Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Taittiriyo Upnishad

Mulchand Tulsidas · 2012/08

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श्रीकृष्णाय नमः। श्रीमदापापंचरणकमलेभ्यो नमः । तैत्तिरीयोपनिषत् । ब्रह्मानन्दवल्ली। आनंदमय वा रसात्मक पुरुषोत्तम । ब्रह्मवित् परने प्राप्त करे छे. एने माटे आ कर कहेवायेली छे. सत्य ज्ञान अनन्त या छ, जे परमाकाश गुहामा विराजेला तेने जाणे छे, ते विपश्चित्यानी साधे सर्व कामनो भोग करे छे. ते आत्मामाथी आकाश प्रकट थयु. आकाशमांथी वायु, वायुमाथी अमि, अग्निमांथी जल, जलमाथी पृथ्वी, पृथ्वीमाथी ओपधि, ओपधिमांथी अन्न, मन्नमांयी (मन्नमय) पुरुप, ते मा पुरुप अन्नरसमय है. तेनुं माज शिर-मस्तक छे. मा दक्षिण-जमणो पक्ष-याहु वा पांस छे. आ उत्तर-डायो पक्ष छे. आ मारमा छ, आ (एजें) पुच्छ प्रतिष्ठा-आधार छ तेने वास्ते आ श्लोक छ, अन्नमाथी निश्चय प्रजा जन्मे ---उन्नये . पृथ्वीने आप्रये रहेली सर्व प्रजा अन्नमांथी उद्भवे छे. पछी अन्नथीज जीवे छे, अने भन्नमां ज लय पामे छे. माटे ज अन्न ज भूतोमा ज्येष्ठ छे. माटे एने सौंपर कहे छ. सर्वन औपधरूप छ. जेओ मन्न ब्रह्मनी उपासना करे छे, तेओ सर्व अन्न प्राप्त करे छे. अन्न भूतोमा ज्येष्ठ है. माटे एने सर्वोपय कहे छे. अन्नमाथी भूतो प्रकट थाय छे. प्रकट थयेला अन्नथी ज पृद्धि पामे छ. अने ते भूतोने पोताना अन्न ज भक्षण करे छे. माटे एने अन्न कहे छे. भूतोथी एने पोषण थाय छे. अने भूतो, ए पोषण छ. माटे ज एने अन्न कहे छे. (प्राणमय) ते मा भारसमय पुरुपथी अन्य अन्तर-भीतर विराजतो आत्मा प्राणमय छ. ते प्राणमयथी अन्नमय पूर्ण छ, व्याप्त छे, ते आ पुरुपविध छे. तेनी पुरुषविधताथी अन्नमय पुरुषविध छे. तेनु -प्राणमय पुरुपनं प्राण एज शिर छे-मस्तक छ, व्यान दक्षिण पक्ष छ, अपान उत्तर पक्ष छे, आकाश आत्मा छ, पृथ्वी पुच्छ प्रतिष्टा--आधार छे. तेनो आ श्लोक छे. देवो प्राणमयनी पछाडी जीवे छे-श्वास ले छे. मनुष्यो अने पशुओ पण तेनी पछाडी जीवे छ. प्राण भूतोनं आयुप छ. माटे एने सर्वायुष कहे छे. जेमो प्राण ब्रह्मनी उपासना करे में तेओ सर्व आयुष्यनी प्राप्ति करे छे. प्राण ए भूतोर्नु आयुध्य छ. माटे एने सर्वायुप कहे छे. तेनो (प्राणमयनो) मा (मत्प्रत्यक्ष) शारीर आत्मा छे, जे पूर्वनो अन्नरसमयनो पण आत्मा छे. १ वेदोतमा आत्मशम्द मुख्यताथी परमारमवाची छे. तेथी अत्र मा क्रमसष्टिन कारण पण अक्षर ब्रह्म २ पक्षशन्द-अत्र ध्रुति मममयादि पंचने पुरुष तथा हसरूपे वणवे छे. जेथी पुरुष भर्थ लईए त्यारे पक्षनो अर्थ पाहु करवो, भने ज्यारे हैसरूपे लईए स्यारे पक्षनो अर्थ पास करवो. बा परमाज छ.

३ . (मनोमय). ते आ प्राणमयथी अन्य अन्तर आत्मा मनोमय छे. तेनाथी प्राणमय पूर्ण व्याप्त छे. ते मा पुरुषविध छे. तेनी पुरुषविधताथी प्राणमय पुरुषविध छे. मनोमयनुं यजुः शिर छे. ऋग् दक्षिण पक्ष 2. साम उत्तर पक्ष छे. आदेश आत्मा छे. अथर्वाङ्गिरस पुच्छ प्रतिष्ठा छे. तेनो आ श्लोक. ज्यांथी वाणी अने मन पाछां फरे छे. ब्रह्मनो आनंद जाणनार कोईथी भय पामतो नथी. तेनो-मनोमयनो आ शारीर आत्मा छे, जे प्राणमयनो पण आत्मा छे. (विज्ञानमय). ते आ मनोमयथी अन्य अन्तर मात्मा विज्ञानमय छे. तेनाथी मनोमय पूर्ण छे-व्याप्त छे. ते आ पुरुपविध छे. तेनी पुरुपविधताधी मा मनोमय पुरुपविध छे. विज्ञानमयर्नु श्रद्धा ए शिर छे. नात त-प्रमीयमाण धर्म दक्षिण पक्ष छे. सत्य ए उत्तर पक्ष छे. योग आत्मा छे. महर्लोक पुच्छ प्रतिष्ठा छे. तेनो आ श्लोक छे. ते विज्ञान यज्ञने विस्तारे छे. कर्मोने पण विस्तारे छे. विज्ञान सर्वे देवताओ छे. तेओ ब्रह्म ज्येष्टने उपासे छे. विज्ञानब्रह्मने जे जाणे ते असावधान-प्रमाद करता नथी. शरीरमांना पाप त्यजीने सर्व कामोने भोगरे छे. तेनो आ शारीर आत्मा छे, जे मनोमयनो पण आत्मा छे. (आनंदमय). ते मा विज्ञानमयथी अन्य अंतर आत्मा मानंदमय छे. आनंदमयथी आ विज्ञानमय पूर्ण छे. ते आ पुरुषविध छे. तेनी पुरुषविधताथी विज्ञानमय पुरुषविध छे. आनंदमयन प्रिय शिर छे. मोद दक्षिण पक्ष छे. प्रमोद उत्तर पक्ष छे. आनन्द आत्मा छे. ग्रा प्रतिष्ठा छे. तेनो आ श्लोक छे. ब्रह्मने-आनन्दमयने-जे असद् जाणे छे ते असद् ज थाय छे. जे एने सद् जाणे छे सद् थाय छे. तेनो शारीर मात्मा छे-जे पूर्वनो छे. महि हवे आ प्रश्नो छे. जे (आ आनन्दमयने) जाणतो नथी तेज आ लोकनो त्याग करीने (परलोक) जाय छे ? अथवा पूर्वोक्त प्रहने जाणनार (सर्व विद्वान ) आ लोकनो त्याग करीने ते लोकनो भोग करे छे. (आ प्रश्नोनुं उत्तर आपे छे.) तेणे कामना करी. हु बहु थाउं; प्रजा उत्पन्न करु. तेणे तप कयु-विचार कयों-तेणे अभिध्यान विचार करीने आ सर्व सर्यु; जे कांइ आ छे. ते सीने तेमांज पछी प्रवेश कयों. तेमां अनुप्रवेश करीने आप सत् (प्रत्यक्ष) अने त्यच् ( अप्रत्यक्ष) थया; निरुक्त वाग्गोचर अने अनिरुक्त वागगोचर, निलयन आधार अने अनिलयन आधाररहित, (विज्ञान अने अविज्ञान,) सत्य अने अनृत, सत्य थy, जे कांइ आ छे, तेथी तेने सत्य एम कहे छे. तेनो आ श्लोक छे. १. बहि प्रश्नशब्द बहुवचनमा छे. तेथी प्रण वा चार प्रश्न श्रुतिने विवक्षित छे. ब्रह्मविद्याना उपदेश थई रया पछी शिष्य गुरुने आवा प्रश्न करे छे. भत्र चार प्रश्न छे. वे प्रश्न स्पष्ट छे, ज्यारे बीजा वे शब्दसामर्थ्य- थी प्राप्त याय छे. प्रश्न ब्रह्मने नहि जाणनार कोई पण परलोकमा जतो नयी ? एने आणनार सव ते लोकमा भोग फरे छ ? यीजा थे सूचित भा छे. ब्रह्मने नहि जाणनार कोइ-सर्व ज परलोकमा जता नयी के कोइ पण जाय छे. ए एक. बीजो मा छे. ब्रह्मने जाणनार सर्व ज जाय छे के नहि, अथवा ब्रह्मने जागनारामाथी कोइ एया छे के नहि के जेने परलोकमा भोग प्राप्त यतो नयी भयवा अहि वे प्रश्न छ, अने पाकीना भृगुवल्लीमा छ. एम पण बहु- पचन भटे छे.

साधु-सार-न फयु, के में कोई पाप कयु. पूर्व निश्चय मा असद्-अध्यारत-अप्रकट हतु, तेमांधी आ निश्चय सद्व्याकृत प्रकट थयु, तेणे मारमाने पोते ते फयु भगवान् पोतेज पोताना मारमाने ते जगदप फयों-तेथी ते सुकृत 'चाय थे. जे आ भगवाननी सृष्टि छे ते मुफ्त छे. ते प्रभु रस ज है. रसनेज मानन्दमय प्रमुनेज प्राप्त करीने ज आ (जीव) मानन्दी थाय है. फोण जीवी मकत, कोण प्राण धारण करी भकत जो आ आकाग-आनन्द न होत तो. गज आनन्दमय प्रभु आनन्दर्नु दान करे हे. ज्यारे मा जीव आ अदृश्य, (जीवना स्वार प्रयत्नथी अदृश्य ), अनात्म्य-रागद्वेपादियी रहित, अनिरुत-अनिवनीय-अनुभायी जैने जाणी भकाय तेबा; अनिलयन-लयरहित एवा आनन्दमयमा अभययुक्त प्रतिष्ठा प्राप्त करे छे त्यारे ते अभय निर्भयता प्राप्त करे रे. ज्यारे अल्प पण अन्तर भेद करे हे त्यारे तेने भय थाय छे. आनन्दमा मात्मानो पण आत्मा छे तेने ज्यारे पोताथी भिन्न जीव-गणे त्यां सुधी तेने भय थाय छे. (मान न्दमय अने पोते भिन्न है एम ) मेद जाणनार अने माननारले भय थाय छे. तेनो आलोक ३. आना भययी वायु वाय छ, भयथी सूर्य उदय पामे छे, भयथी अग्नि अने इन्द्र निज निज नियन कार्य करे . पांचमो मृत्यु-यम देवता पण निज कार्य करे छे. मानंदनी मा मीमांसा थाय छे. वेदादिनुं भव्ययन करेलो निरोगी भोजनशक्तियुक्त दद अंगयुक्त, अतिशय बलवान् कोई तरुण होय, तो आ सर्व पृथिवी विचथी पूर्ण तेनी थाय, या एक मानुप आनंद छ. (मनुष्यना आनन्दनी आ पराकाष्ठा हे.) आवा शत मानुप आनन्द यईने मनुष्य गन्धर्वनो-योत्रिय निष्कामनो-एक मानन्द गणाय. मनुष्य गन्धर्वना तेवा सो मानन्द मलीने देवगन्धर्वनो श्रोत्रिय निष्कामनो-एक मानन्द गणाय. देवगन्धवाना मावा सो आनन्द मलीने चिरलोक पितृोनो श्रोत्रिय निष्कामनो एक मानन्द गणाय. चिरलोकस्थायी पितृमोना आवा सो आनंद मले त्यारे देवलोकमां उत्पन्न थयला श्रोत्रिय निष्काम देवनो एक आनन्द गगाय. देवलोकमां उत्पन्न देवना आवा सो आनन्द मले त्यारे श्रोत्रिय निष्काम कर्मदेवनो एक मानन्द गणाय. कर्मदेवना आवां सो आनन्द मली श्रोत्रिय निष्काम देववो एक आनन्द गणाय. देवोना आवा सो आनन्द मलीने श्रोत्रिय निष्काम इन्द्रनो एक आनन्द गणाय. इन्द्रना आवा सो आनन्द मले त्यारे भौत्रिय निष्काम बृहस्पतिनो एक आनन्द 'गणाय. वृहस्पतिना आवा सो आनन्द मले त्यारे श्रोत्रिय निष्काम प्रजापतिनो एक आनन्द गणाय. प्रजापतिना सो आनन्द मले त्यारे श्रोत्रिय निष्काम बहानो एक आनन्द गणाय. तेमा पुरुपमा छे, आ जे आदित्यमा छे ते एक छे. जे आ जाणे हे से आ लोक 'त्यजीने आ अन्नमय आत्माने प्राप्त करे छे, आ प्राणमय आत्माने प्राप्त करे छे, आ मनोमय आ- माने प्राप्त करे छे, आ विज्ञानमय आत्माने प्राप्त करे छे, आ आनंदमय आत्माने नाम कर छे. तेनो आ श्लोक . ज्यांधी मन साथै, प्राप्त नहि करीने, वाणी पाठी फरे छे ब्रह्मनो आनंद जाणमार क्याहि पण भय पामतो नथी. आने एम पण विचार आवतो नथी के में काई जे आ आम बन्नेने ( अक्षर ब्रह्म तथा परब्रह्म-आनंदमयने) जाणे छे ते पोताना मात्माने प्रेमयुक्त करे छे, (शुद्ध प्रेमर्नु फल आनंदमय तेनो अनुभव करावे छे). जे आम बन्नेने जाणे छे ते निज आत्माने संतोपे छे. आवी उपनिपद्-रहस्यविद्या-छे. आनन्दमय वा रसात्मक पुरुषोत्तम. प्राचीन उपनिपदोमा तैत्तिरीय उपनिषद् सुन्दर छे, अने तेमां पण आनन्दवल्ली वा ब्रह्मवल्ली, वा ब्रह्मानन्दवल्ली परम रमणीय छे. उपनिषदो अनेक प्रकारना छे. यद्यपि सर्व उपनिषदो