Adarsh Library, Jaipur

Youdhisthal

Mithlishwar · 2011/03

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स्थल
मिथिलेश्वर
सरस्वती विहार

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समर्पण
ममतामयी मां श्रीमती कमलावती देवी को,
जिन्होंने बचपन में ही कहानियां सुना-सुनाकर
मेरे अन्दर कथाकार के बीज बोए थे।
पूज्य पिता स्वर्गीय प्रो० वंशरोपणलाल को,
जिन्होंने शुरू में ही
चेखव, गोर्की और प्रेमचंद की रचनाओं से
मेरा साक्षात्कार कराया था।
और
श्रद्धेय गुरुदेव श्री राजनारायणसिंह को,
जिनकी भूमिका मेरी प्रारम्भिक कथा-यात्रा में
अत्यन्त महत्त्व की रही है।

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युद्धस्थल

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00 हाथ मे लकुटी लिए, झुककर चलती हुई रामगरण वहू गाव के बीचो- वीच स्थित बरगद तक चली आती हैं। अब तक वरगद के नीचे काफी मंख्या में लोग जुट चुके हैं। बरगद के तने में रम्मी वांधकर तीन-चार लालटेने टांग दी गई हैं । रामायण का पाठ शुरू हो गया है । पिछले दो दिनो से इस भरतपुर गाव में श्रीमन् नारायणजी आए हैं। वे एक हपता ठहरेंगे। राम-कथा के वे बहुत अच्छे जानकार है। प्रतिदिन शाम को बरगद के नीचे उनका रामायण-पाठ होता है। रामायण को चौपाइयो का अर्थ वे कही बहुत गहरे में उतरकर अत्यन्त सहज और मरस शब्दो मे बताते हैं कि लोग राम कथा के प्रवाह में डूब जाते हैं। हटने का नाम नहीं लेते । लगातार तीन-चार घटे तक उनका पाठ चलता रहता है। रामशरण बहू की तबीयत कुछ सराव थी, इसीमे पिछले दोनो दिन वे नही आ पाई। आज भी उनकी तबीयत पूरी तरह ठीक नहीं है। लेकिन आज वे रुक नही सकी। लाठी टेकते-टेकते चली आई। धर्म-चर्चा और धर्म के कामो मे वे कभी पीछे नहीं रहती हैं। रामशरण वह एक जगह रककर थोडा सुम्ताने लगती हैं। उनका घर गांव के पश्चिमी टोले मे है। इस वरगद से काफी दूर । यहा आते-आते वै धक गई हैं । हाफने लगी हैं। वुढापा आ गया है । उन पचास को पार कर गई है। लेकिन रामशरण वह जानती हैं, उम्र ने उन्हें नहीं पछाड़ा है । इम गाव में पचास पार की कई औरतें अभी बिल्कुल ठीक-ठाक है। बच्चे जनती हैं। वे सघवा हैं। और रामशरण बहू को विधवा हुए तो अटारह ।

साल हो गए। पति की मृत्यु ने पचास पार करने पर ही उन्हें अस्सी वर्ष की बुढ़िया बना दिया है । वाल सफेद हो गए हैं। दांत टूट चुके हैं। कमर झुक गई है । चेहरा सिकुड़कर छोटा हो गया है। विना लकुटी के दो-चार कदम चल पाना भी मुश्किल होता है। रामशरण वह देखती हैं, हर बार की तरह इस बार भी मर्द एक ओर वैठे हैं और औरतें दूसरी ओर। रामायण-पाठ या रामलीला के वक्त वरावर ऐसा ही होता है । औरत-मर्द साथ-साथ नहीं बैठते । असल में कई घरों से नई-नई बहुरिया भी आती हैं, जो औरतों के बीच तो खप जाती हैं, मों के बीच कैसे खपतीं? रामशरण बहू औरतों की जमात की ओर चल देती हैं । लकुटी टेकते- टेकते वे औरतों के बीच पहुंच जाती हैं। फिर एक जगह लकुटी पटक, धीरे से बैठती हैं और वैठते ही पसर जाती हैं। लेकिन यह क्या? उनके वहां बैठते ही आसपास की औरतें खिसकने लगती हैं। तेतरी की माई वहां से वुदवुदाते हुए हट जाती है। सहदेव की पतोहू चूंघट निकाल आगे बढ़ जाती है । रमेसर की बेटी सुरसतिया अपने छोटे भाई का हाथ पकड़ वहां से भाग जाती है। फिर औरतों के बीच से फुसफुसाहट-भरी आवाजें आती हैं, "डायन आ गई. "इसको रामायण से क्या मतलब""जरूर किसीपर टोना-टोटका चलाने आई है..." एक क्षण के लिए रामशरण बहू का मन दुःख से भर जाता है, लेकिन वे शीघ्र ही अपने को नियंत्रित कर लेती हैं। डायन का यह संवोधन गांव ने उन्हें पहली बार नहीं दिया है, बल्कि एक लंबे समय से उनके ऊपर थोप दिया गया है। प्रारंभ में तो वे कई औरतों से झगड़ पड़ी थीं। हाथापाई और झोंटा-झोंटी तक हो गई थी। लेकिन अब तो सहते- सहते वे इस संवोधन की अभ्यस्त हो गई हैं। रामशरण बहू अपना ध्यान औरतों की बातों से खींचकर श्रीमन् नारायणजी की ओर केन्द्रित करती हैं। धनुप-यज्ञ प्रसंग चल रहा है। परशुरामजी आ गए हैं। रामशरण बहू अपने को श्रीमन् नारायणजी की वातों में वहा देना चाहती हैं, लेकिन औरतों के बीच चल रही गुपचुप वातें उन्हें सुनाई पड़ती ही रहती हैं, "सामने से हट जाना चाहिए"एक यह संवोधन १० / युद्धस्थल .. बार भर नजर देख लेगी तो हंसता-पलता भादमी खाट पकड़ लेगा. अरे सुगपतिया, अपने बच्चे को चुप करा दे, नहीं तो कल्याण नहीं.""एक बार मेरे बच्चे की रुलाई सुन ऐसा टोटका किया था कि तुझे क्या बताऊ बहुत झाड-फूक करने के बाद मेरा लड़का ठीक हुआ था' रामशरण बहू का ध्यान राम-चर्चा से अलग हो जाता है । अपने ऊपर औरतो द्वारा लगाए जा रहे घृणित आरोप के खिलाफ उनका मन प्रोधित हो उठता है। उनके जी में आता है कि तेजी मे उठे और गुपचुप बतिया रही औरतों के ऊपर लकुटी से अंधाधुध प्रहार शुरू कर दें। लेकिन यह सोचकर कि ऐसा करने के बाद औरतें उनकी कोई भी दुर्गति वाकी नहीं छोड़ेंगी, वे महटिया जाती हैं। अगर औरतो को उनसे डर ही होता तो फिर उन्हे डायन से मंबोधित ही क्यो करती' रामशरण बहू सोचती हैं कि अगर आज उनकी कोई औलाद होती तो वे सबको बता देती। किसकी मजाल जो उन्हें डायन कहे ? आस निकलवा लेती। लेकिन उनकी बंजर कोस ऊमर नहीं हुई । वेवाक्ष की वाझ ही रही। फिर आगे चलकर विधवा भी बन गई। अव गाव के लोग उन्हें डायन न समझें तो क्या समझे बाझ और विधवा औरत अधेड हो जाने के बाद तो डायन ही न समझी जाती है? रामशरण वह अपने दुर्भाग्य पर आमू बहाने लगती हैं। वे कई वार डूबकर सोच चुकी हैं, दोप किसी और का नहीं, उनके अपने अभागेपनका ही है। ईश्वर ने उन्हें ऐसा बना ही दिया है। उनकी तकदीर गोटी है। अब तो उन्हें सब कुछ चुपचाप सहना-मुनना है । सहने-सुनने के अतिरिक्त वे कर ही क्या सकती हैं ? रामशरण बहू को अपने पति की याद आती है। वे जिन्दा थे तो कितनी बडी छाया थी उनके कार । एक वार रमपतिया ने उन्हें डापन कह दिया था तो वे उमे मारने के लिए लाठी लेकर चल पडे थे। वह छिप गया था, नहीं तो वे उसका माया फोडकर ही वापस लौटते। रामगरण बहू को जगतनारायसिंह की याद भी आने लगती है। वैमे कहने के लिए जगतनारायणसिंह उनके कुछ नहीं मगने थे। एक पडोमी थे । लेकिन यह मिर्फ रामभरण वह का अतर ही जानता है कि दे, जगतनारायणसिंह से कितने गहरे में जुड़ी थीं। जगतनारायणसिंह जब तक जिन्दा रहे, भले ही लोग पीठ-पीछे उन्हें डायन कहते रहे, लेकिन क्या मजाल कि उनके सामने कोई उन्हें डायन कहे ? हालांकि इसके लिए गांव के लोगों ने जगतनारायणसिंह के साथ उनके नाम को जोड़कर बदनाम करने की पूरी कोशिश की, लेकिन इसका उन्हें तनिक भी मलाल नहीं। रामायण-पाठ चलता रहता है। लोग सुनते रहते हैं। औरतों के बीच कहीं-कहीं कानाफूसी भी होती रहती है। लेकिन रामशरण बहू इन सबसे अलग अपने में डूबी रहती हैं। अपनी किस्मत को कोसती रहती हैं। बड़े शौक से राम-चर्चा में भाग लेने आई थीं, लेकिन यहां आने पर दूसरा रोना ही प्रारंभ हो गया। उनके साथ अव अकसर ही ऐसा होने लगा है। लगभग रात्रि के दस बजे रामायण-पाठ समाप्त होता है। फिर आरती होने लगती है। आरती के लिए श्रीमन् नारायणजी बराबर ही अपने साथ एक सहयोगी लाते हैं। उनका सहयोगी एक थाल में कपूर और घी की बत्ती जलाता है। फिर आरती प्रारंभ हो जाती है। सबसे पहले रामायण की आरती होती है। इसके बाद श्रीमन् नारायणजी का सह- ., योगी आरती का थाल लिए लोगों के बीच घुस जाता है। लोग आरती के । थाल में पैसे डालते और आरती लेते जाते हैं। कुछ लोग पैसे के स्थान पर चावल लेकर आते हैं। उनके लिए श्रीमन् नारायणजी का सहयोगी कंधे में एक झोला लटकाए रहता है। इस तरह हफ्ते भर में काफी पैसे और चावल श्रीमन् नारायणजी इकट्ठा कर लेते हैं। श्रीमन् नारायणजी का सहयोगी पुरुषों के बीच आरती दिखाने के बाद औरतों के बीच घुस आता है। औरतें आरती के वक्त पुरुषों से अधिक दाता सावित होती हैं। रूमाल में सेर-सेर भर चावल बांधकर ले आती हैं। श्रीमन् नारायणजी का सहयोगी आरती का थाल लिए रामशरण बहू के सामने आ जाता है। रामशरण वहू अपनी कमर की गांठ से खोल- कर पांच पैसे का एक सिक्का आरती के थाल में डाल देती हैं। श्रीमन् नारायणजी का सहयोगी वहां से आगे बढ़ता है। फिर एक जगह औरतों की धक्का-मुक्की से परेशान हो रामशरण बहू की ओर इशारा करके कहता है, "वहां तो कितनी जगह है, लेकिन यहां आप लोग १० ।- । भीड लगाए बैठी हैं"" इसपर औरतें नाक-भौं चढाती, एक-दूसरे को चिकोटी काटते हुए आपस मे दबी जवान वातें करने लगती हैं। उनकी बातो का एक टुकड़ा रामशरण बहू के कान में पड़ता है, "वहा डायन बैठी है...।" वै तिलमिला जाती है। यह वाक्य तीर की तरह उनके कलेजे में लगता है। बाहरी आदमी के सामने भी यह लाछना और अपमान ! वे माया उठाकर तेज नजरो मे उस ओर देखती है जिस ओर से आवाज आई है। वे सोनती कि कितना अच्छा होता अगर वास्तव में वे डायन होती, तो निश्चय ही इन औरतो से बदला लेती! लेकिन उनकी नजर उधर जाते ही वहा की औरतें अपना मुह घुमाकर पीठ उनकी ओर कर देती हैं । उपेक्षा और अप- मान की एक और चोट उन्हें लगती है। आरती के बाद लोग अपने-अपने घरो की ओर चल देते हैं। कुछ लोग रामायण के प्रसग पर ही बातचीत करते जाते हैं, कुछ लोग दूसरे प्रसंगो पर । पुरपो की अपेक्षा औरतें ज्यादा बातचीत करती और गोरगुल मचाती लोटती हैं। रामशरण बहू सबसे आखिर मे उठती है। जिन्दगी कर बौथापन तो ऐसे ही वोझ बन जाता है। उसपर इतना अपमान और तिरस्कार | उनके पाँव मन-मन भर के वोझिल हो जाते हैं । लकुटी टेकते वे धीरे-धीरे आगे बढती है। जब तक वे बरगद को लाघकर बीच गली मे आती हैं तब तक सभी लोग जा चुके होते हैं। उनके लिए कोई रुकता नहीं है । गलिया सुनसान और वीरान हो जाती है । अगर दुखन की मा आई होती तो जरूर उनके लिए रुकती। अब इस भरतपुर गाव में उसके सिवाय उनका अपना और बचा ही कौन है ? वैसे दुग्वन की मा भी उनके अपने परिवार या नाते की कोई औरत नही है। वह तो कई घरो में दाई का काम करती है। उनके यहाभी दाई के रूप मे ही है । लेकिन वे दुखन की मा को अन्य घरो से अधिक ही देती हैं । पर्व-त्योहार पर नये कपडे भी बनवा देती है। दोनों जून खाना भी खिला देती हैं। वह भी उन्हे अन्य घरो में अधिक ही जानती-मानती । उनकी तरह ही विधवा है । दुग्वन की बहू से उसकी नही पडती । अपने घर मे अलग रहकर कमाती-खानी है। अगर सुहागन होती और बाल- - । । 1 बच्चों के बीच रहती तो उनके यहां कभीनहीं आती। वे डायन जो ठहरी ! रामशरण बहू एक गली को पार कर दूसरीगली में घुस जाती हैं। उन्हें नहीं लगता है कि वे अपने घर जा रही हैं। लगता है, जैसे किसी ऐसी यात्रा पर निकली हों जिसका कोई अंत नहीं। कोई उद्देश्य नहीं । कोई मंजिल नहीं। रामशरण वहू दूधनाथ चौधरी के मकान तक पहुंचते-पहुंचते थक जाती हैं। यहां से उनका घर अव बहुत दूर नहीं है। फिर भी उनकी इच्छा होती है कि वे थोड़ी देर बैठकर सुस्ता लें। वे दूधनाथ चौधरी के दालान के वाहर वाले चबूतरे पर जा बैठती हैं। चैत की रात । हवा में घुली-मिली शीतलता । रामशरण बहू की पलकें झपकने लगती हैं। कुछ समय बाद लोगों की बातचीत से रामशरण बहू की आंखें खुलती है । वे देखती हैं, आसपास के मकानों की खिड़कियां खुल गई हैं। औरतें और बच्चे झांक रहे हैं। कई दरवाजे भी खुल गए हैं। हाथ में लाठी लिए मर्द दरवाजों पर आ गए हैं। रामशरण वहू को दूधनाथ चौधरी की पत्नी की आवाज सुनाई पड़ती है, "हाय दादा ! अब क्या होगा? रमसरना वो डायन आकर बैठ गई है. 'न जाने किसपर घात लगाई है। अब जरूर कुछ होगा!" रामशरण बहू को अपने ऊपर आश्चर्य होता है कि वह घर जा रही थीं तो रास्ते में सो कैसे गई ? अब उनसे एक क्षण भी वहां रुका नहीं जाता है । वहां से उठकर चल देती हैं । डरती भी जाती हैं। मन में अनेक तरह की शंकाएं उठती हैं, न जाने लोग कब क्या कर दें? जब सरेआम उन्हें डायन कहते किसीको डर नहीं लगता, तब फिर कुछ भी करने में लोग क्यों डरेंगे? कहीं कोई उन्हें मार न बैठे ! बुढ़ापे में दुर्गति न कर दे ! वे तेजी से कदम बढ़ाने लगती हैं। अपने दरवाजे पहुंच ताला खोलती हैं। फिर अंदर घुसकर भीतर से किवाड़ बंद कर लेती हैं। अपना खाना ढंककर गई थीं कि रामायण से लौटने पर खाएंगी, लेकिन अब कुछ भी खाने की इच्छा नहीं होती है उनकी। सीधे जाकर खटिया पर गिर पड़ती हैं। फिर खटिया पर गिरते ही रुलाई फूट पड़ती है। अव चाहकर भी वे अपने को रोक नहीं पाती। धर्य का बांध टूट जाता है और वे देर तक १४ / युद्धस्थल सुबकती रहती हैं। 1 - । भरतपुर नामक इस गांव मे जिस दिन दुलहन वनकर रामशरण बहू आई थी, उसको गुजरे हुए एक लवा समय हो गया। एक पूरा जमाना ही बीत गया। वह फागुन के महीने का एक दिन था। न अधिक जाड़ा, न अधिक गर्मी । सुहाना वातावरण। वामंती वयार को मीठी गुदगुदी । कोयल की कूक । राती में विखरी दूधिया चांदनी। वृक्षों मे फूट आई नई कोपलें। नीम के फूल । आम की मंजरियां। हर जगह सुगंध ही सुगंध। लेकिन रामशरण बहू के अंतर में फागुन की मस्ती तो इससे कहीं अधिक थी। फागुन तो उनके मन-प्राणों से फूट रहा था। वे मन और तन मे जिस रूप में पहुंच आई थी, उस रूप में उनके लिए हर महीना फागुन ही था। रामशरण बहू जिस गांव को वेटी थीं, उस गांव में उनमें अधिक मुदर लड़किया थी । लेकिन जैसी जवानी रामशरण बहू के ऊपर आई थी, वैसी जवानी कभी किसीके पर नहीं आई थी। अंग वस्त्र को फाडकर बाहर निकल जाना चाहते थे। चलती थी तो लगता था, धरती उछल रही हो। आसमान झुककर आलिंगन कर रहा हो। लोगो के मामने रामशरण बहू सौंदर्य की एक नई परिभाषा बन गई थी। सौंदर्य और कुछ नही, भरी जवानी का ही दूसरा नाम है । चेहरा लाख साचे में ढला हो, लेकिन अगो मे कांति ही नहीं, बदन में यौवन के खून की ऊष्मा नही, वस्त्र फाड देने वाला मांसल उभार नहीं, तो फिर सौदयं क्या? रामगरण बहू के पति रामशरण भी गवरू जवान थे। असाडे में कुश्तिया लडते थे। मां-बाप के अकेले थे। वाप तो पहले ही गुजर चुके थे । अब सिर्फ मा बची थी। उन अकेले के पास वीस बीघे खेत थे। एक आदमी पर बीस बीघे खेत कम नहीं होते। पूरी मस्ती थी उनको। रामशरण बहू ने प्रथम मिलन मे ही अपने पति को पूरी तरह प्रभा- दित कर दिया था। माथ ही उन्हे अपने मन-प्राणो में भी वसा लिया था। इसके बाद अपने पति के प्रति वे पूरी तरह समर्पित हो गई थी। बदले में उन्हें जो मिला, उसने रामगरण बहू को अपने में पूरी तरह आत्ममात् कर लिया। मंपूर्ण समर्पण का अद्वितीय सुख, जिसके पोछे वे पागलों की तरह भागती रहीं। रामशरण को भी पत्नी की जवानी ने दीवाना बना दिया था। सव ओर से अपने को काटकर पत्नी के बीच ही उन्होंने स्वयं को सीमित कर लिया था। खेत-खलिहान जहां से भी लौटते, पत्नी को बांहों में भर लेते। प्यार करते तो देर तक करते ही रहते। समय का कोई खयाल न रह पाता। बरसाती नदी की तरह बांध तोड़कर दोनों पति-पत्नीवह चले थे- एक-दूसरे में खोए, एक-दूसरे में लीन । दिन छोटे होने लगे। रातें बातों में ही कटने लगीं। देखते-देखते पांच साल की अवधि गुजर गई, लेकिन उन्हें पता तक नहीं चला। अचानक इसी बीच रामशरण की मां स्वर्ग सिधार गई। मां की मृत्यु ने उन दोनों की तंद्रा भंग की। फिर उन्हें यह जानकर काफी आश्चर्य हुआ कि अभी तक वे दोनों सिर्फ नर-मादा ही बने रहे हैं, मां-बाप नहीं बन पाए हैं। रामशरण और रामशरण बहू, दोनों पति-पत्नी के सुखद जीवन के बीच यहीं से एक चिता का प्रवेश हुआ था। वे दोनों स्वस्थ थे। तगड़े थे। नर-मादा के रूप में दोनों का हजारों बार मिलन हो चुका था, लेकिन सारा मिलन व्यर्थ हो गया था। रामशरण खेती-गृहस्थी वाले आदमी थे। बीज डालने के बाद खेतों में फसल न उगने की पीड़ा से वे परिचित थे। वे 'वेचैन रहने लगे। रामशरण बहू की परेशानी भी बढ़ने लगी। अब तक उनकी कोख क्यों सूनी है ? ऊपर से तो वे एकदम भरी-भरी हैं। अंदर क्या कमी है ? रामशरण बहू ने अपने गांव की बंजर जमीन को देखा था उसमें फसल नहीं उगती थी, इसीलिए लोगों ने उसमें गांव भर का चुहारन राख-पात और कूड़ा-कर्कट डालना शुरू कर दिया था। उस जमीन व लोगों की नजर में कोई महत्त्व नहीं था। रामशरण बहू को लगा, बां औरत और उस जमीन में कोई अंतर नहीं। वह अंदर-ही-अंदर दुःखी रह लगीं। रामगरण ने भाग-दौड़ प्रारंभ की। रुपये-पैसों की कोई कमी थी। उन्हें। उन्होंने पानी की तरह पैसा बहाया। आरा और पटना के अ मशहूर चिकित्सकों से स्वयं तथा पत्नी की जांच कराई। किसीने र शरण में कमी बताई तो किसीने उनकी पत्नी में । एक चिकित्सक ने ब । १६ / युद्धस्थल होने के लिए रामगरण की पत्नी का छोटा-मा आपरेशन भी कर दिया तथा रामशरण को ढेर सारी दवाइयां खाने को दी। दोनों पति-पत्नी दवा- इयां खाते तथा बच्चा होने की प्रतीक्षा में ईश्वर में प्रार्थना करते दिन गुजारने लगे। लेकिन जब पाच वर्प और गुजर गए तो उनकी परेशानी और चिंता दुगुने वेग में बढ़ गई । चिकित्मको मे उनका मोह भंग हो गया। इस पांच साल की अवधि में उन्होंने बारी-बारी मे एलोपैथिक, आयुर्वेदिक और होमियोपैथिक, तीनों दवाओं का सेवन किया था। लेकिन सब बेकार । साबित हुआ। 1 • रामशरण बहू को गाव की ओर से तिरस्कृत और उपेक्षित समझे जाने की पीडक स्थिति यही से शुरू हुई। गाव को औरतो ने टीका-टिप्पणि प्रारंभ की, "मर्द के साय रहते दस साल हो गए"अब तक कोई बच्चा नहीं हुआ'वाझ है "वहिला है"रामगरण का खानदान डुवाएगी।" औरतो के बीच तरह-तरह की वातें चलने लगी। रामशरण बहू को उन बातों की जानकारी इधर-उधर से मिलने लगी। पीठ-पीछे औरतें उन्हे बांझ कहती हैं । खर"। उनके सामने तो उन्हें किसीको वाझ कहने की हिम्मत नहीं। चाहे मारा धन विक जाए, लेकिन मुह पर बांझ कहने वाले का गला दबाए विना उनके पति छोडेंगे नही। पीठ-पीछे कौन क्या कहता है, कोई सुनने तो नहीं जाता। लेकिन रामशरण वह की पीड़ा बढ़ते-बढते गुम्मे के इस रूप मे आ गई कि पीठ-पीछे भी कोई क्यो उन्हे बाय कहे ? अपने दरवाजे पर खड़े होकर पीठ-पीछे वाइ कहनेवालियो को उन्होंने गालिया देना शुरू किया, "मैं वाझ हू या वहिला हूँ, किसीमें कुछ मांगने तो नहीं जाती "न किसीसे बुरा खाती हू और न किमीमे बुरा पहनती हूं.""मेरा मुस-चैन देखकर जलने वाली की भगवान दोनो आखें फोट दें."जो मुझे बाझ कहे, वह विधवा हो जाए उमका वेदा मर जाए."उसकी देह में कोड फूट जाए...' रामगरण बहू देर तक गालियां वकती। गालिया बकने के बाद उनके मन का गुबार कुछ शांत हो जाता। लगता, जमे वांझ कहने- पालियों में उन्होने बदला ले लिया। उनका जवाब दे दिया। लेकिन होता, Fa -- - बांझ का सम्बोधन किसीसे लड़-झगड़कर नहीं मिटाया जा सकता। जव तक उनकी कोख हरी-भरी नहीं होगी, वे वांझपन से मुक्त नहीं होंगी। शादी हुए इतने दिन गुजर गए, फिर भी उनकी कोख बंजर ही रही। वे लाख लड़ें-झगड़ें, लोग तो उन्हें बांझ समझेंगे ही। रामशरण बहू को चिन्ता अन्दर-ही-अन्दर गलाने लगती। अपने दुर्भाग्य पर वे पछतावा करतीं। मन-ही-मन ईश्वर को भी दोप देतीं। ईश्वर ने उन्हें सब कुछ दिया, लेकिन बांझ बनाकर तो कहीं का नहीं रहने दिया। रामशरण बहू के वांझपन की व्यथा वढ़ते-बढ़ते दार्शनिक ऊंचाइयों को छूने लगती। तव उन्हें लगता, नारी जब तक मां नहीं बन पाती है, तव तक वह वेश्या है। मां बनने के बाद ही नारी का नारीत्व सार्थक होता है। मां बनने से पहले तो वह सिर्फ नर की भोग्या है। वासना की कठपुतली है । नरककुंड की मछली है। उन दिनों रामशरण वह एकांत में बैठकर घंटों सोचतीं कि अगर इसी तरह आजीवन उन्हें कोई बच्चा नहीं हुआ तो इस जायदाद का हकदार कौन होगा ? बुढ़ापे में उनकी और उनके पति की सेवा-शुश्रूषा कौन करेगा? उनकी मिट्टी पार कौन লা उनके खानदान का नाम कौन चलाएगा? और रामशरण बहू माथा पीट लेती। शादी के बाद उन्हें सारी दुनिया रंगीन नजर आती थी, लेकिन अब आंखों के सामने सिर्फ अंधेरा-ही-अंधेरा नजर आता। रामशरण बहू को लगता, अब वह दिन दूर नहीं, जब गांव के लोग उनके पति को दूसरी शादी करने की सलाह देंगे। फिर एक नई-नवेली दूसरी औरत इस घर में आ जाएगी। उनके पति उनको छोड़ उस नई औरत के साथ रहने लगेंगे। उनको दुनिया उपेक्षित और सीमित होती जाएगी। और अगर उस नई औरत ने बच्चे को जन्म दिया तब तो उसके सामने उनकी कोई हैसियत ही नहीं रह जाएगी। वह घर की मालकिन रहेगी और वे उसकी दासी । उनके अधिकार उठते जाएंगे और वह शासन चलाएगी। उन्हें घर के पिछवाड़े वाली कोठरी दे दी जाएगी जहां उपेक्षा, अपमान, तिरस्कार और तकलीफों को कभी न खत्म होनेवाली कहानी शुरू हो जाएगी। अपने पति की दूसरी शादी की बात सोचते ही रामशरण बहू का ? . DI IST । अन्तर काप जाता। उनके चेहरे पर पसीने को बूंदें चुहचुहा आती। उनकी पीडा घनीभूत हो जाती। फिर उनकी आंखो के सामने अपने मायके की सहदेव बहू का चेहरा नाचने लगता। सहदेव बहू उनकी तरह ही वांझ थी। उसके मदं ने लोगों के कहने पर दूसरी शादी की। वह दूसरी औरत आई और आते ही बच्चे जनना शुरू कर दिया। अब सहदेव बहू घर के लिए फालंतू औरत बन गई। उसका महत्व खत्म हो गया और उसके अधिकार छीने जाने लगे। जब तक शरीर चलता रहा तब तक तो सहदेव बहू अपनी मौत की डाट-फटकार, लांछना-दुत्कार और लात-जूतों की मार सहकर भी अपने अधिकारों के लिए लहती रही, लेकिन जब उसका गरीर अवश हो गया तव उसकी मौत ने उसकी वह गति की कि देखने वाले सिहर गए। उमकी सौत ने घर मे उसे बाहर निकाल गली के किनारे मवेगी बाधने वाली मडई में उसको खाट रखवा दी थी। वहा न कोई उमे पानी देने वाला था और न मेवा करने वाला। पति होते तो उसे घर से बाहर नहीं निकाला जाता। लेकिन वे स्वर्गवासी हो गए थे। सहदेव बहू की सौत के लड़को ने घर मंभाल लिया था। लेकिन उन लडको को उससे क्या मतलब? वह कराहती रहती । छटपटाती रहती। रोती-कलपतीरहती। उसकी मौत स्वयं तो कभी उसके पास जाती ही नहीं थी, बच्चों को भी उसके पास जाने से रोक दिया था। टोला-पडोम की ओरतो को कभी दया आती तो आकर उसे देख जाती । कुछ खिला देती। उसकी नदी खटिया साफ कर देती, नहीं तो उसी गंदी सटिया पर कभी-कभी वह हपतो पडी रहती, और मक्खियां भिनभिनाती रहती। उन दिनो सहदेव बहू रोते हुए एक गीत गाती । उसका वह गीत उम समय गाव की औरतो के बीच काफी प्रचलित हो गया था। रामशरण बहू तो उस समय चौदह साल की लड़की थी, लेकिन महदेव बहू के गीत को पीडा ने उनके मन में भी दर्द पैदा कर दिया था। अब वह गीत रामशरण बहू को बगवर याद आने लगा था। जब-जब वह गीत उन्हें याद आता, उनकी आखें बहने लगती। आंसू ढरककर उनके गालों पर बहते जाते : 'वाधिन, हमका जो तू खाइ लेतिउ, विपतिया से छूटित हो। बाशिन, तुमका जो हम खाइ लेवि, हमहू वाझिन होइव हो। 1 बांझिन, तुमका नागिनी, हमका जो तुम डसि लेतिउ, विपति से हम छूटित हो। जो हम डसि लेवि, हमहू बांझिनी होइव हो। मइया, हमका जो तुम राखि लेतिउ, विपति से हम छूटित हो। विटिया, तुमका जो हम राखि लेवि, हमहू वांझिनी होइव हो। धरती, तुम ही सरन अव देहु, वांझिनी नाम छूटई हो। वांझिनी, तोहका जो हम राखि लेवि, हमहूं होइवि बंजर हो ।' . - रामशरण बहू रोती-सुवकती रहती हैं। रात आधी से अधिक गुजर जाती है। बहुत सारे आंसू बहाने के बाद रामशरण बहू को कुछ शांति मिलती है। अब तो ये आंसू ही उनके बुढ़ापे का सहारा हैं । जब भी उनका मन दुःख, तकलीफ और संताप से भर जाता है, वे जी भरकर रों लेती हैं। रोने के बाद वे कुछ हल्कापन महसूस करती हैं। पीड़ा का अहसास कम हो जाता है । लेकिन इसके चलते उनकी आंखों पर बुरा असर पड़ा है। रोशनी जाती रही है । एक बार एक डाक्टर ने कहा था, 'आंसू कम वहाएं, आंखें खराब हो जाएंगी। लेकिन वे क्या करें? आंखों को देखें या अन्तर की पीड़ा को? रामशरण बहू उठ बैठती हैं। पीड़ा का वेग कम हो गया है । मन सहज हो चला है। वे स्वयं को समझाती हैं, इतना रोने-पीटने से क्या होगा? कोई नई बात थोड़े है । इस तरह की बातें तो वरावर होती ही रहती हैं। जो करम में लिखा है, वह भुगतना ही पड़ेगा। उससे छुटकारा कहाँ ? रामशरण बहू को अब कुछ खाने की इच्छा होती है। वे जानती हैं, रात के तीसरे पहर में खाना नहीं खाया जाता। लेकिन बच्चों और बूड़ों को भूख बर्दाश्त नहीं होती। वे खटिया से उतरकर चल देती हैं। अन्धकार में टटोलते-टटोलते दिराखे के पास आती हैं। फिर दिराखे से माचिस लेकर ढिवरी जलाती हैं। ढिवरी का प्रकाश कमरे में फैल जाता है। अब वे अपने खाने के पास आ जाती हैं। रोटियांठण्डी हो गई हैं और सूख गई हैं। सब्जी का स्वाद भी नष्ट हो गया है। फिर भी रामशरण बहू खाने लगती हैं । खाना खाने के बाद उन्हें तम्बाकू पीने की तलब महसूस होती है। वे उपलों को तोड़कर आग सुलगाती हैं। उपले जल्द सुलगते नहीं। धुएं २० / युद्धस्थल से कमरा भर जाता है । धुएं के तीसेपन में उनकी आसे गीली हो जाती हैं। फिर उनका हाथ एक जगह मे जल जाता है। वे गुस्मे में वड़बडाने लगती हैं, "हरामजादी दुम्बन को मां आज नही आई. और परों में तो उमे अधिक ही देती हूं."फिर भी किमी-किसी दिन नागा ही कर देती है."बुढापे में अपना शरीर अब चलता नहीं, लेकिन दाई-नौकरों का क्या भरोसा? धर्म, ईमान आज थोडे रह गया है किसीके पास !" फिर उन्हें लगता है कि नही, दुखन की मा के साथ ऐमी बात नहीं है। वह तो उनके लिए जितना करती है, शायद अपना भी उतना नहीं करता। जरूर वह किमी खास कारण से कही रुक गई है। उसके बारे में उन्हें ऐसा नहीं सोचना चाहिए। रामशरण बहू उपलों के अगारों को चिलम मे डालती हैं। फिर गुडगुड़ी पीने लगती हैं । तम्बाकू का घुआ भीतर जाता है। फिर बाहर आता है। चिर-परिचित गध। चिर-परिचित स्वाद । मन और तन को राहत मिलती है। वे दीवार के महारे उठंग रहती है। बूढो के पास वतं. मान और भविष्य नहीं होता, मिर्फ अतीत होता है । अतीत को याद करके ही वे बुढापे का बोझ कम करते है। उन्हें जहा कही भी एकात मिलता है, अतीत मे लौट जाते है । इनमें मे कई लोगो का अतीत बहुत उज्ज्वल होता है जिसे याद करना आनन्ददायक सावित होता है। लेकिन रामशरण बहू का अतीत भी वर्तमान की तरह ही अवसादग्रस्त है। जब दवा-दारू और पूजा-पाठ करके गमशरण बहू थक गई उन्हें बच्चा नहीं हुआ, तब वे ओझा-गुनियो के चक्कर मे फसने लगी। रामशरण को ओझाई और झाड़-फूक में तनिक भी विश्वास नहीं था, लेकिन अपनी पत्नी के लिए उन्होंने नये मिरे से विश्वाम पैदा किया। फिर गाव के नामी-गिरामी ओझाओ मे लेकर इलाके के प्रसिद्ध ओझा उनके यहा आने लगे। रामगरण बहू पर ओझाई शुरू हो गई। कोई ओझा प्रेत का प्रकोप बताता तो कोई डाकिनी का। शराब की बोतलें गिराई जाती। मुर्गे की बलि चढ़ाई जाती। डिहवार वावा के नाम मे मनौती मनाई जाती। सर्च और परेशानियों का एक नया मिलसिला। लेकिन फायदा कुछ नहीं।

रामशरण देर तक इस पाखण्ड को सह नहीं सके। उन्होंने अपने यहां ओझाओं का आना रोक दिया। लेकिन रामशरण वह नहीं मानी। मरता क्या नहीं करता ? वे घर से बाहर निकलने लगीं। इस क्रम में गांव तथा पड़ोस की कुछ औरतों से रामशरण वहू की दोस्ती हो गई, जो ब्रह्मस्थानों, देवासों और पीर के मजारों का चक्कर लगाती थीं। रामशरण बहू ने उन स्थानों पर हजारों की संख्या में औरतों को जुटते देखा । औरतें वाल खोले, अपने दोनों हाथ जमीन में टेके खूब जोर-जोर से माथा हिलातीं। सामने वैठे ओझा नीम के पत्ते से धीरे-धीरे उनके ऊपर वार करते। फिर सरसों और चावल उनके ऊपर छिड़कते । आवश्यकतापड़ने पर बाल पकड़कर कुछ पूछते । पीठ पर हाथ फेरते । और न जाने क्या-क्या क्रियाएं करते । राम- शरण बहू के लिए यह दुनिया विल्कुल नई थी। प्रारंभ में तो उन्हें अजीब लगता, लेकिन धीरे-धीरे वे इस दुनिया में प्रवेश करने लगीं। प्रारंभ में वे सिर्फ दिन में ही जातीं। बाद में रातों में भी जाने लगीं। अपने पति को उन्होंने समझा दिया । रामशरण मान गए। आखिर अब वे कोई बहुरिया तो थी नहीं। उम्र काफी सरक गई थी। इसके साथ वे अकेले तो जाती नहीं थीं। गांव की और तीन-चार औरतें उनके साथ जाती थीं। रामशरण बहू देखतीं, कोई बुढ़िया अपनी वेटी को लेकर आई है, तो कोई सास अपनी पतोहू को। किसीके पति ने उसे छोड़ दिया है, तो किसीका बच्चा पैदा होता है और मर जाता है। किसीके साथ समस्या कुछ है, तो किसीके साथ कुछ। लेकिन अधिकांश औरतें औलाद की इच्छा लेकर ही जाती थीं। उन औरतों को देख रामशरण बहू के मन को तसल्ली मिलती कि वे सिर्फ अकेली ही बांझ नहीं हैं, दुनिया में उनकी तरह बहुत सारी वांझ औरतें हैं। रामशरण बहू पातीं कि कुछ देवास वहुत छोटे होते । मुश्किल से सौ- पचास औरतें जुटतीं । लेकिन कुछ देवास इतने बड़े होते कि औरतों की कोई संख्या नहीं। वहां मेले का-सा दृश्य उपस्थित होता। हलवाई की दुकानें होतीं। होटल होते। औरतें चार-चार, पांच-पांच रातों तक वहां ठहरतीं। शाम घिरने से लेकर रात अधियाजाने तक औरतें ओझाओं के सामने झूमती, वदन ऐंठती। जब थककर चूर हो जाती तो ओझाओं की बांहों में गिर --- . २२ / यद्धस्थल पडती । ओझामुंह परपानी देकरहोशम लाते। खूब जमकर ओझाई होती। रामारण वह को यह समझ में नहीं आता कि औरतें इतना चीपती- चिल्लाती और कूदती-फादती हुई अनाप-शनाप कैसे बकती हैं। क्या उनके ऊपर जिस भूत-प्रेत और डाकिनी का प्रकोप है, उसीके चलते ऐमा करती हैं, या जानबूझकर नखरा पसारती हैं ? ओझाओं के अनुमार तो उनके ऊपर भी प्रेत और डाकिनी का प्रकोप है। लेकिन वे कभी इस तरह अनाप-शनाप बोलते हुए हाथ-पैर तो नहीं पीटती। हालाकि उन्हे इस रूप में लाने के लिए ओझाओं ने काफी प्रयास किया। नीम के पत्ते का वार, माथे के बाल पकड़ना, हुंकार भरकर डराना, तरह-तरह की बातें पूछना -लेकिन इसके बावजूद उन्होंने कभी कुछ नहीं वका। इसीलिए उन्हें लगता, ये सारी औरतें पासटी हैं। यहां पावंड के मिवाय कुछ नहीं। इन स्थानों के प्रति उनके मन में पृणा के भाव पंदा होने लगते । लेकिन कुछ औरतो मे यह सुनकर कि यहां आने के बाद अमुक-अमुक औरतो के बच्चे पैदा हुए, वे अपने मन की घृणा को जबरन श्रद्धा में बदल देती। इसके पीछे यह भावना होती कि दो-चार औरतें पाखडी हो सकती है। इतनी देर सारी औरतें एकमाथ पाखडी कैसे हो सकती हैं ? रामशरण बहू ने एक बार एक बडे देवास में रात अधिया जाने के वाद घूमना शुरू किया। वह देवास गांव से काफी अलग एक जगलनुमा वगीचे में था । वह बगीचा मीलों लवा है । दूर-दूर मे वहा औरतें आती हैं। भोजपुर जिले में उससे बड़ा देवाम और दूमरा कोई नहीं। लेकिन उस देवास में आधी रात के बाद दस कदम आगे बढ़ते ही रामगरण बहू को जो कुछ नजर आने लगा, उसे देखकर एक क्षण के लिए तो उन्हें अपनी आखो पर विश्वास ही नहीं हुआ। उन्हें यह देखकर आश्चर्य की सीमा नहीं रही कि शाम के वक्त भूत-प्रेत के प्रकोप से बदन तोडने वाली औरतें ओझाओ के साथ हमविस्तर हैं। उनके साथ आलिंगनवद्ध हो सोई है । प्रत्यक्ष त्वचा- सम्पर्क-सुख का सुला और व्यापक दृश्य । रामशरण वह माथा पकडकर बैठ गई । एक क्षण के लिए उन्हें लगा कि भूचाल आ गया है। घरती घूम रही है । पाप, नरक, कुकर्म, पतन- धर्म-प्रन्यों के शब्द मंडराने लगे। डरावनी डरावनी व्यापाए मडराने । - - लगीं। फिर उन्हें लगा, यहां आने वाली औरतें बदचलन हैं, बेहया हैं, वेश्या हैं, इनकी कोई इज्जत नहीं, कोई आवरू नहीं। मन ही मन उन्होंने यहां की निर्लज्ज और पतित औरतों को धिक्कारा। लेकिन फिर सोचने लगी, एकसाथ इतनी औरतें इतना पतित क्यों हो गई हैं ? क्या इनकी नीयत खराव है या इसके पीछे कुछ मजबूरियां हैं ? फिर उन्हें लगने लगा, पुरुप तो वर्जनाहीन होते हैं, जव जिसके साथ इच्छा हुई, उसके साथ समागम- रत हो गए। नारियां पदों के भीतर रहती हैं-घर-परिवार और सामा- जिक बंदिशों से घिरी। पति की इच्छा पर ही उन्हें निर्भर रहना पड़ता है। पति नौकरी पर है। वहां वह अपनी काम-पिपासा तृप्त कर लेता है। लेकिन पत्नी को अपनी काम-पिपासा की तृप्ति के लिए उसका इन्तजार करना पड़ता है । पत्नी मर गई तो पुरुप पर कोई अकुंश नहीं, लेकिन पति मर गया तो पत्नी के ऊपर हजार अंकुश लग गए । रामशरण वहू को लगता है कि पुरुप-प्रधान इस समाज में शहर की पढ़ी-लिखी औरतों ने चाहे जो रास्ताअख्तियार किया हो, गांव की अनपढ़ औरतों ने तो देवासों के माध्यम से अपनी इस समस्या का समाधान ढूंढ लिया है । रामशरण वहू को स्पष्ट महसूस हुआ कि इस प्रकार के आडंबरपूर्ण देवास सिर्फ एक वहानामात्र हैं। ऐसे पाखंडपूर्ण स्थानों के माध्यम से केवल अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति करने और उन्मुक्त जिन्दगी जीने की ख्वाहिश पूरी की जाती है। रामशरण बहू इस विषय पर डूबकर सोचने लगीं। तब उन्हें लगा, सिर्फ यही कारण नहीं है। इसमें वांझ औरतें भी शामिल हैं। वांझ औरतों के साथ तो मजबूरी है-औलाद पाने की मजबूरी । अब रामशरण बहू को लगने लगा, इस काम-क्रीड़ा में अधिक संख्या वांझ औरतों की ही है। पता नहीं किस जनम का फल वांझ बनकर उन्हें भुगतना पड़ रहा है ! इस कुकर्म के बाद तो और दुर्गति होगी। लेकिन तत्क्षण उन्हें खयाल आया, वांझ औरतों के साथ विकट परिस्थितियां हैं। पति ने दूसरी शादी करने की धमकी दी होगी। गांव ने वांझ के रूप में प्रचारित कर दिया होगा। तब मजबूरन इस बांझपन के खिलाफ उन्होंने यह कदम उठाया है। हो सकता है, इस रास्ते भी कुछ औरतों को सफलता मिली हो, तभी तो इतनी सारी औरतें एकसाथ इस रूप में नजर आ रही हैं ! २४ / युद्धस्थल रामशरण बहू को इसी समय सहदेव बहू का चेहरा याद आने लगा। 'फिर उन्होंने सोचा, चाहे जमे भी हो, इस वाझपन मे मुक्ति में ही कल्याण है। मुक्ति का मार्ग घृणित जरूर है, लेकिन बांझपन की असह्य पीडा के आगे उसका कोई अस्तित्व नहीं। रामशरण बहू के सामने एक सवाल खड़ा हो गया, क्या उन्हें भी इस रूप में आना होगा? दवा-दारू, पूजा-पाठ, झाड़-फूक मब कुछ कराकर उन्होने देख लिया। कुछ नहीं हुआ। अब तो सिर्फ यही एक राम्ता वाली है। इस रास्ते भी सफलता नहीं मिलेगी, ऐमी वात मन को समझाने की उन्होंने कोशिश की, लेकिन मन ने नकार दिया। जिम दवा-दारू, पूजा-पाठ और झाड़-फूक के बारे में कोई जानकारी नहीं, उमरे माथ आस मू दकर जुड़ी रही और जो सर्वविदित बात है, उसमे मुकर जाना उचित तो नहीं । यह एक जानी हुई वात है कि बाझ औरतो को जव भी वच्चा हुआ है, मर्द के समागम से ही-चाहे वह अपना मर्द हो या पराया ! रामचरण बहू का अन्तर काप गया। वे शुरू से ही लज्जागील और मर्यादित नारी रही हैं । अपने पति के मिवाय कभी उन्होंने किसी और की कल्पना तक नहीं की है। वस्त्र के ऊपर भी पर-पुरुप की निगाहे उन्हें गड़ने लगती है। फिर एकदम वेपदं होकर किसी पर-पुरप के सामने अपने को पसार पाना उनके लिए एकदम असभव होगा। वे ऐसा कभी नहीं कर पाएंगी। लेकिन हठात् इसी समय पुन सहदेव बहू का चेहरा उनकी आखो के सामने आ गया। उस चेहरे की भयावह वेदना ने उनके नकार को स्वीकार में बदल दिया। लेकिन एक मयादित स्वीकार। अगर यह सब करना ही हो तो अपने गाव या मपर्क के किमी पुरुप के माथ । तरीके और इग्जत मे । इसीके लिए देवासो मे इतनी दूर तक आना और फिर अघेड़ ओझाओ के साय संभोगरत होना ठीक तो नहीं' इस घटना के बाद रामशरण वहू का देवासो मे आना-जाना कम हो गया। लेकिन अब तक गाव में उनके देवास आने-जाने का प्रचार खूब जोरशोर मे हो चुका था। उस प्रचार के साथ लोगो ने उन्हें एक नया मंबोधन दे दिया था-डायन। यह डायन शब्द वाझ से बह-बदार था। 'बाझ' तो सिर्फ कथन मे कष्ट पहुचाता था, डायन के भरोगों ने - अपने व्यवहार में भेद-भाव प्रदर्शित करना शुरू कर दिया था-~-बच्चों को उनके सामने से हटा लेना, सगुन के कार्यों में उनकी नजर बचा जाना, उनसे दूर ही रहना, पर्य-त्योहारों पर उन्हें निमंत्रित न करना, उनसे डरना, उन्हें मानव न समझ दानव समझना। अपमान, तिरस्कार और उपेक्षा का धुला-मिला रूप। रामशरण बहू को प्रारंभ में लगता था, वांझ होना ही सवसे पीड़ादायक स्थिति है। लेकिन डायन से संबोधित होने के बाद उन्हें लगने लगा, डायन होने से बढ़कर दुःख और कुछ नहीं । समाज में रहकर भी समाज से बहिष्कार की सजा । मानव होते हुए भी लोगों द्वारा दानव समझे जाने की पीड़क स्थिति। रामशरण वह ईश्वर से प्रार्थना करती, चाहे जितनी दुर्गति करवानी हो, करवा लें, लेकिन डायन का संवो- धन हटा लें । डायन वनकर जीना तो अत्यन्त कण्टकर है ही, मरने पर भी किसीके मुंह से सहानुभूति के दो शब्द नहीं निकलते। लोग कहते हैं-~-'मर गई तो अच्छा हुआ''डायन थी. "जीती तो लोगों को कष्ट ही देती...!' इन्हीं दिनों एक ऐसी घटना घटी जिसने रामशरण बहू के डायन होने की प्रामाणिकता पर मुहर लगा दी। हुआ यह कि जेठ की चिलचिलाती दोपहरी में एक अधेड़ उम्र का भूखा-प्यासा भिखमंगा कहीं से आया और “रामशरण बहू के दरवाजे आकर रट लगाने लगा। रामशरण बहू स्वभाव ही दयावान और धर्मात्मा थीं। वे भिखमंगों को अपने दरवाजे से कभी खाली हाथ नहीं लौटने देती थीं। उस भिखमंगे को भी उन्होंने आटा लाकर दिया कि कहीं पका-खा लेना। लेकिन उसने आटा लेने से इनकार कर खाने की मांग की। तव रामशरण वहू ने खाना लाकर उसे खिलाया। खाना खाने के बाद उस भिखमंगे ने जी भरकर रामशरण बहू को दुआएं दी। फिर अपने बदन पर चिथड़े बने कमीज की ओर इशारा कर राम- शरण बहू से एक पुराने कपड़े की मांग की। दयावश रामशरण बहू ने अपने पति की एक पुरानी कमीज लाकर उसे दे दी। चूंकि रामशरण वह का घर गांव की मुख्य गली के किनारे है, इसीलिए गली से आते-जाते अनेक लोगों ने उस भिखमंगे को रामशरण बहू के दरवाजे पर खाते तथा कपड़ा लेते देखा। लेकिन ऐसा तो अकसर ही होता रहता था, इसीलिए रामशरण बहू ने कोई चिन्ता नहीं की बल्कि उस भिखमंगे को विदा कर २६ / युद्धस्थल कुछ देर में उसे जैने भूल-सी गई। लेकिन अचानक शाम को सनमनी की तरह यह खबर पूरे गांव में फैल गई कि एक भिखमगा गांव में बाहर आम- गाछ के नीचे मरा पड़ा है। दोपहर में रामशरण वह डायन ने उसे खिलाया और कपड़ा दिया था। रामगरण बहू डायनने ऐसा बाण उम भिखमंगे को मारा कि दो-तीन घंटे भी न बीतने पाए और वह चल बसा। गांव के लोग भीड की शक्ल में उस आम-गाछ के नीचे जुटने लगे। वह भिखमंगा मरा पडा था। उसके बदन में लिपटी कमीज रामगरण की यो। गाव के आधे से अधिक लोग उम कमीज को पहचानते थे। फिर लोगों के बीच आपस मे चेमेगोइया और कानाफूसी होने लगी। बात को योडा चटक बनाने के लिए कई लोगों ने किम्से गढना प्रारंभ किया कि कैसे वे उस गली से आ रहे थे और रामशरण बहू हंस-हसकर उस भिखमंगे को खिला रही थी। वह भिखम गा अभी कोई खास वूटा भी नहीं हुआ था। एकदम तदुरस्त लगता था । अपना इष्ट बनाने के लिए रामशरण बहू ने उसे मार डाला। कुछ देर तक तो रामशरण यह सब सुनते रहे । फिर उनका खून खोल उठा । वेलाठी लेकर गांव मे निकल पडे, "हिम्मत हो तो मेरे सामने डायन कहो. 'मार-मारकर हड्डी-पसली एक नही कर दी तो नाम रामशरण नही "पीछे शान वधारना वहादुरी नहीं कही जाती।" रामभरण की आवाज से लोगो के बीच सन्नाटा छा गया। रामशरण के सामने उनकी पत्नी को डायन कहने की हिम्मत किसीको नहीं हुई। लेकिन पीठ-पीछे लोगों को गुफ्तगू चलती ही रही। गाव के लोगो के बीच यह धारणा पुख्ता हो गई कि यह रामशरण वहू का ही काम है। देवासों में जाकर वह पक्की डायन बन गई है। गुडगुडी की आग ठदी पड जाती है । रामशरण बहू की आंखें झपकने लगती हैं। रात के तीन पहर गुजर चुके थे, उन्हे नीद नहीं आई थी। लेकिन अब इस चौथे पहर अचानक दुनियाभर की नीद उनको आसों में उमड़ आती है। वे गुडगुडी एक और को रख पसर जाती हैं। फिर जन्द ही उनकी नाक से घरघराहट को आवाज आने लगती है। उनकी नाक में घरघराहट को यह आवाज उनके सो जाने को पक्की सूचना मेरी है ।

