Sanmati Library

Dashbhktyadi Sangrah (sanvyarth)

Goyaliya, Siddhasen Jain · 2009/11

PDF Proofread

Front matter

- प्रकाशक- पं० सिद्धसेन गोयलीय अखिल विश्व जैन मिशन (गुजरात प्रान्तीय केन्द्र) सलाल ( सावरकांठा) गुजरात १००० मृतियां : मूल्य मदुपयाग मुद्रक- वीरेन्द्र प्रसाद जैन महावीर मुद्रणालय ( प्रेस) अलीगञ्ज (एटा) - उ०प्र० है * दो शब्द * श्री १०८ तपोनिधि, अध्यात्मयोगी, प्रात स्मरणीय, परमकृपालु, दिगम्बर जैन मुनिराज श्रीजयसागरजी महाराजका विहार पाच वर्षसे गुर्जर देशमें हो रहा है। प्रापके सदुपदेशामृतसे गुजरात में अनेको रथानोपर जैन पाठशालाओ और औषधालयोको स्थापना हुई । मिथ्यात्व तथा उसकी पोपक रूढियोको आपके उपदेश से अनेक श्रावक-श्राविकाओ ने त्याग कर आत्मलाभ किया है। यम-नियमादि से तो शायद ही कोई जोव बचा हो—जो महाराज श्री के दर्शन को पाया, वह किसी न किसी रूपमें कुछ लेकर अवश्य गया है । आप तथा सभी मुनि व अन्य त्यागीगण इन दशाभवत्यादि को प्रतिदिन पढते है, कितनी ही विशेप २ समय पर पढी जाती है । इन भक्तियो को पढते समय यदि इनका अर्थज्ञान हो तो फिर ओर भी विशेष आनन्द प्राता । इसीलिये श्री १०८ मुनि जयसागर जी महाराज की आज्ञा व आग्रहसे यह प्रयास किया गया है । यद्यपि प लालाराम जी शास्त्री "धर्मरत्न" तथा नातेपुते के दि० जैन सरस्वतीभवन द्वारा हिन्दी टीकाये प्रकाशित हुई है परन्तु उनमें भावानुवाद है, अन्वयार्थ नही। अतः एक २ शब्द, विभक्ति प्रादि का परिज्ञान हो जावे तदर्थ यह एक नवीन प्रकाशन किया है। इन भक्तियो में अधिकतर भक्तिया पूज्यपाद आचार्य श्री १०८ पूज्यपाद स्वामीकी लिखी हुई है। प्राचार्य पूज्यपादरवामी कितने प्रोड और प्राचीन उद्भट विद्वान् प्राचार्य थे यह बात प्रायः समाजके समस्त जनसाधारण तक जानते है। इन भक्यिोकी एक सस्कृत टीका है जो प्राचार्य प्रभाचन्द्र स्वामी की बनाई हुई है । उस टीकामें चैत्यालयको टोकाके प्रारभमें लिखा है कि... श्री वर्धमानस्वामिन प्रत्यक्षीकृत्य गौतमस्वामी "जयति भगवान" इत्यादि स्तुतिमाह। अर्थ गीतसरवामीने भगवान् महावीर स्वामीके प्रत्यक्ष दर्शन कर "जयति भगवान्" इन शब्दसे प्रारंभ करते हुये स्तुति की वृहद्रव्यसग्रहकी तस्कृतटीकामें भी लिखा है। ततश्च जयति भगवान् इत्यादि नमस्कार कृत्वा जिनदीक्षा गृहीत्वा कचलोच- नानन्तरमेव चतुर्ज्ञानसप्तद्धिसम्पन्नास्त्रयोपि (गोतम अग्निभूत वायुभूत नामान) गणघरदेवा सजाता गौतमस्वामीभव्योपकारार्थ द्वादशाग श्रुतरचनाकृतवान्। तदनन्तर गौतम अग्निभूति वायुभूति इन तीनों विद्वानोने "जयति भगवान्" इत्यादि शब्दोसे स्तुति करते हुये भगवान् महावीरस्वामीको नम. स्कार किया। जिनदीक्षाग्रहणकी और केशलोच करनेके अनन्तर ही मति- ज्ञान श्रुतज्ञान अवधिज्ञान और मन पर्ययज्ञान चारो ज्ञान उनको प्रगट हो गये तथा सातो प्रकार की ऋद्धियां प्रगट हो गई । इसप्रकार वे तीनो ही मुनि उसीसमय भगवान् महावीर स्वामी के गणधर हुये । उनमें से गौतम स्वामी ने भव्य जीवोका उपकार करनेकेलिये द्वादशाग श्रुतज्ञानकी रचनाकी। इन दोनो कथनोसे यह निर्विवाद सिद्ध हो जाता है कि इन भक्तियो में से चैत्यभक्ति भगवान महावीर स्वामीके मुख्य गणधर भगवान् गौतम- स्वामीकी बनाई हुई है । इससे इसकी प्राचीनता और प्रौढ प्रमाणता भी स्वय सिद्ध हो जाती है। इस स्तुतिमें कृत्रिम प्रकृत्रिम चैत्यालयोका भी वर्णन है जिसमें भवन. वासी व्यतर ज्योतिषी कल्पवासी आदि सब देवोके चैत्यालयोका तथा मध्य. लोकके अकृत्रिम चैत्यालयोका भी वर्णन है । इससे सिद्ध होता है कि यह मूर्ति पूजा जैनियोंने ब्राह्मणोंसे नही ली है किंतु अनादि कालसे चली प्रारही है । जो लोग मूर्तिपूजा प्रादिको ब्राह्मणोसे ली हुई बतलाते है उनको इससे शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये । साथमें जो लोग जैनभूगोलको अप्रमाण और टोलो पर बैठकर लिखे हुये बतलाते है उन्हे भी अपने नेत्र खोल लेने चाहिये। इस ऊपरके कथनसे यह भी सिद्ध हो जाता है कि यह चैत्यभक्ति महा. वीरस्वामीके केवलज्ञानके समयकी बनी हुई है, अर्थात् चतुर्थकालमें जब तेतीस बर्ष साड़े आठ महीना शेष रह गये थे उस समयकी यह रचना है । ऐसी ऐसी चतुर्थकालकी रचनायें न जाने कितनी है जो अज्ञानताके कारण हमें मालूम नहीं है । बहुतसे लोग कहा करते है कि "वर्तमानके समस्त शास्त्र पंचमकालके बने हुये है इसलिये उनमें कहा हुआ विषय भगवान् महा- वीर स्वामीका कहा हुआ नहीं माना जा सकता" ऐसे लोगोको भी अनर्गल बोलना बंद कर कुछ दिन तक जानकार विद्वानोंसे अध्ययन करना चाहिये। यह सान्वयार्थ हिंदी टीका मैने संस्कृत टीकाके आधारसे तथा पं. लालारामजी जैन शास्त्री व जिनवाणी संग्रह नातेपुते को सहायतासे की है। यह प्रकाशन प्राजतक उपलब्ध सभी प्रतियोके आधार से किया है तथापि प्रमाद व अज्ञानवश इसमें जो भूल हो उसे विद्वान सुधार कर पढ़ें। सलाल (गुजरात) जिनवचनसेवक सिद्धसेन जगायलीय दीपावली बो०नि०म०२४८१)

आभार-प्रदर्शन
दशभक्त्यादि संग्रह के प्रकाशन में निम्नलिखित
महानुभावों ने दान देकर जो ज्ञान प्रसार के महती
धर्म-कार्य में सहयोग दिया है उसके लिए मिशन उनका
अत्यन्ताभारी है:-
१५१ रु० श्री दिगम्बर जैन समाज जाम्बुडी
१०१ रु० श्री दिगम्बर जैन समाज नवा
१०१ रु० श्री दिगम्बर जैन समाज हिम्मतनगर
१०१ रु० श्री दिगम्बर जैन समाज भद्र सर
१०१ रु०
कोटडा
१०१ रु०
पोशीना
१०१ रु०
मऊ
१०१ रु०
टाकाटुका
१०१ रु० स्व० सेठ भोगीलालनानचंद ईडर
१०० रु० दिगम्बर जैन समाज साबली
५१ रु० कोटडिया कांतिलाल छबालाल हिम्मतनगर
५१ रु० को० मोतीचंद रायचंद हिम्मतनगर
५१ रु० दिगम्बर जैन समाज मुनाई
५१ रु०
भीलोडा
५८ रु० बंधु चतुष्टकय
गोरल
२५ रु० दिगम्बर जैन समाज मुडेटी
"
।

7
3
-
.
Ww
--
म
M
1
PM
4.
-----
-- ".
महान नपाची मुनिगज १०८ श्री जयमागर जी महागज

মুujj
অংগ গণমণী
#ী ৭০ *ী প্রথাগংঙ্গী থানংলঞ্জ
৭ংপণী
ভাং খণ্ডন।
-এন জপ

No text on this page.

अनुक्रमणिका- पृ० सं० १ ११ १२ १२ १३ १३ २१ २४ २६ ३९ १ भीजिनसहस्रनामस्तोत्रम् २ सुप्रभातस्तोत्रम् ३ भूतकालतीर्थङ्कराः ४ वर्तमानकालतीर्थङ्कराः ५ भविष्यतकालतीर्थङ्कराः ६ विदेहक्षेत्रस्थविंशतितीर्थङ्कराः ७ भक्तामरस्तोत्रम् ८ कल्याणमंदिरस्तोत्रम् ९ एकीभावस्तोत्रम् १० विषापहारस्तोत्रम् ११ जिनचतुर्विंशतिका १२ तत्त्वार्थसूत्रम् १३ वृहत्स्वयंभूस्तोत्रम् १४ द्वात्रिंशतिका १५ अकलंकस्तोत्रम् १६ मङ्गलाष्टकम् १७ महावीराष्टकस्तोत्रम् २८ नमस्कारमंत्रा १६ कौनसी भक्ति कहाँ करनी चाहिये ? दशभक्ति संग्रह- २० ईर्यापथशुद्धि. २१ श्रीसिद्धभक्तिः २२ श्रीसिद्धभक्तिः (प्राकृता) २३ श्रीश्रुतभक्तिः २४ भीश्रुतभक्तिः (प्राकृता) २५ श्रीचारित्रभक्ति. २६ श्रीचारित्रभक्तिः (प्राकृता) २७ श्रीयोगिभक्तिः २८ श्रीयोगिभक्तिः (प्राकृता) २६ श्रीश्राचार्यभक्तिः ३० धोत्राचार्यभक्तिः (प्राकृता) ३१ श्रीपञ्चगुरुभक्तिः ५७ ५८ ७५ ११५ १३६ १५१ १५२ १५७ १५६ १६५ १६६ ३२ श्रीपंचगुरुभकिः ३३ श्रीतीर्थङ्करभक्तिः ३४ श्रीशांतिभक्तिः ३५ श्रीसमाधिभक्तिः ३६ श्रीनिर्वाणभक्तिः ३७ श्रीनिर्वाणभक्तिः (प्राकृता) ३८ श्रीनन्दीश्वरभक्तिः ३६ श्रीचैत्यभक्तिः ४० कल्याणालोचना ४१ चतुर्दिशिवन्दना ४२ सर्वदोषप्रायश्चितविधिः ४३ सामायिकपाठः (सिद्धवस्तु.) ४४ श्रा० शांतिसागरस्तुति. ४५ देवसिकरात्रिकप्रतिक्रमणम् ४६ मुनिप्रतिक्रमणम् ४७ प्रतिक्रमणदण्डकः (पाक्षिक) ४८ वीरभक्तिः ४९ निर्वाणकाण्ड (प्राकृता) ५० गणधरवलय. ५१ श्रीवीतरागस्तोत्रम् ५२ पोतीर्थ करस्तुतिः ५३ रत्नकरण्ड श्रावकाचार ५४ द्रव्यसंग्रह. ५५ अद्याष्टकस्तोत्रम् ५६ दृष्टाप्टकस्तोत्रम् ५७ परमानन्दस्तोत्रम् ५८ श्रावकप्रतिक्रमणम् ५६ दीक्षा नक्षत्राणि ६० दीक्षा ग्रहणक्रिया ६१ लोचक्रिया ६२ वृहद् दीक्षाविधिः ६३ मुल्लक दीक्षाविधि. ६४ उपाध्याय दीक्षादानविधिः ६५ प्राचार्यपदास्थापनविधिः १६९ १७० १७४ १८३ १८६ २०२ २०४ २२६ २४३ २५७ २५७ २५६ २५६ २६१ २६६ २७४ २८८ २८९ २६२ ૨૨ २६४ २६५ ३०६ ३०८ ३०९ ३२१ ३२१ ३२२ ३२२ ३२६ ३२७ * श्रीवीतरागाय नमः * PIN दशभक्त्यादि संग्रह श्री जिनसेनाचार्यकृतं || श्रीजिनसहस्त्रनामस्तोत्रम् ॥ स्वयंभुवे नमस्तुभ्यमुत्पाद्यात्मानमात्मनि । स्वात्मनैव तथोद्भुतवृत्त- येऽचिंत्यवृत्तये ॥ १ ॥ नमस्ते जगतां पत्ये लक्ष्मीभत्रै नमोऽस्तु ते । विदांवर नमस्तुभ्यं नमस्ते वदतांवर ॥२॥ कामशत्रुहणं देवमामनन्ति मनीषिणः । त्वामानुमः सुरेण्मौलिभालाभ्यर्चितविक्रमम् ॥ ३ ॥ ध्या-' नद्रुघणनिभिन्नघनघातिमहातरुः । अनन्तभवसन्तानजयादासीदनन्तजित् ॥ ४ ॥ त्रैलोक्यनिर्जयावाप्तदुर्दम्यमतिदुर्जयम् । मृत्युगजं विजित्यासी- ज्जिन मृत्युंजयो भवान् ॥ ५ ॥ विधूताशेषसंसारबन्धनो भव्यबांधवः । 191 त्रिपुरारिस्त्वमेवासि जन्ममृत्युजरान्तकृत् ॥ ६॥ त्रिकालविपयाशेषतत्व- भेदातत्रिघोत्थितम् । केवलाख्यं दधचक्षुत्रिनेत्रोऽसि त्वमीशितः ॥ ७ ॥ त्वामन्धकान्तकं प्राहुर्मोहान्धासुरमर्दनात् । अर्दू ते नारयो यसादर्धनारी- श्वरोऽस्यतः ॥ ८॥ शिवः शिवपदाध्यासाद् दुरितारिहरो हरः। शंकर कृतश लोके शंभवम्त्वं भवन्सुखे ॥६॥ वृषभोऽसि जगच्छेष्ठः पुरुः पुरुगुणोदयैः । नाभेयो नाभिसंभूतेरिक्ष्वाकुकुलनंदनः ॥ १० ॥ त्वमेकः पुरुषस्कधस्त्व द्वे लोकस्य लोचने । त्वं त्रिधा बुद्धसन्मार्गस्त्रिज्ञस्त्रिज्ञानधा- रकः ॥ ११ ॥ चतुश्शरणमांगल्यमूर्तिस्त्व चतुरः सुधीः । पञ्चब्रह्ममयो देव पावनस्त्वं पुनीहि माम् ॥ १२ ॥ स्वर्गावतरणे तुभ्यं सद्यो जातात्मने नमः । जन्माभिषेकचामाय वामदेव नमोऽस्तु ते ॥ १३ ॥ सुनिःष्क्रान्ता- वघोराय पद परममीयुपे । केवलज्ञानसंसिद्धावीशानाय नमोऽस्तु ते ॥ १४ ॥ पुरस्तत्पुरुपत्वेन विमुक्तिपदभागिने । नमस्तात्पुरुषावस्था भाविनी तेऽद्य विभ्रते ॥ १५ ॥ ज्ञानावरणनिर्हासान्नमस्तेऽनन्तचक्षुषे । दर्शनावरणोच्छेदान्नमस्ते विश्वदृश्यने ॥१६॥ नमो दर्शनमोहन क्षायिकामलदृष्टये | नमश्चारित्रमोहघ्ने विरागाय महौजसे ॥ १७ ॥ नमस्तेऽनन्तवीर्याय नमोऽनन्तसुखात्मने । नमस्तेऽनन्तलोकाय लोका- लोकावलोकिने ॥ १८॥ नमस्तेऽनन्तदानाय नमस्तऽनन्तलब्धये । नमस्तेऽनन्तभोगाय नमोऽनन्तोपभोगिने ॥ १९॥ नमः परमयोगाय नमसतुभ्यमयोनये । नमः परमपूताय नमस्ते परमर्षये ॥ २० ॥ नमः परमविद्याय नमः परमतच्छिदे । नमः परमतत्त्वाय नमस्ते परमात्मने ॥ २१ ॥ नमः परमरूपाय नमः परमतेजसे । नमः परममार्गाय नमस्ते परमेष्ठिने ।। २२ ॥ परमर्द्धिजुपे धाम्ने परमज्योतिपे नमः । नम पारेत- मःप्राप्तधाम्ने परतगत्मने ॥ २३ ॥ नमः क्षीणकलंकाय क्षीणबंध नमो- ऽस्तुते । नमस्तेक्षीणमोहाय क्षीणदोषाय ते नमः ।। २४ ॥ नमः सुगतये तुभ्यं शोभनां गतिमीयुपे । नमस्तेऽतीन्द्रियज्ञानसुखायानिन्द्रियात्मने ॥ २५ ॥ कायवन्धननिर्योक्षादकायाय नमोऽस्तु ते। नमस्तुभ्यमयोगाय योगिनामधियोगिने ॥ २६ ॥ अवेढाय नमस्तुभ्यमकपायाय ते नमः । [२] नमः परमयोगीन्द्रवन्दितांघ्रिद्वयाय ते ॥ २७ ॥ नमः परमविज्ञान नमः परमसंयत । नमः परमदृग्दृष्टपरमार्थाय ते नमः ।। २८ ॥ नमस्तुभ्यमलेश्याय शुक्ललेशांशकस्पृशे । नमो भव्येतरावस्थाव्यतीताय विमोक्षिणे ॥ २९ ॥ संश्यसंज्ञियावस्थाव्यतिरिकामलात्मने । नमस्ते बीतसंज्ञाय नमः क्षायिक- दृष्टये ।। ३० ।। अनाहाराय तृप्ताय नमः परमभाजुपे । व्यतीताशेपदोंपाय भवाब्धेः पारमीयुपे ॥ ३१ ॥ अजराय नमस्तुभ्यं नमस्ते स्तादजन्मने । अमृत्यवे नमस्तुभ्यमचलायाक्षरात्मने ॥ ३२ ॥ अलमास्तां गुणस्तोत्रमनन्ता- स्तावका गुणाः । त्वां नामस्मृतिमात्रण पर्युपासिसिपामहे || ३३ ॥ एवं स्तुत्वा जिनं देवं भक्त्या परमया सुधीः । पठेदप्टोत्तरं नाम्नां सहस्त्रं पापशांतए ॥१॥ ॥ इति पीटिका ॥ प्रसिद्धाटसहस्रद्धलक्षणं त्वां गिरां पतिम् । नाम्नामष्टसहस्रेण तोष्टुमो- ऽभीष्टसिद्धये ॥१॥ श्रीमान्स्वयंभूर्खपभः शंभवः शंभुरात्मभूः । स्वयंप्रमः प्रभुर्भोक्ता विश्वभरपुनर्भवः ॥२॥ विश्वात्मा विश्वलोकेशो विश्वतश्चक्षुरक्षरः। विश्वविद्विश्वविद्येशो विश्वयोनिरनश्वरः ॥ ३ ॥ विश्वदृश्वा विभुर्धाता विश्वेशो विश्वलोचनः । विश्वव्यापी विधिर्वेधाः शाश्वतो विश्वतोमुखः ॥ ४ ॥ विश्वकर्मा जगज्ज्येष्ठो विश्वमूर्तिर्जिनेश्वरः विश्वदृग्विश्वभृतेशो विश्वज्योतिरनीश्वरः ॥५॥ जिनो जिष्णुरमेयात्मा विश्वरीशो जग- त्पतिः । अनन्तचिदचिन्त्याल्मा भव्यबन्धुरवन्धनः ।। ६ ॥ युगादिपुरुषो 'ब्रह्मा पञ्चब्रह्ममयः शिवः । परः परतरः सूक्ष्मः परमेष्ठी सनातनः ॥ ७॥ खयंज्योतिरजोऽजन्मा ब्रह्मयोनिरयोनिजः। मोहारिविजयी जेता धर्मचक्री दयाध्वजः ॥ ८॥ प्रशान्तारिरनन्तात्मा योगी योगीश्वरार्चितः । ब्रह्मवि- ब्रह्मतत्वज्ञो ब्रह्मोद्याविद्यतीश्वरः ॥ ९ ॥ शुद्धो बुद्धः प्रवुद्धात्मा सिद्धार्थः सिद्धशासनः । सिद्धः सिद्धांतविद्ध्येयः सिद्धसाध्यो जगद्वितः ॥ १० ॥ सहिष्णुरच्युतोऽनन्तः प्रभविष्णुर्भवोद्भवः । प्रभृष्णुरजरोऽजयों भ्राजिष्णुधी श्वराऽव्ययः ॥ ११ ॥ विभावसुरसंभृष्णुः स्वयंभूष्णुः पुरातनः । परमात्मा परंज्योतित्रिजगत्परमेश्वरः ॥ १२ ॥ ॥ इति श्रीमदादिशतम ॥ १ ॥ दिव्यभाषापतिदिव्यः पूतवाक्पूतशासनः । पूतात्मा परमज्योतिर्धर्माध्यक्षो दमीश्वरः ॥ १॥ श्रीपतिर्भगवानईवरजा विरजाः शुचिः । तीर्थकृत्के- वलीशानः पूजाहः स्नातकोऽमलः ॥ २ ।। अनन्तदीप्तानात्मा स्वयंबुद्धः प्रजापतिः । मुक्तः शक्तो निरावाधो निष्कलो भुवनेश्वरः ॥ ३ ॥ निरञ्जनो जगज्योतिनिरुक्त.क्तिनिगमयः । अचलस्थिनिरक्षोभ्यः कूटस्थः स्थाणुरक्षयः ॥ ४ ॥ अग्रणीग्रीमणीनेता प्रणेता न्यायशास्त्रकृत् । शास्ता धर्मपतिर्थयों धर्मात्मा धर्मतीर्थकृत् ॥ ५ ॥ वृषध्वजोवृपाधीशो वृषकेतुर्वृपायुधः । वृपो वृषपतिर्भर्ता वृपभाको वृषोद्भवः॥ ६ ॥ हिरण्यनामिभूतात्मा भूतभृद्भूत भावनः । प्रभवो विभवो भास्वान् भवो भावो भवान्तकः ॥ ७॥ हिरण्य गर्भः श्रीगर्भः प्रभूतविभवोद्भवः । स्वयंप्रभुः प्रभूतात्मा भुतनाथोजगत्प्रभुः ॥८॥ सर्वादि सर्वदृक् सार्व. सर्वज्ञ सर्वदर्शनः । सर्वात्मा सर्वलोकेशः सर्व वित्सर्वलोकजित् ।। ९ । सुगतिः सुश्रुतः सुशृक सुवाक् सूरिबहुश्रुतः । विश्रुतो विश्वतः पादो विश्वशीर्षः शुचिश्रवाः ॥१०॥ सहस्रशीर्ष. क्षेत्रज्ञः महस्राक्षः सहस्रपात् । भूतभव्यभवद्भर्ना विश्वविद्या महेश्वरः ॥ ११ ॥ ॥ इति दिन्यादिशतम ॥ २ ॥ स्थविष्टः स्थविरोज्येष्ठ पृष्ठः प्रेष्ठोः वरिष्ठधीस्थेष्टोः गरिष्ठो बंहिष्ठ: श्रेष्ठो निष्टोगरिष्ठगीः॥ १ ॥ विश्वमुट् विश्वस्रट विश्वेट विश्वभुग्विश्वनायकः विश्वाशीविश्वरूपात्मा विश्वजिद्विजितान्तकः ॥२॥ विभवो विभयो दीरो विशोको विजरो जरन् । विरागो विरतोऽसङ्गोविविक्तो वीतमत्मरः ॥ ३ ॥ विनयजनतावन्धुर्विलीनाशेपकत्मपः । वियोगो योगविद्विद्वान्विधाता सु सुविधि सुघी ॥४॥ शांतिभाक्पृथिवीमूर्ति शांतिभाक सलिलात्मकः । वायुमृतिग्मगान्मा वाद्विमृतिरधर्मधृक् ॥ ५॥ सुयज्वा यजमानाल्मा सुवा सूत्रामपूजित । ऋत्विग्यज्ञपनिर्यजो यज्ञाङ्गममृतं हविः ।। ६ ।। व्योममूर्ति- [४] रमूर्तात्मा निलेपो निर्मलोऽचलः : सोममूर्तिः सुमौम्यात्मा सूर्यमूर्तिर्महा- प्रमः ।। ७ ।। मन्त्रविन्मन्त्रकृन्मन्त्री मन्त्रतिरनन्तगः । स्वतन्त्रस्तन्त्रकृत्वा न्तः कृतान्तान्तः कृतान्तकृत् ॥८॥ कृती कृतार्थः सत्कृत्यः कृतक- त्यक्रितकृतुः। नित्यो मृत्यूजयोऽमृत्यूरमृतात्माऽमृतोद्भवः ।। ९ ।। ब्रह्म निष्ठः परब्रह्म ब्रह्मात्मा ब्रह्मसम्भवः । महाब्रह्मपतिहट् महाब्रह्मपदेश्वरः ।। १० ॥सुप्रसन्नः प्रसन्नात्मा ज्ञानधर्मदमप्रभुः । प्रशमात्मा प्रशान्तात्मा पुराणपुरुषोचमः ॥११॥ ॥ इति स्थविष्ठादिशतम् ॥३॥ महाशोकध्वजोऽशोकः कः स्रष्टा पद्मविष्ठरः । पद्मशः पद्मसंमृतिः पद्मनाभिरनुत्तरः ॥१॥ पद्मयोनिर्जगद्योनिरित्यः स्तुत्यः स्तुतीश्वरः । स्तवनाहों हपीकेशो जितजेयः कृतक्रियः ॥ २ ॥ गणाधिपो गणज्येष्ठो गण्यः पुण्यों गणाग्रणीः । गुणाकरो गुणांमोधिर्गुणज्ञो गुणनायकः ॥ ३ ॥ गुणाकरी गुणोच्छेदी निर्गुणः पुण्यगीर्गुणः । शरण्यः पुण्यवाक्पूतो वरेण्यः पुण्यनायकः ॥ ४ ॥ अगण्यः पुण्यधीगण्य पुण्यकृत्पुण्यशासनः । धारामो गुणग्रामः पुण्यापुण्यनिधरोकः ॥ ५ ॥ पापापेतो विपापात्मा विपाप्मा वीतकल्मपः । निर्द्वन्द्वो निर्मदः शांतों निर्मोहों निरुपद्रवः ॥ ६॥ निर्नि- मेपो निराहारो निष्क्रियो निरुपप्लवः । निष्कलंको निरस्तैना निर्दूतांगो निराश्रयः ।। ७ ।। विशालो विपुलज्योतिरतुलोऽचिंत्यवैभवः । सुसंवृतः सुगुप्तात्मा सुभृत्सुनयतत्ववित् ॥ ८॥ एकवियों महाविद्यो मुनिः परिवृढः पतिः । धीशो विद्यानिधिः साक्षी विनेता विहतांतकः ॥ ६ ॥ पिता पिता- महः पाता पवित्रः पावनो गति । त्राता भिषग्वरों वर्यो वरदः परमः पुमान् ॥ १० ॥ कविः पुराणपुरुषो वर्षीयान्वृषभः पुरुः । प्रतिष्ठाप्रसवो हेतुर्भुवनैक पितामहः ॥ ११॥ १ ॥ इति महाशोकध्वजादिशतम ॥४॥ श्रीपक्षलक्षणः श्लक्षणों लक्षण्यः शुभलक्षणः। निरक्षः पुन्डरीकाक्षः [५] पुष्कलः पुष्करेक्षणः॥ १॥ सिद्धदः सिद्धसंकल्पः सिद्धात्मा सिद्धसा- धनः । बुद्वबोध्यो महाबोधिर्वर्द्धमानो महर्द्धिकः ॥२॥ वेदांगो वेदविद्वे- घों जातरूपो विदांवरः । वेदवेद्यः स्वसंवेद्यो विवेदो वदतांवरः ॥ ३ ॥ अनादिनिधनो व्यक्तो व्यक्तवाग्व्यक्तशासनः । युगादिकृयुगाधारो युगा- दिर्जगदादिजः ।। ४ ॥ अतीन्द्रोऽतीद्रियो धीद्रो महेन्द्रोऽतींद्रियार्थदृक् । अनिंद्रियोऽहमिद्रार्यो महेन्द्रमहितो महान् ॥ ५ ॥ उद्भवः कारणं कर्ता पारगो भवतारकः । अगाह्योगहनं गुह्यं परायः परमेश्वरः ॥ ६॥ अनंत- द्धिरमेयर्द्विरचिंत्यर्द्विः समग्रधीः । प्रायः प्राग्रहरोऽभ्ययः प्रत्यग्रोऽयोऽग्नि- मोऽग्रजः ॥ ७॥ महातपा महातेजा महोदकर्को महोदयः। महायशा महा- धामा महासत्त्वो महाधृतिः ॥ ८॥ महाधैर्यो महावीर्यो महासंपन्महाबलः । महाशक्तिर्महाज्योतिर्महाभूतिर्महाद्युतिः ॥ ९ ॥ महामतिर्महानीतिर्महाक्षा- तिर्महोदयः । महाप्राज्ञो महाभागों महानंदों महाकविः ॥ १० ॥ महामहा महाकीतिर्महाकांतिर्महावपुः । महादानो महाज्ञानो महायोगो महागुणः ॥ ११ ॥ महामहपतिः प्राप्तमहाकल्याणपंचकः । महाप्रभुमहाप्रहातिार्या- धीशो महेश्वरः ।। १२ ।। ॥ इति श्रीक्षाटिशतम् ॥ ५ ॥ महामुनिर्महामौनी महाध्यानी महादमः । महाक्षमो महाशीलो महायज्ञो महामखः ।। १ ।। महाव्रतपतिर्मह्यो महाकांतिधरोधिपः । महामंत्रीमयोऽ- मेयो महोपायो महोमयः ॥ २ ॥ महाकारुणिको मता महामंत्रो महामतिः। महानादो महाघोपोमहेज्यो महसां पति ॥३॥ महाधरधरो धुर्यों महौदा- यौं महेष्टवाक् । महात्मा महसां धाम महर्षिर्महितोदयः ॥ ४ ॥ महाक्लेशां- कुशः शूरो महाभूतपतिर्गुरुः । महापराक्रमोऽनंतो महाक्रोधरिपुर्वशी ॥ ५ ॥ महाभवाब्धिसंतारी महामोहाद्रसूदनः । महागुणाकर दांतो महायोगीश्वरः शमी ॥ ६ ॥ महाध्यानपतिर्ध्याता महाधर्मो महाव्रतः । महाकारिहात्म- ज्ञो महादेवो महेशिता ॥ ७ ॥ सर्वकक्लंशापहः साधुः सर्वदोपहरो हरः। असंख्येयोऽप्रमेयात्मा शमात्मा प्रशमाकरः ।। ८ । सर्वयोंगीश्वरोऽचिंत्यः [६] श्रुतात्मा विष्टरश्रवाः । दांतात्मा दमतीर्थेशो योगात्मा ज्ञानसर्वगः ॥ ९ ॥ प्रधानमात्मा प्रकृतिः परमः परमोदयः । प्रक्षीणबंधः कामारिः क्षेमकृत्क्षेम- शासन ॥ १०॥ प्रणवः प्रणयःप्राणः प्राणदः प्रणतेश्वरः । प्रमाणं प्रणि धिक्षो दक्षिणोऽध्वर्युर ध्वरः ॥ ११ ॥ आनंदो नंदनो नद्यो वद्योऽनि- योऽभिनंदनः । कामहा कामदः काम्यः कामधेनुररिंजय ॥ १२ ॥ ॥ इति महामुन्यादिशतम् ॥ ६ ॥ असंस्कृतः सुसंस्कारः प्राकृतो वे कृतांतकृत् । अंतकृत्कांतिगुः कांत- चिंतामणिरभीष्टदः ॥१॥ अजितो जितकामारिरमितोऽमितशासनः । जितक्रोधो जितामित्रो जितक्केगो जितांतकः ॥२॥ जिनेंद्रः परमानंदो मुनींद्रो दुंदुभिस्वनः । महेंद्रवंद्यो योगींद्रो यतींद्रो नाभिनंदनः ॥ २॥ नाभेयो नाभिजोऽजातः सुव्रतोमनुरुत्तमः । अभेद्योऽनत्ययोऽनाश्वानधिको- ऽधिगुरुः सुधीः ॥ ४ ॥ सुमेधा विक्रमी स्वामी दुराधर्षों निरुत्सुकः । विशिष्टः शिष्टभुक् शिष्ट. प्रत्ययः कामनोऽनघः ॥ ५॥ क्षेमी क्षेमंक- रोऽक्षम्यः क्षेमधर्मपतिः क्षमी । अग्राह्यो ज्ञाननिग्राह्योध्यानगम्योनिरुत्तरः ॥ ६ ॥ सुकृती धातुरिज्याहः सुनयश्चतुराननः । श्री निवासश्चतुर्वक्त्रश्च- तुरास्यश्चतुर्मुखः ॥ ७ ॥ सत्यात्मा सत्यविज्ञानः सत्यवाक्सत्यशासनः । सत्याशीः सत्यसंधानः सत्यः सत्यपरायणः ॥ ८॥ स्थयान्स्थवीयानेदी- यान्दवीयान्दूरदर्शनः । अणोरणीयाननणुर्गुरुराधो गरीयसाम् ॥ ९ ॥ सदायोगः सदाभोगः सदातृप्तः सदाशिवः । सदागतिः सदासौख्यः सदा- विद्यः सदोदयः ॥ १० ॥ सुघोषः सुमुखः सौम्यः सुखदः सुहितः सुहृत् । सुगुप्ता गुप्तिभृगोप्ता लोकाध्यक्षो दमीश्वरः ॥ ११ ॥ - ॥ इति असस्कृतादिशतम ॥ ७ ॥ बृहन्बृहस्पतिर्वाग्मी वाचस्पतिरुदारधीः । मनीषी धिषणों धीमाञ्छे- मुशीपो गिरांपतिः॥१॥ नैकरूपो नयस्तुगो नैकात्मा नैकधर्मकृत् । अविज्ञेयोऽप्रतात्मा कृतज्ञः कृतलक्षणः ॥२॥ ज्ञानगर्भो दयागों [७] रत्नगर्भः प्रभास्वरः । पद्मगर्भो जगद्गर्भो हेमगर्भः सुदर्शनः ॥ ३ ॥ लक्ष्मी वास्त्रिदशाऽध्यक्षो दृढीयानिन ईशिता | मनोहरो मनोज्ञांगो धीरो गभीर- शासनः ॥ ४ ॥ धर्मयूपो दयायागो धर्मनेमिर्मुनीश्वरः। धर्मचक्रायुधो देवः कर्महा धर्मघोषणः ॥ ५॥अमोघवागमोघाजो निर्मलोऽमोघशासनः। सुरूपः सुभगस्त्यागी समयज्ञः समाहितः ॥६॥ सुस्थितः स्वास्थ्यमा- स्वस्थो नीरजस्को निरुद्धवः । अलेपो निष्कलंकात्मा वीतरागो गतस्पृहः ॥ ७॥ वश्येन्द्रियो विमुक्तात्मा निःसपनों जितेन्द्रियः। प्रशांतोऽनन्त- धामर्पिमंगलं मल्हाऽनघः ॥ ८॥ अनीगुपमाभूतो दिष्टिदैवमगोचरः। अमृतों मृर्तिमानेको नको नानकतत्वक । | अध्यात्मगम्योऽगम्या- ल्मा योगविद्योगिन्दितः। सर्वत्रग. सदाभावी त्रिकालविपयार्थदृक् ॥ १०॥ शंकरः शंवदो दान्तो दमी शांतिपरायणः । अधिप: परमानन्दः परात्मज्ञः परात्परः ॥ ११ ॥ त्रिजगहल्लभोऽभ्यच्यस्त्रिजगन्मगलोदयः । त्रिजग- त्पतिपूज्यांघ्रित्रिलोकाग्रशिखामणिः ।। १२ ।। ॥ इति बृहदादिशतम् ॥८॥ त्रिकालदर्शी लोकेशो लोकयाता दृढव्रतः । सर्वले कातिग: पूज्य: सर्वलोकैकसारथिः ॥ १॥ पुराणपुरुष. पूर्व. कृतपूर्वागविस्तर• । आदि- देव. पुराणाद्य पुरुदेवोऽधिदेवता ।। २ ॥ युगमुख्यो युगज्येष्ठो युगा- दिस्थितिदेशकः । कल्याणवर्ण कल्याणः कल्यः कल्याणलक्षण. ॥३॥ कल्याणप्रकृतिदीप्तकल्याणात्मा विकल्मप विकलक कलातीत. कलि- लनः कलाधरः ।। ४ ।। देवदेवो जगन्नाथो जगद्गन्धुर्जगद्विभुः । जगद्धि- तैपी लोकज्ञः सर्वगो जगदग्रजः ॥ ५ ॥ चराचरगुरुगोप्यो गूढात्मा गूढगोचरः सद्योजात: प्रकाशात्मा ज्वलज्ज्वलनसप्रमः ॥ ६ ॥ आदित्य- वर्णो भर्माभ. सुप्रभः कनकप्रभः । सुवर्णवर्णों रुक्माभ. 'सूर्यकोटिस- समप्रभः ॥ ७ ॥ तपनीयनिभस्तुंगो बालार्काभोऽनलप्रभः । संध्याभ्रवर्ध- हेमाभस्तप्तचामीकरप्रभः ॥ ८ ॥ निष्टप्लकनकच्छायः कनकाञ्चनसनिमः । हिरण्यवर्णः स्वार्णाभः शांतकुम्भनिभप्रभः ॥ ९ ॥ धुम्नाभो जात रूपामी [८] A -- तप्तजाम्बूनदद्युतिः । सुधौतकलधौतश्रीः प्रदीप्तो हाटकयुतिः ॥ १०॥ शिष्टेटः पुष्टिदः पुष्टः स्पष्टः स्पष्टाक्षरक्षमः । शत्रुघ्नोऽप्रतिघोऽमोघः प्रशा- स्ता शासिता स्वभूः ॥ ११ ॥ शांतिनिष्ठो मुनिज्येष्ठः शिवतातिः शिवप्रदः । शांतिदः शांतिकछान्तिः कांतिमान्कामितप्रदः ॥ १२ ॥ श्रे- योनिधिरधिष्ठानमप्रतिष्ठः प्रतिष्ठितः । सुस्थितः स्थावरः स्थाणुः प्रथीया- प्रथितः पृथुः ॥ १३ ॥ ॥ इति त्रिकालदर्यादिशतम् ॥ ६ ॥ दिग्यासा वातरशनो निग्रन्थेशो निरम्बरः । निष्किञ्चनो निराशंसो ज्ञानचक्षुरमोमुहः ॥ १॥ तेजोराशिरनन्तौजा ज्ञानााब्धः शीलसागरः । तेजोमयोऽमितज्योतिर्योंतिमूर्तिस्तमोऽपहः ॥२॥ जगच्चूडामणिर्दीप्तः सर्वविघ्नविनायकः । कलिनः कर्मशत्रुघ्नो लोकालोकप्रकाशकः ॥ ३ ॥ अनिद्रालुरतन्द्रालुर्जागरूकः प्रमामयः । लक्ष्मीपतिर्जगज्योतिधर्मराजः प्र- जाहितः ।। ४ ॥ मुमुक्षुर्वधमोक्षज्ञो जिताक्षो जितमन्मथः । प्रशांतरसशै- लूपो भव्यपेटकनायकः ।। ५ ॥ मूलकाखिलज्योतिर्मलघ्नो मूलकारणः आप्तो वागीश्वरः श्रेयोञ्छायसोक्तिनिरुक्तवाक ॥ ६ ॥ प्रवक्ता वचशा- मीशो मारजिद्विश्वभाववित् । सुतनुस्तनुनिमुक्तः सुगतो हतदुर्नयः॥७॥ श्रीशः श्रीश्रितपादाब्जो वीतभीरभयंकरः । उत्सन्नदोषी निर्विघ्नो निश्चलो लोकवत्सलः ॥ ८ ॥ लोकोत्तरो लोकपतिलोकचक्षुरपारधीः । धीरधीवु दुसन्मार्गः शुद्धः सूनृतपूतवाक् ॥ ९॥ प्रज्ञपारमितः प्राज्ञा यतिनियमि- तेन्द्रियः । भन्दतो भद्रकृद्भद्रः कल्पवृक्षों वरप्रदः ॥ १०॥ सुमुन्मूलित- कर्मारिः कर्मकाष्ठाशुशुक्षणिः । कर्मण्यः कर्मठः प्रांशुहेयादेयविचक्षणः ॥११ ॥ अनन्तशक्तिरच्छेद्यास्त्रपुगरित्रिलोचनः । त्रिनेत्रस्व्यवंकस्ब्यक्षः केवलज्ञानवीक्षण ।। १२ ।। समंतभद्र शांतारिधर्माचार्यो दयानिधि । सू- क्ष्मदर्शी जितानंगः कृपालुर्धर्मदेशकः ॥ १३ ।। शुभंयुः सुखसाद्भूतः पुण्यराशिरनामयः । धर्मपालो जगत्पालो धर्मसाम्राज्यनायकः ॥ १४ ॥ ॥ इति दिग्यामादिशनम् ॥ १० ॥ ॥ इत्यष्टाधिकसहस्त्रनामावली समाप्ता ।। [१] - धाम्नांपते तवामूनि नामान्यागमकोविदैः। समुचितान्यनुध्यायन्पु- मान्पूतस्मृतिर्भवेत् ॥ १ ॥ गोचरोऽपि गिरामासां त्वमवाग्गोचरो मतः । स्तोता तथाप्यसंदिग्धं त्वत्तोऽभीष्टफलं लभेत् ॥ २॥ त्वमतोऽसि जग- इन्धुस्त्वमऽतोसि जगद्भिपक । त्वमते.सि जगद्धाता त्वमतोऽसि जगद्वितः ॥३॥ त्वमेकं जगतां ज्योतिस्त्वं द्विरूपोपयोगभाक । वं त्रिरूपैकमुक्त्यंगं स्वोत्थानंतचतुष्टयः॥४॥ पंचब्रह्मतत्वात्मा पंचकल्याणनायकः षड्मे- दभावतत्त्वज्ञस्त्वं सप्तनयसंग्रहः ॥७॥ त्वं दिव्याटगुणमूर्तिस्त्वं नवकेवलल- ब्धिकः । दशावतारनिर्भार्यों मां पाहि परमेश्वरः ॥६॥युष्मन्नामावलीब्धा- विलसत्स्तोत्रमालया। भवंतं वरिवस्यामः प्रसीदानुग्राहाण नः ॥७॥इदं स्तोत्रमनुस्मृत्य पूतो भवति भाक्तिकः ।यस पाठं पठत्येनं सस्यात्कल्याण- भाजनम्॥८॥ ततः सदेदं पुण्यार्थीपुमान्पठति पुण्यधीः। पौरुहूतीं श्रियं प्राप्तुं परमामभिलाषुकः ॥ ६॥ स्तुत्वेति मघवा देवं चराचरजगद्गुरुं । ततस्तीर्थविहारस्य व्यधात्प्रस्तावनामिमाम् ॥१०॥ स्तुतिः पुण्यगुणोत्की- तिः स्तोता भव्यः प्रसन्नधीः । निष्ठितार्थो भवांस्तुत्यः फलं नैश्रेयसं सुख ॥ ११ ॥ यः स्तुत्यो जगतां त्रयस्य न पुनः स्तोता स्वयं कस्यचित् ॥ ध्येयो योगिजनस्य यश्च नितरां ध्याता स्वयं कस्यचित् ॥ यो नेतन् नयते नमस्कृतिमल नन्तव्यपक्षेक्षणः। स श्रीमान् जगतां त्रयस्य च गुरुर्देवः पुरुः पावनः ॥ १२ ॥ तं देवं त्रिदशाधिपार्चितपदं घातिक्षयानन्तरं । प्रोत्थानन्त चतुष्टयं जिनमिमं भव्याब्जिनीनामिनम् । मानस्तंभविलोकनानतजगन्मान्य त्रिलोकीपतिं । प्राप्ताचिंत्यवहिविभूतिमनघं भक्त्या प्रवंदामहे ॥१३॥ ॥ इति श्रीजिनसहस्रनामस्तवनं ममाप्तम् ।। [१०] || सुप्रभातस्तोत्रम् ॥ यत्स्वर्गावतरोत्सवे यदभवजन्माभिषेकोत्सवे । यहीक्षाग्रहणोत्सवे यदखिलज्ञानप्रकाशोत्सवे॥यनिर्वाणगमोत्सवे जिनपतेः पूजाद्भुतं तद्भवैः। संगीतस्तुतिमंगलैः प्रसरतां मे सुप्रभातोत्सवः ॥ १॥ श्रीमन्नतामरकिरीट- मणिप्रभाभिरालीढपादयुग! दुर्द्धरकर्मदुर। श्रीनाभिनन्दन ! जिनाजित! शम्भवाख्य ! त्वद्धयानतोऽस्तु सततं मम सुप्रभातम् ॥ २॥ चत्र- याचलचामरवीज्यमानदेवाभिनन्दनमुने सुमते जिनेंद्र । पद्मप्रभारुणमणि- द्युतिभासुरांग; त्व०॥३॥ अर्हन् सुपार्श्व कदलीदलवर्णगात्र प्रालेय- तारगिरीमौक्तिकवर्णगौर । चन्द्रप्रभस्फटिकपाण्डुरपुष्पदन्त ! त्व० ॥४॥ संतसकांचनरुचे जिनशीतलाख्य श्रेयान्विनष्टदुरिताष्टकलंकपंक । बन्धूकबन्धुररुचे जिनवासपूज्य; त्व०॥५॥ उद्दण्डदर्पकरिपो विमला- मलांग स्थेमन्ननंतजिदनंतसुखांबुराशे । दुष्कर्मकल्मपविवर्जित धर्मनाथ; त्व० ॥ ६ ।। देवामरीकुसुमसन्निभ शांतिनाथ कुंथो दयागुणविभूषणभूषि- तांग । देवाधिदेव भगवन्धरतीर्थनाथ; त्व०॥७॥ यन्मोहमल्लमदभंजन- मल्लिनाथ क्षेमंकरावितथशासनसुव्रताल्य । यत्संपदा प्रशमितो नमिनाम- धेय त्व०॥८॥ तापिच्छगुच्छरुचिरोज्ज्वल नेमिनाथ घोरोपसर्गविज- यिन् जिनपार्श्वनाथ । स्याद्वादरक्तिमणिदर्पणवमान; त्व० ॥९॥ प्रा- लेयनीलहरितारुणपीतभासं, यन्मृतिमव्ययसुखावसथं मुनींद्राः । ध्यायंति गसतिशतं जिनवल्लभानां; त्व०॥१०॥ सुप्रभातं सुनक्षत्रं मांगल्यं परि- कीर्तितम् । चतुर्विंशतितीर्थानां सुप्रभातं दिने दिने ।। ११ ।। सुप्रभात सुनक्षत्रं, श्रेयः इत्यभिनंदितम् । देवता ऋषयः सिद्धाः सुप्रभातं दिने दिने ॥ १२॥ सुप्रभातं तवैकस्य वृषभस्य महात्मनः । येन प्रवर्तितं तीर्थ भव्यसत्त्वसुखावहम् ।। १३ ।। सुप्रभातं जिनेंद्राणां ज्ञानोन्मीलितचचुषाम् । अज्ञानतिमिरांधानां नित्यमस्तमितो रविः॥ १४ ॥ सुप्रभातं जिनेंद्रस्य वीरः कमललोचनः । येन कर्माटवी दग्धा शुक्लध्यानोग्रवहिना ॥१५॥ ११] सुप्रभातं सुनक्षत्र सुकल्याणं सुमंगलम् । त्रैलोक्यहितकर्तृणां जिनानामेव शासनम् ॥ १६॥ ॥ इति सुप्रभातस्तोत्रम् ॥ , 1 भूतकालतीर्थङ्कराः। १ श्रीनिर्वाण २ सागर ३ महासाधु ४ विमलप्रभ ५ श्रीधर ६ सुदत्त ७ अमलप्रभ ८ उद्धर ६ अंगिर.१० सन्मति ११ सिंधु १२ कुसु- मांजलि १३ शिवगण १४ उत्साह १५ ज्ञानेश्वर १६ परमेश्वर १७ विमलेश्वर १८ यशोधर १९ कृष्णमति २० ज्ञानमति २१ शुद्धमति २२ श्रीभद्र २३ अतिक्रांत २४ शांताश्चेतिभूतकालसंवन्धिचतुर्विंशति- तीर्थकरेभ्यो नमो नमः ॥ वर्तमानकालतीर्थङ्कराः। १ ऋषभ २ अजित ३ शंभव ४ अभिनंदन ५ सुमति ६ पद्मप्रम ७ सुपार्श्व ८ चंद्रप्रभ ६ पुष्पदत १० शीतल ११ श्रेयान १२ वासुपूज्य १३ विमल १४ अनंत १५ धर्म १६ शांति १७ कुथु १८ अर १९ मल्लि २० मुनिसुव्रत २१ नमि २२ नेमि २३ पार्श्व २४ बर्द्धमानाश्चेति वर्तमानकालसंबन्धिचतुर्विंशतितीर्थङ्करेभ्यो नमो नमः ।। भविष्यत्कालतीर्थकराः १ श्रीमहापद्म २ सुरदेव ३ सुपार्च ४ म्वयंप्रभ ५ सर्वात्मभूत ६ देवपुत्र ७ कुलपुत्र ८ उदंक ९ प्रोष्ठिल १० जयकीर्ति ११ मुनिसुव्रत १२ अर ( अप्तम) १३ निप्पाप १४ निष्कपाय १५ विमल १६ निर्मल १७ चित्रगुप्त १८ समाधिगुप्त १६ स्वयंभू २० अनिवृत्तिक २१ जय २२ विमल २३ देवपाल २४ अनन्तवीर्याश्चेति भविष्यत्कालसंवन्धिचतु- [१२] -विंशतितीर्थकरेभ्यो नमो नमः ॥११॥ विदेहक्षेत्रस्थविंशतितीर्थङ्कराः। १ सीमंधर २ युगमधेर ३ वाहु ४ सुबाहु ५ सुजात ६ स्वयंप्रभु ७ वृपभानन ८ अनंतवीर्य ९'सुरप्रभ १० विशालकीर्ति ११ वजघर १२ चंद्रानन १३ भद्रबाहु १४ भुजंगम १५ ईश्वर १६ नेमप्रभ (नेमि) १७ वीरसेन १८ महाभद्र १९ देवयंश २० अजितवीर्याश्चेति विदेहक्षे- स्थविंशतितीर्थकरेभ्यो नमो नमः ।। "भक्तामरस्तोत्रम्। भक्तामरप्रणतमौलिमणिप्रभाणामुद्योतक दलितपापतमोवितानम् । मम्यक् प्रणम्य जिनपादयुगं युगादावालवनं भवजले पततां जनाना' ।। १ ।। यः संस्तुतः सकलवाङ्मयतत्ववोधादुद्भुतबुद्धिपटुमिः सुरलोक- नाथैः । स्तोत्रैर्जगत्तियचित्तहररुदारैः स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथम जिनेंद्रम् ॥ २ ॥ बुद्धया विनापि विबुधाचिंतपादपीठ स्तोतुं समुद्यतमति- विंगतत्रपोऽहं । चालं विहाय जलसंस्थिमिंदुविधमन्यः क इच्छति जनः सहसा गृहीतुं ॥ ३॥ वक्तुं गुणान्गुणममुद्र शशांककांतां कस्ते क्षमः सुग्गुग्प्रतिमोऽपि बुद्धया । कल्पांतकालपवनोधतनक्रचक्रं को वातरीतुम- लमवुनिधि भुज्याभ्यां ॥ ४ ॥ सोऽह तथापि तव भक्तिवशान्मुनीश कर्तु स्तव विगतशक्तिरपि प्रवृत्तः। प्रीत्यात्मवीर्यमविचार्यमृगोमृगेंद्र नाम्येति किं निजशिशोः परिपालनार्थम् ॥ ५॥ अल्पश्रुत श्रुतवता परिहासंघाम त्वद्भक्तिरेव मुखरीकुरुते चालान्माम् । यत्कोकिलः किल मधौं मधुरै विरौति तच्चाम्रचारुकलिकानिकरकहेतुः ॥ ६ ॥ त्वत्संस्तवेन भवसंतति- सनिवद्धं पापं क्षणात्क्षयमुपैति शरीरभाजाम् । आक्रांतलोकमलिनीलमशेष- माशु सूर्याशुभिन्नमिव शार्वरमंधकारम् ।।७ ॥ मत्वैति नाथ तव संस्तवन [१३] मयेदमारभ्यते तनुधियापि तव प्रभावात् । चेतो हरिष्यति सतां नलिनी- दलेषु मुक्ताफलद्युतिमुपैति ननूदविंदुः॥८॥ आस्तां तव स्तवनमस्त- समस्तदोष, त्वत्संकथापि जगतां दुरितानि हन्ति । दूरे सहस्रकिरणः कुरुते प्रभव, पनाकरेषु जलजानि विकासभांजि ॥ ९ ॥ नात्यद्भुतं भुवनभूष णभूत नाथ, भूतैर्गुणैर्भुवि भवंतमभिष्टुबन्तः । तुल्या भवंति भवतो ननु तेन किं वा, भृत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥१०॥ दृष्ट्वा भवंतम- निमेपविलोकनीयं नान्यत्र तोपमुपयाति जनस्यचक्षुः । पीत्वा पयः शशि- करद्युतिदुग्धसिन्धोः, क्षारं जलं जलनिघेरसितुं क इच्छेत् ॥ ११॥ यः शांतरागरुचिभिः परमाणुमिस्त्वं निर्मापितत्रिभुवनैकललामभूत । तावंत एव खलु तेऽप्यणवः पृथिव्यां यत्ते समानमपरं न हि रूपमस्ति ॥ १२ ॥ चक्त्रं कते सुरनरोरगनेत्रहारि, निश्शेषनिर्जितजगत्रितयोपमानम् । विम्वं कलङ्कमलिनं क निशाकरस्य यद्रासरे भवति पाण्डुपलाशकल्पम् ।। १३ ।। सम्पूर्णमण्डलशशाङ्ककलाकलापशुम्रा, गुणात्रिभुवनं तव लयन्ति । ये संश्रितास्त्रिजगदीश्वरनाथमेकं कस्तानिवारयति संचरतो यथेष्टम् ॥ १४ ॥ , चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशाङ्गनामिनीत मनागपि मनो न विकारमार्गम् । कल्पान्तकालमरुता चलिताचलेन, किं मन्दरादिशिखरं चलितं कदाचिद ॥ १५॥ निधूमवतिरपवर्जिततैलपूरः कुलं जगत्रयमिदं प्रकटीकरोपि । गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ जगत्प्रकाश ॥ १६ ॥ नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्यः स्पष्टीकरोषि सहसा युग- पजगन्ति । नाम्भोघरोदरनिरुद्धमहाप्रभावः सुर्यातिशायिमहिमासि मुनीन्द्र लोके ॥ १७ ॥ नित्योदयं दलितमोहमहान्धकारं गम्यं न राहुवदनस्य न वारिदानाम् । विम्राजते तवं मुखाब्जमनन्पकान्ति विद्योतयजगदपूर्वश- शाकविम्बम् ॥ १८ ॥ किं शर्वरीपुशशिनाह्नि विवस्वता वा युष्मन्मुखे- न्दुदलितेषु तमःसुनाय । निष्पनशालिवनशालिनि जीवलोके कार्य किय- जलधरैर्जलमारनौः ॥ १९ ॥ ब्रानं यथा त्वयि विभाति कृतावकागं नै तथा हरिहरादिषु नायकेषु । तेजो महामणिपु याति यथा महन्वं नैवं तु काचशकले किरणाकुलेऽपि ॥२०॥ पन्ये वरं हरिहगदय एव दृष्टा [१] दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोपमेति । किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्यः कश्चिन्मनोः हरति नाथ भवान्तरेऽपि ॥ २१ ॥ स्त्रीणां शतानि शतशो - जनयंति पुत्रानान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता । सर्वा दिशो दधति भानि सहस्ररश्मि प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशुजालम् ॥ २२ ॥ त्वामा- मनन्ति मुनयः परमं पुमांसमादित्यवर्णममलं तमसः परस्तात् । त्वामेव सम्यगुपलभ्य जयंति मृत्यु नान्यः शिवः शिवपदस्य मुनींद्र पंथाः॥२३॥ त्वामव्यय विभुमचिन्त्यमसङ्ख्यमाद्यं ब्रह्माणमीश्वरमनन्तमनङ्गकेतुम् । योगीश्वरं विदितयोगमनेकमेक ज्ञानस्वरूपममल प्रवदन्त सन्तः ॥ २४ ॥ बुद्धस्त्वमेव विबुधाचितबुद्धिबोधावं शङ्करोऽसि भुवनत्रयशङ्करत्वात् । धातासि धीर शिवमार्गविधेविधानाद्रयक्तं त्वमेव भगवन्पुरुषोत्तमोऽसि ॥२५॥ तुभ्यं नमस्त्रिभुवनार्तिहराय नाथ तुभ्यं नमः क्षितितलामलभू- षणाय । तुभ्यं नमस्त्रिजगतः परमेश्वराय तुभ्यं नमो जिन भवोदधिशो- पणाय ॥ २६ ॥ को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणैरशेपैस्त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश । दोपेरुपात्तविषुधाश्रयजातगर्वैः स्वमान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि ॥ २७ ॥ उच्चरशोकतरुसंश्रितमुन्मयूखमाभाति रूप- ममलं भवतो नितान्तम् । स्पष्टोल्लसत्किरणमस्ततमोवितानं विम्बं रवेरिव पयोधरपार्श्ववति ॥ २८॥ सिंहासने मणिमयूखशिखाविचित्रे विभ्राजते तव वपु कनकावदातम् । विम्बं वियविलसदंशुलतावितान तुङ्गोदयाद्रि- शिरसीव सहस्ररश्मे ॥ २९ ॥ कुन्दावदातचलचामरचारुशोभं विभ्राजते तव वपुः कलधौतकान्तम् । उद्यच्छशाङ्कशुचिनिर्झरवारिधारमुच्चैस्तटं सुर- गिरेरिख शातकौम्भम् ॥ ३०॥ त्रत्रय तव विभाति शशाङ्ककान्तमुच्चैः स्थितं स्थगितभानुकरप्रतापम् । मुक्ताफलप्रकरजालविवृद्धशोभं प्रख्यापय- त्रिजगतः परमेश्वरत्वम् ॥ ३१॥ गम्भीरताररवपूरितदिग्विभागस्त्रलोक्य- लोकशुभसङ्गमभूतिदक्षः। सद्धर्मराजजयघोपणघोषकः सन्खे दुन्दुभिर्धनति ते यशसः प्रवादी ॥ ३२ ॥ मन्दारसुन्दरनमेरुसुपारिजात सन्तानकादिकुसु- मोत्करवृष्टिरुद्धा । गन्धोदविन्दुशुभमन्दमरुत्प्रयाता दिव्या दिवः पतति ते वयसां ततिर्वा ॥ ३३ ॥ शुम्भत्प्रभावलयभूरिविभा विभोस्ते लोकत्रये [१५] द्युतिमतां द्युतिमाक्षिपन्ती । प्रोद्यदिशाकरनिरन्तरभृरिसंख्या दीप्त्या जय- त्यपि निशामपि सोमसौम्याम् ॥ ३४ ॥ स्वर्गापवर्गगममार्गविमार्गणेष्टः सद्धर्मतत्त्वकथनैकपटुखिलोक्याः। दिव्यध्वनिर्भवति ते विशदार्थसर्वभाषा- स्वभावपरिणामगुणप्रयोज्यः ॥ ३५ ॥ उन्निद्रहेमनवपङ्कजपुञ्जकान्ती पर्युलसन्नखमयूखशिखामिरामौ । पादौ पदानि तव यत्र जिनेंद्र धत्तः पद्मानि तत्र विवुधाः परिकल्पयन्ति ॥ ३६ ॥ इत्थं यथा तव विभूतिर- भूजिनेंद्र । धर्मोपदेशनविधौ न तथापरस्य । यादृक्प्रभा दिनकृतः प्रह- तान्धकारा ताहक्कुतो ग्रहगणस्य विकासिनोऽपि ॥ ३७ ॥ श्च्योतन्मदा- विलविलोलकपोलमूलमत्तभ्रमद्धमरनादविवृद्धकोपम् । ऐरावताभमिभमु- द्धतमापतन्तं दृष्ट्वाभयं भवति नो भवदाश्रितानाम् ।। ३८ । मिन्नेभकु- म्भगल दुज्ज्वलशोणिताक्तमुक्ताफलप्रकरभृपितभूमिभागः । बद्धक्रमः क्रमगतं हरिणाधिपोऽपि नाकामति क्रमयुगाचलसंश्रितं ते ॥ ३९ ॥ कल्पान्तकालपबनोद्धतवतिकल्पं दावानलं ज्वलितमुज्ज्वलमुत्फुलिङ्गम् । विश्व जिघत्सुमिव सम्मुखमापतन्तं त्वन्नामकीर्तनजलं शमयत्यशेपम् ॥४०॥ रक्तक्षणं समदकोकिलकण्ठनीलं क्रोधोद्धतं फणिनमुत्फणमापत न्तम् । आक्रामति क्रमयुगेन निरस्तशङ्कस्त्वनामनागदमनी हृदि यस्य पुमः ।। ४१ ॥ वल्गत्तुरंगगजगर्जितमीमनादमाजौ बलं बलवतामपि भप- तीनाम् । उद्यदिवाकरमयखशिखापविद्धं तत्कीर्तनात्तम इवाशु मिदामुपैति ४२ ।। कुन्ताग्रभिन्नगजशोणितवारिवाहवेगावतारतरणातुस्योधभीमे । युद्धे जयं विजितदुर्जयजेयपक्षास्त्वत्पादपङ्कजवनायिणो लभन्ते ॥ ४३ ।। अम्भोनिधौ क्षुभितभीपणनाचक्रपाठीनपीठभयदोल्वणवाडवाग्नौ । रङ्गत्त- रङ्गशिखरस्थितयानपात्रावास विहाय भवतः स्मरणाबजन्ति ॥ ४४ ॥ उद्भूतभीपणजलोदरभारभुनाः शोच्यां दशामुगताश्च्युतजीविताशाः । त्वत्पादपङ्कजरजोमृतदिग्धदेहा मा भवंति मकरध्वजतुल्यरूपाः ।।४।। आपादकण्ठमुरुशृङ्खलवेष्टिताङ्गा गाढं वृहन्निगडकोटिनिघृष्टजवाः त्वन्ना- ममन्त्रमनिशं मनुजाः सरन्तः सद्यः स्वयं विगनबन्धमया भवंति ।। ४६ ॥ मत्तद्विपेन्द्रमृगराजदवानलाहिसंग्रामवारिधिमहोदरवन्धनोत्थम् ।। तम्याशु [१६] नाशमुपयाति भयं भिवेव यस्तावकं स्तवमिमं मंतिमानधीते ॥ ४७ ॥ स्तोत्रसृजं तव जिनेद्र गुणनिवद्वां भक्त्या मया विविधवर्णविचित्रपुष्पाम् धत्ते जनो य इह कण्ठगतामजसं ते मानतुङ्गमवशा समुपैति लक्ष्मीः॥४८॥ ॥ इति श्रीमानतुङ्गाचार्यविरचित भक्तामरस्तोत्रम ॥ श्रीसिद्धसेनदिवाकरप्रणीत कल्याणमन्दिरस्तोत्रम् । कल्याणमन्दिरमुदारमवद्यभेदि भीताभयप्रदमनिन्दितमंघ्रिपन्नम् । संसारसागरनिमजदशेपजन्तुपोतायभानममिनम्य जिनेश्वरस्य ॥ १ ॥ यस्य स्वयं सुरगुरुगरिमाम्बुराशेः स्तोत्रं सुविस्तृतमतिर्न विभुर्विधातुम् । तीयेश्वरस्य कमठसयधूमकेतोस्तस्याहमेप-किल संस्तवनं करिष्ये ॥ २ ॥ (युग्मम् ) सामान्यतोऽपि तव वर्णयतुं स्वरूपमस्मादृशाः कथमधीश भव- न्त्यधीशाः । धृष्टोऽपि कौशिकशिशुर्यदि वा द्विवान्धो रूपं प्ररूपयति कि किल धर्मरश्मेः॥३॥ मोहक्षयादनुभवन्नपि नाथ मर्यो नूनं गुणान्गण- यितुं न तव क्षमेत | कल्पान्तवान्तपयमः प्रकटोऽपि यसान्मीयेत केन जलधे- ननु रत्नराशिः ॥४॥अभ्युद्यतोऽसि तव नाय जडाशयोऽपि कर्तुं स्तवं लस- दसंख्यगुणाकरस्य । बालोऽपि किं न निजवाहयुगं वितत्य विस्तीर्णता कथयति स्वधियाम्बुराशेः ॥ ५ ॥ ये योगिनामपि नयंन्ति गुणास्तवेश वक्तुं कथं भवति तेषु ममावकाशः । जाता, तदेवमसमीक्षितकारितेयं जल्पन्ति वा निजगिरा ननु पक्षिणोऽपि ॥ ६ ॥ आस्तामचिन्त्यमहिमा जिन संस्तवस्ते नामांपिपाति' भवतो भवतो जगन्ति तीवातपोपहतपान्थ- [१७] जनानिदाघे प्रीणाति पद्मसरसः सरसोऽनिलोऽपि ॥ ७॥ हर्तिनि त्वयि विभो शिथिलीभवंति जन्तोः क्षणेन निविडा अपि कर्मबन्धा । सद्यो भुजंगममया इव मध्यमागमभ्यागते वनशिखण्डिनि चन्दनस्य ॥ ८॥ मुच्यन्त एव मनुजा; सहसा जिनेंद्र रोद्र्रुपद्रवशतैस्त्वविवक्षितेऽपि । गोवामिनी स्फुरिततेजसिष्टमात्रे चौरैरिवाशु पशवः प्रपलायमानैः॥९॥ त्वं तारको जिन कथं भविनां त एव त्वामुहंति हृदयेन यदुत्तरन्तः । यद्वा दृतिस्तरति यजलमेष नूनमन्तर्गतस्य मरुतः स किलानुभावः ॥१०॥ यसिन्हरप्रभृतयोऽपि हतप्रभावाः सोऽपि त्वाया रतिपतिःक्षपितः क्षणेन । विध्यत्पिता हुतभुजः पयसाथ येन पीतं न किं तदपि दुर्धरवाडवेन ॥११॥ स्वामिन्ननल्पगरिमाणमपि प्रपन्नस्त्वां जन्तवः कथमहो हृदये दधानाः । जन्मोदधिं लघु तरन्त्यतिलाघवेन चिन्त्यो न हन्त महतां यदि वा प्रभावः ॥ १२ ॥ क्रोधस्त्वया यदि विभो प्रथमं निरस्तो ध्वस्तस्तदा वद कथं किल कर्मचौराः । प्लोषत्यमुत्र यदि वा शिशिरापि लोके नील- द्रुमाणि विपिनानि न कि हिमानी ॥ १३ ॥ त्वां योगिनो जिन सदा परमात्मरूपमन्वेषयति हृदयाम्वुजकोषदेशे। पूतस्य निर्मलरुचेर्यद वा किम- न्यदक्षस्य सम्भवपदं ननु कर्णिकायाः ॥१४॥ ध्यानाजिनेश भवतो भविनः क्षणेन देहं विहाय परमात्मदा व्रजति । तीवानलादुपलभावमपास्य लोके चामीकरत्वमचिरादिव धातुभेदाः ॥१५॥ अन्तः सदैव जिन यस्य विभाव्यसे त्वं भव्यैः कथं तदपि नाशयसे शरीरम् । एतत्स्वरूपमथ मध्य- विवर्तिनो हि यद्विग्रहं प्रशमयति महानुभावाः ॥ १६ ॥ आत्मा मनीपि- मिश्यं वदभेदबुद्ध्या ध्यातौ जिन्द्र भवतीह भवत्प्रभावः । पानीयमप्य- मृतमित्यनुचिन्त्यमानं किं नाम नो विषविकारमपाकरोति ।। १७ ॥ त्वा- मेव वीततमसं परवादिनोऽपि नूनं विभो हरिहरादिधिया प्रपन्नाः । किं काचकामलिमिरीश सितोऽपि शलो नो गृह्यते विविधवर्णधिपर्ययेण ॥ १८॥ धर्मोपदेशममये सविधानुभावादास्तां जनो भवति ते तरुरप्य- शोकः । अभ्युद्गते दिनपतौ समहीरुहोऽपि किं वा विबोधमुपयाति न जीवलोकः ॥ १६॥ चित्रं विभो कथमवाड्मुखवृन्तमेव विष्वक्पतत्यविरला [१८] सुरपुष्पवृष्टिः । त्वगोचरै सुमनसां यदि वा मुनीश ! गच्छंति नूनमध एव हिवन्धनानि ॥ २० ॥ स्थाने गभीरहृदयोदधिसम्भवायाः पीयूपता तव -गिरः समुदीरयति । पीत्वा यतः परमसंमदसङ्गभाजो भव्या व्रजति तरसा- प्यजरामरत्वम् ॥ २१ ॥ स्वामिन्सुदूरमवनम्य समुत्पतंतो मन्ये वदन्ति शुचयः सुरचामरौघाः । येऽस्मै नतिं विदधते मुनिपुङ्गवाय ते नूनमूग- तयः खलु शुद्धभावाः ॥ २२ ॥ श्यामं गभीरगिरमुज्ज्वलहेमरत्नसिंहास नस्थमिह भव्यशिखण्डिनस्त्वाम् । आलोकयन्ति रभसेन नदन्तमुच्चैश्चामी- कराद्रिशिरसीपनवाम्बुवाहम् ॥ २३ ॥ उद्गच्छता तव शितिद्युतिमण्डलेन लुप्तच्छदच्छविरशोकतरुर्वभूव । सांनिध्यतोऽपि यदि वा तव वीतराग ! नीरागतां व्रजति को न सचेतनोऽपि ॥ २४ ॥ भो भोः प्रमादमवधूय भजध्वमेनमागत्य निर्वृतिपुर्त प्रतिसार्थवाहम् । एतनिवेदयति देव जगत्त्र- याय मन्ये नदन्नमिनभः सुरदुन्दुमिस्ते ॥ २५ ॥ उद्दयोतितेपु भवता भुव- नेपुनाथ तारान्तिो विधुरयं विहतान्धकारः । मुक्ताकलापकलितोरुसिता- तपत्रव्याजाविधाधृतधनुर्धवमभ्युपेतः ।। २५।। स्वेन प्रपूरितजगत्त्रयवि. (ण्डितेन कांतिप्रतापयशसामिव सञ्जयेन । माणिक्यहेमरजतप्रविनिर्मितेन सालत्रयेण भगवन्नभितो विभासि ॥ २७॥ दिव्यस्रजो जिन नमत्रिदशा- दिपानामुत्सृज्य रत्नरचितानपि मौलिवन्धान । पादौ श्रयन्ति भवता यदि वापरत्र त्वत्सङ्गमे सुपनसों न रमन्त एव ॥ २८ ॥ त्व नाथ जन्मजलधे- विपराङ्मुखोऽपि यत्तारयस्यसुमतो निजपृष्ठलनान् । युक्तं हि पार्थिवनिपस्य सतस्तवैव चित्रं विभो यदसि कर्मविपाकशून्यः ॥ २९ ॥ विश्वेश्वरोऽपि जनपालक दुर्गतस्त्वं किंवाक्षरप्रकृतिरप्यलिपिस्त्वमीश | अज्ञानवत्यपि सदैव कथंचिदेव ज्ञानं त्वयि स्फुरति विश्वविकासहेतु ॥ ३० ॥ प्राग्भार- सम्भृतनभांसि रजांसि रोपादुत्थापितानि कमठेन शठेन यानि । छायापि तैस्तर न नाथ हता हताशो ग्रस्तस्त्वमीभिरयमेव परं दुरात्मा ॥ ३१ ॥ यद्दर्जदूर्जितधनीधमदभ्रभीमभ्रश्यत्तडिमुप्तलमांसलघोरधारम् । दैत्येन मुक्त- मथ दुस्तरवारि दबेतेनैव तस्य जिन दुस्तरवारिकृत्यम् ॥ ३२ ॥ ध्वस्तो- चंकेशविकृताकृति मर्त्यमुण्डमालम्बभृद्भयदवक्त्रविनियंदग्निः । प्रेतबजः [१९] प्रतिभवन्तमपीरितोयः सोऽस्याभवत्प्रतिभवं भवदुःखहेतुः॥३३॥धन्यास्त एव भुवनाधिप ये त्रिसन्ध्यमाराधयन्ति विधिवद्रिधुतान्यकृत्याः। भक्त्योल्ल- सत्पुलकपक्ष्मलदेहदेशाः पादद्वयं तव विभो मुवि जन्मभाजः॥ ३४ ॥ असिन्नपारभववारिनिधौ मुनीश मन्ये नमे श्रवणगोचरतां गतोऽसि । आकर्णिते तु तव गोत्रपवित्रमन्त्रे किंवा विपद्विषधरी सविधं समेति ॥ ३५ ॥ जन्मातरेऽपि तव पादयुगं न देव मन्ये मया महितमीहितदान- दक्षम् । तेनेह जन्मनि मुनीश ! पराभवानां जातो निकेतनमहं मथिताश- यानम् ॥ ३६ ॥ नूनं न मोहतिमिरावृतलोचनेन पूर्व विभो सकृदपि प्रवि- लोकितोऽसि मर्माविधो विधुरयन्ति हि मामनाः प्रोद्यत्प्रबन्धगतयः कथ- मन्यते ॥ ३७॥ आकर्णितोऽपि महितोऽपि निरीचितोऽपि नूनं न चेतसि मया विधृतोऽसि भक्त्या । जातोऽसि तेन जनवान्धव दुःखपात्रं यस्मारिक्रयाः प्रतिफलन्ति न भावशून्याः ॥ ३८ ॥ त्वं नाथ दुःखिजन- वत्सल हे शरण्य कारुण्यपुण्यवसते वशिनां वरेण्य । भक्या न ते मयि महेश दयां विधाय दुःखाङ्कुरोद्दल नतत्परतां विधेहि ।। ३९ ॥ निःसख्यसार- शरणं शरणं शरण्यमासाद्य सादितरिपुप्रथितावदानम् । त्यत्पादपङ्कजमपि प्रणिधानवन्ध्यो वन्ध्योऽस्मि तद्भवनपावन हा हतोऽस्मि ॥ ४० ॥ देवे- न्द्रवन्ध विदिताखिलवस्तुसार संसारतारक विभो भुवनाधिनाथ । त्रायस्व देव करुणाहद मां पुनीहि सीदन्तमद्य भयदव्यसनाम्बुराशेः ॥ ४१ ।। यद्यस्ति नाथ भवदङघिसरोरुहाणां भक्तः फलं किमपि सन्ततसञ्चितायाः। तन्मे त्वदेकशरणस्य शरण्य मुयाः स्वामी त्वमेव भुवनेऽत्र भवान्तरेऽपि ।। ४२ ॥ इत्थं समाहितधियो विधिवजिनेन्द्र सान्द्रोल्लसत्पुलककञ्चुकि- ताङ्गभागाः। त्वद्विम्बनिर्मलमुखाम्बुजवद्धलक्ष्म्या ये संस्तवं तव विभो रचयन्ति भव्याः ।। ४३ ।। जननयनकुमुदचन्द्र प्रभास्वराः स्वर्गसम्पदो भुक्त्वा । ते विगलितमलनिचया अचिरान्मोक्षं प्रपद्यन्ते ।। ४४ ॥ 1 ॥ इति सिदसेनदिवाकरप्रणीत कल्याणमंदिरस्तोत्रम् ॥ [२०] श्रीवादिराजप्रणीतम् एकीभावस्तोत्रम् । एकीभावं गत इव मया यः स्वयं कर्मवन्धो घोरं दुःखं भवभवगतो दुनि- वारः करोति । तस्याप्यस्य त्वयि जिनवरे भक्तिरुन्मुक्तये चेज्जेतुं शक्यो भवति न तया कोऽपरस्तापहेतुः ॥ १ ॥ ज्योतीरूपं दुरितनिवहध्वान्त. विध्वंसहेतुं त्वामेवाहुर्जिनवर चिरं तवविद्याभियुक्ताः । चेतोवासे भवसि च मम स्फारमुद्भासमानस्तस्मिन्नहः कथमिव तमो वस्तुतो वस्तुमीप्टे ॥२॥ आनन्दाश्रुस्लपितवदनं गद्दं चामिजल्पन्यश्चायेत त्वयि दृढमनाः स्तोत्र- मन्त्रैर्भवन्तम् । तस्याभ्यस्तादपि च सुचिरं देहवल्मीकमध्यानिष्कायन्ते विविधविपमव्याधयः काद्रवेयाः ॥ ३ ॥ प्रागेवेह त्रिदिवभवनादेष्यता भव्यपुण्यात्पृथ्वीचक्रं कनकमयतां देव निन्ये त्वयेदम् । ध्यानद्वारं मम रुचिकर स्वान्तगेह प्रविष्टस्तकिं चित्रं जिन वपुरिदं यत्सुवर्णीकरोपि ॥४॥ लोकस्सैफस्तमसि भगवन्निनिमित्तन बन्धुस्त्वय्येवासौ सकलविषया शक्तिरप्रत्यनीका | भक्तिस्फीतां चिरमधित्रसन्मामिकां चित्तशय्यां मय्यु- त्पन्नं कथमिव ततः क्लेशयूथं सहेथाः ।। ५ ॥ जन्माटव्यां कथमपि मया देव दीर्घ भ्रमित्या प्राप्तवेयं तब नयकथा स्फारपीयूषवापी । तस्या मध्ये हिमकरहिमव्यूहशीते नितान्त निर्मग्नं मां न जहति कथं दुःखदावोपतापा. ६॥ पादन्यासादपि च पुनतो यात्रया ते त्रिलोकी हेमाभासो भवति सुरभिः श्रीनिवासश्च पनः । सर्वाङ्गण स्पृश्यति भगवस्त्वय्यशेषं मनो मे श्रेयः किंतत्स्वयमहरहर्यन्न मामभ्युपैति ॥ ७॥ पश्यन्तं त्वद्वचनममृतं भक्तिपाच्या पिबन्तं कर्मारण्यात्पुरुषमसमानन्दधाम प्रविष्टम् । त्वां दुर्वारस- रमदहरं त्वत्प्रसादैकभूमिक्रूराकाराः कथ मिव रुजाकण्टका निर्लठन्ति ॥८॥ पापाणात्मा तदितरसमः केवलं रत्नमूर्तिनिस्तम्भो भवति च [२१] परस्तादृशो रत्ववर्गः । दृष्टिप्राप्तो हरति स कथं मानरोगं नराणां प्रत्या- सरियदि न भवतस्तस तच्छक्तिहेतुः ॥ ९ ॥ हृयः प्राप्तो मरुदपि भवन्मृतिशलोपवाही सबः पुंमां निरवधिरुजाधुलिवन्धं धुनोति । ध्याना- हूतो हृदयकमलं यस्य तु त्वं प्रविष्टस्तस्याशक्यः क इह भुवने देव लोकोप- कारः ॥ १० ॥ जानासि त्वं मम भवभवे यच्च यादृक्च दुःखं जातं यस्य सरणमपि मे शस्त्रवनिष्पिनष्टिं । त्वं सर्वेशः सकृप इति च त्वामुपेतोऽसि भक्त्या यत्कर्तव्यं तदिह विषये देव एवं प्रमाणम् ॥ ११ ॥ प्रापदैवं तव नुतिपदैर्जीवकेनोपदिष्टैः पापाचारी मरणसमये सारमेयोऽपि सौख्यम् । कः संदेहो यदुपलभते वासवधीप्रभुत्वं जल्पञ्जायैर्मणिमिरमलैस्त्वन्नमस्कारचक्रम् ॥ १२ ॥ शुद्धे ज्ञाने शुचिनि चरिते सत्यपि त्वन्यनीचा भक्तिों चेदनव- घिसुखावश्चिका कुचिकेयम् । शक्योद्घाटं भवति हि कथं मुक्तिकामस्य पुंसो मुक्तिद्वारं परिढमहामोहमुद्राकवाटम् ॥ १३ ॥ प्रच्छन्नः खल्वयमधमय- रन्धकारैः समन्तात्पन्था मुक्तः स्थपुटितपदः क्लेशगर्तेरंगाधैः । तत्कस्तेन- व्रजति सुखतो देव तचापमासी यद्यग्रेज्ये न भवति भवद्भारतीरत्नदीपः ॥ १४॥ आत्मज्योतिनिधिरनवधिष्टानन्दहैतुः कर्मक्षोणीपहिलपिहितो योऽनवाप्या परेपाम् । हस्ते कुर्वन्त्यनतिचिरतस्तं भवद्भक्तिभाजः स्तोत्रे- बन्धप्रकृतिपुरुपोद्दामधात्रीखनित्रे ॥ १५॥ प्रत्युत्पन्नानयहिमगिरेरायता चामृताब्धेर्यादेव त्वत्पदकमलयः । सङ्गता भक्तिगङ्गा । चेतस्तस्यां मम रुचिरशादाप्लु क्षालितांहः कल्मापं यद्भवति किमियं देव संदेहभूमिः ।। १६ ।। प्रादुर्भत स्थिरपदसुख त्वामनुध्यायतो मे त्वय्येवाहं स इति भति रुत्पद्यते निर्विकल्पा । मिथ्येवेयं तदपि तनुते तृप्तिमभ्रेषरूपां दोपात्मानोऽ प्यभिमतफलास्त्वत्प्रसादाद्भवन्ति ॥ १७ ॥ मिथ्यावाद मलमपनुदन्सप्तम- शीतरगर्मागम्भोधि पनमखिलं देव पर्येति यस्ते । तस्यावृत्ति सपदि विवु- धाश्चेनसेवाचलेन व्यातन्वन्तः सुचिरममृतासेवया तृप्नुवन्ति ॥१८ ' आहायेंम्यः स्पृहयति परं यः खभावादहृयशस्वग्राही भवति सततं वैरिणा यश्च शक्य । सर्वागपुत्वमसि सुभगस्त्वं न शक्य. परेषांतरिकभूपावसनकुसुमै किं च शस्त्रैरदस्तैः ।। १६ ।। इन्द्रः सेवां तव सुकुरतां किं तया श्लाघनं ते [२२] तस्यैवेयं भवलयकरी श्लाध्यतामातनोति । त्वं निस्तारी जननजलधेः सिद्धिकान्तागतिस्त्वं वं लोकानां प्रभुरिति तब श्लाध्यते स्तोत्रमित्थम् ॥ २०॥ वृत्तिर्वाचामपरसदृशी न त्वमन्येन तुल्यस्तुत्युद्वाराः कथमिव ततस्त्वय्यमी न क्रमन्ते । मैवं भूस्तदपि भगवन्भक्तिपीयूषपुष्टास्ते भव्या नामभिमतफलाः पारिजाता भवन्ति ॥ २१॥ कोपावेशो न तब न तव क्वापि देव प्रसादो व्याप्तं चेतस्तव हि परमोपेक्षयैवानपेक्षम् । आज्ञावश्य तदपि भुवनं संनिधिवरहारी ववंभृतं भुवनतिलक ! प्राभवं त्वत्परेषु ॥२२॥ देव स्तोतुं त्रिदिवगणिकामण्डलीगीतकीर्ति तोतूतिं त्वां सकलविषय- ज्ञानमूर्ति जनों यः। तस्य क्षेमं न पदमटतो जातु जाहूर्ति पन्थास्तचग्रन्थ. स्मरणविपये नैष मोमूर्ति मर्त्यः ॥ २३ ॥ चित्ते कुर्वनिरवधिसुखज्ञानदृग्वी- यरूप देव त्वां य. समयनियमादादरेण स्तीति । श्रेयोमार्ग स खलु सुकृती तावता पूयित्या कल्याणानां भवति विषयः पञ्चधापञ्चितानाम् ॥२४॥ भक्तिप्रह्वमहेन्द्रपूजितपदत्वत्कीर्तने न क्षमाः सूक्ष्मज्ञानदृशोऽपिसंयमभृतः के हन्तमन्दा वयम् । असामिः स्तवनच्छलेन तु परस्त्वय्यादरस्तन्यते स्वा- स्माधीनसुखैपिणां स खलु न कल्याणकल्पदुमः ॥ २५ ॥ वादिराजमनु शाब्दिकलोको वादिराजमनु तार्किकसिंहः । वादिराजमनु काव्यकृतस्ते वादिराजमनु भन्यसहायः ।। २६ ।। ॥ इति श्रीवादिराजकृतमेकीभावस्तोत्रम् ॥ अथ श्रीधनञ्जयकविप्रणीतम् विषापहारस्तोत्रम् । सात्मस्थितः सर्वगतः समस्तव्यापारवेदी विनिवृत्तसङ्गः । प्रवृद्धका [२३] लोऽप्यजरोवरेण्यः पायादपायात्पुरुषः पुराणः ॥ १॥ परैरचिन्त्यं युगभा- रमेकः स्तोतुं वहन्योगिभिरप्यशक्यः । स्तुत्योऽद्य मेऽसौ वृपभो न भानो किमप्रवेशे विशति प्रदीपः ॥२॥ तत्याज शक्रः शकनाभिमानं ना त्यजामि स्तवनानुबन्धम् । स्वल्पेन बोधेन ततोऽधिकार्थ वातायनेनेव निरू- पयामि ॥ ३ ॥ त्व विश्वदृश्वा सकलेरदृश्यो विद्वानशेपं निसिलैरवेद्यः । वक्तुं कियान्कीदृशमित्यशक्यः स्तुस्तिस्ततोऽशक्तिकथा तवास्तु ॥४॥ व्यापीडित बालमिवात्मदोपैरुल्लापता लोकमवापिपस्त्वम् । हिताहितान्वेपण- मान्धमाजः सर्वस्य जन्तोरसि वालवैद्यः ।। ५ ।। दाता न हर्ता दिवस विवस्वामयश्व इत्यच्युतदर्शिताशः। सव्याजमेवं गमयत्यशक्तः क्षणेन दत्सेऽभिमतं नताय ॥६॥ उपैति भक्त्या सुमुखः सुखानि त्वयि स्वभा- वाद्विमुखश्च दुःखम् । सदावदातद्युतिरेकरूपरतयोस्त्वमादर्श इवाऽऽवभासि ॥ ७ ॥ अगाद्यताऽन्धेः स यतः पयोधिर्मेरोश्च तुङ्गा प्रकृतिः स यत्र । द्यावापृथिव्योः पृथुना तथैव व्याप त्वदीया भुवनान्तराणि ॥ ८॥ तवा. नवस्था परमार्थतत्वं त्वया न गीतः पुनरागमश्च । दृष्टं विहाय त्वमदृष्टमैपी विरुद्धवृत्तोऽपि समञ्जसस्त्वम् ॥ ९ ॥सरः सुदग्धो भवतैव तसिन्नुधू- लितात्मा यदि नाम शम्भुः । अशेत वृन्दोपहतोऽपि विष्णुः किं गृह्यते येन भवानजागः ॥१० ।। स नीरजा स्यादपरोऽघवान्वा तद्दोपकीत्येव न ते गुणित्वम् । स्वताऽम्बुगशेर्महिमा न देव स्तोकापवादेन जलाशयस्य ॥ ११ ॥ कर्मस्थिति जन्तुरनेकभूमि नयत्यमुं सा च परस्परस्य । त्वं नेत भावं हि तयोर्भवाब्धौ जिनेन्द्र नौनाविकयोरिवाख्यः ।। १२ ॥ सुखाय दुःखानि गुणाय दोषान्धर्माय पापानि समाचरन्ति । तेलाय बालाः सिक- तासमूह निपीडयन्ति स्फुटमत्वदीयाः ॥ १३ ॥ विपापहार मणिमौपधानि मान्त्रं समुद्दिश्य रसायनं च । भ्राम्यन्त्यहो न त्वमिति सरंति पर्यायना- मानि तवैव तानि ॥ १४ ॥ चित्ते न किञ्चित्कृतवानसि त्वं देवः कृत- श्वेतमि येन सर्वम् । हस्तं कृतं तेन जगद्विचित्रं सुखेन जीवत्यपि चिों बाह्यः ॥ १५ ॥ त्रिकालतवं त्वमवेत्रिलोकीस्वामीति संख्यानियतेग्मी- पाम् । बोधाधिपत्यं प्रति ना भविष्यंस्तेऽन्येऽपि चेद्वयाप्स्यदमनपीदम् [२४] ॥ १६ ॥ नाकस्य पत्युः परिकर्म रम्यं नागम्यरूपम्य तत्रोपकारि । तस्यैव हेतुः स्वसुखस्य भानोरुद्विभ्रतश्छत्रमिवादरेण ॥ १७॥ क्वोपेक्षकस्त्वं कसुखोपदेशः स चेत किमिच्छाप्रतिकूलगादः। कासौ क वा सर्वजगत्प्रि- यत्वं तन्नो यथानथ्यमवेविजं ते ॥ १८॥ तुङ्गात्फलं यत्तदकिञ्चनाञ्च प्राप्यं समृद्धान्न धनेश्वरादेः । निरम्भसोऽप्युच्चतमादिवाने कापि निर्याति धुनी पयोधेः ॥ १६ ॥ त्रैलोक्यसेवानियमाय दण्डं दधे यदिन्द्रो विनयेन तस्य । तत्प्रातिहार्यं भवतः कृतस्त्यं तत्कर्मयोगाद्यदि वा तवास्तु ॥ २० ॥ श्रिया परं पश्यति साधु निःस्वः श्रीमान कश्चित्कृपणं त्वदन्यः । यथा प्रकाशस्थितमन्धकार स्थायीक्षतेऽसौ न तथा तमःस्थम् ॥२१ ॥ स्ववृद्धिनिः श्वासनिमेपभाजि प्रत्यक्षमात्मानुभवेऽपि मूढः । किं चाखिलज्ञेयविवर्तिवो- धस्वरूपमध्यक्षपवैति लोकः ॥ २२ ॥ तस्यात्मजस्तस्य पितेति देव त्वां येऽवगायति कुलं प्रकाश्य । तेऽद्यापि नन्गश्मनमित्यवश्यं पाणी कृतं हेमपुनस्त्यति ॥ २३ ॥ दत्तस्त्रिलोक्यां पटहोऽभिभूताः सुरासुरास्तस्य महान्स लाभः । मोहस्य मोहस्त्वयि को विरोधुर्मलस्य नाशो बलवद्विरोधः ॥ २४ ॥ मार्गस्त्वयको ददृशे विमुक्तेश्चतुर्गतीनां गहनं परेण सर्व मया दृष्टमिति सयेन त्वं मा कदाचिद्भुजमालुलोके ॥ २५ ॥ स्वर्भानुरर्कस्य हविर्भुजोऽम्भः कल्पान्तवातोऽम्बुनिधेर्विघातः । संसारभोगस्य वियोगभावों विपक्षपूर्वाभ्युदयास्त्वदन्ये ॥ २६ ॥ अजानतस्त्वां नमतः फलं यत्तज्जान- तोऽन्यं न तु देवतेति । हरिन्मणि काचधिया दधानस्तं तस्य बुद्धशा वहतो न रिक्तः ॥ २७ ॥ प्रशस्तवाचश्चतुराः कषायैर्दग्धस्य देवव्यवहारमाहुः । गतस्य दीपस्य हि नन्दित्त्वं दृष्टं कपालस्य च मङ्गलत्वम् ॥ २८ ॥ नाना- थमेकार्थमदस्त्वदुक्तं हितं वचस्ते निशमय्य वक्तुः । निर्दोषतां के न विभा- वयन्ति ज्वरेण मुक्तः सुगमः स्वरेण ॥ २९ ॥ न कापि वाञ्छा ववृते च वाक्ते काले कचित्कोऽपि तथा नियोगः । न पूरयाम्यम्बुधिमित्युदंशुः स्वंय हि शीतद्युतिरभ्युदेति ॥ ३० ॥ गुणा गभीगः परमाः प्रसन्ना बहु- प्रकारा बहवस्तवेति । दृष्टोऽयमन्तः स्तवने न तेषां गुणो गुणानां किमतः परोऽस्ति ॥ ३१ ॥ स्तुत्या परं नामिमतं हि भक्त्या स्मृत्या प्रणत्या च [२५] ततो भजामि । मरामि देवं प्रणमामि नित्यं केनाप्युपायेन फल हि साध्यम् ॥ ३२ ॥ ततस्त्रिलोकीनगराधिदेव नित्यं परं ज्योतिरनन्तशक्तिम् । अपु- ण्यपापं परपुण्यहेतुं नमाम्यहं वन्द्यमवन्दितारम् ।। ३३ ।। अशद्वमस्पर्शम- रूपगन्धं ला नीरसं तद्विषयावबोधम् । सर्वस्य मातारममेयमन्यैर्जिनेन्द्रमसा- यमनुसरामि ॥ ३४ ॥ अगाधमन्यैर्मनसाऽप्यलध्यं निष्किंचनं प्रार्थित- मर्थवद्भिः। विश्वस्य पारं तमदृष्टपारं पति जिनाना शरणं व्रजामि ॥३५॥ त्रैलोक्यदीक्षागुरवे नमस्ते यो वर्धमानोऽपि निजोनतोऽभूत् । प्राग्गण्डशैलः पुनरद्रिकल्पः पश्चान्नमेरुः कुलपर्वतोऽभूत् ॥ ३६ ॥ स्वयंप्रकाशस्य दिवा निशा वा न वाध्यता यस्य न वाधकत्वम् । न लाघवं गौग्वमेकरूपं वन्दे विभं कालकलामतीतम् ॥ ३७॥ इति स्तुति देव विधाय दैन्यावरं न याचे त्वमुपेक्षकोऽसि । छायातलं संश्रयतः स्वतः स्यात्कश्छायया याचित- यात्मलाभः ॥ ३८ ॥ अथास्ति दित्सा यदि बोपरोधस्त्वय्येव सक्तां दिश भक्तिवुद्धिम् । करिप्यते देव तथा कृपां मे को वात्मपोप्ये सुमुखो न सूरिः ॥३६॥ वितरति विहिता यथाशचिज्जिन विनताय मनीपितानि भक्तिः । त्वयि नुतिविपया पुनर्विशेषादिशति सुखानि यशो धनं जयं च ॥४०॥ ॥ इति श्रीवनंजयकृतं विषापहारस्तोत्रम् ।। श्रीभूपालकविप्रणीता जिनचतुर्विंशतिका श्रीलीलायतनं महीकुलग्रहं कीर्तिप्रमोदास्पद वाग्देवीरतिकतनं जय- रमाक्रीडानिधान महत् । सः स्यात्सर्वमहोत्सर्वेकभवनं यः प्रार्थितार्थपदं प्रातः पश्यति कल्पपादपढलच्छायं जिनाविद्यम् ।। १ ।। शान्तं वपुः श्रवण- [२६] हारि वचश्चरित्रं सर्वोपकारि नव देव ततः श्रुतज्ञाः । संसारमारवमहत्स्थ- लरुद्रसान्द्रच्छायामहीरुह भवन्तमुपाश्रयन्ते ॥२॥ स्वामिन्नद्य विनिर्गतो- ऽसि जननीगर्भान्धकूपोदरादद्योद्घाटितदृष्टिरसि फलबज्जन्मासि चाय स्फुटम् । वामद्राक्षमहं यदक्षयपदानन्दाय लोकत्रयीनेत्रेन्दीवरकाननेन्दु- ममृतस्यन्दिप्रभाचन्द्रिकम् ॥३॥ निःशेषत्रिदशेन्द्रशेखरशिखारत्नप्रदी- पावली-सान्द्रीभूतमृगेन्द्र विष्टरतटीमाणिक्यदीपावलिः । क्वेयं श्रीः क्व च निःस्पृहत्वमिदमित्यूहातिगस्त्वादृशः सर्वज्ञानदृशश्चरित्रमहिमा लोकेश लोकोत्तरः॥ ४ ॥ राज्य शासनकारिनाकपति यत्त्यक्तं तृणावज्ञया, हेला- निर्दलितत्रिलोकमहिमा यन्मोहमल्लो जितः । लोकालोकमपि स्वबोधमुकुर- स्यान्तः कृतं यत्त्वया, सैषाऽऽश्चर्यपरम्परा जिनवर क्वान्यत्र संभाव्यते ॥५॥ दान ज्ञानधनाय दत्तमसकृत्पात्राय सवृत्तये चीर्णान्युग्रतपांसि तेन सुचिरं पूजाश्च बह्वयः कृताः । शीलानां निचयः सहामलगुणेः सर्वः समासादितो दृष्टस्त्वं जिन येन दृष्टिसुभगः श्रद्धापरेण क्षणम् ॥६॥ प्रज्ञापारमितः स एव भगवान्पारं स एव श्रुतस्कन्धाब्धेर्गुणरत्नभूषण इति श्लाघ्यः स एव ध्रुवम् । नीयन्ते जिन येन कर्णहृदयालंकारतां त्वद्गुणाः संसाराहिविषा- पहारमणयस्त्रैलोक्यचूणामणेः ॥ ७॥ जयति दिविजवृन्दान्दोलितैरिन्दुरो चिनिचयरुचिमिरच्चैश्चाम/ज्यमानः । जिनपतिरनुज्यन्मुक्तिसाम्राज्यल- क्ष्मीयुवतिनवकटाक्षक्षेपलीलां दधानः ॥ ८॥ देवः श्वेतातपत्रत्रयचमा- रिरुहाशोकभाश्चक्रभाषापुष्पौघासारसिंहासनसुरपटहैरष्टभिः प्रातिहार्यैः । साश्चर्यैर्धाजमानः सुरमनुजसभाम्भोजिनीभ नुमाली पायान्नः पादपी- ठीकृतसकलजगत्पादमौलिजिनेन्द्रः ॥९॥ नृत्यत्स्वर्दन्तिदन्ताम्बुरुहवन- नटन्नाकनारी निकायः सद्यस्त्रैलोक्ययात्रोत्सवकरनिनदातोद्यमाद्यन्निलिम्पः। हस्ताम्भोजातलीलाविनिहितसुमनोद्दामरम्यामरस्त्रीकाम्यः कल्याणपूजा- विधिषु विजयते देव देवागमस्ते ॥१०॥ चक्षुष्मानहमेव देव भुग्ने नेत्रामृतस्यन्दिनं त्वद्वक्वेन्दुमतिप्रसादसुभगेस्तेजोमिरुद्भासितम् । तेनालोकयता मयाऽनतिचिराञ्चक्षुः कृतार्थीकृतं द्रष्टव्यावधिवीक्षणव्यतिक- रव्याजृम्भमाणोत्सवम् ॥ ११ ॥ कस्तोः सकान्तमपि मल्लमवैति कश्चि- [२७] .. न्मुग्धो मुकुन्दमरविन्दजमिन्दुमौलिम् । मोघीकृतत्रिदशयोपिदपाङ्गपातस्तस्य त्वमेव विजयी जिनराजमल्लः ॥ १२ ॥ किसलयितमनल्पं त्वद्विलोका- मिलापात्कुसुमितमतिसान्द्रं त्वत्समीपप्रयाणात् । मम फलितममन्द त्वन्मु- खेन्दोरिदानी नयनपथमवाप्ताद्देव पुण्यदुमेण ॥ १३ ।। त्रिभुवनवनपुष्प्य पुष्पकोदडदर्पप्रसरदवनवाम्भोमुक्तिसक्तिप्रसूतिः । स जयति जिनराजवा- तजीमूतमङ्घः शतमखशिखिनृत्यारम्भनिर्बन्धवन्धुः ॥ १४ ॥ भूपालः म्वर्गपालप्रमुखनरसुरश्रेणिनेत्रालिमालालीलाचैत्यस्य चैत्यालयमखिलजग- कौमुदीन्दोर्जिनस्या उत्तंसीभूतसेवाञ्जलिपुटनलिनीकुमलास्त्रिः परीत्य श्रीपा- दच्छाययापस्थितभवदवथुः संश्रितोऽस्सीव मुक्तिम् ॥ १५ ॥ देश त्व- दध्रिनखमण्डलदर्पणेऽस्मिन्नध्ये निसर्गरुचिरे चिरदृष्टवक्त्रः । श्रीकीर्ति कान्तिधृतिसङ्गमकारणानि भव्यो न कानि लभते शुभमङ्गलानि॥१६॥ जयति सुरनरेन्द्र श्रीसुधानिर्झरिण्याः कुलधरणिधरोऽयं जैनचैत्याभिरामः । प्रविपुलफलधर्मानोकहानप्रवालप्रसरशिखरशुम्भत्केतनःश्रीनिकेतः॥१७॥ विनमदमरकान्ताकुन्तलाक्रान्तकान्तिस्फुरितनखमयूखद्योतिताशान्तरालः । दिविजमनुजराजबातपूज्यक्रमाब्जो जयति विजितकारातिजालो जिनेन्द्रः ॥ १८ ॥ सुप्तोत्थितेन सुमुखेन सुमङ्गलाय द्रष्टव्यमस्ति यदि मङ्गलमेव वस्तु । अन्येन किं तदिह नाथ तवैव वक्त्रं त्रैलोक्यमङ्गलनिकेतनमीक्ष- णीयम् ।। १६ ॥ त्वं धर्मोदयतापसाश्रमशुकस्त्वं काव्यवन्धकमक्रीडान- न्दनकोकिलस्त्वमुचितः श्रीमल्लिकाषट्पदः । त्वं पुन्नागकथारविन्दसरसी- हंसस्त्वमुत्तंसकः कै पाल न धार्यसे गुणमणिसमालिभिर्मोलिभिः ॥२०॥ शिवसुखमजरश्रीसङ्गमं चामिलष्य स्वमभिनिगमयन्ति क्लेशपाशेन केचित् ।। वयमिह तु वचस्ते भूपतेर्भावयन्तस्तदुभयमपि शश्वल्लीलया निर्विशामः ॥ २१ ।। देवेन्द्रास्तव मञ्जनानि विदधुर्देवाङ्गना मङ्लान्यापेठुः शरदिन्दु- निर्मलयशो गन्धर्वदेवा जगुः । शेपाश्चापि यथानियोगमखिलाः सेवा सुराश्चकिरे तत्कि देव वयं विदध्म इति नश्चित तु दोलायते ॥२२ ।। देव स्वजननाभिपेकसमये रोमाञ्चसत्कञ्चुकदेवेन्द्रर्यदनति नर्ततविधी लम्धप्रभावः स्फुटम् । किं चन्यत्सुरसुन्दरीकुचतटप्रान्तावनद्धोत्तमप्रेसर- [२] A ल्लकिनादझकृतमहो तत्केन संवर्ण्यते ॥ २३ ॥ देव त्वत्प्रतिविम्बमम्बुज- दलस्मेरेक्षण पश्यतां यत्रासाकमहो महोत्सवरसो दृष्टेरियान्वर्तते । साक्षा- सत्रभवन्तमीक्षितवतां कल्याणकाले तदा देवानामनिमेपलोचनतया वृत्तः स किं वर्ण्यते ॥ २४ ॥ दृष्ट धाम रसायनस्य महतां दृष्टं निधीनां पदं दृष्टं सिद्धरसस्य पद्म सदनं दृष्टं च चिन्तामणेः । किं दृष्टेरथवानुपडिग- कफलरेभिर्मयाद्य ध्रुवं दृष्टं मुक्तिविवाहमङ्गालगृहं दृष्टे जिनधीगृहे ॥ २५ ॥ दृष्टत्वं जिनराजचन्द्र विक्रमद्भुपेन्द्रनेत्रोत्पलैः स्नातं त्वन्नुति- चन्द्रिकाम्भसि भवद्विवचकोरोत्सवे । नीतश्चाद्य निदाघजः कममरः शाति मया गम्यते देव त्वद्गतचेयसैव भवतो भूयात्पुनदर्शनम् ॥ २६ ॥ ॥ इति श्रीभूपालकविप्रणीता जिनचतुर्विशतिका ॥ आचार्य श्रीमदुमास्वामिविरचितं तत्त्वार्थसूत्रम् । सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः ॥१॥ तच्यार्थश्रद्धान सम्य- ग्दर्शनम् ॥ २ ॥ तनिसर्गादधिगमाद्वा ॥३॥ जीवाजीवास्तववन्धसंवर- निर्जरामोक्षास्तत्वम् ॥ ४ ॥ नामस्थापनाद्रव्यभावतस्तन्यासः ॥ ५ ॥ प्रमाणनयरधिगमः ॥ ६ ॥ निर्देशस्वामित्वसाधनाऽधिकरणस्थितिविधानतः ॥ ७ ॥ सत्संख्या क्षेत्रस्पर्शनकालान्तरभावाल्पबहुत्वैश्च ॥ ८॥ मतिश्रु- तावधिमनःपर्ययकेवलानि ज्ञानम् ॥३॥ तत्प्रमाणे ॥ १० ॥ आधे परो- क्षम् ॥ ११ ॥ प्रत्यक्षमन्यत् ॥ १२ ॥ मतिः स्मृतिः संज्ञा चिन्ताऽभि- निवोध इत्यनान्तरम् ।। १३ ।। तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तम् ॥१४ ।। अवग्रहेहावायधारणाः ।। १५ । बहुबहुविधक्षिप्राऽनिःसृताऽनुक्त ध्रुवाणां [२९] '- सेतराणाम् ॥१६॥ अर्थस्य ॥ १७ ॥ व्यञ्जनम्यावग्रहः ॥१८ । न चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम् ।। १९ ॥ श्रुनं मतिपूर्व द्वयनेकदादशभेदम् ॥ २० ॥ भवप्रत्ययोऽवधिदेवनारकाणाम् ।। २१ ॥ क्षयोपशमनिमित्तः पविकल्पः शेपाणाम् ॥ २२ ॥ ऋतुविपुलमती मनःपर्ययः ॥ २३ ॥ विशुद्धयाति- पाताम्यां तद्विशेषः ॥२४॥ विशुद्धिक्षेत्रवामिविषयेभ्योऽवधिमनःपर्यययोः ॥२५ ।। मतिश्रुतयोनिवन्धो द्रव्येप्वसर्वपर्यायेषु ।। २६ ।। रूपिष्ववधेः ॥ २७॥ तदनन्तभागे मनः पर्ययस्य ॥ २८ ॥ सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य ॥ २९ ॥ एकादीनि भाज्यानि युगपदेकरिमन्नाचतुर्थ्यः ॥ ३० ॥ मति- श्रुतावधयो विपर्ययश्च ।। ३१ ।। सदसतोरविशेषाद्यहच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत् ॥३२॥ नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दसममिरूढेवंभृता नयाः॥ ३३ ॥ ॥ इति तत्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे प्रथमोऽध्याय ॥ १ ॥ औपशमिकक्षायिकौ भावौ मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्वमौदयिकपारिणा- मिकौ च ॥१॥ दिनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा यथाक्रमम् ॥ २ ॥ सम्यक्त्वचारित्रे।। ३।। ज्ञानदर्शनदानलामभोगोपभोगवीर्याणि च ॥ ४ ॥ ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्धयश्चतुस्वित्रिपञ्चभेदाः सम्यक्त्वचारित्रसंयमाश्च ॥ ५॥ मतिकपायलिङ्गमिथ्यादर्शना ज्ञानाऽसंयताऽसिद्धलेश्याश्चतुश्चनुस्च्येकैकैके- काड्मेदाः ॥ ६ ॥ जीवभव्याऽभव्यत्वानि च ॥ ७॥ उपयोगो लक्षणम् ॥ ८॥ स द्विविधोऽष्टचतुर्भेदः ।। ९ ।। संसारिणो मुक्ताश्च ॥ १० ॥ समनस्काऽमनस्काः ॥ ११ ॥ संसारिणस्वसस्थावराः ।। १२ ।। पृथिव्यप्ते- जोवायुवनस्पतयः स्थावराः ॥ १३ ।। दीन्द्रियादयस्त्रसाः ॥ १४॥ पञ्चे- न्द्रियाणि ॥ १५ ॥ द्विविधानि ॥१६॥ निर्वृत्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् ॥१७॥ लब्ध्युपयोगी भावेन्द्रियम् ॥१८॥ स्पर्शनरसनघाणचक्षुःश्रो- त्राणि ।। १६ ।। स्पर्शरसगन्धवर्गशब्दास्तदर्थाः ॥ २१ ॥ श्रुतमनिन्द्रिय- स ।। २१ ॥ वनस्पत्यन्तानामेकम् ॥ २२ ॥ कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्याः । दीनामेकैकवृद्धानि ॥ २३ ॥ संज्ञिनः समनस्काः ।। २४ ।। विग्रहगती कर्मयोगः ॥ २५ ॥ अनुश्रेणि गतिः ॥२६ ।। अविग्रहाजीवस्य ।। २७ ।। [३०] विग्रहवती च संमारिणः पाक चतुर्यः ॥ २८ ॥ एकसमयाऽविग्रहा ॥ २६ ॥ एकं द्वौ त्रीवानाहारकः ॥ ३० ॥ सम्मृर्छनगर्भोपपाद जन्म ॥३१॥ मचित्तशीतसंवृताः सेतरा मिश्राश्चैकशस्तद्योनयः ॥ ३२ ॥ जरायुजाण्डजपोतानां गर्भः ॥ ३३ ॥ देवनागकाणामुपपादः ॥ ३४ ॥ शेषाणां मम्मूर्छनम् ॥ ३५ ॥ औदारिकवैक्रियिकाहारकतैजसकार्मणानि शरीराणि ।। ३६ ।। परं परं सूक्ष्मम् ॥ ३७॥ प्रदेशतोऽसंख्येयगुणं प्राक तैजसात् ॥ ३८ ॥ अनन्तगुणे परे ॥ ३९ ॥ अप्रतीपाते ॥ ४० ॥ अनादिसम्बन्धे च ॥ ४१ ॥ सर्वस्य ॥४२॥ तदादीनि भाज्यानि युग- पदेकमिन्नाचतुभ्यः ॥ ४३ निरुपभोगमन्त्यम् ॥ ४४ ॥ गर्भसम्मूछ- नजमाद्यम् ।। १५ ।। औपपादिकं वैक्रियिकम् ॥ ४६ ॥ लब्धिप्रत्ययं च ॥४७॥ तैजसमपि ॥ ४८ ।। शुभं विशुद्वमव्याघाति चाहारकं प्रमत्तसं- यतस्यैव ।। ४९ ॥ नारकसम्मूर्छिनों नपुंसकानि ।। ५० || न देवाः।। ५१ ॥ शेपास्त्रिवेदाः ।। ५२ ।। औपपादिकचरमोत्तमदेहाः संख्येयवर्षायुषोऽनपव- क्युपः॥ ॥ इति तत्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ रत्नशमरावालुकापङ्कधूपतमोमहातमः प्रभा भूमयो घनाम्बुपाताकाशप्र- तिष्ठाः सप्ताधोऽध ॥ १ ॥ तासु त्रिंशत्पञ्चविंशतिपञ्चदशत्रिपञ्चोनैकना- कशतमहस्राणि पश्च चैत्र यथाक्रमम् ।। २ । नारका नित्याशुभतरलेश्या- परिणामदेहवेदनाविक्रियाः ॥ ३ ॥ परस्परोदीरितदुःखाः ॥ ४ ॥ संक्ति- टासुरोदीरितदुःखाश्व प्राकचतुर्थ्याः ॥ ५ ॥ तेवेकत्रिसप्तदशसप्तदशद्वा- विंशतित्रयस्त्रिंशन्मागरोपमा सचानां परा स्थितिः ॥ ६॥ जम्बूद्वीपलवणो. दादयः शुभनामानो द्वीपसमुद्राः ॥ ७॥ द्विविविष्कम्भाः पूर्वपूर्वपरि- क्षेपिणो वलयाकृतयः ।। ८ ।। तन्मध्ये मेरुनाभिवृत्तो योजनशतसहस्रवि- प्कम्भो जम्बुद्वीपः ॥ ६॥ भरतहमवतहरि विदेहरण्यकर्हरण्यवतैरावतवर्षाः क्षेत्राणि ॥ १० ॥ तद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवनिषधनील- रुक्मिशिखरिणो वर्षधरपर्वताः ।।११।। हेमार्जुनतपनीयवैडूर्यरजतहेममयाः [३१] ॥ १२ ॥ मणिविचित्रपार्था उपरिमूले च तुल्यविस्ताराः ॥ १३ ॥ पदा- महापातिगिञ्छकेमरिमहापुण्डरीकपुण्डरीका हृदास्तेपामुपरि ॥ १४ ॥ प्रथमो योजनसहस्रायामम्तदर्द्ध विष्कम्भो हदः ॥ १५ ॥ दशयोजनावगाह. ।। १६ ।। तन्मध्ये योजनं पुष्करम् ॥ १७ ॥ तद्विगुणद्विगुणा हृदाः पुष्कराणि च ॥ १८॥ तनिवासिन्यो देव्यः श्रीहीधृतिकीर्तिबुद्धिलक्ष्म्यः पन्योपमस्थितय ससामानिकपरिषत्काः॥ १९॥ गङ्गासिन्धुरोहिद्रोहिता. स्थाहरिद्धरिकान्तासीतासीतोदानारीनरकान्नासुपर्णरूप्यकूलारक्तारक्तोदाः सरितस्तन्मध्यगाः ॥ २०॥ द्वयोदयोः पूर्वाः पूर्वगाः ॥ २१ ॥ शेषा- स्त्वपरगाः ॥ २२॥ चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृता गङ्गासिन्ध्यादयो नद्यः ॥ २३ ॥ भरतः पड्विंशतिपञ्चयोजनशतविस्तारः पट्चैकोनविंशतिभागा योजनस्य ॥२४॥ तद्विगुणद्विगुणविस्तारा वर्षधरवर्पा विदेहान्ताः ॥ २५ ॥ उत्तरा दक्षिणतुल्याः ॥२६ ।। भरतरावयोवृद्धिहामौ पट्स- मयाभ्यामुत्तपिण्यवसर्पिणीभ्याम् ।। २७ ॥ ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिताः ॥२८॥एकद्वित्रिपल्योपमस्थितयो हैमवतकहारिवर्षकदैवकुरवकाः॥२९ ।। तथोत्तराः ॥३०॥ विदेहेषु सत्येयकालाः ॥ ३१ ।। भरतस्य विष्फम्मो जम्बूद्वीपस नवतिशतभागः ॥३२॥द्विर्धातकीखण्डे ॥ ३३ ॥ पुष्करा? च ॥३४॥प्राङ्मानुपोत्तरान्मनुष्याः ॥ ३५ ॥ आर्याम्लेच्छाश्च ॥ ३६॥ भरतैगवतविदेहा. कर्मभृमयोऽन्यत्र देवकुरूत्तरकुरुभ्यः ॥ ३७॥ नृस्थिती पगबरे त्रिपल्योपमान्तमूहर्ते ॥ ३८ ॥ तिर्यग्योनिजानां च ॥ ३९ ॥ ॥ इति तत्वार्थाविगमे मोक्षशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ देवाश्चतुर्णिकायाः ॥१॥आदितस्त्रिपु पीतान्तलेश्याः ॥ २॥ दशा- एपञ्चद्वादशविकल्पाः कल्पोपपन्नपर्यन्ताः॥३॥ इन्द्रसामानिकत्रायस्त्रि- शपारिपदात्मरक्षलोकपालानीकप्रकीर्णकाभियोग्यकिल्चिपिकाचैकशः॥४॥ त्रायस्त्रिंशले कपाल र्जा व्यन्तरज्योतिप्काः ॥ ५ ॥ पूर्वयोन्द्राः ॥६॥ कायप्रवीचारा आ ऐशानात ॥७॥ शेषः स्पर्शरूपशब्दमनःप्रवीचाराः ॥८॥ परेऽप्रवीचारा ॥६॥ भवनवासिनोऽसुरनागविद्युत्सुपर्णाग्निवा- [३२] L, - तस्तनितोदधिद्दीपदिक्कुमाराः ॥१०॥ व्यन्तराः किन्नरकिम्पुरुषमहोरगग- न्धर्वयक्षराक्षसभूतपिशाचाः ॥ ११ ॥ ज्योतिप्काः सूर्याचन्द्रमसौ ग्रह- नक्षत्रप्रकीर्णकतारकाश्च ॥ १२॥ मैस्प्रदक्षिणा नित्यगतयोनृलोके॥१३॥ तत्कृतः कालविभागः ॥१४॥ वहिरवस्थिताः ॥ १५॥ वैमानिकाः ॥ १६ ॥ कल्पोपपन्नाः कल्पातीताश्च ॥ १७ ॥ उपर्युपरि ॥१८ ।। सौध- मशानसानत्कुमारमाहेन्द्रब्रह्मब्रह्मोत्तरलान्तबकापिष्ठशुक्रमहाशुक्रशतारसह- सारेष्वानतप्राणतयोशरणाच्युनर्योनवसु वेयकेषु विजयवैजयन्तजयन्ताप राजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च ॥ १९ ॥ स्थितिप्रभावसुखद्युतिलेश्या विशुद्धी. न्द्रियावधिविषयतोऽधिकाः ॥२०॥ गतिशरीरपरिग्रहामिमानतो हीनाः ॥ २१ ॥ पीतपद्मशुक्ललेश्या द्वित्रिशेषेषु ।। २२ ॥ प्राग्वेयकेभ्यः कल्पाः ॥ २३ ॥ ब्रह्मलोकालया लौकान्तिकाः ॥ २४ ॥ सारस्वतादित्यवह्नयरुण- गर्दतोयतु पिताव्यारावारिष्टाश्च ।। २५ ॥ विजयादिपु द्विचरमा ॥ २६ ॥ औपपादिकमनुष्येभ्यः शेपास्तिर्यग्योनयः ॥२७॥ स्थितिरसुरनागसुपर्ण- द्वीपशेषाणां सागरोपमत्रिपल्योपमार्द्धहीनमिताः ॥ २८ ॥ सौधर्मशानयोः सागरोपमे अधिके ।। २९ ॥ सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः सप्त ॥ ३० ॥ त्रिसप्त- नवैकादशत्रयोदशपञ्चदशभिरधिकानि तु ॥ ३१ ॥ आरणाच्युतादूर्ध्वमे- कैकेन नवग्रैवेयकेषु विजयादिपु सर्वार्थसिद्धौ च ।। ३२ ।। अपरा पल्यो- पममधिकम् ॥ ३३ ॥ परतः परतः पूर्वापूर्वानन्तराः ।। ३४ ॥ नारकाणां च दितीयादिषु ॥ ३५ ॥ दसवर्षसहस्राणि प्रथमायाम् ॥ ३६ ॥ भवनेषु च ॥३७॥ व्यन्तराणां च ।। ३८ ॥ परा पल्योपममधिकं ॥३६॥ ज्योतिष्काणां च ॥ ४० ॥ तदष्टभागोऽपरा ।। ४१ ॥ लौकान्तिकानामष्टौ सागरोपमाणि सर्वपाम् ।। ४२ ।। ॥ इति तत्वार्याधिगमे मोक्षशास्त्रे चतुर्थोऽध्याय. ॥ ४॥ अजीवकाया धर्माधर्माकाशपुद्गलाः ॥१॥ द्रव्याणि ॥२॥ जीवाश्च ॥ ३॥ नित्यावस्थितान्यरूपाणि ॥ ४ ॥ रूपिणः पुद्गलाः ॥ ५ ॥ आ आकाशादेकद्रव्याणि ॥ ६ ॥ निष्क्रियाणि च ॥७॥ असख्येया प्रदेशाः [३३]] प्रदेशाः धर्माधमैकजीवानाम् ॥ ८॥ आकाशस्थानन्ताः ॥ ९ ॥ सङ्ख्ये यासङ्ख्येयाश्च पुद्गलानाम् ॥ १० ॥ नाणोः ॥११॥लोकाकाशेवगाहः ॥ १२ ॥ धर्माधर्मयोः कृत्य ॥ १३ ॥एकप्रदेशादिषु भाज्यः पुद्गलानाम् ॥ १४ ॥ असडख्येयभागादिषुजीवानाम् ॥ १५ ।। प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत् ॥१६॥ गतिस्थित्युपग्रहौ धर्माधर्मये रुपकारः॥ १७॥ आकाश- सावगाहः ॥ १८ ॥ शरीरवाङ्मनःप्राणापानाः पुद्गलानाम् ॥१६॥ सुखदुःखजीवितमरणोपग्रहाश्च ।। २० ॥परस्परोपग्रहो जीवानाम् ॥ २१ ॥ वर्तनापरिणामक्रिया परत्वापरत्वे च कालस्य ॥ २२ ॥ स्पर्शरसगन्धवर्ण- वन्ताः पुद्गलाः ॥ २३ ।। शब्दवन्धसौक्षम्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमश्छायाऽऽ. तपोद्योतवन्तश्च ॥ २४ ॥ अणवस्कन्धाश्च ॥ २५ ॥ भेदसङ्घातेभ्य उत्पद्यन्ते ॥ २६ ॥ भेदादणुः ॥ २७ ॥ भेदसङ्घाताभ्यां चाक्षुपः ॥२८ ।। सद्रव्यलक्षणम् ॥ २९ ॥ उत्पादव्ययधौव्ययुक्तं सत् ॥ ३० ।। तद्धावा- व्ययं नित्यम् ।। ३१ ॥ अर्पितानर्पितसिद्धेः ॥ ३२ ॥ स्निग्धरूक्षत्वाद्वन्धः ॥ ३३ ॥ न जघन्यगुणानाम् ॥ ३४ ॥ गुणमाम्ये सदृशानाम् ॥ ३५ ॥ दृश्यधिकादिगुणानां तु ॥ ३६॥ बन्धेऽधिको पारिणामिकौ च ॥३७॥ गुणपर्यायवद्र्व्यम् ।। ३८ ॥ कालश्च ॥ ३९ ॥ सोऽनन्तसमयः ॥ ४० ॥ द्रव्याश्रयानिर्गुणा गुणाः ।। ४१ ॥ तद्भावः परिणामः ॥ ४२ ।। -- ॥ इति तत्वार्याधिगमे मोक्षशास्त्रे पञ्चमोऽध्याय. ॥ ५ ॥ कायवाड्मनःकर्म योगः॥१॥ स आत्रवः॥ २॥ शुभःपुण्यस्या- शुभः पापस्य ॥ ३ ॥ सकपायाकपाययोः साम्परायिकर्यापथयोः ॥ ४ ॥ सन्द्रियकपायावतक्रियाः पञ्चचतुःपञ्चपञ्चविंशतिसंख्याः पूर्वख भेदाः ॥ ५॥ तीव्रमन्दज्ञाताज्ञातभाषाधिकरणवीर्यविशेपेभ्यस्तद्रिशेपः ॥६॥ अधिकरणं जीपाजीवाः ॥ ७ ॥ आचं संरम्भसमारम्भारम्भयोगकृतकारि- तानुमतकपायविशेपै त्रिस्त्रिस्त्रिश्चतुश्चैकशः ॥८॥ निर्वर्तनानिक्षेपसंयोग-) निसर्गा द्विचतुद्वित्रिभेदाः परम् ।। है । तत्प्रदोपनिववमात्सर्यान्तरायासा- दनोपघाता ज्ञानदर्शनावरणयोः ॥ १०॥ दुःखशोकतापाक्रन्दनवधपरि- [३४] देवनान्यात्मपरोभयस्थानान्यमद्वेवस ॥११ । भृनवृत्त्यनुकम्पादानसरा- गसंयमादियोगः क्षान्ति शौचमिति सद्वेद्यस्य ॥ १२ ॥ केवलिश्रुनमङ्घध- र्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य ॥ १३॥ कपायोदयाचीव्रपरिणामश्चारित्र- मोहस्स ॥ १४ ॥ बह्वारम्भपरिग्रहत्वं नारकस्यायुपः॥ १५ ॥ माया तैर्य- ग्योनस्य ॥ १६ ॥ अल्पारम्भपरिग्रहत्वं मानुपस्य ॥१७॥ स्वभावमार्दवं च ॥ १८ ॥ निःशीलनतिन्वं च सर्वेषाम् ।। १९ ॥ सगगसंयमसंयमासं- यमाकामनिर्जरावालतपांसि देवस्य ॥ २० ॥ सम्यक्त्व च ॥२१॥ योग- वक्रता विसंवादनं चाशुभस्य नाम्नः ॥ २२ ॥ तद्विपरीतं शुभस्य ॥ २३ ॥ दर्शनविशुद्धिविनयसम्पन्नता शीलबनेप्वनतीचारोऽमीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ शक्तितस्त्यागतपसी साधुसमाधियावृत्यकरणमर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचन- भक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभावना प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य ॥ २४ ॥ परान्मनिन्दाप्रशसे सदमद्गुणोच्छादनोद्धावने च नीचंगोरस ॥ २५ ॥ तद्विपर्ययौ नीचयनुत्सेको चोचरस्य ॥ २६ ॥ विघ्नकरण- मन्तरायस्य ॥ २७॥ ॥ इति तत्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे षष्टोऽध्यायः ॥ ६ ॥ हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिव्रतम् ॥१॥ देशसर्वतोऽणुमह- ती॥ २ ॥ तत्स्थयार्थ भावनाः पञ्च पञ्च ॥ ३॥ वाङ्मनोगुप्तीर्यादान- निक्षेपणसमित्यालोकितपानभोजनानि पञ्च ॥ ४ ॥ क्रोधलोभभीरुत्वहा- सप्रत्याख्यानान्यनुवीचीभाषणं च पञ्च, ।। ५ ॥ शून्यागारविमोचितावा- सपरोपरोधाकरणभैच्यशुद्धिमधर्माविसंवादाः पञ्च ।। ६ ॥ स्त्रीरागकथा- श्रवणतन्मनोहगङ्गनिरीक्षणपूर्वरतानुसग्णवृष्येष्टरमवशरीरसंस्कार त्यागाः पञ्च ॥ ७ ॥ मनोज्ञामनोजेन्द्रियविपयरागद्वेषवर्जजानि पञ्च॥ ८॥ हिंसा. दिष्विहामुत्रापायावद्यदर्शन ॥ ९॥ दुःखमेव वा ॥ १०॥ मैत्रीप्रमोदकारु- ण्यमाध्यस्थानि च मत्वगुणाधिकक्लियपानाविनयेषु ॥ ११ ॥ जगत्काय. खभावौ वा संवेगवैराग्यार्थम् ॥ १२ ॥ प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा ।। १३ ।। असदभिधानमनृतम ॥ १४ ॥ अदत्तादानं स्तेयम् ।। १५ ।। [ ३५ मैथुनमब्रह्म ॥१६॥ मूर्छा परिग्रहः ॥ १७ ॥ निःशल्यो वृता ॥ १८ ॥ अगार्यनगारश्च॥ १९॥ अणुव्रतोऽगारी ॥ २० ॥ दिग्देशानर्थदण्डविर- तिसामाविकोषधोपवासोपभोगपरिभोगपरिमाणातिथिसंविभागवतसम्पन ॥२१॥ मारणन्तिकी सल्लेखना जोषिता ॥२२॥ शङ्काकाङ्क्षाविचिकित्मा- न्यदृष्टिप्रशंसासंस्तवाः सम्यग्दृष्टरतीचागः ॥ २३॥ वृतीलेषु पञ्च पञ्च यथाक्रपम् ॥ २४ ॥ बन्धवधच्छेदातिमारारोपणानपाननिरोधाः॥ २५ ॥ मिथ्योपदेशरहोम्याख्यानकूटलेखक्रियान्यासापहारसाकारमन्त्रभेदाः ॥२६॥ स्तनप्रयोगतदाहतादानविरुद्धराज्यातिक्रमहीनाधिकमानोन्मानप्रतिरूपकव्य- वहाराः ॥ २७॥ परविवाहकरणेत्वरिकापरिगृहीतापरिगृहीतागमनानग- क्रीडाकामतीब्राभिनिवेशाः ॥ २८॥ क्षेत्रचास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासी- दासकुप्यप्रमाणातिक्रमाः ॥२९॥ ऊर्धाधस्तिर्यग्व्यतिक्रमक्षेत्रवृद्धिस्मृत्य- न्तरधानानि ॥३०॥ आनयनप्रेप्यप्रयोगशब्दरूपानुपातपुद्गलक्षेपाः ॥ ३१ ॥ कन्दर्पकौत्कुच्यमौखर्यासमीक्ष्याधिकरणोपभोगपरिभोगानर्थ- क्यानि ॥ ३२ ॥ योगदुःप्रणिधानानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ।। ३३ ।। अप्र- त्यवेक्षिताग्रमार्जितोत्सर्गादानसंस्तरोपक्रमणानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥३४॥ मचित्तसम्बन्धमम्मिश्रामिपवदुःपक्काहाराः ॥ ३५ ॥ सचित्तनिक्षेपापिधान- परव्यपदेशमात्सर्यकालातिक्रमाः ।। ३६ ॥ जीवितमरणाशंसामित्रानुराग- सुखानुवन्यनिदानानि ॥ ३७॥ अनुग्रहार्थं स्वस्यानिसगों दानम् ।। ३ ।।. विधिद्रव्यदातपात्रंविशेपाचदिशेपः ॥ ३९ ॥ ॥ इति तत्वार्याधिनमे मोनशास्त्रे सप्तमोऽध्यार. ॥ ७ ॥ मिथ्यादर्गनाविरतिप्रमादकपाययोगा बन्धहेतवः ॥ १॥ सकपाय- त्वाज्जीवः कर्मणो योग्यान्पुद्गलानादत्तं स वन्यः ॥२॥ प्रकृतिस्थित्य- नुभागप्रदेशास्तविधयः ॥ ३ ॥ आयो ज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीया- युर्नामगोत्रान्तगयाः ॥ ४ ॥ पञ्चनबद्यष्टाविंशतिचतुर्दिचत्वारिंशदिव पञ्चभेदा यथाक्रमम् ।। ५ ।। मतिश्रुतावधिमनःपर्यायकवलानाम् ॥ ६ ॥ चचुरचक्षुग्वधिकचलानां निद्रानिद्रानिद्राप्रचलाप्रचलाप्रचलास्त्यानगृद्धयश्च [३६] ॥७॥ मदसद्वद्ये ॥ ८ ॥ दर्शनचारित्रमोहनीयाकपायकषायवेदनीया- ख्यात्रिद्विनपोडशभेदाः सम्यक्त्वमिथ्यात्वतदुभयान्यकपायकपायौहास्य- रत्यरतिशोकभयजुगुप्सास्त्रीपुम्नपुंसकवेदा अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्या- ख्यानसचलनविकल्पाचशः क्रोधमानमायालोमाः ॥ १॥ नारक- तैर्यग्योनमानुपदेवानि ॥१०॥ गतिजातिशरीराङ्गोपाङ्गनिर्माणबन्धस- छातसंस्थानसंहननस्पर्शरसगन्धवर्णानुपूर्व्यगुरुलघूपधातपरघातातपोद्योतो- न्छासविहायोगतयः प्रत्येकशरीरत्रससुभगसुखरशुभसूक्ष्मपर्याप्तिस्थिरादेय- यशाकीर्तिसेतराणि तीर्थकरत्वं च ॥ ११॥ उच्चैर्नीचश्च ॥ १२ ॥ दानलाभभोगोपभोगवीर्याणाम् ॥ १३ ॥ आदितस्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः ॥ १४ ॥ सप्ततिर्मोहनीयस्य ॥१५ ।। विंशतिर्नामगोत्रयोः ॥ १६ ॥ त्रयस्त्रिंशत्मागरोपमाण्यायुपः ॥ १७ ॥ अपरा द्वादश मुहूर्ता वेदनीयस्य ॥ १८ ॥ नामगोत्रयोरष्टौ ॥१९॥शेषाणामन्तर्मुहूर्ता ॥२०॥ विपाकोऽनुभवः॥२१॥स यथानाम ॥ २२ ॥ ततश्च निर्जरा ॥ २३ ॥ नामप्रत्यया:सर्वतो योगविशेषात्सूक्ष्मै- कक्षेत्रावगाहस्थिताःसर्वात्मप्रदेशेष्वनन्तानन्तप्रदेशाः ॥ २४ ॥ सवेद्यः शुभायुर्नामगोत्राणि पुण्यम् ॥ २५ ॥ अतोऽन्यत्पापम् ॥ २६ ॥ ॥ इति तत्वार्याधिगमे मोक्षशास्त्रे अष्टमोऽध्यायः॥८॥ आस्रवनिरोधः संवरः ॥ १॥ स गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीपहजय- चारित्रैः ॥२॥ तपसा निर्जरा च ॥३॥ सम्यग्योगनिग्रहो गुप्तिः ॥४॥ ईर्ष्याभापैपणादाननिक्षेपोत्मर्गाः समितयः॥ ५॥ उत्तमक्षमामा- वार्जवसत्यशौचसंयमतपस्त्यागाकिञ्चन्य ब्रह्मचर्याणि धर्मः ॥ ६ ॥ अनित्याशरणसंसारकत्वान्यत्वाशुच्यासवसंवरनिर्जरालोकवोधिदुर्लभ धर्म खाख्याततत्वानुचिन्तनमनुप्रेक्षाः ॥७॥ मार्गाच्यवननिर्जरार्थ परिपोढ- व्याः परीपहाः ॥८॥ क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकनाग्न्यारतिस्त्रीच- निपद्याशय्याक्रोशवधयाञ्चालाभरोगवणस्पर्शमलसत्कारपुरस्कारप्रज्ञाज्ञाना- दर्शनानि ॥ ६ ॥सूक्ष्मसाम्परायछमस्थवीतरागयोश्चतुर्दश॥ १० ॥ एका- दश जिने ॥ ११ ॥ बादरसाम्पराये सर्वे ॥१२ ॥ ज्ञानावरणे प्रज्ञाज्ञाने ॥ १३ ॥ दर्शनमोहान्तराययोरदर्शनालाभौ ॥ १४ ॥ चारित्रमोहे ना- ग्न्यारतिस्त्रीनिपद्याक्रोशयाश्चासत्कारपुरस्काराः ॥ १५ ॥ वेदनीये शेपाः ॥१६॥ एकादयो भाज्या युगपढेकस्मिन्नेकोनविंशतिः ॥ १७ ॥ सामा- यिकच्छेदोपस्थापनापरिहारविशुद्विसंक्ष्मसाम्पराययथाख्यातमिति चारित्रम् ॥ १८॥ अनशनावमौदर्यवृत्तिपरिसंख्यानरसपरित्यागविविक्तशय्यासन- कायक्लंशा वाह्यं तपः ॥ १६ ॥ प्रायश्चित्तविनयवैयावृन्यस्वाध्यायव्युत्सर्ग ध्यानान्युत्तरम् ॥ २० ॥ नवचतुर्दशपञ्चद्विभेदा यथाक्रम प्रारध्यानात ॥ २१ ॥ आलोचनाप्रतिक्रमणतदुभयविवेकव्युत्सर्गतपग्छेदपरिहारोप- स्थापनाः ॥ २२ ॥ ज्ञानदर्शनचारित्रोपचाराः ॥ २३ ॥ आचार्योपा. ध्यायतपस्विशैक्ष्यग्लानगणकुलसद्धसाधुमनोजानाम् ।। २४ ॥ वाचनापू- च्छनानुप्रेक्षाम्नायधर्मोपदेशाः ॥ २५ ॥ बाह्याभ्यन्तरोपध्योः ॥२६॥ उत्त- मसंहननस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानमान्तर्मुहूर्तात् ॥ २७ ॥ आर्तरौद्रय Hशुक्लानि ॥ २८ ॥ परे मोक्षहेतू ।। २९ ।। आर्तममनोज्ञस्य सम्प्रयोगे तद्विप्रयोगाय स्मृनिसमन्वाहारः ॥ ३० ॥ विपरीतं मनोज्ञस्य ।। ३१ ।। वेदनायाश्च ॥ ३२ ॥ निदान च ॥ ३३ ॥ तदविग्तदेशविरतप्रमत्तसंयता- नाम् ॥ ३४ ॥ हिमानृतस्तेयविषयसंरक्षणेभ्यो रौद्रमविरतदेशविरतयोः ॥ ३५ ॥ आज्ञापायविषाकसंस्थानविचयाय धर्म्यम् ॥ ३६ ॥ शुक्ले चाये पूर्वविदः ॥ ३७ ॥ परे केवलिनः ॥ ३८ ॥ पृथक्त्यैकत्ववितर्कसूक्ष्मक्रिया- प्रतिपातिव्युपरतक्रियानिवर्तानि ॥३९ ।। त्र्येकयोगकाययोगायोगानाम् ॥४०॥ एकाश्रये सवितर्कवीचारे पूर्वे ॥४१॥ अवीचारं द्वितीयम् ॥ ४२ ॥ वितर्कः श्रुतम् ॥ ४३ ।। वीचारोऽर्थव्यञ्जनयोगसंक्रान्तिः ॥ ४४ ॥ सम्यग्दृटिश्रावकाविरतानन्तवियोजकदर्शनमोहक्षपकोपशमकोप- शान्तमोहक्षपकक्षीणमोहजिनाः क्रमशोऽसंख्येयगुणनिर्जराः ॥ ४५ ॥ पुलाकवकुशकुशीलनिर्ग्रन्थस्नातका निग्रंथाः ॥ ४६ ॥ संयमश्रुतप्रतिसेव- नातीर्थलिङ्गलेश्योपपादस्थानविकल्पतः साध्याः ॥ १७ ॥ ॥ इति तत्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥ [३८] मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच केवलम् ॥ १ ॥ वन्धहे- स्वाभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षोमोक्षः ।।२॥औपशमिकादिभव्य- स्वानां च ॥ ३ ॥ अन्यत्र केवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शनसिद्धत्वेभ्यः ॥ ४ ॥ तदनन्नरमूर्ध्व गच्छन्त्यालोकान्तात् ॥ ५॥ पूर्वप्रयोगादसङ्गत्वाइन्धच्छे- दात्तथागतिपरिणामाच ।। ६॥ आविद्धकुलालचक्रवद्वयपगतलेपालांवु. वदेरण्डवीजबदग्निशिखावञ्च ।। ७॥ धर्मास्तिकायाभावात् ।। ८ ॥ क्षेत्र- कालगतिलिङ्गतीर्थचारित्रप्रत्येकबुद्धवोधितज्ञानावगाहनान्तरसंख्याल्पबहु- त्वतः साध्याः ॥९॥ अक्षरमात्रपदस्वरहीनं व्यञ्जनसन्धिविवर्जितरेफम् । साधुभिरत्र मम श्वमितव्यं को न विमुह्यति शाखममुद्रे ॥१॥ दशाध्यायपरिच्छिन्ने तत्वार्थ पठिते सति । फलं स्यादुपवासस्य भापितं मुनिपुङ्गवैः ॥ २॥ तत्वार्थसूत्रकर्तारं गृधृपिच्छोपलक्षितम् । वन्दे गणीन्द्रसंयातमुमास्वामिमुनी- वरम् ॥ ३॥ इति तत्वायत्रम् समाप्तम ॥ श्रीस्वामिसमन्तभद्राचार्यविरचितम् बृहत्स्वयम्भूस्तोत्रम् स्वयम्भुवा भूतहितेन भूतले, समञ्जमज्ञानविभूतिचक्षुपा | विराजितं येन विधुन्वता तमः, क्षमाकरेणेव गुणोत्करः करैः ॥ १ ॥ प्रजापतिर्यः प्रथमं जिजीविपुः, शशास कृष्यादिषु कर्मसु प्रजाः । प्रबुद्धतत्वः पुनरद्- भुतोदयो, ममत्वतो निर्विविदे विदांवरः ॥ २॥ विहाय यः सागरवारिवा- ससं, वधूमिवेमा वसुधाव● सतीम् । मुमुक्षुरिक्ष्वाकुकुलादिरात्मवान्, प्रभुः [३९] प्रबबाज सहिष्णुरच्युतः ॥ ३ ॥ खदोपमूलं स्वसमाधितेजसा, निनाय यो निर्दयभससारिक्रयाम् | जगाद तत्व जगतेऽथिनेऽजसा, बभूव च ब्रह्म- पदामृतेश्वरः ॥ ४ ॥ स विश्वचक्षुर्थपभोऽचिंतः सता, समग्रविद्यात्मवपु- निरञ्जनः पुनातु चेतो मम नाभिनन्दनो, जिनो जितक्षुल्लकवादिशासनः ॥ ५ ॥ ॥ इत्यादिनिनस्तोत्रम् यस्य प्रभावान्त्रिदिवच्युतस्य, कीडाखपि क्षीवमुखारविन्दः । अजे. यशक्तिभुवि बन्धुवर्ग, वकार नामाजित इत्यवन्ध्यम् ॥ ६ ॥ अद्यापि यस्याजितशासनस्य, सतां प्रणेनुः प्रतिमङ्गालार्थम् । प्रगृह्यते नाम परं पवित्रं खसिद्धिकामेन जनेन लोके ॥ ७॥ यः प्रादुरासीत्प्रभुशक्तिमूना, भव्या. शयालीनकलङ्कशान्त्यै । महामुनिर्मुक्तधनोपदेहो; यथारविन्दाभ्युदयाय भाखान् ।।८॥ येन प्रणीतं पृथुधर्मतीर्थ, ज्येष्ठं जनाः प्राप्य जयन्ति दुःखम् । गांङ्ग इदं चन्दनपङ्कशीत, गजप्रवेका इव धर्मतताः ॥९॥ स ब्रह्मनिष्ठः सममित्रशत्रुर्विद्याविनिर्वान्तकपायदोषः । लब्धात्मलक्ष्मीरजि.. तोऽजितात्मा, जिनः श्रियं मे भगवान् विधत्ताम् ॥ १० ॥ ॥ इत्यजितजिनस्तोत्रम् ॥ वं गम्भवः संभवतपरोगः, संतप्यमानस्य जनस्य लोके । आसीरि- हाकसिक एव वैद्यो, वैद्यो यथा नाथ रुजां प्रशान्त्यै ॥ ११ ॥ अनित्य- मत्राणमहंक्रियामिः, प्रसक्तमिथ्याध्यवसायदोपम् । इद जगजन्मजरान्त कातं, निरञ्जना शान्तिमजीगमस्त्वम् ॥ १२॥ शतहृदोन्मेपचलं हि सौख्यं, तृप्णामयाप्यायनमावहेतुः । तृष्णाभिवृद्धिश्च तपत्यजत्रं, तापस्तदायासय तीत्यवादीः ॥१३॥ बंधश्च मोक्षश्च तयोश्च हेतुर्वद्धश्च मुक्तश्च फलं च मुक्तेः। स्याद्वादिनो नाथ तवैव युक्तं, नैकान्तदृष्टेस्त्वमतोऽसि शास्ता ॥ १४ ॥ शक्रोऽप्यशक्तस्तव पुण्यकीर्तेः, स्तुत्यां प्रवृत्तः किमु मादृशोऽन्त्रः तथापि भक्त्या स्तुतपादपद्मो मामार्य देयाः शिवतातिमुच्चः ॥१५ ॥ इति गमवजिनम्तोत्रम ॥ [20] गुणाभिनन्दादभिनन्दनो भवान्, दयाव● शान्तिसखीमशिश्रयत् । समाधितन्त्रस्तदुपोपपत्तये, द्वयेन नन्थ्यगुणेन चायुजत ॥१६॥ अचेतने तत्कृतबन्धजेऽपि, ममेदमित्याभिनिवेशकग्रहात् । प्रभगुरे स्था- वरनिश्चयेन च, क्षतं जगत्तत्वमजिग्राहद्भवान् ॥ १७ ॥क्षुदादिदुःखप्रति- कारतः स्थितिर्न चेन्द्रियार्थप्रभवाल्पसौख्यत्तः । ततो गुणो नास्ति च देहदेहिनो, रितीदमित्थं भगवान् व्यजिज्ञपत् ॥ १८ ॥ जनोऽतिलोलोऽ- प्यनुबधदोपतो, भयादकायेंग्विहन प्रवर्तते । इहाप्यमुनाप्यनुवन्धदोषवि. कथ सुखे संसजतीति चाब्रवीत् ॥ १९ ॥ सचानुवन्धोऽस्य जनस्य ताप- कृत्तपोभिवृद्धिःसुखतो न च स्थितिः । इति-प्रभो लोकहितं यतो मतं, ततो भवानेव गतिः सतां मतः॥.२० ॥ ॥ इत्यभिनन्दननिनस्तोत्रम्॥ अन्वर्थसंज्ञः सुमतिर्मुनिस्त्वं, स्वयं मतं येन सुयुक्तिनीतम् । यतश्च शेषेषु मतेषु नास्ति, सर्वक्रियाकारकतत्वसिद्धिः ॥ २१ ॥ अनेकमेकं च तदेव तत्त्वं, भेदान्वयज्ञानमिदं हि सत्यम् । मृपोपचारोऽन्यतरस्य लोपे, तच्छेपलोपोऽपि ततोनुपाख्यम् ॥ २२ ॥ सतः कथञ्चित्तदसत्वशक्तिः, खे नास्ति पुष्पं तरुपु प्रसिद्दम् । सर्वस्वभावच्युतमप्रमाणं, खवाग्विरुद्ध तब दृष्टितोऽन्यत् ॥ २३ ॥ न सर्वथा नित्यमुदत्यपैति, न च क्रियाका- रकमत्र युक्तम निवासतो जन्म सतो न नाशो, दीपस्तमःपुद्गुलभावतोऽ- स्ति ॥ २४ ॥ विधिनिषेधश्च कथंचिदिष्टी, विवक्षया. मुख्यगुणव्यवस्था । इति प्रणीतिः सुमतेस्तवेयं, मतिप्रवेकः स्तुवतोऽस्तु नाथ ॥ २५ ।। ॥ इति सुमतिजिनस्तोत्रम ॥ पन्नप्रभः पद्मपलाशलेश्यः, 'पद्मालयालिङ्गितचारुमूर्तिः । वभौः भवान् भव्यपयोरुहाणां, पद्माकराणामिव पद्मवन्धुः ॥ २६ ॥ वभार पांच मरस्वतीं च भवान्पुरस्तात्प्रतिमुक्तिलसम्याः। सरस्वतीमेवः समग्रशोभा, सर्वज्ञलक्ष्मी ज्वलितां विमुक्तः ॥ २७.॥ शरीररश्मिनासरः प्रभोस्ते, वाला- रश्मिच्छविरालिलेन । नरामराकीर्णसभां प्रभावच्छेलस्य पद्माभमणेः [४१] .