रहस्यविद्यार्नु ज प्रतिपादन करवावाला छे, उपनिपमात्र भगवानंनुं ज प्रतिपादन करे छे, छतां पण केटलाक उपनिषद् भगवाननी विभूति वगेरेनुं प्रतिपादन करे छे, केटलांक अक्षरब्रह्मनुं निरूपण करे छे, ज्यारे आ आनन्दवल्ली तो उत्तमोत्तम फलनुं प्रतिपादन करे छे, तेथी महान् आचार्यों आने फलप्रकरण कहे छे. प्रभुना उत्तमोत्तम प्रेमैकसाध्य, प्रेमकस्वरूप, अनुभवैकगम्य, निगूढ भावात्मक आनन्दमय रसप्रचुर साकार स्वरूपहूँ, तत्प्राप्ति, सदनुभवप्रकार वगेरेनुं निरूपण आ आनन्दवल्ली फरे छे. पारलौकिक आवा उत्तमोत्तम फलनुं दर्शन जेवू आ श्रुतिमा थाय छे तेवु दर्शन अन्यत्र क्याहि पण थतुं नथी. तैत्तिरीय उपनिषद् ‘ब्रह्मविद् आप्नोति परम् ' ए सूक्ष्म सूत्रवाक्यमा निजोपदेश गूढ़ताथी संग्रही, 'सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म यो वेद निहित गुहायां परमे व्योमन् सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ' ए रुचाद्वारा तदर्थ- विवरण करी, तवशिष्ट ग्रन्थथी परन पुरुषोत्तमनु- परत्व-इत्यादि उपपादन करे छे. विपश्चित् ब्रह्म साथे ब्रह्मज्ञानयुक्तनो सर्वकामोपभोग ए ज परप्राप्ति छे. आ ज विपश्चित् ब्रह्मने श्रुति अही आनन्दमय तथा 'रसो वै सः' तरीके वर्णवे छे, गणि- तानन्द अक्षर-धाम-ब्रह्म-थी पण अधिक अगणितानन्द रसात्मक-आनन्दस्वरूप-साकार-तरीके पुरु- पोत्तमने परने वर्णवे छे. आन प्रतिपादन श्रुति अप्रिम ग्रन्थथी योजे छे. तस्मात् वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः' ए वाक्यमा ते आ आत्माथी सृष्टि कही छे. अर्थात्-परब्रह्म कर्तृ छे, अकर्तृ नथी. उपादान निमित्त उभय ब्रह्म ज छे. आत्माथी, आकाश, मा- फाशथी वायु, वायुथी अग्नि, अग्निथी जल, जलथी पृथ्वी, पृथ्वीथी औषधि, औषधिथी अन्न, अन्नथी पुरुप, आम नमसृष्टि दर्शावी मार्यादिक सृष्टिना कारण पण प्रभु छे एम श्रुति दर्शावे छे. अहि आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, औषधि, अन्न वगैरे तत्तद्रूप ब्रह्म-कारणावस्थ छे. प्राकृत आका- शादिथी भिन्न छे. माम ब्रह्मसृष्टि क्रमसृष्टि निरूपण करी श्रुति अन्नमय पुरुपर्नु निरूपण करे छे. " . १ मन बनेनो अर्थ रगरामानुज, मध्य अने शकर पूर्ववास्यगत पापपुण्य करे छे. जयगोपालमा धमेनो भर्थ प्रकरणानुसार अक्षर ब्रह्म अने परब्रह्म एम करे छे. आम करवामा उपक्रम अने उपसहारनी एकवाक्यता- रूप उपपत्तिविशेष प्राप्त थाय छे. भारभमा प्रति केहे छे 'ब्रह्मने जाणनार परब्रह्मने प्राप्त करे छे', तेम अतमा पण कहे छे के ब्रह्म भने परब्रह्म अर्थात् अक्षर अने भानन्दमयने आणनार परम फल प्राप्त करे छे. या प्रकारे जे तत्व आरममा श्रुतिए निरूपण कयु, तेज अन्तमा पण निरूपण करी उपक्रम भने उपसदारनी एक्वाक्यता सिद्ध करी. मेक्षमूलीन भा वाक्यनी रचनामा गम पडती नयी.

. ते मा पुरुष अन्नरसमय छ, आ ज तेनु शिर छे, आ तेनो दक्षिण पक्ष छे, आ उत्तर पक्ष छे, आ आत्मा छे, आ पुच्छ प्रतिष्ठा छे. अन्न ए प्रजामात्रनु उत्पत्ति स्थिति अने लयन कारण छे. अन्न-अन्नमय-भूतोमा ज्येष्ठ छे, माटे सर्वोपध छे. आ अन्न अन्नमय ब्रह्मने जे उपासे छे ते सर्व अन्न प्राप्त करे छे. मा अन्नमय पुरुपने श्रुति पक्षी तरीके वर्णये ; अन्नमयने पुरुप पण कहै छे, अने प्रजामाननी उत्पत्ति स्थिति लयचं कारण कहे छे. तेथी आ अन्नमय पुरुप विकारशील पांचभौतिक अनित्य देह नथी, परन्तु भगवाननो विराट् देह छै. आ विराट् पुरुष छे, कोश नथी, जे 'अन्न प्रदा ने उपासे छे' एम कहीने अति आ अन्नमय पुरुपनी ग्रह्मता स्पष्ट कहे छे. आ अन्नमय बाह्य व्यवहारतुं कारण छे. आ अन्नमय पुरुपनी अन्तर्गत प्राणमय पुरुप छे. या प्राणमय पण लौकिक कोश नथी, जीवदेहान्तर्गत प्राणमय कोश नथी, परन्तु मुत्यप्राण आसन्य छे; भगवद्रूप छे. आ अन्तर व्यवहा- रखें कारण छे. आ प्राणमय पुरुषनो प्राण शिर छे, व्यान जमणो बाहु छे, अपान डायो बाहु छे. आकाश आत्मा छे. पृथ्वी पुच्छ प्रतिष्ठा छे. आ प्राणमय पुरुप ब्रह्म छे, जीव वा प्राणमयकोश नथी. आ प्राणमयना त्रण कार्य छ, वल, भोजन, अने विसर्ग. आ प्राणमय-आसन्य कोशप्राणमयथी भिन्न छे. प्राणमय कोशनी पांच वा दश वृत्ति छे, ज्यारे आ भगवद्विभूतिरूप प्राणमय पुरुपनी प्रण वृत्ति छ. प्राणमयकोशनो संचार हृदयादि नियत देशमा छे; ज्यारे आ प्राणमय पुरुपनो संचार आ- काशमा छे. ए आकाश स्वरूपलाभनो हेतु होवाथी श्रुति तेने आ प्राणमय पुरुपनो आत्मा कहे छे. प्राणमय कोश देहमां स्थिति करे छे, ज्यारे आ प्राणमय पुरुष सर्व पृथ्वीमां स्थिति करे छे. आ प्राणमय पुरुष अन्नमयनी भीतर विराजीने तेने आफार सम छे. आ प्राणमय पुरुपनी भीतर मनोमय पुरुष विराजे छे. मय पुरुपने आकारसमर्पक आ मनोमय पुरुष छे. आ मनोमय पुरुष तेज वेद-पुरुष छे; ए मा वैदिक व्यापारनुं कारण छे. वेद ए भगवान- मनोमय स्वरूप छे एम श्रीमद्भागवतना एकादश स्कन्धमा 'स एप जीवो विवरप्रसूतिः । पश्लोकमा स्पष्ट कयुं छे. आ मनोमय वेदात्मक पुरुषनु यजुर्वेद शिर छे. अग्वेद दक्षिण बाहु छ, सामवेद वाम बाहु छे. कर्मचोदना-आदेश-आत्मा छे. कर्मनो स्थैर्यसंपादक अथर्ववेद प्रतिष्टा छे. शा. न्ति वगेरे कर्मनो बोध एमां होवाथी एने मनोमय हंसर्नु पुच्छ कयुं छे. वेदात्मक पुरुप मनोमय ए पण भगवाननुं स्वरूप छे, कोश नथी; नाना वृत्तिवाला मनोमय कोशथी आ प्रकारे आ वेदात्मक मनोमय पुरुष भिन्न छे. आ वेदात्मक मनोमय पुरुपना भीतर विज्ञानमय पुरुप विराजे छे. मनोमय पुरुपने आकारसमर्पक मा विज्ञानमय पुरुप छे. आ विज्ञानमय पुरुपर्नु शिर श्रद्धा जल-छे, स्त-प्रमीयमाण धर्म-दक्षिण बाहु छ, सत्य-अनुष्ठीयमान धर्म-वाम बाहु छे. योग मुख्य होवाथी आ विज्ञानमय पुरुपनो आत्मा छे. विज्ञानमय पुरुप-ए अक्षरग्रह्म छे, कोश नथी. संशय, विपर्यासादि नानावृत्तिवाला विज्ञानमय कोशथी आ विज्ञानमय-अक्षर-पुरुप-भिन्न छे. आ विज्ञानमय पुरुपने प्राप्त थयलानी महोफथी नीचे गति थती नथी तेथी ए महलोक विज्ञानमय पुरुपनी प्रतिष्ठा छ, ७ मा विज्ञानमय अक्षर-पुरुपनी भीतर मानन्दमय विराजे छे. विज्ञानमय अक्षर पुरुपने माकारसमर्पक पण मा आनन्दमय पुरुषोत्तम छे. मानन्दमय पुरुपथी कोइ पर पुरुप नथी तेथी एज पुरुषोत्तम छे एम निश्चय थाय छे. अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय सर्वने माकारसमर्पक मानन्दमय होवाथी एर्नु स्वतःसिद्ध साकारत्व निश्चित थाय छे. सर्वमा आन्तर पण मानन्दमय ज छे. एनीज प्राप्तिने आ श्रुति परप्राप्ति कहे छे. आ आनन्दमय पुरुषोत्तम- ने ज श्रुति पर विपश्चिद् ब्रह्म कहे छे. धर्मभेदथी एना स्वरूपर्नु श्रुति वर्णन करे छे. प्रिय एन शिर छे, आनन्दमय पुरुषोत्तम मुख्यताथी प्रेमनोज विषय होवाथी प्रीतिने एतुं शिर कमु छे. मोद ए एनो दक्षिण बाहु छे, प्रमोद एनो वाम पाहु छे. आनन्द एन स्वरूप छे, माटे ए एनो आत्मा छे. ब्रह्म अक्षर ब्रह्म-ए एनुं धाम छे. अक्षर-ब्रह्म-साधनरूप होवाथी ए एy पुच्छ छे. अन्नमयादि पंच पुरुषोना निरूपणथी आ फलित थाय छे. अन्न ब्रानी उपासना करवाथी सर्व अन्न प्राप्त थाय छे, अने तेनाथी वाह्य लौकिक भोग सिद्ध थाय छे. त्यार पछी प्राण-ब्रह्मनी उपासनाथी सर्व आयुष्य प्राप्त थवाथी लौकिक आन्तर भोग सिद्ध थाय छे. त्यार पछी ब्रह्मानन्दना ज्ञानथी भय दूर थवाथी वैदिक भोग सिद्ध थाय छे. लौकिक व्यवहारमा मनुष्य उमर वगेरे प्राप्त कर्याथी स्वतंत्र थाय छे, अने त्यार पछी वैदिक व्यवहार करे छे. आ व्यवहार लौकिक व्यवहारथी भिन्न छे. वैदिक भोग सिद्ध थया पछी पारलौकिक भोगनी सिद्धि विज्ञानमयनी उपासनाथी थाय छे. नानाविध निष्काम यज्ञ करवाथी ब्रह्मज्ञानने माटे योग्य देहनी प्राप्ति थाय छे. ज उपदेश तृतीय अध्यायना प्रथम पादमा करे छे. अन्ते प्रमादना अभावमां सर्व पापना नाश थया पछी सर्वकामनी प्राप्ति थाय छे. आ प्रकारे उपासनाना कथन, प्रयोजन पण स्पष्ट थाय छे. अन्नमयादि पुरुपना स्वरूपनो विचार श्रीमद्भागवतमां वेदस्तुतिमां पण कयों छे. अन्न- मयादि पुरुषोमा अन्तिम पुरुष आनन्दमय भगवान् छे. अन्नमयादिने सर्व पुरुषोने आकार- समर्पक आ आनन्दमय ज छे. आ पांच पुरुपोनी प्राप्ति आ लोकना त्याग पछी थाय छ एम श्रुति कहे छे तेथी एम निश्चय याय छे के आ पाच कोश नथी, परन्तु आ पाचे पुरुष फलरूप व्यापक अने भिन्न छे. मध्व निम्बार्कादि कोइ आ पांचवें कोशत्व स्वीकारतुं नथी. मध्वाचार्य तो अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, अने आनन्दमयने अनुक्रमे अनिरुद्ध, प्रद्युम्न, संकर्षण, वासुदेव अने नारायण कहीने सर्वनी भगवद्रूपता स्वीकारे छे. उपर अन्नमय प्राणमय मनोमय अने विज्ञानमय ए सर्वने कारसमर्पक आनंदमय छ एम कहीने तेनु स्वतःसिद्ध साकारत्व प्रतिपादन कर्यु छे. आ प्रकारे विचार करतां भन्नमय, प्राणमय, मनोमय अने विज्ञानमय ए चार विभूति ठरे छे अने आनंदमय ए पुरुषोत्तम परब्रह्म ठरे छे. भग. वान् यादरायण व्यास पण आनंदमयने ए चार विभूतिथी भिन्न गणीने तेनं परब्रह्मत्व प्रकट करे छे. प्रकृत निसिल प्रपाठकमां आनंदमयनुं वारंवार कीर्तन अने स्तुति स्पष्ट शब्दोथी, अने अर्थथी फरी छे. तेथी आनंदमय ए परब्रह्म छे, ज्यारे अन्य चार पुरुपो भगवान्नी विभूतिओ छे. आनं- दमय स्वतःसिद्ध साकार होवाथी अन्य चारने पुरुषविधता-साकारत्व प्राप्त थाय छे. लोकमा व्यास आ , ८ , जे अंदर भरवामां आवे