थमुवाच । तदा श्रीजिनेश्वरसूरिमिः प्रोक्तम् 'अस्य पदस्य अयमों न भवति, भवद्भिः कथमित्थं पाठयते ?'। तदा विप्रेण उक्तम्-'भवतां वेदार्थपरिज्ञानं कुतः ? चेद् भवेत् तर्हि भवादिरेव अस्य अर्थो वाच्य' इति । अथैतद् वचः श्रुत्वा गुरुभिर्ये केपि पुरो. हितस्य संदेहा अभवन् ते सर्वेऽपि निरस्ताः। ततः पुरोहितेन पृष्टम्- 'को भवतां निवासः ? कम भवतः पिता ?' इति । तदा गुरुमिराणसी नगरी, सोमदत्तबामणव प्रोक्तम् । तदा १५ ॥सरतरगड पाली-२॥ वेन भातम् एतौ मम मागिनेयो, ततथ बहुमानपुरस्सर स्वगृहे राक्षतौ । अथैषा वार्ता चैत्यपा- सिमित भुता, चिन्तितं च स्वचित्ते यतो जिनेश्वरसूरिरत्राऽऽगतोऽस्ति, स तु संवेगरङ्गकि- मप्रगानः परमशुद्धक्रियापात्रमस्ति, वयं तु शिथिला हीनाचारिणः स्मः, ततोऽयं केनाऽपि प्रकारणे नगराद् निष्कासनीयः, अन्यथाऽस्माकं निन्दा भाविष्यति, इत्येवं विचिन्त्य किया- अत्यवासिमिः संभूय दुर्लभनृपाय प्रोक्तम्-'महाराज ! अस्मिन् पुरे दिल्लीतो ग्रन्थिच्छोटका: समागताः सन्ति, ते च भवत्पुरोहितस्य गृहे तिष्ठन्ति' । अथ राज्ञा एतद् वाक्यं श्रुत्वा पुरोहित- माहूय पृष्टम्-'भवद्गृहे चौरा आगताः श्रूयन्ते । तेनोक्तम्-'राजन् ! मद्गृहे तु शुद्धाचारवन्ता, सन्मागर्सचारिणो मुनीश्वराः सन्ति, न चौराः। किंतु ये केऽपि तेषु चौरव्यपदेशं कुर्वन्ति । एष चौराः । तदा राज्ञा आचारदर्शनार्थ जिनेश्वरसूरय आहूताः, आगता गुरवो राजसमायाम, आस्तृत वसं दूरीकृत्य, रजोहरणेन भूमिं प्रमाद्य, ईर्यापथिकी प्रतिक्रम्य, स्वकम्बलमास्ती स्थिताः। अथैतत् सद्गुर्वालोकनाद् आनन्दितेन राज्ञा उक्तम्-' सन्मार्गधारका एवंविधा भवन्ति' । तथा पुनर्भूपेन एतेभ्यो विरुद्धं चैत्यवासिनामाचारं दृष्ट्वा गुरुभ्यो मुनीनामाचार पृष्टः । तदा जिनेश्वरसूरिभिः प्रोक्तम्-' अस्माभिर्मुखात् किं कथ्यते, भवतां देवाधिक्षित सरस्वतीमाण्डागारमस्ति, तत्र सर्वमतस्वरूपनिवेदकानि पुस्तकानि सन्ति, ततो निर्म- लजलेन कुवस्नानां कुमारी कन्यकां संप्रेष्य भाण्डागारात् पुस्तकमानायितव्यम् । तदा सहा तथैव कते सति दशवैकालिकपुस्तकं कन्याया हस्ते आगतम्, तच्च राजसमायामानीतम्, स्तो गुरुमिः प्रोक्तम्-' इदं पुस्तकमेतेषां चैत्यवासिनामेव हस्ते देयम्, एते एव वाचयन्तु' ततो। वार यदिस्तैः साध्वाचारपत्राणि मुक्तानि, तदानीं गुरुभिरुक्तम्- 'राजसभायां दिवसे चौर्य जायते। राशा पृष्टम्-'तत् कथम् ?' तदा तैरुक्तम्-'एभिः पत्राणि मुक्तानि !' राज्ञोक्तम्-'तर्हि यूयमेव वार यत'। गुरुभिरुक्तम्-'नाज अस्माकं कार्यम् , पक्षपातरहितैामणैर्वाचनीयम् । ततो बामणे पुस्तके दचे सति तैयथार्थ वाचितम् । तदा शास्त्राविरुद्धाचारदर्शनेन जिनेश्वरसूरिमादिया 'अतिखराः' इति राज्ञा प्रोक्तम् । ततः 'खरतर' विरुदं लब्धम् । तथा चैत्यवासिनो हि पराबा प्रापणात् 'कुंवला।' इति नामधेयं प्राप्ताः। एवं सुविहितपक्षधारकाः जिनेश्वरसूरयो विक्रमतः१०८ वः 'खरतर' विरुदधारका जाताः । तथा पुनरेकदा मरूदेवीनाम्नी साध्वी चत्वारिंशद् दिनार पावदनशनं कृतवती, प्रान्ते निर्जरां कारयद्भिर्जिनेश्वरसूरिभिरुक्तम्-'स्वकीयमुत्पत्तिस्थानं ज्ञाप- नीयम्' ततः सा गुरुवचः स्वीकृत्य, कालं कृत्वा देवपदं प्राप्ता । अथैकदास देवः सीमन्धरस्था मिवन्दनार्थ गच्छन् ब्रह्मशान्तियक्षं प्रत्युवाच-'भवता जिनेश्वरसूरीणां पार्थे गत्वा 'मसट सट इत्येतानि पञ्चाक्षराणिकयनीयानि, एषामर्थ स्वयमेव गुरवो ज्ञास्यन्ति'--इति। तदा यक्षेणाऽऽ वान्यवराणि कथितानि, ततो गुरुभिस्तेषामर्थो निगदितः । तद्यथा- मरूदेवी नाम अजा गणिनी जा आसि तुझ गच्छम्मि । सग्गम्मि गया पढमे देवो जाओ महट्टीजो॥
॥ खरतरगच्छ पट्टावली-२॥ टक्कलयम्मि विमाणे दो सागरआउसो समुप्पण्णो । समणेसस्स जिणेसरसूरिस्स इमं कहिज्जासु ॥ टक्कउरे जिणवन्दणनिमित्तामिहागएण देवेण । चरणाम्म उजमो भो कायव्वो किं च सेसेहि। एवंविधाः श्रीजिनेश्वरसूरयः प्रान्तेऽनशनं कृत्वा स्वर्ग गताः। ४१.तत्पढे एकचत्वारिंशत्तमः श्रीजिनचन्द्रसूरिः, स च संवेगरङ्गशालाप्रकरणकर्ता तथा पुनरेकदा दिल्लीनगरे समागतः, तत्र 'त्वं दिल्लीपतिर्भविष्यसि' इति प्रागुक्त-गुरुवचनस्मरणात् संप्राप्तविवेकेन मौजदीनसुरत्राणेन प्रवेशोत्सवः कृतः, तथा धनपालश्रीमालगृहे निवासः कारितः। तदानीं धनपालः श्रावको बभूव, तत्सम्बधिनोऽन्येऽपि बहवः श्रीमालगोत्रीयाः श्राद्धाः,प्रतियो- धिताः,केचिदन्यज्ञातीयराज्याधिकारिणोऽपि श्राद्धाः जाताः,तेभ्यः पातिसाहिना बहु महत्त्वं दत्तम्, ततस्तेषां 'महतीयाण' इति गोत्रस्थापना कृता। तद्गोत्रीयाः श्रावकाः 'जिनं नमामि, वा जिन- चन्द्रगुरुं नमामि, नान्यम्' इति प्रतिज्ञावन्तो बभूवुः । एवंविधाः श्रीजिनचन्द्ररयो महाप्रमवका जाताः। तदैव च पद्मावत्या प्रत्यक्षीभूय प्रोक्तम्-'चतुर्थपट्टे सातिशयं 'जिनचन्द्र' इति नाम दातव्यमिति'। तत एवेयं व्यवस्था जाता। ४२. तत्पढे द्विचत्वारिंशत्तमः श्रीअभयदेवसूरिः, स च जिनचन्द्रसूरीणां लघुगुरुभ्राता, परमसंवेगी च संजातः। तत्संबन्धो यथा-धारापुर्या धननामा श्रेष्ठी,तार्या धनदेवी, ततोऽमय- इमारनामा पुत्रो जातः । स चैकदा जिनेश्वरसूरीणां पार्थे धर्म श्रुत्वा प्रतिबुद्धः। दीक्षां च जग्राह । क्रमेण सकलशास्त्राऽध्ययनेन गीतार्थो जातः, आ चार्यपदं च प्रातः । तत एकदा व्याख्याने सुमारादिनवरसान् पोषितवान् तदा सभा सर्वाऽपि आनन्दातिशयसंपना जाता। परं गुरुभिरेकान्ते उपालम्भो दत्तः। ततोऽभयदेवसूरिणाऽऽत्मशुद्धयर्थ प्रायश्चित्ते याचिते गुरुभिरुक्तम्-'तोपर्या- गतजलेन ढुमरकेण च षण्मासी यावद् आचाम्लतपः कार्यम् । तदा पापभीरुणा अभयदेवसरिता गुरुवचसा तथैव कृतम्-षडपि विकृतयः परित्यक्ताः।परमत्यन्तनीरसाहारकरणात् प्राक्तनकर्मोद- याच शरीरे गलत्कुष्ठरोगः समुत्पन्नः । तथापि औषध न करोति । ततः प्रबद्धो रोगः, तदा अनश- नचिकीर्षया गुरवः संघाग्रहेण धवलकाभिधाने नगरे प्राप्ताः। अथ त्रयोदश्या अर्धरात्रे शासनदे- बतया प्रकटीभूय प्रोक्तम्-'स्वामिन् । नवैताः सूत्रकुक्कटिका उन्मोहय। भगवानाह-'करागुति- गलनाद् उन्मोहयितुं न शक्नोमि'। तदा देवी पाह-'अद्याऽपि त्वं चिरकालं वीरतीर्थ प्रभाववि- पसि, नवाङ्गीवृत्तिं च विधास्यसि । ततो रोगगमनोपायं शृणु-स्तम्भनकपुरसमीपे सेढिकानदी- तीरे खंखरपलाशतले श्रीपार्श्वनाथप्रतिमाऽस्ति, तत्र प्रत्यहमेका गौः समागत्य प्रतिमामूर्षि क्षीरं धरति । तत्र संघेन साधं गत्वा स्तुतिः कर्तव्या। प्रतिमा प्रादुर्मविष्यति, तत्स्नात्रजलेन नीरव शरीरं भविष्यति' इत्युक्त्वा देवी अदृश्या बभूव । ततः प्रातः काले प्रत्यासबनमर- प्रायः समागतेन तद्ग्रामवासिना च श्रावकसंधेन साधं तत्र गत्वा 'जय तिहुयण ' इत्यादि नमस्कारवात्रिंशिका कता। तत्र यावता फणफणकार' इत्यादि षोडशकाव्येन स्तुतिः .
५४ ॥खरतरगच्छ पट्टावली-२॥ प्रारब्धा, तावता पार्श्वप्रतिमा प्रकटीबभूव । ततः श्रावकैः स्नात्रपूजां कृत्वा स्नपनजलेन गुरुणां शरीरं सिक्तम्, तदा रोगनिर्मुक्ताः काञ्चनवर्णशरीराः सूरयो बभूवुः। ततः श्रावकैस्तत्र उत्तुजतोरणं देवगृहं कारितम् । तदा श्रीअभयदेवसूरिभिः तत्र पार्थप्रतिमा स्थापिता । तच्च स्तम्भनकनाम्ना महातीर्थ प्रसिद्धम् । तथा 'जय तिहुयण' स्तोत्रस्य अन्तिमे गाथाद्वये घर- जेन्द्र-पद्मावत्याऽऽकर्षणमन्त्री गोपित आसीत् । तद् गाथाद्वयमपवित्रभूताः स्त्रीबालकादयो यव किंचित् कार्येऽपि गुणयन्ति स्म, तदा नः पुनरागमनेन खिन्नयाऽधिष्ठायकदेव्या गुरवे उक्तम्-'स्वामिन् ! एतद्गाथाद्वयं भाण्डागारे स्थापनीयम् , महति कार्ये गुणनीयम् । तथा इयं नमस्कारत्रिंशिका संध्यायां प्रतिक्रमणस्यादौ सदैव गुणनीया' इत्युक्त्वा देवी गता । ततो गुरुभिस्तथैव कृतम् । तथा नवाङ्गानां वृत्तयो विहिताः । एवंविधाः शासनप्रभावकाः श्रीअ- भयदेवसूरयः प्रान्ते गुर्जरदेशे कप्पडवणिजग्रामेऽनशनं कृत्वा चतुर्थ स्वर्ग प्राप्ताः । ४३.तत्पढे त्रिचत्वारिंशत्तमो जिनवल्लभसूरिः, सच प्रथमं कूर्चपुरगच्छीय-चैत्यवासिजि- नेश्वरसूरेः शिष्योऽभूत् । ततश्चैकदा दशवैकालिकं पठन् सावद्यौषधादिकं कुर्वाणम्-अतिप्रमादिन स्वगुरुं विलोक्य उद्विग्नचित्तः संजातः। तदनन्तरं स्वगुरुमापृच्छय शुद्धक्रियानिधीनाममय- देवसूरीणां पार्थेऽगात् । तदुपसंपदं गृहीत्वा तेषामेव शिष्यश्च संजातः। कमेण शास्त्राण्यऽधीत्व महाविद्वान् बभूव । तथा पिण्डविशुद्धिप्रकरण-गणधरसार्धशतक-पडशीति-प्रमुखानेकशास्त्राणि कृतवान् । तथा दशसहस्रप्रमितवागडिकश्राद्धान् प्रतिबोधितवान् । तथा पुनश्चित्रकूटनगरे श्री- गुरुभिः चण्डिका प्रतिबोधिता । सूरिमन्त्रबलसघनीभूत साधारणश्राद्धेन कारितस्य द्विसप्तति (७२) जिनालयमण्डित श्रीवीरस्वामिचैत्यस्य प्रतिष्ठा कृता । तथा तत्रैव पुरे संवत् सागर रस-रुद्र-(१९६७) मिते श्रीअभयदेवरिवचनाद् देवभद्राचार्येण तेषां पदस्थापना कृता । ततस्ते षण्मासान् यावद् आचार्यपदं भुक्त्वा अनशनेन कालं कृत्वा स्वर्ग प्राप्ताः । तद्वारकेच 'मधुकरखरतर' शाखा निर्गता । अयं प्रथमो गच्छभेदः। तथा शासनदेवतावचनात् तत एवं आचार्यस्य नाम्न आदौ सप्रमावस्य जिनपदस्य स्थापना प्रवृत्ता। ४४. तत्पढे चतुश्चत्वारिंशत्तमः श्रीजिनदत्तसूरिः, स च वाछिगमन्त्रि-वाहडदेव्योः पुत्रा, बंधूकामिधनगरवासी, हुवडगोत्रीयः, सं० ११३२ वर्षे लब्धजन्मा, सोमचन्द्रमूलनामा, सं० १९४१ वाचक धर्मदेवपार्चे गृहीतदीक्षाकः, तथा सं० ११६९ वैशाख ३० दि० षष्ठी- दिने चित्रकूटनगरे श्रीदेवमद्राचार्येण सूरिमन्त्रं दत्त्वाऽचार्यपदे स्थापित:-'जिनदचसरि' इति नामस्थापना कृता। परंतु प्रागेकदा सारंगपुरे कुंवरपालोपाध्यायस्य निर्जरा कारिता आसीत्। स हि कालं कृत्वा देवपदं प्राप्य तदानीमेव प्रादुर्भूय बभाषे 'भोः सोमचन्द्र ! त्वमाचार्यपर्व प्राप्सास, परं मुहूर्तप्राय वर्तते । तत्राद्ये मुहूर्ते मृत्युः, द्वितीये गच्छभेदः, तृतीयं शुमम् । ततस्कृतीचे मुहूर्ते पदं प्रासम्, इत्युक्त्वा देवोऽदृश्यो जातः परं कथंचित् दैववसाद द्वितीचे मुहः पदं जातं, तेन संवत् १२०४ जिनशेखराचार्यतो रुद्रपल्ल्यां रुद्रपल्लीय-खरतर- पासा मिला । अयं द्वितीयो गच्छमेदाः। पुनरेकदा श्री जिनदत्चसूरिभित्रकूट देवगने ॥ खरतरगच्छ पट्टावली-२ ।। २५. वज्रस्थंभस्थितं नानामंत्राम्नायमयं पुस्तकं मंत्रयलेन प्रकटीकृत्य गृहीतवान् । तथोज्जयिन्यां महाकालप्रासादस्तंभस्थं, द्वितीयं सिद्धसेनदिवाकरस्य पुस्तकं प्रथमागतविद्ययाऽऽकृष्य जग्राह । तथा एकदा उज्जयिन्यां व्याख्यानमध्ये श्राविकारूपं विधाय छलनार्थमागताश्चतुःषष्टियोगिन्यः पट्टकेषु निवेश्य मंत्रबलेन कीलिताः, ततो व्याख्यानांते पट्टकेभ्य उत्थातुमशक्ताः सत्यो गुरुं प्रत्यूचुः-स्वामिन् ! भवता वयं प्रत्युत च्छलिताः, अथ कृपां विधाय विमोच्यास्तदा गुरुभिर्वचनं गृहीत्वा योगिन्यो मुक्ताः। अथ ताभिर्वरं सप्तकं दत्तं तद्यथा- १ प्रतिग्रामं खरतर श्राद्धो दीप्तिमान् भविष्यति । २ प्रायेण खरतर श्रावको निर्धनो न भावी । ३ संघे कुमरणं न भविष्यति । ४ अखंड शीलपालका साध्वी ऋतुमती न भविष्यति । ५ खरतर श्राद्धः सिंधुदेशं गतः सन् धनवान् भावी । ६ खरतर संघ शाकिन्यादयो न छलिष्यति । ७ जिनदत्तनाम्नि गृहीते विद्युत्पातादिरुपद्रवो न भावी । इति । पुनर्योगिनीभिरुक्तं-एतद्वचनसप्तकं पालनीयं, येन प्रागुक्तमस्मद्दत्तवरसप्तक सफलं स्यात् । तद्यथा- १ सिंधुदेशं गतैर्गच्छनायकैः पंचनदी साधनं कार्यम् । २ तथा सूरिभिः प्रतिदिनं द्विशत् (२००) वारं सूरिमंत्रजापः कार्यः। ४ खरतर श्राद्धैरुभयकालं गृहे वा उपाश्रये वा सप्त स्मरणानि गुणनीयानि । ५ साधुभिनित्यं द्विसहस्र नमस्कार गुणनीयाः। तत्रैकस्मिन्माणके एको नम- स्कार एकं च उपसर्गहरस्तोत्रं एवं यद्गुणनं तत् खिच्चडिका इत्युच्यते । ६ तथा खरतर श्राद्धर्मासमध्ये आचाम्लद्वयं कार्यम् । ७ खरतर साधुभिः सति सामर्थ्य सदा एकाशनकं कार्यम् । इति । पुनस्ताभिरुक्तं-१ दिल्ली, २ अजमेरु, ३ भरुअच्छ, ४ उज्जैन, ५ मुलतान, ६ उच्च- नगर, ७ लाहोर-एतन्नगरसप्तके परिपूर्णशक्तिरहितैः खरतर गच्छनायकै रात्रौ न स्थातव्य- मित्युक्त्वा स्वस्थानं जंग्मुः। तथा पुनरजमेरुनगरे पाक्षिक प्रतिक्रमणं कुर्वद्भिः श्री गुरुभिः पुनः पुनर्सनत्कारं कुर्वाणा विद्युद् मंत्रबलेन जलपात्रस्याधोभागे रक्षिता, ततः प्रति- क्रमणानंतरं पात्राधोभागात् निष्कास्य 'जिनदत्तनाम्नि गृहिते सति नाहं पतिष्यामीति' तद्वरं गृहीत्वा मुक्ता स्वस्थानं गता। तथा पुनरेकदा गुरखो विहारं कुर्वाणा वृद्धनगरं प्राप्ताः, तत्र जिनमतोत्रतिमसहमाना ब्राह्मणा जिनचैत्ये म्रियमाणां गां प्रक्षिपतिस्म । ततो मृता गौः । तां च विलोक्य, ब्राह्मणाः प्रोचुः-अहो जैनानां देवो गौघातक इति । ततो विलक्षीभूतैः श्रावक- रखो विज्ञप्ताः, तदा गुरुभिर्मत्रबलेन व्यतरप्रयोगेण मृता गौः सज्जीकृता; ततः सा गौः स्वय- मेव जिनगृहादुत्वाय शिवदेवगृहे शिवमूर्तरुपरि आगत्य निपविता । ततो नगरे ब्राह्मणानामती- २६ ॥ खरतरगच्छ पट्टावली-२॥ वोपहासो जातः । तदा लज्जिता ब्राह्मणा गुरूणां चरणयोर्निपतिताः, इत्थं कथयामासुश्च-मो स्वामिनो यूयं महन्तः। इतः परमस्मिन् नगरे ये केपि भवत्परंपरायां सूरयः समेष्यन्ति तेषां प्रवेशोत्सवं वयं करिष्यामहे इति। तदानीं भूयसी जिनमतप्रभावना जाता। तथा पुनरन्यदा उच्चन- गरे गुरवः समागतास्तत्र प्रवेशोत्सवे जायमाने जनानामतिबाहुल्यात् तद्ग्रामाधीशस्य मुगलस्य पुत्रो वाहनानिपत्य मृतः, तदा श्राद्धाः सर्वेपि विमनस्का जाताः, अथ तेषां मुखात् श्री गुरु- भिरेतत् स्वरूपं विज्ञाय जिनमतप्रभावनार्थ मद्यमांसभक्षणमस्मै न कारयितव्यमित्युक्त्वा व्यंतर- प्रयोगेण षण्मासान् यावत् स मृतो मुगलपुत्रः सजीवः कृतः। तथा पुनर्नागदेवनामा श्राद्धः अंबड इत्यपर नामा एकदा गिरनार पर्वते उपवास त्रयं कृत्वा अंबिकासमाराध्य च 'हे! मातर- स्मिन् समये भरतक्षेत्रे युगप्रधानपदधारकः कः सूरिरस्ति, यमहमात्मनो गुरुत्वेन स्थापयामीति' पृष्टवान्। तदा अंबिकादेव्या तस्य हस्ते सुवर्णाक्षरैः-दासानुदासा इव सर्वदेवाः, यदीय पादा- ब्जतले लुठंति । मरुस्थले कल्पतरुः स यात्, युगप्रधानो जिनदत्तसूरिः ॥१॥ इत्येत- काव्यं लिखित्वा प्रोक्तं ' य एतानि तव हस्ताक्षराणि प्रकटयिष्यति स सूरियुगप्रधानो ज्ञेयः। ततः स श्राद्धः स्थाने २ बहुभ्यः सूरिभ्यो हस्तमदर्शयत् परं कोपि अक्षराणि वाचयितुं न समर्थो बभूव । अथैकदा स पाटणनगरे त्रांबावाडाभिधपाटके श्री जिनदत्तसूरीणां पार्थे समागत्य हस्तं दर्शितवान्, गुरुभिस्तद्हस्तलिखितस्वर्णाक्षराणामुपरि वासचूर्णप्रक्षेप कृत्वा शिष्याय आज्ञा दसा। ततो वाचितानि शिष्येण तान्यक्षराणि । तदा स नागदेवः परम- भक्तिमान् श्रावको बभूव । एवं विधाः कलिकाले युगप्रधान-पदधारकाः श्री गुरखो जाताः। तथा पुनरेकदा व्याख्यानं कुर्वद्भिः श्री गुरुभिर्दी!पयोगेन समुद्रमध्ये निमज्जतं श्रावकस्य पोतं विज्ञाय स्वस्मरणं कुर्वतां जनानामुपकारार्थ व्याख्यानपृष्टकं मध्ये मुक्त्वा पक्षि- रूपेण समुद्रे गत्वा पोतस्तारितः। एवं श्राद्धस्य कष्टं दूरी कृत्य पश्चादागत्य व्याख्यानं कर्तु समुपविष्टा ज्ञातवैष वृत्तांतः सर्वैरपि लोकैः, ततः श्री गुरूणां महामहिमा प्रससार । तथा पुनरन्यदा श्री गुरवः प्रबलप्रवेशोत्सवेन मुलताननगरे समागताः, तदा चतुःपथे स्थितेन पत्तनवास्तव्य परपक्षीय-अंबडनाम्ना श्रावकेण खरतर गच्छोमतिमसहमानेन प्रोक्तं- 'अस्मिनगरे इत्थमाडंबरेण भवद्भिरागम्यते परं अणहिल्लपत्तने यद्येवं भवदागमनं स्यासदा ज्ञायते' इति । अथैतत् श्रुत्वा गुरुभिरुक्तं 'भो ! वयमनेनैव प्रकारेण तत्रायास्यामः, परं त्वं तैललवणादिकं स्कंधे वहन् सन्मुखं मिलिष्यसीति' । अथ गुरवः कियद्भिर्वासरैरणहिल्लपसने समाजग्मुः। तदानीं स अंबडश्राद्धो दैववसानिधनो जातः। ततो ग्राहकमयात् मुलतान नगरात् पलाय्य पत्तने समागत्य तैललवणादि व्यापारणाजीविका कुर्वन् प्रवेशोत्सवे जायमाने गुरूणां सन्मुखं मिलितः, गुरुभिरुपलक्ष्य शब्दितस्ततो गुरूपरि अति द्वेष वहन् कपटेन खरतर श्राद्धो बभूव । एकदा श्री गुरुभ्यो विषमिश्रितं शर्कराजलं पायितवान् । ततो गुरुभिर्विषप्रयोग ज्ञात्वा तत्रत्य रायमणशालिक गोत्रीय आभूनामकं मुख्यश्राद्धं प्रति तत्स्वरूपं निवेध घटिका- मोबनगामिना क्रमेलकेन पाहणपुरात् विनापहारिणीमद्रामानायब निर्विवा: । अपर ॥ सत्तलपापडी-५॥ अबडो लोके नियमानस्ततो मृत्वा व्यतरो भूत्वा छलनार्थ गुरुछिद्राणि पश्यविस्म । एकदा पहशत् रजोहरणप्रपतनेन छलिता गुरवस्तेन । ततः श्री गुरुन् व्यग्रान् विलोक्य आभूनामक भावकेण तव्यंतरवचसा स्वकुटुंबं गुरूणामुपरि ढोकयित्वा सज्जीकृता गुरवस्ततो गुरुभिस्तदवड- प्छलं ज्ञात्वा रजोहरणं गृहीत्वा तत्प्रयोगेण जीवितं सर्वमपि तत् कुटुंबम् । ततो नष्टो व्यंतरः स्वस्थानं ययौ। तथा पुनरेकदा विक्रमपुरे मरकोपद्रवः प्रादुर्भूतः, ततो गुरुमिर्जेनेभ्यः स उपद्रवो वारितः, तदा दुःखितैर्माहेश्वरैरुक्तं-'स्वामिन् ! अस्मदुपर्यपि एषा कृपा विधेया' ततो गुरुभिर्वचनं गृहीत्वा तेषामपि मरकोपद्रवो निरस्तस्तदा बहवो माहेश्वराः श्रावकाः कृताः; तथा केपि शैवाः श्राद्धा न जाताः । तन्मध्ये यस्य चत्वारः पुत्रास्तस्य एक पुत्रो गृहीतो, यस्य चतस्रः पुत्र्यस्तस्यैका पुत्री गृहीता, एवं च पंचशत (५००) शिष्याः, सप्तशत (७००) साध्व्यश्व दीक्षिताः इत्थं श्रीजिनदत्तसूरिभिर्बहुषु नगरेषु नाहटा, राखेचा, भणशाली, नवलखा, डागा, लूणीया इत्यादि गोत्रालंकृताः साधिक (१) लक्ष श्राद्धाःप्रतिबोधिता तथा श्रीगुरुभिर्मुलताननगरे लूणीया गोत्रीय हाथी साहस्योपरि कृपां विधाय प्रतिक्रमणे तस्मै "अजियंजियसव्वभयं" इति स्तोत्रं दत्तम् । तथा अणहिल्लपत्तने बोहित्थरा गोत्रीय श्रावके भ्यो " जयतिहुयण वर कप्प रुक्ख" इति स्तोत्रं दत्तम् । तथा गुरुभिर्मेडताख्ये नगरे गणधर चोपडा गोत्रीय श्राद्धेभ्य " उवसग्गहरं पासं" इति स्तवनं प्रदत्तम्। अथैवंविधाः क्षत्रीय- ब्रामणादि-कुलीन-साधिकलक्षश्राद्धप्रतिबोधकाः, जलभ्रमोपरि कंवलास्तरणादि प्रकारेण पंचनदीसाधकाः, संदेहदोलावल्याद्यनेकग्रन्थविधायकाः परकायप्रवेशिन्यादि-विविधविद्या- संपमाः, परोपकारकारिणः, परमयशःसौभाग्यधारिणः, श्री खरतर गच्छनायकाः महा- प्रभावकाः श्रीजिनदत्तसूरयः सं० १२११ आषाढ शुदि एकादस्यामजमेरु नगरे अनशनं कृत्वा प्रथमं स्वर्ग गताः॥४४॥ ॥श्री जिनदत्तसूरीणां गुरूणां गुणवर्णनम् । मया क्षमादिकल्याणमुनिना लेशतः कृतम् ॥ सविस्तरेण तत्कतुं सूराचार्योंपि न क्षमः। ४५. तत्पढे पंचचत्वारिंशत्तमः श्री जिनचंद्रसूरिः। स च सं० ११९७ भाद्रपद शुक्ल अष्टम्यां लब्धजन्मा, पिता साह रासलकः माता देल्हणदेवी तयोः पुत्रः। सं० १२०३ फाल्गुण कृष्ण नवम्यां अजमेरुपुरे संप्राप्तदीक्षः। सं० १२११ वैशाख सुदि षष्ठयां विक्रम- पुरे रासलकृतनंदिमहोत्सवेन श्रीजिनदत्तसूरिभिः स्वयमाचार्यपदे स्थापितः । नरमणि मंडितभालः, खंज-क्षेत्रपालसंसेवितश्च संजातः। अथान्यदा श्री गुरवो गुर्जरदेशं प्रति गच्छंतः श्रीपाल मदनपाल श्रीचंदादि संघाग्रहेण दिल्लीनगरे समागताः, तत्रैकदा गुरुमिर- त्यावस्थायां मदनपालश्राद्धाय उक्तं-'अस्माकं मस्तके मणिरस्ति, सा चामिसंस्कारसमये दुग्धमृतपात्ररक्षणेन भवता गृहीतव्या, तथा मार्गमध्ये विश्रामग्रहणार्थ सेढिका न विमोच्या, इति । ततः सर्वायुः षड् विंशति वर्षाणि प्रपाल्य सं० १२२३ भाद्र कृष्ण चतुर्दश्या- मनसनेन स्वयं गताः। तदा सर्वे श्रावकाः संमील्य अग्निसंस्कारणार्थ चलिता यावता च || खरतरगच्छ पट्टापली-२॥ माणिक्यचतुष्के समागताः, तावता तैः कार्याकुलत्वेन प्रागुक्तगुरुवचनविस्मरणात् विश्रा मार्थ सेढिकाऽधो विमुक्ता, मणिग्रहणाय दुग्धपात्रमपि न रक्षितं, परं तत्रैको विद्यावान् योगी माणजिघृक्षया दुग्धपात्रं भृत्वा एकांते स्थितः। अथ सा सेढिका बहुप्रयत्नेन उत्पाव्य मानापि नोत्तिष्ठतिस्म । ततः सर्वस्मिन्नपि नगरे एषा वार्ता प्रवृत्ता, क्रमेण पतिसाहिनापि श्रुता । ततः स्वयं तत्र आगत्य बहव उत्पाटनोपाया अपि कृताः, परं सेढिका पदमात्रमपि ततो न चलिता, ततः पतिसाहिना प्रोक्तं-'सत्यो यं देवः, एतस्य स्थानमत्रैव भवतु' ततः श्रावकै- स्तत्रैवामिसंस्कारः कृतः। तस्मिन्नवसरे मणिर्गुरुमस्तकात् फडाकशब्दं कृत्वा योगिरक्षितदुग्ध- पात्रे आगत्य निपतिता, योगी च तां गृहीत्वा स्वस्थानं ययौ । तदा मदनपालेनोक्तं गुरुभि- मह्यं प्रागुक्तमासीत्, परमहं त्वरावसात् विस्मृतः। ततः सर्वैः साधुश्रावकैः तस्मै उपालंभो दत्तः । अथ तत्रैव जिनचंद्रसूरीणां स्तूपस्थापना कृता, पतिसाहिप्रमुखैः सर्वैरपि लोकैबहुमानो विहितः, तत् स्थानमद्यापि पूज्यमानं प्रवर्त्तते। एवं विधाः सप्रभावाः श्री गुरवो जाताः। इतश्च- तुर्थपट्टे सातिशयजिनचंद्रेति नाम स्थाप्यमिति पद्मावती वचनात् व्यवस्था जाता ॥ ४५ ॥ ४६. तत्पट्टे षट्चत्वारिंशत्तमः श्री जिनपतिसूरिः। तस्य च सं० १२१० चैत्र वदि अष्टम्यां मूलनक्षत्रे जन्म। तथा माल्हूगोत्रीय साह यशोवर्द्धनः पिता, सूहवदेवी माता । सं० १२१८ फाल्गुण वदि अष्टम्यां दिल्लीनगरे दीक्षा । सं० १२२३ कार्तिक सुदि त्रयोदश्यां श्रीजयदेवाचार्येण पदस्थापना कृता । अथ श्रीजिनपतिसूरय एकदा बब्बेरनाम्नि पत्तने समाजग्मुः; तत्र षट्त्रिंशद्वादेषु जयो लब्धः। बही जिनशासन-प्रभावना कृता । तथा पुनरेकदा आसापुरे श्रीमालज्ञातीय हाजीसाह कारित प्रतिष्ठावसरे मणिग्राहिणा योगिना जिनप्रतिमा स्तंभिता । तदा सचिन्तगुरुभिः स्वगुरवः समाराधिताः। ततः श्रीजिनचंद्र सूरिभिः प्रादुर्भूय चूर्ण दत्तम् । अथ प्रभाते गुरुभिः प्रतिमोपरि तच्चूर्ण प्रक्षिप्तं तेन सद्य उत्थि- ता प्रतिमा, ततो रंजितेन योगिना मणिः पश्चात् प्रदत्ता, श्री गुरूणां भूयान्माहमा प्रससार । तथा पुनरेकदा श्री गुरवोऽजमेरु नगरे चतुर्मास्यां स्थिता आसीत्, तदा तत्रत्य रामदेवादि श्रावकाणां पुरः सदैव खेड वास्तव्य छाजेडगोत्रीय मंत्रि ऊधरण साहस्य प्रशंसाम- कुर्वन् । एकदा रामदेव श्राद्धो मंत्रि ऊधरणं प्रति मिलितः, तदा तेन मत्रिणा रामदेव बहादरेण स्वगृहं समानीय विधिना भोजनादिभिस्तद्भक्तिः कृता, तस्मिन्नवसरे मंत्रिपत्नी देवगृहे देववंदनाथ चलिता शाटक-कंचुकाद्यनेक वस्त्रभृता छब्बडिका सार्थे गृहीतवती । तदा राम- देवेन पृष्टं-किमर्थमेताः, ततः सेवकैः उक्तं-साधर्मिक स्त्रीभ्यः प्रदानार्थ सदैव गृह्यते। तदा रामदेव उवाच श्री जिनपतिमूरयो यद् भवत्प्रशंसां कुर्वन्ति तद् योग्यमेव, यद् गृहे इत्थं धर्मकार्याणि जायते इति । अथैकदा ऊधरणमंत्रिणा नागपुर देवगृहं कारितं तदा बिंबप्रतिष्ठानिमित्त मंत्रिणा स्वकीयाः कुलगुरवः समाहूताः, परं केनापि कारणेन मुहूर्तोपरि नागताः । अपरं च ऊधरणस्य भार्या खरतर गच्छीय श्राद्धस्य पुत्री आसीद, तया मंत्रिकुलगुरुन् हीनाचारिणो मत्वा शुद्धसंवेगरंगधारिण:
।। खरतरगच्छ पट्टापली-५॥ २९ भोजिनपतिसूरयः समाहूताः ते च मुहूर्तोपरि तत्रागताः। तदा तेषां पार्थे प्रतिष्ठा कारिता । जवरणमंत्रि सकुटुंबः खरतर गच्छीय श्नावकश्च बभूवः तस्य च कुलधरनामा पुत्रो जातो येन बाहडमेरनगरे उत्तुंगतोरणप्रासादः कारितः। तथा पुनर्मरोटवास्तव्य नेमिचंद्र भांडा- गारिकेण परीक्षां कृत्वा शुद्धसंवेगवतः श्रीगुरून् ज्ञात्वा चारित्रेच्छां कुर्वाणो अंबडनामा स्व- पुत्रो गुरुभ्यो दत्तः । एवंविधाः श्रीजिनपतिसूरयः सर्वायुः सप्तषष्टि वर्षाणि प्रपाल्य, सं० १२७७ पाल्हणपुरे स्वर्ग गताः। तदा सं० १२१३ आंचलिक मतं जातं । तथा सं० १२८५ चित्रवाल गच्छीय जगचंद्र- सूरितः तपागणो जातः॥ ४७. श्री जिनपतिमूरिपट्टे सप्तचत्वारिंशत्तमः श्री जिनेश्वरसूरिः। तस्य च सं० १२४५ मार्गशीर्ष सुदि एकदश्यां भरणीनक्षत्रे जन्म । तथा मरोटवास्तव्यभांडागारिक नेमिचंद्रः पिता, लक्ष्मी माता, तयोः पुत्रो अंबड इति मूलनामा । सं० १२५५ खेडनगरे दीक्षां दया गुरुभिरिप्रभ इति नाम दत्तं । ततः सं० १२७८ माघसुदि षष्ठयां जालोर नगरे माहू- गोत्रीय साह खीमसीकारित द्वादश सहस्र रूप्यमुद्राव्ययरूप नंदिमहोत्सवेन सर्वदेवा- चार्यप्रदत्त मूरिमंत्रण पदस्थापना जाता । अथैकदा अणहिलपत्तने कुमारपालेन राशा हेमाचार्याय प्रोक्तं-'स्वामिन् ! यदि मह्यं स्वर्णसिद्धरुपायं दद्यास्तर्हि विक्रमादित्यवद् अह- मपि नवीनं संवत्सरं प्रवर्त्तयामि'। तदा गुरुणोक्तं- श्रीहरिभद्रसूरिशिष्यानीतबौद्धपुस्तके स्वर्णसिद्धरुपायोस्ति, परं तत् पुस्तकं खरतर गच्छे विद्यते। ततो राजा नानादेश- निवासिनो व्यापारार्थ पत्तने स्थितान् श्रावकान् निरुध्य कथयामास 'यदि पुस्तकं आना- ययत तदा मुच्यध्वे' । ततः श्रावकैर्जिनेश्वरसूरिभ्यस्तत्स्वरूपं कथापितं, तदा गुरुभिश्चित्रकूटे गत्वा चिंतामणिपार्श्वनाथ चैत्यस्तंभात् पुस्तकं निष्कास्य पत्तने आनीय राझे दत्तं, परंतु "इदं पुस्तकं न छोटनीयं न वाचनीयं, किंतु माडांगारे पूजनीयमिति" पुस्तको- परि लिखितानि वर्णानि विलोक्य राजा उवाच-'अहं तु नैतद पुस्तकं छोटयामि'। हेमा. चार्येणाप्युक्तं-'महापुरुषाणां वचनं न लोपनीय' । तदा हेमाचार्यभगिनी हेमश्री म महत्तरा उवाच-'अहं छोटयामि जिनदत्तसूरिवचनात् नाहं बिभेमि'। ततो राज्ञा तस्यै पुस्तकं दत्तं, तया छोटितं परं तत्कालमेव तस्या द्वे अपि चक्षुषी निःमृत्य पतिते; ततो अंधत्वं प्राप्तां तां दृष्ट्वा राज्ञा पुस्तकं स्वभंडागारे मुक्तं रात्रौ अग्नेर्लग्नात् तद्भांडागारं सर्वमपि ज्वलितं, तदा तत् पुस्तकं आकाशे उड्डीय स्वस्थान प्राप्तम् । एवंविधाः श्री जिनेश्वरसूरयः सं० १३३१ आश्विन वदि षष्टयां अनशनेन स्वगं गताः॥४७॥ तद्वारके १३३१ जिनसिंहसूरितो लघु खरतर शाखा भिन्ना । अयं तृतीयो गच्छभेदः ।। ४८. श्री जिनेश्वरसूरि पट्टेऽष्टचत्वारिंशत्तमः श्रीजिनप्रबोधमरिः। स च दुर्गप्रबोध- व्याख्याता । साह श्रीचंद-भार्या सिरीयादवी तयोः पुत्रः। सं० १२८५ लब्धजन्मा पर्वत इति मूलनामा । सं० १२९६ फाल्गुण वदि पंचम्यां हस्ताकें थिरापद्रनगरे गृहीतदीक्षः, ॥ खरतरगच्छ पावकी-१॥ प्रबोधर्तिरिति दसनामा क्रमेण वाचकपदं प्राप्तः, ततः सं० १३३१ आश्विन पदि पंचम्यां संक्षेपेण कृतपट्टाभिषेकः। पश्चात् सं० १३३१ फाल्गुणवदि अष्टम्यां स्वातिनक्षत्रे जालोरवास्तव्य माल्हूगोत्रीय साह खीमसीकेन पंचविंशति सहस्र (२५०००) रूप्यक व्ययेन सविस्तरं विहितपदमहोत्सवः । एवंविधः श्री जिनप्रबोधसूरिनिर्मलचारित्रमाराध्य सं० १३४१ स्वर्ग गतः॥४८॥ ४९. तत्पढे एकोनपंचाशत्तमः श्रीजिनचंद्रसूरिः। तस्य च समियाणाभिधग्रामवा- स्तव्य छाजहडगोत्रीय मंत्रिदेवराजः पिता, कमलादेवी माता, खंभराय इति मूल नाम । सं० १३२६ मार्गशीर्ष सुदि चतुर्थ्यां जन्म । सं० १३३२ जालोरनगरे दीक्षा । सं० १३४१ वैशाखसुदि तृतीयायां सोमवारे जालोरवास्तव्य माल्हूगोत्रीय साहखीमसीकेन द्वादशसहस्त्र (१२०००)रूप्यकव्ययेन पदमहोत्सवः कृतः। एवंविधाश्चतुर्नुपप्रतिबोधकाः, कलिकाल-केवलीति विरुदविख्याताः, जितानेकवादिनः, जिनशासनोन्नतिकारिणः, श्रीजिनचंद्रसूरयः सं० १३७६ कुसुमाणाख्ये ग्रामे स्वर्ग गताः ॥४९॥ तद्वारके खरतर गच्छस्य राजगच्छ इति प्रसिद्धिर्जाता । ५०. तत्पट्टे पंचाशत्तमः श्रीजिनकुशलसूरिः। तस्य च समियाणाभिधग्रामवास्तव्य छाजहड गोत्रीय मंत्रि जील्हागरः पिता, जयंतश्रीः माता, सं० १३३० जन्म। सं० १३४७ दीक्षा । सं० १३७७ जेष्ट वदि एकादश्यां राजेंद्राचार्येण सूरिमंत्रो दत्तः। तदा पाटणवास्तव्य साह तेजपालेन नंदिमहोत्सवः कृतः । चतुर्विंशतिशत (२४००) साधु-साध्वीभ्यः, तथा सप्त- शत (७००) वेषधारि दर्शनि प्रमुखेभ्यो वस्त्राणि दत्तानि तथा तस्मिन्नवसरे दिल्लीवास्तव्य मह- वीयाणगोत्रीय विजयसिंह श्राद्धः तत्रागतस्तेनापि बहुधनव्ययेन नंदिमहोत्सवः कृतः। तथा सं० १३८० साह तेजपाल कृत संघेन सार्धं शत्रुजयतीर्थ समागतैः गुरुभिर्मानतुंग नाम्नि खरतर वसतिप्रासादे सप्तविंशत्यंगुलप्रमाण श्रीआदिनाथविब-प्रतिष्ठा कृता। तथा भीमपल्लीनगरे भुवनपालकारित द्वासप्तति (७२) देवकुलिकामंडित श्रीवीरचैत्यं प्रतिष्ठितम् । तथा जेसलमेरुनगरे जसघवलकारितचिंतामणिपार्श्वनाथप्रतिष्ठा कृता। तथा पुनः जालोरनगरे श्रीपार्श्वनाथप्रतिष्ठा विहिता। तथा आगराभिधनगरनिवासी-श्रीसंघस्य आग्रहेण तत्सार्थे भूत्वा शत्रुजय यात्रां कृत्वा माद्रपदवदि सप्तम्यां पाटणनगरे आजग्मे । तथा श्रीगुरूणां द्वादशशत (१२००) साधु संप्रदायो जातः, पंचाधिकैकशत (१०५) साध्वी संप्रदायोऽभूत् । तथा श्रीगुरुमिर्विनयप्रमादि- शिष्येभ्य उपाध्यायपदं दत्त,येन विनयप्रभोपाध्यायेन निर्धनीभूतस्य निज भ्रातुःसंपत्तिसिद्धयर्थ मंत्र गर्मितगौतमरासो विहितस्तद्गुणनेन स्वभ्राता पुनर्धनवान् जातः। एवंविधा बहुश्रावकप्रतिबोधकार, परम जिनधर्मप्रभावकाः, श्रीजिनकुशलसूरयः, सं० १३८९ फाल्गुणवदि अमावस्यां देराउर नगरे अष्टौ दिनानि यावत् अनशनं कृत्वा स्वर्ग प्राप्ताः। ते च अधुनापि " दादौजी" इति नाम्ना सर्वत्र जगति प्रसिद्धाः संति, प्रति नगरं गुरूणां चरणन्यासौ पूज्येते, सोमवत्यां पौर्ण- मास्यां प्रथम दर्शनं दत्तं, तेन तद्दिने विशेषण पूजा प्रवर्तते इति ॥५०॥ - ॥ खरतरगच्छ पट्टावली-२॥ ३१ , ५१. तत्पट्टे एकपंचाशत्तमः श्रीजिनपद्मसूरिः । तस्य च छाजहडवंशविभूषणस्य सं० १३८९ जेष्ट सुदि षष्टयां श्री देराउरपुरे साह हरपालेन नंदिमहोत्सवः कृतः। तदा अष्टमे वर्षे तरुणप्रभाचार्येण सूरिमंत्रो दत्तः । अथैकदा श्रीगुरु,हडमेरुनगरे श्री वीर- प्रासादे देववंदनार्थ आजग्मे, तदा देवगृहस्य लघु द्वारं महती च प्रतिमां विलोक्य, पंजाब- देशोत्पन्नत्वात्तद्देशभाषया प्रोक्तं-' बहा नंढा वसही बड्डी अंदर क्युं माणीति' अथे- हग वचनैः प्रकटितवालभावं, श्रीगुरुं प्रति पार्श्वस्थितेन विवेकसमुद्रोपाध्यायेन मौन कुरु, इति प्रोक्तं; ततो व्याख्यानादि स्थितिं प्रवर्त्तयता तेनोपाध्यायेन सार्द्ध श्री गुरवो गुर्जरदेशे आगताः, तत्र पाटणपार्श्वे सरस्वतीनदीतटे रात्रौ स्थिताः, परं तदानीं गुरुचेतसि इयं चिंता समुत्पन्ना -'प्रभाते संघाग्रेऽनया भाषया कथं व्याख्यानं करिष्ये' अथैवं चिंतयतां गुरूणां भाग्येन अर्ध- रात्रसमये सरस्वतीनद्या अधिष्ठायिका सरस्वती देवी प्रादुर्भूय इत्थं वरं दत्तवती-'भो स्वामिन् ! प्रभाते त्वं संघाग्रे यत् किमपि वक्ष्यसि तद्वचः सकलजनमनोहारि भविष्यति। ततः प्रभाते समस्तसंघाने श्री गुरुभिः स्वयमेव “ अहंतो भगवंत इंद्रमहिता" इत्यादि नवीनोत्पादितकाव्येन उपदेशो दत्तः, तदा समस्तोपि संघो श्री गुरुवागविलासश्रवणेन रंजितमना संजातः । तत्र गुरुभिः “बालधवलकूर्चाल सरस्वती" बिरुदं प्राप्तम् । एवंविधाः श्री जिनपनसूरयः सं० १४०० वैशाख सुदि चतुर्दश्यां पाटण नगरे स्वर्ग गताः ॥५१॥ ५२. तत्पट्टे द्विपंचाशत्तमः श्रीजिनलब्धिसूरिः। तस्य च पाटणवास्तव्य नवलखा- गोत्रीय साह ईश्वरकृतनंदिमहोत्सवेन पदस्थापना जाता । तरुणप्रभाचार्येण सरिमंत्रो दत्तः। ततः क्रमेण श्री गुरुः सर्वसैद्धांतिकशिरोमणिरष्टविधानपूरकश्च संजातः । स च सं० १४०६ नागपुरे स्वर्ग भाक् ॥५२॥ ५३. तत्पड्ढे त्रिपंचाशत्तमः श्री जिनचंद्रसूरिः। तस्य च सं० १४०६ माघ सुदि दशम्यां नागपुरवास्तव्य श्रीमाल साह हाथीकृत नंदिमहोत्सवेन पदस्थापना जाता । तरुणप्रमाचा- र्येण सूरिमंत्रो दत्तः। श्री गुरुः सं० १४१५ आषाढ वदि प्रयोदश्यां स्तंभतीर्थ स्वर्गमाक्॥५३॥ ५४. तत्पढे चतुःपंचाशत्तमः जिनोदयसूरिः। तस्य च पाल्हणपुरवास्तव्य माल्हू- गोत्रीय साह रुंदपाल पिता, धारलदेवी माता, सं० १३७५ जन्म, समरौ इति मूलनाम । सं० १४१५ आषाढसुदि द्वितीयायां स्तंभतीर्थे लूणीयागोत्रीय साह जेसलकृत नंदिमहो- सवेन श्रीतरुणप्रभाचार्येण पदस्थापना कृता । ततः श्रागुलमिः तत्र श्रीस्तंमतीर्थे अजितजिनचैत्यप्रतिष्ठितं, तथा श्रीशत्रुजययात्रां कृत्वा तत्र पंच प्रतिष्ठाः कृताः । एवं विधा: पंचपदिनोपवासकारकाः, द्वादश ग्रामेषु अमारिघोषणा प्रवर्तकाः, अष्टाविंशति (२८) साधुपरिवारणानेकदेशविहारकारिणः, श्रीजिनोदयसूरयः सं० १४३२ भाद्रपद वदि एकादश्यां पाटणनगरे स्वर्ग गताः। तद्वारके सं० १४२२ वेगड खरतर शाखा मिश्रा, तदेव- प्रथम धर्मवल्लमवाचकाय आचार्यपदप्रदानविचारः कृत आसीद, पश्चात् तं सदोष ज्ञात्वा द्वितीयशिपाय आचार्यपदं दर्द। तदा लोन धर्मवलमगणिना असलमेवास्तव्य वेगर
