Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Jaati Vayvastha
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जाति व्यवस्था
Tar
राजकमल प्रकाशन
पटना
जाति
व्यबस्था
नर्मदेश्वर
प्रसाद
प्रोफेसर एव अध्यक्ष, समाजशास्त्र विभाग
पटना बिमतिमा
प्रकाग
राजवमल प्रकाशन प्रा. लि., दिल्ली ६
©हॉ० नमदेश्वर प्रसाद
मूल्य ६०.५०
प्रपम सस्करण १९६५
एवरेस्ट प्रेग ४ चमेलियान रोड
दिल्ली
पितामह
धनेश्वर प्रसाद
को पुण्य स्मृति मे
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प्राक्कथन भारतीय जाति-व्यवस्था पर लिखना आसान नहीं रहा है और इसके समस्त पक्षा का विवेचन तो लगभग असम्भव है। मुझे नहीं पता कि मैंने इस विषय पर उपलब्ध विशाल साहित्य में कुछ भी नया जोडा है । मैं मिप इतना कह सकता हूं कि मैंने जाति व्यवस्था के सदभ म सामाजिक इतिहास की अतधाराणा का विश्लपण करन का प्रयास किया है। जानक मगे जानकारी है, जाति-सम्बधी अनुस पान को प्रवत्तियो पर पिठन पिचहत्तर या सौ वर्षों म, शायद ही कोई गोघ-काय दृया है। प्रारम्भिक समाज वनानिक अधिकाशन जाति व्यवस्था के कारण, उत्पत्ति पार विवास का पता लगान म व्यस्त रह । अाज की भाषा म उनके प्रयास को 'ऐतिहासिक दृष्टि' की सना दी जाती है । उनकी व्याख्याएँ और निप्वप मुख्यत एतिहामिक स्रोता या प्रमाणा स लिये गए छिटपुट नमूना पर पागारित रह हैं जिनम किमी प्रकार का अन सम्बध या तारतम्य नहीं होना था। इतिहास के परिप्रेश्य की भी पदाचित उपना की जाती रही है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि उनकी उपलधिया नगण्य है । वस्तुत जातिगास्त्र को उसकी देन उच्च काटि की थी। जाति-सम्पपी अध्ययन की नवीनतम प्रवृत्ति जातिया म सम्बघा तनावा भौर सामजस्या---एक ग म मामाजिव प्रावगिवी को पार है। यह पद्धति अभी अपनी प्रविक्मित अदम्या म है। जातिगत तनावा की गहराई एव अन्य मायामा पर प्रकाश डालने वाली काई भी अध्ययन सामग्री अभी तक मेरे दावन म नहा याइ । मरे खपाल में अनुसंधान की पद्धति और उमर उपकरणा पर गम्भीरता से साचने को अत्यधिक आवश्यकता है। एक मामाजिक व्यवस्था के रूप म जाति के समुचित विश्लेषण के लिए प्राचीन और नवीन दाना पद्धतिया के सोधित पोका समन्वय आवश्यर है ताकि हमे दोना पा सतुलन उपलब्ध हो सके। पान जाति केवल एकेडेमिर' अनुमपान वा विपप नहीं है। यह प्रशासका, रामनोनिमा और जन-सामाय के लिए एक ममस्या बन गई है । चाह वह विभी राजनीनिर पार्टी वा कार्यालय हो, या विमी विश्वविद्यालय का प्रागण अथवा सामुदायिक योजना का प्राम, देर सबेर जाति या जातिवाद पर अन्नद्दीन 1 वहम चल पहती है। इससे काई नतीजा नहीं निकलता । अत म निहाय निरुपायना ही हाथ लगती है। विनोबा भावे ने एक बार कहा था कि जानिया जनता की जीवनी शक्ति का भय कर रहा है। १६५७ के माम चुनाव टिप्पणी करते हुए जयप्रकार नारायण ने कहा था वि जाति ही एक पार्टी में विचारधारा है जिसन यह चुनाव लड़ा । किसी राजनीतिक विचारधारा ! पार्षिक कायक्रम का सम्व प इन चुनावों से नहीं था। इसलिए जाति के वर प्रौर क्से का और अधिर पुनमूल्याक्न आवश्यक है। मत म में अपने उन सभी मित्रा सह्योगिया और छात्रा के प्रति कृतज्ञा पापित परना चाहता हूँ जिहाने इस पुस्तक म सच्ची दिलचस्पी जी कोलम्बिया विश्वविद्यालय प्रोफेसर मार० एम० मकाइवर के साप १६४८४ म चिताय गए उन मुसद दिना की याद अभी भी ताजा है जब उनके सा जाति-व्यवस्था की आधारभूत समस्यामा पर विचार विनिमय करत का प्रवस प्राप्त हुआ था । रालम्बिया विश्वविद्यालय में ही प्रोफसर यनहाड जम्ट मोर मरियन हम्ल्यू० स्मिथ के विचारा स भी कामी लाम हुमा है । मैं द मभी विद्वाना के प्रति आभारी हूँ। समाजशास्त्र विभाग, -नर्मदेश्वर प्रसा परना विश्वविद्यालय पटना
विषय-सूची
२
प्राक्कपन
प्रामुख--१
जाति-व्यवस्था का वतमान रूप
जाति-व्यवस्था का उदभव और विकाम
जाति व्यवस्था का इतिहास
हिंदूध और दान
सुधार प्रादोलन
म
भारतीय प्रय-व्यवस्था का विश्लेषण
जाति-व्यवस्था पर नागरीकरण और प्रौद्योगीकरण के प्रभाव
जातिमूलक स्थिर धारणाएँ
जातीय पूर्वाग्रह
जाति-व्यवस्था तथा अय धार्मिक समुदाय
उपसंहार
मदम
१५८
१८१
२०४
२२१
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अध्याय १ आमुख भारत के ५४१ प्रतिशत निवासी हिंदू हैं। हिन्दुओं का सामाजिक संघटन, अर्याद नाति-व्यवस्था, अपने ढग का एक ही है। इसकी एवं पाश्चय ननक प्राचीन परम्परा है, जिसके कारण इमवे मूलभून सिद्धान्त अरमन पवित्र पौर अपरिवतनीय माने जाते हैं । पर इन गिद्धान्तों को माज ननत न पोर स्वत त्रता सम्बधी आधुनिक राजनीतिक मायनाएं गहरी चुनौती दे रही हैं मौर किसी मदर, भारतीय जीवन म प्रवेश भी कर रही हैं। फिर भी यह सोचने की बात है कि भारत के समस्त सामाजिक जीवन पर हिन्दुओं की जाति- व्यवस्था का गहरा असर है । यहाँ सयुक्त परिवार की प्रणाली है, बाल विवाह की प्रथा है, छूत अटून का सवाल है, मौर समाज वृद लोगों को इतना होन बनाकर रखा गया है कि उनको देखना भी पाप समझा जाता है उनसरी छाया से भी परहेज किया जाता है। ऐसी परिस्थिति में मना जनतत्र और स्वाधीनता की भावनाएँ विस प्रकार पनप सकती है ? जनन । महज एक राजनीतिक नारा नहा, इस सामाजिक दान भी बनना है । भारत के नए सविधान म लिखा है (१) "हम भारत के लोग, भारत को एर सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन सोक्त त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तपा उसे समस्त नागरिका, सामाजिक, माथि मोर राजनीतिक पाय, विवार भभिव्यक्ति, विश्वास, घम और उपासना का स्वत ना, प्रतिष्ठा और अवसर को समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सचम व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र एषता मुनिश्चित करनवाली बजुता बढान के लिए हड़-सकल्प होर अपनी इस सविधान-सभा म मान इस सविधान वा भगीकृत अधिनियमित मोर पारमार्पित करते हैं।' (२) "राग्य रिसी नागरिक के विरुद्ध वेवल पम, मूलवण, जाति, लिंग, सम-स्थान मपवा इनमें से किसी के मापार पर कोई विभेद नहीं करेगा।" (३) 'वन पम, मूनवा, नाति निंग नम-स्थान भयवा इनमे से किसी के भापार पर कोई नागरिक-(4) नानों सावननिक भोजनालयों, 1 २ जातियवस्था . होटला तया सावजनिस मनोरान के स्थाना में प्रवेश के अयवा (ख) पूण या पातिक रूप म राज्य निधि स पोपित अथवा साधारण जनता के उपयोग के लिए समर्पित कुया तालावा, स्नान घाटा, सडको तथा सावजनिक समागम स्थाना + उपयोग के बारे में किसी भी निर्योग्यता, दायित्व, निवघा अथवा शत मधीन होगा। (४) राज्याधीन नौकरिया या पदो पर नियुक्ति के मम्बध मे सब नागरिकाब लिए अवसर की समता होगी। (५) 'अस्पृश्यता का प्रत किया जाता है और उसका किसी भी रूप में प्रावरण निषिद्ध किया जाता है । अस्पृश्यता स उपजी पिसी निर्योग्यता को सागू करना अपराध होगा जो विधि ये अनुसार दपनाय होगा।' घर ममस्या है कि क्या जाति-व्यवस्था और जनतत्र का सयोग हो राफ्ता है ? क्या प्रजातात्रिय राज्य और जाति याधारित समाज का सह मस्तित्व सम्भव है ' प्रजातत्र या तात्पय है कि राज्य सम्पूण समुदाय यी सपन्ति प्रक्नि वा वास्तविक प्रथम, न विश्वल प्रतीक म्पम प्रतिनिधित्व फर । इस गामन प्रणाली का चरम लश्य व्यष्टि होता है और इसकी बुनियादी Tत होती है रायके लिए समान अधिकार समान सुविधा पौर समान मवसर । इसम प्रत्यय व्यक्ति को प्रात्म विकास मा उचित अवसर मिलना चाहिए अथवा, जसा नि एरिस फोम ने कहा है प्रत्यय व्यक्ति का निर्माणशील बनो पा स्याधानता हानी पाहिए। या ता जनताविक माश और व्यवहार में विषमता ही माती है परतु जब हम जनतत्र और नाति-व्यवस्था पर विचार परत है तब हमारे ममम मूलत परस्पर विरोधी दो सस्याएँ पोर दो प्रकार पमा हात हैं । दा. भीमराव अम्बडकर ने लिखा है हिदुप्रो की समाज व्ययम्या वा ताजिए और सामाजिक उपयोगिता और सामाजिक न्याय की प्टि राइसवी परीक्षा पाजिए । माप दयगति यह एसा घम है जिसका उदय रयाधीनता समता और भाईचार यी स्थापना वरना नही । यह धम प्राणाया पनि मानव मानना है और हिन्दू-गमान ५ माय लागो को उनकी पूजा करा पा उपादता है। 5 जनात्र का जाति अवस्या स यही मौलिक दिराप है । दलिए हम मममन है कि भारतीय गविषाा यो उपयुपर धाराएँ महा सामाजिक परिवान की सूचय है। स्वतपमा प्राप्त कराया" स माराम प्रोद्योगावरण की बडो-वडी पारस शाविन ररने का प्रयाहा रहा है। हम चाहते हैं कि भारत पानिर तिमान राष्ट्र का, और इतालिए माधुनिक विकास तथा मोद्योगी प्रामुम्ब ३ करण के ये सब आयोजन है। अब जो प्रश्न उठने वाला है या एक तरह से उठ भी चुका है, वह यह कि सन्तुलन से प्राप्त किया जाए । विनान और शिल्प के क्षेत्र म भारत तीव्र गति में बह रहा है, परन्तु तिन सामाजिक सस्थामा के माध्यम से प्राधुनिक यात्रिय सुविधामा का उपयाग और नियंत्रण होगा, वे सर शतादिया पुरानी हो गई हैं । ऐस ही प्रसग म अमरीकी सस्कृति का विश्लेषण करते हुए श्री धान्म न बडे मा वी यात नहीं है पुरातन सस्कृति का पतन इसलिए हुअा कि यूनानी और रोमन समाज व भादों और उनका सस्याग्रा का अथान् उनवे पादशवादी दरान और साम्राज्यवादी राजनीति का इतना अधिक विकास हुआ कि वे अपने जमान के सीमित शिल्प विज्ञान को, विशेषत उस समय को परिवहन व्यवस्था को, पीछे छोडरर बह गए । रीव इसके विपरीत, प्राज की मशीन हमारे सामाजिक चितन और सामाजिक सस्थाप्रा से बहुत प्राग यह गर है जिसके कारण हमारी सस्कृति दुरी तरह सरदापन हा रही।यहा द्विधा यूनाधिक मात्रा में भारत के सामन मोह। दूसरी मुस्य बात है कि क्या व्यक्ति के अधिकारो का सरत्रण कानून के जरिए सम्भव है ? क्या सविधान की सभी धाराएँ, सिद्धान्त और व्यवहार दाना स म समाज द्वारा प्रगीकृत हा सकेगी। अनुभव बताता है कि व्यक्ति के अधिकारो वा सरक्षण कानून के द्वारा नहीं, सामाजिक विवेक द्वारा होता है । क्यादि व्यक्ति का ता कानून दण्डित कर सकता है, परल, पूरी समष्टि का मला विम प्रकार दण्ड दिया जा सरता है ''प्रयेक वस्तु ब्रह्म है-यह हिदू-दान बदल बौद्धिक निधारणा है, यह कभी सामाजिक दशन नहीं बन सका। हितू दारानिका एक हाथ म उनका ददान रहा है पोर दूसर मे मनु और दाहिने हाथ को कभी यह न पता चला कि वाऐं में क्या है।" तात्पय यह है कि क्यल कानून बना देन म हा काम नहीं चलता देखा गया है कि वसे यानून कभी अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर पाते । उदाहरण के लिए, मदालती शादी बानून (द सिविल मगज एक्ट), जाति भयोग्यता उमूलन ब्रानून (दरिमूवल मॉफ कारट डिस एरिलिटीज एक्ट), विधवा- विवाह रानून (दविही रिमेरेज एक्ट १८५६), हिंदू धार्मिक दान प्रानून (६ हिदू रिलीजियस एण्डासमट एक्ट), गारदा कानून (द गारदा एक्ट) याल विवाह नियत्रण सम्बपी वानून (८ चाइल्ड मेरेज एक्ट, १९२६) और भनेर मानून बन, परतु उनसे कोई टोम सामाजिक परिवतन नहीं हो सका। फिर भी इन कानूना का इतना महत्व भवत्य है कि इन द्वारा जाति-व्यवस्था क जातिव्यवस्था मूममूत सिद्धातों को पनौती मिली है मौर उन पर मायात भी पहुंचा है।' (सन १९२० ई. मे अखिल भारतीय सामाजिक सम्मेलन में निम्नलिखित प्रस्ताय पास हुमा) इस सम्मेसन या दृढ विचार है कि जाति-व्यवस्था राष्ट्रीय एकता की सबसे बडी वाघा है । जव तक इस व्यवस्था का मृलोच्छेद नहीं होता तब तक हम राष्ट्रीय एकता प्राप्त नहीं कर सकते । अत यह सम्मेलन बुद्धिजीवियो तथा जन-साधारण को जाति यवस्था वे अनाचारो के प्रति जागस्य बनाकर इस व्यवस्था के उमूलन के लिए देश भर म भादोलन पनाने का निश्चय करता है।' १२ गन् १९३१ १० म जस्टिस पार्टी के नेता ने कहा, भारतीय राष्ट्रीयता का स्वप्न जाति-पाति के समाप्त हाने पर ही पूणत साकार हो सकेगा।" ये सब उक्तियों तथा भारतीय सविधान की रूपय बन पाराएँ सामाजिक परिवतन के लक्षण हैं। पर इन सबके बावजूद अभीष्ट सामाजिक परिवतन पयो नही होते ? यह इसलिए कि समाज की पौराणिर धार्मिक धारणाएं इस माग म बाधा हानती हैं । इन पारणामों म हमारी प्रगणित पीढिया या युक्तिपोपण सचित है और इनम पतनिहित माघिनदिक विश्वासा मे कारण सामाजिव परिवतन का माम मरद हो जाता है । इसी सामाजिव इंद्रजाल से जाति-व्यवस्था को धमित मिनती है । मन जय तक लोगों पी जाति-सम्बधी चिरपोपित माया मग नहीं होगी तप तक नाति-व्यवस्था भी कायम रहेगी।
अध्याय २ जाति-व्यवस्था का वर्तमान रूप जाति क्या है ? इसकी वतमान स्थिति क्सो है ? ये दो प्रश्न हैं जिनका उत्तर हमे ढढना चाहिए। हिन्दुओ को जटिल तथा विचित्र जाति-व्यवस्था की परिभाषा और व्याख्या के प्रसग मे विद्वाना ने इस विषय पर बहुत-कुछ लिखा है । जव व्यक्ति का सामाजिक दर्जा पूर्व निश्चिन रहता है, जिसमें कि सब लोग अपना अपना भाग्य लेकर जम लेते है और उसमे किसी प्रकार के परिवतन की पाशा नहीं की जा सकता है, तभी वग जाति का चरम रूप धारण करता है और जाति बन जाने के बाद वग की गतिशीलता सवथा अवरुद्ध हो जाती है । सिद्धान्तत जाति यवस्या के प्रतगत सम्पूण समुदाम बई परतो मे सक्या स्थायी तथा अटल रूप से बँट जाता है। हज ने जाति की परिभाषा देते हुए इस ऐमा सामाजिक वग बनाया है जिसको सदस्यता (क) म से ही निश्चित हो जाती है और (स) उमके साथ ही विशेष प्रकार के रूढिगत प्रतिवध मोर सुविधाएँ अनुलग्न रहती हैं। इस वग के प्रति समाज के अन्य सदस्यो का एक विरोप दृष्टिकोण रहता है । अत प्रत्येक व्यक्ति की सामाजिक सत्ता उसकी जाति के वारण तरह-तरह के जमजात प्रतिव यो तथा सहूलियता से निर्धारित होती है । हिन्दुप्रा के सामाजिक श्रेणी विभाजन को व्यक्त करने के लिए यूरोप- धासियो में सवस पहले पुतगालिया ने 'काष्टा' (वाप्ट) शब्द का प्रयोग किया, जिसका अर्थ होता है नस्ल, गोत्र या प्रकार भेद । सेनाट का कहना कि जाति एक प्रकार का सकुचित निगम है जिसम दूसरा के लिए स्थान नहीं है और बम-से-मम सिद्धान्तत , यह निगम कठोर रूप से पित्रागति पर आधारित है। इसका अपना स्वतत्र, परम्परागत सघटन रहना है जिसमें एक मुसिया होता है और एक पचायत । अवमर पाने पर समस्त जाति को एक सभा बैठती है। वह सभा जाति पे सम्पूर्ण अधिकार से समवित रहती है। कोई विरोप त्योहार मनाने म भी जाति के सभी लोग समवेत स्प से उनम भाग लेते हैं। जावि के सदस्या की एषतामा मापार होता है उनकी भाजीविका, विवाह, भोजन तथा वद्यात-सम्बधी माचार विचार भौर सामाजिक प्रथामो पी एवरूपता ।
जाति-व्यवस्था जातीय सघटन ने अधिकारा पा क्षत्र वापी प्रास्त रहता है उन प्रधिकाराम यल पर ही जातीय संघटन अपने सदस्यो को अनुगासिन करता है भोर भपराधी सदस्य क लिए भवसरोपयुक्त दण्ड का विधान ररता है। यह दण्ड बहुधा स्थायी या मस्यायी सामाजिक बहिष्कार के रूप में दिया जाता है। वहिवार या भय वास्तव म इतना प्रबल होता है कि उसके माधार पर ही समुदाय को सपिटत सत्ता कायम रहती है।' सर एच० रिज़ल के अनुसार जाति का मतलब है-सवसामाय नाम वार परिवारा तया दलो का सरलन, जो अपने यो पिसी सिप पौराणिक देव या मानव भी सन्तान मानते हैं पोर जिनका पोई वागत पेशा होता है। मधिकारी विद्वानो मा मत है कि उस समुदाय म सम्मिलित परिवार या दल उस समुदाय भभिन पग होते हैं। सर ई० ए० गेट के अनुसार जाति ये दो मुख्य लक्षण है (१) जाति व सभी सदस्प एक ही मूल से अपना उद्भव मानते हैं, मौर (२) सव-ने-सब एक ही वागत माजीविया या वृत्ति ग्रहण परन म विश्वास रखते हैं। उनका विचार है वि जाति समसगर, सनाति-पाणिग्राही (एडोगेमस) सोगा के एप दल या दला से सरसन को जाति बना चाहिए । जाति वे सत्स्यो की एक परम्परागत यत्ति होती है, और वे अपने पो एक ही मूल से उद्भूत मानते हैं । साधारणा उह एक ही सजातीय समुदाय वा मग माना भी पाता है। रेतपर ये मतानुसार भी जाति एर सामाजिर समूह है जिसमें (१) नाति की सस्यता उही लोगा को प्राप्त होती है जिनके पूर्वज उस जाति के सदस्य थे, मर्यात् जाति म सदस्यो रे वापर ही उरा गाति के सदस्य माने जाते हैं, और (२) उस समूह म मविजय, अटल सामाजिर निपेष रहता है रिसदम्यगण अपनी जाति स बाहर विवाह-सम्यप न करें। इन पतों से अपहुए प्रत्येक समूह पा एप विप गम होता है। फिर वस पई छोटे-छोटे समूहो को मिसार एप यहा समूह बनता है और उसका भी एप सामाय माम होता है । पुन ऐो वड-वर समूह भी मपेगारत पोर यहे समूह में भग हाते है जिसरा भी एप प्रसग नाम रहता है। राप्रपार हम देरात है कि जाति का दो नियातीपत है (१) राजाति विवाह तथा (२) वागन (हरिहिटा) । तदनुगार पोई पुरुप अपनी ही जाति परी स्त्री से विवाह पर सरताजानिया की सजाति-पाणिग्राही उपजातिया होती है। ये उपानियां भी पद यहिणीय पाणिग्राही (एक्सागमस) समूहो पविभा रही है। हिंदू मानून र सरि नियम र मनुमार रमत-गम्बधियों मोप विवाह पग्ति है।पुर, रिमी भी पुरष या नारी माता पिता जातिव्यवस्था का वतमान रूप के भाइयो या वहना के वराज भी थापस म शादी ब्याह नही कर सकते । इस प्रकार पितृपक्ष से ६ पीढ़ियों तब तथा मातृपर से चार पीडिया तर के लोगो के बीच ववाहिर सम्बध वर्जित है। इसमें अलावा, अनुलोम विवाह (हाइपरसमी) को भी प्रथा है, जिसके अनुसार ऊँची मामाजिक स्थिति के लोग निम्नस्तरीय परिवार को कया तो ग्रहण करते हैं परन्तु अपनी कन्या का विवाह वैसे परिवार म नहीं करते। वर्जाितीय विवाह का प्रया भी अनेक रूपा म प्रचलित है । फिर गोत्र के नियम भी माने जाते हैं । सजाति पाणिग्राही समूह म किसी एक पूर्वज वे बाजा के समूह दो, जिसम बहिर्मातीय विवाह का प्रथा होती है, गोर कहा जाता है । गोना के नाम विभिन्न पुरातन पिया ये नाम पर रखे गए हैं। प्राय एक गोत्र वाले लोगो के बीच शादी-ब्याह नहा होता । यदा-कदा होता भी है तो उन कुल-कुटुम्बा से याद ही देकर, जिनके बीच विवाह सवथा वर्जित माना जाता है। किसी भी व्यक्ति को गति से जमना गोन प्राप्त नहीं होता, यह द्विज को ही उपनयन सस्कार के समय मिलता है। जाति-व्यवस्था के कारण खान-पान के अनेक प्रतिवध माने जाते हैं। इन प्रतिमा का सम्म व भादिम निपेया (टबू) स है । ऐसे सात निषेध बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं। मपा. (१) पक्ति निषेध... इस निषेध द्वारा निर्धारित है कि किन किन जाति के लागा पी पति म बैठकर भोजन करना चाहिए, भोर क्निको पात में मही। (२) पार निषेध-इस निपेघ द्वारा निर्धारित है कि पिन व्यक्तिया द्वारा पकामा हुमा भोजन ग्रहण किया जा सकता है और दिनके द्वारा पकाया हुभा नहीं। (३) भोजन निषेध-इस निषेध द्वारा निश्चित है दि भोजन करत समय किन सरकारी का पालन परना चाहिए। (४) जल निषेप~मर्थात् किसके हाय का पीना चाहिए पौर पिसके हाय या नहीं। (५) साद्य निषेध-इस निपेय के माधार पर विचार किया जाता है कि मनुष्य श्या साए मोर मया न साए। (६) हवा-पानी निपेय-प्रयात् विसका टुसा पानी पाना चाहिए और रिसरे साय ठपर पीना चाहिए। (७) पात्र निपेप~मर्थात् माने-पौन या भोजन पाने के लिए विस प्ररार का रतन व्यवहार म माना चाहिए।
जाति-व्यवस्था एक ही वहिर्जातीय-पाणिग्राही समूह व मत्स्य एवं माप वठार खा सकते हैं । विन्तु विभिन्न बहिर्जातीय-पाणिग्राही समूह के सस्य भी यदि उनके बीच शादी-ब्याह होता है तो एक पांत म बैठकर भोजन पर सकते हैं। सामायत भोजन भौर विवाह सम्बपी निपेय साय-साप चलते हैं । यनि विहीं दो गोगा म ववाहित सम्बध होना यन्द हो जाए और वे अपने ममूह के बाहर वियाह वरना छोड समूह के भीतर ही ववाहित सम्बध गुरू पर दें तो उन दोनो का साथ बैठकर भोजन करना भी वही जायगा।' पार निषेध ये तो पितन ही प्रभद हैं । सभा जाति के लोगा म पको (अर्थात् दूध या घी ये बन हुए) भोर पञ्च (पर्याद जल सिस) भोजन में मतर माना जाता है । पका भोजन नो साधारणतः गुद समभा जाता है पितु या भोजन कोई हिदू तभी ग्रहण करेगा जबपि उसे उसने किसी स्वजातीय अथवा विती ब्राह्मण न पराया हो। भोजन निषेप भी बुध कम दुर्गेध नहीं। इसके अनुसार किसी अपरिचित की धाया भी भोजन पर नहीं पडनी चाहिए और न भोजन व साय विसी मपवित्र वस्तु या सराग होना चाहिए। भोजन परले के पूर्व चमडा पागज सूती वस्त्र माति वस्तुमा या स्परा नहा परना चाहिए। गघा सूमर और कुत्ते मारिया भी साजित है। जल-राम्बपी निषध भी प्राम इसा प्रसार विभिन जातिया की राम्या क बारे म श्री ए.व० दत्त ने निसा है कि प्राप्त भावडा ये मनुसार छोटी-यही मभी जानियो की कुल सम्या तीन हजार ममपित है जिनम बुधर पी सस्या दशन हद पजन है तो बुधर को साया की।" परन्तु मून वण (जाति रग) यवल पार पाहप (२) क्षत्रिय (३) पाय भोर (४) पूद । प्रथम तान वर्गों को द्विजाति पानिज बहते हैं। मनु ये अनुगार मनेर जानिमा इन मूल वर्गों में सम्मिरण रो भोर तत्पश्चात् उन मिकिन गन्नाना मे पुनमियम अथवा भन्तमिश्रण रा निवनी हैं। इस प्रकार गे उत्पन जानिमा म है (१) मूदाभिषिक्त (बाह्मण-गविय) (२) माहिप्प (त्रिपन्चाय) (३) परण (दय) () मम्मट (ग्राह्या प) (५) निपा (माT) (६) उप (क्षत्रिय T) (७) मृत (अनि पाहा) () मोच (वय-विए) (६) वह (वय-ब्राह्मण) (१०) भयोग (य) (११) रात्री ( गायि) (१२) पाडाल (राह्मण) (१३) प्रवास (हप) (१४) भाभीर (प्राय मायल) (१५) PिrAI (मायण पयोग) (१६) पुराप (निपाद) (१७) पुशुट (निपार) ६ जाति-व्यवस्था का यतमान स्प १८) स्वपाक (खी उग्र), {१६) वन (वदेह अम्बष्ठ), (२०) सरिन (दास्य ययागव) (२१) मैत्रेयक (वैदेह अयोगव), (२२) भागव या दास (निषाद अयोगव), (२३) परवार (निपाद-वदेह), (२४), मैद (वैदेह निपाद), (२५) प्राध (वटेह-क्रवार), (२६) पाडु सोपाक (चाडाल बदह), (२७) अहिदिक (निपाद-वह), (२८) सोपाक (बाडाल पुस्कप), (२६) अतेवामिन् (चाडाल निषाद)। जातिया की प्राधुनिक विस्तन तालिका के लिए जे० एप० हटन लिखित 'कास्ट इन इंडिया (भारत को जातिया) नामक पुस्तक दसनी चाहिए । उहोंने ६०० जातिया और बहिष्कृत जातियो की सूची दी है। परन्तु यह सूची भी नितात सर्वागीण ही है। प्रस्तु, जाति एक प्रकार को सामाजिक साई है। प्रत्येर जाति को अपना विरोप भादरा और नैतिक विधान रखने की प्राजादी है। प्रयेक नाति को भधिकार है कि वह अपन रिसी सदस्य का बहिबार र द, और पुन उसे अपने में शामिल कर ले । एम काम के लिए जाति की पचायत या विरादरी ही “यायपीठ है । परन्तु सभी जातियो के धर्माधिकारी ब्राह्मण है। अधिकारत ब्राह्मण सष्टि में सवप्रमुख है। अन्य सभी जातियाँ ब्राह्मणार नीच हैं । ब्राह्मणा के बाद स्थान है राजपूता और भूमिहारो (निम्नकोटि के क्षत्रियो या ब्राह्मणो) वा। सासरचात् वैश्य हैं और वस्या के नीचे शूद्र (कहार, कुरमी, गोप, भुइयां भादि)। परन्तु सबमे नाचे हैं अस्पृश्य या प्रत (डोम, बाडाल, दुमाध, चमार प्रादि)। जातिव्यवस्था के अन्तगत व्यक्ति को जम लते ही एक निश्चित वातावरण मिलता है। इस वातावरण से उसको न तो धनाढयता विलग कर सकती है और न निधनता, न सफलता, न असफलता। उसके सभी प्रकार के व्यवहार और सम्पप उसकी जाति के नियमो द्वारा नियमित होते हैं, यहा तक दि वर-वधु या पेशे में चुनाव म भी उसे जाति के नियम मानने पड़ते हैं । राप मे, व्यक्ति अपनी जाति के प्राचार विचार के अनुसार ही शादी-ब्याह, खान पान, कपडा पत्ता और पूजा-पाठ कर सकता है। क्या जम, क्या मृत्यु क्या विवाह गया अनपन, जातिव्यवस्था के अन्तगत कही भी व्यक्तिगत स्वत प्रता को गुजादा नही । पों तक का भी जाति के माधार पर वर्गीकरण किया गया हैस, भावणी पूर्णिमा ग्राह्मगा का पव है तो विजमादामी भनियो का, दीपावली परयो का, तो होली गदा या । व्यक्ति का सामाजिक मान भी उसकी जाति में प्राधार पर ही निधारित होता है। इसी प्रशर एर जाति की तुलना मे दूसरी जाति का भी मान स्थिर किया जाता है।
