Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Jain Tatva Prashnottari
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जैन तत्त्व प्रश्नोत्तरी
MANJU P. CHORDIA
2457. M.SB. Ke Rasta
Johari Bazar, JAIPUR-302003
संपादन
कन्हैयालाल लोढ़ा
प्रकाशक:
सम्यग्ज्ञान प्रचारक मण्डल, जयपुर
Oपुस्तक
जैन तत्त्व प्रश्नोत्तरी
सम्पादन
कहैयाताल सोढा
प्रकाशक
सम्यग्ज्ञान प्रचारक मण्डल
बापू बाजार,
जयपुर-३०२००३
1 प्रथम सस्करण १९८४
द्वितीय सस्करण १६८६
0 मूल्य-पांच रुपये
- मुद्रक
मण्ड्स प्रिण्टर्स एण्ड स्टेशनर्स
जौहरी वाजार, जयपुर-३०२००३
0 पुस्तक
जैन तत्त्व प्रश्नोत्तरी
-सम्पादन
कन्हैयालाल लोढा
प्रकाशक
सम्यग्ज्ञान प्रचारक मण्डल
वापू बाजार,
जयपुर-३०२००३
प्रथम सस्करण १९८४
द्वितीय सस्करण १९८६
D मूल्य-पाच रुपये
मुद्रक
फ्रेण्ड्स प्रिण्टर्स एण्ड स्टेशनर्स
जोहरी वाजार, जयपुर-३०२००३
प्रकाशकीय समाज में स्वाध्याय संघों की स्थापना होने से स्वाध्याय करने का प्रचार-प्रसार बढ़ा है। जिससे स्वाध्याय प्रेमी बन्धुत्रों को एक ऐसी पुस्तक की आवश्यकता अनुभव होने लगी जिसमें जैन धर्म के सभी तत्त्वों का परिचय सरल, सुगम शैली मे सम्यक् प्रकार से हो । इस आवश्यकता की पूर्ति हेतु जैन तत्त्वज्ञ श्री कन्हैयालालजी लोढ़ा ने विशेष प्रयास किया और प्राचार्य श्री १००८ श्री हस्तीमलजी म. सा. के सानिध्य में बैठकर प्रश्नोत्तर शैली में यह 'जैन तत्त्व प्रश्नोत्तरी' पुस्तक लिखी । आचार्य श्री का इसमें मार्गदर्शन मिला। एतदर्थ मंडल प्राचार्य श्री एवं लोढ़ाजी का आभारी है । इसकी बहुत मॉग आने से इसका द्वितीय संस्करण प्रकाशित किया जा रहा है । मंडल समाज के सर्वसाधारण व साधक स्वाध्याय वधुओं की ज्ञानवृद्धि हेतु इस पुस्तक का प्रकाशन कर रहा है । उपाध्याय श्री पुष्कर मुनिजी के विद्वान् शिप्य श्री रमेश मुनिजी ने पुस्तक को ध्यान पूर्वक पढ़ा एवं प्रस्तावना लिखकर सहयोग प्रदान किया, उनके प्रति मंडल कृतज्ञता प्रकट करता है। श्री केवलमलजी लोढ़ा, डॉ० नरेन्द्र भानावत ने इसके परिप्कार में अपना अमूल्य समय दिया, श्री सन्तोप चन्दजी वम्व ने पांडुलिपि तैयार की तथा श्री पार्श्वकुमारजी मेहता ने प्रूफ शोधन में अपना योगदान दिया, एतदर्थ मंडल इन सब का आभारी है। निवेदक : देवेन्द्रराज मेहता चैतन्यमल ढढ्ढा प्रत्यक्ष मंत्री सम्यग्ज्ञान प्रचारक मण्डल, जयपुर ५ सम्पादकीय जैन धर्म का तत्त्वज्ञान विशद व अति गहन है । इस पर अनेक विशाल काय ग्रथ लिखे गये हैं, जिन्ह पढकर स्मरण रखने में विशेष समय की अपेक्षा रहती है। इस दृष्टि से एक ऐसी पुस्तिका लिखने की आवश्यकता प्रतीत हुई जो बहुत बडी भी न हो और न उसमे आवश्यक तात्त्विक विवेचन भी आ जाय । प्रस्तुत पुस्तक इसी आवश्यकता की पूर्ति हेतु प्रश्नोत्तर शैनी में लिखी गई है। यह पुस्तक परम श्रद्धेय ग्राचाय प्रवर श्री १००८ हस्तीमलजी म० मा० जयपुर वर्षावाम में विराजे तव प्रश्नोत्तर का क्रम चला, उन प्रश्नो का मकलन व सम्पादन कर प्रस्तुत पुस्तक तैयार की गई । इस पुस्तक में जो कुछ विशेषता व उपयोगिता देखने में आती है, वह सव आचार्य श्री की कृपा का ही परिणाम है । इसके लिये प्राचाय श्री का मैं अति कृतज्ञ हूँ। श्री सम्यक्ज्ञान प्रचारक मडल ने इस पुस्तक का प्रकाशित किया, इसके लिये मैं मडल के प्रति आभार प्रकट करता हूँ। - - प्रस्तुत पुस्तक में जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आश्रव, सवर, निर्जरा, वध व मोक्ष इन नव तत्त्वो का प्रश्नोत्तर शैली में संक्षेप मे वणन है । यह वणन स्वाध्यायी वन्धुप्रो की उपयोगिता का दृष्टि में रखकर किया गया है । श्री रमेश मुनिजी ने इस पुस्तक को गहराई में देखा एव तत्त्वो से सम्बन्धित अन्य विविध जानकारी से युक्त प्रस्तावना लिखने की कृपा की। आशा है, यह पाठको के लिये विशेष लाभदायी होगी।
प्रस्तुत पुस्तक स्वाध्यायी वन्धुओं को जैन धर्म के तत्त्वों की
संक्षिप्त व सार रूप में जानकारी देने में जितनी उपयोगी सिद्ध होगी,
मुझे उतनी ही प्रसन्नता होगी।
११ मई, १९८६
कन्हैयालाल लोढ़ा
अधिष्ठाता
श्री जैन सिद्धान्त शिक्षण संस्थान
साधना भवन, ए-६, महावीर उद्यान पथ
बजाज नगर, जयपुर ३०२ ०१७
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। प्रस्तावना प्रत्येक दर्शन में तत्त्व का महत्त्वपूर्ण और आधारभूत स्थान है । तत्व का जीवन से और जीवन का तत्त्व से प्रगाढ़ और परस्पर सम्बन्ध है । तत्त्व का पारलौकिक क्षेत्र में महत्त्व है और तत्त्व लोक सापेक्ष भी है । वस्तु का भाव "तत्त्व" है । तत् और त्व से तत्त्व शब्द निष्पन्न हुअा है । "तत्" का अर्थ है-उस अथवा "वह" । यह सर्व-नाम "शब्द" है । जो निश्चित रूप से किसी संज्ञा अर्थात् वस्तु की पोर इंगित करता है उस पदार्थ का ही तत्त्व में महत्त्व है । तत् के साथ “त्व" प्रत्यय जुड़ जाने से "तत्त्व" का अभिप्राय हो गया है- उस पदार्थ का स्वरूप अथवा उस वस्तु का भाव अर्थात् किसी वस्तु के धर्म, गुण या क्रिया का परिचय ही तत्त्व है । तत्त्व की समीक्षा इस प्रकार भी हुई है-जो पदार्थ अथवा वस्तु अपने जिस रूप में विद्यमान है उसका उस रूप में होना ही तत्त्व है । प्रत्येक पदार्थ जो है अर्थात् जिसका अस्तित्व स्वीकार्य है वह तत्त्व के अन्तर्गत परिगरिणत हो जाता है । किन्तु दर्शन इन मे से कतिपय को ही अपने अर्थ में तत्त्व रूप में स्वीकार करता है। तत्व का लक्षण "सत्" है । अथवा सत् ही तत्व है । अतएव वे स्वभावतः सिद्ध हैं । इस समूचे लोक में जो हैं, वह तत्त्व है और जो नहीं है, वह तत्त्व नहीं है । इतना स्वीकार कर लेना प्रत्येक अवस्था में यथार्थता के सन्निकट है, सर्वथा निरापद है । तथ्य यह है कि होना ही (१) । तत्त्व है, नहीं होना तत्त्व नहीं है । दाशनिका का क्षेत्र है-अस्तित्व का विवेचन-विश्लेपण करना और अस्तित्वधारियों का वर्गीकरण करना । यही तत्त्वा का अध्ययन है । इससे नो भिन्न अर्थ और स्वरुप मे तत्त्व शब्द लाक व्यवहार म प्रयुक्त होता । हम भी तत्त्व शब्द का प्रयोग जव सामान्य प्रनगो में करते है ता उसका प्रयोग साराश, मूल- भाग, वास्तविक स्थिति, यथाय आदि अर्या का सम्प्रेषण करता है। तत्त्व का यह अतीव व्यापक अथ है । अथ की इस व्यापक्ता को ग्रहण करते हुए पारलौकिक प्रसगो में भी दाशनिका और मनीपी चिन्तको ने तत्त्वो का प्रतिपादन किया है। केवल अन्तर यही ह कि लोक्कि क्षेत्र में तत्त्वो की जो सूची है वह पारलाक्कि तत्त्वा से भिन्न है । इसमे केवल अन्तर भौतिकता और आध्यात्मिकता का है। उदाहरणाथ- परमाथ, द्रव्य स्वभाव, पर-अपर ध्येयादि को दाशनिको ने तत्त्व रूप मे स्वीकृत किया है। इसी सन्दभ म ज्ञातव्य यह है कि-लाक-व्यवहार में और दाशनिको के चिन्तन मे तत्वो के स्वरूप की भिनता मिलती है। अलग-अलग चिन्तनधारामा मे भी तत्त्वा की मिनता पायी जाती है। मिन-भिन चिन्तनधाराग्रो के दाशनिको ने अपनी-अपनी दृष्टि से तत्त्वा का निरूपण किया है । तत्त्वो के इस प्रतिपादन के प्रधान प्राधार पर ही विविध-दशनो मे पार्थक्य सा दृष्टिगोचर होता है और इस प्रकार प्रत्येक दर्शन की अपनी-अपनी परम्परा विकसित होती चली गयी है। 1 जैन दशन में भी अन्य दशना की भाति तत्त्वो की भूमिका की महती प्रतिष्ठा रही है । प्रस्तुत दशन मे तत्त्व का परिवोध अन्य अनेक ममानार्थक शब्दो के माध्यम से कराये जाने का समुल्लेख प्राप्त होता है। अन्य ऐसे पर्यायवाची शब्दो में प्रमुख है--तत्त्वार्थ, सत्त्व, पदाय, अर्थ, द्रव्य, सत् प्रादि ! इन सभी शन्दा का प्रयोग जैन दशन १ में उसी अर्थ के परिबोध के लिये किया जाता है जिसके लिये अन्य दर्शनों में प्रायः तत्त्व शब्द भी प्रयुक्त होता है । जैन-धर्म जैन-दर्शन के आधार पर संचालित होता रहा है और जैन दर्शन तत्त्वों के प्रमुख अाधार पर चिन्तन-मनन के द्वारा रूपायित हुया है, और समय-समय पर विकसित भी होता रहा है । इस तथ्य को नकारा भी नहीं जा सकता । अतएव धर्म के उदय के साथ ही दर्शन के उद्गम-उद्भव को और तत्त्वो की उपस्थिति को स्वयंसिद्ध तथ्य के रूप में माना जाता है । जैन दर्शन में छः द्रव्यों का प्रतिपादन किया है । ये ही जैन दर्शन के आधारभूत तत्त्व है । वे द्रव्य ये है : (१) धर्मास्तिकाय (३) अाकाशास्तिकाय (५) पुद्गलास्तिकाय (२) अधर्मास्तिकाय (४) जीवास्तिकाय (६) काल इन पट् द्रव्यों मे जीवास्तिकाय जीव है और पॉच द्रव्य अजीव हैं । इसी प्रकार पुद्गलास्तिकाय मूर्त है । इसके अतिरिक्त अवशेष द्रव्य अमूर्त है । काल द्रव्य को छोड़कर पाँचों द्रव्य अस्तिकाय है । अस्तिकाय रूप में जैन दर्शन का यह तात्त्विक-निर्धारण सर्वथा मौलिक है । जैन-दार्शनिक-चिन्तन की विशिष्ट अवधारणा है । यह एक ज्ञातव्य तथ्य है। प्रत्येक दर्शन में तत्त्वों का आधारभूत महत्त्व है । यह स्वीकार करते हुए इतना अवश्य मानना होगा कि समस्त दर्शनों में तत्त्व का स्वरूप भिन्न-भिन्न है । सभी दर्शनों में तत्त्वो की समान सत्ता और महत्त्व नहीं है । हाँ, जैन दर्शन में तत्त्व की जो गरिमा है वह वास्तव में अपरिमेय रूप में स्वीकार्य समझी गयी है । जैन दर्शन में मूल्य- (३) भीमासा और वस्तु-मीमासा इन दोनो ही रष्टियो से तत्त्वो का वर्गी- करण हुआ है । वस्तु-मीमासा की अपेक्षा से पचास्तिकाय और काल का निरूपण हुआ है और मूल्य-मीमासा की दृष्टि से नव तत्त्वो के सम्बन्ध मे सविस्तृत विवेचन हुअा है । इम दर्शन के अभिमतानुसार तत्त्व समूचे लोक व्यवस्था का मूलभूत आधार है । जहाँ लोक का अस्तित्व है वहा अलोक की स्थिति भी सापेक्षता के साथ अवश्यम्भावी है । अलोक की अनुपस्थिति में लोक का अस्तित्व ही सदिग्ध रहेगा। लोक और अलोक का सह अस्तित्व एक अडिग तथ्य है । जहाँ लोक है, वहाँ अलोक अवश्य है । लोक मसीम है, निश्चित रूपेण विस्तार युक्त है । इसके विपरीत अलोक असीम है । अमर्यादित रूप से विस्तीण हैं । इस तथ्य के साक्ष्य जैन साहित्य में सुलम है । लोकाकाश के असख्यात प्रदेश है । वह चौदह रज्जू परिमाण युक्त है । जवकि अलोक परिमाण रहित है । लोक द्रव्य को अपेक्षा से सान्त है, क्योकि वह सख्या मे एक है । क्षेत्र की दृष्टि से लोक सान्त है, क्योकि समूचे आकाश मे से एक भाग विशेप ही लोक है । काल की दृष्टि से लोक अनन्त है क्योकि कोई काल ऐसा नहीं है जव लोक का अस्तित्व न हो । भाव की दृष्टि से लोक अनन्त है क्योकि लोक द्रव्य का पर्याय अनन्त है। समूचे लोक मे दो द्रव्यो की प्रधानता है जीव एव अजीव । ये दोनो तत्त्व शाश्वत हैं, अविनश्वर है । साथ ही जीव एव अजीव इन दोनो तत्त्वो के मध्य पूर्वापर सम्बन्ध भी स्थिर नही किया जा सकता कौन सा तत्त्व सर्वप्रथम अस्तित्व में आया और कौन सा उसके अनन्तर अस्तित्व में पाया इस सम्बन्ध मे निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। प्रमुख कारण यह है कि ये दोना ही तत्त्व अनादि हैं, शाश्वत है। जैन दर्शन का स्पष्ट मन्तव्य है कि तत्त्व "नित्य" स्वरूप रखता है, वह अनन्त है, अनादि है । इसी प्रकार पदार्थ का गुण या (४) स्वभाव भी अनादि और अनन्त है । देश-काल की बाधा इस शाश्वतता को कभी भी प्रभावित नहीं करती है । हमें कोई भी ऐसा पदार्थ दृष्टि- गोचर ही नहीं होता है जो किसी अन्य पदार्थ से निर्मित हुआ हो, अर्थात् पूर्व वस्तु का परिवर्तित रूप ही वर्तमान पदार्थ है। और यह परिवर्तन का क्रम अजस्रता के साथ आगे बढता रहा है। इसकी यात्रा वस्तुतः अनन्त होती है। किन्तु वस्तु तत्त्व कभी भी विनष्ट नहीं हो सकता। कभी-कभी हमें उसके विनष्ट हो जाने का भ्रम अवश्य होता है किन्तु वस्तु की पर्याय ही परिवर्तित होती है । काष्ठ के जलने पर वह विनष्ट हो गया है, यह बात नहीं है, काप्ठ भस्म में परिवर्तित हो गया। बिना किसी पदार्थ के आधार के कोई सर्वथा नवीन वस्तु अस्तित्व में नही आ सकती, और न कोई वस्तु विनष्ट होती है । वर्फ वनता है तो जल उसके मूल मे अवश्य होता है। वर्फ कोई नयी वस्तु के रूप मे उत्पन्न नहीं हुआ है। इसी प्रकार वर्फ के पिघलने से वह विनष्ट नही हो गया है, वह केवल जल के रूप में परिवर्तित हो गया है। इसी प्रकार जीव और अजीव के विराट-उपक्रम को संसार चक्र का संचालन कहा गया है । यह संचालन स्वचालित है । उस का कोई संचालक नही है । इसी प्रकार ये वस्तुएँ किसी के माध्यम से निर्मित भी नहीं है । ये अक्षय हैं, अज है, अमर है, अजर हैं। इसी सन्दर्भ में यह विचारणीय प्रश्न है कि जीव और अजीव पदार्थ नव-नवीन रूप में कैसे पा जाते हैं ? परिवर्तन की प्रक्रिया क्या है ? इस सम्बन्ध मे एक वैज्ञानिक सत्य यह है कि जीव समरूपी जीव का प्रजनन करता है। मनुष्य से ही मनुष्य समुत्पन्न होता है । पशु- पक्षियों में भी यह जीवन-चक्र देखा जाता है। इसी प्रकार ग्राम की गुठली में आम्रवृक्ष और फलों की उत्पत्ति होती है। यह सत्य चिरकालिक है। यही सदा से रहा है और सदा के लिये रहेगा भी। (५) यह परिवर्तन भूत में भी होता रहा है, वर्तमान में हो रहा है और भविष्य में भी होता रहेगा। परिवर्तन के विभिन्न चक्र चलते ही पा रहे है । पक्षी से अण्डा और अण्डे से पक्षी की समुत्पत्ति का अजन्न चक्र चलता पा रहा है और चलता रहेगा । इस चक्र का क्या तो आदि और क्या अन्त हो सकता है । यदि इन्ही परिवतन-चत्रो का ममुच्चय यह समूचा मसार है तो फिर लोक के अनादि और अनन्त होने मे भी मदेह नहीं होना चाहिये । जो अनादि है, उसका कर्ता कत्पित करना तक मगत नहीं है । यही तो जैन दृष्टि द्वारा सुस्पष्ट होता है । परमात्मा इम जगत् का मचालन नहीं करता है । जगत् तो स्वचालित परिवर्तनो के आधार पर स्वय ही संचालित होता रहा है। यह एक ध्र व मत्य है कि पदाथ के वास्तविक गुण और उसके स्वभाव पर ही समग्र लोक का समूचा स्वरूप आधारित है । और जैसे पदार्थ अनश्वर है, वैसे ही उसके गुण एव स्वभाव भी नित्य स्वरूप रखते हैं । अग्नि का स्वभाव "उष्णता" है, यह सदा उमके साथ बना ही रहता है । इम स्थायित्व के कारण ही जगत् मुनिश्चित अवस्था से चलता जा रहा है । अग्नि का सस्पर्श दाहक होता है । यह सावदेशिक एव सावकालिक तथ्य होकर सुदृढ नियम हो गया है। यदि अग्नि का स्पश भूल से हो जाये, बालक के द्वारा अवोधता से हो जाय, जान- वूझकर किया जाय, प्रत्येक अवस्था में उसका फ्ल एक ही होगा- जलाना । अवोध बालक पर दया कर अग्नि उसको नही जलाती हो या भूल मे उसको क्षमा कर दती हो-ऐसा कभी भी मभव नहीं हो मक्ता । वस्तु का जो स्वभाव है वह बडी ही अचलता के साथ तथावत् बना रहता है । यही प्रमुख कारण है कि समग्र-लोक विविध- परिवतनो और विभिन्न क्रिया प्रतिक्रियायो के माध्यम से चलता जा रहा है। और स्वयं ही चल रहा है । तथ्य यह है कि जैन दर्शन मे लोक की मर्वोपरि महत्ता स्वयसिद्ध ही है । अन्तत लोक का स्वरूप क्या है ? इस चिन्तनीय प्रश्न पर प्रचुर रूप से मनोमथन जैन दार्शनिकों द्वारा हुया हे और उससे निःसृत नवनीत ने एक अतीव सुग्राह्य लोक व्यवस्था को प्रतिपादित कर दिया । जैन दर्शन के अध्येताओं के लिये यह लोक-व्यवस्था का मौलिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण नितान्त अपेक्षणीय है । यही लोक-व्यवस्था जैन दर्शन की अत्युच्च अटारी की सुदृढ़ आधारशिला है । यह समूचा लोक पट् द्रव्यों की समन्विति है । द्रव्य समग्र लोक-व्यवस्था का मूलभूत आधार है । सत् द्रव्य का अनिवार्य लक्षण है । सत् अविनश्वर होता है । उसका किसी भी क्षरण विनाश नही हो सकता । इसी प्रकार असत् की समुत्पत्ति भी नही होती । सर्वथा रूप से काल्पनिक वस्तु-असत् को जैन दर्शन के अन्तर्गत कभी भी तत्त्व रूप में स्वीकार नहीं किया गया । जो तत्त्व है, वह सुनिश्चित रूप से सत् भी है । समय परिवर्तनशील अवश्य है । जो परिस्थितियाँ भूतकाल में विद्यमान है वे भविष्य काल में परिवर्तित हो जायेंगी । और तदनुसार जीवन और जगत् के अनेक पक्ष रूपान्तरित होते रहे है और वे होते रहेगे । किन्तु सत् अपने मौलिक स्वरूप को यथावत् बनाये रखते है । देश-काल परिस्थिति के परिवर्तन से वे अप्रभावित रहते है। सत् तो स्वयंसिद्ध होते हैं । उत्पन्न होने वाले, विनष्ट होने वाले और ध्रुव रहने वाले को "सत्" कहा गया है । अतः यह स्पष्ट है कि सत् अनादि है, अनन्त है । सत् का न तो क्षय होता है और न इसकी नवोत्पत्ति होती है । भूत वर्तमान और भविष्य मे भी वह सदैव यथावत् वना रहता है। जैन दर्शन का गहराई से अध्ययन करने पर स्पष्टतः ज्ञान होता है कि तत्त्व के उपर्युक्त स्वरूप के अतिरिक्त उसका एक अन्य स्वरूप भी प्राध्यात्मिक क्षेत्र में व्यवहृत हुया है । जागतिक जीव (७) राग-द्वेप, मोह-लोम कर्म वन्ध के कारण कलुपित है, परिपित है और अपने ज्योतिमय स्वरूप को विस्मृत किये हुए है । वह पर स्वरूप अर्थात् पुद्गलो से सम्बन्ध जोडता है। पर-भाव को स्व-भाव की और सम्मुख करने के लिये यह आवश्यक है कि जीव और पुद्गल अर्थात चेतना एव अचेतन के भेद-विज्ञान को स्पष्ट किया जाय । उसके लिये यह प्रतिवोध अावश्यक है। अात्मा ग्रन्य है, और पुद्गल अन्य है। क्योकि ये दोना द्रव्य सवंतन्त्र-स्वतन्न अस्तित्व वाले हैं । यही वास्तव मे तत्त्व मग्रह है। प्रात्मा और पुद्गल इन दोनो का वैनिन्य एव पाधक्य प्रतिपादित करने वाला भेद-ज्ञान आवश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य है । जीव और पुद्गल इन दोनो का मयोग तथा वियोग की समग्र-परिस्थितियो का गम्भीर ज्ञान भी आवश्यक है और सयोग एव वियोग के हेतुआ की समझ मी अतीव आवश्यक है । इस प्रकार आत्मा की विशुद्ध एव अशुद्ध स्थितियो, उन स्थितियो के प्रमुख कारणो, बधनो से विमुक्त होने के मम्दध मे जो कुछ भी कहा जाता है अथवा हेतु बनते है उन्हे तत्त्व कहते हैं। जैन दर्शन मे तत्त्व कितने ही इस चिन्तनीय प्रश्न या महत्त्व विवेचनात्मक दृष्टिकोण से ही है । स्पष्टता एव सुविधा के लिये पृथक्- अनुसार तत्त्वों की मख्या भी अलग-अलग पायी जाती है । किन्तु इस कारण तत्त्व के मौलिक-स्वरूप में कोई अन्तर नहीं आ जाता । एक शैली के वर्गीकरण करने पर तत्त्वों को जिस प्रकार परि- गणित किया गया है । अन्य शैली मे उस मे से कुछ तत्वों को कि ही अय तत्त्वो के माथ समाहित या सयुक्त मान लेने के कारण सख्या घट गई है । अतएव पूर्व शैली मे सयुक्त माने गये तत्त्वा को अन्य शैली मे अलग मान लिये जाने पर सख्या में अभिवृद्धि हो गई है। समग्र रूप से तत्त्व स्वरूप तो ममस्त शैलियो में एक जैसा ही है। पृथक् प्राधार (८) जैन आध्यात्मिक दृष्टिकोण से जीव को प्रथम और प्रमुख तत्त्व स्वीकारा गया है और उसके दो स्वरूप माने गये है कर्म सहित अर्थात् संसारी जीव और कर्म रहित अर्थात् सिद्ध-जीव । इस प्रकार आत्मा के दो भेद हुये संसारी और मुक्त । आत्म तत्त्व के अतिरिक्त अवशेष सभी पदार्थ "अजीव" है । मूलतः तत्त्व दो है--जीव और अजीव या चेतन और जड़ । इसी वर्गीकरण को अन्य रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है—अन्तस्तत्त्व अर्थात् आत्मा और बहिस्तत्त्व अर्थात् जड़ । यह वर्गीकरण वास्तव में गूढ़ और सूत्रात्मक है । अतएव सामान्य जनों की दृष्टि से अति दुरुह है । इसकी जटिलता को सरल करने और इसे विश्लेपणात्मक विस्तार देने का कार्य अवशेष शैलियाँ द्वारा सम्पन्न हुया है । प्रथम शैली मे तत्त्व के दो मुख्य भेद प्रतिपादित है-जीव और अजीव । द्वितीय शैली के अनुसार तत्त्व के सात-भेद हैं । वे इस प्रकार -जीव, अजीव, पाधव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष । anvr इसी प्रकार एक और तीसरी शैली के अनुसार तत्त्व की संख्या नौ हो गई है । जीव, अजीव, पुण्य, पाप, प्राथव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष। प्रथम शैली में जीव और अजीव ये दोनों मुख्यतम तत्त्व हैं। इन्हीं दो में शेष सात तत्त्व समाहित हैं । क्योंकि सातों ही तत्त्व उपर्युक्त दो मूल तत्त्वों की पर्याय हे । उपयुक्त द्वितीय शैली में, जिस सात तत्वों की गणना हुई है । तथा तृतीय शैली में नौ तत्त्व गिनाये गये हैं । किञ्चत् मात्र सा ही अन्तर है । पुण्य और पाप को दो पृथक् तत्त्व स्वीकार करने के कारण तत्त्वों की संख्या नी हो गई। (६) और इन दोनो तन्वो को प्राथव तत्त्व के अन्तर्गत समाहित कर लिया गया । द्वितीय शैली मे तत्त्वो की संख्या सात रह गई । सामान्यत जैन दर्शन मे नव तत्त्वो का उल्लेख प्राप्त होता है । आध्यात्मिक दृष्टि से तत्वो का वर्गीकरण हुग्रा है । इस वर्गीकृत रूप को तीन थेसियो मे कोटिवद्ध किया जा मकता है । (१) ज्ञेय-जो ज्ञात करने के योग्य है । (२) हेय-पाचरण की दृष्टि से जो त्याज्य है। (३) उपादेय-जो ग्रहण करने योग्य है । इस वर्गीकरण के अनुसार जीव, अजीव और पुण्य ये तीनो तत्त्व ज्ञेय हैं । अजीव एव जीव तत्त्व का परिज्ञान साधको के लिये अनिवार्य है । यही ज्ञान उनके मयम-पालन का प्रधान प्राधार बनता है । इस ज्ञान के अभाव मे सयम का सुस्पष्ट चित्र उभर नहीं पाता है। सासारिक बन्ध हेय होते हैं और मोक्ष उपादेय होता है । जब कर्म-वन्ध रूप ससार हेय है, तो स्वत ही स्पष्ट है कि ससार की वृद्धि के कारण प्राथव, पाप और वन्ध भी हेय हैं । यहाँ पर पुण्य के विपय में यह उल्लेख अनिवार्य है कि यह पुण्य तत्त्व सवथा एव मात्र ज्ञेय की कोटि मे नही पा सकता । पुण्य तत्त्व का जो उपादेय और हेय रूप है, उसको नौका उदाहरण से समभा जा सकता है। जैसे अमीष्ट स्थान पर पहुंचने तक नौका की उपादेयता है । अभीप्ट स्थान पर पहुंचने पर नौका छोड दी जाती है । वैसे ही साधक अवस्था मे पुण्य तत्त्व आदेय है और वीतराग गुणस्थानो मे स्वत छटता जाता है । पृथक्-पृथक् अवस्थागो मे पुण्य की परिगणना हेय तथा उपादेय की श्रेणियो में भी की जाती है । इसी प्रकार मोक्ष तत्त्वामी उपादेय की कोटि में माता है । अत सवर एव निजरा ये दोनो तत्त्व भी इसी उपादेय श्रेणी मे पाते है।
रूपी और अरूपी के आधार पर भी तत्त्वों का वर्गीकरण हुआ है । रूपी तत्त्व वे कहलाते हैं, जिनमें वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श ये चारों गुण पाये जाते हों, तथा जो सड़न-गलन, विध्वंसन-स्वभाव से समन्वित हों । इसके विपरीत इन लक्षणों से रहित तत्त्व अरूपी है । जीव तत्त्व अरूपी है और अजीव तत्त्व के पाँच भेद हैं-धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, अाकास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय और काल । इनमें से पुद्गल रूपी है और शेप चार अरूपी है । पुद्गल की पर्याय-विशेष द्रव्य कर्म रूप, अाधव, पुण्य, पाप और वन्ध भी रूपी है। इसी सन्दर्भ में एक और चिन्तनीय प्रश्न उपस्थित होता है कि नव तत्त्वों में से कितने और कौन-कौन से तत्त्व जीव है और कौन-कौन से अजीव हे ? यह निर्णय इस वर्गीकरण का प्रमुख विषय है-जीव तत्त्व की कोटि के अन्तर्गत सहज रूप में ही जीव तत्त्व तो आता ही है । साथ ही जीव की अवस्थाएँ विशेष-संवर, निर्जरा एवं मोक्ष तत्त्व भी जीव श्रेणी के अन्तर्गत आते है । इसी प्रकार अजीव तत्त्व सहजतः अजीव-कोटि में मान्य होता ही है । साथ ही अजीव तत्त्व की अवस्था विशेप पुण्य, पाप, आश्रव और बन्ध अजीव तत्त्व के अन्तर्गत पा जाते हैं, जो पुद्गल-स्वरूप है। इनके अतिरिक्त धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, अाकाशास्तिकाय और काल इन चार द्रव्यों की परिगणना भी अजीव की श्रेणी में की जाती है जो अमूर्त अर्थात् अरूपी है। उपर्युक्त विवेचना का तात्पर्य इतना ही है कि तत्त्वों की संख्या सूत्रात्मक रूप से जिस शैली के अन्तर्गत मानी गई है जीव और अजीव उसमें कोई अनौचित्य जैसा तथ्य नहीं है । जैन दर्शन में तत्वों का वर्गीकरण दो प्टियों से किया जाता (११) है-तत्त्व दष्टि और द्रव्य दृष्टि । उपर्युक्त वर्गीकरण ग्राध्यात्मिक दृष्टि, रूपी-अरूपी और जीव-अजीव की अपेक्षा किया गया है। द्रव्य दृष्टि से तत्त्वो का वर्गीकरण तनिक भिन्न पद्धति से किया गया है । इसके अन्तर्गत द्रव्य को प्रधानत्व प्राप्त होता है और तदनुसार द्रव्य के छ प्रकार निरूपित है । धर्म, अधम, आकाश, जीव, पुद्गल और काल । काल द्रव्य के अतिरिक्त पांच न्यो के साथ जव अस्तिकाय शब्द का प्रयोग करते हैं तब जीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, अाकाशास्तिकाय कहते है । अस्तिकाय का अर्थ है-प्रदेशो का समूह । छह द्रव्यो मे काल प्रदेश समूह रूप नहीं है । अतएव काल द्रव्य के साथ अस्तिकाय शब्द प्रयुक्त नहीं हुअा है। किसी भी पदार्थ के स्वरूप को समझने की दृष्टि में उसको द्रव्य और भाव रूप दो विभागो में विभाजित किया जाता है। द्रव्य का अर्थ है-वस्तु का मूलभूत स्वरूप और भाव का अर्थ है-- इसकी पर्याय विशेष । द्रव्य और भाव का एक अन्य दृष्टिकोण में भी अथ करते हैं । वह इस प्रकार है-द्रव्य का अथ-पौद्गलिक वस्तु और भाव का अर्थ है-अात्मिक-परिणाम ! द्रव्य और माव की दृष्टि से नव तत्त्वो को इस प्रकार घटाया जाता है। अनादिकालीन जीव रूप अखण्ड तत्त्व द्रव्य जीव है। जीव के प्रतिपल-प्रतिक्षण होने वाले विविध-परिणमन अर्थात् पर्याय को भाव जीव कहा जाता है तथा ज्ञान, दर्शन, प्रानन्द आदि आत्मा के निज गुण भी भाव-जीव की कोटि मे आते हैं । इसी तरह अनादि कालीन धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय और काल द्रव्य अजीव हैं और उसकी पर्याय भाव अजीव है । द्रव्य पुण्य क्या है ? शुभ कर्म के पुद्गल । भाव पुण्य है-पुण्य वध के कारण (१२) भूत प्रात्मा के दानादिरूप शुभ-परिणाम । द्रव्य पाप है-अशुभ कर्म के पुद्गल । भाव पाप क्या है ? पाप बन्ध के कारणभूत आत्मा के परपीड़न रूप अशुभ परिणाम । द्रव्य आश्रव क्या है ? मिथ्यात्व, अवत, प्रमाद, कपाय और योग के निमित्त से कर्म-पुद्गलों का प्रास्रवण । भाव आश्रव क्या है ? मिथ्यात्व, अवत, प्रमाद, कपाय और योग रूप आत्मा का परिणाम । द्रव्य संवर क्या है ? प्राथव का निरोध करने के लिये किये जाने वाले व्रत, समिति, गुप्ति के आचरण से पुद्गल रूप द्रव्य कर्मो का निरोध । भाव संवर क्या है ? आश्रव का निरोध करने वाले आत्मा के शुद्ध परिणाम । द्रव्य निर्जरा क्या है ? विपाक, अनशन, उनोदरी आदि तप के द्वारा प्राबद्ध कर्मों का आंशिक क्षय होना । भाव निर्जरा क्या है ? निर्जरा करने वाले प्रात्मा के विशुद्ध परिणाम । आत्म प्रदेशों के साथ कर्म पुद्गल का सम्बन्ध होना द्रव्य बन्ध है । भाव बन्ध क्या है ? आत्मा के राग-द्वेष रूप परिणाम । द्रव्य मोक्ष क्या है-यावद्ध कर्म का प्रात्यन्तिक क्षय होना । भाव-मोक्ष क्या है ? प्रात्मा का अपने शुद्ध, बुद्ध, ज्योतिर्मय स्वरूप में रमण करना । ? इसी सन्दर्भ में एक प्रश्न और उद्भूत होता है कि नव तत्त्वों मे जीव को सर्वप्रथम स्थान क्यों दिया गया है ? उत्तर है कि उक्त तत्त्वों में ज्ञाता-द्रप्टा, पुद्गल का उपभोक्ता, शुभ एवं अशुभ कर्म का कर्ता, संसार और मोक्ष प्राप्ति के लिये योग्य प्रवृत्ति का विधाता जीव ही है । यदि जीव न हो तो पुद्गल का क्या उपयोग रहेगा? इसीलिये नव तत्त्वों में जीव तत्त्व की प्रधानता होने से उसे सर्वप्रथम स्थान दिया गया है । जीव की गति में, अवस्थिति में, अवगाहना में, उपभोग प्रादि में उपकारक अजीव तत्त्व है । अतएव जीव के पश्चात् अजीव का समुल्लेख हुआ है । जीव और पुद्गल इन दोनों का संयोग ही संसार है । उस संसार के प्राथव और वन्ध ये दो कारण है। अतः अजीव के वाद पाश्रव और वन्ध को स्थान दिया गया है । ससारी आत्मा को पुण्य से सुख का वेदन पार पाप से दु ख का वैदन होता है । इस अपक्षा-अाधार से पुण्य और पाप का कम प्राथव और व घ के पूर्व रखा गया ह । जीव पर पुद्गल इन दोनो का वियोग "मोक्ष" है । सवर और निजरा ये दाना मोक्ष-प्राप्ति के मुरय कारण हैं । कम की सम्पूर्ण रूप से निजरा होन पर मोक्ष हाता है । अतएव सवर, निजरा और मोक्ष यह कम रखा गया है । इसी सन्दर्भ में यह तथ्य भी नितान्त ज्ञातव्य है कि अधिकारी की योग्यता को सलक्ष्य मे रखकर तत्त्वो का मक्षेप और विस्तार से विचार किया गया है। यदि जिज्ञासु प्रतिभा सम्पन है, तो तत्त्व का प्रतिपादन सक्षेप-शैली से किया जाता है । और यदि जिज्ञासु की बुद्धि मन्द है तो तत्व का निरूपण विस्तार से किया जाता है जिससे वह स्पष्टता और सुगमता से समझ सके । सात तत्त्वो का भी सक्षिप्त निरूपण करना चाहे ता जीव और अजीव इन दो तत्त्वो मे किया जा सकता है क्योकि सात तत्त्व इन्ही के सयोग और वियोग से बने है । पाश्रव, वन्ध, पुण्य और पाप ये चारो तत्त्व-सयोगी हैं । सवर, निर्जरा और मोक्ष ये तीनो तत्त्व- वियोगी है । आत्मा के ज्योतिर्मय-स्वस्प को आच्छादित करने वाले कर्म जिस क्रिया विशेप से आते है वह प्राधव तत्त्व कहलाता है । जहा प्राथव है, वहाँ बन्ध भी है । कामण-वगणा के पुद्गलो का कपाय से आत्म प्रदेशा से वन्ध हाता है । शुभ वन्ध को पुण्य और अशुभ बन्ध को पाप कहा है । इस प्रकार ये चारो तत्व जीव और अजीव इन दानो के मयोग स बनते हैं। एतदर्थ ये मयोगी तत्व है। सवर का अर्थ है-पाश्रव के द्वारा जो कम-पुद्गल का प्रवाह आ रहा है उसका निराध करना । आत्मा का कर्मों के साय सम्बन्ध न होन देना । कार्मण-वर्गणा के पुद्गलो का आशिक रूप से विलग हो जाना "निर्जरा" है । और सम्पूण रूप से अलग हो जाना "मोक्ष" है । इन तीनो का कार्य विजातीय तत्त्व को हटाना है । इसीलिये ये वियागी (१०) तत्त्व है । जैन दर्शन में जो तत्त्व है, वह सत् है । और जो सत् है, वह द्रव्य है । केवल शब्दों में अन्तर है । भावों मे किञ्चित् मात्र भी अन्तर नहीं है । प्रत्येक वस्तु द्रव्य की अपेक्षा से नित्य है और पर्याय की दृष्टि से अनित्य है । अतः तत्त्व रूप से परिणामी नित्य है । किन्तु वह एकान्तिक रूप से नित्य नही है, अनित्य नही है । यहाँ यह भी स्मरण रखना चाहिये कि द्रव्य और पर्याय पृथक्-पृथक् दो पदार्थ नही हैं । उनमें पदार्थगत कोई भेद नहीं है, केवल विवक्षा भेद है। अनेकान्त दर्शन के अनुसार प्रत्येक सत् पदार्थ उत्पाद, व्यय-ध्रौव्यात्मक है । तथ्य यह है कि पर्याय से उत्पन्न और विनष्ट होता हुआ भी द्रव्य से ध्रुव है। कोई भी पदार्थ इसका अपवाद नहीं है । सभी द्रव्य उभय स्वभावी है । उनके स्वभाव की यथार्थ - विवेचना एक ही प्रकार की नहीं हो सकती । असत् का उत्पाद नहीं होता और सत् का विनाश नहीं हो सकता । इस द्रव्य नयात्मक सिद्धान्त से द्रव्यों की विवेचना हो सकती है पर्यायों की विचारणा नहीं की जा सकती । उनकी विवेचना का निष्कर्ष यह होगा कि असत् की उत्पत्ति और सत् का विनाश होता है । इस पर्यायनयात्मक सिद्धान्त के द्वारा ही विवेचन हो सकता है । इन दोनों को एक शब्द मे यो भी कहा जा सकता है कि- परिणामि नित्यवाद अथवा नित्यानित्यवाद । इसमे स्थायित्व और परि- वर्तन का सापेक्ष रूप से विश्लेपण है । उक्त विवेचन का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक पदार्थ के दो प्रमुख अश है-द्रव्य और पर्याय । अतः द्रव्य को मुख्य रूप से ग्रहण करने वाला दृष्टिकोण द्रव्याथिक नय है और पर्याय को ग्रहण करने वाला दृष्टिकोण नय । यद्यपि पदार्थगत अनन्त धर्मो को ग्रहण करने वाले अभिप्राय अनन्त-अनन्त होते है तथापि उनका अन्तर्भाव द्रव्याथिक और पर्यायाथिक इन दो नयों में हो जाता है। जैन दर्शन का स्पष्ट उद्घोप है कि प्रत्येक तत्त्व अपने स्वरूप में निष्ठ होता है। एक तत्त्व का अन्य तत्त्व में संक्रमण नही हो सकता । स्थूल या बाह्य दृष्टिकोण से हम अनेक पदार्थों के संक्रमण या सहस्थिति को 4 (१५) . एक हो पदाय मान लेते है। परन्तु ऐसी स्थिति म प्रत्येक तत्त्व अपने- अपने मौलिक-स्वरूप में होता है । जहाँ पर तत्त्व के अस्तित्व की अपेक्षा है । वहाँ पर विश्व एक है और चतन्य और अचंतन्य की अपक्षा विश्व एक नहीं है। चेतन विश्व और अचेतन विश्व, ये दो रूप हैं । चैतन्य की अपक्षा चेतन जगत् एक है किन्तु चैतन्य के भी अनन्त प्रकार हैं । चैतन्य और अचैतन्य की दृष्टि से उसमे विभेद है। किन्तु द्रव्यत्व, वस्तुत्व, अस्तित्व आदि अनेक अपेक्षामो से उनमे अभेद हैं । अन्य दृष्टि से सर्वथा अभेद ही नही भेद भी है । उनमे स्वरूप भेद है । एतदर्थ उनमे अर्थ क्रिया मिन-भिन्न होती है । उनमें अभेद भी है। अत दानो मे नेय-ज्ञायक, ग्राह्य-ग्राहक प्रभृति सम्बन्ध है । एक पदार्थ अनेक गुण-धर्मों का वहन कर मकता है । इनमे से एक या कुछ को स्वीकार करने एव अवशेष का निषेध करने की प्रवृत्ति एकान्तात्मक होती है । जब पदार्य स्वय अनन्तधर्मात्मक होने के कारण अनेकान्तात्मक है । उसका प्रस्तुतीकरण एकान्तात्मक रूप मे करना न केवल अनुपयुक्त, अपितु अपूर्ण और पाशिक भी है । हां, यह अवश्य है कि जितने-जितने धर्मों की स्वीकृति अपेक्षित है वे सभी पदार्थ में निवास करते हैं । व्यक्ति अपनी अभिरुचि के अनुसार उनकी कल्पना या उनका आरोप नही कर सकता । जो गुण नही है, उसे उस पदार्थ के साथ जोडना उपयुक्त नही है । उसी प्रकार जो गुण धर्म है, उसको छोडना भी उतना ही अनुपयुक्त है । यह पदार्थ ऐमा है और कथचित् ऐसा भी है । इस शैली के प्रयोग द्वारा पदार्थ के प्रासगिक गुण के साथ-सार उसके अप्रासगिक गुण धर्मो की उपस्थिति को स्वीकार करना अनेकान्तता की अभिव्यक्ति के लिये आवश्यक होता है । यह अभिव्यक्ति शैली स्याद्वाद है । जन धर्म अनेकान्त के वैशिष्ट्य से विभूपित है । जन दृष्टि पदार्थ को अनेकविध धार्मिकता को पूर्ण रूप से स्वीकार करती है और प्रत्येक धर्म को समझने- परखने की चेष्टा करती है। जन दृष्टि की यह महत्ता है कि उसने एक ही पदार्थ मे नित्यता-अनित्यता, सदृशता-असदृशता, वाच्यता- अवाच्यता, सत्ता-असत्ता आदि परस्पर विरुद्ध से प्रतीत होने वाले धर्मो का अविरोध प्रतिपादन करके उनका तर्क संगत समन्वय प्रस्तुत करती है जिससे पदार्थ में प्रत्येक धर्म की संगति निर्विवाद रूप से हो जाती है। और तत्त्व का यथार्थ स्वरूप समग्रता से उद्भासित हो जाता है । अतः यह ध्रुव सत्य है कि अनेकान्त दृष्टि एक विलक्षण और वैज्ञानिक दृष्टि है । इसी दिव्य दृष्टि से प्रत्येक तत्त्व अनेकान्त स्वरूप है, यह स्पष्ट हो जाता है और एक ही वस्तु में वस्तुत्व की निष्पादक धिरुद्ध धर्मों के प्रतिपादन का नाम "स्याद्वाद" है । जिस समय एक तत्त्व अखण्ड रूप से विवक्षित होता है, उस समय वह अस्तित्व, नास्तित्व धर्मों की अभेद वृत्ति करके एक वचन द्वारा कहा जाता है । तथ्य यह है कि वस्तु तत्त्व एकान्तात्मक नही है उसका स्वरूप अनेकान्तात्मक है । अतः अनेकान्त अनेक सापेक्ष दृष्टियों का समुच्चय है । उसका समन्वित रूप ही जैन दर्शन का हार्द है । 'जैन दर्शन की महत्ता इसीलिये है कि उसका तात्त्विक मनन एवं तात्त्विक मीमांसा मौलिकता और यथार्थता को लिये हुए है। -रमेश मुनि शास्त्री (१७)
अनुक्रमणिका
१
१
जीव तत्त्व
२
अजीव तत्त्व
३
पुण्य तत्त्व
68
पाप तत्त्व
प्राश्रव तत्त्व
७२
६
सवर तत्त्व
११६
निजरा तत्त्व
१४४
५
वय तत्त्व
ह
मोक्ष तत्त्व
(१८)