. खसानुम् ॥ २८ ॥ नमस्तलं पल्लवयन्निव त्वं, सहस्रपत्राम्बुजगर्भचार : पादाम्बुजैः पातितमोहदों, भूमौ प्रजानां विजहर्ष मृत्यै ॥ २९ ॥ गुणा- म्बुधेविप्लुपमप्यजत्रं, नाखण्डलः स्तोतुमल तव । प्रागेत्र माक्किमुता- तिभक्तिर्मावालमालापयतीदमित्थम् ।। ३० ।। ॥ इति पद्मप्रभस्तोत्रम् ॥ स्वास्थ्यं यदात्यन्तिकमेप पुंसां, स्वार्थो न भोगः परिभारात्मा । तृपोऽनुपङ्गान्न च तापशान्तिरितीदमाख्यद्भगवानसुपार्श्वः ॥ ३१ ॥ अजङ्गमं जङ्गमनेययन्त्रं, यथा तथा जीवधृतं शरीरम् । वीभत्सु पूति क्षयि तापकं च, स्नेहो वृथात्रेति हितं त्वमाख्यः ॥ ३२ ॥ अलंध्यशक्तिर्भवि- तव्यतेय, हेतुद्याविष्कृतकार्यलिङ्गा । अनीश्वरो जन्तुरहक्रियाः, संहत्य कार्यविति साध्ववादीः ।। ३३ ।। विभेति मृत्योर्न ततोऽस्ति मोक्षो, नित्यं शिवं वाञ्छति नास्य लाभः । तथापि वालो भयकामवश्यो, वृथा स्वयं तप्यत इत्यवादीः ॥ ३४ ॥ सर्वस्य तत्वस्य भवान्प्रमाता, मातेव वालस्य हितानुशास्ता । गुणावलोकस्य जनस्य नेता, मयापि भक्त्या परिणूयसेऽद्य ॥ ३५ ॥ ॥ इति सुपार्श्वजिनस्तोत्रम् ॥ चन्द्रप्रभ चन्द्रमरीचिगौर, चन्द्रं द्वितीयं जगतीव कान्तम् । वन्दे- ऽभिवन्य महतामृपीन्द्र, जिनं जितस्वान्तकपायवन्धम् ॥ ३६॥ यस्याङ्क- लक्ष्मीपरिवेपभिन्न, तमस्तमोरेरिव रश्मिन्नमिम् । ननाश चाह्य बहुमानतं च, ध्यानप्रदीपातिशयेन भिन्नम् ॥ ३७॥ स्वपक्षसौस्थित्यमदावलिप्सा, वाकसिंहनादेविमदा बभूवुः । प्रवादिनो यस्य मदागण्डा, गजा यथा के. शरिणो निनादैः ।। ३८ ॥ यः सर्वलोके परमेष्टितायाः पदं बभूवाद्भुत- कर्मतेजाः । अनन्तधामाक्षरविश्वचक्षुः, समेतदुःखक्षयशासनश्च ।। ३ ।। स चन्द्रमा भव्यकुमुद्रतीनां, विपन्नदोपाभ्रकलङ्कलेपः । व्याकोशवाङ्न्या- यमयूखमालः पूयात्पवित्रो भगवान्मनो मे ।। ४ ।। ॥ इति चन्द्रप्रभजिनस्तोत्रम् ॥ [१२] एकान्तदृष्टिप्रतिपेधि तत्वं प्रमाणसिद्ध तदतत्स्वभावम् । त्वया प्रणीतं सुविधे स्वधाम्ना नैतत्समालीढपदं त्वदन्यैः॥४१॥ तदेव च स्यान्न तदेव च स्यात्तथा प्रतीतेस्तव तत्कथञ्चित् । नात्यन्तमन्यत्वमनन्यता च विधेनिषेधस्य च शून्यदोषात् ॥४२॥ नित्यं तदेवेदमिति प्रतीतेने नित्यमन्यत्प्रतिपत्तिसि- द्धेः। न तद्विरुद्धं बहिरन्तरङ्गनिमित्तनैमित्तिकयोंगतस्ते ॥४३॥अनेकमेकं च पदस्य वाच्यं वृक्षा इति प्रत्ययवत्प्रकृत्या । आकाक्षिणः स्यादिति वै निपातो गुणानपेक्षे नियमेऽपवादः ॥ ४४ ॥ गुणप्रधानार्थमिदं हि वाक्य जिनस्य ते तद्विपतामपथ्यम् । ततोऽभिवन्ध जगदीश्वराणां ममापि साधो- स्तव पादपद्मम् ॥ ४५ ॥ ॥ इति सुविधिजिनस्तोत्रम् ॥ न शीतलाश्चन्दनचन्द्ररश्मयो न गाङ्गमम्भो न च हारयष्टयः । यथा मुनेस्तेऽनघवाक्यरश्मयः शमाम्बुगर्भाः शिशिरा विपश्चितां ॥ ४६ ॥ सुखामिलापानलदाहमृञ्छितं मनो निजं ज्ञानमयामृताम्बुभिः । विदिध्य- पस्त्वं विपदाहमोहितं यथा भिपग्मन्त्रगुणैः स्खविग्रहं ॥४७॥ सवजीविते कामसुखे च तृप्णया दिवा श्रमार्ता निशि शेरते प्रजाः । त्वमार्य नक्तंदि- वमप्रमत्तवानजागरेवात्मविशुद्धवर्त्मनि ॥४८॥अपत्यविचोत्तरलोककृष्णया तविनः केचन कर्म. कुर्वते । भवान्पुनर्जन्मजराजिहासया त्रयी प्रवृत्ति शमधीरवारुणत् ।। ४६ ।। त्वमुत्तमज्योतिरजः क्व निर्वृतः क ते परे बुद्धि- लवोद्धवक्षताः । ततः स्वनिःश्रेयसभावनापरैर्बुधप्रवेकैर्जिनशीतलेज्यसे ॥ ५० ॥ ॥ इति शीतलजिनस्तोत्रम् ॥ श्रेयान् जिनः श्रेयसि वर्मनीमाः श्रेयः प्रजाः शासदजेयवाक्यः । भवांश्वकासे भुवनत्रयेऽसिनेको यथा वीतघनो विनस्वान् ॥ ५१ ॥ विधिषिक्तप्रतिषेधरूपः प्रमाणमत्रान्यतरप्रधानम् । गुणो परो मुख्यनिया- महेतुर्नयः सदृष्टान्तसमर्थनस्ते ॥ ५२ ॥ विवक्षितो मुख्य इतीष्यतेऽन्यो [१३] गुणोऽ विवक्षो न निरात्मकस्ते । तथारिमित्रानुभयादिशक्तियावधिः कार्यकरं हि वस्तु ॥ ५३॥ दृष्टान्तसिद्धावुभयोविवादे साध्यं प्रसिद्ध्ये- न तु तादृगस्ति । यत्सर्वथकान्तनियामदृष्टं त्वदीयदृष्टिविभवत्यशेपे । ॥ ५४ ॥ एकान्तदृष्टिप्रतिषेधसिद्धिायपुमिोहरिपुं निरस्य । असि म कैवल्यविभूतिसम्राट् ततस्त्वमहनसिमे स्तवाहः ॥ ५५ ॥ ॥ इति श्रेयाधिनस्तोत्रम् ॥ शिवासु पूज्योऽभ्युदयक्रियासु त्वं वासुपूज्यस्त्रिदशेन्द्रपूज्यः। मयापि पूज्योऽल्पधिया मुनीन्द्र दीपाचिषा किं तपनो न पूज्यः ॥ ५६ ॥ न पूजयार्थस्त्वयि वीतरागे न निन्दया नाथ विवान्तवेरे । तथापि ते पुण्य- गुणस्मृतिनः पुनातु चित्तं दुरिताञ्जनेभ्यः॥ ५७॥ पूज्यं जिनं त्वायतो जनस्य सावद्यलेशो बहुपुण्यराशौ । दोपाय नालं कणिका विषय न दूपिका शीतशिवाम्बुराशौ ॥ ५८॥ यद्वस्तु वाह्य गुणदोपसूतेनिमित्तमभ्यन्तरमू- लहेतोः । अध्यात्तवृत्तस्य तदङ्गभूतमभ्यंतरं केवलमप्यलं ते ॥ ५९॥ बाह्येतरोपाधिसमग्रतेयं कार्येषु ते द्रव्यगतः स्वभावः । नैवान्यथा मोक्षवि- धिश्च पुंसां तेनामिवन्यस्त्वमृपिqधानाम् ॥ ६० ।। - ॥ इति वासुपूज्यस्तोत्रम् ॥ य एव नित्यक्षणिकादयो नया मिथोऽनपेक्षाः स्वपरप्रणाशिनः । एव तवं विमलस्य ते मुनेः परस्परेक्षाः स्वपरोपकारिणः ॥ ६१ ।। यथै- कशः कारकमर्थसिद्धये समीक्ष्य शेपं स्वसहायकारकम् । तथैव सामान्य- विशेषमातृका नयास्तवेष्टा गुणमुख्यकल्पतः ॥ ६२ ॥ परस्परेक्षान्वयभेद- लिङ्गतः प्रसिद्धसामान्यविशेपयोस्तव । समग्रतास्ति स्वपरावभासकं यथा प्रमाणं भुवि बुद्धिलक्षणम् ॥ ६३ ॥ विशेषवाच्यस्य विशेषणं वचो यतों विशेष्यं विनियम्यते च यत् । तयोश्च सामान्यमतिप्रसज्यते विवक्षिताल्या. दिति तेऽन्यवर्जनम् ।। ६४ ॥ नयास्तव स्यात्पदसत्यलाञ्छिता रसोपविद्रा इव लोहधातवः । भवन्त्यभिप्रेतगुणा यतस्ततो भवन्तमार्याः प्रणता हितै- [११] षिणः ॥ ६५॥ ॥ इति विमलजिनस्तोत्रम् ॥ अनन्तदोषाशयविग्रहो ग्रहो विषङ्गवान्मोहमयश्चिरं हृदि । यतो जित- स्तत्त्वरुचौ प्रसीदता त्वया ततोऽभूर्भगवाननन्तजित् ॥ ६६॥ कषायनाम्नां द्विषतां प्रमाथिनामशेषयन्नाम भवानशेषवित् । विशोषणं मन्मथदुर्मदामयं समाधिभैषज्यगुणैर्व्यलीनयन् ॥ ६७ ॥ परिश्रमाम्बुभयवीचिमालिनी त्व- या स्वतृष्णासरिदार्य शोषिता । असंगधर्माकंगभस्तितेजसा परं ततो निर्व- तिधाम तावकम् ॥ ६८ ॥ सुहृत्वयि श्रीसुभगत्वमश्नुते द्रिषंस्त्वयि प्रत्य- यवत्प्रलीयते । भवानुदासीनतमस्तयोरपि प्रभो परं चित्रमिदं तवेहितम् ॥६९ ॥ त्वमीदृशस्तादृश इत्ययं मम प्रलापलेशोऽल्पमतेर्महामुने । अशे- पमाहात्म्यमनीरयन्नपि शिवाय संस्पर्श इवामृताम्बुधेः ॥ ७० ॥ ॥ इत्यनन्तजिनस्तोत्रम ॥ धर्मतीर्थमनघं प्रवर्तयन् धर्म इत्यनुमतः सतां भवान् । कर्मकक्षमद- हत्तपोऽग्निभिः शर्म शाश्वतमवाप शङ्करः ।। ७१ ॥ देवमानवनिकायसत्तमै रेजिषे परिवृतो वृतो बुधैः । तारकापरिवृतोऽतिपुष्कलो व्योमनीव शश- लाञ्छनोऽमलः ॥ ७२ ॥ प्रातिहार्यविभवः परिष्कृतो देहतोऽपि विरतो भवानभूत् । मोक्षमार्गमशिषन्नरामरान्नापि शासनफलेषणातुरः ॥ ७३ ।। कायवाक्यमनसांप्रवृत्तयो नाऽभवस्तव मुनेश्चिकीर्षया । नासमीक्ष्य भवतः प्रवृत्तयो धीर तावकमचिन्त्यमीहितम् ।। ७४ ॥ मानुषीं प्रकृतिमभ्यतीत- वान् देवतास्वपि च देवता यतः । तेन नाथ परमासि देवता श्रेयसे जिन- वृष प्रसीद नः॥ ७५ ॥ ॥ इति धर्मजिनस्तोत्रम् ॥ विधाय रक्षां परतः प्रजानां गजा चिरं योऽप्रतिमप्रतापः । व्यधा- पुरस्तात्स्वत एव शान्तिर्मुनिर्दयामूर्तिरिवाधशान्तिम् ।। ७६ ।। चक्रेण यः [2] शत्रुभयंकरेण जित्वा नृपः सर्वनरेन्द्र चक्रम् । समाधिचक्रेग पुनर्जिगाय महोदयो दुर्जयमोहचक्रम् ।। ७७ ।। राजश्रिया राजसु राजसिंहो रजाज यो राजसुभोगतन्त्रः। अर्हन्त्यलक्ष्म्या पुनरात्मतन्त्री देवासुरोदारसमे रराज ।। ७८ ॥ यस्मिनभूद्राजनि राजचक्रं मुनौ दयादीधि तेधर्मचक्रम् । पूज्ये मुहुः प्राञ्जलि देवचक्रं ध्यानोन्मुखे ध्वंसि कृतान्तचक्रम् ॥ ७९ ॥ स्वदो. पशान्त्याविहितात्मशान्तिः शान्तेर्विधाता शरणं गतानाम् । भूयाद्भवक्लेश- भयोपशान्त्यै शान्तिर्जिनो मे भगवान् शरण्यः।।८० ॥ ॥ इति शान्तिजिनस्तोत्रम् ॥ कुन्थुप्रभृत्यखिलसवदयकतानः कुन्थुर्जिनी ज्वरजरामरणोपशान्त्यै। त्वं धर्मचक्रमिह वर्त्तयसि स भूत्यै भृत्वा पुरा क्षितिपतीश्वर चक्रपाणिः ॥८१ ॥ तृष्णार्चिपः परिदहन्ति न शान्तिरासामिष्टेन्द्रियार्थविभवैः परि- वृद्धिरेव | स्थित्यैव कायपरितापहरं निमित्तमित्यात्मवान्विपयसौख्यपरा- ङ्मुखोऽभूत् ।। ८२ ॥ बाह्य तपः परमदुश्चरमाचरंस्त्वमाध्यात्मिकस्य तपसः परिवहणार्थम् । ध्यानं निरस्य कलुपद्वयमुत्तरेऽस्मिन् ध्यानद्वये प्रवृतिपेऽ- तिशयोपपन्ने ॥ ८३॥ हुत्वा स्वकर्मककटुकप्रकृतीश्चतस्रो रत्नत्रयातिशय- तेजसि जातवीर्यः । विभ्राजिपे सकलवेदविधेत्रिनेता व्यभ्रे यथा वियति दीप्तरुचिर्विवस्वान् ।। ८४ ॥ यस्मान्मुनीन्द्र तव लोकपितामहाद्या विद्या- विभूतिकणिकामपि नाप्नुवन्ति । तस्माद्भवन्तमजमप्रतिमेयमार्याः स्तुत्यं स्तुवन्ति सुधियः स्वहितैकतानाः ॥ ८५ ॥ ॥ इति कुन्युजिनस्तोत्रम् ॥ गुणस्तोकं सदुल्लध्य तद्बहुत्वकथा स्तुतिः । आनन्त्यात्त गुणा वक्तु- मशक्यास्त्वयि सा कथम् ।। ८६ ॥ तथापि ते मुनीन्द्रस्य यतो नामापि कीर्तितम् । पुनाति पुण्यकीर्तेर्नस्ततो ब्रूयाम किञ्चन ।। ८७ ॥ लक्ष्मी- । विभवसर्वस्व मुमुक्षोश्चक्रलाञ्छनम् । साम्राज्यं सार्वभौम ते जरन्तृणमि- वाभवत् ।। ८८ ॥ तव रूपस्य सौन्दर्य दृष्ट्वा तृप्तिमनापिवान् । द्वयक्षः शक्रः सहस्राक्षो बभूव बहुविस्मयः ॥ ८९ ॥ मोहरूपो रिपुः पापः कषा- यभटसाधनः । दृष्टिसम्पदुपेक्षाखस्त्वया धीर पराजितः ॥ ९० ॥ कन्द- पस्योद्वरो दर्पखेलोक्यविजयार्जितः । हेपयामास तं धीरे त्वयि प्रतिहतो- दयः ॥ ९१ ॥ आयत्यां च तदात्वे च दुःखयोनिनिरुत्तरा । तृष्णा नदी त्वयोत्तीर्णा विद्यानावा विविक्तया ॥ ९२ ॥ अन्तकः क्रन्दको नृणां जन्मज्वरसखा सदा । त्वामन्तकान्तक प्राप्य व्यावृत्तः कामकारतः ॥ १३ ॥ भूपावेपायुधत्यागि विद्यादमदयापरम् । रूपमेव तवाचष्टे धीर- दोषविनिग्रहम् ॥ ६४ ॥ समन्नतोऽङ्गभासां ते परिवेषेण भूयमा । तमो बाह्यमपाकीर्णमध्यात्मध्यानतेजसा ।। ६५ ।। सर्वज्ञज्यो तपोद्भूतस्तावको महिमोदयः । कं न कुर्यात प्रणनं ते सत्वं नाथ सचेतनम् ।। ६६ ॥ तव वागमृतं श्रीमत्सर्वभाषास्वभावकम् । प्रणीयत्यमृतं यद्वत प्राणिनो व्यापि संमदि ॥ ९७ ॥ अनेकान्तात्मदृष्टिस्ते सती शून्यो विपर्ययः । ततः सर्व मृपोक्तं स्यात्तदयुक्तं स्वघातनः || १८ ) ये परस्खलितोनिद्राः स्वदोषेभ- निमीलिनः । तपस्विनस्ते किं कुर्युरपात्रं त्वन्मतश्रियः ॥ ९९ ।। ते तं म्वघातिनं दोणं शमीकर्तुमनीश्वराः । त्वद्विपः खहनो बालास्तत्त्वावक्त- व्यतां श्रिताः ॥१०० ॥ सदेकनित्यवक्तव्यास्तद्विपक्षाश्च ये नयाः । मर्यथेति प्रदुष्यन्ति पुष्यन्ति स्थादितीहिते ॥ १०१ ॥ सर्वथा नियमत्यागी यथादृष्टमपेक्षकः । स्वाच्छब्दस्तावके न्याये नान्येषामात्मविद्विषाम् ॥ १०२ ॥ अनेकान्तोऽप्यनेकान्तः प्रमाणनयसाधनः । अनेकान्तः प्रमा- णात्ते तदेकान्तोऽर्पितान्नयात् ॥ १०३ ।। इति निरुपमयुक्तिशासन प्रि- यहितयोगगुणानुशासनः । अरजिनदमतीर्थनायकस्त्वमिव सतां प्रतिबोध- नायकः ॥ १४ ॥ मतिगुणविभवानुरूपतस्त्वयि वरदागमदृष्टिरूपतः । गुणकृशमपि किश्चनोदितं मप भवता दुरिताशनोदितम् ॥ १०५ ।। ॥ इत्यरजिनस्तोत्रम् ॥ यस्य महर्षेः सकलपदार्थप्रत्यवबोधः समजनिसाक्षात् । सामरमा जग- दपि सर्न प्राञ्जलि भूत्वा प्रणिपतति स ॥१०६॥ यस्य च मूर्तिः कनक-. [१७]] F मयीव स्वस्फुरंदाभाकृतपरिवेषा । वागपि तवं कथयितुकामा स्यात्पद- पूर्वा रमयति साधून् ॥ १०७ ॥ यस्य पुरस्ताद्विगलितमाना न प्रतिती- • भुवि विवदन्ते । मुरपि रम्या प्रतिपदमासीजातविकोशाम्बुजमृदुहासा ॥ १०८ ॥ यस्य समन्ताज्जिनशिशिरांशोःशिष्यकसाधुग्रहविभवोऽभूत् । तीर्थमपि स्वं जननसमुद्रत्रासितमत्वोत्तरणपथोऽग्रम् ॥ १०९ ॥ यस्य च शुक्लं परमतपोऽग्निानमनन्तं दुरितमधाक्षी । तं जिनसिंह कृतकरणीयं मल्लिमशल्य शरणमितोऽस्मि ॥ ११० ॥ ॥ इति मल्लिजिनस्तोत्रम् ॥ अधिगतमुनिसुव्रतस्थितिर्मुनिकृपभो मुनिसुवृतोऽनघः मुनिपरिषदि निवभौ भवानुडुपरिषत्परिवीतसोमवत् ॥ १११ ॥ परिणतशिखिकण्ठरा- गया कृतमदनिग्रहविग्रहाभया । तब जिन तपसः प्रसूनया ग्रहपरिवेषरुचेव शोभितम् ॥ ११२ ॥ शशिरुचिशुचिशुक्तलोहितं सुरभितरं विरजो निजं वपुः । तब शिवमतिविस्मयं यते यदपि च वाड्मनसोऽयमीहितम् - ॥ ११३ ।। स्थितिजनननिरोधलक्षणं चरमचरं च जगत्प्रतिक्षणम् । इति जिनसकलज्ञलाञ्छन वचनमिदं वदतां वरस्य ते ॥ ११४ ॥ दुरितमलक- लंकमष्टकं निरुपमयोगवलेन निर्दहन । अभवदभवसौख्यवान् भवान् भवतु ममापि भवोपशान्तये ।। ११५ ।। ॥ इति मुनिसुव्रतनिनस्तोत्रम् ॥ स्तुतिस्तोतुः साधोः कुशलपरिणामाय स तदा । भवेन्मा वा स्तुत्यः फलमपि ततस्तस्य च सतः ॥ किमेवं स्वाधीनाजगति सुलभ श्रायसपथे। स्तुयानत्वा विद्वान्सततमपि पूज्यं नमिजिनम् ॥ ११६ ॥ त्वया धीमन् ब्रह्मप्रणिधिमनसा जन्मनिगलं । समूलं निभिन्नं त्वमसि विदुपां मोक्षपदवी । त्वयि ज्ञानज्योतिर्विभवकिरणे ति भगव- । न्नभूवन् खद्योता इव शु- चिरवावन्यमतयः ॥ ११७ ॥ विधेयं वार्य चानुभयमुभयं मिश्रमपि तत् । विशेष : प्रत्येकं नियमविपयैश्चापरिमितैः ।। सदान्योन्यापेक्षः सकलभुवन- [४८] ज्येष्ठगुरुण । त्वया गीतं तत्त्वं बहुनयविवक्षेतरवशात् ॥ ११८ ॥अहिंसा भूतानां जगति विदितं ब्रह्म परमं । न मा तत्रारम्भोस्त्यणुरपि च यत्रा- श्रमविधौ । ततस्तत्सिध्यर्थ परमकरुणो ग्रन्थमुभयं । भवानेवात्याक्षीन च विकृतवेपोपधिरतः ॥११९ ॥ वपुर्भपावेपव्यबधिरहितं शांतिकरण । यतस्ते संचष्टे स्मरशरविपाकविजयम् ॥ विना भीम शस्त्रैरदयहृदयामर्ष- विलयं । ततस्त्वं निर्मोहः शरणमसि नः शांतिनिलयः ॥ १२० ॥ ॥ इति नमिजिनस्तोत्रम् ॥ भगवानृपिः परमयोगदहनहुतकल्मपेन्धनम् । ज्ञानविपुलकिरणैः सकलं प्रतिबुध्य बुद्धः कमलायतेक्षणः॥१२१ ॥ हरिवंशकेतुरनवद्यविनय- दमतीर्थनायकः । शीलजलधिरभवो विभवस्त्वमरिष्टनेमिजिनकुञ्जरोजरः ॥ १२२ ॥ त्रिदशेन्द्रमौलिमणिरत्नकिरणविसरोपचुम्बितम् | पादयुगलप- मलं भवतो विकसत्कुशेशयदलारुणोदरम् ।। १२३ ।। नखचन्द्ररश्मिकव- चातिरुचिरशिखराङ्गुलिस्थलम् । स्वार्थनियतमनसः सुधियः प्रणमन्नि मन्त्रमुखरा महर्पयः॥ १२४ ॥ द्युतिमद्रथाङ्गरविविम्बकिरणजटिलांशुमण्ड- लः । नीलजलजदलराशिवपुः सहबन्धुभिर्गरुडकेतुरीश्वरः ॥ १२५ ॥ हल- भृञ्च ते खजनभक्तिमुदितहृदयौ जनेश्वरौ । धर्मविनयरसिकौ सुतरां चरणा- रविन्दुयुगलं प्रणेमतुः ॥ १२६ ॥ ककुदं भुवः खचरयोपिदुपितशिखररैल- कृतः । मेघपटलपरिवीततटस्तव लक्षणानि लिखितानि वत्रिणा ॥१२७॥ वहतीति तीर्थमृपिभिश्च सततमभिगम्यतेऽद्य च । प्रीतिविततहृदयैः परितो भृशमूर्जयन्त इति f श्रुतोऽचलः ॥ १२८ ॥ बहिरन्तरप्युभयथा च करणभविघाति नार्थकृत् । नाथ युगपदखिलं च सदा त्वमिद तलामलक- बद्विवेदिथ ॥ १२ ॥ अथ एव ते वुधनुतस्य चरितगुणमद्भुतोदयम् । न्यायविहितमवधार्य जिने त्वयि सुप्रसन्नमनसः स्थिता क्यं ।। १३० ।। ॥ इत्यरिष्टनेमिनिनस्तोत्रम् ॥ तमालनीलैः सधनुस्तडिद्गुणैः प्रकीर्णभीमाशनिवायुवृष्टिभिः । वला- हकैरिवशरुपद्रुतो महामना यो न चचाल योगतः ॥ १३१ ॥ बृहत्फ णामण्डलमण्डपेन यं स्फुरत्तडिपिङ्गरुचोपसर्गिणम् । जुगूह नागो धरणो धराधरं विरागसन्ध्यातडिदम्बुदो यथा ॥ १३२ ।। स्वयोगनिस्त्रिंशनिशा- तधारया निशात्य यो दुर्जयमोहविद्विषम् । अवापदार्हन्त्यमचिंत्यमद्भुतं त्रिलोकपूजातिशयास्पदं पदम् ।। १३३ ।। यमीश्वरं वीक्ष्य विधूतकल्मषं तपोधनास्तेऽपि तथा बुभूषवः । वनौकसः खश्रमवन्ध्यबुद्धयः शमोपदेशं शरणं प्रपेदिरे।। १३४ ।। स सत्यविद्यातपसांप्रणायकः ममग्रधीरुपला- म्बरांशुमान् । मया सदा पार्वजिनः प्रणम्यते विलीनमिथ्यापथदृष्टिवि- भ्रमः ॥ १३५ ॥ ॥ इति पार्वजिनस्तोत्रम ॥ कीर्त्या भुवि भासि तया वीर त्वं गुणसमुच्छया भासितया । भासो. डुमभासितया सोम इव व्याम्नि कुन्दशोभासितया ।। १३६ ।। तब जिन शासनविभवो जयति कलावपि गुणानुशासनविभवः । दोषकशासनविभवः स्तुवति चेनं प्रभाकृशासनविभवः ॥ १३७ ॥ अनवद्यः स्याद्वादस्तव द्रष्टे- याविरोधतः स्याद्वादः । इनरो न स्याद्वादो सद्वितयविरोधान्मुनीश्वराऽस्या- द्वादः ।। १३८ ॥ त्वमसि सुरासुरमहितो ग्रन्थिकसत्वाशयप्रणामामहितः । लोकत्रयपरमहितोऽनावरणज्योतिरुज्ज्वलधामहितः ॥ १३९ ।। सम्याना- मभिरुचितं दवासि गुणभूषणं श्रिया चारुचितम् । मग्न खस्यां रुचिरंज- यसि च मृगलांछनं स्वकान्त्या रुचितम् ॥ १४० ॥ त्वं जिन गतमदमा- यस्तव भावानां मुमुक्षुकामदमायः । श्रेयान् धीमदमायस्त्वया समादेशि मप्रयामदमायः ॥ ४१ ।। गिरिमित्यवदानवतः श्रीमत इव दन्तिनः स्त्रबहानवतः। तव शमवादानवतो गतमूर्जितमपंगतप्रमादानवतः ॥१४२।। बहुगुणसंपदसकल परमतमपि मधुरवचनविन्यासकलम् । नयभक्त्य वतसकलं तव देव मतं समन्तभद्र सकलम् ॥ १४३ ॥ ॥ इति वीरजिनस्तोत्रम ॥ । ५० यो नि शेषजिनोक्तधर्मविषयः श्रीगौतमाचे कृतः। सूक्तायरमलः स्तवोयमसमः स्वल्पः प्रसन्न पदैः ॥ तयाख्यानमदो यया ह्यवगत किञ्चित्कृतं लेशतः । स्थेयाच्चन्द्रदिवाक- रावधि बुधप्रह्लादचेतस्यलम् ॥ १४४ ॥3 ॥ इति बृहत्स्वयम्भूस्तोत्रं समाप्तम् ॥ श्री अमितगतिसूरिविरचिता द्वात्रिंशतिका । (१७) सत्त्वेषु मैत्री गुणिषु प्रमोदं क्लिष्टेषु जीवेषु कृपापरत्वम् । माध्यस्थभावं विपरीतवृत्तौ सदा ममात्मा विदधातु देव ॥१॥शरीरतः कर्तुमनन्तशक्ति विमिनमात्मानमपास्तदोषम् । जिनेन्द्र ! कोपादिव खगयष्टिं तव प्रसादेन ममास्तु शक्तिः ॥२॥ दुःखे सुखे वैरिणि बन्धुवगें योगे विवोगे भुवने वने वा । निराकृताशेषममत्वबुद्धेः समं मनो मेऽस्तु सदापि नाथ ॥३॥ मुनीश ! लीनाविव कीलिताविव स्थिरौ निशाताविव बिविताविव । पादौ त्वदीयो मम तिष्ठतां सदा तमोधुनानौ हृदि दीपकाविव ॥ ४ ॥ एकेन्द्रि- याद्या यदि देव देहिनः प्रमादतः संचरता इतस्ततः । क्षता विभिन्ना मि लिता निपीडिता, तदस्तु मिथ्या दुग्नुष्ठितं तदा ॥५॥ विमुक्तिमार्गप्र- पूर्वपृष्ठस्य टिप्पणः १ प्रकष्टा मा हिंसा प्रमा, अपगता नष्टा प्रमा अपगतप्रमा अहिंसा, तस्या दानममय- दानम् । तदस्यास्तीति तस्य । २ नया नैगमादय. । तेषा भक्तयो भङ्गास्यादस्तीत्यादयः । त एवाऽवतसकं कर्णभूषणं तल्लातीति । ३ अन्तिम. श्लोक. स्वयम्भूस्तोत्रस्य नास्ति किन्तु टीकाकारस्य । [५१ ] - तिकूलवतिना मया कषायाक्षवशेन दुधिया। चारित्रशुद्धर्यदकारि लोपनं तदस्तु मिथ्या मम दुष्कृतं प्रभो ॥ ६॥ विनिन्दनालोचनगर्हणेरह मनो- वचःकायकषायनिर्मितम् । निहन्मि पापं.भवदुःखकारणं भिषग्विष मन्त्रगु- णैरिवाखिलम् ॥७॥ अतिक्रम यद्विमतेर्व्यतिक्रमं जिनातिचारं सुचरित्र- कर्मणः । व्यधामनाचारमपि प्रमोदतः प्रतिक्रमं तस्य करोमि शुद्धये ॥८॥ क्षतिं मनःशुद्धिविधेरतिक्रमं व्यतिक्रमं शीलवृतेविलंघनम् । प्रभोऽतिचारं विषयेषु वर्तनं वदन्त्यनाचारमिहातिसक्तताम् ॥९॥ यदर्थमात्रापदवा- क्यह.नं मया प्रमादाद्यदि किश्चनोक्तम् । तन्मे क्षमित्वा विदधातु देवी सरस्वती केवलबोधलब्धिम् ॥१०॥ बोधिः समाधिः परिणामशुद्धिः खात्मोपलब्धिः शिवसौख्यसिद्धिः । चिन्तामणि चिंतितवस्तुदाने त्यां वंद्यमानस्य ममास्तु देवि ॥ ११ ॥ यः सर्यते सर्वमुनीन्द्रवृन्दर्यः स्तूयते सर्वनरामरेन्द्रैः । यो गीयते वेदपुराणशास्त्रः स देवदेवो हृदये ममास्ताम् ॥ १२ ॥ यो दर्शनज्ञानसुखस्वभावः समस्तसंसारविकारबाह्यः । समाधि- गम्यः परमात्मसंज्ञः स देवदेवो हृदये ममास्ताम् ॥ १३ ॥ निषूदते यो भवदुःखजालं निरीक्षते यो जगदन्तरालं । योऽन्तर्गतो योगिनिरीक्षणीयः स देवदेवो हृदये ममास्ताम् ॥ १४ ॥ विमुक्तिमार्गप्रतिपादको यो यो जन्ममृत्युव्यसनाधतीतः । त्रिलोकलोकी विकलोऽकलङ्कः स देवदेवो हृदये ममास्तम् ॥ १५॥ क्रोडीकृताशेषशरीरिवर्गा रागादयो यस्य न संति दोपाः निरिंद्रियो ज्ञानमयोऽनपायः स देवदेवों हृदये ममास्ताम् ॥ १६ ॥ यो व्यापको विश्वजनीनवृत्तेः सिद्धो विवुद्धो धुतकर्मबन्धः । ध्यातो धुनीते सकलं विकारं स देवदेवो हृदये ममास्ताम् ॥ १७ ॥ न स्पृश्यते कर्मक- लङ्कदोर्यो ध्वान्तसंधैरिव तिग्मरश्मिः । निरञ्जन नित्यमनेकमेकं तं देव- प्राप्तं शरणं प्रपद्ये ॥ १८ ॥ विभासते यत्र मरीचिमाली न विद्यमाने भुव. नावमासि | स्वात्मस्थित वोधमयप्रकाशं तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये ॥१९॥ विलोक्यमाने सति यत्र रिश्त्रं विलोक्यते स्पष्टमिदं विविक्तम् । शुद्ध शित्र गान्तमनाद्यनन्तं तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये ॥ २० ॥ येन क्षता मन्मथना नमूळ विपादनिद्राभयशोकचिन्ता । क्षयोऽनलेनेव तरुणपञ्चस्तं देवमाप्न शरणं प्रपद्ये ॥ २१॥ न संस्तरोऽश्मा न तृणं न मेदिनी विधानतो नो फलको विनिर्मितः । यतो निरस्ताक्षकषायविद्विषः सुधीमिरात्मैव सुनिर्मलो मतः ।। २२ ।। न संस्तरो भद्रसमाधिसाधनं न लोकपूजा न च संघमेल- नम् । यतस्ततोऽध्यात्मरतो भवानिशं विमुच्य सर्वामपि बाह्यवासनाम् ॥ २३ ॥ न सन्ति बाह्या मम केचनार्था भवामि तेषां न कदाचनाहम् । इत्थं विनिश्चित्य विमुच्य बाह्य स्वस्थः सदा त्वं भव भद्रमुक्त्यै ॥ २४ ॥ आत्मानमात्मन्यत्रलोकमानस्त्वं दर्शनज्ञानमयो विशुद्धः । एकाग्रचित्तः खलु यत्र तत्र स्थितोपि साधुर्लभते समाधिम् ॥ २६ ॥ एकः सदा शाश्वतिको ममात्मा विनिर्मलः साधिगमस्वभावः । बहिर्भवाः सन्त्यपरे समस्ता शाश्वताः कर्मभवाः स्वकीयाः ॥ २६ ॥ यस्यास्ति नैक्यं वपुषापि सार्द्ध तस्यास्ति किं पुत्रकलत्रमित्रैः । पृथक्कृते चर्मणि रोमकूपाः कुतो हि तिष्ठ. न्ति शरीरमध्ये ॥ २७ ॥ संयोगतो दुःखमनेकभेदं यतोऽश्नुते जन्मवने शरीरी । ततनिधासौ परिवर्जनीयो यियासुना निर्वृतिमात्मनीनाम् ॥ २८॥ सर्न निराकृत्य विकल्पजालं संसारकान्तारनिपातहेतुम् । विविक्तमात्मान- मवेक्षमाणो निलीयसे त्वं परमात्मतत्वे ॥ २९ ॥ स्वयं कृतं कर्म यदात्मना पुरा फलं तदीयं लभते शुभाशुभम् । परेण दत्तं यदि लभ्यते स्फुट स्वयं कृत कर्म निरर्थकं तदा ।। ३० । निजार्जित कर्म विहाय देहिनो न कोपि कस्यापि ददाति किंचन। विचारयन्नेवमनन्यमानसः परो ददातीति विसुंच शेमुपीम् ।। ३१ । यः परमात्माऽमितगतिवन्धः सर्वविविक्तो भृशमनव. घः । शश्वदधीतो मनसि लभन्ते क्तिनिकेतं विभववरं ते ॥ ३२ ॥ इति द्वात्रिंशतिवृत्तः परमात्मानमीक्षते । योऽनन्यगतचेतस्को यात्यसौ पदम- व्ययम् ॥ ३३॥ ॥ इत्यमितगतिसूरिविरचिता द्वात्रिंशतिका समासा ।।

अकलंकस्तोत्रम् । [शार्दूलविक्रीडितङ्दः] त्रैलोक्यं सकलं त्रिकालविषयं सालोकमालोकितं । साक्षायेन यथा स्वयं करतले रेखात्रयं सांगुलि ॥ रागद्वेषभयामयान्तकजरालोलत्वलोमा- दयो । नालं यत्पदलंबनाय स यहादेवो मया वद्यते ॥१॥ दग्धं येन पुर- त्रय शरभवा तीव्राचिंषा पसिना । यो वा नृत्यति मचवरिपतवने यस्या- त्मजो वा गुहः ॥ सोऽयं किं मम शंकरो भयपारोपातिमोहक्षयं । कृत्वा यः स तु सर्ववित्तनुभृतां क्षेमकरः शंकरः ॥ २ ॥ यनायेन विदारित कररुहैत्येन्द्रवक्षःस्थल ।। सारथ्येन धनंजयस्य समरे योऽमारयत्कौरवान्।। नासौ विष्णुरनेककालविषयं यज्ज्ञानमव्याहतं । विश्वं व्याप्य विज़ुभते स तु महाविष्णुः सदेष्टो मम ॥ ३॥ उर्वश्यामुदपादि रागबहुलं चेतो यदीयं । पुनः। पात्रीदडकमंडलुप्रभृतयो यस्याकृतार्थस्थितिम् ॥ आविर्भावयितुं भवंति स कथं ब्रह्मा भवेन्मादृशां । जुत्तृष्णाश्रमरागरोगरहितो ब्रह्मा कृता- र्थोऽस्तु नः ॥४॥ यो जग्ध्वा पिशितं समत्स्यकवलं जीनं च शून्यं वदन् । कर्ता कर्मफलं न भुक्त इति यो वक्ता स बुद्धः कथम् ॥ यज्ज्ञानं क्षणवर्ति वस्तु सकलं ज्ञातुं न शक्तं सदा । यो जानन्युगपञ्जगत्त्रयमिदं साचात्स बुद्धो मम ॥ ५॥ [खग्धरा छदः] ईशः किं छिन्नलिंगो यदि विगतमयः शूलपाणिः कथं स्यात् । नाथः किं भक्ष्यचारी यतिरिति स कथ सांगनः सात्मजश्च ।। आर्द्राजः किन्त्वजन्मा सकलविदित किं वेत्ति नात्मान्तरायं । संक्षेपात्सम्यगुक्त पशुपतिमपशुः कोऽत्र धीमानुपास्ते ॥६॥ ब्रह्मा चर्माक्षसूत्री सुरयुवति- रसावेशविभ्रान्तचेताः । शम्भुः खट्वाङ्गधारी गिरिपतितनयापाङ्गलीला- नुविद्धः ।। विष्णुश्चक्राधिपः सन्दुहितरमगमगोपनाथस्य मोहा- । दर्हन्धि. ध्वस्तरागो जितसकलभयः कोऽयमेष्वाप्तनाथः ॥ ७॥ एको नृत्यति विप्रसार्य कुकुभां चक्रे सहस्रं भुजा- । नेकः शेपभुजंगभोगशयने व्यादाय निद्रायते ।। दृष्टुं चारुतिलोत्तमामुखमगादेकश्चतुर्वक्त्रता- । मेते मुक्तिपथं वदंति विदुषामित्येतदत्यद्भुतम् ॥ ८ ॥ यो विश्वं वेद वेद्यं जननजल- निधेर्भगिनः पारदृश्वा । पौर्वापर्याविरुद्धं वचनमनुपमं निष्कलंक यदी- यम् ॥ तं वंदे साधुवंद्यं सकलगुणनिधि ध्वस्तदोषद्वितं । वुद्धं वा वर्द्धमानं शनदलनिलयं केशवं वाशिवं वा ॥ ९ ॥माया नास्ति जटा कपाल मुकुट चन्द्रो न मूर्धावली । खट्वाङ्गं न च वासुकिन च धनुः शूल न चोग्रं मुखं ।। कामो यस्य न कामिनी न च वृषो गीतं न नृत्यं पुनः । सोऽ. सान्पातु निरंजनो जिनपतिः सर्वत्र सूक्ष्मः शिवः॥ १० ॥ नो ब्रह्मांकित. भूतलं न च हरेः शम्भोर्न मुद्रांकितं । नो चन्द्रार्ककरांकितं सुरपतेर्व- जांकितं नैव च ॥ षडवक्त्रांकितबौद्धदेवहुतभुग्यक्षोरगैर्नाकितं । नग्न पश्यत वादिनों जगदिदं जैनेन्द्रमुद्रांकितम् ॥ ११ ॥ मौञ्जीदंडकमंडलु- प्रभृतयो नो लाञ्छन ब्रह्मणो । रुद्रस्यापि जटाकपालमुकुटं कौपीनखट्वां- गनाः ॥ विष्णोश्चक्रगदादिशंखमतुलं युद्धस्य रक्ताम्बरं । नग्नं पश्यत वादिनो जगदिदं जैनेन्द्रमुद्रांकितम् ।। १२ ॥ नाहंकारवशीकृतेन मनसा न द्वेपिणा केवलं । नैरात्म्य प्रतिपद्य नश्यति जने कारुण्यबुद्धथा मया ।। राज्ञः श्रीहिमशीतलस्य सदसि प्रायो विदग्धात्मनो । बौद्धौघान्सकलान् विजित्य स घटः पादेन विस्फालितः ॥ १३ ॥ खटवांगं नैव हस्ते न च हृदि रचिता लम्बते मुंडमाला । भसांगं नैव शूलं न च गिरिदुहिता नैव हस्ते कपालं । चन्द्रा नैव मूर्धन्यपि वपगमनं नैव कठे फणीन्द्रः । त वन्दे त्यक्तदोषं भवभयमथनं चेश्वरं देवदेवं ॥ १४ ॥किंवाद्यो भगवान- मेयमहिमा देवोऽकलंकः कलौ । काले यो जनतासुधर्मनिहितो देवोऽ- कलंको जिनः ।। यस्य स्फारविवेकमुद्रलहरीजाले प्रमेयाकुला । निर्ममा तनुतेतरां भगवती तारा शिरःकम्पनम् ॥ १५ ॥ सा तारा खलु देवता भगवतीमन्यापिमन्यामहे । षण्मासावधिजाब्यसांख्यभगवद्भट्टाकलकप्रभोः। [५५] वाककल्लोलपरम्परामिरमते नूनं मनोमजन- । व्यापार सहते स विस्मित- मतिः सन्ताडितेतस्ततः॥ १६ ॥ ॥ इति श्रीअकलङ्कस्तोत्रम् समाप्तम् ॥ मंगलाष्टकम् श्रीमन्नमसुरासुरेन्द्रमुकुटप्रद्योतरलप्रभा । भाखत्पादनखेन्दवः प्रवच- नांमोघींदवः स्थायिनः ॥ ये सर्वे जिनसिद्धसूर्यनुगतास्ते पाठकाः साधवः स्तुत्या योगिजनश्च पश्चगुरवः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥१॥ सम्यग्दर्शन- वोंधवृत्तममलं रत्नत्रयं पावनं । मुक्तिश्रीनगराधिनाथजिनपत्युक्तोऽपवर्ग: प्रदः ॥ धर्मः सूक्तिसुधा च चैत्यमखिलं चैत्यालय शृयालयं । प्रोच त्रिविधं चतुर्विधममी कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ २ ॥ नामेयादिजिनाधिपा- त्रिभुवनख्याताश्चतुर्विंशतिः । श्रीमन्तो भरतेश्वरप्रभृतयो ये चक्रिणो द्वा- दश ।। ये विष्णुप्रतिविष्णुलांगलधराः सप्तोत्तरा विंशतिः । स्त्रकाल्ये प्रथि तास्त्रिपष्टिपुरुषाः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ३ ॥ देव्योऽष्टौ च जयादिका द्विगुणिता विद्यादिका देवताः । श्रीतीर्थङ्करमातृकाश्च जनका यक्षाश्च य- त्यस्तथा ।। द्वात्रिंशत्रिदशाधिपास्तिथिसुरा दिक्कन्यकाश्चाष्टधाः । दिक्पाला दश चेत्यमी सुरगणाः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ४॥ये सर्वोपद्धयः तु- तपसो वृद्धि गताः पञ्च ये । ये चाष्टांगमहानिमित्तकुशला येऽष्टा विधा- वारणाः ॥ पञ्चज्ञानधास्त्रयोऽपि बलिनो ये वुद्धिऋद्धीश्वराः । सप्तैते मकलाचिंता गणभृतः कुर्वन्तु ते मगलम् ।। ५ ॥ कैलासे वृपमस्य निर्वृति- मही वीरस्य पाचापुरे | चम्पायां वसुपूज्यसज्जिनपतेः सम्मेदशैलेऽहं- ताम् ।। शेषाणामपि चोर्जयन्तशिखरे नेमीश्वरस्थाईतो । निर्वाणावनयः प्रसि- [५६].

द्धविभवाः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ६ ॥ ज्योतिय॑न्तरभावनामरगृहे मेरौ कुलाद्री तथा । वृशाल्मलिचैशाखिषु तथा वक्षारूप्याद्रिपु । इष्वाकार- गिरौ च कुंडलनगे द्वीपे च नन्दीश्वरे शैले ये मनुजोत्तरे जिनगृहा: कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ७॥ यो गर्भावतरोत्सवो भगवतां जन्माभिषेकोत्स- वो यो जातः परिनिष्क्रमेण विभवों यः केवलज्ञानभाक । यः कैवल्यपुर- प्रवेशमहिमा संभाविनः स्वर्गिमिः कल्याणानि च तानि पच सततं कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥८॥ इत्थं श्रीजिनमंगलाष्टकमिदं सौभाग्यसम्पत्पदं कल्याणेषु महोत्सवेषु सुधियस्तीर्थराणामुपः । ये शृण्वन्ति पठति तैश्च सुजनधर्मार्थकामान्विता लक्ष्मीराश्रयते व्यपायरहिता निर्वाणलक्ष्मीरपि ॥ ९ ॥ इति मंगलाष्टकम् । महावीराष्टकस्तोत्रम् [शिखरिणी] यदीये चैतन्ये मुकुर इव भावाश्चिदचितः । सम भांति धौव्यव्यय- जनिलसंतोतरहिताः ॥ जगत्साक्षी मार्गप्रकटनपरो भानुरिव यो । महा- वीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे (नः)॥ १ ॥ अतानं यच्चक्षुः कमल- युगलं स्पंदरहितं । जनान्कोपापायं प्रकटयति वाभ्यंतरमपि ।। स्फुटं मू- तिर्यस्य प्रशमितमयी वातिविमला | महावीर० ॥२॥ नमन्नाकेद्राली- मुकुटमणिभाजालजटिलं । लसत्पादाभोजद्वयमिह यदीयं तनुभृतां ॥ भव- ज्वालाशात्यै प्रभवति जलं वा स्मृतमपि । महावीर० ॥ ३ ॥ यदर्चामा- वेन प्रमुदितमना दर्दुर इह । क्षणादासीत्खर्गी गुणगणसमृद्धः सुखनिधिः। लभंते सद्भक्ताः शिवसुखसमाज किमु तदा । महावीर ॥ ४ ॥ कनत्व-

र्णाभासोऽप्यपगततनुर्ज्ञाननिवहो । विचित्रात्माप्येको नृपतिवरसिद्धार्थ-
तनयः।। अजन्मापि श्रीमान् विगतभवरागोद्भुतगतिः । महावीर० ॥५॥
यदीया वाग्गङ्गा विविधनयकल्लोलविमला । बृहज्ज्ञानांभोमिर्जगति जनता
या स्पयति ॥ इदानीमप्येपा बुधजनमरालैः परिचिता। महावीर०
॥ ६ ।। अनिरोद्रेकस्त्रिभुवनजयी कामसुभटः । कुमारावस्थायामपि नि-
जबलायेन विजितः ॥ स्फुरन्नित्यानंदप्रशमपदराज्याय स जिनः । महा-
वीर० ॥७॥ महामोहातकप्रशमनपराकसिकभिषग। निरापेक्षो बंधुर्वि-
दितमहिमा मङ्गलकरः ॥ शरण्यः साधूनां भवभयभृतामुत्तमगुणो । महा-
वीर० ॥८॥ महावीराष्टकं स्तोत्र भक्त्या भागेन्दुना कृतं । यः पठेच्छ-
गुयाचापि स याति परमां गतिम् ॥९॥
॥ इति ॥
#
अथ नमस्कारमन्त्रा:
णमो अरहंताणं । णमो सिद्धाणं । णमो आइरियाणं । णमो उवज्झा-
याणं । णमो लोए सव्वसाहूणं ।। १॥ मन्त्र संसारसारं त्रिजगदनुपम
सर्वपापारिमन्त्रं । संसारोच्छेदमन्त्रं मविपहरं कर्मनिर्मूलमन्त्रम् ॥ मन्त्र
सिद्धिप्रदानं शिवसुखजननं केवलज्ञानमन्त्रं । मन्त्रं श्रीजैनमन्त्र जप जप
नपितं जन्मनिर्वाणमन्त्रम् ॥ २॥ आकृष्टिं सुरसंपदां विदधते मुक्तिश्रियो
वश्यता- । मुच्चाट विपदां चतुर्गति भुवां विद्वेषमात्मैनशाम् ।। स्तम्भं दुर्ग-
मन प्रति प्रयततो मोहस्य संमोहन । पायात्पञ्चनमस्क्रियाक्षरमयी साराधना
देवता ॥ ३ ॥ अनन्तानन्तसंसारसन्ततिच्छेदकारणम् । जिनराजपदा-
म्भोजस्सरणं शरणं मम ।। ४ । अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।
तस्मात्कारुण्यभावेन रक्ष रक्ष जिनेश्वर ॥ ५॥ न हि त्राता न हि त्राता
न हि त्राता जगत्त्रये । वीतरागात्परो देवो न भूतो न भविष्यति ॥६॥
जिने भक्तिर्जिने भक्तिर्जिने भक्तिदिने दिने । सदा मेऽस्तु सदा मेऽस्तु
सदा येऽस्तु भवे भवे ॥७॥

कौन कौनसी भक्ति कहां कहां करनी चाहिये? देववदना गुरुवदना स्वाध्याय आदि कायों के करनेमें कौन कौनसी भक्ति करनी चाहिये, इसका वर्णन इस प्रकार है: जिनेन्द्र वंदन सर्वव्यासंग निर्मुक्तः संशुद्धकरणत्रयः । धौतहस्तपदद्वन्द्वः परमानन्द मन्दिरम् ॥ १॥ चत्य चैत्यालयादीनां स्तवनादौ कृतोद्यमः । भवेदनन्तसंसारसन्तानोच्छित्तये यतिः ॥ २ ॥ अर्थ---जिन्होने अन्य समस्त कार्य और चिंताओंका त्याग कर दिया है जिनके मन वचन काय तीनों शुद्ध हैं और जिन्होंने दोनो हाथ तथा दोनों पैर धोकर शुद्ध कर लिये हैं ऐसे मुनियों को बड़े आनदके साथ चैत्य अथवा चैत्या- लय आदि की स्तुति वदना आदि करनेके लिये प्रयत्न करना चाहिये । जो मुनि- राज इस प्रकार स्तुति वदना करते हैं उनकी अनंत ससारकी परंपरा अथवा जन्ममरणरूप सतति बहुत शीघ्र नष्ट हो जाती है। यथा निश्चेतनाश्चिन्तामणिकल्पमहीरुहाः। कृत पुण्यानुसारेण तदभीष्टफलप्रदाः ॥ ३ ॥ तथाईदादयश्चास्तरागद्वेषप्रवृत्तयः ।। भक्तभक्त्यनुसारेण स्वर्गमोक्षफलप्रदाः॥४॥ अर्थ--जिसप्रकार चिन्तामणिरत्न तथा कल्पवृक्ष आदि अचेतन हैं तो भी पुण्यवान् पुरुषोको उनके पुण्योदयके अनुसार अनेक प्रकारके इच्छानुसार फल देते हैं । उसी प्रकार भगवान् अरहंत देव वा सिद्ध भगवान् यद्यपि राग द्वेष रहित हैं तथापि वे भक्त पुरुषोको उनकी भक्तिके अनुसार स्वर्ग और मोक्षके अनु- पम फल देते है। [५] भगवान् जिनेन्द्रदेवकी गराय हारिणी मुद्रा गरुडस्य यथा तथा। जिनस्याप्येनसो हंत्री दुरिताराति पातिनः ॥ ५ ॥ सुमनः संगमादंगतीह सूत्र पवित्रताम् । पिष्टः प्रकृष्टमाधुर्य प्रकृष्टेचुरसाद्यथा ॥६॥ चंपापावादिनिर्वाण क्षेत्रादीनि पवित्रताम् । वंद्यतां च वजन्त्येव वन्धसंगपतस्तथा ॥ ७ ॥ अर्थ--जिस प्रकार गारुडी मुद्रा (गरुड की मुद्रा) विपको दूर कर देती है उसी प्रकार पापरूपी शत्रुओंको नाश करनेवाले मुद्रा वा मूर्ति मी भव्य जीवोके समस्त पापोको दूर कर देती है । जिस प्रकार इस संसारमें पुष्पोंके संवधसे सूत भी ( मालामें लगा हुआ सृत वा डोरी) पवित्र हो जाता है, अथवा जिस प्रकार उत्तम इक्षुरसके सबंधसे आटा भी अत्यत मीठा हो जाता है उसी प्रकार अत्यत वदनीय ऐसे तीर्थंकर अथवा अन्य मोक्षगामी पुरुषों के संबंधसे चपापुर, पावापुर आदि निर्वाणभूमिया मी अत्यत पवित्र और वदनीय हो जाती हैं। मत्वेति जिनगेहादि त्रिःपरीत्य कृतांजलिः । प्रकुर्नस्तच्चतुर्दिक्षु सध्यावर्ता शिरोनतिम् ॥८॥ घोरसंसार गंभीर वारिराशौ निमजताम् । दत्तहस्तावलम्बस्य जिनस्यार्चार्थमाविशेत् ।। ९ ॥ अर्थ-यही समझकर जिनमन्दिर जिनप्रतिमा व निर्वाण क्षेत्र आदिकी तीन प्रदक्षिणा देनी चाहिये, हाथ जोडना चाहिये, उन जिन मंदिर वा जिन प्रतिमाके चारों ओर तीन तीन आवर्त करने चाहिये प्रत्येक दिशाकी ओर उनके लिये शिरोनति करना चाहिये। इस प्रकार उनके लिये चारों ओरसे बारह आवर्त और चार नमस्कार करने चाहिये । तदनतर भयकर व गमीर ऐसे मसार रूपी समुद्रमें डूबते हुए प्राणियोंको बचानेके लिये हस्तावलवन (हाथका सहारा ) देनेवाले ऐसे भगवान् जिनेन्द्र- देवकी पूजा करनेके लिये मदिर में प्रवेश करना चाहिये। मदिरमें प्रवेश करते समय "णिसही णिसही" कहना चाहिये। भगवानके [६] समीप पहुंचकर "पडिकम्मामि भत्त इरिया वहियस्स" इत्यादि ईय पथ प्रतिक- मणकी विधि करना चाहिये । तदनतर "इच्छामि भते आलोचं ईरिया वहियस्य" इत्यादि ईर्यापथ आलोचना पाठ बोलना चाहिये। फिर चैत्यभक्ति और पञ्चगुरु भक्ति बोलनी चाहिये । इस प्रकार जिनप्रतिमा वदन विधि करनी चाहिये । सो ही लिखा है। देवनास्तवने भक्ती चत्यपंचगुरूभयोः ॥ अर्थात्--जिन प्रतिमा वदनके समय चैत्यभक्ति और पचगुरुभक्ति करनी चाहिये। आचार्यवंदनविधि लग्न्या सिद्धगणिस्तुत्या गणी वद्यो गवासनात् । सैद्धान्तोऽन्त श्रुतस्तुत्या तथान्यस्तन्नुति विना ॥ १० ॥ अर्थ-आचार्यकी वदना करते समय मुनियोको गवासनसे बैठकर लघुसिद्ध भक्ति और लघुआचार्यभक्ति पढ़कर बंदना करनी चाहिये । यदि आचार्य सिद्धातशास्त्रके जानकार हों तो उनकी वढना करनेके पहले लघुसिद्धभक्ति, लघु श्रुतभक्ति और लघु आचार्य भक्ति पढ़नी चाहिये । आचार्यको छोड़कर अन्य मुनियोकी वदना करते समय मुनियोको लघुसिद्धभक्ति पढकर वंदना करनी चाहिये । यदि वे मुनि सिद्धातके जानकार हो तो सिद्धभक्ति और लघुश्रुतभक्ति दोनों पढ़कर बदना करनी चाहिये। स्वाध्याय करते समय कौनसी भक्ति करनी चाहिये। स्वाध्याय लघुभक्त्या नं श्रुतसूर्योरहनिशे । पूर्वेऽपरेऽपि चाराध्य श्रुतस्यैव क्षमापयेत् ।। ११ ॥ अर्थ-लघुश्रुतभक्ति और लघुश्राचार्यभक्ति पढ़कर स्वाध्यायका प्रारंभ करना चाहिये और लघुश्रुतभक्ति पढ़कर स्वाध्यायको समाप्त करना चाहिये । आगे--प्रात्याख्यान व उपवास ग्रहण करते समय अथवा छोडते समय कौनसी भक्ति पढ़नी चाहिये इसी बातको अन्धकार कहते हैं। हेयं लच्या सिद्धभक्त्याशनादौ । प्रत्याख्यानाद्याशु चादेयमन्ते ।। [११] M सूरौ तादृग्योगिभक्त्याया तद् ग्राह्य वन्यः सूरिभक्त्या सलध्व्या ॥ १२ ॥ अर्थ-यदि पहले दिन उपवास अथवा प्रत्याख्यान ग्रहण किया हो जो दूसरे दिन आहरिके समय लघुसिद्धभक्ति पढकर उसका त्याग करना चाहिये। आहार समाप्त होनेपर लघुसिद्ध भक्ति पढ़कर दूसरे अगले दिनके लिये प्रत्याख्यान अथवा उपवाम ग्रहण करना चाहिये । यह विधि आचार्यके समीप न रहनेपर आहारके आदि व अन्तमें करनी चाहिये। यदि आचार्य समीप ही हों तो आहार के लिये जानेके पहले आचार्यके समीप लघु योगिभक्ति और लघुसिद्धभक्ति पद कर प्रत्याख्यान व उपवास का त्याग करना चाहिये। तथा आहारग्रहणकर आने के वाद आचार्यके समीप लघुयोगिभक्ति और लघुसिद्धभक्ति पढकर प्रत्याख्यान अथवा उपवासकी प्रतिज्ञा करनी चाहिये। तथा लघुआचार्यभक्ति पढकर उसी समय आचार्यकी वदना करनी चाहिये। चतुर्दशीके दिन कौनसी भक्ति करनी चाहिए। त्रिसमयवन्दने भक्तिद्वयमध्येश्रुतनुतिं चतुर्दश्याम् । पाहुस्तद्भक्तित्रय मुखान्तयोः केपि सिद्धशांतिनुती ॥ १३ ॥ अर्थ-चतुर्दशीके दिन त्रिकाल देवबदना करते समय चैत्य भक्ति. श्रुतभक्ति और पचगुरुभक्ति ये तीन भक्तिया पढ़नी चाहिये तथा किन्हीं भाचार्यका यह मत है कि त्रिकालबदना करते समय चतुर्दशीके दिन सिद्धभक्ति, चैत्यभक्ति, श्रुतभक्ति, पंचगुरुभक्ति और शातिभक्ति पढ़नी चाहिये । सोही लिखा है- सिद्ध चैत्ये श्रुते भक्तिस्तथा पंचगुरु स्तुतिः । शांतिभक्तिस्तथा कार्याचतुर्दश्यामिति क्रिया । अर्थ-चतुर्दशीके दिन देववदनाके तीनो समय सिद्धभक्ति चैत्यभक्ति, श्रुतभक्ति पचगुरुभक्ति और शातिभक्ति पढनी चाहिये । यदि किसी कार्यविशेषसे चतुर्दशीके दिन यह क्रिया न हो सके तो पौर्णमा- सीके दिन अथवा अमावस्या के दिन यह क्रिया कर लेनी चाहिये । इसके लिये नीचे लिखे वचन है। [२] - चतुर्दशीदिनेधर्म व्यासंगादिना क्रियां कर्तुं । न लभ्येत चेत् पाक्षिकेऽष्टभ्यां क्रिया ॥ अर्थ---धर्म कार्यकी अधिकता होनेसे यदि चतुदशीके दिन चतुर्दशीकी किग न होसके तो फिर पौर्णमासी वा अमावास्याके दिन यह क्रिया कर लेनी चाहिये । सिद्भक्ति तथा चारित्रभक्ति और शातिभक्ति पढ़कर अष्टमीकी क्रिया की जाती है इसमें पाक्षिकी क्रियासे श्रुतभक्ति अधिक है । अष्टान्हिक पर्वके समय कौनसीभक्ति करनो चाहिये। कुर्वन्तु सिद्धनंदीश्वरगुरुशातिस्तवैः क्रियामष्टौ। शुच्यूर्जतपस्यसिताष्टम्यादिदिनानि मध्यान्हे ॥ १४ ॥ अर्थ--आपाद, कातिक और फाल्गुन महीनेकी शुक्लपक्षकी अष्टमीसे लेकर पौर्णमासी पर्यंत पाठदिन तक नदीश्वरपर्व कहलाता है । उससमय सिद्धभक्ति, नदी- श्वरभक्ति तथापचगुरुभक्ति करनी चाहिये । और सब सघको मिलकर करनी चाहिये। सिद्धप्रतिमा तीर्थकरजन्म व अपूर्व जिन प्रतिमादर्शन के समय कौनसी भक्ति करनी चाहिये। सिद्धभक्त्यैकया सिद्धप्रतिमाया क्रिया मता। तीर्थजन्मनि जिनप्रतिमायां च पाक्षिकी ॥ १५ ॥ अर्थ--सिद्ध प्रतिमाके सामने एक सिद्धभक्ति ही पढ़नी चाहिये । तीर्थकरके जन्मके दिन तथा जिनप्रतिमाके सामने चैत्यभक्ति, श्रुतभक्ति और पचगुरु भक्तिया पढनी चाहिये, अर्थात् चतुदशीके दिन जो भक्तिया पढ़ी जाती हैं वे ही भक्ति तीर्थकरके जन्मदिन और जिनप्रतिमाके सामने पढनी चाहिये । अपूर्व चैत्य वन्दना और नित्यवन्दनाका संयोग यदि अष्टमी वा चतुर्दशीके दिन हुआ तो कौनसी भक्ति पढ़नी चाहिये। दर्शनपूजाविसमयवन्दनयोगोऽष्टमीक्रियादिषु चेत् प्राक्तहि शान्तिभक्तः प्रयोजयेच्चैत्यपंचगुरुभक्ता ॥ १६ ।। [६३ ] अर्थ-~-यदि अष्टमी चतुर्दशीकी क्रिया के समय अपूर्व चैख वंदना व त्रिकाल नित्य वंदनाको सयोग आया हो तो पहले चैत्यभक्ति और गुरुभक्ति करनी चाहिये और फिर अतमें शातिभक्ति करनी चाहिये। अभिषेक वन्दनाकी क्रियामें अनुक्रमसे कौन कौनसी भक्ति करनी चाहिये। अभिषेकवंदनायाः सिद्धचत्यपंचगुरुशांतिभक्तयः। अर्थ--अभिषेक बदनाकी क्रिया सिद्धभक्ति, चैत्यभक्ति पचगुरुभक्ति और शातिभक्ति पढनी चाहिये। स्थिरजिनवित्रप्रतिष्ठा व चलविवप्रतिष्टामें इन दोनों निंबोंके चतुर्थ महामि- षेककी क्रिया कौनसी भक्ति पढनी चाहिये। स्यात्सिद्धशांतिभक्तिः स्थिरचलजिनबिंबयोः प्रतिष्ठायां अभिषेकवंदनाचलतुर्यस्नानेऽस्तु पाक्षिकी त्वपरे ।। अर्थ-स्थिर वित्र प्रतिष्ठा तथा चलचित्र प्रतिष्ठाकी क्रियाओमें सिद्धभक्ति और शातिभक्ति पढ़नी चाहिये । चल जिन विंबके चौथे दिनकी अभिषेक क्रिया में सिद्धभक्ति चैत्यभक्ति पच महागुरुभक्ति और शातिभक्ति पढनी चाहिये। स्थिर जिनवित्र प्रतिष्ठाके चौथे दिनकी अभिषेककी क्रियामें सिद्धभक्ति चारित्रभक्ति वडी आलोचना और शातिभक्ति पढनी चाहिये। पंचकल्याणकको क्रियाओंमें कौनसी भक्तियां करनी चाहिये। आयतसिद्धशांतिस्तुतिजिनगर्भजनुपों स्तुयावृत्तम् । निष्क्रमणे योग्यन्तं विदि श्रुताद्यपि शिवे शिवान्तमपि ।। अर्थ--तीर्थकरोंके गर्भकल्याणक तथा जन्मकल्याणककी क्रियाओंके समयमें सिद्धभक्ति, चारित्रभक्ति और शातिभक्ति पढनी चाहिये।दीक्षा कल्याणक के समय सिद्धभक्ति, चारित्रभक्ति, योगिभक्ति और शतिभक्ति पढनी चाहिये। ६४1 ज्ञानकल्याणककी क्रियाओमें सिद्धभक्ति, श्रुतभक्ति, चारित्रभक्ति, योगिभक्ति और शातिभक्ति, पढ़नी चाहिये । निर्वाणकल्याणककी क्रियाओंके समय सिद्ध- भक्ति, श्रुतभक्ति, चारित्रभक्ति, योगिभक्ति, निर्वाणभक्ति, और शातिभक्ति पढ़नी चाहिये। श्री महावीर निर्वाणके दिन कौनसी भक्ति पढ़नी चाहिये । योगान्तेऽर्कोदये सिद्ध निर्वाण गुरशान्तयः । प्रणुत्या वीरनिर्वाणे कृत्यातो नित्यवन्दना । वर्षायोग समाप्त कर श्रोवर्द्धमान स्वामीके निर्वाणके दिन सूर्योदयके समय सिद्धभक्ति, निर्वाणभक्ति, पंचगुरुभक्ति और शाति भक्ति पढ़नी चाहिये। तदनतर नमस्कार कर नित्यवदना करनी चाहिये । ( यह क्रिया मुनि और श्रावक दोनों को करनी चाहिये ) मुनि और श्रावकोंको श्रुतपचमीकी क्रिया करते समय कौनसी भक्ति पदनी चाहिये। वृहत्या श्रुतपंचम्यां भक्त्या सिद्धश्रुतार्थया । श्रुतस्कन्धं प्रतिष्ठाप्य ग्रहीत्वा वाचतां वृहत् ।। क्षम्यो गृहीत्वा स्वाध्यायः कृत्या शांतिनुतिस्ततः । यमिनां गृहिणां सिद्धश्रुतशांतिस्तया पुनः ।। श्रुतपचमीके दिन बडी सिद्धभक्ति, बड़ी श्रुतभक्ति करनी चाहिये । फिर श्रुतस्कन्ध की स्थापना करनी चाहिये । तदनन्तर वृहत् वाचना स्वीकार करनी चाहिये अर्थात श्रुतावतार का वर्णन करना चाहिये। बडी श्रुतभक्ति और आचार्य भक्ति पढ़कर स्वाध्याय करना चाहिये फिर श्रुतभक्ति पढ़कर स्वाध्याय पूर्ण करना चाहिये फिर अन्तमें शातिभक्ति पढ़कर श्रुतपचमीकी क्रिया पूर्ण करनी चाहिये यह श्रुतपचमीकी क्रिया ज्येष्ठ शुक्ला ५पीके दिन मुनि और श्रावक दोनोंको करनी चाहिये । श्रावकोंको इस क्रियाके करते समय सिद्धभक्ति, श्रतभक्ति और शांति भक्ति करनी चाहिये। सिद्धांतवाचनाग्रहणे सिद्धश्रुतभक्ती कृत्वा तदनु श्रुताचार्यभक्ती [६५] सिद्धांत वाचनेकी क्रियामें कौनसी भक्ति पढ़नी चाहिये। सिद्धांतवाचनाग्रहणे सिद्धश्रुतभक्ती कृत्वा तदनु श्रुताचार्यभक्ती कृत्वा गृहीतस्वाध्यायः तन्निष्ठापने श्रुतशान्तिभक्ती करोतु । सिद्धान्तस्या- र्थाधिकाराणां समाप्तावेकैकं कायोत्सर्ग कुर्यात् । अर्थाधिकाराणां सुबहुमा- न्यत्वात् तेषामादौ सिद्धश्रुतमरिभक्तीः कृत्वा समाप्तावप्येतेन क्रमेण प्रव- तिते सति षटकायोत्सर्गाः भवन्ति ।। अर्थ-सिद्धात वाचनाकी क्रियाको करते समय सबसे पहले सिद्धभक्ति और श्रुत्तभक्ति पढनी चाहिये । तदनतर श्रुतभक्ति और आचार्य भक्ति पढ़नी चाहिये। फिर स्वाध्याय करनेवाले मुनियों को सिद्धातके वाचनेका प्रारंभ करना चाहिये । तथा सिद्धात वाचनेके समाप्त हो जानेपर श्रुतभक्ति और शातिभक्ति पढनी चाहिये। सिद्धानोंमें जो अधिकार है वे अत्यन्त मान्य हैं इसलिये उनके प्रारंभमें सिद्धभकित, श्रुतभक्ति और आचार्यभक्ति करनी चाहिये तथा उन अधिकारों के समाप्त होने पर भी सिद्धभक्ति, श्रुतभक्ति और आचार्यभक्ति करनी चाहिये। तथा छह कायोत्सर्ग करने चाहिये । सन्यास मरणको क्रियामें कौनसी भक्ति पढ़नी चाहिये संन्यासस्य क्रियादौ सा शांतिभक्त्या विना सह ।। अन्तेऽन्यदा वृहद्भक्त्या स्वाध्यायस्थापनोन्मने । योगेपि ज्ञेयं तत्रात्तखाध्यायैः प्रतिचारकैः ।। स्वाध्यायाग्राहिणां प्राग्वत् तदाद्यन्तदिने क्रिया ।। अर्थ-श्रुतपचमी क्रियामें जो विधि कही है उसमेंसे शातिभक्तिको छोड़ कर शेष विधि सन्यासक्रिया में करनी चाहिये । जैसे श्रुतपचमीक्रियामें श्रुतपंचमी की स्थापना की जाती है उसी प्रकार सन्यासकी स्थापना करना चाहिये । सन्या- सकी स्थापनाके प्रारंभमें सिर्भाक्त और श्रुतभक्ति पढनी चाहिये । सन्यास धारण करनेवाले मुनिके खर्गवास होनेपर शातिभक्ति पढनी चाहिये । जिम [६६1 दिन सन्यासकी स्थापना की जाती है । उसके दूसरे दिन स्वाध्याय की स्थपना करनी चाहिये । स्वाध्यायकी स्थापना करते समय बड़ी श्रुतभक्ति और प्राचार्य- भक्ति पढ़नी चाहिये । इस प्रकार स्वाध्यायकी स्थापना करनी चाहिये । जिस दिन सन्यास धारण करनेवाले मुनिके स्वर्गवासकी संभावना हो उससे एक दिन पहले स्वाध्यायकी समाप्ति बड़ी श्रुतभक्ति पढ़कर करनी चाहिये । जिसने सन्यास धारण करनेवाले मुनिके समीप स्वाध्याय प्रारभ किया हो और उसने यदि दूसरे स्थानपर रात्रियोग अथवा वर्षायोग ग्रहण कर लिया हो तो भी उसको सन्यास- धारण करनेवाले मुनिकी वसतिकामें ही सोना चाहिये। गृहस्थोको सन्यासके आरंभके दिन तथा समाप्तिके दिन सिद्धभक्ति, श्रुतभक्ति तथा शातिभक्ति पदनी चाहिये। वर्षायोगके ग्रहण करते समय तथा छोड़ते समय कौनसी भक्ति करनी चाहिये। ततश्चतुर्दशीपूर्वरात्रे सिद्धमुनिस्तुती । चतुर्दिनु परीत्याल्पाश्चैत्यभक्तिगुरुस्तुतिम् ।। शांतिभक्ति च कुर्वाणैर्वर्षायोगस्तु गृह्यताम् ।। ऊर्जकृष्णचतुर्दश्यां पश्चाद्रात्रौ च मुच्यताम् । अर्थ--आचार्य आदि मुनिराजोंको वर्षायोग धारण करना चाहिये। उसकी विधि इस प्रकार है । आषाढ शुक्ला चतुर्दशीकी रात्रिके पहले पहरमें लघु- सिद्धभक्ति, लघुयोगिभक्ति और लघुचैत्यभक्ति पढनी चाहिये । चारों दिशाभोंकी प्रदक्षिणा देनी चाहिये तथा योग तन्दुलक्षेपण करने चाहिये। चारों दिशाओकी प्रदक्षिणा देनेका अर्थ यह है कि एक स्थानपर खडे होकर "मै प्रदक्षिणा करता हूँ" ऐसी कल्पना करनी चाहिये। पहले पूर्वदिशा की प्रदक्षिणा देनी चाहिये और उस समय 'यावति जिन चैत्यानि' इत्यादि श्लोक पढ़कर स्वयभू स्तोत्रके पहली दो स्तुतिया पढनी चाहिये । अचलिकोसहित चैत्यभक्ति पढ़नी चाहिये और इसी प्रकार शेष तीनो दिशाओं में भी प्रदक्षिणा देनी चाहिये तथा उस समय भागेके दो दो तीर्थकरोंकी स्तुतिया पदनी चाहिये। तदनंतर पचगुरुभक्ति व [६७] शति .कि पढकर वर्षायोग स्वीकार करना चाहिये । यह ग्रहण करने की विधि है । कार्तिक कृष्णा चतुर्दर्शी के दिन ऊपर लिखी पूर्ण विधि करके वर्षायोगकी समाप्ति करनी चाहिये। आचार्यपद ग्रहण करते समय कौनसी भक्ति करनी चाहिये। सिद्धाचार्यस्तुती कृत्वा सुलग्ने गुर्वनुज्ञया ।। लात्याचार्यपदं शांतिस्तुयात्साधुः स्फुरद्गुणः ।। अर्थ-जो अपने उत्तम गुणोंसे समस्त सघको मान्य होता है जिसमें छत्तीस गुण दैदीप्यमान होते हैं वही अंको मुनि प्राचार्य पद ग्रहण करने योग्य होता है। जिस समय उस श्रेष्ठ मुनिको आचार्य पद दिया जाता है उस समय पहलेके आचार्य समस्त मुनि संघके सामने उस श्रेष्ठ मुनिको आचार्य पदको सूचित करनेवाली एक पीछी देते हैं और कहते हैं कि आजसे तू रहस्य शास्त्रों के (प्राय- श्चित्त आदि शास्त्रों का अध्ययन करने तथा दीक्षा देने आदि आचायों के करने योग्य कार्योंके योग्य होगया है। उस समय प्राचार्यपद ग्रहण करनेके लिये तैयार हुये इस मुनिको शुभलग्नमें सबसे पहले सिद्धभक्ति और आचार्यभक्ति पढ़कर आचार्यपद ग्रहण करना चाहिये और फिर शातिभक्ति पढ़नी चाहिये । प्रतिमायोग धारण करनेवाले मुनिको वेदना करते समय कौनसी भक्ति पढ़नी चाहिये। लघीपसोऽपि प्रतिमायोगिनो योगिनः क्रियाम् ॥ कुर्युः सर्वेऽपि सिद्भपिशांतिभक्तिभिरादरात् ।। अर्थ-जिसको दीक्षा लेकर बहुत दिन नहीं हुये है अर्थात् जो थोडे दिनका ही दीक्षित है ऐसा मुनि मी यदि प्रतिमायोग धारण करे तो समस्त मुनियोंको आदरपूर्वक उसके सामने सिद्ध भक्ति ऋपिभक्ति पढनी चाहिये । इसप्रकार उनकी वदना करनी चाहिये।

दीक्षा ग्रहण करते समय जो लोच किया जाता है उस समय की विधिमें कौनसी भक्ति करनी चाहिये। सिद्धयोगिबृहद्भक्तिपूर्वक लिङ्गमर्प्यताम् । लुश्चाख्यानाग्न्यपिच्छात्मक्षम्यतां सिद्धभक्तितः॥ अर्थ--दीक्षाग्रह ए करनेके समय बड़ी सिद्ध क्ति और योगिभक्ति पदकर दीक्षा ग्रहण करनी चाहिये । केश लोच करना, दीक्षाका नाम धारण करना, नग्ना- वस्था धारण करना और पीछी धारण करना आदि कार्योको दीक्षा कहते हैं। दीक्षा ग्रहण करनेके अनन्तर सिद्धभक्त पढ़नी चाहिये। दीक्षाके सिवाय अन्य समयमें लोच करते समय कौनसी भक्ति पढ़नी चाहिये। लोचो द्वित्रिचतुर्यासैर्वरो मध्योऽधपः क्रमात् । लघुप्राग्भक्तिभिः कार्यः सोपवासप्रतिक्रमः ॥ अर्थ-दो महीना बाद लोच करना उत्तम है तीन महीना बाद करना मध्यम है और चार महीना बाद करना जघन्य है । लोच करते समय लघुसिद्ध- भक्ति और लघुयोगिभक्ति पढ़नी चाहिये । लोच समाप्त होने पर लघुसिदभक्ति पदनी चाहिये । लोचके दिन उपवास और प्रतिक्रमण करना चाहिये। आगे प्रतिक्रमण रात्रियोग धारण करने व छोड़ने में कौनसी भक्ति पढ़नी चाहिये। भक्त्या सिद्धप्रतिक्रांतिवीरद्विादशाहताम् । प्रतिकामेन्मलं योग योगिभक्त्या भजेत् त्यजेत् ।। अर्थ--प्रतिक्रमणकी विधि करते समय सिद्धभक्ति, प्रतिक्रमण भक्ति वीर- भक्ति, चतुर्विंशतितीर्थङ्करभक्ति पढकर अतीचारोकी शुद्धि करनी चाहिये । योगि- भक्ति पढ़कर रात्रियोग धारण करना चाहिये। तथा योगिभक्ति पदकर ही रात्रि- योगका त्याग करना चाहिये। .

आगे देववदना करते समय कोई दोष उत्पन्न हुये हो अथवा रागादिक दोष उत्पन्न हुये हों तो ऊनको दूर करने के लिये समाधिभक्ति करनी चाहिये। लिखा भी है। ऊनाधिक्यविशुद्धयर्थं सर्वत्र प्रियभक्तिकाः॥ अर्थ-इन समस्त क्रियाओंमें यदि न्यूनाधिकता हुई हो तो उसके ढोषको दूर करेनके लिये समाधिभक्ति पढ़नी चाहिये। जिसने समाधिमरणधारण किया है उस मुनिके शरीरकी तथा उसके निषधिका- स्थानकी क्रिया करते समय कौनसी भक्ति पढ़नी चाहिये सो दिखलाते हैं। सामान्यौ मृतेशरीरस्य निपघकास्थानस्य वा सिद्धयोगिशांतिभक्तयः। सिद्वांतवेदिनां साधूनां सिद्धश्रुतयोगशांतिभक्तयः । उत्तग्योगिनां सिद्धचा- स्त्रियोगिशांतिभक्तयः। सैद्वान्तोत्तग्योगिनां सिद्धचारित्रयोगशांतिभक्तयः। आचार्यस्य सिद्धयोगाचार्यशांतिभक्तयः । सैद्धांनाचार्यस्य सिद्धश्रुतयेगा- चार्यशांतिभक्तयः । उत्तग्योगिनामाचार्याणां सिद्धचारित्रयोगाचार्यशांति- भक्तयः । उत्तरयोगिनः सैद्धांताचार्यस्य सिद्धश्रुतयोगाचार्यशांतिभक्तयः। अनंतरोक्ता अष्टौ क्रियाः शरीरस्य निषधास्थानस्य च ॥ अर्थ--सामान्य ऋषिके वर्गवास होनेपर उनके शरीरकी तथा निषद्या- स्थानकी क्रिया करते समय सिद्धभक्ति, योगे .क्ति और शातिभक्ति पढ़नी चाहिये। यदि सिद्धातके जानकार साधुका स्वर्गवास हो तो सिद्धभक्ति, श्रुतभक्ति, योगिभक्ति, शानिभक्ति पढ़नी चाहिये । यदि उत्तरगुणोंको धारण करने वाले साधुका स्वर्ग- वास हुआ हो तो उनके शरीर वा निषद्यास्थानकी क्रिया करते समय सिद्धभक्ति, चारित्रभक्ति, योगिभक्ति, शातिभक्ति पढ़नी चाहिये । यदि उत्तरगुणोंको पालन करनेवाले मुनि सिद्धानके भी जानकार हों तो उनके स्वर्गवास होनेपर उनके शरीर और निषद्यका स्थानकी क्रिया करते समय सिद्धभक्ति, चारित्रभक्ति योगि- भक्ति, शातिभक्ति पढ़नी चाहिये । आचार्यके स्वर्गवास होनेपर सिद्धभक्ति, आचार्य शातिभक्ति पढ़नी चाहिये । यदि आचार्य सिद्धात के जानकार हों तो उनके स्व- र्गवास होनेपर उनके शरीर निपद्यास्थान की क्रिया करते समय सिद्धभक्ति, श्रुत- भक्ति, योगिभक्ति, प्राचार्यभक्ति और शातिभक्ति पढ़नी चाहिये । यदि प्राचार्य (1001

उत्तर गुणोंको पालन करनेवाले हों तो उनके स्वर्गवास होनेपर उनके शरीर
और निपद्यास्थानकी क्रिया करते समय सिद्वभक्ति चारित्रभक्ति भाचार्यभक्ति
और शातिभक्ति पढ़नी चाहिये । यदि आचार्य उत्तर गुणोंके पालन करनेवाले
हो और सिद्धातके भी जानकार हो तो उनके स्वर्गवास होनेपर उनके शरीर
और निषद्या स्थानकी क्रिया करते समय सिद्धभक्ति श्रुतभक्ति योगिभक्ति
आचार्यभक्ति शातिभक्ति पढ़नी चाहिये ।
ये आठ क्रियाएं उनको शरीर और निषधास्थानकी होती है ।
आगे पाक्षिक वा चातुर्मासिक भादि प्रतिक्रमणमें कौनसी भक्ति पढ़नी
चाहिये सो दिखलाते हैं।
पाक्षिकचातुर्मासिकसांवत्सरिकप्रतिक्रमणे सिद्धचारित्रप्रतिक्रमणानि-
ष्ठितकरणचतुर्विंशत्तितीर्थकरभक्तिचारित्रालोचनागुरुभक्तयो वृहदालोचन
गुरुभक्तिलघीयस्थाचार्यभक्त्तिश्च करणीयाः ॥
अर्थ-~-पाक्षिक चतुर्मासिक और वार्षिक प्रतिक्रमणमें सिद्धभक्ति तथा
प्रतिक्रमण वीरभक्ति चतुर्विशति तीर्थङ्करभक्ति चारित्रालोचना श्रुतभक्ति गुरु-
भक्तिवृहत्आलोचना गुरुभक्ति और लघुआचार्यभक्ति पढ़नी चाहिये।
कौन कौनसी भाक्ति कहां कहां करनी चाहिये
इसका स्पष्ट विवरण
कार्य
भक्ति
जिनप्रतिमावंदन
चैत्यभक्तिपंचगुरुभक्ति लघुसिद्धभक्ति लघु-
आचार्यवंदना (गवासनसे आचार्यभक्ति
सिद्धांतवेत्ता आचार्यकी वंदना- सिद्धभक्ति, श्रुतभक्ति, प्राचार्यभक्ति
साधारण मुनियोंकी वंदना सिद्धभक्ति
सिद्धांतवेचा मुनियोंकी वंदना- सिद्धभक्ति, भूतभक्ति
[७१]

-- खाध्यायका प्रारंभ-- लघुश्रुतभक्ति आचार्यमक्ति स्वाध्यायकी समाप्ति- लघुश्रुतभक्ति आचार्यकी अनुपस्थितिमें ) सिद्धभक्तिपढ़कर उसका त्याग वा माहार पहले दिन उपवास वा प्रत्या- के लिये गमन स्यान ग्रहण किया हो तो दूसरे दिन आहारके समय आहारकी समाप्तिपर अगले दिनके उपवासवा प्रत्याख्यान का सिद्धभक्ति । ग्रहण करने में आचार्य बदना आचार्यकी उपास्थतिमें आहार) लघुयोगिभक्ति, लघुसिद्भक्ति के लिये जानेके पहले आहारक अनंतर प्रत्याख्यान वा उप- लघुयोगिभक्ति लघुसिद्धभक्ति वासकी प्रतिज्ञाक लिये लघुभाचार्यभक्ति चतुर्दशीके दिन त्रिकाल वंदनाके लिये चैत्यभक्ति, श्रुतभक्ति, पचगुरु- भक्ति । अथवा सिद्धभक्ति, चैत्य- भक्ति, श्रुतभक्ति, पचगुरुभक्ति, शातिभक्ति नंदीश्वर पर्वमें सिद्धभक्ति नंदीश्वरभक्ति पंचगुरुभक्ति शातिभक्ति। सिद्धप्रतिमाके सामने सिद्धभक्ति तीर्थङ्करके जन्म दिन चैत्यभक्ति, श्रुतभक्ति पचगुरुभक्ति अथवा सिद्धभक्ति, चैत्यभक्ति श्रुत- भक्ति पचगुरुभक्ति, शातिभक्ति अष्टमी चतुर्दशीकी क्रिया अपूर्व ) चैत्वभक्ति पंचगुरुभक्ति, शाति चैत्यवंदना वा त्रिकाल नित्यवंदना भक्ति। के समय यदि चतुर्दशकी क्रिया चतुर्दशीके दिन न हो सके तो पूर्णिमा वा अमावास्याके टिन अष्टमीको किया करे अर्थात् सिद्ध, श्रुत, चारित्र और शातिमक्ति पढ़े। [७२] -- । अभिषेक वंदना- सिद्धभक्ति, चैत्यभक्ति पचगुरुभक्ति शातिभक्ति. स्थिरविवप्रतिष्ठा-- सिद्धभक्ति, शातिभक्ति चलविप्रतिष्ठा- सिद्धभक्ति, शातिभक्ति चल विप्रतिष्ठाके चतुर्थ सिद्धभक्ति चैत्यभक्तिपंचमहागुरुभक्ति अभिषेकमें शातिभक्ति। तीर्थङ्कगेंके गर्भजन्मकल्याणकमें- सिदभक्ति, चारित्रभक्ति, शातिभक्ति दीक्षाकल्याणक - सिद्भक्नि, चारित्रभक्ति, योगिक्ति, शातिभक्ति । ज्ञानकल्याणक- सिद्ध श्रुत, चारित्रयोगि शातिभक्ति । निर्वाणकल्याणक-- सिद्ध, श्रुत, चारित्र, योगि, निर्वाण और शातिभक्ति वीरनिर्वाण-सूर्योदयके समय सिद्भक्ति निर्वाण पचगुरु शातिभक्ति। श्रुतपंचमी वृद्ध सिद्धभक्ति, वृत्श्रुतभक्ति, श्रुत- स्कंधकी स्थापना, वृहत्वाचना वृहत श्रुत भक्ति, आचार्यभक्तिपूर्वक खाध्याय, श्रुत-भक्ति द्वारा स्वाध्यायकी पूर्णता अंतमें शांतिभक्ति कर क्रियाकी पूर्णता। श्रुतपंचमीके दिन गृहस्थोंको- सिदश्रुतशानिभक्ति । सिद्धांत वाचना सिद्धश्रुभक्ति द्वारा प्रारंभ श्रुतभक्ति आचार्यभक्ति कर वाचना अतमें श्रुत और शातिभक्ति । गृहस्थोंकों सन्यासके प्रारंभमें सिद्ध श्रुत, शातिभक्ति गृहस्थोंको सन्यामके अंतमें सिद्ध, श्रुत, शाति। वर्षायोगधारण करते समय सिद्ध, योगि, चैत्यभक्ति । वर्षायोग पारणकी प्रदक्षिणामें यावति जिन्दैत्यानि, स्वयंभूस्तोत्रकी स्तुति चैत्यभक्ति । । ७३] -- - वर्षायोग स्वीकार करते समय- गुरुभक्ति शातिभक्ति वर्षायोगकी समाप्तिमें- वर्षायागधारण करनेकी पूर्णविधि आचार्यपद ग्रहण करते समय सिद्ध. आचार्य, शातेभक्ति । प्रतिमायोग धारण करनेवाले मुनि । सिद्ध, य .गे, शातिभक्ति की वंदना करते समय दीक्षा ग्रहण करते समय वृहत्सिद्धभक्ति, योगिभक्ति दीक्षाके अन्तमें- सिद्ध भक्ति । केशलोंच करते समय- लघुरसेद्धभकिन, लघुयोगिभक्ति लोचके अंतमें- सिद्धभक्ति। प्रतिक्रमणमें सिद्ध, प्रतिक्रमण, वीरभक्ति, चतुर्विंशतितीर्थंकरभक्ति । रात्रियोग धारण- योगिभक्ति। रात्रियोगका त्याग योगिभक्ति । देववंदनामें दोप लगनेपर- समाधिभक्ति। सामान्य ऋपिके स्वर्गवाम होनेपर उनके शरीर और निपद्याकी क्रिया | सिद्ध, योगि, शातिभक्ति सिद्धांतवेत्ता साधुके स्वर्गवासमें सिद्ध, श्रुत, योगि, शातिभक्ति उत्तरगुणधारी सिद्धांतवेत्ता साधुके वर्गवासपर सिद्ध, चारित्र, योगि, शातिभक्ति आचार्यके वर्गवास होनेपर सिद्ध, श्रुतचारित्रयोगिशातिभक्ति सिद्धांतवेत्ता आचार्यके स्वर्गवास पर सिद्धयोगि, श्राचार्य, शातिभक्ति । उत्तरगुणधारी आचार्यके वर्गवासपर सिद्धश्रुतयोगिआचार्य शातिभक्ति । उत्तरगुणधारी सिद्धांतवेचा सिद्धचारित्रयोगि आचार्यशातिभक्ति । आचार्यके स्वर्गवास पर सिद्ध, श्रुत, योगि, श्राचार्य, शातिभक्ति । पातिक प्रतिक्रमणम- सिद्ध, चारित्र, प्रतिक्रमण वीरभक्तिचतु- विंशतिभक्ति, चारित्रालोचना गुरुभक्ति वृदालोचनागुरुभक्ति लघुआचार्यभक्ति चतुर्मासिक प्रतिक्रमणमें वार्षिक प्रतिक्रमणमें [७] श्रीपूज्यापादाद्याचार्यविरचित:- श्रीदशभक्त्यादिसंग्रहः अथ ईर्यापथशुद्धिः। (स्रग्धरा) निःसंगोह जिनानां सदनमनुपम त्रिःपरीत्येत्य भक्त्या, स्थित्वा गत्वा निपयोचरणपरिणतोऽन्तः शनैहस्तयुग्मम् । भाले संस्थाप्य बुद्धया मम दुरितहरं कीर्तये शक्रवन्ध, निन्दादूरं सदाप्तं क्षयरहितममुं ज्ञानभानुं जिनेन्द्रम् ॥ १ ॥ अन्वयार्थ- (नि सङ्गोऽह) सर्वप्रकार के परिग्रह अथवा विकल्पों से रहित हो र मै ( अनुपम ) अपरिमित माहात्म्यवाले ( जिनाना ) जिनेन्द्रभग- वानके ( सदनं ) चैत्यालय (जिनालय, मदिर ) में (गत्वा) जाकर, (भक्त्या) भक्तिपूर्वक (त्रिःपरत्येत्य ) तीन प्रदक्षिणा देकर, तदनतर (स्थित्वा) थोड़ा खड़ा होकर आगे जाता हू तत्पश्चात् (निषद्य) वैठकर ( शनै. उच्चरणपरिणतो- ऽन्त ) धीरेधीरे मन में स्तोत्र आदिका उच्चारण करते हुए ( हस्तयुग्म ) दोनों हाथों को जोड़ कर (भाले सस्थाप्य ) मस्तकपर रखकर (मम दुरितहरं ) मेरे पापों को नाशकरनेवाले, (शक्रवन्ध ) इन्द्रोंके द्वारा पूज्यनीय, (निन्दादूरं) निन्दादि दोषोसे रहित, (क्षयरहित ) अविनश्चर, (ज्ञानभानु) ज्ञान-सूर्य (सदाप्त ) सदैव आप्त-देवपने को प्राप्त ( अमु जिनेन्द्र) ऐसे जिनेन्द्रदेवकी (बुद्धया ) मै अपनी बुद्धि अनुसार ( कीर्तये ) स्तुति करता हू॥१॥ ( वसन्ततिलका ) श्रीमत्पवित्रमकलङ्कमनन्तकल्पं, स्वायंभुवं सकलमङ्गलमादितीर्थम् ।। [७५) नित्योत्सवं मणिमयं निलयं जिनानां, त्रैलोक्यभृपणमहं शरणं प्रपद्ये ॥२॥ अन्वयार्थ-जो जिनालय (श्रीमत् ) अति शोभायुक्त है, (पवित्रं) पवित्र है, (अकलंक)निर्दोष है, (अनंतकल्प)अनतकल्पकालों से जिसकी परम्परा चली आरही है, ( स्वायभुव ) जो जिनेन्द्रदेव सम्बंधी है, ( सकलमंगलं ) जिममें सर्व- प्रकार के मंगल होते रहते हैं, (आदितीर्थ ) जो मुख्यतीर्थ है, ( नित्योत्सवं) जिसमें निरंतर उत्सव होते हैं, (मणिमय )जो नानाप्रकार की मणियों से बना है, (त्रैलोक्यभूषणम् ) तीनों लोकको भूषणरूप है ऐसे (जिनाना निलय ) जिनेन्द्रभगवान के चैत्यालय की (अहं) मै (शरण प्रपद्ये) शरण को प्राप्त होता हूं ॥२॥ (अनुष्टुप् ) श्रीमत्परमगम्भीरस्याद्वादामोघलाञ्छनम् । जीयात्रैलोक्यनाथस्य, शासनं जिनशासनम् ॥३॥ ( श्रीमत्परमगम्मीरस्यावादामोघलाञ्छन) जो अनेक । प्रकारकी अन्तरंग और बहिरंग शोभा से सुशोमित हैं और अत्यंत गम्भीर स्याद्वाद ही जिसका अमोघ (सार्थक) चिह्न है-ऐसा (त्रैलोक्यनाथस्य शासनं) श्री जिनेन्द्रदेव का शासन जो(जिनशासनं )जिनशासन कहलाता है वह (जीयात) स्थिर हो ॥३॥ श्रीमुखालोकनादेव, श्रीमुखालोकनं भवेत् । आलोकनविहीनस्य, तत्सुखावाप्तयः कुतः ॥४॥ अन्वयार्थ :-(श्रीमुखालोकनात् एव ) श्री जिनेन्द्रडेव के मुख कमल देखलेने मात्र से ही ( श्रीमुखालोकन भवेत् ) मुक्तिरूपी लक्ष्मी का मुख दिखाई देता है। (आलोकनविहीनस्य ) जो श्रीजिनेन्द्रदेव का दर्शन नहीं करते ( तत्सुखावाप्तयः कुत ) उन्हें यह सुख कैसे मिल सकता है ? अर्थान् श्रीजिनेन्द्रदेव के ही दर्शन आत्मदर्शन है और जब तक आत्मदर्शन नहीं होता है तबतक आत्मीक सुखकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? ॥४॥ [७६] अन्वयाथ: .