जाति-व्यवस्था जाति-व्यवस्था में माज भनेक प्रकार के परिवतनों का सूत्रपात हो गया है। पापिय सास्कृतिक तया वत्ति-मूलक क्षेत्रा म सवत्र सामाजिक वर्गों की मनुप्रस्य (हारिज टल) तथा उदग्र (वर्टिक्ल) मा यताएं काम कर रही हैं। विभिन्न वर्गों मोर जातिया ३ मधिवार भोर क्तव्य म युनियादी रद्दोबदल हो गई है । ब्राह्मण भव धर्माधिकारी धर्मोपदेश भथवा नीति विधायक नहीं रहे। या मुघ वैसे ही ब्राह्मण भान भी मिल जाते हैं परन्तु धम शिक्षा भोर धर्मोपदेश पर ब्राह्मण जाति का एकाधिकार मय नहा रहा । योदा क्षत्रियो का भी अस्तित्व मिट-सा गया है। वश्या या स्प भी बदना हुपा है। भलवत्ता गा मौर दलित जातिया की स्थिति व्यवहारत पूर्ववत् ही है। परतु पिसी जमाने में ब्राह्मण पम-पुरोहित ५ सत्रिय सामन्तीय शासर (एप विशप युग म), पाय बुजुमा मोर पूर एव दलित जातियां सवहारा~यह माधुनिक सातायता मात्र सपोन-वल्पना नहीं। विषय की गहराई म उतरने पर हम देखेंगे गि हिमा की सामाजिक गतिविधि के इतिहास में इन पांचा वर्गों में सथप के प्रतिरिपत बुध नहीं है। पनिवल" न भारत ५ बहुजातिय समागम स्थापित्व का भरि भूरि प्रासामा है। उनका मन है वि जाति-व्यवस्था नहीं रहती तो भारत बबर हो गया हाता। रिंग ने भी माना है कि जाति व्यवस्था पेमारण समाज म स्वदना मोर मुम्पयस्था की भावना को प्रोत्साहन मिलता है और किसी मानी म, सरदारा हिंदू-मुदाय स मतगत यिभिन वर्गो म एपता बनी हुई है। मातें नितात विवादास्पद है। यदि जानि-व्यवस्था ये मारण स्व पता पढ़ती है तो दूसरी भोर इराने धारण भस्वच्छता भी पायम रहती है । जया पि पी० जारा न पहा है साधारणतः हिन्दू लोग सपाई-सम्बपी स्वछता की मागा राहार या पय-गम्य पी स्यता पर प्रपिर ध्यान देते हैं । रासापनिर दृष्टि से जम स्तिना भी गदा क्या न हो यदि यह धमपूत या पयपूत है तो हिद भिमर उरा जरा व्यवहार परेगा। दूसरे इसी समयपहान, अनेसारमा (पूरम) गमार-प्यपस्या पारण भारत म राष्ट्रीयता की भावना भी वितरित नहीं हो सरी । इसी मनेरात्मर समाज पारण यहाँ न ठो नतिरता मोई रायमाय स्तर निर्धारित हो गए और न समुष्ट सामाजिर पीयन पा विरास मा। या सानानि-स्यबापा पटन मोर मपरियतनाय मानी जाती है, पर गया पह समार विशानी हष्टि स सभी सम्भव है ? नाति तो हमारा परिवर्तित हाती रही है और भाब भा परिवानगीन भीमभी कोई बहिर्जातीय दल जाति-व्यवस्या का बतभान रूप ११ कालातर में बहुत बड़ा हो जाने के कारण छोटे छोटे समूहा म बैट जाता है। इसके अतिरिक्त क्तिने ही नये-नम समाति-पाणिग्राही समूहो का वरावर निर्माण होता रहता है, जिह पाप जाति या उपजाति कह सकते हैं । एवं स्थान से दूसरे नये स्थान पर जारर बस जाने से भी जाति या उपजाति में परिवतन हो जाता है। भाजीविरा में परिवतन होने से अथवा नया धार्मिक था सामाजिक रस्म रिचाज अपनाने से भी जाति बदल जाती है । सामाजिक मान म भी वद्धि हाने से एसे परिवतन की सम्भावना है। कुछ दिनो पहले तो विधवा विवाह को मानने या न मानने से भी जाति या उपजाति में फेर-बदल हो जाता था। इसलिए जाति विशेष में लोग समाज में अपनी जाति को मर्यादा बढाने के लिए सामूहिक रूप से प्रयास करते हैं । प्रचार और मघटन से भी जाति का नाम और सामाजिक स्थिति बदल जाती है । जैसे, 'भामाम के वृत्तियाल बनिये यास्तव म डोम हैं पर अप व साधारणत बनिया ही कहलाते हैं। इस तरह प्रत्येक दसवर्षीय जनगणना म विश्वकर्मा ग्राह्मण (पाचात शिल्पी), गहतोत राजपूत (धमार) नाई ब्राह्मण (हज्जाम) आदि प्रादि नई मातियो बन जाती थी। विभिन्न जनगणनामो के प्रतिवेदन का तुलनात्मक अध्ययन करने स जातिया म होने वाले इन परिवतनो का पता चल जाएगा। उपयुमत जातिपा म से भधिकाश ने सन् १९२१ ई० को जनगणना म क्षत्रिय पा वैश्य होने का दावा मिमा पा । सन् १९३१ ई० की जनगणना के समय इन मांगों ने अपने को एक विशेष प्रकार का वाह्मण बताया ११ पब हम कायस्पो के विषय में विचार करें। व सामाजिक मर्यादा की दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण हैं । भवारहवी सदी में ये महन शूद्र समझे जात थे। अब उनका म्यान ब्राह्मणो के बाद ही माता है । कायस्यों को कुच उपजातियां, जैसे मायुर और निगम, अपने का ब्राह्मण ही बहती हैं। उनकी पम उपजातियां अपने को क्षत्रिय मानती हैं और चित्रात वगीय होने का दावा करती हैं। इसी प्रकार ग्यासों मा दावा है कि वे चद्रवशीय यादव क्षत्रिय है। अग्रेजी शिक्षा और सरकारी नौकरी से भी लोगों को अपनी जाति बदलने म मदद मिली है। इस तरह हम देखते हैं कि जाति का रूप स्थिर नहीं। इसमे मरमर सामाजिक परिवतन होते रहते हैं हाँ, यह दूसरी बात है कि ये परिवतन बहुत ही धीरे- पोरे भोर मूटम रूप सहा। इस प्रसग म एयनोवेन ने यही हो मौजू भोर पुरमजाक बात सही है कि भापनिक भारत में मोटर के सलासिया ने शोफरों या मोटरचानों को एक जाति बनानी है भोर भव पायद उन लोगा म रोल्स- रायस जाति भोर पोर जाति बनेगी तथा रास्सरायम जातिवाले पोड जातिवालो १२ माति-व्यवस्था के पर मे न शादी-ब्याह करेंगे, न उनका छुपा खाएंगे।" इन परिवतना के बावजूद जाति-व्यवस्था के व घन ढीले पड़ने के पोई समण भभी दिखाई नही पडते, बल्कि विभिन जातियो की प्रवत्ति मे बस एक ही परिवान हुआ है कि ये प्रव ऊंची जाति बनना चाहती हैं और अधिक सामाजिक मर्याना प्राप्त ससा चाहती हैं। इस तरह वा परिवतन जाति-व्यवस्था में निरतर हो रहा है, परतु व्यवस्था के प म जाति विघान ज्या-का-रयों शायम है । उसबै विघटन का कोई चिह्न नहा दौसता। विभिन जातियो मे एक प्रकार की वग-चेतना जग गई है और सामूहिक एकता की भावना से मनुप्रेरित होर वे पोर जोर स जाति-व्यवस्था रा चिपटना चाहती हैं । पहले थोडे से व्यक्ति थे जिहें स्पष्ट रूप स नात था कि उहें क्या करना चाहिए भोर स्या नहीं। वे अपने अच्छ-बुरे कर्मों के लिए पृथ्वी पर ग्राह्मणों के प्रति पौर मरने के बाद दवतामा के प्रति अपन को उत्तरदायी समभते थे। उहें कमवाद मे अटूट विश्वास था। परन्तु भव लोगो के दिमाग में जातीय भावना दूसरे ही प्रकार से पाम परन सगी है । प्रत्येव जाति अपने सामाजिर माथिक मौर राजनीतिक उद्दे या पी पूर्ति के लिए अपने को सघटित पर रही है । जातीय सघटन से भाघार पर चुनाव भी लडे जाते हैं। इस तरह से प्राव मसिल भारतीय क्षत्रिय महाराभा' मखिल भारतीय पायस्थ महासभा', 'त्रिवेणी सप, मसिस भारतीय दलित जाति सीग प्रादि सघटन बन गए हैं। इन परियतनो या दसते हुए हम क्रोग्र, मीज पोर बूगल ये मतों पर विचार परना चाहिए। पावर अनुसार जाति पिसी प्रजातीय इसाई या राजाति पाणिग्राही चागत उपसण्ड हाती है, जिसका समाज-व्यवस्था म प्राय उस राग मी तुलना म केचा या नीचा स्थान रहता है ।१४ मीज के अनुसार, 'जिग समाज म जानि-व्ययस्या है उममें अनेक सजाति पाणिग्राही सण्ड या जानियां होती है। उन जातिया म सामाजिक दृष्टि से रावया अलग रहने की प्रवृत्ति रहती है पौर व यशानुगति द्वारा अपने यो चिरस्पायी बनाए रखती हैं। ये गारतिक पाधार पर परम्परा रा प्रपिप्ति होती हैं भौर उपयुक्त पारो प्रवृत्तियों से अनुप्राप्ति होरर मपना सामाजिक सीमामों से पन्दर अनेकानेर नापियामबंट जाती है। .५ यूगल व मनुमार, 'मगल मलग रहले पी प्रवृत्ति, ऊँच-नीच, पोटे-बर पाभेट माय तथा यागा स्ववत्ति पोस-ये तीनों दरय गति म शामिल रहते हैं । मा जाति प्रथा को पूष परिभाषा प्राप्त पणे के लिए इन टीना सत्यो पर विचार करना चाहिए । हमारा विचार है कि यह 1 बाति-व्यवस्था का वतमान रूप व्यवस्था उस समाज में पाई जाती है जिसमें पित्रागति के आधार पर अनेक विशिष्ट समूह होते हैं, जो परस्पर ऊंची-नीची स्थिति में रहते हैं या परस्पर- विरोधी होते हैं । जिस समाज म भी यह व्यवस्था है उसमे सामाजिक उन्नति, समूह-सम्मिश्रण या रक्त मिश्रण तथा व्यवसाय-परिवतन के सिद्धान्त का विरोध किया जाता है, बल्कि ये बातें बदाश्त नहीं की जाती जाति व्यवस्था के कारण हिंदू-समाज परस्पर विरोधी, छोटे-छोटे अनेक समाजा में बंट गया है।"३॥ हिंदू-समाज मे माज तीन प्रकार की प्रगतिशील शक्तियां काम कर रही हैं । सबसे पहले वे लोग हैं जो जाति प्रथा को एक बुराई मानते हैं और इसका मन्त कर देना चाहते हैं । दूसरे लोग वे हैं, जो समझते हैं कि जाति व्यवस्था मे कुछ युराइया मा गई हैं और उन बुराइयो को दूर करके इस व्यवस्था को पुन शुद्ध मौलिक रूप में लाने की चेष्य होनी चाहिए । तीमरे प्रकार के लोग वे हैं, जो जाति-व्यवस्था को हिदू-सस्कृति का आवश्यक प्रग समझते हैं किन्तु अपरयता को मिटा देना चाहते हैं । इन तीन प्रकार के लागा के अलावा एक चौथा दल भी है जो समझता है कि हम अपने प्रादौ स भ्रष्ट हो गए हैं, प्रत हमें समाज का पुनगठन करना चाहिए और जिन आदर्शों पर हमारे पूर्वज चला करते थे, उहें पुन प्रतिप्टिन करना चाहिए । इस प्रकार के विचार रखने वाले लोग जाति-व्यवस्था की एक नई परिभाषा देते हैं । व समाज का चार प्रकार के समूहो म वाटत हैं (१) मादावादिया का समूह, जो जीवन के प्रति दूरदर्शी दृष्टिकोण वरतता है और अपने आदर्शों के अनुरूप जीवन विताता है, (२) परायवादियो का समूह जिनका दृष्टिकोण अपेक्षाकृत मयुचित होता है, फिर भी जो अपने जीवन से आगे की बात भी सोचते हैं, (३) वस्तुवादियों का समूह, जो अपने जीवन से प्राग की बात नहीं सोचत (४) उन लोगा का समूह निया कोई अपना दृष्टिकोग नहीं होता और पसे-तस जीवनयापन करते हैं। वर्णातम व्यवस्था के अनुसार इन सवको प्रमश ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कहा जाता है । सन् १९०१ ई० के बाद की प्रत्येक जनगणना के अवसर पर इस बात की योडी मालोचना हुई है कि जनसस्या-सम्बधी प्रतिवेदन म जाति-सम्बयो बाता का क्यार उस्लेख किया जाता है । यह भी मारोप लगाया गया है कि जनगणना के समय व्यक्ति पर जाति की मुहर लगापर नाति-व्यवस्या का एक प्रकार से नव-जीवन प्रदान किया नाता है। इसलिए जनगणना के प्रतिवेदन म जाति-सम्बधी किसी प्रकार के विवरण का उल्लेस करने के विष्ट सन् १९३१ ई. में मान्दोलन चलाने की जाति-व्यवस्था मी चेप्टा हुई। मत रहना चाहिए वि लाग जाति-वधन को टीला वरना चाहते हैं मोर विभेद की दीवारो को भी तोड देना चाहते हैं। इन बातो के बावजूद, जसा कि हमने कपर यहा है, जाति प्रया अपने समस्त मूलतत्त्वा के साथ अभी भी कायम है । बलि, जो लोग इसके विरुद्ध है, उनकी भी एक विशेष जाति मानी जाती है। तात्पप यह है कि जाति-व्यवस्था एक प्रवल सामाजिक प्रमाण मोर चिरखालिक सास्कृतिक घटना है।
मध्याय ३ जाति-व्यवस्था का उद्भव और विकास १ हिदू जाति-व्यवस्था समाज में प्रचलित दन्तक्यात्रा पर आधारित है। पर इन दतकयानो के प्रणेता कौन थे और उहोंने इन कथानो को रचना ययोकर को दूसरे शब्दा मै, हम जानना चाहते हैं कि जाति-व्यवस्था का 'प्रारम्भ और विकास विस प्रकार हुआ । जसा कि काक्स ने बताया है, जब हम पूछत हैं कि भारत मे जाति-व्यवस्था कैसे शुरू हुई तो वस्तुत हम जानना चाहत हैं कि हिन्दू समाज की स्थापना किस प्रकार हुइ । परतु इस व्यवस्था की उत्पत्ति के सामाजिक कारण ढूढने की चेप्टा व्यथ है कोई भी सामाजिक व्यवस्था प्रादुभूत नही होती उसका विकास ही होता है । अत जाति-व्यवस्था ये उद्भव या विकास को समझने के लिए हम इतिहास के अनेक पेचीदा और लम्बे रास्ता से गुजरना होगा । जाति के उद्भव को लेकर क्तिने ही सिद्धान्त प्रचलित हैं। इनम से माटे तौर पर पांच सिद्धान्त सवाधिक महत्वपूर्ण हैं । उनमे भी तो सबसे पहले परम्परागत सिद्धान्त उल्लेखनीय है, जो मनु-सहिता मे मिलता है । तत्पश्चात् पाता है भाजीविका-सम्बधी सिद्धात, जिसके सबसे प्रसिद्ध प्रवतव हैं नेस्फील्ड । तत्पश्चात् आती हैं इवेट्मन को जनजातीय और धार्मिक व्याख्या, सेनाट की परिवार और समुदायपरक व्याख्या, रिजले की प्रजाति और अनुलोम विवाह परक व्याख्या । इन सिद्धान्तो को हम दो प्रशस्त थेणियो म बाट सकते हैं (१) वसे सिद्धात जो सास्कृतिक व्याख्या पर आधारित हैं (२) वे सिद्धात जा प्रजातिपरक व्यास्या पर प्राधारित हैं। प्रो० सोरोक्नि का विचार है कि "प्रजाति, चयन और वागति-सम्बधी बातें लोगा को बहुत दिना से मात थी भारत के धार्मिक अथो म यह सिद्धात रूप से प्रतिपादित है कि विभिन्न जातियां ब्रह्मा की देह ये विभिन्न प्रगा से निकली हैं और उनमे मौलिक अन्तर है । फ्लत रक्त का सम्मिश्रण या मतर्मातीय विवाह या प्रजातिया के बीच किसी प्रकार का सम्पक सबसे बड़ा अपराध माना जाता है। प्रत्येक व्यक्ति का सामाजिक भान या दजा उसने माता पिता के रस्त के आधार पर निर्धारित होता है प्राचीन समाज म लोगा - अनुपात म पी। को प्रजनन-तत्त्व की बातें सूब मालूम यी पौर वे उस पर ममन गी करते थे। इस प्रकार सोरोक्नि न प्रजातीय विशुद्धता वाली बात मान ली है। उनका यह भी विचार है कि माा से हजारो वर्ष पहले हि दुपा म एसे भी सानोतिन प जिनका विमान म गहरा प्रया था। सपथी पर० ई. वान्स मोर हावड बेगर न लिखा है, 'यह महत्वपूण बात है कि भारतीय जाति-व्यवस्था के आधार स्तम्भ चार वण हैं, मोर धारों पणों का तात्पय चार रगो स है। ये पग हल्वे श्वेत से लेकर गाढ़े कृष्ण तक हैं। इस व्यवस्या के पाप पर पुरोहित ग्राह्मण हैं जो लगभग ३००० वप ई० पू० भारत पर माक्रमण परने वाले मार्यो के वाज हैं । भायों मोर उनो द्वारा पराजित रगीन जातियो को रास्फूतिया भी तुनना परते हुए टवायनवी न लिसा है दोनो जातिया की गक्ति-सामथ्य उनको अपनी अपनी सरकृति में प्रवलोम वस्टरमार का भी कहना है कि मार्यों की विनम के पूर्व भारत म कृष्ण-बग ये मोगा यी मावादी थी। इन वृष्ण-वण नाजातियो से प्रति उस्त प्रति माय? पो घोर घणा पोर शत्रुता पो, जिरो उहाने अपने सपा पराजित सोगा-शूद्रों-ये वीच तरह-तरह पी थापाएँ वडी परके भभिव्यक्त दिया। उपर्युक्त सभी मत प्रजातीय विरोप मावा मौर रक्त विशुद्धता के सिद्धान्त पर पाधारित हैं । दूसरे शो में, इन मतों पा साराय है यि नाति-व्यवस्था मायाँ पोर विष्ठा को पारस्परिक सामाजिर शत्रुता कारण बनी। (१) परम्परागत सिद्धात जाति-स्यवस्था के मम्पप म सभी घमास्त्रों स्मतियों मार पुराणा में उल्लिसित सपा सवाधिप प्रचलित सिद्धान्त भूमे के मण्डल १०, रापन .. मात्र ११ १२ म मिलता है । ऋग्वेद से इस मा पो पुग्प-सूबा रहते हैं। ग गत म जानिया की उतात्ति पा राई पारण नहीं बताया गया है, फिर भी यह मूरत बात ही महत्वपूर्ण है। 27 मनु न मा पिरमरोच भाव से मान लिया है । इस पौरापिस पल्पना प्रभाय इतना प्रबल है कि दरार प्रति पिगी भी युग म हिन्दमो ने कोई का प्रस्ट नहीं है। जानिया पोतिन सम्रप मे पुरषराम प्रतिरिका अपपई रिसान्त मा पोटी-मोटा पौराणिक मानाएं प्रचलित है। इन सभा भी उल्लेग दिौरिभा महमा मानिरामय-समय पर युगमा माप यावामी के भनुरुप रपे गए हैं। रा प्रकार गोरी त्वति पिपय म परह जाति-मयस्मा का उमूलन और विकास तरह की बातें बताई गई हैं । शतपथ ब्राह्मण (११, १, ४) मे लिखा है कि भु, भुव , स्व , इन तीन गन्दो स ही वर्गों को उलति हुई। तत्तिरीय ब्राह्मण (१११, १२, ६) म लिसा है कि वेदा से ही वण उत्पन्न हुए-सामवेद से ब्राह्मण, यजुर्वेद से क्षत्रिय और ऋग्वेद से वैश्य । पुन शतपय ब्राह्मण (१४, ४, २, १३) के अनुसार देवतामा और असुरा से वर्गों को उत्पत्ति हुई। हरिवरा (११८, ६) म अमृत और मत्य सम्बधी सिद्धान्ता के आधार पर वों का उद्भव माना गया है। ६ जगत् पिता ब्रह्मा की उत्पत्ति विस प्रकार सोने से अण्डे से हु, उसका वणन करने के बाद मनु ने लिखा है कि मानव- सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा ने अपने मुख से ग्राह्मण, वाहमा से सनिय, उदर से वश्य और पर से शूद्र उत्पन दिए।' परन्तु दूसरे श्लोक में मनु ने कुछ दूमरी ही बात कही है-'ब्रह्मा ने अपने शरीर के दो भाग किये । एक भाग पुरुष हुमा यौर दूसरा स्त्री। उम स्त्री में ब्रह्मा ने विरज उत्पन दिया। वितु, सर्वोतम द्विजा, जान लो कि में ही हूँ सम्पूर्ण विश्व का सप्टा, जो पुरुष विरज की कठिन तपस्या से स्वयमेव प्राविभूत प्रा।" महाभारत म भी वों का उत्पत्ति के विषय में कई तरह की कहानियां पाई है। शान्ति पद म भगु ने लिखा है, "नातिया म कोई अन्तर नहीं है। शुरू म ब्रह्मा ने इस विश्व की रचना की और मय लाग जमना ब्राह्मण थे । तत्पश्चात अपने अपने यमो के अनुसार लोग विभिन जानिया म वेट गए। जिन द्विजा को इन्द्रिय- सुध प्रिय था, जो लोधी और हिमालु थे, रक्तिम वण ये तथा नि हाने अपन स्तन्य को त्याग दिया था, वे सब क्षत्रिय हुए । जिन द्विजा ने थाना बनव्य छाटकर गो-पालन की वृत्ति अपना ली और खेती बाडी के काम करने लगे, तथा जिनका पण पीत था, वे सब वैश्य बहलाए । जा द्विज असत्य भाषण, दुष्टाचरण में लिप्त रहत प, लालवी थे तथा सभी तरह के कुक्म-सुकम किया करते थे और जिनवा वण आला पा, बद्र हो गए। इस प्रकार अपने कों ये मनुसार ग्राह्मणगण विभिन्न जातिया म बैट गए । महाभारत उसी पव में यह भी रिलक्षित है विचार जानिया की उत्पत्ति श्रीकृष्ण से हुई । तव पिर महामना श्रीकृष्ण ने सर्वोत्तम मो ब्राह्मणा को अपने मुख से, सौ क्षत्रिया का अपनी मुजामा स, सौ वश्या को अपनी जपा से और सो शुदो सोमपने चरणो से उत्पन दिया। श्रीमद्भगवद्गीता में भी लिखा है "श्रीकृष्ण न महा, 'गुणो मोर यों के आधार पर मैंने लागा का भार जातियो "विभिन्न जातिया में क्व यो वा चपन गौता ने मारहवें मध्याय म पाया है। में बांट दिया।
१८ जाति व्यवस्था 1 जातिया की उत्पत्ति को लेकर इस तरह की भोर भी वितनी परम्पर- विरोधी पहानियां मिलती हैं। हा० म्यूर ने तो सस्कृत-प्रथा से मनुष्य के जम और जातियों की उत्पत्ति से सम्बधित उद्धरणाका १५२ पृष्ठा म सक्लन प्रस्तुत दिया है । दूसरी भी एक नवदव पुस्तक है-'मूल संस्कृत पाठ मोरिजिाल रात्कृत टेक्स्ट बड १, जिसम जानिया की उत्पत्ति के सम्बध मे अनेरानेर पौराणिक पल्पनाएँ मौर गाथाए सग्रहीत हैं। उसम पनर ने प्रश्न भी उठाया है कि वैदिक युग म जातियो का अस्तित्व था नी या नहीं। यस्नुत धामिर माया म जाति-व्यवस्था की उत्पत्ति का सगनिपूण वणन नहीं मिलता प्रत्युत् उनम तरह-तरह पी भटक्सयाजी है। कहा तो रहस्यपूण प्यास्या दी गई है, यहा पौराणिक कल्पना का सहारा लिया गया है और महामही पर कक्ल युषितपोपा वणन मिलता है। बसका ने घटयर कल्पना पौर अनुमान स पाम लिया है। किन्तु सवाधिक प्रचलित पहानी यही है कि जातियो पुरष या ब्रह्म पे मुस याहु जपा पौर चरण से प्रादुभूत हुए। दरा विषय का सबसे प्राचीन उल्लस मम्मद वे पुरुष-गूक्त म माया है । विन्तु जिरा रूप में यह बात कही गइ है उससे राह हाता है नि यह यास्या पायद एप रफ मात्र है । पुराणा म या मनु वे 'मानव पमशास्त्र म बदिर' प्रथा पी यह रहस्ययानी रूपयाती छोड दी गई है और तय्या या यणन स्पष्ट यवतच्या मया गया है। प्रय 1 उठना है मिजातिया की उत्पत्ति वे इतने विनिता विवरण या मिलन हैं सम्भवत इमरे नियमा पो परीक्षा परने पर पता घस रि जागियो का विधान पिसी न्यायाधित दवता लिया। यो क्तव्य गि विप पो हत उराने जो शर्यापिय ज्योशिमय है, सालोग सिए जिनकी उत्पत्ति उगा गुग भुना जा पोर पांव गहुई पी पिभिन नभ्य पोर) उपजोयिस गियत कर दी। वाराणा पिए उगा पग्न पोर पाठन (गया), भानी पार गरी मी सिराना पार पा-ियामानविण।" मायाका मा प्राता दी जाया कर दान दें यावर पार पर 774 गुगाभाग म प्रपाका प्नि परागप या पर नया रे पगार पर पपगाय पर, पण मोर मी आज ।
२ जाति व्यवस्था का उमूलन और विकास १९ "शूद्रो के लिए उमन एक ही कम निवारित किया कि वे उक्त तीन वर्षों की विनयपूवक सेवा करें।"१८ ब्राह्मणो की गरिमा "मनुष्य नाभि के ऊपर (नीचे की अपेक्षा) पवित्रतर कहा जाता है, अतएव स्वय अस्तित्वमान (स्वयभू) न इसको अपना पवित्रतम (अग) मुम घोपित किया है।" 'चूकि ब्राह्मण की उत्पत्ति (ब्रह्मा के) मुख से हुई है और चूकि वह अग्र- जमा है और वेदो पर उसका अधिकार है, इसलिए वह अधिकारत इस सम्पूण सप्टि का स्वामी है।" "क्योकि स्वय अस्तित्वमान ने पूर्ण प्रात्म सयम करने के बाद उसे ही सव- प्रथम अपने मुख से उत्पन किया, ताकि वलि की वस्तुएँ देवतामा तक पहुचाई जा सकें और मनुष्य (पितृस) और इस विश्व को सुरक्षित रखा जा सके । २२ "कौन सजित प्राणी उसका अतिक्रमण कर सकता है जिसके मुख से निरन्तर स्वय देवतागण बलि म चढाइ गइ वस्तुमा का उपभोग करते हैं और मृतक के लिए समर्पित वस्तुमा को पितरा का भोग बतात हैं।'३३ ब्राह्मण का जम ही तय विधान को निधि की सुरक्षा के हेतु पवित्र विधान का एक पावत भवतरण है और वह ब्रह्मा के साथ ही सलयित हो जाता २४ "एक ब्राह्मण, जब वह अस्तित्व ग्रहण करता है, पृथ्वी पर सवरेष्ठ पौर उच्चतम और सभी उत्पन प्राणिया के स्वामी के रूप म जम लता है। '२५ विश्व मे जो कुछ भी विद्यमान है, वह सब-कुछ उसको उत्पत्ति की श्रेष्ठना के कारण ग्राह्मण की सम्पत्ति है, वस्तुन ब्राह्मण इस सवका अधिकारी २७ 'एक ब्राह्मण चाहे वह मूष हो या विद्वान्, एक महान् दिन्यता का स्वामी है, ठीक उसी प्रकार जस कि अग्नि चाह वह (यन के हविकुड के लिए) ले जाई जाए अथक न ले जाई जाए, एक महान् दिव्यता है । ब्राह्मणों का दड चौल सवार (क्पाल मुडन) प्राणदर के स्थान पर ब्राह्मण के लिए उपयुक्त है, परतु दूसरे वर्णों (के लोगा) को प्राणद भुगनना ही पड़ेगा । २८ "किसी भी ब्राह्मण री हत्या न की जाए यद्यपि उसने सभी (सम्भव) जानिन्सवरपा अपराधम बिरहा एग मारापी यो यनपाग जाए और उt सम्पत्ति (उस पास हो) दोदा नारा मोर (उसरे रोरो) कोई मापा रही पचाया पाए। धिमी ब्राह्मण कोहरामराम मधिर र पाप पोर ms नहीं है । म एप राना रिगी प्रारा मारने पा सिर भी पपनमामला. पदों का जन्म-दासतारे हेतु पर एमपू पारे यही हो भपया भीत- मारिए विया पिया जा सकता है क्योंकि स्वयं प्रस्तिापमान 1 उपकी गृष्टिपालमा दास होन 4 लिए ही यी है।" PT पद पर भरने स्वामी । मुसि पा पुरा हो पारिवह दागना म मुसा नहीं हो रारनामयादि यह उगर बम ए हो साप सगा है। इसरो जग मौन स्वरा" एर बाह्मण मावस्त होर मरने (दारा) में सामान को जगर गाना है पारि उग (दारा पा) गति माया भधिपार नहीं है उसमा स्वामी उरार स्यत्वा पर मभिरार पर पता है।" एपमार पाह्मण पी गया हो पूर 4 लिए यष्ठ उपजीविका पोपित है योरि हसरे अलावा यह जो कुछ भी परेगा उसरा उस मोई फल नहीं मिलगा।" शूद्र को धन-समय पदापि नहीं करना चाहिए यद्यपि यह (ऐसा भरने में) रामप भी हो क्यादि पन सचित पर रखने वाला ब्राह्मणों को पोड़ा देता है। दासतामा पारितोपिक 'वे उस नाम निजी परिवार (सम्पत्ति) से उपयुक्त जीवन निर्वाह- योग्य ध्यप प्रदाय हो मायटित पर भार यह उसकी योग्यता, उसरे उद्यम और उनकी सस्या पर जिनका भरण-पोषण करने के लिए यह बाध्य है विचार के पश्चात् ही दिया जाए। 'उच्छिष्ट भोग्य पदाय उसे भवाय ही दिया जाए और पुराने वस्त्र, मन का भगिष्ट भौर परलू उपावर मादि भी।३.
