Adarsh Library, Jaipur
The Sawitri
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सवित्तरी
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शैलेश मटियानी
सविता
AIVA
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रामोदर दत्त दीक्षित को सादर
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- "यहां सोहबतियाबाग में आपके कोनो रिश्तेदार रहित हैं का, साहेब ?" "नहीं," कहते हुए उसने अपनी गोद में थमे सुनील को थोड़ा-सा और संभालकर पकड़ लिया, हालांकि रिक्शा जिस मंथरता से आगे बढ़ रहा था, इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। उसने अनुभव किया कि रिक्शा- वाले के पूछने से वह सपना देखते हुए में से जगा दिए गए व्यक्ति की तरह चौंक उठा है। फाफामक का स्टेशन छूटते हो, जब गंगापुल पर से ट्रेन गुजरी थी, तब भी उसे अचानक लगा था कि जैसे एक दुनिया पोछे छूट चुकी है और दूसरी शुरू हो रही है । उसको सर्वथा अप्रासंगिक रूप से यह याद आया कि बछरावां या रायबरेली के पास कहीं उसने मीता की जांघ पर सिर टिकाने की कोशिश की थी, तो मीता ने अपना घुटना ऊंचा उठा लिया था । उसने अपने भीतर काई की तरह उगो तनावपूर्ण मानसिकता को ठेनने की कोशिश में रिक्शेवाले की तरफ देखा। उसका यों ही पूछ लेने को मन हुआ कि क्या उसका निहायत सक्षिप्त उतर उसको अपर्याप्त लगा है, लेकिन अपने इस तरह से पूछो की हास्यास्दता का ध्यान आते ही वह धीमे से हमा, जैसे होंठों से नही, जीभ से हंसना चाहता हो। इसी बीच उसने एक नजर मीता पर भी डाली । उसके चेहरे पर लम्बे सफर की थकान के अलावा भी कुछ ऐसा है, जो उसके भीतर की खिन्नता की गंव देता हुआ लगता है । मीता का स्वास्थ्य अच्छा-खासा है । सरसरी . दृष्टि से देखे जाने पर भी वह अच्छे खाते-पीते परिवार में पली हुई लगती है । उसकी किंचित् नीली आंखों में एक तरह की तुर्शी है, जो इस वक्त भी ज्यों की त्यों है। हो सकता है, सिर्फ भ्रम हो। बदलती परिस्थितियों के साथ स्त्रियों का रुख काफी संतुलित होता है । वह मानना चाहता था कि अभी तक की लम्बी यात्रा में जितनी बातें उन दोनों के बीच हो चुकी हैं, उन्हें अपने- आपमें काफी होना चाहिए । रहने की जगह जैसी कुछ भी है, वह पहले ही बता चुका है । वल्कि अपनी स्थिति और रहने की जगह, दोनों का अपेक्षा- कृत कुछ बदतर विवरण ही उसने दिया है, ताकि मीता पहुंचते ही भभक न उठे। उसका एकाएक ही कहने को मन हुआ कि 'मोता, अपने सामर्थ्य-भर मैं हर कोशिश करूंगा कि तुम सुखी रह सको।"और लगा, वह निरंतर एक मानसिक दवाव में है । शायद, एक लम्बे अन्तराल तक उसे मीता की अप्रसन्नता का सामना करना पड़ेगा। इसी बीच रिक्शेवाले ने यह भी पूछ लिया कि वह नौकरी कहां करता है और कि 'वहूजी तो पहली बार इलाहाबाद आई लगती हैं । बड़े घर की बेटी लगती हैं, बड़ा तप है मुंह पर ।' इसकी उम्र पैतालिस के आसपास होगी, उसने सोचा । अपनी बढ़ी हुई दाढ़ी में वह लगभग पचास वर्ष का लग रहा था, लेकिन उसके कपड़े काफी साफ-सुथरे थे। हां, ठंड की मार को देखते हुए उन्हें पर्याप्त नहीं कहा जा सकता था। उसको यहां रहते वर्षों हो गए हैं और उसने प्रायः यही देखा है कि अधिकांश रिक्शेवाले मैले-कुचैले कपड़ों में रहते हैं। आनंदभवन वाला चौराहा आने तक में उसने रिक्शेवाले का नाम भी पूछ लिया था और बिना किसी तरह की अनिवार्यता के ही यह भी महसूस किया था कि उसका नाम याद रहेगा। "शिवचरन ! तुम्हारे बच्चे कितने हैं ?" "दो लड़की-जात हैं, बाबू साहेव, एक छोकरा है साला-आवारागिर्द।" ८/सवित्तरी
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वाबू मोहलत - . तो दिखाई न दे और वह संतुष्ट होकर वापस चला जाए । रिक्शेवाले ने पूछ लिया कि यहां कौन-सा मकान किराये पर लिया है, तो उसे फिर से अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर मिल गया, "अरे शिवचरन ! तुम तो, भई, इसी मोहल्ले के रिक्शेवाले हो, तो रायजी की कोठी तो जानते ही होंगे ? बस, उसीकी बगल का बंगाली वावू वाला मकान है । एक मध्यम किस्म का कमरा और छोटा-सा वरामदा। वस, कामचलाऊ है। पहले कभी सस्ते किराये रहे होंगे, अव तो इलाहा- वाद में भी एक मामूली कमरा तक पचास-साठ से कम में नहीं मिलता है । हमें पैंतालिस में अच्छी ही जगह मिल गई है इस हिसाब से । तुम कहां रहते हो?" "हम भी, बस, आपके पड़ोस में ही रहते हैं, साहेब ! मजार के पीछे दूधवालों की रिहायश है ना, सरकार ! बस, वहीं एक कच्चा पुश्तैनी मकान है । वो भी नगरपालिका वाले आ-आके धमका जाते हैं कि तोड़ देंगे। भला हो वाबू मोहलत रायजी का, आसरा दिए हुए हैं कि रहते हमारे दम के तुम लोगों को कोई नहीं उजाड़ सकता । रिक्शा मजार वाली गली से ले चलें, हुजूर ? एमेले साहब की कोठी तो उधर से ही नजदीक पड़ेगी।" "ले चलो। इस मोहल्ले में आए हमको ज्यादा दिन हुए नहीं । बस, यो समझो कि कमरा मिला है, तो बहूजी को लाने चले गए। वैसे दूध- सब्जी, बच्चों के स्कूल वगैरह की लिहाज से तो यह मोहल्ला काफी अच्छा है । सब चीजें आसपास हैं।" शिवचरन के बहाने, उसने महसूस किया, वह इस तरह की सारी बातें मीता से कर रहा है । उसे कुछ डर भी लगा कि कहीं मीता तड़ाक से यों न कह दे कि 'हां, बहुत लम्बी-चौड़ी खरीदारी तुम्हींको तो करनी है, घी- दूध और सब्जी-फल वगैरह की।'.. लेकिन मीता के चेहरे पर अभी भी सिर्फ एक चुप्पापन था, जैसे किसी झील की सतह पर का पानी जमकर ठोस हो गया हो। 1 - डेरे पर ये लोग पहुंचे, तब लगभग दस बज चुके थे और ठंड आदमी के शरीर पर सवारी गांठे रहने की सी मुद्रा में से हट चुकी थी। १० / सवित्तरी
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- तो दिखाई न दे और वह संतुष्ट होकर वापस चला जाए रिक्शेवाले ने पूछ लिया कि यहां कौन-सा मका तो उसे फिर से अपनी स्थिति स्पष्ट करने का शिवचरन ! तुम तो, भई, इसी मोहल्ले के रायजी की कोठी तो जानते ही होंगे? वावू वाला मकान है। एक मध्यम किर वस, कामचलाऊ है। पहले कभी बाद में भी एक मामूली कमर हमें पैंतालिस में अच्छी ही २ रहते हो?" "हम भी, वस ।। वरामदा पूरब की ओर है और, मोहलत राय की दूधवालों की F में न होने से, सर्दियों में भी काफी देर तक धूप रहती मकान है ।र मायके से लाई हुई गहत-भट-मसूर की दालें और बड़ियां भला हो न फैला रही थी। इसके अलावा छोटे-से रसोईघर को लीपना के तकिया था, लेकिन इसी बीच पता चला कि वच्चे को हल्का बुखार हो है, तो सब अधूरा छुट गया। दोपहर का खाना स्टोव पर ही बना लिया गया । और जनार्दन खाना खाते ही यह कहकर निकल गया कि 'अग्रवाल साहव के यहां की 'ट्यूशन' हफ्ते-भर से छुटी हुई है, आज हो आऊ । इतवार है, बच्चे घर पर ही होंगे। कुछ मंगाना हो, तो बताओ। लौटते में लेता आऊंगा।' मीता ने जिस तरह आंखें उठाकर देखा था, वींधने वाला था। उसने चुपचाप एक कोने में खड़ी साइकिल निकाली और चल दिया। वापस लौटा, तब शाम होने को थी और बच्चे का ज्वर पहले की अपेक्षा कुछ बढ़ गया था । सब्जी तथा कुछ अन्य जरूरत की चीजें जो वह ले आया था, चुपचाप रसोईघर में रखकर, वह दवा लेने निकलने लगा, तो मीता की आवाज पीठ पर का कपड़ा पकड़कर खींचती-सी लगी, "दवा क्या रास्ते में खुद अपने हाथों से बनाकर ले आओगे ?" वह पीछे लौट आया, तो वह बोली, "बच्चों की दवा अन्दाज से नहीं लाई जाती । नजदीक में कोई डाक्टर हो, तो मैं इसे साथ लिए चलती हूं।"
"चलो, रिक्शा करके डाक्टर रमेश चन्द्रा के यहां ले चलते है । इस वक्त अपने घर पर हो वो देखते हैं मरीजों को।" गली में से निकलकर, चौराहे पर दोनों पहुंचे, तो देखा कि शिवचरन भी वहीं एक किनारे रिक्शा खड़ा किए वातों में लगा है। उन लोगों की और देखते ही बोला, "कहीं जाना है क्या, साहेब ?" "जरा बच्चे की तबियत ठीक नहीं । रमेश डाक्टर के यहां तक जाएंगे।" उसका वाक्य पूरा होने से पहले ही शिवचरन रिक्शे की ओर मुड़ गया था, लौटकर बोला, "पान-वान खाना हो तो खा लें।" "नहीं।" इस बार मीता बोली थी और उसे लगा कि उसकी आवाज में सख्ती रिक्शा तेज रफ्तार से दौड़ने लगा, तो मीता ने हल्के से भिड़कते हुए कहा, "इतना वेतहाशा न दौड़ाओ, शिवचरन ! गोद में बीमार बच्चा है।" उसने लगभग उसी रफ्तार में ब्रेक लगा दिया, तो रिक्शा एक झटके के साथ रुक गया। उसने गरदन पीछे मोड़ ली थी और उसके माथे के दाई ओर, घाव का निशान साफ-साफ दिख रहा था। वह कुछ सहमा कि कहीं मीता के टोकने का यह बुरा तो नहीं मान गया है, लेकिन उसके चेहरे पर नाराजगी की सख्ती नहीं थी। "वहूजी हमार नाम पुकार लिहिन–'शिवचरन !' मुला हम धन्यवाद हो गए । सबेरे बाबूजी बहुत कहत रहे 'शिवचरन-शिवचरन'-बात कुछ बनी नहीं । हमारी जो विटिया सवित्तरी है ना, साहेब ! हमका चिढ़ावे के सातिर अभी भी कह देती है कि 'देखो, वेटा शिवचरन, दढ़मोंगी खाने का काम ना करो।' आपके यहां आई रही कि नहीं, बाबूजी!" भीता ने रिक्शे को ठेलने की सी मुद्रा में 'नहीं' कहा, तो वह मुड़ा और रिक्शा आगे बढ़ा लिया । डाक्टर रमेश चन्द्रा की कोठी के फाटक के पास पहुंचते ही उसने कहा, "बालक ले के आई है, प्रयागराज में, बहूजी, तो कभी अलोपिन मैया के दरबार में भी हो आवें । नजदीक है मैया । वाल-गोपाल को शरण देने वाली हैं । कौन बड़ा उत्सव करना है, यही फूल-दतेशा-अगर. वत्ती की भूखी मैया है अलोपिन । हमारी सवित्तरी हुई रही ना, साहेब, मुश्किल !
- बैंच पर वह वैठ गई। से पंदरा दिन की रही होगी, जब हम अलोपिन मैया और कल्यानी देवी के मन्दिर में माथा टेके खातिर गए रहे।" वे दोनों रिक्शे से उतर गए, तो शिवचरन रिक्शा यह कहते हुए बाहर की तरफ निकाल ले गया, "आप लोग दवा लेके आवें, साहेब ! हम फटकिया ऊपर रहेंगे । यहां मोटू कम्पौण्डर साहेब मना करित हैं।" "वहुत वातून है यह रिक्शेवाला तो, दिमाग चाट जाता है । खांसता और हांफता भी बहुत है, मगर रिक्शा फिर भी तेज दौड़ाता है।" उसने. लगभग आक्षेप के स्वर में कहा, लेकिन मीता ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। डाक्टर के द्वारा बुलाए जाने की प्रतीक्षा में बैठे हुए लोगों की कतार में एक उसने गहराई से अनुभव किया कि समय और स्थान के एक अच्छे-खासे अन्तराल के बाद भी कुछ ऐसा है, जो मीता के चेहरे पर, उसकी आंखों में और उसके बोलने में-उसके सम्पूर्ण अस्तित्व में जहां का तहां है। उसे एकाएक याद आया कि जब इलाहाबाद के लिए विदा होते समय मीता अपने घर की सीढ़ियां उतर रही थी, तो अपने पांवों से उनपर वजन डालती हुई लगी थी उसे । एक बार तो उसका मन हुआ था कि कहे, 'अगर तुम बहुत नाखुश हो, मीता !.."चाहो, तो अभी भी अपने घर पर ही रुकी रहो । कभी स्वयं तुम्हारा मन हो आने को, तो लिख देना ।.."लेकिन इस बात की माशंका में चुप लगा गया कि मीता का चुप्पापन विस्फोटक और अप्रिय स्थिति न उत्पन्न कर दे। यह उसे स्वयं अप्रीतिकर लग रहा था कि वह अपनी चिन्ता को सिर्फ वच्चे पर केन्द्रित नहीं कर पा रहा है। डाक्टर रमेश चन्द्रा की कोठी के अशोक- वृक्षों की पांत-से भव्य लगते हुए लम्बे-चौड़े लान पर की दूब कितनी मोहक लगती है। उसको लगा कि यह दूब जैसे प्रतीक्षा में है कि कोई वहां बैठे और लम्बे-लम्बे वार्तालापों से उसे धन्य करे। यूनिवर्सिटी में शोध के सिल- सिले में आते-जाते दिनों कनिका बनर्जी के साथ का दूब पर होना, अचानक ही उसकी स्मृति में उभर आया । आदमी खुद कितनी जल्दी और कितना एकाएक अपने ही लिए अतीत बन जाता है। कोशिश तो उसने रामनगर, मीता के मायके में, रहते हुए भी की थी 6.
कि अपने-आपको उसे ठीक-ठीक समझा सके । समझा सके कि गरीब परि- वार का होते हुए भी खुद उसके पास सपने में देखा हुआ-सा भविष्य था और अभी भी उसके अतीत वन चुकने की तकलीफ है । लेकिन वहां रहते हुए मीता का रक्या यह था कि इघर उसने वार्तालाप करना चाहा और उघर वह चुपके से उठी और कमरे से बाहर निकल गई । पांच दिन लगातार वहां रहा था और इस सारे अरसे में मीता का रख उसके प्रति पत्थर बनी अहिल्या का-सा प्रतिक्रियाशून्य था, हालांकि उसकी यह प्रतिक्रियाशून्य दिखने की मुद्रा ही सबसे गहरी प्रतिक्रिया थी। मीता ने साड़ी के पल्ले को ओट देते हुए सुनील को दूध पिलाना शुरू किया, तो उसका धीमे से हंसने को मन हुआ, क्योंकि सावधानो के वाव- जूद की लापरवाही में वह सिर्फ एक बच्चे की मां होने की गवाही देती हुई लग रही थी। वह उसे एकटक देखना चाहता था, लेकिन तुरत दूसरी ओर देखने लगा, ताकि मीता का चेहरा सस्त न हो जाए । कम्पाउण्डर 'टेम्प्रेचर' देखने आया तो उसने मीता की गोद से सुनील को इस तरह उठाया कि अंगुलियां उसके दूध पिलाते में खुले स्तन से छू गई और उसे ऐसा रोमांच हुआ, जैसे किसी दूसरे की पत्नी को छू रहा हो। बच्चे के लिए दवा लेकर, वे घर को लौटने लगे, तो शिवचरन रास्ते. भर कुछ नहीं बोला । पहले चौराहे पर आकर वालसन की दुकान में दवाएं खरीदी और यों ही, विना किसी प्रसंग के, मीता के लिए चुइंगम की कुछ टिकियां ले ली और रिक्शा, सोहबतियाबाग की तरफ, वापस मोड़ लिया। घर पहुंचे, तब लगभग घुघलका होने को आ गया था। वह बच्चे को चारपाई पर लिटाने लगा था कि देखा, मीता ने शिवचरन को एक रुपया दिया और वह इतना कहते हुए निकल गया कि "हम सवित्तरी को कह देंगे, बहूजी ! आप बीमार बच्चे को संभालेंगी कि घर का कामकाज करेंगी।" मीता ने पहले आले में रखा दीया जलाया और तव बिजली जलाई। सवित्तरी/१५ - . बच्चे को दवा पिलाने के वाद, वह रसोईघर में पहुंचकर, सब्जी वन तयारी करना ही चाहती थी कि वह भी रसोईघर में पहुंच गया। हाथ से लौकी लेने के बहाने पहले उसने उसे छुआ और फिर एकाएक वांहों में भर लिया। उसने अनुभव किया कि ऐसा करते हुए वह आपको उन दिनों से कहीं ज्यादा रोमांचित अनुभव कर रहा है, विवाह हुआ ही था और अपने खण्डहर होते हुए-से पुश्तैनी घर में कु को दोनों ही अपने सम्पूर्ण एकान्त में रहे थे। दरअसल मीता के भीतर के अलगाव को उसने तभी अपेक्षाकृत गहराई से अनुभव किया था और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व में उसे एक हीनता की-सी प्रतीति हुई थी। उसे अव भी अक्सर यह याद आ जात किसी ऐसे ही अवसर पर उसने अपने भीतर की खिन्नता में से कहा वह पत्थर की अहिल्या है ।... वह भीतर ही भीतर कहीं डर रहा था कि मीता झटके के सा आपको छुड़ाती हुई अलग न खड़ी हो जाए, लेकिन उसने सिर्फ : कहा, "तुम्हें वक्त-वेवक्त कुछ नहीं सूझता? सब्जी मैं खुद बना लूंगी, सुनील का 'टेम्प्रेचर' लेकर देखो। थर्मामीटर वहीं पर, उसके सिरहाने रखा है।" वह कुछ भी तय नहीं कर सका कि मीता को जो उसने एकाएक वद्ध कर लिया था, उसकी प्रतिक्रिया उसपर क्या हुई है । उसने । मीता के रुख को लेकर अभी भी वह अधर में ही लटका है। वह कहे ही बच्चे की ओर निकल गया और उसने अनुभव किया कि प्रतीक्षा में रहना होगा। हो सकता है, मीता कोई एतराज न करे इसके बाद भी सुवह उसके चेहरे की त्वचा पर अलगाव का वही बेरुखापन पसरा हुआ मिल सकता है, जिसमें से उसका हल्का-सा लिए गोरे रंग तथा यौवन के लावण्य से दिपता मुंह किसी सख्त वना हुआ प्रतीत होने लगता है। " .. . वह बच्चे को थपथपा रहा था कि उसे किसीका 'वहूजी' पू सुनाई पड़ा। कमरे के इस कोने में बैठे रहने पर बरामदे का ठीक ११ । सवित्तरी वाला, यानी सीढ़ियों के पास का, हिस्सा दिखाई नहीं देता। उसने आवाज से अन्दाजा लगाया कि कहीं शिवचरन की बेटी न हो। "पहाड़ पर से आप ही लोग तो लाए है ना, बहूजी?" सवित्तरी का पूछना तो उसे सुनाई दिया, लेकिन मीता ने क्या जवाव दिया-दिया भी, या नही—उसे कुछ सुनाई नहीं पड़ा। वह अपनी उत्सु- कता में से बाहर निकलना ही चाहता था कि मीता की किंचित् मुखर आवाज उसे सुनाई दे गई, “कल लाना । जरा हम वावूजी से पूछ लें, तव बताएंगे।" वह कहना चाहता था कि इससे पैसे-वैसे पूछ लो, क्योकि मीता के उत्तर में उसे अपनी आर्थिक तंगी के प्रति वरती गई सावधानता का आभास हो गया था, लेकिन फिर उसे यही लगा कि इस वक्त चुप ही लगाए रहना ठीक होगा। सवित्तरी का सीढ़ियों पर से उतरना उसे साफ-साफ सुनाई दे गया । पाजेब के धुंघरुओं के वजने की जो आवाज उसे सुनाई दी, उससे किसी अत्यन्त अभिजात और मंयर गति से चलने वाली औरत का-सा आभास उसे हुआ। खाना खाने के बाद, जव सोने की तैयारी होने लगी, तो उसने मीता से कहा, "मेरा बिस्तर जमीन पर लगा दो और तुम दोनों मां-बेटे चारपाई पर सोना । ज्यादा थकी न हो तुम, तो थोड़ी-सी देर पिण्डलियां दवा देना । लम्बे सफर की वजह से भारी-सी हो गई है।" अपने वाक्य को पूरा करते न करते उसे स्वय किसी झील की स्थिर सतह पर कंकर फेंक देने की-सी अनुभूति हुई, लेकिन यह देखकर उसे सिर्फ विस्मय ही हुमा कि भीता ने पलटकर उसकी तरफ देखा, तब वह धीमे-धीमे मुस्करा रही थी।
३ उत्मव-पनों पर लोगों की नींद हराम करने के लिए कृतसंकल्प ला।। ड़कों पर से गनी के लिए गाड़े गए खम्भे तक समेट लिए थे। जिस रह नगरपालिका के कुत्तामार दस्ते के द्वारा आवारा कुत्तों को पकड़ ले जाने के बाद रात मा सन्नाटा जाजम की तरह मोहल्ले-भर में विछ जाता है सार्वजनिक उत्सदों पर लाउडस्पीकर की मार से नींद हराम कर देने वाले लोगों के एक किनारे हट चुकने के बाद भी मोहल्ले में गोर-शराबा कम था। मीता जब धीरे-धीरे पांव दवाने लगी, तो उसे याद आता गया कि दीपावली का पर्व माय के में ही बीता था, मगर इस तरह कि उन दोनों के वीन अलगाव का अंधेरा ज्यों का त्यों बना रहा । उसे सहसा ही स्मरण हो माया कि महालक्ष्मी-पूजा को रात दुलहन के से तेवर में सजी हुई मीता पंक्तिबद्ध दीपकों को अपने ही तारुण्य से उजागर करती लग रही थी, लेकिन उसके प्रति मीता का रख इतना सख्त था कि चाहने के बावजूद वह यह कहने का माहन चटोर नहीं लगा कि 'नाज तुम अद्भुत रूप से सुंदर लग रही हो, मीता ! विल्गुल देवी-प्रतिमा की तरह।' पांच दिन वह वहां लगातार रहा और प्रायः सारी बातचीत मीता की मां के माध्यम से ही होती रही क्योंकि मीता के पिता के स्वभाव में कुछ ऐसा था कि वह उनको आमने-सामने पड़ने से बचने की कोशिशें करता था और मीता का रवैया ऐसा था कि जैसे वह इस बात का संकल्प कर चुकी हो कि उसे जनार्दन के साथ किसी तरह का वातालाप करना नहीं है। उन सारी स्थिति, और फिर, रामनगर से यहां तक की तम्बी यात्रा के बाबजूद, जिस तरह की औपचारिकता यह बरतती चली भा रही थी- वह मचमुच विस्मय में पा कि बिना किसी तरह के प्रतिमाद के यह कसे सम्भव हुआ। मीत्ताने मिर्फ दीया-मर जलता छोड़ दिया था। बच्चे का आरस्मिक रूप से पराव हो वाया स्वास्थ्य अब संभलने लगा था और जनार्दन पांव दबाने चंटने में पहो मीता ने उममा टेम्प्रेचर लिया, तो सिर्फ निन्यानवे था। एक निस्चितता की मांस लेकर, मीना ने बच्चे को गोद में उठा लिया और दूध पिलाने लगी, तो उसने कह दिया, "इसको तुम दूध इस तरह पिलाया करो कि मैं भी देख सकू । मैं उन दिनों को अपनी स्मृति में लाना चाहता हूं, जव इसी तरह मैं अपनी मां की गोद में रहता होऊंगा।" मीता ने उसे और भी ढंककर दूध पिलाना शुरू कर दिया । बोली, 'कहाँ तो ऐसा लगता था, जैसे तुम्हारी जीभ को किसीने तागे से कसकर बाप दिया हो, बस, सिर्फ मा के साथ युसुर-मुर लगाए रहते थे--- यहां आते ही यकाकाने लगे हो।" उसने दीये के मडिम प्रकाय मे देखा, मीता के चेहरे पर एक निस्तव्य स्निग्धता थी। उमे लगा कि विवाह के बाद जो थोड़े-बहुत दिन माघ रहने का अवसर मिला भी था, उसमे मीता ऐसी कमी नहीं हुई थी । नितान अत- रंग वरतों में भी वह इतनो सम्पूर्ण कभी नहीं लगती थी। उसने मुनील को प्यार करने के बहाने मोता को छुआ. तो पनी अंगुलियों के पोरों पर अप्मा को अनुभूति हुई । माता ने उसका हाथ भरा दिया, तो उसके कंधे पर हाथ रखता हुना योला, "तुम, शायद, इस बात की कल्पना नहीं कर सकोगी, मीता, कि मेरा पिछला सारा समय कितने. कितने असमंजसों में दीत गया । इस वक्त तुम जैगे व्यवहार कर रही हो, तुम्हारी आवाज में जिस तरह की कोमलता है-~-पहने दो कि मु. तुम मन-कपा के तुल्य लग रही हो।" मीता ने धोने से मुनौल को अलग किया और उसके होठो को धोती के छोर से धीमे में पांचा, नो उमने पूछ लिया, "मया नुम्हें अभी तक भी दूर । मवित्तरी १६ उतरता है ? अब तो सुनील लगभग दो साल का होगा?" मीता ने एक क्षण को आंखें तरेरकर उसे देखा और फिर कंधे पर से हाथ हटाते हुए वोली "कभी-कभी तो तुम बहुत वेवकूफों की सी बातें करते हो । यह औरतों की-सी आदतें नहीं मालूम कहां से सीखी हैं । तुम तो ऐसे पूछते हो, जैसे गाय-भैसों के बारे में पूछा जाता है । हमारी बड़ी भाभी का कदार स्कूल जाने लगा था, तब भी मां का दूध पिया करता था ।" "यानी तुम्हारी नजर में बड़ी उम्र इसमें कोई बाधा नहीं है ?" वह तमकती हुई-सी उठ खड़ी हुई और सुनील को चारपाई पर सुलाने के बाद हंसते-हंसते दोहरी हो गई। वह जमीन पर विछे बिस्तर पर बैठा था। उसने देखा, मीता धीरे- धीरे आले के पास गई । देव-मूर्तियां वाले सिंहासन का छोटा-सा लाल पर्दा नीने गिराया और फिर अपनी हथेली के स्पर्श से दीये को बुझाने के बाद, उसके पायताने आकर बैठ गई। वह लेट गया, तो उसने धोती को टखनों पर से ऊपर कर दिया और धीमे-धीमे उसके पांव दवाने लगी। दीया वुझाए जाते ही उसको लगा कि वह इस अंधकार में किसी प्रशांत महासागर की रातह पर तैरते जल-पक्षी की तरह हल्का और मुक्त हो गया - मीता की उपस्थिति सिर्फ पिण्डली पर पड़ने वाले उसकी अंगुलियों के दबाव और चूड़ियों की आवाज से ही जानी जा सकती थी, लेकिन उसको लगा कि इस अंधेरे में वह मीता को कहीं ज्यादा साफ देख पा रहा है। सुख का ऐसा गहरा आवेग अपने वैवाहिक जीवन में पहले कभी उसने अनुभव किया नहीं । उसको लगा कि अब वह वक्त सामने है, जबकि मीता को सम्बोधित करके जो कुछ वह कहेगा, उसे सुना जाएगा । सुना जाएगा और समझा जाएगा । स्त्री का सम्पूर्ण और सहज समर्पण कितना अभिभूत कर देने वाला होता है, इसकी अनुभूति उसे पहली बार हुई। उसने अपने दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में जोड़कर, तकिये पर हाथ फैला लिए और फिर बैलियों पर सिर टिकाते हुए बोला, "हमारे वादूजी कहा करते थे कि परमात्मा की इच्छाएं क्या हैं, इसे हम अपनी - २० । मतिनी - 7880 उन इच्छाओं से ही जान सकते हैं, जो हमारे भीतर उत्पन्न होती है, तो हमें सोर समुद्र का जलपक्षी बनाती हैं । मीता, हमारे बाबूजी धनहीन, पिन्तु गहरे संस्कारी ब्राह्मण थे । मैं अब भी यही मानता हूं कि अपने इतने अभावों-से जोदन में भी मुभ में जो एक दशांति है, यह उन्हीके पुग्धों का फल है । जिस जगह यह मुनील को और तुम्हारी चारपाई नगो है- यही, ठीक इसी जगह उनका प्राणांत हुआ था। जिसे ब्रह्ममुहूतं कहा जाता है, मुबह के खुलने का लगभग वही वक्त पा, मीता । और वासूजी की आवाज नीद में होने के कारण मुझे याकाशवाणी की तरह मुनाई दी थी। उन्होंने मेरे माथे पर हाय फेरा था और कहा था, 'जनार्दन, भगवान अंशु- माली के उदय का वक्त हो गया है, मुझे पूर्वाभिमुन्न कर दे, बेटा!'.."मैंने उन्हें पूर्वदिशा में किया, तो उन्होंने कमरे की मुली हुई खिड़की की ओर प्रणाम की मुद्रा में हाय जोड़े और प्राण त्याग दिए । वासना और स्त्री-गंध की कमा से आवेगशील दिखते हुए जनार्दन का इस तरह का एकाएक अपने पिता की स्मृति में आकुल हो उठना, फिचित् विलक्षण-सा लगा मीता यो । उसने अंधेरे में हो अनुमान लगा लिया कि इस वात्त जनाईन की आंखों में आंसू होंगे। एक बार उसका मन हुआ कि धोती के छोर से जनार्दन की आंखों को पोंछ दें, लरिन फिर लगा कि यह इसकी मायाकुलता में विघ्न डालना होगा । धीमे में पूछा, "बाबूजी, मेरे लिए भी कुछ कहते थे?" वह पने बोला,जैसे डूबे हुए में से बाहर निकल रहा हो, "तुम जो इस वन मेरे पाम हो, यह उन्हीका पहा हुआ है, मीता 1 अब नुममे छिपाना वया, जब पिताजी के सरत बीमार होने का पत्र मैंने लिखा था और फिर तुम नहीं आई, तो मुझे यही लगा कि अब तुम मेरे लिए अतीत की वस्तु हो चुकी हो। तुम्हारे पिताजी का वह पत्र, जिसमें उन्होंने रामनगर आकर बातचीत कर लेने को कहा था, मुझे बहुत ही अपमानजनक लगा था। इस वार में जो उनसे एक. दार भी ठीक से वान नही कर मना, इसका धारण पत्र ही था । तुम, शायद, इस बात की कल्पना नहीं कर सकोगी कि असाध्य रम्णता में परत पिता के मल-मूत्र को अपने हाथों से साफ करते हुए विसी ने आदमी के मन पर क्या योत मरती है, जिसने इस बागा में Marry Reiding R रता है ? अब तो सुनील लगभग दो साल का होगा?" मीता ने एक क्षण को आंखें तरेरकर उसे देखा और फिर को पर से थ हटाते हुए बोली "कभी-कभी तो तुम वहुत वेवकूफों की ती बातें करते ।। यह औरतों की-सी आदतें नहीं मालूम कहां से सीखी हैं । तुम तो ऐसे छते हो, जैसे गाय-भैसों के बारे में पूछा जाता है । हमारी बड़ी भाभी का केदार स्कूल जाने लगा था, तब भी मां का दूध पिया करता था ।" "यानी तुम्हारी नजर में बड़ी उम्र इसमें कोई बाधा नहीं है ?" वह तमकती हुई-सी उट खड़ी हुई और सुनील को चारपाई पर सुलाने के वाद हंसते-हंसते दोहरी हो गई । वह जमीन पर विछे बिस्तर पर बैठा था। उसने देखा, मीता धीरे- धीरे आले के पास गई । देव-मूर्तियां वाले सिंहासन का छोटा-सा लाल पर्दा नीने गिराया और फिर अपनी हथेली के स्पर्श से दीये को बुझाने के वाद, उसके पायताने आकर बैठ गई। वह लेट गया, तो उसने धोती को टखनों पर से ऊपर कर दिया और धीमे-धीमे उसके पांव दवाने लगी। दीया बुझाए जाते ही उसको लगा कि वह इस अंधकार में किसी प्रशांत महासागर की रातह पर तैरने जल-पक्षी की तरह हल्का और मुक्त हो गया है। मीता की उपस्थिति सिर्फ पिण्डली पर पड़ने वाले उसकी अंगुलियों के • दबाव और चूड़ियों की आवाज से ही जानी जा सकती थी, लेकिन उसको लगा कि इस अंधेरे में वह मीता को कहीं ज्यादा साफ देख पा रहा है । सुख का ऐसा गहरा आवेग अपने वैवाहिक जीवन में पहले कभी उसने अनुभव किया नहीं । उसको लगा कि अब वह वक्त सामने है, जबकि मीता क सम्बोधित करके जो कुछ वह कहेगा, उसे सुना जाएगा । सुना जाएगा औ समझा जाएगा । स्त्री का सम्पूर्ण और सहज समर्पण कितना अभिभूत क देने वाला होता है, इसकी अनुभूति उसे पहली बार हुई। उसने अपने दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में जोड़कर, तकिये हाथ फैला लिए और फिर हथेलियों पर सिर टिकाते हुए बोला, "हम वाबूजी कहा करते थे कि परमात्मा की इच्छाएं क्या हैं, इसे हम अ २० / सवित्तरी उन इच्छाओं से ही जान सकते हैं, जो हमारे भीतर उत्पन्न होती है, तो हमें सोर समुद्र का जलपक्षी बनाती हैं। मीता, हमारे बाबूजी धनहीन, किन्तु गहरे संस्कारी ब्राह्मण थे । मैं अब भी यही मानता हूं कि अपने इतने अभावों से जीवन में भी मुझमें जो एक शांति है, यह उन्हीके पुण्यों का फल है । जिस जगह यह सुनील को और तुम्हारी चारपाई लगी है-यहीं, ठीक इसी जगह उनका प्राणांत हुआ था। जिसे ब्रह्ममुहूर्त कहा जाता है, मुबह के खुलने का लगभग वही वक्त था, मीता ""और बाबूजी की आवाज नींद में होने के कारण मुझे आकाशवाणी की तरह सुनाई दी थी। उन्होंने मेरे माथे पर हाथ फेरा था और कहा था, 'जनादन, भगवान अंशु- माली के उदय का वक्त हो गया है, मुझे पूर्वाभिमुख कर दे, बेटा!'मैंने उन्हें पूर्वदिशा में किया, तो उन्होंने कमरे को सुली हुई खिड़की की ओर प्रणाम की मुद्रा में हाय जोड़े और प्राण त्याग दिए।..." वासना और स्त्री-गंध की ऊप्मा से आवेगशील दिसते हुए जनार्दन का इस तरह का एकाएक अपने पिता को स्मृति में आकुल हो उठना, किचित् विलक्षण-मा लगा मीता को । उसने अंधेरे में ही अनुमान लगा लिया कि इस वक्त जनादन की आखों में आंसू होंगे। एक बार उसका मन हुआ कि धोती के छोर से जनार्दन की आखों को पोंछ दे, लेकिन फिर लगा कि यह उसकी भावाकुलता में विघ्न डालना होगा। धीमे से पूछा, "वाबूजी, मेरे लिए भी कुछ कहते थे?" वह ऐसे बोला,जैसे डूबे हुए में से बाहर निकल रहा हो, "तुम जो इस वक्त मेरे पास हो, यह उन्हीका कहा हुआ है, मीता ! अब तुमसे छिपाना कथा, जब पिताजी के सरस वोमार होने का पत्र मैंने लिखा था और फिर भी तुम नहीं आई, तो मुझे यही लगा कि अब तुम मेरे लिए अतीत की वस्तु हो चुकी हो । तुम्हारे पिताजी का वह पत्र, जिसमें उन्होने रामनगर आकर बातचीत कर लेने को कहा था, मुझे बहुत ही अपमानजनक लगा था । इस बार में जो उनसे एक बार भी ठीक से वात नहीं कर समराका कारण पर ही था । तुम, शायद, इस बात की कल्पना नहीं कर सकोगी कि असाध्यता मे परत पिता के मल-मूत्र को अपने हाथों से साफ करते हुए विसी मे आदमी के मन पर क्या योत सकती है, जिसने इग माशा में - शादी की हो कि, मां के न होने से, अपने अंतिम समय के विपाद को झेलने में असमर्थ पिता की सेवा-टहल हो जाएगी।" "जिंदगी में कई प्रसंग ऐसे बन जाते हैं, सुनील के बावू, जव हम तो अपने-आपको निर्दोप समझते हैं, लेकिन दूसरों की बुराई हमसे हो जाती है । हमारे बाबूजी के स्वभाव में सबसे बड़ा दोप यह है कि वह सबको अपनी मर्जी से चलाना चाहते हैं । अपनी तरफ से उसकी भलाई तय करते हैं और अगर दूसरा उनकी इस भलाई को स्वीकार न करे, तो उससे बुरी तरह चिढ़ जाते हैं । तुमने जो वहीं के शारदा इंटर कालेज में उनके द्वारा लगाई जा रही नोकरी को नामंजूर कर दिया ना, तो मां से कहते थे कि वह अपनी दरिद्रता पर घमण्ड करने वाले वाप का नालायक बेटा है। मेरी भलाई उन्होंने इसमें समझी थी कि मेरा विवाह तुम्हारे साथ हो जाए, लेकिन तुम्हारे जिद्दी स्वभाव से अप्रसन्न हो जाने से वह भलाई भी खटाई में पड़ गई।" "जिद्दी शब्द का इस्तेमाल तुम्हारे पिताजी किया करते होंगे-तुम भी . कर सकती हो। मैं सिर्फ स्वभाव ही कहना चाहूंगा। जीवन के अंतिम कुछ महीनों में वृद्धावस्था और असाध्य रोग से जर्जर जरूर हो गए थे हमारे बाबूजी, लेकिन मैंने उन्हें कभी विचलित होते नहीं देखा । कहा करते थे कि तुढ़ापे और रोग में अपने शरीर को वनस्पति के तुल्य समझ लेना चाहिए। मैं कल्पना नहीं कर सकता कि वैसी शारीरिक दुर्गति के बीच भी कोई आदमी लगातार घण्टों तक पूजा-पाठ कर सकता है । वो जब श्लोकों का उच्चारण करते थे, सुनने वाला कल्पना नहीं कर सकता था कि इस आदमी को कोई व्याधि भी है । तुम्हें एक बात बताऊं । इस वर्ष के पितृ-विसर्जन के पर्व पर हम लोग संगम गए थे । शायद, सप्तमी थी । पिताजी जी, तिल और पिण्ड हाथों में लिए कमर तक गंगाजी में चले गए थे । और मुझे अच्छी तरह याद है, उन्होंने दादी के साथ-साथ मां को भी स्मरण किया धा । और मां के नाम का उच्चारण जोर से करते हुए. फिर दोनों हाथों ते प्रणाम किया था। कुछ ही देर पहले मैं स्वयं मां का पिण्डदान दे चुका था, लेकिन जब पिताजी ने 'शारदा' कहकर पुकार लगाई, तो मैंने इस बात को अनुभव किया कि वह मेरे द्वारा 'मां' कहे जाने से कहीं ज्यादा पूर्ण था।" । , २२ जना मीता चुपचाप पांव दबा रही थी। जनार्दन कहता रहा, "उसी रात पिताजी ने तुम्हें बुला लेने कोलिसा था और कहा था कि 'बैंट, पत्नी के बिना जीवन कितना अधूरा है, इसे आदमी तरुणाई में नहीं जान सकता। उनका कहना था कि पली अर्धांग है और अपना शरीर यदि दूपित हो जाए, तब भी हमें धारण किए रहना होता है।" "तो क्या वो भी मुझे दूषित समझते ये?" मीता की आवाज हालांकि धीमी ही थी, लेकिन अपनी प्रश्नवाचकता में वह जैसे सारे कमरे में चमगादड़ों के झुण्ड की तरह फैल गई। "वो, मीता, तुम्हें अपनी बेटी के तुल्य ही समझते थे । दूपण से उनका मतलब तुम्हारी जिद और अलगाव में था । मैंने जब कभी कहा कि 'बाबूजी, जो औरत एक वेटे की मां बन चुकने के बाद भी साथ नहीं रहना चाहती, उसका मोह त्याग देने में ही भलाई है। तो जानती हो, बाबूजी में क्या जवाब दिया ? कहने लगे कि 'संसार में उससे बड़ा भाग्यहीन कोई नहीं, जिसे उसकी पत्नी त्याग दे । कही कोई कमी तुममें है या तुम्हारे माचरण में शक्ति नहीं है।' मृत्यु से पहले को रात, उन्होंने फिर तुम्हे याद किया था और मुझसे कहा कि 'पवरदार, जब तक मीता अपनी ओर से तलाक न मागे, उसे यह भूलकर भी न लिखना कि तुम उसे छोड़ देना चाहोंगे। हमेशा उसके लिए प्रतीक्षा में रहना । मैं अब विदा होने वाला हूं, मेरे भाग्य में उसका सुख नहीं था। मेरे क्रिया-क्रम, तेरहवी वगैरह से निवरते ही उसे ले आना- एक बार किसी भी तरह । फिर अपने आचरण से उसे वश में करना।' उनकी मान्यता यही थी कि पली का संबंध सारे संबंधों से बड़ा है, क्योंकि एक यही नाता जन्म-जन्मान्तरों तक का शास्त्रों में माना गया है। बाबुजी कहा करते थे कि पत्नी को त्यागने में मां को त्याग देने से बड़ा पातक है । और भी कितनी बड़ी बात वो कहते थे, सुनना चाहोगी ?" मीता का चेहरा उस अंधेरे में उसे बिल्कुल अपने पाश्वं तक आ गया लगा और वह अपने हाथों पर उठता हुआ-सा बोला, "बाबूजी कहा करते थे कि पली यदि वेश्यावृति करने लगे, तब भी वह त्याज्य नहीं है । उसके सवित्तरी/२३ . सारे पाप और पुण्य पति से ही जुड़े हैं।" मीता को लगा कि यह जनार्दन नहीं बोल रहा, उसके पिताजी बोल रहे हैं । उसे याद नाया कि झूठी ही सही, वदनामी की अफवाहों के बीच जब वह घिरी हुई थी, जनार्दन के पिता ही थे, जिन्होंने जनार्दन के लिए 'हां' भरी थी। जव जनार्दन ने कहा कि "अपने धार्मिक संस्कारों में कट्टर-पंथी होते हुए भी हमारे बाबूजी हृदय से अत्यन्त उदार थे और कहा करते थे, 'धर्म को वहीं तक धर्म समझो, जहां तक वह सहने की शक्ति देता हो। इस जीवन के हर दुःख-सुख-हर्ष-विपाद को शुद्ध चित्त से सहो।' और मैंने अपने अनुभव से भी यही जाना है कि जो कुछ जीवन में घटित होता जाए, उसे शांत हृदय से भेल जाने में ही मुक्ति है ।".."तो वह फफक-फफककर रो पड़ी। जर्नादन ने, उठकर सान्त्वना देने की जगह, अपना सिर फिर ज्यों का त्यों हथेलियों पर कर लिया, "जाति-बिरादरी के लोगों ने कितनी अफवाहें उड़ाई थीं कि तगड़े दहेज के लालच में पीताम्बर आ गए हैं, लेकिन यह तो तुम जानती ही हो कि बाबूजी ने क्या मांगा था? तुम्हें रास्ते में भी कहीं मैंने बताया था, शायद, कि वावूजी ने ही मेरे कानों में यह मंत्र फूंका था कि पैसे वाली ससुराल से आंत जोड़े रखना गीदड़ की योनि में जाने के वरावर है। ब्राह्मण के बेटे को अपने द्विजत्व में ही रहना चाहिए-अपने पुरपार्थ, अपनी वृत्ति से उपाजित करके ही अपना भरण-पोपण करना चाहिए । वास्तविक परान्न-भोगी ससुर-गृह की रोटी खाने वाला ही होता है, ऐसा वह मानते थे और उन्हें यह डर था कि कहीं मैं तुम्हारे पिताजी की मैनेजरी वाले कालेज में ही नौकरी न करने लगूं । चूंकि तुम्हारे पिता- नी को भी कहीं न कहीं गलतफहमी थी कि बाबूजी दहेज के लालच में होंगे, इसीसे उनका व्यवहार दाता का-सा रहा । विवाह की रस्म अदायगी इसी बात ने बाबूजी को तुम्हारे पिता ने विमुख कर दिया। तुम्हारे ताजी ने कहा पा उनसे कि "भट्टजी. अपने बेटे के लिए किसी तरह की बता न कीजिएगा।'' और बाबूजी ने कह दिया था कि 'जितके भरण- पण और आजीविका की चिता उसके ससुर को करनी पड़े, वैसे बेटे का २४ / सवित्तरी पिता होने से नि.