Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Dhammpada

Narayan,kishore · 2012/08

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प्रकाशकीय निवेदन
हिन्दी पाठकों के सम्मुख महाबोधि प्रथमाला यह पुष्प
धम्मपद'-मूल पालि, संस्कृत छाया, हिन्दी अनुवाद-उपत्सित
करते हमें बड़ी प्रसन्नता हो रही है। पुस्तक के मुद्रणाय लेका की
श्रयान बौद्ध उपासिका यरकाडल्ले कुमारी हामी से ५.००) २० का
मान दिया है। हम प्रार्थना करते हैं कि बुद्ध-धर्म-संघ के विरका के
गनुमान से आरका कल्यायो।
मित पर
मदायमा

Publisher's note
It gives me great pleasure in publishing the
present number of the Mahabodhi publication-selles,
a valuable book like The Dhammapada, together
with its Palı text, Sanskrit Tendering and Fundi
translation Mrs Warakaulle likin Kumarılamy,
Warakaulle Valauwa, Wattappola, Kadugannawa,
Ceylon, has been kind enough to donate a sum of
R$ 500/ for the publication of the book I invoke
the blessings of the Trple Gem of the Buddbag
Dhamma and Sancha on her for this poble gift,
14 8-46
Bhillho, M. SANGHARATNA,
Secretary, MAHABODHI Society
SARNATH BENARES

नमो वस्त भगवतो अरहतो सम्मासन्युल्स प्राक्कथन बौद्ध संसार में विम्मपद' का महत्व और प्रचार उसी माँति व्यापक है जैसे भारतवर्ष में गीता का। लाखों श्रदानु चौद नित्य प्रति 'धम्मपद' का पाठ करते हैं, और इसके अमर देश ने अपने जीवन में प्रेरणा ग्रहण करने है । मूल पालि श्लोक इतने उरल और नर्मसी है कि हिन्दी पाठकों को अनायास जीम पर चढ़ जाते हैं। पालि त्रिपिटक के विशाल माहित्य में 'धम्मपद' का क्या स्थान है यह निम्नलिखित तालिका में प्रगट होगा- त्रिपिटक

इस तरह, धम्मपद निपिरक सूत्रपिटक के मुद्दक निकाय के
प्रन्द्रह पन्थों में से एक है।
भगवान बुद्ध के उपदेशों का सर्वांगीन संग्रह 'धम्मपद' जैसी और
कोई पुस्तिका नहीं है। इसका अधिक से अधिक प्रचार हो इसमें
राष्ट्रका कल्याण है।
अपने प्रिय शिष्य उपासक अवध किशोर नारायण श्री० ए० की
इस प्रथम रचना को देख कर बड़ा हर्ष होता है। हम आशीर्वाद करते
हैं कि निरन के अनुभाव से वह दीर्घजीवी हो और शासन की बाधक
से अधिक सेवा कर सके।
कुछ वर्ष पूर्व श्री महापण्डित राहुल साकृत्यायन द्वारा लिखित
धम्मपद' का ठीक ऐसा ही संस्करण महाबोधि सभा द्वारा प्रकाशित
हुना था। उसके समाप्त हो जाने के बाद से मूल पालि श्लोकों के
साथ संस्कृत छाया की बड़ी माग यो । प्रस्तुत पुस्तक उस प्रभाव को
पूति करती है।
हिन्दी अनुवाद सुदर हुआ है। किंतु संस्कृत छाया को दूसरे
मस्करण में पूणत शुद्ध कर लेना श्रावश्यक है।
भिक्षु जगदीश काश्यप
पालि श्रध्यापक,
१५-६-४६
हिन्दू विश्वविद्यालय
काशी।

नमो तत्म भगवतो अरहतो नम्मानन्वुदत धम्मपद स्थान-मावस्ती १ -यमकवरण * व्यन्मि- चरनुपाल ( धेर) १--मनोपुलममा धरमा मनोसेटा मनोनया । मनसा चे पट्टेन भासति वा करोति वा । ततो नं दुक्वनन्वेति चक्कं व बहतो पदं ॥ १ ॥ ( मनःपूर्वमा धर्मा मनःश्रेष्टा मनोमया मनमा नेप्रदुष्टेन भायने या करोति वा। ततस्तं दुःपमन्येति चामिय वहतः पदम् ॥ १५) अनुरार- अग्नी या पुरी) सारी प्रनिया धिन के अनुसार हो होगी:निती उन मरका निरनिरानी हैं। यदि यो दूषित जिग मेंना या करता है लोग टपरा अनुररमा परमादगादी भागने या भर में घर के पास २ धम्मपद स (मनःपूर्वगमा धर्मा मन श्रेष्ठा मनोमयाः। मनसा चेत प्रसन्नेन भापते वा करोति वा । ततस्तं सुखमन्चेति छायेवानपायिनी ॥ २॥) अनुवाद सारी प्रवृत्तियां चित्र के अनुसार ही होती हैं; चिरा ही उनके स्वरूपका निर्णायक है। वे चित्तरूप हो होती है। यदि कोई साफ चित्त से बोलता या करता है तो कभी भी साथ न छोड़ने वाली छाया की तरह सुख उसका अनुसरण करता है। । श्रावस्ती (जेतवन) शुलतिस्स (थेर) ३. -अकोच्छि में, अवधि में, अजिनि में अहासि मे । ये च ते उपनय्हन्ति वेर तेसं'न सम्मति ॥ ३ ॥ ( अक्रोशीत् मां अबधीत् मां अजैपीत् मां अहार्षीत् में। ये च तत् उपनद्यन्ति वैरं तेषां न शाम्यति ॥ ३॥) उसने मुझे डाटा, उसने मुझे मारा, उसने मुझे जीत लिया, उसने मेरा ले लिया-जो मन में ऐसी बातें लाते रहते हैं उनका वैर शान्त नहीं होता। ४-अकोच्छि म अवधि मं अजिनि मं अहासि मे । ये तं न उपनरहन्ति चेरं तेसूपसम्मति ॥ १॥ (अक्रोशीत् मां अबधीत मां अपीत मां अहापत् में ! ये तत् नोपनह्यन्ति वैरं तेपूपशाम्यति ॥ ४॥) उसने मुझे डाटा, उसने मुझे मारा, उसने मुझे जीत लिया, उसने मेरा ले लिया--जो मन में ऐसी बातें नहीं लाते उनका वैर शान्त हो जाता है।

३ पावती (एन) झाली (पशिानी) ५-7 दि चरेन वेरानि सम्मन्तीध युद्धाननं । औरन न समन्ति एस धम्मो सनन्तनो ॥ ५॥ (न दिग्ग धराणि शाम्यन्तीह कदाचन । अऔर नशाम्यन्ति, धर्म. सनातनः ॥ "") पगार में घर में और भी शान नहीं होते । (ii) यही परमानपड़ी महापानिपम । 1

राग की दृष्टि से देखते विहार करने वाले, इन्द्रियों में असयत,
भोजन में मात्रा न जानने वाले, आरसी तथा वीर्यरहित पुरुषको पाप
उसी प्रकार भ्रष्ट कर देता है, जैसे वायु दुर्बल वृक्ष को।
२०५४
८-असुभानुपस्सिं विहरन्तं इन्द्रियेसु सुसंवुतं ।
भोजनम्हि च मत्तमु सद्धं आरबीरियं ।
तं वे नपप्सहत्ति मारो वातो सेलं'च पब्बतं ॥ ८ ॥
4 (अशुभमनुपश्यन्तं विहरन्तं इन्द्रियेषु सुसंघृतम् ।
भोजने च मात्राई श्रद्ध
श्रद्धं आरब्धवीर्यम्।
वैन प्रसहते मारो घातः शैलमिव पर्वतम् ॥८)
वैराग्य की दृष्टि से देखते विहार करने वाले, इन्द्रियों में पूर्ण संयत,
भोजन में मात्रा जानने वाले, श्रद्धायुत तथा उत्साहशील पुरुष को पाप
भ्रष्ट नहीं कर सकता, वायु जैसे शैल पर्वत को।
मावस्ती (जेतवन)
देवदत्त
९--अनिकासावो कासावं यो वत्थं परिदहेस्सति ।
अपेतो दमसच्चेन न स कासावमरहति ॥ ९ ॥
(1.12 -
(अनिकषाय कापाय यो वस्त्र परिधास्यति ।
अपेतो दमसत्याभ्यां न स कापायमहति ॥९॥)
बिना चित्तमलो ( - कसाव को हटाये जो कापाय पर धारण
करता है वह रूथम और सत्य से होन कापीय वस्त्र का अधिकारी नहीं है।
१०-यो च बन्तकसाबस्स सीलेसु सुसमाहितो।
उपेतो दमसच्चेन स वे कासावमरहति ॥१०॥

यमकवग्ग
( यश्च वान्तकपायः स्यात् शीलेपु सुसमाहितः ।
उपेतो दम-सत्याभ्यां स वै फापायमईति ॥१०॥
जिसने चित्तमलों का त्याग कर दिया है, शील पर प्रतिष्टित है, संयम
और सत्य से युक्त है, वहीं कापाय वर का अधिकारी है।
राजगृह ( वेणुवन)
संजय
११-असारे सारमतिनो सारे चासारदस्सिनो ।
ते सारं नाधिगच्छन्ति मिच्छासङ्कप्पगोचरा ॥ ११ ॥
। असारे सारमतयः सारे चासारदर्शिनः ।
ते सारं नाधिगच्छन्ति मिथ्यासकल्पगोचराः॥११॥)
असार को सार समझने वाले और सार को असार, मिथ्या
संकल्प में पढ़े चे सार को प्राप्त नहीं करते।
१२-सारश्च च सारतो अत्त्वा असारञ्च असारतो ।
ते सारं अधिगच्छन्ति सम्मासङ्कप्पगोचरा ॥ १२ ॥
(सारं च सारतो ज्ञात्वा, असारंच असारतः।
ते सारं अधिगच्छन्ति सम्यक्-सङ्कल्प-गोचराः ॥ १२ ॥)
सम्यक् संकल्प से युक्त, जो असार को असार और सार को सार
'समझते हैं वे ही सार को प्राप्त करते हैं।
.
vidh:
श्रावस्ती (जेतवन)
नन्द ( थेर)
१३-यथागारं दुच्छन्नं वुट्ठी समतिविज्झति ।
एवं प्रभावितं चित्तं रागो समतिविज्झति ॥ १३ ॥
(यथागारं दुश्छन्नं वृष्टिः समतिविध्यति ।
एवं अभावित चित्त रागः समतिविध्यति ॥ १३ ॥

६ धम्मपद् जैसे बुरी तरह पाये घर में वृष्टि का जल पैठ जाता है उसी प्रकार ध्यानाभ्यास से रहित चित्त में राग पैठ जाता है। १४-यथागारं सुच्छन्नं वुट्ठी न समतिविज्झति । एवं सुभावितं चित्तं रागो न समतिविज्झति ॥ १४ ॥ (यथागार सुच्छन्नं वृष्टिन समतिविध्यति । एवं सुभावितं चित्त रागो न समतिविध्यति ॥ १४ ॥ जैसे अच्छी तरह छाये घर में वृष्टि का जल नहीं पैठ पाता उसी प्रकार ध्यानाभ्यास से अभ्यस्त चित्त में राग नहीं पैठ पाता । सोचति । राजगृह ( वेणुवन) चुन्द (सूकरिक) १५-इध सोचति, पेच सोचति पापकारी उभयत्थ सो सोचति सो विहमति दिस्वा कम्मकिलिट्टमत्तनो ॥ १५॥ (इह शोचति प्रेत्य शोचति,पापकारी उभयत्र शोचति । स शोचति स विहन्यते दृष्ट्या कर्मलिष्टमात्मनः ॥ १५ ॥ ) इस लोक में शोक करता है और परलोक में जा कर मी पापी दोनों जगह शोक करता है। यह शोक करता है, परेशान होता है, अपने मैले का को देख कर। धर्मिक ( उपासक) मावस्ती (जेतवन) १६-इध मोदति पेच्च मोदति कतपत्री यत्थ उभ मोदति।

यमकवग्ग ७ सो मोदति सो पमोदति दिस्वा कम्मविसुद्धिमत्तनो ॥ १६ ॥ (इह मोदते,प्रत्त्य मोदते कृतपुण्य उभयत्र मोदते । स मोदते स प्रमोदते दृष्ट्वा कर्मविशुद्धिमात्मनः ॥१६॥ लोक में मोद करता है और परलोक में जाकर भी; पुण्यशील दोनों जगह मोद करता है। वह मोद करता है, प्रमोद करता है-अपने कर्मों की विशुद्धिको देख कर । तप्पति । तप्पति । प्रावती (जेतवन) देवदत्त १७-इध तप्पति, पेच्च तप्पति, पापकारी उभयत्थ पापं मे कतन्ति भीग्यो तप्पति • दुग्गतिङ्गतो ॥ १७ ॥ (इह तप्यतिप्रेत्य तप्यति पापकारी उभयत्र तप्यति । पापं मे कृतमिति तप्यति, भूयस्तप्यति दुर्गतिंगतः ॥१७) इस लोक में संताप करता है और परलोक जाकर भी संताप करता है। 'मैंने पाप किया है' सोच संताप करता है। दुर्गति को प्राप्त हो और भी अधिक संताप करता है। । सुमना देवी यावस्ती (जेतवन) १८-इघ नन्दति पेच नन्दति, कतपुझो उभयत्थ नन्दति । पुनं मे कतन्ति नन्दति, भीग्यो नन्दति सुग्गतिंगतोः धम्मपदा (इह नन्दति प्रेत्य नन्दति कृतपुण्य उभयत्र नन्दति पुण्य मे कृतमिति नन्दति,भूयो नन्दति सुगतिगतः ॥१८॥) इस लोक में आनन्द करता है और परलोक जाकर भी; पुण्यशील दोनों जगह आनन्द करता है। "मैंने पुण्य किया है' सोच मानन्द करता है । सुगति को प्राप्त हो और भी अधिक आमन्द करता है। । श्रावस्ती ( मैतवन ) ima दो मित्र मि १९-वृहुंपि चे संहितं भासमानो, न तकरो होति नरो पमत्तो। गोपो व गावो गणय परेसं न भागवा सामजस्स होति ।॥ १९ ॥ (धीमपि संहितां भाषमाणः, न तस्करोभवति नराप्रमत्तः । गोप इव गा गणयन् परेवां, न भागवान् श्रामण्यस्य भवति ॥१९॥) चाहे कोई भले ही अनेक प्रन्यों का पाठ करने वाला हो, किन्तु प्रमोद में पड़ यदि उनके अनुकूल आचरण न करे तो वह, दूसरों की गौवें गिनने वाले चरवाहे की भाँति, सन्यास मत का अधिकारी नहीं होता । २०-अप्पग्पि चे संहितं भासमानो, बात धम्मस्स होति अनुपग्मचारी । 'रागञ्च दोसञ्च पहाय मोहं,

२--अप्पमादवग्गो
कौशाम्बी (घोषिवाराम)
सामावती (रानी)
२१-अप्पमादो अमत-पदं पम दो मच्चुनो पदं ।
अप्पमत्ता न मीयन्ति ये पमचा यथा मता ।।
अप्रमादोऽमृतपदं प्रमादो मृत्योः पदम् ।
अप्रमत्तान नियन्ते ये प्रमत्ता यथा मृताः॥१॥)
सतत-उत्साहशीलता अमृत-पद निर्वाण का साधक है, और उत्साह-
हीनता मृत्यु-पद संसार-बन्ध का । उत्साहशील मृत्यु को नहीं प्राप्त होते ।
उत्साहहीन तो मृत ही हैं।
२२-एतं विसेसतो अत्त्वा अप्पमादम्हि पण्डिता ।
अप्पमादे पमोदन्ति अरियानं गोचरे रता ॥ २ ॥
( एवं विशेषतो ज्ञात्वाऽप्रमादे पण्डिताः।
अप्रमादे प्रमोदन्त आर्याणां गोचरे रताः॥२)
यह बात अच्छी तरह जान, पण्डित लोग बुद्धों के उपदिष्ट आचरण
में रत, उत्साहशील हो प्रमुदित होते हैं ।
२३-ते झायिनो साततिका निचं दलह-परकमा ।
फुसन्ति धीरा निब्बाणं योगक्षेमं अनुत्तरं ॥३॥

अप्पमादवग्गो (ते ध्यायिनः साततिका नित्यं दृढपराक्रमाः। स्पृशन्ति धीरा निर्वाणं योगक्षेमं अनुत्तरम् ||३||) सतत ध्यान का अभ्यास करनेवाले, नित्य दृढप्राक्रमी धीर पुरुष परमपद योग-क्षेम निर्वाण का लाम करते हैं। राजगृह ( वेणुवन) कुम्भवोसक २४-उठानवतो सतीमतो सुचिकग्मस्स निसम्मकारिणो। सञतस्स च धम्मजीविनो अप्पमत्तस्स यसोभिवढति ॥४॥ (उत्थानवतः स्मृतिमतः शुचिकर्मणो निशम्य-कारिणः । संयतस्य च धर्मजीविनोऽप्रमत्तस्य यशोभिवर्धते ||४॥) ( जो ) उद्योगी, सचेत, शुचि कर्मवाला, तथा सोचकर काम करने- वाला है और संयत, धर्मानुसार जीविकावाला एवं अप्रमादी है, (उसका) यश बढ़ता है। राजगृह ( वेणुवन) चुलपयक (थेर) २५-उट्टानेनप्पमादेन सबमेन दमेन च । दीपं कयिराथ मेधावी यं ओघो नाभिकीरति ॥ ५॥ ( उत्थानेनाऽप्रमादेन संयमेन दमेन च । द्वीपं कुर्यात मेधावी यं ओवो नाभिकिरति ॥ ५ ॥ ५11 मेधावी (पुरुष) उद्योग, अप्रमाद, संयम और दम द्वारा ( अपने लिए ऐसा) द्वीप बना, जिसे बाड़ नहीं दुवा सके।

धम्मपद
जेतवन
बालनक्सत्तर (होली)
२६-पमादमनुयुञ्जन्ति बाला दुम्मेविनो जना।
अप्पमादञ्च मेधावो धनं सेट्ठ व रक्खति ॥ ६ ॥
(प्रमादमनुयुंजन्ति बाला दुर्मेधसो जनाः ।
अप्रमादं च मेधावी धनं श्रेष्टमिव रक्षति ॥ शा)
मूर्ख नासमझ लोग बालस्य में पड़े रहते हैं । बुद्धिमान पुरुष श्रेष्ठ
धन की तरह अपनी उत्साहशीलता को सुरक्षित रखता है।
२७-मा पमादमनुयुञ्जय मा कामरतिसन्थवं ।
अप्पमत्तो हि झायन्तो पप्पोति विपुलं सुखं ॥ ७ ॥
(मा प्रमादानुयुंजीत मा कामरतिसंस्तवम् ।
अप्रमत्तो हि ध्यायन् प्राप्नोति विपुलं सुखम् ॥ ७॥)
मत प्रमाद में फँसो, मत कामों में रत होयो, मत काम रवि में लिया
हो । प्रमाद रहित ( पुरुष ) ध्यान करते महान् सुख को प्राप्त होता है।
,
3
जेतवन
महाकरसप (थेर)
२८-पमादं अप्पमादेन यदा तुदति पण्डितो ।
पमापासादमारुम्ह असोको सोकिनि पजं ।
पम्पत्तट्टो व भूमठे धोरो पाले अवेक्वति ॥ ८ ॥
(प्रमादमप्रमादन यदा नुदति पण्डितः।
प्रशामासादमारुहा अशोक शौकिनों प्रजाम् ।
पर्वतस्थ व भूमिस्थान धीरो बालान अवेक्षते ॥८॥

अप्यमादवग्गो
१३
जव पण्डित प्रमाद को अप्रामाद से हटा देता है तब वह शोक-रहित
हो जैसे कोई पर्वत पर चढ़ नीचे खड़े लोगों को देखे से ही-प्रज्ञा
रूपी प्रासाद पर चढ़ संसार में पड़ी जनताको शोक से याकुल देखता है
--
बेतवन
दो मित्र मिनु
२९-अप्पमत्तो पमत्तेसु सुत्तेसु बहुजागरो ।
अवलम्स व सीघस्सो हित्त्वा याति सुमेधसो ||९||
( अप्रमत्तः प्रमत्तेपु सुप्तेषु बहुजागरः।
अवलाश्वमिव शीवाश्वो हित्त्वा याति सुमेधाः 180)
प्रमादी लोगों में अप्रमादी, तथा (अज्ञान की नींद में) सोये लोगों
में (प्रज्ञा से) जागरणशील विज्ञ उसी प्रकार आगे निकल आता है, जैसे
तेज घोढ़ा दुर्बल घोड़े से आगे हो जाता
है
वैशाली ( कूटागार)
महाली
३०-अप्पमादेन मघवा देवानं सेट्टतं गतो।
अप्पमादं पसंसन्ति पमादो गरहितो सदा ॥१०॥
(अप्रमादेन मघवा देवानां श्रेष्ठतां गतः।
अप्रमादं प्रशंसन्ति प्रमादो गर्हितः सदा ॥१०॥)
अप्रमाद (= आलस्य रहित होने ) के कारण इन्द्र देवताओं में श्रेष्ठ
बना। समी अप्रमाद कीप्रशंसा करते हैं। प्रमाद की सदा निन्दा होती है।
कोई मिनु
बेतवन
३१-अप्पमादरतो भिक्खु पमादे मयदस्सि वा ।
सब्ञोजनं अणुं थलं हं अगीव गच्छति ॥ ११ ॥

धम्मपद (अप्रमादरतो भितुः प्रमादे भयदर्शी वा । संयोजनं अणु स्थूल दहन अग्निरिव गच्छति ॥१६॥ जो भिक्षु अप्रमाद में रत है और प्रमाद से भय खाने वाला है वह आग की भाति छोटे मोटे बंधनों को जलाते हुये धागे निकल जाता है । जेतवन (निगम वासी) हिस्स (घर) ३२-अप्पमादरतो भिक्खु पमादे भयदस्सि वा । अभब्बो परिहाणाय निबाणस्सेव सन्तिके ॥ १२ ॥ (अप्रमादरतो भितुः प्रमादे भयदी वा। अभव्यः परिहाणाय निर्धाणस्यैव अन्तिके ॥ १२॥) जो भिक्षु अप्रमाद में रत है, प्रमाद से भय खाता है वह निर्वाण के निकट पहुंच चुका है, उसका मार्ग से च्युत होना सम्भव नहीं ।

३--चित्तवग्गो मेघिय (धेर) चालिय पर्वत ३३-फन्दनं चपलं चित्तं दूरक्खं दुन्निवारयं । उजुं करोति मेधावी उसुकारो'व तेजनं ॥१॥ ( स्पंदनं चपलं चित्तं दूरक्ष्यं दुर्निवार्यम् । ऋजु करोति मेधावी इपुकार इव तेजनम् ॥ १॥) चित्त क्षणिक है, चपल है, इसे रोक रखना कठिन है और इसे निवारण करना भी दुष्कर है । ( ऐसे है। (ऐसे चित्त को) मेधावी पुरुष ( यत्न.. पूर्वक) एकाग्र करता है, जैसे वाण बनाने वाले वाण को। ३४-वारिजोच थले खित्तो ओकमोकत उन्मतो। परिफन्दति'दं चित्तं मारधेय्यं पहातवे ॥२॥ ( वारिजं इव स्थले क्षिप्तं उदकौकत उद्भूतम् । परिस्पन्दत इदं चित्रं मारधेयं प्रहातुम् ॥ २॥) अपने रहने वाले जलाशय से निकाल बाहर स्थल पर फेंक दी गई मछली जिस प्रकार तड़फड़ाती है उसी प्रकार यह चित्त पाप के फन्दे से निकलने के लिए श्राकुल है। श्रावस्ती कोई ३५-दुन्निग्गहस्स लहुनो यत्थकामनिपातिनो। चित्तस्स दमथो साधु चित्तं दन्तं मुखावहं ।। ३ ।

१८ धम्मपद युध्येत मार प्रज्ञायुधेन जितं च रक्षेत् अनिवेशनः स्यात् ॥ ८॥) इस शरीर को घड़े की तरह (अनित्य) जान, इस चित्त को नगर की तरह (रक्षित और दृढ़ ) ठहरा, प्रज्ञा रूपी शस्त्र से पाप (मार) के साथ युद्ध करे। जीत लेने पर बिना आसक्ति लाये उसकी रक्षा करे । श्रावस्ती पूविगत तिस्स (थेर) ४१-अचिरं वतयं कायो पठविं अधिसेस्सति । छुद्धो अपेतविज्ञाणो निरस्थं 'व कलिङ्गरं ॥ ९ ॥ (अचिरं बतायं कायः पृथिवीं अधिशेष्यते। क्षुद्रोऽपेतविज्ञानो निरथं इव फलिङ्गरम् ॥६॥) अहो ! यह तुच्छ शरीर शीघ्र ही चेतनारहित हो निरर्थक कार की भांति पृथिवी पर पढ़ रहेगा। कोसल देश नन्द (गोप) ४२-दिसो दिसं यन्तं कायरा वेरी वा पन वेरिनं। मिच्छापणिहितं चित्तं पापियो नं ततो करे ॥१०॥ (विट् द्विपं यत् कुर्यात् वैरी वा पुनः वैरिणम् । मिथ्याप्रणिहितं चित्तं पापीयांस तं ततः कुर्यात् ॥१०॥) जितनी (हानि ) शत्रु शत्रु की, और बैरी बैरी की करता है, मूळे (मार्गपर)या चित्त उससे अधिक बुराई करता है।

चित्तवग्गो १९ कोसल देश सोरेय्य (थेर) ४३-न तं माता पिता कयिरा अब्जे चापि च जातका । सम्मापणिहितं चित्तं सेय्यसो नं ततो करे ॥ ११ ॥ ( न तत् मातापितरौ कुर्यातां अन्ये चापि च ज्ञातिकाः। सम्यकप्रणिहितं चित्तं श्रेयांसं तं ततः कुर्यात् ॥ ११॥) जितनी ( भलाई) न माता-पिता कर सकते हैं, न दूसरे भाई-बन्धु, उससे ( अधिक ) उसकी भलाई ठीक (मार्गपर) लगा चित्त करता है।

४--पुप्फवग्गो श्रावस्ती पाँच सौ मधु ४४-को इमं पठविं विजेस्सति यमलोकञ्च इमं सदेवकं । को धम्मपदं सुदेसितं कुसलो पुप्फमिव पचेस्सति ॥ १ ॥ ( क इमां पृथिवीं विजेप्यते यमलोकं च इमं सदेवकम् । को धर्मपदं सुदेशितं कुशलः पुष्पमिव प्रचेष्यति ॥ १॥) इस पृथ्वी को तथा देवताओं सहित इस यमलोक को कौन जीतेगा? कौन कुशल पुरुष पुष्प की तरह सूपदिष्ट धर्म-पदों का संग्रह करेगा? ४५-सेखो पठवि विजेस्सति यमलोकञ्च इदं सदेवकं । सेखो धम्मपदं सुदेसितं कुसलो पुप्फमिव प्पचेस्सति ॥ २ ॥ (शैक्षः पृथिवीं विजेयते यमलोकं च इमं सदेवकम् । शैक्षो धर्मपदं सुदेशितं कुशलः पुष्पमिव प्रचेष्यति ॥ २ ॥ शैक्ष्य इस पृथ्वी को तथा देवताओं सहित इस यमलोक को जीतेगा। कुशल शैक्ष्य पुष्प की तरह धर्मपदों का संग्रह करेगा। मावस्ती मरीचि ( कम्मठ्ठानिक थेर) ४६-फेणूपर्म कामिमं विदित्त्वा मरीचिधम्म अभिसम्वुधानो, पुष्फवग्गो २१ छेत्त्वान मारस्य पपुप्फकानि अदस्सनं मच्चुराजस्स गच्छे ॥ ३ ॥ (फेनोपमं कायमिमं विदित्वा मरीचिधम्म अभिसम्वुधानः। छित्त्वा मारस्य प्रपुष्पकाणि अदर्शनं मृत्युराजस्य गच्छेत् ॥ ३॥) इस शरीर को फेन की तरह तथा मृगमरीचिका की तरह (असार) जान, पाप के आकर्षणों को काट यमराज की दृष्टि के परे हो जाय । श्रावस्ती विदूहम ४७-पुप्फानि हेव पचिनन्तं व्यासत्तमनसं नरम् । सुत्तं गामं महोघो व मच्च आदाय गच्छति ॥ ४ ॥ (पुष्पाणि ह्येव प्रचिन्वन्तं व्यासक्तमनसं नरम् । सुप्तं ग्रामं महोघ इव मृत्त्युरादाय गच्छति ॥ ४॥) पुष्प की तरह संसार की आकर्षक दिखावटों के उपभोग में पढ़े,शासक्त मन वाले, मनुप्य को मृत्यु (पाप) उसी तरह ले जाता है, जैसे सोये गांव को बड़ी बाड़। श्रावस्ती पतिपूजिका ४८-पुप्फानि हेव पचिनन्तं व्यासत्तमनसं नरं । अतित्तं येव कामेसु अन्तको कुरुते वसं ।। ५ ॥ (पुष्पाणि होव प्रचिन्वन्तं व्यासक्तमनसं नरम् । मतृप्तं एव कामेषु अन्तकः कुरुते वयम् ॥ ५॥)

२२ धम्मपद पुष्प की तरह संसार की आकर्षक दिखावटों के उपभोग में पड़े, भासत मन वाले, तथा काम-भोग में जिसकी तृप्ति नहीं होती उसे यमराज अपने बस में कर लेता है। श्रावस्ती (कंजूस) कोसिय सेठ ४९-यथापि भमरो पुष्फ वष्णगन्धं महेठय। पलेति रसमादाय एवं गामे मुनी चरे ॥ ६ ॥ ( यथापि भ्रमरः पुष्पं वर्णगन्धं अनन् । पलायते रसमादाय एवं ग्रामे मुनिश्चरेत् ॥ ६ ॥) जैसे भ्रमर पुष्प के वर्ण और गन्ध को बिना हानि पहुँचाये, रस को लेकर चल देता है, वैसे ही मुनि ग्राम में भिक्षाटन करे। श्रावस्वी पाठिक (भाजीवक साधु) ५०-न परेसं विलोमानि न परेसं कताकतं । अत्तनो'च अवेक्खेय्य कतानि अकतानि च ॥७॥ (न परेषां विलोमानि न परेषां कृताकृतम् । आत्मन पय अवेक्षेत कृतानि अकृतानि च ।। ७॥) न तो दूसरों के दोष और न दूसरों के किये तथा न किये की भालो. चना करे। अपने स्वयं क्या किया है और क्या नहीं इसी का चिन्तन करे। श्रावस्ती छत्तपाणि (उपासक) ५१-यथापि रुचिरं पुष्कं वण्णवन्तं अगन्धक। एवं सुभासिता वाचा अफला होति अकुव्यतो ॥ ८ ॥ (यथापि रुचिर पुष्पं वर्णवद् अगन्धकम् । एवं सुभाषिता वाक् अफला भवति अकुर्वतः ॥ ८॥)

पुष्फवग्गो जैसे रुचिर और वर्णयुक्त (किन्तु) गंधरहित फूल है, वैसे ही (कथनानुसार) भाचरण न करनेवाले की सुभापित वाणो भी निष्फल है। ५२-यथापि रुचिरं पुप्फ वण्णवन्तं सगन्धकं । एवं सुभासिता वाचा सफला होति कुबतो ॥९॥ (यथापि रुचिरं पुष्पं वर्णवत् सगन्धकम् । एवं सुभापिता वाक् सफला भवति कुर्वतः ॥६॥) जैसे रुचिर और वर्णयुक्त गन्धसहित फूल होता है, वैसे ही ( वचन अनुसार काम) करनेवालेकी सुभाषित वाणी सफल होती है। के श्रावस्ती पूर्वाराम विशाखा ( उपासिका) ५३-यथापि पुप्फरासिम्हा कयिरा मालागुणे बहू । एवं जातेन मच्चन कत्तव्यं कुसलं वहुं॥ १० ॥ (यथापि पुष्पराशेः कुर्यात् मालागुणान् वहून् । एवं जातेन मयैन कर्त्तव्यं कुशलं बहु ॥ १०॥) जैसे पुष्पों की राशि से कोई अनेक माला की लड़ियां बनावे, वैसे ही जन्म ले कर मनुष्य को भनेक पुण्य करने चाहिए। श्रावस्ती ५४-न भानन्द (थेर) पुप्फगन्धो पटिवातमेति न चन्दनं तगरमल्लिका वा। गन्धो पटिवातमेति सब्बा दिसा सप्पुरिसो पवाति ॥ ११ ॥ सतञ्च २४ धम्मपद (न पुष्पगन्धः प्रतिवातमेति न चन्दन तगर-मल्लिके वा। सतां च गन्धः प्रतिवातमेति सर्वा दिशः सत्पुरुषः प्रवाति ॥ ११ ॥) पुष्प, चन्दन, तगर या चमेरी किसी की भी सुगन्धि हवाके उल्टे नहीं जाती। किंतु सन्तों का यश हवा के उलटे भी फैलता है । सत्पुरुष सभी दिवाओं को ध्याह कर देता है। ५५-चन्दन तगर वापि उप्पल अथ वस्सिकी। एतेसं गन्धजातानं सीलगन्धो सीलगन्धो अनुत्तरो ॥ १२ ॥ (चन्दनं तगरं वापि उत्पलं अथ वार्पिकी। एतेषां गन्धजातानां शीलगन्धोऽनुत्तरः ॥ १२॥) चन्दन या तगर, कमल या जूही, इन सभी ( की) सुगन्धों से सदाचार की सुगन्ध उत्तम है। महाकस्सप राजगह ( वेगुवन) ५६-अप्पमत्तो अय गन्धो या'यं तगरचन्दनी। यो च सीलवत गन्धो वाति देवेसु उत्तमो ॥ १३ ॥ (अल्पमानोऽयं गन्धी योऽयं तगरचन्दनी। यश्च शीलवतां गन्धो वाति देवेषु उत्तमः ॥ १३॥) तगर और चन्दन की जो यह गध फैलती है, वह अपमात्र है, और जो यह सदाचारियों की गध है, (वह) उत्तम (गध) देवताओं में फैलती है।

पुष्पवग्गो २५ राजगृह (वेणुवन) गोधिक (थेर) ५७-तेसं सम्पन्नसीलानं अप्पमादविहारिनं। सम्मदज्ञाविमुत्तानं मारो मयां न विन्दति ॥ १४ ॥ ( तेषां सम्पन्नशीलानां अप्रमाद-विहारिणाम् । सम्यग-ज्ञा-विमुक्तानां मारो मागं न विन्दति ॥ १४ ॥) (जो) वे सदाचारी निरालस हो विहरनेवाले; यथार्थ ज्ञान द्वारा मुक्त (हो गये हैं,) ( उनके ) मार्गको मार नहीं पकड़ सकता। जेतवन गरहादिन्न ५८-यथा संकारघानस्मि उज्झितस्मिं महापथे। पटुमं तत्थ जायेथ सुचिगन्धं मनोरमं ॥ १५ ॥ (यथा संकारधानं उज्झिते महापथे। पद्म तत्र जायेत शुचिगन्धं मनोरमम् ॥१५॥) ५९-एवं संकारभूतेसु अन्धभूते पुथुज्जने । अतिरोचति पञ्जाय सम्मासम्बुद्धसावको ॥ १६ । (एवं संकारभूते अन्धभूते पृथग्जने। अतिरोचते प्रशया सम्यक् संयुद्ध-श्रावकः ॥ १६ ॥) बढ़ी सड़क के किनारे फेंके कूड़े के ढेर पर जिस तरह कोई सुगंध सुन्दर पद्म उत्पन्न हो जाय, उसी तरह कूड़े के समान क्षुद्र अज्ञ संसारसक्त जनता में सम्यक् सम्बुद्ध का शिष्य अपनी प्रज्ञा से अत्यधिक शोभित होता है।

५-बालवग्गो
भावस्ती (बेतवन)
दरिद सेवक
६०-दीघा जागरतो रत्ति दीर्घ सन्तस्स योजन।
दीपो बालानं संसारो सद्धम्म अविजानतं ।। १ ।।
(दीर्घा जानतो राभिः दोघं भान्तस्य योजनम् ।
दीपो चालानां संसारः सद्धर्म अविजानताम् ॥ १॥)
जागने वाले को रात लम्बो मालूम होती है। थके
के लिए
एक योजन बहुत लम्श होता है। सद्धर्म को न जानने वाले अज्ञ पुरुष
के आवागमन का चक्र (=संसार) लम्या होता है।
राजगृह
साविहारी -शिष्य)
६१-चरञ्चे नाधिगच्छेय्य सेय्यं सदिसमचनो।
एकचरियं दल्हं कयिरा नस्थि बाले सहायता ॥ २ ॥
(चरन् चेत् नाधिगच्छेत् श्रेयांसं सदृशं आत्मनः।
एफचया रदं कुर्यात् नास्ति याले सहायता ॥२॥)
विचरण करते यदि अपने से श्रेध या अपने समान कोई भ्यस्ति न
मिले वोदता पूर्वक अकेला ही रहे । मूर्ख से मिग्रता भग्दी नहीं।
माररतो
भानन्द (सेठ)
६२-पुग मयि धनम्मस्थि इति बालो विहमति ।
अजा हि अपनो नयि कुतो पुत्तो कुतो पनं ॥ ३ ॥