जाति व्यवस्था का उ भूलन और विकास २१ शूद्रों का दड "एकज मनुष्य (एक शूद्र ) जो एक द्विज मनुष्य को भद्दी गालियों के साथ अपमानित करता है, उसकी जीभ काटकर अलग कर दी जाएगी, क्योकि वह निम्न वरा का है ।"३८ "यदि वह किसी (द्विज) का नाम और उसकी जाति का उल्लेख तिरस्कार के साथ करता है, तो उसके मुख में रस अगुल लम्बी जलते लोहे को कोल घुसा दी जाएगी।"३६ “यदि वह अहवारवश ब्राह्मणो को 'क्तव्य को शिक्षा देता है तो राजा उसके मुख और कानो म गरम तर डाल दिये जाने की व्यवस्था करेगा।"* 'निम्न वण का मनुष्य चाहे वह जिस किसी भी अग से क्यो न (त्रि वो म से किसी भी मनुष्य को) उच्चतम (वर्गों के) व्यवित्तपो को चोट पहुचाय, उसका वह अग ही काट डाला जाएगा, यह मनु का उपदेश है। "वह जो हाथ या डडा उठायेगा, उसका हाथ वाट लिया जाएगा, वह जो क्रोप में अपने पाव से ठोकरें मारेगा, उसका पाव काट लिया जाएगा।'४२ 'एक निम्न वण का मनुष्य, जा उच्च वण के मनुष्य के स्थान पर अपने को पदस्थापित करने का प्रयल करता है उसके कून्ह पर तपते लोहे से दाभ दिया जाएगा और उसे वनवास दे दिया जाएगा अथवा राजा उसके सितम्ब पर गहरा धान करो की व्यवस्था करेगा)"४३ "यदि प्रहकारवश वह (अपन से किसी वरीय पर) थूकता है, तो राजा उसके दोनो ही हाठो को कटवाने की व्यवस्था करेगा। यदि वह (उस पर) मूत्र- त्याग करता है तो उसका शिश्न, यदि (उसके ममक्ष) वायु निस्सरण करता है, तो उसकी गुदा।"" "यदि वह (किसी वरीय का) वेश परडता है तो राजा को चाहिए कि दह विना हिचक उसके हाथ क्टवा ले, इसी प्रकार (यदि वह उसके) पाव धूवर घसीटे, तो उसकी दाढी गरदन अथवा अडकोश । कतिपय वर्गों के साथ व्यवहार "परन्तु चाडाला और श्वपासा वा निवासस्थान गांव के बाहर होगा, वे मपपात्र होंगे और उनके घनम्वरूप कुत्ते और खच्चर ही होंगे। 'उनने वस्त्र मृतको की पोशाक हागे, वे टूटी पाली मे भोजन करेंगे, बाला मोहा ही उसका गहना होगा, और वे प्रावश्यक रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान म घूमते फिरते रहेंगे।
जाति-ज्यपामा .६ द धर्मोपदेश प्राप्ति के अधिकारी नहीं ' पोई ऐगा परापारा परेगा निगमे उसकी जाति पाली जाए (पातप) और पवित्र पर या पाTM गुणा उरो पवित्र विपात पापन वा मधिरार हो (पार्यों थे मयारि) उरा रिए (इगरे पिय का पालन परन पा) कोई निपप रहा है। रालि द्रको कोई परामा 7 [पा जाए ही उग नोग्य या समिट हो या जाए ही उग दयभीत कामगार ही मिले, 7 अगले (ए मनुप्प ५) मा पवित्र पिधान पी म्यागही की जा र) सपरया या प्रापित राही भारrा जाए। 'यह नो रिमी (TER लिए) पवित्र विचार को माया रसापपया उसे तपस्या मापा प्राचिरा परम पो याम्य परता है उस (T) राम स्थप भी भरावृत (नामर) नर मय जाएगा।" पूब को त्या परने के लिए प्रायश्चित्त या गुद्धि पबिती र नवता एयरपरी एक मेडर' एर पुत्ता र दिसली र उस्तू पपया एम गौर पा मारपर पोई भी एप पी पा में पाप पा प्रायश्चित्त र सरना है।" यह समष्ट है कि पूर्व-यधिक विपियो रागी भयाय से पूण हैं यह भी प्रत्यण है मिना निर्माण पूत व्यक्तिवाद्वारा मानदेयासिपो ये पिक गोदारा बगाने पे वापपूण उद्दप म दिया गया था परतु मधिशा पोगाने इन विधियो र विरुद्ध विद्रोह नपा हो पिया ? विद्रोह हुपा भी साल भी विपल, माथिर मोर राजनीतिर गतिमा म परिवतन सत्य की सृष्टि की पहानिया और विपिया म भी परियना हार हैं । हम माया इस पर मिनार पूवर विचार परेंगे। जाति-व्यवरथा की उत्पत्ति र सयप म हम पुष अपसायत मापनम सिद्धाता पर विचार करें। प्रजाति प्रगम सर हबट रिसले जातिनायधी प्रजानिए मिद्धात पे सर्वाधिर भट ध्याख्याता रहे हैं । उहाने न सत्य के रायप म प्रार पाय पिया है। उहानै प्रजातिक उपपल्पना माघार पर प्री पुरतर ६ पीपुर भाक इंडिया लिखी। प्रथमत रिमते जानिया के निर्माण की प्रक्रिया का विश्लेषण प्रस्तुत करने का प्रयत्न परते हैं । उनके अनुसार माटे तौर पर विभिल प्रक्रियाएँ हैं-(१) मूल निवारिया यी एक सम्पूर्ण यनजाति, मथवा इनमे मे ।
जाति-व्यवस्था का उमूलन और विरास २३ अधिकाश अपने आपको हिदू धम की श्रेणी में अपने ही वनजातीय पदनाम (उपाधि) अथवा नवीन जाति-नाम के अधीन प्रविष्ट करा लेते हैं, जिद स्तरीय जातिया से सुगमतापूर्वक विभेदीकृत किया जा सकता है। उदाहरणाय, उत्तरी बगाल के राजवशी, मध्य भारत के गान। (२) जाति के आर्थिक प्रयवा त्तिक इतने अधिक प्रकार हैं और इतना अधिक विस्तत उनका फैलाव है तथा इनकी विशिष्टताएं इतनी प्रमुख (महत्वपूण) है कि प्रशय की सामुदायिकता का आचरण तथा जाति विकास का मुख्य कारक अपेक्षित होती है । मौलिक प्रेरणा चाह जो भी कुछ रही हो, यह तो पात्र पयवेक्षण का विषय है कि न केवल प्राय प्रत्येक जाति कहती है कि उसकी एक न एक या अनेक परम्परागत उपजीविका हैं, यद्यपि इसके कई सदस्या ने उसका परित्याग भी कर दिया है, वरन गई उपजीविकाया का म्वीकार कर लेने अयवा मूल उपजीविका म परिवतन से भी जातिया के कई उपखड हो सक्त हैं जो अन्ततः एक विलग प्रयक्ष जाति के रूप मे विकसित हो जाते हैं । (३) साम्प्रदायिक प्रकार म कुछ ही जानिया सम्मिलित हैं, जिन्टान लोकोपकारक समुत्साहिया द्वारा प्रवर्तित एक धार्मिक सम्प्रदाय के रूप म अपना जीवन प्रारम्भ किया। य समुत्साही वे थे, जिहान जमा के चक्र और यम के विधान से शीघ्रतापूर्ण मुक्ति प्रदान करने वाले कतिपय अध्यात्मवानी सूना का उद्विकास करने के बाद उह यह समभाया कि संसार के सभी मनुष्य समान है अयवा किसी भी तरह इनके उपदेशा मे विश्वास रखने वाले लोगा को तो एक गमान होना ही पाहिए । (१) राष्ट्रीय प्रकार की जाति । कतिपय एसे समूह भी विद्यमान है जो सामा यनया वतमानमालिक जाति के रूप म अवपित होते हैं और जो मतोतयालोर सम्प्रभुता की परम्परा को मानते हैं और एक साधारण वनजाति थी अपेक्षा सभी अधिकतर रूप में एक संगठन को अनुरेमानो (चिह्नो) को सुरक्षित रखत प्रतीत हात हैं । (५) देशातरगमन से निर्मित जाति-यदि किसी जाति के सदस्य अपना मूल निवासस्थान छोह दत हैं और भारत के किसी दूसरे भाग म जारर यस जाते हैं तो उनम मूल समूह स पृथक हो जान और एक पृथक जाति के रूप में विकसित हो जाने की प्रवत्ति होती है । (५) रीति में परिवतन से निर्मित जाति । प्रतिष्ठापित प्रयाग्रा की अवहेलना अथवा नवीन एव प्रारम्भिक प्यवहारा तया घम निरपक्ष उपतीविसा की स्वीकृति के परिणामस्वरूप नई जातिया का निमाण प्राचीनतम काल से ही जाति-व्यवस्था को एक परिचित घटना है। पर उक्त पडियाम, रिसले स्पष्टत जातियो की परम्परागत उत्पत्ति 1 २४ आदि पापा और मनु द्वारा प्रतिनिमिषा जामिया की पातोपना रोपाप्रपा पसे है । प्रपात रिगो प्रमानि-सागर मी विपि या अनुमोदन गरा। सार पे इतिहास में जहाँ पो भी य जनगमूर दूसरे भासमर पो पचाप मारमण पपया उगा गणपिशर यो पारे पोरे प्रपिसाराबारे पूणाया परास्त कर दिया है यही विजित देशो महिनामा दो दिसापा। रमिता अथवा परतो ये रूप में प्रहण पर लिया है परमपनी पुत्रियों का विवाह पपा ही बोध म किया है। जहाँ यदा जाममूह काही प्रजाति पे रहे हैं पपया रिसी भी प्रकार एप हो पण में रह है, पी जनो योर मनुलोम विवाह की प्रारम्भिा भवस्था शीघ्र ही समाप्त हो गई है और रापूण राम्मेसन हो गया है। दूगरी मार, जहाँ प्रजाति पोर या सम्रय में मरणीय भेद ने हस्तरेर पिया है और पिरोपत य•ि प्रापा जागमूह भपाही या ये व्यक्तिया द्वारा पिरन्तर प्राप्रगिल दिये जाने पर्दा उनियारा पा कम भिा सौर पर होता है । तर प्रवृत्ति रामरोपे एक भिन यर---उच्चतर युल पे पुरुष पोर नीचर पुन मी स्विपो रे बीच पटित भनियमित यौन सम्पयों के परिणाम के निर्माण की पोर उमुरा होती है जो भागम ही पियाह करते हैं और पार सभी अभिमाया मोर उद्दयो मे निमिरा एक ही जाति के हो जाते हैं। हम पाकिव दहिर पथ मे जाति पेवल भारत तक ही सीमित रही है। पह ममरीपी गणराप के दक्षिणी राग्या में भी प्रति स्पष्ट रूप में विद्यमान है जहाँ नीयो पोर विभिन्न मिश्रित प्रजातियां मुसाटोज, यवाड, स पौर मॉक्टरा प्रत्येर पे धीच अपने अपने भन्तवियाह पधिपार उग्र रूप म मात्रित हैं पौर विशिष्टत ये एपेन प्रजाति से यधिक वियाह करने से निनात वचित हैं । कनाडा मेविसको पौर दगिण ममरीका के सपर-जातो म मौर भारत में यूरोपियना मे भी यही समान वृत-युल पथगित किया जा सकता है। जो देशजो के साय पन्तरियाह नहीं परत भौर गुदरपती यूरोपियना से येवल याक्दा हो विवाह-सम्बध स्थापित मत पर, भारत की सन् १६०१ की जनगणना में पर्याप्त मानव मितीय गोप परने पचात् रिमले लिखते हैं जाति विश का माधुनिक विमान इस भाशा म विभिन पारीरिक प्रभारी को उनको अभिर विशिष्टताना ये प्रसग म परिभापित एष वर्गीकृत करने का प्रयत्न परता है कि जब पर्याप्त मांकडे एमिन हो जाएंगे तर कुछ मात्रा मे प्रारो दारे में हो लेपा-जोया तयार ना मोर उनकी रचना के विभिन तत्वो को प्रतिनिश्चित करना शायद सम्भव हो जाएगा और इस प्रकार मानव-जाति के जाति-व्यवस्था का उभूलन और विकास महान् परिवारो मै स एष या दूसरे से उनके सम्बय को स्थापित किया जा सकेगा।" हा मम्भावनामा, जाति विद्या-सम्बधी अध्ययन और मानव मितीय शोध में प्राधार पर रिसले अपने वक्तव्य के साथ प्रक्ट होते हैं-~- पूर्वी भारत म जाति-सगठन की विधि को निर्धारित करना स्वल्पत ही एक विरोधाभास है कि एक मनुष्य की स्थिति उसको नासिका को चौडाइ रे विपरीत अनुपात में परिवर्तित होती रहती है ।' ५५ इम निप्प पर पहुंचने में लिए रिसले ने उत्तर भारत का जातियों के लोगो के माप ग्रादि लिये थे। सेनाद का सिद्धान्त रोनाट के अनुसार, "जातियां प्राचीन भार्यों की उन सस्थामा दे सामाय सहज विकसित रूप हैं जो भारत पी विचित्र अवस्थामा के कारण विचित्र प्राकार ग्रहण करते चले गए। जाति व्यवस्था के प्रारम्भ को वण-विभाजन के रूप म इतिहास का भारतीय ईरानी अवधि के साथ अभिभाजित करना पठिग नहीं है, क्योवि समाज वा चार भागो में बंटा होना अविस्नारी पगिया मौर ऋग्वादर भारत में भी पाया जाता है । इस प्रकार प्राचीन पर्शिया में मथर्वा (पुरोहित), रपेम्या (पाटा) और हुईतो (पारीगर) थे। एकमात्र प्रमुख मन्तर चतुर्थ वा के सम्बनम ही पड़ता है, जो पशिया में पारीगर-बग था वही भारत में दास अथवा शूद्र वग था। परन्तु यह अन्तर वस्तुस्थिति की सभा अधिक्तर पर या स्पप्ट है, यदि हम लोग इस तथ्य पर विचार करें वि हस्तशिल्प र वाय भारत में दासा अथवा शूद्रो के लिए ही अधिकाशन नियत था। भारतीय प्रणालो और पूर्वकालीन यूनानी और रोमन सस्यानो के बोध मादश्यता के निम्नलिसिन बिन्दुआ को भोर वे निर्देश करत हैं । जेस, सेरिया, बनजानि रोम म, परिवार, मट्रिया फाईल यूनान मे, और परिवार गोत्र और जाति भारत मे। "गोत्र का तात्पय एक सस्थानुवर्ती अथवा स्पानानुवर्ती नामधारी समूह से है, जो अपनी सम्पूणता में एक समान पूषन से बणानुक्रमित होने के लिए स्यात है और यह पूर्वज उपयुक्नत एक भूपि, एक पुराण पुरोहित अथवा एक साधु ही होना चाहिए। रोमन कभी भी सपने ही लेन्स की स्त्री से विवाह नहीं करते थे और रोमन सुनौन पी भारतीय ब्राह्मणा की भांति ही अनुलोम विवाह का अधिकार पा. जिमरा उमूलन रेक्स पंन्यूलिया द्वारा दोष सपपये पश्चात् ही सम्भव हो सका। मिश्रित विवाह से उत्पल मन्तति को पवित्र कुलीन पला बी अपेगा निम्न स्थानमा अधिकारी माना जाता था। जग के यज्ञा म मरिपिता या प्रवेश पातिप्यस्था frपिर पा। विवाह पर परोपामागे गोगरी निरी गोत्र भ प्रतरित हो जाने पर भारतीय प्रया का समाशातर हम रामा कारगिया ममिल पाता है। विवाह प्रसग म एUTIT गमूहगी प्रणाली का भारतीय गान पदति म प्रालीच गमानता है और एक कट्रिया मी रायता परियारावा ही मौमा पी जिनसे गगह या पा मह! तालिमपरिचिताप साथ भाग पर भी प्रतिषेश पा। पारिवारिय भोजन पवित्र समझा जाता पा पौर रोमन परिस्टिया से पेपर मपरिचित हा नही परन् परियार से ये गरम भी यहित को विगी भनुपयुत माधरण द्वारा मान मापको स्याा प्रष्ट पर। भारतीय समाज म जिस प्रकार का पानी पदरले पारिपान है पुष इसी प्रकार से प्रया रोमन समाज म यो । ताहो नहीं पनि भारतीम पचायत-पति पो तरह राम गे पारिवाग्रि परिषद, पंदिया पोटेस्टग और "जे ग म प्रधान मा मुणिया मा परत निको पारिवारिक या सामायिक मामला म पुगता दने । प्रपियार होता था । उनर इस पपिसार पो राज्य द्वारा माता प्राप्त हो।तप्यारे मापार पर सेनाट निय नियाला है कि जाति-व्ययस्था में प्रमुग शिसात पौर माग भाप प्रजाति की सभी पापों म परम्परा मौर रीति रिवाज र एप में विद्यमार हैं। सनाट के विधारा से सहमत हो पटिश है। बहिर्गातीय विवाह में सिदात को भारतीय जाति-व्ययस्था पा मुख्य मापार माना है। अपन मा की पुष्टि म उहनि पछ एतिहासिर साहरण ये हैं। परतुन उगहरणो से जानि-व्यवस्था पी उत्पत्ति पर रोशनी नही पडती । यास्तव में यह पवाया प्राह्मण युग परवी-पाल सी उपज है। उसरे बढ़ा दिना रात, सूम-युग म, इसरे नियमा मोनोगरिरात्म मानो सगे । इस पहल मातरजातीय विवाह सूब प्रचलित था। पदिय युग ये प्रारम्भिक दिना म छोटी जाति के सबसे अपवित्र हो जाने की बात अपल्पनीय यो। पतरजातीय नौजन निपप पा भी चलन नहा पा। सनार यह भी नहीं पतला पाते कि निम्नतम जाति, प्रपात पूनानी उत्सति दिरा प्रकार हुई। हम उापा यह पहना नहीं भान गरते कि वग (माह्मण, क्षत्रिय, व य पौर शूद्र) परपत प्राचीनकाल से पले माते हैं और वेवस परवी बाल महोदनको अलग अलग जातिमा एन गइ, पोर इन जातियो का मूल स्रोत भौर पक्षण प्रारम्भ ही से डारे धीच विद्यमान प्रस्तु, इस विषय पर हम मागे लपर विस्तारपूर्वक विचार करेंगे ।
२७ नाति व्यवस्था का उन्मूलन और विकास इवेट्सन और नेसफिल्ड के सिद्धात इवेटसन के अनुसार जाति एक दृढ सामाजिक वग से कुछ प्रथों मे विलग है । यह मत निगमनात्मर प्रतीत होता है । इबेटमन के ग्रय जाति व्यवस्था का प्रारम्भिक इतिहास समभने म सहायता नहीं मिलती। उहोंने सभी प्रकार के समाज के लिए सामाजिक अतर अथवा बिलगाव सम्बधी कुछ सिद्धात प्रतिपादित किये है और हिदू समाज को एक विशेष घटना के रूप में माना है। उनकी अपेक्षा कहीं अधिक सुस्पष्ट और विकसित सिद्धात नेसफ्ल्डि ने प्रस्तुत किया है । इहाने सस्कृति या पेशे के आधार पर जाति-व्यवस्था का विवेचन किया है। वे प्रजाति-सम्बधी सिद्धात को नहीं मानत क्याकि उनका कहना है कि जाति यवस्था सगठित हाने के पहले ही जनसरया बुरी तरह से मिश्रित हो गई थी। ' इस देश म पार्यो के आने के हजार वप वाद ही जाति-सम्बन्धी ववाहिक प्रतिवय लागू हुए और इस समय तक पार्यो और भारत के मूल निवासियो के बीच रक्त सम्मिश्रण हो चुका था। ईसापूर्व २०० वप या उससे भी अधिक दिना वाद, मनु के समय म विवाह के सम्बध मे जाति सम्बधी नियम लागू होने लग थे। उस समय भी, जसा कि मनु के लेख से प्रक्ट है, स्वय ब्राह्मण भी उन नियमो का सवदा पालन नहीं करते थे । मनु ने गूद्र या छोटी जाति की स्त्री से विवाह करने वाल अपने समकालीन ब्राह्मणा की बड़ी भत्सना की है, जिससे प्रक्ट है कि मनु के पहले, अर्थात् जब से आय आक्रमणकारिया ने भारत म प्रवश किया (जो निश्चय ही 'मनुस्मृति' की रचना से लगभग १००० वप भाग की बात है) ब्राह्मण या पेशेवर पुरोहित (क्याकि उन दिना ब्राह्मण बाति का अस्तित्व नहीं था) अपनी पसन्द की किसी भी स्त्री से विवाह कर सकते थे।"५८ नेसफिल्ड का मत है कि प्रारम्भ मे पुरोहिताई पर ब्राह्मणो का पाई एकाधिकार नहीं था। यन के अवसर पर क्षत्रिय या युद्धनायक भी पुरोहित का काम कर सकते थे। परन्तु बहुत दिना बाद, मत्रा और धार्मिक कृत्यो के कारण यन का बहुत ही कठिन और पचीदा हो गया, और उसमे विशिष्टीकरण की आवश्यक्ता उत्पन हो गई। जिन लोगा ने इस पेगे मे विप कुशलता प्राप्त कर ली थी, वे ब्राह्मण हो गए। उन दिना के सामाजिक जोदन मे यनो का बहुत महत्त्व था। इसलिए समाज मे ब्राह्मणो को सवाधिक महत्त्व और प्रतिष्ठा प्राप्त हुई । माग चलकर पुरोहिताई वगानुगत होने लगी। ब्राह्मणा न अपने को विशेष अधिकारास युक्त एक अलग जाति के स्प मे रागटित कर लिया। यह देखकर मय वग वे लागा ने भी प्रात्मरक्षा के लिए अथवा अपने अधिकार को बचाने के लिए अपने को अलग अलग जातियों में २९ जाति-पवरया सटिन दिया। रोमा पले म युद्ध तो प्रतिरक्षा मो भाषा भी पोर गुण मनुपरणयो। 'जप पाहाणामाने पो मनेा अधिपाराग पुरा पण विशिष्ट जाति के रूप मे सगटिन पर लिया तय की गातीपाय या पेसोग भी मधिशापिर मपिरार हथियार मणी ला मरो मो याच एए । उहने यस मारमरला में ही गिरा ऐगा नहा लिया पलि 4 मोये उग वग मे सोगावा भाषरण पर रहे ५ जिगरे प्रति ये पुप गनिया से मार पौर राम्मा प्रति परोये प्रमात हो यो । परिपती रोग पे रोमन पोलिय पुरोहिलो यो तरह यति प्राह्मणा म भी पविवाहित होवो प्रपा एगी, तो जानि की दीवार गहो पर मादा बसी उरिया पिया उस समाज के दौर पर गायद पोई परार नही पा १६ गए म, नेरापिला रहा है रि जाति म रस्त या प्रा नहीं यदि समया रापिड पी पहोरी स्थापनाए गलत है। यह टोर रहीं नानादि जाति ध्यपाषा इतने परवर्ती युग म उ नगपिल्डन यापी अटिना या प्रा उठाया है । परतु या पया तो जटिल हो गए। इस सिv पौरो लोग उत्तरदायी है । यदि पहें रिमात्मरक्षा आधार पर जाम्पियस्यामा विकास हुमा तो यह भी राही नहीं होगा, पारि तर पायो मार पूापी जाति नहीं बन पाती। इस व्यवस्था की उत्पत्ति पौर विकास पा सविगार विपण परते समय हम नेसपिस्ट ये मत पा पुन उल्लेग परेंगे। जातिकाजन जातीय पाचार कुछ विगन् मानते हैं कि जन-जातीप प्रवृत्तियार पारण जाति-व्यवस्था पा विकास हुमा । इस मत की पुष्टि उहें वेस्टरमार प निम्नलिखित विचार से होती है जगली लोग भनेपाने जनजातिया या इबोलों म बेटे रहते हैं और चरे नोच परस्पर फर घणा भी भायना रहती है। ये मापम म गादी विवाह नही परते । भाषाएं उनकी एर ही मूत स मत निकली हुई हो, उनके बीच इतना पलगाव रहता है कि महज एव पतनी-सी नदी या कोई छोरीपहाडी भटल विभाजन रेसा बनार उहें घिरवाल के लिए प्रापरा में मिलने नहीं देती। इस सिदान्त के अनुसार प्रतीत होता है कि जब मायगण जन जातीय अवस्था में पे, तभी जाति-व्यवस्था का विकास हुमा । लेकिन प्रायों प्राचीनतम जाति-व्यवस्या का उन्मूलन और विकास साहित्य, ऋग्वेद में, पुरप-भूस्त को होडरर, जोकि परवर्ती काल की रचना माना जाता है, कही भी जाति-व्यवस्था का काइ चिह्न नहीं मिला। यदि जन जातीय स्रोत मे जाति-व्यवस्था का उद्भव हुना रहता तो निश्चय ही अणु, क्रीवा, यदु, मृजय प्रानि जन-जातीय नाम इस व्यवस्था में भी अवश्य पाए जाते। जो लोग जन जातीय प्राधारपाल सिद्धात को मानने वाले हैं, उनका विचार है कि इस व्यवस्था के विकास मे आर्यों को अपक्षा आदिवासियो का अधिक हाथ था। जिन आदिवासिया ने प्रापत्व स्वीकार नहीं किया, उनमें पशु चिह्न माधारित वहिर्जातीय विवाह और जन-जातिगत अन्तरजातीय विवाह मो प्रया विशेष रूप से प्रचलित थी । उस मम्बध म विद्वाना का कहना है कि 'मार्यों की विजय के बाद भी भारत के आदिवासिया ने अपने पारस्परिक सास्कृतिर विभेदो को नही भुलाया। ये सामाजिक विभेद ही आगे चलकर नातिभेद के कारण बन गए । सचमुच यह पाश्चय की बात है कि उत्तर भारत मे, जहां मार्यों का प्रभाव सबसे अधिक है, छूत अटूत का भेद उतना प्रबल नही है, जितना कि दक्षिण भारत के द्राविडो मे । जानि-सम्बधी नियमों को पावदी दक्षिण भारत के ब्राह्मणा और प्रवाहाणा के बीच ही नहीं है बल्कि विभिन भद्राह्मण मम्प्रदाया के बीच भी है। इस विषय पर दूसरा भी एक मत है कि भारत के लोग प्रजातीय दृष्टि से मुख्यत द्राविड और मुहा हैं। इसलिए द्राविड पोर मुडा ग्रादि प्रजातिया का हिंदू सस्कृति और सामाजिक सगठन पर गहरा असर है । कोट द्वीप को प्राग्यूनानी सभ्यता के अवशेषों की अत्याधुनिक धानबीन से भी उपयुक्त मत की पुष्टि होती है । परन्तु यह पता नहीं चलता कि "विस प्रकार भारतीय प्रार्यों में जाति-व्यवस्था, पुनजम, कमवाद, मायावाद यादि सिदात्ता के माधार पर अपनी विशिष्ट सस्कृति मा विकास किया । क्यापि यूरोप या एगिया,कही भी भार्यों की अय गासामो में ये गुण नहीं पाए जाने ।' बयोलोन व उर तया मय प्राचीन शहरा की सुमर मभ्यता के विषय में हमारी जानकारी पढ रही है । वहा जाता है कि सुमेर और द्राविड एक ही प्रजाति के लोग थे। अत यह भी अनुमान दिया जाता है कि सुसम्य द्राविडों ने मार्यों से युद्ध में परास्त होपर भी कालक्रम से उनर पर सास्कृतिक विजय पाई । स्लेटर ने अपनी पुस्तक 'द है वोडियन एलिमेट इन इडियन कल्पर म लिखा है कि जानि-व्यवस्था मूलत द्राविड सस्कृनि यो उपज है, जिसे मध- सन्य पार्यों न अपना लिया । अपनी पुरवव एगियष्ट इडियन हिस्टोरिसन ट्रेडीयम' में पानीटर ने लिखा है कि द्राविडगा मायों के पुरोहित यन गए, जानि-पापा जिससे यात्री प्राण जानियाग। ये सब ब्रटी मारपर मोर मोरनर पता किोई पार तय नही हो पाती। शिघु पाटी प्राण पुरातात्वि प्रमाण से सप्टन गिर होता है वि दापिट पौर मुमेर एप ही धै। दूसरी विधारणीय बात यह ह कि मार्यों में मोरो पहले भारत की सीधी, गफा हम मन वि यगनीप मान रही है। मोजायण सिद्धात समाज विभिननतिर स्तरामा पर.गीत परण रा. मोर जाति-म्पयस्या से विएप गएर यस प्रिनिन पिपाह। मे तिरावे हैं, 'पाप या पिमरावत्र माराम म पोग्यता पोर प्रयोपता ये पापार पर जाति या यगत प्रचलिन । मागे पसरही भेग या भानुरि पौर प्रापिय रूप हो गया। उनके मतानुगार मानव-गमाज म मनुष्य पर स्वाभारि मोर उक्ति स्थान उसर यण द्वारा निर्धारित होताह । उनरा पहना है कि व द्वारा लोगों की सामाजिक उपयोगिता पात होती है। पारों वों से पता चलता है निमाजम पौन-स लोग सर्वाधिय सामाजिर प्राणी थे और कौन-रो परयन्त मसामाजिय। स्यम्प गुगमन रामात्र मग मौर पण म कोई मे नहीं होता। डॉ० मौज ने वर-व्यवस्पा की भूरि भूरि प्रासामी है। परन्तु पण पा मया तात्पप है। गया उसग छोटे-बड़े सामाजिक मोहा योष होता है? या दि उसे हम सामाजिर मन नारिवप समूह माने ' यति गुणों में मामार पर सामाजिय' यगो या रागटन मम्भय है तब मन उटना है वि या इम सरह यो सात सभी भारत म यो भी इन प्रना को साईरे लिए हम मनु क मानव घमर की सहायता लेना चाहिए। उसग पात होता है दिसामाजिव दर्जे पव-त्योहार या पानिय नियमान माधार पर पनत थे, विपरिषद प्रापार पर। यह टोर है fr मनुष्य व पवितगत गुण मा अवगुण स समाज में उसका स्थान तय होता है फिर भी यह मावश्या नहीं मिमिी सामाजिक वग म जितने भी व्यक्ति शामिल हा उन सबम एक ही तरह मे गुण पाए जा I सामाजिक स्तर भे- म मनुष्य के व्यक्तिगत परित्र या विश्वास का भी कोई महत्व नही रहा है। रंग "वग्ण व्यवस्पा ना एक कारण रग भेद भी था, क्यादि व पामय ही जाति-व्यवस्था का उन्मूलन और विकास होता है रग ।' ६६ इस मल को भी सवाशत स्वीकार करना कठिन है। वण शद के कितने ही अथ होते हैं, जस वाह्याकृति, रग, जाति, प्रकार- भेद, आदि । मनु ने वरण का प्रयोग जाति के अथ म किया है । श्री एन० के० दत्त और श्री जी० एस० घुर्ये जमे भारतीय विद्वाना न रग भेद वाले सिद्धात का एक प्रकार से स्वीकार भी कर लिया है । पर तु उन्होंने ऐसा कोई एतिहासिक प्रमाण नहीं दिया है जिससे पता चले कि श्वेत रग वाले पार्यों और काले रग वाले द्राविडा में शत्रुता थी । दूसरे क्या प्रमाण है कि प्राय श्वेत ये? क्यावि पार्यों के देवता राम और कृष्ण, मेघ श्याम रग के माने गए है । अस्तु इस विषय की चर्चा हम आगे करेंगे। सिद्धा तो का मूल्याकन हिंदू जाति-व्यवस्था की उत्पत्ति के सम्बध मे प्रचलित सिद्धातो का यथासम्भव सक्षिप्त वणन हम ऊपर कर चुके है । इनम स किमी भी सिद्धान्त को समस्या के समाधान की एकमात्र कुजो नहीं समझना चाहिए । जाच करने पर कोई भी सिद्धात खरा नहीं उतरता । ऐसी दशा म हम क्या करें? पया हम सभी सिद्धान्ता को जोड दें ?-और तब, क्या जानि-व्यवस्था के कारणा का पता लग जाएगा? इस प्रणाली को अपनाने से वस्तुत कोई लाभ नहीं। हिदू जाति-व्यवस्था अनेक प्रकार के तत्त्वा के सयोग से बनी है और इस प्रकार बहुत ही जटिल और सश्लिष्ट हो गई है। इतिहास क्रम से भारत पर अनेक आक्रमण हुए और कितनी ही प्रजातिया यहाँ पाइ। विभिन्न युगा में विभिन प्रकार की संस्थाएं बनी, तरह-तरह की सरकारें बनी और इन सबकी छाप भारतीय समाज पर पड़ी है। इसलिए इन तमाम याता का विश्लेषण करना होगा और तव इस व्यवस्था की विशषतामा की ख्या करनी होगी । भारतीय इतिहास के विभिन्न युगा का अध्ययन करके पता लगाना पडगा कि प्रत्यक युग म जाति यवस्था विस रूप म थी। अब तक इस प्रत वा जो कुछ भी अध्ययन हुआ है उमम युग की परिस्थितिया को पृथक छोड दिया गया है। विद्वाना ने साधारणत कौटिल्य वे अपनास्त्र, मनु व 'मानव घमशास्न', यानवल्क्य की स्मृति आदि प्रथा पर तो विचार किया है, परन्तु जिन तत्त्वो के प्राचार पर इन ग्रथा के निप्वप स्थापित हैं उनकी पार ध्यान ही नहीं दिया है । ये प्राय तो महज घटनामा के समान हैं और जब तक घटनामा की प्रक्रिया का विवेचन नहीं दिया जाता, तय तक पटनाएं प्रथहीन रखती हैं । घटनाए वस्तुत तिथिबद रहती हैं और एक दिन पुरानी पड़ जाती है। दूसरी पार एतिहासिक प्रक्रिया अन्त सलिला जाति-व्यवस्था है जो सस्कृत के 'विग स मिलता-जुलता है। परतु हिन्दू समाज मे वश्य यण ये लोग द्विज ५ । सम्भव है कि प्रारम्भ म बन्य कृषि-वाय दिया करते हो, परतु मार्ग चलवर वे नीचे गिर गए । अब प्रश्न उखना है कि दोन थे। प्राच्य विद्यावे यूरोपीय विद्वान् ऐसा मानते हैं कि गूद भारत के मूल निवागी थे। वे वाल रारे थ। उहें पराजित पर श्वत म वाले मार्यों ने गुलाम बना लिया । मह गिद्धात सर्वात अनुमान पर आधारित है । क्या प्रमाण है कि मूल माय गौर बण थे? ददा म प्राय पण पोर दास वण का वणन है। अय पम प्रथा म भी चार वर्णों का उल्लेग हुया है जिनम चार सामाजिव वर्गों का वोप होता है परन्तु क्या प्रमाण है कि वण का अथ रग है था। जमा कि चूमन बार ने बताया है 'म मानना पड़ेगा कि प्राचीन काल में पजाव मे चारा प्रजाति के लोग रहा करते थे प्रयात् दुब लोग गौर प्रजाति (कारशियन) २ घे कुर लोहित प्रजाति (अमरीकी आदिवासी), युध पात प्रजाति (मगोल) मौर बुध कृष्ण प्रतानि (1) रे लाग धै। यदि गौर वण ब्राह्मण भारतीय-यूरोपाय गौर प्रजाति के लोग 4 और कृष्ण वण वाले गूद्र तव लाल रंग वाले क्षत्रिय और पीले रंग वाले परया का क्या होगा? . यह सिद्धात स्पष्टत असम्भव है। हिंदू धमग्र या न वण भद को रूप माना है, जो एक हद तक विश्वासप्रद प्रतीत होता है । यथा भृगु ने उत्तर दिया परमात्मा न मानव मृष्टि की रचना की, ग्राण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र तथा अन्य वर्गों का निर्माण दिया। माहाणा वारण गौर था क्षत्रियो का लाल यो का पीला और गूदा का पाला।' इस पर भारद्वाज न कहा 'यदि चारा वर्गों का जाति भेट उनके ग के माधार पर किया जाएगा तब सभी जातियो में विपलना दीख पडगी। भगु ने उत्तर दिया, 'जातिया म वोइ भेद नहीं। इम सृष्टि की रचना ब्रह्मा न की और प्रारम्भ में सभी लोग ब्राह्मण थे माग चलकर वे नाग अपने अपन वाम के अनुसार कइ जातियो म बँट गए। जिब्राह्मणा को भोग विलास प्रिय था जिनरी प्रकृति हिंसालु और पोजस्वी थी, जि हाने अपना पतव्य छोड़ दिया था और जिनका गरीर रक्त वण का था व सव क्षनिय बलाय । जो ब्राह्मण पशु पालते थे, खनी करके अपना सवन-यापन करने 4 जिनका मोला या और मिहोने अपने पतन्य का पालन छोर लिया था व वश्य बने । जो ब्राह्मण झूठ बोतन थे, लालची पे, समी तरह व काम किया परत थे, दुष्टता म रत पौर अपवित्र तया काले रग के थे वे सूद्र हुए। इस प्रकार अपने अपन कम के अनुसार ब्राह्मण लोग - जाति यवस्या का उमूलन और विकास विभिन्न जातिया म बेटे, परतु यन करने का अधिकार और वतव्य उनम से किसी के लिए भी सवदा वजित नही हुआ।"' इस प्रकार की अनेक व्याख्याएं हैं । पुरोहित का सम्बध धार्मिक कृत्या से था। इसलिए वे पवित्रता के प्रतीक माने जाते थे। उनका वण गौर बताया गया है। मेवा ाय म गदगी का सस्पश रहता है, इमलिए दास गूदा का रग काला माना गया है। पाय देवताग्रो का गौर वण दरअसल स्पकोक्ति है। कही कोइ प्रमाण नही है कि वैदिक प्राय समजातीय समूह के लोग थे । वनुतेरे वैदिक मृपियो तया अटूनो का रग काता था। इन सबके वावजूद जो लोग प्रजातीय दृष्टिकोण से इस समस्या का विवेचन करते हैं, उह सम्भवत उत्तर अमेरिका और दक्षिण अफ्रीवा प्रादि देशो के वतमान प्रजाति सघप मे प्रेरणा मिलती है। ऐसे विषया पर अस्पष्ट सादृश्य बहुधा भ्रामक होता है। उत्तर पूराप अथवा क्सिी दूमरे ही उत्तरी क्षेत्र से नौ? अथात् प्रादि, पार्यों ने भारत पर आक्रमण किया और यहा के कृष्णवण मूल निवासिया से उनका सघप दिटा, जिसके पास्वरूप वे त्वचा के रंग के आधार पर कई स्तरा म बंट गए। यह सिद्धान्त भी बहुत बडी पूरावतिक (मिथिक्ल) स्थापना है । कुछ लोगा का विचार है कि मूल निवासिया म जिस परिमाण मे पाय रक्त का सम्मिश्रण हुआ, उसी के अनुसार भारताय समान-व्यवस्था म ऊंचा या नीचा स्थान प्राप्त हुआ। इस मिद्धात को माननेवाले लोग उत्तर अमेरिका के वणमरो का उदाहरण देते हैं । परतु वे शायद भूल जाते हैं कि उत्तर अमेरिका के श्वेतागा और कृष्णागा ये सम्मिरण से जो जानियां उत्पन्न हुइ हैं उनके आधार पर सामाजिक स्तरा का निर्माण नहीं हुआ है। "शुद्ध रक्त वाले हन्दी या काड न या भौक्टस्न जमे मिश्रित जाति के लोग वेवल अपनी ही जाति के अन्दर शादी म्याह करते हैं, ऐसी बात नहीं। बल्लि इन मवको एक मिली-जुली 'रगीन जाति' है जो श्वेताग समाज द्वारा वहिप्पत है। .