सन्तान मर जाना अन्धा है।"वस, इनी बात पर बाद में तुम्हारे पिताजी ने जिद बांध ली कि जब तक याबूजी जीवित रहेंगे, मीता को भेजा नहीं जाएगा । मैं फिर भी क्रोधी स्वभाव का हूं और मैंने कहा भी या बाबूजी से कि 'मीता अगर आपके जीते-जी इस घर में नहीं आई, तो वाट में भी नहीं आ सकेगी।' इसपर बाबूजी बोले थे कि 'येवक, जब तक मोता उस घर में है, मेरा आधा बेटा वहीं पडा है । ऐसी तृच्छ बात कभी मुंह से न निकालना।' सुनील को एक नजर देखने को कितनी इन्दा यी उनको "यह क्लेश मेरे मन से, शायद, कभी नहीं जा सकेगा कि वाबूजी की मृत्यु से पहले तुम यहां नहीं आई।" "मैं बहुत दोषी हूं, सुनील के बाबू ! इस बार की याया मे और आज रात जितनी बातें मैंने तुमसे सुनी हैं, और जो न्दरूप तुम्हारा देशा है- विश्वास करो ना मब पहले हो चुका होता, तो में बापूजी की इम जिद के बावजूद कती कि 'अगर मीता इलाहाबाद चली गई, तो मैं ममक लूगा, मेरे लिए मर चुकी वेटी। मुझे लग रहा है, जैसे बाबूजी मुझे इन कमरे में बैठी हुई देख रहे हैं।" पोड़ी देर दोनों चुप रहे। थोड़े-से अन्तराल के बाद मीता दोली, "अब सोचती है, तो दहमत होती है कि मैं कितने बड़े अंधकार में थी। नुम्हें याद है कि जब नुमने मुझे पत्थर की अहिल्या कहा था? मैं सहम उठी थी कि मापद, तुम नी यही मानकर चल रहे हो कि जैसे अहिल्या को इन्द्र ने अप रिया था, मैं भी भ्रष्ट रही हूं। पति के द्वारा शक की निगाह में देवा जाना विदना तकलीफदेह होता है, इसे कोई औरत ही ममम मक्ती है । मैं ममन्नी र कि अगर कोई औरत भ्रष्ट भी हो, तो भी वह अपने पति के द्वारा प्रष्ट औरत के रूप में देने जाने को तकलीफ को दर्शन नहीं कर पाएगी।" अपर वह बर्दाश्त करेगी, तो नफरत करती दुई करंगी-मान-यापने भो।" "मत्र इस दवत तुम बुरा न मानना, मोटा ! मैं तुममे फिर वदार कि तुम्हारे सारे गुण-दोष मेरे हैं। उन दिनों सुचमुच तुम्हारा खनाद इतना विचित्र और क्षुध करने वाला था कि अक्सर मैं विचलित हो उठता था। जव भी मैं सम्पूर्ण रूप से तुम्हारे नजदीक होने की कोशिश करता, यही लगता कि तुम बहुत फासले पर हो । मेरे प्रति तुम्हारा वह अलगाव बहुत कष्टदायी होता था।" "पहले, शायद, वता नहीं पाती । अब मैं तुमसे कह सकती हूं कि वह मेरी जिन्दगी का वास्तव में सवसे नाजुक दौर था। मुझे यह स्वीकार कर लेना चाहिए, तुम्हारे सामने, कि संयोग से ही सही, मैं रावत के प्रेम में पड़ गई थी और अन्तर्जातीय शादी करने को भी तैयार थी। लेकिन जिस तरह से वह एक किनारे हट गया, उसके जो भी कारण रहे हों, मुझे एक धक्का-सा लगा। मैंने अपने-आपको अपमानित अनुभव किया। छोटी जगहों का सबसे बड़ा दुख यही होता है कि लोग दूसरों की जिन्दगी में बहुत दिल- चस्पी लेते हैं । कुछ ने तो यहां तक अफवाहें उड़ा दी थीं कि मैं बिना शादी किए ही मां बनने वाली हूं। सच पूछो, तो मेरे मन पर. मेरे दिमाग पर- मेरे रोम-रोम पर इस बात का दबाव था कि ये अफवाहे तुम तक भी जरूर पहुंची होंगी और हो सकता है, तुम तक शादी के बाद पहुंची हों। इसी वीच हमारे बाबूजी के इस खत्त ने भी मन में कड़वाहट भर दी कि तुम अपने जिद्दीपने की वजह से ही दरिद्रता की जिन्दगी को पकड़े हुए हो।" मैं अब जान गई हूं कि वह सब मेरे ही मन का वहम था कि तुम भीतर ही भीतर मेरे प्रति शक्की हो । बाद में, जिस तरह तुमने चुप्पी साध ली एक लम्बे अरसे तक, उसने और चिढ़ा दिया मुझे।" "अफवाहें मुझ तक सचमुच शादी के बाद ही पहुंची थीं। और यही बुरा हुआ। हम जो लोग संस्कारों की एक सीमित दुनिया में जीते हैं, एक खास किस्म का अहंकार हमारे भीतर हमेशा भरा रहता है। जो खुद वेश्या- गामी हो, वह भी अपनी पत्नी को सावित्री की ही शक्ल में देखना चाहता है । मैंने सिर्फ पिताजी के कह देने-भर से ही रिश्ता स्वीकार कर लिया था। उन्होंने ही तुम्हें देखा था और पसन्द किया था। मैं कह नहीं सकता कि अगर अफवाहें शादी से पहले ही मुझ तक पहुंची होती, तो मेरा रुख क्या होता, हालांकि अपने बाबूजी की बात टालना मेरे लिए सम्भव नहीं होता। मां का देहान्त जब हुआ था, मैं मुश्किल से आठ नौ साल का रहा २६ / सवित्तरी होगा। बाबूजी ने जैसे मुझे पाला, उसे मैं शब्दों में बता नहीं सकता। एक तो लगातार पांच बच्चों के जन्म और मरण के दुषों से जर्जर उनका मन और फिर रोगी शरीर । इसके ऊपर, सिर्फ वृत्ति के सहारे चलने वाली जीविका । बाबूजी कहते रहते थे कि 'अगर तुमने ससुराल से कभी रुपये-पैसे की मदद ती, या ससुर का सहारा लिया तो वो लोग यही समझेगे कि हम लोगों ने लालन में ही रिश्ता मंजूर किया था।"मनुष्य का जीवन सचमुच बहुत विलक्षण होता है, मीता! छोटे-छोटे लोगों को भी अपनी जिन्दगी बहुत बड़ी-बड़ी समस्याओं से घिरी हुई लगती है। अपना छोटा-सा दपं चक्रवर्ती सम्राटों का-सा मालूम पड़ता है ।"लेकिन इतना मैं कह सकता हूं कि तुम्हारे लिए मेरे मन में खीझ हो सकती है, नफरत जैसी चीज तव भी नहीं थी।" मीता जिस अनुराग के साथ पांव दवा रही थी, उसका शरीर सारे कमरे में भर गया-सा लग रहा था, जैसे जिधर भी हाथ बढ़ाए उसीसे टकरा जाएगा। उसने अपने हाथो को खोलकर धीमे से मीता को अपनी दाई बांह पर लिटा तिया, तो वह बच्चों की तरह गले से लग गई। पर्वत से फूटकर जैसे कोई नदी पहली-पहली बार बहे, मीता की भावा- कुलता कुछ उतनी ही आवेगपूर्ण थी। उसे लगा कि यात्रा-भर में भी जो यह औरत इतनी सरत-सी दिखती चली आ रही थी, वह शायद पानी के जमकर ठोस वर्फ बन जाने की-सी मनःस्थिति थी। उसने, जैसे ही मीता के सुबकने का आवेग कुछ धीमा पड़ा, उसे पूरी तरह से अपनी बाहों में आवद कर लिया।
४ "तुग सोचते होगे, वहां तुमसे मैं बोलती भी नहीं थी। कितना कठिन होता है अपने ऊपर वीतते हुए को दूसरों से कहलवाना, यह जितना मैंने पिछले कुछ दिनों में जाना, सुनील के बाबू, पहले कभी नहीं जाना था। मेरे मन के भीतर बादल से भरे हुए थे और वह आकाश की तरह घुमड़ता था तुम्हारे लिए कि इतने दिनों के बाद तुम आए हो और इसी वार मेरी जिंदगी की अन्तिम फैसला हो जाना है कि कैसे बीतना होगा इसे । मैं तुमसे कहना पाहती थी कि अगर तुमने अपने साथ ले जाकर मुझे यही महसूस कराना है कि मैं नष्ट थी. मुझमें किसी घर वाली और बहू या एक की मां हो चुकने का भी कोई विवेक ही नहीं है तो मुझे नहीं आना है । अव सोचती हूं कि तुम्हारे साथ-साथ रह गई होती, तो मेरे सारे भ्रम दूर हो चुके होते, लेकिन तुमसे दूर रहने में हर वहम जड़ें डालता चला गया। तुम्हारे मन में भी गांठे जरूर है कि शादी से पहले मैं किसी और से प्रेग गारती रही थी- ऐसा मैं सोचती थी और सोचती थी कि तुम्हारे भीतर की यह गांठ हमेशा जुमे कोंचती रहेगी । मैं तुम्हारे साथ सो रही होऊंगी और तुम्हारे चेहरे पर, म्हारी गांवों में, तुम्हारे सारे जिरग में यही वहम रेंगता होगा कि शायद, द औरत अपने प्रेमी के साथ भी। तुम्हारे साथ जो मैं ज्यादा अरसे तक ही रह सकी, इसका सबसे बड़ा कारण यही था। मायके की बारामतलब जन्दगी ने गुभो नीर शह दी। लेकिन तुम विश्वास करो, यह सुनील एका- कदिन बढ़ता जाता था और उरने लगी थी कि एक दिन यह 'गेरे बाबू कोन है, कहां है?' पूछने वाला हो बारमा । मातार हो जोरतो रहती यो कि मेरी तक्लीफ को कोई नही निगा।दुन ननम्ने हो नि तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहती और बाबुली चामते रहें कि रने, साने. पोने-पहनने की सारी सुविधाएं इसे दी शादी है और क्या कहे।बन्ने की ढंग से परवरिश और पढ़ाई का बंदोबस्त भी हो ही जागा-हमारे लिए क्या ठीक होगा, इसे तय करने की सारी जिम्मेदारी कर नरेनोर ना. लते है, तव जिन्दगी बहुत मुश्किल हो जाती है।" "दरअसल सारी दिक्कतें तब पैदा होती है, नोटा, जब पति या पत्नी के पास कुछ ऐसा हो, जिसे एक-दूसरे से छिनाकर रखने की अट हो।" "तुम ठीक कहते हो, सुनील के वात्रु !" "मैं तुमसे सिर्फ इतना कह सकता हूं, नीता, कि मापद, नवहन- शील न हो पाता। यह मेरे बाबूजी को दीक्षा है, जो हमाचही वहाद थे कि दूसरे को हमेशा उसकी परिस्थितियों में रखकर ही देखा करो। किसीको अपने से हीन समभकर मन चलो, नहीं दो ने भी इन पदोग होंगे, जिनकी तुलना में तुम अपने को हीन मन्ते । नुन दिग्दान करो कि यदि शादी के बाद के दिनों में निद हुए थोड़े एकन्द दिन में तुमने रावत का जिक्र मुझसे म्बुद ही कर दिया होता, दो घोडामा बन्दा पन तुमने मुझमें देखा होगा, वह भी न देवती। मैंने कार मान लिया होता कि तुम्हें मुझसे अलगाव नहीं, निर्फ कपनी द नमक की परिमिति या मनःस्थितियों के कारण तुम परेशान हो और त्रिदीन्देमंदे माय 'एडजस्ट' नहीं कर पा रही हो-मरा म बोर भी आलीय होटा । इटा में जरूर जानता था कि पैसे वाले पिता के यहां ने दनदिन माटों में कि हुए हमारे घर में आने पर कुछ ऐना ही मोचनी होगी दिगदट मंत्र लिसिले में अफवाहें फैल जाने से जल्दबाजी में-दिना पात्रदा दाय को सहूलियतों को देखे ही-तुम्हारी यादी में माप की है और सीलिए तुम्हारे मन में सिन्नता और कुट्टन है I foमादीटि में दद कर तुमसे फिसड्डी ही या । तुम एम० ए० कर पृटी थी, में प्राइवेट देने वा यारी कर रहा था। कोई भी मादमी उब किमी स्त्री वांगर र ना चाहता है, तो उसकी आत्मा के माय पाना चाहता है-मैंने पानी और एक रस्म को स्त्री के रूप में जो पहली-पहली वार जाना, उसमें तुम्हारा रख इतनी उदा- सीनता का था कि लगता था, जैसे तुम मजबूरी में भेल रही हो। मुझे सही रूप में पत्नी और स्त्री तो, शादी से चार वर्षों के बीत चुकने पर, तुम सिर्फ अव लग रही हो, मीता ! और हालांकि मैं एक बच्चे का वाप वन चुका हूं, लेकिन ऐसा लग रहा है कि यह पहली सुहागरात है..." "अरे, भई, तुम तो हद दर्जे के वेहया आदमी हो । माथे पर का त्रिपुण्ड और धोती-कुरता पहने तो तुम साक्षात् सनत्कुमार जैसे ब्रह्मचारी ब्राह्मण दिखाई देने की कोशिश करते हो, लेकिन तुम्हारा सिर्फ बाहरी भेप ही ब्राह्मण का हे "मुनो, जरा तुम अपना घुटना ठीक कर लो।"और सुनील को एक बार और देख लिया जाए क्या ? बच्चों को बुखार कपटमृग की तरह छलता रहता है।..." "हम दोनों जगे हुए हैं। उसे बुखार आया, तो बेचैन होकर करवटें बदलेगा। वैसे मैं सोचता हूं, लम्बे सफर की वजह से 'टेम्प्रेचर' हो आया होगा । खांसी-वांसी तो कुछ है नहीं, जिससे ठण्ड लग जाने या निमोनिया का डर हो । हां, तुम मेरे त्रिपुण्डी ब्राह्मण होने की बात कह रही थीं ना? तुमने तो धर्मशास्त्र और पुराण वगैरह पढ़ रखे है-इसे 'ब्रह्मानन्द सहोदर' का दर्जा देने की कल्पना ब्राह्मणों ने ही की थी ना? अच्छा, एक चीज बताओ। रावत ने तुम्हें कोई दीक्षा नहीं दी थी ?" "धत् ! अरे, तुम मर्द लोग लाख अपने उदार और विश्वासी होने का दावा करोगे, लेकिन औरत की तरफ से इतने शक्की होते हो कि शक तुम लोगों के मन में ठीक वैसे ही भरा रहता है, जैसे सांप के माथे में जहर । समय कितना बड़ा फर्क डाल देता है। इस यात्रा में किस तरह की बातें हमने मुझसे की थीं, लगता था, जैसे मेरी मां बोल रही है और जैसे अपनी मां । कह लेती थी, वैसे ही अव अपने सारे सुख-दुःख, सारे पाप-पुण्य तुमसे भी ह सकती हूं। जब शादी के बाद पहली बार मायके लौटी थी, तो न जाने या मेरे चेहरे पर और मेरी आंखों में रहा होगा कि मां ने मुझे रात को पने साथ सुलाया था और मेरे माथे पर हाथ फेरती हुई बोली थी कि ह सब ठीक नहीं है । औरत को अपना पूरा साथ पति को देना होता है, भी उनमें सही गांठ जुड़ती है ।' हालांकि उन पन्द्रह-बीस दिनों के तुम्हारे -- ३० /सवित्तरी
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. जरूर थी कि रावत अगर कोर्ट मैरिज' के लिए भी कहेगा, तो करूंगी। जव पता चला कि वह दूसरी लड़की से शादी करना चाहता है और मुझसे मिलने में भी कतराता है, तो मुझे लगा कि मेरी कल्पना की दुनिया नट हो चुकी है और अपने इस तरह से नष्ट हो जाने में मैं सिर्फ अकेली हूं- कोई मेरे साथ नहीं। जिस तरह से रावत ने एकाएक रुख बदला, उससे मैंने सुद को बेहद अपमानित और 'डिस्टर्ड' महसूस किया था।"और अपनी ही कुढ़न, अपना ही 'डिफीटेड ईगो' था जो मेरे अस्तित्व में खून की तरह दौड़ता था । कहां मैं समझती थी कि इसे रावत अपना सौभाग्य सम- कता होगा कि मैं उससे प्रेम करती हूं और कहां उसने एकाएक ऐसे कन्नी काट ली, जैसे मुझमें कोई बहुत बड़ी कमी दिखाई दे गई हो । मैं उन दिनों बहुत बड़ी मानसिक टूटन में थी। आत्महत्या कर लेने की बात भी सोचती थी । सोचती थी कि अपने प्रेम में जलील होने की यह तकलीफ है, उसे किसी भी दूसरे को समझाया नहीं जा सकता।"लेकिन हम औरतों के स्वभाव में एक चीज तो होती ही है। भावनाओं की सारी उथल-पुथल के वीच भी व्यावहारिक जिंदगी पर भी आंख लगी रहती है। मैं भी जानती थी कि आत्महत्या न कर पाने पर अगर जिंदगी-भर कुंभारी ही बैठी रह गई या कि फजीहतों से भरी जिंदगी को ले बैठी, तो यह और बड़ा मरण होगा । इसीलिए शादी की बातें जव चलाई गई, तो मैं सचमुच पत्थर की मूरत-तुम्हारे कहने को अहिल्या ना?----बस, मूरत ही वनकर बैठ गई। सोचती थी, शादी के बाद, शायद, कोई रास्ता निकल आए, लेकिन शादी इतनी जल्दी में हो गई कि मुझे वक्त नहीं मिला। आज भी सोचती हूं कि मु. रावत के सदमे से बाहर निकल आने का अवसर मिला होता, तब शादी होती, तो मेरा व्यवहार तुम्हारे साथ वैसा बेरुखा हर्गिज नहीं हुआ होता।" "मेरे साथ ? तब रया जरूरी था कि मेरे हो साथ शादी होती ?" "पहले, शायद, नहीं ही कह पाती, सुनील के बाबू सकती कि मेरी शादी सिर्फ तुम्हारे साथ ही होनी थी। ऐसे क्षण कितने विचित्र होते हैं, जबकि हमें लगता है कि वरा, सिर्फ यही वक्त था कि हम यह बात कहते । सुनो, तुम जरा ढंग से पांव समेटा करो। घुटना मार देते हो बच्चों - ! आज कह - ३२ / सवित्तरी की तरह।""मैं तुम्हें बता रही थी कि मां जद में दनापाया, तब भी मुझे लगा था कि किसीने मेरी तकनीक को मानना है और दिल्लुत से वह पर, ठीक बात पूछी है । जब मैंने मां से बी खोतकर कह दिया कि रावत ने कोई प्रेमबेम न रह जाने पर भी मैं नई स्दिनी दाने को जोड़ नहीं पा रही, तो उसने पंडितों की तरह रहा था कि 'वटी, पुखों को बग्ने पितरों के बाद पर, लेकिन स्त्री को अपनी निदी-मरहित्याने जिन्हो, दीरस्थान दीपो' करते रहना पड़ता है । जो देरे लिए मिड के स्थान पर था, वह छूटा, यव तुझे दौरक के साथ होना है।' मा यह भी कहा करती थी..." "तुम्हारी मां का स्वभाव हमारे बाबूजी के स्वनाव से मिलता है देसी ही शांतचित्तता, वैसा ही अनुराग-मैं तो उन्हें सास समनकर चलना ही भूल जाता हूं। लगता है, मां हैं । सुनो, मीता, कहीं ऐसा तो सम्भव नहीं कि हमारे बाबूजी तुम्हारी मां से प्रेम करते रहे हों ? वैसे ही, जैसे तुम्हारे पिताजी रावत की मां सेलेट एज में ?" "हट, बदमाश कहीं के ! अच्छा, सुनो । वक्त क्या हो गया होगा? आज रात-भर जागते रहोगे क्या ? तुम तो समाधि में जैसे बैठ जाते हो। सुनील जाग गया, तो फिर मैं उसीके साथ जाकर सो जाऊंगी।" "धौंस दिखा रही हो "सुनो, एक चीज है । हमें सुनील को कुछ बड़ा हो जाने देना चाहिए।" "यह तुम नहीं बोल रही हो-सरकार का 'फेमली प्लानिग विभाग' बोल रहा है।" "जिस समय तुम अपने बाबूजी के बारे में बोल रहे थे, लता था, कोई ऋषिपुत्र धरती पर आकर विलाप कर रहा है। मैं तो नही पी, चलो छुट्टी हुई, लेकिन तुम तो पार्थिव-पूजा से ठते ही मार नपाने बाने ब्राह्मण हो !" "मीता, तुम्हारा यह हंसना-फिर इन स्टार.. कह दो कि यह प्रभु-कृपा के तुल्य है। हमारे पाया टेक ढेर सारे भोजन से नहीं, प्रनुमा दा इन्टना रहा है कि एक हजार स्त्रियों में सेट नह ई मही हंसी को सुनने में है। हमारे बाबूजी "वेचारे बाबूजी का नाम तुम ऐसे वक्त में ले रहे हो कि मैं तो म शरम के दवी बा रही हूं।" "मैं सोचता भी नहीं था पहले, कि तुम इतने मजाकिया स्वभाव व हो। जव देखता था, अपनी गंधर्वजात की औरतों की जैसी देह में से तु सिर्फ बेरूखापन बिखेरती हुई-सी दिखाई देती थीं। रास्ते भर भी जैसी गुम सुम तुम चलती चली आई, में लगातार इसी डर में रहा कि तुम यह मान कर चल रही हो कि तुम्हें जवरदस्ती ले जाया जा रहा है।" "वह तुम नहीं समझ सकोगे । रस्सी को सांप समझकर उससे दूर भागने के बाद, उसे रस्सी के रूप में जानने का मोह-भंग कैसा होता है ? मेरा मोह-मंग इससे बड़ा है। हां, वह बात छुट गई थी। जिस तरह से तुमने अब पूछा था कि रावत ने मुझे कोई दीक्षा दी या नहीं, यही बात कहीं अगर तुमने शादी के बाद उन दिनों में कहीं पूछ ली होती, तो अनर्थ हो गया होता। मैं पहले ही इस बात से पीड़ित थी कि मेरी सच्चाई, मेरी तकलीफ और मेरे चोट खाए अहंकार को कोई नहीं समझेगा। तुम भी अफवाहों में से ही गुम-सुम अपने मन में कुछ लिए बैठे होगे । ऐसे में अगर कहीं तुमने उस रात मुझसे ऐसा पूछ लिया होता, जब तुम पत्थर की अहिल्या कहते हुए ऐसे उठ गए थे, जैसे किसी ताड़का ने यज्ञ में बाधा डाल दी हो-~-मैं आज भी डरती हूं कि शायद, मैं तडाक से यह कह देती कि 'हां, मेरा रावत के साथ सब कुछ रह चुका है और मैं उसके बच्चे की मां भी बनने वाली थी।''"सुनील के वाबू, कभी-कभी हमारे भीतर का हाहाकार इतना बड़ा हो जाता है कि आत्महत्या भी छोटी चीज लगने लगती है।" "लो, एकाएक किन्नरियों की तरह हंसते-हंसते तुम सचमुच की अहिल्या. की तरह रोने लगीं ? मैं तुमसे सिर्फ एक बात कहना चाहता हूं कि अव.. कभी तिल-भर भी तुम्हारे प्रति वहम नहीं रखूगा। पत्नी के प्रति वहम : रखना-और वहमी सिर्फ एकतरफा. -यह अपनी जिंदगी को खुद ही नरक बना लेने के अलावा कुछ नहीं । मैंने पहले भी सोचा था, तो इसी नतीजे पर पहुंचा था कि उस उम्र में प्रेम का होना स्वाभाविक है और स्वाभाविक है: कि वह उसीसे होगा, जो आईने की तरह अपने सामने हो।" ३४ / सवित्तरी "तुम इस वक्त सचमुच वैसे ही 'बोर' कर रहे हो, जैसे कोई औरत आईने के सामने शृंगार करने बैठ जाए और सुबह को चाहे शाम हो जाए लेकिन उठने का नाम न ले।" "लो, तुम किसी तरह हंसी तो । अच्छा, सुनो, वह शिवचरन रिमोचाले की बेटी आई थी ना, क्या नाम था उसका? सवित्तरी-तुमने उसे आने को कहा है क्या? चौका-बरतन का अभ्यास तो तुम्हें होगा नहीं। ठीक-ठाक पैसे अगर ले ले..." "इस वक्त, अचानक उसकी याद बहुत आ गई तुम्हें ? उसके बाप से भी ऐसे बतिया रहे थे, जैसे असली ससुर वही हो। हमारे बाबूजी से तुम कन्नी काट-काटकर निकल जाया करते थे।" "तुम तो मजाक में कह रही हो, मीता ! तुम्हारे बाबूजी से सचमुच बातें करने को मन नहीं होता था। कब, किस बात पर वो विच्छ की तरह डंक मार बैठेंगे, कुछ पता नहीं। हम लोगों के वहां से विदा होने के पहले दिन ही कसा रुख था उनका ? उनके सस्त चेहरे को देखकर ऐसा लगता था, जैसे तुम्हें मैं घर नहीं, बनायालय की दिशा में ले जा रहा हूं। यह सच है, मीता! सुविधाएं यहां नहीं हैं । हो सकता है, कुछ दिनों तक बहुत परे- शानी हो पर चलाते हुए, लेकिन अगर तुम सहारा दोगी, तो दिन कट जाएंगे। फिलहाल में तीन-सवा तीन सौ के आस-पास ही कमा पाता हूं, लेकिन मुझे उम्मीद है कि 'थीसिस' पूरी हो जाने पर मैं अपना पूरा वक्त लगा सकूगा । आज जिन अग्रवाल साहब के महां गया था, उनका काफी वड़ा पब्लिकेशन और प्रेस का काम है। डी० फिल० मिल जाने पर मैं उम्मीद कर रहा हूं कि किसी डिग्री या कम से कम इण्टर कालेज में जगह मिल जाएगी। हां, याद आया, अग्रवाल साहब की एक खांडसारी को मिल फूलपुर में है। वहां उनको व्यवस्था में एक हाईस्कूल भी चलता है ।... लेकिन फिलहाल मुझे अपनी पोसिस का काम पूरा कर लेना चाहिए।" "तुमको तो औरतों के साथ वकवास करने की कलापर पी-एच० डी० मिलनी चाहिए थी। मैं तो सोचतो हूं, दिशा खुलने का वक्त होने को होगा। ये सारी वकालत को बातें मुबह होने पर भी कर सकते हो । आई हूं, तो यह विश्वास लेकर ही बाई हूं कि पर संभालना है। अभी महरिन मनितरी.
- रन लगाने की कोई जरूरत नहीं है । कम से कम बीस-पचीस तो मांगेगी । त्योहारों पर कपड़ा-लत्ता अलग से मांगते हैं ये योग। तुम रास्ते में ला रहे थे कि जो वकील साहव हैं "निगम साहब की बात कर रही हो?" "हां, वही, जिनके स्कूल में तुम इन दिनों पढ़ाते हो-तुम बता रहे थे, कोई कन्या पाठशाला वो चलाते हैं ? वहां मुझे काम नहीं दिला सकते हो?" "काम के लिए तो, खैर, मुझे कोई सिफारिश नहीं करनी पड़ेगी। निगम साहव सुद ही बहुत प्रेमी व्यक्ति हैं। फिर तुम जैसी खूबसूरत तो उनके यहां कोई भी टीचर नहीं, यह मैं दावे के साथ कह सकता हूं।" लेकिन तुम अभी अपने लिए किसी काम की बात सोचो ही मत, मीता ! एक तो इससे मुझे मानसिक क्लेश होगा । दूसरे, सुनील हमारा अभी इतना छोटा है कि तुम्हारा पूरा वक्त इसीके लिए जरूरी है..." "बातें तुम बहुत बड़ी बना ले जाते हो। यों तो दिखाने को कहोगे कि सुनील के लिए ही तुम्हारा पूरा वक्त चाहिए और सारी रात अकेले चाट गए हो। एक बार को उसे दूध पिलाने का भी मौका नहीं मिला- बातें ही बातें करते चले जाओगे।" "अरे, भई, तुम सुनील को और मुझको अलग-अलग मानकर क्यों चलती हो? आखिर में भी तो बिना मां-बाप का वच्चा ही हूं।" "अव बस करो। वातें बनाने में तो तुम हमारे यहां की चम्पा नाउन को भी मात कर देते हो । सुनो, तुम कल कहीं से एक छोटी-सी भगवती मां की प्रतिमा जरूर ले आना..." "अभी कुछ ही देर पहले तो तुम कह रही थीं कि आदमी को वक्त- बेवक्त का ध्यान रखकर ही किसीका नाम लेना चाहिए।" "मिट्टी पड़े मेरी जवान पर, याद ही नहीं रहता। तुम्हारे साथ सोई और मन करता है कि इस बात को ही भूल जाऊं कि इस वक्त दुनिया कुछ और भी है, लेकिन रह-रहकर, याद आ जाता है कि अव वावूजी यह कहने का मीका नहीं देना चाहिए कि मैं तो पहले ही कहता था। तो वो कभी तीर्य-यात्रा के लिए नहीं निकले, लेकिन मेरा मन कहता है इस साल मात्र मेला देखने और संगम नहाने के बहाने वो मां को लेकर - ३६ / सवित्तरी धमकेंगे। हमारे यहां जगह कम देखेंगे, तो यों कहते हुए अपने किसी जान- पहचान वाले के यहां जाने की बात करने लगेंगे कि 'मीताचंटा, बेटी के घर तो यों भी ठहरना ठीक नहीं कहा गया है शास्त्रों में..." रावत की मां से जब से दोस्ती बढ़ी है उनकी, तब से घरवालों के प्रति कुछ मैले हो गए है।" "शेक्सपियर ने कहा है कि बुढ़ापे का प्रेम और ज्यादा प्रबल होता "अय बात शेक्सपियर कहते हो, या खुद तुम~है तो टीक । मैंने कई बार देखा है कि जब रावत की मां घर में आई हुई रहती थीं, तो अक्सर पर के भीतर चले जाते थे और चाय-नाश्ते में कुछ अच्छी चीजें बनें, इसकी चिन्ता करते थे।" "अब बताओ, ऐसे प्रेमी पिता की पुत्री होकर, तुम न प्रेम करती, तो और कौन करता? अब वहम न करने लगना । मुझे गहरी नीद मालूम पड़ "अच्छा, आखिर तुम वहानैवाजी पर उतर आए ना ? मैं थोड़ी देर को सुनील के साथ सो जाती हूं..." "उसके बाद क्या फिर मेरे साथ सोमोगी ?" "हां, जरूर। ऐसा करना, जैसे ही सुबह मुले-अपना बिस्तर बरा. मदे में लगा लेना और मेरा इन्तजार करना। तुम तो हद हो । दुनियाभर की बातों को बोरों में भरकर बैठे लगते हो । ये लो, सुनील भी जग गया।" "बड़ा अक्लमन्द बेटा है तुम्हारा । वक्त-वक्त की सही पहचान इसे ही "अब चिल्ला मत, घोकरे ! सारी रात तेरे बाप की बातों ने चाट ली, बाकी बची हुई वैटा 'माउथ-ऑरगन' बजाते हुए विता देगा । तुम लोग तो घोड़े बेच चुकने वालों की तरह खरटिं भरने लग जाते ही । अरे. दूध पीकर तो मेरा राजा बेटा भी फिर सो जाएगा। मां की चिन्ता आपिर बेटा ही तो करेगा..."
닐 ठीक सामने मकान के बीच-बीच में नीम और पीपल के दरस्त हैं । सदियों की धूप, सुबह-सुवह, उनपर चिड़ियों के झुण्डों की तरह बैठती हुई-सी आती है को मोहल्ले के छोटे-छोटे मन्दिरों से आती हुई शंख तथा घण्टों की ध्वनियों से भी पहले, सन्त एन्थोनी कान्वेंट की मन अनुराग में आवद्ध कर लेने वाली लयबद्ध घण्टे की आवाज से ही वह जाग उठी थी, लेकिन जनार्दन गाढ़ी निद्रा में था। सुनील भी। उसने दोनों को वारी-बारी से देखा और धीमी मुस्कराहट से भर गई। वह गीले बालों को सुखा लेने की कोशिश में बरामदे के ठीक किनारे खड़ी थी कि ठीक इसी वक्त उसे कोई लड़की अपनी ओर आती दिखाई दे गई । वह अभी काफी दूर थी। उसके साथ एक कम उम्र लड़की और थी। सहसा यह मान लेने का कोई कारण नहीं हो सकता था कि वह मान ले, दोनों इसी तरफ आ रही हैं। सिर्फ आंखों के आपस में मिलते ही कौंधने वाली चमक थी, जिससे मीता ने अनुभव किया था कि वह सवित्तरी ही होगी । और उसके पास आएगी। गलियों में से दूध दुह लिए जाने के बाद चरने को ले जाई जाती हुई गा गुजर रही थीं। आस-पास के घरों में से अपने-अपने घर के कामों में व्य दिखती हुई औरतों को देखना, उसे लग रहा था, वह इस मोहल्ले से अप - 1 "तुम हमारे यहां काम करने के लिए दोपहर को ग्यारह बजे के बाद कभी भी और रात को,आठ-नौ बजे तक या.जामा करना। और हां, सुनो! जिन दिनों तुम माहवारी पर रहा करो-काम पर आने की जरूरत नहीं है। पांच दिनों तक । मैं जरा परहेज करती हूं।" मीता ने सारी बात धीमे से मुस्कराते हुए और स्नेह के साथ ही कही पी, तो भी एक क्षण को सवित्तरी का चेहरा थोड़ा परिवर्तित हो आया। मीता के कहने तक में वह उठ खड़ी हुई थी। बोली, "ठीक है, बहूजी ! मगर आपके चौका-बरतन का हर्जा नहीं होगा, यह गर्नशी आकर कर जाया करेगी। इसके काम में अभी सफाई उतनी नहीं है।" "अरे, सवितरी! ऐसी कौन-सी बात है ! कौन हमारा.बहुत बड़ा परि- वार है, जो दिक्कत होगी।" -- मीता कुछ देर सवित्तरी और उसकी छोटी बहन को जाते हुए देखती रही। किसी नये शहर में आ पहुंचने का एक जो अजनबीपन होता है, उसने अनुभव किया कि सवितरी ने उसे अपनी संक्षिप्त-सी उपस्थिति से ही तोड़ दिया है। सवित्तरी आंखों से ओझल हो गई, तो मीता अन्दर कमरे में गई और एक बार उसने सुनील को देखा, उसे कम्बल ठीक से ओढ़ाया, फिर जनार्दन के मुंह पर से चादर खींचती हुई बोली, "कुम्भकरन महाराज, उठोगे भी!" "आओ, मन्दोदरी, आओ।" कहते हुए जनार्दन ने एकाएक ही उसे अपने ऊपर पोच लिया और फिर बुद ही अफसोस में होता हुआ-सा बोला, "देखो, शास्त्रों में जो कहा गया है कि रूपवती स्त्री पुरुष को स्मृति और वाणी को अपनी हथेलियों को रेखाओं में समेट लेती है, ठीक ही कहा होगा- मुझे यह भी याद नहीं रहा कि मन्दोदरी तो कुम्भकर्ण की भाभी का नाम था । अच्छा, तुम बता सकती हो कि कुम्भकर्ण की परवाली का नाम पया था" मीता मारे हंसी के दोहरी हो गई। बोली, "तुम शास्त्री लोग धोती- कुरते में जरूर रहते हो, लेकिन बातें तोफरों से भी गई वीती करते हो । अब - सवित्तरी ४३ । भी या नहीं? एक बार की बनी चाय ठण्डी भी हो चुकी, तो और उसकी बहन को पिला दिया। अब तुम उठो और 'कुल्ला करो। देती हूं, चाय पीकर, नहा-धो लेना। यह सुन्नी साला भी नहीं कतना सोता है।" म्हारा सुलाया जल्दी उठ नहीं सकता। यकीन मानो, अगर तुम कुम्भ- गुलाती होती, तो वह महाराक्षस छ महीने की जगह छै सालों के ज करता। तो सवित्तरी को क्या कहा तुमने ? कितने रपये मांगती - - मेरी वजह 'तुमने उसे देखा नहीं, इसीलिए योंही तड़ाक से पूछ ले रहे हो। देख होता, तो कहते-चाहे मन ही मन में-कि मीता, यह सौ-सवा सो भी ो हो, तो कम है।" मीता के मुस्कराने में विनोद था, लेकिन फिर भी वह कुछ झेंप-सा गया, न तुरत ही बोला, "ऐसा तुम से कह रही हो या कि तुम्हें ने ऊपर ही विश्वास नहीं है ?" "अरे, भई ! तुम तो शास्त्री ठहरे । शास्त्रों में तो यह भी लिखा होगा चन्द्रफलाओं का निवास परकीया स्त्रियों में ही होता है !" "लेकिन सवित्तरी तो अभी कुंआरी ही होगी ना, मीता ? उसका प शिवचरन तो यही बताता रहा था । तब वह परकीया कैसे ?" "अव, छोड़ो यह किस्सा। चलो, उठो ! आज तुम्हारी भी छुट्टी है । चर को थोड़ा रांवार लेंगे। मैं तो इतना जानती हूं कि कुत्ता-घर का कपास जिसे कहते हैं, वैसी ही वह लगती है । उसका बोलना, बोलते में उसके चेहरे और आंखों में धूप की तरह उगती हुई चमक-वह तो सचमुच किसी बड़े घर की बेटी लगती है। बाप तो उसका ठिंगने-से कद का और यों ही है, वह अच्छे कद की और अच्छी-खासी सुन्दर है । उसकी छोटी बह्न में उसमें कोई मेल नहीं । छोटी अपने बाप पर गई लगती है। हो सकता है, सवित्तरी की मां लम्बी और खूबसूरत रही हो !" "गयों, हो तो यह भी सकता है कि सवित्तरी का बाप ही लम्बे कद का और खूबसूरत किस्म का आदमी रहा हो ! महाभारत में नियोग- - प्रधा..." ४४ सवित्तरी "अरे, बाबा ! तुमने 'महाभारत-रामायण' और शास्त्रशुराम क्या इसी तरह के उदाहरण देने के लिए पढ़े हैं ? बच्चे प्रसंगों में तुम्हें सिर्फ अपने वादूजी की ही याद लाती है।.." "शास्त्रों में, मीठा, पिता को ही पुराण-पुरुप कहा गया है। अच्छा, छोड़ो ये सब बातें। मेरा विस्तर ले जाकर बरामदे में लगा दो और अपना रात वाला वादा पूरा करो।" मीता ने एक झटके के साथ अपने को छुड़ा लिया और यह बहती हुई बाहर निकल गई, "भाड़ में जाओ तुम ।" उसका मन हो रहा पा, जोर से हंसे । एक सम्बे अन्तराल के बाद कितने दुर्लभ क्षण हैं ये ! मीता ने रसोईभर में बैठे-बैठे ही पुकार लिया, "सुनील के बाबू ! यह चले आओ । मैं चाय चढ़ा चुकी हूं।" वह आलस्य तोढ़ता हुआ-सा उठा। चारपाई पर सोए सुनील को धीमे से प्यार किया और 'ओम् नमो भगवते वासुदेवाय' बहता हुआ मीता की ओर चढ़ गया। सवित्तरी/ ४५ ह इतवार की दोपहर-भर में मीता ने घर को इस तरह संवार दिया कि चाहर से आने वाले को इस बात का आभास नहीं हो सकता था कि इस घर में गृहिणी को आए सिर्फ दो ही दिन हुए होंगे । शाम के वक्त दोनों पहले सिविल लाइंस की ओर घूमने निकल गए और फिर प्लाजा में लगी पुरानी फिल्म 'कागज के फूल' देखकर लगभग दस बजे घर वापस पहुंचे। सुनील रास्ते में ही सो गया था। उसे चारपाई पर सुलाकर मीता ने टोव जलाकर सब्जी गरम की, परांठे भी दिन में ही सेंक लिए थे। रसोई, . र में ही दोनों खाना खाने बैठे, तो मीता वोली, "देखो, कल तुम कहीं से रपाई एक और खरीद लाओ। जरा बड़ी खरीद लाना । तुमने तो वस, ह्मचारियों का सा डेरा बनाया हुआ है। सुनील के साथ सोती हूं, तो पलटने को जगह नहीं मिलती।" "मैं समझ गया । भव वाली चारपाई मुझे ऐसी लानी है, जिसमें तुम और हम सोएं, तब भी पलटने की जगह निकल आए।" "तुम तो अकाल के मारे हुए जानवरों जैसे हो गए हो, जो अपनी भूख में मिट्टी चाटने लगते हैं । फिल्म तक तुमने ठीक से देखने नहीं दी । मैं सुनील के बऔर तुम्हारे लिए थोड़ा-सा ऊन ले आना चाहती थी, सिविल लाइन में दुकानें बंद थीं । कल किसी वक्त..." "सुनील की तो कई बनियाने, तुमने आज घूप में सूखने डाली हुई थीं? तुम तो अभी कुछ दिन मुझको ही बेटा मानकर चलो और सिर्फ मेरी ही - चिता.करो। यह उल्लू का पट्टा तो डेढ़ साल तक दूध पी-पीकर मुटा गया "शि-छि ! तुमने तो बेकार ही ब्राह्मणों के घर जन्म लिया । म्लेच्छ लोग भी तुम जैसी गंदी बातें शायद ही करते हों। बच्चों के लिए तो मां को हर सदी में बनियान विननी ही होती है। मां बताती है कि छोटे बच्चों के लिए कुछ न कुछ बनाते रहना चाहिए, तभी वो तेजी से बढ़ते हैं।" "अभी उसको तेजी से मत बढ़ाओ । थोड़े दिन मेरा पालन-पोपण भी ठीक से होने दो। मीता, मजाक-भरी बात में करता तो हूं, लेकिन सब पूछो तो मैं अघा नहीं पा रहा हूं । योड़े-से वक्त के लिए मिले हुए स्वर्ग की जैसी उतावली मुझमें भरी हुई है । मां मरी, तब तो मैं बहुत छोटा था। इस वक्त तुम्हारे साप बैठे हुए, देखो, मुझे एकाएक मां की याद हो पाई है।" "दिन में जय थोड़ी देर के लिए तुम सो गए थे, बगल को पड़ोसिन आई थीं-मिमेज वर्मा । उनके पति वहीं ए० जी० आफिस में काम करते है. हम लोगों के जो मकान-मालिक हैं, उनके बारे में बड़ी अजीब ही बातें बता रही थीं । इस मकान में हमारे अलावा सिर्फ मिसेज वर्मा लोग ही किरायेदार हैं । उनका दरवाजा दूसरी तरफ पड़ता है । मकान-मालिक का दरवाजा जन होस्टल वाली सड़क पर खुलता है, दूसरा भारद्वाज आघम वाली गली में। उधर से जो गली..." "मीता, अब पेट भर गया है और नोंद आ रही है । तुमने तो बिल्कुल तहकीकात पर आए हुए पुलिस वालों की तरह मकान के बारे में रिपोर्ट देनी शुरू कर दी है । मरे, भाई, हमारे मुखर्जी साहब का कोई प्रेम-प्रेम का किस्मा सुनाना हो, तो तडाक से मुनाओ और छुट्टी करो । स्त्रियों में यह, साहब, बड़ी अद्भुत कलाहोती है कि परिचय हुआ नहीं कि जन्म-जन्मान्तरों के जानने वालों की तरह बतियाना शुरू कर देंगो और उस बताने में हमारे उनको तो करेले को सब्जी बहुत पसंद है या नापसंद है' से लेकर, मोहल्ले में से कब कौन लड़की या घरवाली को ले उड़ा था, तक की बेशुमार बातें होंगी। मैंने मोपासो की एक कहानी पढ़ी पी, उसमें बताया गया था कि दूसरों के किस्से बचानकर ही अक्सर औरतें अपनी दवी हुई हन्याओं का सबूत दिया करती सक्त्तिरी/ ४७