वालवग्गो
२७
(पुत्रा मे सन्ति धनं मे ऽस्ति इति वालो विहन्यते ।
' आत्मा हि आत्मनो नास्ति कुतः पुत्रः कुतो धनम् ।। ३।।)
मेरा पुत्र है, मेरा धन है-इस प्रकार मूर्ख परेशान होता है।
मनुष्य अपना आप नहीं है; पुत्र और धन उसके कहाँ तक होंगे !
जेतवन
गिरहकट चोर
६३-यो बालो मञ्जती बाल्यं पण्डितो चापि तेन सो।
वालो च पण्डितमानी, स वे वालोति वुच्चति ॥ ४ ॥
(यो चालो मन्यते बाल्यं पण्डितश्चापि तेन स ।
वालश्च पंडितमानी स वै वाल इत्युच्यते ॥ ४॥)
जो मूर्ख अपनी मूर्खता को समझता है इस कारण वह पण्डित है।
जो मूर्ख हो अपने को पण्डित समझता है वही यथार्थ में मूर्ख है।
श्रावस्ती(जेतवन
उदायो (थेर)
६४-यावजीवम्पि चे वालो पण्डितं पयिरुपासति ।
न सो धम्मं विजानाति दबी सूपरसं यथा ॥ ५॥
यावज्जीवमपि चेद् वालः पंडितं पर्युपास्ते ।
न स धर्म विजानाति दी सुपरसं यथा ॥ ५॥)
मूर्ख यदि जन्म भर पण्डित के साथ रहे तो भी धर्म का बोध नहीं
करता, ठीक वैसे ही जैसे कलछी तरकारी के रसास्वाद का।
श्रावस्ती (जेतवन)
भद्रवर्गीय ( भिक्षुलोग)
६५-मुहुत्तमपि चे विज्ञ पण्डितं पयिरुपासति ।
खिप्पं धग्मं विजानाति जिहा सूपरसं यथा ॥ ६॥

३०
.
धम्मपद
(महि पापं कृतं कर्म सद्यः क्षीरमिव मुंचति ।
दहन वालमन्वेति भस्माच्छन्न इव पावकः ॥ १२॥)
किया गया पाप शीघ्र ही अपना फल नही लाता। जैसे, ताजा दूध
शीघ्र ही जम नहीं जाता । राख से ढकी आग की तरह वह (पाप कर्म)
जलाता हुआ मूर्ख का अनुगमन करता है।
राजगृह ( वेगुवन)
सहिक्ट (पेट)
७२-यावदेव अनाथाय अतं बालस्स जायति ।
हन्ति बालस्स सुक्कंसे मुद्धमस्स विपातयं ॥ १३ ॥
(यावदेव अनर्थाय शप्तं बालस्य जायते ।
हन्ति बालस्य शुक्लांशं मूर्धानमस्य विपातयन् ॥ १३॥)
मूख का सारा ज्ञान उसी के अनर्थ के लिए होता है। वह मूर्ख को
अच्छाई का नाश करता है, और उसके सिर को नीचा गिराता है।
नेववन
सुषम्म (धेर)
७३-असतं भावनमिच्छेय्य पुरेक्खारश्च भिक्खुस ।
आवासेसु च इस्सरियं पूजा पाकुलेसु च ॥ १४ ॥
(असद् भायनमिच्छेत् पुरस्कारं च भिनुपु।
आपासेषु चैश्वयं पूजा परकुलेषु च ।। १४ ॥)
७४-ममेव कतमन्नन्तु गिही पञ्चजिता उभो।
ममेवातिवसा अस्त किंचाकिचेसु किस्मिचि
इति बालस सरप्पो इच्छा मानो च पद्दति ॥ १५ ॥

बालवग्गो ३१ ३ ( ममैव कृतं मन्येतां गृहि-प्रव्रजितावुभौ । ममैवातियशाः स्यातां कृत्याकृत्त्येपु कस्मिन्धित् । इति वालस्य संकल्प इच्छा मानश्च पद्धते ॥ १५ ॥ भिक्षुओं के बीच अगुआ होना, मठों का अधिपति यनना, गृहत्य परिवारों में पूजित होना, गृही और प्रवजित दोनों मेरा ही क्रिया माने, सभी प्रकार के काम में वे मेरे ही आधीन रहे-ऐसी अनुचित इच्छा करता है । इस प्रकार मूर्ख के संकल्प, और अहंकार बढ़ते हैं। श्रावस्ती (तवन) ( बनवापी ) विस्म (थेर) ७५-अजा हि लाभूपनिसा अञ्जा निव्वान-गामिनी । एवमेतं अभिज्ञाय भिक्खु बुद्धस्स सावको ।। सकारं नाभिनन्देय्य विवेकमनुव्रये ॥ १६ ॥ ( अन्या हि लाभोपनिषद् अन्या निर्वाणगामिनी। एवमेतद् अभिष्ठाय भितुव॒धस्य श्रावकः । सत्कारं नाभिनन्देत् विवेकमनुवृहयेत् ॥ १६ ॥) अनुवाद-लाम का रास्ता दूसरा है, और निर्वाण को ले जानेवाला दूसरा इस प्रकार इसे जानकर बुद्ध का अनुगामी भिक्षु सत्कार का अभिनन्दन न करे, और विवेक (= एकान्तचर्या) को बढ़ावे । वालवर्ग समाप्त ६--पण्डित वग्गो जेतवन राध () ७६-निधीनं व पवत्तारं यं पस्से वज्ज-दस्सिनं । निगरहवादि मेधाविं तादिसं पण्डितं भजे। तादिसं भजमानस्स सेग्यो होति न पापियो ।॥ १ ॥ (निधीनामिव प्रवक्तारं यं पश्येत् वय॑दर्शिनम् । निगृह्यपादिन मेधाविनं, ताहर्श पंडितं भजेत् । तादर्श भजमानस्य श्रेयो भवति न पापीयः॥५॥) दोप दिखा देने वाले को वैसा ही (प्रिय ) समझे जैसा वह जो गडे खजानों का भेद बताने वाला हो। सयत करके उपदेश करने वाले वैसे मेधावी पण्डित के साथ रहे । वैसे ( सत्पुरुष) के साथ रहने से कल्याण ही होता है, बुरा नहीं। । बैतवन अस्सजी, पुनव्वर ७७--ओवदेय्यानुसासेय्य असब्भा च निवारये । सतं हि सो पियो होति असतं होति अप्पियो ॥ २ ॥ (अवयदेवमुशिप्याद् असभ्याच निवारयेत् । सतां हि स प्रियो भवति असतां भवत्यप्रियः॥२॥1) जो सदुपदेश दे, सुमार्ग दिखावे तथा कुमार्ग से निवारण करे वह सजनों को प्रिय होता है, किंतु दुर्जनों को भप्रिय ।

पण्डितवग्गो ३३ - जेतवन छन्न (थेर) ७८-न भजे पापके मित्ते न भजे पुरिसाधमे । भजेथ मित्ते कल्याणे भजेथ पुरिसुत्तमे ॥ ३ ॥ ( न भजेत् पापानि मित्राणि न भजेत् पुरुपाधमान् । भजेत् मित्राणि कल्याणानि भजेत् पुरुषोत्तमान् ॥३॥) बुरे मित्रों के साथ न रहे । अधम पुरुषों का संग न करे । सन्मित्रके साथ रहे । उत्तम पुरुषों का संग करे । जेतवन महाकप्पिन (2) ७९-धम्मपीती सुखं सेति विप्पसन्नेन चेतसा। अरियप्पवेदिते धम्मे सदा रमति पण्डितो ॥ ४ ॥ (धर्मपीतीः सुखं शेते विग्रसन्नेन चेतसा। आर्यप्रवेवित धर्म सदा रमते पंडितः॥४॥) धर्म में आनन्द मानने वाला अत्यन्त श्रद्धायुक्त चित्त से सुख पूर्वक विहार करता है। परिटतजन बुन्द के उपदिष्ट धर्म में सदा रत रहता है। तवन पण्डित सामर ८०-उदकं हि नयन्ति नेत्तिका उसुकारा नमयन्ति तेजनं । दारूं नमयन्ति तच्छका अत्तानं दमयन्ति पण्डिता ॥ ५॥ (उदकं हि नयन्ति नेतृका इपुकारा नमयन्ति तेजनम् । दारु नमयन्ति तक्षका आत्मानं दमयन्ति पण्डिताः ॥५॥ ) ३ ३४ धम्मपद नहर वाले पानी को ले जाते हैं, वाण बनाने वाले वाण को ठीक करते हैं, बदई लकड़ी को ठीक करते हैं; और पंडित (जन) अपने आपका दमन करते हैं। जेतवन भद्दिय (और) ८१-सेलो यथा एकघनो वातेन न समोरति । एवं निन्दापसंसासु न समिञ्जन्ति पण्डिता ॥ ६ ॥ (शैलो यथैकनो घातेन न समीर्यते । एवं निन्दाप्रशंसासु न समीर्यन्ते पण्डिताः ॥ ६॥) जैसे डोस पदाइहवामे करायमान नहीं होना, वैसे ही पंदित निन्दा और प्रशंसासे विचलित नहीं होते। जेतवन काण-माता ८२-यथापि रहदो गम्भीरो विष्णसन्नो अनाविलो। एवं धम्मानि सुत्न विप्पसोदन्ति पण्डिता ॥ ७ ॥ (यथापि हदो गम्भीरो विप्रसमोऽनापिलः। एवं धर्मान् धुत्वा विप्रसीदन्ति पण्डिताः ॥ ७॥) असा गम्भीर स्वाक्ष निर्मल जलाशय हो, वैसा ही पवित लोग धर्म को मुन कर शुद्ध हो जाते है। पाच सोभियु ८३-सभाप ये सरिसा ववन्ति न काममा लपयन्ति सन्तो।

पण्डितवग्गो ३५ . सुखेन अथवा दुखेन न उचावचं पण्डिता दस्सयन्ति ॥ ८ ॥ (सर्वत्र वे सत्पुरुषा व्रजन्ति न कामकामा लपन्ति सन्तः । सुखेन स्पृष्टा अथवा दुःखेन नोच्चावचं पण्डिता दर्शयन्ति ॥८1) सत्पुरुप सभी जगह जाते हैं किंतु वे अपनी मतलब की बातें नहीं करते। सुख हो या दुःख, पण्डित लोग अपने में विकार नहीं प्रदर्शन करते। ८४-न अत्तहेतु न परस्स हेतु न पुत्तमिच्छे न धनं न रहें । 2012 न इच्छेय्य अधम्मेन समिद्धिमत्तनो स सोलवा पनवा धम्मिको सिया ॥ ९ ॥ (नात्महेतोः न परस्य हेतोः न पुत्रमिच्छेत् न धनं न राष्ट्रम् । नेच्छेद् अधर्मेण समृद्धिमात्मनः स शीलवान् प्रशाधान धार्मिकः स्यात् ॥१॥) न अपने लिये और न दूसरे के जिये, न पुत्र की इच्छा करे, न धन की और न राज्य की। अधर्म से अपनी उन्नति की इच्छा न करे। शीलवान् , प्रज्ञावान् और धार्मिक बने । नेतवन धर्मप्रवण ८५-अप्पका ते मनुस्सेनु ये जना पारगामिनो। अथायं इतरा तीरमेवानुधावति ॥ १० ॥ पजा धम्मपद (अल्पकारते मनुष्येपु ये जना पारगामिन । अथेमा इतराः प्रजाः तीरमेवानुधावति ।। १० ।) मनुष्यों में ऐसे बहुत थोड़े हैं जो यथार्थ में उस पार जाना चाहते हो। अधिक तो ऐसे हैं जो किनारे ही किनारे दौड़ते हैं। ८६-ये च खो सग्मदवसाते धम्मे धम्मानुवत्तिनो । ते जना पारमेस्सन्ति मच्चुधेय्यं सुदुत्तर ॥ ११ ॥ (ये च खलु सम्यगाख्याते धर्म धर्मानुवर्तिन । ते जनाः पारमेष्यन्ति मृत्युधेयं सुदुस्तरम् ॥ ११ ॥) जो अच्छी तरह उपदिष्ट धर्म में धर्मानुचरण करते हैं वे ही दुस्तर मृत्यु के राज्य को पार करेंगे। पच सौ नवागत भितु ८७-कण्ह धम्मं विप्पहाय सुक्क भावेथ पण्डितो । स्रोका अनोक आगग्म विवेके यत्थ दूरमं ।। १२ ।। (कृपणं धर्म विप्रहाय शुक्ल भावयेत् पण्डित । ओपात् अनोकं आगम्य विवेके यत्र दूरमम् ॥ १२ ॥) ८८-तत्राभिरतिमिच्छेय्य हित्वा कामे अकिञ्चनो। परियोदपेय्य अत्तान चित्तवलेसेहि पण्डितो ।। १३ ॥ (ताभिरतिमिच्छेद हिस्या कामान् अकिंचन । पर्यघदापयेत् मामानं चित्तपलेशः पण्डितः ॥ १३ ॥) परित युरीयाव को पोर भाषी का अभ्यास करे। घर से येघर maraयान में रह वह साधारण लोगों का मन नहीं लगता। नेववन पण्डितवग्गो . कामनायों को छोड़ अकिञ्चन हो पण्डितजन अपने को चित्त के मलों से शुद्ध करे। '८९-येसं सम्बोधि-अङ्गेसु सम्मा चित्तं सुभावितं । आदान-पटिनिस्सग्गे अनुपादाय ये रता । खीण सवा जुतीमन्तो ते लोके परिनिबुता ॥ १४ ॥ (येषां सम्बोध्यंगेपु सम्यक् चित्तं सुभावितम्। आदानप्रतिनिःसर्ग अनुपादाय ये रताः। क्षीणास्त्रवा ज्योतिष्मन्तस्ते लोके परिनिर्वृताः ॥१४॥) जिनका चित्त सम्बोध्यङ्गों में अच्छी तरह अभ्यस्त हो गया है, जो अनासक्त हो परिग्रह के त्याग में रत हैं, क्षीणश्रव द्युतिमान है, वे ही संसार में निर्वाण पा चुके हैं।

७-अरहन्तवग्गो
राजगृह ( जीवकका आम्रवन)
जीवक
९०-गतद्धिनो विसोकस्स विप्पमुत्तस्स सब्बधि ।
सब्बगन्थप्पहीणस्य परिलाहो न विज्जति ॥ १ ॥
( गताध्वानो विशोकस्य विषमुक्तस्य सर्वथा ।
सर्वनाथप्रहीणस्य परिदाहो न विद्यते ॥१॥)
जिसने मार्ग तय कर लिया है, शोकरहित सर्वथा विमुक्त हो गया
है, जिसकी सभी प्रन्थियां प्रहीरा हो गई हैं उसे कोई सन्ताप नहीं।
राजगृह (वेणुवन)
महाकस्सप
९१-उय्युञ्जन्ति सतीमन्तो न निकेते रमन्ति ते ।
हंसा व पल्लं हित्वा ओकमोकं नहन्ति ते ॥ २ ॥
( उद्यं जते स्मृतिमन्तो न निकेते रमन्ते ते ।
हंसा व पत्धलं हित्वा ओकमोकं जहति ते ॥२॥)
स्मृतिमान् हो उद्योग करते हैं, गृहस्थ जीवन में वे रमण नहीं
करते। हंस जैसे
खुद जलाशय को छोड़ कर उड़ जाता है, वैसे वे सभी
गृहवास को छोड़ देते हैं।
बेतवन
वेलाडि सीस
९२-येसं सन्निचयो नत्थि ये परिजातभोजना।
सुचतो अनिमित्तो च विमोक्खो यस्स गोचरो।
माकासे 'व सकुन्तानं गति तेसं दुरन्नया ॥ ३ ॥

अरहन्तवमो ( येषां सन्निचयो नास्ति ये परिज्ञातभोजनाः। शून्यतोऽनिमित्तश्च विमोक्षो यस्य गोचरः। अाकाश इव शकुन्तानां गतिः तेषां दुरन्वया ॥३॥) जिन्हें कोई संग्रह नहीं, जो भोजन में संयत हैं, शुन्य और अनिमित्त स्वरूप निर्वाण पर जो समाधित्य हैं उनकी गति, आकाश के पक्षी की गति की भांति, भज्ञेय है। राजगृह ( वेणुवन) अनुरुद्ध (थेर) ९३-यस्सा'सवा परिक्खीणा आहारे च अनिस्सितो । सुञतो अनिमित्तो च विमोक्खो यस्स गोचरो। आकासे' व सकुन्तानं पदं तस्स दुरन्नयं ॥ ४ ॥ (यस्यास्रवाः परिक्षीणा आहरे च अनिसृतः। शून्यतोऽनिमित्तश्च विमोक्षो यस्य गोचरः। श्राकाश इव शकुन्तानां पदं तस्य दुरन्वयम् ॥ ४॥) जिसके आश्रव क्षीण हो गये हैं, आहार में जिसे प्रासक्ति नहीं, शून्य और अनिमित्त स्वरूप निर्वाण पर जो समाधिस्थ है उसकी स्थिति, आकाश के पक्षी की भांति, अज्ञेय है। श्रावस्ती (पूर्वाराम) ९४-यस्सिन्द्रियाणि समथं गतानि, अस्सा यथा सारथिना सुदन्ता। पहीनमानस्स अनासवस्स. देवापि तस्स पिहयन्ति तादिनो ॥ ५ महाकञ्चायन धम्मपद (यस्येन्द्रियाणि शमतां गतानि अश्वा यथा सारथिना सुदान्ताः। प्रहीणमानस्य अनानवस्य देवा अपि तस्य स्पृहयन्ति तादृशः॥५॥) सारथी के द्वारा दमन कर लिए गए अश्व के समान जिसको इन्द्रियां शान्त हो गई हैं, वैसे अहंकार रहित अनाश्रय सन्त को स्पृहा देवता लोग भी करते हैं। जेतवन सारिपुत्त (धेर) ९५-पठवंसमो नो विरुज्झति इन्दखीलूपमो तादि सुब्बतो। रहदो 'व अपेतकद्दमो संसारा न भवन्ति तादिनो ॥ ६॥ पृथिवीसमो न विरुभ्यते इन्द्रकीलोपमस्ताटक सुवतः। हद इवापतकदमः संसारा न भवन्ति ताटश ॥६॥) वैसा सुव्रत, इन्द्रकील के समान (द ', तथा पृथ्वी के समान प्रकाप्य होता है। वह पक-रहित जलाशय के समान स्वच्छ है। वह संसार की प्रन्थियों में बद्ध नहीं होता। बेतवन कौसम्बिभासित विस्स थेर) ९६-सन्तं अस्स मनं होति सन्ता वाचा च कम्म च । सग्मदग्नाविमुत्तस्स उपसन्तस्स तादिनो ॥ ७॥ (शान्तं तस्य मनो भवति शान्ता वाक् च कर्म च । साम्यगासाधिमुतस्य उपशान्तस्य तारश ॥ ७॥)

अरहन्तवग्गो
यथार्थ ज्ञान द्वारा मुक हुए उस उपशान्त (अर्हत् पुरुष) का मन
शान्त होता है, वाणी और कर्म शान्त होते हैं।
जेतवन
सारिपुत्र (थेर)
९७-अस्सद्धो असतञ्चु च संघिच्छेदो च यो नरो।
हतावकासो वन्तासो स वे उत्तमपोरिसो ॥ ८ ॥
(अश्रद्धोऽकृतज्ञश्च सन्धिच्छेदश्च यो नरः ।
हतावकाशो वान्ताशः स वै उत्तमपुरुषः ॥ ८॥)
जो ( अन्ध) विश्वास से रहित है, अकृत निर्वाण का ज्ञानी है,
पुनर्जन्म होना जिसे सम्भव नहीं, जिसने सारी तृष्णा का त्याग कर दिया
है, वही उत्तम पुरुप है ।
जेतवन
(खदिरवनी ) रेवत (धेर)
९८-गामे वा यदि वारजे निन्ने वा यदि वा थले ।
यत्थारहन्तो विहरन्ति तं भूमि रामणेय्यकं ॥९॥
(ग्रामे वा यदि वाऽऽरण्ये निम्ने वा बदि वास्थले ।
यत्रान्तिो विहरन्ति
विहरन्ति सा भूमी रमणीया ॥९॥)
गाँव में या जंगल में, निम्न या ऊँचे स्थल में जहाँ कहीं ग्रहंतु लोग
विहार करते हैं, वही रमणीय भूमि है।
जेतवन
भारण्यक मिक्षु
९९-रमणीयानि अरज्जानि यस्थ न रमते जनो ।
वीतरागा रमिस्सन्ति न ते कामगवेसिनो ॥ १० ॥

४२
धम्मपद
(रमणीयान्यारण्यानि यत्र न रमते जनः ।
वीतरागा रस्यन्ते न ते कामगवेषिणः ॥१०॥)
रमणीय वन, जहाँ (साधारण ) जन रमण नहीं करते, वहां
काम (भोगों) के पीछे न भटकने वाले वीतराग रमण करेंगे।

८-सहस्सवग्गो
वेणुवन-
तम्वदाठिक (चोरघावक
जेतवन
१००-सहस्समपि चे वाचा अनत्थपदसंहिता ।
एकं अस्थपदं सेय्यो यं सुत्त्वा उपसम्मति ॥ १ ॥
(सहसमपि चेद् वाचः अनर्थपदसंहिताः।
एकं मर्थपदं श्रेयो यच्छुत्त्वोपशाम्यति ॥ १॥)
व्यर्थ के पदों से युक्त सहस्रों वाक्यों से भी ( वह ) सार्थक एक पद
श्रेष्ठ है, जिसे सुनकर शान्ति होती है।
दारुचीरिव (थेर)
१०१-सहस्समपि चे गाथा अनत्थपदसंहिता ।
एकं गाथापदं सेय्यो यं सुत्त्वा उपसम्मति ॥ २॥
(सहसमपि चेद् गाथा अनर्थपदसंहिताः।
एकं गाथापदं श्रेयो यच्छुत्त्वोपशाम्यति ॥ २॥)
व्यर्थ के पदों से युक्त हजार गाथाओं से भी एक गाथापद श्रेष्ठ है,
जिसे
सुनकर० ।
जेतवन
कुण्डलकेसी (थेर)
१०२-यो च गाथासतं भासे अनत्थपदसंहिता ।
एक धम्मपदं सेय्यो यं सुत्त्वा उपसम्मति ॥३॥

धम्मपद (यश्च गाथाशतं भापेतानर्थपदसंहितम् । एक धर्मपदं श्रेयो यच्छुन्योपशाम्यति ॥ ३॥) जो अनर्थपदों से युक्त सौ गाधार्ये भी पढ़े, उससे कहीं अच्छा एक धर्मपद है जिसे सुनकर उपशान्त हो जाता है। १०३--यो सहरसं सहस्सेन सशमे मानुसे जिने । एक च जेय्यमत्तानं स वे सनामजुत्तमो॥ ४ ॥ (यः सहसं सहसेण संग्रामे मानुपान जयेत्। पकं च जयेद् आत्मानं स वै संग्रामजिदुत्तमः ॥ ४ ॥) जो कोई संग्राम में हजारों मनुष्यों को जीत ले, उससे कहीं यद कर संग्राम विजयी वह है जो एक अपने स्वयं को जीत ले। जैतपन मन-पुष्णक क्षण १०४-अता ह वे जितं सेग्यो या चायं इतरा पजा । अतदन्तस्स पोसस्स निच्चं सम्ञतचारिनो ॥५॥ ( आत्मा ह वै जितः श्रेयान् या चेयमितराः प्रजाः । दान्तात्मनःपुरुषस्य नित्यं संयतचारिणः ॥ ५॥) १०५-नेव देवो न गन्धयो न मारो सह अनुना। जितं अपजितं कायरा तथारूपस्स जन्तुनो ॥६॥ (नेय देयो न गन्धर्यों न मार सह यया । जित अपजित कुर्यात् तथा रूपस्य जन्तोः ६ इन पम्प प्रमाना जीवने में भरेगा परने को जीतना है। अपने को मन मनेवाये, निरय भरने को संयम करनेवाय, मो पुन?

सहस्सवग्गो ४५. उनके जीते को, न देवता, न गन्धर्व, न ब्रह्मा सहित मार, वेजीता कर सकते हैं। वेणुवन सारिपुत्तके मामा १०६-मासे मासे सहस्सेन यो यजेथ सतं समं । एकञ्च भावितत्तानं मुहुत्तमपि पूजये। सा येव पूजना सेय्यो यं चे वस्ससतं हुतं ॥ ७ ॥ ( मासे मासे सहसूण यो यजेत शतं समान् । एकं च भावितात्मानं मुहूर्तमपि पूजयेत् । सैव पूजना श्रेयसी यच्चेद् वर्षशतं हुतम् ॥ ७ ॥) सहस्र ( दक्षिणा यज्ञ) से जो महीने महीने सौ वर्ष तक यजन करे, और यदि परिशुद्ध मनवाले एक ( पुरुप ) को एक मुहूर्त ही पूजे ; तो. सौ वर्ष के हवन से यह पूना ही श्रेष्ठ है। वेणुवन सारिपुत्तका भांजा १८७-यो च वस्ससतं जन्तु अमिंग परिचरे वने। एकं च भावितत्तानं मुहुत्तमपि पूजये। सा येव पूजना सेय्यो यं चे वस्ससतं हुतं ॥ ८ ॥ ( यश्च वर्षशत जन्तुरग्निं परिचरेद् वने। एकं च भवितात्मानं मुहूर्तमपि पूजयेत् । सैव पूजना श्रेयसी यच्चेद् वर्षशतं हुतम् ॥ ८॥). यदि प्राणी सौ वर्ष तक वन में अग्निपरिचरण ( = अग्निहोत्र ) करे, और यदि। •n

धम्मपद
वेणुवन
सारिपुत्का मित्र बामण
१०८-यं किंचि विठं च हुत्तं च लोके.
संवच्छरं यजेथ
यजेथ पुञपेक्खो ।
सबम्पि तं न चतुभागमेति,
अभिवादना उग्जुगतेसु सेय्यो ॥ ९ ॥
( यत् किंचिद् इष्ट' च हुतं च लोके,
संवत्सर
यजेत पुण्यापेक्षः।
समपि तत
न चतुर्भागमेति,
अभिवादना झुगतेपु श्रेयसी ॥ ६ ॥)
पुण्य की अभिलाषा से यदि वर्ष भर लोक के सभी यज्ञ और हमन
करे तो भी जुमृत सन्त को किए ९० प्रणाम का चौथा हिस्सा फल
भी नहीं प्राप्त होता है।
परण्यकुरी
दीनायु मार
१०९-अभिगदनसीलिस्त निच्चं बद्धापचायिनो ।
चचारो धरमा बदन्ति आयु वष्णो मुखं पलं ॥ १० ॥
(अभिवादनशीलस्य नित्यं प्रयापचापिनः ।
चत्वारो धर्मा यर्धन्ते आयुर्वर्णः सुसं पलम् ॥ १०॥)
जो अभिवादन शील है, जो सदा पदों को सेग मनेगा,
उसकी चार पाते (धर्म) पदवी ?--भायु, पर्य, मुन भोर पज।
बटन
tum) सामर
११०-यो च वस्ससतं जीरे दुस्सीटो समादितो।
एकादं जीवितं सेग्यो सीलरन्तरस मायिनी ॥ ११ ॥

धम्मपद (यश्च वर्षशतं जीवेद् अपश्यन् उदयव्ययम् । एकाहं जीवित श्रेयः पश्यत उदयव्ययम् ॥ १४ ॥ (संसार में वस्तुओं के) उत्पत्ति भोर विनाश का विना मनन किए सौ वर्ष के जीवन से, उत्पति और विनाश के मनन शील के जीवन का एक दिन श्रेष्ठ है। जैतवन कितागोमती ११४-यो च वत्ससतं जीवे अपस्सं अमतं पद। एकाहं जीवितं सेय्यो परसतो अमतं पदं॥ १५ ॥ ( यच वर्षशत जीवेद् अपश्यन् अमृत पदम । एकाई जीवितं श्रेयः पश्यतोऽमृत पदम ।। १५.11) अमृतपद ( = दुरसनिर्वाण) को न रयाल किए सौ वर्ष के जीवन से, अमृतपद को देखने वाले जीवन का एक दिन श्रेष्ठ है। जेवन बधुनिका ( रो) ११५-यो च वस्ससत जीरे अपस्सं धममुचमं । एकाहं जीवितं सेग्यो पस्सतो धम्ममुचमं ॥ १६ ॥ (यच वर्षात जीवेदपश्यन् धर्ममुत्तमम् । एकाहं जीवित धेयः पश्यतो धर्ममुत्तमम् ॥ १६॥) उधम धर्म को बिना जाने सौ य के जीवन से, उसम धर्म के देपनेयाले जीवन का एक दिन में है।

६--पापवग्गो
जेतवन
(चूल ) एकासाटक (ब्राह्मण ),
११६-यभित्थरेथ कल्याणे पापा चित्तं निवारये।
दन्धं हि करोतो पुनं पापस्मिं रमते मनो ॥ १॥
(अभित्त्वरेत कल्याणे पापात् चित्तं निवारयेत् ।
तन्द्रितं हि कुर्वतः पुण्यं पापे रमते मनः ॥ १॥)
पुण्य करने में शीघ्रता करे, पापसे चित्तको हटावे। पुण्य कार्य में
शिथिलता करने वाले का मन पाप में लग जाता है।
जेतवन
सेय्यसक (थेर)
११७-पापञ्चे पुरिसो कयिरा न तं कयिरा पुनप्पुनं ।
न तम्हि छन्दं कयिराथ दुक्खो पापस्स उच्च यो ॥ २ ॥
पापं चेत् पुरुषः कुर्यात् न तत् कुर्यात् पुनः पुनः
न तरिम छन्दं कुर्यात्, दुःखः पापस्य उच्चयः ॥२॥)
मनुप्य यदि पाप कर दे तो उसे बार २ न करे। उसमें इच्छा न बढ़ावे।
पापका संचय दुःख का कारण होता है ।
जेतवन
लाजदेवकी कन्या
११८-पुञञ्चे पुरिसो कयिरा कयिराथेनं पुनप्पुनं ।
तम्हि छन्दं कयिराथ सुखो पुनस्स उच्चयो ॥ ३ ॥

धम्मपद -- (पुण्यं चेत् पुरुषः कुर्यात, कुर्याद् एतत् पुनः पुनः। तस्मि छन्दं कुर्यात् सुखः पुण्यस्य उञ्चयः ॥३॥) यदि मनुष्य पुण्य करे तो उसे बार २ करे। उस में खूब उत्साह बढ़ावे । पुण्य का संचय सुखका कारण होता है । जेतवन अनाथपिस्टिक (सेठ) ११९-पापोपि पस्सति भद्रं याव पापं न पञ्चति । यदा च पञ्चति पापं अथ पापो पापानि पस्सति ॥ ४ ॥ (पापोऽपि पश्यति भद्रं यावत् पापं न पच्यते । यदा च पच्यते पापं अथ पाप: पापानि पश्यति ॥४॥) जव तक पाप का फल नहीं मिलता है तब तक पापी को पाप बढ़ा मच्छा लगता है। अप पाप का फल होता है तब वह पापों को अपने स्वरूप में देखता है। १२०-मद्रोपि पस्सति पापं याव भद्रं न पचति । यदा च पञ्चति भद्रं अथ भद्रो भद्रानि पस्सति ॥ ५॥ (भद्रोऽपि पश्यति पापं यावद् भद्रं न पच्यते । यदा च पन्यते भद्रंथ भद्रः भद्राणि पश्यति ॥५॥) जब तक पुण्य का फल नहीं मिलता तब तक पुण्यात्मा को पुण्य चुरा रुगता है। जब पुण्यका फल होता है नव वह पुण्य को अपने स्व- रूप में देखता है बेववन मसंयमी (भितु) १२१-मावमन्नेथ पापस न मन्त त्रागमिस्सति । उदरिन्दुनिपातेन उदकुम्भोपि पूरति । बालो प्रति पापस्स थाक-थोकम्पि आचिनं ॥ ६॥ - पापवग्गो ५१ ( मा 5 वमन्येत पापं न मां तद् आगमिष्यति । उदविन्दुनिपातेन उदकुम्भोऽपि पूर्यते। चालः पूरयति पापं स्तोकं स्तोकमप्याचिन्वन् ।॥ ६॥) "वह मेरे पास नहीं पायेगा" ऐसा (सोच) पाप की अवहेलना न करे । पानी की बूंद के गिरने से घड़ा भर जाता है। (ऐसे ही) मूर्ख थोड़ा-थोड़ा संचय करते पाप को भर लेता है। । जतवन विलालपाद (सेठ) १२२-मावग्रंथ पुनस्स न मन्तं आगमिस्सति । उदविन्दु निपातेन , उदकुम्भोपि पूरति । धीरो पूरति पुज्ञस्स थोक-थोकम्पि आचिनं ॥ ७ ॥ ( माऽवमन्येत पुण्यं न मां तद् आगमिष्यति । उदविन्दुनिपातेन उदकुम्भो ऽपि पूर्यते । धीरः पूरयति पुण्यं स्तोकं स्तोकमप्याचिन्वन् ।। ७ ॥ ) "वह मेरे पास नहीं आयेगा" ~ऐसा (सोच) पुण्य की अवहेलना न करे । पानी को० । धीर थोड़ा-थोड़ा संचय करते पुण्य को भर लेता है। जतवन महाधन ( वणिक् ) १२३-वाणिजो 'व भयं मगं अप्पसत्थो महद्धनो। विसं जीवितुकामो'व प पानि परिवज्जये ॥ ८॥ ( वणिगिव भयं मागं अल्पसार्थो महाधनः । विषं जीवितुकाम इव पापानि परिवर्जयेत ॥८॥) थोड़े काफिले और महाधन वाला वनजारा जैसे भययुक्त रास्ते को धम्मपद ५२ छोड देता है, अथवा जाने की इच्छा वाला पुरुप जैसे विष को छोड़ देता है वैसे ही पुरुप पापों को छोड़ दे। बेशुक्न कुक्कुटमित १२४-पाणिम्हि चे वणो नास्स हरेय्य पाणिना विसं । नावणं विसमन्वेति नत्थि पापं अकुव्वतो ॥ ९ ॥ (पाणौ चेद् व्रणो न स्यात् हरेत् पाणिना विपम् । नाऽनणं विषमन्वेति, नास्ति पापं अकुर्वतः॥४॥) पदि हाथ में धाव न हो, तो हाथ से विष को ले ले (क्योकि) वाव(= व्रण)-रहित (शरीर में) विष नहीं लगता (इसी प्रकार) न करनेवाले को पाप नहीं लगता। 1 जेवन कोक (बुचे का शिकारी) १२५-यो अप्पदुस्स नरस्स दुस्सति सुद्धस्स पोसस्स अनङ्गणस्स। तमेव बालं पच्चेति पापं, मुखमो रजो पटिवातं व खित्तो ॥ १० ॥ (योन्पदुष्टाय नराय दुष्यति शुद्धाय पुरुपायाऽनङ्गणाय। तमेव चालं प्रत्येति पापं, सूक्ष्मो रजःप्रतिवातमिव क्षिप्तम् ॥ १०॥) जो दोपरहित शुद्ध निमंल पुरुष को दोप एगाता है, उसी अश को (उसका) पाप लोट कर रगता है। (जैसे कि) सूक्ष्म धूलि को हवा रेभाने के स्थान में (यह फैलनेगले पर पड़ती है)।

पापवग्गो ५३ तवन ( मापिकारकुलूपग) तिस्स (थेर) १२६-गव्भमेके उप्पजन्ति निरयं पापकम्मिनो। सग्गं सुगतिनो यन्ति, परिनिव्वन्ति अनासवा ॥ ११ ॥ (गर्भमेक उत्पद्यन्ते, निरयं पापकर्मिणः। स्वर्ग सुगतयो यान्ति, परिनिर्वान्त्यनास्रवाः ।।११।। कोई (पुरुष) गर्भ में उत्पन्न होते हैं, (कोई ) पापकर्मा नरक में (जाते हैं), (कोई ) सुगतिवाले (पुरुप) स्वर्ग को जाते हैं; (और चित्त के) मलासे रहित (पुरुष) निर्वाणको प्राप्त होते हैं । जेतवन ३ भिक्षु १२७-न अन्तलिक्खे न समुद्दमज्झे न पव्यतानं विवरं पविस्स । न विज्जती सो जगतिप्पदेसो यथठितो मुञ्चेय्य पापकरमा ॥ १२ ॥ (नान्तरिक्षे न समुद्रमध्ये न पर्वतानां विवरं प्रविश्य । न विद्यते स जगति प्रदेशो यत्रस्थितो मुच्येत पापकर्मणः ॥१२॥) न आकाश में न समुद्र के मध्य में न पर्वतों के विवर में प्रवेश कर- संसार में कोई स्थान नहीं है, जहाँ रहकर-पाप कर्मों के (फल से) पाणी बच सके।

५४ धम्मपद कपिलवस्तु (न्यग्रोधाराम) सम्पबुद (सास्य) १२८-न अन्तलिखे न समुद्दमझे न पब्बतानं विवरं पविस्स । न विज्जती सो जगतिप्पदेसो यस्थट्टितं न प्पसहेय्य मच्चू ॥१३॥ ( नान्तरिक्षे न समुद्रमध्ये न पर्वतानां विवरं प्रविश्य । न विद्यते स जगति प्रदेशो यत्रस्थितं न प्रसहेत मृत्युः ॥१३॥) न आकाश में-जहाँ रहनेवाले को मृत्यु न सताये।

१०-दण्डवग्गो
जेतवन
छब्बगिय ( भिन्नु)
१२९-सव्वे तसन्ति दण्डम्स सव्वे भायन्ति मच्चुनो।
अत्तानं उपमं कत्वा न हनेय्य न घातये ॥ १ ॥
(सर्वे नस्यन्ति दण्डात् सर्च विभ्यति मृत्योः ।
आत्मानं उपमां कृत्वा न हन्यात् न घातयेत् ॥ १॥)
दण्ड से सभी डरते हैं, मृत्यु से सभी भय खाते हैं, अपने समान
(इन बातों को) जानकर न मारे न मारने की प्रेरणा करे ।
.
नेतवन
छन्वग्गिय ( भिनु)
१३०-सव्वे तसन्ति दंडस्स सव्वसं जीवितं पियं ।
अत्तानं उपमं कत्वा न हनेय्य न घातये ॥ २ ॥
( सर्वे त्रस्यन्ति दण्डात् सर्वेषां जीवितं प्रियम् ।
आत्मानं उपमां कृत्वा न हन्यात् न घातयेत् ॥ २॥)
सभी दण्ड से डरते हैं, सब को जीवन प्रिय है, (इसे) अपने
समान जानकर न मारे और न मारने की प्रेरणा करे।
जतवन
बहुत से लड़के
१३१-सुखकामानि भूतानि यो दण्डेन विहिंसति ।
अत्तनो सुखमेसानो पेच्च सो न लभते सुखं ॥ ३ ॥