( वसंततिलका) अद्याभवत्सफलता नयनद्वयस्य, देव ! त्वदीयचरणाम्बुजवीक्षणेन ॥ अद्यत्रिलोकतिलक । प्रतिभासते मे, संसारवारिधिरयं, चुलुकप्रमाणम् ॥५॥ अन्वयार्थ:- (देव) हे देव ! (त्वदीयचरणाम्बुजवीक्षणेन) आपके चरणकमल देख लेनेसे (अद्य ) आज (नयनद्वयम्य ) मेरे दोनों नेत्र (सफलता अभवत् ) सफल होगये । (त्रिलोकतिलक ) हे तीनलोकों के तिलक (शिरोमणि) (अद्य)आज (अय ससारवारिधि ) यह संसार समुद्र (मे) मुझे (चुलुकप्रमाण) चुल्लूभर पानी के समान (प्रतिभासिते) प्रतिभासित होता है जान पड़ता है ।। ५ ॥ (अनुष्टुप्) अद्य मे क्षालितं गात्रं, नेत्रे च विमलेकृते । स्नातोऽह धर्मतीर्थेषु, जिनेंद्र तव दर्शनात् ॥ ६ ॥ अन्वयार्थः- (जिनेन्द्र ) हे जिनेन्द्र ! ( अद्य) आज (दर्शनात् ) आपके दर्शन करने से (मे) मेरा ( गात्र ) शरीर (क्षालितं ) धुलगया है, (च) और ( नेत्र ) मेरे दोनों नेत्र (विमलीकृते ) निर्मल होगये हैं, (अह) मैने (धर्म- तीर्थेषु ) धर्मरूपीतीर्थमें ( स्नातः) स्नान कर लिया है ॥ ६॥ नमो नमः सत्वहितंकराय, वीराय भव्याम्वुजभास्कराय ।। अनन्तलोकाय सुरार्चिताय, देवाधिदेवाय नमो जिनाय ॥ ७॥ अन्वयार्थ.- ( सत्त्वहितंकराय ) सम्पूर्ण जीवोंका हित करनेवाले, ( भव्या- म्बुजभास्कराय ) भव्यरूपी कमलको प्रफुल्लित करनेके लिये सूर्य के समान, (अनन्तलोकाय ) सम्पूर्ण चराचरके देखने वाले (सुरार्चिताय ) देवोंके द्वारा पूज्य ( देवाधिदेवाय) ऐसे देवाधिदेव ( वीराय जिनाय ) श्री वर्द्धमान जिनेन्द्रदेवके लिये मैं ( नमो नम.) वारंबार नमस्कार करता हूँ ॥७॥ [७७] नमो जिनाय त्रिदशाचिंताय, विनष्टदोषाय गुणार्णवाय॥ विमुक्तिमार्गप्रतिबोधनाय, देवाधिदेवाय नमो जिनाय ॥८॥ मन्वयार्थ:- (त्रिदशार्चिताय) देवोके द्वारा पूज्य ( विनष्टदोषाय) वषादि अठारह दोपोंसे रहित (गुणार्णवाय ) गुणोके समुद्र ( विमुक्तिमार्गप्रति- बोधनाय ) मुक्तिमार्गका प्रतिबोध करानेवाले ऐसे (देवाधिदेवाय) देवाधिदेव (जिनाय ) जिनेन्द्रभगवानके लिये मै (नमः ) बारंबार नमस्कार करता हू ॥८॥ देवाधिदेव ! परमेश्वर ! वीतराग ! सर्वज्ञ! तीर्थकर 1 सिद्धमहानुभाव ! त्रैलोक्यनाथ ! जिनपुंगव । वर्द्धमान ! स्वामिन् ! गतोऽसि शरणं चरणद्वयं ते ॥९॥ अन्वयार्थ:-- ( देवाधिदेव ) हे देवाधिदेव ! ( परमेश्वर) हे परमेश्वर (वीतराग) हे वीतराग ( सर्वज्ञ) हे सर्वज्ञ ! (तीर्थकर )हे तीर्थङ्कर ! (सिद्ध) हे सिद्ध ! ( महानुभाव ) हे महानुभाव । ( त्रैलोक्यनाथ) हे त्रैलोक्यनाथ ! (जिनपुगव) हे जिनश्रेष्ठ (वर्धमान ) हे वर्धमान ! ( स्वामिन् ) हे स्वामिन् । मै (ते) मापके ( चरणद्वय ) ढोनो चरणों की ( शरणं ) शरणको (गतोस्मि) प्राप्त होता ह ॥६॥ (आ) जितमदहर्षद्वेषा, जितमोहपरिपहाः जितकपायाः । जितजन्ममरणरोगा, जितमात्सर्या जयन्तु जिनाः ॥ १० ॥ अन्वयार्थ.-- ( जितमदहर्पद्वेषा ) पद-अभिमान, हर्ष और द्वेषको जीतने वाले, (जितमोहपरिपहाः) मोह और परिपह को जीतनेवाले, ( जित- कपायाः ) सम्पूर्ण कपायोको जीतनेवाले, ( जितजन्ममरणरोगाः ) जन्म, मरण) रूपी रोगको जीतनेवाले, (जितमात्सर्याः) मात्सर्य-ईष्र्याको जीतनेवाले (निनाः) जिनेन्द्रदेव 'सदेव' ( जयन्तु) जयशील हो ॥ १० ॥ [७८] - जयतु जिनवर्धमानस्त्रिभुवनहितधर्मचक्रनीरजबंधुः । त्रिदशपतिमुकुटभासुरचूड़ामणिरश्मिरंजितारुणचरणः ॥ ११ ॥ अन्वयार्थ:- ('यः' ) जो ( त्रिभुवन हितधर्मचक्रनीरजबन्धुः ) तीनलोक को हित करनेवाले धर्मचक्ररूपी कमलोके लिये सूर्यके समान हैं और ( त्रिदशप- तिमुकुटभासुरचूड़ामणिरश्मिरजितारुणचरण:) जिन के अरुण-लाल रंगके चरण इन्द्रोंके मुकुटमें दैदीप्यमान चूड़ामणिरत्नकी किरणोंसे भत्यत सुशोमित हो रहे हैं ऐसे ( जिनबर्धमानः ) श्रीवर्धमान जिनेन्द्रदेव सर्वदा' ( जयतु ) जय- शीलहों ॥११॥ जय जय जय त्रैलोक्यकाण्डशोभिशिखामणे, नुद नुद नुद स्वान्तध्वान्तं जगतकमलार्क नः ।। नय नय नय स्वामिन् शान्तिं नितान्तमनन्ति मां नहि नहि नहि त्राता लोकैकमित्र भवत्परः ॥ १२ ॥ अन्वयार्थ:- (त्रैलोक्यकाण्डशोमिशिखामणे) हे भगवान् ! भाप तीनो लोकोंमें अत्यंत सुशोमित होनेवाले शिखामणिके समान हैं, अतः ( जय जय जय) आपकी जय हो, जय हो, जय हो (जगतकमलार्क) आप जगतरूपी कमल को प्रकाशित करनेकेलिये सूर्य समान हैं, अतः (नः ) मेरे (हमारे)(स्वान्तवा- न्त ) हृदयके मोहान्धकारको (नुद नुद नुद ) दूर कीजिये, दूर कीजिये, दूर कीजिये ( स्वामिन् ) हे स्वामिन ! (नितान्त) अत्यत (अनन्ति)कमी न नाश- होनेवाली (शान्ति ) शान्तिको ( मा ) मुझे (नय नय नय ) दीजिये, दीजिये, दीजिये (लोकैकमित्र ) हे भव्यजीवोंके अद्वितीय मित्र ! ( भवत्परः ) आपके सिवाय (त्राता ) मेरी रक्षा करनेवाला--ससारके दुःखोंसे बचानेवाला ( नहि नहि नहि ) अन्य कोई नहीं है, नहीं है, नहीं है ।। १२ ।। चित्ते मुखे शिरसि पाणिपयोजयुग्मे, भक्ति स्तुति विनति मज्जलिमज्जसैव ।। चेक्रीयते चरिकरीति चरीकरीति, यश्चर्करीति तव देव स एव धन्यः ॥ १३ ॥ अन्वयार्थ - (देव) है देव ! (य:) जो (चित्ते ) अपने हृदयमें [७] (तव भक्तिं ) आपकी भक्ति (चेक्रीयते ) करता है, (मुखे) मुखसे ( स्तुति) स्तुति ( चरिकरोति ) करता है (शिरसि ) मस्तकमे ( विनति ) नमस्कार (चरीकरीति ) करता है ( पाणिपयोजयुग्मे ) देनों हाथरूपी कमलों से (अञ्ज- सा एव ) बारंबार ( अञ्जलि ) अजलि ( चर्करीति) करता है (स एव धन्य ) "हे भगवान्" वह पुरुष अत्यत धन्य समझा जाता है ॥ १३ ॥ (मन्दाक्राता) जन्मोन्मानं भनतु भवतः पादपद्म न लभ्यं, तच्चेत्स्वैरं चरतु न च दुर्देवतां सेवतां सः ।। अश्नात्यन्नं यदिह सुलभं दुर्लभं चेन्मुधास्ते, क्षुद्व्यावृत्य कवलयति का कालकूटं बुभुक्षुः॥ १४ ॥ अन्वयार्थ:- "हे भगवन यदि किसी पुरुषको' ( जन्मोन्मायं) जन्म मरण दूर करनेवाले ( भवतः) आपके (पादपद्म) चरणकमल (न )न (लभ्य) प्राप्त हुए हों तो (सः) वह ( तच्चेस्वैरं ) अपनी प्रवृत्ति इच्छानु- मार (चरतु ) करे ( च ) तद्यापि वह ( दुर्देवता ) मिथ्या देवताओंकी सेवतां मेवा (न भजतु ) न करे। ( यदिह ) जो इस संसार में (सुलभ) सुलभतासे प्राप्त ( अन्नं ) अन्नको (अश्नाति ) खाता है तो ठीक है (दुर्लभ चेत् ) परंतु यदि अन्नका मिलना कठिन हो-दुर्लभ मी हो तो (क ) कौन (बुभुक्षु ) भूखा मनुष्य ( ते तुव्यावृश्य ) अपनी भूख मिटानेके लिये ( मुधा) व्यर्थ ( काल- कूटं ) विष (कवलयति ) भक्षण करता है ! अथात् कोई नहीं ॥ १४ ॥ (शार्दूलविक्रीडित ) रूपं ते निरुपाधि सुन्दरमिदं पश्यन सहस्रक्षणः । प्रेक्षाकौतुककारिकोत्र भगवन्नोपैत्यवस्थान्तरम् ।। वाणी गद्गदयन् वपुः पुलकयन् नेत्रद्यं श्रावयन् । मुनिं नमयन् करौ मुकुलर्यश्चेतोऽपि निर्वापयन् ॥ १५ ॥ अन्वयार्थ:-- (भगवन् ) हे भगवान (ते) आपका (इदं) यह (निरुपाधिसुन्दर ) वस्त्र, आभूपण आदि उपाधियोंके बिना ही अत्यन्त सुन्दर (रूपं ) रूप (पश्यन् ) देखकर (प्रेक्षाकौतुक कारिकः) देखने वालोंको अत्यन्त [20] ।

कौतुक ( आश्चर्य ) उत्पन्न करनेवाला है । हे प्रभो । (अत्र ) इस ससारमें ऐसा कौनपुरुष है जो आपके सुन्दर रूपको देखकर (अवस्थान्तरं न उपैति ) अपनी अवस्था को न बदलले अर्थात् आपके सुन्दर रूपको देखकर सबकी अवस्था बदल जाती है । (सहस्त्रक्षणः ) हजार नेत्रोको धारण करनेवाला-इन्द्र भी आप के उस सुदर रूपको देखकर ( वाणी गद्गदयन् ) अपनी वाणीको गद्गद बना लेता है, ( वपुः पुलकयन) शरीर प्रफुल्लित होजाता है, (नेत्रद्वय श्राव- यन) दोनों नेत्रोंसे हर्षके आँसू बहने लगते हैं, ( मूर्द्धान नमयन ) मस्तक को नवा लेता है-मुका लेता है, (करौ मुकुलयन ) दोनों हाथोंको जोड़ लेता है, ( अपि ) और (चेत निर्वापयन ) हृदयमें अत्यन्त सन्तुष्ट होजाता है ॥ १५ ॥ त्रस्तारातिरिति त्रिकालविदिति त्राता त्रिलोक्या इति । श्रेयः मतिरिति श्रियां निधिरिति श्रेष्ठः सुराणामिति ॥ प्राप्तोऽहं शरणं शरण्यमगतिस्त्वां तत्यजोपेक्षणं, रक्ष क्षेमपदं प्रसीद जिन किं विज्ञापितोपितैः॥१६॥ अन्वयार्थः- (जिन) हे जिनेन्द्र भगवान ! (तस्ताराति. इति ) श्राप समस्त कर्म रूपी शत्रुओंके नाश करने वाले हैं, ( त्रिकाल विद्द्दति ) समस्त पदार्थोकी त्रिकाल सम्बंधी समस्त पर्यायों को जानने वाले हैं, (त्रिलोक्यः त्राता इति ) तीन लोकोंकी रक्षा करने वाले हैं, (श्रेयः सूतिः इति ) अनेक कल्याणो को उत्पन्न करनेवाले हैं, ( श्रिया निधिः इति ) अनन्त चतुष्टयरूप लक्ष्मी के निधि हैं, ( सुराणा श्रेष्ठ इति ) देवोंमें मी-सर्वश्रेष्ठ हैं (शरण्य ) समस्त जीवोंको शरण देने वाले हैं, ( क्षेमपद) कल्याणमय पदको प्राप्त होनेवाले हैं, यही समझकर और (अगतिः ) मुझे अपनी कोई दूसरी गति दिखाई न देने के कारण (त्वा शरण ) आपकी शरणमें (प्राप्तोहं ) मै प्राप्त हुआ हू अतः हे नाथ ! रक्ष ) मेरी रक्षा करो, ( प्रसीद ) प्रसन्न होओ (तत् उपेक्षा त्यज ) अपनी उपेक्षाका त्याग करो, ( विज्ञापितैः ) मैंने जो यह प्रार्थना की है उसे ( गोपितैः किं ) गुप्त रखनेसे क्या लाभ है ? ॥१६॥ त्रिलोकराजेन्द्रकिरीटकोटि,- प्रभाभिरालीढपदारविन्दम् । [८१] - निर्मुलमुन्मूलितकर्मवक्ष- जिनेन्द्रचन्द्रं प्रणमामि भक्त्या ॥१७॥ अन्वयार्थ:- (त्रिलोकराजेन्द्रकिरीटकोटिप्रभामिः ) तीनो लोकोंमें उत्पन्न होनेवाले अनेक राजा-महाराजा और इन्द्रोंके करोड़ो मुकुटों की प्रभासे (आली- दपदारविन्द) जिनके चरणकमल सुशोमित होरहे हैं, (निर्मूल उन्मूलितकर्मवृक्ष) जिन्होंने कर्मरूपी वृक्षको जड़से नष्ट कर डाला है ऐसे ( जिनेन्द्रचन्द्र ) जिनेन्द्र देव- भगवान् को मैं ( भक्त्या) बडी भक्तिसे (प्रणमामि ) नमस्कार करता हूं ॥ १७॥ (आर्या) करचरणतनुविधातादटतो विहितः प्रमादतः प्राणी। ईर्यापथमिति भीत्या मुंच तद्दोपहान्यर्थम् ॥ १८ ॥ अन्वयार्थ:- ( अटतः करचरणतनुविधाताद् ) चलते हुये मेरे हाथ, पैर और शरीरके विधातसे (प्रमादत ) प्रमादसे (प्राणी ) जो कोई प्राणी (विहितः) मारा गया हो ( तत् दोषहान्यर्थ ) उसके दोषको नाश करनेके लिये (मीला) मीतिसे (ईर्यापथ इति ) मैं ईर्यापथ (चलने) का (मुचे) त्याग करता हूं ॥१८॥ । ईपिथे प्रचलताध मया प्रमादा- देकेन्द्रियप्रमुखजीवनिकायवाधा। निर्वर्तिता यदि भवेदयुगान्तरेक्षा, मिथ्या तदस्त दुरितं गुरुभक्तितो मे ॥ १९ ॥ अन्वयार्थ:-हे भगवन् ! (ईर्यापथे) ईर्यापथशुद्धिसे (प्रचलता) चलते हुये, ( मया) मुझसे (प्रमादात ) प्रमादवश ( यदि ) यदि (अद्य) आज (एकेन्द्रियप्रमुखजीवनिकायबाधा) एकेन्द्रिय आदि जीव समूहोकी वाधा (भवेत्) हुई हो, अथवा ( अयुगान्तरेक्षा निर्वर्तिता) चार हाथ भूमिसे अधिक दूर तक दृष्टि डाली हो तो (मे) मेरे ( तद् दुरित ) वे सब पाप (गुरुभक्तिः) गुरुकी भक्तिसे ( मिथ्या अस्तु) मिथ्या हों ॥ १६ ॥, पडिकमामि भंते इरियावहियाए विराहणाए अणागुत्ते अइग्गमणे णिग्गमणे ठाणे गमणे चकमणे पाणुग्गमणे विजग्गमणे हरिदुग्गमणे [२] उच्चारपस्सयणखेलसिंहाणयवियडिय पइंठा वणियाए, जे जीवा एइंदिया वा, वेइंदिया चा, तेइंदिया, वा, चउरिदिया वा, पंचेंदिया वा, णोल्लिदा वा, पेल्लिदा वा, संघट्टिदा वा, संघादिदा वा, उद्दाविदा वा, परिदाविदा वा, किरिच्छिदा वा, लेसिदा वा, छिदिदा बा, भिंदिदा वा, ठाणदो वा, ठाणचंकमणदो वा, तस्स उत्तरगुणं तस्स पायच्छिनकरणं तसस विसोहि करणं जाव अरहताणं भयवंताणं णमोकारं पज्जुवासं करोमि तावकार्य पावकम्मं दुच्चरिय वोस्सरामि ॥ हे भगवान् ! मै प्रतिक्रमण करता हु अर्थात् किये हुए दोषोका निराकरण करता है, मैने मन वचन काय की गुप्ति रहित होकर ईर्यापथ करते समय जो कुछ जीवों की विराधना की है उनके दोषोंका मै निराकरण करता हूं। मैने जो शीघ्र गमन किया हो, चलनेकी प्रथम क्रिया प्रारभ की हो, जहा कहीं ठहरनेकी क्रिया की हो, सामान्य गमन किया हो, पैर फैलाये हो, वा सकुचित किये हो, श्वासोच्छ्- वास लिया हो अथवा दोइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चौडन्द्रिय प्राणियोंके ऊपरसे अपने प्रमादके कारण गमन किया हो, किसी वीजके ऊपर से गमन किया हो, हरित- कायके ऊपरसे गमन किया हो, मेने जो मल निक्षेपण (टट्टी) किया हो, मत्र (पेशाब ) किया हो, थूका हो, कफ डाला हो, पीछी-कमडलु-पुस्तक आदि उप- करण प्रमाद पूर्वक रक्खे हो, इन समस्त क्रियाओके करन जो एकेन्द्रिय जीव वा दोइन्द्रिय जीव वा तेन्द्रिय जीव वा चौइन्द्रिय जीव अथवा पचेइन्द्रिय जीव अपने २ स्थान पर जाते समय रोके गये हो, अपने स्थानसे उठाकर दूसरी जगह रक्खे गये हो, एकको दृसरेकी रगड़से पीडा पहुचाई हो, व समस्त इकडे कर एक जगह रख दिये हों, मार दिये हो, सतप्त कर दिये हों, चूर्णरूप कर दियेहो, अर्थात् कूट दिये हों, मूर्छित कर दिये हो, टुकडे २ कर दिये हों, विदीर्ण कर दिये हों अपने ही स्थान पर स्थित हों, अपने एक स्थान से दूसरे स्थान के लिये चल रहे हों ऐसे जीवोकी मुझसे जो विराधना हुई हो उसका प्रतिक्रमण करनेके लिये तत्सबवी टोपोका निराकरण करनेके लिये मैं प्रवृत्त हुआ है। मे जव तक भगवान अरहत देव को नमस्कार करता हू, उनका स्मरण बा पूजा करता है तब तक अपने शरीरसे ममत्त्वको त्याग करता हु अर्थात् '८३ कायोत्सर्ग करता है। इस शरीर से अनेक पाप कर्म होते हैं और अनेक दुष्ट चेष्टायें होती हैं इसी लिये मै डमका त्याग करता हूं। यह भगवान् अरहंतदेवको किया हुआ नमस्कार वा किया हुआ उनका स्मरण अत्यत उत्तम है क्योंकि भगवान् भरहतदेव को नमस्कार करनेसे वा उनका स्मरण करनेमे किये हुये समस्त दोष दूर हो जाते हैं अथवा उन जीवोंकी की हुई विराधना का प्रायश्चित हो जाता है । प्रमादसे उत्पन्न होने वाले समस्त दोष दूर हो जाते हैं तथा उन जीवोंकी विराधनासे उत्पन्न होनेवाले समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं उन पापोंकी शुद्धि हो जाती है। ईर्यापथमें होनेवाले समस्त कर्मों का नाश हो जाता है। ॐ णमो अरहताणं णमोसिद्धाणं णमो आइरियाणं । णमो उवज्झायाणं णमो लोए सवसाहूणं ।। ( यहा पर णमोकारमत्र का नौ बार जप करना चाहिये ) (जाप्यानि नव) अनमः परमात्मने नमोऽनेकान्तायशान्तये। (यह भत्र बोलकर ईर्यापथशुद्धि करे) अर्थ-मै परमात्माके लिये नमस्कार करता हू तथा अनेकात खरूप तत्त्वों का निरूपण करनेवाले और अत्यत शात वीतराग परमदेवके लिये मै नमस्कार करता हूं। इच्छामि भंते आलोचेउं इरियावहियस्स पुन्वुत्तरदविखणपच्छिम चउदिसु विदिसासु विहरमाणेण, जुगंतर दिहिणा, भब्वेण दहव्वा । पमाददोसेण डबडवचरियाए पाणभूदजीवसत्ताण उवघादो कदो वा कारिदो वा कारितो वा समणुमणिदो वा तस्स मिच्छामे दुक्कडं ।। हे भगवन ! मैं आलोचना करने की इच्छा करता हू, निंदा करना और गर्दा करना आलोचना कहलाती है | अपने आप किये हुए दोषोंकी निंदा करना "मैंने जो ये दुष्ट कर्म किये है सो बहुत बुरा किया है। इस प्रकार अपने हृदयमे भावना रखना निंदा कहलाती है तथा गुरुके समीप जाकर उन्हीं दोपोंकी निंदा करना गर्दा है । ईर्यापथ गमन करते समय प्रमाढसे जो ढोष लगे हों उनकी मै निंदा गरूिप आलोचना करता हू। किसी भी भव्यजीव को चलना हो, पूर्व दिशा, उत्तर दिशा, पश्चिम दिशा वा दक्षिण दिशाकी ओर चलना हो अथवा इन दिशाओके मध्यभागमें विदिशाओं [८१]

में चलना हो तो उसे उचित है कि वह चार हाथ प्रमाण भूमिको देखता चले
अर्थात् चार हाथ प्रमाण भूमि तक अपनी दृष्टि रक्खे और उसमें जो एकेन्द्रिय
आदि जीव हों उनको देखता चले, उनका बचाव करता चले।
नोट-दो इय, तेइन्द्रिय, चौइन्द्रिय जीवोंको अर्थात् विकलेन्द्रिय जीवोंको
प्राणी कहते हैं। वनस्पतिकायिक जीवोको भूत कहते है । पचेन्द्रिय जीवोंको
जीव कहते हैं । पृथ्वीकायिक, जलकायिक, तेजकायिक, वायुकायिक जीवोंको
सत्त्व कहते है।
(शार्दूलविक्रीडित)
पापिप्ठेन दुरात्मना जड़धिया मायाविना लोमिना ।
रागद्वेषमालीमसेन मनसा दुष्कर्म यन्निर्मितम् ।।
त्रैलोक्याधिपते जिनेन्द्र भवतः श्रीपाद मूलेधुना ।
निन्दापूर्वमह जहामि सततं निर्वर्तये कर्मणाम् ।।
अन्वयार्थ:- (त्रैलोक्याधिपते ) हे तीनों लोकोंके स्वामी (जिनेन्द्र) श्री
जिनेन्द्रदेव ! (पापिठेन ) पापी (दुरात्मना) दुरात्मा (जडधिया) जड़बुद्धि
( मायाविना ) मायावी (लोभिना ) लोभी ( रागद्वेषमलीमस्न ) रागद्वेषसे मैले
( मनसा ) मनवाले मैने ( यत) जो ( दुष्कर्म ) दुष्कर्म ( निर्मितम् ) किये है
उन्हें (कर्मणा ) कोंके ( निर्वतये ) नाशके लिये ( निंदापूर्वकं अह) निन्दा-
पूर्वक-निन्दा करता हुश्रा मै (अधुना ) अब (भवतः ) आपके (श्रीपादमूले)
श्री चरणोमें (सतत ) निरन्तर-सटाके लिये ( जहामि ) छोडता इ-त्याग
करता है।
जिनेन्द्रमुन्मलितकर्मवन्धं,
प्रणम्य सन्मार्गकृतस्वरूपम् ।
अनन्तबोधादिभवं गुणौघ,
क्रियाकलापं प्रकटं प्रवक्ष्ये ।।
[ Eu]

अन्वयार्थ:- (उन्मूलितकर्मबन्ध ) जिन्होंने कर्मवध नष्ट कर दिया है, (सन्मार्गकृतस्वरूपं ) जिन्होंने सन्मार्गके स्वरूपका प्रकाशन किया है, (अन- न्तबोधादिभव ) जो अरन्तज्ञानादि विभूनिसे विभूपित है, (गुणौद्य) जो अनन्त गुणोसे युक्त हैं ऐसे ( जिनेन्द्र ) श्री जिनेन्द्र भगवानको (प्रणम्य ) नमस्कार करके (प्रकट ) प्रस्तुत अथवा स्पष्टरूपसे ( क्रियाकलाप ) क्रियाकलाप नामक अथको ( प्रवक्ष्ये ) प्रतिपादन करूगा अर्थत् दशभक्ति का वर्णन करता है। अथाईत्पूजारम्भक्रियायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थं भाव- पूजावंदनास्तवसमेतं श्रीमत्सिद्धभक्तिकायोत्सर्ग करोम्यहम् । णमो अरहं. ताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं णमो उवज्झायाण णमो लोए सव- साहुणं ॥ णमोकारमत्रका अर्थ-- अरहतोको नमस्कार हो, सिद्धोको नमस्कार हो, आचार्यों को नमस्कार हो, उपाध्योको नमस्कार हो, लोफमें सर्व साधुओंको नमस्कार हो । -चत्तारि दंडक- चत्तारि मंगलं, अरहंत मंगलं, सिद्ध मंगल, साहू मंगलं, केवलिप- प्णतो धम्मो मंगलं, । चत्तारि लोगुत्तमा, अरहंत लोगुत्तमा, सिद्धले गु- तमा, साह नोगुत्तमा, केवलिपण्णतो धम्मो लोगुत्तमा । चत्तारि सरणं पच्चजामि, अरहंत सरणं पव्यज्गमि, सिद्ध सरणं पधज्जामि, साह मरणं पधज्जामि, केवलिपण्णतो धम्मो सरणं पन्चजामि ।। अर्थ:-चार मगलरूप है---अरहत मंगलरूप हैं, सिद्ध मगल रूप हैं, साधु मगलरूप है, केवली भगवानसे प्रतिपादन किया हुआ धर्म मगलरूप है । लोकमें चार सर्वोत्कृष्ट है --अरहत लोकमें सर्वोत्कृष्ट है, सिद्ध लोकमें मर्वोत्कृष्ट है, साधु लोकमें सर्वोत्कृष्ट है, केवली भगवान से प्रतिपादन किया हुआ धर्म लोक में सर्वोत्कृष्ट है । मैं इन चारोंकी शरणको प्राप्त करता हू-श्री अरहत परमेष्ठी की शरणमें जाता ह.,-श्री सिद्ध परमेष्टी की शरणमें जाता हू, श्री साधु परमेष्टी १-यहा पर बो निया करनी हो उस क्रियाका नाम लेकर यह मंत्र बोलना चाहिये।

, की शरण में जाना है और श्री केवली भगवानसे प्रतिपादन किये हुये धर्मकी शरणको प्राप्त होता है। अट्ठाइज्जदीपदोममुद्देसु पप्णरसकम्मभूमिसु, जावअग्हताण, भयवं- ताणं, आदियगणं, तिथयराणं, जिणाणं, जिणोत्तमाणं केवलियाणं, सिद्धाणं बुद्धाणं, परिणिवुदाणं, अंतगणाणं, पारयडाणं धम्माइरियाणं, धम्मदेसि- याणं, धम्मणायगाणं, धम्मवस्वाउरगचक्कवई,ण, देवाहिदेवाणं, णाणाणं दमणाणं, चरिचाणं सदा करोमि, किरियम्मं । करेमि भंते, सामायिय सव्यसावज्जजोग पञ्चक्खामि, जावज्जीवं तिविहेण मणसा वचसा कायेण, ण करेमि ण कारेमि करतंणि ण समणुमणामि तस्स भते अइचारं पटिक- मामि, णिन्दामि, गरहामि जाव अरहंतणं भयवंताणं, पज्जुवासं करेमि तावकालं पावकम्मं दुचरिय वोस्मरामि जीवियमरणे लाहालाहे संजोग- विप्पजोंगे य बंधुरि सुह दुक्खादो समदा सामायिय णाम ॥ अर्थ-जम्बूद्वीप, धातकी और आधा पुष्कर ये ढाई द्वीप कहलाते है। इन्हींके वीचमें लवण समुद्र और कालोदधि समुद्र आजाते है । ढाई द्वीप इस प्रकाग्मे व्यवस्थित है । इस ढाई द्वीपमे पाच भरतक्षेत्र पाच ऐरावतक्षेत्र और पाच विदेह नेत्र ऐसी पन्द्रह कर्मभूमिया है । इन १५ कर्मभूमियोंमें अरहत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु उत्पन्न होते हैं । भोगभूमियोंमें वा समुद्रोमें कारण- वश जाते हैं । भोगभूमियोंमे तो उपदेश देनेके लिये भी जाते हैं तथा समुद्रोंमें उपसर्गके द्वारा उठाकर रखदिये जाते है या डाल दिये जाते हैं । इस प्रकार इन परमेष्ठियोकी सत्ता ढाई द्वीपमे रहती है । अनादिकालसे अनतकालतक जितने अरहंत हो गये है और होगे वे सब अरहंत भगवान् वा ज्ञानवान् हैं अथवा त्रैलोक्यपूज्य हैं वे अरहत आदि तीर्थ प्रवर्तक कहलाते हैं । दिव्यध्वनि रूप श्रुतज्ञानकी प्रवृत्ति अथवा धर्मादिक की प्रवृत्ति सबसे पहले अर हतोंसे ही होती है। इसीलिये वे "आदियराण" कहलाते हैं तश वे ही अरहंत तीर्थकर कहलाते हैं। जिसमे ससार रूपी समुद्रोंसे पार हो जाय उसको तीर्थ कहते है। ऐसा तीर्थ श्रुतज्ञान है अथवा उत्तम क्षमादि धर्म है। क्योंकि यह जीव या तो शास्त्रज्ञान वा आत्मज्ञानसे मोक्ष प्राप्त करता है या धर्म [८७] ar धारण कर मोक्ष प्राप्त करता है । उस तज्ञान अथवा धर्म के प्रवर्तक तीर्थंकर ही होते हैं और वे अरहत अवस्था में ही होते हैं । इसके सिवाय वे अरहंत जिन कहलाते हैं । यह ससार अनेक प्रकारसे विषय दुःखोंसे भरा हुआ है तथा वह दुःख कोंके उदयसे प्राप्त होता है । यदि कर्म न हो तो दुख हो ही नहीं सकता। उन कर्मरूप शत्रुओंको भगवान् अरहंतदेवने नष्ट कर दिया है, कर्मोको जीत लिया है इसीलिये भगवान् “जिन" कहलाते हैं, अथवा वे भगवान् "जिनोत्तम" कहलाते हैं । एकदेश कर्मोंको नाश करनेके कारण गणधरदेव अथवा ऋद्धिधारी मुनि वा सामान्य मुनि भी 'जिन' कहलाते हैं। उन सबमें उत्कृष्ट होनेके कारण भगवान् अरहंतदेवको 'जिनोत्तम' कहते हैं । इसके सिवाय वे भगवान अरहंतदेव केवलज्ञानी कहलाते है । केवलज्ञानसे सुशोभित हैं अत: केवलज्ञानी कहे जाते है। इस प्रकार अनेक गुणोसे तथा अनेक नामोसे सुशोमित भगवान् अरहतदेवकी स्तुति कर मै आलोचना आदि क्रियाकर्म करता है। इसी प्रकार इस ससारमें भूत भविष्यत वर्तमानकाल सम्बधी जितने सिद्ध परमेष्ठी हैं उनकी भी मै स्तुति कर आलोचना आदि क्रियाकर्म करता हूँ। भगवान् सिद्ध परमेष्ठी बुद्ध अथवा समस्त पदार्थोके जानकार सर्वज्ञ हैं। इस विशेषणके देनेका अभिप्राय यह है कि योगमत वाले जिस प्रकार मुक्तअवस्थामें आत्माको जड़रूप मानते हैं वैसा आत्माका स्वरूप नहीं है किन्तु मुक्तावस्थामें आत्मा सर्वज्ञ ही रहता है । इस प्रकार इस विशेपणसे योगमतका खडन हो जाता है । इसके सिगय वे सिद्ध परमेष्ठी "परिणिव्वुदाण" अर्थात् परिनिर्वृत्त वा परम सुखी हैं । परमसुखी अर्थात आनन्दसुखी कहनेसे साख्यमतका खडन हो जाता है। साख्यमतवाला मुक्त अवस्थामें श्रात्माको शुद्ध चैतन्य स्वरूप मानता है तथा ज्ञानसुख आदि गुणोसे सर्वथा रहित मानता है परंतु वास्तवमें साख्यमतका यह मानना सर्वथा मिथ्या है । क्योकि ज्ञान और सुख दोनो ही आत्माके स्वभाव है, इसलिये वे कभी भी आत्मासे मिन्न नहीं हो सकते । ससारमे जो आत्मा दुःखी और अज्ञानी दिखाई देते हैं उसका कारण उनके कर्म है। कर्मके उदयसे ही यह जीव अज्ञानी और दुःखी दिखाई देते हैं । परन्तु मोक्ष अवस्थामें वे कर्म सत्र । नष्ट हो जाते हैं, इसलिये आत्माका वह अनतज्ञान और अनन्तसुख पूर्णरूपसे- प्रगटरूपसे प्रगट होजाता है । इसप्रकार इस अनन्तसुखी विशेषणसे साख्यमत [८]] - - का खडन होजाता है । इसके सिवाय वे भगवान् सिद्धपरमेष्ठी "अन्तयडाण" अर्थात् अन्तकृत हैं । जो ज्ञानावरणादि समरत कौंको तथा उन व मोंके उदय से होन्वाले ससारको नाश करदे उनको अन्तकृत् कहते हैं । भगवान सिद्धपर- मेठीने भी समरतकर्मोको और ससार परम्पराको नाश कर दिया है, इसलिये वे अन्तकृत कहलाते हैं । नैयायिक और वैशेषिक मतवाले ईश्वरको सदा मुक्त मानते हैं । उसका खडन करनेके लिये ही सिद्धोका यह अन्तकृत विशेषण दिया है। कोई भी प्राणी सदा मुक्त नहीं हो सकता, क्योकि मुक्त शब्दका अर्थ छूटना है कर्मोसे मुक्त होनाही मोक्ष अथवा मुक्ति कहलाती है, अत: सिद्ध होता है कि प्रत्येक प्राणी कोमे छूटकर ही मुक्त होता है ईश्वर भी इसीप्रकार मुक्त हुआ है । इसलिये वह सदा मुक्त नहीं कहला सकता अथवा अन्तकृत् शब्दसे अन्तकृत केवली लेने चाहिये । एक एक तीर्थंकरके समयमें दश-दश अन्तकृत केवली होते है, जो कि अत्यन्त घोर उपसर्गका निमित्त पाकर अन्तर्मुहूर्तमें ही घातिया कर्मों का नाश कर डालते हैं तथा उसी अतर्मुहूर्तमें केवलज्ञान पकर तथा बाकीके समस्त अघातिया कर्मोका नाश कर उसी अतर्मुहूर्तमें सिद्ध हो जाते हैं । ऐसे सिद्धपरमेष्ठीको अतकृत् केवली कहते हैं । ऐसे अन्तकृत केवलीकी स्तुतिकर मै क्रिया कर्म करता हू । इसके सिवाय वे सिद्ध परमेष्ठी अथवा अतकृत केवली 'पारयडाण' अर्थात् ससाररूपी समुद्रसे पार करने वाले हैं अथवा 'पारगमाण' ऐसा मी पाठ है । पारगमोण का अर्थ पारगत होता है । वे भगवान इसससार रूपी समुद्रसे पार हो चुके हैं, इसीलिये पारगत कहलाते हैं । इसप्रकार अनेक गुणोको तथा अनेक नामोको धारण करनेवाले भगवान सिद्ध परमेष्ठीकी स्तुति कर मै आलोचना आदि क्रिया कर्म करता हूँ। इसीप्रकार इस ससारमें भूत, भविष्यत, वर्तमानकाल सम्बधी जितने आचार्य हैं उनसबकी मै स्तुति कर आलोचना आदि क्रिया कर्म करता हूँ। वे आचार्य 'धम्माइरियाण' कहलाते है । धर्म शब्दका अर्थ चारित्र है। लिखा मी "चारित्त खलु धम्मो" अर्थात् निश्चयसे चारित्रही धर्म है, अथवा उत्तम क्षमा, मार्दव आदि । भी धर्म कहलाते हैं । उस चारित्र रूप धर्मको अथवा उत्तम क्षमादि दशलक्षण रूप धर्मको जो खय आचरण करें अथवा अन्य शिष्योंसे आचरण करावें-स्वय पालन करें और शिष्योंसे पालन करावे उनको आचार्य कहते है; ऐसे प्राचार्यों की [१] स्तुति कर आलोचनादि क्रिया कर्म करता हू। तथा मै उपाध्यायोकी स्तुति कर क्रिया कर्म करता ह। वे उपाध्याय 'धम्म- देसियाण" कहलाते हैं । चारित्र रूप धर्मका अथवा उत्तम क्षमादि दशलाक्षणिक रूप धर्मका जो उपदेश दें, शिष्योको अध्ययन करावें उनको उपाध्याय परमेष्ठी कहते है । ऐसे उपाध्याय परमेष्ठीकी स्तुति कर मै आलोचना आदि क्रिया कर्म करता हू। इसीप्रकार साधु परमेष्ठीकी स्तुति कर क्रिया कर्म करता है। साधु परमेष्ठी 'धम्माणाय गाण' कहलाते हैं । जो चारित्ररूप धर्मका अथवा दशलाक्षणिक रूप धर्मको अनुष्ठान करें-पालन करें उनको साधु परमेष्ठी कहते हैं । ऐसे समस्त माधुओंकी स्तुति कर मैं आलोचना आदि क्रिया कर्म करता हूं। अरहत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु ये पाचों ही परमेष्ठी "धम्म- वरचाउरगचक्कवट्टीण" कहलाते हैं । धर्म ही एक सबसे उत्तम चतुरग सेना कहलाती हैं, क्योकि अपने कार्य करने में अर्थात् आत्माका कल्याण करनेमें धर्म का प्रसार वा वृद्धि किसी से किसी प्रकार भी रोकी नहीं जा सकती। ऐसे धर्मरूप चतुरंग सेनाके जो चक्रवर्ती हों-एक मात्र स्वामी हों उनको "धम्मवरचाऊरग- चकवहीण" कहते है । ये पाचों ही परमेष्ठी धर्मकी वृद्धि करने के लिये धर्मरूपी चतुरग सेनाके नायक है इसलिये 'धम्मवरचाउरंगचक्कवट्टी" कहलाते हैं । इसके सिवाय ये पाचो ही परमेष्ठी "देवादिदेवाण" कहलाते है जो चतुर्निकाय देवोंके द्वारा भी पूज्य हों, वदनीय हों, चतुर्निकाय देवमी जिनको अघिदेव अथवा देवाधिदेव मान उनको 'देवाधिदेव' कहते हैं। ये पाचो ही परमेष्ठी देवाधिदेव है, क्योंकि समस्तदेव इनके लिये वदना करते है। ऐसे पाचो परमेष्ठियोंकी मै स्तुति करता हू तथा क्रियाकर्म करता है। इस प्रकार गुणियोंकी स्तुति कर अव गुणोकी स्तुति करते है। सम्यग्ज्ञान की, सम्यग्दर्शनकी तथा सम्यक्चारित्रकी सढा स्तुति करता है । इन तीनों रत्नों का सढा क्रियाकर्म करता है। यद्यपि इस आत्मामें अनन्त गुण है तथापि मोक्षके कारण ये तीन ही रत्न- त्रय है । इसलिये समस्त गुणोंमें ये ही प्रधान है । अतएव उन्ही तीनो गुण की स्तुति की है। [..1 मै आगे सामायिक करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं- करोमि भंते सामायियं सत्रमावजजोगं पञ्चक्खामि जावज्जीवं तिविहेण मणसा वचसा कायेण ण करेमि, ण कारेमि, करंतपि ण समणुमणामि । तस्स भंते अइचारं पडिकमामि जिंदामि गरहामि जाव अरहंताणं भयवंताणं पज्जुवासं करेमि तावकालं पावकम्मं दुचरियं वोस्मरामि । अर्थ:- अरहत आदि पाचों परमेष्ठियोंका क्रियाकर्म करता हुआ मै हे भगवान् ! सबसे पहले सामायिक करता हूं जिसमें रागद्वेषका सर्वथा त्याग कर माध्यस्थ भाव धारण किये जाय उसको सामायिक कहते हैं। लिखा भी है-- जीवियमरणे लाहालाहे संजोग विप्पजोगे य । बंधुरि सुहदुक्खादो समदा सामायियं णाम || अर्थ:---जीवित रहनेमें, मरनेमें, लाभमें, अलाभमें, संयोगमें, वियोग में, बधुओंमें, शत्रुओ , सुखमें तथा दुःखमें सबमें जो समता धारण कहता है, किसी में राग-देष नहीं करना है उसको सामायिक कहते है। ऐसे सामायिकको करता हुआ मै मन वचन कायकी समस्त अशुभ प्रबृ- त्तियोका त्याग करता हू तथा वह त्याग जीवन पर्यंत करता हू और मन वचन काय कृत कारित अनुमोदना से करता हू। भावार्थ मन वचन कायकी अशुभ प्रवृत्तियोको न तो मैं शरीरसे करूगा, न वचनसे कराऊंगा और न करते हुए की मनसे अनुमोदना करूगा | अथवा मै कायसे न करूगा न कराऊगा और न अनुमोदना करूगा इसी प्रकार वचनसे और मनसे न करूंगा, न कराउंगा और न अनुमोदना करूंगा। हे भगवन् ! मै जो अरहत सिद्ध आदि पाचों परमेष्ठीका क्रिया कर्म करता हू उसमें होनेवाले अतिचार वा दोषो का भी त्याग करता हू। उन दोषो की ना अतिचारोंकी निंदा करता हु और गर्दा करता हु । जो दोष किये हैं उनके लिये अपने आत्मा की साक्षीपूर्वक "हाय ! यह काम मैने बहुत ही बुरा किया है। इस प्रकार हृदयमें भावना रखना निंदा कहलाती है, तथा गुरुके सन्मुख जाकर उनकी साक्षीपूर्वक उन्हीं दोषों की निंदा करना गर्दा कहलाती है । इस प्रकार मै लगे हुए दोषोकी निंदा और गर्दा करता हू । और अतिचारोका त्याग करता है। [२१] ।

तवत्तक मैं केवल अशुभ क्रियाओंका त्याग ही नहीं करता कितु ससार में जितने पर- हत हैं जो कि अनतज्ञानी और पूज्य है उनका जबतक मै विशुद्ध मनसे पर्युपासन करता हू जबतक उन अरनदेवकी सेवा करता ह वा उनका स्मरण करता है पाप कर्मो का त्याग कर देता हूं। जन्ममरणरूप ससारको बढ़ानेवाले जितने अशुभ कर्म हैं उन सबको पाप कहते हैं। अथवा पापों के लिये जो क्रिया की जाती है, जो व्यापार किया जाता है उसको भी पापकर्म कहते हैं। ऐसे पाप कर्मों का मै त्याग करता हूं। तथा जन्ममरणरूप संसारकी प्रवृत्तिके कारणजो चेष्टा है-जो चारित्र है वा व्यापार है उसको दुश्चरित्र वा दुचरिय कहते हैं, ऐसे दुश्चरित्रको भी मै छोड़ता है। पापकर्म और दुरचरित्र दोनोंका मै त्याग करता हूं और इन दोनोंसे मै उदासीन होता है। (यहा पर णमोकार मंत्रका नौवार जाप करना चाहिये) चौवीस तीर्थङ्करोंकी स्तुति-- त्थोस्सामिहं जिणवरे तित्थयरे केवली अणंतजिणे । परयवरलोयमहिए विहुयस्यमले महष्यणे ॥ १ ॥ लोयस्सुज्जोययरे धम्मं तित्थंकरे जिणे चंदे । अरहते कित्तिस्से चउवीसं चेव केवलिणो ॥२॥ उसहमजियं च वंदे संभवममिणंदणं च सुमहं च ॥ पउपप्पहं सुपासं जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥ ३ ॥ सुविहिंच पुप्फयंत सीयल सेयं च वासुपुज्जं च । विमलमणतं भयवं धम्म संति च चंदामि ॥४॥ कुथु च जिणवरिंदं अरं च मल्लिं च सुव्वयं च णमि । वदाम्यरिडणेमि लह पासं वड्डमाणं च ॥ ५॥ एवंमए अभित्या विहुयरयमला पहीणजस्मरणा । चउवीसपि जिणवरा तित्थया मे पसीयंतु ॥ ६ ॥ किचियवंदिय महिया एदे लोगोचमा जिणा सिद्धा । आरोग्गणाणलाह दितु समाहिं च मे वोहिं ॥ ७ ॥ [१२] A चदेहिं णिम्मलयरा आइच्चेहि अहियपहा ससा । मायरमिव गभीरा सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥ ८॥ अर्थ- अब मै वृषभादि महावीर पर्यंत चौवीसों तीर्थंकरोकी स्तुति करता । वे समस्त तीर्थंकर 'जिनवर' कहलाते हैं । गणधरादिक देव एकदेश जिन कहलाते है और उनमें जो श्रेष्ठ हों उनको जिनवर कहते हैं । इसके सिवाय वे तीर्थंकर केवली 'अणंतजिण' है । केवलज्ञान विशिष्ट होनेसे केवली कहलाते हैं। तथा जिसका अन्त न हो ऐसे ससार को अनंत कहते हैं । भगवान तीर्थंकर देव ऐसे अनंत संसारको जीतनेवाले हैं, इसलिए 'अनत जिन' कहलाते हैं । अथवा जिनका अत न हो ऐसे अनत सख्या विशिष्ट तीर्थंकरोंको 'अनतजिन' कहते हैं । इससे त्रिकालवर्ती समस्त तीर्थंकरोंका ग्रहण होजाता है। फिर वे तीर्थकर 'णर- यवरलोएमहिये' कहे जाते हैं । जो नर-मनुष्योंमें प्रवर-श्रेष्ठ हों उनको 'नरप्रवर' कहते हैं । ऐसे लोग चक्रवर्ती श्रादि कहलाते हैं । ऐसे चक्रवर्ती आदि के द्वारा भी-वे भगवान् पूज्य हैं, इसलिये वे 'नरप्रवरमहित' कहलाते हैं । अथवा वे तीर्थ- करपरमेदेव मनुष्यों में श्रेष्ठ हैं इसलिये 'नरप्रवर' कहलाते हैं और इन्द्रादिकोंके द्वाग पूज्य हैं, इसलिये महित वा पूज्य कहलाते हैं । वे तीर्थकर परमदेव 'विहुयर- यमले' अर्थात् 'विधूतरजोमल' हैं। जिसप्रकार धूल बादलोंको ढक लेती है, उसी प्रकार ज्ञानावरण और दर्शनावरण ये दोनों कर्म आत्माके ज्ञानदर्शन स्वभाव को ढक लेते है, इसलिए इन कर्मों को रज कहते है। भगवान तीर्थकरने इन दोनों कर्मरूपी रजकी मलिनता नष्ट कर दी है इसलिये वे 'विधूत रजोमल' कहे जाते है। इसके सिवाय वे भगवान् 'महप्पण्ण' हैं । मह शब्दका अर्थ पूजा है।। जो पूजाको प्राप्त हुए हों--जिनकी पूजा तीनों लोकोंने की हो उनको 'मह आपन्न' कहते है । अथवा भूतपूर्व नयकी अपेक्षासे तीर्थंकरको 'महाप्रज्ञ' भी कहते हैं । प्रज्ञाशब्द का अर्थ वुद्धि है, उसका उपयोग वा सत्ता केवलज्ञान अवस्था में नहीं हो सकती, इसलिये यहा पर गृहस्थावस्था की महाबुद्धिमत्ताका ग्रहण करते है॥१॥ इसके सिवाय वे भगवान् अपने केवलज्ञान के द्वारा लोकाफाशके समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करनेवाले हैं इसलिये वे लोयस्सुज्जोययरे, अर्थात् 'लोकस्य घोतक' कहे जाते हैं । ऐसे तीर्थंकरोंकी मै स्तुति करता हूं। तथा चारित्ररूप धर्म [१३] - की स्तुति करता हूं वा उत्तम क्षमा मार्दव आदि दशलक्षणरूप धर्मकी स्तुति करता है, समस्त-तीर्थंकरों की स्तुति करता हूं। तथा मुंडकेवली, मूककेवली, अंत- कृतकेवली आदि अन्य समस्त अरहतोंकी स्तुति करता हू। घातिया कोंके नाश कर देनेसे जिनको अनतज्ञान प्रगट हो जाता है उनको अरहंत कहते है । ऐसे अरहत ही तीर्थंकर कहे जाते है । इस वर्तमानकाल सम्बधी अवसर्पिणीकालमें जो २४ तीर्थकर हुये है जो कि केवलज्ञान से सुशोभित हुये हैं ऐसे २४ तीर्थंकरोका अलग अलग नाम लेकर और उनके लिये अलग अलग प्रणाम करता हुआ उन सबकी स्तुति करता हू॥२॥ मै श्री वृषभदेव और अजितनाथके लिये वदना करता हू। शभवनाय, अमिनदननाथ, सुमतिनाथ, पद्मप्रभ, सुपार्श्वनाथ और भगवान चन्द्रप्रभ जिने- न्द्रदेवको वदना करता हू ।। ३ ।। भगवान् सुविधिनाथ (पुष्पदत),शीतलनाथ, श्रेयासनाथ, वासुपूज्य, विम- लनाथ, अनंतनाथ, धर्मनाथ और भगवान शातिनाथ के लिये वंदना करता हूं ॥४॥ भगवान् जिनेन्द्रदेव कुन्थुनाथ, मरनाथ, मल्लिनाथ, मुनिसुव्रतनाथ, नमिनाथ, अरिष्टनेमिनाथ, पार्श्वनाथ और वर्द्धमान भगवान के लिये मै वदना करता हूं ॥५॥ आगे अपनी शक्ति और भक्ति के अनुसार जिनकी स्तुति की है ऐसे उन भगवानसे अपना आत्मकल्याणरूप फल चाहते हुये स्तुतिकार कहते हैं कि वे भगवान् चौवीसों तीर्थंकर अनुपम और अचिंत्य गुणोंसे सुशोभित हैं तथा 'विहु- यरयमला' अर्थात् घातियाकर्मरूपी रज और मल्से सर्वथा रहित हैं और 'पहीण- जरमरणा, अर्थात बुढापा जन्म मरण आदि समस्त दोषोमे रहित मुक्त है ऐसे तीर्थकर जिनेन्द्रदेव के चौवीसों नाम समस्त पापोंको नाश करनेवाले और परस्पर 'एक दूसरे से भिन्न भिन्न हैं उन सबकी मैने स्तुति की है । इसलिये वे चौवीसो तीर्थकर मुझ पर प्रसन्न हो ॥६॥ ये चौवीसो तीर्थंकर सर्वोत्कृष्ट है और कृतकृत्य है, इनकी मैने वचनसे स्तुति की है, मनसे वदना की है और कायसे पूजाकी है । ऐसे ये तीर्थंकर परमदेव आरोग्यज्ञानकी प्राप्ति देवे । जिसप्रकार रोग शरीरका घात करते हैं उसी प्रकार ज्ञानावरण कर्म भी आत्माके स्वरूपका घात करता है । इमलिये वह रोग समान [२४] ।

है। जिसके वह रोगरूप ज्ञानावरणकर्म न हो उसे अरोग कहते है, उस अरोग के भावको पारोग्य कहते हैं । उस आरोग्यके साथ जो ज्ञान होता है उसे आरो- ग्यज्ञान कहते है । जो ज्ञान समस्त ज्ञानावरणकर्मसे रहित है ऐसा केवलज्ञान वा पूर्णज्ञानको 'आगेग्यज्ञान' कहते हैं । ऐसे केवलज्ञान की प्राप्ति देवें अथवा रोग शब्दका अर्थ मिथ्यात्व है, क्योंकि वह मिथ्यात्व ज्ञानको विपरीत बना देता है। ऐसे मिथ्यात्वसे रहित जो ५ प्रकारका सम्यग्ज्ञान है उसे देवें । तथा २४ ही तीर्थ- कर मुझे समाधि अर्थात् धर्मध्यान, शुक्ल यानकी प्राप्ति देवे, अर्थात् चारित्ररूप समाधिको देवे, और बोधि अर्थात् सम्यग्दर्शनको देवें। जिससे पदार्थों का यथार्थ स्वरूप जाना जाय उसे बोधि कहते हैं । सम्यग्दर्शनके होनेसे ही पदार्थों का यथार्थस्वरूप जाना जाता है । इसलिये सम्यग्दर्शनको ही बोधि कहते हैं । इस प्रकार वे भगवान् तुझे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्ररूप रत्नत्रय की प्राप्ति ठेवें ।। ७ ॥ भगवान् सिद्ध परमेष्ठी समस्तकमोंसे रहित है, इसलिये वे चन्द्रमासे भी अत्यत निर्मल हैं। समस्त लोक को प्रकाशित करनेवाले केवलज्ञान की प्रभासे < सुशोभित हैं, इसलिये वे 'आइच्चोहे' अर्थात् आदित्य -सूर्यसे मी 'अहियपहा' अर्थात् अधिक प्रभावशाली हैं अथवा वे चौबीसों तीर्थंकर चन्द्रमासे भी अधिक निर्मल हैं और शरीरकी प्रभा असाधारण करोडो सूर्योकी प्रमाके समान होनेके कारण सूर्यसे भी अधिक प्रभायुक्त हैं तथा शस्त अर्थात् अत्यत प्रशसनीय है अथवा परम उपशमको प्राप्त हो चुके है । अथवा 'अहियं पयामता' ऐसा भी पाठ । उसका अर्थ ऐसा है कि वे भगवान् सूर्यसे भी अधिकरीतिसे पदार्थों को प्रका- शित करनेवाले है। तथा वे भगवान समुद्र के समान हैं गभीर है । यद्यपि उनमें अनंतगुणरूपी रत्न है तथापि समुद्र के समान गभीरताके कारण दिखाई नहीं देते। ऐसे ससारके दुःखोंसे सर्वथा रहित सिद्ध परमेष्ठी स्तुति करने वाले मुझको समस्त कर्मोमे रहित ऐसी सिद्ध अवस्था को देवे मुझे मोक्षप्रदान करें ॥ ८ ॥ ४ re 1 E५] श्रीसिद्धभक्तिः। (स्रग्धरा) सिद्धानुद्धृतकर्मप्रकृतिसमुदयान्साधितात्मस्वभावान्, चंदे सिद्धिप्रसिद्धथैतदनुपमगुणप्रग्रहाकृष्टितुष्टः । सिद्धिः स्वात्मोपलब्धिः प्रगुणगुणगणोच्छादिदोपापहारात्, योग्योपादानयुक्त्या दृपद इह यथा हेमभावोपलब्धिः ॥ १ ॥ अन्वयार्थ:-( उद्धृतकर्मप्रकृति समुदयान ) जिन्होने ज्ञानावरणादि आठ कर्मा का नाश कर दिया है, ( साधितात्मस्वभावान् ) जिन्होने आत्मस्वभाव की सिद्धि करली है ऐसे (सिद्धान् ) सिद्ध परमेष्ठीको मै (तदनुपमैगुणप्रमहाकृष्टितुष्ट) उनके अनुपम, अनत गुणरूपी रस्सीसे खिंच जाने के कारण संतुष्ट हुमा ( सिद्धिप्रसिद्धथै ) आत्मसिद्धिकी प्राप्ति के लिये ( वदे) वंदना करता हूं। (यथा) जिसप्रकार (इह ) इस ससार मे (योग्योपादानयुक्त्या) योग्य उपादान सामग्री के मिलने से ( दृपदः) पत्थरसे (हेमभावोपलब्धिः) स्वर्णभावकी प्राप्ति होती है "तथा" उसीप्रकार (प्रगुणगुणगणो छातिदोषापहारात ) अनतज्ञानादि गुणोंका आच्छादन करनेवाले अथवा विकृतकरनेवाले दोषो-कोके नाश होजाने से ( स्वात्मोपलब्धिः ) शुद्ध आत्मतत्त्व की उपलब्धि को (सिद्धिः) सिद्धि कहते भावार्थ:-जिसप्रकार भट्टी, धमनी आदि कारणों की युक्तिपूर्वक योजना करनेसे सुवर्णपापाण में से किट्ट कालिमा आदि मैल सब निकल जाता है और शुद्ध सुवर्णकी प्राप्ति होजाती है उसी प्रकार यह ससारी श्रात्मा ज्ञानावरणादि कर्मों से अत्यंत मलिन हो रहा है । इस आत्मा में ज्ञानादिगुण सर्वोत्कृष्ट हैं जो कि किसी भी द्रव्यमें नहीं रहते। अथवा जिनसे पदार्थों का यथार्थ स्वरूप प्रकाशित हो ऐसे ज्ञानदर्शन आदि आत्मा में सर्वोत्कृष्ट गुण है अथवा अनतज्ञान अनत- दर्शन आदि सर्वोत्कृष्ट गुण हैं ऐसे अनतगुणो का समुदाय आत्मा में है। इस [२६] मंसारी आत्माके साथ जो ज्ञानावरण दर्शनावरण आदि घानिया कर्म लगे हुये हैं वे सब आत्माके उन अनन्तज्ञान व अनन्तदर्शन रूप गुणों का घात करते हैं इसीलिये उन समस्त कोंको दोष कहते हैं। उन समस्त घातिया, अघातिया कर्मरूपी दोषोंका सर्वथा नाश वा अभाव हो जानेसे जो अनन्तज्ञानादि स्वरूप शुद्ध आत्माकी प्राप्ति होजाती है उसको "सिद्ध" कहते हैं। उस सिद्धको जो प्राप्त हो चुके हैं, जिनको उस शुद्ध आत्मतत्त्व की प्राप्ति हो गई है उन्हें सिद्ध कहते हैं। वे भगवान कमों की प्रकृतियोंके समुदायसे सर्वथा रहित होते हैं । ससार में बहुतसे ऐसे मी मनुष्य हैं जिनको अजनगुटका सिद्ध होजाता है, वे एक प्रकार का सिद्ध भजन बनाते हैं जिसको आखमें लगानेसे वे किसी को दिखाई नहीं देते तथा उनको सब कुछ दिखता है। ऐसे मनुष्यो को अजनगुटका सिद्ध कहते है। अजनगुटका सिद्ध, सिद्ध नहीं हैं किन्तु जिनके समस्त कर्म नष्ट हो जाते है उन्हींको सिद्ध कहते है। यही सचित करने के लिये प्राचार्यने सिद्धोंका स्वरूप समस्त कर्मप्रकृतियोंसे रहित बतलाया है । इसके सिवाय जिन्होंने अनसज्ञानदर्शन स्वरूप अपने आत्मा का निजस्वभाव सिद्ध कर लिया है उन्हींको सिद्ध कहते वे बहुतसे नैयायिक आदि मतवाले ईश्वरको सदा ज्ञानी मानते है, ईश्वरमें सदा से रहनेवाला ज्ञान मानते हैं । उनका खडन करनेके लिये प्राचार्य कहते है कि जिन्होंने अनतज्ञान प्राप्त कर लिया है वे ही सिद्ध कहलाते हैं । ईश्वरमें सदासे ज्ञान कभी नहीं हो सकता । पूर्णज्ञानप्राप्त करनेके लिये ज्ञानावरणादि कर्मोका नाश करना पड़ता है, तब कहीं जाकर पूर्णज्ञान प्रगट होता है । जिनके पूर्णज्ञान प्रगट हो जाता है उन्हींको सिद्ध कहते हैं । उनसिद्धोंके उपमारहित अनन्तगुण है, उन अनतगुणरूपी रस्सी के द्वारा उन सिद्धोंकी ओर खिंच जानेके कारण अत्यत संतुष्ट हुआ मैं उस शुद्ध आत्मस्वरूप सिद्धिकी प्राप्तिके लिये उन सिद्ध परमेष्ठीको नमस्कार करता हूं। आगे-नैयायिक बौद्ध भादि अन्य दर्शनकार जो मोक्षका स्वभाव मानते -उसका खण्डन करते हुये प्राचार्य मोक्षका यथार्थ स्वरूप बतलाते हुये मात्मतत्त्वका निरूपण भी करते है- [२७] -- के नाभावः सिद्धिरिष्टा न निजगुणहतिस्तत्तपोमिन युक्तः । अस्त्यात्मानादिवद्धः स्वकृतजफलभूक तत्क्षयान्मोक्षभागी॥ ज्ञाता दृष्टा स्वदेहमितिरुपसमाहारविस्तारधर्मा । धौव्योत्पत्ति व्ययात्मा स्वगुणयुत इतो नान्यथा साध्यसिद्धिः ॥२॥ अन्वयार्थ.-(अभावः) "दीपक के बुझने की तरह" आत्मतत्त्वके अभाव को (सिद्धि.) सिद्धि (न इष्टा) नहीं माना जा सकता है, उसी प्रकार (निज- गुणहतिः 'सिद्धिः न इष्टा' )अपने विशेष गुणों के अभाव को भी सिद्धि मानता इष्ट नहीं है। क्योकि जो लोग मात्माभाव और विशेष गुणों के नाशको सिद्धि मानते हैं वे अपने ही नाश करनेके लिये ( तत्तपोभिः न युक्तः) तपश्चर्या आदि द्वारा प्रवृत्त नहीं हो सकते है। साथ ही जिनका ऐसा मत है कि आत्म तत्त्व ही नहीं है, उनका यह कहना मी ठीक नहीं है, क्योकि (अनादिबदः) अना- दिकाल से कर्मों से बद्ध, (बधा हुआ) (स्वकृतजफलभुक् ) अपने द्वारा किये हुए अच्छे बुरे कर्मों के फलों को भोगनेवाला, ( ज्ञाता) जाननेवाला (दृष्टा) देखनेवाला (स्वदेहप्रमितिः) अपने द्वारा प्राप्त शरीर के प्रमाणमें रहनेवाला, (उपसमाहारविस्तारधर्मा ) संकोच और विस्तार धर्मवाला, (ध्रौव्योत्पत्तिव्य- यात्मा ) उत्पाद, न्यय और ध्रौव्य स्वरूप तथा (स्वगुणयुतः) अपने ज्ञानादि गुणो से युक्त ( आत्मा अस्ति ) आत्मा है । (इत अन्यथा साध्यसिद्धिः न ) यदि ऐसा न माना जावे तो इष्ट साध्यकी सिद्धि नहीं हो सकती ॥२॥ भावार्थ:-बौद्ध और वैशेषिक आदि मतवाले मोक्षका स्वरूप अभाव- रूप मानते हैं । वे कहते है कि जिसप्रकार तेलके समाप्त होने पर दीपक बुझ जाता है फिर वह किसी भी दिशा व विदिशामें जाकर नहीं ठहरता किन्तु वह सर्वथा नष्ट हो जाता है, उसीप्रकार आत्मा की सन्तान का जब क्लेश वा दुखा- दिक नष्ट हो जाता है तब आत्मा का सर्वथा अभाव हो जाता है । इसी को मोद कहते हैं ऐसा बौद्ध मानते हैं परंतु आचार्य इसका खडन करते हुये कहते है कि मोक्षका स्वरूप प्रभावस्वरूप नहीं है । क्योंकि ऐसा कोई भी बुद्धिमान नहीं है- जो अपना नाश करनेके लिये प्रयत्न करे तथा मोक्ष के लिये प्रयत्न किया ही, जाता है। इसलिये बौद्ध का माना हुआ मोक्षका स्वरूप ठीक नहीं है। योग कहते हैं कि बुद्धि, सुख, दुख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और [२८]] मस्कार ये भात्मा के विशेष गुण है। इनका अत्यन्त नाश हो जाना ही मोक्ष है । परन्तु आचार्य कहते हैं कि योगोंके द्वारा माना हुआ मोक्षका यह लक्षण भी ठीक नहीं है। क्योंकि मोक्षका स्वरूप आत्माके गुणोंके नाश होने रूप नहीं है । इसका भी कारण यह है कि यदि प्रात्मा के गुणोका नाश होना ही मोक्ष मान लिया जाय तो उनका तपश्चरण करना, व्रत पालना आदि कुछ भी नहीं बन सकेगा। क्योकि अपने आत्मा का नाश करने के लिये अथवा अपने आत्मा के गुणों का नाश करनेके लिये कोई भी मनुष्य व्रत वा तपका पालन नहीं करता। मसारमें जो तप और व्रतोंका पालन किया जाता है वह आत्माको दुर्गतसे बचाने के लिये और आत्माके गुणोकी वृत्ति करनेके लिये ही किया जाता है । अतः मानना चाहिये कि आत्माके गुणोका नाश होना मोक्षका स्वरूप नहीं है । चार्वाक कहता है कि आत्मा ही कोई पदार्थ नहीं है, आत्माका ही सर्वथा अभाव है, फिर मोक्ष किसकी ! परंतु चार्वाकका भी यह कहना ठीक नहीं है । इसीका खडन करते हुये प्राचार्य कहते हैं कि आत्मा है और वह अनादिकालसे चला आ रहा है । कोई कोई लोग आत्माका अस्तित्व मानते तो है परंतु उस आत्माको ही मानते हैं-भूत और भविष्यत कालमें उसका अस्तित्व नहीं मानते। इसी बातका खडन करनेके लिये आचार्य कहते हैं कि वह आत्मा अनादिकालसे चला आ रहा है। अथवा यो कहना चाहिये कि यह आत्मा अनादिकालसे कर्मोसे बधा हुआ चला आ रहा है। सतान प्रति सतान रूपसे बधे हुए कर्मोके द्वारा बधनबद्ध होता हुआ चला आ रहा है। इस कथनसे आचार्य ने साख्यमतकाखडन किया । साख्यमतवाला मानता है कि आत्मा तो सदा मुक्त ही रहता है । वह आत्मा कभी कर्मबद्ध वा पापोंसे लिप्त नहीं होता । प्रकृति ही कर्मोसे बद्ध वा पापोंसे लिप्त होती है और वही प्रकृति उन कोंसे छूटती रहती है परंतु इसका खडन करते हुए आचार्य कहते है कि आत्मा सदासे मुक्त नहीं है किन्तु अनादिकालसे कर्मबध- नबद्ध हो रहा है । इसलिये साख्य का मानना सर्वथा अयुक्त है। इसके सिवाय साल्यमतवाला यह भी गानता है कि यह प्रात्मा कर्मोको करता नहीं है किन्तु उन कर्मोके फलोका भोक्ता अवश्य है । परंतु सांख्यमतका यह मानना भी सर्वथा अयुक्त है, क्योंकि जो कर्ता होता है वही भोता होता है । [२९ है इसी बातको निरूपण करते हुये आचार्य कहते है कि वह अनादिकालसे चला आया आत्मा स्वय-अपने आप कर्मोको करता है और फिर उससे जो सुख दुख रूप फल प्राप्त होते है उनको भोगता है । यह जीव अपने मन वचन कायदी जैसी प्रवृत्ति करता है-जैसी कषाय उत्पन्न करता है उसीके अनुसार अपने कर्मोंका वध करता है और फिर समयानुसार जो कुछ उन काँका फल प्राप्त होता है वह उसे भोगता पड़ता है । इसप्रकार आत्माका यथार्थ स्वरूप कह कर आचार्यने वौद्ध-वैशेषिक-योग-साख्य-चार्वाक आदि सबका खंडन कर दिया है। अब आचार्य यह दिखलाते हैं कि जव मोक्षका स्वरूप ऊपर लिखे अनु- सार नहीं है तो फिर कैसा है। इसके उत्तरमें कहते हैं कि इस प्रात्माने जो कर्म स्वयं किये हैं उनका अत्यंत नाश हो जाने से ही मोक्षकी प्राप्ति होती है । उन कर्मोका नाश ऊन कर्मोका फल भोग लेने पर भी होता है और विना फल भोगे भी होता है-दोनों प्रकारसे होता है। परंतु उन कर्मोका नाश हुये विना कमी भी मोक्ष प्राप्ति नहीं होती। इसके सिवाय वह आत्मा ज्ञाता और दृष्टा है, ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग स्वभाव सहित है। अनेक लोग आत्माका स्वरूप जड-अचेतन मानते है अथवा केवल चैतन्यमात्र मानते हैं । इसका खडन करनेके लिये प्राचार्य कहते हैं कि आत्मा जड़ नहीं और न ज्ञानशून्य केवल चैतन्यमात्र है किन्तु आत्मा ज्ञाता और दृष्टा है-जानना और देखना उसका स्वभाव है । ज्ञान और दर्शन स्वभावको ही चैतन्य कहते हैं। आत्माका परिमाण अपने शरीरप्रमाण रहता है, साख्य-मीमासक और योग मत वाले आत्माको व्यापक मानते हैं परंतु उनका यह कहना ठीक नहीं है । यदि सबका आत्मा व्यापक है और वह समस्त शरीरों में रहता है तो फिर सब जीवोंको एकसा ज्ञान होना चाहिये परंतु ऐसा तो होता नहीं है अतः सिद्ध होता है कि आत्मा व्यापक नहीं है किंतु शरीरके ही बरावर रहता है । कदाचित् यहा पर कोई यह शका करे कि यदि आत्मा अपने शरीरके ही बराबर है तो फिर जो भामा हायीके शरीरमें हैं वह हाथीके शरीरके बराबर है फिर वह मरकर यदि चींटीके शरीरमें जन्म ले, अथवा कोई चींटीको जीव हाथीके शरीरमें जन्मे तो [१००1 1 वह अपना परिमाण कैसे बदल सकता है ? इसके उत्तरमें आचार्य कहते है कि जिसप्रकार किसी दीपकको छोटे घरमें रखदें तो उतने ही घरमें वह प्रकाश फैल जाता है और यदि उसी दीपकको बडे घरमें रखदें तो उसका प्रकाश फैलकर सब घरमें फैल जाता है । यदि उसी दीपकको घडे में रखदें तो उसका प्रकाश उतना ही रह जाता है और मैदान में टांगदे तो दूर तक फैल जाता है । जिस प्रकार दीपकके प्रकाशमें सकोच होने और फैलनेकी शक्ति है उसीप्रकर आत्माके प्रदे- शोंमें भी संकोच और विस्तार होनेकी शक्ति है । अपने २ कर्मोके उदयसे यह जीव जब जैसा छोटा या बडा शरीर पाता है तब उसी परिमाण हो जाता है। जब छोटा शरीर पाता है तब आत्माके प्रदेश संकुचित होकर उसी छोटे शरीर रूप हो जाते है और जब बडा शरीर पाता है तब वे ही प्रदेश विस्तृत होकर उस वडे शरीर रूप हो जाते है । बच्चेके शरीरमे आत्मा उतने ही परिमाण रूप है फिर शरीर बडा होने पर वे ही आत्मा के प्रदेश फैलकर उस बड़े शरीर रूप हो जाते है । यही कारण है कि शरीरके बढ़ जाने पर भी शरीरका कोई भी भाग ऐसा नहीं रहता जिसमें आत्मा न हो । इससे सिद्ध हो जाता है कि आत्माके प्रदेशोंमें संकोच विस्तार होने की शक्ति है। जब यह आत्मा ककि उदयसे छोटा शरीर पाता है तब उसके आत्माके प्रदेश सकुचित उसी शरीरके परिमाण हो जाते हैं तथा जब बडा शरीर पाता है तब वेही आत्मप्रदेश विस्तृत होकर उस बडे शरीर रूप हो जाते हैं। इसके सिवाय वह मात्मा उत्पादव्ययध्रौव्य स्वरूप है । साख्य-मीमासक और योग कहते हैं कि आत्मा सर्वथा नित्य है । सर्वथा नित्य होनेके कारण उस में उत्पादव्यय नहीं हो सकता परतु इन लोगोंका यह कहना ठीक नहीं है । क्योंकि एक आत्मा जो आज सुखी है वही आत्मा कल दुखी हो जाता है तथा जो आज दुखी है वह कल सुखी है इस प्रकार आत्मामें उत्पाद और विनाश स्पष्ट रीति से प्रतीत होता रहता है । अतः आत्मा सर्वथा नित्य नहीं है किन्तु उत्पाद व्ययध्रौव्य स्वरूप है । बौद्धमतवाला मानता है कि आत्माका स्वभाव ज्ञानरूप है तथा ज्ञानमें सदा उत्पाद-विनाश होता रहता है । कभी ज्ञान बढ़ता है, कमी ज्ञान घटता है अत. सर्वथा नित्य नहीं है किन्तु उत्पादव्यय स्त्रम्प है । बौद्धमतवाला आत्माको ध्रौव्य स्वरूप नहीं मानता परंतु उसका यह [१०१] . मानना भी ठीक नहीं है क्योंकि यदि आत्मामें ध्रौव्यपना न माना जायगा तो "मैं वहीं हू जो बालक अवस्था में ऐसा था और कुमार अवस्थामें ऐसा था" यह जो प्रत्येक जीवको प्रत्यविज्ञान होता है सो नहीं होना चाहिये । यदि आत्माको सर्वथा उत्पादव्यय स्वरूप ही माना जायगा ध्रौव्यरूप न माना जायगा तो फिर लेन देनका व्यवहार वा धरोहर रखने और लेनेका व्यवहार कभी नहीं ो सकेगा परंतु ये सब व्यवहार होते है और "मैं वही हू" यह प्रत्यभिज्ञान सबको होता है। इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि आत्मा ध्रौव्यस्वरूप है । इस प्रकार आत्माका स्वरूप उत्पाद व्यय और ध्रौव्यम्वरूप बतला कर आचार्यने सांख्य- मीमांसक-योग और बौद्धका खडन कर दिया है। इसके सिवाय वह आत्मा अपने ज्ञानादिगुणों से सुशोभित होनेके कारण ही उसके निज स्वरूपकी प्राप्ति अथवा मोक्षकी प्राप्ति होती है | यदि आत्माको ज्ञानादिक गुण विशिष्ट न माना जायगा तो फिर उसके निज स्वरूपकी प्राप्ति वा मोक्षकी प्राप्ति मी कमी नहीं हो सकती ज्ञानावरणादिक कर्म आत्माके ज्ञाना- दिकगुणोंको ढक लेते हैं-उन कोंके नाश होनेसे वे ज्ञानादिक गुण प्रगट हो जाते है । इसीको निजस्वरूप अथवा मोक्षकी प्राप्ति कहते हैं । इससे सिद्ध होता है कि आत्मा को ज्ञानादिक गुण विशिष्ट माननेसे ही मोक्षकी प्राप्ति हो सकती है अन्यथा कभी नहीं हो सकती ! आगे यह आत्मा स्वयभू कैसे बनता है ? सो दिखलाते है- म त्वन्तर्बाह्यहेतुप्रभवविमलसद्दर्शनज्ञानचर्या, संपद्धेतिप्रघातक्षतदुरिततया व्यञ्जिताचिन्त्यसारैः।। कैवल्यज्ञानदृष्टिप्रवरसुखमहावीर्यसम्यक्त्वलब्धि,- ज्योतिर्वातायनादिस्थिरपरमगुणेरद्भुतैर्भासमानः ॥३॥ अन्वयार्थी- (स.) वह आत्मा ( अन्तर्वाह्यहेतुप्रभवविमलसदृर्शनज्ञान- चर्यासपद्धतिप्रघातक्षतरिततया) दर्शनमोहनीय आदि कर्म का क्षयोपसमादि- रूप अंतरंग कारण और गुरूपदेश आदि बहिरंग कारणों से उत्पन्न होनेवाले तथा निर्मल ऐसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, और सम्यक्चारित्र संपत्ति रूपी शस्त्र के प्रधात से ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अतराय आदि कमोंके नाश हो जानेसे ( व्यन्निताचिन्त्यसारैः ) जिनकामाहात्म्य अचिंत्य है ऐसे प्रगट हुये [१०२] - (कैवल्यज्ञानदृष्टिप्रवरसुखमहावीर्यसम्यक्त्वलब्धिज्योतिर्वातायनादिस्थिरपरमगुणै. अद्भुतैः भासमानः तु "स्वयम्भूः भवति" ) केवलज्ञान, क्षायिक सम्यक्त्व, अन- तसुख, अनन्तवीर्य, अनतदर्शन, मनतदान, अनतलाभ, अनतभोग, अनन्त उपभोग, भामंडल, चौसठ चमर और तीन छत्र आदि तथा आश्चर्यकारी अन- तकाल रहनेवाले दूसरे अनत गुणों से दैदीप्यमान स्वयम्भू होता है ॥ ३ ॥ भावार्थ:-दर्शनमोहनीयकर्मका उपशम क्षय और क्षयोपशम होना सम्यग्दर्शन उत्पन्न होनेके लिये अतरग कारण हैं तथा गुरुका उपदेश, जिन बि- बदर्शन, जातिस्मरण आदि बाह्य कारण हैं । इन अतरंग और बाहय कारणों के मिलनेसे सम्यग्दर्शन प्रगट होता है । सम्यग्ज्ञान उत्पन्न होनेके लिये दर्शनमोह- नीय और ज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशमादि होना अतरग कारण है और गुरुका उपदेश, स्वाध्याय, तीव्रबुद्धि आदि बाह्य कारण हैं । सम्यक्चारित्र उत्पन्न होने के लिये मोहनीयकर्मकाक्षयोपशमादिक अतरंग कारण है और गुरु उपदेश शरीर सहनन आदि बाह्य कारण है । इन अतरग और बहिरग कारणों के मिलनेसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र प्रगट होते है तथा कर्मोंके विशेप त्योपशम होनेसे ये सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र अत्यत निर्मल हो जाते हैं । इस प्रकार ये निर्मल सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र आत्माकी सपत्ति है । कर्मोंका नाश करनेके लिये यही रत्नत्रयरूप सपत्ति आत्माका शस्त्र है | इस रत्नत्रयरूप शस्त्र के प्रबल प्रहारसे घानिया कर्म रूपी पाप बहुत शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। यह आत्मा अपने रत्नत्रयरूप शस्त्रके प्रबल प्रहारसे जिससमय घातिया कोको नष्ट कर देता है उसी समय इस आत्माके केवलज्ञान, केवलदर्शन, अनतसुख, अत्यत निर्मल सम्यक्त्व, क्षायिकदान, क्षायिकलाभ क्षायिकभोग, क्षायिक उप- योग, यथाख्यातचारित्र, भामडल, चमर और आदि शब्द से छत्रत्रय आदि अनेक अनुपम विभूतिया प्राप्त होती है । ये ऊपर लिखी विभूतिया सिवाय घातिया को को नाश करनेवाले अरइंतोके अन्य किसीके भी प्राप्त नहीं हो सकती । इन विभू- नियोसे ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य, सम्यक्त्व आदि विभूतिया तो आत्मस्वभाव रूप हैं और वे शाश्वत-नित्य हैं । फिर उनका नाश कमी नहीं होता । वे शुद्ध मुक्त स्वरूप आत्माके साथ सदा बनी रहती हैं तथा भामण्डल, छत्र, चमर, सिंसासन आदि विभूतिया देवोपनीत है । वे शरीरके साथ तक रहती है । ये समस्त विभ- [ १०३ ] अनतसुख, अनतवीर्य - तिया अद्भुत है, इनका चितवन भी नहीं किया जा सकता। इन विभूतियोका माहात्म्य अचिंत्य हैं। वह अचिंत्य माहात्म्य स्पष्ट-प्रगट दिखाई देता है। जब यह आत्मा घातिया कोके नाश कर देने पर ऊपर लिखे अचित्य और परम गुणोंके द्वारा दैदीप्यमान होता है तमी यह आत्मा स्वयभू वा अरहंत बन जाता है। यह आत्मा किन २ कामोको करता हुआ स्वयभू होता है-यही बात आगे दिखलातेहैं:- जानन्पश्यन्समस्तं सममनुपरत संग्रतृप्यन्वितन्वन्, धुन्वन्ध्वान्तनितान्तं निचितमनुपम प्रीणयन्नीशभावम् । कुर्वन्सर्वग्रजानामपरमभिभवन् ज्योतिरात्मानमात्मा, आत्मन्येवात्मनासौ क्षणमुपजनयन्सत्स्वयम्भूः प्रवृत्तः॥४॥ अन्वयार्थी- (सत्स्वयम्भू प्रवृत्तः असौ आत्मा) स्वयम् अवस्थाको प्राप्त हुआ यह आत्मा (सम अनुपरत समस्त जानन् पश्यन् ) एकसाथ निरतर सम्पूर्ण लोकालोक को जानता और देखता रहता है, (संप्रतृप्यन् ) पूर्ण तृप्तिको प्राप्त हो जाता है, (वितन्वन् ) अनन्तकाल तक अपनी आत्मा में ही व्याप्त रहता है, (निचित नितान्त ध्वान्तं धुन्वन ) पहले उपार्जन किये हुए और घोर ऐसे मोह रूपी अधकार का पूर्णरूप से नाश कर देता है, (अनुपम प्रीणयन् ) बारह- सभामें बैठे हुए भव्यजीवो को अपने अमृत के समान वचनों से सतुष्ट करता है, (ईशभावं कुर्वन् ) तीनों लोकोंके प्रभुत्वको प्राप्त हुआ ( सर्वप्रजानां अपरमं ज्योतिः अभिभवन ) समस्त प्रजाके मध्यमें विराजमान होकर अपनी केवलज्ञान रूपी ज्योति के द्वारा दूसरे लोगों से माने हुये ईश्वर की ज्ञान रूप ज्योति को अथवा अपने प्रभामण्डल के द्वारा सूर्यक्रे प्रकाश को तिरस्कृत करता है, तथा यह स्वयभू स्वरूप आत्मा (आत्मानं ) अपने श्रात्मा के स्वरूपको (आत्मना) अपने ही आत्मा के द्वारा ( आत्मनिएव ) अपने ही आत्मा में ( क्षण उपजन- यन् ) प्रतिक्षण निमग्न रहते हुये अनुभव करता है । तात्पर्य-परोपदेश की अपेक्षा न करके स्वतः ही मोक्षमार्ग को जानकर और तद्रूप आचरण करके अनतज्ञानादिरूप अवस्था को प्राप्त होता है ॥४॥ भावार्थ:-स्वयंभू वा अरहंत होने पर यह अत्यंत शुद्ध आत्मा समस्त लोक- [१०] अलोकको एकसाथ निरंतर जानता और देखता रहता है । कृतकृत्य हो जाने के कारण पूर्ण तृप्तिको प्राप्त हो जाता है | अनतकाल तक अपने आत्मामें लीन रहता है अथवा केवलज्ञानके द्वारा अनतकाल तक समस्त लोकालोकको जानता और देखता रहता है। मोहरूपी घोर अधकार को उसी समय पूर्णरूपसे नष्ट कर देता है। अपनी समवशरण रूप सभामें किंवा गंधकुटीरूप सभामें अमृतके समान दिव्यध्वनि रूपी वचनोंके द्वारा कल्याणमय उपदेश देकर भन्यजीवोंको अत्यत सतुष्ट करता है उनको अत्यंत आनदित करता है। तीनों लोकोका प्रभुत्व प्राप्त करता है तथा समस्त प्रजाके मध्यमें विराजमान होकर अपने केबल- ज्ञानके द्वारा अन्य लोगोंके द्वारा माने हुये ईश्वरके ज्ञानरूप तुच्छ ज्योतिको तिर- स्कृत करता है तथा अपने शरीर की अनुपम कानिसे सूर्यके प्रकाशको तिरस्कृत करता है। इसप्रकार ज्ञाता-दृष्टा तथा ऊपर लिखे अनुसार अपने आत्मस्वभाव को सिद्ध करनेवाला यह अरहंतरूप शुद्ध आत्मा अपने आत्माके स्वरूप को अपने ही आत्माके द्वारा अपने ही आत्मामें प्रतिक्षण निमग्न करता रहता है फिर वह अपने आत्माको अन्य किसी भी पदार्थमें नहीं लगाता इसप्रकार वह शुद्ध आत्मा विना किसी दूसरेके उपदेशकी अपेक्षाके अपने आप मोक्षमार्गको जानकर तथा उस मोक्षमार्गका अनुष्ठान कर अनन्त ज्ञानस्वरूप हो जाता है । उस समय उस परमशुद्ध आत्माको स्वयभू कहते हैं । जो अपने आप हो ( स्वय भवतीति स्वयभू.) उसको स्वयभू कहते हैं । यह आत्मा भी अपने ही रत्नत्रय रूप गुणो के द्वारा अनन्तज्ञानी हुआ है-अरहत हुआ है । इसलिये भगवान् मरहत देव को स्वयभू कहते हैं। यह स्वयंभू अवस्थाको प्राप्त हुआ आत्मा अतमें सिद्ध वा मुक्त होता है । यही बात आगे आचार्य दिखाते हैं: छिंदन शेषानशेषान्निगलबलबलीस्तैरनतस्वभावैः, सूक्ष्मत्वाग्र्यावगाहागरुलघुकगुणैः क्षायिकैः शोभमानः ॥ अन्यैश्वान्यव्यपोहप्रवणविषयसंप्राप्तिलब्धिप्रभावै- रूज़व्रज्याखभावात्समयमुपगतो धाम्नि संतिष्ठतेऽध्ये ॥५॥ अन्वयार्थी:--(शेषान् अशेषान्निगलबलकलीन् ) भगवान अरहतदेवके जो बाकीके अघातिया कर्म लगे हुये हैं वे भी वेड़ियों के समान अत्यत कठिक [१०५] है ऐसे वेदनीय, नाम, गोत्र और आयु कर्म की मूल उत्तर समस्त प्रकृतियो को (छिंदन ) विदीर्ण करते हुये ( सर्वदा नाश करते हुये ) (तै.अनन्तस्वभावैः) वे भगवान अनन्तस्वभाव को धारण करनेवाले सम्यग्दर्शन, ज्ञान आदि गुणो से (शोभमान ) शोभायमान होते हैं, इसके सिवाय ( क्षायिकैः सूक्ष्मत्वाग्याव- गाहागुरुलघुकगुणै: "शोभमानः" ) समस्त कर्मोक अत्यंत क्षय होनेसे उत्पन्न होनेवाले सूक्ष्मत्व, अवगाहनत्व और अगुरुलघुत्व आदि परमगुणों से भी वे भग- वान् शोमित होते हैं, (न्यै. चान्यव्यपोहप्रवणविषयसंप्राप्तिलब्धिप्रभावैः ) इन गुणो के सिवाय उत्तरोत्तर समस्त कर्म प्रकृतियों के नाश होनेसे जो आत्मा की विशुद्धता और आत्मा का निजस्वभाव प्रगट होता है उससे जिनका माहात्म्य वा प्रभाव खूब बढ़ गया है ऐसे चौरासी लाख उत्तरगुणों से भी वे भगवान सुशो- मित होते हैं । ( ऊवं व्रज्यास्वभावात ) शुद्ध आत्मा का स्वभाव ऊर्ध्वगमन करना है, अतः समस्त कर्मोके नाश होने पर (समयमुपगतः) उसी ससयमें उसी कालके सबसे छोटे भागमें वे भगवान् (धाम्नि अग्र्ये ) लोकाकाशके अग्र. भाग पर ( सतिष्टते ) जा विराजमान होते है । भावार्थ:-जिस मनुष्य शरीरसे यह जीव मुक्त होता है वह उस जीवका अतिम शरीर कहलाता है, उसको चरमशरीर कहते है । मुक्त होनेपर इस जीवका आकार चरमेशरीरके आकारसे मिन्न आकारका नहीं हो सकता, न तो वह समस्त लोकमें व्यापक ही हो सकता है और न वटवृक्षके वीजके समान अणु- मात्र हो सकता है, क्योंकि वहा पर आकार बदलनेका कोई कारण नहीं है किंतु अतिम शरीरके परिणामसे कुछ कम आकार होने कारण है और वह यह है कि मसार परिभ्रमणमें इस जीवका आकार कमोंके उदयसे बदलता था, भव कर्मो के नष्ट हो जानेसे आकार बदलनेवाला कोई कारण नहीं रहा । इसलिये मुक्त अवस्थामे जीवका आकार अतिमशरीरके आकार ही रहता है । तथा उसका परि- णाम अतिमशरीरसे कुछ कम रहता है। क्योंकि शरीरके जिन २ भागोमें आत्मा के प्रदेश नहीं है-उतना परिमाण घट जाता है। शरीरके मीतर पेट नाक कान श्रादि भाग ऐसे हैं जिनमें (पोलेभागमें ) आत्माके प्रदेश नहीं है । इसीलिये आचार्य कहते हैं कि अन्य ऐसे कारण है जिनसे यह सिद्ध हो जाता है कि मुक्त जीवका परिमाण अतिम शरीरके परिमाणसे कुछ कम है । यह कमी आकारकी [१०६] जरा अपेक्षासे है नहीं ही कितु घनफलकी अपेक्षासे है । तथा मुक्त अवस्थामें जीवका आकार अंतिम शरीरके आकारके समान अत्यत दैदीप्यमान रहता है । "एव" शब्द निश्चयवाचक है और 'हि" शब्द स्पष्टता सूचित करनेके लिये है । इससे सिद्ध होता है कि मुक्त अवस्थामें जीवका आकार अतिम शरीरके आकार है । तथा उसका परिमाण अंतिम शरीरसे कुछ कम है । मुक्त जीवका यह माकार व यह परिमाण निश्चित है, स्पष्ट है | इसके सिवाय अन्यकोई आकार तथा अन्यकोई परिमाण हो ही नहीं सकता। इसके सिवाय मुक्त अवस्थामें वह आत्मा अमूर्ति रहता है । रूप रस गंध स्पर्श और शब्द रूप पुद्गल परिणति को मूर्ति कहते हैं । ऐसी मूर्ति जिसके न हो उसे अमूर्ति कहते हैं । सिद्धोंमें रूप रस गन्ध स्पर्शरूप मूर्ति नहीं है | अतः वे अमूर्ति स्वरूप है । अथवा अमूर्त भी पाठ है, जिनके रूप रसादि रूप मूति हो उनको मूर्त कहते है तथा जिनके ऐसी मूर्ति न हो उनको अमूर्त कहते हैं। उन सिद्ध परमेष्ठी की परिणति रूप रस गध स्पर्श स्वरूप नहीं है, इन से सर्वथा रहित है । अत: वे अमूर्त हैं। इसके सिवाय वे भगवान तुधा, तृषा, श्वास, कास, ज्वर, मरण, (बुढ़ापा) अनिष्ट योग, मोह, अनेक प्रकारकी आपत्तिया, तथा इनको आदि लेकर और भी अनेक प्रकारके घोर दुख जिससे उत्पन्न होते हैं ऐसे ससारके परिभ्रमणको उन सिद्ध भगवान ने नाश कर दिया है, अथवा कोंके नाश होने से वह संसार अपने आप नष्ट हो गया है । उस ससारके नष्ट होनेसे सिद्धोंको जो मनन्त सुखकी प्राप्ति हो गई है उस सुखका परिमाण भला कौन कर सकता है ? भर्थात् कोई नहीं । सिद्धोका सुख अनन्त है । उसका परिमाण कमी किसी से नहीं हो सकता। आगे सिद्धोंका वह सुख कैसा है सो दिखलाते है:- अन्याकाराप्तिहेतुर्न च भवति परो येन तेनाल्पहीनः । प्रागात्मोपात्तइहप्रतिकृतिरुचिराकार एव ह्यमूर्तः ।। क्षुत्तृष्णाश्वासकासज्वरमरणजरानिष्टयोगप्रमोह- व्यापत्य धुपदुःखप्रभवभवहतेः कोऽस्य सौख्यस्य माता ॥ ६॥ अन्वयाथों-(येन अन्याकाराप्तिहेतुः न च भवति पर ) क्योकि मुक्तजीव को पुरुषाकारपना छोड़कर दूसरे आकारकी प्राप्ति का कारण नहीं रहने से वह [ १०७] आत्मा (तेन अल्पहीनः प्रागात्मोपात्तदेहप्रतिकृतिरुचिराकारः हि अमूर्तः एव "भवति" ) पहले प्राप्त किये हुये चरम शरीरके आकार का परन्तु उस शरीर से किंचित न्यून, मनोहर और अमूर्त ( रूप, रस, गध और स्पर्श से रहित ) आकार का रहता है। तथा (सुन्तृष्णाश्वासकासज्वरमरणजरानिष्टयोगप्रमोह- व्यापल्याद्युप्रदुःखप्रभवभवहतेः) भूख, प्यास, श्वास,कास (खासी) ज्वर, मरण, वुढ़ापा, अनिष्टसम्बंध, अतिशयमोह और नाना प्रकार की आपत्ति आदि भयं- कर दुःखोंको उत्पन्न करनेवाले संसारका नाश हो जाने से (अस्य) सिद्ध पर- मेष्ठी के (सौख्यस्य) सुखकी.(माता) मर्यादा का प्रमाण (कः) कौन कर सक्ता है ? अर्थात् कोई भी नहीं कर सकता है कारण कि वे सिद्ध भगवान अनंत सुखके भोक्ता हैं ॥ ६॥ भावार्थ:-भगवान अरहतदेवके जो बाकीके अघातिया कर्म लगे हुये हैं मी वेडीके समान अत्यंत कठिन हैं। ऐसे वेदनीय नाम गोत्र और आयु कर्मकी मूल उत्तर समस्त प्रकृतियोंको विदीर्ण करते हुये-सर्वथा नाश करते हुये वे भग- वान अनन्तस्वभाव को धारण करनेवाले सम्यग्दर्शन ज्ञान आदि गुणोंसे शोभा- यमान होते है। इसके सिवाय समस्त कर्मोके अत्यतक्षय होनेसे उत्पन्न होनेवाले सूक्ष्मत्व, अवगाहनत्व, और अगुरुलघु आदि परमगुणों से भी वे भगवान सुशोमित होने है। इन गुणोंके सिवाय उत्तरोत्तर समस्त कर्म प्रकृतियोंके नाश होनेसे जो आत्मा की विशुद्धता और आत्माका निजस्वभावप्रगट होता है उससे जिनका माहा- त्म्य वा प्रभाव खूब बढ़ गया है ऐसे चौरासी लाख उत्तरगुणोसे मी वे भगवान सुशोमित होते है । शुद्ध भात्माका स्वभाव ऊर्ध्वगमन करना है-इसलिये समस्त कर्मोके नाश होने पर उसी समयमें उसी कालके सबसे छोटे भागमें वे भगवान लोकाकाशके अप्रभाग पर जा विराजमान होते है। आगे बतलाते हैं कि सिद्ध अवस्थामें आत्माका परिमाण कितना रहता है? अतिम शरीरसे कम रहता है या अधिक ? आत्मोपादानसिद्ध स्वयमतिशयबद्वीतबाध विशालं, वृद्धिहासव्यपेतं विषयविरहितं निःप्रतिद्वन्दभावम् ॥ [१०८] अन्यद्रव्यानपेक्षं निरुपमममितं शाश्वतं सर्वकालं, उत्कृष्टानन्तसारं परमसुखमतस्तस्य सिद्धस्य जातम् ॥ ७ ॥ अन्वयार्थों-क्योंकि वे सिद्धपरमेष्ठी तुधादिवाधा से रहित (अतः) इसलिये (तस्यसिद्धम्य ) उन सिद्धोके (स्वय आत्मोपादानसिद्ध ) स्वयं आत्मा- रूप उपादान कारणसे उत्पन्न होनेवाला, (अतिशयवत् ) परम अतिशयरूप अवस्थाको प्राप्त, (वीतबाध ) बाधारहित, ( विशालं ) सम्पूर्ण आत्मा के प्रदेशो में व्याप्त होकर रहनेवाला, (वृद्धिहासव्यपेतं ) उत्कर्ष और अपकर्षसे रहित, (विषयविरहित ) इन्द्रियजन्य विषयों की अपेक्षा न करनेवाला, (नि प्रतिद्वन्दभाव) प्रतिद्वन्दभाव रूप दुःखसे रहित, (अन्यद्रव्यानपेक्ष ) सातावेदनीय आदि दूसरे पदार्थों की अपेक्षा नहीं करनेवाला, (निरुपम)उपमारहित, (अमित) अनत, (शाश्वत ) अविनश्वर, (सर्वकाल ) सर्वकालमें एकरूप रहनेवाला, ( उत्कृष्टा- नन्तसारं) परमप्रकर्ष अवस्थाको प्राप्त और मर्यादारहित माहात्म्यवाला (परम- मुख) उत्कृष्टसुख ( जात ) उत्पन्न होता है ॥ ७॥ भावार्थ -भगवान् सिद्धपरमेष्ठीके जो सुख होता है वह केवल आत्मासे ही उत्पन्न होता है। अन्य किसी प्रकृति आदिसे उत्पन्न नहीं होता, अतः वह सुख अनित्य नहीं होता। वह सुख स्वयं अतिशय युक्त होता है । समस्त बाधाओसे रहित होता । अत्यत विशाल वा विस्तीर्ण होता है-आत्माके समस्त प्रदेशों में व्याप्त होकर रहता है । वह सुख न कमी घटता है न बढ़ता है । बृद्धि और हास दोनोंसे रहित होकर है। जिसप्रकार ससारिक सुख विषयोंसे उत्पन्न होता है उसप्रकार वह सिद्धों का सुख किसी विषयसे उत्पन्न नहीं होता, किन्तु सब प्रकार के विषयोसे रहित स्वाभाविक होता है। सुखका प्रतिद्वन्दी दुःख है । उन दु खो से वह सर्वथा रहित है । संसारी जीवोका सुख दुःखोसे मिला हुआ है परंतु सिद्धों को सुख सदा सुखरूप ही रहता है। ससारी जीवोंको सुख सातावेदनीयकर्मके उदयसे होता तथा पुष्पमाला, चदन, भोजन आदि बाह्य सामग्रीसे उत्पन्न होता है परंतु सिद्धोका सुख अन्य किसी द्रव्यकी अपेक्षा नहीं रखता है । वह सिद्धों का सुख उपमा रहित है । मनन्त है । विनाश रहित है। और इसीलिये वह सदा बना रहता है । उस सुखका माहात्म्य परमोत्कृष्ट है और अनन्तकालतक रहता हे । वह सुख परमसुग्व कहलाता है अर्थात् इन्द्रादिकसे भी अत्यत अतिशययुक्त [१०] वा बढ़कर है । जिन सिद्धोंका लक्षण ना उनके गुण पहले निरूपण कर चुके हैं और जो लोकाकाशके अग्रभाग पर विराजमान हैं ऐसे सिद्धोंका अनतसुख ऊपर लिखे अनुसार होता है। अभिप्राय यह है कि सिद्धोंका सुख संसारी जीवोंके सुखोंसे अत्यत विलक्षण है। सिद्धोंका सुख वास्तविक सुख है और इसीलिये वह सर्वोत्तम है । सासारिक सुख अन्नादिक साधनोंसे उत्पन्न होता है परंतु सिद्धोंका सुख किसी भी साधनकी अपेक्षा नहीं रखता । आगे यही दिखलाते हुए प्राचार्य कहते हैं: नार्थः क्षुत्तटविनाशाद्विविधरसयुतैग्नपानरशुच्या, नास्पृष्टगन्धमाल्यैर्न हि मृदुशयनानिनिद्राधभावात् ।। आतङ्कातेरेभावे तदुपशमनसद्भेषजानर्थतावद्, दीपानर्थक्यवद्वा व्यपगततिमिरे दृश्यमाने समस्ते ॥ ८॥ अन्वयार्थों:-(जुत्तृविनाशात् ) क्षुधा और तृषा के नाश हो जाने के कारण सिद्धपरमेष्ठी को ( विविधरसयुतैः अन्नपानैः ) नाना प्रकारके रसमिश्रित अन्न पानकी (अर्थः न ) कोई आवश्यक्ता नहीं है । (अशुच्या. अस्पृष्टेः) अशुचि के अभाव हो जानेके कारण ( गन्धमाल्यैः न ) सुगन्धित पदार्थों की और पुष्पोंकी आवश्यकता नहीं है । । (ग्लानिनिद्राधभावात् ) ग्लानि और निद्रा आदि दोपोंके अभाव हो जाने के कारण (हि) निश्चयसे (मृदुशयनैः अर्थः न) कोमल शय्याकी आवश्यकता नहीं है । (व्यपगततिमिरे) जिस प्रकार अंधकार के नष्ट हो जाने पर (वा समस्ते दृश्यमाने) और सम्पूर्ण पदार्थ स्पष्ट दीखने पर ( दीपानर्थक्यवत् ) दीपक की कोई आवश्यकता नहीं रहती है उसी प्रकार (आतङ्कातेरभावे ) भयंकर रोगादिके कारण होनेवाली पीड़ा के अभाव होनेपर (तदुपशमनसद्भपजानर्थतावत् ) उसको शात करनेवाली औषधि आदि की कोई भावश्यकता नहीं लगती है। तात्पर्य-सिद्ध जीवोंका सुख आत्मोत्थान होने के कारण बाह्य पदार्थो की आवश्यकता नहीं पड़ती है ॥८॥ ताकमम्पत्समेता विविधनयतपः संयमज्ञानदृष्टि,- चर्यासिद्धाः समन्तात्पविततयशसो विश्वदेवाधिदेवाः ।। [११०] भृता भव्या भवन्तः सकलजगति ये स्तूयमाना विशिष्टः, तान्सर्वान्नौम्यनंतानिजिगमिपुररं तत्वरूपं त्रिसन्ध्यम् ॥६॥ अन्वयार्थी - (ये तादृक् सम्यत्समेताः ) जो अनन्तज्ञानादि सम्पत्ति से युक्त, (विविधनयतपः सयमज्ञान दृष्टिचर्यासिद्धाः) नैगमादिक नानाप्रकार के नय, बारह तप,सामायिकादि पाच सयम, मतिज्ञानादि पाचज्ञान,तत्त्वार्थ श्रद्धान- लक्षण सम्यग्दर्शन और तेरहप्रकारका चारित्र, इन सबके निमित्तसे कृतकृत्य अवस्थाको प्राप्त, (समन्तात्मविततयशसः ) जिनका यश तीनों लोकोमे व्याप्त है, ( विश्वदेवाधिदेवाः ) जो सम्पूर्ण देवोके देव हैं, ( विशिष्टैः स्तूयमानाः) जिनकी भन्यजीव स्तुति करते हैं ऐसे ( भूताः भव्या भवन्त ) पहले जो हो गये, वर्त- मानकालमें होते हुये और आगामी कालमें होने वाले (सकलजगति) सम्पूर्ण जगतके जो सिद्ध है (तान् अनन्तान् सर्वान् ) उन अनन्त सर्व सिद्धो को (तत्म्वरूप निजिगमिपुर,) उनके अनन्तगुणोको प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवाला मे (त्रिसन्ध्य) तीनों काल (नौमि ) वंदना करता हू (नमस्कार करता हू) ॥१॥ भावार्थ:-जिसप्रकार किसी जीवके प्राण हरण करनेवाली व्याधि की कोई पीड़ा वा दुःख न हो तो फिर उसके लिये पीडाको शात करनेवाली किसी भी श्रेष्ठ प्रौपधिकी आवश्यकता नहीं होती अथवा जिस समय अधकार का सर्वथा अभाव हो और समस्त पदार्थ स्पष्ट दिखाई दे रहे हो उस समय दीपककी कोई प्राव- श्यकता नहीं होती। उसी प्रकार उन सिद्ध भगवान् के तुधा और तषाका सर्वथा नाश हो गया है इसलिये उनको अनेक प्रकारके रसोंसे परिपूर्ण ऐसे अन्नजलकी कोई आवश्यकता नहीं होती तथा सिद्धोंके किसी भी प्रकारकी अपवित्रताका स्पर्श नहीं होता इसलिये उनको केशर वा चन्दन वा पुष्पमाला आदिकी कोई आव- ज्यकता नहीं होती। इसी प्रकार उन सिद्ध भगवानके ग्लानि वा थकावटका सर्वथा अभाव है, निद्राका सर्वथा अभाव है, और ज्वराठिक रेगोका सर्वथा अभाव है । अत: उन्हे कोमलशय्याकी भी कोई आवश्यकता नहीं होती। अर्थात् सिद्धोंका सुख ससारी जीवोंके सुख के समान भोगोपभोग की सामग्री से उत्पन्न नहीं होता, अतः उनके सुखमें किसी भी बाह्य सामग्रीकी आवश्य- कता नहीं होती। उनका सुख स्वाभाविक सुख होता है और केवल स्वात्मजन्य [१११] होता है । इसलिये वह सदा एकसा अनंत स्वरूप बना रहता है। आगे सिद्धोंका स्वरूप कहते हुये उनको नमस्कार करते है- -आर्या- कुत्वा कायोत्सर्ग चतुरष्टदोपविरहितं सुपरिशुद्धम् । अतिभक्तिसंप्रयुक्तो यो वंदते स लघु लभते परमसुखम् ।। अन्वयार्थों-(चतुरष्टदोषविरहित ) बत्तीसदोषरहित (कायोत्सर्ग) कायो- सर्गको (कृत्वा ) करके (य.) जो (अतिभक्तिसंप्रयुक्तः) अत्यंत भक्ति सहित (सुपरिशुद्ध ) शुद्धात्म स्वरूप परमेष्ठ को (बदते) वदना करता है (सः) वह (लघु) शीघ्र ( परमसुख ) परमसुख (मोक्ष) को (लभते ) प्राप्त करता है। भावार्थ-वे सिद्ध भगवान् अनत ज्ञान आदि अनेक उत्तम गुणोंसे सुशो- भित है । नैगम, संग्रह आदि अनेक प्रकारके नयोके द्वारा कृतकृत्य हो चुके हैं, अनशन आदि बारह प्रकारके तपश्चरणके द्वारा कृतकृत्य हो चुके है, सामायिक आदि पाच प्रकारके सयमसे कृतकृत्य हो चुके हैं, मतिज्ञान आदि पांच प्रकारके ज्ञानोंसे कृतकृत्य हो चुके है, तत्वोंके श्रद्धान करने रूप सम्यग्दर्शनके द्वारा कृत- कृत्य हो चुके हैं और तेरह प्रकारके चारित्रके द्वारा कृतकृत्य हो चुके हैं । इसके सिवाय उनका यश चारों ओर फेल रहा है, वे समस्त देवोंके अघिदेव वा स्वामी कहे जाते हैं और तीनों लोकोंमें समस्त भव्य जन जिनको सदा नमस्कार करते रहते हैं अथवा जिनकी स्तुति करते रहते हैं ऐसे भूतकाल में होनेवाले, भविष्यत् कालमें होनेवाले और वर्तमानकालमें होनेवाले समस्त अनन्तानन्त सिद्धोंको मै उन सिद्धोंके स्वरूपको बहुत शीघ्र ही प्राप्त करनेकी इच्छासे प्रात काल मध्याह्न- काल और सायंकाल तीनो समय नमस्कार करता हूं। सिद्धपरमेष्ठी अनन्तनानी है, कृतकृत्य है, देवाधिदेव है और इन्द्र चक्रवर्ती तीर्थंकर आदि समस्त महापुरुषोंके द्वारा बदनीय है ऐसे समस्त सिद्धोंको मैं उनके स्वरूपकी प्राप्तिके लिये नमस्कार करता हूँ। इच्छामि भंते सिद्धिमत्ति काउस्साग्गो कओ तस्सालोचेउं सम्मणाण. सम्मदसण सम्पचारित्तजुत्ताणं अविहकम्मविप्पमुक्काणं अद्वगुणसंपएणाणं , उडलोयमभयम्मि पट्टियाणं तवसिद्धाणं णयसिद्धाणं संजमसिद्धाणं अती- ताणागढवट्टमाणकालत्तयसिद्धाणं सवसिद्धाणं मया णिचकालं अंचेमि वढामि [११२] पूजेमि णमंस्सामि दुक्खवओ कम्मक्खाओ बोहिलाओं सुगइगमणं समाहि मरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्मं ।। छाया-इच्छामि भगवन् सिद्धभक्ति कायोत्सर्गः कृतस्तमालोचयितु सम्य- ग्ज्ञानसम्यग्दर्शनसम्यक्चारित्रयुक्तान् अष्टविधकर्मविप्रयुक्तान् अष्टगुणसंपन्नान् ऊर्ध्वलोकमस्तकास्थितान तप सिद्धान् नयसिद्धान् सयमसिद्धान् चरित्रसिद्धान् अतीतानागतवर्तमानकालत्रयसिद्धान् सर्वसिद्धान् सदा नित्यकाल अर्चामि वंदे पूजये नमस्यामि दुःखक्षयः कर्मक्षयः बोधिलाभः सुगतिगमन समाधिमरणं जिन गुणसम्पत्तिर्भवतुमह्यम् ॥ अर्थ:--हे भगवन् ! सिद्धभक्ति करनेके अनन्तर जो मैने कायोत्सर्ग किया है उसमें लगे हुये दोपोकी आलोचना करने की मै इच्छा करता हू ।जो सिद्धभग- वान सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र सहित हैं, पाठों कर्मोसे रहित हैं, सम्यक्त्व आदि आठ गुणोंसे सुशोभित हैं, जो ऊर्ध्वलोकके मस्तकपर जाकर विराजमान है, जो तपश्चरणसे सिद्ध हुये है, नयोंसे सिद्ध हुये हैं, सयमसे सिद्ध हुये हैं, चारित्रसे सिद्ध हुये हैं, जो भूतकाल, भविष्यत्काल और वर्तमानकाल तीनों कालोंसे सिद्ध हुये है ऐसे सिद्धोंकी मै सदा हर समय पूजा करता हू, वदना करता हू, अर्चा करता हूं और नमस्कार करता हू । मेरे दुःखोंका नाश हो कर्मों का नाश हो, मुझे रत्नत्रयकी प्राप्ति हो, श्रष्ठेगतिकी प्राप्ति हो, समाधिमरणकी प्राप्ति हो और भगवान जिनेन्द्रदेवके गुणोंकी प्राप्ति हो । . ॥इति सिद्धभक्तिः॥ अथ सिद्धभक्तिः [ प्राकृत] अविहकम्ममुक्के अवगुणढे अणोवमे सिद्धे । अहमपुढविणिविठे णिष्टि- यकज्जे य वंदिमो णिच्चं ॥१॥ तित्थयरेदरसिद्ध जलथलआयासणिव्वुदे सिद्धे । अंतयडेदरसिद्ध उक्कस्सजहण्णमज्झिमोगाहे ॥२॥ उलमहतिरिय- [११३] लोए छविकाले य णिब्बुदे सिद्ध । उबसग्गणिस्वसग्गे दीवोदहिणिबुदे य बंदामि ।। ३ ।। पच्छायडेय सिद्ध दुगतिगचदुणाण पंचचदुरजमे । परि- वडिदापरिवडदे सजेमसम्मत्तणाणमादीहिं॥ ४॥ साहरणासाहरणे सम्मु- . ग्वाददर य णिधादे । ठिठपलियंक्रणिमण्णे विगयमले परमणाणगे बंद ॥ पुवेद वेढता जे पुरिसा खरगसेढिमारूढा । सेसोदयेण वि तहा ज्याणुव- जुत्ता य ते दु सिग्यति । पत्तेयसयं बुद्धाबोहियबुद्धा य होति ते मिद्धा। पायं पन्तय समये समयं पणिवदामि ॥ ७ ॥ पणणवदु अठवीसा चढ- तियणवदीय दोणि पचेव । बावण्णहीणवियसय पयडिविणासेण होति ते सिद्धा ।। ८ । अइमयमचावाह सोक्षमणंत अणोत्रमं परमं । इंदियविस- यातीदं अप्पत्तअच्चत्र च ते पत्ता ॥ ॥ लोयग्गमययत्था चरमसरीरेण ते हु किंचणा । गयसित्थमृसगम जारिस आयार तारिमायारा ॥१०॥ जग्मग्णजम्मरहिया ते सिद्धा मम सुमत्तिजुत्तस्य । दतु वरणाणलाहं चुह- यण परिपत्थणं परमसुध ।। ११ ॥ किच्चा काउस्सग्ग चउग्य दोसविर- हियं सुपरिसुद्धं । अइभचिसंपउचो जोवनड़ लहु लहइ परममुह ॥ १२ ॥ संसारचक्रगमनागतिविप्रमुक्तान् । नित्यं जगमग्णजन्मविकारहीनान् ।। देवेन्द्र दानवगणेभिपूज्यमानान् । सिद्धॉस्त्रिलोकमहितान् शरणं प्रपद्य ॥ १ ॥ अमरीगजीवपणा उवजुत्ता दंसणे य णाणे य । सायारमणायाग लक्खणमेयं तु सिद्धार्ण ॥ २ ॥ मूलुत्तरपयडीणं बंधोदयमत्तकम्मउम्मुक्का । मंगलभूटा मिद्धा अगुणातदिसंसारा ।। ३ ।। अट्टविहकम्मचियला सीदी- भृदा णिरंजणा णिचा | अटणा किडकिचा लोयग्गणिवामिणो सिंद्धा ॥ ४ ॥ मिद्धा हमला विसुद्धबुद्धीय लद्धमभावा । तिहुयणसिरसेह- ग्या पसियनु भंडारया मन्चे ।। ५ ।। गमणागमणविमुक्के विहडियकम्मट्ट- फ्याडिसंघाए । माययमुहसंपले ते सिद्धा वंदियो पिच्चं ॥ ६ ॥जयमंगल भृदाणं विमलाण णाणलंसणमयाणं । तइलोयसेहगण णमो सया मब्वसि- हापम् ॥ ७ ॥ ममत्त णाण इसण वीरियसुहुमं तहेव अवगहणं । अगु- रुलहुमबाबाहं अगुणा ति सिद्धाणं ॥८॥ तवमिधे गय.सद्धे संज- मगिद्ध चरित्तासिद्ध य । णाणम्मि दंगणम्मिय सिद्ध सिरमा णमंमामि [११] .