जैन तत्त्व-(परिचय) प्रश्नोत्तरी शिष्य-जिज्ञासु शिष्य ने श्रद्धा के साथ गुरुदेव से पूछा कि भगवन् ! यह लोक क्या है ? उत्तर में गुरुदेव ने कहा-जहाँ जीवादि छह द्रव्य देखे जाते हो उसे लोक कहते है, जैसा कि शब्दानुशासन में कहा है-"लोक्यंते जीवादि द्रव्याणि यत्र असौ लोकः", अर्थात् जहाँ पर जीव, अजीव आदि द्रव्य और उनकी विविध अवस्थाएं देखी जाती हों, उसे लोक कहते है । जैसा कि आगमवाणी मे कहा है-"धम्मो अहम्मो पागासं, कालो पुग्गल जन्तवो । एस लोगोत्ति पन्नत्तो, जिणेहिं वरदंसिहि ।। (उत्तराध्य- यन अ. २८, गाथा ७) अर्थात् धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, अाकाशा- स्तिकाय, काल, पुद्गलास्तिकाय और जीवास्तिकाय, इस पट् द्रव्यात्मक क्षेत्र को ही लोक कहते हैं। जहाँ धर्मास्तिकाय प्रादि द्रव्य नहीं है, और केवल आकाश हे वह शून्य प्रदेश, अलोक कहलाता है । ढाई हजार वर्ष पूर्व कयंगला नगरी में भगवान महावीर के समक्ष स्कन्दक परिव्राजक ने लोक के सम्बन्ध में अपना समाधान प्राप्त करना चाहा । प्रभु स्कन्दक के मनोगत भावो को जानकर कहा कि है स्कन्दक ! लोक के विषय में तुम्हरी जो शंका थी कि लोक सान्त है या अनन्त है, इस सम्बन्ध मे यह जानना चाहिये कि लोक चार प्रकार के हैं : (१) द्रव्य लोक (२) क्षेत्र लोक (३) काल लोक और (४) भाव लोक । (१) द्रव्य से लोक एक और अन्त सहित है। (२) क्षेत्र से it -- लोक असख्यात कोडा-कोडी याजन का लम्बा-चौडा और परिधि वाला कहा गया है, अत वह सान्त है। (३) काल से लोक कभी नहीं था, नहीं है या नहीं होगा, ऐसी बात नहीं, वह पहले था, प्राज है और भविष्य में रहगा । अत वह अनन्त है। पर्याय दृष्टि से उत्पत्ति और व्यय का क्रम चलते रहने पर भी मूल द्रव्यो की ध्रुवता की अपक्षा वह शाश्वत है, उसका कमी अन्त नहीं होता। (6) भाव से लोक अनन्त वर्ण-पर्याय, अनन्त गन्ध-पर्याय, अनन्त रस-पर्याय, अनन्त स्पर्श- पर्याय तथा अनन्त गुरु-लघु, अनन्त अगुरु-लघु पर्याय वाला एव गुण से अन्त रहित है । चार प्रकार के लोक में द्रव्य और क्षेत्र से लोक अन्त सहित है, तथा काल और भाव से अन्त रहित कहा गया है । इमलिय एकान्त रूप से लोक सान्त या अनन्त नहीं कहा जा सकता। वह द्रव्य क्षेत्र की अपेक्षा सान्त और काल तथा भाव की अपक्षा अनन्त कहा गया है । यह कथन स्याद्वाद प्रधान है। शिष्य-नगवन् ! लोक एक ही है या उसके नाग नी होते हैं? गुरुदेव ने उत्तर देते हुए फरमाया कि-लोक तीन प्रकार का -(१) ऊर्ध्व लोक (२) अधो लोक और (३) तिया लाक । सम्पूण लोक १४ रज्जु प्रमाण प्राकाश मे अवस्थित हैं । शिष्य गुरुदेव ! ऊध्वं लोक, अधो लोक और तिर्यक लोक ये कितने-कितने वडे हैं ? गुरुदेव-तीनो लोक मे ऊर्ध्व लोक कुछ कम ७ रज्जु, तियक् लोक अर्थात् मध्य लोक १८०० योजन और अधो लोक ७ रज्जु जाजेरी कहा है, इस प्रकार कुल मिलाकर १४ रज्जु प्रमाण क्षेत्र मे सम्पूर्ण लोक क्षेत्र माना गया है। २ शिष्य-भगवन् ! सम्पूर्ण लोक १४ रज्जु प्रमाण फरमाया, तो वह रज्जु क्या और कितना बड़ा कहा गया है ? कृपया समझा। ? गुरुदेव ने उत्तर में कहा-शिष्य रज्जु का प्रमाण उपमा से इस पर समझना चाहिये-एक हजार भार का गोला ऊर्ध्व लोक से इन्द्र या कोई देव अति शीघ्रता से नीचे फेंके और वह छह महीने, छह दिन, छह प्रहर, छह घड़ी और छह पल में जितनी दूर जावे उतने क्षेत्र को एक रज्जु कहा जाता है । पूर्वाचार्यों ने एक भार तीन करोड़ इक्यासी लाख वारह हजार नौ सौ सत्तर (३,८१,१२,९७०) मन का बताया है। उपरोक्त प्रमाण के १४ रज्जु का सम्पूर्ण लोक बताया गया है । योजन की अपेक्षा सम्पूर्ण लोक असंख्यात योजन का होता है। इसी में वर्मास्तिकाय अादि पाँच अस्तिकाय द्रव्य और काल अवस्थित है । इसके वाहर अलोक मे शून्य आकाश मात्र है । वहाँ कोई अन्य द्रव्य नही है। ! - शिष्य-भगवन् ! लोक के अनन्त-अनन्त पदार्थों में मूल तत्त्व कितने हैं ? गुरुदेव ने कहा-संसार में मूल तत्त्व दो है। जीव और अजीव । जैसा कि कहा है-"जीवा चेव अजीवा य, एस लोए वियाहिए । अजीव देसमागासे, अलोगे से वियाहिए" (उ० प्र० ३६ गा० २) अर्थात् जीवों और अजीवों के समूह एवं इनके संयोग को लोक कहा गया है, अजीव का एक देश आकाश-अलोक कहा जाता है। सांख्य दर्शन की भापा में इसी को प्रकृति और पुरुप के नाम से कहा जाता है । प्राज का विज्ञान सी से भी अधिक तत्त्व बतला रहा है, पर वे सब जीव-मजीव के अंतर्गत समाविष्ट हो जाते है । विज्ञान अभी जड़-दृश्य तत्त्वों को ही पकड़ पाया है, चेतन तत्त्व की खोज करते हुए भी वह अभी उसे उपलब्ध नहीं कर सका है। me शिष्य-भगवन् । लोक में जीव और प्रजोव दो ही मूल तत्व हैं। तव नवतत्त्व का उल्लेख कैसे है ? गुरुदव न ममाधान की मापा म कहा-है अन्तेवासी । मून तत्त्व जा दा कहे गये हैं, वे मग्रह नय की अपक्षा से समुचित है । अनन्त पुद्गल-स्कन्ध और विभिन्न योनियों के जीव, जीव और अजीव इन दो तत्त्वा मे माहीत हा जाते हैं कि तु जीव और अजीव के मयोग एव वियाग रूप से अन्य तत्त्वो का भी कयन किया जाता है। जीर- अजीव के ही सयाग एव वियोग रूप पयाय से ६ तत्त्व कहे जाते है। शिष्य-भगवन् । मूल दो तत्त्वो मे जीव का स्वरूप क्या है ? उसको किन लक्षणो से पहचानना चाहिये ? गुरुदेव द कहा-जा जीव चेतनाशील और उपयोगमय हा उसे जीव मममना चाहिये । जमा कि शास्त्र में कहा है- जीवो उवाग लक्खया । गुण धर्म म एक हाकर भी गति, जाति नर-नारी आदि पर्याया से जीव अनन्त भी कहा जाता है, जैसा कि कहा है-'प्रगन्ताणि य दव्वाणि कालो पुग्गलजन्तवो" (उ० प्र० २८ गा० ८) अयात् काल, पुद्गल और जीव अनन्त अनन्त है । जीव का लक्षण बतलाते हुए कहा है- "नारण ६ दसरण चेव, चरित्त च तवो तहा । वीरिय उवयोगा य, एय जीवस्स लक्सरण ।। (उ० प्र०२८ गा० ११) अर्याद ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप, वीर्य और उपयोग ये जिसमे पाये जावें उसे जीव समझना चाहिये। जीव अर्याद आत्मा, मन और इन्द्रिया से प्रतीत होने से उसका इन्द्रियो से साक्षात्कार नहीं होता, वह जीव उपरोक्त लक्षणो से ही पहचाना जाता है । ४ शिष्य-जीव कितने प्रकार के हैं ? गुरुदेव-उत्तराध्ययन और पनवणा आदि सूत्रां में जीव के २ भेद बतलाये गये है, जैसा कि कहा है, "संसारत्था य सिद्धा य, दुविहा जीवा वियाहिया । सिद्धा रणेगविहा वुत्ता तं मे कित्तयग्रो सुरण ।। (उ० प्र० ३६ गा० ४६) जिनेन्द्र देव ने कहा है कि-संसारी और सिद्ध-इस प्रकार जीव मुख्य रूप से दो प्रकार के है । उनमें से पहले सिद्ध जीवों का कथन किया जाता है । सर्वथा कर्म मुक्त प्रात्मानो को सिद्ध कहा गया है, वे अनेक प्रकार के होते है । शिष्य ने जिज्ञासा करते हुए पूछा-भगवन् ! सकल कर्मों को क्षय कर लेने के बाद जीवों की विविधता का कौनसा कारण रहता है, जिससे कि सिद्धों के अनेक प्रकार कहे गये। य उत्तर में गुरुदेव ने कहा-वास्तव में सिद्धों में मुक्त हो जाने पर कोई भेद नहीं रहता, सव एक ही आत्म स्वरूप में अवस्थित होते हैं । फिर भी यहाँ जो भेद बतलाया है, वह सिद्धत्व के पूर्व अवस्था की अपेक्षा भेद किये गये है। पूर्व पर्याय की विविधता के उपलक्षण सिद्धां के १४ प्रकार कहे गये हैं । "इत्थी' पुरीसरे सिद्धाय, तहेव नपुंसगा । सलिंगे अन्नलिंगे' य, गिहिलिंगे६ तहेव य उक्को सोगाहणाए" य, जहन मज्झिमाइ य । उड्ढं ° अहे'' य तिरियं' २, समुद्दम्मि' 3 जलम्मि'४ (उ० प्र० ३६ गा० ५०, ५१) अर्थात् स्त्री पुरुष और नपुसक की पर्याय से सिद्ध होने वाले, "स्वलिंग "अन्यलिंग और गृहलिंग अर्थात् गृहस्थी के वेश से मित होने वाले, "उत्कृष्ट अवगाहना जपन्य अवगाहना और मध्यम य।। ५ अवगाहना से सिद्ध होने वाले । क्षेत्र की अपेक्षा, ऊर्ध्वलोक अधोलोक और १२ तियक लोक मे मिद्ध होने वाले । फिर १२समुद्र में और १४जल से सिद्ध होने वाले। इन २ को मिलाकर १४ प्रकार से सिद्ध होते हैं । इस प्रकार पूर्व पर्याय के भेद को सिद्धो के भेद मानकर १४ भेद सिद्ध कहा गया है। प्रज्ञापन सूत्र के प्रथम पद मे सिद्ध जीवो के अनन्तर और परपर दो प्रकार करते हुए सिद्ध जीवो के १५ भेद बतलाये, अरणतर-मिद्ध अससार-समावण्ण जीव पण्णवणा पण्णरसविहा- पण्णता, तजहा-तित्थमिद्धा अतित्थमिद्धा, तित्यगर सिद्धा, अतित्थगर मिद्धा, सयबुद्ध सिद्धा, पत्तेयबुद्ध सिद्धा, बुद्धवोहिय सिद्धा, इत्थीलिंग सिद्धा, पुरिसलिंग सिद्धा, नपु मलिंग सिद्धा, सलिंग मिद्धा, अण्णलिंग सिद्धा, गिहिलिंग सिद्धा, एग सिद्धा, अणेग सिद्धा ॥" प० । - , - अर्थात् - अनन्तर-मिद्ध अससार समापन्न जीवो की पनवणा अनेक प्रकार की है, जैसे तीथ सिद्ध आदि । तीर्थ की स्थापना के पश्चात् सिद्ध होने वाले 'तीर्थ मिद्ध', तीर्थ स्थापना के पूर्व विना ही सिद्ध होने वाले 'अतीर्य सिद्ध, तीर्थकर पद से सिद्ध होने वाले 'तीर्थकर सिद्ध'3 तीर्थकर के अतिरिक्त सिद्ध होने वाले 'अतीर्थकर सिद्ध प्रादि के उपदेश विना स्वय बोध प्राप्त कर सिद्ध होने वाले, 'स्वयबुद्ध", वृपम आदि किसी एक निमित्त से प्रतिवुद्ध होकर सिद्ध होने वाले 'प्रत्येक बुद्ध'६, किसी ज्ञानी की प्रेरणा से प्रतिवुद्ध होकर सिद्ध होने वाले 'बुद्ध वोधित'", स्त्री के शरीर से सिद्ध होने वाले 'स्त्रीलिंग-सिद्ध'८, पुरुप के शरीर से सिद्ध होने वाले 'पुरुपलिंग-सिद्ध", नपु सक के शरीर से सिद्ध होने वाले 'नपु सकलिंग-सिद्ध"", . स्वलिंग रजोहरण मुखवस्त्रिका अादि जैन लिंग से सिद्ध होने वाले 'स्वलिंग- सिद्ध", परित्राजक आदि वेप से सिद्ध होने वाले 'अन्यलिंग सिद्ध" . - ६ मरुदेवी आदि की तरह गृहस्थ वेप से सिद्ध होने वाले 'गृहलिंग सिद्ध'१३ एक समय मे एक सिद्ध होने वाले 'एक सिद्ध१४ और एक समय में अनेक एक साथ में सिद्ध होने वाले 'अनेक सिद्ध'१५ है । इस प्रकार क्षेत्र भेद, लिंग तथा रूप भेद आदि पूर्वावस्था से सिद्धों के भी १५ भेद किये गये है। इनको औपचारिक समझना चाहिये । वास्तव मे सिद्ध एक ही प्रकार के होते है, वहाँ छोटे-बड़े या रंग रूप का कोई भेद नही रहता। शिष्य-गुरुदेव ! उपरोक्त विवेचन से सिद्धों के प्रकार विषयक मेरा समाधान हो गया। किन्तु सिद्ध सर्वथा कर्म मुक्त होने से अशरीरी हैं, तो उन्हें कैसे समझना चाहिये । उनका स्वरूप क्या है ? उत्तर में गुरुदेव ने कहा-सिद्धों के स्वरूप संबंधी उववाईय आदि सूत्रों मे विशद वर्णन मिलता है, जैसा कि कहा है-असरीरा जीवघणा, उवउत्ता दसणे य गाणे य । सागारमणागारं लक्खणनेयं तु सिद्धाणं ।। (उववाईय अ० गा० ११) सिद्ध अशरीरी और चैतन्य घन होते है, अपने मुख्य गुण पूर्ण ज्ञान और पूर्ण दर्शन आदि प्रात्म गुगगों में अवस्थित होते है । याचाराग सूत्र के पंचम अध्ययन के पप्ठ उद्देश्य में सिद्ध भगवान का स्वरूप बतलाते हुए निम्न प्रकार से कथन किया है- "अच्चेइजाइमरणस्स, वमग्गं विक्खायरए" सिद्ध प्रात्मा जन्म-मरण के वृत्त मार्ग को पार कर जाते हैं, उनके स्वरूप को कथन करने के लिये कोई शब्द समर्थ नहीं होता, जहाँ पर तर्क और बुद्धि की पहुँच नही हो सकती, और बुद्धि से भी जहाँ अवगहन नहीं होता । यथाचोक्त-जैसा कि कहा है- ७ पार पर्याप्ता मिलकर २०२ गमज मनुष्य के प्रकार होते है । उनम १०१ पर्याप्त मनुष्य के मल-मूत्रादि १४ स्थानो में उत्पन होने वाले १०१ सम्मूलिम मनुष्य कहलाने हैं। ये अपर्याप्ता अवस्था मे ही काल कर जाते है, इसलिये इनके पर्याप्ता नहीं होते। इस प्रकार कुल मिलाकर मनुष्या के ३०३ प्रकार होते हैं । शिप्य ने पूछा-भगवन् ! कम-भूमि किसे कहते हैं ? उत्तर देते हुए गुरुदव ने कहा-जिस भूमि में असि, मसि और कृपि आदि कम हो और जहाँ राजा-प्रजा, स्वामी-सेवक, गुरु-शिप्य आदि के सम्बन्ध से व्यवहार चलता हो । जहाँ मनुष्य कर्म-निया करके ही व्यवहार और परमार्थ (माक्ष) की साधना करते है । उन भूमियो को कर्म भूमि कहते है । कर्म-भूमि के १५ क्षेत्र हैं । शिष्य-भगवन् । कर्म-भूमि के १५ क्षेत्र कौन-कौन से हैं और वे कहां-कहाँ हैं ? गुरुदेव ने कहा-५ भरत, ५ ऐरावत और ५ महाविदेह, इस प्रकार कम-भूमि के १५ क्षेत्र है । इनमे एक भरत एक ऐरावत और एक महाविदेह जम्बूद्वीप मे हैं । २ भरत, २ ऐरावत तथा २ महाविदेह घातकी खण्ड तया २ भरत, २ ऐरावत और २ महाविदेह अर्द्ध- पुष्कराद्ध द्वीप मे है । कम-भूमि क्षेत्र म तीर्थंकर, चरवर्ती, वलदेव आदि मोक्षगामी उत्तम पुरुप होते हैं ता इसके विपरीत नरक भूमि मे गमन करने वाले महाप्रारमी, महापरिग्रही भी होते हैं। मुक्ति प्राप्त कराने वाली महाव्रत आदि की साधना कर्म भूमि मे ही सम्भव है । अन्यत्र कही सभव नहीं है। शिष्य ने जिज्ञासा करते हुए पूछा-भगवन् । भरत क्षेत्र का - १४ थोड़ा स्पष्ट परिचय दीजिये, जिससे कर्म भूमि के अन्य क्षेत्रों को भी समझ सकू। उत्तर मे गुरुदेव ने कहा-जम्बूद्वीप के चुल्ल हिमवन्त पर्वत से दक्षिण की ओर लवण समुद्र मे लगता हुया ५२६६ योजन ६ कला का भूमि भाग भारतवर्ष के नाम से कहा जाता है। दीर्घ वैताढ्य के कारण भारत के २ विभाग हो जाते है, जिसको उत्तर भरत और दक्षिण भरत कहते हैं । गंगा और सिन्धु ये २ नदियाँ दीर्घ वैताढ्य के अधोभाग से निकलकर लवण समुद्र में गिरती है । इन दोनों नदियों के कारण प्रत्येक के ३-३ विभाग होने से भरत क्षेत्र ६ खण्ड वाला कहा गया है। भारतवर्ष मे अवसर्पिणी और उत्सपिणी काल का प्रवर्तन होता है जो इस प्रकार है- अवसर्पिणी के ६ प्रारक होते हैं- १. पहला ४ कोडा कोडी सागर प्रमाण का; २. दूसरा ३ कोडा कोडी सागर प्रमाण का; ३. तीसरा २ कोडा कोडी सागर प्रमाण का; ४. चौथा १ कोडा कोडी सागर प्रमाण मे ४२ हजार वर्ष कम का; ५. पाँचवा २१ हजार वर्ष का; ६. छठा २१ हजार वर्ष का। पहले, दूसरे और तीसरे पारक में वहाँ के मनुष्य भोग भूमि की तरह युगलिक होते है, उनके शादी-विवाह नहीं होते और न वे खेती- वाड़ी तथा व्यापार प्रादि धन्धा ही करते हैं। वे १० प्रकार के कल्प- वृक्षों से अपनी सभी प्रावश्यकताएं पूरी करते हुए सुख से जीते है। तीसरे प्रारक के अन्त में जब कल्पवृक्ष प्रभावहीन हो जाते है, तव वहां के मानवकुलो की व्यवस्था जो विशिष्ट पुरुप करते हैं, उनको कुलकर के १५ नाम से कहा जाता है. वे तत्कालीन मानव समुदाय की व्यवस्था करते है। वैदिक परम्परा मे कुलकरो को मनु कहते हैं । इस समय अवपिणी के तीसरे मारक के अन्त में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदव ने इक्ष्वाकु भूमि मे जन्म धारण कर जन समाज को युगलिक जीवन से कर्म करने का ज्ञान-बोध कराया और नीति और धमपूर्वक जीवन चलाने का ज्ञान कराया तथा राजधर्म समाजधर्म और प्रात्मधर्म के मार्ग बताये । इस प्रकार भारतवप में अवपिणी के तीसरे और चौथे प्रारक मे २४ तीर्थकर, १२ चक्रवर्ती, ६ वलदेव, ६ वासुदेव और ६ प्रतिवासुदेव इस प्रकार ६३ लाध्य पुरुप होते है जा माक्षगामी माने गये हैं। भारतवप का वतमान पाचवा काल अवपिणी का ५वा मारक है। उत्सपिणी मे इन ६ ही प्रारको का क्रम उल्टा होता है । अवसर्पिणी म जहा वस्तु मे वर्ण, गघ, रस, स्पर्श पार मनुष्यो के बलवीर्य मेघा मायु और धम-कर्म की तेजस्विता हीन होनतर होती जाती है, वहाँ उत्सपिणी के वस्तु के वर्णादि और मनुष्यों के शील, स्वभाव, प्रेमादि में उत्तरात्तर शुभता की वृद्धि होती है। इसलिए एक को अवसर्पिणी और दूसरे को उमर्पिणी काल कहा गया है । शिष्य - गुरुदेव ! भारतवर्ष मे आपने ६३ शलाका-श्रेष्ठ पुरुष बतलाये, कृपा कर उनके नाम आदि का परिचय बतलाइये, तो बहुत बडा अनुग्रह होगा। गुरुदेव न कहा-अच्छा लो, तुम्हारी जिज्ञासा को शात करने के लिए उन सबके नाम आदि बतलाये जाते है। (अ) २४ तीर्थकर १ श्री रूपमदेवजी ३ श्री सभवनाथजी २ थी अजितनाथजी ४ श्री अभिनन्दनजी 10 -- स - ५. श्री सुमतिनाथजी १५. श्री धर्मनाथजी ६. " पद्मप्रभजी १६. " शान्तिनाथजी " सुपार्श्वनाथजी १७. " कुन्थुनाथजी ८. , चन्द्रप्रभ जी १८. " अरनाथजी ६. " सुविधिनाथजी १६. " मल्लिनाथजी १०. " शीतलनाथजी २०. " मुनिसुव्रतजी ११. " श्रेयांसनाथजी २१. " नमिनाथजी १२. " वासुपूज्यजी २२. " अरिष्टनेमिजी १३. " विमलनाथजी २३. " पार्श्वनाथजी १४. " अनन्तनाथजी २४. " महावीर स्वामीजी तीर्थंकर के गर्भधारण के समय उनकी माता १४ शुभ स्वप्न देखती है । वे इस प्रकार है-१. गज, २. वृषभ, ३. सिंह, ४. लक्ष्मी, ५. पुष्पमाला, ६, चन्द्र, ७. सूर्य, ८. ध्वजा, ६. कुम्भ, १० पद्म सरोवर, ११. क्षीर समुद्र, १२. देव विमान, १३. रत्न राशि और १४. निर्धूम अग्नि । तीर्थंकर के जन्म कल्याणक पर स्वर्ग के ६४ इन्द्र पाकर मेरु पर कल्याणक महोत्सव मनाते है। इनका विशेप परिचय जैन धर्म का मौलिक इतिहास प्रथम भाग या शलाका पुरुप चरित्र ग्रंथों से देखना चाहिये। तीर्थकर अपने समय की मध्यम आयु और शरीरमान के धनी होते है। उनका शरीर रूप, लावण्य और बल में अनुपम होता है। तप-संयम की साधना से केवलज्ञान प्राप्त करके वे चतुर्विध संघ की स्थापना करते हैं और प्रायु पूर्ण होने पर सिद्ध, बुद्ध, मुक्त पद को प्राप्त करते हैं । तीर्थकर की तरह अनेक भव्य जीव भी उसी भव में मोक्ष प्राप्त करते है । २४ तीर्थंकरों में शान्ति, कुन्थु, और पर ये तीन तीर्थकर चक्रवर्ती पद के भोक्ता बनकर तीर्थंकर बने । अतः इनके नाम दोनों में हैं। १७ (ब) १२ चक्रवर्ती १ भरत (देश के प्रथम राजा, प्रथम चक्रवर्ती) ७ श्री अरनाथजी २ श्री सगरजी " सुभूमजी ३ " मघवाजी " पद्मजी सनत्कुमारजी " हरिपेणजी " शान्तिनाथजी " जयसेनजी ६ " कुन्थनाथजी १२ ॥ ब्रह्मदत्तजी E ४ " चकवर्ती सम्पूर्ण भारतवप के पट्खण्डाधिपति सम्राट होते है । १४ रत्न, नव निधान और १६ हजार देव इनकी सदा सेवा में रहते हैं । पूरे भारतवर्ष में उनके समान बलवीर्य और सम्पदा मे तीर्थकर के अतिरिक्त अन्य कोई मानव नहीं होता। चक्रवर्ती की माता मी तीर्थकर की माता के समान १४ स्वप्न देखती है, पर वे स्पष्ट नहीं होते। (स) ६ बलदेव १ श्री विजय ४ श्री सुप्रभ ७ श्री नन्दिमित्र २ श्री अचल ५ श्री सुदर्शन ८ श्री राम-बलदेव ३ श्री सुधर्म ६ श्री नन्दी ४ थी पद्म बलदेव बलदेव को राम भी कहते है । , बलदेव की माता उपरोक्त १४ स्वप्नो मे से ४ स्वप्न देखती हैं । १ श्री त्रिपृष्ठ २ श्री द्विपृष्ठ ३ श्री स्वयंभू (द) वासुदेव ४ श्री पुरुषोत्तम ५ श्री पुरुषसिंह ६ श्री पुरुष पुण्डरीक ७ श्री दत्त 1८ श्री नारायण १ श्री कृष्ण वासुदेव चक्रवर्ती से प्राधे बल वाले होते है। इनकी माता उपरोक्त १४ स्वप्नों में से ७ स्वप्न देखती हैं। वासुदेव निदान कृत होते है, अतः वे स्वयं धर्म की आराधना नहीं कर सकते । प्रतिवासुदेव को जीतकर वासुदेव अर्द्ध-भरत अर्थात् ३ खण्ड के स्वामी होते है । वासुदेव को 'युद्ध सूरा' कहा गया है। श्री कृष्ण की तरह लोक- व्यवस्था में इनका प्रमुख हाथ होता है। - श्री अश्वग्रीव २. श्री तारक ३. श्री मेरक (य) ६ प्रतिवासुदेव ४. श्री मधुकैटम ५. श्री निशुम्भ ६. श्री बलि ७. श्री प्रह्लाद ८. श्री रावण 8. श्री जरासन्ध वासुदेव की तरह प्रति वासुदेव भी अर्द्ध मरत के स्वामी होते हैं। इनकी माता भी ७ स्वप्न देखती है। इन ६३ ही महापुरुषों का वर्णन जम्बू-द्वीप के भरत क्षेत्र की तरह अन्य ४ भरत और ५ ऐरावत क्षेत्र में भी समझना चाहिये । ६३ श्लाघा पुरुपो में से तीर्थकर सब मोक्ष गये। १२ चक्र- वतियों में से आठवें सुभूम एवं बारहवें ब्रह्मदत्त ये दो चक्रवर्ती अधोगति में गये शेष चक्रवर्ती मोक्ष गये। बलदेव में से नवें पद्म बलदेव पांचवें देवलोक में गये शेप सब वलदेव मोक्ष में गये । वासुदेव तथा प्रतिवासुदेव मब अयोगतिगामी होते है। शिष्य ने पूछा-भगवन् ! प्रापने कर्म-भूमि और प्रकर्म-भूमि क्षेत्र का अन्तर कर्म करने और नहीं करने की अपेक्षा बतलाया है। इसके अतिरिक्त और भी कोई अन्तर है क्या ? गुरुदेव ने कहा-शिष्य ! कर्म-भूमि और प्रकर्म भूमि में एक १३ - वडा अन्तर यह है कि १५ कम-भूमि क्षेत्रो के जीव साधना द्वारा कर्म काटकर मोक्ष जा सकते हैं, किन्तु अकम भूमि क्षेत्र के मनुप्य मोक्ष म नहीं जा सकते । युगलिक होने से वे केवल देवगति म ही जाते हैं । शिष्य-भगवन् । छप्पन क्षेत्रो को अन्तर द्वीप क्यो कहा गुरुदेव-लवरण समुद्र के बीच में होने से अथवा परस्पर द्वीपो मे अन्तर होने से ये ५६ क्षेत्र अन्तरद्वीप कहलाते है। अकर्म भूमि की तरह अन्तर द्वीप में भी असि, मसि, कृपि-किमी भी प्रकार का कर्म, धन्धा नहीं होता। यहां भी कल्पवृक्ष होते हैं। अन्तर द्वीप में रहने वाले मनुष्य अन्तर-द्वीपज कहलाते है। एकान्त मिथ्या दृष्टि होते है। शिष्य-भगवन अब देवगति के सम्बन्ध मे जानकारी देने को कृपा करावें? ? गुरुदेव-देवगति के जीव चार जातियों में विभक्त किये गए है, जो १ भवनपति, २ व्य तर, ३ ज्योतिप्क व ४ वैमानिक नाम से कहे जाते है। शिष्य-भगवन् ! भवनपति कितने प्रकार के होते हैं गुरुदेव ने फरमाया-भवनपति दस प्रकार के है-१ असुर- कुमार, २ नागकुमार, ३ सुवर्णकुमार, ४ विद्युतकुमार, ५ अग्नि- कुमार, ६ द्वीपकुमार, ७ उदधिकुमार, ८ दिशाकुमार, ६ पवनकुमार और १० स्तनितकुमार । इनके अपर्याप्ता और पर्याप्ता मिलकर बीस भेद होते हैं। शिष्य-भगवन् इन्हे भवनपति क्यो कहा गया है गुरुदेव-अधोलोक के भवनो में रहने के कारण इन्ह भवनपति कहा गया है। 7 २० ११. कुम्भ १२. वालुका ७. काल ४. शवल ५. रौद्र १०. धनुप्य शिष्य-भगवन् परमाधामी (परमाधार्मिक) देव कितने हैं ? गुरुदेव-१५ परमाधामी (भवनपति के अन्तर्गत) कहे गये है। १. अम्ब ६. महारौद्र २. अम्बरीप ३. श्याम ८. महाकाल १३. वैतरणी ह. असि पत्र १४. खरस्वर १५. महाघोप ये १५ तरह के देव तीसरी नारक तक के जीवों को विविध प्रकार की वेदना देते है। १५ परमाधामी के अपर्याप्ता और पर्याप्ता मिलकर तीम भेद होते है। परमाधामी देवों के सम्बन्ध में शिष्य ने पूछा-भगवन् हिन्दू परम्परा के पुराणों में श्याम सबल के अतिरिक्त और कोई नाम उपलब्ध नहीं होते, वहाँ यमराज प्रादि जिनकी बात आती है, वे कौन हैं ? गुरुदेव ने कहा--हिन्दू शास्त्रो में वरिणत 'यम' की वात जैन परम्परा में नही मानी जाती, किन्तु असुर जाति के परमधामी देव ही शेर, चीता एवं पक्षी और दानव का रूप बनाकर नारक जीवों को यास देते हैं और नारक जीवों को कप्ट देने का काम करते है । शिष्य-भगवन् ! अब व्यन्तर देवों के सम्बन्ध में फरमाने की कृपा करावें। गुरुदेव-तिरछे लोक में वनों के अन्तर आदि स्थानों में रहने वाले देवों को व्यंतर कहते हैं । ये १६ प्रकार के हैं । १. पिशाच ५. किन्नर ६. अणपणे १३. कन्दे ६. किम्पुरुप १०. पारणपणे १४. महाकन्दे ३. यक्ष ७. महोरग ११. इसिवाई १५. कूहण्डे ८. गन्धर्व १२. भूयवाई १६. पयंगदेव २. भूत ४. राक्षस २१ ८ फ्ल पुष्प व्यन्नर के भेदों मे दस जृम्भक देव भी पाते हैं, जैसे- १ ग्रन्न जम्मक, २ पान जृम्मक, ३ लयन जृम्मक, ४ शयन जम्नक, ५ वस्त्र जम्मक, ६ पल जम्मक, ७ पुष्प जम्नक, जम्मक, ६ विद्या जम्भक और १० अग्नि जृम्भक । इस प्रकार इन (१६+१०) २६ देवो के अपर्याप्त और पर्याप्त इन दो प्रकारो में कुल ५२ भेद होते है। शिष्य-भगवन् । इन दस को जम्मक देव क्यो कहा जाता है ? गुरुदेव जृम्भक देव नाना प्रकार की चेप्टा करने वाले होते है । वे जिन पर प्रमन हो जाते है उन नगरवामियो को अज आदि से मन्तुष्ट करते हैं । और जिन पर अप्रसन होते है उनका हानि पहुचाने की चेप्टा करते हैं। अत इनके अग्न जृम्भक प्रादि नाम रमे गए हैं । (देखें भगवती सूत्र)। शिप्य-भगवन् । व्यन्तर देव के जो १६ भेद बतलाये गए है उनसे भूत, प्रेत, जिन्द, पित्तर प्रावि सिमे पाते है ? गुरुदेव-अाजकल माने जाने वाले पित्तर आदि का इन मोलहा से अलग अन्य प्रकार का उल्लेख नहीं पाता । तिरछे लोक के वन, वनखण्ड और शून्य घरा में रहने के कारण इन सबको व्यन्तर जाति में ही मानना उचित है। इम विपय में विशेषज्ञ और कुछ गहराई से चितन कर प्रकाश डालें ऐसी अपक्षा है। शिप्य ने कहा-नगयन् । देवो के तीसरे प्रकार में ज्योतिषक बताये गये हैं, तो ज्योतिपक देव कौन और कितने प्रकार के है ? गुरुदेव ने कहा-अपने विमान को प्रमा से प्रकाश फैलाने वाले २२ देवों को ज्योतिप्क कहते है, ये ५ प्रकार के है-चन्द्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र और तारा । ये भी तिरछे लोक अर्थात् मध्य लोक में ही रहते हैं । इनमें चर और अचर दो भेद माने गए हैं। जो विमान एक जगह से दूसरी जगह चलते रहते हों उन्हें चर और जिनके विमान एक जगह स्थिर रहते हो उनको अचर कहा गया है । शिष्य-भगवन् ! चर और अचर ज्योतिप्क कहाँ रहते हैं ? गुरुदेव ने कहा-चर ज्योतिष्क मनुष्य-लोक के भीतर मण्डल गति से भ्रमण करते रहते है और अचर ज्योतिष्क मनुष्य लोक के वाहर ज्योति फैलाये रहते है। इस प्रकार ५ चर और ५ अचर के अपर्याप्ता और पर्याप्ता मिलकर कुल २० भेद ज्योतिप्क के होते है । शिष्य-भगवन् !' अब वैमानिक देवों के सम्बन्ध भी बताने की कृपा करें। इनके कितने भेद हैं ? गुरुदेव ने कहा-वैमानिक देवों को मूल दो भागों में बांटा गया है, जैसे--१. कल्पवासी और २. कल्पोत्तर कल्पवासी देवों के २४ प्रकार कहे गए हैं जो इस प्रकार हैं-१२ देवलोक, ३ किल्विपिक, ९ लोकान्तिक । १२ देवलोक का स्पष्टीकरण इस प्रकार है-१. सौधर्म २. ईशान, ३. सनत्कुमार, ४. माहेन्द्र, ५. ब्रह्मलोक, ६. लान्तक, ७. महाशुक्र, ८. सहस्रार, ९. ग्रानत, १०. प्रारगत, ११. पारण पोर १२. अच्युत । इन विमानों में रहने वाले देवों को अपनी मर्यादा का पालन करना होता है। इनमें १. इन्द्र, २. सामानिक, ३. वायत्रिशंत, ४. लोकपाल प्रादि पदों की व्यवस्था है। इनकी तीन परिपद् होती हैं। १. अनितरिया, २. मग्भिमिया और ३. वाहिरिया। करणीय कार्य के लिये पहली परिपद् में मंत्रणा होती हे फिर मध्य परिगद २३ 1 मे निणय होने पर वाह्य परिपद् में निर्णीत कार्य का प्रचार होता है । ग्राज की भाषा में कार्यकारिणी और सामाय परिषद् के नाम से है। ये अपने-अपने इन्द्र के अधीन रहते है। विमानो मे उत्पन्न होने और घूमने के कारण इह वैमानिक कहा जाता है । भवनपति आदि सभी प्रकार के देवो द्वारा तीथंकर के जम, दीक्षा, फेवलज्ञान और निर्वागा आदि प्रसगो पर कल्याणक मनाने को देवो पाने की मर्यादा है। जिसे जीताचार कहते है। किल्विप का अर्थ पाप होता है। पापयोनि वाले हल्के दर्जे के देवो को किल्विपक कहते हैं । स्थान और स्थिति की अपेक्षा इनके ३ प्रकार हैं । १ तीन पल्य की स्थिति वाले जो प्रथम एव दूसरे देव- लोक के नीचे अर्थात् वैमानिक देवो की पक्ति से बाहर रहते हैं । दूसरे ३ सागर की स्थिति वाले तीसरे, चौथे देवलोक के नीचे रहते है । तीसरे १३ सागर की स्थिति वाले ५वें कल्प के ऊपर और घटठे देवलोक के नीचे रहते है । देवो की समा मे इनका सम्मान नहीं होता, इनके वालने पर सभा के देव अावाज देकर इनको विठा देते हैं । लोकातिक देव नव होते हैं, इनके नाम निम्न हैं-१ सारस्वत, २ आदित्य, ३ वह्नि, ८ वरुण, ५ गई तोय, ६ तुपित, ७ अन्वा- वाह, ८ अगिच्चा और द रिट्ठा हैं। तीर्थंकरो की दीक्षा प्रसगो पर लोकातिक दव स्मृति दिलाने के लिये जाते हैं और निवेदन करते हैं कि भगवन् । भव्यजना को धर्म का प्रतिवोध दीजिये । मध्यलोक के अन्त म होने से इनको लोकान्तिक कहते है। इन २४ देवा के अपर्याप्ता और पर्याप्ता, इस प्रकार ४८ भेद होते है । शिष्य-मगवन् । ये कल्पवासी देव कहां रहते हैं ? गुरुदेव-कल्पवासी देव ऊँचे लोक के विमानो मे रहते हैं । वारह देव-लोक कम से एक के ऊपर एक इस प्रकार अवस्थित है । २४ किन्तु इनमें से पहला-दूसरा, और तीसरा-चौथा, नवाँ-दसवाँ, ग्यारहवाँ- बारहवाँ ये आपस मे एक दूसरे के समान ऊँचाई पर स्थित है। शिष्य-कल्पोत्तर देवों के कितने प्रकार हैं ? गुरुदेव ने फरमाया-कल्प-मर्यादा से अतीत अर्थात् परे होने के कारण इनको कल्पोत्तर अथवा कल्पातीत कहा है । इनमें कोई इन्द्र सामाजिक प्रादि नहीं होते, सभी स्वशासित अहमिन्द्र ही होते हैं । इनमें 8 ग्रेवेयक इस प्रकार है-१. मद्र, २. सुभद्र, ३. सुजात, ४. सुमनस, ५. सुदर्शन, ६. प्रियदर्शन, ७. अमोह, ८. सुप्रतिबुद्ध और ६. यशोधर । तथा ५ अनुत्तर-विमान १: विजय, २. विजयंत, ३. जयंत, ४. अपराजित और ५. सर्वार्थ सिद्ध । ऐसे (६+ ५) १४ के अपर्याप्ता और पर्याप्ता कुल २८ भेद होते है। शिष्य-भगवन् ! कल्पातीत देवता कहाँ रहते हैं ? गुरुदेव ने कहा-बारहवें देवलोक से असंख्यात योजन ऊपर तीन त्रिकों में क्रमशः तीन-तीन वेयक देवो मे विमान है । ग्रेवेयक से अमंख्यात योजन ऊपर ५ अनुत्तर विमान हैं । चार कोनों में चार विमान और मध्य में सर्वार्थसिद्ध विमान कहा गया है । सर्वोत्कृष्ट शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्श की उपलब्धि होने से इन्हे अनुत्तर संज्ञा से सम्बोधित किया जाता है । अनुत्तर विमान के देवों में क्रोध, मान, माया, लोभ, उपशान्त से होते हैं । शिष्य-भगवन् ! ६४ इन्द्र कौन से हैं ? गुरुदेव ने उत्तर देते हुए कहा- दस भवनपति, सोलह व्यन्तर २६ इनमें प्रत्येक के उत्तर और दक्षिण, इस प्रकार दो-दो इन्द्र है अतः कुल ५२ इन्द्र हुये । दो ज्योतिषी में (चन्द्र और सूर्य) और १२ देव- लोक के १० इन्द्र, ऐसे कुल ६४ इन्द्र होते है। ये ६४ इन्द्र तीर्थकरों २५ के जम-दीक्षा ग्रादि पच कल्याणक मनाने मनुप्यलोक मे आते हैं। इह इनका जीत व्यवहार है। शिष्य-भगवन् । जीव और प्रात्मा एक ही है या भिन्न- मिन है? गुरुदेव-वास्तव में जीव और ग्रात्मा में कोई मौलिक अन्तर नहीं है । जैसा कि कहा है-"जीवतिप्राणान् धारयतीतिजीव " जीव शब्द जीवन धारण की अपक्षा है, जबकि आत्मा का अथ एक पर्याय से दूसरी पर्याय म जाते रहना है। इम प्रकार गति, शरीर, ग्रादि पर्याया वी अपेक्षा जीव के ५६३ भेद किये गये हैं। ऐम दृप्टि, दर्शन, ज्ञान, प्रज्ञान आदि गुणो की अपेक्षा जीव के अय प्रकार नी होते है । उनको यथास्थान समझ लेना चाहिये। जीव के भेद, प्रभेदो का परिचय सुनकर शिप्य ने कहा- भगवन् । जीव चेतना लक्षण और ज्ञान दर्शन स्वरूप वाला है, तब उसके विविध भेद कैसे कहे जाते हैं गुरुदेव ने उत्तर दते हुए कहा-वास्तव में मूल-धम और स्वभाव मे तो जीन एक उपयाग, गुणवाला है फिर भी कर्म-युक्त होने से ममारी जीव गति, जाति, आदि पर्याया के कारण अनेक भेदो में विमक्त है, जैसे-ग्राकाश से गिरा हुआ पानी एक ही प्रकार का होता है, पर नदी, तालाव और कुए मे गिरकर अनेक नाम और गोन को प्राप्त कर लेता है, ऐसे ही जीव भी कर्म के कारण यति, जाति आदि अनेक प्रकार को पाकर विविध भेद वाला होता है। शिष्य-भगवन् । पृथ्वीकाय आदि स्थावरो मे सुख-द ख का वेदन ज्ञात नहीं होता, फिर इनको जीव कैसे समझा जावे ? गुरुदेव ने कहा-पृथ्वीकाय आदि मे चम चक्षु से देखने वाले 7 २६ को भले स्पष्ट रूप से सुख-दुःख ज्ञात न हो फिर भी उनमें अस्पष्ट चेतना होने से उन्हें भी जीव मानना चाहिये । जैसे-किसी जन्म से अधे गूगे, बहरे और गतिहीन बालक को क्लोरोफार्म आदि की मूर्छा में कोई अंग-प्रत्यंग का छेदन-भेदन करे-भाला बी आदि शस्त्र का प्रहार करे, तो उस समय बालक की कोई चेष्टा नही होने पर भी उसमें जीव माना जाता है और जैसे उसको अव्यक्त वेदना होती है वैसी ही पृथ्वीकाय आदि स्थावरो मे भी वेदना होती है । अपनी अस्पष्ट चेतना मे वे सुख-दुःख को व्यक्त नहीं कर सकते, तथापि जन्माव वालक की तरह उन्हें भी सजीव ही मानना चाहिये । शिष्य-भगवन् ! जीव ऊर्ध्वगतिगामी होकर भी निम्न गति में क्यों भटकता है ? क्या ऐसा हो उसका स्वभाव है अथवा अन्य कोई कारण है। गुरुदेव ने कहा-वास्तव में निम्न गति में भटकना जीव का स्वभाव नहीं है, वह तुम्बे की तरह जल के सतह पर तिरने वाला है, किन्तु कीचड़ की चिकनी मिट्टी के सघन लेप से भारी बना हुया तुम्बा जैसे जलाशय में डुबा रहता है, ऐसे ही कर्म भार से भारी बना हुआ जीव अधोगति मे भटकता है । तुम्बे का बन्धन और लेप सर्वथा हटने पर तुम्वा जल के ऊपर तैरने लगता है। इसी प्रकार जीव के फल भोग और निर्जरा से जव कर्म हल्के हो जाते हैं तब जीव ऊपर उठता हुया एक दिन सर्वथा कर्म-मल के गल जाने पर वह शुद्ध, बुद्ध होकर अनन्त कर्म की वर्गणा से पर लोकाग्र पर स्थित होता है। शिष्य ने जिज्ञासा करते हुए पूछा-भगवन् ! भारी होने से जीव नीचे जाता है, तो यह समझाइये कि यह भारी कैसे होता है ? गुरुदेव ने उत्तर देते हुए कहा-अन्तेवासी ! जीव प्राणाति- पात (हिमा) झूठ ग्रादि अठारह पापों के सेवन से भारी होता हे ૨૬ और भारी होकर चतुगति रूप मसार में अनन्त काल तक मटकता रहता है। शिष्य ने विनय के साथ अपने मन को शका प्रस्तुत करते हुए कहा-नगवन् ! अठारह पापो से जीव भारी होता है, ऐसे उसके हल्के होने का नो उपाय है क्या कृपया समनाने का काट 7 करें। उत्तर देते हुए गुरुदेव ने कहा-चिरजीव शिष्य | हिंसा आदि अठारह पापो के विरमण अर्थात् परिवर्जन से जीव हल्का होता है और हल्के होने से ऊपर पाता है एव धर्म क्रिया से चार गति और ८४ लक्ष जीव योनि रूप मसार के परिभ्रमण का प्रत कर लेता है। अत्यन्त प्रमोद-भाव से शिष्य ने कहा-भगवन् । जीव के नारी होने और हल्के होने के सम्बन्ध मे प्रापने जो समाधान किया, उससे मेरी शका सर्वया दूर हो गई। अव यह समझाने की कृपा करें कि जीव प्रोर फर्म का सम्बन्ध कब और कैसे होता है ? गुरुदेव ने स्पष्ट करते हुए कहा-जिस प्रकार भूमि मे स्वरण के साथ मिट्टी के परमाणुओं का सम्बन्ध कब से है यह नहीं बताया जा सकता, इसी प्रकार जीव के साथ कर्म-रज का सम्बन्ध भी किसी अमुक काल से हुआ, यह कहना सम्भव नही है, इसीलिये जीव और कर्म का सम्वन्ध अनादि काल से कहा गया है । जैसे स्वर्ण के साथ अनादि काल से मिट्टी का सम्बन्ध होते हुए भी रसायन प्रक्रिया से मिट्टी के दूर हो जाने पर स्वण रज-मुक्त शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार अनादि काल से कम-रज से लिप्त जीव भी तप और सयम की रासा- यनिक प्रक्रिया से शुद्ध होकर सर्वथा कर्म-मुक्त हो सकता है ।
शिष्य ने पूछा-भगवन् ! मानव जगत् में देखा जाता है कि कोई मनुष्य चोरी, अन्याय प्रादि अपराध करता है तो, उसे दण्डाधि- कारी द्वारा सजा दी जाती है, वैसे संसार के जीवों को पापकर्म का दण्ड देने के लिए क्या यमलोक में यमराज या अन्य कोई व्यवस्था करता है जिससे जीव अपने पाप की सजा भोग सके क्योंकि कोई भी प्राणी पाप करके स्वयं सजा भोगना नहीं चाहता । उसका शास्त्रों में क्या खुलासा बताया है ? समझाने की कृपा करें। उत्तर में गुरुदेव ने कृपा करके कहा- जिज्ञासु शिष्य ! जन साधारण की तरह वीतराग मार्ग जीवों को सजा देने के लिए यमराज या किसी ईश्वर विशेप को दण्ड प्रदाता नही मानता । किन्तु जैसे शरीर पर लगे हुए चन्दन, सुप्ठि एवं लोंगयुक्त का लेप स्वयं अपने स्वभाव से शीतलता देता है एवं बात निवारण का काम करता है ऐसे ही आत्मा पर लगे हुए शुभाशुभ कर्म स्वभाव से ही अच्छा-बुरा फल देते । उनको दण्ड दान में किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती। जैसे दुग्ध और मद्य का पान करने वालो को दुग्ध से वल वृद्धि और मद्य से मादकता स्वभाव से ही प्राप्त होती है । विप भक्षण करने वाले के प्राणघात मे किसी दण्डनायक द्वारा दण्ड की आवश्यकता नहीं होती है । व्यभिचारी छुपकर व्यभिचार करता है, पर शरीर पर क्षीणता स्वभाव से ही प्रकट हो जाती है। इसी प्रकार शुभकर्म करने वाले को शुभ फल और अशुभ कर्म करने वाले को अशुभ फल स्व- भाव से ही मिलता है उनके फल दान में किसी दण्डनायक की आव- श्यकता नहीं होती । दण्डनायक तो गल्ती कर सकता है, पर वस्तु के स्वभाव में गल्ती नहीं होती। कैंटीले वृक्ष के बीज बोने वाले को काटे और पाम्र-वृक्ष के वीज वोने वाले को मधुर फल स्वभाव से ही मिलते हैं । इसीलिये अनुमवियों ने कहा है-"स्वयं कर्म करोत्यात्मा, स्वयं तत्फलमश्रुन्ते ।" अर्थात् प्रात्मा स्वयं ही शुभाशुभ करती है और २६ स्वय ही उसका फल भोगती है । लोकप्रिय तुलमीदासजी ने कहा है- "कर्म प्रधान विश्व करि रासा। जो जस करही सो तस फल चाखा ।" वस्तु के गुण धम का प्रभाव विज्ञान द्वारा भी आज जन प्रसिद्ध हा चुका है । लोग जानते है कि अनात दशा मे भी विद्युत के तारो का स्पर्श, स्पर्श करने वाले का प्राण हरण कर लेता है, हर कोई जानता है कि इसमे किसी दण्डाधिकारी के पादश की अावश्यकता नहीं होती। ऐसे ही पाप कम भी ज्ञात या अज्ञात रूप से किया जाय, तव भी वह कर्ता को दुख की प्राग से जलाता ही है। शिष्य-भगवन् । जैन सिद्धान्त के अनुसार जीव स्वय हो कर्म का सचय करता और स्वय हो उसका फल भोगता है, यहां पर शका होती है, कि जीव स्वय अपने शुभ कर्म के तो सहर्ष फल भोग लेगा, पर अशुभ कर्मों को केसे भोगेगा? जड होने से कम स्वय फल देने की स्थिति मे कैसे हो सकते हैं ? गुरुदेव ने कहा-शिष्य । “जीव के सम्बन्ध से" कर्म जड होकर भी क्रिया के अनुसार अपने शुभाशुभ फल देता है । जस मूय किरणो के सयोग से सूर्यकान्त मणि वस्त्र को जला देती है और चन्द्र की कान्ति से चन्द्रकान्त मणि जल की वूदें गिराने लगती है, मिच में तेजी, नमक में तीखापन, व शक्कर मे मिठास होता है, वैसे ही जड होकर भी कर्म शुभाशुभ फल देने में समय होते हैं । भगवती सूत्र मे कालोदायी के प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान् महावीर ने इसको स्पष्ट रूप से समभाया है। शिष्य-भगवन् । भगवान महावीर ने कालोदयो को किस प्रकार पुण्य-पाप के फल देने की वार्ता बतलाई है ? कृपा कर हमे भी समझाइये। गुरुदेव ने कहा-भगवती सून के शतक ७ उद्दे शक १० मे ? वर्णन आता है कि कालोदायी ने प्रभु मे पूछा कि भगवन् कि भगवन् ! क्या जीवों के पाप, पापफल के विपाक वाले होते है ? उत्तर में प्रभु ने कहा हाँ कालोदयी ! पाप कर्म कटु फल देने वाले है । कालोदयी ने पूछा भगवन् ! पाप अशुभ विपाक वाले कैसे होते है ? प्रभु ने कहा-कालोदायी ! जैसे कोई मनुष्य १८ प्रकार के व्यंजन युक्त, विप-मिश्रित थाली पाक का भोजन करे तब उसको वह भोजन तत्काल मधुर और स्वादिष्ट लगता है, किन्तु पीछे शरीर आदि में परिणत होता हुआ पीडाकारी हो जाता है, इसी प्रकार हे कालो- दायी ! प्राणातिपात आदि पाप जीव को तत्काल में रमणीक लगते है, परन्तु पीछे फलोदय के समय कण्टकारी एवं दुःखदायी होते हैं। इसलिए कहा गया है कि जीवों के पाप अशुभ फल के विपाकयुक्त होते है । उनको अपना फल देने के लिए किसी अन्य सहायता की आवश्य- कता नहीं होती । सैकड़ों गायों के झुण्ड में बछड़ा जैसे अपनी माँ को पहचान लेता है, वैसे ही कर्म अपने तथाविध स्वभाव से अपने कर्ता को पहचान लेता है । अर्थात् चुम्बकीय शक्ति से वह कर्ता के पास ही पहुँचता है। जैसे-उत्तराध्ययन सूत्र के अध्याय १३ गाथा २३ मे प्ररूपणा की गई है। न तस्स दुक्खं विभमंति नाईयो, न मित्तवग्गा न सु यान बंधवा । एक्को सयं पच्चणु होइ दुख्खं, कत्तारमेव अणुजाइ कम्मं ॥ उस पापी जीव के दुःख को न जाति वाले बँटा सकते है और न मित्र मंडली, पुत्र बंधुगण ही बेटा सकते है । वह स्वयं अकेला ही दुःख भोगता है क्योंकि कर्म कर्ता का ही अनुगमन करता है। शिष्य-भगवन् ! पाप-कर्म की तरह पुण्य-कर्म के फल के सम्बन्ध में प्रभु ने क्या समझाया है ? कृपा कर स्पष्ट कीजिए। ३१ गुरुदेव ने कहा-कालोदायी के उत्तर में प्रभु ने कहा कि जीवो के कल्याण कर्म कल्याण फल वाले होते हैं । उदाहरण के साथ स्पष्ट करते हुए समझाया-जने काई पुरुप अच्छी तरह पकाए गए १८ प्रकार के व्यजनयुक्त प्रोपपिमिश्रित भोजन करे तब यह भोजन तत्काल औषध के स्वाद से रमणीक नही लगता, परन्तु शरीर में परिणत होकर बल, वीर्य और अग उपागो का वडाकर स्फूर्तिदायी होता है, खाने वाले को शरीर मे साता मालूम देती है । उसी प्रकार कल्याण कर्म भी तत्काल मे रमणीक नही लगते हिंसा विरमण प्रादि शुभ क्यिाएँ करते समय नीरस मालूम देती हैं, किन्तु पीछे परिणाम के समय सुखदायी एव प्रमादकारी होती है । अाज के विज्ञान से भी यह स्पष्ट है कि विद्युत के मह- कार से शब्द हजारो कोस दूर अपने सक्त अपने स्थान पर पहुंचकर कार्य करते दिखाई देते हैं । अनक रेडियो स्टेशनो के वावजूद भी शब्द अपने नम्बर (Freequency) वाले रेडियो से ही सम्बन्ध करते हैं। अत्तरिक्ष मे सकेत भी यथास्थान प्राप्त होते हैं। दुग्धपान पार विप- पान से बलवृद्धि और प्राणहरण प्रत्यक्ष देखा जाता है । फिर अात्मा द्वारा कृत कम अपन शुभाशुभ फल प्रदान करें, इसमे सशय की बात ही क्या है। शिष्य-भगवन् । अापने जीव के लक्षण मे ज्ञान, दर्शन आदि बतलाये । जो जानकार ही समझ सकते हैं, साधारण व्यक्ति जीव की चेतना को सहज समझ सके, ऐसी कोई पहचान बताई जाय तो अच्छा होगा। गुरुदेव ने शिष्य पर अनुकम्पा करते हुए कहा-चिरजीव शिष्य ! सूक्ष्मद्रष्टा महपियो ने छोटे-बडें जीव माय मे जो चार सज्ञायें वतलाई है, उनस जीव की चेतना का परिचय प्राप्त हो सकता है ।
शिष्य ने पूछा-भगवन् ! वे संज्ञायें कौनसी है ? उत्तर में गुरुदेव ने कहा-चार संज्ञायें निम्न है---१. पाहार संज्ञा, २. भय संज्ञा, ३. मैथुन संज्ञा और ४. परिग्रह संज्ञा । संज्ञायें दस कही गयी है किन्तु उनमे मुख्य ये ही चार है । संसारस्थ सभी जीवों में प्रायः पाहारादि की इच्छा पाई जाती है । आहार, भय आदि संजाये स्थावर जीवों में भी लक्षित होती है। वनस्पति के छोटे-मोटे पौधे द्रव्य मन के अभाव में भी शुष्कता अनुभव करते है और अपने मूल तन्तुओं से ग्रासपास जिधर भी आर्द्रता और जलस्रोत होता है, उस ओर अपनी जडो को फैलाते हुए खुराक ग्रहण करते हुए दिखाई देते है। अग्नि की ज्वालाएँ भी प्रासपास के ईंधन और वृक्षो को लपककर भस्मसात करती देखी जाती हैं । वृक्षों में सर्दी, गर्मी या प्रतिकूल स्पर्श को पाकर संकोच विस्तार देखा जाता है । लज्जा- वती की तरह कई पौधे अंगुली लगते ही सिकुडते देखे गए है । वृक्ष और लतानों को ग्रासपास में गडी द्रव्य राशि को अपनी जड़ो को समेटकर रखे पाया गया है । कुछ वनस्पतियाँ, कीट-पतंग और मक्खियो को पत्तो पर बैठते ही पकड़ने की चेप्टा करती है और उनको अपने अंगों में जकड़ लेने की वृत्ति वाले घटपर्णी आदि मांसाहारी पौधे देखे गये है। कीट- पतंग प्रादि व्यक्त चेतना वाले की संज्ञाएँ सहज परिलक्षित होती है। अच्छी खाद्य सामग्री देखकर जीम लपलपाना, भय के कारण अथवा किमी के अाक्रमण की आशंका होते ही सिकुड़ना, भागना और मैथुन के भावों में परस्पर लड़ता, झगड़ना, मार भगाना और अपने अधीन के भोजन के स्थान पर मधुमक्खी की तरह कब्जा करना, ये सब वातें पशु-पक्षी और कीड़ों में भी देखी जाती है। इसलिए शास्त्र में जीव मात्र में इन संज्ञानो का होना बतलाया है। ये संज्ञाएँ सामान्य रूप से जीवों के जीवन की पहिचान कराने वाली है।
शिष्य-भगवन् ! जीव को विशेष शक्ति क्या है ? गुरुदेव ने कहा-जीव की विशेष शक्तियां पाच है--१ उत्थान, २ कम, ३ वल, ४ वीय, व ५, पुरुषाकार पराक्रम | छोटे से किमी वीज को लीजिये । सजीव और निर्जीव दोनो वीजो को खेत की मिट्टी मे दबा दिये जायें। उनमें जो बीज सजीव हैं उसमें ममय पाकर उत्थान गुण से अकुर ऊपर उठा दीवेगा । वह क्रम से मिट्टी दल को भेदन करता तथा वलशक्ति से बाहर निकलता और वीर्य एव पराम्म द्वारा पत्र एव पुष्पादि अवयवो से विस्तार पाता है, जबकि दूसरा सत्व- हीन वीज मिट्टी में गलकर नष्ट हो जाता है। निर्जीव वीज में उत्थान आदि की क्रियाएँ नहीं होती। वे निर्जीव ककर की तरह दवे रह जाते है, लेकिन सजीव वीज मिट्टी में दवा हुया भी ऊपर उठता है और अपने छोट रूप का विस्तार प्रकट करता है। यही सजीव की विशेषता है । सजीव वीज मिट्टी और ककरो की ढेरी मे से भी ताकत लगाकर वाहर आ जाता है । यह जीव के गुण का प्रभाव है । । जीव की प्रान्तरिक विविध दशाप्रो के परिवर्तन का प्रारूप क्या है ? उसे क्या कहते है ? शिष्य-भगवन् उत्तर देते हुए गुरुदेव ने कहा-शास्त्र में जीव के पांच भाव बतलाए गए हैं, उनके कारण अन्तर की दशाओं में विविध परिवर्तन होते रहते हैं । तत्त्वाथ सूत्र में कहा गया है कि-"ौपशमिक क्षायिको भावी मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्त्वमौदयिक पारिणामिको च।" अर्थात् औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक ये जीव के स्वतत्त्व हैं । ऐसे औदयिक और पारिणामिक भी जीव के भाव है । ये भाव कारण हैं और जीव की विभिन्न दशाएँ कार्य (फल) है। मिथ्यात्व मोह और कपायो के उपशम होने से प्रात्मा, सम्यग्दर्शन और उपशम चारित्र की प्राप्ति करता है, ये दोना प्रौपशमिक तथा क्षायोपशमिक - भाव के फल है । ज्ञान और दर्शन में जो न्यूनाधिकता होती है और दान, लाभ, भोग, उपभोग ग्रादि में विघ्नों का न्यूनाधिक होना क्षायो- पशमिक भाव का परिणाम है, कर्म के उदय से होने वाली शरीर और मन की दशाएँ उदय भावजन्य है। सुरूप, कुरूप, सबल, निर्बल, क्रोध, मान, माया, लोम और कामादि विचारों का मन में उदय होना औदायिक भाव के कार्य है । जीवत्व, भव्यत्व और अभव्यत्व ये ३ परिणामिक भाव जन्य है। प्रौपशमिक क्षायिक और क्षायोपशमिक भाव से कर्मों का उपशम-क्षय और क्षयोपशम होने से जीव के गुण प्रकट होते है और उदय भाव से तन और मन पर असर होता है। पारिणामिक भाव अनादि अनन्त और भव्यत्व की अपेक्षा अनादि सान्त होता है । क्षायिक भाव ग्रादि अनन्त है। प्रौदयिक, प्रौपशमिक और बायोपशमिक भाव सादि सान्त होता हैं। इन्ही भावों के कारण जीव के शारीरिक, मानसिक और आन्तरिक गुणो मे विविध परिवर्तन होते है। शिष्य ने जिज्ञासा भाव से पूछा--गुरुदेव ! जीवात्मा के ६ स्थान कहे जाते हैं, वे कौन से हैं ? - गुरुदेव ने कहा- जीवात्मा के पट् स्थान इस प्रकार है- १. मात्मा है और शाश्वत है, २. पात्मा चेतन लक्षण वाला है, ३. मिथ्यात्व प्रादि कारणों से शुभाशुभ कर्म का कर्ता है, ४. कर्मानु- सार सुख-दुःख का भोक्ता है, ५. भव्य जीव पाठ कर्मों का क्षय कर मुक्ति प्राप्त करता है, ६. मोक्ष के उपाय सम्यग् ज्ञान, सम्यग् दर्शन, सम्यग् चारित्र और सम्यग् तप है । वीतराग महर्पियों ने अनुभव किया है कि जीव न तो पंचभूतों के संयोग से उत्पन्न है और न अन्य किसी के द्वारा उत्पन्न किया गया है, अपितु अनादि अनन्त है। अतः पहले स्थान में जीव को शाश्वत कहा गया है। दूसरे स्थान मे जीव का ३५.