रामशरण वहू वांझ से डायन वनीं । एक कष्ट के रहते दूसरे कष्ट के वीच आ घिरीं । लेकिन इसपर भी और नये कष्टों से उन्हें मुक्ति कहां ! वांझ होने और डायन समझे जाने की पीड़क स्थिति से अभी वे गुजर ही रही थीं कि गांव के लोगों ने उनके पति को दूसरी शादी करने की सलाह दी, "रामशरण भाई, अब प्रतीक्षा करने की जरूरत नहीं है.."इस औरत से अब कुछ होने वाला नहीं. 'फटाफट दूसरी शादी कर लो 'खानदान का नाम चलाने वाला भी तो कोई चाहिए"इतना धन-दौलत है तुमको .""कौन हवेख' करेगा ?" रामशरण बहू को गांव के लोगों की यह सलाह अपने प्रति उनका पड्यंत्र मालूम हुआ। वे कांप उठीं। सहदेव बहू की कहानी उन्हें याद आने लगी। गांव ने उन्हें बांझ कहा । डायन कहा। लेकिन वे अन्दर से कमजोर नहीं हुई थीं। पति की छाया जो थी उनके ऊपर । पति ने उन्हें कभी वांझ और डायन नहीं समझा। लेकिन पति की दूसरी शादी की इस बात ने उन्हें अन्दर से तोड़ना शुरू कर दिया। हालांकि पति ने उनसे सीधे-सीधे दूसरी शादी की वात कभी नहीं की, लेकिन परोक्ष रूप से की जाने वाली पति की बातों से उनकी आन्तरिक इच्छा रामशरण बहू से छिपी न रह सकी। पति कहते, “अमुक-अमुक लोग निरबसिया थे लेकिन दूसरी शादी करने के बाद वंश वाले हो गए।" पति का यह परोक्ष इशारा रामशरण बहू को तीर-सा लगता। तब तो इसका यही मतलब है कि पति भी उन्हें बांझ और डायन समझने लगे हैं ? अब वह किनके सहारे जीएंगी? किनके संरक्षण में रहेंगी? किनके ' प्यार को पाकर मन का सारा कष्ट-संताप दूर करेंगी? रामशरण बहू एकांत में घंटों विलाप करतीं। माथा पीटतीं । लेकिन सहज होकर सोचने पर उन्हें लगता कि पति का दोप ही क्या है ? बंजर जमीन को छोड़कर ऊसर जमीन से जुड़ना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है । लेकिन उनका क्या होगा? क्या वे सहदेव बहू की तरह जिएंगी? क्या उनका अंत सहदेव बहू की तरह होगा? नहीं. वे ऐसा कभी नहीं होने देंगी। और रामशरण बहू की आंखों के सामने देवास की रातों का दृश्य उभर जाता । अब यही एक रास्ता शेप बचा है उनके लिए! २८ / युद्धस्थल . रामशरण बहू का ध्यान यही में जगतनारायणमिह की ओर जाने लगा। जगतनारायणसिंह का घर तो उनके बिल्कुल पास है ही, उनका दालान तो एकदम उनके दरवाजे के मामने है। रामशरण बहू ने दुलहन वनकर इस गांव में आने के बाद अपने पति के अतिरिक्त अगर किमी दूसरे पुरुष को पूरी तरह देखा था तो वह जगतनारायणसिंह थे। वे जब भी दरवाजे पर आती, अपने दालान में मवेशियो को चारा-पानी देते जगत- नारायणसिंह उन्हें नजर आते-गोरा चेहरा, कडी-कड़ी मूछे, चौड़ी छाती, कसी हुई देह । अखाड़े में कुश्तिया लडते थे। एक भैम और दो गायें। दूध- दही की कोई कमी नहीं। जगतनारायणसिंह रामसारण बहू को अपनी ओर ताकते देव जैसे निहाल-मे हो जाते । पलटकर उन्हें लतचापी निगाहों में देखने लगते । लेकिन उनकी नजर अपने ऊपर पड़ते ही रामगरण बहू घूघट निकाल लेती। दर- वाजे मे हट जाती। लेकिन छिपकर उन्हें देखती रहती । जगतनारायण- सिंह की नजरें देर तक उनकी बाट जोहती रहती। जगतनारायमिह की शादी रामगरण बहू के आने मे दो साल पहले हुई थी, लेकिन उनकी पत्नी को आए अभी एक वर्ष भी पूरा न हो पाया था कि वह पुत्रवती हो गई। उसके बाद फिर तो हर माल बच्चे होने लगे। सात लड़के और पांच लड़किया। एक पूरी फौज । गाव के लोग मजाक करने लगे, "अव बन्द करो जगतनारायण"इस गाव की जनसंख्या इतनी जल्दी दुगुनी मत करो..." रामगरण वह जगतनारायणसिंह के बार में नये सिरे में विचार करने लगी। जगतनारायणसिंह की आसो की भापा बे ममझती थी। लेकिन कभी उसका उत्तर उन्होंने नहीं दिया। बरावर पतिव्रत-धर्म निभाती रही। लेकिन एक लम्बा समय बीत जाने के बाद उन्हे अफसोस होने लगा, क्यो वे एक झूठे आदर्श मे बंधी रही? दरवाजे पर दस्तक दे रहे कडवे यथार्थ से उन्होंने फायदा क्यो नही उठाया? अब उसी कडवे ययायं को स्वीकार करने के लिए वे तैयार होने लगी थी। एक दिन जेठ की चिलचिलाती दोपहरी मे रामशरण बहू अपन दरवाज पर आ खडी हुई। उस दिन रामशरण घर पर नही थे। चकवन्दी आफिम गए हुए थे। रामशरण वहू ने देखा, जगतनारायणसिंह अपने माल-मवेशियों को खिलाकर खाट पर लेटे थे और एक बीड़ी सुलगाकर पी रहे थे। राम- शरण बहू एकटक जगतनारायणसिंह को देखने लगीं। प्रारंभ में तो जगत- नारायणसिंह का ध्यान दूसरी ओर था, लेकिन जब उन्होंने रामशरण वहू को अपनी ओर ताकते पाया तो अपना पूरा ध्यान रामशरण बहू पर केन्द्रित कर वे उन्हें घूरने लगे। रामशरण बहू की उम्र काफी गुजर गई थी, लेकिन उनके ऊपर आई असाधारण जवानी अभी पूरी तरह नहीं गुजरी थी। उनके बदन के मांसल उभार और कसाव अब भी लोगों को अपनी ओर खींचने के लिए पर्याप्त थे। जगतनारायणसिंह अपनी खाट से उठ बैठे। रामशरण बहू तो उन्हें देखकर चूंघट निकाल लेती थीं, माथा झुकाकर हट जाती थीं, लेकिन आज इस तरह क्यों देख रही हैं ? जगतनारायणसिंह निनिमेष दृष्टि से राम- शरण वहू की ओर ताकने लगे। फिर उनकी अनुभवी आंखों को रामशरण बहू की आंखों की भाषा समझते देर नहीं लगी। वे उठ खड़े हुए और चल पड़े। मन में खुशी थी, लेकिन किसी कोने में संशय भी था। पांव तेजी से बढ़ नहीं रहे थे। लेकिन दूरी भी कोई खास नहीं थी। वे रामशरण बहू के पास आ गए। उन्होंने पाया कि आज पहली बार रामशरण बहू ने अपने और उनके बीच के संकोच के पर्दे को हटा दिया है। जगतनारायणसिंह के अपने विल्कुल करीव आ जाने के बाद भी राम- शरण बहू वैसे ही खड़ी रहीं, उनकी ओर ताकती रही-संपूर्ण इच्छा, प्रेम और समर्पण की दृष्टि से। इस दृष्टि की पहचान भले ही किसी नपुंसक व्यक्ति को न हो पाए, लेकिन जगतनारायणसिंह जैसे मर्द से तो यह दृष्टि छिपाए भी नहीं छिपती। जगतनारायणसिंह ने अत्यन्त विनम्र शब्दों में पूछा, "आपने मुझे बुलाया क्या?" रामशरण वहू ने 'हां' और 'ना' न कहकर यह कहा, "अन्दर आ जाइए, दरवाजे पर कोई देख लेगा तो क्या कहेगा?" यह कहकर रामशरण बहू हंस पड़ीं। खिलखिलाहट की धीमी आवाज। विजली जैसे दांतों की दूधिया चमक । रामशरण वहू की आंखों ने जगतनारायणसिंह को संकेत दिया था। हंसी ने अर्थ दिया। अब वे अन्दर आ गए। उनके अन्दर आने के बाद । ३० / युद्धस्थल रामशरण बहू ने दरवाजा वद कर दिया। फिर वे जगतनारायणसिंह के सामने खड़ी हो गई। जगतनारायणसिंह ने देखा, रामभरण वह ने एक लंबे समय बाद खूब जमकर शृगार किया था। इस उम्र में भी वे एकदम दुलह्नो जैसी लगने लगी थी। जगतनारायणसिंह ने इतने करीब में राम- गरण बहू को पहले कभी नहीं देखा था। एक क्षण तक वे रामभरप बहू के नारी-सौन्दर्य का आकलन करते रहे। जेठ की चिलचिलाती दोपहरी । बद दरवाजे के भीतर रामशरन बहू और जगतनारायणसिंह। दोनो एक-दूसरे के आमने-सामने बड़े। एक- दूसरे को देखते । लेकिन न कुछ जगतनारायसिंह ही बोलते और न राम- गरण बहू ही। नारियां चाहे लाख दुश्चरित्र हो, नमानम के निर पुरर को शब्दी से निमनित नहीं करती, बल्कि आवों ने ही युनानी हैं। जो इन आखो की भाषा नहीं समझते या ममलकर मुकर जाते हैं. वे कारण होते हैं। नारियो की नजर मे उनका कोई महत्व नहीं होता। जगतनारायणसिंह अब और देर तक अपने को रोग नहीं सरें। आगे बढकर उन्होंने रामशरण बहू को बाहों में भर लिया। फिर मोने वाले कमरे में पहुच विस्तरे पर दोनों लुट गए । इन बाद एक-दूसरे के बार- पाम का अतिक्रमण कर न जाने कहा पहुंचने के लिए दोनों एवं-दुमरे में एकाकार होते रहे। इस घटना के बाद रामशरश बहू और जगननागमनिह बरावर ही एक-दूसरे से मिलने लगे। जिस किमी दिन भी रामगरम भर में बाहर होते, उस दिन जगतनारायणसिंह और रामचरण वह का एकातिर मिलन जरूर होता । रामशरण यह को पाने और उनके नारी-जन को भोगने की वर्षों की अपनी प्यास जगतनारायणमिह वुझाने लगे थे और रामगरण बहू के मन में भी आशा की एक नई किरण फूटने लगी थी। जगतनारायण- सिंह मे सम्पर्क के बाद रामशरण बहू को पोडा बहुत कम हो गई थी। उन्हें लगने लगा था, अब जरूर कुछ होगा। जगतनारायमिह की पत्नी को लगातार बारह बच्चे हुए। अगर बच्चेदानी का आपरेशन नहीं करवाया जाता तो अभी उसका बच्चे जनना बन्द नहीं होता। जरूर जगतनारा सिंह के चलते उनका माग भी पलटेगा। उन्हें वीर मापार में जगतनारायणसिंह बचा लेंगे...! लेकिन वैसा कुछ भी नहीं हुआ, जैसा रामशरण बहू ने सोचा था। साल-पर-साल गुजर गए। वे वैसी-की-वैसी रहीं। उनकी कोख पत्थर ही बनी रही। कभी हरी-भरी नहीं हुई। अव रामशरण बहू को जगतनारायण- सिंह से अपने संबंध को लेकर भी पछतावा होने लगा। जो नहीं करना चाहिए, वह उन्होंने किया। अपना धर्म विगाड़ा। अपना लोक-परलोक वर्वाद किया। फिर भी...! किसीके जोर-जोर से किवाड़ पीटने की वजह से रामशरण बहू की नींद उचट जाती है। वे पूछती हैं, "कौन है ?" वाहर से आवाज आती है, "मैं हूं दुखन की मां।" रामशरण बहू उठकर दरवाजा खोलती हैं। देखती हैं, अव तक दिन काफी वीत चुका है । वे देर तक सोती रही हैं। इससे पहले कि रामशरण बहू दुखन की मां से रात न आने का कारण पूछतीं, दुखन की मां स्वयं कह उठती है, "रात मेरी तवीयत बहुत खराब हो गई थी, नहीं तो जरूर आती .."आपके विना तो मेरा मन नहीं लगता. 'एक आप ही तो इस गांव में हैं जिनसे दुःख-तकलीफ कहकर मैं हल्का हो पाती हूं।" रामशरण वहू देखती हैं, सचमुच दुखन की मां का चेहरा काफी उदास नजर आता है। उनका मन दुखन की मां के प्रति आर्द्र हो उठता है। वे कहती हैं, "तुम्हारी तबीयत अभी ठीक नहीं लग रही है "तुम कमरे में आराम करो' 'मैं सब कर लूंगी।" रामशरण वहू की बात सुन दुखन की मां जवाब देती है, “अब मैं ठीक हूं मालकिन ''अपने रहते भला आपको कुछ करने दूंगी।" रामशरण बहू की बात सुन दुखन की मां का मन बाग-बाग हो गया है। वह गांव में कई घरों में काम करती है, लेकिन इतना स्नेह-प्यार उसे कहीं नहीं मिलता है। उनकी आत्मीय वातों से उसका उदास मन चंगा हो उठता है। फिर वह रात के जूठे बर्तनों को एक जगह इकट्ठा कर साफ करने बैठ जाती है। रोज की तरह वर्तन साफ करते हुए ही दुखन की मां गांव की सूचनाएं देने लगती है, "दूधनाथ चौधरी के लड़के की तबीयत ३२ / युद्धस्थल रान मे ज्यादा खराब हो गई है."दूधनाय की पत्नी आपका नाम ले-लेकर गाली वक रही है. कह रही है कि रामगरण वहू रात में मेरे चबूतरे पाकर बैठी थी । उमौन मेरे बेटे को किया है।.." "रात को रामायण में लौटते वक्त थक गई थी। सुस्ताने के लिए दूध- नाथ के चबूतरे पर बैठ गई। मैं क्या जानती थी कि वहां बैठने का इतना बड़ा अक्षरंग मेरे ऊपर लगेगा।" रापगरण बहू दु.स प्रकट करते हुए सफाई देती हैं। इसपर दुखन की मां उन्हें ममझाती है, “अकेले में कहीं मत बैठा कीजिए। आपके माये बदनामी मद दी गई है। किसी भी कारण मे कुछ होगा तो आपको ही पकड़ा जाएगा। दूधनाथ की औरत कह रही पो कि मेरे बेटे को कुछ हो गया तो उस बुढिया को सही सलामत नहीं छोड़ गी."उसकी दुर्गति बनाकर मानूगी।" "अब मेरी कौन-मो दुर्गति वाकी है कि वह वनाएगी ! वांझ बनी। द्वायन कहलाई। पति मर गया। कोई देखने-सुनने वाला नहीं । इममे वढ. कर दुर्गति मेरी और क्या होगी?" रामशरण बहू का गला भर आता है। आंखें छलहला आती हैं। वे उठकर विस्तरे पर जा गिरती है। जिन व्यथाओं के कारण रात देर तक नीद नहीं आई थी, वे व्यथाए पुनः उन्हें कचोटने लगती हैं। इससे पहले कि वे रोकर अपने मन को हल्का करती, दुमन को मा उनके पास आ जाती है। दुपन की मा जानती है, रामनारण वहू के मन की पीडा जब बहुत बढ जानी है, तभी वे आकर विस्तरे पर गिरती हैं। दुखन की मां रामशरण बहू को समझाती है, "जो हुआ सो हुआ, अब चितामत कीजिए.""अब से किमीके दरवाजे रात में मतवैठिएगा .. आपको तो रामायण में भी नहीं जाना चाहिए था""जब शरीर चलता ही नहीं, तब फिर कहीं जाने से फायदा "चुपचाप घर पर पड़े रहिए और राम-राम भजते रहिए' दुखन की मा रामगरण बहू को उठाकर आगन मे ले आती है। फिर एक जगह मचिया पर उन्हें इत्मीनान में बैठा देती है। अब तक बर्तनों को साफ कर घर-आंगन बुहार चुकी है । अब चूल्हा जलाती है। फिर रोज की भाति आटा, गुड़ और घी का हलवा बनाने लगती है। रामगरण बहू को खाने-पीने की कोई तकलीफ नहीं । वमे मरने से पहले पति ने कैम-मुकदमे के चक्कर में आधी जमीन वेच दी थी, लेकिन अब भी जो जमीन बची हुई है, वह रामशरण बहू के लिए पर्याप्त है। उन्हें खुद तो खेती करनी नहीं है, इसीलिए खेती करने वाले मजदूर-किसानों को उन्होंने अपने खेत दे दिए हैं। उनके खेत जोतने वाले पूरा-पूरा हिसाव हर साल चकता तो नहीं करते, लेकिन वे जितना दे देते हैं, वह उनके लिए काफी होता है। उतने से वह मजे में अपना खर्च चला लेती हैं। उन अकेले का खर्च है ही कितना? रामशरण बहू के मरने के बाद उनकी जमीन का हकदार कौन होगा, इसके लिए कई लोगों ने प्रयत्न किए। ठाकुरवारी के महंत ने काफी आरजू- मिन्नत की, "ठाकुरवारी के नाम अपनी जमीन दान दे दीजिए. आपका परलोक वन जाएगा आपके मरने के बाद आपकी जमीन की फसल ठाकुरवारी में आएगी 'ईश्वर का भोग लगेगा साधु-संत प्रसाद पाएंगे ...आपकी कीति अमर रहेगी। गांव के अन्य लोगों ने भी उनकी जमीन हड़पने के लिए कई तरह की बातें कीं। कई तरह के प्रलोभन दिए। उनके मायके में उनका अपना कोई नहीं बचा है। वे मां-बाप की अकेली थीं। कोई सगा भाई-बहन नहीं। मां-बाप भी गुजर गए। अब मायके में दो चचेरे भाई वचे हैं। वे दोनों उनकी जमीन हथियाने के लिए उनके पास आए थे। उन दोनों ने खूब खून का रिश्ता जताकर ममता दर्शाई थी। लेकिन रामशरण बहू ने अपने बाल धूप में नहीं पकाए थे। उन्हें घर-परिवार और समाज का तीखा अनु- भव हो चुका था। वे सबको देख चुकी थीं। समाज के बीच जिस तरह की अपमानित, लांछित और बदनाम जिन्दगी वे जी रही थीं, उसके खिलाफ आवाज उठाने के लिए कोई सामने नहीं आया था। पर जमीन लिखवाने के लालच से लोग आकर चापलूसी करने लगे थे। लेकिन उन्होंने किसीकी एक न सुनी। उन्होंने साफ कह दिया कि वे अपनी जमीन किसीको नहीं देंगी। उन्होंने सोच लिया है, जव समाज ने उन्हें शांति से नहीं रहने दिया है तव वह अपनी जमीन भी शांति से किसीको नहीं हड़पने देंगी। ऐसे ही छोड़कर मर जाएंगी। जमीन के लोभी लोग भले ही आपस में कटेंगे- मरेंगे। उन्होंने समाज से वदला नहीं लिया तो अव यह वदला उनकी जमीन ही लेगी! । । ३४ युद्धस्थल दुखन की मां हलवा तैयार कर देती है। फिर रामदारण बहू के सामने हलबा परोसती है। रामशरण बहू हलवा खाने लगती हैं। जब से उनके दांत टूट गए हैं तब मे सुबह के नाश्ते में वे हलवा ही लेती हैं। यह बनाने और खाने दोनों में आमान होता है। साथ ही स्वादिष्ट और भक्तिदायक भी होता है। रामशरण बहू के हलवा खा चुकने के बाद दुग्वन की मां भी हलवा खाती है। दुखन की मा रामगरण बहू के यहा ही नास्ता और माना ग्रहण करती है। वह गांव के अन्य घरों मे सिर्फ चौका-बर्तन का काम करती है, लेकिन रामशरण बहू के यहा तो वह नाश्ता और खाना भी पकाती है तथा रात को उन्हीके साथ सोती है। शायद इसीके एवज में उसे महीना देते हुए भी रामशरण बहू दोनो जून खाना खिलाती हैं। नाश्ता करने के बाद दुग्वन की मां रोज की तरह रामशरण बहू को गुडगुड़ी सुलगाकर देती है। रामशरण बहू गुडगुडी पोने लगती है और दुखन की मां दिन का खाना बनाने लगती है-भात, दाल और सब्जी। दुसन की मां खाना बनाते हुए ही गाव की एक और सूचना रामशरण बहू को देती है, "कल रात गांव में फिर बाहर से नेता आए थे "वही जमीन के अन्दर छिपकर रहने वाले नेता.."गरीब और छोटी जातियों की तकलीफ के खिलाफ लड़ने वाले पच्छिमी टोने में खूब नारे लगे थे." यंदूक छूटी रामारण बहू दुषन की मा की यह मूचना ध्यान से सुनती हैं। उनके जेहन में अनेक तरह के विचार उटने लगते हैं । वे मचिया मे उठते हुए कहनी हैं, 'दुम्वन की मां, मैं सोने जा रही हूँ""रात अच्छी तरह नीद नहीं आई थी."मुझे जगाना मत" नीद पूरी होने पर अपने-आप जाग जाऊगी।" इसपर दुसन की मां पूछती है, "आज स्नान नही कीजिएगा क्या" "नहीं, आज नहाने की इच्छा नहीं है।" कहकर रामशरण वह घर में चली जाती हैं। फिर गुडगुडी दिरामे पर रख बाट पर लेट जाती हैं। वे अपनी आंखें बन्द कर लेती हैं। चाहती हैं कि नीद आ जाए, लेकिन नीद उन्हें नहीं आती है। उनके कानो में तो दुखन की मा की यह दूसरी सचना गजती रहती है। उनके गाव मे यह लडाई पिछले कई सालों में । छिड़ी है। इसी लड़ाई में उनके पति चले गए। कितने लोगों की जानें गई। कितने घर सूने हो गए। फिर भी यह लड़ाई खत्म नहीं हुई। ऊपर से शांति जरूर कायम हो गई है, लेकिन अन्दर-ही-अन्दर लोग खौल रहे हैं। गांव दो दलों में बंट गया है। दोनों दल एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं । जब जिसे अनुकूल वक्त मिलता है, एक-दूसरे पर चढ़ाई कर देता है। रामशरण वहू को अच्छी तरह याद है, इस लड़ाई की शुरुआत मुरारी- सिंह के चलते हुई थी। मुरारीसिंह इस गांव के सबसे बड़े गृहस्थ हैं । उनके लगभग सौ वीघे खेत हैं । इस गांव में सबसे आलीशान मकान उन्हींका है। उन्होंने इस गांव में आटा-चक्की लगवाने और सब्जीमंडी बनाने की योजना बनाई थी। इस योजना के लिए वे चमरटोली की जमीन दखलि- याना चाहते थे। वे चाहते तो दूसरी जगह भी इस योजना को कार्य-रूप दे सकते थे। लेकिन चमरटोली सड़क के किनारे थी और आटा-चक्की तथा सब्जीमंडी का सड़क के किनारे होना व्यावसायिक दृष्टि से उन्हें नितांत आवश्यक लगता था । चमरटोली की जमीन अगर परती होती तो वे विना किसीसे पूछे काम लगवा देते । पूरे गांव में उनका रोव व्यापता था। लेकिन चमरटोली की जमीन में चमारों की झोंपड़ियां थीं.---कुल सोलह झोंप- ड़ियां । उन्होंने चमारों से कहा, "यह जमीन मेरी है.'मेरे पुरखों ने तुम्हारे पुरखों को यहां बसा दिया था."अब इस जमीन में मैं आटा-चक्की लगाना और सब्जीमंडी बनाना चाहता हूं.''तुम लोग यह जमीन खाली कर दो ''तुम लोगों के रहने के लिए मैं दक्खिन भर पोखरे पर जमीन दे दूंगा' वहां तुम लोग अपनी झोंपड़ी बना लेना।" अगर कोई एक चमार होता तो मुरारीसिंह की बात आसानी से मान जाता। उनसे विरोध मोल लेना मामूली वात नहीं। लेकिन पूरे सोलह घरों के चमार थे। औरत-मर्द और बाल-बच्चों को लेकर लगभग सवा सौ की संख्या में । उन सवोंने एकजुट होकर एकस्वर में कहा, "यह जमीन आपकी नहीं है, हमारी है। हम पुश्तों से यहां रहते आ रहे हैं।" मुरारीसिंह के साथ 'हमारी' और 'तुम्हारी' को लेकर उन सवों की काफी तकरार हुई। फिर मुखिया और सरपंच के निर्देशन में बरगद के नीचे पंचायत बैठी। पंचों ने दोनों ओर से कागज प्रस्तुत करने का आदेश ३६ / युद्धस्थल । दिया। चमारो की ओर से दो-नीन लोग ही कागज निकाल पाए, लेकिन मुरारीसिंह ने दुनिया भर का कागज सामने कर दिया। कागज के अनुसार. पिछले सर्वे में चमरटोली की जमीन मुरारोसिंह के पिता के नाम पर थी। इसके बाद नये मर्वे में कुछ जमीन दो पढे-लिखे चमारों ने अपने नाम पर चहवा ली थी, शेप जमीन पुनः मुरारीसिंह के नाम पर ही आ चढ़ी थी। हालाकि इसके पीछे की भूमिका से गांव के सभी लोग परिचित थे। सर्वे करने के लिए गाव मे आए मरकारी कर्मचारी मुरारीमिह के यहां ही टहरे थे और खूब मौज-मस्ती उड़ाई थी। लेकिन पचो को इममे क्या मतलब ? उन्हें तो कागज पर चढी जमीन देखनी थी। कागज के अनुमार उन्होंने चमरटोली की जमीन का म्दामी मुरारीमिह को साधित कर दिया। पंचायत खत्म हो गई। पचो का निर्णय मुरारीसिंह के पक्ष में हुआ। चमारो ने पंचायत में तो कुछ नही कहा, पंचो के सामने तो जैसे उनके मुह मी दिए गए थे, लेकिन वहा ने लौटने पर उन मवने आपस में मिलकर एक गुप्त बैठक की। उस बैठक में उन सबने यह तय किया कि यह जमीन नहीं छोड़ेंगे । घना-बसाया घर उजाडकर तो मिट्टी में मिल जाएंगे । अगर कोई दूसरी बात होती तो समझोता कर लेते, लेकिन यहा तो घर से बेघर किया जा रहा है, फिर समझौता कमा? इस निर्णय के बाद चमरटोली के पढे-लिमे चमारो ने बाहर दौडना प्रारंभ किया। बाहर में उन्हें यह पता चला कि जिस जमीन में वे वर्षों में रह रहे हैं, उस जमीन पर उन्हें पूरा अधिकार है । उस जमीन ने कोई उन्हें वेदखल नहीं कर मरता है। फिर उन मबोने आपम में चदा उगाहकर मुरारीसिंह पर जोर-जबर्दस्ती के माध्यम में चमरटोली दाखल करने का मुकदमा दायर कर दिया। मोचा, मुरारीमिह पर पहले ही दायर किया गया उनका मुकदमा उनके पक्ष में ही होगा। अब उनकी दाल गलने न पाएगी। इधर पचायत के बाद मुरारीसिंह यह प्रतीक्षा करते रहे कि चमार अब शीघ्र ही वह जमीन खाली कर देंगे। लेकिन समय गुजरता जाता या और वमरटोली मे जमीन छोड़ने की कोई भी आवाज नहीं आ रही थी। इममे पहले कि मुरारीसिंह चमारों को जमीन खाली करने के लिए आगाहाः - । । करते, अदालत का नोटिस उन्हें मिला। यह जानकर मुरारीसिंह को भारी आश्चर्य हुआ कि चमारों ने उनके ऊपर मुकदमा दायर कर दिया है। एक क्षण के लिए उन्हें यह समझ में ही नहीं आया कि यह सब कैसे हुआ। चमार तो शुरू से ही उनसे डरते थे। उनकी एक आवाज पर सिहर उठते थे। आखिर उनके पास इतना साहस कहां से आया कि वे संगठित होकर मुकदमा लड़ने की तैयारी कर बैठे ? कुछ देर तक तो मुरारीसिंह उन सवोंके बारे में सोचते रहे। फिर उन सवोंको अनुभवहीनता पर उन्हें हंसी आ गई। भला अदालत के माध्यम से वे विजयी हो पाएंगे ? मुरारीसिंह को इस बात का पूरा विश्वास था कि सम्पत्ति के बल पर चाहे और कुछ खरीदा जा सकता है या नहीं, लेकिन यहां की अदालतों का न्याय आसानी से खरीदा जा सकता है। वे ऐसा कई बार कर चुके थे। मुरारीसिंह ने चमरटोली की जमीन को लेकर अपने 'अखाडिया' वकील से भेंट की। उनके वकील तक जाने का बूता चमारों में कहाँ ? उनके वकील की फीस की भारी राशि तो उनके जैसे लोग ही दे पाते हैं। लेकिन विजय भी उन्हें निश्चित हासिल होती है। उनके वकील तो मुक- दमा समझने और फीस लेने के बाद ही विजय की घोपणा कर देते हैं। पूरी अदालत में उनके नाम की तूती बोलती है। मुरारीसिंह के वकील ने मुकदमा समझ कार्य-नीति और रणनीति दोनों तैयार की। कार्य-नीति के अन्तर्गत तो कागजों के माध्यम से मुरारी- सिंह के वकील ने कार्य प्रारंभ किया, लेकिन रण-नीति के अन्तर्गत उन्होंने मुरारीसिंह को यह सुझाव दिया कि वाइफोर्स चमरटोली दखल कर लें। मुरारीसिंह जानते थे, उनके वकील उन्हें यही सुझाव देंगे। वे अकसर कहते हैं, किसी भी मुकदमे की जीत के लिए पहले व्यावहारिक जीत जरूरी है। लाठी-कोर्ट के बाद ही कागज का कोर्ट है। वहां विजय-पताका फहरा दीजिए, यहां मैं सव संभाल लूंगा। अपने वकील के इस सुझाव के बाद मुरारीसिंह ने इस शुभ कार्य में विलंब करना उचित नहीं समझा। उन्होंने अपने वकील के यहां से लौटने के तीसरे दिन बाद ही अपने आदमियों के साथ चमरटोली पर धावा बोल दिया। उन्होंने सोचा था कि एक-दो चमारों को पीटने, उनका सामान .. 1 ३८ / युद्धस्थल । निकालकर फेंकने और उनकी झोंपडी उजाड़ने के बाद शेप चमार डरकर स्वयं भाग चलेंग, लेकिन वैसा नहीं हुवा । इम म्यिति का मुकाबला करने के लिए चमारों ने पहले से ही तैयारी कर रखी थी। सभी चमार अपने- अपने घरों में निकल मुरारीसिंह के लोगों के माय भिड गए। मुरारीसिंह को यह देखकर भयंकर आश्चर्य हुआ कि कई चमारो के हाथों में बदू थी-विना लाइसेंस छिपाकर रखी गई बदू। मुरारीमिह ने तो म्वप्न में भी यह नहीं सोचा था कि उनके गाव के पिद्दी चमार अंदर मे इतने साह्मी होंगे? गर चढाई कर देने के बाद पीठ दिखाकर भागना मुरारीसिंह उचित नहीं समझते थे। उन्होंने अपने लोगों को ललकारा। उनके लोग आगे बढे । चमारों ने विरोध किया। परिणामतः दोनो ओर मे मार-काट शुरू हो गई। चमार घरो मेछिपकर दार करने लगे और मुरारी- सिंह के लोग गलियों में। फलतः जहां मुरार्गसिह के चार आदमी पायल हुए, वहा सिर्फ दो चमारो को ही थोडी चोटें आई। इसी बीच अचानक चमरटोली की ओर में निशाना माधकर किमीने गोली चलाई, जो सीधे मुरारीसिंह के बडे लडके की छाती में जा लगी। फिर वह वहीं धराशायी हो गया। उसके गिरते ही मुरारी सिंह के लोग भागने लगे। उनमे अधि- काग भाडे के गुण्डे थे। मुरारीसिंह के खुद के लड़के को गोली का शिकार होते देख अब उनमे ठहरने की हिम्मत कहाँ थी? दोपहर तक यह युद्ध समाप्त हो चुका था। लेकिन सारा गांव खौल उठा था। गाव में राजपूत, भूमिहार, कायस्थ और ब्राह्मण सपन्न और ऊची जाति के लोगो मे गिने जाते थे तथा कहार, चमार, रजवारा, डोम, दुसाध, कुम्हार, धोबी, नाई, बारी, बढ़ई, लोहार, आदि विपन्न तया नीची जाति के लोगों में । अन्य जाति के लोग भरतपुर नामक इस गाव में नहीं थे। इस घटना के बाद गाव की बडी जाति के लोग आश्चर्य में पड़ गए। चमारों को ऐसी हिम्मत कने हुई? इतने पातक हथियार वे छिपाकर रमे है। पहले तो कभी विरोध तक नहीं करते थे। जरूर उन्हें बाहर की हवा लगी है। भरतपुर की बड़ी जाति के लोगो के मन में चमारी के खिलाफ आग मुलगने लगी । बड़ी जाति का हर आदमी भले ही मुह में कुछ नहीं वह पा रहा था, लेकिन उसका अतर सोलने लगा था। आज मुरारीसिंह के साथ भी भरतपुर ह बात हुई है तो कल उनके साथ भी होगी। अब चमार उनके शासन में ही रहेंगे। हालांकि अंदर से यह बात सोचते हुए भी भरतपुर की बड़ी जाति के लोग तत्क्षण मुरारीसिंह के साथ नहीं हो पा रहे थे। 'दूसरे के झगड़े में क्यों पड़' का उनका संस्कार अभी टूट नहीं पाया था। इधर विपन्न और नीची जाति के लोग चमारों के इस साहस को देख- कर उत्साहित हो उठे थे । वे भी चमारों की तरह ही उपेक्षित, शोपित और पीड़ित थे। चमारों द्वारा मुरारीसिंह के लड़के की हत्या से वे अंदर ही अंदर प्रसन्न थे । अव उनका मन भी अपने ऊपर किए जा रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने को करने लगा था। वे भावनात्मक रूप से चमारों के साथ जुड़ने लगे थे। लेकिन अंदर से चमारों के प्रति सद्भाव पैदा होते की छोटी जाति के लोग तत्काल चमारों के साथ नहीं हुए। यहां भी उनके संस्कार आड़े आ गए। शाम तक घटनास्थल पर पुलिस आ गई। इस युद्ध की चर्चा सनसनी की तरह आसपास के गांवों से होते हुए कस्बे के पुलिस-थाना तक पहुंच गई थी। पुलिस ने घटना की छानबीन की। विभिन्न लोगों के बयान लिए। ऊपर वालों को यह बताने के लिए कि पुलिस पूरी तरह मुस्तैद है, सव कागजात तैयार कर लिए गए। इसके बाद थाना-प्रभारी ने पुलिस के पांच जवानों को उस गांव में एक हफ्ता रहने की ड्यूटी लगा दी। प्रारंभ में दो-तीन दिनों तक इस घटना की चर्चा भरतपुर और आसपास के गांवों में खूब गर्म रही, लेकिन कुछ ही समय बाद फिर ठंडी पड़ने लगी। एक पखवारा बीतते-बीतते तो सब कुछ शांत हो गया। बात आई-गई हो गई। लेकिन इस शांति के पीछे मुरारीसिंह की पड्यंत्रकारी भूमिका थी 'मुरारीसिंह ने जानबूझकर कुछ क्षणों के लिए चुप्पी साध ली थी, तावि गांव से पुलिस हट जाए, स्थिति पूर्ववत् हो जाए और वे आराम से बदल ले सकें। जिस दिन से उनका वेटा मरा था, उस दिन से वे सो नहीं पा 'थे। उन्होंने सोच लिया था कि जब उनका बेटा ही चला गया तब धन सम्पत्ति बचाकर ही क्या होगा? वे चमारों को भूनकर छोड़ेंगे। इस वीच चमरटोली में वाहर के लोग आने लगे थे-छोटी जाति और गरीब लोगों की तकलीफों के खिलाफ लड़ने वाले। चमरटोली ४० / युद्धस्थल रोज रात को बैठकें होने लगी थी। वाहर मे आने वाले लोग रात में ही आते और रात में ही चले जाते। उन्होंने चमारों के माय मंगठिन हार अन्याय का मुकाबला करने के लिए भरतपुर के मभी गरीब और छोटी जाति के लोगों को समझाया। मवों के मन में चमारों की इस घटना को लेकर एकजुट होने के भाव में ही, बाहरी लोगों द्वारा ममनाए जाने पर ये भाव और गहरा गए । दाहरी लोगो की बातों में जाने कैसी शक्ति थी कि भरतपुर के सभी गरीव और छोटी जाति के लोग एकनाथ हो गए। इधर जब मुरासिह को चमरटोली को इम तैयारी को सूचना मिली तो एक रात वे भी अपने वर्ग और अपनी विरादरी के लोगों को इकट्ठा करने के लिए निकले। रात बारह बजे के आसपाम उन्होंने गाव की बड़ी जाति के लोगो की एक गुप्त बैठक बुलाई। इसमे पहले कि मुरागैमिह अपना मतव्य स्पष्ट करते, नभी लोग अपने-आप चमारों के खिलाफ आग उगलने लगे। चमरटोली मे वाहर के लोगो के आने की सूचना मनो- को मिल चुकी थी। चमारो के बढ़ते हुए मन को सदा के लिए कुचल देते की योजना गोप्टी में बनाई जाने लगी। रामगरण ने चिल्लाकर कहा, "जितनी जल्दी हो सके, चमरटोली के लोगो को सबक सिवा देना चाहिए .."पुश्तो मे जो बात इस गाव मे नही हुई थी, वह यात अब मभव होने लगी है"डोम-चमार बराबरी करने लगे हैं."यह नव सहने की अपेक्षा तो मर जाना बेहतर है।" मुरारीसिंह ने कहा, "आप सब सिर्फ मेरी पीठ पर पड़े रहिए. मैं मिनटो मे धमरटोली के लोगो की गरमी शाह दूगा।" गोष्ठी में मंयुक्त रहने, मौका पड़ने पर मठिन होकर मुकाबला करने तथा एक-दूसरे को मदद करने की बात पक्की की गई। लगभग रात के दो बजे गोप्टी समाप्त हुई। गोण्ठी समाप्त होने नक प्राय ममी लोगी ने यह निर्णय ले लिया था कि इस गाव के चमारो तथा छोटी जाति के लोगों को बिगड़ने नहीं देंगे। मदियो मे जमे रहते आए हैं, वैमे ही उन्हें रहना है। अगर वे नहीं मानेंगे तो फिर उनका काम तमाम करना पडेगा, चाहे इसके लिए जो हो। ममय बीतता गया । मुरारोसिंह चनरटोली के खिलाफ अपनी . भून नकारी योजना की तैयारी में लगे रहे। अपनी योजना को कार्य रूप देने नए मुरारीसिंह ने पानी की तरह पैसा बहाया। हालांकि उन्होंने जो भी किया, सब गुप्त रूप से ही । गुप्त रूप से काम करके ही वे अपनी निा को मूर्त रूप देने की स्थिति में पहुंचे। फिर जैसाकि उन्होंने सोचा एक रात लगभग तीन सौ जवानों के साथ उन्होंने चमरटोली को घेर या। उनके लोगों के हाथ में घातक हथियार और किरासन के टीन थे। नरटोली के चारों तरफ की झोंपड़ियों पर किरासन तेल छिड़ककरमुरारी- ह के लोगों ने आग लगा दी तथा आग से बाहर निकलकर भागने वालों देने के लिए हथियार लेकर तैनात हो गए। जव चमरटोली में चारों तरफ से एक ही बार आग की ज्वाला धधकने नगी तव जान बचाने के लिए चमरटोली के औरत-मर्द और बच्चे इधर से उधर भागने लगे। कुछ तो गलियों में ही झुलसकर मर जाते । लेकिन कुछ चमरटोली से बाहर निकलकर गांव में भागना चाहते, पर वे सफल नहीं हो पाते। चमरटोली के वाहर गिरोह की शक्ल में खड़े मौत के दावेदार उन्हें इस भवसागर से पार उतार देते। फिर उनके नश्वर शरीर को आग की लपटों में फेंक देते। चीख-पुकार की आवाजें और हल्ला-गुल्ला सुन भरतपुर की छोटी जाति के लोग सहायता के लिए घटनास्थल की ओर बढ़े, लेकिन मुरारी सिंह के वर्ग के लोगों ने उन्हें रोक दिया। वे अल्पसंख्यक डरकर रुक गए। लेकिन उनमें से कुछ लोग थाने की ओर दौड़ चले। अगर समय से थाना निकट आ गया होता तो शायद बहुत लोगों की जाने वच जातीं; लेकिन थाना के पास काफी विलम्ब से पहुंचे। अब तक लगभग आधे लोग जल चुके थे। शेप लोग जो चमरटोली के बीच स्थित पेड़ों पर चढ़ गए थे या कुएं में उतर गए थे, वे बचे रह गए थे। सुवह होने पर चमरटोली का दृश्य अजीव भयावह लगने लगा था। पत्थर-दिल इंसान भी इस दृश्य को देखकर कांप जाते थे। मुरारीसिंह और उनके लोगों ने बदले की भावना से प्रेरित होकर यह कर तो दिया था, लेकिन इसे देखकर वे भी दहल उठे। उन्हें भय भी होने लगा था कि अब जरूर कुछ होगा। इतने बड़े कांड को वे आसानी से नहीं पचा पाएंगे। - ४२ / युद्धस्थल फलतः अपने ऊपर आने वाले मंकट मे बचने के लिए इम कांड के मुख्य अभियुक्त गांव मे दूर रिश्ते-नातेदारों के यहां छिपने के लिए भाग चले। । इस घटना की चर्चा विजली की तरह आसपाम के गांवों और शहरों को लापते हुए सीधे राजधानी में पहुंची। फिर दोपहर ढलते-दलते राज- धानी में मंत्री, नेता, पत्रकार और फोटोग्राफर आ धमके। भरतपुर गांव की कच्ची सड़क पर, जिसपर सिर्फ बैलगाड़ियां ही चलती थी, कारों, मोटरमाइकलों, स्कूटरो और तागो का मेला लग गया। जली हुई चमर- टोली का दृश्य देखने तथा नेताओं और मत्रियों के दर्शन के लिए गांव और शहर के लोग भी उमड़ पड़े। चमरटोनी का मुआयना किया जाने लगा। चीखते-चिल्लाते लोगो के बयान लिए जाने लगे। जले हाए लोगों और जली हुई झोपडियो की तस्वीरें खीची गई। राहत के नाम पर कुछ कपड़े और रपये बाटे गए। अधजले और छटपटाते लोगों को अस्पताल भेजा गया। फिर अत्याचारियो को दंड देने, इस घटना मे क्षत-विक्षत हुए लोगो को नये घर बनाने के लिए आर्थिक सहयोग देने तथा अव से उनकी सुरक्षा करने का आश्वासन देकर सरकारी लोग लौट गए। पता नही इस घटना का प्रभाव सुद ही ऐमा था या सरकारी मेहमानों के आ जाने में यह घटना प्रभावपूर्ण बनी थी, कुछ भी कहा नहीं जा सकता। खर"जैसे भी हुआ हो, इस घटना की चर्चा देश के स्तर पर शुरू हो गई थी। असबारो के प्रथम पृष्ठ पर मोटी-मोटी सुखियो में यह समाचार छपने लगे थे-'भरतपुर-हत्याकाड भरतपुर में भीषण नर-महार" भरतपुर की जघन्य हत्या...'आदि । रेडियो में समा- चार आते। पूरे देश से भरतपुर की चर्चा चल निकली थी। बिहार के एक कोने मे दवे-छिपे गाव भरतपुर पर ऐसी रोशनी पड़ी थी कि वह नीयं- स्थल बन गया या । भरतपुर के दर्शन के लिए दूर-दूर मे 'तीर्थयात्री' आने लगे थे। प्रारम्भ मे भरतपुर के गोपित-पीड़ित लोगो को लगा था कि अब उनके दिन फिरेंगे। जब दिल्ली की सरकार सीधे आकर उनके दरवाजे में लौटी है, तब वे जरूर अपनी पहली स्थिति में ऊपर उठेंगे। लेकिन चन दिनों बाद ही उन्हें अपनी सोची हुई वातें गलत सावित हुईं। उन्होंने देखा कि भरतपुर-कांड को लेकर मंत्रिमंडल मंग किए जाने तथा पदासीन मंत्रियों के इस्तीफे की मांग की जाने लगी। फिर धीरे-धीरे भरतपुर- कांड तो पुराने मंत्रियों को हटाने और नये मंत्रियों को पदासीन करने का एक मुद्दा भर रह गया । लगा, जैसे भरतपुर-कांड पर इसीके लिए रोशनी डाली गई थी। इसीके लिए उसे इतनी चर्चाओं के बीच लाया गया था। । । रामशरण बहू गहरी नींद में सो चुकी हैं। दुखन की मां इस प्रतीक्षा में बैठी है कि रामशरण वहू जगेंगी। दुखन की मां ने अव तक खाना बना- कर रख दिया है। उसके अनुसार अब खाना.खाने का वक्त भी बीता जा रहा है। लेकिन रामशरण वहू तो जैसे घोड़े वेचकर सोई हैं। समय का कोई खयाल नहीं। सोने से पहले उन्होंने दुखन की मां को यह चेतावनी दे दी थी कि मुझे जगाना मत । मैं स्वयं जग जाऊंगी। लेकिन दुखन की मां को अब और प्रतीक्षा करते नहीं बनती है। उसे भूख जोरों की लग चुकी है। सुबह का खाया हलवा तो कभी का हजम हो चुका है। दुखन की मां की इच्छाहोती है कि अपना खाना परोसकर खा ले । रामशरण बहू जब उठेगी तव खाएंगी। लेकिन ऐसा उसने कभी नहीं किया था। वरावर राम- शरण बहू को खिलाने के बाद ही वह खाती थी। इसीलिए रामशरण बहू की खाट के पैताने जाकर वह उन्हें जगाने लगती है, “मालकिन, उठिए ! बहुत वक्त हो गया 'खाना ठंडा पड़ रहा है...!" लेकिन रामशरण बहू खर्राटे भरती रहती हैं। अब दुखन की मां उनका पांव पकड़कर धीरे-धीरे हिलाती है। इस वार रामशरण बहू की आंखें खुल जाती हैं। वे आंखें मलते हुए उठ बैठती हैं, "दुखन की मां, वदन में वहुत सुस्ती मालूम पड़ रही है 'उठने का मन नहीं कर रहा है...।" दुखन की मां बताती है, "दिन काफी चढ़ चुका है 'खाना ठंडा हो रहा है। 'खाना बनाकर देर से आपके जगने की राह देख रही हूं।" "मुझे खाने की इच्छा नहीं दुखन की मां'तुम खा लो मुझे जी भरकर सोने दो "मन बहुत भारी है"।" रामशरण बहू कहती हैं। "नहीं मालकिन ! ऐसा कैसे होगा कि मैं खा लूंगी और आप नहीं , ४४ / युद्धस्थल । साएगी."उलिए-उठिए..." और दुम्बन की मा रामशरण बहू को जबरन उठाकर आंगन मे ले आती है। फिर हाथ-मुह धुलाकर पीड़ा-पानी लगाती है और पाना परोम उनके सामने रख देती है। रामशरण बहू खाने लगती हैं। गुरू में दाई लौंडी के हाथ वावनाया याना व नहीं खाती थी। बहुत 'नेम-धरम' से रहती थी। नहा-धोकर अपना खाना स्वयं बनाती थी। लेकिन जब में शरीर अवश हो गया है तब से दुग्वन की मा के हाथ का बनाया जाना बाने लगी है। माना माने के बाद रामशरण वह हाथ-मुह धोती हैं। अब उन्हे गुड़गुड़ी पीने की तलब महमूम होने लगती है। दुखन की मां जानती है, रामशरण वह नाश्ते और खाने के बाद नियम मे गुडगुडी पोती हैं। इसी- लिए साने और नाश्ते के वक्त वह पहले से ही गुडगुडी का इंतजाम रसती । सदा की भाति वह रामगरण बहू को गुडगुडी थमा देती है । रामशरण वह गुडगुड़ी हाथ में ले कमरे में चली जाती हैं। फिर अपने विस्तरे पर आराम से बैटते हुए गुडगुडी पीने लगती हैं। इधर दुसन की मा अपना साना परोसकर बाने लगती है । वह देर से भूख को रोके हुए थी। मूर्य रामशरण बहू के घर के ठीक ऊपर से गुजर रहा होता है। दुपहरिया तपने लगती है । चैत के महीने की तीसी धूप और गर्म हवा । पूरी दोपहरी कमरे में बद रहना ही उचित जान पड़ता है। रामगरण वहू को तो चैत-वैशारा की धूप तनिक भी नहीं सुहाती। गुरू मे ही पति ने उन्हें लाह-प्यार मे रखा था। अब उन्हें अफसोस होता है, अपने शरीर को उन्हें इतना नाजुक नहीं बनाना चाहिए था। उनकी उम्र की कई बाम- काजी औरतें अपना चूल्हा-चौका स्वय कर लेती हैं । लेकिन वे तो खटिया पकड़ती जा रही हैं। रामशरण बहू दुपन की मागे पानी मागती है । दुमन की मो अव तक खा चुकी होती है। वह गिलास में पानी लेकर आती है तथा राम- दारण बहू को पिलाती है। फिर रामशरण को साट के पास ही नीचे अपनी गुदड़ी विधा सो रहती है । अब पूरी दोरहरी दुखन की मा यही सोएगी। फिर शाम होने पर गाव में दो-चार लोगों के यहां चौका-वर्तन चली जाएगी। चौका-बर्तन के बाद पुन: पहा लोट आएगी। ।

- . खाना बनाने, रामशरण बहू को खिलाने, अपने खाने तथा रामशरण बहू के साथ ही सो रहने की अपनी ड्यूटी निभाएगी। दुखन की मां गुदड़ी पर लेटते ही रामशरण बहू से अपनी राम-कहानी सुनाने लगती है-अपने बेटे और पतोहू की करनी की कहानी। यह कहानी वह पहले भी कई वार उन्हें सुना चुकी है। दुखन की मां राम- शरण बहू से अकसर दो तरह की बातें ही करती है-या तो वह गांव की नई-नई सूचनाएं उन्हें देती है, या अपने वेटे और पतोहू के नाम का रोना प्रारंभ कर देती है। रोज की भांति दुखन की मां अपनी पतोहू को श्राप देते हुए कहती है, "उस निगोड़ी की देह में कोढ़ फूट जाए "उसका सत्यानाश हो जाए'''वह मुझे दाई के वरावरं भी नहीं समझती. 'वेटा जनमाकर मैंने उसे दे दिया."उसी वेटे से राज कर रही है। लेकिन मुझको घर में रहने भी नहीं दिया''भगवान, तू उस 'कुलच्छनी' को उठा ले ''मैं दुखन की दूसरी शादी कर दूंगी."उसकी देह में कीड़े पड़ें... वह तड़प-तड़प कर मरे 'मुझको जितना दुःख वह दे रही है, हे भगवान, उतना ही दुःख तू उसको भी देना मेरी तरह ही बुढ़ापे में उसका भी दिन दरवाजे-दरवाजे लौंड़कम (दाई का काम) करके ही कटे।" फिर दुखन की मां रुलाईमिश्रित आवाज में कहने लगती है, "कितने से वेटा जनमाया.."कितने अरमान संजोकर उसे पाला-पोसा. लेकिन उसने आते ही बेटे को हथिया लिया.. मैं तो जैसे कुछ हूं ही नहीं ...'मुझसे कुछ मतलव ही नहीं. आज तक मैंने वेटा-पतोहू का कोई सुख नहीं जाना''मैं अभागिन हूं. मेरी किस्मत खोटी है।" और दुखन मां रोने लगती है। रामशरण बहू, दुखन की मां को चुप कराती हैं। सांत्वना देती हैं, "रोओ मत दुखन की मां, तुम्हें तो बेटा है पतोहू है... कोई तुम्हें वांझ नहीं कहता 'डायन नहीं कहता 'सास-पतोहू में तो झगड़ा होता ही रहता है। तुम अपने को अभागिन न कहो तुम्हें तो सारा लगन भरा है 'तुमसे लगनवती कौन है ?" रामशरण बहू की वात से दुखन की मां की रुलाई वन्द हो जाती है। लेकिन यह क्या? दुखन की मां को चुप कराने के बाद रामशरण बहू की अपनी पीड़ा खुद हरी हो जाती है। कहती हैं, "इस दुनिया में मुझसे -दुःख की ४६ / युद्धस्थल अभागिन कोन है दुखन की मां'"मेरे बागे-पीछे कोई नहीं कौन मेरी मिट्टी पार लगाएगा? मेरे मुख मे कौन आग देगा? मैं पापिन हूं."पूर्व- जन्म के अपने पापो का फल भोग रही हूँ""मुझे तो जनमते ही मर जाना चाहिए था.." और रामशरण वह फूट-फूटकर रोने लगती हैं। अव दुखन की मा रामशरण बहू को चुप कराती है,"मालकिन, आपके पाम धन-दौलत है। आपको तकलीफ नहीं होगी। एक की जगह पर चार दीजिएगा करने वाले हजार मिलेंगे। वंश होना तो अपने हाथ की वात है नहीं, फिर उसके लिए क्या पछताना?" इसी तरह दुखन की मां और रामशरण वहू दोनों एक दूसरे में अपनी व्यथा कहती और एक-दूसरे को सात्वना देती रहती हैं कि अचानक गली मे नारे लगाते हुए लोग गुजरने लगते हैं, "हम गरीबों का राज बनाकर रहेंगे.''इस गाव मे अब जुल्म नहीं चलेगा "इस गाव पर हमारा शासन है. 'इस गांव में न कोई बडा है और न छोटा"न कोई ऊंच है और न नीच.. इस गांव में भेद-भाव को नीति बरतने वालो, कान खोलकर सुन लो, हम इंट का जवाब पत्थर से देना जानते हैं..." रामशरण बहू ध्यान से नारी को सुनने लगती हैं, लेकिन दुपन की मा पर इन नारो कर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता है। एक लबे समय में यह इस तरह के नारे सुनती आ रही है। हर पन्द्रह दिन बाद एक बार इस तरह के नारे लगाए जाते हैं । दुखन की मा तो इन नारी में बेखवर ऊंघने लगती है; लेकिन रामशरण बहू गुडगुडी एक ओर रव इन नारो के बारे में सोचने लगती हैं। उन्हें अपने पति की हत्या की याद आने लगती है। चमरटोली की घटना के बाद गाव का रूप एकदम बदल गया था। चमरटोली के जो चमार बच गए थे, उन्हें बाहरी सहयोग पर्याप्त मात्रा मै मिलने लगा था, फलतः बदले की भावना से प्रेरित हो वे सिहो की तरह दहाड उठे थे। उन्होने ढूट-दूटकर मुरारीमिह के परिवार के एक- एक सदस्य की हत्या की। उसके बाद तो गाव में हत्याओ का वह सिला चला कि आसपास के गांवो के लोग भी दहल उठे। ताल मे लौटते, घर में सोए-बठ, गांव में घूमते, जिने जहा दाव मिल - । । । हत्या कर दी। चमरटोली के लोगों के साथ भरतपुर के सभी गरीब और छोटी जाति वाले सीना तानकर सामने आ गए थे। उन्हें वाहर से हथि- यार तथा निर्देश मिलने लगे थे। रातों में दर्जनों की संख्या में उनके पक्ष- . घर आ धमकते थे। इधर मुरारीसिंह के वर्ग के लोग जान हथेली पर लेकर गांव में उभरने वाली इस नई शक्ति को दबाने के लिए जूझ पड़े थे। हालांकि चमरटोली की घटना के बाद से गांव में स्थायी तौर पर एक पुलिस चौकी का निर्माण कर दिया गया था। पुलिस के बारह जवान रहने लगे थे। लेकिन उससे इन हत्याओं की रफ्तार में कोई कमी नहीं आई थी। ऐसा कभी नहीं हुआ था कि किसीकी हत्या होने से पहले ही सूचना पाकर पुलिस उसे बचाने के लिए चली आई हो। होता तो यह था कि हत्या होने के बाद घटनास्थल पर पुलिस पहुंचती थी और अपना 'कोरम पूरा करती थी। लोगों ने घर से निकलना बंद कर दिया था। शाम होते ही किवाड़ वन्द कर दिए जाते थे। इस ओर के या उस ओर के लोग जब भी कहीं निकलते, हथियारों से लैस, गिरोहवंद होकर ही । गृहस्थी का काम छूटने लगा था। मौत का खूखार पंजा गांव में हर जगह मंडराता नजर आता । था। पूरा भरतपुर गांव एक बड़े श्मशान के रूप में तब्दील हो गया था। कब किसकी हत्या हो जाएगी, कुछ ठीक नहीं। लोगों की आंखों से नींद उड़ गई थी। ऐसा कोई-कोई ही दिन गुजरता था जिस दिन गांव से कोई लाश नहीं निकलती थी। दिन में पूरा सन्नाटा व्यापता रहता था। लोग कहां हैं, पता नहीं चलता। लेकिन रातों में लगता कि दुनिया भर के लोग इस गांव को धेरे खड़े हैं। बंदूकें छूटतीं। नारे सुनाई पड़ते। इस स्थिति से दहशत खा कई लोग गांव से शहर भाग चले थे। ऐसे ही समय में एक दिन रामशरण घर के लिए कुछ आवश्यक सामान खरीदने वाजार गए थे। वे जव बाजार से लौट रहे थे, दिन के वारह बज रहे थे। उनके साथ और चार-पांच आदमी थे। भरतपुर गांव से बाजार की दूरी कोई खास नहीं थी। सिर्फ दो मील ! वे लोग आधी से अधिक दूरी तय कर चुके थे। अव गांव एकदम करीब ही था। लेकिन । , ४८ / युद्धस्थल । अचानक रास्त कामकनार का झाड़ियाआर गड्ढा स लगभग बीस-पच्चीम आदमी आए और रामशरण तथा उनके माधियो को घेर लिया। फिर नारे लगाते हुए उन सबोंने रामशरण की हत्या कर दी। उनके साथ के लोगो को छोड़ दिया। जव रामशरण के साथ के लोग गाव लोट और रामशरण बहू को यह सूचना दी तो वे पागलों की तरह रोती-चिल्लाती घर मे निकलकर दौड पड़ी। रास्ते में कई जगह साडी मे उनके पर फस जाते। वे गिर पडती। घुटने छिल जाते। फिर भी उठकर दौडने लगती। वे गिरती-पड़ती घटना- स्थल पर पहुंची। लेकिन अब तक हत्यारों ने उनके पति की लाश भी गायब कर दी थी। वे गाव मे घूम-घूमकर हत्यारो को गालियां बकने लगी तथा साप देने लगी। पति ही उनके लिए सब कुछ थे। उन्हीसे उनको दुनिया थी। अव वे अकेले जीकर क्या करेंगी, इसीलिए वे चाहती थी कि पति की तरह हत्यारे उन्हें भी मार दें। लेकिन उनपर किसीने वार नहीं किया। वे हपते भर पागलों की तरह गालियां बकती फिरौ। फिर अंत में प्राणात करने के लिए एक कुए में कूद पडी। लेकिन उन्हें कुएं में कूदते हुए गांव के कुछ बच्चो ने देख लिया था। कुहराम मच गया। भीड लग गई। इसके बाद जगतनारायसिंह ने तेजी मे कुए मे प्रवेश कर उन्हें निकाला। उनके घर ला उन्हे मुलाया। लगातार दो-तीन दिनों तक उन्हें नये सिरे मे जिन्दगी जीने के लिए समझाया । अगर कोई दूसरा होता तो रामशरण वह नहीं मानती, लेकिन जगतनारायसिंह की बात उनसे टालते न बनी। गमगीन स्थिति में ही सही, वे जिन्दगी जीने लगी। आत्महत्या की बात उन्होंने परे ढकेल दो। जगतनारायसिंह का पूरा सरक्षण अय उन्हें मिलने लगा था। जब भी जिस चीज की जरूरत होती, जगत- नारायणसिंह हाजिर हो जाते। रामशरण से बनु चहकर उनकी देखभाल जगतनारायणसिह ने शुरू कर दी थी। लेकिन गाव की स्थिति तत्काल नहीं बदली। रामभरण की हत्या के बाद लगातार दो-तीन सालो तक खूब हत्याएं होती रहा। कभी इस ओर के लोग मारे जाते तो कभी उस ओर के । चुन-चुनकर गाव के सभी सूरमा मार दिए गए। फिर समय बीतने के साथ-साय धीरे-धीरे शाति लोटने लगी-हत्याओं के बाद की शांति और समझौता ! इस शांति और सम- झौते के वीच गांव ने एक नई स्थिति ग्रहण कर ली थी। अब गांव पर मुरारीसिंह के वर्ग के लोगों का शासन नहीं, चमार और उनके वर्ग के लोगों का शासन चलने लगा था। मीटिंग करके मजदूरी तय की जाती। जो रेट निर्धारित कर दिया जाता, उसे सवको मानना पड़ता। मजदूरों के साथ पहले की तरह मनमानी और ज्यादती करने का सिलसिला खत्म हो गया था। गांव के वनिहार, चरवाह और मजदूर सम्मानित जिन्दगी जीने लगे थे। पहले की तरह उन्हें अकारण गाली दे देने और अपमानित करने का माहौल खत्म हो गया था। आगे चलकर भरतपुरके पिछड़े लोगों ने अपने आसपास के अन्य गांवों में भी यह आग लगानी शुरू कर दी थी। फिर कई गांवों में भरतपुर-कांड की पुनरावृत्ति शुरू हो गई थी। पिछड़े वर्ग के लोगों ने भरतपुर गांव को अपना मुख्य अड्डा बना लिया था। यहां वे लड़ाई जीत चुके थे। अव यहीं से पूरी तैयारी के साथ दूसरे गांवों पर हमला बोलते । इस गांव के मुरारीसिंह के लोग फिर अपनी पहली स्थिति में न लौटें, इसके लिए हर पन्द्रहवें दिन यहां नारे लगाए जाते और उन्हें चेतावनी दी जाती। रोज दुखन दुखन की मां सो गई है। लेकिन इस वार रामशरण वहू की आंखों में नींद नहीं आ पाई है। सुवह नाश्ता करने के बाद वे देर तक सोई थीं। उस वक्त उन्हें लगा था कि अभी वे और सोएंगी । नींद पूरी नहीं हुई है। लेकिन खाना खाने के बाद वे चाहती रह गई, नींद नहीं आई। रामशरण बहू देखती हैं, दोपहरी गुजर गई है। शाम हो चली है। की मां जगा जाती थी। उसे और दो-चार घरों में काम करने होते हैं। लेकिन आज तो एकदम निश्चिन्त होकर सोई है। रामशरण बहू दुखन की मां को जगाती हैं, "दुखन की मां, उठो ! शाम हो गई है। काम पर नहीं जाओगी क्या?" दुखन की मां उठती है। फिर यह देखकर कि शाम हो चली है, वह तेजी से भागती है। अगर रामशरण वहू उसे नहीं जगाती तो वह और देर तक सोई ही रहती। उसका मन रामशरण वहू के प्रति कृतज्ञ हो उठता ५० / युद्धस्थल है। वह समझ नहीं पाती है कि आखिर रामगरण बहू के माथ उसका ऐमा कौन-सा रिश्ता है कि अपना दुःख वह उनको मुनाकर हल्का हो जाती है और वे अपना दुःख उसे मुनाकर हल्का हो जाती हैं ? वे देर में सोई रहती हैं तो वह उन्हें जगाती है और वह देर में मोने लगती है तो वे उसे जगाती दुम्बन की मा के चले जाने के बाद रामशरण बहू अकेले वच जाती हैं। अकेलेपन से रामशरण बहू का मन हमेगा तो नहीं घबराता, लेकिन कभी- फभी घबराने लगता है। रामशरण बहू उटकर आगन में आती हैं। उन्हें यह समझ नहीं आता है कि दुखन को मा के आने तक वह कहां जाएं और कौन-सा काम करें। गांव मे तो वे किमीके घर जा नही सकती हैं। उन्हें पूछता ही कौन है ? उल्टे किमीके घर जाने पर कोई-न-कोई लांछन ही उनके माथे मढ़ दिया जाता है। इसीलिए वे चुपचाप अपने दरवाजे आकर बैठ रहती हैं। लेकिन वरावर की तरह अपने दरवाजे पर आकर उनके बैठते ही गली में खेलते बच्चों को उनकी माताए बुला लेती हैं। इसके बाद सामने के घरो की खिडकिया और दरवाजे, जो देर से खुले थे, वन्द होने लगते हैं। फिर यह खबर सनसनी की तरह गली मे इस छोर में उम छोर तक फैल जाती है कि रामशरण बहू डायन अपने दरवाजे बैठी हैं। रामशरण बहू का मन कर्मला हो उठना है । वे दरवाजे से उठकर पुनः अन्दर आ जाती हैं। लेकिन अन्दर भी आज उनका मन नहीं लगता है। पिछले कई बार की तरह आज फिर उनका मन एकाकीपन के खिलाफ विद्रोह कर उठता है । फिर वे बहुत वेचैन हो उठती हैं । कभी घर में जाती हैं तो कभी आंगन में आती हैं। इन्ही वेचन क्षणो मे शिव-मदिर चलने की बात उनके मस्तिष्क में उठती है। वे सोचती हैं, अच्छा रहेगा। शकर भगवान के दर्शन भी हो जाएगे और उनका मन भी बहल जाएगा। तब तक दुखन की मा भी लौट आएगी। रामशरण यहू लकुटी उठाकर चल देती है । दरवाजे में वाहर आकर ताला लगाती हैं । फिर लकुटी टेकते हुए आगे बढ़ जाती हैं। वे जिम गली मे होकर जा रही है, उम गली में जगह-जगह वच्चे गेल रहे हैं। लेरित उनपर नजर पड़ते ही बच्चे चिल्लाते हुए भागने लगते हैं, "डायन आ गई: ।