३२
। खरतरगच्छ पट्टावली-२॥
छाजहडगोत्रीय स्वसंसारिणामग्रे सर्वोपि स्ववृत्तांतः प्रोक्तः। ततः तेषां मध्ये कैश्चित् तद्
भ्रातादिभिरुक्तं 'अस्माकं त्वमेवाचार्यः, वयमन्यं न मन्यामहे' इति । तदा तत्रायं चतुर्थो
गच्छभेदो जातः। परं तत्संसारिण एव द्वादश श्रावका जाताः, नान्ये; तथा गुरुशापात्
तद्गच्छे प्राय एकोनविंशति (१९) यतिभ्योऽधिका यतयो न भवंति, यदि स्यात् तदा म्रियते-
भ्रष्टो वा स्यात् इति ॥५४॥
५५. श्रीजिनोदयसूरिपट्टे पंच पंचाशत्तमः श्रीजिनराजसूरिः ।
तस्य च सं०
१४३२ फाल्गुनवदि षष्ठयां पाटणनगरे साह धरणकृतनंदिमहोत्सवेन सूरिपदं जातं । ततो
मुखाधीतसपादलक्षप्रमाण न्यायग्रन्थाः, श्री स्वर्णप्रभाचार्य, भुवनरत्नाचार्य, सागरचंद्राचार्य
स्थापकाः, श्री गुरवः सं० १४६१ देवलवाडाख्ये नगरे स्वर्ग गताः॥५५॥
५६. तत्पट्टे षट्पंचाशत्तमः श्री जिनभद्रसूरिः। तत् प्रबंधो यथा-सागरचंद्राचार्येण
श्री जिनराजसूरिपट्टे श्री जिनवर्द्धनसूरिः स्थापित आसीत् । स चैकदा जेसलमेरुदुर्ग
श्री चिंतामणिपार्श्वदेवगृहे मूलनायकपार्श्वस्थितां क्षेत्रपालमूर्ति विलोक्य, स्वामिसेवकयो-
स्तुल्यस्थाने अवस्थानमयुक्तमिति विचिंत्य च क्षेत्रपालमूर्ति उत्पाट्य द्वारे स्थापितवान् , ततः
कुपितः क्षेत्रपालो यत्र तत्र गुरूणां चतुर्थव्रतभंगं दर्शयामास । अनया रीत्या एकदा चित्रकूटे
समागताः, तत्रापि देवेन तथैव कृतं, ततः सर्वेपि श्रावकाः चतुर्थवतभंगं ज्ञात्वाऽयं पूज्य-
पदयोग्यो नास्ति, इति कथयामासुः, अथ जिनवर्द्धनसूरयो व्यंतरप्रयोगेण प्रथिलीभूताः
संतः पिप्पलकग्रामे गत्वा स्थिताः, कियंतः शिष्याः पार्श्वे स्थितवंतः। अथ पश्चात् सागर-
चंद्राचार्यप्रमुखसमस्तसाधुवर्गेण एकत्रीभूय 'गच्छस्थितिरक्षणार्थ
नवीन आचार्यः
स्थाप्य' इति विचारं कृत्वा एकं नवीनं क्षेत्रपालमाराध्य तं च सर्वेषु देशेषु संप्रेष्य-
'ययूयं करिष्यध्वे तदस्माकं प्रमाणमिति' समस्त खरतरगच्छ-
समस्त खरतरगच्छ-संघस्य हस्ताक्षराणि
आनाय्य सर्वसाधुमंडली संमील्य माणसोलग्रामे आजग्मे । तत्र श्रीजिनराजसूरिभि-
रेकः स्वशिष्यो वाचकशीलचंद्रगणिपार्श्वेऽध्यापनाय रक्षितोऽभूत् ।
स च अधीतसकल-
सिद्धान्तार्थः, भणसालिक गोत्रीयः, भादौ इति मूल नामा । सं० १४६१ गृहीतदीक्षः ।
कमेण पंचविशति वर्षीयो जातः। तं च योग्यं ज्ञात्वा श्री सागरचंद्राचार्यः सप्त भकाराक्षराणि
संमील्य सं० १४७५ माघ सुदी पौर्णमास्यां भणसालिक नाल्हा साहकारित सपादलक्ष-
रूपकव्ययरूपनंदिमहोत्सवेन सूरिः स्थापितवान् । सप्त भकारास्तु अमी-१ माणसोल
नगरं, २ भणशालिक गोत्रं, ३ भादौ नाम, ४ भरणी नक्षत्रं, ५ भद्रा करणं, ६ भट्टारकपदं,
७ जिनभद्रसूरीति स्थापित नाम, इति । अथैवंविधा अर्बुदाचल, गिरिनार, जेसलमेरु प्रमुख
स्थानेषु बिंवप्रासादप्रतिष्ठाकारकाः, श्री भावप्रभाचार्य, कीर्तिरत्नाचार्य,-स्थापकाः । स्थाने
२ पुस्तक भांडागारस्थापकाः, श्री जिनभद्रसूरयः, सं० १५१४ मार्गशीर्ष वदि नवम्या
कुंभल भेरुनगरे स्वर्ग प्राप्ताः। तद्वारके सं० १४७४ श्री जिनवर्द्धनसूरितः पिपलक खरतर
शाखा मिला । अयं पंचमो गच्छमेदः॥५६॥
|| सरवरमहावी-२॥ ५७. तत्पढे सप्तपंचाशत्तमः श्री जिनचंद्रसूरिः। तस्य च जेसलमेल्वास्तव्य चम्मगोत्रीय साह वच्छराजः पिता, बाल्हादेवी माता । सं० १४८७ जन्म, सं० १४९२ दीक्षा, सं० १५१४ वै० व० २ कुंभलमेरु वास्तव्य कूकडचोपडागोत्रीय साह समरसिंह- कृतनंदिमहोत्सवेन श्री कीर्तिरत्नाचार्येण पदस्थापना कृता । ततो अर्बुदाचलोपरि नवफणपार्थ- नाथप्रतिष्टाविधायकाः, श्रीधर्मरत्न, गुणरत्नसूरि, प्रमुखानेकपदस्थापकाः श्री जिनचंद्रसूरयः सं० १५३० जेसलमेलनगरे स्वर्ग प्राप्ताः ॥५७।। -तद्वारके सं० १५०८ अहमदावादे लौंकाख्येन लेखकेन प्रतिमा उत्पापिता, ततः सं० १५२४ वर्षे लोकाभिचं मतं जातं ॥ ५८. तत्पढे अष्टपंचाशत्तमः श्री जिनसमुद्रसूरिः। तस्य च बाहडमेरुवासी पारख गोत्रीय देकासाह पिता, माता देवलदेवी। सं० १५०६ जन्म, सं० १५२१ दीक्षा, सं० १५३० मा० सु० १३ जेसलमेरुवास्तव्य संघपति सोनपालकृतनंदिमहोत्सवेन श्री जिनचंद्रसूरिभिः स्वहस्तेन पदस्थापना कृता । ततः पंचनदी सोमयक्षादिसाधकाः, परमचारित्रवतः, श्री जिनसमुद्रसरयः सं० १५५५ अहमदावाद नगरे स्वर्ग गताः ॥५६॥ ५९. तत्पढे एकोनषष्टितमः श्री जिनहंससूरिः। तस्य च सेत्रावाभिध नगरवास्तव्य चोपडागोत्रीय साह मेघराजः पिता, कमलादेवी माता। सं० १५२४ जन्म, सं० १५३५ दीक्षा, स०१५५५ अहमदाबादे पदस्थापना जाता। तथा सं० १५५६ वैशाखसुदि तृतीयायां रोहिणी- नक्षत्रे श्रीवीकानेरनगरे करमसीमंत्रिणा पीरोजी-लक्षव्ययेन पुनः पदस्थापना-महोत्सवो विहितः। अथैकदा आगरामिधनगरवास्तव्य सं० डुंगरसी, मेषराज, पोमदच प्रमुख संवेन अत्याबदेण आहूताः श्री जिनईससूरयः तत्र गताः । तदा पतिसाहिहितहस्त्वश्व- सिपिकावादिश्चचामराद्याडंबरेण गुरूणां प्रवेशोत्सवो विहितः। तत्र गुरुमक्तिसंप- भक्ति-भादो दिलक्षद्रव्यं न्यीकृत, तदसहमान-पिशुनकृतविकारेण पतिसाहिना गुरव माहवार, शालपुरे रक्षितः । ततो देवकृतसानिमात् श्री गुरवः पतिसाहिरिवं रंगविला, पयत (५००) बंदिजनान् मोचयित्वा, अमारपोषणां कारयित्वा, उपाश्रये आगताः। हर्षितः समस्तोपि संवः। ततोऽतिसौभाग्यधारकाः, त्रिषु नगरे प्रतिष्ठात्रयकारकाः, अनेकसंधपति- ममुखवस्थापकाः, श्री गुरवः पाटपनगरे त्रीणि दिनानि अनशनं कृत्वा सं० १५८२ समासाः ॥ ५९॥ -वहारके स०१५६४ मतदेशेउपान्याव (प्रत्यन्तरे आचार्य) शान्तिसामरतः आचार्य सस्वर शाखा मिमा अर्ष पछो मच्छमेदः॥ २०. वत्पढे पष्टितमः श्रीजिनमाविस्वसरिः। ता च डचोपडामोत्रीय साह बाराबपिता, पबादेवी माता । सं० १५४९ जन्म, सं० १५६० दीक्षा, सं० १५८२ कों मायादवदि नया साह देवराजकृत नदिमहोत्सावेन श्रीजिन समरिमिः स्वास्न बह- ता। बोपुर देव देव, सिंध देशादि विहारकारका नदीमा ।। खरतरगच्छ पट्टावली-२॥ . सं० १५९३ मिते वीकानेवास्तव्य वच्छासुत मंत्रि कर्मसिंहकारित नमिनाथ चैत्यबिंब- प्रतिष्ठाकारकाः श्री जिनमाणिक्यसूरयः कियंति वर्षाणि जेसलमेरुदुर्गेऽवसन् । तदा मुनयः सर्वेपि शिथिलाचारा जाताः, प्रतिमोत्थापकमतं च बहु विस्तृतं । ततो बीकानेवास्तव्य बच्छावत मंत्रि संग्रामसिंहेन गच्छस्थितिरक्षणार्थ श्री गुरव आहूताः, तदा भावतो विहित- क्रियोहारैः श्रीगुरुमिः 'प्रथमं देराउरनगरे श्रीजिनकुशलसूरियात्रां कृत्वा पश्चात् परिग्रह त्यक्त्वा इतो विहारं करिष्ये' इति विचिंत्य गुरुयात्रार्थ देराउरे जग्मे । तत्र गुरुदर्शनं कृत्वा, जेसलमेरुं प्रति पश्चादागच्छतां गुरूणां मार्गे जलाभावात्पिपासापरीषहः समुत्पन्नः। ततो रात्री जलं मिलितं तदा गुरुमिचितितं 'मया इयंति वर्षाणि रात्री चतुर्विधाहारप्रत्याख्यानं कृतं, सदद्य एकस्मिन् दिने कथं विनाश्यते' इति । ततः तत्रैव सं० १६१२ आषाढसुदि पंचम्या- मनशनेन कालं कृत्वा स्वर्गतिं प्राप्ताः ॥ ६० ।। ६१. तत्पढ़े एकषष्टितमः श्रीजिनचंद्रसूरिः। तस्य च विमरीनगरपार्श्वस्थवडलीग्राम वास्तव्य रोहडगोत्रीय साह श्रीवंतः पिता, सिरीयादेवी माता। सं० १५९५ जन्म, सं० १६०४ दीक्षा, सं० १६१२ भाद्रपदसुदि नवम्यां जेसलमेरुनगरे राउत मालदेवकारित- नंदिमहोत्सवेन सूरिपदं जातं । तदा एव रात्रौ श्रीजिनमाणिक्यसूरिभिः प्रादुर्भूय समवसरणपुस्तकस्थमाम्नायसहितं सरिमंत्रपत्रं जिनचंद्रसूरिम्यो दर्शितं । ततः श्रीजिन- चंद्रसूरयः संवेगवासनया वासितचिताः संतः, गच्छे शिथिलत्वं दृष्ट्वा सर्व परिग्रहं परित्यज्य मंत्रि- संग्रामसिंहपुत्रकर्मचंद्राग्रहेण बीकानेर नगरे समागताः, तत्र प्राचीनोपाश्रयं शिथिलाचारै- तिमिनिरुद्धं विलोक्य मंत्रिणा स्वकीयाऽधशाला गुरुम्यो दत्ता, अपरापि वही गुरुभक्तिः कृता । गुरवस्तत्र विशेषतः क्रियोद्धारं विधाय सुविहितसाधुमार्गमादृत्य, स्वसमानाचारैः साधुभिः सार्धं ततो विहारं कृत्वा स्थाने स्थाने प्रतिमोत्थापकमतोच्छेदं कुर्वतः स्वसमाचारों द्रढयंतः क्रमेण गुर्जरदेशे आगताः । तत्राइमदाबादनगरे चिर्मटीव्यापारेणाजीविका कुर्वाणौ मिथ्यात्विकुलोत्पन्नौ प्राग्वाटजातीयौ सिवा-सोमजी-नामानौ द्वौ भ्रातरौ प्रतिबोध्य सकुटुंबौ महाधनवती श्रावको कृतवंतः। तथा पाटण नगरे एकदा केनापि परपक्षीयेण जनानां पुरो 'अमयदेवसरिः खरतरगच्छे न जातः,' इत्युक्तं तदा गुरुमिः शास्त्रसंमत वादं कृत्वा चतुरशीतिगच्छीय मुनिसमक्षं परपक्षीयाः पराजयं नीताः। ततः सर्वैरपि नवांगीति- विधायकोऽभयदेवसरिखरतरगच्छे जातः इत्यंगीकृतं । पुनः तत्कृतकुमतिकुदालान्यो शुद्धभावं प्रापितः। तथा पुनः फलवर्द्धिकपार्श्वनाथदेवगृहद्वारे तपागच्छीयैर्दचानि तालकानि उद्घाटितानि, तथा पुनरेकदा मंत्रि कर्मचंद्रमुखाद् गुरूणामति महत्वं श्रुत्वा पतिशाहिना दर्शनार्य समाहृता गुरवो लाहोरनगरे गत्वा अकबरं प्रतिबोध्य सकलदेवेषु फुरमाणकान् मोचयित्वाऽष्टाहिकासु अमारिपालनं कारितवंतः, तथा वर्ष पावन स्त्रमनगरपाईस्वसमुद्र- मत्स्यान मोचितवंतः, तथा पुनर्येषामविशयं वा पतिसाहिना युगप्रधानपदं दचं । बस्ति- मल्सरे एव श्रीमदकम्बराबहात् गुरुमिर्जिनसिंहसरिः सहस्तेनाचार्यपदे स्थापितः । सदाति || खरतरगड पहावडी-१॥ १५ प्रमुदितेन कर्मचंद्रमत्रिणा महोत्सवो विहितः। तत्र नव प्रामा: ९, नव हस्तिनः ९, पंचाशत् (५००) घोटकाः याचकेभ्यो दत्ता एवंकारसपादकोटि द्रव्यं दत्तं । पुनमंत्रिणाऽनेकदा श्री खरतरगच्छोद्दीपनं विहितं । तथा पुनः सं० १६५२ श्री गुरुभिः पंचनद्यः साधिताः, तत्र पीरपंचक, मानभद्र यक्ष, खंजक्षेत्रपालादयो देवाः साधिताः। तथा पुनरेकदा सं० १६६९ श्री सलेमपतिसाहिना गानादिकलानिपुणत्वेन स्वपार्श्वे रक्षितस्य तपागच्छीययतेनिज- खिया सह एकांतस्नेहवा करणाधनाचारं विलोक्य कुपितेन सता स्वसेवकेभ्य इत्यमाशा दत्ता-" मम सर्वदेशेषु ये केपि दर्शनिनः संति ते सर्वेपि स्त्रीधारकाः कर्तव्याः, नोचेद देशेभ्यो बहिः कार्या" इति । ततो भीता यतयः केचित् समुद्रमुल्लंघ्य द्वीपांतरं गवार, केचित् भूमिगृहेषु प्रविष्टाः, केचित् कोलिककाष्ठिकादीनां स्थानेषु स्थिताः। तस्मिनवसरे श्रीजिनचंद्रसूरिभिः पाटणतो विहत्य उपद्रववारणार्थ आगराख्ये नगरे आजग्मे । सत्र गुदर्श- नादेव रंजितेन पतिसाहिना बहादरेण गुरव आहूताः, तदा गुरुभिर्वहुचमत्कारान् दर्शयित्वा प्राग्दत्ताज्ञा दूरीकारिता, सर्वत्र फुरमाणकान्मोचयित्वा सर्वे यतयः स्त्र स्व स्थान प्रापिताब। इत्थं बहुधा जिनशासनोबतिः कृता, पुनर्गुरूणां-१ समयराज, २ महिमाराज, ३ धर्म- निधान, ४ रत्ननिधान, ५ ज्ञानविमल-एतत्पांडवपंचकप्रमुखाः, पंच नवति (९५) शिष्याः संजाताः। एवंविधाः श्रीजिनचंद्रसूरयः सर्वायुः पंचसप्तति (७५) वर्षाणि पालायित्वा, सं० १६७० आश्विन वदिद्वितीयायां बेनातटे स्वर्ग प्राप्ताः॥६१॥ -तद्वारके सं० १६२१ भावहर्षोपाध्यायात् भावहर्षीय खरतरशाखामिना । अर्व सप्तमो गच्छभेदः॥ ६२. तत्पढे द्वाषष्टितमः श्रीजिनसिंहसूरिः । तस्य च गणधरचोपडागोत्रीय साह चांपसी पिता, चतुरंगदेवी माता। सं० १६१५ मार्गशीर्षसुदि पौर्णमास्यां खेतासरनामे जन्म, मानसिंहेति मूलनाम । सं० १६२३ मार्गशीर्षवदि पंचम्यां बीकानेरे दीक्षा। सं. १६४० माघसुदि पंचम्या बेसलमेरो वाचकपद। सं० १६४९ फागुनमुदि द्वितीयाणा लाहोरनगरे बीकानेरं वास्तव्य मंत्रि कर्मचंद्रकत महोत्सवेन आचार्य पदं । सं० १६७० वेनातटे सरिपदं । सं० १६७४ पौषवदि त्रयोदश्यां मेडताख्य नगरे स्वर्गप्राप्तिर्जाता ॥१२॥ ६३. तत्पढे श्रीजिनराजसरिः। तस्य च बोहित्वरा गोत्रीय साह धर्मसी पिता, धार- लदेवी माता। सं० १६४७ चै० सु० ७ जन्म, सं० १६५६ मि० सु०३वीकानेरे दीक्षा, राक- समुद्र इति नाम दत्तं । सं० १६६८ आसाउलिपुरे श्रीजिनचंद्रसरिभिः वाचकपदं प्रदर्ष। ततः सं० १६७४ फा० सु०७ मेडताख्ये नगरे चोपडा गोत्रीय साह आसकरणकृत महोत्स- वेन सूरिपदं जातं श्रीजिनराजसूरिरिति नामविहितं; तथा द्वितीय शिष्य बोहित्यरा गोत्रीय सिद्धसेनगषिः, तस्मै आचार्यपदं दचं, जिनसागरसूरिरिति नाम विहितं । ततो द्वादशवर्षाषि याबदाचार्यः श्रीपूज्यानां आज्ञायां प्रवृत्तः, पवात्समयसुन्दरोपाध्याय-शिष हनिदनात कदागदेष सं० १९८६ बाचार्य जिनसागरसूरितो लघु-आचापि-खरतर : शाखा ॥खरतरगच्छ पट्टावली-२॥ मिना। अयमष्टमो गच्छमेदो जातः। ततः श्री जिनराजसूरिभिः लोद्रवपदने श्री जेसलमेरु वास्तव्य भणशालिक साह थाहरू कारितोद्धार विहारशृंगार श्रीचिंतामणि- पार्थप्रतिष्ठा कृता । तथा सं० १६७५ वै० सु० १३ शुक्रे श्रीराजनगर वास्तव्य प्राग्वाटवा. संपति सोमजीपुत्र रूपजीकारित श्रीशजयोपरि चतुर्दार विहारहारायमाण श्रीऋषमादि जि- नैकाधिक पंचशत (५०१) प्रतिमानां प्रतिष्ठा विहिता । तया पुनर्भानुवडग्रामे साह चाप- सीकारितदेवगृहमंडन श्रीअमृतश्राविपार्श्वनाथ प्रमुखाशीति (८०) बिंबानां प्रतिष्ठा वि. धायि । तथा पुनमेंडताख्ये नगरे गणधरचोपडागोत्रीय संघपति श्रीआसकरणसाहकारित चैत्याधिष्ठायक श्रीशांतिनाथप्रतिष्ठा निर्मिता । एवमन्यत्रापि-राजनगराधनेकनगरेषु श्रीजिन- प्रतिष्ठा चके। एवंविधाः श्रीजिनमतोन्नतिकारकाः, अंबकाप्रदत्तवरधारकास्तबलप्रकटित पंधाणीपुरस्थितचिरंतनप्रतिमाप्रशस्तिवांतराः समस्ततर्कव्याकरणच्छन्दोलंकारकोशकाव्यादि- विविधशास्त्रपारिणो नैषधीयकाव्यसंबंधी जैनराजी-वृल्याउनेकनवीन अन्य विषावका: श्रीबृहत्खरतरगच्छनायकाः श्रीजिनराजसूरयः सं० १६९९ आषाढ सु० ९ पचने स्वर्गमावः। तदेव, सं० १७०० मिते उ० श्रीरंगविजयगणितो रंगविजय खरतर शाखा भिका। अब नवमो मच्छमेदः । ततस्तन्मध्यान् श्रीसारोपाध्यायतः श्रीसारीय खरतर शाखा मिया । वर्ष दक्षमो गच्छमेदः । एकादशस्तु हत्खरतर नामा मूलगच्छः। एवमेकादशमेदः खरतर गया। ६४. तत्पढे श्रीजिनरत्नहरिः। तख सेरुणामिष प्रामवास्तव्य लूणीयायोत्रीय साह तिलोकसी पिता, तारा देवी माता, रूपचंद्रेति मूल नाम । तथा निर्मलवैराम्पेण मातृ- सहितेन दीक्षा गृहीता । ततः सं० १६९९ आषाढ सुदि सप्तम्यां श्रीजिनराजसूरिभिः सरि- मंत्रो दतः । ततब शुद्धक्रियाम्यासिनोऽनेकपुरविहारकारिणः श्रीजिनरत्नसूरयः सं० १७११ श्रा०व०७ अकबरावादे स्वर्ग गताः । ६५. तपढे श्रीजिनचंद्रसूरिः। तस्य च गणधरचोपडागोत्रीय साह सहसकरका पिता, सुपियारदेवी माता, हेमराजेति मूलनाम, हर्षलामेति दीक्षानाम । सं० १७११ मा. व० १० श्रीराजनगरे नाहटागोत्रीय साह जयमल्ल तेजसी मातृकस्तूरवाईकृत महोत्सवेन र सापना जाता। ततः श्रीगुलमर्योधपुरवास्तब्य साह मनोहरदासकारित श्रीसंघेन सार्य श्रीबटुंजवयात्रा सता, तया मंडोवरनगरे संधपति मनोहरदासकारित चैत्यभंगार श्रीर- पवादि चतुर्विशतिजिनप्रतिष्ठा विहिता । एवंविधा नानादेशविहारिणः सर्वसिद्धान्तपारमा बीजिनचंद्रसूरवः सं० १७६३ श्रीसूरतविंदरे स्वर्ग प्राप्ताः । ६६. तत्पहे श्रीजिनसौख्यसरिः। तस्य च फोगपचन वास्तव्य साहलेचा बहरागोत्रीय साह रूपसी पिता, सुरुमा माता, सं० १७३९ मार्गशीर्ष सुदि १५ जन्म, सं० १७५१ माघ चदि ५ पुष्पालरनामे दीक्षा, सुखकीर्तिरिति दीक्षानाम । सं० १७६३ आषाढ ११ सूरतविंदरवास्तव्य चोपडागोत्रीय पारिस सामीदासेन एकादश सहस रूपकम्पवेन महोत्सवः । वन एकदा पोषाविंदरे नवसंडपानासाना सवा शुरुकान ॥