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था आपके यहा' निगम साहब मिर्फ नमस्कार स्वीकार कर लेने की-सी मुद्रा में अपने भारी-भरकम सिर को थोड़ा-सा हिलाकर, दूसरी तरफ निकल गए, तो वह तय नहीं कर पाया कि वालदिवस की तैयारियों में उमरी मनुपस्थिति 2. प्रति उनका रख नाराजगी का है, या नहीं। इतना वह जानता था कि नवम्बर का महीना शुरू होते ही निगम साहब के सारे अस्तित्व में दालदिवस मंट- राने लगता है। दो महीने पहले ही राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, स्वराष्ट्रमंत्री, वित्तमत्री मे लेकर मुल्यमंत्री तथा अन्य प्रादेशिक मंत्रियों तक को भव्य ढंग से पत्र चले जाते है । जहां यही ने भी शुभकामना संदेश आ जाते हैं, उन्हें 'विनोदिनी देवी कन्या पाठमाला' के 'सायनियर' में छापने के साथ-साय, उनकी फोटो को खिचवाकर, युद्ध को मढ़वा लेते हैं, वाकी अलवम में रख लेते है बार विशेष रूप से अपने मुवक्किलों को दिखाते है । 'सायनियर में छाने वाले अधिकांश शुभकामना-विज्ञान भी मुवक्किल के ही होते हैं.। पिछले वर्ष के बालदिवस की तैयारियों में जनार्दन ने भी काफी परि- थम किया पा-'सांवनियर' के प्रकाशन में भी निगम साहब प्रसन्न हुए थे और सीधे पचाम रपये बढा दिए थे । नाराज होंगे तो पटा भी सकते हैं। जनार्दन जानता है कि अपने इस छोटे स्कूल को लेकर निगम साब अपने व्यक्तित्व में विश्वविद्यालयों के उपकुलपतियों की कोटि की गरिमा अनुभव करते हैं। उसने चारों ओर देखा । अच्छी-वासी सजावट और चहल-पहल के अलावा पुलिस वालों की मौजूदगी समारोह को भव्यता प्रदान कर रही थी। स्थानीय राजनीति के झुटभैये भी इधर-उधर मंडरा रहे थे। वह अपनी चिंता में हो या कि जिलाधिकारी की पत्नी की मुख्य अनिपि के रूप में उपस्थिति सारे वातावरण में छा गई। खान तौर पर सारे वकील एकसाथ ऐसे उठ खड़े हुए थे, जैसे कक्षा में अपनी गुम्नल अध्यापिका को देखते ही छोटे बच्चे उठ खड़े होते है । मुख्य अतिपि ने अपने संक्षिप्त भाषण में जहा दो-दो बच्चों के स्वर्गी को सुचारू रूप से चलाकर, निगम साहब के द्वारा पडित जवाहरलाल नेहरू सवितरी/ ४९ । । और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के महान आदशों को पूरा किए जाने वात कही, वहीं महिलाओं की प्रगति का भी जिक्र किया। "जैसाकि माप सभी लोग जानते हैं, हमारे देश में इलिट्रिट औरतों नम्बर बहुत बड़ा है । जिस कंट्री की औरतें वेपढ़ यानी 'अन-एज्यूकेटिड होते हैं-वो हमेशा बैकवर्ड रहता है । ऐसी कंट्री में सोशल इकानामिक प्रोग्रेस नहीं होते हैं । गर्ल्स को उनकी 'चाइल्डहुड' से ही एज्यूकेशन में डालने से बड़ी हो करके वो एज्यूकेटेड औरत वनकर अपने कौम और कंट्री की तरक्की कर सकती हैं । इस नेक काम में हमारे वकील साहव ने काफी काम किया है। अक्सर लोग औरतों के मर जाने पर उनके नाम पर धर्मशाले, स्कूल से लेकर गौशाला तक बनाते हैं। हमारी कंट्री में जब तक औरत जिंदा रहती है, उसे दवाने की कोशिश की जाती है । हमारे वकील साहब ने अपनी जिंदा धर्मपत्नी के नाम पर स्कूल बनाकर एक महान् आदर्श पेश किए हैं । हम इस बात की तारीफ करती हूं।" तालियों की गड़गड़ाहट के बीच ही लोगों की फुसफुसाहट भी फैल रही थी कि 'कलक्टर साहब को तो ये ऐसे ही दावे रखती हैं, जैसे चूहे को विल्ली ।' बाकि 'जैसे महिला-उद्धार निगम साहब करते हैं, ऐसा ही सव करने लगें, तो सचमुच महिलाएं मुक्त हो जाएं।' अब कहीं जनार्दन का ध्यान इस ओर गया कि विनोदिनी कन्या पाठ- शाला की सभी अध्यापिकाएं विशेष रूप से संवरी हुई स्वयंसेविकामों की- सी भूमिकाओं में विचरण कर रही हैं । मिसेज उमिला भटनागर ने अपना भाषण समाप्त करके, अपने बेटे भटनागर के हाथों से नेहरूजी के चित्र को पुष्पहार पहनवाया, फिर तालियों का शोर गूंज उठा । उसी शोर के बीच प्रफुल्लता और कृत- कृत्यता में विदेह हो गए-से निगम साहव मंच पर पहुंच गए और 'धन्यवाद' की मुद्रा में होकर, उन्होंने भी अपना संक्षिप्त-सा भाषण दे डाला। अपने संक्षिप्त पापण में उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि 'हमारे बच्चों की कानूनी शक्षा तगड़ी होनी चाहिए।' फिर क्रम से राजनैतिक छुटभैयों के भापण हुए, जिसमें उन्होंने इतनी डी-बड़ी बातें कही कि वहां उपस्थित सारे छोटे बच्चे गलत जगह आ तो ५०/सविता गए लगे। उनके चेहरों पर, अब और उदासीनता छा गई पी। लगातार पष्टों तक अपनी समझ मे परे के लोगों को महने में वे निरीह हो बाए थे। अंत में, श्रीमती विनीदिनी निमम मंच पर आई और सबसे पहले उन्होने जिलाधीश की पत्नी श्रीमती भटनागर को धन्यवाद दिया कि 'मुझे श्रीमती भटनागर में स्वर्गीया कमला नेहरूजी का जैसा तेज दिखाई पड़ता है।' कुछ उनके स्वरूप और कुछ उनकी बातों के कारण लोगों में हंसी फैलने लगी तो उन्होंने निगम साहब के संपेत पर जल्दी-जल्दी हिंद की शरण ले ली। श्रीमती निगम के भाषण के बाद, जब बच्चों के सांस्कृतिक कामंत्रम प्रारम्भ हो गए, तो उसने देखा कि निगम साहव संकेत से उसे पास चुला रहे हैं। पास पहुंचा, तो निगम माह की प्रफुरलता देख राहत मिली। वह जनार्दन का कंधा थपथपाते हुए बोले, "मई, मट्ट! मैं जरा धीमती भटनागर को विदा करने जाता हूं। देख लेना, बच्चों के सांस्कृतिक कार्यत्रम ठीक से और जल्दी-जल्दी निबट जाएं और मिठाई टीक से बंट जाए। क्या कहें, हमें भी ध्यान नहीं रहा, नहीं तो तुम्हें पर बाल दिवस के बाद जाने को वह देते । तुम्हारे न होने से इस बार 'साँवनियर' वक्त पर नहीं निकल पाया । अब तुम्हें ही निकालना होगा।" अपना कहना समाप्त करते हुए भी उन्होंने उसके कंधे को बड़ी आत्मी. यता से यपयपाया, "अब कल किसी वक्त घर पर जाओ, वाइफ को साय लेते माना । श्रीमतीजी से भेंट करा देना । कल बच्चों की छुट्टी ही रहेगी।" स्कूल से लौटते वक्त, वह पहले हाशिमपुर रोड पर अपने एक परिचित मित्र के यहां गया । यहां से कुछ देर बाद भारद्वाज आश्रम की ओर से वापस घर की ओर लौटा, तो पी० ए० सी० पार्क के मुहाने पर की लाल बंगलिया के पास ही अचानक सदित्तरी दिख गई। उस कान वह किसी प्रौढ़ किस्म की औरत के साथ थी । वह औरत नाले के किनारे ही लघुशंका निवटने बेटी हुई थी, और उसने गौर किया कि सविना का चेहरा शर्म से भर गया है। यह कुछ फासले पर ही यो । जनादन संकोच ने कन्नी काटकर।
जाना ही चाहता था कि तब तक में वह औरत उठ खड़ी हुई। सवित्तरी को भावाज उसे सुनाई ६ गई, "मोसी, तुम चलो, हम आइत है।" वह समझ नहीं पाया कि अपनी ही जगह पर आखिर वह क्यों रुका रह गया है? हालाकि सिर्फ कुछ ही क्षण बीते होंगे, लेकिन उसे लगा, वह काफी देर से वहीं खड़ा था। सवित्तरी ने उसकी ओर देखा और संकोच-भरी मुस्कराहट के साथ "नमस्ते, साहेब !" कहा तो वह अपने-आपको थोड़ा-सा विचलित अनुभव करने लगा । सवित्तरी के 'नमस्ते, साहेब !' के उत्तर में उसे क्या कहना चाहिए, कुछ सूझा नहीं । एकाएक उसे ध्यान आया कि मांसी नाम की औरत को, शायद, सवित्तरी ने इसीलिए विदा कर दिया होगा कि नमस्ते कर किसी तरह बोला, "कहो, सवित्तरी, कैसी हो? शिवचरन कहां है ?" थोड़ी-सी बातचीत के बाद ही वह घर वापस लौट आया, लेकिन उसे कुछ समझ में नहीं आया कि सवित्तरी को देखकर इतने संकोच में पड़ जाने की उसे क्या आवश्यकता थी। मीता घर के कामों में व्यस्त थी। वह धीमे से कपड़े पहने-पहने ही चारपाई पर लेट गया और उसे लगा कि वह सवित्तरी के उन क्षणों के रूपा- कान की कल्पना कर लेना चाहता है।
- गाम को जनादन बलोपीवाग वाली 'ट्यूशन' पर से वापस लौटा, तो सुनील बरामदे में अपनी लकड़ी की पोडागाड़ी से खेलता मिला। उसके चेहरे से साफ झलक रहा था कि इस यीच वह बहुत रोया होगा । पर में एक प्रकार के सन्नाटे की-सी स्थिति थी, जबकि ऐसा कभी होता नहीं है । यह मीता के पूजागृह में होने का वक्त है । अक्सर वह घर तक हाथ थामकर पहुंचाती हुई-सी इस छोटी गली में प्रवेश करता होता है कि शंखध्वनि उसे अपने अस्तित्व को स्पर्ग करती अनुभव होती है । मुनील भी, अपनी मां के साय, पूजागृह में होता है । वह कल्पना पर जोर देता, साइकिल यों ही बड़ी कर, मुनील को प्यार करते आगे बढ़ा ही था कि शायद, मीता रही दगल पडोम में ग. हो- मौता के कराहने की आवाज उसे साफ गुनाई दे गई । वह तेजी से कमरे की तरफ बढ़ा, तो घ्यान आया कि प के पास पहुंचते ही जिस बात से वह सबसे ज्यादा चौका था. बह घर में रोशनी का न दिखाई देना था । उमने यटन दबाया, तो कमरे में गिनी होते ही उसे दिख गया कि मीता चारपाई पर पटी योर मुहार । उसने ओटे हुए गदे, कम्बल और लिहाफ को मुह पर से हटाया, तो पाया कि मोता का चेहरा ज्वर से तपा है । माथे पर हाथ रखा तो हल्का-सा चिपचिपापन और दाह महमूस हुआ। मौता ने कराहते हुए ही आंखें मोली, और वस. यो हो देसनी रही ।
तेज बुखार है।" हरा बहुत तनाव-भरा था और वह बोल नहीं पा रही थी। वह कुछ पूछना चाहता था कि 'मीता, ये अचानक तुम्हें क्या हो र कि एक तो तभी याद आ गया कि खांसी और हरारत तो कई दिनों उसे । और दूसरे, बरामदे में इस बीच फिर से रोना शुरू कर चुके को गोद में लिए, सवित्तरी कमरे में आ गई थी, "क्या बात है, स वहूजी इस वक्त खटिया पर कैसे पड़ी हैं ?" "इन्हें, शायद, वहुत "कहीं नमूना बुखार ना हो कोई दवा नहीं रखी घर में ?" "अनासिन, शायद, मंगाई थी इन्होंने परसों । सवित्तरी, तुम आ गई तो ऐसा करो, थोड़ी-सी चाय बना दो। फिलहाल चाय के साथ अनासिन दें इनको।" अनासिन ढूंढ़ने वह रसोईघर में गया कि यहीं कहीं रखी होगी मी ने । रसोईघर के संकरेपन में पानी लेने को बाहर आती सवित्तरी आमना-सामना हो गया। भीनी-सी महक अनुभव करते ही उसने देखा कि सवित्तरी ने अपने जूड़े में चमेली के फूलों का गजरा सजा रखा सवित्तरी के चाय बनाकर ले आने तक, वह मीता के माथे पर का पसीना पोंछता और सांत्वना देता रहा। हलका-सा पसीना हो आने और उसकी उपस्थिति का सहारा पाकर, मीता ने टूटती हुई-सी आवाज में बताया कि अभी लगभग सिर्फ घण्टा-भर पहले वह 'वाथरूम' तक गई, तो अचानक कैसे बदन में पहले हरारत, फिर भयंकर जकड़न और कंपकंपी-सी महसूस हुई और चक्कर खाकर 'बाथरूम' में ही गिरते-गिरते बची। किसी तरह अपने को साधकर खटिया तक पहुंची और असह्य कंपकंपी में खटिया पर रखा सारा विछोना ओढ़ती चली गई । सुनील ने रोना शुरू किया, रोता रहा और गला बैठने को आ गया, तव बाहर निकल गया कमरे में से । रोना उसे सुनाई देता रहा, मगर अपनी कंपकंपी और यातना के भंवर में पड़ी लकड़ी की तरह डूबी रह गई । "हमारे पहाड़ों में इतनी ठंड पड़ती है, वर्फ गिरती है, मगर निमो- निया की बीमारी जितनी 'प्लेस' में होती है, हमारे यहां नहीं । सवित्तरी, . ५४ / सवित्तरी तुम्हें कहीं किमी घर पर काम पर जाना है,या कुछ देर यहीं रक जाओगी? मैं जरा डॉक्टर बुला लाता। वहजी को युनार.ज्यादा ही मालूम पड़ता है। लक्षण निमोनिया के ही दिखते हैं..." सवित्तरी ने रुके रहने का संकेत सिर हिलाकर दिया और मीता के सिरहाने की ओर, फां पर बैठ गई। "चाय तुम भी पी लेना, सवित्तरी, और जरा सुनील का ध्यान रखना-- मैं जल्दी ही लौटूंगा।" कहता वह बाहर निकला. तो पाया कि साइकिल गापद है। साफ पा कि कोई ले गया । अपनी पिन्नता को दवाए, यह मुख्य सड़क तक पैदल घना आया और फिर रिवगा करके डॉक्टर के महां तक चला आया। डॉक्टर का स्वभाव उसे पिछली बार भी कुछ चिड़चिड़ा किस्म का लगा था। मरीज की बातों को धेयंपूर्वक सुनने की जगह, वे आनन-फानन में हाल-चाल पूछते और जब तक रोगी अपना पूरा हात बता भी न पाए. दवा लिखना शुरू । उमे याद आया, पिछली बार डॉक्टर साहब एक महिला से उसके बच्चे के दस्त लगने के बारे में पूछ रहे थे और वह महिला रही रहती कि बहुत वार । डॉक्टर का 'बहुत कितना, बहनजी, दस वार ? बीस वार ? सौ बार ? हजार वार ? साय वार कहना उसे एकाएक याद आया और उमे लगा कि बाज वही उसने भी 'बहुत तेज युग्दार है' कहा, तो डॉक्टर भन्ला न पढ़ें कि 'आखिर कितना बहुन ? सो डिग्री ? हमार डिग्री लाय डिग्री ?' "हो, साहब, आएं।" डॉक्टर रमेश चंद्रा ने उसीकी तरफ संकेत किया, तो वह कुछ हतप्रभ हो गया। "हाल बताएं।" डॉक्टर चंद्रा ने अपने मशीनी लहजे में पूछा, तो वह सहसा तय नहीं कर पाया कि वताना कैसे करे। "हाल बताएं "जी, मेरी वाइफ है"उन्हें पिछले कुर"यानी तीन चार दिनों में कुछ 'इंपनू-एंजा' को सी शिकायत थी-हरारत, टूटन और कुछ--यहो कोई दिन में तीन-चार बार सामी । रात को कुछ ज्यादा ।" "रात को कितनी बार?" " .."
"जी, यही कोई..." "यानी तीन-चार बार? हाल बताएं "जी, दिन में कोई ऐसी बात नहीं थी. मगर आज शाम जैसे ही घर पर वापस लीटा, तो देखा-श्रीमतीजी कम्बल, गद्दा, लिहाफ, सब एक- साथ ओढ़े चारपाई पर पड़ी हैं और तेज बुखार से उनका हाल बुरा है "हाल वताएं: "जी, ऐसा है, कि वो बोलने में तकलीफ महसूस कर रही थीं और आंखों में तेज जलन, नेहरा तपा हुआ, माथे पर चिपचिपा पसीना..." "हाल वताएं..." "जी, बुखार..." कहते हुए वह फिर रुक गया और उसे लगा कि हर वार एकाध वाक्य के बाद उसका गला बंध-सा जाता है। डॉक्टर चंद्रा जैले संगीत की लय में हों, 'हाल बताएं' कहे जा रहे थे। उसने अनुभव किया कि अब उनका अगला सवाल यही होगा कि बुखार कतना था? बहुत कितना? सी डिग्री ? हजार डिग्री ? लाख डिग्री ? उसको लगा, किसी दूसरे डॉक्टर के पास जाना चाहिए था। इसी बीच उसने पाया कि डॉक्टर ने दवाएं लिख भी दी हैं। पुर्जा पक- ते वो फिर उसी 'हाल बताएं' वाली लय में कहते गए, “कैप्सूल न में तीन बार, मिक्सचर चार वार । पुड़िया चार बार । थर्मामीटर रीद लें। बुग्बार घण्टे-दो घण्टे में नापते रहें। खाने में डवलरोटी का । । मौसमी का रस । चाय । बुखार ज्यादा तेज होने पर ठंडे पानी की ।। एक सौ तीन ने बढ़े, वर्फ की पट्टी। दुवाग आएं । हाल वतावें ।" डॉक्टर रमेश चन्द्रा का बड़ा-सा, अगोक वृक्षों से घिरा लॉन पार कर ने पर अब उमे पहली बार अनुभव हुआ कि साइकिल चोरी चली जाने पाद इस वीच भी उसके भीतर इकट्टा होता रहा है और सड़क पर ही नेहरे की त्वचा तक छलक आया है । साइकिल के विना तीन-तीन नों पर जाना कैसे संवेगा? सामने से एक रिक्शा खाली आता दिखाई पड़ा, तो उसे लगा, इसे रन होना चाहिए, मंगर वह कोई दूसरा ही था और मूंड़ी हिलाता निकल गया। ५६ / सवित्तरी आखिर वह तेज-तेज चलता, पैदल ही घर पहुंचा दवाएं लेकर, तो पाया कि सवित्तरी मीता के मार्य पर पट्टी रखे है और पाम में ही पानी का भगौना रमे, सिरहाने के पास पर्व पर वैटो, अपवार पड़ रही है । "सवित्तरी, तुम तो पढ़ी-लिगी मालूम पड़ती हो?" पूछने के आरंग को उसने जमे जीन की नोक पर रोक लिया। मीता को दवा खिला चुकने के बाद, वह बोला, "भई, यह डॉक्टर रमेश चंद्रा बहुत भावकी आदमी है । क्मिीकी ठीक से मुनगे नही । बस, जमे गाड़ी छूट रही हो, 'हाल यताएं, हाल बताएं' की रट लगाए रहेंगे और जब तक मैं हाल बताने की शुरुआत करूं, दवा लिखकर, पुजा यमा देंगे- "डबल रोटी का गूदा गिलाएं। दुवारा आएं । हाल बताएं। इनको वा मुनते हुए 'दाढ़ी बनाने में पहले और दाढ़ी बनाने के बाः' वाला विज्ञापन याद आने लगता है। बिलकुल वैसा ही 'टोन' है वोलने का 1 डॉक्टर को ऐसा रूखा न होना चाहिए । "इस दवा के यत्म हो जाने पर, दूसरा डॉक्टर देखेंगे । और, मीता, लगता है, बुध गर्दिश का वक्त आ रहा है । इधर तुम बीमार हो गई हो, उधर साइकिल चोरी चली गई है।" "अभी कुछ देर पहले हम और गनेशी सक्सेना साहब के पहा काम पर जा रही थी, तो आप घर की तरफ साइक्ति पर आ रहे घे ना...?" उसने लक्ष्य किया, वोलते वक्त सवित्तरी की त्वचा निहायत पारदर्शी हो जाती है । सवा-एक महीने की इस छोटी-सी अवधि में ही उमका योजना बहुत दिनों के परिचितों का सा हो आया है । "हा, मविनरी, साइकिल यही घर से चोरी गई है। पर में अपरा और सन्नाटा देयकर में कमरे में वर्मी के पास चला आया या. हड़बड़ी में ताला लगाना भूल ही गया।" "हम आए, तब रही नहीं। यानी कि आपके साइकिल छोड़ने और हमारे आने के बीच में ही कोई उड़ा ले गर हरामजादा उसके कहने में खुद की हुई हानि जसा विषाद मालक ता था। "तुम तो, भई, मी० आई० डी० वालो की सी तपती फर लेती हो।" कहते हुए यह होने से मुस्कराया को सामने स्वर में सरती पड़ी माता की उपस्थिति में उसे अपनी वह मुस्कराहट अप्रासंगिक-मो म्हमृग हुई, लेकिन सवित्तरी/५७ कुत्ता-- फिर भी उसे याद आया कि अभी कुछ ही दिन पहले सुनील को सवित्तरी की गोद से लेते वक्त वह एक अवूझ किस्म के रोमांच से भर गया था। है भी कैसी यह सवित्तरी? मीता क्या कहती थी उस दिन कि घर की कपास ? उसे कहना होता, तो वह क्या कहता कि जंगल का फूल ?- याकि "याकि... मीता ने करवट बदली, तो उसे लगा कि वह सवित्तरी की तरफ एक- टक ताकते देख लिया गया है । उसने झटपट मीता का हाथ अपने हाथों में ले लिया और पूछ लिया, "अब कुछ 'रिलीफ' महसूस होती है, मीता?" उसे जाने क्यों यह महसूस हुआ कि 'पहले से ठीक हूं' कहते हुए मीता, शायद, धीमे से मुस्कराई है । वह अचानक कुछ याद करके अलमारी की तरफ चला गया। थर्मामीटर लाकर ज्वर देखा-अभी एक सौ चार डिग्री से ऊपर ही था। "कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करें । डॉक्टर ने बताया था कि ज्यादा बुखार होने पर वर्फ की पट्टी रखें माथे पर, मगर निमोनिया में वर्फ "जैसा डॉक्टर साहेब कहे हैं, वैसा करें।" कहा सवित्तरी ने, तो उसे भी लगा कि बात सवित्तरी से ही कही गई थी, शायद । "कुछ रूखा जरूर बोलते हैं, डॉक्टर साहेब-मगर बड़े दयालु और निरलोभी हैं रमेश डॉक्टर । बाकी के बड़े डॉक्टर मरीजों को मूसने में तेज है साहेब, ये गरीबों के डॉक्टर कहे जाते हैं। "वैसा ही विना लाग-लपेट का बोलना है उनका ।" "लगता है, सवित्तरी, तुम भी उनकी मरीज रह चुकी हो?" "हम तो नहीं, साहेब, मगर वप्पा और गंगवा रह चुके हैं । "अरे हां, . आपको साइकिल कौन कम्पनी की रही ?" "कम्पनी से तुम्हें क्या वास्ता, सवित्तरी ?" "ऐसे ही पूछती हूं।" "हीरो यो।" कहता वह चौराहे की तरफ वर्फ लेने निकल गया। रास्ते चलते भी उसे यही अनुभव होता रहा कि वह सवित्तरी की बातों में एक नितांत अपरिचित किस्म की सुगंध-सी महसूस करता है । इधर ५८ / सवित्तरी . - लगभग डेढ़ महीने से विश्वविद्यालय की तरफ नहीं गया है । मीता रे लेने जाने से पहले, कनिका बनर्जी के साय का जनरल लाइब्रेरी या सीनेट हॉल के सामने के मौलश्री के वृक्षों की छाया में होना। वहां भी तो अंकुरों की तरह उगते कोमल संबंधों के बीच लगातार इस बात का अहसास पा कि मीता है । "हालांकि अब, इन बदली हुई परिस्थितियों में, वह सोच सकता है कि कनिका को लेकर उस तरह की व्याकुलता और घटपटाहट अनुभव होने के पीछे मोता और उसके वीच की गहरी साई भी जरूर पी। यहां ऐसा कुछ नहीं है, जो समस्या के यास-पास की चीज लग सके, मगर यह सवित्तरी नाम की लड़की अव अनुपस्थिति के क्षणों में भी याद रह जाती है । जाने क्यों, एक मद्धिम-मी कमा अपने भीतर अनुभव होती है, इसे देखते--अथवा स्मरण रसते-हए। कहने को तो एक झटके में यह भी कहा जा सकता है कि सवित्तरी मी भरने-भरने को आ चुके जल जैसे सारुम्म मे आंखों को बांधती-सी इस सड़की के प्रति आकर्षण अनुभव करना स्वाभाविक ही है और वह अनुभव कर रहा है । लेग्नि नहीं, सड़की होने में से अगला ही कोई कदम स्त्री होने की भूमिका में रखने को प्रत्येक क्षण तार दिगुती हुई-सी सवित्तरी को देखते -या स्मरण रखते हुए सिर्फ इतना ही महसूम नहीं होता है। जाने क्यों उसे सगने लगा है कि इसे जरूर कहीं न कहीं, कभी न कभी पहले भी देखा है ? कभी यों ही राह चलते, इसके अपने घर आने से पहले ? सपने में ? किसी पूर्वजन्म में ?.."तय है कि सपने में नहीं देखा है । इस सोहबतियाबाग में मकान लिए सिर्फ हपता-भर हुआ था, जबकि वह मीता को लेने गया। नही, इससे पूर्व, कहीं नहीं देखा, अन्यथा दिखने पर याद रह जाने-मर को सवित्तरी है । लेकिन जाने क्यों रात सोने में बहते जल जैसी यह सवित्तरी उसके भीतर इकट्ठा होती जाती है । मीता को अगर जरा भी आभास मिला कि वह इस सवित्तरी से लगाव महमूग करने लगा है, तो कितना गिर जाएगा वह उसकी नजर में ' सवित्तरी को तो मीता शायद, तुरन्त काम पर से अलग कर दे? नहीं, इस तरह की अप्रिय स्थिति आने से अच्छा यह है कि वह इस सारे प्रकरण को पूरी तरह स्थगित कर दे और डूबने-डूबने को हो आने से सवितरी/ ५६ पहले ही बाहर को निकल आए। बजट में कभी, या किसी और बहाने सवित्तरी को काम पर से अलग कर देने की सलाह खुद ही मीता को दे दे । यह जो पिछले सवा-एक महीने में एक अबूझ-सा कोहरा उसकी चेतना के ईद-गिर्द एकत्र होता जा रहा है, धीरे-धीरे खुद-बखुद छंट जाएगा, बल्कि विल्कुल उतने ही स्वाभाविक तौर पर, जैसे कि यह महसूस होना शुरू हुआ था। वर्फ लेकर, मीता के पास लीटते तक में वह काफी संतुलित हो चुका था। नहीं, मीता को यह प्रतीति देना कतई ठीक नहीं कि जब वह निमोनिया के तेज ज्वर में तप रही होती थी, तब वह रात के सन्नाटे में सितार पर बजते किसी कोमल राग की सी अनुभूतियों में खोया रहता था । स्वस्थ होने पर मीता जरूर सवित्तरी को लेकर बातचीत करेगी, यह विभ्रम मन में जाने क्यों लगातार बनता ही जा रहा है । - सवित्तरी ही वर्फ की पट्टी भी रखने लगी, तो उसने रोकने की कोशिश की, "तुम जाओ अव, सवित्तरी, वहुत परेशान हुई हो । तुम्हें अपने काम पर जाना होगा।" "काम पर तो हम जाती रहती हैं, साहेब ! सिर्फ दो घर छूटे हैं । अभी व आप वाजार गए थे, गनेशी आई थी। हमने उसे सौंप दिया। यहां बहूजी की तबियत बहुत सराव है । हम खाना बनाती जाएंगी।" "तब तुम बर्फ की पट्टी साहब को ही रखने दो, सवित्तरी। जल्दी से साह लिए दो फुलके सेंककर चली जाओ । वहुत रात हो जाएगी। खाना तु अपने लिए भी बना लेना । डोलची में लौकी पड़ी होगी, सब्जी बना लेना गनेशी ले आई है ना? पहले दूध गर्म करके, पप्पू को पिला दो। ब काम आई हो तुम । इस बीमारी में, यहां परदेश में कौन - देख हमें।" काफी अंतराल देकर, धीमे-धीमे बोलने के बावजूद मीता के में पर थकावट उभर आई । सुनील रोते-रोते थका, रुआंसा चेहरा लिए उ बगल में आ गया था। मीता से उसका उदास चेहरा देखा न गया। से अपने पास बुला लिया। लेकिन अभी दूध पिलाने को हुई ही थी कि लेकर आती सवित्तरी ने टोक दिया, "ना-ना, यह क्या कर रही है, वह - ६० / सवित्तरी नमूना बुखार में बच्चे को दूध पिलाना ठीक नहीं । मैं अभी भंस का दूध पिलाती हूं । हाय, माई का मन ! मरते भी बच्चे को छाती से लगाएगी।"... कहते-कहते उसकी नजर जनार्दन पर पड़ी, तो वह जल्दी से चाय का प्याला पकड़ाती, सामने रसोईघर में चली गई लेरिन उसका संकोर से भर उना जैसे उसकी पीठ तक उभर आया । जनार्दन कुछ कहने को हुआ मगर लगा कि वात हवा के नौके की तरह सिर्फ उसके ही मन में हलका-सा कम्पन पैदा करके, पन गई हैं।
C सुवह सवित्तरी आई, तव जनार्दन बरामदे के कोने में चौकी पर पालथी रे वंठा था। मीता द्वारा बनाए गए, छोटे-से मन्दिर का-सा आभास देते उस जा-गृह में बैठे दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हुए, वह पुजारियों की-सी द्रा में हुआ पड़ा था। ललाट पर के चंदन के तिलक और गले में झूलती नेक से उसका समूचा व्यक्तित्व कुछ बदल गया-सा प्रतीत हो रहा था। सवित्तरी के होंठों पर धीमी-सी मुस्कराहट फैल गई और वह खुद नहीं समझ सकी कि ऐसा सिर्फ कौतूहल में हुआ है या कि शरारत में भी। वह सवित्तरी की उपस्थिति को पूरी तरह अनुभव कर चुका था, मगर वेखबर-~-याकि उदासीन-दिखने की कोशिश करता, दुर्गा सप्तशती के पाठ में डूवा था: 'त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वंहि वपटकारः स्वरात्मिका । स्वधा त्वमक्षरे नित्ये...।' सवित्तरी की ओर अनायास आंखें पड़ते ही जाने क्यों उसे एकाएक दि आ गया कि अगली तीसरी पंक्ति में ही 'त्वमेव संध्या सावित्री त्वं देवि निनी परा' पंक्ति है ! सवित्तरी की तरफ पीठ पड़ती है, मगर जैसे सांप के बारे में कहा जाता कि वह अपनी सम्पूर्ण त्वचा से सुनता है, सवित्तरी के आने को शायद उसने ती कुछ ऐसे ही सुना था, क्योंकि वह जव चलती है तो बहुत निकट पहुंच जाए, भी चलने की आवाज सुनाई दे पाती है। "सवित्तरी, तुम माज जल्दी ही आ गई।" पाठ-निवृत्त होते ही उसने पूछा। - "वहूजी की तबियत कैसी है, साहेब ?" "कुछ ज्याद ही खराब होती मालूम पड़ती है । रात को बुखार एक सी *पांच से भी ऊपर तक पहुंच गया था।" "वप्पा रे..." कहती वह जनार्दन के कहने को अधर में ही छोड़कर, तुरन्त भीतर पहुंच गई । सिर्फ एक दिन, रात की अस्वस्थता में ही माता का चेहरा पीला पड़ गया था। सवित्तरी ने उसके माये और कपोलों को स्पर्श किया, तो उसे कोमलता की अनुभूति हुई। सुनील छोटी वाली चारपाई पर सोया पड़ा था। "दूध आ गया होगा, यहूजी !" "हाँ । बाबूजी ले आए हैं । तुम इतनी मुबह-सुबह आ गई हो और तुम्हारी आंखों में मेरी विन्ता झांक रही है | "मां भगवती हो तुम्हें प्रेरित कर रही होंगी और तुम मेरे ठीक होने तक इस पर की देख-रेख कर ही दो, सवित्तरी ! बाबू साहब को स्कूल और ट्यूगनों पर जाना होता है । लोग नागा वरदास्त नहीं करते । यों भी भरदों से घर के छोटे-छोटे काम कहां हो पाते हैं । ठीक हो जाने पर जो मुझसे बन पड़ेगा, दूंगी जरूर तुमको । "वस, इतना देस लेना कि तुम्हारे काम का हर्जा न हो और तुम्हारे बाबू नाराज न हों कि लड़की एक पर पकड़कर बैठ गई।" सांस बहुत तेज चलने से वह हाफकर रह गई । "इतनी भुवह हमें वप्पा ही भेजे हैं, नही सो कुछ देर से ही आती। बप्पा कहते हैं कि भले लोग हैं । विपदा में काम आने में पुन्न है । "आप निसखातिर रहें, बहूजी ! आपके ठीक होने तक हम सारा काम करेंगी। आपके जैसा तो नहीं हो पाएगा।" "तुम मुझसे अच्छा ही कर लोगी, सवित्तरी!" कहते-पाहते मीता के आंघों में आईता आ गई। उसका चेहरा थकान से पूरी तरह भर गया दिख रहा था। सवित्तरी ने अंगुलियों से धीमे में उसको आयों को पोंछ दिया। हालांकि सुद वह भी सोच रहा था, डॉक्टर के यहां ले जा सकने की स्थिति में भीता नहीं है और वहां जाकर आनन-फानन में हाल बताने सवित्तरी/६३ - र दवा लिखवा लेना लापरवाही बरतना होगा, मगर सवित्तरी का यह हना और जल्दी ठेल ले गया कि 'वहूजी की तबियत कुछ ज्यादा ही बराव मालूम पड़ती है, साहेव !' डॉक्टर रमेश चंद्रा आए और कुछ ही क्षणों में बुखार का चार्ट देखने और 'स्टेथिस्कोप' छाती तथा पेट की तरफ घुमाकर, खिलाड़ियों की-सी फुर्ती के साथ बाहर निकलने को हुए तो उसने डरते-डरते पूछा, "डॉक्टर साहब, दवा वदलने की जरूरत पड़ेगी ?" "क्या बात करते हैं, जनाव ? दवा क्या इस तरह ही दस-बारह घंटे में बदली जाएगी? दवा पुरानी चलने दो, चार दिन । कैप्सूल एक और नई वढ़ा देते हैं । टेम्प्रेचर इसी तरह लेते रहें । तेज बुखार में वर्फ की पट्टी रखें । खाने को वही डबल रोटी का गूदा । चाय, मुसम्मी या गुनगुनाते पानी में नीबू की शिकंजी । शाम को डिस्पेन्सरी आवें, तो टेम्प्रेचर का चार्ट लेते आवें । मरीज को माथ न लावें। सिर्फ हाल बतावें।" उसके फीस के दस रुपये देने तक में तो डॉक्टर चन्द्रा सड़क पर पहुंच चुके, "शाम को लेते आवें। मरीज का हाल भी बतावें।" उसका मन हुआ कि सवित्तरी के सामने ही अपने माथे पर दोहत्थी मार उसने देखा नहीं, मगर महसूस किया कि उसकी बदहवासी पर सवित्तरी हलके से मुस्करा रही है । दवा का पुर्जा हाथ में थमा था, वह चप्पल पहन- कर वाजार जाने लगा कि कैप्सूल लेते आए, तभी सवित्तरी ने टोक दिया, "बाबू साहेव, इसी तरह चले जाएंगे..." "क्यों, इसी तरह जाने में कोई बुराई है क्या? क्या डॉक्टर हैं, साहब इतना तक नहीं बता गए कि आखिर बीमारी क्या है। पूछ लेता, तो अपन वही वोरोलिन वाली आवाज में जवाव ठोक देते कि बीमारी क्या कोई द वारा घण्टे में जानने-बताने की चीज है, जनाव! "हद है।" "हम तो सिर्फ यों कहने लगी थी कि इस धोती-कुरते-तिलक-चन्दन तो आप खुद ही बंद मालूम पड़ते हैं !" यह पहला वाक्य था जो सवित्तरी ने उसे भरपूर विनोद में सम्बो करते कहा था और उसे लगा, सवित्तरी का कहना जैसे किसी कोमल ६४ / सवित्तरी की तरह स्पर्श कर गया है । वह सवित्तरी की तरफ यों ही देवता बाजार की ओर निकल गया। नई लिखी दवा उसे कटरा मिश्रा फार्मेसी तक जाने पर ही मिल पा और आते-जाते दोनों बार रिक्शा तय करने में इतना बत्त. लग गया कि लग भग सवा घण्टे बाद ही वह घर वापस लौट पाया। सिर्फ इस सवा घण्टे में ही सवित्तरी ने मीता को दातून करवापर, मुंह धुला दिया था। सहारा देकर 'वाथरूम' तक ले गई थी और याग्रह कर. करके चाय दुवारा पिला चुकी पी। सुनील को दूध पिला दिया था और अंगीठी मुलगाकर दाल का पानी चढ़ा दिया या। मीता ने बता दिया कि दाल-भात उसका पकाया नहीं खाएगा जनार्दन । "देखो सवितरी, जब तक बहूजी की तबीयत ठीक नहीं हो जाती, तुम मेरे अकेले के लिए खाना बनाने का भमेला मोल न सो। मेरा भी काम डबलरोटी से चल जाएगा।" "आप पण्डित लोग जाने कैसे-कैसे लोगों के गुंदै मैदे की डबलरोटी साली लेकिन हम लोगों का पकाया दाल-भात नहीं खाएंगे।" पहती सविता बाल्टी हाथ में लिए सावजनिक नल की ओर निकल गई, "घर बम्चे। पानी नहीं आ रहा।" सवित्तरी के रुख से स्पष्ट लगता है कि वह हस्तक्षेप बचाना चाहती। और ज्यों-ज्यों मीता की अस्वस्थता सम्बी खिंचती चली गई, घर के व्यवस्था संभालने में वह लगभग अधिकार का रुख अरितयार करती चली गई है। हालांकि अत्यन्त विनय-भाव से ही वह सारा काम-काज निपटा रही थी, मगर पूरा घर जैसे उसकी उपस्थिति से भर गया था। मन मार- कर वह स्कूल भी जा रहा था और ट्यूशनों पर भी, ताकि आर्थिक जर्जरता मीता के उपचार के आड़े न आने लगे और लौटने पर सवित्तरी के हापों की चाय न मिलना अब उसे एक रिक्तता और अभाव महसूस कराने सगा था। प्रायः यही होता था कि यह ट्यूशन निपटाकर सौटता, तो चाय का पानी स्टोव पर चढा देता। वह खुद महसूस कर रहा था कि निहायत सवित्तरी / ६५ पारी की स्थिति में ही सही, मगर सवित्तरी का घर के वातावरण पर- क कहना चाहिए कि उसकी मानसिकता पर इस कदर हावी होते जाना । उसको चाहे जितना प्रीतिकर लगता हो, मगर पारिवारिक वातावरण लिए स्वस्तिकर शायद, सिद्ध न हो पाएगा। डॉक्टर रमेश चन्द्रा ने बता दिया था कि वे पहले ही दिन समझ गए कि बहुत ही सीवियर किस्म का निमोनिया है और इसके शिकंजे से निक- नते और बीमारी की टूटन से संभलते वक्त लग जाएगा। . पांचवें दिन वह राजापुर चला गया और अपनी ककेरी विधवा मौसी को दुला नाया। इस बीच जो एक अन्य महत्त्वपूर्ण घटना घटित हुई, वह यह कि उसकी साइकिल वापस मिल गई और सवित्तरी ने विना लाग-लपेट के सीधे-सीधे बता दिया कि उसका भाई साइकिल चुराने वाले लोगों की सोहबत में पड़ गया है और वे लोग उसे प्रति साइकिल बीस से लेकर चालिस रुपये तक देते है। "ई संजोग रहा, साहेब, कि आपकी साइकिल गंगवा हरामी ही गायब किए रहा । हम तो सिर्फ शुवहे में वोली थी कि गंगवा रे, तुझे मेरी सौं, मरी दीदी का मुंह देखो, जो तू झूठ बोले-पंडित साहेव की हीरो साइकिल तुम लोगों के गिरो ने तो ना चुराई ?' बुरी नोहवत में पड़ गया है, साहेव ! गरीबों के घर में चारों तरफ की आग है । सातवीं में पढ़ता था, स्कूल भी ट गया। बदजवान भी हो चला। एकदम गुस्से में बोला, 'जा साली, फल पहुंचवा देंगे तेरे कह रहा था कि तेरे नये साहेब के यहां कल पहुं- चवा देंगे'कह देना आइन्दा से ताला लगा के रखा करें । पहाड़ी "पहाड़ी भुस्स कह रहा होगा, तुम छिपा लेना चाहती हो।" कहते उसके मस्तिष्क में कौंधा कि 'कल पहुंचवा देंगे तेरे...' कहते हुए भी सवित्तरी कुछ छिपा ले गई थी। यहरहाल साइकिल वापस मिल जाने से जैसे पांव वापस मिल गए हों काफी दुविधा अनुभव कर रहा था और उसने वीस रुपये गंगवा को दे के लिए नागे बढ़ाए भी थे, मगर सवित्तरी गे एकाएक बदल गए चेहरे । देखते ही जेब में वापस रख लिए। वह ६६ / सवित्तरी पंसे की तंगी के कारण वह साइकिल के करियर पर ही विटा नाना चाहता था मौसी को, मगर उन्होंने साफ कह दिया कि 'जनार्दन रे, मेरे लिए तो रिक्शा करवा दे। साइकिल पर मुझे चक्कर पाता है।' मौसी ने आते ही मीता को गले लगाया। सूब रोई। मुनील को प्यार किया। अन्त में "यह जनार्दन वो, बहू, इसी इंतजार में रहता होगा कि मौसी मरेगी, तो एक दिन कंधा देने को ही आऊंगा। इसके वायू से गरण और पाद के दिनों में आई थी, तब से अब आई हूं इस पर में, जब तू बीमार पड़ी है ! खैर, मुसीवत में अपने ही काम आते हैं । आंगों में ही आगू फूटते हैं, घुटनों से कहां।" कहती मुनील वाली चारपाई पर लेट गई। लेटे-लेटे ही पूछ तिमा, "यह रसोईघर में बिजली जमे घूमती छोकरी कौन है। वह ?' "महरिन है, मौसी ! सवित्तरी है इसका नाम ।" "ए सवित्तरी, जरा इधर तो ना।" मौसी का मिर रमाईपर मी दिशा में पूम गया, "चहा बनाना तो जानती ही होगी ये ? यक गई हूं, रे जनार्दन !" मौसी की ओर यह पलटी ही थी कि बगल में चारपाई पर पड़ी मीता की ओर करवट लेकर मौसी धीरे से फुसफुमाकर कुमाऊनी में बोली, "हाय, यो रंड और देसण-चाणघवे ! "क्यों ये, क्या नाम है तेरा? सवित्तरी? तेरा म्याहहो चुका या नहीं?" उन्होंने अपने प्रश्न को स्टोव मुलगाती सवित्तरी की पीठ पर कर्मद की तरफ फेंका। जनार्दन ने देखा कि सक्तिरी अचान के इस सवाल से हतप्रभ हो उठी और इनकार में सिर हिलाते हुए, वह मुरमा-सी गई। "बड़ी डांट होने तक अनव्याही ही रह गई यह तो!" मौसी ने आश्चर्य भी मुद्रा में अपने सिर को हथेलियों का गिरहाना देकर, पोड़ा और कंपा कर लिया। मौसी सिर्फ दो दिन ही रही मगर उनकी उपस्थिति सवित्तरी पर जैसे १.हाय, यह राहतो दिखने में बहुत ही सुन्दर है।
- - री की स्थिति में ही सही, मगर सवित्तरी का घर के वातावरण पर- कना चाहिए कि उसकी मानसिकता पर इस कदर हावी होते जाना उसको चाहे जितना प्रीतिकर लगता हो, मगर पारिवारिक वातावरण नए स्वस्तिकर शायद, सिद्ध न हो पाएगा। डॉक्टर रमेश चन्द्रा ने बता दिया था कि वे पहले ही दिन समझ गए क बहुत ही सीवियर किस्म का निमोनिया है और इसके शिकंजे से निक- और बीमारी की टूटन से संभलते वक्त लग जाएगा। ह पांचवें दिन वह राजापुर चला गया और अपनी ककेरी विधवा मौसी । बुला लाया । इस बीच जो एक अन्य महत्त्वपूर्ण घटना घटित हुई, वह कि उसकी साइकिल वापस मिल गई और सवित्तरी ने विना लाग-लपेट सीधे-सीधे बता दिया कि उसका भाई साइकिल चुराने वाले लोगों की सोहबत में पड़ गया है और वे लोग उसे प्रति साइकिल वीस से लेकर चालिस रुपये तक देते हैं। "ई संजोग रहा, साहेब, कि आपकी साइकिल गंगवा हरामी ही गायब किए रहा । हम तो सिर्फ शुवहे में बोली थी कि गंगवा रे, तुझे मेरी सौं, मरी दीदी का मुंह देखो, जो तू झूठ बोले-पंडित साहेव की हीरो साइकिल तुम लोगों के गिरो ने तो ना चुराई ?' बुरी सोहबत में पड़ गया है, साहेव ! गरीबों के घर में चारों तरफ की आग है । सातवीं में पढ़ता था, स्कूल भी - गया। बदजवान भी हो चला। एकदम गुस्से में बोला, 'जा साली, कल पहुंचवा देंगे तेरे कह रहा था कि तेरे नये साहेब के यहां कल पहुं- चवा देंगे 'कह देना आइन्दा से ताला लगा के रखा करें । पहाड़ी'' "पहाड़ी भुस्स कह रहा होगा, तुम छिपा लेना चाहती हो।" कहते उनके मस्तिष्क में कौंधा कि 'कल पहुंचवा देंगे तेरे...' कहते हुए भी सवित्तरी कुछ छिपा ले गई थी। बहरहाल नाइकिल वापस मिल जाने से जसे पांव वापस मिल गए हों। वह काफी दुविधा अनुभव कर रहा था और उसने वीस रुपये गंगवा को देने के लिए लागे. बढ़ाए भी थे, मगर सवित्तरी के एकाएक बदल गए चेहरे को देखते ही जेब में वापस रख लिए। - ६६ / सवित्तरी पैसे की तंगी के कारण वह साइकिल के करियर पर ही विठा लाना चाहता पा मोभी को, मगर उन्होंने साफ कह दिया कि 'जनादन रे, मेरे लिए तो रिवगा करवा दे। साइकिल पर मुझे चक्कर माता है।' मौसी ने आते ही मीता को गले सगाया। सूय रोई। मुनील को प्यार किया । अन्त में "यह जनादन तो, यह, इसी इंतजार में रहता होगा कि मौसी मरेगी, तो एक दिन कंधा देने को ही आऊंगा। इसके यावू मे मरण और बाद के दिनों में आई थी, तब से यय आई इस पर में, जब तू बीमार पड़ी है ! सर, मुसीबत में अपने ही फाम आते हैं । आपों ही आंगू फूटते हैं, घुटनों से कहां।" कहती सुनील वाली चारपाई पर लेट गई। लेटे-लेटे ही पूछ लिया, "यह रसोईघर में विक्षली जमे घूमती छोकरी कौन है; बहू ?" "महरिन है, मौसी ! सवित्तरी है इसका नाम ।" "ए सवित्तरी, जरा इधर तो आ।" मौसी का मिर रमाईघर की दिशा में घूम गया, "चहा बनाना तो जानती ही होगी य? यक गई हूं, रे जनार्दन !" मौसी की और यह पलटी ही थी कि बगल में चारपाई पर पड़ी मीता की ओर करवट लेकर मोती धीरे से फुसफुमाकर कुमाऊंनी में बोली, "हाय, यो रंड और देखण-वाण छ वे !" "पमों ये, क्या नाम है तैरा? सवित्तरी? तेरा व्याह हो चुका या नहीं?" उन्होंने अपने प्रश्न को स्टोव मुलगाती सवित्तरी की पीठ पर कमंद की तरफ फेंका। जनादन ने देखा कि मवितरी मचानक के इस सबाल से हतप्रभ हो उठी और इनकार में सिर हिलाते हुए, वह मुरमा सी गई। "घड़ी डांट होने तक अनच्याही ही रह गई यह तो !" मौसी ने आप की मुद्रा में अपने गिर को हथेलियों का सिरहाना देकर, पौड़ा और कंचा कर लिया। मौसी सिर्फ दो दिन ही रही मगर उनकी उपस्थिति सवित्तरी पर जैसे १.हाप, यह पर तो दिदने में बहुत ही गुलर है!