२ रिजले का रह्ना है कि जिस जाति म प्राय रक्त जितनी मात्रा म है, उसके विलोम-कम म उस जाति कोमामाजिक स्थिति निर्धारित है। यदि रितले या यह सिद्धान्त ठीक है तव क्यारर सत्रियों के मुवावले जाट लोग नीची श्रेणी के माने जाते हैं, मोर दक्षिण भारत म प्रव्राह्मण जाति के लम्बडी लोगो का सिर क्याकर पतला मोर लम्बा है और क्योंकर ब्राह्मगा का सिर चौडा पुनश्च मद्रास शहर के ब्राह्मणो की तुलना में वनड वे महता की नाक क्यार पतली है ? इससे स्पष्ट है कि रिजले का सिद्धात मानव शास्त्र द्वारा प्रमाणित नहीं है । रिम्ने जातिव्यवस्था का मत है कि किसी भी जाति का सामाजिक दर्जा उसको नासिका सूचक प्रक के विलोम कम मे रहता है। यह भी सही नहीं ! उदाहरणो से समस्या का समाधान नहीं होता है, फिर भी यदि हम हिंदुओ के वग भेद जसी व्यवस्था कही ढूढना चाह तो वह यूनान, रोम तथा मध्यकालीन जमनी, फास पोर इग्लग्न के इतिहास म मिल सस्ती है न कि उत्तरी अमरिया के भुलेटो और वाड न समाज में । यूनान का समाा सामन्तवादी था, परतु उसम जन-जातीय सामाजिक संगठन क अनेक लक्षण थे। वहा का राजा एक साय ही क्वायली नेता पोर पुरोहित होता था । उसके नीचे अभिजात सामन्ता का दल या। उनके नीचे एथेस के पटा या स्पार्टी के पेरीकाई और हेलौट (रयता) का वग था। उनके भी नीचे दासा का वग था। परतु मानवशास्त्र की दृष्टि से उन लोगा म कोई विशेष मन्तर नहीं था। पेराबाई और हलौट हारे हुए लोग थे। उनके राजनीतिर पातशा के अनुसार ही उनका सामाजिक दर्जा तय हुआ था। रोमन साम्राज्य के प्रारम्भ म भी यही बात दसन को मिलती है। हिंदू समाज का भी प्राय उसी ढग पर विवास हुना। यहाँ आर्थिक हैसियत के माघार पर लोगा की राजनीतिक हैसियत निर्धारित हाने लगी। यूनान म राजतत्र वा अत हो जाने पर राजनीतिक अधिकार अभिजात वग के हाथा मे मा गया। उस वग 4 लोगो ने शासन के अधिकारों के अलावा पुराहिताई के अधिकारों को भी अपने ही हाया में रखने की सोगिकी। इस प्रकार हम देखते हैं कि समाज ज्या ज्या जनजातीय अवस्था से सामन्तवादी अवस्था की पोर वरता है त्या-त्या मामाजिक अन्तर और मसमानता वा भार निम्न और अपक्षाकृत गरीव वर्गों के घा पर पडता है । यूनान मे जव सामतवादी यवस्था पूर्ण रूप स कायम हो गइ तव विभिन बर्गों बीच समान स्तर पर शादी-ब्याह की बात नापसद की जाने लगी और अत म बिलकुल रोक दी गइ। रामन समाज को भी कुछ इसी प्रकार के दौर से गुजरना पड़ा । रोमवाले समभत थ कि प्लवियनो (निम्न स्तर के लोग जनसाधारण) के साथ विवाह करने से उनका रक्त अशुद्ध हो जाएगा और उनके द्वारा अपित मध्य देवताओं को स्वीकार नहीं होगा (देखिये मनु का धम पशास्त्र)। भारत में भी अनुलोम विवाह की अनुमति थी, परन्तु प्रतिलोम विवाह सवथा वर्जित या। मध्यकालीन यूरोपीय समाज में सवत्र तीन-चार वग के लोग थे और उनमे सवस्तिमान् राजा से लेकर रयत और गुलाम उन सबकी सामाजिक स्थिति जाति व्यवस्था का उमूलन और विकास और राजनीतिक अधिकार बंटे हुए थे। इन सब विभेदो के वावजूद, वे सव-के- सब श्वेत अथवा गोरे प्रजाति के लोग थे। इसलिए अचरज की बात लगती है कि यूरोपीय विद्वान् प्रजाति-सघप के दृष्टिकोण से हिन्दू जाति-व्यवस्था का विश्लेपण करते समय प्राचीन और मध्ययुगीन यूरोप के इतिहास की ये बातें भूल जाते हैं । यूरोप का यह इतिहाम असदिग्ध रूप से प्रमाणित करता है कि एव जन-जाति द्वारा दूसरी जन-जाति के पराजित हो जान पर यह अावश्यक नही कि उनके वाच सामाजिव अन्तर की दीवार भी खडी हो जाए। बल्कि बहुत-सी जगहा मे देखा गया है कि आयिक सायनो का आधार खत्म हो जान पर राजनीतिक अधिकार भी दिन गए हैं, जिसरे फलस्वरूप और भी सामाजिक विघटन और पतन हुआ है। महान् पीटर के युग म रस की यही दगा थी। क्या हम नहीं जानते कि राजनीतिक अधिकारा से हीन वहा के रयत लोग कभी मुक्त और सम्मानित नागरिक थे प्राचीन और मध्ययुगीन यूरोपीय समाज मे भनेवानक स्तर बने हुए ये पार उनके बीच अंतरजातीय विवाह और सम्भवत अन्तरजातीय सान पान वजित हो गया था। जमनी मतो कितने हो देवताग्रा के पुराहिता और साधारण-जन के पुरोहितो के बीच भी अन्तर- नानीय सान पान बद हा गया। व्यापारी और प्रौद्योगिर वग वा उदय और विकास होने पर सामाजिक वघन ढाल पडन लग । इतिहास बताता है कि बुजुमा (पूजीपति) वग के उदय के साथ एथेस का व्यापारिक और प्रौद्योगिक साम्राज्य फ्ला। उसने बाद ही राजमत्ता व्यापारी वग ये हाय म मा गई और सामाजिक व धन टूटने लगे। राम मे उद्योगा का विसराम तुपा ही नहीं । सूला और मेरियम का गह युद्ध अभिजात तथा मध्यवों वी आपसी लडाई थी। राम के अभिजात वग ने मन तर अपने या जन-साधारण से पया रखा। शायद यही कारण ह कि इमाई घम की प्रजातात्रि साम्यवादी प्रतिया रोमन क्थोलिक चच की नौररमाहीम तबदील हो गइ। उपयुक्त पवितया में प्रकट है कि हिंदू जाति-व्यवस्था के उद्भव को प्यास्या न तो प्रजाति मिदान मे मिलती है, न रग भेद के सिद्धान्त से और न मन सिसान्न मे ही। उन-जातीय वैदिक युग म जाति-व्यवस्था का कोई चिह्न नहीं था, परन्तु मम मदह नहीं वि समाज कई वर्गो म बटा हुआ था। तब क्या यदवातीन भारतीय समाज उन-जातीय माम्यवाद के दौर से गुजर रहा परतु ऐगी बात भी नहीं क्यापि वदो म राजार का सप्ट उल्लेख है। राजा ने इद गिद सरकार एक गिरोह रहता था। पाग चलकर राज . या जाति-व्यवस्था काग से पुरोहित का कम पथक कर दिया गया। इस प्रकार सनिक साम तो ये वग से पुरोहित बर का उदय हुमा । सम्भवत उस समय तय रयत वग (स्ति और उस्ति) भी विकसित हो चुना या । कालान्तर म व्यक्तिगत सम्पत्ति मा भी कुछ इसी प्रकार उदय हुआ। वेदकालीन राय वयायती या जन-जातीय राज्य था। चोर उन दिनो तर बग जाति म परिणत नहीं हुमा था। भोजन और स्पा-सम्पची निपथ भी लागू नही थे। ऋग्वेद म पात है कि वामदेव नामक ब्राह्मण ने सुधात भवस्था में एक चागल (मन) के पर कुते का मास साया। ऋग्वेद म ही एवं दूमर मृपि ने कहा है मैं चारण हूँ मरे पिता वद्य और मेरी मां पत्थर तोहन वाला। धन प्राप्ति की इच्छा स हम तोग तरह-तरह का प्रायोजन करते हुए पशु की तरह दूसरा का अनुगमन पसे इद्र के लिए सोम रस प्रवाहित हो । ऋग्वरिक माल क उस जातिहीन समाज म धनिका का एक उच्च वग बन गया था जिसे महा कुल या मधवन कहते थे। उन दिना वैश्य वग भी क्षत्रियो स तथा स्वाधीन दो से जोषि खेती तथा मय निम्न कम म लगे हुए थे अपनी रक्षा करने के लिए मापारी संघ बना रहा था। जहां-तहां दासा मा भी उल्लेख जीत है मिलता है। परवर्ती युग अनिवायत वरण सघप का युग था जिसम प्रत्येक वग अपनी प्रभुता स्थापित करन की चेष्टा कर रहा था। राजया (क्षत्रिया) ने दूसरे वर्गों के ऊपर श्रेष्ठता का दावा किया । परन्तु इनके विरोध म ब्राह्मणो का दावा था कि वे राजया के भी ऊपर हैं। इसके अलावा जन साधारण और अभिजात वग म भी सवय चलता था। अनिय-ब्राह्मण समप या विस्तत वरान रामायण म (ग्राह्मणो के दृष्टिकोण स), महाभारत म तथा जन धमग्रय हरिवन और सुभौम चरित म मिलता है। भागवणीय ब्राह्मणों के नेता परशुराम थे और है सवगीय क्षत्रिया के नेता कानवीय अजुन : वीवर और जीमा का मत है कि यह युद्ध वनिक युग और महाकाय युग २ मध्यवर्ती काल में हुआ था। वीवर का बना है कि इस सघम म पुरुरवा मोर नहुप मादि क्षत्रिय राजा ब्राह्मणी पर धार अत्याचार परत थे । क्षत्रियगण ब्राह्मणा का स्त्रियो और गाया का अपहरण कर लते थे । इसी युग में ब्राह्मणी ने ब्राह्मजय स्तोन' ब्राह्मगवि स्तोत्र और शनाद्रीय स्तोत्र की रचना की। पार्जीटर का कहना है कि यह सथप सौ वर्षों तक चला और अत मे ब्राह्मण लोग पराजित हो गए। परतु जीमा का कहना है कि ब्राह्मणो को कुछ सुविधाएं प्रदाय मिल गइ जसे दान लेने का अधिकार प्राणदण्ड से मुक्ति जाति-व्यवस्था का उन्मूलन और विकास मादि प्रादि । इस प्रकार घोर वग-मधप के बाद ग्राह्मणा का पुरोहिताइ पर एकाधिकार प्राप्त हुआ। मेनाट तया दूसरे विद्वान् इस मघप को वग-मधप नहीं मानते । इनका कहना है कि प्राचीन भारतीय ग्रन्या म जाति का उल्लेप नही है, पर तु तत्कालीन समाज मे वग नहीं थे वरिक जातिया ही थी। बौद-युग म क्षनिया ने पुन सवश्रेष्ठ वण होने का दावा किया । गौतम बुद्ध का भी ऐमा ही दावा था। वौद्ध और जैन माहित्य म क्षत्रिय का ब्राह्मण से श्रेष्ठ घापित किया है। उस ज़मान में ब्राह्मणा और क्षत्रिया के बीच घोर शत्रुता थी। दोना म इस कदर भेद भाव आ गया था कि अरीन्दम नामक राजा न पुरोहित के पुत्र को हीनजाति अथवा हीनकुलात्पन्न कहा कोराल के राजा ब्राह्मणो को इतना नीच समझते थे कि अपने ब्राह्मण क्मचारियो से वातचीत करते समय दे बीच में एक पर्दा डाल लेते थे तारि उनका मुह न देखना पडे । माक्य क्षत्रिय जव अपनी मभा मे बठे होते तव मभाभवन में क्सिी ब्राह्मण को प्रवेश करते देखकर वे हंसते-मन लोट पोट हो जाते थे और उसे पीछे ढवेल देते थे। वे उसे बैठने के लिए भी नहीं कहते थे। उनका 'तीय अभिमान और प्रौपत्य चरम सीमा पर पहुच गया था। सस्कृत साहित्य मे प्रनाय शब्द का प्रयोग प्रथम बार इनापूव पाचवीं सदी मे हुआ है। इस शब्द ने प्रजाति-सघप का सिद्धान्त मानन वाला की पल्पना म पर लगा दिए हैं। उनका कहना है कि पार्यों न इस गब्द का प्रयोग भारत के मूल निवामी द्राविडा के लिए किया है। यदि एमा रहता तो इस शब्द का प्रयोग बहुत पहले हुआ रहता । वैदिक युग मे इस शब्द का पता भी नहीं था। इसका प्रयोग यास्क ने अपने निरक्त पौर निघण्टु' म विक्टों (परवर्ती मागधा, अयात् वनमान बिहार के पटना और गया जिले के रहने वाला) के लिए क्यिा था। वीवर का कहना है कि यह शब्द विद्रोही बौद्धा का द्योतक है। ब्राह्मण लाग इन पशब्द का प्रयोग उन मभी लोगों के लिए किया करते थे जो वैदिव नियम अथवा पाय घम का पालन नहीं करते । ८' म्मरणीय है कि उही दिनों बुद्ध अपने घम का प्रचार कर रह ये और मगध वासिया ने उनका घम नबग पहले स्वीकार दिया था। इसलिए ब्राह्मणा न मगर को मनार्यों की भूमि पहना गुरु किया, परतु जन और बौद्धों ने मगध को श्रेष्ठ मार्यों की भूमि पहा । इसमे विलकुल माफ है कि प्राय पद क्सिी प्रजाति का सूचव नहीं, जैमा रि जमन विद्वाना ने सममा पोर प्रयोग किया। इस शब्द या मूसन धामिर भौर माम्वृनिक प्रय था जो मागे घनकर गम्भीर राजनातिर महत्त्व का विषय बन गया।
४. जाति ध्ययस्या इसके बाद ही भारतीय इतिहास या वह युग प्रारम्भ हाता है जबकि पुरोहित वग द्वारा समर्थित पटटरपथी समाज-व्यवस्था के विरुद्ध क्षत्रियो द्वारा समर्थित बहु-जातिक क्रातिवारी समाजव्यवस्था का सपप छिन गया। इस प्रसग म स्मरणीय है पि जन मोर बौद्ध धम के प्रवत्तर पश्यि थे। चय और शूद्र भी इन धर्मों के ससग स भटते नही रह । य दोना धार्मिक प्रादोलन धार्मिक मघप वे माय माय वग-सघप ये भी धोतर थ। यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि प्राचीन या मध्ययुग म वग राघष धार्मिक सपप के रूप म ही सचालित होता था। यह टीय है कि यूनान और रोम जस राया म, जहाँ रानीतिर चतना ययप्ट विवगित हा गर था वग-मथप गुस्पष्ट राजनीतिक पय या अनुगमन करता या। पिन रोमन माम्राज्य प्रतिम दिनो म जगदि दासा तथा निम्न वग लोगा न ईमाई धम या रवीवार पर लिया था भौर मध्ययुग म जयवि सुधारवादी सम्प्रदाया ने रोमन क्योलिक व्यवस्था के विरुद्ध विद्राह या नारा बुलाद दिया था तब क्या वग-राधप ने धामिर स्प धारण नहीं किया था? ८३ सुधारवाटी पाटोलना व मूल मे सवा एतिहासिर एव भौतिक्याटी क्तियां काम करती रहती है। इतिहास थीमाटावादी पौर भौतिकवादी व्याख्यामा या सयोग स्वार्यों की पीठिका पर होता है।८३ बौद्ध-युग म जवकि पागों या घोर सघप चल रहा था ब्राह्मणतर वर्गों ने विस प्रेरणा पर बदाम विरुद्ध बगावत की जन साधारण ने क्यार बौद्ध धम स्वीकार पिया स्पष्ट है कि इस विद्राह के रूप में भारत म पहली बार सामाजिक प्राति का सूत्रपात हुअा था । उस प्राति व मौलिक तत्त्वा को समझने लिए उम काल व इतिहास को जानना चाहिए। मगध म शगुनाग क्षनिया का गासन समाप्त होन पर नद वरा या उन्य हुमा । नता को लोग क्षत्रिय नही मानत थ । जमा वि पुराणा म यणन माया है महापधनद ने धाधियो यो उसाड या। उसने ऐसा क्यापर दिया? इस पर पुराण मौन हैं। परतु पुराणो से इतना अवश्य पात है कि नदवश वाल शुनाग क्षत्रियो की अवध सन्तान थ और महापअनार की मां शूटा थी। सम्भव है कि इसी यारणवा नदवा क्षत्रियो का विरोधी था। चरगुप्त मौय भी नवा की ही सतान था और उसके उदय र साय ामा सत्ता ना के हाथ म घली माई। याद रयने की बात है कि यह परिवतन क्षत्रियो और शूद्रा के बीच घोर सघप के बाद ही हुआ होगा । नय शासर दग ने निश्चय ही अपने को नई क्षत्रिय जाति के रूप म पुरस्थापित किया होगा। पुराणो मे मगध के एक राजा विवाफणि का उल्लेस पाया है जिसके विषय म भविष्य । माति-व्यवस्था का उमूलन और विकास वाणी की गई कि वह क्षत्रिय जाति को पराजित कर कंवों, पको, पुलिदो मौर ब्राह्मणा को राजा बनायेगा। ८५ यह विवशपणि कौन था, इसमे हमारी विरोप दिलचस्पी नही । वह च द्रगुप्त मौय भी हो सकता है या उसी के समान मय कोई 15६ जायसवाल का सयाल है कि वह वनारम का सीथियाई क्षनिय वशफोरम ही था। ८" अथवा वह महापद्मनद भी हो सकता है किन्तु एक यात निश्चित है कि इस सघप के सिलसिले में एक नई क्षनिय जाति का उदय हुआ । इमसे यह भी साबित होता है कि सामाजिक स्तरो वे निर्माण मौर परिवतन म राज्य का बहुत बडा हाय होता है। मौर्यों के उदय के साथ भारतीय इतिहास का दूसरा क्रान्तिकारी युग प्रारम्भ हुआ। पुराणो का मत है कि मौय वश का सस्थापक चन्द्रगुप्त मौय शूद्र था। ब्राह्मण कौटिल्य की मदद से वह मगध का शामक बन बैठा और मन्त मे वेद्रित भारतीय साम्राज्य का प्रथम सम्राट् हुआ जिमने विदेशी गप्ट्रो भी अपना राम्पर स्थापित किया। वेदा म गूद्र राजा 'जनन नि का उल्लेस तो है ही अन एक दूसरा वृपल गूद्र उत्तर भारत वा सम्राट बना। इस गूद्र राजा के शासनकाल म उसके ब्राह्मण मत्री कौटिल्य ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक 'अथशास्त्र लिखी। उसग लिखा है नि जा गूद्र जमतात दास नहीं बल्कि 'पायप्राण है और जो वालिग नहीं हुआ है वमे गूद्र को बेचन या वचक रखने बाले को १२ 'पण का अथदण्ड देना होगा आय को कदापि गुलाम नही बनाया जा सकता। यदि किसी माय ने अपने को बेच दिया है तो उसकी सन्तान मूय वापस करके पुन प्रायत्व प्राप्त कर सकती है यह रात जम- जात अथवा प्रतिथुन दास लिए भी लागू हो सकती है। ८८ यहाँ प्राय पद वा युव दूसग ही अथ प्रतीत होता है। वेदो म इस शब्द का प्राशय पार्मिक और सास्कृतिर था, परन्तु पौटिल्य ने इमपा राजनीतिक अय म प्रयाग किया है । तदनुसार 'प्राय का भय नागरिव है। उस पूर्ण राजनीतिक अधिकारा और क्तव्या से समवित राज्य की नागरिक्ता अथवा सदस्यता प्राप्त थी। कौटिल्य ये उपयुक्त उद्धरण मे यह भी मात होता है कि गूद्र भी माय थे। चद्रगुप्त मौय के बाद दूसरा महत्त्वपूर्ण गासर उमरा पौत्र अगोर टमा। टिल्य ने ग्राह्मण को महिमा गाई थी, और गूग को यद्यपि दासता मे मुक्त खे 'माप माना या, फिर भी उनके प्रति ग्राह्मणा ये मुकाबले मे कठोरता सलाद यो। परन्तु मगर ने सभी प्रकार की यानूनी अगमानाएं ममाप्त पर दी। गुरदमा और राजा के मामले म उसने अपनी प्रजा ये वीच पिसी प्रकार - ४२ जाति-व्यवस्था वा अन्तर नहीं रमा और सबको परावर माना। उसने ब्राह्मणो के विशेपाधिवारा वो खत्म कर दिया और राजवमचारिया को विना विसी वण भेद में नियुक्त किया। यह भी एक कारण था कि प्राग चलवर ब्राह्मणो ने ब्राह्मण सनापति पुप्यमिय के नेतृत्व म मौयवाद विरुद्ध विदाह दिया। मौर्यों की सत्ता उसड गई और पुप्यमिन गद्दी पर वठा । इस प्रकार भारतीय इतिहास म प्रथम बार एक यड भूभाग पर बाह्मणा वा दामन यायम हुमा । पुष्यमित्र गुग ने मोय राणा वय का मारकर उसकी राजगद्दी हथिया ली। उमर ासनकाल में मनु का मानव धमशास्त्र लिसा गया। उसमें पहली बार दावा किया गया कि ग्राह्मण राजा और सेनानायन भी हो सकता है। शूद्रा के प्रति उमम बही कठोरता बरती गई है। उसम स्पष्ट लिखा है कि गूद्र न्यायाधीश के पद पर नियुक्त नहीं हो सकता। परतु इसके पहल एसा कोई व धन नहीं था। गूद्रा को बहुधा यायाधीश नियुक्त किया जाता था बल्कि कौटिल्य के मथगास्य म भी इसका उल्नस है। पुप्पमित्र के गासनकाल म प्र का नामनतर तोड दिया गया और उस स्थान पर प्रतिक्रियावादी ब्राह्मण नौरवाही स्थापित की गई। मनुस्मृति अथवा मानव धमशास्त्र म गूदा और वौद्धो ये प्रति घोर घणा प्रदगित की गई है। बौद्ध प्रवति वाले विद्रोही गूद्रा (अथात् पूर्ववर्ती पासा वग) और क्टटर प्रतिक्रियावारी ब्राह्मणो (नवीन पूर्ववर्ती शासक वग) के पारस्परिक सघप म इस प्र य का विष महत्व है । गुग वा अम्युदय से लेकर गुप्त वंश की स्थापना तक (ईसा के वार दूसरी सटी) उत्तर और दक्षिण भारत म अनेक ग्राह्मण राजा हुए। इसी युग म ब्राह्मणो की श्रष्ठता और पवित्रता का दावा पूणत स्थापित हुमा भौर पहली बार उह प्रथम और सर्वोच्च वण माना गया। जसा कि भूपेन्द्रनाथ दत्त ने प्रश्न दिया है जो पुरोहित वग अपनी परवरिश के लिए दूसरे वर्गों पर निभर करता था वह विना गासन-मता की सहायता व भला किस प्रकार अपन अधिकारो के स्थापित कर सकता विश्व इतिहास में कहा भी पुरोहित वग ने एसे अधिकारो का दावा नहीं किया । यूनान रोम के पुरोहित यहूरियो रवी ईरान ये मगी मिस र पुराहित तथा सल्टो ने 'हइड ने भी एस अधिकारो का दावा पा नहीं किया। हां मध्ययुग म रोमन चच के पादरियो ने अवश्य बुध एस ही अधिकार चलाये लक्नि उन दिना रोमन चच की प्रबल भौतिक राजसत्ता थी जिसके आधार पर उनके अधिकार माने गए। दक्षिण भारत में उत्तर की अपेक्षा उग्रतर जातीयता सदा से विद्यमान रही जाति व्यवस्था का उन्मूलन और विकास है। ऐसा क्यो ? प्रजाति सिद्धात वालो का विचार है कि भारत के पारि- निवासिया ने उत्तर में पार्योद्वारा प्रताडित होकर दक्षिणापथ मे शरण ली। याद रखने की बात है कि शुग-कण्व काल म उत्तर की तरह दक्षिण भारत में भी ब्राह्मणो का प्रवल अत्याचार जारी था। निश्चय है कि दक्षिण की ब्राह्मणेतर जातिया ने महज़ हिन्दू कहलाने के लिए ब्राह्मणा का अत्याचार सहन नहीं किया होगा । वस्तुत दक्षिण भारत मे मातवाहन वश से लेकर विजय नगर साम्राज्य काल तक राजसत्ता ब्राह्मणा के हाथ में थी। स्पष्ट है कि वर्ग-सएप के द्वारा ही किसी वग (या उसकी प्रस्तरीभूत सना-जाति) का सामाजिक दर्जा निर्धारित होता था । बगाल के इतिहास से यह बात और भी साफ़ हो जाती है । वहा के वोद्धा की राजसत्ता उखड जाने के बाद वे सब के सब अछूत हो गए । अनाचरणीय वग के जितने भी अवशेष पाज मिलते हैं, वे सब किसी काल के विस्मृत वौद्ध हैं । हि दुप्रा का राजत्व समाप्त हो जाने के वाद वगाल के निन लोगा ने न तो ब्राह्मणवाद को क्यूल क्यिा और न इस्लाम को, बल्कि अपनी पुरानी पूजा-पद्धति कायम रखी, वही आज अछूत कहलात हैं।' इतिहास में इस तरह के अनक उदाहरण मिलेंगे। आधुनिक युग म भी यह सिद्धात काम कर रहा है । गूजर पान शूद्र कहलाते हैं । परतु प्रतिहार, जो कि उनके पुराने सगे सम्बधी है, राजपूत (आधुनिक क्षत्रिय) कहलाते हैं । सिंघ (पाकिस्तान के जाट इन्न कासिम के समय में अशौच शूद्र माने गए, परन्तु उत्तर राजपूताना में उनके सग-सम्बधी प्राज क्षत्रिय होने का दावा कर रहे हैं । सथाल परगना (विहार) के मुइयां अपन को क्षप्रिय मानते हैं, जबकि बगाल के भुझ्या नीच जाति के गूद्र माने जाते हैं । तात्पय यह है कि जब जिस जाति का यथेष्ट माशि मिल जाती है, तब वह अपनी श्रेष्ठता का दावा परन लगती है । वग विभेद को जड में मायिक असमानता रहती है और जब कोइ दग जाति बन जाता है तव व ही आर्थिक गक्तियां उसका सामाजिक दर्जा भी निधारित करती हैं। भारत के चारा वण निश्चय ही चार प्रकार को मनुष्य-जाति के सूचक नही थे । वे प्रजातीय तत्त्वो या प्रतिनिधित्व नहीं करते । एक क्षण के लिए मान लीजिय कि ब्राह्मण, क्षत्रिय मोर वैश्य-इन तीन प्रयम वर्गों के लोग एर प्रजातीय तत्व के प्रतिनिधि थे और उहाने अपने को द्विज माना। उसी प्रकार उनके द्वारा पराजित भारत के मूल निवासी दास या गूद्र बहलाए । यह पात यदि मच है तय फिर ऊपर के तीन वर्षों में कौन छोटा है और कौन ४४ जातिव्यवस्था बडा-~~-इम सवाल को लेकर क्यामर सपप हुआ ? वश्यो को द्विज समुदाय में क्यापर सबसे नीचे जगह मिली प्रमवा क्या अभिमात यग के लोगो ने वाणिज्य व्यवसाय म लगे व्यविया के प्रति चिरपोपित मवना के यारण वैश्यो यो निम्न श्रेणी म स्थान गिया? प्राचीन भारत म वैग्यो यो धाय कहा जाता था। और जो वश्य और गह एक साथ एक ही माथिक क्षेत्र म काम करते थे उहे शूद्रायु कहा जाता था। प्राग चलवर वश्य क्वल व्यापार वाणिज्य में लग गए पौर कृषि यम तथा पशुपालन का काम त्याग यिा। कुछ दिनो वाद व लोग शक्तिशाली श्रष्ठि बन गए। उनके मन प्रभावशाली सघ थे । वेदा म उनकी मच्ची गति थी। मत म वय वोद्भव हपवद्धन ने उत्तर भारत म अपना प्रबल साम्राज्य भी स्थापित पर लिया। इस साम्राज्य की सीमा पामू दरिया से लेकर समुद्र तक की हुई थी। वैश्या के बाद राजसत्ता शूद्रा में हाय म मा गई। पजाय तया प्राय स्थानोम ऐस अनक समुदाय थे जिहें प्रहिंसा म विश्वास नही था। बसे लोग जनता की नज़र म गिर गए। गा की तरह वे भी होन भणी म गिने जाने लगे। इस प्रकार वश्य और गूद एक सामाजिर स्तर पर मा गए । परतु वदन वा की स्थापना के साथ वरया का उदय प्रारम्भ हुआ। इससे स्पष्ट है कि यद्यपि वश्य प्रथम तीन वर्षों म एव थे, उनकी वास्तविक स्थिति गदा जसी थी। पर तु पाथिर और राजनीतिक शक्ति बढने पर उनकी सामानित स्थिति भी उची हो गर । अब देखना चाहिए विगढ़ कौन थे। शूद्र क्या मानवशास्म का कोई दार है अथवा इसका कोई मार्थिक पा सास्कृतिर पथ है ? ध्यान देन की बात है कि ऋग्देट से लेकर रपुन दन तक जस-जस हम माधुनिक युग की पार बढने लगत हैं हम देखते हैं कि गूदा के प्रति ब्राह्मणा की असहिष्णुता बढती जाती है। कौटिल्य का प्रथशास्त्र उनके प्रति यदि महार नहीं है तो कुछ उदार भी नहीं है । मोर मनु को तो उनके प्रति घोर पापो था हो । गौतम, वौधायन, मापस्तम्ब स लेकर कुल्लर भटट और रघुन दन तक जितने भी घमशास्त्र प्रणीत हुए उन सबम गूदा वे प्रति ब्राह्मणो की कठोरता उत्तरोत्तर बढती गइ है।3 भोधापन न ब्राह्मण और गूर के बीच विवाह की अनुमति दी थी। प्रापस्तम्ब ने लिसा कि शूद्र अपने (उच्च जाति के) स्वामी लिए माय को निगरानी म भोजन यनावर दे सकता है। उसने मह भी कहा कि स्तियो और गो में जितना कुछ परम्परागत मान है वही उनके लिए विद्या री चरम सामा है। श्री बी० पी० पाने का ४५ जाति-व्यवस्या का उमूलन और विकास खयाल है कि बोधायन और प्रापस्तम्ब ईसा पूर्व ६.० स ३०० वप के बीच अर्यात् वेदोतर काल म हुए थे। वशिष्ट ने अतरजातीय विवाह के विरुद्ध मत दिया । उमने हा को वैद पढने से मना किया, बल्कि यह भी कहा कि गूदा की उपस्थिति में किसी को भी वेदपाठ नहीं करना चाहिए। कान का विचार है कि वशिष्ट का जन्म ईमावे वाद पहली शताब्दी में हुआ था। महाराष्ट्र के नागभटट और वगाल के रघु- नन्दन मुसलमाना के आक्रमण के बाद हुए । उन लोगा ने बताया कि भारत में दरअसल दो ही नातिया यो-ब्राह्मण और गूद्र । उनके अनुसार सभी ग्राह्मणेतर जातियां महज गूद्र हो गई। यदि शूद्रगण वास्तव म किसी दूसरी प्रजाति के थे- यदि वे सचमुच के पराजिन आदिवामी थे-तो निश्मय ही प्रारम्भ में मर्यात् मार्यों की विजय के तलाल वाद उनके और मार्यों के बीच उप गता रही होगी। मा चलकर सम्मिश्रण के जरिए पता को भाग पोर पोर गान्त हुई हागो । रितु बात यहाँ कुछ उलटी ही दीखती है । एसा नया प्रान है कि मृद्र ये कौन ? क्या भारत के मूल निवासी थे? क्या वे मार्यों के समाज में निम्नतम श्रेणी के लोग य? अयवा क्या वे प्रारम्भिक वैदिक युग के दस्युओं और दासा की सन्तान थे? इन सब प्रश्ना की अब तक माई नहीं हो सकी है। वदिन इटैक्स' म लिखा है कि ऋग्मद मे दम्युमों का भौति दासा का भी दानव रूप में वर्णन पाया है । परनु कितने ही स्थलों पर एसा वणन मिलता है जिसस जान पडता है कि वे मानव थे और पार्यों के पौर गये । भियत्र ऐसे भी प्रमग हैं जहां गूद्र को सोमयन म स्थान दिया गया है। प्राचीन प्रया में सम्मन शुदा का भी वणन पाया है।.. उना राजमनी ये स्पम भी टल्लैस है।.' बोद्ध प्रगाम रहे गृहपति' पहा गया है । विपि-साहित्य म गूद्र राताम्रा का भी जिक्र मिलता है। 'वयर महिना' भोर 'तत्तरीय सदिना' म गूदा और मार्यों र प्रनि अपरायों भी चचा पाई है।' २ 'ततरीय महिता' म गूदा को उनति के लिए प्राथना की गई है। प्रयवबर और 'दाजानेयो सहिता' म मात हाता है दि लोग माय मोर गृह, दोना के प्रिय पात्र हाना चाहत थे।" "सूत्रा न स्वीकार दिया है निगूद्रों को वापि य-व्यापार करने का अधिकार है।" यजुर्वेद सहिता मे गूदा और मार्यों में बीच अवध यौनाचार रा उल्लेस है उपमुक्त पक्तियों से पूदों की सामाजिर स्थिति को दो मलर मिलती है, वह प्राह्ममा भी सदान्तिक विवेचना से सपया भिन्न है । इमामों से पृयक् जाति व्यवस्था विसी मप पजाति में लोग थे, ऐसा मानना सम्भव नहा दोसता। सुप्रसिद्ध पुरुष सूक्त म यही बताया गया है कि सभी पातियाँ ग्रहा से ही प्रादुभूत हुइ । कौटिल्य ने स्पष्ट रूप से चूला को माय माना है। पूलीप सबसे बड़े शत्रु, मनु ने भी नहा रहा है कि वे माय नहीं थे। चारो वर्षों के पूर पुरुष 'मनु हो थे । 'मधि महिता म सर, पान, चाडाल मौर म्लेच्छ सवो बाह्मण यश का माना है। सूदा को सामाजिक स्थिति निर्धारित करने में लिए हमेगा 'घमात्रा का हवाला दिया जाता है । वे निश्चम रुप से शुदा ये प्रति योर है । पितु 'घमात्रा प्रणेता ब्राह्मणा ने क्या त्रिपा और पाया के लिए भी कोई सदभावना दिसलाई है । इस दृष्टिकोण से 'पE TERE या अध्ययन मब तक नही हुमा है । मन भाइये हम लोग उनको दुहराए । किमी क्षत्रिय या वश्य न यति किसी प्रकार से किसी ब्राह्मणी वा राग प्राप्त किया है, तो उस एव' मास नक यव थोर गामूत्र पर रहकर प्रायश्चित करना चाहिए। यदि विमी नीच जाति की स्त्री प्रति माई भारपित होता है तो यह काइ अपराध नहीं । परन्तु कनी जाति की स्त्री प्रति इस प्रकार के भाव प्रस्ट करना अपराध माना जायगा और उसकी मजा प्राणदण्ड होगा।' यह दर भी वर्णों की श्रेष्टता का ध्यान रखकर दिया जाएगा। ब्राह्मणो का मन लन बाला दरिद्र होता है । क्षत्रिय का अनसने वाला पशु समझा जाता है और वयामा अन लनवाला ए हो जाता है। और, द्र का मान ग्रहण करने वाला तो सोये नरक जाता है।"" ब्राह्मण का दिया हुमा भान मासा जो मरता है वह अमरत्व प्राप्त करता है । क्षत्रिय का भात सापर मरनवाला भाले जम म दरिद्र होता है। वश्य बारिया भात खाकर मरनेवाले व्यक्ति को अगले जन्म म शूद्र का भात लाना पड़ता है। और शूद्र का भात सादर मरनेवाला अगले जन्म म नरव की पल भोगता है ।।१२ गोमास या बाडाल द्वारा राधा हुमा भात खाने वाले ग्राह्मण को चाहिए कि वह एक गाय दान बरे मश्रिय दो गाय दान करे, वैश्य तीन गायें और गृह चार गायें। सभी महापातको (बाह्मणो को छोडकर) प्राणदण्ड + भागो हैं । ब्राह्मणो यो बिसी भी प्रकार पा शारारिक दण्ड दिया ही नहीं जा सकता। बाह्मण को निदा करने वाले क्षत्रिय को एक सौ पण का जुर्माना होगा और अश्य को १५० से लेबर २०० पण का। परन्त गुद को पारीरिक दण्ड सहना जाति व्यवस्था का अमूलन और विकास पडेगा! १५ क्षनिय का अपमान करने पर वाह्मण को ५० पण का जुर्माना होगा, वैश्य का अपमान करने पर २५ पण का और शूद का अपमान करने पर १२ पण का। इस प्रकार के अनेक दृष्टान्त है जिनस नात हाता है कि ब्राह्मणो को छोड- पर भय क्सिी जाति की सामाजिक स्थिति अच्छी नहीं थी। परन्तु ये घम- शास्त्र महज धमशास्त्र ही तो हैं जिनमे विधि और दण्ड की असमानता के अलावा और है भी क्या? समाज ज्यों ज्या जन जातीय व्यवस्था को छोडकर सामन्तवादी व्यवस्था अपनाता गया इस प्रकार की असमानताएँ और दण्ड की कठोरता बढ़ती गई। साथ ही यह भी मर है कि प्रथमता और रासता यदि अविष दिना तक पुराहित जाति के हाथ में रही नही होती ती इस प्रकार की बात नहीं हो पाती। हमन पूव पृष्ठा म देखा है कि चारो जातियो म स प्रत्यक ने किसी न किसी समय राजसता अवश्य प्राप्त की। परन्तु माम बाणा की बारी आई, और हिदू शासनकाल म उहाने ही सर्वाधिक समय तक राजलक्ष्मी का उपभोग दिया। उनके ही राजत्वकाल में भमन या म सब फेर-बदल किये गए । वाद मे मुसलमानो का प्रारमण हुमा और तर ब्राह्मणी के विय का काई इलाज नहीं हो सका। आर की पत्तिया से स्पष्ट हो जाना चाहिए कि हिन्दू जाति-व्यवस्था प्रनानि-मघप के कारण उत्पन नहीं हुई, और न जातिया का सामाजिक मान पार रक्त के अनुपात पर निधारित किया गया । अमेरिका तथा प्रम दशा को मिथित जातिया से हिन्दू जातियों की तुलना करना व्यय है । वेदा म वण (ग) का उल्लेस पाया है। ""हम नही जानते कि भारत में प्रयम वार प्रया करने वाले मार्यों की कौन सी प्रजाति थी और न हम यही जानते हैं कि वतमान पाल को जातिया मे से दिमम किस प्रजाति का कितना तत्व धुला मिला है। इसलिए हम लोग कह सरते हैं कि वैदिर काल तया वदात्तर पाल वा वगभेद येवल सामाजिक अतर का सूपर था। हमने देशा है कि हमेशा भपसत्ता और राजसता के पापार पर हो सामाजिर मान मर्यादा निर्धारित या जातो यो । पूर्वपृष्टो म हमने राजनीतिक मान्दालना को एक बार देगी है । अब हम यह देखना चाहिए कि सामाजिक भेटभाव का कौन-सा मायिक प्राधार है। साधारणत हिन्दू समाज के पार भाग थे-बाहाण, सत्रिय, वैश्य मोर मा। परन्तु वास्तविर जीवन म भनक नातियाँ यो । मनुस्मृति म मनु ने भी जाति-व्यवस्था उसन लिखा है कि "उन दिना प्राधिक वारणवश किंवा यग स्वार्यों की रक्षा के लिए व्यावसायिक सघ बने हुए थे परन्तु इन सघो की परम्परा भारतीय संस्कृति वे प्रारम्भिक दिना से चली आ रही थी । जातयो मे जिम युग वा वणन है उसके सम्बध म हम किंचित् विश्वास के साथ वह सकते हैं कि उन दिनो व्यापारी वो के यवसायगत सघ बने हुए थे और जसे-जसे व्यापारिक सम्बध विकसित होगा गया वस-बसे सपा का महत्त्व और उनकी मातरिव एकना भी बनी गई। परम्परागत संघटन और पित्रागत सहायता के कारण य सघ जातिया स मिलते-जुलते थे। इसलिए माग चलवर उनम भी शादी-ब्याह और सान पान-सम्बधी ऐसे रीति रिवाज चल पड़े, जो वास्तव म जातिया के अनुरूप थे विशेषकर ब्राह्मण जाति के । इस तरह, धीरे धीरे इन सघा ने मायुनिक जातिया का रूप ग्रहण कर लिया। उत्पादप वग की जेट्ठ नामक संस्था हुमा करती थी। इससे हम अनुमान पर सकते हैं वि व्यापारी वग वी तरह उत्पादक वग का भी राप होता था। स्थानीय तौर पर वाम का बँटवारा, पित्रागति के प्राधार पर अपना यवसाय ग्रहण करना तथा हर व्यवसाय म एप बुजुग या होना-इन तीन बातो से स्पष्ट पात है कि प्रत्येक हस्त शिल्प के लिए एक सघटन होता था जिसकी हम अपने (यूरोप के) मध्ययुगीन निगमो से अनेक प्रगाम तुलना कर सकते हैं। इस तरह स शतादियां बीतती गइ । ति सिद्धात उत्तरोत्तर--बौद्धमतावलम्बी क्षेत्रों म भी-जड पदइता गया और उच्च जातिया की ऐकातिक्ता और मर्यादा भी प्रमश बढती रही। उसी अनुपात म उत्पादका के निगम भी जाति व्यवस्था के दायरे म पात गए । अभिजात वुलो भोर ब्राह्मण जातियो की देखादेखी इन निगमो म भी तरह-तरह की पावरियां लगने लगी। निगम के जो सदस्य अपने हीन मूलवश के कारण मानव-समाज की निचली सीढी पर अवस्थित माने जाते थे अर्थात् जिनकी जाति छोटी समझी जाती थी, उनके साय एक तस्त पर बठना या एक पासन पर भोजन ग्रहण करना वजित हो १२८ ऐसे ही व्यावसायिक संघटन में मनु की मिश्रित जातियों का रहस्य खुलता है । जातियां चारा वर्गों से अथवा उनके सम्मिश्रण से उत्पन नही हुइ । वे मूलत विशिष्ट सामाजिप समूहा की धोतर थी अथवा बना चाहिए कि जो विभिन्न सामाजिक समूह य प्राग चलकर उनकी अलग अलग जाति बन गइ । मौयकाल म (ईमापूव ३२१ से १८५ वष तक) व्यावसायिक सघो का खूब विवास हुमा । कौटिल्य के प्रयास्त्र मे क्षनिया के यावसायिक सघ वा जिक्र मिलता है।' २९ उन गिना उनका व्यवसाय युद्ध और गया।
जाति-व्यवस्था का उभूलन और विकास व्यापार, दोना था। परतु यदि यह न माना जाए कि शिल्प-सघो म, जोकि उत्पादको और मजदूरो का सघटन हुआ करते थे, शूद्र को भी सदस्यता प्राप्त थी, तो मानना पडेगा कि शूद्रा के संघटन का कही कोई वणन उपलब्ध नही ।१३° पवद्धन के जमान म जव वश्या ने अपने को 'शूद्रायुप्रा' से पृथक कर लिया तो शूद्रो ने अपना अलग व्यावसायिक सघ बनाया। उनमे बढई, नाई, बुनकर, मृतिकार और क्सिान आदि पेशेवर लोग थे । शूद्रो के नीचे भी अनेक लोग थे जो टोकरी बनात थे, चमडे का काम करते थे या वतन गढते ये 113 उपयुक्त विवेचन से यही निष्क्ष निकलता है कि हर पेशेवर जमात की अलग जाति थी। जिस जमात का पेशा जितना हो हीन होता था, उसकी सामाजिक हैसियत भी उतनी ही नीची मानी जाती थी।
मध्याय ४
जाति-व्यवस्था का इतिहास
वरिययुगीन भारत म तथा पावरतारालीन रान म समाज वर्षों में बेटा
हा या प्रारम्भ म तीन हो वा धे। बोया ग मागे पसर बना । जसा कि
सेनार ने लिखा है कि ईरान के चारा पिरा और हिन्दू समाज के चारायण!