छे, तेनो तदाकार धातुनी मूर्ति बनावती वखते जोवामां आवे छे. वहार वेष्टित जे होय तेनी तदाकारता तो उपदेहमां अने सीवेलां वस्त्रमा जोवामां आवे छे. जेम भांडना कर्तामो प्रथम मीणनी आकृति वनावीने ते ऊपर माटी लगाडीने तेना याकोरामा धातु रेडे छ, नहि तो पूरित। भांडनु निर्माण न थाय. आ देह तेवो छे. माटे अहि देहमां कोई आन्तर एवो होय छे के जेना अपर आवेला अन्नमयादि सर्व पुरुषाकार थाय- जो तेम न मानो तो घटादिनी माफक आ पांच पुरुषो जीवकृतिथी साध्य नहि होवाथी राखो- डीना जथानी माफक ढगला थइ जाय. अहि तो श्रुतिमा 'तस्मात् वा एतस्मात् अन्नरसमयाद्- न्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः । तेन एप पूर्णः । स वा एप पुरुपविधः । तस्य पुरुपविधतामन्ययं पुरुषविधः' एम कयुं छे. अर्थात् ते आ अन्नरसमयथी अन्य आंतर आत्मा प्राणमय छे. ते प्राणमयथी आ अन्नमय आत्मा पूर्ण छ, व्याप्त छे, ते आ प्राणमय पुरुपविध छे, तेनी पुरुषविधता- थी आ अन्नमय आत्मा पुरुपविध छे, एम कयुं छे. तेथी प्राणमय आंतर आत्माथी उपरितन अन्नमय पूर्ण छे एम फहीने आ प्राणमय पुरुषविध होवाथी अन्नमय तदाफार पुरुपविध छे एम श्रुति कहे छे. आधी पांचे पुरुषोमां सर्वथी आन्तर आत्मा आनंदमय ज सर्वने माकारसमर्पक ठरे छे, एने तेथी तेनुं स्वतःसिद्ध साकारत्व पण स्पष्ट प्रतीत थाय छे. वेद- स्तुतिमां पण भगवदन्वयथी ज अन्नमयादिनी साकारता निरूपण करी छे. अन्नमयादिने साका- रत्यने माटे अन्यनी अपेक्षा पडे छे, आनन्दमयने नहि. कोई अन्नमयने सर्वना आकारसमर्पक फहे तो तेनो निषेध श्रुतिओ स्वयं करती कहे छे के अन्नमयादिमां जे चरम-अन्तिम-सर्वान्तर आनन्दमय छे तेना अन्वयथी ज अन्नमयादि अन्य पुरुपविध थाय छे. माटे अन्तःस्थित आनन्द- मय जे अन्नमयादि चार पुरुपोनी पुरुपविधता निरन्तर संपादन करे छे ते ज प्रभु अत्यन्त मान्य छ. भगवान ज मानन्दमय छे. अन फेटलाक शाकर विचारको अन्नमयादिनुं स्पष्ट आत्मत्व-पुरुषत्व लौकिक देहथी भिन्नत्व श्रुतिमा स्पष्ट कहेलुं छे ते अनादर करी आ अन्नमयादि पांचेने कोश माने छे. मा प्रकारं परम प्रेष्ठ मानन्दमय प्रभुनो त्याग फरवाथी अवशिष्ट रहेता शोकने ते लोको प्राप्त कर छ. बादरा- यण व्यास स्पष्टतम शब्दोमां आनन्दमयनु परग्रहव कथे छे, तेने पण ते लोको तिलांजलि अपें . आनन्दमयमा मयदप्रत्यय विकारवाची नथी, परन्तु प्राचुर्यवाची छे, एम व्यास स्पष्ट यहे , ते पण मवगणवाने धाष्टर्य कर छे, 'द्वयचछन्दसि ए सूत्रथी महर्षि पाणिनि घे स्वरवाला शादमा विकारवाची मयप्रत्यय होय एम फहे थे, परन्तु प्रण स्वरवाला शब्दमा मयद् विकार- पाची होह शफे एम फहेता नथी, ते पण लक्षमा राख्या विना व्रण स्वरवाला आनन्दमयमा मय मत्यय विकारयाची छ अने तेथी ते ना नथी एम फ्ल्प छे. परन्तु आ सर्व कल्पनानी उन साफार प्रसना दूपमांधी ने अथवा ब्रह्मपदमा रहेली जह श्रद्धामांयी थयलो, पम लागे हैं. प्रमने मानन्दमयनुं पुच्च-प्रतिष्ठा श्रुतिए स्पष्ट शब्दयी पाय से गले उतरदं नयी, तेनु कारण पण आनन्दमयने श्रुति हंसरूप वर्णवे छे, सेना उपर लक्ष्य महि रदेवायी ज. प्यार परमात्मा मानन्दमय हमारार होय त्यारे नदाधार अक्षर ग्रहा तेन पुच्छ , थाय छे. ज्ञानमार्गनुं फल अक्षर-ब्रह्म छे, ज्यारे भक्तिमार्गनुं फल आनन्दमय छे ते, अने भकि- मार्गनुं फल ज्ञानमार्गना फल फरतां उत्तम छे ते, बताववाने श्रुति प्रसने-अक्षरने-आनन्दमयर्नु पुच्छ कहे छे. आनन्दमयने पुरुप तरीके वर्णवे त्यारे ब्रह्म-अक्षर, आनन्दमयनी प्रतिष्ठा-आधार- गृह-धाम-चरण-इत्यादि कहेवाय छे. परन्तु तेथी अक्षर-भगवञ्चरण मब्रह्म थ नथी. माटे अन्तः- स्थित आनन्दमय ज आनन्द आकार संपादन करे छे. आ प्रकारचें आनन्दमय प्रभुनु पुरुषो- त्तमत्व जे स्वीकारता नथी तेने आधिदैविक श्रुतिदेवीओ कृतन कहे तेमां शुं कहेवू, अने जे आवा अन्व:स्थित आनन्दमय प्रभुने पुरुषोत्तम जाणीने भजे ते युक्त छे एम कहे तेमां पण शुं कहेवू ? आनन्दमयमा मवट्प्रत्यय विकारवाची ज छे एप कहीने तेनुं अब्रह्मत्व शंकराचायें कह्यं तेने स्थिर करवाने भामती कार त्रण चार कारणो आपे छे ते तासीए. 'प्रायपाठप- रित्यागो मुख्यत्रितयलंघनम् । पूर्वस्मिन्नुत्तरे पक्षे प्रायपाठस्य बाधनम् ॥' अर्थात् आनन्दमयनु, ब्रह्मत्व स्वीकारवामां आवे तो ए पक्षमा अनमयादिमां स्वीकृत मयट्प्रत्ययना विकारार्थना त्यागथी.. प्रायपाठनो परित्याग थायछे ए एक दोष. ब्रझना अर्थमा अप्रसिद्ध एवा आनन्दमयपदनो अर्थ ब्रह्म लक्षणाथी वा योगयी मानवामां आवे तो आनन्दमयपदना मुख्य अर्थर्नु उल्लंघन थाय ए. वीजो दोप. तेम ज ब्रह्मने आनन्दमयनुं पुच्छ का ते पण आनन्दमयना अवयव तरीके गौण अर्थमां थाय छे ए बीजो दोप. अने ब्रह्मपद पण प्रम नहि पण पुन्छ थतां अनम थाय, तेमां स्वार्थको त्याग थतां चोयो दोष. आ प्रकारे आनन्दमयनुं जो ब्रह्मत्व स्वीकारवामां आवे तो तेमां चार दोष प्राप्त थाय छे. ज्यारे आनन्दमयनुं विकारार्थ फत्र मानी र तेनां प्रझरना मुख्य अर्थनो त्याग थतो नथी, तेम आनन्दमयना मुख्यार्थनो पण नहि, तेम आनन्दरदना मुख्यार्थनो पण नहि. पुच्छपदनो मुख्यार्थबाध थाय छे ते तो पुच्छने अश्यत्र वा अधिकरण जे लोको माने । छे तेमने पण तुल्य छे. तेम मानवामां पण मुख्यार्थनो वाध थाय छे. आनन्दमयने विकारयुक्त मानीए तेमा अवयवना प्रायपाठनो बाध थाय छे ए दोर छे, तेम आनन्दमयने ब्रह्म मानीए तो. त्यां विकारना प्रायपाठनो बाध आक्वाथी उभयत्र दोष तुल्य छे. आथी विकारार्थ मयप्रत्यय. आनन्दमयमा होवायी ते अत्र छ एम मानवू एज युक्त छे एम भामतीकार कहे छे. परन्तु आ सर्व भामतीकारनुं कथन व्याख्येय अन्य शांकरभाष्यनुं पूजनमात्र छे. एमां ता- त्त्विक काइ नथी. विकारार्थनो प्राणमयमां कोई आदर करतुं नथी. घटाकाशने घटनो विकार , कहीने प्राणमयमा मयट्प्रत्यय, विकारवाचित्व घटावी शकाय एम नथी. छेक प्राकृतथी आरंभी महापंडितपर्यन्त कोई घटाकाशने घटनो विकार समजतुं नयी. घटमां भरेला दुबने कोई घटनो विकार मानतुं होत तो तेवु अनुमान करी शकात, पण तेम पण कोई करतुं नयी. लोकमां के शास्त्रमा तेवो। प्रयोग कोई करतुं नथी. भास्कराचार्यादि पण प्राणमयमा विकारार्थता स्वीकारता नथी. मा प्रकारे प्राणमयमा ज जो विकारार्थता न मनाय, तो पछी तेनी प्रायता पण वन्ध्यापुनना सौन्दर्य जेवी यई , जाय छे. वस्तुतः अन्नमयादि पांचे पुरुषोमा मयट प्राचुर्यवाची छे पर ध्यासमूत्र तो सूचवे छे. वली, शब्दमात्र ॐकारनी विकृति छे. ॐकार ब्रह्मवाचक छे एम गीता पण कहे छे. तेथी *कारना विकृतिरूप शब्दमात्र उत्सर्गयी ग्रह्मवाचक सिद्ध ज छे. अथात् शब्दमात्रनो १० मुख्य अर्थ भगवान छे; परन्तु ते ते शब्दनो शक्तिसंकोच करीने व्यवहारार्थ लोको ते ते कहे छे, ते गौण अर्थत्व दूर करीने शब्दमात्र, भगवदर्थकत्व सिद्ध करवाने व्यासावार्यनी प्रवृत्ति छे. तेथी आनन्दमय, ब्रह्म, के पुन्छ कोई शब्दना मुख्यार्थy उलंघन थर्नु नथी, सर्व भगवान् छे तेथी. आ प्रकार आनन्द नयने ब्रह्म मानवामां कोई पण दोर नहि होगाथी अने तेने अनझ मान. वामां बहु दोप उपरांत व्यासविरोव मुख्य होवाथी आनन्दमयनुं ज ब्रह्मत्व स्वीकार एन युक्त छे. भामतीकारनी शिक्षा के वेद अने सूत्रमा परस्पर विरोध होय तो सूत्रोने मचडवा ए तो केवल शांकरभाष्यनो उपहास लागे छे. व्यासना सूबो स्पष्ट रीते वेदार्थनो ज निश्चय करवाने योनायला छे, तेमने जो मवडवामां आवे तो तेमां फल वेदार्थना विप्लव शिवाय अन्य तो दिशj नथी. दुःखना अतिवनी संभावना थाय छे तेथी आनन्द नय ब्रह्म नथी एम मानवू पण युक्त नधी. लोकमां पण प्रचुरप्रकाशयुक्त सूर्य छे, बहुतापवालो उज्णकालनो दिवस छ, अन्ध- कारमयी वर्षारात्रि छे, श्रवण बहु धनवान् छे, आ वाक्योमां पण तद्विरुद्ध अंधकार, शीतलता, प्रकाश अने दरिद्रनानो प्रत्यक्ष ज बाध थाय छे, त्यां पछी तेना अस्पत्वनी शंका ज रहे ती नथी. वेदमा तो सर्वभूतो जेनाथी जीवे छे ते आनन्दमयनां, आनन्दप्राचुर्यमां, दुःखनी शंका तो सुदूर थाय छे. वेदने ओ दुःखनुं सूचन आनन्दमयमा जो क्याहि पण करवू होत तो आनन्दमयना स्वरूप- वर्णनमां कोई अवयवद्वारा तेम करत ज; पण त्यां तो प्रेमने शिर कहे छे, मोदने दक्षिण पक्ष, प्रमोइने सर पक्ष, आनन्दने आत्मा-कहे छे. काई सजातीय ज पदार्थ पी अपवकलना श्रुति सर्वत्र करती नथी.आकाश आत्मा छ, पृथिवी पुच्छ छे, महलोंक पुच्छ छे एम पण श्रुति कहे छे. तेथी श्रतिए दुःख कम आनन्दमयना अवयववर्णनमां न कह्यु ए पग विचारणीय छे. आनन्दमयना निरूपणनां 'शारीर आत्मा ' ए प्रयोगमा शरीरशब्दथो पग दुःख .सूबन थ नधी. शारीर ब्राह्मणां सर्वने भगवान्नां शरीर कहां आनन्दमय प्रभुमां-निरववि-आनन्दमां-जेने दुःखनी स्फूर्ति थाय छे तेना उपर महादुःखना संस्कार- प्राबल्य केटणु हशे ते फल्पी शशातुं नी. वली जो आनन्दमयने ब्रह्म न मानीर तो ए कयो पदार्थ थाय तेनो विचार पग शांकरो करता मी. आनन्दमय जीव तया जड नयी एम तो व्यासाचार्य स्वतः कहे छे. अर्थात् प्रह बिना इतर वस्तु मानन्दमयने मानवा जवामां आचार्य श्रीवल्लभाधीश्वर माज्ञा करे छ तेम-महा- साहसिकता-या महामूढता-ज प्रकट थाय छे. आनन्दमय ज परब्रह्म ज छे ए प्रत्यक्ष श्रुत्यर्थनो याच तो सास ब्रह्माजी करवा मागे तो तेनाथी पण थवो अशस्य छे. अनमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय अने आनन्दमयनी प्राति श्रुति आ लोकना त्याग पछी थाय जे एन कहे छे, एटले आ अन्नमयादि जीवकोश तो नथी ज, आ पांच फलरूप, च्यापक मने भिन्न है. अन्नात् प्राणा भान्ति, भूतानां प्राणैमिनः । मनसश्च विज्ञान, विज्ञानादा. नन्दो प्रायोनिः ॥ स वा एप पुरुपः पञ्चधा पञ्चारमा येन सर्वमिदं । प्रति पृथिवी पान्तरिमं च, द्याय दिशधावान्तरदिशश्च ॥ स वै सर्वमिदं जगत् स भूतं स भन्यं । वगैरेषी अन्य श्रुति अनादि पंचविर, उक्तरीतियी पंचारमझ, पुरुषती .सर्वव्याप्ति अने सी- माना योधीने अन्ते झावा तमे मनता हा च भुयो न मृत्युमुपयाहि विद्वान' ए वाक्ययी ते जाणनार मुक्ति प्राप्त करे छे एम कहे छे. आ प्रकारे अन्नमयादि कोश तो नथी ज. त्यारे आ कोशनी कल्पना क्यांथी आवी ? 'अन्नमयप्राणमयमनोमयविज्ञानमयान. न्दमया मे शुध्यन्ताम्' ए श्रुतिना आधार अन्नमयादिने कोश कही शकाय परन्तु मारा' अन्नमयादि (कोशो) शुद्ध थाओ एम कहेलं होबाथी ए कोशो स्व स्व जीवना भेदना छे. ते कोशो प्रतिशरीर भिन्न छे. परन्तु एमां 'मारा अन्नमयादि कोशो' शुद्ध थाओ एम कहेलं होवाथी, तेना आधारे तैत्तिरीय श्रुतिना अन्नमयादि पुरुषोने कोश कल्पवा जवू ए अयुक्त छे. आ प्रकारे शांकरमतमां अन्नमयादि पांचे प्रतिशरीर भिन्न जीव कोश छे, व्यासाचार्यना पूर्व- पक्षीना मते पांचे विभूतिरूप छे, ज्यारे व्यासाचार्य तथा श्रीमदाचार्यजीना सिद्धान्त प्रमाणे अन्नमय, प्राणमय, मनोमय भने विज्ञानमय ' ए चार विभूतिरूप छे, अने आनन्दमय परम पुरुष होवाथी फलरूप छे. अत्र आम विशे छे. 'ब्रह्मविद् परने प्राप्त करे छे' एम प्रतिज्ञा करीने श्रुति सर्वत्र प्रपा- ठकमां तदर्थ- ज, फलनु ज, प्रतिपादन करे छे तेथी आ फलपकरण छे एर निश्चय थाय छे. प्रपा- ठकमां जे अनुभवेश कहेलो छे ते पण प्रकरणना अनुसार फलरूपनो ज छे एम स्पष्ट छे; जीवनो नहिं. अहि अनुमविष्ट 'फलरूप पुरुषनी सर्वात्मकता अने सर्वनी सत्यता कहेली होवाथी, छांदोग्य श्रुतिमां कहेला नामरूपना कारणरूप अनु श्वेशथी आ अनुप्रवेश भिन्न छे. फलरूप आन- दुनो अनुप्रवेश सर्वत्र आ श्रुतिमां कह्यो छे ए वात स्पष्ट छे. 'जो आकाश आनन्द न होत तो' र वाक्यथी आनन्दमयनी अन्त.स्थिति वर्णवी छे. अर्थात् अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमयने जो कोश ज मानवा होय तो ब्रह्मकोश मानो, जीवकोश नहि. सर्वान्तःस्थित आनन्दमय होवाथी माकारसमर्पक तो तेज छ; अने ते ज प्रकारे अन्नमयादि चार पुरुषो तेना तनुरूप कोशरूप मानो तो पण युक्त ज छे. मैत्रायणीय श्रुतिमां अन्न, प्राण, मन, विज्ञान वगैरेने भगवानना उनु तरीके वर्णव्या छे. 'अन्नथी प्राण, प्राणोथी मन, मनथी विज्ञान, विज्ञानथी ब्रह्मयोनि मानन्द. तेज आ पुरुष पांच प्रकारे. पंचात्मक छे, जेमाथी आ सर्व, पृथिवी अन्तरिक्ष द्युलोक दिशा, अवान्तर दिशा व्याप्त छे. तेज आ सर्व जगत् छे. भूत भव्य ते ज छे'. आ उपर कहेली तैत्तिरीय श्रुतिथी अत्र कहेला अन्नमयादि सर्वव्याक अने सर्वात्मक ठरे छे. तेथी ए जीव- कोश तरीके तो गणी शकाय एम नथी ज. तेथी आ भगवत्तनुरूप अन्नमयादि चार पुरुषो तो भगवद्विभूतिरूप, नित्य, व्यापक, भिन्न तथा प्राप्य छे. अन्नमयादि जीवकोशो जे अन्य श्रुतिमा कहेला छे ते तो आ भगवद्विभूतिरूप अन्नमयादि पुरुषोना व्यष्टिरूप छे. आ प्रकारे अहि निरूपण करेला अन्नमय-विराट् दह, प्राणमय-आसन्य, मनोमय-वेद, विज्ञानमय-अक्षर, ए चार पुरुषो. भगवाननी विभूति होवाथी अने जीरकोशी भिन्न होवाथी, परम पुरुष आनन्दमय जेने श्रुति सर्वान्तःस्थित सर्वाकारसमर्पक वर्णवे छे, अने जेनुं वारंवार प्रपाठकमां कीर्तन करे छे ते आ भग- वद्विभूतिरूप अन्नमयादि चार पुरुपोथी पण भिन्न छे. आज आनन्दमयने श्रुति पर पुरुषोतम कहे छे, परम फलरूप पण भा ज छे, अने आनु म निरूपण सर्वत्र प्रपाठकमा छे. ब्रह्मवन् जीवपूर्वोक्त विभूतिव्यष्टिरूप स्वकोशोमांथी उत्क्रमग करीने, त्यजीने, समष्टिभूत अन्नमय, प्राणमय, मनोमय १२ विज्ञानमय, अने आनन्दमय विभूतिओने प्राप्त करी, आनन्दमयरूप थईने आ परम पुरुष आन- न्दमय ब्रह्मने प्राप्त करे छे. 'आनन्दमानन्दमयोउसान' एम श्रीमद्भागवतना द्वितीय स्कंधमां पण कां छे. अत्र यद्यपि आनन्दमयनुं मध्यमां निरूपण नथी तो पण 'तडितोधि वरुणः सम्बन्धात्' ए व्याससूत्रथी तेम मानवामां विवादलेश नथी. आम अहि त्याज्य एका अन्नमयादि कोशोमाथी नीकली, त्यार पछी भगवानना विभूतिरूप समटिरूप भगवत्तनुरूप अन्नमयादि पांचने प्राप्त करी, अन्ते परम पुरुष फलरूप आनन्दमयने क्रमेथी प्राप्त करे छे. ज्ञानमार्गनी रीतिथी प्राप्तिप्रकार. भावो छे. आचार्यश्रीए आज प्रकारनुं निरूपण मान्त्रवर्णिकसूत्रना भाष्यमा कयु छे. भक्तिमार्गीय प्राप्तिप्रकार आ छे. मा श्रुति अनुप्रवेश कहे छ, पुरमा प्रभु आवेश करे छे, एम बीजी श्रुति पण कहे छे. तेथी पुरोमां-भक्तशरीरोमां प्रभुनो प्रवेश ए श्रुतिसिद्ध छे. यद्यपि सर्वाकारसमर्पक आनन्दमयनी लौकिक शरीरमा स्थिति तेवी प्राप्ति थतां पहेला पण सिद्ध छे, अने अन्य चार पुरुषो पण आकाशवद् व्यापक होवाथी तेमनी स्थिति पण भक्तशरीरमां सिद्ध छे छता पण आ सार्वदिक स्थिति तेटला ज कार्य पुरती छे, आनन्दमयना फलानुभवमा आवी स्थिति प्रयोजक नथी. जेवी रीते अग्नि काष्ठमा नित्यसिद्ध छे, छतां ए अमिनी काष्ठमां स्थिति काष्ठना दहन करवामां प्रयोजक नथी, तेम भक्तशरीरोमां आनन्दमय तथा अन्नमयादिनी पूर्व स्थिति छे उतां फलानुभवमा ते स्थिति प्रयोजक नथी. आम होवाथी वहार विराजता प्रभु भक्तिथी भीतर पधारे, अथवा हृदयमा ज मायाना टेराने सरकावीने प्रकट थाय त्यारे अक्षरात्मक विभूतिरूप अन्नमयादि भगवाननी साथे भीतर पधारे छ, अथवा तो प्रकट थाय छे. आ तो भकना लौकिक गरनी व्यवस्था थई. परन्तु ज्यारे आ लोक छोडीने भक्त अलौकिक शरीर प्राप्त करे छे त्यारे तो त्यां आ अन्नमयादि विभूविरूप सर्व विद्यमान होवाथी, कार्यकारित्व तेमनुं त्यां विशेष छे. माम अन्नमयादि आधिभौतिक रूप भक्त शरीरमा व्याप्त रहे छे, आध्यात्मिकरूपे-पक्षिरूपे- प्रवेश फर छे, अने आधिदैविकरूपे कार्य को छे. आधिभौविक लोकमां नियत छे, आधिदैविक भगवानमां नियत छ एम फलित थाय छे. अवान्तर सर्वमा आधिदैविकादि नणे यथासंभव सव्य- पक्ष . आम भक्तिमागीय प्रातिप्रकार पण स्पष्ट श्रुतिए कह्यो छे. मानन्दमयसूत्रभाष्यना. द्वितीय वर्णयमा आ प्रकार प्रभुचरणे स्पष्ट कयों छे. आ प्रकारे मार्यादिक सृष्टिर्नु पण श्रुतिए शेषयी निरूपण कर्यु. 'सोऽकामयत, यह स्याम, मनायेय,' प्रभुए फामना फरी, यहु थाउं, उचनीच भाव प्रकट करूं. मा याक्यथी प्रभु काम- नायी अने कामना ए मानसधर्म-होबाथी मनधी पण सृष्टि प्रकट करे छे. मा प्रवाह सृष्टि छे. प्रवाहमुष्टिना पण फारण फर्वा मनथी मनु स्वयं याय छे. मार्यादिक प्रायाहिक मृष्टिदयतुं निरूपण करीने पठी श्रुति पुष्टिमृधिन निरूपण कर छे. 'सदारमानं स्ययमपुरत । तम्मात् सन् मुकतमुच्यते ।' आ सृष्टि प्रभुनी निजरूप छे, श्रीमंगमां- भी प्रमु प्रकट फर . मा एष्टि मुफ्त है. आ सृष्टिमा रसात्मक आनन्दमय प्रभुज सर्व है, से पियाने श्रुति पह, फे भफ एम रसने प्राप्त परीने आनन्दी थाय . कोण जीवी कोन वाण भारत परी नमन गो माफाशरूप मानन्द न होत तो-महि श्रुति प्रेममार्ग । सरत, आवा 'प्रकट उपदेशे छे. अहि रसात्मक भगवत्स्वरूपना लाभथी आनन्दी थवाय छे एम कहीने ते जरसा- त्मक प्रभुने जीवनना हेतु अने परमानन्दना हेतु कह्या छे. रसस्वरूपर्नु मरणनी उपस्थितिना अभावमा जीवनहेतुत्व कहेवू घटीशके ज नहि. आरस-तो संयोग अने विप्रयोगधी पूर्ण अनुभवमां आवे छे; केवल संयोग के फेवल विप्रयोगधी नहि. त्यां विरहताप घणो ज तीन होवाथी भक्तनी प्राणस्थिति पण न टके, ते मा थाओ ए हेतुथी रसात्मक भगवान तैना हृदयमा विराजे छे. श्रुति कहे छे के जो आ हृदयमा स्फुरदूप आकाश भगवान् न होत तो कोण प्राण धारण कगवी शकत. विरहतापयुक्त भगवदीयने तो जीवनटकावी रासनार भगवत्स्वरूप विना अन्य कोई नथी. ग्रह्मानन्द- थी अधिक पूर्णानन्द-आनन्दमय-सात्मक पुरुषोत्तम छे. तेना विरहतापथी जे प्रेममुग्ध भगवदीय प्रेमनी दृग्भंगादि नव अवस्था ओलंगीने प्रेमनी अन्तिम अवस्था-मरण-समीप-जे पहोंच्यो छे, तेर्नु 'जीवन टकावी राखवा, सामर्थ्य रसात्मक प्रभु विना अन्य कोर्नु होइ सके ? परन्तु आवा भग- वदीय, जीवन संपादन करवू प्रभुने आवश्यक छे. मा विरहतापात्मक आकाश स्वरूप पण आनन्दात्मक छे ते जणाववाने तेने आनन्द कयो छे. आ विरह अवस्थामा प्रलाप गुणगानादि जे भगवदीयथी थई जाय छे ते पण विप्रयोग रंसात्मक प्रभुना ज धमों छे. नीलांबुदश्यांम-मेघश्याम- कृष्ण-आनन्दमय-जे हृदयमां विराजे ते अनिक्लेशथी हृदयथी यहार पधारे एम भाव थाय तो पण हृदयमांथी ते स्वरूपने ससेडी शकातुं नथी ते जणाववाने श्रुति आ विप्रयोगात्मक आनन्दावस्थाने आकाशरूप कहे छे. आ प्रकारे विरहतापथी भक्त आसन्नमरण थाय छे, त्यारे प्रस्ट थईने प्रभु विना अन्य एवो कोण होई शके के जे दर्शन, स्पर्श, आश्लेप, भापणादिथी स्वरूपानन्दनुं दान करीने ते भगवदीयने जीवाडी शके, पूर्व प्रकट थयला विरहतापनी निवृत्ति करी तेने आनन्दपूर्ण करी शके, आ जणाववाने श्रुति कहे छे के ए ज रसरूप प्रभुने प्राप्त करीने भगवदीय आनन्दपूर्ण थाय छे. आनन्दमय पुरुषोत्तम ज रसरूप छे ए दर्शावी, तदंगज विशेष कृपायुक्त तद्रूप सृष्टि आ रसात्मक आनन्दमयनी प्राप्तिने ज परप्राप्ति माने छे एम कहीने आवा रसात्मक