कृत्वा कायोत्सर्ग चतुरष्टदोषविरहितं सुपरिशुद्धम् । अतिभक्तिसंप्रयुक्तो यो वदते स लघु लभते परमसुखम् ॥ १॥ इच्छामि भंते सिद्धिभचि काउ. स्सग्गोकओतस्सालोचेउं सम्मणाणसम्मदमणसम्मचारित्तजुत्ताणं अट्ठविह- कम्मविप्पमुक्काणं अटुगुणसंपण्णाणं उडलोयमच्छ्यम्मि पहियाणं तवसि- द्वाणं णयसिद्धाणं संजमसिद्धाणं अतीताणागदवट्टमाणकालत्तयसिद्धाणं मनसिद्धाणं सया णिच्चकालं अंचेमि चंदामि पूजेमिणमस्सामि दुक्खक्खो कम्मक्खओ चोहिलाहो सुगइगमणं समाहिमरणं जिणगुणसंपति होउ मज्झ । - श्री श्रुतभक्तिः ॥ स्तोष्ये संज्ञानानि परोक्षप्रत्यक्षभेदभिन्नानि । लोकालोकविलोकनलोलितसल्लोकलोचनानि सदा ॥१॥ अन्वयार्थ-(लोकालोकविलोकनलोलितसल्लोकलोचनानि) लोक और 'अलोकको देखनेके लिये उत्कण्ठित हुये सम्यग्दृष्टियोंके लिये लोचन [ नेत्र ) ममान (परोक्षप्रत्यक्षमेदभिन्नानि ) परोक्ष और प्रत्यक्ष इसप्रकार दो भेदरूप- मति, श्रुत, [ परोक्ष ] अवधि, मनः पयर्य, [विकलप्रत्यक्ष] और केवलज्ञान सिक- लप्रत्यक्ष] (सज्ञानानि ) इन पाच नामक सम्यग्ज्ञानोंकी मै ( सढा) सर्वदा ( स्तोध्ये) स्तुति करता हूँ। भावार्थ-सम्यक् (ज्ञान ) कहनेसे मिथ्याज्ञानका निषेध हो जाता है । लोकाकाशमें भरेहुए जीव अजीव आदि समस्त पदार्थों को प्रकाशित करनेवाला एक सम्यग्ज्ञान है । इसीलिये मै सम्यग्ज्ञानकी स्तुति करता है। मतिज्ञानकी स्तुति अभिमुखनियमितबोधनमाभिनियोधिकमनिन्द्रियेन्द्रियज । बह्वाद्यवग्रहादिककृतट्विंशतिशतभेदम् ।। २ ।। विविधर्द्धिबुद्धिकोष्ठस्फुटबीजपदानुसारिबुद्धियधिकं । संभिन्न श्रोतृतया सार्थ श्रुतभाजनं वन्दे ।। ३ ।। ।११५] अन्वयार्थ--(अमिमुखनियमितबोधन) योग्य देश और योग्यकाल में स्थित नियमित पदार्थको जाननेवाले ज्ञानको (भामिनिवोधिक) आभिनिवोधिक-मति- ज्ञान कहते हैं, वह मतिज्ञान (अनिन्द्रियेन्द्रियज) पाच इन्द्रिय और मनसे उत्पन्न होता है तथा (बह्वाद्यवग्रहादिककृतषट्त्रिंशत् त्रिशतभेद) बहु बहुविध आदि वारह प्रकार के पदार्थोका अवग्रहादि रूप ज्ञान होनेसे तीनसौ छत्तीस (३३६) भेद वाला है उसको (वन्दे ) वदना करता हू तथा ( विविधर्द्धिबुद्धिकोष्ठस्फुट- वीजपदानुसारिबुद्धयधिक) नानाप्रकारकी ऋद्धि कोष्ठबुद्धि, वीजबुद्धि, पदानु- सारिणी बुद्धिरूप और ( समिन्नश्रोतृतया साधं ) सभिन्न श्रोतृताबुद्धि सहित ( श्रुतभाजन) श्रुतज्ञानको (वदे ) मैं वंदना करता है। भावार्थ.-मतिज्ञानको आमिनिबोधिक ज्ञान कहते हैं । लिखा भी है- "मतिः स्मृति. सज्ञाचिंताभिनिबोध इत्यनान्तरम्" अर्थात् मति, स्मृति, संज्ञा (प्रत्य भिज्ञान) चिंता (तर्क) आमिनिबोध (अनुमान ) ये सब एक ही मतिज्ञानके वाचक है। यह आभिनिबोधिक संज्ञा सार्थक है । जानके लिये जो योग्य देश, काल और ग्रहणकरने योग्य सामग्री है उसको 'अमि' कहने हैं। 'नि' शब्दका अर्थ नियम है । जैसे-चतुके द्वारा रूपका ज्ञान होता है, नाकके द्वारा गंधका ज्ञान होता है, कानके द्वारा शब्दका ज्ञान होता है, जिहासे रस का ज्ञान होता है, स्पर्शन इन्द्रियसे स्पर्शका ज्ञान होता है । इन सबका पृथक् पृथक् इन्द्रियोंसे जो नियमित रीनिसे ज्ञान होता है उसको निबोध' कहते हैं। इसप्रकार योग्य स्थान- पर योग्यकालमें निर्दोष इन्द्रियोंमे जो पदार्थोंका ज्ञान होता है उसको मतिज्ञान कहते हैं। मतिज्ञानके भेद- अवग्रह, ईहा, अवाय, धारणा ये चार भेद हैं । इनमेंसे प्रत्येकके बहु, बहु- विध, एक, एकविध, शीघ्र, देरसे, निःसृत (प्रगट) अनिःसृत (अप्रगट ) उक्त, अनुक्त, ध्रुव, मध्रुव ये बारह विषय होते हैं । इस हिसावसे (१२४४=४८) अड़- तालीस भेद हो जाते हैं। ये सब पाच इन्द्रिय और मनसे उत्पन्न होते हैं, अतः इनसे गुणा कर देनेसे ( ४८४६=२८८) दोसौ अठासी भेद होते हैं । ये अर्या- वग्रह के भेद है । व्यञ्जनावग्रहका (अप्रगट पदार्थका ) केवल अवग्रह ही होता है। ईहा, अवाय, धारणा नहीं होते तथा वह आखसे और मनसे नहीं होता। इस [११६] प्रकार उसके ( १२४१-४८) अडतालीस भेद होते हैं। दोनों मिला कर (२८५४८-३३६) तीनसौ छत्तीस मेद होते हैं। इसके सिवाय वह मतिज्ञान अनेक ऋद्धियोंसे सुशोभित है । तपश्चरणादिक के द्वारा मतिज्ञानावरण कर्म का विशेष क्षयोपशम होनेसे ये ऋद्धिया उत्पन्न होती हैं । वे ऋद्धिया नीचे लिखे अनुसार हैं-- कोष्ठ बुद्धि--जिसप्रकार भंडारी एक ही कोठेमें अनेक प्रकारके धान्य रखता है तथा उनको नष्ट मी नहीं होने देता। उसीप्रकार अपनी बुद्धिमें अनेक प्रथोकी धारणा रखता है, उनकी अलग अलग अवस्था रखता है तथा किसी भी धारणाको नष्ट नहीं होने देता । ऐसी कोठेके समान बुद्धिकी प्राप्तिको कोष्ठबुद्धि ऋद्धि कहते हैं। वीजबुद्धि--जिसप्रकार अच्छे खेतमें कालके अनुसार वोया हुआ एक वीज भी अनेक धान्य उत्पन्न कर देता है उसीप्रकार वीजके समान एक पदके ग्रहण करनेसे ही जिस बुद्धिके द्वारा अनेक पदार्थोका ज्ञान होजाय-उस बुद्धिको बीज बुद्धि कहते हैं। पढानुसारिबुद्धि-जिसबुद्धिमें किसी प्रथका पहला पद अथवा अतका पद ग्रहण करनेमात्रसे समस्त प्रथका ज्ञान हो जाय, ऐसी वुद्धिकी ऋद्धिको पढानु- सारि अद्धि कहते हैं। मभिन्नश्रोतृता--एक ही साथ अनेक शब्द होते हो उन सबको एक साथ अलग अलग जिस विशेष बुद्धिके द्वारा जान सकते हैं उस बुद्धिकी ऋद्धि को ममिन्नश्रोतृता ऋद्धि कहते हैं । चक्रवर्तीकी सेना बारह योजन लम्वे और नौ योजन चोड़े मैदानमें रहती है। उसमें हाथी, घोड़ा, ऊट, मनुष्य आदि समी एक साथ वोलते हैं उन सबकी अक्षररूप और अनक्षररूप भाषाको एक साथ अलग अलग जान लेना इस ऋद्धिका काम है । ऐसी ऋद्धि इसी जन्ममें अथवा पहले जन्ममें उपार्जित किये हुये तप विशेष क्षयोपशम होने के कारण होती है। इस प्रकार ये चार बुद्धि ऋद्धि कहलाती हैं। इनमें बुद्धिकी विशेषता है, तपश्च- रणसे उत्पन्न होनेवाली शक्ति की मुख्यता है । इसलिये इनका वर्णन अलग किया है। इसके सिवाय वह मतिज्ञान श्रुतज्ञानका कारण है । मतिज्ञानसे ही श्रुतज्ञान [११] उत्पन्न होता है । लिखा मी है---"श्रुत मतिपूर्व" इत्यादि । अर्थात श्रुतज्ञान मतिपूर्वक ही होता है । इन ऊपर लिखे समस्त भेटोंसे और ऋद्धियों से सुशोभित ऐसे मतिज्ञानके लिए मै नमस्कार करता हूं। श्रुतज्ञानकी स्तुति----- श्रुतमपि जिनवरविहितं गणधररचितं द्वथनेकभेदस्थम् । अङ्गागवाह्यभावित्तमनन्तविपयं नमस्यामि ॥४॥ अन्वयार्थ-(जिनवरविहितं ) जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कथित (गण- धररचित) गणधरों द्वारा रचित (अगांगवाह्यभावित ) अग और अंगबाह्य सहित (द्वयनेकभेदस्थं ) दो और अनेक भेद रूप (अनन्तविषय ) अनन्तपदार्थोंको विषय करनेवाले ( श्रुतं अर्यि ) श्रुतज्ञानको भी (नमस्यामि ) नमस्कार करता है। भावार्थ:-मै केवल मतिज्ञानको ही नमस्कार नहीं करता किन्तु उस श्रुत- ज्ञानको भी नमस्कार करता हूँ कि जो श्रुतज्ञान अर्थरूपसे श्रीजिनेन्द्रदेवने निरू- पण किया है तथा अर्थ और पदरूपसे जिसकी अग-पूर्व रूप रचना गणधर देवोंने की है । जिस श्रुतज्ञानके दो मेद हैं और अनेक भेद हैं । उनमेंसे श्रुतज्ञान के दो भेद अंग और अगवाह्य हैं तथा द्रव्यश्रुतज्ञान और भावश्रुतज्ञानके भेदसे श्रुतज्ञानके अनेक मेद है । शब्द रूप ज्ञानको द्रव्यश्रुत कहते हैं और उनसे जो पदार्थज्ञान होता है उसको भावश्रुत कहते हैं। उसश्रुतज्ञानको विषय भनत पदार्थोसे भरा हुआ यह समस्त लोकाकाश है । ऐसे श्रुतज्ञान को मै नमस्कार करता हूं। भात्रश्रुतज्ञान-- पर्यायाक्षरपदसंघातप्रतिपरिकानुयोगविधीन् । प्राभृतकप्रामृतक प्राभृतकं वस्तुपूर्न च ।। ५ ।। तेषो समासतोऽपि च विंशतिभेदान्समश्नुवानं तत् । बदे द्वादशधोक्तं गंभीरवरशास्त्रपद्धत्या ॥६॥ अन्वयार्थ ---(पर्यायाक्षरपदसंघातप्रतिपत्तिकानुयोगविधीन् प्राभृतकप्राभ- : तक प्रामृतकं च वन्तुर्व) पर्याय, पर्यायसमास, अक्षर, अक्षरसमास पद, पद--- समास, संघात, सघातसमास,प्रतिपत्ति, प्रतिपत्तिसमास, अनुयोग, अनुयोगसमास, प्रामृतप्रामृत, प्राभृतप्राभृतसमास, प्राभृतक, प्राभूतकसमास, वस्तु, वस्तुसमास, [११८] । पूर्व और पूर्वसमास, रूप जो भेद, है (तेपा समसतः अपि च ) उन [ पर्याया- दिक का सक्षेपसे ही जिसमें समावेश है ऐसे (विंशतिभेदान् समश्नुवानं ) वीस भेद सहित तथा (गंमीरवरशास्त्रपद्धत्या द्वादशधोक्तं ) गमीर श्रेष्ठ जिनवाणीकी पद्धतिसे बारह प्रकारका कहा गया जो (ततश्रुत ) वह श्रुतज्ञान है उसको (वदे) वदना करता हूँ। भावार्थ-पर्यायादिक श्रुतज्ञानके बीस (२०) भेद है । इनका अन्तर्भाव द्वादशाग श्रुतज्ञानमें हो जाता है । वीस भेदोंका वर्णन नीचे लिखे अनुसार है- १--पर्याय- सूक्ष्मनित्यनिगोदके लब्ध्यपर्याप्त जीवके पहले समय में जो श्रुतज्ञान होता है, उसको पर्याय श्रुतज्ञान कहते हैं । यह ज्ञान सबसे जघन्य होता है-लब्ध्यक्षर इसका नाम है । श्रुतज्ञानावरणकर्मके क्षयोपशमको लब्धि' कहते हैं । जिस ज्ञानका कमी नाश न हो उसको अक्षर कहते हैं । यह ज्ञान सदा बना रहता है। इसका कमी आवरण नहीं होता। यह ज्ञान एक अक्षरके अनन्तवें भाग होता है । इसीलिये यह ज्ञान सबसे जघन्य कहा जाता है । यह ज्ञान सदा आवरण रहित रहता है । अतएव इतना ज्ञान सदा बना रहता है । यदि इसका मी अभाव मान लिया जाय तो जीवका नाश ही हो जाय, क्योकि उपयोग ही जीवका लक्षण है । यदि उसका भी नाश मान लिया जायगा तो जीवका ही अभाव हो जायगा । इसलिये जीवके कमसे कम इतना ज्ञान अवश्य रहता है । सोही लिखा है- सुहुमणिगोदअपञ्जत्तस्स जादस्स पढमसमयसि । हवदि हु सब्बजहणं णिच्चुग्घाडं णिरावरणं ।। (गोम्मटसार जीवकाड गा० ३१९) २ पर्यायसमास-जब पर्याय श्रुतज्ञान अनतभागवृद्धि, असख्यात भाग- वृद्धि, सख्यातभागवृद्धि, सख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि, अनतगुणवृद्धि- इसप्रकार षट्गुणीवृद्धि होते होते जब असख्यातलोकप्रमाण हो जाता है तब उस को पर्यायसमासज्ञान कहते है । अक्षरश्रुतज्ञानसे पहले तक पर्यायसमास कह- लाता है १-क्षयोपशमजन्यविशुद्धिलब्धि [११६] ३-अक्षरश्रुतज्ञान-अकार आकार आदि अक्षररूप श्रुतज्ञान को अक्षरश्रुत- ज्ञान कहते है। ४-अक्षरसमास-अक्षर श्रुनज्ञानसे ऊपर पद श्रुतज्ञानसे नीचे जो श्रुतज्ञानके भेद है-उनको अक्षरसमास कहते है। ५-पदश्रुत- अक्षर श्रुतज्ञानसे आगे क्रम क्रमसे अक्षरोकी वृद्धि होते होते जब सख्यात अक्षरोकी वृद्धि हो जाती है तब उस ज्ञानको पदश्रुतज्ञान कहते हैं। ६-पदसमाम-पदश्रुतज्ञानसे आगे संघात श्रुतज्ञान होने तक श्रुतज्ञानके जितने भेद है उन सबको पदसमास कहते है । ७-संघात-एक पदज्ञानके आगे एक एक अक्षरकी वृद्धि होते होते जब संख्यात हजार पदोंकी वृद्धि होती है तब यह संघात ज्ञान होता है । यह जान चारों गतियोमेंसे किसी एक गतिका वर्णन कर सकता है। ८-संघातसमास-क्षरोंके द्वारा बढता हुआ जो ज्ञान संघात से लेकर प्रतिपत्ति श्रुतज्ञान तक हो जाता है उसको संघातसमास श्रुनज्ञान कहते हैं । ह-प्रतिपत्तिज्ञान-संघात समस्तसे बढ़ते बढते जब संख्यात हजार संघातोंकी वृद्धि हो जाय तब प्रतिपत्ति श्रुतज्ञान होता है । इस ज्ञानके द्वारा चारों गतियों का स्वरूप वर्णन किया जा सकता है। १०-प्रतिपत्ति समास-प्रतिपत्ति ज्ञानसे आगे जब संख्यात प्रतिपत्ति रूप ज्ञान बढ़ जाता है-तब अनुयोगसे पहले तक उसको प्रतिपत्ति समास कहते है । ११-अनुयोग-प्रतिपत्ति समाससे एक एक अक्षरकी वृद्धि होते होते जब सख्यात हजार प्रतिपत्ति की वृद्धि हो जाती है तब एक अनुयोग श्रुतज्ञान होता है । इस ज्ञानसे चौदह मार्गणाओंका स्वरूप जाना जाता है । १२-अनुयोग समास-अनुयोग ज्ञानसे आगे और प्रामृतप्रामृतज्ञान से पहले जितने ज्ञान के विकल्प है वह सव अनुयोग समास है। १३-प्रामृतप्रामृत-अनुयोग ज्ञानके आगे एक एक अक्षर की वृद्धि होते होते सख्यात अनुयोग होने पर प्रामृतप्रामृत ज्ञान होता है। प्रामृत शब्दका अर्थ अधिकार है। वस्तु नामक श्रुतज्ञानके अधिकारको प्रामृत और उसके २-उपयागो लक्षणं । तत्वार्थ १०२ [१२०] भी अधिकार को प्रमृतप्रामृत कहते हैं। १४-प्रामृतप्राभूतसमास-प्राभृतप्राभृतसे आगे और प्राभृतसे पहले तक श्रुतज्ञान के जितने विकल्प हैं उन सबको प्राकृतप्राभूतसमास कहते है। १५-प्रामृत-प्राभूतप्राभृतज्ञान की वृद्धि होते होते जब जब चौवीस प्रामृतप्राभूत हो जाते हैं तब एक प्राभूत ज्ञान होता है । १६-प्राभूतसमास-प्राभूतसे ऊपर और वस्तुसे नीचे जो श्रुतज्ञानके विकल्प है- उन सबको प्रामृत समास कहते है। १७-वस्तु शुनज्ञान--प्राभूतज्ञानकी वृद्धि होते होते जब वीस प्राभूत बढ़ जाते है- तब वस्तु श्रुतज्ञान होता है। १८-वस्तुसमास-वस्तुज्ञानसे ऊपर क्रमसे अक्षर पटोंकी वृद्धि होते होते दस वस्तुबानकी वृद्धि हो जाय-उसमेंसे एक अक्षर कम तक जो ज्ञानके विक- ल्प हैं-उनको वस्तुसमास ज्ञान कहते हैं । १९--पूर्वश्रुत - पूर्वजानके चौदह भेद है । वस्तु समासके अन्तिम भेदमें अक्षर मिलानेसे उत्पादपूर्व होता है २०-उत्पादपूर्वसमास-उत्पादपूर्वमें भी वृद्धि होते होते चौदह वस्तु पर्याय वृद्धि होने पर उसमें से एक अन्तर कम करनेसे उत्पादपूर्व समास ज्ञान होता है। उसमें एक अक्षर बढ़ानेसे अग्रायणीयपूर्व और उसकी वृद्धि होते होते अग्रा- यणीयपूर्व समास होता इसीप्रकार आगेके पूर्व और पूर्व समास समझने चाहिये। इसप्रकार वह हादशाग श्रुतज्ञान अनन्त पदार्थों को विषयभूत करनेसे अत्यत गंभीर है और अवावित विषय होने से अत्यत श्रेष्ठ है । इसप्रकारकी शाख प्रणाली के अनुसार वह श्रुतबान बारह प्रकार है । ऐसे श्रुतज्ञान को मैं नमस्कार करता है। श्रुतज्ञानके बारह भेद---- आचारं सूत्रकृतं स्थानं समवायनामधेयं च । व्याख्याप्रज्ञप्तिं च ज्ञातृकथोपासकाध्ययने ॥ ७ ॥ वन्देऽन्तकृद्दशमनुत्तरोपपादिकदर्श दशावस्थम् । प्रश्नव्याकरणहि विपाकसूत्रं च विनमामि ॥ ८ ॥ अन्धयार्थ-(श्राचार) आचाराग (मत्रकृत) सूत्रकृताग (स्थान) [१२१] स्थानांग (च समवायनामधेयं) तथा समवायाग नामक (व्याख्याप्रज्ञप्ति) व्या- ख्याप्रज्ञप्त्यंग (च ज्ञातृकथोपासकाध्ययनै ) ज्ञातृकथाग व उपासकाध्ययनांग (अतकृद्दशं) अतकृशाग ( दशावस्थ' अनुत्तरोपपादिकदश) दश दश मुनि- योंके व्याख्यान करनेवाले अनुत्तरोपपादिकदशांग ( हि प्रश्नव्याकरणं) निश्चयसे प्रश्नव्याकरणाग ( च विपाकसूत्र ) और विपाकसूत्राग को ( बन्दे, विनमामि) वदना करता हू, नमस्कार करता हू । ( दृष्टिवाद का वर्णन 8वें श्लोकमें है) भावार्थ.-इन बारह अगोंकी पदसंख्या और स्वरूप इसप्रकार है.-- १- आचागग---इसकी पदसंरव्या अठारह हजार है। इसमें गुप्ति, समिति आदि मुनियोंके आचरणोंका वर्णन है। श्रुतज्ञानके दो भेद हैं- एक द्रव्यश्रत और दूसरा भाव श्रुत। द्रव्यश्रुतकी रचना शब्दात्मक है इसलिये उसकी पदसंख्या कही जा सकती है परंतु भावश्रुत ज्ञानमय है इसलिये उसकी पदसंव्या आदि कुछ नहीं कही जा 1 सकती। द्वादशांगमें आचारांगको सबसे पहले स्थान मिला है। इसका कारण यह है कि मोक्षका साक्षात् कारण मुनिमार्ग है और वह गुप्ति, समिति, पंचाचार, दशधर्म आदि रूप है । इन सबका वर्णन आचारागमें है। इसलिये सबसे पहले यही कहा है । अथवा भगवान अरहतदेवने अपनी दिव्यध्वनिके द्वारा मोक्षमार्ग का निरूपण किया, उसीको सुन कर गणधरदेवने द्वादशाग श्रुतज्ञानकी रचना की। उसमें सबसे पहले मोक्षका साक्षात् कारण होने से आचाराग की रचनाकी। इसलिये भी प्राचाराग सबसे पहला अग कहा जाता है। २-सूत्रकृताग-इसमें ज्ञान-प्राप्तिके लिये ज्ञान का विनय व अध्ययन के कारण आदिका वर्णन है । इसकी पदस्खया छत्तीस हजार है । ३--स्थानाग---इसमें जीवादिक द्रव्योके एकसे लेकर अनेक स्थानों तक का वर्णन किया है। जैसे-सग्रहनयसे आत्मा एक है । संसारी, मुक्तके भेदसे दो १- दशावस्थं यह पद ८३ अन्तकृयाग व ६ वै अनुत्तरोपपादिकदशाग दोनों अंगो के साथ समझें, क्योंकि दोनों ही अंगोंमें १०-१० मुनियोंका विशेष वर्णन होता है । स्पष्टी- करणके लिये इन्हीं लोकों का मावार्थ-देखिये । सं० [१२२] प्रकार है, उत्पादव्ययध्रौव्यकी अपेक्षा तीन प्रकार है। गनियोकी अपेक्षा चार प्रकार है । औपशमिक, क्षायिक, क्षयोपशमिक, औदायिक, पारिणामिक भावोंकी अपेक्षा पांच प्रकार है । पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर, नीचे इन छह दिशाओंकी ओर ( विग्रहगतिमें ) गमनकरनेके कारण छह प्रकार है । स्यात अस्ति, स्यान्नास्ति आदि सप्त भंगोंकी अपेक्षा सोत प्रकार है। आठ कोंके प्रति- तण आश्रवकी अपेक्षा आठ प्रकार हैं। नवपदार्थरूप स्वरूपकी अपेक्षा नौ प्रकार है । पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक, प्रत्येक- साधारण वनस्पति, दो इन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चौइन्द्रिय, पचेन्द्रियके भेदसे दश प्रकार है । इसप्रकार जीवके अनेक भेद हैं। इसीप्रकार पुद्गल, धर्म, अधर्म आदि समस्त द्रव्योंके विकल्प समझने चाहिये । ये सब भेद स्थानागमें निरूपण किये हैं । इस अगकी पढसंख्या न्यलीस हजार है। ४-समवायाग- इसमें द्रव्य क्षेत्र, कल, भावकी अपेक्षासे द्रव्योंमें जो परस्पर ममानता हो सकती है वह दिखलाई है । जैसे-धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य लोकाकाश और एक जीवके प्रदेश समान है यह द्रव्यकी अपेक्षा समानता है । जम्बूद्वीप, अप्रतिष्ठान नरक, नदीश्वरकी बावडिया और सर्वार्थसिद्धि विमान समान क्षेत्र है। यह क्षेत्रकृत समानता है। उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी दोनोका काल समान है। यह कालकी समानता है ? क्षायिकंज्ञान और क्षायिकदर्शन दोनों समान हैं। गह भावकृत समानता है । इसप्रकार समानता को निरूपण करनेवाला समवा- याग है। इसकी पदसख्या एक लाग्व चौसठ हजार हैं। ५-व्याख्याप्रज्ञप्त्यग--जीव है अथवा नहीं है, इसप्रकार गणधरदेवने साठ- हजार प्रश्न भगवान् अरहतदेवसे पूछे । उन सब प्रश्नोंका तथा उनके उत्तरोंका वर्णन इस अंगमें है । इसकी पदसंख्या दो लाख अट्ठाइस हजार है । ६-ज्ञातकाग--इसमें भगवान् तीर्थंकर परमदेव और गणधरदेवोंकी कथाओंका तथा उपकथाओंका वर्णन है । अंन्य-महापुरुषोंकी कथाएं भी उसीमें है। इसकी पदसंख्या पाच लाख छप्पन हजार है । ७-उपासकाध्ययनाग--इसमें श्रावकोंके समस्त आचरण, क्रिया, अनु. छान आदिका वर्णन है । इसकी पदसंख्या ग्यारह लाख सत्तर हजार है। [१२३] .

--अतकृशाग-प्रत्येक तीर्थकरके समयमे दश दश मुनीश्वर ऐसे होते है जो भयंकर उपसर्गोको सहन कर समस्त कर्मोका नाश कर मोक्ष जाते हैं। उनका वर्णन इस अंगमें है। संसारका अंत करनेवाले दश दश मुनियोंका वर्णन जिसमें हो-उसको अंतकृदृशांग कहते हैं । इसकी पदमाख्या नेईमलाग्व अट्ठाइस हजार है। 1-अनुत्तरोपपादिकदशांग-~-प्रत्येक तीर्थकरके समयमें दश दश मुनि ऐसे होते है जो घोर उपसर्ग सहनकर समाधिमरणसे अपने प्राणोंका त्याग करते है और विजय, वैजयंत, जयंत, अपराजित और सर्वार्थसिद्धि इन अनुत्तर विमानों में उत्पन्न होते हैं । उन सबका वर्णन इस अंगमें है। इसकी पदसंख्या बानवे. लाव चवालीस हजार है। १०-प्रश्नव्याकरणांग-जो वस्तु खो गई है, या मुट्ठीमें है या और कोई चिंताका विषय हो-उन सब प्रश्नोंको लेकर उनका पूर्ण यथार्थ व्याख्यान वा ममाधानका वर्णन इस अंगमें है । इसकी पदसंख्या तिरानबेलाख सोलह हजार है। ११-विपाकसूत्रांग-इसमें अशुभकर्मोका उदय, शुभकर्मोंका उदय तथा उनका फल वर्णन किया है। इसकी पदसंख्या एक करोड़ चौरासीलीख है। इसप्रकार ग्यारह अंगोंकी पदसंख्या चारकरोड़ पन्द्रहलाम्व दो हजार है। ऐसे श्रुतज्ञानको मैं नमस्कार करता है। दृष्टिवाद (बारहवें) अंगकी स्तुति- परिकर्म च सूत्रं च स्तौमि प्रथमानुयोगपूर्वगते । साई चूलिकया च पंचविध दृष्टिवादं प॥६॥ अन्वयार्थ---(परिकर्म) परिकर्म (च) और (मूत्रं ) सूत्र (च) और (प्रधमानुयोगपूर्वगते) प्रथमानुयोग (च ) और पूर्वगत (च) और (चूलिकया माई ) चूलिका सहित-इसप्रकार ( पचविधं ) पांचप्रकारके (दृष्टिवादं ) दृष्टि- बाद नामक वारहवे अंगकी (स्तौमि) स्तुति करता हूं। भावार्थ:-दृष्टिबाद नामक बारहवें अंगके पांच भेद है। परिकर्म, मूत्र, प्रथमानुयोग, पूर्वगत, चूलिका । इन सर्वको मैं नमस्कार करता हूं। १-परिकर्म-जिसमें गणितकी व्याख्याकर उसका पूर्ण विचार किया हो उसको परिकर्म कहते हैं। इसके पांच भेद ई-चंद्रप्राप्ति, मर्यप्रजाति, जम्बूद्वीप- [१२] - प्रज्ञप्ति, द्वीपसागरप्रज्ञप्ति और व्याख्याप्रज्ञप्ति । चन्द्रप्रज्ञप्ति-इसमें चद्रमाकी आयु, गति, परिवार, विभूति आदिका वर्णन है। इसकी पदसंख्या छत्तीसलाख पाच हजार है । सूर्यप्रज्ञप्ति-इसमें सूर्यकी आयु, गति, परिवार, विभूति, ग्रहण मादिका वर्णन है। इसकी पदसंख्या पांचलाख तीन हजार है। जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति—इसमें जम्बूद्वीप सबधी सात क्षेत्र, कुलाचल, पर्वत,सरो- घर, नदिया आदिका वर्णन है । इसकी पदसंख्या तीनलाख पच्चीस हजार है। द्वीपसागरप्रज्ञप्ति-इसमें असंख्यात दीपसमुद्रोंका वर्णन है। उन दीप समुद्रोंमें अकृत्रिम चैत्यालय, ज्योतिष, व्यंतर आदि सबका वर्णन है। इसकी पद- संख्या वावनलाख छत्तीस हजार है। व्याख्याप्रज्ञप्ति- इसमें जीवाजीवादिक द्रव्योंका स्वरूप, उनका रूपी प्ररूपीपना भादिका वर्णन है । इसकी पदसंख्या चौरासीलाख छत्तीस हजार है। २-मूत्र---इसमें जीव कर्मोका कर्ता है, उनके फलका भोक्ता है,शरीरप्रमाण है इत्यादि पदार्थोंका यथार्थ स्वरूप निरूपण किया है तथा यह जीव पृथिवी, जल, अग्नि, वायुसे उत्पन्न नहीं हुआ है, अणुमात्र नहीं है, सर्वगत नहीं है इत्यादि रूपसे अन्य मतोके द्वारा माने हुए पदार्थोके म्वरूपका ग्वडन है । इसकी पदसंख्या अठासीलाख है। ३-प्रथमानुयोग-इसमें त्रेसठ शलाका पुरुपोंके चरित्र व पुराणोका निरूपण है इसकी पदसख्या पाच हजार है। "-पूर्वगत--इसमें समस्त पदार्थोके उत्पाद, व्यय, धौव्य, प्रादिका वर्णन है। इसकी पदसंख्या पिचानवे करोड़ पचासलाख पाच है। "-चूलिकाके पाच भेद हैं-जलगता, स्थलगता, मायागता, रूपगता, और प्राकाशगता। जलगता-इसमें, जलमें गमन करनेकेलिये तथा जलका स्तभन करनेकेलिये जो कुछ मंत्र, तत्र वा तपश्चरण कारण है उन सबका वर्णन है। इसकी पदसरव्या दो करोड़ नौ लाख नवासी हजार दोसौ है. स्थलगता-इसमें पृथिवीपर गमनकरने के कारण मत्र, तंत्र घ तपश्चरणोंका वर्णन है । पृथिवी पर होनेवाली जितनी वास्तु विद्याएं हैं, मकान बनाने [१२५] , आदिकी विद्याए हैं उन सबका वर्णन है । इसकी पदसंख्या दो करोड़ नौ लाख नवासी हजार दोसौ है । मायागता-इसमें इन्द्रजाल सम्बधी मत्र तत्रों का वर्णन है। इसकी पदसख्या दो करोड़ नौ लाख नवासी हजार दोसौ है । रूपगता-इसमें सिंह, व्याघ्र, हिरण आदिके रूप धारण करनेके मत्र तत्रों का वर्णन है तथा अनेक प्रकारके चित्रबनानेका वर्णन है । उसकी पदसंख्या दो करोड़ नौ लाख नवासी हजार दोसौ है। आकाशगता---इसमें, आकाशमें गमन करनेके कारण मत्र नत्र और तपश्चरणका वर्णन है। इसकी पदसंख्या दो करोड नौ लाख नवासी हजार दोमो है। आगे-यद्यपि पूर्वगतकी स्तुति कर चुके हैं तथापि उसके अनेक भेद है । इसलिये उन सब भेदो को कहते हुए उस पूर्वगतकी फिर भी स्तुति करते है पूर्वगतं तु चतुर्दशधोदितमुत्यादपूर्वमाद्यमहम् । आग्रायणीयमीडे पुरुवीर्यानुप्रवाद च ॥ १० ॥ संततमहमभिवंदे तथास्तिनास्तिप्रवादपूर्ण च । ज्ञानप्रवादसत्यप्रवादमात्मप्रवादं च ॥ ११ ॥ कर्मप्रवादमीडेऽथ प्रत्याख्याननामधेयं च । दशमं विद्याधार पृथुविद्यानुप्रवाद च ।। १२ ॥ कल्याणनामधेयं प्राणावार्य क्रियाविशालं च । अथ लोकबिंदुसार बन्दे लोकाग्रसारपदं ॥ १३ ॥ अन्वयार्थ--( पूर्वगत तु) १२ वा दृष्टिवादाग अंतर्गत पूर्वगत ( चतु- ईशधा ) चौदह प्रकार का ( उदित ) कहा गया है, उनमें (आधं ) पहला ( उत्पादपूर्व ) उत्पादपूर्व व ( आप्रायणीय ) आग्रायणीपूर्वको (मह ईडे ) में नमस्कार करता है [ स्तुति करता ह] (चपुरुषीर्यानुप्रसाद ) और महान् वीर्यानुप्रवादपूर्वको ( सततं) सदा ( अह अभिवदे ) मैं नमस्कार करता है १-प-महत ( महान ) यह शन्द ( विशेषण ) हरेक पूर्वके पहले लगा लेना चाहिये। [ १२६] - (तथा अस्तिनास्तिप्रवादपूर्व ) तथा अस्तिनास्तिप्रवादपूर्वको (च) और (ज्ञान- प्रवादसत्यप्रवाद ) ज्ञानप्रवाट पूर्वको, सत्यप्रवादपूर्वको (च) और आत्मप्रवादपूर्व को (अथ ) तथा ( कर्मप्रवादं ) कर्मप्रवादपूर्वको (ईडे ) वंदना करता ह (च) और (प्रत्याख्याननामधेयं ) प्रत्याख्याननामपूर्वको (दशम) दशवें ( विद्याधार पृथुविद्यानुप्रवाद)७०० क्षुद्र विद्या व ५०० महाविद्यावाले पृथुविद्यानुप्रवादपूर्वको (च) और (कल्याणनामधेय ) कल्याणवादपूर्व नामक (प्राणावाय) प्राणा- वायपूर्व (च) और (क्रियाविशाल ) क्रियाविशालपूर्व ( अथ ) तथा ( लोका- प्रसारपद ) लोकमें श्रेष्ठ सारभूतसुखको देनेवाले ( लोकविन्दुसार) लोकविन्दु- सार पूर्वको (वढे ) नमस्कार करता है। भावार्थ-पूर्वगतके चौदह भेद हैं । उनके नाम ये है- उत्पादपूर्व, अप्रायणीयपूर्व, वीर्यानुवादपूर्व, अस्तिनास्तिप्रवादपूर्व, ज्ञानप्रनादपूर्व, सत्यप्रवादपूर्व, आत्मप्रवादपूर्व, कर्मप्रवादपूर्व,प्रत्याख्यानपूर्व,विद्यानुवादपूर्व, कल्याण प्रवादपूर्व, प्राणावायपूर्व, क्रियाविशालपूर्व, लोकबिंदुसार । उत्पादपूर्व--इसमें जीवादिक पदार्थोंके उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यस्वरूप धर्मों का वर्णन है । इसकी पद सख्या एक करोड़ है। आग्रायणीयपूर्व-इसमें प्रधान-मुख्य पदार्थोंका निरूपण है । दुर्नय, सुनय और द्रौव्योंका वर्णन है , इसकी पद सख्या छयानवे लाख है। ३-वीर्यानुवादपूर्व-इसमें चक्रवर्ती, इन्द्र, धरणेन्द्र, केवली आदिकी साम- र्थ्यका माहात्म्य दिखलाया है । इसकी पदसख्या सत्तरलाख है । ४-अस्तिनास्तिप्रवादपूर्व-इसमें अनेक प्रकार से छहों द्रव्योंके अस्तित्व और नास्तित्व आदि कर्मोका वर्णन है । इसकी पद सख्या साठ लाख है । ५-ज्ञानप्रवादपूर्व---इसमें पांचों ज्ञानोंका तथा तीनों मिथ्या ज्ञानोंके खरूप का वर्णन है। उसके प्रगट होने के कारण और उनके आधार वा पात्र (जिनसे वह ज्ञान होता है) आदिका वर्णन है । इसकी पद सख्या निन्यानवे हजार नौ सौ निन्यानवे है। ६-सत्यप्रवाद--इसमें वचनगुप्तिका वर्णन है, वचनोंका सस्कार किस प्रकार होता है, उसका वर्णन है । कंठ, तालु आदि उच्चारण स्थानोंका वर्णन है | जिनके बोलनेकी शक्ति उत्पन्न हो गई है ऐसे दो इन्द्रिय, तेइद्रिय, चौइन्द्रिय, [१२७] पचेन्द्रिय जीवोंके शुभ-अशुभ वचनोंके प्रयोगोंका वर्णन है। इसकी पद संख्या एक करोड़ छह है। ७-आत्मप्रवादपूर्व--इसमें जीवके ज्ञान, सुख और कर्तृत्व आदि धर्मोका वर्णन है । इसकी पद संख्या-छब्बीस करोड़ है | -कर्मप्रवादपूर्व---इसमें कोका बध, उदय, उदीणा, उपशम और निर्जरा मादिका वर्णन है । इसकी पद संख्या एक करोड़ अस्सीलाख है। 1-प्रत्याख्यानपूर्व-इसमें द्रव्य और पर्याण के त्यागका वर्णन है। उपवास- करना, व्रत, समिति, गुप्तिपालन करना, अतिक्रमण प्रतिलेखन, विराधना, विशुद्धि आदिका वर्णन है । इसकी पदसंख्या चौवीसलाख है। १०-विद्यानुवादपूर्व--इसमें सातसौ लघुविद्या, पाचसो महाविद्याओं का वर्णन है । आठों महानिमित्तोंका वर्णन है तथा सब विद्याओंका साधनका वर्णन है। इसकी पदसख्या एक करोड दश लाख है। ११-कल्याणवादपूर्व---इसमें तीर्थकर परमटेव, चक्रवर्ती, बलदेव, नारा- यण आदिके गर्भकल्याणक, जन्मकल्याणक आदिका वर्णन है । इसकी पढ- मंख्या छच्चीस कर.ड़ है। १२-प्राणावायपूर्व---इसमें प्राण, अपानके विभाग का वर्णन है, आयुर्वेद शास्त्र,मन्त्रशास्त्र, गारुडीविद्या आदिका वर्णन है। इसकी पदसंख्या तेरह करोड है। १३-क्रियाविशाल-इसमें बहत्तर कलाओंका वर्णन है तथा छंदशास्त्र और अलकार शास्त्र का वर्णन है। इसकी पदसंख्या नौ करोड़ है। १४ - लोकविंदुसार--इस लोकमें सबसे प्रधान और सारभूत जो मोक्ष है, उसके मुख, साधन और उसको प्राप्त करने के लिये कहे गये समस्त अनु- टानोंका वर्णन है । इसकी पदसख्या बारह रोड पचास लाख हैं। इमप्रकार पूर्वगतके चौदह भेट हैं उन सबको मै भक्तिपूर्वक नमस्कार करता है। इनकी वंदना करता ह और स्तुति करता है। इसप्रकार चौदह पूर्वोकी स्तुति की। पूत्रों के अधिकार तथा प्रत्येक अधिकार के प्रामृत प्राढिका वर्णन- दश च चतुर्दश चाष्टावष्टादश च द्वयोद्विपकं च । पोडश च विंशतिं च त्रिंशतमपि पञ्चदश च तथा ॥ १४ ॥ [१२-1 वस्तूनि दश दशान्येष्वनुपूर्व भापितानि पूर्वाणाम् । प्रतिवस्तु प्राभृतकानि विंशति विंशति नौमि ॥ १५ ॥ अन्वयार्थ-उत्पादपूर्व के ( दश ) दश अधिकार हैं ( च चतुदर्श और भाग्रायणीयपूर्वके चौदह अधिकार है ( च अष्टौ ) तथा वीर्यानुवादके आठ (च अष्टादश ) अस्तिनास्तिप्रवादके अठारह ( च द्वयोः द्विषक) ज्ञानप्रवाद के वारह, सत्यप्रवाद के बारह ( च पोडश ) आत्मप्रवादके सोलह (च विंशति) कर्मप्रवादके वीस ( अपि त्रिंशत ) प्रत्याख्यानपूर्वक तीस ( च पञ्चदश ) मिद्या- नुवादके पन्द्रह, ( तथा अन्येषु पूर्वाण अनुपूर्व दश दश वस्तूनि भाषितानि ) क्रम से कल्याणवादके दश, प्राणावाय के दश, क्रिया विशाल के दश और लोकबिंदुके दश अधिकार कहे गये है । (प्रतिवस्तु) एक एक वस्तु (अधिकार) में (विंशतिं विंशति) वीस वीस (प्रामृतकानि ) प्राभृतक होते है-उनको (नौमि ) नमस्कार करता है। भावार्थ-उत्पादपूर्व आदि १४ पूर्वो के वस्तु (अधिकारो) की संख्या क्रमसे १०,१४, ८, १८, १२, १२, १६, २०, ३०, १५, १०, १०, १० १० है । ये सब मिलकर १९५ अधिकार होते है । इन सब अधिकारो को वस्तु कहते हैं । एक एक वस्तु (अधिकार ) में वीस वीस प्रामृत होते है। इस प्रकार ११५ अधिकारों में ३९०० प्राभूत होते है तथा एक एक प्राभूत चौवीस चौवीस प्रामृत प्राभूत होते हैं। सब प्रामृत प्रामृतों की संख्या ९३६०० होती है। पूर्व १४, वस्तु १६५, प्रामृत ३९०० प्रामृत प्रामृत ६३६०० होते है । इन सबको मै भक्ति पूर्वक नमस्कार करता हू । आग्रायणीयपूर्वके १४ अधिकारों के नाम- पूर्वातं ह्यपरान्त ध्रुवमध्रुवच्यवनलब्धिनामानि । अध्रुवसंप्रणिधिं चाप्यर्थ भौमावयाधं च ॥ १६ ॥ सर्वार्थकल्पनीयं ज्ञानप्रतीतं त्वनागतं कालं । सिद्धिमुपाध्य च तथा चतुर्दशवस्तूनि द्वितीयस्य ॥ १७ ॥ अन्वयार्थ - (द्वितीयस्य ) दूसरे आरायणीय पूर्वक (चतुर्शदवस्तुनि) चौदह अधिकार हैं- (पूर्वान्त) पूर्वान्त ( हि अपरान्त) परान्त (ध्रुवमध्रुव- [१२९] ये नाम च्यवनलब्धिनामानि ) ध्रुव, अध्रुव, च्यवनलब्धि (भध्रुवसंप्रणिधि ) अध्रुवसप्र- णिधि (अपि च अर्थ ) अर्थ (च भौमावयाद्य ) भौमावय ( सर्वार्थकल्पनीयं) सर्वार्थकल्पनीय (ज्ञान) ज्ञान (अतीत तु अनागत काल ) अतीतकाल और , अनागतकाल (सिद्धि) सिद्धि (तथा च उपाध्य ) और उपाध्य । प्राचार्य परम्परा से चले आ रहे हैं। इनको मी मैं नमस्कार करता हूं। प्रामायणीयपूर्वक के ५ वें अधिकार 'च्यवनलब्धि' के चौथे अध्याय 'कर्म प्रकृति के २४ अनुयोगों के नाम--- पंचमवस्तुचतुर्थप्रामृतकस्यानुयोगनामानि | कृतिवेदने तथैव स्पर्शनकर्मप्रकृतिमेव ॥ १८॥ बंधननिबंधनप्रक्रमानुपक्रममथाभ्युदयमोक्षौ । संक्रमलेश्ये च तथा लेश्यायाः कर्मपरिणामौ ॥१९॥ सातसमात दीर्घ हस्वं भवधारणायसंझं च । पुरुपुद्गलात्मनाम च निधत्तमनिधत्तममिनौमि ॥२०॥ सनिकाचितमनिकाचितमथ कर्मस्थितिकपश्चिमस्कंधौ । अन्पबहुत्वं च यजे तद्द्वाराणां चतुर्विंशम् ॥ २१॥ अन्वयार्थ- (पचमवस्तुचतुर्थप्रामृतकस्यानुयोगनामानि ) आप्रायणीय- पूर्वके पांचवें अधिकार 'ध्यवनलब्धि' के चौथे अध्याय 'कर्मप्रकृति' के २४ अनुयोगों के नाम ये हैं-(कृतिवेदने ) कृति, वेदना, (तथैव स्पर्शनकर्मप्रकृतिमेत्र) उसी प्रकार स्पर्शन, कर्म, प्रकृति, (बंधननिबंधनप्रक्रमानुपक्रम) बंधन, निबंधन प्रक्रम, अनुपक्रम, (अथ) और (अभ्युदयमोक्षौ)मभ्युदय, मोक्ष (च)तथा(संक्र- मलेश्ये ) संक्रम, लेश्या (द्रव्य),(तथा लेश्यायाः कर्मपरिणामौ) तथा भावलेश्या, (सातमसातं) सातमसात, (दीर्घ) दीर्घ, (हस्वं)हस्व(च भवधारणीयसंज्ञ)तथा भवधारणीय (च पुरुपुद्गलात्मनाम ) और पुरुपुद्गलात्म, (निधत्तमनिधत्त) निध- त्तमनिधत्त, (सनिकाचितमनिकाचितं) सनिकाचितमनिकाचित, (अथ ) तथा (कर्मस्थितिकपश्चिमस्कंधौ)कर्मस्थितिक, पश्चिमस्कंध, (च अल्पवहुत्वं) और अल्पवहुत्व (तद्वाराणा चतुर्विश) ये चौवीसों अनुयोग चतुर्थप्राभूत के द्वारसमान हैं-इनको (अभिनौमि-यजे) भक्ति पूर्वक नमस्कार करता हू और पूजा करता हूं। [१३०॥ ~ भावार्थ--जपर कहे अनुसार २४ अनुयोग 'कर्मप्रकृति के हैं। इनसे चतुर्थ प्रामृत में प्रवेश हो जाता है । इनके सिवाय एक पच्चीसवा 'सर्वानुयोग' नामका अनुयोग और है । इसमें जो कथन है वह समस्त अनुयोगो के लिये उप- योगी है। इसलिये इसका नाम 'सर्वानुयोग' है। इसके होने से ही सबकी परि- पूर्णता होती है । इस प्रकार ये २४ अनुशेग अथवा २५ अनुयोग आप्रायणीय पूर्वके पाचत्र 'न्यवनलब्धि' नामके अधिकारके कर्मप्रकृति नामक चौथे प्रामृत कहे जाते है । इनको में भक्ति पूर्वक नमस्कार करता है। द्वादशाग श्रुतज्ञान की पद मख्या- कोटीनां द्वादशशतमष्टापंचाशतं सहस्राणाम् । लक्षत्र्यशीनिमेव च पंच च वंदे श्रुतपदानि ॥ २२ ॥ अन्वयार्थ-(कोटीना द्वादशशतं च लक्षयशीति अष्टापचाशतं सहस्राणां च पच एव श्रुतपदानि बढे) एक सौ बारह करोड़ तिरासीलाख भट्टावन हजार पाच श्रुतज्ञान के पदों को नमस्कार करता है। (११२८३५८००५) एक एक पदमें कितने कितने प्रक्षर होते हैं । पोडशशतं चतुस्त्रिंशत्कोटीनां व्यशीतिलक्षाणि । शतसंख्याष्टासप्ततिमष्टाशीतिं च पदवर्णान् ॥ २३ ।। मन्वयार्थ--(पोडशशत चतुखिशत् कोटीना त्र्यशीतिजक्षाणि शतसंख्या- टासप्तनि च श्रष्टाशीति पदवर्णान 'वंदे') सौलह सौ चौतीस करोड़,तिरासीलाख अठत्तर सौ अठाप्ती अक्षर अर्थात् सोलह अरव चौतीस करोड़ तिरासीलाख सात हजार आठसौ अठासी अक्षर एक एक मध्यमपदके होते हैं-उनको नमस्कार करता है। भावार्थ--पट तीन प्रकार के होते हैं-अर्थ पद, प्रमाणपद और मध्यम पद । कहने वालेका अभिप्राय जितने अक्षरों से पूर्ण हो जाय उतने अक्षरों का एक पट अर्थ पद होता है । इस पद के अक्षर नियत नहीं हैं। किसी पदमें अधिक अक्षर होते हैं और किसी में कम । जैसे-'अग्नि लाओ' इसमें थोडे अक्षर है और इस सफेद गायको अपनी जगह पर बाध दो' इसमें अधिक अक्षर हैं। आठ अक्षर वा इससे अधिक अक्षरों के समुदायको प्रमाणपद कहते हैं । इससे अंगवाह्य श्रुतकी सख्या कही जा सकती है। जैसे-अनुष्टुप श्लोकके प्रत्येक [१३१] चरणमें आठ अक्षर होते है। अगप्रविष्ट श्रुतकी संख्या के निरूपण करनेवाले जो पद हैं-उनको मध्यम- पद कहते हैं । इस श्लोकमें उन्हीं मध्यम पदके अक्षरोंकी सख्या का प्रमाण कहते है। १६३४८३०५८८८ अक्षर एक एक मध्यम पदके होते हैं। समस्त श्रुतज्ञानके अक्षरों की संख्या 'एक्ट्ठीप्रमाण' है । अर्थात् १८४४- ६७४४०७३७०९५५१६१६ इतने अक्षर हैं। इसमें मध्यमपदके अक्षरों का भाग देना चाहिये, जो फल पावे वह द्वाद- शागकी पदसख्या समझनी चाहिये । तथा जो अक्षर वाकी रहते हैं वे अक्षर अगवाहय श्रुतज्ञातके समझने चाहिये । जो अक्षर बाकी रह जाते हैं उनसे मध्यम पद नहीं बनता । इसीलिये वे अक्षर अगवाह्य के समझे जाते हैं। उनकी मंख्या आठ करोड एक लाख आठ हजार एकसौ पिचहत्तर है । (८०१०८१- ७५) उस अगबाह्यके अनेक भेद है। अगवाह्यके भेदोकी स्तुति-- मामायिकं चतुर्विंशतिस्तवं चंदना प्रतिक्रमणम् । बैनयिक कृतिकर्म च पृथुदशवैकालिक च तथा ॥ २४ ॥ चरमुत्तराध्ययनमपि कल्पव्यवहारमेवमभिवदे । कल्पाकल्पं स्तौमि महाकल्पं पुण्डरीकं च ।। २५ ॥ परिपाट्या प्रणिपतितोऽस्म्यहं महापुण्डरीकनामैव । निपुणान्यशीतिकं च प्रकीर्णकान्यंगवाह्यानि ॥ २६ ॥ अन्वयार्थ -( अगवाह्यानि निपुणानि प्रकीर्णकानि ) अगवाह्यश्रुतज्ञानके सूक्ष्मार्थ के प्रतिपादकप्रकीर्गक (भेद) चौदह हैं वे इसप्रकार है-(सामायिक) सामा- यिक (चतुर्विशतिस्तव) चतुर्विंशतिस्तव (बदना) वदना (प्रतिक्रमण)प्रतिक्रमण (वैन यिक)वैन यिक (च कृतिकर्म) कृतिकर्म (च तथा पृथुदशकालिक) दशवैका- लिक ( अपि वर उत्तराध्ययन) उत्तराध्ययन (एवं कल्पव्यवहार) कल्पव्यवहार को (अमिवदे) भक्ति पूर्वक नमस्कार करता है । (कल्पाकल्प) कल्पकल्प ( महाकल्प) महाकल्प (च पुण्डरीक) पुंडरीक की (स्तौमि )स्तुति करता ह।(महापुडरीकनामैत्र) महापुडरीक (च अशीतिक) और अशीतिक को (अह) मै (परिपाटया ) क्रमसे (प्रणिपतितोऽस्मि ) नमस्कार करता है। [१३२] भावार्थ-अंगवाह्य श्रुतज्ञानके ऊपर वाले १४ भेद हैं । उन्हीं को प्रकी- क भी कहते हैं । इनमे पदायो का स्वरूप अत्यत सक्ष्म रीतिसे वर्णन किया है । ऐसे इन १४ प्रकीर्णकोंको में बडी भक्ति, विनय के साथ बदना करता हु । १--सामायिक-गृहस्थ वा मुनि जो नियत काल तक अथवा अनियत काल तक समता धारण करते है, उसको सामायिक कहते हैं । उसका जिसमें वर्णन हो-वह सामायिक प्रकीर्णक है । २-चतुर्विशतिस्तव-वृपभादि चौवीस तीर्थङ्करोंके आठ प्रातिहार्य, चौतीस अतिशय, चिट तथा अनतचतुष्टय आदिकी स्तुति करना स्तव है। उसका जिसमें वर्णन हो वह चतुर्विशतिस्तव है। ३-बदना-पच परमेष्टियों में से प्रत्येक की अलग-अलग वदना करना बदना है। उसका जिसमें वर्णन हो-वह वदना है । ४ -प्रतिक्रमण-जिममें ७ प्रकारके प्रतिक्रमणका वर्णन हो, उसे प्रतिक्रमण कहते है। देवसिकप्रतिक्रमण-दिनके दोषों को निराकरण करने वाला प्रतिक्रमण । रात्रिक प्रतिक्रमण-रात्रिके दोषो का निराकरण करनेवाला प्रतिक्रमण । पातिकप्रतिक्रमण-पन्द्रह दिनके दोपोंका निराकरण करनेवाला प्रतिक्रमण। चातुर्मासिकप्रतिक्रमण-जिसमें ४ मास के दोषोंका निराकरण हो । सांवत्सरिकप्रतिक्रमण-जिसमें एक वर्षके दोषोंका निराकरण हो । पिथिकप्रतिक्रमण-जिसमें ईर्यापथ सम्बधी दोपोंका निराकरण हो । उत्तमार्थिक प्रतिक्रमण-जिसमें समस्त पर्यायसम्बंधी दोपोंका निराकरण किया जाय । इसप्रकार ७ प्रकारके प्रतिक्रमणों का वर्णन जिसमे हो-उसको प्रति- क्रमण प्रकीर्णक कहते है। ५-वैन यिक-जिसमे ज्ञानविनय, दर्शनविनय, चारित्रविनय, तपविनय और उपचारविनयों का वर्णन हो-उसको वैन यिक प्रकीर्णक कहते हैं। ६--कृतिकर्म-जिसमें दीक्षा देने और दीक्षा लेने का विधान हो-उसको कृति- कर्म कहते है। ७--दशवकालिक -दुम पुष्पित आदि दश दश अधिकारों के द्वारा इसमें मुनियोंके समस्त प्राचरणोका वर्णन है। [१३३] ---उत्तराध्ययन-इसमें अनेकप्रकार के उपसर्ग सहन करने और उनको सहन करने के फलोंका वर्णन है। -कल्पव्यवहार-इसमें मुनियोके योग्य आचरणोंका तथा उन पाचरणों से च्युत होने पर योग्य प्रायश्चित्तका वर्णन है। १०-कल्पाकल्प-इसमें गृहस्थ और मुनियोंके योग्य तथा अयोग्य आच. रणोंका वर्णन हो । द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावकी अपेक्षा वा विशेष समयके अनुसार योग्य भाचरणोंका निरूपण इसमें किया गया है। ११-महाकल्प-दीक्षा, शिक्षा, गणपोपण, आत्म संस्कार, भावना, उत्त- मार्थ ये ६ कालभेद माने हैं, इनके अनुसार इसमें मुनियों के आचरणों का निरू- पण है। १२-पुंडरीक-इसमें भवनवासी, व्यतर मादि देवोंमें उत्पन्न होनेके कारणों का वर्णन है। १३-महापुडरीक-इसमें देव, देवागना, अप्सरा आदि स्थानो में उत्पन्न होने के कारणोंका वर्णन है। १४-अशीतिक-इसमें मनुष्यो की आयु और सामर्थ्यके अनुसार स्थूल दोप और सूक्ष्म दोपोंके प्रायश्चित्तोका वर्णन है। इसप्रकार ये १४ प्रकीर्णक कहलाते हैं। इनमें अत्यत मृक्ष्म पदार्थोका वर्णन है इसीलिये इन्हें निपुण कहते हैं । ये अगवाह्य इतने ही हैं । न इनसे कम हैं और न इनसे अधिक हैं। ऐसे इस अगबाह्य को मै नमस्कार करता हु तथा स्तुति करता हू। अवधिज्ञानकी स्तुति पुदलमर्यादोक्तं प्रत्यक्ष समभेदमवधि च । देशावधिपरमावधिसर्वावधिभेदममिवंदे ॥ २७॥ अन्वयार्थ-(पुद्गलमर्यादोक्तं ) पुद्गल [ रूपीपदार्थ-मूर्तिक ] ही है मर्यादा जिसकी अर्थात् जो रूपीपदार्थोको ही विषय करता हो जानता हो, ऐसा शास्त्रों में वर्णित (प्रत्यक्ष ) प्रत्यक्ष [मति श्रुतज्ञान की तरह इन्द्रिय, मनकी सहायता नहीं होने वाला ] (च सप्रमेट ) मेद-प्रमेट सहित अर्थात् (टेशावधिपरमावधि- [१३४] सर्वावधिभेद ) देशावधि, परमावधि, सर्वावधि मेद सहित (अवधि) अवधिज्ञान को (अभिवंदे) भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूं। भावार्थ-जो अधिकतर नीचेके विषयको जाने, उसको अवधि कहते हैं। अथवा जिस ज्ञानका विषय पुद्गल ही हो, उसको अवधिज्ञान कहते हैं । अव- धिज्ञान रूपी पदार्थको ही जानता है अन्यको नहीं। यह अवधिज्ञान प्रत्यक्ष है। केवल आत्मा से उत्पन्न होता है । मतिज्ञान श्रुतज्ञानके समान इन्द्रियोंसे उत्पन्न नहीं होता है और इसीलिये परोक्ष नहीं है । इस अवधिज्ञानके अनेक भेद हैं और वे सब अबाधित हैं । देशावधि, परमावधि और सर्वावधि ये तीन मुख्य भेद है। इनमें से परमावधि और सर्वावधि चरमशरीरी मुनियोंके ही होता है तथा देशावधि अवधिज्ञान सबके होता है । देशावधि और परमावधिमे जघन्य, मध्यम उत्कृष्ट आदि अनेक भेद है, क्योंकि भवधिज्ञानावरण कर्मोंका क्षयोपशम जैसा जैसा बढ़ता जाता है वैसा ही यह ज्ञान भी बढता जाता है। सर्वावधिमें एक उत्कृष्ट भेद ही होता है, क्योंकि यह सर्वावविज्ञान समस्त अवधिज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशमसे ही प्रगट होता है। ऐसे इस भवधिज्ञानको मैं नमस्कार करता है। मन पर्ययज्ञानकी स्तुति--- परमनिस स्थितमर्थ मनसा परिविद्य मंत्रिमहितगुणम्। ऋजुविपुलमतिविकल्पं स्तौमि मनःपर्ययज्ञानम् ॥ २८॥ अन्वयार्थ-(परमनिस) दूसरों के मनमें (स्थितं ) स्थित (अर्थ) अर्थ को-पदार्थको ( मनसा) मनके द्वारा (परिविद्य) जानकर [ जाननेवाले ] और (मंत्रिमहितगुण ) मुनीश्वरों से जो गुण ( ज्ञान ] पूजित है ( ऋजुविपुलमतिवि- कल्प) ऋजुमाते और विपुलमति जिसके मेद हैं ऐसे (मनःपर्ययज्ञान ) मन:- पर्ययज्ञानकी (स्तौमि ) स्तुति करता हूँ। भावार्थ-दूसरोंके मनमें स्थित पदार्थोंको जो प्रत्यक्ष जानले, उसको मनः- पर्ययज्ञान कहते हैं । यह जन्ममरणरूप अपार संसार एक प्रकार का दुर्वार विप है । उस संसाररूपी विषको दूर करने में ऐसा अपराजित मत्र मुनियोंके ही पास रहता है । इसलिये उन मुनियों को भत्री कहते हैं। ऐसे मुनिराज विशेष बढते हुये चारित्रके साथ रहनेवाले इस मनःपर्ययज्ञानकी पूजा वा आरा- धना करते हैं । मनःपर्यय ज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमसे केवल आत्माके द्वारा [१३५ - दूसरेके मनमें ठहरे हुये पदार्थोंको प्रत्यक्ष जान लेना मनःपर्ययज्ञान है। यह मनःपर्ययज्ञान उत्तम मुनियोंके ही होता है । यहाँपर कदाचित कोई यह प्रश्न करे कि जब यह ज्ञान दूसरे के मन के सम्बध से होता है तो फिर उसको अतीन्द्रियज्ञान नहीं कह सकते। क्योंकि इस ज्ञानके द्वारा दूसरे के मनमें ठहरे हुए पदार्थ ही जाने जाते हैं । अतएव मनका सम्बन्ध होने से इसको इन्द्रियजन्य ज्ञान कहना चाहिये ? यहां पर यह प्रश्न ठीक नहीं है क्योंकि 'बादलमें चन्द्रमा देखो' इस वाक्यसे जो ज्ञान होता है उसमें चन्द्रमाका ज्ञान करानेवाला बादल नहीं है, किन्तु चन्द्रमा ही खयं अपना ज्ञान कराता है । इसीप्रकार मनःपर्ययज्ञान उत्पन्न होने में दूमरेका मन कारण नहीं है । जिन पदार्थोंको मन:पर्ययज्ञान जानता है, वे पदार्थ दूसरेके मनमें ठहरे हैं। मन केवल उन पदार्थों का आधार है इसलिये वह ज्ञान उत्पन्न होने में कारण नहीं है । इससे स्पष्ट मालूम हो जाता है कि मनःपर्यय मनसे उत्पन्न नहीं होता । किन्तु पात्मासे उत्पन्न होता है। मन.पर्ययज्ञानावरण और वीर्या- तराय कर्मके विशेष क्षयोपशम होनेसे ही यह मनःपर्ययज्ञान उत्पन्न होता है। भतएव यह ज्ञान भतीन्द्रिय ही है। इस मनःपर्ययज्ञानके दो भेद हैं-एक ऋजुमति और दूसरा विपुलमति जिसके मन वचन काय सरल है ऐसे पुरुष के मन में ठहरे हुये पदार्थोंको प्रत्यक्ष जान लेना ऋजुमति मनःपर्यय ज्ञान है । तथा जिसके मन वचन काय सरल हो वा कुटिल हों ऐसे पुरुषके मनमें ठहरे हुये पदार्थोंको जान लेना विपुलमति मनःपर्ययज्ञान है । ऐसे मनःपर्ययज्ञानकी मै स्तुति करता है। केवलज्ञानकी स्तुति-- क्षायिकमनन्तमेकं त्रिकालसर्वार्थयुगपदवभासम् ! सकलसुखधाम सततं वन्देऽहं केवलज्ञानम् ॥ २९ ।। अन्वयार्थ--(क्षायिकं ) क्षायिक (अनन्त) अनन्त (एकं) एक (त्रिकालसर्वार्थयुगपदवमास ) त्रिकालवर्ती समस्त पदार्थोको एकसाथ जानने वाले (सकलसुखधाम ) अनन्त सुखके स्थान रूप ( केवलज्ञान ) केवलज्ञान को (अहं) मै (सततं) सदा ( वन्दे ) वदना करता हूँ। भावार्थ--यह केवलज्ञान क्षायिक है, क्योंकि समस्त ज्ञानावरणकर्मके ११३६] है अत्यंत क्षय होने से उत्पन्न होता है अथवा ज्ञानावरण दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय इन चारों घातिया कोके मत्यन्त क्षय होने से केवलज्ञान प्रगट होता है अतः इसको दायिक कहते हैं । इसके सिवाय यह केवलज्ञान अनन्त । इसका कमी नाश नहीं होता । मनतकाल तक बराबर बना रहता है । तथा एक है, अद्वितीय है | इसको किसकी सहायता की आवश्यकता नहीं होती तथा न इसका कोई मेद है यह ज्ञान अभेदरूप है । यह ज्ञान भूत, भविष्यत और वर्तमान तीन कालों में होनेवाले समस्त पदार्थ और उनकी समस्त पर्यायोंको एक साथ जानता है । यह ज्ञान अनंत सुखका स्थान है। केवलज्ञानके होते ही अनंत सुखकी प्राप्ति अवश्य होती है, ऐसे केवलज्ञानकी मे सदा वंदना करता है। स्तुनिके फल की प्रार्थना एवममिष्टुवतो मे ज्ञानानि समस्तलोकचक्षुषि । लघु भवताज्ज्ञानर्द्धि ज्ञानफलं सौख्यमच्यवनम् ।। ३० ॥ अन्वयार्थ-(एव ) इसप्रकार ( समस्तलोकचक्षुपि) लोकाकाशके समस्त पदार्थोंको जानने के लिये नेत्र-समान (ज्ञानानि ) पाचों ज्ञान (मे) मुझे (अमि- "टुवतः) अभीष्ट होते हुये अर्थात् मैने स्तुति की है अतः उन ज्ञानसे (अच्यवन) नाश रहित-अविनाशी (सुख ) सुख और (ज्ञानर्द्धि ज्ञानफल परम प्रकर्षताको प्राप्त ज्ञान-फल अतीन्द्रियज्ञान ( लघु) शीघ्र ( भवतात )प्राप्त हो। भावार्थ-ये पाचों ही ज्ञान लोकाकाशके समस्त पदार्थोंको जानने के लिये नेत्रके समान हैं। इसी लिये मैंने इन ज्ञानोंकी स्तुति की है । ज्ञानकी स्तुति करने से मुझे बहुत शीघ्र उस अनत सुखकी प्राप्ति हो-ये अनत सुख कभी नष्ट नहीं होता तथा जो सुख ज्ञान पैदा होता है । इन्द्रियोंसे उत्पन्न नहीं होता अथवा पुष्पमाला, भेजना, स्त्री आदि बाह्य पदार्थोसे उत्पन्न नहीं होता। केवल ज्ञानमय प्रात्मासे उत्पन्न होता है । ता जिस सुखमें झनकी अनेक अद्धिया भरी हुई हैं। अनंतदर्शन और अनतवीर्य जिस अनंत सुखके साथ हैं, ऐसा अनंत सुख मुझे शीघ्र ही प्राप्त हो। इसके भागे-कायोत्सर्ग करना चाहिये- इच्छामि भंते ! सुदत्तिकाउस्सग्गो को तस्स आलोचेऊं अंगो- वंगपइण्णए पाहुडयपरियम्मसुत्तपढमाणिओगपुन्चगयचूलिया चेव सुत्त. [१३७] -- स्थयथुइधम्मकहाइय णिच्चकालं अंचेमि, पूजेमि, वदामि, णमसामि, दुक्ख- क्खओ, कम्मक्खओ बोहिलाओ, सुगइगमणं, समाहिमरणं, जिणगुण संपति होउ मज्झं। हे भगवन् ! श्रुतभक्ति करने के बाद मैने जो कायोत्सर्ग किया है और ) उसमें जो दोप लगे है उनकी मै आलोचना करने की इच्छा करता है। श्रुतज्ञान के जो अंग और उपाग हैं, प्रकीर्णक, प्रामृतक, परिकर्म, मूत्र, प्रथमानुयोग, पूर्व- गत, चूलिका, सत्रार्थ, स्तुति, धर्मकथा श्रादि हैं, उन सबकी मैं सदाकाल अर्चा करता हु सबकी पूजा करता हू सबकी वदना करता हू और सबके लिये नमस्कार करता ह, । ऐमा करने से मेरे समस्त दुखोंका नाश हो, समस्त कर्माका नाश हो, मुझो रत्नत्रयकी प्राप्ति हो, सुगति प्राप्त हो, समाधिमरणकी प्राप्ति हो और भगवान जिनेन्द्रटेषके अनतगुणोंकी प्राप्ति हो । ॥ इति श्रतभक्तिः । AA अथ श्रु तभक्तिः ( प्राकृत) सिद्धवग्सासणाणं सिद्धाणं कम्मचकमुक्काणं । काऊण णमुक्कारं भत्तीए णमामि अंगाइ ॥१॥ आयारं सुहयडं ठाणं समवाय विहायप- एणची । णाणाधम्मकहाओ उवासयाणं च अज्झयणं ॥ २॥ चंदे अंत यडदसं अणुत्तरदसं च पण्हवायरणं । एयारसमं च तहा विवायसु णम- मामि ॥ ३ ॥ परियम्म सुतपढमाणुओ य पुच्चगयचूलिया चेव । पवरवर दिठिवाढ तं पंचविहं पणिवदामि ॥ ४ ॥ उम्पाय पुनमग्गायणीय विरि- यत्थिणत्थि य पचाई। णाणासच्चपवाद आदा कम्मप्पवादं च ॥५॥ पञ्चक्खाणं विजाणुवाय कल्लाणणाम वरपुव्वं । पाणावायं किरियाविसाल- मथलोयबिंदुसारसुठ ॥ ६॥ दसचउदस अटारस वारस तह य दोसु पुन्वेसु । सोलसवीसं तीसं दसमम्मिय पण्णरसवत्थू ॥ ७ ॥ ऐदेसि पुन्वाणं जावदियो वत्थुसंगहो भणियो । सेसाणं पुवाणं दसदसवत्थ । पाणिवंदामि ॥८॥ एक्क्कम्मि य-वत्यू वीसं वीसं च पाहुडा भणिया । [१३८] विसमसमा विय वत्थू सव्वे पुण पाहुडेहि समा ॥ ९॥ पुव्वाणं वत्थुसयं पंचाण वदी हवंति वत्थूओ ॥ पाहुड तिण्णिसहस्सा णवय सया चउद- साणंपि ॥ १० ॥ एवमए सुदपवरा भचीरायेण संथुया तच्चा ॥ सिग्ध मे सुदलाई जिणवरवसहा पयच्छंतु ॥ ११ ॥ इच्छामि भंते ! सुदभति- काउस्सग्गो कओ तस्म आलोचेउ अंगोवगपइण्णए पाहुडयपरियम्मसुत्त- पढमा णिओगपुन्वगयचूलिया चेव सुत्तत्थयथुड धम्मकहाइयं णिच्चकाल अंचेमि, पूजेमि, वदामि, णमसामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्रवओ, बोहिलाहो, सुगइगमणं, समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झ । इति श्रतभक्ति । चारित्रभक्तिः * येनेन्द्रान्भुवनत्रयस्य विलसत्केयूरहारांगदान् । भाखन्मौलिमणिप्रभाप्रविसगेत्तुगोचमानानतान् ।। स्वेषा पादपयोल्हेपु मुनयश्चक्रुः प्रकामं सदा । वंद पचतय तमद्य निगदन्नाचारमभ्यर्चितम् ॥ १ ॥ अन्वयार्थ--(येन ) जिस आचरण द्वारा ( विलसत्केयूरहारागदान् ) जिनके शरीर केयूर, हार और बाजूवद आदि आभूषणोसे सुशोभित है ( भास्त्र- न्मौलिमणिप्रविसरोत्तुगोत्तमागान् ) जिनके मस्तक दैदीप्यमान मुकुटकी मणियों की कातिके फैलाव से बहुत ऊचे दिखाई देते हैं ऐसे (भुवनत्रयस्य इन्द्रान्) तीनो लोकोंके समस्त इन्द्रोंको (मुनय ) जिन मुनियोंने ( स्वेषा पादययोरु- हेषु ) अपने चरणकमलोंमें (नतान् चक्रु ) नम्रीभूत कर लिया ऐसे (अभ्य- चित) अत्यत पूज्य (तम् पचतय ) उन पंचाचारोंके (निगदन् ) स्वरूपको कहनेकी इच्छा करनेवाला मै (सदा) सदैव (प्रकाम) भक्तिपूर्वक (वटे) नमस्कार करता है। शार्दूलविक्रीडितवृत्त [१३९] भावार्थ- इन्द्रादिकदेव भी मुनियो के चरणकमलोमें नमस्कार करते है, यह पचाचारका ही प्रभाव है । वे मुनि पचाचारका पालन करते हैं, इसीलिये इन्द्रादिक देव उनको नमस्कार करते है । उन्हीं पचाचारोंको नमस्कार करता है। ज्ञानाचारका स्वरूप-- अर्थव्यञ्जनतद्वयाविकलताकालोपधाप्रश्रयाः ! स्वाचार्याधनपद्धवो बहुमतिश्चेत्यष्टधा व्याहृतम् ।। श्रीमज्जातिकुलेन्दुना भगवता तीर्थस्य कर्नाऽजसा। ज्ञानाचारमहं त्रिधा प्रणिपताम्युचूतये कर्मणाम् ।। २ ॥ अन्वयार्थ--(अर्थव्यञ्जनतव्याविकलताकालोपधाप्रश्रया.) अर्थ, शब्द और उन दोनों (अर्थ, शब्द) की परिपूर्णता, काला उपधा, प्रश्रय ( स्वाचा- धिनपहव. ) अपने आचार्य [ गुरु ] का नाम न छिपाना (च बहुमतिः ) और बहुमति ( इति अष्टधा ज्ञानाचारं ) यह आठ प्रकारका ज्ञानाचार ( श्रीमज्जाति- कुलेन्दुना ) लक्ष्मीसे युक्त ज्ञाति [ जाति और कुलमें चन्द्रमाके समान (अजसा) परमार्थसे (तीर्थस्य कर्ता) धर्म रूपीतीर्थ के करनेवाले ( भगवता) भगवान् तीर्थंकर देवने (व्याहृत) प्रतिपादन किया है । ( अह ) मैं (कर्मणा उद्धृतये) कर्मोके नाश करनेके लिये उस ज्ञानाचारको (त्रिधा ) मन, वचन काय से (प्रणिपतामि) नमस्कार करता है। भावार्थ- ज्ञानाचार आठ प्रकारका है। १ अर्चाचार--ज्ञानके द्वारा जाने हुये अर्थ वा पदार्थको अच्छी तरह धारण करना। २ व्यानाचार--शब्दोंको स्पष्ट और निर्दोष उच्चारण करना । ३ तदुभयाचार---उन दोनोंकी पूर्णता अर्थात् अर्थाचार और शब्दाचार [ व्यसनाचार ] की पूर्णता । ४ कालाचार--योग्य समयमें ज्ञानका आराधन करना । प्रातःकाल, मध्याह्नकाल, सन्ध्याकाल, भूकंप, मूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, उल्कापात, वज्रपात पाढिके समय ज्ञानका अाराधन नहीं करना चाहिये । इन सबको छोड़कर योग्य समयमें जानका आराधन करना चाहिये। ५ उपधाचार--स्मरणपूर्वक अध्ययन करना चाहिये। [१४०] - '६ प्रश्रयाचार--( विनयचार ) शास्त्रोंका विनय करते हुये प्रत्ययन करना चाहिये। ७ स्वाचार्याद्यनपन्हव~-अर्थात् पञ्चाचारको निरूपण करनेवाले आचार्य अथवा ज्ञान देनेवाले उपाध्याय आदि का नाम नहीं छिपाना चाहिये । ८ बहुमति--प्राचार्य वा उपाध्यायोंका आदर सत्कार करते हुये अध्ययन करना चाहिये। इस प्रकार ज्ञानाचारके आठ भेद हैं | जिनके अनतचतुष्टयरूप अतरग लक्ष्मी और समवशरणादिक बहिरग लक्ष्मी विद्यमान है । जो अपनी जाति और कुल को प्रकाशित करनेके लिये चन्द्रमाके समान हैं और जो श्रुतज्ञान रूप तीर्थ के अथवा धर्मरूपतीर्थके यथार्थ कर्ता हैं, धर्म वा श्रुतज्ञानको प्रगट करनेवाले वा निरूपण करनेवाले हैं। ऐसे भगवान् जिनेन्द्रदेवने इस आठ प्रकारके ज्ञाना- चारका निरूपण किया है । ऐसे' ज्ञानाचारको मै अपने समस्त कोको नाश करनेके लिये मन, वचन, काय से नमस्कार करता हूं। दर्शनाचारका स्वरूप-- शङ्कादृष्टिविमोहकांक्षणविधिव्यावृतिसन्नद्धताम् । वात्सल्य विचिकित्मनादुपरतिं धर्मोपवृहक्रियाम् ।। शक्त्या शासनदीपनं हितपयाभृष्टस्य संस्थापनम् । वदे दर्शनगोचरं सुचरितं मूर्ना नमन्नादरात् ।। ३ ।। अन्वयार्थ--(शकोशिविमोहकाक्षणविधिव्योवृत्तिसन्नद्धता) शका दृष्टि- विमोह, काक्षा करनेकी निवृत्ति रूप तत्परता अर्थात् शकाकी निवृत्ति-निःश. कित अग, दृष्टिविमोहकी निवृत्ति-अमूढदृष्टि अग, कांक्षाकी निवृत्ति-निःका- क्षित अग (वात्सल्य ) वात्सल्प अग (विचिकित्सनात् उपरति) ग्लानिका त्याग (धर्मोपबृहक्रिया ) उपग्रहन अग (शक्त्या शासनदीपन ) शक्तिअनुसार जैन- धर्मका प्रकाश करना-प्रभावना अग ( हितपथात मृष्टस्य सस्थावन ) हितपथ रत्नत्रय से मृष्ट-च्युत जीवोंको फिर उसी में स्थिर करना स्थितिकरण अग ये दर्शनगोचरं ) दर्शनाचारके (सुचरित) गणधरदेवादिकके द्वारा प्रतिपालित हैं-उन आठों दर्शनाचारके अगोंको (मूर्ना नमन् आदरात वढे ) मस्तक नमाकर आदर सहित वदना करता है। [१४१] भावार्थ-इस सम्यग्दर्शनरूप दर्शनाचारके भी आठ अग है। पहले अग का नाम निःशकित है। सर्वज्ञ है या नहीं, अथवा ये पदार्थ सर्वज्ञटवके कहे हुये हैं या नहीं- इस प्रकारके सदेह को शका कहते है । ऐसी शका कभी न करना-ऐसी शका की निवृत्तिमें सदा तत्पर रहना अर्थात सर्वज्ञ प्रणीत पदार्थों में पूर्ण विश्वास करना निःशंकित अग है । दूसरे अंग का नाम-मूढदृष्टि है। दृष्टिशब्दका अर्थ पदार्थो का यथार्थ श्रद्धान है, उसकी मूढ़ता अन्य मिध्यादृष्टियो की प्रशंसा करना है। ऐसी मूढ़ता न करना, ऐसी मूढ़ताकी निवृत्ति करने में सदा तत्पर रहना अमूदहष्टि अग है, तीसरा अग नि:कानित है। आगामी भोगों की इच्छाका होना काक्षा कहलाती है । ऐसी काक्षा न करना, इच्छाओं की निवृत्ति में सदा तत्पर रहना नि:कांक्षित अग है । चौथा अग वात्सल्य साधर्मी भाइयोके साथ स्नेह रखना वात्सल्य है । पाचवा अग निर्विचिकित्सा है । विचिकित्सा ग्लानि को कहते हैं। मुनियोंके मलिन शरीरको भी देखकर ग्लानि न करना निर्विचिकित्सा अग है । छठाअग उपवृहण ( उपगूहन) है। उत्तम क्षमा आदि धर्मों की वृद्धि करना अथवा धर्मका अनुष्ठान करनेवाले धर्मात्मा भाइयों के प्रमादवश लगे हुये दोषोंको ढक कर धर्म की वृद्धि करना धर्मोपवृंहण नामका अग कहा जाता है। सातवे अग का नाम प्रभावना है । अपनी शक्ति के अनुसार तपश्चरण आदिके द्वारा जैनधर्मका माहात्म्य प्रगट करना प्रभावना है। आठवे अगका नाम स्थितिकरण है । जो मुनि या श्रावक रतत्रयसे भ्रष्ट हो रहा है, उसको उदाहरण देकर या हेतुवादसे या नयवादसे समझाकर रत्नत्रयमें स्थिर करना भ्रष्ट न होने देना स्थितिकरण अग कहलाता है। इस प्रकार जिस दर्शनाचारमें सम्यग्दर्शनके ये आठ अग हैं जिनका अनु- ष्ठान या धारण करना अत्यन्त मनोहर वा सुगति देनेवाला है अथवा जिसका अनुष्ठान गणधरादिकदेव करते हैं ऐसे दर्शनागरको मै बडे आदर से मस्तक नमाकर नमस्कार करता है । तपाचारका स्वरूप--(बाह्यतप) एकान्ते शयनोपवेशनकृतिः संतावनं तानवम् । संख्यावृत्तिनिवन्धनामनशनं विप्वाणमोदरम् ।।

त्यागं चेन्द्रियदन्तिनो मदयतः स्वाटो रसस्यानिशम् । पोढा बाह्यमहं स्तुवे शिवगतिप्राप्त्यभ्युपायं तपः॥४॥ अन्वयार्थ-(एकान्ते शयनोपवेशनकृतिः ) एकान्त स्थान में सोना बैठना [ विविक्तशय्यासन ] (तानव सतापन) शरीरको क्लेशित करना [ कायकलेश) (सख्यावृत्तिनिबन्धना ) आहारादिवृत्ति के कारणोकी गिनती [ वृतपरिसख्यान ] (अनशनं ) अनशन -उपवास (अझैदर विष्वाण) आधापेट भोजन करना [अवमौदर्य ] ( च इन्द्रियदन्तिन: मदयतः स्वादः रसस्य अनिश त्याग ) तथा इन्द्रियरूपी हाथीको मद उत्पन्न करनेवाले इन (षोढा) छह प्रकारके (शिवग- तिप्राप्यभ्युपाय) मोक्षकी प्राप्तिके कारण रूप (बाहय तपः) बाह्यतपोकी (मह) मै (स्तुवे ) स्तुति करता हूँ। भावार्थ-तपश्चरणके दो भेद हैं-एक अतरगतपश्चरण और दूसरा बाह्य तपश्चरण । इन दोनों तपोंके छह छह मेद हैं । इनमें से बाह्य तपके छह भेद यहा दिखलाते हैं । जहा पर पशु, स्त्री, नपुसक आदि न रहते हों ऐसे एकान्त स्थानमें सोना-बैठना विविक्तराय्यासन नामका तप है । अनेक प्रकारके तपश्च रणोंसे शरीरकों क्लेशित करना कायक्लेश नामका तप है । अपने आहार विहार आदि प्रवृत्तिके जो कारण हैं-उनकी गिनती या नियम करना वृतपरिसख्यान तप है। चार प्रकारके आहारका त्याग कर उपवास करना अनशन तप है । अर्ध पेट भोजन करना-अवमौदर्य तप है। इन्द्रियरूपी हाथीको मद उत्पन्न करनेवाले स्वादिष्ट या पौष्टिक रसोंका सदाके लिये त्याग करना-रसपरित्याग नामका तप हैं । इस प्रकार बाह्य तपके छह भेद है । ये छहों प्रकारके तप बाहरसे दिखाई देते है, लोगोंको मालूम हो जाते हैं अतः इनको बाह्य तप कहते हैं । तथा ये छहों तप मोक्षमार्गको प्राप्त करानेके कारण हैं , उनसे मोक्षप्राप्ति अवश्य होती है । ऐसे छह प्रकारके बाह्य तपोंकी मै स्तुति करता हू तथा वदना करता हू । अन्तरग तपोका वर्णन- स्वाध्यायः शुभकर्मणश्च्युतव्रतः संप्रत्यवस्थापनम् । ध्यानं व्यापृतिरामयाविनि गुरौ बृद्ध च वाले यतौ ।। कायोत्सर्जनसक्रिया विनय इत्येवं तपः षड् विधं । वंदेऽभ्यन्तरमन्तरंगवलवद्विद्वषिविध्वसनम् ।। ५ ॥ [१४३] - - . , अन्वयार्थ--(स्वाध्यायः ) स्वाध्याय (शुभकर्मणश्च्युत व्रतः संप्रत्यव- स्थापन ) शुभकर्मोको-सामायिक, वदनादिको जो छोड़ रहे हैं या छोड चुके हैं उनको प्रायश्चित्तादि देकर फिर उसी मार्गमें लगाना [प्रायश्चित्त ] (ध्यान) । ध्यान (आमयाविनि गुरौ, वृद्ध च बाले यतो व्यापृतिः) रेगी गुरु, वृद्ध और बाल यतियोंकी वैयावृत्त्य करना ( कायोत्सर्जनसक्रिया) कायसे ममत्त्व छोड़ने रूप सक्रिया [कायोत्सर्ग ] ( विनयः ) विनय (इति एवं षविधः अभ्यन्तर तपः) इस प्रकार छह तरहके अतरग तपोंको ( अन्तरंगबलवद्विद्वेषिविध्वसन) जो अत्यन्त बलवान अन्तरग शत्रुओको जड मूलसे नष्ट करने वाले हैं-उन (तपों) को नमस्कार करता है। भावार्थ--अतरग तपके छह भेद इस प्रकार हैं--लाभ, सम्मान, कीर्ति आदिकी इच्छा रहित केवल कर्मोको नाश करने के लिये धर्मशास्त्रोंका अध्ययन करना स्वाध्याय है । जो सामायिक, वदना आदि शुभकार्योको छोड़ रहे है या छोड़ चुके हैं उनको प्रायश्चित्त दकर फिर उसी सनातन मोक्षमार्गमें लगाना प्रयश्चित्त नामका तप है। अपने मनको किसी एक पदार्थ पर लगा कर अन्य समस्त चितवनोंको रोक देना ध्यान है। जो गुरु या प्राचार्य रोगी हो अथवा कोई मुनि अत्यन्त वृद्ध हो या कोई बालक अवस्थामें (कम अवस्थामें ) मुनि हो गया और वह रोगी हो तो अपने शरीरसे उसकी सेवा करना वैयावृत्य नाम का तप है। अपने शरीरसे ममत्वका त्याग कर देना कायोत्सर्ग नामको तप है। चार प्रकारका विनय धारण करना विनय तप है । इस प्रकार अतरंग तपके छह मेद हैं। ये सब अतरग तप अत्यन्त बलवान ऐसे क्रोधादिक अतरंग शत्रुओको नाश करनेवाले हैं। ऐसे इन छहों तपोंको मै बड़ो भक्ति के साथ नमस्कार करता हू। वीर्याचारका वर्णन- सम्यग्ज्ञानविलोचनस्य दधतः श्रद्धानमईन्मते । वीर्यस्याविनिगृहनन तपसि स्वस्य प्रयत्नाद्यतेः ।। या वृतिस्तरणीव नौरविवरा लम्बी भवोदन्वतो। वीर्याचारमहं तमुर्जितगुणं वंदे सतामचितम् ॥ ६ ॥ - १-एकाग्रचिन्तानिरोधो व्यानम् । [१४४] अन्वयार्थ:-- ( सम्यग्ज्ञान विलोचनस्य दधतः ) सम्यग्ज्ञानरूपी नेत्रों को धारण करनेवाले (अर्हन्मते श्रद्वान 'दधतः' यते) अहंत भगवानके मत में गाढ श्रद्धानको धारण करने वाले मुनिके (वीर्यस्य भविनिगृहनेन ) वीर्यशक्ति को न छिपाकर (स्वस्य प्रयत्नात् तपसि या वृत्तिः) अपने प्रयत्नसे तप में जो प्रवृत्ति है, वह ( भवोदन्वतो) ससार समुद्रसे ( अविवरा' ) छिद्रा रहित (लघ्वी) हल्की ( नौः इव ) नावके समान ( तरणी) पारकरनेवाली है ऐसी शक्तिरूप (तं उर्जितगुणं सता अर्चित बीर्याचार अह वदे ) उस समस्त कमों के नाश करने में समर्थ, सत्पुरुषोके द्वारा पूज्य वीर्याचारको मै नमस्कार करता हूँ। भावार्थ-~जो मुनि वन्नुके यथार्थ स्वरूपको जाननेवाले सम्यग्ज्ञानरूपी नेत्रोंको धारण करते हैं और भगवान् अरहतदेवके कहे हुये मतमें गाढ़ श्रद्धान धारण करते हैं ऐसे सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान को धारण करनेवाले मुनि अपने वीर्य या शक्तिको न छिपाकर बड़े यनसे-आदरसे ऊपर कहे हुये बारह प्रकारके तपश्चरण पालन करने में अपनी प्रवृत्ति करते हैं, वह उनकी प्रवृत्ति ससार रूपी समुद्रसे पार करने के लिये नावके समान होती है । जिस प्रकार नाव छिद्र रहित होती है उसी प्रकार उन मुनियोंकी प्रवृत्ति मी अतिचार रहित होती है तथा नाव जिस प्रकार छोटी और हल्की एक ही लकडी की बनी हुई अव- श्य पार कर देती है उसी प्रकार उन मुनियों की प्रवृत्ति मी आडबर रहित केवल तपश्चरण रूप होती है । ऐसी जो वह मुनियोंकी शक्ति है या वीर्याचार हैं-जो कि समस्त कर्मों के नाश करने में अथवा कठिन तपश्चरणोंके धारण करने में अत्यन्त गुणशाली है और गणधरादिक बडे बड़े अद्धिधारी मुनि मी जिसकी पूजा करते है ऐसे वीर्याचारको अत्यन्त कठिन और घोर तपश्चरण करने की शक्ति को मै नमस्कार करता है। चारित्राचारका वर्णन-- तिस्रः सत्तमगुप्तयस्तनुमनोभाषानिमित्तोदयाः । पंर्यादिसमाश्रयाः समितयः पञ्चव्रतानीत्यपि ।। ३-श्रादरात्। २--यथावस्थितवस्तुग्राहिज्ञान सम्यग्ज्ञान। ३--वृत्यर्थे निरतिचारा। (अविवरा छिद्ररहिता) [१४५] चारित्रोपहितं त्रयोदशतयं पूर्व न दृष्टं परै- राचारं परमेष्ठिनो जिनपतेरि नमामो वयम् ।। ७' अन्वयार्थ:-(तनुमनोभाषानिमित्तोदयाः) शरीर, मन, भाषाके निमित्त से होनेवाली (तिस्रः) तीन (सत्तम गुप्तयः ) शोभनीक गुप्तिया ( ईर्यादिसमा- श्रयाः पश्च समितयः) ईर्यादिक पाच समिति (अपि ) और (पंच व्रतानि) पाच व्रत' (इति ) इस प्रकार (त्रयोदशतय ) तेरह प्रकारका (चारित्रोपहित) चारित्राचार जो (परमेष्ठिनः जिनपते; वीरं परैः) अरहंत परमेष्ठी तीर्थकर- परमदेव भगवान् वीरनाथके सिवाय ( पूर्व न दृष्ट ) पहिले किसी ने निरूपण नहीं किया ऐसे ( आचार') चारित्राचारको (वय नमामः ) हम नमस्कार करते हैं। भावार्थ --चारित्रके तेरह भेद हैं और वे इस प्रकार हैं । मनको वशकरना, वचनको वश करना और कायको वश करना अर्थात मन वचनकायकी कोई क्रिया न होने देना गुप्तिया कहलाती हैं । इस प्रकार गुप्तियोंके तीन भेद हैं। समितिया पांच हैं । ईर्यासिमिति, भाषासिमिति, एषणा समिति, प्रादान निक्षेपण समिति और उत्सर्ग समिति । सूर्यके प्रकाशमें चार हाथ भूमि देलकर चलना ईर्या समिति है । हित मित प्रिय भापा बोलना भांपा समिति है। शास्त्रमें कही हुई विधिके अनुसार शुद्ध निर्दोष भोजन ग्रहण करना एषणा समिति है। उपकरणों को देख शोधकर रखना, उठाना श्रादाननिक्षेपण समिति है । जमीनको देखकर ( जीवजतु रहित ) मलमूत्र निक्षेपण करना व्युत्सर्ग समिति है । इनके सिवाय पाच महाव्रत हैं । हिंसा झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पाच पापोका मनवचनकाय और कृतकारित अनुमोदना से सर्वथा त्याग कर देना पाच महाव्रत कहलाते हैं। यह सब तेरह प्रकारका चारित्र कहलाता है । इस तेरह प्रकारके चारित्रके समु- दायको चारित्राचार कहते हैं। उस चारित्राचारके ऊपर लिखे हुये तेरह भेद हैं। यह तेरह प्रकारका चारित्राचार भगवान वीर प्रभु ने ही निरूपण किया है। १-हिन्सानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेन्यो विरति तम २-सम्यग्योगनिग्रहो गुतिः [१४६] भरहंत परमेष्ठी तीर्थकर परमदेव भगवान वीरनाथके सिवाय तथा भगवान वृषभ- देव (प्रथमतीर्थकर ) के सिवाय अन्य अजितनाथ तीर्थकर से लेकर पार्श्वनाथ तीर्थकर तक २२ तीर्थंकरों में से किसी ने भी निरूपण नहीं किया है। श्री वृषभ- देव तीर्थकर के समय लोगोंकी बुद्धि सरल थी परंतु मार्ग वद होने के कारण लोग जानकार नहीं थे । इसलिये उन्होंने तेरह प्रकारका चारित्र निरूपण किया तथा महावीर भगवान् के समयमें लोगोंकी बुद्धि जड़रूप थी-परिणामोंमें कुटि- लता थी, अतः उन्होंने ऐसे भव्य जीवोंके लिये तेरह प्रकारका चारित्र निरूपण किया। बाकीके तीर्थंकरोंने समस्त पापोंकी निवृत्तिरूप एक सामायिक चारित्र का ही निरूपण किया था। क्योकि उनके समय न तो जीव भोले थे और न जड बुद्धिवाले ही थे। ऐसे चारित्राचारके लिये मै नमस्कार करता है। पश्चाचार पालनेवाले मुनियों की वंदना-- आचारं सहपंचभेदमुदित तीर्थ' परं मंगलम् । निग्रंथानपि सच्चरित्रमहतो वदे ममग्रान्यतीन् ।। आत्माधीनसुखोदयामनुपमां लक्ष्मीमविध्वंसिनीम् । इच्छन्केवलदर्शनावगमनप्राज्यप्रकाशोज्वलाम् ।। ८॥ अन्वयार्थ--(सहपचभेदमुदित आचारं ) ऊपर कहा गया पार प्रकार का प्राचार (तीर्थ) ससार समुद्रसे पार करनेवाला तीर्थ है ( परं मगल ) उत्कृष्ट मंगल रूप है उस आचारको मै (वंट) नमस्कार करता हूं। तथा इस माचारको पालन करनेवाले ( सच्चरित्रमहतः) जो उत्तम चारित्र पालनेसे पूज्य है ( निग्रं- थान् ) परिग्रहसे रहित हैं ऐसे ( समग्रान् यतीन अपि 'व' ) समस्त मुनियों को भी वदना करता हूं। जो लक्ष्मी (आत्माधीनसुखोदया ) आत्मासे उत्पन्न होने वाले सुखमय है (अनुपमा ) अनुपम है ( अविध्वसिनी) नाश रहित अविनाशी है तथा ( केवलदर्शनावगमनप्राज्यप्रकाशोज्वला ) केवलदर्शन, केवलज्ञान इन दोनोंके मनत प्रकाशसे अत्यन्त दैदीप्यमान है ऐसी ( लक्ष्मी ) लक्ष्मीकी (इच्छन् १-भत्रोदधि भव्यास्तरस्यनेनेति तीर्थ । २-मंग सुख-पुण्य लाति श्रादत्ते इति मंगल अथवा में पापं-मलं गालमति मिनाशयति इति मंगलं ।। ३-प्रथानिष्कांता:. निरस्ती वा अथो यस्ते निम्रन्थाः तान् । [१७] इच्छा करता हुआ मै 'याचारं यतीन अपि' उस प्राचार और आचार धारण करनेवाले मुनियोंको नमस्कार करता है। भावार्थ-जिस आचारके ऊपर पाच भेद बतलाये हैं, जो प्राचार भव्य जीवोंको इस ससार समुद्रसे पार कर देनेवाला तीर्थ है, जो मोक्ष मार्गमे सर्वो- स्कृष्ट है और जो पापोंको नाश करनेवाला है, अनत पुण्य उत्पन्न करनेवाला मगलमय है, ऐसे पचाचारके लिये मै बढना करता है। तथा इनकी वदना के साथ साथ इन पचाचारोको धारण करनेवाले समस्त मुनियोकी मी वदनाकरता ह, जो उत्तम चारित्रको पालन करने से ही पूज्य है ऐसे समस्त मुनियोके लिये मै वंदना करता हूँ। इस मसारमें एक मोक्ष लक्ष्मी ही अविनश्वर है, बाकी की समस्त लक्ष्मियां नाश होनेवाली है । इसके सिवाय यह मोक्ष लक्ष्मी केवल आत्मासे उत्पन्न होने वाली अनत सुखमय है तथा केवलदर्शन और केवलज्ञान इन दोनोंके अनत प्रकाशसे अत्यन्त दैदीप्यमान है और इसीलिये वह उपमा रहित है ऐसी मोक्ष लक्ष्मी के प्राप्त करनेकी इच्छा करता हुअा मै पचाचारोंको और पंचाचार धारण करनेवाले समस्त मुनियोंको नमस्कार करता है। चारित्र पालनमें दोपोंकी आलोचना--- अज्ञानाद्यदवीवृतं नियमिनोऽवर्तिप्यहं चान्यथा । तस्मिन्नर्जितमस्यति प्रतिनव चैनो निराकुर्वति ।। वृत्ते सप्ततयी निधि सुतपसामृद्धिं नयत्यद्भुत । तन्मिथ्या गुरुदुष्कृत भवतु मे स्वं निंदतो निंदितम् ॥ ९ ॥ अन्वयार्थ:--मैंने (अज्ञानात् ) अज्ञानसे जो ( नियमिन.) मुनियोंको ( अन्यथा ) शास्त्रमें कही गई विविके प्रतिकूल ( यदवीकृत ) प्रवर्तन कराया हो (च अहं 'अन्यया' अवर्तिपि) अथवा यदि मैने स्वय अपने अज्ञान से आगमसे विरुद्ध प्रवर्तन किया हो और (नस्मिन् 'अन्यथा वर्तने' ) उस बागम के प्रवर्तन करने अथवा करानेमें जो (एनः अर्जितम् ) पाप लगे हों वे सब पाप ( अस्यति ) नष्ट हो जाते हैं (च ) और ( प्रतिनव ) नवीन नवीन जो पाप आते है वे मी इस चारित्रके पालन करने से (निराकुर्वति ) नष्ट हो जाते हैं। इसके सिवाय ( वृत्तेः ) इस चारित्रके प्रभावमे (सुतपसा ) श्रेष्ठ तप करने [१४] / वाले मुनियोंको (अद्भुतं) आश्चर्य करनेवाली (सप्ततयीं )सात (निधिं अर्धि) निधिस्वरूप ऋद्धियाँ (नयति) प्राप्त होती है, ऐसे इस चारित्रके पालन करनेमें ('यत्' गुरुदुष्कृत ) जो महा पाप बन गया हो जोकि ( निंदितन ) निंदित हो (तत्) वह सब पाप (स्व निंदत. मे ) अपनी आत्माकी निंदा करने वाले मेरे ( मिथ्या भवतु) मिथ्या हो । भावार्थ--मैने अपने अज्ञानसे यदि मुनियोंको शास्त्रमें कही गई विधिके प्रतिकूल प्रवर्तन कराया हो अथवा यदि मैने स्वय अपने अज्ञानसे आगम विरुद्ध प्रवर्तन किया हो और उस आगमके प्रतिकूल प्रवर्तन करने अथवा कराने में जो पाप लगे हों वे सब पाप इस चारित्रके पालन करने से नष्ट हो जाते हैं तथा नगन नवीन जो पाप आते हैं वे भी सब इस चारित्रके पालन करने से नष्ट हो जाते हैं। इसके सिवाय इस चारित्रके प्रभावसे श्रेष्ठ तपश्चरण करने वाले मुनियोको आश्चर्य करनेवाली तपश्चरणकी सात ऋद्विया उत्पन्न हो जाती हैं । वुद्धिऋद्धि, घोरतपऋद्वि, विक्रियाऋद्धि, औषधिऋद्धि, रसऋद्धि, बलऋद्धि, अक्षीण ऋद्धि ये सात प्रकारकी ऋद्धिया मुनियोको इस चारित्रके ही प्रभावसे होती हैं । ऐसे इस चारित्रके पालन करने में जो मुझ से महापाप बन गया हो- जोकि अत्यन्त गर्हित वा निंदनीय हो वह सब पाप अपने आत्माकी निंदा करने वाले मेरे मिथ्या हो। चारित्र धारण करनेका उपदेश-- संसारख्यमनाह तिप्रचलिता नित्योदयग्रार्थिनः । प्रत्यासन्न विमुक्तयः सुमतयः शान्तैनसः प्राणिनः॥ मोक्षस्येव कृत विशालमतुलं सोपानमुच्चस्तराम् । आरोहन्तु चरित्रमुत्तममिदं जैनेन्द्रमोजस्विनः ॥ १० ॥ अन्वयार्थ--(ससारव्यसनाहनिप्रचलिता) जो भव्य जीव ससारके दुःखों के धक्कोंसे भयमीत हो गये हैं ( नित्योदयप्रार्थिनः) जो सदाकाल रहनेवाली मोक्ष लक्ष्मीके प्राप्त होने की प्रार्थना करते है (प्रत्यासन्नविमुक्तयः) जो आसन्न भव्य हैं-मोक्ष लक्ष्मी जिनके समीप तक आ पहुची है (सुमतयः ) जिनकी बुद्धि उत्तम है ( शान्तैनस.) जिनके पाप कर्मोका उदय शान्त हो गया है (ओज- स्विनः प्राणिनः) जो बडे तेजस्वी हैं ऐसे जीव ( जैनेन्द्र ) जिनेन्द्र भगवान् के [१४६] द्वारा निरूपण किये हुये (अतुलं ) जिसकी संसार में कोई उपमा नहीं है (विशालं ) जो अत्यन्त विशाल है (उच्चौस्तराम्) अत्यंत ऊंचा है ऐसा (मोक्ष. स्यकृत सोपानं इव) मोक्षके लिये बनाये हुए जीने के समान (इद उत्तम चरित्रं भारोहुतु) उस उत्तम चारित्रको धारण करो। भावार्थ---जो जीव संप्तारके दुःखोंके धक्कोंसे भयभीत हो गये हैं, जो सदा- काल रहनेवाली मोक्षलक्ष्मीके प्राप्त होनेकी प्रार्थना करते हैं, जो भासन्न भव्य हैं या मोक्ष लक्ष्मी जिनके समीप तक आ पहुची है, जिनकी बुद्धि मोक्षमार्ग में लगी रहनेके कारण अत्यन्त उत्तम है, जिनके पापकर्मोको उदय शान्त हो गया है और जो बड़े तेजस्वी या मोक्षमार्गमें उद्यम करनेवाले हैं ऐसे भव्य जीव इस ऊपर कहे हुए, श्रीजिनेन्द्रदेवके द्वारा निरूपण किये हुए तथा जिसकी ससारमें कोई उपमा नहीं है, जो अत्यन्त विशाल और अत्यन्त ऊचा है ऐसा मोक्ष के लिये बनाये हुये जीने के समान इस उत्तम चारित्रको धारण करें-पालन करें। कायोत्सर्गः । इसके आगे कायोत्सर्ग करना चाहिये । अथ आलोचना- इच्छामि भंते ! चारित्तभत्तिकाउस्सग्गो कओ तस्स आलोचेउ । सम्मणाणजोयस्स सम्मत्ताहिठियस्स सव्व पहाणस्स णिव्वाणमगास्स कम्म. णिज्जरफलस्म खमाहारस्स पञ्चमहव्वयसंपण्णस्स तिगुत्तिगुवस्स पश्च समि- दिजुत्तस्स णाणज्ज्ञाण साहणस्स समया इब पवेसयस्स सम्पचारित्तम्स सया अंचेमि, पूजेमि, वंदामि, णमसामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ, बोहिलाहो सुगइगमणं, समाहिमरणं, जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं । अर्थ--हे भगवन् ! मै चारित्रभक्ति करके कायोत्सर्ग करता हूं तथा उस कायोत्सर्गमें जो अतिचार या दोष लगे हों उसकी आलोचना करनेकी इच्छा करता हूं। यह सम्यक्चारित्र सम्यग्ज्ञान सहित है, सम्यग्दर्शनसे परिपूर्ण है, मोक्ष प्राप्त करानेके कारणों में से सबमें प्रधान है, मोक्षका साक्षात् कारण है, कोंकी निर्जरा होना ही इसका फल है, उत्तम क्षमा ही इसका आधार है, पच महावतोंसे सुशोभित है, तीनों गुप्तियों से इसकी रक्षा होती है यह पाचों समितियों सहित है, ज्ञान और ध्यानका मुख्य साधन है, समताका प्रवेश इसके अन्तर्गत है ऐसे सम्यक्चारित्रकी मै अर्चा करता है, सदा पूजा करता हू, सदा वदना करता हूं, और सदा नमस्कार करता हूं। ऐसा करने से मेरे समस्त दुखोंका [१५० नाश हो, समस्त कमोंका नाश हो, रतत्रयकी प्राप्ति हो, शुभगतिकी प्राप्ति हो, समाधिमरण की प्राप्ति हो और श्रीजिनेन्द्रदेवके गुणों की प्राप्ति हो। इति चारित्रभक्तिः। अथ चारित्रभक्तिः [ प्राकृत] तिलोयसव्वनीवाणं हिदं धम्मोवदेसिणं । वठ्माणं महावीरं वंदित्ता सन्चवेदिणं ॥ १ ॥ घादिकम्मविधादत्थं घादिकम्मविणासिणा । भासियं सव्वजीवाणं चारित्तं पञ्चभेददो ॥ २ ॥ सामाइय तु चारित्तं छेदोवछावणं तहा ॥ नं परिहारविसुद्धिं च संजम सुहुमं पुणो ॥३॥ जहाखाद तु चारित्त तहाखादं तु तं पुणो । किच्चाहं पञ्चहाचारं मंगलं मलसोहणं ॥४॥ अहिंसादीणि उत्ताणि महन्वयाणि पश्च य । समिदीओ तदो पश्च पञ्च इदियणिग्गहो ॥५॥ छन्भेया वा सभृसिजा अण्हाणत्तमचेलदा । लोयच ठिदिभुतिं चअदंतधावणमेव य ॥६॥ एयभचेण संजुता रिसि मूलगुणा तहा । दसधम्मा तिगुत्तीओ सीलाणि सयलाणि च ॥७॥ सव्वेवि य परीसहा उत्तरोत्तरगुणा तहा । अण्णे विभासिया संता तेसिं हाणि मए कया ॥ ८॥जइ रायेण दोसेण मोहेणाणादरेण वा ॥ वंदिता मचसिद्धाणं संजदा सा मुमुक्खुणा ॥ ९॥ संजदेण मए सम्म सव्वसंजम- भाविणा । सव्वसंजमसिद्धीओ लन्भदे मुत्तिज मुहं ॥ १० ॥ व्रवसमुदयमूलः संयमस्कंधबंधो। संयमनियमपयोभिर्वर्धितःशीलशाखः। समितिकलिकमारो गुप्तिगुप्तप्रवालो गुणकुसुमसुगंधिः सत्तपश्चित्रपत्रः॥१॥ शिवसुखफलदायीयो दयाछाययोद्धः। शुभजनपथिकानां खेदनोदे समर्थः॥ दुरितरविजतापं प्रापयन्नतभावं । स भवविभवहान्यै नोस्तुचारित्रवृक्षः ॥२॥ चारित्र सर्वजिनश्चरित्र प्रोक्तं च सर्वशिष्येभ्यः ॥ प्रणमामि पच- भेदं पञ्चमचारित्रलाभाय ॥ ३ ॥ धर्मः सर्वसुखाकरो हितकरो धर्म बुधाः श्चिन्वते । धर्मेणैव समाप्यते शिवसुखं धर्माय तस्मै नमः । धर्मानास्त्य- [१५१] परः सुहृद्भवभृतां धर्मस्य मूलं दया । धर्मे चिरमहं दधे प्रतिदिनं हे धर्म मां पालय ॥४॥ धम्मो मङ्गलमुक्किडं अहिंसा संजमो तओ। देवा वि तस्स पणमंति जस्म धम्मो सया मणो।। ५ ।। इच्छामि भंते चारिचमत्तिकाउस्सग्गो कोतस्स आलोचेउं सम्म- ण्णाणजोयस्म सम्मत्तहिटियस्स सव्वपहाणस्स णिवाणमग्गरस कम्म- णिजर फलस्स खमाहारस्स पंचपहव्ययसंपण्णस्स तिगुत्तिगुत्तुस्स पंचसमि- दिजुत्तस्म, णाणज्माणसाहणस्स समयाइव पवेसयस्स सम्मचारित्तस्स सया अंचेमि, पूजेमि वंदामि णमंसामि, दुक्खक्खओ कम्मक्खओ, चोहि- लाहो, सुगइमणं समाहिमरणं जिणगुणसंपति होउ मन्नं। . योगिभक्तिः दुबई छद- जातिजरोरुरोगमरणातुरशोकसहस्रदीपिताः । दुःसहनरकपतनसन्त्रस्तधियः प्रतिवुद्धचेतमः ।। जीवितमवुर्विदुचपलं तडिदभ्रसमा विभूतयः । सकलमिद विचिन्त्य मुनयः प्रशमाय वनान्तमाश्रिताः॥१॥ अन्वयार्थ-(जातिजरोरुरोगमरणातुरशोकसहस्रदीपिताः) जो जन्म, जरा, बुदापा, उरुरोग-पेटके महारोग भगदर जलोदरादिक मरण आदि रोगों से पीडित-दुखी हैं, हजारों शोकों-पुत्रस्त्री आदिके वियोगजनित सतापसे अत्यन्त जाज्वल्यमान हैं (दुःसहनरकपतनसन्त्रस्तधियः) असह्य नरक पतनसे जिनकी बुद्धि भयमीत हो रही है (प्रतिवुद्धचेतसः) जिनके हृदयमें हेयोपादेय का विवेक जागृत हो रहा है ऐसे (मुनयः) मुनि (जीवित अबुर्विदुचपल ) इस जीवनको पानीकी वूद के समान चश्चल समझ (विभूतयः ) तथा संसारकी समस्त विभू- तियों को (तडित्मसमा) विजली व बादलके समान (इद सकल विचिन्त्य) बणविनश्वर समझ कर (प्रशमाय ) शातिके लिये-रागद्वेषको दूर करनेके लिये- [१५२] मसारका नाश करने के लिये (वनान्तं माश्रिताः) वनका श्राश्रय लेते हैं-वनमें चले जाते हैं। वन में जाकर क्या करते हैं भद्रिका छद. व्रतसमितिगुप्तिसंयुताः शमसुखमाधाय' मनसि वीतमोहाः । ध्यानाध्ययनवशंगताः विशुद्धये कर्मणां तपश्चरन्ति ॥२॥ अन्वयार्थ:- (व्रतसमितिगुप्तिमयुताः ) जो मुनि व्रत-पांच महाव्रत, ममिति-ईर्यादि पाचों समिति, गुप्ति-मनोगुप्ति आदि तीन गुप्ति कर सहित हैं अर्थात ५ महाव्रत, ५ समिति, ३ गुप्ति, इस प्रकार १३ प्रकारका चारित्र प्रयत्न पूर्वक पालते हैं (वीतमोहाः ) जिनका दर्शन मोहनीय कर्म सर्वथा नष्ट हो गया है (ध्यानाम्ययनवशगताः) जो ध्यान और अध्ययन-स्वाध्याय में ही सदा लीन रहते हैं वे मुनि ( कर्मणा विशुद्धये ) कर्मोका नाश करने के लिये (मनसि शम- सुखमाधाय ) परम वीतरागताके सुखको हृदयमें धारण कर (तपः चरन्ति) नपरचरण करते हैं। दिनकरकिरणनिकरसंतप्तशिलानिचयेषु निस्पृहाः । मलपटलावलिप्ततनवः शिथिलीकृतकर्मबंधनाः॥ व्यपगतमदनदर्परतिदोपकपायविरक्तमत्सराः । गिरिशिखरेपु चंडकिरणाभिमुखस्थितयो दिगम्बराः ॥ ४ ॥ अन्वयार्थ:- (मलपटलावलिप्ततनवः ) मैलके पटलों से जिनका शरीर लिप्त हो रहा है-स्नान नहीं करने से जिनके शरीर पर मैलके पटन जम गये हैं (शिथिलीकृतकर्मवधनाः) जिनके कर्मोके स्थितिवध और अनुभागबध सब शिथिल हो गये हैं-नष्ट हो गये हैं (व्यपगतमदनदर्परतिदोषकपायविरक्तमत्सराः) जिनके कामका उद्रेक, इष्ट पदार्थों में रति-राग, मोहादिक दोष, क्रोधादिक कषाय और मात्सर्य नष्ट हो गये हैं ( चडकिरणाभिमुखस्थितयः) सूर्यकी प्रचड किरणों के सामने जो विराजे हुये हैं ऐसे (दिगम्बराः दिगम्बर मुनिराज (गिरि- शिखरेषु) पर्वतोंके शिखर पर (दिनकरकिरणनिकरसतप्तशिलानिचयेषु ) सूर्यकी १-शिवसुखमित्यपि पाठः [१५३] किरणोंके समूहसे संतप्तभत्यत तप्तायमान शिलाओं के समूह पर (निस्पृहाः) निस्पृह होकर (तपः चरन्ति' ) घोर तपश्चरण करते हैं। भद्रिका छट:- सज्ज्ञानामृतपायिमिः क्षान्तिपयः सिच्यमानपुण्यकार्यः । घृतसंतोषच्छत्रकैः तापस्तीतोऽपि सह्यते मुनीन्द्रैः ॥ ४ ॥ अन्वयार्थ-- (सज्ज्ञानामृतपायिभिः) जो मुनि सम्यग्ज्ञानरूपी अमृत को पीते रहते हैं ( कान्तिपयः सिच्यमानपुण्यकायैः ) जो अपने पुण्यमय शरीर को क्षमारूपी जल से सींचते रहते हैं अथवा जो अपने पुण्यके समूह को क्षमा रूप जलसे सींचते रहते हैं (धृतसन्तोषच्छत्रकैः) जो संतोषरूपी छत्रको धारण करते रहते हैं ऐसे (मुनीन्द्रः ) मुनिराज ( तीब्रोऽपि ताप ) असह्य काय- क्लेश (सह्यते) सहन करते हैं। भावार्थ-मुनिराज गर्मी के दिनोंमें पर्वतकी शिखरपर जाकर तपश्चरण करते हैं, केवलज्ञानरूपी जलको पीते हैं, क्षमारूप जलसे स्नान करते हैं और संतोषरूपी छत्र धारण करते हैं । इस प्रकार गर्मी के दिनोंमें घोर तपश्चरण करते हैं। वर्षा ऋतुमें मुनिराज क्या करते हैं ? शिखिगलकालालिमलिनैविबुधाधिपचापचित्रितः । भीमरवैर्विसृष्टचण्डाशनिशीतलवायुवृष्टिभिः ।। गगनतलं विलोक्य जलदै : स्थगितं सहसा तपोधनाः। पुनरपि तरुतलेपु विपमासु निशासु निशंकमासते ॥ ५ ॥ अन्वयार्थ:-- (शिखिगलकज्जलालिमलिनैः ) मोरकी गर्दन के समान काले भथवा काजल भ्रमरके समान कृष्ण (विवुधाधिपचायचित्रितै;) इन्द्र- धनुषोंसे सुशोभित ( मीमरवैः ) भयकर शब्द करनेवाले (विसृष्टचण्डाशनि- शीतलवायुधष्टिमिः) विजली गिरानेवाले, शीतल वायु करनेवाले, घनघोर वर्षा करनेवाले ( जलदैः) बादल (गगनतल स्थगित )आकाशमें छाये हुये (विलो- क्य) देखकर (तपोधनाः) मुनि (पुनरपि ) फिर मी (विषमासु) भयानक (निशासु) रात्रियोमें (तरुतलेपु) वृक्षोंके नीचे ( विशंक) निर्भय (पासते ) 'आतापन योग धारण कर विराजते है। । १५४ वे मुनि वर्षात्रातुमे वृक्षके नीचे विराजमान रहते हैं, मूसलधार वर्षासे उनके शरीरको बहुत कष्ट पहुचता है तथापि वे मुनिराज अपने प्रतिज्ञा किये हुये व्रत से च्युत नहीं होते हैं-ऐसा बताते हैं- 4 भद्रिका छद' * जलधाराशरताडिता न चलन्ति चरित्रतः सदा नृसिंहाः। संसारदुःखभीरवः परीपहाराति- घातिनः प्रवीराः ॥ ६ ॥ अन्वयार्थ -- (जलधाराशरताटिता) वे मुनिराज पानी की धारारूपी बाणों से ताडित किये जाते हैं-वर्षाकी धारा बाणों के समान उनको दुख देती है तथापि वे (नृसिंहाः ) मनुष्योंमें सिंहके समान शूरवीर होते है (ससारदुःख- मीरवः ) ससारके दुखोंसे वे भयभीत रहते हैं (परिपहारातिघातिनः प्रवीराः ) परीषह रूपी शत्रुओं को वे सर्वथा घातनेवाले है-इसीलिये शूरवीरोमें भी मुख्य गिने जाते हैं ( सदा ) वे हमेशा ऐसी घोर वर्षामें भी ( चरित्रतः) अपने चारित्र से (न चलन्ति) चलायमान नहीं होते हैं । शीतकाल में वे मुनिराज क्या करते है * दुबई छदः * अविरतवहलतुहिनकणवारिमिरंघ्रिपपत्रपाननै- रनवरतमुक्तसात्काररवैः परुपैरथानिलैः शोपितगात्रयष्टयः । इह श्रमणा धृतिकंवलावृताः शिशिरनिशां । तुपारविषमां गमयन्ति चतुःपथे स्थिताः ॥७॥ अन्वयार्थ:--(अथ ) वर्षाकाल के बाद (इह ) इस लोकमें ( अविरत- बहलतुहिनकणवारिभिः) शीतकालमें सदा बहनेवालीचलनेवाली वायु बरफ या पालेकी बड़ी बड़ी वूदों से भरी रहती हैं ( अघ्रिपपत्रपातनैः ) वह वायु, बृक्षो के सब पत्तोको गिरा देती है (अनवरतमुक्तसात्काररवैः ) उससे सदा 'साय- साय' ऐसा बड़ा भारी शब्द होता रहता है (परुपैः अनिलैः) वह वायु अत्यत कठोर एव असह्य होती है-ऐसी मझा वायुसे (शोषितगात्रयष्टयः) जिनकी शरीररूपी लकडी सब मूख गई है ऐसे (श्रमणाः) वे मुनिराज (चतुःपथे [१५५] स्थिताः) चौराहेपर-चौड़े मैदान में विराजमान होकर ( धृतिकंचलावृताः) धैर्य- सतोष रूपी कबलको धारण कर बडे सुखसे (तुषारविषमा ) पाला-बरफ पड़ने से अत्यन्त असह्य ऐसी (शिशिरनिशा) शीतकालकी रात्रिको (गमयन्ति) व्य. तीत करते हैं। स्तुतिफलकी याचना- इति योगत्रयधारिणः सकलतपशालिनः प्रवृद्धपुण्यकायाः। परमानंदसुखषिणः समाधिमध्यं दिशतु नो भदन्ताः ॥ ८ ॥ अन्वयार्थ:-- (इति ) इसप्रकार ( योगत्रयधारिणः) तीन योग धारण करनेवाले-गर्मी में पर्वतके शिखरपर आतापन योग धारण करनेवाले, वर्ग में वृक्षके नीचे विराजमान होनेवाले और शीतकालमें चौरायेपर विराजमान होने. वाले अथवा मन वचन काय तीनों गुप्तियोंको पालन करनेवाले (सकलनपशा- लिनः) बाह्य-अभ्यंतर समस्त तपोंसे सुशोमित होनेवाले (प्रवृद्धपुण्यकायाः) अपने पुण्यके समूहको परम अतिशय से सुशोभित करनेवाले अथवा अनेक प्रकारके तपश्चरण करनेमें अपने शरीरको उत्साहित करनेवाले (परमानदसु- खैपिणः ) मोक्षरूपी सुखकी इच्छा करनेवाले ( भदन्ताः ) वे मुनिराज (नो) स्तुतिकरनेवाले मुझको (अश्य समाधि ) परमसर्वोत्तम शुक्लथ्यानकी (दिशन्तु) प्राप्ति करो। इसके आगे कायोत्सर्ग करना चाहिये । आलोचना-इच्छामि भत! योगिभत्तिकाउस्सग्गो तस्सालोचेउ । अवाइजदीवदो समुद्देसु षण्णारसकम्मभूमीसु आदावणरुक्खमूलअब्भोवा- मठाणमोणविरासणेयासकुक्कुडासण चउछपक्खखवणादियोगजुत्ताण मव्वसाहूणं बंदामि, णमंसामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ, बोहिलाहो, मुगहगमणं, समाहिमरणं, बिणगुणसंपचि होउ मज्झं । हे भगवन् ! मै योगिभक्ति कर कायोत्सर्ग करता है इसमें जो दोष हुये हों, उमकी बालोचना करना चाहता हू । ढाई द्वीप और दो समुद्रों में जो पन्द्रह कर्मभूमिया है उनमें जो साधु आतापनयोग धारण करते है, वृक्षके नीचे रहते है और चौड़े मैदान में रहते हैं इस प्रकारके तीनों योगोंको जो धारण करते है, जो मौनव्रत धारण करते हैं, वीरासन, एक पार्श्व ( एक कर्वटसे सोना ) और [१५६] .