- - ले की तरह पड़ गई । काम वह बदस्तूर पहले जितना, बल्कि कुछ जी से करती रही, मगर वह घर के चारों ओर मंडराती गौरैया की जैसी मुक्तता खत्म हो गई। पहले वह काम निवटा लेने पर भी बड़ी देर बैठी रहती थी और लगातार मीता की टहल में रहती थी। मगर अब प्रायः 'अच्छा, वहूजी, हम चलित हैं।' कहती बाहर निकल पड़ती थी। मीता की हालत यह थी कि दिन पर दिन वह तेजी से पस्त पड़ती जा रही थी। बुखार अब थोड़ा उतरना शुरू हुआ था, मगर इस सप्ताह-भर जितना तेज ज्वर रहा था और पसलियां जर्जर कर देने वाली खांसी- उसकी आंखें जैसे गड्ढे में धंस गई थीं। चेहरा विलकुल फीका पड़ चुका था और दो-चार शब्द कहते ही हांफ चढ़ जाती थी। एक दिन 'जरा रिक्शा करवा देता, जनार्दन, राजापुर होती आती। कल को लौट आऊंगी।' कहा-भर था मौसी ने, कि जाने कैसे अपने को साघे, मीता धीमे से मुस्कराई थी और कहा था कि, नहीं अवं वह ठीक होने लगी। बुखार एक-दो दिन में पूरा उतर जाएगा । अब वे भी अपने बच्चों को देखें । स्कूल जाने वाले बच्चे हैं। "दसेक रुपये हों तो दे दे, जनार्दन ! इतने दिनों के बाद जा रही जाने घर में क्या जरूरत हो, क्या नहीं। मौसा तेरे अब रहे नहीं। तू जानता ही है, बड़े बेटे धर्मानन्द का ट्रान्सफर मेरठ हो गया है।" कहते हुए मौसी ने दस का नोट और अपना अस्तित्व घर में से जाल की तरह समेटा था और जाते-जाते मीता के कान में कहती गई कि 'वहू, मेरा कहा मानना महरिन बदल लेना !' जनार्दन वहुत तंगदस्त हो चुका था, मगर मौसी की वापसी मीता खुद चाही है, इस सन्तोप में उसे दस रुपया थमाना खला नहीं। मौसी छोड़ आने वह चौराहे तक गया। अव कहीं जाकर उसे इस बात का ठीक- अंदाजा हो पाया कि कैसे मौसी की उपस्थिति उन सवपर समान रूप से गई थी और कि उनके आने से पहले तक सवित्तरी कैसे अपेक्षाकृत जतन से घर संभाले थी। रात जब मोसी बाथरूम गई थीं और सवित्तरी भी घर जा चुर्क मीता ने टूटती-सी आवाज में कितनी यातना के साथ कहा था कि 'यह ६८ /सवित्तरी तो मौत की तरह सिरहाने बैठ गई। कान साती रहती है सनसजूर की तरह । सार पर ऐसे पसरी रहती हैं, जैसे मुद का पहरा कर रही हों। इन्हें निवटायो । इनकी वजह से सवित्तरी भी रहल कम करने लगी।' मोमी को रिस्ता करवाकर वह लौटकर घर आया, तो मीता के पास याते ही पाया कि यह गहरी मूछता में दूवी है और मुनील रो रहा है। वह बदहवास-मा हो गया और रोने लगा तो पहीन ने मिसेज वर्मा और दो चार लोग आकर इकट्ठा हो गए। मिमेज वर्मा ने मनाह दी कि 'दौड़कर डॉक्टर को बुला लाइए । नय तक हम लोग देगे।' उसने तुरन्त साइकिल पकड़ी और तेज रफ्तार से चलाता डॉग्टर रमेश नंद्रा के घर पहुंच गया। डॉक्टर अपनी हिम्पेन्सरी में बैठे मरीजों को देख रहे थे। वह चाहते हुए भी सन्तुलन रग नहीं पाया और रोने डॉक्टर चंद्रा उटकर उसके पास तक आए । सांत्वना देते बोले, "क्या बात है मिस्टर भट्ट ! वाइफ की तबीयत कुछ ज्यादा खराब हो गई क्या?" वह कुछ बोल नहीं पाया । डॉक्टर चंद्रा ने तुरन्त बंग मंभाला, कमरे में बैठे मरीजों से माफी मांगते, थोड़ी देर में लौट जाने को रहने, दरारे साथ चल पड़े। वह निरन्तर इस ग्लानि में दूवा रहा कि इससे पहले भी डॉक्टर तीन बार आ धुके, मगर पीस सिर्फ एक बार दी गई है, सचिन जित करने को यह वक्त उपयुक्त नहीं था। डॉक्टर ने पूछा, सो वह चुपचाप अत्यन्त मंक्षेप में उनकी बातों को जवाब देता रहा । "सतरे का तो पोई चान्स नहीं था, मिस्टर मट्ट! कल रात तो देखा या हमने । सी यान कम्प्लोटली बाउट आफ हेन्जर । मेरा प्रयाल है, होगी मिर्फ कमजोरी की वजह से होगी।" पूछने पर उगने बताया तो डॉक्टर चंद्रा बोले कि लगता है, फीडिंग नहीं हो पा रही है। घर पहुंचने पर डॉक्टर ने मीता को इस बार बड़े और एकाग्रता के साथ देखा । यह अभी भी मूमुना में ही पड़ी थी । एक इंसान देने के . । डॉक्टर ने अपने हाथ से पानी के छींटे थोड़ी जोर से मुंह पर दिए और ता की आंखें खोलते ही, फिर उतनी ही त्वरा के साथ उठ खड़े हुए, मिस्टर भट्ट, आप बेकार परेशान न हों। मिसेज आपकी विलकुल ठीक है। उठाएं-विठाएं एहतियात ते । बाथरूम सहारा देकर ले जाएं । 'कैप्सूल' अब दोनों वन्द कर दें। ये टानिक लेकर, चार घण्टे में एक बार पिलाएं। खाने में डवलरोटी का गूदा । मीसम्बी का रस । गुनगुने पानी में नीबू की शिकंजी । अभी यही चलने दें। कल सुबह से आलू के भुरते के साथ हलकी चपातियां । मूंग की पतली खिचड़ी। एहतियात बरतें । कल सुबह आकर हाल वताएं।" वह गली तक उनके साथ-साथ आया बैग उठाए। अपनी शर्मिन्दगी व्यक्त की कि फीस के रुपये इकट्ठ पहली तारीख आने पर दे देगा। डॉक्टर चंद्रा सामने से आते रिक्शे को रोककर, फुर्ती से बैठ गए और 'फिन न करें। कल सुबह आएं । हाल वताएं ।' कहते हुए नमस्कार की मुद्रा में हाथ जोड़ लिए। घर पर इकट्टा लोगों की भीड़ धीरे-धीरे छंट गई । शिवचरन भी आया था और सवित्तरी को समभाता गया था। रात, इतने दिनों की बाधित निद्रा और वेचैनी के बाद, पहली बार मीना गहरी नींद में सोई । नींद में डूबने से पहले, सिर्फ इतना कहा कि- 'मैं बेहोशी में ही तुम्हारा रोना सुन रही थी। मैं मूच्छित थी, मगर लोग का इकट्टा होना मुझे सुनाई पड़ रहा था । सवित्तरी भी आई थी और उस रोना अलग से पहचान में आ रहा था, लेकिन अब तुम घबराओ मत मेरे सिन्हाने से उठकर चली गई है।' सुबह होते-होते उसका चेहरा सचमुच मौत के शिकंजे में से निकल भ सा हो गया और उसने खुद ही इच्छा प्रकट की कि थोड़ी-सी पतली खि गाना चाहेगी। सावित्तरी आ चुकी थी। जनार्दन ने उसे स्टोव पर पानी चढ़ा मूंग-चावल बनाने के लिए कहा, तो मीता बोली, "चोखी रसोई वन रिवाज तो अब पहाड़ में ही डूबने लगा, सुनील के बाबूजी, तुम यहां वाद में कब तक च नाते रहोगे ? सवित्तरी ही पका ले, तो इ । ७० / सवित्तरी हर्ज है ? यहां परदेश में हारी-बीमारी में शुद्धि कहां-कहां देखेगा कोई ?" जाने कैसे,. लेकिन वह कह बैठा, "हां, सवित्तरी तुम्हारी ही तरह कपड़े बदतर खिचड़ी पका ले, तो हर्ज क्या है?" "पानी, सिर्फ एक धोती में ? मगर एकवमना के लोभी पंडित महा- राज, सवित्तरी की अभी मादी ही नहीं हुई है, जो कपड़े बदलकर पिचड़ी बनाएगी ?" कहते हुए मीता ने व्यंग्य-भरी आंसों से देना, तो वह सकपकाकर रह गया। सवित्तरी 'एकवसना' का मर्म ठोक से समझी थी या नहीं, मगर जिस तरह उसने घोती का छोर मुंह में ठंस लिपा--साफ़ पा कि बात को समझ रही है। "पहले थोड़ी-सी चाय और बना दे, सवित्तरी, फिर पिचड़ी का पानी चढ़ाना ।" मीता ने कहा, "माज इतने दिनों के बाद पहली बार नहाया है, तो दूसरा जन्म हुमा लग रहा है।" उरा काफी कमजोर हो आए चेहरे पर प्रफुल्लता और ज्यादा घटक दिसाई दे गई और उसने सुनील के साथ टूटी-फूटी जवान में बात करते हुए व्यस्त कर लिया अपने-आपको । मीता का मजाक अभी भी कानों को पुरेद रहा था । चाप ले आई सदित्तरी तो मुनील को उपमा दिया। मीता ने अब तक चाय का घूट भर लिया था, हमने में कपड़ों पर बिखर गई । जनारंग ने अपनी प्याली तिपाई पर रसी और तौलिये से मीता के कपड़ों पर गिरी चाय को पोंछना शुरू किया तो वह फिर हेम पड़ी- और भयो छोटी-मी चिलतिलाहट । वह समझ नहीं पाया, सिर्फ इतना ही अनुमान सगाया कि बीमारी के दिनों में जो गवित्तरी के माय उमका ज्यादा संवाद हुभा है और ममय पीता है, इसीको नेकर मजाफा करने की गुहा में है। "क्यों, मीता, बात ही यों हंसी एट रही है ?' "अरे कुछ नहीं । मैं तो गि सोच रही पी कि पंडित आदमी हो- 'विहारी सतसई नहर घोटी होगी?" "बोहो, तुम तो यस पलिया युभाने लगी, मीता ! सम्बी बीमारी के बाद बहुत मजाक थे. मूट में हो गई हो?" फिर पहाड़ी में बोता कि इस - मावती त्तरी के सामने कहीं कोई ऐसा मजाक न कर देना कि इसे बुरा लग र । अनव्याही लड़की है, हमें सीमाओं का ध्यान रखना चाहिए।' मीता ने धीमे से टोक दिया, "जो बात मुझे कहनी चाहिए थी, खुद कहे ले रहे हो-आखिर वात क्या है ?" और फिर हंस पड़ी। सवित्तरी नजदीक आते देख, वह जोर से बोला, "सवित्तरी ने बड़ी सेवा की है तुम्हारी, मीता !" क "हां, इसमें क्या गक है, मगर लगता ये है कि स्वास्थ्य-लाभ तुम्हें ज्यादा हुआ है।" कहते हुए मीता ने उसकी ओर से अपना मुंह तुरन्त सवितरी की बोर कर लिया, "सवित्तरी, तुम भी चाय पी लो और यहीं आ जाजो। पानी अपने-आप खोलता है।" सवित्तरी अपने-आपको समेटती-सी पास आ गई, तो मीता ने अपने निकट विठा लिया। वह चारपाई पर थी, सवित्तरी नीचे फर्श पर । उसके माथे पर हाथ रखनी बोली, "क्यों सुनील के बाबू, तुम्हारी मांजी को मरे कितने साल हुए होंगे?" "क्यों, अचानक 'नहीं, जरा बताओ तो सही, याद करके..." "यही कोई वीस-इक्कीस वर्ष..." "और सवित्तरी, तुम्हारी उम्र कितनी हुई ?" पूछा मीता ने, तो उसकी में आया और अपने को हलका करता-सा बोला, "यानी तुम ये करना चाहती हो कि यह सवित्तरी मेरी पूर्व जन्म की मां है ?" "हां, मेरा खयाल यही है।" मीता ने संकोच में गड़ी सवित्तरी के माथे । सहलाते हुए कहा, “इसने सचमुच सास की तरह ही घर संभाला मेरा हीं तो जाने कितनी फजीहत होती । कैसे कहती थी उस दिन विल्कुल बड़ी यूढ़ियों की तरह कि वहूजी, मुन्ना को बुखार में दूध न पिलाइए !" मीता हंसी तो वह सेंप गई। धीरे-धीरे उपरती हुई बोली, वनाती तो एक बात थी, वहजी, आप तो हमें सास वनाने लगीं!" जनार्दन को लगा, जैसे किसीने पीठ पर जोर की चिकोटी काट है। सवित्तरी का 'ननद वनाती, तो एक बात थी', कहना लगा, जैसे उ भीतर कोहरे की तरह एकत्र होती कोमल अनुभूतियों को किसीने से "नन - । ७२ / सवित्तरी से एक ओर मटक दिया है । उसे लगा कि खिन्नता के मारे मुंह का स्वाद जाता रहा । वह चाय की प्याली, दो-तीन चूंट चाय उसमें बाकी छोड़कर, रसोईघर की तरफ रखने जा रहा था कि मीता की हसी ने उसके पांचों को थाम लिया, "बरी, नागवान, गनीमत ममम रितु मैंने सारा ही सममा, सौत नहीं समझ लिया।" उसको जैसे काठ मार गया हो । एक क्षण उमे नगा कि अपनी बीमारी के दिनों में संचित सारे विक्षोभ को हंसी में उगल रही है मीता, मगर दूसरे ही क्षण मीता का यह कहना उसे सारे तनाव से मुक्त कर गया कि, "मैं तेरी बड़ी बहन की तरह हूं सवित्तरी! कभी मजार में कुछ कह ना तो बुरा न मान जाना। हम लोगों के लिए जैसे अपने घर की मयानी बेटी, वैमी तुम । फूल-सी सिली रहती हो तुम तो हम लोगों को भी अच्छा लगता है । मनहूस सूरत मुझे पसन्द नहीं । यो मोसो मा गई यों ना? ऐसा लगता था, जैसे चुडैल सिरहाने चंठ गई हो। दो-तीन दिन और रह जाती, तो मैं शायद मर ही जाती।" पूरी चाय पीकर, जनार्दन यह कहता बाहर निकल गया कि 'जरा निगम साहब के यहां हो आऊ, मीता ! कुछ पंसों लिए पहना होगा । ट्यूमन पढ़ाता ही वापस लौटूंगा ! तुम सिचड़ी पा लेना । मौसम्बियां मत्म है, पता याऊंगा।' 'मरे अब कर तक इतना खर्च उठाते जाओगे, मौसम्बी अय रहने दो।' कहने जा रही पी मीता, तब तक वह बरामदा पार कर चुका। जनार्दन के जाते ही सवित्तरी ने शाम का गिलास हाप में उठा लिपा और पीने लगो, तो मोता ने उसे तिपाई पर रग हिय मे से पुष विपुट निकालकर दिए। "हम तो समझो थी कि इस यवत बीमारी के कारण आप पुप लगाए होंगी। अच्छी होते ही कहेगो, 'सवित्तरी, अब हमारे यहां काम पर न आना।' हम सोचती थी.." "वो क्यों ? इसलिए कि साहब तुमसे हसने योनने सगे?" बीच में ही मात काटकर भीता ने पूछ लिया, तो सयित्तरी ने अपना सिर फोड़ा नशा ।
- तया । बोली, "अरे ना, बहूजी ! ऐसी ओछी बात हम क्यों कहने लगीं। म तो ये कह रही थीं कि आप सोचेंगी, जिस लड़की का भाई. साइकिल- चोर है, उसे अपने घर काम पर रखना ठीक नहीं "आदमी की आंखें बोलती हैं, सवित्तरी ! तुम कभी चोरी कर नं पाओगी और फिर हम लोगों के यहां कौन धन-सम्पत्ति है । बंजारों का सा डेरा है अभी तो। ला, जरा वो कोने वाला वक्सा तो इधर खींच ला।" संदूक खोलकर, मीता ने एक धोती निकाली और फिर यथावत् बन्द करके, वापस रखवा दिया। "ले सवित्तरी, यह धोती तू ले जा अपने पहनने को।" "वहूजी..." "वेकार में संकोच मत कर, सवित्तरी ! बड़ी बहन का दिया समझ के पहन लेना । अच्छा, तू अव जल्दी से खिचड़ी बना डाल । तेरा बहुत हर्जा हो गया मेरी बीमारी के पीछे । गनेशी अभी वहुत छोटी है।" मीता को खिलाकर, जनार्दन के लिए खिचड़ी और पालक की सब्जी व मूली ठीक से रखकर, सवित्तरी अखवार में लपेटी धोती हाथों में लिए, अपनी छोटी वहन गनेशी के साथ बरामदा पार कर ही रही थी कि वापस लौट आए जनार्दन की साइकिल ठीक सामने खड़ी हो गई। "हम चलते हैं, साहेब !" कहती वह एक क्षण को ठिठकी और दूसरे ही क्षण आगे बढ़ गई। उसने महसूस किया कि सवित्तरी के चलने में एक खास किस्म का आभिजात्य है और उसका चलना लगभग वेआवाज होत & लगभग टेढ़ महीने बाद, माय में मीता के माता-पिता, दोनों मंगम नहाने आए। मीता को पूरे मनोयोग और निष्ठा के साथ गृहन्दी में रमा देखकर पिताजी ने भी संतोष व्यक्त किया और कहा कि रामनगर के सरा- यगी कालेज की नौकरी से मीता के द्वारा इस्तीफा दे दिए जाने का कब उन्हें कोई अफसोग नहीं रहा। जाते मां जरूर इतना बढ़ती गई कि "मिन, तेरे वाढ वह रहे थे कि इतनी जवान, दुबसुरत और अनचाही नौकरानी का पर नहीं।' फहने को मन तो हुआ उसका कि. 'मां, हमारे बाबू और मुनीत के यावू में अन्तर है।' मगर सिर्फ गिर हिलाकर पुप लगा गई कि पर कास लौटनी मां से बात बढ़ाने की कोई जरूरत नहीं । पहला ठीक धीनती निगम में यहां से युनाया उसे नवम्बर में ही आया पः, मगर पुछ दिन मान-क्त में निकल गए । युद्ध बीमारी, पुप बांगारी में उबरने में और पिर मा-बाबू आने वाले है और आज जबकि मां-बायू को रामनगर चामा गए भी हाना-मर होने को आ गया, तब पहली बार वर जनरे पर जा पा रही है। सवित्तरी ने मुनीर को नहना दिया था और काई पहना रही थी। चोली,"निगम उबाल की परवाली को आप देसी है कभी, वही?"
सोता ने पलटकर देखा, सवित्तरी के होंठों पर शरारत-भरी मुस्कराहट "तुम्हारे साहव कभी-कभी जिक्र करते हैं।" "सुनने से दिखाई पड़ने वाली औरत कहां है उकीलन ?" "क्यों, ऐसी क्या बात है ?" 'साहेव के स्कूल की तो हेड मास्टरनी हैं, इसीलिए वेचारे यादा कहते होंगे, वहूजी ! वैसे तो हमारी भी गुरुआइन हैं..." सविनरी का अत्यन्त नाटकीय ढंग से जीभ दंगना, मीता को भी हंसा या। वोली, "चलो-आज तो दर्शन तो हो जाई।" "उकीलन के स्कूल में आप टीचरनी वनेंगी ? साहब बता रहे थे कि आप उकीलन से 2 दर्जा वेसी पढ़ी हैं। हम तो चौथी पर ही बोल गईं।" पब पछताती हैं, जव उमर वीत गई।" "साहव तुम्हें बड़ी बातें बताते हैं । और कुछ नहीं बताए ?" "वर, ई बात हम खुदै जानती हैं, वहूजी, कि आप पप्पू भैया की खातिर हना लेने चली गई रहीं !" पहले तो मीता की समझ में कुछ आया नहीं । समझी, तो आगे बढ़कर क घोल जमाई सवित्तरी की पीठ पर, "तू क्या पंडिताइन है जो जान रही कि यहन ही ले आई हूं?" 'हमरे मन में इच्छा है। लड़के ही लड़के ठीक नहीं।" "सवित्तरी, अव तू हर तरह से सयानी होती जाती है, रे! अक्ल से भी, पाल से भी। गरीव घर की बेटी न होती तु, तो तेरे क्या रूप होता। परसों शवचरन से बात चल रही थी तो कह रहा था कि 'जो लोग रिश्ता करने गते हैं, ये ही सुनाई पड़ता है कि नहीं शिवचरन, यहां, नहीं। जाने क्या नखा है अभागिन के भाग में ।'.."जाने क्यों हम लोगों को भी तुझसे ऐसा हि हो गया कि तेरे जाने की चिन्ता रहने लगी है। एक दिन मिसेज वास्तव कह रही थीं कि 'आपके साथ तो वह ननदों के से तेवर से रहने गी है । 'दूसरों के घर तो सुना है वस, जल्दी-जल्दी झाड़-पोंछा करने कल जाती है।'.."मैंने कहा कि 'भाई, हम तो परदेसी हैं यहां, जिसने घराप र लिया।' तो कहने लगी कि 'खर, भट्ट साहब तो बहुत नेक-नज - -- ७६ /सवित्तरी आदमी मालूम पड़ते हैं ।' मैंने कह दिया कि सिर्फ नेक-नजर ही नहीं, एक नजर भी है !" तुरन्त 'मीरियस' हो गई और बहने लगी कि अन- स्याही जवान लड़कियों का दूसरों के घर काम-काज करना फिर भी टीक नहीं। पहले हमारे यहां भी माती पी, हमारे श्रीवास्तर मात्र ने खुद ही बदल ली। मैंने कह दिमा, 'अव यहां दो-चार महीनों की बात और है। शिवचरन वेचारा गुद ही फिर में है कि पराये पर की अमानत अपने घर जाए" "गरीव की बेटी की चिन्ता दूसरों को ज्यादा ही होती है, यही ?" "मों तो ध्यान नहीं जाता, सवित्तरी, कि कौन कहां क्या काम करता है । तू अपनी छवि से आखों में रहती है । मैं तो औरत जात हूं, मगर भाज तू मेरी ही दी हुई धोती पहने भाई है, तो खुद मुझे लग रहा है कि धोती धन्य हो गई।" "लो, आप तो हमारा मजाक उड़ाने लगी। "मगर हमें अपनी औकात मालूम है, यहूजी ! बस, ये पर है, जहां लगता है कि हां, हम भी इंसान है। गुद बाबू पसन्द नहीं करते कि हम घर-घर डोलें । पिछले साल भी दिए थे, मगर लगातार चार-पांच महीना बीमार रहे, तो पर पलना मुश्किल हो गया । "आप चायू फे रिक्शे में बैठी होंगी, तो देशा ही होगा, कैसे हांफने-यांसने लगते हैं । अव मयानी होती जाती हैं, तो याबू मी तर. लीफ सबसे ज्यादा काटती है । वेटा होती, तो बापू की गत पे घोई ना होने देती । गंगवा सुमर तो पक्का हरामजादा निकल गया..." वह रोने लगी थी, मीता ने माये पर हाप मारते पहा. " ऐसी गंदी बात नहीं कहते, सवित्तरी ! उसे जरा हमारे यहाँ उन र उससे बातें करना चाहते हैं । अभी वक्त है। एक बार ही पा जाएगा, पूरी जिन्दगी सराय हो जाएगी। अभीया अदा, सुनौल को जरा काजल सगा दे तो । तर सो रहे हैं काम आएगा।" - दूसरी सुबह माई मविप्तरी को मोता ने चार देने वृधया, मग निगम साहब के स्कूल में काम करोगी।" महिना ५७ .. "काहे, वहूजी ? अच्छा, दाई का काम ? लगता है, आपकी जवरी दायत फल ? आप मास्टरनी हो गई वहां ?" जनार्दन सब्जी लेने वाजार चला गया था। "निगम साहब कहीं दूसरी जगह भी स्कूल खोलने की सोच रहे हैं गली जुलाई से । तव तक कुछ महीने उसी स्कूल में पढ़ाने को कहते थे । ने फिलहाल मना कर दिया, सुनील अभी बहुत छोटा है।"और तवियत जो ठीक नहीं। कुछ नहीं रे, हम औरतों की जिन्दगी भी कुछ नहीं। बस, मेढकियों का-सा जीना है। पढ़-लिखके भी अकल नहीं आई हमें तो। सोचती हैं, सफाई करवा लें क्या ?" कौन आपके दर्जन, दो दर्जन हो चुके, जो आप ऐसी बातें करती हैं ?" "मैं भी पागल ही हूं, सवित्तरी, जो तुमसे ये सब बातें कर बैठती हूं। गया बताऊं, मिसेज श्रीवास्तव और शर्माइन लोगों से अभी जी खोलकर बोलने जितनी आपसदारी बन नहीं पाई। "हाथ की मजदूरी करने वालों को बच्चे बोझ न लगते होंगे, सवित्तरी, मगर दिमाग और कलम की: मज- दूरी वालों की अव मुसीवत है । महंगाई का ये हाल है, एक बच्चे की ठीक से परवरिश मुश्किल । मैं सोचती थी, कहीं किसी स्कूल में मैं भी पढ़ाने लगूगी तो बोझ बंटेगा, मगर जब तक यह सुनील साथ ले जा सकने वरा- वर होगा, तब तक मैं तो फिर गू-मूत पोंछने की नीयत में आ जाऊंगी..." "आप अभी से जाना चाहती हों, तो सुनील भैया की फिकर छोड़ दें, बहुजी ! इन्हें हम देख लेंगी।" "अरे, नहीं, सवित्तरी ! घण्टे-दो घण्टे की बात नहीं। कम से कम छ- -सात घण्टे स्कूल में रहना होगा । तुम्हें दूसरे घर भी तो देखने होते हैं।" "सिर्फ दो घरों में ही हम जाती हैं, वो भी अब छोड़ ही देना चाहती है। अच्छी आय से नहीं देयती शर्माइन भी । कहती थीं फल शाम कि अ तुम्हारे पीछे-पीछे आवारागिर्द लोग घर के सीढ़ियों तक आने लगे हैं। 'इन नासपीटों को भी मौत आ जाय, चलना-फिरना हराम किए रहते है अब हम गरीव लड़की जात, हम किससे कहें कि पीछे-पीछे ना चला कर पुछ कहें भी तो तडाफ से यही कहेंगे कि 'क्यों री, सड़क तेरे बाप की ७८ / सवित्तरी से हो गई?' पहूजी, कंगा नरक है. हम गरीबों को जिन्दगी भी उन कुत्तों को बुध कहने की ताव लोगों में नहीं, मगर हमें मुनाले वत. जीम सांप बन जाती "तो फिर तुम स्कूल में नौकरी क्यों नहीं कर लेती ?" "उहूं । दाईगोरी न होगी हमसे । एफ तो निगम जोन हमें टोर आदमी नहीं लगतं । उनके पर हम काम कर चुकी है। कई मास्टर्रानियों से हम देखी हैं यही दुसर-पुगर है उजील मे। दूसरे, यहां तो ये है कि पर से निकली, सीधे चली लाई यहा । वहां दर्जनों बच्चों को सादार देने जाओ और आवाजागिदों की चुहसवानी सुनो । एक. वो मुमुरा बच्चालाल हमारे पीछे पड़ गया है। हमसे तो कुछ नहीं पहता, मगर वायू पाजीव याए "तुझसे शादी करना चाहता है क्या ?" "क तो चाहता है, वहूजी, मगर हम नहीं चाहते और न या नाट्ने हैं। बहुत लोफर किस्म का भादमी है । जोर नागे अभी महीने नहीं चौते। कौन जानता है, वो क्यों भागी? मुआ किसी फैरटरी में नौकरी क्या करता है, सोवता है, मोहल्ले की सारी लहरियां स्वयंवरो लिए डोल रही हैं । "यू." "हाप, तू तो बिल्कुल छोटे बच्चों की तरह यूरती है।" "आप और साहब, दोनों चले जाया करें, बहूजी ! वच्चा को हम देय लेंगी। दस-बीस हमारी तनसा आप ही बड़ा दें। दूसरे लोगन के पर जाने को जी नहीं बनता। पाक और हिकारत की आंस देखने वाले रहत है, प्रेम और दया की निगा का अकाल है।" "अच्छा तो, अभी साहब लौट आते हैं सब्जी मण्डी से, बात करती हूं। तुम्हें पैसा देना पुरा न लगेगा हमे।" रात का खाना खा चुरने पर, थोड़ी देर अपनी शोप ये सित्तमिले में जनादन मोता से भी मदद लेना रहा। सोने सगे तो उसने कहा, "तुम पढ़ाने लगो, तो अच्छा ही है, मोता! मुझे कुछ दिनों अपनी गोप के मिल- सिले में बनारस की तरफ भी जाना पड़ेगा, तुम स्थून में रहोगी, तो निगम - ज्यादा एतराज न करेंगे । बस, किसी तरह मैं सिर्फ रिसर्च पूरी कर लूं, तो 'तुम भी एल०टी० कर लो।" "सवित्तरी को हम लोग कितने रुपये तक दे सकते हैं ?" "देखो, मीता! अभी निगम साहब डेढ़-पौने दो सौ से तुम्हें ज्यादा देंगे, यह उम्मीद करना बेकार है । फिर भी पैंतीस-चालीस तक तो हम दे ही सकते हैं।" "बहुत संभाल के वतला रहे हो। तुम्हें क्या अभी भी यह भ्रम रहता है कि कहीं तुम सवित्तरी की तरफदारी करने लगोगे तो मैं आंखें बड़ी करने लगूंगी ?" में मैं दोनों, इन बक्त, एक ही चारपाई पर सोए थे। उसने शरारत-भरी हंसी में विस्तार पाकर अपनी तरफ को बढ़ते मीता के चेहरे को आंखें गड़ाकर देखा और बोला, “शक तो, शायद तुम्हें है, मीता!" "गलत है क्या ?" "तुम सही समझती हो?" "तुम्हें सवित्तरी अच्छी नहीं लगती.?" "अच्छी...॥ "अच्छी से मेरा मतलव खूबसूरत और गवान से भी है ।' "बहुत टेढ़ा सवाल किया है, मीता, तुमने । लेकिन जवाब देते मुझे ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। शुरू-शुरू कुछ विचलित जरूर हुआ था। लगता था, यह लड़की सपने में दिखी हुई-सी सामने आती है । महसूस होने लगा था कि यह अपनी मौजूदगी से स्थिति को मेरे लिए कुछ असामान्य वना जाती है। मुझे खुद भ्रम होने लगा कि इसको चोर.नजर से देखने लगा हूं।"लेकिन जब मैंने एकान्त मन से इसपर सोचा-विचारा तो लगा कि जैसी यह सवितरी है, इसको देखते किसी भी पुल्प के मन में इतनी उथल- पुथल तो विल्कुल स्वाभाविक है । धीरे-धीरे..." "धीरे-धीरे इस उथल-पुथल को स्वाभाविक मान लेने का अभ्यास वन गया-यही ना?" "आदमी का स्वभाव अब इतनी आसान चीज रह नहीं गया, मीता, जितना कभी आदिम युग में रहा होगा । सुन्दर और तरुण स्त्री के प्रति ८० / सवित्तरी ..
आवेग अनुभव करना स्वाभाविक हो सकता है, मगर अपने इस आवेग को दर तना वासान नहीं।" "मोर उचित?" "नहीं, मैं इसे उचित भी नहीं कहूंगा। हम एक समाज के बीच में रहते हैं और उसकी पहली इकाई हमारा, गुद का परिवार है और स्त्री के मामले में ही नहीं, बल्कि किसी भी मामले में आवेग वरतने से पहले हमें इतना शायद, जहर देख लेना कि इसमें परिवार का अहित तो नहीं।"और फिर दूमरों के हित-अहित की चिन्ता..." "तुम अपनी शोध-सामग्री पढ़ने में लग गए । ग्रंय और भादमी में बहुत फर्क है।" "अच्छा, तुम्हारा ख्याल क्या है ?" "वहीं, जो तुम्हारा है । हर आदमी अपने-आपको ज्यादा बेहतर जानता है । मैं तो, बस, तुम्हारी व्याकुलता को देखती रही है। लेकिन मानना पड़ेगा कि हो तुम पंडित के बेटे ! अपनी वेचनी को आवमन के जल की तरह घोटकर पी गए !" भीता का हंसना उन दोनों के बीच के नाम-मर के फासले के बीच गिन- हरी की तरह दौड़ गया। "रहे तो हम लोग पहले भी कई वार, और अच्छे-खाते अरसे तक साथ- साप, मीता ! "मगर तुम्हारा यह झरने का-सा करना पहले कभी नहीं हुआ । वर्षे पानी की तरह तुम अपने में ही सिमटी रह गई।" "मैंने अपने मायके में रहते बहुत सीखा, सुनील के वाबू ! जो चीज मैंने गहराई से महमूस की, वह यह कि हमारी मां की उदासीनता और नीरसता है, जो वायू को भटकन में डाले रही है । इसी एहसास से मैं डरी के कही यह मेरी बेरुखी और उदासीनता मुझे भी किसी विपत्ति में न डाल , और मेरी जिन्दगी में एक शादीशुदा औरत होने के अलावा और कुछ की न रह जाए । मेरे मन में लगातार यह बात वोन डालती । मुझे शादी से ही इनकार कर देना चाहिए था और या शादीशुदा होने बतौर एक बच्चे को लेकर यहां मायके में पड़े रह जाने की इस नियति 'तोड़ डालना चाहिए । इस बार मैं यह संकल करके चली किया .
अपने को बूंद-बूंद तुम्हें दे दूंगी या अन्तिम रूप से किनारा कर लूंगी।" "पहले तुम मास्टरनियों की तरह बोलती थीं, मीता, अब मेरे भीतर को चेतना की तरह बोलती सुनाई पड़ती हो।" "तुम बहुत संवेदनशील हो और ज्यादा संवेदनशील होने के जोखिम होते हैं।" "जोखिन ? "जैसे "जैसे "जैसे यही कि तुम अपनी भावुकता में आकर यही संकल्प कर डालो कि मुझ जैसी पढ़ी-लिखी, समझदार-सुन्दर और प्रेमी औरत के प्रति निष्ठावान रहना तुम्हारा फर्ज है-और सवित्तरी के प्रति मन के बिल्कुल अकेले कोने में भी किसी तरह की कोमल भावनाएं बनाए रखना..." "सुनो, मीता, तुम कल से ही इस लड़की को आने को मना कर दो।" इम बार वह कुछ हतप्रभ हो चुका-सा, चुपचाप आंखें बंद कर, थोड़ी-सी करवट लेके सो गया, "वत्ती बुझा दो, मीता, नींद आ रही है।" मीता उठी, वत्ती बंद करके, बिल्कुल सटकर सो गई। बोली, "जव आदमी अपने-आपको छिपाने की जरूरत महसूस करता है, तो रोशनी आंखों में चुभने लगती है ना? और, भई, मैं मना करने वाली कौन ? तुम ही मना कर देना सुवह ।" वह तुरत कहने को हुआ कि 'मुझे इस संकट में न डालो, मीता !' मगर अन्ततः धीमी, निहायत असंलग्न-सी आवाज में, वोला, "ठीक है, मैं मना ५ कर दूगा।" गुस्सा होके "तुम तो कह रहे हो ? शांत मन से कहो कि 'ठीक है, कल सुवह सवित्तरी से मैं खुद ही कह दूंगा कि सवित्तरी, अब मुझे तुम्हारी जरूरत नहीं रही। "तुम्हारा संदेश सुनते ही.. "मुझे क्यों कहूं ? 'हमें जरूरत नहीं रही' कहूंगा।..." "अन्धा, चलो, यही कह देना । अव उठो और अपनी चारपाई पर सो जाओ।" "मेरी चारपाई तो यही है." "हमारी चारपाई नहीं कहा तुमने ?" मीता का आत्मीय भाव से सना कमरे में भरे अंधेरे में घुलता चला गया । ८२/ सविनरी सुबह सवित्तरी आई, बरामदे में पूजा-पाठ करते जनार्दन के समानान्तर एक क्षण को रुकी और पांव पोंछकर, भीतर आने को हुई कि भीतर से मोता ने जोर से पुकार लिया, "सवित्तरी, कल रात तुम्हारे साहब कह रहे..." उसने जानबूमकर वाक्य को अधूरा छोड़ दिया और 'गजाननं भूत गणादि सेवितं' जपते-जपते एकाएक पलटकर देखते जनादन के खिसिया जाने को शरारत के साथ घूरकर देखा और फिर अपने अधूरे वाक्य को यह कहते हुए पूरा किया कि "साहब कह रहे थे कि जब पर संभाल लेने का जिम्मा सवित्तरी ले ही रही है, तो तुम स्कूल में पढ़ाने से इनकार क्यों करती हो?" उसकी शरारत-भरी आंखों को सवित्तरी ने भी अपने चेहरे पर की त्वचा को स्पर्श करता-सा महसूस किया, और वह संकोच से गड़ी-सी तेजी से भीतर चली गई। चाय का पानी मीता चढ़ा चुकी थी, बनाई सवित्तरी ने । जनार्दन पूजा-निवृत्त होकर, भीतर कमरे में आया और प्रसाद देने लगा तो मीता ने कहा, "सवित्तरी को खुद ही क्यों नहीं देते, पंडित ? कुंवारी वन्या को प्रसाद सबसे पहले देना चाहिए।" अपना कहना समाप्त करके, सवित्तरी के दायें हाथ की कलाई पकड़कर उसने अपने हाथ से उसकी हथेली को जबरदस्ती जनार्दन के सामने फैला दिया, तो सचमुच यह मोहाविष्ट हो गया। नहीं, सवित्तरी की हथेली के रंग को गुलाबी के अलावा और कुछ नाम दिया नहीं जा सकता। रेखाएं ऐसी, जैसे रक्तकमल का सम्पूर्ण हो चुका पत्ता सामने हो। गहरे ताल में के जल के हवा के स्पर्श से धीमे से कांप उठने की तरह, सवित्तरी के सारे अस्तित्व में दौड़ती-सी संकोच की लहर को देखते हुए भी यही लगता है कि कोशिश करने पर, छुआ जा सकता - "सवित्तरी, तुम्हारी बहूजी बहुत मजाकिया स्वभाव की हैं। इनकी बातों का बुरा न मान जाना कही ।" किसी तरह जनार्दन ने अपने-आपको साधते हुए यह बात कही और चाय की प्याली उठाकर, दीवाल से लगी छोटी-सी मेज की तरफ निकल गया। सवित्तरी ३ १० निगम साहब मीता का "विनोदिनी कन्या पाठशाला' में पढ़ाने लगना, सचमुच आस- पास में चर्चा का विषय बन गया कि कोई पहाड़िन टीचर आई है और, सुना है, बहुत अच्छा पढ़ाती है। अपने आत्मीयतापूर्ण व्यवहार से उसने श्रीमती निगम से लेकर बाकी की सारी अध्यापिकाओं और दाइयों तक को वश में कर लिया और बच्चों के बीच वह 'गोरी टीचरजी' के रूप में लोकप्रिय हो गई। अपने किचित् सुनहलापन लिए-से गोरे रंग और अपेक्षाकृत लम्वे कद में वह सचमुच दूसरों से अलग दिखाई पड़ती है । खुद साहब ने एक दिन सबके सामने कह दिया कि 'आपको तो यूनिवर्सिटी में लेक्चरार होनी हिए।' वावू की चिट्टी मई में ही आ गई थी, और जनार्दन को भी आपत्ति नहीं थी, मगर मीता ने प्रसंग को टाल दिया । आखिर कब तक गमियां पहाड़ पर वापस जाकर काटी जाएंगी और वह भी मायके में ! एक महीने के लिए भी जाने का मतलब होगा, अगले कई महीनों तक के अपने 'बजट' को घपले में डाल लेना। यहां पहुंचते ही पहले बीमारी में और फिर मां-बाबू के माने में अतिरिक्त रूप से खर्च उठाना पड़ा है और अब कहीं जाकर, इन चार महीनों में स्थिति थोड़ी-सी संभली है। इसके अलावा, घर पर ही 'ट्यूशन' देने लगने की व्यवस्था कर लेने से जनार्दन का साइकिल पर लोगों के घरों का चक्कर काटना बंद हुआ है और इस सिलसिले को टूटने नहीं देना है। पहले सिर्फ एक कमरा था, अब इससे लगा कमरा भी किराये पर मिल गया है। हालांकि कमरा अपेक्षाकृत छोटा है, मगर आंधी-बारिश के वक्त आठ-दस वच्चे सुविधा से पढ़ने बैठाए जा सकते हैं, जबकि अभी सिर्फ पांच बच्चे आते हैं। जनार्दन अव बाहर की ट्यूशनों के नाम पर सिर्फ अलोपीबाग जाता है, निगम साहब के दोस्त के बच्चे को पढ़ाने, जिसके बारे में उनको भ्रम है कि शायद वह उन्हींका बच्चा है । वह ट्यूशन से लौटता, राधा भवन वाले चौराहे पर पहुंचा ही था कि उसे किसीके जोर से चिल्लाकर बोलने की आवाज सुनाई पड़ी और लगा, आवाज परिचित है। सड़क पर पर्याप्त रोशनी नही थी और उसे चेहरा साफ दिखाई नहीं दिया, मगर उसने अनुमान लगा लिया कि सवित्तरी ही है। सवित्तरी के पास खट्टा व्यक्ति अपने बाहरी खाके में किंचित् उचक्का ही मालूम पड़ रहा था, मगर इतना साफ था कि सवित्तरी से उसका परि- चय है। नवित्तरी जिस तरह कुछ सकपकाई और कुपित-सी खड़ी थी, उसे लगा, सवित्तरी की सहमति के विपरीत बुछ हुआ है और वह यह कहता पोड़ा निकट चला आया कि, 'सवित्तरी, क्या बात है, यहां इस तरह क्यों रुको हो? जनार्दन को देखते ही, साइकिल की टेक लिए सड़ा वह व्यक्ति तेजी से अपने को समेटता बैरहना की दिशा में निकल गया। अभी भी कुछ परेदशान-सी सवित्तरी से उसने कहा, "घर वापस जा रही हो या कहीं काम पर जाना है ?" सवित्तरी अव भी नि.शब्द ही खड़ी रह गई, तो उसने धीमे से कहा, "चलो, साथ-साथ चलते हैं।" उसने अनुभव किया कि जाने क्यों अचानक मन में यह बाया कि यदि सम्पूर्ण एकान्त होता, तो वह सवितरी को साइकिल के करियर पर बैठ जाने को कह बैठा होता।
"नहीं, साहेब, आप चलें। आपके साथ हमारा जाना ठीक नहीं।" कहने के साथ ही पहले सवित्तरी का पूरा चेहरा खिन्नता और संकोच से भर गया, और फिर वह तेज कदमों से अपने घर की दिशा में मुड़ गई, बिना उसकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किए ही । घर पहुंचकर रात को सोते वक्त उसने मीता से जिक्र किया तो वोली, "अरे वही वच्चालाल होगा। सवित्तरी से शादी करने को दीवाना है । सुना है, यहां तक कहता है कि 'सवित्तरी, हम बच्चालाल नाम ऐसे ही नहीं रख लिए हैं, तुमसे बच्चा बनाने की खातिर रखे हैं।' उम्मीदवार तो और भी बहुत-से हैं..." "उस साले लोफर की तो चमड़ी खींच लेनी चाहिए थी !" अचानक ही उसके मुंह से निकला और काफी आवेग के साथ । "बड़ी हिर्स महसूस होने लगी तुम्हें, वात क्या है पंडित? आप तो बिल्कुल प्रतिद्वन्द्वी-भाव से भर गए हो?" हालांकि मीता ने शुद्ध विनोदभाव से और हंसते हुए कहा था, मगर वह थोड़ा खिसिया गया । "सुनो, आप किसीसे उलझने के चक्कर में न पड़ना । ये पहाड़ नहीं है, भैया ! यहां तो महा छुरेवाज किस्म के लोग रहते हैं।" "मैंने सवित्तरी को इस तरह चिल्लाकर बोलते पहली बार सुना..'' "अरे, सुनीन के बाबू, जितनी और जैसी वह हम लोगों को दिखती है सवितरी, सिर्फ उतनी नहीं है । वह खुद एक दिन कह रही थी, 'शक्ल से हम भले ही दब्यू दिखती होंगी, वहूजी, मगर बस्ती के लोफरों की अभी ये मजाल नहीं कि कोई छू दे । कुत्तों की तरह पीछा भले ही कर लें ।' 'मुझे तो यह लड़की एक समस्या मालूम पड़ने लगी।" "तुम्हें क्या लगता है, मीता, वह बदमाश किस्म की लड़की है ? तुम तो बड़ी पैरवी करती रही हो उसकी ?" "खैर, गुवहा कर लिए जाने का डर न होता, तो तुम भी पैरवी ही करते होते, पंडित !" मीता ने उसके माये पर आए बालों को पीछे लौटाते हुए फिर मजाक किया, "बदमाश होती, तो तुम्हें फायदा ही पहुंचा होता ना? मैं - - ८६ / सवित्तरी मीता में हुंगो "प्रतिमान "अरे. तो बिल्कुल दूसरी बात कह रही थी । इस सड़की 'ईगो' है। कहती है, जैसे-तैसे आदमी से शादी कर नहीं अन्धा । चलने-फिरने, खाने पहनने में ही नहीं दे वरतती है वह ! उसकी बहन गनेशी है, उसमें कह मुझे शुरू से ही जाने क्यों लगता आया है कि क की उपज तो नहीं ? मोहल्लेवालियों में कुछ खुसर "कभी-कभी तो, मीत्ता, तुम भी शब्दों का ऐता पानात करता हो कि गेहूं-धान की उपज नहीं हुई, आदमी की उपज हो गई।" "उपज सबकी सृष्टि के नियम से ही होती है।" "बस, बस ! अब बहुत मंडन मिश्र की घरवाली न बनो..." पंडित, मैं मंडन मिश्र को घरवाली बनूं, न बनूं मगर तुम कहीं बच्चा- लाल न बन जाना !" कहते हुए, मोता ने करवट बदल ली और बड़ी देर तक हंसती हो रह गई। "सुनो, मीता. इस सवित्तरी ससुरी को लेकर तुम हमेशा मेरी टांग खींचती रहती हो.." "दववाती भी तो हूं।" मीता की आवाज उसके सारे अस्तित्व को तेज और तीसी हवा की तरह झकझोर गई। "वो तुमने तो खुद कहा था "मैं तो मजाक कर रहा था।" "ओहो, तुम तो बच्चों की तरह नाराज होने लगते हो, पंडित !" कहती हुई वह उसकी ओर पलटी, तो पाया कि वह दूसरी तरफ करवट बदल चुका है। बोली, "अरे, तुम थके-मादे आए थे। तुमने मुझसे कहा था, मैं सुनील को दूध पिला रही थी, मैंने सवित्तरी से कह दिया ।"और मैं देख तो रही थी, सिर्फ घुटनों तक ही तो दबाया था वैचारी ने !"दूसरे दिन बहुत शर्मिदा हो रही थी कि 'बहूजी, आप सोचती होगी, कैसी बेशरम लड़की है ! एक बार को ये भी न कहा कि वहूजी, हमसे न होगा। क्या बताएं, हम भूल ही गई। साहेब इतने भले आदमी है...' मुझे ऐसा लगता है, तुम उसके लिए प्रतिमान बनते जा रहे हो । "कल्पना-पुरुष !" .