प्रभुमां निष्ठायुक्त सृष्टिनी निर्भयता श्रुति जणावे छे. आ सृष्टिने लोकवेदनो भय नथी. आ सृष्टि प्रभुने ज आधीन रहे छे. वायु, सूर्य, अग्नि, इन्द्र, यम वगेरे देवताओ तेने अधीन थई स्वधर्म पाळे छे, तो पछी तदंश जीवो तेने अनुसरे तेमां शुं कहेवू ? आ प्रकारे अति विविध सृष्टि कहीने प्रभुनी विविध लीला पण प्रतिपादन करे छे. आसुर 'प्रावाहिक संर्गथी ए क्रीडा विप्रकृष्ट थाय छे, आसुर सृष्टिमां प्रभु दूरथी क्रीडा कर छे, माया वगेरेनो अन्तरपट राखीने खेले छे. मार्यादिक सर्गथी परम्परित, मार्यादिक सृष्टिमां प्रभु विभूति वगैरे परंपगथी खेले छे. अने पुष्टिसर्गमा साक्षात् क्रीडा करे छे. पुष्टिसृष्टि श्रीअंगसृष्टि होवाथी, प्रभु विशेष अनुग्रहथी साक्षात् स्वयं तेमां विशेष रमण करे छे. आम आनन्दमय साकार रसात्मक पुरुषोत्तम, तत्प्राप्तिमा थता सर्व कामोपभोगनो प्रकार वगैरे सर्व निरूपण करीने 'ब्रह्मविद् परने प्राप्त करे छे' ए वाक्यमां कहेला अक्षर ब्रह्मना आनन्दनी गणना श्रुति करे छे. श्रोत्रिय, निष्काम निरोगी, यौवनयुक्त, विद्वान्, भोजनशक्तियुक्त, दृढ अंगयुक्त, अलवान् पुरुपने जे आनन्द थाय ते मनुष्यनो एक आनन्द गणाय. आवा शत आनन्द मले त्यारे मनुष्यगन्धर्वनो एक आनन्द थाय. आम देवगन्धर्व, चिरलोक पितृ, आजानजदेव, कर्मदेव, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापति वगैरेनो एक आनन्दं पूर्वना आनन्दं करता उत्तरोचंर शतगुण विशेष छे एम १४ जणावी ब्रह्मानन्दनी गणना करी ए ब्रह्म गणितानन्द अक्षरब्रह्मधाम छे एम श्रुतिए जणाव्युं छे. आ ब्रह्मने पुरुषमा वा आदित्यमां जाणे छे, ते एक छे एम जे जाणे छे, ते आ लोक त्यजीने आ अन्न- मय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय आनन्दमयने प्राप्त करे छ एम कहीने ब्रह्मविद् पर-पुरुषोत्तमनी प्राप्ति करे छ एम कहीने, आ पुरुषोत्तमनी प्राप्तिमा तेनी साधे सर्व कामोपभोग करनारने पाप पुण्यनो-लोक वेदनो भय रहेतो नथी एम कहीने, आरंभमां ब्रह्मविद्नी जे परप्राप्ति कहेली तेनुं पुनः अन्ते विवरण करी, उपक्रम अने उपसंहारनी एकवाक्यता श्रुतिए जणावी. आज “आनन्दमय उपनिपर्नु परम निगूढ़ परम तत्त्व छे. एका रसात्मक पुरुषोत्तमनु कचित् पण दर्शन श्रीमदाचार्यचरणनी कृपाथी थाओ एज अत्र प्रार्थ्य छे. अखंड ग्रह्मवादनी रीतिथी आनन्दमयनु परब्रह्मत्व सिद्ध थयु. आ ज अर्थने फरीथी सुदृढ करवाने श्रीमत्प्रभुचरण श्रीमविट्ठलेश्वर आधिदैविकवादनो आश्रय लईने आज प्रपाठकने नीचे दर्शा. वेला प्रकारे योजे छे. ब्रह्मवादभवननी रचना सुदृढ थया पछी तदन्तःस्थित आधिदैविकवादनी झांखी पण परम रमणीय लागशे. आनन्दमय प्रभुनुं देवत्व-क्रीडैकशालिस्व पण आधिदैविक वादथी स्फुट थाय छे. परम विशुद्ध निर्गुण निरवधि निरुपधि निगूढ प्रेमनी पराकाष्ठा आ ज रसात्मक साकार आनन्दमय छे. तत्प्राप्तिथीन आत्यन्तिक शोकनी निवृत्ति अने परमानन्दनी प्राति थाय छे. तल्लीलानुं अनुसंधान पण परम कैवल्य मोक्ष छे. तल्लीलानु कीर्तन पण मोक्षदायक छे. रासलीलैक- तात्पर्य श्रीवजराज ज आ परम प्रेमनो विषय छे, रसात्मक साकार पुरुषोत्तम आनन्दमय पण ते ज छे, गोपवधूओ पण तद्रूप छे, अने तेमनुं परस्पर रमण पण तदात्मक छे. आवी परम निर्दुष्ट भावनाओनो स्वल्पांश पण हृदयना अन्तरंग स्थानमा भास थाय तो पण परम भाग्य समजवू. आ तात्पर्य प्रकट करवाने श्रीमत्प्रभुचरण आनन्दवल्लीने नीचे जणावेला प्रकारे योजे छे. आनन्दवल्लीनो आरंभ 'ब्रह्मवित् आप्नोति परम्' 'ब्रह्मवित् परने प्राप्त करे छे। ए मूत्रवाक्यथी थाय छे. आचायों आ वाक्यने सूत्रवाक्य कहे छे. आने सूत्र कहेवा, कारण ए छे के आ वा- क्यमा अक्षरो स्वल्प छे, सारभूत छे, निःसन्दिग्ध छ, अनवद्य छे, अने सर्वमान्य छे. आवाक्य प्रज्ञा- नने परप्राप्ति- साधन जणावे छे,परवस्तु सर्वव्यापक होवा छतां पण प्राप्य छे, गन्तव्य छे, अने तत्वाति जेने थई छे, तेने पुनरावृत्ति नथी एम सूचवीने वादरायणाचार्य साथे पोतानी संमति प्रकट करे छे. अत्र प्रभाविद् परने प्राप्त करे छ एम फही श्रुति आ ब्रह्मथी पर कोई अधिक छे एम पण स्पष्ट कहे छ. आ ब्रह्म शुं, आ पर शुं, परनी प्राति शें, इत्यादिनुं स्पष्टीकरण श्रुति निज शब्दोथी नहि करता प्रचायी फरे छे. महान् भगवदीयोनो अनुभवप्रकार परम निगूढ ऋचाद्वारा थाय ए सुयोग्य ज है. • 'प्रावित् गानोति परम् । ए सूत्रवाक्यनो अर्थ निरूपण करवावाली प्राया आ छे, 'सत्यं ज्ञानं अनन्तं प्रक्ष यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् सोऽश्रुते सर्वान् फामान् सह ग्रह्मणा विपश्चिता.. आ ऋचा ' सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म' ए चार शब्दोथी 'ब्रह्मविन् आप्नोति परम् ' ए वाक्यना ग्रह्मशब्दनो अर्थ स्पष्ट कर छे, 'यो वेद निहिनं गुहायां' ए शब्दोथी 'विन्' शब्दनो, मने 'परमे व्योमन् सोनुते सर्वान् कामान् सह प्रक्षणा विपश्चिता' ए शब्दोथी 'आप्नोति परम्ने ग्पष्ट करे छे. 'प्रझविन् परने (पुम्पोत्तमने ) प्रान कर छए वाक्यने झाचा स्पष्ट करवाने कहे के के 'सत्य शान अनन्त-आनन्द माने गे परम व्योमरूप हृदयाकाशमा स्थापित जाणे हे ते विपश्चित - ब्रह्म साथ सर्व कामनो भोग करे छे. एविपश्चित् विविधरसभोगचतुर ब्रह्मनी साथे सर्वकामभोगने परम फल कह्यं छे, ब्रह्मज्ञान पटीनी अवस्थामा यती परप्रामि ते ज आ विविधरसमोगचतुर ब्रह्मनी साधेनो प्राप्त थयलो सर्वकामोपभोग ज छे. आ विचार करतां ब्रह्मज्ञान ए पुरुषोत्तमप्राप्तिर्नु साधन थाय छे, अने पुरुषोत्तम-परब्रह्म ते फल थाय छे. 'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः न मेवया न बहुना श्रुतेन यमैवैष घृणुते तेन लभ्यस्तस्यैप मात्मा वृणुते तनुं स्वाम् ' ए श्रुति जणावे छे के आ आत्मा-परमात्मा-प्रभु प्रवचनथी, मेधा-बुद्धिथी, बहु अध्ययन वगैरेयी प्राप्त थता नथी, जेनुं-जे जीवनुं प्रभु वरण करे छे, तेने ज ए प्रभु प्राप्त थाय छे, अने तेवा वृत जीवने प्रभु निजतनु तरीके वरे छे. अर्थात् प्रभुप्राप्तिमां कारण मात्र प्रभुनु करेलु वरण न छे; प्रभुत वरण विना तत्प्राप्तिमा अन्य कारण नथी. आ प्रकारे एक श्रुतिवाक्य ब्रह्मज्ञानने परप्राप्तिनुं सायन कहे छे, ज्यारे अन्य श्रुतिवाक्य प्रभुप्राप्तिमा वरणने ज साधन कहे छे, अर्थात् साधनमात्रने निपेधे छे. आम आपाततः श्रुतिमा परस्पर विरोध भासे छे. परन्तु श्रुतिओमा परस्पर विसंवाद होयज नहिं, सर्व श्रुतिओ एक ज प्रभुनुं गान करे छ; त्यारे आम भिन्नताथी निरूपण- प्रयोजन शुं! अहि तात्पर्य आ छे. अक्षरब्रह्मना ज्ञानश्री अविद्यानी निवृत्ति थाय , अविद्या निवृत्त थतां प्राकृत लौकिक धर्मों पण निवृत्त थाय छे, अने तेथी शुद्धि प्राप्त थतां पुरुषोत्तमनी प्राप्तिमा अपेक्षित स्वरूपयोग्यता संपादन थाय छे. स्वरूपयोग्यताथी संपन्न आका शुद्ध जीवनुं स्वीय तरीके प्रभुज्यारे वरण करे छे त्यारे तेनामां निरूपधि निरवधि प्रेम-भक्ति-नो प्रादुर्भाव थाय छे, अने आ प्रकारे स्वरूपयोग्यता अने प्रेम-भक्ति-साहित्य संपादन थतां पुरुषोत्तमनी प्राप्ति तेवा वृत जीवने थाय छे. त्यारे ज गुहामां परम व्योमनो प्रादुर्भाव थाय छे. आ हृदयाकाश परम छ कारणके परम-पुरुषोत्तमर्नु यथार्थ दर्शन-तेनो यथार्थ अनुभव-अहि ज थाय छे. अर्यात् गुहामा हृदयाकाशमां आविर्भूत परम व्योम ए अक्षरात्मक व्यापिवैकुंठ छे, अने ते पुरुषोत्तमना धामरूप होवाथी, त्यां प्रभुने विराजता जे जाणे ते भक्त ब्रह्मनी साथे नित्य अविकृत-विविधरसभोगचतुर प्रभुसाथे सर्व कामनो भोग करे छे. आ ज परप्राप्ति. अत्र प्रथमा विमक्तिथी भोगमा भक्तनुं स्वातंत्र्य अने प्रभुनु तृतीया विभक्तिथी गौणत्व श्रुति सूचवे छे. आ युक्त ज छे. प्राप्त फल ज्यां सुधी स्वाधीन न थाय त्यां मुधी तेनुं फलत्व ज घटे नहि. निजवृत जीवना सकल मनोरथ पूरण करवाने तदिच्छानुसार तेना भक्तिवलथी तदधीन थइने सर्वस्वतंत्र प्रभु खेले छे. आने ज श्रीमदाचार्यचरण सेवाफलमा अलौकिकसामर्थ्य कहे छे. आ फल जीवकृतिसाध्य नथी, केवल दानैकसाध्य छे. 'नायमात्मा' श्रुति प्रभुप्राप्तिमा सर्वसाधनोनो निपेत्र एकवार करीने पुनः कथे छे के 'नायमात्मा वलहीनन लभ्यः' अर्थात् वलयुक्त ज प्रभुने प्राप्त करे ई एम कहे छे, तेनो पण आ ज आशय छे. निन वरणथी जीवमा प्रेमातिशयनो-भत्त्यतिशयनो प्रादुर्भाव थाय छे, अने ते निरवधि निरुपति प्रेमथी-भक्तिथी. प्रमु निज प्रभुत्वधमों-निन माहात्म्य तेनै नहि दर्शावता-तेने अधीन थईने खेले छ भक्तमनोरथपूरक थाय छे. निजवृतजीवना प्रेमवलथी-भक्तियलयी सर्वस्वतंत्र प्रभु तदधीन थईने खेले छे एज प्रभुनो तेना उपर अत्यन्त अनुमह सूचवे छ. उनुग्रहात्मक पुष्टिमार्गर्नु आज मा उत्तमोत्तम फल छ, आनु ज प्रतिपादन भगवती श्रुति अन करे छे, अने आ ज श्रुतिनुं उपबृंहण भगवान् व्यास श्रीमद्भागवतना दशमस्कंधमा गोपीकृष्णना प्रसंगी करे छे. तात्पर्य आ छे. अति विपश्चित् ब्रह्मनी साथे सर्वकामोपभोग कथे छे, परप्राप्ति पण आ ज छे. तृतीय विभक्तिथी प्रभुनुं गौणत्व अने भक्तर्नु प्राधान्य पण स्पष्ट छे. छांदोग्य उपनिषद् पण आत्मरति आत्मक्रीड आत्ममिथुन सर्वकामचार इत्यादिशब्दोयी भक्नी आ ज अवस्थानुं प्रतिपादन करे छे. सर्वस्वतंत्र भुनी साथे अल्प जीव भक्तर्नु भोगसामर्थ्य न घटे तेथी प्रभु स्वतः हंसरूपे तेमा प्रवेश करे छे. 