में एक महत्वपूण समानता है। सनाट तथा दूसरे विद्वाना ने स्वीकार
रिया है कि वण वरतुत का वा द्योता था जाति या नहीं। परन्तु सेनाट
का कहना है वि यरमी वदिक युग म वण हो सहि होरर जाति वन गमा ।
पत हम दसना हिए वि बिभि न युगो म हिदू जाति व्यवस्था का विस
प्रकार विकास भा है । इस विषय में सम्पर अध्ययन के लिए हम भारतीय
इतिहास को वैदिक युग से लकर मची शासनकाल तक दस युगो म बाट
सकते हैं
(१) वैदिक युग
(२) उत्तर पदिक मुग
(३) मोय युग
(४) शुर-कण्य युग
(५) प्राध-कुषाण युग
(६) भारशिव-वाकातक युग
(७) गुप्त युग
(5) बखन युग तथा परवर्ती युग
(E) इस्लाम का भाक्रमण तथा परवी गुरु
(१०) ब्रिटिशासनमाल।
पदिक युग (ई० पू० ३०००ई० पू० ६००)
वदिम युगीन समाज अस्थिर और पापावर था। वैसे समाज म पियागति
पर भारित विशिष्ट सामाजिक सम्हो वा होना असम्भव था। जो भी समूह
थे वे कायकारी थे। इसी प्रकार दिन देवतामा के मी पण ये, यथा, पग्नि
नाति-व्यवस्था का इतिहास और वृहस्पति ब्राह्मग इद्र, वरुण और सोम क्षनिय, वसु रुद्र, आदित्य, वैश्वदेव और मस्त आदि वैश्य, और पूपा आदि गूद थे। महाभारत मे भी लिखा है कि "इनमे प्रादित्य ब्राह्मण हैं, मरद्गण वश्य हैं, अश्विनीकुमार शूद्र हैं और अगिरा से उसन देवगण ब्राह्मग हैं । इस प्रकार देवनामा के भी चार वण हैं।" देवताया के ये चारा वण उनके कार्यों के आधार पर बटे हुए थे। ऐतरेय ब्राह्मण की निम्नलिखित पक्तिया से यह बात साफ हो जाएगी--ब्रह्म- वादिया ने कहा है कि इस यन मे देव वैश्या की पूजा होगी, काल्पनिक देव- वैश्या की उपासना करके मानव वैश्य धनवान बनते हैं। " पहले वताया जा चुका है कि वदिक काल मे जनसाधारण को 'विस' क्ढे थे। उन दिना खूब मार काट हुई थी। इसलिए लोग विभिन्न वश और वों में बंट गए थे और अपने को राजन्य कहते थे। ये रानन्य सामूहिक रूप से क्षत्रिय कहे जान लगे । हम ऐमा भी पाते हैं कि क्षनिय राजा स्वय यन क्यिा करते थे । पुराहिता को उह कोई आवश्यकता नही थी । वशावलि से मालूम होता है कि ब्राह्मण और क्षत्रिय एक ही परिवार से उत्पन्न हुए थे। राजा रितिमेन का एक पुत्र देवापि ब्राह्मण था और दूसरा पुन शान्तनु क्षत्रिय और उन दाना ने जनता के शोषण के लिए क्रमा ब्राह्मगा और क्षत्रिया को सटिन रिया-'पुरोहिता को सुरढ करा क्षत्रिया को सुदृढ करो' यह उनका नारा था। उन दिना प्रत्येक जन जाति म कुछ भाट परिवार रहते थे, जिनका काम राजा और जनता के वीर कर्मों का प्रास्ति-गान करना था। म्यार न लिखा है कि ऐसा लगता है कि ब्राह्मण गद स पहो मृपि और कवि का बोध होता था। आगे चलकर उसका अय हुना यन कराने वाला पुरोहित । अन्त म पुरोहित का भी एक निश्चित प्रय हो गया। कालान्तर म गायक भाट राजामो के लिए नितान प्रावश्यक हो गए। पुरोहित के बिना सम्पन हुए यत म अपित हविष्य को देवगण ग्रहण नहीं करते, इसलिए जो कोई भी राजा यन करता, उसे ब्राह्मण पुरोहित रसना पडता था। अनुमान है कि हिन्दू समाज म पुरोहिता का दल उसी प्रकार से उठ खडा हुप्रा और कालान्तर म वे इतने गक्ति सम्पन हो गए कि ब्राह्मण देवता' भी इस प्रकार 'विस' से ग्राहाण और क्षत्रिय, दा बग निक्ले । गेप बचे जन- साधारण जो वश्य पहलाए । उनरे लिए दूसरा कोई चारा भी नहीं था। पहलाने लगे जाति-म्यवस्था वे पूर्ववत् पि काय म लगे रह । उनका वग मपया सुविधाहान था, जिस पर क्षत्रिया और ब्राह्मणो का दुहरा प्रभुत्व चलता था । जव ऊपर वे दोनो वर्गों ने अपने अपने व्यवसाय को वशानुगत बना लिया तब वैश्य सेतिहरा मौर पशु पालको ने अपना सपटन पहले वशानुगत रूप म नही बल्लि गिल्ड (सामू हिक सहारिता) के आधार पर वाया। मागे चलकर, अपने नातिमय सैनिक व्यवसाय के कारण वश्यगण समाज वल माने जाने लगे। इस लिए अथववेद म निम्नोक्न प्रकार स वर्गीकरण दिया गया है--ग्राह्मण क्षत्रिय पौर बल ।'• शूद्र का वश्य के साथ गूद्रायु नाम स उल्लस हुमा है। इस समाजतन के बाहर रहन वाले वगविहीन लोगा का नाम 'वान्य' था। जीमर पा मत है वि प्राव्यगण भी माय ही थे, परन्तु उन्हाने याह्मणता को स्वीकार नही किया था। बाद में शायद उनके लिए ही मनु न मिषित जाति का प्रयोग किया है। भव विचारणीय है कि इन वर्गों की समाज म क्या दापी प्राचीन समाज म व्यक्ति की स्थिति अथरण्ड के परिमाण पर तय होती थी। वर्गों की सामाजिक स्थिति वा माप भी यहा था। भग्वेद म उल्लस है कि एक प्रादमी की १०० गाए थी। यजुर्वेद में भी यही सख्या उल्लिसित है। किन्तु वण भेद का कही कोई उल्लेख नहीं है। Wer geld से आदमी के सामाजिक वग का कोई सम्बध नही था। इसका मथ है कि उन दिना समाज में बग विभाजन का रूप रद नहीं था। तब क्या क्सिी व्यक्ति के लिए दर-परिवतन करना सम्भव था? अर्थात् क्या कोई मान्भी एक व्यवसाय को छोडकर दूसरा व्यवसाय ग्रहण कर सकता था। उस समय तर व्यवसाय वशानुगत नही हुआ था। प्रमाण है कि एक पि स्वय पवि थे उनव पिता बध थे उनकी मां अनाज पीसने वाली थी। "क्षत्रिय राजा विश्वराट की क्या तो प्रसिद्ध ही है कि वे किस प्रकार क्षत्रिय से ब्राह्मण ऋपि विश्वामित्र बन गए । उसी प्रकार यानवल्क्य के उपदेदा से राजा जनर भी ब्राह्मण बन गए इस तरह अनेर ब्राह्मणो ये क्षत्रिय वन जाने के भी उदाहरण मिलते हैं । वसे ब्राह्मण ब्रह्म-क्षत्रिय कहलात थे। इन ब्रह्म-क्षत्रियो के विषय में मत्स्यपुराण म लिखा है-- - वाला ने, जिनका कि भृगु वश (एक ब्राह्मण वश) म उत्पन्न होना है राज्य-गोत्रो की स्थापना की। पुनश्च भगिरा वे वराज कण्व ये। और वे क्षत्रिय वादे पौर उत्पन्न हुए थे।" वश्या, कपिसा गाया, प्रियम्बदा और मौद् 'म भी यही बात है । ५ पुराणा म क्या प्राई है रि वशाल ।
जाति-व्यवस्था का इतिहास २१ एक क्षत्रिय राजा भालानन्द वैश्य हो गया। यह भी ना हवि 'मुग्वेद' मे तीन वश्य मत्रकार ये-भालानद, वत्स या वासव और सक्लि । पुराणा में लिखा है कि य वैश्य ब्राह्मण बन गए। इस तरह वैदिक वाङ्मय से व्यवसाय-परिवतन के रूप में वग परिवनन के अनेक प्रमाण एकन क्यि जा सकते हैं। शतपचनाह्मण म श्यापरस याक्यान ने अपनी सन्तान के विषय में ऐसा कुछ कहा है जिससे प्रतीत होता है कि वे लाग अभिजात सामन्त बन सक्ते थे, पुरोहित वन सक्त थे अथवा साधारणजन भी रह सक्ने थे। 'ऐतरेय ब्राह्मण' मे विश्वान्तर स कहा गया है कि उसन यदि गलत अध्य दिया तो उसकी सन्तान अय तीन जातिया का हो जाएंगी । मुग्वेद' के अद्रूप पि ने क्थन से मालूम पड़ता है कि मानो वे राजा हो जाएंगे। अनेक उदाहरणा मे स इन कुछ एष उदाहरणा से म्पष्ट हो जाता है कि कोई भी व्यक्ति अपने पो और वग को बदल सकता था। इस काल के पतिम चरण म, ब्राह्मण ग्रथा से हम ब्राह्मण जाति की वग चेतना का प्राभास मिलता है । 'ऐतरेय ब्राह्मण' मे ब्राह्मण को क्षत्रिय तया अय वगों से श्रेष्ठ पहा गया है ।२२ तमिरीय ब्राह्मण' म ब्राह्मण वग का ईश्वर और गूदा रामसुर कहा गया है ।२ कोपोतिको ब्राह्मण' म ब्राह्मण का दव या देवाधिदेव कहा गया है । 'तपय ब्राह्मण' म ब्राह्मणा न अचा दान, भजेयता और मवध्यता मादि विशेष सुविधाया की मांग की है ।२५ इस स्थल पर ग्राह्मणा और क्षत्रिया के नीषण वग-मथप का भी उल्लख है । इसका प्रधान वारण गायद ब्राह्मण की म असम्भव मांगें ही हो सकती हैं। रामायण में ब्राह्मण परशुराम और सत्रियो के बीच युद्ध को क्या प्राई है। अन्त में ब्राह्मण हार गए, परन्तु इसम कोई सन्देह नहीं कि उन्हें अनेक सहूलियतें भी प्राप्त हुइ । गाम गास्त्री लिखन हैं वि राम से पराजित हाकर परशुराम कुछ ब्राह्मणा के साथ दक्षिण की मार चले गए । दक्षिण भारत के नम्बूदिरी ब्राह्मण उन्ही ब्राह्मणा के वाज मान जाते हैं । सर, जो हा अन्तिम दिना म पुरोहिताई बानुगत हो गई थी। तब ब्राह्मणगण रका की शुद्धता पर विशेष रूप से ध्यान देने लगा। वम ऐतुम को जुमारी और दासिपुत्र पहार ताना मारा गया है, हालांकि ग्राह्मण भी उमी जादूगरी व कायल थे । वाम पर गूदा स उत्पन्न होने का माराप लगाया गया और समुचित पुदीकरण के बाद ही उमे स्वीकार किया गया २" हम जावाल के पुत्र पत्पकाम की या भी मालूम है । मत्पकाम दासी के गम से उसन्न हा मा भी पाम नही पा कि कौन उसका पिता है। यह बात उसने भोर रसे यह जाति व्यवस्था साफ-साफ बता दी, तभी हरिद्रुमत गौतम ने उसे अपना गिप्य बनाया । शिष्य बनाते समय हरिदुमत गौतम ने कहा कि एक ब्राह्मण-पत्र ही अपने सम्बध मे इतनी कठिन वात इस स्पप्टता से कह सकता है ।२८ इस काल म जाति-व्यवस्था नहीं थी। उन दिना ममाज मे वे शत नी नहीं थी जिनके कारण जाति-व्यवस्था जसी सस्था बन पाती है। विभिन्न वर्गों म बिना किसी वाघा वे गादी होती थी। क्षत्रिय राणा रयनिधि ने अपनी यया ब्राह्मण समाश्व को दी था।२६ ब्राह्मण वृहस्पति न अपनी रया रोमसा का विवाह क्षत्रिय राजा सवनय भवग य स पर दिया था। टिज और शूद्र के बीच मी विवाह-सम्य च हुआ करते थे। द्विज पुरप गूद्रानो से विवाह करते थे।" और उसी प्रसार गूगण द्विज जगति की स्त्रियो से । ३२ वेदो म अन्तरजातीय भोज को भी कहा वजना नहीं की गई है। नाम शास्त्री लिखत हैं-प्राग्बौद्ध युग म हि दुआ म मान पान और शादी-ब्याह के सम्बध में ऐसे कोई नियम नहीं थे जिनसे अन्तरजातीय भोजन और विवाह का निपध होता।३ (२) उत्तर वदिक रग उत्तर यदिक काल का सामाजिक इतिहास ब्राह्मण और क्षत्रिया के वग सघप का इतिहास है । उही दिना राज वेन ने पुरोहितो को यज्ञादि कम करने से रोक दिया था राजा पुरुरवा ने ब्राह्मणो के माभूपण छीन लिए थे भौर नुहुप ने एक हजार ब्राह्मणा से अपनी शिविरा सिंचवाई थी। ये कथाए वेता तथा तरुद्रीय ग्राह्मजय और ब्राह्मगवी ग्रादि प्रथो में मिलती हैं। सनाट स्वीकार करते हैं रि बम से कम कुछ स्थाना म विसी समय म दोनो वर्गों का पारस्परिक सम्पप बडा ही कटुतापूण था। ३५ ऐमी दाम वटिवता का प्रत्यारयान स्वाभाविक था। पिल सारय दशन ने तथा प्राजीविका विभिन्न तीथकरा और अहिंसा के प्रचारवान वदिक धम का विरोध किया। य सर वदिव विधिया और पुरोहित वग वो वलित धष्ठता के विरद्ध पार्मिक और बौद्धिक विद्रोह के लक्षण थे। सास्य दान' ने मनुष्य का विवरण पार विभाजन तीन गुणा (चारिमिर लक्षणो) सत् रजस भोर तमस (मिगुण) के आधार पर किया । बौद्ध और जन घम के उदय के बाद उत्तर वटिक युग समाप्त हो गया। इसी युग (६०० ई०पू० से ५०० ई०पू०) म मनाय शक का प्रयम प्रयोग यास्क नामक एक व्यक्ति ने ऋग्वेद के एक सभ की व्याख्या करते हुए जाति व्यवस्था का इतिहास किया। पास्क के अनुसार 'वीक्ट अनार्यों का देश था। मात हुग्रा कि कीक्ट नाम मगध का था । देवर का मत है कि '1- का प्रयोग यास्क ने ऐसे प्रार्यों लिए दिया है जो 'अदीक्षित और ब्राह्मण- विराधी थे। वे यह भी सोचते हैं कि 'अनाय' शब्द वौद्धो और उनके पूर्वतियों रे लिया गया है । " तत्कालीन संस्कृत विद्वान् सायण ने 'कोक्ट' का अय 'नास्तिक' बतलाया है और 'मागध' का अथ सूदपोर । मगध म ही बुद्ध अपना दशन प्रचारित किया । बौद्ध साहित्य मे मगध को पार्यों का देश माना गया है । लेकिन ब्राह्मण साहित्य में इसे अनार्यों का देश कहा है । डॉ० भूपन्द्र- नाय दत्त का मत है कि बुद्ध और यास्क समकालीन थे और दोना ही दो परस्पर विरोधी दल में थे, इसी कारण व्याख्या में यह अन्तर है ।३८ अगर 'अनाय' शब्द का अर्थ 'अदीक्षित' है, तव सप्ट है कि 'अनाय' शब्द चौद्धा का द्योतक था, क्यापि यौद्ध दीक्षा में विश्वास नही रखते थे और अदीक्षित हो रहा करते थे। इस प्रकार हम अब तक दस चुके हैं न विस प्रकार लाग अपनी मचि के मनुसार अपना पेगा चुना करते थे। रामायण में एक ब्राह्मण को चर्चा पाई है जो हल-कुदाल चलाकर अपनी प्रातीविका उपाजन करता था। लक्नि महाभारत काल म ब्राह्मण एसा नीच कम नहीं कर सकता था। महाभारत स स्पष्ट पात होता है कि समान में वा विभेत उत्तरोत्तर बढ रहा था। उसमे लिमा भी है-'प्राह्मण को भीख मागकर जीवन-यापन करना चाहिये, निय अपनी प्रजा की रक्षा करे वैश्य को धनोपान करना चाहिए और गूद्र को पाहिए कि वह उपयुक्त तीना वगों की सवा करे।" .. और भी लिखा है "उपयुक्न तीना वर्गो म से किसी वा या काई आदमी यदि अपने वर्गोचित मतव्य से विचलित होता है तो वह शूद्र हो जाएगा ।'' यह सब परिवतन रामायण काल से महाभारत काल तर माते-पाते हो गया। इन महाकाव्या वाद घमशास्त्रा और स्मृतिया का युग पाता है। विमी भी घमास्त्र का तब तक ठोक स अध्ययन नहीं हो सकता जय तक हम उस युग या निमम वह घमास्त्र लिखा गया, अच्छी तरह मध्ययन नही कर लेते मोर उसरे लसक जिस वातावरण म रहत ये उसकी जानकारी नहीं प्राप्त कर लते। सभी धर्म पाया म गौतम, बौधायन भौर मापस्तम्ब ६ घमणास्त्र सवाधिर प्राचीन मान गए हैं । याणे का मत है कि ये सब घमास्त्र ६०० इ० पू० से ३०० ई०पू० चीर लिखे गए।१३ गौतम पार पौगायन ने मिश्रित जातियो की एर लम्बी सूची दी है। गौतम का कहना है कि क्षत्रिय पुरप और दा स्त्री जाति-व्यवस्था शूद्र द्वारा चाहिए। ५ ४४ से उत्पन्न सन्तान यवन पहलाएगी। मापस्तम्ब इस विषय पर मौन हैं । परन्तु उहाने पहली बार भोजन वै सम्बप मे अस्पृश्यता का उल्लेख किया है। गौतम ने आपस्तम्ब के इस मत का विरोध किया है । यास्क और दुर्गा जो इा दोनों के पहले हुए थ इस विषय पर चुप हैं। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि उन दिना कुछ भी निश्चित नहीं था। परन्तु ब्राह्मणो में सबसे अलग अलप रहने की प्रबल प्रवत्ति थी। जैसा कि आपस्तम्ब ने लिखा है- यदि भोजन करते समय उसे (ब्राह्मण को) कोई शूद्र छू लेता है तो उसे भाजन थाड देना चाहिए। लाई गई कोई भी वस्तु जिसे वह हए या न टूए नही सानी चाहिए शूद्र द्वारा दिया हुआ पानी स्नातक (दीक्षित) नहीं पिये। बौधायन ने द्विज भोर सूद के बीच विवाह की अनुमति दी है लेकिन गौतम ने नही। यथा गणना क विलोमक्रम से छोटी जाति के पुरुप द्वारा ऊंची जाति की स्त्री से उत्पन्न पुत्र कोई भी धार्मिक सस्वार (जसे श्राद्ध प्रादि) नहीं कर सकता। जिस पुरुष की स्त्री शूद्र जाति की है, उसे थार के अवसर पर भोजन नहीं कराना पुनश्च गौतम-सहिता में ही हम विप रूप से गूद्रा के विरुद्ध कठोर नियमो का दान होता है । जस, राजा को चाहिए कि वह शूद्र के उस भग को क्टवा दे जिसस उसने (शूद्र ने) क्सिी ब्राह्मण वा महित क्यिा है या उसको मारा है। उस शूद्र को जिसने किसी ब्राह्मण को लूट लिया है अथवा ग्राह्मण की कोई सामग्री चुराकर छिपा लो है, मौत की सजा देनी चाहिए।" यही हम यह भी पहली बार पाते हैं कि अपराधी वे वग के अनुसार दण्ड-कर म भी विभेट था। जसे जिस शूद्र ने ब्राह्मण के साथ एक भासन पर बठने की चप्टा का है अथवा जिमने ब्राह्मण के साथ सडक पर बराबरी का व्यवहार दिया है उसे १०० पणा का प्रयदण्ड मिलना चाहिए। उसी प्रकार उस क्षत्रिय का भी जिसने ब्राह्मण के साथ दुव्यवहार किया है उतना ही दण्ड मिलगा लक्नि वास्तव में ब्राह्मण पर प्राघात करने पर दण्ड को रकम दुगुनी हो जाएगी। ब्राह्मण के साथ अभद्र व्यवहार करने व अपराध म वश्य वो २५० पणा का प्रयदण्ड मिलना चाहिए। लेक्नि एप क्षभिय के साथ अभद्र व्यवहार करने के अपराध में ब्राह्मण को केवल ५० पणो का दण्ड मिलेगा। भोर वश्य प्रति क्यि गए वम अपराध के दण्ड में ब्राह्मण को उक्त रकम का वेवल माघा ही दना पडगा। शूद्र के साथ दुव्यवहार करने के लिए ब्राह्मण को कोई दण्ड नही मिलना चाहिए।" उम समाति काल म इसी प्रकार की वस्तुस्थिति थी। सामाजिक । जाति-व्यवस्था का इतिहास माणिक व्यवस्या म परिवतन होन के बाद अथात् मुद्रा के रूप म अथदण्ड के स्थान पर गो के रूप मे अथदण्ड देने की पद्धति चल निक्लने पर सामाजिक असमानता की खाई और भी चोटी हो गई। दण्ड और उत्तराधिकार के नियमो में भी व्यावहारिक विभेद शुरू हो गए। वगसघप की एक नइ और अधिक जटिल अवस्था का प्रारम्भ हो रहा था। किन इस बात म ब्राह्मणा को हम सनिक या गासन-सम्बधी अधिकारा का दावा करते नहीं पाते । बौधायन और आपस्तम्ब, दोना ने ब्राह्मण को गस्त छूने से मना किया है। घमास्ना ने समाज को हमेगा ब्राह्मणो की दृष्टि से देखा है। इसलिए में पक्षपातपूर्ण और सबया एकागो वणन मिलता है । और, उनकी कही पुष्टि भी नहीं मिलती। बौद्ध और जन-ग्रयो म हिन्दू समाज का बिलकुल दूसरा ही चित्र मिलता है । इस प्रकार हम उससे वास्तविक मामाजिक स्थिति की तुलना करने का अवसर मिलता है। लेकिन बौद्ध और जैन-प्रथा पर विचार करने में पूर्व एक महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर दे लेना चाहिए । हमने रामायण म देखा है कि विम प्रकार पहली बार वग-मघप म ब्राह्मणा की हार हुई । अब सवाल है कि महाकाव्य-वाल के बाद ही उन पराजित ब्राह्मणा ने भला किस प्रकार विलकुल उल्टो वात बताने पाने धमशास्त्रा को प्रस्तुत किया । उहें इतना शक्तिशाली होने का क्व मौका मिला। जव हम देखते हैं कि महाभारत के युद्ध मे प्रगतिशील पाण्डवा न कटटरपयी और प्रति- प्रियावाटी पोरवा को हरा दिया था, तब यह प्रश्न और भी महत्त्वपूण हो उठता है। लेकिन स्मरण रखना चाहिए कि महाभारत के युद्ध म ब्राह्मण वग का किसी प्रकार को हानि को आशा नहा थी । ' महाभारत युद्ध ने भारतीय घास गासका की शक्ति का नाश कर दिया। क्षत्रिय सनिक, अभिजातवणीय सामन्त और राजे-महाराजे हमारा की सस्या म मारे गए। परन्तु उधर दाह्मणो का दल हार भी गया, ता भी वग के रूप म उनकी काई हानि नहीं हुई। वे इस युद्ध को ज्वाला मे सवथा अलग रहे और उनके धन-जन पर इसका कोई असर नही पहा । उनकी सफलता युद्ध के परिणामा पर निमर नहीं करती थी। उनकी स्वाय सिद्धि केवल एक राजा को दूसरे राजा के विरुद्ध एक दल को दूसरे दल के विरुद्ध लडा दने म थी। इस उद्देश्य म सफलता भी मिली । महाभारत के युद्ध म क्षत्रिया की गति सवया विनष्ट हो गई और बाह्मणो को इतने से ही मतलव था। ग्राह्मणवा' का विरोध पनियों के नेतृत्व में ही होता था, मोर भव जबपि यह विरोय खत्म हो गया या ब्राह्मणवाद में लिए देश सभी भागा मनिविरोष पंचने का और यमा एव प्राचार- - ६० जाति-व्यवस्था विधिया के व्यापक प्रचार का स्वण सुयोग प्राप्त था। राजामो और जनना को ब्राह्मण जाति की गुलामी क्यूल करनी हो यो । यही कारण है कि महा साव्य-काल व याद गौतम बौवायन और मापस्तम्ब को सहितामो जसे ब्राह्मण प्रपति और प्रचारित रिय गए। अब हम बौद्ध और जन-ग्रयो पर विचार करें। मथुरसुत्त मे मधुरा और मरण ये राजापा कोष बातचीत हुई है जिमम उन लागा ने ब्राह्मणों विशेषाधिकारा पर विचार किया है । बुद्ध वा मत है कि व्यक्ति और “यक्ति के बीच वास्तविक विभद धम (धम्म) के माधार पर ही साता है नरि यग विभेट (पन) प्रापार पर • यति विसी दाथिय ने यथेम सम्पन्नता प्राप्त करता है तो वह किसी भी क्षत्रिय ब्राह्मण वश्य अथवा पद से सेवा र सका है। उसी प्रकार अय तीनो वर्गों का कोई भी पनी पाटमी क्षत्रिय ब्राह्मण, वश्म और गद्र स, भयका सबसे काम परा सकता है और सर अपने स्वामी की सेवा म विना अपनी जाति का ध्यान दिये सा उत्साह दिसला सकते हैं । इम पकार की स्थाएँ 'अस्मलयान मुत 'वस सुत्त अवट्ठ सुत्त मानि म मिलती हैं। सभी बौद्ध मोर जन प्रन्या में क्षत्रिया का माह्मणा से पष्ठ बतलाया गया है। गौतम चौधायन और आपस्तम्ब की सहितार कभी चलन में नहीं पाई। परन्तु उनम हमे इतना अवश्य मान होता है कि ग्राहाणा का दिमाग निरा प्रभार से काम करता था । बाह्मणों क विराध करन पर भी अन्तरजातीय विवाह प्रचलित था। बुद्ध ने शाह्मण को बातचीत के सिलसिले म स्मरण दिलाया है कि यर कृष्णायन बरा का है जोकि एक क्षत्रिय राजा की दासी से निपता है ।५२ कुम्मास पिण्ड जातक म मातिया के राजा की पुत्री में कोलराज मावति में विवाह की पया पाई है। बनारस के राजा के ब्राह्मण पुरोहित को एक नीची जाति की स्त्री से अवैध पुत्र हुआ जिस ग्राह्मण मान लिया गया | पिसी व्यापारी को मन्या ने एक चारास को देखा और उस पर कुर हो गई। परन्तु वह उसी चापटान को व्याही गई। ३ मौय युग (ई० पू० ३२३ वर्ष से ई० पू० १८५ वय) भारत पर मिकन्दर के पाश्मण से उत्तर बदिव कान का मन्त हो गया। उस काल का सबस प्रतापी राजा नन्दवा का एक सूद था। नन्दो के सम्पप म पुराणाम अनेक क्याएँ उपलब्ध हैं । विष्णु एव भागवत पुराणों में लिखा है कि नलवा वाले द्वितीय परसुराम की भांति नियो का उमूलन कर पीवे जानि-व्यवस्था का इतिहास दो। नन्दवाने अन्तिम शासक को चद्रगुप्त मौय नामक एक दूसरे गूद्र ने कौटिल्य नामक एक ब्राह्मण की महायता से मार डाला। चद्रगुप्त मौय ने जिस मौय साम्राज्य की स्थापना को, वह भारत के सर्राधिक विस्तत साम्राज्यों में मे है । मौयों में उदय के साथ ही पास अग के रूप म क्षत्रियो की पूण पराजय हो गई । अव प्रश्न है वि सवा के हेतु जम धारण करने वाला शूद्र किस प्रकार समाद ये पद पर पामीन हो सका? क्या यह क्टु वग-सपप से बिना सम्भव था? हमने क्षत्रिय विश्वामिर और ब्राह्मण पशिष्ठ के बीच हाने वाल सधप का रूप देखा है । वदिव कान म परशुराम तस्य म भी ब्राह्मणा को क्षत्रिया मे लन्त देवा है। उत्तर कवि वाल म रामशक्ति क्षत्रिया में हाथ में थी, यद्यपि महाभारत के बाद उनका बल सवथा क्षीण हा गया था। सम्भव है कि इस परिस्थिति मे लाभ उठाकर ग्राहाणा न शूद्रा से साठ-गांठ को और क्षत्रिया के विरुद्ध संघप शुरू कर दिया। मन्त म नद और मौयवा के उदय के साप क्षशिया की पूण पराजय हो गई। प्रमाण उपलब्ध है रि नन्दा की नीति ब्राह्मणा ये प्रति सहानुभूतिपूण थी । भोयकाल में मत्री कौटिल्य ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्ता अमान' की रचना था। 'अथशास' म विशुद्ध धमनिरपेक्ष राज्य में नियम दिये गए हैं । मम इसका भी स्पष्ट उल्लेख है कि राज्याना धार्मिक नियमा का भी प्रत्याख्यान र सकती है। यह तो नहीं कहा जा सकता दिवौटिल्य ने गहा के माय “याय रिया, पर इतना अवश्य सत्य है कि उसने अपर तीन वर्षों और शूद्रो के बीच अन्तरजातीय विवाह की अनुमति दी। उसने शूद्रा को प्राय स्वीकार दिया और दासप्रथा उठा दी गई। उमने 'प्रथशास्न' म साफ शदा म लिखा है कि शूद्रो पौर अन्त्यमा को भी वेद पढना चाहिए । ये सब पौटिल्य के कुछ कातिकारी काय थ। सूद वे राजत्वकाल में रिसी दूसरे प्रकार की व्यवस्था हो भी नहीं मरती थी। परन्तु स्थान-पान पर मास्त्र' दो के प्रति वाफी कठोर भी है। डॉ. वालिदास नाग तया अप विद्वानों सा मत है जि बाद पे टिपण ब्राह्मणो ने इन मशा को पपगास्त्र मे भानी भोर से मिला दिया है। गौटिल्य न शुदो यो राज्याधिररण म उपस्थित सार गवाही देने वा मधिरार दिया था। मयशास्त्र का सबसे महत्वपूग मा दण्ड भोर जुर्माने के सम्र ए में है। मय तक ग्राह्मणा को अपदण्ड दिया ही नहीं जाता या भपया दिया भी जाता था, तो महा नाम मात्र वाभिय पनि रे मुरारत म ये निचय ही बहुत कम जुमाना दो थे। कौटिल्प कहा कि 'मगर पिसी चुद को उसर गदापमान बेच दिया है या बम जाति-व्यवस्था डाल दिया है और वह जमना दास नही बलि माय है भोर नावालिग है तो उसे वेचने या वधा डालने वाला को जुर्माने म १२ पण देने पड़ेंगे। उसी प्रयार विसी वश्य को बेचने या वधक रसने के लिए २४ पणो का क्षत्रियो के लिए ३६ पणा वा मौर ब्राह्मणो के लिए ४८ पणा का जुर्माना होगा।८ कौटिल्य इस मादेश स भनेर बातें साफ हो जाती हैं । यथा-- शूद्र जमना पाय भी या । अपराधी जितन हो ऊचे वग या होगा उमको सजा भी उतनी हा अधिर मिलगी। पायत्व का दासता से यही कोई मेल नहीं है आदि मादि। जायसवाल का मत है वि पौटिल्य ने माय गब्द वो स्वतत्र शन का समानाथ माना है उसका सिद्धान्त है कि प्राय दास ही हो सक्ता । इस सिद्धात के अन्तगत वह उन स्वतत्र शूद्रा को भी ले पाता है जिन्हे यह माय प्राण (श्वास प्रतिश्वास से प्राय अर्थात् स्वतन व्यक्ति) बहता है। अथशास्त्र सहम निष्क्य निकाल सकते हैं कि 'पायत्व विशेष प्रकार की आर्थिक-सामाजिव प्रथा पर निभर करता था। मगर माय शर का अभिप्राय किसी जाति विशेप से होता तो निश्चय ही उसया भय नही बदलता। कौटिल्य इस बात में भी सावधान था कि अपराध के हेतु मिलने याने दण्ड से--यहाँ तक कि मत्युदण्ड से भी ब्राह्मण यच न निकलें। डा० जायसवाल का विचार है कि देश के सभी दीवानी और पौजदारी कानून अयशास्त्रा म सही सही लिप जाते थे। हिन्दू विधान वास्तव में घम शास्त्रा से नहा निकला है बलि अर्थशास्त्रा पर आधारित है। पद्रगुप्त मौय के पौत्र प्रशार 7 शासन-कान तक माते पाते ब्राह्मणो के पाखण्ड का यचा सचा चिह भी नष्ट गया । पशु बलि पर सवथा प्रतिवर था और उसक साय साथ वदिक विधि यवहारो पर रोक लगा थी।' पडित हरप्रमाद शास्त्री का मन है वि ये सब कानून ब्राह्मण वग के विरोष में बनाये गए थे और चूकि इह शूद्र गासक ने चलाया था, इसलिए ब्राह्मणा को इनसे सास चिट था। एक शिलालेख म भदेवा (पृथ्वी पर के देव सामा-ब्राह्मणा) को भड देवता पहा गया है। ब्राह्मण जाति के अधिकारो और विशेपाधिकारा वो पाखिरी ठोकर उस समय लगी जब अशोक ने घम महामात्य नियुक्त क्यि । दण्ड के मामले मे सभी बराबर थे। मदालत के सामने किसी को बाई विपाधिकार प्राप्त नहीं था। इस प्रकार कानून वी नजर में सबको समानता का सिद्धात स्थापित हो गया। पलत ब्राह्मण नौकर शाही का मह भी धूलिसात हो गया। मशोर तथा उसके परवर्ती मौय गासको जाति-व्यवस्था का इतिहास ने बौद्ध धम को राजघम मान लिया था और बौद्ध धम वेदो की मर्यादा और प्राह्मणों की श्रेष्ठता का प्रत्याख्यान करता था, ईश्वर और पारमा म विश्वास नहीं रखता था। इसलिए उग्र वग सघप का दूसरा प्रकरण प्रारम्भ हो गया। शुग-कण्व युग मोय वश के अन्तिम शासव वहद्रथ को उसके ब्राह्मण महासेनापति पुष्य- मिन शुग ने मार डाला और स्वय गद्दी पर बैठ गया। भारत के इतिहास मे यह पहला अवसर था जबकि १८४ ई० पू० मे एक ब्राह्मण राजसिंहासन पर भासीन हुआ । शुगो के उदय के बाद ब्राह्मणवादी प्रतिक्रिया अपने चरमबिन्दु पर पहुच गई । बहुतेरे विद्वान् इस युग को ब्राह्मणवादी प्रतिक्रान्ति का काल मानते हैं । पुष्यमिन न राजगद्दी पर बैठने के उपलक्ष्य मे अश्वमेध यज्ञ किया। उसके शासन काल में सभी बौद्ध विहार विनष्ट कर दिये गए । बौद्ध भिक्षुप्रो की हत्या की गई । वदिक आचारी का पुनरत्यान हुआ । ६३ जायसवाल के पान्दा म यह 'कटटरपथी प्रतिक्राति थी। इसी युग मे 'मानव धमशास्त्र अर्थात् मनुस्मृति लिखी और प्रचारित की गई । जायसवाल का कहना है कि इस ग्रय से ही प्रमाणित हो जाता है कि इसको रचना पुप्यमित्र के गासन- फाल में हुई क्याकि इसमे पुष्यमित्र द्वारा की गई राजहत्या का समथन दिया गया है । 