"नहीं, , कहने के , 1 में सिर्फ शरारत है, यह उसे स्पष्ट लगा। ? किस बात का प्रतिमान ?" पंडित, यही कि काश, मेरा दूल्हा भी ऐसा ही हो। सुबह हा-धोकर, स्वच्छ धोती पहने, नंगे बदन पर पीली, उज्जर जने रण किए पूजा की चौकी पर बैठा हो, तो ऐसा लगे, जैसे सूरज भगवान अपना धाम त्यागे भगवती की पूजा कर रहे हों... "इधर तुम बहुत ही ज्यादा शरारती हो चली हो, मीता ! खूब मजाक भर f वना लो..." में खड़े हुए । तुम्हारे गोरे "अरे, पंडित महाराज, ये मैं मजाक नहीं बना रही हूं, सवित्तरी के शब्दों को दोहरा भर दे रही हूं।''तुम्हें याद है, जब मां-बाबू आए हुए थे और संगम नहाने सवित्तरी भी हम सबके साथ गई थी?" उसने कुछ जवाव नहीं दिया । करवट लिए पड़ा रहा। "वहां तुम सूरज महाराज के उगते-उगते, कमर तक पानी में खड़े और अंजलि में फूल लिए सूर्य-नमस्कार की मुद्रा थे वदन पर स्वच्छ पीली जनेऊ धनुप पर की रेशमी प्रत्यंचा मालूम पड़ रही थी। और मेरे साथ नाव पर बैठी सवित्तरी तुम्हें एकटक ऐसे देख रही थी, जैसे तुम्हारी छवि को गगाजल की तरह अपनी आंखों में भर लेना चाहती हो..." "ये सब तुम ठीक नहीं कर रही हो, मीता ! उस परायी जवान लड़की । लेकर इस तरह की बातें करना ठीक नहीं । और हालांकि मैं मानता हूं ये सारी बातें तुम विनोद में कह रही होगी, मगर कभी-कभी आदमी +९ इस तरह की बातों का बहुत अस्वाभाविक प्रभाव पड़ता है। "तुम मुझसे अलग नहीं हो और इसीलिए मैं कह सकता हूं कि उस लड़की को लेकर अफसोस महसूस करने की बात जहां तक है-हां, मैंने इस तरह की कमजोरी महसूस की है । सचमुच कितना दुखदायी होता है गरीव घर की सुंदर बेटी का जीवन, यह अब अपनी आंखों के सामने है, मीता ! मैं ये बात दोटूक कहना चाहता हूं कि दूसरों के घर चौका-बरतन करते जितनी सामान्य यह लड़की नहीं । और विश्वास मानो, मीता ! मैं बचना चाहता रहा हूं। मैंने बचने की कोशिश की है। मैंने एक लम्बे विराम के बाद ८८ / सवित्तरी . . तुम्हें फिर से पाया है और अब में कोई बात ऐसी होने देना पसंद नहीं करूंगा, जिससे तुम्हें तकलीफ हो और न यह कि जीवन भर के लिए मन में यह पश्चात्ताप रहे कि गरीब को वेरी से ज्यादती हो गई।" "अरे पडित, आप तो ऐसे सफाई देने लगे जैसे सक्त्तिरी वरमाला लिए आपके सामने खड़ी-~~'आओ, प्रियतम ! आओ, प्रियतम !'पुकार रही हो ! मीता ने उसको पीठ की तरफ से ही अपनी बाहों में भर लिया और थोड़ा- सा अंतराल देकर बोली, "येकार ही इतना भावुक होने लगते हो तुम । जो तुम नफाई के तौर पर बन रहे हो, मुझे इन सारी बातों का भीतर से इत- मीनान है। तुम्हें मुझसे सवित्तरी प्यारी हो सकती है, यह कल्पना भी कही मुझमें हो सकती है ? मैं तो क्स, तुम्हें थोर नजर रखते देखती हूं और मजा लेती हूं।" इस बार जर्नादन तेजी से उसकी ओर पलट गरा, ''तुम्हारा यह मजा लेना कहीं तुम्हें भारी पड़ गया तो..?" "बच्चे हो तुम । पति का विश्वास प्राप्त हो तो फिर उसका किया कुछ भी औरत को भारी नहीं पड़ता । पुरुप की निष्ठा का केन्द्र मेरे अलावा कहीं नहीं, यह आश्वस्ति मन मे हो, तो उसकी नजरों का केन्द्र कोन है, यह फिक जाती रहती है। इसके बाद पति जो भी करता है, यह अकेली औरत".." "नजरों का केन्द्र बदलने के साथ-साथ निप्टा का केन्द्र भी तो बदल सकता है, मीता!" "नहीं, मैं निष्ठा को ऐसी ढलवां चीज नहीं मानती । औरों को छोड़ो, लेकिन अगर तुम्हारी नजरों का केन्द्र कहीं और हो जाए, तो मैं इसे तुम्हारा नहीं, अपना जुर्म मानूगी।" "ऐसा क्यों?" "ऐसा इसलिए कि जिस निष्ठा के साथ तुम मुझे लाए हो, उससे तुम सिर्फ तभी फिसलोगे, जब मैं तुम्हें अकेला छोड़ दूंगी। पली होना अगर पुष्प की मंगिनी होना है, और बगर अपने साथी के डूबन-उतरने में अपना खुद का बना-उत्तरना भी शामिल नहीं, तो फिर ऐसी शादी से तलाक अच्छा है। मैं दूसरी बात कह रही यो। पति-पलो में तेरा-मेरा नहीं, त्रिनी - - - मारा चलता है । विधाता की इस सृष्टि को कोई क्या करेगा, जनार्दन ! सारे बंधन बाहर के हैं, भीतर के नहीं। मेरे लिए तो आश्चर्य की-कह सकती कि परितोप की भी बात यह है कि तुम रस्सी से बंधे बछड़े की तरह टुकुर-टुकुर ताकते-भर रह जाते हो और मुझे तुमपर दया आने लगती है । और विश्वास मानो, अगर मुझे यह अंदेशा ना होता कि बात आगे बढ़ने पर दूसरी तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं, तो मैं तुम दोनों को और निकट आते देखना चाहती "तुम, शायद, यह महसूस नहीं कर रही हो, मीता, कि बहुत 'एवनार्मल' किस्म की बात कर रही हो, तुम !" "एक लम्बे वक्त तक तुमसे फासले पर, और तुम्हारी इस उपज के साथ, रहने के दिनों तुम मुझे~मैं क्या बताऊं कि कितने याद आते रहे हो। साथ थी, तव न हो पाया। फासले पर हुई, तो मेरा औरत होना मेरे ही भीतर इकट्ठा होता गया, सुनील के वाबू !..'जव तुम मुझे वापस लेने आए थे, तुम जो खुद कह रहे थे कि शंकित और चौकन्ने थे-मैं तुम्हें लगा तार आंखों से छान रही थी। तुम्हारे बोलने को भी आंखों से देखती थी मैं । रास्ते में मेरे गुम-सुम रहने से तुम दुविधा में थे और मैं इसमें, कि यह बंधा जल सबके सामने न फूट पड़े । तुम सोच सकते हो कि इस कल्पना से मुझपर क्या बीती होगी कि हो सकता है, अब तुम कभी मुझे अपने पास न बुलाओ ? हो सकता है, और दो-चार साल तक मुझे यों ही मायके में छोड़ देते तुम? और हो सकता है, आखिर में झख मारकर खुद तुम्हारे पास चली आती "मगर विश्वास करो, मैं फिर यह आज की मीता न होती। मैं तुम्हारे साथ होती, मगर फासला हमेशा बना रहता और फिर तुमसे अपना बुरा कभी होता, तो वह सिर्फ तुम्हारा किया होता।"तुम्हें याद है, मुनील के बाबू ! यहां पहुंचने की पहली रात हम लोग उजाला होने पर सोए थे। कितना बोली थी मैं उस दिन ? कमरा भर गया लगता था ।" "आज भी कुछ वैसा ही इरादा दिखाई दे रहा है..." जनार्दन । मुस्वाराते हुए कहा, तो मीता ने छोटी बच्ची की तरह अपना सिर उसव छाती से टिका दिया, "वस, अब नहीं बोलूंगी।" - - ६०/ सवित्तरी ऐसा कतई नहीं है कि सुबह, इस वक्त, वह दूर से बाती सवित्तरी को देखने के बाद 'दुर्गा सप्तशती का पाठ शुरू करता हो। और सवित्तरी के बारे में तो खर, यह सोचना ही नहीं चाहिए कि वह ठीक इसी क्षण पूर्व- नियोजित ढंग से उपस्थित होती होगी। लेकिन, संयोग ही इसे कह लिया जाए कि इघर यह देवी-स्तुति में होता है और उधर से वह प्रकट होती . उसे तुरन्त यह भी याद मा गया कि कल शाम उसके साथ चलकर पहुंचा देने के प्रस्ताव को सवितरी ने दोटूक टाल दिया था और इस बात पर मीता' का कहना यह था कि बच्चालाल ने उसपर यह लांछन लगाना शुरू कर दिया है कि वह पहाड़ी मास्टर के चक्कर में पड़ी हुई है। सवित्तरी रोज की ही तरह, आवाज न करते कदमों से बरामदे में बिके कट्टे पर पांव पौरती भीतर चली गई। उसने सब साफ-साफ अनुभव किया कि दुर्गा सप्तशती के पाठ में अन्दर चली गई सवित्तरी के बारे में सोचना भी जुड़ गया है । पहलै सवित्तरी के आने के कतई नहीं था कैसे कहे, मगर अब तक शायद सिर्फ हवा की-सी शकल में था । अनुभव होता था, दिखता नहीं था, मगर इस वक्त जंगल में की धुंध की तरह उग आया है। कल अन्त-अन्त में क्या कहा था मीता ने कि आदमी का जीवन तिलस्मी किस्म का है और निहायत गए-बीते आदमियों के जीवन में भी कुछ न कुछ ऐसा हमेशा बना रहता है कि जिजीविषा वुझती नहीं। उसने फिर दोहराया था कि 'अब हमारे वावू को ही ले लो..' 'तो तुम क्या वैसा ही तिलिस्म अपने यहां भी खड़ा करना चाहती हो?' उसने मजाक किया था और मौता ने निहायत इतमीनान से कह दिया था कि 'नही, वैसी नौबत हमारे यहां नहीं आएगी। वाबू और तुममें फर्क है । तुम मेरे बाबू पर नहीं, अपने ही वाव पर गए हो !' किसी तरह पाठ निवटाया उसने, मगर यही अनुभव किया कि सप्तगती का पाठ अब पहले जैसा किताबी-भर नही रह । संस्कारों के चलते, वह काफी ग्लानि अनुभव करता है, मगर अब उसे अक्सर देवी-प्रतिमा ठीक वंसा ही रूपाकार ग्रहण कर लेती-सी प्रतीत होने लगती है, जैसी-और जिन - में, पायों में--यह स्तुति कर रहा होता है । हे जगदम्बा, कोसी है यह तेरी मोहिनी माया-पत्थरों पर दूध की तरह उगती हुई-सी ? कहां, मन के किस कोने में यह कोरी जगह थी, इस सचित्तरी नाग की लड़की से साक्षात्कार से पहले ? कितनी-कितनी वर्जना गौर अन्तर्वाधाओं के कांटों के बीच फूल-सा सिलता और सारे अस्तित्व में एक अबुन, गन्ध विरोरता हुआ-सा यह अपना नर होना ? मीता क्यों कहती होगी कि 'जब तुम उस दिन गंगा की धारा में सूर्य को अध्यं देने पड़े हुए थे."तब तुम्हें सवित्तरी...' तो जो पल दोटूक इनकार इसने कर दिया, वह सिर्फ अपनी और जनार्दन की बचत के लिए था और मन में राग कहीं जरूर है ? कितनी बार, एकान्त यह भी मन में आया है कि सचित्तरी को घर को काम पर से अलग कर देना ही ठीक होगा, मगर ऐसा तय कर लगने के क्षणों में ही अपनी मोहास्तता ज्यादा साफ दिखने लगती है। जाने क्यों मन में एक लहर-सी बार-बार उठती है कि जैसा राग उसके मन में है, वैसा ही अनुराग-पर्यादा और विवेक से बंधन-पाहीं सवित्तरी गोभीतर भी सच- गुच है या नहीं ? उसके चले जाने के बाद फिर कभी यह अवसर न होगा कि इस सनातन फिस्म के राग को जाना जा सके, जो सामने से दर्पण, और पांवों के निकट के जल में समान रूप से प्रतिविम्बित होता है। कभी-कभी सवितरी ठीक उसकी आंगों के सामने होती है-औरत- ६ शीशे की तरह ! भाभी-भी सवित्तरी ठीक थोड़े-से फासले पर होती है, जैसे पांचों की पहुंच के आस-पास की झील हो ! सवित्तरी ने 'साहेब, बहुजी चा पीने को बुलाती हैं ।' पाहा और सुनील को ठीक से संभालते हुए अपने कंधे पर कर लिया, तो यह एकबारगी अच- रचा गया । उसे लगा, सवितरी ने जो कुछ कहा है, यह फासले पर से नहीं. बेल्गुल बांह पगारकर पहा है । रापितरी फा पलना ही नहीं, स्पर्श करना भी कितना वेआवाज और न्तुिलित होता है, यह गुब जानता है। उस दिन के, पिण्डलियों पर के वित्तरी की अंगुलियों को स्पर्श अभी गए नहीं हैं। व्लंगा-बोर्ड की ऊपरी 'तह पर की सफेद यडिया की लिखावट को यह 'उस्टर' से साफ करता - ६२ सहित
रहता है। लड़की के भीतर काही पुगलिया हो तो, उसे मिलने
उपाय होगा?
दूसरों से यहां तक कि सास आपसी समझदारी और
वाद भी मीता तक से-छिपा लेना शितना औक हो, और साथ
सुद अपने से यह अनुभूति अन्यत्र यहाँ से गारपिाएकि विलियो
पर के वे सारे सशं काठ के भीतर की लिलाहोपए है ! भाग MIh
वस्था में मिट जाएं, जब त्वचा हड्डियों से जा सगती है और पीप सा
जीवन-रस विलीन हो चुका होता है ? और फिर भी गही, तो पागद, मस
देह के अन्त के साथ
भीतर पहुंचकर, वह चाय पीता रहा, गगर महरा सगातार हो l
रहा कि उसकी मानसिक अस्त-व्यस्तता मीसा रो fiyी मही रहेगी। 1
। रात वह फिर देर तक मीता से यातचीत करेगा।
"साहेव, चा और लेंगे?"
सवित्तरी का पूछना जैसे किसी पोटली में मंग पण कामात
कलाई पर या गया और उसे लगा कि हाथ की प्यासी Inminthali
है।
किसी तरह 'नहीं, बस कहना वह उठा और एटीपी
टोकरी उतारता वाहर निकल गया।
पता नही, मीता सचमुच हमी या नही, मगर Jinner
आने तक यही लगता रहा कि मीता का पिलखिपाना fift
पिल्ले की तरह दौड़ा चला आ रहा है।
११ जून वीत चुकने पर स्कूल खुले तो मीता ने कहलवा दिया कि अब वह बच्चों को पढ़ाने नहीं जाएगी । रात को स्वयं छोटी-सी मेज चारपाई के आगे लगाकर, रोज की ही तरह दोनों कुछ देर साथ-साथ बैठे काम करते रहे। सुनील में यह अच्छी आदत है कि जहां उसने रोटी खाई थोड़ी-सी और दूध पिया, बस, थोड़े-से क्षणों को मीता ने उसे अपने वक्ष से लगा लिया और वह गहरी नींद में । इस चारपाई से उठाकर दूसरी में सुलाओ, वह जागता नहीं। एक बार तो नींद में चारपाई से फर्श पर गिर गया था और फिर भी चुप पड़ा रहा था । वे दोनों समझे थे कि सिर पर चोट आ जाने से अचेत हो गया है, मगर वह सिर्फ नींद में था। 'वेटा तो खूब सोता है, मगर वाप की नींद हराम हो गई है ।' कहते हुए, तव भी मजाक उड़ाया था उसने । बोली, "तुम्हारे रिसर्च-वर्क को देखते-देखते अब मेरा भी जी 'रिसर्च' को होने लगा है।" "किन सब्जेक्ट पर ?" "लोग 'चैरिटी विगेन्स फ्राम होम' कहते हैं । मैं कहूंगी, 'रिसर्च विगेन्स फाम होम !' मैं 'मनु य की आदिम वृत्तियां और सामाजिक बंधन', याकि 'इससे कुछ मिलते-जुलते टॉपिक पर..." "निगम साहब को मैंने बताया कि तुम अब कुछ अरसे तक स्कूल नहीं - आना चाहती हो । यो वजह पूछने लगे, तो मैंने कहा कि भाप लोग जानरो ही हैं, मगर महा खूसट आदमी है, यकता पला गया कि नहीं, भट्ट साहब, मुझे कुछ मालूम नहीं । कही बहनजी नाराज तो नहीं ? सेलरी कम होने की शिकायत तो नहीं कर रही थी ?'."आखिर भय मारफर मैंने बताया तो कांग्रेच्यूलेट करने लगे और फिर अपनी गंजी गोपड़ी गुजलाने के याद बोले कि 'मिस्टर भट्ट, मेरी एक अर्जी बहनजी थे दरबार में लगा दीजिए। कहिए तो लिखकर दे दूं। बस, सिर्फ जुलाई-भर बहननी आ जायें और चाहे वलास ना लें-प्रिसिपल वाले कमरे में बैठी रहें । लोगों को पता पाला, वो स्कूल आना बंद कर चुकीं, तो इससे हमें नुकसान पहुंचेगा। में एडमिदारा का महीना है। यह भी कह रहे थे कि अभी तो प्राइमरी-पीरियर ही पण रहा होगा।" "टिपीकल आदमी हैं मिस्टर निगम !"जहां तक मैं रामभीर औरत- खोर के रूप में वह यों ही कुछ ज्यादा बदनाम है। युछ मीर गगी होती हैं कि जानबूझकर सुद कांटा निगलती हैं और आदमी को ग मुगालत में हाले रखती है कि उसने फंसा डाला। उनका यास्ता गेगी ही औरणों में पड़ा होगा । मुमसे याज तक कभी ममभ्यता का रती-मर भी कोई याय नहीं किया । और हां, वात तुमने "विएट' कर दी। कहाँ मैं रिगय.." "तो तुम जानोगी जुलाई-भर को ?" उमने फिर यात काट दी। "मैं तो, मजबूरी न होती, पर बैठना कतई पमर न करती। नया कर सकने की गुंजाइश होने पर भी लोग घर में पर रहे, मी पर भारी होना जाता है । मगर मेढकी की तरह पैट फुलाए योगों के बीच में मना" "अरे, उस कन्या पाटगाला में चार लोग है कहा : गिफ बफ धीर मास्टरनियां-दाइयां ! लोगों नाम पर मि बाग में है और गा." "इतनी अक्ल तुममें होती दो मदों को ही मा न बना दिया होता मग. वान ने ? बड़ों के देखने से भी मुले नो बच्चों का देगना ज्यादा रना है। धौर नहल और निशामा-भाव में देखते हैं पञ्चे और फिर आग में टिप्पणी करते हैं तरह-वाह मे कि 'हमारी मिटटी की नी नीर मार निकन पाई है। पाकि "मिस्टरजी मारकल बहुत ज्यादा माल या पनी हैं।'डान ऐमी ही विननी शरारत-मरी बा । इन नियमी' - होते हैं। लेकिन जुलाई-भर चल सकता है । अभी सातवां लगा-भर है, मगर क्लास मैं सचमुच नहीं लूंगी।" "क्लास तो मेरी ले लेना तुम' "तुम्हारी क्लास लेते-लेते ही तो यह नौबत आती है !" कहते हुए मीता उसकी पीठ से लग गई। जुलाई बीतते ही मीता ने स्कूल जाना बन्द कर दिया, किंतु इसी बीच उसने भगततारन गर्ल्स डिग्री कालेज के लेक्चरर-पद के लिए निकली 'वांट' के सिलसिले में आवेदन भी कर दिया। "मैं उम्मीद कर रहा हूं कि अक्तूबर-नवंबर तक अपनी 'थीसिस' पूरी कर लूंगा । जरा एक चक्कर इस बीच लमही तक का लगा आना होगा। दो-चार दिनों को वनारस रुक जाऊंगा । जीवनी-खंड अप-टु-डेट कर लेना है । नवंबर तक..." "एक थीसिस' तो तुम्हारी अक्तूबर में ही 'कम्प्लीट' हो जाएगी..." "बच्चों के बारे में तुम स्त्रियां ऐसे बातें करती हो, जैसे अकेला वही उल्लू का पट्टा जिम्मेदार हो।" "लेकिन सवित्तरी कहती है कि इस बार उल्लू का पट्ठा नहीं, पट्टी आनी चाहिए...!" मीता जोर से हंसी, तो वह सिर्फ देखता रह गया। "सवित्तरी कहती है, इस वार लड़की होनी चाहिए। कहती है, साय- साथ लड़के होने से..." "उसे बड़ी फिकर है तुम्हारी।" "ये तुम जानो, किसकी ज्यादा है, मगर आज अरसे-बाद जिक्र चल पड़ा है फिर उसका, तो एक बात बताऊं। हमारे मकान-मालिक ने वह बता रही थी-उसे कहा है कि 'सावियो, कहीं किसी का प्रेम में तो नहीं पोड़ गया रे ?.."तुमने खुद गौर नहीं किया, उसमें काफी परिवर्तन आ गया है ?" "तो मैं क्या करूं?" "खीमत क्यों हो? कहीं ऐसा न हो कि वह सचमुच किसीके प्रेम में - १६/ सवित्तरी पड़ गई हो?" "नहीं, नहीं, कहो कि 'तुम्हारे प्रेम में पड़ गई है।' भली औरत हो तुम भी, भई ! समझदार औरत वो, जो दूसरों की परछाई से भी बचाती हो, मगर तुम हो किसी न किसी बहाने उसका जिक्र निकालकर, मजा लेने लगती हो।" 'लेने कहां देते हो तुम । जमींदार पंडित होते तुम, खूब लम्बी-चौड़ी खेती-बारी होती तुम्हारी, तो मैं भी खेल खेलती होती। लोटे में की मछली उछलेगी, अपनी ही पूंछ तोड़ेगी । मगर मैं बात तुमसे यों ही नहीं कह रही थी । सवित्तरी खुद बता रही थी कि राधाभवन वाली तरफ जिन रेलवे वाले तिवारीजी के यहां काम पर जाती है दोनों वहन-उनका लड़का उसपर डोरे डालने की कोशिश करता रहता है । बता रही थी कि कोई चिट्टी भी लिखी थी उसने, जिसमें शायरी-वायरी भी कुछ थी।" "तुमने अपने पढ़ने को मांग लेनी थी सवित्तरी से ! पुराने दिनों की याद ताजा हो जाती।" कह तो गया जनार्दन, मगर तुरन्त सहम गया कि कहीं इसे विनोद की जगह अपने ऊपर आरोप न समझ ले मीता। उसका चेहरा उतर गया। "तुम बेकार उदास हो रहे हो। मुझे बुरा नहीं मानना है । तुम तो खालिस मजाक में कह रहे हो-गुस्से और हिकारत में रह रहे होते, तो भी मैं सिर्फ सुन लेती। यह बात तुम्हें मैंने खुद बताई थी और बताकर हर तरह के अफसोस से मुक्त हो गई।" कहते हुए, उसकी सकपकाहट पर मीता धीरे से मुस्करा-भर दी, तो वह कुछ और हतप्रभ हो गया। बोला, "मीता, कभी मेरे मुंह से कुछ अनुचित निकल भी पड़े, तो उसे तकलीफ पहुंचाने के लिए कहा गया न मानना, प्लीज !" "पंडित हो, 'कृपया' कहते, तो ज्यादा अच्छा सुनाई पड़ता।" मीता हंस पड़ी। थोड़ी देर दोनों चुप रहे । अन्तिम घूट पीकर, चाय की ..ाली के किंचिद जोर से रखे जाने की आवाज कमरे भर आए सन्नाटे में साफ- साफ सुनाई दे गई। मोता उठी और चाय की खाली प्यालिया उठाकर, रसोईघर में - .
. भाई। "सुबह ही घोऊंगी। आलस आने लगा। कुछ तो मैं मायके से ही आलसी थी, कुछ इस सवित्तस्ने ने हाथ-पैरों को जंग लगा दी। लोकापवादों की फिक्न न होती, तो मैं इसे हमेशा-हमेशा को साथ रख लेती। बड़ा आराम देती मुझे।" कहती मीता छत की ओर मुंह किए अपने विस्तर पर लेट गई, तो उसका मां होना जैसे एकाएक उसकी सम्पूर्ण देह पर उदित हो आया। "हद औरत हो तुम ! कुछ सामंतों-राजाओं के किस्से तो सुने थे कि उन्हें अपनी रानियों के लिए पुरुप रखैल रखने का शौक हुआ करता था। तुम, मीता, इस प्रसंग को अव स्थगित ही करो, तो अच्छा है। शिवचरन तो कभी-कभी तुम्हारे पास आकर बैठता है, उसे कहो, जल्द से जल्द शादी कर दे उसकी । मैं देख रहा हूं, जब तक उसकी शादी नहीं हो जाएगी, तुम खुद उसे हटा नहीं पाओगी।" "आदमी तो, खैर, तुम पंडित हो। बहुत दूर तक की सोचते हो । सोचते होगे, एक बार शादी हो जाए सवित्तरी की, तो फिर डर नहीं रहेगा ? बहूजी से मिलने तो वह आया ही करेगी ?" "अव छोड़ो, भई ! ये पेज तो पूरा कर लेने दो। तुम तो जाने क्यों रोज सचित्तरी-पुराण लेके बैठ जाती हो।" "क्यों, तुम एक दिन खुद नहीं कह रहे थे कि ऐन मेरे दुर्गा-पाठ के वक्त मा पहुचती है ?" "तुमने न किया हो, मगर मैंने इरादा किया था कि शिवचरन को पहूंगा। मगर फिर संकोच में पड़ गया कि मैं कौन होता हूं । उसका बेटा तो यहां से कहीं चला ही गया।" "सवित्तरी कह रही थी कि 'बाबू साहेब के समझाने का उसपर बहुत गहरा असर पड़ा है, बहूजी ! रात घर आया तो चेहरा उतरा हुमा था। बहुत गुमसुम, खोया-लोया था। सुबह देखती हूं कि विस्तर पर नहीं।' क्या कह दिया था तुमने उससे ?" "लड़का वह गैरतमंद लगता था, बुरी सोहबत में पड़ गया। मैंने यही समझाया कि 'तुम दो बहनों के बीच के भाई हो, कभी किसी लम्बे चक्कर . ! - अडा में फंस जाओगे, तो जिन्दगी गारत हो जाएगी। बीमार और गरीव दाप, सयानी होती जाती बहनों को कुछ फिक्र करो। खैर, इतना तो कह सकता हूं कि वह लड़का घर से निकल गया है, तो ये उसके हक में ठीक ही हुआ है । मुझसे वह कबूल कर रहा था कि साइकिलों के फ्रेम के डण्डों बनाने वाले गिरोह की सोहबत में भी वह आ चुका." "ये अद्धा क्या बला है ?" "अरे देशी पिस्तोल, और क्या। वह बताता था कि साहेब, पुलिस वाले तक खरीदते है।" कुछ देर दोनों चुप रहे । जनार्दन ने कागज-कलम समेटकर रख दिए। "आज दुवारा चाय नहीं पियोगे ?" "रहने दो, मीता ! आज सिर्फ थोड़ी देर पढू गा, वस!" वह उठी और रसोईघर की तरफ चल पड़ी। उसने गौर किया कि भीता के चलने में आयु के परिवर्तन को वह, इस वक्त, पहली बार महसूस कर पा रहा है । सुनील के वक्त तो वह शुरू के दिनों में ही मायके चली गई थी और फिर लगभग तीन वर्ष वहीं बीत गए। कैसे अपनी आंखों के सामने भी जीवन अबूझ-सा वीतता जाता है । इतने दिन मीता यों ही सामने रही, मगर इसको चलते देखकर किसी गभिणी मृगी को देखने की सी अनुभूति इससे पहले कहां हुई । मीता की रसोईघर से वापसी को भी वह वैसे ही देखता रहा। उसे चाय देकर, मीता अपनी चाय लिए दूसरी चारपाई पर बैठ गई। "बहुत दूर बैठने लगी हो मीता।" उसने सुनील को ठीक से करवट करते हुए कहा, तो मीता ने धीमे से सिर्फ इतना कह दिया, "बहुत नजदीक आने की वजह से ही।" कहीं उस तरह का कोई सकेत नहीं था, मगर जाने उसे क्यों लगा कि इस बात से भी सवित्तरी जुड़ी हुई है। "मीता, आज मैं तुमसे इस लड़की को लेकर, कुछ दोटक बातें करना चाहता हूं और तम मजाक में लोगी, तो अच्छा न होगा। खास पर . बच्चालाल वाले प्रसंग के बाद मुझे लगातार यह लग रहा है कि कभी वेकार की फजीहत न उठानी पड़े। मुझे अब समझ में आ रहा है कि मेन- रोड पर पान की दुकान पर खड़ा वच्चालाल अक्सर मुझे क्यों घर-घूरकर देखता है। हो सकता है, उसका शक कभी यकीन की हद तक जा पहुंचे ? ये निचले तबके के लोग मध्यमवर्गीय लिहाज और दव्यूपन के कायल नहीं होते। यो भी, मीता, हम लोगों की छोटी-सी गृहस्थी है । तुम्हारी वापसी ने इसको शुरू किया है और अभी हमें अपने-आपको ठीक से व्यवस्थित कर लेने में ही कुछ वक्त लगेगा।" "लगता है, तुम स्त्री को लेकर उत्पन्न होने वाले द्वन्द्वयुद्ध से डर गए हो?" "तुम तो, मीता, फिर मजाक में ही ले रही हो वात को। तुम अपने अनन्त किस्म के अनुराग में से मुझे देखती हो, वाहर के लोग नहीं देखेंगे। अध्यापकी का पेशा ऐसी चीज है कि इसमें बदनामी की हवा सिर्फ तक- लीफदेह ही नहीं, नुकसानदेह भी सिद्ध होती है । अब तुमसे क्या छिपाना, इस सवित्तरी के प्रति जाने क्यों, आकर्पण तो मैं महसूस करता हूं और इस वात को कह ले जाने की छूट तुमने दी है। मगर तुम्हारे इस संशयहीन विश्वास ने ही मुझे और ज्यादा सावधान कर दिया है कि-जनार्दन, अपने सिर पर चील की तरह लगातार मंडराती परिस्थिति से बेखवर रहना ठीक नहीं । कहीं कभी ऐसा न हो कि हम लोग वेवात की फजीहत में पड़ जाएं। अड़ोस- पड़ोस में भी सवित्तरी के यहां लगातार के बने रहने की चर्चा है । अव तो तुम्हें घर पर ही रहना है, इसलिए अब सुनील की प्रोब्लेम भी नहीं रही। कालेज में तुम्हारी नियुक्ति हो जाएगी, तब देखी जाएगी। अभी तो एकाध महीना लगेगा ही । तब तक में तुम्हारी 'डिलीवरी के दिन भी तो नजदीक आने लगेंगे? एक बार ज्वाइन करके..." "तुम्हारी बातें फिजूल हैं, ऐसा मैं नहीं कहूंगी, सुनील के वाबू ! मगर जहां ये दस-ग्यारह महीने निकल गए, दो-तीन महीने और निकल जाने दो। में खुद उसके व्यवहार में ऐसी बंध गई हूं कि 'सवित्तरी, अब तुम हमारे घर न माया करो।' यह कहना मुश्किल हो गया। उसके काम की कुछ ऐसी आदी हो गई हूं:कि मालूम पड़ता है, मेरा सोचा हुआ जान जाती है.। मैं - - इधर इरादा करूंगी कि अव माज दाल नहीं, कढ़ी बननी चाहिए और पता चलता है कि 'वह सुद पूछ रही है कि बहूजी, माज कढ़ी बनायेंगी क्या?" गणेशी मदारी की बंदरिया है। सोंटा ठकठकाते रहो, वह नाचती रहे। बंद करो, बंद । पतीली लाओ कहूं, तो पतीली देगी और फिर मसाला. प्याज-कलधी, संडसी-चिमटा-हरेक चीज के लिए अलग से कहना होगा। सवित्तरी का ये हाल है कि नहाते वक्त भी मुझे यह चिंता नहीं करनी है कि कौन-सा कपड़ा निकला है, कौन नहीं। महीने में सिर्फ चार-पांच दिन नहीं आती है, मैं परहेज करती हूं इस बात का खयाल रखकर, और मैं परेशान होने लगती हूं। मैरा सुस जाता रहता है । शिवचरन से मेरी बातें होती हैं और अक्सर सचित्तरी को लेकर ही होती हैं । इस साल की सदियों में उसकी शादी कर ही लेगा, ऐसा मुझे लगता है। हालांकि एक बार कहता था कि 'बहूजी, हम तो इसके आते ही वेवासरा हो जाएगे। रिको की गद्दी के नीचे आलू-परांठा-अचार-रोटी गनेशी कहां रख पाएगी। बेटी है, परायो अमानत है । नही तो यही कहते कि विटिया, हमें चले जाने दे, तभी तू जाना ।.."इतनी तो सचाई है, सुनील के बाबू, कि वह अद्भुत लड़की है। शिवचरन जैसे गरीब के घर तो वह प्रकृति के चमत्कार की तरह लगती है । हालांकि शास्त्रों में बिल्ली के सामने दही की हांडी करना वर्जित माना गया है, मगर तुमने उसे अभी देखा नहीं है। एक दिन मैंने उससे यही नहा लेने को कह दिया था। मई-जून की दोपहर में कभी। क्या कहूं-मील में की मछली हो जैसे !.."उसका सारा टसका जमींदार पर की बेटियों का सा है, मगर उसके मांजे हुए बरतनों में, उसके लगाए भाड़ -पोंछ में, घोए-सुखाए कपड़ों में मजाल है, कोई जरा-सा भी नुक्म निकाल ले !" "खेर, मर्यादा तो उसमें गजब की है । तुम्हारे कहने पर उसने पांव उस दिन दवा तो दिए मेरे, मगर तुम्हारे सारे-सारे मजाकों के बाद भी मैं एका- स लेने का साहस नहीं कर सकता। जितना कोई औरत वित्ता. भर जबान बाहर निकालकर कह सकती है, उतना तो वह सिर्फ एक पलक गिराने में कह लेगी।" "'स्टडी' तो तुमने उसकी बड़ी 'माइन्यूट' कर रखी है ? आखिर रिसर्च एक उसे ! स्कॉलर हो ना? और वो भी इलाहावाद यूनिवर्सिटी के ! अच्छा, अब मैं तुम्हें बताऊं कि वैसा मैंने शरारतन किया था और मुझे इस बात का पूरा इत- मीनान था कि जिस मर्द को सवित्तरी खुद भीतर से पसंद नहीं करें, उसे स्पर्श कर लेने को आसानी से तैयार न होगी।" "यानी तुम कहना चाहती हो कि वह मुझे भीतर से पसन्द करती है?" "अब कितनी बार कहलवा-कहलवा के सुनोगे, पंडित ! अव तो कल- जुग आ गया, तुम पंडितों की गत विगड़ गई। पुराना वक्त होता, तो दक्षिणा में मिल गई होती।" "मेरे लिए तो वह सचमुच अंतर्वाधा बन गई है और वजह सिर्फ तुम हो, मीता! दूसरी कोई भी औरत इसे खेल खेलने की चीज नहीं मानती।" लेकिन आखिर-आखिर निस्तार इसीमें है, मीता, कि वह दूर हो जाय । समस्या इसलिए है कि तुम्हें भी इतना नोह है उससे । है तो वह निश्चित रूप से प्यारी लड़की । मैं अक्सर उने बहन के रूप में भी देख लेने की कोशिश करता हूं। हमारे समाज की बनावट ऐसी है, मीता, कि इसमें आदमी का जीवन बनने में चाहे जितना लगे, नष्ट होने में वक्त नहीं लगता। खासतौर पर 'प्लेन्स' के शहरों की इन धनी बस्तियों में कैसा दमघोटूं वातावरण रहता है ! अक्सर कितनी मामूली-सी बातों या घटनाओं को लेकर हंगामे खड़े हो जाते हैं, देखती तो हो । जिस तरह और जितनी गंदी जवान में यहां के लोग आपस में वाग्देवी की स्तुति करते हैं..." जनार्दन, शायद, अपनी री में धाराप्रवाह वोलता जाता कि मीता ने वीच में ही टोक दिया, "अरे सुनील के वाबू, इतनी लम्बी तफसीलों में जाने की जरूरत क्या है। जब खुद कहते हो कि 'वहन के रूप में देखने की कोशिश भी करता हूं', तो फिर समस्या रह ही कहां गई? लाज क्या है, सोम? अरे, परसों ही तो रक्षाबंधन पड़ रहा है-राखी बंधवा लेना सवित्तरी बह- निया से?" मीता का खिलखिलाना कमरे में पारदर्शी जल की तरह भरता रहा और वह एक असुविधाजनक खिन्नता में डूबा हुआ-सा वत्ती वुझाकर सुनील की बगल में सो गया। १०२ / सवित्तरी अक्सर रात सोते वक्त, बत्ती वुझा देने के तुरन्त बाद के अंधेरे में मौता का बोलना ज्यादा मुखर हो जाता रहा है, मगर आज उसने पाया कि मीता जल्दी ही गहरी नींद में सो चुकी है। मां बनने की दिशा में जाती हुई यह स्त्री निकट से देखते रहने पर किसी अलौकिक यात्रा में आगे बढ़ती-सी दिखाई देने लगती है। यह मद्धिम-मद्धिम खरटि भरना भी इसका, दस, लगभग एकाध महीने से ही शुरू हुआ है। लाख अंतर्वाधाओं के बावजूद, यह जाने क्यों अपने को सोचने से रोक नहीं पा रहा है कि सवितरी जब कभी मां बनने को होगी, तब उसका रूप कैमा होगा? मान लिया जाए कि वह गादीशुदा होती और ठीक मीता की तरह मां होने-होंने को और जैसेकि मीता ने स्कूल पढ़ाने जाना छोड़ दिया है कि देखा जाना अच्छा नहीं लगता-ऐसे ही सवित्तरी भी एक दिन धीमे से मीता से कह गई होती कि 'वहूजी, अब कल से हम नही आवेंगी, सिर्फ गणेशी आवेगी। काम पर ऐसे में यादूजी के सामने पड़ना अच्छा नहीं लगता "अचानक ही उसने अपने-आपको अंधेरे में के चोर की जैसी मन:- स्थिति में महसूम किया और तेजी से करवट बदलकर, मीता की तरफ पीठ करके सो गया।
१२ - - आजकल मीता स्थूल नहीं जाती, इसलिए उसकी वापसी तक सुनील से बंधे रहने की जरूरत नहीं रह गई। दूसरे जो तीन घर और हैं, उनमें चूल्हा -चौका-भाड़-पोंछा कम से कम सुबह के वक्त का अकेली गणेशी भी निवटा लेती है और गृहिणियों का भीकना बना रहता है कि 'सवित्तरी, तेरा तो अब हवा का सा चलना हो गया । जब तेरी मर्जी हुई, आ गई। नहीं हुई, नहीं आई।' सामान्य दिनों में न सही मगर त्योहार-उत्सव के दिनों गृहिणियां उसे पहले ही सहेज देती हैं कि 'सवित्तरी, कल तुझे भी जरूर आना है।' श्रीमती अग्रवाल ने कल शाम ही जोर देकर कहा था, 'सवित्तरी वेटी, सुवह तुम भी जरूर आना रात को चाहे फिर न आना । रक्षाबंधन के दिन, सारै काम सुवह ही रहते हैं।' अग्रवाल परिवार में काम करते ज्यादा वक्त नहीं हुआ, मगर जनार्दन के घर के अलावा कहीं दूसरे परिवार में जाना थोड़ा अच्छा लगता है, तो फिर यहीं । मुख्य सरोकार तो, गृहिणी से ही होता है और विदादेवी सिर्फ बोलने में ही 'विटिया-बिटिया' नहीं करतीं, वल्कि व्यवहार में भी स्नेह बरतती हैं। दोनों लड़कियां भी सहेलियों के से अपनापे से बातें करती हैं, मगर समस्या की तरह अगर वहां कुछ मौजूद है तो अनुराग--अग्रवाल दम्पति का छोटा बेटा। उन क्या होगी इसकी? यही सवित्तरी के आसपास । ज्यादा से ज्यादा बीस-इक्कीस। सवित्तरी मीता के घर का सुबह का काम जल्दी ही निवटा आई। छोटा परिवार है और अभी अकेला सुनील । जनार्दन को राखी बांधने वही राजापुर वाली वुआ आएंगी और सवित्तरी इसीलिए और भी जल्दी खिसक आई है । अव शाम के वक्त जाएगी, हालांकि मीता बहुत कहती रही थी कि इस वक्त यहीं खा लेना। खाने का आग्रह तो श्रीमती विंदादेवी की ओर से भी है और दोनों लड़कियां जिद करेंगी। गणेशी दूसरी दो जगहों पर जाएगी। गंगवा घर पर रहता था तो कभी इतना ध्यान रहता नहीं था। गरीबों के घर त्योहार भी आता है, तो दाढ़ निकाले आता है। किसी मेले-उले में भले ही निकल पड़े, घर में त्योहार की चहल-पहल जैसी चीज कहां । आज रक्षा-बंधन है, मगर शिवचरन यह कहता निकल गया है कि 'तुम दोनों तो त्योहारी में हीखा लोगी, सवित्तरी ! हम कहींटेशन की तरफ कुछ या लेंगे।' आज वार-वार गंगवा की याद आ रही है । आखों से दूर होकर, ज्यादा नजदीक हो गया है। लगने को हमेशा डर लगा रहता था कि लोफर-उचक्कों की सोहबत में जाने कब जेल चला जाए या टुरेबाजी का आखेट हो जाए, मगर अब घर वीराना-सा लगने लगा। दोनों बहनें एक दिन पहले से ही कैसी तैयारी में लगी पड़ी थी कि कल रक्षाबंधन है । देख-देखकर मन मे हूक उठती थी कि जाने गगवा ससुर कहा होगा और किस हालत में! अनुराग को रंगीन साइकिल पर राधाभवन से मन्त्रीमण्डी की तरफ निकलता देखकर, फिर तेजी से गगा की याद आई है और गायद, उसने अनुराग को टकटकी लगाकर देखा है, इसलिए तो उसे आंख मारने का अव- सर मिल गया। कोई दूसरा होता, सवित्तरी आग हो चुकी होती। इस वनिया छोरे को देखकर, उसे जाने क्यों गस्सा नहीं आता।
चुका। उम्र क्या होगी इसकी, यही बीस-इक्कीस । लगभग हमउम्र है और सूरत- सीरत से कुल मिलाकर बबुआ लगता है । शातिर किस्म के लड़कों की जगह, स्त्रियों को लेकर इसकी आंखों में ही नहीं, बल्कि चेहरे पर की त्वचा पर तक कुछ-कुछ बेवकूफी का-सा भाव तर आता है और अपने काफी मोटे शीशे तथा सुनहरी फ्रेम वाले चश्मे में यह वाज वक्त सचमुच उल्लू का पट्टा नजर आने लगता है। ऐसा यह कई बार पहले भी कर चुका है । विंदादेवी या स्वाति और चिया के कहने पर इसे कुछ देने, या किसी और काम से, वह जब भी इसके निकट गई है, दो-चार क्षण को भी आंखें मिलीं नहीं इससे कि इसने तुरत झपकी ली है। कांइयापन इसमें कतई नहीं होता और सवित्तरी के पेट में हंसी का गोला-सा घुमड़ता है, मगर वह विंदादेवी या स्वाति-चित्रा पर अपना मनोभाव प्रकट नहीं होने देती। अलवत्ता इससे एक बार धीमे से जरूर कहा था कि 'क्यों भैयाजी, आंख में फूस तो नहीं पड़ गई ?' इसने खिसियाकर, अपना मुंह गोलगोल-सा कर लिया था और मुंह फेरकर, सीटी में कोई फिल्मी धुन बजाने लगा था। यों अक्सर यह 'माउथ- आरगन' को लालीपाप की तरह मुंह में लिए रहता है और स्कूल जाते वक्त यदि सवित्तरी पहुंचती है तो संण्डो बनियान और अंडरवियर में होकर कपड़े बदलता है। अग्रवाल ऐने नहीं हैं । सवित्तरी के प्रति उनमें बड़े बुजुर्गों की-सी ही मर्यादा और स्नेह से भरा व्यवहार है, मगर वे इसकी तरह अनुभवों के कोरे नहीं लगते । इसे देखकरतो, बस, पूंछ उठाकर, उछलते-कूदते बछड़े को देखने नुभूति होती है। जनार्दन के आगे खुलकर बोलते शिक्षक होती है, हालांकि ऐसे कई अव- सर आए हैं, जब वह और जनार्दन घर पर एकांत में रहे हैं और मीता सुनील को लिए कहीं पड़ोस में गई रही है। और दोनों में, निहायत औपचारिक तौर पर ही सही, सुख-दुःस की बातें भी हुई है जैसेकि जनार्दन का एक दिन का यह पूछना उसे अभी तक याद है कि 'क्यों सवित्तरी, जब तुम्हारी मां . . - पी-सी १०६ / सवित्तरी मरो, तब तुम्हारी उम्र कितनी रही होगी?' सवित्तरी का भी अभी जिसे दुनिया देख चुकना कहते हैं, इससे गुजरना हुआ कहां है, मगर इतना वह समझ लेती है कि अक्सर आदमी को कुछ ऐसी बातें करनी पड़ती हैं. जो उसके मंतव्य को ढांके रहें। अनुराग से बोलते ऐसा नहीं होता, बल्कि अपने किंचित् अधिक अनु- भवी होने का-सा इत्मीनान महसूस होता है, अन्यथा यांख में फूस पड़े होने की वात ही वह कहां कह पाती? शुरू-शुरू में तो उसे यह भी भ्रम होता था कि कहीं ऐसा न हो कि यह पलक झिरते रहना उसकी शारीरिक वृत्ति ही हो, शरारत न करता हो । वाद में गौर से देखने पर पता चला कि सिर्फ उसीके सामने ऐसी हरकत करता है और यह हरकत करते वक्त उसमें अपने अधिकृत होने का-सा जो भाव होता है, इसीसे यह लगभग उल्लू का पछा लगता है और हंसने को जी होता है। हालांकि गंगा की याद आ जाने मे भीतर कही गहरे में उदासी भर गई- सी प्रतीत होती है. जैसे गोखुर-भर जगह में वर्षा का जल भर आया हो, मगर जाने क्यों अचानक ही उसने तय किया कि अगर इसने कुछ नादानी- भरी हरकत की, तो बख्शेगी नहीं। फिल्में देखने का ज्यादा शौक है या नहीं, यह दोटूक कहने की गुंजाइश नहीं है। कई बार फिल्में देखते हुए ऐसा लगता रहा है कि किसी ऐसी ही दुनिया में उसे भी होना चाहिए था, जहां जीवन परिदों की-सी उड़ान के साय घटिन होता है । जाने किस फिल्म में उसने कभी देखा था कि एक गरीब मजदूर की बेटी की शादी मिल-मालिक के बेटे से हो गई थी और इस फिल्म का उसपर बहुत दिनों तक असर रहा था । गरीव घर की बेटी होने के बावजूद कहीं बहुत अच्छी जगह अपने मनचाहे किस्म के आदमी से शादी हो सकने की सम्भावना-यह सिर्फ भाग्य अथवा कल्पना की ही चीज हो सकती थी और इस तरह के कल्पना-लोकों का साक्षात्कार अपने आसपास के यथार्थ में नहीं, सिर्फ फिल्मों में ही होता था। इस बनियावच्चा को देखकर अचानक जो फिल्मों की याद हो आई है, तो सिर्फ इसीलिए कि यह हर वक्त फिल्मी गाने गुनगुनाते, सोटी या माउथ ऑरगन में धुनें बजाता रहता है । सवित्तरी/१०७ सवित्तरी ने पहले ही अनुमान लगा लिया कि यह वगल में से कबूतर की तरह उड़ता-सा गुजरेगा और थोड़ी दूर आगे निकलकर, फिर पीछे लौटेगा और अन्ततः लगभग परिक्रमा कर चुकने की-सी तृप्ति में होता हुआ, तेजी से आगे निकल जाएगा। सवित्तरी भी तो खुद ही कैसी होती गई है इन दो-तीन वर्षों में। बच्चालाल हो, जनार्दन हो या और कोई-इस तरह के सारे लोग जो भी उसकी परिधि में आते हैं, नदी-किनारे आए हुए-से लगते हैं। एक तरफ असमय बूढ़े और कमजोर हो चुके वाप, निर्वासन पर जा त्रुका भाई और अभावों के बीच अपने वचपन के क्षय से गुजरकर गांठ होती जाती-सी छोटी बहन का विपाद है, जो उथले जलवाले तालाब के सतह पर की काई की तरह हर समय उसके भीतर के मनोलोक को ढांके रहता है ।"और दूसरी तरफ, अपने एक सौंदर्य और तारुण्य में दिपती स्त्री होते जाने का मायावी- पन, जो घर और परिस्थितियों के कंगलेपन के बीच भी झील में की मछली चना डालता है। वह सचमुच कबूतर के-से उड़ने की प्रतीति देता हुआ करीव से गुजरा। फिर वही परिचित धुन सीटी पर बजाते हुए-'अंखिया मिलाके, जिया भरमा के...' मन हुआ कि आवाज देकर पुकार ले कि 'भैया, चले तुम खुद ही जा रहे हो, हम तो यहीं खड़ी हैं।'.."मगर सिर पर आंचल का छोर करती आगे बढ़ गई। वह साइकिल को धनुपाकार घुमाता, ठीक मुंह-सामने आ गया, "हम सब्जी लेने जा रहे हैं, सवित्तरी !" "हम सोचे, ववुआ, सनीमा देखे खातिर चले हैं सवित्तरी ने अपनी बड़ी-बड़ी आंखों को उसके मुखमण्डल पर इस तरह किया कि वह झपकी लेना भूल गया। थोड़ी देर सकपकाए रहने के बाद बोला, 'हमको वबुवा-ववुवा न कहा करो, सवित्तरी !" सवित्तरी ने एक बार दूर आगे तक देखा, कहीं छत पर से तिवारिन या कोई और इधर न देख रहा हो। . १०८ / सवित्तरी "गलती हो गई, भैया जी!" कहते हुए, सयिप्तरी शरारत के साथ भुस्कराई, तो पहले वह कुछ हतप्रभ हुमा, मगर सुरन्त बाद ही वह नितान अप्रत्याशित तौर पर साइकिल पर आगे को झुका और यूआर.मान, आयम थोर डालिंग!' कहता, सवित्तरी देवायें गाल पर मुटी पाटना, तेजी से सब्जी मण्डी की तरफ निकल गया। एक क्षण में जो वात बिजली की तरह रादित्तरी के मन कि कही इस तरफ से भट्ट मास्टर साहब न गुजर रही ! It :- लाल। पहले चारों तरफ देखकर अपने को सायरन का कि कही अपने मुह पर तोते के पांच भर लेन गदै म ६ : डॉ. लगा कि नहीं, इस छोरे को बढ़ावा दना ठीक नहीं। यही अपने नादान दोनों को फजीहत में न डाल से । उसका सोचना मन पर हावी होता गया. पाटार अपने आप तेज हो गई । पर पहुंच जान पर मदिन गनपुरी समय-17- को काम में खपा दिया। बीच में जाने कब विदादेवी ने रसके भाषाहार-र बनना- फिरना, काम करना-सय पुरान वकों के अाधा दौर सवित्तरी!" लोगों के इसी तरह के कहने को मुनती-मुनी दामिन जमीन पर से कार उठती गई है। जिन घरों में काम घर-इन दोनों के बीच के फासले में कहीं बने इं दी बनी रहती है और वह खुद नहीं जानती फिएम सदा टमट अब कहां वह इस वक्त विदादेवी के साथ टीमोटा : कहां यह मन में टीस कि कार, किमी ऐम ही घर की वानी हैं उज्जर कपड़े अग्रवाल साहब पहनते है, इनमें शिवबरट Tre- वाले !' कहकर पुकारने की हिम्मत कौन करता? और कहा दर र चूल्हा-चौका करती उसकी महतारी और कहा में अनी महार में "ज्यादा गदराए बदन और मंतोष-भरे चेहरे वासी विवाददी! सवित्तरीl.