। जिम्मेवारी अपने ऊपर ले ली थी। इसके साथ ही समय पर उनके खेतों की मालगुजारी चुकाने, खेत जोतने वालों से फसल वसूलने, बाजार से उनके घर के लिए आवश्यक चीजें खरीदने, बीमारी आदि पर उन्हें दवा कराने, पर्व-त्योहार पर उनके लिए कपड़े बनवाने तथा वे सभी काम, जो रामशरण करते थे, जगतनारायणसिंह करने लगे थे। साथ ही वे वरावर रामशरण बहू की नजरों के सामने ही रहते थे। अगर कभी रामशरण बहू का मन मलिन हो जाता या उनका चेहरा उदास पड़ जाता या वे अपने अंधकारपूर्ण भविष्य के बारे में सोचने लगतीं तो जगतनारायणसिंह तत्क्षण उनके पास पहुंच इधर-उधर की बातों से उनका मन बहलाते तथा किस्से-कहानियों के माध्यम से उनका ध्यान दूसरी ओर कर उन्हें सहज रूप में लाते। राम- शरण वहू उदास हों और जगतनारायणसिंह चुपचाप देखते रहें, यह तो होने ही वाला नहीं था। जगतनारायणसिंह अकसर अपने दालान पर ही सोते थे--अपने माल- मवेशियों के पास । अपने घर के अन्दर तो वे तभी सोने जाते थे जव पत्नी से सहवास की इच्छा होती थी। लेकिन उस इच्छा को भी वे एक लंबे समय से दमित कर चुके थे। वाल-वच्चे सेयाने हो गए थे। वहुएं आ गई थीं। अव उन्हें पत्नी के पास जाते हुए शर्म महसूस होती थी। रात को खाना खाने के बाद वे सीधे दालान पर आ जाते थे। लेकिन रामशरण के मरने के बाद उन्हें लगने लगा था कि रामशरण बहू रात को अकेले में डरेंगी, इसीलिए उन्होंने अपनी दिनचर्या ऐसी वना ली थी कि रात का पहला पहर गुजर जाने के बाद वे नियमतः रामशरण बहू के घर चले जाते । रामशरण बहू तो जैसे उनकी राह देख रही होतीं। उनके आ जाने के बाद वे आदर से उन्हें अन्दर ले आतीं। फिर वे एक-दूसरे से अपनी कहते-सुनते तथा प्रेम से सो रहते। रात के अंतिम पहर जगतनारायणसिंह वहां से उठकर पुन: अपने दालान पर चले जाते। रामशरण बहू के साथ उनका सोना किसीको पता न चले, इसके लिए वे पूरी सावधानी बरत रहे थे। बीतते समय के साथ रामशरण बहू और जगतनारायणसिंह के संबंध उत्तरोत्तर घनिष्ठ होते जा रहे थे। रामशरण बहू ने बहुत पहले एक बार यह सोचा था कि जगतनाराय' वंध कर उन्होंने ठीक नहीं किया। वे मां नहीं बनी, उल्टे पर-पुरुप मे मम्पर्क कादोप उन्हें लग गया। लेकिन अब उन्हें महमूम होता कि उस समय उन्होंने गलन मोचा था। जगतनारायणसिंह मात्र गरीर के लोभी नहीं, बल्कि तन, मन और धन से उनके साथ हैं। वे उनकी ही नीद सोते है और उनकी ही नीद जागते । पति में भी अधिक खयाल रखते हैं। सच तो यह है कि कई अर्थों में . वे पति से भी बढ़-चटकर नावित होने है। मायद इसीलिए रामशरण बहू ने अपने मन के अन्दर कही बहुत गहरे में जगननारायणमिह को उतार लिया था। इघर जगननारायणमिह भी रामगरण बहू को दिलोजान से चाहने लगे थे। उन्हें लगने लगा था कि रामगरण वह उनकी जिन्दगी में आकर वह की पूरी की है, जिसकी पूर्ति पहले कभी नहीं हुई थी। वैसे दुनिया को दिखाने के लिए पत्नी, बच्चे थे। लेकिन अब उन्हें लगने लगा था कि पत्नी क्या होती है, कैसी होती है, मदं के जीवन में उसकी कितनी वडी भूमिका होती है। रामगरण बहू के माथ के मंबध ने उन्हें एक नई अनुभूति प्रदान की थी। फिर पुरानी व्यापाए और पुराने मान-मूल्य उनके सामने ढहने लगे थे। तत्पश्चात् इम प्रौढ अवस्था में एक रात ईश्वर की मूर्ति के सामने रामशरण वहू और जगतनारायणमिह ने एक-दूसरे को नये धर्म-पति और नई धर्म-पत्नी के रूप में म्वीकार किया तथा जिन्दगी के अतिम क्षणो तक एक-दूसरे का साथ निभाने का मकस लिया। फिर किशोरवय और जवानी के भावुक और रोमानी प्रेम-मवधी से कार सह- योगी, सहभोक्ता और महयात्री वन जीने लगे। हालाकि उन दोनो ने इस वात की पूरी कोशिश की कि उनके इस मवघ को गाव में गलत मवध का नाम न दिया जाए। लेकिन इस तरह के सवधो को जो परिणति होती है, वही परिणति इमरी भी हुई। उनके मवध को भी कई तरह के नाम देकर गाव में प्रनारित किया जाने लगा। लोग खूब चटखारे ले-लेकर बातें करने लगे। तरह-तरह की कहानिया गट्टी जाने लगी। बूद मिर्च-मसाला मिलाकर उनके मबघ को चटक रप दे दिया गया। लेकिन रामशरण बहू ने इसकी तनिक भी परवाह नहीं की। उन्होंने मोचा कि लोग गाल वन क्या कर लेंगे? वक्त आने पर तो वे म्बय बता देंगी कि जगतनाग सिंह को उन्होंने पति-स्प मे वरण किया है। 1 - । व कभी आकर खा जाया करते थे। प्रमोदसिंह की गाय ह अनाज खाने लगी। रामशरण वहू ने तो उसे देखा भी नहीं। वे र के अंदर किसी काम में लगी थीं। लेकिन गली से गुजरते हुए गांव नेक लोगों ने देखा। कुछ समय बाद प्रमोदसिंह भी वहां आ धमके। को पकड़ने के लिए वे पीछे से आ रहे थे। फिर गाय को पकड़कर उसे अपने दरवाजे ले गए। लेकिन उस दिन उनकी गाय ने तनिक भी व नहीं दिया। अपने थन के पास वह किसीको बैठने ही नहीं देती। उसे देखकर कुछ लोग कहते कि इसे थनइल (थन में घाव) हो गया है। लेकिन कुछ लोग कहते कि रामशरण वहू ने कर दिया है। जव लगातार तीन दिनों तक प्रमोदसिंह की गाय की ऐसी ही हालत रही, तव वे राम- शरण वह का नाम ले-लेकर उन्हें गाली देने लगे तथा गाय को ठीक करने के लिए धमकाने लगे। वे सोच रहे थे कि अव तो रामशरण हैं नहीं। वे जैसे चाहेंगे, रामशरण बहू के साथ पेश आएंगे। कोई डर नहीं। लेकिन उन्हें यह देखकर काफी आश्चर्य हुआ कि जगतनारायणसिंह आंखें लाल किए, कंधे पर लाठी लेकर उनके सामने आ खड़े हुए, "प्रमोद, रामशरण बहू को असहाय मत समझो' अव तक उनको तुमने जो कह दिया सो कह दिया, अव अगर उनके खिलाफ कुछ कहोगे तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा'या तो तुम्हीं रहोगे या मैं !" प्रमोदसिंह ने भी जवाव दिया, "बीच में तुम मत पड़ो जगतनारायण 'दूसरे का झगड़ा मोल न लो मैं तुमको तो कुछ कह नहीं रहा हूं।" "रामशरण बहू को मुझसे अलग न समझोरामशरण की मृत्यु बाद उनकी सारी जिम्मेवारी मेरे ऊपर है।" "तो तुम जानबूझकर झगड़ा करोगे?" "जरूर। अगर रामशरण वहू को तुम कुछ कहोगे तो मैं चुप -- रहूंगा।" "लेकिन उसने मेरी गाय को कुछ किया है, यह सारा गांव है।" "झूठी वात है लेकिन अगर तुम्हें संदेह भी है तो इसमें दो नहीं, तुम्हारा ही है। वे तुम्हारे दरवाजे तो गई नहीं थीं। तुम् ५८ / युद्धस्थल स्वयं उनके दरवाजे गई थी। तुमने अपनी गाय को क्यों उनके दरवाजे जाने दिया? वाधकर रखते।" प्रमोदसिंह और जगतनारायणसिंह के बीच इसी तरह वात बढते. बढते हल्ला गुल्ला और गाली-गलौज के रूप में तब्दील हो गई। गाय के अनेक लोग जुट आए। जगतनारायणमिह एकदम प्रोध में आ गए थे। लोग उन्हें जानते थे, वे चुप हैं तो चुप हैं, लेकिन जव क्रोध में आ जाएं तो फिर मरने-मारने की कोई चिन्ता नहीं। उनका हिसा रूप देग प्रमोर- सिंह डर गए। फिर वे चुप लगा गए। उसके बाद रामगरण यहू का नाम लेकर उनको गालियां बकना उन्होंने बद कर दिया। हालाकि दबी जवान बरने चलती रही। इस बीच उनकी गाय की वाई और ओझाई दोली हुई । उनकी गाय ठीक हुई। कुछ लोगों ने दवाई का प्रभाव बताया, कुछ लोगो ने ओझाई का। लेकिन उस घटना के बाद सामने आकर रामशरण बहू को फिर किसीने डायन नहीं कहा। लोगों को पता लग गया कि राम- शरण बहू की पीठ पर एक और रामशरण तैयार हैं। उन दिनो गाव की स्थिति शात और सहज हो गई थी। काफी मार- काट और हत्या के बाद भरतपुर गाव बदलकर अब इस रूप में आ गया था कि गाव के गोषित, पीडित, उपेक्षित और दमित वर्ग के लोगो को न सिर्फ बराबरी का दर्जा ही मिला था, बल्कि गांव के शासन की बागडोर भी उनके हाथो में ही आ गई थी। अब उनकी मर्जी से ही कुछ होता था। पहले की तरह उन्हे सताए जाने और भूखो मारने की बात सत्म हो गई थी। लेकिन इसके अतिरिक्त अन्य मामलो मे गाव पूर्ववत् ही था। रदिमा, अंधविश्वास और आडंबर पहले ही की तरह बने रहे थे। हा, हत्या को घटनाएं अव वद हो गई थी। अब गांव में शासन चला रहे इस नये वगं द्वारा हर पंद्रह दिन बाद नारे लगाए जाते, सभाओ का आयोजन कर भाषण दिए जाते, नाटक खेले जाते। और इन सबके माध्यम में यह बात बताई जाती कि अमीरी के पोषण और अत्याचार के सिताफ मरीव वर्ग को संग- टिन होकर लडना है। जगतनारायसिंह को असामयिक मृत्यु उनके दुर्भाग्य के चलते हुई mnainr नलते सगीर-सीक नहीवहा जा सकता।

लेकिन रामशरण बहू को लगता कि जगतनारायणसिंह अगर नाटक देखने नहीं गए होते तो इस तरह उनकी अकाल मृत्यु नहीं होती। दरअसल, हुआ यह था कि मई दिवस के अवसर पर गांव से बाहर बगीचे में एक नाटक का आयोजन किया गया था। नाटक में काम करने के लिए शहर से भी कई कलाकार आए थे। कुछ लड़कियां भी आई थीं। नाटक की तैयारी पिछले कई महीनों से की गई थी। भरतपुर तथा आस- पास के गांवों में इस नाटक का खुव प्रचार था। लोग भारी संख्या में जुटे । जगतनारायणसिंह को नाटक और नौटंकियों से बेहद प्रेम था। भिखारी ठाकुर का 'विदेसिया' नाटक देखने के लिए तो वे पांच कोस तक की पैदल-यात्रा कर देते थे। अपने गांव में होने वाले नाटकों और नौटं- कियों को न देख पाना उनके लिए असंभव ही था । वे मुरेठा बांधकर वीड़ी पीते हुए अगली पंक्ति में बैठकर नाटक देखते थे। उस दिन भी जगतनारायणसिंह नाटक प्रारंभ होने से पहले ही अपनी जगह पर बैठे थे। रामशरण बहू से सदा की भांति कहकर आए थे कि आधी रात के बाद ही लौटेंगे। इससे पहले नाटक खत्म नहीं होगा। जगत- नारायणसिंह ने रामशरण वहू को यह भी समझा दिया था कि वे इतनी देर तक जागकर उनकी प्रतीक्षा नहीं करेंगी। सो रहेंगी। वे आने पर दर- वाजे की कुंडी खटखटाकर उन्हें जगा लेंगे लेकिन उस दिन नाटक आधी रात तक नहीं हो सका। अभी नाटक को शुरू हुए एक घंटा भी नहीं बीतने पाया था कि दर्शकों के बीच से किसीने पिस्तौल चला दी थी। मंच पर जमींदार की क्रूर भूमिका निभाने वाला एक पात्र घायल हो गया था। फिर तो कुहराम मच गया। कुछ लोग भाग चले । कुछ लोग एक-दूसरे से जूझ पड़े। वंदूकें छूटने लगीं। एक क्षण के लिए तो जगतनारायणसिंह के होश उड़ गए। फिर वह भीड़ से निकल- कर सरपट भागे। वे अपने गांव की ओर न भागकर दूसरी ओर भाग चले, क्योंकि उनके गांव की ओर से ही बंदूकों की आवाजें आ रही थीं। जगतनारायणसिंह भागते-भागते उत्तरपट्टी के पोखरे के पास चले आए। पोखरे के पश्चिमी किनारे पर कुछ जंगलनुमा झाड़ियां थीं। एक । झाडी में जाकर दुबक गए। यह जगह उन्हे सुरक्षित जान पडी। घटना- स्थल से वे काफी दूर आ गए थे। लेकिन लोगो की शोरगुल और बदूक की आवाजें यहां भी उन्हें साफ मुनाई पड़ रही थी। रात अधेरी थी। पुरवा हवा चल रही थी। धीरे-धोरे हल्ला-गुल्ला की आवाजें कम होती जा रही थी। जगतनारायणसिंह सोच रहे थे कि वातावरण और शात हो जाए तब वे अपने गांव की ओर लौटें। उन्हें लगने लगा था कि यह लडाई इलाके के लोगो ने छेड़ी है-मुरारीसिंह के वर्ग और विरादरी के लोगो ने । भरतपुर के उनके लोगो में तो चमरटोती और उसके पक्षधरों मे टकराने की हिम्मत ही कहां बची है ? इस गांव पर तो वे शासन करने लगे हैं। काफी समय तक तो उनके सिलाफ इलाके से भी कोई आवाज नही उटी थी। लेकिन अब इलाके के मुरारीसिंह के पक्षपर संगठित होकर उनपर हमसा बोलने लगे है। उन्हें डर है कि भरतपुर के बाद अन्य गांवो पर भी वे कब्जा न कर लें। जगतनारायणमिह को इस मले से मन-ही-मन खुशी होने लगी। वे खुद भी मुरारीसिंह के वर्ग और बिरादरी के ही हैं । डरकर समझौता कर लिया है उन लोगों ने, लेकिन मन के अंदर जल रही बदले की आग अभी बुझी नही है। वे वक्त की प्रतीक्षा में हैं। चमरटोली के लोग और उनके बाहर के साथी जब भी कमजोर पड़ेंगे, वे बिना दबोचे मानेंगे नहीं। अब तो बात सिर्फ शक्ति और मामर्थ्य की है। जिसका पलड़ा भारी होगा, उसका शासन गांव पर चलेगा। जगतनारायणसिह यह सब सोच ही रहे थे कि अचानक उनके वायें पैर के तलवे मे काटा चुभने जैसी टीस हुई। उन्होंने पलटकर देगा। लेकिन उपर देखते ही भय के मारे उनका हृदय जोर-जोर से धडरने लगा। एक काला नाग फन फैलाए उनके पास फुफकार रहा था। उसने जवदंम्न वार किया था उनके अपर । खून की बूदें पकने लगी थी। जगत नारायसिंह से अब एक क्षण भी दहा का नहीं गया। एक बड़े मक्ट के बीच घिर जाने के बाद पहले का मंकट जैसे छोटा पड़ राता है, वैसे ही जगतनारायण- सिंह मार-काट की घटना को भूल गए तया अपने गात्र को ओर भाग चले । बंदूको से लैस लोग कहा खडे हैं तया कहां एक-दूसरे पर वार कर । रहे हैं, इसकी ओर जगतनारायणसिंह का ध्यान नहीं रहा। वे तो गिरते- पड़ते और चीखते-चिल्लाते अपने गांव की ओर भागे जा रहे थे। सांप के जहर का असर उनके ऊपर होने लगा था। जगतनारायणसिंह के गांव में पहुंचने के बाद उनकी पत्नी और बाल- बच्चों ने उन्हें घेर लिया। टोला-पड़ोस के लोग भी जुट गए। यह सूचना पा रामशरण वह भी आ गईं। फिर भाग-दौड़ प्रारंभ हो गई। तरह-तरह के उपचार होने लगे। कोई दौड़कर गांव के वैद्यजी को बुला लाया तो कोई मंत्र पढ़कर सांप के विप उतारने वाले गुनियों को। झाड़-फूंक और ग्रामीण उपचार में जगतनारायणसिंह के लड़कों ने कोई कमी नहीं होने दी; लेकिन फायदा कुछ नहीं हुआ। जगतनारायणसिंह के ऊपर सांप के विप का असर वढ़ता ही जा रहा था। फिर वे वेहोश हो गए। उनके मुंह से झाग आने लगा : उनका शरीर नीला पड़ने लगा। जगतनारायणसिंह की यह हालत देख रामशरण वहू के अंतर में हाहा- कार मचने लगा। उन्हें अव सारी दुनिया अंधकारपूर्ण लगने लगी थी। उन्होंने दीवार के सहारे मुश्किल से अपने को संभाल रखा था। उन्हें लगता था कि जगतनारायणसिंह की देह पर वे अब गिरी कि तब गिरी ! जगतनारायणसिंह के लड़के और मुहल्ले वाले हारकर शांत पड़. गए थे। अब वे चुपचाप जगतनारायणसिंह को मौत के मुंह में जाते हुए देखने लगे थे। लेकिन रामशरण बहू नहीं चाहती थीं कि जगतनारायण- सिंह को ठीक करने के रास्तों और उपायों के प्रति एक क्षण के लिए भी तटस्थ हुआ जाए। उन्हें लगता कि शायद कुछ और इंतजाम करने के बाद वे ठीक हो जाएंगे, इसीलिए उन्होंने कहा कि हाथ-पर-हाथ रखकर बैठा न जाए, वल्कि कस्बे के अस्पताल में ले जाया जाए। रामशरण वहू की बात उनके लड़कों को जंची। इस रास्ते भी कई लोग ठीक हो गए थे। लेकिन रुपयों का संकट आ खड़ा हुआ। कम-से-कम तीन-चार सौ रुपयों की जरूरत महसूस हुई।कस्वे के अस्पताल वाले रोगी को कभी-कभी बड़े अस्पताल भेज देते हैं । फिर तो हर जगह सिर्फ रुपये ही रुपये। दुर्भाग्य से जगतनारायणसिंह के यहां उस दिन सिर्फ पचास रुपये थे। अनाज वेचकर और रुपये इकट्ठे किए जा सकें, इसके लिए अब समय ६२ / यशल 1 भी तो नहीं था। लेकिन रामशरण यहू ने रुपयो की वजह से पांच मिनट के लिए भी दिलंब नहीं होने दिया। तत्वाल पाच सौ रुपये लाकर उन्होंने जगतनारायणसिंह के लड़कों को दे दिए। अव जगतनारायण सिंह के लड़कों ने एक बाट पर अपने पिता का मुलाया और साट कन्धे पर ते दौड़ते हुए कम्य के अस्पताल की और चल पड़े। लेकिन वहां पहुंचने पर उनकी हालत देख क्स्व के अस्पताल ने उन्हें बड़े अस्पताल ( सदर अस्पताल, आरा) भेज दिया। वे बड़े अस्पताल पहुंचे। लेकिन वहा के डाक्टरो ने जगतनारायणसिंह को देखते ही उन्हें मृत घोपित कर दिया। मायद कस्वे से बड़े अस्पताल की यात्रा में ही वे गुजर चुके थे। अब उनके लडकों का सारा उत्साह और परिश्रम एकाएक ठडा पड़ गया। वे रोते-पीटते गाव वापस लौटे। उन्हें बम इसी बात का संतोप था कि अपने पिता को बचाने के लिए उन्होंने कोई भी प्रयास छोड़ नहीं रखा है। उसके बाद समय गुजरता गया। जगतनारायणसिंह की मृत्यु का प्रभाव उनके परिवार के लोगों पर मे धीरे-धीरे कम होने लगा। वे पूर्व- वत् सहज होने लगे। लेकिन एक लम्बे समय बाद भी रामगरण बहू सहन नहीं हुई। गाव के लोगो के सामने अपने पति की मृत्यु की तरह गला फार- कर रोने-चिल्लाने और पागली की तरह माया पीटने की क्रिया तो राम- भरण बहू ने नहीं की, लेकिन उनके अन्तर की वेदना इन बाहरी नियाओ मे हजार गुना अधिक थी। वे अपने पति की मृत्यु से भी अधिक सत- विक्षत, पीड़ित और आहत हो गई थी। उन्हें लगने लगा था कि जगत- नारायणसिंह के साथ ही उनका सब कुछ चला गया। अब कुछ भी नहीं वचा है उनके पास । कोई भी नहीं रह गया है उनका अपना। । दुग्वन की मां अन्य घरों का काम कर रामगरण बहू के यहा नोट आती है। अब तक अन्धकार गहरा चुका होता है। भाम की सीमा रेखा को पार कर रात सरक रही होती है । दुयन की मां को किवाई पोटने की जरूरत नहीं पड़ती। दरवाजा खुला है। वह जानती है, रामारण बहू ने उसीके लिए दरवाजा खुला छोड़ रखा है। कभी-कभी तो वे दरवाजा .. .

तो हैं, लेकिन कभी-कभी उसीके लिए खुला छोड़ रखती हैं। दुखन अन्दर घुस जाती है, लेकिन अन्दर चारों तरफ घोर अन्धकार है। कोई रोशनी नहीं । दुखन की मां समझ नहीं पाती है कि रामशरण अन्दर हैं या नहीं। अगर होती तो अव तक उन्होंने ढिबरी जरूर आई होती । शायद कहीं चली गई हैं। वह पुकारती है, "मालकिन लकिन...!" अव रामशरण वहू की तंद्रा भंग होती है। वे जवाब देती हैं, "अन्दर हूँ, आ जाओ।" दुखन की मां आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछती है, "आप अंधेरे में क्यों वैठी हैं ? अव तक आपने रोशनी क्यों नहीं की? क्या तवीयत ठीक नहीं है ?" रामशरण बहू वेदनायुक्त शब्दों में कहती हैं, "ठीक ही हूं.."ढिवरी जलाने की इच्छा नहीं हुई 'अव तो मुझे अंधेरे और उजाले के बीच कोई फर्क ही नजर नहीं आता "सच पूछो तो रोशनी अब कष्ट देती है-दुःख का साथी तो अंधेरा ही है।" रामशरण बहू की इन बातों को सुन दुखन की मां को आभास हो नाता है कि जरूर कुछ बात हुई है। वह पूछती है, "किसीने कुछ कहा है क्या?" रामशरण बहू उसी लहजे में जवाब देती हैं, "लोगों ने बाकी क्य छोड़ रखा है कहने के लिए?" दुखन की मां दिराखे के पास पहुंच जाती है। फिर दियासलाई ढिवरी जलाती है । ढिवरी की रोशनी कमरे में फैल जाती है। दुखन मां देखती है, रामशरण वहू का चेहरा उदास और चिंताओं से ग्रस्त उससे रहा नहीं जाता है। वह एक बार फिर पूछती है, "तवीयत तो है न ? किसीसे कुछ कहा-सुनी हुई क्या ?" रामशरण बहू कोई जवाब नहीं देती हैं । वे समझ नहीं पाती क्या कहें। लेकिन दुखन की मां की नजरें जवाव पाने के लिए रा के चेहरे पर ही टिकी होती हैं। एक क्षण तक रामशरण व की मां की नजरों की चुभन सहती रहती हैं, फिर एक दीर्घ वहू ६४ / युद्धस्थल छोड़ते हुए कहती हैं, "दुवन की मा, मुझे एक गिलास पानी पिलाओ और गुड़गुड़ी चढ़ाकर दे दो...।" दुखन की मा रामारण बहू को पानी लाकर पिलाती है। फिर गुड- गुड़ी चटाकर उन्हें थमा देती है। इसके बाद अपना और रामशरण बहू का खाना बनाने के लिए चूल्हा जलाने लगती है। अन्य दिनों की अपेक्षा आज उसे विलंब हो गया है, इसीलिए वह तेजी मे रसोई के काम में जुट जाती है। रामशरण बहू भी अव कमरे मे निकल आंगन में आती हैं। फिर एक जगह बैठ गुडगुड़ी पीने लगती हैं। मूह मे तो वे कुछ नहीं कहती हैं। लेकिन दुसन की मा के आ जाने के बाद उनके तडपते-छटपटाते मन की बहुत राहत मिलती है। लगता है, जमे बीच मझधार मे उन डूबते हुए के लिए दुसन की मा सहारा बन गई है। दुम्बन की मा चूकि गाव से लौटकर आई है, इसीलिए होगा की तरह रसोई का काम करते हुए ही सूचनात्मक बातों का सिलसिला प्रारम्भ करती है, "मालकिन, अब से आप कभी किमोके दरवाजे मत जाइएगा। दूधनाथ चौधरी की औरत ने पूरे गांव में यह बात फैला दी है कि उसके लडके को आपने ही कुछ फिया है"मैं जहां-जहा काम करने गई, सबके यहां यही चर्चा.... रामशरण यह के होठ तो जने मी दिए गए हो। वह पुध नहीं रहती हैं । माया उठाकर चुपचाप दुम्बन की मा की और नारने लगती हैं । दुवन की मा रामगरण बहू के चेहरे पर उभर आई कातरता और वेदना के भावों को देख द्रवित हो उठती है। फिर चुप सगा जाती है। अब उममे कुछ भी कहते नहीं बनता है। उसे समझ में नहीं आता है कि वह राम- शरण बहू के लिए क्या करे । कुछ भी तो उसके वा की बात नहीं। इधर रामशरण बह के अन्तर में काी और चिताओ के तूफान उठने लगते हैं। मुबह भी दुमन की मा ने यही भूचना दी थी। शाम को शिवमंदिर से वे तौट रही थी तो गाव की औरतों के बीच इसी बात का जिक चन रहा था। अब रात में भी दमन को मा गांव से पुन यही चर्चा लेकर आई है। रामशरण बहू को लगता है कि जरूर बुध ग्राम । बात है। आम घटनाओं की तरह मात्र उन्हें डायन कहकर ही इस वार छोड़ नहीं दिया जाएगा। जरूर कुछ होगा। और रामशरण बहू का हृदय कांपने लगता है। वे मन-ही-मन कहती हैं, हे ईश्वर, अव और कौन-सी दुर्गति दिखाओगे ? अव तो कोई रक्षक भी नहीं। न पति ही और न जगत- नारायण सिंह ही । अब सिर्फ तुम्हारा ही आसरा है। रामशरण वहू एक दुःखद निःश्वास छोड़ते हुए आंगन की दीवार के सहारे माथा टिका देती हैं । उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं। दुखन की मां रामशरण बहू की इस स्थिति को लक्षित कर लेती है। फिर कहती है, "किसीके कहने से क्या होगा? अपने घर चाहे लोग लाख ऊलजलूल वकते रहें, लेकिन किसकी मजाल जो पास आए !" रामशरण बहू जानती हैं, दुखन की मां उन्हें सांत्वना दे रही है। लेकिन सचाई इसके विल्कुल विपरीत है। उनके पास आने में अब किसीको क्या डर ? वे सोचती हैं कि अगर दूधनाथ चौधरी आकर कह बैठे कि तूने मेरे बेटे को कुछ किया है, चल उसे ठीक कर, नहीं तो नेरा गला दबा दूंगा, तो वे क्या कहेंगी? कौन उनकी रक्षा करेगा? रामशरण वहू घुटनों पर माथा टिका चिंताओं में डूब जाती हैं। दुखन की मां को रामशरण बहू की इस हालत पर बहुत तरस आता है। उसे लगता है, दोष उसीका है। उसे गांव में चल रही बातों की जानकारी रामशरण वहू को नहीं देनी चाहिए थी। लेकिन फिर उसे लगता है, यह भी तो उचित नहीं होता। लोग रामशरण बहू के खिलाफ बतियाएं और वह सुनकर महटिया जाए, यह तो उसके प्रति छल ही है। वह उनका नमक खाती है। आजीवन सरियत देगी। उनके बारे में कहीं भी कुछ सुनेगी तो जरूर बताएगी। उसका वश चलता तो रामशरण बहू को डायन कहनेवालियों के मुंह तोड़ देती। लेकिन वह विवश-लाचार है। रामशरण बहू के प्रति सिर्फ अपनी सद्भावना ही व्यक्त कर सकती है,उसे व्यावहारिक रूप नहीं दे सकती। दुखन की मां को यह समझ में नहीं आता है कि रामशरण बहू को लोग डायन किस आधार पर कहते हैं। वह तो एक लम्बे समय से उनके साथ रहती आ रही है। उनका सोना-जागना-बैठना, खाना-पीना, चलना: - EE Iगदम्शल फिरना कुछ भी तो उममे छिपा नहीं है । लेकिन उनको जोग-टोना करते तया तंत्र-मंत्र साधते हुए दुखन की मा ने कभी नहीं देखा है । दुयन की मा को तो लगता है कि इन चीजों के बारे में रामशरण बहू को कोई भी जानकारी नहीं, लेकिन गाव में अफवाह उड़ती रहती है कि रामगरण बहू रात को श्मशानों में जाती है, कि गड़े मुद उमाह वे उममे बातें करती हैं, कि पीपल के पेड़ पर चढ़कर उमे हांकती हैं, कि नंगी होकर सप्पड़ लेकर नाचती हैं, आदि। कुछ बातें तो इसमे भी आगे बढकर प्रचारित की जाती हैं कि अमुक-अमुक लोगों ने रामशरण बहू को खप्पर लेकर दमगान में नाचते और मुदों का मांस खाते देखा है, कि रात में एक दिन रामशरण बहू जा रही थी तो फलां काका ने अपने दालान में उन्हें देवा या कि फला काका ने जब उन्हें टोका तब वे आदमी में जानवर बन गई, आदि। दुखन को मा ने कई जगह इन बातों का विरोध किया है। लेकिन लोग यह कहकर उसका मुह वद कर देते हैं कि तू तो दोनो जून उनके यहां खाती है, तू उनकी शिकायत थोडे करेगी। दुखन की मा सोचती है कि अगर गाव के लोग उमकी तरह ही राम- शरण बहू के करीब होते तो कभी इस तरह की बातें नहीं करते। दुग्न की मां को यहां इस बात का अनुभव प्राप्त हुआ है कि किमी भी बात की मचाई उसको करीव रहकर ही जानी जा सकती है, उममे दूर रहकर नही। दुसन की मां के मन में अव यह विश्वाम पुख्ता हो गया है कि राम- मरण बहू को गांव के लोग डायन मिर्फ इसीलिए समझते हैं कि वह वान और विधवा है। लेकिन यह गांव के लोगो की क्तिनी गलत धारणा है । वांश और विधवा न होना अपने वश की बात तो है नहीं। यह तो प्रगति का प्रकोप है । इसके आगे मनुष्य का कोई जोर नही । गाव और समाज के लोगो को तो मानवता के नाते यह चाहिए कि प्रकृति के प्रकोप मे पीडित लोगो को सहानुभूति दें, आदर दें, ताकि वे अपनी नियति पर पटनाया नसा सके। लेकिन गाव और समाज के लोग प्रकृति के प्रकोप में वन्त लोगों को तो उल्टे और अधिक पीडा और मजा देने लगते हैं । समाज के लोगों का यह घोर निंदनीय और क्रूर कम है। इसीलिए तो । दुखन की मां इस समाज के नाम पर कई वार थूक चुकी है, जिसके निर्णय उसे अकसर विवेकसम्मत नहीं लगते। रामशरण बहू और दुखन की मां एक-दूसरे के करीव ही बैठी हैं, लेकिन देर से चुप हैं। अपनी-अपनी दुनिया में खोई हैं। रामशरण बहू तो पत्थर की मूर्ति की तरह घुटनों पर माथा रखकर जड़वत् वैठी हैं। लेकिन दुखन की मां रसोई के कामों को भी निपटाती रही है। वह अब तक खाना तैयार कर चुकी होती है। अव मौन को भंग करते हुए रामशरण बहू से कहती हैं, "मालकिन, खाना तैयार हो गया 'परोसती हूं. 'खा लीजिए।" रामशरण बहू कहती हैं, "खाने की एकदम इच्छा नहीं"तू खा ले मैं आज नहीं खाऊंगी।" दुखन की मां रामशरण बहू को समझाती है, "आपका चौथापन चल रहा है.''देह कमजोर होती जा रही है। अभी से अगर खाना छोड़ दीजिएगा तव तो खटिया से भी नहीं उठ पाइएगा। रामशरण बहू कहती हैं, "खैर, जो हो; लेकिन मुझसे आज एक कौर भी नहीं खाया जाएगातवीयत ठीक नहीं। तू जिद न कर दुखन की मां!" लेकिन दुखन की मां नहीं मानती है । खाना परोस उनके सामने रख देती है। फिर कहती है, "खाकर तो देखिए । खाया क्यों नहीं जाएगा बहुत अच्छी खिचड़ी बनाई है । आज शनिवार है। शनिवार को खिचड़ी खाने से ग्रह टलते हैं।" दुखन की मां खिचड़ी से ग्रह टलने की वात कह तो देती है, लेकिन उसे लगता है, यह झूठी बात है । वह एक लम्बे समय से हर शनिवार को खिचड़ी खाती आ रही है । रामशरण बहू को भी खिलाती है। लेकिन न तो उसके ऊपर से ही ग्रह टलते हैं और न रामशरण बहू के ऊपर से ही। उसे लगता है, रामशरण बहू को डायन समझे जाने की लोगों की झूठी धारणा की तरह ही यह भी एक झूठी धारणा है। इसके पीछे भी कोई सत्य नहीं। दुखन की मां देखती है, रामशरण बहू ने खिचड़ी खाना प्रारम्भ कर ६८ / युद्धस्थल दिया है। लेकिन इच्छा में नहीं, अनिच्छा में दमन की मां जानती है कि रामशरण यहू उमकी जिद के चलते गा रही हैं। जाननी हैं कि वे नही माएंगी तो वह भी मूपी रह जाएगी। मकिन नीन-चार कोर में अधिक रामगरण बहू खा नहीं पाती हैं। थाली एक ओर पिसकाकर कहती हैं, "तुम्हारा मन रय दिया दुखन की मां "लेकिन अब और गाने को बहोगी तो फिर मारा खाया वाहर हो जाएगा.""जब भीतर मे इच्छा नहीं नव फिर बाहर मे ढूंसने से क्या फायदा?" रामशरण बहू अय कमरे में चल देती हैं और दुगन यो मा स्वयं साना खाने बैठ जाती है। माना साने के बाद दुखन की मा चीजो को ढाप देती है। चौका माफ करती है। फिर गुडगुडी मुलगा रामशरण बहू के पास आ जाती है। रोज की भाति रामशरण बहू ने गुडगुडी की मांग तो उसमे नहीं की थी, लेकिन दुमन को मा के लिए तो यह नियम बन गया था। रामगरण बहू गुडगुडी ले पीने लगती हैं और दुगन की मा पाम ही अपना गुदडा विद्या लेट जाती है । गुददे पर लेटने के बाद दुवन इत्मीनान की सांस लेती है। उमे गाति महमूस होने लगती है। इधर रामगरण बहू भी तंबाकू के धुएं मे सहज होने लगती हैं । उनके अन्दर अपने ऊपर थोपे गए इम नये आरोप को लेकर जिनामाए उटने लगती हैं। फिर वह दुम्बन की मा में पूछती हैं, "दुखन यी मा, मैंने तो दूधनाय चौधरी के लड़के को कभी देखा भी नहीं है, तुमने नो उमे जरूर देखा होगा "कितना बडा है ? क्या उम्र होगी उमकी" "अभी तो वह एक्दम यच्चा है मालकिन यही कोई वार-पाच माल का होगा।" "तू जानती है, उमे क्या हुआ है ?" "अरे मालकिन, उमे पीलिया हो गया है। उमरा मारा बदन पीला पड़ गया है । आप जिस दिन उसके दरवाजे बैठी थी, उममे वापी पहले में वह बीमार है । आपके बैठ जाने से तो दीप आपके ऊपर मटने के लिए उन लोगों को एक बहाना मिल गया है।" की मा -- " "कराई थी. 'कस्वे के डाक्टर से दिखाया था। शायद कोई फायदा नहीं हुआ."असल में उन लोगों ने तो जमकर दवाई भी नहीं कराई। ओझाई के चक्कर में ही पड़े रहे । ओझाओं ने ही दूधनाथ चौधरी के घर वालों को समझाया है कि यह कोई रोग-बीमारी नहीं, डायन का प्रकोप है। ओझाओं ने भी आपका नाम लिया है "मालकिन, मुझे यह समझ में नहीं आता कि ओझाई में लोग जितना खर्च करते हैं, उतना दवाई में क्यों नहीं करते ? ओझाई पर लोगों को जितना विश्वास रहता है, उतना दवाई पर क्यों नहीं होता?" रामशरण वहू को समझ में नहीं आता है कि दुखन की मां को वे क्या जवाव दें। ओझाई पर विश्वास करने वालों को अज्ञान और मूर्ख कैसे कहें ? यह तो छोट मुंह बड़ी बात हो जाएगी। वे और दुखन की मां ज्ञानी हैं और अधिकांश लोग अज्ञानी, यह वे कैसे कहें ? कैसे सावित करें ? इसीलिए इस सवाल का जवाब न दे वे दुखन की मां से पूछती हैं, "इस समय दूधनाथ के लड़के की हालत कैसी है ? ?" "आज तो उसकी हालत बहुत खराव हो गई थी। लोगों को नहीं लग रहा था कि वह बचेगा। फिर किसीके कहने पर दूधनाथ चौधरी शहर के बड़े अस्पताल में उसे ले गए हैं। देखिए, क्या होता है !" अब एक क्षण के लिए रामशरण वहू चुप हो जाती हैं, फिर पूछती हैं, "मेरे बारे में और क्या-क्या वातें हो रही थी ?" "दूधनाथ की औरत आपको धमकियां दे रही है। मैं जहां-जहां काम करने गई, वहां-वहां औरतों ने मुझे बताया कि दूधनाथ चौधरी की औरत कह रही है कि अगर मेरे बेटे को कुछ हुआ तो मैं रामशरण बहू को चैन से नहीं रहने दूंगी।" अब रामशरण बहू चुप लगा जाती हैं । दुखन की मां भी मौन साध लेती है। लेकिन दुखन की मां काफी समय तक जगी रहकर यह प्रतीक्षा करती रहती है कि शायद मालकिन कुछ और पूछे। लेकिन मालकिन अब छ भी नहीं पूछती हैं। कोई भी सवाल अव उनके पास शेप नहीं वचता है । फलस्वरूप थकी-मांदी दुखन की मां सो जाती है। रात गहराती जा रही है । दुखन की मां नींद में सो चुकी है, लेकिन ७० / युद्धस्थल । रामशरण बहू की आखों से तो नींद जैसे उड़-सी गई है। दुसन की मा के सो चुकने के बाद उन्होंने ढिबरी बुझा दी है। कमरे मे घोर अन्धकार हा गया है। कोई भी चीज दिखाई नही पड़ रही है दीवारें, न छत । सिर्फ अन्धकार ही अन्धकार । लेकिन उनकी पलकें वद नहीं हो पा रही हैं। वे अन्धकार को घूरती रहती है तथा उनकी आंखो के सामने दूधनाथ चौधरी की पत्नी की धमकी मंडराती रहती है। रामशरण बहू जानती हैं, दूधनाथ चौधरी का परिवार इम गाव के चन्द शक्तिशाली परिवारी में से एक है । उनके यहा कई लाठीधारी जवान है। चमरटोली की लड़ाई में देर तक टिकने वाला उनका ही परिवार था। शेप लोग जल्द ही हार मान गए थे। हालांकि उसके बाद अब गाव की स्थिति बहुत बदल गई है । अब दूधनाथ चौधरी के परिवार का रोव-दाब पहले की तरह नहीं रह गया है। लेकिन रामशरण बहू को लेकर इसमें कोई फर्क पड़ने वाला नहीं। रामशरण बहू के लिए तो उनका परिवार अब भी वाघ है। वे पराजित हुए हैं अपने मे एक बडी शक्ति के सामने । रामशरण बहू के साथ तो वे जब जमा चाहे, सलूक कर सकते हैं । रामशरण बहू मोचती है कि उम दिन उन्हें रामायण मुनने नहीं जाना चाहिए था। अगर वे रामायण सुनने नहीं जाती तो यह नई ममस्या उनके माथे नहीं आती। आखिर अब रामायण सुनकर वे क्या करेंगी? उनकी पूरी जिन्दगी तो पीडाओं और मंकटों से घिरी रही है। अब इस चौथेपन मे कौन-मा मुख उन्हें नसीब हो जाएगा जहा तक परलोक बनाने की यात है, यह अब उन्हें नहीं जंचती। उन्हें लगता है, बहुत सारी वातो पर लोगों ने झूठ-मूठ का विश्वास टिकाए रखा है । वे तो यह जानती भी नहीं कि डायन कमी होती है ? कि उसके अन्दर केसी शक्ति रहती है ? कि वह लोगों को कमे क्या करती है ? कि वह यह गुण कहा मे सीखती है ? वे डायन के बारे में बिल्कुल अनभिज्ञ हैं । लेकिन सारा गाव उन्हें डायन समझता है । लाख मफाई देने पर भी कोई नहीं मानता। लेकिन सचाई इसके बिल्कुल विपरीत है। रामशरण बहू को लगता है कि उनको डायन समझे जाने की तरह ही परलोक आदि की बातो के ऊपर भी लोगों ने आंख मूदकर विश्वास ।

- कर लिया है। सचाई को तो किसीने जाना नहीं है । मरने के बाद आदमी पूरी तरह से यहीं समाप्त हो जाता है या परलोक में जाता है, इसे किसीने देखा तो नहीं है। रामशरण बहू के अन्दर गांव द्वारा उन्हें जबरन डायन समझे जाने के खिलाफ ऐसी प्रतिक्रिया होती है कि अब उन तमाम बातों के ऊपर से उनका विश्वास उठता जाता है जिसे प्रत्यक्ष घटित होते हुए वे नहीं देख पाती हैं। लेकिन इसके बावजूद भी वे रामायण, कीर्तन और देवी-देव- ताओं की पूजा से विमुख नहीं हो पाती हैं । जव उनके मन को तीखी चोट पहुंचती है, कोई गहरा सदमा लगता है, तव उनका आस्तिक विश्वास इसी तरह डगमगा जाता है। लेकिन फिर बाद में वे उसी लकीर की फकीर बन जाती हैं । दरअसल, सचाई तो यह है कि अपने संस्कारों से वे पूरी तरह वरी नहीं हो पाती हैं। रामशरण बहू विचार करने लगती हैं कि रामायण से लौटते हुए वे दूधनाथ चौधरी के चबूतरे पर क्यों बैठीं। उन्हें नहीं बैठना चाहिए था। अगर वे सीधे घर आ गई होती तो आज इतना बड़ा दोप भी उनके माथे नहीं मढ़ा जाता। रामशरण वहू को अपनी गिरती हुई उम्र और छिन्न पड़ती शक्ति पर खीझ होने लगती है । क्यों वे थोड़ा चलने पर ही थक जाती हैं ? उस दिन भी थक जाने के कारण ही सुस्ताने के लिए दूधनाथ चौधरी के चबूतरे पर जा बैठी थीं। लेकिन वहां उन्हें नहीं बैठना चाहिए था । किसी दूसरे के दालान पर जाकर बैठती तव भी तो यही समस्या उठ खड़ी होती । तव गली में ही कहीं वैठ रहतीं। लेकिन गली में भी तो लोग उन्हें बैठे देख कोई आरोप लगा ही देते। रामशरण बहू को लगता है, वे लाख प्रयत्न करें, उनकी जान छूटने वाली नहीं । जब विधाता ने उन्हें वांझ और विधवा होने की सजा दे दी है, तब फिर गांव के लोग मुरीबत क्यों करें? रात अधिया चली है। रोज की अपेक्षा आज ज्यादा उमस है । राम- शरण बहू के चेहरे पर पसीने की बूंदें चुह चुहा आई हैं । दुखन की मां का 'भी गर्मी से बुरा हाल है। प्रारंभ में तो वह निश्चल पड़ी सोती रही थी; लेकिन बाद में आंह-ऊह करती हुई करवटें बदलने लगती है । फिर उठकर ७२ / युद्धस्थल 1 बंठ जाती है । कहती है, "मालकिन सो गई क्या?' रामशरण वहू जवाव देती हैं, "नहीं"।" दुखन की मां कहती है, "वडी गर्मी है मालकिन "इसमें आदमी क्या सोएगा. अब तो आंगन में सोना चाहिए। अब घर में वर्दाश्त नहीं होता""" इसके बाद एक क्षण चुप रहकर दुखन की मा कुछ सोचने लगती है। फिर कहती है, "मालकिन, चलिए आंगन मे सोया जाए, यहा तो अब नीद नहीं आएगी."उठिए, मैं आपकी खाट निकाल देती हूं"मैं भी वही नीचे अपना बिछावन लगा लूगी।" रामगरण बहू को दुखन की मा का यह सुझाव पसंद आता है । लेकिन इससे पहले कि वे खाट से नीचे उतरती, दुखन की मा डिवरी जला देती है तथा अपना विछावन उठा आगन में रख आती है । अव रामगरण बहू भी खाट से नीचे उतर गई होती हैं । दुखन को मा उनका विद्यावन हटाती है । फिर खाट आंगन में निकालती है । इसके बाद पहले उनका विछावन ठीक करती है, फिर अपना । फिर उन्हें लिटाकर स्वयं लेट जाती है। आंगन मे घर की अपेक्षा उमस महमूस नहीं होती। यहा का वाता- वरण ठंडा है। खुले आकाश के नीचे सोना आनन्ददायक लगता है। लगता है, जैसे टिमटिमाते तारों की शीतलता नीचे तक पहुच रही हो। दुखन की मा कहती है, "मालकिन, जान पड़ता है, आप सो नहीं पाई। क्या अब तक आप जगी ही थी ?" "नीद नहीं आ रही है दुखन की मां ! रामशरण बहू जवाव देती हैं। इमपर दुमन को मा सोचने लगती है, उन्हें क्यों नीद नहीं आ रही है ? फिर एक क्षण सोचने के बाद उमे इस रहस्य का अदाजा हो जाता है । वह कहती है, "दूधनाथ चौधरी की पत्नी की बात को लेकर आप चितित मत होइएगा मालकिन वे आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है। अपने घर गाली बक रही हैं, वकने दीजिए""उनकी यह हिम्मत नहीं कि आपके सामने आकर कुछ कहे.'' आप चुपचाप अपने घर में पड़ी रहिए"वे चौधरी है तो आप भी चौधरी हैं."उनमे किसी भी मायने में आप कम नहीं हैं।" ।

- शरण बहू को दुखन की मां की बात से कुछ संतोप मि गता है, इस गांव में एक दुखन की मां ही तो है जो उन्हें सही है, जो उनके प्रति सद्भाव रखती है। वह उन्हें ढाढस देने के । ऐसी बात कहती है, अन्यथा दूधनाथ चौधरी की पत्नी और उनमें न और जमीन का फर्क है । एक राई है तो दूसरा पर्वत । वे दुखन मां को समझाते हुए कहती हैं, “दूधनाथ चौधरी की पत्नी की वरावरी झे न समझो दुखन की मां ! मैं तो उसके पसंघे में भी नहीं हूं.''वह सुहागिन, औलाद वाली है और मैं वांझ, विधवा हूं।" "वांझ और विधवा समझकर अपने मन को छोटा न करें। मैं भी तो प ही की तरह विधवा हूं। वांझ नहीं हूं। एक बेटा हो गया है। लेकिन उसमे मुझे क्या सुख ? आप ही की तरह तो अकेली रहती हूं.''पर आपकी तरह दिन-रात घुलती नहीं।" दुखन की मां पुनः रामशरण वहू का हौसला बुलंद करने की कोशिश करती है, लेकिन अनुभवी राम- शरण बहू फिर उसे धराशायी कर देती हैं, "दुखन की मां, हर परिवार में झगड़ा होता रहता है । वाप-वेटे में, भाई-भाई में, सास-पतोहू में, लेकिन क्या मजाल कि दूसरे लोग कुछ कह दें ! तुम अपने बेटे से अलग रहकर कमा-खा रही हो लेकिन उसकी छन-छाया तो है तुम्हारे ऊपर। वह तुमसे अलग जरूर है, लेकिन गांव का कोई आदमी तुम्हें कुछ कह दे तव देखो, वह कैसे लाठी लेकर आ जाता है...!" रामशरण बहू की इस बात से दुखन की मां का मातृत्व जाग उठता है। वह कहती है, "ठीक ही कह रही हैं मालकिन, अपना खून तो वक्त पर काम आ ही जाता है ''अभी परसाल की ही तो वांत है, तेतरी की मां ने मेरे ऊपर गेहूं चुराने का आरोप लगा दिया था। वह जानती थी मैं वेसहारा हूं.''दुखन से अलग हो गई हूं। लेकिन जब दुखन के कान यह वात पड़ी तो वह काम से दौड़ा हुआ आया और तेतरी की मां खूब खरी-खोटी सुनाई। तेतरी का बाप बीच में आ पड़ा तो उसे झकझोर दिया। अगर टोला-पड़ोस के लोगों ने जुटकर बीच-बचाव किया होता तो वह मारपीट करके ही लौटता।"उस दिन के वाद तेतरी की मां ने कभी दुवारा मुझपर चोरी का आरोप नहीं लग ७४ / युद्धस्थल हालाकि दुखन के कर्ने पर उसी दिन से तेतरी की मा से मैंने अपना संपर्क भी खत्म कर दिया।" दुखन की मा वात्सल्य प्रेम में आकर कहने को तो कह देती है, लेकिन उसे लगता है, इस बात से रामशरण बहू की पीड़ा और बढ़ेगी। यह कहकर तो उसने उनकी दुखती रग को छू दिया । जरूर इस बात से उनके अन्दर का जरूम हरा हो गया होगा। उसे मन-ही-मन अफमोस होने लगता है। इस तरह की परिस्थिति के प्रतिकूल बात उमे नहीं कहनी चाहिए । जो कमो उन्हे खल रही है, इस बात में तो और बढ़ेगी ही। दुखन की मा एक क्षण तक चुप होकर रामशरण बहू के ऊपर अपनी इस बात की प्रतिक्रिया जानना चाहती है। वह देखती है, रामगरण बहू बिल्कुल खामोश हो गई हैं। उनके चेहरे पर वेवसी के भाव उभर आए हैं तथा श्वास-प्रश्वास को गति वेदना से बोझिल हो गई है। दुग्वन की मां रामशरण बहू को इस स्थिति से उबारने के लिए तत्काल बातों का विपय बदल देती है, "मालकिन ! अपना बेटा, चाहे पति हो या न हो.."गांव के लोग तो है. 'गाव के सभी लोग एक ही जैसे नहीं है.''आपको कोई ऊच- नीच बोलने लगे और सारा गाव चुपचाप देखता रहे, यह नहीं होगा। पुरवारी पट्टो के कुछ लडको की वातचीत मैने सुनी है.'वे सब कोलेज में पढ़ने वाले लडके हैं। कहते है कि डायन और भूत-प्रेत का प्रचार बखेडा है ''यह सब बिल्कुल झूठी बातें हैं "मूर्ख लोग ही इसपर विश्वास टिकाए रहते है""" इमपर रामशरण बहू कहती हैं, "तो वे सब सामने क्यों नहीं आते है ? रोज ही तो मुझे डायन कहा जाता है । दूधनाथ चौधरी की पत्नी मेरे खिलाफ तरह-तरह की अफवाह उड़ा रही है"फिर इसका विरोध वे लोग क्यों नहीं कर रहे हैं ?" दुखन की मां तरक्षण जवाब देती है, "सव होगा मालकिन "वक्न आने पर सव होगा। चमरटोली की लड़ाई कुछ लोगों की ही लड़ाई थी, लेकिन उसमे पूरा गाव गुथ गया आप अपने को एकदम अकेला न समझें..." दुखन की माइस वार रामगरण वह को पछाड़ देती है। उसे मन-ही. 1 । मन खुशी होती है, बहुत ही अच्छा संदर्भ पेश किया उसने । वह देखती है, रामशरण बहू के चेहरे के भाव बदलने लगे हैं । वे अब पूरी तरह चित हो गई हैं । दुखन की मां के चेहरे पर विजय की एक मुस्कान खिल जाती है। रात का चौथा पहर गुजर रहा है। दुखन की मां और रामशरण बहू शांत होकर अव सोने का उपक्रम करने लगती हैं। लेकिन दुखन की मां के साथ ऐसा होता है कि एक बार जब उसकी नींद उचट जाती है तव फिर लाख प्रयत्न करने के बाद भी दुवारा नहीं आती। दुखन की मां देखती है, रामशरण बहू की पलकें झपकने लगी हैं। सारी रात मन के वोझ से वे सो नहीं पाई थीं। अब इस चौथे पहर कुछ हल्कापन महसूस कर सोने लगी हैं । दुखन की मां ने यह देखा है कि चितित, परेशान और व्यथित लोग अकसर रात के चौथे पहर में ही सोते हैं। तीन पहर तो तूफानी सोच के दायरे में ही चक्कर काटते रहते हैं। दुखन की मां रामशरण वहू के वारे में सोचने लगती है। ऊंची जाति, पक्की ईंटों का मकान और पर्याप्त धन-सम्पत्ति होते हुए भी रामशरण बहू का जीवन कितना दुःखी, निराश और पीड़ित है ! अपनी बातों से राम- शरण बहू की पीड़ा कम करने की कोशिश वह बराबर करती रहती है; लेकिन जानती है, जिन स्थितियों के बीच वे घिरी हैं, उससे वे कभी उवर नहीं पाएंगी। उनका अन्त उन्हींके बीच होगा दुखन की मां को याद है, एक बार रामशरण बहू को गोद लेने की वात उसने समझाई थी। समीर के गांव के मुंशीजी का उदाहरण भी दिया था। फिर गांव के लोगों ने भी उन्हें यह सलाह दी थी। इसके बाद संयोग- वश एक दिन गांव में किसी दूर शहर के अनाथालय के बच्चे चन्दा मांगने आए थे। उनमें से एक लड़का रामशरण बहू को पसन्द आ गया था। गांव के लोगों को भी वह खूब जंचाथा। वह बहुत सुन्दर और भोला-भाला लड़का था। उसकी उम्र लगभग आठ-नौ साल की थी। रामशरण बहू ने उस. लड़के को रख लिया। फिर उस लड़के पर वे अपनी जान छिड़कने लगीं। उसका लालन-पालन खूव दुलार-प्यार से करने लगीं। गांव के स्कूल में उसका नाम लिखवा दिया। उस लड़के को किसी भी बात की कोई तक- लीफ न हो, इसके प्रति वे पूरी तरह मुस्तैद रहने लगीं। उस लड़के को । ।

. पाकर वे अपने को धन्य समझने लगी थी। गांव के लड़को के बीच खेलता हुआ वह लडका उन्हें राजकुमारों की तरह लगता। उस लड़के को पाने के बाद उनके अन्तर की पीड़ा कम हो गई थी। उन्हें लगने लगा था, अब उनके लिए भी अपना कहने को कोई हो गया। अब उनकी मिट्टी पार लगाने, बुढापे में उनका साथ देने तथा उनकी जायदाद को संभालने वाला मिल गया। दुखन की मा को सारी बातें याद है, उन दिनो वे वरावर ही उसमें कहती कि मैं अपने बेटे को इंजीनियर बनाऊंगी। रामगरण वहू के मायके मे कोई इंजीनियर था जिसके परिवार को राई मे पर्वत वनते हुए उन्होंने देखा था, इसीलिए अपने गोद लिए बेटे को वे इजीनियर बनाने के प्रति कृतसंकल्प थी। लेकिन यहां भी उनके भाग्य ने साथ नहीं दिया। उस लड़के से भी घोखा सा गई। उनके सारे मंसूबो और सारी आशाओं पर पानी फेरकर एक रात वह लडका बक्से मे सचित करके रखे गए उनके रुपयो और गाडकर रखे गए जेवरों को लेकर भाग गया। उस लडके को वे अपने प्राणो से भी बढकर समझती थी। इसीलिए प्रारम्भ में तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। फिर जव विश्वास हुआ तब भी उन्हें लगा कि वह लड़का लोटकर जरूर उनके पास आएगा। उस लड़के को उन्होंने इतना प्यार किया था कि उनसे अलग हटकर उसके रहने की बात उन्हें अविश्वस- नीय लगती। लेकिन वे प्रतीक्षा करते-करते थक गई, वह नही आया। फिर इस घटना की रामशरण बहू के ऊपर अजीब प्रतिक्रिया हुई। वे महीनों तक एकदम गुमसुम बनी रही। मिर्फ टकटकी लगाए भून्य आकाश की ओर ताकती रहती । न कही आना-जाना, न कुछ बोलना-चालना । दुखन की मा द्वारा दस बात पूछे जाने पर किमी एक बात का जवाब देना। इसी बीच आकाग की ओर ताकते हुए ही कभी-कभी फूट-फूटकर रो पड़ना। एकदम पागलो जैसी स्थिति हो चली थी उनकी। उन दिनों उनको देखने पर यह सहज ही प्रतीत हो जाता कि वे विक्षिप्तावस्था की ओर जा रही है। लेकिन मयोग अच्छा था, वे पागल नहीं हुई। धीरे-धीरे ठीक हो गई। उसके बाद जब पुन.किसी बच्चे को गोद लेने की बात उनसे कनी जाती तो वे एकदम नकार देती। हालांकि लोग उन्हें समझाते कि । - मन खुशी होती है, बहुत ही अच्छा संदर्भ पेश किया उसने । वह देखती है, रामशरण वहू के चेहरे के भाव बदलने लगे हैं । वे अव पूरी तरह चित हो गई हैं । दुखन की मां के चेहरे पर विजय की एक मुस्कान खिल जाती है। रात का चौथा पहर गुजर रहा है। दुखन की मां और रामशरण बहू गांत होकर अव सोने का उपक्रम करने लगती हैं। लेकिन दुखन की मां के साथ ऐसा होता है कि एक बार जब उसकी नींद उचट जाती है तब फिर लाख प्रयत्न करने के बाद भी दुबारा नहीं आती। दुखन की मां देखती है, रामशरण बहू की पलकें झपकने लगी हैं। सारी रात मन के बोझ से वे सो नहीं पाई थीं। अब इस चौथे पहर कुछ हल्कापन महसूस कर सोने लगी हैं। दुखन की मां ने यह देखा है कि चितित, परेशान और व्यथित लोग अकसर रात के चौथे पहर में ही सोते हैं। तीन पहर तो तूफानी सोच के दायरे में ही चक्कर काटते रहते हैं। दुखन की मां रामशरण बहू के बारे में सोचने लगती है। ऊंची जाति, पक्की ईंटों का मकान और पर्याप्त धन-सम्पत्ति होते हुए भी रामशरण बहू का जीवन कितना दुःखी, निराश और पीड़ित है ! अपनी बातों से राम- शरण बहू की पीड़ा कम करने की कोशिश वह वरावर करती रहती है; लेकिन जानती है, जिन स्थितियों के बीच वे घिरी हैं, उससे वे कभी उवर नहीं पाएंगी। उनका अन्त उन्हीं के बीच होगा। दुखन की मां को याद है, एक वार रामशरण बहू को गोद लेने की बात उसने समझाई थी। समीर के गांव के मुंशीजी का उदाहरण भी दिया या। फिर गांव के लोगों ने भी उन्हें यह सलाह दी थी। इसके वाद संयोग- वश एक दिन गांव में किसी दूर शहर के अनाथालय के बच्चे चन्दा मांगने भाए थे। उनमें से एक लड़का रामशरण बहू को पसन्द आ गया था। गांव के लोगों को भी वह खूब जंचाथा। वह बहुत सुन्दर और भोला-भाला लड़का । उसकी उम्र लगभग आठ-नौ साल की थी। रामशरण वहू ने उस. ड़के को रख लिया। फिर उस लड़के पर वे अपनी जान छिड़कने लगीं। सका लालन-पालन खूब दुलार-प्यार से करने लगीं। गांव के स्कूल में सका नाम लिखवा दिया। उस लड़के को किसी भी बात की कोई तक- फि न हो, इसके प्रति वे पूरी तरह मुस्तैद रहने लगीं। उस लड़के को । ७६ / युद्धस्थल पाकर वे अपने को धन्य समझने लगी थी। गांव के लड़कों के बीच खेलता हुआ वह लड़का उन्हे राजकुमारों की तरह लगता। उस लड़के को पाने के बाद उनके अन्तर की पीड़ा कम हो गई थी। उन्हें लगने लगा था, अब उनके लिए भी अपना कहने को कोई हो गया। अब उनकी मिट्टी पार लगाने, बुढापे में उनका साथ देने तथा उनकी जायदाद को सभालने वाला मिल गया। दुखन की मा को सारी बातें याद हैं, उन दिनों वे वरावर ही उससे कहती कि मैं अपने बेटे को इंजीनियर बनाऊंगी। रामदारण बहू के मायके मे कोई इजीनियर था जिसके परिवार को राई से पवंत बनते हुए उन्होंने देखा था, इसीलिए अपने गोद लिए वेटे को वे इंजीनियर बनाने के प्रति कृतसकल्प थी। लेकिन यहां भी उनके भाग्य ने साथ नहीं दिया। उस लड़के से भी घोखा खा गई। उनके सारे मसूबो और सारी आशाओ पर पानी फेरकर एक रात वह लडका वक्मे मे मचित करके रखे गए उनके रुपयो और गाडकर रखे गए जेवरो को लेकर भाग गया। उम लडके को वे अपने प्राणो से भी बढकर समझती थी। इसीलिए प्रारम्भ मे तो उन्हे विश्वास ही नहीं हुआ। फिर जव विश्वास हुआ तब भी उन्हें लगा कि वह लड़का लौटकर जरूर उनके पास आएगा। उस लडके को उन्होंने इतना प्यार किया था कि उनसे अलग हटकर उसके रहने की बात उन्हें अविश्वस- नीय लगती । लेकिन वे प्रतीक्षा करते-करते थक गई, वह नहीं आया। फिर इस घटना की रामगरण बहू के ऊपर अजीब प्रतिक्रिया हुई। वे महीनो तक एकदम गुमसुम बनी रही। मिर्फ टकटकी लगाए गून्य आकाश की ओर ताकती रहती । न कही आना-जाना, न कुछ बोलना-चालना । दुग्पन की मा द्वारा दस बात पूछे जाने पर किसी एक वात का जवाब देना। इसी बीच आकास की ओर ताकते हुए ही कभी-कभी फूट-फूटकर गे पड़ना । एकदम पागलों जैसी स्थिति हो चली थी उनकी। उन दिनो उनको देखने पर यह सहज ही प्रतीत हो जाता कि वे विक्षिप्तावस्था की ओर जा रही हैं। लेकिन सयोग अच्छा था, वे पागल नही हुई। धीरे-धीरे टीक हो गई। उसके बाद जब पुन किसी बच्चे को गोद लेने की वान उनने कही जाती तो वे एकदम नकार देती। हालाकि लोग उन्हें समझाने किमि ।