'द्वासुपर्णा दिति ए श्रुतिमा प्रभु अने भक्त उभयने पक्षी तरीके वर्णव्या छे, अने श्रीमद्भागवतमा एवं स मानसो हंसो हंसेन प्रतियोधितः । ए वाक्यमा प्रभु अने भक्त उभयने हंस कह्या छे. पक्षीओमां हंस चातुर्यमाटे प्रसिद्ध छे. माटे अहि पण अति प्रभु तथा भत्त ने हंसरूपे वर्णवे छे, अने ज्यारे प्रभु गतिप्रतिबंधक ओळंघीने हंसरूपे भक्त. हंसमा प्रवेशे छे त्यारे तत्समान थईने भक्तने सर्व आनंदनो दानद्वारा अनुभव करावे छे. स्वरूपानन्दानुभव ज परम पुरुषार्थ छे तेथी अति प्रभु तथा भक्तने पुरुपरूपे वर्णवे छे. शास्त्र पण पुरुषाधिकार लईने प्रवते छे. भगवान् बादरायण पण परम मुक्तिनी अवस्थामा प्रभु तथा भक्तर्नु मोगमात्रमा साम्य स्वीकारे छे. आ प्रकारे भक्तसाम्य स्वीकारीने स्वतः गौण थईने निजवृत भक्तना सकल मनोरथ प्रभु जे अवस्थामां पूरण करे छे ते ब्रह्मज्ञानथी पण उत्तम कक्षा छे. अत्र ब्रह्मवित् परने प्राप्त करे छे एम कर्तुं छे; आ ज ब्रह्मने ऋचा सत्य ज्ञान अनंत कहे छे, आ ज ब्रह्मना आनन्दनी गणना करे छे, आ ज ब्रह्मने आनन्दमयनुं पुन्छ-प्रतिष्ठा कहे छे; अर्थात् आ गणितानंद ब्रह्म ए पर-आनन्दमयनुं पुच्छ-प्रतिष्ठा छे; आनन्दमय-पर-नुं आ ब्रह्म आधार- धाम-छे. श्रीमद्भगवद्गीतामा अक्षरने प्रभु-पुरुषोत्तम-निज धाम कहे छे. अर्थात् आ ब्रह्म जेनुं ज्ञान पर-पुरुषोत्तमनी प्राप्तिमा योग्यता संपादन करे छे ते अक्षर ब्रह्म छे, गणितानन्द छे, पुरुषोत्तम-आनंदमयनु (हंसरूपे होय त्यारे ) पुच्छ, (पुरुषरूपे)धाम -प्रतिष्ठा आधार-गृह छे. आज अक्षरने कचित् लक्ष्मी, शेष इत्यादि भावनाओ बहुधा योजाय छे. श्रीमदाचार्यचरण रासांचाध्यायीना आरंभमा 'ब्रह्मानन्दात् समुद्धृत्य भजनानन्दयोजने' ए फारिफामां आज तिनु मर्म परम रमणीय रीते दर्शाये छे.जेम त्यां नित्यसिद्ध भगवदीयोने ब्रह्महद द्वारा योग्यतानी अपेक्षा नथी, तेम अत्र पण निजांगमाथी प्रादुर्भवेली सृष्टिने साक्षात् पुरुषोत्तम ज स्वतः सर्व थवाथी अक्षरब्रह्मना ज्ञाननी अपेक्षा पड़ती नथी. आवा ज परम भगवदीयोने उद्देशीने श्रीमागवत 'न ज्ञानं न च वैगम्यं प्रायः श्रेयो भवेदिह ' एम मुक्तकंठे वदे छे. तेवा भगवदीयोने तो प्रभुकृतवरण ज सर्व ले. तेवा भगवदीयोमा जेमने योग्यता संपादन करावीने स्वरूपानंद दान करवानो प्रभुनो संकल्प होय तेवामीने अक्षरग्रह्मनुं ज्ञान संपादन थया पछी, तेना अक्षरग्रारूप हृदयाकाशमा स्वयं प्रकट थाय छे, त्यारे तेवा भगवड़ीयने ए अक्षग्नहा अव्यक्त इत्यादि नयी पुरतुं परन्तु भगवद्धामरूप पर छ, भने ए अगत्मक धाममा प्रभु-पुरुषोत्तम स्वतः गौण थईने निजतना सर्व मनोरय पूर्ण बरे हे. भा ज भगवदामने कचित् व्यापियकुंठ, गोकुल इत्यादि नामयी पुगणो वर्ग में, अने उपनिषदो एने दहादि नामयी वर्णये है. आ धाम अक्षरात्मक . नित्य छे, कार्यलोक नथी. भगवान् बादरायण पण आ ज तात्पर्यने 'सम्पद्याविर्भावः स्वेन शब्दात् । ए सूत्रमा सूत्रे छे. अक्षरब्रह्मनुं ज्ञान थया पछी, अक्षर ब्रह्म प्राप्त थया पछी, भगवत्प्राप्ति थया पछी निज वरणमात्रथी, स्वतरूपवलथी प्रभु भक्तनो पृथगाविर्भाव करीने तेनी साथै विविध विलास करे छे, अने भक्तना निजवरणजन्य प्रेमातिशयथी तदधीन थाय छ, आ अवस्थाने आचार्यश्री अलौकिकसामर्थ्य कहे छे. अत्र परम व्योम जेने का छे तेने पुराणमा कचित् व्यापिवैकुंठ, श्रीमद्गोकुल वृन्दावन वगैरे कयुं छे. आ भगवल्लोक नित्य छे, कार्य नथी, पण पर-ब्रह्म छे. वादरि आचार्य आ भगवल्लोकने कार्य मानीने तेनी अनित्यता सूचवे छे, अने शंकर पण आ ज मतनो व्यासविरुद्ध थईने आप्रहथी स्वीकार करे छे. परन्तु जैमिनि अने व्यास उभय भगवलोकने कार्य वा अनित्य कहेता नथी, उभयना मते भगवल्लोक नित्य छे. रामानुज, मध्व, निंबार्क, नीलकंठ शैवाचार्य सर्व भग- वलोकने ब्रह्मरूप नित्य माने छे, आ कोई पण आचार्य भगवल्लोकने अनित्य कार्य कहेवानुं धाय करता नथी. अत्र विपश्चित् ब्रह्म जेने कयुं छे तेने उपनिषद् अगाडी रसरूपे आनन्दरूप वर्णवे छे. बादरायणाचार्य एने ज आनन्दमय कहीने तेनी परब्रह्मता स्वीकारे छे. ब्रह्म जेनुं ज्ञान परब्रह्मनी प्राप्तिनी पूर्व कक्षानुं छे ते अक्षर ब्रह्म-वा-अक्षर धाम छे. आ ज अक्षर-ग्रह्म-धामने उपनिपद् हंसरूप पुरुषरूप आनन्दमय रसात्मक पुरुषोत्तमनुं पुच्छ-प्रतिष्ठा कहे छे. आ अक्षर ब्रह्म निर्गुण छे, तो पछी तदनन्तर प्राप्य विपश्चिद्ब्रह्म अने सर्वकामोपभोग सगुण कम होइ शके ? तेम मानवा जतां उपनिषद्मा स्पष्ट कथेलो साधनसाध्यभावनो व्याघात थाय. विष्णुपुराण पण 'देहे- न्द्रियासुहीन' वैकुंठपुरवासीओने देह इन्द्रिय प्राणविनाना वैकुंठमां स्थिति करनारा कहीने भगव. दक्तोर्नु अलौकिक विग्रहवत्त्व, दिव्य तनुवत्त्व, स्पष्ट सूचवे छे. श्रुति पण अत्र विविधरसभोगचतुर ब्रह्मनी साथै-रसात्मक आनन्दमय-पुरुषोत्तमनी साथै भक्तनो सर्वकामोपभोग स्पष्ट कथती तेनुं अलौकिक विप्रवत्त्व सूचवे छे. आ प्रकारे परप्रातिर्नु ऋचाभी भगवत्ती श्रुतिए जे वर्णन कर्डं, ते आपणे जोयु. हवे अगाडी मृष्टि आदिनुं निरूपण करता मन्थनुं गुं तात्पर्य हे ते विचारीए. अहि श्रुति आधिदैविकवाद उपदेशे छे. पुरुषोत्तम-परब्रह्म ज निरवधि आनन्दरूप परम फल छे, सर्व अंतरंगोमां पण अंतरंग छे, ते जणाववाने 'भगवान् प्राणना प्राण है, चक्षुना चक्षु छे, श्रोत्रना श्रोत्र छ । ए श्रुतिना आधार प्रभु सर्वना सर्वरूप छे एम प्रतिपादन करे छे. ए प्रभु सर्वना सर्वरूर होवाथी सर्वाधिदैविक- रूप पण स्वयं छे ए जणाववाने आधिभौतिक वगैरे रूपथी प्रक्ट थवाने भगवान् आकागरूपे प्रकट याय छ; अने तेथी ज अहि आकाशनुं कर्तृल कहीने ते भूताकाम नथी, पण भगवान्नी विभूति छ एम जणाव्यु छै. तेज प्रकारे वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ओषधि, मन्न ए सर्व प्राकृन पदार्थ नथी, परन्तु ए सर्व भगवान्नी विभूतिओ छ; भगवद्रूप छे. त्यार पछी अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, अने विज्ञानमय ए चार रूपनुं निरूपण फयु है. तैमा अनमयनो अन्तरंग प्राणमय के, प्राणमयनो अंतरंग मनोमय है, मनोमयनो अंतरंग विज्ञान- , १८ मय छे. आनन्दमय विज्ञानमयनी भीतर विराजे छे. एर्नु पुरुषत्व-स्वतःसिद्ध साकारत्व दर्शावीने श्रुति एना आकारथी विज्ञानमय आकारयुक्त थाय छे, विज्ञानमयना आकारथी मनो. मय आकार प्राप्त करे छे, मनोमयना आकारथी प्राणमय आकारयुक्त थाय छे, अने प्राणमयना आकारथी अन्नमय आकारयुक्त पुरुष थाय छे. अर्थात् पांच पुरुषोने आकारसमर्पक आनन्द. मय जछे. आ पण अत्र ध्यानमा राखवानुं छे. आरंभमां श्रुति कहे छे के 'ब्रह्मविद् परने प्राप्त करे छे.' अने अन्ते ज्ञेय आनन्दनी गणना करी कहे छे के 'ते जे आ पुरुपमा छे, जे आ आदित्यमा छे ते एक छे.' आ वाक्यथी ब्रह्मविद् पुरुषमा अने आदित्यमां ते ज अक्षर ब्रह्म प्रतिष्ठित छे अने तेथी ते आनन्द पण अक्षरानन्द-गणितानन्द छे. आQ गणितानन्द अक्षरब्रह्म जे जाणे छे ते क्रमश: अन्नमय वगेरे प्राप्त करीने अन्ते आनन्दमय आत्माने प्राप्त करे छे. अत्र श्रुतिमा आनन्दमय आत्मानुं संक्रमण करे छ एम कर्तुं छे ते प्राप्तिना अर्थमा समजवू. ज्योतिःशास्त्रमा पण आवो प्रयोग थाय छे. रवि मकरराशि प्राप्त करे छे त्यारे मकरसंक्रान्ति थइ एम कहेवाय छे. आ ज आनन्दमयनी प्रानि परम मुक्ति छे; कारणके आने अन्नमयादिपुरुषनी प्राप्ति थतां पूर्व आ लोकनो त्याग ज थाय छै एम श्रुति निरूपण करे छे. माटे ज भक्तने पुरुषोत्तमानन्दनो अनुभव थाय छे त्यारे आ ज आनन्द 'अनुभवै. कवेद्य' छे, मनवाणीनो विषय नथी एम जाणीने लोकवेदथी ते भय पामतो नथी, एम 'यतो वाचः ए श्लोकथी श्रुति निरूपण करे छे. आ उपरथी स्पष्ट एम प्रतीत थाय छे के 'सोऽश्नुतेथी जे फल आरंभमां श्रुतिए का ते ज फलनु विवरण अन्ते श्रुतिए कर्यु छे. नहि तो आ लोकना त्याग पछी देह नहि होवाथी, तदाक्षिप्त भय क्याथी होय, अने ते न होय तो अति निषेध व्यर्थ शा माटे करे ? कामभोग पण असंभवित ज थइ जाय. आथी एम निश्चय थाय छे के भक्त लौकिक पूर्वदेहनो त्याग कर्या पठी साक्षाद् भगद अजनमा उपयोगी भगवद्विभूत्यात्मक संघात प्रथम प्राप्त करे छे. देह इन्द्रिय, प्राण, अन्त फरण, अने जीव पांच मलीने संघात थाय छे. तेमां स्थूल शरीर अन्नमय प्रथम विभूति है प्राणमय द्वितीय विभूतिरूप छे. 'मनोमय तृतीय विभूतिरून छे, कारण के मन सर्व इन्द्रियों नियामक छ; अने अन्तःकरणात्मक होवाथी इन्द्रियान्तःकरणरूप छे. जीवतत्त्वात्मक विज्ञानम चतुर्थ विभूतिरूप छे. अक्षरब्रह्मज्ञानयुक्त जीव ए विज्ञानमय विभूति छे. अत्र गुहामां भगवतरणथ परम व्योम प्रकट थाय छे, अने त्यां परम व्योममा पूर्णानन्दात्मक फलरूप पुरुषोत्तमस्वरूप प्रा फरीने ऋचामा दर्शावेलो भोग प्रभु साये भक्त प्राप्त करे छे. अत्र अन्य पण विचारणीय छे. 'पुरश्चक्रे द्विपदः ए श्रुतिप्रमाणे भगवान् वस्तुतः पुरुष छनां पुरना संबंधी थइ, पक्षी थइ पुरोमा प्रवेश करे हे. तैत्तिरीयश्रुतिमां-प्रकृत श्रुतिमां अन्नमया दिने पक्षिरूप वर्णव्या हे. आम होवाथी एक पुरमा (शरीरमां) विभूतिरूप पांच पक्षीओनं प्रयेश फईबो उचित नथी. त्यारे कया पुरमा फोने प्रवेश थाय छे एनो विचार करतां अन्ननया पांचे पक्षीमां अप्राकृनत्व भने ब्रह्मत्वमा विशेष नहि होवायी, तेम अन्य गति नहि होवार्य फ्यांतो सर्वनो सर्वत्र प्रवेश, या अप्रवेश मान याय.mart-1.