लक्षण, ज्ञान और दशन रूप उपयोग माना है जैसा कि कहा ह-'जीवा उवयोग लक्खो (उत्तराध्ययन २८ अ०) । तीसरे स्थान में जीव का कर्म का कर्ता कहा गया है वह विभाव की अपेक्षा है । स्वभाव से तो वह अपने ज्ञानादि गुणो का हो कर्ता होता है। चौथे स्थान मे जीव को पुण्य-पाप रूप शुभा-शुभ कर्मों के पल का मोक्ता माना गया है, वह भी विभाव की अपक्षा ही समझना चाहिये । पांचवे स्थान में कहा गया है कि जीव अनादि- कालीन कर्म के सवध को भी काट सकता है अर्थात् जोव के साथ लग कर्मों का सवथा विच्छेद हो सकता है। छठे स्थान में कम वध से मुक्ति पान के चार उपाय बताये गये हैं। उनमें ज्ञानपूर्वक रिया से कमा को क्षय कर मुक्ति प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार इन ६ स्थाना से प्रत्येक मुमुक्षु के मन में यह विश्वास उत्पन्न किया गया है कि अनादिकालीन कम वध भी काटा जा सकता है व उसका उपाय भी है। जो दृढ़ सकल्प से पुरुषार्य करता है वह सर्वथा कर्मवन्ध से मुक्त होकर सिद्ध, बुद्ध, शाश्वत पद का अधिकारी हो जाता है। ६ अजीव तत्त्व . शिष्य-भगवन् ! लोक का परिचय देते हुए आपने कहा कि जीव और अजीव-ये लोक हैं उनमें से जीव तत्व का स्वरूप और उसके भेद-प्रभेद की जानकारी प्राप्त की। अब यह बतलाने की कृपा करें कि अनीव क्या है और कितने प्रकार का है ? गुरुदेव ने उत्तर देते हुए कहा-जीव से भिन्न जो भी द्रव्य हैं वे सब अजीव हैं। अजीव के मुख्य ५ प्रकार है-१. धर्मास्तिकाय, २. अधर्मास्तिकाय, ३. पाकागास्तिकाय, ४. काल, व ५. पुद्गलास्तिकाय शिष्य ने जिज्ञासा को कि-भगवन् ! धर्मास्तिकरय प्रादि क्या हैं और इनकी पहिचान कैसे है ? गुरुदेव-लोक में जीव और पुद्गल द्रव्य के गति, स्थिति अवगाहन ग्रादि की व्यवस्था मे सहायक बनने वाले द्रव्य या शक्ति वर्मास्तिकाय कही जाती है। जिस प्रकार मछली या पक्षियो को गति करने में जल पीर आकाश जैसे सहकर्मी द्रच्य आवश्यक हैं वैसे ही जीव प्रादि को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ग्रावागमन करने में सहायक होना बर्मास्तिकाय की पहचान है। वैज्ञानिक जगत् में इसको ईथर कहा है। अधर्मास्तिकाय जीव और पुद्गल के स्थिर रहने में वैसे ही सहायक होते है जैसे पक्षी को वृक्ष, थके पथिक को छाया ठहरने मे महायक होती है, बेमे हो जीव और पुद्गल को भी ठहरने में जो सहायक हो उसे अधर्मास्तिकाय कहते है । - मसार के जीव ग्रादि द्रव्य प्राधेय है उह ठहरने के लिए आधार की आवश्यकता है, क्योकि विना आधार के प्राधेय नही रह सकता । जीव और पुद्गल लोक मे भरे हुए है, इससे प्रमाणित होता है कि उनका कोई प्राधार भी है और वह है अाकाश द्रव्य । उसका गुण अवकाश देना है। पदार्था में पर्यायो का परिपतन कान की पहचान है, काल का वतना गुण है। शिष्य ने जिज्ञासा भाव से पूछा-पया ये चार अजीव द्रव्य देखे जा सकते हैं? गुरुदेव ने कहा- ये वर्ण, गध, रम और म्पर्ण रहित हैं। इनके कोई ग्ग, रूप और प्राकार नहीं होता इसलिए इनको अम्पी कहा पया ह । अरूपी होने से ये चम चक्षु से नहीं देखे जा सकते । ? शिप्य-भगवन् । पाचा अजीव द्रव्य पुद्गलास्तिकाप का स्वरूप और उसकी पहचान क्या है गुरुदेव ने कहा-जो मिलता और विछुहता हो, जिसमे वर्ण, मन्ध, रस, स्पर्श और सठाण हो, उसे पुद्गल कहते है । जीव के शरीर, इन्द्रिय, श्वास और भाषा आदि के निर्माण में पुद्गल द्रव्य ही महकारी होता है। पुद्गलास्तिकाय के महकार से ही जीव की गति-स्थिति आदि क्रियाएं हाती है। रग, रूप और प्राकार वाला होन से यह कथाचित स्पी और दृश्य भी हाता है । शिष्य-भगवन दीजिये। पुद्गल की कुछ पर्यायों का परिचय ३८ गुरुदेव ने कहा-पुद्गल की अगणित पर्यायें होती है। इसकी पर्याय का परिचय देते हुए उत्तराध्ययन सूत्र में कहा है- एगत्तं च पुहत्तं च, संखा संठाणमेव य । संजोगा य विभागा य, पज्जवारणं तु लक्खरणं ।। (उ. अ. २८ गा. १३) अर्थात् एक होना, अलग होगा, संख्या में गिना जाना, संठाण (प्राकार) होना, संयोग (मिलना) और वियोग (अलग होना) ये पुद्गल पर्याय के लक्षण है। परमाणु मे लेकर अनन्त प्रदेशी स्कन्ध तक अनन्त-अनन्त प्रकार की पर्यायें होती है। शास्त्र में अन्यत्र कहा है कि शब्द, अन्धकार, उद्योत, प्रभा, छाया और ग्रातप ये मव पुद्गल के रूप हैं। इनके मुख्य चार रूप किए जा सकते हैं-१. देखे जाते है, लेकिन पकड़े नही जाते, २. पकड़े जाते हैं, लेकिन देखे नही जाते ३. देखे भी जाते हैं, पकड़े भी जाते हैं, ४. देखे भी नहीं जाते, पकड़े भी नहीं जाते। भगवती सूत्र के शतक ८ उद्देश १ में पुद्गल की पर्याय का वर्णन पाता है कि “तिविहा पोग्गला पन्नत्ता तजहापयोगपरिणया, मीससा परिणया वीससापरिणया" (१) एकेन्द्रिय मादि जीवों के प्रयोग व्यापार क्रिया से शरीरादि से परिणत होने वाले प्रयोग परिणत (२) सहज स्वभाव से बादल की तरह अपने पाप इकट्ठे होने वाले विलसा परिणत और (३) जीव की क्रिया के प्रयोग से शरीरादि रूप परिणत और विस्रसा (स्वभाव) से परिणत मिथ परिणत पुद्गल कहे जाते हैं जैसे मृत कलेवर। ३३ परमाणु पुद्गल से लेकर सरयात प्रदेशी, असख्यात प्रदेशी, अनन्त प्रदेशी, मूक्ष्म स्कन्ध और वादर स्कन्ध ये पुद्गल की विविध पर्यायो के रूप हैं। परमाणु मात्र एक गन्ध, एक वर्ण, एक रस और दो स्पर्श वाला होता है । मूक्ष्म प्रदेशी स्कन्ध चस्पर्शी होते हैं और वादर अष्ट स्पर्शी होते हैं। इनका विस्तृत परिचय भगवती सूत्र के शतक ८ उद्देशक १ में देखा जा मकता है। उत्तराध्ययन, पनवणा और भगवती सूत्र में पुद्गल के पर्यायो का विस्तृत विवरण किया गया है । प्रकारान्तर से पुद्गल के ६ प्रकार वतलाए गए है- (१) वादर-वादर-जो विभाजित होकर पुन एक ही रूप में नहीं मिलते । सभी इन्द्रिय द्वारा ज्ञेय, छेद-भेद, अग-प्रत्यग की गति मे हीन । जैसे पर्वत-पत्थर, पृथ्वी, भोगोपभोग के पदार्थ । (२) वादर-जो द्रवण शील है (तरल है) मित-मिन होकर भी पुन एक रूप में मिल जाने वाने, इन्द्रिय गम्य । जैसे घी, तेल, दूध, जन, गति वाले पदार्थ । - (३) वादर सूक्ष्म-ग्राख द्वारा दृष्टि गम्य हो पर पकड में नहीं पावें, यनादि से ग्राह्य । जैसे धूप, दाँव, प्रकाश आदि के पुद्गल । (४) सूक्ष्म वादर-कुछेक इन्द्रिया द्वारा जाने जाते हैं पर दृष्टि गम्य नही होते तथा जो शक्ति द्वारा छेद्य-भेद्य हैं। जैसे भाषा, गन्ध वायु के पुद्गल । ४० (५) सूक्ष्म-अनन्त सूक्ष्म परमाणु से बने हुए अपेक्षाकृत स्थूल, शक्ति विशेष से छेद-भेद पर इन्द्रियों से अगोचर । जैसे चौस्पी कार्मण वर्गणा । (६) सूक्ष्म-मूक्ष्म-अछेद्य-अभेद्य, विशिष्ट अवधि या केवल ज्ञान से ज्ञातव्य, यंत्र शक्ति से भी अछेद्य-अभेद्य । जैसे द्विस्पर्शी परमाणु । पुद्गलास्तिकाय के चार भेद किये गये हैं-स्कन्ध, देश, प्रदेश और परमाणु । परमारण के समूह को स्कन्ध कहते हैं, स्कन्ध के एक 'भाग को देश कहते हैं, स्कन्ध के सबसे छोटे अंश को प्रदेश और स्कन्ध से अलग हुये प्रदेश यानी अविभागीय अंश को परमाणु कहते है । शिष्य ने गुरुदेव से जिज्ञासा की कि-भगवन् ! अनीव के पांच भेद बतलाए, किन्तु जीव तत्त्व की तरह इनके अलग-अलग भेद भी मतलाए गए हैं और यदि बतलाए गए हैं तो फिर कितने हैं ? समझाने की कृपा करें। गुरुदेव ने कहा-"उत्तराध्ययन सूत्र में धर्मास्तिकाय आदि ५ भेदों को बतलाकर ३० अरूपी और ५३० रूपी कुल ५६० भेद अजीव तत्त्व के भेद किये हैं। धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय और आकाशास्तिकाय के स्कन्ध, देश, प्रदेश के प्रकार से ह भेद और काल ये १० भेद होते हैं। फिर धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय और काल के द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव और गुण इस प्रकार ५-५ भेद कर २० भेद किये। ये कुल ३० भेद अरूपी अजीव के हैं। धर्मास्तिकाय आदि की तरह पुद्गल के ५ वर्ण, २ गंध, ५ रस, ८ स्पर्श और ५ संठाण के साथ भंग करने से ५३० भेद होते हैं । ४१
पुद्गल की विशेष जानकारी के लिय उत्तराध्ययन मूत्र मा ३६वा
अध्ययन देखना चाहिये ।
पांच अजीव द्रव्यो मे धर्मास्तिकाय ग्रादि द्रव्यो का कार्य सर्व
माधारण द्वारा लक्षित होने योग्य नहीं है। केवल एक पुद्गलास्तिकाय
ही जन साधारण को दृष्टिगोचर होता है । दृष्टि जगत् का सारा
दृश्य-हाट, हवेली यान, वाहन, राकेट और अणु वम पुद्गल द्रव्य का
ही कार्य ह । जीव के सहयोग से पुद्गल द्रव्य विविध प्रकार के
चमत्कारपूर्ण प्रयोग करने में सफल होता है जा हम सबके प्रत्यक्ष है ।
शिष्य-भगवन् ! रूपी जीव के ५३० भेद कहे हैं, वे
कौन से हैं ?
गुरुदेव-रूपी जीव के ५३० भेद मस्थान, वर्ण, गन्ध, रम
और स्पर्श के आधार में कहे गये है । वे इस प्रकार है--सम्यान ५
है-(१) परिमडल, (२) वृत्त, (३) तस, (6) चतुरम,
(५) पायत । इनमें से प्रत्येक के ५ वर्ण, २ गन्ध, ५ रस और
८ स्पर्श इनके अनुसार २० भेद होते है । अत इनके ५४२० = १००
भेद हुए।
वर्ण ५ है-(१) काला,
(२) नीना, (३) लाल,
(४) पीला, (५) सफेद । इनमे से प्रत्येक के २ गन्ध, ५ रस,
५ मस्थान और ८ स्परा के अनुसार २० भेद हैं प्रत इनके
५४२०=१०० भेद हुये।
गन्ध २ हैं-(१) सुरभि गन्ध और (२) दुरभि गन्ध । इनमे
से प्रत्येक के ५ सस्थान, ५ वरण, ५ रस और ८ स्पर्श के अनुसार
२३ भेद हैं । अत इनके २४२३=४६ भेद हुए।
रस ५ हैं--(१) तिक्त, (२) कटु, (३) कसैला, (४) खट्टा और (५) मीठा । इनमें से प्रत्येक के ५ संस्थान, ५ वर्ण, २ गन्ध और ८ स्पर्श के अनुसार कुल २० भेद हैं अतः इनके ५४२०=१०० भेद हुये। स्पर्शन ८ हैं--(१) गुरु, (२) लघु, (३) मृदु, (४) कठोर, (५) शीत, (६) उप्ण, (७) स्निग्ध और (८) रूक्ष । इनमें से प्रत्येक के ५ संस्थान, ५ वर्ण, २ गन्ध, ५ रस, ६ स्पर्श (८ स्पर्श में से एक स्वयं को और एक विरोवी इन दो स्पर्श को छोड़कर) २३ भेद है अतः इनके ८४२३-१८४ भेद हुये । इस प्रकार संस्थान के १००, वर्ण के १००, गन्ध के ४६, रस के १०० और स्पर्श के १८४ भेद मिलकर ५३० भेद रूपी अजीव के हुये। ४३ पुण्य तत्त्व - शिष्य-नगवन् ! आपने लोक के जीव और अजीव इन दो तत्त्वो का परिचय कराया, इनके अतिरिक्त पुण्य-पाप ग्रादि कहे माते हैं। वे क्या है ? कृपया क्रमश पुण्य के विषय मे फरमावें । गुरुदेव ने उत्तर देते हुए फरमाया कि मिट्टी और पानी की तरह मूल तत्त्व जीव और अजीव ये दो हैं किन्तु जैसे मिट्टी और पानी के सयोग से घडे, गमले और विविध सिलाने आदि बनते हैं, वैमे ही जीव और पुद्गल के सयोग से अनेको पर्याय उत्पन होती है । जब जीव की शुभ प्रवृत्ति में शुम पुद्गला का सयोग होता है तब उसे पुण्य कहते है । जैसा कि तत्त्वाथ सूत्र में कहा है-"शुभ पुण्यस्य । जो जीव को शुभ फल देने के कारण होता है उसे पुण्य कहते हैं । पुण्यादि अन्य तत्त्व जीव और अजीव इन दो मूल तत्त्वो के सयाग और वियोग के परिणाम हैं । जीव की कम शुद्धि में प्रेरणा प्रदान करने वाले होने से इन्ह तत्त्व कहा गया है । शिष्य-भगवन् ! पुण्य कार्य किन-किन कारणो से होता है ? उत्तर देते हुये गुरुदेव ने कहा-पुण्य सचय के प्रमुख कारण है १ अन पुण्य २ पान पुण्य ३ लयन पुण्य ४ शयन पुण्य ५ वस्त्र पुण्य ६ मन पुण्य ७ वचन पुण्य ८ काय पुण्य ६ नमस्कार पुण्य (ठाणाग सूत्र का वा ठाणा)।
१. क्षुधातुर को आहार दान, २. प्यास से पीड़ित को जलदान ३. स्थान, ४. शय्या, ५. सर्दी गर्मी से पीड़ित को वस्त्रदान, ६. विनय, भक्ति और दुःख निवारण के शुभ विचार, ७. सत्य-मित और हितकारी वचन, ८. शरीर से सेवा सुश्रूषा आदि कार्य और ६. गुणवानों को नमस्कार । इस प्रकार मुख्य रूप से पुण्य संचय के ६ कारण है । मन वचन और काया की शुभ प्रवृत्तियों मे इन सव का समावेश हो जाता है । औषधि दान, पुस्तक आदि धर्मोपकरण का लाभ और ज्ञान दान इन्ही में सम्मिलित होते है । उपदेश दान और देव, गुरु, धर्म का प्रचार विशिष्ट पुण्य प्रकृति का कारण है, उनको भी शुभ मन, शुभ वचन और शुभ कार्य मे समझना चाहिये । शिष्य-भगवन् ! पुण्य कर्म के फल क्या है ? गुरुदेव ने कहा-प्रिय शिष्य ! पुण्य कर्म के भोगने के ४२ प्रकार हैं-नाम, गोत्र, आयु और वेदनीय की शुभ प्रकृतियों की प्राप्ति से जीव शरीर आदि शुभ सामग्रियों की प्राप्ति करता है ये ४२ प्रकार की है। सा उच्च गोय मण दुग, सुर दुग पंचिदिजाई पणदेहा, आइतितणू णुवंगा, प्राइम संघयण संठाणा ।। वण चउक्का गुरुलहु परघा उस्साय प्रायवुज्जोय, सुभखगई निमिण तसदस सुरनर तिरि प्रायु तित्थयरं ।। तस वायर पज्जत्ते, पत्तेय थिरं सुमंच सुभंगच, मुस्सर प्राइज्ज जसं, तसाइदसगं इमं होइ ।। (नव तत्त्व) पुण्य का काम सामग्री प्रस्तुत करना है, सवल और निरोग शरीर आदि सामग्री पाकर आगे भी शुभ करणी कर प्रात्मा को ऊँचा उठावें या पाप कर्म में शक्ति लगाकर पतन करें, यह कर्ता के अधीन ४५ करता है । उत्कृष्ट पुण्य प्रकृति पाकर भरत ने उसी भव मे मोक्ष प्राप्त कर लिया तो ब्रह्मदत्त ने सभी अनुकूल सामग्री पाकर भी सप्तम नरक योग्य कर्म मचय किये । पुण्य की सामग्री ने एक का धर्म के सन्मुख किया तो दूसरे को धर्म के विमुख । पुण्य के ४२ भेदो मे पहले माता वेदनीय वध परमार्थ के काय को सफल करने में स्वस्थ शरीर का होना परम पावश्यक है। पचेन्द्रिय जाति विकल इन्द्रिय वाला कार्य करने में भी असमर्थ होता है । अत पुण्यवान को पचेन्द्रिय जाति का होना परम आवश्यक है। (३ से ७) उच्च गोर मनुष्य गति, मनुष्य-मानुपूर्वी देव गति और देव आनुपूर्वी भी शुभ सामग्री के स्थान होने से पाचो पुण्य के फल हैं । (८ से १५) ५ शरीर और ३ अगोपाग इन ८ का होना पुण्य के उदय पर निर्भर । (१६ से २५) उस दशक -वस नाम, वादर नाम आदि १० प्रकृतियां विशिष्ट कार्य के सम्पन्न होने मे आवश्यक है। बस की तरह वादर नाम भी पुण्योदय से प्राप्त होता है, क्योकि नम जीव वादर नाम के उदय वाले ही होते है और विशिष्ट कार्य के लिये त्रस जीव ही अधिकारी होते हैं. स्थावर नही । इस प्रकार अन्य प्रकृतियों के सम्बन्ध म न समझे। (२६ से ३२) ७ प्रत्येक प्रकृति-अगुरु लघु नाम, परा- धात नाम ग्रादि ७ प्रत्येक प्रकृतियां भी पुण्य उदय से ही प्राप्त होती हैं। (३३ ३४) वन अपन नाराच सहनन और समचतुरस सस्थान, शरीर की पूर्ण दृढता और स्थिरता के लिये वज ऋपम नाराच सहनन वाला कठोरतम वेदना और प्रहार भी सरलता से सह सकता है। सहनन की तरह सस्थान नी पुण्य माग के शुभ लक्षण से उत्पन होता है। (३५ मे ३७) मनुष्य प्रायु, देवायु और तियंच का शुम दीर्घ आयु ये भी शुभ कम के उदय से ही प्राप्त होते हैं। (३८ से ४१) शरीर के शुभ वर्ण, गप, रस और स्पर्श ये चार मी पुण्य प्रकृति के फल हैं। तीर्थकर, चक्रवर्ती ग्रादि के शरीर में ऐस ही उत्तम वणादि होते है, जो जीव को सहसा मोहित कर लेते है । ४२ शुभ विहायोगति श्वान या सियाल की तरह अणुभ चाल की अपेक्षा पुण्यशाली जीव की चाल भी शुभ होती है, जिसे गज गति या हंस गति यादि विशेषणों से कहा जाता है। इस प्रकार पुण्य की ये ४२ प्रकृतियाँ है । शिष्य-भगवन् ! पाप की तरह पुण्य भी कर्म है और मोक्ष प्राप्ति के लिए पुण्य-पाप दोनों कर्मों का क्षय करना होता है, फिर पुण्य कर्म करने का उपदेश क्यों दिया गया ? गुरुदेव ने कहा-मोक्ष प्राप्ति के लिये शुभाशुभ कर्म क्षय करने पड़ते है, फिर भी पुण्य और पाप में अन्तर है । समुद्र पार करने वाले को गाड़ी और नौका दोनों का परित्याग करना होता है पर जब तक समुद्र के किनारे नही पहुँचता तब तक नौका को उपादेय मानकर सहारा लेना पड़ता है । यदि समुद्र के मध्य में नौका छोड़ दी जाय तो पार होने की प्राशा धूमिल होने के साथ-साथ प्राणों से भी हाथ धोने पड़ते है । यात्रा में वाहन की तरह भवसागर पार करने के लिये भी पुण्य के वाहन की अावश्यकता होती है । इसलिये पुण्य को पाप कर्म की तरह एकान्त हेय नहीं कहा जा सकता । गृहस्थी लोग भी साधना के प्रारम्भ मे शुभ का मार्ग अपनाते है । होली आदि सामूहिक उत्सवों में एक ओर धूल उछाला जाता हो, काले पानी से कपड़े गन्दे किये जाते हो और दूसरी ओर केसर की छाप मारी जाती हो और गुलाल डाला जाता हो तो काले छाप और धूल से हर कोई खिन्न होगा व वचना चाहेगा लेकिन केसर और गुलाल से प्रसन्न रहेगा। दोनों रंग होते हुये भी एक अशुभ और दूसरा शुभ माना जाता है । कसर इच्छा से लगवाते हैं, लेकिन कीचड़ का लेप अनिच्छा से भी ४७ लग जाये तो साफ करेंगे । इसी प्रकार पुण्य-पाप समझना चाहिये । पुण्य गुलाल और केसर की तरह अादरणीय हैं तो पाप धूल और कीचड की तरह मदा परित्याज्य है । अत पुण्य को एकान्त हेय रूप मानने की बात भूलकर भी नहीं करनी चाहिये । तीर्थकर जैसा स्व-पर कल्याणकारी पद की प्राप्ति पुण्य के ही फल से होती है । ४८ पाप तत्त्व शिष्य-भगवन् ! पुण्य बंध के कारण और उसके फल का संक्षेप में वर्णन ज्ञात हुआ । पुण्य की तरह पाप भी तत्त्व माना गया है। पाप क्या है ? उसका बंध किस कारण से होता है और पाप का फल कितनी तरह से भोगा जाता है ? समझाने की कृपा करें। गुरुदेव ने समझाते हुये कहा-अशुभ योग से होने वाले कर्म के बंध को पाप कहते है । पाप कर्म के संचय करने के १८ प्रकार है। शिष्य---भगवन् ! पाप बंध के १८ प्रकार कौन-कौन से हैं ? गुरुदेव ने कहा-~पाप के १८ कारण पाप के १८ कारण ये है । १. प्राणातिपात (हिंसा), २. मृपावाद (झूठ), ३. अदत्तादान (चोरी), ४. मैथुन (कुशील सेवन), ५. परिग्रह (धन-धान्यादि का संग्रह), ६. क्रोध, ७. मान, ८, माया, ६. लोभ, १०. राग, ११. द्वेप (अनिष्ट पदार्थों पर), १२. कलह (लड़ाई), १३. अभ्याख्यान (किसी पर झूठा आरोप लगाना), १४. पैशुन्य (चुगली करना), १५. पर परिवाद (निन्दा करना), १६. रति-परति (पाप कार्यों पर रति और संयम साधना से अरति), १७. माया मृपावाद (कपट सहित झूठ बोलना), १८. मिथ्या दर्शन शल्य (मिथ्या दर्शन)। इन १८ प्रकार की प्रवृत्तियों से पाप कमों का वध होता है। पाप कर्म जीव खुशी-खुशी करता है, परन्तु जव फल भोगने का समय ८३ आता है, तव वचाव करता है और कष्ट का अनुभव करता है। दुख ही दुख भोगता है। शिष्य-गुरुदेव । आपने पाप कर्म कैसे बघता है बताने की कृपा को, पाप कर्म का फल क्या है वह कैसे मोगा जाता है ? यह बताने की कृपा करें। गुरुदेव-पाप कर्म का फल दुखद रूप में प्रकट होता है और वह ८२ प्रकार का है। यथा - नागातराय दसग नव वीए नीय साय मिच्छत्त। थावर दस नरय तिग कसाय पणवीस तिरिय दुग ॥१८॥ थावर सुहुम अपज्ज साहारणमथिरमसुम दुभगाणि । दुम्सरणाइज्जजस थावर दसग विवज्जत्थ ॥१६॥ इग-वि-ति चउजाइनो, कुखगई उवधाय हुति पावस्स । अपस्सत्थ वण्णचऊ अपढम सघयण सठाणा ॥२०॥ नव तत्व अर्थात्-(१) मतिज्ञानावरणीय, (२) थुतज्ञानावरणीय, (३) अवधिज्ञानावरणीय, (6) मन पर्याय ज्ञानावरणीय, (५) केवल ज्ञानावरणीय, (६) दानान्तराय, (७) लाभान्तराय, (८) भोगान्तराय, (8) उपभोगान्तराय, (१०) वीर्यान्तराय, (११) निद्रा, (१२) निद्रा-निद्रा, (१३) प्रचला, (१४) प्रचला-प्रचला, (१५) स्त्यानद्धि, (१६) चक्षुदर्शनावरणीय, (१७) अचक्षुदर्शनावरणीय, (१८) अवधि दर्शनावरणीय, (१६) केवल दर्शनावरणीय, (२०) असाता वेदनीय, (२१) नीच गोन, (२२) मिथ्यात्व मोहनीय, (२३) स्थावर नाम, (२४) सूक्ष्म नाम, (२५) अपर्याप्त नाम, (२६) साधारण नाम, (२७) अस्थिर नाम, (२८) अशुभ नाम, (२६) दुभग नाम, (३०) दु स्वर नाम, (३१) अनादेयनाम, (३२) अयश कीत्तिनाम, (३३) नरक गति, (३४) नरकानुपूर्वी, (३५) नरकायु, (३६) अनंतानुबधी क्रोध, (३७) अनतानुबंधी मान, (३८) अनंतानुबंधी माया, (३६) अनंतानुबंधी लोभ, (४०) अप्रत्याख्यानी क्रोध, (४१) अप्रत्याख्यानी मान, (४२) अप्रत्याख्यानी माया, (४३) अप्रत्याख्यानी लोभ, (४४) प्रत्याख्यानावरण क्रोध, (४५) प्रत्याख्यानावरण मान, (४६) प्रत्याख्या- नावरण माया, (४७) प्रत्याख्यानावरण लोभ, (४८) संज्वलन लोभ, (४६) संज्वलन मान, (५०) संज्वलन माया, (५१) संज्वलन लोभ, (५२) हास्य, (५३) रति, (५४) अरति, (५५) भय, (५६) शोक, (५७) दुगुया, (५८) स्त्रीवेद, (५६) पुरुपवेद, (६०) नपुसकवेद, (६१) तियंचगति, (६२) तिर्यंचानुपूर्वी, (६३) एकेन्द्रिय जाति, (६४) द्वीन्द्रीय जाति, (६५) श्रीन्द्रिय जाति, (६६) चौइन्द्रिय जाति, (६७) अशुभ विहायो गति, (६८) उपघात नामकर्म, (६६) अशुभ वर्ण, (७०) अशुभ गंध, (७१) अशुभ रस, (७२) अशुभ स्पर्श, (७३) ऋपम नारांच संहनन, (७४) नाराच संहनन, (७५) अर्द्ध- नाराच संहनन, (७६) कीलिका संहनन, (७७) सेवात संहनन, (७८) न्यग्रोध परिमंडल संस्थान, (७६) सादि संस्थान, (८०) वामन सस्थान, (८१) कुब्जक संस्थान, (८२) हुंडक संस्थान । ये ८२ प्रकृतियां पाप कर्म के परिणाम के रूप में मिलती हैं। शिष्य -भगवन् ! प्राचार्यों ने देव, गुरु धर्म के राग को शुभ उपादेय बतलाया है, कैसे? गुरुदेव-देव गुरु और धर्म वन्धुनों के राग को शुभ मानकर उपादेय बतलाना व्यवहार की अपेक्षा है । व्यवहार में प्रेम से मनुष्य देव, गुरु, धर्म की भक्ति में अधिक रस लेता है और त्याग, तप ध्यानादि मी प्रेम से ही प्रासानी से किये जाते हैं। प्रेमवश अधिक से अधिक त्याग, तप को मनुष्य कष्ट न मानते हुये कर जाते हैं। इसलिये इसे शुभ राग ५१ बतलाया है । दरिया के किनारे पहुंचने पर जैसे यात्री को नाव छोडनी होती है, वैसे ही भवसागर के किनारे पहुंचन पर यह राग भी छोडना होता है। अत सिद्धान्त रूप से यह भी ठोडने याग्य है । पर साधना काल मे नही छोडा जाता। शिष्य-भगवन एक व्यक्ति पुण्योदय से अनेक सामग्री पाकर भोग विलास और दुष्कर्मों में अपनी शक्ति और सम्पदा लगाता है और दूसरा व्यक्ति पुण्य को सामग्रो पाकर भी भोगविलास मे रस न लेकर देव, गुरु, धर्म की भक्ति मे सम्पदा का विनिमय कर अपने अापको कृत-कृत्य समझता है । सुद कष्ट सहकर भी दूसरो के दुख निवारण मे आनन्द मानता है इसका क्या कारण है ' पुण्य के उदय से दोनो मे समानता होनी चाहिये थी, फिर इस प्रकार का अन्तर क्यो ? - गुरुदेव ने कहा-शिष्य ' तुम्हारी शका ठीक है, पुण्य दो प्रकार के माने गये है । एक पुण्यानुवन्धी पुण्य और दूसरा पापानुबन्धी पुण्य । पुण्यानुवन्धी पुण्य जीवन म सत्कर्म की साधना कराता है। इसके विपरीत पापानुवन्धी-पुण्य असत् कम के आचरण म प्रीति उत्पन करता है । अत भोग मे अतर देखा जाता है। शिष्य-~-गवन् । पुण्यानुबन्धी पुण्य और पापानुबन्धी पुण्य का क्या अर्थ है ? गुरुदेव-प्रिय शिष्य । जिस पुण्य के उदय मे व्यक्ति भविष्य के लिये शुभ कम की साधना करने मे हप का अनुभव करता है दीन- दुखियो की सेवा, व्रत, नियम और सत्सग मे अपनी शक्ति और सम्पदा के विनिमय मे उसे प्रसनता होती है । भरत आदि की तरह पुण्योदय मे भविष्य भी उनत बनाता है, उसे पुण्यानुवन्धी पुण्य कहते हैं । इसके विपरीत पापानुवन्धी पुण्य के उदय मे मानव तन-धन- ५२ परिजन के सुख पाकर भी सदा पाप कर्म में ही रुचि मानता है और उससे प्रसन्न रहता है जैसा कि कहा है- परिपूरण पाप के कारण ते भगवन्त कथा न रुचे जिनको, तिन एक कुनार बुलाय लही नचवावत है रिनको। मरदंग कहे धिक है धिक है, मंजीर कहे किनको-किनको, तव हाथ उठाय के नारी कहे, इनको, इनको, इनको ।। इस प्रकार पापानुवंधी पुण्य वाला इन्द्रिय सुख में ही सदा प्रामक्त रहकर संचित पुण्य के खजाने को लुटा देता है, और आगे के लिये पाप की गांठ को सिर पर लिए अधोगति का महमान बनता है, इसी को पापानुबन्धी पुण्य कहते हैं । शिष्य -भगवन् ! एकान्त पाप कर्म कितने है ? गुरुदेव ने कहा--प्रिय अन्तेवामी ! पाठ कर्म में ४ एकान्त पाप कर्म कहे गये है-जानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अन्तराय । शेप चार कर्म-वेदनीय, प्रायु, नाम और गोत्र पाप रूप और पुण्य रूप दोनों प्रकार के होते है । पाप प्रकृतियाँ प्राणी के लिये एकान्त अहितकर है अतः इन्हें एकान्त त्याज्य कहा हे। शिष्य-भगवन् ! पाप के बन्ध के कारण १८ बताये गये हैं स्या उनके अतिरिक्त भी कोई कारण हैं ? हैं गुरुदेव ने कहा- ज्ञानावरण आदि अशुभ कर्मों के वन्ध के फारगा अलग भी बतलाये गये हैं । ज्ञानावरणीय कर्म के बन्व के छः कारगा वतनाये हैं:-१. ज्ञान व जानी की निन्दा करने से २. ज्ञान अज्ञानी का अपलाप करने से, ३. ज्ञान प्राप्त करने वाले के अन्तराय शालने में, ४, ज्ञान व ज्ञानी से द्वेप करने से, ५. ज्ञान व ज्ञानी की माशातना करने मे, ६. मान व ज्ञानी से विवाद करने में।
इसी प्रकार दर्शनावरणीय बन्ध के भी छ कारण होते हैं । १ (देव-गुरु के) दशन व दर्शनी का विरोध करने से, २ दर्शन व दशनी का अपलाप करने से, ३ दर्शन प्राप्त करन वाले के अन्तराय डालने से, ८ दशन व दर्शनी मे द्वेप करने मे, १ दर्शन व दगनी की आशातना करन में, ६ दर्शन व दशनी से विवाद करने मे। ऐमे ही मोहनीय कम के बन्ध के छ कारण होते ह -१ तीन पोच, २ तोत्र मान, ३ तीत्र माया, ८ तीन लोन, ५ तीव्र दर्शन मोहनीय, ६ तीव चारित्र मोहनीय करने से नोवादि मोहनीय का वध हाता है, जो प्रात्मा के लिये कठोर फन देने वाला होता है। शिष्य-भगवन अन्तराय कर्म का बन्ध कितने कारणो से होता है? गुरुदेव-प्रिय शिष्य । दान, नाम, माग, उपभोग और वीर्य मे अतराय कर्म का वध होता है । यहाँ पर अन्य कम की तरह ज्ञान, दशन, चारिप प्रत के दान-लाभ में वावा डालना भी अन्तराय कर्म के वध का कारण ममझना चाहिये। शिष्य-नगवन् । वीर्यान्तराय कर्म का वध किससे होता है? गुरुदेव ने कहा-प्रिय शिष्य ! ज्ञान आदि की आराधना करने से किसी को इनकार करना, सत्सग सेवा और साधना मे पुरुषार्थ करने वाले को अनुत्साहित कर उन्ह सप्रवृत्तियो को पाराधना मे उन्मुख करना अन्तराय कर्म का बन्ध का कारण है। कोई भी व्यक्ति शुभ कर्म मे अपनी शक्ति लगा रहा हो, उसको उन सप्रवृत्तियो की निरुपयोगिता बताकर अलग करना वीर्यान्तराय कम वध का कारण होता है ।
दशाश्रत स्कन्ध और समवायांग सूत्र में महामोह के ३० कारण बतलाये गये है, उनमें तपस्वी नहीं होते हुए अपने को तपस्वी कहलाना, ब्रह्मचारी न होते हुये ब्रह्मचारी कहलाना, इस प्रकार अनेक स्थान महामोह के बन्ध के माने गये है। शिष्य-भगवन् ! प्राणी नहीं चाहते हुये भी विविध प्रकार के शारीरिक भोग और आक्रान्तों से पीड़ित क्यों होता है ? गुरुदेव ने कहा--ग्रायुष्मान् शिष्य ! शास्त्र में असाता वेदनीय के १२ वन्ध स्थान बताये गये है जैसे प्राण, भूत, जीव, सत्व को दुःख देने, शोक कराने, अश्रुपात कराने, विलाप कराने, पीटने और परि- तापना देने, बहुत दुःख देने, पीटने, शोक कराने, अश्रुपात कराने, विलाप कराने और परितापना देने से असाता वेदनीय कर्म का वन्य होता है । अनुभवियों ने उक्ति में भी कहा है कि- दुःख दिया दुःख होत है, सुख दिया सुख होय, जो तू हणे न और कू, तोकू हणे न कोय । इसलिये सुख के अभिलापी प्राणी को कभी किसी प्राणी को अहित भाव से कष्ट नहीं देना चाहिये । शिष्य-~भगवन् ! असाता वेदनीय के बन्ध स्थानों की तरह प्रगुम प्रायु, नाम और गोत्र के भी अलग-अलग बन्ध स्थान होंगे ? उन्हें समझाने की कृपा करें। गुरुदेव ने कहा-शिप्य ! ४ प्रकार के प्रायुप्य में नरक और तियंच प्रायु को अशुभ कहा है, उनके बन्ध स्थान ४-४ माने गये हैं जैसे-१. महा प्रारम्म, २. महा परिग्रह, ३. पंचेन्द्रिय जीव की हत्या, ४. मद्य, मांस ग्रादि का ग्राहार करने से नरकायु का वन्ध होता है । १. कपट करने, २. नाम उपाधि प्रादि वदलकर गूढ़ कपट करने, ३ झूठ बोलने, ४ झठा लेस अथवा सोटा तोन माप करने मे तियंच आयु का वध होता है। अशुभ नाम कम का वन्ध-१ उठने बैटने एव चलने की क्रिया में काया की वत्रता, २ भाव और ३ नापा को वश्ता, ४ विमवाद आदि अशुभ योग से होता है। १ जाति, २ कुल, ३ वल, ४ रूप, ५ श्रुत, ६ तप, ७ लाम और ऐश्वयं का मान (मद) करने से नीच गोन का बन्ध होता है, अत जाति ग्रादि के अभिमान से सदा डरते रहना ही कल्याण के लिये श्रेयस्कर है। शिष्य-भगवन् । पाप कर्म के वध स्थान १८ बतलाये गये हैं, फिर जो ये अलग अलग स्थान बताये जाते हैं, उनसे १८ पाप स्थानों की बात में क्या बाधा नहीं आवेगी? गुरुदेव ने कहा-१८ पाप स्थानो का कथन सामान्य दृष्टि से किया गया है, अत ज्ञानावरणीय प्रादि के और महामोहनीय के ३० वालो से इनम वाघा नही पाती । मुख्य रूप से इन १८ स्थानो मे अन्य का समावेश हो जाता है जैसे अमाता के १२ कारण प्राणातिपात, प्रथम पाप स्थान मे आ जाते है, ऐस ही अन्य स्थान के भेद नी आ जाते हैं । ज्ञानावरणीय प्रादि के वन्य स्थान स्पष्ट रूप से समझाने के लिये अलग गिनाये गये है। ? शिष्य-गुरुदेव । सापने पुण्य वध के ६ और पाप बघ के १८ स्थान बतलाये फिर ८ फर्मों के अलग-अलग बन्ध स्थान क्यो कैसे कहे जाते हैं उत्तर मे गुरुदेव ने कहा-पुण्य के हैं और पाप बन्ध के १८ स्थान सामान्य दृष्टि से हैं । विशष रूप से पुण्य और पाप के फल जैसे अनेक प्रकार के होते है, वैसे ही दोनों के बन्ध स्थान भी अनेक प्रकार के कहे गये हैं। शिष्य ने पूछा-गुरुदेव ! मापने पहले पुण्य के फल भोगने के ४२ प्रकार बतलाये हैं क्या उनमें भी कोई भिन्नता या विशेषता है ? उत्तर--पुण्य ४२ प्रकार से भोगा जाता है उनमें अनेक कारणों में भिन्नता आ जाती है, यथा- (१) बहुत से जीवों को पंचेन्द्रिय जाति और मनुष्य गति प्राप्त होकर भी पाप प्रकृतियों की बहुलता से विविध प्रकार की यातनाएँ भोगते देखा जाता है, शारीरिक कष्ट के साथ उनकी बुद्धि भी कुमार्ग के आचरण की ओर ही जाती है फिर भी पंचेन्द्रिय जाति और मनुष्य गति पाने की अपेक्षा से उसे पुण्योदय कहा जाता है। (२) दूसरे प्रकार के वे प्राणी हैं जिन्हें पंचेन्द्रिय जाति और मनुष्य गति के अतिरिक्त तन, धन और परिवार की दृष्टि से भी सुख प्राप्त है। राज्य और समाज में भी उनका सम्मान है पर अज्ञान और मोह की प्रबलता से सदा सत्संग-सेवा की ओर अरुचि रखते और कुमार्ग की ओर शक्ति लगाते हुये अपने साधनों का दुरुपयोगक रने में ही प्रमोदानुभव करते रहते हैं जैसे ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती आदि । ऐसे जीवों को पुण्य की वाह्य सामग्री तो प्राप्त होती है पर अज्ञान और मोह की प्रबलता से अन्तर में पाप का उदय है तथापि वाह्य दृष्टि से उन्हें पुण्यशाली कहा जाता है। (३) तीसरे प्रकार के वे प्राणी हैं जिन्हें पंचेन्द्रिय जाति, मनुष्य गति मिलने पर भी उसका कोई सुफल प्राप्त नहीं है, न तन का मुख है, न परिवार का फिर मान सम्मान की तो बात ही क्या ? ऐमी स्थिति में भी मन सत्कर्म की साधना की पोर लालायित रहता है, जो यह समझते है कि पहले जन्म मे भावपूर्वक पुण्य कर्म का साधन नही किया इसलिये आज भी निम्न स्थिति को भोग रहा हूँ तो अब मनुष्य जन्म को सफल करने के लिये तन-मन से सत्सग, सेवा और शुभ कम की साधना मे क्यो न अपने जीवन को समर्पित करदू, दुख मे रोते-रोते मरने की अपेक्षा सत्कर्म की साधना कर हंसते-हंसते जीवन का अन्त करना अधिक अच्छा होगा । इस प्रकार के प्राणी वाह्य दृष्टि से पुण्यहीन कहे जाते हैं पर अन्तर में उनके पाति कर्म की मदता से पुण्य का उदय देखा जाता है जैसे हरिकेशी वल मुनि । (४) चौथे प्रकार के वे प्राणी है जिनको मनुष्य जन्म के साथ शरीर के वन, वीय और सुरूपता भी प्राप्त है, ममाज मे मान है, परि- वार का सुख है और आर्थिक हालत भी (भौतिक वैभव) अच्छी है, इन बाह्य सुस सामग्रियो के साथ जिममे मोह की मदता और ज्ञानावरणीय तथा अन्तरायकर्म के क्षमोपशम से समति भी जागृत रहती है । फल- स्वरूप सदा अपनी शक्ति और सम्पत्ति का सदुपयोग करते एव सत्कर्म के आचरण करने मे ही जीवन की सफलता मानते हैं, ऐसे प्राणिया को अन्तरग और बहिरग दोनो प्रकार के पुण्य के फल प्राप्त है । पुण्य के इम चतुर्थ श्रेणी में सुबाहु और मुनि मेघकुमार आदि श्रावक धर्म और श्रमण धर्म की साधना करने वाला के उदाहरण दिये जा सकते हैं। इस प्रकार पुण्य उदय के सामान्य-विशेष अनेक प्रकार के फल, पुण्य की विभिन्नता को प्रमाणित करते है । पुण्य के फलो को सुनकर शिष्य ने पूछा-गुरुदेव । पुण्य फल को चार थेरिणयो से यह स्पष्ट है कि नौ प्रकार के पुण्य बध स्थानों के अतिरिक्त अन्य मी पुण्य के कारण होने चाहिये । पुण्य को चार ५८ श्रेणियों में सम्पत्ति और सत्धर्म में रुचि मी पुण्य का फल बताया गया है, पुण्य किन कारणों से प्राप्त होते हैं कृपया यह भी समझाने का कप्ट करें। उत्तर में गुरुदेव ने कहा-विशिष्ट प्रकार के पुण्य तीर्थकर नाम गोत्र बंध के ज्ञाताधर्म कथा श्रु. १ अध्ययन ८ में बीस स्थान बताये गये हैं यथा-१. अरिहन्त, २. सिद्ध, ३. प्रवचन, ४, गुरु, ५. स्थविर, ६, वहुश्रुत, ७. तपस्वी इन सातो का गुणगान करने में उत्कृष्ट रस ग्रावे, ८. ज्ञान की निरन्तर आराधना करे, ६. निर्मल सम्यक्त्व का पालन करे, १०. गुणी, पूज्यजनो का विनय करे, ११. भावपूर्वक प्रतिक्रमण करे, १२. निरतिचार शीलव्रत पाले, १३. सदा मंगभाव रखे, १४. सुपात्रदान देवे, १५. वैय्यावृत्य करे, १६. समाधि- भाव रमे, १७. नित्य नवीन ज्ञान का अभ्यास करे, १८. श्रुतज्ञान की भक्ति करे, १६. प्रवचन की प्रभावना करे । इन २० कारणों से तीर्थकर गोत्र रूप पुण्य का वध होता है । इन वीस बोलों में संवर एवं निर्जरा के साथ शुभ योग से होने वाले विशिष्टतम पुण्य के कारण बताये हैं, इसके फल में वाह्य सामग्री के साथ अन्तर मे धर्मलाभ भी प्राप्त होता है। जिन नाम से अन्य विशिष्ट पुण्य हो सकता है । इस प्रकार का पुण्य धर्म सावन में वाधक नहीं होकर अधिक साधक होता है। शिष्य-भगवन् ! पुण्य के सामान्य-विशेष प्रकार बतलाये, बसे पाप के भी विविध प्रकार होंगे, उन्हें भी बतलाने की कृपा करें। उत्तर देते हुए गुरुदेव ने कहा-हाँ, होते हैं । गुम भाव पोर योग की मंदता तथा तीव्रता के अनुसार जैसे पुण्य अनेक प्रकार के हैं, में ही हिंसा प्रादि पाप कार्य, एक इच्छा से करता है, दूसरा परवशता में राजा के मैनिक की तरह करता है। दोनों के पाप में अन्तर है। ५ इच्छा से हिंसा करते हुए भी एक रुक्ष (उदामीन) भाव से करता है और दूसरा प्रसन मन से, तीसरा हिंसा तो इच्छा से करता है पर करने के पश्चात् फिर उसे पश्चात्ताप होता है। उसका पहले का पाप हल्का हो जाता है । इस प्रकार भावना की तीव्रता, मदता से हिंसा के पाप में अन्तर होता है । इसी प्रकार अन्य पापो के सम्बन्ध में भी समझा जा सकता । क्रोध, मान, माया व लोभ की मदता और तीता के अनुसार पाप के वध में भी मदता व तीव्रता पाती है। अत पाप कम के १५ स्थानो को सामान्य समझना चाहिये । इसके अतिरिक्त विशेष वध के स्थान भी होते हैं । तपस्या करके भोगो का निदान करना भी पाप के कारण रूप में परिणत होता है।