बिल्कुल नवजात शिशु को वे गोद लें। वह उन्हें छोड़कर नहीं भागेगा। लेकिन वे कहतीं, "पराया खून कभी अपना नहीं हो सकता' 'भले ही वह न भागे "उन्हें अपना ही समझता रहे, दुनिया की नजर में भी वह उनका वेटा बन जाए, लेकिन क्या अपने अन्तर से वह उसे अपना वेटा मान सकेंगी अपने अन्तर की पीड़ा कम कर सकेंगी 'गोद लेकर बाहरी अभाव की पूर्ति की जा सकती है, भीतरी अभाव की पूर्ति नहीं...।" दुखन की मां देखती है, अव पौ फटने ही वाली है। वह पाती है, राम- शरण बहू गहरी नींद सो चुकी हैं। वह उन्हें जगाती नहीं है। सोचती है, रात-भर की जगी हैं, सोने दे, नींद पूरी हो जाने पर स्वयं जगेंगी। दुखन की मां अब तेजी से काम पर चल देती है। उसे शाम की तरह ही इस वक्त भी तीन-चार घरों में चौका-वर्तन का काम करना है। फिर लगभग आठ बजे के आस-पास वह यहां लौटेगी। इसके बाद रोज की तरह अपना तथा रामशरण बहू का खाना बनाने में जुट जाएगी। - समय बीतता जाता है। रामशरण बहू को इधर-उधर से तथा दुखन की मां के माध्यम से गांव की सारी सूचनाएं मिलती रहती हैं। दूधनाथ चौधरी का लड़का शहर के बड़े अस्पताल में पांच दिन रहने के बाद गांव लौट आया है। उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है। डाक्टरों के अनुसार, उसकी बीमारी काफी बढ़ चुकी है। उसके इलाज में असाधारण विलंब हुआ है। डाक्टरों ने कहा है कि पीलिया की बीमारी जल्दी नहीं जाती। उसमें महीनों लग जाते हैं। रोगी का चलना-फिरना बंद कर उसे विस्तरे पर पूरी तरह आराम दिया जाए तथा संयम-नियम का पालन करते हुए दवाओं का सेवन कराया जाए। डाक्टरों ने इस बात की ओर भी दूधनाथ चौधरी का ध्यान आकृष्ट किया है कि आपका लड़का जिस स्थिति में पहुंच गया है, उस स्थिति में सिर्फ ईश्वर ही उसे बचा सकते हैं, डाक्टरों का कोई वश नहीं। दूधनाथ चौधरी के लड़के के शहर से लौटने और उससे सम्बन्धित बातों की जानकारी प्राप्त करने के बाद गांव के ओझाओं ने मूंछों पर ताव देते हुए यह कहा है कि हम लोग तो कह ही रहे थे कि दवाई से कुछ होने ७८ / युद्धस्थल वाला नहीं। अगर कोई बीमारी होती तव न दवाई से फायदा होता, लेकिन इसपर तो डायन का प्रकोप है। ओझाओं को मन-ही-मन बहुत खुशी हुई है। वे तो ऐसे ही अवसर की प्रतीक्षा में थे। उनके लिए यह वक्त वहुत ही अनुकूल और उपयोगी है। प्रारभ मे दूधनाथ चौधरी के परिवार के जिन लोगों ने उनकी बात पर विश्वास नहीं किया था, अव उनका भी निर्णय डगमगाने लगता है। इस स्थिति से पूरा-पूरा फायदा उठाने के लिए ओझाओं ने कई तरह के मनगढत किस्सो का प्रचार करना शुरू कर दिया है कि रामशरण बहू एक लवे समय से इस लडके पर घात लगाए बैठी थी, कि जिम दिन यह लड़का पैदा हुआ, उसी दिन रामशरण बहू ने अपना पहला बाण इसपर छोडा था, कि जब यह लडका तीन साल का था तो गली में एक दिन इमे सेलते पाकर रामशरण बहू ने एक जड़ी इमे मुंघाई थी, कि रातों में कई वार मत्र के सहारे इस लड़के को वे अपने पास बुला चुकी हैं, आदि । दूधनाथ चौधरी के लड़के को लेकर प्रारंभ मे छिटफुट चर्चाएं ही थी; लेकिन अब गाव के इस छोर से उस छोर तक चर्चाए चलने लगती हैं। पूरे गांव में सनसनी की तरह यह खबर फैल गई है कि दूधनाय चौधरी का लड़का मरनासन्न है । डाक्टरों ने जवाब दे दिया है । ओझाओ के अनुसार, रामशरण बहू ने उमे कुछ किया है । दूधनाय चौधरी रामशरण बहू पर बहुत खफा हैं । इस बार वे रामशरण बहू को छोडेंगे नही, आदि। चूकि रामधारण बहू एक लंबे समय में इस गाव में रहती आ रही हैं, इसीलिए उन्हें यह सब पता है कि इस गांव में कहां कमी वातें होती हैं । उनके बारे मे भी जो बातें होती हैं, वह भी उनसे नहीं छिपती। अपनी पूरी उम्र इस गाव मे गुजार देने के बाद अब वे गाव के जर-जरें से परिचित हो गई हैं। गांव के प्रमुख स्थानो और वैठकों पर बातें चालू हैं । वरगद के नीचे श्यामजीसिंह, रामजी चौधरी, शिवपूजन महतो और धनराज यादव बातें कर रहे हैं। ये सभी बूढ़े हैं। इनकी गिनती इम गाव के अच्छे गृहस्थो में होती है। लेकिन बुढापा आ जाने की वजह से ये अव सेनी-गृहस्थी के कामो में स्वयं नही खट पाते। इनके बाल-बच्चो ने येती-बारी का काम लिया है। ये तो अव बरगद के नीचे बैठकर सिर्फ गप्पें लड़ा यद इसी बहाने अपना बुढ़ापा गुजारते हैं । इनमें से शिवपूजन महतो लान तो वरगद से सटा ही है, शेप लोगों के घर भी वरगद के पास इं। और गांवों में स्थित बरगदों की चाहे जैसी स्थिति रही हो, इस व के बरगद के नीचे तो सिर्फ वुड्ढों को वैठकें होती हैं । इससे पहले भी इढों की एक मंडली इस बरगद के नीचे बैठती थी। उनके गुजर जाने बाद अब ये नये बुड्ढे इस बरगद के नीचे बैठने लगे हैं। कभी-कभी तो गांव के दूसरे मुहल्लों के वुड्ढे भी यहां गप्प लड़ाने आ जाते हैं, इसीलिए इस स्थान को गांव के लोग 'वरगद के नीचे' कम, 'वुड्ढों का अड्डा' ज्यादा कहते हैं। चमरटोली की लड़ाई और वाद के दिनों में जब गांव की सारी वैठकें सूनी हो गई थीं, तब भी यहां बरावर ही दो-चार बुड्ढे नजर आ जाते थे। दरअसल, जिसके पांव खुद ही श्मशान की ओर बढ़ रहे हों, उन्हें मरने-कटने से क्या डर? वे निश्चित होकर यहां पूर्ववत् ही बैठते थे। और ताज्जुब यह है कि कभी कोई उनके ऊपर वार नहीं करता था। हालांकि गांव में पैदा होने वाली उस नई स्थिति के खिलाफ ही वे मंत्रणा करते थे। वह घटना आज शांत पड़ गई है, लेकिन गांव की स्थिति को न्मने पूरी तरह परिवर्तित कर दिया है। बरगद के नीचे बैठने वाले एक ज वर्ग के ये बुड्ढे बाहरी दबाव के चलते अब उस परिवर्तन का विरोध नहीं कर रहे हैं, लेकिन मन से उसे स्वीकार भी नहीं पा रहे हैं। उनको गता है, जो कुछ भी हुआ है, सब गलत हुआ है। भठयुग की यह पहचान । ऊंच-नीच का भेद मिट रहा है 'घोर अनर्थ, अत्याचार और पापों क युग आ गया। दूधनाथ चौधरी के लड़के को लेकर धनराज यादव कहते हैं, "रा शरण वहू को तो मैं शुरू से ही देखता आ रहा हूं."अब तो उसने अप प्रकोप कम कर दिया है, नहीं तो उसकी गली से गुजरते हुए भी लगता था।" धनराज यादव शायद अभी और कुछ कहते, ले उनकी बात बीच में ही काटकर श्यामजीसिंह बोलने लगते हैं, राज भाई, मैं अभी पिछले साल की बात बता रहा हूं।''रामशर एक दिन कहीं जा रही थीं। रास्ते में ठेगुआ का कुत्ता उन्हें देखकर . ८० | युद्धस्थल लगा। उन्होंने एक-दो बार डांट लगाई। लेकिन वह नहीं माना । तब उन्होंने आगे तरेरकर उसकी ओर ताकते हुए अपने आंचल के छोर में कुछ पोलकर उसके ऊपर फेंकना शुरू किया। मैंने तो अपनी आखों मे देवा नहीं, लेकिन जिन लोगों ने देखा है, वे कहते हैं कि वह कुत्ता वही गिरकर छटपटाने लगा। उसके बाद वह हपते-भर भी नहीं जी सका । मुंह से खून फेंकते-फैकन मर गया ।..मेरी तो इतनी लवी उम्र हो गई, लेकिन राम- दारण यह की तरह पककी डायन मैंने और कही नहीं देखी...।" अब शिवपूजन महतो, जो चुपचाप सुन रहे थे, वोल उटते हैं, "मैं तो भाई, डायन, भूत नहीं मानता। रामगरण बहू से मेरा कई वार आमना- सामना हुआ है, लेकिन मुझपर तो कभी उनका कोई असर नहीं पटा... में तो कहता हूं कि जो डायन है, वह अपना वाण मुझपर चलाए, लेकिन किमीने कभी अपना प्रभाव मुझे नहीं दिखाया।" इमपर रामजी चौधरी कहते हैं, "शिवपूजन, अगर तुम किसी डायन के परले पट गए होते तो तुम्हारी सारी नदी निकल गई होनी "सैर मनाओ, किसी डायन को कृषित दृष्टि तुम्हारे पर नहीं पड़ी।" फिर रामजी चौधरी बात को शिवपूजन महतो मे अलग कर रामगरण बहू पर केन्द्रिन कारते हुए कहते हैं, "रामशरण बहू को दूधनाथ चौधरी के लड़के पर वार नहीं करना चाहिए था । दूधनाथ के भाइयों के तो बहुत लडके है, लेकिन दूधनाथ के यही एक लड़का है । रामगरण बहू को अब इस चौथेपन मे यह गव छोड़ देना चाहिए। जिन्दगी भर नो उन्होंने शिकार किया हमी तरह दूधनाथ चौधरी के लड़के और रामगरण बहू को लेकर बरगद के नीचे बातें चल रही होती है। बरगद के नीचे के बंटकबाजों के बीच गियपूजन महतो की तरह के लोग एकाध ही होते हैं, जो अलग ढग में कुछ मोचते हैं। गप लोगों के विचार तो एक-दूसरे मे गुथे होते हैं। तनिक भी भिन्नता नहीं। बरगद के वंटकवाजों के मन में रामशरण बह के डायन होने के प्रति पक्का विश्वास है। उनके अनुमार, रामशरण बहू वास्तव में डायन है और उन्होंने दूधनाथ चौधरी के लडके को प्रमा है। वरगद के बाद गाव की दूसरी चटक हरि दादा का दासान है। हरि दादा तो बहुत पहले गुजर गए । अव उनके परिवार के लोग हैं। लेकिन दालान अभी भी उनके नाम से ही संबोधित होताहै। संपन्नता की दृष्टि से मुरारीसिंह के बाद गांव में हरि दादा के परिवार का ही दूसरा नंबर है। हरि दादा का दालान गांव का सबसे लंबा दालान है। हरि दादा ने यह सोचकर इतना लंवा दालान बनवाया था कि उनके घर के लड़के-लड़कियों की गादी में बारात कहीं और न ठहरकर उनके दालान में ही ठहर सके। अपने दालान को तैयार करने में हरि दादा ने पूरा खर्च किया था। उस खर्च में दो-तीन मकान बनवाए जा सकते थे। लेकिन हरि दादा को तो गांव के लोगों को यह दिखाना था कि उनके अन्दर इतनी सामर्थ्य है कि अपने दर- वाजे सौ-दो-सौ की संख्या में आनेवाली वारात को भी वे अपने यहां ठहरा लेंगे। लेकिन जहां हरि दादा के अपने इस्तेमाल के लिए उस दालान का प्रयोग दो-तीन बार हुआ, वहां गांव के लोगों के लिए आए दिन होने लगा। गांव में आने वाली अधिकांश वारातें हरि दादा के दालान में ही ठहरतीं। हालांकि इसके लिए लोगों को हरि दादा की अनुमति लेनी पड़ती। उस वक्त हरि दादा का सीना गर्व से फूल जाता जव लोग अपने यहां आई वारात को उनके दालान में ठहराने की अनुमति मांगने आते। हरि दादा के बाद भी यह परंपरा आज तक कायम है। लेकिन बारात तो रोज नहीं आती है। लगन के दिनों में और खास-खास लोगों के यहां ही वारात आती है। शेष दिनों में तो दालान खाली ही रहता है । अतः लोगों ने उसे वैठक बना दिया है। गांव की सबसे बड़ी इस बैठक में प्रायः विभिन्न पेशे और विभिन्न उम्र के लोग उपस्थित रहते हैं। लेकिन बहुलता तीस वर्ष से साठ वर्ष के भीतर वाले लोगों की ही रहती है । खेती-गृहस्थी के कामों में लगे लोग छुट्टी पा यहां अपनी एकरसता दूर करने, मन बहलाने या गप्पें लड़ाने आ जाते हैं। गहर की नौकरी से अवकाग ले गांव में आए अधिकांश लोग यहां स्वतः आ जाते हैं, क्योंकि यहां एकसाथ कई लोगों से मिलना-जुलना हो जाता है। गांव में सभी लोगों के अपने दालान नहीं हैं, फलतः ऐसे अनेक लोग सुबह-शाम खाना और नाश्ता के बाद आराम के लिए यहां विराजमान रहते हैं। हरि दादा के दालान पर गांव की सामयिक घटनाओं की चर्चा खूब । ८२ / युद्धस्थल । जमकर होती है। जितने मुंह, उतनी ही बातें। कभी-कभी किसी बात को लेकर विवाद उठ खड़ा होता है, तो कभी हल्ला-गुल्ला। चमरटोली की लड़ाई के वक्त मुरारीसिंह के लोगो को वैठकें अकसर इमी दालान में होती थी। बाद में इसी दालान में कई लोग मारे गए। इस दालान की दीवारों में जगह-जगह गोलियो के निशान हैं। बीच के दिनों में तो कुछ दिनों के लिए यह दालान एकदम मूना पड़ गया था। कोई यहा नजर नहीं आता। किन्तु स्थिति शात होने पर अव पुनः लोग यहा आकर बंटने लगे है। लेकिन अब उनकी बैठक की पहले वाली निर्भीकता सत्म हो गई है। जहा पहले यहा के वैठक्वाज रम ने-लेकर यह वतियाने कि कैसे अपने बनिहार को उन्होंने पीटा, अपने चरवाह को मार-पीटकर गांव मे भगा दिया, मजदूरी का रेट बढाने के लिए कहने वाले एक मजदूर का एक पर तोड दिया, गली से उनके गुजरने पर खटिया मे न उठने वाले एक चमार की उन्होंने खटिया उलट दी, लेकिन वही अब वे ऐसी बातें भूलकर भी अपनी जुबान पर नहीं लाते हैं। पिछले दिनो जो कुछ हुआ, उसने उन्हे दहशत से भर दिया है। फलत. भयवश वे अपनी पहली स्थिति से अलग हो गए हैं। लेकिन रामशरण बहू के मामले में बातचीत करते हुए उन्हें तनिक भी घबराहट नहीं होती है। उन्हें लगता है कि यह मामला तो बिलयुल निरा- मिप है। इसपर बातचीत करना कतई खतरनाक नहीं। हरि दादा के दालान पर रामशरण वह को लेकर तरह-तरह की बातें शुरू हो गई हैं। एक लम्बे समय बाद हरि दादा के दालान के बैठकबाजी को एक ऐसा विषय मिला है, जिसपर उन्मुक्त होकर वे बोलने लगे हैं। पिछले काफी दिनों में उनकी जुबान पर लटकते आ रहे नाले आज बुल गए हैं, फलत पहले की तरह बेहिचक वे अपनी बात कहने लगे हैं इम बैठक के एक आदमी का कहना है कि रामशरण बहू पी डायन है कि वह जिमे अपनी नजर पर चहा लेती है, उमे गीघ्र ही या जाती है। लेकिन एक-दूसरे आदमी का पहना है कि नहीं, यह अभी मफल डायन नहीं हुई है। अगर सफल डायन होती तो एक गिकार मे इतना समय नही लगाती। इसके बाद एक तीसरा आदमी गाव में प्रचलिन रामगरण बहू के विभिन्न कारनामों को उजागर करने लगता है। फिरक आदमी छापन ।

ओझाओं के बारे में अपने संस्मरण सुनाने लगता है। इसी वीच एक मी अपना अविश्वास प्रकट करता है। लेकिन तत्क्षण उस आदमी को -चार आदमीसमझाने लगते हैं। इलाके के डायन-ओझाओं के करिश्मों पा देवासों की कहानियों का जिक्र शुरू हो जाता है । अविश्वास प्रकट रने वाला वह आदमी अनेक लोगों के सामने हार मान जाता है। उसे यह मानने के लिए विवश होना पड़ता है कि यह सब सच है। इतने लोग झूठ कैसे बोलेंगे? कुछ और लोग, जिनके मन में अविश्वास की वात होती है, वे भी अव चुप रहते हैं । शायद हार मान गए हैं या शायद वहस में पड़ना नहीं चाहते हैं। एक आदमी का कहना है कि दोप सिर्फ रामशरण बहू का ही नहीं होगा, दूधनाथ चौधरी का भी होगा। डायन ऐसे ही किसीको नहीं असती है। जरूर उन दोनों में पहले ने कोई बात चली आ रही होगी। इसके बाद एक दूसरा आदमी कहता है कि दूधनाथ चौधरी को उसी वक्त रामगरण वहू को पकड़ लेना चाहिए था, जिस वक्त वह टोटरम करने उनके दरवाजे गई थी। इसी तरह लोग चटखारे ले-लेकर बातें कर रहे होते हैं। फिर लोग यह सम्भावना प्रकट करने लगते हैं कि अपने वेटे के कुछ हो जाने पर दूध नाथ चौधरी जरूर रामशरण बहू से बदला लेंगे। दूधनाथ चौधरी इन दिन बरावर ही रामशरण बहू को धमका रहे हैं, दूधनाथ की पत्नी उन्हें तर तरह की गालियां दे रही है। फिर लोग यह सुझाव देने लगते हैं कि डाय का माथा मुंडाकर उन्हें गदहे पर बैठाकर गांव में घुमाना चाहिए। उन आंखें फोड़ देनी चाहिए। उनके हाथ-पांव काट लेने चाहिए। उन्हें ज के अन्दर जिन्दा गाड़ देना चाहिए, आदि । इस बैठक में अनेक लोग अनेक तरह की वातें कहते हैं, लेकिन लोग चुपचाप सुन रहे हैं और मजा ले रहे हैं। उनकी इच्छा है कि ही कुछ घटित हो और वे तमाशा देखें । जगतनारायणसिंह का बड़ा वोधा, जिसकी उम्र तीस-पैंतीस के करीब होगी, देर से बैठक वैठा चुपचाप सुन रहा था, अव बोल उठता है, "मैं देर से सुन रह गांव में रामशरण बहू से बड़ी-बड़ी डायन हैं, लेकिन कोई उनका लेता। रामशरण वहू वांझ हैं और विधवा होकर वेसहारा हो ८४ / युद्धस्थल .. लोगों के मुह मे वडी-चही यातें निकलने लगी हैं।" इमपर एक आदमी व्यंग्य कमता है, "वेचारे को वाप की रमल पर तरम आ रहा है।" अव बोधा अपने को रोक नहीं पाता है । चिल्ला पडता है, "मुह संभालकर बात करो, नहीं तो जवान बीच लूंगा।" वह आदमी भीतैश में आ जाता है। कहता है, "अपनी अकड़ मुझको क्या दिपा रहे हो ? दूधनाथ चौधरी को दिखाना, तव मरद समझगा।" वोधा गुस्मे मे गरजता है, "देखता हूं, कोन रामशरण वह के पास जाता है" ""इस गांव में एक असहाम और अकेली औरत को लोग बेइज्जत करेंगे "नहीं, यह कभी नहीं होगा।" बोधा और उस आदमी के साथ यात बढते-वदतै गाली-गलौज के रास्ते हाथापाई तक पहुंच जाती है। फिर कुछ लोग वोधा को पकड़ लेते है और कुछ लोग उम आदमी को। माहौल गर्म हो जाता है। एक अरने के बाद इस बैठक का माहौल इस तरह गर्म होता है। लोगो को चमरटोली की लड़ाई से पहले की अपनी यह वैठर याद आ जाती है। इसी तरह गूब गरमा-गरम चर्चाए हुआ करती थी। चमरटोली की लडाई न तो में उनकी पहले की रुचि ही उनमे छीन ली थी। तौल-तौलकर और सोच-विचारकर कोई भी बात मुह में निकालनी पड़ती थी, क्योंकि हर वक्त यह भय बना रहता था कि कही धड में गर्दन अलग न हो जाए। लेकिन रामशरण बहू के इम मामले में वे पहले की तरह मोचने-विचारने के लिए अपने-आपको स्वतंत्र महसूस करने लगते है । वे जानते हैं कि एक बोधा नाराज है तो वह व्यक्तिगत कारणों से प्रेरित होकर हो। अगर रामशरण बहू के स्थान पर किमी और का नाम रहना तो बोधा भी नाराज नहीं होता। हरि दादा के दालान के बाद गाव की तोमरी बैठक पुस्तकालय की कोठरी है। गाव के पढ़े-लिखे लोगों ने चदा उगाहकर पुस्तकालय का निर्माण किया है। हालांकि इस पुस्तकालय की स्थापना में गाव के प्रथम ग्रेजुएट विनोदसाल की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होने न सिर्फ गाव वे पडे. लिसे लोगो का ध्यान ही इस ओर आकृष्ट किया है, बल्कि अपनी गौशाला को एक कोठरी भी पुस्तकालय के लिए मोप दी है।

-- नौर ओझाओं के बारे में अपने संस्मरण सुनाने लगता है। इसी बीच एक आदमी अपना अविश्वास प्रकट करता है। लेकिन तत्क्षण उस आदमी को तीन-चार आदमी समझाने लगते हैं । इलाके के डायन-ओझाओं के करिश्मों तथा देवासों की कहानियों का जिक्र शुरू हो जाता है । अविश्वास प्रकट करने वाला वह आदमी अनेक लोगों के सामने हार मान जाता है। उसे यह मानने के लिए विवश होना पड़ता है कि यह सब सच है। इतने लोग झूठ कैसे बोलेंगे? कुछ और लोग, जिनके मन में अविश्वास की बात होती है, वे भी अब चुप रहते हैं । शायद हार मान गए हैं या शायद बहस में पड़ना नहीं चाहते हैं। एक आदमी का कहना है कि दोप सिर्फ रामशरण बहू का ही नहीं होगा, दूधनाथ चौधरी का भी होगा। डायन ऐसे ही किसीको नहीं प्रसती है। जरूर उन दोनों में पहले से कोई बात चली आ रही होगी। इसके बाद एक दूसरा आदमी कहता है कि दूधनाथ चौधरी को उसी वक्त रामशरण बहू को पकड़ लेना चाहिए था, जिस वक्त वह टोटरम करने उनके दरवाजे गई थी। इसी तरह लोग चटखारे ले-लेकर बातें कर रहे होते हैं। फिर लोग यह सम्भावना प्रकट करने लगते हैं कि अपने वेटे के कुछ हो जाने पर दूध- नाथ चौधरी जरूर रामशरण बहू से बदला लेंगे। दूधनाथ चौधरी इन दिनों बराबर ही रामशरण बहू को धमका रहे हैं, दूधनाथ की पत्नी उन्हें तरह- तरह की गालियां दे रही है । फिर लोग यह सुझाव देने लगते हैं कि डायनों का माथा मुंडाकर उन्हें गदहे पर बैठाकर गांव में घुमाना चाहिए। उनकी आंखें फोड़ देनी चाहिए। उनके हाथ-पांव काट लेने चाहिए। उन्हें जमीन के अन्दर जिन्दा गाड़ देना चाहिए, आदि । इस बैठक में अनेक लोग अनेक तरह की बातें कहते हैं। लेकिन कुछ लोग चुपचाप सुन रहे हैं और मजा ले रहे हैं। उनकी इच्छा है कि जल्दी ही कुछ घटित हो और वे तमाशा देखें । जगतनारायणसिंह का बड़ा लड़क बोधा, जिसकी उम्र तीस-पैंतीस के करीव होगी, देर से बैठक के वीर बैठा चुगचाप सुन रहा था, अब बोल उठता है, "मैं देर से सुन रहा हूं, इर गांव में रामशरण वहू से बड़ी-बड़ी डायन हैं, लेकिन कोई उनका नाम नह लेता। रामशरण वहू वांझ हैं और विधवा होकर वेसहारा हो गई हैं । । गदम्थल - लोगो के मुंह मे बड़ी-बड़ी वातें निकलने लगी हैं।" इमपर एक आदमी व्यंग्य कमता है, "वेचारे को वाप की रमल पर तरम आ रहा है।" अब बोधा अपने को रोक नहीं पाता है । चिल्ला पडता है; "मुह मंभालकर बात करो, नही तो जवान खीच लूगा।" वह आदमी भी तैश में आ जाता है। कहता है, "अपनी अब मुझको क्या दिखा रहे हो ? दूधनाथ चौधरी को दिखाना, तब मरद समझूगा।" बोधागुस्मे में गरजता है, "देखता हूं, कौन रामशरण बहू के पास जाता है"इम गाव में एक असहाय और अकेली औरत को लोग वेइजत करेंगे "नहीं, यह कभी नहीं होगा।" वोधा और उस आदमी के साथ बात बढ़ते-बढ़ते गाली-गलौज के रास्ते हाथापाई तक पहुंच जाती है। फिर कुछ लोग योधा को पकड़ लेते हैं और कुछ लोग उस आदमी को। माहौल गर्म हो जाता है। एक अरने के याद इस बैठक का माहौल इस तरह गर्म होता है। लोगो को चमरटोली की लढाई मे पहले की अपनी यह बैठक याद आ जाती है। इसी तरह सूब गरमा-गरम चर्चाएं हुआ करती थी। चमरटोली की लडाई ने तो जैसे उनको पहले की रुचि ही उनमे छीन ली थी। तौल-तौलकर और सोच-विचारकर कोई भी यान मुह मे निकालनी पडती थी, क्योंकि हर वक्त यह भय बना रहता था कि कहीं धड मे गर्दन अलग न हो जाए। लेकिन रामशरण बहू के इस मामले में वे पहले की तरह मोचने-विचारने के लिए अपने-आपको स्वतन महमूस करने लगते है। वे जानते हैं कि एक बीघा नाराज है तो वह व्यक्तिगत कारणों में प्रेरिन होरर ही। अगर रामशरण बहू के स्थान पर किमी और का नाम रहता नो बीघा भी नाराज नहीं होता। हरि दादा के दालान के बाद गाव की तोमरी बैठक पुस्तकालय की कोठरी है । गाव के पढ़े-लिखे लोगो ने चदा उगाहकर पुस्तकालय का निर्माण किया है। हालाकि इस पुस्तकालय की स्थापना मे गाव के प्रथम ग्रेजुएट विनोदलाल की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने न सिर्फ गाव के पड़े- लिसे लोगो का ध्यान ही इस ओर आकृष्ट किया है, बल्कि अपनी गोशाला को एक कोठरी भी पुस्तकालय के लिए मौंप दी है।

नोझाओं के बारे में अपने सस्मरण सुनाने लगता है। इसी बीच एक सो अपना अविश्वास प्रकट करता है। लेकिन तत्क्षण उस आदमी को -चार आदमी समझाने लगते हैं। इलाके के डायन-ओझाओं के करिश्मों । देवासों की कहानियों का जिक्र शुरू हो जाता है । अविश्वास प्रकट ने वाला वह आदमी अनेक लोगों के सामने हार मान जाता है। उसे यह नने के लिए विवश होना पड़ता है कि यह सब सच है। इतने लोग झूठ से वोलेंगे? कुछ और लोग, जिनके मन में अविश्वास की बात होती है, वे भी अव चुप रहते हैं । शायद हार मान गए हैं या शायद वहस में पड़ना नहीं चाहते हैं। एक आदमी का कहना है कि दोप सिर्फ रामशरण बहू का ही नहीं होगा, दूधनाथ चौधरी का भी होगा। डायन ऐसे ही किसीको नहीं असती है। जरूर उन दोनों में पहले से कोई वात चली आ रही होगी। इसके बाद एक दूसरा आदमी कहता है कि दूधनाथ चौधरी को उसी वक्त रामगरण बहू को पकड़ लेना चाहिए था, जिस वक्त वह टोटरम करने उनके दरवाजे गई थी। इसी तरह लोग चटखारे ले-लेकर बातें कर रहे होते हैं। फिर लोग यह सम्भावना प्रकट करने लगते हैं कि अपने वेटे के कुछ हो जाने पर दूध- Tथ चौधरी जरूर रामशरण बहू से बदला लेंगे। दूधनाथ चौधरी इन दिनों बरावर ही रामशरण बहू को धमका रहे हैं, दूधनाथ की पत्नी उन्हें तरह तरह की गालियां दे रही है। फिर लोग यह सुझाव देने लगते हैं कि डायर का माथा मुंडाकर उन्हें गदहे पर बैठाकर गांव में घुमाना चाहिए। उन आंखें फोड़ देनी चाहिए। उनके हाथ-पांव काट लेने चाहिए। उन्हें जम के अन्दर जिन्दा गाड़ देना चाहिए, आदि। इस बैठक में अनेक लोग अनेक तरह की वातें कहते हैं; लेकिन लोग चुपचाप सुन रहे हैं और मजा ले रहे हैं। उनकी इच्छा है कि ही कुछ घटित हो और वे तमाशा देखें । जगतनारायणसिंह का वड़ा बोधा, जिसकी उम्र तीस-पंतीस के करीव होगी, देर से बैठक में बैठा चुपचाप सुन रहा था, अब बोल उठता है, "मैं देर से सुन रह गांव में रामशरण बहू से बड़ी-बड़ी डायन हैं, लेकिन कोई उनका लेना। रामशरण बहू वांझ हैं और विधवा होकर वेसहारा हो Y | युद्धस्थल लोगों के मुह मे वडी-बड़ी बातें निकलने लगी हैं।" इमपर एक आदमी व्यग्य कमता है, "वैचारे को वाप को बल पर तरम आ रहा है। अब वोधा अपने को रोक नहीं पाता है। चिल्ला पड़ता है, "मुह संभालकर बात करो, नहीं तो जबान खोच लूंगा।" वह आदमी भीतैश में आ जाता है। कहता है, "अपनी अकड़ मुझको क्या दिपा रहे हो? दूधनाथ चौधरी को दिवाना, तव माद समझूगा।" बोधागुस्म मे गरजता है, ' देवता हू, कौन रामशरण बहू के पाम जाना है।''इस गाव में एक असहाय और अली औरत को लोग बेइज्जत करेंगे ""नहीं, यह कभी नही होगा।" वोधा और उस आदमी के साथ बात वदते-बढ़ते गाली-गलौज के रास्ते हाया-पाई तक पहुंच जाती है। फिर कुछ लोग वोधा को पकड़ लेते हैं और कुछ लोग उस आदमी को। माहौल गर्म हो जाता है। एक अरमें के बाद इस बैठक का माहौल इस तरह गर्म होता है। लोगो को चमरटोली की लड़ाई से पहले की अपनी यह बैठक याद आ जाती है। इसी तरह मूब गरमा-गरम चर्चाएं हुआ करती थी। चमरटोली की लडाई ने तो जैसे उनकी पहले की रुचि ही उनमे छीन ली थी। तौल-तौलकर और सोच-विचारकर कोई भी बात मुह में निकालनी पड़ती थी, क्योकि हर वक्त यह भय बना रहता था कि कही धड मे गर्दन अलग न हो जाए। लेकिन रामशरण वह के दम मामले में वे पहले की तरह मोचने-विचारने के लिए अपने-आपको बतय महमूम करने लगते है। वे जानते है कि एक बोधा नाराज है तो वह व्यक्तिगत कारणो मे प्रेरित होरर ही । अगर रामदारण बहू के स्थान पर किसी और का नाम रहता नो बोधा भी नाराज नहीं होता। हरि दादा के दालान के बाद गाव बी नीमरी बैठक पुस्तकालय की कोठरी है । गाय के पढ़े-लिखे लोगो ने चदा उगाहकर पुस्तकालय का निर्माण किया है। हालांकि इस पुस्तकालय की स्थापना में गाव के प्रथम ग्रेजुएट विनोदलाल की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने न सिर्फ गाव के पडे- लिसे लोगो का ध्यान ही इस ओर आकृष्ट किया है, बल्कि अपनी गोगाना की एक कोठरी भी पुस्तकालय के लिए मौंप दी है। ।

। ओझाओं के बारे में अपने संस्मरण सुनाने लगता है। इस मी अपना अविश्वास प्रकट करता है। लेकिन तत्क्षण उस आदमी को न-चार आदमी समझाने लगते हैं । इलाके के डायन-ओझाओं के करिश्मों या देवासों की कहानियों का जिक्र शुरू हो जाता है । अविश्वास प्रकट रने वाला वह आदमी अनेक लोगों के सामने हार मान जाता है। उसे यह मानने के लिए विवश होना पड़ता है कि यह सव सच है। इतने लोग झूठ कैसे बोलेंगे? कुछ और लोग, जिनके मन में अविश्वास की वात होती है, वे भी अब चुप रहते हैं । शायद हार मान गए हैं या शायद बहस में पड़ना नहीं चाहते हैं। एक आदमी का कहना है कि दोप सिर्फ रामशरण बहू का ही नहीं होगा, दूधनाथ चौधरी का भी होगा। डायन ऐसे ही किसीको नहीं प्रसती है। जरूर उन दोनों में पहले से कोई वात चली आ रही होगी। इसके बाद एक दूसरा आदमी कहता है कि दूधनाथ चौधरी को उसी वक्त रामशरण बहू को पकड़ लेना चाहिए था, जिस वक्त वह टोटरम करने उनके दरवाजे गई थी। इसी तरह लोग चटखारे ले-लेकर बातें कर रहे होते हैं। फिर लोग यह सम्भावना प्रकट करने लगते हैं कि अपने वेटे के कुछ हो जाने पर दूध नाथ चौधरी जरूर रामशरण बहू से बदला लेंगे। दूधनाथ चौधरी इन दिन बराबर ही रामशरण बहू को धमका रहे हैं, दूधनाथ की पत्नी उन्हें तर तरह की गालियां दे रही है। फिर लोग यह सुझाव देने लगते हैं कि डा. का माथा मुंडाकर उन्हें गदहे पर बैठाकर गांव में घुमाना चाहिए। उ आंखे फोड़ देनी चाहिए। उनके हाथ-पांव काट लेने चाहिए। उन्हें के अन्दर जिन्दा गाड़ देना चाहिए, आदि । इस बैठक में अनेक लोग अनेक तरह की बातें कहते हैं; लेकि लोग चुपचाप सुन रहे हैं और मजा ले रहे हैं। उनकी इच्छा है हि ही कुछ घटित हो और वे तमाशा देखें । जगतनारायणसिंह का बड़ा वोधा, जिसकी उम्र तीस-तीस के करीब होगी, देर से बैठक वैठा चुपचाप सुन रहा था, अब बोल उठता है, "मैं देर से सुन गांव में रामशरण बहू से बड़ी-बड़ी डायन हैं, लेकिन कोई उनक लेता। रामशरण बहू वांझ हैं और विधवा होकर वेसहारा है ८४ / युद्धस्थल ? लोगों के मुह में बड़ी-बड़ी बातें निकलने लगी हैं।" इसपर एक आदमी व्यंग्य कसता है, "वेचारे को वाप वीरगल पर तरम आ रहा है।" अब वोधा अपने को रोक नहीं पाता है । चिल्ला पड़ता है, "मुह मभालकर बात करो, नही तो जवान खीच लूगा।" वह आदमी भी तैश में आ जाता है। कहता है, "अपनी अकड़ मुझको क्या दिग्गा रहे हो? दूधनाथ चौधरी को दिवाना, तब मरद समभूगा।" वोधा गुस्से में गरजता है, देखता हूं, कौन रामशरण बहू के पास जाता है" ""इम गाव मे एक असहाय और अकेली औरत को लोग बेइज्जत करेंगे "नही, यह कभी नहीं होगा।" बोधा और उस आदमी के माय बात वढ़ते-बढ़ते गाली-गलौज के रास्ते हाथा-पाई तक पहुंच जाती है। फिर कुछ लोग बोधा को पकड़ लेते हैं और कुछ लोग उस आदमी को। माहौल गर्म हो जाता है। एक अरने के बाद इस बैठक का माहौल इस तरह गर्म होता है। लोगो को चमरटोली की लड़ाई मे पहले की अपनी यह बैठक याद आ जाती है। इसी तरह ग्यूब गरमा-गरम चर्चाएं हुआ करती थी। चमरटोली की लडाई ने तो जने उनकी पहले की रुचि ही उनसे छीन ली थी। तौल-तौलकर और सोच-विचारकर कोई भी वात मुह मे निकालनी पडती थी, क्योकि हर वक्त यह भय बना रहता था कि कही घड में गर्दन अलग न हो जाए। लेकिन रामशरण बहू के दम मामले में वे पहले की नन्ह मोचने विचारने के लिए अपने-आपको स्वतत्र महमूम करने लगते है। वे जानते है कि एक बोधा नाराज है तो वह व्यक्तिगत कारणो मे प्रेरित होकर ही। अगर रामशरण बहू के स्थान पर विमी और का नाम रहता नो बोधा भी नाराज नहीं होता। हरि दादा के दालान के बाद गाव श्री नीमरी बंटक पुस्तकालय की कोठरी है। गांव के पढ़े-लिखे लोगों ने चदा उगाहकर पुम्नकालय का निमाण किया है। हालाकि इस पुस्तकालय की स्थापना मे गाव के प्रथम ग्रेजुएट विनोदलाल की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने न मिर्फ मात्र वे पटे- लिमे लोगों का ध्यान ही इस ओर आकृष्ट किया है, बल्कि अपनी गोगाला की एक कोठरी भी पुस्तकालय के लिए सौंप दी है। ।

स्तकालय की कोठरी में सुबह आठ बजे से लेकर रात नौ बजे तक युवकों की भीड़ लगी रहती है। स्कूल और कालेज में पढ़ने वाले तथा पढ़ाई-लिखाई समाप्त कर बेरोजगारी का दर्द झेलने वाले युवक हां अधिक जुटते हैं। लेकिन यहां आकर युवक पुस्तकें पढ़ने और उन- विचार-विमर्श करने में अपना समय नहीं गुजारते हैं। वे कभी-कभी पुस्तकें लेते और उनपर चर्चा करते हैं। शेप समय तो यहां बैठकर श खेलने और गप्प लड़ाने में ही बिताते हैं। किसीके दालान पर और भिभावकों के सामने गांव के लड़कों के लिए यह सब असंभव था, लेकिन पुस्तकालय की कोठरी ने इसे संभव बना दिया है। गांव के युवक एक जगह मिल सकें, इसके लिए पुस्तकालय की कोठरी एक जवरदस्त माध्यम वन गई है। इसीलिए यह पुस्तकालय कम, गांव के शिक्षित युवकों की बैठक ज्यादा हो गई है। इस बैठक मे स्कूल-कालेज की बातों, फिल्मी सूचनाओं और सामयिक घटनाओं की चर्चाओं के साथ गांव की लड़कियों को फंसाने की योजनाएं भी बनाई जाती हैं। यहां के युवक ग्रुपों में बंटे होते हैं। कुछ लोग कोठरी के उस कोने मे जाकर बैठ जाते हैं, तो कुछ लोग इस कोने में, तो कुछ लोग वीच में। कभी-कभार किसी बात को लेकर युवकों में गाली-गलौज और मारपीट भी हो जाती है। तव यह कोठरी बंद कर दी जाती है। लेकिन शीघ्र ही युवक विनोदलाल से आग्रह कर इसे पुनः खुलवाते हैं और पूर्ववव बैठने लग जाते हैं। चमरटोली की लड़ाई और उसके बाद के दिनों में इस कोठरी के वा इस तरह ताला लटकता नजर आता था कि लगता, यह कोठरी अवर खुलेगी ही नहीं। उस वक्त गांव में भी स्कूल-कालेज के लड़के बहुत नजर आते। दरअसल, बहुत सारे लड़कों को उनकी माताओं ने गां बदली हुई स्थिति से डरकर उन्हें गांव से अलग रिश्तों में भेज दिय कुछ लड़के शहर जाकर रहने लगे थे। बाद में जब स्थिति शांत हुई त लोटने लगे। पुस्तकालय की कोठरी का ताला भी खुल गया। उस से उस कोठरी में लड़के पुनः बैठने लगे। रामशरण बहू और दूधनाथ चौधरी के प्रसंग को लेकर जव . - ८६ / युद्धस्थल -- में बात चलती है तो दम कोठरी के युवको की प्रतिक्रिया वरगर और हरि दादा के दालान की प्रतिक्रिया में विरल भिन्न होती है। इने-गिने दो. तीन युवकों को छोड़कर, जो वरगद और हरि दादा के दालान की बातों के अन्यसमर्थक होते हैं, शेष मभी युवक इसका विरोध करते हैं। युवको के अनुसार यह एक सामाजिक रूति है। इस रूटि के चलते अकारण ही रामशरण यहू को बदनाम किया जा रहा है। यहा के युवको को भूत-प्रेत और डायन-ओझा की बातो में तनिक भी विश्वास नहीं। यहा के गुयक वहते है कि अगर डायनो मै मात्र के द्वारा किमीको यत्म भरने की क्षमता ही होती तो फिर सरकार अपने व्यापक उद्देश्य के लिए उनका इस्तेमाल क्यो नहीं करती? सीमाओ पर लड़ने के लिए सेना क्यो भेजनी पयो नही गांव-गांव से चुनकर डायनो को ही भेज देती, जो दूर गे ही दुश्मनो का सफाया करती रहती? पुस्तकालय की कोठरी के युवक आपस में बातचीत करते हुए यह यहीं हैं कि आज जब मनुष्य पंद्रलोक की यात्रा पर जा रहा है, विशान द्वारा जीवन की नमाम मुविधाएं मुहैया की जा रही हैं, यहा इस तरह की बातों पर विश्वास करना मूर्यता और पिछड़ेपन का ही परिचायक है। यहा के युवकों को यह लगता है कि उनके गाय के अशिक्षित और अविश्वामी लोगों ने ही इस तरह की धारणाओ को जिलाए रया है। यहा के युवको के अनुसार, जनजीवन मे व्याप्त इस तरह के दोग, पाखड-आहबर और अंधविश्वास वा पर्दाफाश होना चाहिए। जीवन के स्वाभाविक विकास में इनकी भूमिका अवरोधक की होती है। लेकिन रामशरण पहू को यह समझ में नहीं आता है कि पुस्तकालय को कोठरी में वंटने वाले युवक जब इस तरह के विचार रगते हैं, तब ये उमे व्यावहारिक रूप क्यो नहीं दे पाते है । रामशरण बहू न तो कई बार पाया है कि किसी गली में उनके गुजरने हा पुम्नकालय की कोठरी में छठने वाले युवक भी उनकी आपो में ओमल होने के लिए घर-उधर छिपने लगते हैं। उस वक्त रामगरण यहू को अजीब लगता है। उनरे सामने यह सवाल पडा हो जाता है कि जो युवक अपनी बेटा में पर मर्दानगी बघारते हैं, सामने पड़ने पर क्यों भीगी बिल्ली बन जाते हैं ? 4 सोचने-विचारने पर रामशरण बहू को इस सवाल का उत्तर भा ता है। उन्हें लगता है, स्कूल-कालेज में पढ़ने और गांव की हवा हर रहने के कारण ही ये युवक इन आग्रहों से विचारों के स्तर पर हो गए हैं। लेकिन सक्रिय जीवन के स्तर पर वे इसीलिए मुक्त नहीं रहे हैं कि उनके संस्कार आड़े आ जाते हैं । अपने संस्कारों से वे पूरी ह मुक्त नहीं हो पाते हैं। जब भी सक्रिय जीवन के स्तर पर इन धार- ओं के विरोध में कुछ करने की सोचते हैं कि संस्कारगत शंकाएं उन्हें पने लगती हैं-कहीं यह सच न हो ? कहीं इसका अंजाम बुरा न हो ए? इसीलिए ये युवक सिर्फ कहकर ही रह जाते हैं, कुछ कर नहीं गते। पुस्तकालय की कोठरी के बाद गांव की चौथी वैठक पाठशाला के कमरे में लगती है। गांव से बाहर बच्चों के पढ़ने के लिए पाठशाला का निर्माण किया गया है। पाठशाला में सिर्फ दो कमरे हैं और एक वरामदा। उसकी हालत ऐसी है कि एक कमरे में तो गुरुजी ने अपने मवेशियों का भूसा रख दिया है और दूसरे कमरे को तो कमरा कहना कमरों का उपहास उड़ाना होता है । उसका छप्पर उजड़ चुका है, दीवारें नूनी लगने की वजह : से झड़ रही हैं तथा खिड़कियां और दरवाजे कभी के गायव हो चुके हैं। वच्चे या तो इसी कमरे में बैठकर पढ़ते हैं या वरामदे में। लेकिन थोड़ी- सी धूप बढ़ जाने और हल्की-सी आंधी-पानी आ जाने पर भी गुरुजी को पाठशाला बंद करने का बहाना मिल जाता है। पाठशाला की बैठक का कोई एक निश्चित समय नहीं होता है। बच्चों की पढ़ाई के अनुसार ही उसका समय निर्धारित होता रहता है। गर्मिय के दिनों में जब पढ़ाई सुबह के समय होती है तब यहां दोपहर को बैठ लगती है, वाकी दिनों में शाम चार बजे के बाद । यहां की बैठक के सदर गांव के चरवाहे और उनकी तरह के ही लोग होते हैं। गांव के वे लड़के, पढ़-लिख नहीं सके या जिन्हें पढ़ने-लिखने के बाद नौकरी नहीं मिल स खेती-गृहस्थी में जुट गए। वे अपनी गाय-भैंसों को चराने जब गां वाहर निकलते हैं तो खेतों में अपने पशुओं को छोड़ स्वयं पाठशाल इसी उजड़ी कोठरी में आ वैठते हैं। फिर छिपकर गांजा पीने, जुआ ८८ ! युद्धस्थल - यौनाचार करने और गप लडाने आदि का मिलमिला शुरू हो जाता है। यहां के बैठकबाजों की दुनिया अपनी अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति और अपने मवेशियों की चर्चा के बीच ही मोमित होती है। लेकिन कभी-कभी जब किमी बात की चर्चा गांव मे जोर-गोर में चल रही होती है तब यहां भी उमपर विचार-विमर्श किया जाने लगता है। चमरटोली की लडाई के वक्त गाव की अन्य वंठनों की तरह यह बैठक भी खत्म हो गई थी। रातो में बाहर से आने वाले प्रातिकारी पाठशाला को इभी कोठरी मे ठहरते थे। उन दिनों यहां बच्चे भी पटने नहीं आते थे। अनिश्चित काल के लिए पाठगाला बंद कर दी गई थी। चरवाहे भी मवेशियों को लेकर बाहर नहीं निकलते थे। दरवाजे पर ही मवेशियों को बिला दिया जाता था। बाद में जब उपद्रव और हिमात्मक घटनाओ का कम बंद हुआ तब मवेशी पुन: बाहर निकलने लगे। नव यहां की वंटर पुनः लगने लगी। पहले इस बैठक में प्राय: गाव की मभी जातियों के लडके आते थे; लेकिन चमरटोली की लड़ाई के बाद जातिगत भावनाओं में प्रेरित होकर गाव की तथाकथित छोटी जाति के लडके अव दुमरी जगह बैठने लगे हैं । पोसरे के किनारे वर्षों में खाली पड़ी 'मौनिया माधु की कुटिया' को उन्होंने अपनी बैठक बना लिया है । मौनिया माधु जव तक जिन्दा थे, नव तक उम कुटिया का अपना एक अलग महत्त्व था। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद वह मुटिया एक्दम लावारिम हो गई है। गाव में ऐमी चर्चा है कि गनों में उम कुटिया मे कभी चोर चोरी का माल वाटते हैं तो कभी कोई औरत-मदं गाव मे छिपकर अपनी पारीरिक प्यास बुझाने उममें जाने हैं। लेकिन दिन मैं तो चरवाहे ही उम कुटिया में नजर आते हैं। उस दुटिया के चरवाही की बैठक भी कमोवेश पाठमाला की बैठक की तरह ही होती है--विचार और कार्य दोनो स्तरो पर समानता लिए हुए। इधर गर्मी के मौसम की वजह ने पाटगाला की वंठक दोपहर को लगने लगी है। बच्चे पढकर मुबह ही लौट जाते हैं । फिर चरवाहे आ जुटते हैं । इसके बाद वात गुरू हो जाती हैं। रामगरण बहू और दूधनाथ चौधरी के लड़ने की चर्चा छिडने पर इम जा एक चरवाहा, जिसका घर दूधनाथ चौधरी के पास ही है, बहुत स्यपूर्ण शब्दों मे विस्तार के साथ यह सुनाने लगता है कि कैसे इन दूधनाथ चौधरी के यहां ओझाओं का जमघट लगा रहता है । इलाके क से एक नामी ओझा आए हैं। कुछ ओझा ध्यान में डूबकर यह वता हैं कि रामशरण बहू ने कब और कैसे इस लड़के को अपनी चपेट में या। रामशरण बहू इस लड़के को मारने के लिए इस समय क्या-क्या ग-जप कर रही हैं, उस सवका आंखों-देखा हाल कुछ ओझा बता रहे हैं। धनाथ चौधरी के लड़के की हालत दिन-ब-दिन खराव होती जा रही है। दूधनाथ चौधरी कह रहे हैं कि इस बार वे रामशरण वहू को छोड़ेंगे नहीं। उसकी ऐसी दुर्गति करेंगे कि फिर वह सदा के लिए यह काम छोड़ देगी। दूधनाथ चौधरी के पास के चरवाहे की बात ध्यान से सुनने के बाद पाठशाला की बैठक के प्रायः सभी चरवाहे रामशरण वहू को डायन मान- कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगते हैं। उनमें से कुछ बुढ़ापे के चलते रामशरण वहू के डरावने हुए चेहरे का वर्णन करने लगते हैं। फिर गांव के नरे-बुजुर्गो द्वारा सुनाए गए डायन और ओझाओं के किस्से कहने-सुनने गते हैं। इसके बाद उनमें से एक चरवाहा यह भेद की बात बताता है कि यन की नजर पड़ जाने पर जमीन में थूक देने और उस थूक को अपने र मे मिटा देने के बाद डायन की नजर नहीं लगती। इसी तरह वे देर तक बातचीत करते रहते है। पाठशाला के कमरे के बाद गांव की पांचवीं बैठक केतुसिंह के वगी मे लगती है। केतुसिंह उस गांव के मुरारीसिंह और हरि दादा की त ही एक अमीर किसान हैं। उनका बगीचा गांव के विल्कुल पास है। उ बगीचे में आम, अमरूद और महुआ के पेड़ हैं। केतुसिंह के खेत बगीचे से ही शुरू हो जाते हैं। अपने खेतों की सिंचाई के लिए केतु अपने बगीचे में वोरिंग लगवाई है। अब उनके खेत सूखे की चपेट में आते। अपने खेत पटाने के बाद भाडे पर औरों का खेत भी पटाते तरह वोरिंग से वे दोहरा फायदा उठाते हैं। पेड़ों की छांव में, बोरिंग के नीचे केतुसिंह और उनके लोगों बराबर ही लगी रहती है। केतुसिंह के खेतों में काम करने वाले १० | युद्धस्थल और मजदुर यही आकर मुम्नाने हैं। आसपास के सेतों में काम करने वाले मजदूर भी ठंडक-पानी के लिए यहीं पहुंचते हैं। इघर के खेतों में काम करने वाले मजदूरों की पलियां उनका साना लेकर यही जुटती हैं। इसके साय गर्मी के दिनों में गांव के भीतर की उमस से ऊबकर कई लोग यहां आ जाने हैं। इस तरह यहां की बैठक सदाबहार चलती रहती है। यहां की बैठक मे सेत-खलिहान और गांव की सामयिक वातों की चर्चा होती है। सायही रामायण के किसी-न-किसी प्रसंग पर जिक्र जरूर खिड़ जाता है। असल में केतुतिह के पिता रामाधारसिंह इस गांव के मशहूर रामायणी हैं। वे इलाके में भी रामायण-पूजा और रामायण-सम्मेलनों में भाग लेने जाते हैं। इस गांव में बरगद के नीचे श्रीमन् नारायणजी या अन्य किसी कथावाचक के आगमन पर रामायण-पाट की व्यवस्था वे ही करवाते हैं। यहां अपने बोरिंग पर भी उपस्थित लोगों के बीच रामायण की कोई चौपाई फेंक उसपर चर्चा प्रारंभ कर देते हैं। कई बार उनकी यह रामा- यम-चर्चा वहां उपस्थित लोगों को उबाऊ प्रतीत होती है। लेकिन वे कुछ पते नहीं। दम साधे चुपचाप सुनते रहते हैं। सोचते हैं, रामायण के खिलाफ बोलने पर पाप लगेगा। भगवान की चर्चा में विघ्न उपस्थित करने का दोप लगेगा। इसके चलते शायद उनका कुछ अहित भी हो जाए। लेकिन कभी-कभार कुछ लोग अपने को रोक नहीं पाते हैं। कह उठते हैं, "रामाधार दाबा, आज रामायण का प्रसंग रहने दिया जाए।" इसपर रामाधारसिंह एक्दम दिगढ़ उठते हैं। कहते हैं, "रामायण का प्रचंग छोड़कर चिनार दान किया जाए"मुक्ति रामायण की चर्चा मेंही है"ार लोगों पर दम कलियुग का प्रभाव है" हरि की चर्चा छोड दूसरी चर्चा करना चाहते हैं। 'दाबा तुलसीदास ने एक जगह लिखा है- 'पूर्वजन्म के पाप ने हरि-चर्चा न मुहाय । जैते रचि बुलार की अन्न देखि हुलिया। फिर रामाधानिह समझाने लगते है, "आपलोगो को नियमिन रामा- पा-पाठ करना चाहिए। मन के विशार का परिकार, आत्मा की शुद्धि और परलोक मे स्वर्ग की प्राप्नि--रामायण के रास्ते ही नंभव है। इन नदनागर ने राम-मत्तिही आपको पारलगाएगी।" इसके बाद रामाधार- " कुछ नहीं । । मिह वाल्मीकि, अजामिल और गणिका की कहानी विस्तार के साथ बताने लगते हैं कि राम-भक्ति से कैसे उनका बेड़ा पार लगा। रामायण का प्रसंग बंद कराने वाले लोग अव चाहकर बोल पाते हैं। रामाधारसिंह की बातें यह सोचने के लिए उन्हें वाध्य कर देनी हैं कि रामायण भगवान की कहानी है। इस सृष्टि के संचालक की। घर-घर में उनकी पूजा होती है । उसका महत्त्व हर जगह है। उन्हें रामा- यण के प्रसंग को नहीं रुकवाना चाहिए। उनपर दोप लगेगा। वे दंड के भागी होंगे। फलतः वे दुवारा कुछ नहीं कह पाते हैं । चुपचाप सुनते रहते हैं । चमरटोली की लड़ाई के वक्त इस वैठक का अस्तित्व भी छिन्न-भिन्न हो गया था। धीरे-धीरे यहां लोगों की संख्या कम होती गई थी। एक रात जव बोरिंग की कोठरी में सोए केतुसिंह के बड़े भाई फागुसिंह की हत्या हुई तब यहां की बैठक एकदम सूनी पड़ गई। आधी रात को नारे लगाते हुए कुछ लोग आए थे और फागुसिंह की हत्या करके चले गए थे। उसके वाद यहां की बैठक एकदम भयावह बन गई। यहां बैठने वाले लोग फागु- सिंह की बड़ी-हड़ी आंखें और कड़ी-कड़ी मूछे भुलाए नहीं भूल पाते। उन्हें लगना, फागुसिंह उस बोरिंग वाली कोठरी में है। बदला लेने के लिए वे अब निकले कि तब निकले। बोरिंग की कोठरी में काफी दिनों तक ताला झूलता रहा। खेत पटवन के अभाव में सूखते रहे । सिर्फ मार-काट का माहौल ही बना रहा। बाद में जब स्थिति धीरे-धीरे शांत हुई तव केतुसिंह ने अपने बोरिंग की बैठक पुनः ताजा की। हालांकि उनके भाई की हत्या के बाद वह बोरिंग 'भुतहा बोरिंग' के नाम से प्रचलित हो गई थी। लोग वहां जाने से डरने लगे थे। लोगों के अन्दर यह धारणा पुष्ट हो चली थी कि स्वाभाविक मृत्यु न मर- कर हत्या से मरने के कारण फागुसिंह प्रेत हो गए हैं। लेकिन केतुसिंह ने वहीं सत्यनारायण भगवान की कथा का आयोजन कर उस जगह को पवित्र किया तथा लोगों को वहां जुटाने के लिए खर्च करना शुरू किया। उस समय वहां आने वाले प्रायः सभी लोगों को केतुसिंह खैनी, बीड़ी और गांजा देते। इस तरह जल्द ही वहां की बैठक को केतुसिंह ने पुनः आबाद कर दिया । लेकिन पहले की अपेक्षा स्थिति अब काफी बदल चुकी है। जहां पहले - -- ६२ / युद्धस्थल वोरिंग से फागुसिंह की एक आवाज लगाने पर मजदूर कांप उठते थे, वहां अब केतुसिंह के लाख चिल्लाने पर भी मजदूरो पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है। वे गहर के मजदूरों की तरह समय देखकर काम पर आते है और समय देखकर जाते है। रोज मजदूरी में कमी और विलय होने पर केतुमिह मे लड वैठते है । पहले की भांति केतुसिंह अव पेडो में वाधकर उन्हें पीटने तथा बोरिंग की कोठरी मे ले जाकर बिजली के तार का झटका लगाने मे डरते हैं । फागुसिंह की निर्मम हत्या ने उन्हे कही बहुत अंदर तक दला दिया है। इस बैठक मे रामशरण बहू और दूधनाथ चौधरी के लडके की चर्चा जब चलती है तो बूढे रामाधारसिंह रामगरण बहू को दोपी बताते हुए इस गाव की एक दिवंगत डायन सिराज बहू की कहानी सुनाने लगते हैं कि कने जब वे बच्चे थे और सिराज वहू ने एक बार उन्हे टोक दिया था तो वे इस तरह बीमार पड़े थे कि बहुत मुश्किल से बच पाए थे। मिराज बहू को दो-तीन घटनाए सुनाने के वाद रामाधारसिंह राम- चरित मानस में आए भूत-प्रेत के प्रसंग की चर्चा छेड देते हैं । वहा उपस्थित और लोग अपने से कुछ न कह रामाधारसिंह की वातो को ही हां-हू कह- कर मुनते रहते हैं। दरअसल, रामाधारसिंह को यह खासियत होती है कि वह अपनी बैठक में सबोके ऊपर पूरी तरह हावी हो जाते है। किसीको कुछ बोलने नहीं देते। स्वय ही वोलते रहते हैं। केतुमिह के बगीचे के बाद गांव की छठी बैठक नरेश चौधरी के खलि- हान में लगती है। वैसे तो गाव मे सेती-गृहस्थी करने वाले प्राय सभी लोगो के अपने खलिहान है, लेकिन नरेश चौधरी का खलिहान गाव के विल्कुल पास और गाव का सबसे बडा खलिहान है । गाव मे वैसे तीन-चार गृहस्थ हैं, जिनके पास खलिहान के लिए गाव के करीब जमीन नहीं है और वे गाव से काफी दूर खलिहान नहीं करना चाहते हैं फलत. वे नरेश चौधरी की अनुमति पा उनके खलिहान का ही इस्तेमाल करते है। इस तरह नरेग चौधरी के खलिहान में दम-पद्रह की मस्या में लोग अकसर ही मौजूद र हैं । इसके साथ आसपास के खलिहानो के लोग भी बातचीत सुनने के लं में यहा आ धमकते है । साथही हजाम, धोबी, कुम्हार, कहार, वारी अ । सिंह वाल्मीकि, अजामिल और गणिका की कहानी विस्तार के साथ बताने लगते हैं कि राम-भक्ति से कैसे उनका वेडा पार लगा। रामायण का प्रसंग बंद कराने वाले लोग अब चाहकर भी कुछ नहीं बोल पाते हैं। रामाधारसिंह की बातें यह सोचने के लिए उन्हें वाध्य कर देती हैं कि रामायण भगवान की कहानी है। इस सृष्टि के संचालक की। घर-घर में उनकी पूजा होती है। उसका महत्त्व हर जगह है। उन्हें रामा- यण के प्रसंग को नहीं रुकवाना चाहिए। उनपर दोप लगेगा। वे दंड के भागी होंगे। फलत: वे दुवारा कुछ नहीं कह पाते हैं। चुपचाप सुनते रहते हैं । चमरटोली की लड़ाई के वक्त इस बैठक का अस्तित्व भी छिन्न-भिन्न हो गया था। धीरे-धीरे यहां लोगों की संख्या कम होती गई थी। एक रात जब बोरिंग की कोठरी में सोए केतुसिंह के बड़े भाई फागुसिंह की हत्या हुई तव यहां की बैठक एकदम सूनी पड़ गई। आधी रात को नारे लगाते हुए कुछ लोग आए थे और फागुसिंह की हत्या करके चले गए थे। उसके बाद यहां की बैठक एकदम भयावह बन गई। यहां वैठने वाले लोग फागु- सिंह की बड़ी-बड़ी आंखें और कड़ी-कड़ी मूंछे भुलाए नहीं भूल पाते। उन्हें लगता, फागुसिंह उस वोरिंग वाली कोठरी में है। वदला लेने के लिए वे अव निकले कि तब निकले। बोरिंग की कोठरी में काफी दिनों तक ताला झूलता रहा । खेत पटवन के अभाव में सुखते रहे । सिर्फ मार-काट का माहौल ही बना रहा। बाद में जव स्थिति धीरे-धीरे शांत हुई तव केतुसिंह ने अपने बोरिंग की बैठक पुनः ताजा की। हालांकि उनके भाई की हत्या के बाद वह वोरिंग 'भुतहा बोरिंग' के नाम से प्रचलित हो गई थी। लोग वहां जाने से डरने लगे थे। लोगों के अन्दर यह धारणा पुष्ट हो चली थी कि स्वाभाविक मृत्यु न मर- कर हत्या से मरने के कारण फागुसिंह प्रेत हो गए हैं। लेकिन केतुसिंह ने वहां सत्यनारायण भगवान की कथा का आयोजन कर उस जगह को पवित्र किया तथा लोगों को वहां जुटाने के लिए खर्च करना शुरू किया। उस समय वहां आने वाले प्रायः सभी लोगों को केतुसिंह खैनी, बीड़ी और गांजा देते। इस तरह जल्द ही वहां की बैठक को केतुसिंह ने पुन: आवाद कर दिया। लेकिन पहले की अपेक्षा स्थिति अब काफी बदल चुकी है । जहां पहले १२ / युद्धस्थल बोरिंग से फागुसिंह की एक आवाज लगाने पर मजदूर काप उठते थे, वहा अब केतुसिंह के लाख चिल्लाने पर भी मजदूरी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है। वे शहर के मजदूरों की तरह समय देखकर काम पर आते है और समय देखकर जाते है। रोज मजदूरी मे कमी और विलव होने पर केतुमिह से लड बैठते हैं। पहले की भाति केतुसिंह अब पेड़ो से वाधकर उन्हें पीटने तथा बोरिंग की कोठरी मे ले जाकर विजली के तार का झटका लगाने में डरते हैं । फागुसिंह की निर्मम हत्या ने उन्हे कही बहुत अदर तक दहला दिया है। इस बैठक मे रामशरण बहू और दूधनाथ चौधरी के लड़के की चर्चा जब चलती है तो बूढे रामाधारसिंह रामशरण बहू को दोषी बताते हुए इस गाव की एक दिवंगत डायन सिराज बहू की कहानी सुनाने लगते है कि कैने जब वे बच्चे थे और सिराज बहू ने एक बार उन्हे टोक दिया था तो वे इस तरह बीमार पड़े थे कि बहुत मुश्किल मे बच पाए थे। सिराज बहू की दो-तीन घटनाए सुनाने के बाद रामाधारसिंह राम- चरित मानस में आए भूत-प्रेत के प्रसंग की चर्चा छेड़ देते हैं । वहां उपस्थित और लोग अपने से कुछ न कह रामाधारसिंह की बातो को ही हां-हूं कह- कर सुनते रहते है। दरअसल, रामाधारसिंह की यह खासियत होती है कि वह अपनी बैठक मे सबोके ऊपर पूरी तरह हावी हो जाते है। किमीको कुछ बोलने नहीं देते । स्वयं ही वोलते रहते हैं। केतुसिंह के बगीचे के बाद गांव की छठी बैठक नरेश चौधरी के खलि- हान में लगती है। वैसे तो गांव मे खेती-गृहस्थी करने वाले प्रायः मभी लोगो के अपने खलिहान हैं, लेकिन नरेश चौधरी का खलिहान गाव के विल्कुल पास और गांव का सबसे बडा खलिहान है । गाव मे वैमे तीन-चार गृहस्थ हैं, जिनके पास खलिहान के लिए गांव के करीव जमीन नहीं है और वे गांव से काफी दूर खलिहान नहीं करना चाहते हैं फलतः वे नरेश चौधरी की अनुमति पा उनके खलिहान का ही इस्तेमाल करते हैं। इस तरह नरेश चौधरी के खलिहान मे दम-पंद्रह की संख्या में लोग अकसर ही मौजूद रहने हैं। इसके साथ आसपास के खलिहानों के लोग भी बातचीत सुनने के लोभ में यहा आ धमकते हैं। साथ ही हजाम, धोबी, कुम्हार, कहार, वारी आदि . भी दवनी के अपने हिस्से के अनाज के लिए यहां जुटे रहते हैं। इसके अतिरिक्त गांव के पुरोहित भी अपने हिस्से के लिए विराजमान रहते हैं। दरअसल, भरतपुर गांव में यह परंपरा एक लंबे समय से चली आ रही है कि ब्राह्मण, हजाम, धोवी, कुम्हार, कहार, वारी आदि विभिन्न पेशा वाले लोगों का मेहनताना गांव के लोग एक ही वार अनाज होने पर देते हैं और वह खलिहान में। इसीलिए दवनी के वक्त हर खलिहानों में पुरोहित और दवनी के परिवार के लोग अपने हिस्से के लिए जुटे रहते हैं। नरेश चौधरी के खलिहान की वैठक वर्ष-भर नहीं चलती है। सिर्फ खरीफ और रब्बी की दवनी के दिनों में ही यहां वैठक लगती है। नरेश चौधरी के खलिहान के एक कोने में जामुन का एक बहुत ही घना वृक्ष है। उसके नीचे पुआल बिछाकर कुछ लोग इत्मीनान से बैठे रहते हैं तथा कुछ लोग खलिहान में दवनी तथा ओसवनी करते रहते हैं। यहां की बैठक के लोगों की बातें अकसर ही अपनी फसल को लेकर होती हैं कि देखें, इस साल कितना अनाज पैदा होता है ! परसाल इतने खेत में इतना अनाज हुआ था, पर साल खाद नहीं मिला. था, इस साल पानी का पूरा इंतजाम नहीं होने के कारण फसल बहुत अच्छी नहीं थी। दवा छिड़कने पर भी फमलों के कीड़े समाप्त नहीं हुए थे। फलां की फसल बहुत अच्छी है और फलां इस बार फिर बाजी मार ले जाएगा, आदि। चमरटोली की लड़ाई के बाद पहलाआक्रमण इसी खलिहान पर हुआ था। चमरटोली जलाए जाने के दो महीने के अन्दर हीएक रात कुछ लोग ने इस खलिहान में आग लगा दी थी। इस खलिहान में एकसाथ चार-पांच लोगों के पुआल के टाल थे। आग लगने के वाद भयंकर दृश्य उपस्थित हं गया था। लोगों के लाख पानी फेंकने गौर इन्तजाम करने के बाद भी को पुआल का टाल नहीं बचा। उसके बाद इस खलिहान में एक लंबे सम तक राख का ढेर लगा रहा। फिर वरसात के पानी ने इसे धीरे-धीरे सा करना शुरू किया। इसके बाद वातावरण शांत होने पर पुनः इस खलिहा में वैठक जमने लगी। लेकिन इस बीच स्थितियों में काफी परिवर्तन : गया है। अब खलिहानों में काम करने वाले वनिहारों और मजदूरों चुप्पियां टूट गई हैं। रोज मजदूरी के लिए अब उन्हें गिड़गिड़ाना न १४ | युद्धस्थल पड़ता है। जितना काम करते हैं, उतना अनाज लड़कर ले लेते हैं। कई वधुआ मजदूरों ने मुक्ति पाती है। कई लोग जो डर मे बनिहारी करत ये, अब बनिहारी छोडकर दूसरे अपने मनोनुकूल कामो मे लग गए इस सलिहान में जब रामशरण बहू और दूधनाथ चौधरी के लड़के की बात चलती है तो वहुत लोग जिज्ञासा प्रकट करने लगते हैं कि कैसे क्या हुआ। असल मे यहा के कई लोग खेती-गृहस्थी के कामो मे इस तरह मशगूल होते हैं कि इस सूचना से विल्कुल अनभिज्ञ रहते हैं। इसपर जो लोग इस सूचना से परिचित होते हैं, वे पूरी कहानी शुरू में बताने लगते है कि कैसे रामशरण बहू रामायण मे लौटकर आते हुए दूधनाथ के चबूतरे पर बैठी थी, कि कैसे दूधनाथ चौधरी कालडका अब मरने ही वाला है, कि डाक्टरो ने उसे जवाब दे दिया है। लेकिन एक आदमी अभी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाता है कि कोई दूसरा आदमी यह बताना शुरू कर देता है कि असल बात वह नही, यह है"। और लोग एक ही बात को थोडा घुमा-फिराकर सुनाते रहते हैं। इस बैठक में देर तक सिर्फ यही होता रहता है । लोग अलग-अलग अपनी प्रतिक्रिया नहीं दे पाते हैं । असल में अपनी पूरी चेतना के साथ दवनी में जुटे होने के कारण लोग सिर्फ इस घटना से एक-दूसरे को अवगत भर ही करा पाते हैं, अपनी वात नहीं कह पाते। नरेश चौधरी के खलिहान के बाद गांव की सातवीं बैठक पुलिया पर जमती है । पश्चिमी दिशा में गांव से होकर जो सडक बाहर जाती है, उसी- पर इसका निर्माण हुआ है। पहले जब पुलिया का निर्माण नहीं हुआ था, बरसात में इस जगह की सडक टूट जाती थी। दोनो ओर के जलाशयो का पानी टूटी सडक के बीच जमा हो जाता था। तव इम सड़क से होकर गांव से बाहर निकलना काफी मुश्किल होता था। पानी में तैरकर टूटी सड़क की दूरी तय करनी होती थी। लेकिन पुलिया के बन जाने के बाद अब यहां की सड़क नही टूटती। जलाशयों का पानी पुलिया के नीचे में होकर गुजरता रहता है। इस पुलिया के निर्माण को भी अपनी एक विचित्र कहानी है। गाव -- -- , के लोग प्रयास करके थक गए थे, लेकिन सरकार की ओर से इसके निर्माण को कोई सुगबुगाहट नही । वह तो संयोग था कि अपने चुनाव-प्रचार के दौरान एक दिन एक नेता की गाड़ी इसमें आ फंसी । वह वरसात का नहीं, गर्मियों का मौसम था। नेताजी अपनी पार्टी के प्रचार के लिए अपने क्षेत्र के गांवों के दौरे पर निकले थे। इस जगह की टूटी सड़क देख उनका ड्राइवर एक क्षण के लिए रुका। फिर उसे लगा, रास्ता ठीक है। उसने गाड़ी आगे बढ़ा दी। लेकिन यहां ड्राइवर की नजर चूक गई थी। हालांकि टूटी सड़क के बीच का पानी सूख गया था, लेकिन कीचड़ अभी नहीं सूखी थी। धूल की एक हल्की परत कीचड़ के ऊपर चढ़ गई थी, जिससे उसका गीलापन ढंक गया था। यहां ड्राइवर धोखा खा गया। उसकी गाड़ी टूटी सड़क के बीच कीचड़ में जा फंसी। इसके बाद ड्राइवर कोशिश करके थक गया, वह गाड़ी नहीं निकली। तब नेताजी ने गांव में प्रवेश कर लोगों को इकट्ठा किया। गांव के लोग जब काफी संख्या में आए और कमर कस- कर उस कीचड़ में कूद पड़े तव कहीं जाकर नेताजी की गाड़ी निकली। लेकिन इसी समय भिखारी रजवार का बेटा जगिया, जो कालेज. में पढ़ता नेताजी में कह उठा, "नेताजी, गांवों के लिए कुछ कीजिए या मत कीजिए, लेकिन जिस सड़क के सहारे वोट लेने आपं गांवों में आते हैं, उसकी मरम्मत अवश्य करा दीजिए ताकि आपके कार्य में बाधा उपस्थित न हो..." जगिया की बात नेताजी को जा चुभी थी। उन्होंने पलटकर उसकी और देखा था। फिर दांत निपोरते हुए बोल पड़े थे, “गांव और सड़क दोनों से मुझे प्यार है। दोनों के लिए करूंगा "सिर्फ अनुकूल वक्त की प्रतीक्षा में हूं.''भविप्य में आप लोगों को मुझसे कोई भी शिकायत नहीं रहेगी..." और उस घटना के एक महीने के अन्दर ही नेताजी ने इस जगह पुलिया का निर्माण करवा दिया। लेकिन पुलिया के निर्माण के पन्द्रह साल के बाद भी गांव के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया। अब उनकी गाड़ी इस पुलिया से होकर अपने क्षेत्र में प्रचार के लिए वरावर जाती है। लेकिन अब वे कभी पलटकर भी इस गांव की ओर नहीं देखते हैं। एकाध वार जगिया था, - , ६६ / युद्धस्थल यु.६ । और उमके दोस्तो ने फिकरे कसे थे, लेकिन उन्होंने अनसुना कर दिया। यह पुलिया चमरटोली और अन्य छोटी जाति के लोगों के मुहल्ले के पास ही है। चमारो और अन्य छोटी जाति के लोगों में दो-तीन को छोड़- कर भेप किमीके पास अपना दालान नहीं है। माथा छिपाने के लिए किसी तरह सिर्फ झोपडी का निर्माण कर लिया है । दालान बनाने की सामर्थ्य लोगो में कहा ? लेकिन पुलिया के बन जाने के वाद दालान का अभाव खत्म हो गया है । अव जब भी उन्हें अवकाश मिलता है, पुलिया पर आकर बैठ रहते है । अंगोछे में मुजा लाकर पुलिया पर ही फाकते है । गाजा-बीड़ी पीना हो तो पुलिया पर आ जाते हैं । जगिया के बाद भिखारी रजवार ने पुलिया के किनारे एक आम का गाछ लगा दिया है । अब पुलिया छायादार हो गई है । पहले जहां सिर्फ सुबह-शाम ही लोग यहा बैठते थे, अव दिन भर बैठने लगे है । वरसात के तूफानी दिनो को छोड दोप दिनों मे यहा वरावर ही दम-पाच लोग नजर आते हैं। यहा की बैठक मे रोज-मजदूरी और माल-मवेशियो का जिक्र विशेप रूप से होता है तथा किसके ऊपर अब कितना कर्ज है और कोन कों से मुक्त हो गया, इसकी चर्चा जरूर होती है। चमरटोली की लडाई के बाद यहा के लोगों में अपनी प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ने के लिए काफी उत्साह पैदा हो गया है । अब वे पहले की अपेक्षा वहुत निर्भीक हो गए है। जहां पहले गांव के बावू लोगों के पुलिया से गुजरते हुए वे उठ खडे होते थे, वहां अब चुपचाप बैठे रहते हैं । अब पहले की भाति न उठने पर कोई उन्हें दडित नहीं कर पाता है । इस बैठक में जब रामशरण बहू और दूधनाथ चौधरी के लडके की चर्चा चलती है तो यहा उपस्थित सभी लोग मुसन दुसाध की ओर देखने लगते हैं । मुसन दुसाध इस बैठक का स्थायी सदस्य है और गाव का मश- हूर ओझा । दूधनाथ चौधरी के लडके की ओझाई के लिए जिन ओझाओ को नियुक्त किया गया है, उनमे मुसन दुसाध भी है। मुसन दुसाध यहां के लोगों को रामशरण बहू और दूधनाथ चौधरी के लड़के की कहानी खूब मिर्च-मसाला मिलाकर सुनाता है । अनेक लोग कुछ सवाल पूछते हैं, तो मुसन दुसाध तत्काल उसका जवाब देता है । दरअसल, - दुसाध की समझदारी और हाजिर-जवाबी के बल पर ही Tई का गांव में अपना एक अलग महत्त्व है। ओलाई के चलते मुसन ध ने जितना कुछ प्राप्त किया है, उतना गांव के अन्य ओझा नहीं पा हैं। रामशरण बहू और दूधनाथ चौधरी के लड़के की विस्तार से चर्चा रने के बाद मुसन दुसाध अपनी बैठक के एक व्यक्ति की जिज्ञासा को गांत करते हुए यह बताता है कि डायन की विद्या सीखने के लिए रात में औरतों को श्मशान में जाना होता है। वहां पीपल के वृक्ष के नीचे नंगी होकर साधना करनी पड़ती है। साधना के वक्त तरह-तरह के भूत-प्रेत उसे डराने आते हैं। अगर वह डर जाती है तो उसकी साधना खत्म हो जाती है। लेकिन जब निडर होकर साधना में रत रहती है, तो उसे सिद्धियों की प्राप्ति होती है। उसके बाद वह जिस किसीका भी चाहे, अनिष्ट कर सकती है। डायन बनने की प्रक्रिया को संक्षेप में बताते हुए मुसन दुसाध सदा की भांति अब स्वयं अपना गुणगान करने लगता है कि कैसे उसने एक भयं- कर डायन को पछाड़ा था। एक डायन सीधे उसके पैरों पर आ गिरी थी। बगल के गांव में एक चुडैल के प्रकोप वाली औरत को ठीक करने के लिए उस गांव के ओझो थक गए थे, लेकिन उसने जाकर ठीक कर दिया तब से उस गांव के सभी ओझा उसका लोहा मानते हैं। एक बार एक बहुत जबर्दस्त डायन से उसकी भिड़न्त हो गई थी। वह जब भी मंत्र पद कर वार करता, वह उसे निगल जाती। लेकिन जब गुस्से में आकर उर अपने अंतिम मंत्र का प्रयोग किया तवावह मैदान छोड़कर भाग गई। उस बाद उस डायन ने उसका अनिष्ट करने की बहुत कोशिश की, ले उसके पास उसकी दाल गलने नहीं पाई। उसका इप्ट पहले ही अ उसे सतर्क कर देता कि वह वार करने वाली है। इसी तरह मुसन दुसाध चटखारे ले-लेकर देर तक अपनी का गुणगान स्वयं करता रहता है। पुलिया की बैठक के लोग मंत्र भाव से उसकी बात सुनते रहते हैं। ओझाई के बल पर ही उसने घर के फूस की छत को खपरैल में तब्दील कर दिया है, तथा कों १८ / युद्धस्थल हो गया है। साथ ही अब उसके हाथ मे दस-पाच रुपये भी रहने लगे हैं। उसकी निरन्तर परिवर्तित होती जा रही स्थिति उसकी बात पर विश्वास करने के लिए लोगो को बाध्य करती रहती है। पुलिया के बाद गाव की आठवी वैठक भिखारी रजवार की मडई में लगती है। भिखारी रजवार की मडई चमरटोली और दुसाधटोली के बीच मे है । भिसारी रजवार का घर मिट्टी का है। उमके दरवाजे पर नीम का एक बहुत पुराना वृक्ष है। उसी नीम के वृक्ष के नीचे दालान के रूप में भिखारी रजवार ने मड़ई खड़ी की है । गाव के वायू लोगो की तरह पक्की ईंटो का दालान बनाने की उसका आंकात कहा ! जब वह अपना घर पक्की ईंटों का नहीं बनवा सका, तव फिर दालान कहां ने वनवा पाए? भिखारी रजवार को मडई में चमरटोली और दुसाघटोली के लोग एक लंबे समय से बैठते आ रहे हैं। गाव के अन्य मुहल्लों को छोटी जाति के लोग भी यहां आते हैं। पुलिया पर बैठने वाले लोग भी यहा अकसर जुटे रहते हैं । असल में इस पूरे गांव में भिखारी रजवार की एक मर्द ही इस रूप में चली आ रही है जहा गाव की पिछडीऔर छोटी जाति के लोग अपना सुख-दुख एक-दूसरे को सुनाते आ रहे हैं। उम ममय जव गाव में अमीर किसानों के जुल्म और शोपण महकर भी गाव के पिछड़े लोग जुबान नहीं खोलते थे, क्योंकि उसके चलते उन्हे और दडित होना पड़ता था, तब भी भिखारी रजवार को मड़ई में अपने लोगों के बीच वे फट ही पड़ते थे। हालांकि इसके लिए वे पूरी तरह सतर्क रहते थे कि उनकी वात अमीर किसानों तक न पहुंचे। लेकिन अमीर किमानों को इसकी भनक मिल ही जाती थी। फिर वे भिखारी रजवार को डाटने लगते थे कि अपनी मड़ई मे बैठक न लगवाओ। उस वक्त कुछ समय के लिए भिखारी की मडई की बैठक खत्म हो जाती थी। लेकिन फिर जल्द ही वहा लोग बैठने लगते थे । गाव के अमीर किसानो को उन्हीं दिनो यह लगने लगा था कि इस गाव में उनके खिलाफ भिखारी रजवार की मड़ई में ही जमीन तैयार की जा रही है। लेकिन इसका आभाम होते हुए भी वे इन ओर अपना ध्यान पूरी तरह आकृष्ट नहीं कर पाते थे, क्योकि उनके मन । -