५६ धम्मपद (सुखकामानि भूतानि यो दण्डेन विहिनस्ति । श्रात्मनः सुखमन्विप्यन् प्रेत्य स न लभते सुखम् ॥ ३॥) १३२--मुखकामानि भूतानि यो दण्डेन न हिंसति । अतनो सुखमेसानो पेच्च सो लभते सुखं ॥ ४ ॥ (सुखकामानि भूतानि यो दण्डेन न हिनस्ति। आत्मनः सुखमन्विप्यन् नेत्त्य स लभते सुखम् ॥ ४॥) मुख चाहने वाले प्राणियों को, अपने मुख की चाह से जो दरर से मारता है, वह मर कर मुख नहीं पाता। सुख चाहने वाले प्राणियों को, अपने मुख की चाह से, जो दण्ड से नहीं मारता, वह मर कर सुख को प्राप्त होता है । जनवन कुण्डधान (धेर) १३३-मा वोच फरुस कश्चि वुत्ता पटिवदेव्यु तं । दुक्खा हि सारग्भकथा पटिदण्डा फुसेय्यु त ॥ ५ ॥ (मा चोच परुप किंचिद् उका प्रतिवदयुस्त्वाम् । दुखा हि संरम्भकथा प्रतिदण्डा स्पृशेयुस्त्वाम् ॥शा) १३४-सचे नेरसि जवान कसो उपहतो यथा । एस पत्तोसि निब्याण सारम्भो ते न विज्जति ॥ ६ ॥ (स चेत् नेरयसि आत्मानं फांस्यमुपहतं यथा। एप मातोऽसि निर्याणं संरम्भस्ते न पियते ॥६1) कटार सघन न योली, बोलने पर (दूसरे भी वैसे ही) मुन् बोलेंगे, दुर्वचन दुःखदायक (होने हैं), (बोलने से) यदले में मुम्ह

दण्डवग्गो
दण्ड मिलेगा। टूटा कांसा जैसे निःशब्द रहता है, (वैसे) यदि तुम
अपने को (निःशब्द रक्खो), तो तुमने निर्वाण को पालिया, तुम्हारे
लिये कलह (= हिंसा) नहीं रही।
यावस्ती ( पूाराम)
विसाखा आदि ( उपासिकाय)
१३५-यथा दण्डेन गोपालो गावो पाचेति गोचरं ।
एवं जरा च मच्चू च आयुं पाचेन्ति पाणिनं ॥ ७ ॥
(यथा दंडेन गोपालो गाः प्राजयति गोचरम् ।
एवं जरा च मृत्युश्चायुः प्राजयतः प्राणिनाम् ॥ ७॥)
जैसे ग्वाला लाठी से गायों को चरागाह में ले जाता है, वैसे ही
चुदापा
और
मृत्यु प्राणियों की
पायु
को ले जाते हैं।
।
राजगृह ( वेणुवन)
अजगर (प्रेत)
१३६-अथ पापानि कम्मानि करं बालो न बुज्झति ।
सेहि कम्मेहि दुम्मेधो अग्गिदढो 'व तप्पति ॥ ८ ॥
(अथ पानानि कर्माणि कुर्वन् वालो न बुध्यते ।
स्वैः कर्मभिः दुर्मेधा अग्निदग्ध इव तप्यते ॥ ८॥)
पाप कर्म करते वक्त मूढ़ (पुरुष उसे) नहीं बूझता, पीले दुर्बुद्धि
थपने ही कर्मों के कारण आग से जले की भाँति अनुताप करता
राजगृह (वेणुवन)
महामोग्गलान (थेर)
१३७-यो दण्डेन अदण्डेसु अप्पदुठेसु दुस्सति ।
दसन्नमञ्जतरं ठानं खिप्पमेव निगच्छति ॥ ९ ॥

धम्मपद . (यो दण्डेनादण्डेयप्रदुष्टेयु दुष्यति । दसानामन्यतमं स्थानं क्षिप्रमेव निगच्छति ॥ ६॥) १३८-वेदनं फरुसं जानि सरीरस्स च भेदनं । गरुकं वापि आबाधं चित्तखेपं व पापुणे ॥ १० ॥ (वेदनां परुषां ज्यानि शरीरस्य च भेदनम् । गुरुकं चाऽप्यावाधं चित्तक्षेपं वा प्राप्नुयात् ॥१०॥) १३९-राजतो वा उपस्सगं अन्भक्खानं व दारुणं । परिक्खयं व त्रातीनं भोगानं व पभङ्गणं ॥ ११ ॥ राजतो वोपसर्गमभ्याख्यानं या दारुणम् । परिक्षयं या ज्ञातीनां भोगानां वा प्रभंजनम् ॥ ११ ॥) १४०-अथवस्स अगारानि अग्गी डहति पावको। कायस्स भेदा दुप्पो निरयं सोपपज्जति ॥ १२ ॥ (अथवाऽस्यागाराण्यग्निदहति पावकः। कायस्य भेदाद् दुष्प्रशो निरयं स उपपद्यते ॥ १२॥) जो दगड-रहितों को दरड से (पादित करता है), निदीपा को दोष लगाता है, वह शीघ्र ही इन बातों में से एक को प्राक्ष होता है। कदवी चंदना, हानि, अंग का भंग होना, भारी बीमारी, (या)चित्त- विष (- पागल) को प्राप्त होता है। या राजा से दगड को (प्राप्त होता है), दारण निन्दा, जाति बन्धुभी का विनाश, भोril का आय: अपया उसके घर को भग्नि = पावक जलाता है; काया छोड़ने पर यह दुधुदि नर्क में उत्पन्न होता है। - दण्डवग्गो ५१ जेतवन बहुमत्तिक ( भिक्षु) १४१-- नग्गचरिया न जटा न पका नानासका थण्डिलसायिका वा। रजोवजल्लं उक्कुटिकप्पधानं सोधेन्ति मच्चं अवितिण्णकङ्ख ॥ १३ ॥ (न नग्नचर्या न जटा न पंकं नाऽनशनं स्थण्डिलशायिका रजोजलियं उत्कुटिकप्रधानं शोधयन्ति मत्त्यं अवितीर्णाकांक्षम् ॥ १३ ॥ जिस पुल्प की. श्राकांक्षायें समाप्त नहीं हो गईं, उस मनुष्य की शुद्धि, न नंगे रहने से न जटा से, न पंक ( लपेटने) से, न फाका (= उपवास) करने से, न कड़ी भूमि पर सोने से, न धूल लपेटने से, और न उकई बैठने से होती है। वा। जतवन सन्तति ( महामात्य) १४२-अलङ्कतो चेपि समं चरेय्य सन्तो दन्तो नियतो ब्रह्मचारी । सव्वेसु भूतेसु निधाय दण्डं सो ब्राह्मणो सो समणो स भिक्खू ॥ १४ ॥ (अलंकृतश्चेदपि शमं चरेत् शान्तो दान्तो नियतो ब्रह्मचारी। सर्वेषु भूतेषु निधाय स ब्राह्मणः स श्रमणः स भिक्षुः ॥१४॥)

६० धम्मपद श्रलंकृत रहते भी यदि वह शान्त, दान्त, नियम तत्पर, ब्रह्मचारी, तथा सारे प्राणियों के प्रति दडत्यागी है, तो वही ब्राह्मण है, वही श्रमण (= संन्यासी) वही भिक्षु है । बेतवन पिलेतिक (धेर) १४३-हिरीनिसेधो पुरिसो कोचि लोकस्मि विज्जति । यो निन्दं अप्पबोधति अस्सो भद्दो कसामिव ॥ १५ ॥ (ह्रीनिषेध पुरुपः कश्चित् लोके विद्यते । यो निन्दा न प्रबुध्यति अश्वो भद्रः कशामिव ॥ १५ ॥) लोक में कोई पुरुष होते हैं, जो (अपने ही) लजा करके निषिद्र (कर्म) को नहीं करते, जैसे उत्तम घोडा कोड़े को नहीं सह सकना, चैसे ही वह निन्दा को नहीं मह सकते। १४४-अस्सो यथा भद्रो कसानिविट्ठा आतापिनो संगिनी भवाथ। सद्धाय सीलेन च वीरियेन च समाधिना धम्मविनिच्छयेन च। सम्पन्न विज्ञाचरणा पतिम्सता पहम्सथा दुक्वमिदं अनप्पकं ॥ १६ ॥ (अश्यो यथा भद्रः कशानिविष्ट प्रातापिन. संवेगिनो भवत । अदया शोलेन च घीर्येण च समाधिना धर्मचिनिधयेन च ।

दण्डवग्गो सम्पन्न विद्याचरणाः प्रतिस्मृताः पहास्यथ दुःखमिदं अनल्पकम् ॥१६॥) कोड़े पड़े उत्तम घोड़े की भाँति, उद्योगी, ग्लानियुक्त, (वेगवान् ) हो; श्रद्धा, आचार, वीर्य, समाधि, और धर्म निश्चय से युक्त (बन ) विद्या और आचरण से समन्वित हो, स्मृतिवान हो इस महान् दुःख (राशि) को पार कर सकते हो। तेजनं । १४५-उदकं हि नयन्ति नेत्तिका उसुकारा नमयन्ति दारूं नमयन्ति तच्छका अत्तानं दमयन्ति सुब्बता ॥ १७॥ (उदकं हि नयन्ति नेतृकाः, इपुकारा नमयन्ति तेजनम् । दारुं नमयन्ति तक्षका आत्मानं दमयन्ति सुव्रताः ॥१७॥) नहरवाले पानी ले जाते हैं, वाण बनानेवाले वाण को ठीक करते हैं, बदई लकड़ी को ठीक करते हैं, सुन्दर व्रतवाले अपने को दमन करते हैं ।

. ११-जरावग्गो जेववन पिसाखाकी सगीनी १४६-कोनु हासो किमानन्दो निच्च पज्जलिते सति । अन्धकारेन श्रोनद्धा पदोप न गवेम्मथ ॥ १ ॥ (को नु हास क आनन्दो नित्त्य प्रज्वलिते सति । अन्धमारेणावनद्धा प्रदीप न गवेषयथ ।। १ ॥) जय (सभा)निय जल रहा है तो हसा कैसा, आनन्द कैसा । अपकार से घिरे तुम प्रदीप श खोज क्यों नहीं करते? राजगृह (बेगुवन) मिरिमा १४७-परस चितफ्त विम्ब अरुकाय समुस्सित । आतुर बहुसरण यास नस्थि धुव ठिति ॥ २ ॥ (पश्य चित्र स्त विम्म यरु काय समुन्छितम् । यातुर बहुसकल्प यस्य नास्ति धुप स्थिति ॥ २॥) इस चिमित छाया को देश में यों से पूर्ण, फूला, प्याकुल तथा अनक सकल्पा म युक्त है--जिसकी स्थिति अनित्य है। देववन परी (40) १२८-परिणिमिद रूप रोगनिङ पभार । भिजनो पूतिसन्देहो मरणन्त हि नारित ॥ ३ ।।

जरावग्गो ६३ परिजीर्णमिदं रूपं रोगनीडं प्रभंगुरम । भिद्यते पूतिसन्देहो मरणान्तं हि जीवितम् ॥३॥) यह रूप जीर्ण-शीर्ण होने वाला है, रोगों का घर है, अत्यन्त भंगुर है। यह गंदा शरीर छूट जाता है । जीना का अन्त मरण में होता है। । जेतवन अधिमान (मिक्तु) १४९-यानि'मानि अपत्यानि अलावूनेव सारदे । कापोतकानि अट्ठीनि तानि विस्वान का रतिः॥ ४ ॥ (यानिमान्यपथ्यान्यलावूनीव शरदि। कापोतकान्यस्थीनि तानि दृष्ट्वा का रतिः॥४॥) शरद कालकी अपथ्य लौकी की भांति (फेंक दी गई) या कबूतर की सी (सफेद हो गई) हड्डियों को देखकर किसको इस (शरीर में) प्रेम होगा? जेतवन. रूपनन्दा (थेरी) १५०-अट्ठीनं नगरं कतं मंसलोहितलेपनं । यस्थ जरा च मच्चू च मानो मक्खो च ओहितो ॥ ५ ॥ (अस्थनां नगरं कृतं मंसलोहितलेपनम् । यत्र जरा च मृत्युश्च मानो म्रक्षश्चावहितः॥५॥) हट्टियों का ढाचा (नगर) बना है है, जिस पर मांस और लट्ट का लेप चढ़ा है, जिसमें जरा, मृत्यु, अभिमान और द्वेप छिपे हैं। जेतवन मल्लिका देवी १५१-जीरन्ति वे राजरथा सुचित्ता अथो सरीरम्प जरं उपेति।

६४ धम्मपद सतं च धम्मो न बरं उपति सन्तो ह वे सब्मि पवेदयन्ति ॥ ६ ॥ (जीयन्ति वै राजरथाः सुविधा अथ शरीरमपि जरामुपैति । सर्वच धर्मो न जरामुपैति सन्तो हये सद्भयः प्रवेदयन्ति ॥६॥) राजा के सुचित्रित (रथ) पुराने हो जाते है, तथा यह शरीर भी पुराना हो जाता है। किन्तु सन्तो का धर्म पुराना नहीं होता । सन्त लोग सन्तों से ऐसा ही कहते है। जेतवन (लाल ) उदायी (थेर) १५२-अप्पस्सुतायं पुरिसो बलिवदो' च जीरति । मंसानि तस्स बद्दन्ति पन्ना तम्स न वदति ।।७।। (अल्पश्रुतोऽयं पुरुषो बलीव इव जीयति । मांसानि तस्य पद्धन्ते प्रधा तस्य न पड़ते ॥७॥) यह अल्पश्रुत मनुष्य बैल की तरह बढ़ता है । उसके मांस तो बदते है किन्तु उमरी प्रज्ञा नहीं बहती। १५३-अनेकजातिसंसारं सन्धाविस्सं अनिलिस। गहकारकं गवेसन्तो दुक्खा जाति पुनप्पुर्न ॥ ८ ॥ (अनेकजातिसंसारं समाधाधिपं अनिधिशमानः । गृहकारर्फ गवेपयन, दुखा जातिः पुनः पुनः ॥ ८॥ १५४-गहकारक 1 दिट्टोसि पुन गेहं न काहसि । सध्या ते फामुसा भगा गहक्टं विसहितं । विसहारगतं चिच तहानं बयमन्मगा। .

जरावग्गो
६५
(गृहकारक, दृष्टोऽसि पुनर्गहं न करिष्यसि ।
सर्वास्ते पाश्विका भग्ना गृहकूटं विसंस्कृतम् ।
विसंस्कारगतं चित्तं तृष्णानां क्षयमध्यगात् ॥ ६॥)
अनेक जन्मों तक मैं संसार में लगातार भटकता रहा-गृह निर्माण
करने वाले की खोज में । वार वार का जन्म दुखमय हुया ।
हे गृह के निर्माण करने वाले ! मैंने तुन्हें देख लिया, तुम फिर घर
नहीं बना सकते। तुम्हारी कड़ियाँ सब टूट गईं, गृह का शिखर गिर
गया। चित्त संस्कार रहित हो गया। तृष्णाओं का क्षय हो गया
वाराणसी (ऋषिपतन)
महाधनी सेठका पुत्र
१५५-अचरित्त्वा ब्रह्मचरियं अलद्धा योव्यने धनं ।
जिण्णकोंचाव झायन्ति खीणमच्छे'व पल्लले ॥ १० ॥
(अचरित्वा ब्रह्मचर्य अलब्ध्वा यौवने धनम् ।
जीर्णक्रौंचा इव ध्यायन्ते क्षीणमत्स्य इव पल्वले ॥१०॥)
ब्रह्मचर्य का विना आचरण किये, यौवन काल में विना धन उपार्जन
किये, मनुष्य-जिसमें मछलियाँ खतम हो गई हैं ऐसे जलाशय में
बैठे बूढ़े क्रौंच पक्षी की तरह-(वृद्धावस्था में )चिंता को प्राप्त होता है।
१५६-अचरित्या ब्रह्मचरियं अलद्धा योग्यणे धनं ।
सेन्ति चापातिखीणा'च पुराणानि अनुत्युनं ॥ ११ ॥

६६
धम्मपद
(अचरित्वा ब्रह्मचर्य अल-या योवने धनम् ।
शेरते चापोऽतिक्षीण इव पुराणान्यनुतन्वन्तः ॥ ११ ॥)
ब्रह्मचर्य का विना आचरण किये, या यौवन काल में बिना धन
उपार्जन किये, मनुष्य (वृद्धावस्था में)- पुराने धनुप की तरह अपनी
अतीत बातों की ही चर्चा करता रहता है।

१२--अत्तवग्गो
दंसुमारगिरि (भेसकलावन )
बोधि रानकुमार
१५७–अत्तानं चे पियं जञा रक्खेय्य तं सुरक्खितं ।
तिण्णमञ्जतरं यामं पटिजग्गेय्य पण्डितो ॥ १ ॥
(आत्मानं चेत् प्रियं जानीयाद् रक्षेत्तं सुरक्षितम् ।
त्रयाणामन्यतमं यामं प्रतिजागृयात् पण्डितः॥ १ ॥)
अपने को यदि प्रिय समझे तो अपने को सुरक्षित (संयत)
रक्खे । पंडित तीनों में से किसी एक पहर में अवश्य जागरण करे।
जेतवन
( शाक्यपुत्र ) उपनन्द (थेर)
१५८-अत्तानं एव पठमं पटिरूपे निवेसये ।
अथञमनुसासेय्य न किलिस्सेय्य पण्डितो ॥२॥
(आत्मानमेव प्रथमं प्रतिरूपे निवेशयेत् ।
अथान्यमनुशिष्यात् न क्लिश्येत् पण्डितः ॥ २॥)
पहिले अपने स्वयं को ही उचित मार्ग में लगावे, बाद में दूसरे को
उपदेश दे । इस तरह पंडित क्लेश को न प्राप्त हो ।
.
जेतवन
(अभ्यास) तिस्स (थेर)
१५९-अत्तानञ्चे तथा कयिरा यथञ्जमनुसासति ।
सुदन्तो वत दम्मेथ अत्ता हि किर दुद्दमो ॥ ३ ॥

६८ धम्मपद (आत्मान चेत् तथा कुर्याद् ययाऽन्यमनुशास्ति । सुदान्तो यत दमयेद्, आत्मा हि किल दुर्दम ॥ ३ ॥) अपने को वैसा बनावे, जैसा दूसरे को अनुशासन करना है। (पहिले) अपने को भी प्रकार दमन करे, वस्तुत अपने को दमन करना (ही) कठिन है। जेतवन बुमार करसपकी मावा (धेरी) १६०-अत्ता हि अत्तनो नाथो को हिनायो पगे सिया । अचनावव सुदन्तेन नाथ लमति दुल्लभ || ४ || (आत्मा हि आत्मनो नाथ को हि नाथ पर स्यात् । आत्मनेघ सुदान्तेन नाथ लभते दुर्रमम् ॥ ४ ॥) मनुष्य अपना स्वामी पाप है, भला कोई दूसरा उसका स्वामी क्या होगा । अपने हा को अछी तरह दमन कर लने से यह दुईभ स्वामित्र कायाम करता महाकाल ( उपासक) १६१-अनाव पत्त पाप अचन अतसम्भव । अभिमन्यति दुम्मेध वजिर 'यस्ममय मणि ॥ ५ ॥ (मात्मनैव कृतं पाप आत्मज आत्मसम्मयम् । अभिमानाति दुर्मेधस पत्रमियाममय ममि 141) अपना रिया पाप भएन सहार अपने हा उस दुपदि मनुष्य कोपारिय माता। पापर स पर हारा पाभर पास मागको काला।

अत्तवग्गो जैतवन देवदत्त १६२-यम्सचन्तदुसोल्यं मालवा सालमिवोततं । करोति सो तथत्तानं यथा'नं इच्छति दिसो ॥ ६ ॥ ( यस्याऽत्यन्तदौःशील्यं मालुवा शालमिवाततम् । करोति स तथात्मानं यथैनमिच्छति द्विटः ॥ ६ ॥) मालुवा लता से वेष्टित शाल (वृक्ष) की भाँति जिसका दुराचार फैला हुआ है; वह अपने को वैसा ही कर लेता है, जैसा कि उसके शत्रु चाहते हैं। राजगृह ( वेणुवन) संव में फूट के समय १६३-सुकरानि असाधूनि अत्तनो अहितानि च । यं वे हितञ्च साधुञ्च तं वे परमदुक्करं ॥ ७ ॥ (सुकराण्यसाधुन्यात्मनोऽहितानि यद् वै हितं च साधु च तद् वै परमटुष्करम् ॥ ७ ॥) बुरी बातों का करना बड़ा आसान है जिनसे अपना ही अहित होता है। उसे करना बढ़ा दुष्कर है जो अच्छा और हितकर है। जेतवन काल (थेर) १६४-यो सासनं अरहतं अरियानं धम्मजीविनं । पटिक्कोसति दुग्मेधो दिट्टिं निस्साय पापिकं । फलानि कट्ठकस्सेव अत्तघनाय फल्लति ।। ८ ॥ (यः शासनमहतां आर्याणां धर्मजीविनाम् । प्रतिक्रुश्यति दुर्मेधा दृष्टिं नि:श्रित्य पापिकाम् । फलानि काटकस्येवात्महत्त्यायें फल्यति ॥5॥)

धम्मपद जो धर्मात्मा श्रेष्ठ अहंतों के धर्म की-अपनी पाप मर्या मिथ्या धारणा के कारण-निन्दा करता है वह अपनी ही बर्बादी करता है, जैसे बाँस का फूल बाँस को ही नष्ट कर देता है। जेतवन (चूल) काल ( उपासक) १६५-अत्तनाव कत पाप अत्तना सकिलिस्सति । अत्तना अकत पाप अत्तना' व विसुञ्झति ।। सुद्धि असुद्धि पञ्चत नाचमन विसोधये ॥ ९ ॥ (आत्मनैव कृत पापं श्रात्मना सक्लिश्यति । आत्मनाऽकृत पापं धात्मनेव विशुध्यति । शुद्धयशुद्धी प्रत्यात्म नाऽन्योऽन्यं विशोधयेत् ॥80) अपना किया पाप अपन को मेला करता है। अपना न किया पाप भपने को शुद्ध करता है। शुद्धि और अशुद्धि अपने ही में होती है। कोई किसी दूसरे को शुद नहीं कर सकता। जेवन भदाय (थेर) १६६-अपदस्थ परस्येन पहुनाऽपि न हापये । असदस्यमभिन्नाय सदस्यपसुतो सिया ॥ १० ॥ (आत्मनोऽयं परार्थन पानाऽपि न हापयेत् । मनोऽर्थमभिशय सदमसित स्यात् ॥ १०॥) पराप के पहुप्त हित क लिपे भा अपने हित की हानि न कर। अपने भकी या मोसमझ मदर्श मापन में लग जाय ।

१३--लोकवग्गो जेतवन कोई अस्पवयस्क मिनु १६७-हीनं धम्मं न सेवेच्य, पमादेन न संबसे । मिच्छादिटिंट न सेवेय्य न सिया लोक-बढ़नो ।। १ ॥ (हीनं धर्म न सेवेत, प्रमादेन न संवसेत् । मिथ्याष्टिं न सेवेत, न स्यात् लोकवाईनः॥१॥) नाच धर्म का सेवन न करे, प्रमाद से न रहे, मिथ्या धारणा में न पड़े, आवागमन का चक्र न बढ़ाव। . कपिलवलु (न्यत्रोबाराम) सुद्धाटन १६८-उत्तिट्ट नष्पमन्नंव्य बन्न मुचरितं चरे। घन्मचारी सुन्वं सति अस्मिं लोक परहि च ॥ २ ॥ (उत्तिप्टेन् न प्रमायेद धर्म मुचरितं चरन् । धर्मचारी मुखं शेते मिमं टोके परत्र च ॥२॥) मं, प्रमाद न कर, मट्टाचार के धर्म का आचरणा नं। धार्मिक पुण्य इस लंक और परलोचदानों जगह मुन्न पूर्वक रहना है। ! १६९-यन चरे सुचरितं न हैं दुचरितं चं! बनची मुन्न मेति अनि लोक पन्दि च ॥

(हंसा आदित्यपर्थ यन्ति, आकाशे यन्ति मृद्धिया। नीयन्ते धीरा लोकात् जिवा मार सवाहिनीकम NEU) हंस सूर्य-पथ (आकाश ) में उड़ते हैं, ऋदि से योगी भी प्रकाश में गमन करते हैं। अपनी सना सहित मार को जीत पंडित लोग संसार से जाते है। बेतवन चिचा ( माणधिका) १७६-एकं घमं अतीतस्स मुसाबादिस्स जन्तुनो। वितिष्णपरलोकस्स नत्य पापं अकारियं ॥१०॥ (पकं धर्ममतीतस्य मृपाचादिनो जन्तोः । विस्तीर्णपरलोकस्य नास्ति पापमकार्यम् ॥१०॥) एक धर्म (सल्य) का अतिक्रमण कर जो मूल बोलता है उस परलोक के चितन से रहित पुरुष के लिये कोई पाप ऐसा नहीं रह जाता जो बहन कर सके। Trainik 11 (मकवान) १७७-२ वे कदरिया देवलोकं वन्ति वाला हवे न पसंसन्ति दान । धोरी च दानं अनुमोदमानो तेनेव सो होति सुसी पर (न ये फदर्या देवतर्फ मन पाता वैन धार दानं अनुमोदमान स भवति म

लोकवग्गो
७५
कंजूस देवलोक नहीं जाते, मूढ़ दानकी प्रशंसा नहीं करते; धीर
हानका अनुमोदन कर, उसी (कर्म) से पर (लोक ) में सुखी होता है।
जेतवन
अनाथपिण्डिकके पुत्रका मरय
१७८-पथव्या एकरञ्जन सम्गस्स गमनेन वा ।
सव्वलोकाधिपञ्चेन सोतापत्तिफलं वरं ।। १२ ।।
(पृथिव्या एकराज्यात् स्वर्गस्य गमनाद् वा ।
सर्वलोकाऽऽधिपत्याद् वा स्रोतापत्तिफलं वरम् ॥१२॥ )
पृथ्वी के एक राज्य से, अथवा स्वर्ग गमन करने से, अथवा सारे लोक
का स्वामी हो जाने से भी श्रेष्ट श्रोतापत्ति फल की प्राप्ति है।

१४--बुद्धवग्गो उरुवेला (बोधिमंड) मागन्दिय (नाक्षण) १७९-यस्य जितं नावजीयति जितमस्स नो याति कोचि लोके । तं बुद्धमनन्तगोचरं अपदं केन पदेन नेस्सथ ॥ १ ॥ (यस्य जितं नावजीयते जितमस्य न याति कश्चिम्लोके । तं बुद्धमनन्तगोचर श्रपदं फेन पदेन नेप्यथ १ ॥१॥) जिसका जीता यजीता नहीं किया जा सकता, जिसकी विजय को मसार का कोई भी बराबरी नहीं कर सकता, उम अनन्त ज्ञानी वीततृष्ण. को किस तरह यहका सकते हो? १८०-यस्स जालिनी विसत्तिका तण्डा नत्थि कुहिचि नेतवे । तं बुद्धमनन्तगोचरं अपदं केन पदेन नेम्सथ ॥ २ ॥ (यस्य जालिनी विपामिफा तृष्णा नास्ति कुप्रचित् नेतुम् । तं बुद्धयनन्तगोचरं अपदं फेन पदन नेप्यथा ) जिम बन्धन में गलने चारी शिरूपी नष्णा कहीं भी नही जा सम्ता उस भनन्न शानी यांतप्य को रिम नरद याका समतो? पायल बुद्धवग्गो संकास्य नगर देख, मनुष्य १८१-ये माणपस्ता धीरा नेवखामृपसमे रता । देवापि तेसं पियन्ति सम्बुद्धानं सतीमतं ॥ ३ ॥ ( ये ध्यानप्रसिता धीरा नफम्योपशमे रताः । देवा अपि तेषां स्पृह्यन्ति संवृद्धानां स्मृतिमताम् ॥३॥) जो धीर ध्यान में लगे, परम शान्त निर्माण में रत है उन स्मृतिमान बुद्धों की स्पृहा देवता लोग भी करते हैं। पाराणसी परकपत्त (नागराज) १८२-किच्छो मनुस्सपटिलाभो किच्छं मच्चानं जीवितं । किच्छं सद्धम्मसवणं किच्छो बुद्धानं उप्पादो ॥ ४ ॥ (कृच्छो मनुष्यप्रतिलाभः कृच्छ्रौं मानां जीवितम् । कृच्छ् सद्धर्मश्रवणं कृच्छो बुद्धानां उत्पादः ॥४॥) मनुष्य योनि में जन्म लेना कठिन है, (जन्म लेकर भी ) जीवित रहना कठिन है, (जीवित रहकर भी) सद्धर्म का श्रवण करना कठिन है, और बुद्धों का जन्म ग्रहण करना (और भी) कठिन है । जेतवन अानन्द ( थेर) का प्रश्न १८३-सव्वपापस्स अकरणं कुसलस्स उपसम्पदा । स-चित्तपरियोदपनं, एतं बुद्धान 'सासनं ॥ ५ ॥ (सर्वपापस्याकरणं कुशलस्योपसम्पदा। स्वचित्तपर्यवदापनं एतद् बुद्धानां शासनम् ॥ ५ ॥1) ७८ धम्मपद सारे पापों का न करना, पुण्यों का संचय करना, अपने चित्त को परिशुद्ध करना, यह है बुद्धा की शिक्षा । परूपघाती , जेतवन १८४-खन्ती परमं तपो तितिक्खा , निव्वाणं परमं चदन्ति बुद्धा । नहि पव्वजितो समणो होति परं विहेटयन्तो ॥ ६ ॥ (क्षान्तिः परमं तपः तितिक्षा निर्वाणं परमं वदन्ति बुद्धाः। नहि प्रवजितः परोपघाती श्रमणो भवति परं विहेठयन् ॥६॥) सहन शीलता और क्षमा शीलता परम तप है, बुद्ध लोग निर्वाण को परम पद बताते है। दूसरो की हिसा करने वाला और सताने वाला प्रवजित सच्चा साधु नहीं होता। १८५-अनुपवादो अनुपघातो पातिमोक्खे च संवरो । मत्तञ्जता च भत्तस्मिं पन्तञ्च सयनासनं । अधिचित्ते च आयोगो एतं बुद्धान सासनं ॥ ७ ॥ (अनुपवादोऽनुपघातः प्रातिमोक्षे च संवरः। माघाइता च भक्के प्रान्तं च शयनासनम् । अधिचित्ते चायोग एतद् युद्धानां शासनम् ॥७॥) निन्दा न करना, घात न करना, प्रातिमोक्ष के नियमों का पालन करना, भोजन में परिमाण को जानना, एकान्तवाम, चित्त की शुद्धि में योग- यही है बुद्धां की शिक्षा ।

अस्वगो
तपन
( आम मिथु)
१८६-न कहापणवत्सेन तित्ति कामेलु विनति ।
अप्पस्सादा दुखा कामा इति विश्वाय पण्डितो ॥ ८ ॥
(न कार्यापणवण तृप्तिः कामेपु विद्यते ।
अल्पास्वादा दुःखाकामा इति विज्ञाय पण्डितः 10)
१८७-अपि दिब्बेसु कामेसु रति सो नाधिगच्छति ।
तण्हक्खयरतो होति सम्मासम्बुद्धसावको ॥ ९ ॥
(अपि दिव्यपु कामेयु रतिं स नाऽधिगच्छति ।
तृष्णाक्षयरतो भवति सम्यकसंबुद्धश्रावकः ॥ ६॥)
यदि रुपयों (= कदापण) की वर्षा हो, तो भी (मनुष्य की)
कामों (= भोगों) से तृप्ति नहीं हो सकती । (सभी). काम (= भोग)
अल्प स्वाद, (और) दुःखद हैं, ऐसा जानकर पंडित देवताओंके भोगोंमें
भी रति नहीं करता और सभ्यसंबुन्द (= बुद्ध.) का श्रावक (= अनु-
यायी) तृष्णाको नाश करनेमें लगता है।
-
जेतवन
अगिदत्त (प्राणाय)
१८८-बहु चे सरणं यन्ति पब्बतानि बनानि च ।
आरामरुक्खचेत्यानि मनुस्सा भयतज्जिता ॥ १० ॥
(बहु वै शरणं यान्ति पर्वतान् वनानि च ।
आरामवृक्षचैत्त्यानि मनुष्या भयतर्जिताः ॥ १०॥)
१८९-नेतं खो सरणं खेमं नेतं सरणमुत्तमं ।
नेतं सरणमागग्म सव्वदुक्खा पमुच्चति ॥ ११ ॥

८० धम्मपद ( नैतत् खलु शरणं क्षेमं नैतत् शरणमुत्तमम् । नैतत् शरणमागम्य सर्वदुःखात्प्रमुच्यते ॥११॥) मनुष्य भय के मारे पर्वत, वन, आराम (= उद्यान), वृक्ष, चैत्य चौरा) आदिको देवता मान उनकी दारण में जाते है, किन्तु ये शरण मंगलदायक नही, ये शरण उत्तम नहीं; (क्योंकि) इन शरणों में जाकर सब दुःखो से छुटकारा नहीं मिलता। जेतवन अग्गिदत्त (बाम) १९०-यो च बुद्धञ्च धम्मञ्च सङ्घञ्च सरणं गतो। चत्तारि अरियसञ्चानि सम्मप्पाय पस्सति ॥ १२ ॥ (यश्च बुद्धं च धर्म च संधं च शरणं गतः। चत्वार्यसत्त्यानि सम्यक् प्रज्ञया पश्यति ।। १२॥) १९१-दुक्खं दुक्खसमुप्पादं दुक्खस्स च अतिकम । अरियञ्च'ठङ्गिकं मां दुक्खूपसमगामिनं ॥ १३ ॥ (दुःखं दुःखसमुत्पादं दुःखस्य चातिक्रमम् । आर्याष्टांगिक मार्ग दुःखोपशमगामिनम् ॥ १३ ॥) १९२-एतं खो सरणं खेमं एतं सरणमुत्तमं । एतं सरणमागम्म सव्वदुक्खा पमुच्चति ॥ १४ ॥ (एतत् खलु शरणं क्षेमं एतत् शरणमुत्तमम् । पतत् शरणमागम्य सर्वदुःखात् प्रमुच्यते ॥१॥) जो वुद्ध, धर्म और संघ की शरण गया, जिसने चार आर्य सत्यों को -दुस, दुखकी उत्पत्ति, दु.ख से मुक्ति, और मुक्तिगामी आर्य प्राप्टगिक सुस्वग्गो द? मार्ग-सम्यक प्रज्ञा से देख लिया है, यही रशादायक शरण है, उत्तम गरण है । इसी शरण को प्राप्त कर वह सभी दुग्गों से मुक्त हो जाता है। । चतवन आनन्द (घर)का प्रश्न १९३-दुल्लभो पुरिसाजन्नो न सो सम्वत्थ जायति । यत्य सो जायती धीरो तं कुलं सुखमेधति ॥ १५ ॥ (दुर्लभः पुरुषाजानेयो न स सर्वत्र जायते । यत्र स जायते धीरः तत् कुलं सुखमेधते ॥ १५ ॥) उत्तम पुरुष दुर्लभ है, वह सर्वत्र उत्पन्न नहीं होता, वह धीर (पुरुष) जहाँ उत्पन्न होता है, उस कुलमें मुखकी वृद्धि होती है। जेतवन बहुतसे मिच १९४-सुखो बुद्धानं उप्पादो सुखा सद्धग्मदेसना । सुखा संघस्स सामगी समम्गानं तपो मुखो ॥ १६ ॥ (सुखो बुद्धानां उत्पादः सुखा सद्धर्म-देशना । सुखा संघस्य सामग्री समग्राणां तपः सुखम् ॥ १६॥) सुखदायक है बुद्धोंका जन्म, सुखदायक है सच्चे धर्मका उपदेश, संघमें एकता सुखदायक है; और सुखदायक है एकतायुक्त हो तप करना। - चारिकाके समय कस्सप बुद्धका सुवर्ण चैत्य १९५-पूजारहे पूजयतो बुद्धे यदि व सावके । पपश्चसमतिकन्ते तिण्णासोकपरिहवे ॥ १७ ॥ (पूजानि पूजयतो बुद्धान् यदि वा श्रावकान् । प्रपंचसमतिकान्तान् तीर्णशोकपरिद्रवान् ॥ ॥ १७ ॥) ६ धम्मपद १९६-ते तादिसे पूजयतो निव्वुते अकुतोभये । न सका पुब्नं संखातुं इमेलम्पि केनचि ॥ १८ ॥ (तान् तादृशान् पूजयतो नितान् अकुतोमवान् । न शक्यं पुण्यं संख्या एवम्मात्रमपि केनचित् ॥ १८॥) पूजनीय बुद्धों, अथवा (उनके ) अनुगामियों-जो संसार को अति अमणकर गये हैं, जो शोक भयको पारकर गये है की पूजाके, (या) उन ऐसे मुफ और निर्भय (पुरुषों) की पूजाके, पुण्यका परिमाय "इतना है"-यह नहीं कहा जा सकता।

१५--सुखवग्गो राम्य नगर जातिफलक उपशमनार्थ १९७-सुसुखं वत! जीवाम वेरिनेसु अबेरिनो । वेरिनेसु मनुस्सेलु विहराम अवेरिनो ॥ १ ॥ (सुसुखं वत ! जीवामो वैरिवरिणः । वैरिपु मनुष्येपु चिहरामोऽवैरिणः ॥ १) १९८-सुसुखं वत! जीवाम आतुरेसु अनातुरा। आतुरेसु मनुस्सेसु विहराम अनातुरा ॥ २ ॥ ( सुसुखं वत! जीवाम आतुरेप्वनातुराः। आतुरेपु मनुष्येपु विहरामोऽनातुराः ॥२॥) १९९-सुसुखं वत ! जीवाम उस्सुकेसु अनुम्सुका । उस्सुकेसु मनुस्सेसु विहराम अनुस्सुका ॥३॥ (सुसुखं वत ! जीवाम उत्सुकेष्वनुत्सुकाः। उत्सुकेपु मनुप्येपु विहराम अनुत्सुकाः ॥३॥) वैरियोंके प्रति (भी) अवैरी हो, अहो ! हम (कैसा) सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं; वैरी मनुप्योंके वीच अवैरी होकर हम विहार करते हैं। भयभीत मनुष्यों में अभय हो, अहो ! हम सुखपूर्वक जीवन विता रहे हैं। भयभीत मनुष्यों के बीच निर्भय होकर हम विहार करते हैं। उत्सुकों (= आसक्तों) में उत्सुकता-रहित हो । !