प्राश्रव पुण्य तत्त्व और पाप तत्त्व की तरह पांचवां पाश्रव तत्त्व है। शिष्य-गुरुदेव ! प्राश्रव किसे कहते हैं ? गुरुदेव-शिष्य ! जिन कारणो से कर्मों का प्रागमन हो उसे आश्रव कहते हैं । तालाब में पानी पाने के नाले (द्वार) की तरह प्रात्मा रूपी तालाब में कर्म रूपी पानी के आगमन के मार्ग को प्राथव कहते हैं। दूसरी तरह से कर्म का आना भी ग्राश्रव कहा जाता है । शिष्य-गुरुदेव ! प्राश्रव कितने प्रकार का है ? गुरुदेव-द्रव्याश्रव और भावाश्रव के भेद से ग्राश्रव दो प्रकार का कहा गया है। शिष्य----कर्मों का प्रागमन प्रर्थात् पाश्रव कैसे होता है ? गुरुदेव-कर्माधव के पांच, वीस, पच्चीस और वयालीस प्रकार बताये गये है। शिष्य-मानवों के सम्बन्ध में सिद्धान्त ग्रंथों में क्या प्रतिपादन किया गया है? गुरुदेवतत्त्वार्थ सूत्र में तन, मन और वाणी के क्रिया रूप योग को माधव कहा गया है। जैसे कायवाट् मनः कर्म योगः । ६१
माधव । तत्त्वार्थ मून अध्ययन ६-१ । प्रकारान्तर से तीन योगा के
साय ३६ भेद जाडकर ग्राथर ८२ प्रकार का बतलाया गया है। जैसा
कि तत्त्वार्थ सूत्र में कहा है-
इन्द्रिय कपायावत प्रिया पञ्च चतु पञ्च पञ्च विंशति
सख्या पूर्वस्य भेदा । अ६ सूत्र ६
अर्थात् पाच इद्विया, चार कपाय, प्राणातिपात आदि ५
अवत, और मिथ्यात्वादि पच्चीस क्रियाएँ कम वध के कारण होने से
इन ३६ नेदो का भी प्राथव कहा गया है ।
शिष्य-गुरुदेव ! उपर्युक्त भेदो को जरा स्पष्ट करके
समझाइये।
गुरदव-थोत्र, चक्षु, प्राण, रसना और स्पशन इन पाच
इद्रिया को वश मे नही करना, प्रोध, मान, माया व लोम रूप चार
कपायो का निग्रह नहीं करना और हिंसा, असत्य, चौयं कम, अब्रह्म
और परिग्रह से विरमण नहीं करना तथा कायिकी प्रादि २५ नियाएँ
करना तथा मन, वचन और काया को अगुप्त रसना ये ४२ प्रकार के
पाथव बतलाये गये हैं।
शिष्य-गुरुदेव । पच्चीस क्रियाएँ और उनका स्वरूप क्या
है ? समझाने की कृपा करें।
गुरुदेव-कर्म वध के कारण रूप प्रवृत्ति को रिया कहते हैं ।
वे पच्चीस प्रकार की हैं जो इस प्रकार है-
(१) कायिकी-शरीर से होने वाली उपयोग रहित गमनागमन आदि
किया को कायिकी क्रिया कहते है।
(२) अधिकरणिको अधिकरण अर्थात हिंसाकारी शस्लो से होने
६२
वाली क्रिया को अधिकरणिकी क्रिया कहते है । शस्त्रों को बनाने और जोड़ रखने रूप वह दो प्रकार की है। (३) प्राषिकी क्रिया-जीव या अजीव वस्तु पर द्वेप करने से होने वाली क्रिया प्राद्वेषिकी क्रिया कहलाती है। (४) पारितापनिकी क्रिया-जिससे अपने व दूसरों को पीड़ा उत्पन्न हो उसे पारितापनिकी क्रिया कहते है । जैसे अपने या दूसरे के सिर पर चपेटा या लाठी प्रादि से प्रहार करना । (५) प्रारणातिपातिकी क्रिया-शस्त्र आदि के प्रहार से अपने व दूसरे के प्राणों का अतिपात हो वैसी क्रिया को प्राणातिपातिकी क्रिया कहते है। (६) प्रारंभिको क्रिया-गृह कार्य में चूल्हा, चक्की आदि से छः काय के जीवों का हनन हो, उस प्रारम्भ से होने वाली क्रिया को प्रारंभिकी क्रिया कहते है । (७) पारिग्रहीकी क्रिया-धन, धान्य, सुवर्णादि का संग्रह करने से होने वाली क्रिया को पारिग्रहीकी क्रिया कहते हैं । (८) मायाप्रत्यायको-कपट करके दूसरों को ठगने से तथा क्रोध प्रादि कपाय से होने वाली क्रिया को मायाप्रत्ययिकी कहते है। (8) अप्रत्याख्यानिकी क्रिया-हिंसादि पापों के प्रत्याख्यान नहीं करने से लगने वाली क्रिया को अप्रत्यास्यानिकी क्रिया कहते है। (१०) मिण्या दर्शन प्रत्ययिकी क्रिया-मिथ्यात्व अर्यात् विपरीत घसा से होने वाली क्रिया को मिथ्या दर्शन प्रत्ययिकी क्रिया कहते हैं।
(११) दिट्टिया किया-जीव या किमी अजीव को रागपूर्वक देखने से होने वाली निया को दिट्टिया कहते है। (१२) पुट्टिया क्रिया-जीव या अजीव आदि का रागादिवश छन तथा सावद्य प्रश्न पूछने से होने वाली क्रिया को पुट्टिया कहते हैं। (१३) पाडुच्चिया किया~जीव और अजीव आदि पदार्थों में एक दूसरे की अपेक्षा अच्छा-बुरा देखकर रागादि करने से होने वाली निया को पाडुच्चिया कहते है । (१४) सामन्तोवरिणवाइया किया~-अपने सुन्दर भवन या सुन्दर पशु आदि को देखकर लोगो से होने वाली प्रशसा से मन मे रागादि उत्पन्न हो उस क्रिया को सामन्तोपनिपातिकी क्यिा कहते हैं। (१५) नेसडिया रिया- अपने हाथ अादि से मनुष्य, वाण या पत्थर आदि फेकने से होने वाली क्रिया को नेसट्ठिया कहते है । (१६) साहत्थिया-~-अपने हाथ से किसी को ताडना, पीटना आदि करने से होने वाली क्रिया को साहत्थिया कहते है । (१७) प्राणवरिणया (प्राज्ञापनिका)-प्राज्ञा देने या जीव आदि किसी चीज के मगाने मे हाने वाली रिया आणवरिणया (प्राज्ञापनिका) कही जाती है। (१८) विप्रारणिपा-कागज, वस्त्र या दुष्ट भाव से किसी जीव के शरीर का विदारण करने से होने वाली क्रिया को वंदारणिकी कहत हैं। ६४
(१९) अणाभोगवत्तिया-विना उपयोग के गमनागमन आदि की
क्रिया करने में होने वाली क्रिया
वाली क्रिया को अणाभोगवत्तिया
कहते हैं।
(२०) अणवकंखवत्तिया-हिताहित की अपेक्षा बिना किये ही की गई
अपध्यान और हिंसा, झूठ आदि की क्रिया से होने वाली क्रिया
को अनवकांक्षवत्तिया कहते है।
(२१) पओगवत्तिया-मन, वचन, काया के सावद्य तथा प्रमादपूर्वक
क्रिया करने से होने वाली क्रिया को प्रयोगवत्तिया कहते हैं।
(२२) सामुदाणिया-पशु-पक्षियों की लड़ाई और अपराधियों के
शूलारोपण आदि देखने के लिए सामूहिक रूप से जो खुशियाँ,
मनाई जाती है उससे होने वाली क्रिया को सामुदाणिया
कहते हैं।
(२३) रागवत्तिया-राग या लोभादि वश क्रिया करने से होने वाली
क्रिया को रागवत्तिया कहते हैं ।
(२४) दोसवत्तिया-द्वेप से होने वाली क्रिया को दोसवत्तिया
कहते है।
(२५)
ईपिथिकी-सूत्रानुसार क्रिया करने या निर्मोह भाव से क्रिया
करने से होने वाली क्रिया को ईर्यापथिकी कहते है। ग्यारहवें
से तेरहवें गुणस्थान तक वाले जीवो की यही एक क्रिया
होती है।
शिष्य-गुरुदेव ! आपने आश्रव के बयालीस भेद समझाने की
कृपा की, अब आश्रव के पच्चीस, पांच व वीस भेद बताने का कष्ट
करें।
६५
, १ गुरुदेव-पर पणित पच्चीस मियाना मे आश्रव के पच्चीस भेद कहे जाते हैं, तया (१) मिथ्यात्य, (२) अप्रत (३) प्रमाद, (४) कपाय और (५) अशुभयोग ये पाच जाश्रय के प्रमुर भेद है। ये पाच भेद तथा प्राणातिपात जादि पाच अव्रत के पाच भेद, भोग आदि प.च इन्द्रिया का वश में न रखने म्प पाच भेद, मन, वचन और काया इन तीनो योगा का वश में न रखने के तीन भेद, मद उपकरण व सूई कुशाग्र मात्र का अयतना मे लेने जार. रखने रूप दो भेद, इस प्रकार कुल बीस भेद आथव के सामान्य म्प से रहे गये है। शिष्य-गुरुदेव ' कर्म वध के कारणो मे मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कपाय और अशुभ योग को प्रमुख कारण माना है तो मिथ्यात्व क्या है ? और उसके कितने भेद हैं गुरुदेव -मवज्ञ प्रणीत जीव जादि पदार्यों को नहीं मानना, न्यूनाधिक मानना या विपरीत मानना इसे मिथ्यात्व कहते हैं। स्थानाग सूत्र के अनुसार मिथ्यात्व के दस भेद कहे गये है जो इस प्रकार है- (१) जीव को जीव थद्धना, (२) अजीव को जीव थद्धना, (३) अहिंसा, सयम, शाति, मुक्ति आदि धर्म को अधर्म मानना, (४) हिंसा आदि उधम को धर्म मानना, (५) पच महाव्रत धारी साधु को असाघु मानना, (६) असयमी, मोगी साधु का साधु मानना, (७) सम्यक् दशन आदि मोक्ष माग को ससार का माग मानना, (८) ससार के मार्ग को मोक्ष का मार्ग मानना, (९) कर्म मुक्त सिद्ध जादि को अमुक्त मानना, (१०) जमुक्त को मुक्त मानना मिथ्यात्व है। प्रकारान्तर से मिथ्यात्व के पाच भेद कहे गये हैं जैसे- (1) आमिग्रहिक-तत्त्वात्व की परीक्षा किए बिना किसी बात को आग्रहपूर्वक पकड़े रखना।
(२) अनाभिग्रहिक--विना परीक्षा के सब धर्मों को समान समझना या मिथ्या व सत्य मार्ग का दृढ पकड़ नहीं होना । (३) आभिनिवेशिक-अपने मान्य परम्परा को सदोप जानते-मानते हुए भी दुराग्रह वश असत्य को सत्य वताना और उसी में स्थिर रहना। (४) सांशयिक-जीव आदि तत्त्वों के विषय में संशयशील रहना । (५) अनाभोगिक-अज्ञानतावश तत्त्वातत्त्व के ज्ञान शून्य होना यह प्राय: असंज्ञी जीवों को होता है । शिष्यगुरुदेव ! देव, गुरु, और धर्म के सम्बन्ध में रूढ़िवश लौकिक पर्वो को मानना , इसे भी मिथ्यात्व कहते हैं, वह किस प्रकार है ? गुरुदेव-व्यवहार में लोकिक मिथ्यात्व आदि अन्य भेद भी किए है जो लौकिक पर्वादि से सम्बन्धित हैं, ये दस प्रकार के है । यथा- (१) लौकिक मिथ्यात्व-संसार के मायावी प्रपंचों से युक्त सरागी देवों को देव मानना एवं यज्ञ-स्नान आदि और तीर्थ यात्रा में धर्म मानना। लोकोत्तर मिथ्यात्व-वीतराग देव और निर्ग्रन्थ गुरु की स्तुति, वन्दना और मागलिक पाठ आदि से सांसारिक सुखों की इच्छा (२) करना। कुप्रावच निक मिथ्यात्व-एकान्तवादी सरागियों की वाणी को शास्त्र मानकर तदनुसूल आचरण करना अर्थात् मिथ्यामत की क्रियाओं में श्रद्धा रमना ।
(४) (५) यून मिथ्यात्वशास्त्र कथित मावा का अपनी मनमानी कल्पना से मूल रूप में कम मानना से निब जमानी द्वारा 'कडे माणे कडे' को 'कडे माणे जकडे रहा गया । बधिक मिथ्यात्व -जीव आदि तत्त्वो के स्वरूप में अधिक मानना जैसे उगाहना की पेक्षा समारी जात्मा स्वदेह प्रमाण होता है, उसे लोक व्यापी मानना अधिक मिथ्यात्व है और अगुष्ठ प्रमाण मानना न्यून मिथ्याल है । विपरीत मिथ्यात्व-चैतन्य स्वरूप आत्म तत्व की स्वतन्न सत्ता मानने के बदते पात्मा का पचभूता के सयोग से उत्पन्न मानना। ७ ) 5 ) अप्रिया मिथ्यात्वमात्मा को अप्रिय मानना अथवा ज्ञान किया युक्त मुक्ति मार्ग मे क्रिया का निपंध कर मात्र ज्ञान से मुक्ति मानना। अज्ञान मिथ्यात्व-ज्ञान को सकल्प-विकल्प का कारण मानकर अनानवादी की तरह ज्ञान से ही मुक्ति मानना । यह कहना कि वालक दशा में प्राणी हिंसादि पापो का आचरण कम करता है जबकि ज्ञानी होकर वह अधिक पापाचरण करने लगता है। इस प्रकार अज्ञान को ही श्रेयस्कर मानना ज्ञान मिथ्यात्व है। अविनय मिय्यात्व-देव, गुरु, चर्म के विनय मे श्रद्धा भाव नही रखना। आशातना मिय्यात्व-तत्त्वात्व का सम्यक् विचार किए बिना जश्रद्धा से धम तथा तक के बल पर शास्त्र वाणी पर यद्वा तद्वा प्रलाप करना। यह कहना कि सिद्ध किसी से (९) 1 (१०)
मिलते-जुलते नही और न ज्ञानोपदेश देकर भव्य आत्माओं का
कल्याण कर पाते है, ऐसी दशा मे उनको क्या आनन्द है ?
इससे तो हम मनुष्य लोक के प्राणी अच्छे है जो चतुर्विध संघ
की सेवा करते हुए धर्म प्रचार करते है। ऐसे निम्रन्थ गुरु और
धर्म तत्त्व के प्रतिकूल
प्रतिपादन करना।
मिथ्यात्व है।
आशातना
शिष्य-गुरुदेव ! आश्रव के भेदों में पच्चीस क्रिया और मिथ्यात्व
की जानकारी प्राप्त हुई परन्तु प्रमाद और कषाय को भी आश्रव कहा है,
इनके कितने भेद हैं । समझाने की कृपा करें।
गुरुदेव-प्रमाद के अज्ञान आदि अनेक प्रकार बताये गये है,
उनमे मुख्य पांच प्रकार है जैसे कहा है-मज्ज विसय कसाया, निद्दा
विगहा य पंचमी भणिया। ए ए पंच पमाया, जीवं पाडति संसारे ।
अर्थात् मद्य, विपय कपाय, निद्रा और विकथा ये पाच प्रमाद जीव को
संसार सागर में गिराने वाले है।
(१) इनमें पहला प्रमाद मद्य अर्थात् नशे के पदार्थों का सेवन
करना है।
(२)
शब्द, रूप, गंध, रस और स्पर्श इन पाच इन्द्रियों के विपयों में
प्रीति रखना विपय रूप प्रमाद है।
(३) क्रोध, मान, माया, लोभ संसार बढाने वाले होने से इन चारों
को कपाय कहा गया है। इन चारों का निग्रह नहीं करना
कपाय रूप प्रमाद है।
(४) निद्रा--पांच प्रकार की निद्राओं का सेवन करना निद्रा रूप
प्रमाद है।
(५) विकथा-देश कथा, राज कथा, मोजन कया, अर्थ फ्था, स्त्री कथा, दर्शन भेदिनी, चारित भेदिनी आदि सात प्रकार की विकथाओ में से कोई विकथा करना विकथा रूप प्रमाद है। शिष्य-भगवन् । आपने आश्रव का विवरण समझाकर हमे कर्म वध से बचने की शिक्षा दी। इसके लिए हम आपका उपकार नहीं भूल सकते, पर एक शका होती है कि तत्त्वार्य सूत्र मे शुभ और अशुम योग को आश्रव कहा गया है और हम शुभ योग को सवर कहते हैं यह कैसे ? शास्त्रीय आधार से बताने की कृपा करें। गुरुदेव-शिप्य । तुम्हारी शका ठीक है। योग का पूर्ण निरोध करना सवर कहा गया है, जो चौदहवें योग गुणस्थान वाला को होता है, किन्तु व्यवहार माग को साधना करने वाले का अयोग दशा प्राप्त नहीं होती, उनके लिए शुभ योग से जशुभ को राक्ना सवर कहा गया है। इसी अपेक्षा से पाच समिति, बारह मावना, पाच प्रकार के स्वाध्याय आदि कियाजा को सवर कहा गया है, क्योंकि इनसे अशुभ प्रवृत्तिया रोकी जाती है । भगवनी सूत्र के पहले शतक में एक प्रश्नावली के माध्यम से यह समझाया गया है कि जीव जात्मारम्भी, परारभी, तदुभयारभी और अनार भी है। ममार के सभी जीव यानी चौबीस ही दडक के जीव जात्मारभी, परारमी और तदुभयारभी हाते हैं। किन्तु मनुप्य मे जात्मारभी, परार भी तदुमयार भी और जनारभी यो चारा प्रकार के होते है। इस विपय को स्पष्ट करते हुए भगवती शतक १ उद्देश्य १ सून ४८ मे इस प्रकार कहा है-- गौतम । जीव दो प्रकार के है। सिद्ध और ससारी। इनमे जो सिद्ध जीव है वे न आत्मारभी हैं, न परारभी है और न तदुभयारभी है परन्तु अनार भी हैं। ससारी जीव दो प्रकार के हैं-सयमी और असयमी। इनमें से सयमी दो प्रकार के हैं—प्रमत्त सयमी और अप्रमत्त संयमी । इनमें जो अप्रमत्त संयमी है वे आत्मारंभी नही है, परारंभी नहीं हैं, तदुभयारंभी नहीं होते किन्तु अनारंभी है। पर जो प्रमत्त सयमी है वे 'सुहं जोगं पड्डच्च' अर्थात् प्रति लेखन आदि शुभयोग की अपेक्षा न आत्मा- रंभी है, न परारंभी हैं, न तदुभयारंभी है अपितु अनारभी है और 'असुहं जोगं पड्डच्च' अर्थात् अशुभ योग की अपेक्षा आत्मारंभी भी हैं और तदुभयारंभी हैं परन्तु अनारभी नहीं है जो असयमी जीव है वे आत्मारंभी भी है, परारंभी भी है, तदुभयारम्भी है किन्तु अनारंभी नही होते । उपर्युक्त सूत्र में शुभ योग की अपेक्षा प्रमत्त संयमी को एकात अनार भी कहा है । इस आधार से शुभ योग को अशुभ प्रवृत्ति रोकने के प्रधान दृष्टिकोण से संवर माना गया है । ऐसा शुभ योग आश्रव नहीं होता हे। इस प्रकार अशुभ योग को आनव माना गया है । कर्मबंध का कारण होने से आलव त्यागने योग्य है। ७१
संवर तत्त्व
पिछले अध्याय मे कर्म वध के कारणों पर विचार किया अव
वध निरोध जौर कर्म-निर्जरा स्पसवर और निर्जरा के प्रकारी को
क्रमश बताया जायेगा।
शिष्य ने पूछा-भगवन् ' जैसे कर्म वध के कारणों का विचार
आधव मे बताया, वैसे ही अव यह समझाइये कि सवर क्या है और वह
क्तिने प्रकार का है ?
उत्तर देते हुए गुरु देव ने कहा-आत्मा में आने वाले कर्मों को
जिन कारणा से रोका जाय उसे सवर कहते हैं। 'सवरणम् सवर" इस
व्युत्पत्ति के अनुसार आत्मा को वध मे सवृत्त रखना (वचाना) ही सवर है ।
तत्त्वार्य मूनानुमार 'जाधव निरोध सवर" कहा गया है । जिसका अर्थ
होता है आश्रव अर्थात् कर्मो के जाने का निरोध करना सवर कहा जाता
है। वह पाच, वीस और सत्तावन भेद वाला है।
शिष्य ने जिज्ञासा करते पूछा भगवन् । सवर के पाच भेद कौन
से हैं?
गुरुदेव-(१) सम्यक्त्व, (२) विरति, (३) प्रमाद, (४)
अकपाय और (५) शुभ योग । ये सवर के प्रमुख पाच भेद है। प्रश्नव्याकरण
मून
के
अनुसार अहिंसा,
अस्तेय,
ब्रह्मचर्य जोर
सत्य,
७२
अपरिग्रह इन पाँचों को भी धर्म के द्वार रूप से कहा गया है। प्रकारान्तर से संवर के दो भेद भी किये गये हैं-(१) द्रव्य संवर और (२) भाव संवर। कर्म पुद्गलों के आगमन को रोकना द्रव्य संवर कहा गया है और आत्मा की अशुभ प्रवृत्ति रूप भावों को रोकना भाव संवर कहा है। शिष्य-गुरुदेव ! संवर के सम्यक्त्व आदि पाँच भेद बतलाये उनमें सम्यक्त्व क्या है ? गुरुदेव-तत्त्वों के यथावत् श्रद्धान करने को सम्यक्त्व कहते है, जैसा कि तत्त्वार्थ सूत्र में कहा है-तत्त्वार्थ श्रद्धानम् सम्यग्दर्शनम् (अ. १ मूत्र २) तथा अरिहंत देव, निर्ग्रन्थ गुरु और दयामय धर्म पर दृढ़ विश्वास रखना सम्यक्त्व कहा जाता है। आप्तवाणी में भी कहा है कि वीतराग कथित तत्त्वों का स्वभाव से उपदेश या भाव पूर्वक अन्त- करण में श्रद्धान् करने को सम्यक्त्व कहा गया है। व्यवहार में देव, गुरु, धर्म पर सम्यक् श्रद्धा रखने को भी सम्यक्त्व कहा जाता है ।१ शिष्य----गुरुदेव ! कोई सम्यक्त्वधारी है या नहीं। इसको जानने के क्या लक्षण हैं ? गुरुदेव-सम्यक्त्व के पाँच लक्षण हैं-(१) प्रगम, (२) संवेग, (३) निवेद, (४) अनुकम्पा और (५) आस्था । शिष्य-गुरुदेव ! प्रशमादि का क्या स्वरूप है ? गुरुदेव---(१) अनन्तानुबंधी कपाय और मिथ्यात्व के उपशम को प्रशम कहते हैं, (२) सवेग का अर्थ मोक्ष की तीव्र अभिलापा होना । (३) निर्वेद का अर्थ संसार के भोगों में उदासीनता होना है। (४) अनुकम्पा का अर्थ दुःखियों के दुःख से हृदय का अनुकम्पित होना अर्थात् १. तहियाणं तु भावागं, ननावे उवएसणं । भावेणं गद्दतस्न सम्मत्तं तंवियाहियं । उत्तरा. अध्याय २८ गाथा १५ 2 करणा माव से दिल पा पिघल जाना है व (५) नाम्या का जथं वीतराग कथित सिद्धान्त वाणी पर दृढ विश्वास होना है अर्थात् जीवादि तत्त्वा पर सम्यक् विश्वाम होना आस्था कहा गया है। शिष्य-भगवन् । सम्यक्त्वधारी को रुचि कैसी होनी चाहिये गुरुदेव --मम्यक्त्व सम्पन्न व्यक्ति की पीनराा वाणी के श्रवण और जाराधना में हार्दिक प्रीति होती है, कई दिना का भूखा व्यक्ति जैसे उत्तम भोजन में रुचि करता ह जोर विद्यार्थी योग्य विद्या दाता को पाकर लगन से अध्ययन करता है। तथा शक्तिशाली तरण व्यक्ति जैसे युवतियो के मनोहर राग-1 म रुचि परता ह वैसे ही भव्य प्राणी की धर्माचरण एव वीनगग वाणो रे श्रवण मे प्रगाढ रुचि होती है । ये तीन सम्यक्त्व । निंग बनताये गये ह । शिष्य-गुरदेव ' सम्यक्त्व यह आत्मिक भाव है वह बाहर के पोद्गलिक (भौतिफ निमित्तो) को पाकर दोलायमान क्यो हो जाता है ? उसको स्थिरता के क्या उपाय हैं ? गुरुदेव-जलते दीपक का मुरक्षित रखने के लिये काच के गोता या अन्य भावरण की आवश्यरुता है और उसी प्रकार सम्यक्त्व मान की सुरक्षा के लिये भी चार उपाय बतलाय गये हैं। जैसे (१) मत्मग और सत्साहित्य म परम तत्त्व का परिचय करना, (२) परम तत्त्व के जानकर मत्पुरुषो की मवा करना, (३) मिथ्यात्वी की संगति न करना और (८) सत् श्रद्वा से पतित व्यक्ति जा अश्रद्धाभाव मे चला गया है और जो भौतिकवाद, जनात्मवाद जादि में मिथ्या श्रद्धा रखता है उनसरी संगति में चना, ये चार मम्यक्त्व स्थिरीकरण के पाय हैं। शिष्य-भगवन् । सम्यक्त्व के स्वरूप का परिचय देते हुए आपने अरिहन्त देव, निर्गन्य गुरु और दयामय धर्म पर विश्वास रखने को । ७४ ? सम्यक्त्व कहा तो देव, गुरु और धर्म का स्वरूप क्या है ? यह बतलाने की कृपा करें। गुरुदेव ने उत्तर देते हुए कहा--आराध्य देवों में अन्य देवों की अपेक्षा विशिष्टता होती है । वे राग-द्वेप आदि मन के समस्त दोपों पर विजय दिलाने वाले होते हैं, जिनमें राग-द्वेप और काम-क्रोधादि है, वे तो सामान्य जीवों की तरह जन्म-मरण के चक्कर में पड़े होते हैं, अत: वे कल्याणार्थी के लिए आराध्य नहीं हो सकते, वास्तव में आराध्य देव वे ही है जो रागादि दोपों पर विजय पा चुके है जैसा कि कहा है-“दसट्ठ दोसा न जस्स सो देवो" अर्थात् जिनमें अठारह दोप नहीं पाये जाते हैं तथा (१) अनन्त ज्ञान, (२) अनन्त दर्शन, (३) अनन्त सुख, (४) अनन्त वीर्य, (५) दिव्य ध्वनि, (६) भामंडल, (७) स्फटिक सिंहासन, (८) अशोक वृक्ष, (९) कुमुम वृष्टि, (१०) देव दुदुभि, (११) छत्र, (१२) चवर ये १२ गुण पाये जाते है, वे मुमुक्षु के लिए आराध्य देव होते है। शिप्य-भगवान् ! वे अठारह दोष कौन से है, जिनसे अरिहन्त देव मुक्त होते हैं ? गुरुदेव ने उत्तर देते हुए कहा-ज्ञानावरणीय आदि घाति को के उदय से जीव अठारह दोपों से युक्त होता है । जैरी ज्ञानावरणीय के कारण अज्ञान दोप, दर्शनावरणीय के उदय से निद्रा दोप, मोहनीय कम के उदय से (१) मिथ्यात्व, (२) अविरति, (३) राग, (४) द्वेप, (५) हास्य, (६) रति, (७) अरति, (८) भय, (२) शोका, (१०) दुगंछा (घृणा) और (११) काम विकार ये ग्यारह दोप जीवों के साथ लगे रहते हैं फिर अन्तराय फर्म . कारण--(१) दानान्तराय, (२) लाभान्तराय, (३) भोगान्तराय, (४) उपभोगान्त राय, और (५) वीयांलराय ये पान दोष होने है । अन्तराय के कारण ही १ विविध प्रकार के मद्काया में वाधा जाती रहती है, इस प्रकार पहले के १३ दोपो के साथ इन पाचो को मिलाने से १८ दोप होते है। इन १८ दोपो मे मर्वथा निर्लेप (मुक्त) महापुरुप ही आराध्य देव कहे जा सकते है। उनकी जारावना और उपासना से ही कल्याणार्थी अपने अन्तर दोपो पर विजय प्राप्त कर सर्वया दुख मुक्ति का अधिकारी वनता है । देव योनि के असख्य देव रागादि दोपो से युक्त होने के कारण सावक को बधन मुक्त नहीं कर सकते । बत मुमुक्षु को इन १८ दोपो से मुक्त देव को ही आराध्य मानकर श्रद्धा करनी चाहिये । जाराध्य दर को जिनन्द्र, अरिहन्त और देवाधि देव भी कहते है। शिष्य-भगवन् । अरिहन्त देव की क्या-क्या विशेषताएं हैं गुरुदेव ने उत्तर म कहा-अरिहन्त अनन्त चतुष्टय के धारक होते है, खासकर अनन्त ज्ञान, अनन्त दशन, अनन्त चारित और अनन्त शक्ति के भण्डार होते हैं । वे असख्य देव देवियो के स्वामी इन्द्र से भी चलायमान नहीं किए जा सकते, वे देव देवेद्रो के पूजनीय होते है । सामाय केवली की अपेक्षा तीर्थकर जरिहत मे अप्ट महा प्रतिहाय भी विशेप पाये जाते हैं, जो इस प्रकार हैं-(१) अशोक वृक्ष, (२) देव कृत अचित पुप्प वृष्टि, (३) दिव्य ध्वनि, (४) स्फटिक सिंहासन, (५) देव कृत छन, (६) चवर (७) देव दुन्दुभि और (6) भामण्डल । शिष्य-गुरुदेव । सामान्य केवली और तीर्थकर अरिहन्त मे क्या अतर है उत्तर मे गुरुदव ने कहा-दोना प्रकार के अरिहन्तो मे वीत- रागता और मवज्ञता तो समान है क्योकि दोनो ने धाति कर्मों का क्षय कर लिया है। किन्तु तीर्थकर जरिहत की यह विशेषता है कि वे धम दशना दकर चार तीथ की स्थापना करते हैं और उपदेश द्वारा त्याग कर ज्ञान की गंगा बहाकर लाखों जीवों को प्रतिवोध देते है पर सामान्य अरिहत (केवली) चार तीर्थ की स्थापना नहीं करते। उपदेश द्वारा भव्य जीवों को प्रतिवोध देना भी उनके लिये अनिवार्य नहीं है। सामान्य अरिहन्त में देव कृत अष्ट प्रतिहार्य भी नहीं होते। जीवन के अन्त में चार अघाति कर्मो का क्षय कर मुक्ति प्राप्त करना दोनो के लिये समान है। शिष्य -भगवन् ! वीतराग होने से अरिहंत किसी पर प्रसन्न नहीं होते फिर उनकी भक्ति और स्तुति करने से क्या लाभ है ? उत्तर देते हुए गुरुदेव ने कहा-यह ठीक है कि अरिहंत वीतराग है किन्तु सयोगी होने के कारण मन, वाणी और काय की क्रिया उनके भी होती है । अत: ग्राम नगरों में विचरण करते हुए वचन योग से अरिहंत भी देशना फरमाते है । उनकी धर्म-देशना से लाखों मुमुक्षु मिथ्यात्व सम्यक्त्व ग्रहण करते, श्रावक धर्म और साधु धर्म स्वीकार करते करते और अपनी चंचल आत्मा को धर्म में स्थिर कर परम-पद मोक्ष के अधिकारी वन जाते हैं। राग-द्वेष रहित होकर भी अरिहंत भगवान् परम करुणा रूप होने से वे अधर्म मार्ग में गिरते हुए प्राणियों को धर्म में स्थिर कर कल्याण मार्ग में आगे बढ़ाते है । अत: उन्हें पतित-पावन नी कह सकते है और मोक्ष मार्ग के प्रवर्तक भी कहते है । भगवान् महावीर ने मेघकुमार के अस्थिर मन को उपदेश द्वारा पूर्व जन्म की स्मृति दिलाकर संयम में स्थिर किया जो शास्त्र में स्वाध्यायियो के लिये प्रसिद्ध है । अरिहंत की भक्ति करने वाले को शुभ अध्यवसायो द्वारा अशुभ कर्म की निर्जरा होने से सुख शान्ति प्राप्त होती है इसलिये भी अरिहंत प्रभु की भक्ति लाभकारी कही गई है। इसके विपरीत राग-द्वेष युक्त देवों को आराध्य मानकर भक्ति करना मिथ्यात्व होने से बंध का कारण बताया गया है ।
शिष्य-गुरुदेव । सवया रागादि दोष मुक्त अरिहत आज कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होते फिर असत् पदाथ पर श्रद्धा से की जाय ? गुरुदव ने उत्तर में कहा-तुम्हारी शका ठीक है। किन्तु इस देश म परिहन के दृष्टिगाचर नहीं होने से ही उनको असत् नही कहा जा सकता है । क्योकि भरत खण्ड के अलावा शास्त्र मे पाच महाविदेह क्षेत्र मी माने गये है यहा पर सदावाल अरिहन्त विद्यमान रहते हैं । मनुष्य लाक के पाच विदह क्षेत्र की बपक्षा जाज भी वीस अरिहत विद्यमान हैं । भरत यण्ड में हीयमान जोर वधमान रूप से काल का परिवतन होने के कारण जवमपिणी पार ये तीसरे और चौथे आरे म एक के बाद एक ऐमे चांगीस तीर्थकर होते है। अभी यहा पर पचम काल प्रवतमान होन से तीर नहीं होते । उनकी आज्ञा रूप जिनवाणी का अनुपालन करने वाले आचार्य, उपाध्याय और सतगण ही अरिहत की वाणी का आज उपदश करते हैं। शिष्य--गुरुदेव । महाविदेह मे बीस तीर्थकर शाश्वतिक होना बतलाया है उनके नाम भी बतायें जायें तो अच्छा है। उत्तर में गुरुदेव ने कहा-महाविदेह के तीर्थंकरो को विहर- मान कहते हैं उनके नाम ये हैं- (१) श्री सीमधिर स्वामी, (२) श्री युगमधिर स्वामी, (३) श्री वाहु स्वामी, (४) श्री सुबाहु स्वामी, (५) श्री सुजात स्वामी, (६) श्री स्वयप्रम स्वामी, (७) श्री ऋपभानन स्वामी, (5) श्री अनन्तवीय स्वामी, (९) श्री मूरप्रम स्वामी, (१०) श्री विशालधर स्वामी, (११) श्री वज्रधर स्वामी (१२) श्री चद्रानन स्वामी, (१३) श्री चन्द्रवाहु स्वामी, (१४) श्री भुजग स्वामी, (१५) श्री ईश्वर स्वामी, (१६) धी नेमतम स्वामी, (१७) श्री वीर सेन स्वामी, - ७६ (१८) श्री महाभद्र स्वामी, (१९) श्री देवयश स्वामी, और (२०) श्री अजितवीर्य स्वामी। शिष्य-गुरुदेव ! अरिहंत देव की वीतरागता का जन समाज में कोई प्रभाव दृष्टिगोचर होता है क्या ? गुरुदेव ने कहा-हॉ, अरिहन्त देव तन, मन और वाणी की विलक्षणता से जनसाधारण को प्रभावित किए बिना नहीं रहते । उनके आसपास का वातावरण इतना शुद्ध होता है कि जन्म सिद्ध वैरभाव वाले गेर और बकरी जैसे प्राणी भी अपनी शत्रुता भूल जाते है । चिन्तातुर व्यनि उनके पास आकर शोक मुक्त हो जाना हे और चारों दिशा में पच्चीस पच्चीस कोरा तक अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ईति-भीति आदि उपद्रव नहीं होते है। अरिहंत में विश्व मैत्री की निर्मल भावना होने से उनके शरीर का रक्त भी मधुर होता है, मानों उनके तन-मन मे क्षार रहा ही न हो । इस प्रकार अरिहंत के चौतीत अतिशय व पतीरा वाणी के गुण बतलाये हैं, जो शास्त्र के स्वाध्याय से समझना चाहिये। - शिष्य-शिष्य ने देव के सम्बन्ध में पृच्छा करते हुए अर्ज की गुरुदेव ! वैदिक परम्परा में आराध्य देव के सगुण और निर्गुण; साकार और निराकार रूप से दो प्रकार किये हैं, वे ब्रह्म को निर्गुण-निराकार मानते हैं वैसे ही यया जैन शास्त्र में भी निर्गुण निराकार देव माना गया है? गुरुदेव ने उत्तर देते हुए कहा-जैन शास्त्रानुसार अरिहंत देव को गाकार माना गया है क्योंकि उनके शरीर होता है किन्तु मिद्धों ने आठों कर्मो का क्षय कर लिया है इसलिए उनको शरीर रहित होने से निराकर कहा जाता है।
शिष्य-सिद्ध भगवान् निराकार और अकर्ता हैं तब वे अपने वाणी योग से कल्याणकारी प्राणियो को उपदेश नहीं दे सकते फिर उनकी भक्ति क्यो की जाती है? उत्तर देते हुए गुरुदेव ने कहा-~-यह सच है कि सिद्ध भगवान् निष्क्रिय, निराकार और अकर्ता हैं । मात्र ज्ञानादि आत्मगुणो मे जात्म- स्वरूप में स्थित रहते है, फिर भी मक्त अपनी शुम भावना और मन, वाणी, काया के शुभ योग के कारण पुण्य का मचय करता है और सचित जशुभ कर्मों को हल्का कर लेता है। इसमे उसे सहज शाति का लाभ होता है । अकर्ता होने से सिद्ध भगवान् भक्त को सुख-शाति देने की इच्छा नहीं कर तव भी भक्तो को शाति लाभ होता है। जैसे किसी नदी या तलाई के तट पर वैटने वाले को जल की शीत लहर से ही शाति मिलती है और बगीची की शीतल छाया और हरे भरे वृक्ष के पास बैठने वाले की दृष्टि म तरावट और मस्तिष्क मे शाति प्राप्त होती है, ऐसे ही सिद्धो की भक्ति से भी शाति प्राप्त होती है। सिद्धो के आदर्श का स्मरण-चिन्तन और ध्यान करने में भक्तो की ज्ञान चेतना जागृत होती है और शुद्ध स्वरूप की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। इस प्रकार अरिहत और सिद्ध विश्व के आराध्य देव हैं इनके और दृढ श्रद्धा रखना मुमुक्षु को जममरण के चक्र से मुक्ति दिलाने वाली है। शिप्य-आराध्य देव के सम्बन्ध मे आपने अच्छी तरह से समझा दिया, अब गुरु तत्त्व के बारे मे भी समझाने की कृपा करें। उत्तर में गुरुदेव ने कहा-शिष्य के अज्ञान को दूर करने वाले को सद्गुरु कहते हैं। पूर्वाचायों ने गुरु का लक्षण बतलाते हुए ८० कहा है-“सोहु गुरु जो णासी आरम्भ-परिगहा विरओ।" अर्थात् गुरु वही है जो ज्ञानी और आरंभ परिग्रह का त्यागी होता है। सूक्त मुक्ता- वली में इसी बात को आचार्य सोमप्रभ ने कहा है- 'अवद्यमुक्ते पथियः प्रवर्तते, प्रवतंयत्यन्यजनंच निस्पृहः । ससेवितव्यः स्वहितैपिणा गुरुः, स्वयं तरंस्तारयितुं क्षमः परम् ॥' अर्थात् जो पाप रहित मार्ग पर स्वयं चलते और बिना किसी स्पृहा के अन्य जनों को उस मार्ग पर लगाते हैं वे ही सद्गुरु हो सकते है । आत्महित चाहने वाले, कल्याणार्थियों को ऐसे ही गुरु की सेवा करनी चाहिये। इसके विपरीत जो भोगी हैं, भंग आदि नशे का सेवन कर आनन्द मनाते हैं, वे सद्गुरु कहलाने के अधिकारी नही होते । गुण रहित वेशधारी की पूजा पापबंध की कारण होती है। जो पंच महावत व समिति गुप्ति के पालक हैं, वैसे निर्लोभी गुरु ही भवसागर से तारने वाले होते हैं, संत वाणी में भी कहा है : "लोमी गुरु तारे नहीं, तिरे सो तारण हार । जो तू तिरना चाहे तो, निरलोभी गुरु धार ।" सद्गुरु में सत्य, शील, संतोष और निर्लोभ वृत्ति का होना आवश्यक है। , शिष्य-गुरुदेव ! लोक में कला और शिल्प आदि सिखाने वाले शिक्षक को भी गुरु कहते हैं। क्या वे गुरुपर में नहीं आते ? गुरुदेव ने उत्तर में कहा-शिल्प कला और भापादि का ज्ञान कराने वाले कलावार्य और शिल्पाचार्य को इल्म की दृष्टि से लौकिक गुरु कह सकते हैं, किन्तु भवसागर से तारक सद्गुरू पंच महाव्रतधारी संत एवं साध्वी ही होते हैं। कलाचार्य और शिल्पाचार्य अभी संसार ८१ अवस्था में है, उनकी भक्ति भी धन धान्य एव वस्त्र आभूषण से की जाती है किन्तु धर्म गुरु परिग्रह के सम्पूर्ण त्यागी होने से चे रुपये पैसे को नहीं छूते, उनकी भक्ति, ज्ञान, दशन, चारित्र की आराधना और आज्ञा पालन से ही की जाती है, क्योकि सुसाधु वस्त्र, पाय, आहार और धर्मस्थान भी निर्दोप ही ग्रहण करते हैं । वे कोई मेंट पूजा ग्रहण नहीं करते है । - r शिष्य--गुरुदेव ! सत्गुरु को पहचान' कराते हुए आपने कहा कि वे पच महाव्रत और समिति गुप्ति के पालक होते हैं और वस्त्र, पान और आहार भी सदोष नहीं लेते हैं तो वे पच महाव्रत आदि और आहार में टालने योग्य दोष कौन-कौन से हैं। गुरुदेव ने कहा-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और परिग्रह ये पाच महावत होते हैं । साधु, हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पाचो को सेवन करते नहीं, कराते नही, करने वाले का भला भी नही मानते मन, वचन और काया, से । इस प्रकार पापो के सम्पूण त्याग को ही महावत कहते है । महाव्रत की तरह पाच समिति और तीन गुप्ति का पालन भी सयम धर्म की रक्षा के लिए आवश्यक होता है। जो इस प्रकार है-पाच समिति " - (१) ईर्या समिति, भूमि पर जीवो को देखकर विधिपूर्वक चलता। (२) भाषा समिति-विधिपूर्वक उपयोग रखकर बोलना। (३)" एपणा समिति-वस्त्र-पार और आहार आदि को ग्रहण करते शुद्धाशुद्धि की गवेपणा करना । - १२
(४) आदान भंडमत्त निक्षेपणा समिति-वस्त्र, पात्र आदि उपयोगी
वस्तुओं को यतना से लेना और यतना से रखना।
(५) उच्चार पासवण परिस्थापनिका समिति-मल-मूत्र आदि त्यामने
की वस्तुओं को किसी को पीड़ा न हो ऐसे निर्दोष स्थान पर विधि-
पूर्वक डालना।
तीन गुप्ति इस प्रकार है :-
(१) मनो गुप्ति-मन की अशुभ प्रवृत्ति का गोपन करना।
(२) वचन गुप्ति-वाणी का संयम करके सावध वचन छोड़कर निर्दोष
वचन बोलना।
(३) काय गुप्ति-शरीर की प्रवृतियों पर संयम रखते हुए सावध क्रिया
से तन के व्यापार को रोकना जैसा कि शास्त्र में कहा-'गुत्ति
नियत्तणे वुत्ता, असुभत्येसु सव्वसो।' उ. अ. २४ गा. २६ अर्थात्
सभी प्रकार के अशुभ कार्यों से निवृत्त होकर यतना से प्रवृत्ति
करना काय गुप्ति है।
शिष्य-गुरुदेव ! आहार आदि के प्रहन में दालने योग्य ४२)
दोष कौन से हैं?