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के लोगो को ये सूचनाएं मिलने लगी थी कि उनकी मुक्ति के लिए देश में कहां-कहा संघर्ष शुरू है। इससे पहले तो वे कुप-मंडूक की जिन्दगी जी रहे थे। गाव के बाबू लोगो की बेगारी और गुलामी को उन्होने अपनी निपति मान लिया था। लेकिन जगिया उन्हे बताता कि देश के विभिन्न भागो मे हरिजन और सभी पिछडे वर्ग के लोग संगठित हो रहे है। उन्होंने अपनी मुक्ति के लिए जगह-जगह आन्दोलन छेड दिया है । अमुक जिले के अमुक गांव में मजदूरी बढाने के लिए गाव के गरीब लोगो ने काम बंद कर दिया है । अमुक गांव मे अमीर किसानो और पिछड़े वर्ग के लोगो के बीच जमकर लड़ाई हुई है। अब पहले वाली स्थिति वदल रही है । कई गावो के अमीर किसानो को मुह की खानी पड़ी है। अमुक गाव मे वहा के हरिजनों और पिछडे वर्ग के लोगो ने अपनी विजय-पताका फहरा दी है, आदि। जगिया से पहले गाव के बाबू लोगो के लडके बराबर ही कालेज में पढ़ते थे। अखवार की सूचनाओ से अवगत होते थे। किन्तु गाव में वाहर की हवा को न आने देने के लिए वे मकल्पित थे। लेकिन जगिया ने गाव में बाहर की हवा के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त कर दिया। हालाकि इसके लिए जगिया को गाव के बाबू लोगो की डाट-फटकार, गाली-गलौज और मारपीट भी सहनी पडी। लेकिन फिर भी वह अपने रास्ते से विमुख नही हुआ । अपने लोगो को जागरूक करता ही गया । धमरटोली की लड़ाई मे जगिया ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। चमरटोली की लड़ाई में पिछड़े वर्ग के लोगो की सफलता का एकमात्र श्रेय जगिया को है। जगिया के माध्यम मे ही इस गाव मे पिछडे वर्ग की पक्ष- घर भक्ति वाहर से आई है। लेकिन वाहर से उस याक्ति के आने के बाद कई नेतृत्व-कामी लोगो ने इस सफलता का श्रृंय अपने ऊपर ले लिया है, लेकिन जगिया को इसकी कोई परवाह नहीं। वह श्रेय और नेतृत्व का भूखा कभी नही रहा। उसका उद्देश्य तो सदियो से शोपित-दमित अपने लोगों को मुक्ति दिलाना है। प्रारभ मे जगिया की मडई मे प्रौढ, अधंड और बूढे लोग ही ज्यादा वैठते थे, लेकिन जगिया के युवा होने पर अब पिछड़ी जाति के अनेक युवक वहा वैठने लगे हैं। यहा की बैठक के बुजुर्ग । . .

र उसके साथियों का उत्साह देख कहते हैं, बिल्कुल ऐसा ही होता था। अंग्रेजों को यहां से भगाने के तरह गुप्त वैठकें करते थे, गुप्त योजनाएं बनाते थे। इसी उत्साह और कुछ कर गुजरने की क्षमता से हम लैस होते वे तो विदेशी थे.."उनको तो यहां से जाना ही था किंतु न लोगों के खिलाफ काम कर रहे हो.''वे तो यहीं के हैं.. के लोग हैं 'उनको तुम कैसे भगा पाओगे?" र जगिया समझाता है, "हमारा उद्देश्य भगाना नहीं, उन्हें ठीक ' 'पुश्तों से वे जो हमारा शोपण करते आ रहे हैं, वह अब नहीं सपर बुजुर्ग अपनी शंका व्यक्त करते हैं, "लेकिन यह संभव कैसे ?थोड़ी देर के लिए भले ही बाहरी शक्ति के आ जाने से. वे चुप हो अंततः उनका शासन फिर चलेगा ही। उनके पास खेत अधिक हैं। अधिक है। अव बाहर से उनके वर्ग के लोग उन्हें मदद भी पहुंचा- । फिर उनके ठीक होने और रास्ते पर आने का सवाल ही खत्म हो एगा।" इसपर जगिया कहता है, "चुप रहकर तो हम सदियों से उनका शासन तहते आ रहे हैं । अकारण मार खाते हैं। दिन-भर काम करते हैं, फिर भी भूग्वे रहकर सोते हैं। हमारी वहन, वेटियों और बहुओं पर उनका अधि- कार होता है। हमारी जिन्दगी एकदम घृणित और नारकीय होती है। इस जिन्दगी मे तो मर जाना बेहतर है। जव एक छोटी चींटी पांव पड़ने पर पलटकर काट लेती है तब हम मनुष्य होकर चुपचाप अत्याचार-अनाचार और जुल्म-शोपण सहते रहें, यह उचित नहीं। 'अन्याय करने की तरह ही अन्याय सहना भी दोपपूर्ण है। अपने हक और अधिकार के लिए लड़ना मानव-धर्म है। न्याय के लिए लड़ना और लड़कर मर जाना, अन्याय के नीचे जीने से ज्यादा श्रेयस्कर है।" जगिया की मड़ई की बैठक के बुजुर्गों को जगिया की यह बात बहुत जंचती है। वे निरुत्तर हो जाते हैं। उन्हें लगता है, जगिया ठीक ही तो कह रहा है । इसके सिवाय और दूसरा रास्ता ही क्या है ? १०२ / युद्धस्थल इस बैठक में जब रामशरण बहू और दूधनाथ चौधरी के लडके को लेकर वात चलती है तो अनेक बुजुर्ग इसे सही मानते हैं। लेकिन जगिया इमे गलत करार देते हुए लोगो को समझाता है कि यह एक अन्धविश्वास और परंपरा-पोपित रूढि है । जगिया समझाता है कि एक जमाने में सती- प्रथा पर भी लोगो को ऐसा ही विश्वास था; लेकिन राजा राममोहन राय में लोगो ने उसका विरोध किया और उस सामाजिक दोप से लोगों को मुक्त किया। जैसे-जैसे लोग जागरूक होते जाएगे, यह रूढि भी पीछे छूटती जाएगी। जगिया की बैठक के कई लोगों को जगिया की यह बात पसद नहीं आती है। उनके दिमाग मे जगिया की यह नई वात समाती नहीं है। लेकिन वे इसका विरोध भी नहीं करते है। चमरटोली की लड़ाई के बाद जगिया को वे देवता समझने लगे हैं। वह जो कुछ भी कहता है, चुपचाप सुनते हैं । अगर नहीं समझ में आता है उमपर विचार करते हैं, विरोध नहीं करते। जगिया अपनी बैठक के चंद अधविश्वामी लोगों को समझाने के लिए एक कहानी सुनाता है, " बात अभी हाल की ही है-इसी भोजपुर जिले के अमरपुर गाव की। उस गाव मे डायन और ओझा को लेकर रोज ही नई-नई कहानियां जन्म लेती रहती थी। उसी गांव में जितराम नामक एक व्यक्ति को इन बातों पर तनिक भी विश्वास नही था। वह इन्हें ढोग और पाखंड समझता था। उसे ऐसे लोगों से नफरत थी जो गाव में इन रूढ़ियो को बढावा देते थे। वह अपनी पत्नी को भी इन आग्रहों से मुक्त रहने के लिए समझाता था, लेकिन उसकी पत्नी उमसे छिपकर ओझाओ मे मिलती रहती थी। असल मे वह पाच पुत्रियों की माता थी। हर पुत्री के बाद पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से ही वह गर्भ धारण करती थी। लेकिन पुत्र न होकर पुत्री ही हो जाती। इसी तरह पाच पुत्रिया होने के बाद उसे लगने लगा कि जरूर किसी डायन का उसके ऊपर प्रकोप है। बस, वह ओझाओ के चक्कर में रहने लगी । वह अपने पति जितराम के स्वभाव से परिचित थी। इसीलिए चोरी-छिपे ही ओझाओ के पास जाती तथा इस वात के प्रति पूरी तरह सतर्क रहती कि जितराम [ग जगिया और उसके साथियों का उत्साह देख कहते हैं, "आजादी की ड़ाई के वक्त विल्कुल ऐसा ही होता था। अंग्रेजों को यहां से भगाने के लए हम इसी तरह गुप्त बैठकें करते थे, गुप्त योजनाएं बनाते थे। इसी रिह उमंग, उत्साह और कुछ कर गुजरने की क्षमता से हम लैस होते ये. 'लेकिन वे तो विदेशी थे.''उनको तो यहां से जाना ही था किंतु तुम लोग जिन लोगों के खिलाफ काम कर रहे हो तो यहीं के हैं." इसी धरती के लोग हैं उनको तुम कैसे भगा पाओगे ?" " इसपर जगिया समझाता है, "हमारा उद्देश्य भगाना नहीं, उन्हें ठीक करना है। 'पुश्तों से वे जो हमारा शोपण करते आ रहे हैं, वह अव नहीं चलेगा।" इसपर बुजुर्ग अपनी शंका व्यक्त करते हैं, "लेकिन यह संभव कैसे होगा? थोड़ी देर के लिए भले ही बाहरी शक्ति के आ जाने से वे चुप हो गए हैं, अंततः उनका शासन फिर चलेगा ही। उनके पास खेत अधिक हैं। पूजी अधिक है। अब बाहर से उनके वर्ग के लोग उन्हें मदद भी पहुंचा- एंगे। फिर उनके ठीक होने और रास्ते पर आने का सवाल ही खत्म हो जाएगा।" इसपर जगिया कहता है, "चुप रहकर तो हम सदियों से उनका शासन सहते आ रहे हैं । अकारण मार खाते हैं। दिन-भर काम करते हैं, फिर भी भूखे रहकर सोते हैं। हमारी वहन, बेटियों और बहुओं पर उनका अधि- कार होता है। हमारी जिन्दगी एकदम घृणित और नारकीय होती है। इस जिन्दगी मे तो मर जाना बेहतर है। जब एक छोटी चींटी पांव पड़ने पर पलटकर काट लेती है तब हम मनुष्य होकर चुपचाप अत्याचार-अनाचार और जुल्म-गोषण सहते रहें, यह उचित नहीं। 'अन्याय करने की तरह ही अन्याय सहना भी दोपपूर्ण है। अपने हक और अधिकार के लिए लड़ना मानव-धर्म है। न्याय के लिए लड़ना और लड़कर मर जाना, अन्याय के नीचे जीने से ज्यादा श्रेयस्कर है।" जगिया की मड़ई की बैठक के बुजुर्गों को जगिया की यह बात बहुत जंचती है। वे निरुत्तर हो जाते हैं। उन्हें लगता है, जगिया ठीक ही ते कह रहा है। इसके सिवाय और दूसरा रास्ता ही क्या है ?

इस बैठक मे जर रामशरण बहू और दूधनाथ चौधरी के लडके को लेकर वात चलनी है तो अनेक बुजुर्ग इसे सही मानते हैं। लेकिन जगिया इमे गलत करार देते हुए लोगों को समझाता है कि यह एक अन्धविश्वास और परपरा-पोपित रूढि है । जगिया समझाता है कि एक जमाने में सती- प्रथा पर भी लोगो को ऐसा ही विश्वास था; लेकिन राजा राममोहन राय जैसे लोगों ने उसका विरोध किया और उस सामाजिक दोष से लोगों को मुक्त किया। जैसे-जैसे लोग जागरूक होते जाएगे, यह रूढि भी पीछे छूटती जाएगी। जगिया की बैठक के कई लोगो को जगिया की यह बात पसद नहीं आती है। उनके दिमाग में जगिया की यह नई वात समाती नहीं है। लेकिन वे इसका विरोध भी नहीं करते है। चमरटोली की लडाई के बाद जगिया को वे देवता समझने लगे है। यह जो कुछ भी कहता है, चुपचाप मुनते है । अगर नही समझ में आता है तो उसपर विचार करते हैं, विरोध नहीं करते। जगिया अपनी बैठक के चद अंधविश्वासी लोगो को समझाने के लिए एक कहानी सुनाता है, " बात अभी हाल की ही है-इसी भोजपुर जिले के अमरपुर गाव की । उस गाव मे डायन और ओझा को लेकर रोज ही नई-नई कहानिया जन्म लेती रहती थी। उसी गाव मे जितराम नामक एक व्यक्ति को इन बातों पर तनिक भी विश्वास नहीं था। वह इन्हे ढोग और पाखड समझता था। उसे ऐसे लोगों से नफरत थी जो गाव मे इन रूढियों को बढ़ावा देते थे। वह अपनी पत्नी को भी इन आग्रहों से मुक्त रहने के लिए समझाता था, लेकिन उसकी पत्नी उससे छिपकर ओझाओ मे मिलती रहती थी। असल में वह पाच पुत्रियो की माता थी। हर पुत्री के बाद पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से ही वह गर्भ धारण करती थी। लेकिन पुत्र न होकर पुत्री ही हो जाती। इसी तरह पाच पुत्रिया होने के बाद उसे लगने लगा कि जरूर किसी डायन का उसके ऊपर प्रकोप है। वस, वह ओझाओ के चक्कर में रहने लगी । वह अपने पति जितराम के स्वभाव से परिचित थी। इसीलिए चोरी-छिपे ही ओझाओं / के पास जाती तथा इस बात के प्रति पूरी तरह सतकं रहती कि जितराम - म गिया और उसके साथियों का उत्साह देख कहते हैं, "आजादी की के वक्त विल्कुल ऐसा ही होता था। अंग्रेजों को यहां से भगाने के हम इसी तरह गुप्त वैठकें करते थे, गुप्त योजनाएं बनाते थे। इसी ह उमंग, उत्साह और कुछ कर गुजरने की क्षमता से हम लैस होते "लेकिन वे तो विदेशी थे.."उनको तो यहां से जाना ही था. "किंतु लोग जिन लोगों के खिलाफ काम कर रहे हो.''वे तो यहीं के हैं.' इसी धरती के लोग हैं 'उनको तुम कैसे भगा पाओगे?" इसपर जगिया समझाता है, "हमारा उद्देश्य भगाना नहीं, उन्हें ठीक करना है। 'पुश्तों से वे जो हमारा शोपण करते आ रहे हैं, वह अव नहीं चलेगा।" इसपर बुजुर्ग अपनी शंका व्यक्त करते हैं, "लेकिन यह संभव कैसे होगा ? थोड़ी देर के लिए भले ही वाहरी शक्ति के आ जाने से वे चुप हो गए हैं, अंततः उनका शासन फिर चलेगा ही। उनके पास खेत अधिक हैं। पूजी अधिक है । अव वाहर से उनके वर्ग के लोग उन्हें मदद भी पहुंचा- एंगे। फिर उनके ठीक होने और रास्ते पर आने का सवाल ही खत्म हो - जाएगा।" इसपर जगिया कहता है, "चुप रहकर तो हम सदियों से उनका शासन सहते आ रहे हैं । अकारण मार खाते हैं। दिन-भर काम करते हैं, फिर भ भूखे रहकर सोते हैं। हमारी वहन, वेटियों और बहुओं पर उनका अधि कार होता है। हमारी जिन्दगी एकदम घृणित और नारकीय होती है। जिन्दगी से तो मर जाना बेहतर है। जब एक छोटी चींटी पांव पड़ने पलटकर काट लेती है तब हम मनुष्य होकर चुपचाप अत्याचार-अना और जुल्म-गोपण सहते रहें, यह उचित नहीं। 'अन्याय करने की ही अन्याय सहना भी दोपपूर्ण है । अपने हक और अधिकार के लिए मानव-धर्म है। न्याय के लिए लड़ना और लड़कर मर जाना, अन नीचे जीने से ज्यादा श्रेयस्कर है।" जगिया की मड़ई की बैठक के बुजुर्गों को जगिया की यह व जंचती है। वे निरुत्तर हो जाते हैं। उन्हें लगता है, जगिया ठी कह रहा है। इसके सिवाय और दूसरा रास्ता ही क्या है ? १०२ / युद्धस्थल इम बैठक में जब रामशरण बहू और दूधनाथ चौधरी के लड़के को लेकर वात चलती है तो अनेक बुजुर्ग इसे सही मानते हैं। लेकिन जगिया इमे गलत करार देते हुए लोगों को समझाता है कि यह एक अन्धविश्वास और परंपरा-पोपित रुढि है । जगिया समझाता है कि एक जमाने में सती- प्रया पर भी लोगों को ऐसा ही विश्वास था; लेकिन राजा राममोहन राय में लोगों ने उसका विरोध किया और उस सामाजिक दोष से लोगों को मुक्त किया। जैसे-जैसे लोग जागरूक होते जाएगे, यह रूढि भी पीछे छूटती जाएगी। जगिया की बैठक के कई लोगों को जगिया की यह वात पमंद नहीं आती है। उनके दिमाग में जगिया की यह नई वात समाती नहीं है। लेकिन वे इसका विरोध भी नहीं करते हैं। चमरटोली की लड़ाई के बाद जगिया को वे देवता समझने लगे हैं। वह जो कुछ भी कहता है, चुपचाप सुनते हैं । अगर नहीं समझ में आता है तो उमपर विचार करते हैं, विरोध नहीं करते। जगिया अपनी बैठक के चंद अंधविश्वासी लोगो को समझाने के लिए एक कहानी सुनाता है, " वात जभी हाल की ही है—इसी भोजपुर जिले के अमरपुर गाव की । उस गांव मे डायन और ओझा को लेकर रोज ही नई-नई कहानिया जन्म लेती रहती थी। उसी गांव मे जितराम नामक एक व्यक्ति को इन बातों पर तनिक भी विश्वास नहीं था। वह इन्हे ढोग और पाखंड समझता था। उसे ऐमे लोगो से नफरत थी जो गाव मे इन रूढियो को बढावा देते थे। वह अपनी पत्नी को भी इन आग्रहो के मुक्त रहने के लिए समझाता था, लेकिन उसकी पत्नी उसमे छिपकर ओझाओ मे मिलती रहती थी। असल में वह पाच पुत्रियों की माता थी। हर पुत्री के बाद पुन-प्राप्ति की इच्छा से ही वह गर्भ धारण करती थी। लेकिन पुत्र न होकर पुत्री ही हो जाती। इसी तरह पाच पुत्रियां होने के बाद उसे लगने लगा कि जरूर किसी डायन का उसके ऊपर प्रकोप है। बस, वह ओझाओ के चक्कर में रहने लगी। वह अपने पति जितराम के स्वभाव से परिचित थी। इसीलिए चोरी-छिपे ही ओझाओ के पास जाती तथा इस बात के प्रति पूरी तरह सतर्क रहती कि जितराम को इसका पता न चले। लेकिन एक दिन जितराम को सब कुछ पता चल गया। उसकी पत्नी उसके गांव के पास के ही एक देवास में एक ओझा से अपनी जांच-पड़ताल कराने गई थी। ओझा ने उसकी पत्नी को अपने सामने बैठा पचरा का गान किया तथा फिर अपने मुंह से तरह-तरह की डरावनी आवाजें निकाल उसके ऊपर झुक गया और उसके बाल पकड़ उसका माथा जमीन पर पटकते हुए उसने उसकी पीठ पर दो-तीन हाथ लगाए। उस देवास में आई अन्य औरतों की भांति उसकी पत्नी भी अव अनाप-शनाप बकने लगी तथा पागलों की तरह माथा हिलाने लगी। जितराम उस समय खेतों में काम कर रहा था। वहां एक आदमी के द्वारा उसे यह सूचना मिली कि उसकी पत्नी को प्रेत-वाधा है। वह वक रही है। यह सुनकर वह गुस्से में जल उठा। खेत से लौटने पर उसने पत्नी की जमकर पिटाई की और कहा कि जिस तरह ओझा के सामने तुम्हारा प्रेत वक रहा था, उसी तरह मेरे सामने बको, तब मैं तुम्हें छोडूंगा, नहीं तो जान से मार दूगा। इसपर उसकी पत्नी उसके पैरों पर गिड़गिड़ाने लगी तथा अपनी गलती स्वीकारते हुए उससे क्षमा-याचना करने लगी। - "पत्नी को जी भरकर दंडित करने के बाद जितराम अव उस आझा को दंडित करने की सोचने लगा, जिसने उसकी पत्नी के ऊपर प्रेत-बाधा सावित की थी । वह ओझा जितराम के गांव का ही था। उससे बदला लेने के फिराक में रहते एक दिन जितराम का अनुकूल अवसर भी मिल गया । वह चैत की रामनवमी का दिन था। हर वर्ष की भांति उस वर्ष भी उस दिन समूचे गांव में काली मां की पूजा हो रही थी। साथ ही हर वार की तरह उस दिन भी गांव के प्रायः सभी ओझा और गुणी अपने इप्ट की पूजा कर रहे थे तथा अपने घर पूजा-स्थल पर बैठकर भूत-प्रेत, डायन आदि से असित लोगों की झाड़-फूक में लगे थे। "जितराम उस दिन अपनी पत्नी के ऊपर प्रेत-बाधा काआरोप लगाने वाले ओझा के यहां बदला लेने के लिए पहुंचा। चूंकि वह गांव का एक मशहूर ओझा था, इसीलिए उस दिन उसके यहां लोगों की भीड़ कुछ ज्यादा ही थी। विभिन्न संकटों से त्रस्त औरत-मर्द अपने को दिखाने आए थे तथा अनेक लोग तमाशा देखने की दृष्टि मे आए थे। वह ओभा अपने आंगन में देवस्थान के पास अपने हाथ में नीम के हरे पत्तों को एक पतली डाली लिए माथा हिला-हिलाकर कुछ गा रहा था। हवन को सुगंध और अगरबत्तियों को खुशबू आंगन में बिखरी थी। अभी-अभी वहा एक बकरे की बलि दी गई थी, जिसका रक्त देवस्थान के पास लगा था। उस ओझा के औठ भी रक्त से लाल नजर आते थे। बकरे का गर्म ताजा रक्त अभी-अभी ओझा ने ग्रहण किया था। वहां के वातावरण और ओझा की हरकत ने वहा उपस्थित दर्शकों को जिज्ञासा को बना दिया था कि देते, अव आगे और क्या होता है | लोग सामोश हो औक्षा के सामने प्रार्थना करनेवाले औरतों-मर्दो को देखते थे। तरह-तरह की समस्याओं को लेकर लोग ओझा के सामने प्रार्थना कर रहे थे। किसीको बच्चा नहीं होता, तो किसीको सिर्फ तड़किया ही होती है। कोई बरावर बीमार रहता है, किसीके दरवाजे पशु सहते ही नहीं, तो किसीका बेटा बाहर से अभी तक लौटा नहीं है। "ओझावारी-बारी मेमभीको अपने सामने बैठाता तथा उनकी झाड- फूंक करता था। फिर नीम की डाली में उसके ऊपर प्रहार कर सरसो और अक्षत के दाने उसके हाथ में थमाता और पीठ ठोककर उन्हें अलग हटा देता। " जितराम एक क्षण तक माहौल का जायजा लेने के बाद उस ओझा के सामने जा बैठा और अपना माथा हिलाने लगा । ओझा ने जितराम की स्थिति देख यह घोषणा की कि इसे भूत ने पकड लिया है। फिर ओझा ने जितराम की ओझाई शुरू की। लेकिन जितराम ने भात होने के बजाय अपने माथे को और जोर-जोर से हिलाना तथा हाथ-पांव फेकना प्रारभ किया। इसपर ओझा ने गरजते हुए जितराम के माथे के बाल पकड उसमे 'बोल ! भागता है कि नहीं' "सपर भी जितराम ने कोई जवाब नहीं दिया और अपनी हरकत उसी तरह चालू रखी। दर्शको को अब बहुत मजा आने लगा था। अकमर हो जव ओझा और भूत-प्रेत से ग्रमित किसी व्यक्ति के साथ जबर्दस्त भिडंत होती थी, दर्शक तालिया बजाते हुए झूमने लगते थे। उनको पूछा, में कौतूहल और विस्मय के भाव भर जाते थे। जितराम ने कुछ क्षणों तक भूत से ग्रसित व्यक्ति का अभिनय करते ओझा की डांट और मार सही, इसके बाद अभिनय के क्रम में ही वह ती से उठा और अपनी वलिष्ठ भुजाओं में ओझा को टांग उसने धरती र पटक दिया। लोगों ने तालियां और सीटियां बजानी प्रारंभ की। लोगों को लगा कि जितराम का भूत ओझा के इप्ट से बड़ा है। लोग यह सोचने लगे कि ओझा अव जरूर अपने इष्ट की करामात दिखाएगा और जितराम के भूत को मजा चखाएगा; लेकिन लोग यह सोचते रह गए और जितराम ओझा को जमीन से उठा-उठाकर निर्दयता के साथ पटकता गया। ओझा को काफी चोट लगती थी, लेकिन दर्शकों के बीच वह यह सावित करना नहीं चाहता था। लेकिन जव तीसरी बार जितराम ने उसे कसकर देव-प्रतिमा के ऊपर ही पटक दिया, तव उसके मुंह से 'बाप रे!' की आवाज निकली और वह चिल्ला पड़ा, 'जान वचाओ''जान वचाओ...' "अब तक ओझा का जो एक आवरण उसने ओढ़ रखा था, वह खत्म हो गया था। वह एक सामान्य मनुष्य की तरह चोट की पीड़ा से कराहने और भय से कांपने लगा था। उसके परिवार के लोग यह सब देख जित- राम की ओर मुखातिब हुए थे; लेकिन अब तक जितराम भीड़ को चीर हुए वहां से भाग गया था। इस घटना की चर्चा उस गांव में खूब चली। जो लोग घटनास्त पर उपस्थित थे, उन्होंने खूब ठहाके लगा-लगाकर इस घटना का व करना शुरू किया। इस घटना के बाद आज उस गांव में ओझाओं के लोगों का विश्वास बहुत कमहो गया है। देखिए, भविष्य में क्या होता जगिया की कहानी सुन उसकी बैठक के लोग खूब जमकर : लगाते हैं। मजा आ जाता है सवको। उसकी बैठक में एक ओझा था, लेकिन कहानी प्रारंभ होते ही वह वहां से खिसक चुका था। था, जगिया की कहानी उसके विरोध में ही होगी। उसके मन में के विरोध की वात उठती थी, लेकिन पिछड़े वर्ग के लोगों के हित जा रहा जगिया का कार्य देखकर वह चुप हो जाता था। एक । १०६ / युद्धस्थल

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बना लिया। फिर इसीमें उनकी वैठकें होने लगीं। योजनाएं बनने लगी। अपनी रणनीति और कार्य-नीति वे यहीं से तय करने लगे। वैसे मनसुख को तरह चमरटोली के और दो-तीन घर खाली हो चुके थे। उन घरों को भी इन लोगों ने अपना लिया। फिर किसी में सामान रखने, किसी में खंदक खोदकर जमीन के भीतर सुरक्षित रूप से छिपने तथा किसीमें रहने-सोने की व्यवस्था कर ली। लेकिन मनसुख के घर को विचार-विमर्श और वैठक के रूप में ही रहने दिया। असल में मनसुख का घर काफी बड़ा और सुरक्षित था। उसमें एकसाथ तीस-चालीस आदमी छिपकर बैठ जाते थे और गली से गुजरने वाले आदमी को इसका कोई आभास तक नहीं हो पाता था। चमरटोली की लड़ाई के वक्त इस बैठक में सिर्फ मार-काट की ही बातें होती थीं । मार-काट की योजना बनती और उसे तत्काल क्रियान्वित किया जाता। उस समय गांव में एक ऐसी लहर उठी थी कि प्रायः सभी छोटी जाति और पिछड़े वर्ग के लोग चमारों के साथ हो गए थे। हालांकि इसके पीछे मनसुख के घर की इस बैठक की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। चमर- टोली जलाए जाने के बाद इस बैठक के लोगों ने ही इस गांव के पिछड़े लोगों के घर जा-जाकर यह समझाया था कि आज चमारों के घर जलाए गए हैं, तो कल तुम्हारे जलाए जाएंगे। जब तक तुम सभी गरीव और छोटी जाति के लोग मिलकर एक नहीं हो जाओगे, तव तक तुम्हारे साथ यही होता रहेगा । तुम्हें संगठित होकर गांव के वावुओं का मुकाबला करना चाहिए। अकेले होकर तुम जितना असहाय महसूस कर रहे हो, संगठित होने पर उतना ही शक्तिशाली बन जाओगे। तुमने यह कहानी सुनी होगी कि एक- एक लकड़ी को तोड़ा जा सकता है, लेकिन लकड़ियों के एक गट्ठर को नहीं तोड़ा जा सकता। लेकिन मनसुख की बैठक के लोगों को अब यह बात समझ नहीं आ रही है कि उस समय गांव के सभी पिछड़े वर्गों के लोग आंख मूंदकर चमारों के साथ कैसे हो गए थे! पता नहीं, यह उनके समझाने का प्रभाव था या चमरटोली जलाए जाने की घटना का प्रभाव, कुछ भी ठीक-ठीक कहा नहीं जा सकता। अव स्थिति शांत होने के बाद वे पुनः अपने पुराने बोल में १०८ / युद्धस्थल । । । लौटने लगे है। पहले की भांति उनकी अपनी अलग-अलग सत्ताएं कायम होने लगी हैं। मनमुम्ब की बैठक के लोगो के बीच इस समय चर्चा का विषय यही होता है कि मभी छोटी जाति और पिछडे वर्ग के लोग आपसी भेद-भाव भूलकर कैमे पूरी तरह मगठित होगे। मनसुस की बैठक के लोग यह देख रहे हैं कि धोबी, चमार, कहार, कुम्हार, डोम, रजवार आदि छोटी जातियों के लोगो के बीच की जातिगत और संस्कारगत दूरियां मिट नहीं रही है। जीवन के स्तर पर ये सभी एक ही जैसे हैं, लेकिन जातिगत आधार पर इन्होने एक-दूमरे मे दूरी बना ली है । चमरटोली की लड़ाई के वक्त अचा- नक ये मगठित हो गए थे; लेकिन फिर जल्द ही अपने पहले रूप में आने लगे। दरअमल, गांव के वावुओं के खिलाफ लडने भर के लिए ही ये संगठिस थे। जीवन के शेष कामो में तो पूरी तरह अलग थे। शादी-ब्याह, सान- पान और पर्व-त्योहार आदि अवसरो पर तो ये मिर्फ अपनी विरादरी के होकर ही रह जाते थे। मनमुख की बैठक के लोगो को लगता है कि दशहर और फैक्टरी के मज. दूरों की अपेक्षा गाव के पिछडे वर्ग और छोटी जाति के लोगो को सगठित करना ज्यादा कठिन काम है। शहर और फैक्टरी के मजदूर पढे-लिगे होते है। विभिन्न स्थानों से आने के कारण उनकी अपनी व्यक्तिगत जाति राष्टित होकर सिर्फ एक सामूहिक जाति बन जाती है-मजदूर । लेकिन गाय पी छोटी जाति और पिछड़े लोग गाव मे ही परो-बढे होते है। गाय मी भेद- भाव वी नीति के बीच ही उनका विकास होता है। जन्म में सर गुन् तक उन्हें जानिगत आधार पर अलगाया जाता रहता है। इसीलिए भेद भाव में बलग हट वे पूरी तरह सगटित नही हो पाते है। मनसुन की बैठक मे बाहर से आया एफ ठगिन आपगीचर. विमर्श के लिए एक घटना सुनाता है, " वात विक्रमगज कम्ये को 11 स्टेशन के पास एक पजावी होटल है। अभी हाल ही एक दिन गो" मे वहा की ऊंची जाति के कुछ यावू लोग पाना याने बंधे कि मी गण वहा के कुछ डोम उस होटल मे आ पहुचे । डोगो ने आनेही शेगा को खाना लगाने का आर्डर दिया। लेकिन होदरा के मातिम गा) ।

। । मझाया, 'बावू लोगों को खाकर चले जाने दो, इसके बाद तुम सब खाना। वू लोगों के साथ बैठकर तुम सब खाओगे, यह उचित नहीं होगा। बाबू लोग इसे सह नहीं पाएंगे। वात अनजाने में होती तो कोई बात नहीं थी, लकिन जानबूझकर कोई मक्खी कैसे निगलेगा?' " इसपर डोम होटल के मालिक पर विगड़ पड़े। वे युवा थे। उनके अंदर नया खून था। उन्होंने होटल मालिक से कहा, 'होटल में भेद-भाव कैसा? जो पैसा देगा, वह खाएगा। जल्दी खाना लगाओ, नहीं तो तुम्हारी हंडी-तसली उठाकर सड़क पर फेंक देंगे।' "होटल का मालिक चिंतित हो गया। अपरिचित ग्राहकों के आने पर वह आसानी से निपट लेता था, लेकिन स्थानीय और एक-दूसरे से परि- चित लोग आकर उसे मुसीबत में डाल देते थे। होटल का मालिक जानता था, अगर डोमों को वह वाबू लोगों के साथ खिलाता है तो वावू लोग उस- पर जरूर बिगड़ेंगे और नहीं खिलाता है तो ये डोम उसे वेइज्जत करेंगे। लेकिन इसी वक्त होटल के मालिक को एक बात सूझी। वह डोमों को बिठाकर अपने होटल के बगल वाले धोबी के पास पहुंचा। धोबी को समझा- बुझाकर अपने साथ ले आया। अव होटल का मालिक अलग बैठ गया उसके समझाए अनुसार धोवी डोमों को खाना परोसने लगा। लेकिन य क्या ? धोवी द्वारा खाना परोसा जाता देख डोम गाली बकते हुए उठ ख हुए। वे धोबी को पहचानते थे। होटल के मालिक पर बरसते हुए बो 'साला ! हमारा खाना धोवी से परसवाता है। हमारा धर्म विगाड़त "हम धोवी का छुआ नहीं खाएंगे 'कमीना ! हरामजादा ! बदमाश " होटल के मालिक को मन ही मन खुशी हुई। वह मुनता रहा, उसे गालियां वकते हुए वहां से चले गए। मनसुख की इस बैठक में बाहर से आए व्यक्ति के मुंह से यह सुन लोग अपनी-अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। एक आदमी का है कि वर्ण-व्यवस्था का जो जन्मदाता था, वह बहुत चतुर कुटनीतिक उसने यहां के समाज को इस रूप में विभक्त कर दिया है कि आस लोगों को वर्ण-मुक्त नहीं किया जा सकता है। । इसके बाद एक दूसरा आदमी यह सूचना देता है कि अमुक ! - ११० / युद्धस्थल जो क्रांति हुई थी, उसे वर्ग-मंघर्ष का नाम दिया जा रहा था, लेकिन वस्तुतः यह वर्ण-संघर्प था । इसीलिए वह देर तक टिक नहीं पाया। इसके बाद एक युवक कहता है, “यादव और कुर्मी जहा गरीव हैं, वहां वै छोटी जातियो के साथ हैं। लेकिन जहा अमीर हैं, वहां वे अपने को राजपूत, भूमिहार मे कम श्रेष्ठ नहीं समझते है और शेप छोटी जातियों को दबाते हैं। इससे यह लगता है कि कई जगह वर्ण टूटकर वर्ग में तब्दील होते जा रहे हैं।" इसपर जगिया कहता है, "वर्ण-संघर्ष को पूरी तरह वर्ग-मघर्ष में तब्दील करने के लिए लोगो को जागरूक बनाना जरूरी है। लेकिन नब्बै प्रतिशत लोग अशिक्षित हैं। मिक्षित होते तो पुस्तको के माध्यम से उन्हें आसानी से जागरूक बनाया जा सकता था। दोष उनका नहीं है। अशिक्षा की वजह से वे अधे बने हैं, इसीलिए अघो की तरह गुड और ढेला की पह- चान उन्हें नहीं। जब आदमी के अदर जागरूकता और ममझदारी आती है तभी वह दोस्त और दुश्मन को पहचानता है।" अपनी बात को थोडा और आगे बढाते हुए जगिया कहता है, “गाव की अभिक्षित जनता को जागरूक और सचेत बनाने के लिए नाटको और भापणो के मिवाय फिल- हाल और कोई रास्ता नहीं।" जगिया की वात मनसुख की बैठक के सभी लोगों को खूब जचती है। एक आदमी कहता है, "नाटकों की रफ्तार तेज कर दी जाए। हर हफ्ते लोगों को नाटक दिखाया जाए तथा प्रत्येक तीन दिन के बाद लोगो को एक जगह जुटाकर भापण दिया जाए।" यह सुझाव भी लोगों को पसद आ जाता है। लोग सर्वसम्मति से इमे स्वीकृति दे देते हैं। इसके बाद गाव के वावू लोगो की हरकतो की समीक्षा होती है। अपने आगामी कार्य की योजना तैयार की जाती है। फिर अपने कार्य पर आशा व्यक्त की जाती है कि उन्हें निश्चित सफलता मिलेगी। वे जो कर रहे हैं, वह सही है । इसी रास्ते उनकी मुक्ति मभव है। इस बैठक में जव रामशरण वहू और दूधनाथ के लड़के की चर्चा पहुंचती है तो लोग आश्चर्य प्रकट करते है कि विकास के नाम पर निर्फ ।