'मनुस्मति ने बडी कठोरता से अयशास्त्र' तथा मौयकालीन प्रय नियमा को उलटकर रच दिया। जायसवाल का कथन है कि मनुस्मति इस प्रकार के अपने राजनीतिक सामाजिक और धार्मिक पूर्वाग्रहा से आक्रात है पौर सम्भवन इसी कारण इसका इतनी ऊंची मा यता प्राप्त है। राज्यानु मोदित होने 4 कारण ही इसके विधान को लोगा ने स्वीकार कर लिया। यह भी सम्भव है कि इस घमशास्त्र को गुग काल का गासन विधान मान लिया पया। अब हम जरा इस 'मानव घमशास्त्र का सपम विवेचन करें। इसमें लिखा है कि परिस्थिति थिोष म राजा की हत्या भी की जा सकती है। इसया एक- पात्र उद्देश्य पुष्पमित्र वे आय की सफाई देना है। यह पम मात्र हा पिरख जितनी दूर तक गया है, उतनी दूर तक दूसरा कोई घमास्त्र नहीं जाता है। इसम ब्राह्मणा यो यूद्र पासर के राज्य मे रहने से मना किया है। इतना ही मही इमम स्पप्ट लिया गया है वि शूद्र यायाधी नही हो सकता। नियम भौयकालीन नियम में टीर विपरीत था। इसम यह भी लिया है कि जिस राज्य पपूरी भी सम्या विशाल है भोर वे नास्तिव हैं और वहां द्विज नहीं है, वह यह आति-व्ययस्था राप प्रमाल तथा नाना प्रकार के रोगावा शिवार होकर शीन ही विनष्ट हो जाएगा। ये बातें बस्तुत मौव राज्य जरो यूद्र राज्य में प्रति प्रापणा की पापवाणी यौ । इस प्रथम गुरु म ब्राह्मणी वा गुदा स विवाह परने की अनुमति दी गई है । ५० दिन माग घसपर एस विवाह को वजिन पर दिया गया है। इसम पिसा है कि ब्राह्मणा और क्षत्रिया व इनिहारा म परम्परा म यही भी उल्लेस ही है दिउहाने विपरीत परिस्थिति म भी पदा से विवाह पिया। मानव ममशास्त्र या इतिहास व प्रनि पसा सम्मान भाव था यह इस उद्धरण स प्रमट है । हम है कि इस काल ठीक पूर मौयकाल म कौटिल्य ५ अयशास्त्र न मिति विवादादा लेस रिया मानव धमाल म इस प्रकार को पिरोधी वात भरी पड़ी हैं । इसने जान-यूभकर पूद्र को प्राय मानने से इचार किया है। दराम लिखा है कि जिस प्रकार मयेगी और घोडो वे बच्चे उन मालिक वी जायदाद हो जाते हैं उसी प्रकार दासी को सतानें रसर स्वामी की सम्पत्ति हो जाती हैं। यहाँ भी अयशास्त्र के नियम को ताक पर रप रिपा गया है। ब्राह्मणा व इष्टि कोण से रची गई पुरानी दण्ड प्रणाना को फिर से जारी किया गया। यदि कोई शूद्र किसी द्विज यो अपार रहता है तो उसकी जीभ काट ली जाएगी, पयादि वह नीच वगम उत्पन है यदि वह द्विज नाम और जाति का घृणापूर्वक उच्चारण करता है तो उसके मुख म दरा मगुल लग्यो लोहे की पात घुमेड दी जाएगा य िवह ब्राह्मणा को उनका मतन्य सिरालाने वी धृष्टता करता है तो राजा उसके मुख भौर कान म गरम तेल डलवा देगा भौर नीच जाति का कोई यक्ति अपने जिस भासे (अपने से बष्ट तीन) उच्चतम जातिमा म से रिसीभी जाति के व्यक्ति पर भाघात परेगा तो उसका वह प्रग काट लिया जाएगा ये सब मनु की सीख हैं । इतना ही नहा मानव घमशास्त्र' मे गूद्राको मपनी सम्पत्ति से भी रचित कर दिया। ब्राह्मण वही आसानी से दास शूद्र को सम्पत्ति जत बर सकता है, क्योकि शूद्र की अपनी कोई सम्पत्ति नहीं हो सकता । जिस पम्नु पर स्वामी या अधिकार हो सस्ता है, यसी विसी यस्तु पर दाग का अधिकार नहीं हो सकता। ये तमाम बातें प्रयास्य क विपरीत परती हैं। इनम हमे पट्टरपयी श्राह्मणो को भ्रष्ट भोर माछी मनोवत्ति की तसवीर मिलती है । उहाने अपनी श्रष्ठता पर विशेष रूप से जोर दिया है। मानव भमशास्त्र म भी लिसा .3 है जाति-व्यवस्था का इतिहास अर्थाभाव के कारण मरणासन रन पर राजा को वेदज्ञ ब्राह्मण से कर नहीं लेना चाहिए।"१५ शूद्रा के लिए अग्निपरीक्षा जैसी प्रयाएं चालू को गइ। कौटिल्य ने अपराधी का पता लगाने के लिए जाच-पड़ताल की जा विधि चनाई थी, वह उठा दी गई । इस तरह का वग-विभेद रोजमर्रा के माथिक सम्वघा मे भी वरता जाता था। जस “महाजन पंजदार ब्राह्मण से सैक्डे दो पण की दर से सूद लेगा, क्षत्रिय से सरडे तीन पण की दर से, वैश्य से सक्हे चार पण की दर से और शूद्र से सक्डे पाच पण की दर से। भौटिल्य ने सूद की दर मे इस तरह का वण विभेद नहीं किया था। इस प्रकार अशोर की व्यवहार-क्षमता गुग काल मे विलकुल खत्म हो गई। ब्राह्मणा के लिए मृत्यु दण्ड उठा दिया गया । " ब्राह्मणा के शरीर पर किसी प्रकार की चोट नहीं लगनी चाहिए ब्राह्मण-हत्या से बढ़कर दूसरा कोई दुष्कम दुनिया में नही है , इसलिए राजा को ब्राह्मण-वय की बात मन में भी नहीं लानी चाहिए। ऐरा समय म जम और वा के प्रश्न को महत्त्व देना स्वाभाविक हो या। इसलिए सजातीय विवाह पर भी विशेष रूप स जोर दिया जाता है। मनु- स्मृति म कई मिश्रित जातिया का उल्लेप मिलता है। उसम लिखा है- • वर्गों के सम्मिश्रण के बारण, विवाह के लिए अनुपयुक्त स्त्री से विवाह करन के कारण तथाविहित क्तव्या की अवहाना के कारण मिश्रित जातियां बन गई है। पत मनुस्मृति' की दृष्टि से रच्च वर्षों की रक्त-शुद्धता का आप्रह करना सबया युक्तिसगत था-"अच्छा वीर हम गा प्रशसित होता है । 'मानव धमगास्न' म ब्राह्मणा न पहले-पहल खुलकर अपने विशेष राज- नीतिक अधिदारा का दावा किया । उसमें लिखा है.- वही-से-बडी विपत्ति म भा राजा ब्राह्मणा का युद्ध कर, क्यादि बुद्ध हाने पर ब्राह्मण शीघ्र ही राज्य का नाकर सपना है शिक्षित हो अथवा अशिक्षित, ब्राह्मण महादव रे समान है। उसम यह भी बताया गया है कि राजा सात-पाठ एसे ग्राह्मणाना मी रखे जारि बेदा म पारात हैं और यशपरम्परा से जिावा राजबात से सम्दच हो। कौटिल्य वे अयशास्त्र म इस प्रकार के वण विभेद का कहा पाइ उल्लेख नहीं है। राजनीतिक क्षेत्र म ब्राह्मणा में दावे दा परम रूप 'मनुस्मृति म इस प्रकार पाया है-- महासनापति का पद तथा राय पाने का अधिकार दण्ड दन मोर नतृत्व वरन वा अधिकार तथा सब पर गासन फरने का अधिकार उही लागो का मिलना चाहिए जो वेदा म निजात है।"59 इसरे पहले किसी भी सहिदा या स्मृति म इस प्रकार का दावा पेश - जाति-व्यवस्था ब्राह्मण को नहीं किया गया था। डा. जायसवाल का कहना है कि ये सारी बात दरअसल पुष्यमित्र-गृत राजहत्या का चातुरीपूर्ण युक्तिपोपण है । 'मनुस्मृति ने राजा के दवी अधिकारा का भी प्रतिपादन किया है। इसका परिचय अवतार-पुरुष की कल्पना म मिलता है। यह एक स्पष्ट सकेत है जिससे शात होता है वि हिंदू समाज सामतवादी स्वरूप ग्रहण कर रहा था। दूसरा धमशास्त्र जोवि ब्राह्मण शासनकाल में लिसा गया वरिष्ठ-स्मृति है । इसमे मनुस्मृति की याता का समथन किया गया है । परन्तु यह स्मृति क्षत्रिय के प्रति अधिक कठोर है। इसम लिखा है कि सूटनेवाला "यक्ति विखरे बाल दौडता हुमा भाये और राा वे समक्ष उपस्थित होकर वर महाराज मैं लुटेरा हूँ मुझे दण्ड दीजिए। इस पर राजा उसे उदुम्बर का प्ठ का बना गस्त्र दे जिसस वह व्यक्ति मात्महत्या कर ले। वेदो म का गया है कि मृत्यु के बाद वह पापमुक्त हो जायगा 13 पतजलि पुष्यमित्र । समकालीन थे। उहोने पाणिनि वे व्याररण की जो टीका लिसी है उस उहरण के रूप मे उहाँने भी मनु मौर वशिष्ठ वे मत को स्वीकार किया है। प्राध्र-कुपाण युग शग वश के बाद कण्व वा का गासनकाल पाया। यह ब्राह्मण वश था। इस जमाने में मानव धमशास्त्र (मनुस्मृति) और वशिष्ठ-स्मृति' को सवमान्य गासन एव दण्ड विधान मान लिया गया। कण्वा का शासनकाल ई०पू० ७२ वप म शुरू हुआ और ई० पू० २७ वप मे समाप्त हो गया। इस प्रकार गग एव कण्व वंश के ब्राह्मणो ने १५७ वष तक भारत म राज्य क्यिा और १५७ वष तक मानव धमशास्त्र का समाज मे वोलबाला रहा । किन्तु उत्तर-कप्त काल म कलिंग म सारवेल का उन्य हुप्रा । कहा जाता है खारवल ने मगध के कप्व गासप भस्मित को मार डाला। उसके अभिलेखो म लिया है कि यवनराज निमित (मध्य एशिया का निमित्रियस) उसके भय स वापस लौट गया था। उसन (चारवेल) बौद्ध सम्राट अशोक की भाति जन पडितो की एक सभा बुलाई। सी काल म वक्ट्रिया के यवन दौर मत म दुपाण प्राति मध्य एशिया का जन जातियां उत्तर पश्चिम के दरों को पार कर भारत म प्रवेश करने लगी। ये माक्रमणकारी विभिन मापा मापी थे। इनका याक्रमण भनेर वर्षों तक चला। मत म वे भारत के पश्चिमी एव उत्तर-पश्चिमी प्रान्तो के शासक बन बठ । इन भाग तुवा म बुपाणो ने उत्तर भारत को समाा व्यवस्था म विशेष रूप से भाग - जाति व्यवस्था का इतिहास ६७ लिया। व पूणत भारताय हो गए। उन्होंने अपनी ही जाति के पासर कनिष्क के राजत्व म, जिसका साम्राज्य वगाल की खाडी तक फैला हुआ था, वौद्ध धम स्वीकार कर लिया। इसलिए वे ब्राह्मणा के लिए कभी गय नहीं हो सके। ब्राह्मणा न हमेगा उह विदगी और म्लेच्छ माना । जसा कि जायसवाल न बताया है, इसका एक कारण यह था कि "कुपाण वा के प्रारम्भिक दिना म उस वा के किसी राजा न अग्निदव के मन्दिरा को गिराकर उनके स्थान पर बौद्ध विहार बनवा दिए सभी जातिया को मिटाकर व्यावहारिक रूप म एक जाति बनाई गई लोग हिंदू देवता की जगह अवशिष्ट हडिडया की पूजा करा लग । वर्णाथम प्रथा मिटा दा गई। बौद्ध धम, अन्तराष्ट्रीय धम ता था हो, अब काफी आक्रामक भी हो गया। इसके फलस्वरूप बड-बडे सामाजिक परिवतन हुए । कुपाण राज्य बनारम स्थित प्रान्तपति न अपने क्षेत्र की करीब-करीव ब्राह्मण विहीन बना दिया। उसने उच्चवर्गीय ब्राह्मणा का दमन दिया और विदेशिया तया निम्नजातीय व्यक्तिया को पदा पर ला बिठाया। यह मामाजिक अत्याचार और धार्मिक कट्टरता की नीति थी, जिसका पालन परवर्ती बुपाण शासका न भी किया। इस नीति के पौधे कुछ राजनीतिक उद्देश्य भी था । ब्राह्मणवादी समाज व्यवस्था म कुपाण दश वाला के लिए तिरस्कार-ही निरम्वार था। स्वभावत ऐमो ममाज-व्यवस्था का नाश करन के लिए उहाने भनेक प्रयत्न दिए । ८५ उनकी नौकरताही ने उत्तर भारत म प्राहामा की श्रेष्ठना वा गट ध्वस्त कर लिया। लेक्नि उत्तर-दक्षिण भारत म पान के सातवी प्रयवा सातवाहन वाकी स्वच्दाया म ब्राह्मणवाद की जड जम रही थी। मातवाहन ब्राह्मण वा । धुपाण वश वारे वाहर मे माय ये, किन्तु ये भारतीय थे। इसलिए इनम कुपाणा की अपेमा मधिप राष्ट्रप्रेम था। सम्भव है कि उनका यह दावा वुपाणो के विरुद्ध युद्ध गनने का बहाना मात्र या। सर, जोहो, ब्राह्मणा को उत्तर भारत म जा सति हुई वह दक्षिण म एक ब्राह्मणवीय गामन के राउत्व में पूरी हो गई। गौतमीपुत्र मातकों के पासनबाट म सत्रिया का भी दमन कर दिया गया। इस प्रकार ब्राह्मणो का वग-सघप मत्रिय और बौद-दोनों के विरुद्ध था। इसी बात म 'यानवयप धमशास्त्र की रचना हुई । स्वर्गीय जायसवाल ५ मनुसार इसका रचनाकाल ई० बाद दूसरी ताली है । यह घमास्त्र मनु वे घमास्त्र का विकसिन रूप है। ममे चौसा के प्रति पणा दिखताई गई है स्यापि उन दिना भी यौट का धर्मावलम्बी दुपाण-वावालों का राज्य भापम पा। जायसवाल का मत है वि यानवयर ने मध्य देश के किसी ६८ जाति-व्यवस्था ८० विमा। - - भागम इस प्राय की रचना कसम लिया है कि पीत पीयरघारी बौद्धों या दशन अशुभ हाता है । किन्तु इसम गर-सरिया के प्रति या म्लेच्छा ये प्रति भी यही खुलेग्राम भोर सीधे तौर पर विद्वप प्रदर्शित नहीं किया गया है। डा० दत्त का मत है कि उन दिना उत्तर भारत मे दुधाण वारा राज्य था इसलिए यानव श्य ने अपने अभिमत को परिस्थिति अनुप प्रक्ट यह समय का ही प्रभाव था दि इस घमशास्र म 'मनुस्मृति' की अपेक्षा गूदों की स्थिति भी दिसलाइ गई है । याज्ञवल्पप-स्मृति के अनुसार उहे चादायण यत रखने को भी टूट थी। पहले यह अधिकार केवल ग्राहाणा का हा या । उस प्रकार तमाम मतिरमपूण दण्ट विधान, जो शूद्रो के दमन के लिए बनाये गए 4 उठा दिये गए थे। स्मरणीय है कि उन दिनो महाराष्ट्र भसाभारराज ई वरसन नतृत्व म शूद्रो पा पुनरदम हो रहा पाऐग समय म याज्ञवल्क्य स्मृति का लिया जाना ब्राह्मणा की गुप्त पारवाई पी। रिस समय यह स्मृति लिखी गई उस समय यो मायता प्राप्त नहीं हो सकी। वरित मागे वर-गुप्तवशीय सम्राटोक राय काल म-इस स्मृति नसम्पूण प्रावित म मनुस्मृति का स्थान ल लिया। मनुस्मृति रद कर दी गई।८६ पर भोर बात स्मरणीय है । माय स्मृतिया की भांति पारवत्मय स्मृति' ने यह नही लिखा है रि मावित विस भू भाग को रहते थे। वस्तुत भावित या परिमापा उस समय थी भी टिन क्यापि नाह्मणवादी कटटरता के इस गह पर उन दिना बौद्ध धर्मावलम्बा कुपाण राजामा का ही शधिपत्य था। भारशिव बाकातक युग (६० पू० १५० २५ से ई०पू० ३२० वष तक) भारशिव वादातर काल को कटटरपथो ब्राह्मणवादी लीला का पूर्वाभिनय कह सकते हैं। या तो माघ्र कुपाण काल के उपरान्त भारतीय इतिहास म भययुग पाता है । इस काल म सतुलन और समभोले के लिए सब प्रकार से प्रयत्न क्यि गए। परतु समय का सौटी पर पुरानी वपासक्याएं लगे नहीं उतर सका। इसलिए वर्णाश्रम घम पर प्राधारित रामाज-व्यवस्था व दापरे म नई नई पास्यामिवामा की सृष्टि अवयम्भावी थी । वैदिक गापामा मोर मापारो म इतना दम दारा नहीं बचा था कि वे बौद्ध धम से लोहा लती यद्यपि विदेशी दुपाणा में विरुद्ध युक्तिपोपिन राष्ट्रीयता ने पानी दूर तब ग्राह्य पवाद का माग प्रशस्त कर दिया । अधयुग का मिश्रा को चौरपर मध्य भारत म भारशिय नाग का उदय हुमा । वे अपने को क्षत्रिय रहत ये। वे प्राचीन सल दिय योदय थे, अथवा समय समय पर बनने ? जाति व्यवस्था हा इतिहास वाले नवक्षत्रिय, यह विवादास्पद विषय है। मजुथी मूलकल्प' म उहे वश्य कहा गया है। जायसवाल का कहना है कि भारशिवो के जमाने में वौद्ध धम के विरुद्ध शव घम ने सिर उठाया था। "समाज की पुनव्यवस्था के लिए दोप शोधन म्प मे शव सयास आवश्यक हो गया था सुधार के लिए शैवमन को नितान्त आवश्यकता थी।"६१ जायसवाल का यह भी कहना है कि वौद्ध धर्मावलम्बी कुषाणो से लड़ने के लिए भारशिवा ने कई राज्यो को मिलाकर सघ बद्ध विया । फर्जी राष्ट्रीयता के हिमायती भारशिवो के लिए इसके सिवा कोई चारा भी नहीं था । उहोंने प्राचीन भारतीय परम्परा का उद्धार करा का, बदिक अाधार विचारो के एकमात्र ज्ञाता के रूप म पुरोहित वग को पुा प्रतिष्ठित करने का प्रत लिया था। मनोवज्ञानिक दृष्टि से भी उनके लिए यह प्रावश्यक था कि वे जाति एवं रग की समता, प्राचीन जातीय परम्परामो की अवमानना नथा अन्तर्राष्ट्रीयता आदि, बौद्ध धम का सभी मा यतानो का विरोध करते । इस प्रकार 'विष्णुपुराण' म वणित नागा ने कटटरपथो ब्राह्मणवाद का नेतृत्व किया। लेकिन प्रश्न है, ये नाग कौन थे गुणदा महादेवी वे नारायणपाल शिना- लेखो एव अभिलेवविद श्री हीरालाल के अनुस धानो से ज्ञात है कि समाज मे वर्गों की मृष्टि करो वाल तत्त्वा में परिवतन हो रहे थे । जन-समाज से नये- नय समुदाय निकलते थे और विभिन वर्गों में अपने व्यवसाय के अनुसार अपनी कोई जगह बना लेते थे । फिर जिस वग म वे मिलते थे, उसका नाम भी धारण कर लेते थे । ३ नागवश भी वसा ही एक समुदाय था। वाकातक ग्राह्मण वश का उदय २८४ ई० से ३४२ ई० के बीच में हुआ। गौतमीपुन वाकात ने भारगिव राजा भवनाग की कन्या से विवाह किया। गुप्तवश के अन्यदय के पूर्व इसी वाकातर वश की शक्ति देश में सवप्रधान थी। भारशिवो वो भाति वावातक वा वाले भी शव मतावलम्बी थे। वे ब्राह्मणवाद तथा यज्ञ याग के अनुयायी थे । उही दिना दक्षिण में भी पल्लव या का शासन चल रहा था। इस प्रकार लगभग सम्पूण भारत पर ब्राह्मणा का गासन पुन स्थापित हो गया था। वर्णाश्रम धम का पुनरस्थान भी स्वाभाविक ही पा । इन प्राह्मणवादी शासका ने अनेक वैदिक यन भी किए । उनका बहना था कि ब्राह्मण घम में सुधार साना उनका प्रावश्यक कतव्य है। गुप्त युग (ई० पू० ३२०-ई० ५०० ई०) गुप्तवा वा गासनकाल भारतीय इतिहास में विशेष रूप से उल्लेखनीय है । इसी युग में भापनिक हिंदू धम वा स्वाप निर्धारित हुमा । यह धम ७० जाति व्यवस्था पुरानी वर्णाश्रम घम-व्यवस्था व ढांचे के अदर होनेवाले परिवतना और सगोपना का मन्तिम अध्याय था जिसम निग्रहादि बौद्ध धम की भनेर प्रथामो को प्रतिक्रातिमूलक माना गया । वेदो को इश्वरकृत अय स्वीकार किया और ब्राह्मणो को सब वर्णो म थप्ठ बताया। पाप-बम और प्रायश्चित के प्रश्नो पर भी विचार होने लगा। इस तरह स ब्राह्मणवाद भारत या जातीय घम बन गया। उसके बाद स इस घम ने किसी भी प्रभारतीय प्रभाव को स्वीकार नहीं किया और क्रमा भारत की राष्ट्रीयता का प्रतिरूप बन गया। गुप्तवश वाल कोन थे? उहाने कही भी अपने वण का उल्लेस नहीं किया है । दूसरा कोई भी शासक वश अपने वण का उल्लेख करने से नहीं चूका है। जायसवाल लिखते हैं, उहाने कही भी अपनी उत्पत्ति या वण का उल्लेख नहीं किया है ऐसा जान पडता है उन्होंने जान बूभकर इन बाता पर पर्दा डाला है। १४ 'कौमुदी महोत्सव के आधार पर जायसवाल का मत है गुप्तवश वाले वारस्वार नामक मछूत वण के थे। वारस्कारो के सम्बध म बौधायन ने लिखा है कि ब्राह्मणों को उनसे बचना चाहिए। उनसे मिलकर वापस माने पर उहे प्रायश्चित करना चाहिए। हर जायसवाल लिखते हैं कि जब चन्द्रगुप्त प्रथम राज्यासीन होने के लिए पाटलिपुत्र भाया तो उसे तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा। इस दो कारण ये एक तो यह वह वारस्वार वण का था दूसरे उसने बौद्ध मतावलम्बी लिच्छवी राजा की कन्या से विवाह विया था। यह विरोध तभी शात हो सका जववि गुप्तवा वाला ने ब्राह्मणा की अधीनता पूणत स्वीकार कर ली और भारशिवो वाकातका और पल्लवो की भांति ही कटटरपयी ब्राह्मणवाद का ध्वजावाही होना कबूल किया। इस प्रकार प्रजात कुल गुप्तवश वाले परम हिंदू बन गए। द्वारा तिरस्कृत वारस्वार य, वे वर्णाश्रम धम और क्टटरपथी ब्राह्मणवाद ये प्रचारक बन गए। जसा कि हम ऊपर कह पाए है वदवार बौद्ध धम को पराभूत करने म मवथा असफल रहा । यही कारण है कि भारगिव वामाता काल म वेदवाट पीछ हटता गया और देवतामा के इद गिद नये मता का सृजन होने लगा। वदिक हिन्दुत्व के स्थान पर पौराणिक हिन्दुत्व की प्रतिष्ठा हुई जोकि आज तर चल रहा है। यदि भारशिव शव ये तो गुप्तवा वाल वणव । उनके शासन काल म स्मृतियां विधान वन गइ । वर्णाश्रम धम एव ब्राह्मणा की श्रेष्ठता मे विश्वास रखना लोगो के लिए अत्यत आवश्यक हो गया। महाकाया के नायर राम और कृष्ण ईश्वर के अवतार माने गए। पदिय बात ये जनजातीय कि जो ब्राह्मणा जाति-व्यवस्था का इतिहास देवतामा के स्थान पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रभावशाली त्रिमूर्ति प्रतिष्ठित हुई । शक्तिशाली ददिक देवता इद्र स्वग को नौकरशाही का प्रधान अधिकारी मात्र रह गया। जो इन्द्र पहले दानवो का सहार करता था, वही अव दानवो से बरावर हारता है हारकर विष्णु की महायता मागता है, और विष्णु की सहायता मिलने पर ही वह युद्ध म विजयी हो पाता है । सस्कृत साहित्य मे भी ब्राह्मणा की महिमा सिद्ध करने के लिए अनक उलट फेर किये गए, तभी एक पुराण में तो यहा तक लिखा हुआ है कि महर्षि भृगु एक वार क्षीर-समुद्र मे गए। वहा सवशक्तिमान् विष्णु को सोते देखकर उन्होंने उनकी छाती मे एक लात मारी । उस पाद प्रहार बा चिह्न विष्णु की छाती पर उभर पाया और विष्णु ने इसे अपना भय भाग समझा । ६६ क्या इससे भी बढकर वगगत अहम यता का प्रचार हो सकता है। 'याज्ञवल्क्य सहिता' अलावा इस काल में अय धमशास्ना मे नारद, विष्णु और पराशर सहिताएँ भी हैं । विष्णु-महिला तो निश्चय ही 'मनुस्मृति' और यानवल्क्य सहिता' के वाद लिखी गई, क्याकि उसम इन दोना ग्रयो की थातें उधार ली गई हैं। उसमें लिखा है कि पीले वस्त्र वाले सन्यासियो और कापालिका का दशन अमगलकारी होता है । इसके अनुसार अन्त्यजो और म्लेच्छा से बातचीत करना भी पाप है। इस सहिता ने पार्यावत की परिभाषा इस प्रकार की है-'जिस देश में चातुवण-व्यवस्था नहीं है, उस ऋषि मुनि म्लेच्छा की भूमि कह । प्रावित वंस देगो की सीमा से सवथा दूर है । ६६ इससे माफ पता चलता है कि जहा वणाश्रम धम नहीं है, यहा पायावन नही हो सकता । इम महिता न विष्णु की पूजा की विशेष विधिया निधारित की है। इसम यह भी लिखा है कि "अगर गुप्त धन हाथ लगे, तो ब्राह्मण उसका स्वय उपयोग कर सवना है।".. इम क्थन से 'विष्णु सहिता' वे ब्राह्मणा के प्रति पक्षपातपूर्ण दृष्टियाण का पता लग जाता है। इतना ही नहीं, इसके अनुसार ग्राह्मणा को मृत्युदण्ड नहीं दिया जा सकता । और "राज निम्न-वग के विसी व्यक्ति का वह अग बाट ले, जिसमे उस व्यक्ति ने अपने स थप्ठ व्यक्ति पर मापाल किया है ।" .. ६ उसी प्रकार अपराधी के वग के अनुगार ही उसको कम या श्यादा अथदण्ड देना चाहिए । 'विष्णु सहिता म छुपात का सवाल भो स्पष्ट रूप स उठाया गया है। लिखा है 'मटन जाति का कोई व्यक्ति यदि जान-बूमकर तीना उच्च जातिया - है ।