खरतरगच्छ पहावली-२॥ सार्थ स्तंमतीर्थगमनार्थ प्रवहणमारूढास्तत्रसमुद्रमध्यभागे पोतस्यापस्तनफलक मर्म, ततो जलेन पूर्यमाणं पोतं विलोक्य गुरुभिः स्वेष्टदेवाराधनं चक्रे। ततः श्रीजिनकुशलसूरिसाहायेन अक- मानवीनपोतप्रादुर्भावाजलधेः पारं लब्धं ततः स पोतोऽदृश्यो बभूव । एवंविधाः श्रीशचुंजया- दियात्राविधायकाः सकलशास्त्रपारगा विजेतानेकवादिनः श्रीगुरवस्त्रीणि दिनान्यनशनं कृत्वा सं० १७८० ज्ये०व०१० श्रीरिणीनगरे स्वर्ग प्राप्तास्तत्र तद्दिने देवैरदृष्टवादित्राणि वादितानि वत्पुराधीशादिसर्वलोकास्तद्वाधघोष श्रुत्वाऽऽथर्यवन्तो जाताः ॥६५॥ ६७. तत्पद्वे श्रीजिनभक्तिसूरिः। तस्य च इंदपालसर ग्रामवास्तव्य सेठ- गोत्रीय साह हरिचंद्रः पिता, हरिसुखदेवी माता। सं० १७७० ज्ये० सु०३ जन्म भीमराजेति मूलनाम । सं० १७७९ माघसुदि ९ दीक्षा भक्तिक्षेमेति दीक्षानाम । सं० १७८० ज्येष्ठवदि ३ रिणीपुरे श्रीसंघकृतमहोत्सवेन गुरुभिः स्वहस्तेनाचार्यपदं दत्तं। ततो नानादेशविहारिणः साद- डीप्रभृतिनगरेषु हस्तिचालनादिप्रकारेण प्रतिपक्षान् पराजयं नीत्वा विजयलक्ष्मीधारिणः सर्व सिद्धान्तपाठप्रचारिणः श्री सिद्धाचलादि सकलमहातीर्थयात्राकारिणः श्री मूढाले नगरे अजितजिनचैत्यप्रतिष्ठाविधायिनो महातेजस्विनः सकलविद्वज्जनशिरोमणि-श्रीराजसोमोपा- ध्याय, श्रीरामविजयोपान्यायादि-सत्परिकरसंसेवितचरणाः श्रीजिनमतिसरया कच्छदेशमंटन- भीमांडवीविंदरे सं० १८०४ ज्ये० सु० ४ स्वर्ग प्राप्ताः । तत्र सायं अभिसंस्कारमूमौ देवैर्दीप- माला विहिता । ईदृक् प्रभावका जाताः॥६६॥ ६८. तत्पढे श्रीजिनलाभसूरयः। तेषां च वीकानेवास्तव्य वोहित्यरागोत्रीय साह पंचायण- दासः पिता, पद्यादेवी माता। सं० १७८४ श्रा० सु० बापेउग्रामे जन्म, लालचंद्रवि मूलनाम, सं० १७९६ ज्येष्ठसुदि ६ जेसलमेरुनगरे दीक्षा, लक्ष्मीलाम इति दीक्षानाम । सं० १८०४ ज्ये० सु० ५ श्रीमांडवीविंदरे छाजहडगोत्रीय साह मोजराजकृत नंदिमहोत्सवेन पदस्थापना जाता। ततः श्रीगुरवो जेसलमेरुवीकानेराधनेकपुरेषु विहारं कृत्वा सं० १८१९ ज्ये०व०५, पंक सप्तति (७५) साधुमिः सामीगौडीपाशपात्रांकृतवन्तः। ततःसं.१८२१०म०प्रतिषियी पंचाक्षीति (८५) मुनिभिः सह श्री दाचलपात्रां कुर्वति स्म । ततब पायेराव-वाडीलामो बमबे चोपडा वपतसाहादिकृतमहोत्सवेन समागत्य उपद्रवकरवाय सं० पक्षीयान् स्वरलेन पराब नीत्वा विजयवादित्राणि वादितवंतः। ततस्तदेशराणपुरादि-पंचतीची वंदित्वा नातट- मेदिनीवट-पनगर-अपपुरोदयपुरादि-नगरेषु विहत्य सं० १८२५ वै० सु० १५ अध- शीति (८८) मुनिभिःसाई भीषलेवनडाविष्टायकऋषभदेवयावा उर्वति स्म। ततः परिसनासत्य पुर-रामनपुरादिषु हिल श्रीसंखेचर पार्थयात्रा हत्या सेठ गुलालचंद सेठ माईदास श्रीस- बाजारसपिंदरे समागताः । तत्र सं० १८२७ ० तु. १२ आदिगोत्रीय साहनेमीदासां- गज माईसा कारित त्रिभूमप्रासादमंडन श्रीशीवलनाव सहसफवपार्थ गौडीपायका- शीत्यधिक शत (१८१) विव प्रतिष्ठां कृतवंतः। वासं० १८२८ बै० सु०१२ तब देखते श्री महावीरादि इचशीति (८२) विवप्रविष्ठ कवति स्म । तदा देवगृहवि निर्मापन २८ । खरतरगच्छ पट्टावली-२॥ प्रतिष्ठाद्वयविधानसंघमक्तिकरणादौ पत्रिंशत्सहस्र (३६०००) रूपकानि व्ययी भूतानि । ततश्च मुनिसुव्रतस्वामियात्रार्थ भृगुकच्छे समागताः। तत्र रात्रौ रेवातटे योगिनीकृत महाधनवृष्टयुपद्रवेण व्याकुलीभूतं सर्वसाथ स्वेष्टदेवस्मरणेन निराकुलं कृतवंतः। तता राजनगरभावनगरादौ विहत्य घोघाबंदरे नवखंडपार्श्वयात्रां विधाय पादलिसपुरे समागताः। तत्र सं० १८३० माधवदि ५, पंचसप्ततिमुनिभिः सार्द्ध श्रीशत्रुजययात्रां कुर्वति स्म । ततो जीर्णगढमागत्य सं० १८३० फा० सु०९ पंचाधिकैकशत (१०५) साधुभिः सह श्री गिरनारम- डननेमिजिनयात्रामकुर्वन् । ततो वेलाकूलपत्तन-नव्यनगरादिषु विहत्य कच्छदेशे मांडवीबि- दरे श्रीगुरुपदकमलस्थापनां वंदित्वा क्रमेण तद्देशाद्विहृत्य राउपुरनगरे श्री चिन्तामाण- पार्श्वेशममिवंद्य सं० १८३३ मिति चैत्र वदि द्वितीयायां श्री गौडीपार्श्वयात्रां चकुः । एवंविधा: परमसौभाग्यादिसद्गुणश्रेणिधारिणो महोपकारिणः श्रीजिनलाभसूरयः सं० १८३४ मिति आश्विन वदि १० श्री गूढानगरे स्वर्ग गताः॥६७ ॥ ६९. तत्पट्टे श्रीजिनचंद्रसूरयः । तेषां च वीकानेवास्तव्य वच्छावतमुंहता रूपचंद्र पिता, केसरदेवी माता, सं० १८०९ कल्याणसरग्रामे जन्म, अनूपचंद्रेति मूलनाम। सं० १८२२ मंडोवरे पुरे दीक्षा, दयासार इति दीक्षानाम। सं० १८३४ आश्विन वदित्रयोदश्यां सोमे शुमलो गूढानगरे कूकडचोपडागोत्रीय दोसी लक्खासाहकृतोत्सवेन मूरिपदं जातं । ततस्तेगणाधीश्वरा महेवादिपुरेषु चैत्यान्यमिवंद्य श्रीगौडीपार्श्वेशं नत्वा क्रमेण जेसलमेरुवीकानेरादिषु चिन्तामाणि पार्श्वनाथादि देवयात्रां कृतवंतः। तत्र जेसलमेरौ आवश्यकादि-योगक्रियां च विहितवंतः। ततोऽ योध्या कासी चंद्रावती पाटलीपुत्र चंपा मकसूदावाद संमेतसिखर पावापुरी राजगृह मिथिला दुतारापार्श्वनाथ क्षत्रिकुंडग्राम काकंदी हस्तिनागपुरादियात्रा व्यधुः। तदानीं पूर्व देशे श्रीलक्ष्याउनगरे नाहटागोत्रीयः सुश्रावको राजा बच्छराजाख्यश्चतुर्मासकवर्ष महोत्सवेन कारितवान् । तत्र बहुविस्तृतः प्रतिमोत्थापक-निन्हवमार्गः श्रीपूज्यैः स्वज्ञान- बलेन निराकृतः, बहवः श्राद्धाःसन्मार्ग नीताः। श्रीपूज्यानां सुतरां महिमा प्रससार। तमगरास- मोद्याने राज्ञा श्रीजिनकुशलसूरीणां स्तूपः कारितस्ततोविहृत्य श्रीगिरनारशत्रुजयतीर्थयोर्यात्रा व्यधुः । तत्र पादलिसपुरे परपक्षीयैः सार्द्ध महान् विवादः समजनि; परं श्रीदेवगुरुप्रसादाजय- प्रामिर्जाता, परपक्षीयाः पराजयं प्राप्य पलायितास्तदा तत्रत्य नृपादिभिर्वहुमानकरणात्यू- ज्यानां महिमा सर्वत्र सुतरां विस्तृतवान् । ततो वर्षानंतर मोरवाडामिग्रामे श्रीगौडी पार्थेश यात्रार्थमागते साधिक लक्ष मनुष्यात्मक श्रीसंघ तत्रत्यामात्यादि प्रधानपुरुषवचनाद् द्वयो- भट्टारकयोः परस्परमेल: संजातः। ततो दक्षिणदेशेऽन्तरिक्षपार्थेशयात्रां कृत्वा श्रीसूरत बिंदरे सं० १८५६ ज्ये० सु०३ स्वर्गगताः । एवंविधाः परमसौभाग्यधारिणः सकलजन्मनो- हारिणः सर्वसिद्धान्ताध्ययनकारिणः सर्वत्रविख्यातकीर्तिभरा जंगमयुगप्रवराः श्रीबहत्खरकर गच्छेश्वराः वागजितसुरेंद्रसूरयः श्रीजिनचंद्रसूरयः संजाताः ॥ ६८॥ : प || खरतरगच्छ पट्टावली-१॥ गांमीर्यादिगुणग्रामवेश्मनां शुद्धचेतसां। श्रीजिनलाभसूरीणामाज्ञामादाय शोमनां ॥१॥ श्रीजिनभक्तिसूरीन्द्रशिष्या बुद्धिवार्द्धयः। प्रीतिसागरनामानस्तच्छिष्या वाचकोत्तमाः ॥२॥ श्रीमंतोऽमृतधर्माख्यास्तेषां शिष्येण धीमता । क्षमाकल्याणमुनिना शुद्धिसंपत्तिसिद्धये ॥३॥ संवत्सरे व्योमकृशानुसिद्धि क्षोणी (१८३०) मिते फाल्गुन मासि रम्ये । विशुद्धपक्षे लिखता नवम्यां गुरुस्तुति र्णगढे नवासौ ॥ इति श्रेयः॥ [ अनुपूर्तिः] ७०. तत्पट्टे श्रीजिनहर्षसूरयः। तेषां वालेवाग्रामे जन्म, हीरचंद्रेति मूलनाम, मीठडियावृहि- रागोत्रीय साह तिलोकचंद्रः पिता, तारादेवी माता । सं० १८४१ आऊआमे दीक्षा, हितरंग इति दीक्षानाम; सं० १८५६ ज्ये० सु० १५ श्रीसूरतविंदरे श्रीसंघकृतोत्सवेन सरिपदं जातं । श्रीजिनहर्षसूरिरितिनाम विहितं । तदा तस्मिनगरे श्रीसंघेन चैत्यविप्रतिष्ठा करापिता । तथा सं० १८६० अक्षयतृतीयायां तिथौ देवीकोटवास्तव्य श्रीसंघकारित देवगृहे साई अतबिंबानां प्रतिष्ठा व्यधायि । तथा पुनर्जालोरनगरे मंत्रि अपयराजकारित देवगृहे प्रतिष्ठा निर्मिता । तथा सं० १८६६ चै० सुदि १५ गिडीयासंघपति राजाराम लूणीया गोत्रीय साह तिलोकचंद कृत संघे सपाद लक्ष श्राद्धैः एकादश शतसाधुभिः सह श्रीगिरनार-पुंडरीकादी यात्रामकुर्वन् । ततो गुरवः अनेक देशेषु विहत्य सं० १८७० शिखरगिरिराज तीर्थस्य पात्रां चक्रुः । पुनरपि सं० १८७६ श्रीसंघेन सह शिखरागरियात्रां चक्रुः। ततः पश्चाद् दक्षिणदेशे अंतरीक पार्श्वनाथ, मगसी पार्धनाथ, धुलेवगढ इत्यादि तीर्थयात्रां कुर्वता सं० १८८७ आवार मुदि १० तिथौ श्रीवीकानेरे श्रीसीमंधरस्वामिमंदिरे पंचविंशति विवानां प्रतिष्ठा निर्मिता । सं० १८८९ मा० सु०१० तिथौ श्रीवीकानेरे सेठियागोत्र साह अमीचंद कारित सम्मेतशिखर मिरिमावविराजितमंदिरस्य प्रतिष्टा विहिता। तस्मिनक्सरे जेसलमेरवास्तव्य वाफमा साह- बाहदरमल्ल बोरावरमल्लकस्य हृदये सिद्धाचलगिरियात्राविचारो बभूव । मनसीति विचारः स सत्सकः-यः सिद्धाचलगिरि सृथति तस्य जीवितं सफल भवति' इति विचार्य सर्व परिवारेसह विक्रमपुरे आगताः, महामहोत्सवेन बहुद्रव्यव्ययेन गुरवः वैदिताः, सशस्त्रानेषु बहु द्रवंद, बदा सर्व साधन प्रति बहु वस्त्राप्यर्पितानि । तदा गुरवः श्रीसंपेन सह सिद्धाचलगिरियात्रा प्रतिचेल:। अंतराले वर्षाकालस्समागतः। तदा गुरवः मंडोवरे चतुर्मास्यां स्थिताः। एवं विधा: बितानेकवादिनः जिनशासनोद्योतकराः गुरवस्तव मंडोवरे सं० १८९२ का० ० ९ चतु: महराणि यावदनशनं प्रपाल्य स्वर्गगताः॥ ७१. तत्पढे एक सप्ततितमाः श्रीजिनसौभाग्यसूरयः । तेषां च मारवाडवास्तव्य स्वाई सेर- बाबामे सं० १८६२ जन्म, मुरतरामेति मूलनाम, गवघर चोपडाकोठारी गोत्रीय साह करमचंदः पिता, करुणा देवीमाता, सं० १८७७ सिंघिया दोलतरावकस्व लस्करे दक्षिा शौभाग्यविशा- लेति दीवानाम, सं० १८९२ मार्गशीर्ष शुक सतम्यां गुरुवारे शुमलमे भीमविक्रमनगरे सबा- नवी साह लालचंद सालमासिंह कतनंदी महोत्सवेन सरिपदं बात ॥
। परिशिष्टम्. -- Ver- [प्रत्यन्तरे ६२ तम पट्टपश्चात्-यावत् ७१ पतम पट्टपर्यन्तं निम्नलिखिता मित्र पट्टपरंपरा समुपलभ्यते.] ६३. तत्पढे त्रिषष्टितमः जिनसागरसूरिः। तस्य च वोहित्थरागोत्रीयः श्रीवीकानेर- वास्तव्य साह वच्छराजः पिता, मिरगादे माता। सं० १६५२ वर्षे कार्तिकसुदि १४ रखी अधिन्यां जन्म, चोला मूलनाम । सं० १६६१ वर्षे माहसुदि ७ दिने अमरसरसि श्री जिनसिंह- सरिणा दीक्षितः। श्रीमालचुहरा अचूका श्रावकैनंदीमहोत्सवः कृतः। वादी श्री हर्ष- मंदनगणिना बाल्यत आरम्य सर्वशास्त्राणि पाठितानि। सं० १६७४ वर्षे फाल्गुनसुदि सप्तम्यां मेडताख्ये नगरे चोपडागोत्रीय साह आसकरणकृतमहोत्सवेन सूरिपदं जातं, श्री जिनसामरसरिरिति नाम विहितं । तथा द्वितीय शिष्य बोहित्यरागोत्रीय राजसमुद्र- मणिः, तस्मै आचार्यपदं दत्तं, जिनराजसूरिरिति नाम विहितं । ततो द्वादशवर्षाणि यावदा- चार्य श्री पूज्यानां आज्ञायां प्रवृत्तः, पश्चात् आचार्य जिनराजसूरितः त्रिभिर्गच्छो विभिनः । वस्य व्यवस्था इयं-सं० १६९९ मिते बृहत् भट्टारक श्रीरंगविजयगणितो रंगविजय खरतर शाखा मिश्रा, अयं नवमो गच्छमेदः। ततः तन्मध्यात् श्रीसारोपाध्यायतः श्रीसारीय खरतर शाखा मिना, अयं दशमो गच्छमेदः। ततः सं० १७१२ आचार्य जिनराबसूरीणां द्वितीय शिष्य रूपचंद्रेण लघु भट्टारक खरतर शाखा भित्रा, अयं एकादशमो गच्छमेदो आतः। ततः महारक श्री जिनसागरसूरिभिः सं० १६७४ वैशाख सुदि त्रयोदश्यां शुक्रे श्रीराज- नगरवास्तव्य प्राग्वाटज्ञातीय संघपति सोमजीपुत्र रूपजीकारित श्री अटुंबयोपरि चतुर्दार विहारहारायमाण श्रीऋषमादिजिनकाधिक पंचशत (५०१) प्रतिमानां प्रतिष्ठा विहिता । एवंविधाः श्रीजिनमतोमतिकारकाः, अंबिकाप्रदत्तवरधारकाः, समस्ततर्कव्याकरण- छंदोलंकारकोषकाव्यादि विविधशास्त्रपारिणः, स्थाने स्थाने सर्वत्र भावकैमानिता, परम- संवेगवंता, माग्यसौभाग्यवंतः, महारक श्रीजिनसागरसूरयः श्री अहमदापादनगरे सं. १७२० वर्षे ज्येष्ठवदि तृतीयायां एकादशवासराजशनं विधाय, स्वपड़े श्री विन- वर्मसूदिान संस्थाप, सर्वशिष्याणां शिक्षा दत्वा स्वर्ग जग्मुः। अयमष्टमस्तु वृहत्तरवरमाला मूलगच्छः । एवमेकादशमेदः खरतर गच्छः ॥६३ ॥ ६४. तत्पडे चतुषष्टितमः श्रीजिनधर्मसूरिः। स च मणशालीगोत्रीय श्रीवीकानेर- बास्सय सारिषमलमार्या रतनादेपुत्रः, सं० १६९८ वर्षे पौषमुदि २ अभिजित् नक्षत्रे जन्म, खरहय मुलनाम । सं० १७........वर्षे वैशाखमुदि ३ दिने श्रीजिनसापरसृरिणा दीक्षित बादि श्री हनदनगमिना बाल्ये क्यसि सर्वशासानि पठितानि। सं० १७११ बर्षे मार- सुदि १२ आचार्यपदमहोत्सवः चई (१) मार्य विमलादे रातः ।सं० १७२० वर्षे मी विक- ॥ खरतरगच्छ पट्टावली-२॥ मपुरे भट्टारक पदमहोत्सवः गोलवच्छा अचलदासजीकेन कृतः। ततो भट्टारक श्रीजिन- धर्मसूरिभिः साह उग्रसेन रतनकृत श्री शंखेश्वरपार्श्वनाथ संघयात्रा कृता, पुनः शत्रुजये पष्ठाष्टमादितपः कृतं, सर्वदेशेषु सर्वक्षेत्रेषु विहारः कृतः। सं० १७४६ वर्षे मृगसिरवदि ८ श्रीजिनचंद्रसूरीणां गच्छभारं स्वकीयपटुं समर्प्य श्री लूणकरणसरसि नगरे स्वर्ग गताः॥४॥ ६५. तत्पट्टे पंचषष्ठितमः श्रीजिनचंद्रसूरिः। वावडीयग्रामवासी वुहरागोत्रीय साह सांमलदास साहिबतयोः पुत्रः, सं० १७२९ वर्षे जन्म, सुखमल्ल नाम । सं० १७३८ वर्षे श्रीजिनधर्मसूरिपार्श्वे दीक्षा गृहीता। सं० १७४६ वर्षे मृगसिरसुदि १२ लूणकरणसरसि भट्टारक पदं प्रासं, तदुत्सवश्च छाजहड रतनसी जोधाणीकेन कृतः। ततः सर्वदेशेषु विहत्य सं० १७८५ वर्षे श्रीवीकानेरमध्ये श्रीजिनविजयसूरीणां आचार्यपदं दत्तं । ततः सं० १७९४ वर्षे ज्येष्ठसुदि १५ दिने श्रीवीकानेरनगरे सर्वायुः ६५ वर्षाणि प्रपाल्प स्वर्ग गताः ॥६५॥ ६६. तत्पट्टे षष्ठषष्ठितमाः श्रीजिनविजयसूरयः । कीदृशाः-नाहटागौत्रीय साह डुंगरसी दाडिमदेपुत्र, सं० १७४७ वर्षे जन्म, नाम रतनसी। सं० १७५३ वर्षे श्रीजिनचंद्रसूरि- पार्श्वे दीक्षा । सं० १७८५ वर्षे श्रीवीकानेरमध्ये आचार्यपदं प्राप्त, तदुत्सवः श्री हाजी- खांनडेरा वास्तव्य डेहरा थाहरुमल्लकेन कृतः। सं० १७९४ वर्षे श्री वीकानेरमध्ये भट्टा- रकपदं प्राप्त, तदुत्सवश्व डागा पुंजाणी कृतः, प्रभावना बाई फूलां कृता । सं० १७९७ वर्षे आसो वदि ६ दिने जेसलमेरुदुर्गे दिवं गताः ॥ ६६ ॥ ६७. तत्पट्टे सप्तषष्ठितमाः श्रीजिनकीर्तिमूरयः । तेषां च मारवाडवास्तव्य खीवसरा गोत्रीय साह उग्रसेन पिता, उच्छरंगदेवी माता, सं० १७७२ वर्षे वैशाख सुदि सप्तम्यां फल- वीनगरे जन्म, किसनचंद्रेति मूलनाम । सं० १७९७ जेसलमेरु मध्ये भट्टारक पदं प्राप्त । अनेक देशेषु विहारं कृत्वा पूर्वदेशे समेतशिखरादि तीर्थ यात्रां कृत्वा मुकमुदाबाद मध्ये चतुर्मासकत्रयं कृतं, पश्चात् ततो विहारं कृत्वा अनुक्रमेण श्री विक्रमपुरे प्राप्तः । पथाव सं० १८१९ विक्रमपुरे दिवं गताः ॥ ६७॥ ६८. तत्पट्टे अष्टषष्टितमाः श्री जिनयुक्तसूरयः। तेषां च मारवाडवास्तव्य वुहरा गोत्रीयः साह हंसराज पिता, लालदेवी माता, सं०,१८०३ वैशाखसुदि पंचम्यां जन्म, मूलनाम जीमणेति । सं० १८१५ भट्टारक जिनकीर्तिसूरिणा स्वहस्तेन दीक्षिताः । अनेक- शास्त्रपारगा एतादृशाः, सं० १८१९ भट्टारकपदं श्री विक्रमपुरे प्रासं, तदुत्सवश्च गोलेच्छा कृतः। ततो विहारं कृत्वा श्री जेसलमेरुदुर्गे सं० १८२४ आसो वदि द्वादश्यां स्वर्ग गताः ॥६८॥ ६९. तत्पढे एकोनसप्ततितमाः श्रीजिनचंद्रसूरयः। तेषां च ग्राम भगवास्तव्य रेहडगोत्रीय साह भागचंद्र पिता, माता च भक्तादेवी । सं० १८०३ चैत्रसुदि चतु- ईयां जन्म। सं० १८२० युगप्रधान श्री जिनयुक्तसूरिणा स्वयमेव दीक्षा दत्ता, ततो व्याकरणादि समग्रसिद्धान्तपारगाः, परमतखंडन प्रवीणाः, एवंविधा बभूवुः। सं० १८२४ .