कुक्कुरासन (मुर्गका सा आसन ) आदि अनेक आसनोंसे तपश्चरण करते हैं, जो वेला तेला करते हैं, पन्द्रह दिनका उपवास और अधिक उपवास करते है-ऐसे समस्त मुनियों की मै वंदना करता हूं, सबको नमस्कार करता हूं। मेरे दुःखोंका क्षय हो, कर्मों का क्षय हो, मुझे रतत्रयकी प्राप्ति हो, शुभगतिकी प्राप्ति हो, समाधिमरण की प्राप्ति हो व भगवान् जिनेन्द्रदेवके गुणोंकी प्राप्ति हो। इति योगिभक्तिः। अथ क्षेपक श्लोकानि। योगश्विगन् जिनान्सर्वान्योगनिधृतकल्मपान् । योगे स्त्रिभिरहं बंद योगस्कंधप्रतिष्ठितान् ।। १ ।। प्रावट्कालेसविद्युत्प्रपतितसलिले वृक्षमूला- विधामाः ।। हेमते रात्रिमध्ये प्रतिविगतभया काठवलक्तदेहाः ।। ग्रीष्ये सूर्याशुतप्ता गिरिशिखग्गताः स्थानकूटांतरस्थाः ॥ ते मे धर्म प्रदधुर्मुनिग- णवृषभा मोचनिःश्रेणिभूताः ॥२॥ गिले गिरिसिहरत्था वरिसायाले रुक्खमूलरयणीसु सिसिरे वाहिरसयणा ते साह वदिमो णिच्चं ॥ १ ॥ गिरिकंदरदुर्गेषु ये वसंति दिगंबगः । पाणिपात्रपुटाहारास्ते यांति परमां गतिम् ।। २॥ योगिभक्तिः [ प्राकृत] थोस्सामि गुणधराण अणयाराण गुणेहि तचाहिं। अंजलिमउलिय- हत्थो अभिवदंतो सविभवेण ॥ १ ॥ सम्म चेव य भावे मिच्छाभावे तहेव योधव्वा । चहऊण मिच्छमावं सम्मम्मि उवहिदे वदे ॥२॥दोदोसविप्प- मुक्के तिदंडविरद तिसल्लपरिसुद्धे । तिष्णियगारवरहिये तियरणसुद्धे णम- सामि ।। ३ ॥ चउविहकसायमहणा चउगयसंसारगमण भयभीए । पचा- सवपडिविरदे पंचेंदियणिज्जिदे वंदे ॥ ४॥ छज्जीवदयावण्णे छडायदण- विवज्जिदे समिदभावे । सत्ता भयविप्पमुक्के सत्ताण सिवंकर वंदे ।। ५ ।। णमयहाणे पणठकम्मणिट्ठियढे अट्टगुणड्ढीसरे वदे ॥६॥ णवव. [१५७] - भचेरगुत्ते णवणयसम्भावजाणगे बंदे ॥ दहविहधम्मट्ठाई दससंजमसंजदे वंदे ॥ ७॥ एयारसंगसुदसायरपारगे वारसंगसुदणिऊणे । बारमरिहतवणि- रदे तेरसकिरियादरे वदे ॥ ८॥ भूदसु दयावण्णे चउदस चउदससुगथः परिसुद्धे । चउदसपुचपगम्मे चउदसमलविवज्जिदे बंटे ॥९॥ वटे चउ- स्थभचादिजावछम्मासखवणपडिवण्ण । वंदे आदावते सूरस्स य अहिमुह- हिदे सूरे ॥१०॥ बहुविहपडिमट्ठाई णिसिञ्जवीरासणेक्कवासीय । अणि, हीवकंडवदीवे चत्तदेहे य वंदामि ।। ११ ।। ठाणी मोणक्दीये अमोवा- सीय रुक्खमूलीय । धुवकेसमंसुलोमे णिप्पडियम य बंदामि ।।१२।। जल्लमल्ललित्तगत्ते वंदे कम्ममलकलुसपरिसुद्धे । दीहणहमंसुलोम तवसिरि- भरिये णमंसामि ॥ १३ ॥णाणोदयाहिसित्ते सीलगुणविहसिये तवमुगंधे । बवगयरायसुदवे सिवगइपहणायगे दे ।। १४ ॥ उग्गत दित्ततवे तन- तवे महातवे य घोरतवे । वंदामि तवमहते तवसंजमइडिसंजुते ॥ १५ ॥ आमोसहिये खेलोसहिये जल्लोसहिये तवसिद्धे । विप्पोसही य सब्बोसही य बंदामि तिविहेण ॥ १६ ॥ अमयमहुखीग्सप्पिसबीयअक्षिणपहाणसे वंदे । मणबलिवचणबलिकायबलिणो य वंदामि तिविहेण ।।१७।। वरकुट्ट- बीयवुद्धी पदाणुसारीय मिण्णसोदारे । उग्गहईहसमत्थे सुत्तत्थविसारदे बदें ॥ १८ ॥ आमिणियोहियसुदओहिणाणिमणणाणिसवणाणीय । वंदे जगप्पदीवे पञ्चक्खपरोक्खणाणीय ॥१९॥ आयामनंतुजलसेढिचारणे जाचारणे वंदे ॥ विउवणइविपहाणे विजाहरपण्णसवणे य ॥ २० ॥ गह- चउरंगुलगमणे तहेव फलफुल्लचारणे वदे ।। अणुवमतवमहंते देवासुरवंदिदे चंदे ।। २१ ॥ जियभय जियउवसग्गे जियइदियपरीसहे जियकसाए । जियरायदोसमोहे जियसुहदुक्खे णमंसामि ॥ २२ ॥ एवं ममित्थुया अण- यारा रायदोसपरिसुद्धा । सङ्घस्स वरसमाहिं मज्झवि दुक्खक्खय दिनु ॥ २३|| इच्छामि भंते योगिभत्तिकाउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउं अढाइज- दीवदोसमुद्देसु पण्णारसकम्मभृमीसु आदावणरुक्खमूलअमोवासठाणमो- णविरासणेकपासकुक्कुडासण चउछपक्खखवणादियोगजुचाणं सब्यसाहणं वंदामि, णमंसामि, दुक्खक्खओकम्मक्खओ, बोहिलाहो, सुगङ्गमणं समा- हिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्म । [१५८] आचार्थभक्तिः स्कन्द छन्द:- सिद्धगुणस्तुतिनिरतानुद्धतरूपाग्नि- जालबहुलविशेषान् । गुप्तिभिरभिसंपूर्णान् मुक्तियुतः सत्यवचनलचितभावान् ॥ १॥ अन्वयार्थ:-जो आचार्य (सिद्धगुणस्तुतिनिरतान् ) सिद्धोंके सम्यक्त्वादि गुणोंकी स्तुति करने में सदा लवलीन हैं (उद्धृतरुषाग्निजालबहुल विशेषान् ) क्रोधरूपी अग्नि-उपलक्षणसे मान, माया, लोभ भादि कषायों का जो समूह उसके अनन्तानुवधी आदि अनेक भेद हैं-अर्थात् कषायोंके जो भेद हैं वे सब जिन्होंने नष्ट कर दिये हैं ( गुप्तिमिः अमिमपूर्णान ) जो मनगुप्ति, वचनगुप्ति, और कायगुप्तिका पालन करते हैं-गुप्तियों से परिपूर्ण हैं, जो ( मुक्तियुतः) मुक्ति-मोक्षसे ही सदा सम्बंध रखते हैं ( सत्यवचनलक्षितभावान ) जिनके भाव सत्यवचनसे ही भरपूर हैं-जो कभी किसी को नहीं ठगते ऐसे आचार्यों को मै नमस्कार करता है। मुनिमाहात्म्यविशेषान् जिनशासनसत्प्रदीपभासुरमृर्तीन् ।। सिद्धि प्रपित्सुमनसो बद्धरजोविपुलमूलघातनकुशलान् ॥ २॥ अन्वयार्थ:--(मुनिमाहात्म्यविशेषान् ) जो मुनियोंके विशेष माहात्म्यको- ज्ञानके अतिशयको प्रकाशित करनेवाले हैं ( जिनशासनसत्प्रदीपभासुरमूर्तीन् ) जिनकी मूर्ति जिनशासनको प्रकाशित करनेके लिये दीपक के समान दैदीप्यमाम - १-इस श्लोक में तथा श्रागेके श्लोकों में नमस्कार सूचक कोई वाक्य नहीं है, वह वास्य दशवें श्लोकमें है और वहा तक सब श्लोकोंका सम्बन्ध है। अत: "नमस्कार करता है" यह वाक्य वहा से लिया गया है। श्रागे भी ऐसा ही समझना चाहिये । [१५६) है अथवा तपश्चरणके माहात्म्यसे जिनके शरीरकी मूर्ति दीपक के समान दैदी- प्यमान हो रही है ( सिद्धि प्रपित्सुमनसः) जिनके मनमें सिद्धपद प्राप्त करने की इच्छा है ( बद्धरजोविपुलमूलघातनकुशलान् ) और जो ज्ञानावरण आदि कर्मों के बंध होने के तत्प्रदोष, निव, मात्सर्य आदि कारणोंको नाश करनेमें अत्यंत कुशल हैं-ऐसे आचार्यों को मै नमस्कार करता हूं। गुणमणिविरचितवपुपः पद्रव्यविनिश्चितस्य धातृसततम् । रहितप्रमादचर्यान् दर्शनशुद्धान् गणस्य संतुष्टिकरान् ॥३॥ अन्वयार्थ:--- (गुणमणिविरचितवपुषः) जिनके शरीर सम्यग्दर्शन आदि गुणरूपी मणियों से सुशोभित है (षड्द्रव्यविनिश्चितस्य) जो जीवादिक छहों द्रव्योंके निश्चयके (सतत ) सदा (धातन ) आधार भूत रहते हैं-अर्थात् जिनके हृदयमें छहों द्रव्योका सदा गाट श्रद्धान रहता है ( रहितप्रमादचर्यान् ) जिनके चारित्र विकथा आदि प्रमाढोंसे सदा रहित रहते हैं (दर्शन शुद्धान्) जिन 'का सम्यग्दर्शन सदा शकादिक पच्चीसों दोषोंसे रहित होता है (गणस्य सतु- ष्टिकरात् ) और जो सघको सदा सतुष्ट करनेवाले हैं-ऐसे आचार्यों को मैं सदा नमस्कार करता हू। मोहच्छिदुग्रतपसः प्रशग्तपरिशुद्धहृदयशोभनव्यवहारान् । प्रासुकनिलयाननघानाशाविध्वंसिचेतसो हतकुपथान् ॥ ४ ॥ अन्वयार्थः- ( मोहच्छिदुग्रतपसः) अवधिज्ञान भादि अतिशय होने के कारण जिनका उग्र तपश्चरण मोह और अज्ञानका नाश करनेवाला है, (प्रश- स्तपरिशुद्धहृदयशोभनव्यवहारान् ) जिनके हृदयमें सदा धर्मवृद्धिकी इच्छा रहती है, जिनका हृदय सदा शुद्ध-लाभादिक की इच्छासे रहित रहता है इसी लिये जिनका समस्त व्यवहार अपने प्रात्माका और अन्य भव्य जीवोंका कल्याण करनेवाला होता है (प्रासुकनिलयान् ) जिनके रहने का स्थान सम्मूर्छन जीवों से रहित प्रासुक रहता है (अनघान् ) जो पापोंसे या पापकार्योंसे सर्वथा रहित होते हैं (प्राशाविध्वसिचेतसः) जिनका हृदय इसलोक और परलोककी आशा से सर्वथा रहित होता है (हतकुपान् ) और जो मिथ्यादर्शनरूप कुमार्ग को [१६०] मदा नाश करनेवाले होते हैं। ऐसे भाचार्यों को मे सदा नमस्कार करता है। धारितविलमन्मुंडान्यजितबहुरडपिंडमडलनिकगन् । मकलपरीपहजयिनः क्रियाभिरनिग प्रमादतः परिरहितान् ॥५॥ मन्वयार्थ:- (धाग्निविलसन्मुडान् ) जिनके मन, वचन, काय, पांचों इन्द्रिया और हाय परों आदिके व्यापार सब पाप रहित हैं और इसीलिये अत्यत शोभायमान रहते हैं (वर्जितबहृदंडपिंडमंडलनिकगन् ) जो मुनियोंका समुदाय अधिक प्रायश्चित्त लेनेवाला या अपराधी होता है प्रयवा अधिक प्रायश्चित्त लेनेवाला पाहार ग्रहण करता। ऐसे मुनि समुदायसे जो आचार्य सर्वथा अलग रहने हैं (क्रियामि.) जो नपश्चरणके विशेष विशेष अनुटानोंमे (अनिश) मदा (मकलपरीपहजयिनः ) अनेक प्रकरकी परीपहोंको जीतते रहते हैं (प्रमा- दतः) जो प्रमादसे ( परिरहितान ) सर्वथा रहित होते है,मे आचार्यों को मैं मदा नमस्कार करता है। अचलान्व्ययेतनिद्रान् स्थानयुनान्कष्टदुष्एलेग्याहीनान । विधिनानाश्रितवामानलिप्तदेहान्विनिर्जितन्द्रियकरिणः ॥ ६ ॥ अन्ययार्थ:- (अचलान ) जो अनेक एगेपहों के भाजाने पर भी अपने मनुष्टानसे या बामे कमी चलायमान नहीं होते ( व्ययेतनिद्रान ) जो विशेष- कर निद्रामे रहित हते है (स्थानयुतान ) प्रायः कायोत्सर्ग धारण करते है (कष्टदष्ट लेग्याहीनान ) अनेक प्रकार के दुःख और दुर्गतियों को देनेवाली अशु- मलेग्याओंसे जो मदा दर रहते है ( विधिना ) विधिपूर्वक (अनाश्रितवासान ) घरका त्याग कर दिया है अथवा नियमसे घर रहित हैं अथवा आगमके अनु. मार जिनके कदरा, चमतिका भादि अनेक प्रकार के रहने के स्थान है । (भलि- प्रदेहान्) तपश्चरणके माम्यसे जिनका शरीर अत्यत निर्मल है ( विनिर्जि- तेन्द्रियकार: ) जो इडिय रूपी हाथीको मदा अपने वश में रखते हैं इन्द्रियों को जीतनेवाले हैं-ऐसे प्राचार्योको में सदा नमस्कार करता है। अतुलानुत्कुटिकासान्विविक्तचित्तानखडितस्वाध्यायान् । दक्षिणभावसमग्रान्व्यपगतमदरागलोभशटमात्सर्यान् ।। ७ ॥ । १-विलिम इति च चित्पाटः, अर्थात् जिनका शरीर मल (रेल) से लिप्त है। [१६१] अन्वयार्थ--(अतुलान् ) जो आचार्य अतुल-अनुपम हैं संसारमें जिन की कोई उपमा नहीं है ( उत्कुटिकासान् ) जो उत्कुटिकासन आदि कठिन कठिन भासनोंसे तपश्चरण करते हैं (विविक्तचित्तान् ) जिनका हृदय सदा हेयोपादेय के विवेकसे सुशोभित रहता है (अखडितस्वाध्यायान् ) जिनका स्वाभ्याय सदा अखंडित रहता है ( दक्षिणभावसमप्रान्' ) जो शुभ परिणामों से ही सदा सुशोमित रहते है ( व्यपगतमदरागलोभशठमात्सर्यान् ) जो मद- अभिमान-अहकार, राग, लोभ, अज्ञान और मत्सरता ( ईर्ष्या ) मै सदा मलग रहते हैं-ऐसे आचार्योंको मै सदा नमस्कार करता है। मिन्नातरौद्रपक्षान्संभावितधर्मशुक्लनिर्मलहृदयान् । नित्यं पिनद्धकुगतीन्पुण्यागण्योदयान्विलीनगारवचर्यान ||८|| अन्वयार्य:-( मिन्नातरौद्रपक्षान् ) जिन्होंने मार्तध्यान और रौद्रध्यान रूपी पक्षोका सर्वथा नाश कर दिया है (सभावितधर्मशुक्लनिर्मलहृदयान् ) जो अपने निर्मल शुद्ध हृदयमें धर्मध्यान और शुक्लध्यानका सदा अनुभव करते रहते हैं (नित्य ) सदाके लिये ( पिनद्धकुगतीन्३ ) जिन्होंने नरकादिक दुर्ग- तियोंका नाश कर दिया है (पुण्यान्) जो अत्यंत पवित्र या पुण्य स्वरूप . हैं (गण्योदयान् ) जिनकी ऋद्धियां या तपश्चरणके माहात्म्य अत्यत प्रशसनीय लाध्य हैं (विलीनगारवचर्यान् ) जो दूररसास्वादन (दूरसे ही इसका प्रास्वा- दन कर लेना ) आदि ऋद्धियोंकी प्रवृत्तियोंसे सर्वथा रहित होते हैं-एसे आचार्योको मै सदा नमस्कार करता हू। तरुमूलयोगयुक्तानवकाशातापयोगरागसनाथान् । बहुजनहितकरचर्यानभयाननघान्महानुभावविधानान् ।। ६ ।। अन्वयार्थ:- (तरुमूलयोगयुक्तान ) जो वर्षाकालमें वृक्षके नीचे तरुमूल- योग धारण करते हैं (अबकाशातापयोगरागसनाथान् ) ग्रीष्मकालमें आतापन- योग और शीतकालमें अभ्रावकाशयोग (मैदान में रहना) धारण करते है (बहुजनहितकरचर्यान् ) जिनका चारित्र सदा अनेक जीवोंको हितकरनेवाला २-दक्षिणेन-प्रशस्तेन, भाषेन-परिणामेन, समग्रान्-परिपूर्णान् । ३-पिनद्धा निराकृता कुगतिर्थः तान् । ४-पुण्यान्-प्रशस्तान्-पवित्रीभूतान् । [१६२] होता है ( अभयान ) जो सात प्रकारके भयसे सर्वथा रहित हैं (अनघान् ) जो सब प्रकारके पापोंसे रहित है ( महानुभाव विधानान् ) प्रवल पुण्यके उदय से जिनका प्रभाव सब जंगह पड़ता है-जो सदा धर्म-और शुलध्यानमें ही लीन रहते हैं-ऐसे आचार्योंको मै सदा नमस्कार करता हू। ईदृशगुणसंपन्नान्युष्मान्भक्त्या विशालया स्थिरयोगान् । विधिनानारतमध्यान्मुकुलीकृतहस्तकमलशोभितशिरसा ॥१०॥ अभिनौमि सकलकलुपप्रभवोदयजन्मनरामरणवंधनमुक्तान् । शिवमचलमनधमक्षयमव्याहतमुक्तिसौख्यमस्त्वितिसततम् ॥११॥ अन्वयार्थ:-- ( ईदृशगुणसपन्नान् ) जो आचार्य उपर कहे हुये समस्त गुणोंसे सुशोभित हैं (स्थिरयोगान् ) जिनके मन वचन काय अनेक परीषहोंके माजाने पर मी सदा स्थिर रहते है (अनारत अग्र्यान् ) समस्त गुणों को धारण करने से जो सदा मुख्य-प्रधान रहते हैं ( सकलक्लुषप्रभवोदयजन्म जगमरणवधनमुक्तान ) अशुभकर्मोके उदयसे प्राप्त होनेवाले जन्म, जरा-बुढ़ापा मरण आदि समस्त दोषों के सम्बन्धसे-बधनसे जो सर्वथा रहित होते हैं ऐसे (युष्मान् ) आचार्योंको मैं ( विशालया भक्त्या) बड़ी भारी भक्ति से (विधिना) विधिपूर्वक-आचार्य भक्ति करके (मुकुलीकृतहस्तकमलशोभितशिरसा) अपने दोनों हाथरूपी कमलोंको जोड़कर मस्तक पर रखकर (अभिनौमि ) सदा नम- स्कार करता है तथा इस नमस्कार करनेका फल (शिव अचल अनघ अक्षय अव्याहतमुक्तिसौख्यं इति सतत अस्तु) अत्यत प्रशसनीय-कल्याणरूप-मंगल- मय, हीनाधिकतासे रहित, निर्दोष-पाप रहित, अक्षय अविनश्वर और बाधा रहित मोक्षका अनत सुख मुझे प्राप्त हो-ऐसी कामना-इच्छा करता हु अर्थात ऐसे मोक्षसुखको प्राप्त करनेके लिये ही मे आचार्य परमेष्ठीको नमस्कार करता हू। इसके आगे कायोत्सर्ग करना चाहिये । अथ आलोचना इच्छामि भते ! आइरियभचिकाउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउं । सम्म- णाण सम्मदंसण सम्पचारित्तजुनाण पञ्चविहाचाराणं आयरियाणं आया- रादिसुदणाणोवदेसयाणं उघडझायाण तिरयणगुण पालणरयाणं सब्यसाहूण । १६३) - सम्मचारिनस्स सया अंचमि, पूजेमि, वंदामि, णमंसामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ, वोहिलाहो, सुगइगमणं, समाहिमरणं, जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं। अर्थ-हे भगवन् ! मै आचार्य भक्ति कर कायोत्सर्ग करता है। इसमें जो दोष हुये हों उनकी आलोचना करनेकी इच्छा करता हु । मै सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र सहित और पश्चाचार पालनेवाले आचार्योंकी, आचाराग आदि श्रुतज्ञानका उपदेश देनेवाले उपाध्यायकी और रत्नत्रय गुणको पालन करनेवाले समस्त साधुओंकी सदा अर्चा करता हू, पूजा करता हूं, वदना करता हूं, नमस्कार करता हू, मेरे समस्त दुखोंका नाश हो, कर्मोका नाश हो, मुमे रतत्रय प्राप्ति हो, शुभगतिकी प्राप्ति हो, समाधिमरण की प्राप्ति हो और भग- वान जिनेन्द्रदेवके गुणोंकी प्राप्ति हो। इति श्राचार्यभक्तिः। अथ क्षेपक श्लोकानि। श्रतजलधिपारगेभ्यः स्वपरमतविभावनापटुमतिभ्यः । सुचरिततपो- निधिभ्यो नमो गुरुभ्यो गुणगुरुभ्यः ॥ छत्तीसगुणसमग्गे पंचविहाचार- करणसंदरिसे । सिस्साणुगहकुसले धम्मायरिये सदा चंदे ।। गुरुमत्ति संजमेण य तरंति संसारसायरं घोरं । छिण्णति अहनम्मं जम्मणमरणं ण पावंति ॥ ये नित्यं व्रतमत्रहोमनिरता ध्यानाग्निहोत्राकुलाः । षट्कर्माभि- रतास्तपोधनधनाः साधुक्रियाः साधवः ॥ शीलप्रावरणा गुणप्रहरणाश्व- द्रार्कतेजोऽधिकाः । मोक्षद्वारकवाटपाटनभटाः प्रीणंतु मांसाधवः ।। गुरवः पान्तु वो नित्यं ज्ञानदर्शननायकाः । चारित्रार्णवर्गमीरा मोक्षमार्गोपदे शकाः ॥ प्राज्ञः प्राप्तसमस्तशास्त्रहृदयः अव्यक्तलोकस्थितिः । प्रास्ताशः प्रतिभापरः प्रशमवान्प्रागेत्र दृष्टोत्तरः ।। प्रायः प्रश्नसहः प्रभुः परमनोहारी परानिंदया । ब्रूयाद्धर्मकथां गणी गुणनिधिः प्रस्पष्टमिष्टाक्षरः ॥ श्रुतमवि- [१६४] कलंशुद्धा वृत्तिः परप्रतिबोधने । परिणतिरुरुयोगो मार्गप्रवर्तनसद्विधौ बुधनुतिरनुत्सेको लोकज्ञता मृदुताऽस्पृहा । यतिपतिगुणा यसिन्नन्ये च सोस्तु गुरुः सताम् ॥ विशुद्धवंशः परमाभिरूपो । जितेन्द्रियो धर्मकथा- प्रसक्तः । सुखद्धिलाभेष्वविसक्तचित्तो । बुधैः सदाचार्य इति प्रशस्तः ।। विजितमदनकेतुं निर्मलं निर्विकारं । रहितसकलसंग संयमासक्तचिचं । सुनयनिपुणभावं ज्ञाततत्वप्रपञ्चम् । जननमरणभीतं सद्गुरु नौमि नित्यम् ।। सम्यग्दर्शनमूल ज्ञानम्बंधं चरित्रशाखाट्यम् । मुनिगणविहगाकीर्णमाचा- यमहाद्रुमं वदे ।। अथ आचार्यभक्तिः [ प्राकृत] देसकुलजाइसुद्धा विसुद्धमणवयणकायसंजुचा ॥ तुझ पायपयोरुह- मिह मंगलमत्थु मे णिच्च ॥१॥ सगपरसमयविदण्हू आगमहेदहि चावि जाणित्ता । सुसमत्था जिणवयणे विणये सत्ताणुरूवेण ॥ २ ॥ बालगुरु- बुट्टसेहे गिलाणथेरे य खवणसंजुना। वहावयगा अण्णे दुस्सीले चावि जाणित्ता ॥३॥ वयसमिदिगुत्तिजुत्ता मुचिपहेटावया पुणो अएणे । अज्झावयगुणणिलये साहुगुणेणावि संजुत्ता ।। उत्तमखमाए पुढवी पसण्ण- भावेण अच्छजलसरिसा कम्मिधणदहणादो अगणी वाऊ असंगादो ॥१॥ गयणमिव णिरुबलेवा अक्खोहा सायरुव्व मुणिवसहा । एरिसगुणणिल- याणं पायं पणमामि सुद्धमणो ॥६॥ संसारकाणणे पुण वंभममाणेहि भव्यजीवहिं । णिव्वाणस्स हु मग्गो लद्धो तुम्हें पसाएण ॥७॥ अविसु- द्धलेस्सरहिया विसुद्धलेस्साहि परिणदा सुद्धा । रुद्दढे पुण चचा धम्मे सुक्के य संजुत्ता ॥ १८॥उग्गहईहावायाधारणगुणसंपदेहि संजुत्ता । सुच स्थभावणाए भावियमाणेहि वंदामि ॥ ९॥ तुम्हं गुणगणसंथुदि अजा. णमाणेण जो मया बुत्तो । देउ मम बोहिलाहं गुरुभलिजुदत्यओ णिच्च॥१०॥ [१६५] पञ्चगुरुभक्तिः श्रीमदमरेन्द्रमुकुटप्रघटितमणिकिरणवारिधारामिः । प्रक्षालितपदयुगलान्प्रणमामि जिनेश्वरान्भक्त्या ॥१॥ अन्वयार्थ:--(श्रीमदमरेन्द्रमुकुटप्रघटितमणिकिरणवारिधाराभिः) जिनके चरणकमलविशेष लक्ष्मी से सुशोभित है ऐसे-इन्द्रोंके मुकुटोंमें लगे हुये मणियों की किरणरूपी जल धारासे (प्रक्षालितपदयुगलान् ) प्रक्षालित किये गये हैं चरण युगल जिनके ऐसे (जिनेश्वरान् ) श्री अरहतदेव जिनेन्द्र भगवान को (भक्त्या) बड़ी भक्तिसे (प्रणमामि ) नमस्कार करता हू। अष्टगुणैः समुपेतान् प्रणष्टदुष्टाष्टकर्मरिपुसमितीन् । सिद्धान्सततमनन्तान्नमस्करोमीटतुष्टिसंसिद्धये ॥ २ ॥ अन्वयार्थ:--(अष्टगुणैः समुपेतान् ) जो सम्यक्त्व आदि आठों गुणोंसे सुशोमित हैं (प्रणष्टदुष्टाष्टकर्मरिपुसमितीन् ) जिन्होंने अत्यत दुष्ट दुख देने- वाले ऐसे आठों कर्मरूपी शत्रुओंके समूहको नष्ट कर दिया है ऐसे (अनन्तान् सिद्धान् ) अनन्त सिद्धोंको ( सतत ) सदा (इष्टतुप्टिससिद्धयै ) इष्ट तथा तुष्टि की ससिद्धिके लिये-मोक्ष लक्ष्मीको प्राप्त करनेके लिये ( नमस्करोमि ) नमस्कार करता हू। साचारश्रुतजलधीन्प्रतीर्य शुद्धोरुचरणनिरतानाम् । आचार्याणा पदयुगकमलानि दधे शिरसि मेऽहम् ॥ ३ ॥ अन्वयार्थ:-( साचारश्रुतजलघीन् प्रतीर्य ) जो पश्चाचार सहित द्वाद. शाग श्रुतज्ञानरूपी समुद्रके पार हो गये हैं (शुद्धोरुचरणनिरतानाम् ) जो निर्दोष तथा उग्र तपश्चरणके पालनमें सदा तत्पर रहते हैं ऐसे (प्राचार्याणा) प्राचार्योंके ( पदयुगकमलानि ) दोनों चरण कमलोंको ( अहं ) मै (मे शिरसि) अपने मस्तक पर (दधे) धारण करता है। मिथ्यावादिपदोग्रध्वान्तप्रध्वंसिवचनसंदर्भान् । उपदेशकान् प्रपद्ये मम दुरितारिप्रणाशाय ।। ४ ।। [१६६] अन्वयार्थ:-( मिथ्यावादिमदोग्रध्वान्तप्रध्वंसिवचनसदर्भान ) जिनके वचनोंकी रचना मिथ्यावादियोंके अंहकाररूपी अंधकारका नाश करनेवाली है ऐसे (उपदेशकान् ) उपाध्यायोंकी मै (मम दुरितारिप्रणाशाय) अपने पापरूपी शत्रुओंको नाश करनेके लिये ( प्रपद्ये ) शरण लेता हू-मै उनकी शरण में जाता हु। सम्यग्दर्शनदीपप्रकाशका मेयबोधसंभृताः। भूरिचरित्रपताकास्ते साधुगणास्तु मा पान्तु ॥ ५॥ अन्वयार्थ:- (सम्यग्दर्शनदीपप्रकाशका' ) जो सम्यग्दर्शनरूपी दीपक से भव्य जीवोंके मनके अधकारको दूर कर उनके मनको प्रकाशित करनेवाले हैं ( मेयबोधसभूताः ) जीवादिक समस्त पदार्थों के ज्ञानसे सुशोमित हैं ( भूरि- चरित्रपताका: ) अतिशय चारित्रकी पताका-ध्वजा जिन्होंने फहरा रक्खी है (ते साधुगाः तु) वे साधुगण भी-( मा ) मेरी (पान्तु ) रक्षा करो। जिनसिद्धसूरिदेशकसाधुवरानमलगुणगणोपेतान् । पञ्चनमस्कारपदैविसंध्यममिनौमि मोक्षलाभाय ॥ ६ ॥ जन्वयार्थ:--( अमलगुणगणोपेतान् ) जो अनेक निर्मल गुणोंके समूह से सुशोभित हैं ऐसे (जिनसिद्धसूरिदेशकसाधुवरान् ) अरहत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और उत्तम साधुओंको मै ( मोक्षलभाय ) मोक्षप्राप्त करनेके लिये (पचनमस्कारपदैः) पंच नमस्कार मत्र पढ़कर (त्रिमध्य ) तीनोंकाल (अभि- मौमि) नमस्कार करता हू। एप पञ्चनमस्कारः सर्वपापप्रणाशनः । मङ्गलानां च सर्वेषां प्रथम मंगलं भवेत् ।। ७ ॥ अन्वयार्थ:--(एषः पचनमस्कारः) यह पचनमस्कार मत्र (सर्वपाप- प्रणाशनः) समस्त पापोका नाश करनेवाला है ( च सर्वेषा मगलानां) और समस्त मगलोंमें (प्रथम मगल ) प्रथम-मुख्य मगल ( भवेत् ) गिना जाता है | अर्हत्सिदाचार्योपाध्यायाः सर्वसाधवः । कुर्वन्तु मंगलाः सर्वे निर्वाणपरमश्रियम् ॥ ८ ॥ अन्वयार्थ:- (महत्सिद्वाचार्योपाध्यायाः सर्वसाधवः) अरहंत, सिद्ध, [१६७] । .

आचार्य, उपाध्याय और सर्वसाधु ( सर्वे ) ये पाचों (मंगलाः) मगलरूप हैं-इसलिये वे सब मुझे (निर्वाणपरमश्रिय ) मोक्षरूपी परम लक्ष्मीको (कुर्वन्तु) प्रदान करो। सर्वान् जिनेन्द्रचन्द्रान्सिद्धानाचार्यपाठकान् साधुन् । रत्नत्रय च वदे रत्नत्रयसिद्धये भक्त्या ॥९॥ अन्वयार्थ --(सर्वान् ) समस्त (जिनेन्द्रचन्द्रान्) अरहंतोको (सिद्धान्) सिद्धोंको (प्राचार्यपाठकान् ) भाचार्योको, उपाध्यायोंको ( साधून ) साधुओं को (च) और ( रत्नत्रय ) रत्नत्रयको ( रसत्रयसिद्धये ) रत्नत्रयकी प्राप्तिके लिये (भक्त्या) भक्तिसे (वटे) नमस्कार करता है। पान्तु श्रीपादपद्मानि पंचानां परमेष्टिनाम् । लालितानि सुराधीशचूडामणिमरीचिमिः ॥१०॥ अन्वयार्थ:-(सुराधीशचूडामणिमरीचिमिः) जो इन्द्रोंके मकुटोंमें लगे हुये चूडामणि रत्नकी किरणोसे ( लालितानि ) सुशोभित हैं ऐसे ( पचाना परमेष्ठिना) पाचों परमेष्टियोंके (श्रीपादपद्मानि) शोभनीक चरण कमल मेरी (पान्तु ) रक्षा करो। प्रातिहाजिनान् सिद्धान् गुणैः सूरीन् स्वमातृभिः । पाठकान् विनयैः साधून योगांगैरप्टमिः स्तुवे ॥ ११ ॥ अन्वयार्थ:-(प्रातिहार्य जिनान् ) जो भगवान् अरहतदेव आठ प्राति- हार्य और ३४ अतिशय से सुशोभित हैं (गुणै. सिद्धान् ) जो सिद्ध सम्यक्त्व मादि पाठ गुणोंसे सुशोमित हैं (स्वमातृभिः सूरीन् ) जो प्राचार्य तीन गुप्ति और पाच समिति इन आठ प्रवचन मातृकाओं से सुशोमित हैं ( विनयैः पाठ- कान् ) जो उपाध्याय अनेक शिष्योंसे सुशोभित है (अष्टभिः योगागैः साधून ) और जो साधु प्राणायाम, ध्यान, धारणा, प्रत्यय, आहार, यम, नियम और आसन इन आठ योगसाधनके अगोंसे सुशोभित हैं ( स्तुवे ) उन सबकी-पाचों परमेष्ठियोंकी मै स्तुति करता हू। इसके आगे कायोत्सर्ग करना चाहिये। आलोचना- इच्छामि भंते! पंचमहागुरुभचिकाउस्सग्गोकओ तस्सालोचेउं । अट्ट- [१६] महापाडिहेरसंजुत्ताणं । अद्वगुण संपण्णाणं उड्ढलोयमस्थयम्मि पइडियाणं सिद्धाणं । अट्ठपवयणमउसंजुत्ताणं आयरियाण । आयारादिसुदणाणोवदे- yसयाणं उवज्झायाणं । तिरयणगुणपालणरयाणं सव्वसाहूणं । णिचकालं अंचेमि, पूजेमि, वंदामि, णमंसामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ, वोहिलाहो, सुगइगमणं, समाहिमरणं, जिणगुणसंपत्ति होउ मज्छ । अर्थ--हे भगवन् ! मै पञ्चगुरुभक्ति कर कायोत्सर्ग करता हू । इसमें जो दोष लगे हों उनकी आलोचना करने की इच्छा करता हू । भगवान् भरहत. देव आठ महाप्रातिहार्य गुणोंसे सुशोमित हैं, भगवान् सिद्ध परमेष्ठी सम्यक्तवादि आठ गुणोंसे विभूपित हैं और ऊर्द्ध लोकके शिखरपर विराजमान है, भगवान प्राचार्य परमेष्ठी अष्टप्रवचन मातृकाओं से सुशोभित हैं, भगवान् उपाध्याय परमेष्ठी पाचाराग भादि श्रुतज्ञानका उपदेश देते हैं और सर्वसाधु परमेष्ठी रत्नत्रय गुणोंका पालन करनेवाले हैं। इन पाचों परमेष्ठियों की मैं सदा अर्चा करता है, पूजा करता है, वदना करता हु और नमस्कार करता है। मेरे दुखो का नाश हो, कर्मों का नाश हो, मुझे रत्नत्रयकी प्राप्ति हो, शुभ गतिकी प्राप्ति हो, 'समाधिमरणकी प्राप्ति हो और भगवान् जिनेन्द्र देवके गुणोंकी मपत्ति प्राप्त हो। इति पञ्चगुरुभक्तिः। : अथ पञ्चगुरुभक्तिः [ प्राकृत ] मणुयणाइदसुरधरियछत्तत्तया पंचकल्लाणसोक्खावलीपत्तया ॥दसणं णाणज्झाणं अणतं बल, ते जिणा दितु अमं वरं मंगलम् ॥१॥ जेहिं ज्झाणग्निवाणेहिं अइदद्वयं, जम्मजरमरणणयरत्तय दड्डयं ।। जेहिं पचं सिवं सामयं ठाणयं, ते महं दितु सिद्धा वरं णाणयं ॥ २॥ पंचहाचारपंचग्गि- संसाहया, पारसंगाइसुअजलहिअवगाहया, मोक्खलच्छीमहंती महंते सया । क्षरिणो दितु मोक्खं गयासंगया ॥३॥ घोरसंसारमीमाडवीकाणणे, ' तिक्खवियरालणहपावपंचाणणे । णहमग्गाणजीवाण पहदेसया, बंदिमो ते [१६९] उवज्झाय अझे सया ॥ ४ ॥ उग्गतवचरणकरणेहि खीणंगया, धम्मवर. ज्झाण सुक्केकज्झाणंगया । णिम्भरं तवसिरियसमालिंगया, साह वो ते महामोक्खपथमग्गया॥ ५ ॥ एण थोत्तेण जो पञ्चगुरुवदए, गुरुयसंसार- घणवल्लि सो छिंदये। लहइ सो सिद्धिसोक्खाइ बहुमाणणं, कुणइ कम्मि- धणं पुञ्जपजालणं ॥ ६ ॥ अरुहा सिद्धायरिया उवझाया साहु पञ्चपरमेष्टि । एदे पञ्च णमोयारा भवे भवे मम सुहं दितु ॥ ७॥ इच्छामि भंते पञ्च- महागुरुभचिकाउस्सग्गो कओ तस्सालोचेलं अहमहापाडिहेरसंजुनाणं अर- हंताणं, अठगुणसंपण्णाणं उडलोयमत्थयम्मि पटियाणं सिद्धाणं, अठपव- यणमउसंजुचाणं, आयरियाण, आयारादिसुदणाणोवदेयाणं उवज्झायाणे, तिरयणगुणपालणरयाणं सब्बसाहूणं, णिच्चकालं अंचेमि, पूजेमि, वदामि णमसामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ वोहिलाहो सुगड्गमणं, समाहिमरणं, जिणगुणसंपत्ति होउ मज्ज। तीर्थड्वरभक्तिः अथ देवसियपडिक्कमणाए सव्वाइच्चारविसोहिणिमित्रं । पुन्वाड- रियकमेण चउवीमतित्थयरभत्तिकाउस्सग्गं करेमि । अर्थ-दैवसिक प्रतिक्रमण में लगे हुये अतीचारोंको शुद्ध करनेके लिये पूर्वा- चार्योंकी परंपराके अनुसार में तीर्थंकरभक्ति और तत्सवधी कायोत्सर्ग करता है। णमो अरहताणं णमो सिद्धाणं णमोआइरियाणं । णमो उबज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूर्ण ।। अर्थ-मै अरहतोके लिये नमस्कार करता हूं, सिद्वोके लिये नमस्कार करता हू, आचार्योंके लिये नमस्कार करता ह, उपाध्यायोंके लिये नमस्कार करता ह और लोकमें सर्व साधुओंके लिये नमस्कार करता हूँ। चउवीसंतित्थयरे उसहाईवीरपच्छिमे बंदे । सव्वेसि मुणिगणहरसिद्धे सिरसा णमंसामि ॥१॥ अर्थ-मै श्री वृषभदेवसे लेकर श्री वर्धमान पर्यंत समस्त चौवीस तीर्थंकरों [१७०] को मस्तक झुकाकर नमस्कार करता है तथा मुनिगणधर और सिद्धोंको भी नमस्कार करता है। ये लोकेष्टमहसलक्षणधरा ज्ञेयार्णवान्तर्गता । ये सम्यग्भवजालहेनुमथनाश्चंद्रार्कतजोधिकाः॥ येसाच्चिन्द्रसुगप्सरे गणशनर्गीतप्रणुत्याचिंताः। तान्देवान्वृषभादिवीरचरमान्भक्त्या नमस्साम्यहम् ॥ २ ॥ अन्वयार्थ:-- (ये ) जो (लोकेष्टसहस्रलक्षणधराः) तीर्थकर परमदेव मंसारमें लोकमें एक हजार पाठ लक्षण धारण करते हैं, (ज्ञेयार्णवांतर्गता.) जो जीवादिक पदार्थरूपी महासागरके पारगत हैं अर्थात समस्त पदार्थोंको एक साथ जानते हैं (ये सम्यग्भवजालहेतुमथनाः) जो जन्म मरणरूप ससार को बढ़ानेवाले मिथ्यात्व आदि कारण हैं उन्हे जिन्होंने सर्वथा नष्ट कर दिया है (चन्द्रार्कतेजोऽधिका.) जिनका प्रकाश मूर्य चन्द्रमासे भी अधिक है अर्थात् शरीरका प्रकाश करोड़ों मूर्यसे मी अधिक है और ज्ञानका प्रकाश लोक-प्रलोक से भी अधिक है ( ये साविन्द्रसुराप्सरोगणशतैः गीतप्रगुत्याचिंताः ) जो सैकड़ों इन्द्र और अमख्यात देव अप्सराओं के समूह जिनकी कीर्ति को गाकर और जिनके लिये नमस्कार कर जिनकी पूजा करते हैं ऐसे (तान् वृषभादिवीरचर- मान् देवान् ) उन श्री वृषभदेवसे लेकर अतिम महावीर पर्यंत चौर्वसों तीर्थंकर परमदेवोंको (मई) मैं ( भक्त्या) भक्तिसे (नमस्यामि ) नमस्कार करता हू । नामेय देवपूज्यं जिनवरमजित मर्वलोकप्रदीपं । सर्वज्ञ संभवाख्यं मुनिगणवृपभं नदन देवदेवम् ।। कर्मारिघ्नं सुवुद्धिं वरकमलनिभं पद्यपुष्पामिगधम् । क्षान्तं दान्तं सुपाचं सकलशशिनिभं चन्द्रनामानमीडे ॥३॥ अन्वयार्थ:--( देवपूज्य नामेय ) देवोंके द्वारा पूज्य ऐसे श्री वृषभनाथकी (सर्वलोकप्रदीप जिनवर अजित ) समस्त लोकको या लोकाकाशमें भरे हुये समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करनेके लिये दीपकके समान भगवाम् अजितनाथ की (मुनिगणवृषभं सर्वज्ञ संभवाख्य ) मुनिगणोंमें श्रेष्ठ, सर्वज्ञ ऐसे सभवनायकी (देवदेव नदन) देवाधिदेव श्री अमिनदनदेवकी (कर्मारिघ्नं सुबुद्धि ) कर्मरूपी [१७१] .

शत्रुका नाश करनेवाले भगवान् सुमतिनाथी (वरकमलनिभ पद्मपुष्पामिगध) श्रेष्ठ कमलके समान कातिको धारण करनेवाले भगवान् पद्मप्रभकी (दान्त दान्त सुपारच ) क्षमाको धारण करनेवाले और इन्द्रियों को सर्वथा वश करने वाले भगवान सुपार्श्वनाथकी (सकलश शिनिभ चन्द्रनामानं ईडे) तथा पूर्ण चन्द्रमाके समान-अत्यत सुशोमित भगवान चन्द्रप्रभकी मै स्तुति करता हू । विख्यातं पुष्पदन्तं भवभयमथनं शीतलं लोकनार्थ । श्रेयासं शीलकोश प्रवरनरगुरुं वासुपूज्यं सुपूज्यम् ।। मुक्तं दान्तेन्द्रियाव विमलमृपिपति सिंहसैन्यं मुनीन्द्रम् । धर्म सद्धर्मकेतुं शमदमनिलयं स्तौमि शान्ति शरण्यम् ॥ ४ ॥ अन्वयार्थ -- ( भवभयमथन विख्यात पुष्पदन्त ) संसारके भयको नाश करनेवाले और अत्यन्त प्रसिद्ध ऐसे भगवान पुष्पदन्त की ( लोकनाथं शीतल) तीनों लोकोंके स्वामी भगवान शीतलनाथकी (शीलकोश श्रेयास) शीलवतके निधि भगवान श्रेयासनाथकी (प्रवरनरगुरु सुपूज्यं वासुपूज्य) गणधरादिक दवोंके गुरु और अत्यन्त पूज्य ऐसे श्री वासुपूज्यकी (मुक्त दान्तेन्द्रियाव विमल) कर्मोंसे सर्वथा मुक्त होनेवाले और इन्द्रिय रूपी घोड़ेको सर्वथा वश करनेवाले भगवान विमलनाथकी (ऋषिपति मुनीन्द्र सिंहसैन्यं ) समस्त ऋषियों के स्वामी मुनिराज श्री अनन्तनाथकी (सद्धर्मकेतु धर्म ) सद्धर्मकी ध्वजा को धारण करने वाले भगवान धर्मनाथकी (शमदमनिलय शरण्य शान्ति स्तौमि ) तथा अत्यत शातिको धारण करनेवाले, इन्द्रियों को सर्वथा वश करनेवाले और समस्त जीवोंके शरणभूत ऐसे शातिनाथ भगवानकी मैं स्तुति करता है। कुंथु सिद्धालयस्थं श्रमणपतिमरं त्यक्तभोगेषु चक्रम् । मल्लिं विख्यातगोत्रं खचरगणनुतं सुव्रतं सौख्यराशिम् ।। देवेन्द्रायं नमीशं हरिकुलतिलक नेमिचंद्रं भवान्तम् । पाच नागेन्द्रबंध शरणमहमितो बर्द्धमानं च भक्त्या ॥५॥ अन्वयार्थ:-(सिद्धालयस्थं श्रमणपति कुथु ) सिद्धालयमें जाकर विराज- मान होनेगले और समस्त मुनियोंके स्वामी ऐसे भगवान कुन्थुनाथकी (त्यक्त- भोगेषु चक्रमरं ) भोगोपभोगके समस्त पदार्थों का त्याग करनेवाले भगवान [१७२] अरनाथकी (विख्यातगोत्र मल्लि ) प्रसिद्ध काश्यप नामके गोत्र में उत्पन्न होने वाले भगवान मल्लिनाथकी (खचरगण नुत सौख्यराशि सुव्रत ) समस्त देव और विद्याधर जिनके लिये नमस्कार करते हैं और जो अनन्त सुखकी राशि हैं ऐसे भगवान मुनिसुव्रतनाथकी (देवेन्द्राच्य नमीशं ) ठेवोंके समरत इन्द्र जिनको नमस्कार करते हैं ऐसे भगवान नमिनाथकी (हरिकुलतिलकं भवान्त नेमिचन्द्र) जो हरिवशके तिलक हैं और मसारको नाश करनेवाले है ऐसे भगवान नेमि- नायकी (नागेन्द्रबंध पाञ्चं ) धरणेन्द्रदेवके द्वारा वदनीय ऐसे भगवान पार्श्व- नाथकी (च भक्त्या वर्धमानं अह शरणं इत ) और भक्तिपूर्वक भगवान वर्द्ध- मान स्वामीकी मै शरणको प्राप्त होता है । इसप्रकार में चौवीसों तीर्थंकरोंकी स्तुति करता हु और चौवीसों तीर्थंकरोंकी शरण जाता है। इसके बाद कायोत्सर्ग करना चाहिये। पालोचना- इच्छामि भंते ! चउवीसतित्थयरभचिकाउस्सग्गो को तस्सालोचे। पचमहाकल्लाणसंपण्णाणं, अट्ठमहापाडिहेरसहियाणं, चउतीसअतिसयवि- सेससंजुत्ताणं, बत्तीसदेविंदमणिमउडमस्थयमहियाणं, बलदेववासुदेवचक्कर हररिसिमुणिनइअणगारोवगूढाणं, थुइसयसहस्सणिलयाणं, उसहाइवीरपः च्छिममङ्गलमहापुरिसाणं णिच्चकालं अंचेमि, पुज्जेमि, वंदामि, णमंसामि दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ, वोहिलाहो, सुगड़गमणं, समाहिमरणं, जिण गुणसंपत्ति होउ मज्ज्ञ। अर्थ- हे भगवन् ! मैं चौवीसों तीर्थंकरोंकी भक्ति कर कायोत्सर्ग करता है। इसमें जो दोष लगे हों उनकी आलोचना करनेकी इच्छा करता हू। जो तीर्थकर गर्भ, जन्म आदि पाचो महाकल्याणकोंसे सुशोभित हैं, जो आठ महाप्रातिहार्योंसहित विराजमान हैं, जो चौतीस विशेष अतिशयोंसे सुशो- भित हैं, जो देवोंके बत्तीस इन्द्रों के मणिमय मुकुट लगे हुये मस्तकोंसे पूज्य हैं, जिनको समस्त इन्द्र श्राकर नमस्कार करते हैं, बलदेव, वासुदेव, चक्रवर्ती, ऋपि, मुनि, यति, मनगार आदि सब जिनकी सभामें आकर धर्मोपदेश सुनते [१७३] . है और जिनके लिये लाखों स्तुति की जाती हैं ऐसे श्री कृषभदेवसे लेकर श्री महा- वीर एयंत चौवीसों महापुरुष तीर्थकर परमदेवकी मैं सदा अर्चा करता हूं, पूजा करता है, वदना करता है, और उनके लिये सदा नमस्कार करता हु, । मेरे दुःखोंका नाश हो, कर्मोका नाश हो, मुझे रक्षत्रयकी प्राप्ति हो, शुभगतिकी प्राप्ति हो, समाधिमरणकी प्राप्ति हो, जिनेन्द्र भगवान के समस्त गुणोंकी प्राप्ति हो । इति तीर्थ इरभक्तिः। शान्तिभक्तिः न स्नेहाच्छरणं प्रयान्तिभगवन्पादद्वयं ते प्रजाः । हेतुस्तत्र विचित्रदुःखनिचयः संमारघोरार्णवः ।। अत्यन्तस्फुरदुग्ररश्मिनिकरव्याकीर्णभूमंडलो। ग्रैष्मः कारयतीन्दुपादसलिलच्छायानुराग रविः ॥ १॥ अन्वयार्थ--(भगवन् ) हे भगवन् । (प्रजाः) ससारी जीव (ते पाद- द्वयं)भापके दोनों चरणकमलों की (स्नेहात ) स्नेहसे (शरण) शरण (न प्रयांति ) नहीं आये हैं किन्तु ( तनहेतुः ) आपके चरणकमलोंकी शरण में आने का कारण (विचित्रदुःखनिचयः ) अनेक प्रकारके दुःखोंसे भरा हुआ (ममार- घोरार्णवः 'अस्ति' ) संसाररूपी घोर-भयानक महासमुद्र ही है (अत्यन्तम्फुर- दुपररिमनिकरव्याकीर्णभूमंडलः) अत्यन्त दैदीप्यमान तेज किरणो का समूह समस्त भूमडल में व्याप्त हो रहा है ऐसा (त्रैष्मः ) ग्रीष्मऋतुका (रविः) सूर्य (इन्दुपादसलिलच्छायानुराग कारयति) चन्द्रमाकी किरणें, जल और छायाके अनुरागको कराता है। भावार्थ--जिसप्रकार गकि दिनोमें सूर्यसे संतप्त होकर यह जीव छाया और जलसे अनुराग करता है, क्योंकि छाया और जल उस संतापको दूर करने वाले है । इसीप्रकार आपके चरण कमल मी संसारके दुःखोंको दूर करनेवाले हैं, इसीलिये ससारके दुःखोंसे अत्यन्त दुःखी हुये प्राणी उन दुःखोंको दूर करनेके लिये भापके चरण कमलोंकी शरण लेते है। [१७४] नमस्कार करनेसे इसलोक सम्बन्धी फल- क्रुद्धाशीविपदष्टदुर्जयविपज्वालावलीविक्रमो'। विद्याभेपजमंत्रतोयहवनर्याति प्रशान्ति यथा ।। तद्वत्ते चरणारुणांबुजयुगस्तोत्रोन्मुखानां नृणाम् । विघ्नाः कायविनायकाश्च सहसा शाम्यन्त्यहो विस्मयः ।।२।। अन्वयार्थ:- (क्रुद्राणीविषदष्टदुर्जयविपज्वालावलीविक्रमः ) क्रोधित हुये सर्पके काट लेनेसे जो असह्यविष समस्त शरीरमें फैल जाता है वह (यथा) जैसे (विद्यामेषजमंत्रतोयहवनैः ) गास्डी मुद्रा में दिखाने या उसके पाठ करने रूप विद्यासे, विषको नाश करनेवाली औषधियोंको देनेसे, मत्रसे, जलसे और होम करने आदिसे (प्रशातिं याति) शातिको प्राप्त हो जाता है (तद्वत) उसी प्रकार 'हे भगवन्' (ते चरणाम्बुजयुगस्तोत्रोन्मुखाना नृणा) आपके दोनों चरण- रूपी अरुणलाल कमलोंका स्तोत्र करनेवाले मनुष्योंके ( विघ्नाः) समस्त विश्न (च) और (.कायविनायकाः) शरीर सम्बन्धी समस्त रोग ( सहसा ) शीघ्र ही (शाम्यन्ति )शातिको प्राप्त हो जाते हैं -नष्ट हो जाते हैं (अहो विस्मयः) यह एक महा आश्चर्य की बात है। भावार्थ--विघ्नको दूर करनेके लिये बहुतसा परिश्रम करना पड़ता है परंतु रोग और विन्न आदि केवल भापकी स्तुति करने मात्रसे दूर हो जाते हैं । यही सबसे अधिक आश्चर्यकी बात है। प्रणाम करनेका फल-- संतप्तोत्तमकांचनक्षितिधरश्रीसद्धिंगौराते । 'मां त्वचरणप्रणामकरणात्पीडाः प्रयाति क्षयं ।। उद्यद्भास्कर विस्फुरत्करशतव्याघातनिष्कासिता। नानादेहिविलोचनद्युतिहरा शीघ्रं यथा शर्वरी ॥३॥ अन्वयार्थ:- (यथा) जिसप्रकार (नानादेहिविलोचनद्युतिहरा शर्वरी) १-श्राशी: सर्पदंष्ट्रा श्राश्या विषं यस्य असौ श्राशीविषयः, अधश्चासौ श्राशीविषश्च तेन दष्टे भक्षिते दुयश्चासौ विषज्वालानलीविक्रमश्च । विक्रमः प्रसर. मामर्थ्य वा। २-कायविनायकाश्च-कार्य विशेपेण नयति अपनयंतीति कायविनायकाः रोगा। [१७५] अनेक प्रकारके प्राणियोंके नेत्रोंके प्रकाशको रोकनेवाली रात्रि-अधकारमय रात्रि (उद्यद्भास्करविस्फुरत्करशतव्याघातनिष्कासिता) उदय होते हुये सूर्यकी दैदी- प्यमान सैंकड़ों किरणों के आधातसे मानों निकाल दी गई है इसप्रकार (शीघ्र ) शीघ्र (क्षयं 'प्रयाति' ) नष्ट हो जाती है ('तथा' ) उसीप्रकार (संतप्तोत्तम- कांचनक्षितिधरश्रीस्पर्द्धिगौरद्युते 'भगवन्' ) आपके शरीरकी काति तपाये हुये उत्तम सोनेके समान मेरु पर्वतकी शोभाकी रूपर्धा करनेवाली है या तपाये हुये उत्तम सोनेके समान और मेरु पर्वतके समान आपके शरीरकी काति अत्यन्त दैदीप्यमान है ऐसी अनुपम शोभाको धारण करनेवाले हे भगवन् (त्वचरणप्रणा- मकरणात् ) आपके चरण कमलों को नमस्कार करनेसे (पुसा) मनु यो की (पीडाः) पीड़ाएं-दुःख 'क्षणात्' क्षणभरमें (क्षय प्रयान्ति ) नाशको प्राप्त हो जाती हैं। स्तुति ही मोक्षपदकी कारण है-- त्रैलोक्येश्वरभंगलब्धविजयादत्यन्तरौद्रात्मकात् । नानाजन्मशतान्तरेषु पुरतो जीवस्य संसारिणः ।। को वा प्रस्खलतीह केन विधिना कालोपदावानला- न स्थाञ्चेत्तव पादपद्मयुगलस्तुत्यापगावारणम् ।। ४ ।। अन्वयार्थ:-(पुरत: नानाजन्मशतान्तरेषु)पहले अनेक प्रकारके सैकड़ों जन्मों में (त्रैलोक्येश्वरभगलब्धविजयात् ) तीन लोकके ईश्वर धरणेन्द्र, चक्रवर्ती आदिके विनाश से प्राप्त हुये विजयके कारण (अत्यन्तरौदात्मकात् ) अत्यन्त रौद्र-कर अवस्थाको प्राप्त हुये ( कालोपदावानलात् ) इस कालरूपी उपदावा- नलके पाससे (संसारिणः जीवस्य ) इस ससारी जीवका (चेत् तव पादपद्म- युगलस्तुल्यापगावारणं न स्यात् ) जो आपके चरणकमलयुगलकी स्तुति रूपी नदी निवारण करनेवाली नहीं होती तो (इह ) इस संसार से (को वा केनवि- घिना प्रस्खलति ) कौन किस प्रकारसे उद्धार करता ? भावार्थ-- इस संसारमें जीवोंको जन्म मरण करना ही पड़ता है । एक आपके चरणकमलोंकी स्तुति ही ऐसी है जो इन जीवोंको जन्म मरण से बचा सकती है और अजर अमर पट अर्थात् मोक्षपद दे सकती है। [१७६] -- स्तुति करनेसे असाध्यरोगोंका भी नाश-- लोकालोकनिरंतरप्रविततज्ञानकमूते विभो ! नानारत्नपिनद्धदंडरुचिरश्वेतातपत्रत्रय ॥ त्वत्पादद्वयपूतगीतखतः शीघ्रं द्रवन्त्यामया। दध्मिातमृगेन्द्रभीमनिनदाद्वन्या यथा कुंजराः ॥ ५॥ अन्वयार्थी--(विभो) हे प्रभो ! (लोकालोकनिरंतरप्रविततज्ञानकमूर्ते) लोक-अलोकमें सर्वत्र फैले हुये ज्ञान रूपी अद्वितीय मूर्तिको धारण करनेवाले तथा ( नानारत्नपिनद्धदडरुचिरश्वेतातपत्रत्रय) नानाप्रकारके वेष्टित-जड़े हुये मनोहर दडसे युक्त सफेद तीन छत्रको सिरपर धारण करनेवाले हे भगवन् ! ( त्वत्पादद्वयपूतगीतरवतः) आपके दोनों चरण कमलोंकी स्तुतिमें गाये हुये पवित्र गीतोंके शब्दोंसे-आपके चरण कमलोंकी स्तुति करने से (प्रामयाः) समस्त रोग (शीघ्र ) शीघ्र (द्रवन्ति ) नष्ट हो जाते हैं ( यथा) जैसे (दर्पा- ध्मातमृगेन्द्रभीमनिनदात् ) गर्वसे उद्धत हुये सिंहकी गर्जनाके भयकर शब्दों को सुनकर ( वन्याः) जगलके ( कुञ्जराः ) बड़े बड़े हाथी भाग जाते हैं । भावार्थ-- जिप्तप्रकार सिंहकी गर्जनाको सुनते ही हाथी भाग जाते है उसीप्रकार भगवान शांतिनाथकी स्तुति करने मात्रसे समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं। स्तुतिसे मोक्षके अनत सुखकी प्राप्ति-- दिव्यस्त्रीनयनाभिरामविपुलश्रीमेरुचूडामणे । भास्वद्वालदिवाकरद्युतिह रप्राणीष्टभामंडल ॥ अव्यायाधमचिन्त्यसारमतुलं' त्यक्तोपमं शाश्वतं । सौख्यं त्वच्चरणारविंदयुगलस्तुत्यैव संप्राप्यते ॥६॥ अन्वयार्थ--(दिव्यस्त्रीनयनामिरामविपुलश्रीमेरुचूडामणे) हे देवागनाओं के नेत्रोके लिये मी अत्यन्त सुन्दर ! महाविभूतिको धारण करनेवाले मेरु पर्वत की चूडामणिके समान । ( भाखद्वालदिवाकरद्यतिहर ) दैदीप्यमान उदय होते हुये सूर्यकी कातिका मी हरण करनेवाले । (प्राणीप्टभामडल ) हे प्राणियों के - १-अतुल न विद्यते तुला इयत्तावधारण यस्य २-त्यक्तोपमं अनुपम ३-शाश्वतं नित्य [१७७] लिये इष्ट भामडलसे शोभायमान ! (त्वच्चरणारविंदयुगलस्तुत्या एव ) आपके दोनों चरणकमलोंकी स्तुति करनेसे ही-इस जीवको-(अन्यावाधं ) बाधा ! रहित (अचिन्त्यसारं ) अचिन्त्य माहात्म्य सहित (अतुलं ) उपमा रहित (त्य- तोपमं) समानता रहित (शाश्वत) नित्य (सौख्य ) सुख (सप्राप्यते ) प्राप्त होता है। पापोंका नाश भगवानके चरणकमलके प्रसादसे- यावन्नोदयते प्रभापरिकरः श्रीभास्करो भासयं- स्तावद्धारयतीह पङ्कजवन निद्रातिभारश्रमम् ।। यावत्वच्चरणद्वयस्य भगवन्न स्यात्प्रसादोदय- स्तावज्जीवनिकाय एप वहति प्रायेण पापं महत् ॥ ७ ॥ अन्वयार्थ:-- ( यावत् ) जबतक (प्रभापरिकरः') अपनी किरणों के समूहसे परिपूर्ण ( भासयन्' ) दैदीप्यमान होता हुमा-स्व-पर पदार्थोके स्वरूप को प्रकाशित करता हुआ ( श्रीभास्कर.) सूर्य (न उदयते) उदय नहीं होता है ( तावत् ) तबतक ही ( पकजवन' ) कमलोंका वन (इह') जगत में (निद्रातिभारश्रम ) नींदके बोझसे परिश्रमको धारण करता है-मुद्रित रहता है- सूर्यके उदय होते ही वह प्रफुल्लित हो जाता है उसीप्रकार ( यावत् ) जबतक (भगवन् ) हे भगवन् ! (त्वच्चरणद्वयस्य ) आपके दोनों चरण कमलों की (प्रसादोदयः ) प्रसन्नता-कृपाका उढय ( न स्यात् ) नहीं होता है (तावत् ) तमीतक (एपः) यह (जीवनिकाय:५) जीवोंका समूह ( प्रायेण ) प्राय:- अधिकतर ( महत् पापं) महापापको ( बहति ) धारण करता है। भावार्थ-आपके चरणकमलों की प्रसन्नता होते ही वे समस्त पाप स्वयं नष्ट हो जाते है। . १-प्रभापारकरः किरणनिकरपरिकरितः। २-भासयन् स्वपरस्वरूपमुद्योतयन् । ३-पकजवनं-पद्मसंघातः। ४-इह-जगति । ५-जीवनिकाय:-ससारिजीवसघात । ६-प्रायेण-अतिशयेन, [१७८] .

शान्ति शान्तिजिनेन्द्र शान्तमनसस्त्वत्पादपद्माश्रयात् । संप्राप्ताः पृथिवीतलेषु बहवः शात्यर्थिनः प्राणिनः ॥ कारुण्यान्मम भाक्तिकस्य च विभो दृष्टिं प्रसन्नां कुरु । त्वत्पादद्वयदैवतस्य गदतः शान्त्यष्टकं भक्तिनः ॥ ८॥ अन्वयार्थ:--(शातिजिनेन्द्र ) हे शातिजिनेन्द्र । (पृथिवीतलेपु) इस सम- स्त पृथिवी मडलपर ( बहवः) अनेक (शान्त्यर्थिनः प्राणिनः ) शातिकी इच्छा करनेवाले-परम कल्याण रूप शाति चाहनेवाले-ससारको नाश करने रूप शाति चाहनेवाले प्राणी ( शान्तमनसः ) शात मनसे ( त्वत्पादपद्माश्रयात् ) मात्र आपके चरण कमलोंका आश्रय लेनेसे ही (शातिप्राप्ताः ) मोक्षरूप परम शातिको प्राप्त कर चुके ( विभो ) हे प्रभो । ( त्वत्पादद्वयदैवतस्य) आपके दोनों चरणकमलोंको ही परमदेव मानने गले (भक्तितः) बड़ी भक्तिसे (शान्त्य- ष्टक ) शान्त्यष्टकका (गदतः ) पाठ करनेवाले (मम भाक्तिकस्य च ) मुझ भक्तपर मी ( कारुण्यात् ) दया करके ( प्रसन्ना दृष्टिं) प्रसन्न दृष्टि कुरु । भावार्थ-मुझे भी मोक्षरूप परमशाति दीजिये, हे प्रभो ! मेरी दृष्टिको सम्य- ग्दर्शनको अत्यन्त निर्मल बना दीजिये जिससे मुझे वह परम शाति स्वयं प्राप्त हो जाय । शांतिजिनं शशिनिर्मलवक्त्रं, शीलगुणव्रतसंयमपात्रम् । अष्टशताचितलक्षणगात्रं, नौमि जिनोत्तममंबुजनेत्रम् ॥ ९॥ अन्वयार्थ:-- ( शशिनिर्मलवक्त्र ) जिनका मुख पूर्णचन्द्रमाके समान अत्यन्त निर्मल है ( शीलगुणवतसयमपात्र ) जो शील, गुण, व्रत और सयमके अदितीय पात्र हैं ( अष्टशताचिंतलक्षणगात्र ) जिनका शरीर एक सौ आठ शुभ लक्षणोंसे सुशोभित है ( अबुजनेत्र ) जिनके नेत्र कमलके समान सुशोभित हैं (जिनोत्तम ) जो गणवरादिक देवोंसे भी उत्तम हैं-परमोत्कृष्ट हैं ऐसे (शाति- जिनं ) भगवान शातिनाथको (नौमि ) मै नमस्कार करता है। पञ्चमभीप्सितचक्रधराणां, पूजितमिन्द्रनरेन्द्रगणैश्च । शांतिकरं गणशांतिम्मीप्सुः पोडशतीर्थकरं प्रणमामि ॥१०॥ [१७६] अन्वयार्थ:-(ईसितचक्रधराणा) जो शातिनाथ भगवान् गृहस्थावस्था में बारह चक्रवर्तिओंमें ( पचम ) पाचवे चक्रवर्ती थे ( इन्द्रनरेन्द्रगणैः च पूजित ) इन्द्र और नरेन्द्र चक्रवर्तियोंके समूहसे पूजनीय (शांतिकर ) शातिकरने बाले (षोडशतीर्थकर ) सोलहवे तीर्थंकरको (गणशाति अमीप्सुः ) समस्त सपके लिये शातिकी इच्छा करनेवाला मै (प्रणमामि ) नमस्कार करता है। आठ प्रातिहार्योंकी शोभा- दिव्यतरुः सुरपुष्पसुवृष्टिदुन्दुमिरासनयोजनघोपौ। आतपवारणचामरयुग्मे यस्य विभाति च मंडलतेजः।। अन्वयार्थ --(दिव्यतरुः ) दिव्य अशोकवृक्ष, (सुरपुष्पसुवृष्टिः ) देवों के द्वारा की गई पुष्पवृष्टि-पुरुपोंकी वपा ( दुदुभिः ) दुदुमि बाजे (आसन- योजनघोपौ) सिंहासन, एक योजन पर्यंत दिव्यध्वनि ( आतपवारण 'चामर- जुग्मे' ) तीनछत्र, चौसठ चमर ( च मडल तेजः ) भामडल ( यस्य ) जिन शातिनाथ भगवानके समीप ( विभाति ) शोभायमान है । तं जगदचितशांतिजिनेन्द्र शांतिकरं शिरसा प्रणमामि। सर्वगणाय नु यच्छतु शानि मह्यमा पठते परमां च ॥ १२ ॥ अन्वयार्थ:-(शातिकर ) मोक्षरूप परम शातिको देनेवाले (त जगदर्चि- तशातिजिनेन्द्रं ) उन तीनों लोकों द्वारा पूज्य शानिनाथ भगवानको मैं (शिरसा) मस्तक झुकाकर (प्रणमामि ) नमस्कार करता हू (सर्वगणाय तु ) वे शाते- नाथ भगवान् समस्त सबके लिये (परमा शांति) परम शाति (यच्छतु) प्रदान करें (च पठते महय अरं) और उस शातिनाथ की स्तुति पदनेवाले मुझको मी शीघ्र परमशाति प्रदान करें। २४ तीर्थंकरोंसे शातिकी प्रार्थना-- येऽभ्यचिंता मुकुटकुंडलहाररत्नैः । शक्रादिभिः सुरगणैः स्तुतपादपद्माः ।। -- १-अातपवारण-छत्रत्रय। २-चामरयुग्मं-चतुमष्टिचामरसंभवेप्युभयपार्श्ववतिचामरेन्द्रद्वयवात्यपेक्ष्या चामरयुग्माभिधानं ३-मडलतेनः-मामंडलप्रकाशः। [१०] अन्वयार्थ:- ते मे जिनाः प्रवरवंशजगत्प्रदीपाः । तीर्थकराः सततशांतिकरा भवन्तु ।। १३ ॥ अन्वयार्थ:---(मुकुटकुण्डलहाररत्नैः) मुकुट, कुण्डल हार और रत्नोंसे युक्त (सुरगणैः ) देवोंके समूहमे ( शक्रादिभिः ) व इन्द्रोंसे ( स्तुतपादपाः) स्तुति किये गये हैं चरण कमल जिनके तथा (ये अभ्यर्चिताः ) जो उन देव- इन्द्रादिकोंसे पूजित हैं (प्रवरवंशजगत्प्रदीपाः)जो उत्तम वशमें उत्पन्न होकर ससारमें सब पदार्थोंको प्रकाशित करनेवाले दीपकके समान हैं (तीर्थंकराः) जो तीर्थकर-आगमके खामी-आगम प्रर्वतक हैं ( सततशातिकराः) जो सदा शाति के करनेवाले हैं ऐसे (ते जिनाः ) वे २४ तीर्थंकर (मे) मुझे शाति के देनेवाले ( भवन्तु ) हों। संपूजकानां प्रतिपालकानां यतीन्द्रसामान्यतपोधनानाम् । देशस्य राष्ट्रस्य पुरस्य राज्ञः करोतु शांति भगवान जिनेन्द्रः ॥१४॥ ( भगवान् जिनेन्द्रः ) केवलज्ञानी, पूज्य भगवान् जिनेन्द्र- देव (सपूजकाना ) पूजा करनेवालोंके लिये, (प्रतिपालकाना) चैत्य-चैत्यालय और धर्मकी रक्षा करनेवालों के लिये, ( यतीन्द्रसामान्यतपोधनाना) भाचार्य, उपाध्याय साधुवोंके लिये, शैक्ष्यादि सामान्य तपस्वियोंके लिये (देशस्य) देशके लिये ( राष्ट्रस्य ) राष्ट्र के लिये ( पुरस्य ) नगरके लिये ( राज्ञः) राजाके लिये (शाति) शाति ( करोतु ) प्रदान करें। -सग्धरा इद- क्षेमं सर्वप्रजानां प्रभवतु बलवान्धार्मिको भूमिपालः । काले काले च सम्यग्वर्षतु मघवा व्याधयो यान्तु नाशम् ॥ दुर्भिक्ष चौरमारिः क्षणमपि जगतां मास्मभुज्जीवलोके । जैनेद्रं धर्मचक्र प्रभवतु सततं सर्वसौख्यप्रदायि ॥१५॥ अन्वयार्थ:--(सर्वप्रजाना क्षेमप्रभवतु) इस संसार में समस्त प्रजाका कल्याण हो (भूमिपाल: बलवान् धार्मिक प्रभवतु) राजा बलवान् और धार्मिक हो (च काले काले मघवा सम्यावर्षतु ) समय समय पर इन्द्र [बरसनेवाले बादल ४-तीर्थाधिप: इत्यपि पाठः ५-उप्रवंश, नाथवश, इक्ष्वाकुवंश प्रादि [१८१] - अच्छी [ जितनी जरूरत हो उतनी ] बर्षा करे (व्याधयः नाश यान्तु ) रोग सब नष्ट हो जाय (जीवलोके ) संसारमें (जगता) ससारी जीवोंको (क्षण अपि ) क्षणभर के लिये मी (दुर्भिक्षं चौरमारिः मास्मभून ) दुष्काल, चौर और मारी अर्थात प्लेग आदि मारक रोग या शस्त्रादिक से होनेवाला अपघात कमी न हो तथा (सर्वसौख्यप्रदायि ) जो सब जीवोको सुख देनेवाला है ऐसा ( जैनेद्र धर्मचक्र ) जिनेन्द्रदेवका कहा हुआ उत्तम क्षमादि धर्माका समूह ( सतत ) विना किसी रुकावटके-सदा (प्रभवतु ) प्रवृत्त होता रहे । इसके बाद कायोत्सर्ग करना चाहिये। आलोचना--इच्छामि भंते शांतिभत्तिकाउस्सग्गो को तस्सालो- चेउं । पञ्चमहाकल्लाणसंपण्णाणं, अट्ठमहापाडिहेरसहियाणं, चउतीसाति- सयविसेससंजुत्ताणं, बत्तीसदेवेंदमणिमयमउडमत्थयमहियाणं, बलदेववासु- देवचक्कहररिसिमुणिजदिअणगारावेगूढाणं, थुइसयसहस्सणिलयाण, उम- हाइवीरपच्छिममंगलमहापुरिसाणं णिच्चकालं अंचेमि, पूजेमि, बंदामि, गर्म- सामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ, बोहिलाहो, सुगइगमण, समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं ॥ अर्थ- हे भगवन् ! मै शातिभक्ति कर कायोत्सर्ग करता है। इसमें जो दोष लगे हों उनकी आलोचना करनेकी इच्छा करता हू । जो गर्भ, जन्म आदि पाचों कल्याणोंसे सुशोभित हैं, जो आठ महा प्रातिहार्यों सहित विराजमान हैं, जो ३४ विशेष अतिशय से सुशोभित हैं, जो बत्तीस देवेन्द्रोंके स्तमय मुकुटोंसे सुशोमित मस्सकोंसे नमस्कार किये जाते हैं-पूजे जाते हैं, बलदेव, वासुदेव, चक्रवर्ती, ऋपि, मुनि, यति, अनगार जिनकी सदा सेवा करते रहते हैं और जो लाखों स्तुनियोंके पात्र हैं ऐसे श्री वृषभदेवसे लेकर महावीर पर्यंत चौवीस महा- पुरुपोंकी-तीर्थकर परमदेवोंकी मै सदा अर्चा करता है, वदना करता है, और नमस्कार करता है। मेरे दुःखोंका क्षय हो और कोका क्षय हो । मुझे रत्नत्रय की प्राप्ति हो, शुभ गतिकी प्राप्ति हो, समाधिमरणकी प्राप्ति हो और भगवान् जिनेन्द्रदेवके समस्त गुणों की प्राप्ति हो । इति शातिभक्तिः। [१८२] अथ क्षेपक श्लोकानि । शांतिः शिरोधृतजिनेश्वरशासनानां । शांतिनिरन्तरतपोऽभवमाविता- नाम् ।। शांतिः कषायजयमितवैभवानां, शांतिः स्वभावमहिमानमुपाग- तानाम् ॥१॥ जीवंतु संयमसुधारसपानतृप्ताः, नंदंतु शुद्धसहसोदयसु- प्रन्नाः सिद्धयंतु सिद्धिसुखसंगकृताभियोगाः, तीव्रतपंतु जगतां त्रितयेऽ- हदाज्ञाः॥२॥ शांतिःशं तनुतां समस्तजगतः संगच्छतां धार्मिकैः, श्रेयः श्रीः परिवर्धतां नयधराधुर्यों धरित्रीपतिः ।। सद्विद्यारसमुग्दिरंतु कवयो नामाप्यघस्यास्तु मा ।प्रार्थ्य वा कियदेक एव शिवकृद्धर्मो जयत्वहताम्॥३॥ समाधिभक्तिः खात्माभिमुखसंविचि लक्षणं श्रुतचक्षुपा पश्यन्पश्यामि देव त्वां केवलज्ञानचक्षुषा ॥१॥ अन्वयार्थ:-( देव) हे भगवन् ! ( स्वात्माभिमुखसवित्तिलक्षणं) अपने मात्माके स्वरूपमें तल्लीन होनेवाला ज्ञान ही आपका लक्षण है अर्थात् आपका स्वरूप केवलज्ञानमय है ऐसे (त्वा ) आपको ( श्रुतचक्षुषा पश्यन् ) श्रुतज्ञान- रूपी नेत्रसे देखता हुआ मैं ( केवलज्ञानचक्षुषा पश्यामि ) केवलज्ञानरूपी नेत्र से देख रहा हूं। भावार्थ --जो भव्य जीव श्रुतज्ञानसे आगमके अनुसार आपकी आराधना करता है उसको केवलज्ञानकी प्राप्ति अवश्य होती है । जो श्रुतज्ञानसे आपको देखता है वह केवलज्ञानसे मी अवश्य देखता है । शास्त्राभ्यासो जिनपतिनुतिः संगतिः सर्वदायः । सद्वृत्चानां गुणगणकथा दोपवादे च मौनम् ।। सर्वस्यापि प्रियहितवचो भावना चात्मतत्त्वे । संपद्यतां मम भवभवे यावदेतेऽपवर्गः ॥२॥ अन्वयार्थ:--(यावदेतेऽपवर्गः)जबतक मुझे मोक्षकी प्राप्ति हो तबतक (शात्राभ्यासः) भगवान् जिनेन्द्रदेवके कहे हुए शास्त्रोंका अभ्यास सदा बना [१८३] रहे (जिनपनिनुतिः) तबतक में भगवान् जिनेन्द्रदेवके चरणों में नुति-नमस्कार करता हूं (सर्वदा आर्यैः संगतिः ) निरन्तर सज्जनपुरुषोंकी संगति रहो,-व्रती पुरुषोंका समागम होश्रो ( सद्वृत्ताना गुणगणकथा) सम्यक्चारित्रको पालन करनेवालों के गुणका निरतर कथन करता रहूं या श्रेष्ठ व्रतोंके गुणोंकी कथा में ही सदा लीन रह ( दोषवादे च मौनं ) दोषोंके कथन करनेमें मौनको धारण करू (सर्वस्य अपि प्रियहितवचः) सर्वके साथ बोलते हुये मेरे मुखसे प्रिय और हित करनेवाले वचन निकलें (च आत्मतत्त्वे भावना) मेरी भावना सदा यात्म तत्त्रके चितवन करनेमें रहे, हे भगवन् ! इन सब गुणोंकी ( मम ) मुझे ( भव- भवे) भव भवमें (सपद्यता) प्राप्ति हो। जैनमार्गरुचिरन्यमार्गनिवेगता जिनगुणस्तुतौ मतिः । निष्कलंकविमलोक्तिभावनाः संभवन्तु मम जन्मजन्मनि ॥३॥ अन्वयार्थ:- ( मम जन्मजन्मनि ) मुझे जन्म जन्ममें-प्रत्येक पर्याय में (जैनमार्गरुचिः ) जैनधर्ममें रुचि-श्रद्धान होश्रो (अन्यमार्गनिर्वेगता) मिथ्या- मार्गसे उदासीनता होश्रो ( जिनगुणस्तुतौ मतिः) जिनेन्द्रभगवानके गुणों की स्तुति करनेमें बुद्धि होओ (निष्कलकविमलोक्तिभावनाः ) निर्दोष तथा निर्मल तत्त्वों के कथन करनेमें भावना ( संभवन्तु) होओ। गुरुमूले यतिनिचिते चैत्यसिद्धान्तवाधिंसद्धोपे । मम भवतु जन्मजन्मनि सन्यसनसमन्वितं मरणम् ॥ ४ ॥ अन्वयार्थ --हे देव ! ( यतिनिचिते गुरुमूले ) मुनि समुदायसे वेष्टित गुरु के पादमूलमें ( चैत्यसिद्धान्तवार्धिसद्धोपे ) जिनप्रतिमाके समीप, अथवा जहा पर सिद्धान्तरूपी समुद्रके गमीर शब्द हो रहे हों-ऐसे स्थानोंमें ( मम जन्म- जन्मनि ) मेरा भव भवमें (सन्यसनसमन्वित मरण भवतु )सन्यास सहित मरण हो। जन्मजन्मकृतं पापं जन्मकोटिसर्जितम् । जन्ममृत्युजरामूलं हन्यते जिनवंदनात् ॥ ५ ॥ अन्वयार्थ:- (जिनवंदनात् ) भगवान जिनेन्द्रदेवकी बढना करने से (जन्मजन्मकृत पापं ) जन्म जन्ममें-भव भवमें किये हुए पाप ( हन्यते) नष्ट [१८४] हो जाते हैं (जन्ममृत्युजरामूल ) जन्म, मरण और बुढ़ापा जो दुःखों के मूल कारण हैं ऐसे (जन्मकोटिसमार्जित) करोड़ों जन्ममें इकडे किये पाप भगवान् की वदना करने से नष्ट हो जाते हैं। आवाल्याज्जिनदेवदेव भवतः श्रीपादयोः सेवया । सेवासक्तविनेयकल्पलतया कालोधयाबद्गतः ।। न्यां तस्याः फलमर्थये तदधुना प्राणप्रयाणक्षणे । त्वनामप्रतिबद्धवर्णपठने कण्ठोऽस्त्वकुण्ठो मम ॥६॥ गन्वयार्थ:-(जिनदेवदेव ) हे देवाधिदेव-जिनदेव ! ( सेवासक्तविनेयक- न्पलतया) सेवामें मासक्त भव्य जीवोंको भक्तों को कल्पलताके समान (भवत) आपके (श्रीपादयोः ) शोभायुक्त दोनों चरणोंकी ( सेवया) सेवा करते हुये मेरा (आबाल्यात् ) बाल्यावस्थासे लेकर (कालोधयावद्गतः ) आजतक जो काल व्यतीत हुआ है (तदधुना) इसलिये आज (त्वा) मापसे (तस्याः फलं) उस सेवाका यही फल (अर्थये ) चाहता हूँ कि (प्राणप्रयाणक्षणे ) इस मरण के समय-समाधिमरणके समय ( त्वन्नामप्रतिवद्धवर्णपठने ) आपके नाम के अदर पढ़ने में-आपका नामोच्चार करने में (मम कण्ठः ) मेरा कण्ठ (अकु- पटः अस्तु) कुण्ठित मत होओ-रुके नहीं । तवपादौ मम हत्ये मम हृदयं तव पदद्वये लीनम् तिष्ठतु जिनेन्द्र तावद्यावनिर्वाणसंप्राप्तिः ॥ ७ ॥ अन्वयार्थ:--(यावन्निर्वाणसप्राप्तिः) जबतक मोक्षकी प्राप्ति हो (तावत्) तबतक ( जिनेन्द्र ) हे जिनेन्द्र भगवान् ! (तव पादौ मम हृदये) आपके दोनों चरगा कमल मेरे हृदयमें विराजमान रहे ( मम हृदय तव पदद्वये लीन तिष्ठतु) मेरा हृदय आपके दोनों चरण कमलों में तल्लीन बना रहे। एकापि समथयं जिनभक्तिर्दुर्गति निवारयितुम् । पुण्यानि च पूरयितुं दातुं मुक्तिश्रियं कृतिनः ॥ ८॥ अन्वयार्थ:-(इय एकापि जिन भक्तिः) यह एक ही भगवान् जिनेन्द्र- देवकी भक्ति (दुर्गतिं निवारयितुं ) समस्त नरकादि दुर्गतियोंसे बचानेके लिये (च पुण्यानि पूरयितु ) तथा समस्त पुण्योंको पूर्ण करनेके लिये ( कृतनः मुक्ति- [१८५] श्रिय दातु समर्था) कृतकृत्य जीवोंको-भव्य जीवोंको मोक्षरूपी लक्ष्मी देने के लिये समर्थ है। पश्चअरिंजय पञ्चय मदि सायरे जिणे वंदे । पञ्च जसोयरणामे पञ्चय सीमंदरे वंदे ॥९॥ रयणत्तयं च वंदे चब्बीसजिणे च सव्वदा चंदे । पञ्चगुरूणं वंदे चारणचरणं सदा वंदे ॥ १० ॥ अर्थ-ढाई द्वीपमें होनेवाले पञ्चपरमेष्टीको मैं वदना करता हूं लवणसमुद्र और कालोदधि समुद्रमें होनेवाले पाच परमेष्ठियोंको मैं वदना करता हूं, लोको- तर यशको धारण करनेवाले पच परमेष्ठीको मैं वदना करता हूं और मेरुपर होनेवाले पच परमेष्ठीको मैं नमस्कार करता हूँ। मैं रतत्रयको वंदना करता हू, चौवीस तीर्थंकरोंको सदा वंदना करता हूं, पाच परमेष्ठीको वंदना करता हू और चारण ऋद्धिधारी साधुओंको निरन्तर वदना करता हूं। अहमित्यक्षरब्रह्मवाचकं परमेष्ठिनः । सिद्धचक्रस्य सद्धीजं सर्वतः प्रणिदध्महे ॥ ११ ॥ कर्माष्टकविनिर्मुक्तं मोक्षलक्ष्मीनिकेतनम् । सम्यक्त्वादिगुणोपेतं सिद्धचक्रं नमाम्यहम् ।। १२ ।। अन्वयार्थ:--( अहं इति अक्षरब्रह्मवाचक परमेष्ठिनः 'वाचक') 'मह' यह अक्षर-शब्द परमब्रह्मका वाचक है, पंच परमेष्ठीका वाचक है (सिद्ध- चक्रस्य सद्वी) सिद्धचक्रका सर्वोत्तम बीज मत्र है-सिद्धचक्रमंत्रका वीजभूत है (सर्वतः प्रणिदध्महे ) इसलिये मै उसको सदा नमस्कार करता ई-इसलिये मै उस 'अहं' अक्षरको अपने हृदयमें सब ओर से धारण करता हूँ। (कर्माष्टकविनिर्मुक्तं)जो आठ कर्मोंसे रहित हैं (मोक्षलक्ष्मीनिकेतन) मोक्षरूपी लक्ष्मीके स्थान हैं (सम्यक्त्वादिगुणोपेत) सम्यक्त्वादिक गुणों से सुशोभित हैं ऐसे (सिद्धचक्र अह नमामि ) सिद्धचक्रको-समस्त सिद्धसमूहको मैं नमस्कार करता है। आकृष्टिं सुरसंपदां विदधते मुक्तिभियो वश्यताम् । उच्चाटंविपदां चतुर्गतिभुवां विद्वेपमात्मैनसाम् ।। [१६] स्तम्भं दुर्गमनं प्रति प्रयततो मोहस्य सम्मोहनम् । पायात्पचनमस्क्रियाक्षरमयी साराधना देवता ॥ १३ ॥ अन्वयार्थ:--(पचनमस्क्रियाक्षरमयी साराधना देवता-पायात् ) पच- नमस्कार मत्रके अक्षरोंसे बना हुमा नमस्कार मंत्र भाराधन करने योग्य देवता- देव है, वह मेरी रक्षा करो। इस देवताके आराधन करनेसे-पचनमस्कार मत्रका जप करनेसे ( सुरमपदा आकृष्टिं विदधते ) स्वर्गकी सपदाका आकर्षण होता है (मुक्तिश्रियः वश्यता) मोक्षरूपी लक्ष्मी यश हो जाती है ( चतुर्गतिभुवा विपदा उचाट ) चारों गतियों में होनेवाली विपदाओंका उच्चाटन हो जाना है ( आत्मनसा विद्वप ) मात्माके द्वारा होनेवाले पापोंसे विद्वेष हो जाता (दुर्गमन स्तम्भ ) दुर्गतियोंका स्तभन होता है (प्रति प्रयततः मोहस्य सम्मोहन) इस देवताका माराधन करनेवाले पुरुपका मोह स्वयं मूर्छित हो जाता है-इस मत्रके प्रति प्रयत्न करनेवाले पुस्पके मोह का सम्मूर्छन हो जाता है अनन्तानन्नसमारसंततिच्छेदकारणम् । जिनराजपदाम्भोजस्सरणं शरणं मम ॥ १४ ।। अन्वयार्थ:-(जिनराजपदाम्भोजस्मरण) भगवान् जिनेन्द्रदेवके चरण कमलोंका स्मरण करना ( अनन्तानन्तससारसततिच्छेदकारणं ) अनंतानत मसार परम्पराके नाश करनेका कारण है इसीलिये ( मम शरण ) मैं भगवानके उन चरण कमलोंकी शरण लेता ह-वे भगवान्के चरण कमल मुझे शरणरूप हैं । अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम । तस्मात् कारुण्यभावेन रक्ष रक्ष जिनेश्वर ॥ १५ ॥ अन्वयार्थः (अन्यथा शरण नास्ति ) हे प्रभो ! इस ससारमें भापके सिवाय और कोई मेरी शरण-रक्षा करनेवाला नहीं है ( त्वमेव मम शरण ) यही समझकर मैने आपकी शरण ली है-तू ही मुझे शरणरूप है (तस्मात् जिनेश्वर कारुण्यभावेन रक्ष रक्ष) अतएव हे जिनेश्वर भगवान् ! करुणाभावसे मेरी रक्षा करो, रक्षा करो-मसारके दुःखोंसे मुझे बचाइये । नहि त्राता नहि त्राता नहि त्राता जगत्त्रये । वीवरागात्परो देवो न भूतो न भविष्यति ॥ १६ ॥ [१८७] - मे अन्वयार्थ:-(जगत्त्रये नहि त्राता नहि त्राता नहि त्राता) हे प्रभो ! इन तीनों लोकोंमें तुम्हारे सिवाय कोई रक्षा करनेवाला वास्तवमें नही है, नहीं है, नहीं है ( वीतरागात्परः देवः न भूतः न भविष्यात ) और वीतराग परमदेवके सिवाय कोई देव न तो हुआ और न होगा। जिने भक्ति जिने भक्ति जिने भक्ति दिने दिने । मदामेऽस्तु सदामेऽस्तु सदामेऽस्तु भवे भवे ॥ १७ ॥ अन्वयार्थ:-(दिनेदिने जिनेभक्ति: जिनेभक्तिः जिनेक्तिः ) हे भगवन्! प्रतिदिन जिनेन्द्र भगवानमें मेरी भक्ति रहे, रहे, रहे ( भवे भवे सदा मे अस्तु अस्तु मे अस्तु) तथा वही भक्ति भव भव में सदा मुझे प्राप्त हो, प्राप्त हो, प्राप्त हो। याचेहं याचेहं जिन तव चरणारविंदयोभक्तिम् । याचेह याचहं पुनरपि तामेव तामेव ॥ १८ ॥ अन्वयार्थ.-- (जिन) हे जिनेन्द्र भगवन् ( तव चरणारविंदयो भक्ति अह याचे अहं याचे ) आपके दोनों चरणकमलोंकी भक्तिकी मैं याचना करता ह-मै याचना करता हूं (पुन: अपि ) फिर मी (ता एव ता एव ) उसी आपके चरण कमलोंकी भक्तिकी (अह याचे अह याचे ) मैं याचना करता हूं, मै याचना करताहा इसके अनतर कायोत्सर्ग करना चाहिये। आलोचना- इच्छामि भते समाहिभत्तिकाउस्मग्यो कओ तस्सालोचउ । रयणत्तय- परूवपरमप्पज्माणलक्षणं समाहिभत्तीये णिञ्चकालं अंचेमि, पूजेमि, बदामि णममामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ, बोहिलाहो, सुगइगमणं, ममाहि- मरणं, जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं । ! मै समाधिमक्ति कर कायोत्सर्ग करता है तथा उसमें जो दोष लगे हों उनकी आलोचना करना चाहता है। इस समाधिमक्तिमें रत्नत्रय को निरूपण करनेवाले शुद्ध परमात्माके ध्यानस्वरूप शुद्ध प्रात्माकी सदा पर्चा [१८]] - हे भगवन् करता है, पूजा करता ह, वदना करता हू और नमस्कार करता हू। मेरे दुःखों का नाश हो, कर्मोका नाश हो । मुझे रतत्रयकी प्राप्ति हो, शुभगतिकी प्राप्ति हो, समाधिमरणकी प्राप्ति हो और भगवान् जिनेन्द्रदेवके समस्त गुणोंकी प्राप्ति हो। इति समाधिभक्तिः ॥ निर्वाणभक्तिः -आर्या छट:- विबुधपतिखगपनरपतिधनदोरगभूतयक्षपतिमहितम् । अतुलसुखविमलनिरुपम शिवमचलमनामयं संप्राप्तम् ॥ १ ॥ कल्याणेः संस्तोप्ये पश्चभिरनय त्रिलोकपरमगुरुम् । भव्यजनतुष्टिजनने१रवापैः सन्मति भक्त्या ॥२॥ अन्वयार्थ.-(विवुधपति 'विगप नरपति धनदो रंग भूतयक्षपतिमहित) ढवेन्द्र, विद्याधरोंके राजा, चक्रवर्ती, कुवेर, धरणेन्द्र, चमरेन्द्र और यक्षेन्द्रसे पूज्य (अतुल सुखविमल निरुपमशिव,अचल, अनामयं संप्राप्त) अतुल-उपमारहित सुरवरूप, निर्मल,उपमारहित, मोक्षस्वरूप.निश्चल और रोगरहित अवस्थाको प्राप्त (अना') निष्पाप (त्रिलोकपरमगुरु) तीन लोकके परम गुरु ऐसे (सन्मति) महावीर स्वामीकी (भक्त्या) भक्तिपूर्वक (भव्यजनतुष्टि जननैः १२) भन्यजीवोंको मतुष्ट करनेवाले (दुरबाप.१३) अत्यन्त कष्टसे प्राप्त होनेवाले पचमिः कल्याणैः) पाच कल्याणकों के द्वाग (मस्तोष्ये ) स्तुति करता है। १.विबुधा देवाः तेण पतय. इन्द्राः। २.रवे-आकाशे गच्छन्ति इति खगा:-विद्याधराः, तानपाति-रनति इति खगण:-विद्याधरचक्र- वर्तिनः। ३-नरपतयः चक्रवर्तिनः। ४-कुवेराः ५-घरगोन्द्राः ६ अतुल अनुपम सुखं यत्र तत् । ७-विमल विनष्टकममलं ८-अचल-ई नाविक सुखादिस्वरूपरहित । ६-न विद्यते श्रामयो-व्याधियंत्र । १०.अनन्य नि:पापं । ११-सन्मति-अन्तिमतीर्थकरदेव १२-भव्यजनसतोषकरः। १३-महता कण्टेन प्राप्यैः। १४-गर्भावतारजन्माभिषेकनिःक्रमणबानमोक्षलक्षणैः । [१८६]] - गर्भकल्याणक-वर्णन- आषाढसुसितषष्ठयां हस्तोत्तरमध्यमाश्रितेशशिनि । आयातः स्वर्गसुखं भुक्त्वा पुष्पोत्तराधीशः ॥ ३ ॥ सिद्धार्थनृपतितनयो भारतवास्ये विदेहकुण्डपुरे । देव्या प्रियकारिण्यां सुखमासंप्रदय विभुः॥४॥ अन्वयार्थ:-(पुष्पोत्तराधीशः ) सोलहवें स्वर्गमें स्थित पुष्पोत्तर विमान का खामी ( श्री महावीर खामीको जीव ) वहा पर ( स्वर्ग सुखं भुक्त्वा ) स्वर्ग सुखोंको भोगकर ( भारतवास्ये) जम्बूद्वीपके इस भारतक्षेत्रमें स्थित ( विदेह- कुण्डपुरे) विदेहदेशके ( विहारके) अतर्गत कुण्डपुर (कुण्डलपुर ) नामके नगरमें (सुस्वप्नान्सप्रदर्य )रात्रिके पिछले प्रहरके समय सोलह स्वप्न दिखला- कर वह ( विभुः) प्रभु (आषाढसुसितषष्टया ) आषाढ शुक्ला षष्ठीको (हस्तो- त्तरमध्यमाश्रिते शशिनि (हस्त और उत्तरा नक्षत्रके मध्यभागमें चद्रमाके होते हुए ( सिद्धार्थनृपतितनयः ) सिद्धार्थ राजाके पुत्र होकर श्री महावीरस्वामी ( प्रियकारिण्या देव्या पायातः) प्रियकारिणीत्रिशलादेवी रानीके गर्ममें पाये । जन्मकल्याणक-वर्णन- चत्रसितपक्षफाल्गुनि शशांकयोगे दिने त्रयोदश्याम् । जज्ञे स्वोच्चस्थेषु ग्रहेषु सौम्येषु शुभलग्ने ॥ ५ ॥ हस्ताश्रिते शशाके चैत्रज्योतन चतुर्दशीदिवसे | पूर्वाण्हे रत्नघटे विवुधेन्द्राश्चक्रुरभिषेकम् ॥ ६ ॥ अन्वयार्थ:--(चैत्रसितपक्षफाल्गुनि शशाकयोगे त्रयोदश्या दिने ) चैत्र- शुक्ला त्रयोदशीके दिन, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रके ऊपर चन्द्रमा होते हुए और (सौम्येषु ग्रहेषु स्वोच्चस्थेषु शुभलग्ने जज्ञे समस्त सौम्यग्रह अपने उच्च स्थान पर रहते हुए शुभलग्नमें श्री भगवान महावीरस्वामीका जन्म हुआ। (चैत्रज्योत्स्ने चतुर्दशीदिवसे ) चैत्रशुक्ला चतुर्दशी के दिन (हस्ताश्रिते शशाके ) हस्त नक्षत्रपर चन्द्रमाके होते हुये (पूर्वाण्हे ) प्रातःकालमें (रनघटैः) रत्नोंके १०० कलशों द्वारा (विबुधेन्द्राः) इन्द्रोंने (अभिषेक) अमिषेक [१९० (चक्रुः ) किया। दीक्षा कल्याणकका वर्णन- भुक्त्वा कुमारकाले त्रिंशद्वर्षाण्यनंतगुणराशिः। अमरोपनीतभोगान्सहमाभिनिवोधितोन्येयुः ॥ ७ ॥ नानाविधरूपचितां विचित्रकूटोच्छितां मणिविभूषाम् । चन्द्रप्रभाख्यशिविकामारुह्य पुराद्विनिःक्रान्तः ॥ ८ ॥ मार्गशिरकृष्णदशमीहस्तोत्तरमध्यमाश्रिते सोमे । पष्ठेन त्वपराहे भक्तंन जिनः प्रवत्राज ॥९॥ अन्वयार्थ:- (अनतगुणराशिः) अनंतगुणोकी राशि ऐसे वे महावीर स्वामी (कुमारकाले त्रिंशत्वर्षाणि ) कुमारकालके तीसवर्ष तक (अमरोपनीत- भोगान् भुक्त्वा ) देवोंके द्वारा प्राप्त भोगोंको भोगकर ( अन्येद्युः सहसा अमि- निवोधितः ) तीसवर्षके अनतर किसी एकदिन, एकदम, लोकांतिक देवोंके द्वारा प्रतिबोधित किये गये वे जिनराज- (नानाविधरूपचिता) अनेकप्रकारले सजाई गई (विचित्रकूटोच्छिता) अनेक प्रकारके ऊचे कगूरेवाली ( मणिविभूषा ) मणियोंसे शोभायमान ( चढ़- प्रभाख्यशिविका आरुह्य ) ऐसी चन्द्रप्रभा नामकी पालकी में बैठकर (पुरावि- निःक्रान्तः ) नगरसे बाहर गये । ( मार्गशिरकृष्णदशमीहस्तोत्तरमध्यमाश्रिते सोमे ) मार्गशीर्ष कृष्णा दशमी के दिन, हस्त और उत्तरा नक्षत्रके मध्यमें चन्द्रमाके होनेपर सोमवारको (अप- राण्हे) शामके समय (षष्ठेन तु भक्तेन जिनः प्रवबाज ) वेला-दो उपवासकी प्रतिज्ञा लेकर दिगम्बर दीक्षा धारण की । ज्ञान कल्याणक-वर्णन- ग्रामपुरखेटकटमटवघोषाकरान्प्रविजहार । उग्रस्तपोविधानादशवर्षाण्यमरपूज्यः ॥ १० ॥ १-सुमेरु पर्वतके पाडुकवनमें पाडुकशिलापर पूर्व दिशामें भगवानका मुखकर क्षीरसागरसे हार्थों हाथ जल लाकर अभिषेक किया था। कलशका परिमाण-८ योजन लम्बा, ४ योजन पेट-अन्दरकी गोलाई १ योजन मुख । सौधर्म और ईशान इन्द्र अभिषेक करते हैं । सनत्कुमार और महेन्द्र चमर टोरते हैं। [११] ऋजुकूलायास्तीरे शाल्मद्रुमसंश्रिते शिलापट्टे । अपराहे षष्ठेनास्थितस्य खलु ब्रूमिकाग्रामे ॥ ११ ॥ वैसाखसितदशम्यां हस्तोचरमध्यमाषिते चन्द्र । क्षपकोण्यारूढस्योत्पन्न केवलज्ञानम् ॥ १२ ॥ अन्वयार्थः-(अमरपूज्यः ) टेवोंके द्वारा पूज्य ऐसे भगवान् महावीरखामी ने( द्वादशवर्षाणि ) वारहवर्ष पर्यंत (उप्रैः तपोविधान. ) घोर तपश्चरण करते हुये (ग्रामपुरखेटकर्वटमटॅबघोषाकरान् ) गाव,' नगर, खेट, कर्वट, मटंब, घोष, आकार, आदि स्थानों में प्रविजहार ) विहार किया-तदनंतर (ऋजु- कूलायाः तीरे ) ऋजुकूला नदीके किनारे (जूमिकाग्रामे ) जृमिका नामके गाव में (शाल्मगुमसंश्रिते शिलापट्टे) शालवृक्षोंसे घिरी हुई या शालवृक्षके नीचे एक शिलाके ऊपर (षष्ठेनास्थितस्य खलु ) दो उपवासकी प्रतिज्ञा लेकर खड़े हुए। (अपराण्हे ) उसीदिन शामके समय (क्षपकश्रेण्यारूढस्य ) क्षपकश्रेणी के ऊपर आरोहणकरके (वैसाखसितदशम्यां हस्तोत्तरमध्यमाश्रिते चन्द्रे) वैसाख शुक्ला दशमीके दिन हस्त और उत्तरा नक्षत्रके मध्यमें चन्द्रमा रहते हुये (केवल- ज्ञान उत्पन्न ) केवलज्ञान उत्पन्न दुधा। अथ भगवान् संप्रापदिव्यं वैभारपर्वत रम्यम् । चातुर्वर्ण्यसुसंघस्तत्राभृगौतमप्रभृति ॥ १३ ॥ छत्राशोको घोणं सिंहासनदुंदुभी कुसुमवृष्टिम् । वरचामरभामंडलदिव्यान्यन्यानि च वापत् ॥ १४ , जिसके चारो ओर वाड हो-गाव । २-जिसके कोटमें चार दरवाजे हो-पुर-नगर । ३-जो नदी और पर्वतके वीचमें हो-खेट । ४-निसके चारों और पर्वत हो-कर्वट । ५-जिसमें ५०० गाव लगते हो-मटव । ६-छोटी झोपडीवाले स्थान-घोष। ७-जिसमें खानि हो -~-श्राकार । ( श्राकरो नवसारिकापत्रादिविशिष्टवस्तृत्पत्तिस्थानं ) ८-श्रादिशे-पत्तन-जहा रल उत्पन हो। द्रोणमुख-समुद्रके किनारे। संवाइन-पर्वतके ऊपर। [१२] - दशविधमनगाराणामेकादशधोत्तरं तथा धर्मम् । देशयमानो व्यहरस्त्रिंशद्रोण्यथ जिनेन्द्रः ।। १५ ।। अन्वयार्थ:-(भय ) तदनतर ( भगवान् ) वे भगवान् (दिव्य रम्य वैभारपर्वत सप्रापत्) दिव्य और मनोहर वैभारपर्वत पर जा विराजमान हुये (तत्र गौतम प्रभृति चातुर्वर्ण्य'सुसघः' अभूत् ) वहा पर गौतम गण धरको लेकर रतत्रयसे सुशोभित चारों प्रकारका सघ था। छत्राशोको) भगवान्के समवशरणमें दिव्य छत्र, अशोकवृक्ष (घोप) दिव्यध्वनि सिंहासनदुंदुमी ) सिंहासन, दुदुमि (कुसुमवृष्टिं ) पुष्पवृष्टि (वर- चामरभामडलदिव्यानि ) उत्तम ६४ चमर और भामडल ये पाठ प्रातिहार्य (च अन्यानि अवापत् ) और अनेक प्रकारकी विभूति थी । अनेक प्रकारके अति- शयोंसे शोभायमान थे। (अथ जिनेन्द्रः) अनन्तर भगवानने (त्रिंशत्वर्षाणि व्यहरन् ) तीस वर्ष तक विहार करते हुये (अनगाराणा दशविध" तथा उत्तर एकादशधा" धर्म देशयमानः ) मुनियोके उत्तमक्षमादि दश धर्मोका तथा श्रावकोंकी ग्यारह प्रतिमाओं खरूप धर्मका उपदेश दिया। पद्मवनदीर्घिकाकुलविविधद्रुमखंडमडिते रम्ये । पावानगरोद्याने व्युत्सर्गेण स्थितः मुनिः ॥ १६ ॥ कार्तिककृष्णस्यान्ते खातावृक्षे निहत्य कर्मरजः । अवशेषं संप्रापदव्यजरामरमक्षय सौख्यम् ॥१७॥ अन्वयार्थः-(सः मुनिः) अतमें वे भगवान् (पवनदीर्घिकाकुल विवि- धद्रुमखडमंडिते) कमलोंके समूहसे शोगित ऐसे पानीके तालाबसे तथा अनेक L- १-चातुर्वर्ण्यः ऋष्यायिकाश्रावकश्राविकालक्षण. सचासौ मघश्च । २-शोभनो रत्नत्रयोपेतः संघ: समुदायः सुसघः। ३ गन्यूतिशनचतुष्टयसुभिक्षतागगनगमनाटीनि। ४ मुनीनाम् । ५-दशविधमुत्तमक्षमादिदशप्रकार । ६-इतर सागराणा धर्मम् । ७-एकादशधा दर्शनव्रताोकादशप्रकार । [१९३] प्रकारके वृक्षोंके समूहसे सुशोमित (रम्ये ) अत्यन्त मनोहर ( पावानगरोद्याने) पापापुरीके उद्यानमें (व्युत्सर्गेण स्थितः ) कायोत्सर्ग से विराजमान हुये। वे मुनि (अवशेष कर्मरजः निहत्य )बाकीके चार अघातिया कर्मोका नाश करके (कार्तिककृष्णस्यान्ते ) कार्तिक कृष्णा अमावस्याके दिन (स्वातावृक्षे) स्वाति नक्षत्रमें (व्यजरामरं ) जरा-मरणसे रहित-अजर अमर (अक्षय ) अवि- नाशी ( सौख्य ) सुखको ( सप्रापत् ) प्राप्त हुये-मोक्षमें चले गये । 'परिनिर्वृतं जिनेद्रं ज्ञात्वा विबुधा ह्यथाशु चागम्य । देवतरुरक्तचन्दनकालागुरुसुरमिगोशी ः ॥१८॥ अनीन्दाज्जिनदेहं मुकुटानलसुरमिधूपवरमाल्यैः । अभ्यर्च्य गणधरानपि गता दिव्यं खं च वनभवते ॥ १९ ॥ अन्वयार्थ:-- ( अथ जिने द्र परिनिर्वृतं ज्ञात्वा ) तदनतर जिनेन्द्र भग- वान् महावीरस्वामी मोक्ष पधारे ऐसा जानकर (विबुधाः ) इन्द्रादिक देव (आशु च) शीघ्र ही (आगत्य ) आकर ( देवतरु रक्तचन्दनकोलागुरुसुरभिगो- शीर्षेः ) देवदारु, रक्तचन्दन-लालचन्दन, कृष्णागुरु और सुगधित गोशीर्ष नाम के चन्दनसे (अग्नीन्द्रात ) अग्निकुमार देवोंके इन्द्रके ( मुकुटानलसुरमिधूप- वरमाल्यैः ) मुकुटसे निकली हुई अग्निसे तथा सुगंधित धूप और उत्तम मालाओं से ( जिनदेह ) भगवान् के शरीरका अग्नि सस्कार करके ( गणधरान् अपि अभ्यर्च्य ) गणधरोकी पूजा करके (दिव ख" च वनभवते गताः) कल्प- वासीदेव स्वर्गको, ज्योतिषीदेव आकाशमें स्थित विमानोंमें, व्यन्तर तथा भवन- वासीदेव क्रमसे देवारण्य आदि वनको तथा पाताल लोकको चले गये। अठारहवें श्लोकमें 'भाशु' के स्थानमें 'शुचा' मी पाठ है । उसका अर्थ १-परिनिर्वृत्ते रत्यपि पाठः। २-शुचा-शोकन इत्यपि पाठः। ३-देवतरु-देवदारु। ४-दिवं-स्वर्ग। ५-ख-आकाशवर्तिनं स्वविमान । ६-देवारण्य, भूतारण्ययं वनं । ७.श्राशु-शीघ्र । [१९] यह है कि भगवानके मोक्ष जानेपर देवोंकों शोक हुआ। 'अब भगवान मोक्ष चले गये-मब उनके दर्शन नहीं होंगे' यही उनके लिये शोकका कारण था। ऐसा शोक करते हुये ही वे देव आये। इत्येवं भगवति वर्धमानचन्द्रे यः स्तोत्रं पठति सुसंध्ययोद्रयोहिं । सोऽअन्तं परमसुखं नृदेवलोके भुक्त्वान्ते शिवपदमक्षयं प्रयाति ॥ २० ॥ अन्वयार्थ:- (इति एव ) इसप्रकार ( इति एव ) इसप्रकार (य:) जो भव्यजीव (हि) निश्चय से (द्वयोः सुमध्ययोः) दोनों सन्ध्याकालोंमें-प्रातः काल, सयंकाल ( भगवति वर्धमानचन्द्रे ) भगवान् वर्धमानस्वामी का (स्तोत्र पठति ) स्तोत्र पढ़ता है (सः) वह (नृदेवलोके) मनुष्यलोक और देवलोकके (परमसुख भुक्त्वा) उत्कृष्ट सुखोंको भोगकर ( अते ) अन्तमे (अनन्त अक्षय शिवपद प्रयाति) अनन्तरूप, कमी भी नाश नही होनेवाले मोक्षपदको प्राप्त करता है । यत्राहतां गणभृतां श्रुतपारगाणां, निर्वाणभूमिरिह भारतबर्षजानाम् । नामय शुद्धमनसा क्रियया वचोमिः, सस्तोतुमुद्यतमतिः परिणौमि भक्त्या ॥२१॥ अन्वयार्थ:- (इह ) इस जम्बूद्वीपके ( भारत'वर्षजाना ) भरतक्षेत्र में उत्पन्न हुये ( महता ) अहंत-२४ तीर्थंकरोंकी (श्रुतपारगाणा' गणमृता ) श्रुतज्ञानमें पारंगत ऐसे गणधरदेवों की अथवा गणधरदेव और श्रुतकेवली पाटि मुनियोंकी ( यत्र ) जहा जहां (निर्वाणभूमिः) निर्वाणभूमि है ( ता) उन सबकी (अद्य) आज ( सस्तोतु उद्यतमतिः ) स्तुति करनेके लिये उद्यत हुआ मै (शुद्धमनसा क्रियया वचोमिः भक्त्या परिणोमि ) शुद्ध मनसे, शरीरकी क्रिया १-भरतस्येद भारतं तच्च तद्वर्षे च क्षेत्रं च तत्र जाताना । २-चतुर्विंशतितीर्थकराणाम्। ३-श्रुतस्य द्वादशागादेः पारं पर्यंत गतवता। ४मागधर देवाना। ५-परि-समंतालौति। [१५] से शुद्ध वचनसे भक्ति पूर्वक नमस्कार करता हू। कैलाशशैलशिखरे परिनिर्वृतोऽसौ शैलेशिभावमुपपद्य वृषो महात्मा ।। चंपापुरे च वसुपूज्यसुतः सुधीमान् । सिद्धि परामुपगतो गतरागवधः ॥ २२ ॥ अन्वयार्थ:-- (असौ महात्मा वृषः) वे महात्मा वृषभदेव (शैलेशि- भाव') अठारह हजार शीलोंके मेदोंके स्वामित्वको (उपपद्य) प्राप्त होकर (कैलाशशैलशिखरे परिनिर्वृतः ) कैलाश पर्वतके शिखर परसे मोक्ष पधारे (च) तथा (गतरागवंधः) रागबधसे रहित ( सुधीमान् ) बुद्धिमान् (वसुपूज्यसुतः) वसुपूज्य राजाके पुत्र ऐसे वासुपूज्य जिनराज (चम्पापुरे ) चम्पापुरसे (परा सिद्धिं उपगतः५) उत्कृष्ट सिद्धिको प्राप्त हुये-मोक्ष पधारे। यत्प्रार्थ्यते शिवमय विबुधेश्वराद्यैः । पाखंडिमिश्च परमार्थगवेपशीलः॥ नष्टाष्टकर्मसमये तदरिष्टनेमिः । संप्राप्तवान क्षितिधरे बृहदुर्जयन्ते ॥ २३ ॥ अन्वयार्थ :- ( यत् अय शिवः ) जिस मोक्षकी ( विबुधेश्वराये.) इन्द्रा- दिकदेव (च) और ( परमार्थगवेषशीलैः ) परमार्थको खोजनेवाले (पाखंडिमिः) पाखंडी लोग मी (प्रार्थ्यते ) प्रार्थना-इच्छा करते हैं (तत्) उस मोक्षको (अरिष्टनेमिः ) श्री अरिष्टनेमि भगवान् २२ वे तीर्थकरने (नाष्टकर्मसमये) पाठों कर्मोको नाश करनेके समयमें ही (बृहत् ऊर्जयन्ते निनिधरे) महा ऊर्ज- यन्त पर्वतसे-गिरनारसे (संप्राप्तवान् ) प्राप्त किया। पावापुरस्य बहिरुनतभूमिदेशे। पद्मोत्पलाकुलवतां सरसां हि मध्ये ।। श्रीवर्द्धमानजिनदेव इति प्रतीतो। निर्वाणमाप भगवान्प्रविधूतपाप्मा ॥ २४ ॥ १-शीलाना समूहः शीलं तस्येशिमाव प्रभुत्व -शोभना धी: केवलज्ञानं तद्वान् । ३-सकलकर्मविप्रमोदलक्षणा । ४-मुक्ति । ५-प्राप्तः । [१९६] अन्वयार्थ:-( पावापुरस्य वहिः ) पावापुर नगरके बाहर ( पद्मोपलात्कु- लवता' सरसा हि मध्ये ) चन्द्रविकासी और सूर्यविकासी कमलोंसे भरे हुए तालाब के मध्यमें ( उन्नतभूमिदेशे ) ऊचे टीले परसे (प्रविधूतपाप्मा) समस्त पापों के नाश करनेवाले ( भगवान् ) भगवान् (श्रीवर्द्धमान जिनदेव इति प्रतीतः ) श्री वर्द्धमानखामी जिनदेव नाम से प्रसिद्ध (निर्वाण आप' ) निर्वाणको प्राप्त हुये। शेपास्तु ते जिनवरा जितमोहमल्ला । ज्ञानार्कभूरिकिरणरवभास्य लोकान् ।। स्थानं परं निरवधारितसौख्यनिष्ठं । सम्मेदपर्वततले समवापुरीशाः ॥ २५ ॥ अन्वयार्थः-(जितमोहमल्लाः) मोहरूपी मल्लको जीतनेवाले (शेपाः तु ते जिनवराः) ऐसे बाकीके वे बीस तीर्थंकर जिनदेव ( ज्ञानार्कभूरिकिरणः) केवलज्ञान रूपी मूर्यकी अनेक किरणोंसे ( लोकान् अवभास्य ) तीनों लोकोंको प्रकाशित करते हुये ( सम्मेदपर्वततले 3 ) सम्मेद शिखर पर्वतके ऊपरके भाग से (निरवधारित सौख्यनिष्ठं) जिसके सुखकी कोई सीमा नहीं है-अनन्तानंत - सुखवाले (परं स्थानं ) परम स्थान-मोक्ष स्थानको (ईशाः) वे प्रभु ( सम- वापुः ) प्राप्त हुये। आद्यश्चतुर्दशदिनविनिवृत्तयोगः । पष्ठेन निष्ठितकृतिर्जिनवर्द्धमानः ।। शेपार्विभूतधनकर्मनिबद्धपाशाः। मासेन ते यतिवरास्त्वभवन्वियोगाः ॥ २६ ॥ अन्वयार्थ:-- (आद्यः) पहले-आदिनाथ भगवानने ( चतुर्दशदिनैः) प्रायुके १४ दिन बाकी रह जाने पर ( विनिवृत्तयोगः ) योगनिरोध किया १-पद्मोत्पलाकुलवता इति च क्वचित्यपाठः। २-श्राप-प्राप्तवान् । ३-सम्मेदपर्वतोपरितनमागे। ४-निरवधारिता इयत्तावधारणानिष्क्राता सौख्यस्य निष्ठा परमप्रकर्षों यत्र । ५-प्राप्तवन्तः। ६-विनष्टद्रव्यमनोवाक्कायव्यापारः । [१९७] (जिनवर्द्धमानः) श्री जिनेन्द्र वर्द्धमान स्वामीने (षष्ठेन' ) दो दिन बाकी रह जानेपर (निष्टिंत कृतिः ) योग निरोध किया ( विधूतधनकर्मनिवद्धपाशाः) आठ कर्मोकी पाश- जालको नष्ट करनेवाले ( ते शेषाः यतिवराः तु) ऐसे उन बाकी तीर्थंकरोंने ( मासेन ) एक मास श्रायु वाकी रहनेपर ( वियोगा: अभवन् ) योगनिरोध किया । माल्यानि वास्तुतिमयैः कुसुमैः सुदृब्धा- न्यादाय मानसकररमितः किरंतः। पर्यम आदृतियुता भगवन्निषद्याः, संप्रार्थिता वयनिमे परमां गति ताः ॥ २७ ॥ अन्वयार्थ:-(वास्तुतिमयैः कुसुमयैः सुदृब्धानि माल्यानि ) वचनोंके द्वारा होनेवाली स्तुतिरूपी पुष्पोंसे गूथी हुई मालाओंको ( आदाय ) लेकर (ताः भगवन्निषद्याः) भगवानकी निर्वाण भूमियोंके (अमित:") चारों ओर (मान- सकरैः किरंतः६ ) मनरूपी हाथोंसे उन मालाओंको चढ़ाते हुये (आनियुताः इमे वय ) आदरके साथ (पर्येम') उन निर्वाण भूमियोंकी परिक्रमा करते हैं और (परमा गति सप्रार्थिता) हमको परमगति-मोक्षगति प्राप्त हो-ऐसी प्रार्थना करते हैं। तीर्थंकरोंकी निर्वाणभूमियोंके सिवाय अन्य मुनियोंकी निर्वाण भूमियोंकी स्तुति- शत्रुञ्जये नगवरे दमितारिपक्षाः । पंडोः सुताः परमनिवृतिमभ्युपेताः ।। तुंग्यां तु सङ्गरहितो बलभद्रनामा । नद्यास्तटे जिनरिपुश्च सुवर्णभद्रः॥ २८ ॥ १-षष्ठेन-टिनद्वयेन परिसंख्याते श्रायुषि सति । २-निष्ठिता विनष्टा कृतिः द्रव्यमनोवाक्कायक्रिया यस्यासौ । ३-वियोगा विगतद्रव्यमनोवाक्कायव्यापाराः। ४-भगवता तीर्थङ्कराणा निषद्याः तीर्थस्थानानि । ५-अभितः-समन्ततः । ६-किरन्त:, क्षिपन्तः । ७ इमे स्तोतारो वयं । ८-पर्येम-प्रदक्षिणीकुर्मः। [१९८] द्रोणीमति प्रबलकुडलमेंदूके च । वैभारपर्वततले वरसिद्धकूटे ॥ ऋष्यद्रिके च विपुलाद्रिवलाहके च । विध्ये च पौदनपुरे वृपढीपके च ॥ २६ ॥ मह्याचले च हिमवत्यपि सुप्रतिष्ठे । दडात्मके गजपथे पृथुसारयप्टौ ।। ये साधवो हतमलाः सुगतिं प्रयाताः । स्थानानि तानि जगति प्रथितान्यभूवनि ।। ३० ॥ अन्वयार्थ:- (दमतारिपक्षाः ) कर्मरूपी शत्रुओंको नाश करने गले ( पडोः सुताः)पंडु राजाके पुत्र युधिष्ठर, मीम, अर्जुन ये तीनों भाई (नग्गरे शत्रुजये ) पवित्र शत्रुजय पर्वतसे ( परनिर्वृति अभ्युयेताः ) परम मुक्तिको पधारे। (संगरहितः बलभद्रनामा तु) समस्त परिग्रहों से रहित बलदेव (तुग्या) तुगीगिरी से मोक्ष पधारे, ( च जितरिपुः सुवर्णभद्रः नद्याः तटे) और कर्मरूपी गत्रुओंको जीतनेवाले सुवर्णभद्र नदी के किनारे से-पावागिर पर्वतके पास चलना नदीके किनारसे मोक्ष पधारे। (द्रौणमति ) द्रोणागिर, (च प्रबलकुण्डलमेंढ़के ) उत्तम कुण्डलपर्वत, मेटगिर पर्वत (मुक्तागिर)(वैभारपर्वततले ) वैभारपर्वत, (वरसिद्धकूटे) उत्तम सिद्धवरकूट (च ऋष्याद्रिके) तथा ऋष्याद्रि, ( च विपुलाठिवलाहके) विपु- लाचल, वलाहक, ( च विध्ये ) विध्धपर्वत (पौदनपुरे) पोदनपुर ( च वृष- दीपके )वृपदीपक, (सध्याचले )सह्याद्रि (च हिमवति ) हिमवान् ( अपि सुप्र- तिष्ठे ) सुप्रतिष्ठ (दडात्मके) दंडात्मक ( गजपथे ) गजपथ (पृथुसारयष्टी) पृथुसारयष्टि आदि जिन जिन पर्वतों परसे (ये हतमलाः साधवः) जो कर्ममल- कलकको नाशकरके मुनिराज ( सुगति प्रयाताः) मोक्ष पधारे है ( जगति) मंसारमें (तानि स्थानानि प्रथितानि अभूवन् ) वे सब स्थान प्रसिद्ध हो गये हैं। इक्षोर्विकारसपृक्तगुणेन लोके । पिष्टोऽधिकं मधुरतामुपयाति यद्वत् ॥ ततश्च पुण्यपुरुपैरुपितानि नित्यं । स्थानानि तानि जगतामिह पावनानि ।। ३१ ।। [१९१] अन्वयार्थ:-- ( यद्वत् ) जिसप्रकार (लोके ) ससारम (इक्षोविकाररस- पृक्तगुणेनपिष्ट:) ईखके रससे उत्पन्न होनेवाले गुड़के रसमें गुदा हुआ पाटा (अधिक मधुरता याति ) अधिक मीठा हो जाता है ( च तद्वत् ) तथा उसी प्रकार (नित्यं ) सदा ( पुण्यपुरुपैः उपितानि तानि स्थानानि ) पुण्यपुरुषोके द्वारा-तीर्थंकर, गणधर, सामान्य मुनियो द्वारा सेवन किये गये वे स्थान (इह) लोकमें (जगा ) संसारके प्राणियों को ( पावनानि ) पवित्र करनेवाले हो जाते हैं। इत्थहतां शमवतां च महामुनीनां, प्रोक्ता मयाऽत्र परिनिर्वृतिभ्रमिदेशाः । तेमे जिना जितमया मुनयश्च शांताः, दिश्यासुराशु सुगति निरवद्यसौख्याम् ।। ३२ ॥ अन्वयार्थ:- (इति ) इसप्रकार (मया) मैंने ( अत्र ) यहा (महता) भगवान तीर्थंकर परमदेवकी (शमवता ) अत्यन्त शान्तता को धारण करनेवाले सामान्य मुनियोंकी (च महामुनीना ) और महामुनि गणधरदेवोंकी जो ( परि- निवृतिभूमिदेशाः ) निर्वाणभूमिया (प्रोक्ता) बतलाई हैं (त) वे सब निर्वाणभूमिया ( जितभयाः शाता: जिनाः च मुनयः) ससारके समस्त भयोंसे रहित, अत्यन्त शांत ऐसे वे सब तीर्थकर परमदेव गणधर केवली और सामान्य केवली (मे) मुझे (आशु ) शीघ्र ही ( निरवद्यसौख्या) सब तरहकी बाधाओंसे रहित सुख- वाली (सुगति) शुभगति-मोक्षको (टिश्यासुः) देवे । इसके अनन्तर कायोत्सर्ग करना वाहिये। आलोचना-- इच्छामि भंते । परिणिचाणभत्ति काउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउ । इमम्मि अवसप्पिणीये चउत्थसमयस्स पच्छिमे भाए। आउद्यमासहीणे वासचउक्कम्मि सेसकाम्मि | पावाये णयरीए कत्तियमासस्स किएहचउद- सिए रचीए सादीये णक्खने पच्चूसे भयवदो महदि महावीरो चड्डमाणो सिद्धि गदो। तिसुवि लोएसु भवणवासियवाणवितरजोयिसियकप्पवासि- यत्ति चउबिहा देवा सपरिवारा दिव्वेण गंधेण, दिब्वेण पुप्फेण, दिव्वेण [२००] . धूवेण, दिव्वेण चुण्णेण, दिव्वेण वासण, दिव्वेण रहाणेण. णिचकालं अच्चतिः पूजति वंदंति, णमसंति. परिणिबाण, महाकल्लाणपुज्जं करंति । अहमिव इह संतो तत्थ संताइयं णिचकाल अंचेमि, पूजेमि, वंदामि, णमं मामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खओः बोहिलाओ, सुगइगमणं, समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं। अर्थ-हे भगवन् । मै निर्वाण भक्ति कर कायोत्सर्ग करता हू उसमें जो दोष लगे हों उनकी आलोचना करना चाहता हू । इस अवसर्पिणीवालके चौथे समयके पिछले भागमें जव तीन वर्ष साड़े आठ महीने कम थे, तव पात्रापुर नगर मे कार्तिक कृष्णा चतुर्दशीकी रात्रिके पिछले भागमे प्रातःकाल खाति नक्षत्र में भगवान् महति महावीर वर्द्धमानखामी मोक्ष पधारे थे। उस समय तीनों लोकों में निवास करनेवाले भवनवासी, व्यतर, ज्योतष्क और कल्पवासी ये चारों प्रकार के देव अपने अपने परिवार सहित आये थे और वे दिव्य गध, दिव्य फूल, दिव्य धूप, दिव्य सुगंध, दिव्य वस्त्र और अमिपेकसे सुसज्जित होकर सदा अर्चा करते थे, पूजा करते थे, वंदना करते थे,नमस्कार करते थे, और निर्वाण कल्या- -णकी पूजा करते थे। मै मी वैसा ही होकर सदा अर्चा करता है, पूजा करता है, वदना करता हू और नमस्कार करता हूँ। मेरे दुःखोंका नाश हो, कोंका नाश हो, मुझे रत्नत्रयकी प्राप्ति हो, शुभगतिकी प्राप्ति हो, समाधिमरण की प्राप्ति हो और भगवान् जिनेन्द्रदेव के समस्त गुण की प्राप्ति हो। इति निर्वाणभक्ति। अथ क्षेपकश्लोकानि। कैलासाद्रौ मुनीद्रः पुरुरपदुरितो मुक्तिमाप प्रणतः ।। चंपायां वासु पूज्यस्त्रिदशपतिनुतो नेमिरप्यूर्जयते । पावायां वर्धमानस्त्रिभुवनगुरवों विंशतिस्तीर्थनाथाः।। सम्मेदाग्रे प्रजग्मुर्ददत विनमतां निर्वृति नो जिनद्राः॥ ॥१॥ गोर्गजोश्वःकपिः कोकासरोजः स्वस्तिकः शशी । मकरः श्रीयुतो [२०१] वृक्षो गंडो महिषसूकरौ ॥ २॥ सेधा वज्रमृगच्छागाः पाठीनः कलश- स्तथा ॥ कच्छपश्चोत्पलं शखो नागराजश्च केसरी ॥ ४॥ शांतिकुन्थ्थर कौरव्या यादवो नेमिसुव्रतौ । उग्रनाथौ पार्श्ववीरौ शेषा इक्ष्वाकुवं शजाः ॥५॥ निर्वाणभक्तिः[प्राकृत] अहावयमि उसहो चंपाये वासुपूज्यजिणणाहो । उज्जते णेमिजिणी पावाए णिव्वुदो महावीरो ॥ १ ॥ वीसं तु जिणवरिंदा अमरामुरवंदिदा धुदकिलेसा । मम्मेदे गिरिसिहरे णिवाणगया णमो तेसि ॥२॥ सत्तेव य बलभद्दा जदुवरिंदाण अडकोडीओ गजपथे गिरिसिहरे णिव्वाणगया णमो तेसिं ।। ३ ।। बरदत्तो य वरगो सायरदत्तो य तारवरणयरे । आहु- द्वयकोडीओ णिवाणगया णमो तेसि ॥४॥णेमिसामि पज्जुण्णो संयु- कुमारो तहेव अणिरुद्धो । वाहत्तरकोडीओ उज्जन्ते सत्तसया सिद्धा॥५॥ रामसुआ वेणि जणा लाडणरिंदाण पञ्चकोडीओ। पावागिरिवरसिहरे णिव्वाणगया णमो तेसिं ॥६॥ पंडुसुआ तिण्णि जणा दविडणरिंदाण अहकोडिओ ।। सेतुजयगिरिसिहरे णिवाणगया णमो तेसि ॥ ७॥ राम- हणूसुग्गीवो गवयगवक्खो य णीलमहणीला । णवणवदी कोडीओ तुङ्गी- गिरिणिब्बुदे वंदे ।। ॥ गाणंगकुमारा कोडीपञ्चद्धमुणिवरा सहिया । सुवण्णवरगिरिसिहरे णिवाणगया णमो तेसिं ॥९॥ दहमुहरायम्स सुआ कोडी पञ्चमुणिवरे सहिया । रेवाउहयतडग्गे णिव्याणगया णमो तेसि ॥१०॥ रेवाणइए तीरे पच्छिमभायम्मि सिद्धवरकूटे । दो चक्की दहकप्पे आहुठयकोडि णिचुदे वंदे ॥११ ।। वडवाणीवरणयरे दक्खिण- भायम्मि चूलगिरिसिंहरे । इदजियकुम्भकण्णो णिव्वाणगया णमो तेमि ॥ १२ ॥ पावागिरिवरसिहरे सुवण्णभद्दाइमुणिवरा चउरो। चलणाणईत- डग्गे णिव्वाणगया णमो तेसि ।। १३ ।। फलहोडीवरगामे पन्छिमभायमि दोणगिरिमिहरे । गुरुद गाइमुणिंदा णिव्वाणगया णमो तेसिं ॥ १४ ।। [२०२] णायकुमार मुणिंदो वालि महावालि चेव अज्झया ।। अहावयगिरिसिहिरे णिवाणगया णमो तेसि ॥ १५॥ अच्चलपुरवरणयरे ईसाणभाये मेढ- गिरिसिहरे आहठयकोडीओ णिव्वाणगया णमो तेसि ॥ १६ ॥ वंसत्थ- लवरणियडे पच्छिमभायम्मि कुंथुगिरिसिहिरे ॥ कुलदेसभूसणमुणी णिव्वा- णगया णमो तेर्सि ॥ १७ ॥ जसहररायस्प सुता पञ्चसयाइ कलिंगदेस- म्मि । कोडिसिलाकोडिमुणी णिव्वाणगया णमो तेसिं ॥ १८ ॥ पासस्स ममवसरणे सहिया वरदत्तमुणिवरा पञ्च ॥ रिस्सिदे गिरिसिहरे णिव्वा- गया णमो तेसिं। १६ ।। पासं तह अहिणंदण णायद्दहि मंगलाउरे वदे । अस्सारम्मे पट्टणि मुणिसुन्वओ तहेव वंदामि ॥ २० ॥ बाहूबलि तह वंदामि पोदनपुरहत्थिनापुरे वदे । संती कुन्थुव अरिहो वाराणसिए सुपास पासं च ।। २१ ।। महुराये अहिछित्ते वीर पासं तहेव चंदामि ।। जंबुमु- जिंदो वंदे णिब्बुइपरतोवि जलवणगहणे ॥ २२ ॥ पञ्चकल्लाणठाणइ जाणवि संजादमच्चलोयमि ।। मणवयणकायसुद्धी सब्वे सिरसा णमसामि ॥ २३ ॥ अग्गलदेव वंदमि वरणयरे णिवरकुण्डली वंवे ॥ पास सिवपुरि चंदमि लोहागिरिसंखदीवम्मि ॥ २४ ॥ गोमटदेवं वदमि पञ्चसयं धणु- हेदेहउच्च । देवा कुति बुट्टी केसरकुसुमाण तम्स उवरिम्मि ॥ २५ ॥ णिवाण ठाण जाणिवि अइसयठाणाणि अइसये सहिया । संजाद मिच्च. लोए सव्वे सिरसा णमंसामि ॥ २६ ॥ जो जण पढइ तियाल णिव्वुइक- डपि भावसुद्धीए । भुंजदि णरसुरसुक्ख पच्छा सो लहइ णियाणं ॥२७॥ श्रीमच्चद्रगुहावराक्षरशिला वस्त्रावतारं सदा । अचें चारणपादुकां चण- गुहे सर्वामरैरचितां । भाखल्लक्षणपक्ति निर्वृतिपथं विंदुच धर्म शिला, मम्यग्ज्ञानशिलां च नेमिनिलयं वंदे सशृंगत्रयम् ॥ २८ ॥ समवसरणमान योजनं द्वादशादि । जिनपनिययावद्योजनार्वार्द्धहानिः । कथयति जिन- पाचे योजनेक सपाद । निगदितजिन वीरे योजनैकं प्रमाणम् ॥ २९ ॥ नाभेयस्य शतानि पञ्च धनुपां मानं पर कीर्तितम् । सद्भिस्तीर्थकराष्टकस्य निपुणैः पञ्चाशदून हि तत । पश्चानां च दशोनक मुवि भवेत्पंचोनक चाष्टके । हस्ताः स्युनव सप्त चान्त्य जिनयोर्येषां नु तान्नौम्यहं ॥ ३० ॥ [२०३] श्रीचंद्रप्रभेनाथपुष्पदशनौ कुदावदातच्छवी ॥ रक्ताम्भोजपलाशवर्णवपुषी पद्मप्रमद्वादशौ॥ कृष्णौ सुव्रतयादवौ च हरिती पार्वः सुपार्श्वश्च वै ।। शेषाः संतु सुवर्णवर्णवपुषो मे पोडशायच्छिदे ॥ ३१ ॥ वासुपूज्यस्तथा मल्लिनेमिः पाऊथ सन्मतिः ।। कुमाराः पञ्च निष्क्रान्ताः पृथिवीपतयः परे॥३२॥ इच्छामि भंते । परिणिव्वाणभक्ति काउस्सग्गो, कओ तस्सालोचेउ, माम्मि अवसप्पिणीये, चउत्थसमयस्स पच्छिमे भाए, आउट्टमासहीणे, वासचउकम्मि सेसकालम्मि, पावाये णयरीए, कत्तियमासस्स किण्हच उद- सिए, रचीए सादीये णक्खने, पच्चूसे, भयवदो महदि महावीरोवड्ढमाणो सिद्धिं गदो । तिसुवि लोएसु, भवणवासियवाणवितरजोयिसियकप्पवासि- यति चउन्विहादेवा सुपरिवारा दिव्वेण गंधेण, दिव्येण पुप्फेण, दिव्वेण धूवेण, दिव्वेण चुरणेण, दिग्वेण वासेण, दिव्वेण एहाणेण, णिच्चकालं अच्चतिः पूजति वंदति, णमसंति, परिणिव्वाण, महाकल्लाणपुज्जं करंति। अहमवि इह संतो तत्थ संताइयं णिच्चकाल अंचेमि, पूजेमि, वंदामि, णमं- सामि, दुक्खरखओ, कम्मक्खओ; वोहिलाओ, सुगड्गमणं, समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्यं । . नन्दीश्वरभक्तिः त्रिदशपतिमुकुटतटगतमणिगणकरनिकरसलिलधाराधौत- क्रमकमलयुगलजिनपतिरुचिरप्रतिबिंबविलयविरहितनिलयान् ॥११॥ निलयानहमिह महसा सहसाप्रणिपतनपूर्वमवनौम्यवनौ । त्रय्या त्रय्या शुद्धया निसर्गशुद्धान्विशुद्धये धनरजसाम् ॥ २॥ अन्वयार्थ - (त्रिदशपतिमुकुटतटगतमणिगणकरनिकरसलिलधाराधौत- क्रमकमलयुगलजिनपतिरुचिरप्रतिविचविलयविरहितनिलयान् ) इन्द्रोंके मुकुटोंके किनारे पर लगे हुये अनेक मणियोंके किरणोंके समूह रूपी जलकी धारासे जिन के दोनों चरण कमल प्रचालित हो रहे हैं ऐसे जिनेन्द्र देवके प्रतिबिंवोंको विनाश [२०४] .