- बड़, चमचमाते कांसे के पाल में राखियां-रोली-अक्षत-फूल.और बूंदी के लड्डू सजाए स्वाति-चित्रा अनुराग को राखी बांधने आगे बढ़ी, तो अत्यन्त विनय के साथ एकाएक ही सवित्तरी ने निहायत धीमे स्वर में कह डाला, "अम्माजी, हम भी बांध लें भैयाजी को राखी ?" विदादेवी ने लगभग चौंकते हुए उसे घूरा. लेकिन अगले ही क्षरण उनके होंठों पर हल्की-सी स्नेह-भरी मुस्कराहट आ गई, "अरे क्यों नहीं। तू यता रही थी कि गंगा कहीं बाहर चला गया? अकेले भाई का आज घर में न होना सभी बहनों को बुरा लगता है। बड़ा श्रीराम दिल्ली में है, सो दोनों वहनें याद कर रही थीं कि लिफाफं में भरकर भेजना एक बात है, भैया की कलाई अपने हाथों में लेते हुए राखी बांधने का सुख इसमें कहां।" स्वाती, तुम लोगों के बांधने के बाद ये सवित्तरी विटिया भी बांधेगी राखी मुन्ना को। ये तो भावना का त्योहार है । इसमें राजा-रंक सब एक हैं। रानी कर्मवती ने तो मुसलमान राजा को राखी भेजी थी..." विदादेवी बोलने पर आती है, तो भव्य होतो चली जाती हैं । "जा, हाथ धो ले । अभी इतनी लोइयां बहुत हैं ।" कहते हुए विदादेवी ने उसे अपने पास से मुक्त कर दिया, तो वह बड़े जतन से सिर पर आंचल करती वाशबेसिन की तरफ निकल गई। अग्रवाल साहव रसोईघर से लगे कमरे में ही आरामकुर्सी पर पसरे कोई असवार पढ़ रहे थे। आरती करने के बाद स्वाति और चित्रा राखी बांधने लगी, तो उसने भावाज को वाप के कानों तक पहुंच जाने से रोके रखने की सावधानी में लगभग फुसफुसाकर कहा, "हमे नहीं बंधवानी है इस महरिन के हाथों से 'रासी" उसके कहने में निहित खीझ को लक्ष्य करते हुए, दोनों बहनों ने एक- दूसरे की तरफ देखा, और कुछ कहने की जगह, स्वाति ने बूंदी का लड्डू लेने के बाद भी अधखुले-से रह गए मुंह में ढूंस दिया और फिर दोनों बहनें एकसाथ जोर से खिलखिला उठीं। "मयों, भई, पया बात है? क्यों ठहाके लगा रहा हो दोनों बहनें ?" अग्रवाल साहब की भारी आवाज कमरे में गूंजी, तो उसका मस्तित्व अपने- उसके पह आपमें दबता चला गया । सवित्तरी घोती के छोर से हाथ पोंछती, माथे पर ठीक से आंचल करती, देवकन्या होने के से आभिजात्य को आंखों में भरे उसके करीब पहुंच गई, तो उसने अपने-आपको एक तरह की हतप्रभता में पाया और दुवारा यह कहने का माहस नहीं जुटा पाया कि सवित्तरी से राखी नहीं वंधवाएगा। सवितरी ने देखा, वह कुछ बदहवास और रुआंसा-सा हो पाया है और यह पहला अवसर है कि उससे आंखें नहीं मिला पा रहा है, जबकि इससे पहले वह इस तलाश में चौकन्ना दिखता था कि कब वह उसकी ओर देखे । सवित्तरी ने उसकी कलाई को लगभग घनिष्ठता के भाव से अपने हाथों से स्पर्श किया और राखी को किंचित् कसकर बांधा। यह देखकर उसे हंसी फूटने को हुई कि उसका चेहरा काफी कड़वा हो आया है। वह बहनों से घिरे होने और पिता को उपस्थिति के बीच निरुपाय हो चुका-सा दिख रहा था और स्वाति के कहने पर सवित्तरी ने मोतीचूर का लड्डू उसके मुंह की तरफ वढाया, तो उसने लगभग झपट्टा मारकर अपने हाथ में ले लिया और उसे स्वाति के घूरकर देखने तक मुट्ठी मे भीचे रहा । अखवार एक तरफ रखते हुए, अग्रवाल माहव ने विनोद-भरी शरारत के साथ 'ठीक किया, सवित्तरी वेटी, जो बनिया के वटड़े को रस्सी से बांध दिया !' कहते हुए जोर का ठहाका लगाया तो विदादेवी से लेकर दोनो वहनों तक के चेहरों पर जिस तरह चमक कोष गई- सवित्तरी ने पहली चार महसूस किया कि दनियाछोरे के उसके प्रति अनुराग को शायद, ये सभी लोग भी महसूस करते रहे हैं । दूसरे दिन वह लगभग दस बजे उन लोगो के यहां पहुंची तो पाया कि बैठक का दरवाजा तो खुला है, मगर घर में खालीपन और सन्नाटा भरा है। ऐसा कभी होता नहीं है कि इस घर का बोलना बैठक के दरवाजे तक पहुंच जाने पर भी कानों तक न आए । खास तौर पर दोपहर से पहले-पहले, या दोपहर के बाद । सवित्तरी अभी घर को टोहने में ही पी कि वह बैठक से लगे कमरे में से लगभग एकाएक प्रकट हआ।
सवित्तरी ने महसूस किया कि जाने क्यों आज वह कल की तरह शरारत अथवा मुग्धता की चित्तवृति में उसकी तरफ देख नहीं पा रही है । हालांकि उसका चेहरा पूरी तरह नहीं देखा, मगर अनुमान लगाया कि कुछ सिसि- पाया जहर होगा बनियावच्चा! सवित्तरी को यह कल्पना करते कुछ रोमांच-सा अनुभव हुआ कि शायद इस बनियावच्चे ने उसकी वांधी राखी को फुर्सत और एकांत पाते ही नोच फेंका होगा! उसे लगा कि यों द्विविधा में पड़ी रह जाना ठीक नहीं। परिवार के लोग जहां भी गए होगे, यह युद ही बता देगा । वह चुपके से बाहर बरामदे के कोने में रखा फूलझाड़ उठा लाई और बैठक में आर-पार तक विछे बड़े कालीन को वुहारना शुरु कर दिया। सवित्तरी ने जैसे अपनी आंखों से नहीं, बल्कि पीठ पर की त्वचा से देखा कि वह उसी तरह खानोगी को अपने इर्द-गिर्द लपेटता-सा, दुबारा अपने कमरे में गया और एक बड़ी-सी पत्रिका हाथों में लिए, बैठक के बीच में पडी छोटी-सी मेज के सामने सोफे पर पसर गया । सवित्तरी ने तय किया फिझाड़ देते वक्त इससे हटने को या पांव थोड़ा ऊपर उठा लेने को कहना ठीक नहीं । वह बाहर-बाहर खामोशी में लिपटा, मगर भीतर कई वाहट और क्रोध में भरा लग रहा था । हालांकि अभी तक भी सवित्तरी ने उसके चेहरे को गीर ने नहीं देखा या, मगर जाने क्यों वह ऐसा महसूस कर रही थी कि यह लपने मिसियाएपन की वजह से ही चुप्पा वना बैठा है और फिल्मी धुनें इसके होटों पर से लगातार गायव हैं । याखिर बहुत धीने शब्दों में, और बहुत सलीके से, उसने पूछ लिया- "भैयाजी, अन्मां लोग कहीं गए हैं क्या? खाना पूरा बना-बुनू कर गई हैं, या कुछ तैयार करने को कह गई हैं ?" उसने अपना सिर ऊपर नहीं उठाया, लेकिन सवित्तरी के लिए लगभग अप्रत्यागित बात कहते हुए, तेजी से पत्रिका के पन्ने पलटने लगा, "हमारे लिए एक कप चाय बनाकर दे सकती हो तुम?" सवित्तरी ने मान लिया कि घर के लोगों के बारे में यह चायं पा जाने पर ही बताएगा । वह भीतर गई और गैस के चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ा ११२ सवित्तरी . - स-७ देने के बाद, उसके उबलते तक में इधर-उधर बिखरे बरतनों तथा सामान को करीने से लगाती रही। चाय की प्याली मेज पर रखने को वह झुकी तो देखा कि मेज पर जो पत्रिका वह फैलाए हुए है, उसमें औरतों की नंगी रंगीन तस्वीरें एपी वह सन्नाकर रह गई और लगा कि उसे यहां से जल्दी से निकल चलना चाहिए। "मम्मी लोग लुकरगंज चले गए हैं-अंकल के यहां। वहीं खाना खाएंगे।" उसके मुह से निकलने को हुआ कि 'भैयाजी, आप नहीं गए है, तो क्या आपका खाना बना देने को हमें कह गई है, अम्माजी ? मगर उसने अपने को रोक लिया कि कही सचमुच इसने खाना बनाने को कह दिया तो उसे रुकना पड़ जाएगा और साफ है कि यह राखी के धागों से उस अर्थ में नहीं बंधा है, जिसकी उसने और घर के लोगों ने अपेक्षा की थी-बछड़े के अर्थ में भले ही बंधा हो। सवित्तरी ने तय किया कि 'अच्छा, भैयाजी से कह दें कि दुवारा शाम के वक्त आवेंगी हम ।' कहती हुई, एकबारगी वाहर वरामदे में निकल चले और फिर वहां से तेज कदमों से फाटक के बाहर । सड़क पर पहुंचने के बाद यह पीछा नहीं करेगा। उसने इरादा किया कि चाय की जूठी प्याली-तस्तरी को धोकर रख जाने की प्रतीक्षा करने की जरूरत नहीं और नीचे सरक आई धोती को माये पर करती, फूलझाड़, हाय में लिए वह बरामदे की दिशा में इस तरह बढ़ी जैसे झाड़, बाहर बरामदे के कोने में रखकर, तुरन्त वापस बैठक में आना हो।"मगर उसकी सारी सावधानी और मानसिक प्रतिक्रियाओं को वह जैसे अत्यन्त पैनी नजर से देख रहा हो । उसने जिराफ की-सी त्वचा में हाय को आगे बढ़ाते हुए सवित्तरी की कलाई को काफो कसकर थाम लिया, "तू क्या समझती है लोडिया, कि राखी बाध देने से तू मेरी सचमुच की वहनिया इन गई है ?" सवित्तरी पहले तो सहम उठी, लेकिन फिर तमककर उसकी तरफ .
देखा। हालांकि वह अपने तई पूरी आक्रामक मुद्रा बनाए था, मगर चेहरे पर उसके कुछ ऐसी बदहवासी का भाव था कि सवित्तरी को लगा कि कहीं अपने खुले हाथ से उसने कसकर झापड़ मार दिया तो यह रो पड़ेगा। अचानक ही सवित्तरी ने अपनी कलाई छुड़ाने के लिए जोर से हाथ झटका, तो वह सवित्तरी और अपने बीच की मेज से टकराया और चाय- प्याली-तश्तरी के साथ ही उसकी आंखों पर का चश्मा भी झटके से नीचे जा गिरा। उसकी छाती वाला हिस्सा शायद मेज के किनारे से टकरा गया था। उसके चेहरे पर दर्द का खिंचाव उभ आया था। इसीमें उसने किसी तरह सिर उठाकर सवित्तरी की ओर देखा, तो चश्मा न होने से सिर्फ एक धुंधलका- सा महसूस करके रह गया। तभी सवित्तरी ने कड़ककर कहा, "दूंगी एक झापड़ तो सारी गुण्डागीरी भूल जाओगे। आने दो आज अम्मा-बाबूजी को . . घ !" वह चीते की-सी फुर्ती से अपने-आपको समेटता-सा नीचे झुका और सवित्तरी के पांव पकड़ लिए, "सवित्तरी, तुम महरिन होकर मालिक के बेटे को पीटोगी ?" वह इतने वेतुके तरीके से रो रहा था कि सवित्तरी को पिल्ले के किंकि- के से लिजलिजेपन की अनुभूति होने लगी। पहले तो उसने अपने पांव छुड़ाए और फिर उसे सोफे पर सीचे विठा दिया, "अब वहुत नौटंकी ना करो, बबुवा ! कोई आ गया तो फजीहत हो जाएगी। यों तो बहुत हीरो बनते हो, मगर एक ही झटके में पी-पी करने लगे !" सिर के लम्बे वालों के माथे पर विखर आने और चश्मा न होने से आग्ने मिचमिचाने के कारण अब वह और भी अजूबा लग रहा था । सवित्तरी ने ढूंढकर, चश्मा उसकी आंखों पर लगा दिया और उसके माये पर के बालों को हलके झटके से पीछे की तरफ करते हुए कहा, “बहुत दिलीपकुमार बनते हो । कभी किसी अनवरसिटी वाली के हाथों पिटाई हो गई तो सड़क पर रोते फिरोगे । चलो, अपने कमरे में जाके बाल संवारो और पढ़ाई करने बैठो। ये क्या नंगी औरतों की तस्वीरें लिए बैठे रहते ११४ / सवित्तरी हो। दो-दो जवान वहन मिर पर हैं, बार तुम्हें शरम नहीं !" अपनी वात खत्म करते हुए, नवित्तरी ने नीचे कालीन पर गिरी पत्रिका को उठाकर चिंदी-चिंदी करके कूड़ेदान में डाल दिया और प्याली- तस्तरी उठाकर, वाघबेनिन को वरफ निकल गई। मेज पर पौधा लगा देने के बाद वह बाहर निकली और कूड़ेदान को फाटक से बाहर, सड़क रिनारे की नाली में उलट आई। बैठक में लौट आई, तब कहीं घ्यान मापा कि इन सारे नमेले में दुद का अस्त-व्यस्त हो गई है । संयोग की बात कि बाज विना नेसरी पहने ही चली आई। वह उठकर नवनुच मोघे अपने कमरे में चला गया था। अब नदितरी ने अनुभव किया कि इन वीच तेजी से जो कुछ घटित हो गया, इसे वह खुद ठीक-ठीक नहीं समझ पा रही है कि यही होना चाहिए या या नहीं। हालांकि उसने अपनी बदहवासी में ही कहा था मगर तर है कि उनने यह कल्पना नहीं की होगी कि महरिन की मौकात के बाहर की कोई चीज कहने जा रहा है। खुमुर-पुनुर या मजाक में ही नही, बकनर यह मुनने में आया है कि वह शायद शिवचरन से नहीं । तो क्या वह खुद अपनी मां को नियति में पहुंचने के करीद होती जा रही है ? वह सिर्फ दौडमपना दरतके, चुपचाप अपने कमरे में जा बैठा है, तो यह एकाएक याद मा रहा है कि ऐमा कठई नहीं है कि किनीका अपने निकट आना उसे बुग, तकलीफदेह, या अजूबा लगता हो। जब-जब लोकमय, अंतर्वाधा अथवा परिस्थितियों के चलते वह निबंध दरतती है, अपने स्त्री होने को ज्यादा तीव्रता में महसूस करने की अनुभूति होती है । मां बताती थी कि उनकी शादी निर्फ ग्यारह वर्ष की उम्र में हो गई यी। मवितरी बीम की होने को आ गई और उनका उगना गमले में पेड़ के पौदे का उगना होता जाता है। कम उम्र में ही उनकी भी शादी हो गई होती, तो दुख-मुख जोहोते होते, यह अपनी ही आंदों को गड़ने लगने की विडंबना न होती। झाड़-पौधा निवटा लेने तक में वह सारा प्रसंग घूल की तरह के गया। सवित्तरी/११५ उसे खुद लगा कि वनिया छोरे के रुआंसा हो जाने ने उसके गुस्से को बिखरा दिया है। अव हंसी आने को हो रही है कि जब इतने कमजोर चित्त का है तो अभी से औरतों की तलाश में क्यों हो गया है ? जब वह वापस लौट जाने की बात सोच रही थी और 'हम जा रहे हैं। कहते हुए निकल जाना चाहती थी, मगर कठोरता बरतना उससे हो नहीं पाता है। गुस्से में जो हो जाए, सामान्यतया किसीका जी दुखाना, उसे खुद अपने विपरीत जाना लगता है । वह महसूस करती है कि जो कुछ वह है, सिर्फ अपनी तारुण्य-भरी काठी-मात्र से नहीं है, बल्कि अपने अंतस में वादलों की तरह छाए रहने वाले इस स्त्री-तत्त्व के कारण भी है, जो उसे तमाम प्रतिकूल स्थितियों में भी आर्द्रता में किए रहती है । वह उसके कमरे तक चली गई। वह आंखों पर तीलिया डाले, चार- पाई पर पसरा पड़ा था। सवित्तरी के आने की आहट उसे लग गई, इससे साफ था कि सवित्तरी के साथ घटित हुआ प्रसंग अभी उसपर से उतरा नहीं है। उसने तौलिया हटाकर देखा, अनुराग के चेहरे पर परास्तता का भाव था। . सवित्तरी एक हाथ से पर्दे को पकड़े कुछ क्षण चुपचाप खड़ी रही और '' 'फिर पूछा, "भैयाजी, आपके लिए खाना बनाना होगा ? अम्माजी लोग कुछ कह गईं या नहीं ?" सवित्तरी प्रतीक्षा में थी कि वह कुछ कहे, तो इस पीठ पर लदी हुई- सी स्थिति से मुक्त हो । खाना बनाना हो, तो उसमें जी लगाए, अन्यथा वापस लौट चले। मगर उसने कोई उत्तर दिया नहीं। कुछ क्षणों तक एक- टक सवित्तरी की ओर देखता रहा, फिर धीमे से होंठ कांपे और जब तक में आंखों से आंसू बहकर वाहर तक आते-तेजी से तीलिया अपने मुंह पर कर लिया। सवित्तरी को लगा, उसके पांव दलदल में हो गए हैं। थोड़ी देर के बाद वह मुड़ी और रसोईघर की तरफ चली आई। जब तक में सवित्तरी ने आलू-गोभी की सब्जी बनाई और दो फुलके ११६ / सवित्तरी सेंककर, पाली में खाना लगाया-वह नींद में हो चुका था। सवित्तरी करीव गई, तो देखा, तौलिया हट जाने से मुंह खुला पड़ा है और अब, इस वक्त, उसके चेहरे पर कुछ देर पहले की-सी आक्रामकता कहीं दिखती नहीं। सवित्तरी की कल्पना में वह सारा पूर्व-दृश्य उभर आया जब वह सवित्तरी पर एक पुरष की तरह हावी होने की कोशिश में आक्रामक और असंतुलित लग रहा था। उसके चेहरे और आंखों में वन्य पशु की सी जो कौंच उस वक्त भी, अब गायब थी। अब वह कुछ निरीह लग रहा था। सवित्तरी का 'भैयाजी, खाना खा लें।' कहना उसके चेहरे की त्वचा पर मक्खी के बैठने की तरह घटित हुआ और उसने अचकचाकर आंखें खोल दी। पछतावे और हताशा में उसकी आंखें निहायत दीनता-भरी लग रही थी और उसने चारपाई पर पड़े-पड़े ही, धीमे से सवित्तरी के हायों को अपने हाथों में ले लिया, तो सहसा हटाते नहीं बन पड़ा । सवित्तरी से वह सहारा लेता हुआ-सा उठा और वासवेसिन में हाप-मुंह धोने के वाद, सीधे खाने की मेज पर पहुंच गया। सवित्तरी ने थाली सामने रखी और दूर टंगे तौलिये को उसके हापों में देती बोली, "भैयाजी, मुंह तो पोंछ लो..."
१३. अलोपीवाग में राजरानी के फ्लैट पर वह आज लगभग दस-ग्यारह दिनों के वाद पहुंचा था। राजरानी सबसे ऊपर, तीसरी मंजिल पर रहती है और घर की बनावट कुछ ऐसी है कि नीचे की मंजिलों से कोई आपसी सरोकार नहीं। सिर्फ सवा छः बजे थे, मगर सदियों में छोटे पड़ते दिन के कारण गली में अच्छा-खासा अंधेरा हो गया था। साइकिल में ताला लगाकर, मकान के भीतरी गलियारे में खड़ी करके, वह ऊपर की मंजिल के लिए सीढ़ियां चढ़ने लगा। सीढ़ियों पर भी अंधेरा था।"और, शायद, इसीलिए राजरानी के फ्लैट के बरामदे में भरे अधेरे के पार का दृश्य उसे साफ-साफ दिख गया । फ्लैट का मुख्य दरवाजा बंद था, वरामदे की बत्ती जली न थी। वैठक वाले कमरे में भी बहुत तेज रोशनी नहीं थी, मगर अंधेरे में चलकर आने के कारण भटनागर के हाथ में थमा कांच का गिलास और उसमें लगभग आखिरी चूंट-भर को रह गई शराव भी उसे साफ-साफ दिख गई। राजरानी सामने वाले सोफे पर पौराणिक नायिकाओं की-सी अलस मुद्रा में अघलेटी पसरी थी। उसे अचानक ही याद आया कि आज सुबह ही तो निगम साहब कह रहे थे कि अलोपीवाग में 'मंजुश्री कन्या मंदिर' खोलने की योजना बना रहे मंजुश्री राजरानी की दिवंगत बेटी का नाम था और राजरानी ने निगम साहब को ही नहीं, दुद उसे भी बताया था कि वह निगम साहब से ही हुई थी और अब यह पसू है। इसी जनादन को यहां, अलोपीबाग आना होता है । भीतर के परिदृश्य से कुछ पकित और हतप्रभ हुआन उतरने को हुआ ही था कि पहले खट् से बरामद की, और लगी सीढ़ियों पर की दत्ती जल उठी। "अरे, आप हैं मास्माद ?" कहती राजरानी उसके दिल्कुल सामने पहुंच गई, "मैं जो सोचं, सीढियों पर से कार उटतो आवाज एकाएक खानोग श्यों हो गई । पप्पूराम तो अभी सेलने से नहीं लौटे हैं, जाने कब लौटें।... मगर आप भीतर याइए ना? एक प्याली चाय पीते जाइए। कल निगम साहब बता रहे थे कि आप बहू को ले आए और पिता भी बनने वाले हैं, मगर मिठाई का डिब्बा तो आपके हाथों में कभी देखा नहीं।" राजरानी ऐसे हसी जैसे बरामदे में खड़े किसी नौसिम्युला चौर पर हंस रही हो। वह अजव मानसिक सकट की स्थिति में फस गया। किसी तरह बोला, "ऐसा है, जब पप्पू महाशय घर पर नहीं हैं. वेकार में आपको 'डिस्टन्स' होगी।" "अरे, भई, यही तो मैं आरको बताना चाहती हूं कि 'डिस्ट' होने की कोई बात नहीं।" कहते हुए, रावरानी ने कुण्डा गिराकर, दरवाजा पूरा खोल दिया, "आइए, आइए!" कहने में मुंह, शायद, कुछ ज्यादा खुला बोर जनार्दन को लगा, शायद, राजरानी ने भी कुछ ले रखी है। उसके कमरे में पांव रखते ही, कोच पर लगभग पसरे पड़े भटनागर की त्वचा पर लगभग वैसी ही प्रतिक्रिया हुई, जैसी मैना के पीठ पर बैठते ही तालाब में पसरी भैस की खाल पर होती है। भटनागर के मुह में अब इस वक्त पान का बीड़ा भरा था, इसीलिए 'नमस्कार' का उत्तर उसने सिर्फ सिर हिलाकर दिया । राजरानी उसे भट- नागर साहब के सामने छोड़कर, भीतर चली गई। लगभग पांच-सात मिनट वाद चायन्नमकीन लिए तोटी, तब तक में जनार्दन को लगा कि वह भट- नागर साहब से युद्ध करते-करते पूरी तरह पक चुका सदितरी/१e । इस पूरे अंतराल में भटनागर पान को अपने मुख-मंडल में रचाते हुए, सर्फ उसकी ओर देखते रहे थे। उनका देखना न अजनवी को घूरने जैसा था, न परिचित के सामने होने जैसा। जनार्दन को महसूस होता रहा कि जसे वह 'सर्चलाइट' की रोशनी में घिरा है और भटनागर साहव की चुप्पी वाज की तरह उसको मनोजगह में भ.पट्टे मार रही है । यह शख्स दूसरों के अस्तित्व में बसता-सा मालूम पड़ता है । जनार्दन के दिमाग में अचानक यह कल्पना आई कि छाया-रूप ग्रहण करके परकाय-प्रवेश में दक्ष यह आदमी जब कभी निगम साहब के आमने-सामने होता होगा, तव निगम साहब फैसा अनुभव करते होंगे? इधर राजरानी ने चाय छोटी तिपाई पर रखी ही थी कि जाने कैसे जनार्दन के मुंह से निकल गया, "निगम साहब से इधर यापकी मुलाकात कई दिनों से नहीं हुई, शायद, भटनागर साहव ?" राजरानी में हुई प्रतिक्रिया को उसने देखा तो नहीं, लेकिन जैसे सुना हो। आंखें तो उसकी भटनागर साहब में ही अटकी थीं। भटनागर की त्वचा, उसे लगा, पानी की तरह इधर-उधर बहने में समर्थ है। उसे यह अहसास थोड़ी-सी दहशत में डालने वाला-सा लगा कि इस वक्त एकाएक ऐसा मह- सूस हुआ है, जैसे इस व्यक्ति की आंखें चमगादड़ों की तरह अपने इर्द-गिर्द उड़ती मालूम पड़ रही हैं। इस बीच भी भटनागर ने एक शब्द नहीं कहा, मगर उसे जाने क्यों । लगा कि भटनागर की बातें सुनते-सुनते उसके कान थक चुके हैं। राजरानी विल्कुल उसकी वगल वाली कुर्सी पर बैठ चुकी थी। इस औरत में जाने कैसी एक मायावी-सी ऊष्मा है, अपने निकट बैठे व्यक्ति पर अपने को हवा में बहती गंध की तरह उंडेलती है । पप्पू की 'ट्यूशन' के क्षणों में भी वह अक्सर ऐसा अनुभव करता रहा है। और इस वक्त तो अव साफ-साफ अनुभव होने लगा था कि वह सिर्फ अपनी मांसलता की कामा में ही नहीं, बल्कि अच्छी-खासी माया में ली हुई 'शम्पेन' में भी है । जनार्दन अभी विमूढ़-सा अपने में ही धंसा दिया गया-सा पड़ा था कि उसे पता चला, जाने कैसे और कव, भटनागर साहब वार्तालाप में हो गए हैं, जैसे जनार्दन के आने से पहले अधूरी छूट गई वात को पूरा करने जा रहे १२० / सवित्तरी "तो ऐसा है, राजरानीजी, कि जो उदाहरण उस सिलसिले में मैं आपको दे रहा था, वह भीष्म-पर्व में से पा । भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर से फहा था कि भोजन करते समय हाथ-पांव धोकर, पूर्वाभिमुरा होकर पटना चाहिए । जहां तक हो सका है, मैंने अपने जीवन में इस नियम को निभामा है। पचास की उम्र में भी मेरी अच्छी तंदुरुस्ती का रहस्य यही है।" क्यों, साहब, आपकी उम्र क्या होगी? यही तीस-इकतीस ? आपके जन्म. स्थान में क्या बृहस्पति उच्च का है यानी 'इक्जास्टेड ?' और फेन्द्र में पदमा और शुक्र हैं ? हां, निगम साहब क्या हमें याद कर रहे थे इस बीच कभी? इधर लम्बे अरसे से सचमुच मुलाकात नहीं हुई। कहिएगा, कभी हमारी तरफ निकल आएं, तो शतरंज रहे । हां, तो राजरानीजी, आप क्या कि कर रही थीं कि फर्रुधावाद की तरफ आप इसी महीने जाने वाली है?" "हां, मम्मीजी का वुलौवा आया है। यहां निगम साहब पच्चियों का एक स्कूल खोलना चाहते हैं और उद्घाटन हमारी मम्मीजी से फरयाना चाहते हैं । पापा तो, आपको पता है, जब हम सिर्फ दस वर्षों की थी, तभी पन पते ये। आपके ट्रांसफर का क्या हुआ ?" "यहां के 'ट्रक ओनर्स एसोसियेदान' की तरफ से 'मेमोरेडम' गा है लखनऊ । आजकल ईमानदारी का मतलब हो गया है ज्यादती। और, हर सरकार हमारा यहां से ट्रांसफर भी करेगी, तो जहां हम चाहेंगे और प्रोमो- शन पर । फर्रुखाबाद से आप हम लोगों के लिए दो पदिया-सी पररूपले आएंगी..." जनार्दन को लगा कि जैसे अगले किसी भी क्षण यह परिक्त प्रमा तो, मैं चलू ।' कह देगा और इसका उठकर जाना, राजरानी के पास नाम के घायल किए हुए पशु की तरह छूट जाना होगा। एकाएक ही वह अपनी पूरी शक्ति लगाकर उठा और 'अन्धा, नमस्कार !' करता. हाप ओडे जोड़े दोनों की ओर घूमता, बाहर बरामदे में निकल पाया। सीढ़ियां उतरते उसे लगा, जैसे मेठकों पर से पार पमाले जसरा। 'उसे उन दोनों का सम्मिलित ठहाफा, हो सकता है, सिर्फ अपनी कामा कारण ही सुनाई दिया हो। हो सकता है, रागरानी को कुर्सी पर सेतीग- सविसरी/१२१ कर, अपनी साल तक ले आने का उद्यम भटनागर ने वास्तव में न किया हो । होने को यह भी हो सकता है कि भटनागर ने उसके बरामदे से नीचे उतरते ही पूछा हो कि 'यह चूतिया कौन था ?' और राजरानी ने 'मास्टर साहब कहते हुए, भटनागर को वह किस्सा सुनाया हो, जिसे वह मास्टरों की निरीहता को लेकर, खुद उसे सुना चुकी है ! !' . यहां चतुर्मास में ज्यादा मारक उमस होती है। वह पसीने में लथपथ हो चुका था। गलियारे में से साइकिल बाहर निकालने से पहले उसने रुमाल से अपनी छाती और पीठ पर का पसीना पोंछा, फिर तेजी से साइकिल चलाता निगम साहब के घर की ओर चल पड़ा । वह खुद नहीं समझ पा रहा था कि इस वक्त निगम साहब के घर जाने की जरूरत ही क्या है। जाने क्यों उसे सिर्फ इतना अनुभव हुआ कि भटनागर प्रेतच्छाया की तरह अभी भी उसके अस्तित्व पर लदा हुआ है। उसने असमंजस में होते-होते, अंततः दोटूका फैसला ले लिया कि अब राजरानी वाली 'ट्यूशन' पर जाएगा नहीं। 'कालबेल' वजने के साथ ही किसीके उठने और कमरे में कुछ वजने की आवाज सुनाई पड़ी। 'कौन है ?' के जवाब में 'मैं हूं, निगम साहब, भट्ट !' सुनते ही, निगम साहब ने दरवाजा खोला, तो दरवाजा एकाएक खुलने पर तेज हो चली हवा में शराब की गंध जनार्दन के नथुनों तक चली आई । जनार्दन को याद हो आया कि भटनागर भी पिए था और बड़ी देर तक पान चबाता रहा था, फिर भी, शराब तो शराब है। उसने सोचा, निगम साहब से कहे कि इस वक्त वह वापस लोट जाए, कल किसी वक्त, किन्तु अभी वह अपने ठिठकेपन में ही था कि निगम साहब ने उसका हाथ पकड़ लिया और भीतर को चले। वायें हाथ से दरवाजा बंद करते हुए, वोले, "आप बहुत ही संकोची हैं, भट्ट - साहब !" जनार्दन ने देया, निगम साहव के.उठते वक्त हाथ की ठेस लगने से मेज पर से नीचे गिर पड़ी पीतल की तश्तरी कालीन पर उलटी पड़ी है १२२ / सवित्तरी और दालमोठ चारों ओर छिटकी इस बात की गवाही दे रही है कि निगम साहब आज पूरी मुक्ति में हैं । श्रीमती निगम फैजाबाद गई हैं, अपने बड़े भाई के यहां । वहां उनकी भाभी का देहांत हो गया है । यह वात दह भट- नागर को भी बताना चाहता था, मगर वह शल्त भोप्न-पर्व से फर्रुधाबादी पर्दो तक इतनी तेजी में वीच ले गया सारे प्रसंग को, कुछ कहने की गुंजा- इश ही नहीं रही। निगम साहब सोफे पर बैठ चुके थे और उनका इस वक्त का दैठना सचमुच, निष्णात रामकथा-वाचक का-सा बैटना था । व्हिस्की के तुरूर में सूत-भर चेहरे पर से बाहर को खिल आई-सी त्वचा के कारण, निगम आध्यात्मिक मुद्रा में बैठे प्रतीत हो रहे थे। उनके चेहरे पर, आंवों में भट- नागर वाली बात कतई न थी। कांइयापन और हिकारत में सने आदमी की नहीं, अपनी सम्पूर्ण निश्छलता में डूबे व्यक्ति की-सी निर्मलता निगम साहब को लगभग दिव्य वनाए हुए यो । जसा इस वक्त, वैसा खिला-खिला- सा व्यक्तित्व निगम साहब का, जनार्दन ने इससे पहले कभी देखा नहीं था। वह अभी असमंजस में ही था कि निगम साहब ने सिगरेट जला ती और उसे हुक्के की-सी शक्ल में करते हुए, वोले, "मैं करीब दो घंटे से चुप में पड़ा था, भट्ट साहव ! अरे साहब, जाने क्या हुआ कि मैं आज एका- एक अपने 'पास्ट' में चला गया। मुझे अपने वाप-दादाओं के चेहरे याद आते चले गए। और खुद अपना चेहरा, जव मैं यहां इसी शहर के परि- याग टेसन पर उतरा था और झोले में हाईस्कूल-इंटरमीडिएट के सार्टी- फिकेटों के साथ सत्तू बंधा पड़ा था और पैसे थे-सिर्फ सात रुपये !"खर, वो लम्वी कहानी है । आपको जरा कष्ट दूगा। नीचे तरतरी गिरी पड़ी होगी। सामने आलमारी खुली पड़ी है। इसमें थोड़ी दालमोठ लेते आए । वहीं भगोने में रसगुल्ले पड़े होंगे-चार ठो एक दूसरी तश्तरी में अपने लिए लेते आएं । और चम्मच । मैं जानता हूं, आप लेंगे नही । दरअसल यह चीज, जिसका नाम शराब है-- 'गिल्टी कांशस' से सफर लोगों के पीने की चीज है और फिर या ऋषी-मुनियों-शायरों-कवियों के -पीने की चीज ! बाकी के जो लोग इसे पीते हैं, अपनी जिन्दगी और शराब, -न्या दोनों को खराव करते हैं।" जनार्दन को लगा, निगम साहब इस वक्त धर्मासन पर बैठे-से वोल रहे हैं । उनके कहने में एक अमूर्त दवाव-सा है । वह उठा। वापस लौटा, तब तक में निगम कांच के छोटे-से खूब- सूरत 'कटवर्क' वाले गिलास को सम्पूर्ण कर चुके थे और वर्फ की शुंगर- क्यूब जैसी शक्ल वाली डालियां ऊपर तैरती वास्तव में आकर्षक लग रही वीं। । जनार्दन की उम्मीद के विपरीत, इस वार, निगम खुद उठ खड़े हुए और जब फ्रिज के पास से लौटे, तो वियर मग में शर्बत लिए हुए । जनार्दन ने गौर किया, सोफे पर पालथी मारकर बैठते में निगम साहब पहले कुछ क्षणों को अपने शरीर को साधते हैं, जैसे योगाभ्यास कर रहे हों। पानी और वर्फ मिलाकर, निगम ने शर्वत का गिलास भी ठीक वैसे ही लहजे में तैयार किया, जैसे व्हिस्की का गिलास हो। "हां, तो मैं आपसे कह रहा था कि ये एक ऐसी चीज है, जो तीसरे पेग पर जाते ही आपको अपनी जगह पर से या तो कान पकड़कर उठा लेती है, या कंधे पर हाथ रखते हुए । या आपको दूर 'पास्ट में धकेल देती है, या 'डीप फ्यूचर' में । अंग्रेजी गलत इस्तेमाल कर जाऊं, तो माफ करें। दरअसल ये जो व्हिस्की है, अगर सच्ची है, तो यह अपने-आपमें 'सुपर- पेज' है-'प्रेमर' की बंदिशों से आजाद ! यह आदमी को पैर से सिर 1. सिर्फ 'तत्त्व' बना देने वाली चीज है । लेकिन जैसाकि मैंने कहा, ये सबके लिए नहीं, सबके बूते की नहीं और सबकी दोस्त नहीं । "मगर, भट्ट साहब, बिलीव मी "इस हरामजादी को अगर आप पा गए, तो आपके भीतरी केयास' में आपकी सबसे बड़ी हमदर्द है यह ! हमराज है ! हम-विस्तर है ! इम-स्वाव है !" निगम साहब ने अपने सिर को हलके से झटका, तो लगा, जैसे सिर पर गरा पानी झटक रहे हों। जनार्दन को लगा, वहां राजरानी और भटनागर के सामने से उठ आना आसान था। यहां निगम साहब के सामने से. चल निक- नना मुश्किल है। "ऐसा है, भट्ट साहब ! कभी जिंदगी में मौका मिलेगा, तो आप भी पावेंगे ! . - १२४ सवित्तरी कि पांव में चुभे कांटे को निकालना एक चीज है और हाथों में यमे फूल को फेंकना, विल्कुल दूसरी चीज । र, ये 'सुपर संग्वेज' की चीज है, शवंत से समझना मुश्किल है !" निगम साहब हंसे, तो कमरे के बीचोबीच रखा गया पंडस्टल पंखा भौचक्का रह गया प्रतीत हुआ। "लीजिए, एक 'एक्सपेरीमेण्ट' करते हैं, मिस्टर भट्ट! आप तो, सर, आदतन चुप बैठे ही हैं, मैं भी सामोश हो जाता हूं और बाप ये मिरा- केल' देखिए, आज मुद अपनी आंखों से दल्कि कहूं कि कानों से देखिए और आंखों से सुनिए-कि मैं अपने भीतर इकट्ठा हो चुकी 'सुपर लैंग्वेज' को आपके शवंत के गिलास में छोड़ देता -जादुई बुकनी की तरह !... मैंने आपसे कहा था ना, कि तीसरे पेग में यह या तो 'पास्ट' में पहुंचाती है, या 'फ्यूचर' में ? नो आज जरा गिनकर तीन घूट शर्वत पिएं तो सही पहले और फिर ध्यान लगाएं आप, तो जोतपी हो जाएं, जनाय ! आप जानते हैं कि मैं क्रिमीनल कैसेज 'डील' करता हूं। एक मुवक्किल से मैंने चौये पैग में उगलवा लिया कि हां, उसने वीस साल पहले एक कत्ल किया था, जिसमें उसकी नामजद रिपोर्ट तक नहीं दर्ज हुई। गांव की छोटी नदी में बाढ़ आई हुई थी और बाढ़ में दोनों मासामी बह गए । एक ऊपर वाले की किरपा से बच गया, दूसरे की लाश वहकर, जाने कहां निकल गई। तैराक वह तेज था, मगर गड़ासे की मार के बाद कितना तैरता? तो मिस्टर भट्ट, कहना मैं ये चाहता हूं आपसे कि आदमी की 'लाइफ' में कुछ खास 'मोमेण्ट्स' आते हैं । अब देखिए, कोई नहीं जानता कि कर कोई करत कर बैठेगा। भंवर में आप फंस गए, फंस गए। "आपको मेरी बातों से लगता होगा कि मैं वहक चुका हूं ? मेरा जवाब होगा कि अपनी सही 'टोन में आ चुका हूं। मिस्टर भट्ट, आप देखते हैं ना-मैं काफी छोटे कद का आदमी हूं। जितने में डूब जाऊ, उतनी दूर तक बढ़ जाना मेरी'नेचर' में नहीं। मैंने अपनी लाइफ को 'स्वीमिंग टैक' बना लिया है। राजरानी का फोन आपसे पहले मुझ तक पहुंच गया था लेकिन सवाल ये है, मिस्टर भट्ट, कि हम जरूरत भर से ज्यादा की उम्मीद ही क्यों करें दूसरों से? अब देखिए, आपकी 'वाइफ' इतनी वेल-एजूकेटेड औरत हैं कि उन्हें यूनिवर्सिटी या कम में कम कालेज में लेक्चरर होना चाहिए-आपने, शायद, कहीं 'एप्लाई' भी करवा रखी है ? -- मगर मैं प्राइमरी स्कूल चलाता हूं । मेरे यहां 'पे-स्केल'- जनी किसी चीज का कोई वजूद ही नहीं।"