|| खरतरगच्छ पट्टावली-१ ॥ श्री जेसलमेरदुर्गे आचार्यपदं प्राप्त, तदुच्छवश्च लक्षव्ययेन भूपाल मूलसिंघेन नंदि- महोत्सवो कृतः। अथान्यदा रतलामपुरे चतुर्मासी कृता, तत्र जिनबिंबस्य प्रतिष्ठामकरोत् । ततः श्री शत्रुजयादि यात्रां कृत्वानुक्रमण विक्रमपुरं अगमत् । अथान्यदा श्री आचार्यस्य मुखात् धर्म श्रुत्वा विक्रमपुरस्य राजा परमश्रावको जातः। एवंविधा जिनचंद्रसूरयः जेसल- मेरदुर्गे सं० १८७५ कार्तिक सुदि पूर्णिमायां स्वर्ग गताः ॥६९ ॥ ७०. तत्पट्टे सप्ततितमः श्री जिनउदयसूरिः । सच सौवमपालग्रामवास्तव्य वोत्थरागोत्रीय साह जयराजपिता, जयदेवी माता तयोः पुत्रः। सं० १८३२ माघ सु० सप्तम्यां जन्म । सं० १८४७ मृगसिरसुदि तृतीयायां भट्टारक श्री जिनचंद्रसूरिणा दीक्षा दत्ता । सं० १८७५ मृगसिरसुदि पंचम्यां जेसलमेरदुर्गे आचार्यपदं प्रासं, तत्र तत्पट्टमहो- सवः संघवी तिलोकचंद्रेण सहस्र द्रव्यव्ययेन नंदिमहोत्सवः कृतः । अथान्यदा मंदसोर पुरेगमत् , तत्र सं० १८९३ वैशाखसुदि तृतीयायां ऋषभजिनस्य विच प्रतिष्ठितं । पुनः विक्रमपुरे सं० १८९७ वैशाखसुदि षष्टयां श्री शान्तिनाथबिंब प्रतिष्ठित । सं० १८९७ वैशाखसुदि त्रयोदश्यां दिने विक्रमाख्ये पुरे स्वर्गमगमत् ॥७॥ ७१. तत्पट्टे एकसप्ततितमः श्रीजिनहेमसूरिः ।। गो....त्रीया साणियाला प्राम वास्त- व्यः साह पृथ्वीराज मा० प्रमादेवी तयोः पुत्रः, सं० १८६६ वर्षे आसाढशुक्ल प्रतिपदायां पुष्यनक्षत्रे जन्म, हुकमचंद मूलनाम । सं० १८८३ वर्षे वैशाखसिते तृतीयायां श्रीजिन- उदयसूरिणा दीक्षीतः। दीर्घदर्श कस्तुरचंद्रजीगणिना बाल्यावस्थायां शास्त्राणि पाठितानि । सं० १८९७ वर्षे ज्येष्ठशुभ्रदले पंचम्यां तिथौ श्री विक्रमपुरे भट्टारकपदमहोत्सवः डागा सुरतरामजीकेन कृतः। ततो भट्टारक श्री जिनहेमसूरिभिः इंदोराख्यपुरे ऋषभेश्वरबिंब- प्रतिष्ठा कृता, तत्र श्री संवस्य द्विधाभावं निवार्यानंतर मनोदप्रामे श्री पार्थप्रभोबिंवप्रतिष्टा विहिता । पश्चात् श्री शझुंजयादि तीर्थयात्रां कृत्वा सर्वदेशेषु विहत्य विक्रमपुरे प्रातः । तस्मिन् चिरं पदं भुक्तवान् । Q -- 7 ॥खरतरगच्छ पट्टावली॥ [३] अथ पहावली लिख्यते । प्रथमं श्रीउद्योतनसूरिः। सुविहितचक्रचूडामविलक- क्रियाकर्वा जिनशासनसाधुमार्गप्रकाशको बभूव । एकदा मालवदेशात् बहुश्रीसबसहितः श्रीशत्रुञ्जयतीर्थयात्रा गच्छदिमध्यरात्री आकाशे रोहिणीशकटमध्ये बृहसतिः प्रविष्टो दृष्टः । श्रीसूरिभिस्वतं 'यदि साम्प्रतं सूरिपदं यस्य दीयते स गच्छाधिपतिर्महान् मावी, गच्छाडि प्रामोति; मवेषिताः साधवः परं पार्थे नोपलभ्यते'। तदा गणेशेनोक्तं भवच्छिप्यो वृद्धाख्योड स्ति तस्य दीयतां यदि वेलामाहात्म्बमास्ति अयमपि भाग्याधिको भविष्यति । वासो नास्ति । गोछगणकचूर्णेन लुंकडीयावडवृक्षाधः स्थापितो वर्धमानसूरिः श्रीउद्योतनसूरिमिः । क्रमेवाय श्रीवर्धमानसूरयो बहुपरिवारा जाताः। तस्मिन्नवसरे विमलदण्डनायकेन गुर्जरराज्ञा सम्मानि- तेनार्बुदाचलधरित्र्यां आरासननगरे अम्बायाः कुलदेव्याः प्रासादः कारितस्तत्रागम्य स्वमे देव्या दर्शनं दत्तं । खहं गृहाणेत्युक्त्वा रुप्यत्रम्बकषानी दर्शते च तया । ततस्तेन महत् सैन्यं कृत्वा देवीमाहात्म्येन चतुर्विशति देशा गृहीताः । छत्राणि अग्रे ताड्यन्ते वणिक्कुलत्वात शीर्षे न स्थाप्यन्ते तस्येति । सौराष्ट्रादिमहादेशेषु प्रोढाज्ञां प्रतिपालयन् बहुकालं निनाय । सः अन्यदाऽर्बुदाचलेगात् श्रीमार्यासुप्रभातपुत्राभ्यां साधं । शुभस्थानमालोक्य श्रीः प्रोचे विमल स्वामिनत्र स्थले चेत् जिनप्रासादः कार्यः ते तदा महान् लामो भवति । द्विजाः पृष्टाः प्रोचुरिदमस्मदीयं तीर्थ न कदाचिज्जैनतीर्थमत्रासीत् । इत्युक्त्वा विप्रैर्महान कलिः प्रारब्धः, मरणाय बहवो ब्राह्मणा उद्यता जाताः। तस्मिन्नवसरे श्रीवर्धमानसूरयः समेताः विमलेन वन्दिताः पृष्टाश्च, भगवन् अत्र जैन चैत्यं नास्ति अहं तत् चैत्यं कारयामि । परं विनरतार्थ कर्म प्रारब्धं किं क्रियते । अवचेत् जिनप्रतिमा निर्गच्छति तदा एते यान्ति । ततः भीमसिमित सपादकोटि सूरिमन्त्रजापेन धरणेन्द्रं समाहूम तस्याग्रे वार्ता उक्ता, तेन त्वरितमेव श्रीआदि- नाथप्रतिमा धनुःपञ्चाशादधःस्थाद्दर्शिता । अत्र तीर्थकरप्रतिमासीत् इत्युक्त्वा ततो विमलेन सर्वे द्विजा मेलिताः। यत्रेयं मालापतति ततोऽयो जिनप्रतिमा । क्रमेण निःसृता जिनप्रतिमा । द्विजाः प्रोचुर्मवदीयं तीर्थ पुरासीद परमधुनास्माभिः गृहीतं । महीं मौल्येन दास्याम इति । कृपालुना विमलेन मधुकरीभिर्धरा पूरिता अन्तरालधरा तिष्ठति सापि पूरिता, पशक तत्र मात विमलेन हठात् चिन्तितं सर्वोऽप्ययं गिरिर्मया स्वर्णमुद्रया गृहीप्यते । द्विजैरचिन्ति तीर्थमस्म- दीयं सर्व यास्यतीति विचिन्त्य स्तोकैव घरा दचा । तत्र महान् श्रीआदिनाथप्रासादः कारितः । अथैकदा श्रीसूरयः सरस्वतीपत्तने जग्मुः। शालायां स्थिताः स्वशिष्यान् तर्क पाठयन्ति। तदा जिनेश्वरबुद्धिसागरी विप्रौ श्रुत्वा तर्कशालायां समेतौ । वादः कृतः गुरुमि- ईसाधर्मो व्याख्यातः। ताभ्यामूचे दयावन्तो विप्रा एव । सूरिभिस्वा न विशेषु दवा प्राप्यते ।
॥ खरतरगच्छ पट्टावली-३ ॥ ताम्यामुक्तं कथं नेति । गुरुभिः सातिशयैर्वभाषे युवयोः शिरसि मृतमत्स्योऽस्ति । ताभ्यां तथैव दृष्टः । प्रतिबुद्धौ द्वाभ्यामपि दीक्षा गृहीता । पठितानि सम्यग् शास्त्राणि । गुरुभिः पट्टे स्थापितः जातः श्रीजिनेश्वरसूरिः॥ अपरो भ्राता आचार्यों बुद्धिसागरः। - अन्यदा गुर्जरधरित्र्यां श्रीअनहिल्लपाटके श्रीसूरयः समेताः। तत्र दुर्लभो राजा अतीव-विज्ञः षट्दर्शन पूजकः । तत्र चैत्यवासिनोऽतीवप्रमत्ताः साधुजनद्वेषिणः सन्ति । श्रीजिनेश्वरसूरिः, भ्राता बुद्धि- सागराचार्यः स्वमातुलगृहमागतः । चैत्यवासिनां निर्णीतिर्जाता । प्रभाते राज्ञः सभायां चैत्य- वासिनः समेताः। श्रीगुरवोऽपि राज्ञा पृष्टा युष्माकं मध्ये के सदाचाराः। गुरुभिरुक्तं ये सिद्धान्त- प्रोक्तमार्गानुयायिनस्ते सत्याः। राज्ञा निजकन्या भाण्डागारे मुक्ता, हे कन्ये त्वं पुस्तकं यथा- रुचि गृहीत्वा समानय। सा गता प्रथमत एव दशवैकालिकसूत्रं समानीतं समा समक्षं, चैत्यवा- सिनः पुस्तकं गृहीत्वा वाचयन्ति स्म । गुरुभिरर्थोऽभिहितः। साध्वाचारे गोचर्याधिकारे पत्र चतुष्कमाच्छादितं । गुरुभिरुक्तं-राज्यपर्षदि स्तैन्यं जायते । पत्राणि निर्वासितानि । एतेस- त्यवादिनस्तस्कराः। यूयं खरतराः, इति सत्यवादिनः । गुरुभिरुक्तमेते कोमलाः इति । ततः श्रीगुरुभिः खरतरबिरुदं प्राप्तं । दससय चिहु वीसेहि नयरपाटण अणहिलपुरि । हुओ वाद सुविहित चहवासीसु बहुपरि । दुलमनरवइ समासुमुषि जिाण हेलइ वजित्तउ । चित्तवास उत्थपिअ देस गूरजरहिव दित्तउ । सुविहितगच्छखरतर बिरुद दुलभनरवइ तिहां दियउ । श्रीवर्धमान पदृइ तिलउ सूरि जिणेसर गहगाउ ॥ गच्छस्थापना जाता। बहवः श्रावका बभूवुः। २. तेषां पट्टे श्रीजिनचन्द्रसूरयः । मोजदीन पातिसाहस्य पिंजारकगृहस्थितस्य उक्तम- भूत, यथायं ढिल्यां मालवोपि पातिसाहो भविष्यति । ततः क्रमेण कस्यापि म्लेच्छस्य पवासो जातः । एकदा पातिसाहेनोक्तं म्लेच्छस्य एष सेवको सबालोऽस्माकं देहि। तेन दत्तः। शतवर्षीयो मृतावस्थाप्राप्तः पातिसाहः क्षणं यावत् सचेतः क्षणं अचेतो भवति । तदा पाति- साहपुत्रो मोजदीनः पिंजारकपुत्रो पि षवासो नाना मोजदीनः । षवासः तिष्ठन् पार्थे परिचर्चा करोति, तावत् प्रधानपुरुषैरुक्तं स्वामिन् पुत्रस्य राज्यं देहि । तेनोक्तमवसरे दास्यामि। अन्यदा मध्यरात्रौ श्वासश्चटितः, ज्ञातं म्रियते, आकारितः पुत्रो मोजदीनः । पुत्रस्य निद्रा समेता । खावासेन ज्ञातं परिचर्यार्थ मामाकारयति । आगतःपवासः पुत्रभ्रान्त्या शिरः टोपी तस्य शिरसि न्यस्ता, षड्गः करे दत्तः। स्वयं प्रणामः कृतः। मिलिताः प्रधानाः प्रोचुः-स्वामिन् किंकृतं ? नामनांत्या पवासस्य राज्यं दत्तं । पातिसाहेनोक्तं-मया यत् दत्तं तत दत्तमेवेति । सत्पुरुषवाक्यं नान्यथा स्यात् । पुत्रः प्रणष्टः खवासस्य राज्यं जातं मोजदीनपातिसाहिरिति । अथ श्री जिनचन्द्रसूरिमिर्जातं स एव पिंजारकपुत्रोऽस्मत्कथितः पातिसाहिर्जातः । ढिलीमण्डले साधूनां विहारो नास्ति । अनेक मुल्ला-सेख-काजी-प्रमुखैर्दृषिभिर्निवारितो । वर्ष यामो येन साधूनां विहारो भवेदिति विमृश्य तत्रागता गुरवः । श्रीमालधनपालगृहस्थिताः ।
१५ ॥ खरतरगच्छ पट्टावली-३॥ तेनोक्तम्-'श्रीपूज्यानामत्रागमनं दुःखाय भविष्यति । सो आगतोऽस्ति । धनपालो जगाम तथैवोवाच च । प्रभाते महोत्सवेन समानीताः गुरवः । पतितः पादयोः । सर्वत्र देशे साधूनां विहारो जातः। बहवः श्रावका जाताः । धनपालकटाकजाता महुतीयाण गोत्रीया इति । मुहुतीयाण डादुइ जिण नमइ कइ जिण कइ जिणचंद । तस्य पद्मावती प्रत्यक्षासीत् गुरुभिरुक्तं-अस्माकं गच्छो यथा वर्धते तथा कुरु । देव्योक्त गच्छो वर्धिष्यते, चतुर्थपट्टे भवदीयं नामदेयमिति। तेन दीयते स तु प्रायो भव्यो भवति । तच्छिष्यः श्रीअभयदेवसूरिः। षोडशवर्षे आचार्यपदं । प्रथमे दिनेऽतिकाररसो व्या- ख्यातो, लोका हर्षिताः । परं गुरुभिरुक्तं-शिष्य, शृङ्गाररसोऽतीव साधुमिर्न वर्ण्यते । यतो विनाशो भवति धर्मस्य । त्वं नीरागी, परं लोकाः सरागाः सन्तीति । तदोत्थाय साधुसमक्ष पविकृतित्यागं विदधाति स्म । ठूबर छासि जलं एतत् द्रव्यत्रयं गृहीयामीत्यमिग्रह ललौ । क्रमेण गलितकुष्टी जातः। गलिताः नासिकाद्याः शरीरावयवाः मुखवत्रिकामपि गृहीतुं न शक्रोति । तदा त्रम्बावतीपुरश्रावकाणां पुरतः प्रोचे गुरुभिः, चेत् संघः कथयति तदाह- मनसनं गृह्णामि । सङ्घनोक्तं प्रातः । ततो रात्रौ शासनदेवता आगता कथित नवैताः सूत्रकोकड्यः संति ता उद्धर । तेनोक्तं अङ्गुलीभिर्विना कथमुद्धरामि। तयोक्तं-सेटिका- नदीतीरे पाषरापलाशतरुतले धेनुग्धं स्रवति तत्र श्रीस्तम्भनकपार्श्वनाथप्रतिमास्ति नागार्जुनेन क्षिप्तास्ति । तत्र गत्वा निजबुद्धया स्तवनं कृत्वा तिष्ठ, तत्स्नानोदकेन स्वर्णसमशरीरं ते भविष्यति । ततः प्रभाते श्रीसङ्घपुरतो वार्ता कथिता। सङ्घो जहर्ष । श्रीसङ्घन समं श्रीगु- रवस्तत्र गताः । गोपालेन दर्शितः एलाशः। नवीनस्तोत्रं कृतं 'जयतिहुयणवरकप्परक्त इत्यादि स्तवनप्रभावेन प्रकटिता श्रीस्तम्भनकपार्श्वेश प्रतिमा। श्रीसङ्घन पूजा कृता । स्नानो- दकेन गतो रोगः सकलोऽपि । श्रीजिनशासनमहिमा जातः। सकलदेशे बहवः श्रावका जाताः । ततोऽन्यदा शासनदेवी समायाता । तयोक्तं त्वयोक्तमत् हस्ते सज्जीकृते कोकडी- रूद्धरिष्यामि, तदधुनोद्धर । नवाङ्गानां वृत्तिं कुरु । ततो नवाजानां वृत्तिः कृता, प्रतिमा मायतनगरे स्थापिता । जयतिहुयणद्वात्रिंशिका सर्व श्रावकश्राविकाभिः पठिता। तत्र प्रान्तगाथायां धरणेन्द्रपद्मावत्योराकर्षणमन्त्रं समानीतं नायोऽपित्रापठन्ति (१)। ततः कुप्यत- स्तोकेनापि धेनुदुग्धाग्रहणावसरो गुणितं स्तवनं सेहलात् सर्पो बभूव (१)। ततः सूरिभिट्टे गावे भण्डारिते, विना कष्टं न जप्येते इति । श्रीअभयदेवसरिराचार्यों जातः न भट्टारकस्तेन नामादौ जिनपदं न दत्तमिति । अथ श्रीगुरुणा श्रावक एकः प्रतिबोधितः परमजैनधर्मका- सितः, स मृत्वा देवलोकं गतः । देवलोकात् तीर्थकरवन्दनार्थ महाविदेहे गतो देशना- नन्तरं श्रीसीमन्धराः पृष्टाः-मम गुरवोऽभयदेवसूरयः कतमे भवे मुक्तिं गमिष्यन्ति । उक्त प्राणा तृतीये भवे । पृष्टो वोघोति वेदितं श्रीअभयदेवसूरीणां यतः मणियं तित्ययरेहिं महाविदेहे भवमि तइयंमि। तुम्हाण चेव गुरुणो सिग्धं मुर्ति गमिसति। कर्पटवाणिज्ये नगरे भीअभवदेवा दिवं गताः चतुर्थदेवलोके विजयिनः सन्ति । - ॥खरतरगच्छ पहावली-३ ॥ अन्यदा चित्रकूटे कच्चोलाक्षा आचार्याः सन्ति, तेषां शिष्यो वल्लभाभिधः। स तु अत्यन्तसंवेगी परं सर्वशास्त्राणि अधीतानि । यः कोऽपि नवीनः पण्डित आगच्छति तस्य वा- देन जित्वा स्वर्णकच्चोलकं गृह्णाति, तेन भोजनं करोति, तेन नाना कचोलवृक्षाभिषः । अन्यदापडीगणार्थ आचार्या ग्रामं गताः। वल्लभस्योक्तं सर्वपुस्तकंतवायत्तमस्ति परमेषा अपवरिका नोद्घाव्या । ततस्तेन सैवैकान्ते दृष्टा । एकादशाङ्गानि वाचितानि । ज्ञातः साधुमार्गः। गुरुणा पृष्ट, सिद्धान्तकारणकथितं, यतिरहं भवामि भवदाज्ञया । ततो दत्तादेशः खरतरगच्छे श्रीअभ- यदेवरिपाई दीक्षा गृहीता । अत्यन्तवैराग्यवान् जातः। श्रीअभयदेवसूरिभिः अन्त्यसमये प्रोक्तं-वल्लभस्य पदं देयं । नतो गच्छवासिनः पदं न प्रयच्छन्ति, कोमल्योयं न विश्वासोऽस्य । एकदा त्रिस्थानको गुरुः चित्रकूटे गतः। चामुण्डाप्रसादे स्थितः। शिष्यमकं मुक्त्वा स्वयमाहारार्थ गतः। पश्चात् शिष्येण चामुण्डाअक्षिणी उत्पाटिते क्रीडया, शिष्य अंधो जातः। आगतो गुरु, शिष्येण प्रवृत्तिरुक्ता । तत्रैव स्थित्वा एकविंशतिकाव्यैश्चामुण्डा प्रतिबोधिता। शिष्यः सजी- कृतः । देव्या हिंसा त्यक्ता, गुरोर्महान् लाभो जात इति। तथा बागडदेशे श्रावका बहवो प्रति- बोधिताः-दशसहस्र प्रमाणाः। संघपट्टनामा ग्रन्थो विहितः लघुर्वद्धोऽपि। पिण्डविशुद्धिनाम शास्त्रं कृतं । शुद्धमार्गः प्ररूपितः। वर्ष १२ यावत् आचार्यगच्छो निर्वाहितः, तदा मधुकरखर- तरगच्छ निर्गतः। सौराष्ट्रदेशे प्रसिद्धः। चिन्तामणिपार्श्वनाथप्रासादे प्रशस्ति-काव्याष्टकं लिखितमस्ति । तथा 'भावारिवारण' स्तवनं निजनामरहितं कृतं । चित्रवालगच्छनायकेन गृहीतं । चैत्रकूटे चैत्यानर्णये जाते चरणे पतितः ततो निजनामस्तोत्रे समानीतं । षण्मासायुषि पट्टो दत्तः। संवत् ११६७ वर्षे आसाढवदि ६ दिने पट्टे स्थापना श्रीदेवभद्रसूरिणा कृता श्रीचित्रकूटे। ततो मृत्युअवसरे गच्छेषु गवेषितो वाचनाचार्य जयदेवशिष्यः जिनदत्ताभिधः डंबडजातीयः पट्टार्थे । श्रीजिनवल्लमः स्वर्गतः। ततः श्रीसंघेन समाकारितः श्रीजिनदत्तः सर्व शास्त्रवेत्ता मार्गे आगच्छन् सारंगपुरे एक: कोमल्यौपाध्यायस्तस्य शिष्याः सन्ति परमतीव मन्दमतयः, पाठकस्य तदा मरणावस्था समेता, कोऽपि नाराधनाकारकस्तादृग् विद्वान्, तदा तं तथाविधं समालोक्य ज्ञातमरणो जिनदत्तः करुणापरो धर्ममनशनलक्षणं तस्मै ददौ । सोऽपि दिनत्रयमनशनं प्रतिपाल्य महर्षिको देवोऽभूत् । तेन जिनदत्तोपकारं स्मरता रात्री प्रत्यक्ष समेत्योचे तव सानिध्य सर्वदा करिष्यामि। परं तव पट्टाभिषेको मुहूर्तत्रयं गवेषितमस्ति, प्रथमे षण्मासे मृत्युः; द्वितीये गच्छस्कोटो भकि- प्यति, तव गच्छानिष्कासनं; तृतीये सुंदरं भावीति । परमियं प्रवृत्तिर्मम न कस्याप्यो वाच्या। ततः समागतो जिनदत्तः प्रथममुहूर्ते कायोत्सर्गे स्थितः। वेला व्यतीता। द्वितीयेऽपि कायो- त्सर्गः समारब्धः साधुश्रावकैनिषिद्धः। ततो द्वितीये मुहूर्त स्थापितः। संवत् ११६९ वर्षे वैशाख सुदि १० दिने सन्ध्यालग्ने श्रीदेवभद्रसूरिणा, चित्रकूटे श्रीमहावीरभवने, नाम श्री जिनदत्तसृरिरिति जावं। सर्वेऽपि साधवः स्वीयस्थाने गताः। इतथेको महात्मा श्रीजिनवल्लमेन गच्छाविष्कासितोऽभूत, असमप्रतिक्रमणापराधेन । स तदा समागतः ममोपरि कृपा इस्त।