- अब्रह्म मा शंकानुं समाधान आम दिशे छे. 'आ लोक त्यजीम' ए वाक्यमा 'आ' शब्दना प्रयोगथी भक्त प्राकृत गुणमय प्रपंच त्यजीमे गुणातीत साक्षात् लीलोपयोगी प्रपंच प्राप्त करे छे' एम लागे छे. तत्प्राप्तिथी ज भगवद्भाव संपन्न थतां प्रथम , अति तीन सर्वोपमर्दक भगवान्ना विरहमावथी-विप्रयोगथी, तेना (भक्तना) शरीर इन्द्रिय, प्राण अन्तःकरण नष्ट ज थइ जाय जो ते ते रूप प्रभु ते तेमां प्रविष्ट न होय तो, अने जीवनो ब्रह्ममां ज लय थवाथी भगवन्नी लीलाना' अनुभव विना तो ते लय मोक्ष नहि, पण नाश थयलो गणाय. आवी रीते ते ते रूप ब्रह्म ते तेमा स्थित छे तेथी तेमनो नाश थतो नथी. अहीं अन्नमय, प्राणमय, मनोमय वगेरे प्राकृत पदार्थ नथी, विकारशील अनित्य, पदार्थो नथी. भृगुवल्लीमां भृगु वरुणनी पासे ब्रह्मविद्यानो उपदेश प्राप्त करवाने जाय छे. वरुणे तेनो उत्तम अधिकार नथी एम जाणीने, पोते ब्रह्मस्वरूप कह्यु नहि, परन्तु तपथी अधि. कारातिशय प्राप्त थतां भृगुने स्वतः ब्रह्मस्वरूपनुं ज्ञान थशे एम जाणीने सर्वत्र तप करवानो उपदेश कयों ब्रह्मथी अतिरिक्त भिन्न साधनथी ब्रह्मज्ञान थर्बु अशक्य होवाथी तपनी ब्रह्मता उपदेशी. ब्रह्म तरीके करेला तपोरूप साधनथी ज्ञात थयला अन्नमयादिरूपो प्राकृत पदार्थों छे एम कोई न्यायशील विचारक स्वीकारी शके एम नथी. भृगुए अन्नमयादिना ज्ञान थया पछी पण जे ब्रह्मजिज्ञासा करी छे तेथी पण अन्नमयादिनुं ब्रह्मत्व दूर थतुं नथी. भगवाननी विभूतिओ अनन्त छे. जे रूपथी जेटलुं कार्य करवं होय तेटलुंज ते रूपथी, समर्थ होवा छतां, अन्य । कार्य भगवान करता नथी. प्रभुनी लीला ज आ प्रकारनी छे. आ प्रकारे अन्नमयादिरूपश्री । बुद्र फलनुं दान करे छे. हीनाधिकारीओनी आकांक्षा तेटलाथी निवृत्त थाय छे. वस्तुस्थिति आम होवाथी जेवा अधिकारथी अन्नमयना स्वरूप, ज्ञान थाय छे, तेवो ज्ञानयुक्त अधिकार तेने- प्राप्त थतां, फल पण तदधिकारानुसार प्राप्त थाय छे. एम प्राणमय वगैरेमां पण समजवू. आ प्रकारे आकाशादिरूप आविभौतिक स्वरूप छे एम कहीने अन्नमयादि पुरुष आध्या-. त्मिक स्वरूप छे एम कहेती 'आ तेनुं शिर छे' इत्यादिथी श्रुति ते अन्नमयादि पुरुष पक्षिरूप छ एम कहे छे. कारणके आध्यात्मिक पुरुष पक्षिल्पेज आविभौतिक स्वरूपमा प्रवेश कर . आबु ज निरूपण वाजसनेयिशाखामां पण कर्यु छे. 'पुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः, पुरः स पक्षी भूत्वा पुरः पुरुष आविशद् . वस्तुतः तो पुरुप ज छे, परन्तु पुरना संवन्धी थई पक्षी थईने पुरमां-. शरीरमां-प्रवेश करे छे. प्राकृत विविध पुरमा अप्राकृत एकविधनो प्रवेश यद्यपि अनुचित छे, तथापि स्वप्रवेश विना कांई पण थई शके नहि एम होवाथी गतिनां प्रतिबंधकने ओलंघीने अलो. किक गतिथी आप प्रवेश करे छे, ते जणाववाने आप पक्षी थाय छे. प्रभु सर्वभवनसमर्थ छे. आम आधिभौतिक अने आध्यात्मिक पुरुषोनुं निरूपण करी आधिदैविक पुरुष आनन्दमयनुं निरूपण करे छे. माध्यात्मिक पुरुष जेम प्रतिशरीर भिन्न छ तेम आनन्दमय नथी ते जणावाने यः पूर्वस्य -एम श्रुतिए सर्वत्र निरूपण कयु. आनन्दमय परमाकाष्ठापन्न एक ज अद्वितीय छे. अन्नमयादि पांचे पुरुषनो आत्मा-आनन्दमय छे. अहि आ तात्पर्य है. ईश्वरथी अन्य सर्वनो' * एक आत्मा कोई यई शमवाने योग्य नथी. सर्वना प्रभु एकला ज आत्मा ऐ, भने ते पोते. । - .

आनन्दरूप छ एम श्रुति पोते ज निर्णय कर छे. श्रुतिमां कडं छे के 'ए प्रभुनी आनन्दनी एवं मात्रा उपर, एक अंश उपर, तदितर अन्य सर्व भूतो जीवे छे, ए प्रभु पोते रस छे, ए रसने प्रार करीने आ जीव आनन्दी थाय छे. कोण जीवी शकत, कोण प्राण धारण करी शकत, जो । आकाशरूप आनन्द न होत तो. एज प्रभु आनन्दनुं दान करे छे.' आ श्रुतिओथी एम स्पर 'प्रतीत थाय छे के ए ज आनन्दमय सर्वना आत्मरूप छे अने एज पुरुषोत्तम-पर-छे. आनन्दमर ज पुरुषोत्तम पर छे ते भृगुवल्लीथी पण स्पष्ट थाय छे. त्यां पण जेम अन्नमयादिना ज्ञान थय पछी भृगु पुनः प्रश्न करे छे तेम आनन्दमयना ज्ञान थया पछी अधिक जिज्ञासार्थ प्रश्न करतो नथी जीवमां तो आनन्दमय पुरुषोत्तम प्रवेशे छे. आनन्दमय पुरुषोत्तम रसात्मक होवाथी आनन्दा रमक ज विरहभावरसान्धिनो अनुभव करीने पछी प्रादुर्भवेलुं प्रभुस्वरूप प्राप्त करीने 'क्यांहि पर भय पामतो नथी' ए वाक्यथी लोकनो, अने 'ए विचार करतो नथी के में पुण्य कम न कयु, पाप केम कयु. ' ए वाक्यथी वेदनो भय आ तदनुभववान भत्तने रहेतो नथी. शरीर, प्राण, मन, अन्तःकरण, जीवात्मा ए सर्व भगवान्ना शरीर छे एम वाजसनेयि शाखाना अन्तर्यामित्राह्मणमां कयुं छे. त्यां सर्वभूत,प्राण, वाक् , चक्षु, श्रोत्र, मन, त्वचा, अने अन आत्मा ए सर्वने प्रभुना शरीर क्ह्यां छे. अहि भक्तोना पूर्वोक्त निर्गुण देहो प्रभुना चरणा रविन्दनी रजमांथी आविर्भाव पामेला होवाथी ए भूतरूप होवाथी ए ब्रह्मना शरीररूप थाय ठे अन्नमयब्रह्मना प्रवेशथी विरहदशापन्न अन्नमयनी स्थिति रहे छे, प्राणमयब्रह्मना प्रवेशथी प्राण मयनी स्थिति रहे छे, मनोमयब्रह्मना मनमा प्रवेशथी तेनी स्थिति रहे छे, ज्ञानेन्द्रियरूप विज्ञान मयमा विज्ञानमयब्रह्मना प्रवेशथी तेमनी स्थिति रहे छे; अने जीवमां तो आनन्दमय साक्षा प्रवेश करे छे तेथी तेनी स्थिति रहे छे. मा प्रकारे अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, अने आनन्दमयने श्रुतिए शा कारणथं 'पक्षिरूपे वर्णव्या छे ते स्पष्ट थयु. आनन्दमयने शारीर आत्मा शाथी कह्या तेनुं तात्पर्य स्पा फरीए. आनन्दमय निगृढ रसात्मक भावात्मक होवाथी विशेष कहे, अशक्य होवाथी 'य पूर्वस्य' एम सर्वत्र श्रुति कहे छे. शरीरना प्रवेश माटे अपेक्षित पक्षिरूप पांचे पुरूपोमा साधारण होगाथी तेमां तेवो प्रवेश दर्शाववाने श्रुति आनन्दमयना संबंधमां पण तेम निरूपण करे ? अर्थात् पूर्वनो जे शारीर आत्मा आरम्भमां जगकर्ता तरीके कह्यो तदभिन्न ज आ छे. प्रकारे जेम पारसमणिना स्पर्शथी रजतादि सुवर्ण थाय छे, तेम उपर दर्शावेला प्रवेशना आश्रय रूप अन्नमयादिनु भगवद्रूपत्व कयुं छे. यस्तुतः आ सर्व परीक्षवाद छे. ब्रह्मविद् परने प्राप्त करे छे ए सामान्यरीते ब्रह्मविद्नी परमार यहीने, ए वाक्यतुं तात्पर्य 'सत्यं ज्ञानं ए ऋचाद्वारा निरूपण कर्यु. त्या सर्वात्मभाववान् भर भगवान्नी साथै भगवदात्मक कामोनो अनुभव कर छ एम प्रचाए करेला व्याख्यानथी समजार है. उक्त भक्तने तो सदैव, अने विरहभावमा तो विशेषतायी, प्रियस्वरूपथी अतिरिक्तनी स्पूर्ति नहि ययायी, तेवा भफ्ना अन्न, प्राणादिरूप भगवान् स्वतः ज थाय छे, ते जणावत्राने अत्र श्रुति अगवान्ना अन्नमयादिस्वरूपोर्नु निरूपण कर है. आ .