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ना गा। ५९ । लामुना रहता थी कि करने को कुछ नहीं, साधुओ को जुटाकर मिर्फ अच्छे-अच्छे पकवानो की फर्माइश उनके चचेरे भाई भी अपने दरवाजे पर अकसर साधु. महात्माओ को खाते देख नाराज होते रहते थे। एक दिन इसी विषय पर चक्रधर स्वामी की अपने चचेरे भाई और उनकी पत्नी से जमकर लडाई हुई। लड़ाई के बाद वे उन लोगो से अलग हो गए। फिर गाव-जवार से चदा माग इम ठाकुरवारी की स्थापना की। इसके बाद अपने हिस्से की सारी जायदाद (बारह वाघे रोत) उन्होने ठाकुरवारी के नाम लिख दी। इस इलाके के वे पहले व्यक्ति थे जिन्होने अपनी पूरी जायदाद किमी व्यक्ति को न दे ईश्वर के नाम लिख दी थी। फलत. उनके इस कार्य को देख गाव और इलाके के लोग उन्हे देवता की तरह पूजने लगे थे। उन्हें एक महान मंत- पुरप समझ लोग उनके शिष्य बनने तगे थे। वे गाव की जिस गली से गुज- रते, दोनो ओर के लोग हाथ जोडकर बडे हो जाते । माताएं अपने बच्चों को उनके पैरो पर लिटाती । वे ठाकुरवारी के मतों के लिए इलाके के गांवो में अपने शिष्यों को लेकर अनाज मागने जाते तो वोरा का बोरा अनाज लेकर लौटते। उनकी ईश्वर-भक्ति, त्याग और ठाकुरवारी की स्थापना ने इलाके में उन्हें पूर्ण प्रतिष्ठित कर दिया था। गाव मे बाद आती । मूखा पडता । महामारी आती। गरीब लोग भूस से भरने लगते। गाव छोडकर शहर भागते । लेकिन चक्रधर म्दामी को ठाकुरबारी में कभी किसी चीज की कमी नहीं होती। भजन-कीर्तन चलता रहता । साधु-संतों का भोग लगता रहता। चक्रधर स्वामी तो जन्नत का मुग पाते। जब तक वे जिन्दा रहे, भक्तो ने उन्हे हाथ पर उठाए रमा। उनको मेवा में तैनात लोगो की कोई कमी नही। उन्हे जो सुख मिला, वह सामान्यजन के लिए दुर्लभ है। इसीलिए गांव के बुजुर्गों की नजर में वै आदमी नहीं, देवता थे। आदमी को उतना मुख पाने की औकात कहां' चक्रधर स्वामी ने अपने मरने में पहले गाव के तथा इलाके के कुछ माम-वास भक्त लोगों को चुनकर एक समिति का निर्माण किया। समिति को उन्होंने प्रत्येक तीन साल बाद आकुरखारी की देख-रेख और संचालन के तिए एक महंत चुनने का अधिकार दिया। उसके बाद से आज तकनिरतर . समिति द्वारा प्रत्येक तीन साल पर नये महंत चुने जाते हैं। समिति के जो सदस्य पुराने होकर गुजर जाते हैं, उनके स्थान पर भक्तों के बीच से नये सदस्य ले लिए जाते हैं। इस तरह ठाकुरवारी की व्यवस्था बिना किसी विघ्न और एकावट के चलती रहती है। ठाकुरवारी के महंत एक तरह से ठाकुरवारी के मालिक होते हैं। ठाकुरवारी की आमदनी और उसके उपयोग का हिसाव उनके पास रहता है। गांव के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि इस ठाकुरवारी की संपत्ति से कई महंत मालामाल हो गए। चक्रधर स्वामी की तरह कोई भी ऐसा महंत इस ठाकुरवारी में नहीं आया, जिसका अपना कोई न हो। जो भी यहां महंत बनकर आता है, उसका अपना परिवार अवश्य होता है। फिर अपना पेट भरने के बाद अपने परिवार का पेट भरने में वे लग जाते हैं। पिछले दिनों इस गांव के वैसे दो लोग महंत बनाए गए थे जिनके जिम्मे वीवी-बच्चे और एक पूरा परिवार था। लेकिन अपने बारे में उन्होंने ऐसी चर्चा उठा रखी थी कि वे ईश्वर-भक्ति के लिए घर-परिवार से पूरी तरह तटस्थ हो चुके हैं। लेकिन गांव के लोगों से यह बात छिपी नहीं रह सकी कि उनकी तटस्थता कैसी और कितनी थी। इस ठाकुरवारी का काम गांव में ईश्वर-भक्ति का प्रचार करना है। ठाकुरवारी की ओर से भजन-कीर्तन और यज्ञ की व्यवस्था बरावर की जाती है। कभी-कभी बाहर के संतों को बुलाकर प्रवचन भी दिलवाया जाता है । साथ ही गांव के पर्व-त्योहार और सामूहिक उत्सवों का नेतृत्व ठाकुरवारी के साधु-संन्यासी काफी रुचि से करते हैं। इसके अतिरिक्त यहां गांव में हो रहे कार्यों का विवेचन पाप और पुण्य की दृष्टि से किया जाता है। इस ठाकुरबारी के प्रति गांव के लोगों के मन में बड़ी श्रद्धा-भावना है। लोग इसे देव-स्थान समझते हैं। हालांकि चमरटोली की लड़ाई के बाद ठाकुरवारी के प्रति कुछ लोगों की श्रद्धा-भावना खंडित हो गई है। लेकिन अभी बहुमत श्रद्धा देने वाले लोगों का ही है। गांव के लगभग सभी बाबू लोग तो ठाकुरवारी के भक्त हैं ही, छोटी जाति और पिछड़े वर्ग के लोगों के बीच भी कुछ ठाकुरबारी के कट्टर भक्त हैं । जगिया और उसके साथियों ७७४ के लाख समझाने पर भी वे नहीं समझते हैं। इसी विन्दु पर जगिया और उसके साथियों में वे अलग पड़ जाते हैं। ईश्वर को नकारने का साहस वे अपने अंदर नहीं जुटा पाते है। गांव मे शादी-ब्याह और पर्व-त्योहार के अवसर पर ठाकुरवारी के आगन मे तोगों की भीड लग जाती है। लोग कोई भी शुभ कार्य ठाकुर- बारी से ही प्रारंभ करते हैं। होली में अबीर-गुलाल का धीगग ठाकुर- बारी से ही होता है तथा दीवाली का पहला दीप ठाकुरवारी में ही जलता है। ठाकुरवारी के आगन मे ईश्वर से मनौती मनाने नथा ठाकुरजी के ऊपर फूल, पंसा और अनाज चढाने लोग बरावर ही जुटे रहते हैं। ठाकुरवारी का घटा गाव मे मशहूर है । मुबह-शाम ठाकुरजी को भोग लगाते वक्त ठाकुरवारी के साधु-संत खूब जोर-जोर मे घंटा बनाते हैं । घटे की आवाज गाव मे साफ-साफ सुनाई पड़ती है। गाव मे ठाकुरवारी के भक्त कुछ वैसे बुजुर्ग अभी भी हैं, जो ठाकुरवारी के घटे की आवाज सुनने के बाद ही अन्न ग्रहण करते हैं। ठाकुरवारी के मंदिर का कलग और ठाकुरवारी का लहराता ध्वज दूर से ही नजर आता है। ठाकुरवारी के. साधु-मंत ठाकुरवारी के बाहर वाले बरामदे मे या भीतर के बरामदे में पड़े रहते हैं । ठाकुरवारी के समीप पहुंचते ही गेरुआ वस्त्र, हाथ में तुलसी की माला, बगल में पड़ा कमडल, बढे हुए बाल हवा में लहराती पकी दादियां, गीता या रामायण की पंक्तियों का उच्चारण तथा ललाट पर चंदन से बने त्रिशूल पर लोगो की नजर अपने-आप चली जाती है । दूर-दूर के मठो और आश्रमो से विभिन्न आयु और आकृति के साधु यहां रोज ही आते रहते हैं । बाहर से आने वाले साधु अपना महत्त्व बताने तथा गाव के लोगो का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए कभी-कभार छोटे-छोटे चमत्कारी का प्रदर्शन भी किया करते ठाकुरवारी को इस बैठक में बाहरी और स्थानीय दोनो लोग होते है। कंतुसिंह के पिता रामाधारसिंह ठाकुरवारी की बैठक के एक नियमित सदस्य हैं । यह उनके ठाकुरवारी पर बैठने का ही प्रभाव है कि अपने वोग्गि! पर भी वे रामायण चर्चा करते रहते हैं तथा गाव के बीच बरगद के नीचे, ने . गमायण-पाठ की व्यवस्था के अगुआ होते हैं। ठाकुरवारी की बैठक में मठ-मंदिरों, आश्रमों और साधु-संन्यासियों को चर्चा ज्यादा होती है-इस समय कहां का मठ सवसे श्रेष्ठ है, किस मठ में कितने आदमी खाते हैं । अमुक मंदिर के महंत वदल गए। अमुक माथ अमुक जगह विशाल यज्ञ करने की घोपणा की है। अमुक स्वामी के पास इन दिनों दर्शन करने वालों और आशीर्वाद पाने वालों की भीड़ लगी रहती है। उनके पास देश के बड़े-बड़े नेता, अफसर और सेठ-साहूकार आशीर्वाद पाने जाते हैं । अमुक जगह में एक नये मंदिर का निर्माण कार्य शुरू है. आदि। इसके साथ गांव की सामयिक सूचनाओं और अपनी आगामी योजनाओं पर भी ठाकुरबारी की बैठक में बातें होती हैं। चमरटोली की लडाई के वक्त गांव में हो रही हिंसा के खिलाफ पहली बार ठाकुरवारी ने ही आवाज उठाई थी। ठाकुरवारी ने यह धमकी भी दी थी कि अगर हिसा की घटनाएं बन्द नहीं हुई तो वनारस, प्रयाग, हरिद्वार मथुरा आदि स्थानों मे वह नागाओं को बुलाएगी। लेकिन परिवति माहील पर ठाकुरवारी की वात का कोई असर नहीं हुआ, उल्टे एक दि ठाकुरवारी के ओसारे में भी वम-विस्फोट हुआ जिसने ठाकुरवारी को = रहने और दखल न देने की ओर इशारा किया। ठाकुरबारी की इस बैठक में पुजारीजी गांव से रामशरण बहू दूधनाथ चौधरी के लडके की चर्चा लेकर आते हैं। ठाकुरवारी के पू किसी कार्यवा गांव गए थे। वहीं पर इस चर्चा से वे अवगत हुए। लौटकर आने पर खूब मिर्च-मसाला मिला यह चर्चा छेड़ देते हैं । व आए साधु-संत ध्यान से सुनने लगते हैं। पूरी कहानी जानने के जिज्ञासु हो उठते हैं। इसपर स्थानीय लोग, जो इस चर्चा से अव हैं, पुजारीजी के साथ ही इस प्रसंग को विस्तार के साथ वताने रू बैठक में मौजूद बाहरी साधु जब पूरी कहानी सुन लेते हैं तब अण निया बताने लगते हैं। साधुओं के अनुसार, भूत-प्रेत और ओझा बातें झूठी नहीं, सच्ची होती हैं। साधुओं का कहना है कि न क्षित और ग्रामीणों के बीच ही इसका प्रभाव होता है, ब' और गहरी लोग भी इसके चंगुल में फंसे होते हैं। साधु कि ११६ / युद्धस्थल के कई प्रतिष्ठित लोगों को भूत-प्रेत से ग्रमित होने का उदाहरण प्रस्तुन करते हैं। इसके बाद माधु अपने-अपने गावो की डायनों की विचित्रतापूर्ण कहानिया मुनाने लगते हैं। स्थानीय लोग माधुओ को अपने में विगिष्ट मान सिर्फ उनकी बात सुनते रहते हैं, कुछ कहते नहीं। इस विषय पर देर तक बातचीत करने के बाद अंत में माधु अपना यह निष्कर्ष देते हैं कि दूध- नाथ चौधरी को अपने लड़के को किसी अच्छे ओझा को दिखाना चाहिए। ओझा पक्का और तगडा होगा तो किसी भी तरह की डायन के प्रकोप को दूर कर देगा। साधूओ के बीच अधेड उम्र का एक साधु है जो चुपचाप सुनता रहता है, कुछ बोलता नहीं। उस साधु के माथे के वाल आपस सटेकर लद बन गए हैं। उसकी दाढ़ी के पके हुए बाल काफी लंबे हो गए हैं । उस साधु की पोगाक ठाकुरवारी मे उपस्थित सभी साधुओ मे साफ-मुधरी तथा चमक- दार है। उसकी पोशाक का गहरा गेरुआ रंग बरबस लोगो का ध्यान अपनी ओर खीच लेता है। उस माधु ने अपने ललाट पर विभिन्न रंगो के चन्दन का लेप इस तरह लगाया है कि उसका चेहरा अन्य माधुओं की अपेक्षा भव्य और देदीप्यमान लगता है। वह साधु पिछले दो दिनो मे उस ठाकुरदारी में आया है । अव वह यहा में आगे बढ़ने की तैयारी में है। वर्ष में मिर्फ एक ही बार वह इस ठाकर बारी मे आ पाता है। इस ठाकुरबारी में निरतर आने वाले माधुओं की तरह गांव के लोग उसे नहीं पहचानते है । लेकिन ठाकुरबाग के पुजारी, महंत और साधु-संन्यासी उमे जानते होते है। वह माधु इम देश के छोटे- बड़े प्रायः सभी मन्दिरो, मठो और आश्रमो को जानता है। लगभग नाम माल की उम्र के बाद वह साधु बना था। उसके बाद अपनी दम माठ माल की उम्र तक का समय उसने एक 'स्थान' से मरे 'म्यान में घूमते हाही गुजार दिया है। अपने खाने-पीने, रहने-माने और कपडे-लने की दिक्कत उमने कभी महसूस नहीं की है। ईश्वर के दरवारों में घूमने रहने के कारण ही उसे विना कोई काम किए सालो भर दोनो जून बटिया खाना प्राप्त होता रहता है तथा हाथ मे भी दस-पाच रुपये रहते हैं। सर मात्रु को ही मठ में अनेक वार जाते हैं, उनकी उननी इज्जन नही होती। नाकन - - वह जिम मठ में भी पहुंचता है, उसका भरपूर आदर-सत्कार होता है। अपनी रुचि के अनुसार उसे भोग लगाने को मिलता है, क्योंकि वर्ष में एक मठ में पहुंचने की उसकी बारी सिर्फ एक ही वार आती है। उसके साधु बनने के पीछे भी एक विचित्र कहानी है। ईश्वर-भक्ति में प्रेरित होकर तो वह साधु वनता ही नहीं। अगर ईश्वर-भक्ति भीतर से वहुत जोर मारती तो वह अपने घर पर ही पूजापाठ की व्यवस्था कर लेता, साघु नहीं बनता। लेकिन उसके साथ स्थिति कुछ और थी। वह अपनी जिन्दगी के तीन विरोधी तत्त्वों से परेशान था। उसकी जिन्दगी का पहला विरोधी तत्त्व उसका न पढ़-लिख सकना था। न पढ़ने के कारण वह अच्छी नौकरी ने वंचित था। उसकी जिन्दगी का दूसरा विरोधी तत्त्व उसकी बादी न होना था, फलत: कुंआरा होने की वजह से घर बसाने की बात उसके दिमाग में नहीं उठती थी। और उसकी जिन्दगी का तीसरा विरोधी तत्त्व उसका आलसी होना था। उसे खेती-बारी या अन्य कोई भी काम करने की इच्छा नहीं होती थी, वह विना किसी परिश्रम के ऐसे ही बैठ- कर खाना चाहता था। लेकिन वह अपनी इच्छानुसार जिन्दगी जी नहीं पाता था। उसकी जिन्दगी के ये विरोधी तत्व उसे हर वक्त सताया करते थे। वह इन विरोधी तत्त्वों से मुक्ति की राह तलाशता रहता था। काफी चिन्तन-मनन के बाद उसे बह राह मिल गई। साधु बनकर उसने अपने विरोधी तत्त्वों को पूरी तरह पछाड़ दिया। विरोधी तत्त्वों के चलते उसकी जिन्दगी में तव लोगों को जो खामियां नजर आती थीं, वे अव खूवियां दिखने लगी हैं। तव जो लोग उसकी उपेक्षा करते थे, अब वे उसके सामने हाथ जोड़कर आशीर्वाद ग्रहण करने के लिए माथा झुका देते हैं। रामशरण बहू और दूधनाथ चौधरी की चर्चा सुन उस साधु को बहुत खुशी होती है। वह तो ऐसी ही घटनाओं की प्रतीक्षा में रहता है। इस तरह की कई घटनाओं को वह भुना चुका है। अपने प्रति वह ईश्वर की यह अनुकम्पा ही समझता है कि जब भी उसकी जेब खाली होती है, इस तरह की घटनाएं उसकी पूर्ति के लिए रास्ते में मिल जाती हैं। वह साधु अपना कम्बल और कमण्डलु ले ठाकुरवारी से प्रस्थान करता है। महंत और पुजारी से वह विदा ले चुका है, लेकिन सड़क पकड़कर वाहर निकलने के बजाय अपने मन की गुप्त योजना के अनुसार वह गाव में प्रवेश कर जाता है। दुपहरिया तप रही होती है। सूर्य का गोला आग उगल रहा है। गर्म हवाएं जोरों में चल रही हैं। गांव के अधिकाश लोगों ने अपने घर की खिडकियां और दरवाजे बन्द कर लिए है। फिर भी अनेक लोग अपने दालान मे ताश खेलते और गप्प लडाते नजर आ जाते हैं। वह साधुन तो गाव के लोगों से परिचित है और न गाव के लोग ही उसमे परिचित है। उस साधु को गाव की गलियो के बारे में भी कोई जानकारी नहीं कि कौन-सी गली कहा जाती है, इसीलिए वह लोगों से पूछते-पूछते दूधनाथ चौधरी के घर पहुंचता है। लेकिन दूधनाथ चौधरी के घर की खिडकिया और दरवाजे बन्द हैं। दालान की कोठरी का किवाड भी भीतर में बन्द है । वह माधु दूधनाथ चौधरी के घर के आगे के चबूतरे पर खडा होकर ईश्वर के नाम का जयकारा तेज आवाज मे लगाने लगता है। उसकी आवाज सुनकर दालान की कोउरी खुलती है । दूधनाथ चौधरी वाहर निकलते हैं। घर का दरवाजा भी सुलता है। दूधनाथ चौधरी की पत्नी और अन्य महिलाएं दरवाजे पर आ जाती हैं। इससे पहले कि दूध- नाथ चौधरी कुछ कहते, वह साधु आगे बढ़कर पूछता है, "बच्चा ! तुम्हारा नाम ही दूधनाथ चौधरी है ?" दूधनाथ चौधरी जवाब देते हैं, "हा वावा, कहिए, क्या आज्ञा है ?" वह माधु कहता है, "मैं बनारम का मत हूं..'इस गली से गुजर रहा था कि तुम्हारे घर पर नजर पडते ही मेरे कदम रुक गए "तुम्हारे घर पर एक काली छाया मंडरा रही हैहम साधु-मन्यासियो का जोवन तो लोगो 'कल्याण में ही बीतता है"मोचा, तुम्हें आशीर्वाद देता चल..।" उम साघु की बात सुन दूधनाथ चौधरी, उनकी पत्नी और परिवार के अन्य लोग हाथ जोडकर गिडगिड़ाने लगते हैं, "आप ठीक ही कह रहे हैं बाबा"हम बहुत परेशान हैं।" "घबराओ मत सव टीक हो जाएगा ईश्वर की प्रेरणा से ही मैं यहां चला आया हूं, अन्यथा तुम लोगो से तो मेरा कोई परिचय भी नहीं।" अब दूधनाथ चौधरी के परिवार के लोग उस साधु को आदर के साथ " - " अपने घर के अन्दर ले आते है तथा ओसारे में एक उचित आसन पर विठाकर खुद उसके सामने जमीन पर बैठ जाते हैं। दूधनाथ चौधरी पूछते है, "बाबा, आपने मेरे घर के ऊपर क्या देखा?" "बेटा! तुम्हारे घर के ऊपर एक डायन की भयानक छाया मंडरा रही है।" दूधनाथ चौधरी अब अपने को रोक नहीं पाते हैं, "वावा, मेरा लड़का लेकिन वह माधु दूधनाथ चौधरी की बात बीच में ही रोक कहता है, "मैं सब देख रहा हूं बेटा! मुझे कुछ बताने की जरूरत नहीं। तुम्हारा लड़का काफी दिनों से खाट पर पड़ा है तुम्हारा वही एक लड़का है... डायन अपना पहला शिकार उसीको बना रही है। उसके बाद फिर परि- वार के किसी दूसरे आदमी को पकड़ेगी।" अव दूधनाथ चौधरी और उसकी पत्नी साधु के पैर पकड़ विनती करने लगते हैं, "वावा! हमारे लड़के को बचा लीजिए'हमें इस संकट मे उबार लीजिए...!" वह साधु कहता है, "मुझे उस बच्चे को दिखाओ।" दूधनाथ चौधरी और उनके परिवार के लोग अब उस साधु को बच्चे के पास ले जाते हैं। वह साधु देखता है, उस बच्चे का सारा शरीर पीला पड़ गया है। आंख, दांत और नाखून भी एकदम पीले हो गए हैं। वह काफी दुबला हो गया है। उसे देखने के बाद उसकी आसन्न-मृत्यु की सूचना साधु से छिप नहीं पाती है। लेकिन इससे उस साधु को क्या मत- लव ? वह जिए या मरे ? उमको कोई फर्क पड़ने वाला नहीं। रोज ही हजारों आदमी जीते-मरते रहते हैं। वह तो अपना काम वनाने आया है। काम बनाकर चल देगा। "बच्चा ! तुम्हारे यहां अरवा चावल होगा!" साधु दूधनाथ चौधरी से पूछता है। "हां, बावा!" "तो मुझे थोड़ा अरवा चावल दो और यहां धूप-दीप जलाने की व्यवस्था करो।" १२० । यटम्थल - . - दूधनाथ चौधरी को पलो तेजी में अंदर जाना है और सार असा चावल माधु को देती है और उस बच्चे के पाम धूप-दीप बताती है। वह मायु अरवा चावल अपने हाथ में ले कोई मंत्र पड़ने लगता है। जिसने मुह मे तरह-तरह की डरावनी ध्वनियां निकालते हुए उस बच्चे के पर चावल छिडकने लगता है। इसके बाद आपाहा, पातान और चारो दिमाशे को मबोधित करते हुए वह चारों तरफ चारल के दाने फेंका है। सिर अपने कमण्डलु का थोडा-मा जल उस बच्चे को पिलाता है और मेपल घर में चारी नरफ छिड़कवा देता है। “बच्चा ! अब तुम्हारा सडका धीरे-धीरे ठीक हो जाएगा. अपन के चंगुल से मैंने इसे मुक्त कर दिया।" साघु कहता है। दोनो पति-पत्नी उस माधु के पैरो पर गिर पड़ते हैं. 'वाना हम आपको क्या मेवा करें" माधु कहता है, "बच्चा'हम कोई बनिया शेडे हैं कि एक कर देतो दो भर वसूल करें. 'अरे, हम तो ईश्वर के भक्त हैं ' वनारम जिम मदर में हम रहते हैं, वहा ईश्वर को प्रमाद चढ़ाते हैं. अपनी सामने अन- मार ईश्वर को प्रसाद चढ़ाने के लिए तुम जितना दे सको दे दो। दूधनाय चौधरी की गिनती गाव के अच्छे गृहस्थों में होनी है । उनके यहा अनाज की कोई कमी नहीं। उनके जैसे गृहन्यों की भून मान अनाज ही है। अनाज के बल पर हो वे बुध करने है। अनाज देवर की कुछ खरीदते हैं। दान-दक्षिणा में भी अनाज ही देने है। सो उम मानव लिए छोटी-छोटी बोरियो में एक बोरी चावल और एक बोरी गेह लापर देते हैं। साधु कहता है, "बच्चा। यह गठगे लेकर हम कहा जा हमको बहुत दूर जाना है। ईश्चर वे प्रसाद के लिए तमने जिनमा ना निकाल दिया है, उतने का पैसा ही मुझे दे दो दूधनाथ चौधरी और उनके परिवार के लोग बर व नाम पर निकाले गए अनाज का अंदाजा नगाने है। फिर उमरी मिनिनि करते है। वे अनाज के मुकाबले गशि का निशाण बद-मी करते है, क्योंकि साधु ने उनके मन को इस धारणा 7 उगा दर ईश्वर के नाम पर निकाले गए अनाज के एवज म मममममा र्ण होगा। दूधनाथ चौधरी के परिवार की ओर से उस अनाज की राशि ५ रु० निर्धारित की जाती है। फिर उस साधु को अनाज के बदले ये सौंपे जाते हैं। वह साधु रुपये जेब में रख ईश्वर के नाम का जयकारा गाता है। फिर दूधनाथ चौधरी के लड़के के माथे पर अपना हाथ फिराता । इसके बाद चल देता है। दूधनाथ चौधरी के परिवार के प्रायः सभी लोग उस साधु को छोड़ने के लिए अपने घर से बाहर गली तक आते हैं। फिर साष्टांग दण्डवत् कर उस सांधु को विदा करते हैं। वह साधु उन लोगों से मुक्त हो तेजी से आगे बढ़ चलता है । अव वह एक क्षण के लिए भी कहीं नहीं रुकता। सड़क पकड़ इस गांव की सरहद को मिनटों में पार कर जाता है। . - रामशरण बहू की चिंता और परेशानी निरंतर बढ़ती ही जा रही है। वैने गांव के लोग एक लंबे समय से उन्हें डायन समझते आ रहे थे; किन डायन समझने की जितनी सजा आज उन्हें मिल रही है, उतनी सजा पहले कभी नहीं मिली थी। घर से उनका निकलना मुश्किल हो गया है। गांव में हर जगह उनको लेकर बातें जारी हैं। उन बातों पर कहीं लोग विश्वास करते तो कहीं अविश्वास । लेकिन बहुमत विश्वास प्रक करने वालों का ही है। जो चंद लोग अविश्वास प्रकट करते हैं, वे भी सि' कहकर ही, व्यवहार में नहीं। पुरुषों की तरह गांव में महिलाओं की भी अनेक वैठकें हैं। महिला की बैठकें भी इस चर्चा से गर्म हैं। दूसरी चर्चाओं में पुरुषों की बैठक महिलाओं की बैठकें चाहे जितना पीछे छूट जाती हों, रामशरण व इस चर्चा में तो बाजी मार लेती हैं। इस चर्चा से गांव के माहौल को कित करने की भूमिका महिलाओं की बैठकें ही अदा करती हैं । गांव में महिलाओं की पहली बैठक सती मैया के चौरे पर लग सती-प्रथा के जमाने में इस गांव की एक औरत सती हुई थी। स्मृति को बनाए रखने और उसे पूजने के उद्देश्य से गांव के लोगों चीरा का निर्माण किया था। तब सती-चौरा बहुत छोटा था १२२ / युद्धस्थल । छाया देने के लिए लगाया गया नीम-गाछ भी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ था। लेकिन समय के साथ-साथ जब सती-चौरा का पलस्तर झड़ने लगा और ईंटें उखड़ने लगी तव गाव के लोगो ने नंदा उगाहकर न सिर्फ सती-चौरा की मरम्मत ही की बल्कि उसे काफी बड़ा आकार भी दे दिया। और कामो के लिए चदा देने में भले ही लोग कोताही करते, लेकिन सती- चौरा की मरम्मत और उसके व्यापक निर्माण के नाम पर तो लोगो ने दिल खोलकर चंदा दिया। तब से इस सती-चौरा की काया ही पलट गई है। नीम-गाध भी अब विशाल और गहन हो गया है। सती-चौरा को वह बराबर अपनी सघन छाया दिए रहता है। मती-चौरा के एक कोने मे सती मैया की एक छोटी-सी मूर्ति की स्थापना की गई है। लेकिन वह मूति अब नजर नहीं आती। सिद्दर के ढेर के नीचे दब गई है। गाव की सधवा औरतें प्राय. हर तीज-त्योहार के अवसर पर सती मैया को सिन्दूर चढाने अवश्य आती है। प्रारंभ में सती-चौरा का बहुत महत्त्व था। बिना स्नान किए सती- चौरा पर कोई नहीं चढ़ता था। अगर भूल से पांब मे चप्पल पहने कोई सती-चौरा पर चढ जाता तो देखने वाले औरत-मर्द जमकर उसकी फीचाई करते। लेकिन अब वह स्थिति नही रह गई है। अब तो सती. चौरा गाव की महिलाओ के लिए एक प्रमुख वैठक बन गई है। गांव की वे महिलाएं, जो बहुरिया की सीमा-रेवा को पार कर चुकी होती हैं, जिन्हें बाल-बच्चे हो गए होते हैं, जिनको घुटनो तक धृधः निकालने की अब जरूरत नही होती है, वे अपने घर के कामो को निबटा, सती-चौरा पर आ जाती हैं । फिर कोई अपने बच्चो को दूध पिलाने, कोई किसी के सिर से जुएं निकालने तथा कोई म्वेटर बुनने में लग जाती कामों के लिए सती-चौर पर बैठने का तो वहाना है। मचाई नो गण लदाना ही है। वे महिलाए गप्प लडाने के उद्देश्य से ही यहा जुटती है। यहा की बैठक में तरह-तरह की बाने चलती है कि किसके मर्द को कौन-सा गाना रूचता है, किसका मर्द किसको मारता है, किमके यहाभ क्या बना है, किस सास ने आज अपनी पतोहू को पीटा, किस रन्गेर अपनी सास के पर जलते हुए अगारे फेके, किसका बच्चा बेशर । इन , किसको बच्चा होने वाला है, कौन अपने देवर के साथ फंसी है, किस ममुर ने अपनी भवह को ही रख लिया है, किमका नाजायज गर्भ गिराया गया, आदि । इसके साथ गांव की सामयिक घटनाओं और तत्कालीन चर्चाओं पर भी जमकर बातें होती हैं। चमरटोली की लड़ाई के वक्त यह वैठक काफी दिनों के लिए एकदम मुनी पड़ गई थी। पुरुपों ने अपने घर की औरतों को सती-चौरा पर बैठने मे मना कर दिया था । पुरुपों की यह मान्यता थी कि वे मारे जाएं, उनकी कितनी भी दुर्गति हो, वे सह लेंगे; लेकिन उनके घर की औरतों को कोई कुछ कह दे, यह वे सह नहीं पाएंगे। इसीलिए औरतों के घर से बाहर निकलने पर उन्होंने रोक लगा दी थी। लेकिन एक लंबे समय बाद अब पुनः सती-चौरे पर औरतों की बैठकें लगने लगी हैं। इस बैठक में रामशरण बहू और दूधनाथ चौधरी के लड़के की चर्चा को अतिशय महत्त्व देते हुए बातें चल रही हैं । एक औरत कहती है, "मेरी बेटी को भी रामशरण बहू ने किया था। गंगा-स्नान के त्योहार की बात है। मैं अपनी बेटी को लेकर पोखरे में स्नान करने पहुंची थी। लेकिन यह देखकर मेरा ख्न ही सूख गया कि रामशरण वह वहां पहले ही से मौजूद है। मैं उससे नजर बचा चुपके से स्नान करने लगी। लेकिन वह चुडैल तो आंखें फाड़े मेरी बेटी को ही देख रही थी। जव मैं पोखरे के पानी में घुस गई तो घाट पर खेलती मेरी बेटी को उसने गोद में ले लिया और मेरी ओर ताककर कहने लगी, 'बड़ी मुन्दर विटिया है। क्या नाम रखा है इसका?' " मैं स्नान करना छोड़ बाज की तरह उसकी ओर झपटी और अपनी बेटी को उससे छीन घर की ओर भागी। लेकिन उसके तीसरे दिन बाद से ही मेरी बेटी इतनी जोरों से बीमार पड़ी कि बनने की कोई आशा नहीं रही। जब मैंने सती मैया को चुनरी चढ़ाने की मनीती की और कई ओझाओं को बुलाया, तब कहीं जाकर मेरी बेटी बची। एक दूसरी औरत कहती है, "अगर मेरे बच्चे को रामशरण बहु छू देती तो मैं उसका झोंटा पकड़, लसार-लसारकर मारती। उस डायन की यह मजाल कि मेरे लेलते बच्चे को गोद में ले ले !" १२४ / युद्धस्थल एक तोमरी औरत कहती है, "मुझे ना को गुजरते हुए भी डर लगता है। एक वार किनी काम की रही थी। जब उसके सामने से गुजरने लगी नीम्ना - तरह मुझे देखा कि घर आते ही मैं उल्ली कन्नी दोन दिनो तक बीमार रही। मुसन ओजा अगर समय पर नहीं पहनन में निगोडी रामगरण बहू मुझे कही का नहीं छोड़ती। मुस्लने दावा रिम कुलच्छनी ने मेरे ऊपर एक 'वैमत' को नदार कर दिया या । मलाही मुसन ओझा का, , उसने मुझे सकट ने बचाया।" फिर एक चौथी औरत कहती हैं, "दूधनाय बांधर्ग के लडके को बचाने के लिए ओझा लाय प्रयत्न कर रहे हैं, लेकिन उसकी हालत मुधरने के बजाय बिगडती ही जा रही है। रामगरण बहू ने बहुत कमकर उनके ऊपर वार किया है। उसे देखने पर लगता है कि अब और तीन-चार दिनों से अधिक वह नहीं जी पाएगा।" इसपर एक औरत कहती है. "दूधनाथ चौधरी महटियाएगे नही रामशरण बहू को भी इस बार किमी जबर्दम्न आदमी में पाला पडा है। दूधनाथ चौधरी के परिवार के लोग तो गाव मे मे ही लडाई मोजते रहते हैं। इस बार उन्हें अच्छा मौका मिल जाएगा।" इमी तरह सती मैया के चौरे पर औरतो की बनकही चलती रहती है। गमवारण वह ने गाव में अपनी डायन-विद्या से किन-किन लोगो को खत्म किया, इमे एक-एक कर औग्ने उजागर करती है । इम गाव के मृतको की सूची में गमगरण वह द्वारा मारे गए कुछ वमे लोगो के नाम औग्ने उभारती है, जिनका रामशरण वह मे कभी कोई सम्बन्ध नहीं था। यहा की औरतो के लिए गमगरण वह का नाम माक्षात् काल का नाम है। अपनी वानों में वे रामशरण वह का इनना भयानक चित्र प्रस्तुत करती है कि उनके माथ आए छोटी उम्र के बच्चे दर जाते है । वे अपनी माताओं से जा चिपकते हैं। इम बैठक की औरते वहुत कम पढ़ी-लिखी है। मिर्फ चिट्टी-पी वांचना मर ही जानती हैं। उनकी दुनिया घर-परिवार तक ही सीमित है इसीलिए उनके ज्ञान का दायरा भी सकुचित है। हालाकि उनमें से एक जग्गू । दो औरतें कुछ पढ़ी-लिखी हैं। प्रारंभ में वे किसी भी विषय पर अपनी प्रतिक्रिया अलग ढंग से देती थीं, लेकिन इनके साथ रहते-रहते अब वे भी इन्हींकी तरह सोचने-समझने लगी हैं। सनी मैया के चोरे के बाद गांव में महिलाओं की दूसरी बैठक घुनसार में लगती है। वैसे तो गांव में दो-तीन धुनसार हैं, लेकिन जग्गू कानू घुनसार ही औरतों के बीच ज्यादा लोकप्रिय है। दरअसल, यहां जगह काफी है। साथ ही अपने यहां अनाज का मुंजा बनाने के लिए आने वाली औरतों मे और उसकी पत्नी का व्यवहार भी मधुर होता है। अन्य गांवों की तरह इस गांव में भी अनाज का मुंजा बनाने का काम घुनसार में ही होता है। घुनसार का निर्माण अकसर कानू जाति के लोग ही अपने घरों में करते हैं । खेतों और बगीचों से पुआल तथा पत्ते बुहार- कर कानू लाते हैं । उनके घर की औरतें उससे घुनसार जलाती हैं। घुन- मार में एकसाथ सात-आठ औरतों के अनाज भूजे जाते हैं। चावल, बूट, मकई, गेहूं आदि अनाजों का मुंजा मशहूर होता है। अन्य गांवों की तरह इस गांव के लोगों के लिए भी मुंजा एक प्रिय, स्वादिष्ट और स्वास्थ्यकर वाद्य पदार्थ है। रिश्ते-नाते के लोगों के आने पर मुंजे से ही उनका स्वागत किया जाता है। कानू लोगों के यहां के घुनसार, जो पहले सप्ताह में सिर्फ तीन ही दिन जलते थे, अब रोज जलते हैं। अपने घुनसार में मुंजा भूजने के एवज में कानू लोग प्रत्येक भूजे जाने वाले अनाज का छठा हिस्सा ले लेते हैं। इस तरह घुनसार के माध्यम से अपने परिवार को जिलाने-खिलाने की समस्या वे हल कर लेते हैं। जग्गू कानू के घुनसार में अनाज का मुंजा बनाने के लिए गांव की औरतों की भीड़ लगी रहती है। जो औरतें एक-दूसरे से कभी मिलती- जुलती नहीं थीं, इरा घुनसार के माध्यम से वे भी एका-दूसरे से मिलती हैं। घर की चहारदीवारी में कैद औरतें घुनसार में आने पर अपने को मुक्त महमूस करती हैं । जग्गू की पत्नी उधर मुंजा मूंज रही होती है और इधर उसके पास ही एक जगह बैठकर गांव की औरतें बातचीत करने में मशगूल हो जाती है । मुंजा तैयार होने के बाद भी वे यहां से जल्द सख्सत नहीं । १२६ । यद्धस्थल होती, आपस में चल रही बातचीत का पूरा आनंद लेकर ही हटती है। घुनसार की इस बैठक में सती मया के चौरे की तरह ही अनेक प्रकार की बातें होती है कि अमुक लड़की शादी करने लायक हो गई, अमुक लड़की की उम्र बहुत गुजर गई। उसके बाप-भाई को फिकर ही नहीं। वह तो अब बूढी जैसी लगने लगी है। अमुक लडकी की गादी अमुक जगह तय हो गई। उसके बाप दस हजार का तिलक दे रहे है । अमुक लड़के को भी बीस हजार मिल रहा है, लेकिन उसके बाप की पच्चीस हजार की मांग है । अमुक लड़के को नौकरी मिल गई, अब वह अपने घर की हालत सुधार देगा । अमुक की पतोहू भूत खेलती है। वह नहर मे ही नकर आई है । अमुक की लडकी के ममुराल जाते वक्त अमुक डायन ने नजर लगा दी थी, वह वहां जाते ही बीमार पड़ गई है। उसके बाप-भाई परेशान हैं। लड़के वाले कहते हैं कि रोगी लडकी दे दी। अमुक औरत डायन-विद्या सीख रही है। अमुक के यहा झगड़ा हुआ है । अमुक बाप-बेटा अलग हो गए । अमुक भाई ने अपनी औरत का कहना मान अपने भाई का माया 'फोड़ दिया है। अमुक के घर की औरतें अपने यहां के बनिहार और चरवाह से फंसी हैं, आदि । चमरटोली की लडाई के वक्त घुनसार की वैटक काफी कमजोर हो गई थी। चूकि घुनसार के माथ जग्गू कानू की रोजी-रोटी का सवाल जुड़ा था, इसीलिए उन दिनो भी उसका धुनसार रोज ही जलता था। लेकिन उस समय उसके धुनसार में सिर्फ आसपास की दो-चार औरतें ही आ पाती थी। शेप औरतें तो घरो में वद हो चुकी थी। वे अपने घर ही मुंजा तैयार कर लेती थी। हालाकि धुनसार के मुकाबले उनका मुजा अच्छा नहीं होता था; लेकिन हिंसा के उस माहौल मे मुजे के अच्छे-बुरे का खयाल भी तो लोग नहीं कर पाते थे। गले के ऊपर नलवार लटकनी हो तो फिर अच्छे-बुरे खाद्य पदार्थ की वात कौन करेगा? लेकिन वक्त के गुजरने के साथ-साथ अव पुनः घुनसार मै औरने जुटने लगी हैं। घुनसार की इस बैठक मे दूधनाथ चौधरी और गमगरण वर को चर्चा छिड़ने पर औरतें रामशरण बहू के बारे में ऐसे-ऐसे किम्मे मुनाने लगती है कि धुनसार का पूरा माहौल दहशत से भर जाता है। लगना है ह पण बहू यहां अब पहुंचीं कि तव पहुंची। यहां पहुंचत हा च्चा चवा जाएंगी। वह मानव-भक्षी राक्षसी हैं। यहां की औरतें गरण बहू को अनेक नई और कल्पित घटनाओं के साथ जोड़कर त्रत करने लगती है। लेकिन एक औरत इन सबसे बढ़-चढ़कर यह स्योद्घाटन करती है कि रामशरण वहू ने अपने पति को भी मारा है। औरत कहती है कि डायन को अपनी सिद्धि के वक्त दो चीजों में से कोई एक देनी पड़ती है-मांग या कोख यानी पति या वेटा; लेकिन राम- गरण बहू तो बेटा वाली थीं नहीं, इसीलिए पति देकर ही उन्होंने सिद्धि प्राप्त की। दुन्वन की मां, जो इस घुनसार में मौजूद होती है, पहले तो चुपचाप सुनती रहती है-किस-किससे वह लड़े-लेकिन जब रामशरण बहू के ऊपर उनके स्वयं के पति के मारने का आरोप एक औरत लगाती है तव वह उसने कहती है, “और तुम्हारा भी तो वेटा मरा था। तुमने अपने बेटे को देकर क्या सीखा है ?" इसपर वह औरत गरजकर कहती है, "दुखन की मां, मुंह संभाल- कर बात कर, नहीं तो जीभ खींच लूंगी 'दाई-लौंडी तेरी यह औकात! "तुम भी जवान मंभालकर बोलो'एक विधवा, बेसहारा पर झूठा अक्षरंग लगाते तुझे शर्म नहीं आती...!" "देख दुखन की मां, बीच में तू मत पड़ 'मैं तुझको तो कुछ कह नही रही हूं. मैं तो रामशरण बहू को कह रही हूं।" "क्यों तुम रामशरण बहू को कुछ कहोगी ? हिम्मत हो तो कि 'वरियारा' को कहकर देखो''तुम्हारे सात पुश्तों का उद्धार न कर नि तो मेरा नाम बदल देना...।" "तो तू उसका पक्ष लेकर लड़ने आई है ! मुझे तुझसे डर लग "तू भी तो डायन है 'रामशरण बहू के पास सीखने जाती है।' "तू भी डायन है, राक्षसी है।" "तू चुडैल है, रंडी है।" "तेरा भतार मर जाए।" "तेरा बेटा 'उफर' पर जाए।" . १२८ / युद्धस्थल "तेरी देह मे कोड फूट जाए।" "तेरी देह में कीड़े पड़ जाएं।" और इसके बाद वह औरत आगे बढकर दुखन की मा पर हाथ चला देती है। फिर दुखन की मा झपटकर उसके वाल पकड़ लेती है। दोनो एक-दूसरे से गुथ जाती हैं। फिर जमीन पर गिर पड़ती है। काम-काज करने की वजह से दुखन की मां मजबूत होती है । यह उस औरत को जम- कर पिटाई करती करती है। वह औरत भी दुखन की मा को अपने दांतो से कई जगह काट देती है । धुनसार में उपस्थित महिलाओं के बीच हंगामा मच जाता है । सब इस अनपेक्षित घटना से आतकित हो उठती हैं। महि- लाओं द्वारा लाख बीच-बचाव किए जाने पर भी दोनो एक-दूसरे को छोड़ती नहीं है । शोरगुल और चीख-चिल्लाहट की आवाज सुन जब गली से गुजरते कुछ पुरुष घटनास्थल पर पहुचते हैं, तब उन्हे एक-दूसरे से अलग किया जाता है। उस औरत को कुछ औरतें लेकर उसके घर की ओर चल देती हैं और कुछ औरतें दुखन की मा को लेकर उसके घर की ओर। रास्ते मे दुखन की मां यह सोचती जाती है कि आज उसने एक बाबू घराने की औरत को पीटा है। अगर पहले की बात होती तो उस वावू घराने के लोग लाठी लेकर जरूर उममे बदला लेने आते, लेकिन चमरटोली की लड़ाई के बाद उनकी वह हिम्मत खत्म हो गई है। दुवन की मा को लगता है, चभरटोली की लडाई ने उन गरीबो और पिछड़ी जाति के लोगो के लिए बहुत कुछ किया है । उसी लडाई की बदौलत पहले की तरह आज वह मार खाकर नहीं, पीटकर लौट रही है। घुनसार के बाद गाव में महिलाओ की तीसरी बैठक फुलझरिया के घर लगती है। फुलझरिया फल्गुमिह की बड़ी लड़की है। उसमें छोटी उसकी दो बहनें है, लेकिन कोई भाई नही है। उसके पिना फल्गुमिह गाव के चंद सम्पन्न गृहस्थो मे एक हैं । फुलझरिया और उसकी बहनो को अपने घर में जितना लाड-प्यार मिलता है, उतना गाव की अन्य लड़कियो को नहीं मिल पाता है। असल में गाव मे लडको की तुलना मे लडकियो को तुच्छ और हेय समझा जाता है। जिस घर में लड़के होते हैं, उस घर में लड़कियों को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता है। इसके पीछे उनकी यह भावना होती है कि लड़कियां तिलक-दहेज लेंगी और एक दिन इस घर से चली जाएंगी। शायद इसीके चलते लोगों के अन्दर ऐसी धारणा है कि पुत्र पैदा होने पर धरती वित्ता-भर ऊपर उठ जाती है और पुत्री पैदा होने पर वित्ता-भर नीचे धंस जाती है। गांव में यह लोकगीत मशहूर है कि : 'जाहु हम जनिती धियवा कोखी रे जनमिहे पिहितों में मरिच झराई रे। मरिच के झाके झुके धियवा मरि रे जाइति, छुटि जाइते गरूवा संताप रे॥'. लेकिन फुलझरिया और उसकी बहनों के साथ विपरीत स्थिति है। प्रारंभ में तो फल्गुसिंह की पत्नी को कोई बच्चा ही नहीं होता था। वांझ वनने की स्थिति में वे आ गई थीं, इसीलिए जव फुलझरिया का जन्म हुआ तो दोनों पति-पत्नी की खुशी की कोई सीमा न रही । उनकी शादी के एक लंबे समय वाद जव वे 'निसंतानी-निपुत्तर' बनने जा रहे थे, फुलझरिया ने पैदा होकर उन्हें एक भयंकर संकट से बचा लिया। इसीलिए फुलझरिया को वे लड़की नहीं, लड़का ही समझते हैं ! फुलझरिया के बाद जव उसकी और दो बहनें पैदा हुई तब भी वे हतोत्साहित नहीं हुए हैं । वे दोनों पति- पत्नी यह सोचते हैं कि जव किस्मत में लड़का नसीव होगा तो होगा, नहीं तो ये लड़कियां ही सब कुछ हैं। इसीलिए गांव की अन्य लड़कियों से अलग फुलझरिया और उसकी बहनें अपने घर का अतिशय स्नेह-प्यार , पाती हैं। फुलझरिया के यहां उसकी और उसकी बहनों की हमउम्र लड़कियां वरावर ही जुटी रहती हैं। चूंकि फुलझरिया और उसकी बहनें राजकुमा रियों की तरह जिन्दगी जीती हैं, इसीलिए गांव की शेप उपेक्षित लड़कियों के लिए वे आकर्षण का केन्द्र बनी रहती हैं। जहां एक ओर गांव की लड़- कियां अपने घर के लड़कों की तुलना में बहुत नगण्य, घर के कामों में दबी, झूला झूलने और मेहंदी चढ़ाने जैसी अपनी बुनियादी इच्छाओं की पूर्ति भी लुक-छिपकर करती हैं, वहीं फुलझरिया के पिता ने अपने बनिहारों- चरवाहों को फुलझरिया और उसकी बहनों के लिए झूला बनाने, मेहंदी १३० । यद्धस्थल की पत्तियां तोड़कर लाने तथा गुड्डे-गुड़ियों की शादी में उनको इच्छित सामग्री जुटाने का आदेश दे दिया है। फुलझरिया के घर की इस बैठक मे गांव की नई उम्र की लड़कियां ही ज्यादा आती हैं। वे विवाहित लडकिया भी, जो अपनी ससुराल से लौट आई रहती है, यहां उपस्थित होती हैं। यहां लडकिया झूला झूलने, गीत गाने, मेहंदी चढाने, गुड्डे-गुड़ियों का ब्याह रचाने तथा एक-दूसरे को छेडने में लगी रहती हैं। गांव मे लडकियो के लिए ऐसी अनुकूल जगह और दूसरी नहीं । अपने घरो से अवकाश पाते ही गाव की लडकियां सीधे यहां भाग आती हैं। हालांकि यहा सिर्फ बाबू घराने को लडकिया ही आती हैं, चमरटोली और अन्य छोटी जातियों को नहीं। जहां दूसरे घरों में लड़कियों को यह मजलिस देख लोग नाराज होते, वहां फल्गु सिंह दम्पती यह देखकर खुश हो उठते कि उनकी लड़किया अपनी सहेलियों के बीच चहकते हुए दिन गुजार रही हैं । सती मैया के चौरे और घुनसार की बैठक की तरह ही यहां की अधि- काश लड़कियां भी अनपढ़ होती है। गाव में सिर्फ चौथी कक्षा तक की पढ़ाई होती है। लेकिन वह पढ़ाई भो पच्चीस प्रतिशत लडकिया ही कर पाती हैं। असल में गाव के लोग लड़कियो को पढ़ाने के पक्ष में नहीं होते हैं। उनको मान्यता है कि लड़किया कम बोलें, लुक-छिपकर रहें, चूल्हा- चौका का काम जान जाएं, बस यही काफी है। शादी-ब्याह कर दिया जाएगा। जहा जाएंगी, वहा घर संभाल लेंगी। पढाई-लिखाई और देश- दुनिया की जानकारी से उनको क्या मतलव ? यहा की बैठक को वातचीत का विपय यह होता है कि गांव में इस समय कौन लड़का सबसे अच्छा है। कौन लडका किम लड़की को घूरता है। अमुक लडकी भाग्यशाली है, उसकी शादी बहुत जल्द तय हो गई। उसके बाप-भाई को बहुत घाट का पानी नहीं पीना पडा । अमुक लड़की के जीजाजी आए हैं। वे ऐने हैं"। शाम को चलकर उनको छेडना होगा। इसके साथ ही ससुराल से नई-नई लौटी विवाहिताओ को पकड़कर शेप लडकिया यह सुनती हैं कि अपने पति के साथ उनकी पहली रात कसे गुजरी। अगर वे ना-नुकर करती हैं तो उन्हें सब मिलकर चिकोटी यों को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता है। इसके पीछे उनकी यह होती है कि लड़कियां तिलक-दहेज लेंगी और एक दिन इस घर से जाएंगी। शायद इसीके चलते लोगों के अन्दर ऐसी धारणा है कि पैदा होने पर धरती वित्ता-भर ऊपर उठ जाती है और पुत्री पैदा होने वित्ता-भर नीचे धंस जाती है। गांव में यह लोकगीत मशहूर है कि : 'जाहु हम जनिती धियवा कोखी रे जनमिहे पिहितों में मरिच झर्राई रे। मरिच के झाके झुके धियवा मरि रे जाइति, छुटि जाइते गरूवा संताप रे॥' लेकिन फुलझरिया और उसकी बहनों के साथ विपरीत स्थिति है। प्रारंभ में तो फल्गुसिंह की पत्नी को कोई बच्चा ही नहीं होता था। वांझ बनने की स्थिति में वे आ गई थीं, इसीलिए जव फुलझरिया का जन्म हुआ तो दोनों पति-पत्नी की खुशी की कोई सीमा न रही । उनकी शादी के एक लवे समय वाद जब वे 'निसंतानी-निपुत्तर' बनने जा रहे थे, फुलझरिया ने पैदा होकर उन्हें एक भयंकर संकट से बचा लिया। इसीलिए फुलझरिया को वे लड़की नहीं, लड़का ही समझते हैं। फुलझरिया के बाद जब उसकी और दो बहनें पैदा हुईं तव भी वे हतोत्साहित नहीं हुए हैं । वे दोनों पति- पत्नी यह सोचते हैं कि जब किस्मत में लड़का नसीव होगा तो होगा, नहीं तो ये लड़कियां ही सब कुछ हैं। इसीलिए गांव की अन्य लड़कियों अलग फुलझरिया और उसकी बहनें अपने घर का अतिशय स्नेह-प्य पाती हैं। फुलझरिया के यहां उसकी और उसकी बहनों की हमउम्र लड़ा बरावर ही जुटी रहती हैं। चूंकि फुलझरिया और उसकी बहनें राज रियों की तरह जिन्दगी जीती हैं, इसीलिए गांव की शेष उपेक्षित लड के लिए वे आकर्षण का केन्द्र बनी रहती हैं। जहां एक ओर गांव की कियां अपने घर के लड़कों की तुलना में बहुत नगण्य, घर के कामों झूला झूलने और मेहंदी चढ़ाने जैसी अपनी बुनियादी इच्छाओं भी लुक-छिपकर करती हैं, वहीं फुलझरिया के पिता ने अपने र चरवाहों को फुलझरिया और उसकी बहनों के लिए झूला बना १३० युद्धस्थल बुढ़िया क्या कर बैठे? एक दूसरी लडकी कहती है कि दूधनाथ चौधरी का लडका कितना भोला-भाला और सुन्दर था ! जब वह एक साल का था तब मैं उसके घर जाती थी तो वह अपनी मां की गोद से उछलकर मेरी गोद मे आ जाता था। अब तो उसे देखती हूं तो पहचान मे ही नहीं आता है कि यह वही लइका है। फिर वह लडकी रामशरण बहू को थापने लगती है कि रामशरण बहू घुल-धुलकर मरेगी."उसकी देह में कीड़े पड़ेंगे 'वह बहुत पाप कर रही है। इसके बाद ससुराल से लौटी एक नव-विवाहिता लडकी कहती है कि उसकी ससुरात मे भी इसी तरह की एक डायन है। जब वह बहुरिया वनकर गई थी तो गाव को औरतों के बीच उसका मुह देखने के लिए वह आई थी। लेकिन उसकी चतुर सास ने पहले ही उसकी कमर में एक तावीज लाकर वाघ दिया था। फिर जब औरतों के साथ वह डायन मुह देखकर चली गई थी तब उसकी सास ने पीले सरमों से उसे 'ओइछ' कर सरसों के दाने चूल्हे में फेंक दिए थे। इस तरह डायन की कुपित दृष्टि के प्रभाव को उसकी सास ने खत्म कर दिया था। इसके बाद फुलझरिया कहती है कि पहले रामशरण बहू अकसर मेरे यहा आ जाया करती थी। नजदीक घर होने के कारण वरावर आ धमकती थी। लेकिन एक दिन मेरी मा ने बहुत प्रेम से उन्हे समझा दिया कि आप बुरा न मानेगी, आपकी नजर ठीक नहीं है "मेरी लडकियों को लग जाती है. 'वे बीमार पड़ जाती हैं । वस, उस दिन से रामशरण बहू ने मेरे यहा आना छोड दिया। इसपर फुलझरिया की छोटी बहन लबेसरी खिडकी की ओर बढ़ते हुए कहती है कि खिडकी सोलकर देखा जाए न, जरूर रामशरण बहू अपने दरवाजे पर बैठी होगी। न जाने अपने दरवाजे पर बंटकर वह क्या बुदबुदाती रहती है । फिर खिडकी खोलकर लबेसरी आश्चर्य प्रकट करती हुई सयको बुलाती है, "अरे मोनिया, तेतरी, रमतिया, मुगिया, मव दौडो, देखो, सचमुच रामशरण बहू अपने दरवाजे पर बैठी है।" इसके बाद सब लड़किया उस खिडकी पर आ जुटनी हैं और आखें फाड-फाड़कर रामशरण बहू को देखने लगती हैं। एक लड़की कहती है, कि गली में आने-जाने वालो की ओर ताक कने रही है, जमे वा जाएगी। फिर एक दूसरी लडकी कहती है कि मुझे तो इसको देखकर ही डर लगता ।

. के बाद तीसरी लड़की सब लड़कियों को दिखाते हुए कहती है कि रामशरण बहू की हल्की-हल्की मूंछे हैं। डायन की मूंछे होती हैं ! क इसी बीच रामशरण वहू की नजर इस खिड़की की ओर आ जाती र लड़कियों के वीच तहलका मच जाता है। वेखिड़की से भागने लगती अरे! रामशरण वहू इधर ही ताकने लगी। अब फुलझरिया खिड़की स आती है। फिर रामशरण बहू के ताकने के उत्तर में खूब जोर से ड़की बन्द करती है। खिड़की वन्द करने के बाद उसे कुछ नजर तो नहीं ता, लेकिन वह अनुमान लगाती है कि उसकी खिड़की की तेज आवाज रामशरण वहू की पलकें एक क्षण के लिए जरूर बंद हो गई होंगी। फुलझरिया के घर के बाद गांव में महिलाओं की चौथी वैठक कच्ची सड़क के किनारे लगती है। कच्ची सड़क इस गांव से होकर गुजरी है। अनेक गांवों को एक-दूसरे से जोड़ते हुए शहर जाने वाले मार्ग से जा मिली है। इसकी हालत बहुत शोचनीय है। यह जगह-जगह टूट गई है। इसमें कई जगह गड्ढे हो गए हैं। यह निरंतर नीचे की ओर धंसती ही जा रही है। इसके दोनों किनारों के खेत अब इससे ऊंचे दिखने लगे हैं। अपनी इस हाल में भी शहर से आने वाली बसों और गांव से जाने वाली बैलगाड़ियों का वोझ यह अपने सीने पर सहतीरहती है। इसी कच्ची सड़क के किनारे महिलाओं की बैठक लगती है। यहां की वैठक सिर्फ सुबह और शाम को लगती है-सुवह भोर होने से पहले और शाम धुंधलका घिरने के वाद। वैसे यहां औरतें बैठक लगाने के उद्देश्य से नहीं आती हैं। वे तो सुबह-शाम यहां फराकित होने आती हैं। लेकिन ज पांच-दस की संख्या में एक जगह जुट जाती हैं तब अपने-आप उनकी बैट लग जाती है। फिर शौच करने से पहले या शौच करते हुए या शौच क- के बाद बातों में मशगूल रहती हैं असल में गांव के नब्बे प्रतिशत लोगों को गांव में हर तरह के नि की आवश्यकता महसूस होती है, लेकिन अपने घर में शौचालय के नि की आवश्यकता महसूस नहीं होती। इसके पीछे जहां गांव के कुछ की विपन्नता है, वहीं शेप लोगों की दकियानूसी भावना है। परि औरतों को सड़क के किनारे जाना पड़ता है। मर्दो की तरह न त १३४ / युद्धस्थल खेतों में जा सकती हैं और न गाव के बीच कोई ऐसा स्थल होता है, जहा सामूहिक रूप मे वे मल-विसर्जन कर सकें। एक बार एक शहर की लडकी गांव की महिलाओं पर रिसर्च करने के लिए इस गाव में आई थी। कुछ महिलाओ को देखने और उनमे मिलने के बाद उसने अपनी डायरी मे नोट किया कि बदन दिखाने वाले आधुनिक फैशन मे दूर, शहर की महिलाओं की अपेक्षा गांव की महिलाएं रहन-सहन और अपने व्यवहार में पूरी तरह लज्जाशील हैं। लेकिन जब शाम को सड़क के किनारे पाखाना करते हुए उसने औरतो को देखा तो उसके होश उड़ गए। सडक से लोग आते-जाते रहते हैं, बैलगाडियां गुज- रती रहती हैं और औरतें दूसरी तरफ मुंह किए कपड़े उठाए बैठी रहती हैं। उसने अपनी डायरी मे पहले लिखी पंक्तियों को काटकर पुनः लिखा कि बदन दिखाने और निर्लज्जता के स्तर पर गाव की महिलाओं के सामने शहर की महिलाओं का कोई अस्तित्व नहीं। यहां की बैठक में अन्य बैठको की तरह ही विभिन्न प्रकार की बातें होती हैं। लेकिन इस बैठक की यह खासियत होती है कि यहां महिलाओ के आपसी राग-द्वेप की चर्चा खूब चलती है। पीठ-पीछे यहा महिलाए एक- दूसरे को खूब गलियाती हैं। कभी-कभी आमने-सामने हो जाने पर 'पुतवा कदनी' और 'भतरा कटनी' के पवित्र उच्चारण के साय हाथापाई और झोंटा-झोटी भी कर बैठती हैं। चमरटोली की लड़ाई के वक्त यहां की बैठक एकदम खत्म हो गई थी। युछ लोगों ने अपने यहां संडास सोद लिए थे। कुछ लोगो के यहा से नालियों में विष्ठा बहाया जाने लगा था। शेप औरतें अपने घर मे ही शौच जाती और सुबह-शाम लोगों की नजर वचा कूडे-कर्कट वाले स्थान पर फेंक देती। लेकिन अब पुनः सडक अपनी पहली स्थिति मे लौट आई है। यहां की बैठक पुनः चालू हो गई है। रामशरण बहू और दूधनाथ चौधरी के लडके से सम्बन्धित सूचना इस बैठक में मबसे पहले पहुंचती है। फिर इस बैठक में अफवाहों का बाजार गर्म हो जाता है। यहां की औरतें रामशरण बहू को लेकर ऐसी- ऐसी अफवाहें उड़ाती हैं कि सुनकर ही भय लगने लगता है। इस सूचना के बाद अब इस बैठक की महिलाएं शाम गहराने से पहले ही घर ती हैं कि कहीं रामशरण वहू आ न जाए ! कहीं अन्धकार में वह र बैठी न हो! हालांकि उनकी यह धारणा सच नहीं होती थी। एक वार सच हो जाती है। औरतों के बीच सनसनी की तरह यह फैल जाती है कि रामशरण वहू आई है। फिर जो जिस स्थिति में है, उसी स्थिति में मुड़कर देखने लगती है। सचमुच रामशरण बहू न की मां को लेकर फराकित होने आ गई हैं। यह तो इस ओर नहीं ती थीं। आज कैसे आ गई ? औरतों के बीच भगदड़ मच जाती है। आरती-पड़ती औरतें वहां से भागने लगती हैं। रामशरण वहू तो अवाक् चुपचाप देखती रहती हैं। लेकिन दुखन की मां वोल पड़ती है, "भागो- भागो, नहीं तो राक्षसी निगल जाएगी "तुम सब मानवी हो और हम दोनों राक्षसी हैं." इसपर भागती हुई औरतों के बीच से एक औरत कहती है, "दुखन की मां भी डायन हो चली है 'रामशरण बहू के साथ डायन-विद्या सीखने के लिए रहती है।" अभी उस औरत की बात पूरी भी नहीं होने पाती है कि दुखन की मां गरजती हुई भागती औरतों की तरफ क्रुद्ध होकर सिंहनी की तरह झपटती है, "ठहर-ठहर, मैं डायन हूं तो अभी तुझको बताती हूं.''रामशरण बहू की तरह मुझे बेसहारा न समझ। तेरी साड़ी खोलकर इसी सड़क पर तुझे नचा न दिया तो मेरा नाम बदल देना..." लेकिन दुखन की मां के आगे बढ़ने तक भागती औरतें सड़क से उत गांव की एक गली में घुस चुकी होती हैं । दुखन की मां को सुनाई पड़ता एक औरत कह रही है, "चमरटोली की लड़ाई के बाद इस दुखना की का मन बहुत बढ़ गया है। यह जानती है कि वरावर इसीका पलड़ा भ रहेगा। जब कहीं फिर दो-चार हाथ खाएगी तव अपने-आप रास्ते पर जाएगी." दुखन की मां गुस्से में आगबबूला हो उठती है। मन-ही-मन बहुत अफसोस होता है, काश, वह औरत पास होती! एक क्षण त जलती आंखों से उस ओर को देखती रहती है, फिर पलटकर रा - । यदस्थल वहू के पास आ जाती है। अब तक रामशरण बहू की आंखों में आंसू उरक्ने हुए उनके गालों से होकर चू रहे होते हैं । दुसन की मां रामशरण बढ़ को चुप कराती है। फिर उन्हें लेकर चल देती है । इम सडक के बाद गाव में महिलाओं की पांचवी वैटक तरंगन नाव के महुए के नीचे लगती है । गाव ने वाहर पश्चिम दिगा में तरेंगन नाव का एक विशाल महुआ का वृक्ष है। पूरे गांव में इसके जोड का और कोई वृक्ष नहीं । इमको जड के पास मिट्टी डालकर चबूतरे जैसा बना दिया गया है। लोग कहते हैं, जव महुआ मे फुलिया निकलने लगती यो तो तरंगन साब की खटिया महुआ के नीचे बिछ जाती थी। फिर वे रात-दिन यही पडे रहते और महुआ को फुलिया चुनते जाते। इस एक महुआ के पेड ने तरेगन माव को इतना महुआ प्राप्त हो जाता था कि चोरी-छिपे गांव के लोगों को वे वर्ष भर भराब पिलाते रहते थे। लेकिन तरेंगन साव के गुजर जाने के दाद अब यहा सटिया डालकर कोई नहीं रहता। महुआ मे पुलिया लगने के बाद शाम-सुवह उनके परिवार के लोग सिर्फ चुनने के लिए आते हैं। बाकी दिनों में मो इस महुआ के नीचे मजदूर औरतो की बैठकी लगी रहती है। गाव की अन्य दिशाओं की मजदूर औरतें चाहे जहा बैठती हो, इन ओर की औरतें तो रोपनी और कटनी के वक्त पानी और धूप से बचने के लिए इमी महुए की छाया में आती हैं । घास काटने के लिए भी संतो में आने के बाद इस महुआ के नीचे वे अवश्य ही सुस्ताती हैं। महए की हाना बहुत गीतल लगती है। गांव मे दूर सेतो में होने के कारण यहा गदगी तनिक भी नहीं होती और काफी शाति रहती है। यहा मिर्फ धमरटोली और अन्य छोटी जाति को मजदूर औरतें ही बैठती हैं, बाबू घराने की औरतें नही । चमरटोली की लड़ाई से पहले यहा की औरतों को वाने असा दमी विषय पर होती थीं कि अमुक के पति को अमुक बाबू साहब ने आज विता किसी कारण के पीटा है। अमुक के कार अव इतना कर्ज हो गया । वनि- हारी-चरवाही करके वह कर्ज से मुक्ति नही पा सकता है। अमुक का पनि वाबू साहब के यहां अव वनिहार रहना नहीं चाहता है। वे उसने ज्यादा काम लेते हैं और अकसर मारते-पीटते भी रहते है। लेकिन वह उनमें मुक्त हो तो कैमे ? उनका कहना है कि मेरा कर्ज चुकता करके हटो।