धम्मपद मार पंचसाला (माक्षणग्राम, मगध ) २००-सुसुखं वत ! जीवाम येसं नो नत्थि किञ्चनं । र पीतिभक्खा भविस्साम देवा आभस्सरा यथा ॥ ४ ॥ (सुसुखं वत ! जीवामो येषां नो नास्ति किंवन । प्रीतिभक्ष्या भविष्यामो देवा आभास्वरा यथा ॥४॥) जिन हम (जोगी) के पास कुछ नहीं, ग्रहो! वह हम कितना मुखसे जीवन बिता रहे है। हम आभास्वर देवनाओ की भाँति प्रीतिभक्ष्य (प्रीति ही भोजन है जिनका) हैं। कोसलराज जेववन २०१-जयं वेरं पसवति दुक्खं सेति पराजितो। उपसन्तो सुखं सेति हित्त्वा जयपराजयं ॥ ५ ॥ (जयो वैरं प्रसूते दुःखं शेते पराजितः। उपशान्तः सुखं शेते हित्वा जयपराजयी ॥ ५॥) विजय धेरको उत्पन्न करती है, पराजित (पुरुष) दुःखकी (नीर) सोता (राग आदि दोप जिसके) शान्त (', यह पुरुष) जय और पराजयको छोर मुग्यकी (नींद) सोना है। कोई कुतरन्या बेपन २०२-नस्थि रागसमो अन्गि, नरिय दोससमो कलि । नधि सन्धसमा दुक्खा नत्स्यि सन्तिपरं सुखं ॥६॥ (नारित गगसमोऽग्निः, नास्ति पसमा लिा। नास्ति यसमा दुःपा, नास्ति शान्तिपर मुपम ।।६) मुखवग्गो राग ममान अलि नहीं, देप समान मल नहीं, (पाँच)स्कन्धों के (= समुदाय) समान दुःप नहीं, शान्तिसे बदकर मन नहीं । બાર ५.पामा २०३-जिघच्छा परमा रोगा, सहारा परमा दुखा । एवं अत्वा यथाभृतं निव्वाणं परमं मुखं ॥ ७ ॥ (जिघत्ला परमो रोगः, संस्कारः परमं दुःखम् । एतद् शात्त्वा यथाभूतं निर्वाणं परमं सुखम् ॥ ७॥) भूख सबसे बड़ा रोग है, संस्कार सबसे बड़े दुःख है, यह जान, यथार्थ निर्वाणको सबसे बड़ा सुख ( कहा जाता है)। जेतवन पसेनदि कोमलराज धनं। २०४-आरोग्यपरमा लामा सन्तुट्टी परमं विस्सासपरमा जाती निव्याणं परमं मुखं ॥ ८ ॥ ( आरोग्यं परमो लाभः, सन्तुष्टिः परमं धनम् । विश्वासः परमा शातिः, निर्वाणं परमं सुखम् ॥ ८॥) निरोग होना परम लाभ है, सन्तोप परम धन है, विश्वास सबसे बड़ा बन्धु है, निर्वाण परम (= सबसे बढ़ा) सुख है। +रूप, वेदना, संशा, संस्कार, विशान यह पाँच स्कन्ध है। वेदना, संशा, संस्कार विशानके अन्दर है । पृथिवी, जल, अग्नि, वायु ही रूप स्कंध है। जिसमें न भारीपन है, और जो न जगह घेरता है, वह विज्ञान स्कंध है। रूप (Matter) और विज्ञान (= find ) सहकि मेलसे सारा संसार दनाई।

द धम्मपद वैशाली तिस्स (येर) २०५-पविवेकर पीत्वा रसं उपसमस्स च । निहरो होति निप्पापो धम्मपीतिरसं पिवं ॥ ९ ॥ (प्रविवेकरसं पीत्वा रस उपशमस्य च । निर्दरो भवति निष्पापो धर्मप्रीतिरसं पिवत् ॥६॥) एकान्त (चिन्तन) के रस, तथा उपशम (= शान्ति) के रसको पोकर (पुरुष), निटर होता है, (और) धर्मका प्रेमरस पानकर निष्पाप होता है। बेलपग्राम ( वेणुग्राम, वैशोली के पास ) वक (देवराज) २०६-साधु दस्सनमरियानं सन्निवासो सदा सखो। अदस्सनेन बालानं निच्चमेव सुखी सिया ॥१०॥ (साधु दर्शनमार्याणां मनिवासः सदा सुखः। प्रदर्शनेन बालानां नित्यमेव सुखी स्यात् ॥१०॥) २०७-बालसंगतिचारी हि दीघमद्धानं सोचति । दुक्खो बालेहि संवासो अमितेनेव सदा । धीरो च सुखसंवासो जातीनं 'व समागमो ॥११॥ (बालसंगतिचारी हि दीर्घमध्वानं शोचति । दुःखो चालैः संयासोऽमिणैव सर्वदा । घोरम सुरासंबासो मातोमामिव समागमः ।।११।।) मार्यो (= सत्पुरुषों) का दर्शन मन्दर है, मतों के साथ निवास पदा मुसदायक होता है।मूहों के न दर्शन होने मे (मनुप्प)मदा मुखी पियवग्गो तस्मात् प्रियं न कुर्यात्, प्रियापायो हि पापकः। न्थाः तेषां न विद्यन्ते येषां नास्ति प्रियाप्रियम् ॥३॥) ये प्रिय न बनाये । मिय से वियोग बुरा होता है। उन्हें कोई जिन नो प्रिय हैन अप्रिय । । कोई मुटुम्यो पतो जायतें सोको पियतो जायते भयं । रतो विप्पमुत्तम नत्थि सोको कुलो मयं ॥४॥ ग्यतो जायते शोकः प्रियतो जायते भयम् । तो विषमुक्तस्य नास्ति शोकः कुतो भयम् ? ॥॥) नु) गो माता, प्रिय से भर इत्पर होता बन्धन 'जोनन है, उसे शो नहीं है, फिर भय -

१६-पियवग्गो
नेतवन
दीन मिनु
२०९-अयोगे युञमत्तानं योगस्मिञ्च अयोजयं ।
अस्थं हित्वा पियग्गाही पिहेत'चानुयोगिनं ॥ १ ॥
(अयोगे युअन् आत्मानं योगे चायोजयन् ।
अर्थ हित्वा प्रिय-ग्राही स्पृहयेदात्मानुयोगिनम् ॥ १॥)
बुरे कर्म में लगा हुआ, अच्छे कर्म में न लगने वाला, तथा परमार्थ
को छोड़ ससार के आकर्षण में लगनेवाला पुरुष उस पुरुष की स्पृहा करे
जो आत्मउन्नति में लग्न है।
२१०-मा पियेहि समागच्छि अप्पियेहि कुदाचनं ।
पियानं अदस्सनं दुक्खं अप्पियानञ्च दस्सनं ।। २ ।।
(मा प्रियैः समागच्छ, अप्रियः कदाचन ।
प्रियाणां प्रदर्शन दुःखं, अप्रियाणां च दर्शनम् ॥शा)
प्रियों का सग न करे, और न कभी थपियों का । नियों का न देखना
दुःखद है, और अग्रियों का देखना ।
१११--तस्मा पियं न कयिराथ पियापायो हि पापको ।
गन्था तेसं न विज्जन्ति येसं नस्थि पियाप्पियं ॥३॥

पियवग्गो ८९ (तस्मात् प्रियं न कुर्यात्, प्रियापायो हि पापकः। ग्रन्थाः तेषां न विद्यन्ते येषां नास्ति प्रियाप्रियम् ॥३॥) इसलिये प्रिय न बनाये । प्रिय से वियोग बुरा होता है। उन्हें कोई पन्धन नही मिन्नन नी प्रिय ईन अप्रिय । भजन २१२-पियतो जायतें सोको पियतो जायते भयं । पियतो विप्पमुत्तम्स नत्थि सोको कुतो भयं ॥४॥ (प्रियतो जायते शोकः प्रियतो जायते भयम्। प्रियतो विममुकम्य नास्ति शोकः कुतो भयम् ? ॥४॥) मिय (वस्तु) में शोक उत्पन होता है, प्रिय से भय इत्पर होता प्रिय (बन्धन)ो मुह, उसे शोक नहीं है, रि भय ६. धम्मपद (स्या जायते शोको रत्या जायते भयम् । रत्या विप्रमुतस्य नास्ति शोकः कुतो भयम् ।।६ ) रति (राग) से शोक उत्पन्न होता है, रतिसे भय उत्पन्न होता है। जेतवन अनित्यगन्ध कुमार २१५-कामतो जायते सोको कामतो जायते भयं । कामतो विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ॥ ७॥ ( कामतो जायते शोकः कामतो जायते भयम् । कामतो विप्रमुक्तस्य नास्ति शोकः कुतो भयम् १ ॥७॥) काम से शोक उत्तम होता है। जेतवन कोई बाम २१६-तण्हाय जायते सोको तण्हाय जायते भयं । तण्हाय विप्पमुत्तस्स नस्थि सोको कुतो भयं ॥८॥ (कृष्णाया जायते शोकः तृष्णाया जायवे भयम् । तृष्णाया विषमुक्तस्य नाऽस्ति शोकः कुतो भयम् १।।।) तृष्णा से शोक उत्पन्न होता है। राजगृह ( वेणुवन) पाच सौ बालक २१७-सीलदसनसम्पन्न धम्मळं सच्चवादिनं अत्तनो कम्म कुब्बानं ते जनो कुरुते पियं ॥९॥ (शील दर्शन सम्पन्नं धर्मिष्ठं सत्यवादिनम् । आत्मनः कर्म कुर्वाणं तं जनः कुरुते प्रियम् ॥ ६ ॥)

पियवग्गो हर जो गील (= पाचरण) और दर्शन (= विद्या) से सम्पन्न, धर्म में स्थित, सत्यवादी और अपने कामको करनेवाला, उस (पुरुष) को लोग न करते हैं। २१८-छन्दजातो अनखाते मनसा न फुटो सिया । कामेमु च अपटिबद्धचित्ती उद्धंसाता ति कुच्चति ॥१०॥ (छन्दजातोऽनाम्याते मनसा च स्फुरितः स्यात् । कामेषु चाऽप्रतिवद्धचित्त ऊर्चस्रोता इत्युच्यते ॥१०॥ ) गो मध्य (बस्तु = नियांदा) का अभिनापी , ( उसमें)निमका मन लगा, कामों (=iii) में सिमका निन रद नहीं, यह जर्म- सोन हाता

૬ ૨
धम्मपद
बहुत दिनों तक विदेश में रहने के बाद दूर से सकुशल घर लौटे
पुरुष को जाति-भाई, मित्र और हितैपी स्वागत करते है।
वैसे ही इस लोक से परलोक गये पुण्यात्मा पुरुष को उसके पुण्य
अपने सम्बन्धी के समान स्वागत करते है।

१७--कोधवग्गो
कपिलवस्तु (न्यसाधाराम)
रोहिणी
२२१-कोथं जहं विप्पलव्य मानं
सन्नोजनं सबमतिकाव्य ।
तं नाम-परिम असन्जमान -
अकियनं नानुपनन्ति दुक्खा ॥? ||
(क्रोधं जहाद विप्रजयात् मानं
संयोजन नमतिकमत।
नं
नाम-रूपयारमन्यमान
किचन नानपतन्ति पनि

६४ धम्मपद जो चढ़ते क्रोध को भटके रथ की तरह रोक लेता है उसी को में सथा सारथी कहता हूँ-दूसरे तो केवल लगाम पकड़ने वाले हैं। राजगृह ( वेणुवन) उत्तरा। आसिका) २२३-अकोधेन जिने को, असाधु साधुना जिने। जिने करियं दानेन सच्चेन अलिकवादिनं ॥३॥ (अमोधेन जयेत् क्रोध, असाधु साधुना जयेत् । जयेत् कवयं दानेन सत्येनाऽलीफयादिनम् ॥३॥) प्रमोध से क्रोध को जीते, असाधु को साधु (-भलाई) से जीते, कृपण को दान से जोते, झूठ योलनेवाले को सत्य से (जीवे)। महामोमालान (2) २२४-सच्चं भणे न कुशेय्य, दज्जा पस्मिम्पि याचितो । एतेहि तोहि टानेहि गच्छे देवान सन्तिके ||४|| ( सत्त्यं मणेत न क्रुध्येत, बचावल्पऽपि याचितः। पतेत्रिमिा स्थाने. गच्छद देवानामन्ति के ॥1) सप मोजे, झोप न करे, थोड़ा भी मांगने पर वे इन तीन पानी में (पुरुष) देवता के पास जाता है। माग(योमा) २२५-हिसका ये मुनयो निच्चं फायन संसुता । ते गन्ति अच्चुतं यनं यन्य गन्त्वा न सोचरे ||५|| (भरिमका पे मुनयो नित्यं पायेन संगुना ते पन्ति मयुतं स्थान पर गाया न शोधन्ति ) कोधवग्गो ६५ जो मनुष्य हिंसा से रहित, नित्य अपने शरीर में संयत है व उस मच्युत पद को प्राप्त करते है जिसे प्राप्त कर वे शोक नहीं करते। राजगृह (गृभट) रामगृह प्रेमी का पुत्र २२६-सदा जागरमानानं अहोरत्तानुसिक्विनं। निब्याणं अधिमुत्तानं अस्थं गच्छन्ति आसवा ॥३॥ (सदा जाग्रतां अहोरात्र अनुशिक्षमाणानाम् । निर्वाणं अधिमुक्तानां अस्तं गच्छन्ति मानवाः ॥६॥ ) उनके आश्र (चित मल) नष्ट हो जाते है जो सदा जागरण-शीच दो दिन-नात योगाभ्यास में लगे रहते है और निर्वाचही जिनका एक उश्य।

धम्मपद - हे अतुल ! यह पुरानी बात है, आज की नही-(लोग) चुप हुए की निन्दा करते हैं, और बहुत बोलनेवाले की भी, मितभाषी की भी निन्दा करते हैं; दुनियाँ में अनिन्दित कोई नहीं है । विजुल ही निन्दित या बिल्कुल ही प्रशंसित पुरुष न था, न होगा; न आजकल है । जेनवन मतुल (उपासक) २२९-यन्चे विज्ञ पसंसन्ति अनुविच्च सुत्रे सुवे । अच्छिदवुति मेधावि पञ्जासोलसमाहितं ॥९॥ (यश्चेद् विक्षाः प्रशंसन्ति अनुविव्य श्यः श्यः । अन्छिद्रवृत्ति मेधाविन प्रवाशोलसमाहितम् ॥६॥) २३०-नेक्खं जम्बोनदस्सेव को तं निन्दितुमरहति । देवापि तं पसंसन्ति ब्रह्म णाऽपि पमंसितो ॥ १० ॥ (निष्कं जम्बूनदस्येव कस्तं निन्दितुमर्हति । देषा अपि तं प्रशंसन्ति ब्रह्मणाऽपि प्रशंसितः॥१०॥) जिस निर्दोष भाचाण वाले मेधावी प्रज्ञा और शील से युफ पुरुष की प्रशसा विन लोग दिन प्रति दिन समम समझ कर करते है, उस सये सोने जैसे की निन्दा भला कौन कर सकता है। देवता लोग भी उसकी प्रशंसा करते हैं और प्रम्हदर भी। बेगुरुन बजिय( भितु) २३१-कायप्पको रक्खेय्य कायेन संयुत्तो सिया । कायदुच्चरितं हित्त्वा कायेन मुनरितं चरे ॥१२॥ (कायप्रकोपं रक्षेत् कायेन संवृतः स्यात् । कापनुपरित दिया कापेन सुचरितं चरेत् ।।११०) १८-मलवग्गो बेतवन गोधातक-पुत्र २३५-पाष्टुपलासो' व दानिसि, यमपुरिसापि च तं उपट्टिता । उय्योगमुखे च तिट्ठसि पाथेय्यपि च ते न विज्जति ॥१॥ (पाण्डुपलासमिचेदानीमसि यमपुरुषा अपिच यामुपस्थिता। उद्योगमुखे च तिष्ठसि पार्ययमपि च ते न विद्यते || ) २३६-सो करोहि दीपमत्तनो खिप्पं चायम पण्डितो भव । निद्धन्नमलो अनागो दिव्यं श्ररियभूमिमेहिसि ॥ २ ॥ (स कुरद्वीपमात्मन: क्षिप्रं ध्यायच्छम्प पण्डितो मय । निर्धतमलोऽगणो दिव्यां आर्यभूमि एप्यसि ॥२॥) पीले पसे के समान इस बक है, यमन मेरे पाम भामा है, प्रदाय के रिपे तयारक है, और पाय मेरे पास नहीं है। मोन भपने गिय दीप (रवास्थान) यना, उपोग र, परित यन, मन अपालिन कर, दोपरदिन पर पायी दिव्य पद को पायेगा। गोपाल २३७-३पनीतायो च दानिसि सम्पयातोमि यमम्म न्तिक । वासोपि च ते नन्धि अन्दरा पायथ्याम्पचन चिनि मलवग्गो (उपनीतवया इदानीमसि यसम्प्रयातोऽसि मस्याऽन्तिक। वासोऽपि च ते नाऽस्ति अन्तरा पाथेयमपि च ते न विद्यते ।।३।। २३८-गो करोहि दीपमाननो लिणं वायम पण्डितो भव । निदन्तमलो अागो न पुन जातिजरं उपेडिसि ॥ १ ॥ ( म कुमद्रोपमात्मनः क्षिप्रं व्यान्छन्य पण्डितो भव। निर्धनमलोनंगगो न पुनजातिजरे उपयति । १॥ . आयु नेग समाप्त हो गई, यम पाम पर गुहा, निाम (न्यान ! भी मेरा नहीं है, (यामा माग लिय ने पार पास भी नहीं। मोनायिका - धम्मपद (अयस इव मलं समुत्थितं त (स्मा) उत्याप तदेव खादति। যমনিয়নকাতি মানি कर्माणि नयन्ति दुर्गतिम् ॥ ६॥) लोहा का मुरचा उससे उत्पन्न होकर उसी को खाता है, वैसे ही सदाचार का उलंघल करने वाले मनुष्य के अपने ही कर्म उसे दुर्गति को प्राप्त कराते हैं। उन (लाल ) उदायी (थे। २४१-असज्झायमला मन्ता अनुट्टानमला घरा । मलं वणस्स कोसज पमादो रक्खतो मलं ॥ ७ ॥ ( अवायायमला मना अनुत्थानमला गृहा। मलं वर्णस्य कौसीय, प्रमादो रक्षतो मलम् ॥ ७॥) पाठ का न करना मंत्र का मैल है, झाइ पहाद न करना घर का मल है, आलस्य सौन्दर्य का मैल है, असावधानी पहरेदार का मैल है। को दुलपुत्र रजगृप ( वेणुवन) २४२-मसिस्थिया दुच्चरितं मच्छेरं ददतो मलं। मला वे पापका घमा अम्मिं लोके परम्हि च ॥ ८ ॥ ( मलं खिया दुश्चरितं मात्सयं ददतो मलम् । मलादे पापका धर्मा अस्मिन् लोके परम च ॥ ) सी का मेल दुराचार है, दानी का मेल कमी है। पर इस लोक और पालीक दोनों के मेल है।

१०२
धम्मपद
जेतन
पाँच सौ उपासक
२४६-यो पाणमतिपातेति मुसावादश्च भासति ।
लोके आदिन्नं आदियति परदारञ्च गच्छति ॥१२॥
(यापाएमतिपातयति मृषावादं च मापते।
लोकेऽदत्वं आदत्त परादारांश्च गच्छति ॥१२॥)
२४७-सुरामेरयपानञ्च यो नरो
नरो अनुयुञ्जति ।
इघेवमेसो लोकस्मिं मूल खनति अत्नी ।।१३।।
( सुरामैरेयपानं च यो नराऽनुयुनकि ।
इहैवमेप लोके मूलं खनत्यात्मनः ॥१३॥ )
२४८-एवं भो पुरिस ! जानाहि पापधम्मा असनता।
मा त लोभो अधम्मो च चिरं दुक्खाय रन्धयुं ॥१४॥
(एवं भो पुरुप ! जानीहि पापधर्माणोऽ संयतान् ।
मा त्यांलामाऽधर्मश्च चिरं दुःखाय संध्येताम् ॥१४॥)
जो जीव दिसा करता है, झूठ बोलता है, चोरी करता है, परस्त्रीगमन
करता है, शराय दारू पीता है यह इस ससार में अपनी ही जा
खोदता है।
हे पुरुष ! सपम रहिन पाप कम ऐसे ही होते है, हमे जानो । म
रोम भोर अधर्म चिरकाल रु दुस
मन बगल रहे।
वरन
विस्म (बालक)
२४९-ददन्ति ये यथास, यापसादनं जनो।
तस्य यो मंकु भादि परमं पानभाजने ।
नमो दिग या रतिया ममाधि अधिगच्छति ॥१५॥

मलषग्गो
१०३
( ददाति वै यथाश्रद्धं यथाप्रसादनं जनः।
नत्र यो मूको भवति परेषां पानभोजने।
न ल दिवा वा रात्री वा समाधिमधिगच्छति ॥१५!!)
२५०-यम्स च तं समुच्छिन्नं मूलघचं समूहतं ।
स वे दिवा वा रतिं वा समाधि अधिगच्छति ॥१६॥
(यस्य च तत् समुच्छिन्नं मूलघातं समुद्धतम् ।
स वै दिवा रात्रौ वा समाधि अधिगच्छति ॥१६॥)
लोग अपनी श्रद्धा भक्ति के अनुसार दान देते हैं। दूसरों के खाने
पीने को देख जो सह नहीं सकता वह दिन या रात कभी नी एकाग्रता का
लाभ नहीं करता।
जिसकी ऐसी मनोवृत्ति उच्छिन्न हो गयी है, समूल नष्ट हो गई
है, वही दिन और रात एकाग्रता का लाभ करता है ।
जेतवन
पुाँच उपासक
२५१-नत्थि रागसमो अगि नस्थि दोससमा गहो।
नत्थि मोहसमं जालं नत्थि तण्हासमा नदी ||१७||
(नास्ति रागसमोऽग्निः नाऽस्ति द्वेषसमो ग्राहः ।
नाऽस्ति मोहसमं जालं नाऽस्ति तृष्गा समा नदी ॥१७.)
रागके समान आग नहीं, द्वेपर्क समान ग्रह (= भूत, चूहल)
नहीं; मोहके समान जाल नहीं, नृप्या के समान नदी नहीं।
भट्टियनगर ( जातियावन)
मेण्डक (अष्ठी
२५२-सुदस्सं वजमञ्जेसं अत्तनो पन दुइसं ।
परेसं हि सो बजानि ओपुणाति यथाभुसं ।
अत्तनो पन छादेति कलिं' व कितवा सठो ॥१८॥

धम्मपद
(सुदृश्यं वद्यमन्येषां आत्मनः पुनदुदृश्यं ।
परेषां हि स वद्यानि अवपुनाति यथातुपम् ।
आत्मनः पुनः छादयति कलिमिव कितवात् शठ)
दूसरंका दोष देखना आसान है, किन्तु अपना ( दोप) देखना कठिन
है । वह (पुरुष) दूसरोके ही दोपाको भुस्सेकी भाँति उड़ाता फिरता है,
किन्नु अपने (दोपो) को वैसे ही ढाँकता है, जैसे शठ जुआरी से पासे को।
+
जेतवन
उन्मानसन्गी (थेर)
२५३-परवजानुपस्सिस्स निचं उज्मानसचिनो ।
आसवा तस्स बढन्ति आरा स यासक्खया ॥१९||
( परषधाऽनुदर्शिनो नित्यं उद्ध्यावसंशिनः ।
आप्रवास्तस्य पद्धन्ते आराद् स आस्रवक्षयात् ॥१६)
दूसरों के दोप देखने वाले, तधा सदा दूसरों की टीश टिप्पण करने
वाले के चित्त मल पढ़ते हैं। चित्तमलों के जयसे वह पृथक
।
कुशीनगर
ममद ( परिमाजक)
२५४--आकासे च पद नत्यि समणो नस्थि बाहिर ।
पपञ्चाभिरता पजा निष्पपञ्चा नधागता ॥२०॥
(आकाशे च पद नाऽस्ति भ्रमणो नाऽस्ति बहिः ।
प्रपंचाऽभिरता. प्रजा निप्रपंचास्तथागताः ॥२०)
२५५-आकासे च पद नथि समणो नत्थि चाहिरे।
महमारा सरसता नस्थि, नयि बुद्धानमिति ॥२१॥

मलवगो
१०५
(आकाशे च पदं नाऽस्ति अमणो नाऽस्ति बहिः ।
संस्काराः शाश्वता न सन्ति,
नाऽस्ति बुद्धानामिङ्गितम् ॥२१।।)
अाकाश में ठहराव नहीं, बाहर में सब श्रमण नहीं। लोग प्रपत्र
में रत है। तथागत प्रपत्र रहित है।
अाकाश में ठहराव नहीं, बाहर में सच्चे श्रमण नहीं। संस्कन पदार्थ
नित्य नहीं, युद्धों में चंचलता नहीं।

१९--धम्मवग्गो जेतवन विनिच्छयमहामञ्च (जज ) २५६-न तेन होति धम्मट्ठो येनत्थं सहसा नये । यो च अथ अन थञ्च उभो निच्छेश्य पण्डितो॥ १॥ (न तेन भवति धर्मस्थो येनार्थ सहसा नयेत् । यश्चाऽर्थ अनथं च उभौ निश्चिनुयात् पंडितः ।। १ ।) २५७-असाहसेन धम्मेन समेन नयती परे। धम्मस्स गुत्तो मेधावी धम्मोति पवुच्चति ॥ २ ॥ ( असाहसेन धर्मण समेन नयते परान् । धर्मेण गुप्तो मेधावी धर्मस्थ इत्युच्यते ॥ २॥) विना विचारे यदि कोई न्याय करता हो तो वह न्यायाधीश नहीं । जो पंदित सच्चे और झूठे दोनों का निर्णय कर विचार पूर्वक धर्म में पक्षपात रहित होकर न्याय करता है वही धर्म की रक्षा करने वाला संचा न्यायाधीश कहा जाता है। बेतवन बज्जिय (मिन) २५८-न तेन पण्डितो होति यावता बहु भासति । सेमी अवेरी अभयो पण्डितोति पचति ||३|| घट्यो १०७ (न तावता पंडितो भवति यावता बहु भापते । क्षेमी अवैरी अभयः पंडित इत्युच्यते ॥३॥ ) बहुत भाषण करने से पंदित नहीं होता। जो क्षेमवान् अवरी और अभय होता है, वही 'दित कहा जाता है। तवन २५०-न तायता धम्मघरो यावता बहु नासति । यो चे अप्पम्पि सुत्लान थन्मं कायेन पल्सति । सवे धामधरो होति यो धन्म नपमन्जति ॥४॥ (न तावता धर्मधरो यावता बहु भापते यश्वाल्पमपि श्रुत्वा धन्म कायेन पश्यति । सवै धर्मधरो भवति यो धर्म न प्रमाद्यति ॥2॥) स्योंकि बाबान बोलता ईसलिये या धनंबर नहीं होता। जो आरभी भारत र धर्म का मानसिक सालानालाही धर्मपर गोधर्म में मना नहीं बना।

धम्मपद जेतवन लकुपटक महिय (थेर) २६१-यम्हि सच्चच धम्मो च अहिंसा सञ्जमो दमो । स वे वन्तमलो धीरो थेरो 'ति पवुच्चति ॥६॥ (यस्मिन् सत्त्यं च धर्मवाहिंसा संयमो दमः । स वै वान्तमलो धीरः स्थविर इत्युच्यते ॥६॥) जिसमें सत्य, धर्म, अहिसा, सयम और दम है, वही विगतमल, धीर और स्थविर कहा जाता है। जेतवन कितने ही मिनु २६२-न वाक्करणमत्तेन वष्णयोक्खरताय वा । साधुरूपो नगे होति इस्सुकी मच्छरी सठो पणा ( न वारकरणमात्रेण वर्णपुष्कलतया या । साधुरूपो नरो भवति ईषु को मत्सरी शठः १७) २६३-यस्स चेतं समुच्छिन्नं मूलधच समूहतं । म वन्तदोसो मेधावो साधुरूपो 'ति वुचति ॥८॥ ( यस्य चैतत् समुच्छिन्नं मूलयातं लमुद्घतम् । स वान्तदोषो मेधावी साधुरुप इत्युच्यते 1101) ईयां और मात्सर्य से युक्त पाठ पुरुष अपने वचन मा सौन्दर्य के कारण अस्या नहीं हो सकता। जिसका यह उदिए हो गया है, समूल नष्ट हो गया है वहीं इंग रहित मेधावी अश्या कहा जाता है।

धम्मट्यम्गो क्षेतवन रत्यक (नितु २६४-न मुण्डकेन समणो अव्यतो अलिक भणं । इच्छालाभसमापन्नो समणो कि भविस्सति ॥९॥ (न मुंडकेन धमणोऽव्रतोऽलीकं भणन् । इच्छालाभसमापनः श्रमण कि भविष्यति ॥80) २६५-यो च समेति पापानि अणुं थूलानि सब्बसो । समितत्ता हि पापानं समयोति पवुचति ॥१०॥ ( यश्च शमयति पापानि अणूनि स्थूलानि सर्वशः। शमितत्त्वाद्धि पापानं धमण इत्युच्यते ॥१||) जो मतरहित, मिथ्यामापी है, वह मुरिक्षत होने मात्र से अमए नही होता । इरसा लानसे भरा (पुरुष), क्या अमर दोगा? जो बोट करे पायों को सर्वथा शमन करनेवाला पापको शमित दोन कारण : ममया (अमग) कहा जाता है।

धम्मपद नेतवन कोई नाबण २६७-योध पुअञ्च पापञ्च वाहित्त्वा ब्रह्मचरियवा। सड्खाय लोके चरति स वे भिक्खूति वुच्चति ॥१२॥ (य इह पुण्यं च पापं च वाहयित्वा ब्रह्मचर्यवान् । संख्याय लोके चरति स वै भिक्षुरित्युच्यते ॥१२।।) लोकमें जो यहाँ पुण्य और पापको छोड़ ब्रह्मचारी बन, ज्ञानके साथ विचरता है, वह भिक्षु कहा जाता है। जेतवन तीधिक २६८-न मोनेन मुनी होति मुल्हरूपो अविद्दतु । यो च तुलं व पगरह वरमादाय पण्डितो ॥१३॥ ( न मौनेन मुनिर्भवति मूढरूणेऽविद्वान् । यश्च तुलामिव प्रगृह्य वरमादाय पंडितः ॥१३॥) २६९-पापानि परिनेति स मुनी तेन सो मुनि । यो मुनाति उभो लोके मुनी तेन पवुञ्चति ॥१४॥ ( पापानि परिवजयति स मुनिस्तेन स मुनिः । यो मनुत उभौ लोको मुनिरतेन प्रोच्यते ॥१४॥) मौन धारण करने माय से कोई अविद्वान मद मुनि नहीं होता। जो पडित-मानो श्रेष्ठ तुला प्रहय करके दोनों लोकों का मान करना (तौलना है) और पापों को गोद देना है वह इस कारण मुनि है और मुनि कहा जाता है। है

धम्मवग्गो
जेतवन
प्ररिय नालिमिर
२७०-न तेन अरियो होति येन पाणानि हिसति ।
अहिंसा सव्यपाणानं अरियो'ति पवुच्चनि ||||
(न तेनाऽऽयों भवति येन प्राणान हिनस्ति ।
अहिंसा सर्वप्राणानां आर्य इति प्रांच्यते ॥१५॥ )
प्राणियोंको हनन करनेसे ( कोई ) आर्य नहीं होना, सभी प्राणियों की
हिंसा न करनेसे ( उसे ) आर्य कहा जाता है।

२०--मग्गवग्गो अनबन पाँच सौ,भिव २७३-मन्गानङ्गिको सेट्टो सच्चानं चतुरो पदा। विरागो सेट्ठो धम्मानं द्विपदानच चरखुमा ॥१॥ { मार्गाणामष्टांगिकः श्रेष्ठः सत्त्यानां चत्वारि पदानि । विरागः श्रेष्ठो धर्माणां द्विपदानां च चतुप्मान् ॥१॥ ) २७४-एसो' मन्गो नत्य'जो दस्सनस्स विसुद्धिया । एतं हि तुम्हे पटिपनथ मारस्सेत पमोहनं ।।२॥ . ( एप एव मार्गो नाऽस्त्यन्यो दर्शनस्य विशुद्धये । पतं हि यूयं प्रतिपयध्य मारस्योप प्रमोहन ॥RI) मागों में अष्टागिक मार्ग श्रेष्ठ है, सायों में चार पद = चार भायमस्य) Jष्ट है, धर्मों में वैराग्य श्रेष्ठ है, द्विपदों (मनुष्यों) में पशुमान् (=ज्ञाननेवधारी, उब) श्रेष्ठ है । दर्शन (मान) की विशुद्धि के लिए यही मार्ग है, दूसरा नहीं; (भिक्षुभो!) इसी पर नुम पाहत होमी, पही मार को दिन करने वाला है। अनबन पारमा भित्र २७५-एन हि तुम्हें पटिपला दुपवसन्तं करिस्मथ । आम्दानी नया मनो अम्लाय मलमन्यनं ||३|| मगावग्गो ( एतं हि यूयं प्रतिपना दुःखस्यान्तं करिष्यथ । आख्यातो वै मया मार्ग प्रामाय शल्य-संस्थानम् ||३।।) २७६-तुम्हेहि किच्चं यातप्पं अक्खातारो तथागता । पटिपन्ना पमोक्खन्ति मायिनो मारवन्धना ॥ ४ ॥ (युप्माभिः कार्य आनप्यं आख्यातारस्तथागताः । प्रतिपन्नाः प्रमोच्यन्ते ध्यायिनो मारवन्धनात् ।। ४ 1 ) इस मार्ग पर आल हो तुम दुखों का अंन कर दोगे। सत्य-समान दुग्म का निवारण-स्वरूप निर्माण की जान मैंने इस का उपदेश किया है काग तो तुम्हीं को करना है, बुद्ध केवल उपदेश भर कर देते दें। ध्यानाभ्यासी मार्ग पर पाल हो मार के बंधन से मुक्त हो जाने ।

धम्मपद समो चीजें दुख के कारण है, इस बात को अब प्रज्ञा मे देव लेता है तब दुखमय ससार से उसे विक्ति हो जाती है। विशुद्धिक यही मार्ग है। २७९-सब्वे धम्मा अनचा 'ति यदा पनाय पस्सति । अथ निम्विन्दति दुक्खे एस मम्मो विसुद्धिया ॥ ७ ॥ (सर्व धर्मा अनात्मान इति यदा प्रक्षया पश्यति । अथ निर्विन्दति दुःखानि पर्ष मार्गो विशुदये ।।७३) सभी स्थितियाँ प्रसार है, इस बात को जब प्रज्ञा से देख लेता है ठव दुखमय ससार से उसे विन्ति हो जाता है। विशुद्धि का यह मार्ग है। बेदन (योगी) विस() २८०-उानकालन्हि अनुट्टहानो युवा बली आलसियं उपतो। ससन्नसकप्पमनो कुसीतो पञ्नाय मगं अल्सो न विन्दति ||८|| ( उत्थानकालेऽनुचिठन युवा बली आलस्यमुपेतः । संसन-सकल्प मनाः कुसीदः प्रथया मार्ग अलसो न विन्दति ।। =n) पुषा और बलवान होते हुए भी जो भाबस्य में पर उयोग करने के अवसर पर उधोग नहीं करता वह उसमाधाओं से होन निर्व मालसी प्रज्ञा के मार्ग को प्रात नहीं करता। एज (गुम्न) (यसर) २८१-वाचानुरक्ती मनसा सुमंता कायेन च अकुसळं न कापरा मगगवग्गो ११५ एते तयो कम्मपये विसोधये आराधये ममामिसिप्पवेदितं ॥१॥ ( वाचाऽनुरक्षा मनसा सुसंवृतः कायेन चाऽकुशल न कुर्यात् । एतान् श्रीन् कर्मपथान् विशोधयेत्, श्राराधयेत् मागं पिप्रवदितम् ॥l) वाणी का संयम करे, मन का संयम करे, और शरीर से कोई पार नपरे । (मन, वचन, फाय) इन तीनों कम पयों को शुद्ध करे। बुद्ध के रताय मार्ग का अनुसरण करे ।

धम्मपद
(वनं छिन्धि मा वृक्षं बनतो जायते भयम् ।
छित्त्वा वनं च वनयं च निर्वाणा भवत भिक्षवः ॥११॥)
२८४-यावं हि वनथो न छिज्जति अनुमत्तोपि नरस्स नारिसु ।
पटिबद्धमनी नु ताव सो वच्छो खोरपको 'व मातरि ।। १२॥
( यावद्धि वनथो न विद्यतेऽणुमात्रोऽपि नरस्य नारीपु ।
प्रतिबद्धमनाः नु तावत् स वत्सः क्षीरप इव मातरि ॥१२॥
वन को काटो, वृक्ष को मत, वन से भय उत्पन्न होता है । भिक्षुओ'
बन और झाड़ी को काटकर निर्वाण को प्राप्त हो जायो । जबतक भणुमात्र
भी स्त्री में पुरुष की कामना अखडित रहता है, तबतक दूध पीनेवाला
बड़ा जैसे माता में पारख रहता है, वैसे ही वह पुरुष यथा
रहता है।
बेतवन
सुवरपकार (थेर)
२८५-उच्छिन्द सिनेहमतनो कुमुदं सारदिकं 'व पाणिना ।
सन्तिमग्गमेव वह्य निव्यानं सुगतेन देसितं ॥ १३ ॥
( उच्छिन्धि स्नेहमात्मनः कुमुद शारदिकमिव पाणिना।
शान्तिमार्गमेय हय निर्वाण सुगतेन देशितम् ॥ १३ ॥ )
हाय से शरद् (तु) के कुमुद की भौति, आरमस्नेह को उचित
कर गलो। मुगत (बुद्ध) द्वारा उपदिष्ट (इस ) शान्तिमार्ग निर्वास
कायाधय लो।
बश्वन
(मसपनी मलिक
२८६-इध वस्सं वसिमामि इध हेमन्तगिम्हम् ।
दति बालो विचिन्तेवि अन्तरायं न बुज्मति ॥ १४ ॥