७२ जाति व्यवस्था १ . २ 3 1 से किसी व्यक्ति को देता है तो उसे मृत्युदण्ड मिलेगा। सम्पत्ति उत्तराधिकार के मामले म इस सहिता ने मानव घमास्त्र वा मनुसरण या है । प्रतिलोम विवाह इस युग की विशपता थी। सभी प्रकार के सामाजिव सम्बघ वेवल सजातीय लोगो में योच ही हो सकते थे। विष्णु सहिता की अपेक्षा पराशर महिता बुध उतार है। फिर भी उस सहिता ने 'विष्णु सहिता का समर्थन दिया है। उसम गोमांस भक्षण को पाप बताया है और मातरजातीय भोज से लागा को मना दिया है । इस स्मृति के जमाने सब क्षत्रिय जाति ब्राह्मणवादी प्रतिक्रिया रो पूण पराभत हो गई थी। उनके हाय का रांधा हुआ चावल ब्राह्मणा के लिए अग्राह्य था। हाँ मनु के समय की अपेक्षा इस काल म वश्यो और गूद्रा की स्थिति कुछ अच्छी थी। परार T लिया है- वश्य या शूद्र को मवदा व्यापार यि या गृहोद्योग पर निभर रहना चाहिए। यह भारचय की बात नहीं क्योकि उन तिो भासिर शूद्र जाति वाले गुप्तवशीय राजाप्रो का ही तो शासन चल रहा था। नारद-स्मृति भारतीय इतिहास के मध्यकाल में लिखी गई । इगम कमजोर भौर अयोग्य राजा का भी माटेग पालन करने का आग्रह किया गया मनु ने पुष्यमित्र द्वारा राजहत्या की सपाई दी। नारद ने भयोग्य राजा का भी समयन किया। इन दोनो में किसी प्रकार का मतरविरोध नहीं है । मनु के जमाने म ब्राह्मण अपने को सुरक्षित नहीं समझते थे। वे सोचते थे कि भद्राह्मण राज्यो का उन्य सम्भव है । कुपाण वा के उदय के रूप में एसा हुमा भी। किन्तु गुप्त बाल म जववि ब्राह्मणो ने क्षत्रिया तथा मय जातियो को पूरी तरह कुचल डाला था मानव घमशास्त्र का ऐतिहासिक कतव्य पूरा हो गया। इसलिए नारद ने निद्वन्द होकर मनुस्मृति से अलग अपना अभिमत दिया। ब्राह्मण इस काल म देवब्रह्म (अर्थात् ब्राह्मण देवता) कहलाते थे। अपने राजनीतिक उद्देश्यो की सिद्धि के लिए उन्होने समान्तिक रूप से तो नहीं पर व्यवहारत वेदो को तिलाजलि दे दी। ब्राह्मणवाद और बौद्धधम दाना के निरन्तर सघप से लोग उब गए थे और समझौता कर लेना चाहते थे। इसके विना समाज या राज्य की स्थिरता भसम्भव थी। दौद्ध धम ने महायान पय का रूप धारण कर समझौते का हाथ बढाया और ब्राह्मणवाद ने भी अहिंमा तथा प्रय वौद्ध सिद्धान्तो को स्वीकार कर लिया। इसलिए वेद विहित बलि प्रथा छोड दी गई। जसा वि नारद और पराशर स्मृतियो से प्रकट है वश्या भौर शूद्रा के प्रति भी उदारता दिखलाई गई। इतना ही नही स्वर बुद्ध का हा राह्मणवादी हिन्दू धम म मिला लिया और उहे विष्णु का एक अवतार - जाति व्यवस्था का इतिहास माना गया । भगवद्गीता में लिखा है-~-"मैंने गुण और क्म अनुसार चार धों की सृष्टि की है।" क्षित्रियो की शक्ति का पूणत नाश हो चुका पा, इसलिए ब्राह्मणा न पहले के क्षत्रिया द्वारा प्रणीत उपनिषदा को स्वीकार करने में किसी प्रकार की आपत्ति नहीं की। यही कारण है कि गीता म हम वेदान्त और सास्य के प्रभाव पाते हैं। यह सामन्तवाद था जमाना था। वैदिककालीन यायावर युग कभी का समाप्त हो गया था। निजी सम्पत्ति का विकाम हो चला था। प्रोद्योगिको के सप भी बन रहे थे 1 सजातीय विवाह भी शुरू हो रहा था। गुप्तकाल के पिछले दिनो मे जाम को वधता, पग को थेष्ठना, निम्न वग के लिए अधिकाधिक अपदण्ट की व्यवस्था, अन्तरजातीय विवाह पर प्रतिव घ, भौति भाति की दासता, भू-स्वामित्व के प्राचार पर प्राभिजात्य को स्थापना सामतवादी भूमि व्यवस्था, राजा के दवी अधिकार तथा सामन्तवादी श्रेणी गृहला प्रादि की विचित्र प्रवृत्तियां प्रकट हो गपी थी। मौयों के कौन-से विशेषाधिकार थे, इसकी जानकारी उस जमाने में प्रचलित शिकार के नियमा से भगत हा जाती है। पम राज्य का उल्लेख भी मिलता है। गीता में भी ऐसी बात लिखी हैं। इन सबसे प्रकट है कि गुप्तकाल तक भारतीय समाज को व्यवस्था सामन्तवादी हो चली थी। माथिक राजनैतिक आधार पर समाज मे यग विभाजन होता या मोर सामन्तवादी श्रेणियां निर्धारित की जाती थी। यही कारण है कि उस फाल मे वर्णाधम पम और प्राचार को ब्राह्मणवाद का प्रग मान लिया गया । गुप्त वसपा शासनकाल यह भारत के एकीकरण का भी समय था । मार्यावर्त (उत्तर भारत) और दक्षिणापय (दक्षिण भारत) के मिलन से भारतवप बना । 'भारत के इन दोना मण्डा र सास्कृतिर एकीकरण का श्रेय ब्राह्मण-साम्राज्यवाद का है। प्रायगर ने लिखा है, 'उत्तर भारन म जिन निनो पौद्ध धम का बोलबाला था, उही दिना दक्षिण भारत म ब्राह्मणवाद का प्रचार हो रहा था। यद्यपि म य दोना घमौ की तुलना म इमे कोई विशेष महत्त्व नहीं मिला फिर भी इसके प्रचार प्रसार में कोई पठिनाई नहीं हुई। बद्धनकान एव तत्पश्चात् पटनकाल (६०६ ई० -६४८ ई.) म बौद्ध धम को पुन एक बार उठने दामोरा मिना । वडा वश वाले वैश्य जाति वे पाहणा 2 माक्रमण तथा मान्तरित पडया पलस्वरूप गुप्त सामाग्य के पतन के बाद यह वा उत्तर जाति व्यवस्था भारत का नाम बना । घश्य यात परे पि वम यो गये हाय में छोड पर व्यापारी बन गए थे। कातातर म पनी वन्य परिवाराने उद्योग सपो पर भधिकार परला शारम्भ किया। उनम से बदन वा याने राजमता तर हथियाने म सफल हो गए। धोनी बौद्ध यानी हुएनसाग ने लिखा है---- 'सव मत्तात्मक्ता पई पुता स क्वल क्षत्रिया ये हाय म रही। कभी-कभी विद्रोह पोर राजपाएँ तर हुई हैं थोर मय जालिया बो नी माग बढने का अवसर . मिला है। बदनों का राज्य स्थापित होने के बाद ही ब्राह्मणापौर बौदो या उस सपप शुरू हो गया । याहाणवानी पाक्तियों पश्चिमी बगान म राजा शाक के नेतत्व में सघटित हु और पवद्धन की पराया म सघटित बोद्ध शक्ति को विनष्ट करने के लिए उद्यन हो गई। जब तक शाक जीवित रहा हपक्दन को एक न चली । उसका मृत्यु के बार ही हपवादन का सामाग्य विस्तार पा सका। इन दोनो शासकों का मध्य यस्तुत कटटरता भार उदारता की लड़ाई था जिसम भन्तत उदारता की जीत हुई। बदन वाल के बाद भारत के लिए पुन मध युग पा रहा था। इस युग म सामन्तवारी सरतारा ने विरोधी सिद्धाना की भाड में एक दूसरे स लडाइयाँ लहो । देश उथल-पुथल गभ से बगाल म पालवा राजपुताना मे गुजर प्रनिहार वा और दक्षिण म राष्ट्रकूट वा उदित हुए । गुप्त वाकबाट जनता ने एक शूद्र को ही अपना राजा चुना। उसन ब्राह्मण मामन्ता का नाम कर दिया। उसके बाद पालवा के स्थापन गापाल का उन्य हुमा । गोपाल को भी जनता ने चुना था। पालवा के पासनकाल म बाद धम पुन लोकप्रिय पोर निशाली हो गया । जायसवार लिसते हैं कि गोपाल पा चुनाव इस बात का धाता है कि बगालिया ने बहुत पहल-प्रायवी सदी में जातिगत श्रेष्ठता के वदिर मिदानम अपन का मुक्त कर लिया था। उस एव महान् राजनीतिक काय स उन लोगो ने निमिन सस्थामा को समाप्त कर दिया। यह उन दिनाम बहुत बड़ा पात पा। एक शूद्र को राजा बना देने का प्रथ था कि युग-युग में पोषित मानसिप गुलामी की कडियां तोड दी गई हैं इस अवसर पर मुक्त-मन मोहवतीयो ने राह दिसलाई और सूदर ने भारत के इतिहास म एक उज्वल प्रध्याप जोडा। पाला का उदय निम्न वग वाला के लिए महत्वपूर्ण था। उस वारा राज इतना जनप्रिय या विमान मो भगाल की जनता महिपाल के गुण गाती है । बताया गया है शि बगाल म आज जो साग अछूत कहताते हैं, मनुद्वारा " ७५ जाति-व्यवस्था का इतिहास वे उन पाल अपसरा पार सैनिका के वगघर हैं, जिहाने ब्राह्मणवाद को कभी स्वीकार नहीं किया। ब्राह्मणा या फिर से विजय प्राप्त करने का मौका ग्यारवी सदी के मध्य म मिला । पश्चिमी भारत के गुजर प्रतिहारा का दावा था कि वे क्षत्रिय हैं। किन्तु यह सन्देहारत है । दक्षिण में उन दिनो राष्टकूटो का बोलवाला था। वगाल वे पालवा म राष्टकूट घराने की यात्रा के विवाह हुए । राप्टफूटा को ब्राह्मण चानुपया ने मार हटाया। उधर वगाल म मेनवा शक्तिशाली हो रहा था। सेना और चालुवया के गठव धन के बाद पालवा का राज्य सत्म हो गया। इस प्रकार ब्राह्मण पुन शक्तिशाली हो गए और मुमलमाना के आक्रमण के समय के ही हिदुओ को शक्ति सवप्रधान प्रतीक थे। इसमे सन्देह नहीं कि उस समय राजपूता ने राज्य भी थे। किन्तु य राजपूत मूल रूप से क्षत्रिय नही थे। उनका उदय या तो जनता के बीच से हुआ था, या व दिदेगी थे। इसलिए उन्होंने ब्राह्मणा का प्रभुत्व स्वीकार करना हो श्रेयस्वर समभा, प्रयया उन लिए सत्ता का उपभोग असम्भव था।"राजपूत राज्य विशुद्ध फौजी साम्राज्यवाद या, जिसम राजपूत गासका पोर लोभी ब्राह्मण पुरोहिता न गठवचन करक जनता का सूब चूमा और अपन महला और मदिरा को अपार धन स भर लिया । सम्पूर्ण देशम पोड ही समय में बडे-बडे मन्दिर बन गए। उनके निमाण में हजारा मजदूरा को, जो पि दास या दी थे, सपना पडा और बगुमार धन सच हुमा । मन्दिरा ये गभ-गह मोना चांदी और अपार सम्पत्ति से भर लिये गए। पुरोहिताई के भ्रष्टाचार की कोई सीमा नहीं थी । सगीत और बनाव-सजाव के वातावरण म सरहा नतक्यिों मन्दिरा का मुमरित करती रहती थीं। उपर राजागण भी अकल्पनीय वभव मोर भ्रष्टता म लीन रहते थे। किसी का भी जनता की परवाह नहीं थी। मुमनमाना के हमले के ममय भी, जबकि हमलावरा ने बडे-बडे गहरा और मन्दिरा का धन लूटना शुरू किया, हम ग्राम लोगा वी काई यात सुनाई नही पडतो। सगण घन और प्रौरत के लिए मापस म ही सहते रह गए। ब्राह्मण भी अलग अपने मन्दिरा के मोहन वातावरण म तल्लीन थे । इतिहाम म पात है कि मुसलमान मग मील की दूरी तय करते चले माते हैं, और राह म कोई उनका विरोध नहीं करता। प्रधिवारिया को कोई सूचना भी नहीं मिल पाती और पारमणवारी नगरा मोर मन्दिरा म प्रवेश कर जाते हैं ! उसी प्रकार ये अपार मन्पत्ति लूटकर निविरोप लम्बी दूरी तय करल हुए वापस भी लोट जाने हैं। ऐसा प्रतीत होता है उन दिना दाम कोई तामन प्रवच या ही नहीं।
भाति-व्यवस्था - मुसलमानों का हमला (७१२ ई०-१२०० ई०) पुसलमानो का पहला हमला मिघम ७१२ ई० मे हुमा । उस अभय से हम हिन्दु समान के विषय म मुसलमान यात्रिया व लसा सही जानकारी प्राप्त होती है । इन्न खुरदार ED इ. चे लस म अनुलोम विवाह, और ब्राह्म वप (पर्याद व ब्राह्मण जो अपती रया का विवाह क्षत्रिय से नहीं करते थे, पर क्षत्रियो की क्या को स्वयं याह लते थे) का यान मिलता है। शूद्रो के सम्बप में उसने लिखा है कि गूद्र वे लोग थे जो पैसे से विमान थे। ग्यारहवा सनी मे मलबन्नी नामर दूसरा मुसलमान यायो भारत नाया। उसने लिसा है कि राजपूतो (क्षत्रिया) का स्थान प्राह्मणा स बहुत नाव नहीं पा । परन्तु उसने मह भी लिखा है कि इन्न सुरक्षाद जसे परब यात्रियो ने राजपूना को जिस भवस्था म पाया था उमम वे कुछ नीचे गिर गए हैं। काणे का कहना है कि शद मे चलकर ब्राह्मणा म्लच्छ' शब वे अन्तगत परव, तुक और सव-वेसब मुसलमान आ गए। जिन दिनो गुमलमान भारत के पश्चिमी हिस्सों में लूटमार कर रहे थे रही दिनो पूर्वी भाग में बडा ही व्यापक परिवतन हो रहा था। ब्राह्मणवादी प्रतिनिया पहले तो गालिपूण प्रसार के जरिए और बाद म विजय के जरिए, पपनी चरम सीमा पर पहुंच गई थी। सेना के नेतत्व म ब्राह्मणो न काल मे शैद्ध मतावलम्बा पालवश को हरा दिया था। पश्चिमी पगब वे वमना की भानि ब्राह्मणो के भनेक उपनिया पूर्वी हिम्मा म बस रह थे। ब्राह्मण शासन काल म बौद्ध धम का परित्याग और वर्णाश्रम धमका अगीकार करने के सिवा लोगा लिए कोई चारा नहीं था। यह लिए जीवन रभा का प्रश्न था । बगाल म बौद्धो का इतना निमम दमन हुआ कि उनका कोई चिह्न तक नहीं बचा। बौद्ध लोकगाथामा और लोकोक्तियो तर को ब्राह्मणपरक रूप दे दिया गया। ब्राह्मणो न एक नया प्रचार गुरू किया कि कलियुग म चार नहीं, देवल दो वण बब हैं ग्राह्मण और गूद। इसका ता पर है किबद क्षतिया और वश्यो को राजशक्ति दिन गई है तो वे शूद्र बना लिए पए । यह बात भी ब्राह्मणो ने किसी पुराण या लोकोक्ति की व्याख्या के रूप वह डाली है। लविन मिस धमनथ में यह लिया है, पता नहीं चलता। वय ने लिखा 'उपयुक्त सिद्धान्त का मूल सूत्र हमे बही नहीं मिलता। बनारस ये वमलावर भट्ट ने अपन अप द कमलाकर' में अवश्य इस मय का एर बास्य उद्धत दिया है। परन्नु रमलाकर भटट को स्वयं इसवी सचाई जाति-व्यवस्था का इतिहास का विश्वास नहीं था, क्यापि उसने भी 'किमी पुराण म लिखा है'--इस तरह का हवाला दिया है। परन्तु किस पुराण मे यह बात माइ है ? प्रतीत होता है कि यह वाक्य कल्पनाप्रसन है। इसको उक्न पडित ने वन उद्धृत किया है। यह स्वय उसका लिया नहीं हो मकना । १३ वद्य के मतानुमार मह मिसान्त १३०० ई० से १६०० ई. के बीच किसी समय प्रतिपादत किया गया। यह मुसलमानो के आक्रमण के समय की सामाजिक स्पिति का द्योतक है । जहा कहीं भी क्षनिया और वैश्यों ने राज्य- पित सो दी थी, उनका पूण दमन हो गया । वगाल मे यह दमन पद्रहवी सटी में रघुनन्दन के समय मे शुरु हुा । वहा के प्रस्ता वे सम्बप में पडित हरप्रसाद शास्त्री के मत से हम परिचित हैं। किसी-न विभी प्रकार की उलट पुलट अवश्यम्भावी भी । 'पालवश में राजामा के द्वारा प्रचारित महायान पर पर चलने वाली बौद्ध जनता के उच्च वग के लोग तात्रिक पथ के ब्राह्मणवादी बन गए । बाकी साधारण लोग बौद्ध जन तपा मय लाग श्री तय के वैष्णय पथी ब्राह्मणवादी हा गए ।' ११ मुसलमाना के प्रागमन में पूर्व सभी हिन्दू समान थे। विन्तु अगात वातावरण से लाभ उठाकर ब्राह्मणगण हिन्दू समाज मे सवप्रमुस बन गए । जो लोग समाज-व्यवस्था के प्रति असन्तुष्ट थे, उनमे से प्रना न इस्लाम धम का भगीकार किया। मुसलमाना से पराजित होने के बाद गक्तिहीन क्षत्रिय गासका के लिए ब्राह्मणवादी समाज-व्यवस्था स्वीकार कर लेन के सिवा दूसरा चारा नहीं था। पडित हरप्रसाद शास्त्री लिखत है-- मुसलमान सभी भारतीया का हिन्दू हा या बौद्ध-हिंदू या भारतीय पहले थे। इसम लाभ उठाने म ब्राह्मण नहीं चूके। उहाने ऐसा दिसलाया, मानो योद्ध ये ही नहीं। वे इस प्रकार भारतीय प्रयवा हिन्दू जनसमुदाय मे सवप्रमुख बन बठे। प्रसस्य वोट विना मालिक के रेवड जस हा चल । वच्चयानिया महजिया, नायपथिया और कालचक्रयानिया ने कुछ दिना तर अपना मस्तित्व मलग कायम रसा लेकिन कालान्तर म उनके अनक अनुयामी या ता मिल गए, या मुस्लमान हो गए। किन्तु ब्राह्मणा ने अपने तग दापर म वसे ही लोगा को लिया, निहाने पूषत उनके पीछे-पीछे चाना स्वागार किया। ऐस लोगा को उन्होंने (ब्राह्मणा ने) 'नवासा' कहा। जिन लागा ने अपना स्वतत्र अस्तित्य ररान का प्रान स्पिा वे समाज स बहिरत कर दिए गए। उनसे अनाचारणीय जाति भयवा दलित वग कहा गया।""" हिंदू यमान ने 41, पाणा और हुमा का पचा तिसरा पा, किन्तु मुसनमानी पाना पया मगा। इस्लाम भवन एफ विदेशी घम दो नहा पा पति जाति व्यवस्था उसकी एक सम्यता भी थी, जो भारताय मभ्यता की हर रूप म प्रतिद्वदी यो। स्लाम की परम्पराए भारतीय परम्परामा 4 पिलरल विपरीत पा । हिन्दुप्रा मा पवित्रतामूलक कटटरवादिता इस्लामी अन्तर्राष्टीयना ये मुकाबले में टिक नहीं सकी। ऐसी दाम हिन्दू धम को आत्मरमाय जारीय राष्टीयता का सहारा लना पड़ा। दूसरा कोई रास्ता भी नहा था । मुसलमाना के साथ किसी प्रकार का सम्पद जित हा गया। जातीय राष्टीयता के नाम पर गजपूतान मे राध स्थापिन विथ गए। दणि विजयनगर का राज्य कायम हुआ । किन्तु ऐक्य के अभाव में उन्ह मफलता नही मिली। हिदुमा के दिमाग में वहिप्यार और बजना को मनोवृत्ति बड़ी उग्र हो रही यो । सभी प्रकार के वाहा सम्पक को वजित कर दिया गया था। यहां तक कि पुरा समाज पुथरा गया गति का कोई चिन्हें नहीं रहा। हिन्दू समाज का. यही मतिम रूप था जिी माज भी कायम हो। उस समय स हिन्द जनता की मनावृत्ति उस पराजित जाति-जैसी है जो हमेशा आत्मरक्षा के लिए और बाह्य प्रभाव से वचन द लिए चिन्तित रहती है। दसवी सदी के बाद से हिन्दू समाज के विभिन्न वग पथरा-पथरापर जाति वन गा ! उनम (मातीय विवाह का सिद्धान्त कायम हुआ। फिर जातिया र उपभेदा ममी पारस्परिक अलगाव पाने तमाम प्रकार पश्चिमी बंगाल के कायस्थ विहार मा उत्तर प्रदेश क कायस्यो स वैवाहिर सम्बध नहीं परते। देशस्थ ब्राह्मण का विवाह कापणी ग्राह्मण परिवार म नहीं होता। इस प्रक्रिया का परिणाम यह निकला कि वो में स्थान पर जाति उपजातिया को शृपला वन गइ . (वण का सिद्धान्त मात्र रह गयो । व्यवहार म जातियों प्रचलित हुई। इसके बाद सस्थति तया राजनीतिक-सामाजिक प्रभावों के प्राधार पर प्रान्तीय विभेद उठ खड़े हुए। जाम और बाकी पवित्रता को विप महत्त्व दिया जाने लगा। मुस्लिम बहुमत वाले इलाको म रहने वाल हिदुओ पर लाग सन्दह करत तग । उन वा और भाचार विचार के प्रति घृणा व्यक्त की गई। के ঘাম और राजसत्ता पर मुसलमानी के अधिकार के बाद तो ब्राह्मणवाद की ही विजय थी। ममलमानो से पराजित हो जाने पर हिन्दू राजानी की मर्याना बहुत घट गई लविन हिदुप्रा का नाव राजसत्ता के नये स्वामी मुसलमाना व हाम म जाने के बजाय पूर्णतया ब्राह्मणा के हाथ में मला गया। जसा कि पहले भी हम देख चुके हैं, ब्राह्मणवाद के पुनरत्यान का पहला बौद्ध धम ७६ जाति व्यवस्था का इतिहास चिह्न था, नये धमशास्त्रा पुराणा और दूसर धार्मिक साहित्य का प्राचीन मृषि मुनियो द्वारा लिखित बताकर उनको प्रचारित करना ! शायद ही कोई सस्कृत रचना है, जिसम ब्राह्मणो ने कोई फेर-बदल नही किया है । यह उनके लिए काफी आसान भी था, क्याकि सस्कृत हमा। से कुछ चुने चुनाए लोगो की भापा थी । इस प्रकार से सस्कृत ग्रथा के साथ इतना स्वेच्छाचार हुआ है कि उनकी एतिहासिक्ता म अविश्वास करना साधारण सी बात हो गया है । रमेशचन्द्र दत्त लिखते हैं, 'पुराण, जो कि आज तक प्रचलित है विक्रमादित्य और शिलादित्य के ममय म लिखे गए, किन्तु बाद की सरिया मे यहा तक कि मुसनमा को भारत विजय के बाद भी उनम अत्यधिक परिवतन और परिवद्धन किया गया है यही कारण है कि हमे पुराणो मे विभिन सम्प्रदाया गडा का उल्लख मिलता है। प्रत्येक सम्प्रदाय ने असस्य घुनिक हिंदू देवनाग्रा में से चुने हुए अपन विशेष देवता की श्रेष्ठता सिद्ध करने की चेप्टा वी ह बाद में हिदू लेखको ने अपनी रचनाओ वो प्राचीनता और मान्यता का चोगा पहनाने के लिए प्राचीन नाम से लिखना गुरू किया। इस प्रकार अाज वे अठारहा पुराण वेद यास द्वारा प्रणीत बतलाये जाते है ।"१५६ इस युग म ग्राह्मणवाद का क्या रूप था यह जानने के लिए हम जरा इस कान के शास्त्रा के आदेगा पर भी विचार करें-(१) जाति विभेद का मानने पर बहुत जोर दिया गया है। ये विभेद पहले की अपेक्षा अत्यधिक क्टोर और कर हो गए हैं (२) अन्तरजातीय विवाह और भोज तथा अय प्रकार के अतरजातीय सम्पक वजित किये गए है (३) नाना प्रकार के उपयागो उद्योग घरो में लगे हुए लोगा को जसे सुनार, लाहार, धोबी, बुनकर बदई और धनिया आदि को नीची जाति का बताकर उनसे घृणा की जाती है, (४) विभिन्न जानिया के बीच छुआछूत का भेद बरतने पर जोर डालते हैं, (५) कुछ जातियो को अपवित्र करार दिया जाता है, पिर उह म्लेच्छ या चाण्डाल कहकर उनका वहिप्तार किया जाता है (६) मुसलमाना, ईमाया, चानिया, जापानिया तथा दूसरे सभ्य लोगों को अपवित्र कहर उनका अपमान किया जाता है। कहा जाता है कि उनके सम्मफ से प्रादमी अशुद्ध हो जाएगा (७) न केवल अपराध के हेतु मिलने वाला दड ही, बल्कि परियम का प्रतिदान भी जाति भेद के भापार पर नियमित होता है। ब्राह्मण द्वारा पुराया गया पन दूसरे जम में काम पाता है शूद्र का दिया गया धन नरक मल जाता है (5) समुद-यात्रा वर्जित है । यह पाप करन वाला को जाति-यहिप्पार का दण्ड मिलता है या बड़ा ही मपमानजनक प्रायश्चित करना आति व्ययस्या पन्ना है, (8) सप्ट-म ध्रप्ट प म भी मूर्तिपूजा पा प्रोत्साहित किया जाता है, (१०) मन्दिरा और उनो मार पास की भूमि को दिन्य स्थल बनाकर कहा जाता है कि वहां जाने में ईवर प्रसन्न होते हैं। इतना हा नहीं और भी भनेर मूखतापूण नियम और पर धारणा शास्त्रों द्वारा शापित भौर प्रसारित का गइ यथा, 'सांसा प्रहाहत्या के लिए मिलने वाला दर है। इसकी दवा यही है कि चार तोले सोने का कमल बनवाइये, फिर मनाचार के माम हाम बस उसे वित्ती धर्मात्मा ब्राह्मण पो दान कर दीलिए।" जाति के धाधार पर ही अपराधा को स्वीच करने का नियम मा । जैसे, ब्राह्मण के लिए इस प्रकार का नियम था--- उरो तरान पर तोता जाए फिर कुछ मार्मिक विधियां पूरी पर ना दे द उस फिर से ताता जाए। यदि वह पहली तान स हल्या हो जाता है तो उसरा क्थन सत्य माना जाएगा। यदि वह पहले से भारी हो जाता है, या तm भारी ही रहता है, तो वह झूटा माना जाएगा। वश्य के लिए--- यर पूर्वाभिमुख होरर नाभि-पयन्त जल में प्रवा कर । पिर पास ही सहा मरा भादमी १०६ मगुल चौडाई वाले धनुप से सरकटे का वाण जिमका नोक पर नोर का फ्ल नहीं लगा हुआ है चलाये । वाण छोडत समय पल म खडा व्यक्ति टुरको लगाये । नदी के उस पार एक और भादमी, बाण को वापम नान के लिए दौडे। यदि दुबकी लगाने वाला मादमी वाण के पार जाने और वापस लान तक पानी क भातर ही हूबा रह जाता है, तो उस निरपराप समझना चाहिए।"२ शूद्र के लिए उसका इस प्रकार से रहर दिया जाए~~-दिप यो उसके परिमाण स ३० गुणा अधिक घो म मिना दिया जाए पोर मात्र पढकर अभियुक्त का खिलाया जाए । अभियुक्त दक्षिणाभिमुरा रहे और विप दने वाले या मुह पूर्व या उत्तर को पार । तत्पश्चात् कगण ५०० बार ताली बजाएँ। इस बीच विप साने वाले को कुछ नहा हाता ता यह दापमुक्त समझा जाएगा मोर उस विप का असर दूर परने वाला दवा दी जाएगी। १२, ये सब वणन शामिम डिविन द्वारा धन ति 'प्राईन अक्वरी म हैं। इस प्रकार की प्रथाएँ अपवर ने पमा म प्रचलित पी। सरन नय पारगो के आधार पर ब्राह्मणा ने अपने को भूटर (पथ्वी पर य देवना) धोर भूपति (१ या व स्वामी) पहा । उनका दावा था कि राजा और प्रजा, दोनो उनकी पूजा करें।हान मीन पर प्रपन का अधिकार मा दावा किया । मालाबार म तो यह सरमाय सिद्धात न गया कि जमीन वा जाति व्यवस्था का इतिहास स्वामित्व केवल ब्राह्मणो के हाथ में रहेगा। दूसरे लोग उनमे ही जमीन बन्दोवस्त लेंगे। जाति-व्यवस्था मे मदिर का विशिष्ट स्थान था। वह आज भी है । पुरोहिता और मदिरो के कारण जन समाज क बहुसरयक लोगो के अधिकार छिन गए । मदिर वास्तव मे केवल धार्मिक सस्था नही था। इसके कई प्रकार के उपयोग थे। वह गाव के प्रशासन का केंद्र था तथा जाति-व्यवस्था के नियमों के सम्बध में उच्चतम न्यायालय के रूप में प्रतिष्ठित था। वहा जिन लोगा को जैसे अधिकार प्राप्त ये उसके आधार पर ही उन लोगा की आति और श्रेणी निर्धारित की जाती थो। ब्राह्मणो को ही इष्ट देवता तक जान और मूर्ति की पूजा करने का हक था। उनके बाद से लोगा का स्थान था, जो मदिर के अन्तरग के प्रवेश-द्वार पर खडे हो सकते थे । रहे भीतर जाने का अधिकार नहीं था । तीसरी श्रेणी मे वे लोग थे, जिह केवल मदिर के अहाते में जाने दिया जाता था । उह मदिर के मुख्य भवन म जाने की अनुमति नही थी। चोयी श्रेणी अट्टता की थी, जिहें मन्दिर से निश्चित दूरी पर रहने का आदेश था । कुछ अछूना को तो मन्दिर वाली गली से भी गुजरने की इजाजत नहीं थी। मन्दिर म जाति-सम्बधी झगडा की सुनवाई भी होती थी। देवी तरीका से अभियुक्त की जान की जाती थी, और अपराधी को जुर्माना किया जाता था। यहाँ धुनाव भी होता था। यानी वहा जातीय जीवन के सभी महत्वपूर्ण शाम होते थे । गाव की पाठशाला भी वही चलती थी। "वडे-बडे शहरों में तो मदिर सरकारी खाने का भी काम देता था।' १२२ इस प्रकार मन्दिर का पुजारी राजस्व पर नियंत्रण भी रखता था । इसलिए ब्राह्मणो के हेतु मन्दिर की नौकरी सबसे लाभदायक थी। रितु राजापा न कुछ दूसरे ही मतलब से मन्दिर या ममयन क्यिा । राज्य यो मदिरा से काफी प्रामदनी होती थी। उनके जरिये ननता से भी पम वसूल जाते थ । ' मूर्ति-पूजा का जन-समाज पर कोई उन्नायक प्रभाव या भी नहीं पड़ता था। पर भारत म तो इसके साथ पप भोर मरावियों जुड़ी हुई थी। मनु के काल तक वय तथा साधारण जन अपने अपने तरीदे स अपने इप्ट देव की उपासना कर सक्त थे और परम ही पूजा एव प्रध्य निक्दन परत ये। किंतु जब पूजा का स्थान पर से हटकर मन्दिर ममा गया तो मदिर के अभिभावक ये स्प म पुरोहित अथवा पुजा रियों का भी प्रार लोगा के दिमाग पर निश्चित कप से पहन लगा । उहाने चौगों गल म गुलामी का एवं प्रौर तौर डाल दिया। माडम्बरपूरा 1 २ जाति व्यवस्था उत्सवो तया विपुल सजावट के कारण जनता पर उसका बेहद प्रभाव पड़ा और अनेकानेक अय धारणामा को सष्टि हुई । काव्य कलाकौगल मूर्तिकला वास्तुक्ला एव सगीत से भी इस काम म सहायता मिली। इस प्रकार कुछ ही सदियो मे राष्ट्रीय धन का अधिकारा मदिरो की शानदार इमारतो और उत्सवो पर उलीचा गया। यह सब जनता को भोप श्रद्धा एव विश्वास की बाह्य मभिव्यक्ति थी। पहले तीय-यात्रा का नाम भी लोग अच्छी तरह नहीं जानते थे किन्तु अब बडे पमान पर तीथयात्रामा वा प्रायोजन दिया गया। मदिरो वो जमीन मौर धन दान म मिले । इस तरह से घम का मथ हो गया देव मूर्तियो भोर उनके पुरोहितो की मघ भक्ति । भारत के बडे-बडे दाहरो मस्तिने ही मन्दिर बने हैं भनक नई मूर्तियां और अनेक नये देवता मदिरो और अघ भक्तो ये हृदय में स्थापित हो गए । २३ ऐसे ही करत घरते ग्राह्मण जाति हिदू समाज म सबसे ज्यादा प्रभावशाली हो गई। सामाजिक राजनीतिक सस्था के रूप म मन्दिरा का नियंत्रण समाज पर पूण स्प से स्थापित हो गया और समाज से बहुसख्यक लोगो की इच्छा यावाक्षामो वो बरहमी से कुचल दिया गया। तभी से ब्राह्मणो की छत्रदाया म उनकी कृपा प्राप्ति के लिए भागे बढ़ने की प्रतियोगिता और साम्प्रदायिक सवीणता शुरू हुई। हम देखते हैं 1 हिन्दू समाज का इतिहास जनजातीय सस्थामो से गुरू हुमा और मुसलमानो ये गासन काल म उसम स्यान भेद के साथ सामाजिक भेट भाव भी उठ खड हुए। समाज का जीवन अनेक स्वतत्र जातिया उप जातियो में बँट गया। यह विभाजन खडी सीध और पड़ी सीप दोना रूप म हुमा । बहुधा पडी सीध म ऊपर उठने का अय था व्यक्ति के सामाजिर एव जातीय स्तर में उत्थान । यह सिलसिला पूरे मुस्लिम काल तक चला । यद्यपि सिस भादोलन एव लिंगायत अान्दोलन के रूप म इस व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह भी हुए किन्तु सामान्यत पोई भी परिवतन नही हुआ । विद्रोहा को राजनीतिक अथदा बौद्धिा स्प से कुचल भी दिया गया। सिटिशकाल प्रिटिश शासन काल म ब्रामणवाद या गर और भी मजबूत गया। *ट इख्यिा कम्पनी एक व्यापारी मस्या थी । उसका एकमात्र उद्देश्य मुनाना करना था। उसके लिए भारत एक जमीगरी सा था जिसका प्रनय कम्पनी म गामोदारो के हित की दृष्टि से पराा था। उसकी दिलचस्पी सालाना जाति-व्यवस्था का इतिहास १२४ प्रामन्नी की रखम म थी, न दियायपूण शासन-व्यवस्था के सिमाना और नीतिया म । इसलिए म्वभावत कम्पनी ने देश के प्रमुख लोगा का विश्वाम प्राप्त करने की कोशिश की । बसे लोगा म मुस्थत ब्राह्मण ही थे। कम्पनी को मुसलमानों का भरामा नहीं या, क्यानि उसने उनके हाथा सही सत्ता योनी थी। एवं डब्याय न १८१६ ई० मे इस प्रकार लिखा है- ब्राह्मणाने भी भारत के सम्पति विनाली यूरोपीय शासको की कृपा प्राप्त करने म वी होशियारी दिखलाई है। वह विभिन सरकारी सस्थापा, दफ्लरा और जिला के यामालपा में उच्चतम पद प्राप्त है जहाँ उह पम भी मवस पादा मिलते हैं। दरअसल, सावजनिक सामन प्रबध का कोई भो ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहां वे अनिवाय न हो गए हा सम्पन्न मदिरो के प्राय मे कम्पनी के मुलाजिमा और ग्राह्मणों के बीच पनिष्ठ सहयोग था । हम पहल देख चुके हैं कि मुसलमाना के गामनवाल के प्रारम्भ से ही ये मदिर जिस प्रकार ब्राह्मणवाद और इसलिए जातिवाद क प्रतीर हो चले थे। विदेगी मुसलमान शासका के अधीन रहकर माता के लिए वग-सघप चलाना सम्भव नहीं था। इसी कारण मन्दिरवाद का प्राविवार हमा । मुसलमान गासका ने भी वार्षिक प्राय व विचार से मदिरा का ममशन किया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी न भी ऐसा ही किया। यदि इस प्रामदनी का भरोसा नहीं रहता तोय मन्दिर कब क न गिरा दिए गए होते । सन् १८०३ ३० म पुरी जगन्नाप मदिर मे कम्पनी को १,३५००० रूपये की प्रामदनी हुई। यात्रा कर से वोध गया में भी दो-तीन लाख रुपये आये । तिपति बाशीपुर, सरकार और सम्बल मादि तीथम्याना से लगभा १९,३४,००० रुपये वसूल गए । इस नीति से ग्राह्मणवाद का मथप्ट बत्त मिता । २उस युग क भनेक सुधारवादी भादोलन असफल हो गए ययाकि ब्राह्मणों को राज्य का वा प्राप्त था। सरकार ने मना मन्दिरोगा जाणोंदार दिया और बड़ी-बड़ी पररावि मनु न म दी । मद्रास प्रेसीडेमी को ८,७६७६० रुपय का वार्षिक भनुन मिला, याबई प्रेसीडेमी के २६,५८६ मदिरो और भूतिया का ६,६४ ५६३ रुपये मिले । कम्पनी को पूरी जागीरदारी में मूर्ति-पूजा पर १७१५५८६) सय प्रतिवप पत्र दिए जात थे। इमाम ही पवायाभारी परिणाम या । इमसे आति-व्यवस्था नोपोप यल प्राप्त हुधा पौर जानि-व्यवम्या पाधार पर हो ब्राह्मणों का सामाजिक भरि धार्मिक प्रभुत्व मिा मा पा । कम्पनी का भी हिदू जाति का मन पलेस जाति-मवस्या के एम एम सुती पर प्राप्त था, पारि हिन्दुमा जाति-व्यापा म जाति वहिवार मृत्यु-दण्ड स भी अधिक भयर या । सन् १७६७ ई. में कम्पनी ने जातीय कचहरियां स्थापित का और इन कचहरिया मो हिन्दुभा में सामाजिक और पारिवारिक जीवन म भी हस्तक्षेप करने का अधिकार दिया । हिदू लोग जातीय परियो से अत्यन्त मातक्ति रहत थे क्यारि उन विप रान निगम का प्रय या सामाजिक मुत्यु। यक ने वारेन हेस्टिग्रा ये विरुद्ध भपन सुप्रसिद्ध आरोपो को उपस्थित करने के प्रसग म इन जातीय कचहरियो का भी जिक्र किया है। उसने वहा उसने अपने नौकर को धामिर अधिकार क्षत्र में सर्वोच्च पद पर ला विठाया है । इस भधिकार क्षेत्र म सभी जातियों के मुख-दुख, पारिवारिक और सामाजिक मान प्रतिष्ठा नथा परलोर के मुक्ति प* से सम्बंधित सभी प्रश्न आ जाते हैं। .