- - रहित-सटाके लिये अनन्तानन्त कालके लिये स्थान देनेवाले (निसर्गशुद्धान्) स्वाभाविक शुद्ध और ( महसा ) तेजकी राशि (इह त्रय्या) ऐसे तीनों लोकोंके (निलयान ) अकृत्रिम चैत्यालयोंको (मह) मे (त्रय्या शुद्धया) मनवचन- कायकी त्रिशुद्धिपूर्वक (घनरजसा विशुद्धये ) महापापोंको नाश करनेके लिये (सहसा) शीघ्र (भवनौ प्रणिपतनपूर्व ) पृथ्वी पर पडकर (अवनौमि ) नम- स्कार करता हूं ।। १-२॥ अधोलोक सबधी भवनवासियों के विमानोंके अकृत्रिमचैत्यालयोंका वर्णन- व्यतरदेवोंके अकृत्रिम-चैत्यालय- त्रिभुवनभृतविमूना संख्यातीतान्यसंख्यगुणयुक्तानि । त्रिभुवनजननयनमनःप्रियाणि भवनानि भौमविबुधनुतानि ।। भावनसुरभवनेषु दासप्ततिशतसहस्रसंख्यास्यधिकाः। कोटयः सप्त प्रोक्ता भवनानां भूरितेजसा भुवनानाम् ॥३॥ अन्वयार्थ (भूरितेजसा भावनसुरभवनेषु भुवनाना) अत्यन्त तेजको धारणकरनेवाले ऐसे भवनवासी देवोंके भवनों में रहनेवाले (भुवनाना) प्रकृ- त्रिम चैत्यालयोंकी (सप्त कोट्यः द्वासप्ततिशतसहनसख्याभ्यधिकाः प्रोक्ता) सात करोड़ बहत्तरलाख सख्या कही है। भावार्थ-भवनवासियोंके इतने ही भवन हैं और उनमें प्रत्येकमें एक एक अकृत्रिम चैत्यालय है ।। ३ ।। अन्वयार्थ:-- (भौमविबुधनुतानि ) जिनको समस्त व्यंतर देव नमस्कार करते हैं (त्रिभुवनजननयनमनःप्रियाणि ) जो तीनों लोकोंके जीवोंके नेत्र और मनको अत्यन्त प्रिय लगते हैं ऐसे ( त्रिभुवनभूतविभूना भवनानि ) तीनों लोकों के समस्त प्राणियोंके स्वामी-भगवान् जिनेन्द्रदेवके मदिर (सख्यातीतान्यसल्य- गुणयुक्तानि) असख्यातको असल्यातसे गुणा करने पर जितनी सख्या होती है उतने हैं। भाषार्थ व्यन्तर देवोंके आवास मी असंख्यातासखयात है और उनमें प्रत्येकमें एक-एक अकृत्रिम चैत्याजय है । ज्योतिष्कदेव तथा वैमानिकदेवोंके अकृत्रिम चैत्यालय-- [२०५] - यावन्ति संति कान्तज्योतिर्लोकाधिदेवताभिनुतानि । कल्पेऽनेकविकल्पे कल्पातीतेऽहमिन्द्रकल्पानल्पे ॥ ५॥ विंशतिरथ त्रिसहिता सहस्रगुणिता च सप्तनवति प्रोक्ता । चतुरधिकाशीतिरतः पञ्चकन्येन विनिहतान्यनघानि ॥६॥ अन्वयार्थ:-(कान्तज्योतिर्लोकाधिदेवताभिनुतानि ) सुन्दर ऐसे ज्योतिषी देवोंके द्वारा नमस्कार किये गये 'भवनानि' जिनालय (यावन्ति सति ) उतने ही अर्थात् अमख्यातासख्यात है। (अनेकविकल्पे कल्पे ) अनेक मेदरूप सोलह खोंमें और ( अहमिन्द्रकल्पानल्पे कल्पातीते ) जिनमें अहमिन्द्रोंकी कल्पना है ऐसे बहुत कल्पातीत विमानों में-(अनघानि ) पापरहित चैत्यालयोंकी सख्या ००००० Esx (चतुरधिकाशीतिः अतः पंचकशून्येन च सप्तनवति सहस्रगुणिताविनिहतानि ३ २० अथ त्रिसहिता विंशतिः प्रोक्ता ) पच शून्यसे गुणा किये हुये चौरासीलाख, एक हजारसे गुणा किये हुये सतानवे अर्थात् सतानवे हजार और तेईस है अर्थात् चौरासीलाख सतानवे हजार तेईस हैं । यह सख्या कल्पवासी और कल्पातीत दोनों प्रकारके देवोके अकृत्रिम चैत्यालयों की है । यदि इनके चैत्यालयों की पृथक पृथक् संख्या कही जाय तो कल्पवासियोंके चैत्यालय चौरासी लाख छ्यानवे हजार सातसौ है और कल्पातीत देवोंके चैत्यालयोंकी सख्या तीनसो तेईस है। मनुष्य क्षेत्रके अकृत्रिम चैत्यालयोंकी सख्या-- अष्टापंचाशदतश्चतुः शतानीह मानुषे च क्षेत्रे । लोकालोकविभागप्रलोकनालोकसंयुजां जयभाजाम् ॥ ७॥ अन्वयार्थ:-(लोकालोकविभागप्रलोकनालोकसयुजा) लोक और अलोक के विभागको देखनेके लिये प्रकाश के समान-केवलदर्शनसे सुशोभित होनेवाले (जयभाजा) और घातिया कोंको नाश करनेके कारण सर्वत्र विजय प्राप्त करनेवाले भगवान् अहंतदेवके अकृत्रिम चैत्यालय (इह मानुपे च क्षेत्रे ) इस मनुष्य नेत्रमें ( अष्टापचाशदत: चतुः शतानि) चारसौ अठावन हैं। तीनो लोकोंके अकृत्रिम चैत्यालयों की संख्या-- [२०६] नवनवचतुःशतानि च सप्त च नवतिः सहस्रगुणिताः पट् च । पंचाशत्पंचवियत्महताः पुनरत्र कोटयोऽष्टौ प्रोक्ताः ॥८॥ एतावन्त्येव सतामकृत्रिमाण्यथ जिनेगिनां भवनानि । भुवनत्रितये त्रिभुवनसुरसमितिसमय॑मानसत्प्रतिमानि ॥ ९ ॥ अन्वयार्थ:- (त्रिभुवनसुरसमितिसमय॑मानसत्प्रतिमानि ) तीनों लोकोके देवोंके द्वारा जिनकी मनोहर मूर्ति-प्रतिमा पूजी जाती है ऐसे (सता जिनेशिना) उत्कृष्ट जिनराज के (अकृत्रिमाणि अथ भवनानि) अकृत्रिम जिन चैत्यालय ६४६-८१+१००%D४८१+ ६.४१०००%3 (भुवनत्रितये ) तीन लोकमें (नवनवचतुः शतानि च सप्त च नवतिः सहस्र- ६७०००६+ ५०-५६४.००००-५६००००० ८००००००० गुणिताः षट् च पंचारात पचवियत्प्रहताः अत्र पुनः अष्टौ कोटयः एतावन्त्येव प्रोक्ताः) आठ करोड़,छप्पन लाख, सत्तानवे हजार ४८१ हैं। (८५६९७४८१) अधोलोकमें ७७२००००० मध्यलोकमे ४५८ ऊर्धलोकमें ८४१७०२३ ८५६९७४८१ तीनलोकके कुल चैत्यालय । ज्योतिष्क और व्यन्तरदेवोंके असख्यातासख्यात चैत्यालय अलग हैं। मध्यलोकके ४५० चैत्यालय-- १७० ४३०४ वक्षाररुचककुंडलरौप्यनगोत्तरकुलेपुकारनगेषु । कुरुपुच जिनभवनानि त्रिशतान्यधिकानि तानि पविंशत्या ॥१०॥ अन्वयार्थः (वक्षाररुचककुण्डलरौप्यनगोत्तरकुलेपुकारन गेषु च कुरुषु जिनभवनानि तानि त्रिशतान्यधिकानि षविंशत्याः) वक्षारगिरि-पाचविदेह मवधी ८०, गजदत २० कुल १०० पर्वतो पर १०० अकृत्रिम चैत्यालय है, रुचकद्वीपमें रुचक पर्वतपर ४, कुण्डलद्वीपमें कुण्डलपर्वत पर ४, रौप्यनग- विजयाईपर्वत पर १७० कर्मभूमि सम्बंधी ढाई द्वीपके १७० चैत्यालय, मानु- षोत्तरपर्वतपर ४, हिमगन आदि ३० कुलाचलों पर ३०, चार इषुकार-इणा- [२०७] कार पर्वतों पर ४ और देवकुरुमें ५, उत्तरकुरुमें ५, इस प्रकार इन अकृत्रिम जिनभवनोंकी सख्या ३२६ है (नन्दीश्वर द्वीपके ५२ और पञ्चमेरुके ८० मिला कर कुल ४५८ चैत्यालय (अकृत्रिम ) होते हैं। नोट-एक एक विदेहमें १६-१६ वक्षारगिरि और ४-४ गजदत मिलकर १०० पर्वतो पर १०० अ० चै० हैं । ढाई द्वीपमें १७० कर्मभूमिया हैं उनमें १७० ही विजया पर्वत हैं उन पर १७० ही अ० चै० हैं। जम्बूद्वीपमें ६ कुलाचल, धातकी खडमें १२ और पुष्करा में १२ कुलाचल हैं। सब मिल कर ३० कुलाचल हैं, इन पर ३० ही अ० चै० हैं । देवकुरुमें ५ और उत्तर कुरुमें ५ इस प्रकार १० उत्तमभोग भूमियोंमें १० अ० चै० है । अस्सीवक्षार व २० गजदतोंके १०० चार रुचिकगिरिके ४ चार कुण्डलगिरिके ४ १७० विजयाध-एकसौ सत्तर कर्मभूमिके १७० चार मानुषोत्तर पर्वतके तीस कुलाचल पर्वतोंके ३० चार इष्वाकार पर्वतोंके देवकुरु-उत्तरकुरुके १० - ॥ ॥ - ac - ॥ ४ ३२६ ५२ । नन्दीश्वर सवधी पचमेरु सबंधी - ४५८ कुल अ० चैत्यालय नन्दीश्वरद्वीपके चैत्यालय-- नन्दीश्वरसद्वीपे नन्दीश्वरजलधिपरिवृत्ते धृतशोमे। चन्द्रकरनिकरसंनिभरुन्द्रयशोविततदिङमहीमंडलके ॥ ११ ॥ तत्रात्यांजनदधिमुखरतिकर पुरुनगवराख्यपर्वतमुख्याः। प्रतिदिशमेपामुपरि त्रयोदशेन्द्रचितानि जिनभवनानि ॥ १२ ॥ अन्वयार्थी--(चन्द्रकरनिकरसंनिभरुन्द्रयशोविततदिड्महीमंडलके) चद्रमा [२००] की किरणोंके समूहके समान फैले हुये यशके द्वारा जिसने समस्त दिशाओं का समूह और समस्त पृथ्वीमंडल व्याप्त कर दिया है अर्थात् जिसकी कीर्ति समस्त पृथ्वीपर फैल रही है तथा (नन्दीश्वरजलघिपरिवृते) नन्दीश्वर नामके महासागर से चारों ओर घिरा हुआ है और (धृतशोमे) जो बड़ी अच्छी शोभा को धारण कर रहा है ऐसे ( नन्दीश्वरसद्दीपे ) सर्वोत्तम नन्दीश्वर दीपकी (प्रतिदिश) प्रत्येक दिशामें (तत्रत्याजनदधिमुखरतिकरपुरुनगवराख्यपर्वतमुख्याः एषा उपरि इन्द्रर्चितानि जिनभवनानि त्रयोदश) वहा होनेवाले एक एक अजनगिरि है, उस अजन गिरिके चारों ओर चारो दिशाओं में चार चार दधिमुख हैं, वे दधिमुख बाव- डियों में हैं उन बावड़ियों के किनारे-कोनों पर रतिकर पर्वत हैं । प्रत्येक अजनगिरि पर और प्रत्येक दधिमुख पर्वत पर एक एक अकृत्रिम चैत्यालय है तथा बाव- डियोंके भीतरी दोनों कोनों पर जो दो दो रतिकर पर्वत हैं उन पर प्रत्येक पर एक एक अकृत्रिम चैत्यालय है । इस प्रकार नन्दीश्वर दीपकी एक दिशामें एक अजनगिरि, चारद घिमुख और पाठ रतिकरोंके ऊपर चैत्यालय हैं । ये सब तेरह होते हैं। इसीप्रकारकी रचना नन्दीश्वर द्वीपकी चारों दिशाओं में है । इसलिये चारों दिशाओं में मिलकर सब बावन चैत्यालय होते हैं । इन चैत्यालयों में इन्द्र आकर पूजा करते हैं। आषाढकार्तिकाख्ये फाल्गुनमासे च शुक्लपक्षेप्टम्याः । आरभ्याष्टदिनेषु च सौधर्मप्रमुखविबुधपतयो भक्त्या ।।१३।। तेषु महामहमुचित प्रचुराक्षतगंधपुष्पधूरैर्दिव्यैः । सर्वज्ञप्रतिमानामप्रतिमानां प्रकुर्वते सर्वहितम् ॥ १४ ॥ अन्वयार्थ:- (आषाढ़कार्तिकाख्ये च फाल्गुनमासे ) भाषाढ़, कार्तिक और फाल्गुन मासमें (शुक्लपक्षेष्टम्या) शुक्लपक्षकी अष्टमीसे (भारभ्य) प्रारभ करके (अष्टदिनेषु च) आठ दिन तक (सौधर्मप्रमुखविबुधपतयः भक्त्या) सौधर्म इन्द्रको आदि लेकर समस्त इन्द्र वडी भक्तिसे 'वहा पर जाते हैं । (भप्र- तिमाना) जिनकी समता-बराबरी ससारभरमें कहीं नहीं है ऐसी ( तेषु सर्वज्ञप्रति- माना ) वहा पर विराजमान भगवान् सर्वज्ञदेवकी प्रतिमोंकी (दिव्यैः प्रचुराक्षत- गधपुष्पधूपैः) बहुतसे दिव्य भक्षतोंसे, दिव्यगधसे, दिव्यपुष्पोंसे और दिव्य धूपसे (सर्वहित ) समस्त प्राणियोंका हित करनेवाली (उचित ) अपने योग्य [२०६] अर्थात् इ द्रोंके द्वारा ही करने योग्य ऐसी ( महामह) महामह नामकी पूजा (प्रकुर्वते ) करते हैं। भेदेन' वर्णना का सौधर्मः स्नपनकत्ततामापनः । परिचारकभावमिताः शेषेन्द्रारुन्द्र चन्द्रनिर्मलयशसः ॥१५॥ मंगलपात्राणि पुनस्तद्देव्यो विभ्रतिस शुभगुणाढ्याः । अप्सरसो नर्तक्यः शेषसुरास्तत्र लोकनाव्याधियः ॥१६॥ अन्वयार्थ:-( का भेटेन वर्णना) उन नन्दीश्वर द्वीपके चैत्यालयोंका विशेष वर्णन-माहात्म्य क्या कहे, जहा (सौधर्मः स्नपनकस्तृता आपन्नः ) सौधर्म इन्द्र स्वयं उन प्रतिमाओंके अभिषेक करने का काम करता है, (रुन्द्रचन्द्रनिर्मल- यशसः शेषेन्द्राः परिचारकभाव इता:) पूर्णमासीके चन्द्रमाके समान जिनका निर्मल यश फैला हुआ है ऐसे बाकी के इन्द्र सब उस सौधर्म इन्द्र के परिचारक- सहायक बन जाते हैं अर्थात् उस महामिषेकमें सहायता देते हैं-अन्य सब काम करते हैं। (पुनः शुभगुणाढ्याः तद्देव्यः ) तथा निर्मल गुणोंको धारण करनेवाली उन सौधर्म आदि इन्द्रोंकी महादेविया (मगलपात्राणि विप्रतिस्म ) आठ महा- मंगल द्रव्य धारण करती है, (अप्सरसः नर्तक्या) अप्सराये नृत्य करनेवाली होती हैं (तत्र शेषसुराः लोकनाव्याधियः) और वहा बाकीके सब देव तथा देविया उस अभिषेकको देखने में व्यग्रचित्त रहते हैं। वाचस्पतिवाचामपि गोचरतांसंव्यतीत्य यत्क्रममाणम् । विबुधपतिविहितविभवं मानुषमात्रस्य कस्य शक्तिः स्तोतुम् ॥१७॥ अन्वयार्थ:--(विबुधपतिविहितविभव ) सौधर्मादिक इन्द्रोंके द्वारा किया गया वह पूजावैभव ( यत्क्रममाण ) जो उन्हींके द्वारा प्रवर्तमान है उसका वर्णन १-भेदेन-विशेषेण । २-मंगलपात्रापयष्टी-श्लोक:--- छत्रं ध्वज कलशचामरसुप्रतीका, मुंगारतालमतिनिर्मलदपणं च । शसंति मंगलमिदं निपुणस्वभावाः, दत्यस्वरूपमिह तीर्थकृतोऽष्टधैव ।। [२१०] ( वाचस्पतिवाचा अपि गोचरता संव्यतीय ) बृहस्पतिके वचनोंकी शक्तिके मी बाहर है-उस पूजनकी शोभा और भक्ति का वर्णन वृहस्पति मी नहीं कर सकता फिर भला (मानुषमात्रस्य कस्य स्तोतु शक्तिः) उन चैत्यालयोंकी स्तुति करने में हम मनुष्योंकी शक्ति क्या काम दे सकती है अर्थात् उनकी स्तुति करना मनुष्यमात्रकी शक्ति के बाहर है । निष्ठापितजिनपूजाश्चूर्णस्नपनेन दृष्टविकृतविशेपाः । सुरपतयो नन्दीश्वरजिनभवनानि प्रदक्षिणीकृत्य पुनः ॥ १८ ॥ पचसु मदरगिरिषु श्रीभद्रशालनंदनसौमनसम् । पांडुकवनमिति तेषु प्रत्येकं जिनगृहाणि चत्वार्येव ॥ १९ ॥ तान्यथ परीत्य तानि च नमसित्वा कृतसुपूजनास्तत्रापि । खास्पदमीयुः सर्व स्वास्पदमूल्यं खचेष्टया संगृह्य ।। २० ।। अन्वयार्थ:- (चूर्णस्नपनेन ) सुगधित चूर्णसे जिन्होंने महाभिषेक पूर्वक (निष्ठापितजिनपूजाः ) जिन पूजा पूर्ण करली है, इसीलिये जिनको महा मानद आरहा है उस आनंदसे ( दृष्टविकृतविशेषाः ) जिनकी भाकृति कुछ विकृत हो रही है ऐसे ( सुरपतः) इन्द्र (पुनः) फिर ( नन्दीश्वरजिनभवनानि ) नदीश्वरदीप के उन चैत्यालयों की ( प्रदक्षिणीकृत्य ) प्रदक्षिणा देते हैं । फिर वे इन्द्र (पचसुमदरगिरिपु ) पाचों मेरुपर्यत सबंधी (श्रीभद्रशालनद- नसौमनस पाडुकवन इनि तेषु चत्वारि एव प्रत्येक जिनगृहाणि ) भद्रशाल, नदन, सौमनस और पाडुकवन इसप्रकार चार वनों में प्रत्येकमें चार चार जिनमंदिरों की ( अथ तानि परीत्य ) पहले प्रदक्षिणा देकर (च तानि नमसित्वा) और उनकी स्तुति करके (कृतसुपूजनाः) बहुत उत्तम रीनिसे पूजा करते हैं । (तत्रापि) वहा (खचेष्टया ) जो अभिषेक पूजनादिक किया है उसके बदले (स्वास्पद- मूल्य सगृह्य ) अपने देवपदके योग्य महापुण्य सचय करके (सर्वे) सव इन्द्राटि ( स्वास्पद ईयुः ) अपने अपने स्थानको चले जाते हैं। एक एक मेरु पर्वत पर चार चार वन हैं । भद्रशाल, नंदन, सौमनस और पाडुक । मेरु पर्वतोंके सबसे नीचे चारों ओर भृदशाल वन है-इनके ऊपर मेरु पर्वतके चारों ओर नदनवन हैं, उसके ऊपर तीसरी कटनी पर चारों ओर सौमनस वन हैं और उनके ऊपर चारों ओर पडिक वन हैं । इस प्रकार पाचों [२११] मेरु संबधी बीस वन है । इन वनों की चारों दिशाओ में एक एक अकृत्रिम चैत्या- लय । इस प्रकार पाचों मेर पर्वतों पर अस्सी चैत्यालय है। चैत्यालयोंकी विभूति-- सहतोरणसद्वेदीपरीतवनयागवृक्षमानस्तभ- ध्वजपंक्तिदशकगोपुरचतुष्टयत्रितयशालमडपवयः ॥२१॥ अभिषेकप्रेक्षणिका क्रीडनसंगीतनाटकालोकगृहैः । शिल्पिविकल्पितकल्पनसंपन्पातीतकल्पनैः समुपेतः ॥ २२ ॥ वापीसत्पुष्करिणीसुदीर्घिकाद्यंबुसंसृतैः समुपेतैः। विकसितजलरुहकुसुमैनभस्यमानैः शशिग्रहः शरदि॥ २३ ॥ मुंगाराब्दककलशाद्यपकरणटशतकपरिसंख्यानः। प्रत्येक चित्रगुणः कृतझणझणनिनदविततघटाजालैः ॥ २४ ॥ प्रविभाजते नित्य हिरण्मयानीश्वरेशिनां भवनानि । गंधकुटीगतमृगपतिविष्टररुचिराणि विविधविभवयुतानि ॥२५॥ अन्वयार्थ.-वे अकृत्रिम जिन चैत्यालय (सहतोरणसवेदीपरीतवनयाग- वृक्षमानस्तभध्वजपंक्तिदशकगोपुर चतुष्टयत्रितयशालमडपवयः) अकृत्रिम तोरणों से, चारों ओर होनेवाली वेदीसे, चारों ओर रहनेवाले वनोंसे, यागवृक्षोंसे, मान- स्तभोंसे दश दश प्रकार की ध्वजाओंकी पंक्तिओंसे, चार चार गोपुरोसे, तीन तीन कोटोंसे, तीन तीन शालाओंसे, उत्तम उत्तम मडपोंसे सुशमित हैं। (अभिषेकप्रेक्षणिकाः) अभिषेक जिन मडपोंमें बैठकर देखते हैं ऐसे मंडप हैं ( क्रीडनसगीतनाटकालोकगृहैः ) क्रीडाभूमि, सगीतभूमि, नाटकशालाओं से सुशोमित हैं (शिल्पिविकल्पितकल्पनसंपल्पातीतकल्पनैः समुपेतैः ) यह रचना उनको बनानेवाले कारीगरों द्वारा कल्पना की हुई रचनाके भेदोके विचार से सर्वथा रहित है अर्थात किसी चतुर कारीगरने भी उनके बनानेकी कल्पना नहीं की है वे सब तोरण आदि अकृत्रिम हैं ऐसी अकृत्रिम शोभाओंसे वे सब अकृ- त्रिम चैत्यालय शोभायमान हैं (वापीसत्पुष्करिणीसुदीर्घिकाद्यबुससृतैः समुपेतैः) गोल वापिकाओंसे, चौकोर वापिकाओंसे, बहुत गहरी वापिकाओसे सुशोभित हैं, वापिकाए सुन्दर निर्मल जलसे भरी हुई हैं, ( विकसितजलरुहकुसुमैः) खिले हुये कमलोंके पुष्पोंसे शोमित है, (शरदि शशिप्रहः नभस्यमानः ) जैसे शरद [२१२] त्रातुमें च द्रमा, ग्रह, नक्षत्रोंसे आकाशकी जो शोभा होती है उससे कहीं अधिक शोभा वापिकाओ की है (प्रत्येक भृगाराब्दककलशाधुपकरणैष्टशतकपरिस- ख्यानैः ) प्रत्येक चैत्यालय एकसौ आठ भृगार, दर्पण, कलश आदि मंगल द्रव्योंसे सुशोभित है, (चित्रगुणः) अनेक प्रकारके गुणोंसे शोभायमान हैं, ( कृतझणझण निनद विततघटाजालैः) झणझण शब्द करते हुये बहुत बड़े- बड़े घटाओं के समूह पक्ति बद्ध होकर उन चैत्यालयों में लटक रहे हैं (गंधकुटी गतमृगपतिविष्टररुचिराणि विविधविभवयुतानि हिरण्मयानि ईश्वरशिना भवनानि नित्य प्रविभाजते ) मनोहर गधकुटी, सुन्दर सिंहासन से सुशोभित, अनेक प्रकार की विभूतियोंसे युक्त, सुवर्णमयी ऐसे जिनेन्द्र भगवान के चैत्यालय सदैव दैदीप्य- मान और शोभायमान हो रहे हैं। प्रतिमाओं का वर्णन- येपु जिनानां प्रतिमाः पञ्चशतशरासनोच्छिताः। मणिकनकरजतविकृता दिनकरकोटिप्रमाधिकप्रभदेहाः ॥२६॥ तानि सदा वंदेऽहं भानुप्रतिमानि यानि कानि च तानि । यशसा महसां प्रतिदिशमतिशयशोभाविभाजि पापविभजि ॥२७॥ अन्वयार्थ:- (येषु ) जिन चैत्यालयों में (जिनाना प्रतिमाः ) जिनेन्द्र भगवानकी प्रतिमाए (पचशतशरासनोच्छिताः) पाचसौ धनुष ऊची (सत्प्र- तिमाः) अत्यन्त मनोहर और सुन्दर आकारवाली हैं । (मणिकनकरजतविकृताः) मणि, सुवर्ण व चादी की बनी हुई हैं, (दिनकरकोटिप्रभाधिकप्रभदेहाः) करोडों सूर्योकी कातिसे मी अधिक जिनके शरीरकी काति दैदीप्यमान है, (भानुप्रति- मानि ) वे सब अकृत्रिम चैत्यालय सूर्यके विमानके समान दैदीप्यमान, (यानि- कानि च तानि' ) जो कुछ हैं जैसे हैं बस बेही हैं-अद्वितीय हैं, (यशसा' महसा ) यश व तेजके स्थान हैं, (प्रतिदिश अतिशयशोभाविभाजि) प्रत्येक दिशामें होनेवाली अपूर्व शोभासे सुशोगित हैं, (पापविभजि) और समस्त पापोंको १-अनिर्दिष्टस्वरूपा'ण । २-कीतीना। ३-तेजा। ४-दिशंप्रति-प्रतिदिर्श, सर्वासु दिक्षु । [२१३] - नाश करनेवाले हैं ऐसे (तानि) उन अकृत्रिम चैत्यालयोंको (अह) मैं (सदा) सदैव (वदे) नमस्कार करता है। तीर्थकरों की स्तुति- सप्तत्यधिकशतप्रियधर्मक्षेत्रगततीर्थकरवरवृपभान् । भूतभविष्यतसंप्रतिकालभवान् भवविहानये विनतोऽसि ॥२८॥ अन्वयार्थ:-(सप्तत्यधिकशतप्रियधर्मक्षेत्रगततीर्थकरवरवृषभान्) जिनको धर्म अत्यन्त प्रिय है ऐसे एकसौ सत्तर नेत्रोंमें जो श्रेष्ठसे श्रेष्ठ तीर्थंकर होते हैं- (भूतभविष्यतसंप्रतिकालभवान् ) उन तीर्थंकर भूत, भविष्यत् और वर्तमानकाल में होनेवालोको ( भवविहानये ) जन्म मरणरूप ससारको नाश करनेके लिये ( विनतोऽस्मि ) नमस्कार करता है। वृषभदेवका वर्णन-- अस्यामवसपिण्यां वृषभजिनः प्रथमतीर्थकर्ता भर्ता । अष्टापदगिरिमस्तकगतस्थितो मुक्तिमाप पापान्मुक्तः ॥ २९ ॥ अन्वयार्थ -(अस्या अवसर्पिण्या ) इस अवसर्पिणीकालमें (वृषभजिनः प्रथमतीर्थकर्ता भर्ता' ) चौवीस तीर्थंकरोंमें से वृषभदेवस्वामी प्रथम तीर्थकर हुये और असि मसि आदि छहों कर्मोका उपदेश देकर सबके स्वामी थे। पोषक थे। वे (पापान्मुक्तः ) समस्त पापोंको नष्टकर (अष्टापद गिरिमस्तकगत स्थितः) कैलाशपर्वतके शिखरपर से, कायोत्सर्ग आसनसे (मुक्ति आप") मोक्ष पधारे। भगवान वासुपूज्यकी स्तुति-- श्रीवासुपूज्यभगवान् शिवासु पूजामु पूजितस्त्रिदशानाम् । चंपायां दुरितहरः परमपदं प्रापदापदामन्तगतः ॥ ३० ॥ अन्वयार्थ:- (दुरितहरः) समस्त काँको नाश करनेवाले ( आपदा अतगतः ) आपत्तियोंसे रहित (शिवासु पूजासु ) सर्वोत्तम पंचकल्याणकों में (त्रिदशाना पूजितः ) इन्द्रादिकदेवों के द्वारा पूज्य ऐसे ( श्रीवासुपूज्यभगवान्) श्री वासुपूज्य स्वामी १२ वें तीर्थंकर (चपाया ) चम्पापुरसे ( परमपदं प्रापत) मोक्षको प्राप्त हुये। १-लोकाना पोषक:-भर्ता। २-अष्टापट कैलाशः। ३-गत -प्राप्त । ४-स्थितः-ऊर्ध्वक्रायोत्सर्गोपेतः। ५-प्राप्तवान् । ६-शिवासु-शोमनामु ! ७-नाम-पञ्चकल्याणरूपासु। ८-दुरितहर:-अष्टकर्मध्वंसी। ६-परमपट-मोक्षं। [२१४ - .

- नेमिनाथस्वामीकी स्तुति- मुदितमतिबलमुरारिप्रपूजितो जितकषायरिपुरथ जातः । बृहदूर्जयन्तशिखरे शिखामणित्रिभुवनस्य नेमिर्भगवान् ॥ ३१ ॥ अन्वयार्थ - (मुदितमतिबलमुगरिप्रपूजित.) कृष्ण और बलदेव दोनों भाइयोंने अत्यन्त प्रसन्न होकर जिनकी पूजाकी है, (अथ जितकषायरिपुः) तथा जिन्होंने समस्त कषायरूपी शत्रुओंको जीत लिया है, (त्रिभुवनस्य शिखामणिः) जो तीनों लोकोके चूडामणि है ऐसे ( भगवान् नेमिः ) श्री भगवान् नेमिनाथ. (वृहदूर्जयन्तशिखरे) बड़े गिरनार पर्वतसे (जातः) परम सिद्धपदको प्राप्त हुये। श्रीमहावीर स्तुति- पावापुरवरसरसां मध्यगतः सिद्धिवृद्धितपसां महसाम् । वीरो नीरदनादो मूरिगुणश्चारुशोभमास्पदमगमत् ॥ ३२ ॥ अन्वयार्थ:-- (सिद्धिवृद्धितपसा) जो अपने इच्छित कार्यों को उत्पन्न करने, उत्तर क्षमादि गुणोंका उत्कर्ष करने और अनशन भादि महातपश्चरण करनेमें सर्वोत्तम हैं, (नीरदनादः ) जिनकी दिव्यध्वनिका शब्द मेघकी गर्जना समान है, ( भूरिगुणः) जिनके गुण अनत हैं, ( महसा मध्यगतः) जो महातपस्वी हैं ऐसे ( वीरः ) श्री वीर भगवान् ( पावापुरसरसा) पावापुर नगर के समीपवर्ती उत्तम सरोवर से (चारुशोभं आस्पद अगमत् ) अनत सुखके स्थानमोक्षस्थानमें जा विराजमान हुए। वाकी वीस तीर्थंकरों का वर्णन-- सम्मदकरिवनपरिवृतसम्मेदगिरीन्द्रमस्तकेविम्तीर्णे । शपा ये तीर्थकराः कीर्तिभृतः प्रार्थितार्थसिद्धिमवापन् ॥ ३३ ॥ अन्वयार्थः ( सम्मदकरिवनपरिवृतसम्मेदगिरीन्द्रमस्तके विस्तीर्णे) जिसमें मदोन्मत्त हाथी चारों ओर फिर रहे हैं ऐसे वनोंसे घिरे हुए सम्मेदशिखर पर्वतके विशाल मस्तकपरसे (कीर्तिमृतः) अनत कीर्तिको धारण करनेवाले (शेषाः ये तीर्थकराः ) बाकीके जो वीस तीर्थंकर (प्रार्थितार्थसिद्धिं अवापन् ) सबके द्वारा प्रार्थनीय सिद्धि-मोक्षको प्राप्त हुये। शेषाणां केवलिना अशेषमतवेदिगणभृतां साधूनां । गिरितलविवरदरीसरिदुरुवनतरुविटपिजलधिदहनशिखासु ॥३४॥ [२१५] मोक्षगतिहेतुभूतस्थानानि सुरेन्द्ररुन्द्रभक्तिनुतानि । मगलभूतान्येतान्यंगीकृतधर्मकर्मणामस्माकम् ।। ३५ ॥ अन्वयार्थ:-(शेषाणां केवलिना) इन तीर्थंकरोंके सिवाव अन्यसामान्य- केवली (अशेषमतवेदिगणमृता) समस्त मतोको जाननेवाले गणधरदेव (साधूना) . तथा सामान्य साधु जहा जहासे मोन पधारे हैं ऐसे (गिरितलविवरदरीसरिदुरु- वनतरुविटपिजलघिदहन शिखासु) पर्वत, पर्वतके शिखर, पर्वतोंके दरें (घाटी) गुफायें, नदी, बड़े बडे वन, वृक्ष, वृक्षोंके स्कध, समुद्र और अग्निकी शिखाए आदि स्थान हैं जिनको (सुरेन्द्ररुन्द्रभक्तिनुतानि ) इन्द्रादिकदेव बड़ी भक्तिसे नमस्कार करते है, (मोक्षगतिहेतुभूत स्थानानि ) मोक्षके कारणभूत और (मग- नभूतानि) सबका कल्याण करनेवाले हैं ऐसे ( एतानि ) ये स्थान ( अगीकृत- धर्मकर्मणा अस्माक)धार्मिक कार्योंको स्वीकार करनेवाले हमलोगोंको भी मंगल करनेवाले हों। जिनपतयस्तत्प्रतिमास्तदालयास्तनिषद्यका स्थानानि । ते ताश्च ते च वानि च भवन्तु भवघातहेतवो भच्यानाम् ॥ ३६॥ अन्वयार्थः- (जिनपतयः) चौवीस तीर्थंकर ( तत्प्रतिमाः) उनकी प्रतिमा (तदालयाः) उनके जिनालय (तन्निषद्यकास्थानानि ) उनके निर्गण क्षेत्र (ते च ताः च ते च तानि ) वे जिनेन्द्र, वे जिनप्रतिमाए, वे जिनालय और वे निर्वाणभूमिया ( भत्र्याना) भव्यजीवोको (भवघातहेतवः ) संसार नाशका कारण ( भवन्तु) होओ। तीनो समय नदीश्वरभक्ति करनेका फल-- संध्यासु तिसृषुनित्यं पठेद्यदि स्तोत्रमेतदुत्तपयशसाम् । सर्वज्ञानां सावं लघु लभते श्रुतधरेडितं पदममितम् ॥ ३७॥ अन्वयार्थः- ('य.' )जो (उत्तमयशसा ) जिनका यश संसारमें उत्तम है ऐसे (सर्वज्ञाना) भगवान् सर्वज्ञदेवका ( एतत स्तोत्रं ) यह स्तोत्र (यटि) यदि (नित्यं ) सदैव (तिसृषुसंध्यासु ) तीनों संन्यासमय-प्रातःकाल, मध्याह- काल, सायंकाल ( पठेत् ) पढ़ता है-वह (लघु) शीघ्र ही (सावं) समस्त जीवोंका कल्याण करनेवाले (श्रुतधरेडितं ) गणधर देवोंके द्वारा पूज्य ऐसे (अमित पद लभते) अनन्त काल तक रहनेवाले मोक्षपदको प्राप्त करता है । [२१६] अरहतोंके शरीर सम्बन्धी दश अतिशय- नित्यं निःस्वेदत्वं निर्मलता क्षीरगौररुधिरत्वं च । स्वाद्याकृतिसंहनने सौरूप्यं सौरभं च सौलक्ष्यम् ॥ ३८ ॥ अप्रमितवीर्यता च प्रियहितवादित्वमन्यदमितगुणस्य । प्रथिता दशविख्याता स्वतिशयधर्माः स्वयंभुवो देहस्य ॥३६॥ अन्वयार्थः-(नित्य नि:स्वेदत्व ) कमी शरीरमें पसीना न आना (निर्म- लता) मलमूत्र नहीं होना (च क्षीरगौररधिरत्व ) दूधके समान सफेद रुधिरका होना (खाद्याकृतिसहनने ) समचतुरस्र सस्थान, वज्रवृषभनाराचसहनन होना (सौरूप्य ) अत्यन्त सुन्दर शरीर होना (च सौरभ ) सुगधमय शरीर होना (सौलक्ष्य ) शरीरपर उत्तम लक्षणोंका होना (१००८ लक्षण ) ( अप्रमित- वीर्यता ) अनन्तवीर्य होना (च प्रियहितवादित्वं ) हितकारी एव मधुर वचनोंका निकलना ('इति' प्रथिता स्वतिशयधर्माः) ये प्रसिद्ध-विख्यात स्वाभाविक अति- शय (अन्यत् अमितगुणस्य ) अन्य अनन्त गुणोंको धारण करनेवाले (स्वय- भुवः देहस्य ) तीर्थंकरदेवके शरीरमें (दशविख्याता:) दश प्रकारके कहे गये हैं। केवलज्ञानके दश अतिशय- गव्यूतिशतचतुष्टयसुमिक्षतागगनगमनमप्राणिवधः । भुक्त्युपसर्गाभावश्चतुरास्यत्वं च सर्वविद्येश्वरता ॥४०॥ अच्छायत्वमपक्ष्यस्पदश्च समप्रसिद्धनखकेशत्व । स्वतिशयगुणाभगवतोघातिक्षयजा भवन्ति तेऽपि दशैव ॥४१॥ अन्वयार्थ:-- ( गव्यूति'शतचतुष्टयसुमिततागगनगमनमप्राणि वधः) चारसौ कोशतक सुभिक्षता होना-दुष्काल का न पड़ना, आकाशमें गमन करना, किसी जीवको बाधा न पहुचना (भुक्त्युपसर्गाभावः' ) कवलाहार ग्रहण न करना, किसी प्रकारका उपसर्ग न होना ( चतुरास्यत्व) चारों दिशाओंमें चार मुखका दिखाई देना (च सर्वविद्येश्वरता) समस्त विद्याभोंका ईश्वरपना प्रगट १-गन्यूति:-क्रोशमेकं । २-अप्राणिवध:-जीवघाताभावः । ३-भुक्त्युपसर्गाभावः-भुक्तिः,- मोजनं, कवलाहारः । उपसर्गः उपद्रवः तयोरभावः । ४-चतुरास्यत्वं-चतुमुखत्वं । [२१७] होना (अच्छायत्व' ) शरीरकी छायाका न पड़ना (अपक्ष्मस्पदः२) नेत्रों का टिमकारा न लगना (च समप्रसिद्धनखकेशव )और नखकेशोंका न बढ़ना ये (स्वतिशयगुणाः) स्वाभाविकगुण (भगवतः ) भगवान् तीर्थकर परमदेव के (घातिक्षयजाः) घातिया कोके नाश होनेपर (तेऽपि दशएव भवन्ति) दश ही होते हैं । अर्थात् केवलज्ञानके ये अतिशय मी दरा ही होते हैं। देवकृत चौटह अतिशय-- सार्वार्धमागधीया भाषा मैत्री च सर्वजनताविपया । सर्वर्तुफलस्तवकप्रवालकुसुमोपशोभिततरुपरिणाया ॥ ४२ ॥ आदर्शतलप्रतिमा रत्नमयी जायते मही च मनोज्ञा । विहरणमन्वेत्यनिलः परमानंदश्च भवति सर्वजनस्य || ४३ ॥ मन्वयार्थ.- (सार्वा अर्धमागधीया भाषा) समस्त जीवोंका कल्याण करनेवाली भगवानकी दिव्यध्वनिका अर्धमागधी भाषा रूप होना ( च सर्व- जनताविषया मैत्री ) समवशरणमें आनेवाले समस्त प्राणियोंका अपना जन्ममे होनेवाला वैर विरोध छोड़कर मैत्री भावसे रहना (सर्वर्तुफलस्तवकप्रवालकुम- मोपशोमिततरुपरिणामाः ) वहा की पृथ्वीके वृक्षोंका छहों ऋतुओंमें होनेवाले फल, गुच्छ, पत्ते और फलों से सुशोभित होना (च मही रत्नमयी मनोज्ञा आढ- शतलप्रतिमा जायते) वहा की पृथ्वीका रत्नमेयी, सुन्दर, दर्पण-समान अत्यंत निर्मल होना (अनिलयः विहरण भन्वेति ) भगवान् जिस दिशाकी ओर विहार करते हैं-वायुका मी उसी दिशाकी ओर बहना ( च सर्वजनस्य परमानन्दः भवति ) वहांपर आनेवाले समस्त जीवोंको महा आनन्द का होना। मरुतोऽपि सुरमिगंधव्यामिश्रा योजनान्तरं भृभागं । युपशमितधृलिकंटकणकीटकशर्करोपलं प्रकुर्वति ।। ४४ ॥ तदनु स्तनितकुमारा विद्युन्मालाविलामहासविमृषाः । प्रकिरंति सुरमिगधिं गधोदकवृष्टिमाजया त्रिदशपतेः ॥ ४५ ॥ अन्वयार्थ:-(सुरमिगधव्यामिश्रा मरुतः अपि योजनान्तरं भूभागं व्यु- पशमितधूलिकंटकतृणकीटकशर्करोपल प्रकुर्वति ) जहा भगवान् विहार करते हैं - -अच्छायत्वं-प्रतिबिंबरहितता। २-अपच्मस्पंदः-चनुः पदमणा चलनामावः । [२१८] वहा पर सुगंधसे मिली हुई वायु एक योजनतककी भूमिको धूल, काटे, तृण, कीडे और बालू रेती, पत्थर-आदिको हटाकर स्वच्छ कर देती है ( तदनु विद्य. न्मालाविलासहासविभूपाः स्तनितकुमाराः त्रिदशपतेः आज्ञया सुरमिगधिं गधो- दकवृष्टिं प्रकिरति ) उसके अनन्तर विजलीकी चमचमार और बादलोकी गर्जना ही जिनके माभूषण है ऐसे स्तनितकुमार जातिके देव इन्द्र की आज्ञासे सुगधसे मिली हुई गधोदक वृष्टि करते हैं । चरपद्मरागकेसरमतुलसुखस्पशेहममयदलनिचयम् । पादन्यासे पद्म सप्त पुरः पृष्ठवश्च सप्त भवन्ति ॥ ४६॥ अन्वयार्थ:- (वरपद्मरागकेसर भतुलसुखस्पर्शहेममयदलनिचय पद्म पादन्यासे सप्त पुरः च सप्त पृष्ठतः भवन्ति ) उत्तम पद्मरागमणियोंका जिसमें केशर है, जिनका स्पर्श अत्यन्त सुखकर है, सुवर्णमय जिनके पत्ते हैं ऐसे कमल भगवानके पादन्यासके-चरण रखनेके समय-चलते समय सात कमल आगे सात कमल पीछे होते है। भावार्थ-भगवान तीर्थंकर दरमदेव नब विहार करते हैं तब देव उन चरण कमलके नीचे कमलोंकी रचना करते हैं । एक कमल चरण कमलके नीचे रहता है, सात आगे होते हैं और सात पीछे होते हैं । इस प्रकार सब पन्द्रह कमल होते हैं । अथवा 'च' शब्दसे अन्य समस्त कमलोकी सख्या ले लेनी चाहिये। सब कमल दोसौ पच्चीस होते हैं । एक कमल भगवानके चरण कमलके नीचे रहता है । सात सात कमल भाठो दिशाओं में तथा उन आठों दिशाओके मध्य के पाठों भागोंमें रहते है । इस प्रकार एकसौ तेरह कमल होते हैं तथा उन सोलह पक्तियोंके मध्यभागमें सात सात कमलोंकी पक्ति और होती है । इस प्रकार एकसौ बारह कमल ये होते हैं । सब मिलाकर दोसौ पच्चीस कमल होते है। अथवा यों समझ लेना चाहिये कि एक कमल भगवानके चरण कमल के नीचे रहता है । सात कमल आगे होते है, सात कमल पीछे होते हैं। ये सब पन्द्रह कमल होते हैं । इनमेंसे एक एक कमलके दाईं ओर सात सात कमल होते हैं और बाईं ओर भी सात सात कमल होते हैं। इस प्रकार पन्द्रह मध्यके कमल तथा एकसौ पाच दाई ओरके कमल और एकसौ पाच बाई ओर के कमल होते हैं । सब मिलाकर दोसौ पच्चीस हो जाते है । [२१९ - -- फलभारनम्रशालिबीह्यादिसमस्तसस्यधृतरोमांचा । परिहपितेव च भूमिस्त्रिभुवननाथस्य वैभवं पश्यती ।। ४७ ॥ अन्वयार्थ:--(त्रिभुवननाथस्य वैभव पश्यन्ती परिदृषिता एव च भूमि: फलभारनम्रशालिव्रीह्यादिसमस्तसस्यधृतरोमाचा) तीनलोकके नाथ भगवान के वैभवको देखकर मानो हर्षित ही हो रही है इस प्रकार पृथिवी फलोंके भारसे नम्रित और शालि आदि समस्त धान्यके निमित्तसे रोमाचित हुई के समान दिखती है। शरदुदयविमलसलिलं सर इव गगन विराजते विगतमलं । जहति च दिशस्तिमिरिकां विगतरजाप्रमृतिजिह्मताभावं सद्यः॥४८|| अन्वयार्थ:--(शरदुदयविमलसलिल सर इव विगतमलं गगन विराजते दिशः तिमिरिका च जहति, सद्यः विगतरज:प्रमृतिजिह्मताभाव ) उस समय शरद ऋतुके आनेसे जिसका जल अत्यन्त निर्मल हो गया है ऐसे सरोवरके समान निर्मल आकाश ( बादल आदि सब दोषोंसे रहित ) शोमित होता है, समस्त दिशाएं अधकारको छोड़ देती हैं, धूल रहित हो जाती हैं, और भी सब तरहकी , मलिनता से रहित होकर शीघ्र ही निर्मल हो जाती हैं। एतेति त्वरितं ज्योतिभ्यंतरदिवौकसाममृतभुजः। कुलिशभृदाज्ञापनया कुर्वत्यन्ये समन्ततो व्याह्वानम् ।। ४९ ॥ अन्वयार्थ:- (ज्योनिव्यन्तरदिवौकसा अन्ये अमृतभुजः कुलिशमृदाज्ञा- पनया समन्ततः एत एत इति त्वरित व्याहवान कुर्वति ) ज्योतिपीदेव, व्यन्तर- देव, कल्पवासीदेव और भवनवासीदेव इन्द्रकी आज्ञा से चारों ओर परस्पर 'प्रायो, आओ' इस प्रकार शीघ्रता से बुलाते हैं । स्फुरदरसहस्ररुचिरं विमलमहारत्नकिरणनिकरपरीतम् । प्रहसितकिरणसहस्रद्युतिमण्डलमग्रगामि धर्मसुचक्रम् ॥ ५० ॥ अन्वयार्थ:-(स्फुरत् अरसहस्ररुचिरं विमलमहारत्नकिरणनिकरपरीत प्रह- सितकिरणसहस्रद्युतिमंडलं धर्मसुचक्र अग्रगामि ) जो दैदीप्यमान एक हजार आरों से शोभित है, चारो ओर अत्यंत निर्मल महारत्नोंकी किरणों के समूहसे . शोभायमान है, जो अपनी कातिसे सूर्यकी कातिको मी हंसती है-तिरस्कृत करता है ऐसाधर्मचक्र भगवान्के विहार करते समय सबसे भागे धागे चलता है। [२२०] . - इत्यष्टमंगलं च स्वादर्शप्रभृति भक्तिरागपरीतैः । उपकल्पप्यन्ते त्रिदशैरेतेऽपिनिरुपमातिशेपाः ॥ ५१ ॥ अन्वयार्थ:-इति खादर्शप्रभृति अष्टमगलं च भक्तिरागपरीतैः त्रिदशैः निरुपमातिशेषाः एतेऽपि उपकल्प्यन्ते ) इसीप्रकार अर्थात् धर्मचक्रके समान दर्पण आदि आठ मंगलद्रव्य मी भगवानके आगे रहते हैं । भक्तिके राग से सुशोभित ठेव इन उपमा रहित १४ अतिशयोंको धारण करते है । जन्मके १०, केवलज्ञानके १० और देवकृत १४ अतिशय इसप्रकार सत्र ३४ अतिशयोंका वर्णन किया। आठ प्रातिहार्योका वर्णन- -अशोकवृक्ष- वैडूर्यरुचिरविटपप्रवालमृदुपल्लवोपशोभितशाखः । श्रीमानशोकवृक्षो वरमरकतपत्रगहनवहलच्छायः ॥ ५२ ।। अन्वयार्थः-(वैडूर्यरुचिरविटपप्रवालमृदुपल्लवोपशोमितशाख: ) जिसका विस्तार वैडूर्यमणिकी कातिके समान अत्यन्त सुन्दर है, जिसकी शाखाएं नवीन अकुरोंसे और कोमल पत्तोंसे सुशोभित हैं (घरमरकतपत्रगहनबहलच्छायः) उत्तम मरकतमणिके समान जिसके हरे पत्ते हैं, पत्तोंके अधिक होनेसे जिसकी छाण बहुत बडी और घनी है ऐसा अनेक प्रकारकी शोभासे सुशोभित (श्रीमान- शोकवृक्षः) श्री जिनेन्द्र भगवानके पास होनेवाला शोभनीक 'प्रशोकबृक्ष' होता है। पुष्पवृष्टि-- मंदारकुंदकुवलयनीलोत्पलकमलमालतीबकुलाद्यैः । समदभ्रमरपरी तैयामिश्रा पतति कुसुमवृष्टिर्नभसः ॥ ५३ ॥ अन्वयार्थ:-(समदभ्रमरपरीतैः) जिसके चारों ओर मदोन्मत्त भ्रमर फिर रहे हैं ऐसे (मंदारकुन्दकुवलयनीलोत्पलकमलमालतीवकुलाधैः ) मदार, कुन्द, रात्रिविकासी कमल, नील कम्ल, श्वेत कमल, मालती, बकुल आदि (व्यामिश्रा) मिले हुये पुष्पों द्वारा (नभसः) आकाश से ( कुसुमवृष्टिः पतति ) सदा पुष्प- वृष्टि होती रहती है। (२२१] चामर कटकटिसूत्रकुण्डलकेयूरप्रभृतिभूषितांगौ स्वंगौ। यक्षौ कमलदलाक्षौ परिनिक्षिपतः सलीलचामरयुग्मम् ।।५४॥ अन्वयार्थ:-- (कटकटिसूत्रकुण्डलकेयूरप्रभृतिभूषितागौ )कड़े, करधनी- कदोरा, कुण्डल, बाजूबंद आदि आभूषणोसे जिनके शरीर सुशोमित हो रहे हैं, (स्वंगौ ) स्वाभाविक रीतिसे जिनके अग सुन्दर है (कमलदलाक्षौ)और कमल के दलके समान जिनके सुन्दर नेत्र हैं ऐसे ( यक्षौ) दो यक्ष ( सलीलचामर- युगल) आनन्द पूर्वक-लीलापूर्वक दो चमरों को ( परिनिक्षिपतः) टोरते रहते हैं। , . भामंडल--- आकस्मिकमिव युगपद्दिवसकरसहस्रमपगतव्यवधानम् । भामंडलमविभावितरात्रिंदिवभेदमतितरामाभाति ।। ५५ ॥ अन्वयार्थ:--(भाकस्मिक इव युगपर्दिवसकरसहस्र अपगतव्यवधान अविभावितरात्रिंदिवभेद भामडल भतितरा भाति ) अकस्मात-सहसा मानों एक साथ हजारों सूर्य व्यवधान रहित उदय हुये हों,गत्रिदिनका मेद भी जिससे नष्ट हो जाता है ऐसा भामंडल अत्यन्त दैदीप्यमान होता रहता है | दुदृमिवाद्य-- प्रवलपवनाभिघातप्रक्षुमितसमुद्रघोसमद्रध्यानम् । दंध्वन्यते सुवीणावशादिसुवाद्यदुदुभिस्तालसमम् ।। ५६ ।। अन्वयार्थ - ( प्रवलपवनाभिघातप्रक्षुभितसमुद्रघोषमन्द्रध्वानम् ) प्रवन वायुके घातसे शोमित हुये समुद्रके गमीर शब्दके समान जिनके मनोहर शब्द हो रहे हैं ऐसे (सुवीणविशादिसुवाद्यदुदुभिः तालसमं दध्वन्यते ) वीणा, वंशी- बसरी आदि हुन्दर बाजोंके साथ दुंदुमि बाजे तालके साथ बडी मनोहर ध्वनि से बजते रहते हैं। -- तीन छत्र- त्रिभुवनपतितालांछनमिदुत्रयतुल्यमतुलमुक्ताजालम् । नत्रयं च मुबृहद्वैडूर्यविक्लप्तदंडमधिकमनोज्ञम् ।। ५७ ।। अन्वयार्थ.- (त्रिभुवनपतितालाछनं ) जो तीनों लोकोंके खामीपने के [२२२] -- . चिह्न हैं, (इन्दुत्रयतुल्यं ) जो ऊपर नीचे रक्खे हुये तीन चन्द्रमायोके समान हैं (अतुलमुक्ताजाल ) जिनमें उपमा रहित अनेक मोनियोंकी झालरें लगी हुई हैं (अधिकमनोज्ञ ) जो बहुत ही मनोज्ञ हैं-मनोहर है (सुवृहद्वैडूर्यविक्लुप्त- टडं ) और जिनके द्ड बड़ी-बड़ी वैडूर्य मणियोंके बने हुये है ऐसे (छत्रत्रय च) तीन छत्र भी भगवानके ऊपर सदा सुशोभित होते रहते हैं । दिव्यध्वनि-- ध्वनिरपि योजनमेकं प्रजायते श्रोत्रहृदयहारिगभीरः । ससलिलजलधरपटलध्वनितमिव प्रवितान्तराशावलयम् ।। ५८।। अन्वयार्थ:-(ससलिलजलधरपटलम्वनित इव ) पानीसे भरे हुये बादलों की गर्जनाके समान (प्रवितान्तराशावलयं ) समस्त दिशाओंके समूहमें व्याप्त श्रोत्र हृदयहारिगभीरः) और कानोंको तथा मनको अत्यन्त सुख देनेवाली (ध्वनि. अपि एक योजनं प्रजायते ) ऐसी भगवान्की दिव्यध्वनि एक योजन तक पहुचती हैं। सिंहासन- स्फुरितांशुरत्नदीधितिपरिविच्छुरितामरेन्द्रचापच्छायम् । ध्रियते मृगेन्द्रवर्यैः स्फटिकशिलाघटितसिंहविष्टरमतुलम् ।।१६।। अन्वयार्थ:-(स्फुरिताशुरत्नदीधितिपरिविच्छुरितामरेन्द्रचापच्छाय) जिन की किरणे चारो ओर फैल रही हैं ऐसे रत्नोंकी किरणोंसे जिसने इन्द्र धनुष भी अनेक रगका बना दिया है ऐसा ( अतुल ) नुपम (स्फटिकशिलाघटितसिंह विष्टर ) स्फटिक पाषाण का बनाया हुआ अत्यन्त उत्कृष्ट सिंहासन (मृगेन्द्र- वयः ) सिंहोंके द्वारा (ध्रियते) धारण किया जाता है । यस्येह चतुस्त्रिंशत्प्रवरगुणा प्रातिहार्यलक्ष्यम्यश्चाष्टौ । तस्मै नमो भगवते त्रिभुवनपरमेश्वराहते गुणमहते ॥ ६ ॥ (यस्य इइ ) जिनके इसप्रकार (चतुस्त्रिंशत्प्रवरगुणाः) उत्तम गुणोंको धारण करनेवाले चौतीस अतिशय हैं (च अष्टौ प्रातिहार्यल- दम्यः ) और आठ प्रतिहार्य की विभूतिया हैं, जो (गुणमहते ) गुणोंसे पूज्य हैं (त्रिभुवनपरमेश्वराहते ) नीनों लोकों के परमेश्वर हैं, केवलज्ञानसें सुशोमित हैं ऐसे (तस्मै भगवते नमः ) उन भगवान भरहंत प्रभुके लिये नमस्कार हो। [२२३] अन्वयाथ:- - इसके आगे कायोत्सर्ग करना चाहिये । आलोचना- इच्छामि भंते ! गंदीसरभत्तिकाउस्सग्गो कहो तस्सा लोचेउं । गंदी- सरदीवम्मि, चउदिसविदिसासु अंजणदधिमुहरदिकरपुरुणगवरेसु जाणि जिणचेइयाणि ताणि सव्वाणि तीसुवि लोएसु भवणवासियवाणवितरजोड- सिकप्यवासियत्ति चउविहा देवा सपरिवारा दिव्वेहि गंधेहि, दिव्वेहि पुप्फेहि दिव्वेहि धुव्वेहि, दिव्वेहि चुण्णेहि, दिव्वेहि वासेहि, दिव्वेहि ण्हाणेहि आषाढकत्तियफागुणमासाण अट्टमिमाइ काऊण जाव पुण्णिमंति णिचकालं अंचंति, पूजंति, वदंति, णमसंति । गंदीसरमहाकल्लाणं करंति अहमवि इह संतो तत्थसंताइ णिच्चकालं अंचेमि, पूजेमि, वंदामि, णमसामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ, बोहिलाहो, सुगइगमए, जिणगुणसंपत्रिहोऊ मज्झं। अर्थ-हे भगवन् ! मै नदीश्वरभक्ति कर कायोत्सर्ग करता हू । इसमें जो दोष हुए हों उनकी आलोचना करना चाहता हू तन्दीश्वरदीपमें चारों दिशाओं में तथा विदिशाओंमें अजनगिरि, दधिमुख, रतिकर पर्वत हैं। चारों दिशाओं में श्यामवर्णके चार अजनगिरि पर्वत हैं। एक एक अजनगिरि पर्वतके चारों ओर एक एक विशाल बावड़ी है, उसके मन्यभागमें एक एक दिधिमुख पर्वत है। इस प्रकार एक अजनगिरि सम्बन्धी चारों बावड़ियोंमें चार दधिमुख हैं। उन चारो बावड़ियो के चारों कोनो पर रतिकर हैं परंतु अकृत्रिम चल्यालय मजनगिरिकी ओर भीतरी कोनों पर हैं । इसलिये आठ रतिकरों पर ही चैत्या- लय है तथा अजन गिरि पर तथा चारों दधिमुखों पर चैत्याजय हैं । इस प्रकार एक दिशामें तेरह चैत्यालय हैं । गरों दिशामोंमें बावन चैत्यालय हैं । तीनो लोकोंमें रहनेवाले भवनवासी, व्यतर, ज्योतिषी और कल्पवासी चारो प्रकार के देव सपरिवार आते हैं और आषाढ, कार्तिक, फाल्गुन महीनेकी शुक्ला अष्टमी से लेकर पौर्णमासीपर्यंत दिव्यगध, दिव्यपुष्प, दिव्यधूप, दिव्यचूर्ण, दिव्यवस्त्र और दिव्य अभिषेक से सदा अर्चा करते हैं, पूजा करते हैं, वदना करते हैं, और नमस्कार करते है । इसप्रकार नन्दीश्वर पर्वका महाउत्सव करते हैं । मै यहा रहकर ही उसीरीतिसे सदा अर्चा करता हू, पूजा करता हू, वंदना करता [२२४) हू और नमस्कार करता हूँ। मेरे दुःखोंका नाश हो, कोका नाश हो, मुझे रत्नत्रयकी प्राप्ति हो, शुभगतिकी प्राप्ति हो, समाधिमरण की प्राति हो और भग- वाम जिनन्द्रदेवके गुणोकी प्राप्ति हो। इति नन्दीश्वरभक्तिः। अथ क्षेपकश्लोकानि। गत्वा तितेवियति पञ्चसहस्रदण्डान् । सोपानविंशतिसहस्रविराज- माना ॥ रेजे सभा धनदयक्षकृता यदीया तम्मै नमस्त्रिभुवनप्रभवे जिनाय ॥१॥ शालोऽथ वेदिरथवेदिरतोऽपि शालो, वेदी च शाल इह वेदिर- तोऽपि शालः ॥ वेदी च भाति सदसि क्रमतो यदीये तस्मै नमत्रिभुवन- प्रभवे जिनाय ॥ २॥ प्रासादचैत्यनिलयाः परिखात वल्लिः । प्रोद्यान- केतुसुरवृक्षगृहांगणाश्च ॥ पीठत्रयं सदसि यस्य सदा विभाति । तस्मै नम- त्रिभुवनप्रभवे जिनाय ॥ ३॥ मालामृगेन्द्रकमलांबरवैनतेय-मातंगगोप- तिग्थांगमयूरहसाः ॥ यस्य ध्वजा विजयिनो भुवने विभांति । तस्मै नम- त्रिभुवनप्रभवे जिनाय॥४॥ निग्रंथकल्पवनितावतिका भभौमनागस्त्रियो भवनभौमभकल्पदेवाः । कोष्ठस्थिता नृपशवोऽपि नमति यस्य तस्मै नम- त्रिभुवनप्रभवे जिनाय ।। ५ ॥ भापाप्रभावलयविष्टरपुष्पवृष्टिः पिंडिद्रुम- स्त्रिदशद्दुभिचामराणि । छत्रत्रयेण सहितानि लसंति यस्य तस्मै नमस्त्रि- भुवनप्रभवे जिनाय ॥६॥ शृंगारतालकलशध्वजसुप्रतीक-श्वेतातपत्र- वरदर्पणचामराणि ॥ प्रत्येकमष्टशतकानि विभाति यस्य तस्मै नमस्त्रिभुवन- प्रभवे जिनाय ॥ ७ ॥ स्तंभप्रतोलिनिधिमार्गतडागवापी क्रीडाद्रिधूपघट- तोरणनाटयशालाः । स्तूपाश्च चैत्यतरवो विलसति यस्य तस्मै नमस्त्रिभु- वनप्रभवे जिनाय ॥ ८॥सेनापतिस्थपतिहर्म्यपतिद्विपाश्व स्त्रीचक्रचर्म- मणिकाकिणिकापुरोधाः । छत्रासिदडपतयः प्रणमति यस्य तस्मै नमस्त्रि- भुवनप्रभवे जिनाय ॥ ९॥ पद्मःकालो महाकालः सर्वरत्नश्च पांडकः । [२२५] -- नैसो माणवाशङ्खः पिंगला निधयो नव ॥ एतेषां पतयः प्रणमंति यस तस्मै नमस्त्रिभुवनप्रभवे जिनाय ॥ १० ॥ खवियघणघाइकम्मा चउती- सातिसयविसेसपञ्चकल्लाणा अहवरपाडिहेरा अरहता मङ्गला मज्झ ।।११॥ चैत्यभक्तिः। हरिणी छन्द:- जयति' भगवान् । हेमाम्भोजप्रचारविजम्भिता- वमरमुकुटच्छायोद्गीर्णप्रभापरिचुम्बितौ। कलुषहृदयामानोद्धान्ताः' परस्परवैरिणः, विगतकलुपाः पादौ यस्य प्रपद्यविशश्वसुः ॥१॥ अन्वयार्थ:- (हेमाम्मोजत्रचारविज़म्भिती) स्वर्णके कमलोंपर दूसरे मनुष्यों के लिये असंभव ऐसे क्रमसे पैर रखनेके क्रमसे रहित जिनका गमन शोभा- यमान होता है और ( अमरमुकुटच्छायोद्गीर्णप्रभापरिचुम्बितौ ) देवोंके मुकुटों में लगे हुये मणियोंसे जो प्रभा निकलती है उसके संयोगसे जिनके चरण स्पर्श किये गये हैं ऐसे ( यस्य ) जिन जिनेन्द्र भगवान्के ( पादौ) दोनों चरणकमलों का (प्रपद्य ) आश्रय लेकर ( कलुषहृदयाः) क्रूर हृदयवाले ( मानोद्भान्ताः) अहंकारभावके कारण आत्मस्वभावसे च्युत हुए ( परस्परवैरिणः ) परस्परमें वैर रखनेवाले सर्प नौला आदिक जीव ( विगतकलुषाः ) वैरभावसे रहित होकर (विशश्वसुः) परस्पर विश्वासको प्राप्त होते हैं वे (भगवान् ) श्री जिनेन्द भग• वान् ( जयति ) जयवन्त होओ। १-सर्वोत्कर्षण वर्तते। २-इन्द्रादीना पूज्यः केवलज्ञानसम्पन्नो वा। ३-सक्लिष्टी, प्रालिगिती। ४-करमनसाः ५-मानेनाहकारेण स्तब्धत्वेन उत्क्रान्ताः, यथावदात्मस्वरूपात्मच्याविताः । ६-बहिनकुलादयः । ७-विनष्टयूरभावाः। ८-विश्वासं गताः। [२२६ .

विशेप-भगवान् अरहंतदेव जब विहार करते हैं तब आगे पीछे पैर रखते हुये नहीं चलते कितु दोनों चरण कमल समान रखते हुये-एक साथ उठाते हुये विहार करते हैं । वे आकाश में विहार करते है । चरण कमलों के नीचे देव लोग सुवर्णमय कमलोंकी रचना करते जाते हैं । उस समय भगवान्के चरण कमलों की शोभा बड़ी ही अच्छी जान पड़ती है। तदनु जयति श्रेयान्धर्मः प्रवृद्धमहोदयः। कुगतिविपथक्लेशाधोसौ विपाशयति प्रजाः । परिणतनयस्यांगीभावाद्विविक्तविकल्पितम्, भवतु भवतस्त्रात त्रेधा जिनेन्द्रवचोऽमृतम् ।। २ ।। अन्वयार्थ:-( तदनु ) श्री अरहत परमेष्ठीको नमस्कार करने के बाद (श्रेयान् ) अत्यत प्रशसनीय-स्वर्गादिक पदकी प्राप्ति रूप (प्रवृद्धमहोदयः) जिसका उदय अत्यन्त वृद्धिको प्राप्त हो गया है (कुगतिविपथक्लेशाध:') नरकादि दुर्गति, मिथ्यादर्शन आदि खोटे मार्ग और दुःखोंसे (प्रजाः२) जो समस्त प्रजाको ( विपाशयति') छुड़ाता है (असौ धर्मः' ) ऐसा जिनधर्म (जयति) चिरकाल तक जयशील होओ। (परिणतनयस्य" अगीभावात् ) द्रव्यार्थिकनयको गौणकरके-पर्यायार्थिकनयको मुख्य करके (विविक्तविकल्पितं*) गणधरादिके द्वारा रचे गये (त्रेधा) तीन प्रकारके-उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यरूप अथवा अंग, पूर्व, अंगबाह्यस्वरूप ( जिनेन्द्रवचः अमृतं ) जिनेन्द्र भगवान्के पचनरूपी अमृत ( भवतः) आप लोगोंको (त्रातृ भवतु) संसारसे पार करने वाले-ससारके दुःखोंसे बचानेवाले होश्रो । तदनु जयताज्जैनी वित्तिः प्रभंगतरंगिणी । प्रभव विगमध्रौव्यद्रव्यस्वभावविभाविनी ॥ । ॥ १-कुत्सिता गतिः कुगतिः । विरूपकः पथा:-विपथो मिथ्यादर्शनादिः । क्लेशो दुःखं । २-लोकान् । ३-पाशाद्विमोचयति । ४-नरकादिपु गतिपु पततः प्राणिनो धरतीति धर्म उत्तमक्षमादिलक्षणश्चारित्रस्वरूपो वा । ५-विविधपर्यायरूपतया परिणमते यत्तत्परिणत द्रव्यमुच्यते तत्र नयः परिणतनयों द्रव्यार्थि- कनयः तस्य श्रङ्गीभावात् अप्रधानभावात् पर्यायार्थिकनयप्राधान्यादित्यर्थः। गणधरादिभिः रचित । ६-जात-रक्षक। [२२७] निरुपमसुखस्येदं वारं विघटथ निरर्गलम् । विगतरजसं मोक्षं देयान्निरत्ययमव्ययम् ।। ३ ।। अन्वयार्थ-- (तदनु) तत्पश्चात् (प्रभंगतरगिणी) जिसमें 'स्यादस्ति, स्यान्नास्ति' इत्यादि मगरूपी तरगें उठती हैं-(प्रभवविगमध्रौव्यद्रव्यस्वभावविभा- विनी ) जो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यस्वरूप द्रव्यके स्वभावको प्रकाशित करने वाला है ऐसा ( जैनी वित्तिः ) यह जिनेन्द्रदेव सम्बन्धी केवलज्ञान (जयतात) जयवन्त होओ-मति ज्ञानादिककी अपेक्षा उत्कर्परूप से रहो। ( इद ) इस प्रकार मरहंतदेव, वीतरागधर्म, स्याद्वादरूप वाणी और केवलज्ञान स्तुति किये गये थे चारों ( निरुपमसुखस्य द्वार) निरुपमसुखके द्वाररूप (मोक्ष) मोक्षको (निरर्गलं ) अर्गल रहित-खुले हुये कपाटयुगलके समान मोहनीयकर्मको व अतरायकर्मको (विधव्य ) नाश करके ( निरत्यय, अव्यय, विगतरजसं) व्याधि रहित, अविनाशी, ज्ञानावरणी दर्शनावरणीकर्म रहित ( देयात्) मोक्षपदको देवे। श्रार्या- अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायेभ्यस्तथा च साधुभ्यः । सर्वजगद्वंद्येस्यो नमोस्तु सर्वत्र सर्वेभ्यः ॥ ४ ॥ अन्वयार्थ:-( सर्वजगद्वद्येभ्यः ) तीनों लोकोंके समस्त प्राणियों द्वारा बदनीय ( सर्वत्र सर्वेभ्यः अहत्सिद्वाचार्योपाध्यायेभ्यः तथा च साधुभ्यः) सब स्थानोंके समस्त भरहत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्यायोंको और समस्त साधुवोंको (नमोऽस्तु ) नमस्कार हो। अरहतदेवको पुनः नमन- मोहादिमर्षदोपारिघातकम्यः सदाहतरजोभ्यः । विरहितरहस्कतेभ्यः पूजाहेभ्यो नमोऽईद्भया ॥ ५ ॥ अन्वयार्थ:-(मोहादिसर्वदोषारिघातकेभ्यः ) मोहादि सर्व दोपोंका घात करनेवाले (सदाहतरजोभ्यः ) सर्वदाके लिये जिन्होंने ज्ञानावरण तथा दर्शना- वरण कर्मका नाश कर दिया है (विरहितरहस्कृतेभ्यः) अतरायकर्मका भी जिन्होंने नाश कर दिया है (पूनाभ्यः ) इन्द्रादिक देवोंसे पूजनीक ऐसे (भई- म्य: नमः ) अरहंतोंको नमस्कार हो। (२२८ . धर्मको नमस्कार- क्षान्त्यार्जबादिगुणगणसुसाधनंसकललोकहितहेतुम् । शुभधामनि धातारं वंदे धर्म जिनेन्द्रोक्तम् ॥ ६ ॥ अन्वयार्थ:-- ( क्षात्यार्जवादिगुणगणसुसाधनं ) उत्तम क्षमा, मार्दव, मार्जव भादि दश धर्मरूपी गुणों के समूहका जो साधन है, (सकललोकहित- हेतु ) समस्त प्राणियोंके जो हितका कारण है (शुभधामनि धातारं ) जो, उत्तम स्थान जो मोक्ष उसमें रखनेवाला है ऐसे ( जिनेन्द्रोक्तं ) भगवान जिनेन्द्रदेवके द्वारा कहे हुये ( धर्म वढे ) धर्मको नमस्कार करता है। जिनवाणीकी स्तुति- मिथ्याज्ञानतमोवृतलोकैकज्योतिरमितगमयोगि। सांगोपांगमजेयं जैनं वचनं सदा वंदे ॥ ७.॥ अन्वयार्थ:-- (मिथ्याज्ञानतमोवृतलोकैकज्योतिः) नो मिथ्याज्ञानरूपी अधकारसे आच्छादितसे लोगोंको अद्वितीय ज्योतिरूप है (अमितगमयोगि) असल्यातरूप समस्त पदार्थोंकों विषय करनेवाला जो श्रुतज्ञान उसका जिस जिनवाणीके साथ कार्यकारणभावसम्बन्ध है ( सागोपागं) जो पाचारादि अग और पूर्व वस्तु मादिक उपागसे युक्त है (अजेय ) एकातवादियोंके द्वारा जो जीता नहीं जा सकता ऐसे (जैन वचनं ) जिनेन्द्रदेवके वचनोंको (सदा वंदे) सर्वदा वदना करता है। भगवान्की प्रतिमाको नमस्कार- भवनविमानज्योतिव्यतरनरलोकविश्वचैत्यानि । त्रिजगदभिवंदितानां त्रेधा वदे जिनेन्द्राणाम् ।।८।। अन्वयार्थ:-- (त्रिजगदमिवदिताना ) जिनको तीनो लोकोंके समस्त प्राणी नमस्कार करते हैं ऐसी (जिनेन्द्राणा) जिनेन्द्रदेव की ( भवनविमान- ज्योतिव्यतरलोकविश्वचैत्यानि) भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिक देवोंके समस्तनिवासस्थानों में और मनुष्य लोकमें-मध्यलोकमें मी सब जगह विराजमान प्रतिमाएं हैं उन सबको (त्रेधा ) मन, वचन, कायसे वढे नमस्कार करता है। [२२] - .

चैत्यालकी स्तुति- भुवनत्रयेऽपि भुवनत्रयाधिपाभ्यर्च्यतीर्थकर्तृणाम् । वदे भवाग्निशान्त्यै विभवानामालयालीस्ताः ॥ ९ ॥ अन्वयार्थ:-(विभवाना' ) जो जन्ममरणरूप संसार से सर्वथा रहित हैं (भुवनत्रयाधिपाभ्यर्चतीर्थकर्तृणा) तीन लोकोके खामी जो देवेन्द्र, नरेन्द्र, धरणेन्द्र आदिके द्वारा सदापूज्य ऐसे तीर्थंकर परमदेवके ( यालयालीः) भवन चैत्यालय (भुवनत्रये अपि) इन तीन लोकोमें जितने हैं (ताः ) उन सबको मैं ( भवाग्निशात्यै ) अनेक प्रकारके दुःखरूप सतापका कारण ऐसी संसाररूपी अग्निको शात करनेके लिये ( वंदे) नमस्कार करता है। स्तुतिका उपसहार तथा फल याचना- इति पञ्चमहापुरुषाः प्रणुता जिनधर्मवचनचैत्यानि । चैत्यालयाश्च विमलां दिशन्तु बोधि वुधजनेष्टाम् ॥ १० ॥ अन्वयार्थ:- ( इति ) इसप्रकार ( पञ्चमहापुरुषाः२) पंच परमेष्ठियों की ( जिनधर्मवचनचैत्यानि ) जिनधर्म, जिनवचन जिनवाणी, जिन प्रतिमा (च चैत्यालयाः) और जिनालयोंकी (प्रणुता )स्तुतिकी है । अतः ये सब (विमला) अत्यन्त निर्मल (बुधजनेष्टा") गणधरादिक विद्वानोंको भी इष्ट (बोधि) ऐसे रत्नत्रयको ( दिशन्तु ) देवें। कृत्रिम अकृत्रिम जिन प्रतिमाओकी स्तुति- अकृतानि कृतानि चाप्रमेयधुतिमति द्युतिमत्सु मंदिरेषु । मनुजामरपूजितानि वंदे प्रतिबिंवानि जगत्त्रये जिनानाम् ।।११।। अन्वयार्थ:-(जगत्त्रये) तीनों लोकोंमें (द्युतिमत्सु मदिरेषु ) अत्यन्त दैदीप्यमान समस्त जिनालयोंमें (जिनाना) भगवान् जिनेन्द्रदेवकी ( मनुजा- मरपूजितानि ) मनुष्य और देवों के द्वारा पूज्य ऐसे (अप्रमेयद्युतिमति कृतानि च अकृतानि प्रतिबिवानि वदे) अपार-अत्यन्त दैदीप्यमान कृत्रिम और अकृत्रिम प्रतिमाओंको नमस्कार करता हू। १-विनष्टससाराणा। २-पंच परमेष्टिन.। ३-स्तुताः। ४-निर्मला, क्षायिकी। ५-नाणधरदेवादयस्तेषामभिप्रेताम् । ६-सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रप्राप्ति। ७-प्रयच्छतु । [२३०] द्युतिमण्डलभासुरांगयष्टीः प्रतिमा अप्रतिमा जिनोत्तमानाम् । भुवनेषु विभूतये प्रवृत्ता वपुपा प्रांजलिरसि वंदमानः ॥ १२ ॥ अन्वयार्थ --(धुतिमण्डलभासुरागयष्टीः) कातिमण्डलसे जिनका शरीर टैदीप्यमान हो रहा है ऐसी (भुवनेषु प्रवृत्ताः) तीनों लोकोंमें विराजमान ( जिनोत्तमाना) देवाधिदेव जिनेन्द्र भगवान् की ( वपुषा अप्रतिमाः प्रतिमाः) तेजसे या स्वस्वरूपसे उपमा रहित प्रतिमाओंको ( विभूतये ) अरहत आदि परमेष्ठियोंकी विशेप विभूति प्राप्त करनेके लिये अथवा स्वर्ग, मोक्ष देनेवाले पुण्य की प्राप्तिके लिये ( वदमान ) नमस्कार करता हुआ (प्राजलिः अस्मि) हाथ जोड़कर खड़ा होता है। विगतायुधविक्रियाविभूपाः प्रकृतिस्थाः कृतिनां जिनेश्वराणाम् । प्रतिमाः प्रतिमागृहेषु कान्त्याप्रतिमाः कल्मपशांतयेऽभिवदे ।। १३॥ अन्वयार्थ:-(कृतिना जिनेश्वराणा)कृतकृत्य जिनेन्द्र भगवान्की (विग- तायुधविक्रियाविभूपाः) आयुध-शस्त्र, नानाप्रकारके विकार और अलकारों से रहित (प्रकृतिस्था. ) अपने स्वरूपमें स्थित (कान्या अप्रतिमा: ) तेज-काति से अतुल्य अनुपम ( प्रतिमागृहेषु प्रतिमाः ) ऐसी जिनालयमें स्थित प्रतिमाओंको ( कल्मपशान्तये अभिवटे ) मै अपने पापोंको नाश करनेके लिये सन्मुख होकर वदना करता। कथयन्ति कपायमुक्तिलक्ष्मी' परया शांततया भवांतकानाम् । प्रणमाम्यभिरूपमृनिमंति प्रतिरूपाणि विशुद्धये जिनानाम् ॥१४॥ अन्वयार्थ:-- ( भवान्तकाना जिनाना ) जन्ममरणरूप ससारको नाश करनेवाले भगवान् जिनेन्द्रदेवकी (अभिरूपमूर्तिमति ) चारों ओरसे अत्यन्त सुन्दरताको धारण करनेवाली ( प्रतिरूपाणि ) जो प्रतिमाएं (परया शांततया) अपनी अत्यन्त शातताके द्वारा ( कपायमुक्तिलक्ष्मी कथयति ) कषायोंके अभाव होनेसे प्राप्त होनेवाली अतरगबहिरग लक्ष्मीकी प्राप्तिको सूचित करती हैं, उन १-कपायाणा मुक्तिरभाव. तस्या लक्ष्मी-सपत्ति। २-परमोपशातमूर्त्या। ३-प्रतिबिबानि । ४-कर्ममलप्रक्षालनाय । (२३१] प्रतिमाओंको ( विशुद्धये ) अपने कर्मरूपी मलको दृरकर आत्माको प्रत्यत विशुद्ध बनानेके लिये (प्रणमामि) नमस्कार करता है। स्तुतिके फलकी प्रार्थना- यदिदं मम सिद्धभक्तिनीतं सुकृतं दुष्कृतवर्मरोधि तेन । पटुना जिनधर्म एव भक्तिर्भवताजन्मनि जन्मनि स्थिरामे ॥१५॥ अन्वयार्थी--(सिद्धभक्तिनीतं ) तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध ऐसी भगवान् जिने- न्द्रदेवकी प्रतिमाओंकी भक्ति करनेसे ( मम ) मुमे (यत् इद) जो कुछ (सुकृत') पुण्यकी प्राप्ति हुई है, जिससे (दुष्कृतवमरोधि ) मन, वचन, कायके द्वारा होनेवाला समस्त पाप रुक जाता है ऐसे (प्टुना तेन ) अत्यन्त सामर्थ्यको धारण करनेवाले उस पुण्यसे ( मे जन्मनि जन्मनि ) मुझे जन्म जन्ममें -भत्र भवमें (स्थिरा') सदा स्थिर रहनेवाली ( जिनधर्म एव भक्ति. भवतात ) जिन- धर्मकी ही भक्ति प्राप्त हो। चारों प्रकारके देवोंके विमानोंमें व मनुष्यलोकमें होनेवाले चैत्यालयोंकी स्तुति- -अनुष्टुप- अर्हतां सर्वभावानां" दर्शनज्ञानसंपदाम् । कीर्तियिष्यामि चैत्यानि यथावुद्धि विशुद्धये ॥१६॥ अन्वयार्थ:-(सर्वभावाना) समस्त पदार्थोंको एक साथ जाननेवाले, (दर्शनज्ञानसंपदा) दायिकदर्शन, दायिकज्ञानरूपी संपत्तिको धारण करने वाले अथवा क्षायिकदर्शन, क्षायिकज्ञानसे प्रगट होनेवाली समवशरणादि विभूति १-पुण्यं । ३-भवे मवे। २-समर्थेन । ४-अविचला। ५-सर्वे-निशेषाः भावा:-पदार्थाः विषयो येपा । *दर्शननानयोः क्षायिकरूपयो. सपयेषा, तयोर्चा सतोः सपत्समवसरणादिविभूतियेषाम्। ६-स्तीध्ये। ७-प्रतिबिंबानि। ८-स्त्रमतिविभवानतिक्रमेण । ६-मंमलप्रतालनाय । [२३२] .

को धारण करनेवाले (महतां ) भगवान् जिनेन्द्रदेवकी (चैत्यानि ) जितनी प्रतिमाएं हैं उनकी मै ( विशुद्धये) कोंको नाश करनेके लिये ( यथाबुद्धि) बुद्धिके अनुसार (कीर्तियिष्यामि) स्तुति करूगा या करता हू। श्रीमद्भावनवासस्था स्वयभासुरमूर्तयः । चंदिता नो विधेयासुः' प्रतिमाः परमा गतिम् ॥१७॥ अन्वयार्थ:-( स्वयंभासुरमूर्तयः ) जिनकी मूर्ति अपने आप दैदीप्यमान हो रही हैं ऐसी (प्रतिमा.) भगवान् जिनेन्द्रदेवकी जो प्रतिमायें ( श्रीमद्भावनवा- सस्याः) बड़ी विभूतको धारण करनेवाले भवनवासियोंके भवनों में विराजमान हैं (वदिता ) उनकी वदना करनेसे (न:) हमको (परमा गति ) मोक्षरूप परमगतिको ( विधेयासुः) देवे । यावंति संति लोकेऽसिनकृतानि कृतानि च । तानि सर्वाणि चैत्यानि वंदे भूयांसि मृतये ॥ १८ ॥ अन्वयार्थ:- (अस्मिन् लोके ) इस मध्यलोकमें ( यावंति भूयासि ) जो बहुत सी (अकृतानि च कृतानि ) अकृत्रिम भौर कृत्रिम (चैत्यानि) प्रतिमाएँ :- (सति) हैं (तानि सर्वाणि) उन सबको मै (भूतये ) मोक्षकी परमविभूति प्राप्त करनेके लिये ( वदे ) नमस्कार करता हूं। ये व्यन्तरविमानेषु स्थेयांसः प्रतिमागृहाः। ते च संख्यामतिकांताः सन्तु नो दोषविच्छिदे ॥ १९॥ अन्वयार्थ:-(व्यन्तरविमानेषु ) व्यन्तरदेवोंके विमानोंमें (ये स्थेयासः) जो सदा स्थिर रहनेवाले (प्रतिमागृहाः) प्रतिमाओंके स्थान हैं-चैत्यालय हैं (ते च संख्या प्रतिकाताः ) उनकी संख्या असख्यात है, वे सब चैयालय (नः) हमार (दोषविच्छिटे ) रागद्वेषादि दोपोंको नाश करनेवाले (सतु) हों। ज्योतिपामथ लोकस्य भूतयेऽद्भुतसंपदः । गृहाः स्वयंभुवः''संति विमानेषु नमामि तान् ॥ २० ॥ १-क्रियासुः। २-मुक्ति। ३-यत्परिमाणानि। ४-तिर्यग्लोके । ५-प्रचुरतराहि । ६-विभूत्यर्थ । ७-अतिशयेन स्थिरा., सर्वदावस्थायिनः । ८-असंख्याताः। ६-दोपशान्तये-रागाद्युपरमाय। १०-विभूतिनिमित्तं । ११-अर्हतः । [२३३] अन्वयार्थ - (अथ) तत्पश्चात् (ज्योतिपा लोकस्य) ज्योतिपी देवोंके (विमानेषु ) विमानों में जो (स्वयंभुः ) जिनेन्द्रदेवके (अद्भुतमंपदः) अत्यत पाश्चर्य उत्पन्न करनेवाली सपत्तिको धारण करनेवाले (गृ : मनि ) चैत्यालय हैं ( तान् ) उनको मैं ( भूतये ) समवसरणादि विभूति प्राप्त करनेके लिये (नमामि ) नमस्कार करता है। वदे सुरति रीटाग्रमणिच्छायामिपेचनम् । याः क्रमेणैव सेवन्ते तदर्चाः सिद्धिलब्धये ॥ २१ ॥ अन्वयार्थः-(सुरकिरीटाग्रमणिच्छायाभिपेचन) वैमानिक देवोंके मुकुटोंके अग्रभागमें लगी हुई मणियोंकी कातिसे जिनके चरण कमलोंका अभिषेक किया जाता है, (तदर्चाः ) उन्हीं वैमानिक देवोंमे पूजनीक (याः क्रमेण एव सेवन्ते) जो चरण कमलोंसे ही पूजे जाते हैं अर्थात् देव भगवानके चरण कमल की ही पूजा करते हैं , उन प्रतिमाओंको में (सिद्धिलब्धये ) मोक्ष प्राप्तिके लिये (वंदे) नमस्कार करता है। स्तुतिके फलकी प्रार्थना- इति स्तुनिपथातीतश्रीभृतामहतां मम | चत्यानामस्तु संकीति' सर्वास्रवनिरोधिनी ।। २२ ॥ अन्वयार्थ:-(सने ) इसप्रकार (स्तुतिपथातीतश्रीमृता अर्हता) जिनकी स्तुति करनेके लिये अशक्य है, ऐसे अतरग और बहिरंग लक्ष्मीको धारण करने वाले अरहत परमेष्ठीकी (चत्याना सक्रीनिः) प्रतिमाओंकी स्तुति ( मम ) मुझे (सर्वान्नवनिरोधिनी यस्तु ) समस्त कमाके आवको रोकनेवाली हो-मोक्ष प्राप्त करानेवाली हो। महानदकी उपमा महित अग्हंतदेवका स्वरूप- स्कदछट.- अहन्महानदस्य त्रिभुवनभव्यजनतीर्थयात्रिकदुरितम् । प्रक्षालनेककारणमतिलौकिककुहकतीर्थमुत्तमतीर्थम् ॥ २३ ॥ (त्रिभुवनभव्य जनतीर्थयात्रिकदुरित , जो तीन लोकवर्ती (१) किरीटाव इत्यपि पाठ । (२) स्नुति । [२३४] अन्वयार्य:

Hic भयजीवरूपी तीर्थकी यात्रा करनेवालोंवे पापक को (क्षानककरण ) प्रदा- लन करनेमें एक अद्वितीय करण है, (अतिलौकिक कुइवतीर्थ उत्तमतीर्थ ) जो लौकिक व्यवहारी ज्गोंके द्वारा माने हुए खोटे तीर्थको उलइन करनेवाला है और जो अमावाण है ऐसा (अहन्महानदस्य ) अरहत परमेष्टाका महान् द्वादशाग. पी तीर्य मध्वा जिनधर्मरूपी तीर्थ हम लोगोंके पापपकको दूर करो। भावार्थ -नदियों का प्रवाह पूर्व दिशाकी ओर होता है परत जिनका प्रवाह पश्चिमकी अोर हो उनको 'नद' कहते हैं । आचार्य ने भगवान् अरहतदेवको भी एक नद बनाया है। क्योकि नसारन्पी नदीका प्रवाह अनादि कालसे चल । भगवान अरहतदेवता प्रवाह उससे सर्वथा विपरीत है । जीवोंका प्रवाह नमारकी ओर जा रहा है और अरहत भगवानका प्रवाह मोक्षकी ओर जा रहा है । इसीलिये इनको श्राचार्यने 'नद' की उपमा दी है । यह अहतरूपी 'नट' बहुत विस्तृत है. इसलिये इसको 'महानद' कहते हैं। जिसप्रकार महानदमें तीर्थ होते हैं उसीप्रकार इसमें भी ग्यारह अग, चौदह पूर्वरूपी उत्तम्तीर्थ हैं । जिनके द्वाग यह जीव संसारसे पार हो जाय उनको 'तीर्थ' कहते हैं । इन द्वाद- शागसे संसारके प्राणी तिर जाते हैं, इसलिये इस द्वादशागको निरूपण करनेवाला भगवानका मत सबसे उत्तम तीर्थ है । नदोंके तीर्थसे शरीरका मल दूर होता है परंतु भगवान् अरहतदेवरूपी महानटके तीर्थमें स्नान करनेसे पापरूपी समस्त मल नष्ट हो जाते हैं और भव्यजीवोंको मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है । ससारमें अन्य जितने तीर्य हैं, सब दम और ढोंगसे भरे हुए हैं परंतु भगवान मरहतरूपी महानदका तीर्थ उन सबको नीचा दिखाता है और अपनी उत्तमता प्रगट करता है । यह तीर्थ असाधारण है, सर्वश्रेष्ठ है। तीनों लोकोंमें यात्रा करनेवाले भव्य- जीवोंके पापोंको नाश करने में यह अरहंत भगवानरूपी महानदका तीर्थ एक मदितीय कारण है, इसीलिए यह एक अलौकिक और महाउत्तमतीर्थ है । ऐसा यह भगवान् अरहतदेवरूपी महानदका तीर्थ मेरे सब पापोंको नाश करो। कदाचित् कोई यह कहे कि तीर्थका प्रवाह बहता है, इस अरहंतदेवरूपी महानदका प्रवाह नहीं बहता होगा। उसके लिये प्राचार्य कहते हैं- लोकालोकसुतच्चप्रत्यवयोधनसमर्थदिव्यज्ञान-1 प्रत्यहवहत्प्रवाहं व्रतशीलामलविशालकूलद्वितयम् ॥ २४ ॥ [२३५ ] अन्वयार्थ:- (लोकालोकसुतत्त्वप्रत्यववोधनसमर्थदिव्यज्ञानप्रत्यहवह प्रवाह) लोक और अलोक का जो स्वरूप है-जीवादिक पदार्थों का जो यथार्थ स्वरूप है उसको पूर्णरूपसे जाननेकी सामर्थ्य रखनेवाला जो केवलज्ञानरूप दिव्यज्ञान है उसका प्रवाह इस भगवान् अरहतदेवरूपी महानद से प्रतिदिन बहता रहता है और (व्रतशीलामलविशालकूलद्वितयम् ) पाच महाव्रत और अठारह हजार भेदोंके लिये हुये शील ये दोनों ही उस महानदके निर्मल और विस्तीर्ण किनारे हैं। यहापर कदाचित कोई यह कहे कि महानदके किनारे राजहस रहते है, वह गमीर शब्दसे गर्जता रहता है और बालूसे सुशोमित रहता है ये सब शोभाए इस अरहंतदेवरूपी महानदमें नहीं होंगी। इसके लिये आचार्य कहते हैं- शुक्लध्यानस्तिमितस्थितराजद्राजहंसराजितमसकृत्-1 खाध्यायमद्रघोष नानागुणसमितिगुप्तिसिकतासुभगम् ॥२५॥ अन्वयार्थ:--इस अरहतदेवरूपी महानदके किनारे (शुक्लध्यानस्तिमि- तस्थितराजद्राजहसराजितं) शुक्लध्यान रूपी राजहस अत्यंत स्थिरताके साथ खड़े हुए बहुत ही अच्छे जान पड़ते है, उनसे यह महानद बहुत ही शोभा- यमान रहता है (असकृत्स्वाध्यायमन्द्रघोष ) लाभ, पूजा, कीर्तिकी इच्छाके विना जो सर्वदा स्वाध्याय होता रहता है, उसकी गमीर ध्वनि उस महानदकी मनोहर ध्वनि होती रहती है ( नानागुणसमितिगुप्तिसिकतासुभगन् ) अनेक प्रकारके-चौरासीलाख सख्याको धारण करनेवाले उत्तर गुण, पाच समिति तीन गुप्ति ये ही सब उस महानदमें सुन्दर बालू है, उससे वह महानद अपूर्व ही शोभा को धारण करता है । ऐसा वह अरहतदेवरूपी महानद मेरे सब पापोंको दूर करो। कदाचित् कोई यह कहे कि अन्य महानदोंके तीर्थमें भ्रमर पड़ते हैं, चारों ओर पुष्पलताऐ होती है और उसमें सदा लहरें उठती रहती हैं। यह सब शोभा इस अरहतदेवरूपी महानद में नहीं है । इसलिये प्राचार्य कहते हैं- क्षान्त्यावर्तसहस्र सर्वदयाविकचकुसुमविलसल्लतिकम् । दुःसहपरीपहाख्यदुततररंगत्तरंगभंगुरनिकरम् ।। २६ ॥ अन्वयार्थ :-- (क्षात्यावर्तसहस्र ) भगवान् अरहतदेवरूपी महानदमें उत्तमक्षमाके हजारों भ्रमर सदा पडते रहते हैं (सर्वदयाविकचकुसुमविलसल्लतिक) [२३६] समस्त प्राणियोंकी दया ही खिले हुये फूलोंसे सुशोमित रहनेवाली लता वहापर सदा शोभाको बढ़ाती रहती है तथा (दु सहपरीषहाख्यद्रुततररगत्तरभंगुरनिकर) जो बड़ी कठिनतासे सही जा सकें ऐसी तुधा, पिपासा आदि वाईस परिषह ही उसमें अतिशीघ्रताके साथ चारों ओर फैलती हुई और क्षणक्षणमें नाश होती हुई लहरें सदा उठती रहती हैं । ऐसा वह अरहुतटेवरूपी महानद मेरे समस्त पापोंको दूर करें। कदाचित् कोई यह कहे कि महानदमें फेन या झाक नहीं होते, शैवाल या काई नहीं होती, कीचड़ नहीं होती और मगर मच्छ नहीं होते। तभी उस तीर्थकी सेवाकी जाती हैं परंतु इस महानदरूपी तीर्थमें ये होंगे। इसके उत्तरमें आचार्य कहते हैं-- व्यपगतकपायफेनं रागद्वेपादिदोपशवलरहितम् । अत्यस्तमोहकर्दममतिदूरनिरस्तमरणमकरप्रकरम् ॥ २७ ॥ अन्वयार्थ:-फेन पानीको शुद्ध नहीं होने देता-मलिन कर देता है । जिस प्रकार तीर्थ में फेन नहीं होता उसीप्रकार अरइंतटेवरूपी महानदमें (व्यपगत- कपायफेन ) आत्माको कलुपित करनेवाला कषायरूपी फेन सर्वथा नहीं होता। जिसप्रकार तीर्थमें शैवाल-काई नहीं होती क्योंकि काई होनेसे मनुष्य पैर फिसल कर गिर पड़ता है । उसीप्रकार अरहतदेवरूपी महानदमें ( रागद्वेषादिदोषशैव- लरहित ) रागद्वेष आदि दोपरूपी शैवाल नहीं होते | जिसप्रकार शैवाल गिरने का कारण है उसीप्रकार रागद्वेष आदि दोष मी व्रतियोंको अपने व्रतसे गिरा देते हैं, इसीलिये वे अरहंतदेवरूपी महानदमें कभी नहीं होते और इसीलिये उनका आत्मारूपी जल अत्यन्त निर्मल और शुद्ध रहता है। जिसप्रकार महानद में कीचड़ नहीं होती-यदि कीचड हो तो पानी गदला हो जाता है। यदि कीचड़ न हो तो पानी स्वच्छ निर्मल रहता है । और उसके मीतरके पदार्थ स्पष्ट दिवाई देते हैं उसीप्रकार भगवान् अरहतदेवरूपी नदमें ( अत्यस्तमोहकर्दम ) मोह- रूपी कीचड़ सर्वथा नहीं होती। यह मोह ही आत्माको गदला बना देता है। मोह न होने से यह आत्मा अत्यन्त निर्मल और शुद्ध हो जाता है फिर उसमें समस्त पदार्थ स्पष्ट दिखाई देते हैं । जिसप्रकार तीर्थमें मगर मच्छ नहीं होते-यदि मगर मच्छ हो तो स्नान करनेवालोंका शरीर नष्ट हो जाय । उसीप्रकार भगवान् [२३७) 1 अरहतदेवरूपी महानदमें (अतिदृ निरस्तमरणमरप्रकर) मरण रूपी मगर मच्छोंका समूह सर्वथा नहीं होता। यदि मरण हो तो शरीर भी नष्ट हो जाय परतु भगवान् अरहत देवरूपी महानद मोक्षका साक्षात कारण है । इसीलय उसमें मरणरूपी मगर मच्छोका समूह बहुत दृर रहता है । इसप्रकार अत्यन्त निर्मल वह भगवान् अरहतदेवरूपी महानद मेरे समस्त पापोको दूर करो। कदाचित् कोई यह कहे कि तीर्थके किनारे अनेक पक्षी शब्द करते रहते हैं, आते हुये पानीको वद करनेके लिये और भरे हुये पानीका निकालनेके लिये मार्ग होते हैं । ये सब बातें इस नदमें नहीं होगी। इसके लिये प्राचार्य कहते है- ऋपिवृषभस्तुतिमन्द्रोद्रेकितनि?पविविधविहगध्धानम् । विविधतपोनिधिपुलिनं सासवसंवरणनिर्जरानिःस्रवणम् ॥२८॥ अन्वयार्थ:-(ऋषिवृषभस्तुतिमन्द्रोद्रेकिनिर्घोषविविधविहगध्वान, ऋषियो में श्रेष्ठ ऐसे गणधरादिक देव जो भगवानकी स्तुति करते हैं उनके जो अत्यन्त गंमीर और मनोज्ञ शब्द होते हैं उन शब्दोंके द्वारा होनेवाला जो शास्त्रोका पाठ है वही पाठ उस अरहतदेवरूपी महानदमें अनेक प्रकारके पक्षियोंके शब्द समझने चाहिये । जिसप्रकार तीर्थों में ऊचे किनारे होते हैं-जहापर बहनेवाले लोग तिरकर पहुच जाते है उसीप्रकार उस अरहतदेवरूपी महानदमें (विविध- तपोनिधिपुलिन ) अनेक प्रकारके तपश्चरणको करनेवाले महामुनिराज ही ऊचे किनारे है । जो प्राणी इस ससाररूपी महानदीमें बहते जा रहे हैं उनको पकड कर पार लगानेवाले वे मुनिराज ही है, इसलिये वे ही मुनिराज उस महानदके ऊचे किनारे हैं । जिसप्रकार तीर्थमें पानी अधिक होनेपर आता हुआ पानी रोक दिया जाता है और उसमें भरा हुआ पानी निकाल दिया जाता है । पाते हुये पानीको रोकने और भरे हुए पानीको निकालनेका सुमीता रहता है उसीप्रकार इस भरहंतदेवरूपी महानदमें ( सासवर्सवरणनिर्जरानि स्रवण ) कर्मोके आनेके मार्ग सब वद हो जाते हैं तथा जो पहलेके कर्म होते हैं उनकी सदा निर्जरा होती रहती है । इसप्रकार वह महानद सबर और निर्जरा दोनोंसे सुशोभित रहता है। ऐसा वह भरहतटेवरूपी महानद मेरे समस्त पापोंको दूर करो। गणधरचक्रधरेन्द्रप्रभृतिमहाभव्य पुण्डरीकैः पुरुषैः। बहुभिः स्नातं भक्त्या कलिकलुपमलापकर्षणार्थममेयम् ॥२६॥ [२३८] N अन्वयार्थ:- यह श्री अरहंतदेवरूपी महानद ( अमेयं ) अत्यन्तविशाल है, ( कलिकलुषमलापकर्षणार्थ ) इस कालमें होनेवाले पापरूपी मलोंको दूर करनेके लिये (बहुमिः अनेक गणधरचक्रधरेन्द्रप्रभृतिमहाभव्यपुडरीकैः पुरुषैः भक्त्या स्नात ) गणधर, चक्रवर्ती और इन्द्र आदि प्रधान प्रधान महाभव्य पुरुषोंको बड़ी भक्ति के साथ स्नान करने योग्य है अर्थात् ये सब महाभव्यपुरुष इस महानदमें सदा स्नान किया करते हैं और कर्मरूपी मलोंको दूर करमपने आत्माको अत्यन्त निर्मल बनाया करते हैं। अवतीर्णवतः स्नातुं ममापि दुस्तरसमस्तदुरितं दूरम् । व्यवहरतु परमपावनमनन्यजय्यम्वभावभावगंभीरम् ॥ ३० ॥ अन्वयार्थ:--(परमपावन ) श्री अरहतदेवरूपी महानद तीर्थ सबसे श्रेष्ठ है-परम पवित्र है, (अनन्यजय्यस्वभावभावगंभीर ) परवादी जिनका कमी खडन नहीं कर सकते ऐसे जीवादिक पदार्थोसे अत्यन्त गंभीर है [ जीवादिक पदार्थोंका यथार्थ स्वरूप और उनके अनन्तगुणोंका वर्णन जैसा भगवान् अरहत देवके शासन में है वैसा और किसी मल में नहीं है ] ऐसे इस अरहत- देवरूपी महानदमें ( स्नातु) स्नान करनेके लिये-कर्मरूपी मलको धो डालने के लिये मै भी ( अवतीर्णवतः) उतर पड़ा हू, इसलिये हे भगवन् ! ( ममापि दुस्तरसमस्तदुरित दूर व्यवहरतु ) मेरे अनन्त समस्त पापोंको समस्त कर्मों को बहुत शीघ्र दूर कर दीजिये । जिनेन्द्रके रूपका वर्णन- पृथ्वीछन्द - अताम्रनयनोत्पल सकलकोपबन्हेर्जयात् । कटाक्षशरमोक्षहीनमविकारतोद्रेकतः ।। विषादमदहानितः प्रेहसितायमान सदा । मुखं कथयतीव ते हृदयशुद्धिमात्यंतिकीम् ।। ३१ ।। अन्वयार्थ:-- हे प्रभो ! (सकलकोपबन्हे जयात् ) सपूर्ण क्रोधरूपी वहिको-अग्निको जीत लेनेसे ( अताम्रनयनोत्पल ) आपके ये नेत्र कमल थोड़े लाल हैं (अविकारतोदेकतः) वीतरागताके परमप्रकर्षको प्राप्त हो जाने के कारण ( कटाक्षशरमोक्षहीन ) कटाक्षरूपी वाणोके छोड़नेसे रहित हैं (विषा- [२३] , दमदहानित:) विषाद और अहकारके नष्ट हो जाने के कारण (सदा प्रह. सितायमानं )निरतर इंसते हुएकी तरह ( ते मुखं ) आपका ये मुख (आत्यंतिकी) अत्यंत (हृदयशुद्धि ) हृदयकी शुद्धिको ही (कथयति इव ) मानो कहता है । निराभरणभासुरं विगतरागवेगोदयात् । निरम्बरमनोहरं प्रकृतिरूपनिदोपतः ॥ निरायुधसुनिर्भय विगतहिस्सहिंसक्रमात् । निरामिषसुतृप्तिमद्रिविधवेदनाना क्षयात् ।। ३२ ॥ अन्वयार्थ.--( विगतरागवेगोढयात् ) जिनेन्द्र भगवान् का स्वरूप राग के वेगके उदयका अभाव हो जानेसे (निराभरणभासुर ) आभरणा के बिना भी सुन्दर है, (प्रकृतिरूपनिदोषतः) निर्दोष प्रकृति स्वरूप होनेके कारण (निरं- बरमनोहरं ) विना वस्त्रके ही सुन्दर है, (विगतहिंस्यहिंसक्रमात ) हिंस्य और हिंसक भावके नष्ट हो जानेसे (निरायुधसुनिर्भय ) विना आयुधके ही निर्भय है विविधवेदनाना क्षयात् ) जन्म, मरण आदि नानाप्रकारकी वेदनाओके नष्ट हो जाने से (निरामिषसुतृप्तिमद् ) भोजनादिसे रहित होकर मी अत्यन्त तृप्तिको प्राप्त हैं। मितस्थितनखागज गतरजोमलस्पर्शनम् । नवाम्बुरुहचंदनप्रतिमदिव्यगंधोदयम् ।। रवीन्दुकुलिशादिदिव्यबहुलक्षणालंकृतम् । दिवाकरमहसभासुरमपीक्षणानां प्रियम् ।। ३३ ।। अन्वयार्थ -(मितस्थितनखागज) जिनेन्द्र भगवान् के शरीरके नख और केश परिमित रहते हैं-बृद्धिको प्राप्त नहीं होते हैं, (गतरजोमलस्पर्शन ) रजो- मलके रूपर्शसे रहित हैं ( नवाम्बुरुहचदनप्रतिमदिव्यगधोदय) नवीन कमल और चन्दनके सदृश, दिव्य जिनके शरीरमें सुगध आती है ( रवीन्दुकुलिशादि- दिव्यबहुलक्षणालकृत ) सूर्य, चन्द्र, वज्र इत्यादि दिव्य एक हजार आठ लक्षणों से जो शोभायमान हैं ( दिवाकरसहसभासुरं अपि ईक्षणाना प्रिय ) और हजारों सूर्यके समान देदीप्यमान होते हुये भी देखनेवालोंको नो भत्यन्त प्रिय हैं। हितार्थपरिपंथिमिः प्रबलरागमोहादिभिः । कलकितमना जनो यदभिवीच्यशोशुध्यते ।। [२१०1 सदामिमुखमेव यञ्जगति पश्यतां सर्वतः । शरद्विमलचन्द्रमण्डलभिवोत्थितं दृश्यते ।। ३४ ॥ अन्वयार्थ:- ( हितार्थपरिपथिमि प्रबलरागमोहादिभिः ) हितरूपी अर्थ जो मोक्ष उसको चुरानेवाले ऐसे जो प्रबल राग और मोहादिक उनसे (कल- कितमना जनः) जिसका मन दूपित है ऐसा मनुष्य मी ( यद् अमिवीक्ष्य ) जिस सुन्दररूपको देखकर (शोशुध्यते ) शुद्ध हो जाता है, उसीप्रकार (जगति ) ससारमें ( यत् सदाभिमुख एव पश्यता सर्वतः ) जिनेन्द्र भगवान के विरागी मुखको देखनेवालोंको चारों ओर वह (शरद्विमल चन्द्रमडल इव उत्थित दृश्यते) शरदऋतुमें उदयको प्राप्त हुए स्वच्छ पूर्ण चन्द्रमाके समान दीखता है। तदेतदमरेश्वरप्रचलमौलिमालामणि- । स्फुरत्किरणचुंबनीयचरणारविंदद्वियम् । पुनातु भगवज्जिनेन्द्र तव रूपमन्धीकृतम् । जगत्सकलमन्यतीर्थगुरूपदोषोदयैः ॥ ३५ ॥ अन्वयार्थ:- (अन्यतीर्थगुरूपदोषोदयैः ) मिथ्या तीर्थक खोटे उपदेश से उत्पन्न हुए दोपोंसे (अन्धीकृत सकल जगत ) अधे हुए इस सम्पूर्ण जगत् को ( भगवत् जिनेन्द्र ! ) हे भगवन् जिनेन्द्र ! (तत् एतत् अमरेश्वरप्रचलमौलि- मालामणिस्फुरकिरणचुबनीयचरणारविंदद्वयं तव रूप पुनातु) इन्द्रादिकके नमस्कार करते समय उनके मुकुटके मणियोंकी कातिसे जिनके दोनों चरण रूपी कमल स्पर्श किये गये हैं ऐसा अत्यन्त मनोहर आपका सुन्दर रूप पवित्र करो। इसके बाद कायोत्सर्ग करना चाहिये। मालोचना--- इच्छामि भंते चेइयमति काउस्सग्गो को तस्सालोचेउं । अहलोय- तिरियलोयउडढलोयम्मि किट्टिमाकिट्टिमाणि जाणि जिणचेइयाणि ताणि सब्वाणि तिसुवि लोएसु भवणवासियवाणवितरजोइसियकप्पवासियत्ति चउविहादेवा सपरिवारा दिव्वेण गंघेण, दिवेण चुण्णेण, दिव्वेण वासेण, दिव्वेण म्हाणेण, णिच्चकालं अंचंति, पुज्जति, वदंति, णमसंति, । अहमपि इह संतो तत्थ संताई णिच्चकाल अंचेमि, पूजेमि, वंदामि, णमंसामि, [२४१] दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ, बोहिलाहो, मुगइगमणं, समाहिमरणं, जिण- गुणसंपति होउ मझं। अर्थ-हे भगवन् ! मै चैत्यभक्ति कर कायोत्सर्ग करता है। इसमें जो दोष लगे हों उनकी आलोचना करना चाहता हू । अधोलोक, मध्यलोक व ऊर्ध्व- लोकमें जो कृत्रिम वा अकृत्रिम चैत्यालय हैं उन सबकी तीनों लोकों में रहनेवाले भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिष्क और कल्पवासी चारों प्रकारके देव परिवारको साथ लेकर दिव्य गधसे, दिव्य चूर्णसे, दिव्य वस्त्रसे, और दिव्य अमिषेकसे, सदा अर्चा करते हैं, पूजा करते हैं, वदना करते हैं, और नमस्कार करते हैं। मैं मी यहा ही रहकर उसीप्रकारसे सदा समस्त चैत्यालयोंकी भर्चा करता है, पूजा करता हू, वदना करता है, और नमस्कार करता हू । मेरे दुःखोंका नाश हो, कोका नाश हो, मुझे रत्नत्रयकी प्राप्ति हो, शुभगतिकी प्राप्ति हो, समाधि- मरणकी प्राप्ति हो, और भगवान जिनेन्द्रटेवके समस्त गुणोंकी तथा विभूतियों की प्राप्ति हो। इति चैत्यभक्तिः । क्षेपक श्लोका- मानस्तमाः सरांसि प्रविमलजलसत्खातिका पुष्पवाटी। प्रकारो नाटय- शाला द्वितयमुपवनं वेदिकांतर्ध्वजाद्याः ।। शालाकल्पद्रुमाणां सुपरिवृत- वनं स्तूपहावली च । प्राकारःस्फाटिकोन्तसुग्मुनिसभा पीठिकाग्रे स्वयंभूः॥१॥ वर्षेषु वर्षान्तरपर्वतेषु, नदीश्वरे यानि च मदरेषु । याव- न्ति चैत्यायतनानि लोके सर्वाणि वंदे जिनपुङ्गवानाम् ॥ २ ॥ अवनित- लगतानां कृत्रिमाऽकृत्रिमाणाम् । वनभवनगतानां दिव्यवैमानिकानाम् ॥ इह मनुजकृतानां देवराजाचितानाम् । जिनवरनिलयानां भावतोऽहं सरामि ॥ ३ ॥ जम्बृधातकिपुष्कगर्द्धवसुधाक्षेत्रत्रये ये भवाश्चंद्रांभोजशिखडि- कण्ठकनकनावद्धनाभाजिनः। सम्यग्ज्ञानचरित्रलक्षणधरादग्याष्टकर्मेन्धनाः भूतानागतवर्तमानसमये तेभ्यो जिनोभ्यो नमः ।। ४ ॥ श्रीमन्मेरौ कुलाद्रौ [२४२] रजतगिरिवरे शाल्मलौ जंक्षे, वक्षार चैत्यवृक्ष रतिकररुचके कुण्डले मानुपांके । इवाकारेंऽजनादौ दधिमुखशिखरे व्यंतरे स्वर्गलोके । ज्योति- लोकेऽभिवंदे भुवनमहितले यानि चैत्यानि तानि ॥ ५ ॥ देवासुरेंद्रनरना- गसमचितेभ्यः, पापप्रणाशकरमन्यमनोहरेभ्यः। घंटाध्वजादिपरिवार- विभूपितेभ्यो,-नित्यं नमो जगति सर्व जिनालयेभ्यः ॥ ६ ॥ अथ कल्याणालोचना परमप्पइ वढमई परमेठीणं करोमि णवकारं । मगपर सिद्धिणिमित्त कल्लाणालोयणा चोच्छे ॥१॥ परमात्मानं वर्द्धितमर्ति परमेष्ठिनं करोमि नमस्कारम् । स्वकपरसिदिनिमित्वं कल्याणालोचनां वक्ष्ये ॥ अर्थ-जिनका ज्ञान अनत परिणाम तक बढ़ा हुआ है ऐसे अरहत परमेष्टी को मै नमस्कार करता हू तथा अपने प्रात्माकी सिद्धि के लिये और अन्य जीवों के कल्याणकी सिद्धि के लिये मै कल्याणालोचना कहता हू। रे जीवाणंत भवे संमारे संसरंत बहुवारं । पत्तो ण बोहिलाहो मिच्छत्तविजभपयडीहिं ।। २ ॥ रे जीव अनंतनवे संसारे संसस्ता वहुवारम् । प्रातोन वाधिलाभ. मिथ्यात्वविजमितप्रकृतिमि॥ रे जीव ! मिथ्यात्वकर्मकी बढ़ी हुई प्रकृतियोंके द्वारा इस अनत जन्ममरण रूप ससारमें तूने अनंतवार परिभ्रमण किया परतु अबतक तुमे रनत्रयकी प्राप्ति कमी नहीं हुई। संसारभमणगमणं कुणत आराहिओण जिणधम्मो । तेणविणा वर दुक्ख पचोसि अणतवाराइ ॥ ३ ॥ संसार भ्रमणगमन कुर्वन् शाराधितो न जिनधर्मः । तेन विना वरं दुःख प्राप्तोऽसि अनन्तवारम् ॥ अर्थ-इस ससारमें परिभ्रमण करते हुये तूने जिनधर्मका पाराधन कमी नहीं किया और उसी दिन धर्मके विना इस ससारमें तुमे अनन्तवार महा दाव [२४३ ] प्राप्त हुए है। संसार णिवसंता असतमरणाइ पाविओसि तुमं । कवलिणा विणतेसि संखापजत्ति णो हवइ ।। ४ ॥ संसारे निवसन् अनन्तमरणानि प्राशोऽसि त्वम् । केवलिना विना तेषां संख्या पर्यान्तिन भवति ॥४॥ अर्थ-इस मसारमें निवास करते हुये तूने अनन्तवार मरण किये परतु केवल उस एक जैनधर्मके विना उन मरणों की संख्या पूरी नहीं हुई, अर्थात जन्ममरण का अंत नहीं हुआ। तिष्णिसया छत्तीसा छावटिसहस्सबार मरणाइ । अंतो मुहुत्तमज्झे पत्तोसि णिगोयमझम्मि ॥ ५ ॥ त्रीणिशनि पटत्रिंशानि पट्पष्टि सहस्रवारमरणानि । अंतर्मुहर्तमध्ये प्राप्तोऽसि निगोदमध्ये ॥ ५ ॥ अर्थ-हे जीव । तने निगोढमें अर्मुहर्तकाल में छयासठ हजार तीन सौ इत्तीम बार मरण किया। वियलिदिये असीदी सट्ठी चालीसमेव जाणेहि । पंचेंदिय चउवीसं खुदृभवतोमुहचस्म ॥ ६ ॥ विकलेन्द्रिये अशीति पष्ठिं चम्बारिशत् एव जानीहि । पंचेन्द्रिये चतुर्विंशति शुद्रभवान् अन्तर्मुहर्ते ॥ अर्थ--हे जीव ! तूने दो इन्द्रिय अवस्थामें अतहत कालमें मस्सी क्षुद्र- भव धारण किये । तेड द्रिय अवस्था माठ क्षुद्रभव धारण किये, चौद्रिय पर्याय में चालीन मुहमव धारण किये और पंचेंद्रिय पर्यायमें चौबीस तुद्रमव धारण किये। आण्णोणं खज्जता जीवा गति दारुणं दुक्खं । ण हु तेसि पजत्ती कहपावइ धम्ममहसुण्णो ॥ ७ ॥ अन्योन्य कुध्यन्ते जीवा प्राप्नुवन्ति दाम्णं दुःखम् । न रनलु तेषां पर्याप्तीकथं प्राप्नोति धर्ममतिशन्य' । अर्थ परस्पर एक दूसरेके साथ क्रोध करते हुये ये जीव अत्यन्त घोर दुख पाते हैं। उनकी कभी पर्याप्ति ही पूरी नहीं होती फिर भला धैर्यम्प वुद्धिसे सर्वथा रहित वे जीव उम जिन धर्मको कैसे धारण कर सकते हैं। (२४४] मायापिया कुण्डवो सुजणजण कोवि णायई सत्थे। एगागी भमइ सदा णहि वीओ अस्थि संसारे ॥८॥ माता पिता कुटुम्बः स्वजनजनः कोपि नायाति सह । एकाकी भ्रमति सदा न हि द्वितीयोअस्ति संसारे । इस संसार में परिभ्रमण करते हुये इस जीवके साथ माता पिता कुटुम्बी लोग तथा अपने परिवारके मनुष्यों में से कोई भी साथ नहीं जाता। यह जीव सदा अकेला परिभ्रमण किया करता है । इसका साथी कोई दूसरा नहीं होता। आउक्खएवि पत्ते ण समत्थो कोवि आउदाणेय। देवेंदो ण णरेंदो मणिओसह मतजालाई ॥६॥ प्रायु क्षयेपि प्राप्ते न समर्थ कोपि आयुर्दाने च । देवेंद्रो न नरेन्द्र मण्यौषधमन्त्रजातानि ॥९॥ अर्थ- --जव आयुका अत भा जाता है भायुपूरी हो जाती है तब कोई भी उसमायुको नहीं बढ़ा सकता ।न देवोंका इन्द्र किसीकी भायु बढ़ा सकता है न चक्रवर्ती बढ़ा सकता है और न मणि, औषधि वा मत्रोंके समूह मायुको बढ़ा मकते हैं। संपडि जिणवरधम्मो लद्धोसि तुमं विसुद्धजोएण । वापसु जीवा सव्वे पत्तेसमये पयत्तेण ॥१०॥ सम्प्रति जिनवरधर्मो लब्धोऽसित्वं विशुद्धयोगेन । क्षमस्व जीवान् सर्वान् प्रत्येकसमये प्रयत्नेन । मर्थ-इस समय योगोंकी वा मन वचन कायकी विशुद्धि होनेसे तुझे इस जैनधर्मकी प्राप्ति हुई है इसलिये बड़े प्रयत्न के साथ प्रत्येक समय में तू समस्त जीवोंको क्षमा कर । उनपर क्षमा धारण कर । तिण्णिसया तेसहि मिच्छत्ता दमणस्स पडिवक्खा । अण्णाणे सहहिया मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥ ११॥ त्रीणि शतानि त्रिषष्टिमिथ्यात्वानि दर्शनस्य प्रतिपक्षाणि । अज्ञानेन द्धितानि मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ अर्थ-सम्यग्दर्शन के प्रतिपक्षी वा विरोधी मिथ्यात्वके तीन सौ तिरेसठ भेद हैं। यदि उनका मैने अपने अज्ञानसे श्रद्धान किया हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों। [२४५] ॥ पहुमज्जमसजूआपमिदीवसणाइ सत्तमेयाई । णियमो ण कथं च तेसिं मिच्छा मे दुक्कड हुज्ज ।। १२ ।। मधुमांसमद्यातप्रभृतीनि व्यसनानि सप्त मेदानि । नियमो न कृतःच तेपा मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ अर्थ-मधु, मास, मद्य और जूआ आदिको लेकर जो व्यसनोंके सात मेट हैं उनको त्याग करनेका यदि मैने नियम न किया हो तो वह सब मेरा पाप मिथ्या हो। अणुवयमहब्बया जे जमणियमासीलसाहुगुरुदिण्णा । जे जे विराहिदा खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज ॥ १३ ॥ अणुव्रतमहाव्रतानि यानि यमनियमशीलानि साधुगुरुदत्तानि । यानि यानि विराधितानि खलु मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ १३ ॥ अर्थ-साधुओंने वा गुरुओंने मुझे जो अणुव्रत दिये हों और उनमेंसे जिन जिनकी विराधना हुई हो वह सब मेरा पाप मिथ्या हो । णिच्चिदरधादुसतय तरुदसवियलिदिएसु छच्चेव । मुरणग्यतिरियचउरो चउदस मणुए सदसहस्सा ।। १४ ॥ एदे सव्वे जीवा चउरासीलक्खजोणिवसि पचा। जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥ १५ ॥ नित्येतरधातुसप्त नरुदश विकलेन्द्रियेपु पट् चैव । सुरनारकतिर्गक्षु चत्वार. चतुर्दश मनुष्ये शतसहस्त्राणि ॥१४॥ एते सर्व जीवाश्चतुरशीतिलक्षयोनिवशे प्राप्तः। ये ये विराधिता स्खलु मिथ्या मे दुप्कृतं भवतु ॥ १५ ॥ अर्थ-नित्य निगोदकी सातलाख, इतर निगोदकी सातलाख, पृथिवी कायिककी सातलाख, जल कायिककी सातलाख अग्निकायिककी सातलाख वायु- कायिककी सातलाख, दो इन्द्रियकी दो लाख, ते इन्द्रियकी दो लाख, चौइन्द्रिय की दो लाख, देवोंकी चार लाख, नारकियों की चार लाख, पचेन्द्रिय तिर्यंच की चार लाख और मनुष्यों की दश लाख । इस प्रकार समस्त जीवोंकी चौरासी लाख योनियों में प्राप्त हुए जीवोंमेंसे जिन जिन जीवोंकी विराधना मुझसे हुई हो वह सब मेरा पाप मिया हो। [२४६] पुढवीजलग्गिवाओ तेओवि वण'फर्ड य वियलतया । जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुकडं हुज्ज ॥ १६ ॥ पृथ्वीजलग्निवायुतेजोवनस्पतयश्च विकलत्रया.। ये ये विराधिताः खलु मिथ्या मे दुष्कृत भवतु ॥ १६ ॥ भर्थ-पृथ्वीकायिक जीव, नलकायिक जीव, अग्निकायिक जीव, वायुका- यिक जीव, वनस्पतिकायिक जीव और विकलत्रय जीवोंमें से जो जो मुझसे विराधे गये हों उनकी विराधना से होनेवाला सब पाप मेरा मिथ्या हों। मल सत्तरा जिणुला वयविसये जा विराणा विविहा मामइया खमइया खलु मिच्छा मे दुफड हुज्ज ॥ १७॥ मलसप्तति जिनोता प्रतविषये वा विराधना विविधा। सामायिक क्षमादिका मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ १७ ॥ अर्थ-भगवान् जिनेन्द्रदेवने व्रतोंके सत्तर अतीचार बतलाये हैं उनमें से जो जो अतिचार लगे हों वा व्रतोंमें अनेक प्रकार से विराधना हुई हों वा सामा- यिक और क्षमाभावोंकी विराधना हुई हो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों। फलफुल्लछल्लिबल्ली अणगल पहाणं च धोवणाईहिं । जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥१८॥ फलपुप्पत्वग्वल्ली अगालितस्नानं च प्रक्षालनादिभि । ये ये विगधिता खलु मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ १८ ॥ अर्थ-फल, पुष्प, छाल, लता आदिको काममें लाने में जो जीवोकी विरा- धना हुई हो, विना छने जलसे स्नान करनेमें जिन जीवोंकी विराधना हुई हो, वस्त्रादिकके धोनेमें जो जीवोंकी विराधना हुई हो उन सबसे होनेवाले मेरे पाप सब मिथ्या हों। णो शीलं णेव खमा विणओ तवो ण संजमोवासा । ण कया ण माविकया मिच्छा मे दुक्कड हुज्ज ॥१९॥ न शील नैव क्षमा विनयस्तपो न संयमोपवासा. । न कृतान भाविनी कृता मिथ्या मे दुप्रुत भवतु ॥ १६ ॥ अर्थ - मैंने जो शील पालन न किया हो, क्षमा, धारण न की हो, विनय न किया हो, तप न किया हो, मयम पालन न किया हो, उपवास न किया हो तथा न इनकी भावना की हो। वह समस्त मेरा पाप मिथ्या हो। [२४७] . . - कंदफलमूलवीया सचित्तरयणीयभोयणाहारा । अण्णाणे जे वि कया मिच्छा मे दुक्कड हुज्ज |॥ २० ॥ कन्दफलमूलबीजानि सचित्तरजनोमोजनाहारः। मज्ञानेन ये पि कृता मिथ्याऽमे दुष्कृतं भवतु ॥२०॥ अर्थ-यदि मैने अपने अज्ञानसे कद, मूल, फल, वीज, खाये हो । अन्य सचित्त पदार्थोंका भक्षण किया हो वा रत्रिमें भोजन किया हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों। णो पूया जिणचरणे ण पनदाणं न चेइयागमणं । ण कया ण भाविय मये मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥२१॥ नो पूजा जिनाचरणे न पात्रदान नचेर्यागमनम् । न कृतान भाविता मया मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ २१ ॥ अर्थ-मैने भगवानके चरण कमलोंकी पूजा न की हो, पात्र दान न दिया हो, ईर्यासमिति पूर्वक गमन न किया हो, ये सब काम न किये हों, न इनकी भावना की हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों। बंभारंभपरिग्गह सावज्जा बहु पमाददोसेण । जीवा विराहिया खलु मिच्छा में दुक्कडं हुज ॥ २२ ॥ ब्रह्मारंभपरिग्रहसावद्यानि वहनि प्रमाददोपेण । जीवा विराधिताः खलु मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ २२ ॥ मर्थ-मने अपने प्रमाद जन्य दोषसे ब्रह्मचर्य, आरभ और परिग्रहमें बहुत मे पाप किये हों तथा उनमें जीवोंकी विराधना हुई हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों। ममिउखित्तभवा तीदाणागय मुबट्टमाणजिणा । जे जे विगहिया खलु मिच्छा मे दुक्कड हुज्ज ।। २३ ।। सप्ततिशतक्षेत्रभाषाः अतीतानागतवर्तमानजिना । ये ये विराधिताः खलु मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ २३ ॥ अर्थ-एक्सौ सत्तर कर्मभूमियों में होनेवाले भूत भविष्यत् वर्तमानकाल सम्ब- न्धी तीर्थंकरों की जो विगधना की हो उनका अनादर किया होनो वे सब मेरे पाप मिथ्या हो। [२४] अरुहासिद्धाइरिया उवझाया साहु पश्चपरमेष्टी। जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज ॥ २४ ।। अहत्सिद्धाचार्या उपाध्यायाः साधवः पञ्चपरमेष्टिनः । ये ये विराधिताः खलु मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ २४ ॥ अर्थ-भगवान् अरहंत परमेष्ठी, सिद्ध परमेष्ठी, आचार्य परमेष्ठी, उपा- ध्याय परमेष्ठी और साधु परमेष्ठीकी जो जो विराधनाकी हो इनकी आज्ञा भग की हो वा अनादर किया हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों। जिणवयणधम्मचेइयजिणपडिमा किहिमाअकिहिमया । जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कड हुज ॥२५॥ जिनवचनं धर्मः चैत्य जिनप्रतिमा कृत्रिमा अकृत्रिमाः । ये ये विराधिताः खलु मिथ्या मे दुप्कृतं भवतु ॥ २५ ॥ मर्थ-जिनवचन, जिनधर्म, जिन चैत्यालय और कृत्रिम अकृत्रिम जिन प्रतिमानों की जो विराधना की हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हों। दसणणाणचरित्ते दोसा अट्टहपञ्चभेयाइ । जे जे विराहिया खलु मच्छा मे दुक्कडं हुज ॥ २६ ॥ दर्शनशानचारित्रे दोषा अष्टाष्ट्रपञ्चमेदा । ये ये विराधिताः खलु मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ २६ ॥ अर्थ-सम्यग्दर्शनके पाठ दोष हैं, सम्यग्ज्ञानके आठ दोष हैं और सम्यक् चारित्रके पाच दोष है इनमेंसे जो जो दोष मैने लगाये हों तो उनसे होनेवाले मेरे सब पाप मिथ्या हों। महसुइओहीमणपञ्जय तहा केवलं च पचमयं । जे जे विगहिया खलु मिच्छा मे दुक्कड हुज ॥ २७ ॥ मतिः श्रुतं अवधिः मन पर्यंय तथा केवल च पञ्चमकम् । ये ये विराधिता. खलु मिथ्या मे दुष्कृत भवतु ॥ २७ ॥ अर्थ - मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनः पर्ययज्ञान और केवलज्ञान इन पाचों ज्ञानोंमें से जिम किसी ज्ञानकी विराधना हुई हो तो वह मेग पाप मिथ्या हो। आयागदी अंगा पुन्धपइण्णा जिणेहिं पण्णता । जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कडम् हज्ज ॥ २८ ॥ [२४६ श्राचारांगादीनि अंगानि पूर्वप्रकीर्णकानि जिनः प्रणीतानि । ये ये विराधिताः खलु मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ २८ ॥ आचाराग आदि ग्यारह अग और चौदह पूर्वोका स्वरूप जो भगवान् जिनेन्द्रदेवने कहा है । उसमें जो कुछ मुझसे विराधना हुई हो तो वह सब मेरा पाप मिथ्या हों। पंच महन्वयजुत्ता अट्ठादससहस्ससीलकयसोहा । जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुआ ।। २९ ।। पञ्चमहावतयुक्का अष्टादशसहस्रशीलकतशोभाः। ये ये विराधिताः खलु मिथ्या मे दुष्कृत भवतु ॥ २६ ॥ अर्थ-जो पच महावतोंसे सुशोभित है और अठारह हजार शीलोंसे जिनकी शोभा बढ़ रही है ऐसे भगवान् अरहंत देवकी जो कुछ विराधना हुई हो तो वह सब मेरा पाप मिथ्या हो लोए पियरसमाणा रिद्विपवण्णा महागणवइया । जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कड हुज ॥ ३० ॥ लोके पितृसमाना ऋद्धिप्रपन्ना महागणपतयः । ये ये विराधिताः खलु मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ ३० ॥ अर्थ-अनेक ऋद्धियोंको धारण करने वाले गणधरदेव इस ससारमें पिता के समान हैं क्योंकि वे सब ऋषियोंके गुरु हैं, उनकी जो कुछ मुझसे विराधना हुई हो तो वह सब मेरा पाप मिथ्या हो। णिग्गंथ अजियाओ सट्टा सड्ढी य चउविहो संघो। जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कड हुज ॥ ३१ ॥ निग्रंथा आर्यिकाः श्रावकाः श्राविकाः च चतुर्विध संघः । ये ये विराधिताः खलु मिथ्या मे दुष्कृत भवतु ॥ ३ ॥ अर्थ-निप्रथमुनि, अर्जिका, श्रावक श्राविका इन चार प्रकारके मघोंमें से जिस किसीकी विराधना हुई हो तो वह मब मेरा पाप मिथ्या हो। दंचा सुग मणुस्सा णेरड्यातिरियजोणिगयजीवा । जे जे विराहिया खलु पिच्छा मे दुक्कड हुञ्ज ॥ ३२ ॥ देवा असुरा मनुप्या नारका तिर्यग्योनिगत जीवाः। ये ये विराधिताः खलु मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ ३२ ॥ 1 २५०] अर्थ-वैमानिक देव, भवनवासी, व्यतर ज्योतिषी देव, मनुष्य, नारकी, और तिर्यंच गतिमें रहनेवाले जीवोंकी जो विराधना हुई हो और उससे जो पाप हुये हो ने सब मिथ्या हों। कोहो माणो माया लोहो एदेय रायदोसाई। अण्णाणे जे वि कया मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥ ३३ ।। क्रोधो मानो माया लोम. एते रागद्वेषा। सज्ञानेन ये पि कृता मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ ३३ ॥ अर्थ-मैने अपने प्रज्ञानसे जो क्रोध मान माया लोभ भादि राग द्वेष किये हों वे सब मेरे पाप मिथ्या हों। परवत्थं परमहिला पमादजोएण अज्जियं पाव । अण्णावि अकरणीया मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥ ३४ ॥ परवस्त्रं परमहिला प्रमादयोगेनार्जितं पापम् । अन्येपि अकरणीया मिथ्या मे दुप्कृतं भवतु ॥ ३४ ॥ अर्थ-परवस्त्र और परस्त्री श्राढिके मवधसे प्रमाद योग पूर्वक जो पाप मैने किये हों अथवा और जो जो न करने योग्य कार्य किये हों वे सब मेरे पाप मिष्या हों। उक्को सहावसिद्धो मोह अप्पा वियप्पपरिमुक्को । अण्णो ण मज्म सरणं सरणं सो एक्क परमप्पा ॥ ३५ ॥ एक स्वभावसिद्धः स भात्मा विकल्पपरिमुक्तः। अन्यो न मम शरणं शरण स एक परमात्मा ॥ ३५ ॥ अर्थ-जो आत्मा एक है स्वभावसे ही सिद्ध है और सब तरह के विकल्पों से रहित हैं ऐसे एक परमात्माकी ही मै शरण जाता ह ऐसे परमात्माके सिवाय भन्य कोई भी मेरे लिये शरण नहीं है। अरस अब अगंधो अबबाहो अर्णतणाणमओ। अण्णो ण मज्म सरण सरण सो एक्क परमप्पा ।। ३६ ।। अरस अरूप अगंधः अव्याखाव अनन्तज्ञानमय.। अन्योन मम शरण शरणं स एक परमात्मा ॥३६ ॥ अर्थ-जो परमात्मा रस रहित है, रूप रहित है, गधरहित है, सब तरह की वाधाओंसे रहित है और अनन्तज्ञान स्वरूप है ऐसा एक परमात्मा ही मुझे [२५१] .