मगगवम्गो
(दह वर्षालु वसिष्यामि इह हेमन्तप्रीमयोः।
इति चालो विचिन्तयति, अन्तरायं न वुध्यते ॥ १४ ॥)
यहाँ वर्षा में या गा, यहां हेमन्त और ग्राम में (बसू गा)
-मृद इस प्रकार सोचता है । (चीत्र के ) अन्तराय (= विनों) को
नहीं माना।
किमा गोमती (थेर)
२८७-- तं पुतपमुसम्मतं व्यासत्तमन नरं ।
सुतं गामं महोघो 'व मच्चू आदाय गच्छति ॥?'!!
(तं पुत्र-पशु-सम्मतं व्यासकमनसं नरम् ।
सुप्त ग्राम महीय इव मृत्युरादाय गच्छति ॥ १५ ॥)
मांगे गो कोसे बड़ी बाई (महा संजाये), यदी पुग्न और
पशु म पुगर को मात लाता।

धम्मपद २८९-एतमत्थवसं प्रत्त्वा पण्डितो सीलसंवुतो। निबाणामनं मागं खिप्पमेव विसोधये ॥१७॥ (एतमर्थवशं झारखा पंरितः शीलसंवृतः। निर्वाणगमनं मागं क्षिप्रमेव विशोधयेत् ॥ १७॥) इस बातको जानकर पडित ( नर) शीलवान हो, निर्वाण की ओर बेजानेवाले मार्ग को शान ही साफ करे ।

१२० धम्मपद भयिनगर (जावियावन) भदिय ( भिक्षु) २९२-यं हि किच्चं तदपविद्धं अकिच्चं पन कयिरति । उन्नलाने पमनानं तेसै बदन्ति आसवा ॥ ३ ॥ (यद्धि कृत्यं तद् अपविद्धं, अरुत्यं पुनः क्रियते । उन्मलान प्रमत्तानां तेषां धर्द्धन्त प्रानवाः ॥३॥) २९३-येसच्च सुसमारद्धा निच्चं कायगता सति । अकिच्चन्ते न सेवन्ति किच्चे सातच्चकारिनो। सतानं सम्पजानानं अत्यं गच्छन्ति आसचा ।। ४ ॥ (थेपाञ्च सुसमारन्धा नित्यं काधगता स्मृतिः। अकृत्यं ते न सेवन्ते कृत्ये सातत्यकारिणः । स्मरतां सम्प्रजानानां अस्तं गच्छन्त्यानवाः ॥ ४॥) जो कसभ्य है, उसे (तो वह ) छोड़ता है, जो अकर्मन्य है उसे करता है। ऐसे पढ़े मलवाले प्रमादियों के श्रास्रव (=चित्तमल) पाते हैं। जिन्हें काया में (यभगुरता, मलिनता आदि दोप सम्बन्धी ) स्मृति उपस्थित रहती है, वह अकर्तव्य को नहीं करते, और कन्य के निरन्तर करनेवाले होते है। जो स्मृति और सम्प्रजन्य (-सचेतपन) को रखनेवाजे होते हैं, उनके भासव अस्त हो जाते है। जेवयन लकुण्टक भरिप (थेर) २९४-मातरं पितिरं हन्ता राजानो द्वे च खचिये । रहूँ सानुचरं हन्त्वा अनियो याति ब्राह्मणो ॥५॥ ( मातरं पितरं हत्या राजानी दी च तधियी। राष्ट्र साऽनुचरं हरयाऽनयो याति प्राणः५१) पकिरणकवग्गो १२१ D माना (= तृणा), पिता (= अहंकार), दो क्षत्रिय राजाओं शाश्वत दृष्टि और उच्छेद दृष्टि), और अनुचर के साथ सारे राष्ट्र (-संसार की सारी आसक्तियाँ) को मारकर ब्राह्मण (ज्ञानी) निप्पाप होना है। २९५-मातरं पितरं हन्त्या राजानो द्वे च सोत्थिये। वेव्यग्यपञ्चमं हन्त्वा अनियो याति ब्राह्मणो ॥ ६ ॥ (मातरं पितरं हत्वा राजानो द्वौ च श्रोत्रियो । व्याघ्रपञ्चमं हत्वाऽनयो याति ब्राह्मणः॥ ६॥) माता, पिता, दो त्रिय राजाओं को (शाश्वत दृष्टि और उच्छेद दृष्टि) और पांचा नीवरणों को मार कर ब्राह्मल निप्याप हो जाता है । राजगृद (गुमन) (दास्ताकाटकच) २५६-मुप्पबुद्धं .पवुमन्ति सदा गोतमसावका । येसं दिवा च रत्तो च निच्चं बुद्धगता सति ||७|| (सुमबुद्धं प्रयुध्यन्ते सदा गौतमश्रावकाः । येपां दिवा च रात्रौ च नित्त्यं बुद्धगता स्मृतिः ॥७॥) दिन और रात संदेव युद्ध के गुणानुस्मत्य में जो लीन रहने है ये गौतम के शिष्य नित्य युद्ध का स्मरर करते उने । २९.७--युप्पबुद्ध पवुमनिमन्ति सदा गौतमसावका। यसं दिवा च रो च निचं यमगता सति ॥ ८ ॥ (मुमधुर प्रबुध्यन्ते सदा गौतमधावाः । येणं दिया च रात्री च नित्यं धर्मगता स्मृतिः 1) ૨૨૨ धम्मपद दिन और रात सदैव धर्म के गुखानुस्माण में जो लोग रहते हैं ये गौतम के शिष्य नित्य वुद्ध का स्मरण करते उठते है। २९८ -सुप्पबुद्धं पबुज्झन्ति सदा गोतमसावका। येसं दिवा च रत्तो च निच्चं सङ्घगता सति ।।९।। (सुप्रवुयं प्रधुध्यन्ते सदा गौतमधायकाः। येषां दिवा च रात्रौ च नित्यं संघगता स्मृतिः ॥६१) दिन और रात सदैव सघ के गुणानुस्मरण में जो लीन रहते हैं ये गौतम के शिष्य निस्य बुद्ध का स्मरण करते उठते हैं। २९९-सुप्पबुद्धं पवुज्झन्ति सदा गोतमसावका । येसं दिवा च रत्तो च निच्चं कायगता सति ॥१०॥ । सुप्रबुखं प्रवुभ्येन्ते०१० नित्यं कायगता स्मृतिः॥१०॥) दिन और रात सदेव काया की गंदगियों के स्मरण में जो लान रहते है। ३००-सुप्पबुद्धं पवुज्झन्ति सदा गोतमसावका। येसं दिवा च रत्तो च अहिंसाय रतो मनो ॥११॥ (सुमधुसं० । अहिंसामरतं मनः ॥११1) दिन और रात सदेव जिनका मन अहिंसा में रत है । ३०१-मुष्पबुद्ध परामन्ति सदा गोतमसावका। येसं दिवा च रोच भावनाय रतो मनो ॥ १२ ॥ (सुमयुखं०1 मावनार्या रतं मनः ॥ १२॥) दिन और रात मदेव जिनका मन ध्यानाभ्यास में रत है।

पकिरणकवग्गो १२३ वैशाली (महावना) बजिपुत्तक (मिज) ३०२-दुप्पव्वज्जं दुरभिरमं दुरावासा घरा दुखा। दुक्खोऽसमानसंवासो दुक्खानुपतितद्धगू । तस्मा न च अद्धगु सिया न च दुक्खानुपतितो सिया ॥१३॥ (दुष्प्रवज्यां दुरभिरामं दुरावासं गृहं दुःखम् । दुःखोऽसमानसंवासो दुःखाऽनुपतितोऽध्वगः । तस्मान वाऽध्वगः स्यान्न च दुःखाऽनुपतितः स्यात् ॥१३॥) बुरी तरह ग्रहण की गई प्रव्रज्या के जीवन में रमण करना कठिन' है, न रहने योग्य घर में रहना दुखद है, जो मनुष्य अनुकूल नहीं हैं उनके साथ निवास करना दुखद है, संसार के मार्ग में न पड़े, दुख में न पड़े। नेतवन चित्त (गृहपति) ३०३-सद्धो सीलेन सम्पन्नो यसोभोगसमप्पितो। यं यं पदेसं भजति तत्थ तत्थेव पूजितो ॥ १४ ॥ जेतवन (चुल्ल) नुमद्दा ३०४-दूरे सन्तो पकासेन्ति हिमवन्तो 'व पव्वता । असन्तेत्थ न दिस्सन्ति रत्तिखित्ता यथा सरा ॥ १५ ॥ (दूरे सन्त: प्रकाशन्ते हिमवन्त इव पर्वताः । असन्तोऽत्र न दृश्यन्ते रात्रिक्षिता यथा शराः ॥१५॥ ) सन्त (जन) दूर होने पर भी हिमालय पर्वत (की) धवन चोटियों की भाँति प्रकाशते हैं, और असन्त यहीं (पास में भी) होने पर, रात में फेंके वाण की भाँति नहीं दिखलाई देते ।

१२४
धम्मपद
जेतवन
अकेने विहरने वाले (और)
३०५-एकासन एकसेय्य एको चरमतन्दितो।
एको दमयमत्तानं वनन्ते रमितो सिया ।। १६ ॥
(एकासन
एकशय्य एकश्वरततन्द्रितः ।
एको दमयनात्मानं बनान्ते रतः स्यात् ॥१६॥)
एक ही आसन रखने वाला, एक शय्या रखने वाला, अकेला विचरने
वाला (बन), यालस्य रहित हो, अपने को दमन कर अकेला ही वनान्त
में रमण करे।

2.२----निरयवग्गो
ति चाह।
नेतवन
सुन्दर ( परिनीजिका)
३०६-अभृतवादी निरयं उपेति यो वापि
कत्त्वा 'न करोमी'
उभोपि ते पेच समा भवन्ति
निहीनकम्मा मनुजा परत्थ ॥१॥
(अभूतवादी निरयमुपेति,
यो वाऽपि कृत्वा न करोमी ति चाह ।
उभावपि तो प्रेत्य समौ भवतो
निहीनकर्माणो मनुजौ परत्र ।। १ ।।)
असत्यवादी नरक में जाते हैं, और वह भी जो कि करके 'नहीं
किया'- कहते। दोनों ही प्रकार के नीचकर्म करने वाले मनुष्य मरकर
समान होते हैं।
राजगृह ( वेणुवन)
( पाप फलानुमवी प्राणी)
३०७-कासावकण्ठा बहवो पापधामा असम्बता।
पापा पापेहि कमेहि निरयन्ते उप्पजरे ॥२॥

धम्मपद
(कापायकंठा बहवः पापधर्मा असंयताः।
पापा. पापै कर्मभिनिरयं त उत्पधन्ते ॥२॥)
कंठ में कायाप (वस) वाले कितने ही पापी असंयमी हैं, जो
पापी (अपने) पाप कर्मों से नरक में उत्पन्न होते हैं।
वैशाला
( गुमुदातीरवासी मितु)
३०८-सेय्यो अयोगुलो भुत्तो ततो अग्गिसिखूपमो ।
यञ्चे भुन्जेय्य दुस्सीलो रट्ठपिण्डं असञतो ॥३॥
(श्रेयान अयोगोलो भुकस्ततोऽग्निशिखोपमः ।
यच्चेद् भुम्जीत दुःशीला राष्ट्रपिण्डं असंयतः ॥२॥ )
असंयमी दुराचारी हो राष्ट्रका पिंट (= देश का अन) खाने से
अग्निशिखा के समान तल लोहे का गोला साना उत्तम है।
जेतवन
सेम ( थोठीपुत्री)
३०९-चत्वारि टानानि नरो पमतो आपन्नती परदारूपसेवी ।
अपुजलामं न निकामसेय्यं निन्दंततीयं निरयं चतुत्थं ॥४॥
(चस्यारि स्थानानि नरा प्रमच आपद्यते परदारोपसयो।
अपुण्यसामं न निकामशय्यां
निन्दा तृतीयां निरयं चतुर्थम् ॥ ४॥)
३१०-अपुन्नलाभो च गती च पापिका,
भीतस्स भीताय रती च थोकिका।
राजा च दण्डं गरुक पणेति
उस्मा नरो परदारं न सेवे ॥ ५ ॥

निरयवग्गो १२७ (अपुण्यलाभ गतिघ पापिका, मीतस्य भीतया रतिध स्तोकिका। राजा च दण्डं गुरुकं प्रणयति तस्मात् नरः परदारान् न सेवेत ||५) प्रमादी परस्त्रीगामी मनुष्य की चार गतियाँ हैं-- अपुण्य का लाभ सुखसे न निद्रा, तीसरे निन्दा, और चौथे नरक । (अथवा ) अपुण्य लाभ, बुरी गति, भयभीत (पुरुप) की भयभीत (स्त्री) से अत्यल्प रति, और राजा का भारी दंड देना। इसलिये मनुष्य को परस्त्रीगमन न करना चाहिये। जेतवन कुटुभाषी (मिद्ध) ३११-कुसो यथा दुग्गहीतो हत्थमेवानुकन्तति । सामनं दुप्परामळं निरयायउपकड्ढति ॥६॥ (कुशो यथा दुर्गृहीतो हस्तमेवाऽनुकृन्तति । श्रामण्यं दुष्परामृष्टं निरयायोपकर्षति ॥६॥) जैसे ठीक से न पकड़ने से कुश हाथ को ही काट देता है, (इसी प्रकार) श्रवणपन (= संन्यास) ठीक से ग्रहण न करने पर नरक में ले जाता है। ३१२-यं किञ्चि सिथिलं कम्मं सङ्किलिटं च यं वतं । सङ्कम्सरं ब्रह्मचरियं न तं होति महप्फलं ||७|| ( यत् किंचित शिथिलं कर्म संक्लिष्टं च यद् व्रतम् । संकृच्छ्र ग्रह्मचयं न तद् भवति महत्फलम् ॥ ७॥) जो कर्म की शिथिलता है, जो व्रत क्लेश (मल) युक्त है, और जो ब्रह्मचर्य भशुद्ध है, का महाफळ (-दायक) नहीं होता।

१२८ धम्मपद ३१३-कयिरचे कविराधेनं दल्हमेनं परकमे। सिथिलो हि परिबाजो भिय्यो आकिरते रजं ॥ ८॥ (कुर्याच्चेत् कुर्वतितद् दृढमेतत् पराक्रमेत । शिथिलो हि परिवाजको भूय आकिरते रजः ॥ यदि (प्रमज्या कर्म) करना है, तो उसे करे, उसमें हद पराक्रम के माध लग जावे; ढीला ढाला परिवाजक (- संन्यासी) अधिक मल विखाता है। जेनवन (कोई इप्योल खी) ३१४-अकतं दुक्तं सेय्यो पच्छा तपति दुकतं । कतश्च मुकत सेय्यो यं कत्त्वा नानुतप्पति ॥ ९ ॥ (अकृतं दुष्कृतं श्रेयः पधात् तपति दुष्कृतम् । कृतं च सुकृतं थेयो यत् छत्त्वा नाऽनुतप्यते ॥ ॥) दुष्कृत(पाप) का न करना श्रेष्ठ है, दुष्कृत करनेवाला पीछे अनुताप करता है। मुफ्त का करना श्रेष्ठ है, जिसको करके (मनुष्य) अनुताप नहीं करता। वसुवने नि ३१५-नगरं यथा पच्चन्तं गुतं सन्तरवाहिरं। एवं गोपेय अचान सणो वे मा उपच्चगा। स्वणातीता हि सोचन्ति निरयदि समपिता ॥ १०॥ (नगर पपा प्रत्यन्तं गुप्त सान्त धम् । एवं गोपपेदात्मानं क्षएं ये मा उपातिगा। क्षणातीता दिशोचन्ति निरये समर्पिताः॥१०॥)

निरयवग्गो
१२९
सीमान्त का नगर जिस प्रकार भीतर बाहर से खूब रक्षित होता है
उसी प्रकार अपने को संयत रक्खे । अवसर न चूके । अवसर चूक जाने
से नरक में पढ़ कर शोक करता है।
जेतवन
(जैनसाधु )
३१६-अलज्जिता ये लजन्ति लजिता ये न लज्जरे ।
मिच्छादिठिसमादाना सत्ता गच्छन्ति दुग्गतिं ॥ ११ ॥
(अललिता ये लजन्ते लजिता ये न लजन्ते ।
मिथ्यादृष्टिसमादानात् सत्त्वा गच्छन्ति दुर्गतिम् ॥११॥)
लज्जा न करने के स्थान में जो लजित होते हैं, और लजा करने
के स्थान में लजित नहीं होते-वे जीव मिथ्या-धारणा ग्रहण करने के
कारण दुर्गति को प्राप्त होते हैं।
३१७-अभये च मयदस्सिनो भये च अभयदस्सिनो ।
मिच्छादिटिसमादाना सत्ता गच्छन्ति दुग्गतिं ॥ १२ ॥
(अभये च भयदर्शिनो भये चाऽभयदर्शिनः ।
मिथ्यादृष्टिसमादानात् सत्त्वा गच्छन्ति दुर्गतिम् ॥१२॥ )
भय न करने के स्थान में भय देखते है, और भय करने के स्थान
में भय नहीं करते वे जीव० ।
.
तवन
(तीथिंक-शिष्य)
३१८-अवज्जे वज्जमतिनो वज्जे चावज्जदस्सिनो।
मिच्छादिठि० ॥१३॥

धम्मपद (अवधे वद्यमतयो वद्ये चाऽवद्यदर्शिनः । मिथ्याष्टिक ॥१३॥) अनिन्दनीय बात में दोष देखते हैं, और निन्दनीय बात में दो नहीं देखते वे जीव० । ३१९-वज्जच बजतो जत्ला अवज्जञ्च अवज्जतो। सम्मादिटिसमादाना सत्ता गच्छन्ति सुम्गतिं ॥ १४ ॥ (घद्य च वद्यतो ज्ञात्वाऽवयं चावद्यतः । सम्यगदृष्टिसमादानात् सत्त्वा गच्छन्तिसु गतिम् ॥९) निन्दनीय बात को निन्दनीय, और अनिन्दनीय बात को अनिन्दनीय बात को अनिन्दनीय जान सम्यक् दृष्टि धारण करके प्राणी सुगति को प्राप्त होते हैं।

२३--नागवग्गो
नेनवन
आनन्द (थेर)
३२०-अहं नागो'व सङ्गामे चापतो पतितं सरं ।
अतिवाक्यं तितिक्खिस्सं दुस्सीलो हि बहुजनो ॥ १ ॥
( अहं नाग इव संग्रामे चापतः पतितं शरम् ।
अतिवाक्यं तितिक्षिप्ये. दुश्शीला हि बहुजनाः ॥ १॥)
युद्ध में जैसे हाथी धनुप से छोड़े वाणों को सहन करता है वैसे ही
में वाक्यों को सहन करूँगा । संसार में दुःशील लोग ही अधिक हैं।
३२१-दन्तं नयन्ति समिति दन्तं राजाभिरुहति ।
दन्तो स्ट्ठो मनुस्सेसु यो तिवाक्यं तितिक्खति ॥२॥
(दान्तं नयन्ति समिति दान्तं राजाऽभिरोहति ।
दान्तः श्रेष्ठो मनुष्येपु योऽतिवाक्यं तितिक्षते ॥ २॥ )
दान्त कर लिये गये (हाथी) को युद्ध में ले जाते है, वैसे ही
हाथी पर राजा चढ़ता है। अपने को जिसने दमन कर लिया है वहीं
मनुष्यों में श्रेष्ट है, जो दूसरों के कटु वाक्यों को सहन करता है ।
३२२-वरं अस्सतरा दन्ता आजानीया च सिन्धवा ।
कुञ्जरा च महानागा अत्तदन्तो ततो वरं ॥ ३ ॥

१३२
धम्मपद
(वरमश्वतरा दान्ता आजानीयाश्च सिंधव.।
कुजराश्च महानागा आत्मदान्तस्ततो वरम् ॥ ३॥ )
खच्चर, अच्छी जाति के घोड़े और महा नाग हाथी दान्तकर लिये जाने पर
अच्छे होते हैं। जिसने अपने को दमन कर लिया है वह सबसे अच्छा है।
बेतवन
(भूतपूर्व महापत मि)
३२३-नहि एतेहि यानेहि गच्छेय्य अगतं दिस ।
यथाऽत्तना सुदन्तेन दन्तो दन्तेन गच्छति ॥ ४ ॥
(नहि पतैर्यानैः गच्छेदगा दिशम् ।
यथा ऽऽत्मना सुदान्तेन दान्तो दान्तेन गच्छति ॥)
इन यानों से कोई निर्वाण की घोर नहीं जा सकता । अपने को
जिसने दमन कर लिया है वही सुदान्त वहाँ पहुँच सकता है ।
( परिभिरण पाषाणपुत)
३२४-धनपालको नाम कुञ्जरो कटकप्पभेदनो दुन्निवारयो ।
बद्धो कवलं न भुञ्जति सुमरति नागवनस्स कुञ्जरो ॥५॥
(धनपालको नाम कुंजरो कटफमभेदनो दुनिवार्यः ।
परः कपलं न भुंकस्मरति नागवनं कुंजरः ॥ ५॥)
धनपारक नाम का हाथी, सेना को तितर बितर कर देनेशला, भत्यन्त्र
दुर्वष यन्धन में पर आने पर प्रास नहीं खाता। बह हाथियों के अगल
को स्मरण करता है।
देववन
पसेनी (कोरामराव)
३२५-मिद्धी यदा होति महन्धसो च निदायिता सम्परिवचसायी ।
महावराहो 'व निदापपुठो पुनप्पुनं गम्भमुपैति मन्दो ॥६॥

नागवग्गो (मृद्धो यदा भवति महायसश्च निद्रायितः सपरिवर्तशायी। महावराह इव निवाप-पुष्टः पुनः पुनः गर्भमुपैति मन्दः ॥६॥) आलसी, बहुत खाने वाला, निद्रालु, करवट बदल-बदल कर सोने चाला, खिला-पिला कर पुष्ट किये मोटे सूअर की तरह,-मन्द वार-बार गर्भमें पड़ता है। जेतवन (सामणेर) ३२६-इदं पुरे चित्तमचारि चारिक येनिच्छकं यत्थ कामं यथासुखं । तदज्ज 'हं निग्गहेस्सामि योनिसो हत्थिप्पभिन्नं विय अङ्कुसग्गहो ।।७।। चारिका यथेच्छं यथाकामं यथासुखम् । तदद्याऽहं निग्रहीष्यामि योनिशो हस्तिनं प्रभिन्नमिवांकुशग्राहः ॥७॥) पहले यह चित्त मनमाना जिधर चाहा उधर स्वच्छन्द जाता.रहा, रसे आज मैं अच्छी तरह अपने बस में लाऊँगा--अङ्कुश ग्रहण करने वाला जैसे भड़के हाथी को। (इदं पुरा चित्तमचरत् जेतवन कोसलराजका पविय्यक नामक हाथी ३२७-अप्पमादरता होथ स-चित्तमनुरक्खथ । दुग्गा उद्धरथचानं पके सत्तो'व कुञ्जरो ॥८॥ (अप्रमादरता भवत स्वचित्तमनुरक्षत। दुर्गादुद्धरताऽऽत्मानं पंके सक्त इव कुंजरः ।। - ॥)

१३४
घम्मपद
अप्रमाद में रत होओ, अपने चित्त की रक्षा करो। इस कठिन संसार
से अपना उद्धार करो-पडू में फंसे हाथी की तरह।
पारिलेय्यक
बहुत से मितु
३२८-सचे लमेथ निपकं सहाय
सद्धिं चरं साधुविहारिधीरं ।
अभिभुय्य सब्बानि परिस्सयानि
चरेय्य तेनत्तमनो सतोमा ॥९॥
(स चेत् लभेत निपक्चं सहायं
साई चरन्तं साधुविहारिणं धीरम् ।
अभिभूयं सर्वान् परिश्रयान
चरेत् तेनाऽऽचमनाः स्मृतिमान ॥९॥)
यदि साथ विचरण करने वाला अनुकूल परिस्त मित्र मिल जाए
तो सभी विनों को दूर कर उसके साथ स्मृतिमान और प्रसन्न होकर
विहार करे।
३२९-नो चे लमेथ निपकं सहायं
सद्धि चरं साधुविहारिधीरं ।
राजा 'व स्टुं विजितं पहाय
एका चरे मानगरस्य नागो ॥ १० ॥
(न चेत् लभेत निपक्वं सहाय
सायं चरन्तं साधुपिहारिणं धीरम् ।
राजेय राष्ट्र विजितं प्रहाय,
एफचरेत् मातंगोऽरपय हव नागः ॥१०॥

नागवग्गो १३५ यदि साथ विचरण करने वाला अनुकूल पण्डित मित्र न मिले तो- पराजित राष्ट्र को छोड़ राजा की भाँति- हस्तिराज के समान अकेला विचरण करे। ३३०-एकस्स चरित सेय्यो नत्थि वाले सहायता । एको चरे न च पापानि कयिग अप्पोस्सुको मातङ्ग 'रब्व नागो ॥११॥ ( एकस्य चरितं श्रेयो नाऽस्ति वाले सहायता । एकश्चरेत् न च पापानि कुर्याद् अल्पोत्सुको मातंगोऽरण्य इव नागः ॥११॥) अकेला रहना उत्तम है। मृर्स के साथ मित्रता अच्छी नहीं। अकेला विचरे, पाप न करे। हस्तिराज की तरह अनुत्सुक होकर रहे । । हिमवत्-प्रदेश ३३१-अस्थम्हि जातम्हि सुखा सहाया तुट्ठी सुखा या इतरीतरेन। पुज सुखं जीवितसंखयहि सव्वस्स दुक्खस्स सुखं पहाणं ।। १२ ॥ ( अर्थे जाते सुखाः सहायाः, तुष्टिः सुखा येतरेतरेण । पुण्यं सुखं जीवितसंक्षये सर्वस्यदुःखस्य सुखं प्रहाणम् ॥ १२॥) काम पड़ने पर मित्रों का होना सुखकर है। जो मिले उससे सन्तुष्ट रहना सुख के उपरान्त पुण्य सुख । सभी दुःखो का ग्रहाण सुस है। । मृत्यु है धम्मपद ३३२-सुम्या मतेय्यता लोके अथो पेत्तेय्यता सुखा । सुग्खा सामञ्जता लोके अथो ब्रह्ममता सुखा ॥ १३ ॥ (सुखा मात्रीयता लोकेऽथ पित्रीयता सुखा। सुखा भ्रमणता लोकेऽथ ब्राह्मणता सुखा ॥ १३॥) ससार में माता और पिता का सेवा मुखकर है। भ्रमणभाव सन्यास) सुखकर है, और माह्मणभाव = निष्पाप होना) भी मुखकर है। ३३३-सुख यार जरा सील सुखा सदा पतिष्टिता । सुखो पचाय पटिलाभो पापान अकरण सुख ॥ १४ ॥ (सुख यावद् जरां शोलं सुखा श्रद्धा प्रतिष्ठिता। सुखः प्रशाया प्रतिलाभ पापाना अकरणं सुखम् ॥१४) वृद्धावस्था तक शील का पालन सुखकर है, स्थिर अदा का होना मुसकर है। शान का लाभ करना मुखकर है। पापों का न करना मुम्बका है। - २४–तराहावग्गो जेतवन कपिलमच्छ ३३४-मनुजस्स पमत्तचारिनो तण्हा बड्ढति मालुवा विय । सो पलवती हुराहुरं फलमिच्छं 'व वनस्मिं वानरो ॥१॥ (मनुजस्य प्रमत्तचारिणः तृष्णा वर्धते मालुवेव । स प्लवतेऽहरहः फलमिच्छन् इव वने वानरः ॥ १॥) प्रमत्त होकर विचरण करने वाले मनुष्य की तृष्णा मालुवा लता की भांति बढ़ती है। जंगल में फल की इच्छा से कूद-फांद करते वानर की तरह जन्मजन्मान्तर में भटकता रहता है। ३३५-यं एसा सहती जग्मी तण्हा लीके विसत्तिका । सोका तस्स पबढन्ति अभिवटै 'व वीरणं ॥२॥ (यं एपा साहयति जाल्मी तृष्णा लोके विषात्मिका । शोकास्तस्य प्रवर्द्धन्तेऽभिवृष्टं इव वीरणम् ।। २।।) यह विप रूपी नीत्र तृष्णा जिसे अभिभूत कर देती है उसके शोक वर्षाकाल में वीरण तृण की भांति वृद्धि को प्राप्त होते हैं। ।

धम्मपद ३३६-यो चेतं सहती जग्मिं तण्हं लोके दुरचयं । सोका ताहा पपतन्ति उदविन्दू 'व पोखरा ॥ ३ ॥ (यश्चैतां साहयति जाल्मों तृष्णां लोके दुरत्ययाम्। शोकाः तस्मात् प्रपतन्त्युदविन्दुरिव पुष्करात् ॥ ३॥) जो संसार में इस दुस्त्याज्य नीच तृष्णा को जीत लेना है, उसके शोक उस तरह गिर जाते है जैसे काल के ऊपर से जल के विन्दु । ३३७-तं वो वदामि भई वो यावन्तेत्य समागता । तण्हाय मूलं खपाथ उसीरस्थो 'व वीरणं ॥ ४ ॥ मा वो नलं व सोतो व मारो भल्जि पुनप्पुनं ।। ४ ।। (तद् वो वदामि भद्रं वो थावन्त इह समागता। तृष्णाया मूलं खनतोशीरार्थीव पीरणम् ॥ ४॥) इसलिए मैं तुम्ह, जितने यहाँ आये हुए है, तुम्हारे कल्याण के लिए कहता हूँ। तृष्णा की जर को खोदो, खस के लिए वारण घास की तरह। जलधारा जैसे सरकडे को बार-बार उस्ताद हालती है, वैसे मार तुम्हें न करे। - जतवन गूध-राकर पोतिक ३३८-यथापि मूले अनुपद्दवे दल्हे छिन्नोपि वलो पुनरेव रुहति । एवम्पि तहानुसये अनूइते निन्वति दुक्खमिदं पुनप्पुन ॥ ५ ॥ (पपाऽपि मलेऽनुपद्रये दृढ़े छिमोऽपि पृता पुनरेव रोक्षति । पपमपि कृष्णाऽनुशयनिहते निर्यतते दुपमिदं पुनः पुना ) तराहावग्गो १३९ जैसे दृढमूल के बिलकुल नष्ट न हो जाने से कटा हुआ वृक्ष फिर भी बढ़ जाता है, वैसे तृष्णा और अनुशय के समूल नष्ट न होने से यह दुःख- चक्र बार-बार प्रवर्तित होता रहता है। ३३९-यस्स छत्तिसती सोता मनापस्सवना भुमा ! वाहा वहन्ति दुट्ठिं सङ्कप्पा रागनिस्सिता ॥ ६ ॥ (यस्य पटाविंशत् स्रोतांलि मनापश्रवणानि भूयासुः । वाहा वहन्ति दुष्ठिं संकल्पा रागनिःसृताः॥ ६॥ ). जिसके छत्तीस श्रोत संसार में प्रिय पदार्थों की ओर अत्यन्त ग्रवाहित होते हैं उसके राग पूर्ण संकल्प उसे दुर्दृष्टि की ओर बहा ले जाते है। ३४०-सवन्ति सबधि सोता लता उभिज्ज तिट्ठति । तञ्च दिस्वा लतं जातं मूलं पञ्चाय छिन्दथ ॥ ७ ॥ ( नवन्ति सर्वतः स्रोतांसि लता उद्भिद्य तिष्ठति । तां च दृष्ट्वा लतां जातां, मूलं प्रज्ञया छिन्दत ॥ ७॥) यह स्रोत सभी ओर बहते हैं। लता फूट कर निकलती है। उसः उगी लता को देख उसके मूल को प्रज्ञा से काट डालो। ३४१-सरितानि सिनेहितानि च सोमनस्सानि भवन्ति जन्तुनो। ते सोतसिता सुखेसिनो ते वे जाति-जरूपगा नरा ॥ ८ ॥ ( सरितः स्निग्धाश्च सौमनस्या भवन्ति जन्तोः । ते स्रोतःसृताः सुखैपिणस्ते वै जातिजरोपगा नराः ॥)

धम्मपद
तृष्णा की धारायें प्राणियों को बड़ी प्रिय और मनोहर लगती हैं।
सुख के फेर में पड़े उसकी धारा में पढ़ते हैं और बार बार जन्म जरा
चक्र में आते हैं।
के
३४२-तसिणाय पुरक्खता पजा परिसप्पन्ति ससो व बाधितो।
सओजनसङ्गसत्ता दुक्खमुपेन्ति पुनप्पुनं चिराय ॥ ९॥
( तृष्णया पुरस्कृता प्रजा' परिसर्पन्ति शश इव .।
सयोजनसंगसका दुःखमुपेन्ति पुनः पुनः चिराय ॥६॥)
तृष्णा के पीछे पड़े प्राणी, वधे खरगोश की भाँति चक्कर काटते,
सयोजनों (= मन के वधनों) में फंसे लोग पुनः पुन चिरकाल तक
दु.ख
पाते हैं।
मजाः
३४३-तसिणाय पुरक्खता पजा परिसप्पन्ति ससो' व बाधितो ।
तस्मा तसिन विनोदये भिक्खू अफसी विरागमत्तनो ॥१०॥
(तृप्णया पुरस्कृताः
परिसर्पन्ति शश
तस्मात् तृष्णां बिनोदयेद्
भिमुराकांक्षी विरागमात्मनः ॥१०॥
तृप्या के पीछे पड़े प्राणी, बधे, सरगोश की भाँति पर काटते है।
इमलिये पैराग्य की श्राकापा रख भिक्षु मृप्या को दूर करे ।
पद्ध।
वगुवन
विभस (भि)
३४४-यो नियनथो वनाधिमुनी वनमुनो वनमेव धावति ।
त पुमालमेर पस्सथ मुत्तो बन्धनमे धावति ॥११॥

तण्हावग्गो १४१ (यो निर्वनथो वनाऽधिमुक्तो वनमुक्तो वनमेव घावति । तं पुद्गलमेव पश्यत मुक्तो बन्धनमेव धावति ॥ ११ ॥ जो सांसारिक बन्धनों से छूट वनवास करता हुआ फिर बन को छोड़ संसार-तृष्णा (वन) की ही ओर जाता है। उस पुरुप को देखो- मुक्त होकर फिर वन्धन की ओर जाता है। -- नेतवन बन्धनागार ३४५-न तं दलहं बन्धनमाहु धोरा यदायसं दारुजं बव्वजञ्च । सारत्तरत्ता मणिकुण्डलेसु पुत्तेसु दारेसु च या अपेक्खा ॥१२॥ (न तद् दृढं बन्धनमाहुर्धारा यद् आयसं दारुजं वर्वजं च । संरक्त-रक्ता मणिकुंडलेषु पुत्रेषु दारेषु च याऽपेक्षा ।। १२ ।।) ( यह ) जो लोहे लकड़ी या रस्सी का बन्धन है, उसे बुद्धिमान (जन) दृढ़ बन्धन नहीं कहते । ( वस्तुतः दृढ़ बन्धन है जो यह ) मणि, कुण्डल, पुत्र स्त्री में इच्छा का होना है। ३४६-एतं दलहं बन्धनमाहु धीरा ओहारिनं सिथिलं दुप्पमुञ्च। परिव्वजन्ति अनपेक्खिनो कामसुखं पहाय ॥ १३ ॥ एतम्पि छेत्त्वान

१४२
धम्मपद्
(एतद् रद बन्धनमाहुर्धारा
अपहारि शिथिलं दुष्प्रमोचम् ।
पतदपि छित्त्वा परियजन्त्य-
नपेक्षिणः कामसुखं प्रहाय ॥१३॥ )
धीर पुरुष इसी को हद कधन, अपहारक शिथिल और दुस्त्याम
कहते हैं;(वह) अपेक्षा रहित हो, तथा काम सुखों को छोड़, इस
(द) बन्धन को दिनकर, प्रमजित होते हैं।
राजगह ( वेणुवन)
खेमा (पिसार-मरिसी)
३४७-ये रागरनानुपतन्ति सोतं सर्व कतं मकटकों व जालं।
एतम्पि छेत्त्वान बजन्ति धीरा
अनपेक्सिनो सन्यदुक्खं पहाय ॥ १४ ॥
(ये रागरका अनुपतन्ति स्रोतः
स्वयंकतं मर्कटक प जालम् ।
एतदपि छित्त्या व्रजन्ति धीरा
अनपेक्षिणः सदुखं महाय ॥१४)
जो राग में रत, यह जैसे मादी अपने मनाये जाल में पढ़ती है,
से ही) अपने पनाये, स्रोत में परते हैं। धीर (पुरुष)इम (प्रोत)
को भी येद कर सारे दुखों को पोर भाकपा रहित हो पल देते हैं।
रा(गुचन)
उगमेन)
३५८-मुघ पुरे मुध पच्छतो मन्छे मुश भरस पारगू।
सम्म पिमुचमानसो न पुन जतिरं उपहिमि ॥१५॥

तराहावग्गो (मुंच पुरो मुंच पश्चात् मध्ये मुंच भवस्य पारगः । सर्वत्र विमुक्तमानसो न पुनः जातिजरे उपैषि ॥१५॥) आगे पीछे और मध्य की (सभी वस्तुओं को) त्याग दो, ( और उन्हें छोड़) भव (सागर) के पार हो जायो; जिसका मन चारों ओर से मुक्त हो गया, (वह ) फिर जन्म और जरा को प्राप्त नहीं होता। जेतवन (चुल्ल ) धनुगगह पंडित ३४९-वितक्कपमथितस्स जन्तुनो तिव्बरागस्स सुभानुपस्सिनो । भिय्यो तण्हा पबद्दति एसो खो दलहं करोति बन्धनं ॥१६॥ वितर्क-प्रमथितस्य जन्तोः तीवरागस्य शुभाऽनुदर्शिनः। भूयः तृष्णा प्रबर्द्धते एप खलु दृढं करोति वन्धनम् ॥१६॥ ) जो प्राणी सन्देह से मथित, तीन राग से युक्त, सुन्दर ही सुन्दर को देखने वाला है, उसकी तृष्णा और भी अधिक बढ़ती है, वह (अपनेलिए) और भी दृढ़ बन्धन तय्यार करता है। ३५०-वितक्कूपसमे च यो रतो असुभं भावयति सदा सतो । एस खो व्यन्तिकाहिनी एसच्छेच्छति मारवन्धनं ॥ १७ ॥ (वितर्कोपशमे च यो रतो ऽशुभं भावयते सदा स्मृतः। खल व्यन्तीकरिष्यति एप छेत्स्यति मारवन्धनम् ।।१७॥) बुरे विचारों के शान्त करने में जो रत है, सचेत रह (जो) अशुभ (दुनिया के अन्धेरे पहलू) की भी सदा भावना करता है, वह मार के वन्धन को छिन्न करेगा, विनाश करेगा।