राजरानी कह रही थीं, 'मास्टर साहब बहुत पवित्र आदमी हैं । पवित्र आदमी का हाणमा कमजोर होता है !' यकीन मानिए, मिस्टर भट्ट, राजरानीजी के इस 'कमेण्ट' पर मैं दीवाना हो गया, और पूरा गिलास एक सांस में गटक गया।" अपना वाक्य पूरा करते-करते, निगम साहब ने गिलास उठाया और एक सास में पूरा गटकने के बाद, धीमे से मेज पर रख दिया जैसे विदा कर रहे हों। उनका चेहरा अब और मूफियाना हो गया था। उन्होंने धीमे से आंखों पर से ऐनक हटाते हुए कहा, "माइनस श्री, प्वाइंट सिक्स है ! इसे उतारकर गायब कर दीजिए-चारों तरफ अंधेरे से भी ज्यादा दहशत में डालने वाली 'स्पेस' भंवर की तरह घूमती मुझे दबोच लेगी। मगर मेरी 'नेचर' में ही 'एडजस्टमेंट' है। मैं एक एक्स्ट्रा ऐनक हमेशा अपने 'पोर्टफोलियो' में रखता हूं।" जनार्दन को लगा, जैसे निगम साहब ऐनक उठाकर नहीं, आंखों पर की चमड़ी उतारकर दिखा रहे हों। वह कुछ हतप्रभ हो गया। शराब पी लेने पर बहकते हैं, कभी गुंडों और कभी फकीरों की तरह बोलने लगते है- इतना गुन रखा था। कई वार हलके सुरूर में देखा भी था, मगर आज से पहले हमेशा निगम साहब की ओर से पहल हुई कि उसे यथासम्भव जल्दी और निहायत गंक्षिप्त वार्तालाप में ही विदा कर दिया जाए । आज पहली बार है कि निगम साहब पुष इस फिल्म की मुद्रा में दिख रहे हैं, जैसे सारी रात उसके साथ बितानी हो । सचमुच लगभग पौने ग्यारह का वक्त हो गया, घर वापस पहुंचते । मीता इस बीच चिता में रही है, यह दरवाजा खोलने से पहले के उसके 'कौन है ?' की आवाज से ही आभास मिल गया था । आज से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि नौ से ज्यादा वक्त हो गया हो । अगसर मीता चिढ़ाती रही है कि 'हो तुम सचमुच के मास्साव !' सुनील सो नुका था। मीता सब्जी गरम करने चौफे में चली गई, तो १२६ / सवित्तरी वह भी वहीं पहुंचकर, आसन खींचकर बैठ गया। खाते तक में सारी बातें बता दी । यह भी कि कल से अलोपीवागवाली 'ट्यूमन' पर नहीं जाना है। "मुझे इस शख्स की दो बातें बहुत अच्छी लगी-पेट में कपट नहीं; दिमाग में वदी नहीं। कहने लगे कि 'भट्ट साहब, ये छोटा तालाव है । पड़े वक्त का ठहरना कीजिए।' कोन अपने बारे में यों कह सकता है कि 'साहब, में क्रिमीनल केसेज डील करता हूं, मगर मेरा केस सिर्फ ऊपर वाला डील करेगा !' कहां, क्या इस आदमी को जिन्दगी में गलत है, कुछ कहा नहीं जा सकता, मगर रहस्य कहीं है जरूर । आखिर कहने लगे कि राज- रानी के उनके बीच 'एडजस्टमेंट' है । आर० टी० ओ० भटनागर इस 'एड- जस्टमेण्ट' को नहीं तोड़ सकता । मेरे ख्याल से निगम इन दो औरतों के साथ वैसे ही जिंदगी गुजार रहे हैं, जैसे दो ऐनकों के साथ।" "और, मास्सावजी, आप हैं कि दो औरतों के बीच ऐसे हो गए हैं, जैसे कोई नदी पार करने को उतावला दो नावों गया हो ! एक नाव में उसका जिस्म पड़ा हो, दूसरी में आत्मा।" मीता खिलखिलाई, वह संकोच में गड़ गया। वोला, "तुम फिर मेरा मजाक बनाने पर उतर आई !" "अरे, भई, वो भी आई थी। सवितरी! बड़ी देर तक अग्रवाल के घर का किस्सा सुनावी रही। अनुराग नाम है उसका । सवित्तरी का दीवाना हुआ जा रहा है । कह रही थी, 'हमारे मास्टर साहब तो देवता आदमी हैं।.."मैंने मजाक कर दिया, 'देवतादक्षिणा के लोभी होते हैं।' वोली- -प्राण भी ले लें, तो दिया जैसा न मालूम पड़े।' अच्छा, तुम इस घोसे में कभी न रहना कि सीधी गंवार लड़की है । बहुत 'विटी' है । कहती है- शरारत पर उतर आती हूं, वहूजी, तो अपना गरीव वाप भूल जाता है- लगता है, जाने सिर्फ ऊपर वाले को विटिया हूं।''"अच्छा, सुनो, निगम साहब कुछ मेरी 'अप्लीकेशन' के सिलसिले में भी कह रहे थे ?' "कह रहे थे-'यह स्कूल चलाने का धंधा भी एक 'सोशल प्राइम' है । सरी समाजवादी सरकार हो, तो हम जैसे लोग जेलों में ठूस दिए नाएं ।चूंकि हमारी सरकारें खुद अपने में आज तक 'ईस्ट इण्डिया कम्पनी' हैं, और इनका धंधा भी समाज को लूटना-मसोटना .. -AA हम जैसे लोगों की गुमटियां भी चल रही हैं ।'.."और जानती हो, मीता, उस आदमी ने अन्त में क्या कहा ?" मीता ने अपना चेहरा पूरी तरह उसके सामने कर लिया, बोली कुछ नहीं। "बोले कि 'आपने मुझे नंगा देख लिया है। मुझे माफ कर देंगे, तो आपको भी शांति मिलेगी।'.."अजव आदमी है। हां, तुम्हारे लिए भगत- तारन डिग्री कालेज की मैनेजिंग कमेटी के मेम्बरों से बात करने का वादा भी कर रहे थे। फिलहाल 'एडहाक एप्वाइंटमेण्ट' ही हो जाता, तो भी काफी था। हम लोग अधर में टंगे हुए से जमीन पर पांव टिका लेते।" - . शराव " चारपाई पर पहुंचकर, जनार्दन ने मीता को धीमे से अपनी ओर किया. और मुंह खोलकर, जोर से सांस छोड़ी, "जरा देखो तो, कहीं मेरे मुंह से की वदवू तो नहीं आ रही ?" मीता को आश्चर्य की मुद्रा में होते देख, वह धीरे से हंस पड़ा, "नहीं, भई, तुम्हारे मास्साहब ने 'व्हिस्की नहीं पी है, सिर्फ शर्वत ही पिया है... मगर निगम साहब की पी हुई जाने क्यों अपने भीतर भी महसूस होने लगी है । आज तो दोनों जगह ऐसे संकट में फंस गया कि लग रहा है, अंधेरे जंगल में का भागता घर पहुंचा हूं।' "पालतू जानवरों का हाल यही होता है !" कहते हुए, मीता ने स्नेह से उसके माथे पर हाथ फेरा और उठकर सुनील की बगल में सो गई। वह थोड़ी देर आंखें वंद. किए लेटी मीता को गौर से देखता रहा। कितने थोड़े समय में कितना स्त्रीत्व आ गया है इसमें-जैसे सूखी नदी में जल आ गया हो। इलाहावाद पहुंचने से पहले इसका स्त्री होना जैसे सिर्फ अपनी देह तक सीमित था, अव जनार्दन के अस्तित्व तक भर गई है । वह उठा, वत्ती बंद की और खुद भी सो गया । १२८ / सवित्तरी इसे संयोग के अलावा क्या कहा जाए कि सितम्बर इक्कीसवी को 'एइ- हॉक एप्वाइंटमेण्ट' की सूचना मिली, इस निर्देश के साथ कि पहली अक्तूबर से 'ज्वाइन' कर ले-उन्नीस से ही एकाएक तबीयत खराब हो गई और लेडी डॉक्टर श्रीमती बरुआ ने तुरन्त अस्पताल में भर्ती हो जाने को कह दिया। प्रारम्भ में, जब असमय तकलीफ अनुभव होने लगी, दोनों की धारणा यही थी कि पहली बार भीषण गर्मी भेलनी पड़ी, लगातार तीन-चार महीने, इसीको प्रतिक्रिया होगी, किन्तु श्रीमती बरआ ने कल ही बताया है कि केस कुछ 'कम्प्लीकेटेड' दिखता है। सुवह स्नान और पूजा से निवृत्त होकर, वह सवित्तरी की प्रतीक्षा करने लगा, तो एकाएक यह ध्यान हो आया कि यही सवित्तरी थी, जो लगभग सदैव प्रायः उन्हीं क्षणों में उपस्थित होती थी, जब वह 'दुर्गा सप्तशती' का पाठ कर रहा होता था । इधर लगभग डेढ़ महीने से सवित्तरी के आने का क्रम एकाएक गड़बड़ा गया है। न सिर्फ आने का क्रम, वल्कि आते-जाते में पालतू बिल्ली में की-सी निर्द्वन्द्वता भी जैसे धीरे-धीरे विखरती चली गई है । अभी कल भी तो मीता ने यही कहा था कि 'क्या बात है, सवित्तरी, इन दिनों तुम्हारा आना-जाना तो दिल्ली की तरह का हो गया- कब आओगी, कब नल दोगी, कुछ ठीक नहीं--मगर रहना पराये मन का !' जवाव में जिस विनय भाव से 'ऐसी कुछ बात तो नहीं, बहूजी ! बापू को तबीयत ठीक नहीं चल रही, इसीमें जी उदास रहता है ।' कहा था - मुका लिया। सवित्तरी ने, मगर उसमें जितना विपाद था, विश्वसनीयता नहीं थी। वे लोग चाय पी चुके, तव सवित्तरी पहुंची। मीता ने उसके लिए चाय वचा रखी थी, नाश्ता भी। अभी सवित्तरी चाय के वरतन घोने में ही थी कि जनार्दन यों कहता वाहर निकल गया, "सवित्तरी, मैं रिक्शा लेने जा रहा हूं। बहूजी को अस्पताल में भर्ती करना होगा । तुम मेरे लोटने तक घर देखोगी।" सवित्तरी ने अपनी ही जगह पर स्थिर रहते हुए, थोड़ा-सा सिर घुमाया और चारपाई पर गद्दे का सहारा लिए बैठी मीता की ओर देखा और फिर चुपचाप सिर काम निवटाकर वह मीता के पास आ वैठी । इस बीच मीता का चुप वैठे रहना उसपर बोझ की तरह लदता गया था । वह मीता के अभी तक भी थोड़े गीले बालों को संवारने लगी, तो मीता ने हाथ पीछे ले जाकर उसके सिर को अपने कंधे पर झुका लिया, "क्यों, क्या वात है, सवित्तरी !... तू आजकल एकाएक इतनी खोई-खोई क्यों रहने लगी? हम लोगों से नाराज है क्या ?" सवित्तरी का फूट-फूटकर रो पड़ना मीता से वहन नहीं हो पाया। वह निहायत थकी-सी, बिस्तर पर लेट गई। बोली, "सवित्तरी, गरीव बेटी को सचमुच एक सिर्फ मां-बाप का आसरा होता है, मगर तू फिन मत कर, :. शिवचरन को कुछ न होगा । क्या बताऊं, मैं देखने माती-मेरी खुद.ये गत हो गई है, जाने बचती हूं कि नहीं। वावूजी से कह दूंगी। किसी अच्छे डॉक्टर को दिखवा देंगे । अभी पांच-सात रोज पहले तो आया था शिवचरन, तब सिर्फ कमजोर-भर दिखता था।" सवित्तरी चुपचाप उसका माथा दबाती रही। मीता ने अपनी आंखों को बंद कर लिया, "सवित्तरी, हो सकता है, इस वार मैं जिंदा..." सवित्तरी की मांसल हथेली में उसके होंठ दबकर रह गए। उसने धीमे से सवित्तरी की फालाई पकड़ ली। - मीता को अस्तपाल में भर्ती करते, 'एक्स-रे' करवाते-बारह वज. गए । श्रीमती वरुञा ने बता दिया कि गर्भ में बच्चा क्षतिग्रस्त हो चुका १३० / सवित्तरी है और भीतर ही मर जाए, इससे पहले ही 'बापरेशन करना होगा। लौटने लगा, तब वह लगभग रो पड़ने को था । मोता कुछ देर उसका हाय चुपचाप पकड़े रही, फिर धीमे से मुस्कराई, "नारी देह के दण्ड तो भुगतने ही होते हैं, सुनील के बाबू ! तुम चिन्ता न करना और सुनो, मेरे संदूक में डाकखाने की पास-बुक पड़ी है। रामनगर से यहां ट्रांसफर करा ली पी। शायद, संतीस सौ रपये हैं । तुम्हें तो पता तक न होगा। नौकरी करती थी, इसलिए हो पाए कुछ जमा। मैंने दो फार्म दस्तखत करके रख दिए है। जितनी जव जरूरत पड़े, निकाल लेना । हां, सौ रुपये सवित्तरी को दे देना। बाप की बीमारी से परेशानी में हैं वो लोग । कभी समय निकाल- कर देख भी आना।" जनार्दन को लगा, जैसे डूवे को उधार लिया गया है । उसके भीतर यही चिता लगातार मंडरा रही थी, पैसों की अल्पता में कहीं मीता के उपचार में कमी न रह जाए। मीता से चाबी लेकर, वह तेजी से घर की ओर चल पड़ा, ताकि दो बजे से पहले रुपये निकाल ले। उसने तय किया कि चार-पांच सौ रुपये थोड़ा एकांत करके लेडी डॉक्टर श्रीमती वस्या को उनके निवास पर ही दे आएगा, ताकि आपरेशन करने में वे कुछ विशेष ध्यान रखें । इसके अलावा 'प्राइवेट वार्ड' में कमरे की व्यवस्था करवा लेगा, जनरल वार्ड में तो एक दहशत-सी महसूस होती है। कई बार जान-पहचान के लोगों को देखने जाना पड़ा है, तो यही लगता रहा है, खुद डॉक्टर जनरल वाई के मरीजों को हिकारत की नजरों से देखते हैं । आज भी जाने क्यों यही अनुभव हुआ कि मौजूदा व्यवस्था में तो बाहर भी सारा देश प्राइवेट और जनरल वाडौं में बंटा हुआ है। नौकरी ढूंढने जाओ, कोर्ट-कचहरी जाओ, बाजार में खरीदारी करने जाओ । सर्वत्र सिर्फ संवेदनमून्य पशुजगत में पहुंच जाने की । छटपटाहट होने लगती है। सवित्तरी सुनील के साथ करम खेल रही थी। उसको आते ही फिर वाहर निकलने की हड़बड़ी में देख, पूछा कि खाना लगा दे, मगर वह यह कहता वाहर निकल गया कि, "वस, आधा घंटा और रुक जाना, जरा डाक- सवित्तरी घर तक जा रहा हूं। वहूजी के लिए खाना तुम्हीं दे आलोगी। इस वक्त के खाने के बाद उन्हें भूखा रहना होगा। कल सुवह ही आपरेशन होना सवित्तरी ने अब आंखें उसकी ओर करके देखा, तो वह एक क्षण को रका और कहता गया, "बच्चा पेट में ही नष्ट हो गया है । आपरेशन करके निकालना जरूरी हो गया है। पहले बीमार पड़ी थीं, शायद उसका 'रिएक्शन' हो गया है।" डाकघर से लौटने और अफरा-तफरी में कुछ खा लेने के बाद, जनार्दन ने सवित्तरी को मीता के लिए खाना ले जाने को कहा, "सवित्तरी, अपने सामने खिला देना। मेरा जी तो जाने क्यों डरने लगा है। वर्षों के वाद हम लोगों की कुछ ढंग की गृहस्थी वसनी शुरू हुई थी कि यह मुसीवत या पड़ी। हालांकि तुम, शायद, खुद मुसीबत में हो। मगर इधर कम से कम आपरेशन हो जाने तक तुम्हें मीता की देख-भाल करनी होगी। शिवचरन को में देख आऊंगा । तबीयत ज्यादा खराव हुई, तो रमेश डॉक्टर साहब को दिखा..." "नहीं बाबूजी, ऐसी कोई खास फिक्र की बात नहीं। अब तो ठीक- ठाक हैं।" सवित्तरी बोली, तो जसे अपने आस-पास तने जाले साफ करती- सी। -- "तुम्हारे लिए मीता ने सौ रुपये देने को कहा था, लौटते में लेती जाना । यहीं ऊपर वाले खाने में रखे रहेंगे।" सवित्तरी ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह लगातार आमने-सामने पड़ते भी, अपने चेहरे को अनुपस्थित कर लेती-सी जान पड़ती है । उसके व्यवहार से, या चेहरे और आंखों से-उन लोगों के प्रति अवज्ञा या अप्रियता झांकती नहीं, किंतु सवित्तरी में परिवर्तन आया है, यह अव उसके आते-जाते, काम फरते में पतझर में झरते पत्तों की नामालूम-सी आवाज की तरह अपने को प्रकट करता रहता है। सवित्तरी आंखों से ओझल हो चुकी थी, मगर उसका सम्मोहन छाया की तरह छूट गया अनुभव होता है । जनार्दन थकान अनुभव करता चारपाई पर लेट गया और सुनील को अपने पास बुलाकर, सीने १३२/ सवित्तरी पर विठा लिया, तो उसका 'ममी कहां है ?' पूछना, सयानों का पूछना लगा। "मम्मी हिस्टर लेने गई ?"सुनील ने फिर पूछा। उसे याद आया, इधर वह कहने लगा था। कुछ दिनों के बाद मां पर दूर जाएगी और उसके लिए परिस्टर' लाएगी। "वैसी ही हिस्टर? लंगोन?" सुनील के आलमारी में रखो गुड़िया की तरफ उठे हाथ को देखते हुए, एकाएक उसे वे कुछ क्षण याद आ गए, जब श्रीमती बरुमा का बताना कानों में कूड़े को तरह गिरता अनुभव होता रहा था। उसने गाया, मांसों में चुभन-सी हो रही है। पास में पड़े ट्रांजिस्टर को उठाते हुए, उनने सुनील का ध्यान बंटाने का इरादा कर लिया और साथ-साथ यह भी सोचता रहा कि प्राइवेट वार्ड में कमरा मिला तो क्या करना ठीक होगा । मुनील के साथ सुद वहां भीता के साथ रहना, या सवित्तरी को"किंतु वह वहां रहने की बात को स्वीकार करेगी भो ? उसे अभी काफी फासले पर ही सही, कभी-कभी जाने क्यों यह आशंका भी आकार लेती-सी मालूम पड़ती है कि कहीं मीता को कुछ हो गया" तो? हालांकि इस आशंका के कल्पना में उभरते ही, वह उसे राह चलते में पांवों से अचानक उलझ गए गदे चोयड़े की तरह दूर फेंक देने की कोशिश करता है, लेकिन जाने क्यों इसके बाद भी गदं की तरह इतना अपने इर्द-गिर्द टूट गया-सा लगता है कि मा को सो चुके सुनील के साथ सवित्तरी के वार्तालाप में होते हुए वह कैसी मानसिक स्थितियों में होगा? क्या इसके वाद भी वह यों ही सुनील की देखभाल करने आती रहेगी? उसे लगा, श्रीमती वरुआ की बातें उसके कानों में कनखजूरों को तरह भर गई हैं बौर ये सारी अप्रीतिकर कल्पनाएं मन में समाए दहशत की उपज-भर हैं । जब उचित समय पर आपरेशन होने जा रहा है, तो तक- लीफ चाहे जितनी हो, जोखिम नहीं ही होना चाहिए । सवित्तरी के लौटने तक वह सो चुका या, सुनील भो । दरवाजा मों ही उढ़का था, सवित्तरी का कमरे में आ जाना उसे पता नहीं चला। सवित्तरी कुछ क्षणों तक उसे चुपचाप और एकटक देखती रही। उसके चेहरे पर विपाद की छाया थी, जैसे कोई दुःस्वप्न देख रहा हो । सवित्तरी । रसोई में गई और चाय बनाने की तैयारी में भी सावधानी बरतती रही किशोर न हो। मीता ने कहा था कि अगर सोया न हो तो चाय देकर, जल्दी भेज दे, सुनील के साथ । , सवित्तरी चाय लेकर नजदीक पहुंची, इस बीच जनार्दन की नींद एका- एक टूटी थी, और सवित्तरी के रसोईघर में होने को उसने जान लिया था, मगर आंसें वन्द किए रहा। सवित्तरी ने 'चाय' कहा, तो आंखें बंद किए हुए ही उसने सवित्तरी के हाथ को धीमे से यों पकड़ा, जैसे गहरी नींद का अलसाया, मीता समझ रहा हो उसे । हाथ आगे बढ़ाकर, सवित्तरी को स्पर्श करने की मानसिक तैयारी करते हुए मन में एक अजीव-सा धुंधलका था, हाथ पकड़ लेने पर स्वच्छ शीतल हवा के किसी झोके को छू लेने की सी अनुभूति हुई। इस लड़की में कोपलों की तरह उदित होता गया-सा स्त्रीत्व मन में निरंतर एक प्रीति- भाव भरता चला गया और अब अनुभव हो रहा है कि यह सब प्रकृति की तरह ही स्वाभाविक था। इसमें दोप कहीं नहीं है । मुग्धता मानवचित्त का विकार नहीं, संस्कार है, मगर सवित्तरी, शायद, इतनी दूर तक देख न पाएगी। जनार्दन उसको लेकर जो अक्सर बड़े भाई या पिता की सी चिताओं में हो जाता रहा है कि अंततः क्या होगा इस गरीव वाप की बेटी का? जंगल में के फूल का सा इसका स्त्री होना कैसा है, जैसे पैदा न होकर, प्रकट हुई हो! मीता भी तो यही कहती थी कि यह अपवाद रूप से सुंदर लड़की है । सवित्तरी ने अत्यंत धीमे, लगभग ऐसे शांत मनोभाव से अपना हाथ अलग कर लिया, जैसे उसके सोचे हुए को सुनती गई हो। चाय पीते हुए जनार्दन लगातार निश्चय करता रहा कि हालांकि यह एक नाजुक वक्त है, किंतु मीता से वह इस प्रसंग को कहेगा जरूर । नहीं, मन में कहीं भी ऐसी अपराध-भावना की जकड़न नहीं है । वह फूल को छु लेने में अनुभव हुई-सी इस मुग्धता को छिपाएगा नहीं । मीता के स्वभाव को वह जानता है। उसके दुत्ति में न होने को मीता साफ-साफ अनुभव कर पाएगी और अपनी इस अस्वस्थता में भी मजाक करने में चूकेगी नहीं। १३४ | सवित्तरी पली के विश्वास का बंधन सबसे ज्यादा मजबूत होता है । विश्वास त्री को बड़ा बना देता है और आदमी को गलत हो जाने से, जितना गरिमा रोक सकती है, शायद, अंकुश नहीं । जनार्दन ने एकाएक अनुभव किया कि मीता जो अपार और देने पगी है कि 'वह कुछ कहानी-उपन्यास-निबंध-जसी धीजें लिसे, तो यह राम अगम्भप तो है नहीं। मीता का आपरेशन सफल हो जाए तो वह वहां उसका साप रहते हुए शुरुआत कर सकता है । मीता के बारे में सोचते-सोचते वह सयित्तरी की उपस्थिति को भूल गया था। उसने कहा, "यहूजी कही थी, मुनील को साथ लेते जाएंगे आप..." एकाएक ही उसने सवित्तरी की ओर देगा और दग एक क्षण में सवित्तरी का चेहरा पूरा-पूरा दिया गया उसे~वेदाग और निग्धर । उसका मन हुआ कि कहे, 'सवित्तरी, तुम यो प्रतिमा-गी पड़ी होती हो, तो स्तुति करने को मन होता है । मगर यही इसने एकाएर यह दिया कि 'बाबूजी, हमसे मजाक न किया पीजिए। “पाकि 'बाबू गाहेय, हम गरीव घर की बेटी है, रोजी की पातिर पग में काम करती फिरती है। मगर हमारी भी इग्जत है !'.."नो ? उसने अपने भीतर एक सिहरन-सी अनुभव की और अब तक पगारे सोचे हुए को समेटकर, एक. बोर रखता हुआ-गा योला, "विरारी, गुम क्या दो-चार दिन बहजी के साथ रह सकोगी ?" "नही माहेय ! वहजी ने कहा है कि हम गनेशी के गाय पहा पर पर, रहेंगी । औपरेशन के दिन और दो-तीन दिन बाद तक यही पण यो गाप रखना नहीं चाहती हैं । वही थी, यहा परगान होगा। वर्ग को यहाँ रगना ठीक भी नहीं। ऑपरेशन के बाद ही बहत भारान भी बरत पड़ेगी।" मस्तिरी एक मान में कह गई। अपने गिर को अपने विविध नुका कर लिया था, मगर उमऊ बोलने में एक मशिनी गरि का याभास था। वह कुछ न कह पाने की यिात में घटका पहा पाकिमपिन माग बढ़ी और मुनील काहे ठीक करने में जुट गई । मुनील की में मी धूल को अपनी धोती के किनारे से पोंछते-पोंछते ही, वह वोली, "आप लोग चले जाएंगे, तब हम दरवाजा बाहर से बंद करती चली जाएंगी। वहूजी बहुत विस्वास करती हैं न हमारा, कभी धोखा खा लेंगी, तव जानेंगी। हमने बहुत कहा, हमें न सौंपिए, मगर मानीं नहीं । कहती थीं, 'अरे तू कोई नौकरानी है, सवित्तरी-छोटी बहन है, मेरी।":"जो खुद बड़ा होता है, वह दूसरों को भी बड़ा कर देता है । जो खुद नीच होते हैं, दूसरे को भी गिराते हैं। "हमने बहूजी से कहा था कि प्राइवेट में तो रसोई भी बन सकती है, वहीं कुछ स्टोव-वरतन उठा ले जाएं क्या । मना करने लगी कि दो-चार दिन के लिए कहां इतना बवाल किया जाय । शाम का खाना हमसे यहीं बना लेने को कही हैं। बाज आप वहीं रहेंगे तो "मैया दयाती वनी, तो हंसती-खेलती घर लौटेंगी जल्दी ही। हम तो अभी भी उम्मीद करती है। बच्चा भी ठीक-ठाक होगा। बड़ी-बूढ़ियां कहती हैं कि सात महीने के तक जिंदा बच जाते हैं । "यों तो बहूजी की जिंदगी रही तो देने वाला और देता रहेगा।" जनार्दन सुनील को जगाना चाहता था, मगर सवित्तरी की बातों में उलझा, सुनील की पीठ पर यों ही हाथ रखे रह गया । सवित्तरी का इस वक्त का धाराप्रवाह बोलना जैसे नदी का वहना था । द्वन्द्वों से ऊपर उठी हुई उसकी आवाज । वीच में वह कुछ सहमा था कि नीच लोगों के द्वारा दूसरों को भी छोटा किए जाने की बात कहीं उसने जनार्दन के द्वारा हाथ पकड़ लिए जाने के प्रसंग में तो नहीं कही थी। उसने घूरकर, सवित्तरी की ओर देखा । ऐसा नहीं दिखा, जो कांच के टुकड़ों की तरह गड़े। वह कहने को हुआ कि 'सवित्तरी, इस आपरेशन फे बाद फिर, शायद, मीता मां बन नहीं सकेगी। मगर कहा नहीं । अस्पताल को जाते समय, जनार्दन कहता गया, "सवित्तरी, ताला-चावी के नीचे दवाकर तुम्हारे लिए रुपये भी रसे हैं । लेती जाना जाते समय ।" सवित्तरी साथ-साथ बाहर निकलने की बात सोच रही थी, मगर रुक गई । वह मुनील को अंगुली थमाए बाहर निकला, तो दरवाजे तक निकल आई। मोड़ पर पहुंच चुकने के बाद, जनार्दन ने यों ही पलटकर, घर की जोर देखा, तो दरवाजे से लगकर खड़ी सवित्तरी को देखकर, एकाएक उसके - . १३६ / सवित्तरी भीतर एक अजीब और अभूतपूर्व-सौ कल्पना कोष गई। सवित्तरी पर सोचने से अपने को अलग करता हुआ-सा; वह अपेक्षाकृत तेज कदमों से आगे बढ़ गया। रात के प्रारम्म होते ही, मीता ने सुनील को घर वापस ले जाने को कह दिया, सुनील के साथ खुद भी बरामदे तक आई और सवित्तरी ने, सुनील को गोद में उठा लिया, तो माथा चूमती बोली, "याज बांटी के साथ रहना, सुनो! मेरा बेटा तो बड़े प्यार से अपनी सवित्तरी मौसी के साथ रहेगा। विल्कुल अपने बाप पर गया है ना !"कहानियां सुनाने को कहना मौसी से। 'रुनक भुनक मैया माई रे मंदिरवा' वाला गाना भी सुनना, हां! सवितरी, तुलसीजी का दीया जरूर जला देना।"और सुन, कल सुबह जल्दी न माना । वावूजी जाएं, तव ।" जनार्दन अपनी जगह पर गड़ा-सा सवित्तरी और गणेशी को जाते देखता रहा । मीता के बोलने में प्रसन्न दिपने की कोगिनों के वावजुद अवसाद अब साफ अनुभव होने लगा है। जिस जोखिम से मुबह-सुबह गुजरना है मीता को, वह रात के प्रारम्भ होते ही जैसे उसके कंधों पर वाज की तरह आ बैठा है। मीत्ता को सहारा दिए, वापस जनरल वार्ड में लाते-सात जनार्दन को लगा, जैसे चिंता और विपाद उसके गले तक आ पहुंचे हैं। हवा नितांत मद्धिम है वार्ड में, फिर भी जाने क्या है, जो भील के पानी की तरह तलवों पर से कार उठता-उठता, कानों के इर्द-गिर्द महसूस होने लगता है। जनरल वार्ड के भयावह वातावरण में आत्मीय वार्तालाप के हो सकने की सहूलियत कतई नहीं है । सिर्फ औपचारिक बातें कर लेने भर की गुजा- इश मालूम पड़ती है। "प्राइवेट वार्ड में कमरा कल सुबह ही मिलेगा। महम कह रही यों कि ऑपरेशन के बाद सीधे वही रखा जाएगा तुमको।" "मैं हिम्मत हारने लगू, सुनील के दावू, तुम न हारला। बाज हो प्राइवेट वार्ड मिल गया होता, तो मैं रात देर तक तुमने बातें करती । आज मैंने पहली बार अनुभव किया है कि मां-बाप मरते वक्त बच्चों को ढेर सारी बातें क्यों समझा जाना चाहते हैं । "सुनो, तुम बच्चों का-सा जी नी/930 न बना लिया करो । जीवन तो जीवन है, इसके संकटों से भागने लगो, तो और बढ़ते हैं। खुद मुझे पूरा विश्वास है, मुझे कुछ नहीं होगा। "मगर एक लम्बे वक्त तक ज्यादा वोलने की इजाजत भी तो नहीं देंगी, डॉक्टर? तुम समझो कि सामने बैठे होगे, मेरे मन में ढेर सारी बातें उमड़ती होंगी, लेकिन चुप रहना होगा। दरअसल, मुझे यह कल्पना बोझ मालूम दे रही है कि ऑपरेशन के पहले मुझे बेहोश किया जाएगा । हो सकता है, आप- रेशन दो-तीन घंटे चले। "और यह एक पूरा युग होगा, जव मैं तुम लोगों के विना अकेली रहूंगी।" जनार्दन ने देखा, मीता ने अपनी आंखों को धीमे से मूंदा है । उसके हाथ को अपने दोनों हाथों में थोड़ा कसकर पकड़ा है और वंद, पलकों में से आंसु ओस की बूंदों की तरह प्रकट हो रहे हैं । वह चुपचाप मीता को देखता रहा। यह क्षण खुद के विगलित होने का नहीं, इस स्त्री को सांत्वना दे सकने का है-यह अहसास होते ही, उसने अपने-आपको संतुलित कर लिया और संकोच त्यागकर, वायें हाथ से मीता का माथा सहलाने लगा। वह रात मीता की वेड के समीप जमीन पर सोया था। बड़ी देर नोंद आई ही नहीं, लेकिन लगभग तीन बजे के बाद जो आंख लगी, तो सव कुछ नींद की गहराइयों में डूब गया। सुबह आंख खुली, तो वार्ड की खिड़कियों के पास तक चली आई नीम की टहनियों पर फुदकती चिड़ियों का चहचहाना सबसे पहले सुनाई पड़ा और जनार्दन को यह सव अत्यंत प्रीतिकर लगा। चिड़ियां ऐसे मधुर स्वर में चहचहा रही थीं, जैसे नये जीवन की अगवानी में गा रही हों। उसने बैठते हुए, मीता की ओर देखा-वह जाने कव की जगी थी। उसके चेहरे पर रात के वात का विपाद तो नहीं था, लेकिन एक शांत थकान-सी जहर थी। १३८ / सवित्तरी १५ आपरेशन के वाद की तीसरी शाम जनाईन मीता के लिए मौसम्बी- डबलरोटी लेने कर्नलगंज सब्जीमण्डी की ओर निकला, तो अस्पताल वापस लौटने से पहले सीधे डेरे पर चला गया। सोचा, सवित्तरी सागा दूघ ले बाई होगी। सुनील को वह मीता के पास ही छोड़ आया था। अस्पताल वाली दाई कमरे में है, देखेगी । आज से अस्पताल से छुट्टी मिलने तक, अब दोनों मीता के कमरे में ही सोएंगे। सवितरी, शायद, इस वक्त खाना बना रही होगी। लेता जाएगा। घर पहुंचा, तब अंधेरा हो चला था । रोशनी वाली जगहों से अस्तित्व- रक्षा में भागा हुआ-सा अंधेरा बोट को जगहों में काफी गहरा हो गया था। मीता के पास से घर पहुंचने तक के इस अंतराल में जनार्दन ने अनुभव किया कि आपरेशान को सुबह वाले पास की स्थिति से अब तक पूरी तरह मुक्त हो चुका है। यह ठीक है कि यद मीता मां बन सकने यो सभावना को खो चुकी औरत है, किंतु उसने अब अच्छी तरह अनुभव कर लिया है कि पत्नी की आवश्यकता आदमी को सिर्फ बच्चों की परवरिश के लिए ही नहीं होती, खुद अपनी परवरिश के लिए भी होती है । उसे याद है, बाप- रेशन के क्षणों में बरामदे में चहलकदमी करते वक्त उसने मीता के लिए प्रार्थनाएं की थी । ईश्वर से ही नहीं, पिता से भी। उसे याद है, जब आपरेशन के दूसरे दिन मोता बताया गया था, तो उसने धीमे से मुस्कराते हुए कहा था, 'अगर तुम्हें 'योग परिवार सुस था, उसे परिवार' से संतोप न मिले, तो कहीं नियोग करके ले आना दो-चार बच्चे। पालन-पोषण में कर दूंगी, यह वादा रहा !' 'कहीं' पर मीता ने कुछ इस तरह जोर दिया था, एकाएक जाने क्यों सवित्तरी याद आ गई थी । अव, इस वक्त, वह घर से सिर्फ चंद कदमों के फासले पर है और उसके भीतर इन तीन दिनों में सवित्तरी के साथ वीता समय गड्ढे में भरते जल की तरह इकट्ठा हो आया है । वीच के कुछ असें में अन्यमनस्कता में डूवी-सी सवित्तरी इस बीच पूरी तरह आत्मीय हो आई थी। आपरेशन वाले दिन चिंता से उसका कैसा बुरा हाल था ! अचानक ही रोने लगती थी। आज सुबह जब वह नहाने, पूजा करने लौटा था, पानी, कच्छा-बनियान, तोलिया रखते, चाय-नाश्ता तैयार करते हुए कैसी लगती रही थी सवित्तरी ! स्त्री जब अपने सम्पूर्ण स्नेह में होती है, तो कैसी रची गई-सी अनुभव होती है! उसने ज्यादा देखा नहीं था सवित्तरी की ओर, मगर, शायद, लगभग अपने समूचेपन में उसे अनुभव करता रहा था। सवित्तरी पूजा-घर और तुलती वाले गमले में दीये जला चुकी थी। दरवाजा उढ़काया था, मगर खिड़की में से रसोईघर में बैठी सवित्तरी साफ-साफ दीख रही थी । मीता को दी हुई यह केशरिया किनारे वाली सफेद धोती पहने रहती है, तो पीठ की ओर से दूसरी मीता लगती है । मीता अस्पताल में भर्ती न होती, कहीं पास-पड़ोस में गई होती, तो वह सीधे जाकर सवित्तरी को अपनी बांहों में भर सकता था और सवित्तरी के चौंकने या नाराज होने की मुद्रा में होने- होने तक, तुरंत कह सकता था, 'अरे, तुम हो सवित्तरी ! मैं समझा, मीता है । माफ करना, देखने में धोखा हो गया।' उसने धीमे से दरवाजा खटखटाया । 'कालवेल' लगा लेनी है, यह वात फिर याद आ गई। सवित्तरी 'आई, वावूजी !' कहते हुए इस ओर आती खिड़की से साफ दीख गई और लगा कि देख चुकी है । दरवाजा खोलने के साथ ही वह थोड़ा-सा एक ओर हट गई थी। कमरे में रोशनी तेज नहीं थी और उस थोड़ी मद्धिम-सी रोशनी में सवित्तरी और सघन हो आई-सी महसूस हो रही थी। - १४० / सवित्तरी "बहुजी को तवियत तो बिल्कुल ठीक है ना, साहेब ?" उसने पूछा, तो वह सहसा उत्तर न दे सका । दरवाजा बंद करके सिटकनी लगाई। जमे अपने को कही अंतरिक्ष में पा रहा हो, खुद के ही लिए अपरिचित-सी आवाज में बोला, "विल्कुल ठीक है । तुम तो ठीक हो ना?" जनार्दन ने साफ अनुभव किया कि उसके बदले हुए स्वर की प्रतिक्रिया सवित्तरी में हुई है और जैसे उसका चेहरा आईना हो गया है । सवित्तरी के प्रति अपने अनुराग को जनार्दन ने महसूस किया कि दह सवित्तरी के चेहरे पर ज्यादा साफ-साफ देख पा रहा है । सवित्तरी के प्रतिविम्ब भरे दर्पण जैसे चेहरे पर एक चौकन्नापन-सा आ चुका था और वह 'सब्जी न लग गई हो,' कहती रसोईघर की ओर मुड़ी ही थी कि जनार्दन ने उसे अपनी बांहों में भर लिया और जब तक में सवित्तरी ने अप्रत्याशित किस्म की सी तेजी से उसे भटककर, अपने से अलग किया- जनार्दन को अपने नदी में समा चुकने की अनुभूति हुई । उसे लगा, इस वक्त, यह रोशनी या अंधेरे में फर्क कर सकने जितनी चेतना भी खो चुका है। सवित्तरी ने अपने को इतने वेग से छुड़ाया था कि वह लगभग गिरते- गिरते बचा। उसे लगा कि अब इसके बाद सवित्तरी रुकेगी नहीं । या तो तेजी से रसोईघर की ओर जाएगी और या अपने घर की ओर। वह तिरस्कार और ग्लानि के बारे में एकदम स्वत्वहीन हो चुका था। उसे लग रहा था, अपनी इस स्तब्धता में से उबरने में जाने कितना समय लग जाएगा । सवित्तरी प्रतिरोध करेगी, इसकी कल्पना भी कहीं मन में होती, तो वह कदापि अपनी मर्यादा न त्यागता-यह अहसास उसे और ज्यादा जड़ीभूत किए था। सवित्तरी वहीं, अपनी जगह खड़ी थी। अपने सारे विक्षोभ को समे. टती-सी वह वोली, "वाबू साहेब, ये सब अच्छी बात नहीं । आप तो देवता आदमी हैं। हम जसी नाचीज औरत को छूना आपको शोभा नहीं देता। आप बैठे, हम आपके लिए चाय लाती हूं।" उसे चाय पिलाने और खाना-दूध वगैरह सब सहेज देने के बाद, सवित्तरी उसके साथ-साथ बाहर निकली। जनार्दन के हाथ खाली नहीं थे। सवित्तरी ने ही दरदाजा बंद किया और ताला लगाने के बाद चाबी जनार्दन को देती बोली, "वहूजी से कह दीजिएगा, अव हम सुवह की वेला देखने भाएंगी।" सवित्तरी के, मागे निकलकर, ओझल हो जाने तक वह अपनी ही जगह खड़ा रह गया । गली में खड़ा कुत्ता उसे अपनी ओर घूरता-सा लगा। डोलची साइकिल में लगा लेने के बाद, थोड़ी दूर तक वह इस भय में साइ- किल थामे पैदल ही चलता रहा, कि सवित्तरी दुवारा न मिल जाए। जब वह मीता के पास से चला था, अव उसे साफ-साफ याद आया कि तभी से कहीं किसी सुदूर अंधेरे कोने में सवित्तरी की स्मृति उसमें भोर के तारे की तरह उदित हो चुकी थी। सवित्तरी के निकट पहुंचने तक में वह खुद एक तरह की रोशनी में हो चुका था। सवित्तरी को अपनी चेतना में अनुभव करना निरंतर सघन होता गया था। और नव सवित्तरी उल्का की तरह टूट पड़ने के वाद, उसे एक सम्पूर्ण अंधेरे में डुबो गई है । मीता के पास पहुंचने-पहुंचने तक वह अपने भीतर ही भीतर पूरी तरह परास्त हो चुका था। शिवचरन का-वहां मीता के पास बैठा होना उसे ईश्वरीय दण्ड जितना वेधक लगा और वह 'मैं अभी आया, मीता ! वाहर जरा एक-दो दोस्त मेरा इंतजार कर रहे हैं।' कहता, तुरत बाहर बरामदे में निकल आया और अस्पताल के मुख्य द्वार से काफी फासले पर इस प्रतीक्षा में टहलने लगा कि शिवचरन बाहर निकल आए १४२ / सवित्तरी १६ दूर से आती मीता को वह देखता रहा। घर से कुछ दूरी पर ही वह रिक्शा पर से उतर गई। जनार्दन और सुनील को देखते ही उसका चेहरा आत्मीयतापूर्ण मुस्कराहट से भर गया। नजदीक आ गई, तो जनार्दन ने साफ महसूस किया-मोता की आंखों में कालेज से लौटते समय की थकान से ज्यादा गरिमा और संतोष का भाव है। बरामदे में रखी सब्जी की थाली देखते ही, मीता हंसी, “अब तुम मेरी घरवाली हो चुके हो !" जनार्दन ने कोई उत्तर नहीं दिया, किंतु उसका उदास हो जाना मीता से छिपा नहीं । वह तुरत चाय बनाने रसोईघर को जाने लगी थी कि जनार्दन ने हाथ पकड़ लिया। बोला, "पहले कपड़े तो बदल लो, मीता !... और जव घरवाली का खिताव दे चुकी हो, तो हक न छोनो। पाय मैं बना लाता हूं।" मीता ने उसके सिर के बालों को मुट्ठी में भर लिया, "चलो, उधर बैठो। कपड़े बदल लेने पर ही चाय बनाऊंगी अब !.."