२८ यायाधीशो और वकीलो को ब्राह्मणवादी नियम की जानकारी कराने के लिए वारेन हेस्टिग्स ने ब्राह्मण विद्वाना यी मदद से सस्कृत ग्रथा प्राधार पर उन नियमा को एक सहिता प्रस्तुत कराई मोर उमरा मजा में मनुवार पर लिया गया। जाति को सुस्पष्ट माथि मोर राजन तिव महत्व प्रदान दिया गया। जनादोलन के कारण मागे चतर विभिन्न जातिया म मरवारी सरक्षण का विभाजन कर दिया गया तथा स्खूला-बालजा म, चुनाव भैया मे तथा वैधानिक सूमारी में विभान आनिया भधिकारो भोर मतो को भी स्थान मिलने लगा। जाति-व्यवस्था को मिटाने म समाज-सुधारमनगण सवथा मसमय रह । जाति क्या है विभिन सामाजिक समहा की स्पिति और भधिकार क्या हैं इन बातो का निणय करने का अधिकार सरकार ने मपन हामो भले लिया। हस्तक्षप न धरले ही सरकारी नाति का वास्तविर मथ पा यास्थितिल का समयन । यह ठीक है कि विटिश सरकार ने भारतीयो के धार्मिक और सामाजिक जीवन म दिलचस्पी लना छोड दिया। सायद मय इसकी जरूरत भी नही थी। सम्पूर्ण देश में ब्राह्मणवाद की जर जम गई थी। दक्षिण भारत में तो इसका प्रभाव पहा ही से पा। माह्मणवादी समाज-व्यवस्था अर्थात जाति-व्यवस्था का स्वीकार कर तने बाद सभी सम्प्रया को तरह-तरह की सहूलियतें और पाजानी मिल जाती थीं। हिंदू पपये वतमान नेतामो ने हिन्दू धम वी समुच्चय वृत्ति का प्रसा की है। डा० सवपाला राधाकृष्णन का मत है कि हि घम किसी प्रजातीय तत्व पर मापारित नहीं है । यह विचार भोर भावाक्षामो का पित्रागत उत्तराधिकार है, जिसम भारत म रहने वाली सभी प्रजातियो ने योगदान दिया है वतमान हिंदू पम के बहुत से लक्षण भादिकाल से प्राप्त हैं । वेदा में वो वा पम जाति व्यवस्या का इतिहास चणित है । परन्तु जन-समाज अपने परम्परागत देवतामा, यमो और नागो की उपासना करता रहा । वदिक कटटरवादिता तथा प्रतीकवाद को प्रोट मे अनेका नेक विश्वासो धार्मिक सम्प्रदाया तथा ग्रादिम प्रजातीय तत्त्वा का व्यापक प्रचार था । वदिक धम मे उन तमाम प्रादिम युगीन धार्मिक सम्प्रदायो के तत्व सनिहित हैं । उन तत्त्वो को नष्ट करन के बदले वदिक पम ने उन्हें ग्रहण कर लिया । बदिक घम में दाविडा तथा भारत के अय आदिम निवासियो के सामाजिक जीवन का इतना कुछ तत्त्व मिल गया है कि आज मौलिक प्राय तत्त्वो को विलग करना कठिन है । सब-कुछ इतना सस्लिष्ट सूक्ष्म पौर चिर न्तन हो गया है कि उनके आधार पर एक विशिष्ट हिदू सभ्यता विकसित हो गई है जिस न तो हम प्राय सम्यता कह सकते हैं न द्रावित सभ्यता और न मादिवासी सभ्यता । चिरकाल से एक्ता का स्वप्न हमारे नेतागण देखते रहे हैं और उस स्वप्न की छाया सम्पूर्ण परिपाश्व पर मंडराती रही है इस्लाम और ईमाई धम ने समय समय पर हिंदू धम म युयुत्सु प्रवृत्तियां उत्पन्न करने की चेष्टा की है फिर भी हिंदू घम की मौलिर प्रवृति समवय और सहि- एणुता की है । इस उदार दृष्टिकोण के कारण हिंदू धम सभी प्रकार की धार्मिक मावाक्षामो और चेप्टामा का वण-पटल बन गया है। "२६ हिन्दू धम का यह ममयन भ्रातिमूलक है। इतिहास इसकी पुष्टि नही बरता । मादिम धारणामो की स्वीकृति सहिष्णुता और उदारता का लक्षण नहीं है, यह दुबलता का लक्षण है । प्रत्येक युग को अपनी विचार-सम्पदा होती है जो पहले युग की विचार-सम्पदा वा स्थान ग्रह्ण कर लेती है । आदिम शालीन धारणामो से चिपके रहने के कारण चतुर्दिक अप पतन का सिल- सिला शुरू हो जाता है । यह सोचना भम है कि उन सबम कुछ सत्य है । उसी तरह यह कहना भी गलत है कि हिन्दू धम मे कोई रूढि नही । हिन्दू जीवन मे ऐसी एक भी बात नही जो रूरिया वा रीति रिवाजो से नियत्रित नही होती । हिन्दुमो ने इम्लाम और ईमाई घम के पगम्परा की पूजा स्वीकार की है। यह उदारतावा नहीं बल्लि कमजोरी के कारण । इतिहाम बतलाता है कि हिन्दू धम ने कभी भी विभिन ममूहा और सम्प्रदायो को गान्तिपूर्वक एव साय रहने की प्रेरणा नहीं दी। हिंदू धम ने इस उद्देश्य से इन समूहा मार गम्प्रदायो को स्वीकार नहीं किया । इस घम के दायरे म तरह-तरह पे दल मोर पार्मिर सम्प्रदाय यदि शामिल हो गए हैं तो इसका कारण है प्रजातीय स्थान-परिवतन पुट मोर व्यवमाय की तला।। जाति-व्यवस्था म इस प्रकार जाति-व्यवस्था की गरता का सवथा अभाव है । यति इसम सचमुच उतारता होता तो ने तो कभी थापा दमन होता न धुमाश्त की बात उठनी और न जन्म भाधार पर जाति-व्यवस्था बन पाती । उसी प्रकार स्मृनियां भी दिन धम का वल्लपन करने बाल शूद्रो के लिए प्राण-दण्ड मा विधान नहीं भरती"" हिंदू धम को पुराहिन वग ने कापम दर रखा है। इसलिए न तो भाषि- भौतिय विषया पर यथाथवारी दृष्टि से विचार मरन की पतति बन पाई और ने उस प्रकार की समाज-व्यवस्था धन सपी । जिस वग ने नक्षा मृत व्यक्तियो भूत प्रेतो तथा इस तरह की अनेराने भातियान प्राधार पर अपनी सत्ता पायम रखी, उसने अपनी स्वाथ रक्षा के निमित हो ऐसी अधधारणामा का परिपोषण रिया। जिस समान म उत्साद वर पुरोहित वग का प्रभुत्व समाप्त करने म असमय रहता है उस समाज में किसी प्रकार का नया विचार कारगर नही हो पाता ! पुरोहिता का प्रभाव मिटन पर ही विज्ञान और दान का विकास होता है । सूरोप म बहुत हिना तक रोमन साम्राज्य कारण ईमाई घम वा शेलवाला रहा। अरव म व्यवसायिया और सनिया के यम्युदय के कारण इस्लाम धम उठ खडा हुा। भारत म भी प्रदाह्मण वर्गों ने ही बौद्ध पम जसा सावदेशिक पम प्रचारित किया। यह सा है कि जब मानव-समाज बबर युग पी देहली पारकर बाहर माया तब पुराहिता र ग ने प्रगतिशील भूमिका अदा की। परन्तु उसके बाद से यह वग सवदा प्रगति का पथ भवस्त करता रहा। भारत के इतिहास में यह बात पूर्णतया सिद्ध हो जाती है। सामाजिक परिसारव दान और प्रान्तोलन के प्रभाव म हिन्दू धम तया इसकी विचित्र सामाजिक सस्थामा का इतना उलझा रूप बन गया है । जस-जसे जाति-व्यवस्था की जड जमती गइ है वसे-वस हिंदू समाज में निम्न श्रेणी के लोग जाति के विषय में सचेष्ट होते गए हैं और ब्राह्मणवादी नियमा को मानकर हिंदू समाज म प्र पान या उपर उठने का प्रयास किया है। भूमि ऊंची जाति में लोग ब्राह्मणवा नियमा का पालन करते हैं इसलिए छोटी जाति के लोग भा इनवा पालन उचित समझते हैं। इसलिए जो जानि सामाजिक सोपान पर ऊँचे उटना चाहती है वह उतनी ही मुस्तदोस धार्मिक कटटरता का पालन करती है। माज में भारत म हम यह प्रत्यक्ष देस रद हैं कि जिन जानिमों में कमी बाह्मण पुरोहित नहीं थे, वे जातियां भी अपने ब्राह्मण पुरोहित नियुक्त कर रही हैं और ब्राह्मण पटटरवादिता से सम्बंधित सभी त्योहारो गोगा मौर जाति-व्यवस्था का इतिहास प्रवरा को अगीकार कर रही हैं। आदिवाधिया म भी जा हिंदू होना चाहते है वे अपन मामाजिक निपेषा का ता कायम रखत हैं किन्तु अपन सम्बध मूचक चिह्न को छोड़ रहे हैं और उनके स्थान पर हिन्दू देवतामा को स्वीकार कर रहे हैं । शुरू म वै विसी धार्मिक सुधार मान्दालन के रूप म पिछले दरवाजे से हिन्दू समाज में प्रवेश करते हैं। मागे चार प्राधिर स्थिति के अनुरूप अपनी एक अलग जाति बना लेते हैं । त पश्चाए ये ग्राहाणा को खूब दान-दक्षिणा देने हैं जो उनकी जाति के लिए धर्मान्धानों के आधार पर मच्छी-खासी प्राचीन मूलोत्पत्ति ढूढ निकालते हैं । हिन्दू समाज म प्राज इसी प्रकार का विकास हो रहा है।"१३२ जानि-व्यवस्या के विरुद्ध कभी कोई पालन नहीं चला। इक्के-दुको व्यक्रिया और समूहा ने निश्चय हो अावाज ठाई है, परन्तु कोई विशेष परिवतन नहीं हो सका है। इस प्रकार नास्तिकता सामाजिक वों की वाह्याभिव्यक्ति है। इस सघप के विषय में ऐंगेल्स ने लिखा है "इतिहास की गलिशालता के नियम जिसके मनुसार राजनीतिक, धार्मिर, दानिर या पाददामूलर सभी ऐतिहासिक राघष चना करते हैं, वस्तुत विभिन्न सामाजिक वर्गों के सघप की अभिव्यक्ति "13 प्रध्याय ५ हिन्दू धर्म और दर्शन किसी भी सामाजिव रास्था वो मच्छी तरह समझने के लिए उसपे दारा माधार की जानकारी मावश्यक होती है । जानि-व्यवस्था को भी सही भों समझने के लिए हिदू घम और दशन का विश्लेपण उपयोगी प्रतीत होता है हिन्दू धमकी ठीक-ठीक परिभाषा देना कठिन है, क्योकि इस विषय पर रितन ही परस्पर विरोधी मत मिलते हैं। फिर भी एप' सवसामाय दृष्टिकोण है कि हिदू धम समाज व्यवस्था के स्थायित्व की रक्षा करने वाली विधियो की एक सहिता है । यही कारण है कि इस घम म चातुवण्य व्यवस्था जसे सिद्धाता को प्राथमिक महत्व दिया जाता है । कुछ विचारव इस प्रकार वे तों का विस्तार करते हुए कहते हैं कि ईश्वर की कल्पना तथा परलोर पुनजम देवता मादि की धारणा मूलत प्रतीकात्मक है और इनकी भवतारणा इसलिए हुई है कि जन साधारण विधियो और सामाजिक नियमो का पालन करें। दूसरे विचारस ऐसे भी हैं जिनका विश्वास है कि हिंदू धम इहलोक और परलोक मे सुस शान्ति प्राप्त करने का माग बतलाता है। श्रुति स्मृति और पुराण चारो पुरुषाय पौर चारो वर्णों के सिद्धान्तो का प्रचार करते हैं और बतलाते हैं कि अपने वर्णाश्रम धम का पालन करने वाला व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करता है। एक तीसरा भी मत है कि हिन्दू धम शत प्रतिशत माध्यात्मिक धम है। दाव यष्णव और वेदान्ती सभी इस मत की पुष्टि करते हैं । उनका कहना है कि जीव मोक्ष माग का तीर्थयात्री है । उसके लिए यह भौतिक जीवन एक पडाव मात्र है। मात्म रक्षा समाज रक्षा धन तष्णा प्रादि तमाम बातें निरयर मायाजाल हैं। ये सब मत विवादास्पद हैं। हिदू धम से सामाजिक स्थायित्व और सुव्यवस्था को बल मिला यह बात भी मानने योग्य नही। इस अथ म हिदुओ ने घम को कभी स्वीकार भी नहीं किया। कुछेर अपवादो को छोडवर हिदू धम के भी प्राचार्यों ने हमेशा परस्पर विरोधी विचारो का प्रचार किया। इसरा वाण वदिक विधियो में प्रात्मा ब्रह्म मुक्ति और अमरत्द-सम्बधी उपनिपदो हिद पम और दशन को परिकल्पनायो मे, स्मृतियो के वर्गाश्रम धम में, पुराणो की प्राथना, तीर्थयात्रा तथा मय धार्मिक नियमों में बडो आसानी से मिल जाएगा । वदा मे धम का सवथा भौतिकवादी स्प मिलता है। उनमें भौतिक सुख के लिए शक्ति के लिए, वर्षा के लिए, मुदर स्वास्थ्य भौर दीर्घायु के लिए प्राथनाएँ मिलती हैं । पास्यदेव भी भौतिक शस्तियो के प्रतीकमात्र है। ठीक इसके विपरीत वेदात का धम मूलन पाम्यात्मिर है। भौतिक पार्यों का महत्व स्वीकार करनेवाला धम, पिछडे हुए सामाजिक संगठन का सूचर होता है। वसे धम को स्वीकार करनवाल लोग विश्वास करत हैं कि मनुष्य के दनदिन जीवन-व्यापार में भी देवतामा का हाथ रहता है और उन देवताओं को प्रसनता से अभीप्सित फल की प्राप्ति हो सकती है। अयथा उनके कोप से जीवन विपद-सकुल और कष्टकर हो जाता है । वस्तुत इस प्रकार का विश्वाम भौतिक घटनाग्रो के काय कारण भेद को न जानन से ही उत्पन्न होता है । ऐसे अज्ञान धूमिल व्यक्ति वैमानिक दृष्टिकोण अपनान म सवया भसमय रहते है। हिंदू धम के अधिकाश मध ऐम ही लोगो ने लिखे हैं जिन्हे देवी शक्तिया म अधविश्वास था भयवा जिह समाज के प्रभावशाली वर्गों से प्रेरणा मिलती थी । वैदिर घम का प्रभाव क्षीण होन पर विभिन्न प्रकार २ मत प्रतिपादित किये गए, जिनम उपनिषदो का प्रभाव विशेष रूप से कालि- पारी सिद्ध हुआ । यही कारण है कि अनेक लोग हिन्दू धम को सवथा माध्या- मिक मानते हैं । इन सर परस्पर विरोधी विचार से भारतीय समाज पा अप पतन हुमा । वेद, पुराण भौर स्मृतियों ने भारतवासिया को धमशास्त्री का भविश्वासमस्त उपासक बना दिया। उन लोगो न पूण आस्था के साथ वणाधम धम को स्वीकार किया और ऐमा मानने लगे कि कोई भी व्यक्ति उच्च श्रेणी का हो या निम्न श्रेणी का, यदि वह अपने धर्म का पालन परता हो तो निश्चय ही मुक्ति लाभ करणा। भारतीय दशन ने भी बडी सफाईस दुनिया के कठोर सत्य पर अध्यात्म की चादर हात दी है। इसी सासले अाधार पर मायावाद मा वितडा सहा विमा गया, जिसमी भोट म लासो-करोडा दप-पौडिन भारतीय जनता का प्रसिक्त चेहरा छिप गया । यह समार माया है हम माग जो युद्ध हैं भोर जिम दशा मे है, यह सब हमारे पूर्व जन्म में कभी का पल है, और उसम किसी प्रकार के परिवतन पी सम्भावना नहीं। इसलिए उसे बदलन को पेप्टाहोपयोपर पी जाए? यो न अपने को भाग्य के भरोसे छोड दिया जाए पुनश्च, न भूव बाह्मणो द्वारा प्रतिपाति बतव्यो रा पालन रले हुए मोग माम लिया जा सकता है तब पिर इहतोक को स्थिति में परिवतन लाने से १ जाति-ध्यवरपा भावश्यक्ता ही क्या? हिंदू धम म नाना प्रकार के धार्मिक रूपा मोर परस्पर विरोया प्रतियो का सम्मिश्रण है । इस दो महत्त्वपूर्ण पहलू हैं । एक तो यह कि गामाजिक जीवन म तरह-तरह की प्रथाएँ और नियम है दूसरे तरह-तरह वे असगतिपूण परस्पर विरोधी अध्यात्मवादी सम्प्रदाय पालू हैं। प्रत्यक धम 4 मूल में कोई न-कोई समाज व्यवस्था होती है । हिदू घम वा यह पलू बिलकुल स्पष्ट है जसे-चातुवण्य जाति-व्यवस्था विवाह-सम्बधी विधियो, पारिवारिप या जाति जीवन के मानदण्ड तथा सयुक्त परिवार प्रणाली मादि मादि । इस प्रकार हिन्दू धम एक विशिष्ट सामाजिक संगठन स सम्बधित विधि विधाना या प्रतिरूप है । हजारा वर्षों से लोग मानते पा रहे हैं कि यह घम जाति-व्यवस्था पर माधारित है । जो हिदू मपनी जाति के नियमा का पालन करता है वही वास्तव म हिंदू है । सभी घम-प्रयो ने समाज-व्यवस्था की हिमायत म पुनज म मौर कमवाद के सिद्धान्त का उपयोग किया है। हिदुत्व का धार्मिक पर सामाजिक प्रथापा मोर नियमा को केवल भौतिक महत्त्व ही नहीं दता बल्कि उनका प्राध्यात्मिक मूल्य भी बतलाता है । इस तरह से सभी सामाजिक नियमा का कोई-न-कोई धार्मिक अभिप्राय बतलाया गया है। सभी सामाजिक और राजनीतिक मान्दोलना का एक दाशनिव माधार रहता है। दान विज्ञानपरक भी हो सकता है मौर घमपरक भी। यह सब सामाजिक चिता धारा पर निभर करता है। प्राचीन-वाल व सामाजिक मान्दोलना पर धम का विशेष प्रभाव रहता था। धम भी क्तिने प्रकार के पे-स्वाभाविक प्रकृति पूजा बहुदेववाट एकेश्वरवाद ईश्वरीय सवसतावाद अथवा शकावाद । उन गिनों सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक विकास धार्मिक माध्यम से ही सम्भव था जोकि प्राधुनिक काल में सम्भव नही दीखता । शोचनीय बात है कि माज 4 बल्तेरे शिस्ति भारतीय नहीं जानते कि सामाजिक और राजनीतिक उथल पुथल पर विज्ञान और दशन वा क्तिना असर रहता है । सामाजिक गति पीलता जब तक स्पष्ट स्पस प्रस्ट नहीं हो जाती तब तक दशन हवाइ किले जसा लगता है। यह याद रखने की बात है कि काति का प्रभाव मानव जीवन के सभी भगा पर पड़ता है । प्राजक्ल को सामाजिक क्रातियां हमारे अध्यात्मिय और ननिक जीवन को प्रभावित करती हैं । परन्तु प्राचीन काल में मनुष्य के मन पर धार्मिक और प्राविधिक विश्वासो का सर्वाधिक प्रभाव रहता था। उन दिना लोग विश्वास पर ही जीते या स्वभावत वसे जमाने में लागा क धार्मिय विश्वामा विचारा और सस्याग्राम परिपतन लाने के लिए हिंदू धम और दान धार्मिक मान्दोलन के रूप म ही प्राति का सूत्रपात होना था, अर्थात् दुनिया के सभी घम महान् प्रातिया के परिचायक हैं । बौद्ध धम एक प्रकार को महान् फ्राति थी। इसी प्रकार ईसाई और इस्लाम धम भी। इन सभी कातिया के मूल मे प्रारम्भिव प्रकृति-पूजा और पुरोहिता के विरुद्ध विद्रोह की भावना थी। वदिक युग वा ब्राह्मणवाद एक प्रकार की प्रारम्भिक प्रकृति-पूजा थी, जिसके विरुद्ध लगातार विद्रोह होते रहे । उनम बौद्ध और जैन धम प्रमुख हैं । इसलिए प्राचीन भारतीय समाज को धार्मिक पृष्ठभूमि का विश्लेषण प्रावश्यक प्रतीत होता है । धार्मिक विश्वासो और रुढिया का स्वरूप स्थिर होते होते पूरा युग थीत जाता है, जिस हम सामाजिक परिवतन का काल कह सकते हैं । भौतिक और सामाजिक जीवन म क्रमा परिवतन होते रहते हैं और तदनुसार लोगों पादों में भी परिवतन होते हैं । यदि कोई धार्मिक विश्वास खडित हो गया तो इसका अथ है कि जिस सामाजिक व्यवस्था की नीव पर वह विश्वास टिका हुआ था यह व्यवस्था ही विघटित हो गइ । मनुप्या का जैसा कुछ मापसी सम्बघ रहता है, वैसा ही कुछ सम्बघ मनुष्य और ईश्वर के बीच अथवा मनुष्य और देवतामा के बीच स्थापित हो जाता है । वेदा की प्रकृति- पूगा दरमसल तरह-तरह की प्राकृतिक गस्निया की उपासना है । एकेश्वरवाद मे द्रीभूत राजसत्ता से मिलता जुलता है । आदिम प्रजाते व मे ही तरह-तरह ये देवी-देवतामा की पूजा सम्भव थी । वे देवी-देवता वस्तुत शक्तिशाली, प्रादा व्यक्तिया के समान थे। उसके बाद जिस प्रकार जनजातीय स्वतत्रता के भग्नावशेप पर राजतत्र की इमारत खडी होती है, उसी प्रकार प्रकृति पूजा मौर बहुदेववाद के पश्चात् एवश्वरवाद का उदय होता है । इन सय वाना पो सामाजिक प्रावश्यक्ताया की रोशनी म ही समझना चाहिए। घम के स्वरूप म क्रमिक विकास हुआ करता है, जस बहुदेववाद के बाद एकेश्वरवाद । प सब सामाजिव सान्ति के परिणाम हैं । प्रगतिगोल शक्तियो के अनुरूप ही जातियाँ होती हैं । बहुदववाद या सवया भत हो जाने पर एवेवरवाद की स्थापना हुई, जिसके फलस्वरूप तमाम सामाजिक सम्बघा मे जातिवारी परिवतन होन लग । पुरान और नये उमान के बीच एक प्रकार का समझौता हमा, मोर उसपे नतीजे म लागों न बहुदेववाद को छोडवर सवाक्तिसम्पन्न एक ईश्वर को पासना गुस् यी। इसका मथ है कि सामाजिक सगटन पूरा- पूरा मिट नहीं सपा पा प्रगतिशील पाक्तियां इतनी पुष्ट नहीं हो पाई थी कि प्राचीन गनित व्यवस्था यो उखाड बनी। प्राचीन भारत म नोग बहुधा समभौत का रास्ता अपनात थे। वेदान्त जाति व्यवस्था के एकेश्वरवाद ने वैदिक विश्वासो का सघया उमूलन नही किया, पति उपनिष ने प्रादिमवाल वे बहुदेववाद का एक प्रकार से मुक्ति पोषित १५ डूढ निकाला। इस तरह का समझौता क्योर हुमा-~~यह जानने के लिए सामाजिक वर्षों में मापी सम्पप का विश्लेषण करना चाहिए। किसी नये का ने एकेश्वरवाद को प्रचारित नहीं किया था। रामेश्वरवादी दृष्टिकोण प्राचीन परम्परा से सवथा मुक्त नहीं था। यही कारण है कि बहुदेववादी बाह्मणो ने रहस्यो मुष एवेश्वरवाद का ईश्वरीय सवसतावा या रूप दे मला। और इसीलिए भारत में मामाजिक और राजनीतिर एकता स्थापित नहीं हो सकी मोर न केद्रीभूत राजसत्ता का विराम हुमा । विचारणाय पात्र है कि कातिकारी बौद्ध धम के भाव नोचे बडे-बडे मामाग्यो वा उदय हुमा परन्तु वे ज्यादा दिनो नय नही टिब म । सामाजिक एकता के प्रभाव म वेदोमूत सत्ता वाले राज्य छिन्न भिन्न हो गए। पहाँ न तो पृणत एवेश्वर- वादी धन का विस्तार हुशा और न मामाजिर और राजनात वा स्थापित हुई। इतिहास प्रान्ति पोर प्रतिक्रान्ति के सथप की कहानी है। भारतीय इतिहास में बौद्ध जन मोर लिंगायत धम के द्वारा प्रालियां हुइ। इन सब धर्मों ने वदिक धम और वहिक समाज का विरोध किया। छहोंने समाज से माहह्मणो का माधिपत्य मिटान की चेष्टा की और उच्च वग के विरुद्ध जन सापारण के अधिकारी वा नारा बुलद किया। बुद्ध नै समाजगत विरोधो की परीक्षा की। उहोंने देखा निवेदो के पुरोहितवार के कारण समाज म अरोप दुख है । ब्राह्मण पुरोहित जनता का मार्थिक और सामाजिक पण करते है विद्या पर ब्राह्मण वग का एकाधिकार है, बद विदित यज्ञादि कृत्या का चारा पार बोलबाला है जनता पा कम पत म मरोग विश्वास है लोग पेड और पत्थर को देवना रूप में पूजते हैं । असा वि एम० एन० राय न लिखा है इतिहास के विभिन युगो में तरह-तरह से अतिरिक्त सामाजिक अधिकार (सोगल सरप्लम) मचित होते रहते हैं । प्राचीन काल मे बसा ही एक रास्ता था देवताग्रो में प्रति नवेधादि अर्पित करते मौर ये नवेद्यादि किस प्रकार अपित रिये जाएँ यह पुरहित ही बतला एकता था। इसीलिए हम कह सकते हैं कि ब्राह्मण ही उस जमाने के चक्र थे। देवल देवताओ वे दलाल थे बलि समय समय पर देवनामा प्रति पित किये गए नवद्या के रूप म मतिरिक्त सामाजिर अधिकारी सरना भी थे। देवता के दलालों के लिए यह बह ही मुनाफ का यापार था । वे जनता से हिदू पम और दान ज्यादा-से-ज्यादा वसूल लिया करते थे। आज एक देवता क्रुद्ध है तो इसको प्रसन्न करने के लिए एक नहीं बल्कि तीन-तीन बकरियां अथवा दूसरी कोई चीज चटानी चाहिए । इस प्रकार इतना कुछ चढावा घढता था कि पुरोहित एकवारगी हजम नही कर सकता था। वचा हुअा चढ़ावा उसकी निजी सम्पत्ति हो जाती थी। इस तरह से धीरे धीरे सारा सामाजिक धन ब्राह्मणों से एकाधिकार म चला गया और वे समाज के शासक बन गए। इस पदिक ब्राह्मणवाद के विरुद्ध बौद्ध घम ने विद्रोह का शख फूका। इसकी ध्वनि को जन-माधारण ने बड़े चाव मे सुना । वौद्ध धम न केवल परम्परागत ही धम का विरोधी या, बल्कि सस्कार-जजरित जातिवद्ध समाजव्यवस्या के विरुद्ध घोर प्रतिरोव का भी मूचक था । लगभग हजार वर्षों तक इस धम न ब्राह्मणवाद का मुकाबला किया, लेकिन अत म जीत ब्राह्मणवाद की हुई । बौद्ध धम की पराजय का एक कारण यह भी था कि वह घम उतना एकेश्वरवादी नहीं था, जितना कि नकारात्मक । अपन अन्तिस दिना में तो वह धम मठवाद के दलदल में बुरी भरह फंस गया था और जिस भ्रष्टाचार के विरुद्ध विद्रोह के रूप म उदित हुपा पा उसी भ्रष्टाचार से स्वय प्राक्रान्त हो गया था। ब्राह्मणवादी प्रतिक्रिया के नायर दाक्राचाय ने अन्त म बौद्ध धम का श्राद्ध कर डाला। शकराचाय के महत्त्वाकाक्षापूण एकेश्वरवाद के बल पर प्रतिक्रियावादी हिन्दू धम ने बौद्ध धम का उमूलन तो कर दिया, परन्तु अपनी जड जमाने के लिए समाज में मनान मोर अघविश्वास को खूब प्रश्रय दिया । हिंदू धम-तत्र चाहे बौद्ध युग के पहले का हो प्रयदा कराचाय के जमाने वा, उस पर एकाधिकार ग्राह्मणा का ही रहा । जनता के लिए वस्तुत' पतनामुस पौराणिक अविश्वासा भौर जाति तथा छुवाछून सम्बधी सामाजिर पूर्वाग्रहा ये सिवा दूसरा कोई घम नहीं बच रहा था। उन मध विश्वासा और सामाजिक रुढिया का कटटरपथी ग्राह्मण जाति बडी मुस्तदी से प्रचारित पोर प्रोत्साहित करती थी।' व्यापारी वग की कमजोरी के कारण बौद्ध धम म पुननिर्माण की मपक्षा विघटन की पाक्ति हो भधिक सक्रिय यो । यह ठीक है कि योद्ध धम के विद्रोह रो पदिय समाज की बुनियाद हिल गइ और ब्राह्मणवादी व्यवस्था विष्ट हुई । परन्तु माय ही तत्कालीन शिथिल समाज व्यवस्था म विघटनकारी प्रवृत्तिया को भी विशप यल मिल गया। बौद्ध धम ६ सगुण पा से प्रेरित होकर नया समाज बनाने को अपेक्षा अधिकारी लोग उसके नकारात्मक पारा ही प्रभावित हा गा मोर नव निमाण के कठिन पय से पराठ मुख होरर निर्वाण जाति व्यवस्मा को खोज मे लग गए । प्रतत बौद्ध समाज अपनी मान्तरिम कलह से नजर हो गया और प्रतिक्रियावादी ब्राह्मणवाद ये दुधप माक्रमग से अपनी या नहीं बौद्ध धम को पराजित वरखे भपनो सत्तापुनापित करने के लिए ग्राह्मणो ने शरराचाय के नेतृत्व में तमाम दानिक चिन्तनो को जोकि उपनियतो में समाविष्ट हैं, घाड दिपा और वेदा मी मोर लौट चले । बौद्ध धम मौर ब्राह्मणवाद कामयप इतना दुधप था कि सारा समाज उससे अस्तव्यस्त हो गया और साधारणजन माधिदविर रविनयो की उपासना करने नगे। महापूय मे लय होने की अपेक्षा यह लोग परलोक मपवा किसी दूसरे जम में ही सुप पाने की पागा कहा पयादा पापक पी। इसलिए लोगा को बाहाण बाद अधिक भान लगा । ब्राह्मणो का नारा भी था 'देवताभी का पूजन करो, ये तुम्हार इस जाम पे सभी कष्टा का मोवन बरंगे और यदि नुमने यम का पथ नही त्यागा तो वे तुम्ह अगले जम म यथोचित पारितोपिर भी देंगे। यहाँ घम से तात्रय है मनुस्मृति जमे घम शाम्यो म यणित सामाजिक नियम । इस प्रकार प्रततोग मा पुनज म, कम और मामा सम्मघी शकरावाप में सिद्धात में सभी प्रगतिशील शक्तिया का नाश कर डाला। इन सबम कम वाद का सिक्षात सबमे प्रश्न पुरावृत (मिथ) साबित हुआ है । कमवाद तथा उससे ही सलग्न भाग्यवाद तथा पुनजय के सिद्धात म हिन्दुमो वा धार्मिक दृष्टिकोण तथा मानव-जीवन सम्बधा उनसरी समस्त व्याख्या समाविष्ट है। श्री पाणराय निसत हैं 'इम सिद्धात (कमवाद) के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति वो अपने अच्छे और बुरे कर्मों का मीठा-मडका फल चलना पड़ता है। एक ही जम की अवनि म वाय-कारण भेद का पता नहीं चल मरवा । यमवाट वा ही दूसरा पहलू है पुनज म या मिटान । फिर भी भारतीय रहस्यवाद (स्पिरिचुअलिपम) का परम लक्ष्य है निष्काम कम अर्थात् फल पान को चिता निए बिना कम करत जाना। परतु कोई चाह अथवा न चाहे जब उसके कर्मों का फल उमको मिलन ही वाला है तब माता वह फल की चिन्ता किए बिना विस प्रकार अपना यम परता जाएगा वस्तुत कमवाद और निष्काम यम का पारस्परिक विरोध स्वत । इदा {सी बिल) पौर भाग्यवाद के प्रातरिख विरोध का सूचक है भारतीय प्राधिदविर चितन का दूसरा भास यह है कि कर्मों की शृखता का एक दुप पावत माना जाए और तब उसम मुक्त होने की चेप्टा की गए। मह पादश बहुत ही मधिरारपूण शन्नो म गोता म प्रतिपादित है- 'म विसी -