धम्मपद मार जेतवन ३५१- निङ्गतो असन्तासी वीततण्हो अनङ्गणो । उच्छिज्न भवसल्लानि अन्तिमोयं समुस्सयो ॥१८॥ ( निषंगतोऽसंत्रासी वीततृष्णोऽनंगणः। उत्सज्य भवशल्यानि, अन्तिमोऽयं समुछयः ।। 11 ) जिसके (पाप पुण्य) समाप्त हो गये; जो त्रास उत्पादक नहीं है, जो तृष्णारहित और मलरहित है, वह भव के शज्यों को उखाड़ेगा, यह उसका अतिम देह है। ३५२--चीततण्हो अनादानो निरुतिपदकोविदो। अक्खरानं सन्निपातं जञा पुव्वापरानि च । चे अन्तिम्सारीरो महापञ्योति उच्चति ॥१९॥ (बीततृष्णोऽनादानो निरुतिपदकोधिदो। अक्षराणां सन्निपातं जानाति पूर्वापराणि च । सधे अन्तिमशारीरो महामास इत्युच्यते ॥१६॥ ) जो तृष्णारहित, परिग्रहरहित, भाषा और कान्य का जानकार है। और (जो) अपरों के पहिले पीछे रखने को जानता है, यह निश्चय ही भन्तिम शरीर वाला तथा महाप्राज्ञ कहा जाना है। वाराणसी से गया के रास्ते में उपक (माजीवक) ३५३-सव्याभिम् सम्वविदूहमस्मि सब्वेन्स धम्मसु अनूपलितो। सबाहो तहक्वये तम्हक्लये विमुतो सयं अभिन्नाय फमदिसेय्य ।। २० ॥ स तराहावग्गो १४५ ( सर्वाभिभूः सर्वविदहमस्मि सर्वेषु धर्मेष्वनुपलिप्तः । सर्वजहः तृष्णाक्षये विमुक्तः स्वयमभिज्ञाय कमुद्दिशेयम् ॥२०॥) मैं (राग आदि) सभी का परास्त करने वाला हूँ, (दुःख से मुक्ति पाने की) सभी (वातों) का जानकार हूँ, सभी धर्मों (= पदार्थों) में अलिप्त हूँ, सर्वत्यागी, तृष्णा के नाश से मुक्त हूँ, (विमल ज्ञान को) अपने ही जानकर (मैं अब) किसको (अपना गुरु) वतलाऊँ ? . तवन सक देवराज ३५४-सव्वदानं धम्मदानं जिनाति सव्वं रसं रसं धम्मरसो जिनाति । सव्वं रति धम्मरती जिनाति तण्हक्खयो सव्वदुक्खं जिनाति ।। २१ ।। (सर्वदानं धर्मदानं 'जयति सर्व रसं धर्मरसो जयति। सर्वा रति धर्मरतिजयति तृष्णाक्षयः सर्वदुःखं जयति ॥२॥॥) धर्म का दान सारे दानों से बढ़कर है, धर्मरस सारे रसों से प्रवल है, धर्म में. रति सब रतियों से बढ़कर है, तृष्णा का विनाश सारे दुःखों को जीत लेता है। जेतवन (अपुत्रक श्रेणी) ३५५-हनन्ति भोगा दुग्मेधं नो चे पारगवेसिनो। भोगतण्हाय दुम्मेधो हन्ति अने' व अत्तनं ॥ २२ ॥ १०

धम्मपद
(नन्ति भोगा दुर्मेधसं न चेत् पारगवेषिणः ।
भोगतृष्णया दुर्मेधा हन्त्यन्य इवात्मनः ॥ २२ ॥)
(ससार को) पार होने की कोशिश न करनेवाले दुर्युबि (पुरुष)
को भोग नष्ट करते हैं, भोग की तृष्णा में पड़कर (वह) दुर्बुद्धि पराये
की भौति अपने ही को हनन करता
है
पाण्डकम्बलशिला ( देवलोक )
३५६-तिणदोसानि खेत्तानि रागदोसा अयं पजा ।
तस्मा हि वीतरागेसु दिन्न होति महप्फलं ॥ २३ ॥
(तृपदोषाणि क्षेत्राणि रागदोपेयं प्रजा।
तस्मादि वीतरागेषु दत्तं भवति महाफलम् ॥२३॥)
सेतों का दोप तृण है, इस प्रजा (= मनुष्यों ) का दीप राग है,
इसलिये (दान) वीतराग (पुरुष) को देने में महाफल होता है ।
३५७-तिणदोसानि खेचानि दोसदोसा अयं पजा।
तस्मा हि वीतदोसेसु दिन्नं होति महप्फलं ॥ २४ ॥
(नृणदोपाणि क्षेत्राणि द्वेषदोपेयं मजा।
तस्माद्धि पीतपेषु व भवति महाफलम् ॥ २४॥)
तों का दोष तृप है, इस प्रजा का दीप प है, इसलिये धान रेप
(परहिन ) को देने में महाफल होता है।
३५८-निणदोसानि संचानि मोहदीसा अयं पना ।
तम्मा हि वनिमोहसु दिन्नं होति महमलं ॥ २५ ॥

तरहावग्गो १४७ (तृणदोपाणि क्षेत्राणि मोहदोपेयं प्रजा । तस्माद्धि वीतमोहेपु दत्तं भवति महाफलम् ।।२५।। ) खेतों का दोय तृण है, इस प्रजा का दोप मोह है; इसलिये वीतमोह (-मोहरहित) को देने में महाफल होता है । ३५९-तिणदोसानि खेत्तानि इच्छादासा अयं पजा । तस्मा हि विगतिच्छेसु दिन्नं होति महप्फलं ॥२६॥ (तृणदोपाणि क्षेत्राणि, इच्छादोपेयं प्रजा। तस्माद्धि विगतेच्छेषु दत्तं भवति महाफलम ॥२६||) खेतों का दोष तृण है, इस प्रजा का दोप इच्छा है; इसलिये विगतेच्छ इच्छारहित) को देने में महाफल होता है।

२५-भिक्खुवग्गो जनयन पान मित ३६०-चम्बुना संवरो साधु साधु सोतेन संवरो। घाणेन संवरो साधु साधु जिह्वाय संवरो ॥ १ ॥ (चतुषा संघरः साधुः, साधुः श्रोग्रेण संयरः । घाणेन सपरः साधुः साधुः जिया संवरः॥१॥) भोप का संवर ( संयम) टीक है, ठीक है कान का संग, प्राय (= नाइ) का संवर टीक है, टीक है जीम का संस। ३६१-कायेन मंबरो साधु, साधु वाचाय संगे। मनसा संवरो साधु साधु सन्चत्य संयरो। सब्यस्य संमुतो मिश्य सञ्चदुक्खा पमुधति ॥ २ ॥ (कायेन संयरमाणुः सापुर याला संपर। मनमा संपरः साधु, माधुः मर्यच संपरः । मयंत्र संगृतो मितुः मयंगात्प्रमुच्यते ।।२३) बापान मंपर (= संप:) टोटकीपन का मा मन मर, मांत्र (त्रियों) कामेर । मला-पुष शिशु मारे प्रांग र जाता।

भिक्खुवग्गो १४९ जेतवन हंसघातक ( भिन्तु) ३६२-हत्थसञतो पादसञतो वाचाय सञतो सञ्जतुत्तमो । अझत्तरतो समाहितो एको सन्तुसितो तमाहु भिक्खं ॥३॥ (हस्तसंयतः पादसंयतो वाचा संयतः संयतोत्तमः । अध्यात्मरतः समाहित एकः तन्तुष्टस्तमाहुर्भिनुम् ॥३॥) जिसके हाथ, पैर और वचनमें संयम है, (जो ) उत्तम संयमी है, जो घटके भीतर ( = अध्यात्म ) रत, समाधियुक्त, अकेला ( और ) सन्तुष्ट है, उसे भिक्षु कहते हैं। जेतवन कोकालिय ३६३-यो मुखसम्ञतो भिक्खु मन्तभाणी अनुद्धतो । अत्थं धम्मञ्च दीपेति मधुरं तस्स भासितं ।। ४ ।। ( यो मुखसंयतो भिक्षुर्मन्नभाणी अनुद्धतः । अर्थ धर्म च दीपयति मधुरं तस्य भाषितम् ॥ ४ ॥ जो मुख में संयम रखता है, मनन करके बोलता है, उद्धत नहीं है, अर्थ और धर्म को प्रकट करता है, उसका भापण मधुर होता है। । . जेतवन धम्माराम (थेर) ३६४-धम्मारामो धम्मरतो धम्मं अनुविचिन्तयं । धम्मं अनुस्सरं भिक्खु सद्धम्मा न परिहायति ॥ ५॥ (धर्मारामो धर्मरतो धर्म अनुविचिन्तयन् । धर्ममनुस्मरन् भिक्षुः सद्धर्मान्न परिहीयते ॥ ५॥)

धम्मपद धर्म में रमण करनेवाला, धर्ममें रत, धर्मका चिन्तन करते, धर्म का अनुस्मरण करते भिक्षु माचे धर्म से च्युत नहीं होता। राजगृह (बेगुवन) विपक्व सेवक ( भिस्तु) ३६५-सलाभ नातिमझेय्य, नाझेस पिहयं चरे। अझेसं पिहयं भिक्खू समाधि नाधिगच्छति ॥ ६ ॥ (स्वलाभ नातिमन्येत, नाऽन्येषां स्पृहयन चरेत् । अन्येषां स्पृहयन् भिक्षु समाधि नाधिगच्छति ॥ ६॥) अपने लाभ की अवहेलना नहीं करनी चाहिए। दूसरों के (राम) की स्पृहा न करनी चाहिये। दूसरो के (लाभकी ) स्पृहा वरनेराला भिक्षु समाधि (चित्त की एकाग्रता ) को नहीं प्राप्त करता। ३६६-अप्पलाभोपि चे भिक्खु स-लाभं नातिमनति । तं वे देवा पससन्ति सुद्धाजोविं अतन्द्रित ॥ ७ ॥ ( अल्पलाभोऽपि चे मितु स्वलामं नाऽतिमन्यते । तं देवाः प्रशंसन्ति शुद्धाऽऽजीवं अतन्दितम् ॥ ७ ॥ चाहे अल्प ही हो, भिक्षु अपने लाभकी अवहेलना न करें। उमौकी देवता प्रशसा करते है, (जो) शुद्ध जीविकावाला और बालस्यरहित है। बरसे नि ३६७-सन्यसो नाम-रूपास्मि यम्स नत्थि ममायितं । असता च न सोचति स ये भिक्खूति वुच्चति ॥ ८ ॥ (मर्यशो नामरूप यस्य नाऽस्ति ममायितम् । अमति च न शोचति सबै भिक्षुरिल्युच्यते ।। = u) भिक्खुवग्गो १५१ नाम-रूप ( = जगत ) में जिन की विल्कुल ही ममता नहीं, न होने पर (जो) शोक नहीं करता, वही भिक्षु कहा जाता है । - . जेतवन बहुतसे भिक्षु ३६८-मेत्ताविहारी यो भिक्खु पसन्नो बुद्धसासने अधिगच्छे पदं सन्तं सङ्खारूपसमं सुखं ॥ ९ ॥ ( मैत्रीविहारी यो भिक्षुः प्रसन्नो वुद्धशालने अधिगच्छेत् पदं शान्तं संस्कारोपशमं सुखम् ।। ६ ।।) मैत्री (भावना) से विहार करता जो भिक्षु बुद्धके उपदेश में प्रसन्न = श्रद्धावान् ) रहता है, वह सभी संस्कारों को शमन करने वाले शान्त (और) सुखमय पदको प्राप्त करता है। ३६९-- सिञ्च भिक्खु ! इमं नावं सित्ता लहुमेस्सति । छत्त्वा रागञ्च दोसञ्च ततो निव्वाणमेहिसि ॥ १० ॥ (सिंच भिक्षो! इमां नावं सिक्ता ते लघुत्वं एष्यति । छित्वा रागं च द्वेषं च ततो निर्वाणमेष्यसि ॥१०॥) हे भिक्षु ! इस नावको उलीचो, उलीचने पर (यह ) तुम्हारे लिये हल्की हो जायेगी। राग और द्वेप को छिन्न कर, फिर तुम निर्वाण को प्राप्त होगे। ३७०-पंच छिन्दे पञ्च जहे पञ्च चुत्तरि भावये । पञ्च सङ्गातिगो भिक्खु ओघतिण्णो' ति वुचति ॥ ११ ॥ पंच छिन्धि पंच जहीहि पंचोत्तरं भावय। पंचसंगाऽतिगो भिनुः, 'ओघतीर्ण' इत्युच्यते ।।११।।)

१५४
धम्मपद
(प्रतिसस्तारवृत्तस्याऽऽचारकुशल स्यात् ।
ततः प्रामोद्यबहुलो दुखस्याऽन्त करिष्यति ॥ १७॥ )
जो सेवा-सत्कार स्वभाव वाला तथा आचार ( पालन ) में निपुण
है, वह सानन्द दु ख का अन्त करेगा।
जेतवन
पाँच सौ मिनु
३७७-वस्सिका विय पुष्पानि मद्दवानि पमुञ्चति ।
एव रागञ्च दोसञ्च पिप्पमुञ्चेथ भिक्खयो ।। १८ ॥
( वर्षिका इव पुष्पाणि मर्दितानि प्रमुंचति |
एवं रागं च द्वेपं च विप्रमुंचत भिक्षव ॥ १८ ॥ )
जैसे जूही कुम्हलाये फूलो को छोड़ देती है, वैसे ही हे भिक्षुओ।
(तुम) राग और द्वेप को छोड़ दो।
(शान्तकाय थेर)
३७८-सन्तकायो सन्तवाचो सन्तवा सुसमाहितो ।
वन्तलोकामिसो भिक्खु उपसन्तो 'ति चुच्चति ॥ १९ ॥
(शानकायो शान्तवाक शान्तिमान् सुसमाहित ।
धान्नलोकाऽऽमिपो भितु 'उपशान्त' इत्युच्यते ॥ १०॥
काया । और ) पचन से शान्त, भरी प्रकार समाधियुन्न, शान्ति
सहित (तथा ) लाफके आमिपको दमन
कर दिये हुए भिक्षु
'उपशान्त' कहा जाता है।
-
जेठवन
जवन
लगून (पर)
३७९-अत्तना चादय चान पटिवासे
पटिवासे अचमचना ।
मा अचगुणे सतिमा मुख भिक्षु विहाहिसि ॥ २० ॥

भिक्खुवग्गो
१५५
( आत्मना चोदयेदात्मानं प्रतिवसेदात्मानं आत्मना ।
स आत्मगुप्तःस्मृतिमान् सुखं भिक्षो! विहरिष्यसि ॥२०॥)
(जो) अपने ही आपको प्रेरित करेगा, अपने ही श्रापको संलग्न
करेगा; वह आत्म-गुप्त (= अपने द्वारा रक्षित ) स्मृति-संयुक्त भिक्षु
सुखसे विहार करेगा!
३८०-अत्ता हि अत्तनो नाथो अता हि अत्तनो गति ।
तस्मा सञ्जमयत्तानं अस्सं भद्रव वाणिजो ॥ २१ ॥
(आत्मा ह्यात्मनो नाथ आत्मा ह्यात्मनो गतिः ।
तस्मात् संयमयात्मानं अश्वं भद्रमिव वणिक ॥ २१ ॥)
मनुष्य अपने ही अपना स्वामी है, अपने ही अपनी गति है।
इसलिये अपने को संयमी बनावे, जैसे कि सुन्दर घोड़े को बनिया
(संयत करता है)।
.
राजगृह ( वेणुवन )
वक्कलि ( थेर)
३८१-पामोज्जबहुलो भिक्खु पसन्नो वुद्धसासने ।
अधिगच्छे पदं सन्तं सङ्खारूपसमं सुखं ॥ २२ ॥
(प्रामोद्यवहुलो मिनुः प्रसन्नो वुद्धशासने ।
अधिगच्छेत् पदं शान्तं संस्कारोपशमं सुखम् ॥ २२ ॥ )
बुद्ध के उपदेश में प्रसन्न बहुत प्रमोदयुक्त भिक्षु संस्कारों को
उपशमन करनेवाले सुखमय शान्त पदको प्राप्त करता है।
श्रावस्ती (पूर्वाराम )
सुमन ( सामणेर)
३८२-यो ह वे दहरो भिक्खु युञ्जति बुद्धसासने ।
सो इमं लोकं पभासेति अब्मा मुत्तो' व चन्दिमा ॥ २३ ॥

१५६
धम्मपद
(यो ह वै दहरो भिनुयुके बुद्धशासने ।
स इमं लोकं प्रभासयत्यनान् मुक्त इव चन्द्रमा ॥२३॥)
जो भिक्षु यौवनमें बुद्ध-शामन (= वुद्धोपदेश, धुद्ध-धर्म) में सलग्न
होता है, वह मेघ से मुक्त चन्द्रमा की भांति इस लोक को प्रकाशित
करता है।

२६-ब्राह्मणवग्गो जेतवन (एक बहुत श्रद्वालु ब्राह्मण ) ३८३-छिन्द मोतं परकाम काम पनुद ब्राह्मण ! | संखारानं खयं अत्वा अकतसि ब्राह्मण ! || १ || (हिन्धि स्रोतः पराक्रम्य कामान् प्रणुद ब्राह्मण । संस्काराणां क्षयं ज्ञात्वाऽकृतज्ञोऽसि ब्राह्मण ! ॥ १॥) (तृष्णा रूपी) धारा को काट दो। पराक्रम करो। हे ब्राह्मण ! कामनाओं को दूर करो। हे ब्राह्मण ! संस्कारों के नय को जान कर अकृत = निर्वाण का साक्षात्कार कर लोगे । जेतवन ( बहुतसे भिक्षु । ३८४-यदा द्वयेसु धम्मेसु पारगू होति ब्राह्मणो । अथस्स सव्वे संयोगा अत्थं गच्छन्ति जानतो ॥ २ ॥ ( यदा द्वयोधर्मयोः पारगो भवति ब्राह्मणः। अथाऽस्य सर्वं संयोगा अस्तं गच्छन्ति जानतः ॥ २॥) जब धर्माभ्यासी (समथ और विदर्शना इन) दो धर्मों में सिद्ध हो जाता है तब उस ज्ञानी के सभी बन्धन अस्त हो जाते हैं।

१५८
धम्मपद
जेतवन
मार
३८५-यस्स पारं अपार वा पारापारन विज्जति ।
वीतहरं विसञ् जुत्त
तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥ ३ ॥
(यस्य पार अपारं वा पारापारं न विद्यते ।
बीतदरं विसंयुक्त तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥ ३ ॥
जिसके पार ( = आँख, कान, नाक, जीभ, काया, मन), अपार
(= रूप, शब्द, गध, रस, स्पर्श, धर्म) और पारापार (= में और मेरा)
नहीं है, (जो) निर्भय और अनासक्त है, उसे में ब्राह्मण कहता है ।
जेतवन
( कोई मालप)
३८६-मायिं विरजमासीन कतकिच्चं अनासव ।
उत्तमत्थ अनुप्पत्त तमहं ब्रूमि ब्राह्मण ।। ४ ॥
। ध्यायि विरजमासी कृतकृत्यं अनास्रयम् ।
उत्तमार्थमनुप्राप्तं नमहं प्रवीमि ब्राह्मणम् ॥ ४॥)
(जो ) ध्यानी, निर्मल, आसन रद्ध (= स्थिर), कृतकृत्य, मानव
(=चित्तमल) रहित है, जिसने उत्तम अर्थ (= सत्य) को पा लिया
है, उमे में ग्राह्मण कहता है।
भारती ( पूराम)
भानन्द (2)
३८७-दिवा तपति आदिचो रति आभाति चन्दिमा ।
सनद्धो बत्तियो तपति मायी तपति मासणो ।
अथ मनमहोरति बुद्धो तपति तेजसा ॥ ५ ॥

ब्राह्मणवग्गो १५९ (दिवा तपत्यादित्यो रात्रावाभाति चन्द्रमा । सन्नद्धः क्षत्रियस्तपति ध्यायी तपति ब्राह्मणः । अथ सर्वमहोरात्रं वुद्धस्तपति तेजसा ॥ ५ ॥) दिनमें सूर्य तपता है, रातको चन्द्रमा प्रकाशता है, कवचबद्ध ( होने पर ) क्षत्रिय तपता है, ध्यानी ( होनेपर ) ब्राह्मण तपता है, और बुद्ध रात-दिन ( अपने ) तेजसे सब (से अधिक ) तपते हैं। । जेतवन { कोई प्रव्रजित ३८८-वाहितपापो 'ति ब्राह्मणो समचरिया समणो ति वुचति । पव्वाजयम त्तनो मलं तस्मा पब्बजितो, ति वुचति ॥ ६ ॥ (वाहितपाप इति ब्राह्मणः समचर्यः श्रमण इत्युच्यते । प्राब्रजयन्नाऽऽत्मनो मलं तस्मात् प्रणजित इत्युच्यते ॥ ६॥) जिसने पाप को (धोकर ) वहा दिया वह ब्राह्मण है, जो समताका आचरण करता है, वह समण (=श्रमण = संन्यासी) है, (चूंकि ) उसने अपने (चित्त-) मलॉको हटा दिया, इसीलिये वह प्रवजित कहा जाता है। जेतवन सारिपुत्त (थेर) ३८९-न ब्राह्मणस्स पहरेय्य. नास्स मुंचेथ ब्राह्मणो । घि ब्राह्मणस्स हन्तारं ततो घि यस्स मुञ्चति ॥ ७ ॥ (न ब्राह्मणं प्रहरेत् नाऽस्मै मुञ्चेद् ब्राह्मणः । धिग् ब्राह्मणस्य हन्तारं ततो धिग यस्मै मुंचति ॥॥) ब्राह्मण (= निष्पाप ) पर प्रहार नहीं करना चाहिये, और ब्राह्मण धम्मपद को भी उस (प्रहारदाता ) पर (कोप) नहीं करना चाहिये । ब्राह्मण को जो मारता है उसे धिक्कार है, और धिक्कार उसको भी है जो ( उसके लिये ) कोप करता है। ३९०-न ब्राह्मणात्सेतदकिच्चि सेग्यो यदा निसेधो मनसो पियहि । यतो यतो हिंसमनो निववति ततो ततो सम्मति एव दुक्खं ॥ ८ ॥ (न ब्राह्मणस्यैतद् अकिंचित् श्रेयो यदा निषेधो मनसा प्रियेभ्यः। . यतो यतो हिंसमनो निवर्तते ततस्ततः शाम्यत्येव दुःपम् ॥ ८॥) माह्मण के लिये यह बात कम कल्याण ( कारी) नहीं है, जो या प्रिय (पदार्थो) से मन को हरा लेता है, जहाँ जहाँ मन हिंसा में मुदता है, यहाँ यहाँ दु.स ( अश्य ) ही शान्त हो जाता तवन महारजापति गोमती ३९१-यस्य कायेन वाचाय मनसा नत्धि दुक्कते। संवुतं तीहि टानेहि तमहं ममि ब्राह्मणं ॥ ९ ॥ (यस्य कायेन याचा मनसा नाऽस्ति दुप्पतम्। संवृतं प्रिमिः स्थान, तमहं प्रयोमि ग्रामपम |) प्रिमो मन, परन और कार्य से दुपत (Dपा) नहीं होते, (ोहन ) नीनों ही स्थानों में सर (सयम -युटी, गं में माम करता है।

ब्राह्मण्वग्गो १६१ जेतवन सारिपुत्त (थेर) ३९२-यम्हा धम्म विजानेय्य सम्मासम्बुद्धदेसितं । सकच्चं तं नमस्सेय्य अग्गिहुत्तं 'व ब्राह्मणो ।। १० ॥ ( यस्माद् धर्म विजानीयात् सम्यक्-संबुद्ध-देशितम् । सत्कृत्य तं नमस्येद् अग्निहोत्रमिव ब्राह्मणः ॥ १०॥) जिस ( उपदेशक ) से सम्यक्संबुद्ध (बुद्ध) द्वारा उपदिष्ट धर्म को जाने, उसे ( वैसे ही) सत्कार-पूर्वक नमस्कार करे, जैसे अग्निहोत्र को ब्राह्मण । जेतवन जटिल ब्राह्मण ३९३-न जटाहि न गोत्तेहि न जच्चा होति ब्राह्मणो । यम्हि सच्चञ्च धम्मो च सो सुची सो च ब्राह्मणो.॥ ११ ॥ (न जटाभिर्न गोत्रैर्न जात्या भवति ब्राह्मणः । यस्मिन् सत्त्यं च धर्मश्च स शुचिः स च ब्राह्मणः॥११॥) न जटासे, न गोत्रसे, न जन्मसे ब्राह्मण होता है, जिसमें सत्त्य और धर्म हैं, वही शुचि ( पवित्र ) और वही ब्राह्मण है वैशाली ( हागारशाला) (पाखंडी ब्राह्मण) ३९४-किं ते जटाहि दुम्मेध ! किं ते अजिनसाटिया । अब्भन्तरं ते गहनं वाहिरं परिमज्जसि ॥ १२ ॥ (किं ते जटाभिः दुर्मेध ! किं तेऽजिनशाट्या। आभ्यन्तरं ते गहन वाहिः परिमार्जयसि ? ॥ १२॥)

१६२ धम्मपद है दुर्बुद्धि ! जटाओंसे तेरा क्या ( बनेगा), (और) मृगचर्मके पहिननेसे तेरा क्या ? भीतर (दिल) तो तेरा ( राग आदि मलोसे) परिपूर्ण है, बाहर क्या धोता है। किसा गोमती राजगृह (गृभक्ट) ३९५-पंसुकूलधर जन्तुं । किसं धमनिसन्थतं। एकं वनस्मिं झायन्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥ १३ ॥ (पांशुक्लधरं जन्तुं कृशं धमनिसन्ततम् । एकं वने ध्यायन्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥ १३॥) जो प्राणी फटे चीथदौको धारण करता है, जो नसोंसे मदे शरीरवाला है, जो अकेला वनमें ध्यानरत रहता है, उसे मैं माझा करता हूँ। दुबला पतला और बेतवन (एक प्रावण) ३९६-न चाहं ब्राह्मणं ब्रूमि योनिज मचिसम्भवं । 'भो वादि' नाम सो होति स चे होति सकिञ्चनो। अकिन्चनं अनादानं तमहं ब्र.मि ब्राह्मणं ॥१४॥ (न चाऽहं ब्राह्मणं प्रवीमि योनिज मातृसम्भवम् । 'भो पादीनाम स भवति स वैभवति सचिना। अकिंचनं अनादानं तमहं प्रवामि ग्राह्मणम् ॥१४३) माता की योनि से उत्पय होने के कारण किसी को मैं माम नहीं भवा । यदि यह सम्मा हो तो लोग ( भले हो ) उसे ( सम्मानपूर्पक) ब्राझणवग्गो १६३ 'भो' कह कर पुकारें । मैं तो ब्राह्मण उसे कहता हूं जो अपरिग्रही और त्यागी है। राजगृह ( वेणुवन) उग्गसेन (मेष्ठीपुत्र; ३९७-सव्वसञोजनं छेत्त्वा यो वे न परितस्सति । सङ्गातिगं विसङ्घत्तं तमहं व मि ब्राह्मणं ॥ १५ ॥ ( सर्वसंयोजनं छित्त्वा यो वै न परित्रस्यति । संगाऽतिगं विसंयुक्त तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥ १५ ।।) जो सारे संयोजनों (=बंधनों) को काटता है, जो कि भय नहीं खाता, जो संग और आसक्ति से विरत है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ जेतवन (दो ब्राक्षण) ३९८-छेत्त्वा नन्दिं वरत्तञ्च सन्दामं सहनुक्कमं। उक्खित्तपलि बुद्धं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।। १६ ॥ (छित्त्वा नन्दि रत्रां च सन्दानं सहनुक्रमम् । उत्क्षिप्तपरिघं बुद्धं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥ १६ ॥ ) नद्धि, रस्सी, पगहे और जाले को काट, जूए को फेंक जो बुद्ध हुआ उसे में ब्राह्मण कहता हूँ। राजगृह ( वेणुवन ) (अकोस) भारद्वाज ३९९-अक्कोसं बधबन्धञ्च अदुट्ठो यो तितिक्खति । खन्तिबलं बलानीकं तमहं व मि ब्राह्मणं ।। १७ ॥

२६४ धम्मपद , में (अक्रोशन् बध-बंध च अदुष्टो यस्तितिक्षति । क्षान्तिबलं चलानीकं तमह प्रवीमि ब्राह्मणम् ॥ १७॥) जो विना दूपित (चित्त) किये गाला, बध और बधन को सहन करता है, समा बल ही जिसके बल (= सेना) का सनापति है, उसे ब्राह्मण कहता हूँ। राजगृह ( वेणुवन) सारिपुत्त (और) १००-अकोधन वतवन्त सीलवन्त अनुस्सुत । दन्त अन्तिमसारीर तमह ब्रूमि ब्राह्मण ॥ १८ ॥ (अक्रोधन व्रतवन्तं शीलवन्त अनुश्रुतम् । दान्त अन्तिमशरीर तमह ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥ १८ ॥) जो अमोधी, प्रता, शालवान्, बहुश्रुत, सयमा (= दान्त) और अन्तिमशरीर वाला है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ राजगूर [ देणुवन) उम्पलवएम थेरी] १०१-बारि पोक्खरपत्ते व आरम्गेरिव सासपो। यो न रिप्पति कामेसु तमह न मि ब्राह्मण ॥ १९ ॥ (वारि पुष्करपन इव, पाराम इव सर्पपः। यो न लिप्यते कामेषु तमह प्रबोमि ब्राह्मणम् ॥१६॥) कमलके पते पर जल, और भारे के नोक पर सरमा का भौति ओ भोगों में लिस नहीं होता, उम में माह्मण कहता हूँ। तपन (कोई मामणो) ४०२-यो दुक्खस्स पजानाति इधेव म्पयमचना। पनभार विसत्त तमह प्रमि प्रामण ॥ २० ॥ -- ब्राह्मण्वग्गो १६५ ( यो दुःखस्य प्रजानातीहैव क्षयमात्मनः । पन्नभारं विसंयुक्त तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२०॥). जो यहीं (= इसी जन्म में ) अपने दुःखोंके विनाशको जान लेता है, जिसने अपने बोझको उतार फेंका. और जो आसक्तिरहित है, उसे में ब्राह्मण कहता हूँ। राजगृह ( गृध्रकूट) खेमा (मिमी) ४०३-गम्भीरपञ्च मेधावि मम्गामग्गस्स कोविदं । उत्तमत्थं अनुप्पत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥ २१ ॥ ( गंम्भीरप्रज्ञ मेधाविन मार्गामार्गस्य कोविदम् । उत्तमार्थमनुप्राप्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२१॥) जो गम्भीर प्रज्ञावाला, मेधावी, मार्ग-ग्रमार्ग का ज्ञाता, उत्तम पदार्थ = सत्य) को पायें है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ। जेतवन ( पभारवासी ) तिस्स (येर) ४०४-असंसठं गहठेहि अनागारेहि चूभयं । अनोकसारि अप्पिच्छं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥ २२ ॥ (असंसृष्ट गृहस्थैः अनागारेश्चोभाभ्याम् । अनोकसारिणं अल्पेच्छं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२०॥) घरवाले (-गृहस्थ) और घरवाले दोनों ही में जो लिप्त नहीं होता, जो बिना ठिकाने के घूमता तथा अल्पेच्छ है, उसे मैं ब्राह्मा कहता हूँ।

१६६ धम्मपद बेतवन ( कोई भिदु) १०५-निधाय दण्डं भूतेषु तसेसु थावरेसु च । यो न हन्ति न घातेति तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥ २३ ॥ (निधाय दण्ड भूतेषु स्थावरेषु च । यो न हन्ति न घातयति तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२३॥) चर-अचर (सभी)प्राणियों में प्रहारविरत हो, जो न मारता न मारने की प्रेरणा करता है, उसे मै ब्राह्मण कहता हूँ। - जेतवन चार श्रामणेर ४०६-अविरुद्ध विरुद्धेसु अत्तदण्डेसु निबुतं । सादानेसु अनादान तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥ २४ ॥ (अविरुद्ध विरुद्धसु अत्तदण्डेसु निबुतं । सादानेवानादान तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२४॥) जो विरोधियों के पीच विरोधरहित रहता है, जो दण्डधारियों बीच ( दण्ड-) रहित है, सग्राहियों में जो सप्रहरहित है, उसे में ग्रामय कहना हूँ। राजगृ (वेणुवन) मान्यक (थेर) ४०७-यस्स रागो च दोसो च मानो मक्खो च पातितो। सासपोरिव श्रारा तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।। २५ ॥ (यस्य राग द्वेषध मानोब्रशव पातितः। सर्पप घाराप्रात् नमाह प्रवीमि प्राह्मणम् ।।२५।)

ब्राह्मण्वग्गो द्वेष, आरे के ऊपर सरसो की भाँति, जिसके (चित्त से) राग, मान, डाह, फेंक दिए गये हैं, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ। राजगृह ( वेणुवन) पिलिन्द ( वच्छ थेर) ४०८-अफकासं विनापनि गिरं सचं उदीरये। याय नाभिसजे किञ्चि तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ||२६|| ( अकर्कशां विज्ञापनी गिरं सत्त्यां उदीरयेत् । यया नाऽभिपजेत् किंचित् तमहं ब्रवीमि ग्राह्मणम् ॥२६॥ ) (जो इस प्रकार की) अकर्कश, सार्थक ( तया) सच्ची वाणां को योले; कि जिससे कुछ भी पीढा न होवे, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ। जेतवन कोई स्थविर ४०९-यो'धदी वा रस्सं वा अणुं थूलं मुभानुभं। लोके अदिन्नं नादियते तमहं वृमि ब्राह्मणं ॥२७॥ ( यरह दीर्घ वा द्वस्वं वाऽणं स्थूलं शुभाशुभम् । लोकेऽदत्तं नादत्ते तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२७॥) (चीन) चाहे दी हो या हुस्य, मोटी हो या पतली, गुन हो या अमुम, जो संसार में किसी भी) चिना दी गई जीत को नहीं लेता दसे में माता दनाई।

१६८ धम्मपद (आशा यस्य न पिद्यन्तेऽस्मिन् लोके परस्मिन् च । निराशयं विसंयुक्त तमहं ब्रमीमि ब्राह्मणम् ॥२८il इस लोक और परलोक के विषय में जिसकी धाशायें (= चाह) नहीं रह गई है, जो आशारहित और श्रासतिरहित है, उसे में ग्राह्मण जेतवन महामोग्गलान (2) ४११-यत्सालया न विनन्ति अमआय अर्थकथी। अमतोगधं अनुप्पत्तं तमहं चूमि ब्राह्मणं ॥२९॥ ( यस्याऽऽलया न विद्यन्त आशायाऽकथंकथी। अमृतायगाधमनुप्राप्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥REn) जिमे सृष्णा (= भालय) नही है, जो जानकर सायरहित होगया है तथा जिमने पैठकर भमृत पद निर्याण को पा लिया है उसे में ग्रामय करता हूँ। यावस्ती ( पूर्वागम) नरत (र) ५१२-यो'ध पुनश्च पापन उभो सङ्ग उपचगा । असोकं विरजं मुद्ध तमहं प्रमि प्राह्मणं ॥३०॥ (यद पुण्यं च पापं चोमयोः संग उपात्यगात् । अयोर्क शिरजं गुरं नमहं प्रयीमि ब्राह्मम् ॥३०) निसने पात पुरय और पार दोनों में भामन्दिो पोर दिया, जो गोमति, निमंस, मे में पाप मता। प्रार ब्राह्मणवग्गो १६९ जैतवन चन्दाम (थेर) ४१३-चन्दं व विमलं सुद्धं विप्पसन्नमनाविलं । नन्दीभवपरिक्खीणं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ||३१|| (चन्द्रमिव विमलं शुद्धं विप्रसन्नमनाविलम् । नन्दीभवपरीक्षीणं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३१॥ जो चन्द्रमा को भांति विमल, शुद्ध, स्वच्छ = अनाविल है (तया- जिसकी) सभी जन्मोंकी तृष्णा नष्ट हो गई है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ। कुण्डिया ( कोयलि ) सीवलि (थेर) ४१४- यो इमं पलिपथं दुग्गं संसारं मोहमञ्चगा। तिण्णो पारतो झायी अनेजो अकथंकथी। अनुपादाय निबुतो तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३२॥ ( य इमं प्रतिमथं दुर्ग संसारं मोहमत्यगात् । तीर्णः पारगतो ध्याय्यनेजोऽकथंकथी। अनुपादाय निवृतः तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३२॥) जिसने इस दुर्गम संसार, (=जन्म मरण ) के चक्कर में डालनेवाले मोह (रूपी) उलटे मार्ग को त्याग दिया, जो ( संसार से) पारंगत, ध्यानी तथा तीर्ण (= तर गया) है, उसे मैं ब्राह्मण कहता । । नेतवन सुन्दर समुह (धेर) ४१५-यो 'ध कामे पहत्त्वान अनागारो परिव्बजे। कामभवपरिक्खीणं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३३॥ - १७० धम्मपद . (य इह कामान् महाया नागारः परिव्रजेत् । कामभवपरिक्षीणं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३३॥) जो यहाँ भोगों को छोड़, बेघर हो प्रवजित (=संन्यासी ) हो गया जिसके भोग और जन्म नष्ट हो गये, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ। राजगृह ( वेणुवन) जटिल (धेर) ४१६-यो 'ध तण्हं पहत्त्वान अनागारो परिव्बजे । तण्हाभवपरिक्खीणं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३४॥ ( य इह तृष्णां प्रहायाऽनागारः परिव्रजेत् । तृष्णाभवपरिक्षीणं तमहं प्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३४॥) जो यहाँ तृष्णा को छोद, बेघर बन प्रव्रजित है, जिसकी तृष्णा और (पुनर् ) जन्म नष्ट हो गये, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ। L (भूतपूर्व नट भितु) राजगृह ( वेणुवन) ४१७-हित्त्वा मानुसकं योगं दिव्यं योगं उपञ्चगा । सब्ययोगविषयुत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३५|| ( हित्त्वा मानुपर्क योग दिव्यं योग उपात्यगात् । सर्वयोगविसंयुक्त तमहं प्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३५॥) जो मनुष्य के बन्धनों को छोड़, दिव्य बन्धनों को भी छोड़ चुका सभी यन्धनों से रहित उमे में प्राह्मण कहता हूँ । ४१८-हित्त्वा रतिश्च अरतिञ्च सीतिभूतं निरूपधि । सब्बलोकाभिमुं वीरं तमहं धूमि ब्राह्मणं ॥३६॥ (हित्त्या रति चाऽरतिं च शीतिभूतं निरूपधिम् । सर्यलोफाऽमिभवं वीरं तमहं ग्रामि ब्राह्मणम् ॥३६॥) है वादगवगो १७१ संतोप-असंतोप की वात दोड़ जो शान्त और परिग्रहरहित हो चुका उस सर्वलोकविनयी वीर को मैं ब्राह्मण कहता है। राजगृह ( वेमुक्न) वङ्गीत (थेर) ४१९-चुति यो वेदि सत्तानं उपपत्तिञ्च सब्बसो । असत्तं सुगतं वुद्धं तमहं वृमि ब्राह्मणं ॥३७॥ ( च्युति यो वेद सत्त्वानां; उपपत्ति च सर्वशः। असतं सुगतं बुद्धं तमहं प्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३७॥) जो प्राणियों की च्युति(= मृत्यु) और उत्पत्तिको भली प्रकार जानता है, (जो) आसक्तिरहित सुगत (=सुन्दर गतिको प्राप्त ) और बुद्ध (=ज्ञानी ) है, उसे मैं बाहरण कहता हूँ। ४२०-यास गतिं न जानन्ति देवा गन्धवमानुसा। खीणासवं अरहन्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३८॥ (यस्य गतिं न जानन्ति देव-गंधर्व-मानुषाः। क्षीणावं अरहन्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३८॥) जिसकी गति (= पहुँच) को देवता, गंधर्व, और मनुष्य नहीं जानते, जो क्षीणानव (=रागादिरहित ) और अर्हत् है उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ। राजगृह ( वेणुवन) 'धम्मदिन्ना (थेर) ४२१-यस्स पुरे च पच्छा च मञ्झे च नत्थि किञ्चनं । अकिञ्चनं अनादानं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥३९॥ ( यस्य पुरश्च पश्चाच्च मध्ये च नाऽस्ति किंचन । अकिंचन आनादान तमहं प्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३६।।)