गुरुदेव ने उत्तर में कहा-१६ उद्गम और १६ उत्पादना
१० एषणा के दोप मिलाकर साधु को टालने के वयालीस दोष होते हैं ।
उद्गम के सोलह दोष इस प्रकार हैं :
(१) साधु-साध्वियों के लिए बनाये गये आहारादि ग्रहण करना आधाकर्मी
दोष है।
(२) किसी एक साधु के लिए बनाया गया आहारादि दूसरे साधु द्वारा!
सेना उद्देशिक दोष है।
-
आंधाक
- m (३) शुद्ध आहार में नाधाकर्मी का शमान भी पड़ा हो उसे लेना पूतिकम दोप है। (४) साधु और, गृहस्य के लिये सम्मिलित बनाये गये आहार आदि लेना मित्र दोष हा। (५) साधु के लिए स्थापना करके मतग रखा हुना आहार आदि लेना स्थापना दोप है। (६) साधु के लिए मेहमानो के समय को बदलकर तैयार किया गया आहार लेना प्राभूतिका दोप है। (७) अधकार में प्रकाश करके या प्रकाश में लाकर दिया हुआ आहार आदि लेना प्रादुप्करण दोप है। () साधु के लिए खरीदकर लाये गये आहारादि लेना कोत दोष है । (९) साधु के लिए उधार लेकर दिये गये आहारादि लेना पामिच्च 7 11 दोप है। -- - (१०) साधु के लिए अपनी वस्तु दूसरे से बदलकर दिये गये आहारादि लेना परावृत्य दोप है। (११) ग्राम या घर आदि से सामने से लाकर दिया गया माहारादि लेना यभ्याहृत दोप है। (१२) मिट्टी आदि के चेप से वन्द (सोल) किए हुए को उघाडकर दिया जाने वाला बाहार आदि लेना उद्भिन्न दोष है । (१३) ऊपर या नीचे रक्खे हुए पदाय को निस्सरणी आदि से उतार कर दिए गया आहार आदि लेना मालापहृत दोष है। है । -
(१४) निवल से छीना हुआ आहार आदि लेना आवद्य दोप है।
(१५); दो भागीदारों में से एक की इच्छा के विना दिया गया आहारादि
लेना अनिसृष्ट दोप है।
(१६) अपने लिए बनाये आहार में साधु का आगमन सुनकर कुछ ज्यादा
बनाकर दिया हुआ आहरादि लेना अध्यवपूरक दोष है।
ये सोलह दोष दातार द्वारा लगते है इसीलिए इनको उद्गम कहते
हैं।
शिष्य-भगवन् ! उत्पावना के सोलह दोष कौन से हैं ? समझाइये।
गुरुदेव-उत्पादना के दोष बतलाते हुए गुरु ने कहा-
(१) धाई की तरह किसी के बालकों को खिलाकर आहारादि लेना धात्री
दोप है।
(२) दूती की तरह गृहस्य के संदेश को इधर-उधर पहुँचाकर आहारादि
लेना दूती दोप है।
(३) निमित्त ज्ञान से गृहस्थ को लाभ-हानि बताकर आहारादि लेना
निमित्त दोष है।
(४) अपने कुल-जाति बताकर आहारादि लेना आजीविका चोप है।
V
(५) भिवारी की तरह दीनता बतलाकर आहारादि लेना बनीपक दोष है।
(६) वैा की तरह औषध-उपचार वतलाकर आहारादि लेना चिकित्सा
८५
?
T
(७) गृहस्य को क्रोध से डराकर माहारादि लेना कोघ दोप है।
(5) मैं कौन हूँ तुम नहीं जानते, मैं तुमको श्राप दे दूगा इस
प्रकार अहकार करके माहारादिक लेना मान दोप है।
(९) कपट करके आहारादि लेना माया दोप है।
(१०) लोभ , दिखाकर या लोभ से अधिक आहारादि लेना लोभ
दोष है।
(११) दान से पहले या पीछे दाता की प्रशसा करके आहारादि लेना
!, पूर्व पश्चात् सस्तव दोप है।
(१२) देवी अधिष्ठायक जैसी विद्या का प्रयोग करके आहारादि लेना
विद्या दोष है
(१३) मत्र वतलाकर आहारादि लेना मन दोप है।
(१०) वशीकरणादि के लिये चूर्ण बताकर आहारादि लेना चूर्ण
दोष है।
(१५) दो वस्तुओं को मिलाकर किए गए लेपादि बताकर आहारादि
लेना योग दोप है।
(१६) गर्भ स्तभन, गर्भ धारण और गर्भपात आदि का उपाय बताकर
आहारादि लेना मूल कर्म दोष है।
ये १६ दोष भिक्षाटन करने वाले साधु-साध्वियो को लगते हैं ।
एपणा के दस दोप इस प्रकार बतलाये हैं -
(1) साध्वी या गृहस्थ को दोप की शका हो वैसी भिक्षा लेवे तो
शकित दोष है।
-
(२) हाथ या पात्र सचित्त से भरे हों उससे आहारादि लेवें तो भ्रक्षित
दोप है।
(३) सचित्त वस्तु पर रखे हुऐ आहारादि लेवें तो निक्षिप्त दोष है.।
(४) सचित्त से ढका हुआ आहारादि लेवें तो पिहित दोष है ।
(५) पात्र से सचित वस्तु निकालकर उसी पात्र से दिये जाने वाला
आहारादि लेवें तो सांह्नित दोप है।
(६) लूले, लंगड़े, अंधे ऐसे अयोग्य दाता अथवा गर्भवती से आहारादि :
लेवे तो दायक दोप है।
(७) सचित्त-अचित्त मिला हो अथवा शस्त्र परिणत नही हुआ हो
ऐसा धोवन पानी या अधपका शाक आदि लेवें तो उन्मिथ
दोप है।
() पूर्ण शस्त्र परिणत नहीं हुआ हो अर्थात् जो पूरी तरह
अचित्त नहीं हुआ हो ऐसा
हुआ हो ऐसा आहारादि लेवें तो अपरिणत
दोष है।
(१) तत्काल के लीपे हुए आंगन से चल कर दिया हुआ आहारादि लेवें
तो लिप्त दोप है।
(१०) ऊपर से बूद आदि गिरते हुए दिया गया आहारादि लेवें तो छिद्रित
दोप है।
ये दस दोष दाता और साधु दोनों की ओर से लगते हैं। इस प्रकार
भिक्षा के मुख्य ४२ दोष टालकर मुताधु भिक्षा ग्रहण करते हैं।
शिष्य-गुरुदेव ! पाच दोष और भी बताये जाते हैं वे
कौनसे है ?
गुरुदेव-माधु को माहार सेवन करते समय पांच दोपो का वर्जन करना होता हैं उहें माडलिक दोष कहते हैं। - (१) दूध में शक्कर और शाक मे नमक यादि मिलाकर स्वाद के लिए खाना सयोजना दोप है । भिक्षा के समय शक्कर आदि का योग मिल गया हो तो अलग बात है खासकर उसके लिये दुवारा जाकर लाना उचित नहीं है। (२) प्रमाण से अधिक खाना अप्रमाण दोष है । (३) सरस आहार को प्रशसा करते हुए खाना अगार दोप है । (४) नीरस आहार की निंदा करते हुए खाना धूम दोष है। (५) शास्त्रोक्त छ कारणो के विना आहार करना अकारण दोप है । ये पांच दोप भोजन के मडल पर खाते समय लगते है। शिष्य-गुरुदेव ' सुसाधु की वेशभूषा कैसी होती है ? उत्तर म गुरुदेव ने कहा-शास्त्रानुसार मुनि दो प्रकार के होते हैं । (१) जिनकल्पी और (२) स्थविर कल्पी । जिन कल्पी करपात्री और पात्र धारी दोनो प्रकार के होते हैं। उनके लिये रजोहरण और मुखवस्त्रिका ये दो उपकरण आवश्यक बतलाये गये हैं। इस काल म जिनकल्प अराधना की क्षमता नही मानी जाती क्योकि जिनकल्पी को रुग्ण दशा म भी औषध सेवन वजित कहा है। वे उपदेशादि भी नहीं करते हैं। दूसरे स्थविर कल्पी हैं ये मुखवस्त्रिका, रजोहरण, पात्र और लज्जा निवारण हेतु चोल पट्ट धारण करते हैं। चरण विहार, मधुकरी वृत्ति में निर्दोष आहार ग्रहण और नवकल्पी विहार तथा कल्याणार्थी ८८ ? प्राणियों को धर्म उपदेश देना उनको मुख्य चर्या होती है। जैन साधु सूक्ष्म जीवों की भी हिंसा न हो इसलिये मुख पर आठ फुट की मुख- वस्त्रिका धारण किये रहते हैं। सिर, मूछ आदि के बालों का हाथ से लुचन करते हैं। शिप्य-मुखवस्त्रिका धारण करने के क्या लाभ है गुरुदेव ने उत्तर दिया-मुख वस्त्रिका के ४ लाभ है:- (१) मुख की गर्म हवा से वायु काय आदि स्थावर एव छोटे त्रस प्राणियों की हिंसा से बचाव होता है। मुनि राजेशेखर ने अपने पट्दर्शन समुच्चय ग्रन्य मे अन्य मत के ग्रन्थों से भी मुखवस्त्रिका की उपयोगिता प्रमाणित की है जैसे कि- वीटेती भारतेख्याता, दारवी मुखवस्त्रिका । । दया निमित्तं भूतानां, मुख निश्वास रोधिका ।। इस श्लोक से राजेश्वर ने यह स्पष्ट किया है कि जीवों की दया के लिए मुखवस्त्रिका धारण की जाती है । (२) जैन साधु के वाह्यलिंग में मुखवस्त्रिका और रजोहरण का विधान है। अत: मुम्बवस्त्रिका जैन साधु के परिचय का भी कारण होती है । - (३) सदोष मापा न बोलने और भाषा पर नियन्त्रण रखने की स्मृति दिलाने वाली है। (४) मुखवस्थिका से गुल्पनों पर व गास्त्रों पर मुख से उछलकर थूवः गिरने का भी बचाय होता है। (५) लोक व्यवहार में भी बड़ों के सामने बोलने समय मुख के आगे म.गड़ा दिया जाता है। जैसा कि माता मूत्र के प्रथम अध्ययन में २९ मेधकुमार के दीक्षा प्रसंग पर महारा श्रेणि क्ल ने काश्यप क सदेश दिया कि सुगधित जल से हाथ-पैर को साफ करके चार पु वाले श्वेत कपडे से मुख को वाधकर मेघमार के र केगो र कर्तन करें। सुत्तागमे पृष्ठ ९९३ । शिष्य-कुछ लोग यह शका करते हैं कि हवा तो नाक से में निकलती है फिर नाक को न वाधकर फेवल मुख को ही क्यो वाध जाता है? उत्तर में गुरु देव ने यहा--यह ठीक है कि नाक से भी श्वास की वायु निकलती है पर नाक स निकलने वाली वायु मुख की वायु समान गर्म नहीं होती, वह मुख की वायु के समान सोधी न निकलकर तिरछी निकलती है और भीतर के वालो से छनकर निकलती है तथा मुख की हवा स्यूल रूप में जितनी सघन व वेग वाली होती है नाक को हवा उतनी नहीं होती। अत नाक पर मुखवस्तिका बावने का प्रश्न ही नहीं होता। छीक के समय में जब नाक से वेश की हवा निकलने की सम्भावना होती है तव नाक पर हाय का नावरण किया जाता है। शिष्य गुरुदेव । मुख पर मुखवस्त्रिका बाध रखने से कुछ लोग सम्मूच्छिम जीवों को उत्पत्ति का प्रश्न करते हैं, यह कहा तक ठीक- है ? समाधान कराने की कृपा करें। उत्तर मे गुरुदेव ने कहा-जो लोग मुखवस्त्रिका वाधने मे जीवो को उत्पत्ति बताते हैं । उनका कथन शास्त्रानुसार ठीक नही ह । मुंहपत्ति नही वाधने वालो के भी सर्दी के समय में छाती घन्टो वधी रहती है, उसका पसीन से गीला होना अवश्यम्भावी है किन्तु उसमे जीवोत्पत्ति नहीं मानी जाती फिर मुखवस्त्रिका में थूक के गीलेपन से सम्मूच्छिम जीवों की उत्पत्ति बताना कहां तक ठीक है। शास्त्र में चौदह सम्मूच्छिम के स्थानों में 'खेलेसुवा' पाठ आता है किन्तु थूक या पसीना के लिए कोई पाठ नहीं आता तथा फिर मुख पर रही हुई मुखवस्त्रिका को गर्म भाप लगती रहती है इसलिए भी उसमें किसी प्रकार की जीवोत्पत्ति की सम्भावना नहीं रहती एव मुंह से हटने पर उसे सूखने के लिए फैला दिया जाता है । इसलिये मुखवस्त्रिका बांधने में जीवोत्पत्ति मानना उचित नहीं है। शिष्य- गुरुदेव ! तत्त्वत्रयी में देव और गुरु के सम्बन्ध में आपने परिचय दिया। अब धर्म तत्त्व का स्वरूप समझाने की कृपा करें। उत्तर देते हुये गुरुदेव ने कहा-शिप्य! शास्त्रों में धर्म दो प्रकार का बतलाया गया है। पहला श्रुत धर्म और दूसरा चारित्र धर्म । श्रुत धर्म में स्वाध्याय और सम्यगदर्शन दोनों का समावेश होता है। जैसा कि पूर्वाचार्यों ने कहा है --"सुय धम्मो सज्झाओ ।" तथा श्रुतधर्म रूप स्वाध्याय, सम्यन्दर्शन के बिना धर्म रूप नहीं मानी जाती क्योंकि सम्यग्दर्शन के साथ सम्यग्ज्ञान रहता ही हे अतः श्रुतधर्म से दोनों लिये जाते हैं। शिष्य-भगवन् ! सम्यादर्शन जिसे सम्यक्त्व कहते हैं उसका स्वरूप क्या है ? और वह कितने प्रकार का है ? समाधान करते हुए गुरुदेव ने कहा-सम्यग्दर्शन के लिये पहले कहा जा चुका है कि तत्व श्रद्धान को सम्यग्दर्शन कहते हैं। सम्यक्त्व की प्राप्ति के लिये यह आवश्यक है कि दर्शन मोहनीय की तीन प्रातियां समक्ति मोहनीय, मिथ मोहनीय और मिथ्यात्व मोहनीय तथा अनंतानुबन्धी शोध-मान माया-लोम इन सात प्रकृतियों के उपशम क्षयोपशम, अथवा क्षय होने पर आत्मा मे जो शुद्ध अध्यवसाय उत्पन्न होता है उसे सम्परत्व कहते हैं। उसके पांच भेद हैं -(१) उपशम, ९१ (२) क्षयोपशम, (३) मास्वादन, (४) दर और (५) क्षायिक । यह सम्यग्दर्शन देव देवेद्र को भी दुलभ है। अत्यन्त पुण्योदय और घाती कम का आवरण हल्का होता है । तब कही जीव को सम्यक्त्व गुण की प्राप्ति होती है। यह इतना महत्त्वशाली है कि अन्तर्मुहूत मान भी यदि आत्मा ने सम्यक्त्व का स्पर्श कर लिया तो उसके लिये भवनमण परिमित हो जाता है। वह अधिक से अधिक अर्द्ध पुद्गल परावता काल तक ससार मे रहता है। इस सीमा म रह कम वधन को काटकर शिव-पद का अधिकारी बन जाता है। शिष्य-~लनादिकाल से सतार में मटकता हुआ जीव सम्यक्त्व कैसे प्राप्त करता है गुरुदेव --जब जीव कम-फा मोगन-भोगते हल्का हो जाता है तब अध्यवसाय की शुद्धि के कारण आयु कर्म के जतिक्ति सभी कर्मा की स्थिति पल्योपम के सत्यातवें भाग कम एक कोडा-कोडी सागरोपम रह जाती है। इस प्रकार की आत्मिक परिणति को ययाप्रवृत्तिकरण कहते है। यथाप्रवृत्तिकरण से जीव राग द्वेप की ग्रन्थी तक पहुच जाता है । पूर्वाचार्यों ने माना है कि यह करण अनन्य भी कर लेते हैं। किन्तु यथा प्रवृत्तिकरण से ग्रन्थी का भेदन नहीं होता, यहा समझन की बात है कि कुछ जीव तो ग्रन्थी को दुर्भध समवार वहा से पीछे लौट जाने हैं, दूसरे नम्वर के ग्रन्थी के अगर वगल घूमते रहते ह पर ग्रन्थी का भेदन नहीं कर पाते हैं क्योकि यह ग्रन्यी रशम की मघन गाठ की तरह दुर्भद होती है । तीसरे नम्बर का का. विशिष्ट पराक्रमी पुरुष ही परिणाम की विशिष्टता से राग द्वेष की प्रन्यि को भेदने म ममय होता है। आत्मा के इस परिणाम विशेप का जपूरकरण कहते हैं । ऐसा परिणाम कमी पहले प्राप्त नहीं हुमा इसलिय से अपूर्व कहा गया है । अपूर्वकरण के बाद परिणाम भी विशेष शद्धि से तीसरा अनिवृत्तिकरण होता है। इस परिणाम के पश्चात् जीप गम्यवत्व को ९२ अवश्य प्राप्त करना है, वह विना सम्यक्त्व प्राप्त किये नही लीटता । अतः इसको अनिवृत्तिकरण कहा गया है | अनिवृत्तिकरण के अन्तर्मुहूर्त काल में जब एक भाग शेग रहता है तब अन्तरकरण की क्रिया की जाती है और उसमें मिथ्यात्व के पुद्गलों को आगे-पीछे करके अन्तर्मुहूर्त का काल मिथ्यात्व के दलिकों से रहित कर दिया जाता है । अतः अनिवृत्तिकरण काल की पूर्णता पर उपशम सम्यक्त्व के अध्यवसाय प्राप्त हो जाते हैं। इसमें मिथ्यात्व मोह एवं अननानुवन्धी कगाय का प्रदेश उदय और विपाक उदय दोनों ही नहीं रहते हैं किन्तु उपणम सम्यक्त्व प्रतिपाती होता है। इसलिए अन्तर्मुहूर्त के पश्चात् अनंतानुबन्धी कपाय के उदय को पाकर वह फिर मिथ्यात्व की ओर उन्मुख हो जाता है। जब तक वह जीव मिथ्यात्व की भूमिका तक नहीं पहुंचता उस मध्यकालीन अध्यवसाय को सास्वादन सम्यक्त्व कहते हैं। सास्वादन सम्यक्त्व के लिए यह बतलाया गया है कि जैसे किसी को खीर-खॉड का भोजन करके उल्टी हो जाये तब उसके मुंह में कुछ काल के लिए मीठा जायका रहता है। इसी प्रकार सास्वादन सम्यक्त्व में जीव को मिथ्यात्व के उदय नहीं होने तक पूर्व प्राप्त सम्यक्त्व का आंशिक अनुभव रहता है। इसी को सास्वादन सम्यक्त्व कहते है इसकी स्थिति उत्कृष्ट छ: आवलिका मात्र होती है। शिष्य-~भगवन् ! उपशम और सास्वादन का परिचय प्राप्त हुआ। अब सायोपशमिक सम्यक्त्व किसे कहते है ? कृपया स्पष्ट करावें। उत्तर में गुरुदेव ने फरमाया~क्षय और उपशम दोनों पद मिल- कर अगोषणमित बनता है जिसका अर्थ उदय प्राप्त मिथ्यात्व और अनंता- नुबन्धी कपाय के दलिकों को भाग कर क्षय करने और उदय में आने वालों का उपशम करने से जो सम्यक्त्व परिणाम प्राप्त होता है उसे क्षायोपश- मिक कहते है। इसमें सम्यक्त्व मोहनीय का उदय माना गया है। ९३ क्षायोपशमिक सम्यक्त्व मे उदयाभावी क्षय और सत्ता म उपशम माना जाता है। शिष्य-गुरुदेव । वेदक सम्यक्त्व किसे कहते हैं ? उत्तर में गुरुदेव ने फरमाया-क्षायोपशामिक सम्यक्त्व वाला जीव जव सम्यक्त्व मोह का अन्तिम रमानुभव करता है तव सम्यक्त्व मोह के अन्तिम वेदनकाल के अध्यवसाय को वेदक सम्यक्त्व कहते हैं । पटखडागाम और कपाय पाहुड ग्रयो के अनुसार समकित मोहनीय के पूर्ण वेदना काल को वेदक सम्यक्त्व कहा है। शिष्य-क्षायिक सम्यक्त्व किसे कहते हैं ? और वह कब होता है ? गुरुदेव-अनतानुबन्धी गोध, मान, माया, लोभ और दशन मोह की तीन प्रकृतिया मिथ्यात्व मोह मिथ मोह और सम्यक्त्व मोह इन सात, प्रकृतियो के क्षय से होने वाले परिणाम को क्षायिक सम्यक्त्य कहते हैं । जब सम्यक्त्व मोह से वेदन कान के पश्चात् तत्काल क्षायिक सम्यक्त्व की उपलब्धि हो जाती है । क्षायिक सम्यक्त्व अप्रतिपाती होने से आने के पश्चात् जाता नही अर्थात् यहाँ तक कि सिद्धावस्था में भी शाश्वत काल तक विद्यमान रहता है। श्रुत धर्म के अतिरिक्त दसरा चारित धर्म बतलाया, वह क्या है उत्तर में गुरुदेव ने कहा-मम्यग्दर्शन और ज्ञानपूवक होने वाले विरति परिणाम यर्थात् हिंसादि से विरति (निवृति) को चारित्र कहते है, वह देश और सर्व के भेद से दो प्रकार का होता है। देश चारित्र को सूत्रकार ने "चरित्ता चरित" शब्द से कथन किया है। सवविरति चारित्र शिष्य-गुरुदेव ? के पांच भेद हैं।
शिष्य-गुरुदेव ! सर्वविरति चारित पांच प्रकार का बतलाया, सो वे पाँच प्रकार कौन से हैं ? समझाने की कृपा करें, बड़ी क्या होगी। उत्तर में गुरुदेव ने कहा-चारित्र के पांच भेद इस प्रकार है-(१) सामायिक चारित्र, (२) छेदोपस्थापनीय चारित्र, (३) परिहार विशुद्धि चारित्र, (४) सूक्ष्म संपराय चारित्र, और (५) यथाख्यात चारित्र। शिप्य-गुरुदेव ! आपने चारित्र के नाम तो बतलाये, उनका स्वरूप भो समझाने की कृपा करें। गुरुदेव ने कहा-अच्छा लो ध्यान में पाँचों चारित्र के स्वरूप को श्रवण करो। (१) सामायिक चारित्र-प्राणी मात्र को अपनी आत्मा के समान समझ कर हिंसा-असत्य आदि सम्पूर्ण पाप कर्मों के प्रत्याख्यान को सामायिक चारित कहते हैं, वह दो प्रकार का है-(१) इत्वरक सामायिक नारित्र और (२) यावत् कथित सामायिक चारित्र । जघन्य सात दिन, मध्यम चार मास, और उत्कृष्ट छ: मास के सावद्य त्याग रूप व्रत को त्वरक मामाधिक चारित्र कहते हैं। इत्वरक सामायिक वालों को अधिक से अधिक छ: मास को पश्चात् छे दोपस्थापनीय चारित्र में उपस्थापन किया जाता है। यह चारित्र भरत-ऐरावत क्षेत्र के प्रयम और अंतिम तीर्थंकर के शासन काल में होता है। यावत् कर्थिक सामायिक चारित्र महाविदेह और भरत-रावती बाईस तीर्थंकरों के शासन काल में होता है । यावत् कर्थिक सामायिक चरित वातों की छेदोषस्थापना नहीं होती है। यह सामान्य नियम है। गला स्पष्टीकरण आगे किया जायेगा। शिष्य --गुरुदेव ! दोपस्थापनीय चारित्र को क्या विशेषता होती है ? उसका स्वकप बतलाये। उत्तर में गुरुदेव ने फरमाया-पहले के दीक्षा काल का छेदन 7 करने पच महाव्रतो में आरोपण परो को छेदोपस्थापणीय चारित कहते हैं। वह दा प्रकार का है-(१) सातिचार और (२) निरनिचार-छेदोप- स्थापनीय । सातिचार छेगेपस्थापनीय चारित्र उमे कहा जाता है जो मूल गुणो मे दोष लगाने पर किसी साधु की आत्मगुद्धि के लिए चार या छ माम की दीक्षा को छेदकर फिर उसे महाव्रतो में आगपण किया जाता है । निरति चार छेदोपस्थापनीय चरित प्रथम और अतिम तीथंकर के शासन में इत्वरिख मामायिक चालो को जर समय पाकर देदोगस्थापनीय के द्वारा 'महाव्रतो मे आरोपण किया जाना है नयवा एक तोयंकर के तीर्थ से दूसरे तीर्थकर के तीर में प्रवेश किया जाता है तव जो साधु का महानारोपण किया जाता है वह निरतिबार छेदोपस्थापनीय कहलाता है। प्रथम और अन्तिम तीर्यकर के छेदोपस्थापनीय चारित्र को बडी दीक्षा भी कहते हैं । शिष्य-परिहार विशुद्धि चारित्र क्या है समझाइये। उत्तर देते हुए गुरुदेव ने कहा-जिसमे परिहार तप की साधना से विशेप आत्मशुद्वि की जावे उमे परिहार विशुद्धि चारिन कहते हैं इसमे विशेष बात्मशुद्धि के लिए नौ साधुओ का एक दल अपने गण से निकलकर एकान्त मे साधना के विचार से जाता है। उनमें चार साधु तपस्या करते हैं, चार उनकी सेवा करते हैं और एक वाचनाचाय का काम करता है । पहली बार की तपस्या पूरी होने पर सेवा करने वाले साधु तप करते है और पहले चार तप करने वाले साधु सेवा करते हैं । और वचनाचाय वाचन का कार्य परता है। इस चरिन के दो प्रकार है--- निविश्यमान् और निर्विष्टकायिक । तप करने वाले साधुओ क चारिन को निविश्यमान परिहार विशुद्धि कहते हैं और तप करके वैय्यावृत्य करने वाले अनुपरिहारिक साधुओ को निविष्टकायिक कहते हैं । सब मिलाकर यह १८ मास का तप होता है ।। उसका स्वरूप 7 ब शिष्य-गुरुदेव ! सूक्ष्म संपराय चारित्र का क्या स्वरूप है ? गुरुदेव-जिस चारित्र में सम्पराय अर्थात् कपायें सूक्ष्म हों, किट्टीकृत सज्वलन लोभ मात्र ही रहा हो उसे सूक्ष्म संपराय चारित्र कहते है। यह दसवें गुणस्थान में ही होता है। इसके भी दो भेद है (१) विशुद्धयमान, और (२) संक्लेश्यमान । क्षपक श्रेणी वाले जीवों को उत्तरोत्तर परिणाम की शुद्धि से विशुद्ध यमान सूक्ष्म संपराय होता है, जबकि उपशम श्रेणी वाले साधक को पतनोन्मुखी अवस्था में परिणाम की संक्लिष्टता से संक्लेश्यमान सूक्ष्म सम्पराय होता है। विशुद्ध यमान चारित्र वाला दसवें से वारहवें गुणस्थान में जाता है किन्तु संक्लिश्य- मान परिणाम वाला दसवें से नववे गुणस्थान मे आ जाता है । - शिष्य-यंयाख्यात चारित्र किसे कहते हैं ? उत्तर में गुरुदेव ने फरमाया-जिसमें कपाय का सर्वथा उदय नहीं होने से शास्त्रानुसार निर्दोप चारित्र का पालन किया जाता हो उसे यथाख्यात चारित्र कहते है। यह ग्यारहवें, बारहवें आदि गुणस्थानों में होता है । ग्यारहवें गुणास्थान का चारित्र वाला उपशांत कपायी वीतराग कहा जाता है, जवकि आगे के गुणस्थान वाले क्षीण कपायी वीतराग कहे जाते है। इन पाँच चारित्रों में से किसी भी चारित्र को पालन करने वाले सुसाधु, तारक, सद्गुरु होते है । वे स्वयं भव सागर को पार करते हैं और सेवा में आने वाले अन्य भव्यजनों को भी संसार सागर से पार कराने में सहायक होते हैं। ऐसे सुसाधु मनुष्य होकर भी देव तुल्य होते हैं। शास्त्र में इन्हें धर्म देव कहा गया है। इस प्रकार अरहंतदेव, त्यागी गुरु और श्रु त चारित्र रूप धर्म पर श्रद्धा रखना और देवगुरु की माशा पालन में हार्दिक' रुचि होना सम्यक्त्व को पहचान है। इसको व्यवहार में सम्यक्त्व कहते हैं। . ९७ प्राप्त शिप्य-गुरुदेव ! सवर के प्रथम भेद सम्यक्त्व के विषय मे समुचित जानकारी हुई और सद्गुरु फा परिचय देते हुए आपने साधुधम की भी जानकारी दी, परन्तु श्रावफ धर्म क्या है ? अभी इसका परिचय नहीं मिल सका। दूसरे विरति सवर मे हिंसा, मृपावाद आदि पापो से सर्वथा विरत रहने वाले साघुओ की तरह हिंसा आदि पापों से सीमित निवृत्ति फरने वाले , देश विरतियो का भी परिचय देने की कृपा करें। . -गुरुदेव ने कहा-धर्म का पूर्ण रूप सव त्यागी साधुओं का होता है । फिन्तु जो हिंसादि पापो का - सर्वथा त्याग करने की स्थिति में नहीं होते, उन मुमुक्षु जीवो के लिए दूसरा मार्ग पापो को सीमित करने का बताया गया है। इमे आगार, धर्म या-प्रावक धम भी कहते हैं । ये लोग सत्य को यथावत् जानते जोर मानते हुए भी पारिवारिक विवशता और अपने जात्मवल की कमी से सम्पूर्ण पापो का, परित्याग नही कर पाते । ये अपनी दुर्वलता पर खेदानुभव करते हुए हिंसा, मृपावाद, चोरी, ब्रह्म और परिग्रह रूप पाप के मेवन म सीमित त्याग करते हैं और स्थूल रूप म हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह का त्याग करते हैं, इसी को थावक धर्म कहते हैं । - श्रावक धर्म मे देव, गुरु, धर्म पर यथार्थ श्रद्धा रखते हुए पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार आव्रत इन वारह व्रतो का पालन किया जाता है। . - शिष्य गुरुदेव ' श्रावक धर्म के बारह व्रत कौन से हैं। समयाते हुए गुरुदेव ने कहा-(१) स्यूल हिंसा विरमण-- गृहस्थ प्रतिज्ञा करता है कि चलने फिरने वाले जीव जैसे-कीडी, चीटी, मक्खी, मच्छर, साप, विच्छू, पशु-पक्षो और मनुष्य आदि को जान ९८ बूझकर मारने की भावना से मारना नहीं और दूसरों से जीवों की हिंसा करवाना नहीं: (२) स्थूल मृषावाद विरमण-दूसरे की जान माल की हानि हो वैसा झूठ नहीं बोलना दूसरा व्रत है। इसमे जमीन, जायदाद, धन संपदा, पशु और संतानों के लिए बड़े झूठ का वर्जन किया जाता है । (३) स्थूल अदत्तादान विरमण-विना दी हुई दूसरे की वस्तु का हरण करने का त्याग करना तीसरा व्रत है। इसमे व्रत की रक्षा के लिए चोर की सहायता करना, चोरी का माल लेना, झूठा माप तौल करना और वस्तु में मिलावट करना आदि दोपों का वर्जन किया जाता है। (४) स्थूल , मैथुन विरमण व्रत--विषय-वासना को सीमा में नियंत्रित करने के लिए गृहस्थ अपनी विवाहित पत्नी के साथ वासना की मर्यादा ग्रहण करता है और विवाहित स्त्री के अतिरिक्त अन्यत्र विषयभोग का त्याग करता है। इसको . स्वदारा संतोप व्रत. भी कहते हैं। काम, वासना की आग जीवन धन को जलाने वाली है। असे घर के आंगन में रखी हुई आग घर के संरक्षण में खतरे का कारण होती है । इसलिए वह किसी चूल्हे की चार दीवारी या गड्ढे में रखी जाती है । उसी प्रकार काम-वासना की आग को खुली रखने से बह आत्म-गुणों का विध्वंस करने वाली होती है। अत: वासना की आग को सीमित रखने के लिए इस व्रत की आवश्यकता है । (५) स्थूल परिग्रह परिमाण व्रत या इच्छा परिमाण व्रत- . इसके द्वारा गृहम अपनी आर्थिक लिप्सा को नौमित करता है। सम्यग्दृष्टि यह मानता है कि परिग्रह ही संसार में दुःख का मूल है। मनुष्य यदि परिग्रह के सबंध में अपनी इच्छा सीमित रखकर चले तो सभी प्रकार में संघर्ष समाप्न हो सकते है अत: मन की शांति और - ससार के संघर्ष का टालने के लिए वह परिग्रह का परिमाण करता है। (धन-धान्य, द्विपद-चतुप्पद, जमीन-जायदाद) परिग्रह नौ प्रकार का होता है-(१) खेती की जमीन का, (२) मकानो का परिमाण करना, (३-४) अपने घर से धन-धान्य के सग्रह का परिमाण करना, (५-६) सोना-चादी जितना रखना हो उसके तोल-माप का निर्धारण करना (७-८) दास-दासी और गाय-भैस, घोडे जादि चतुप्पदो की संख्या का परिमाण करना, (९) घर के मेज, कुर्सी आदि सामान और मोटर, साइकिल, स्कूटर आदि वाहनो का परिमाण करना। इस व्रत मे इच्छा को परिमित करने का उपाय इस प्रकार बतलाया गया है, इससे गृहस्थ साधक का मानसिक तनाव कम होता है और उमे सतोपामृत पान करने का मौका मिलता है। (६) दिक् परिमाण व्रत-इच्छा को सीमित - रखने के लिए देश- देशान्तर के भ्रमण को सीमित रखना आवश्यक है। मानव मन की यह सहज स्थिति देखने में जाती है कि वह जब परिग्रह की नई-नई सामग्री को देखता है तो उसके मन मे भी उसे प्राप्त करने की इच्छा जागृत होती है । इसलिए श्रावक धर्म का छठा व्रत दिक् परिमाण । कहा गया है । पूवादि चारा। दिशाएँ और ऊंचे-नीचे इन छ दिशाओ मे गाडी आदि “वाहना, नौका और वायुयान, से जाने के भी प्रसग आ सकते हैं । मुमुक्षु गृहस्थी के लिए छठे व्रत से यह बतलाया गया है कि अहिंसादि पहले के पांच व्रत निर्दोष पालन होते रहे इसलिए वह पूर्वादि छहो दिशाओ मे गमनागमन की सीमा निर्धारण करें । सीमा के निर्धारण से गृहस्थ विना किसी कारण के केवल घूमने की दृष्टि से इधर-उधर नही भटकेगा। उसके मन की गमनागमन की इच्छा शान्त रहेगी। (७) भौगोपभोग परिमाण व्रत-इसमे मुमुक्षु गृहस्थ हिंसा, असत्य आदि दोपो के कारणरूप भोग-सामग्री का परिमाण करता . १००
है । इसमें भोगोपभोग की सामग्री को छब्बीस भाग में बाँटकर उनका
परिमाण जीवन भर के लिए किया जाता है। कपड़े, जूते, फल आदि कुछ
पदार्थों की संख्या से और भोजन, पानी आदि कुछ का वजन से परिमाण
रखकर त्याग किया जाता है । भोगोपभोग के परिमाण से इनके लिए होने
वाली हिंसा, असत्य आदि दोपों में भी कमी आ जाती है । भोग्य सामग्री
के अतिरिक्त इस व्रत में ऐसे काम-धन्धों का त्याग किया जाता है जिनमें
महाआरम्भ होता है। अधिक कर्मवन्ध के कारण होने से ऐसे धन्धों को
कर्मादान कहते है । जो इस प्रकार हैं-
(१) अंगार कर्म-कोयले बनाकर बेचना ।
(२) वन कर्म--वन कटवा करके वेचना ।
(३) गाड़ी कर्म-गाड़ी आदि बनाकर वेचना या गाड़ी चलाने
का काम करना।
(४) भाडी कर्म-गाड़ी, घोड़े, मोटर आदि वाहनों से भाड़ा
कमाना।
(५) फोडी कर्म--हल, कुदाल आदि से भूमि को फाड़ना
(चीरना), खान खुदाकर, पत्थर फुड़ाकर अजीविका
कमाना।
(६) दंत वाणिज्य-हाथी दांत आदि का व्यापार करना ।
(७) लग वाणिज्यलाय, चपड़ी आदि श्लेप वाले पदायों का
व्यापार करना ।
() रस वाणिज्य-मदिरादि रसों का व्यापार करना ।
(२) विष वाणिज्य-मंखिया, अफीम और अन्य दाम् गोला
जहरीले पदार्थों का व्यापार करना ।
(१०) केग वाणिग्य-रा बाले जानवर भेड़, बकरी आदि के
वित्री का धन्धा करना।
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(११) यनपीलन कम-तेल को घाणी आदि चलाने का व्यापार
करना।
(१२) निलाछन कर्म चल, पोडे आदि को कस्सी (नपु सक वनाने)
का धन्धा करना।
(१३) दवाग्निदापन कम-जगल मे आग
लगाकर जीविका
चलाना।
(१४) तर दहतडाग शोषणता-नदी, नाला व तालाव सुखाने का ।
काम करना।
(१५) जसता जन पोषणता-लडकियां व दासियो को रखकर
वैश्यावृत्ति करना । उपर्युक्त धन्धे निंद्य कर्म हैं जत श्रावक
को नहीं करना चाहिए।
इन धन्धा में हिंसा सीमातीत होती है, कई पशु-पक्षी आदि
पर्चेद्रिय जीवो की मो हिंसा हो जाती है। अत अधिक कर्म बन्ध होने के
कारण इनका श्रावक वर्जन करता है ऐसे अन्य धन्धो मे भी जिनमे अधिक
हिंसा हो उनके वजन का लक्ष्य रखना आवश्यक है। आज के यानिक युग
मे इन्डस्ट्रीज के काम प्रमुख व्यवमाय का साधन माना जाता ह अत इन्हें
सम्पूर्ण छोडने को स्थिति न हो तब भी उनका आवश्यक परिमाण करना
श्रावक के लिए जरूरी है।
(८) अनर्थ दड विरमण-बहुत से पाप ससार म बिना प्रयोजन
ही किये जाते है । बावक के लिए ऐसे विना प्रयोजन किये जाने वाली
हिंसादि के कामा का वर्जन करना आवश्यक है। इन विना प्रपोजन किये
जाने वाले पापा का अनथ दड कहते हैं। यह अनथ दड चार प्रकार का
है, यथा-
(१) अपध्यान चरित-आत और रोद्रध्यान कम वध-के मुख्य कारण
है । अत विवेकी गृहस्थ के लिए सहज मोह-भाव से होने वाले रुदन
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के अतिरिक्त रिवाज रूप से रोना, धोना या किसी के साथ बैर- विरोध में उसके धन, जन की हानि करने आदि का रौद्र विचार करना एवं मारण उच्चाटन जैसे—मलिन मंत्रों का प्रयोग आदि करना, कराना पहला अपध्यान रूप इन दोपों का सेवन करना अनर्थ दण्ड है । अनर्थकारी होने से श्रावक के लिये ऐसे काम करना उचित नहीं है। - (२) · प्रमारा चरित-निद्रा, विकथा, मद्य और विपय के वशीभूत भी पाप कर्म किए जाते हैं। अतः श्रावक का कर्तव्य है कि शारीरिक आवश्यकता के अतिरिक्त प्रमाद बढ़ावा नहीं करे। अधिक सोते रहना, नशा करना, ताश, चौपड़ आदि खेलना, सर्कस आदि देखना, , इत्यादि पाप वृद्धि के साधन रूप प्रमाद का त्याग करें। ऐसे प्रमाद का सेवन करना दूसरा प्रमाद रूप अनर्थ दंड है। . (३) 'हिलं प्रदान-विवेकी गृहस्थ हिंसाकारी अस्त्र, शस्त्र, अग्नि तथा अफीम, संखिया आदि हिंसक सामग्री (वस्तुएँ) खास कारण के बिना उपयोग नहीं करता और न विना विचारे किसी को अस्त्र आदि प्रदान करता है। क्योंकि अस्त्र, शस्त्रादि का प्रदान करना अनर्थ दण्ड का तीसरा प्रकार है। (४) पापकर्मोपदेश-श्रावक को गृहस्थ होने के नाते हिंसा, अदत्त, कुगील आदि के काम करने पड़ते है, किन्तु वह दूसरों को पाप कर्म का उपदेश विना कारण नहीं दे क्योंकि जिस किसी को पाप कर्म हिंसा, असत्य आदि द्वारा धन मिलाने या नाम कमाने आदि की प्रेरणा करते रहना, इन्डस्ट्रीज (कारखाना) खोलने, शादी करने आदि के लिए प्रेरित करना अनर्थ दाद का चौथा प्रकार है। (९) सामायिक प्रतगृहस्थ जीवन में काम, क्रोध, लोभ आदि १०३ जान्तरिक विकार सदा मन को घेरे रहते त उनको कम करने और मन को निर्विकार स्थिति में पहुंचाने हेतु श्रावक का लक्ष्य होता है । इसके लिए प्रतिदिन कुछ समय के लिये राग-द्वेप से हटकर मन को समत्व की ओर बढाने का अभ्यास पिया जाता है। एतदर्य विवेक श्रावक प्रतिदिन मुहूर्तभर के लिए ससार के प्रपचा को छोडकर, मीनस्थ दशा में राग-द्वेष से रहित रहने का नियम पालन करता है। मुहूर्त मर के इस सामायिक व्रत मे वह दो करण तीन योग से सम्पूर्ण पापा का परित्याग करके शात स्थिति की माधना करता है। प्रतिदिन विधिपूर्वक इस प्रकार की साधना से वह समत्व की जोर गति करने म समर्थ बनता है । यह श्रावक का नवां व्रत है। (१०) देशावकासिक व्रत-पहले के ९ व्रतो मे जाजीवन के लिए किए गए हिमा, असत्य आदि पापो व भोगोपभोग त्याग को इसम प्रतिदिन घटाने का अभ्यास किया जाता है। इसमे घडी, दो घडी या रामि आदि के परिमाण से कम बन्ध के कारणभूत आश्रवो का त्याग किया जाता है । खाने-पीने एव भोग उपभोग की मामी का दैनिक सकोच करना भी इस व्रत का लक्ष्य है। (११) पौषधोपवास व्रत-सद् गृहस्थ को धर्माधर्म का परिज्ञान होने से उसकी भावना पापो से उपरत रहने की रहती है । वह प्रतिदिन तीन मनोरथा के चिन्तन में ऐसी भावना करता है कि कव मैं आरम्भ- परिग्रह का त्याग कर मुनिमत ग्रहण करूंगा । विविध परि- स्थितियो म उलझा हुमा समारी मानव सदा के लिए पापो का परित्याग कर व्रत की आराधना नही कर सकता । अत अभ्यास के तौर पर श्रावक मासिक कुछ दिनो के लिए आत्मपोषण की भावना से दो करण तीन योग सम्पूर्ण पापा का त्याग कर एकान्त में पूरे रात-दिन धर्म साधना के लिए तत्पर रहता है। इसमे वह ससार का कोई कार्य नहीं करता । इस १०४ प्रकार मुनिसम चर्या से अहोरात्रि निप्पाप जीवन की साधना करते हुए अपने आत्मवल को बढ़ाता और निप्पाप जीवन जीने का अभ्यास करता है। इसी को पोपधोपवास व्रत कहते है । (१२) अतिथि सविभाग व्रत-इस व्रत में त्यागी पुरुषों को प्रतिलोभ देने का ध्यान दिलाया गया है। प्रतिदिन भोजन के समय त्यागी पुरुपों के प्रतिलाभ की भावना करना विशेप कठिन नहीं है किन्तु अहोरात्रि के आहार त्याग के पश्चात् त्यागी पुरुषों के प्रतिलाभ का संयोग मिल सके तो मेरा अहोभाग्य होगा। इस प्रकार की भावना से कुछ क्षण प्रतीक्षा में रहना विशेप कठिन होता है । यह १२वॉ व्रत है। श्रावक प्रतिदिन की तरह पौपध के पारणे के समय भी प्रतिलाभ की भावना करता है । इसमें श्रावक अपने भोजन से पूर्व केवल संत- सतियों की भावना करके ही नहीं रहता किन्तु योग मिलने पर चौदह प्रकार के निर्दोप पदार्थ देकर अपने को धन्य मानता है । आरम्भ परिग्रह के त्यागी साधु-साध्वियो को अन्नादि देकर उनके त्याग तप को परिपुष्ट करने में सहायक होना दान कर्म-निर्जरा का कारण गया है । गृहस्थ के लिए शेष अनुकम्पा दान, वात्सल्य दान आदि का निषेध नहीं है वे भी पुण्य लाभ के हेतु बनते है । उपर्युक्त व्रतों में १, २. ३, ४, ८, ९, १०, ११, में दो करण तीन योग से, ५, ६, ७, १० वाँ व्रत एक करण तीन योग से तथा चौथा एक करण एक योग से लिया जाता है। उपर्युक्त वारह व्रतों का सम्यक्त्वपूर्वक पालन करना आगार धर्म अर्थात् श्रावक धर्म कहा गया है । माना ग्रन्थों में श्रावक धर्म को आचार्यों ने तीन भागों में बांट दिया है यथा-~~-जघन्य, मध्यम और उत्कृप्ट । (१) कम से कम जानते हुए चलते-फिरने जीवों की हिसा नहीं करना मद्य मांस का वर्जन करना १०५ दान जौर पच परमेष्ठी की उपासना करना यह' श्रावक धर्म की जघन्य अर्थात् प्रथम श्रेणी मानी गई है । (२) श्रावक के लिए लज्जा, दया, गभीरता, सज्जनता लादि श्रावक योग्य इक्कीम गुणा से युक्त होना, प्रतिदिन देव, गुरु, धर्म की भक्ति करना, जर्यात्' अरिहत प्रभु के स्मरण, ध्यान एव आज्ञा पालन ब्ह मक्ति करना,निग्रंन्य मुनियो की सेवा करना, शास्त्र के पठन-पाठन-श्रवण रूप स्वाध्याय करना, 'विपय- कपाय और इन्द्रिय क सयम । का अभ्यास करना, अनशन आदि वारह प्रकार के तप मे से तप करना और देश, काल, पान को देखकर यथा शक्ति करना' यह श्रावर धर्म की मध्यम' श्रेणी 'कही गई है। (३) श्रावक द्वारा सचित जाहार का सेवन नहीं करना, एक बार एकासन से भाजन करना जार ब्रह्मचय व्रत की अराधना करना । यह श्रावक धर्म की उत्कृष्ट श्रेणी कही गयी है। श्रावक ये तीन घोणियाँ जन्य प्रकार स कही गयी है यया-जघय श्रेणी में दर्शन श्रावक, मध्यम श्रेणी म एक से लेकर बारह प्रतधारी श्रावक एव उत्कृष्ट श्रेणी म प्रतिमाधारी थावक को स्थान दिया जाता है । शिष्य-गुरुदेव । अन्य धार्मिक सम्प्रदायो के गृहस्थो के लिए वारप्रस्थ का विधान किया जाता है, क्या जैन धर्म मे भी मुमुक्षु गृहस्थों के लिए गृहस्थाश्रम के पश्चात् वानप्रस्थ' की ' व्यवस्था बतायी गई है ? क्या जैन धम मे थावको के लिए ऐसी कोई व्यवस्था है ? यदि है तो बताने की कृपा करें। उत्तर-दन हुए गुरुदेव ने फरमाया-थावक धम का प्रतिपादन करते हुए जैन शास्त्र म दशन श्रावक आर प्रती श्राप ऐमी दो विभाग किये है । दर्शन श्रावक-जा दव, गुरु, धम पर मम्यक् श्रद्वा रखते हुए वीतराग के वचना पर विश्वास करता है रितु हिंमा, जमत्य आदि पापा ने विरति नहीं कर पाता, ऐसे सम्यक श्रद्धा सम्पन शासन-सेवी को दर्शन श्रावक माना गया है। वह पच परमेष्ठी का ही उपास्य और ૧૦૬ वंदनीय मानता है । महाराज श्रेणिक की तरह तन-मन से शासन की भक्ति करते हुए भी व्रत-नियम नहीं कर पाता है । ये प्रथम श्रेणी के दर्शन श्रावक कहे गये है । जो श्रावक -अहिंसा, सत्य आदि बारह प्रकार के व्रतों का पालन करते हुए न्यायोपार्जित द्रव्य से जीविका चलाते हुए धर्म-साधन करते हैं, वे व्रती श्रावक कहे गये हैं । व्रती श्रावकों में आरम्भ-परिग्रह घटाकर संसार से उपरत होने की भावना रहती है। समय आने पर वे स्वयं संसार के प्रपंचों से अलग हो जाते है और एकांत स्थान में धर्म साधन करते हैं । जो पडिमाधारी के रूप से कहे जाते हैं । उपासक दशा और दशाश्रत स्कन्ध में ग्यारह पडिमाओ का वर्णन किया गया है । जिज्ञामु पाठक उन सूत्रों स्वाध्याय से अपनी जिज्ञासा शान्त कर सकते है । पडिमाधारी श्रावक वानप्रस्थ के स्थान पर होकर भी कुछ अपनी विशिष्टता रखता है । इसकी साधना करने वाले सम्पूर्ण आरम्भ एवं परिग्रह के त्यागी और पूर्ण ब्रह्मचारी होते हैं । दसवीं और ग्याहरवी पडिमाओं में तो संयमी साधु के समान श्रावकों की चर्या होती है अतः उन्हे भ्रमण भूत कहा गया है। इन दोनो प्रतिमाओं के समय धावक निर का ल चन और सजातीय · घरों से भिक्षा लाकर निर्वाह करते हैं । वे स्वयं अन्न, जल को पचन-पाचन आदि का आरंभ नहीं करते, दूसरों से नहीं करवाते, और अपने लिए आरम्भत भोजन आदि का उपयोग भी नहीं करते हैं। जैन श्रावक की यह उच्चतम माधना अन्यत्र दृष्टिगोचर होना दुर्लभ है । प्रतिमा वहन करने वाले श्रावक फिर गृहवास में नही आते है । अन्तिम मरण सुधार भी नमाधि- पूर्वक पंडित मरण से करते हैं । यह धावकः धर्म का संक्षिप्त परिचय दिया है विशेष उपामदशा, दशानन माध, उयवाश्य में देना ना माना। - १०७ T शिष्य--गुरुदेव । माधव को रोकने वाले सम्परत्व सदर और विरति सवर का जापके द्वारा परिचय प्राप्त हुआ । विरति सवर मे साधु धर्म और श्रावक बम का आपने जो स्वरूप समझाया उससे बीत- राग माग की विशिष्टता ज्ञात हुई, स्न्तुि एक शका रह जाती है कि वितराग के उच्चतम धर्म सिद्धान्त मे हिंसा, असत्य, चोरी, कुशील और परिग्रह रूप बाह्म पापी के त्याग का विधान है, वसे ही क्या ससार चन को बढाने वाले क्रोध, मान माया, लोम आदि अन्तर दोपो के त्याग का विधान है । यदि है तो कृपा कर समाधान करावें । समाधान करते हुए गुरुदव ने कहा जैन धर्म म हिंसा आदि पापो के त्याग की तरह कपाय विजय पर भी उतना ही जोर व लक्ष्य दिया गया है । व्यवहार माग क पचिपा को साधना के स्थूल नियम इसलिए बताये गय हैं कि सामान्य व्यक्ति उनका आसानी मे ग्रहण जोर पालन कर नक, किन्तु इसका यह नय नहीं है कि कपाय विजय की ओर उपक्षा रखी गई हो । ठाणारा सून के दसवें स्थान में दशविध धम का कथन किया जाता है उमम वासकर जतरग वृत्तियो के शोधन का ही लक्ष्य रखा गया है। शिष्य-गुरुदेव ' वे दशविध धम कौन से हैं ? उत्तर देते हुए गुरुदेव ने कहा-(१) क्षमा, (२) मुक्ति, (३) आर्जव, (४) मार्दव, (५) लाघव, (६) सत्य, (७) सयम, (८) तप, (९) त्याग और (१०) ब्रह्मचयवास ये दशविध धम कहे गये है इनका सक्षिप्त परिचय इस प्रकार है- (१) क्षमा -प्रतिकूल परिस्थिति में उत्तेजित न होकर शान्त भाव से कप्ट एव कटु वचनो को सहन करना। (२) मुक्ति-लोभ पर अकुश रखकर निर्लोभवृत्ति का अभ्यास करना। १०८ - (३) आर्जव-कपट को छोड़कर सरलता को धारण करना । (४) मार्दव-कोमल होना, गुण और गुणीजनों के सम्मान मे सदा तत्पर रहना । (५) लाघव-द्रव्य और भाव से हल्का होना। (६) सत्य-भाव और भाषा में सच्चाई रखना। (७) संयम इन्द्रियों और कपाय आदि का संयम रखना। (८) तप-बारह प्रकार के तप का आराधन करना । (९) त्याग-द्रव्य से उपधि और भाव से कपाय का त्याग करना। (१०) ब्रह्मचर्यवास-अठारह प्रकार के ब्रह्मचर्य के पालन करने में रत रहना । इन दशभाव धर्मों की भावपूर्वक आराधना करने वाला देव- देवेन्द्र का भी पूज्य होता है । जैसा कि कि महामुनि नमिराज की प्रशंसा करते हुए इन्द्र ने कहा है- अहो ते निज्जिओ कोहो, अहो माणो पराजिओ। अहो ते निरक्किया माया, अहो लोभी वीकओ ॥ ५६ ।। अहो ते अज्जवं साहु, अहो ते साहु मवं । 'अहो ते उत्तमा चन्ती, अहो ते मुत्ती उत्तमा ।। ५७ ।। नमिपवज्जा हे नमिराज ! आश्चर्य है कि आपने क्रोध को जीत लिया, मान को पराजित कर दिया, माया को दूर कर दिया, लोभ वा में कर लिया आपकी सरलता, निरभिमानता, क्षमा और निलोभता श्रेष्ठ व उत्तम है। इन्द्र द्वारा की गई नमिराज की इस प्रशंसा में पाठक राहग समक्ष सकते हैं कि शास्त्रकार ने कपाय विषय पर कितना लक्ष्य दिया है। हिंसा, असत्य, चोरी, कुशील जादि के त्याग में भी आचार्य कपाय विजय को भुने नहीं है। गोश, मान आदि कवाय, हिंसा, असत्य आदि पापों के कारण है। जात्र, मान, मावा, लोन की प्रबलता ही १०९ रूप व्यक्ति हिंसा, जमत्य जादि पापा म प्रवृत्त होता है। अत हिंसा, असत्य, आदि अशुभ कर्मों का त्याग करने पर, उनके कारण क्रोध आदि कपायो का वजन अवश्य करना होता है। इसलिए व्यवहार पक्ष मे शास्तकारो ने अशुभ कार्यो के त्याग का विधान किया है, उसमे कपाय को कारणभूत रूप से निपिद कहा गया है। पाठक इससे शास्त्रकारा की अन्तरग त्याग की जोर लक्ष्य को सरलता से समझ सकते हैं। शिष्य-गुरुदेव । जापकी कृपा से सम्यक्त्व सवर और व्रत सवर का स्वरूप समझा । सवर के अय भेद कौन से हैं ? कितने हैं ? यह भी समझाने की कृपा करें। उत्तर में गुरुदेव ने कहा-सवर के मूल पाच भेदो मे सम्यक्त्व सवर, व्रत सवर को विस्तार से कह चुके हैं। ऐसे प्रमाद और कपाय का वर्जन करना। (३) अप्रमाद और (8) अकपाय सवर है और (५) अशुभ योग को रोकना स्प शुभ योग सवर है। इन पाचो के अतिरिक्त सवर के वीस और सत्तावन भेद भी बताये हैं। सवर के सत्तावन भेदो मे पाच समिति, तीन गुप्ति, दशविध धर्म, और पाच चारित का पालन करना, वाईस परिपह और वारह भावनायें 'हैं कारण कि ये कर्मवध को रोकने के साधन हैं। प्रथम दशधर्मों मे शाति धर्म से साधक सहिष्णु वनता है। अनुकूल-प्रतिकूल कप्टो को प्रसन्न मन से सहन करता है अत उनको परिपह कहा गया है। वे सक्षेप में वाईस हैं, सहन करने से उनसे होने वाला कमवध नही होता अत इन्हें सवर कहा गया है। वाईस परिपह के नाम इस प्रकार है (2) पिपासा, (३) शीत, (४) उष्ण, (५) दशमशक, (६) अचेल, (७) रति, (८) स्त्री, (९) चर्या, (१०) निपद्या, (१०) जामोश, (१३) वध, (१४) याचना, (१६) रोग, (१७) तृण स्पर्श, (१८)जल्ल, -- - (१) क्षुधा, (११) शय्या, (१५) अलाभ, ११०
(माल) (१९) सत्कार-पुरस्कार,
(२०) प्रज्ञा, (२१) अज्ञान,
(२२) दर्शन-सम्यक्त्व।
शिष्यगुरुदेव ! बारह भावना कौन सी और किस प्रकार है ?