। तो सिर्फ दो सौ रुपये उसे दिए थे; लेकिन व्याज का व्याज जोड़कर र साल में ही दो सौ का इग्यारह सौ बना दिया है। हालांकि एक आबू से उसने बात कर ली है। वे उसका कर्ज चुकता कर उसे छुड़ा- पने यहां ले जाएंगे। लेकिन पता नहीं, इग्यारह सौ का वे कितना एंगे ? शायद पूरी जिन्दगी उनके यहां ही उसे रहना पड़े। मरने के बाद अमुक वनिहार की तरह उसकी पत्नी और बेटे को उनके यहां खटना । अमुक के लड़के ने अमुक वावू साहव के यहां चरवाही का काम पकड़ या है और इतने पैसे पर तय हुआ है । अमुक बाबू साहब का बनिहार रात अपने बाल-बच्चों के साथ कहीं भाग गया। उसके ऊपर उस बाबू साहब का बहुत कर्ज है । वे लोग लाठी लेकर आसपास के गांवों में उसे खोजने गए हैं। मिल जाने पर वे लोग उसकी जमकर मरम्मत करेंगे और घसीटकर पुनः इस गांव में खींच लाएंगे। अमुक का पति दारू पीता है। कर्ज बढ़ते जा रहे है और उसे कोई चिन्ता नहीं। अमुक के पति को अचानक लकवा मार गया है । वह अव घर पर पड़ा रहता है। जिसके यहां वह वनिहार था, वह आकर उसके बदले में उसकी पत्नी को खींच ले गया है। हल नहीं चलाएगी, लेकिन और सारा काम तो करेगी ही। दो महीने से भागा हुआ अमुक चरवाह अमुक गांव में पकड़ा गया है। उस गांव के बावू लोग यह जानने के बाद कि भरतपुर के एक वावू साहब का वह चरवाह है, वे उसे पकड़कर लेते आए हैं। इसके साथ ही उस समय इस बैठक की औरतों के बीच कुछ गुप्त वातें भी होती थीं। अपनी सहेलियों या विश्वासपात्राओं के कान में फु फुसाते हुए औरतें कहतीं कि आज अमुक वावू साहव ने रात में अपने खी हान में मुझको बुलाया है । वीस रुपये में तय हुआ है। तीन आदमी रहें अमुक औरत को रात में अमुक वावू साहब ने उस बगीचे में बुलाया वात दो आदमियों की थी, लेकिन वहां सात मौजूद थे। इसपर जितने रुपये तय हुए थे, उसके आधे भी उसे नहीं मिले। अब वह पैसा ले लेती है तो जाती है। वह कह रही थी कि हरामी ने बदल है। एक बार उसके बुलाने पर नहीं गई थी, उसीका दंड दिया है वनिहार की लड़की को अमुक बाबू साहब का गर्म है। वे गर्भ .* ०३८ | युद्धस्थल

उसको लेकर शहर गए हैं। अमुक औरत किसी वावू साहब की बात नहीं
सुनती। वह किसीको अपने पास नहीं फटकने देती। लेकिन इसीके चलते
बावू लोग उसके पति को दूसरे-दूसरे बहाने से पीटते और परेशान करते
हैं। अभी नई-नई है। धीरे-धीरे सब समझ जाएगी। यह जान जाएगी कि
वनिहार-चरवाह को औरतें सार्वजनिक धर्मशाला होती हैं, जब रिनी
इच्छा होती है, आकर ठहर जाता है। अमुक चरवाह के नायक
साहव की लडकी फसी है। वह दिन-पर-दिन दुबलाता जा रहा है।
चार जव बाबू साहब को इसकी भनक मिली तो एक दूसरे दहानन्द
उसे खूब पीटा । लेकिन उसका दोप ही क्या? वे अपनी देटी मान
रोकते, जो रात मे उस चरवाह की देह पर जबर्दस्ती बढ़ जाती है।
लेकिन चमरटोली की लड़ाई के बाद हम वैट की अंग
एकदम बदल गई है। अब तो वे आश्चर्य प्रकट करने
लगी है । एक औरत कहती है, "मैंने तो कभी सोचा ---
होगा'अब तो यह गांव पहचान में भी नहीं माना।
एक दूसरी औरत कहती है, "लेकिन कत्र :
रहेगी नही "बाबू लोग जरूर अपना दन मात्र ही
से उनका शासन चलता आया है"इतने में दे नई
इसपर एक तीसरी औरत कहती है, और
चावू लोग कहते है कि जगिया कां मनाहि:------
जड वही है।"
फिर एक चौथी औरत कहती है,
बर समझाती रहती हूं कि लड़ाकट-है--
तो फिर मैं किसके सहारे जिकंटे
देखू या तुम्हारी जैसी इम गाट डोट ----
ही मेरी समझ में नहीं आती है।
रहते हैं।"
इसपर एक पादही केन्द्र
मानते, सिर्फ मार-काटमंदर
मारोगे.वर तोता---

- यदा।'तव वे कहते हैं, 'हम किसीको मारते नहीं, सिर्फ जवाव देते हम तो वर्षों से पीटे जा रहे हैं, लेकिन अब हमने सोच लिया है, चुप- उप सहेंगे नहीं, ईंट का जवाव रूई के फाहे से नहीं, पत्थर से देंगे।' इसपर एक छठी औरत कहती है, "पता नहीं, आगे क्या होगा. इस चक्त तो सचमुच लड़ने का फायदा महसूस हो रहा है। विना लड़े हमें इतनी इज्जत कभी नहीं मिलती''अब तो बाबू लोग देखते हैं तो माथा झुका लेते हैं। पहले की तरह गंदे-गंदे मजाक और भद्दे-भद्दे इशारे वे नहीं करते । खलिहान और बगीचे में भी नहीं बुलाते हैं।" इसके बाद एक सातवीं औरत कहती है, "भगवान करे, वरावर ऐसा ही समय रहे !" इस बैठक में जब रामशरण बहू और दूधनाथ चौधरी के लड़के का जिक्र छिड़ता है तो एक औरत कहती है, “भई, मुझे रामशरण बहू से कभी सरोकार नहीं पड़ा.''उनके बारे में मैं कुछ भी नहीं जानती। लेकिन जब सारा गांव उन्हें डायन कहता है, तब मुझे भी मानना ही पड़ता है।" एक दूसरी औरत, जो काफी बूढ़ी है, कहती है, "रामशरण बहू बड़ी दयावन्त हैं.. 'चमरटोली की लड़ाई से पहले जब हम लोग उनका खेत रोंपकर शाम को मजूरी लेने उनके घर पहुंचती थीं तो वे एक-एक चुल्ल तेल हमें माथे पर रखने के लिए देती थीं। मेरा मन कहता है, वे डायन नहीं हैं." इसपर एक तीसरी औरत कहती है, "अरे नहीं काकी, तुझको क्य पता रामशरण बहू तो पक्की डायन है''मेरा मरद उसके यहां ; हार था "सिर्फ तीन साल ही उसके यहां रहा था कि उसने ऐसा मारा कि उसने खाट पकड़ ली। फिर मैं लाख कोशिश करती रह मेरा सुहाग नहीं बचा 'ओझाओं ने मुझे बताया है, रामशरण बहू उसे मारा है..." चौथी औरत कहती है, "उसने मेरे बेटे को भी किया है." पति मेरे बेटे को चरवाह रखना चाहता था, लेकिन मेरा बेटा तैया हुआ"इसपर मेरे बेटे की ओर पलटकर उसने ऐसे देखा कि मे उसी दिन से रोगिआया रहता है." १४० । युद्धस्थल

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" लौटती। कभी शाम घिरने से पहले ही लौट आती है, तो कभी शाम हराकर रात वन जाने के बाद लौटती है। अचानक दरवाजा खटखटाता है। शायद दुखन की मां हो । रामशरण तेजी से उठकर दरवाजे की ओर बढ़ती हैं। फिर विना पूछे कि कौन है, वाड़ खोल देती हैं। लेकिन यह क्या ? दुखन की मां के स्थान पर मुसन झिा खड़ा है। यह मुसन ओझा क्यों आया है ? मुसन ओझा रामशरण वहू को अपनी ओर ताकते देख बोल उठता है, "पाय लागी काकी!" रामशरण वहू जवाब देती हैं, "खुश रहो।" यह मुसन ओझा उनके यहां आता तो नहीं था, लेकिन जहां कहीं भी उनपर उसकी नजर पड़ती थी, 'पायलागी' जरूर करता था। रामशरण बहू पूछती हैं. "किसको खोज रहे हो मुसन?" "आप ही के पास आया हूं.''कुछ काम है।" "क्या काम है मुझसे ?" रामशरण बहू चौंकते हुए पूछती हैं । "दरवाजे पर बैठना ठीक नहीं होगा।" मुसन उनके जिज्ञासापूर्ण आश्चर्य को और बढ़ा देता है। वे मुसन को अन्दर आने को कहती हैं; लेकिन घर के अन्दर उसे नहीं ले जातीं, ओसारे में ही एक जगह उसे बैठाकर उसके सामने मचिया पर स्वयं बैठ जाती हैं। फिर पूछती है "अव वताओ?" मुसन कहता है, "दूधनाथ चौधरी ने मुझे भेजा है।" अचानक रामशरण वहू को लगताहै कि सामने बिठाकर किसीने उ सीने में एक तेज चाक् घोंप दिया हो। एक क्षण के लिए उनके हृदय गति वहुत बढ़ जाती है। उनकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगता लगता है, जैसे भूकम्प आ गया हो। उनके चेहरे पर पसीने की बूंदें चुहा आती हैं लेकिन यह एहसास होते ही कि मुसन सामने बैठा तरह घबराना ठीक नहीं होगा, वे अपने को संयत करते हुए पू "क्यों भेजा है ?" "आप तो जानती ही होंगी काकी ! आपसे क्या छिपा है? अन लडके को कुछ हो गया तो वे..." । सदस्थल "तो वे मुझे सजा देंगे. मेरी दुर्गति बनाएगे-यही न ! लेकिन मुसन, भीड में तो तुम कुछ भी स्वीकार कर लेते हो, यहां मेरे और तुम्हारे सिवा और कोई नहीं है. मैं तुमसे पूछती हूं कि क्या तुम्हें लगता है कि मैंने उसके लडके को कुछ किया है ? मैं तुलसी, गंगाजल और भगवान को मूर्ति लाकर रखती हू, तुम उन्हें छ कर कह दो तो जानूं।" मुसन कहता है, "एक में ही होता तब तो। काकी, वहां तो गाव और वाहर के अनेक ओझा जुटे है । सव आपका ही नाम ले रहे हैं। फिर एक मेरे ना कहने से भी क्या होता?" अब रामशरण बहू क्रोधित होते हुए कहती हैं, "मुसन ! मैं तुम सब ओझाओं को पाखंडी समझती हूं। पाखंड करके ही तुम सब दूसरो को ठगते हो। तुम सबमें सत्य हो तो मुझपर अपना प्रभाव दिखाओ"अन्य महिलाओं की तरह मुझे भूत सेलवा दो तो मैं अपनी सारी सम्पत्ति तुम्हें दे दूंगी।" मुसन रामशरण बहू के गुस्से को कम करने के लिए थोड़ा मुस्कराता है, फिर कहता है, "मेरी रोजी-रोटी उसीसे चलती है काकी !" रामशरण बहू कहती हैं, "लेकिन यह ठीक नहीं है। जिस माध्यम से रोजी-रोटी हासिल करने पर दूसरों का अहित होता हो, उसे छोड देना चाहिए।" मुमन माथा झुका लेता है। रामशरण बहू को याद है, उनके पति कहते थे, जो गरीब लोग चतुर होते हैं, जिन्हे बनिहारी-चरवाही की मजदूरी उचित नहीं जान पड़ती है, वे ओझाई या इसी तरह के अन्य रास्तो मे लोगों को ठगते है। उनके पति कहते थे कि जद समाज में चतुर लोगो को उनके अनुकूल काम नहीं मिलता, तब वे ही बुराइया फैलाना शुरू करते है। रामशरण बहू जानती हैं, मुसन बहुत चतुर व्यक्ति है। दूधनाथ चौधरी कहकर आया होगा कि जाकर रामशरण बहू को इस तरह टागा, उस तरह डाटूगा; लेकिन यहा आने पर उसका रूप ही कुछ और हो गया."फिर यहा से लौटेगा तो दूधनाथ चौधरी को बनाएगा कि उसने कसे रामशरण बहू को डराया-धमकाया। उसे देखते ही रामगन्न बटु कापने लगी। उसके पर पर आ गिरी, आदि।

मशरण बहू पूछती हैं, "मुसन ! और कुछ कहना है ?" 'नहीं काकी !" कहकर मुसन उठ खड़ा होता है। रामशरण बहू जे तक उसके पीछे-पीछे आती हैं। अब तक अंधकार घिर गया है। न रामशरण वहू को पाय लागन कहकर दरवाजे से निकल चल देता है। कन ठीक उसी समय दुखन की मां अन्धकार के कारण जाने वाले व्यक्ति नहीं पहचान पाती है, इसीलिए वह रामशरण बहू से पूछती है, "कौन या था?" . वे जवाव देती हैं, "मुसन ओझा।" "मुसन ओझा! यहां क्यों आया था?" दुखन की मां का मुंह आश्चर्य से खुला रह जाता है । "दूधनाथ चौधरी ने भेजा था।" "अच्छा तो दूधनाथ चौधरी की यह हिम्मत ! आपने मुसन ओझा को डांटा क्यों नहीं ? भगाया क्यों नहीं ? हंडिया चलाकर क्यों नहीं मारा?" दुखन की मां आवेश में चिल्ला उठती है। रामशरण बहू कहती हैं, "दुखन की मां! मुसन को मुझसे डर होता तो फिर वह यहां आता ही कैसे और दूधनाथ चौधरी अगर डरते तो फिर उसे मेरे पास भेजते ही क्यों ?" "मैं यह सब नहीं सुनूंगी,” दुखन की मां झल्लाती है, "आप वहु सोझिया (सीधी) हैं सोझिया का मुंह कुत्ता चाटता है। मैं होती उसे बिना मारे नहीं छोड़ती 'टेढ़ बनना ही पड़ता है. "विना टेढ़ गुजारा नहीं। टेढ़ से सब डरते हैं। वावा तुलसी दास ने लिखा है : 'टेढ़ि जानि संका सव काहू, वक्र चन्द्रमा ग्रस न राहू ।' दुखन की मां और रामशरण बहू आंगन में आ जाती हैं । दुखन ढिवरी जलाती है। फिर पूछती है, "क्या कह रहा था हरामजादा "क्या कहेगा? दूधनाथ चौधरी की धमकी मुझे सुनाने आय अगर उनके लड़के को कुछ हो गया तो वे..." "यानी दूधनाथ अव आपको धमकाने लगे हैं ? एक अवल बन रहे हैं ? वे समझ रहे हैं कि आप अकेली हैं ? रहिए, मैं पू ? ? १४४ / युद्धस्थल खदेड देंगी कोई बात नही करेंगी आप उसकी जमीन में नहीं बसी हैं कि वह आपको निकालने आएगावाबू है तो अपने घर के लिए""" दुग्खन की मां सो जाती है । थकी-मादी होने के कारण नीद उसे शीघ्र ही दबोच लेती है। रामशरण वह कुछ देर तक उसका सोना देखती रहती हैं, फिर छप्पर की ओर ताकते हुए सोचने लगती हैं, यह कोई साधारण घटना नहीं है । धमकाने के बाद तो सिर्फ अंतिम कार्य ही रह जाता है। जिसकी कल्पना में ही उनका अन्तर कांपने लगता है। इस गाव में उनकी इतनी लंबी उम्र गुजर गई है। लोगो ने वाझ कहा, बदचलन होने का आरोप लगाया; लेकिन कभी उनके घर कोई धमकाने नही आया। दुसन की मां सात्वना दे रही है, लेकिन वह वैचारी कर ही क्या सकती है उसके पक्ष लेने से क्या होने वाला है ? वह तो चमरटोली की लड़ाई के बाद किसीसे लड-झगड भी लेती है, अन्यथा पहले तो। रामशरण बहू जानती है, दुखन की मा उनको दाइन देने के र ही झूट बोलती है कि गांव के लोग नही जानते हैं। यह बानो कोने-कोने मे प्रचारित हो गई है। अब तो इस बात मे गार आदमी अनभिज्ञ नहीं। लेकिन गाव के लोगो को इसका एक उन जैसी बुढ़िया की वेइज्जती-दुर्गति होने के कारक पड़ने वाला है ? है भगवान ! अव तू ही सहारा है। राम हो आई मन से भगवान को पुकारने लगती हैं। उन्होंने का चीर हरण हो रहा था तो उसने भगवान को गज और ग्राह मे लडाई छिडी थी और हारे मारने जा रहा था, तब गज ने ईश्वर को पुकारे ईश्वर ने तत्काल पहुचकर द्रौपदी की लावा कर गज को मुक्त किया था। रामशरण बहू शुरू से ही ईश्वर में है, हालांकि बीच-बीच में कई बार उन्हें लगा था कि ईश्वर-उबर - वे तो वरावर संकटो मे शिगह:- ईश्वर ने कभी उनकी कोई - .

। लोग ईश्वर को मानते हैं, वे फिर मानने लगतीं। उन्होंने सोचा कि शायद ईश्वर के चलते ही उन्हें इतना 'कम दुःख' हो रहा है। अगर ईश्वर की कृपा न होती तो जाने और कितना दुःख सहना होता! रामशरण बहू को याद है, जब वे बच्ची थीं और अपने मायके में रहती थीं तो उनकी मां अपने परिवार पर आई किसी विपत्ति से मुक्तिया किसी कार्य की सफलता के लिए विभिन्न देवताओं की मनौतियां मनाया करनी थीं। शादी के बाद इस भरतपुर गांव में आने और इस वुढ़ापे की उम्र तक पहुंचने तक रामशरण वहू ने अनेक औरतों को अनेक वार मनौ- तियां मनाते देखा है। वे भी कई बार मनौतियां मना चुकी हैं । मनौतियां मनाने के बाद कार्य की सिद्धि निश्चित ही होगी, इसके बारे में उनकी कोई खास जानकारी नहीं। वैसे उन्हें याद है, एक वार जव उनकी सोने की अंगूठी कहीं खो गई थी तो उन्होंने अपने घर के पीछे वाले ब्रह्म वावा के पास जाकर यह मनौती मनाई थी कि अगर उनकी अंगूठी मिल जाएगी तो वे ब्रह्म वावा को खड़ाऊं चढ़ाएंगी। इसके बाद दूसरे दिन ही घर बुहा- रते हुए एक कोने में उनकी अंगूठी मिल गई। फिर क्या कहना ! उन्होंने मन ही मन ब्रह्म बाबा के नाम का खूब जयकारा मनाया तथा बाजार से खड़ाऊं का एक नया जोड़ा मंगाकर उनके नाम पर समर्पित किया। इसपर उनके पति ने हंसते हुए कहा कि ब्रह्म वावा के प्रताप से तुम्हारी अंगूठी नहीं मिली है। वह तो घर में गिरी थी। ऐसे भी घर बुहारते हुए तुम्हें मिल ही जाती। लेकिन उन्हें पति की बात जंची नहीं। उनके मुंह पर हाथ रखते हुए उन्होंने कहा, "देवताओं के खिलाफ नहीं बोला जाता है, वे अंतर्यामी होते हैं । क्रुद्ध होकर अगर कुछ अनिष्ट कर दिया तो..." रामशरण वहू के मन में ब्रह्म वावा की मनौती मनाने की बात फिर उठने लगती है। वे सोचती हैं कि सुबह चलकर उनके पास यह मनौती मनाना ठीक होगा कि हे ब्रह्म बावा ! या तो दूधनाथ के लड़के को ठीक कर दो या मेरे नाम को ही उससे काट दो। फिर तुम्हें दो किलो लड्डू और एक जोड़ा नया खड़ाऊं तो चढ़ाऊंगी ही, तुम्हारे नाम का एक नया ध्वज भी फहराऊंगी तथा सवा किलो शकील का हुमाध करूंगी। शायद ब्रह्म वावा उनकी बात सुन लें। शायद मनौती से प्रसन्न हो उन्हें इस नई १४८ / युद्धस्थल खबर करती हूँ""देखती हूं कि वे आपका क्या कर लेंगे...?" "दुखन की मां! गाव के लोग अब तक इस घटना से अनजान नहीं हैं । सब लोग जानते हैं। किसीमे कहकर क्या करोगी?" "नहीं मालकिन, लोग नहीं जानते हैं। मैं बताऊंगी और उसके बाद देखिएगा दूधनाथ चौधरीको आपमे कुछ भीपूटने की हिम्मत नहीं रहेगी।" दुखन की मा चूल्हा-चौका के कामो में लग जाती है और रामशरण बहू अपने विस्तरे पर आकर गिर पडती है। दुसन की मां काम करते हुए ही बडबडाती रहती है, "दूधनाथ सड-मडकर मरेगा "उसके बदन में कोडे पड़ेंगे."एक अबला को सताते हुए उसे तनिक भी डर नहीं लगता है वह पापी है"हत्यारा है..." इधर रामगरण वह सोचने लगती हैं, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। गांव के लोग उन्हें डायन जरूर कहते थे, कई घटनाओ मे उनके नाम को जोड़ा भी गया था, लेकिन उन्हें धमकाने के लिए किसी ओझा को कभी उनके पास नहीं भेजा गया था । जाने अब और कौन-सा दिन उन्हें देखने को बाकी है ! रामशरण बहू भगवान से प्रार्थना करती हैं कि अब और उन्हे कष्ट झेलने के लिए न रहने दें। शीघ्र ही उठा लें। रामशरण बहू ने जहर खाकर अब तक आत्महत्या कर ली होती; लेकिन उन्होंने सुना है, अकाल मृत्यु में लोग प्रेत-योनि को पाते हैं । जाने पूर्वजन्म में उन्होंने ऐमा कौन-मा पाप किया था कि उन्हें इतना दुःख भुगतान पड़ रहा है, जहर खाकर मरने पर जाने किस-किम योनि में भटकना पडे ! दुम्बन की मां रसोई तैयार कर रामशरण बहू के सामने परोमती है। रामशरण बहु को खाने की तनिक भी इच्छा नही । उनकी भूय तो मुसन ओझा अपने साथ लेते गया है, और उसके स्थान पर दहशत दे गया है । लेकिन रामगरण वह जानती हैं, दुग्वन को मां उन्हे विना खिलाए छोडेगी नहीं । कोई बहाना नहीं सुनेगी। इसीलिए वे अनिच्छा से खाने लगती है, पर दुपन की मां लक्ष्य कर लेती है । कहती है, "मालकिन, आप इत्मीनान से खाएं । तनिक भी न सोचें । दूधनाथ आपका कुछ नही कर पाएगा। जो वादल गरजते हैं, वे बरसते नहीं हैं..." रामशरण बहू सोचने लगती हैं, यह दुखन की मा उनका कितना . ? खयाल करती है। हालांकि वे उसे मुफ्त में तो कुछ देती नहीं, लेकिन फिर भी वह उनके ऊपर लगाए गए झूठे आरोप से कितना क्षुब्ध हो उठती है ! वैसे वह छोटी जाति की औरत है। गांव में चौका-वर्तन का भी छोटा काम ही करती है। लेकिन रामशरण वहू के मन में उसके प्रति बहुत ऊंची जगह बन गई है। रामशरण बहू को लगता है कि एक दुखन की मां ही है जो उन्हें अच्छी तरह जानती है। काश, गांव के सब लोग उनको अच्छी तरह जानने के बाद ही कोई निर्णय लेते! रामशरण बहू को खिलाने के बाद दुखन की मां स्वयं खाने वैठ जाती है। अकसर जिस दिन चितित और दुःखी होने के कारण रामशरण बहू अच्छी तरह खा नही पाती हैं, उस दिन दुखन की मां से भी ठीक से खाया नहीं जाता है । हालांकि उसने कई बार सोचा है, रामशरण वहू के लिए वह क्यों ऐसा करती है ? वे उसकी होती ही कौन हैं ? वह उनके यहां तो एक मामूली दाई है। लेकिन इसके बावजूद जव कहीं लोग उनके खिलाफ बतियाते हैं तो वह पिछली बातें भूल लड़ाई-झगड़ा करने पर उतारू हो जाती है। असल में रामशरण बहू के साथ एक लम्बे समय से रहते आने के कारण वह यह भली भांति जान गई है कि रामशरण वहू कहीं से भी गलत नहीं हैं। उसके मन में इस बात का पूरा विश्वास है कि गांव के लोग राम- शरण बहू से दूर रहने के कारण ही उनपर तरह-तरह के आरोप लगाते हैं। अगर लोग उसकी तरह रामशरण बहू की जिन्दगी के नजदीक होते तब उनके विरुद्ध कभी आवाज नहीं उठाते । दुखन की मां को लगता है कि रामशरण बहू औरत नहीं, देवी हैं। उनकी तरह धर्मात्मा, दानी, दया- वान और परोपकारी गांव में और कोई दूसरी औरत नहीं। खाना खाने के बाद रामशरण बहू और दुखन की मां अपने विस्तरे पर जा पड़ती हैं । रामशरण बहू तो रामायण की घटना के बाद से ही अच्छी तरह सो नहीं पाई हैं । कभी-कभार कुछ देर के लिए उनकी आंख लग जाती है, नहीं तो जगी ही रहती हैं। लेकिन दुखन की मां को नींद आने लगती है, हालांकि सोने से पहले वह रामशरण बहू को समझाती है, "मालकिन, आप दूधनाथ को लेकर कुछ भी न सोचेंगी आंख मूंदकर सो रहेंगी और हां, अब अगर उसके यहां से कोई आए तो उसे डांटकर ""शायद दूधनाथ चौधरी ने आपको देखा था ''जव ओझाओं में उन्होंने इसका जिक्र किया तो वे कहने लगे कि आपके लड़के को सत्म करने के लिए उमने अतिम वाण चलाया है तथा उसीकी सिद्धि के लिए ब्रह्म बाबा के पास मनौती मनाने गई थी. फिरतो कानो-कान सारे गांव में यह बात पहुंच गई."आखिर आप ब्रह्म वावा के पास क्यो गई थी ?" "ब्रह्म बाबा की पूजा किए बहुत दिन हो गए थे दुखन की मा! सोचा, पूजा कर लू"शायद ब्रह्म यात्रा के चलते कुछ शाति मिले...।" "आपको मैंने कहा है मालकिन, कि आप यह सब एकदम छोड दें। जिन्दगी-भर तो आप पूजा ही करती रही, आपको कौन-सी शाति मिली? मिर्फ सच्चे मन से ईश्वर को याद कर लें--बस, यही काफी है। और अगर ब्रह्मस्थान जाने की इच्छा ही थी तो मुझसे कहा होता-मैं आपको लेकर चलती..." रामशरण वहूजवाब देती हैं, "मैं क्या जानती थी कि मेरे ब्रह्मस्थान जाने का लोग दूमरा अर्थ निकाल लेंगे।" फिर चे रुआंसा होकर कहती हैं, "हे ईश्वर ! तुम कहा छिपे हो? क्या यह झूठी बात है कि प्रहलाद को बचाने के लिए तुम सभा फाड़कर उपस्थित हो गए थे. अगर नही तो फिर मेरी रक्षा के लिए क्यो नही आ रहे हो? अव और क्या देखना चाहते हो?" रामशरण बहू दोनों हाथ से अपना माथा पकडकर रोने और विलाप करने लगती है। दुसन की मां उनके पास आकर उन्हे चुप कराती है। उनकी रलाई की हृदयविदारक आवाज से दुसन की मा की आमें भी भर आती हैं। दुखन की मां यह समझ नही पाती है कि आखिर दूधनाथ क्यों हाय धोकर रामगरण वहू के पीछे पड़ा है। ओझा भेजकर उन्हें धमकाता है। पूजा करने जाती हैं तो उसका दूसरा प्रचार करवा देता है । दुसन की मां का अन्तर दूधनाथ के प्रति गुरसे से खौल उठता है। फिर उसके होंटो पर अनजाने में ही कई शब्द उभर आते हैं-नीच"" पापी..कमाई"हत्यारा"! दोपहर का समय है। रामशरण बहू और दुखन को मा दिन का साना खाकर आराम कर रही हैं। अचानक इसी बीच कोई दरवाजा खटहार ? रण वहू और दुखन की मां के मन में एक ही होता है कि कौन है ? मुसन ओझा के आने के बाद से तो अब कोई दरवाजा खटखटाता है, रामशरण वहू के मन में तरह- | शंकाएं उठने लगती हैं। जाने इस वार कौन आए ? किस मक- आए? रामशरण बहू को लगता है कि बिना मर्द के औरत की जन्दगी नहीं, चाहे वह विल्कुल वहुरिया हो या अस्सी वर्ष की पुरानी या। अंत तक उसे मर्द का संरक्षण चाहिए। आज अगर उनके पति जगतनारायणसिंह में से कोई होते तो फिर किसकी मजाल जो उनके वाजे झांकने आता! रामशरण बहू के कहने पर दुखन की मां जाकर दरवाजा खोलने गती है। रामशरण बहू शंकित मन से व्यग्रता के साथ यह इंतजार करने लगती हैं कि कौन है। उनके चेहरे पर घबराहट और भय के भाव उभर आते हैं। लेकिन जव दुखन की मां के पीछे-पीछे दुखन को आते हुए देखती हैं तो उनका मन सहज हो जाता है। दुखन रामशरण बहू के पास पहुंच उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम करता है। रामशरण वह उसे आशीर्वाद देती हैं, फिर बैठने को कहती हैं । दुखन उनके इशारे पर. एक जगह वैठ जाता है। रामशरण बहू देखती हैं, दुखन की मां का चेहरा तन गया है। वह अपनी जगह आकर चुपचाप बैठ गई है। उस ने दुखन की ओर से अपना मुंह घुमाकर दूसरी ओर कर लिया है। उसके व्यवहार से दुखन के प्रति उसकी नाराजगी स्पष्ट परिलक्षित होती है। रामशरण वह जानती हैं, दुखन की मां दुखन को हृदय से चाहती है दुखन उसका इकलौता बेटा है। लेकिन पत्नी के आ जाने के बाद दुख मां से बढ़कर पत्नी को समझने लगा है, यही वात दुखन की मां को कई गई है। जव दुखन की पत्नी ने उससे तकरार की, तव दुखन ने अप पत्नी को पीटा क्यों नहीं ? उसके पैरों पर लाकर क्यों नहीं गिराय जब उसकी पत्नी से लड़कर वह घर छोड़कर जा रही थी कि 'मैं कम लूंगी ''मुझे किसीका आसरा नहीं.''अव इस घर में दुबारा कभी आऊंगी'-तव दुखन ने उसे रोका क्यों नहीं? पत्नी को डांट- - १५२ / युद्धस्थल मुसीवत से उधार लें। सारी रात यो ही गुजर जाती है। रामशरण बहू मो नहीं पाती हैं। लेकिन न सो पाने के कारण उनके चेहरे पर भारीपन और आलम का प्रभाव कही से भी नजर नहीं आता है। ब्रह्म वावा की मनौती मनाने की अपनी योजना के बाद तो उन्हें अन्दर-ही-अन्दर काफी फुतों महमूम होती है। वे रोज की अपेक्षा याज दुसन की मां को एकदम तड़के ही जगाती हैं। वे अपनी योजना दुखन को मा को भी नहीं बताती । सोचती हैं, मनौतियो को गुप्त रखना ही ठीक होता है। दुखन वीमा मे फराकित होने के लिए चलने को कहती है । दुखन की मा को यह देखकर आश्चर्य होता है कि एकदम नीम अंधेरे ही रामदारण वहू फराकित के लिए तैयार हो गई हैं। फिर उसे लगता कि बुढ़ापे को देह है। शायद हाजत महमूम हो रही हो, इसीलिए वह उन्हें लेकर चल देती है। दुखन की मा रामशरण बहू को आज सडक की ओर नहीं ले जाती है। सड़क की ओर की डरपोक और झूठी अफवाह उड़ाने वाली औरती से उसे घृणा हो गई है। वह रामशरण बहू को मदा की भाति उत्तरपट्टी के गड्ढे की ओर ले जाती है । वहा बहुत कम औरतें जुटती हैं, सिर्फ दो-चार हो। फराकित होने के बाद रामदारण बहू और दुवन कोमा घर लौट आती हैं । अव दुखन की मां रामशरण बहू को छोड काम पर भागती है, लेकिन उसके जाते ही रामशरण बहू भी अपना काम शुरू कर देती है। वे जल्दी- जल्दी स्नान करती है। फिर कपड़े बदलती है। इसके बाद धूप-दीप, धी आदि पूजा की डलिया मे ले चल देती है। एक हाथ में पूजा की इलिया लिए तथा दूसरे हाथ से लकुटी टेकते हुए वे ब्रह्म वावा के स्थान पर पहुंच जाती हैं। फिर ब्रह्म बावा के पाम धूप-दीप जलाने और दण्डइन करने के बाद अपनी मनौती होठो मे बुदबुदाती है। रात में उन्होंने दिनमा मोचा था, उसमे आगे बढकर वे मनौती मनाती है कि इस समय हुटकारे के बाद ब्रह्म वादा के लिए एक छोटा-सा मदिर भी बना देनी। ब्रह्म वावा को पूजने और मनौती मनाने के बाद गनगन बट्ट से वापस घर लौट आती है। घर आने के बाद उन्हें कुछ गहत महमूम -- । होती है। जिस तरह लाटरी का टिकट कटाने के बाद एक क्षण के लिए मन में तरह-तरह की रंगीन आशाएं जागने लगती हैं, उसी तरह राम- शरण बहू के मन में भी यह आशा जाग उठती है कि शायद ब्रह्म बावा के प्रताप से वे संकटों से मुक्त हो जाएं। रामशरण दहू खाट पर आ पड़ती हैं । इधर जैसे ही उनका मन कुछ हल्का होता है, नींद उनकी पलकों पर हावी हो जाती है। उनकी पलकें बंद होने लगती है। वे जानती हैं, मन के साथ नींद का घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। ऊपर ले लाख बुलाने पर वह नहीं आती, लेकिन जब मन सहज हो उठता है तव अपने-आप आ जाती है। रामशरण बह सुबह से काफी दिन चढ़े तक सोती रहती हैं। ब्रह्म बाबा के पास से लौटने के बाद दरवाजा बंद करना भी वे भूल गई हैं। रोज की भांति दुखन की मां जव काम से लौटकर आती है तो उसे किवाड़ खटखटाने की जरूरत नहीं पड़ती। खुले दरवाजे से वह भीतर घुस आती है। देखती है, रामशरण बहू नींद में खोई हैं। उसका मन कहता है कि सोने दे, नींद पूरी होने पर स्वयं जगेंगी। लेकिन फिर सोचती है कि नहीं, जगा- कर पूछे। गांव में जो कुछ वह सुनकर आई है, उसकी सत्यता की जांच के लिए उन्हें जगाना जरूरी है। कुछ क्षण तक तो दुखन की मां द्वंद्व की स्थिति में उनकी खटिया के पास खड़ी रहती है कि उन्हें जगाए कि नहीं, फिर अंततः वह उन्हें जगाती है। रामशरण वहू जागने के बाद दुखन की मां को सामने खड़ी पा पूछती हैं, "कब आई?" दुखन की मां जवाब देती है, "अभी-अभी।" फिर एक क्षण तक रामशरण बहू और दुखन की मां दोनों चुप रहती हैं। इसके बाद चुप्पी को तोड़ते हुए दुखन की मां पूछती है, "आप ब्रह्म- स्थान गई थीं।" "तुम्हें कैसे पता?" रामशरण बहू आश्चर्य से दुखन की मां की ओर ताकने लगती हैं। उन्होंने तो दुखन की मां से बताया भी नहीं। उसके घर से निकलने के बाद वे ब्रह्मस्थान गई। फिर वह जान कैसे गई ? दुखन की मां कहती है, "आप पूछ रही हैं कि मुझे कैसे पता "विजली की तरह यह खवर सारे गांव में फैल गई है कि आप ब्रह्मस्थान गई थीं १५० / युद्धस्थल आज सिर्फ दुखन के बारे मे ही सोचे । दुखन की ही बात करे। लेकिन यह सोचकर कि दुखन की अधिक चर्चा करने पर रामशरण बहू को पुत्र न होने की अपनी पीडा सालने लगेगी, वह मुह मे कुछ न कहकर अंदर-ही-अंदर उस सुख को भोगती और महसूस करती रहती है। यह बात बिलकुल सच है कि दु.ख के क्षण बिताए नहीं बीतते और सुख के क्षण ऐसे बीत जाते हैं कि पता तक नही चलता। दुपहरिया ढलकर शाम हुई और शाम कव रात में बदल गई, दुखन की मा को पता तक नही चला । जब दरवाजे पर पुनः दस्तक होती है तो उसे लगता है कि दुखन बहू को लेकर आ गया है। वह तेजी से जाकर दरवाजा खोलती है। उसका अंदाजा सही सावित होता है । वह दुखन और उसकी बहू से बिना कुछ बोले पलटकर आती है और रामशरण वहू के पास बैठ जाती है। राम- शरण वह देखती हैं, आगे-आगे दुखन आ रहा है और पीछे-पीछे घूघट निकाले उसकी बहू । उसकी बहू का पेट आगे की ओर निकला है। समय पूरा हुआ ही जान पड़ता है। दुखन की वहू, दुखन की मा के पैर के पास बैठकर रोने लगती है। दुखन की मां कहती है, "क्यो झूठ-मूठ को नखड़ा पसार रही हो मुझसे अव तुमको क्या मतलब 'वेटा जनमाकर दे ही दिया "खूब राज करो""" दुखन की बहू, अब अपनी सास के पांव दोनो हाथों से पकड़ लेती है। कहती है, "माफ कर दें अम्मा !." वच्चा जांघ पर हग देता है तो मा-बाप जांघ नहीं काटते.. मेरी गलती आप नहीं माफ करेंगी तो और कौन करेगा?" रामशरण बहू से अब रहा नहीं जाता है । बोल उठती है, "गुस्सा थूक दुखन की मां "किस परिवार में झगड़े नहीं होते है ""अपना खून अपना हो रहता है...।" अब दुखन की मा के चेहरे पर मुस्कान को एक रेखा उभर आती है ! वह महज होते हुए अपनी पतोहू मे कहती है, "मालकिन का पायलागन कर"इनकी तरह देवता इस गांव में और कोई नहीं।" उसकी पतोहू उसके कहे अनुसार अपनी साड़ी का आंचल हाथ में ने दे विधिवत् रामशरण बहू का पायलागन करती है। इस अप्रत्याशित सम्मान मे रामशरण वहू का हृदय खुशी से झूम उठता है । इस गांव की कभी किसी बहू ने उनका पायलागन नहीं किया था। उन बांझ और डायन का पाय- लागन करने पर उनका अहित जोहो जाता। लेकिन दुखन की मां आज उन्हें यह सम्मान भी दिलवाती है। इस सम्मान के बाद रामशरण बहू के झुरींदार चेहरे पर एक विशेष चमक पैदा हो जाती है तथा उनकी आंखों में खुशी के आंसू छलछला आते हैं। दुखन की मां अपनी पतोहू का चूंघट हटाकर उसका मुखड़ा रामशरण बहू को दिखाती है। गांव में इसे 'मुंह-दिखाई' की रस्म कहा जाता है। रामगरण वह इस रस्म के सुख से भी अभी तक वंचित थीं। लेकिन दुखन की मां उनकी अतृप्त इच्छा की आज पूर्ति कर देती है। एक क्षण के लिए रामशरण वहू को लगता है कि उनकी खुद की पतोहू उतर आई है। फिर वे तेजी से आंगन से उठ अंदर कमरे में जाती हैं तथा अपना बक्सा खोल एक रंगीन साड़ी निकालती हैं। मरने से पहले उनके पति ने उनके लिए खरीदी थी। लेकिन उनके मर जाने के बाद वे उसे पहन नहीं सकी। विधवा होने के बाद वे रंगीन साड़ी कैसे पहनती ? अव तो सफेद साड़ी में रहने की उनकी नियति हो गई थी। वह साड़ी वे लाकर दुखन की बहू को मुंह-दिखाई के एवज में सौंप देती हैं। दुखन, उसकी और दुखन की मां को यह देखकर काफी आश्चर्य होता है कि रामशरण वहूने एक कीमती साड़ी लाकर दे दी है। इस सुखद आश्चर्य से रामशरण बहू के प्रति उनका मन श्रद्धा से भर जाता है। राम- शरण बहू कहती हैं, "दुखन की मां'आज मेरे यहां वह पहली बार आई है खूब अच्छा खाना बनाकर इसे खिलाओ..." दुखन कहता है, “काफी रात हो जाएगी मालकिन ''हम लोग घर जाकर खाना खा लेंगे..." "नहीं, यह कैसे होगा? आज तो तुम सबको यहीं खाना पड़ेगा।' " और रामशरण वहू दुखन की मां के साथ लगकर खाना बनवाने लगती हैं। दुखन की मां रामशरण बहू को हटाती है, "मालकिन, आप आराम से बैठे, मैं सव बना लूंगी।" - १५६ / युद्धस्थल जसकी बात मानने के लिए बाध्य क्यों नहीं किया ? रामशरण बहू दुखन की मां को पूरी तरह जानती हैं। ऐमे वह वरा- वर बोलती रहती है, लेकिन इस समय कुछ नहीं बोलेगी। अपने स्वाभि- मान को तनिक भी कमजोर नहीं होने देगी। इसीलिए वे खुद दुखन मे पूछती हैं, "कैसे आए हो?" वह कहता है, "मा को ले जाने।" अव दुखन की मा पलटकर गरज उठती है, "वह कलमुंही नहीं है क्या? मां के बदले में तो वह आ गई है। अब मां की कौन जरूरत दुखन कहता है, "मा, तुम अपने साथ उसकी तुलना क्यों करतो हो ? वह तो तेरे पर की धूल के वरावर भी नहीं है। उसकी मा बीच में ही उसकी वात काट तेज आवाज में बोल उठती है, "चापलूसी मत कर सीधे-सीधे वता, क्यों आया है ?" "उसको बच्चा होने वाला है। दिन पूरा हो गया है। तू नहीं रहेगी तो कैसे कुछ होगा?" "मैं उसकी दाई-लौंडी नहीं हूं । काम पडा है तो आया है लिया जाने, इससे पहले मेरी खोज-खबर ली थी तूने ?" दुखन कुछ बोले, इसमे पहले उसको मा फिर बोलने लगती है, "तू सीधे चला जा यहा से .."मैं तेरी सूरत देखना नही चाहती नौ महीने गर्भ में तुझे ढोया पाल-पोसकर इतना बडा किया और अब उसके आगे मेरा कोई खयाल ही नहीं। मैंने जनमाया और उसने हथिया लिया... और तू भी कितना नालायक निकला''चार दिन की लौंडिया पर रीझ- कर मा को बिसारे बैठा है "उसका मन तूने बिगाड़ा है, नही तो उसकी चया मजाल जो वह मुझसे जुवान लड़ाती" एक क्षण तक दुखन चुपचाप सुनता रहता है। उसकी मां घर पर भी इसी तरह कई बार उमे फटकार चुकी थी। लेकिन तब मा की बात का उसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। पली नई-नई थी। वह उसके आकर्षण में खोया रहता था। पत्नी की गलत बात भी उसे उचित लगती थी। लेकिन अब मां की वात का उसके ऊपर काफी प्रभाव पड़ता है। उसे ।