१७२ धम्ममद जिसके पूर्व और पश्चात् और मध्यमें कुछ नहीं है, जो परिग्रहरहित आदानरहित हैं उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ। जेतवन मगुलिमाल ( थेर) ४२२-उसभं पवरं वीरं महेसिं विजिताविनं। अनेज नहातकं बुद्धं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥४०॥ (ऋषभ प्रवरं वीरं महर्षि विजितवन्तम् । अनेजं स्नातकं वुद्धं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥४०॥) (जो) ऋषभ (= श्रेष्ठ), प्रवर, धीर महर्षि, विजेता अकम्प्य, स्नातक और बुद्ध है, उसे मैं बृह्मण कहता हूँ। जेतवन देवहित (बाहाण) ४२३-पुब्बेनिवासं यो वेदि मग्गापायञ्च पस्सति । अथो जातिखयं पत्तो अभिजावोसितो मुनि । सन्यवोसितबोसानं तमहं व्रमि ब्राह्मणं ॥४१|| (पूर्वनिवासं यो वेद स्वर्गाऽपायं च पश्यति । अथ जातिक्षयंप्राप्तोऽमिसाव्यवसितो मुनिः। सर्वव्यवसितम्यवसान तमहं प्रवीमि ग्राह्मणम् ॥४५॥) जो पूर्वजन्म को जानता है, स्वर्ग और नरक को जिसने देख लिया है, जिसका पूर्वजन्म पीण हो चुका है, जिसकी प्रज्ञा पूर्ण हो पुकी है, जिसने अपना सब कुछ पूरा कर लिया है, उसे में माह्मण कहता हूँ।

बोधिनी , गाथा १ धम्मा = चित्तकी प्रवृत्तियाँ। 'मन' शब्द से यहाँ अर्थ है अच्छे या बुरे चित्तों का । साधु महात्मा को देखकर श्रद्धालु उपासक को दान देने का चित्त-मन उत्पन्न होता है । अथवा, शत्रु को देखकर शत्रु को उसकी हिंसा करने का चित्त उत्पन्न होता है, इत्यादि । दान देने के चित्त के साथ श्रद्धा, स्मृति, त्यागभाक मैत्री आदि अच्छी २ प्रवृत्तियाँ (= चैतसिक ) उत्पन्न होती है । उसी तरह, हिंसा करने के चित्त के साथ मोह, निर्लजता, द्वष, अभिमान आदि बुरी २ प्रवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। अभिधर्म के अनुसार चित्त ८९ हैं, और चैतसिक ५२ । गाथा ७-८ सुभानुपस्सी-असुभानुपस्सी ~ संसार की आकर्षक चीजों को देख उनमें जो रस लेता है उसे 'सुभानुपस्सी' कहते हैं । और जो उनके प्रति वैराग्य उत्पन्न करता है उसे 'असुभानुपस्सी' कहते हैं। उदाहरणार्थ, 'सुभानुपस्सी' मूढ़ मनुष्य स्त्री-रूप को देखकर उसे बड़ा सुन्दर और सुखद समझता है; किंतु ज्ञानी 'असुभानुपस्सी' उसे माँस, हड्डी लहू, मल, मूत्र, आदि गन्दगियों से भरा देखता है । गाथा ९--अनिकसावो कासावं-पहले 'कसाव' शब्द का अर्थ है 'चित्त-मल', और दूसरे का अर्थ है 'काषाय वस्त्र' । गाथा ३१-संयोजन = सांसारिक बन्धन ।

( १७४ ) सयोजन दस हैं, जिनसे बद्ध प्राणी आवागमन के चक्र से नहीं छूटता । पहले पाँच सयोजनों को 'नीचे वाले' (=ओरभागियानि ) और दूसरे पाँच को 'ऊपर वाले' (= उद्धभागियानि ) बन्धन कहते हैं । यहाँ 'अणु' और 'स्थूल, संयोजनों से अर्थ इन्हीं से है। पहले तीन संयोजन हैं-) सकायदृष्टि = अात्मा के होने में विश्वास, ( २ ) विचिकित्सा = संदेह,(३) शीलवतपरामर्श = स्नान तीर्थाटनादि बाह्य प्राचारों से ही केवल मुक्ति पा लेने में विश्वास ! योगा- भ्यास से अनित्य-अनात्म-दुःख का साक्षात्कार कर जिसने इन दोनों का प्रहाण कर दिया है उसे श्रोतापन्न कहते हैं, क्योंकि वह मोदगामी धारा में चला आया है। वह अधिक से अधिक सात जन्म ग्रहण करेगा। इसी के भीतर वह अवश्य निर्वाण पा लेगा। इसके बाद के दो संयोजन हैं-(४) कामच्छन्द = विषयकामना, और (५) व्यापाद देष। इन दो संयोजनों को अत्यन्त दुर्बल करके योगी सहदागामी पद प्राप्त करता है। मरकर वह एक बार फिर मनुष्य-योनि ग्रहण करता है, और निर्वाण प्राप्त कर लेता है। इन्हीं दो संयोजनों को यदि उसने सर्वथा प्रहाण कर दिया तो वह अनागामी हो पाता है, तब वह मरकर किसी देवलोक में षन्म ग्रहण करता है, और वहीं उप से उपतर अवस्याओं फो प्राप्त होता हुया निवारण पा लेता है। आगे के पांच संयोजन है-(.)रूपराग, (७) अपराग- रूपावर और अरूपापचर योग की दो भूमियाँ है, उनमें भी तृप्पा परना बन्धन है। (८) मान, (1) औरत्य-चनलता और ( १०) भरिया । इनरामी पर्वथा प्रहार कर योगी अर्हत हो पाता है। योज.

( १७५ ) तृष्ण हो जाने के कारण उसके कर्म दग्धबीन की तरह, विपाक = फल उत्पन्न नहीं करते। शरीरत्याग के बाद वह फिर जन्म ग्रहण नहीं करता, आवागमन से युक्त हो जाता है। श्रोतापन्न से विल्कुल अर्हत् होने की एक अवस्था पहले, तक प्राप्त सन्तको सेख - शैक्ष कहते हैं, क्योंकि उसे अभी कुछ और सोखना बाकी रहता है । जब वह सभी कुछ सीखकर पूर्ण सिद्ध कृतकृत्य अर्हत् हो जाता है , तब उसे असेख = अशैक्ष कहते हैं, क्यों कि उसे अब कुछ सीखना बाकी नहीं है। श्रोतापन्न होने से पूर्व अावागमन के चक्र में पढ़े सभी को पुथुजन = पृथक् जन कहते हैं। गाथा ४४--सेख = शैन । देखिए गाया ३१ । गाथा ४५----मृत्यु-पाप का अविपति 'मार' है। वही मृत्यु का भी द्योतक हैं । जो पाप से सर्वथा मुक्त हो गया वह मृत्युञ्जय है, क्योंकि वह आवागमन के चक्र से छूट गया है । गाथा ४8-वैसे ही मुनि...इसका अर्थ यह है कि मिनु चुप- चाप अघोष्टि किए गाँव में भिक्षाटन करे, अपनी ओर से किसी को कोई कष्ट होने न दे। गाथा ६९-विपाक-कर्मफल । जब तक किसी की अविद्या ग्रन्थि प्रहीण नहीं हुई है तब तक उमके अच्छे या बुरे कर्मों के संस्कार जमा होते रहते हैं, जिनके अनुमार पुनर्जन्म में उसकी गति होती है। इसे कर्म-बन्ध कहते हैं। यही कम का 'विपाक' है। गाथा ७०-महीन महीने पर...इसका अर्थ यह है कि केवल - ( १७६ ) उपवासादि कठिन व्रतो के पालन करने से चित्त की शुद्धि नहीं होती। चित्त की शुद्धि तो योगाभ्यास से धर्म का साक्षात्कार करने से. ही होती है। उपवासादि का ढोंग रच कर जो दूसरों पर प्रभाव डालना चाहते हैं उनसे सावधान रहना चाहिए । गाथा ५-उस पार = निर्वाण । किनारे ही किनार = सत्काय दृष्टि वाले सिद्धान्तों में पड़े रहते हैं । अर्थ यह है कि बहुत लोग मुक्ति २ की रट लगाते हैं, किंतु आनन्द और सुख को तृष्णा को त्याग नहीं सक्ते । यह सुनकर कॉप जाते हैं कि निर्वाण में उनका सर्वथा निरोध हो जायगा । इस कारण वे मुक्ति की तरह २ की कल्पना करते हैं जिसमें वे किसी स्थिर, मुखी, एकरस स्थितिका लाभ करना चाहते हैं। वे उस पार जाने वाले नहीं हैं। गाथा ८९--सम्बोध्यङ्ग-सात हैं-(१) स्मृति सतत जागरूकता (२) धर्मविचय-सत्यजिज्ञासा, (३) वीर्य = धर्माभ्यास में उत्साह, (४) प्रीति = एकाग्रता जनित चित्त का अहाद, (५) प्रश्रन्धि=वित्त की परम शाति, (६) समाधि - अकम्प्य एकाग्रता, और (७) उपेक्षा चित्र में सुख या दुःख का लेश भी नहीं रहना । इन ात असो को सिद्ध करके ही कोई परम ज्ञान (= सम्बोधि )ना लाभ कर सकता है। श्रत, इन्हें सम्बोया यहते हैं। ताणाव-अईत, जिसका चित्तमल सर्वथा महीण हो नुका है। गाथा ९८-मार्ग · ग्रार्य यात्रिक मार्ग में सिद्धि प्रात र मुक्त हो गया है। उसे अब कुछ और सिद्ध करना बाकी नहीं रहा। या कि मार्ग है-(१ सम्पक प्रिनित्य अनात्य दुरापा 1 । ( १७७ ) शान, (२) सम्यक् संकल्प, ( ३ ) सम्यक् वाणी, ( ४ ) सम्यक् कर्म, (५) सम्यक् नीविका, (६) सम्यक् व्यायाम = सदुत्साह, (७) सम्यक् स्मृति, और (८) सम्यक् समाधि । इनमें पहले दो शान-सम्बन्धी प्रज्ञा है; बीच के चार आचारसम्बन्धी =शील हैं; और अन्तिम दो योग-सम्बन्धी समाधि हैं ! ग्रन्थियाँ =संयोजन, देखिए गाथा ३१ । गाथा ६२-शून्य, अनिमित्त-समाधिस्थ हो योगी जब सत्ता मात्र के अनित्य-अनात्म-दुःख स्वरूप का साक्षात्कार कर लेता है तन उसकी तृष्णा नष्ट हो जाती है, और वह शरीर त्याग के बाद फिर जन्म नहीं ग्रहण करता । यही अर्हत् का पद है । निर्वाण = विमोक्ष तो एक ही है, किंतु प्राप्त करने के मार्ग के भेद से इसके तीन नाम हैं । जिस योगी ने अनात्म का. साक्षात्कार करके तृष्णा का प्रहाण किया है उसके इस निर्वाण को 'शून्य-स्वरूप' कहते हैं । जिसने अनित्य का साक्षात्कार करके तृष्णा का प्रहाण किया है उसके इस निर्वाण को 'अनिमित्त-स्वरूप' कहते हैं । जिसने दुख का० इस निर्वाण को 'अप्रणिहित-स्वरूप' कहते हैं । गाथा ६५-इन्द्रकील-पहले नगरद्वार के ठीक सामने पत्थर का बहुत बड़ा स्तम्भ खड़ा कर देते थे, जिससे आक्रमण के समय शत्रु हाथी को हल कर दरवाजे को तोड़ न सके । वह खूब दृढ़ और ठोस होता था। इसी से स्थिरता की उपमा उससे दी जाती थी। ग्रन्थियों-संयोजन | देखिए गाथा ३१ । गाथा ९६-सम्मदम्बा - यथार्थज्ञान-~-समाधिस्थ हो अनित्य- अनात्म-दुःख का साक्षात्कार करने से जो परम ज्ञान प्राप्त होता है। .

( १७६ ) . + गाथा 85--यह द्वयर्थक गाया है। इसके शब्दों के दो २ अर्थ इस प्रकार हैं- शब्द ऊपरी अर्थ यथार्थ अस्मद्धो = श्रद्धा रहित अन्य विश्वास अक्तच - प्रकृतज्ञ अकृत-निर्वाण, उसको जानने वाला सन्धिच्छेटो सेंध मारने वाला सन्धि-संयोजन, उसे जिसने दिन कर दिया है इतावासो = अवकाश रहित पुनर्जन्म का जिसे अवकाश नरी घन्तासो - अाशारहित श्राशा तृष्णा, जिसकी माये तृप्पा छूट चुकी है। इस तरह, गाया के ऊपरी अर्थ देखने से बड़ा उटपटांग मा लगता 'है । ५६ कि, मो असाहीन, अकृतश, सेंध मारने वाला, अवसाराहीन, निगश है यही उस्म पुरुष है। किंतु, इसका सचा अर्थ तो गधा के बाय है। गाथा 10-जुभूत = सीधे, जिनमें किसी प्रकार की दुटिलटा नहीं है। मोटापन्न से लेकर आईत् वर" अकया। गाथा १०९-चार बाते-मिलाइए मनु, २, १२१ । अभिवादनशीलस्य नियं वृद्धोपसेविनः । चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुविद्या यशो बलम् ।। गाथा १२९-मिलाइए, हितोरदेश १, २. प्राणा यथात्मनोऽभीष्टा भूतानामपि ते तथा । आत्मीपम्येन भूतेषु दयां गुन्ति सापयः ।। .

( १७६ ) गाथा १३१-मिलाइए, मनु ५. ४५. योऽहिसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया । स जीवंश्च मृतश्चैव न क्वचित्सुखमेधते ॥ . महाभारत- अहिंसकानि भूतानि दण्डेन विनिहन्ति यः । आत्मनः सुखमिच्छन् स प्रेत्य नैव सुखी भवेत् ॥ गाथा १५३-२५४. बुद्धत्व लाम करने के बाद ही भगवान् के मुख से यह गाथायें निकली थी- यहाँ गृहकारक से अर्थ है तृष्णा का, क्योंकि यही इस शरीररूपी गृह को बार २ इस संसार में खड़ा करती है। फासुका-कड़ियों से अर्थ है बारहों निदान का । गृहकूट - गृह का शिखर से अर्थ है अविद्या का, क्योंकि बारह निदानों की कोटि यही है । 'संस्कार-रहित' का अर्थ है कर्मबन्ध मे मुक्त । • अनिविसं = न जानते हुए। सन्धाविरसं-यह भविष्यकाल' आत्मनेपद, उत्तमपुत्प, एकवचन. का रूप है। देखिए, पालिमहाव्याकरण ! यहाँ भूतकाल के अर्थ में भवि- प्यत्काल का प्रयोग हुआ है। गाथार५७-तीन में पहर-रात के तीन पदर एक पहर नागकर अभ्यास अवश्य करे । अथवा, तक्षण, युवा और वृद्धः इन तीन अवस्थाओं में किसी एक में सम्हल कर उत्साह से योगाभ्यास करे ।

( १८० )
गाथा १६०-मिलाइए, भगवद्गीता ६,५।
उद्धरेदात्मनात्मानं
नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो! |बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
गाथा १६२-मालुवा लता-यह लता वृक्ष पर पूरी तरह छा
जाती है । इसके पत्ते कटोरे जैसे खुले होते हैं। पानी बरसने पर सभी
पने भर जाते हैं, और उनके वजन से बड़े बड़े वृक्ष भी गिर जाते है ।
अट्ठकथा।
गाथा १६४-मिथ्या धारणा-आत्मा में विधास करना, तथा
किसी भी पदार्थ को नित्य और सुख करके मानना ।
गाथा१७५-मार = पाप का अधिपति । काम क्रोध आदि सभी
बुरी वृत्तियां उसकी सेना कही जाती है।
गाथा (७-~-श्रोतापति-फल-देखिए गाथा ३१ । श्रोतापन्न,
सकृदागागी, अनागामी तथा अर्हत, इन चारों के मार्ग और फ्ल के भेद
से दो २ अवस्थाएँ है। उस पद को प्राप्त करने का जो पहला क्षण
उसे 'मार्ग कहते हैं। पर वह नान कर दूसरे क्षण में उस पर स्थिर हो
जाता है तो उसे 'पल' कहते हैं। इस तरह, मोइका मारम्भ श्रोतापति-
मार्ग से होता है और अईस्ल में जाकर पूर्ण हो जाता है।
गाथा १८५-प्रातिमोक्ष-भगवान ने भिक्षुओं को जिन नियमों का
पालन करने को आदेश दिया उन्ही के संग्रह को प्रातिमोच' कहते हैं।
प्रत्येक भितु से आशा की पाती है कि वह उन नियमो को पूर्णतया
है
निभायेगा।
गाथा १६२-सम्यक् प्रसा= समाधिस्य हो अनित्य-अनारम पुन

( १८१ )
का साक्षात्कार कर सत्ता मात्र के स्वरूप का जो ज्ञान प्राप्त कर लिया है,
उसी से यहाँ अभिप्रेत है।
आर्य श्राष्टांमिक मार्ग -देखिए गाथा ९० ।
गाथा २००-प्रीतिभक्ष आभास्वर देव-यह एक देवयोनि है,
जहाँ उनके चित्तका भीतरी आहाद ही उनका भोजन है।
गाथा २०२-यांच स्कन्ध-ये हैं-११) रूप, ( २ ) वेदना, (३)
संज्ञा, ( ४ ) संस्कार, और ( ५ ) विज्ञान । हमारा व्यक्तित्व इन्हीं भौतिक
और मानसिक अवस्थात्रों का समुदाय मात्र है। इनसे पृथक् अात्मा
जीव-पुरुष नाम की कोई चीज़ नहीं है ।
गाथा-२८३-संस्कार = कर्मबन्ध
गाथा २१८-उर्ध्वस्त्रोत -यह आनागामी की अवस्था है, देखिए
गाथा ३१ ।
मनुष्य योनि से च्युत हो कर वह किसी देवलोक में उत्पन्न होता है,
और वहीं उच्च से उच्चतर अवस्थानों को प्राप्त करता हुआ निर्वाण का
लाभकर लेता है। इसी से उसे अर्ध्वस्त्रोत् अर्थात् धारा के ऊपर
चढ़नेवाला कहते हैं।
गाथा २२१-संयोजन-देखिए गाथा ३१ ।
नाम-रूप-सभी भौतिक अवस्थात्रों को 'रूप, और सभी अभौतिक
अवस्थानों (-चिंत, चैतसिक, सूक्ष्म रूप, निर्वाण, प्रशप्ति = conecpt )
को 'नाम' कहते हैं।
गाथा २३६. पाथेय, यहाँ इसका अर्थ 'पुण्य कर्म से है, क्योंकि
परलोक में अपना पुण्य ही आधार होता है ।

( १८२ ) द्वीप-इस संसार सागर में प्रतिष्ठा-भूत अपने सुकर्म । अायों के दिव्य पद-श्रोतापन्न आदि पहुंचे हुए सतों को 'आर्य- श्रेष्ट' कहते हैं, उनके पद। गाथा २९२-कायगता सति-अपने शरीर के विषयों में स्मृति । हम लोगों का शरीर बत्तीस प्रकार की गन्दगियों से भरा है, जैसे केश, लोम, नख, दाँत, त्वचा, मास, श्नायु, हड्डी, मज्जा, हृदय, यकृत, क्लोमक, स्प्लीहा, फुप्फुस, भात, लम्बी श्रॉत, उदर, मैला, मूत्र, पित्त, कफ, पीब, लहू, पसीना, चरबी, श्रॉसू, वसा, थूक, नाक का पोया, लस्सी, दिमाग । अपनी इन गन्दगियों पर मनन करने से अपने शरीर के प्रति वैराग्य उत्पन्न होता है, और मुक्ति की ओर प्रवृत्ति होती है। इन पर मनन करके इनके विषय में सतत बागरूक रहने को 'कायगता सति' कहते हैं। गाथा २९४-२९५-शाश्वत दृष्टि और उच्छेद दृष्टि-मरने के बाद कूटस्थ वही स्थिर अात्माजीव एक शरीर से निकल कर दूसरे में प्रवेश करता है, ऐसी मिथ्या धारणा को शाश्वत दृष्टि कहते हैं। श्रीर, मरने के बाद व्यकिल का लोर हो जाता है, वह नहीं रहता, ऐसी मिथ्या धारणा को उच्छेर दृष्टि कहते हैं । इन दोनों अन्तौ यो छोर, मोड दर्शन मध्य या मार्ग बताता है। यह कि, चित्त की संतति प्रतीत्यसमुत्पन्न हो एक योनि से दूसरी योनि में प्रवाहित होती है। जिस प्रकार पहले पार को प्रदीप-शिखा दूसरे पहर में पिस्तुल वही नहीं रहती है, और न अत्यन्त भिन्न हो जाती है. उसो तरह बनमने वाला न तो विल्कल यही है और न मिल । फिनु, उस तादारपसननिगत है। गाथा २९५-येप्यग्पश्यमं-पाच नीरण । पाच नीरग- ( १८३ ) (१) कामच्छन्द = विषयकामना, (२) व्यापाद द्वघ, (३) स्त्यान-मृद्ध आलस्य, (४) औद्धत्य-कौकृत्य = चित का चाञ्चल्य और पाश्चात्ताप, (५) विचिकित्सा शंशय । जब तक यह पाँच बातें उपस्थित रहती हैं तबतक समाधि का लाभ नहीं हो सकता। इसीसे इन्हें नौवरण-कावट - समाधि के लिए रुकावट कहते हैं । अन्तिम नीवरण 'शशय है। शंशय को पालि में 'वेय्यग्ध' भी कहते हैं। जंगल में संध्या समय पेड़-पौधों को देख कर भी बाघ का शंशय उत्पन्न हो जाता है। इसी से 'शंशय = विचिकित्सा' को वेय्यग्ध कहते हैं। इन पाँच नीवरणों में अन्तिम विचिकित्सा = वेय्यग्घहै, इसलिए उन सभी को 'वेय्यग्धपञ्चम' के नाम से कहा। इन पाँच नीवरणों पर विजय प्राप्त कर जो समाधि प्राप्त होती है उसे समथ समाधि, कहते हैं। और, अनित्य-अनात्म-दुःख पर समाधि प्राप्त कर जो संयोजनों का प्रहाण करना है उसे विपश्यना-समाधि कहते हैं । पहले को 'लौकिक' और दूसरे को 'लोकोत्तर' समाधि भी कहते हैं । गाथा २९९-कायगता-देखिए २९२ । गाथा ३३९-छत्तीस श्रोत-अठारह धातु- बाह्य और अभ्यान्तर . भेद से छत्तीस। गाथा ३४१-सरितानि-स्मृतानि । पहले की बातों को याद करना बड़ा प्रिय होता है, ऐसा भी अर्थ करते हैं । गाथा ३४४--यह एक भिक्षु को लक्ष्य करके कहा गया है जो राग में पड़ फिर भी गृहस्थ हो गया। एक बार' गृह-बन्धन से मुक्त हो फिर उसी बन्धन में पड़ा।

( १८४ )
गाथा ३७०-पाँच नीचे के संयोजनों को काटे, पॉच ऊपर के
सयोजनो छोरे [ देखिए गाथा २९५ ] । श्रद्धा, स्मृति, वीर्य, समाधि
और प्रज्ञा इन पॉच इन्द्रियों का अभ्यास करे। पाँच बन्धनों को पार कर
गया--रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान इन पाँच स्कन्धों की
श्रासक्ति से मुक्त।
गाथा ३८५-समय और विदर्शना-देखिए २९५॥
गाथा ३६७-नद्धि = यहाँ, दप । रस्सी = यहाँ, राग । पगहे.
मोह । जूए को फेंक- अविद्या के सारे मार को छोस ।

२७५, ४२१ अकसं अकतं दुक्तं अफत' भकिचं, २९२, २१३ ३६५ पाद-सूची गाथा के प्रथम पाद काले अवरों में है। अ ग्रजा निवारण ४०८ ग्रजाय ३१४ अश्या हि ३८३ अडनेवापि अनेसं २२१, ३९६, ४२१ , अट्टीनं नगरं भकोच्छि मं ३, ४ अगुथलं ४०० अणुथूलानि अकोधेन २२३ / अगुमत्तापि ३६६ अतित येव ३५२ अतिरोचति २७६ अतिवाक्य २७५ अनवजाय २०७ ' अत्तज भफिवन ४०४ भशोधनं २६५ २८ ४८ ५९ असं भक्तरानं अक्वातारो प्रस्तातो वे अग्निपरिचरे ३२० १६.