उत्तर में गुरुदेव ने कहा-बारह भावना इस प्रकार हैं
(१), अनित्य भावना-संसार के : धन, वैभव शरीर आदि
सभी दृश्य पदार्थ अनित्य एवं अशाश्वत हैं, ऐसा चिन्तन करना अनित्य
भावना है । जैसा कि कहा है-
-
"राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार ।
मरना सबको एक दिन, अपनी- अपनी वार, ।।"
इसी अनित्य भावना का चिंतन करते श्रेणी चढ़कर सम्राट
'भरत ने केवलज्ञान प्राप्त कर लिया।
(२) अशरण भावना-संसार में , आधि, व्याधि, उपाधि हप
कर्म जन्य दुःखों में फंसे हुए प्राणी को पिता-पुत्र आदि कोई भी शरण
रूप नहीं होता है । एक धर्म ही आत्मा के लिए शरण भूत है ।
संसार के धन, परिजन कोई भी मरण-समय रक्षण नही कर सकते जैसा
कि कहा है-
"दल बल देवी देवता, मात पिता परिवार ।
मरती विरिया जीव को, कोई न राखनहार ||"
अनाथी मुनि ने इसी अगरण भावना से वैराग्य भाव की
प्राप्ति की थी।
(३) संसार भावना-संसार कर्म बंध और जन्म, जग,
मरण, रोग, गोल आदि दुःगों का स्थान है। विषय-कलाय रूप, संमार
मार्ग में चलने वाले प्राणी अनंत काल में गंगार चक्र में भटका रहे
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अत इसम सुख की कल्पना करना विपपान स जीवन चाहने के समान है,
यह ससार भावना है, जैसा कि कहा है-
"दाम विना निर्धन दुजी, तृष्णा वश धनवान् ।
कह न सुख समार में, सब जग देख्यो छान ॥"
मल्ली भगवती जी ने इसी भावना से ६ राजाओ को प्रतिवोध
देकर मुनिधर्म मे दीक्षित किया ।
(४) एक्त्व भावना-जात्मा अकेला ही ससार मे जाया और
अकेला ही जायेगा। ससार के पुन, मिन, कनय जादि कोई भी सकट
में साथ देने वाला नहीं है। इस प्रकार का चिन्तन करना एकत्व
भावना है । जैसा कि कहा है--
"आप अकेला जवतरे, मरे अकेला होय ।
या कवहू या जीव को, साथी सगो न कोय ॥"
श्री नमिराज ऋपि ने एकत्व भावना का चिन्तन कर धन, वैभव
का त्याग कर वैराग्य भाव में रमण किया।
(५) अयत्व भावना-ससार के धन, वैभव, परिजन आदि
सव आत्मा से भिन है, पर हैं । शास्त्र म कहा है कि-ज्ञान, दर्शनयुक्त
एक आत्मा ही शाश्वत है। शेप वाह्य पदार्य अल्पकाल के सयोग से
सम्बन्धित हैं, वास्तव मे वे सब मेरे से जन्य हैं-पर हैं आये हैं सो चले
जायेंगे, इस प्रकार का चिन्तन करना अन्यत्व भावना है। जैसा कि
कहा है-
"जहाँ देह अपनी नही, वहा न अपना कोय ।
घर सपत्ति पर प्रगटये, पर हैं परिजन लोय ।।
इस प्रकार की भावना से मृगापुन ने सुख-दुख मे एकरसता
प्राप्त कर आत्मभाव में स्थिरता प्राप्त की।
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(६) अशुचि भावना-ऊपर से रमणीक दिखने वाला यह
शरीर मल, मूत्र और रज, वीर्य, अस्थि, मज्जा, रक्त, पीप आदि अनेक
'मलिन पदार्थों से भरा पड़ा है.। जरा सी चमड़ी को हटाकर देखें तो
आपको इससे घृणा हो जायेगी, हम इसे देख नहीं सकेगे । भला ऐसे
मलिन शरीर से प्रीति कैसी ? जैसा कि कहा है-
"दीपे चाम चादर मंढ़ी, हाड़ पांजरा देह ।
भीतर या सम जगत में, और नहीं घिन गेह ॥"
ऐसी अशुचि भावना से सनत्कुमार चक्री को शरीर से विरक्ति
हो गई; वे तपस्वी हो गये ।
(७) आश्रव भावना-मिथ्यात्व और विषय कषाय आदि
आश्रव-कर्म बंध के कारण हैं, इस प्रकार कर्म बंध के कारणों का चिन्तन
करते हुए विषय, कपाय और इन्द्रियों की चंचलता रोकी जाती है ।
बंध का कारण होने से आश्रव' हेय है । जैसा कि कहा है-
"जगवासी घूमें सदा, मोह नींद के जोर ।
सव लूटे नही दीसतां, कर्म चोर चहुं ओर ॥"
(८) संवर भावना-आश्रव भाव त्यागने योग्य है, ऐसा संवर
भाव बंध से बचाने वाला है । विषय, कपाय और प्रमाद निवारण
संवर है, उपशम भाव रूप संवर से कर्मों का आगमन रुकता है, इस
लिए ये भावनाएं प्रवृत्ति रूप होकर भी अशुभ कर्म को रोकने से संवर
। संवर मुक्ति का प्रथम द्वार है । कहा भी है-
"मोह नीद जव उपशमे, सत्गुरु देय जगाय ।
कर्म चोर आवत रुके, तब कुछ बने उपाय ॥"
संवर भावना का चिंतन हरिकेशी मुनि ने किया, उनकी आत्मा
कम भार से हल्की हो गई।
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(९) निर्जरा भावना-आत्मा के साथ लगे हुए कर्मों को हल्के करने जौर क्षीण करने की क्रिया को निर्जरा कहते है । जनशन मादि बारह प्रकार की तपस्या कर्म के क्षीण करने का साधन है । तपस्या से आत्मा हल्की होकर शनै शनै सर्वया कर्म मुक्त हो जाती है। कहा भी है- "ज्ञान दीप तप तेल भर, 'घर शोधे भ्रम छोर ।। या:विधि पिन निकने नहीं बैठे पूरर चोर ।। पच महाव्रत, सचरण, समिति पच प्रकार 1 प्रपन पत्र इद्रिय 'विजय, सार निजरा सार ॥" तपस्या से कर्म निजरा का चिन्तन मुनि अर्जुनमाली ने किया। 4 , (१०) लोक स्वरूप भावना-चौदह रज्जू रूप पुरुषाकृति लोक का चिन्तन करते हुए यह सोचना कि आत्मा किन-किन कारणों से कर्माधीन होकर कहा कहाँ भटकता आया है, इसमे नोक के आकार और जीवा के गति का विचार किया जाता है । यह धर्म ध्यान का एक साधन व प्रकार है। जैसा कि कहा है- "चौदह राजू उतग नभ, लोक पुरुप सठान । ता मे जीव अनादि ते, मरमत है विनु ज्ञान ॥". शिवराज ऋपि ने लोक स्वरूप का चिन्तन करते करते ही वैराग्य प्राप्त किय था । (११) वोधि दुर्लभ भावना-सम्यग्ज्ञान पूर्वक वोधि का प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है । ससार मे भेटकते-भटकते अनन्त काल होने पर भी उसकी प्राप्ति नहीं हुई। इसके वाधक कारणा को समझ- कर उनको हटाने का-यल करना ही वोधि दुर्लभ भावना है । जैसा कि कहा है- + -- -- 1 ११०
"धन-जन-कंचन राज सुख, सवहि सुलभ कर जान ।
दुर्लभ है संसार
संसार में, एक यथारथ ज्ञान ॥"
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ऋषभदेव के ९८ पुत्रों ने इसी भावना से आत्मा का उत्थान
किया।
(१२) धर्म भावना-- त-चारित्र रूप धर्म ही आत्म कल्याण का
सही मार्ग है । जिसकी प्राप्ति अतिशय पुण्य के उदय से ही होती है । प्रमाद
और कषाय से वह धर्म रत्न हाथ से चला न जाय इस दृष्टि से धर्म की
महिमा और उसके साधक बाधक कारणों का चिन्तन करना धर्म भावना
है । कहा भी है-
"याचे सुरतरु देय
सुख, चितित चिन्तन रेन ।
विन याचे विन चिंतये, धर्म सदा सुख देन ॥"
धर्म रुचि ने धर्म भावना से ही कडुए तुम्वे का आहार कर
धर्म की आराधना करली। समिति, गुप्ति, चारित्र, दशविध धर्म
और परिपह की तरह बारह भावनाएँ कर्मों के नवीन संचय को रोकने
वाली होने से संवर कही गई है। संवर और निर्जरा ही मुक्ति का
बार है।
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निर्जरा तत्त्व - . शिष्य गुरुदेव ' आपकी कृपा से यह समझ मे आ गया कि सवर धर्म से नये कर्मों का सचर होना रुक जाता है, किन्तु पूर्व सवित कर्मों का क्षय किस प्रकार होता है ? और कर्मों को क्षीण करने के उपाय क्या हैं ? यह समझाने की कृपा करें। उत्तर में गुरुदेव ने कहा-सचित कर्मों को देशत क्षीण करने की निया को निर्जरा कहते हैं । उसके १२ प्रकार हैं, उनकी आराधना से सचित कों का क्षय होता है। कम क्षय के कारण वे १२ तप इस प्रकार हैं- (१) अनशन (२) ऊनोदरी (३) भिक्षाचर्या अथवा वृत्ति सक्षेप (४) रसपरित्याग (५) काया-क्लेश (६) प्रति सलीनता (७) प्रायश्चित्त (८) विनय (९) वैय्या वृत्य (१०) स्वाध्याय (११) ध्यान (१२) व्युत्सग । इन १२ प्रकार की तपस्या रूप सावुन से आत्मारूप कपडे पर लगे हुए कर्म मल को दूर (साफ) किया जाता है। सचित कर्मों के क्षय के लिए तपस्या प्रमुख साधन है। शिष्य-गुरुदेव । आपने सचित कर्मा के क्षय हेतु १२ प्रकार के तप बतलाये, कृपया उन १२ प्रकार की तपस्याओ को विशेष स्पष्ट कर समझाइये। गुरुदेव ने कहा-सचित कमों को क्षय करने के साधन रूप बारह प्रकार की तपस्या में प्रथम के छ वाह्य और पीछे के छ आभ्यतर ११६ - तप कहलाते हैं । बाह्य ६ तप का असर मुख्य रूप से तन पर होता है जबकि आंतरिक .६ तप मन के विकारों को तपाने का कार्य करते है। अत: वे आभ्यंतर तप कहलाते हैं। वाह्य और आभ्यंतर तप एक-दूसरे के पूरक माने गये हैं। आत्मा के साथ लगे हुए कर्म इस तप की करणी से तपा कर अलग किये जाते हैं। अतः इन वारहों को तप कहा गया है, इनका संक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है अनशन-जल के अतिरिक्त तीन आहार या जल सहित चारों आहार का जिसमें त्याग किया जाता है उसे अनशन कहा गया है । अनशन दो प्रकार का होता है (१) इत्वरिक और (२) यावत् कथिक । एक उपवास से लेकर ६ मास तक की तपस्या को इत्वरिक. तप कहते हैं और आजीवन के लिए किया गया आहार त्याग यावत्-कथिक अनशन' कहा जाता है। इसे संथारा भी कहते हैं। वह तीन प्रकार का होता है-(१) पादपोपगमन (२) भक्त प्रत्याख्यान और (३) इगित मरण । (१) चारो आहारों का त्याग करके वृक्ष की डाली के समान जिसमें शरीर का हलन-चलन सर्वथा बंद रख कर शरीर को निश्चेष्ट रखा जाता है उसे पादपोपगमन अनशन कहते हैं । (२) तीन या चार प्रकार के आहारों का जिसमे जीवन भर के लिए त्याग किया जाता है उसे भक्त प्रत्याख्यान अनशन कहते हैं । (३) इंगित मरण : जिसमें सीमित क्षेत्र तक हलन-चलन आदि चेप्टा का आगार रख कर आजीवन सर्वथा आहार का त्याग किया जाय उसे इंगित मरण सथारा कहते हैं। शिष्य-बिना कारण शरीर को कष्ट देना और ६-६ मास तक निराहार रहना इसको तप के बदले काया-क्लेश क्यों नहीं कहा जाय ? यह तो एक प्रकार की हिंसा है। उत्तर देते हुए गुरु बोले-जान सहित स्वेच्छा से तप करना काया-गलेश नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इससे तपस्वी प्रसन्नता का अनुभव करता है। हिंगा में बलात्कार होना है किन्तु तप स्वेच्छा में ११७ - किया जाता है इसलिए यह हिंसा नहीं है । वैदिक वन्धु भी कई दिना तक अन, जल आदि का त्याग कर भूमि म समाधि लेते हैं पर उसे काया-कप्ट या हिंसा नहीं कहा जाता, फिर इस ज्ञान सहित निरा. हार तप को कप्ट या हिंसा कैसे कह सकते हैं ? अर्थात् नहीं कहा सकते। शिष्य--अनशन तप तो समझ मे आया पर ऊनोवरी को तर कसे बतलाया। गुरुदेव --अनशन नहीं कर सकने वालो के लिये कम खाना यह भी तप है, क्योकि भूप होने पर रुचि के पदार्थ सामने होते हुए भी कम पाने में इच्छा को रोका जाता है और इच्छा निरोध को तप कहा है । इसलिए ऊनोदरी को भी तप समझना चाहिए। शिष्य-ऊनोदरी तप कितने प्रकार का होता है। जरा सम- झाने की कृपा करें। गुरुदेव-ऊनोदरी तप के मूल दो भेद हैं, (१) द्रव्य ऊनोदरी (२) भाव ऊनोदरी । सयम धर्म की रक्षा के लिये आहार और वस्त्र पान आदि का परिमाण बताया गया है उसमे कुछ कम करना-घटाना द्रव्य ऊनोदरी है-जैसे भूख होत' हुए भी भोजन मे कुछ ग्रास कम खाना यह आहार उनोदरी है। वन पात्र आवश्यकता से कम रखना उपकरण उनोदरी है ! द्रव्य उनोदरी के ८ भेद आहार के ५ उपधि के... ३ भेद है। शिष्य-भाव ऊनोदरी क्या है, और फैसे की जाती है ? गुरुदेव-आहार और उपकरणो के समान क्रोध आदि दुर्भाव और अप्रीतिकारक सभापण को कम या मद कर के अल्प नोध ६ प्रकार की हैं अल्पमान, जल्पमाया, अल्पलोभ और अल्प शब्द तथा अल्पकलह ૧૧ । अर्थात् अल्प कपायी होना भाव ऊनोदरी है । प्रति दिन अभ्यास से क्रोधादि कपायो को घटाना एवं मंद करना संभव है . 1 यह भाव ऊनोदरी है । इस प्रकार ऊनोदरी में आन्तरिक तप का भी ध्यान रक्खा गया है। शिष्य-आपने भिक्षाचारी को तीसरा तप बतलाया वह किस प्रकार है, समझाने की कृपा करें। गुरु-आरम्भ त्यागी साधु · मधुकरी से प्राप्त निर्दोप आहार आदि का ही उपयोग करते है, भिक्षा में विविध प्रकार के अभिग्रह ग्रहण करके अनेक घरों से भिक्षा ली जाती है। वे लाभाला'म मे सतुष्ट रहते है, इसलिये भिक्षाचारी भी अपने आप में एक तप है । साधारण व्यक्ति लाभ पाकर संतुष्ट और अलाभ मे खिन्न हो जाता है । साधु लामालाभ में मन की समता नहीं खोता है । भिक्षाचारी तप को प्रकारातर से वृत्ति संक्षेप भी कहा गया है। अभिग्रहण धारण और वृत्ति संक्षेप के अनुसार आये हुए पदार्थों में कम करना, थोड़े पदार्थो से काम चलाने का अभ्यास, गृहस्थों के द्वारा भी सरलता से ग्रहण किया जा सकता है । इससे यथालाभ सन्तोप की वृति का अभ्यास होता है । इसके ३० भेद है। शिष्य-गुरुदेव ! रस परित्याग तप का क्या स्वरूप है और वह कितने प्रकार का है ? गुरुदेव भोज्य पदार्थों में रस का परित्याग करना, रस परि- त्याग तप कहा जाता है, जैसे दूध, दही, घी मीठा आदि और प्रणीत रस का वर्जन करना रस परित्याग तप में ग्रहण किया गया है । इसमें निवि, आयविल और अन्तप्रान्त आहार सेवन आदि का समावेश होता है । रस परित्याग तप का मुव्य दृष्टिकोण स्वाद विजय प्रतीत होता है। भोजन में नमक, मिर्च आदि कम होने ११९
पर नया ग्रहण नहीं करना भी इस तप का प्रकार होता है। इसके
९ भेद हैं।
शिप्य-गुरुदेव ' काया क्लेश तप का क्या स्वरूप है "
गुरुदेव ने फरमाया-क्रिग करते समय होने वाले शारीरिक
कप्ट को सहप सहन करना और तप के लिए वीरामन पद्मामन नादि
विविध आसन और केश लुचन करना काया क्लेश तप है। काया क्लेश
तप साधक मे सहिष्णुता का गुण बढाता है, इसका जम्यासी शारीरिक
कष्ट होने पर भी खेद का अनुभव नहीं करता है ।
शिष्य गुरुदेव' छठे प्रतिसलीनता तप का क्या स्वरूप है ?
और उसके कितने मेद हैं।
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उत्तर में गुरुदेव ने कहा-इन्द्रिय और मन को वश करके
रखने को प्रति सलीनता कहते हैं। ५ इन्द्रिय, ४ कपाय, ३ योग और
१ निर्दोष स्थान को अपक्षा यह तप चार प्रकार का व १३ भेद वाला
कहा गया है।
(१) विपयो की ओर गतिशील इन्द्रियो को उस ओर से
रोकना और गृहीत शब्दादि विषयो मे राग द्वेष नहीं करना इसे इन्द्रिय
प्रतिसलीनता कहते है।
(२) क्रोध, मान, माया, लोभ रूप कपायो के उदय को
रोकना और उदय प्राप्त कपायो को निष्फल करना, इसे कपाय प्रति-
सलीनता कहते हैं ।
(३) योग प्रतिसलीनता के तीन प्रकार हैं इनमे (१) मन
की जकुशल प्रवृत्ति को राककर कुशल काय म लगाना मन प्रति-
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संलीनता है । (२) अशुभ और सावध वचन को और सावध वचन को छोड़कर निर्दोष भाषा बोलना वचन प्रतिसंलीनता है और (३) काया से यतनापूर्वक चलना एवं अंग-उपांगों को कछुए की तरह गोपन करके रखना काया प्रतिसंलीनता है। (४) निर्दोष और एकान्त स्थान में जहाँ स्त्री, पुरुप नपुंसक आदि विकारी साधन नही हो, ऐसे स्थान का सेवन करना विविक्त शय्यासन रूप प्रतिसंलीनता का चतुर्थ भेद है । ये ६ वाह्य तप है । इनसे शरीर और इन्द्रियों को वश में किया जाता है । वाह्य तप आभ्यतर तप का साधन है। दोनों प्रकार के तप एक-दूसरे के पूरक होते है। इसके लिये उत्तराध्ययन सूत्र का ३०वा तप मार्ग अध्ययन और उववाई मूत्र का समवशरण प्रकरण दृष्टव्य है । शिष्य गुरुदेव ! क्या बाह्य तप के बिना आभ्यंतर तप नहीं हो सकता। गुरुदेव-एकान्त रूप से तो यह नहीं कह सकते कि आभ्यंतर तप वाह्य तप के विना नही हो सकता किन्तु आभ्यन्तर तप करते कोई न कोई वाह्य तप हो ही जाता है। व्यक्ति विनय, वैयावृत्य के समय भूख प्यास भूल जाता है, इन्द्रिय और योगों का सगोपन करना ही पड़ता है। इस तरह आभ्यन्तर तप के साथ वाह्य तप देखा जाता है। बाह्य तप आभ्यन्तर तप के विना नीरस रहता है, स्वाध्याय और ध्यान के विना अकेले बाह्य तप में कपाय उभर आने की सम्भावना रहती है, इसलिए बाह्य तप के साथ आभ्यन्तर तप भी आवश्यक माना गया है। शिष्य-गुरुदेव ! आजकल लम्बी तपस्या में तप का उत्सव और प्रमावना आदि से तप का प्रदर्शन किया जाता है, इससे सब लोगों ૧૨૧ को जानकारी मिलती है और धर्म को प्रभावना होती है फिर भी कुछ लोग इसका विरोध करते हैं यह कहाँ तक ठीक है ? क्या ऐसा करना दोष है ? गुरु ने समाधान करते कहा-तपस्या आत्मा कल्याण के लिए की जाती है, लोकपणा या प्रशसा के लिए नहीं की जाती । तपस्वी अपनी प्रशंसा को एक प्रकार का परिपह मानता है। रहा प्रभावना का प्रश्न तो कहना होगा कि समय-समय पर प्रभावना का तरीका वदलता रहता है, कभी लड्डू वाटने और बाजे-गाजे के आडम्बर में प्रभावना मानी जाती थी पर आज की बदली स्थिति और महगाई म समय और शक्ति का इस रूप में खच लाभकारी नहीं होता इससे तो तपस्या मे और विक्षेप होता है। इससे कितना जमूल्य समय प्रमाद मे चला जायेगा और आरम्भ की भी वृद्धि होगी। इस रूप मे खच लाभकारी नहीं है। देखिये दसवैकालिक के नव्वें अध्ययन मे तप ममाधि का वर्णन करते हुए सूरकार ने कहा है कि साधक इस लोक के मान सम्मान या धन-वैभव-पुन आदि के लिए तप नहीं करे। परलाक में देवी सम्पदा या इन्द्रादि का पद प्राप्त हो इस भावना से भी तप करना दूपित है । यह-कीति और महिमा के लिए भी तप नही करें। इस प्रकार इस लोक के लाम प्राप्ति के लिए किये गये तप से तपम्वी अपने वास्तविक लाभ को खो देता है। यत शास्त्रकार ने कहा है कि केवन कर्म निजरा के लिए ही तप करना श्रेष्ठ है । चक्र- वतियों ने तेरह वार तेने का तप किया परन्तु , वह तप की गणना में नही माना गया । जाज की स्थिति म तपम्बी यदि शक्ति हो तो ज्ञान- दान, अभयदान और स्वधर्मी वात्सल्य में यथा शक्ति सर्च कर सकते हैं, यही प्रभावना का स्थाई साधन है। शिष्य-गुपदेव ' दोनो तपो के सम्बध मे महत्त्व की बात समझ मे आई। कृपा कर यह स्पष्ट करावे कि वाह्य तप का क्या १२२ उपयोग है ? और उससे हमारे जीवन में कोई प्रत्यक्ष लाम होता है क्या? गुरुदेव ने उत्तर देते हुए कहा-बाह्य तप का भी अपना महत्त्व और उपयोग है। चिकित्सकों के अनुभव से भी प्रमाणित है कि उपवास से उदर विकार और शरीर के अनेक रोग अच्छे हो जाते है । शारीरिक तप के प्रभाव से इन्द्रियों की अपने विपयों में चंचलता कम होती है और सहिष्णुता की वृद्धि होती है। जो लोग बाह्य तप ज्ञान पूर्वक नहीं कर पाते उन्हें भी बाह्य तप से कई प्रकार की सफलता प्राप्त होती है। इसीलिए गांधीजी ने सत्ता के सम्मुख उपवास और सत्याग्रह को महत्त्व देकर अपनाया था। इतना ध्यान रहे कि उपवास आदि तप के पहले और पीछे आहार का संयम रखना आवश्यक है, इसको न भूलें। शिष्य-गुरुदेव ! ६ प्रकार के शारीरिक तपों का तो आपने वर्णन किया, अब मानसिक एवं वाचिक तप जो आभ्यंतर तप कहे जाते हैं, के कितने व किस प्रकार के होते हैं ? समझाने की कृपा करें। गुरुदेव ने - कहा---आभ्यातर ना ६ प्रकार का है, जमे-पाय. श्चित्त, विनय, वैय्यावृत्य, स्वाध्याय, ध्यान और गुल्मगं । शिष्य--गुरुदेव ! प्रायश्चित्त किसे कहते हैं और उसके कितने भेद हैं? गुरुदेव-प्रायश्चित्त का अर्थ है लगे हुए दोनों की शुदि के लिए की जाने वाली निया, वह मुख्यतः दम प्रकार का हरी ---(१) आलो- चना (२) प्रतिक्रमण (३) तदुभय (४) विवेक (2) व्युत्सर्ग (६) तप (3) हेद (क) मूल (१) अनवस्याग और (१०) पारचिन। मुल भद ५० है। १२३
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शिष्य गुरुदेव । वस प्रायश्चित्तो का अयं क्या है
गुरुदेव--(१) जालोचना प्रायश्चित्त वह है जिस दोप की
शुद्धि गुरु के समक्ष कथन मात्र से ही होती हो ।
(२) प्रतिक्रमण प्रायश्चित गमनागमन जादि म होने वाले
सूक्ष्म दोपो की शुद्धि इरियावहिय प्रतिक्रमण से जति मिच्छामि-
दुक्कडम् से होती है, उसे प्रतिक्रमण योग्य प्रायश्चित कहते हैं ।
(३) तदुभय-जिस दोष की शुद्धि के लिए आलोचना और
प्रतिरमण दोना किए जाय, उसे तदुभय योग्य कहते हैं ।
(6) विवेक प्रायश्चित्त-अरल्पनीय, अशुद्ध जाहार के त्याग
करने से जिस की शुद्धि होती हा, उसे विवेक योग्य प्रायश्चित
कहते है।
(५) व्युत्सर्ग प्रायश्चित्त-दोपा
शुद्धि हा उस कायोत्सर्ग
किया जाता है, जिस दोप की कायोत्सग से शुद्धि हा उस दोप को
व्युत्सर्ग योग्य कहते हैं।
(६) छेद योग्य-दीक्षा पर्याय का छेद करने से आज्ञातिक्रमण
या मूलव्रत दोपो की शुद्धि हो उसे छेद योग्य कहते हैं । जैसे राति
मोजन आदि ।
(७) तपयोग्य-तप के द्वारा जिसकी शुद्धि हो वह तप योग्य
है । जैसे सचित्त जल आदि का स्पश ।
(८) मूलाह-नयी दीक्षा से जिसको शुद्धि हो उसको मूलाह,
कहते हैं । जैसे साधुवेश मे चतुर्थ व्रत का भग आदि ।
(९) अनवस्थाप्य-गृहस्थ बनाकर जिसको नयी दीक्षा दी
जाय, ऐस दोप को जनवस्थाप्याह कहते हैं ।
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(१०) पारंचित-अमुक समय तक साधु योग्य सम्बन्ध से अलग रख कर फिर गृहीभूत करके नयी दीक्षा से जिसकी शुद्धि हो उसे पारंचित कहते हैं। वर्तमान में अन्तिम दो प्रायश्चित्त का परम्परा से विच्छेद माना जाता है। ? प्रायश्चित्त ग्रहण करते समय साधक मानापमान की अपेक्षा छोड़कर सरल भाव से अपने दोप प्रकट करता है । आज तक जिन्होंने मुझे बड़ा निर्दोप माना था वे आज क्या समझेगे, इस बात को भूल कर गुरु के समक्ष बालक के समान अपने दोप प्रकट करना प्रायश्चित्त रूप आन्तर तप है । प्रायश्चित्त द्वारा हर कोई शुद्धि नहीं कर पाता, जो जाति मान, कुलवान्, विनयवान्, पापभीरु, ज्ञानवान् और दर्शनवान् होगा वही प्रायश्चित्त का अधिकारी हो सकता है । शिष्य-गुरुदेव ! आपने प्रायश्चित्त के लिए विनयवान् होना आवश्यक बताया, वह विनय क्या है और कितने प्रकार का है ? यह भी बतलाने की कृपा करें। गुरुदेव-विनय का अर्थ नमन और बहुमान करना ही नही, रत्नत्रयी के आराधकों के प्रति आदर भाव तथा देव, गुरु, धर्म पर श्रद्धा और उचित व्यवहार एवं आज्ञा पालन है। व्याकरण की दृष्टि से आत्मा पर लगे हुए कर्मों को अलग करने अर्थात् हटाने की क्रिया को विनय कहते है। शास्त्र में विनय के ७ भेद बतलाये है, जो इस प्रकार है-(१) ज्ञान विनय (२) दर्शन विनय (३) चारित्र विनय (४) मन विनय (५) वचन विनय (६) काय विनय और (७) लोकोपचार विनय । शिप-~-गुरुदेव ! जान, दर्शन आदि गुण होने से दृष्टिगोचर नहीं होते फिर उनका बिनय कसे करना? १२५ शिष्य-गुरुदेव ' आपने मन विनय, वचन विनय और काय विनय का सही स्वरूप समझाकर वहुत कृपा को, अभी तक हम यही समझ रहे थे कि सदोष मन, वचन और काय की प्रवृति से किया गया विनय अप्रशस्त और उपयोग पूर्वक निर्दोष मन, वचन आदि से किया गया विनय प्रशस्त विनय है । कि तु अव यह बात समझ मे आई कि जो मन, वचन को प्रवृत्ति (१) सावध (२) सकिय (३) कर्कश (४) कटक (५) निप्टर (६) फरस (७) हिंसाकारी (6) छेदफारी (९) भेदकारी (१०) परितापकारी (११) उपद्रवकारी और (१२) भूतोपघातिनी है, उसे छोड कर निर्दोप, अक्रिय आदि प्रशस्त स्प में लगाना ही मन एव वचन फा विनय है । ऐसे ही काया से विना उपयोग के गमन आदि से बचना और उपयोग पूर्वक हलन, चलन आदि करना ही काय का विनय है । इस प्रकार योगो को अशुभ प्रवृत्ति को छोडकर शुभ मे जोडना निर्जरा का कारण कहा गया है। अब विनय का सातवा भेद लोकोपचार विनय कहा गया है, वह क्या और कितने प्रकार का है ? समझाने की कृपा करें। गुरुदेव-विनय के लिए किये गये बाह्य व्यवहार को उपचार विनय कहते हैं, इससे सात भेद हैं जैसे--(१) अभ्यास वर्तिता-गुरु या वडो के समीप रहना (२) परछन्दानुवर्तिता-गुरुजनो की इच्छा का अनुसरण करना अपनी इच्छा पर नहीं चलना, (३) काय हेतुक विनय करना (6) तृत-प्रतिक्रिया-उपकार के बदले मे विनय करना (५), जात गवेषण-परिवार में कोई रोग से पीटित हो उसकी सम्भाल करना पूछना (६) देशकाल- ज्ञाता-देशकाल का ज्ञान होना, देशकाल के अनुसार उचित आहार आदि से विनय करना (७) सर्वार्थेषु अप्रति लोभता-बोलने चलने आदि किसी भी क्रिया मे विना किसी के साथ टकराते हुए निया करना । ये लोक व्यवहार मे दृष्टिगोचर होने वाले व्यवहार उपचार विनय कहे गये हैं । १२८ । 4 शिष्य-गुरुदेव ! विनयवादी भी स्थान-स्थान पर विनय का उपदेश करते हैं और आप भी विनय की शिक्षा देते हैं, दोनों में क्या अन्तर है ? समझाने की कृपा करें। गुरुदेव-तुम्हारी शंका ठीक है, विनय का उपदेश दोनों देते हैं; · फिर भी दोनों के कथन मे मौलिक अन्तर है । विनयवादी की मान्यतानुसार पशु-पक्षी, माता, पिता, राजा आदि सब विनय के योग्य है। वे गुणी हैं या निर्गुणी है, यह देखने की आवश्यकता नही है । क्योंकि उनकी दृष्टि में सब प्राणी ईश्वर के अंश होने से विनय के पात्र है । परन्तु जैन दर्शन में ज्ञान, दर्शन, चारित्र आदि गुणों से सम्पन्न व्यक्ति को विनय योग्य माना जाता है । आगमानुसार गुणशून्य 'या अवगुणी वंदनीय नहीं' माना जाता क्योंकि वह विनय कर्म-निर्जरा का हेतु नही होता और जैन दर्शन में विनय को कर्म-निर्जरा का हेतु कहा है। इसी प्रकार सम्यग्दर्शन आदि गुणों से रहित अन्य लोगों के प्रति किया गया विनय शुभभावमय होने से पुण्य का कारण हो सकता है, कर्म-निर्जरा का नही। लोक विनय प्राय: भय, लज्जा, स्वार्थ, लोभ, मोह और अज्ञानवश किया जाता है, जबकि धार्मिक क्षेत्र का लोकोत्तर विनय एकान्त निर्जरा की भावना से किया जाता है उसमें भय, लज्जा और स्वार्थ का कोई विचार नहीं होता, भय आदि विचारों से किये गये विनय को शास्त्रकार तप नही मानते यहाँ जैन दर्शन के विनय की प्रमुख विशेपता है जैसे कि कहा है ---"गुणी देखकर वंदना, अवगुण देख मध्यस्थ" धर्म के स्वरूप का ज्ञाता गुणहीन और अवगुणी को अवंदनीय मानता है फिर भी उनके साथ द्वेप नहीं करता । यदि प्रेम से कहने पर भी कोई नही माने तो धर्मात्मा उसके प्रति मध्यस्थ भाव रखता है। तात्पर्य यह है कि विनयवादी गुणावगुण की अपेक्षा किये बिना सवको विनय योग्य मानता है और विनय धर्म में गुणी-अवगुणी के प्रति विनय करने को निर्जरा का हेतु कहा गया है। - १२९ - शिष्य-क्या साधु साध्वी के अतिरिक्त अन्य जीवों के साथ विनय नहीं होता' गुरुदेव-किसी भी प्राणी के साथ कष्टप्रद व्यवहार नहीं करने रूप जनाशातना विनय किया जा सकता है। जैसा कि नियुक्त में कहा है-हित भापण, मृदु भाषण, अल्प मापण और विचार पूर्वक बोलना वाणी का विनय है यह सर्वन किया जा सकता है। ऐसे ही कुशल विचार जो आत्त एव रौद्र रूप होते हैं उनको रोक कर शुभ विचारो की उदीरणा करना मन का विनय है, यह भी हर किसी के साथ किया जा सकता है । किमी को कष्टप्रद हो वैसा व्यवहार नहीं करना, सबके साथ यथोचित व्यवहार करना, यह प्रतिरूप विनय भी सर्वत्र किया जा सकता है । श्रावक को जीव मान के साथ मैत्री भाव से रहना है अत वह ध्यान रखता है कि उसका व्यवहार किसी के प्रति दुखदायी नही हो, यह प्राणीमान का विनय है। शिष्य-भगवन् । विनय का स्वरूप और उसके प्रकार आपने समझाये, अव वयावृत्य तप का स्वरूप व उसके प्रकार समझाने की कृपा करें। गुरुदेव-वैयावृत्य एक प्रकार की सेवा है जो विनयवान् ही कर पाते हैं । अत विनय के पश्चात् वैयावृत्य का उल्लेख किया गया है। वयावृत्य का अर्थ है अशन-पान-औषध एव धर्मोपकरण का स्वर्मियो के लिए पूर्ति करना और ग्लान वृद्ध की सेवा करना । वह दस प्रकार की है-(१) जाचाय का वयावृत्य '(२) उपाध्याय का वयावृत्य (३) स्थविर का वयावृत्य (४) तपस्वी का वैयावृत्य (५) ग्लान-रोगी का वैयावृत्य (६) कुल का वयावृत्य (७) गण का वैया- वृत्य (८) संघ का वयात्वृत्य ,(९) शिप्य-नव दीक्षित का वैयावृत्य व (१०) सार्मिक का बयावृत्य ! ये दस सेवनीय हैं । इन दस की सयम + १३० - . . के अनुरूप सेवा दस प्रकार की वैयावृत्य है। इस प्रकार की सेवा से कर्मों की बड़ी निर्जरा होती है। शिष्य-गुरुदेव ! जिनेन्द्र भगवान ने वयावृत्य का क्या लाभ बतलाया है ? उत्तर में गुरुदेव ने कहा- व्यवहार सूत्र में बताया है कि आचार्य, उपाध्याय आदि दस प्रकार के त्यागियों की वैयावृत्य करते हुए जीव महा निर्जरा और महान् संसार का पर्यवसान करते हैं जैसा कि कहा है-आयरिय वेयवच्चं करे माणे समणे निग्गथे महानिज्जरे महापज्जवसाणे भवतिः । विशेप शुद्धि होने पर सेवक तीर्थंकर गोत्र का भी उपार्जन कर लेता है। जैसा कि कहा है-वेयावच्चेणं भते जीवे किंजणयइ, वेयावच्चेणं तित्थयरनाम गोतं कम्मं निबंधइ । उत्तराध्ययन सूत्र २९/४३ 'माप्यकार ने इन १० दशों को १३ प्रकार से वैयावृत्य करना बतलाया है। शिष्य-भगवान् ! आचार्य आदि १० सेवनियों की १३ प्रकार से की जाने वाली सेवा कौन सी है ? गुरुदेव-तेरह प्रकार से वयावृत्य निम्न प्रकार से होती है : जैसे-भत्ते, पाणेरायणामणेय, पडिलेहपायमच्छिमद्धाणे । रायातेणे दंड-गहे, य गेलण्णमत्तेम/१२५ । अर्थात् (१) आहार लाना (२) जल लाना (३) शय्या-संस्तारक करना (४) आसन पाट आदि देना (५) क्षेत्र और उपकरणों का प्रतिलेगन करना (६) चरण प्रमान करना (७) आंग आदि रोग में चिकित्सा करना (८) मार्ग में नहयोग करना (९) गजीय उपनगं से बचाना (१०) चोरों के हमले में बचाना (संरक्षण करना) (११) बद्ध रोगी की लकड़ी पकड़कर महारा देना - १३१ -- - (१२) वृद्ध रोगी के मल-मूत्रादि विसर्जन को व्यवस्था करना (१३) रोगी को उचित सम्भाल करना। इन १३ प्रकार से सवर-निर्जरा धम के आराधक नाचार्य जादि १० प्रकार त्यागिया की सेवा करना कर्मों की निर्जरा का कारण होता है। शिप्यगुरुदेव ' आपने आचार्य आदि की सेवा से कर्म निर्जरा का नाम बतलाया तो दोन-दु खो रोगी मानव और दुख पीडित पशु- पक्षी आदि की सेवा से क्या लाभ होता है ? यह भी समझाने की कृपा करें। गुरुदेव-नाचाय उपाध्याय आदि की सेवा, लोकातर वयावृत्य रूप धर्म है । इसमे सवर-निजरा धर्म के नाराधक त्यागियों के ज्ञानादि गुणा की पुष्टि होती है। जवकि दीन, दु दुखी "मानव और पशु-पक्षी अनुकम्पा के पात्र हैं । दया भाव से की गई प्राणियो की सेवा शुभयोग और अनुकम्पा भाव से पुण्य-लाभ को कारण होती है । ये प्राणी मात्र भी, सपरिग्रही है और सवर-निजरा धर्म के आराधक नही है । इनकी सेवा ज्ञानादि गुणो की पोपक नहीं होती। अत इस प्रकार की सेवा मुख्य रूप से पुण्य लाम की ही जनक मानी गई है । सेवा करते हुए जो विषय-कपाय का निग्रह किया गया हो वह कम निजरा का कारण बन सकता है,। लौकिक सेवा अनुकम्पा प्रधान है। अत इससे विशेष प्रकार का पुण्य लाभ हो सकता है। असयमी गृहस्यों की सेवा को भी एकान्त पाप मानना उचित नहीं है। राजा, मेघरथ ने कबूतर की रक्षा का प्रयत्न किया और सुमेरु प्रभ हाथी ने शशक की रक्षा हेतु अपना पांव ऊँचा रखा इस अनुकम्पा से निर्जरा के साथ पुण्य लाभ हुआ जिससे राजकुल म जन्म प्राप्त हुआ था। इस प्रकार लोक सेवा प्रमुख रूप से पुण्य लाभ की कारण होती है। किन्तु अहिंसा, सत्य आदि नियमो के पालक सम्यग्दृष्टि भाई-बहन इसके अपवाद . १३२, हैं। देश विरति धर्म के पालक होने से उनकी सेवा निर्जरा रूप हो सकती है, क्योंकि उससे अहिंसा आदि देश विरति संयम व गुणों को पोषण मिलता है। 7 शिष्य-गुरुदेव ! चतुर्थ आभ्यंतर तप स्वाध्याय का स्वरूप और उसके प्रकार किस तरह कहे गये हैं ? समझाने की कृपा करें। गुरुदेव-स्वाध्याय पद में सु, आ और अध्याय ऐसे तीन शब्द हैं, जिनका सीधा अर्थ है सभ्यक् श्रत का विधिपूर्वक पठन, पाठन और मनन करना । जिन्होंने राग-द्वेप कामादि दोपो पर पूर्ण विजय प्राप्त कर लिया है ऐसे---सत्पुरुपों की निर्दोष वाणी मानव के मन के मल को धोने वाली और सत्यार्थ का प्रकाश करने वाली है। ऐसी वाणी का अध्ययन मानव मन की सुप्त चेतना को जागृत कर आत्म-गुणों को विकसित करता है, अत: ऐसे शास्त्रों का पठन-पाठन स्वाध्याय कहा गया है। शिप्य-गुरुदेव ! स्वाध्याय योग्य सम्यक् शुत मुख्य रूप से कितने और कौन से हैं ? गुरदेव--- पूर्ण ज्ञान और दर्शन के धारक वीतराग पुरुपों द्वारा प्रतिपादित शास्त्र सभ्यता शुत हैं, जो आचारांग आदि ११ है । जमे (१) आचाराग (२) मूत्रकृनाग (३) स्थानाग (४) समवायांग (2) व्याख्या प्राप्ति (६) उपासक दगा (७) अन्तकृत दशा (6) ज्ञाता धर्म कथा (५) अनुत्तरोषपातिकः (१०) प्रश्न व्याकरण और (११) विपाक श्रत । ये मुख्य रूप में सम्यक भत है, इनका मूल मूष रूप से, हिन्दी, गुजरातो, महाराष्ट्र आदि अर्थ कप में और मुन के गाय अर्थ नभय प में अध्ययन किया जाताना अनुरुल व्यान्यान नादि रूप में नो अन्य आगम वाणी को पुष्ट करने वाले है वे स्वाध्याय मे पढे जा सक्ते है । स्वाध्याय स्व-पर प्रकाशक होने से परम तप है। इसलिए कहा है कि-स्वाध्याया- तमा प्रमद । स्वाध्याय से प्रमाद मत करो। ? -शिष्य-गुस्दैव ! स्वाध्याय कितने प्रकार का है गुरुदेव-स्वाध्याय पाँच प्रकार का कहा गया है, जो इस प्रकार है (१) वाचना-मूल या जय रूप से श्रुत का वाचन करना (२) पृच्छा- सुने हुए विषय को स्पष्टता के लिए पृच्छा करना (३) परिवतना-वाचना म पढे हुए श्रत की पुनरावृत्ति करना (४) जनुप्रेक्षा-जीवादि तत्त्वो के विषय में चिन्तन-मनन करना (५) धर्मकथा-जीवादि पदाथ और पुण्य- पाप, वध-मोक्ष आदि को हेतु पूवक समझाकर आत्म-भाव को जागृत करने वाली, (३) नक्षेपिणी (u) विक्षेपिणी आदि यम कया करना । . शिष्य-भगवन् । स्वाध्याय क्यो किया जाता है। इसका पया फल है ? गुरुदेव- दशवकालिक सूत्र में अध्ययन करने के चार कारण बतलाये हैं, जैसे-(१) श्रुत के अध्ययन से तत्त्वातत्त्व का ज्ञान होगा इसलिए पढना (२) अध्ययन से चित्त एकाग्र हागा इसलिए पढना (३) अपनी आत्मा को धर्म म स्थिर कर सकूँगा इमलिए पढना (४) स्वय स्थिर होकर दूसर का भी धम म स्थिर कर सकूगा इसलिए श्रुत का अध्ययन करना । दशव० ९ उ० ४ । सम्यक् श्रुत के पठन-पाठन वाचना के स्थानाग सून मे भी लाभ बतलाये है। - शिष्य गुरुदेव । स्थानाग सूत्र मे धत वाचना के क्या लाभ बतलाये हैं? १३४ गुरुदेव-श्रुत के अध्ययन को (श्रत की) वाचना देने से पाँच लाभ होते हैं, जैसे-(१) वाचना देने से शिप्यों में श्रत ज्ञान का संग्रह होता है (२) वाचना देने से शिप्यों का उपकार होता है वे तप संयम की आराधना में समर्थ होते है (३) वाचना देने से कर्मों की निर्जरा होती है (४) वाचना देने से अपना श्रत ज्ञान स्पष्ट और विकसित होता है (५) वाचना देने की परम्परा चालू रहने से शास्त्र रक्षित रहेगे, इनका विच्छेद नहीं होता है । इस प्रकार शास्त्र वाचना से श्रुत की भक्ति के साथ ज्ञान का व्यापक प्रचार होता है। (स्था. ५/३/८१) ! शिष्य-भगवन् ! वाचना देने के समान श्रुत की वाचना लेने के लाम भी बतलाइये। गुरुदेव-श्रु त ज्ञान की वाचना करने के पाँच लाभ बताये गये है जैसे कि ~~~ (१) तत्त्वों का सम्यग् ज्ञान प्राप्त करने के लिए वाचन लेना (२) श्रद्धा की दृढ़ता हो इसलिए वाचन लेना (३) आचार धर्म का ज्ञान कर चारिय का निर्दोष पालन किया जा सके इसलिए श्रुत का वाचन लेना (४) मतभेदों के विवाद से मुक्त होने एवं दूसरो को मिथ्या मार्ग से हटाने के लिये वाचन लेना (५) द्रव्य, गुण और पर्याय के स्वरूप को यथार्थ जानने के लिये श्रत का वाचन करना--(स्था० ५/३/८१) । पाचना देने और लेने के इन नामों के अतिरिक्त स्वाध्याय से मानावरणीय कम का भी क्षय होता , जैमा कि कहा है..माझापणं नाणावरणिग्ज कम्म मवेद--(उत्तगध्ययन २९/१६) । स्वाध्याय करने से ज्ञानावरगीय कर्म का क्षय किया जाना है। इसीलिये श्रमणों की दिन-राविना में, ४ पहर की स्वाध्याय निर्देश कर स्वाध्याय को दी गुम्य स्थान दिया गया है. १३५ - -- उत्तराध्यायन सून २६/१२/१८ मे ऐसा विधान है। १२ पढम पोरिसि सज्झाय, वीय झाण झिवायई तइयाए मिक्खायरिय, पुर्णोचउत्थीइ सज्झाय,। १८ पढम पोरिसि सज्झाय, बीय झाण झियायई तइयाए निद्दमोक्खतु, चउत्थी भुज्जो वि सज्झाय । शिष्य-भगवन् । आपने कहा स्वाध्याय से मन की एकाग्रता होती है यह समझ मे आया अब यह बतलाइये कि ध्यान क्या और उसके कितने प्रकार हैं ? गुरुदेव-ध्यान का अर्थ है किसी एक चिन्तन पर मन का लीन हो जाना, वह ध्यान चार प्रकार का है जैसे-(१) आर्तध्यान (२) रौद्र- ध्यान (३) धर्मध्यान (४) शुक्ल घ्यान । शिष्य-भगवन् । आपने ध्यान के चार प्रकार बतलाये, उन्हें स्पष्ट करने की कृपा करें। गुरुदेव-चार प्रकार के घ्यानो मे पहले दो ध्यान मोह के उदय से सहज होते है, वध के कारण होने से वे त्याज्य है, पीछे के दो ध्यान कम के क्षयोपम से होते हैं, उनके लिए पुरुपार्य किया जाता है । पहले के दो अशुभ ध्याना को दूर कर शुभ ध्यान में लीन होना ही तप ह । यह चिरकाल के सचित कर्मों को क्षण भर में नष्ट करने वाला है । पहले के आर्त और रोद्र ध्यान मे नर, नारक, देव तथा तियंच चारो गति के, जीव प्रभावित है (१) आतं ध्यान- शब्दादि विपय और भोग सामग्री के अजन, रक्षण और सवर्धन मे चिन्तित रहना तथा पुन मित्र कलर आदि परिजन जोर धन वैभव की चिन्ता करना आत ध्यान है । जोर मे कदन करना चिल्लाना, शोच करना, जासू गिराना आदि आर्त ध्यान के परिचायक चिह्नहैं।