शरण है अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है। णेयपमाणं णाणं समए इक्केण हुंति ससहावे । अएणो ण मज्झ सरण सरणं सो एक्क परमप्पा ॥ ३७ ॥ शेयप्रमाणे ज्ञान समयेन एकेन भवति स्वस्वभावे। अन्ये न मम शरणं शरणं स एक. परमात्मा ॥ ३७॥ अर्थ-परमात्माका वह अनतज्ञान यद्यपि अपने स्वभावमें ही स्थिर रहता है तथापि वह प्रत्येक समयमें समस्त ज्ञेय पदार्थोंको जानता रहता है । ऐसा वह परमात्मा ही मुझे शरण है परमात्माके सिवाय अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है। एयाणेयवियप्पप्पसाहणे सयसहावसुद्धगई । अण्णो ण मज्झ सरण सरणं सो एक्क परमप्पा ॥३८॥ एकानेकविकल्पप्रसाधने स्वकस्वभावशुद्धगतिः । भन्यो न मम शरण शरणं स एकः परमात्मा ॥ ३८ ॥ अर्थ-उस परमात्माको चाहे एक प्रकारसे सिद्ध किया जाय और चाहे अनेक प्रकारसे सिद्ध किया जाय वह सदा अपने ही स्वभावमें शुद्ध बुद्ध स्वरूप स्थित रहता है । ऐसा वह परमत्मा ही मुझे शरण है उसके सिवाय अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है। देहपमाणो णिच्चो लोयपमाणो वि धम्मदो होदि । अण्णो ण मज्झ सर सरणं सो एक्क परमप्पा ।। ३९ ॥ देहप्रमाण नित्य' लोकप्रमः अपि धर्मतो भवति। अन्योन मम शरण शरणं स एक परमात्मा ॥ ३९ ॥ अर्थ-वह परमात्मा नित्य है, शरीरके प्रमाणके बराबर है, और प्रदेशोंके द्वारा लोक प्रमाण है ऐसा वह परमात्मा ही मुझे शरण है उसके सिवाय अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है। केवलदसणणाणं समये इक्केण दुष्णिउवओगा | अण्णो ण मज्म सरणं सरणं सो एक्क परमप्पा ॥ ४० ॥ केवलदर्शनबाने समयेनैकेन द्वौ उपयोगी। अन्योन मम शरण शरणं स एक. परमात्मा ॥४०॥ अर्थ-उन परमात्माके एकही समयमें केवलदर्शन और केवलज्ञान दोनों [२५२] ही उपयोग एकसाथ होते हैं । वह परमात्मा ही मुझे शरण है। अन्य कोई शरण नहीं है। सगरूव सहजसिद्धो विहावगुणमुक्ककम्मवावारो। अण्णो ण मम सरणं सरणं सो एक्क परमप्पा ॥४१॥ स्वकरूप सहजसिद्धो विभावगुणमुक्त कर्म व्यापारः। अन्यो न मम शरण शरणं स एकः परमात्मा ॥४१॥ मर्थ-वह परमात्मा अपने स्वभाविक स्वरूपमें ही लीन रहते हैं, स्वा- भाविक स्वभावसे ही सिद्ध है और रागद्वेषादिक वैभाविक गुणोंसे रहित होनेके कारण समस्त कर्मों के व्यापारसे रहित हैं । ऐसे वे परमात्माही मुझे शरण है। उनके सिवाय अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है। सुण्णो णेय असुण्णो णोकम्मो कम्मवज्जिओ णाणं । अएणो ण मज्झ सरण सरण सो एक्क परमप्पा ॥ ४२ ॥ शून्यो नैवाशून्यो नोकर्मकर्मवर्जितो ज्ञानम् । भन्यो न मम शरणं शरणंस एक परमात्मा ॥ ४२ ॥ अर्थ-वह परमात्मा रूप, रस, गंध, स्पर्श रहित होनेके कारण शून्यरूप है तथा ज्ञानमय आत्मास्वरूप होनेके कारण शून्यरूप नहीं मी है । उस परमा- त्माका ज्ञान नोकोसे मी रहित हैं और ज्ञानावरणादिक कमोंसे भी रहित है । ऐसा वह परमात्मा मुझे शरण है, उसके सिवाय मुझे और कोई शरण नहीं है। णाणाउ जो ण भिण्णो वियप्पभिण्णो सहावसुक्खमओ। अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एक्क परमप्पा ॥४३॥ ज्ञानतो यो न मिन्न विकल्पभिन्नः स्वभावसुखमयः । अन्योन मम शरणं शरणं स एक. परमात्मा ॥ ४३ ॥ अर्थ- जो परमात्मा अपने केवलज्ञानसे कमी मिन्न नहीं होता, परंतु सब तरहके विकल्पोंसे वह सदा भिन्न रहता है, स्वाभाविक सुखस्वरूप है ऐसा परमात्मा ही मुझे शरण है ऐसे परमात्माके सिवाय अन्य कोई शरण नहीं है। अच्छिण्णोवच्छिण्णो पमेय रूवत्त गुरुलहू चेव । अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एक्क परमप्पा ॥४४॥ अच्छिन्नोवच्छिन्न प्रमेयरूपत्व भगुरुलघुत्वं चैव । अन्योन मम शरण शरणं स एकः परमात्मा ॥४४॥ [२५३] 1 भर्थ-जो कभी किसी प्रकार छिन्न भिन्न नहीं होता, जो अखण्ड स्वरूप है तथा भवच्छिन्न है, अतिम शरीरके प्रमाणके समान है अथवा असख्यात प्रदेशमय है। जो ज्ञानके द्वारा समस्त पदार्थोके समान है अर्थात समस्त पदार्थों का ज्ञाता है और अगुरु लघु गुणसे सुशोमित है ऐसा परमात्मा ही मुझे शरण है। उसके सिवाय अन्य कोई भी शरण नहीं है । सुहअसुहभावविगओ सुद्धसहावेण तम्मयं पत्तो। अएणो ण मज्झ सरण सरणं सो एक्क परमप्पा || १५ ।। शुभाशुभभावविगत. शुद्धस्वभावेन तन्मय प्राप्त.। अन्योन मम शरणं शरणं स एक. परमात्मा ॥ ४५ ॥ अर्थ-जो शुभभाव और अशुभ भाव दोनोंसे रहित है । जो केवल शुद्ध- स्वभावके द्वारा अपने ही आत्मामें तल्लीन है । अथवा जो केवल अपने शुद्ध- स्वभावमें ही लीन है ऐसा ही परमात्मा मुमे शरण है । इसके सिवाय अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है। णो इत्थी ण णउंसो णो पुसो णेव पुण्णपात्रमओ। अण्णो ण मज्झ सरणं सरण सो एक्क परमप्पा ॥ ४६ ॥ न स्त्री न नपुंसक न पुमान् नैव पुण्यपापमय । अन्यों न मम शरण शरणं स. एकः परमात्मा ॥ ४६ ॥ भर्थ~जो न स्त्री है, न नपुसक है, न पुरुप है और न पुण्यपाप रूप है, ऐसा परमात्मा ही मुझे शरण है। उसके सिवाय अन्य कई मी शरण नहीं है। ते कोण होदि सुयणों त कस्स ण बंधवो ण सुयणो वा । अप्पा हवेह अप्पा एगागी जाणगो सुद्धो ।। ४७ ।। तव को न भवति स्वजन त्वं कस्य न बंधुः स्वजनो या। श्रात्मा भवेत् श्रात्मा एकाकी शायकः शुद्ध ॥४७॥ अर्थ-हे भात्मन् ! इस समारमें तेरा कोई कुटुम्बी नहीं है तथा तू भी किसी का भाई वा कुटुम्बी नहीं है । यह श्रात्मा सदा श्रात्मा ही रहता है अकेला ही रहता है, समस्त पदार्थोका जानना इसका स्वभाव है और यह सदा शुद्ध है । जिणदेवो होउ सया मई मु जिणसामणे सया होऊ । मध्यासेण य मरण भवे भवे मज्म संपटओ।। ४८॥ [२५१ .

जिनटेवो भवतु सदा मति. सुजिनशासने सदा भवतु । सन्यासेन च मरणं भवे भवे मम सम्पत् ॥ ४० ॥ मर्थ-मै जिनदेवकी ही सदा सेवा करता हू जिन देवके सिवाय अन्य किसीको देव न मानूं । मेरो बुद्धि सदा जिनशासनमें वा धर्नमें ही बनी रहे । जैन धर्मको छोड़ कर अन्य किसी धर्ममें मेगे बुद्धि न जाय । मेरा मरण सदा समाधि पूर्वक ही हो समाधि मरणके सिवाय अन्य मरण न हो। यह मपत्ति मुझे भव भवमें प्राप्त हो। जिणो देवो जिणो देवो जिणो देवो जिणो जिणो । टयाधम्मो दयाधम्मो दयाधम्मो दया सया ।। १६ ।। जिनो देवो सिनो देवो जिनो देवो जिनो जिन। दयाधर्मो दयाधर्मो दयाधर्मो दया सदा ॥ ४ ॥ मर्य-इस संसार में देव जिन ही है, देव जिन ही हैं देव जिन ही है भग- वान् जिनेन्द्रदेव अरहंत देव ही देव है भन्य कोई देव देव नहीं है । धर्म दयारूप ही है, धर्म दयामय ही है, धर्म दया ही है । धर्म सदा दयामय ही होता है दया के सिवाय अन्य कोई धर्म हो ही नहीं सकता। महासाहू महामाहू महामाहू दिगवरा । एव तच सदा हुज्ज जाव णो मुचिसंगमो ॥ ५० ॥ महा साधव. महा साधवः महासाघवो दिगंबरा । एवं तस्वं सदा भवतु यावन्न मुक्तिसंगम ॥ ५० ॥ अर्थ-महासाधु दिगम्बर ही होते हैं महासाधु दिगम्बर ही होते हैं महासाधु दिगम्बर ही होते हैं । हे प्रभो ! जबतक मुझे मोक्षकी प्राप्ति न हो तबतक मेरे हृदयमें यही तत्व सदा बना रहे । भावार्थ-तबतक मै दया मय धर्मको मानता रहू जिनेन्द्रदेवको देव मानता रह भौर निर्मथ मुनियोंको साधु वा गुरु मानता रहूं। एवमेव गओकालो अण्तो दुक्खसंगमे । जिणोवविट्ठमण्णासे ण यचारोहणा कया ॥ ५१ ।। एवमेव गतः काल' अनन्तो दुःखसंगमे। जिनोपदिष्टसन्यासे न यत्तारोहणा कृता ॥ १ ॥ मर्य-आजतक मेरा अनंत काल दुख भोगते ही व्यर्थ वीत गया। मैने [२५५] i अबतक भगवान् जिनेन्द्र देवके कहे हुए समाधि मरणके लिए यत्न पूर्वक कमी प्रयत्न नहीं किया। भावार्थ-समाधि मरण कभी धारण नहीं किया। संपइ एव संपत्ताराहणा जिणदेसिया । किं किंग जायदे मज्जा सिद्धिसंदोहसंपई ॥ ५२ ॥ सम्प्रति एव सम्प्राप्ता आराधना जिनदेशिता। का का न जायते मम सिद्धिसंदोहसम्पत्तिः॥ ५२ ॥ अर्थ-अब इस समय मुझे भगवान् जिनेन्द्र देवकी कही हुई आराधना प्राप्त हुई हैं इनके प्राप्त होने से अब इस संसार में ऐसी कौनसी सिद्धियोंकी समूह रूप मपत्ति है जो मुझे प्राप्त न हो। भावार्थ-अब इन आराधनाओंके पालन करनेसे मुझे समस्त सिद्धिया प्राप्त हो जायेंगी। अहो धस्ममहो धम्म अहो मे लद्धि मिस्मला । संजादा संपया सारा जेण सुक्खपणूपमं ॥ ५३ ॥ बहो धर्सः बहो धर्मः अहो मे लब्धि निर्मला। सजाता सम्पत् साग येन सुख अनुपमम् ॥ ५३ ॥ अर्थ-यह जिनदेवका कहा हुआ दयाधर्म बड़ा ही आश्चर्य कारक है तथा यह धर्म सबसे उत्तम है और यह मुझे प्राप्त हुई अत्यत निर्मल काल लब्धिमी अत्यत आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली है । इस निर्मल काललब्धि और जिनधर्म के प्रसादसे मुझे पागधनारूप सर्वोत्तम सपत्ति प्राप्त हुई है इस आराधना रूप मपत्तिसे ही उपमा रहित मोक्ष सुख प्राप्त होता है । एव आराहतो आलोयणवंदनापडिक्कमणं । पावइ फलंय तेर्सि णिद्दि अजियवम्मेण ।। ५४ ॥ एवा आराधयन् अालोचनाबंदनाप्रतिक्रमणानि । प्राप्नोति फलं च तेषां निर्दिष्टमजितब्रह्मणा ॥ ५४॥ अर्थ-इस प्रकार आलोचना वंदना और प्रतिक्रमणकी आराधना करनेसे भगवान् जिनेन्द्र देवका कहा हुआ मोक्ष फल प्राप्त होता है। [२५६] अथ चतुर्दिशि वंदना। प्राग्दिग्विदिगन्तरि, केवलिजिनसिद्ध साघुगणदेवाः । ये सर्वद्धिस- मृद्धा, योगिगणास्तानऽहं वन्दे ॥१॥ दक्षिणदिग्विदिगन्तरि, केवलि- जिनसिद्धसाधुगणदेवाः । ये सर्वद्धिसमृद्धाः ॥२॥ पश्चिमदिग्विदिगन्तरि केवलिजिनसिद्धसाधुगणदेवाः । ये सर्वर्द्धिसमृद्धा० ॥३॥ उत्तरदिग्वि- दिगन्तरि, केवलिजिनसिद्धसाधुगणदेवाः । ये सर्वद्धिंसमृद्धा० ।। ४ ।। इति चतुर्दिशि वदना। , सर्वदोषप्रायश्चित्तविधिलिख्यते । ॐ हीं अहं असि आ उ सा त्रयस्त्रिंशदत्यासादनात्यागानुष्ठितप्रो- पधोद्योतनाय नमः॥१॥ ॐ ह्रीं अहं अहिसामहाव्रतस्यात्यासादनात्या- गायानुष्ठितप्रोषोद्योतनाय नमः ।। २ ।। ॐ हीं अहं सत्यमहाव्रतस्या- त्यासादनात्य गायानुष्टितप्रोषधोद्योतनाय नमः ॥३॥ ॐ ह्रीं अहं अचो- र्यमहावतस्यात्यामादनात्यागायानुष्ठितप्रोपधोद्योतनाय नमः ॥ ४ ॥ ॐ ही अहं ब्रह्मचर्यमहाव्रतस्यात्यासादनात्यागायानुष्ठितप्रोषधोद्योतनाय नमः ॥ ५ ॥ ॐ ह्रीं अहं अपरिग्रहमहाव्रतस्यात्यासादनात्यागायानुष्ठितप्रोष- धोद्योतनाय नमः ॥ ६॥ॐ ह्री अहं ईर्यासमितेरत्यासादनात्यागायानु- ष्ठितम्रोषधोद्योतनाय नमः ॥ ७॥ ॐ ह्रीं अहं भाषासमिरेत्यासादनात्या. गायानुष्ठितप्रोपधोद्योतनाय नमः ।।८ ॥ ॐ हीं अहं एपणासमिरेत्या- सादनात्यागायानुष्ठितप्रोषधोद्योतनाय नमः ।। ९ ।। ॐ ह्रीं अहं श्रादा- ननिक्षेपणसमिरेत्यासादनात्यागायानुष्ठितप्रोसधोधोतनाय नमः ॥१०॥ ॐ ही अहं उत्सर्गसमिरेत्यासादनात्यागायानुष्ठितप्रोषधोद्योतनाय नमः ॥११॥ ॐ ही अहे मनोगुप्तरेत्यासादनात्यागायानुष्ठितप्रोपधोद्योतनाय नमः ।। १२ ।। ॐ ह्रीं अहं वचोगुप्तरत्यासादनात्यागायानुष्ठितप्रोपधो- योतनाय नमः ॥ १३ ॥ ॐ हीं अहं कायगुप्तेरत्यासादनात्यागायानुष्ठि- [२५७] तप्रोपधोयोतनाय नमः ॥ १४ ॥ ॐ ह्रीं अहं जीवास्तिकायिकस्यात्या- सादनात्यागायानुष्ठितप्रोपधोद्योतनाय नमः ॥ १५ ॥ ॐ ह्रीं अहं पुद्ग- लास्तिकायिकस्यात्यासादनात्यागायानुष्ठित्योषधोद्योतनाय नमः ॥ १६ ॥ ॐ ही अहं धर्मास्तिकायिकस्यात्यासादनात्यागायानुष्ठितप्रोषधे द्योतनाय नमः ॥ १७॥ ॐ हीं अहं अधर्मास्तिकायिकस्यात्यासादनात्यागायानु ठितप्रोपधोद्योतनाय नमः ॥ १८ ॥ ॐ हीं अहं श्राकाशास्तिकायिक- स्यात्यासादनात्यागायानुष्ठितप्रोषधोद्योतनाय नमः ॥ १९ ॥ ॐ ही अहे पृथ्वीकायिकस्यात्यासादनात्यागायानुष्ठितप्रोषधोद्योतनाय नमः ॥२०॥ ॐ हीं अहं अपकायिकस्यात्यासादनात्यागायानुष्ठितप्रोषधोद्योतनाय नमः ॥ २१ ॥ॐही अहं तेजः कायिकस्यात्यासादनात्यागायानुष्ठितप्रोषधोद्यो- तनाय नमः ।। २२ ।। ॐ ह्रीं अहं वायुकायिकस्यात्यामादनात्यागाया- नुष्ठितप्रोपधोद्योतनाय नमः ॥ २३ ॥ ॐ ही अहं वनरपतिकायिकस्यात्या. सादनात्यागायानुष्ठितप्रोषधोद्योतनाय नमः ।। २४ ।। ॐ हीं अहं त्रस- कायिकस्यात्यासादनात्यागायानुष्ठितम्रोपधोद्योतनाय नमः ।। २५ ।। ॐ ही अहं जीवपदार्थस्यात्यासादनात्यागायानुष्ठितप्रोषधोद्योतनाय नमः ॥ २६ ॥ ॐ ही अहं अजीवपदार्थस्यात्यासादनात्यागायानुष्ठितप्रोषधोद्यो- तनाय नमः ।। २७ ।। ॐ हीं अहं आस्रवपदार्थस्यात्यासादनात्यागायानु. ष्ठितप्रोपघोद्योतनाय नमः ।। २८ ॥ ॐ हीं अई बंधपदार्थस्यात्यासादना- स्यागायानुष्ठितमोपधोद्योतनाय नमः ॥ २९ ॥ ॐ ह्रीं अहं संवरपदार्थ- सात्यासादनात्यागायानुष्ठितप्रोपधोद्योतनाय नमः ॥३०॥ ॐ ही अहे निर्जरापदार्थयात्यासादनात्यागायानुष्ठितप्रोषधोद्योतनाय नमः ॥ ३१ ।। ॐ ही अहे मोक्षपदार्थस्यात्यासादनात्यागायानुष्ठितप्रोषधोद्योतनाय नमः ।। ३२ ॥ ॐ ह्रीं अहं पुण्यपदार्थस्यात्यामादनात्यागायानुष्ठितप्रोपधोधो- तनाय नमः ।। ३३ ॥ ॐ ही अहं पापपदार्थस्यात्यासादनात्यागायाउष्ठि- तप्रोपयोद्योतनाय नमः ॥३४॥ ॐ ह्रीं अहं सम्यग्ज्ञानाय नमः ॥३५॥ ॐ ह्रीं अई सम्यग्दर्शनाय नमः ।। ३६ ॥ ॐ ही अहं सम्यक्चारित्राय नमः ॥ ३७॥ इति सर्वटोपप्रायश्चित्तविधि । [२५] अथ सामायिक पाठः। सिद्धवस्तुवचो भक्त्या, सिद्धान् प्रणमतः सदा । सिद्धकार्याः शिवं प्राप्ताः, सिद्धिं ददतु नोऽव्ययाम् ॥१॥ नमोस्तु धौतपापेभ्यः, सिद्धे- भ्यः ऋपिसंसदि । सामायिकं प्रपद्येऽहं, भवभ्रमणसूदनम् ॥२॥ साम्यं मे सर्वभूतेषु, वैरं मम न केनचित् । आशां सर्वा परित्यज्य, समाधिमहमा- श्रये ॥३॥रागद्रेपान्ममत्वाद्वा, हा मया ये विराधिताः। क्षमन्तु जंत- वस्ते मां, क्षाम्यन्तु सदा तेभ्यः क्षमाम्यहं ॥ ४ ॥ मनसा वपुषा वाचा, कृतकरितसम्मतैः । रत्नत्रयभवं दोपं, गहें निन्दामि वर्जये ॥५॥ तैरश्च मानवं दैवमुपसर्ग सहेऽधुना । कायाहारकपायादीन्, संत्यजामि त्रिशुद्धितः ॥६॥ रागद्वेषं भय शोक, प्रहौत्सुक्यदीनताः । व्युत्सृजामि त्रिधा सर्वमरति रतिमेव च ॥ ७ ॥ जीवने मरणे लाभेऽलाभे, योगे विपर्यये। वन्धावरौ सुखे दुःखे, सर्वदा समता मम ॥ ८ ॥ आत्मैव मे सदा ज्ञाने, दर्शने चरणे तथा । प्रत्याख्याने ममात्मैव, तथा संवरयोगयोः ॥९॥ एको मे शाश्वतश्चात्मा, ज्ञानदर्शनलक्षणः । शेषा बहिर्भवा भावाः, सर्वे संयोगलक्षणाः ॥१०॥ संयोगमूला जीवेन, प्राप्ता दुःखपरम्परा ॥ तसा- संयोगसम्बन्ध, त्रिधा सर्व त्यजाम्यहम् ॥११॥ एवं सामायिकात्स- म्यक, सामायिकमखंडितम् । वर्तते मुक्तिमानिन्या, वशीभूताय ते नमः॥१२॥ इति सामायिक पाठः। आचार्यशान्तिसागरस्तुतिः। पूज्यातिपूज्यैर्यतिमिस्सुवध संसारगम्भीरसमुद्रसेतुम् । ध्यानकनिष्ठा- गरिमागरिष्ठं, आचार्यवर्य प्रणमामि नित्यम् ॥ १॥ ध्यानादिसैन्य परि- [२५९] वर्य पूर्ण, कर्मारिवर्ग प्रणिहत्य वेगात् । नीरागस्वातंत्र्यपदे प्रतिष्ठ, आ. ॥२॥ यो मुख्यसरिर्मुनिनायकानां, आचारपार गतवान्समधे । ध्यान- प्रभावेण प्रवृद्धदीप्तिः, आ० ।।३।। दुर्जेयक द्वादशधा कषाय, जित्वा निजात्मानुभवैकशुद्धया । पष्ठे गुणे सप्तमके गतं तं, आ० ॥ ४ ॥ आभ्य- न्तरो बाह्य उपाधिभारः, दूरीकृतो येन वितृष्णभावात् । दैगम्बरं सुन्दर- दिव्यकायं, आ० ॥ ५ ॥ धर्मामृतं पाययति प्रभूत, यो भव्यजीवान् करुणास्वरूपः। स्वात्मस्वरूपं च चकार तेभ्यः आ०॥६॥ योऽनेक- साधून विषयेष्वरक्तान्, निग्रंथलिंगे विधिना चकार । गुरूपरागोपि च वीतरागः, आ० ॥ ७ ॥ महागभीरंविशदीकृतार्थ, शास्त्राधिपारे गत- वान् समग्रम् । तथापि प्रज्ञामदताविरक्तः, आ० ॥८॥ यथा कुन्दकुन्दः सुरवंद्यपादा, अमृत्साधुसंसेव्यमानप्रपादः । तथैवाधुना लोकपूज्य यती- न्द्रं भजे सूरिवयं सदा साधुवंद्यम् ॥ ९॥ यथा दुष्टजीवेन घोरोपसर्गाः कृताः पार्श्वनाथे त्रिलोकैकपूज्ये । तथा दुष्टलोकोपसर्ग सहिष्णुं भजे. ॥ १० ॥ यतीनामनेके यथा शिष्यवर्गाः, प्रभोः कुन्दकुन्दस्य सूरेरभृवन् । तथैवाधुना साधुसंदोहशिष्यम्, भजे ॥११ ॥ यथा सूत्रचिन्हं हि रत्न- त्रयस्य, पुरा भारते पूर्वराज्यनिरुक्तम् । तथैवाधुना सूत्रचिन्हें दधान, भजे० ॥ १२ ॥ शान्तेरगारं विनष्टारिमारं जगत्कञ्जमित्रं गुणाढ्यं पवि- त्रम् । वरिष्ठैः सुपूज्य गरिष्टप्रधान, भजे०॥ १३ ॥ गुरु मगौडा महा- शक्तिशाली, स्वामाता सती सत्यरूपा सुरूपा । तयोः पुत्ररत्न जिताक्षा- रियत्न, भजे ॥ १४ ॥ जगदल्ल- कर्तयित्वा कृपाणी, गृहीत्वा शुभ- ध्यानरूपा स्वभावाम् । प्रपेदे गुणं सप्तपञ्चैकहीन, भजे० ॥ १५ ॥ गुणागमनीरं भवाम्भोधितीरं, मढा निर्विकारं गृहीतात्मसारम् । कपायादि- दुर्दण्ड भेदं भजे ॥ १६ ॥ महद्धयाननिष्ठं महत्सु प्रकृष्ट, महपिंप्रतिष्ठं बचा यस्य मिष्टम् । चिदानंदरूपे स्वरूपे प्रविष्टं, भजे ॥ १७॥ निग्रंथ- माधुमधुपत्रजराजमाना, त्वत्पादपअकलिका धवलाभिरामा । नक्षत्रवृन्द- परिवेष्टितचन्द्रविम्बः, देवेः सुदृष्टिशुचिभिर्मघवा यथा वा ॥ १८ ॥ यत्पादसेवनग्नाः खलु भव्यलोकाः, संसारतो झटिति यांति विक्ति- {२६०] द्विम् ॥ यद्गीः प्रशस्यमहनीयसुहेतुपूता, पश्चाननम्य समतां सदसि व्य- नक्ति ॥ १९॥ मिथ्यान्धकारपटलं प्रविहाय शीघ्र, तत्त्वप्रसारकिरणः सुखदैः समन्तात् । श्रद्धापरायणजनाम्बुजकोरकांच, सन्तोषयन् विगतता- परविस्त्वमेव ।। २० ॥ मिथ्यान्धकारपरिमर्दनरश्मिजालं, ज्ञानप्रकाशितज- गत्प्रविकाशिसूर्यम् । ध्यानकताननियतं मुनिराजसेव्यं, आचार्यवर्यगुरुपा- दमहं नमामि ॥ २१ ॥ गुणास्त्वदीयाः धवलाः गमीराः, सुरेन्द्रनागेन्द्र- नरेन्द्रपूज्याः। विभाति सूरे ! तव दिव्यदेहे, ततोसि पूज्यः खलु विश्व- लोके ॥ २२ ॥ दर्श दर्श सूरिशांतस्वरूपं पायं पायं वाक्यपीयूषधाराम् । सारं सारं तद्गुणान् स्पृष्टपादाः, जाताः शान्ताःसाधवोऽक्षेष्वरक्ताः॥२३॥ चित्ते चित्ते शान्तमूर्तेः सुबोधः, बोधे तत्स्वरूपानुरूपम् । रूपे रूपे स्वा- स्मवृत्ती प्रवृति वृत्तौ वृत्तौ कुन्थुनेमीन्दुवीराः ॥ २४ ॥ आसीद्यः खलु दक्षिणायनकरः पश्चादुदीच्यां गतः । ज्ञानध्यानतपःप्रभामयवपुः संधार- यन् दीप्तिमान् ॥ सम्यग्ज्ञानमरीचिभिर्विकसिता आशाश्च येनाखिलाः। मोऽय सूरिरपूर्वभानुरुदितो लोके सदा शांतिदः ॥२५ ॥ सुखदयाखिल- वोधविधानया, विधिविशाखिकठोरकुठारया । विगतरागगुरुर्जिनदीक्षया, तरति तारयति भ्रमजालतः॥ २६ ॥ इति श्राचार्यशान्तिसागरस्तुतिः । देवसिकरात्रिकप्रतिक्रमणम् । जीवे प्रमादजनिताः प्रचुराः प्रदोषा, यसात्प्रतिक्रमणतः प्रलयं प्रया. न्ति । तसाचदर्थममलं मुनिबोधनार्थ, वक्ष्ये विचित्रभवकर्मविशोधनार्थम् ॥१॥ पापिष्ठेन दुरात्मना जडधिया मायाविना लोभिना । रागद्वेषमली. मसेन मनसा दुष्कर्म यनिर्मितम् ॥ त्रैलोक्याधिपते जिनेन्द्र ! भवतः थी- पादमूलेऽधुना । निन्दापूर्वमहं जहामि सततं वर्वतिषुः सत्पथे ॥२॥ खम्मामि सम्बजीवाणं सब्वे जीवा खमतु मे । मिची मे सबभूदेसु वेरै २६१] । मज्झं ण केण वि ॥३॥ रागबंधपदोसं च हरिसं दीणभावयं । उस्सु- गचं भयं सोग रदिमरदिं च वोस्सरे ॥ ४ ॥ हा ! दुट्ठकयं हा ! दुट्ठ- चिंतियं भासियं च हा दुहु । अंतोअंतो डझमि पच्छुत्तावेण वेदनो ॥ ५ ॥ दन्वे खेचे काले भावे य कदावराहसोहणयं । णिदणगरहणजुत्तो मणवचकाएण पडिकमणं ॥ ६॥ एकेन्द्रिया द्वीन्द्रियात्रीन्द्रियाश्चतुरि- न्द्रियाः पञ्चेन्द्रियाः पृथ्वीकायिका अप्कायिकास्तेजःकायिका वायुकायिका वनस्पतिकायिकास्त्रसकायिकाः, एतेषां उचापन, परितापन, विराधन, उपधातः कृतो वा कारितो चा क्रियमाणो वा समनुमतस्तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् । व्रतसमितीन्द्रियरोधा लोच आवश्यकमचेलमस्नानं । क्षितिश- यनमदन्तधावन स्थितिभोजनमेक भक्तश्च ।। १ ॥ एते खलु मूलगुणाः श्रमणानां जिनवेरेः प्रज्ञप्ताः । अत्र प्रमादकृतादतिचारान्निवृतोऽहम् ॥२॥ छेदोपस्थापनं भवतु मम । पञ्चमहाव्रतपञ्चसमितिपश्चेन्द्रियरोधलोचपडावश्यक क्रियाः, अष्टा- विंशतिमूलगुणाः, उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिश्चन्य- ब्रह्मचर्याणि दशलाक्षणिको धर्मः, अष्टादशशीलसहस्राणि, चतुरशीति- लक्षगुणाः, त्रयोदशविधं चारित्रं, द्वादशविधं तपश्चेति सकलं सम्पूर्णम- ईसिद्धाचार्योपाध्यायमर्वसाधुसाक्षिक सम्यकत्वपूर्वक दृढयत सुव्रतं समा- रुद्ध (ते १ ) मे भवतु । "अथ सर्वातिचारविशुद्वयर्थ देवसिकप्रतिक्रमणक्रियायां कृतदोपनि- गकरणार्थ पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थ भावपूजावन्दनास्तबसमेतं आलोचनासिद्धभक्तिवायोत्सर्ग करोम्यहम्" इति प्रतिज्ञाप्य "णमो अरि- हताणं" इत्यादि सामायिकदण्डक पठित्वा कायोत्सर्ग कुर्यात् । "थोस्सामि" इत्यादि चतुर्विशतिस्तव पठेत् । श्रीमते वर्धमानाय नमो नमितविद्विपे । यज्ज्ञा- नान्तर्गतं भृत्या त्रैलोक्य गोप्पदायते ॥ १।। तवसिद्धे णयसिद्ध संजमसिद्धे चरित्तसिद्वे य । णाम्मि दसणम्मि य सिद्धे सिरसा णमंसामि ।। २ ।। इच्छामि भंते ! सिद्धभत्तिकाओस्मग्गो को तरसालोचेउ, सम्मणाणस- म्मढमणसम्मचरित्तजुत्ताणं, अविहकम्ममुक्काणं, अद्वगुणसम्पण्णाणं, उड़- [२६२ " ढलोयमत्थयम्मि पइडियाणं, तवसिद्धाणं, णयसिद्धाणं, संजमसिद्धाणं, चरित्त सिद्धाण अतीदाणागदवट्टमाणकालत्तयसिद्धाण, सव्वसिद्धाणं, णिच्चकाल अंचेमि पूजेमि वंदामि णमंसामि दुक्खक्खओ कम्मक्खओ बोहिलाहो सुगइगमणं समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्मं । आलोचना इच्छामि भगवन् ! चारित्राचारस्त्रयोदशविधः परिविभावितः पञ्च- महाव्रतानि पञ्चसमितयः त्रिगुप्तयश्चेति । तत्र प्रथमे महानते प्राणाति- पाताद्विरमणम् । तस्य पृथिवीकायिका जीवा असंख्यातासंख्याताः, अप्का- यिका जीवा असंख्यातासंख्याताः, तेजः कायिका जीवा असंख्यातासं- ख्याताः, वायुकायिका जीवा असंख्यातासंख्याताः, वनस्पतिकायिका जीवा अनन्ताः, हरिता, वीजाः, अंकुराः छिन्नाः मिन्नाः, तेषामुत्तापन, परितापनं, विराधन, उपघातः कृतो वा कारितो वा क्रियमाणो वा समनु- मतः, तस्य मिच्छामे दुष्कृतम् ।। १॥ द्वीन्द्रिया जीवा असंख्यातासं ख्याताः, कुक्षिकमिशङ्खक्षुल्लकवराटक अक्ष अरिष्टबालशम्बूकशुक्तिपृथि- वीकायिकाः, तेषामुचापन, परितापन, विराधन, उपघातः कृतो वा कारितो वा क्रियमाणो वा सपनुमतः, तस्य मिच्छा मे दुष्कृतम् ।। २ ।। त्रीन्द्रिया जीवा असंख्यातासंख्याताः कुन्थुदेहिकवृश्चिकेगोंभिक (१) गोयू- कामत्कुणपिपीलिकादिकास्तेषामुत्तापन० ॥ ३ ॥ चतुरिन्द्रिया जीवा असंख्यातासंख्याताः दशमशकमक्षिकापतङ्गकीटभ्रमरमधुकरगोमक्षिकादि कास्तेषामुत्तापनं० ॥ ४ ॥ पंचेंद्रिया जीवा असंख्यातासंख्याताः अंडा- चिताः, पोताचिताः, जराचिताः रसाचिताः, संस्वेदिनः,' सम्मृच्छिनः, उद्धेदिनः, उपपादिन अपि चतुरशीतियोनिप्रमुखशतसहस्रषु, एतेषामु- त्तापन० ॥ ५ ॥ अथेष्टदेवतान मस्कारानन्तर दैवसिकापाक्षिकचातुर्मासिकमेदेन त्रि प्रका- राणा प्रतिक्रमणाना। मध्ये देवसिकप्रतिक्रमणायास्तावत्पीठिकादण्डकमाह- इच्छामि भगवन ! देवसिके आलोचयितुं पञ्चमहाव्रतानि । तत्र [२६३] - प्रथम महाव्रतं प्राणातिपाताद्विरमणं, द्वितीय महाव्रत मृषावादाद्विरमणं, तृतीयं महाव्रतमदत्तादानाद्विरमणं, चतुर्थे महाव्रतं मैथुनाद्विरमणं, पचमें महाव्रतं परिग्रहाद्विरमणं, षष्ठमणुव्रतं रात्रिभोजनाद्विरमणं, ईर्यासमिती, भाषासमिती, एषणासमिती आदाननिक्षेपणसमिती, उच्चारप्रस्रवणश्लेष्म- शिंधाणकविकृतिप्रतिष्ठापनिकासमिती, मनोगुप्तौ, वचोगुप्तौ, कायगुप्ता, ज्ञानेषु, दर्शनेषु, चारित्रेषु, द्वाविंशतिषु, परीपहेपु, पञ्चविंशतिपु, भाव- वासु पञ्चविंशतिषु क्रियासु अष्टादशशीलसहस्त्रेषु चतुरशीतिगुणशतसह- स्रेषु द्वादशानां संयमानां द्वादशानां तपसां, द्वादशानां अङ्गाना, चतुर्द- शानां पूर्वाणां, दशानां मुण्डाना, दशानां श्रवणधर्माना, दशानां धर्म- ध्यानां, नवानां ब्रह्मचर्यगुप्तीनां, नवानां नोकपायाणां, षोडशानां, कषायाणां, अष्टानां कर्मणा, अष्टानां प्रवचनमातृकाणां, अष्टानां शुद्धीनां, मप्तानां भवानां, सप्तविधसंसाराणां, पण्णा नीवनिकायानां, षण्णां आवश्यकानां, पञ्चानामिंद्रियाणां, पचानां महाव्रतानां, पंचानी समि- तीना, पंचानां चारित्राणां, चतसृणां संज्ञानां, चतुर्णा प्रत्ययानां, चतुर्णां उप-सर्गाणां, मूलगुणानां, उत्तरगुणानां दृष्टिक्यां, पृष्टिक्यां, प्रादोपिक्यां, परितापनिक्या, वस्स क्रोधेन, वा मानेन वा मायया वालोमेन बारागेन वा द्वेषेण वा मोहेन वा हास्येन वा भयेन वा प्रद्धेषेण वा प्रमादेन वा प्रेम्णा वा पिपासया वा लजया वा गौरवेण वा एतेषामत्यासनतायां त्रयाणां दण्डानां, तिसृणां लेश्यानां, त्रयाणां गौरवाणां, द्वयोरातरौद्रसं- क्लेशपरिणामयोः, त्रयाणामप्रशस्तसंक्लेशपरिणामानां, मिथ्यादर्शनमिथ्या- मानमिथ्याचारित्राणां मिथ्यात्वप्रायोग्यं असंयमप्रायोग्यं कपायप्रायोग्य योगप्रायोग्यं अप्रायोग्यसेवनताया प्रायोग्यगीयां, अत्र मे यः कश्चिदेवा- सिकः रात्रिकः अतिक्रमः व्यतिक्रमः अतिचारः अनाचारः आभोगः अनाभोगः तस्य भगवन् ! प्रतिक्रमामि मया प्रतिक्रान्तं, तस्य मे सम्य- क्त्वमरण समाधिपरणं पण्डितमरणं वीर्यमरणं दुःखक्षयः कर्मक्षयः बोधि- लाभः सुगतिगमनं समाधिमरण जिनगुणसंप्राप्तिर्भवतु मम । 'व्रतसमिती'- इत्यादि पठेत् । (इति प्रतिक्रमणपीठिकादण्डकाः) [२६४] अथ सर्वातिचारविशुद्धयर्थं देवसिक-(रात्रिक) प्रतिक्रमणक्रियायां कृतदोषनिराकरणार्थ पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थ भावपूजावंदना- स्तवसमेत श्रीप्रतिक्रमणभक्तिकायोत्सर्ग करोम्यहम् । 'णमो अरहंताण' ( इत्यादि दण्डक पठित्वा कायोत्सर्ग कुर्यात् । अनन्तर) 'थोस्सामि' (इत्यादि पठेत् )। निषिद्धिकादंडकाः णमो अरहताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरीयाण । णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूण ॥ नमो जिनेभ्यः ३, नमो निसिद्धिकायै ३, नमोस्तु तुभ्य ३, अर्हन् ! सिद्ध ! बुद्ध ! नीरजः ! निर्मल ! सममनः ! शुभमनः ! समयोग ! समभाव ! शल्यघट्टानां शल्यपत्ताण! निर्भय ! नीराग ! निर्दोष ! निर्मोह ! निर्मम ! निःशक निःशल्य ! मानमायामृषामर्दक ! तपः- प्रभावन ! गुण-रत्न-शीलसागर ! अनन्त । अप्रमेय ! महतिमहावीरवर्ध- मान बुद्धर्षेनमोऽस्तु तुभ्य ३। अर्हन्तश्च सिद्धाश्च बुद्धाश्च जिनाच केवलिनोऽवधिमानिनो मनःपर्य- यज्ञानिनः चतुर्दशपुर्वाङ्गमिनः श्रुतसमितिसमृद्धाश्च, तपश्च द्वादशविध तपखिनः, गुणाश्च गुणवन्तश्च, महर्षयः, तीर्थस्तीर्थकराश्च, प्रवचनं प्रव- चनी च, ज्ञान ज्ञानी च, दर्शनं दर्शनी च, संयमः संयताश्चविनयो विनी- ताथ, ब्रह्मचर्यवासों ब्रह्मचारी च, गुप्तयश्चैव गुप्तिमन्तश्च, मुक्तयश्चैव मुक्तिमन्तश्च, समितयः समितिमन्तश्चं, खसमयपरसमयविदा, शान्तिक्षप- काश्च क्षान्तिमन्तश्च, क्षीणमोहाः क्षणिवन्तश्च, बोधितबुद्धाश्च बुद्धि- मन्तश्च, चैत्यवृक्षाश्च चैत्यानि । ( एते सर्वे मम मङ्गलं भवन्तु )। ऊधिस्तियग्लोके सिद्धायतनानिनमस्करोमि, सिद्धनिषिद्धकाः अष्टा- पदपर्वते सम्मेदे ऊर्ध्वयन्ते चम्पायां पावायां मध्यमायां हस्तिवालिकामण्डपे (नमस्यामीति सम्बन्धः )। या अन्याः काश्चित् निषिद्धिकाः जीवलोके ईषत्प्रारभारतलगतानां सिद्धानां बुद्धानां कर्मचक्रमुक्तानां नीरजसां निर्म- [२६५] लानां गुर्वाचार्योपाध्यायानां प्रवर्तिस्थविरकुलकराणां (नमस्यामि) चतु- र्वणश्च श्रमणसंघश्च भरतैरावतेषु दशसु पञ्चसु महाविदेहेषु ( मम मङ्गलं भूयात् ) ये लोके संति साधवः संयता तपस्विन एते मम मंगलं पवित्रं । एतानहं मगल करोमि भावतो विशुद्धयः शिरसा, अभिवन्द्य सिद्धान कृत्वाञ्जलिं मस्तके त्रिविधं त्रिकरणशुद्धः । १. प्रतिक्रमामि भदन्त ! दैवसिकस्यातिचारस्य अनाचारस्य मनो- दुश्चरित्रस्य वचनदुश्चरित्रस्य कायदुश्चरित्रस्य ज्ञानातिचारस्य दर्शनाति- चारस्य तपोऽतिचारस्य वीर्यातिचारस्य चारित्रातिचारस्य पञ्चानां महा- व्रतानां पश्चानी समितीनां तिसृणां गुप्तीना षण्णामावश्यकानां षण्णां जीवनिकायानां विराधनायां पीलः (पीडा) कृतो वा कारितो वा क्रिय माणो वा समनुमतः तस्य मिच्छा मे दुष्कृतम्......। २. अतिगमने निर्गमने स्थाने गमने चक्रमणे उदर्शने परिवर्तने आकुञ्चने प्रसारणे आमर्शे परिमर्श उत्स्वपनापिते ( पूतकृते वा ) दन्तकट- कायिने (अतीवकर्कशशब्दे वा ) चलिते निषण्णे शयने सुप्तस्योत्थाय उद्भवने उद्भस्य उपविश्य शयने एकेन्द्रियाणां......संघट्टनया संघात- नया उत्तापनया परितापनया विराधनायां यत्र मे यः कश्चिदेवसिको रात्रि- कोऽतिक्रमो न्यतिक्रमोऽतिचारोऽनाचारस्तस्य. ३. ऐर्यापथिकायां विराधनायां ऊर्ध्वमुखंचरता वा अधोमुखं चरता वा तिर्यग्मुख चरता वा दिशामुख चरता वा विदिशामुखं चरता वा प्राणाचक्रणतः बीजचंक्रमणतः हरितचंक्रमणतः उतिंग-पणक-दकमृद्- मर्कटक तन्तु-सत्वाना चंक्रमणतः पृथ्वीकायिकसंघट्टनया अप्कायिकसंघ- इनया तेजःकायिकसंघट्टनया वायुकायिकसंघट्टनया वनस्पतिकायिकम- घट्टनया त्रसकायिकसघट्टनया उत्तापनया परितापनया विराधनायां एत- स्या मे यः कश्चिदैर्यापथिक्याम् ...... । ४. उच्चारप्रस्रवणच्वेलसिंहानकविकृतिप्रतिस्थापनिकायां प्रतिस्था- पयता ये केचित्प्राणा वा भृवा वाजीवा वा सत्वा वा संघट्टिता वामंधा- तिता वा उचापिता वा परितापिता वा एतस्मिन् [२६६] :- ५. अनेषणया पानभोजनेन पणकभोजनेन वीजभोजनेन हरित- भोजनेन अधःकर्मणा वा पश्चात्कर्मणा वा पुराकर्मणा वा उद्दिष्टकृतेन निर्दिष्टकृतेन दयासंसृष्टकृतेन रससंसृष्टकृतेन परिसातनिकया प्रतिष्ठापनि- कया उद्देशिकया निर्देशिकया क्रीतकृते मिश्रे जाते स्थापिते रचिते अनि- सृष्टे वलिप्राभृते प्राभृते घट्टिते मूर्छिते अतिमात्रभोजने एतस्यां ( अनेप- णाया) मे यः कश्चित् गोचरिणः .....। ६. स्वप्मेन्द्रियाया विराधनायां स्त्रीविपरियासिकायां दृष्टिविपरियासि- कायां मनोविपरियासिकायां वचोविपरियासिकायां कायविपरियासिकायां भोजनविपरियासिकाया उच्च्यावजाया स्वप्नदर्शनविपरियासिकायां पूर्व- रते पूर्घखेलिते नानाचिन्तासु विश्रोत्रिकासु, एतस्या .....। ७. स्त्रीकथाया अर्थकथायां भक्तकथाया राजकथायां चोरकथायां वैरकथायां परपापण्डकथायां देशकथायां भाषाकथायां अकथायां विक- थायां निष्टुरकथायां परपैशून्यकथायां कान्दपिक्या कौतुत्कुचिकायां डाम्ब- रिकायां मौखरिकायां आत्मप्रशंसनतायां परपरिवादनतायां परजुगुप्सन- तायां परपीडनकरायां सावधानुमोदनिकायां एतस्यां .. ८. आर्तध्याने रौद्रध्याने इहलोकसंज्ञाया परलोकसज्ञायां आहारस- ज्ञाया भयसज्ञायां मैथुनसज्ञाया परिग्रहसज्ञाया क्रोधशल्ये मानशल्ये माया- शल्ये लोभशल्ये प्रमशल्ये पिपासाशल्ये निदानशल्ये मिथ्यादर्शनशल्ये क्रोधकपाये मानकपाये मायाकपाये लोभकषाये कृष्णलेश्यापरिणामे नील- लेश्यापरिणाम कापोतलेश्यापरिणामे आरंभपरिणामे परिग्रहपरिणामे प्रतिश्रयामिलापपरिणामे मिथ्यादर्शनपरिणामे असंयमपरिणामे कषाय- परिणामे पापयोगपरिणामे कायसुखामिलापपरिणामे शब्देषु रूपेषु गंधेषु रसेषु स्पर्शेषु कायिकाधिकरणिकायां प्रदोपिकायां परिद्रावणिक्यां प्राणा- तिपातिकासु, एतसिन् ......। ९ एकस्मिन् भावे अनाचारे, द्वयो रागद्वेषयोः, त्रिषु दण्डेषु, तिसृषु गुप्तिषु त्रिषु, गौरवेषु, चतुःपु, चतसृषु संज्ञाषु, पश्चसु महात्र- तेषु, पञ्चसु समितिषु, षट्सु जीवनिकायेपु, षट्सु आवश्यकेषु सप्तसु [२६७] ।

भयेषु, अष्टसु मदेषु नवसु ब्रह्मचर्यगुप्तिपु, दशविधेषु श्रमणधर्मेषु, एका- दशविधासु उपासकप्रतिमासु, द्वादशविधासु मिथुप्रतिमासु, त्रयोदश- विधेष क्रियास्थानेषु, चतुर्दशविधेषु भूतग्रामेषु पञ्चदशविधेषु प्रमादस्थानेषु षोडशविधेषु प्रवचनेषु, सप्तदशविधेसु असंयमेषु अष्टादशविधेषु असम्प- रायेषु, एकोनविंशती नाथाध्ययनेषु, विंशतौ असमाधिस्थानेषु, विशेषु सवलेषु, हार्विशेषु परीसहेषु, त्रयोविशेष सूत्रकृताध्ययनेषु, चतुर्विशेषु अर्ह- त्सु, पञ्चविंशतौ भावनासु, पञ्चविशेषु क्रियास्थानेषु, षडविंशतौ पृथिवीपु, सप्तर्विशेषु अनगारगुणेषु, अष्टाविशेषु आचारकल्पेषु एकोनत्रिंशत्सु पापमू- प्रसङ्गेषु, त्रिंशत्सु मोहनीयस्थानेषु, एकत्रिंशत्सु कर्मविपाकेषु द्वात्रिंशत्सु जिनोपदेशेषु त्रयस्त्रिंशत्प्रकारायां अत्यासादनवायां, संक्षेपेण जीवानामत्या- सादनतायां, अजीवानामत्यासदनतायां, ज्ञानस्यात्यासादनतायां दर्शनस्य अत्यासादनतायां चारित्रस्यात्यासादनतायां तपसःअत्यासादनतायां वीर्यस्य अत्यासादनतायां तत्सर्व पूर्व दुश्चरित्र गहें, प्रत्युत्पन्न अतिक्रान्तं प्रतिक्रमामि अनागतं प्रत्याख्यामि, अगहितं गहें, अनिन्दित निन्दामि, अनालोचित आलोचयामि, अराधनां अभ्युत्तिष्ठामि, विराधनां प्रतिक्रमामि...... । १०.इच्छामि भगवन्! इमं निग्रंथ प्रवचन अनुत्तरं केवलियं परिपूर्ण नैकायिफसामायिकं संशुद्ध शल्यघटानां शल्यघातन सिद्धिमार्ग श्रेणिमार्ग, क्षांतिमार्ग मुक्तिमार्ग, प्रमुक्तिमार्ग मोक्षमार्ग प्रमोक्षमार्ग निर्माणमार्ग निर्वाणमार्ग सर्वदुःखपरिहाणिमार्ग सुचरित्रपरिनिर्वाणामार्ग अविसंपादक समाश्रयन्ति, प्रवचनं उत्तम, तच्छद्दधामि, तत्प्रतिपद्ये, तद्रोंचे, तत्स्पृ- शामि, इत उत्तरमन्यन्नास्ति न भृतं [न भवति ] न भविष्यति ज्ञानेन वा दर्शनेन वा चारित्रेण वा सूत्रेण वा । इतो जीवा सिद्धयति बुद्धथन्ते मुच्यन्ते परिनिर्वायति सर्वदुःखानामन्तं कुर्वति परिविजानति, श्रमणोऽ- स्मि संयतोऽस्मि उपरतोऽस्मि उपशान्तोऽस्मि उपधिनिकतिमानमाया- मृषामिथ्याज्ञानमिथ्यादर्शनमिथ्याचारित्र च प्रतिविरतोऽस्मि, सम्यग्ज्ञान सम्यग्दर्शन सम्यग्चारित्रं च रोचे, यज्जिनवरैः प्रज्ञप्त अत्र ११. प्रतिक्रमामि भदन्त ! सर्वस्य, सर्वकालिक्याः, ईर्यासमितेः [२६] भाषासमितेः एषणासमितेः आदाननिक्षेपणसमितेः उच्चार प्रश्रवण-खेल- सिंघाणक विकृतिप्रतिष्ठापनसमितेः मनोगुप्तेः वचोगुप्तेः कायगुप्तेःप्राणा- तिपाताद्विरमणायाः मृषावादाद्विरमणायाः अदत्तादानाद्विरमणायाः मैथु- नाद्विरमणायाः परिग्रहाद्विरमणायाः रात्रिभोजनाद्विरमणायाः सर्वविराध- नायाः सर्वधर्मातिक्रमतायाः सर्वमिथ्याचरितायाः (विशुद्धेनिमित्त ) अत्र......। इच्छामि भदन्त ! वीरभक्तिकायोत्सर्ग यो मम देवसिको रात्रिकोऽ- तिचारोऽनाचार आभोगोऽनाभोगः कायिको वाचिको मानसिक दुश्चि- न्तितः दुर्भापितः दुष्परिणामितः दुःस्वमितः ज्ञाने दर्शने चारित्रे सूत्रे सामायिके पश्चानां महाव्रतानां पश्चानां समितीनां तिसृणां गुप्तीनां षण्णां जीवनिकायानां पण्णां आवश्यकाना विराधनायां अष्टविधस्य कर्मणाःनिर्घा- तनस्य अन्यथा उच्छ्वासितेन वा निःश्वासितेन वा उन्मिषितेन वा निर्मिषि- तेन वा खात्कृतेन वा छीत्कृतेन वा जम्मायितेन वा सूक्ष्मः अङ्गचलाचलैः दृष्टिचलाचलैः एतैः सर्वैः असमाधिप्राप्तैः आचारैः, यावदहतां भगवतां पर्युपासनं (देवसिकप्रतिक्रमणायामष्टोत्तरशतोच्छासैः षट्त्रिंशद्वारान् पञ्च- नमस्कारोचारण रात्रिप्रतिक्रमणायां तु चतुःपंचाशदुच्छ्वासैः अष्टादशवा- रान् पंचनमस्कारोच्चारणं पर्युपासन ) करोमि तावत्कायं पापकर्म दुश्च- रित व्युत्सृजामि । मुनिप्रतिक्रमणम् ३. (इच्छामि भते ! अहमियम्मि आलोचेउ, अट्ठएह दिवसाणं अट्ठण्ह राईणं अभंतरादो पञ्चविहो आयारो णाणायारो दंसणायारो तवा- यारो वीरियायारो चरिचायारो चेदि। [२६९] इच्छामि भते ! पक्खियस्मि आलोचेलं, पएणग्सह दिवसाणं पण्ण- रसह राईणं अब्भंतराओ पञ्चविहो आयारो णाणायारो दसणायागेतवा- यारो वीरियायारो चरित्तायारो चेदि । इच्छामि भंते ! चाउमासियम्मि आलोचे उं, चउण्ह मासाणं अट्ठण्ह पवखाणं वीसुत्तरसयदिवसाणं वीसुत्रसयराईण अभंतराओं पचविहो आयारो णाणायारो दंसणायारो तवायारो बीरियायारो चरिचायारोचेदि। इच्छामि भंते ! संवच्छरियम्मि आलोचेउ, वारसह मासाणं, चऊ- बीसएह पक्खाण, तिण्ह छावढिसयदिवसाणं, तिएह छावट्ठिमयराईण अब्भतराओं पञ्चविहो आयारोणाणायारोदसणायारो तवायारो वीरिया- यारो चरित्तायारो चेदि । तत्थ णाणायारो, काले, विणए, उवहाणे, बहुमाणे, तहेव अणि- ण्हवणे, विजण-अत्थ-तदुभये चेदि णाणायारो अहविहो परिहाविदो, से अखहीणं वा, सरहीणं वा, पदहीणं वा, पिंजणहीणं वा, अत्थहीणं वा, गथहीणं वा, थएसु वा, थुईसु वा, अत्थक्खाणेसु वा, अणियोगेसु वा अणियोगद्दारेसु चा, अकाले सज्झाओ कओवा, कारिंदो वा, कीरंतो चा समणुमण्णिदो, काले वा परिहाविदो, अच्छाकारिद, मिच्छा मेलिदं, आमेलिदं, वामेलिद, अण्णहादिण्ण, अण्णहा पडिच्छिद, आवासएसु परिहीणदाए, तस्स मिच्छा मे दुक्कड ॥१॥ दसणायारो अहविहो, णिस्संकिय णिक्कखिय णिब्धिदिगिंछा अमृढदिट्ठी य, उवगृहण ठिदिकरणं वच्छल्ल पहावणा चेदि । अट्टविहो परिहाविदो, संकाए कंखाए विदिगिंछाए अण्णदिट्ठीपसंसणणाए परपा- खण्डपसंसणदाए अणायदणसेवणदाए अवच्छल्लदाए अप्पहावणदाए, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥२॥ तवायारो वारसविहो, अब्भतरो छब्बिहो बाहिरो छबिहो चेदि तत्थ वाहिगे अणसणं आमोदरिय वित्तिपरिसंखा रसपरिचाओ सरीरपरिचाओ विवित्तसयणासणं चेदि । तत्थ अभतरो पायच्छित विणओ वेजायचं सज्माओ झाणं विउस्सग्गो चेदि । अब्भनरं वाहिरं चारसविह तबोकम्म [२७०] ण कदं णिसण्णेण, पडिक्कतं, तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥ ३॥ वीरियायारो पञ्चविहो परिहाविदो वरवीरियपरिकमेण' नहुत्तमा- येण बलेण वीरिएण परिकमेण" णिगृहियं तवोकम्म ण कम णिस- एणेण पडिक्कतं तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥४॥ चरित्तायारों तेरसविही परिहाविदों, पञ्चमहन्वयाणि, पश्च समि- दीओ, तिगुत्तीओ चेदि । तत्थ पढममहन्वदं पाणादिवादादो वेरमणं । से पुढविकाइया जीवा असंखेजासंखेजा, आउकाइया जीवा असंखेजासं- खेजा, तेउकाइया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा, वाउकाइया जीवा असंखेज्जा- संखेज्जा, वणफ्फदिकाइया जीवा अणंताणंत, हरिया बीया अंकुरा छिण्णा भिण्णा, तस्स उदावणं परिदावणं विराहणं उवधादो कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं । वेइदिया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा, कृक्खिकिमि-शव-खुल्लयवराडय- अक्ख रिट्ठ-गडवाल-संबुक्क-सिप्पि-पुलविकाइया तेसिं उद्दावणं परिदा- वणं विराहण उपघादो कदो वा कारिढो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं । तेइदिया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा, कुंथु-देहिय-विछियगोभिंद- गोजूव-मक्कुण-पिपीलियाइया, तेसिं उद्दावणं परिदवाणं विराहणं उवघादो कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुश्कडं । चउरिदिया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा, दसमंसय-मक्खियपयंग-कीड- भमर- महुयरि-गोमक्खियाइया, तेसिं उद्दावणं परिदावणं विराहणं उव- घादो कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कड। पंचिंदिया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा, अंडाइया पोदाइया जराइया रसाइया संसेदिमा सम्मुच्छिमा उम्मेदिमा उक्वादिमा अवि चउरासीदि- जोणिपमुहसदसहस्सेसु, एदेसि उद्दावणं परिदावणं विराहणं उवघादो कदोवा कारिदो वाकीरतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा में दुक्कर ॥१॥ पाहावरे दुग्वे महव्वदे मुसावादादो वेरमणं, से कोहेण वा माणेण [२७१] वा मारण वा लोहेण वा राएण वा दोसेण वा मोहेण वा हस्सेण वा भएण वा पमादेण वा पेम्मेण वा पिवासेण वा लज्जेण वा गारवेण वा अणादरेण वा केणवि कारणेण जादेण वा सम्वो मुसावादो भासिओ भासाविओ भासिञ्जतो वि समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥२॥ आहावरे तब्वे महव्वदे अदिण्णदाणादो वेरमणं, से गामे वा णयरे वा खेडे वा कवडे वा मंडवे वा मडले वा पट्टणे वा दोणमुहे वा घोसे वा आसमे वा सहाए वा संवाहे वा सण्णिवेसे वा तिणं वा कट्ट वा विडि वा मणि वा एवमाइयं अदत्तं गिहियं गेहाविय गेण्हिज्जत समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥३॥ आहावरे चउत्थे महव्वदे मेहुणादो वेरमणं, से देविएसु वा माणु- सिएसु वा तेरिच्छिएसु वा अचेयणिएसु वा पणुणामणुणेसु रुवेसु मणु- णामणुणेसु सद्देसु मणुणामणुणेसु गंधेसु मणुणामणुणेसु रसेसु मणुणाम- णुणेसु फासेसु चक्खिदियपरिणामे सोदिदियपरिणामे घाणिदियपरिणामे जिभिदियपरिणामे फासिंदियपरिणामे णोइंदियपरिणामे अगुण अगु- निदिएण णवविहं चंभचरियं ण रक्खियं ण रक्खावियं ण रक्खिज्जतो वि समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ।। ४ ।। आहावरे पञ्चमे महव्वदे परिग्गहादो वेरमणं, सो वि परग्गहो दुविहो अन्भतरो वाहिरो चेदि तत्थ अब्भतरो परिग्गहोणाणावरणीयं दंसणा- वरणीयं वेयणीय मोहणीय आउग्ग णाम गोदं अंतराय चेदि अट्टविहो तत्थ वाहिरो परिग्गहो उवयरण-भड-फलह पीढ-कमडलु-संथार सेज्जउव- सेज्ज-भत्त-पाणादिमेएण अणयेविहो, एदेण परिग्गहेण अट्टविह कम्मरयं बद्धं बद्धावियं वद्धज्जंतं पि समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कड ॥५॥ आहावरे छठे अणुचदे राइभोयणादो रमणं, से असणं पाणं खाइयं रसाइयं चेदि चविहो आहारो, से तिचो वा कडओ वा कसाइलो वा अमिलो वा महुरों वा लवणो वा दुञ्चितिओ दुव्भासिओ दुप्परिणामिओ दुस्सिमिणिओ रत्तीए भुत्तो भुजवियो भुजितो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कई । छ । [२७२] पंचसमिदीओ ईरियासमिदी भासासमिदी एसणासमिदी आदावण- णिक्खेवणसमिदी उच्चारपस्सवणखेलसिंहाणयवियडिपइट्ठावणासमिदीचेदि। तत्थ ईरियासमिदी पुब्बुत्तरदक्षिणपच्छिमचउदिसिविदिसासु विहरमा- गेण जुगंतरदिद्विणा दहव्वा डवडवचरियाए पमाददोंसेण पाण-भूद- जीव-सत्ताणं उवधादो कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमरिणदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥६॥ तत्थ भासासमिदी कक्कसा कडया परुसा णि?रा परकोहिणी मज्झकिसा अइमाणिणी अणयंकरा छेयंकरा भूयाण वहंकरा चेदि दस- विहा भासा भासिया भासाविया भासिज्जतो पि समणुमरिणदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥ ७ ॥ तत्थ एसणासमिदी आहाकम्मेण वा पच्छाकम्मेण वा पुराकम्मेण वा उद्दिट्ठयडेण वा णिहिट्ठयडेण वा कीडयडेण वा साइया रसाइया सह- गाला सधूगिया अइगिद्धीए अग्गीव छण्हं जीवणिकायाणं विराहणं काऊण अपरिसुद्ध भिक्ख अण्णं पाणं आहारादियं आहारिय आहारावियं आहारि- जंतो पि समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥८॥ तत्थ अदावणणिक्खवणसमिदी चक्कल वा फलहं वा पोथयं ना कमंडलं वा वियर्षि वा मणिं वा एवमाइया उवयरण अप्पडिलेहिऊण गेण्हतेण वा ठवतेण वा पाण-मृद-जीव-सचाण उवघादो कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कड ॥९॥ तत्थ उच्चार-पस्सवण-खेल-सिंहाणय-वियडिपडद्यावणिया समिदी रत्तीए चा वियाले वा अचक्खुचिसए अवत्थंडिले अब्भोवयासे सणिद्धे सवीए सहरिए एषमाइऐसु अप्पासुगहाणेसु पइटावतेण पाण-भूद-जीव-सचाण उवघादो कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कड ॥१०॥ तिषिण गुत्तीओ, मणगुत्तीओ वचिगुत्तीओ कायगुत्तीओ चेदि, तत्थ मणगुत्ती अट्टे झाणे रुद्दे झाणे इहलोयसण्णाए परलोयसपणाए आहारसण्णाये भयसपणाए मेहुणसण्णाए परिग्गहसण्णाये एवमाइया जा [२७३] मणगुची ण रक्खिया ण रक्खाविया ण रक्खिज्जतो पि समणुमण्णिदो तस्स मिच्छ मे दुक्कडं ॥ ११ ॥ तत्थ पचिगुती इत्थिकहाए अत्थकहाए भत्तकहाए रायकहाए चोर- कहाए वेरकहाए परपासंडकहाए एवमाझ्यासु जा रक्खिया वचि गुत्ती ण रक्खिया ण रक्खाविया ण रविवज्जतं पि समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥ १२॥ तत्थ कायगुती चित्रकम्मेसु वा पोतकम्मेसु वा कटकम्मेसु वा लेप्पकम्मेसु वा एक्पाइयासु जा कायगुत्ती ण रक्खिया ण रक्खाविया ण रक्सिज्जंतो पि समणुमणिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥ १३ ॥ णवसु वंभचेरगुतीसु, चउसु सण्णासु, चउसु पच्चएसु, दोसु अट्ट- रुद्दसंकिलेसपरिणामेसु, तीसु अप्पसस्थसंकिलेसपरिणामसु, मिच्छाणाण- मिच्छादसण-मिच्छाचरित्तेसु, चउसु उवसग्गेसु, पञ्चसु चरित्तेसु, छसु जीवणिकाएसु, छसु आवासएसु, सत्तसु भएसु, अट्ठसु सुद्धीसु, (णवसु वभचेरगुत्तीसु) दससु समणधम्मसु, दससु धम्मज्झाणेसु, दससु मुडेसु, बारसेसु संजमेसु, वावीसाए परीसहेसु, पणवीसाए भावणासु, पणवीसाए किरियासु, अट्ठारससीलसहस्सेसु, चउरासादिगुणसयसहस्सेसु, मूलगु- णेसु, उचरगुणेसु, अट्ठमियम्मि पक्षियम्मिचउमासियम्मि संवच्छरियम्मि आइक्कमो वदिक्कमो अइचारो अणाचारो आभोगो अणाभोगो जो तं पडिक्कमामि भए पडिक्क्रतं, तस्स मे सम्मरमरणं समाहिमरणं पंडियमरणं वीरियमरणं दुक्खक्खओ कम्मक्खओ चोहिलाहो सुगडगमणं समाहिमरणं जिणगुणसम्पत्ति होउ मज्डं। प्रतिक्रमणदण्डकः-- णमो अरहंताण णमो सिद्धाणं णमो आइरियाण | णमो उबझायाणं णमो लोए सबसाहूणं ।। १ ।। णमो जिणाणं, णमो ओहिजिणाणं, णमो परमोद्दिजिणाण, णमो [२७५] . - - -- . मम्वोहिजिणाया, णमो अणतोहिजिणायां, णमो कोट्टयुद्धीणं, णमो वीज- युवीणा, रामो पादाणुमारीग्णं, गमो संमिण्यामोदागणं, णमो सययुद्धाणं, णमो पन्नेययुद्धाणं, गामो चोहिययुद्धाण, णमो उजुमदीणं, णमो विउल- मीण, गमो दमपुथ्वीणं, णमो चउदमपुर्वीण, गमो अटुंगमहाणिमिन- कुमलाण, पामो विउन्बढिपत्तागं, गमो विज्जाहगरण, णमो चारणाण, रामो पप्णयमणाण, गामो आगामगामीग, णमो आसीविमाणं णमो दिट्टचिमाग, णमो उग्गतयाणं, गामो दिनतवाण, णमो तचतवाण, णमो महानवाण, णमो घोरतवाण, णगो घोग्गुणाण, णमो घोरपरककमाण, सामो घोग्गुणमयारीणं, गामो आगोमहिपत्ताण, णमो रोन्लोसहिपत्ताणं गामी जल्लोमहिपन्तागं, गामो विप्पीमहिपत्ताणं, गामो मव्योमहिपन्ताणं, णमो मगवलीणं, गमो यचिवलीगणं, गयो कायवलीणं, णमो खीरमवीणं, गमो मरिपमयीगा, गमो परमवीण, गमो अमियसीणं, णमो अक्खीण- पहाणमाणं. णमो पढ़याणाणं णमो सिद्धायदणाणं, गामो भयवटो मह- दिमहावीग्वटढमाणयुद्धरिगीणो चेदि । जम्संतियं धम्मपहं णियच्छे तस्सं- नियं चणटयं पहुंजे । कारण याचा मणमावि णिचं मफारए तं सिरपञ्च- मेण ॥ १ ॥ सुद में आउम्संतो! इह सलु समरणेण भयवदो महदि महावीरेण महाफम्मवेण सव्वण्हुणा मधलोगटरिसिणा संदेवासुरमाणुसस्स लोयस्स आगदिगदिचरणोरवाद वध मोक्र इइिंढ ठिहिं जुदि अणुभाग तक्क कल मणीपाणसिय भृनं कय पडिसवियं आदिकम्मं अरुहकम्म सन्चलोए मधजीव सत्रमावे सव्वं मम नाणंता पस्संना विहरमाणेण ममणणं पञ्च- महच्चदाणि गईभायणवेरमणमहाणि सभावणाणि समाउगपदाणि सउत्तर- पढाणि मम्म धम्म उबदेसिदाणि । त जहा- पढमे महब्बद पाणादिबादादो चेग्मणं, विदिए महन्वदे मुसावादादो बैग्मणं, निदिए महब्बदे अदिण्णदाणादो वेरमणं, चउत्थे महव्वदे मेहु- णादो वेग्मण, पश्चमे महब्वदे परिग्गहादो वेग्मए, छटेमणुव्वदे राईभोय- णाटो वरमण चेदि। [२७५] तत्थ पढमे महबदे सव्व भंते ! पाणादिवादं पञ्चक्खामि जावजीच तिविहेण मणसा चचिया कारण, से एइंदिया वा, पेइंदिया था, तेइदिया वा, चउरिदिया वा, पंचिंदिया वा, पुढविकाइए वा आउकाईए का तेउ- काइए वा वणप्फदिकाइये वा तसकाइए वा अंडाइए वा पोदाइए वा जराइए वा रसाइए वा संसेदिमे वा सम्मुच्छिमे वा उम्मेदिमे चा उबवा- दिमे वा तसे वा थावरे वा बादरे वा सुहुमे वा पाणे वा भूदे वा जीवे वा सत्ते वा पञ्जत्ते वा अपजत वा अवि चउरासीदिजोणिपमुहसदसह- स्सेसु, गेव सयं पाणादिवादिज णो अण्णेहि पाणे अदिवादावेज्ज अण्णेहि पाणे अदिवादिन्ततो वि ण समणुपणेज्ज तस्स भंते ! अइचार पडिक- मामि जिंदामि गरहामि अप्पाणं, बोस्सरामि पुबिचणं भते ! ज पिमए रागरस वा दोसस्स वा मोहस्स वा वसगदेण सय पाणे अदिवादाविदे अण्णेहि पाणे अदिवादाविद अण्णेहिं पाणे अदिवादिज्जते विं समणुमण्णिदे तं पि हमस्स णिग्गंथस्स पावयणस्स अणुत्तरस्स केवलिपस्स केवलिपण्ण- त्तस्स धम्मस्स अहिंसालक्खणस्स, सचाहिटियस्स विणय मूलस्स खमाब- लस्स अट्ठारससीलसहस्सपरिमडियस्सचउरासीदिगुणसयसहस्सविहूसियरस पवयंभचेरगुत्तस्स नियतिलक्खणस्स परिचायफलस्स उबसपपहाणस्स खंतिमग्गदेसयस्स मुत्तिमग्गपयासयस्स सिद्धिमग्गपञ्जवसाहणस्स, से कोहेण वा माणेग वा मारण वा लोहेण वा अण्णाणेण वा अदंसणेण वा अवि- रिएण वा असंयमेण वा असमणेण वा अणहिगमणेण वा अभिमंसिदाएण वा अयोहिदाएण वा रागेण वा दोसेण वा मोहण वा हस्सेण वा भएण वा पदोसेण वा पमादेण वा पेम्मेण वा पिवासेण वा लज्जेण वा गारवेण वा आणादरेण वा केण वि कारणेण जादेण वा आलसदाए कम्मभारि- गढाए कम्मगुरुगदाए कम्मदुच्चरिदाए कम्मपुरुक्कडदाए तिगारवगुरु- गदाए अबहुमुददाए अविदिदपरमट्ठदाए सन्ध पुब्वं दुच्चरिय गरिहामि आगमेसि च, अपच्चक्खियं पच्चक्खामि, अणालोचियं आलोचेमि अणि- दिय जिंदामि, अगरहिय गरहामि, अपडिक्कत पडिकमामि, विगहणं योस्स- गमि आगहणं अब्भुटेमि, अण्णाण बोस्सरामि सण्याण अब्भुट्टेमि, कुदसणं [२७६] वोस्सरासि सम्मदंसणं अन्भुढेमि, कुचरियं वोस्सरामि सुचरिय अब्भुढेमि, कुतवं वोस्सरामि सुतवं अन्भुटेमि. अकरणिज्जं वोस्सरामिकरणिज्ज अन्न- टेमि अकिरिय वोस्सरामि किरिय अब्भु मि, पाणादिवादं वोससरामि अभयदाणं अब्भुट्टेमि, मोसं बोस्सरामि सञ्च अन्भुट्टैमि, अदचादाणं वोस्स- रामि दिणकप्पकिज्ज अब्भुठेमि, अवंभेवोस्सरामि, बंभचरिय अन्भु- ठेमि, परिग्गह वोस्सरामि अयरिग्गहअन्भुठेमि, राईभोयणं वोस्सरामि दिवाभोयणमेगभचं पच्चुप्पण फासुगं अन्भुट्ठमि, अट्टरुद्दज्माणं वोस्सरामि धम्मसुक्कज्झाण, अब्भुट्टमि; किण्हणीलकाउलेस्सं वोस्सरामि ते उपम्मसु- क्कलेस्सं अब्भुठेमि, आरंभ वोस्सरामि अणारंभ अब्भुटठेमि असंजमं बोस्स- रामिसंजमं अभुठे मि, सग्गथं वोस्सरामि णिग्गथ अब्भुट्ठमि, सचेल वोस्स- रामि अचेल अभुटेमि, अलोचं वोस्सरामि लोच अन्भुटेमि, पहाण वोस्सरामि अण्हाणं अन्भुढेमि, अखिदिसयणं वोस्सरामि खिदिसयण अव्युट्टेमि, दत- वण वोम्सरामि अदतवण अन्भुटेमि, अद्विदि भोयणं वोस्सरामि ठिदिभोयण मेगमत्तं अन्भुटेमि अपाणिपतंवोस्सरामि पाणिपचं अन्मुडेमि, कोह वोस्स- रामि खंति अव्भुटूठेमि, माण वोस्सरामि महवं अन्भु मि, माय वोस्मरामि अञ्जव अभुट्टेमि लोह वोस्सरामि संतोसं अभुढेमि अतनं वोस्सरामि दुवादसविहतवोकम्म अब्भुठे मि, मिच्छ परिवजामि सम्म उवसंप- ज्जामि, असील परिवज्जामि सुसील उवसंपन्जामि, ससलं परिवज्जामि णिसल्लं उपसंपज्जामि;अविणय परिवज्जामि 'विणय उपसंपज्जामि, अणा- चारं परिवज्जामि आचारं उवसंपज्जामि, उम्मग्ग परिवज्जामि जिणमग्ग उपसंपज्जामि अखर्ति परिवज्जामि खंति उपसंपज्जामि अगुलिं परिव- ज्जामि, गुलिं उपसंपज्जामि, असुचिं परिवज्जामि सुमुत्ति उपसंपज्जामि, असमाहि परिवज्जामि, सुसमाहि उपसंपज्जामि, ममत्ति परिवज्जामि णिम- मत्ति उपसंपज्जामि अभाविय भावेमि भाविय ण भावेमि, इमं णिग्गंथं पव्ययणं अणुत्तरं कवलियं पडिपुण्णं णेगाइयं सामाइय संसुद्धं सल्लघट्टाणं सल्लघत्ताण सिद्धिमग्ग सेढिमग्गं खतिमग्ग मुत्तिमा पमुत्तिमग्ग मोक्ख- मग्ग पमोक्खमग्ग णिज्जाणमग्ग णिव्याणमग्ग सव्वदुक्खपरिहाणिमग्गं [२७७] - सुचरियपरिणिव्याणमग जत्थ ठिया जीवा सिझति बुझंति मुंचति परिणिव्वायंति सव्वदुक्खाणमंतं करेंति तं सदहामि तं पचियामि तं रोचेमि तं फासेमि, इदो उत्तर अण्णं णत्थि ण सूदं ण भवं ण भविस्सदि, णाणेण वा दसणेण वा चरिण वा सुतेण वा सीलेण वा गुणेण वा तवेण वा णियमेण वा वदेण वा विहारेण वा आलएण वा अञ्जवेण वा लाहदेण वा अण्णण वा वीरिएण वा समणोमि संजदोमि उवरदोमि उवसंतोमि उव- घिणियडि माण माया-मोस-मूरण मिच्छाणाण मिच्छादसण मिच्छाचरिचं च पडिविरदोमि, सम्मणाण-सम्मदसण-सम्मचरित्र च रोचेमि, जं जिणव- रेहिं पण्णचो जो मए देवसिय-राइय-पक्खियचाउम्मासियसंवच्छरिय इरि- यावहिकेमलोचाइचारस्स संथारादिचारस्स पथादिचारस्स सव्वादिचारस्स उत्तमस्स सम्मचरित्रं च रोचेमि । पढमे महबदे पाणादिवादादो वेरमणं उवट्ठावणमडले महत्थे महागुणे महाणुभावे यहाजसे महापुरिसाणुचिन्ने अरहंतसक्खिय सिद्धसक्खियं साहुसक्खियं अप्पसक्खियं परसश्वियं देवा- तासक्खिय उत्तमट्ठम्हि इद मे महव्वद सुचदं दढव्वद होदु, णित्थारयं पारयं तारय आराहियं चावि ते में भवतु | प्रथमं महानत सेंपां व्रतधारिणां सम्यक्त्वपूर्वकढवतं सुव्रत समा- रुढं ते मे भवतु ॥३॥ णमो अरहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरीयाणं । णमो उवमायाणं णमो लोए सव्वसाहण ॥४॥ पाहावरे विदिए महव्वदे सच भते ! मुसाबाट पञ्चक्खामि जाव- ज्जीवं तिविहेण मणाना वचिया काएण, से कोहेण वा माणेण वा माएण या लोहेण वा रागेण वा दोसेण वा मोहेण वा हस्सेण वा भएण चा पदो- सेण वा पमादेण वा पिम्मेण वा पिचासेण वा लज्जेण वा गारवेण वा अण्णादरेण वा केणवि कारणेण आदेण या णेव सय मोसं भासेज ण अपणेहिं मोसं भामाविज्ज अयणेहि मासं भासिज्जंत पिण समणुमणिज्ज तस्म भते! अइचारं पडिक्कमामि णिंदामि गरहामि अप्पाणं, वोस्सरामि [२७८] पुबिचणं भंते ! जंपि मए रागस्स वा दोसस्स वा मोहस्स चा वसंगदेण सयं मोसं भासिय अण्णेहिं मोसं भासावियं अण्णाहिं मोसं भासिज्जत पि समणुमण्णिद इमस्स णिग्गंथस्स पवयणस्स अणुत्तरस्स केवलियस्स केवलि- पण्णत्तस्स धम्मस्स अहिंसालक्खणस्स सच्चहिटियस्स विणयमूलस्स खमा- बलस्स अट्टारससीलसहस्सपरिमंडियस्स चउगसीदि गुणसयसहस्सविहू- सियस्स णवसुवभचेरगुचस्स णियदिलक्खणस्स परिचागफलस्स उवसम- पहाणस्स खंतिमग्गदेसगस्स मुत्तिमग्गपयासयरस सिद्धमग्गपञ्जवसाह- णस्स' 'सम्मणाण सम्मदसण-सम्पचरिच च रोचेमि जं जिणवरेहि पण्णत्तो इत्थ जो मए देवसिय-राइय-पक्खिय-चउमासिय संवच्छरियइरि- यावहिकेसलोचाइचारस्सपथादिचारस्स सब्वातिचारस्स उत्तमट्ठस्स सम्म- चरित्तं च रोचमि, विदिए महब्बदे मुसावादादो वेरमणं उवट्ठाणमंडले महत्थे महागुणे महाणुभाचे महाजसे महापुरिसाणुचिण्णे अरहतसक्खियं सिद्धसक्खिय साहुसक्खिय अप्पसक्खिय परसक्खियं देवतासक्खियं उत्तम- हम्मि इदं मे महव्वद सुव्वद दढव्वदं होदु, णित्थारय पारयं तारयं आरा- हियं चावि ते मे भवतु । द्वितीय महावत सेंवपां व्रतधारिणां सम्यक्त्वपूर्वकं दृढव्रतं सुव्रत समारूढ ते मे भवतु ।। ३॥ णमो अरहंताणं णमो सिद्धाण णमो आइरीया । णमो उवज्झायाण णमो लोए सव्यसाहूण ॥ ३ ॥ आधावरे तदिये महव्वदे सव्व भते ! अदत्तादाण पञ्चक्खामि जाव. ज्जीव तिविहेण मणसा वचिया कारण से देसे वा गामे वा णगरे वा खेडे वा कन्नडे वा मंडवे वा मडले वा पट्टणे वा दोणमुहे वा घोसे वा आसणे वा सहाए वा संवाहे वा सण्णिवसे वा तिणं वा कह वा विडि वा मणि वा खेच वा खले वा जले वा थले वा पहे वा उप्पहे वा रणे वा अरण्णे वा गटुं वा पमुटुं वा पडिढ वा अपडिढं वा सुणिहिद वा दुण्णि- हिंदं वा अप्पं वा बहु वा अणुय वा थूल वा सचित्तं वा अंचिचं वा मज्म- [२७६] ज्यं वा बहित्य वा अवि दंततरसोहणमित्तं पिणेव संयं अदन गोरिण- जाणो अपणेहिं अदर्श गेहाविज अण्णेहिं अदर गेण्हिजतं पिण समणु- मणिज, तस्स भते ! अइचारं पडिकमामि जिंदामि गरहामि अप्पारणं बोस्सरामि पुचिचणं भते ! ज पि मए रागस्स वा दोसस्स वा मोहस्स वा वसंगदेण संयं अदर गेण्हिदं अण्णेहिं अदत्त गेहाविद अण्णेहिं अदत्तं गेरिणज्जतं पि समणुमरिणदो न पि इमस्स णिग्गथस्स परयणस्स अणुत्तर- स्स केवलियस्स केवलिपण्णचस्स धम्मस्स अहिंसालक्खाणस्स सञ्चाहिटि- यस्स विणयमूलस्स खमावलस्स अट्ठारससीलसहस्सपरिमंडियस्स चउरासी- दिगुणसयसहस्सविहसियस्स णवसुबंभचरगुत्तस्स णियदिलक्खणमस परि- चागफलस्स उवसमपहाणसस खतिमग्गदेसियस्स मुत्तिमग्गपयासयस्स सिद्धिमग्गपज्जवसाहणस्स सम्पणाण सम्मदसण-मम्मच- रित्तं च रोचेमि, जं जिणवरेहिं पण्णतो इत्थ जो मए देवसियराईय-पक्खिय चउमासिय संवच्छरियइरियावहिकेसलोचाइचारस्स संथारादिचारस्स पंथा- दिचारस्स सव्वाइचारस्स उत्तमहस्स सम्मचरित्त रोचेमि । तदिए मह- बदे अद्दत्ताणादो वेरमण उबट्टावणमंडले महत्व महागुणे महाणुभावे महाजसे महापुरिसाणुचिण्णे अरहतसक्खिय सिद्धसक्खियं साहुसक्खियं अप्पसक्खियं परसक्खियं देवतासक्खियं उत्तमहम्हि इद मे महब्बद सुव्वदं दढब्बद होदु, णित्यारयं पारय तारयं आराहियं चावि ते में भवतु ॥३॥ दतीय महावत सर्वेषां व्रतधारिणां सम्यक्त्वपूर्वकदृढव्रतं सुव्रतं समा- रूढं ते मे भवतु ॥३॥ णमो अरहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरीयाणं । णमो उवझायाण णमो लोए सव्यसाहूण ।। ३ ।। आहावरे चउत्थे महन्यदे सव्वं भते ! अवभपच्चक्खामि जावज्जीव तिविहेण मणना बचिया काएण, से देविएसु वा तिरिच्छिएसु वा अचेय- णिएसु वा कट्ठकम्मेसु वा चित्तकम्मेसु वा पोत्तकम्मेसु वा लेप्पकम्मेसु वालयकम्मेसु वा सिल्लाकम्मेसु वा गिहकम्मसु वा भित्तिकम्मेसु वा भेद- कम्मसु वा भंडकम्मेसु वा घादुकम्मेसु वा दंतकम्मसु वा हत्थसंघट्टणदाए [२०] .. पादसंघट्टणदाए पुग्गलसंघट्टणदाए मणुणामणुणेमु सहसु मणुणामणुणेसु रूवेसु मणुणामणुणेसु गंधेसु मणुणामणुणेसु रसेसु मणुणामणुणेसु फासेसु सोदिदियपरिणामे चक्खिदियपरिणामे घाणिदियपरिणामे जिभिदिय- परिणामे फासिंदियपरिणामे णोइदियपरिणामें अगुत्तेण अगुत्तिदिएण रणेव सयं अब सेविज्ज णो अपणेहिं अबभं सेवाविज्ज णो अपणेहि अवमं सेविज्जत पि ममणुमणिज्ज तम्म भंते ! अइचारं पडिकमामि र्णिदामि गरहामि अप्पाणं, बोम्मरामि पुन्धिचण भंते ! जपि मए रागस्स वा दोसस्स वा वसंगदेण सयं अभवं सेवियं अण्णेहिं अवभं सेवोविय अएणेहिं अवमं सेविज्जंतं पि समणुमण्णिद त पि इमस्स णिग्गथस्स पव- वयणम्स अणुत्तरस्स केवलिपएणत्तस्स धम्मस्स अहिंसालक्खणस्स सच्चा- रिहितस्स विणयमूलस्स खमावलस्स अट्ठारससीलसहस्सपरिमंडियस्स चउरासीदिगुणसयसहस्सविहसियस्सणवसुत्र भचेरगुचम्स णियदिलक्क- णस परिचागफलस्स उवसमपहाणस खतिमग्गदेसयस्स मुक्तिमग्गपया- मयस्स सिद्धिमग्गपज्जवमाहणस्स सम्मणाण सम्मदंसण-सम्मच- रिच रोचेमि, जंजिण परेहि पएणतो इत्थ जो मए देवसिए-राइय- पक्सि-चउमासिय संवच्छरिय इरियावहिकेसलोचाइचारस्स संथारादिचार स्स पथादिचारस्स सन्यादिचारस्स उत्तमट्ठस्स सम्मचरित्तं च रोचमि । चउत्थे महन्वदे अभादो वेग्मण उवठ्ठवणमंडले महत्थे । महागुणे महाणु- भावे महाजसे महापुरिसाणुचिण्णे अरहंतसक्खिय सिद्धमक्खियं साहुस- क्खियं अप्पसक्खिय परसक्खियं देवतासक्खियं उत्तमम्हि इद मे मह- बदं सुचद दिढव्वदं होदु णित्थारयं पारयं तारयं आरहियं चावि ते मे भवतु ॥३॥ चतुर्थे महानत सर्वेषां व्रतधारिणां सम्यक्त्वपूर्वक दृढव्रतं सुव्रतं समा रूढं ते में भवतु ॥ ३॥ णमो अरहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं । णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूर्ण ॥३॥ आधावरे पञ्चमे महव्वदे सचदे सव्व भते! दुविहं परिग्गह पञ्चक्खिामि [२८१] .