मगर, श्रीमानजी, आप ये न भूलें कि होम-डिपार्टमेंट में तुम सिर्फ 'एवनी' हो, 'पर्मानेण्ट' अस्पताल से वापसी के बाद कंसी अनंत ममतामयी-सी हो चली है यह औरत ! इसके खिलखिलाने में अब कहीं जाकर, विवाह के तुरत वाद के दिनों की-सी तरुणी का आवेग गूंजता सुनाई पड़ता है। रात के भोजन के बाद, सुनील के सो जाने तक तो मीता अपने कालेज की बातें सुनाती रही। यह भी कि प्रिंसिपल श्रीमती अग्रवाल तो उसपर मुग्ध हैं और 'मीता वेटी, मीता वेटी,' पुकारते हुए, विल्कुल मां हो आती हैं । सिर्फ सप्ताह-भर की नौकरी में ही इतनी आत्मीयता किसी और टीचर को कभी इस कालेज में मिली न होगी, ऐसा प्रायः कहने लगे हैं लोग । "हो भी तुम ऐसी ही, मीता !" "मुझमें जो कुछ प्रिय लगता होगा दूसरों को, सुनील के वाबू, उसमें जाने कितना तुम्हारा दिया होगा। अच्छा, सुनो, कालेज में नीकरी मिल जाने के बाद से मुझमें कुछ अहंकार भाव जागने लगा है। अब अगर मैं तुम्हें 'सुनील के बाबू' की जगह जनार्दन कहकर पुकारने लगूं, तो तुम इंफोरियारिटी काम्प्लेक्स से पीड़ित तो न हो जायोगे ?" मीता का पड़ोसियों का लिहाज रखते हुए खिलखिलाना कसा उसे अपनी मर्यादा में वहती नदी-सा कर देता है ! नींद में डूबने-डूबने को हो चुके सुनील ने वीमे से आंखें खोलीं, तो मीता ने उसकी आंखों को चूम लिया। "अब तुम सुनील को चूमती हो, तो मुझे अपनी त्वचा पर सिहरन अनु- भव होती है।" "सिर्फ सिहरन-उत्तेजना नहीं ? हो पंडित ही !" "पोंगापंडित नहीं कहा तुमने..." "सवित्तरी का आना तो छूट ही गया।" वह समझ नहीं पाया, एकाएक क्यों मीता को सवित्तरी की याद आ गई, किंतु जैसे एकाएक उसने तय किया और धीरे-धीरे वह सारा प्रसंग वता गया, जो मीता के आपरेशन की तीसरी शाम सवित्तरी के साथ घटित हुआ था। "मीता, मैं शायद तुमसे माफी मांगने का हकदार नहीं रहा..." "हां. काफी देर कर दी तुमने 'कनफेस' करने में "नहीं तो, शायद माफ कर ही देती।"देखो, जनार्दन, पति-पत्नी का रिश्ता तो ऐसा है कि दोनों में से कोई एक ईश्वर के आगे क्षम्य न रहे, तो भी दूसरे के सामने रहे ।"तुम दरअसल पोंगापंडित हो । बेकार इतने दिनों तक बोझ ढोते रहे । तुम्ही न कहा करते थे कि वावूजी बताते थे कि रथ के दो पहिये होते हैं पति-पत्नी । १४४/सवित्तरी स-६ अपना कोई बोम अकेले होने लगे, तो इसमें ज्यादा कटिन और तकलीफ- देह कुछ और नहीं । तुम्हारा सारा बर्ताव सिर्फ स्वाभाविक था। उस रोज शिवचरन को देखते ही तुम्हारा चेहरा उतर गया था, मैं आज समझ पाई कि क्यों । जिसमें हया होती है, मर्यादा होती है, वह पश्चात्ताप में डूबता है, सुनील के चावू, वेया तो 'रेप के बाद भी मूछों पर ताव देते हैं । तुमने, में सूब जानती हूं. यह सारा प्रसंग मुझसे छिपाने की चालाकी में अपने भीतर नहीं दयाए रखा, बल्कि अपनी शर्म में नहीं कह पाए तुम । "मगर मेरी ममझ में अब भी यही नहीं आ रहा है कि नवित्तरी ने ऐसा किया क्यों ? आने को तो वह मेरे अस्पताल से लौटने के बाद भी करीब बीसेक रोज तक आती रही। "वह तुम्हारे पूरी तरह स्वस्थ हो जाने के इंतजार में होगी।" "मैं बिल्कुल दूसरी बात सोच रही हू । मेरे लिए ताज्जुब की बात यह है कि तुम्हें इस तरह दुत्कार क्यों दिया उसने ।" "इसमें ताज्जुब की बात क्या है, मीता! मुझे वह शरीफ भादमी समझती रही और मेरी हरकत से उसको एकाएक 'शाम' लगा होगा। उसके विश्वास को चोट लगी होगी । और दूसरी बात यह है, मीता कि उसके मन में जरूर कही यह पीड़ा भी जागी होगी कि एक गरीव-बीमार रिक्शेवाली की बेटी न होकर, वह अच्छे खाते-पीते घर की बेटी होती, तो न यो पराये घरों में नौकरी करती होती, न उसे छेड़ने की कोर्ट हिम्मत करता । उसे मेरा छेड़ना, अनुराग में छेड़ना न लगा होगा गरीव लडकी के साथ मालिक की गंदी हरकत मालूम पड़ी होगी। मैंने उम दिन लगातार यह महसूस किया कि शराफत के खोल में कही मैं वच्चालाल से भी ज्यादा दुश्चरित्र व्यक्ति हूं। यह सचमुच कितना बड़ा पाप है मीना कि हमे किसी गरीब के वेटी में अपनी बहन-बेटी का प्रतिरूप न दिखाई पडे, बल्कि इस विकार के मारे हमें उचित-अनुचित कुछ न में ही नहीं कि यह गरीब है, बेसहारा है-इसे दवाया जा सकता है कुमलाया जा सकता है !" मीता ने धीमे से उसके होठो पर अपनी हथेली रस दी। गौर से उसके पश्चात्ताप-भरे चेहरे को देखती रही, तो पाया कि जनार्दन की आखों में आंसू भर आए है। . निती१८५ थोड़ी देर दोनों के बीच सिर्फ मौन उपस्थित रहा । जनार्दन को संयत देखते ही, मीता ने उसे करवट घुमा दिया और कंधों को धीमे-धीमे दबाती कहती गई, "सब नष्ट हो जाय, आदमी के भीतर का करुणा भाव न नष्ट हो, तो समझो कुछ नहीं गंवाया है । तुम्हारी वातों ने आज मेरा औरत होना सार्थक कर दिया।"देखो, अचानक ही मुझे याद आ गया कि नसें बातचीत कर रही थीं आपस में कि लड़की थी। अव इस वक्त और तृष्णा अनुभव हो रही है कि काश, उसे एक झलक देख तो लेती ! कैसा अबूझ है यह औरत होना! वच्चे की आकृति को पहली-पहली वार का देखना-कितना चमत्कार पूर्ण होता है वह क्षण किसी मां के लिए ! लेकिन, देखो, तुम इस मुगालते में न पड़ जाना कि भविप्य में मां न बन पाने की कुंठा में बोल रही हूं। तुम्हारे ही शब्दों में दो वच्चों की मां तो मैं आज भी हूं ही और दो से ज्यादा में आज- कल नौकरी तक से हटाया जा सकता है !" कुछ क्षण, मीता, हंसती रही। फिर लगा, चेष्टापूर्वक हंसना वेदना को और गाढ़ा वनाएगा। चुप हो गई। जनार्दन ने करवट लिए-लिए ही कहा, “सो जाओ, मीता, बहुत थकी होगी । अभी तुम्हें काफी दिनों तक आराम की जरूरत होगी।" "देखती हूं, कब तक लेने देते हो आराम !" मीता ने धीमे से चुटकी भर ली उसकी पीठ पर, तो वह चिहुंक उठा। मीता धीमे से उठती, बत्ती बुझाती सुनौल वाली चारपाई पर चली गई। कुछ क्षणों के बाद, धीमे से बोली, "मुझे अभी भी नहीं लगता कि सवित्तरी तुम्हारे छूने से नाराज हो गई होगी। 'आखिर मैं भी तो औरत हूं और औरतों के सोचे हुए तक की गंध ले सकती हूं।" वह तेजी से मीता की ओर पलटा, मगर अंधेरे में आर-पार तक कहीं कुछ दिखाई नहीं पड़ा।
१७ 1 साल-भर बीतते न बीतते जाने कितना परिवर्तन आ गया है । सुनील स्कूल जाने लगा। जनार्दन को डी० फिल० की उपाधि ही नहीं मिल गई है, बल्कि शोध ग्रंथ छपना भी शुरू हो गया। पूरी आशा है, शीघ्र ही कहीं प्राध्या. पक के रूप में नियुक्ति हो ही जाएगी। फिलहाल निगम साहब के स्कूल में पढ़ाने के साथ-साथ, प्रबंध का कार्य भी देख लेता है और निगम आशा से अधिक ही देने लगे हैं । सुनील भी आखों के सामने रहता है उसके । मोता भी निश्चित भाव से कालेज जा पाती है। मां परसों ही आ गई थीं, मगर थकी-सी थीं सो मंगम नहाने की बान आज तक के लिए टाल दी गई। आज रविवार तो नहीं, मगर छुट्टी है । मां इस बार अकेली आई है-जनार्दन की वनारस वाली मामी और उनके बेटे-बहू के साथ । वे लोग शुक्र की शाम ही बनारम चने गर । - जाते मामी कहती गई थी कि जनादंन के मामाजी का कहना है वि डांस्टरेट की डिग्री मिल जाए तो दहर में नहीं सही, जिले के रिमी हिलो वानेत्र में नियुक्ति करवा ही लेंगे। इस नौकरी वाली बात पर तो मीता ने ध्यान हो इमलिए नहीं दिया कि वह नहीं चाहती कि दोनों को अलग-अलग शहर में नौकरी करनी पड़े या कि वह भगततारन वाली नौकरी छोड़ दे। मगर अपनी मा का जनार्दन की मामी से कहा हुआ नहीं भूलता कि 'विपिन की मा, एक देल की किमया गई है इन लोगों की। आगे की आस जाती रही। मैं आस लगा - ।
इस साल जाने में दूसरे नाती का मुंह देखने को मिलेगा।' मीता कहने को हुई थी कि मां, तुम लोग औरत होने की सारी कृतार्थता बच्चे पैदा कर पाने में ही क्यों देखती हो।' मगर कहा नहीं। इतना तो है कि अधिक नहीं, पर एक-दो और बच्चों की कामना उसे भी थी। नसों का तव का आपस में बतियाते हुए कहना कि लड़की थी-साल-भर से अधिक हो गया~मगर जाने क्यों माथे पर के घाव की तरह रह गया है, मिटता नहीं। रह गई होती, तो आज अपने पैरों चलती होती। मीता की आंखें अपने-आप आर्द्र हो आई। अपने अवसाद में से उबरने की कोशिश में वह थोड़ा जोर से पुकार उठो, "इजा, तुम देर लगा रही हो। ठंडे पानी में नहाने से डर लगता है क्या ? मगर गंगाजी के नहाने का तो सारा पुण्य ही नहीं, पानंद भी तभी है, जब कड़क सर्दी में नहा आए ।" मां पूजा की सामग्री वाली डोलची लिए, सुनील का हाथ पकड़ती बाहर निकल पाई, "इतना डरती, तो नहाती ही क्यों, मीता? पिछले साल हम माघ में नहीं नहाए थे क्या?' संगम से लौटते दोपहर हो गई। खाना खा लेने पर मीता की मां ने राजापुर वालों के यहां जाने की इच्छा प्रकट की, 'जनार्दन की ही नहीं, हमारी भी रिश्तेदारी निकलती है।' मीता और सुनील साथ थे और रिक्शा यूनिवर्सिटी रोड वाले चौराहे से मागे बढ़ा ही था कि इधर मां के मुंह से निकला—'यहीं कहीं नैनीताल वाले जगातियों का होटल बताते थे लोग !'.."और उधर मीता के होंठ आश्चर्य में सुले ही रह गए, "सवित्तरी!" भोली थी। हाथ में कपड़े का एक सोला। चटख रंगों वाली मामूली-सी धोती और पूरे बांहों का ब्लाउज । एक अंतराल के बाद देखते हुए, लगता है, जैसे कोई दूसरी सवित्तरी है । जब घर पर आती थी, वह लावण्य कहीं विलीन हो चूका लगता है । अल्हड़ तरुणी की जगह, अनुभवी और वक्त से गुजरी हुई- सी औरत ने ले ली है। चेहरे पर का रंग फीका पड़ चुका है। भौहें उतरी- उतरी-सी लगती हैं। ीता को देखते ही सवित्तरी में एक कौंध जागी थी, मगर रिक्शे के पास भाने की बजाय, दूर ही खड़ी रही। वहीं से हाथ जोड़ दिए । १४८ / सवित्तरी मीता से नहीं हो पाया कि रिक्शा आगे बढ़वा ले । उत र कर, सवित्तरी के निकट चली गई। सवित्तरी संतुलन न रस सकी। सड़क पर, लोगों के बीच होने को भूलकर, गले से लग गई। कुछ देर सवित्तरी से बतियाकर, मीता लौटी, तब उसको आरों गीली देखकर, मां ने पूछा, "कोन थी रे?" "तुमने देखी तो थी, मां! हमारे यहां काम करती थी, व तुम और वायू आए थे ! सवित्तरी!"तुमको तो, मां, शायद, यहां तक डर सगता था कि कही मेरी सौत न बन जाय ?" कोशिश करने पर भी मीता हंस नहीं पाई। रिक्शा आगे बढ़ गया, तो वह फिर सवित्तरी के सोच में खो गई। शाम राजापुर से वापस लौटते और थोड़ा रवांत पाते ही, माता ने जनार्दन के कंधे पर हाथ रखते हुए, रहस्य खोलने की-सी मुद्रा में कहा, "मुनी तुम्हारी 'सवित्तरी मिली थी !" जनार्दन ने अचकचाकर देखा, तो पाया कि शरारती दिख सकने की कोशिश के बावजूद, मीता की आंखों में विवाद को पाया है। जनार्दन को चक्ति भाव में टंगा छोड़ते हुए, वह इतना हत्ती रसोईघर को ओर निकत्त गई, “अब वह सवित्तरी यहां!• गले मिलकर रोते में हांफने लगी थी। वह आई हूं कि मल कॉलेज से लौटते में उसके घर जाऊंगी।" चाय के बाद, जनार्दन को सब्जी के लिए डोलची देते हुए मौता ने धीमे से कहा, "एक बेटी की मां बन चुकी सवित्तरी!" जनार्दन कुछ कहने को हुआ ही था कि मीता धीमे से मुस्कराती, बोली, "चौंका क्यों रहे हो । साल भर तो हो गया होगा शादी हुए ?" सोमवार को कालेज से वापसी में, मीता शिवचरन के घर पर पहुंची, सव सवित्तरी घर में अकेली थी। मीता को देखते ही पालतू जानवर-सी विह्वल होती, आगे तय निकल आई और पांव हुने को झुकी ही थी कि उसने दोनों हाथों से खींचकर, गले लगा लिया। मीता ने देखा, कुछ लोग फासले पर से देख रहे हैं और उन लो कुछ ऐसा भाव है, जैसे कोई अजूवा देख रहे हों।
- जैसे इंतजार में हो सवित्तरी । मीता के लिए खटोले में साफ धुली चादर पहले ही विछाए हुए थी। मीता ने मिठाई का डिव्या एक ओर रखते हुए, पास ही एक और छोटे, शीने-से खटोले पर सुला दी गई बच्ची को हाथों में लिया, तो वह रो पड़ी। मीता ने उसके कपोलों को चूमते हुए हाथों में झुलाया तो चुप हो गई। "हाय सवित्तरी, यह तो बड़ी ही सुंदर-सी है, रे !" "हम भी और हो चुकी, बहूजी! आप मुहब्बत जता रही हैं और हम साफ देख रही हैं कि हैरत में हुई जाती हैं आप कि साल-भर मुश्किल से शादी को हुए, ये पांच-छ महीनों की वेटी कहां से आ गई ?" सवित्तरी की मुस्क- राहट में से फूटी पड़ती-सी वेदना मीता से छिपी नहीं रही। वह चुपके से उवरती कि सवित्तरी अंगूठे से फर्श कुरेदती-सी बोली, "अव कुछ ढंका नहीं रहा, बहूजी ! कहने वाला चिल्ला-चिल्ला के कह गया है कि 'शिवचरन, गाभिन गैया वेचने वाले बहुत देखे थे, गाभिन बेटी व्याहने वाला वाप नहीं देखा था !'.."दूसरी कोई वेटी होती, तो कोई बेटी होती, तो डूब मरी होती । हम बेहया हैं, वाबू के दरवाजे जिंदा पड़ी हैं।" सवित्तरी फूट-फूटकर रोने में ही थी कि मीता की कल्पना में हलचल- सी मच गई कि कहीं ऐसा तो नहीं कि जनार्दन ने भूठ बोला हो? कहीं इसी- लिए तो नहीं छोड़ा था सवित्तरी ने उनके घर आना? "आप लोग सोचते रहे होंगे कि जाने क्यों सवित्तरी ने काम पर आना छोड़ दिया। शादी पर याद तक न किया। क्या करती वहूजी, एक-एक दिन काटना परबत हो गया। अब आपसे बता रही हूं, जब आप अस्पताल में थीं, एक संध्या बाबूजी ने हमें छुआ था । हमने ऐसे झिटकार दिया, जैसे औरत ना रह गई हों, जिनावर हो चुकी हों । हम कैसे कहनी, बहूजी, उन देवता सरीधे बाबूजी से कि 'भैयाजी, हमें न छुइए, हम महापापिन हैं । उस दिन तक तो दो महीने पूरे होने को आ गए थे।"आपसे जिक्र तो किया करती थीं हम उस बनिया के बेटे का ? सनीमे का हीरा बन गया वो हमारे लिए और जब वोली हम कि 'तुम्हें हमसे शादी करनी होगी, हम किसीको मुंह दिखाने काविल नहीं रहे हैं। तो वनिया का बेटा हमारे पांवों से लिपट गया और लगा रोने, जैसे मां-बाप-भाई-बहन, सब इकट्ठे ही मर गए हों ! १५० / सवित्तरी - - - । कहने लगा कि 'सवित्तरी, मार जूतों के हमारी साल खीच लो, मगर हमारे लिए मौत के अलावा और कोई रास्ता बचा नहीं रहेगा।"हमने सिर के काकुलों का झोंटा पकड़कर अलग कर दिया कि 'जा, तेरा पाप तेरे, हमारा हमारे हिस्से !'."बंदर से कोई बोला, 'सवित्तरी, गुनहगार तू भी है । इसकी जिनगी नष्ट करके क्या पाएगी।'" बहूजी, गंगाजी की सोचती थी हम, पोषर में पारण लेनी पड़ी। जिस बच्चालाल से नफरत करती थी, उसीका पल्ला पकड़ा, मगर जब शादी के सातवें महीने यह प्रभागन जनमी है, साल-मर उदर में रही जैसी गोल-मटोल, तो आप से बाहर हो गया। ये भी ना देसा फसाई ने कि अभी-अभी तो परसूत से हुई हैं हम । बड़ी मार मारी और यहां पायू के दरवाजे डाल गया।"आग लगे हमको, अपने ही पाप रोती रह गई हैं, आपको चाय को भी न पूया।" आंसू पोंछती, सवित्तरी, बिना मीता की ओर देरो ही, कमरे के भीतरी छोर की तरफ बढ़ गई और चाय बना लेने पर ही वापस लौटी। मीता को इस बीच, लगातार यही अनुभूति होती रही कि भारी बोझ उतरने के बाद की सी थकान हो चली है। थोड़ा नमकीन, पोड़ा मीठा कहीं अच्छी दुकान से मंगाकर रखा होगा। मीता के आग्रह पर सवित्तरी ने भी चाय ले ली। "तो अन क्या यापस नहीं ले जाएगा कभी भी ?" "शायद कभी आए। कभी-कभी तो हमें लगता है कि यह सारा नाटक है उसका । एक दिन वह हमें जरूर वापस ले जाएगा, मगर""जोरू की हैसि- यत से साय रखने को नहीं, बेसवा की हैसियत से बाजार में बिठाने को !" सवित्तरी जैसे बोली नहीं हो, पत्यर की तरह टूटी हो । मीता कुछ सहम- सी गई। "आप सोचती होंगी, पहूजी, क्या हो गया इस सवित्तरी को । सच, आप लोगों के घर आने-जाने तक हम और पों, इसके बाद नाश हो गया। गरीव याप की बेटी से अपनी अस्मत न संभाली जाए, तो सारा जिम्मा उसीका है- गीधों ने गोश्त साया, चोंच साफ कर ली। पत्थर का कर लिया है हमने अपना कलेजा और बाबू को बचन दे दिया है कि चाहे जो हो, आत्मघात न करेंगी। बहूजी, फैमा वेवस और दयावान चित्त होता है गरीष बाप का ! बच्चालाल सवित्तरी | १५१ को हुए। जैसे इंतजार में हो सवित्तरी । मीता के लिए खटोले में साफ.धुली चादर पहले ही बिछाए हुए थी। मीता ने मिठाई का डिब्बा एक ओर रखते हुए, पास ही एक ओर छोटे, झीने-से खटोले पर सुला दी गई बच्ची को हाथों में लिया, तो वह रो पड़ो। मीता ने उसके कपोलों को चूमते हुए हाथों में झुलाया तो चुप हो गई। "हाय सवित्तरी, यह तो बड़ी ही सुंदर-सी है, रे !" "हम भी और हो चुकी, बहूजी ! आप मुहब्बत जता रही हैं और हम साफ देख रही हैं कि हैरत में हुई जाती हैं आप कि साल-भर मुश्किल से शादी ये पांच-छ महीनों की वेटी कहां से आ गई ?" सवित्तरी की मुस्क- राहट में से फूटी पड़ती-सी वेदना मीता से छिपी नहीं रही। वह चुपके से उवरती कि सवित्तरी अंगूठे से फर्श कुरेदती-सी बोली, "अब कुछ ढंका नहीं रहा, बहूजी ! कहने वाला चिल्ला-चिल्ला के कह गया है कि 'शिवचरन, गाभिन गैया वेचने वाले बहुत देखे थे, गाभिन बेटी व्याहने वाला वाप नहीं देखा था!'."दूसरी कोई बेटी होती, तो डूब मरी होती। हम वेया हैं, वावू के दरवाजे जिंदा पड़ी हैं।" सवित्तरी फूट-फूट कर रोने में ही थी कि मीता की कल्पना में हलचल- सी मच गई कि कहीं ऐसा तो नहीं कि जनार्दन ने भूठ बोला हो? कहीं इसी- लिए तो नहीं छोड़ा था सवित्तरी ने उनके घर आना? "आप लोग सोचते रहे होंगे कि जाने क्यों सवित्तरी ने काम पर आना छोड़ दिया। शादी पर याद तक न किया। क्या करती बहूजी, एक-एक दिन काटना परवत हो गया। अब आपसे बता रही हूं, जब आप अस्पताल में थीं, एक संध्या वाबूजी ने हमें छुआ था । हमने ऐसे झिटकार दिया, जैसे औरत ना रह गई हों, जिनावर हो चुकी हों। हम कैसे कहतीं, बहू जी, उन देवता सरीले बाबूजी से कि 'भैयाजी, हमें न छुइए, हम महापापिन हैं । उस दिन तक तो दो महीने पूरे होने को आ गए थे।"आपसे जिक्र तो किया करती थीं हम उस बनिया के बेटे का? सनीमे का हीरा बन गया वो हमारे लिए और जय बोली हम कि 'तुम्हें हमसे शादी करनी होगी, हम किसीको मुंह दिखाने काबिल नहीं रहे हैं।' तो बनिया का बेटा हमारे पांवों से लिपट गया और लगा रोने, जैसे मां-बाप-भाई-बहन, सब इकट्ठे ही मर गए हों ! १५० / सवित्तरी , - कहने लगा कि 'सवित्तरी, मार जूतों के हमारी खाल खींच लो, मगर हमारे लिए मौत के अलावा और कोई रास्ता बचा नहीं रहेगा।"हमने मिर के फाकुलों का झोंटा पकड़कर अलग कर दिया कि 'जा, तेरा पाप तेरे, हमारा हमारे हिस्से !'."अंदर से कोई वोला, सवित्तरी, गुनहगार तू भी है। इसकी जिनगी नष्ट करके क्या पाएगी।'"बहूजी, गंगाजी को सोचतो पी हम, पोवर में पारण लेनी पड़ी। जिस बच्चालाल से नफरत करती थी, उसीका पल्ला पकड़ा, मगर जब शादी के सातवें महीने यह प्रभागन जनमी है, साल-भर उदर में रही जैसी गोल-मटोल, तो आप से बाहर हो गया। ये भी ना देसा कसाई ने कि अभी-अभी तो परसूत से हुई है हम । बड़ी मार मारी और यहां बाबू के दरवाजे डाल गया।"याग लगे हमको, अपने ही पाप रोती रह गई हैं, आपको चाय को भी न पूछा।" आंसू पोंछती, सवित्तरी, विना मोता की ओर देखे ही, कमरे के भीतरी छोर की तरफ बढ़ गई और चाय बना लेने पर ही वापस लौटी । मीता को इस बीच, लगातार यही अनुभूति होती रही कि भारी बोझ उतरने के पाद को सी थकान हो चली है। थोड़ा नमकीन, थोड़ा मोठा कहीं अच्छी दुकान से मंगाकर रखा होगा। मीता के आग्रह पर सवित्तरी ने भी चाय ले लो। "तो अन क्या वापस नहीं ले जाएगा कभी भी ?" "शायद कभी आए। कभी-कभी तो हमें लगता है कि यह सारा नाटक है उसका । एक दिन वह हमें जरूर वापस ले जाएगा, मगर"जोरू की हैसि- यत से साथ रखने को नहीं, देसवा की हैसियत से बाजार में बिठाने को!" सवित्तरी जैसे घोली नहीं हो, पत्यर की तरह द्टी हो । मीता कुछ सहम- सी गई। "आप सोचती होंगी, बहूजी, क्या हो गया इस सवित्तरी को। सच, आप लोगों के घर थाने-जाने तक हम और थी, इसके बाद नाम बाप की बेटी से अपनी अस्मत न संभाली जाए, तो सारा जिम्मा उमौका है- गीयों ने गोश्त साया, चोंच साफ कर ली। पत्थर का कर लिया है हमने अपना फलेजा और वायू को वचन दे दिया है कि चाहे जो हो, आत्मघात न करेंगी। बहूजी, कमा वेबस और दयावान चित्त होता है गरीब चार का! बच्चालाल गया। गरीब - जैसे इंतजार में हो सवित्तरी । मीता के लिए खटोले में साफ.धुली चादर पहले ही विठाए हुए थी। मीता ने मिठाई का डिब्बा एक ओर रखते हुए, पास ही एक ओर छोटे, झीने-से खटोले पर सुला दी गई बच्ची को हाथों में लिया, तो वह रो पड़ी। मीता ने उसके कपोलों को चूमते हुए हाथों में झुलाया चुप हो गई। , "हाय सवित्तरी, यह तो बड़ी ही सुंदर-सी है, रे !" "हम भी और हो चुकीं, वहूजी! आप मुहब्बत जता रही हैं और हम साफ देख रही हैं कि हैरत में हुई जाती हैं आप कि साल-भर मुश्किल से शादी को ये पांच-छ महीनों की वेटी कहां से आ गई ?" सवित्तरी की मुस्क- राहट में से फूटी पड़ती-सी वेदना मीता से छिपी नहीं रही । वह चुपके से उवरती कि सवित्तरी अंगूठे से फर्श कुरेदती-सी बोली, "अव कुछ ढंका नहीं रहा, बहूजी ! कहने वाला चिल्ला-चिल्ला के कह गया है कि 'शिवचरन, गाभिन गैया वेचने वाले बहुत देखे थे, गाभिन बेटी व्याहने वाला वाप नहीं देखा था !'-"दूसरी कोई वेटी होती, तो डूब मरी होती। हम वेया हैं, बाबू के दरवाजे जिंदा पड़ी हैं।" सवित्तरी फूट-फूट कर रोने में ही थी कि मीता की कल्पना में हलचल- सी मच गई कि कहीं ऐसा तो नहीं कि जनार्दन ने झूठ बोला हो? कहीं इसी- लिए तो नहीं छोड़ा था सवित्तरी ने उनके घर आना? "आप लोग सोचते रहे होंगे कि जाने क्यों सवित्तरी ने काम पर आना छोड़ दिया। शादी पर याद तक न किया। क्या करती बहूजी, एक-एक दिन फाटना परबत हो गया। अब आपसे बता रही हूं, जब आप अस्पताल में थीं, एक संध्या बाबूजी ने हमें छुआ था । हमने ऐसे झिटकार दिया, जैसे औरत ना रह गई हों, जिनावर हो चुकी हों । हम कैसे कहीं, वहूनी, उन देवता सरीखे बाबूजी से कि 'भैयाजी, हमें न छुइए, हम महापापिन हैं । उस दिन तक तो दो महीने पूरे होने को आ गए थे।""आपसे जिक्र तो किया करती थीं हम उस वनिया के बेटे का? सनीमे का हीरा बन गया वो हमारे लिए और जब बोलीं हम कि 'तुम्हें हमसे शादी करनी होगी, हम किसीको मुंह दिसाने काविल नहीं रहे हैं।' तो वनिया का बेटा हमारे पांवों से लिपट गया और लगा रोने, जैसे मां-बाप-भाई-बहन, सब इकट्ठे ही मर गए हों ! १५० / सवित्तरी । - , कहने लगा कि 'सवित्तरी, मार जूतों के हमारी गाल खींच लो, मगर हमारे लिए मौत के अलावा और कोई रास्ता बचा नहीं रहेगा।"हमने सिर के काकुलों का झोंटा पकड़कर अलग कर दिया कि जा, तेरा पाप तेरे, हमारा हमारे हिस्से !'.. अंदर से कोई बोला, 'सवित्तरी, गुनहगार तू भी है । इसकी जिनगी नष्ट करके क्या पाएगी।'"यहूजी, गंगाजी की सोचती घों हम,पोयर में शरण लेनी पड़ी। जिस बच्चालाल से नफरत करती पी, उसीका पल्ला पकड़ा, मगर जब शादी के सातवें महीने यह प्रभागन जनमी है, साल-भर उदर में रही जैसी गोल-मटोल, तो आप से बाहर हो गया। ये भी ना देसा फसाई ने कि अभी-अभी तो परसूत से हुई हैं हम । बड़ी मार मारी और यहां पावू के दरवाजे डाल गया।"आग लगे हमको, अपने ही पाप रोती रह गई हैं, आपको चाय को भी न पूछा।" आंसू पोंछती, सवित्तरी, विना मीता की ओर देखे ही, कमरे के भीतरी छोर की तरफ बढ़ गई और चाय बना लेने पर ही वापस सोटी । मीता को इस बीच, लगातार यही मनुभूति होती रही कि भारी बोझ उतरने के बाद की सी थकान हो चली है। थोड़ा नमकीन, पोड़ा मोठा कहीं अच्छी दुकान से मंगाकर रखा होगा। मीता के आग्रह पर सवित्तरी ने भी चाय ले ली। "तो अब क्या वापस नहीं ले जाएगा कभी भी ?" "शायद कभी आए। कभी-कभी तो हमें लगता है कि यह सारा नाटक है उसका । एक दिन वह हमें जरूर वापस ले जाएगा, मगर जोरू की हैसि- यत से साय रखने को नहीं, बेसवा की हैसियत से बाजार में विठाने को!" सवित्तरी जसे बोली नही हो, पत्थर की तरह टूटी हो । मीता कुछ सहम- सी गई। "आप सोचती होंगी, बहूजी, क्या हो गया इस सवित्तरी को । सच, आप लोगों के घर आने-जाने तक हम और घी, इसके बाद नाश हो गया। गरीब बाप की बेटी से अपनी अस्मत न संभाली जाए, तो सारा जिम्मा उमीका है- गीधों ने गोश्त साया, चोंच साफ कर ली। पत्थर का कर लिया है हमने अपना कलेजा और वावू को बचन दे दिया है कि चाहे जो हो, आत्मघात न करेंगी। बहूजी, कमा वेवस और दयावान चित होता है गरीब बाप का ! बच्चालाल - जाते वक्त भी लात जमाने को आगे बढ़ा तो वाबू ने धक्का मारकर दूर कर दिया और लाठी हाथ में उठाकर बोले, 'खबरदार, बच्चालाल, मेरी बेटी को छुआ तो लाश ही उठेगी तेरी!"दुनिया के लिए बेसवा हो जाय, हमारे लिए फिर भी बेटी रहेगी !'... उस दिन हमें पहली-पहली बार ये गरब हुआ, बहूजी, कि सवित्तरी, तेरा गरीब बाप शहर के सारे पैसेवाले बापों से बड़ा है । हम उस दिन..." सवित्तरी का जैसे पूरा शरीर आंख बन गया। उसका बिलखना जल-भरे घड़े का टूट जाना हो गया । जैसे रोम-रोम से आंसू बिखरने लगे हों। मीता ने सांत्वना देने को, बच्ची को खटोले पर सुला कर, उसे गले से लगा लिया। "जाने कितने दिनों की पीड़ा आज उतार पाई हूं, बहूजी ! आप नहीं माई हैं, अम्मा आ गई है।''जी यही कर लिया अब तो कि सवित्तरी, जीना है तो बाहर से लोहा बनोगी, तभी भीतर का गीला बचा पाओगी। आदमी भीतर से सूख जाय, तो उसका मरना अच्छा । बच्चालाल भीतर से रूखा काठ है। वावूजी ने छुआ था, तो लगा था, वहती नदी ने छुआ है क्या "बच्चालाल ने छुआ तो मुर्दे का छूना मालूम पड़ा। आपकी जगह तो मैया सदा-सदा आपको ही देंगी, वहूजी ! मगर प्रार्थना जरूर करती हूं कि हे मैया, यह जनम जैसा दिया-अगले जनम वावूजी के घर की बहन या वेटी का जनम देना।"आज तो कीच हुई नाले में पड़ी हूं, मगर भीतर कहीं आप लोगों के साथ का विताया हुआ सुवास की तरह वसा है और मरते दम तक साथ देगा।" "और तो हम क्या कर सकते हैं, सवित्तरी! मगर हमारे योग्य जो होगा, जरूर करेंगे । दोप तेरा नहीं, भाग का है। हरामजादे किस्म के लोगों का है। गरीव की बेटी की प्रेम में भी दुर्गत है, शादी में भी। पैसेवाले उसे शौक पूरा करने की चीज समझते हैं और खसम फालतू कहके दुत्कारता है । जहां ममता को प्रांस का देखना नहीं, वहां पाप सब देखते हैं, वेदना कोई नहीं देखता।" शिवचरन ने सचमुच बाप का सा दिल पाया है। जो अपनी बेटी को क्षमा न कर सके, उसके दुख को अपने दुख से बड़ा करके न माने-वह वाप नहीं, नर जानवर-भर है, सवित्तरी। और क्या कहूं, जीवन को ईश्वर की थाती करके जानना ही ठीक है, अपनी नहीं। शिवचरन को सहारा बनी रहो, आगे जैसी ईश्वर की रचना होगी "कुछ पैसों की जरूरत कभी हो काम पर पाना १५२ / सवित्तरी - चाहो । अब तो दोनों नौकरी पर है।.." "आप लोगों से न नहके किससे कहूंगी, बहूजी ! “फिलहाल पैसों का दुख नहीं है । अभी चार रोज पहले गंगवा भी आया था। बावू बता रहे थे कि वारा सौ दे गया है और रिक्शा चलाने को मना कर गया है। गनेशी को कहीं काम पर भेजने को मना कर गया है । अगले माह में गनेशी की शादी हो जाएगी। इसके बाद गगा की भी सोच रहे हैं बावू ! मगर हम यहां से निकल चलना चाहूंगी जल्दी-जल्दी । पाप का वोझ सिर पर लिए अपनों के बीच का रहना ठीक नहीं। सब कोई वाप नहीं होते । गंगा को तो जिनगी वावूजी ने सुधार दी..." "उनको तो सबसे बड़ा पश्चात्ताप यही या सवित्तरी, कि कहीं तुमने यही न माना हो कि गरीब की बेटी समझकर लिया। अब अगले रक्षाबंधन को तू माकर उन्हें राखी जरूर बांध जाना.. "इतनी ताव मुझमें नहीं, वहूजी, कि उनके सामने पड़ने की हिम्मत करूं । कुछ लोग ऐसे होते है, जिनको अपने भीतर ही रखना ठीक होता है । वाबूजी से कहिएगा, जव दुर्गा मैया की पूजा करने बैठाकरें, मेरे लिए मौत और अगला जनम, दोनों साथ-साथ मांगदें।" इस बार सवित्तरी ने एकाएक हंस पड़ने की कोशिश की, तो जैसे घने काले बादलों के बीच से किरण फूटी हो । मीता उठी, बच्ची को फिर से चूमा । वोली, "जो हो, है तो ये अद्भुत सुंदर, सवित्तरी!" "पाप का फूल गूलर का फल है, बहूजी ! वाहर चटख लाल, चिकना। भीतर कीड़े पड़े हुए।" सवित्तरी का स्वर एकाएक तीखा हो गया। "नहीं, सवित्तरी, ऐसा नहीं कहते। "जैसे शिवचरन ने तुमसे घृणा नहीं की, वैसे ही तुम भी इससे नफरत न करना । औरत के भीतर की मां मर गई, तब उसके जिए का घरम कहां।"अच्छा, तू बैठ, मैं चलो जाऊंगी।" सवित्तरी नहीं मानी, साथ कुछ दूर पहुंचाने चल पड़ी। कुछ ही कदम भागे बढ़ी थी कि बच्ची का रोना सुनाई दे गया और मोता ने उसे जिद करके वापस भेज दिया। घर वापस पहुंचते तो नहीं मगर रात के एकांत में धीमे-धीमे मीता ने सारा वृत्तांत जनार्दन को सुनाया, वह चुपचाप सुनता ही रहा । बताते हुए, मीता निरंतर अनुभव करती रही कि उसका कहा हुआ सब जनार्दन में इकट्ठा होता जा रहा है। - इस घटना को महीना भी पूरा न बीता था कि एक दिन वहीं सोहबतिया- बाग रोजे के पास शिवचरन मिल गया मीता को। उसने बताया कि सवित्तरी गई वच्चालाल के साथ, बच्ची यहीं हैनाना के पास । बच्चालाल वच्ची को साथ ले जाने को तैयार नहीं हुआ। "अच्छे इरादे से नहीं ले गया लगता है, बहूजी ! उसकी आंखों में या न थी। मैंने तो सवित्तरी को बहुत मना किया, मगर वह यों कहती चली गई कि 'बाबू, अभी विधवा नहीं हुई हूं।''जानबूझकर. यहां से चल दी है। क्या कहूं, किस मुंह से कहूं, बहूजी !.."मगर लड़की क्या थी वह, देवी थी, मुझ अभागे से नहीं संभाली गई।' शिवचरन का रोना मीता के कानों तक चला आया। वह कालेज से लौट रही थी, मगर घर पहुंचने की जगह सीधे शिवचरन के साथ निकल गई कि बच्ची को देखने का बड़ा मन बच्ची को गणेशी टहला रही थी। शिवचरन ने देखते ही कहा, "यहूजी, गरीय बाप का जीना भी पाप, मरना भी। गनेशी को औरतें अभी से यों कहके चिढ़ाने लगी कि एक-आध साल में ये भी ऊपर वाले से मौत मांगने की भी तो गुंजाइश नहीं।"गनेशी तो विदा हो जाएगी इसी साल, मगर गंगवा की वह आएगी, तो वह भी यों न कहने लगे कि, तुम्हारी वहन का पाप मैं क्यों संभालू ।" मीता ने देखा, शिवचरन का गला रुंध गया है । वह चुपचाप मागे बढ़ती रही। कमरे के निकट पहुंचकर, बच्ची को देखने के लिए बढ़ने की जगह, शिवचरन से अत्यंत धीमे किंतु हेढ़ स्वर में बोली, "शिवचरन, मैं भी तुम्हारे लिए बेटी समान ही हूं। एक दान दोगे ?" शिवचरन विस्मय में ही था कि मीता दोटूक बोली, "तुम्हें पता तो होगा कि मेरे अव बच्चे नहीं होने। इस सवित्तरी की बेटी को मुझे दे दो। सवित्तरी को लिखवा देना कि बहूजी लोगों ने गोद ले ली है । वह इनकार न । SYY for करेगी। गलती हो गई, मुझे पिठनी वार सवित्तरी से ही मांग लेना था, मगर उन दिनों मेरी मां यहीं थीं।" जनार्दन बाहर टहल रहा था। मौता को रिकों में बैठे और बच्चे को गोद में लिए उतरते देखा, तो कुछ मारवर्य हा कि किसका बच्चा से आई। रिक्शेवाले को पैसे देकर मीता तेज कदमों से धनती, सौघे कमरे में चली गई । जनार्दन भी भीतर पहुंच गया, तो धोरे से बच्ची को उसके आगे किया "किसकी बच्ची है यह, मीता? हाय, बड़ी सुन्दर-सी है !" मोता कुछ न बोली सिर्फ मुस्कराती रही। "क्या नाम है इस गुड़िया का?" जनार्दन ने बच्ची के कपोल पर धीमी- सी चुटकी काटते हुए पूछा, तो मीता ने एक-एक अक्षर पर जोर देते हुए कहा, "स-वि-त-री..." कुछ क्षण तो जनार्दन हतप्रभ-सा देखता ही रह गया। बुध धानों के बाद, पूछा, "सवित्तरी कहां है, मीता ? वह नहीं आई तुम्हारे साये ?" "नहीं सुनील के बाबू ! और न आएगी ही।..." जनार्दन अपनी स्तब्धता में ही था कि सवित्तरी के बच्चालास के साथ चले जाने की बात बताते हुए मीता ने स्नेह और पता से मरी भागार मैं सिर्फ इतना ही कहा, "इस लड़की को मैंने गोद ले लिया है, मुनीर के बाबू!" जनार्दन के चेहरे पर थोड़ी अस्त-व्यस्तता देखते ही, मीता ने पूछा, "हनने सलाह किए बिना ही ले आई, तुम नाराज तो नहीं ?" "मीता. ...!" जनार्दन नै उसे बीच में ही रोक दिया, "तुम सबमुख रहो औरत हो। तुमने जो कुछ किया है, अपने अनुहा ही किया है। नुनं न वगन में गया है । माता हो होगा। एक दिन मुझसे पूछ रहा था. 'मी हिम्वर नहीं लाई ।' उसे देखते ही कहना कि 'लो. तुम्हारे लिए जिम्नर' से आई जनार्दन के चेहरे पर प्रसन्नता देवरर, मीता ने एक ही सास सं.
बच्ची को कसकर अपने आंचल से लगा लिया।
!
कुछ देर बाद किसी गाय के रंभाने की आवाज सुनाई पड़ी, तो जनार्दन
उठ खड़ा हुआ, "लामो, लोटा दो, मीता ! तुम्हारी विटिया के लिए दूध लेता
आऊं।"तुम्हें तो अव दूध होने से रहा।"
मीता ने लोटा थमाते हुए, एक घोल जमाई और अहीरटोले की तरफ
जाते जनार्दन को ओझल हो चुकने तक देखती रही।
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