(२) रौद्र ध्यान-स्व और पर के लिए दुःखदायी तथा अहित- कारी विचारों में डूवा रहना, मोह और अज्ञान के वश अपने व पर की हत्या करना, लूटना, धोखा देना और विरोधी को जड़-मूल से उखाड़ फेंकने के विचारों में लीन रहना रौद्र ध्यान है । हिंसा करना, झूठी बातें बनाना आदि रौद्र ध्यान के परिचायक चिह्न है । इनमें आर्त ध्यान राग और मोह की प्रधानता वाला है । रौद्र ध्यान में क्रोध व द्वप की प्रधानता रहती है। प्रत्येक के चार प्रकार और चार लक्षण यों आठ-आठ भेद किये गये हैं। ये दोनों ध्यान कर्म वन्ध के कारण हैं इनको छोड़कर शुभ ध्यान मे लगना ही तप है । 'शुभ ध्यान दो प्रकार के है। (१) धर्म ध्यान और (२) शुक्ल ध्यान । धर्म ध्यान-देव, गुरु, धर्म की भक्ति और आत्मा-परमात्मा के स्वरूप चिन्तन में लीन होना तथा संसार के पदार्थो को अनित्य अशाश्वत और निस्सार समझ कर दश विध धर्म के चिन्तन मे मन को स्थिर करना धर्म ध्यान कहा जाता है। धर्म ध्यान के चार प्रकार चार लक्षण, चार आलंवन और चार अनुप्रेक्षा यों सोलह भेद किये गये है। शिष्य-गुरुदेव ! धर्म ध्यान के आधार (पाये) रूप चार प्रकार कौन से हैं? गुरुदेव-धर्म ध्यान रूप प्रासाद का प्रथय चरण आज्ञा-विचय है। वीतराग देव की आज्ञा का चिन्तन करना और यह निश्चित करना कि वितगग की आज्ञा ही भवसागर से पार करने वाली एक अछिद्र नौका है। इसके अतिरिक्त अर्थ कथा, देश कथा आदि आत्मा के जन्म- मरण ने चम मे भटकाने वाली है। प्रामाद का दूसरा चरण अपाय १३७ विचय है । जाज्ञा के प्रतिकुन चलने वाले जीव के काम क्रोध लोभादि दोपो की वृद्धि होती है, जिससे जीव किंकर्तव्य विमूढ होकर अपना भान भूल जाता है । अत मुमुक्षु जात्मा को सदा इन दोषो से बचे रहना चाहिए। प्रासाद का तीसरा चरण विपाक-विचय है। दोप दुख के कारण है । काम, क्रोध, लोभादि दोपो के कारण ही प्राणी को कर्मा- धीन होकर विविध गतियो में भटकना पडता है। दोषो के अशुभ फल को जानकर अपने मन को उनसे अलग करना विपाक-विचय नाम का तीसरा चरण है। प्रामाद का चौथा चरण मस्थान-विचय है। कर्म के वशीभून प्राणी नानाविध गतियों ने किस रूप में और कहाँ-कहाँ कम फ्ल मोगा करता है । यह जानकर लोक के संस्थान (स्वस्प) का विचार करना सस्थान विचय कहा जाता है । सस्थान-विचय में ऊध्व लोक, मध्य, लोक और जो लोक मे जीव किम तरह, कहाँ तथा कैसे कम फल अनुभव करता है यह जाना जाता है । अत धम ध्यान का यह चौथा चरण है। शिष्य-~-किम साधक को धर्म ध्यान के प्रति रुचि है, इसे सम- सने का क्या लक्षण है? गुरुत्व-~-धम ध्यान के चार लक्षण बताये गये हैं, जा इस . - प्रकार है- 7 (१) आना रुचि-श्रन चारित्र धर्म रूप वीतराग की जाज्ञा पर हादिक प्रीति (रुचि) हाना । (२) निमग मचिजाति स्मरण आदि ज्ञान से, विना उपदेश कही धम पर कचि हाना। १३८ (३) उपदेश रुचि-सद्गुरु के उपदेश सुनने में या उपदेश सुनने से पारमार्थिक तत्त्वों पर रुचि होना। (४) सूत्र रुचि-जिनेन्द्र देव प्रणीत आगम वाणी के पठन-पाठन में रुचि होना। इन चार प्रकार की रुचियों से पहचाना जा सकता है कि मानव धर्म ध्यान का रसिक है। शिष्य-गुरुदेव ! धर्म-ध्यान रूप प्रासाद पर आरोहरण करने के साधन कौन से हैं ? गुरुदेव-धर्म ध्यान के प्रासाद पर आरोहण करने के चार आलम्बन बताये गये है। जैसे-(१) वाचना--वीतराग वाणी का पठन- पाठन और वाचना करना (२) पृच्छा-तत्वार्थ के प्रश्नोत्तर करना (३) परिवर्तना-पठित ज्ञान का पुनः-पुन: परावर्तन करना और (४) धर्मकथा राग-द्वेप से मुक्ति पाने की कथा या दश प्रकार के धर्मों का कथन करना । इन चार आलम्बनों से मुमुक्षु धर्म ध्यान के प्रासाद पर सरलता से आरोहण कर पाता है। शिष्य-गुरुदेव ! धर्म ध्यानी का चिन्तन कैसा होना चाहिए? गुरुदेव-धर्म ध्यान की चार अनुप्रेक्षाएं कही गई है। धर्म ध्यानी का इनके आधार पर चिन्नन होता है वह इस प्रकार है- (१) अनित्य भावना-दृश्यमान जगन् के नाना प्रकार के निताकर्षक पदार्थों की अनित्यता नार नश्वरता का चिन्तन करना। (२) अशरण भावना--(इसमें सोचा जाता है कि) पुन, मित्र, कला आदि प्रेमीजन और धन-वैभव आदि सम्पदा इनमे से दुःख के समय आत्मा का कोई भी शरण भूत (रक्षा) होने वाले नहीं है । एक मान धर्म ही रणभूत है। १३९ (३) एकत्व भावना-आत्मा एक है अकेला ही आया और अकेला ही जाने वाला है। संसार के धन, वैभव, पुत्र, मित्र आदि कोई उसके साथी नहीं होते। क्योकि आत्मा नित्य है जोर दृश्यमान जगत् अनित्य है। आत्मा ज्ञान, दशन युक्त है और दृश्य पदाथ जड पर है। आत्मा ही कम का कर्ता और भोक्ता है । अत कष्ट में वाह्य पदार्थों को अपेक्षा करना या उनसे आशा रखना अज्ञान और भूल ही कहा जा सकता है। (४) ससार भावना-धर्म ध्यान की चौथी अनुप्रेक्षा समार भावना है । सनार दोप और दुखा का घर है, राग, द्वेप आदि दोप और जन्म, जरा, मरण, रोग, शोष आदि दुसा का वह उत्पत्ति म्यान है । विपय-कपाय के अधीन बना हुआ प्राणी चतुगतिक संसार में अनन्त काल से भटक्ता हुआ मी ज्ञानवश मोगो म सुख मानता और श्वान व जस्थि चवण की तरह इन्द्रिय सुखा में अपनी शक्ति को नष्ट कर जानन्द मानता है। कल्याणार्थी मानव ससार के वास्तविक स्वरूप को समझ कर कमन पनवत् भौतिक सुखो से लिप्त रहता है। शिष्य-भगवन् । शुक्ल ध्यान क्या है ? कब किया जाता है ? और उसके कितने भेद हैं ? गुरुदेव-कपाया का उपशम या क्षीण कर जात्मा की विशेष शुद्धि के लिए चित्त को प्रशान्त सागर की तरह शान्त और स्थिरता में लीन कर लेता है इसी का नाम शुक्ल ध्यान है। साधक धर्म ध्यान से राग-द्वेप आदि दोपो को क्षीण कर शुक्ल ध्यान पर जारूढ होता है । तथा सप्तम प्रमत्त गुणस्थान को पार कर जब जात्मा निवृत्ति वादर अष्टम गुणस्थान म बढ़ता है, तब कपाय मल को उपशान्त या क्षीण करते हुए शुक्न ध्यान में प्रवेश किया जाता है। इसके चार प्रकार हैं १४० (१) पृथक्त्व-वितर्क सविचारी (२) एकत्व वितर्क-अविचारी (३) सूक्ष्म क्रिया अनिवृत्ति और (४) समुच्छिन्न क्रिया अप्रतिपाती। (१) पृथक्त्व वितर्क सविचारी-जब कोई पूर्व-धर मुनि अपने पूर्व ज्ञान के आधार पर एक द्रव्य में उत्पाद, व्यय और स्थिति रूप विविध पर्यायों का अलग-अलग चिन्तन करता है, साधक की उस मन:स्थिति को पृथक्त्व वितर्क सविचारी कहते है। - । (२) एकत्व वितर्क अविचारी-जब साधक मन को एकाग्र करके किसी एक द्रव्य या पर्याय विशेष पर स्थिर चित्त होता है तब एकत्व वितर्क अविचारी दूसरा चरण होता है । (३) सूक्ष्म क्रिया अनिवृत्ति-जब वीतराग दशा प्राप्त केवली के मात्र श्वासादि रूप से सूक्ष्म काय योग की प्रवृति चालू रहती है तव सूक्ष्म क्रिया अनिवृत्ति ध्यान का तीसरा चरण होता है । जो १३वें गुगस्थान के अन्तिम समय में होता है। (४) समुच्छिन्न क्रिया अप्रतिपाती-- जब मन और वाणी की तरह काय की सूक्ष्म क्रिया भी बन्द हो जाती है तव शुक्ल ध्यान का चौथा चरण समुच्छिन्न क्रिया अप्रतिपाती होता है, यह चरण शैलेशी दशा प्राप्त कवनी को योग-निरोध की स्थिति में १४३ गुणस्थान में होता है। शुक्ल ध्यान के चार चरणों में पहले चरण में तीन शुभ योग विद्यमान रहते हैं। दूसरे चरण में तीन योग में से कोई एक योग होता है। तीसरे चरण में मात्र एक काय योग ही शेष रहता है। इसमें मनोयोग और वागयोग का सम्पूर्ण निरोध हो जाता है। नया चतुर्थ चरण अयोगी दवा प्राप्त कवली को ही होता है। १४१ शिष्य-गुरुदेव । धर्म ध्यान की तरह शुक्ल ध्यान के भो कुछ लक्षण होगे । उन्हें समझाने की कुपा करें। गुरुदेव-शुक्न ध्यान के भी धम ध्यान की तरह चार लक्षण है । (१) अव्वहे-देव, मनुप्यादि के उपमर्गों से व्यथित नहीं होना तथा पीडा का अनुभव नहीं करना शुक्ल ध्यान का पहला लक्षण है । (२) असम्मोहे-देव आदि को ऋद्धि व शास्त्रीय गूढ विपया मे सम्मोह प्राप्त नहीं होना शुक्ल ध्यान का दूसरा लक्षण है । (३) विवेक-ससार के विविध सयोग और दह तक से जात्मा की मिनता का भान होना यह शुक्ल ध्यान का तीसरा लक्षण है । (४) व्युत्सर्ग-देह और वाह्य उपकरणो का निसग भाव से ध्यानी त्याग कर देता है। यह शुक्ल घ्यान का चौथा लक्षण है। शिष्य गुरुदेव ! शुक्ल ध्यान के चरण व लक्षण की जानकारी प्राप्त हुई । अव शुक्ल ध्यान के आलम्बन कितने हैं ? समझाने की कृपा करें। । । गुरुदेव-शुक्ल ध्यान के चार आलम्बन हैं-(१) क्षमा (२) आर्जव (२) मार्दव और (४) मुक्ति । ध्यान की स्थिरता मे जो सहायक हो उसे मालम्वन कहते हैं । (२) क्षमा---पहला आलम्बन क्षमा है । शुक्ल ध्यान की साधना से साधक को कपायें सूक्ष्म सूक्ष्मतम वन जाती हैं । ध्यानी का पहला आलम्बन शाति है, कैसी भी प्रतिकूल परिस्थिति हो उसमे ध्यानी विचलित नही होता। कपाय को मदता से सुख-दुख मे ममत्व की स्थिति बनाये रखना यह उसका पहला आलम्बन है।' (२) जार्जव-शुक्ल ध्यान की साधना में दूसरा आलम्बन आजव होता है । ध्यानी मन, वाणी और व्यवहार में एक रस होता है, - । - ११४२ वह अपने साध्य की ओर सरल दृष्टि से बढ़ता है, उसकी ऋजुता दूसरा आलम्बन है। (३) अहकार को क्षीण कर देने से मार्दव गुण प्रकट होता है । अकपाय भाव की ओर प्रगति करने के लिए यह शुक्ल ध्यानी का तीसरा आलम्बन होता है। (४) संग्रह भाव और ममता की सीणता से साधक लोभ गे मुक्ति प्राप्त करता है यह ध्यानी का चौथा आतम्बन हे । शिष्य-गुरुदेव ! आलम्बन की तरह शुक्ल ध्यान की अनु- प्रेक्षाएं भी समझाने की कृपा करें। गुरुदेव-शुक्ल ध्यान की पहली अनन्तः वर्तितानुप्रेक्षा-पहली अनुप्लेक्षा मे शुक्ल ध्यानी जन्म-मरण की अनन्त परम्परा का चिन्तन करता है । प्रत्येक वस्तु की त्रिकालवर्ती अनन्त पर्यायों का चिन्तन अनन्त वर्तितानु- प्रेक्षा है। 1 (२) विपरिणामानुप्रेक्षा-संसार के पदार्थों के प्रतिक्षण विविध म्हापों में परिणमन का चिन्तन करना विपरिणामानुप्रेक्षा है। (३) अशु'भानुप्रेक्षा-संसार कर्म का स्थान है ससार के पौद्गलिक मुख क्षण स्थायी होकर अन्त में दुःख में परिणत होते है । अत: यहां का मुन भी अशुभ है इस प्रकार संसार की अशुभता का चिन्तन करना अशुभानुप्रेक्षा है। (४) अपायानुप्रेक्षा-अशुभ से प्रीति करना दोष और दु.प का कारण है, इस प्रकार का चिन्तन अपायानुप्रेक्षा है। शिष्य-भगवन् ! ध्यानी बाड़ा बातुओं से उपरत रहता है, अत: प्यान के गार घट्ठा तप पुत्सगं कहा है, व्युत्सर्ग का स्वरूप और उसके मेर समझाने की कृपा करें। १४३ - गुरुदेव-पौद्गलिक वस्तुओ के त्याग को व्युत्सर्ग कहते हैं उसके मुख्य २ भेद है-द्रव्य व्युत्सग जोर भाव व्युत्मर्ग । द्रव्य व्युत्सग से वाह्य वस्तुआ का त्याग किया जाना है जो चार प्रकार का है । (१) शरीर व्युत्सर्ग (२) गण व्युत्सर्ग---जिनकल्प जादि के लिए गच्छ का त्याग करना (३) उपधि व्युत्सर्ग और (6) भक्त पान का त्याग । इन चारो का निर्मम भाव से त्याग करना द्रव्य व्युत्सग कहा गया है। शिप्य-भगवन । भाव व्युत्सगं क्या है ? गुरुदेव-भाव व्युत्मर्ग तीन प्रकार का है। जैसे—(१) कपाय व्युत्सर्ग, (२) ससार त्याग, (३) कम व्युत्सग । (१) ग्रोध, मान, माया और लोभ आदि का त्याग करना कपाय व्युत्सर्ग है । (२) कपाय के त्याग से ससार वृक्ष का सिंचन नहीं हाता । फलस्वरूप भव-भ्रमण रुक जाता है, यह ससार त्याग स्प व्युत्मर्ग है । (३) ससार का त्याग कर्म छूटने पर होता है त तीसरा कर्म व्युत्सग कहा गया है । व्युत्सग तप म वाह्य और जाभ्यातर दोनो प्रकार के त्याग का समावेश होता है फिर भी आन्तर त्याग की प्रधानता से यह अन्तिम आन्तरिक तप माना गया है । आन्तरिक तप मन के विकार को नष्ट करन का काम करता है, अत यह विशिष्ट निर्जरा वा साधन है। हर मुमुक्षु को वाह्य तप के साथ आतर तप का भी अवश्य ध्यान रखना चाहिये। निर्जरा बन्धे हुए कर्मा की होती है, अत निजरा के पश्चात् वन्ध को समयना आवश्यक मानकर जागे के प्रकरण मे वन्ध तत्त्व का निस्पण करते हैं। शिष्य-~मगवन ! वध क्या है गुरुदेव-जीव के साथ कम पुद्गला का क्षौर नीरवत् जो सम्बन्ध होता है, इसे बन्ध कहते हैं । . १ १४४ शिष्य-भगवन् ! जीव के साथ कर्म पुद्गलों का सम्बन्ध कैसे होता है ? गुरुदेव-जीव और कर्म के सम्बन्ध को समझने के लिए भगवती सूत्र शतक १३ का एक रूपक द्रष्टव्य है, जैसे कोई दरिया पानी से परिपूर्ण भरा है उसमे दो नौकाएं छोड़ी गईं, एक छिद्र वाली है और दूसरी अछिद्र, छिद्र रहित है। उनमें छिद्र वाली नौका दरिया में धीरे-धीरे पानी से भर जाती है। ऐसे ही संसार रूप दरिया कर्म परमाणु रूप जल से भरा पड़ा है। उसमें जीव रूप नौका राग, द्वेष एवं इच्छा के छिद्र वाली होने से कर्म जल से भर जाती है, इस प्रकार नौका की तरह जीव कर्म जल से व्याप्त हो जाता है । यही जीव के साथ कर्म पुद्गलों के सम्बन्ध की प्रक्रिया है। दूसरी नौका जिसका छिद्र बन्द कर दिया गया है उससे जव संचित जल निकाल दिया जाता है, तब जल रहित नौका दरिया के जल पर तैरने लगती है। इसी प्रकार जीव रूप नौका के इच्छा के छिद्र सर्वथा बन्द कर संचित कर्मों को तपस्या से सुखा कर नष्ट कर दिया जाता है, तब जीव भी कर्म रहित होकर कर्म पुद्गलों पर तैरते रहता है, यही बन्ध मुक्ति का स्वरूप है। शिष्य-गुरुवर ! कर्म बन्ध के मुख्य कारण कितने हैं ? गुरुदेव-कर्म बन्ध के मुख्य हेतु २ हैं-योग और कपाय । तत्त्वार्थ सूत्र में वन्ध के ५ हेतु कहे गये है जो इस प्रकार है (१) मिथ्यात्त्व, (२) अविरति, (३) प्रमाद, (४) कषाय और (५) योग (अशुभ योग)। शिष्य-भगवन् ! कर्म बन्ध के कितने प्रकार हैं ? गुरुदेव-कर्म का बन्ध चार प्रकार से होता है, १४५
जैसे—(१) प्रकृति वन्ध, (2) स्थिति वन्ध, (३) अनुभाग वन्ध और
(४) प्रदेश बन्ध
सम०1४1
१
शिष्य-प्रकृति बन्ध आदि का स्वरूप क्या
कितनी हैं ?
व मूल प्रकृतियां
गुरुदेव-वधने वाले कम परमाणुओ में भिन्न-भिन्न शक्तियो
स्वभावो का पैदा हाना प्रकृति वन्ध है, जो मूल आठ हैं और उत्तर भेदो के
रूप मे १८८ या १५८ होती हैं।
शिष्य-कर्म को मूल आठ प्रकृतियों फौन सी हैं ?
गुरुदेव-कर्म की नाठ मूल प्रकृतियां इस प्रकार हैं-
(१) ज्ञानावरणीय-इसका काम आत्मा के ज्ञान गुण को
आच्छादित करना है।
(२) दर्शनावरणीय-आत्मा के दशन गुण को रोकने वाली
प्रकृति को दशनावरणीय कहते हैं ।
(३) वेदनीय-जिस प्रकृति से साता-असाता की प्राप्ति हो, उसे
वेदनीय कहते है।
(४) मोहनीय-जो आत्मा को सत्-असत् का भान भुलादे, उसे
मोहनीय कहते हैं।
(५) आयुकम-जो आत्मा को शरीर के बन्धन मे रोका रक्खे
उसे आयु कम कहते है।
(६) नाम कम-जिस प्रकृति से आत्मा गति, जाति, शरीर,
सस्थान आदि पर्यायो को प्राप्त करे, उसे नाम कर्म कहते हैं ।
(७) गोन कम-जिस कर्म प्रकृति से जीव ऊँच, नीच समझा
जावे, उसे गोन कम कहते हैं।
.
१४६
(८) अन्तराय-जो कर्म आत्मा के दान, लाभ, भोग, उपभोग और तप आदि कार्य में विघ्न उत्पन्न करे, उसे अन्तराय कर्म कहते है। , ये आठ मूल प्रकृतियों और इनके उत्तर भेद १४८ या १५८ होते हैं इसे प्रकृति बन्ध कहते हैं । कर्म परमाणुओं में ज्ञान गुण को रोकना आदि स्वभाव का होना प्रकृतिवन्ध है, प्रकृति की काल मर्यादा को स्थिति बन्ध कहते हैं । बन्धे हुए कर्मों में न्यूनाधिक फल देने की शक्ति को अनुभाग बन्ध कहते है और जीव के साथ न्यूनाधिक कर्म पुद्गलों का सम्बन्ध होना प्रदेश बन्ध है। इसे सरलता से समझने के लिए एक दृष्टान्त देखिये । जैसे-किसी ने औषधि मिश्रित मोदक बनाया उसमें वातहरण आदि गुण उसकी प्रकृति है, मास या १५ दिन जब तक वह औषधि अपना काम करे वह काल स्थिति बन्ध है । दवा की मात्रा के प्रमाण से उसमें कड़वेपन की मंदता, तीव्रता का होना यह रस है और मोदक का छोटे-बड़े परिमाण में होना यह प्रदेश बन्ध है। ऐसे ही कर्म परमाणुओं में ज्ञान आदि पर आवरण करने का स्वभाव यह प्रकृतिबन्ध है। कर्मों का अपने स्वभाव मे रहने का काल-प्रमाण स्थिति बन्ध और शुभाशुभ फल की तीव्रता, मदता यह रस बन्ध है.---तथा कर्म दलिकों का न्यूनाधिक परिमाण मे होना इसको प्रदेश बन्ध कहते हैं। प्रकृति और प्रदेश का बन्ध योग से होता है, जबकि रम और स्थिति का बन्ध्र कपाय से होता है । जैसा कि कहा है-मिथ्यादर्शनाविरति प्रमाद कपाय योगाः बन्ध हेतवः/८/१/तत्त्वा. । गिम---गुरुदेव ! कर्म के सम्बन्ध में कुछ कर्मों को पाती और कुछ को को भपाती कहा माता है, इसका क्या रहस्य है ? गुरुदेव ने उत्तर में फरमाया-बन्ध की अपेक्षा मभी कम नमान १४७ रूप से आत्मा को बन्धन मे डालने वाले हैं। फिर भी कार्य की अपेक्षा इनमे अन्तर माना गया है। कुछ कम ऐसे हैं जो शरीर और इन्द्रियो पर प्रभावकारी होते हैं, वे जात्मा के मूल स्वभाव मे कोई हानि नही पहुचाते । किन्तु कुछ कर्मों का स्वभाव ऐसा है कि वे आत्मा के गुणो को प्रकट नही होने देने है । अत इनके दो विभाग, कर बताया गया है कि जो आत्मा के ज्ञान, दशन, आदि गुणा की हानि करें के घाती कर्म है और जो शरीर के आकार प्रकार, सुख-दुख जादि के रूप में ही अपना अमर बताने वाले हैं उनको जघाती कम कहते हैं। -- शिष्य--गुरुदेव । घाती हम कितने और कौन-कौन से हैं ? तथा ये किसको घात करते हैं ? - " । .. - गुरुदेव-घाती कम चार प्रकार के हैं, जैसे-(१) ज्ञानावरणीय, (२) दशनावरणीय, (३) मोहनीय, (४) अन्तराय । इन चार कर्मों में (१) ज्ञानावरणाय का काम आत्मा के ज्ञान गुण की घात करना है। (२) दर्शनावरणीय, कर्म, से आत्मा के दर्शन गुण अर्थात् सामान्य बोध की घात होती है।। (३) मोहनीय कम आत्मा के शुद्ध श्रद्धान और विरति भाव स्प चारिन गुण का अवरोध करता है ।। (४) अन्तराय कर्म ज्ञानादि गुणो की आराधना और पालना में विघ्न उपस्थित करता है। 1. ये चार कर्म ज्ञान, 'दर्शन, चारित्र और अनन्त शक्ति रूप आत्मिक गुणो का पात करने वाले होने से घाती माने गये हैं। ये केवल आत्मा को समार मे रोके ही नही रखते किन्तु उसके मूल स्वभाव को भी' प्रकट होने में रुकावट करते हैं। जब तक इनका जोर होता है आत्मा भव - चकमा भ्रमण करती है, पर इन चारो के क्षय होने पर शेष चार अघाती कम सत्ता में रहते हुए भी आत्मा के मूल 11 १४८
स्वभाव में वाधा नहीं देते और निर्वल - होकर अपना काल पूरा करते
हैं । अत: इन्हें अघाती कर्म अर्थात् साधारणकर्म कहा है।
शिष्य-गुरुदेव ! अघाती कर्म कौन से हैं ? और उनका क्या
काम है?
गुरुदेव-अघाती कर्म चार प्रकार' के है। (१) वेदनीय,
(२) आयु, (३) नाम और
(३) नाम और (४) गोत्र
(१) वेदनीय में साता-असाता की प्रतीति होती है, अनुभव
होता है।
(२) आयु कर्म आत्मा को. शरीर में अमुक काल तक रोके
रखता है।
(३) नाम कर्म शरीर के रंग, रूप, लम्बाई, चौड़ाई, शरीर
की सबलता, अनुपादेयता, अमनोज्ञता, और शरीर में शुभाशुभ वर्णादि
उत्पन्न करता है।
4-
(४) गोत्र-कर्म, जाति, कुल, चल आदि से जीव को ऊंच और
नीच कहलाने का काम करता है।
शिष्य-गुरुदेव ! कर्म आत्मा के साथ किन-किन दशाओं में
रहते हैं?
गुरुदेव-आत्मा के साथ बन्धा हुआ कर्म-दल मुन्यत: चार
दशाओं में रहते हैं (१) बन्धा, (२) उदय, (३) उदीरणा और
(४) मता।
वध-आत्मा द्वारा नवीन कर्मों के ग्रहण करने को बन्ध
उदयनारमा के माय बन्धे हा मंदानिकों का अपने को नियन
ममम पर शुभाशुभ प्राद होना उस बनाना है।
१४२
-- . उदीरणा-बन्ध कम-दलिको के नियत समय से पहले ही फल दन को आगे लाना, इसको उदीरणा करते है। मत्ता-बन्धे हुए कर्मों को आत्मा के साथ लगे रहने को सत्ता कहते हैं। शिष्य गुरुदेव ' क्या बन्धे हुए कर्मों में कोई हेर-फेर तथा फल मे न्यूनाधिकता को जा सकती है ? गुरुदेव ने उत्तर दिया आत्मा के साथ कोना बन्ध दो रूप में होता है-(१) अपरिवर्तनीय और (२) परिवतनीय । जपरि- वर्तनीय बन्ध मे कर्मों का फल निश्चत रूप से वन्ध के अनुरूप हो भोगा जाता है। वहाँ कर्म-विपाक को भोगे विना छुटकारा नही होता है । इसमे बन्धे हुए कर्मों का उद्वतन, जपवर्तन और सक्रमण नहीं होता है । इमको निकाचित वन्ध कहते हैं। 1 ऐसे दूसरे परिवतनीय बन्ध में परिणाम विशेप से कर्म की स्थिति व अनुभाग मे उद्वर्तन, अपवर्तन अर्थात् घट-बढ हो सकती कम विपाकोदय के विना प्रदेशोदय से ही निजरित होजर आत्मा से अलग हो जाते है। इसम एक प्रकृति का किसी दूसरी प्रकृति में स्पान्तर जिसे सक्रमण कहा जाता है--- नही होता है । इसे निधत्त वन्ध कहते हैं। शिष्य-गुरुदेव । ज्ञानावरणीय आदि कर्मों को उत्तर प्रकृतियाँ कितनी और कौन-कौन सी हैं ? गुरुदेव ने फरमाया-आठ कर्मों को उत्तर प्रकृतियाँ १४८ या १५८ होती हैं । आठ कम पहले कहे जा चुके है । उनमे एक-एक कर्म की उत्तर प्रकृतियां इस प्रकार है ज्ञानावरणीय की पांच प्रकृतियां है-(१) मति ज्ञान, (२) थ त चान, (३) अवधिज्ञान, (४) मन पर्याय ज्ञान, (५) केवल १५०
-
(
२)
ज्ञान । इन पर जो प्रकृतिर्या आवरण करें वे पाँच हैं, उन्हें मतिज्ञाना-
वरणीय आदि नाम से कहा गया है।
दर्शनावरणीय-कर्म की नौ प्रकृतियाँ है-(१) चक्षुदर्शन,
(२) अचक्षुदर्शन, (३) अवधि-दर्शन और (४) केवल-दर्शन । इन
पर आवरण करने वाली, ढकने वाली चक्षु दर्शनावरणीय आदि चार
प्रकृतियाँ है, तथा निद्रा की पाँच प्रकृतियाँ है। इस प्रकार कुल ९
प्रकृतियां हुई। पाँच निद्राएं इस प्रकार है-
(१) निद्रा-जिस निद्रा में सरलता या सुख से सोए और सुख
से जागे उसे निद्रा कहते हैं ।
निद्रा-निद्रा-जिस नीद में जोर मे चिल्लाने एवं शरीर पकड़
कर हिलाने पर भी जो कठिनाई से जागे उसे निद्रा-निद्रा
कहते है।
(३) प्रचला- जिस कर्म के उदय से बैठे-बैठे या खड़े-खड़े निद्रा
आवे उरो प्रचला कहते है।
(४) प्रचला-प्रचला-चलते-फिरते आने वाली निद्रा को प्रचला-
प्रचला कहते है।
(५) स्स्यानद्धि-जागृत अवस्था मे सोचे हुए काम को निद्रा में
किया जा सके उसे स्त्यानाद्ध निद्रा कहते है। इस निद्रा में
किया हुआ कार्य जागृत अवस्था मे नही किया जा सकता है
क्योकि दस निद्रा के उदय से वासुदेव का आधा बल प्राप्त
होता है।
।
बेनीय--जिरा कर्म से प्राणी सुख-दुःप का अनुभव करे उसे
वेदनीय कर्म कहते हैं। जैसे शहद लगी तलवार को नाटने के नमान
अला मुग और अधिक दुख होता है। इनके दो भद:- (1) माना
बदनीय और, (२) माता वेदनीय । गाता दिनीय मद चाटने ग
१५१
। होने वाले सुख के ममान और असाता वेदनीय तनवार मे जीभ स्टने के दुख के समान जानना चाहिये । मोहनीय मद्य के समान जो कर्म आत्मा को हिताहित का भान मुलावे उसे मोहनीय कर्म कहते है ! मोहनीय कम की मुख्यत दो प्रकृतियां है, दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय । दर्शन मोहनीय की तीन जौर चारिय मोहनीय की पच्चीस इस प्रकार कुल २८ प्रकृतिया होती है । दर्शन मोहनीय की तीन प्रकृतियां ह- (१) समकित मोहनीय-जिसके उदय से सम्यक्त्व गुण पूर्ण निर्मलता को प्राप्त नहीं कर सके उसे समकित मोहनीय कहते हैं । (२) जिस प्रकृति के उदय से श्रद्धा मे दोलायमान हो, अयथार्थ और यथार्थ को समान समझता हो उसे मिथ मोहनीय रहते हैं। (३) मिथ्यात्व मोहनीय—जिस कर्म के उदय से जीव को तत्त्वो के श्रद्धान की यथाथ रुचि न होकर विपरीत श्रद्धान हो, उसे मिथ्यात्व मोहनीय कहते हैं। शिप्य-भगवन् । क्पाय किसको कहते हैं ? गुरुदेव-जो परिणाम मन को कलुपित करे और भव भ्रमण को वढावे उमको कपाय कहते है। शिष्य-भगवन् ! कपाय के कितने प्रकार हैं ? गुरुदेव-पाय चार प्रकार के हैं । (१) क्रोध, (२) मान, (३) माया और (४) लोभ । परिणामो के तीव-मद सक्लेश के कारण गोध आदि चार प्रकार के होते हैं । जैसे—(१) जनन्तानुवधी (२) प्रत्याख्यानी, (३) प्रत्याख्यानावरण और (४) सज्वलन। १५२ शिष्य-भगवन ! अनन्तानुबन्धी आदि कषायों की पहचान क्या स्पष्ट करावें? 1 गुरुदेव-अनन्त अनुबन्ध वाले कलुपित . परिणामों को अनन्तानु- बन्धी कहते है। जिसके तीव्रतम संक्लिष्ट परिणाम पत्थर की दरार के समान प्रयत्न करने पर भी नही मिट पावें उसे अनन्तानुबन्धी कहते है । अनन्तानुबन्धी क्रोध को पर्वत की दरार के समान अमिट कहा है। जो मान वज्र के थंभे के समान, माया वास की जड़ के समान और लोभ किमचीरग के समान प्रयत्न करने पर भी नही मिट पावे उसको अनन्तानुबन्धी समझना चाहिए। अप्रत्याख्यानी प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन के क्रोध आदि में क्रमशः मद, मंदतर, मंदतम परिणामों की संक्लिष्टता होती है । स्थूल रूप से यही अनन्तानुबन्धी आदि की पहचान समझनी चाहिए। अनन्तानुवन्धी आदि चार कपायों में प्रत्येक के ४-४ भेद मिलाकर सव १६ भेद कपाय मोह के होते है। शिष्य-भगवन् ! नो कषाय मोह का क्या स्वरूप है ? और क उसके कितने प्रकार हैं ? गुरुदेव-जो क्रोधःआदि कपायों के साथ रहकर उनको प्रेरित करता हो, बढ़ाता हो उसे नो कपाय मोह कहते हैं । इनके १ प्रकार हैं। जो इस प्रकार है - (१) हास्य, (२) रति, (३) अरति, (४) भय, (५) मोक, (६) जुगुप्सा, (७) स्त्री वेद, (८) पुरुप वेद, और (९) नपुंसक वेद इस प्रकार नो कपाय मोहनीय के १ और कपाय मोहनीय के १६ मिलाकर चरित्र मोहनीय की कुल २५ प्रकृतियां होती है । दर्शन मोहनीय की ३ प्रकृनियां जोड़ने से मोह कर्म की २८ उत्तर प्रकृतियां होती है। १५३
+
,
शिष्य-गुरुदेव । आयु-कर्म किसे कहते हैं, और उसको उत्तर
प्रकृतियां कितनी हैं ?
गुरदेव-जो कर्म जीव को नारक, तिर्यंच, मनुष्य और देव
गति में वन्दीखाने में वन्दी की तरह रोका रखे, उसे आयु कर्म कहते हैं ।
उसके चार प्रकार हैं-(१) नरक आयु, (२) निर्यच आयु, (३) मनुप्य वायु
और (४) देव आयु।
शिष्य-गुरुदेव ' नाम कर्म किसे कहते हैं और उसकी कितनी
प्रकृतियां हैं ?
गुरुदेव । जिस कर्म के उदय से जीव को गति, जाति, शरीर
आदि विविध पर्यायो की प्राप्ति हो उसे नाम कर्म कहते हैं। नाम कम
के अपेक्षा से ४२, ६५, ९३ और १०३ भेद कहते है । वे इस प्रकार हैं-
पिंड प्रकृति के १४, प्रत्येक प्रकृति के ८, अस के १० और स्थावर के
१०, ४० भेद हुए। इनमें १४ पिंड प्रकृति के भेद व उपभेद इस
प्रकार हैं-
(१) गति-गति के चार भेद हैं-(१) नरक, (२) तियंच, (३) मनुष्य
और ४) देवगति।
(२) जाति-जाति के पाच भेद हैं—(१) एकेन्द्रिय, (२) वेइन्द्रिय,
(३) तेइन्द्रिय, (४) चतुरिन्द्रिय और (५) पचेन्द्रिय ।।
(३) शरीर-शरीर नाम के पांच भेद हैं-(१) जौदारिक,
(२) वैश्यि, (३) आहारक,
(४) तेजस और (५) कार्मण
।
यो कुल
शरीर।
(४) अगोपांग-अगोपाग नाम के ३ भेद हैं-(१) औदारिक
जगोपाग, (२) वैनिय अगोपाग, (३) आहारक अगोपाग ।
१५४
(५) बन्धन-बन्धन नाम के पाँच भेद है-(१) औदारिक बन्धन, (२) वैक्रिय बन्धन, (३) आहारक बन्धन, (४) तैजस वन्धन और (५) कार्मण बन्धन । (६) संघातन-संघातन नाम के ५ भेद हैं। औदारिक संघातन आदि पांचों शरीर के पाच संघातन है । (७) संहनन--संहनन के ६ भेद हैं--(१) वच ऋपभ नाराच संहनन, (२) ऋपम नाराच संहनन, (३) नाराच, (४) अर्द्ध नाराच संहनन, (५) कीलिका संहनन और (६) सेवात संहनन । (5) संस्थान संस्थान नाम के ६ भेद हैं--(१) सयचतुरस्त्र संस्थान, (२) न्यग्रोध परिमंडल सस्थान, (३) सादि संस्थान, (४) वामन संस्थान, (५) कुब्जक संस्थान, और (६) हुडक संस्थान । (९) वर्ण-वर्ण नाम के पाँच भेद है-(१) काला, (२) पीला, (३) नीला, (४) लाल और (५) सफेद । (१०) गंध-~-गंध नाम के २ भेद हैं--(१) सुगन्ध और (२) दुर्गन्ध । (११) रस-~-रस नाम के ५ भेद हैं--(१) तीखा, (२) कडुवा, (३) कसला, (४) खट्टा और (५) मीठा । (१२) स्पर्श-स्पर्श नाम के ८ भेद हैं-(१) गुरु, (२) लघु, (३) मृदु, (४) खर, (५) शीत, (६) उष्ण, (७) स्निग्ध, और (८) रूक्ष । (१३) भानुपू:----आनुपूर्वी नाम के ४ भेद हैं-(१) नरकानुपूर्वी, (२) तिथंचानुपूर्वी, (३) मनुष्यानुपूर्वी और (४) देवानु- पूर्वी। (१८) बिहायोगति -विद्यायोगति नाम मे २ भेद हैं-(१) शुभ निहायोगान और (२) अनुन पिहायोगनि । १५५ -- - इस प्रकार पिंड प्रति के कुल ६५ भेद होते हैं । शिष्य-गुरुदेव ' अपने पिंड प्रकृतियो के ६५ भेद बतलाये, उनका अर्थ समझाने की कृपा करें। गुरुदेव ने फरमाया-चार गति और पांच जातियों का स्वरूप प्रसिद्ध है, अत उनको परम्परा के अनुसार समझ सकते है। शरीर नाम कम का अर्थ है जो प्रतिक्षण जीर्ण हो, शीण हो उमे शरीर कहते है । वह पाच प्रकार का होता है। औदारिक शरीर-जो शरीर हाड मास, रक्त आदि से बना हो, जो जलाया व ठेदन-भेदन किया जा सके तथा जीव के निकलने पर भी कलेवर रूप से पड़ा रहता हो, उसे औदारिक शरीर कहते हैं। यह शरीर मनुष्यो और तिर्यचो में होता है । -वैफिय शरीर-जिसमे विशेष क्रिया को जावे और शरीर से जीव के निकलन पर देह के परमाणु कपूर की तरह विखर जावे । उसे वैक्रिय शरीर कहते है यह देव नारक मे जन्म सिद्ध होता है । आहारक शरीर-चवदह पूर्व धारी मुनि अपनी शका को निवारण करने के लिए आहारक समुद्घात द्वारा अपने शरीर से एक हाथ का पुतला निकालकर तीर्थकर या केवली के पास भेजे और जिसके माध्यम से उत्तर प्राप्त करे उस शरीर को आहारक शरीर कहते हैं । यह तीर्थंकर से उत्तर पाकर मुनि के पास पहुंचता है और मूल शरीर में विलीन हो जाता है । तंजस शरीर-जिसके द्वारा गाये हुए भोजन की पाचन क्रिया हो-और जिससे तेजोलेश्या-नधि प्रकट हो उस तेजस, शरीर कहते है। कार्मण शरीर-जिम शरीर से जीव अपने उत्पत्ति काल में साहार ग्रहण करे और जो चतगति मसार म भ्रमण करावे जो कर्मों का पुज हा उमे कामण शरीर कहते है। ये दोनो अन्तिम शरीर समस्त ससारी जीवा के होते है। १५६ - --
अंगोपांग-जिस कर्म के उदय से हाथ, पैर, सिर आदि अग
और अंगुली आदि उपांग प्राप्त हों। पोर अगुलियो की रेखा एवं पर्यो
को अंगोपांग कहते है। प्रथम के तीन शरीरो मे ही अंगोपांग होते है अतः
अंगोपाग नाम के तीन भेद किये है।
बधन नाम-जिस कर्म के उदय से पहले से गृहीत शरीर
पुद्गलों के साथ नवीन पुद्गलों का बंध हो उसे बंधन नाम कहते है ।
औदारिक आदि पाँच शरीरों के अनुरूप इसके पाँच भेद है । । ।
-
.