॥ खरतरगच्छ पट्टावली-३ ॥ गुरुभिः क्षिप्तः। आगताः साधवः । अहारार्थ मुखवत्रिका प्रति लेखयतो गुरोधोलपट्टः स्फाटितो, ज्ञातं गच्छो द्विधा भविष्यति । तदा वारिकरणावसरे त्रयोदशाचार्यरुक्तं एष बाह्यः कृतोऽस्ति, अस्य दृष्टया आहारो न कर्तव्यो भवद्भिः। गुरुभिरुक्तं-अयं क्षिप्तो मया गच्छे । कुपिता आचार्या:-अद्यैव स्वयं कर्ता जातः । अयोग्योऽयमस्माकं न पृच्छति । समिलित्वा निष्कासितो गुरुर्गच्छात् । ततः पट्टाभिषेककारकस्य श्राद्धस्योक्तं सूरिणा वर्षवयं यावत् मम मार्गोऽवलोक्यो भवता, यदि मम माहात्म्यं भवति तदाहमेव भवतो गुरुः, नान्यथेति । त्रिस्थानकेन निर्गतो गुरुः क्रमेण विक्रमपुरे समागतः । तत्र मरकोपदवो महान् । जनैः पृष्टा गुरखो, गुरुरूचे-यस्य चत्वारः पुत्राः सन्ति स एकं मह्यं ददातु, यस्य च तिस्रः पुत्र्यः स एकां चेति । तैर्मणितं गत उपद्रवे दास्याम इति । ततो गुरुणा 'तं जयउ' इति नाम स्तवनं कृतं । तन्माहात्म्येन शान्तिर्जाता । तत्रैव पुरे पश्चशतप्रमाणाः शिष्या जाताः। साध्वीनां त्रिशतं जातम् । सर्वेऽपि श्रावका जाता इति । ततो विहृत्य गुरवो नारनउलपुरे गताः। तत्रेश श्रीमालश्रावकस्य जामाता विवाहसमये एव मरणधर्म प्राप्तः । तेन सार्थ कन्याया अपि काट- भक्षणं कारयन्ति जनाः । सा भीता गुरूणां पार्श्वे समेता । तदा गुरुभिरुक्तं पित्रोः । अयुक्त- मेतत् क्रियते'। पितृभ्यामुक्तमावयोनित्यशल्यं भविष्यति । गुरुमिर्गृहीता कोमल्यसाध्वीनां दत्ता 'त्वया एषा पाठ्या।' तस्याः पार्श्वे द्वादश वर्षाणि स्थिता । ततो गुरुभिर्दीक्षिता । तस्या वस्त्रे वयः षटपद्यः पतन्ति । साध्वीभिरुक्तं गुरूणां एषा अतीवाहण्डा एतस्या वस्त्रे पतन्ति यूकाः । गुरुभिरुक्तं एषा सप्तशतसाध्वीनां मुख्या भविष्यति । तदैव तस्याः साध्व्याः सर्वाः शिक्षिणीत्वेन दत्ताः, महत्तरापदं च दत्तं । कोमल्यसाध्व्या सा महत्तरा पृष्टा त्वयास्माकं किमपि कथनं करणीयं, अस्माभिस्त्वं पाठिता। तयोक्तं-वदत किंकरोमि। ताभिरूचे-धर्म बजे दशाकाः प्रलम्बाः कार्या इति । प्रतिपनं तद्वचः, अद्यापि तथैव जायते इति । तदा गुरुणामतीव माहात्म्यं वर्धते स्म । आचार्यैः पुनर्गच्छे समानीता गुरवः। सर्वेऽपि साधवो गुर्वाज्ञायां प्रवर्तते स्म । ततस्तेम्य एक आचार्यों निर्गतो रुद्रपल्लीवगच्छो जातः । अन्यदा जिनदत्तसूरय सिन्धुदेशं प्राप्ताः । तत्र मूलवाणे चतुर्मासं स्थिताः । तत्र कोमल्यगच्छीयाः भावकाः महर्द्धिकाः, खरतराः सामान्याः। तैरुक्तं खरतराणां महत्त्वपातकं करोमि (कुर्मः)। सदा हाथी इति नामा लूणियामोत्रीयः पावक: सामान्योऽस्ति । अब यदा धर्मदेशनावसरे हाथी श्रावकः समागच्छति तदा श्रीजिनदचसूरिः प्रभूतं सत्कारं ददाति । अन्ये भावकाः कषयन्ति-किमर्थमस्य बहु सत्कार दत्य । गुरुमिरवत-एष हस्ती राजद्वारे शोमते । महति कार्ये समप्यत्यसौ। अन्यदा कोमल्यश्रावकैबहु धनं दत्वा पातिसाहिर्वशीकृतः, कथितं च तैः खरतराणां शिरच्छेदं कुरु । साहिनोक्तं कथं ज्ञास्पन्ति खरतराः, कथं च भवन्तः । तैरुक्तं ये कौमल्यास्ते तिलकं विधाय मस्तके समेष्यन्ति, ये तु तिलकवर्जितास्ते खरतरा इति । तां पाता श्रुत्वा हस्ती रात्रौ गुरुसमीपे समेतो वार्ता चोक्ता । गुरुयोक्त-त्वं वाहि वीवीपाय सुन्दरं भविष्यति । सोऽपि वीवीपाचें गत्वोवाच शगिति । ममायमरण, तेनाई मिलना समेतः।
। खरतरगच्छ पट्टावली-३॥ तस्या अग्रे वार्ता प्रोक्ता । सापि गता साहिपार्श्वे एष हस्ती मम भ्राता। अनेन सार्धमहमपि मरिष्यामि । साहिनोक्तं-प्रभाते वैपरीत्यं विधास्यामि, मा कुरु चिन्तां । प्रगे कौमाल्यश्रावकाः सतिलकाः सर्वेऽपि समेताः खरतरा अतिलकाः। पतिसाहिना बभाषे-कपाटं दत्वा ये सतिलका- स्ते सर्वेऽपि वध्याः, ये तु अतिलकाः ते न वध्याः। ततः सर्वेऽपि मरणभयेन तिलकमपनीया- पनीय हस्तिपृष्टौ लमाः। सर्वेऽपि खरतराः सिन्धुमण्डले । तदा गुरुभिहस्तीकस्य अजितशान्ति- स्तवो दत्तः । अन्यदा गुरूणां प्रोक्तं मिलित्वा सिन्धुदेशस्थैः श्रावकः 'अमास्कं गृहे यथा बहुधनं भवति तथा कर्तव्यं । गुरुभिरुक्तं-नागपुरात् परतो गत्वा मकडाणा ग्रामे द्वात्रिंशद- गुलप्रमाणं प्रतिमां कारयित्वाऽमुकनक्षत्रेऽमुकवेलायां च, ततस्तांरुतमध्ये प्रक्षिप्यात्रानयत यूयं परं मार्गे न कस्यापि गृहे भोक्तव्यम् । ततस्तां शुभवेलायां स्थापयिष्यामि। यत्रतत्र लक्ष्मीः स्थास्यति स्वयमिति। ततस्ते तत्र गताः, प्रतिमा कारिता, तेऽन्तरा नागपुरे समेताः। तत्र पुरे शान्तिसूरि- नामाचार्यस्तिष्ठति । तेन रात्री लक्ष्मी उपनाना कैश्चित् दृष्टा । उत्थितो ध्यानेन कञ्चनदेवं समाहयति स्म। सोऽप्यागतः, प्रोचे प्रतिमया साधं लक्ष्मीर्याति, जिनदत्तसूरिराकर्षति । प्रतिमा अप्रतिष्ठिता स्वीति । प्रभाते तेन श्रावकाणामग्रे प्रोक्तं-एते सिन्धुदेशीया वणिज आयाताः सन्ति तान् सर्वानपि मन्त्र्य भोजयत, यथा लक्ष्मी गपुरान याति । श्रावकैर्गत्वा ते सर्वेऽपि निमन्त्रिताः भोजिताश्चेति। ततत्तेनाचार्येण रुतमध्यस्थिता प्रतिमा प्रतिष्ठिता अञ्जनशिलाकया तत्रैव रक्षिता, तैः श्रावकैन ज्ञाता तामेव प्रतिमा लात्वा गुरुसमीपे समेताः । गुरुभिरुक्तं-रछो- हरीया यथा याताः, किं कृतं, प्रतिमा प्रतिष्ठिता सूरिणा लक्ष्मीस्तत्रैव स्थितेति । तैरुक्तं- पुनरन्यमुपायं कथयत, सावधानतया तं करिष्याम इति । गुरुभिः कृपापरैर्भूय उक्त-भट- नेर नगरे श्रीमहावीरप्रासादे श्रीमाणिभद्रयक्षप्रतिमास्ति तामानयत । ततश्चत्वारः श्रावकाः व्यापारमिषेण तत्र गताः, नित्यं जिनाचा कुर्वन्ति । अन्यदा लब्धावसराः प्रतिमां गृहीत्वा निर्गताः। पृष्टतो बाहरिका अपि चलिता ज्ञातव्यतिकराः। क्रमेण सिन्धुदेशे उच्चनगरे रिपडी- नद्याः पार्थे पश्चनद्यो वहन्ति, पञ्चनद्योणं जलं । तत्र ते समेताः, बाहरका अपि समाजग्मुः। ते प्रतिमां गृहीत्वा नद्यां प्रन्ष्टिाः। ते अपि प्रविष्टाः। तद्भयेन प्रतिमा तैर्नयां मुक्ता । बाहरकाः संशोध्यालभमानाः प्रतिमां गताः परभूमिमिया । तैः समाचारा जिनदत्तसूरीणां निवोदिताः। गुरवोऽपि नद्यां समेताः । आराधितो माणिभद्रः। प्रत्यक्षी भुत्वोवाच-अहम- त्रैव स्वास्यामि बहिर्नागच्छामि । अत्रैव स्थितः, सानिध्यं करिष्यामि । ततः श्रीजिनदत्त- सरि पार्थे माणिभद्रयक्षेण सप्त वरा मार्गिताः। तद्यथा-मट्टारको यः पञ्चनदीः साधयति स सिन्धुमण्डले समेति १ । सूरिः सदा सूरिमन्त्रसहस्रप्रमाणं जपेत् २। सामान्यसाधुः शतत्रमप्रमाणं जपेत् ३। खरतर श्रावक उभयोः सन्ध्ययोः सप्त स्मरणानि पठति ४ । श्राद्धः प्रतिगृहं द्विशतप्रमाणां क्षिप्रचटीं पठति ५। श्राद्धः प्रतिगृहं आचाम्लद्वयं मासमध्ये करोति ६। पदस्थो यो भवति स एकाशनेन भुञ्जते ॥ तथा श्रीजिनदत्तसूरीणां सप्त वराः प्रदत्ताः माणिक्यमद्रेण । तद्यथा-प्रतिग्रामं श्राद्ध एको मुख्यः सघनश्च भविष्यति १ । श्रादः .. ४९ ॥ खरतरगच्छ पट्टावली-३॥ सर्वथा निर्धनो न भविष्यति २। खरतरः श्राद्धः कुमरणेन न मरिष्यति ३। साध्वीनां रतिन समेष्यति ४ । भवन्नाम गृहीते विद्युम्न पतिष्यति ५। निर्धनः श्राद्धो यः सिन्धुदेशे समेष्यति स सधनो भविष्यति ६ । भवन्नाम्ना शाकिन्यो न लगिष्यन्ति ७। श्रीगुरूणां पार्थे सर्वदा समेति । परस्परं प्रीतिर्जाता । एकदा पीरैः पार्थात् रूप्यमुद्राशतं दर्शितं, गुरुभिः सुवर्णमुद्रासहस्रकं दर्शितं आसनाधः। एकदा पीरे स्थिते साधवः आहारार्थ गताः म्लेच्छरुक्तं-अस्माकं मोजनं देयं । तैरुक्तमयुक्तमेतत् । गुरुभिस्ते म्लेच्छाः समाहूताः, उक्तं चात्र तिष्ठत, भोजनं दापयिष्यामः । श्रावकानाहूय तेषां मिष्टभोजनं कारित । एवं वारद्विकं, तेन ते सन्तुष्टाः । एकदावसरे संग्रामे मृताः । संजाता देवाः । रात्रौ श्रीगुरूगां स्वमान्तरे प्रत्यक्षी बभूव । कुत्रास्माकं स्थान ? श्रीपूज्यैरुक्तं-पश्चनयां, यत्र माणिभद्रो यक्षोऽस्ति तत्र यूयमपि वसत । भोजनं याचितं तथैव गुरुभिर्दापितं, सन्तुष्टाऽतीव । एकदा देराउरस्वामीहिंदुको राजपुत्रः स क्रमेणातीव निर्धनो बभूव । गुरूणां पार्श्वे समेतः साधूनां भारवाहको जातः, सुखेनाजीविकां करोति । गुरवस्तुष्टाः। तेन देराउर- दुर्गः कारितः । सोमाख्यस्तस्य सेवकोऽभूत् । सोऽन्यदा संग्रामे प्रहारैर्जर्जरीकृतः गुरुमिरनशनं दत्तं। मृत्वा व्यन्तरो जातः सोमाहः। सोऽपि समेतो गुरुः पार्श्वे स्थानं देहीति वदन् । गुरुभिः पञ्चनद्यां स्थापितः। अथ तत्र देशे सिलेमा पर्वते तत्र षोडीयो क्षेत्रपालः, स देशाधि- छायकः। माणिभद्रप्रमुखा देवास्तमूचुः-प्रथमतः ये तव पूजां करिष्यति पश्चाद्वयं पूजा तस्य अहिष्यामः नान्यथा। तेन प्रथमतः स पूज्यते, ततो माणिभद्रः सपीरः । एकदा श्रीगुरुमिस्वतं- 'प्रतिवर्ष न कोऽपि भवतां पूजां करिष्यति, येऽस्माकं पट्टस्थायी भविष्यति स एकशो विस्तारेणा- गत्यात्र पूजां करिष्यति' इति पद्धतिः विहिता । खरतरगच्छाधिष्ठायकाः पञ्चनदीवास्तव्यदेवाः सुप्रसन्ना भविष्यन्ति । इति पञ्चनदीपूजास्थापना विचारः॥ एकदा श्रीजिनदत्तसूरयो ढिल्यां गताः। तत्र चतुःषष्टियोगिनी-पीठानि सन्ति । न वन्दन्ते स्म । कुपिता योगिन्याश्चिन्तितं 'छलयाम एनं' । अथैकेन व्यन्तरेणामत्य गुरूणां प्रोक्तं- अत्र योगिन्यः सन्ति, भवतः छलिष्यन्ति, सावधानतया स्थेयं । श्रीपूज्यैः रात्रौ महणसी नामा श्रावकस्तं समाहूय प्रोक्तं चतुःषष्टिः नवा पट्टलिकाः कारयित्वा समानय। महत्कार्यमस्ति । तेन रात्रावेव आनीताः। श्रीपूज्यैः मन्त्रिताः। प्रातर्व्याख्यानावसरे एकस्य श्रावकस्योक्तं चतुः- पष्टिः श्राविकाः एकेन टोलकेनाद्य समेष्यति । दक्षिणदिशि स्थास्यन्ति श्वेतवस्त्राः। तासां पह- लिका एताः प्रदेयाः । व्याख्यानावसरे समेताः, श्राद्धेन दत्ताः, सर्वस्थिताः । श्रीगुरुमिमन्त्र- प्रभावेण स्थमिताः । व्याख्यानानन्तरं गुरुभिरुक्तं यात, प्रमाते पुनरागन्तव्यं । ता ललिताः। अयं महाविद्यापात्रं स्वापराचं क्षामयंतिस्म । वयं यामः । गुरुभिरुक्तं-किश्चिदस्माकं प्रयच्छत । ताभिः सप्त वरा दत्तास्तद्यथा-खरतरसाधुः प्रायो मूखों न मविप्पति १ । साध्वी सीधर्म न यास्यति २ । खरतरसाधुसाध्वीनां न सर्पान्मृत्युः ३। खरतराणां वचनसिद्धिः ४। विद्युतो नमयं ५। शाकिन्यो न च्छलिम्पन्ति ६ । श्रीखरतर श्रावकाः ढिल्याः परतः सर्वेऽपि धनवन्तः || खरतरगच्छ पट्टावली-३ ॥ पण्डिताश्च भविष्यन्ति ७। इति सप्त वराः प्रदत्ताः। योगिनीभिरुक्तं-एकमस्माकमपि वचनं कुरु । यथा भवदीयः पट्टे यः कोऽपि गच्छनायको भावष्यति ढिल्यां अजयमेरौ भरुकच्छे उज्ज- यिन्यां यद्यायाति तदा भोजनं कृत्वा याति रात्रौ न तिष्ठति। यदि रात्रौ तिष्ठति तदा भोजन न करोति इति वाक्यं दत्वा गता निजस्थानं । अन्यदा श्रीजिनदत्तसूरयो वडनगरे गताः। तत्र द्विजा बहवोऽतीव द्विषः साधूनाम् । एकदा एका गौः म्रियमाणा जिनचैत्ये प्रवेशिता, सा रात्री मृता, द्विजा हास्यं कुर्वन्ति-एषां देवा गौघातकाः। तत्र नगरे रीतिः-चाण्डालाः पुरमध्ये नागच्छन्ति, प्रतोली यावत् स्वामिनो निकासयन्ति । ततस्ते गृह्णन्ति । मिलिताः सर्वे श्रावकाः परं चैत्यद्वारं लघु, तां निर्वासितुं न कुर्वन्ति । श्रीपूज्यानामुक्तं श्रावकैः- एतत् विप्रैः कृतं भवदीर्ण्यया । श्रीपूज्याः सुप्ताः, शिष्यानां प्रोक्तं-'मम वस्त्रं नोद्घाटनीयं चतुर्दिक्षु सप्तस्मरणानि पठनीयानि । परकायप्रवेशिनीविद्याबलेन मृता गौरुत्थिता, जिनगृहात् ईश्वरप्रासादे पिण्डिकाया उपरि पतिता, जन समक्षं महाच्चित्रं जातम् । सर्वे द्विजाचरणे पतिताः । स्वामिन् देव गृहाद् गाम- पनयत । श्रीपूज्या न मन्यन्ते ततः सर्वैविप्रैमिलित्वा इति वचनं कृतं यदा खरतरगच्छाधि- पतिर्वडनगरे समेष्यति तदा प्रवेशोत्सवं विप्रा एव विधास्यन्तीति । रात्रौ धेनुरुत्थाय पुरादहिः पतिता। इति परकायप्रवेशिनीविद्या । अन्यदा गूर्जरपरित्र्यां नागदेवः श्रावकः चित्ते चिन्तयति ' श्रीवीतरागैरुक्तमस्ति सर्वदा एको युगप्रधानो भवति । तं वन्देऽहं, परं न ज्ञायते। तत्रार्थे सोऽम्बकाटुंके श्रीगिर- नारगिरौ गतः। उपवासत्रयं कृतं प्रत्यक्षा जाताऽम्बिका। तेनोक्तं कथयास्मिन् काले को युगप्रधानो ? । अम्बिकयोक्तं-हस्ते तवाक्षराणि लिखित्वा ददामि । य एतानि प्रकटयिष्यति स त्वया युगप्रधानो ज्ञेय इति । तेनोक्तं-हस्तेन कथं भोक्ष्ये ? आशातना भविष्यति देव्योक्तं-न काप्याशातना, याहि त्वं । ततः स पत्तने समेतः । प्रतिशालमाचार्याणां दर्शितो हस्तो। न कोऽपि वाचयति । प्राप्तखेदोऽतीवागतो जिनदत्तसूरिसमीपे नागदेवः। पूज्यानां हस्तो दर्शितः। वासक्षेपः कृतः, प्रकटितान्यक्षराणि । यतः दासानुदासा इय सर्वदेवा यदीयपादाब्जतले लुठन्ति । मरुस्थलीकल्पतरुः स जीयात् युगप्रधानो जिनदत्तसूरिः॥ इत्यक्षराणि प्रकटितानि। हर्षितोऽभूनागदेवः। प्रणतिस्म गुरुन् । सर्वत्रापि प्रसिद्धियुगप्रधानोऽयं । नागदेव वरसावएणं उजतिवडेविण, पुच्छिय जुगगुरु कहउ तिणि उववास करेविण । अंबिक हु परतक्खि हत्थि तिण अक्खर लिक्खिय, सोवणमय करि प्रकट सोय आचारिज लक्खिय करि वासखेव अणहिल्लपुरि जुगपहाण संजमतिलउ, जिनदत्तसूरि सुविहितगुरु श्रीखरतरगच्छ गुणनिलउ॥ अन्यदा श्रीउच्चनगरे जिनदत्तसूरीणां प्रवेशमहोत्सवो जातः, मिलिताः स्वदेश-पर- देशीया जनाः। तत्र एको मुलाणापुत्रः सप्तवार्षिकः पतितः चरणप्रहारैर्मृतो। मिलिता म्लेच्छ. जनाः साधूनामुपाश्रये पोरं विधास्यामः । नगरे महानुपद्रवो जातः । साघवो गंतुं समेतुं च न ।। खरतरगच्छ पट्टावली-३॥ शक्नुवन्ति । श्रीपूज्यैरुक्तं-जीवनसौ कथं भूमौ प्रक्षिप्यते । ततो रात्रौ परकायप्रवेशिनीविद्या प्रारब्धा । एको व्यंतरश्चाकर्षितः । बालकशरीरे प्रक्षिप्तः। व्यंतरेणोक्तं-कदाहं छुटिष्यामि ? गुरुभिरुक्तं-म्लेच्छानामग्रे 'एष बालो यदा महिषीमांसं अत्स्यति तदा मरिष्यति' इति कथायित्वा जीवितो बालः । मासात्रिके मांस भुक्त्वा पतितः। एकदावसरे अजमेरौ प्रतिक्रमणावसरे विद्युद् अतीव प्रकाशते उजेहीभवति । ततः श्रीगुरुभिः प्रासुकजलेनाभिमंत्र्य स्तंभिता । कृते प्रति- क्रमणे मुक्तेति । श्रीअणहिलपत्तने भांडशालिक आभू सुश्रावकोऽभूत् । तस्मिन्नवसरे श्रीपूज्या मूलत्राणे नगरे गताः। श्रावकैर्महान् प्रवेशोत्सवो विहितः । तत्र पत्तने वास्तव्यान्यपक्षीय अंबड- नामा श्रावकोऽभूव । तेनोक्तमत्रैवविधः महाप्रवेशोत्सवः क्रियते । अस्मत्पत्तने एवंविधः क्रिय- ते तदा ज्ञायते भवतां शक्तिः। ततः श्रीगुरुभिरुक्तं-अस्माकं तत्राप्येवंविधः प्रवेशोत्सवो भविष्यति परं त्वं तत्र प्रवेशोत्सवे जायमाने निर्धनो मस्तके पोट्टालिकां कूटिका हस्ते च विनत मिलिष्यसि । तत्तथैव जातं । गुरवः पत्तने समेताः। स गुरूणामुपरि द्वेषं वहति । कपटश्रावको जातः । ततः पारणकदिने आतिथिसंविभागं कृत्वा शर्करापानीयमध्ये विषप्रयोगं चकार । तथा गुरुर्विषा- दितो जातः । ततः आभूसुश्रावकेण योजनगामिनीमुष्ट्रिकां प्रेषयित्वा देवतादत्तो रसपकः प्रल्हादनपुरादानीतः। तेनामृतरसेन निर्विषा बभूवु गुरवः । ततः सोऽम्बडः कर्मवशान्मृत्वा दुष्टव्यंतरो जातः । गुरूणां पार्श्वतो भ्रमति छलनाय । अन्यदा रात्रौ पट्टिकोपरि सुप्तानां रजो- हरणं पपात । तत्पातेन गुरवः ससंभ्रमा जाताः। छलिता व्यतरेण । ततः प्रभातसमये आभूश्रावकप्रमुखः श्रीसंघो मिलितः। नानाप्रकारो उपचारो विहितः परं तथापि स दुष्ट- व्यंतरो न मुंचति गुरुं। ततः श्रावकआभूपुत्री व्यंतरं प्रोचे अस्मतकुटुंबे अष्टादश मनुष्याः संति मदीयाः, तान् सर्वान् गृहाण, परमेनं गुरुं मुंच । व्यतरेणाचिंति किमेष सत्यं ददाति नवेति व्याकुलोऽभूत् । गुरवः सावधाना जाताः । शिखातो गृहितो व्यंतरः। मोचितोऽत्यान- हेणाभूसुश्रावकेणेति । ततः श्रीजिनदत्तसूरयो वर्ष ८४ आयुः प्रतिपाल्य अजयमेरौ स्वर्ग गताः। तत्र स्तूपं संघेन कारित । संवत १२०५ वैशाखसुदि ६ दिने श्रीविक्रमपुरे श्रीजिनदत्तसूरीणां स्वहस्तेन पदे स्थापितः नवम वर्षे गृहतिदीक्षः श्रीजिनचंद्रसूरिः। तस्य शिरसि मणिरभूत् । स तु एकदा वीरनाथयोगींद्रेण दृष्टः। तेन ज्ञातं एतस्य पंचवर्षायुरस्ति । ततो गुरखो दिल्यां गताः । तत्र योगिनीभिरुक्तं-अनेनास्मदाज्ञालोपिता अथैन छलयामः । ततो योगिन्यो रात्रौ समागताः धर्मध्वजमाहात्म्येन छलं तासां न लगति । तदा मूषकरूपेणापहतो धर्मध्वजः। श्रीगुरवो ज- जागरुः । मार्जारीरूपेण धाविताः । छलिता गुरवस्तामिः । प्रभातेऽनशनं कृत्वा कोचरभाव- कस्याने चोक्तं गुरुभिः-मम मस्तके मणिरस्ति स दागसमये श्मशाने पार्श्वे दुग्धपात्र स्थापनीयं तस्य मध्ये पतिष्यति । स गृहे पूजनीयोऽक्षयं धनं भविष्यति । ततः श्रीपूज्ये परलोके प्रासे कोचरस्य सा वार्ता विस्मृता। परं योगिना दुग्धपात्रं मंडितं दाधकाले । मणि लात्वा मतो योगी। दृष्टो वणिजा कोचरेण कलहः कृतः। परं न ददाति । 242 1- ॥ खरतरगच्छ पट्टावली-३॥ ततः श्रीजिनचंद्रपट्टे संवत् १२२३ वर्षे कार्तिक सुदि १३ बब्वेरक ग्रामे श्रीजयदेवा-- चार्येण १४ वर्ष प्रमाणानां पदं दत्तं । श्रीमालतांबी गोत्राभ्यां सा. रामदेव सा. मानदेवाभ्यां महोत्सवश्वकाते । श्रीजिनपत्तिसूरिलिभावे चारित्रं गृहीत्वा प्राप्तपदः पंचशतसाधुपरिवारेण हिंसारसमीपे हांसी नगरे समेतः। श्रीपार्श्वनाथप्रतिमा श्रावकैः कारिता । श्रीजिनप्रासादो नवीनः कारितः। प्रतिष्ठावसरे नरमणिग्राही योग्यपि तत्रागतः। योगिना ज्ञातं अस्य गुरोः पार्थे विद्याऽभूव , अस्य पाास्ति न वेति परीक्षार्थ चैत्ये प्रतिमा स्तंभिता । स्थानान चलति । जनानामग्रे योगी वक्ति मयैषा स्थंभितास्ति युष्माकं गुरुरुत्थापयतु । तत आचार्या उपाध्या- याच सविषादा जाताः। विद्या कस्यापि पार्श्वे नास्ति। ततः प्रतिष्ठांतरायो जातः। तदा साळ्या शिक्षिता नार्यों गायति 'बालचंद्रः चंद्रिकां न करोति, अयं बालो गुरुः किं जानाति । गुरुमिथिताकृता 'धिग् मे जीवितं'। एकदा श्रीपूज्येन सरिमंत्रगोलको वीक्षितो मध्ये सार्धतृतीयाक्षरो मंत्राधिपो स्थितः । निर्वास्य गुरवो जपंति स्म। पद्मावती समेता । प्रभाते आचार्याः पाठका व्याख्यानं कुर्वति, तावत् बालकैः परिवृतो गुरुः क्रीडां कुर्वन् चैत्ये गतः । प्रतिमा स्तंभिताऽस्ति योगी वक्ति । शिरसि वासक्षेपं कृतं, स्तंभितश्च सः । श्रीसंघः सर्वोपि मिलितः । जाता प्रतिष्ठा अहो गुरूणां लघूनामपि माहात्म्यं । योगीवक्ति मां मोचय, कृपां वि- धाय । गुरुभिरुक्तं ढिल्यां मम गुरुशिरोमणिस्त्वया गृहीतोऽस्ति तमर्पय । योगिना दत्तो मणिः । उक्तं चाहो महाभाग्य ! इमां विद्यां गृहाण परमस्य विधिरेवरूपो वर्तते तांबुलप्रयोगे सिद्धयति । गुरुभिरुक्तं अस्माकं तांबूलभक्षणं न युक्तं, विद्या सिद्धयतु मा वा । ततो योगिना मुखात्तांबूलं निर्वास्योक्तं हे विद्ये ! याहि पातालं, तवास्मिन् लोके ग्राहकोऽन्यो नास्ति । ततः पातालं गता। ततः श्रीगुरुभिः षट्त्रिंशत् भट्टमिश्राणां वादे जेता गच्छसूत्रानां सूत्रधारः गच्छसमाचारी प्रवर्तकः परमसंवेगी। तस्य वारके नेमचंद्रो भंडारीगोत्रीयस्तस्य पुत्रो देव- दत्तः, तेनोक्तमहं चारित्रं गृहीष्यामि । नेमचंद्रेणोचे प्रथमतोहं परीक्षां करोमि । यदि कोपि शुद्धचारित्रप्रतिपालको मिलति तदा तत्समीपे गृहीयाश्चारित्रं। चतुरशीति गच्छवासिनो गवेषितास्तेन परं 'जे जे दीसंति गुरू समय परिकवायति न पुजंति' इत्यादि भग्नपरिणाम आगतः सरस्वतीपत्तने जिनपत्तिसूरीणामुपाश्रये । रात्रौ समुत्थितः अलसेलकूपिका दृष्टा, ज्ञातं घृतमस्ति । कूणके वर्षाकालार्थ रक्षापि दृष्टा ज्ञातं चूर्णमस्ति । प्रातर्दृष्ट, ज्ञातं एते संवेगिनः । ततः स्वकीयगृहे गत्वाऽष्टवार्षिको निजपुत्रो दत्तस्तेन, दीक्षितच गुरुभिः । स्वर्ग गते गुरौ संवत् १२७८ माघ सुदि ६ दिने । भीसर्वदेवसूरिणां दत्तपदो जावालपुरे पट्टाभिषेकः श्रीजिनेश्वरसूरिः स्थापितः। परं अभिणितो मूर्खः । पूज्यैर्मरणकाले श्रीलब्धिचंद्रोपाध्यायानां भलामणिदत्तः। स तु न पाठयति भट्टारकं, किंतु स्वयमेव व्याख्यानादिकं करोति, गवं वहति, यथा मूर्खः श्रीपूज्यः अहं विद्वान् । अन्यदा वाग्भटमेरुमध्ये आगताः। तत्र महावीरवसतिं दृष्ट्वा द्वारं संकीर्ण चैत्यं बृहत् । प्रधान चावादीद गुरु 'चूहा नंटा वसही वही अंदार कित उत्त मइ माणी' इति वचनात् प्रकटितो ॥बरतरगच्छ पहावली-३ ॥ ५२ मूर्खभावः । ततो गता अणहिल्लपुरपत्तनं, । सरस्वती नदीतीरे । उत्तीर्णा नदी। पूज्वैचिंतित- प्रातः संघो मिलिष्यति, नाहं व्याख्यानं कर्तुं समर्थः, तस्मान्मरणमेव मम सुंदर; इति विमृश्य स्वयमुत्थितः सूरिः। सरिमंत्रं परित्यज्य प्रविष्टो नद्यां मरणाय । ततो भाग्योदयात् सरस्वती- तुष्टा, वरमिति ददौ-त्वं महान् विद्यावान् भवेः। पश्चादागत्य सुप्तः। प्रभाते मिलिताः सर्वे लोकाः पूज्याः स्थिताः। लब्धिचंद्रश्चिंतयति-ममादेशः कथं न दीयते भट्टारकाः। तावदेव गुरुभिर्नवीनकाव्येनोपदेशोदत्तः। तद् यथा- अहंतो भगवंत इंद्रमहिताः सिद्धाश्च सिद्धिस्थिताः आचार्या जिनशासनोन्नतिकराः पूज्या उपाध्यायकाः। श्रीसिद्धान्तसुपाठका मुनिवराः रनत्रयाराधकाः पंचते परमेष्ठिनः प्रतिदिनं कुर्वतु वो मंगलम् ॥ १॥ इत्यादिना चमत्कृत उपाध्यायः अनेक श्रावकाः प्रतिबोधिताः। श्रीजिनपत्तिसूरिपट्टे जिनेश्वर सूरिः [तद् ] वारके श्रीपत्तने कुमारपालराजा प्रतिबोधकः, श्रीहेमाचार्यः, त्रिकोटीग्रंथकर्ता, अष्टादशदेशेऽमारिघोषणाकारकः, अष्टौ सहस्राः तुरगा गलितजलपानं कुर्वति। तेन राज्ञा हेमाचार्याग्रे प्रोक्तं यदि सुवर्णविद्या भवति तदाहं विक्रमा- दित्यसंवत्सरं दूरीकृत्य कुमारसंवत्सरं करोमि । हेमाचार्येणोक्तं-खरतरगच्छे श्री हरिभद्र- मरिशिष्यैरानीतं बौद्धपुस्तकमस्ति, तस्य मध्ये सुवर्णसिद्धिविद्यास्ति । ततः सर्वे खरतर श्रावकाः गौर्जरातीयाः सौराष्ट्रीयाः कच्छपांचालाः समुद्रोपकंठीयाः कारागारे क्षिप्ताः। तेषां भूपः शरीरेऽतिव्यथां करोति स्म । तैः श्रावकैर्मिलित्वा गुरूणां पत्रं मुक्त-वयं युष्माकं श्रावकाः, एष कुमारपालः कदर्थयति । नो येषां रुचि पुस्तकं मोच्यमेव । ततः श्री जिनेश्वरसरिमिश्चि- त्रकूटे चिंतामणिपार्श्वनाथप्रासादे भांडागारे पुस्तकं निर्वास्य प्रदत्तं । क्रमेमागतं पचने । महोत्सवेनानीतं । श्री कुमारपालाद्याः सप्तशतमनुष्याः सश्रीकाः अन्ये पि बहवो जनाः शालायां स्थिताः संति । दृष्टं पुस्तकं हेमाचार्येण । उपरि लिखितमस्ति 'इदं पुस्तकं न छोटनीयं, न वाचनीय;-किंतु भांडागारे पूजनीयं ।' ततः शंकितो मनसि हेमाचार्यों न छोटयति । तदा हेमाचार्यभगिनी हेमश्री महत्तराऽस्ति, तयोक्तं-छोटयतु । तैरुक्तं-इदं लिखितमस्ति- यः छोटयिष्यति तस्य श्री जिनदत्तसूरीणामाज्ञास्ति' तेन बेभेमि । महत्तरयोक्तं को जिनदत्तः, न कोपि भवदीयसमो गच्छाधिपः । अहं छोटयामि । कुमारपालेन दत्तं । तया छोटितमात्रे दवरके तत्कालं नेत्रद्वयं पतितं । अन्धा जाता । पुस्तकं मांडा- गारे मुक्तं । रात्रौ वह्निर्लमः सर्व पुस्तकं प्रज्वलितं । तत्पुस्तकमाकाशमार्गेण बौद्धानां समीपे गतं । श्री जिनेश्वरसूरिपट्टे संवत् १३३१ आसौजवदि ५ दिने जावालपुरे पट्टाभिषेक श्री जिनप्रतिबोधसूरिः। तद्वारके लघुतर खर गच्छो निर्गतः । श्री जिनसिंहसरिः। श्रीमालज्ञातीयः । साधिता तेन पावती । तयोक्तं पष्मासावधि- रायुरस्ति, नाहं ददामि किंचित् । तेनोक्तं मम मोघं देवदर्शनं । तयोक्तं हम नगरे बाबी - ।
॥ खरतरगच्छ पट्टावली-३ ॥ श्रीमालगोत्रे वणिगस्ति । तस्य पंच पुत्राः । तेषां मध्यात् तृतीय पुत्रः तं शिष्यं कुरु । तस्याहं वरं दास्यामि । तेन तथा कृतं । तस्य नाम श्री जिनप्रभसूरिः। तस्यावदाता बहवः । यथा- गयणथकी जिनि कुलह नांषि ओघइ उत्तारी, किद्ध महिष मुषवाद नयर पिक्खइ नव वारी। ढिलीपति सुरताण पूठि तसु वृक्ष चलाविय, रयणि सेत्तुंजि सिहरि दुद्ध जलहर वरसाविय। दोरडइ मुद्र कीधी प्रकट जिन प्रतिमा बुल्ली वयणि, जिनप्रभसूरि सम कवण भरतखंड मंडिण रयाणि ॥१॥ इत्यादि प्रभावकः तपागच्छस्य धर्मध्वजदंडीदानं सप्तशतमंत्रप्रदान काचलीयामंत्र- प्रदानं कृतं। तपगच्छविस्तारो यतो जातः। श्रीअल्लावदीन पातिसाहि प्रतिबोधकः अमावस्याः पूर्णिमासी कृता; येन द्वादशयोजनं यावत् चंद्रोद्योतो जातः। पद्मावत्या कर्णकुंडलोऽर्पितो यस्य । इत्यादि बहवोऽवदाता इति । ततः श्रीजिनप्रबोधसूरिपट्टे संवत् १३४१ वैशाखसुदि ३ दिने जावालपुरे पट्टाभिषेकः श्रीजिनचंद्रसूरिः। छाजहडगोत्रीयः । १३७७ ज्येष्ठवदि ११ दिने अणहिल्लपत्तने पट्टा- भिषेकः। श्रीशत्रुजये खरतरवसतिप्रतिष्ठाकारकः। श्रीजेसलमेरौ श्रीपार्श्वनाथबिंब प्रति- ठितं । येन श्रीजावालपुरे श्रीपार्श्वनाथप्रतिमा प्रतिष्ठिता। यस्य परिकरे द्वादश शतानि साधुसाच्चीनां जातानि। श्रीमंगलवरनगरे समुद्रवासिनो देवा बहवो मंत्रबलेन वशीकृताः । देरा- उरे स्तूपनिवेसो जातो तस्य। तथाद्यापि प्रत्यक्षं स्मरणेन मेघ समानयति, जलपानं कारयति तृषातुराणां । अचिंत्यमहिमा श्रीखरतरगच्छवासिनां साधुसाध्वीश्रावकश्राविकाणां, तथाऽ- न्येषामपि नामग्राहिणां सांनिध्यं करोति, वांछितं पूरयति यो गुरुः । ततः श्रीजिनकुशलसूरिपट्टे संवत् १३९०, ज्येष्ठसुदि ३ दिने सिंधुपुरे देराउरपुरे पट्टा- भिषेकः। श्रीजिनपद्मसूरिः। तस्य वारके वेगडनिर्गतः। पट्टत्रिकं छाजहडगोत्राणां जातं परमस्मा- कमेवगोत्रीयाणां दास्यामः पढें, नान्येषां तेन सीगडेन भ्राता वेगडः स्थापितः। श्रीसत्यपुरे बाराही साधिता। उधरणकेटके खरतरश्रावका जाताः। तत्पट्टे श्रीजिनलब्धिसूरिः । संवत् १४०० आसाढ सुदि १ पट्टाभिषेकः । कूर्चालसरस्वती । तस्य वारके अजयमेरौ 'हिन्दुक राजा' बीसलदेराजा । खरतराणां चतुरसीति शिष्याः व्याकरणपाठकाः । सप्तशत पौषधाः। घंटाशब्देन आलोचनं क्षामणं कुर्वति ते । तदानवदीन पातिसाहमयेन पद्मावती प्रहिता। गुरु- भिरुक्तं च शुद्धिं कृत्वा एहि । म्लेच्छैद्धा देवी । अकस्मादागतो बहुसैन्यः । सर्वे प्रणष्टाः। . देव्योक्तं अहं बद्धा म्लेच्छदेवैः। अथाहं न स्मरतव्या नागच्छामि । म्लेच्छबाहुल्यं जातं । गुरुभिः पंचशिष्याः, महर्षिकाच पंचश्राद्धा निर्वासिताः निखातद्वारे । संवत् १४०६ महासुदि १० दिने पट्टाभिषेकः श्रीजेसलमेरुदुर्गे तत्पट्टे श्रीजिनचंद्र- मूरिः। उद्यतविहारी परमसंवेगी । संवत् १४१५ आसाढसुदि १३ श्रीस्तंभतीर्थे पट्टाभिषेकः, तत्पट्टे श्रीजिनोदयसूरिः। तस्येदं माहात्म्यं जातं । येषां शिरसि बालत्वे वासक्षेपः कृतस्ते सर्वे संघपतयो जाताः। शिष्याणां - । खरतरगच्छ पट्टावली-३॥ शिरसि वासक्षेपे सर्वे पट्टस्था जाताः। प्रतिमाः प्रतिष्ठिताः ताःसर्वा मूलनायका जाताः। श्री- मालवदेशे मांडवनगरमध्ये श्रावका बहवो धनाढया जाताः। प्रासादाः प्रतिष्ठिताः । संवत् १४३३फाल्गुनवदि६ दिने श्रीअणहिल्लपत्तने पट्टाभिषेकः तत्पट्टे श्रीजिनराजसूरिः। तस्य वारके वाचनाचार्य श्रीक्षेमकीर्तयो जाताः। साधितधरणेंद्राः। दीक्षितानेकशिष्याः । पट्त्रिंशत्वाचकाः, द्वादशपाठकाः, क्षेमधारि (डि ?) विश्रुताः । पुनस्तस्य वारके आचार्याः श्रीजिनवर्धनसूरयः । तैः श्रीजेसलमेरौ पार्श्वनाथचैत्यमध्ये गंभारका क्षेत्रपालो निर्वासितः। तेन कुपितेन प्रतिज्ञा कृता अहं त्वां गच्छानिर्वासयाभि । रात्री स्त्रीरूपेण समागच्छति। ततचित्रकूटे गताः। तत्रापि क्षेत्रपालो नारीरूपेण पश्चिमरात्रौ उपाश्रये प्रवि- शति, निर्गच्छति। तथा पूर्व सा० सहना केल्हणाऽऽचार्यस्य पदस्थापनं कारितमभूत् । तदा आचार्यै- रक्षाविधानमर्दलकं दत्तमभूत् । राजवस्यकारकं । तस्मिन्नवसरे क्षेत्रपाले निर्वासितः आचार्यः तत्र सर्वसंघो मिलितः । नाल्हाख्यो विधवासुतः। स तु नाहूतः आचार्यैर्मादलको गृहीतः सहणापा- र्थात् नाल्हाकस्य दत्तः। तत् प्रभावेन पा(ग्या ?) सदीनसुरत्राण पार्श्वे गतः सम्मानितः। सहणाख्यो बंदिगृहे क्षिप्तः । तदा पीपिलिया खरतरगच्छो निर्गतः। ततः सप्तभिर्भकारैर्मुहूर्त मीलयित्वा भाणसोल ग्रामे १, भणीसालीगोत्रे २, भौम- वारे ३, भद्राकरणे ४, भरणीनक्षत्रे ५, भावकृतगृहनामा । संवत् १४७५ माघसुदि १५ दिने भट्टारकश्रीजिनभद्रसूरिःस्थापितः । श्रीसागरचंद्रसूरिभिमंत्री दत्तः। रात्रौ सूरिमंत्रं समवस- रणं गृहीत्वा प्रणष्टाः। श्रीजेसलमेरौ आगताः। तत्र महोत्सवाः संजाताः। सं० पांचाकेनप्रासादः कारितः श्रीसंभवनाथस्य । तत्र पुस्तकभंडागारं स्थापितं । क्रमेण सप्त प्रासादाः प्रतिष्ठिताः । संखवालगोत्रीय:श्रीकीर्तिरत्नसूरीणामाचार्यपदंदत्तं । तस्य वारके ग्रामे २ पुरे २ श्रावका धनाढ्या जाताः। तस्य शतवर्षप्रमाणं जातमायुः । तस्याष्टादश शिष्याः जाताः श्रीसिद्धान्तररुचिमहो- पाध्यायश्रीकमलसंयमोपाध्यायादयः । संवत् १५१५ वर्षे वैशाखवदि २बुधवारे अणहिल्लपत्तने पड्डाभिषेकः श्रीजिन चंद्रसरिः । तत् स्थापितः श्रीजिनसमुद्रसूरिः। संवत् १५३३ वर्षे महासुदि १३ दिनेश्रीपुंजपुरेपट्टाभिषेकः । तत्पट्टे चोपडागोत्रे सं० १५५५ वर्षे श्रीबीकानेरवास्तव्यम० कर्मसीकृतनंदीमहोत्सवः श्रीजिनहंससूरिः। ढिल्यां सिकंदरपातिसाहिना कारागारे क्षिप्तः। मालवावास्तव्यसोहागदेवावि- कया 'चतुर्दससाधुसमानं कनकं ददामीति प्रोक्तं' तथापि न मुंचति। सिकंदरस्य प्रतिज्ञा येन मया बद्धो मुखेन तेन कथं वच्मि मुंचथेति पंचशतबंदिन एकस्थाने स्थिताः संति । तदा क्षेत्रपाल: शय्यायाः अधः पातयति, साहि तथापि न मुंचति। तदाजेसलमेरुतः क्षेत्रपालः समेतो गुरुं प्रत्यू- चे यूयं वदथ एनं मारयामि । पूज्यरक्त-नायमस्माकमाचारः। क्षेत्रपालेनोक्त-भवतो नयामि जेसलमेरुं । पूज्यैरुक्तं-अन्येषां साधूनां का गतिः १ तेनोक्तमन्यानपि क्रमेणानयिष्यामि । पूज्यै- रुक्त-नाहं प्रच्छन्नवृत्त्या यामि, तस्करवत् । ततः मूरिणा सूरिमंत्रो ध्यातः। आगता शासनदेवी। तयोक्तं पश्यतु भवंतो मम माहात्म्यं । तया साहिशरीरे महावेदना कृता । थापयोपायान क्षति ५६ । खरतरगच्छ पट्टावली-३ ।। तथातथाऽधिकतरा जाता। तदा वेदनापीडितो गुरुचरणयोः पतितः। भवंतः पूज्याः गच्छंतु निजं स्थान । पूज्यैरुक्तं यदि सर्वेषां बंदिमोचनं करिष्यसि तदा यामि, नान्यथा। सर्वेपि मोचिताः। अती- व माहात्म्यं जातं । श्रीजिनहंससूरिवारके श्रीशांतिसागरसूरिभिः प्रतिष्ठा कृता । शिष्यदीक्षायां वि- रोधो जातः। तत्राचार्यायो गच्छो निर्गतः। तत्रधाडीवाहागोत्रे टाटीयाशाखेसा० ठकुराकेन लक्षत्र- यद्रव्यदानेन मंडोवरे राजा वशीकृतः । दोसीसाखे श्रीजिनदेवसूरीणां स्थापना कृता । श्रीजिनहंससूरिपट्टे चोपडागोत्रे अणहिल्लपत्तने बलाही देवराजकृतमहोत्सवः संवत् १५८२ वर्षे भाद्रवावदि १३ पट्टाभिषेकः श्रीजिनमाणिक्यसूरिः। अनेकशास्त्रवेत्ता। तेन द्वादश पाठ काः स्थापिताः। एकनंद्यां चतुःषष्टि शिष्या दीक्षिताः। सिंधुदेशे सा० धनपतिकृतमहोच्छवेन पंचनद्यः साधिताः । तस्य वारके श्रीकनकतिलकोपाध्यायादिभिः क्रियोद्धारः कृतः। श्रीदेराउरे यात्रार्थ गच्छद्भिरेव स्वर्गप्राप्तः। संवत् १५९५ जन्म, संवत् १६०४ दीक्षा, तत्पट्टे रीहडगोत्रे संवत् १६१२वर्षे भाद्रपद ९ दिने गुरुवारे श्रीजेसलमेरुनगरे राउलश्रीमालदेवकृतमहोच्छवो भट्टारकः श्रीजिनचंद्रमूरिः स्थापितः संवत् १६१३वर्षे श्रीविक्रमनगरे चैत्रमासे सप्तमीदिने क्रियोद्वारः कृतः। तेषां चेतेऽवदाताः श्रीफलवर्धीताद्यचैत्यतालकोद्घाटकृत् । पुनः संवत् १३४३ वर्षे ताद्यधर्मसागरकृतग्रंथछेदकृत् । श्रीअकबरसाहिप्रतिबोधकारी । तत्साहिवचसा युगप्रधानपदधारी । संवत् १६५२वर्षे नानगा- नीकृतमहोत्सवेन पंचनदीनां साधकः । सिंधु १, वहव २, वनाह ३, रावी ४, घारउ ५ इति- पंचनद्यः, तथा स्तंभतीर्थे वर्ष यावत् मीनरक्षाकृत् । श्रीज्येष्ठ पर्वणि सर्वत्राष्टदिनानि यावदमारी प्रवर्तकः। श्रीशQजयादि तीर्थेषु चैत्यप्रतिमा प्रतिष्ठाकृत् । श्रीविक्रमपुरे ऋषभविबादि- प्रभूतबिंबप्रतिष्ठाकृत् । श्री साहि सलेमराज्ये ताद्यकृत श्रीजिनशासनमालिन्यतः श्रीसाधु विहारो निषिद्धः साहिना । तत्रावसरे श्री उग्रसेनपुरे गत्वा साहिं प्रतिबोध्य च साधूनां विहारः स्थिरीकृतः। तदा लब्धः सवाई युगप्रधान बडागुरुरितिबिरुदो येन गुरुणा । एव- मवदाता भूयांसः संति सुप्रसिद्धाः । तेषां निर्वाणं श्री बीलाडापुरे १६७० वर्षे आसूवदि २ दिने। स्थूपस्थापना । तस्य वारके श्रीसागरचंद्रसूरिसंतानेऽनुक्रमेण भावहर्षसूरयो निर्गता इति। तत्पट्टे श्री जिनसिंहमूरिः चोपडागोत्री कोटिद्रव्यव्ययेन मंत्रिराज श्रीकर्मचंद्रेण कृत- नंदीमहोत्सवः श्रीलाभपुरे । ननिर्वाणं तु मेदनीतटे संवत् १६७४ वर्षे पोसवदि १३ दिने । तत्पट्टे गुरु श्रीजिनराजसूरिः। संवत् १६७४ वर्षे फागुण सुद ७ दिने संघपति श्री आसकर्णेन कृतनंदीमहोत्सवः। तस्मिन्नेव दिने श्रीजिनसागरसूरीणामाचार्यपदस्थापनेति । . कियत् काले निर्वासिताः। श्रीमजिनराजसूरिः तस्य पट्टे विद्यमानगुरुः । .