तिविहेण मणसा वचिया कारण । सो परिग्गहो दुविहो अन्भितरं परि- ग्गह-मिच्छत्तवेयराया तहेव हस्सादिया य दोसा। चत्तारि तह कसाया चउदस अभंतरं गंथा।॥ १ ॥" तत्थ वाहिर परिग्गहं से हिरणं वा सुवणं वा धणं वा खेचं वा खलं वा वत्थु वा पवत्थु वा कोसं वा कुठारं वा पुरं वा अंतउरं वा बलं वा वाहणं वा सयडं वा जाणं वा जपाणं वा जुगं वा गद्दियं वा रहं वा सदणं वा सिवियं वा दासीदासगोमहिसगवेडयं मणिमोत्तियसंखसिप्पिपवालय मणिभाजणं वा सुवण्णभाजणं वा रजतभाजणं वा कसभाजण वा लोयभाजणं वा तवभाजणं वा अंडज वा वॉड रोमनं वक्कर्ज वा वम्म वा अप्पं वा बहुंवा अणुवा सचित्तं वा अचित्तं वा अमुत्थ वा वहित्थ वा अवि वालग्गकोडिमित्तंपि णेव सयं असमणपाउग्ग रिग्गह गिहिजणो अण्णेहिं असमणपाउग्ग परिग्गाह गेण्हाविज्ज णो अण्णेहिं असमणपाउग्गं परिग्गहं गिण्हज्ज त पि समणुमणिज्ज तस्स भंते ! अइचार पडिक्कमामि णिंदामि गरहामि अप्पाण, वोस्सरामि पुम्बि- चण भंते ! जंपि मए गगस्स वा दोसस्स वा मोहस्स वा वसंगदेण सय असमणपाउग्ग परिग्गाहं गिहिज्ज अण्णेहिं असमणपाउग्गं परिग्गह गेहाविय, अण्णेहिं असमणपाउग्गं परिग्गहं गेगिजतं पि समणुपरिणद नं पिइमस्स णिग्गंथस्स पववयणस्स अणुत्तरस्स केवलियस्स केवलपण्णत्त- स्स धम्मस्स अहिंसालक्खणस्स सच्चाहिद्वितस्स विणयमूलस्स खमावलस्स अट्ठारससीलसहस्सपरिमडियस्स चउरासीगुणसयसहस्सविहूसियस्सणवसुब- भचेगुस्स णियदिलक्खणस्स परिचागफलस्स उवसमपहाणस खंतिमग्ग- देसयस्स मुत्तिमग्गपयासयस सिद्धिमग्गपज्जवसाहणस्स सम्मणाण सम्मदंसण सम्मचरिच च रोचेमि, जं जिणवरेहि पएणते इत्थ जो मए देवसिय-राइय पक्खिय-चउमासिय-संवच्छरिय-इरियावहिकेसलोचाइचारस्स संथागइचारस्म पथाइचारस्स सव्वाइचारस्स उत्तमट्ठस्स सम्मचरित्त रोचेमि । पञ्चमे महव्यदे परिग्गहादों वेरमणं उवट्ठवणमंडले महत्थे । महा- गुणे महाणुभावे महापुरिसाणुचिण्णे अरहंतसक्खिय सिद्धसक्खियं साहुस- क्खियं अप्पसक्खिय परसक्खियं देवतासक्खियं उत्तमट्टम्हि इद मे मह- [२८२] व्वद सुब्बदं दिढव्वदं होदु णित्थारयं पारयं तारयं आरहियं चावि ते में भवतु ॥३॥ पञ्चमं महान सवी व्रतधारिणां सम्यक्त्वपूर्वकं दृढव्रतं समारूढं ते मे भवतु ॥ ३ ॥ णमो अरहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं । णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूर्गा ॥३॥ आधावरे छद्रे अणुन्चदे सव्वं भंते! राईभोयण पच्चक्खामि जावजीवं तिविहेण मणमा वचिया कारण, से असणं वा पाणं वाखादियं वा सादियं वा कडुयं वा कसायं वा आमिलं वा महुरंवा लवण वा अलवण वा सचित्तं वा अचित्र वा तं सव्व चउन्विहं आहारं णेवसयं रनि भुजिअ णोअण्णेहिं रति झुंजाविज णो अपणेहिं रत्ति भुजिज्ज तं पि समणुमणिज्ज, तस्स मंते ! अइचारं पडिक्कमामि णिंदामि गरहामि अप्पाणां, वोसिरामि पुम्वि- चणं भंते ! ज पि मए रागरस वा दोसस्स वा मोहस्स वा वसंगदेण चउ- विहो आहारो सयं रत्ति भुत्तो अयणेहिं रत्ति भुंजाविदो अएणेहिं रत्ति १ भुजिजंतो वि समणुमण्णिदो, त पि इमस्स णिग्गथस्स पवयणस्स अणु- त्तरस्स केवलियस्स केवलिपएणत्तस्त धम्मस्स अहिंमालक्खणस्स सचाहि- ट्ठियस्स विणयमूलस्स खमावलस्स अट्ठारससीलसहस्सपरिमंडियस्स चउ- रासीदिगुणसयसहस्सविहूसियस्स णवसुबंभचेरगुत्तस्स णियदिलक्खणस्स परिचागफलस्स उवसमपहाणसस खतिमग्गदेसियस्स मुन्तिमग्गपयासयस्स सिद्धिमग्गपज्जवसाहणस्म सम्मणाण सम्मदंसण-सम्मच- रित्तं च रोचेमि, जंजिणवरेहिं पण्णतो इत्थ जो मए देवसियराइय-पक्खिय- चउमासिय संवच्छरियइरियावहि केसलोचाइयारस्स संथारादिचारस्स पंथा- दिचारस्स सब्बाइचारस्स उत्तमट्ठस्स सम्मचरित्त च रोचेमि, छडे अणु- ब्बदे राईभोयणादो वेरमणं उवट्ठावणमडले महत्थे महागुणे महाणुभावे महाजसे महापुरिसाणचिण्णे अरहंतसक्खिय सिद्धसक्खियं साहुसक्खियं परसक्खियं देवतासक्खियं उत्तमट्टम्हि इद मे अणुव्वद सुव्वदं दिढव्वदं होदु, णित्थारयं पारयं तारयं आराहियं चावि ते में भवतु ।। ३ ।। [२८३) पष्ठ अणुव्रत सर्वेषां व्रतधारिणां सम्यक्त्वपूर्वकदृढव्रतं सुव्रतं समा- रूढं ते मे भवतु ।।३।। णमो अरहताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरीयाणं । णमो उवझायाणं णमो लोए सव्वसाहणं ।। ३ ।। चूलियन्तु पवक्खामि भावणा पञ्चविंसदी। पञ्च पश्च अणुएणादा एक्मेवकसि महव्वदे ॥१॥ मणगुत्तो वचिगुत्तो इरिया-कायसंयदो एमणासमिदिसंजुन्तो पढमं पदमस्सिदो ॥२ ।। अकोहणो अलोहो य भयहस्सविवज्जिदो अणुवीचिमासकुसलो विदियं वदमस्सिदो॥३॥ अदेहणं भावणा चावि उग्गहं या परिग्गहे । संतुट्ठो भत्तपाणेसु तिदिय बदमस्सिदो॥४॥ इस्थिकहा इस्थिसंसग्गहासखेडपलोयणे । णियमम्मि हिदो णियतों य चउत्थं वदमस्सिदो सचिस्ताचित्तदन्वेसु बॉम्भतरेसु य । परिग्गहादों विरदो पञ्चमं वदमस्सिदो ॥ ६ ॥ घिदिमंतो खमाजुत्तोझाणजोगपरितुदो। परीसहाणउरं देतो उत्तम वदमस्सिदो॥७॥ जो सारोसव्वसारेसु सो सारोएस गोयम । सारं झाणंति णामेण सव्वं बुद्धहिं देसिदं ॥८॥ इच्चेदाणि पञ्चमहन्वयाणि राईभोयणादोवेरमणद्वाणि सभावणाणि समाउग्गपदाणि मउत्तरपदाणि सम्मं धम्म अणुपालइन्ता समणा भय- चंता णिग्गंथादोओण सिझंति बुझंति मुच्चंति परिणियंति सचदुक्खा गमंतं करेंति परिविज्जाणति । तं जहा- पाणादिवादं चहि मोसगं च अदत्तमेहुण्णपरिग्गहं च । वदाणि सम्म अणुपालइत्ता णिव्वाणमग्गं विरदा उर्वति ॥ १ ॥ जाणि काणि वि सल्लाणि गरहिदाणि जिणसासणे। [२८] ताणि सव्वाणि वोमरिचा णिसल्लो विहारदे सया मुणी ॥ २ ॥ उप्पण्ण गुप्पण्णा माया अणुपुब्ध सो णितन्वा । आलोयण पडिकमणं जिंदणगरहणदाए ॥ ३ ॥ अन्भुद्विदकरणदाए अन्भुटिददुक्कड णिराकरणदाए । भव भावपडिक्कमण सेसा पुण दव्वदो भणिदा ॥ ४ ॥ एसो पडिझमणविही पएणत्तो जिणवरेहिं सव्वेहिं ! मंजमतवट्टिदाणं णिग्गथादाणं महरिसीण ॥ ५ ॥ अक्खरपयत्थहीणं मचाहीणं च ज भवे एत्थ । तं खमउ णाणदेवय ! देउ समाहिं च वोहिं च ॥६॥ काऊण णमोकारं आहंताणं तहेव सिद्धाणं । आइरिय-उवज्झायाणं लोयम्मि य सवसाहूणं ॥ ७ ॥ इच्छामि भंते ! पडिक्कमणमिदं, सुनस्स मूलपदाणं उत्तरपदाण- मच्चासणदाए । तं जहा- णमोक्कारपदे अरहतपदे सिद्धपदे आइरियपदे उवज्झापदे साहूपदे मङ्गलपदे लोगोत्तमपदे सरणपदे सामाझ्यपदे चउवीमतित्थयरपदे वदण- पदे पडिक्कमणपदे पच्चक्खाणपदे काउमग्गपदे असीहियपदे निसीहियपदे अंगगेसु पुच्वंगेसु पडण्णएसु पाहुडेसु पाहुडपाहुडेसु कदकम्मेसु वा भूद- कम्मेसु वा णाणस्स अहक्कमणदाए दसणस्स अइक्कमणदाए चरित्तस्स अहक्कमणदाए तबस्स अइक्कमणदाए वीरियस्म अइक्कमणदाए, से अक्ख- रहीणं वा पदहीण वा सहीण वा वंजणहीण वा अत्थहीणं वा गंथहीणं वा थएसु वा थुईनु वा अट्टखाणेमु वा अणियोगेसु वा अणियोगद्दारेसु वा जे भाव पण्णत्ता अरहंतेहि भयवंतसिं तित्थयरेहिं आदियहिं तिलोगण- हेहिं तिलगवुद्धेहिं तिलोगदग्सीहि ते मद्दहामि ते पचियामि ते रोचेमि ते फासेमि, ते मदतस्म ते पचयंतस्म ते रोचयंतस्म ते फासयतस्स जो मए देवसिओ राईयो पक्खियो संग्छरिओ अदिक्कमो वदिक्कमो अइचारो अणाचारो आभोगो अणाभोगो अकाले सज्झाओ कओकाले वा परिहा- विदो अस्थाकारिद मिच्छामेलिदं वा मेलिद अण्णहादिण्ण अण्णहापडि- [२८५] च्छदं आवंसएसु पडिहीणदाए तस्स मिच्छा मे दुक्कडं । अह पडिवादाए विदिए तदिए चउत्थीए पञ्चमीए डीए सत्तमीए अट्ठमीए णवमीए एयारसीए वारसीए तेरसीए चउद्दसीए पुण्णमासीए पण्णरसदिवसाणं पण्णरसराईणं, छउण्डं मासाणं अट्ठण्ह पक्खाणं-वीसुत- रसयराईण, वारसण्हं मासाण चबवीसहं पक्खाण तिण्हं छावद्विसयदिव- साणं तिण्हं छावट्ठिसयराईणं, पञ्चवरिसादो परदो अभिंतरदो वा दोण्हं अट्टरुद्दसंकिलेपरिणामाणं तिण्हं अप्पसत्थसंकिलेसपरिणामाणं तिण्इं दंडाणं तिण्ह लस्साणं तिण्ह गुत्तीर्ण तिण्हं गारवाणं तिण्ह सल्लाणं चउण्हं सण्णाणं चउण्हं कसायाण चउण्णं उवसग्गाण पञ्चहं महब्बयाण पञ्चहं इन्दियाएं पञ्चएहं समिदीण पश्चण्डं चरित्ताणं छण्ह आवासयाण सत्तरहं भयाणं सत्तविहससाराणं अट्ठण्डं मयाणं अट्ठण्हं सुद्धीणं अट्ठण्हं कम्माणं अट्ठण्हं पवयणमाउयाणं णवण्हं वभचेरगुतीण गवण्हं णोकसायाणं दसविहमुडाणं दसविहसमणधम्माणं दसविहधम्मज्झाणं बारसोई संजमाणं वारसएई तवाण वारसण्हं अंगाण तेरसण्ह किरियाणं चउदसण्ह पुवाहं पएणर- सरह पमायाण सोलसण्ह कसायाण पणवीमाएकिरियासुपणवीसाए भाव- णासु वावीसाए परिसहेसु अहारसीलसहस्सेसु चउरासीदिगुणसयसहस्सेसु मूलगुणेसु उत्तरगुणेसु अदिक्कम्मो बदिक्कम्मो अइचारो भणाचारों आभोगो अणाभोगो तस्स भते ! अइचारं पडिक्कमामि पडिक्कत कदों चा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदं तस्स भंते ! अइचारं पडिक्कमामि जिंदामि गरहामि अप्पाणं वोस्सरामि जाव अरहंताण भयवंताणं णमो- कारं करेमि पज्जुवासं करेमि ताव काय दुचरियं वोस्सरामि । णमो अरहताण णमो सिद्धाण णमो आइरियाणं । णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूण ॥१॥ पढमं ताव सुदं मे आउस्संतो ! इह खलु समणेण भयवदा महदि. महावीरेण महाकस्सवेण सवण्हणाणेण सव्वलोयदरसिणा सावयाण सावियाणं खुड्डयाण खुड्डीयाणं कारणेण पञ्चाणुच्चदाणि तिण्णि गुणव- दाणि चचारि सिक्खावदाणि वारसविह गिहत्थधम्म सम्म उवदेसिपाणि। 1 २८६] तत्थ इमाणि पश्चाणुव्वदाणि पढमे अणुव्वदे थूलयडे पाणादिवादादो वेर- मण, विदिए अणुव्वदे थूलयडे मुसावादादो वेरमण, तदिए अणुवदे धूल- यडे अदत्तादाणादो वेरमणं, चउत्थे अणुवदे थूलयडे सदारसंतोसपरदा- रागमणवेरमणं कस्स य पुणु सचदो विरदी, पंचमे अणुव्वदे धूलयडे इच्छाकदपरिमाण चेदि, इच्चेदाणि पश्च अणुव्वदाणि । तत्थ इमाणि तिण्णि गुणवदाणि, तत्थ पढमे गुणवदे दिसिविदिसि पच्चक्खाणं, विदिए गुणव्वदे विविधअणस्थदडादो वेरमणं, तदिए गुण- व्वदे भोगोपभोगोपरिसंखाणं चेदि, इच्चेदाणि तिणि गुणव्वदाणि । तत्थ इमाणि चत्तारि सिक्खावदाणि, तत्थप ढमे सामाइयं, विदिए पोसहोवासयं, तदिए अतिथिसंविभागो, चउत्थे सिम्खावदे पच्छिमसल्ले- हणामरणं, तिदियं अभोवस्साण चेदि । से अमिमद जीवाजीव-उवलद्धपुण्णपाव-आसववधसंवरणिज्जर- मोक्खमहिकुसले धम्माणुरायरचो पि माणुरागरत्तो अछिमज्जाणुरायरत्तो मुच्चिदडे गिहिदढे विहिदढे पालिदढे सेविदढे णिग्गंथपावयणे अणुचरे { सेअढे सेवणुढेणिस्संकियणिचर्कखिय णिविदिगिंछी य अमूढदिट्ठी य । उवगृहण हिदिकरणं वच्छल्लपहावणा य ते अट्ठा ॥१॥ सव्वेदाणि पश्चाणुव्वदाणि तिष्णि गुणवदाणि चत्तारि सिक्खाव- दाणि वारसविह गिहत्थधम्ममणुपालइचादसण वय सामाइय पोसह सचिच राइभत्तेय । चंभारंभ परिग्गह अणुमणमुद्दिट्ट देसविरदो य ॥ १॥ महुमंसमज- जूआ वेसादिविवज्जणासीलो । पंचाणुन्चयजुत्तो सत्तेहि सिक्खावएहि संपुण्णो ॥२॥ जो एदाई वदाई धरेइ सावया सिवियाओ वा खुड्डय खुडियाओ वा अट्ठदहभवणवासियवाणवितरजोइसियसोहम्मीसाणदेवीओं वदिक्कमिचाउ- परिमअण्णदरमहड्ढियासु देवेसु उवबज्जति । तं जहा-सोहम्मीसाणसणक्कुमारमाहिंदवंभवंभुत्तरलांतवकापिट्ठसु क्कमहासुक्कसतारसहस्सारआणतपाणतारणअच्चुतकप्पेसु उववजन्ति । [२८७] अडयवरसत्थधरा कडयंगदबद्धनउडकयसोहा । भासुरवरवोहिधरा देवा य महड्डिया होति ॥१॥ उक्कस्सेण दोतिण्णभवगहणाणि जहण्णे सत्तट्ठभवगहणाणि तदो समणुसुचादो सुदेवत्त सुदेवत्तादो सुमाणुसत्तं तदो साइहत्था पच्छा णिग्गथा होऊण सिझन्ति बुझंति मुंचंति परिणिव्वाणयंति सव्वदुक्खा- णमंन करेंति । जाव अरहंताणं भयपताण णमोकारं करेमि पज्जुवास करेमि ताव कार्य पावकम्मं दुचरियं वोस्सरामि । (अनन्तरं साधवः "थोस्सामि" इत्यादि दंडकं पठित्वा सूरिणा सहिताः "वदसमिर्दिदियरोधो” इत्यादिकं चाधीत्य वीरस्तुति कुयुः) वीरभक्तिः यः सर्वाणि चराचराणि विविधद्रव्याणि तेषां गुणान् । पर्यायानपि भृतभाविभवतः सर्वान् सदा सर्वदा ॥ जानीते युगपत् प्रतिक्षणमतः सर्वज्ञ इत्युच्यते । सर्वज्ञाय जिनेश्वराय महते वीराय तस्मै नमः ॥१॥ वीरः सर्वसुरासुरेन्द्रमहितो वीरं बुधाः संश्रिताः । वीरेणामितः स्वकर्म- निचयो वीराय भक्त्या नमः ।। वीराचीर्थमिदं प्रवृत्तिमतुलं वीरस्य धोरं तपो । वीरे श्री-द्युति कांति-कीर्ति-धृतयो हे वीर! भद्रं त्वयि ॥२॥ ये वीरपादौ प्रणमन्ति नित्य ध्यानस्थिताः संयमयोगयुक्ताः । ते वीतशोका हि भवन्ति लोके संसारदुर्ग विषयं तरंति ॥३॥ ब्रतसमुदयमूलः संय- मस्कन्धवन्धो यमनियमपयोभिर्वधितः शीलशाखः। समितिकलिकभारो गुप्तिगुप्तप्रवालो गुणकुसुमसुगंधिः सत्तपश्चित्रपत्रः॥ ४ ॥ शिवसुखफल- दायी यो दयाछाययोद्यः । शुभजनपथिकानां खेदनोदे समर्थः ।। दुरितर- विजतापं प्रापयन्नन्तभावं । स भवविभवहान्यै नोऽस्तु चारित्रवृक्षः॥५॥ चारित्रं सर्वजिनेश्वरित प्रोक्त च सर्वशिष्येभ्यः। प्रणमामि पश्चभेदं पञ्चमचारित्रलाभाय ॥६॥ धर्मः सर्वसुखाकरो हितकरो धर्म वुधाश्चि- [२८८] न्वते । धर्मेणैव समाप्यते शिवसुख धर्माय तस्मै नमः ॥ धर्मान्त्रास्त्यपरः सुहद्भवभृतां धर्मस्य मूल दया। धर्मे चित्तमहं दधे प्रतिदिन हे धर्म ! मां पालय ॥७॥ धम्मो मंगलमुक्किट अहिंसा संजमो तवो। देवा वि तस्स पणमति जस्स धम्मे सया मणो॥८॥ अंचलिका इच्छामि भंते ! पडिक्कमणादिचारमालोचेउ, सम्मणाण-सम्मदसण सम्मचारित्त-तव-वीरियाचारेसु जम-णियम-संजम सील-मूलुत्तरगुणेसु सन्व- मईचारं सावञ्जजोग पडिविरदोमि असंखेअलोगअज्झवसायठाणाणि अप्प- सत्थजोगसण्णाणिदियकसायगारवकिरियासु मणवयण कायकरणदुप्पणि- हाणाणि परिचिंतियाणि किएहणीलकाउलेस्साओ विकहापलिकुंचिएण उम्मगहस्सरदिअरदिसोयभयदुगछवेयणविज्जभजभाइआणि अट्ठरुद्दसंकि लेसपरिणामाणि परिणामदाणि अणिहुदकरचरणमणवयणकायकरणेण अक्खित्तबहुलपरायणेण अप्पडिपुराणेण वासरक्खरावयपरिसंघायपडि- वत्तिए वा अच्छाकारिदं मिच्छा मेलिद आमेलिद वा मेलिद वा अयणहा- दिण्णं अण्णहापडिच्छदं आवासएसु परिहीणदाए कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं । बदसमिदिदियरोधो लोचो आवासयमचेलमण्हाण | खिदिसयणमदं- तवण ठिदिभोयणमेयभत्तं च ।। १ ॥ एदे खलु मूलगुणा समणाणंजिण- वरेहि पण्णत्ता । एत्थ पमादकदादो अइचारादो णियत्तो हं॥२॥छेदो- वट्ठावणं होदु मज्झं। इति वीरभक्तिः निर्वाणकाराड (गाथा) अट्ठावयम्मि उसहो, चम्पाए वासुपुज्यजिणणाहो । उज्जंते णेमिजिणो, पावाए णिब्बुदो महावीरो ।। १ ।। [२९] " वीसं तु जिणवरिंदा अमरासुर-चंदिदा धुदकिलेसा। सम्मेदे गिरिसिहरे, णिव्वाणगया णमो तेसिं ॥२॥ वरदत्तो य वरंगो, सायरदत्तोय तारवरणयरे। आहुट्ठयकोडीयो, णिवाण गया णमो तेसि ॥३॥ णेमिस्सामि पजुण्णो, संयुकुमारो तहेव अणिरुद्धो । वाहत्तरिकोडीओ, उज्जते सत्वसया सिद्धा ॥४॥ रामसुआ वणि जणा, लाडरिंदाण पञ्चकोडीओ। पावागिरिवरसिहरे, णिव्वाण गया णमो तेसिं ॥५॥ पंडुसुआ तिण्णिजणा, दविडणरिंदाण अट्टकोडीओ। सत्तुंजे गिरिसिहरे, णिचाण गया णमो तेसिं॥६॥ संते जे वलभद्दा, जदुवरिंदाणि अठकोडीओ। गजपंथ गिरिसिहरे, णिव्वाण गया णमो तेसि ॥७॥ रामहणूसुग्गीओ, गवयगवक्खो य णीलपहणीलो । णवणवदीकोडीओ, तुंगिगिरीणिब्बुदे वदे ॥८॥ गंगाणंगकुमारा, कोडीपञ्चद्धमुणिवरा सहिया । सवणागिरिवरसिहरे, णियाण गया णमों तेसिं ॥१॥ दहमुहरायस्स सुआ, कोडीपश्चद्धमुणिवरा सहिया । रेवाउहयतडगे, णिव्वाण गया णमो तेर्सि ॥१०॥ रेवाणइये तीरे, पच्छिमभायम्मि सिद्धवरकूटे । दो चक्की दहकप्पे, आहुट्ठयकोडिणिचुदे वदे ॥११॥ वडवाणीवरणयरे, दक्षिणभायम्मि चूलगिरिसिंहरे । इंदजीदकुंभयणो, णिन्याण गया णमो तेसिं ॥ १२ ॥ पावागिरिवरणयरे, सुवपणभद्दाइमुणिवरा चउरो। चलणाणईतडग्गे, णिवाण गया णमो तेसिं ॥ १३ ॥ फलहोडीवरगामे, पच्छिमभायम्मि दोणगिरिसिहरे। गुरूदत्ताइ मुर्णिदा, णिव्वाण गया णमो तेसिं ॥१४॥ णायकुमारमुर्णिदो, वालि महावालि चेव अज्ञया । [२१०] अट्ठावयगिरिसिंहरे, णिव्वाण गया णमो तेसि ॥१५॥ अच्चलपुरवरणयरे, ईसाणे भायमेढगिरिसिहरे। आहुठ्ठयकोडीओ, णिव्याण गया णमो तेसिं ॥ १६ ॥ वंसत्थलम्मि णयरे, पच्छिमभायम्मि कुंथगिरिसिहरे। कुलदेसभृपणमुणीणिवाण गया णमो तेसि ॥ १७ ॥ जसहररायस्स सुआ, पचसयाई कलिंगदेसम्मि । कोडिसिला कोडिमुणी, णिव्वाण गया णमो तेसि ॥१८॥ पासस्स समवसरणे, गुरुवरदत्त पचरिसिपमुहा । रेसिंदीगिरिसिहरे, णिव्वाण गया णमो तेसि ॥ १९ ॥ जे जिणु जित्थु तत्था, जे दु गया णिव्वुदि परमं । ते बंदामि य णिच्चं, तियरणसुद्धो णमंसामि ॥ २० ॥ सेसाणं तु रिसीणं, णिचाणं जम्मि जम्मि ठाणम्मि ते ह बंदे सव्वे, दुक्खक्खयकारणट्टाए ।। २१ ।। पासं तह अहिणंदण, णायद्दहि मङ्गलाउरे बंदे। अस्सारंभे पट्टणि, मुणिसुव्वओ तहेव वदामि ॥१॥ बाहूबलि तह-बदमि, पोदनपुर हत्थिनापुरे वंदे । संतीकुन्थुव अरिहो, वाराणसिए सुपास पासं च ॥२॥ माहुरए अहिछित्ते, वीरं पासं तहेव वंदामि । जंबुमुर्णिदो बदे, णिबुइपचोवि जंबुवणगहणे ॥३॥ पञ्चकल्लाणठाणइ, जाणि वि संजादमच्चलोयम्मि। मणवयणकायसुद्धो, सव्वे सिरसा णमंसामि ॥४॥ अग्गलदेवं वंदमि, वरणयरे णिवडकुण्डणी वंदें । पासं सिरिपुरि बंदमि, होला गिरिसंखदेवम्मि ॥ ५ ॥ गोम्मटदेवं वंदमि, पचसयं धणुहउच्चं तं । देवा कुणंति वुट्टी, केसरकुसुमाण तस्स उवरिम्मि ॥ ६ ॥ णिवाणठाण जाणिवि, अइसयठाणाणि अइसये सहिया । संजादमिञ्च लोए, सव्वे सिरसा णमंसामि ॥ ७॥ [२९१] जो जण पैठइ नियालं, णिचुइकडंपि भावसुद्धीय । भुंजदि परसुरसुक्ख, पच्छा सो लहइ णिवाणं ॥८॥ अचलिका इच्छामि भंते ! परिणिव्वाणभतिकाउस्सग्गो कओ तस्सा लोचेउं। इमम्मि अवसप्पिणीए चउत्थ समयस्स पच्छिमे भाये, आहुट्ठमासहीणे वासचउक्कम्मिसेसकम्मि पावाए गयरीयकशियमासस्स किण्हचउद्दसिए रत्तीए सादीए णक्खत्ते पच्चूसेभयवदो महदिमहावीरो वड्ढमाणो सिद्धिंगदो, तिसुवि लोएसु भवणवासिय वाणवितर जोयिसिय कप्पवासि- यति चउन्विहा देवा सपरिवारा दिव्वेण, गंधेण, दिव्वेण पुफ्फेण, दिव्वेण धूवेण, दिव्वेण, चुरणेण, दिग्वेण वासेण, दिब्वेण पहाणेण णिञ्चकाल अच्चति, पूजति, वदति, णमसंति, परिणिव्वाणमहाकल्लाण- पुज्ज करेंति, अहमवि इह सन्तो तत्थ संताई णिचकाल अंचेमि, पूजेमि, वदामि, णमंसामि, दुक्खक्खओ कम्मक्खओ बोहिलाहो सुगइगमणं समा- हिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मल्झं। गराघरवलयः जिनान् जितारातिगणान् गरिष्ठान देशावधीन सर्वपरावधींश्च । सत्कोष्ठवीजादिपदानुसारीन् स्तुवे गणेशानपि तद्गुणाप्त्यै ॥ १॥ संमि- भश्रोत्रान्वितसन्मुनीन्द्रान् प्रत्येकसम्बोधितबुद्धधर्मान् । स्वयंप्रबुद्धांश्च विमु- क्तिमार्गान् स्तुवे गणेशानपि तद्गुणाप्त्यै ॥२॥ द्विधामनःपर्ययचि- त्प्रयुक्तान् द्विपञ्चसप्तद्वयपूर्वसक्तान् । अष्टाजनैमित्तिकशास्त्रदक्षान् स्तुवे गणेशानपि तद्गुणाप्स्यै ॥३॥ चिकुर्वणाख्यमिहाप्रभावान् विद्याधरां- धारणप्रर्द्धिप्राप्तान् । प्रज्ञाश्रितानित्यखगामिनश्च स्तुवे गणेशानपि तद्- गुणाप्त्यै ॥ ४॥ आशीविषान् दृष्टिविपान्मुनीन्द्रानुपातिदीप्तोत्तमतप्त- तप्तान् । महातिघोरप्रतपःप्रसक्तान् स्तुवे गणेशानपि तद्गुणाप्त्यै ॥५।। [२९२) वन्द्यान् सुरपोरगुणांश्च लोके पूज्यान् बुधैर्घोरपराक्रमांश्च । घोरादिसंसद्- गुणब्रह्मयुक्तान् स्तुवे गणेशानपि तद्गुणाप्त्यै ॥ ६ ॥ आमद्धिलद्धि- प्रजल्लविदासर्वद्धिप्राप्तांश्च व्यथादिहतन् । मनोवाकायवलोपयुक्तान् स्तुवे गणेशानपि तद्गुणाप्त्यै ॥ ७॥ सत्क्षीरसर्पिर्मधुरामृतद्धीन् यतीन चराक्षीणमहानसांश्च । प्रवर्धनांखिजगत्प्रपूज्यान स्तुवे गणेशानपि तद्गु. णाप्त्यै ।। ८ । सिद्धालयान् श्रीमहतोऽतिवीरान् श्रीवर्द्धमानदिविबुद्धिद- क्षान् । सर्वान् मुनीन् मुक्तिवरानृपीन्द्रान् स्तुवे गणेशानपि तद्गुणाप्त्यै ॥९॥ नृसुरखचरसेव्या विश्वश्रेष्ठद्धिंभूषा विविधगुणसमुद्रा मारमातङ्ग- सिंहाः। भवजलनिधिपोता वंदिता मे दिशन्तु मुनिगणसकलान् श्रीसिद्धिदा: सहपीन्द्रान् ॥ १०॥ इति गणधरवलयः। अथ वीतरागस्तोत्रम् । शिवं शुद्धबुद्ध परं विश्वनाथं । न देवो न बधुन कर्मा न कर्ता । न अंग न संगं न चेच्छा न कामं । चिदानदरूपं नमो वीतरागम् ।।१।। न बंधो न मोक्षो न रागादिदोपः । न योग न भोग न व्याधिन शोकं । न कोप न मानं न माया न लोभ । चिदानद० ॥२॥न हस्तौ न पादौ न घ्राणं न जिह्वा । न चक्षुर्न कर्णन वक्त्रं न निद्रा । न स्वामी न मृत्यं न देवो न मर्त्यः ॥चिदानद०॥३॥ ना जन्ममृत्यू न मोह न चिंता। न क्षुद्रो न भीतो न काश्यं न तंद्रा । न स्वेदं न खेदं न वर्ण न मुद्रा । चिदानद०॥४॥त्रिदण्डे त्रिखण्डे हरे विश्वनाथ । हुपीकेश विध्वस्त- कर्मादिजालं। न पुण्यं न पापं न चाक्षादि गात्रं । चिदानंद० ॥५॥न बालो न वृद्धो न तुच्छो न मूढो । न स्वेदं न भेद न मूर्तिन स्नेहः । न कृष्णं न शुक्लंन मोहं न तंद्रा । चिदानंद०॥६॥न आद्यं नमध्यं [२१३] न अंतं न मन्या । न द्रव्यं न क्षेत्रं न कालो न मानः। शिष्यो गुरुर्नापि हीन न दीनं । चिदानद० ॥ ७॥ इद ज्ञानरूपं स्त्रय तत्ववेदी । न पूर्ण न शून्यं न चैत्यस्वरूपो । न चान्यो न मिन्न न परमार्थमेकम् ॥ चिदा- नद० ॥ - ॥ आत्मारामगुणाकरं गुणनिधि चैत्यन्यरत्नाकरं । सर्वे भूतगता गते सुखदुःखे ज्ञाते त्वया सर्वगे । त्रैलोक्याधिपते स्वयं स्वमनसा ध्यायति योगीश्वराः । वंदे तं हरिवंशेहर्षहृदय श्रीमन् हृदाभ्युद्यताम् ॥ ९ ॥ अथ तीर्थंकरस्तुतिः स्वस्त्यैव नः स्यादृपभो जिनेन्द्रः। स्वस्तिमदो नस्त्वजितो जिनेंद्रः। श्रीसंभवो नोऽस्तु सदैव स्वस्ति । स्वस्त्यैव स्यादमिनदनो जिनः॥१॥ स्वस्तिप्रवृद्धो सुमतिस्तु नोऽस्तु । पद्मप्रभो नः प्रतनोतु स्वस्ति । सुपार्श्व- नामाति जिनोऽस्तु स्वस्ति । चन्द्रप्रभो नो दिशतां च स्वास्ति ।। २ ।। श्रीपुष्पदंतो विदधातु स्वास्त । सुखस्तिदायी मम शीतलोऽस्तु । श्रेयांस स्वस्त्यैव ममैव भूयात् श्रीवासुपूज्योऽपि जिनोऽस्तु स्वस्ति ।। ३ ।। ख- स्तिग्रदो नो विमलो जिनोऽस्तु । स्वस्ति त्वंनतोऽपि ममास्तु नित्यं । धर्मोऽपि मां स्वस्तिकरः सदास्तु । श्रीशांतिनाथोस्तु ममैव स्वस्ति । कुन्थु- स्तुभृयान्मय स्वस्तिकारी | जिनस्त्वरः स्वस्तिकरच नोस्तु । स्वस्त्यैव मल्लिस्तु जिनोस्तु नित्यं । स्वस्तिप्रदो नो मुनिसुव्रतोऽस्तु ॥ ५ ॥ नमि- जिनः स्वस्तिकृदस्तु नित्य । स्वस्त्यैव नेमिर्जिन मेऽस्तु नित्यं । श्री पार्श्व नाथो मयि स्वस्तिदोऽस्तु । श्रीस्वस्तिदो वीरजिनः सदास्तु ॥६॥ इति तीर्थङ्करस्तुतिः। [२९४] अथ रत्नकरंड श्रावकाचार । नमः श्रीवर्द्धमानाय निर्धतकलिलात्मने । सालोकानां त्रिलोकानां यद्विद्या दर्पणायते ॥ १ ॥ देशयामि समीचीनं धर्म कर्मनिवर्हणम् । संसा- रदुखतः सस्त्रान् यो धरत्युत्तमे सुखे ॥२॥ सदृष्टिज्ञानवृत्तानि धर्म धर्मेश्वरा विदुः। यदीयप्रत्यनीकानि भवन्ति भवपद्धतिः ॥ ३ ॥ श्रद्धानं परमार्थानामाप्तागमतपोभृताम् । त्रिमूढापोढमष्टांगं सम्यग्दर्शनम- सयम् ॥ ४ ॥ आप्तेनोछिन्नदोषेण सर्वज्ञेनागमेशिना । भवितव्य नियो- गेन नान्यथा ह्याप्तता भवेत् ।। ५ ॥ क्षुत्पिपासाजरातङ्कजन्मांतकभय- मयाः । न रागद्वेपमोहाश्च यस्याप्तः स प्रकीर्यते ॥ ६ ॥ परमेष्ठी परंज्यो- तिर्विरागो विमलः कृती। सर्वज्ञोऽनादिमध्यान्तः सार्वः शास्तोपलाल्यते ॥ ७ ॥ अनात्मार्थ विना रागैः शास्ता शास्ति सतो हितम् । ध्वनन् र शिल्पिकरस्पर्शान्मुरजः किमपेक्षते ॥ ८॥ आप्तोपज्ञमनुल्लध्यमदृष्टेष्टविरो. धकम् । तत्वोपदेशकृत्सा शास्त्र कापथघट्टनम् ॥ ९॥ विषयाशावशा- तीतो निरारम्भोऽपरिग्रहः । ज्ञानध्यानतपोरक्तस्तपस्वी स प्रशस्यते ॥१०॥ इदमेवेदृशमेव तत्वं नान्यन्न चान्यथा । इत्यकम्पायसाम्भोवत्सन्मार्गेऽसंशया रुचिः ॥ ११ ॥ कर्मपरवशे सान्ते दुःखैरन्तरितोद ये । पापधीजे सुखे- ऽनास्था श्रद्वानाकांक्षणा स्मृता ॥ १२॥ स्वभावतोऽशुचौ काये रत्नत्रय- पवित्रते । निर्जुगुप्सा गुणप्रीतिर्मता निर्विचिकित्सिता ॥ १३ ।। कापथे पथि दुखानां कापथस्थेप्यसम्मतिः। असंघक्तिरनुत्कीर्तिरमूढा दृष्टिरुच्यते ॥ १४ ॥ स्वयं शुद्धय मार्गस्य बालाशक्तजनाश्रयाम् । वाच्यतां यत्प्रमा- जति तवदंत्युपगृहनम् ॥ १५ ॥ दर्शनाचरणाद्वापि चलतां धर्मवत्सले । प्रत्यवस्थापन प्राः स्थितिकरणमुच्यते ॥१६॥ खयथ्यान्प्रति सद्भावस- नाथापेतकतवा । प्रतिपतियथायोग्यं वात्सल्यमभिलप्यते ॥ १७ ॥ अज्ञा- नतिमिरव्याप्तिमपाकृत्य यथायथम् । जिनशासनमाहात्म्यप्रकाशः स्यात्प्र- [२२५] - IpIDEEPIL भावना ॥ १८॥ तावदंजनचौरोंऽगे ततोऽनंतमती स्मृता । उदायनम्त- तीयेऽपि तुरीये रेवती मता ॥ १६ ॥ ततो जिनेद्रभक्तोऽपि वारिपेणस्ततः जनामा च शेपयोलभ्यतां गतौ ॥ २० ॥ नांगहीन- मलं छेत्तुं दर्शन जन्मसंततिम् । न हि मन्त्रोऽक्षरन्यूनी निहंति विषवेदनां : आयुगासागरमा नमुचया सिकतामनाम गिरिपातोऽग्निपा- तच लोकम निगत शायरोपिलिप्साशावान रोगपीलीमसी देवता यदुपासीत देवतामूढर्मुच्यते मरिशासथारमहिमानी संसशिवत- 'वर्तिनाम् । पाखेदिनी पुरस्कारी जय पखिडिमोहन ।। मी ज्ञान पूजी कुल जाति बलमृद्धि तपों वपुः अष्टोवाश्रित्य मानिव मयमार्गतमयोः मन याम्यनित्यति धर्मस्थानामविताशयः सोऽत्यति घममात्मीय नाधमा पार्मिकेविना ।। ५६ यदि पापनिरोधोऽन्यसंपदा या पासवोऽस्त्यन्यसपदा कि प्रयोजन ॥ ३७ सम्य- दिशनसपन्नमपि प्रतिगदहजम्मादेवा देव विभस गुढीगी तिरौसम मारवापि देवोऽपि दिया जायत, धर्मकिल्विपाद कापि नाम भवदन्या 'सपद्धमाच्छरारिणी हा मशिलिहलोमाञ्च कुवागमलि- गिनी प्रणाम विनय च न कुया शुद्धदृष्टयः नागाशेन ज्ञान- चारित्रात्साधिमानमुपाग्नुता दर्शन कर्णधार त महिमाग प्रचक्षतगदिशा विद्यावृत्तय संभृतिस्थितिवृद्धिफलोदयानन सत्युसति सम्यक्त वीजा- भाव गरिव । गृहस्थी मोक्षमार्गस्था निगाहों नैव मोहन्।ि अनगारो गृही श्रयान निमाही मोहितो ने शान सम्यक्त्वसमें किंचित काल्ये त्रिजगत्यागीयाध्यश्च मध्यालसमा मान्यता नारतिय नपुसंकतानिन दुःकुलविकतो पायदेदिताच जति नाप्यतिकशाम अनिम्तजीविद्यार्यि- PERMATHAमहाकुला महाथी मानवतिलका मवेति यशीवृद्धिविजयविभवसनाथाः दुशनपूताः। मा अप्टगुणपष्टितुष्टादृष्टिविशिष्ट प्रकृष्टशीमा- जुटा । अपराप्सरसा परिपाद चिरस्मता जिनेन्द्रभक्ती स्वर्गमा इना नवनिधिमतद्वयन्ताधीशागसमिपतषश्चम वत्तीय प्रभवतिकिट करिब का -FIER दृशक्षवमौलिशेखरचरणाATRA|अमरासुरनस्पतिमिर्यमवरसतिमि- तपादांभोजाशहाट्या सुनिश्चितापचक्रधसभवति लोकुशरण्याः दाशिवमर्जरमरुजमीयमच्यावाधे विशोकभपशको कार्यगतसुख- व्धिीविभवाविसलं भजति दर्शनशरणाः देवेद्रचक्रसहिमानम- मेयमानं राजेद्रचक्रेमननीन्द्राशिरोनीयम्-धिमंद्रवक्रमपरीकृत सर्वलोक लंध्या शिवंञ्चाजिनभक्तिरुपैतिःभयgHfeatsTIMETHIS I.एफचन्यूिनमनतिरिक्त पांधातर्थयाविनाचा विपरीताता। निःसंदेही वेद पदाहस्तज्ज्ञानमागमिमःORIRथमीनुयोगमाख्याना चिरिती पुस- गणमपिायघोधिसमाधिनिधान बोधति वोधः समीचीनलारगिलोका- -लोकनिभक्तेर्युगपरिवृचायतर्गतीननिचार औदर्शमिव तथा मतिरवैतिकर- -गानुयोगभवनाघि गृहमेध्यानमांसणानि चारित्रोत्पतिवृदिराक्षांगमिः। -वरणानुयोगसमयंसस्यग्नानाविजानाति नीताजीवसुतत्वोपुण्या- पुण्ये विविन्धमोक्षौ चतन्यानुयोगदीपाश्रुतविद्यालोकमाता नामोहनिमिरापहागन्दर्शनलाभादवाससंज्ञानसागरागद्वेषनिवृत्याचरणं -प्रतिपद्यतेसाघुमनारागद्वेषनिवृत्तेहिंसादिनिवार्यता कता भवति अनपेक्षितान्तिाका पुरुमीमा सेवतोपतीन्:/TAEहिंसानुवाचौपर्ये- प्रोपैथुनिसेवामरिग्रहाम्यांचा पापप्रणालिकाभ्यो विरति संजय चारि- विमगाशासकल विकला चरणदतत्सकलं सर्वसंगविरताना अगा- -भीणविक Aगाराणा प्रसंगानी DINE || निहिणाविधातिष्ठायाणगु- -शिक्षाकृतात्मक परिणामचनिचतुर्मेदवयः यथासंध्यमाख्यातायात प्रीणातिपात वितन्याहारस्यकामालेमय क्यूलेभ्यः। पाछेभ्यो ज्यु- करमणमणुिवतीभवति INRNसंकल्यांदवकारितमनुनायोगस्यस्य चरसचीनगन हिनस्ति यत्जदाहकधूलवधाद्विरमागसनिपुगीBHATI 'छेवनयमपीडीमतिमतिरोपनियतीचा आहारवारिपापिहर- -वैधाक् पिरतापनपास्थूिलालीकात बदतिम राज काव- -यत्तिगतरसमफिीनिर्मदेचदति सान्तालवाद्वरमाsayapil -परिवादरावास्यापैगंगटलेसकरण : अयासानहारितापित [[5080] - व्यतिक्रमा: पंच सत्यस्या ।। ५६॥ निहतं वा पतितं वा सुविस्मृतं वा पर- स्वमविसृष्ट न हरति यन च दत्ते तदकृशचौर्यादुपारमण ।। ५७ ॥ चौर- प्रयोगचौरार्थादानविलोपसदृशसन्मिश्राः । हीनाधिकावीभिमानं पंचस्तेये व्यतीपाताः ॥५८॥ न तु परदारान् गच्छति न परान् गमयति च पापभीतेर्यत् । सा परदारनिवृत्तिः स्वदारसन्तोषनामापि ।। ५६ || अन्य- विवाहाकरणानंगक्रीडाविटत्वविपुलतृषः इत्वरिकागमनं चामरस्य पंच व्यतिचाराः ॥ ६० ॥ धनधान्यादिग्रंथं परिमाय ततोऽधिकेषु निःस्पृहता परिमितपरिग्रहः स्यादिच्छपरिमाणनामापि ॥ ६१ ।। अतिवाहनाति- संग्रहविस्मयलोभातिभारवहनानि । परिमितपरिग्रहस्य च विपेक्षाः पंच लक्ष्यते ।। ६२ ।। पचाणुव्रतनिधयो निरतिक्रमणाःफलन्ति सुरलोकं यत्रा- वधिरप्टगुणा दिव्यशरीरं च लभ्यते ॥ ६३ ।। मातगो धनदवेश्च वारि- पेणस्ततः परः । नीली जयश्च संप्राप्ताः पूजातिशयमुत्तमम् ।। ६४॥ धन- श्रीसत्यघोपौ च तापसारक्षकावपि । उपाख्येयास्तथा श्मश्रुनवनीतो यथा क्रमम् ।। ६५ ।। मद्यमांसमधुत्यागैः सहाणुव्रतपंचकम् । अष्टौं मूलगुणा- नाहुर्गृहिणां श्रमणोचमाः॥ ६६ ।। दिग्व्रतमनर्थदडव्रतं च भोगोपभोंग- परिमाणम् । अनुवृहणाद् गुणानामाख्याति गुणव्रतान्यार्याः ॥ ६७ ॥ दिग्वलयं परिगणित कृत्वातोऽहं बहिर्न यास्यामि इति संकल्पो दिव्रत. मामृत्यणुपापविनिवृत्यै ॥६८॥ मकराकरसरिदटवीगिरिजनपदयोजनानि मर्यादा ! प्राहुर्दिशां दशानां प्रतिसंहारे प्रसिद्धानि ॥ ६९ ॥ अवधेहि- रणुपापप्रतिविरतेर्दिग्नतानि धारयता। पंचमहाव्रतपरिणतिमणुव्रतानिप्रप- द्यते ॥ ७० ॥ प्रत्याख्यानतदुत्वान्मंदतराश्चरणमोहपरिणामाः । सत्वेन दुरवधारा महाव्रताय प्रकल्प्यते ॥ ७१ ॥ पंचाना पापानां हिंसादीनां मनोवचाकायैः । कृतकारितानुमोदैस्त्यागस्तु महाव्रत महतां ॥ ७२ ॥ ऊधस्तिचर्यग्व्यतिपाता क्षेत्रवृद्धिरवधीनां । विस्मरणं दिग्विरतरत्याशाः पंच मन्यते ॥ ७३ ॥ अभ्यतरं दिगवधेरपार्थिकेभ्यः सपापयोगेभ्यः । विर- मणमनर्थदंडवत विदुव्रतधराग्रण्यः ।। ७४ ॥ पापोपदेशहिंसादानापध्या- नदुःश्रुतीः पंच | प्राहुःप्रमादचर्यामनर्थदण्डानदण्डधराः ॥७५ ॥ तिर्य- [२२] कक्लेशवाणिज्याहिंसारंभप्रलंभनादीनाम् । कथाप्रसंगप्रसवः सर्तव्यः पापो- पदेशः ।। ७६ ॥ परशुकृपाणखनित्रज्वलनायुधशगिशंखलादीनां । वधहे. तूनां दानं हिमादान त्रुवंति बुधाः ।। ७७ ॥ वधबंधच्छेदादेद्वैपादागाच्च परकलत्रादेः । आध्यानमपध्यानं शासति जिनशासने विशदाः ॥ ७ ॥ आरंभसंगसाहसमिथ्यात्वद्वेपरागमदमदनैः। चेतः कलुपयतां श्रुतिरवधीनां दुःश्रुतिर्भवति ॥ ७६ || क्षितिसलिलदहनपवनारंभ विफलं वनस्पतिच्छेद। सरणं सारणमपि च प्रमादचर्या प्रमाणते ।। ८०॥ कंदर्प कौत्कुच्यं मौख- र्यमतिप्रसाधनं पंच। असमीक्ष्य चाधिकरणं व्यतीतयोऽनर्थदडकृद्विरते: ।। ८१॥ अक्षार्थानां परिसंख्यान भोगोपभोगपरिमाणं । अर्थवतामप्य- वधौ रागरतीनां तनूकृतये ॥२॥ मुक्त्वा परिहातन्यो भोगो भुक्त्वा पुनश्च भोक्तव्यः । उपभोगोऽशनवसनप्रभृतिः पञ्चेंद्रियो विषयः ॥३॥ सहतिपरिहरणार्थ क्षौद्र पिशित प्रमादपरिहतये । मद्यं च वर्जनियं जिन- चरणौ शरणमुपयातैः।। ८४ ॥ अल्पफलबहुविधातान्मूलकमाणि भंग- वेराणि । नवनीतनिवकुसुम कैतकमित्येवमवहेयम् ।। ८५ ॥ यदनिष्ट तद व्रतयेद्यच्चानुपसेव्यमेतदपि जह्यात् । अभिसंधिकृता विरतिविषयायोग्याद् व्रत भवति ।। ८६ ॥ नियमो यमश्च विहितौ द्वधा भोगोपभोगसंहारे। नियमः परिमितकालो यावज्जीवं यमो ध्रियते ॥ ८७ ॥ भोजनवाहनश- यनस्नानपवित्रांगरागकुसुमे । तांबूलवमनभूषणमन्मथसंगीतगीतेषु ॥८॥ अद्य दिवा रजनी वा पक्षो मासस्तथर्तुरयन वा । इति कालपरिच्छित्या प्रत्याख्यानं भवेनियमः ॥ ८६ ॥ विषयविपतोऽनुपेक्षानुस्मृतिरतिलौल्य- मतितपानुभवः । भोगोपभोगमाव्यतिक्रमाः पश्च कथ्यते ॥ १० ॥ देशावकाशिक वा सामायिक प्रोषधोपावासो वा । वैयावृत्यं शिक्षा- व्रतानि चत्वारि शिष्टानि ॥ ११ ॥ देशावकाशिक स्यात्कालपरिच्छेदनेन देशस्य । प्रत्यहमणुव्रतानां प्रतिसंहारो विशालस्य ॥ १२ ॥ गृहहरिग्रा- माणां क्षेत्रनदीदावयोजननां च । देशावकाशिकस्य सरंति सीनां तपो- वृद्धाः ॥ ९३ ।। संवत्सरमृतुरयनं मासचतुर्मासपक्षमृक्षं च । देशावकाशि- कस्य प्राहुः कालावधि प्राज्ञाः ॥ १४ ॥ सीमान्तानां परतः स्थूलेतर- [२९] ३ पंचपापसंत्यागात् । देशावकाशिकेन च महाव्रतानि प्रसार्थ्यते ॥ १५ ॥ प्रेषणशब्दानयनं रूपाभिव्यक्ति पुद्गलक्षेपौ । देशावकाशिकस्य व्यपदि- ' श्यतेऽत्ययाः पंच ॥१६॥ आसमयमुक्ति मुक्त पंचाघानामशेषभावेन । सर्वत्र च सामयिकाः सामयिकं नाम शसंति ॥ ९७ ॥ मूर्धरुहमुष्टिवा- सोधं पर्यकबंधनं चापि । स्थानमुपवेशन वा समयं जानति समयज्ञाः ॥८॥ एकाते सामायिक निाक्षेपे वनेषु वास्तुपु च । चैत्यालयेषु वापि च परिचेतव्य प्रसन्नधिया ॥ ९९ ॥ व्यापारवैमनस्याद्विनिवृत्याम- तरात्मविनिवृत्या । सामयिकं बघ्नीयादुपबासे चैकमुक्त वा ॥ १० ॥ सामयिकं प्रतिदिवसं यथावदप्यनलसेन चेतव्यं । व्रतपञ्चकपरिपूरणकार- णमवधानयुक्तेन ॥ १०१ ॥ सामयिके सारंभाः परिग्रहा नैव संति सर्वे- ऽपि । चेलोपसृष्टमुनिरिव गृही तदा याति यतिभावम् ।। १०२ ॥ शीतो. प्णदंशमशकपरीषहमुपसर्गमपि च मौनधराः । सामायिक प्रतिपन्ना अधि- कुर्वीरनचलयोगाः ॥ १०३ ।। अशरणमशुभमनित्यं दुःखमनात्मानमाव- सामि भवम् । मोक्षस्तद्विपरीतात्मेति ध्यायतु सामयिके ॥ १०४ ॥ वाका- यमानसानां दुष्प्रणिधानान्यनादरासरणे । सामयिकस्यातिगमा व्यज्यते पञ्च भावेन ॥ १०५ ।। पर्वण्यष्टम्यां च ज्ञातव्यः प्रोपधोपवासस्तु । चतु- रभ्यवहार्याणां प्रत्याख्यान सदेच्छामिः ॥ १०६ ॥ पञ्चानां पापानाम- लक्रियारंभगधपुष्पाणाम् । स्नानांजननस्यानामुपवासे परिहृतिं कुर्यात् ॥ १०७ ॥ धर्मामृत सतृपणः श्रवणाभ्यां पिवतु पाययेद्वान्यान् । ज्ञान- ध्यानपरो वा भवतपत्रसन्नतंद्रालुः ॥ १०८ ॥ चतुराहारविसर्जनमुपवास: प्रोपधः सकृद्भुक्तिः। स प्रोपधोपचासो यदुपोष्यारंभमाचरति ॥ १०९॥ ग्रहणविसर्गास्तरणान्यदृष्टमृष्टान्यनादरासरणे । यत्प्रोपधोपवासव्यतिलक- नपचक तदिद ॥११० ॥ दानं वैयावृत्यं धर्माय तपोधनाय गुणनिधये । अनपेक्षितोपचारोपक्रियमगृहाय विभवेन ॥ १११ ॥ व्यापत्तिव्यपनोदः पदयोः संवाहनं च गुणरामात् । वैयावृत्यं यावानुपग्रहोऽन्योऽपि संय- मिनां ।। ११२॥ नवपुण्यैः प्रतिपत्तिः सप्तगुणसपाहितेन शुद्धेन । अप बनारंभाणामार्याणामिप्यते दानम् ॥ ११३ ॥ गृहकर्मणापि निचितं कर्म (३००] विमार्टि खलु गृहविमुक्तानां । अतिथीनां प्रतिपूजा रुधिरमलं धावते- वारि ॥ ११४ ॥ उच्चैर्गोत्रं प्रणते गो दानादुपासनात्पूजा । भक्तेः सुंदररूपं स्तवना कीनिस्तपोनिधिषु ॥ ११५ ॥ क्षितिगतमिव वटवीज पात्रगतं दानमल्पमपि काले । फलतिच्छायाविभव बहुफलमिष्टं शरीर- भृतां ॥ ११६ ॥ आहारौपधयोरप्युपकरणावामयोश्च दानेन । वैयावृत्यं ब्रुवते चतुरात्मत्वेन चतुरस्राः ।।११७ ॥ श्रीपेणवृषभसेने कौंडेशः शूक- रश्च दृष्टाताः। चैयावृत्यस्यैते चतुर्विकल्पस्य मतव्याः ।।११८ ॥ देवा- घिदेवचरणे परिचरणं सर्वदुःखनिहरणम् । कामदुहि कामदाहिनि परिचि- नुयादातो नित्यम् ।। ११९ ।। अर्हचरणसपर्यामहानुभावं महात्मनाम- वदत् । भेकः प्रमोदमत्तः कुसुमेनकेन राजगृहे ।। १२० ॥ हरितपिवान- निधाने ह्यनादरासरणमत्सरत्वानि । वैयावृत्यस्यैते व्यतिक्रमाः पंच कथ्यन्ते ॥ १२१ ॥ उपसर्गे दुर्भिक्षे जरसि रुजायां च निष्प्रतीकारे । धर्माय तनुविमो चनमाहुः सल्लेखानामार्याः ॥ १२२ ॥ अंतक्रियाधिकरणं तपःफलं सक- लदर्शिनःस्तुवते । तस्माद्यावद्विभवं समाधिमरणे प्रयतितव्यम् ।। १२३ ।। स्नेह वैरं संग परिग्रहं चापहाय शुद्धमनाः । स्वजन परिजनमपि च क्षान्त्वा क्षमयत्प्रियैर्वचनैः ॥ १२४ ॥ आलोच्य सर्वमेनः कृतकारितम- नुमतं च निर्व्याजम् आरोपयेन्महाव्रतमामरणस्थायि निश्शेषम् ।। १२५ ।। शोकं भयमवसाद क्लेदं कालुप्यमरतिमपि हित्वा । सच्चोत्साहमुदीर्य च मनः प्रसाधं श्रुतैरमृतैः ॥ १२६ ।। आहारं परिहाप्य क्रमशः स्निग्ध विव- द्धयेत्पानं । स्निग्धं च हापयित्वा खरपान पूरयेक्रमशः ॥ १२७ ॥ खर- पानहापनामपि कृत्वा कृत्योपवासमपि शक्त्या पंचनमस्कारमनास्तनुं त्य- जेत्सर्वयत्नेन ॥ १२८ ॥ जीवितमरणाशंसे भयमित्रस्मृतिनिदाननामानः। सल्लेखनातिचाराः पच जिनेन्द्रः समदिष्टाः ॥ १२९ ॥ निश्रेयसमभ्युदयं निस्तीरंदुस्तरं सुखांबुनिधि । निष्पिवति पीतधर्मा सच? खैरनालीढः॥१३०॥ जन्मजरामयमरणैः शोकैर्दु:खमयश्चै परिमुक्तम् । निर्वाणम् शुद्धसुखं निः- यसमिष्यते नित्य ॥१३१ । विद्यादर्शनशक्तिस्वास्थ्यप्रह्लादप्तिशुद्धियुजः। [३०१] . .

निरतिशया निरवधयो निःश्रेयसमावसंति सुखं ॥ १३२ ॥ काले कल्पश- तेऽपि च गते शिवानां न विक्रिया लच्या । उत्पातोऽपि यदि स्यात् त्रिलो- कर्मभ्रांतिकरणपटुः ।। १३३ ।। निःश्रेयसमधिपनाललोक्यशिस्वामणिश्रियं दधते । निष्किट्टकालिकाच्छविच भीकरभासुरात्मानः ॥ १३४ ॥ पूजा- श्वर्यैवलपरिजनकामभोगभूयिष्टैः। अतिशयितभुवनमद्भुतमभ्युदय फलति सद्धर्मः ॥१३५॥श्रावकपदानि देवरेकादश देशितानि येषु खलु । खगुणाः पूर्वगुणैः सह संतिष्टते क्रमविवृद्धः ।। १३६ ॥ सम्यग्दर्शनशुद्धा संसारशरीरभोगनिर्विएणः। पंचगुरुचरणशरणो दर्शनिकस्तत्वपथगृह्यः ॥ १३७ ।। निरति क्रमणमणुव्रतपचकमपि शीलसप्तकं चापि । धारयते निःशल्यो योऽसौ बतिनां मतो बतिकः ।। १३८ ॥ चतुरावत्रितयश्चतुः प्रमाणः स्थितो यथाजातः सामयिको द्विनिपद्यस्त्रियोगशुद्धस्त्रिसंध्यमभिवंदी ॥ १३९ । पर्वदिनेषु चतुर्वपि मासे मासे खशक्तिमनिगुह्य । प्रोपधनि यमविधायी प्रणिधिपरः प्रोषधानशनः ।। १४०।। मूलफलशाकशाखा- करीरंकदप्रसूनबीजानि । नामानि योऽति सोऽयं सचित्तविरतो दयामूर्तिः ॥ १४१ ॥ अन्नं पानं खाद्य लेां नानाति यो विभावयाँ। सच रात्रि- मुक्तिविरतः सत्वेष्वनुकपमानमनाः ॥ १४२ ॥ मलवीज मलयोनि गल. न्मलं पूतिगधि वीभत्सं। पश्यन्नंगमनंगाद्विरमति यो ब्रह्मचारी सः ॥ १४३ ।। सेवाकृषिवाणिज्यप्रमुखादारंभतो व्युपारमति प्राणातिपातहे- तोर्योऽसावारंभविनिवृत्तः ।। १४४ ॥ वाह्येषु दशसु वस्तुषु ममत्वमुत्सृज्य निर्ममत्वरतः । खस्थः संतोषपरः परिचित्तपरिग्रहाद्विरतः ॥१४५ ॥ अनुमतिरारंभे वा परिग्रहे वैहिकेषु कर्मसु वा । नास्ति खलु यस्य समधी- रनुमतिविरतः स मंतव्यः॥१४६|| गृहतो मुनिवनमित्वा गुरूपकंठे व्रतानि परिगृह्य । भक्ष्याशनस्तपस्यन्नुत्कृष्ठश्वेलखंडधरः॥१४७॥ पापमरातिर्धमो बंधुर्जीवस्य चेति निश्चिन्वन् । समयं यदि जानीते श्रेयो ज्ञाता ध्रुवं भवति ।। १४८ ।। येन खय वीतकलंक विद्यादृष्टिक्रियारत्नकरंडभावं । नीतस्तमा- याति पतीच्छयेव सर्वार्थसिद्धिनिपु विष्टपेषु ।। १४८ ॥सुखयतु सुखभूमिः कामिन कामिनीव, सुतमिव जननी मां शुद्धशीला भुनक्तु । कुलमिव (३०२] गुणभूपा कन्यका संपुनीताज्जिनपतिपदपद्मनेक्षिणी दृष्टिलक्ष्मी ॥१५॥ इति रत्नकरण्डश्रावकाचार समाप्त । अथ द्रव्य संग्रह जीवमजीव दचं, जिणवस्वमग जेण णिद्दिढ । देविंदविंदबंद, वंदे त सव्वदा सिरसा ।।१॥ जीवो उवओगमओ अत्ति कत्ता सदेह- परिमाणो । भोचा संयारत्थो सिद्धो सो विस्ससोड्ढगई ॥ २ ॥ तिकाले चदु पाणा इंदिय बलमाउ आणपाणो य । ववहारा सो जीवो णिचयण- यदो दु चेदणा जस्म ।। ३ ॥ उबओगो दुवियप्पो दंसणं चदुधा । चक्खु अचक्खु ओही दसणमध केवलं णेयं ।। ४ ॥णाणं अट्टवियप्पं मदिसुद- ओही अणाणणाणाणि। मणपञ्जय केवलमवि पञ्चक्खपरोक्खमेयं च ॥ ५ ॥ अट्टचदुणाणदंसण सामण्णं जीवलक्खणं भणियं । ववहारा सुद्ध- णया सुद्ध पुण दंसण णाण ॥ ६ ॥ वण्ण रस पंच गधा दो फासा अट्ठ णिचया जीवे । णो संति अमुन्ति तदो क्वहारा मुशि बंधादो।।७।। पुग्गलकम्मादीण कत्ता बबहारदो दु णिच्चयदो। चेदणकम्माणादा सुद्ध. णया सुद्धभावाणं ॥ ८ ॥ ववहारा सुहदुक्खं पुग्गलकम्मप्फलं पहुंजेदि। आदाणिच्च यणयदो चेदण भाव खु आदस्स ॥ ९ ॥ अणुगुरुदेहपमाणो उपसंहारप्पसप्पदो चेदा । असमुहदो ववहारा णिच्चयणयदो असंखदेसो वा ।। १० । पुढविजलतेउवाऊ वणप्फदी विविहथावरेइंदी । विगतिगच- दुपचक्खा तसजीवा होति संखादी ॥ ११॥ समणा अमणा णेया पचे- दिय णिम्मणा परे सवे । वादर सुहुमेहदी सव्वे पज्जच इदरा य ॥१२॥ मग्गणगुणठाणेहिं य च उदसहिं हवति तह असुद्धणया। विष्णेया संसारी सव्वे सुद्धा हु सुद्धणया ॥ १३ ॥ णिकम्मा अट्टगुणा, किंचूणा चरम- देहदो सिद्धा । लोयग्गठिदा णिच्चा उत्पादवयेहिं संजुत्ता ॥१४॥ पय- डिडिदिअणुभागप्पदेसर्वधेहिं सब्बदो मुक्को । उड्ढ गच्छदि सेसा विदि- सावज्ज गर्दि जति ॥ १५ ॥ अज्जीवो पुण णेओ पुग्गल धम्मो अध- [३०३) ज ८१ 2 . . - म्म आयासं । कालो पुग्गल मुत्तो रूवादिगुणो अमुस्ति सेसा दु ॥१६॥ सद्दो बंधो सुहमो थूलो संठाणभेदतमछाया । उज्जो दादवसहिया पुग्गल- दव्वस्स पञ्जाया ॥ १७॥ गइपरिणयाण धम्मो पुग्गलजीवाण गमणसह- यारी । तोयं जह मच्छाणं अच्छता णेव सो णेई ॥ १८ ॥ ठाणजुदाण अधम्मो पुग्गलजीवाण ठाणसहयारी । छाया जह पहियाणं गच्छंता णेव सो धरई ॥१६॥ अवगासदाणजोग्ग जीवादीणं वियाण आयासं | जेण्ह, लोगागासं अल्लोगागासमिदि दुविहं ॥ २० ॥ धम्माधम्मा कालो पुग्गल- जीवा य संति जावदिये । आयासे सो लोगो तत्तो परदो अलोगुत्तो ॥ २१ ॥ दबपरिवरूवो जो सो कालो हवेइ ववहारो। परिणामादी- लक्खों वट्टणलक्खो य परमट्ठो ॥ २२ ॥ लोयायासपदेसे इक्केक्के जे ठिया हु इक्केका। रयणाणं रासीमिव ते कालाणू असंखदब्वाणि ॥२३॥ एवं छमेयमिदं जीवाजीवप्पमेददो दव्वं उर्च कालबिजुलं णायव्वा पंच अस्थिकाया दु ॥ २४ ॥ संति जदो तेणेदे अस्थीति भणंति जिणवरा' जम्हा । काया इव बहुदेसा तम्हाकाया य अस्थिकाया य ॥२५॥होति असंखा जीवे धम्मा धम्मे अणत आयासे । मुचे तिविह पदेसा कालस्सेगी ण तेण सो काओ ॥ २६ ॥ एयपदेसो वि अणू णाणाखंधप्पदेसदो होदि। बहुदेसो उवयारा तेण य काओ भणंति सन्वाण्हू ॥ २७॥ जावदियं आयासं अविभागी पुग्गलाणुवढद्धं । त खु पदेसं जाणे सवाणुहाण दाण- . रिहं ॥२८॥ आसवबंधणसंवर णिजरमोक्खा सपुण्णपावा जे । जीवा- जीवविसेसा ते वि सपासेण पभणामो ।। २९ ॥ आसवदि जेण कम्म परिणामेणप्पणो स विणणेओ। भावासवो जिणुत्तो कम्मासवणं परोहोदि ॥३०॥ मिच्छचाविरदिपमादजोगकोहादओऽथ विष्णेया। पण पण पणदह तिय चदु-, कमसो भेदा दु पुवस्स ॥ ३१ ॥णाणवरणादीणं जोग्गं जं पुग्गल समासवदि । दव्यासयो सणेओं अणेयभेदों जिणक्खादों ॥ ३२॥ वज्झदि कम्मं जेण दु चेदणभावेण भावबंधो सो कम्मादप- देसाणं अण्णोण्णपवेसणं इदरों ।। ३३ ।। पयडिद्विदिअणुभाग,-प्पदेसभेदा दु चदुविधों बंधों । जोंगा पयडिंपदेसां ठिदिनणुभाग कसायदों होति (३०४] ॥ ३४ ॥ चेदणपरिणामो जो कम्मस्सासवणिरोहणे हेऊ । सो भावसंवरो खलु दवासवरोहणे अण्णो ॥ ३५ ॥ वदसमिदीगुत्तीओ धम्माणुपिहा परीसहजओ य । चारित्तं बहुभेयं णायव्वा भावसंवरविसेसा ॥ ३६ ॥ जहकालेण तवेण य मुत्तरसं कम्मपुग्गल जेण । भावेण सडदि णेया तस्सडणं चेदि णिजरा दुविहा ।। ३७ । सव्वस्स कम्मणो जो खयहेदू अप्पणो ह परिणामो। णेओ स भावमोक्खो दव्वविमोक्खो य कम्मपुध- भावो ॥ ३८ ॥ सुहअसुहभावजुत्ता पुगणं पावं हवति खलु जीवा । सादं सुहाउ णामं गोदं पुण्यं पराणि पावं च ॥ ३९ ॥ सम्मइंसण गाणं चरणं मोक्खस्स कारणं जाणे । ववहारा णिचयदो तत्तियम इओ णिओ अप्पा ।। ४० ॥ रयणत्तयं ण वट्टइ अप्पाण मुयत्तु अण्णदवियनि । तमा तत्तियमइओ होदि हु मोक्खणस्स कारणं आदा ॥४१॥ जीवादीसदहणं सम्म रूवमप्पणो त तु दुरमिणिवेसविमुकं गाणं सम्म खु होदि सदि जहि ॥ ४२ ॥ संसयविमोहविन्भमविवज्जियं अप्पपरसरुवस्स । गहणं सम्म णाणं सायारमणेयमेयं च ।। ४३ ॥ सामण्णं गहणं भावाणं णेव कट्टुमायारं । अविसेसिदण अढे दसणभिदि भएणये समये ॥४४॥ दसणपुव्वं गाणं छदात्थाणं ण दुण्णि उवओंगा | जुगव जमा केवलि, णाहे जुगव तु ते दो वि ॥ ४५ ॥ असुहादो विणिविची सुहे पवित्ती य जाण चारित्रं । वदसमिदिगुत्तिरूव । ववहारणया हु जिणभणियं ॥४६॥ बहिरभंतरकिरिया रोहो भवकारणप्पणासह। पाणिस्स जंजिणुत्तं तं परम सम्मचारित्तं ॥ ४७ ॥ दुविहपि मोक्खहेउ झाणे पाउणदि जं मुणी णियमा । तमा पयत्तचित्ता जूयं ज्झाणं समभसह ॥४८॥ मा मुज्झह मा रज्जह मा दुस्सह इट्ठणि?अत्थेसु । थिरमिच्छहि जइ चित्त विचिचझा- णप्पसिद्धीये ॥ ४६॥ पणतीस सोल छप्पण चदु दुगमेगं च जवह झाएह । परमेटिवाचयाण अण्णं च गुरूवदेसेण ।। ५० ।। णट्ट चदुघाइ कम्मों दसणसुहणाणवीरियमईओ । सुहदेहत्थो अप्पा सुद्धो अरिहो विचि. तिज्जो॥५१॥ गट्टकम्मदेहो लोयालोयस्स जाणओ दट्ठा । पुरिसायारो अप्पा सिद्धो ज्झाएह लोयसिहरत्थो ।। ५२ ।। दमणणाणपहाणे वीरिय- [३०५] चारित्तवरतवायारे । अप्पं पर च जुजइ सो आइरियो मुणी ज्झेओ ।। ५३ ।। जो रयणायजुत्तो णिच्च धम्मोवएसणे णिरदो । सो उबझाओ अप्पा जदिवरवसहो णमो तस्स ।। ५४ ॥ दसणणाणसमग्गं मग्ग मोक्ख स्स जो हु चारित। साधयदि णिच्च सुद्धं साहू स मुणी णमो तस्स ॥५५॥ जंकिंचि वि चिंतंतो णिरीहविची हवे जदा साह । ल्झ्णय एयत्त तदा हु तं तस्स णिचय ज्झत्तंण ॥ ५६ ॥ मा चिट्ठह मा जंपह, मा चिंतह किंचि जेण होइ थिरो। अप्पा अप्पलि रओ इणमेव परं हवे आण ॥ ५७ ॥ तवसुदवदवं चंदा झाणरहधुग्धरो हवे जमा । तमा तत्तिय- णिरदा तल्लद्धीए सदा होह ॥ ५८ ॥ दव्यसंगहमिणं मुणिणाहा दोससंच- यचुदा सुदपुण्णा। सोधयंतु तणुसुत्तधरेण णेमिचंदमुणिणा भणिय जं ॥ ५९ ॥ अथाद्याष्टकस्तोत्रम् । अद्य मे सफलं जन्म नेत्रे च सफले यम । वामद्राक्षं यतो ढेव हेतुमक्षयसम्पदः ॥१॥ अब संसारगम्भीरपारावारः सुदुम्तरः । सुतरो- ऽयं क्षणेनैव जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥ २ ॥ अब मे क्षालितं गात्रं नैत्रे च विमले कृते । स्नात्तोऽहं धर्मतीर्थेषु जिनेन्द्र तब दर्शनात् ।। ३ ।। अद्य मे सफलं जन्म प्रशस्तं सर्वमंगलम् । संमागर्णवतीर्णोऽह जिनेन्द्र तव दर्श- नात् ॥ ४ ॥ अब कर्माप्टकज्वालं विधूनं सकपायकम् । दुर्गतेविनिवृतो- ऽहं जिनेन्द्र तव दर्शनात ॥ ५ ॥ अद्य सौम्या ग्रहा सर्व शुभाञ्चकादश स्थिताः । नष्टानि विन जालानि जिनेन्द्र तब दर्शनात् ॥ ६ ॥ अद्य नष्टो महावन्धः कर्मणां दुःखदायकः । सुखसंगमसमापन्नो जिनेन्द्रं तव दर्श- नात् । अद्य कर्माष्टकं नष्ट दुःखोत्पादनकारकम् । सुखाम्भोधिनिमग्नोऽहं जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥ ८ ॥ अद्य मिथ्यान्धकारय हन्ता ज्ञानदिवाकरः । उदितो मच्छिरीरेऽसिन् जिनेन्द्र तव दर्शनात् ।। ९ ॥ अद्याह सुकृती [३०६] भूतो निधूताशेषकल्मषः । भुवनत्रयपूज्योऽहं जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥१०॥ अद्याष्टकं पठेद्यस्तु गुणानन्दितमानसः। तस्य सर्वार्थसंसिद्धिजिनेन्द्र तव दर्शनात् ।। ११ ॥ अथ दृष्टाष्टकस्तोत्रम् दृष्टं जिनेन्द्रभवनं भवतापहारि, भव्यात्मनां विभवसंभवभूरिहेतुः। दुग्धाब्धिफेनधवलोज्वलकूटकोटि-नद्धध्वजप्रकरराजिविराजमानम् ॥१॥ दृष्टं जिनेन्द्रभवनं भुवनैकलक्ष्मीधामविद्धिनमहामुनिसेव्यमानम् । विद्या- धरामरवधूजनमुक्तदिव्य-पुण्याञ्जलिप्रकरशोभितभूमिभागम् ॥२॥ दृष्टं जिनेन्द्रभवन भवनादिवास-विख्यातनाकगणिकागणगीयमानम् । नाना- मणिप्रचयभासुररश्मिजाल-व्यालीढनिर्मल विशालगवाक्षजालम् ।। ३ ।। दृष्टं जिनेन्द्रभवनं सुरसिद्धयक्ष-गन्धर्षकिन्नरकरापितवेणुवीणा । संगीत- मिश्रितनमस्कृतधीरनाद-रापूरिताम्बरतलोरुदिगन्तरालम् ॥ ४ ॥ दृष्ट जिनेन्द्र भवनं विपलद्विलोल-मालाकुलालितलितालक विभ्रमाणम् । माधु- यवाद्यलयनृत्यविलासिनीनां, लीलाचलद्वलयनूपुरनादरम्यम् ॥ ५॥ दृष्टं जिनेन्द्रभवनं मणिग्नहेमसारोज्वलैः कलशचामरदर्पणाद्यैः । सन्मंगलैः सततमष्टशतप्रभेढे-विभ्राजित विमलमौक्तिकदामशोभम् ॥ ६॥ दृष्टं जिने- न्द्रभवनं वरदेवदारु-कर्पूरचन्दनतरुस्कसुगधिधूपैः । मेघायमानगगने पव- नाभिघात चश्चच्चलशिमलकेतनतुङ्गशालम् ॥ ७ ॥ दृष्ट जिनेन्द्रभवनं धवलातपत्र-च्छायानिमग्नतनुयक्षकुमारवृन्दैः । दोध्यमानसितचामरपक्ति- भासं, भामंडलद्युतियुतप्रतिमाभिरामम् ।। ८ ॥ दृष्टं जिनेन्द्रभवन विवि- धप्रकार-पुष्पोपहारसमणीयसुरत्नभूमि । नित्यं वसंततिलकश्रियमा दधानं सन्मगलं सकलचन्द्रमुनीन्द्रवन्धम् ॥ ९ ॥ दृष्ट मयाद्य मणिकाञ्चनचित्र- तुङ्गसिंहासनादिजिनविम्बविभूतिमुक्तम् । चैत्यालय यदतुल परिकीर्तित मे, सन्मंगल सकलचन्द्रमुनीन्द्रवन्धम् ॥ १० ॥ [३०७] अथ परमानन्दस्तोत्रम् परमानंदसंयुक्तं, निर्विकारं निरामयम् ॥ ध्यानहीना न पश्यन्ति निजदेहे व्यवस्थितम् अनंतसुखसंपन्नं, ज्ञानामृतपयोधरम् ।। अनंतवीर्य- सम्पन्नं, दर्शनं परमात्मनः ॥२॥ निविकारं निरावाध, सर्वसंगविवर्जि तम् । परमानन्दसम्पन्न, शुद्धचैतन्यलक्षणम् ।। ३ ।। उत्तमा स्वात्मचिंता सात, मोहचिंता च मध्यमा । अधमा कामचिंता स्यात्, परचिंताधमाधमा ॥ ४ ॥ निर्विकल्पसमुत्पन्नं, ज्ञानमेव सुधारसम् । विवेकमंजलिं कृत्वा, तं पिवंति तपस्विनः ।। ५ ।। सदानंदमय जीवं, यो जानाति स पंडितः । स सेवते निजात्मान, परमानंदकारणम् ॥ ६॥ नलिनाच्च यथा नीरं मिन्न तिष्ठति सर्वदा । सोऽयमात्मा स्वभावेन, देहे तिष्ठति निर्मलः ॥ ७ ॥ द्रव्य- कर्ममलैर्मुक्तं, भावकर्मविवर्जितम् । नोकर्मरहित सिद्धं, निश्चयेन चिदा- त्मकम् ॥ ८॥ आनंदं ब्रह्मणों रूपं, निजदेहे व्यवस्थितम् । ध्यानहीना न पश्यंति, जात्यन्धा इव भास्करम् ।। ९ ।। सद्ध्यानं क्रियते भव्यो, मनो) येन विलीयते । तत्क्षणं दृश्यते शुद्ध, चिच्चमत्कारलक्षणम् ॥ १०॥ ये ध्यानलीना मुनयः प्रधानाः, ते दुःखहीना नियमाद्भवंति सम्प्राप्य शीघ्र परमात्मतत्त्वं, ब्रजंति मोक्ष क्षणमेकमेव ॥११॥ आनदरूप परमात्मतत्त्वं समस्तसंकल्पविकल्पमुक्तम् । स्वभावलीना निवसंति नित्य, जानाति योगी स्वयमेव तत्व ॥ १२ ॥ निजानदमयं शुद्ध, निराकारं निरामयम् । अनत- सुखसम्पन्नं सर्वसंगविवर्जितम् ।। १३ । लोकमात्रप्रमाणोय, निश्चये न हि संशयः । व्यवहारे तनुमात्रः, कथितः परमेश्वरैः ॥ १४ ॥ यत्क्षणं दृश्यते शुद्धं, तत्क्षणं गतविभ्रमः । स्वस्थचित्तः स्थिरीभृत्वा, निर्विकल्प- समाधितः॥ १५ ॥ स एव परम ब्रह्म, स एव जिनपुंगवः । स एव परम तत्वं, स एव परमो गुरुः ॥ १६ ॥ स एव परम ज्योतिः स एव परमं तपः । स एव परमं ध्यान, स एव परमात्मकः ॥१७॥ स एव सर्व- । (३००] ..

कल्याणं, स एव सुखभाजनम् । स एव शुद्धचिद्रूपं स एव परमं शिवः ॥ १८ ॥ स एव परमानंदः, स एव सुखदायकः । स एव परमज्ञानं स एव गुणसागरः ॥१६॥ परमाादसंपन्नं, रागद्वेषविवर्जितम् । सोहं तं देहमध्येषु यो जानाति स पंडितः ॥ २० ॥ आकारहितं शुद्ध, स्वस्त्र- रूपे व्यवस्थितम् । सिद्धमष्टगुणोपेत, निर्विकारं निरंजनम् ।। २१ ॥ तत्स- दृश निजात्मान, यो जानाति स पंडितः । सहजानदचैतन्यप्रकाशाय मही- यसे ॥ २२ ॥ पापाणेषु यथा हेम, दुग्धमध्ये यथा घृतम् । तिलमध्ये यथा तैलं, देहमध्ये तथा शिवः ।। २३ ॥ काष्ठमध्ये यथा वह्निः, शक्ति- रूपेण तिष्ठति । अयमात्मा शरीरेषु, यो जानाति स पडितः ॥ २४ ॥ श्रावक-प्रतिक्रमणम् । जीवे प्रमादननिताः प्रचुराः प्रदोषा यसाप्रतिक्रमणतः प्रलयं प्रया- न्ति । तस्साचदर्थममल मुनिबोधनार्थ वक्ष्ये विचित्रभवकर्मविशोधनार्थम् ॥ १॥ पापिष्ठेन दुरात्मना जडधिया मायाविना लोमिना रागद्वेपमलीम- सेन मनसा दुष्कर्म यनिर्मितम् । त्रैलोक्याधिपते जिनेन्द्र ! भवतः श्रीपाद- मूलेऽधुना निन्दापूर्वमह जहामि सततं वर्तिपुः सत्पथे ॥ २॥ खम्मामि सच्चजीवाणंसम्वे जीवा खमंतु मे । मेरती मे सव्वभूदेसु वेरं पझंण केणवि ॥ ३ ॥ रागबधपदोसं च हरिसं दीणभावय । उस्सुग भयं सोग रदिम- रदिं च पोस्सरे ॥ ४ ॥ हा दुट्ठकयं हा दुट्टचिंतियं भासियं च हा दुई । अंतो अंतो उज्झमि पच्छत्तावेण वेयंतो॥ ५ ॥ दव्वे खेत्ते काले भावे य कदावराहसोहणय । णिंदणगरहणजुचो मणक्यकाएण पडिकमणं ॥ ६ ॥ एइंदिय-बेइंदिय-तेइदिय-चउरिदिय-पंचेंदिय-पुढविकाइय-आउकाइय -तेउकाइय-बाउकाइय-वणप्फदिकाइय तस्सकाइया, एदेसि उद्दावणं परि- दावणं विराहणं उवधादो कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुपष्णिदो [३०९] तस्स मिच्छा मे दुक्कडं। दसणवयसामाइयपोसहसचित्तरायभत्ते य । वंभारंभपरिग्गहअणुमणुमुद्दिष्ट देसविरदेदे ॥ १ ॥ एयासु जधाकहिदपडिमासु पमादाइकयाइचारसोहणटुं छेदोवट्ठावणं होदु मज्झं। अरहतसिद्धआइरियउवज्झायसन्चसाहुसक्खियं सम्मत्तपुव्वगं सुव्वदं दिढव्वद, समारोहियं मे भवदु मे भवदु मे भवदु । देवसियपडिक्कमणाए सब्बाइचारचिसोहिणिमित्तं पुव्वाइरियकमेण अलो- यणसिद्धभचिकाउस्सग करेमि सामाथिकदण्डकः णमो अरहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं । णमो उवझायाणं णमो लोए सबसाहूण ॥३॥ चत्वारि मगल- अरहत मंगलं, सिद्ध मगलं, साहु मंगलं, केवलि पण्णचो धम्मो मंगलं। चचारि लोगोत्तमा--अरहतलोगोत्तमा, साहु लोगोत्तमा, केवलि- पण्णत्तो धमो लोगोत्तमा। चत्तारि सरणं पव्वजामि--अरहत सरणं पव्वजामि, सिद्ध सरणं पव्यजामि, साहु सरण पबजामि, केवलिपण्णत्तो धम्मो सरणं पन्चजामि । अड्ढाइज्जदीवदोंसमुद्देसु पण्णारसकम्मभूमीसु जाव अरहताणं भय- वताणं आदियराणं तित्थयराणं जिणाण जिणोत्तमाणं केवलियाणं, सिद्धाणं बुद्धाणं परिणिव्बुदाण अंतयडाण पारयडाणा, धम्माइरियाणं, धम्मदेसयाणं, धम्मणायगाणं, धम्मवरचाउरंगचक्कवट्टीणं देवाहिदेवाण, णाणाणं दसणाणं चरित्ताण मदा करेमि किरियम्मं । करेमि भते ! सामाझ्य सव्वं सावज्जजोग पञ्चक्खामि, जावजीव तिविहेण मणसा वचिया कारण ण करेमि ण कारेमि अण्या करंत पिण समणुमणामि । तस्स भंते ! अइचारं पडिकमामि, णिंदामि, गरहामि अप्पाणं, जार अरहंताणं भयवंताणं पज्जुवासं करेमि नाव कायं पावक- [३१०] - म्म दुश्चरियं वोस्मरामि। णमोकार र गुणिया । कायोत्सर्ग उच्छ्वास २७॥ - चतुर्विशतिस्तवः- थोस्सामि हैं जिणवरे तित्थयरे केवलीअणंतजिणें । शरपवरलोयम- हिए विडयस्यमले महापरणे ॥१॥ लोयस्सुज्जोययरे धम्मंतित्थंकरे जिणे वंदे । अरहते कित्तिस्से चउवीसं चेव केवलियो॥२॥ उसहमजियं च वंदे संभवममिणंदणं च सुमइ च । पउमप्पहं सुपासं जिणं च चंदप्पर वंदे ॥३।। सुविह च पुप्फयंतं सीयल सेयंस वासुपुज्जं च । विमलमणतं भयवं धम्म संतिं च वदामि ।। ४ ।। कुन्थु च जिणवरिंदं अरं च मलिं च सुन्वयं च णमि । वंदामि रिटणेमि तहपासं चड्ढमाणं च ॥ ५॥ एवं मए अमित्थुआ विहुयरयमला पहीणजरमरणा | चउवीसं पि जिणवरा तित्थ- यरा मे पसीयंतु ॥ ६ ॥ कित्तिय वंदिय महिया एए लोगोत्तमा जिणा सिद्धा । आरोग्गणाणलाहं दितु समाहिं च मे बोहिं ।। ७ ॥ चंदेहिं णिम्म- लयरा आइच्चेहि अहिय पयासंता । सायरमिव गमीरा सिद्धा सिद्धि मम दिसंतु ॥८॥ धीमते वर्धमानाय नमो नमितविद्विषे । यज्जानान्तर्गतं मृत्वा त्रैलोक्यं गोष्पदायते ।। १ ॥ सिद्धभक्तिः-- तवसिद्ध मयसिद्धे संयमसिद्धे चरित्तसिद्धे य। णाणम्मि दंसणम्मि य मिद्धे सिरसा णमसामि ॥२॥ इच्छामि भते ! सिद्धभत्तिकाउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउ, सम्मणाण- सम्मदंसण सम्मचरित्तजुत्ताणं अहविहकम्ममुक्काणं अद्वगुणसंपएणाणं उडढलोयमत्थयम्मि पट्टियाणं तबसिद्धाण णयसिद्धाणं चरित्तसिद्धाणं सम्मणाण-सम्मदसण सम्मचरित्तसिद्धाण अदीदाणागदवट्टमाणकालस्तय- (३११] सिद्धार्ण सव्वसिद्धाणं णिचकालं अंचेमि पूजेमि वदामि णमंसामि दुक्ख क्खओं कम्मक्खओ बोहिलाहो सुगइगमणं समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं। आलोचना इच्छामि भते ! देवसिय आलोचेऊ । तत्थ-पंचुंबरसहियाई सत्त वि वसणाई जो विवज्जेइ । सम्मत्तविसुद्धपई सो दसणसावओ भणियो ॥१॥ पञ्च य अणुव्वयाई.गुणव्ययाई हवंति तह तिष्णि | सिक्खावयाइं चत्तारि जाण विदियम्मि ठाणम्मि ॥२॥जिणवयणधम्मचेझ्यपरमेष्टिजिणयाल- याण णिच्च पि । जं वंदणं तियालं कीरइ सामाइयं त खु ।। ३ ।। उत्त- ममज्झजहणं तिविहं पोसह विहाणमुद्दिष्टुं । सगसचीए मासम्मि चउसु पव्वेसु कायव्य ॥ ४ ॥ वज्जिजदि हरिदं तयपत्तपवालकदफलवीयं । अप्पा- सुगं च सलिलं सच्चित्तणिवत्तिमं ठाण।। ५ ।। मणवयणकायकदकारि- दाणुमोदेहि मेहुणं णवधा | दिवसम्मि जो विवादिगुणम्मि सो सावओ हो ॥ ६ ॥ पुवुत्तणवविहाणं णि मेहुणं सव्वदा विवज्जतों । इत्थि- कहादिणिवित्ती सत्तमगुणवभचारी सो ॥७॥जं किंपि गिहारंभ बहु थोवं वा सया विवज्जेदि । आरंभणि वित्तपदी सो अट्ठमसावओ भणिओ ॥ ८॥ मोत्तूण वत्थमिचं परिग्गह जो विवञ्जदे सेसं । तत्थ वि मुच्छ ण करदि वियाण सो सावओ णवमो ॥ ६ ॥ पुठो वा पुट्ठो वाणियगेहिं परेहि सग्गिहकज्जे । अणुमणणं जो ण कुणदि वियाण सोसावओदसमो॥१०॥ णवकोडीसु विसुद्ध भिक्खायरणेण भुजदे भुज । जायणरहियं जोग्गं एया- रस सावओ सो दुः॥ ११ ॥ एयारसम्मि ठाणे उक्किट्ठो सावओ हवे दुविहो । वत्थेयधरो पढमो कोवीणपरिग्गहों विदिओ॥ १२ ॥ तवषयणि- यमावासयलोच कारेदि पिच्छ गिण्हेदि । अणुवेहाधम्मझाणं करपत्ते एय- ठाणम्मि ॥ १३ ॥ इत्थ मे जो कोई देवसिओ अइचारो अणाचारो तस्स भते! पडिक्क- मामि पडिकम्मंत्तस्स मे सम्मत्नमरणं समाहिमरण पंडियमरणं वीरियमरण दुक्खक्खओ कम्मक्खओ वोहिलाहो सुगइगमणं समाहिमरणं जिणगुण- [३१२] संपति होउ मज्ज्ञ। दमणवयमामाइयपोसहसच्चिनगयमत्त य । बंभारंगपरिग्गहअणुपणुमुद्दिष्ट देमविरदेदे ॥ १ ॥ एपासु जघाकहिटपडिमासु पमाढाडकयाइचारमोहणटुं छेटोत्रहावर्ण होद मज्य। - प्रतिक्रमणभक्तिः-- श्रीपडिक्कमणभक्ति काउस्मग्गं करेमि- णपो आहताणमित्यादि-थोस्सामीत्यादि । णमो अरहताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं । णमो उवज्झायाण णमो सेए सव्यसाहण ॥३॥ णमो जिणाणं ३, णमो णिस्सहीए ३, णमोत्थु दे ३, अरहंत ! सिद्ध ! युद्ध ! णीग्य ! हिम्मल ! मपमण ! सुभमण ! सुसमस्थ ! सम- जोग ! समभाव ! सल्लपट्टाणं ! सल्लघताण ! णिन्भय ! णिराय ! णिदोस! हिम्मोह ! णिम्मम ! णिम्संग ! णिस्मल ! माणमायमोममूरण ! तव- पहायण ! गुणग्यण ! सीलमायर ! अणंत ! अप्पमेय ! महदिमहावीर- बद्दपाण! युद्धिरिसिणो चेटि णमोत्थु दे णमोत्थु दे णमोत्थु दे । मम मगलं अम्हंता य सिद्धा य वुद्धा य जिणा य केवलिणो ओहि- ओहिणाणिणो पण पन्जयणाणिणो चउदमपुन्चंगामिणो सुदसमिदिसमिद्धा य, तवो य वारमविहो तवसी, गुणा य गुणवंतो य महारिसी तिन्थं तित्थकरा य, पवयणं पत्रणी य, णाण णाणी य, दसणं दसणी य, संजमो संजदा य, विणओं विणीदा य, वंभचेरवासो बंभचारी य, गुत्तीओ चेत्र गुत्तिमंतो य, मुत्तीओ चेव मुत्तिमंतो य, समिदीओ चेव समिदिमंतोय, ससमयपरसमयविद्, खंति खवगा य, खीणमोहा य खीणवंतो य, बोहि- यबुद्धा य बुद्धिमंनो य, चईयरुक्खाय चईयाणि । उड्ढमहतिरियलोए सिद्धायदणाणि णमंसामि सिद्धिणिसीहियाओ अट्ठायपव्वे य सम्मेदे उज्जते चंपाये पावाए मज्झिमाए हस्थिवालियसहाए [३१३] , जाओ अपणाओं का वि णिसीहियाओं जीवलोयम्मि ईसिप भारतलगयाणं सिद्धाणं युद्धाण कम्मचकमुकाणं णीरयाणं णिम्मलाण गुरुआइरियउवज्मा- याण पत्र-तित्थेर-कुलयराणं चाउवण्णाय समणसंघाय भरहेरावएसु दससु पंचसु पहाविदेहेसु जे लोए संति साहवो संजदा तवसी एदे मम मगलं पविच एदे ह मगल करेमि भावदो विसुद्धो सिरसा अहिवंदिऊण सिद्धे काऊण मजलिमत्थयंमि पडिलेहिय अडकत्तरिओ तिविहं तियरणसुद्धो। पडिकमामि मंते ! दमणपडिमाए संकाए कंखाए विदिगिछाए पर- पासंडाण पसंसाए पसंथुए जो मए देवसिओ अइचारो मणसा वचिया कारण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कड ॥१॥ पडिक्कमामि भंते ! वदपडिमाए पढमे थूलयडे हिंसाविरदिवदे वहेण वा वघेण वा छेएण वा अइभारारोहपोण वा अण्णपाणणिरोहणेण वा जो मए देवसिओ अइचारो मणसा वचिया काएण कदोवा कारिदो वा कीरंतों वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा से दुक्कई ।। २-१ ॥ पडिक्कमामि भते ! वदपडिआए विदिए थूलयडे असञ्चविरदिवदे मिच्छोवदेसेण वा रहोअब्भक्खाणेण वा कूडलेहणकरयोण वा सायापहा- रेण वा सायारमंत्रमेएण वा जो मए देवसिओ अइचारो मणसा वचिया काएण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमरिणदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥ २-२॥ पडिक्कमामि भंते ! वदपडिमाए तिदिए थूलयडे थेणविरदिवदे थेणपओगेण वा घेणहरियादाणेण वा विरुद्धरज्जाइक्कमणेपणा वा हीणा- हियमाणुम्माणेण वा पडिरूवयववहारेण वा जो मए देवसिओ अइचारे मणसा बचिया कारण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा में दुक्कडं ।। २-३ ॥ पडिस्कमामि भते ! वदपडिमाए चउत्थे थूलयडे अबमविरदिववे परविवाहकरणेया वा इत्तरियागमणेण वा परिग्गहिदापरिग्गाहिदागमणे वा अणगकीडणेण वा कापतिव्चाभिणिवेसेण वा जो मए देवसिओ अइ [३१४) चारोमणसा वचिया काएण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥ २-४ ॥ पडिक्कमामि भते ! वदपडिमाए पंचमे थूलयडे परिग्गहपरिमाणवदे खेत्तवत्थूण परिमाणाइक्कमणेणवाधणधाणाणं परिमाणाइक्कमणेणवादासी- दासाणं परिमाणाइक्कमणेण वा हिरण्णासुवष्णाणं परिमाणाइक्कपणेण वा कुप्प- भांडपरिमाणाइक्कमणेणचा जोमए देवसिओ अइचारोमणसावचियाकारण कदोवा कारिदो वा कीरंनो वा समणुमरिणदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥२-५॥ पडिकमामि भंते ! वदपडिमाए पढमे गुणव्वदे उड्ढवइक्कमणेण वा अहोवइक्कमणेण वा वातिरियवहक्कमणेण वा खेत्तउद्धीएण वा सदिअंत- राधाणेण वा जो मए देवसिओ अइचारो मणसा वचिया काएण कदोवा कारिदो वा कीरतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥२-६-१।। पडिक्कमामि भते ! वदपडिमाए विदिए गुणव्वदे आणययोण वा विणिजोगेण वा सद्दाणुवाएण वा रूवाणुवाएण वा पुग्गलखेवेण वा जो मए देवसिओ अइचारो मणसा पचिया कारण कदो वा कारिदो वा कीरतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥ २-७-२ ॥ पडिकमामि भंते ! वदपडिमाए तिदिए गुणव्यदे कंदप्पेण वा कुकु- वेएण वा मोक्खरिएण वा असमक्खियाहिकरणेण वा भोगोपभोगाणत्थ- केण वा जो मए देवसिओ अइचारोमणसावचिया काएण कदो वा कारिदों वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ।। २-८-३ ।। पडिक्कमामि भंते ! वदपडिमाए पढमे सिक्खावदे फासिदियभोग- परिमाणाइक्कमणेण वा रसणिदियभोगपरिणाइक्कमणेण वा घाणिदिय- भोगपरिमाणाइक्कमणेण वा सवणिंदियभोगपरिमाणाइक्कमणेण वा जो मए देवसिओ अइचारोमणसा वचिया कारण कदो वा कारिदोवा कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कड ।। २-९-१॥ पडिक्कमामि भते ! वदपडिपाए विदिए सिक्खावदे फार्सिदियपरि- भोगपरिमाणाइक्कमणेण वा रसणिदियपरिभोगपरिमाणाइक्कमणेण वा घाणिदियपरिभोगपरमाणाइक्कमणेण वा चक्खिदियपरिभोगपरिमाणा- [३१५] इक्कमणेण वा सवणिदियपरिभोंगपरिमाणाइक्कमणेण वा जो मए देव- सिओ अइचारो मणसा वचिया काएण कदो चा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमपिणदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥ २-१०-२ ॥ पडिक्कमामि भंते ! बदपडिमाए तिदिए सिक्खावदे सचित्तणिक्खे- वेण वा सचित्तापिहाणेण वा परउवएसेण वा कालाइक्कमणेण वा मच्छरि- एण वा जो मए देवसिओ अइचारो मणसा वचिया कारण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा ये दुक्कड ॥२-११.३॥ पडिक्कमामि भंते ! वदपडिमाए चउत्थे सिक्खावदे जीविदासंसणेण वा मरणासंसणेण वा मिवाणुराएण वा सुहाणुबंधेण वा णिदाणेण वा जो मए देवसिओ अइचारो मणसा वचिया कारण कदो वा कारिदो वा कीरतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कड ॥ २-१२-४ ।। पडिक्कमामि भंते ! सामाइयपडिमाए मणदुप्पणिधाणेण वा वायदु- प्पणिधाणेण वा कायदुप्पणिधाणेण वा अणादरेण वा सदिअणुवट्ठावणेण वा जो मए देवसिओ अइचारो मणसा वचिया काएण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥ ३ ॥ पडिकमामि भंते ! पोंसहपडिमाए अप्पडिवेविखयापमज्जियोस्सग्गेण वा अपाडवेक्खियापमज्जियादाणेण वा अप्पडिवेक्खियापमज्जियासंथारो- वक्कमणेण वा आवस्सयाणादरेण वा सदिअणुवट्ठावणेण वा जो मए देव- सिओ अइचारो मणसा चचिया काएण कदो वा कारिदो चा कीरंतो वा सपणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ।। ४ ॥ पडिक्कमामि भंते ! सचिचविरदिपडिमाए पुढविकाइया जीवा असं- खेजासंखेजा आउकाइया जीवा असंखेजासंखेजा तेउकाइया जीवा असं- खेजासंखेजा वाउकाइया जीवा असंखजासंखेजा वणप्फदिकाइया जीवा अणताअणंता हरिया वीया अंकुरा छिण्णा मिण्णाएदेसि उद्दापणं परिदा- वणं विराहणं उवघादो कदोवा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कर्ड ॥ ५॥ पडिक्कमामि भंते ! रायभचपडिमाए णवविहवंभचरियस दिवा [३१६] जो मये देवसिओ अइचारो अणाचारो मणसा वचिया काएण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ।।६।। पडिक्कमामि भंते ! वभपडिमाए इस्थिकहायत्तणेण वा इस्थिमणोह- ररंगणिरक्खणेणवा पुन्धरयाणुस्सरणेण वा कामक्रोवणरसासेवणेण वा सरीरमंडणेण वा जो मए देवसिओ अइचारो अणाचारो मणसा वचिया काएण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कड ॥७॥ पडिक्कमामि भते ! आरंभविरदिपडिमाए कसाय वसंगएण जो मए देवसियो आरंभो मणसा वचिया कारण कठो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥८॥ पडिक्कमामि भंते! परिग्गहविरदिपडिमाए वस्थमेतपरिग्गहादो अवरम्मि परिग्गहे मुच्छापरिणामे जो मए देवसिओ अइचारो अणावारो कदोवा कारिदोवा कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं।९।। पडिक्कमामि भते! अणुमणुविरदिपडिमाए जं किं पि अणुमणणं पुट्टापुट्टेण कद वा कारिदं वा कीरंतं वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥१०॥ पडिकमामि भंते ! उद्दिवविरदिपडिमाए उद्दिट्टदोसबहुलं अहोरदियं आहारयं अहारवियं आहारिज्जतं वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कड ॥११॥ इच्छामि भंते ! इस णिग्गथ पावयणं अणुत्तरं केवलय पडिपुण्णं णेगाइय सामाइय संसुद्ध सल्लघट्टाण सल्लघत्ताणं सिद्धिमाग्गं सेढिमग्गं खतिमग्गं मोत्तिमग्ग पमोत्तिमग्गं मोक्खमग्ग पमोक्खमग्गं णिज्जाणमग्गं णिव्वाणमग्ग सम्वदुक्खपरिहाणिमग सुचरियपरिणिव्याणमग्गं अवितहम- विसंतिपव्ययणमुत्तमं त मदहामि त पत्तियामि त रोचेमि तं फासेमि इदो उत्तरं अण्ण णस्थि भूदं ण भयं ण भविस्सदि णाणेण वा दसणेण वा चरित्तेण वा सुत्तेण वा इदो जीवा सिज्झति बुज्झति सुच्चति परिणिव्वा- णयंति सव्वदुक्खाणमंतं करंति परिवियाणंति समणोमि संजदोमि उवरदोमि [३१७] उवसंतोमि उवधिणियडियमाणमायामोसमूरण मिच्छणाणमिच्छदसणमिच्छ- चरिच च पडिविरदोमि सम्मणाणसम्मदंसणसम्मचरिच च रोचेमि जंजिण- परेहि पएणचोइत्थ मे जो कोइ देवसिओ अइचारो अणाचारो तस्स मिच्छ मि दुक्कड। इच्छामि भंते ! वीरभचिकाउस्सग्गं करेमि जो मए देवसिओ अइ- चारो अणाचारो आभोगो अणाभोगो काइयो चाइयों माणसिओ दुच्चरिओ दुच्चारिओ दुम्मासिओ दुप्परिणामिओ गाणे दसणे चरित्ते सुत्ते सामाइए एयारसण्हं पडिमाणं विराहणाए अट्टविहस्स कम्मस्स णिग्घादणाए अण्णहा उस्सासिदेण णिस्सासिदेण वा उम्मिसिदेण णिम्मिस्सिदेण खासिदेण वा छिंकिदेण वा जंभाइदेण वा सुहुमेहि अंगचलाचलेहि दिद्विचलाचलेहि एदेहिं सव्वेहिं असमाहिं पत्तेहिं आयारेहिं जाव अरहताणं भयवंताणं पज्जु- वासं करेमि तान कायं पान कम्मं दुचरियं वोस्सरामि । दंसणनयसामाइयपोसहसचिचराइभत्ते य । वंभारंभपरिग्गहअणमणुमुद्दिट्टसविरदेदे ॥ १ ॥ वीरभस्तिकाउस्सग करेमि-- (णमो अरहताणमित्यादि, थोस्सामीत्यादि जाप्य ३६ देवा)। यः सर्वाणि चराचराणि विधिनद्रव्याणि तेषां गुणान् पर्यायानपि भृतभाविभनतः सर्वान् सदा सर्वदा । जानीते युगपत्प्रतिक्षणमतः सर्वज्ञ इत्युच्यते सर्वज्ञाय जिनेश्वराय महते वीराय तसै नमः॥१॥ वीरः सर्व- सुरासुरेन्द्रमहितो वीरं बुधाः संश्रिता वीरेणामिहतः खकर्मनिचयो वीराय भक्त्या नमः वीरात्तीर्थमिंद प्रवृत्तमतुलं वीरस्य वीरं तपो वीरे श्री-श्रुति- कांति-कीर्ति-धृतयो हे वीर ! भद्रं त्नयि ॥२॥ये वीरमादौ प्रणमंति नित्यं ध्यानस्थिताः संयमयोगयुक्ताः । ते वीतशोका हि भवन्ति लोके संसारदुर्ग विषय तरंति ॥३॥ व्रतसमुदयमूलः संयमस्कन्धवन्धो यमनियमपयोमि- धितः शीलशाखः। समितिकलिकमारो गुप्तिगुप्तप्रवालो गुणकुसुमसुगंधिः [30] सत्तपश्चित्रपत्रः ॥ ४ ॥ शिवसुखफलदायी यो दयाछाययोधः शुभजन- पथिकानां खेदनोदे समर्थः । दुरितरविजताप प्रापयन्नन्तभावं स भववि- भवहान्यनोऽस्तु चारित्रवृक्षः॥ ५ ॥ चारित्र सर्वजिनैश्चरितं प्रोक्तं च सर्वशिष्येभ्यः । प्रणमामि पचभेदं पचमचारित्रलाभाय ॥ ५ ॥धर्मः सर्व- सुखाकरो हितकरो धर्म बुधाश्चिन्वते धर्मेणैव समाप्यते शिवसुखं धर्माय तस्मै नमः । धर्मान्नास्त्यपरः सुहृद्भवभृतां धर्मस्य मूल दया धर्मे चित्त- महं दधे प्रतिदिन हे धर्म ! मा पालय ॥ ७ ॥ धम्मो मगलमुद्दिढ अहिंसा संयमो तवो । देवा वि तस्म पणमति जस धम्मे सया मणो ॥८॥ इच्छामि भंते ! पडिकमणाइचारमालोचेउं तत्थ देसासिआ आसणा- सिआ ठाणासिआ कालासिआ मुद्दासिआ काओसग्गासिआ पाणामासिआ आवत्तासिआ पडिक्रुमासिए छसु आवासएसु परिहीणदा जो मए अचा- सणा मणसा वचिया कारण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुम- ण्णिदो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं । दसण-वय सामाइय-पोसह-सचित्त-रायभत्ते य । वंभारंम परिग्गह-अणुमणमुद्दिट्ट देसविरदो य ॥ १ ॥ चउवीसतित्थयरभत्तिकाउस्सग्ग करेमि-- (णमो अरहताणमित्यादि, थोस्सामीत्यादि ) चउवीतं तित्थयरे उसहाइवीरपच्छिमे वंदे । सव्वेसिं गुणगणहरसिद्ध सिरसा णमंसामि ॥१॥ये लोकेप्टसहस्रलक्षणधरा ज्ञेयार्णवान्तर्गता ये सम्य- कभवजालहेतुमथनाश्चन्दार्कतेजोधिकाः । ये साध्विन्द्रसुराप्सरोगणशते- गीतप्रणुत्यार्चिता-स्तान् देवान् वृभादिवीरचरमान् भक्त्या नमस्याम्यहम् ॥२॥ नामेय देवपूज्यं जिनवरमजित सर्वलोकप्रदीपं सर्वज्ञ संभवाख्यं मुनिगणवृपभ नन्दनं देवदेवम् । कर्मारिघ्नं सुवुद्धिं वरकमलनिभ पद्मपुष्पा- भिगन्धं क्षान्त दान्तं सुपाचं सकलशशिनिभं चन्द्रनामानमीडे ॥३॥ विख्यात पुष्पदन्त भवभयमथनं शीतलं लोकनाथं श्रेयांसं शीलकोश प्रव- रनरगुरु वासुपूज्यं सुपूज्यम् । मुक्तं दान्तेन्द्रियाश्व विमलमृपिपति सिंह- (३११] सैन्यं मुनीन्द्र धर्म सद्धर्मकेतुं शमदमनिलयं स्तौमि शांति शरण्यम् ॥४॥ कुन्धुं सिद्धालयस्थ श्रमणपतिमरं त्यक्तभोगेषु चक्र मल्लिं विख्यातगोत्र खचरगणनुतं सुव्रतं सौख्यराशिम् । देवेन्द्राच्यं नमीश हरिकुलतिलक नेमिचन्द्र भवान्त पार्श्व नागेन्द्रवन्ध शरणमहमितोवर्धमानं च भक्त्या।।५।। अंचलिका---- इच्छामि भंते ! चउवीसतित्थयम्भत्तिकाउत्सग्गो को तस्सालोचेउ पञ्चमहाकल्लाणसंपण्णाणं अट्ठमहापाडिहेरसहिदाणं चउतीसातिसयविसेस- संजुचाणं वत्तीसदेविंदमणिमउडमत्थयमहिदाण बलदेव-घासुदेव-चक्कहर- रिसिमुणिजइअणगारोवगूढाणं थुइसहस्सणिलयाण उसहाइवीरपच्छिममङ्ग- लमहापुरिसाण णिच्चकालं अंचेमि पूजेमि वंदामि णमंसामि दुक्खक्खओ कम्मक्खओ वोहिलाहो सुगइगमण समाहिमरण जिणगुणसंपत्ति होउ मज्छ। दसण-वय सामाइय-पोसह-सचित्त-रायत्ते य । वंभारंभ-परिग्गह-अणुमणमुदिट्ट देसविरदो ॥१॥ श्रीसिद्धभक्ति-श्रीप्रतिक्रमणभक्ति-श्रीवीरभक्ति-श्रीचतुर्विंशतिभक्तीः कृत्वा तद्धीनाधिकत्वादिदोषविशुद्धथर्थ समाधिभक्ति कायोत्सर्ग करोम्यह- (णमोकार ९ गुणिवा ) अथेष्टप्रार्थना प्रथमं करण चरण द्रव्य नमः शास्त्राभ्यासोजिनपति- नुतिः संगतिः सर्वदायः सद्वृत्तानां गुगगणकथा दोषवादे च मौनम् । सर्वस्यापि प्रियहितवचो भावना चात्मतत्वे सम्पद्यन्तां मम भवभवे याव- देतेऽपवर्गः ॥१॥ तव पादौ मम हृदये मम हृदय तव पददये लीनं । तिष्ठतु जिनेन्द्र ! तावद्यावनिर्वाणसम्प्राप्तिः ॥२॥ अक्खरपयत्थहीण मत्ताहीण च ज भए भणियं । तं खमउ णाणदेव य मज्झ वि दुक्खक्खयं दितु ॥ ३ ॥ दुक्खक्खओ कम्मक्खओं वोहिलाहो सुगइगमण समाहि- मरण जिणगुणसंपत्ति होउ मझं । इति श्रीश्रावकप्रतिक्रमण समाप्तम् । (३२०] दीक्षा-नक्षत्राणि प्रणम्य शिरसा वीरं जिनेन्द्रममलव्रतम् । दीक्षा ऋक्षाणि वक्ष्यन्ते सतां शुभफलाप्तये ॥१॥ भरण्युत्तरफाल्गुन्यौ मघाचित्राविशखिकाः। पूर्वाभाद्रपदा भानि रेवती मुनि-दीक्षणे ॥ २ ॥ रोहिणी चोचरापाढा उत्तराभाद्रपत्तथा । स्वातिः कृत्तिकया या वर्ज़ते मुनिदीक्षणे ॥३॥ अश्विनी-पूर्वाफाल्गुन्यौ हस्तस्वात्यनुराधिकाः। मूल तथोत्तगपाढा श्रवणः शतभिषक्तथा ॥ ४ ॥ उत्तराभाद्रपञ्चापि दशेति विशदाशयाः । अर्यि- काणां व्रते योग्यान्युपन्ति शुभहेतवः ॥ ५ ॥ भरण्यां कृत्तिकायां च पुष्पे श्लेपार्द्रयोस्तथा । पुनर्वसो च नो दधुरार्यिकाव्रतमुत्तमाः ॥६॥ पूर्वाभाद्रपदा मूल धनिष्ठा च विशाखिका । श्रवणञ्चैपु दीक्ष्यन्ते क्षुल्लकाः शल्यवर्जिताः ॥ ७ ॥ इति दीक्षानचत्रपटलम् .. दीक्षा ग्रहणक्रिया सिद्धयोगिवृहद्भक्तिपूर्वकं लिङ्गमर्प्यताम् । लुश्चाख्यानाग्न्यपिच्छात्म क्षम्यतां सिद्धभक्तितः ॥ अथदीक्षाग्रहण क्रियायां .... सिद्धभक्तिकायोत्सर्ग करेमिः- ('सिद्धानुद्धृत' इत्यादि) अथ दीक्षाग्रहण क्रियायां योगिभक्तिकायोत्सर्ग करोमि (थोस्सामि गुणधराणां इत्यादि जातिजरोरूरोग इत्यादि वा ) अनन्तरं लोचकरण, नामकरण, नाग्न्यप्रदानं, पिच्छप्रदानं च अथ दीक्षा निष्ठा- पनक्रियाया ... सिद्धभक्ति कायोत्सर्ग करोमि । दाक्षादानोत्तरकर्तव्यम्- व्रतसमितीन्द्रियरोषाः पंच पृथक क्षितिशयो रदाघर्षः। स्थितिसकृदशने लुश्चवश्यकपटके विचेलताऽस्नानम् ॥ - [३२१] इत्यष्टविंशति मूलगुणान् निक्षप्य दीक्षिते । संक्षेपेण सशीलादीन् गणी कुर्यात्प्रतिक्रमम् ॥ ।. लोचक्रिया लोचो द्वित्रिचतुर्मासैर्वरो मध्योऽधमः क्रमात् । लघु प्राग्भक्तिः कार्यः सोपवास प्रतिक्रमः ॥ अथ लोच प्रतिष्ठापनक्रियायां..... सिद्धभक्तिकायोत्सर्गकरोमि- ('तवसिद्धे' इत्यादि) अथ लोच प्रतिष्ठापनक्रियायो ..... योगिभक्तिकायोत्सर्ग करोमि अनन्तरं स्वहस्तेन पाहस्तेनापि वा लोचः कार्यः । अथ लोच-निष्ठापनक्रियाया..."सिद्धभक्तिकायोत्सर्ग करोमि ('तव- सिद्धे' इत्यादि) अनन्तरं प्रतिक्रमणं कर्तव्यम् । वृहद्दीक्षाविधिः पूर्वदिने भोजनसपये भाजनतिरस्कारविधि विधाय आहारं गृहीत्वा चैत्यालये आगच्छेत् । ततो वृहत्प्रत्याख्यानप्रतिष्ठापने सिद्धयोगभक्ति पठित्वा गुरुपाचे प्रत्याख्यान सोपवासं गृहीत्वा आचार्य-शांति समाधि- भक्तीः पठित्वा गेरोः प्रणाम कुर्यात् । अथ दीक्षादाने दीक्षादातृजनाशांतिक-गणधरवलयपूजादिकं यथा- शक्ति कारयेत् । अथ दाता तं स्नानादिकं कारयिन्वा यथायोग्यालङ्कार- युक्तं महामहोत्सवेन चैत्यालये समानयेत् । स देवशास्त्र-गुरूपूजां विधाय वैराग्यभावनापरः सवैः सह क्षयां कृत्वा गुरोरनिष्ठत् । ततो गुरोरग्रे संवस्याग्रे दीक्षायै च यांचां कृत्वा तदाज्ञया सौभाग्य- बती-स्त्री-विहितस्वस्तिकोपरि श्वेतवस्त्र प्रच्छाद्य तत्र पूर्वदिशामिमुखः पर्यकासनं कृत्वा आसते गुरुश्चोत्तराचिमुखो भृत्या संघाष्टकं संघ च परि- पृच्छय लोचं कुर्यात् । [३२२] अथ तद्विधिः- वृहद्दीक्षायां लोचस्वीकारक्रियाया पूर्वाचार्येत्यादिकमुच्चार्य सिद्ध-योगि- भक्ति कृत्वा- ॐनमोऽहते भगवते प्रक्षीणाशेषकल्मपाय दिव्यतेजोमूर्तये श्रीशांति- नाथाय शांतिकराय सर्वविघ्नप्रणाशनाय सर्वरोगापमृत्युविनाशनाय सर्व- परकृतक्षुद्रोपद्रवविनाशनाय सर्वक्षामडामरविनाशाय ओ हां ही हु हौं हः असि आ उसा अमुकस्य सर्व शांतिं कुरु कुरु स्वाहा । इत्यनेन मंत्रेण गन्धोदकादिक त्रिवार मंत्रयित्वा शिरसि निक्षिपेत् । शांतिमंत्रेण गधोदक त्रिः परिपिंच्य पस्तकं वामहस्तेन स्पृशेत् । ततो दध्यक्षतगोमयर्वा कुरान् मस्तके वर्धमानमत्रेण निक्षिपेत्- ॐ नमो भयवदोवड्ढमाणस्स रिसहस्स चक्कं जलंतं गच्छइ आयासं पायाल लोयाणं भूयाण जये वा विवादे वा थंभणे वा रणगणे वा राय- गणे वा मोहण वा सव्वजीवसन्ताणं अपराजिदो भवदु भवदे रक्ख रक्ख स्वाहा वर्धमान मंत्रः। ततः पवित्रभसपात्र गृहीत्वा "ओं णमोअरहताणं रत्नत्रयपविमिकृ- चोत्तमांगाय ज्योतिर्मयायमतिश्रुतावधिमनः पर्ययकेवलज्ञानाय असि आउसा स्वाहा" इदं मत्र पठित्वा शिरसिकपूर मिश्रितं भस परिक्षिप्य "ओं हीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह असि आ उसास्वाहा अनेन प्रथमं केशोत्पाटन कृत्वा पश्चात् "ओं हां अर्हद्भ्यो नमः, ओं ही सिद्धेभ्यो नमः, ओं हं. सरिभ्यो नमः, ओं हौ पाठकेभ्यो नमः, ओं दः सर्वसाधुभ्यो नमः" इत्युच्चरन् गुरुः स्वहस्तेन पंचवारान् केशान उत्पाटयेत् । पश्चादन्यः कोऽपि लोचावसाने बृहद्दी- क्षायां लोचनिष्ठापनक्रियाया पूर्वाचार्येत्यादिक पठित्वा सिद्धभक्ति (किंत) कर्तव्या ( कुर्यात् । ततः शीर्ष प्रक्षाल्य गुरुभक्ति कृत्वा वस्त्राभरणयज्ञो- पवीतादिकं परित्यज्य तत्रैवावस्थाप्य दीक्षा याचयेत् । ततो गुरुः शिरसि श्रीकारं लिखित्वा "ओं ही अहं असि आ उ सा ही स्वाहा" अनेन १०८ मंत्रेण जाप्यं दद्यात । ततो गुरुस्तस्याजलौ केशरकरिश्रीखंडेन श्रीकरं कुर्यात् । [३२३] श्रीकारस्य चतुर्दितु- स्यणत्तयं च वंदे चउवीसजिणं तहा वंदे। पचगुरूणं वंदे चारणजुगलं तहा वंदे ।। इति पठन् अंकान् लिखेत् । पूर्वे ३ दक्षिणे २४ पश्चिमे ५ उत्तरे २ इति लिखित्वा "सम्यगदर्शनाय नमः सम्यक्चारि- त्राय नमः" इनि पठन् तन्दुलैरञ्जलिं पूर्यत्तदुपरि नालिकेरं पूगीफल च धृत्वा सिद्धचारित्रयोगिभक्ति पठित्वा ब्रतादिकं दद्यात् । तथा हि-- बदसमिदियरोधो लोचो, आवासयमचेलमएहाणं । खिदिसयणमदतवणं ठिदिभोयणमेयमचं च ॥२॥ इति पठित्वा तद्व्याख्या विधेया कालानुसारेणेति निरूप्य पचमहा- व्रत-पंचसमित्यादि पठित्वा सम्यक्त्वपूर्वक दृढव्रत सुव्रतं समारूढ ते भवतु इति त्रीनवारान् उच्चार्य व्रतानि दत्वा तथा शांतिभक्तिं पठेत् । ततः आशोः श्लोक पठित्वा अंजलिस्थं तन्दुलादिक दात्रे दापयित्वा अथ पोड- शसंस्कारारोपणं-- अर्थ सम्यग्दर्शनसंस्कार इह मुनौ स्फुरतु ॥१॥ अयं सम्यग्ज्ञानसंस्कार इह मुनौ स्फुरतु ॥२॥ अय सम्यक्चारित्रसंस्कार इह मुनौ स्फुरतु ।।३।। अय वाह्याभ्यतरतपःसंस्कार इह मुनौ स्फुरतु ॥४॥ अयं चतुरगवीर्यसंस्कार इह मुनौ स्फुरतु ॥ ५ ॥ अयं अष्टमातृमंडलसंस्कार इह मुनौ स्फुरतु ।।६।। अयं शुद्ध्यष्टकावटमसंस्कार इह मुनो स्फुरतु ।। ७॥ अयं अशोपपरीपहजयसंस्कार इह सुनौ स्फुरतु ॥८॥ अयं त्रियोगसंगमनिवृतिशीलतासंस्कार इह मुनौ स्फुरतु ॥९॥ अयं त्रिकरणसंपमनिवृतिशीलतासंस्कार इह मुनो स्फुरतु ।। १० ।। अयं दशासंयमनिवृतिशीलतासंस्कार इह मुनौ स्फुरतु ॥११॥ अयं चतुःसंज्ञानिग्रहशीलतासंस्कार इह मुनौ स्फुरतु ॥ १२ ॥ [३२] अयं पंचेंद्रियजयशीलतासंस्कार इह मुनौ स्फुरतु ॥ १३ ॥ अयं दशधर्मधारणशीलतासंस्कार इह मुनौ स्फुरतु ॥ १४ ॥ अयं मष्टादशसहस्रशीलतासंस्कार इह मुनौ स्फुरतु ॥ १५ ॥ अयं चतुरशीतिलक्षणसंस्कार इह मुनौ स्फुरतु ॥ १६ ॥ इति प्रत्येकमुच्चार्य शिरसि लवंगपुष्पाणि क्षिपेत णमो अरहताण' इत्यादि ओ परमहंसाय परिमेष्ठिने हंस हस हं हा हं हो ही है हः जिनाय नमः जिन स्थाययामि संवौषट् ऋपिमस्तके न्यसेत् अथ गुर्वावली पठित्वा अमुकस्य अमुकनामा त्वं शिष्य इति कथयित्वा संयमाधुपकरणानि दद्यात् । णमो अरहंताणं भो अन्तेवासिन्! पड्नीवनिकायरक्षणाय मार्दनादि- गुणोपेतमिद पिच्छिकोंपकरणं गृहाण गृहाणेति । ओं णमो अरहताणं मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलज्ञानाय द्वादशांग- श्रुताय नमः भो अन्तेवासिन् । इदं ज्ञानोपकरणं गृहाण गृहाणेति । कमंडलु वामहस्तेन उद्धृत्य ओं णमो अरहताणं रत्नत्रयपवित्रकर- णाय बाह्याभ्यंतरमलशुद्धाय नमः भो अन्तेवासिन् ! इद शौचोपकरणं गृहाण गृहाणेति। तत्पश्चात् समाधि-भक्तिं पठेत् । ततो नवदीक्षितो मुनिर्भक्त्या गुरुं प्रणम्य अन्यान् मुनीन् प्रणम्योपविशतियावद् व्रतारोपणं न भवति ताव- दन्ये मुनयः प्रतिवन्दना न ददति ततों दातृप्रमुखा जना उत्तमफलानि अग्रे निघाय तस नमोऽस्त्वति प्रणाम कुर्वति । ततस्तत्पक्षे द्वितीयपक्षे वा सुमुहूर्ते व्रतारोपणं कुर्यात् । तदा रत्न- त्रयपूजां विधाय पाक्षिकप्रतिक्रमणपाठः पठनीयः तत्र पाक्षिकनियमग्रह- णसमयाव पूर्व यदा बदसमदीत्यादि पठ्यते तदा पूर्वव्रतव्रतादि दद्यात् । नियमग्रहण समय यथायोग्यं एकं तपो दद्यात् (पल्यविधानादिकम्) दात- प्रभृतिश्रावकेभ्योऽपि एक एक तपो दद्यात् ततोऽन्ये मुनयः प्रतिवन्दना ददति । अथ मुखशुद्धि मुक्तकरणे विधि:-- त्रयो दशसु पंचसु त्रिषु वा कच्चोलिकाशु लवंगएलापूगोफलादिकं [३२५] निक्षिप्य ता:कच्चोलिकाःगुरोरग्रे स्थापयेत् 'मुखशुद्धिमुक्तकरणपाठक्रिया. यामित्यायुच्चार्य सिद्ध योगी आचार्य शांति-समाधि भक्तिविधाय ततः पश्चान्मुखशुद्धिं गृहीयात् । इति महाव्रतदीक्षा विधिः तुल्लक दीक्षा विधिः अथ लघुदीक्षायां सिद्ध-योगी-शांति-समाधिभक्तीः पठेत् । “ओं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अहं नमः" अनेन मत्रेण जाप्यं वार २१ अथवा १०८ दीयते । भन्यच्च विस्तारेण लघुदीक्षाविधि: अथ लघुदीक्षानेतृजनः पुरुषः स्त्री वा दाता संस्थापयति । यथा- योग्यमलंकृतं कृत्वा चैत्यालये समानयेत, देव वंदित्वा सवै सह क्षां कृत्वा गुरोरने च दीक्षा याचयित्वा तदाज्ञया सौभाग्यवतीस्त्री विहितस्व- स्तिकोपरि श्वेतवस्त्रं प्रच्छाद्य तत्र पूर्वाभिमुखः पर्यांकासनो गुरुश्चोत्तरा- मिमुखः संघाष्टं संघ पृच्छय च परिपृच्छय लोचं....."ओं नमोऽहते भगवते प्रक्षीणाशेषकल्मषाय दिव्यतेजोमूर्तये शांतिनाथाय शांतिकराय सर्वविघ्नप्रणाशकाय सर्वरोगापमृत्युविनाशनाय ओं हां ह्रीं ह, हौं हः अ . सि आ उ सा अमुकस्य सर्वशांति कुरु कुरु स्वाहा, अनेन मंत्रेण गंधोद- कादिकं त्रिवारं शिरसि निक्षिपेत् । शांतिमंत्रणं गधोदकं पारंत्रि परिषिच्य वामहस्तेन स्पृशेत् । ततो दध्यक्षतगोमयतद्भस दुर्वांकुरान् मस्तके वर्धा- पनमंत्रेण निक्षिपेत् “ओं णमो भयवदो वड्ढयमाणस्सेत्यादि वर्धापनमत्र: पूर्व कथितः । लोचादिविधि महाव्रतविधाय सिद्धभक्ति योगभक्ति पठित्वावतं दद्यात् । दसणवयेत्यादि वारत्रयं पठित्वा व्याख्यायां विधाय च गुर्वावली पठेत् । ततः संयमाधुपकरणं दद्यात् ।ओं णमो अरहंताणं भो क्षुल्लक ! (आये- ऐलक) क्षुल्लके वा पट्जीवनिकायरक्षणाय मार्दवादिगुणोपेमिदं पिच्छो- [३२६] पकरणं गृहाण गृहाण इत्यादि पूर्ववत्कमडण्लु ज्ञानोपकरणादिक च मत्र पठित्वा दद्यात् । -- इति लघुदीक्षा विधान समाप्तम् अथोपाध्यायदीक्षादानविधिः शुभ मूहूर्ते दाता गणधरवलयार्चनं च कारयेत् । ततः श्रीखंडादिना छटान दत्वा तन्दुलैः स्वस्तिकं कृत्वा तदुपरि पट्टकं संस्थाप्य तत्र पूर्वा- भिमुख तमुपाध्यायपदयोग्यं मुनिमामयेत् अथोपाध्यायपदस्थापनक्रियायां पूर्वाचार्येत्यायुच्चाय सिद्ध श्रुतभक्तिं पठेत् । तत आहानादिमत्रानुच्चार्य शिरसि लवग पुष्पाक्षतं क्षिपेत् तद्यथा-ओं हौं णमो उवज्झायाणं उपाध्या- यपरमेष्ठिन् ! अत्र एहि एहि संचौपट आह्वानन स्थापन समिधिकरणं । ततश्च "ओं ह्रौं णमो उवज्झायाण उपाध्यायपरमेष्टिने नमः" इमं मत्रं सहेंदुना चन्दनेन शिरसि न्यसेत । ततश्च शान्तिसमाधिभक्तीः पठत् । ततः स उपाध्यायो गुरुभक्ति दत्वा प्रणम्य दात्र आशिष दद्यादिति । इत्युपाध्यायपदस्थान विधि: - अथाचार्यपदास्थापनविधिः सुमुहूर्ते दाता शांतिकं गणधरवलयार्चनं च यथाशक्ति कारयेत् । ततः श्रीखंडादिना छटादिकं कृत्वा आचार्यपदयोग्यं मुनिमासयेत् । आचा- र्यपदप्रतिष्ठापनक्रियायां इत्यायुच्चार्य सिद्धाचार्यभक्ति पठेत् । "ओ हूं, परमसुरामिद्रव्यसन्दर्भपरिमलगर्भतीर्थाम्बुसम्पूर्णसुवर्णकलशपचकतो- येन परिषेचयामीति स्वाहा' इति पठित्वा कलशपचकतोयेन पादौपरि- सेचयेत् । ततः पंडिताचार्यों "निर्वेद सौष्ठीइत्यादि महर्षिस्तवन पठनपादौ समंतात्परामृश्य गुखारोपण कुर्यात् । ततःओं हूं णमो आइरियाणं आचा- र्यपरमेष्ठिन् ! अत्र एहि एहि संवौपट आह्वानं स्थापन सन्निधिकरणं । ततश्च “ओं ह णमो आइरियाणं धर्माचार्याधिपतये नमः" अनेन मंत्रण [३२७] सहेन्दुना चन्दनेन पादयोद्धयोस्तिलक दद्यात । ततः शान्तिसमाधिमक्ति कृत्वा गुरुभक्त्या गुरंप्रणम्योपविशति । तत उपासकास्तस्य पादयोरष्ठत- मिमिष्ठि कुर्वति । यतयश्चै गुरुभक्ति दत्वा प्रणमंति । स उपाककेन्य आशीर्वाद दद्यात् । इत्याचार्यपददानविधिः ओं हां हीं श्रीं अहं हंसः आचार्यायनमः आचार्यवचनमंत्रः अन्यच्च- ओं ह्रीं श्रीं अहं हं सः आचार्याय नमः आचार्यमंत्रः। मुनि एक स्थान पर कितने दिन रह सकते हैं? मासं चासोऽन्यदकत्र योगक्षेत्रं शुचौ ब्रजेत् | मार्गेऽतीते त्यजेच्चार्थवशादपि न लंघयेत् ।। अर्थ-चातुर्मासके सिवाय हेमन्तादि ऋतुओं में मुनिगण एक नगरादि स्थानमें एक महीने तक ठहर सकता है। आषाढके महीने में वह श्रवणसम वर्षायोग स्थानको चला जाय और कार्तिकका महीना बीतते ही उस वर्षायोग स्थानको छोड़दे। -क्रियाकलापे पृ० ३२६ लसमाप्त

No text on this page.

Dashbhktyadi Sangrah (sanvyarth)

Author
Goyaliya, Siddhasen Jain
Title
Dashbhktyadi Sangrah (sanvyarth)
File name
Dashbhktyadi Sangrah (sanvyarth)
Text
OCR done
Published
2009/11
Publisher
Gujarat, Akhil Vishva Jai Nmishan
Language
Sanskrit
Pages
338
Library
Sanmati Library
Classification
Dashbhktyadi sangrah
DLI number
344382
Barcode
99999990234247.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
nL0lFtUsKMJ
Download PDF

Dashbhktyadi Sangrah (sanvyarth)