( १८६) अत्तनो कम्म ३४६, ३४७ २१७ । अथो जातिक्खयं भत्तनोपन • २५२ अथो पेत्तेय्यता ३३२ श्रत्तनोव ५० अथो ब्रह्मज्ञता ३३२ अत्तनो सुख १३१, १३२, २९१ | अथो वाचाय अत्तानं उपम १२९, १३० | अथो सरीरपि १५१ अत्तानं चे १५७, १५९ अदस्सन अत्तानं दमयन्ति ८०, १४५ / अस्सनेन २०६ अत्तान मेव १५८ अदुढो यो ३९९ अत्ताहवे १०४ | अधिगच्छे ३ ३१८, ३१ अत्ताहि अत्तनो ६२,१६०,३८० अधिचित्ते च १८५ अत्तादि किर १५९ अनत्यपद १००, १०१, १०२ अत्थं गच्छन्ति २२६, २९३, २८४ अनन्वाहत अर्थ धम्मच ३६३ । अनपेक्खिनी अस्थ हित्वा २०९ | अनवहित चित्तस्स अत्यम्हि जातम्हि ३३१ | अनवस्सुत चित्तस्स ३६ अथञ्चमनुसासेय्य १५८ ! अनागारेहि अथ निम्धिन्दति २७७, २७८,२९९ | अनागारो अथ पापानि १३६ | अनिक्कसावो अथ पापो ११९ । अनीयो याति अथ बालो ६९ । अनुदानमला अथ भद्रा १२. अनुपादाय अथवास १४० । अनुपादियानो अथवा समाधि २७१ अनुपुम्वेन રા अथ सच महारति ३८७ । अनुविच्च २२९ अपम्स सन्चे ३८४ | अनूपवाद ८५ अनेकजाति संसार १५३ ४१५, ४१६ ६ २९४, २९५ यथार्थ तग ( १८८ ) ७३ ३०४ २२३ अभिभुय्य सब्बानि २२८ ( अविरुद्ध अभिमन्यति १६१ | अवेरेन च पू अभिवव ३३५ ! अससह ४८४ अभिवादन सीलिस्स १०६ । असमायमला २४१ अभिवादना उज्जु १०८ ] असतं भावन अभूतवादी ३०६ / असतं होती अमत तं असता चन ३६७ अमतोगध असत्त सुगत अमानुसी ३७३ | असन्तेत्य अमितेनेव ६६, २०७ असब्भाच अयसाव मलं २४० असरीर अयोगा भूरि २८२ असाधु साधुना अयोगे युञ्जमत्तानं २८६ [ असारच असारतो अरियश्चदृङ्गिक मग्ग १९१ | असारे सारमतिनो ११ अरियप्पवेदिते ७१ असाहसेन २५७ अरियान २२, १६४ अमुभ भावयति ३५० परियोति २७० । असुभानुपरिसं अरुकाय १४७ | असोक विरज ४१२ अलङ्कतो चेपि १४२ असोको सोकिनि २८ अलजिता ये ३१६ अस्मालोका २२० १५५, १५६ अस्मि लोके १६८, १६९, अलापूनेव २४२,४१० अलीनेनप्पगन्भेन २४५ अस्स भद्रं व ३८० भवजच ३१९ | अस्सद्धो ६७ अवज्जे ३८ अस्मा यथा अविज्जापरम २४३ स्सो भद्रो ( १८० ) २५३ ४१० अस्सो यथा भद्रो अहं नागोव अहिंसका अहिंसाय रतो अहिंसा सजनमो अहिसा सम्बपाणानं अोरत्तानु ह इछा दोसा ३५९ इच्छ लोभ २६४ आ . ६२, २८६ आकासे पर्द आकासे यन्ति पाकासेव आचार कुसलो आजानीया यातापिनो आनुरं यातुरेनु आदान पटिनिस्सग्गे ग्रापन्जति १४४ ग्रासवा तत्स ३२० यासा यत्स २२५/ पाहारे च ३०० २६१ २७० इछा मानो च. २२६ इतिवालस २५४, २५५ इतिवालो १७५ इति विज्ञाय ६२, ९३ / इदं पुरे ३७६ इध तप्पति ३२२ इध नंदति १४४ इघ पञ्ञत्स १४७ इध मादति १८९ इध वस्सं ८९ इध सोचति ३०९ इघ हेमन्त गिम्हितु १३५ / इव खय मत्तनो १०९ / इव मेसो ४०१ इन्दखीलूपमो २८१ / इन्द्रिय गुत्ति १८८ । इन्द्रियेतु अतंबुत २५३ इन्द्रियेतु नुसंधुत २०४ इमेत्तमिति ७३ / इल्लुकी मन्दरी ३२६ १७ १८ ३०५ १६ १५ पायुपाचेन्ति आयु वएगो ૪૦૨ २४७ ६५ पारग्गेरिव आगपये मग्गं श्राराम वक्स चेत्यानि ३७५ आरा सो द प्रारोग्य परमा श्रानानु च ( १६० ) 5०, १४५ उ उक्खित्तपलिषं च्छिन्द सिनेह उर्जु करोति उभितस्मि उट्ठानकालम्हि उद्यानवतो उट्ठानेनप्पमादेन उत्तमत्त उत्ति उदक हि उदकुम्भोपि उदबिन्दु उदबिन्दूव उद्ध सोतोति उन्नलान उपनीत वयो उपसन्तस्स उपसन्तो उपसन्तोति उपपत्तिच उपेतो दमसच्चेन उप्पल अथ उय्युञ्जन्ति ३५८ | उय्योगमुखे २३५ २८५ उसमें पवर ४२२ ३३ | उसीरत्थोव ५८। उसुकारा २८० उसुकारोव २४ | उस्सुकेमु १९९ २५ ए ३८६, ४०३ एक अत्यपदं १६८। एक गाथापदं ८०, १४५ ] एक धम्म १७६ १२१, १२२ एक धम्मपदं १०२ १२१, १२२ | एक वनस्मि २६५ ३३६ । एक चरिय ६१ २१८ २९२ एकञ्च भावितत्ताने २६२ एकन्तं २२८ १६ 'कस्स चरितं २०१ एकासनं ३०५ ३७८ एकाह जीवितं ११०, १११ ४१९ ११२, ११३, ११४, ११५ १० एको चरमतन्दितो ३०५ ५५ | एको चरे २५६ । एको दमय मत्ताने ३०६ एको सतुसितो ३६२ ४१२ । एत सो सरण १९२ एकच जेय्य १०६, १०७ ३२०,३३० उभो निच्छेय्य उभोपिते अभो सङ्ग ( १९१ ) एत अत्वा एतं दलहं एस खो एस धम्मो एस पत्तोसि एस मग्गो एतं द्वधापथ एतं बुद्धान सासन एतं मलं एतं विसेसतो एतं सरण एत मत्थवसं एतम्मि छेत्वान एतम्हि तुम्हे एते तयो एतेसं गन्धजातानं एतेहि तीहि (थ पस्सथिम एवं अतिधोन चारिन एवं प्रभावित एवं गामे एवं गोपेथ एवं जरा च एवं जातेन एवं धम्मनि एवं निन्दापसंसासु एवं रागञ्च एवं लोकं एवं सङ्कार भूतेसु एवं सुभावितं २०३ एव सुभासिता ५१,५२ ३४६ एव मेतं अभिनाय ७५ २८२ / एवम्पि तहानुसये १८३,१८५ | एवम्भो पुरिस २४८ २४३ दलहं ३४९ २२ एस खो व्यन्ति काहिति ३५० १९२ | एसच्छेच्छति ३५० २८६ ३४६, ३४७ १३४ २७४, २७५ २७७, २७८, २७६ २८१ एसोव मग्गो २७४ ५५ ओ २२४ अोक मोकं ९१ १७१ | अोक मोकत ३४ २४० | अोका अनोक १३ | अोघ तिण्णो ३७० ४६ / प्रोपुणाति २५२ ३१५ ओवदेय्यनुसासेय्य .१३५ | अोहारिनं सिथिलं ३४६ ५३ क ८२ | कसो उपहतो १३४ ८१ कटुकप्प भेदनो ३२४ ३७७ कएहं धम्म ८७ १७० कतकिच्चं ३८६ ५६ कतञ्च सुकतं ३१४ १४ | कतपुञ्चो १६, १८ ८७ ३९४ ३६४ २९३ १८२ १८२ कतानियकतानि कत्तब कम्मारो कयिराचे कयिराथेतं कयिरा मालागुणे कर बालो करोति सो करोन्ता पापक कलं अग्धति कलिंव कितवा काकसूरेन कापोतकानि कामतो जायति कामतो विष्यमुत्तस्स काम भव ७० १८२ ३९५ ३२२ ६२ २८५ ४० ५० कि त अजिन साटिया ५३ | कि ते जटाहि २३९ । किच्चा किन्चेसु ३१३ । किच्चे सातच्च ११८] किच्छ मचान ५३ | किच्छं सद्धम्म सवर्न १३६ ] किच्छो बुद्धान १६२ | किच्छो मनुस्स ६६ । किसं धर्मानसन्थत कुजराच २५२ | कुतो पुत्ता २४४ | कुमुद सारदिकं व १४९ कुम्भूपमं २१५ । कुसलस्स उपसम्पदा २१५ | कुसलेन ४१५ | कुसलो ३८३ | कुसीत हीनवीरिय २१८ | कुसीतो हीन वीरियो २३१ । कुसो यथा २३१ ! को इम १४० | कोचि लोकस्मि २८१ ] को तं निन्दितु ३६१ | कोधं जहे २३४ । को धम्मपदं २३१ / कोनु हासो ३०७ । कोहिनायो ४४,४५ कामे पनुद ७ ११२ कामेसु च कायदुचरितं कायप्पकोपं कायरस मेदा कायेन च कायेन सवरो कायेन संवुता कायेन संवृतो कासावकाष्ठा ४४ १४३ २३० २२१ १४६ ( १६३ ) ४०८ ७४ ३१५ १९ ३६० १ ख खनातीता हि खनो वे मा खन्तिवलं खन्ती परमं खन्धानं खिप्पं धर्म खिप्पं वायम खिप्पमेव खीणमच्छेव खीणासवं खीणासवा खेमी अवेरी ग गच्छे देवान गच्छेय्य गतद्धिनो गतितेसं गन्थातेसं गम्भमेके गम्भीर पठवं गरुकं वापि गहकारक गहकारक दिट्ठोसि गहकूट गामे वा यदि गावो पाचेति ३१५ गिर सच ३१५ गिही पबजिता ३९९ । गुत्तं सन्तर १८४ गोपो व गावो ३७४ घ ६५ । धानेन संवरो २३६, २३८ १३७, २८९ चक्कं व वहतो १५५ चक्खुना संवरो ४२० चजे मत्ता सुखं ८९ चत्तारि अरिय सच्चानि २५८ चत्तारि ठानानि चत्तारो धम्मा २२४ / चन्द, व विमलं ३२३ / चन्दनं तगरं ६० चरं चे नाधिगच्छेय्य ९२ चरन्ति बाला २११ / चरेय्य तेनत्तमनो १२६/ चापातो पतितं ४०३ | चित्तं गुत्तं १३८ । चित्तं दन्त १५३ चित्रं रक्खेथ १५४ / चित्रं राजस्थूपम १५४ चिचक्खेपं व ६८ चित्तक्लेसेहि ३६० २६० १९० ३०४ ४१३ ६६ . ३२८ ३२० ३५ १७१ १३८ ( १६४ ) चितस्स दमथो चिर दुक्खाय ४१९ / झायिनो चिरप्पवासिं चुति यो वेदि छ छन्दजातो छायाव अनपायिनी छिन्नोपि रुक्खो छिन्दसोतं छुदो अपेठवित्रानो छेत्वा नन्धि छेत्वान मारस्स छत्वा रागञ्च छेत्वा वनञ्च ३५ भ २४८ . झायभिक्खु ३७१ २१६ । मायि विरज मासीनं ३८६ २७६ भायी तपति २१८ २ | आति मित्ता २१९ ३३८ अतीन व २०७ ३८३ जत्त बालस्स ७२ ड ३१९ । डह अगीव ३ डहन्त बाल त २१७ ३६९ २८३ ते कुल सुखमेधति तं जनो ३५२ त तादिस २०१ त नाम रूपस्मि २०३ । तं पुग्गलमेव जञा पुनपरानि जय वे २२१ ३४४ २८७ तं पुत्तपसु तं भूमि ०. जिघच्छा परमा जिराण कोश्चाव जित अपजित जितञ्च रक्खे जितमस्स जिने कदरिय १०५ तं वे देवा त वे नप्पसहति २२३ ६५ तवे पसहति १५१ | तं वो वदामि १७५ तजज्जह तवे परम जिह्वा सूपरस जीरन्ति वे जेवामार ३३७ ३२६ ( १६५ ) तज कम्म तञ्ज दिस्वा तरह लोके तरहक्खय रतो तण्हक्खयो तराहानं तराहा नस्थि तराहाभव तरदाय जायती तण्हाय मूलं तरहाय विप्प मुत्तत्स तरहा लोके तराहा वडढति ततो ततो ६८ । तथत्तानं २८२ ३४० तथारूपरस २०५ ३३६ तथेवकतपुबम्पि २२० १८७ तदुद्याय २४० ३५४ तनुकेत्य १७४ १५४ तमहं ब्रूमि ब्राहमणं ३८५, ३८६ १८० ३९१, ३९५,३९६, ३९७,३९८ ३९९, ४००, ४०१, ४०२, ४०३ २२६ । ४०४, ४०५, ४०६,४०७, ४०८ ३३७ ४०९, ४१०, ४११, ४१२ ४१३ ४१४, ४१५, ४१६, ४२७, ४१८ ३३५ ४१९, ४२० ४२१, ४२२, ४२३ ३३४ तमहं सारथि २२२ ३९० / तमेव वालं १२५ ३८९ तम्बुद्ध मनन्त ९७९,१८० १ / तम्हि छन्द ११८ २ तसिनाय पुरक्खता ३४२, ३४३ ३६९ / तसेसु थावरेसु ४०५ ततो धि यस्स ततो नं दुख्खमन्वेति ततो नं सुखमन्वेति ततो निव्वाणमहिसि ततो पामोज्ज बहुलो ततो मला ततो सम्मन्ति तत्तो अग्गि तत्राभि रतिमिच्छेय्य तत्रा यमादि तस्मा तसिनं तरमा नरो २४३ तत्मा न चद्धगू ३०२ ६ ३१० ३०८ तस्मा पन्चजितोति ८८ तस्मापियं २२१ ३७५ | तस्मा सञ्जमयत्तानं ३८० ३०३ | तस्माहि विगतिक्छेतु ३५६ २४९ तस्माहि वीत ३५६,३५७, ३५८, तत्येव तत्थ तत्य योमङ्कु १२१, १२२ द तित्ति कामसु तिन्न मञतर तुही सुखाया ( १९६.) तादिस पण्डित तादिसं भजमानस्य ७६ / थेरो इति २६१ तानि दिस्वान १४९ / थोक थोक ૨૩૬ तिणदोसानि ३५६, ३५७, ! योक योकम्पि ३५८, ३५६ तिएणसोक १९५ | दज्जाप्पस्मिम्पि २२४ तिएणो पारगतो ४१४ | ददन्ति वे २४१ दन्त अन्तिम १५७ | दन्तं नयन्ति ३२१ तिब्बरागस्स ३४९ | दन्तं राजाभिरूहति ३२१ तीरमेवानुधावति ८५ दन्तो दन्तेन ३२३ ३३१ । दन्तो सेहो ३२९ तुम्हेहि किच्चं २७६ | दन्ध हि करोतो ५६ दब्बी सूपरसं ६४ ते झायिनो दलहमेत ते तादिसे दसन्नमञ्जतर तेनेव सो होति १७७ दस्सनस्स २७४ ते यन्ति २२५ दारु न मयन्ति ८० १४४ ते लोके ८९ | दिहिं निस्साय १६५ ते वे जाति ३४१ | दिन्न होति ३५६,३५७, ३५८,३५९ २३४ | दिन्ब अरिय २३६ २९२ | दिब्वं योग तेसं सम्पन्नसीलानं ५७ | दिवातपति ३८७ तेसातसिता ३४१ दिसोदिसं ४२ ते सारं अधिगच्छन्ति दिवाकम्म ते सारन धिगच्छन्त्रि ११ । द्विपदानञ्च ૨૭૩ ते जना ते वे सुपरि तेस बदन्ति ( १९७ ) २१९ ३०४ २०० ४२० ३० ९४ १८१ २३० ३५७ म २६ ३२४ ३६४ दीवं मन्तस्स ६० | दूरतो सोत्थि दीवमदान २०७ | दूरेसन्तो दीघा जागरतो ६० देवा ग्राभत्सरा दीयो बालानं ६० | देवा गन्धब्ब दीपं कयिराय २५ / देवानं सेहतं दुच्दुश्खखं १६१ देवापि तत्स दुक्खं सेति २०१ | देवापि तेर्स दुक्खमुपेन्ति ३४२ | देवापिन दुक्खस्स च १९१ दोस दोसा दुक्खत्सन्तं २७५, ३७६ दुक्खा जाति २५३ धनं सेहव दुक्खानु पतितद्गू ३०२ धनपालको नाम दुक्खादि सारम्भ कथा १३३ घम्मं अनुविचिन्तयं दुक्खूप समगामिनं १९२ धम्म अनुस्सरं दुक्खो पापस्स ११७ धम्म कायेन दुक्खो बालेहि २०७ धम्म चरे दुक्खो समान ३०२ धम्म सुचरितं दुग्गा उदरयत्तान ३२७ धम्मचारी दुन्निग्गहस्स ३५ घम्मदं दुप्पो १११ धम्महोति दुप्पव्यन्जं ३०२ धम्मपीति दुरक्खं ३३ धम्मस्स गुत्तो दुरावासा ३०२ धम्मस्स होति दुल्लभो १६३ धम्मारामो दुस्सीलो ११०,३२० धम्मघम्मानु दूरङ्गम ३७ घी वाझएस्स २५९ १६९ १६८ १६८,१६९ २१७ २५७ ७६, २०५ २५७ २० ३६४ ८६ ३८९ ( १९६ ) न तेन भिक्खु धीरख्च पञश्च धीरोच दान धीरोच सुख धीरो बाले घोररह सील न न अत्तहेतु न अन्तनिक्खे न इच्छेय्य न उच्चावच न कहापण वस्सेन न कामकामा न किलिस्सेय्य नगर यथा नगरूपम न च दुक्खानुपतितो न चन्दन न चाहं ब्राह्मणं न चाहुन च न चेतरहि न जच्चा होति न जटाहि न गोत्तेन न तं क्म्म न त कयिरा न त दलहूँ नत दुचरित २०८ न त माता १७७ न त होति २०७ न तकरो होति २८ | न तम्हि छन्द ११७ २०८ न तावता २५६ न ते कामगवेसिनो ८४ न तेन अरियो २७० १२७, १२८ | न तेन थेरो २६० न तेन पण्डितो २५७ २६६ १८६ । न तेन होति २५६ ८३ / नत्थि खन्दसमा २०२ १५८ । नयि जागरतो ३१५ | नत्यि भान ३७२ ४० नस्थि आतिसु २८८ ३०२ । नस्थि तराहा २५१ ५४ | नत्थि दोस २०२.२५१ ३६६ | नत्थि पापं १२४,१७६ २२८ तत्थि बाले ६१,३३० २२८ । नत्थि बुद्धान २५५ ३९३ / नस्थि मोह २५१ ३६३ | नत्थि राग २०२,२५१ ६७ | नत्थिलोके २२७ नस्थि सङ्गो ३४५ | नत्थ सन्तिपरं १६९ नत्य सोको २१२, २१३, २१४ ( १६६ ) नन्दी भव न पन्चतान न पिता नपि न पुष्फगन्धो नब्राह्मणस्स न भजे पुरिसाधमे न भागवा २१५,२१६ न सीलब्बत मत्तेन २७१ न नग्ग चरिया १४१ न सो कासावमरहति ९ न निकेते न सो दिवा वा २४९ ४१३ न सी धम्म ६४ १२७,१२८ न सो सङ्खत धम्मानं न परेसं न सो सव्यत्य २८८ न हनेय्य १२९, १३० न पुत्त मिच्छे न हि एतेहि ३२३ न पुन जाति २३८,३४८ न हि पब्बनितो १५४ न हि पापं ३८६ | न हि वेरेन न ब्राह्मणस्सेतदकिञ्चि ३६० नाचमझो १६५ न भजे पापके ७८ | नाम्नेसं पिहयं ७८ नार्थ लभति १६० १९ नानासका १४१ न मन्तं १२२, १२२ नावणं विस १२४ १०५ नात्स मुञ्चेथ ३८९ २६४ निग्गरहवादि न मोनेन २६८ निचं उझान २५३ २६२ निच्चं कायगतासति २९३, ३९९ १२७,१२८ निच्चं कायेन २२५ १७७ | निच्चं दलहपरकमा २३ १९६ / निच्च धम्मगतासति २९७ न सन्ति पुत्ता २८८ निच्चं पजलिते ८१ निच्चं बुद्धगतासति १६७ । निच्चं वद्धापचायिनो न मारो सह न मुण्डकेन नवाकरन न विजती न वे कदरिया न सकापुत्रं नसामञ्जन्ति न सिया लोकवद्धमो ( २०० ) १४० ३१५ ३५२ ३०६ १७५ २३० १८१ २२७ १८९ निच्च सङ्घगतासति २९८ । निरयं सो निच्च सञ्जत चारिनो १०४ | निरयहि निच्च सुचिगवेसिना २४५ | निरयायूप निच्चमेव २०६ / निरासयं निट्ठङ्गतो ३५१ / निरुचि पद निदरो होति २०५ / निहीनकम्मा निदायिता ३२५ | नीयन्ति धीरा निद्ध तमलो २३६, २३८ नक्ख जम्बोन निद्धमे मलमत्तनो २३९ नेक्खम्मूप निधाय दण्ड ४०५ / नेत अजत निधीनं व ७६ | नेतं खो सरणं निन्द ततीय ३०९ नेते सरण निन्दन्ति २२७ । नेव देवो मिन्ने वा यदि ९८ नोचे पारगवेसिनो निप्पपञ्चा २५४ नो चे लभेथ निम्बत्तति ३३८ | नोचावचं निन्बना होथ २८३ प निबाण १८४, २०३, | पसुकूलघर २०४, २२६ २८५ पक्खन्दिना नि बाण गमनं २८९ पङ्क सचोव निब्वारपस्सेव ३२ | पच्छा तपति निब्बुते १९६ | पन्छा सो निम्म नाहोथ २४३ पञ्च चुचरि निरस्थ व पञ्च छिन्दे पञ्च सङ्गातिगो 'नरय पाप १२६ पञ्ञातस्स ३५५ ३२६ ३९५ २४४. ३२७ १७२ ३७० निरय ते ३७० १५२ ( २०१ ) ४०२ २५४ २७ २८ १८८ ३८५ पञ्जा नत्थि पत्रा न परिपूरति पना पासादमारुह्य पञाय मग्ग पञ्चावन्तस्स पन्ना सील पटिकोसति पटिजग्गेय्य पटिदएडा पटिपन्ना पटिबद्ध मनोव पटिमासे पटिसन्थार पठविं अधिसेस्सति पठवीसमो पण्डितं. पण्डितोति पण्डितो वापि पण्डितो सील पण्डु पलासोव पतिरूपे पथव्या एकरज्जेन पदं तस्स રક पन्नभार पपञ्च समतिकन्ते २८ पपञ्चाभिरता २८० पप्पोति विपुलं १११ । पञ्चतहो' व २२९ पचतानि १६४ पवाजयत्तनो १५७ / पमादं अप्पमादेन १३३ | पमादमनुयुञ्जन्ति २७६ / पमादेन २८४ पमादे भय ३७९ | पमादो गरहितो ३७६ / पमादो मच्चुनो ४१ पमादो रक्खतो परदारश्च ६४, ६५ | परदुक्खूप दानेन २५८ परवजानु पस्सिस्स परिक्खयं व.. २८९ परिजिन्नमिदं २३५ परिनिन्वन्ति २६ १६७ ३१,३२ ३० २१ २४१ २४६ २६१ २५३ १२६ २६० १५८ | परिपको ३४ पदीपं न १७८ | परिप्लव पसादस्स ९३ परिफंदतिदं १४६ / परियोदपेय्य ५८ परिलाहो १८५ परिसप्पन्ति ८८ पदुमं तत्थ पन्थञ्च ३४२,३४३ ( २०२) ३८१ ३८४ २२. २१२ २१२ २१० २११ २०० ११८ १८ ३३१ परेच न विजानन्ति ६ | पामोज बहुलो परेस पान भोजने २४९ / पारगू होति परेस हि सो २५२ पारापार पलेति रसमादाय ४९ / पियं जाति व पविवेक रसं २०५ | पियतो जायति पसन्नो बुद्धसासने ३६८, ३८१ / पियतो विप्पमुत्तस्स पस्स चित्त कतं १४७ | पियानं अदस्सन पस्सतो ११३, ११४, ११५ १ पिया पायो हि परसे चे विपुल २९० पिहेतत्तानु पहस्सथ १४४ | पीति भक्खा पहीन मानस्स ९४ | पुन चे पुरिसो पाणिम्हि चे १२४ ) पुत्र मे कतन्ति पातिमोक्खे च १८५, ३७५ पुन सुखं पाथेय्यम्पि च २३५, २३७ | पुन पाप पापं थे पुरिसो ११७ पुनानि पाप में कतन्ति १७ | पुत्ता मत्थि पापकारी १५, १७ पुत्तेसु दारेसु पाप धम्मा २४८, ३०७ | पुनगेई पापस्मि रमती ११६ | पुनप्पुन पापाचिन ११६ | पुष्पानि हेव पापान अकरन ३३३ । पुस्खे निवास पापानि परिषज्जये १२३ । पुराणानि पापानि परिवज्जेति २६६ | पुरेक्खा रश्च पापा पापेहि ३०७ | पूजा परकुलेमु च पापियो नं ४२ / पूजारहे पापोपि परसति ११६ ! पूरति धीरो २२० ६२ १५४ ३२५ ૪૩ १५६ કરે 3 १२२ ( २०३ ) . पूरति वालो पेच सो पेमतो जायति पेमतो विप्पमुत्तस्स पोराण मेतं १२१ बाहेत्वा ब्रह्मचरिय वा २६७ १३१, १३२ । बुद्धे यदि व १९५ २१३ } बुद्धो तपति ३८७ २१३ व्यासचमनस ४७, ४८, २८७ २२७ , ब्रह्मनापि २३० भ ७८, २०८ १२० भये चा भय फन्दनं चपलं फलमिच्छं' व फलानि कहकस्सेव फुसन्ति धीरा फुसामि फेनूपम ३३ / भजेथ ३३४ भद्रोपि पस्सति १६४ २३ भवाय विभवाय २७२ भस्मच्छन्नो'व भावनाय रतो ३१७ २८२ व भासति वा ३०१ १, २ ३४३ ७५ २७२ २६६ १४८ बद्धोकवलं बलिवद्दोव बहुवे सरणं बहुनापि बहुम्पि चे बाल सङ्गतचारीहि बाला दुम्मेधिनो बाला हवे बालो च पण्डितमानी बाली भुजेथ वाहित पापोति बाहिर परिमजसि ३२४ | भिक्खु याकङ्क्षी १५२ भिक्खु बुद्धस्स १८८ भिक्खु विस्सास १६६ । भिक्खु होति १६ भिजति पूतिसन्देहो २०७ , भिय्यो याकरिते २६ १७७ भिय्यो तप्पति भिय्यो नन्दति भीतस्स भीताय ३८८ | भोग तरहाय ३९४ भोगानं व २७१ भोजनम्हि भिय्यो तराहा ३१३ ३४९ १७ १८ ७० ३१० ३५५ १३९ बाहु सच्चेन ७,८ ( २०४ ) भोवादि नाम म मंस लोहित मंसानि तस्स मग्गानट्ठङ्गिको मग्गामग्गस्स १,२ मच्चु श्रादाय मच्चु धेय्य -- मच्चु राजा मच्छर मझेच नत्थि मज्झे मुञ्च ३९६ / मनुजस्स पमत्त ३३४ मनुस्सा भय १८ १५० मनो दुच्चरित २३३ १५२ मनोपको २३३ २७३ | मनो पुब्बङ्गमा १,२ ४०३ मनो सेवा ४७, २८७ | ममेव अतिवसा ८६ | ममेव कतमजन्तु १७० मयमत्थ यमामसे ६ २४२ मरणन्तं हि १४८ ४२१ मरीचि धम्म ४६ ३४८, मलं वरणस्स २४१ १८५ मलावे पापका ૨૪૨ ३६३ । मलिथिया २४२ २६० । महापयो ३५२ ३७७ | महावराहोव ३२५ ३६३ । हेमसि विजिताविनं ४२२ ६६ मा कन्दि २१८ मा कामरति २७ १,२ २४८ मातरं पितरं २६४, २६५ माते कामगुणे ३७१ मानो मक्खो २३३ मा पमाद २३३ मा पियेहि .२१० माप्प मब्बेथ १२१, १२२ मत्त ता मत्तभाणी मत्तासुख मद्दवानी मधुर तस्स मधूवा मजति मनसा च मनसा चे मनसा नथि मनसा सवो मनसा सवुता मनसा सवुतो मनसा सुचरित मनापरसवना . मात लोभो १५०,४०७ ( २०५ ) २६८ . मावो नल व ६ मारपेयं ३४ | मूह रूपो मारस्सेतं २७४ | मेत्ता विहारी मारो मसि ३३७ । मोक्खन्ति मारो मर्ग ५७ / मोघजिन्नोति मालुवा सालमिवोत्थतं १६२ मोह दोसा मा लोहगुलं ३७१ मावो च फरुसं १३३ / यं एसा सहती ३३५ यं योघो नाभिकीरति २५ मासे मासे ७०, १०६ र्यकत्वा ६७,६८३१४ मिच्छादिष्टि १६७. यं किञ्चि थिटुं व १०८ मिच्छादिहि ३१६, ३.१७, ३१८ यं किञ्चि सिथिलं ३१२. मिच्छा पणिहितं ४२ यं पस्से मिच्छा सङ्कप्पगोचरा यं यं पदेस ३०३ मितमाणिस्पि २२. यं वे हितञ्च १६३ ३७५ । यं सुत्वा १००, १०१, १०२ मिद्वी यदा होति ३२५ | यं हि किन्चं २६२ मुञ्चपुरे ३४८ यं होति मुत्तो बन्धनमेव यञ्चे भुजेय्य मुद्धमस्स यञ्च वस्ससत १०६, १०७ मुनी तेन २६९ यचे विन् २२६ मुसावादश्च ३७४,३६० मुसावादिस्स १७६ यत्य अरहन्तो मुहुत्तमपि ६५, १०६, १०७ यत्थ काम ३५, ३६ मूलं.खनति २४७ यत्य गन्त्वा. २२५ मूलं पाय ३४० यत्य जराच १५० मूल. पच्चं २५०, २६३ यत्यहि १२८ भित्ते भजस्सु ६६ २४६ । यता यतो ( २०६ ) २६२ ३७२ २६१, ३६३ १६२ यथानं इच्छती यथा पसादन ४२० २५०, २६३ ३३६ १८० १७४ यथा पस्से यत्थहितो १२७ / यमलोकञ्च यस्य नरमती ९९ | यम्हा धम्म यस्थ बाला १७१ | यहि मानञ्च यस्थ सो जायतो १९३ / यम्हि सचच यथयमनुसासति १५९ यस अञ्चन्त यथागार १३, १४ यस अस्सुमुखो यथात्तना ३२३ यस्स कायेन यथा दण्डेन १३५ यस्स गति १६२ । यस्स चेतं २४९ । यस्स छत्ति सति १७० यस्स जालिनी यथापि पुष्फरासिम्हा ५३ / यस्स जित यथापि भमरो ४६ | यस्स नत्यि २३८ । यस्स पतीतो यथापि रहदो ८२ यस्स पाप यथापि रुचिरं ५१,५२। यस्स पारं यथा बुब्बुनक १७० । यस्स पुरे यथा भूरि २८२ । यस्स रागो यस्सालया यदा च पञ्चति ६९,११९, १२० यस्सासवा यदा द्वयेसु ३८४ | यस्सिन्द्रियानि यदा निसेधो ३६. | यसो मोग यदानुदति २८ याचार्य इतरा यदा पञ्भाष २७७, २७८, २७९ | यानिमानि यदायर्स ३४५ (याय तगर यमपुरितापिच २३५ | याय नाभिसजे २४७, ३६७ यथापि मूले १७३ ३८५ ४२१ ४०७ ४११ । यथा सवार ३०३ १४६ ५६ ( २०७ ) . यावता बहु २६६ । ये च तत्थ यावं हि वनतो २९४ , येसं नो नत्थि २०० याव जीवम्पि ६४ येस सन्निचयो ६.२ २५८, २५९ ! येसं सम्बोधि ८ यावता भिक्खते ये सच सुसमारद्धा २६३ यावदेव ७२ यो अप्पदुवस्स १२५ यावन्तेत्य यो इमं पलिपथं ४१४ यावपापं योगक्खेमं २३ ६९,११९ : योगम्मिच २०९ याव भद्रं १२० योगा वे जायति २८२ युञ्जति बुद्धसासने ३८२ यो च यत्थं २५६ युवावलो २८० ये च खो सम्म यो च अप्पम्पि २५९ ८६ यो च तुलं'व २६८ ६ यो च पुवे १७२ ये चित्तं सचमेस्सन्ति ३७ यो च बुद्धन्च १६० ये जना पारगामिनो ८५ यो च वन्तकसावस्स १८१ यो च समेति २६५ येते उपनरहन्ति ३ | यो च सोलवतं “५६ येतं न उपनरहन्ति यो चापि कत्वा ३०६ २५६ यो चे गाथा १०२ ये न पाणानि २७० यो चेतं सहती ३३६ ये नस्स पलित २६० यो चे वस्ससतं १०७, ११० ३२६ से ११५ तक २१ योति वाक्यं ३२१ ये परिजमात भोजना ९२ / यो दण्डेन १३१, १३२, १३७ ये रागरत्तानु ३४७ । यो दुक्खस्स ४०२ ये सं दिवा च २९६ से ३०१ तक यो घ कामे ४१५, येसं नत्यि २११ यो घ तराई ४१६ ये झान पसुता ४ ये नत्थं सहसा ये निच्छक ये पमत्ता ( २०८) २१४ २१४ ३८७ ३०४ २२२ २२२ यो ध दीघ यो ध पुजञ्च यो धम्मै योपेथ मार यो नरा अनुयुवति यो नलिम्पति यो न इन्ति यो नि मत्ति यो निन्द यो निब्बणतो यो पाणमवि यो बालो यो मुख सम्बतो यो मुनाति यो यजेथ यो वत्थ यो वे उप्पतितं यो वे नपरितस्सति यो सहस्सं यो सासनं यो हवे दहरो २० ३५६ ४०९ रतिया जायति २६७,४१२ | रतिया विप्पमुत्तस्स २५९ रति आभाति रत्ति खित्ता २४७ रथ मन्तव ४०१ | रमणीयानि रस उपसमस्सच ३९६ | रस्मिग्गाहो १४३ रहदोव ३४४ रागञ्च दोसञ्च २४६ | रागदोसा ६३ । रागोन समति ३६३ | रागो समति २६९ । राजतो वा राजा च दण्ड ९ राजानो द्वेच २२२ राजा व रह ३९७ / रोग निड्द १०३ १६४ | लजिनाये ३८२ | लता उनिमज्ज लभती पीति १५७ | लोके अदिन्न व २९४ | बची दुचरित ३०८ वचीपको १८७ | बच्छो खीर १३६ २९४, २९५ ३२९ १४८ ल ३४० ३७४ र २४६, ४०१ रस्खेय्य ने रजो च जल्ल रठे सानुचर २३२ २३२ २८४ रठ पियर्ड रति सो ( २०६ ) ३०५ / विप्पसन्नो चजिर वस्ममयं चन्नच चज्जे चा वज चएणगन्ध वरण पोक्खरताय चएणवन्तं चनं छिन्दथ चनतो जायती चनन्ते रमितो वन मुत्तो वनमेव चन्त लोकामिसो चरमसतरा चरमादाय चस्सिका विय चाचानुरक्खी चाचाय संवुतो चाचाय सञतो चाचाय सुचरितं वाणिजोव वाति देवेसु वातेन न समीरति वाती रक्खंव चातो सेलंव चारिजोव चारि पोक्खर चासोपिच चाहा वदन्ति १६१ / वितक्क पमथि तस्स ३४६ ३१६ वितक्कूपसमे.च ३५० ३१८ वितिएण परलोकस्स १७६ विपाकं पटिसेवति ६७,६८ २६२ / विप्पमुञ्चेथ ३७७ ५१, ५२ | विप्पमुत्तस्स ९० २८३ विप्पसन्नमनाविलं ४१३ २८३ विप्पसन्नेन ८२ ३४४ विप्पसीदन्ति ८२ ३७८ विमोक्खो ९२, ९३ ३२२ विरागो सेहो ૨૭૩ २६८ विरियमारमतो ११२ ३७७ / विविच सयनेन २७१ २८१ विवेकमनुबेहये ७५ २३२ ३६२ विसं जीवितुकामोत्र १२३ २३२ विसङ्कारगतं १५८ १२३ वित्सं धम्म ५६ वित्सास परमा २०४ १९७, १९८, १९९ ७ / वीततएहो ३५१, ३५२ ८ वीतदरं ३८५ ३४ | वीतरागा ९९ ४०१ वुट्टी न समति २३७ / वुट्टी समति ३३९ कुत्ता पटिवदेय्युत १३३ विवेके यत्थ २६६ ८१ | विदराम ( २१० ) २०३ ३८३ २५५ ३६८, ३८१ ३९७ वेदनं फरुसं वेम्यग्ध पञ्चम वेर तेस वेर तेप वेरससग्गा वेरा सो वेरिने वेरी वा पन स संयोजन सशसत्ता संवच्छर १८३ ३२७ १३४ संवुत तीहि १३८ । सङ्खार परमा २९५ सङ्घारानं खयं ३ सङ्खारा सरसता ४ ! सङ्खारूपसम २९१, सङ्गातिगं २९१ | सङ्गामे मानुसे सङ्घश्च सरणं ४२ | सचित्त परियोदपन । सचित्तमनुरक्खय ३४२ । सचे नेरेसि १०८ सचे लभेथ ३९१ । सचे होति ८० सच्चं भने ४१४ सच्चान चतुरो ९५ / सच्चेन २४० । सज्जुखीर' व १७४ । सञतस्स च ३९२ सञमन ७५ सञोजन १२६ । सठिलोहि १७८ । सतं हि सो ४२३ सतब धम्मो २१२ | सताने सम्पजानाने ३१२ । सत्ता गच्छन्ति ३९६ ००४ २७३ २२३ ४ २५ ससार मोह ससारा न सककम्मानि सकुन्तो जालमुत्तोव सक्कञ्च सकार सगर्ग मुगतिनो सगस्स गमनेन सग्गापायव सङ्कप्या रागनिस्सिता सङ्क सर सविलिहब सद्विलिन सतञ्च गन्धो १५१ २१६, ३१७ २१८, ३१ १६६ मवाय लोके २६७ सदत्य पमुतो ( २११ ) सद्धं पारद्ध सन्तं तस्स सदागोतम सावका २९६, २९७, | सव्यं रस ३५४ २९८, २९९, ३००, ३०१ / सञ्चगन्थप्पहीनस्स सदा जागरमानानं २२६ / सचाहो ३५३ सदा रमति ७९ सव्वत्य विमुत्त सव्वत्थ वे सद्धम्म अविजानते सव्वत्य संचुतो ३६१ सद्धम्म अविजानतो ३८ सम्बदानं ३५४ सद्धम्मान ३६४ सयदुक्खा १८९, १९२, ३६१ सद्धाय सीलेन सच्चपापस्स १८३ सद्धो सीलेन ३०३ सम्बम्पि तं १०८ सद्धिचरं ३२४, ३२९ सब्बयोग विसं युक्तं ४१७ ६६ सब्बलोकाधिपच्चेन १७८ सन्त कायो ३७८ | सब्बलोकाभिभु सन्तचित्तस्स ३७३ सच वोसित वोसाने ४२३ सन्त वा सुसमाहितो ३७८ / सब संयोजन ३६७ सन्तावाचाच ९६ सबस्स दुक्खस्स ३३१ सन्तिमग्गमेव २८५ | सचसो नामरूपस्मि ३६७ सन्तुट्टी परम २०४ सच्चा ते फासुका २५४ १४२ | सन्चादिसा १५१ सव्वाभिभू ३५३ सन्दाम ३९८ सच्चे तसन्ति १२६, १३० सन्धाविसं १५३ / सव्वे धम्मा २७६ सन्धिच्छेदो सब्वे भायन्ति १२९ सन्नद्धो ३८७ सब्वेस जीवित सन्निवासो सहारा २७७, २७५ सफला होति ५२ / सव्येसु धम्मे ३५३ सन्न रति ३५४ / सब्वेसु भूतेसु सन्तो दन्तो सन्तो हवे . २०६ / सन्चे - ( २१२ ) ३५३ ३४१ ३६५,३६६ ૨૫૬ ३७२ सभागवा २० सय अभिमा समग्मान स्य फत मकटकोव समचरियाय ३८ । सरितानि समणो कि २६४ । सरीरस्स च समयोति २६५ | सताभ समणो नस्थि २५४, २५५ सवन्त दोसो समणो होति १८४ | सवन्ति सब्बधि समाधि अधिगच्छन्ति २४९, २५० / सवे अन्तिम समाधि नाधिगच्छति ३६५ । सवे उत्तम समाधिना धम्म १४४ | सवे कासावमइति समितत्ता दि २६५ । सवे दिवा वा स मुनी तेन २६९ । सवे धम्मघरो समेन नयति २५७ / सवे निबाण सम्पन्न विज्जा १४४ / सवे बालोति सम्पयानोसि २३७ | सवे भिक्खूति सम्पस्स विपुल २९० । सवे वन्तमलो १८१ / सवे सङ्गाम सम्मन्तीध कुदाचन ५ सवे होति सम्मदा स सीलवा सम्मप्पजानो २० | सहस्समपि सम्मप्पाय १९. सादानेसु सम्माचित ८९ साधु जिव्हाय सम्मादिष्टि समादाना ३१६ सपो सम्मा धम्म १३ सम्मा पणिहित सम्मा सप्पगोचर २६७, ३६७ २६१ सम्बुद्धान सतीमत १००, १०१ ४०६ २६२,२६३ ३६०, ३६१ ( २१३ ) सायेव पूजना ८३ सीति भूतं १०६, १०७ | सुखेन फुटा सारच सारतो १२ | सुखो पाय सारत्त रत्ता ३४५ | सुखो पुञ्जस्स ११८ सारम्भो ते १३४ | सुखो बुद्धानं १६४ सारे चासार ११ | सुचि कम्मस्स '२४ सासपोरिव ४०७ सुचि गन्धं ५८ साहुदस्सनमरियानं २०६ सुजीवं सिच भिक्खु ३६६ | सुअतो ९२, ९३ सित्ता ते ३६९ | सुन्नागारं ३३ 'सिथिलो हि ३१३ | सुत्तं गाम ४७, २८७ ४१८ | सुत्तेसु बहुजागरो २९ सीलगन्धो ५५ सुदन्तो वत १५९ . सीलदस्सन २१. सुदस्सं वजं २५२ सीलवन्तं ४०० सुदुद्दसं सीलवन्तस्स ११० १२५ सीलेसु सुसमाहित • १० | सुद्धाजीवि ३६६ मुकरांनि १६३ सुद्यजीवे ३७५ ८७ २४५ सुखं भिक्खु ३७९ | मुद्धि असुद्धि १६५ सुखं याव ३३३ सुप्पबुद्ध २६६ से ३०१ तक सुखकामानि १३१, १३२ | सुभानुपस्सि सुखा मत्तय्यता ३३२ सुमरति ३२४ सुखा संघस्स १९४ सुरामेरय २४७ सुखा सद्धम्म देसना १९४ | सुसुकं वत १९७ से २०० सुखा सद्धा ३३३ । सेखो धम्मपद ४५ सुखा सामञ्जता ३३२ सेखो पठविं सुखुमो रजों १२५ सेन्ति चापातिखीनाव १५६ सुद्धस्स पोसस्स सुक्कं भावेथ सुद्धा जीवन ... p Pave .

(२१२ ) ३४१ १३८ ३६५, ३६६ २६३ ३४० ३५२ २५४, २५५ २५० २५९ ३७२ सभागवा २० सय अभिमा समम्मान १९४ | सय त मकटकोव समचरियाय ३८८ सरितानि समणो कि २६४ । सरीरस्सर समयोति २६५ सलाम समणो नत्थि सवन्त दोसो समणो होति १८४ | सवन्ति सवधि समाधि अधिगच्छन्ति २४९, २५० । सवे अन्तिम समाधि नाधिगच्छति ३६५ । सवे उत्तम समाधिना धम्म १४४ / सवे कासावमक्षति समितता हि २६५ । सवे दिवा वा स मुनी वेन २६९ सवेधम्मघरो समेन नपति २५७ | सवे निम्बाण सम्पन्न विज्जा सम्पयातोसि २३७ । सवे भिक्खूति सम्परस विपुल २९० सवे वन्तमलो सम्बुसान सतीमत १८१ । सबे सलाम सम्मन्तीय कुदाचन ५ सवे होति सम्मदच्या ५७,९६ ससीलया समापजानो २० सहस्समापि सम्मप्पमाय १९. सादानेनु सम्माचिन साधु जव्हाय सम्मादिहि समादाना ३१९ साधु रूपो सम्माधर्म्म ३०३ | साधु याचाय सम्मा परिवि ८३ माशु सन्यस्य उम्मा सम्प्पगोचरा सोतेन सम्मा सम्मुल ५९, १८०, ३१२ | सामन्न दुप्पामा १४] सवे पालोति २६७, ३६७ २५१ ३१६ १००, १०१ ४०६ २१२, २६३ ३११ २६०, ३६१ १२ । मधु ( २१३ ) सायेव पूजना सुखेन फुटा ४०७ सीति भूतं सुदरसं वज्ज १.६, १०७ सारख्च सारतो १२ | सुखो पाय सारत्त रत्ता ३४५ | सुखो पुञस्स सारम्भो ते १३४ | सुखो बुद्धानं १६४ सारे चासार ११ | सुचि कम्मरस • २४ सासपोरिव सुचि गन्ध साहुदस्सनमरियानं २०६ सुजीवं २४४ सिन्च भिक्खु ३६६ | सुब्रतो .९२, ९३ सित्ता ते ३६९ सुब्बागारं ३३ सिथिलो हि ३१३ । सुत्तं गार्म ४७, २८७ ४१८ सुत्तेसु बहुजागरो २९ सीलगन्धो ५५ सुदन्तो वत १५९ . सीलदस्सन २१. २५२ सीलवन्तं सुदुद्दस सीलवन्तस्स ११० सुद्धस्स पोसस्स १२५ सीलेसु सुसमाहित • १० सुद्धाजीवि ३६६ मुकरानि १६३ | सुद्धाजीवे ३७५ २४५ सुखं भिक्खु ३७९ | मुद्धि असुदि सुखं याव ३३३ सुप्पबुद्ध २६६ से ३०१ तक सुखकामानि १३१, १३२ सुभानुपस्सि सुखा मत्तेय्यवा ३३२ सुमरति सुखा संघस्स १९४ | सुरामेरय २४७ सुखा सद्धम्म देसना १९४ | सुसुकं बत १७ से २०० सुखा सद्धा ३३३ सेखो धम्मपद ४५ सुखा सामञ्जता ३३२ / सेखो पठविं सुखुमो रखो १२५ । सेन्ति चापातिसीनाव १५६ ४०० सुक्कं भावेथ सुद्धा जीवन ( २१४ ) hd १७५ सेय्य सदिसमत्तनो सेय्य सोनं सेय्यो प्रयोगुलो सेय्यो होति ३०८ सेलो यथा ३६२ ३२६, हन्ति बालस्स ६१ ४३ / हंसा दिव हसाव पल्ललं इतावकासो ८१ हत्यमेवानु १३६ / हत्य सब्बतो ३७९ | हत्यिप्पभिन्न इन्ति श्रव २३६, २३८ ३३६ / हुनन्ति भोगा हरेय्य पाणिना हित्वा कामे हित्वा जय हित्वा मानुसर्फ हित्वा याति ३४१ / हित्वा रविच १६ | हिमवन्तो व ३९३ | हिरीनि सेधो १५ हिरीमचा च होनं धम्म सेहि कम्महि सो अत्तगुत्तो सो इम लोक १७२, १७३, ३८२ सो करोहि सोका तम्हा सोका तस्स सोतापत्ति फल १७८ सोधेन्ति मन्च १४१ सो प्लवति सो ब्राझणो १४२ सोमनस्सानि सो मोदति सो मुची सोच सो सोचति १२४ २२ ३०४ .

Dhammpada

Author
Narayan,kishore
Title
Dhammpada
File name
Dhammpada
Text
OCR done
Citation
1946
Published
2012/08
Publisher
Banaras.,mahabodhi Sabha
Language
Sanskrit
Pages
206
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313340
Barcode
99999990322037.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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nMsSNUYRrjK
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