? गता है, मां ठीक ही तो कह रही है। उसे मन ही मन अफसोस होने नगता है। मां के साथ उसने गलत किया है। वह आगे बढ़कर कहता है, "माफ कर दे मां"उस समय मेरी बुद्धि मारी गई थी।" अचानक दुखन की मां का आक्रोश खत्म हो जाता है। उसके चेहरे पर उगी तनाव की रेखाएं विलीन हो जाती हैं । वह कुछ बोलती नहीं है। उसकी दोनों आंखों से आंसू ढरकने लगते हैं। दुखन उसकी इस स्थिति से फायदा उठाते हुए कहता है, "चल मां. अब वह तुझसे जुवान लड़ाएगी तो उसे काटकर फेंक दूंगा ।" वह कहती है, "मुझे बच्चों की तरह फुसला मत । उस घर में वह रहेगी तो मैं नहीं रहूंगी।' दुखन समझाता है, "उसे भी बहुत अफसोस है मां ! कह रही थी कि अम्माजी से लड़कर मैंने ठीक नहीं किया...।" "क्यों झूठ-मूठ को उसके अफसोस के बारे में कह रहा है ? मुझसे लड़ने पर उसे अफसोस होगा ! वह कुलच्छनी तो मुझे सास समझती है नही, वह तो मुझे गोतिनी समझती है। उसने आते ही मां-बेटे को अल किया. उसका नाम न ले मेरे सामने..." "लेकिन वह अगर तेरे पैर पर गिरकर क्षमा मांगेगी तव विश्वास होगा न?" "मेरे पैर पर गिरने से वह छोटी नहीं हो जाएगी."उसका मह घट जाएगा।" "ठीक है मां ! अव वही आकर तेरे पैर पर गिरेगी तव तो त न!" और दुखन इतना कहकर वहां से चल देता है। दुखन के जाने के बाद उसकी मां के चेहरे पर विजय, गर्व और के भाव उभर आते हैं। पुत्र द्वारा सम्मान दिए जाने के कार मातृत्व भी उमड़ आता है । जव रामशरण वह यह कहती हैं कि मां, तुम्हारा बेटा बहुत अच्छा वेटा बहुत अच्छा है। भगवान करे, जिसका भी के दुखन की तरह,' तो दुखन की मां का मन गद्गद हो जाता है इतनी खुशी मिली है कि उसके अंदर समा नहीं रही है। वह लगता है, उसके पांव धरती पर पड़ नहीं रहे हों। उसकी इच्छ १५४ / युद्धस्थल विहान कव दरद हो जाए""मैं नहीं रहूंगी तो घबरा जाएगी" पहली बार चच्चा जनने वाली है..।" "हा-हां, दुखन की मा, इस ममय तो उसके साथ तुम्हारा रहना बहुत जरूरी है।" रामशरण बहू कहती हैं। लेकिन यह कहते ही उनका अंतर कांप उठता है । दुसन की मां अव उनके साथ नही मोएगी, यह वात दिमाग में कौंधते ही उनका चेहरा स्याह पड़ने लगता है । कुछ देर के लिए खुशियों की वह दुनिया, जो उन्हें धेरै खड़ी थी, मिनटों मे दफन हो जाती है। वे पुन: अपने पुराने खोल में वापस लौट आती हैं। रामशरण बहू वुझे मन और थके कदमो से दुखन को मां और उसके वेदा-पतोहू को छोड़ने दरवाजे तक जाती हैं। फिर उन्हें विदा करने के बाद किवाड़ बंद कर अदर लौट आती है । एक क्षण पहले ही जो पर उन्हें स्वर्ग की तरह रमणीय और मोहक लगा था, अब किसी जगल की तरह निर्जन और भयावह लगने लगता है । लगता है, जैसे अनेक हिसक भेडिये इस घर में छिपे हैं जो उन्हें अकेली पाकर दबोचने के लिए गीघ्र ही सामने निकल याएंगे। रामगरण बहू अपने विस्तरे पर जा पड़ती हैं। अपने मन को खुद वे ढाढस देती हैं कि उन्हें डरना नहीं चाहिए। इस घर में वे वर्षों से अकेली रह रही हैं। जब उनके पति गुजर गए, जगतनारायणसिंह नही रहे, तब फिर यह दुखन की मा ही उनकी कौन है जोवरावर साय निभाएगी? जव जी में आएगा, रहेगी। जब जो में आएगा, नहीं रहेगी। उनकी तकदीर में तो अकेले रहना वदा है। उन्हें किनी सगी-साथी की तलाश नही करनी चाहिए। लेकिन अपने मन को लाख समझाने के बाद भी रामशरण बहू दुखन की मां को अनिवार्यता महमूस करती ही रहती हैं। उसके अभाव को झुठलाने का उनका सारा प्रयाम निरर्थक सावित होता है। रामशरण बहू सोचने लगती हैं, बाल-बच्चो वाली या सधवा औरतो की जिन्दगी कितनी खुशनसीब होती है। दुखुन की मा अपने वैटा-पत्तोह के माथ रामगरण बहू को याद आने लगती है। उसकी छोटी दुनिया जो अपने-आपमे भरी-पूरी होती है, उनकी आखो के सामने नाचने लगती है। वह काफी समय तक उस दुनिया में खोई रहती हैं। फिर उनकी आखों के स चित्र के स्थान पर मुसन ओझा का चित्र उभर आता है। इसके नाथ की धमकियों तथा गांव में उनके डायन के प्रचार का। ब तक रात काफी गुजर चुकी होती है। हवा जोरों से बहने लगती मयों की रातों में उठने वाली आंधी की तरह। हवा के झोंकों का 1 और छप्परों से टकराने तथा सनसनाहट की ऊंची आवाज राम- बहू को साफ सुनाई पड़ती है। इस तूफानी रात का माहौल उन्हें अधिक भयावह लगने लगता है। रह-रहकर बाहर का दरवाजा बज सा है, जिससे वे काफी आतंकित हो उठती हैं । हवा के झोंके से दरवाजा ता है या मुसन ओझा की तरह ही फिर किसीको दूधनाथ ने भेजा है ? गर फिर कोई हो तो? .."उनके चेहरे पर पसीना आ जाता है। फिर अपने को संयत कर सोचती हैं, कोई होगा, इस रात में वे किवाड़ नहीं बोलेंगी। लेकिन अगर दूधनाथ के लोग किवाड़ तोड़ने लगें, तव ? तब वह गोर मचाएंगी। पूरा गांव नहीं आएगा, तब भी कुछ लोग तो आएंगे ही । लेकिन अगर दरवाजे के रास्ते न आकर छप्पर से कोई उनके आंगन मे धीरे से उतर आए और फिर उनके कमरे में आकर उनका मुंह बंद कर दे, तब ? तव कोई रास्ता नहीं। कोई चारा नहीं। उन्हें लगता है कि वे किमी जंगल में ऐसी जगह खड़ी हैं, जहां चारों ओर से मुंह वाये भेड़िये उन्हें घेरे है। जिस ओर को भी मुड़ी कि किसी भेड़िये का दानवी जवड़ा उनकी ओर बढ़ा। रामशरण बहू खटिया से उतर नीचे आती हैं। फिर उस कमरे का दरवाजा भी अंदर से बंद कर लेती हैं। अव छप्पर के रास्ते आंगन में उतरने के बाद कोई आसानी से उनके पास नहीं आ पाएगा। उनके कमरे का दरवाजा उसे तोड़ना पड़ेगा। तब तक वे काफी शोर मचाएंगी हालांकि कमरे का दरवाजा बंद करने के बाद उन्हें काफी उमस महसू होने लगती है; लेकिन वे मन-ही-मन निश्चय कर लेती हैं, चाहे जित गर्मी लगे, अब बिना भोर हुए दरवाजा नहीं खोलेंगी। रामशरण बहू कान खड़ा किए घर और बाहर की आहट लेती र हैं। हवा के झोंके का आंगन की दीवार से टकराने तथा ठप्पर से चीज आंगन में गिरने के बाद वे शंकित हो खटिया से उतरकर दरव १६० / युद्धस्थल लेकिन वे मानती नहीं हैं। आज भी अपने बंदर ये बीय गुर्मी और उमग महसूस करती है । इनके अंदर या बंजर धरती पान अचानयारी भरी हो गई है। उनकी दी हुई रगीन गाड़ी पहन दुग्णन की या दही बनती है। उसे देख-देखकर रामगरण बह ये मन हदय योगामी भोग- लता मिलता है। दुखन की बहू मागे बकर गमगरण यह और अपनी गागोगोई से हटाकर स्वयं बनाने लग जाती है, "मेरे गहने थाप लोग करेंगी." मुझे ठीक नहीं लगता है." दुखन की बहू के इस व्यवहार में गमगा बह के अंदर हां और उल्लास की कोई सीमा नहीं रहती। वे अलग हटकर दुगन यामा गाथ एक जगह आ बैठती हैं और कहती हैं, "दुगन यी मा, नू ग्रह कोटी आलोचना करती थी."कितनी तो यच्छी है बेचारी अभी नई-नई... कुछ गलतियां हो गई होंगी धीरे-धीर मत्र ममम जागी..." दुखन की मां कुछ कहती नहीं है। यह भीनर-ही-भीतर मानदिन होगी रहती है, जिसके भाव उसके चेहरे पर रह-रहका उमग्ने डाग हैं । दुगन की मा अपने भावी पोते को लेकर कल्पनाओं में दी जाती है कि गांद- सा नन्हा-मुन्ना वालक आएगा। उसकी हिलरी पा काकांना-यांना जगमगा उठेगा। वह उसे दिन-रान आनी गोद में निरहगी। बाकी साथ मुलाएगी। इन नई औरतों को नो बच्चे पालना भी नहीं आया। यह सोने जैसे बालक को इस औरत पर नही छोडेगा । बरगमनमागे कहती है, "मालकिन, मेरे दुखन को आप देख रही हैं और उमरी यह यो भी। दोनो की जोड़ी कितनी अच्छी है ! ""दा लोगों के बंटागतोदवी तरह मेरा पोता खूब सुन्दर होगा "अगर मडका हवा दी मागणी तरह और लड़की हुई तो राजकुमारी को नरहनदी टीवी मग यहा वैसा बच्चा नहीं होगा'"क्रिमोकी जोड़ी ही मी नही है। दुगन की मादी के लिए कितने तोग आए थे, लेकिन मैंने बनकर उमर मारपी से उसकी शादी की है।" इसी तरह रामशरण बहू और दुखनको मा बाम में दिगती हैं कि दुखन की बहू आकर सूचना देती है, "ग्मोनकर हो गई।" -- । अव रामशरण बहू और दुखन की मां खाना खाने वंठ जाती हैं। साथ ही दुम्बन को भी बैठा लेती हैं । दुखन की बहू प्रेम से खाना खिलाने लगती है। रामशरण बहू को आज भोजन काफी स्वादिष्ट लगता है। एक लंबे ममय बाद वे खूब जमकर खाती है। दुखन की मां भी अन्य दिनों की अपेक्षा आज ज्यादा खाती है । और दुखन ! वह तो डटकर खाता है। ऐसे खुगी के अवसर पर वह बहुत ज्यादा खा लेता है। सबों को खिलाकर दुखन बहू अब स्वयं खाने वैठ जाती है। इधर रामगरण वहू, दुखन और दुग्वन की मां के बीच बातचीत शुरू हो जाती है। दुग्वन कहता है, "मालकिन ! मां को समझा दें, आपके सिवाय अव यह और किसीके घर काम न करे। दस घरों में इसका जूठन मांजना मुझे ठीक नहीं लगता।" इमपर दुखन की मां कहती है, "जूठन मांजती हूं तो कोई चोरी नहीं करती हूं 'कमाकर खाने में कोई बुराई नहीं 'अपनी विरादरी की सभी औरतें तो कमाती ही हैं। "तू अकेला कितना कमाएगा? ..'मैं घर में वैलूं और तू कमाता-कमाता मरे, यह मुझमे नहीं देखा जाएगा. मैं अभी काम . - हीं छोड़ गी...।" अपनी मां की बात सुन दुखन चुप हो जाता है। रामशरण बहू दुखन को समझाते हुए कहती हैं, "ठीक ही तो कह रही है। चोरी-बदमाशी न करके ईमानदारी से कमाने-खाने में क्या दोप है ? अगर दो-चार बीघे खेत होते तो वात और होती। तुम्हें तो मजदूरी करके ही पेट भरना है। एक अकेले मजदूरी करके तुम कितने लोगों का पेट भरोगे ? पत्नी मर्द की कमीनी पर चुपचाप वैठकर खा लेती है, लेकिन मां अगर बूढ़ी भी होती है तब भी पुत्र को मंकट से उबारने के लिए कुछ-न-कुछ करती ही रहती है।" अब तक दुखन की पत्नी खाना खाकर आ जाती है । अब दुखन अपनी मां और पत्नी के साथ चलने की तैयारी करने लगता है। दुखन की मां रामगरण वहू से कहती है, "मालकिन, आप कोई चिंता न करेंगी.. मैं दोनों जून खाना बनाने के समय पर आ जाऊंगी. "किसी-किसी रात को भी आप ही के पास आकर सो रहूंगी "इसको जव वच्चा हो जाएगा पहले की तरह ही आपके साथ रहने लगूंगी 'अभी नई-नई है. 'रात- १५८ / युद्धस्थल पास आ जाती हैं। फिर दरवाजे की दरार से आंख सटाकर आंगन में देखने लगती हैं कि कोई आ तो नहीं गया है ? इसके बाद पुनः खटिया पर लौट जाती हैं। लेकिन फिर जब आंग्य लगने को होती है तो उन्हें लगता है कि आगन मे कोई आ गया है। इसके बाद फिर वे दरवाजे की दरार के पास आकर झांकने लगती है। इसी तरह पूरी रात गुजर जाती है। जब सुबह होती है, तब कही जाकर उन्हें कुछ शांति मिलती है। . सुबह काफी दिन चढ चुकने के बाद दुम्बन की मा रामगरण बहू के दरवाजे पहुंचती है। अपने घर से तो वह एकदम भोर मे ही चली थी; लेकिन अन्य परो के काम निपटाते-निपटाते आज उमे रोज की अपेक्षा ज्यादा विलंब हो गया है। दुखन की मा रामशरण बहू का दरवाजा खटखटाती है, लेकिन अंदर से कोई आवाज नहीं आती है। दुखन को मा को लगता है, रामशरण बहू शायद सो गई हैं । अकेले होने की वजह से रात मे घबरा रही होगी। नीद नहीं आई होगी। इसीलिए दिन में सो रही हैं । दुखन की मा सोचती है कि उमे रामशरण बहू को नहीं छोडना चाहिए। रात में भी उनके पास ही रहना चाहिए। लेकिन अपनी पतोहू पर गजर पडते ही वह मुसीबत में पड जाती है। उसकी पतोहू का दिन भी पूरा हो गया है । एक-दो दिन के अदर ही 'देह छटने वाला है । न जाने कब क्या हो जाए ? कुछ ठीक नहीं । वह इस हालत में उसे कैसे छोडे ? दुमन की मा धर्म-सकट में पड़ जाती है। वह मन-ही-मन ईश्वर मे मनाती है कि उसकी पतोहू को देह जल्द-से-जल्द छूट जाए ताकि वह पुनः रामशरण बहू के साथ रहने लगे। दुग्वन की मा अब काफी जोर-जोर से रामशरण बहू का दरवाजा खटखटाने लगती है। कुछ देर तक वह जब लगातार उनका दरवाजा खट- खटाती रहती है तब वे आकर दरवाजा सोलती है । दुधन को मा गमशरण बहू के उनीदे और अलसाए चेहरे को देखकर यह जान जाती है कि उसका अदाजा सही है । इसमें पहले कि वह कुछ पूछे, रामशरण बहू स्वय बोल उठती हैं, "रात नीद नही बाई थी, इमीलिए सुबह मो गई।" दुखन की मां कहती है, "रात में किसी-किसी बात की चिंता - , आप जगी मत रहिए'''बीमार पड़ जाइएगा 'दो-तीन दिन के अंदर ही मुझे फुर्सत मिल जाएगी रात से ही वहू का पेट कुछ अकड़ गया है।" अव वहुत जल्द ही वह बच्चा जनेगी. फिर मैं आपके पास आकर रहने लगूंगी...।" रामशरण वहू पुनः अपने विस्तरे पर जाकर लेट रहती हैं। नींद की खुमारी अभी खत्म नहीं हुई है। कच्ची नींद से उठकर ही वे दरवाजा खोलने गई थीं। दुखन की मां को लगता है कि एक ही रात में रामशरण बहू काफी कमजोर हो गई हैं और थक गई हैं । वह रामशरण बहू के पास जाती है तथा उनकी खटिया के पैताने वैठकर उनके पांव दवाने लगती है। रामशरण बहू कहती हैं, "छोड़ दो दुखन की मां! तुम तो कई घरों में काम करके आ रही हो। खुद थकी होगी।" "मैं काम करने से नहीं थकती हूं, मालकिन !" दुखन की मां जवाव देती है, "दिन में चाहे मैं जितना काम करूं, रात में अच्छी तरह सो जाने के बाद एकदम ठीक हो जाती हूं। तनिक भी थकान महसूस नहीं होती। ईश्वर ने रात इसीलिए वनाई है कि दिन भर का थका-मांदा आदमी चैन और आराम से सोए 'इस गिरती उम्र में रातों में जागकर आप ठीक नह कर रही हैं. 'आपका स्वास्थ्य एकदम खराव हो जाएगा।" "अव अच्छा स्वास्थ्य रखकर क्या करूंगी दुखन की मां ?" "ऐसा न कहें मालकिन स्वास्थ्य ही तो सब कुछ है 'खटिया घुल-घुलकर मरने से चलते-फिरते रहकर मरना अच्छा होता है।" रामशरण बहू को लगता है, दुखन की मां ठीक ही तो कह रही रातों में जाग-जागकर वह बीमार पड़ जाएंगी। फिर खटिया पकड़ ले उस वक्त उन्हें कितना कष्ट होगा? स्वथ्य रहकर चलते-फिरते मर इससे अच्छा और क्या हो? लेकिन रामशरण वहू दुखन की मां व समझाएं कि वे जानबूझकर तो जागती नहीं हैं। दुखन की मां रामशरण बहू को गांव की एक नई सूचना से कराती है, "मालकिन, कल आपको लेकर दूधनाथ चौधरी और काफी लड़ाई-झगड़ा हुआ।" "मुझको लेकर ! 'क्यों ?" रामशरण बहू का उनींदापन ? १६२ / युद्धस्थल . 7 खत्म हो जाता है । वे उठकर बैठ रहती हैं । दुखन की मां बताती है, "एक, जगह दूधनाथ चौधरी अपने कुछ मित्रों और ओझाओं से बातचीत कर रहे थे। बातचीत के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अव तो लडका वचने वाला नही । एक-दो दिन मे ही मर जाएगा। अब उन्हें और प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए"रामशरण बहू को खीचकर लड़के के पास ले आना चाहिए और पूछना चाहिए कि लड़के को ठीक करती हो या नही । अव तो लड़का ऐसे भी मर रहा है, वैसे भी मही...। वोधा, जो किसी काम से वहा गया था, यह सुनकर एकदम विगड उठा। उसने कहा कि 'इस गांव में अनेक डायन हैं, लेकिन उनमे से कोई रामगरण बहू की तरह बैसहारा नहीं है। उनके यहा अनेक लाठिया हैं। उनमे से किसीको सीच लाने की हिम्मत तो आपको नहीं होगी, रामशरण को असहाय ममझकर आप वीर बन रहे हैं।' " इसपर दूधनाथ ने वोधा को धमकाते हुए कहा कि 'तुम धीच मे बोलने वाले कौन होते हो? उस डायन पर दया ही आ रही है तो क्यो नहीं जाकर पूछते कि ऐसा क्यों कर रही है ? मैं उसके साथ जो भी करू, तुमको क्या मतलब " इसके बाद वोधा ने कहा कि 'मतलब क्यो नही है ? किमीको कम- जोर समझकर आप सताएगे और हम चुपचाप देखते रहेगे?' " इसपर दूधनाथ ने गरजकर कहा कि क्या कर लोगे तुम्हारा वाप भी एक बार मुझमे टकराकर मजा चप चुका है। एक ही हाथ में सारी हेकडी दूर हो जाएगी. अपने बाप की रखैल की पक्षधारी करने आए हो...?' "यस, इसके बाद दोनो ओर मे गाली-गलौज और हाथापाई शुरू हो गई। जव हल्ला-गुल्ला सुनकर दोघा के चाचा आए तब उसे डाट-डपट- कर ले गए कि तुमको इससे क्या मतलब ? जिमको जो जी में सो करे.." दुसन की मां से यह सूचना सुन गमगरण दर के होग उड जाते है। उनके चेहरे पर भय और आतक वे भाव माने है । तो दूधकार तयारी कर रहा है ? इसीके लिए पहरे झा को भेजा था। आए, दुखन की मां कहती है, "मालकिन, आप तनिक न डरें आज सुबह मैं गांव भर में यह खवर फैला आई हूं.''इसीके चलते मुझे यहां आने में देर भी हुई।" "लोग क्या कह रहे थे ?" रामशरण बहू पूछ उठती हैं। दुखन की मां कहती है, "मालकिन, मैं तो आपसे कह रही थी कि लोग जान जाने के वाद चुप नहीं रहेंगे 'लोग कह रहे थे कि ऐसा कभी नहीं होगा ''कोई अपने घर भले ही किसीको डायन कह ले लेकिन उसके घर जाकर उसे खींचकर लाएंगे तो फिर खून कीनदी बह जाएगी।" रामशरण वहू दुखन की मां के चेहरे पर आंख गड़ाए यह सुनती हैं तथा उसके चेहरे के भावों को पढ़ती रहती हैं कि वह सच बोल रही है या झूठ। कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हें सांत्वना देने के लिए वह झूठ बोल रही हो ? फिर वे पूछती हैं, "ऐसा कौन-कौन लोग बोल रहे थे ?" दुखन की मां एक ही सांस में जवाब देती है, "जगिया, उसके साथी, पुस्तकालय की कोठरी वाले लड़के, हरि दादा के दालान के कई लोग...।" रामशरण बहू पूछती हैं, "सच कह रही हो दुखन की मां?" "हां मालकिन, बिल्कुल सच कह रही हूं."ईश्वर की सौगंध खाकर कहती हूं।" फिर भी रामशरण बहू को पूरी तरह विश्वास नहीं हो पाता है। इस गांव में रहकर ही उन्होंने अपने बाल पकाए हैं और कमर झुकाई है । इस गांव के लोग तो दूसरों के मामले में कभी दखल नहीं देते थे, चाहे वह भला हो या बुरा । फिर इस बार यह कैसे हो रहा है ? रामशरण बहू सोचने लगती हैं। अब दुखन की मां वहां से उठ रसोई में आ जुटती है। रसोई बनाते हुए ही एक बार फिर वह रामशरण बहू के पास आती है और कहती है, "मालकिन, आज शाम को खाना बनाने नहीं आ पाऊंगी "दुखन अपनी वहू को पीरो (कस्वा) के अस्पताल में दिखाने ले जा रहा है। मैं भी साथ जा रही हूं.''लोटने में शायद रात हो जाए, इसीलिए सोच रही हूं कि इसी समय रात के लिए भी आपको रोटियां बना दूं।" "बना दो।" रामशरण बहू कहती हैं। ऐसा पहले भी कई बार हो १६४ / युद्धस्थल चुका है। दुसन को मा को जब किसी जरूरी कार्यवश रात में नहीं आना होता है, तब वह दिन में ही रात के लिए भी रोटियां धना देती है। रसोई तैयार होने के बाद दुषन की मां रामगरण बहू को खिलाती है। चिंताओ में डूबी रामशरण बहू आज फिर अच्छी तरह सा नहीं पाती हैं। दुसन की मा समझाती रह जाती है, लेकिन वे थोड़ा-सा खाकर हो उठ जाती हैं। दुखन की मां अब रामशरण बहू का रात का खाना अच्छी तरह ढंकती है। फिर चल देती है। आज वह यहां नही माती । अपना माना भी साथ लेती जाती है । रामशरण बहू मे विदा ले वह भागती हुई चल पड़ती है। उसके मुंह से निकले शब्द रामशरण बहू को साफ सुनाई पड़ते हैं, "वहुत देर हो गई. 'बहू को लेकर दुखन तैयार होगा "मेरी ही राह देख रहा होगा." दुखन की मां को विदा कर रामगरण वह बाहर का दरवाजा बंद कर अपने कमरे में लौट आती हैं। सोचने लगती हैं, दुगन की मा अपने बेटा- पतोहू की दुनिया में रचने-घसने लगी है। ठीक ही कर रही है। उनके साथ उने क्या मिलेगा? दुखन की बहू के वच्चा हो जाने के बाद भी वह दुखन की मा को उमीके माथ रहने के लिए बाध्य करेंगी। अपने साथ रखकर उसका जीवन वर्वाद नहीं करेंगी। रामशरण बहू बोधा के बारे में सोचने लगती हैं। वोधा ने उनके चलते लडाई की है। आखिर उसके अंदर जगतनारायणसिंह का खून जो है। रामशरण यहू को जगतनारायणसिंह की याद सताने लगती है। वे सोचती हैं कि अगर आज बोधा की जगह उनकी अपनी कोष का जन्मा लडका होता तव फिर कोई चाचा उमे समझाने नहीं आते। वह इंट का जवाव पत्थर से देता। तब वह भी सरिया पर पडी-पड़ी चिंताओ मे घुलती नहीं, बल्कि सिंहनी की तरह गाव की गलियों में दहाड़ती होतो। रामशरण बहू का ध्यान गाव के लोगो की ओर चला जाता है । जगिया, उसके साथी, पुस्तकालय को वैठक वाले लड़के, हरि दादा के दालान के कई लोग! क्या सचमुच ये लोग उन्हें बचाएगे? उन्हें लगता, नहीं। अगर ऐसा होता ही तो अब तक वे उनके पक्ष में आबाज नहीं उठाते ! कई गांवों के ओझा रोज आते हैं । दूधनाथ ओझाओं की बातों पर विश्वास कर उनके बारे में तरह-तरह की अफवाहें उठाते हैं। लेकिन कोई कभी रोकने तो नहीं आता है। दुखन की मां ने उन्हें सांत्वना देने के लिए यह कहा है। सच्ची सूचना यह नहीं है । लेकिन फिर उन्हें लगता कि दुखन की मां ने तो कभी झूठी सूचना तो दी नहीं है। उनके सामने तो वह झूठ वोलती ही नहीं। दुपहरिया तपने लगती है। रामशरण बहू की आंखें झपकने लगती हैं । दिन के उजाले में रात की तरह उनका मन भयभीत नहीं होता ! शीघ्र ही उन्हें नींद आ जाती है। फिर वे सपने देखने लगती हैं। वे देखती है कि दूधनाथ चौधरी और उसके लोग एक तरफ खड़े हैं तथा दूसरी तरफ कंधे पर लाठी लेकर जगतनारायणसिंह उन्हें चुनौती दे रहे हैं। दूधनाथ कहते 'जगतनारायण, तुम बीच में न पड़ो।' जगतनारायणसिंह गरजते हैं, 'मां का दूध पिए हो तो आगे बढ़ आओ'रामशरण बहू के दरवाजे पहुंचने से पहले यहां लाशों की ढेर न लगा दी तो मेरा नाम जगतनारायणसिंह नहीं...।' दूधनाथ अपने लोगों को ललकारकर आगे बढ़ते हैं। वस, गांव में मशहूर जगतनारायणसिंह की लाठी बिजली की तरह चलने लगती है । दूधनाथ का माथा फट जाता है। उसके भाई का एक हाथ टूट जाता है। उसके एक आदमी की गरदन लटक जाती है। शोरगुल सुन सारा गांव जुट जाता है। चीखने-चिल्लाने और रोने-पीटने की आवाजें तेज हो जाती हैं। बस, रामशरण वहू की नींद टूट जाती है। वे पसीने से भीग गई हैं और उनके दोनों हाथ की मुट्ठियां बंध गई हैं। अजीव सपना देखा उन्होंने । इस तरह का सपना तो पहले कभी नहीं देखा था। नींद टूट जाने के बाद भी सपने की घटना उनकी आंखों के सामने नाचती रहती है। जगत- नारायणसिंह को याद कर-करके वे आंसू बहाने लगती हैं। जगत- नारायणसिंह जिस तेजी से उनकी जिन्दगी में आए थे, उसी तेजी से चले गए। अच्छा होता अगर उनकी जिन्दगी में आए ही न होते। तव इस तरह उनका अभाव उनके दुःखी मन को और अधिक नहीं सताता oce जगतनारायणसिंह के बारे में सोचते-सोचते ही उनकी पलकें फिर बन्द होने लगती है। नीद उन्हें फिर दबोच लेती है। कुछ क्षण वाद फिर सपने आने लगते है-दूधनाय के मकान के पास लोगो की भीड़ लगी है। उनके पति रामशरणसिंह कन्धे पर लाठी लेकर वहा पहुंचे हैं और दूध- नाथ को उसके घर मे खीचकर गली में ते आए है। लोगों के सामने दूध- नाथ का गला पकडकर वे पूछ रहे है कि मेरी पत्नी को तूने क्यो डायन कहा दूधनाथ गिडगिड़ा रहा है। उसकी पत्नी आकर उनके पति के पैरों पर गिर जाती है और दूधनाथ की प्राण-भिक्षा मांगने लगती है। लेकिन वे दूधनाथ को छोडते नहीं । दूधनाथ की गर्दन उन्होंने अपने हाथों में जकड रखी है। उनके हाथों का कसाव बढ़ता ही जा रहा है। दूधनाथ की आसें आगे को निकलने लगी हैं। उसकी बड़ी-मी जीभ बाहर निकल आई है। उसका चेहरा डरावना लगने लगा है। और..! उनकी नीद टूट जाती है। फिर अपने पति का चेहरा उनकी आंखों के सामने नाचने लगता है। वे खटिया में उठ पति की तस्वीर के पास जाती हैं और अपना माथा टिका कहती हैं, "हे नाथ ! तुम मुझे छोड़कर चले गए." अब यहा मेरी खोज- खबर लेने वाला ही कौन है ? मुझे भी वही बुला लो 'अव यहां का दुस मुझमे महा नहीं जाता..." रामशरण यह अपने पति की तस्वीर के समीप बैठी देर तक रोती रहती हैं। फिर अपने विस्तरे पर आ जाती हैं। जो भी उनके अपने थे,सव चले गए। अब मिर्फ सपने मे ही आते है। काश, वे अभी होते ' काश, वे मिर्फ सपने मे ही न आकर साक्षात् आ जाते ! रामशरण वहू सोचने लगती है। सोचती जाती हैं। उन्हे पता भी नही चलता और सोचते-सोचते ही वे पुनः नीद की गिरफ्त मे चली जाती हैं । इस वार सपने उन्हे जल्द नहीं आते। कुछ समय बाद आते हैं, लेकिन एकदम भयावह रूप में । वे देखती हैं कि दूधनाथ के मकान के चारो तरफ आग लगा दी गई है। जगिया, उसके साथी, पुस्तकालय की कोठरी याले लड़के और अन्य अनेक लोग आग से बाहर गिरोह की शक्ल मे हथियारो से संस खड़े हैं। दूधनाथ के परिवार के जो लोग आग से बचने के लिए अपने घर मे निकलकर भागना चाहते हैं, उन्हे बाहर खडे लोग पकड़कर आग । की लपटों में फेंक देते हैं। गांव में ढूंढ-ढूंढकर ओझाओं को पकड़ लिया गया है और उन्हें वारी-बारी से आगमें फेंका जा रहा है। आदमी के जलने की तीखी दुगंध वातावरण में फैल गई है। आग की लपटें लाल, नीली और पीली होते हुए आसमान को छू रही हैं। वन्दूकें छूट रही हैं। नारे लगाए जा रहे हैं। नारों की तेज आवाज से कान फटने लगते हैं और सहसा उनकी नींद उचट जाती है। रामशरण बहू आश्चर्यचकित हो वैठ जाती हैं। आज इस तरह के सपने उन्हें क्यों आ रहे हैं ? ऐसा तो पहले कभी नहीं होता था। उन्हें अपनी मां की एक बात याद आ जाती है। जब वे क्वारी थी और मायके में थीं तो एक बार उनकी मां ने कोई सपना देखने के बाद उन्हें बताया था कि सपने या तो किसी शुभ कार्य के होने से पहले आते हैं या विघ्न उप- स्थित होने से पहले। रामशरण वह अपने सपनों को याद कर सोचती हैं कि अब उनकी जिन्दगी में कौन-सा शुभ कार्य होगा ? जरूर कोई बहुत बड़ा विघ्न ही उपस्थित होने वाला है। ये सपने उसीकी पूर्व सूचना देने आए हैं । ऐसा सोचते ही रामशरण बहू का अन्तर एकबारगी कांप उठता है। वे सिर से पांव तक दहशत में डूब जाती हैं। अव तक सांझ हो चली है। दिन के उजाले पर सांझ की कालिमा हावी होने लगी है। रात होने में कोई देर नहीं। लेकिन जाने क्यों, रात के नाम से ही रामशरण बहू का चेहरा स्याह पड़ने लगता है। उनका गला सूख जाता है। उनके अन्दर एक अज्ञात भय की लहर दौड़ जाती है। उन्हें लगता है, रात, रात नहीं, कोई मानव-भक्षी राक्षसी हो, जो उन्हें निगलने के लिए आगे बढ़ रही हो। रामशरण वहू ढिवरी जलाती हैं। फिर कमरे से निकलकर आंगन में आ जाती हैं । आकाश में तारे उगने लगे हैं। गांव के विभिन्न घरों से धुआं उठ-उठकर आकाश में छाने लगा है। शायद चूल्हे जल गए हैं। लेकिन उनका चूल्हा आज नहीं जलेगा । दुखन की मां तो दिन में ही रात का खाना भी बनाकर गई है। रामशरण बहू सुनती हैं, उनके बगल के घर से रोज की भांति औरतों की खिलखिलाहट की आवाज सुनाई पड़ती है। रामशरण बहू जानती हैं, १६८ / युद्धस्थल -- - उस घर में दो नई बहुरिया आई हैं। उनके पति सेती-गृहस्थी करते हैं। दिन-भर खेतों पर रहते हैं। लेकिन शाम को जब घर लौटते है तब उनके यहा हेसी-मजाक और खिलखिलाहट का दौर शुरू हो जाता है। उनके लिए रात कितनी रंगीन और मुहावनी होती है ! मानव-जीवन का वे सच्चा आनद पाते हैं। और एक वे हैं ! लेकिन वे मानव है ही कहा? अपने जानते ही तो वे मानव हैं। गाव के लोग तो उन्हें दानव समझते हैं। अचानक बाहर का दरवाजा खटखटाता है। रामशरण बहू के कान खड़े हो जाते है। दुखन की मा तो होगी नही, फिर कौन है ? एक क्षण तक रामशरण बहू आगन मे चुपचापपूर्वत. गडी रहती हैं। फिर बाहर के दरवाजे वाले कमरे में चल पड़ती हैं । दरवाजे के पास पहुचकर वे मौन हो यह जानने की कोशिश करती रहती है कि कौन है। लेकिन दुवारा न तो कोई दरवाजा ही खटखटाता है और न आवाज ही देता है । काफी देर तक प्रतीक्षा करने के बाद रामशरण बहू पूछती हैं, "कौन है ?" बाहर से कोई जवाब नहीं आता। इसके बाद आवाज को थोडा और तेज कर वे पुनः पूछती हैं, "कौन है इस बार भी उत्तर में सिर्फ सन्नाटा । अव रामशरण बहू दरवाजा खोलती है। बाहर कोई नहीं है । शायद कोई लडका उनको तंग करने के लिए दरवाजा खटखटा गया हो। इससे पहले भी उनको तग करने के लिए लड़के कई बार ऐसा कर चुके थे। लेकिन उन्हें लगता है, यह किसी लड़के का काम नहीं, जरूर दूधनाथ ने फिर किसीको भेजा होगा। रामशरण बहू दरवाजा वद कर अपने कमरे में चल देती है। मन में यह बात बाते ही कि दूधनाथ ने किसीको भेना होगा, उनका चित्त अशात हो जाता है। भयावह और डरावनी आकृतिया उनके सामने नाचने लगती है । दूधनाथ ने उनको खीचकर ले जाने की योजना बनाई है। दिन में तो इस काम में वह सफल नहीं हो पाएगा, इसीलिए रात में ही वह ऐसा करेगा। रामशरण बहू अपने कमरे में आ जाती है। रात की कालिमा काफी गहरा गई है। रामशरण बहू अपने कमरे के भीतर का दरवाजा भी वद " - कर लेती हैं। फिर अपने बिस्तर पर लेट जाती हैं। बाहर के दरवाजे से आने पर ही वे काफी थक गई-सी लगती हैं। सिर से पांव तक पसीने से भीग गई हैं। साथ ही धीरे-धीरे हांफने भी लगी है। रामशरण बहू काफी देर तक चुपचाप यों ही पड़ी रहती हैं। फिर उन्हें याद आता है, रात का खाना उन्होंने अभी तक खाया नहीं। लेकिन यह याद आने के बाद भी उन्हें खाने की इच्छा नहीं होती है। बाहर का दरवाजा खटखटाने के बाद उनका अन्तर डरावती आशंकाओं से भर गया है। खाने की इच्छा का तो कहीं कोई नामोनिशान भी नहीं रह गया है। फिर भी वे जबरन सोचती हैं कि उन्हें खा लेना चाहिए। भूखे सोने से तो उनका शरीर और अधिक कमजोर होता जाएगा। दुखन की मां ठीक ही कहती है, जितने दिन भी जीना हो, स्वस्थ रहकर ही जीना चाहिए। खटिया पर धुल-घुलकर मरना तो सबसे अधिक कष्टदायक होता है। रामशरण बहू सोचती है कि जिसे अभी मरना नहीं चाहिए, भगवान उसको मृत्यु देते हैं और जो मरना चाहता है, उसकी जिन्दगी बढ़ाते जाते हैं। उनके पति और जगतनारायणसिंह को अभी इस दुनिया में रहने की जरूरत थी, लेकिन भगवान ने उन्हें अपने पास बुला लिया और वे इस दुनिया से मुक्त होना चाहती हैं तो उनकी उम्र बढ़ाते जाते हैं। अगर वे काफी बूढ़ी होकर खाट पकड़ लेंगी तो फिर उनकी सेवा कौन करेगा? कोई अपना तो है नहीं। इसीलिए उन्हें इस बात के प्रति सतर्क रहना चाहिए कि मरने के दिन तक वे चलने-फिरने लायक रह सकें। रामशरण बहू इच्छा न होने पर भी खाना खाने के लिए खटिया से नीचे उतर जाती हैं। दुखन की मां उसी कमरे में उनका खाना और पानी सब ढंककर रख गई है। लेकिन रामशरण बहू से खाया नहीं जाता है। रोटी का एक टुकड़ा तोड़कर मुंह में डालती है; पर उनके कान तो आंगन की ओर लगे रहते हैं। पिछली रात की तरह आज फिर हवा जोरों से वहना शुरू हो जाती हैं। दरवाजे का बजना । छप्पर से किसी चीज का आंगन में गिरना । हवा की सनसनाहट । रामशरण वहूसे खाया नहीं जाता है। अपने साथ काफी जोर-जबर्दस्ती करने के बाद भी वे आधी रोटी से अधिक नहीं खा पाती हैं। फिर पानी पीकर पुनः विस्तरे पर आ जाती है। १७० / युद्धस्थल कमरे का दरवाजा भीतरसे वद कर लेने के बाद कमरे की गर्मी बहुत बढ गई है। लेकिन रामशरण बहू ने सोच लिया है, भोर होने से पहले वे दरवाजा नहीं खोलेंगी। जाने कब किस रास्ते से दूधनाथ का आदमी आ जाए! रामशरण वहू सोने की कोशिश करती हैं । मोचती हैं, नीद लग जाती और एक ही बार सुवह मे टूटती तो इस काल-रात्रि के संकट मे वे मुक्त हो जाती। लेकिन नीद आ नही पाती है। उन्हें लगता है कि दिन में उजाले की वजह से वे सो पाई थी। उजाले से चाहे उनकी और कोई समस्या दूर न होती हो, लेकिन मन के अन्दर सुरक्षा-बोध की प्रतीति अवश्य होती है। रात जैसे-जैसे गुजरती जाती है, रामशरण बहू के मन की आशकाएं वढती जाती हैं। उनका तो सिर्फ स्थूल शरीर ही विस्तरे पर पड़ा है। चेतना तो आंगन और दरवाजे की आहट लेने में जुटी है। आगन से कोई हल्की-सी आवाज भी होती है तो उनके हृदय की धडकनें तेज हो जाती है। फिर उनके मन में तरह-तरह के डरावने विचार आने लगते हैं। अचानक छप्पर से आगन में किसी चीज के कूदने की आवाज आती है। रामशरण बहू के कान खड़े हो जाते हैं। उनके हृदय की धडकनें तेज हो जाती है । वे एकाप्रचित्त हो आहट लेने लगती हैं। उनके दिमाग में आशंकाओं के घोडे दौड़ने लगते हैं । जरूर दूधनाथ का कोई आदमी छप्पर से आगन में कूद आया है। अव वह बाहर का दरवाजा खोलेगा। फिर अनेक लोग आ जाएगे। इसके बाद उनके कमरे के खुलने को वे मव प्रतीक्षा करेंगे। जब वे अपने-आप नही खोलेंगी, तब वे तोड़ना शुरू कर देंगे। लेकिन नही "दरवाजा टूटने से पहले वे शोर मचाकर लोगो को जुटा लेंगी."रामशरण बहू अभी इतना ही सोच पाई थी कि आगन ने आवाज आती है, 'म्याऊ !' एक क्षण के लिए रामशरण वहू को लगता है, दिल्ली है। फिर वे सोचती है, नहीं। दिल्ली की बोली बोलकर उनके यहा आया आदमी अपना मकसद पूरा करना चाहता है। सोचता है कि बिल्ली समझकर रामशरण बहू दरवाजा खोल देंगी और वह अपने उद्देश्य सफल हो जाएगा। इलाके की कई चोरियों में ऐसा हो चुका है। चोर पशु की वोली बोलकर किवाड़ खुलवाने में सफल हो गए हैं। लेकिन रामशरण वहू किवाड़ नहीं खोलेंगी। वे याद करती हैं, छप्पर से आंगन में कूदने की आवाज किसी बिल्ली की नहीं, आदमी की आवाज थी। काफी भारी- भरकम और वजनदार आवाज । रामशरण बहू के मन में यह पक्का विश्वास हो जाता है कि कोई आदमी निश्चय ही उनके यहां कूद आया है। फिर उनके अन्दर घबराहट और वेचैनी बढ़ जाती है। वे खटिया से उतर दरवाजे के पास आती हैं और दरवाजे की दरार से झांककर आंगन में देखती हैं । आंगन में घोर अन्धकार छाया है। कुछ भी दिख नहीं रहा है। लेकिन उनकी नजर जिधर जाती है, उधर ही उन्हें कोई आदमी खड़ा प्रतीत होता है। उन्हें साफ लगता है कि आंगन के एक कोने में एक आदमी खड़ा है और वह घातक हथियार लिए हुए है। वे डर के मारे थर-थर कांपने लगती हैं। शोर मचाना चाहती है तो पाती हैं कि उनका कंठ सूख गया है। उनके मुंह से एक शब्द भी नहीं फूट पाता है। वे पलटकर विस्तरे पर आ गिरती हैं। एक क्षण तक वेहोशी की स्थिति में पड़ी रहती हैं। फिर आंखें खोलती हैं। उन्हें चारों तरफ सिर्फ अन्धकार-ही-अन्धकार । नजर आता है। इसी बीच छप्पर के खड़खड़ाने की आवाज उन्हें सुनाई पड़ती है। उन्हें लगता है, उनके कमरे के छप्पर पर कई लोग चढ़ गए हैं और वहीं से सूराख बनाकर अन्दर आ रहे हैं। फिर उन्हें अपने कमरे की दाई दीवार में खरखराहट महसूस होती है। वे अनुमान लगाती हैं, उनके कमरे में पहुंचने के लिए बाहर से दीवाल में सेंध लगाया जा रहा है । वे अपनी दोनों आंखें बंद कर लेती हैं। फिर भी उन्हें लगता है कि हजारों आदमी हथियारों से लैस उनकी ओर बढ़े चले आ रहे हैं। वे आंखें खोल देती हैं। लेकिन यह क्या? उन्हें लगता है कि छप्पर में एक वड़ा-सा सूराख हो गया है और कई लोग अन्दर उतर रहे हैं। वे देखती हैं, बगल की दीवार में सेंध-मरनी से छेद कर दिया गया है और कई लोग बाहर से झांक रहे हैं। एक क्षण के लिए उनके होश-हवाश गुम हो जाते हैं। फिर उन्हें अपनी आंखों के सामने विजली चमकने जैसा आभास होता है । इसके बाद वे पागलों की तरह तेजी से उठती हैं और कमरे का दरवाजा खोल १७२ / युद्धस्थल । आगन में आ जाती है। उन्हें लगता है, छप्पर पर अनेक आदमी बैठे हैं। वे बागन में एक क्षण भी सहा नही रह पाती है। वहां से भागते हुए वरामदे मे पहुचती है और बाहर का दरवाजा खोल गाय की गली में आ जाती है । गली में आने के बाद रामशरण बहू को कुछ शांति महमूस होती है। ठडी हवा के स्पर्श का उन्हें सुखद अनुभव होता है । यहा पर की अधेरा भी बहुत गहरा नहीं है। आकाश मे टिमटिमाते तारो की तरह मद्धिम रोशनी नीचे तक आ रही है। रामशरण बहू चुपचाप आगे बढ़ी जा रही है। रात आधी से अधिक बीत गई है। सन्नाटा हर जगह व्याप रहा है। अपने अपने दालानो पर लोग गहरी नीद सोए है। कही किसीके खासने की आवाज सुनाई पड जाती है तो कही किसी घर से किसी बच्चे के रोने की । कहीं-कही दालान की गर्मी में ऊबकर कुछ लोग गली के किनारे ही चौकी बिछाकर मो गए है। कही किसीके दरवाजे पर बधे पशु रभाते नजर आते है । एक जगह एक कुत्ता रामशरण बहू को देखकर भूकने लगता है। फिर उनके पास आकर उन्हें पहचान लेने के बाद दुम हिलाने लगता है। वह उनके मुहल्ले का ही कुत्ता होता है। रामशरण बहू एक गली को लापते हुए दूसरी और फिर नीमरी में घुसती जाती है । देखते-देखते ही वे गाव मे बाहर चली आती है । यहा मे एक कच्ची सडक उन्हें मिलती है। महक के एक किनारे गाव है और दूसरी ओर सेत । वे कच्ची सडक पकडकर चल देती है। कुछ दूर जाने से बाद वे थकान महसूस करने लगती है। 'डिहवार बाबा के स्थान तर पहुंचते-पहुचते वे बुरी तरह थक जाती हैं। अब उन्हे चलने की नानव भी इच्छा नहीं होती। डिहवार बाबा के पाम उन्हें काफी गीतलना महम्म होती है। डिहवार वावा का चबूतरा काफी बड़ा है। चवतरे में दोर पर डिहवार यावा की स्थापना की गई है। चबूतरे में पाम ही पीपल का प घना वृक्ष है। यहा का वातावरण पदम मान और मन को मोह लेने वाला लगता है। रामशरण वह चबूतरे पर बैठ जाती है। उनकी आत्रे झपकने लगती है। फिर वे लेट जाती है। टमक बाद शीघ्र ही नीद उन्हे आ दबोचती है।

रात का चौथा पहर गुजर रहा होता है। मौसम गेहूं की कटनी का चल रहा है। कटनिहार अपने-अपने घरों से निकलकर खेतों की ओर चल देते हैं। चार कटनिहार सड़क पकड़कर भी जा रहे हैं। लेकिन डिहवार वावा के पास पहुंचते ही उनके कदम रुक जाते हैं। यहां कौन सोया है ? शायद कोई कटनिहार ही यहां पहले आ गया हो। लेकिन जब वे नजदीक पहुंचकर देखते हैं तो उनके अचरज का ठिकाना नहीं रहता कि यहां रामशरण वहू सोई हैं। फिर वे ऊंची आवाज में बातें करने लगते हैं कि रामशरण बहू किसी मंत्र की सिद्धि के लिए यहां पहुंची हैं, दूधनाथ के लड़के को खत्म करने के लिए कोई मनौती मनाने आई हैं..." अपने पास कुछ लोगों की तेज आवाज सुन रामशरण वहू की नींद टूट जाती है। उन्हें यह देखकर अत्यधिक आश्चर्य होता है कि वे डिहबार वावा के पास हैं और उन्हें कुछ कटनिहार आंखें फाड़-फाड़कर देख रहे हैं। वे यहां कैसे आई, कौन ले आया, उन्हें कुछ भी समझ नहीं आता है। वे वहां से उठकर अपने घर की ओर तेजी से भागती हैं। अपने मकान के पास पहुंचकर उनका मन और अधिक विस्मय में पड़ जाता है। वाहर का दरवाजा खुला है। अगर कोई चोर घुसकर उनका बक्सा ले भागा हो, तव ? रामशरण बहू घर में घुसकर देखती हैं, उनका वक्सा सही-सलामत है। कोई भी चीज चोरी नहीं गई है। लेकिन यह हो कैसे गया? वे बुरी तरह हैरत में पड़ जाती हैं। फिर माथा पीटने लगती हैं। इसके बाद एक जगह बैठकर वे विचार करने लगती हैं। उन्हें लगता है, यह अशुभ लक्षण है। फिर वे फूट-फूटकर रोने लगती रामशरण बहू रोती रहती हैं। सुवह हो जाती है। दिन एक पहर चढ़ जाता है। फिर भी वे रोती ही रहती हैं। दुखन की मां रोज की भांति अपने नियत समय पर आती है। उसे देखकर रामशरण बहू और जोर-जोर से रोने लगती है। दुखन की मां आज गांव से एक सनसनीखेज सूचना लेकर आई है। डिहवार बाबा के पास रामशरण बहू को देखने के वाद कटनिहारों ने यह खवर पूरे गांव में फैला दी है। दुखन की मां आते ही उनसे पूछती हैं, "आप डिहवार वावा के पास क्यों गई थीं?" 1 १७४ / युद्धस्थल रामदारण वहू, दुखन की मां की ओर आंखें उठाकर रोते हुए ही कहती है, "मुझे कुछ नहीं मालूम दुखन की मा"कुछ नहीं मालूम'"" दुखन की मा देखती है,रोते-रोते रामशरण बहू की आखें मूज गई है। वह उन्हें धीरज बंधाती है तथा मांत्वना देते हुए चुप कराती है। राम- भरण बहू की रुलाई इतनी हृदय-वेधक होती है कि दुखन की मां भी रोने लगती है। उससे सहा नही जाता। दुमन की मां मन-ही-मन सोचने लगती है, रामशरण बहू डिहवार बाबा के पास क्यों गई थीं। गाव के लोग भले ही इसका दूसरा अर्थ निकाल लें, लेकिन वह तो रामशरण बहू को एकदम नजदीक मे जानती है। वह दूसरा अर्थ कभी नहीं निकाल सकती है। उसे लगता है, दुप- तकलीफ और विताओं के चलते रामशरण बहू को पागलपन का दौरा पड़ने लगा है। दुसन की मा का मन भावी आशंकाओ से काप उठता है। उसे याद आ जाता है, मृत्यु से कुछ दिन पहले भोका कहार की हालत भी ऐसी ही हो गई थी। सत्तर साल की उम्र गुजार देने के बाद भोका अचा- नक रातो में चलने लगा था । आधी रात के बाद या उसके आसपास भोका विस्तरे से उठकर गांव में घूमने लगता। कभी वह बरगद के नीचे पाया जाता, तो कभी ठाकुरवारी पर, तो कभी तुसिंह की बोरिंग पर । उसके परिवार के लोग चिंतित हो गए थे। लेकिन इसके ठीक एक हफ्ते के अन्दर ही भोका इस दुनिया से चला गया। दुखन की मां रसोई बनाने मे लग जाती है, लेकिन आज उमका हृदय बहुत अशात है। मन किसी भी काम मे लग नही रहा है। दिमाग में तरह-तरह की दुश्चिताएं मटरा रही है। यह जान चुकने के बाद कि रामशरण बहू के कदम मौत की तरफ बढ़ रहे हैं, उसका अन्तर चीत्कार कर उठता है। वह सोचती है कि उसे इस हालत में रामगरण वह को नहीं छोडना चाहिए। वह मन-ही-मन यह निर्णय करती है कि अब रात में भी अपनी बहू की देखभाल कर रामशरण वहू के यहा आ जाएगी। अब सिर्फ उमे अपनी बहू को नहीं, रामशरण बहू को भी देखना है। उसकी यहू को तो सिर्फ प्रसव-पीडा मे ही गुजरना है, रामदारण बहू की वोरा जमकी दर को पीटा में कई गना ज्यादा है।

दूसरी रात रामशरण वहू फिर अकेली रह जाती हैं। दुखन की मां उन्हें खाना खिलाकर जा चुकी है। हालांकि उन्होंने नाम का ही खाना खाया है, सिर्फ दुखन की मां का मन रखने के लिए। उनकी थाली में तो रोटियां ज्यों-की-त्यों पड़ी है। सिर्फ एक रोटी के कुछ टुकड़े ही वे निगल पाई है। - रामशरण बहू ने कल की ही भांति वाहर का और कमरे का दरवाजा वंद कर लिया है । वातावरण में उमस कल की ही तरह है। लेकिन आज वे ठंड महसूस करती हैं। उनकी तबीयत खराब हो चली है। दोपहर से ही उनके माथे और बदन में दर्द होना शुरू हुआ था तथा नाक से पानी आने लगा था। दुखन की मां ने उनके सारे बदन में तेल की मालिश की है तथा यह कहा है कि रो-रोकर आपने अपनी तबीयत खराव की है। अव एकदम नहीं रोने और कुछ भी नहीं सोचने के लिए दुखन की मां उन्हें अपनी सौगन्ध दिलाकर गई है। रामशरण बहू को प्रारंभ में ठंड का साधारण अनुभव होता है। वे बिछावन की चादर खींचकर ओढ़ लेती हैं। उन्हें लगता है, इतने से ठंड दूर हो जाएगी। लेकिन उससे ठंड दूर नहीं होती। ठंड द्रुतगति से बढ़ती ही जाती है। वे महसूस करती हैं कि चादर से काम चलने वाला नहीं, कुछ और ओढ़ना पड़ेगा। लेकिन खटिया से उठने की हिम्मत नहीं होती उनकी । ठंड से वे सिकुड़ती जाती हैं। इस वक्त अगर कोई अपना होता तो कितनी सहायता मिलती। लेकिन अपनों का सुख तो सवको नसीव होता नहीं। जव उन्हें लगता है कि वे ठंड से बुरी तरह अकड़ जाएंगी, तव वे चादर के भीतर से अपना हाथ निकाल खटिया के पास ही स्टूल पर रखी रजाई खींचकर ओढ़ लेती हैं। लेकिन रजाई ओढ़ने के बाद भी ठंड से उन्हें मुक्ति नहीं मिलती। निरंतर बढ़ने ही जाने और कलेजा कंपा देने वाली ऐसी ठंड की अनुभूति उन्हें पहले कभी नहीं हुई थी। उनके हाथ-पांव कांपने लगते हैं । सारा वदन कांपने लगता है। दांत किटकिटाने लगते हैं। वे वर्फानी सदियों का अनुभव करते हुए अचेत पड़ी ठिठुरती रहती हैं। उन्हें अपने अंग सुन्न होते जान पड़ते हैं। काफी देर तक इसी स्थिति में रहने के बाद धीरे-धीरे उनकी ठंड कम 918 यद्रस्थल होने लगती है। लेकिन जैसे-जैने उनकी ठंड कम होती जाती है, वैसे-वैमे वे अपने शरीर के तापमान में वृद्धि महमूम करती है। पूरी तरह ठंड खत्म होने तक तो वे दुमार में जलने लगती है। अब उमस महमूस होनी शुरू होती है। वे अपने ऊपर से रजाई हटा देती । चादर भी परे कर देती है । लेकिन उमम बढ़ती ही जाती है । लगता है, जमे बदन के भीतर आग जल रही हो । मुह और नाक मे बाहर आने वाली हवा बहुत गर्म होती है तथा आंखो से आग की लपटें निकलती जान पड़ती है। उन्हें जोरों में प्यास लगती है। वे सटिया से उतर घडे के पाम जाती है। फिर एक ही साथ दो गिलास पानी गटागट पी जाती है। पानी पीकर वे पुनः पटिया पर पहुंचती है कि ठीक इसी वक्त छप्पर पर एक रोडा गिरने की आवाज होती है । रामशरण बहू का मन एक ही माथ शकित और यात कित हो उठता है । अकमर चोर-बदमाश किसीके यहा घुसने से पहले उसके मकान के कार एक रोडा फेंककर यह जानने की कोशिश करते है कि घर वाले सो गए हैं या जगे है ? रामगरण वहू युमार की उमम से तो बेहाल थी ही, इस गेडे को आवाज के बाद और अधिक व्यथित हो उठती है। फिर शीघ्र ही उनकी व्यथा घबराहट और वेचनी में बदल जाती है। इस स्थिति में पहुंचने के बाद डरावने दृश्य उनकी आखो के सामने नाचने लगते है । उन्हे लगता है कि कई नकाबपोश व्यक्ति उनके कमरे में आ गए हैं। उनके हाथो में घातक हथियार है। उनमे में एक आगे बढ़कर उनका गला दबाने लगता है। दूसरा उनका मुंह बंद कर देता है। तीसरा उनके ऊपर निदंपता में वार करने लगता है। चौया व्यक्ति दूधनाथ है। उसके हाथ में एक तेज चाकू है। वह उनके सीने पर वार करना चाहता है। गमगरण वह बुखार मे ही वडवडाने लगती है, “नहीं मेरा कोई दोष नही अव वे गोर मचाना चाहती हैं, लेकिन मुह योलती हैं तो आवाज गले के भीतर ही घुटकर रह जाती है। वे आव बोलकर देखना चाहती है कि जो देखा है उन्होंने, वह मही है या भ्रम है ? लेक्नि आब बोलने के बाद उन्हें सिर्फ चिनगारिया ही चिनगारिया नजर आती हैं और चिनगारियो के बीच कई हिंसक चेहरों का आभाम होना है। इसके बाद एकाएक उन्हें अपने शरीर का तापमान बहुत बढ़ गया महसूस होता है। फिर उन्हें सांस लेने में कठिनाई होने लगती है। लगता है, इस कमरे में तनिक- भी हवा नहीं। उन्हें अपना दम घुटता हुआ महसूस होने लगता है। कमरे से वाहर खुली हवा में जाने के लिए उनका मन छटपटाने लगता है। उन्हें लगता है कि अब अगर एक क्षण भी इस कमरे में ठहर गई तो प्राण निकल जाएंगे। वह बेहोशी की स्थिति में विस्तरे से उठ कमरे के दरवाजे के पास जाती हैं। उन्हें कुछ भी दीख नहीं रहा है। अंदाजे से ही वह कमरे का दरवाजा खोलती हैं फिर भागते हुए बाहर के दरवाजे की ओर चल देती हैं। एक जगह आंगन की दीवार से टकराकर गिर जाती हैं । माथा फूटते- फूटते बनता है। वहां से फिर उठकर भागती हैं और वाहर का दरवाजा जाकर खोल देती हैं। बुखार के वेग में वे कमरे से बाहर के दरवाजे तक तो दौड़ते हुए आ जाती हैं, लेकिन बाहर का दरवाजा खोलने के बाद उन्हें लगता है कि अचानक किसी ने जमीन से आसमान में उठाकर उन्हें जोरों से पटक दिया हो। इसके बाद वे वहीं गिरकर अचेत हो जाती हैं। रामशरण बहू की चेतना जव लौटती है, वे अपने को पसीने से भीगी हुई पाती हैं। उनकी इच्छा होती है कि कमरे में विस्तरे पर चलें, लेकिन यहां से एक कदम चल सकने में भी अव वे अपने को असमर्थ पाती हैं। चुपचाप वहीं बाहर के दरवाजे के पास पड़ी रहती हैं, गली की ठंडी हवा का स्पर्श उन्हें अच्छा लगता है। नजर उठाकर गली में देखती हैं तो कुछ भी नजर नहीं आता, सिर्फ अन्धकार और सन्नाटा ! लेकिन यह क्या ? अचानक गली में छिपा एक आदमी तेजी से उनके पास आता है और उनका मुंह बंद कर देता है। फिर और दो-तीन आदमी आते हैं और उन्हें टांगकर भागते हुए चल पड़ते हैं । वे देख रही हैं, गली के दालानों पर लोग सोए हैं। वे शोर मचाकर लोगों को जगा देना चाहती हैं, लेकिन उनके मुंह में काफी कपड़ा ठूस दिया गया है। उनके अन्तर में हाहाकार मचा है । अन्दर से वे खूब चीख-चिल्ला रही हैं, लेकिन बाहर उनकी कोई भी आवाज नहीं निकल पा रही है। रामशरण बहू को टांगकर ले जाने वाले लोग पूर्व निश्चित योजना के अनुसार दूधनाथ चौधरी के घर ले जाते हैं। फिर उन्हें उस कमरे में ले 910 | यदल -- . जाया जाना है, जहां दूधनाथ का लडका पड़ा है। अब उन्हें नीचे उतारा जाता है। उनके मुह मे ठूमा कपडा भी निकाल दिया जाता है। कमरे में लालटेन जल रही है। रामशरण वह भय के मारे थर-घर काप रही होती हैं। वे देखती हैं, पलग पर दूधनाथ का लइका मुर्दे की तरह पड़ा है। वह एकदम पीला और नर-कंकाल की तरह लग रहा है। कभी-कभी अपना हाथ-पाव हिलाता है, जिममे उसके जिन्दा होने का आभास होता है । कमरे मेधूप-दीप के जलने की सुगध फैली है । दूधनाथ, उसके भाई, उसके घर की औरने और उसके दो-तीन विश्वासी आदमी वहा मौजूद है । दो बाहर के ओझा पलग के नीचे बैठे गुनगुनाते हुए 'पचरा' गा रहे है । रामशरण वह में दूधनाथ पूछता है, "बोल | मेरे बेटे को ठीक करती है कि नहीं?" "मैंने आपके लटके को कुछ नहीं किया है।" रामशरण बहू दोनो हाथ जोडकर कापने लगती है। "तो किमने किया है ?" एक ओडाा गरजता है। "रामायण में लौटते वक्त इनके चबूतरे पर क्यो वैठी थी? ओझा दहाडता है। "ईश्वर जानता है, मैं बिल्कुल निर्दोप है.. मैं तो यह जाननी भी नहीं कि डायन क्या होनी है ।" गमशरण बह गिडगिडाने लगती हैं। "अभी तुमको सव बता दिया जाएगा।" दूधनाथ का भाई धमकी देने हुए कहता है। "यह ऐमें नहीं मानेगी मेग लाल नो अब जा ही रहा है मैं इसे भी नहीं छोड़ गी ।" दूधनाय की पन्नी निल्लाने हा आगे बटनी है और वाज की तरह झपटकर गमशरण यह की साडी खोल उन्हे नगा वर देती है। फिर दौडकर रमोई में जल रहे चूल्हे मे एक जलती हई लकडी खीच ले आती है और कहती हैं, 'बोल डायन | मेरे लाल को ठीक करती है कि नहीं रामशरण बहू आख बद कर लेती है। उनी आखो मे आम् दरकने लगते हैं। फिर वे अपने दोनों हाथ ईमा ममीह की नन्ह ऊपर आममान की ओर जोडते हुए कहती हैं, 'हे भगवान । अब तू ही महाग है।' दूमग 1 7 दूधनाथ की पत्नी चिल्लाती है "पाखंड कर रही है चुडैल !" और जलती हुई लकड़ी से वह रामशरण बहू के गुप्तांग पर वार करती है। रामशरण वहू के मुंह से 'आह !' की एक करुण आवाज निकलती है और वे वहीं धड़ाम से गिर जाती हैं। मांस जलने की तीखी दुर्गन्ध कमरे में फैल जाती है । दूधनाथ की पत्नी गुस्से में चूल्हे से आग के काफी अंगारे निकाल उनकी देह पर फेंक देती है। दुखन की मां अपने बेटे और बहू के साथ रात का खाना खाकर रामशरण बहू के यहां चलना चाहती है कि पुनः उसकी बहू के पेट में कल की ही भांति दर्द होने लगता है। कस्वे की डाक्टरनी ने बताया है कि दिन पूरा हो गया है। आजकल में ही बच्चा हो जाना चाहिए। दुखन की मां तेल गरम करके अपनी बहू के पेट पर रखती है और हाथ से धीरे-धीरे उसका पेट सहलाने लगती है। दुखन के बाद इस घर में यह दूसरा बच्चा होने वाला है। दुखन को पैदा हुए बत्तीस साल हो गए हैं। इस बीच कोई बच्चा नहीं हुआ । वत्तीस साल बाद फिर इस घर में एक बच्चे की किलकारी सुनाई देने वाली है। दुखन की मां का मन हुलसित- पुलकित हो उठता है। लेकिन यह याद करके कि रामशरण बहू अकेली होंगी."उसके ऊपर पागलपन का दौरा पड़ रहा है।"उसका मन दुःखी हो उठता है। उसका ध्यान कभी अपनी बहू पर आ टिकता है तो कभी रामशरण वहू की ओर चला जाता है। कभी उसके चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ जाती है तो कभी दुःख और चिताओं में उसका चेहरा डूब जाता है। दुखन की मां पाती है कि पेट सहलाते-सहलाते ही उसकी बहू सो गई है। दुखन की मां को लगता है, बच्चा होने वाला दर्द नहीं था। ऐसे.ही दर्द हो गया था। बच्चा होने वाला दर्द होता तो उसे नींद नहीं आती। दुखन की मां दुखन को जगाती है, फिर कहती है, "मैं मालकिन के यहां जा रही हूं। उनकी तबीयत ठीक नहीं है। अगर वहू के पेट में दर्द होने लगे तो मुझे आकर खबर कर देना।" दुखन कहता है, "मैं वहां तक तुम्हें छोड़ने चलूं क्या ?" १८० / युद्धस्थल को आज वह कहती है, "नही। मैं स्वयं चली जाऊगी।" दुखन की मा अपने घर से निकलकर चल देती है। एक गली को पार कर दूसरी गली में घुस जाती है । वह रामशरण बहू के वारे में ही सोचती जाती है, कितना अपमान, कप्ट और यातनाएं सह रही हैं वे ! यह कैसा समाज है कि जो शक्तिशाली है, वे लाख गलतियां करते है, फिर भी कोई चू तक नहीं करता और असहाय, वेसहारा को तग करने के लिए सव आगे वढ आते है। इसीलिए दुसन की मा को लगता है कि चमरटोली की लडाई ठीक हुई है। हाय जोडकर गिड़गिड़ाने से अन्याय करने वाले लोग मानने वाले नहीं । जव उन्हें इंट का जवाब पत्थर से दिया जाएगा तव वे रास्ते पर आएंगे। चमरटोली की लड़ाई के बाद से तो वह सहना भूल गई है। सेर का जवाब सवा सेर से देती है। रामशरण बहू के बारे में सोचते-सोचते ही दुसन की मा उनके घर के पाम आ जाती है। यह देखकर उसका मन आशंकाओ मे भर जाता है कि रामदारण यहू के घर का दरवाजा खुला है । क्या रामशरण बहू फिर पागलपन का दौरा पड़ा है ? दुखन की मा के मन मे तरह-तरह के सवाल उठने लगते हैं। वह तेजी से उनके घर के अन्दर घुम जाती है । रामशरण बहू कही नहीं हैं। उनकी सटिया खाली है। आगन और रसोई- घर में भी वह झाककर देख लेती है। फिर तेजी से गाव की गलियो मे भागने लगती है। एक गली में दूसरी गली। वह चाहती है कि पूरे गाव मे दौडकर, जहा कही भी रामशरण बहू हो, उनके पास पहुच जाए । वह एक गली को भागते हुए पार कर रही है कि अचानक एक मोड पर दूध- नाथ की गली मे तीन-चार आदमी आते हुए दीसते है। वह ध्यान से देखती है, वे लोग किसीको टागकर ले आ रहे है। सोचती है, शायद कोई बीमार होगा। कस्बे के अस्पताल में ले जा रहे होगे। फिर उसे लगता है, रोगी को तो लोग खटिया पर लिटाकर ले जाते है। इसे तो ऐमे ही हाथो और कन्धो पर टाग रखा है। शायद कोई चीज हो। फिर उसे उन लोगो पर सन्देह होने लगता है। सोचती है, दौडकर उनके पास पहुंच जाए। लेकिन उसे लगता है, अगर चोर-बदमाश होगे तो हथियारो से लैस होंगे ! पास पहुचने पर उसकी आवाज बद कर देंगे। इसीलिए । !

- वह दूर से ही आवाज देती है, "कौन है ?" सोचती है, उसकी आवाज सुन अगर उसकी ओर वे सब मुखातिव होंगे तो वह शोर मचाकर लोगों को जुटा देगी। लेकिन यह क्या? उसकी आवाज सुनते ही वे सब जिस चीज को टांगकर ले आ रहे थे, उसे वहीं गली में पटक पीछे की ओर भाग चलते हैं। दुखन की मां भागने वालों में दूधनाथ के भाई को पहचान लेती है । अब वह उन सबका पीछा करते हुए चिल्लाती है, "चोर ! .."चोर ! .''दौड़ो! . पकड़ो !" आसपास के दालानों पर सोए अनेक लोग गली में आ जाते हैं। भागने वाले तो लापता हो जाते हैं। लेकिन दुखन की मां लोगों को लेकर वहां पहुंचती है, जहां उन्होंने टांगकर ले जाने वाली चीज फेंक दी है। वहां पहुंचकर यह देखते ही दुखन की मां और उसके साथ के लोगों के होश उड़ जाते हैं कि रामशरण बहू नंगी पड़ी हैं और उनके शरीर को कई जगह जला दिया गया है । दुखन की मां की हालत तो एकदम पागलों जैसी हो जाती है। वह रामशरण बहू के चेहरे के पास झुककर आवाज लगाती है, "मालकिन 'मालकिन...!" लेकिन रामशरण बहू कोई जवाब नहीं देती हैं। उनकी आंखें तो बंद हैं । सिर्फ उनके हृदय की धड़कनें चल रही हैं, लेकिन होश गायब हैं । दुखन की मां अब उनके पास से हटकर गांव की गलियों में वेतहाशा दौड़ते हुए गला फाड़कर चिल्लाने लगती है, "दौड़ो 'दौड़ो "दूधनाथ ने राम- शरण वह को जिन्दा जला दिया है. 'वचाओ'वचाओ एक अवला की रक्षा करो...!" दुखन की मां गांव के इस छोर से उस छोर तक चिल्लाकर लोगों को जगा देती है। लोग घटनास्थल पर जुटने लगते हैं। पहले से भी वहां काफी लोग मौजूद हैं । देखते-ही-देखते वहां पूरा गांव इकट्ठा हो जाता है। सबसे पहले जगिया और उसके साथी पहुंचते हैं। फिर गांव के अन्य नौजवान । इसके बाद लाठी टेकते हुए बुड्ढे आ जाते हैं। घर के अन्दर सोई औरतें आ गई हैं। उनींदी आंखें लिए वच्चे आ खड़े होते हैं, और वहां आकर रामशरण बहू को देखने के बाद अन्तर खौल उठता है । सारे गांव के रहते हुए एक अवला की दूधनाथ ने यह दुर्गति की! लोग रामशरण - १८२ / युद्धस्थल बहू को देखने तथा उनके जीने-मरने का अंदाजा लगाने लगते हैं। जो लोग रामशरण बहू को डायन समझते थे, ये भी दूधनाय द्वारा उनकी इस तरह दुर्गति देय, दूधनाथ के प्रति गफा हो गए हैं। और दुपन यो मा ! वह तो भीड़ को चीरकर रामशरण यहू के समीप पहुचती है और उनये नंगे बदन को अपनी माटी फाड़कर ढंक देती है तथा उनके मुह पर पानी का छोटा देते हुए उन्हें होग में लाने की कोशिश करने लगती है । लगिन रामशरण बहू उसी तरह पड़ी रहती हैं। दुमन की मां गते और पिलाते हुए कहती है, "मालकिन, आपको जलाकर वह कमाई जिन्दा नही रहेगा... 'मारा गाव जुट गया है." ""अब फैसला होकर रहेगा! लेकिन रामगरण बहू को तो जमे कुछ मुनाई ही नहीं पड़ रहा है। ये उसीतरह अचेत पडी है । अब तक गाव के वंद्यजी भी घटनास्थल पर परग आए हैं और रामशरण बहू को होश में लाने के प्रयास में लग गए हैं। पं. जो के प्रयास के बाद एक क्षण के लिए अचानक रामशरण बहू की मासे ग्गुलती हैं। उनकी आखें लाल और जाले से भरी हुई होती है । दुरन मा के चेहरे पर सुमी लोटने लगती है। वह चिल्लाकर कहती है - किन, मैं कह रही थी न कि गाव के लोग जान जाएगे नो भूः रहेंगे। लेकिन यह क्या ? दुपन की मा अभी अपनी बात पूरी नहीं पाती है कि रामशरण बहू को एक तेज हिरवी शान है। आंग सदा के लिए बंद हो जाती हैं । दुरपन यी मा पाती। वह उनके शरीर पर गिरकर जोर-जोर nिd अब भीड़ के बीच से जगिया गरडता है - चाहिए"यह एक बहुत बड़ा अन्याय है।" बोधा दहाडता है, "हम सबको चुना कि एक विधवा को इस गाव में इग्जर पुस्तकालय की बैठक के लडो रहा है - इस गांव में इस तरह की पति और न

दुखन कहता है, "अभी और इसी समय वदला लेना होगा. मैं
सवको उनकी मां की और इस गांव की धरती की सौगन्ध देता हूं कि
पीछे न मुड़ें।"
और इसके बाद दूसरी सुवह फिर...!

मिथिलेश्वर
जन्म : २७ अक्तूबर, १६४८ बिहार के भोजपुर
जिले के बंसाठीह नामक गांव में । लेखन १९६५ से
प्रारंभ। अब तक हिन्दी की प्रायः सभी विशिष्ट
पत्रिकाओं मे रचनाएं प्रकाशित । अनेक रचनाएं
विभिन्न देशी और विदेशी भापाओं में अनूदित ।
आकाशवाणी से प्रसारित । अनेक विशिष्ट कपा-
सग्रहों में संकलित । फिल्मों के लिए अनुबन्धित ।
प्रकाशित पुस्तकें
'मापूजी', 'बंद रास्तों के बीच', 'दूसरा
महाभारत', 'मेघना का निर्णय' और 'मिपिलेश्वर की
श्रेष्ठ कहानिया' नामक पांच कहानी-संग्रह तया
'मुनिया' नामक उपन्यास।
'बाबूगी' कहानी-संग्रह मध्य-प्रदेश शासन
साहित्य परिषद् द्वारा 'अखिल भारतीय मुक्तिबोध
पुरस्कार' तथा 'बंद रास्तो के बीच' कहानी-संग्रह
सोवियत रूस द्वारा 'सोवियत संड नेहरू पुरस्कार'
से पुरस्कृत व सम्मानित।
शिक्षा:पी०ए० हिन्दी आनसं, एम०ए० हिन्दी।
संप्रति : स्वतंत्र सेवन

Youdhisthal

Author
Mithlishwar
Title
Youdhisthal
File name
Youdhisthal
Text
OCR done
Citation
1920
Published
2011/03
Publisher
Delhi,z.t.printing Press
Language
Sanskrit
Pages
194
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
General
DLI number
552129
Barcode
4990010032853.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
nM9mWXglFhe
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