A
पाच
-
-
संघातन नाम---यह ग्रहण किए हुए पुद्गलो को यथा स्थान
व्यवस्थित रूप से स्थापन करता है। यह भी औदारिक आदि .
प्रकार का है।
संहनन नाम-शरीर की अस्थि रचना को सहनन , नाम कहते
हैं । वह ६ प्रकार का है । यथा-(१) वज्रऋषभ नाराच (२) ऋषभ
नाराच (३) नारान (४) अर्द्ध नाराच (५) कीलक और (६) गेवात ।
बञऋषम नाराच-शरीर में रही हुई दो अस्थियों । के ऊपर
पट्टा होने को अपभ, ऊपर नीचे मर्कट बंध को नारान और पट्टी पर
बचमय कीलिका तो वन कहा गया है।
(१) जिस शरीर में दोनों अस्थियों पर दृढ़ कीले हो वैसे अस्थि
बंध की रचना को वचनपभ नाराच संहनन कहते है।
(२) जिन शरीर में वन की कीलिका को छोड़कर भागा और
मट बब हो उसे ऋषभ नाराज मंहनन कहते है।
(३) जिस गरीर में बस और पभ को ब्रोकर केवल मट
बंध हो मे नारान संहनन कहते है।
१५७
(४) जिस शरीर में स्थियो पर ऊपर नीचे वधन न होकर
केवल एक ओर मकंट वधन हो उसे अर्द्ध नाराच कहते हैं ।
(५) जिस शरीर में कीलक युक्त अस्थि बधन हो, उसे कीलक
सहनन कहते है।
(६) जिस शरीर में कीलक आदि कुछ मी न होकर मान
अस्थियां हो ऐसे शिथिल शरीर वधन को सेवात्त कहते हैं ।
इनमे आगे-आगे के सहनन मे स्मश
शारीरिक बल और
अस्थि रचना की मजबूती मे कमी मानी गई है।
सस्थान–शरीर के आकार को संस्थान कहते है, यह ६ प्रकार
का है यथा-(१) समचतुरस्र (२) न्यग्रोध परिमडल (३) सादि (४) वामन
(५) कुब्जक और (६) हुडक ।
(१) समचतुरस्र सस्थान--पालकी आसन से बैठे हुए को
दाहिने कधे से वायें घुटने तक और वायें कधे से दाहिने घुटने तक और
दोनो घुटनो और स्कन्धो का अन्तर मापने से समान हो अथवा जो शरीर
ऊपर और नीचे के अवयव लक्षण प्रमाण सहित हो, उसे समचतुरस्र संस्थान
कहते हैं।
(२) न्यग्रोध परिमण्डल सस्थान-जो शरीर वट वृक्ष की तरह
ऊपर से विस्तार युक्त और नीचे से सकुचित हो, उसे यग्रोध परिमण्डल
सस्थान कहते हैं।
(३) सादि सस्थान-जिस शरीर में नाभि से नीचे क अग
प्रमाणोपेत हो और ऊपर के अग प्रमाण से हीन हो, उसे सादि सस्थान
कहते हैं।
(४) वामन सस्थान-जो शरीर वामने आकार का हो, उसे
वामन सस्थान कहते है।
१५६'
. (५) कुन्न संस्थान-जिस शरीर की आकृति कुबड़े रूप में हो, जिसकी छाती आगे निकली हुई हो, उसे कुब्ज संस्थान कहते हैं । (६) हुँडक संस्थान--जिसका पूरा शरीर प्रमाण रहित हो सभी अवयव बेडोल आकृति के हों उसे हुडक संस्थान कहते हैं । वर्ण-जिस कर्म के उदय से शरीर में कृष्ण, नील आदि वर्ण हो उसे वर्ण नाम कहा है। गंध-जिस कर्म से शरीर में शुभाशुभ गंध की प्राप्ति हो उसे गंध नाम कहते है। रस---जिग कम से शरीर के पुद्गल तिक्त, कटु, आदि रस रूप मे हों उसे रस नाम कहते है । स्पर्श -शरीर में कर्कश, मृदु, गर्म, ठंडा आदि स्पर्श वाले अंग- प्रत्यंगों का होना स्पर्श नाम है । अपेक्षाकृत वर्णादि में शुभ और अशुभ माने गये है। शुभ वर्ण, गंध, रस और स्पशं शुभ नाम कर्म के उदय से और अशुभ वर्ण, गंध, रस और स्पर्श अशुभ नाम कर्म के उदय से माने गये है । व्यवहार मे कृष्ण और नील वर्ण, गंध में दुरभि गंध, रस में तिक्त और कटु तथा स्पर्श खुरदरा भारी, लूखा और ठंडा, इनको अशुभ प्रकृतियों के रूप से माना गया है । इमे सामान्य कथन समझना चाहिये। विशेष रूप से कृष्णादि सभी वर्ण, गंध, रस, स्पर्श शुभ भी होते है। जैसे आख का तारा व निरके बाल काले होकर भी शुभ हैं। इनका धोला (सफेद) होना अशुभ माना जाता है। इस प्रकार वर्ण, गंध, रस, और वर्ण की सभी प्रकृतिया शुभ और अशुभ दोनों प्रकार की मानी गई है। भानुपूम्यों नाम कम-बल की नाय के समान, समश्रेणी से वक्र गति में जाते हुए जीव को उत्पत्ति स्थान की ओर मोड़ कर उस स्थान - १५९ - पर पहु चावे उसे आनुपूर्वी नाम कर्म कहते है। यह विग्रह गति में वक्र गति से जाने वाले जीव को ही हाता है । (क्याकि जीव समश्रेणी से जब आगे बढने लगता है तब उसको उत्पत्ति स्थान की ओर मोडने मे आनुपूर्वी नामकर्म अपना काम करता है ।) आनुपूर्वी नाम कर्म चार प्रकार का है। यया-(१) नरकानुपूर्वी (२) तियंचानुपूवा (३) मनुष्यानुपूर्वी और (४) देवानुपूर्वी । विहायोगति नाम मं—यह दा प्रकार का है । (6) शुभ विहायोगति और (u) अशुभ विहायोगति- (१) जिस कर्म के उदय से जीव हायी, बैल, हस के समान शुभ गति वाला हो उसे शुभ विहायोगति नाम कहते है । (२) जिस कर्म के उदय से जीव श्वान, गधा और ऊट के समान अशुभ गति वाला हो उसे अशुभ विहायोगति नाम कहते है । पिण्ड प्रकृतियो के अन्तर्मेद सब मिलाकर ६५ समझाये गये है। इनम पाठ प्रत्येक प्रकृति और उस दशक और स्थावर दशक इन २८ प्रकृतियो को मिलाने से ८३ भेद नाम कम की प्रकृतियो के होते है । शिष्प-गुरुदेव ' २८ प्रकृतियाँ कौन सी हैं और उनका क्या 'स्वरूप है? गुरुदेव-२८ प्रकृतियो में पहले ८ प्रत्येक प्रतियो का वर्णन किया जा रहा है जो इस प्रकार है- (१) पराघात नाम-जिस कर्म के उदय से जीव अपनी शारी- रिक बल और ओज से दूसरों को पराभूत कर सके उसे पराघात 'नाम कहते हैं। (२) उच्छवास नाम जिस कर्म के उदय से जीव वामो- च्छवास वर्गणा के पुद्गलो को ग्रहण कर छोड़ने का सामर्थ्य प्राप्त करता है उसे उच्छवास नाम कहते है। है . है - १६० and- (३) आतप नाम-जिस कर्म के उदय से जीव का शरीर स्वयं उप्ण नहीं होते हुए भी दूसरों के लिए तापयुक्त हो उसे आतप नाम कहते हैं। आतप नाम कर्म का उदय सूर्य मण्डल की तरह पृथ्वीकाय के जीवों को होता है। . . (४) उद्योत नाम-जिस कर्म के उदय से जीव का शरीर शीतल प्रकाश उत्पन्न करता हो उसे उद्योत नाम कहते हैं जैसे चन्द्र मण्डल, नक्षत्र, तारक, जुगनू और पार्थिव शरीर में उद्योत नाम कर्म का उदय माना गया है। (५) अगुरुलघु नाम-जिस कर्म के उदय से जीव का शरीर न हल्का न भारी होता है, उसे अगुरुलघु नाम कर्म कहते हैं । (६) निर्माण नाम-जिस कर्म के उदय से शरीर के अंगोपांगों का सूत्रधार के समान यथोचित स्थान में व्यवस्थापन किया जाय उसे निर्माण नाम कर्म कहते हैं। (७) उपघात नाम-जिस कार्य के उदय से अपने शरीर के अंगो- पाग चोर दांत की तरह अपने लिए पीड़ाकारी हो उसे उपघात नाम कर्म कहते हैं। (5) तीर्थकर नाम-जिस कर्म के उदय से जीव तीनों लोकों में पूजनीय हो और धर्म तीर्थ की स्थापना करे उसे तीर्थकर नाम कर्म कहते हैं। इसका उदय कैवल्य दशा में ही होता है। ये आठों प्रकृतियां प्रतिपक्ष रहित होने से प्रत्येक प्रकृति कह- लाती है। बस आदि दस प्रकृतियां- (१) बस नाम-जिस कर्म के उदय से जीव वेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय रूप से असनशील अर्थात् गतिशील शरीर १६१
।
प्राप्त करे, जो एक स्थान से दूसरे स्थान को स्व-प्रयल से जा सके उसे नस
नाम कर्म कहते हैं।
(२) बादर नाम-जिस कर्म के उदय से जीव को यादर काय की
प्राप्ति हो, उमे वादर नाम कर्म कहते हैं।
(३) पर्याप्त नाम-जिस कर्म के उदय से जीव अपनी योग्य
पर्याप्तियो से युक्त हो, उसे पर्याप्त नाम कहते हैं।
(४) प्रत्येक नाम -जिस कम के उदय से जीव को पृथक-पृथक
शरीर की प्राप्ति हो उसे प्रत्यक नाम कम कहते हैं ।
(५) स्थिर नाम -जिस कर्म के उदय से दात, अस्थि मादि शरीर
के अग स्थिर हो अर्थात दृढ हो उसे स्थिर नाम कर्म कहते हैं ।
(६) शुभ नाम-जिस कर्म के उदय से शरीर के आख, कान,
नासिका और सिर आदि अग पूर्ण व शुभ हो उसे शुभ नाम कर्म
कहते है।
(७) सुमग नाम जिस कम के निमित्त से जीव सव प्रिय हो
उसे सुभग नाम कम कहते है ।
(८) सुस्वर नाम-जिस कर्म के उदय से प्राणी का स्वर मधुर
और इष्टकारी हो, उसे सुस्वर नाम कर्म कहते हैं
(९) आदेय नाम-जिस कम के उदय से जीव का वचन
सर्वमान्य
हो उसे आदेय नाम कम कहते हैं।
(१०) यश कीर्ति नाम-जिस कर्म के उदय से जीव की यश
कोति फैले यशकीति नाम कर्म कहते है।
अस दशक की तरह स्थावर को भी दश प्रकृतिया है जो इस
प्रकार हैं-
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(१) स्थावर नाम-जिस कर्म के उदय से जीव का शरीर स्थिर हो, एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की सामर्थ्य रहित हो उसे स्थावर नाम कर्म कहते हैं। (२) सूक्ष्म नाम-जिस कर्म के उदय से जीव का शरीर सूक्ष्म हो, इन्द्रिय ग्राह्य नही हो उसे सूक्ष्ग नाम कर्म कहते है। (३) अपर्याप्त नाम-जिस कर्म के उदय से जीव अपनी योग्य पर्याप्तियों को पूर्ण न करे तब तक उसे अपर्याप्त नाम कर्म कहते है । (४) साधारण नाम-जिस कर्म के उदय से प्रत्येक जीव का पृथक् शरीर न होकर अनन्त जीवों का एक ही शरीर हो उसे साधारण नाम कर्म कहते हैं। ऐसे जीवों का जन्म, मरण, आहार और श्वास आदि संयुक्त रूप से एक साथ होता है। (५) अस्थिर नाम-जिस कर्म के उदय से जीव को जिह्वा, कान आदि अस्थिर अवयव प्राप्त हों उसे अस्थिर नाम कर्म कहते हैं। (६) अशुभ नाम-जिस कर्म के उदय से शरीर के अंग अशुभ हों उसे अशुभ नाम कर्म कहते हैं। (७) दुभंग नाम-जिस कर्म के उदय से जीव उपकार करते हुए भी अशुभ लगे उसे दुर्भग नाम कर्म कहते हैं। (८) दुःस्वर नाम-जिस कर्म के उदय से जीव का स्वर कर्कश और वाणी अप्रिय प्रतीत हो उसे दुःस्वर नाम कर्म कहते हैं। (९) अनादेय नाम-जिस कर्म के उदय से प्राणी की अच्छी बात भी दूसरों को अच्छी नहीं लगे, ग्राह्य नहीं हो सके उसे अनादेय नाम कर्म कहते हैं। (१०) अपरा:कीर्ति नाम-जिस कर्म के उदय से जीव लोक में अपकीति प्राप्त करे, उसे अयश:कीति नाम कर्म कहते हैं।
- इस पफार ८ प्रत्येक प्रकृति, १० स नाम प्रकृति और १० स्थावर नाम प्रकृति कुल २८ प्रकृति में पूर्गत ६५ पिण्ड प्रकृति मिल कर नाम कर्म की ९३ प्रक्रतिया होती है और इनमे बन्धन की १० प्रकृतियो और मिलाने से १०३ प्रकृतिया हो जाती है। तथा प्रकारान्तर से उपर्युक्त २८ प्रकृतियो के माथ १८ पिण्ड प्रतिया मिलाने से नाम कर्म की ४२ प्रकृतिया भी गिनी जाती हैं। जन साधारण मे जो वालक के जन्मकाल से छठे दिन विधाता जी के लेख लिखने की धारणा चलती है, वह भ्रान्त है । जैन शास्न यह बतलाता है कि जीव ही अपना र्ता-धर्ता है उसके शुभाशुभ को लिखने के लिए किसी अय देवी देव की कल्पना की आवश्यकता नहीं है । आत्मा के शुभाशुभ कर्म के अनुमार उमके शुभाशुभ फल इसी नाम कर्म के द्वारा सम्पन्न किय जाते हैं । इसी को एक प्रकार से विधाता कह सकते हैं। शिष्य-भगवन् ! मनुष्य समाज मे कोई ऊँचा और कोई नीचा कहा जाता है इसका क्या कारण है ?' गोत्र कर्म क्या है ? और उसके कितने भेद हैं ? स्पष्ट करने की कृपा गुरुदेव ने फरमाया-जैन धर्म मे जन्म से ऊंच-नीच की व्यवस्था वास्तविक नहीं मानी गई है। गोन कम की व्यारया मे मुस्यता से मातृप की उज्ज्वलता को उच्च कुल और उसकी होनता अर्थात् सदोपता को नीच कुल कहा गया है। जिसके द्वारा जीव उच्च-नीच कहा जावे उमे गोत्र कर्म कहते हैं । ठाणाग सूत्र मे गोन कर्म के दो प्रकार किये हैं--(१) उच्च गोन और (२) नीच गोन । वृत्तिकार ने व्याख्या करते हुए कहा है-पूज्यो पूज्योऽ यमित्यादि व्ययदेश रूपा गावाच नायते इति गोवम् (स्थानाग २-४) अर्थात् । १६४ - जिससे जीव पूज्य अपूज्य अथवा प्रशंसात्र और निंदापात्र कहा जावे, वहे गोत्र कर्म है। उत्तराध्ययन सूत्र के ३३वें अध्याय में कहा है- गोयं कम्मं तु दुविहं उच्च-नीयंच आहियं । उच्चं अट्ठविहं होई, एवं नीयं पि आहियं ॥१४॥ अर्थात् गोत्र कर्म दो प्रकार का है-(१) ऊँच गोत्र और (२) नीच गोत्र । ऊंच गोत्र के आठ प्रकार है, ऐसे ही नीच गोत्र को भी समझना चाहिये । यहाँ सूत्रकार ने गोत्र कर्म के दो प्रकार बतलाकर ऊँच गोत्र और नीच गोत्र को आठ-आठ प्रकार का कहा है। इससे केवल जाति विशेष में जन्म पाने से ही उच्च और नीच नहीं होता, किन्तु आठ वातों की विशेपता से उच्च और आठ बातों की हीनता से नीच बतलाया गया है । इसी बात का समर्थन करते हुए उत्तराध्ययन सूत्र के १२ अध्याय गाथा ३७ में कहा है। "सक्खं सु दीसई, तवो विसेसो, न दीसई जाइ विसेस कोई" ॥३७|| अर्थात् प्रत्यक्ष में तप की विशेपता देखी जाती है, जाति की विशेषता नहीं देखी जाती। शिष्य-गुरुदेव ! उच्च गोत्र के आठ प्रकार बतलाये हैं वे कौन से हैं ? गुरुदेव ने फरमाया-उच्च गोत्र के आठ प्रकार, इस प्रकार है- (१) जाति सम्पलता (२) कुल सम्पन्नता (३) बल सम्पन्नता (४) रूप सम्पन्नता (५) तप सम्पन्नता (६) श्रुत सम्पन्नता (७) लाभ सम्पलता और (6) ऐश्वर्य सम्पन्नता। जाति, कुल आदि आठ प्रकार के मद स्थानों का सेवन नही करने से जाति, कुल आदि आठ की सम्पन्नता प्राप्त होती है । यही १६५ उच्च गोत्र है । जाति आदि का गवं करने से इन आठौ की हीनता मिलती है यही नीच गौत्र हैं । ठाणाग वा समवयाग दवा शिप्य-गुरुदेव ! आपने आठ प्रकार के मद कहे हैं वे कौन गुरुदेव ने फरमाया-ठाणाग सूप मे आठवें ठाणे म आठ प्रकार के मद कहे हैं-अट्ठ मय ठाणा पण्णत्ता त जहा जाइमए, कुलमए, वलमए, रुवमए, तवमए, सुयमए, लाभमए इस्सरियमए ।।६।। अर्थात् विशिष्ट जाति एव कुल में उत्पन्न होने का मद करना, वल-शक्ति को अधिकता का मद करना, रूप शरीर की सुदरता का मद करना, तप का मद करना, श्रत ज्ञान का मद करना, लाभ प्राप्ति का मद करना तथा-ऐश्वर्य प्राप्ति का मद करना। इन आठ मदो के सेवन से नीच गोग का वध होता है । इस प्रकार परिणामो के अनुसार उच्च गोत्र और नीच गोग की प्राप्ति होती है। शिष्य-गुरुदेव अन्तराय कर्म का क्या स्वरूप है ? और इसके कितने भेद हैं ? जिस कम के उदय से जीव को अपने इष्ट काय की सिद्धि व फ्ल प्राप्ति मे वाधा उत्पन्न हो, (चाहते हुए भी जिसके निमित्त से जीव अपना काय नहीं कर सके) उसे अन्तराय कम कहते हैं। इसके मुख्य पांच भेद हैं---- जैसा कि कहा है-दाणे, लाभे य, भोगे य, उवभोगे वीरिए तहा । उत्तराध्ययन मूत्र का ३३वा अध्याय गाथा १५ अर्थात्-(१) दान (२) लाभ (३) भोग (४) उपभोग और (५) वीर्य उपरोक्त पाचो में बाधा होना अन्तराय का प्रकार है । इनके अतिरिक्त तप, ध्यान और श्रुत पठन आदि के अन्तरायो को ध्यानान्तराय आदि रूप से स्वय समझ लेना चाहिये। इस प्रकार पाठ कर्म की १४८ उत्तर प्रकृतिया कही गई हैं।
मोक्ष मोक्ष-बन्ध से सर्वथा छूटने का नाम ही मोक्ष है। जैसा कि कहा है- "कृत्स्नकर्मक्षयो मोक्ष" अर्थात् सम्पूर्ण कर्मों का क्षय ही मोक्ष कहलाता है । इसलिए बन्ध तत्त्व के बाद मोक्ष का विचार किया जाता है। शिष्य ने जिज्ञासा भरे शब्दों में पृच्छा को--भगवन् ! पिछले प्रकरण में बन्ध का स्वरूप और उसकी उत्तर प्रकृतियों का परिचय प्राप्त हुआ । अब यह बतलाइये कि जीव का इस कम जन्य बन्ध से छुटकारा कैसे होता है, कर्म बन्ध से छूटने के क्या उपाय हैं ? गुरुदेव ने कहा-संवर और निर्जरा धर्म की सम्यग् आराधना से जीव कर्म जन्य अनादिकालीन पराधीनता और बन्ध से मुक्त होता हैं । तत्वार्थ सूत्र में भी कहा है- "बन्धहेत्वभावनिराम्यां कृत्स्नकर्मक्षयो मोक्षः" (तत्त्वार्थ १०/२-३) अर्थात् सर्वथा वन्ध हेतुओं के अभाव और निर्जरा से सर्वथा भावेन कर्म से आत्मा का छूटना ही मोक्ष है। कर्म वन्ध से छूटने के चार उपाय हैं। जैसे-सम्यक्तान, सम्यग्दर्शन, सम्यकचारिम और सम्यगतप । तस्वा मुत्र में तप का चारित्र में समावेश करके तीन उपाय भी बताये हैं - १६७ "सभ्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्राणि मोक्ष मार्ग" अर्थात् सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित ही मोक्ष का मार्ग है। शिप्य-कम मुक्त आत्मा को किस नाम से पुकारा जाता है ? गुरुदेव-मुक्त आत्मानो को सिद्ध, वुद्ध आदि अनेक शब्दा मे अभिहित किया जाता है। जैसा कि कहा है "सिद्ध ति य बुद्ध ति य पारगय ति य परम्पर गय ति।" उम्मुक्फ कम्म कवया अजरा अमरा असा य ॥२०॥ उक्वाई ॥२॥ सिद्ध-बुद्ध-पारगत, परम्पर गत, उन्मुक्त, अजर, अमर और असग आदि मुक्तात्माओ को अनेक नामो से पुकारा जाता है । फम बन्ध से छुटकारा पाने पर आत्मा को क्या स्थिति होती है गुरुदेव-कम बन्ध से छूट जाने पर आत्मा सिद्ध, बुद्ध, मुक्त और तन-मन इन्द्रियो से रहित अशरीरी, अरूप हो जाता है। वह शुद्ध आत्मा. भाव अथात ज्ञान दशन आदि स्वभाव में लोन रहता है। असरीरा जीव धणा, उवउत्ता दसणे य नाणे । सागार उणागार लक्खण मेय तु सिद्धाणा ।। अर्थात् मुक्त जीव शरीर रहित चैतन्य धन और ज्ञान-दशन उपयोग वाले होते हैं। वे शुद्ध आत्मा भाव मे ही स्थित होते हैं । ससारी जीव की तरह उनको जन्म, मरण और वृद्धावस्था के कष्ट नहीं होते। शिष्य-भगवन् । कम से मुक्त हो जाने पर जीव की गति कसे होती है ? शिष्य-भगवन् ? । - H १६८ गुरुदेव-मुक्तात्मा का स्वभाव ऊर्ध्वगमन करने का होता है और ऊर्ध्वगमन ऋजुगति से होता है। जैसे धुआं ऊपर की ओर जाता है वैसे मुक्तात्मा लोकाग्र की ओर गति करती है। कुम्भकार का चक्र, धनुप से छोड़ा बाण, मूग आदि की सूखी हुई फली से उछले हुए वीज की तरह मुक्तात्माओं की गति मानी गई है । ईधन से निकला हुआ धुआँ, तथा बन्दूक से छोड़ी गई गोली के समान मुक्तात्मा पूर्व प्रयोग से अवं गति कर लोक के अग्र भाग पर जाकर स्थित होती है। शिष्य--भगवन् ! मुक्तात्मा लोकाग्र तक ही क्यों जाती है, आगे अलोक में क्यों नहीं जाती ? गुरुदेव-जीव के गति करने में धर्मास्तिकाय का सहकार होता है। जल के विना भूमि पर मछली गति नही कर सकती उसी की तरह मुक्तात्मा धर्मास्तिकाय शून्य प्रदेश में गति नही कर पाती। आकाश के अतिरिक्त धर्मास्तिकाय आदि शेप द्रव्य लोक में ही सीमित रहते हैं । अलोक में नहीं होते। अतएव धर्मास्तिकाय के अभाव में मुक्तात्माओं का लोक के बाहर गमन नहीं होता। शिष्य--भगवन् ! मोक्ष के अधिकारी जीव या अजीव कौन होते हैं ? क्या सभी जीव मुक्त हो सकते हैं ? गुरुदेव-कर्म बन्ध जीव के ही होता है, अजीव के नहीं इसलिये मोक्ष का अधिकारी भी जीव ही होता हे अजीव नहीं। जीवों के भव्य और अभव्य दो प्रकार के जीव होते हैं। उनमें भव्य ही मोक्ष के अधिकारी होते हैं अभव्य नहीं । क्योकि अभव्य में मुक्ति प्राप्त करने की योग्यता नहीं है। अत: वे मुक्ति के अधिकारी नहीं होते। शिष्य--भगवन् ! मुक्तात्माओं के सम्बन्ध में शास्त्र में और फिस प्रकार से विचार किया गया है ? १६९ गुरुदेव-मुक्तात्मा जिनको सिद्ध भी कहते है, के सम्बन्ध में उत्तराध्ययन और ओपपातिक सूत्र मे चार प्रश्न दिये हैं और उनके उत्तर के माध्यम से सिद्धो का स्वरूप बताया गया है। प्रश्नोत्तर का क्रम इस प्रकार है--(१) सिद्ध कहाँ जाकर के रुके रहते हैं ? (२) कहाँ अवस्थित हैं ? (2) शरीर का त्याग कहाँ करते हैं और (6) किस जगह सिद्ध होते हैं ? उत्तर में कहा गया है-मिद्ध परमात्मा बलोक से लग कर रुके है, लोक के अग्र भाग में अवस्थित है मनुष्य लोक में शरीर का त्याग कर लोक के अग्र भाग मे जाफर सिद्ध हुए हैं जैसा कि कहा है- अलोए पडिह्या सिद्धा, लोयग्गे य पइट्ठिया। इबोदि चइत्ताण तत्य गतूण सिज्झई ॥उत्तराध्य ३६५६ शिष्य-भगवन् । मुक्त जीव कहां, किस रूप में और एक समय मे कितने सिद्ध होते हैं गुमदेव-जन शास्त्र मे सिद्धो के १५ भेद बताये गये हैं । जो इस प्रकार हैं- (१) तीर्थकर सिद्ध तीर्थकर पद की प्राप्ति करके सिद्ध होने वाले, तीर्थकर सिद्ध कहलाते हैं जैसे भगवान् ऋषभदेव आदि । (२) जतीर्थकर सिद्ध-सामान्य केवली पद से सिद्ध होने वाले-जैसे गोतम, पुण्डरीक आदि । (३) तीथ सिद्ध-चतुर्विध तीर्थ सघ की स्थापना के पश्चात् सिद्ध होने वाले जसे-~गौतम आदि । ? १७० (४) अतीर्थ सिद्ध तीर्थ स्थापना के पहले या तीर्थ का विच्छेद होने के वाद, सिद्ध होने वाले राग द्वेष पर विजय प्राप्त कर सिद्ध होने वाले-जैसे मरुदेवी आदि । (५) स्वयं बुद्ध सिद्ध-जाति स्मरण आदि ज्ञान से पूर्व जन्म जानकर विना उपदेश के ही स्वयं साधना से सिद्ध होने वाले-जैसे कपिल आदि । (६) प्रत्येक बुद्ध सिद्ध-वृक्ष-चूड़ी आदि किसी एक निमित्त को पाकर स्वयं दीक्षा लेकर सिद्ध होने वाले-जैसे करकडू राजा भादि। (७) बुद्ध बोधित सिद्ध-गुरु आदि के उपदेश से प्रतिबोध पाकर सिद्ध होने वाले-जैसे जम्बू स्वामी आदि । (८) स्त्री लिंग सिद्ध-वेद का क्षय करके जो स्त्री के शरीर से सिद्ध होते है-जैसे मरुदेवी माता आदि । (९) पुरुष लिंग सिद्ध-पुरुप शरीर से राग द्वेप का क्षय करके सिद्ध होने वाले जैसे-सुधर्मा स्वामी आदि । (१०) नपुंसक लिंग सिद्ध नपुंसक शरीर से वीतरागता प्राप्त कर सिद होने वाले-जैसे भीष्म आदि । (११) स्वलिंग सिद्ध-रजोहरण मुख वस्त्रिका आदि जैन वेश से वीतरागतापूर्वक सिद्ध होने वाले-जैसे जैन साधु । (१२) अन्य लिंग सिद्ध-तापस, परिव्राजक आदि के वेश में वीतरागता पूर्वक सिद्ध होने वाले-जैसे वल्कल चीरी आदि । १७१ (१३) गृह लिंग सिद्धगृहस्य के वैश मे भावना को प्ररलता से वीतरागता प्राप्त कर सिद्ध होने वाले-जैसे मरुदेवी आदि । (१४) एक मिद्ध-एक समय म एक सिद्ध होने वाले-नमे भगवान महावीर स्वामी आदि। (१५) अनेक सिद्ध-एक समय म २ से लेकर १०८ तक मिद्ध होने दाले–जसे भगवान ऋपम देव आदि । शिष्य-भगवन् । जीव किस काल, क्षेत्र और लिंग से आत्मा मुक्त होता है इस सम्बध मे जी शास्त्र का क्या विचार है ? गुरुदेव- जैन शास्त्र किसी एक देश-जाति-कुल या वेश म साधना को मीमित नहीं मानता। जैन धम गुणो को ही अधिक महत्त्व देता ह, उसको दृष्टि में सम्यक थद्धा और मयम की यथावत् पालना करने वाला कोई भी मानव नुक्त हो सकता है जो इस प्रकार है-क्षेत्र, काल, गति, लिंग, तीर्थ, चारिन, प्रत्येक बुद्ध-बोधित, ज्ञानावगाहना तर, सख्या अल्पवहुत्वत साध्या तच्चार्य १०-3 (१) क्षेत्र को दृष्टि से मुक्त आत्मा उर्वलोक मे पडकवन से, तिर्यक लोक म मनुष्य लोक से और अधो लोक में महाविदेह की विजय के अधोलोकस्थ स्थानो से सिद्ध होते हैं । (२) काल की दृष्टि से भरतादि क्षेत्रो मे अवसर्पिणी मे जन्म लेने के तीसर चौथे काल में जन्मे सिद्धत्व प्राप्ति की अपेक्षा तीसर, चौथे, पाचवें काल म सिद्ध होते है । महाविदेह म यह मर्यादा नही है। (३) गति से मनुष्य गति मे ही सिद्ध होते है । अन्य गतियो मे सम्पूण सयम नहीं होता। अत सिद्ध नहीं होते है । १७२ (४) लिंग वर्तमान दशा में अवेदी सिद्ध होते हैं, किसी भी वेद में सिद्ध नहीं होते, वेद विकार का क्षय होना सिद्धत्व के लिए आवश्यक है। लिंग-जैन शास्त्र के अनुसार द्रव्य लिंग की अपेक्षा-जैन साधु का वेश, परिव्राजक आदि का वेश या गृहस्थ वेश से भी मुक्त सकते हैं । भाव लिंग संयम होना ही चाहिये । (५) तीर्थ-तीर्थ और अतीर्थ दोनों स्थिति में सिद्ध होते हैं। (६) चारित्र-मोक्ष मार्ग के अधिकारी तो सम्यग् दृष्टि श्रावक और साधु भी होते हैं। पर मुक्त क्षायिक यथाख्यात चारित्री ही होते है। (७) वुद्ध द्वार में स्वयं बुद्ध, प्रत्ये क बुद्ध, बुद्ध बोधित आदि में से कोई भी ज्ञानी वीतराग भाव की प्राप्ति कर मुक्त हो सकता है । (८) ज्ञान द्वार-मति ज्ञान, थु त ज्ञान भी मोक्ष मार्ग के साधन है पर अनन्तर मोक्ष का साधन केवलज्ञान ही है। (१) अवगाहन (ऊंचाई)-जघन्य दो हाथ वाले और उत्कृष्ट पाँच सौ धनुप देह वाले सिद्ध होते है । (१०) अन्तर-निरन्तर आठ समय तक सिद्ध हो सकते है। अन्तर पड़े तो जघन्य दो समय उत्कृष्ट ६ मास का काल है । (११) सप्या-एक समय में जघन्य एक उत्कृष्ट १०८ सिद्ध होते है। (१२) अल्प-बहुत्व-सबसे कम नपुसंक लिंग सिद्ध, उनसे स्त्री लिंग सिद्ध संख्यात गुण्य, उनसे पुरुष लिंग सिद्ध संख्यात गुण्य हैं। शिष्य-भगवन् ! मनुष्य लोक में कर्म क्षय कर सिद्ध होने वाले मात्मा कहाँ रहते हैं ? गुरुदेव-अशरीरी होने से सिद्ध को ठहरने के लिए कोई घर की आवश्यकता नहीं होती, सिद्ध आत्मा अचंगति से जाकर ४५ लाख १७३ योजन को सिद्ध शिला पर अलोक से रुक कर ठहर जाते है जैसा कि अलोए पडिहयासिद्धा लोयग्गे पइट्ठिया ।।उ० अ०३६ गा० ५६ ॥ अर्थात् सिद्ध अलोक से रुके हुए लोकाग्र में स्थित है । सिद्ध गिला जो अर्जुन सुवणमय श्वेत उलटे छय की तरह है, वह उपलक्षण से सिद्ध स्थान कहा जाता है। वास्तव मे सिद्ध परमात्मा सिद्ध शिला के अन्तिम कोश के छठे भाग के जाकाश मे ज्ञान की ज्योति मे अव- स्थित रहते हैं, शास्त्रीय वचन में भी इसीलिये लोकाग्र प्रतिष्ठित कहा है। -- शिष्य-भगवन् । मुक्त आत्माओ का ९ द्वारो से विचार किया, वह किस प्रकार है ? गुरुदेव-मोक्ष के नव द्वार कहे गये हैं वे इस प्रकार हैं- (१) मोक्ष की सत्ता शाश्वत है, सिद्ध चेतना धन है। (२) द्रव्य से सिद्ध अनन्त है । (३) काल से एक सिद्ध की अपेक्षा सिद्ध की आदि है, अन्त नहीं। अनेक सिद्ध की अपेक्षा अनादि अनन्त है। (४) क्षेत्र से लोक के असख्यातवें भाग में स्थित हैं । (५) स्पर्शना-क्षेत्र से स्पर्शना कुछ अधिक है । (६) अन्तर-सिद्धो का अन्तर नहीं है। सिद्ध गति मे गये हुए जीव पुन संसार मे नही आते हैं। (७) भाव-सिद्ध मे केवलज्ञान, केवलदर्शन रूप भाव से क्षायिक भाव और जीवत्व रूप से परिणामिक भाव होते हैं । - १७४ (6) भाग-सिद्ध सब जीवों के अनन्तवें भाग और अभव्य से अनन्त गुणा हैं। (९) अल्प-बहुत्व-सवसे थोड़ा नपुंसक सिद्ध, स्त्री लिंग सिद्ध संख्यात गुण, पुरुप लिंग सिद्ध संख्यात गुण है। इस प्रकार मुक्त आत्मा अनन्त ज्ञान दर्शन और निरावाध अनन्त आनन्द का अनुभव करते हैं, वहाँ न रोग है, न जरा है, न वेदना है। वे सर्वथा पर सयोग से मुक्त हैं, अत: वियोग का अवकाश ही नहीं है। यों तो सिद्ध परमात्मा में अनन्त गुण होते हैं, तथापि ज्ञाना- बरणीय आदि आठ कर्मों के क्षय की अपेक्षा से उनमे ३१ गुण विशेषतया आविर्भूत हो जाते हैं। वस्तुतः आत्मा ज्ञान स्वरूप और अनन्त गुणों का समुदाय रूप है, परन्तु कर्म जन्य उपाधि भेद से ससारी आत्माओं के वे गुण मावरणयुक्त हो रहे है। जैसे सूर्य प्रकाश रूप होने पर भी बादलों के कारण उस पर आवरण आ जाता है। उसका प्रकाशवान रूप हमें दिखाई नहीं देता। इसी प्रकार आत्मा भी प्रकाशमान है, उस पर आये हुए आवरण जव दूर हो जाते है, तब वह गुण समुदाय प्रकट हो जाता है, फिर उस पूर्ण शुद्ध आत्मा को सिद्ध, बुद्ध, मुक्त अजर, अमर, सर्वज्ञ सर्वदर्शी और अनन्त शक्ति सम्पन्न इत्यादि शुभ नामों से पुकारा जाता है। वे ३१ गुण इस प्रकार है- (१) सिद्ध परमात्मा के आभिनिबोधिक ज्ञानावरण क्षीण हो चुका है। अर्थात् ज्ञानावरणीय कर्म की पांच प्रकृतियों मे से आमिनिवोधिक शान के २८ भेद हैं, उन पर छाए हुए कम परमाणुओं के आवरणों का क्षय हो चुका है। १७५
(२) शुत ज्ञानावरण (थु तज्ञान के १४ भेद हैं, उन पर आये हुए
आवरण) का क्षय हो चुका है।
(३) अवधि ज्ञान (के ६ भेदो) पर आये हुए आवरण का क्षय हो
चुका है।
(४) मन पर्यवज्ञान (के दो भेदो) पर आये हुए आवरण का क्षय हो
चुका है।
(५) केवलज्ञान के (केवल एक भेद) पर आये हुए आवरण का भी क्षय
हो चुका है।
झानावरण की पांचो प्रकृतियो के आवरण क्षीण (दूर) हो जाने
से मिद भगवान् को सर्वज्ञ कहा जाता है।
(६) चभुदर्शन पर आया हुआ आवरण सिद्ध परमात्मा का क्षय हो
चुका है।
(७) चक्षुवजित श्रोत्रेन्द्रियादि इन्द्रियो पर आया आवरण (अचक्षु
दशनावरण) भी क्षय हो चुका ।
(८) अवधि दर्शन पर आया हमा आवरण भी निर्मूल हो गया है ।
(९) केवल दर्शनगत आवरण भी क्षीण हो चुका है ।
(१०) निद्रा (सुम पूर्वक शयन) रूप दर्शनावरण भी चला गया है ।
(११) निद्रा निद्रा (सुखपूर्वक शयन करने के पश्चात दुखपूर्वक जागृत
अवस्था) रूप दशा भी जाती रही।
(१२) प्रचला (ठे-बैठे ही निद्रागत होने रूप) अवस्था भी उनकी
नहीं रही।
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(१३) प्रचला-प्रचला (पशु की तरह प्रायः चलते-चलते निद्राधीन हो जाने रूप) दशा भी समाप्त हो गयी है । (१४) स्त्यानद्धि (अत्यन्त घोर निद्रा जिसके उदय से वासुदेव का आधा बल प्राप्त हो जाये, ऐसी अत्यन्त भयंकर निद्रा) दशा भी सिद्ध परमात्मा की नहीं रही। . । (१५-१६) सिद्ध भगवान् के वेदनीय कर्म की प्रकृतियाँ साता रूप प्रकृति और असाता रूप प्रकृति क्षीण हो चुकी है, इसलिए वे अक्षय आत्मिक सुख में मग्न है । (१७-१८) मोहनीय कर्म की दोनों प्रकृतियों-दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय के क्षय हो जाने से सिद्ध परमात्मा क्षायिक सम्यक्त्व व चारित्र के धारक हो जाते है। (१६ से २२) आयुष्य कर्म की चारों प्रकृतियाँ-नरकायु, तिथंचायु मनुष्यायु और देवायु के क्षय हो जाने से भगवान् निरायु है, अतएव उन्हे शाश्वत कहा जाता है, क्योंकि आयुष्य कर्म के कारण जीव की अशाश्वत दशाएँ होती है। - (२३-२४) गोत्र कर्म की दोनो प्रकृतियाँ-उच्च गोत्र और नीच गोत्र का भी अभाव हो चुका है। गोत्र कर्म के कारण जीव की उच्च-नीच दशा होती रहती है । गोत्र कर्म के न रहने से सिद्ध भगवान् की उच्च-नीच दशा भी समाप्त हो जाती है और वे मगुरु लघु गुण सम्पन्न हो जाते है। (२५-२६) इसी प्रकार शुभ नाम और अशुभ नाम रूप नाम कर्म की जो दो प्रकृतियाँ हैं, वे भी समाप्त हो चुकी है ; सादि सान्त रूप नाम कर्म के क्षय हो जाने से सिद्ध भगवन् अनादि अनन्त पद (४) दो प्रकार के मोहनीय कम का क्षय हो जाने से उन्हें क्षायिक सम्यक्त्व रत्ल और वीतराग भाव की प्राप्ति होती है जिससे वे स्व-स्वरूप में स्थित होत है। (५) चारो प्रकार के आयुष्य कर्म का क्षय हो जाने से वे अव्यय (अजर-अमर) हो गये। जव तक प्रायुष्य कर्म रहता है, तब तक आत्मा की वाल्य, यौवन, वाद्ध क्य, रोगित्व, निरोगित्व आदि दशा की मम्भावना रहती है । जव आयुष्य कर्म के प्रदेश प्रात्म प्रदशो से सवथा पृथक हो जाते हैं, तब वह अात्मा अव्ययत्व गुण धारक हो जाता है। आयुष्य कम स्थिति युक्त है । आयुष्य कर्म के प्रदेशो की स्थिति उत्कृष्ट ३३ साग- रोपम होती है । यह कर्म स्थिति युक्त होने से जीव सादि-सान्त पद वाला होता है, किन्तु जव सिद्धो के आयुष्य कम का अभाव हो जाता है, तब वे सादि-अनन्त पद को धारण करते हुए अव्ययत्व गुण के धारक होत ह । (६) दो प्रकार के नाम कम का क्षय हो जाने से वे अमूर्तिक हुए । नाम कर्म के होने से शरीर, इन्द्रिय, अगोपाग, जाति आदि की रचना होती है । नाम कम वर्ण-गन्ध-रस-स्पश पुद्गल जन्य होता है । जब आयुष्य और नाम कम का क्षय कर दिया तो सिद्ध भगवान् शरीरादि तथा वर्णादि से रहित हो गये । शरीर से रहित आत्मा अमूर्तिक और अत्पी होता है, क्योकि प्रात्मा का निज गुण अमूर्तिक है। (७) गोत्र कर्म का क्षय हो जाने से सिद्ध भगवान् अगुरु लघुत्व-गुण से युक्त हो गये। जव गोन कम रहता है, तब उच्च गात्र के कारण नाना प्रकार के गौरव (गुरुता) की प्राप्ति होती है और नीच गोत्र के कारण नाना प्रकार की लघुता (हीनता- १८० तिरस्कार) का सामना करना पड़ता है। जव गोत्र कर्म ही क्षीण हो गया, तव गुरुता-लघुता (मान-अपमान) नही रहे और सिद्ध भगवान् अगुरुलघुत्व गुण के धारक हो गये । शिष्य-गुरुदेव यहाँ एक शंका होती है कि " सिद्ध भगवान् भक्तो द्वारा उपास्य और पूज्य है, किन्तु जो नास्तिक है वे तो सिद्ध भगवान् के अस्तित्व में ही शका करते हैं अतः नास्तिकों द्वारा वे उपास्य और पूज्य नहीं होते, ऐसी स्थिति में सिद्ध भगवान के प्रति उच्चता-नीचता (गुरुता-लघुता) का भाव या जाने से उनमें गोत्र कर्म का सद्भाव क्यों नहीं माना जाये ?" गुरुदेव इसका समाधान यह है कि गोत्र कर्म की वर्गणाएँ परमाणु रूप हैं, अतः वे पुद्गल जन्य होने से रूपी भाव को धारण करती है और जीव जब तक गोत्र कर्म से युक्त होता, तब तक वह शरीरवारी अवश्य होता है । उस समय गोत्र कर्म द्वारा उस जीव को उच्च या नीच दशा की प्राप्ति होना गोत्र कर्म का फल माना जा सकता है, किन्तु सिद्ध है, अरूपी अमूर्तिक है, और शरीर रहित हैं ऐसी स्थिति में सिद्धों के साथ गोत्र कर्म का सद्भाव न होने से उनमें उच्च-नीच दशा की प्राप्ति कथमपि सम्भव नहीं है । केवल ग्रास्तिकों या नास्तिकों द्वारा ही पूर्वोक्त क्रियाओं के करने से सिद्धों मे गोत्र कर्म का सद्भाव नहीं माना जा सकता । अतः मिद्ध-परमात्मा में अगुरुलघुत्व गुण ही मानना चाहिए. जोकि शुद्ध प्रात्मा का निज गुण है । (८) पाँच प्रकार के अन्तराय कर्म का क्षय हो जाने से सिद्धो में उक्त प्रकार की अनन्त शक्ति प्रादुर्भूत हो गई । वे अनन्त शक्तिमान हो गये। अनन्त जान-दर्शन के द्वारा वे मद पदायाँ हस्तामलकवत् यथाकथित में जानते और अपने स्वरूप में कदापि वलित नही होते है। इसीलिए उहे सच्चिदानन्दमय कहा जाता है । जो अक्षय आत्मिक सुख मिद्ध परमात्मा को प्राप्त होता है, वह सुख देवो या चक्रवर्ती अादि विशिष्ट मनुष्यों को विरकुल प्राप्त नहीं है । क्योकि आत्मिक सुख के समक्ष पोदालिक सुख कुछ भी नही है । जैसे सूर्य के प्रकाश के साथ दीपक आदि के प्रकाश की तुलना नहीं की जा सकती, उसी प्रकार सिदो के सुख के समक्ष अन्य सुख क्षुद्रतम प्रतीत होते हैं । इमोनिए उत्तराध्ययन में कहा है कि वे अस्प ह. सघन है (अनन्त) ज्ञान-दशन सम्पन्न हैं, जिसकी कोई उपमा नहीं है, ऐसा अतुल सुख उन्ह प्राप्त है। शिप्य-मगवन् प्रात्माएं किस शरीर के परिमारए से मुक्त होते हैं उनका शरीर छोटा होता है या बडा? गुरुदेव-आत्मा व प्रकार के सम्यानो मे मे "वामन" कुब्ज ग्रादि से भी सिद्ध हो सकती है, छोट से छोट शरीर २ हाथ के भी निद्ध होते हैं, कूर्मा पुन की तरह । वडे मे ५०० धनुष शरीर वाले भी मिद्ध होत है। - शिष्य- भगवन् कुछ प्राचार्य स्त्री के लिए मोक्ष नहीं मानते, ययोकि उसका शरीर अल्प पुरुषार्थ वाला और अशुचि पिंड माना जाता है, फिर वह पुरुषों को तरह वस्त्र त्याग नहीं कर सक्ती, प्रत उसका मोक्ष नहीं होता, यह कहाँ तक ठीक है? गुरुदेव-पुस्प के समान स्त्रियो का साध्वी संघ और श्राविका सघ मे स्थान है । सत्य, शील और सन्तोप की आराधना में वे पुरुष से कम नहीं हैं । पति के पीछे या शील की रक्षा के लिए हंसते. हंसते प्राण देने का साहस करने वाली नारिया कम नहीं है । अत वल वस्त्र त्याग नहीं करने मात्र से उनको मुक्ति की अनधिकारिणी मानना उचित नहीं कहा जा सकता। वस्त्र तो एक बाह्य उपधि है। शरीर की तरह वस्त्र-पात्र आदि धर्मोपकरणों को मूर्या रहित होकर केवल साधन रूप में ही उपयोग किया जाय तो वह परिग्रह नही होता, क्योंकि-"मुच्छापरिग्गहोवुत्तो" इस शास्त्र वचन के अनुसार मू भाव ही परिग्रह है उसका त्याग स्त्री भी कर सकती है । अतः स्त्री के लिये मुक्ति का निपेव करना वस्तु तत्त्व न्यायोचित नहीं कहा जा सकता। दिगम्बर परम्परा के पटखंडागम में स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्यनियो में सास्वादन सम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर अयोगि केवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवी जीव द्रव्य प्रमाण से कितने है ? संख्यात है। पटखंडा० १/२/४६ । इसके पाठक भलीभांति समझ सकते हैं कि जिनशासन में धर्म करणीकर मुक्ति प्राप्त करने के लिए स्त्री-पुरुष का कोई भेद नहीं है। उत्तराध्ययन सूत्र के अध्ययन ३६ मे स्पष्ट कहा है कि- इत्थीपुरिससिद्धा य, तहेव य नपुंसगा। सलिंगे अगालिंगे य, गिहिलिगे तहेव य ।५०। दम य नंपुसएसु, वीसं इत्थियासु य । पुरिसेमुय अट्ठसयं, ससएणेगेग सिज्झई।५२॥ स्त्री पुरुष और नसक तन से मिद्ध होते ऐसे स्वलिंग, अन्यलिंग और गृहलिंग में भी सिद्ध होना माना गया है । एक समय में कौन कितने सिद्ध होते इसका उल्लेख करते कहा है-नपुंसक मे १०, स्त्रीलिंग से २० और पुहार लिंग में १०८ सिद्ध होते है । इस प्रकार स्त्री का सिद्ध होना शास्त्र मम्मत है। D0 १९३