अनुक्रमणिका नाम पृष्ट नाम पृष्ठ अकबर (साहि) १३,३४,५६ प्राग्राम २ अकबराबाद ३६ भाकरपुर अखयराज (मंत्री) ३६ भागरा (नगर) १३,३०,३३,३५ अग्निवश्यायन (गोत्र) प्राचाय खरतर शाखा (भाचार्याय गच्छ) अचलदास ४१ भादि (गोत्र) प्राद्यपक्षीयगण अजमेर (अजमेरु, अजयमेरु,-दुर्ग,-नगर) प्राबू (अर्बुदाद्रि, अर्बुदाचल) ३,१२,२१,३२,३३,३७,४३ ४,११,२५,२७,२५,५०,५१,५४ भाभू २६,२७,५१ अजितशांतिस्तव ४८ मायधर्म है अणहिलपत्तन (-पाटण, पुरपत्तन, पाटक, पुरपाटण) भार्यनन्दि २१,२६,२७,२६,४४,५०,५१,५३-५६ प्रायभद्र अनार्यदेव १७ प्रायमहागिरि ६,१७ अनूपचंद ३८ प्रायमंगु अभयकुमार १०,२३ मार्यरक्षित सूरि २,११ अभयदेव सूरि (-भाचार्य) ३,१०,२३,२४,३४,४५,४६ भार्यक्यरदि अमरसर ४० प्रायश्यामा अमृतधर्म ३६ भार्यसमुद्रसूरि प्रम्बका टुक ५०४ मार्य संभूति विजय अम्बिका (अम्बा) १०,२२,२६,३६,४०,४३,५० / मार्य सुहस्ति सरि ६,१७ ११,२६,२७,२६,५१ भारासन नगर अम्मोहर देश भावश्यक नियुक्ति १७ अयोध्या ३८ आवश्यक लघुवृत्ति ३ अलसेल कूपिका ५२ भाषाढाचार्य मल्लावदीन (पातिसाहि) भासकरम -साह) १४,३५,३६,४०,५६ प्रवन्सी ( 'उज्जैन' देखो) प्रासाउलिपुर १७ प्रासाधीर भव्यक्त ( ३य निहव) १७ अश्वमित्र १७ भासानगर (-पुर) अहमदाबाद ( राजनगर) १३,३३,३४,३६,३८,४० आंचलिक मत अवन्ती सुकुमाल (२) नाम पृष्ठ नाम पृष्ठ इक्ष्वाकु कुल इन्द्रदिध सूरि इन्द्रमति (गौतम) इंदपालसरग्राम इंदोर (पुर) ईश्वर (पाह) ईश्वरी १५ का कमकतिलकं उपाध्याय कपडवंज (कप्पडवनिज) १५ २४,४५ कमलसंयमोपाध्याय १५ कमलादेवी ३०,३३/ कर्मग्रंथ ४,१२ ४२ कर्मचंद्र, (कर्मसिंह, करमसी-मंत्री) ३१ ७,१२-१४,३३-३५,३६,५५,५६ १८/ करुयादेवी ३९. कल्पसूत्र १७ १५ कल्याणमंदिर कल्याणवती कल्याण सर १४,५६ २५,२६,४८,५० २०,२१ ३८ ४१. कस्तुरचंद्र गणि २,१०,११,१५,२५,५० उपसेन उग्रसेनपुर उचनगर उदरंग देवो उज्जैन (अवन्ती) उजती ( गिरनार देखो) सत्कोशिक गोत्र उत्तराखंड उदयकरया उदयपुर कस्तूर बाई १७,३५ काकन्दी ( नगरी) काचलीया मंत्र २० कात्यायन गोत्र १२ कालिकाचार्य (१)[-श्यामाचार्य (२) [गई मिल्लोच्छेदक] (३) " उद्योतन सूरि ३,१०,२०,४३ ६,१७,२५ १६ " उपसागहर स्तोत्र उमास्वाति (चाचक) ६,२५ ऊधरम ( मंत्री) कघर केटक काश्यप (-गोत्र) २८,२६ किसनचंद्र कोत्तिरत्र [सुरि-प्राचार्य) कोल्हू १,६,१५ कुमतिकुटालग्रंथ ३४ ऋषभदत्त-श्रेष्ठी अषमेश्वर २० F १० एलापत्य प्रोवंश ६ कुमारपाल (राजा) १७ कुलक कुलघर १० कुलागसनिवेश १०/.समाणा ग्राम कुंभलमेरु (-नगर) कुंघरपाल (उपाध्याय) २०,३८,५३ कुंवला मोसोया नगर १२,३०,३३ कचोलाक्षा कन्देश (पांचाल) २४ २२ ( ३ ) खरतर वसति पृष्ठ कूकरचोपडा गोत्र ३३,३८ गुखरवसूरि (-प्राचार्य) १२,३३ कूर्चपुरगच्छ २४ गुलालचंद ३७ कूचाल सरस्वती ५४/ गूढानगर ३७,३८ केल्हया ५५ गोलवच्छा केयरदेवी ३८ गोविद पाचक कोचर (गोत्र) १२,५१ गोष्ठामाहिल ( ७वां निडव) १६ कोटिक (-गच्छ, ब) १७,१८ गौर्जरत्रा (गौर्जरातीया ) ११,५३ कोठारी ३६ गौतम गोत्र १,१५,१०,१५ कोधिक १ गौतम रास ३० कोमल्यगच्छ ४७ गौतमस्वामी ( इन्द्रभूति) १,१५ कोल्लाक ग्राम १५ गोवर ग्राम कोश्या ६,१७ घंधाणीपुर ३६ कोमल्य (साध्वी, भावक) ४७,४ घाणेराव ३७ कोमल्योपाध्याय ४६ घारठ (नदी) १३,५६ ५,११,३०४५ घोघा बंदर ३६,३८ खरतर बिरुद्ध ३,१०,२२ चण्डिका ४,२४ खरड्य (गोत्र) ४० खंभराय ३० ४० खंभायत नगर चन्द्र ভিত্তিকা २५ चन्द्र (-गच्छ, कुस) ८६,१८ खीमसो (-साह) २६,३० चन्द्रमुनि (सूरि) खीवसरा (गोत्र) ४१ चन्द्रावती नगरी १०,२१,३८ खेड (-नगर) २८,२६ चम्म (-गोत्र) १२,३३ खेतासर (ग्राम) चंपा खोडिया (खंज) क्षेत्रपाल ११,२७,३५,४६ चामुण्ट १०,४६ १. चांपसी (-साह) ३५,३६ गण (५ वां निहव) चितौड़ (चित्रकूट, चैत्रकूट ) ४,१०,२४,३२,४६,५३,५५ गरधर चोपड़ा गोत्र ३५,३६,३६ चित्रवाल गच्छ २६,४६ गरधर साद्धशतक प्रकरण चिरंतन प्रतिमा प्रास्ति ३६ गर्दमिल्ल १० चोपडा (गोत्र) १३,१४,२७,३३,३५-३७,४०,५५,५६ गिडीया चोला गिरनार (-गिरि) १२,२६,३२,३८,३६,५०४ छाबहर! -गोत्र, वंश, छाजेड) ११,२८,३०-३२,३०, गुजरात (गुर्जर देश, गुर्जरधरित्री) ११,१३,२०,२१,२४ ४१,५४ २७,३१,३३,३४,४३,४४,५० २४. ४० ४० ।
१६ पृष्ठ जिनपति सरि ५,११,२८,२६,५२,५३ जगचन्द्रसूरि जिनपभ सूरि ६,११,१२,३१,५४ जमालि (१ला निहव) १५ जिनप्रतिबोध सरि जम्बु (-कुमार, -मुनि, -स्वामी) १,६,१५,१६ जिनप्रबोध सूरि ५,११,५४ जयसिहभण स्तोत्र १०,४५ जिनप्रभ सूरि ११,५४ जयदेव ( वाचनाचार्य, सरि, प्राचार्य ) १६,२८,४६,५२ जिनभक्ति सूरि जयदेवी ४२ जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण ६,१६ १६,३७ जिनभद्र सूरि २,६,१२,३२,५५ जयमल ३६ जिनमाणिक्य सूरि ८,१३,३३,३४,५६ जयराज ४२ जिनयुक्त सूरि ४१ जयसागर पाठक १२ जिनस्त्र सूरि १४,३६ अयसीरी ११ जिनराज सूरि ६,१२,१४,३२,३५,३६,४०,५५,५६ जयंतश्री ३० जिनलब्धि सूरि ६,१२,३१,५४ जयानन्द सूरि १६ जिनलाभ सूरि ३७-३६ जाटा ७ जिनवर्द्धन (सूरि, -गुरु) ६,१२,३२,५५ जालोर (जावाल, -पुर, -नगर, महादुर्ग) ५,११,२९- जिनवल्लभ सूरि (-गुरु ) ३,४,१०,२४,४६ ३०,३६,५२-५४ जिनविजय सूरि जावड जिनशेखर सरि (-प्राचार्य) ५,११,२४ जिनकीर्ति सूरि जिनसमुद्र सूरि (गुरु) ७,१३,३३,५५ जिनकुशल सूरि ५,११,१३,३०,३४,३७,३८,५४ जिनसागर सूरि १४,३५,४०,५६ जिनचंद्रसरि (१) ३,१०,२३,४४ जिनसिहसूरि (१) ५,११,२६,४०,५३ (२) ५,११,२७,२८,५१,५२ (२) १४,३४,३५,५६ ५,११,३०,५४ जिनसौख्य सूरि (४) ६,१२,३१,५४ जिनसौभाग्य सूरि ३६ ६,१२,१३,३३,५५ जिनहप सरि ३६ १३,३४,३५,३६ जिनहस (-गुरु, -सूरि) ७,८,१३,३३,५५,५६ (७) जिनचंद्रसूरि (७क) जिनेश्वर २२,२१,४३ ३८ जिनेश्वर सूरि (१) ३,१०,२१-२३,४४ ४१,४२ ५,६,११,२६,५२,५३ जिनचंद्राचार्य (चैत्यवासी) २० ( चैत्यवासी.) २४ जिनदत्त (-गुरु, -मुनि, सूरि) ४,१०,११,२४-२७,२६, जिनोदय सूरि ६,१२,३१,३२,४०,५४ ४६-५१,५३ जीमम जिनदत्त श्रेष्ठी १८ जीरापल्ली पुरी जिनदेव सूरि ७,१३,५६ जीलागर (-मंत्री) ११,३० जिनधर्म सरि ४०,४१ जीवराज (साह) ३३ " " " " " १४,३६ जिनहेम सूरि " ह जेसल साह जैनराजी (वृत्ति) जोधाणो जोरावर मल्ल मुझयूं नगर डागा (गोत्र) डूंगरसी जुनागढ ( जीर्थगढ) ३५,३६ थिरापद्रनगर २६ जेसलमेर ( -दुर्ग, -नगर ) ६,७,११-१३,३०-३६,४१,४२, थूलिभद्र ५४-५६ दत्त ३०,३२,५५ दयासार दशपुर वधवैकालिक सूत्र १०,१६,२२,२४,४४ दक्षिणदेश १८,३८,३६ ५३ दाडिमदे दादोजी ३० टाटिया शाखा दिगम्बर ठाकुरा १८ दिन सूरि दिल्ला (दिल्ली) ११,२२,२३,२५,२७,२८,३०,४४, १२,२७,४१,४२ ४९-५२,५५ ७,१३,३३,४१ दिल्लीपति डेहरा ४१ दिलोमण्डल ४४ दुर्गप्रबोध तपा (-गण, गच्छ) २६,३४,३५,५४ दुबलिका पुष्यमित्र सूरि ( दुबलिका पक्ष ) २,६,१६ तरुणप्रभ ( -सूरि, प्राचार्य) ११,१२,३१ दुर्लभ (-नरपति, -नृप, राज, राजा ) ३,१०,२१,३२,४४ तारादेवी ३६,३६ तांबी श्रीमाल (गोत्र) तिमरी नगर १३,३३ तिलोकचंद देराउर ( दुर्ग, -नगर, -पुर) ३०,३१,३४,४६,५४,५६ तिलोकसी (साह) तिष्यगुप्त (२रा निहव) तुङ्गीयायन गोत्र तुम्बवन ग्राम तेजपाल तेजसो १०,२४,४६ अम्बावतीपुर ६,८,१३,३०,३३,५६ प्रांबावाडाभिध पाटक ६,११,१३ त्रिशती মিয়লা १२,३२ দাখি ३,६,१६,२० थाहरूमल्ल १६ थाहरूलाह ३६ देविद पाचक दुष्प्रसह सरि ar ५३ दृष्टिवाद ३४ देका (साह) ३६,४२ ३६ देलवाडा (नगर) १५ देलब देवी १६ देवकुलपाटक १८ देद्धिणि तमाश्रमण ११,३० देवदत्त ३६ देवभद्र सुरि ४५ देवराज (मंत्री) २६ देवराजपुर ११ देवलदे (देवी) १,१५ देवल वाटक १५ देवसूरि ४१ देवानन्द सूरि (८) ४५ ७ भुवनरत्न ( प्राचार्य) माल्हू (गोत्र ) भाईदास ३७ महाविदेह १३ भागचंद्र ४१ महिगलदे ३५ माणसोल (-ग्राम,-नगर, भाणसपल्ली) १,१२,३२,५५ महिमाराज ३६ महेवा भानुवड भावनगर ३८ मंगलवर नगर १२,३२ भावप्रभ (-प्राचार्य) मंडप १३ ५५ मंडोवर (-पुर, -नगर) ३६,३८,२६,५६ भावकृत भावहर्ष (सूरि, उपाध्याय) १४,३५,५६ माठर गोत्र भावार्षीय खरतर शाखा (७) ३५ माणिभद्र यक्ष ३५,४५,४६ भावारिवारण स्तवन ४६ माधव भीमपल्ली (-नगर) ११,१२,३० मानतुङ्ग (सूरि) ५,११,१६,३० भीमराज ३७ मानदेव सूरि भुवनपाल ३० मानदेव साह ५२ १२,३२ मानसिंह भोजराज ३७ मालदेव ( रायत) ३४,५६ मालवा १०,२०,४३,४४,७५ मउठीया १३ ११,१२,२८-३१ मकडाणा माहेश्वरी मकसूदावाद ३८,४१ मांडव नगर मगसी मांडवी (बिदर) ३७,३८ मण्डूक मिरगादे ४० मणिग्राहि मिथिला ३८ मदनपाल ११,२७,२८ मीठडिया वुहरा (गोत्र) मधुकर खरतर शाखा (१) २४,४६ मुगल (मुद्गल) १३,२६ मनक १,१६ मुलतान (बारा) १०,२५-२७,४७,५१ मनोद ग्राम मूलसिंघ ४२ मनोहरदास मूलाणा (ज्ञाति) १८,१६,४२ मेघराज (-साह) ८,१३,३३ मल्देश ( मारवाड़, मंडल, स्थल ) ४,११,२१,२६,३३, मेडता (नगर, -पुर, मेदनीतट ) १४,२७,१५-३७,४०,५६ ३६,४१,५० मेरु मरोट २६ मेवाड़ (मेवात) मायासी मोरवाड़ा महतीयाण (महुमुहु) गोत्र ११,२३,३०,४५ मौजदीन (-पोतिसाह, -मुस्त्राय) २३,४४ महाकाल (-प्रासाद) १०,१८,२५ महागिरि यशोभद्र (सूरि) (१) १,६,१६ ४,२७४ ३६ मन्दसौर ( दयपुर) महाधन श्रेष्ठी १० नाम ४८ यशोवद्धन याकिनी धर्मपुत्र योधपुर ( योधानक) १३,३४,४१,५६ ५,११,२४ २४,४७ रछोहरीया रजोहरण नाम २८ रिपडी (नदी) रीहड ( रेहड) गोत्र ७,३६ रुद्रपल्ली रुद्रपल्लोय खरतरशाखा (२) ४८ रुद्रसोमा रुंदपाल (साह) रुदेलिया गण (गणेश) रूपचंद्र ४० रूपजी ४२ रूपनगर ३५ रूपसी १३ ४४ १२,३१ ११,१२ ३६,३०,४० ३६,४० ७ रेया नगर रेवती सूरि रेवा बट १४,३६,४० रोहगुप्त ३६,४० ३८ लक्खा (साह) १८ 56११३ लक्ष्मी २७ रतनसीK रतनादे रतलाम रत्ननिधान रयणादे रविप्रभसूरि रसकूपक रंगविजय गणि रंगविजय खरतरशाखा (6) रापुर राउल। राखेचा (गोत्र) राजगच्छ राजगृह राजनगर ('अहमदाबाद' देखो) राज समुद्रगणि राजसोमोपाध्याय राजाराम राजेंद्राचार्य रायपुर राधनपुर रामदेव रामविजय उपाध्याय रायभाशाली ( गोत्र) रावी (नदी) लक्ष्मीलाभ ११,३० लखनऊ (लक्ष्याड नगर) ६,१५,१६,३८, लघुभाचार्यांय खरतरशाखा (4) ३५ लघु खरतरगच्छ (-गया-शाखा)(३) ५,११,२६,५३ ३५,४० लघुभट्टारक खरतर शाखा (११) ३७ लघुसंधपट्ट लब्धिचंद्र उपाध्याय ४० लाछलदेवी ३७ लालचंद ३० माहोर लामपुर) ३७,३६ १४,२५,३४,३५,१६ ४१ २८,५२ लुंटक ३७ लूमकरवसर २६ लूखिया (गोत्र) १३,५६ लोदवा ( लोदव पत्तन) २७ लौहित्य २७,३१,३६,३६,४७ २ रासल लौंका (मत) रियमल / रिथी (-नगर,-पुर) वच्छराज (राजा.) (साह) ३३,४० " [ १० ] नाम पृष्ठ वच्छावत १६ पृष्ठ नाम ३४,३८ विन्ध्य राजा ३४ विपुलपुरुजपुर २,६,१८,१६ विषुधप्रभ सरि १५ विमल ( -दंडनायक,-मंत्री) १८ विमलगिरि २५,५० विमल चंद्रसरि ३४ विमलवसति ( वसही) १०,२१,४३ १०,२१४ १३ विमलादे बच्छामृत वज्र (-सूरि, स्वामी,-मुनीन्द्र) वज्रसेन ( -सूरि, प्राचार्य) वज्रशाखा (वयरसाहा) वट नगर (वृद्धनगर) वडली वडा भाचा-या गच्छ वनवासी वनाह नदो वयप (वहव) नदी चयरी वराहमिहिर वर्धमान वर्धमान सूरि ११,३१ १६ १६ विवेकसमुद्र उपाध्याय १३,५६ विशेषावश्यक भाष्य १३,५६ वीर क्षेत्रपाल १५ वीरनाथ योगीन्द्र वीरप्रभ २० वीरसूरि ३,१०,२०,२१,४३,४४ वीसलदे राजा ४६ वृद्धदेव सूरि वृद्धनगर ३७ वृद्धवादी सूरि ६,१५ वृहत्खरतरगच्छ वल्लभी नगरी वपतसाह वसुभूति (ब्राह्मण) चागडिक ( वागडी) ३,१८ ३६,४० ४६ १०,२४ वृहत्संघपट .,११,१३,५२ वृहस्पति १०,२४ वेगड (मंत्री) वाग्भट मेरु वाचक (वाछिग ) मंत्री वात्स्य गोत्र २० घाफमा वालीनाथ क्षेत्रपाल वालेवा ग्राम ३६ वालहा देवी वावटीय ग्राम वासिष्ठ गोत्र पाहडदे विक्रमपुर ( 'बीकानेर' देखो) विक्रमसरि विक्रमादित्य विजयसिंह विद्याधर (गच्छ, कुख) विनयप्रम (-उपाध्याय, पाठक) १२,५४ १६ वेगड खरतरशाखा (वेगडागच्छ, ३६ पैकटगण) (४) १०,२१ वेगराज वेनातट ३३ वेलाकुल पत्तन ३७ ४१ व्याघ्रपत्य गोत्र शकडाल (पगडाल )मंत्री २,१७ १०,२४ सकन्दर ( सिकन्दर, नरपति-पातिसाहि) ७,१३,५५ १६ बंजय (सिद्धाचल, तीर्थ १२-१३, १५,२०,३०, ३६-४३,५४,५६ २,६,१८,२६,५३ शय्यंभव सरि( भट्ट) ३० शान्तिसागर (-उपाध्याय, प्राचार्य) १३,३३,५६ ६,१८ शान्सिसूरि (१) १२,३० [ ११ ] १२ १४,३५,५६ ११,२६,५२ १२ . ३६ ४ ३७ ४६ १३,४२ १३,५६ संप्रति १,१६ ३,१०,२३ ४२ नाम पृष्ठ नाम शान्ति स्तव सलखगपुर शिवशर्मा (शिवेश्वर) २०,२१ सलेम (-पातिसाहि) शोलचंद्रगणि (वाचनाचार्य) १२,३२ सर्वदेव सूरि (प्राचार्य) शीलानाचार्य १,१६ सहजशानगवि पौभाग्यविद्याल ३६ श्यामाचार्य ( 'कालिकाचार्य (१) देखो) सहसकरण श्री ५३ संखपाल श्रीकरण संखेश्वर श्रीचंद ११,२७,२६ संग्रामसिंह मंत्री श्रीपाल संघपट्ट (ग्रंथ) श्रीमाल २३ संधवो (गोत्र) श्रीमाल ( ज्ञाति,गोत्र ) ७,११,१३,२३ संडिल्ल सूरि २८,३१,४०,४४,४७,५२-५४ संदेहदोलावलि श्रीमालदेव राठल श्रीवंत ३४ संभूतिविजय सरि श्रीप्सार उपाध्याय संवेगरङ्गशाला प्रकरण श्रीसारीयखरतर शाखा (१०) ३६,४० सागरचंद्र (-सूरि, प्राचार्य) श्रीसूरि प,४३,४४ साणियाला ग्राम श्रेणिक सातल (नृप) श्वेतपट सादडी षडशीति प्रकरण १०,२४ सामलदास सामीदास सत्यपुर ३७,५४ सामुच्छेदिक (४ निव) समन्त भद्रसूरि १६ साईशतक प्रकरण समयराज सारंगपुर समयसुंदर उपाध्याय ६,१२,३१ साहि समरसिंह साह १२,३३ साहिब समियाणा ग्राम ११,३० साहलेचा (गोत्र) समुद्रसूरि समुद्रोपकंठीया समेतथिखर (शिखर गिरिराज) ३८,३६,४१ सिद्धसेन (गबि-दिवाकर) सरसापत्तन १०,२० सिद्धाचल ( 'शत्रुजय' देखो ) सरस्वती (देवी) ११,३१ सिदार्थ नदी ११,२०,३१,५३ सिरियादे १२,४३,५२ सिरवंत भाण्डागार ४१ २४,४६ ३५ सालमसिंह १६ सिकंदर ५३ सिद्धवर ३,६,१८,२५,३५ १३,२६,३४ १३ २२ [ १२ ] पृष्ठ ४६ सौवमपाल ग्राम नाम सिलेमा पर्वत सिवा सिधिया सिंधु ( नदी) सिंधु (देश, मण्डल) सिधुपुर सिहगिरि सूरि सोगड सीमंधर (स्वामी) सुखकोर्ति सुखमल्ल सुधर्म (-स्वामी) सुनन्दा सुपियार देवी सुप्रभात ४३,४६,५३ ४२ ६,१०-१३, २३,२४,३१,३४,३७,५४,५६ २,१७ १२,३२ ३६ पृष्ठ नाम ४६ सोमा व्यन्तर ३४ सोहाग ३६ सौराष्ट्र देश १३,५६ ४,२५,३३,४७,४८,४९,५६ स्तंभतीर्थ (-पुर, नगर) ५४ २,१५ स्थूलभद्र स्वामी ५४ स्वर्णप्रभ प्राचार्य २०,२२,४५ स्वाइसेरडा ग्राम हरपाल ४१ १,६,१५ हरिभद्र २,१८ हरिश्चंद्र ३६ हरिसुखदेवी ४३ हर्षनंदनगणि ३६-३६ इर्ष लाभ ३६,४२ हस्तिनागपुर १०,३१ हस्तो ३१ ३,६,१६,२६,५३ ३७ ३७ ३५,४० सूरत ( -बिदर) ४७,४८ सूरतराम सूरिमंत्र सुरूपा सुवर्णविद्या सुविहित खरतरगच्छ सुविहित पक्षगच्छ सुस्थित सूरि मुहस्ति ५३ हंसराज साह ४४ हाजो शाह २० हाजीखांन डेरा १७,१८ हाथी साह २ हांसी नगर ४१ १२,२५ ४१ २७,३१,४७ सूहब देवी २८ हितरंग ३० ४६,५४ ५२ ३६ सेठ सेटिया) गोत्र सेढिका नदी सेत्रावा (नगर) सेरुणा ग्राम सोनपाल सोपारक सोमचंद्र सोमजी सोमदत्त (ब्राह्मण) सोमदेव ( पुरोहित) सोमप्रभ सोमाख्य सोमेश्वर महादेव सोमयज सोमराज ३७,३६ हिंदुक (राजा) १०,२३,४५ हिसार ३३ हीरचंद्र ३६ हुकुमचंद १३,३३ हुंबड (-गोत्र, ज्ञाति) १८ हेमराज २४ हेमश्री महत्तरा ३४,३६,४० हेमाचार्य १०,२०,२१ क्षत्रियकुंड (-ग्राम,नगर) १२ क्षमाकल्याणक मुनि ४६ जेमकीर्ति वाचनाचार्य २० क्षेमधारी १३,३३,४६ ज्ञानविमल २४,४६ ३६ २६,५३- २६,५३ १५,३० २७,३९ ३५ ४ 了