२१ आथी भक्तनुं प्रभुविषयक परम प्रेमवत्व सिद्ध थाय छे. सारे ए प्रेमवत्त्वथी भगव- दाविर्भाव थवा छतां विरभाव अतितीत्र होवाथी ज्ञानादि सर्व तिरोधान थयलं होवाथी संयोगरसानुभव न थइ शके तेथी प्रभु ज स्वयं ते भक्तना अनुभवात्मा थाय छे. ए जणाववाने 'प्रभु विज्ञानरूप कयुं छे. त्यार पछो अनुभवविषय प्रकट मानन्दमय प्राप्त थाय छे तेथी तेना स्वरूपश्रुति निरूपण करे छे. आनन्दमयना स्वरूपमा निरुपधि प्रीति ज मुख्य छे, अन्य नहि, ते 'जणाववा प्रियने प्रेमने आनन्दमयनुं प्रधान अंग शिर-मस्तक-कहुं छे. त्यार पछी प्रियना दर्शना- दिथी आनन्दात्मक ज विविधरसभावनो संदोह उत्पन्न थाय छे ते आनन्दमयनी दक्षिण-जमणी पक्ष पांस कहेवाय छे. आनन्दमय प्रभुनो ए दक्षिग याहु छे. त्यार पछी स्पर्शादिथी पूर्व- वथी विलक्षण प्रकृष्ट आनन्दुनो संदोह जे उत्पन्न थाय छे तेने उत्तर पक्ष, वा वाम पांख कहे :. आनन्दमय प्रभुनो ए वाम वाहु छे. नाना प्रकारना पिच्छना-भावना-समूहात्मक ए भय होवाथी तत्कथन पण युक्त छे. शृंगाररस स्थायिभाव एक ज आनन्दस्वरूप होवाथी तेने मात्मा कह्यो छे, कारण तेमांथी ज विभाव अनुभावादियी विविध भावनी उत्पत्ति थाय छे. रप्राप्तिनी सायनभूत ब्रह्मज्ञानदशामां तदानन्द जे पूर्व अनुभूत थयो ते गणितानन्द होवार्थी । पण आ आनन्दात्मक पुरुषोत्तमना अनुभव पछी तुच्छ भासे छे, ते इष्टगतिमां पण असाधन- रूप होवाथी आनन्दमयना स्वरूपथी तेनी हीनता, अने ते पृष्ठभागे होवाथी दूरस्थित पुच्छरूपता । ब्रह्मनी लागे छे. आ (अक्षर) अझ पुरुशोत्तम रसात्मक मानन्दमयनुं अधिष्ठान गृहरूप होवाथी तेने अहीं प्रतिष्टारूपे वर्णव्युं छे. आ प्रकारे अक्षर ब्रह्मथी आनन्दात्मक रसात्मक पुरुषोत्तम पर-अधिक होत्रा छतां स्वयं गौण अप्रधान थइने भक्तमनोरथ पूरण करे छे ते कथनमा असंभावना विपरीतभावना थाय ते दूर करवाने असन्नेव स भवति' ए श्लोक श्रति कहे छे. पोताने अनुभव न होय तो पण गुरुना उपदेश थी पण आवा आनन्दात्मक रसात्मक पुरुषोत्तमनुं अस्तित्व मात्र पण जे जाणे छे, तेने ब्रह्मविद् लोको सन्त सत्वधर्मविशिष्ट अने वर्तमान जाणे छे. तेथी अगाडी कह छ ' ब्रह्म छ एम जो जाणे तो'. आबुं ब्रह्म जे जाणतो नथी ते असन् छ' एम कहीने, 'तेनुं अस्तित्व जे जाणे छे ते सद् थाय छ। एम कह्या विना 'एने सन्त तेओ जाणे छे' एम तत्त्वथी अन्यज्ञान जे कां तेयी उक्त पुरुषोत्तमना आन- न्दना अनुभववान् जीवने ज्ञानक्रियाविशिष्ट अने वर्तमान तेओ जाणे छे, अनुभव विना केवल गुरूप. देशथी आईं रसात्मक साकार आनमय प्रम छ एटलं जो जाणे तो तेने स्वरूपथी तो सद् छे एम जाणे छे, ज्ञानादिमान् नहि. आवा रसात्ना साकार पुरुषोत्तम प्रझना अस्तित्व, पण जेने शान नथी ते तो अलीकतुल्य छे एम श्रुतिनुं तात्पर्य जणाय छे. आम विचारचातुर्ययुक्त सत्पुरुषो तमे। मानो आनन्दसन्दोह श्रीकृष्ण प्रजराजमां ॥ १।। आ प्रकारे मानन्दवल्लीनुं भगवन्मयन्त्र श्रीमदाचार्यचरणनी अने श्रीमत्प्रमुचरणनी दृष्टिथी जोयु. अन्नमय प्राणमय मनोमय विज्ञानमय अने आनन्दमय सर्व भगवान हैं. अन्नमयादि जीवकोश या जीव नथी; पण सर्व प्रल छे, भगवद्रूप में, भगवभिन्न है. उपनिपन्माननी यां २२ . आज सुधी भगवन्मयता स्पष्ट प्रतीत न थाय त्यां सुधी तत्तात्पर्य, अवगाहन संदिग्ध ज समजबु. आ शुद्ध दृष्टिविन्दु जणाववाने श्रीमदाचार्यचरणे अन्नमयादिने, श्रौत शब्दोने अनुसरीने, भगवद्वि- भूतिरूप कह्या, अने आनन्दमयने परब्रह्म पुरुषोत्तम कया. श्रीमत्प्रभुचरणे पण आधिदैविकवा. दनो आश्रय लईने अन्नमयादिने भगवत्स्वरूप तरीके वर्णन्या छे, अने आनन्दमयने रसात्मक पुरुषोत्तम वर्णवी तेनुं परम प्रेमर्नु ज विषयत्व निरूपण कयु छे. आ प्रकारे आ उपनिषद् भग- वान्नु ज प्रतिपादन करे छे, जीवनुं नहि. मात्र आ उपनिषद् नहि पण सर्व उपनिषद् भगवान्नु ज प्रतिपादन करे छे. उपनिपने वेदान्त वा रहस्यविद्या कहे छे. वेदनुं परम रहस्य अन ज निरूपण थयलुं छे. ऋग्वेद संहिताना प्रथम 'अग्निमीळे पुरोहितम् ' ए मन्त्रथी आरंभी उप- निषद्मात्र पर्यन्तना वेदविभागने आचार्यों श्रुति तरीके वर्णवे छे. मा अखिल वेद विभागने श्रुति कहेवानुं प्रयोजन छे. 'सर्वे वेदा यत्पदमानन्ति । वैदेश्च सर्वैरहमेव वेद्यः । ए श्रौतशब्दो अने भगवद्वाक्यथी वेदमात्रनो मुख्य विषय, मुख्य अर्थ भगवान् छ एम निश्चय थाय छे. आशयथी का छे के वेदाक्षराणि यावन्ति पठितानि द्विजानिभिः । तावन्ति हरिनामानि कीर्ति- तानि न संशयः'. अर्थात् सर्व वेदोनो विषय भगवान् छे, एटलं ज नहि परन्तु द्विजातिए उच्चारेला वेदना यात्रमात्र शब्दो पण हरिनां नाम छ. वेदने आचार्यों भगवान्नी नामलीला कहे छे, ए नामलीला जीवने संसारमाथी मोक्षनुं दान करवावाली छे. रूप प्रपंचमां निज अंशो आसक्त थयला छे तेने तेमांथी मुक्त करवाने, अने निजस्वरूप तेमने दर्शाववाने प्रभुए वेदनुं प्राकट्य कयु. उनिपन्माननी, वेदमात्रनी, शास्त्रमात्रनी एकवाक्यता शुद्ध स्वरूपे त्यारे ज सिद्ध थई कहेवाय के ज्यारे सर्व भगवदर्थकत्व निसंदिग्धरीते हृदयमां स्फुरे अने निःसंकोचथी तेनो प्रकट स्वीकार भावान् विना एवी कई वस्तु छ के जे सर्वनो आश्रय थई शके. सर्वतुं परम निधान भगवान् छे. भगाने पोतानुं सर्वत्व, सर्वमयत्व, सर्वात्मकत्व प्रतिपादन करवाने-निज अंशोने- जणाववाने एक होवा छतां अनन्त प्रकारे स्वत:, भिन्न भिन्न ऋषिओ सन्मुख, प्रकट थई, तद्- 'धिकारानुसार भिन्न भिन्न स्वरूपे दर्शन दीधुं. भगवत्स्वरूपनो जेवो अनुभव पोताने थयो, तेको उपदेश पोताना वंश्योने करवाने ऋपिओए निज निज अनुभवनो संग्रह कयों. मा संगृहीत उपदेश ते वेदनी शाखा थई. आ प्रकारे वेदनी शाखाओ अनन्त थई. भगन्ना स्वरूप अनन्त तेम तत्प्रतिपादक वेदनी शाखाओ पण अनन्त. ऋपिओने भगवत्स्वरूपनो अनुभव निज अधिकारानुसार ज थयो, अने ते भिन्न अधिकारने लईने भगवत्स्वरूपना वर्णनमा भिन्नता आवी. कोईए प्रभुने आत्मा कह्यो तो कोईए एने ब्रह्म का, कोईए एने अक्षर तो कोईए एने आनन्दमय फडं. कोईए एने वैश्वानर, सद्, पुरुष, आकाश, दहर, प्राण, इत्यादि यथारुचि नामथी व्यव- हायु. ज्यां सुधी भगवत्सांनिध्य रह्यं त्यां सुवी तो मा भिन्न नाम अने वर्मनथी ब्रह्मस्वरूपमा संभ्रम न थयो, परन्तु ज्यारे भगवदावेश जे जेम न्यून थतो गयो तेम तेम मन्द मन्यम अधि. फारीमोनां मनमा शंकाओ उत्पन्न थई. आ शंकाओ एटले सुधी वृद्धि पामी के वेदनो मुख्य अर्थ भगवान् छे ते प्रकट वासर्यनी पण विस्मृति थई, अने वैदमात्रनी परम रमणीय एकवाक्यनाने स्थाने अनन्त विरुद्ध करसनाओ उद्भवी. आ विरुद्ध कल्पनाओमांधी सांत्यादि शास्त्रो उदया. थाय.

२३ ब त्पर्य ए थ{ के भगवद्रूप वेदमांथी भगवान्नी विस्मृति थई. आ विस्मृतिथी अलौकिक वेदमा हौकिक भावनाओ थवा लागी. आ प्रकारे वेदार्थनो विप्लव थयलो तेने दूर करवाने भगवान स्वयं बादरायण व्यासरूपे प्रकट थया, अने ब्रह्मसूत्रोद्वारा सकल वेदार्थने संग्रही, पुनः वेदार्थनी भगवद्रूपता निष्पत्यूहरीते स्थापन करी. जेम वेद भगवान, प्रतिपादन करे छे तेम व्याससूत्रो पण भगवाननुज सर्वत्र प्रति- पादन करे छ. भगवान् सिवाय अन्यपदार्थनें ब्रह्मसूत्रमा जेने दर्शन थाय तेने ब्रह्मसूत्रनुं तात्पर्य सर्वथा अज्ञात ज छे. भगवान् बादरायण व्यासे 'आनन्दमयोभ्यासात् ' ए सूत्र सूत्रीने आनन्द- मय प्रभुनी परम ब्रह्मता निःसंदिग्ध,शब्दोमां कही छे. ते स्पष्ट शब्दोनो अनादर करी आनन्द- मय तो ब्रह्म नथी, विमुक्ताविद्य जीव छ एम कल्पना करनाराओ वेदार्थथी विमुख थाय छे. अत्रत्य के पाश्चात्य विद्वानो गमे ते प्रकारे कहो, परन्तु ज्यां सुधी वेद, वेदार्थ सर्व भगवान् छे एम न मानो त्यां मुधी सर्व अन्य कल्पनाओ वा तत्कल्पनानी स्तुतिओ भ्रान्त छे. आनन्दमय एज परम तत्त्व छे, रसरूप पण ते ज छे, ए रस ते ज आनन्द छे, ए रसनी प्राप्तिथी ज मानन्दयुक्त थवाय छे, ए आनन्दनी मात्रा उपर अन्य भूतो जीवे छे इत्यादि परमसुन्दर भावनाओ हृदयने स्पर्ग न करे, 'मोद-ए आनन्दमय प्रभुनो दक्षिण श्रीहस्त छे, प्रमोद ए एनो वाम श्रीहस्त छे, प्रेम-प्रिय-एर्नु वरांग छे, आनन्द एनुं स्वरूप है' इत्यादिथी वर्णवेला सदानन्द आनन्दमयमां दुःखना अस्तित्वनी संभावना हृदयमां स्फुरे, ते लोको वेदार्थहैं तात्पर्य केटलुं समज्या ए तो ज जाणे. वस्तुतः व्यासोक्त ज शास्त्रार्थ मन्तव्य छे. अने व्यासथी विरुद्ध मतमात्र एकदेशि 2, वा भ्रान्त छे. व्यासे स्वतः आनन्दमय ब्रह्म छे एम क्युं ज छे, आनन्दमयमां मयद् प्रत्यय प्राचुर्यवाची छे, विकारवाची नथी एम स्पष्ट सूयुं छे. ते ज प्रकारे ए आनन्दमयने आचार्यश्री तथा ठुलेश्वर परब्रह्म तरीके स्वीकारे छे. उपनिषद्ना स्पष्ट शब्दोनो विचार करता पण आ ज तात्पर्यने पुष्टि मळे छ. श्रीनदाचार्यचरण ब्रह्मपाद स्थापन करवाने अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय अने आनन्द- गया ए सांप्रे अनुरुले विराष्ट्रदेड, झामन्य वेदनारायणा, अमर प्रसा आने परम प्रहा तरी स्वीकार छे. आनन्दमय प्रभुनु आ प्रकारे स्थापित करेलुं परम ब्रह्मत्व स्वीकारीने तत्प्रतिपादक शब्दोमांथी सूचित प्रेममार्ग:प्रकट करवाने माधिदैविकवाद श्रीमद्विट्ठलेश्वर योजे छे. निवरवधि निरुपवि प्रेमयुक्तने निज प्रेमनो विषय ज जीवन, प्राणपोषक थे, परम निर्दुष्ट तो प्रभु जछे, ते सर्व. दर्गाववाने अहि आनन्दमय प्रमुना अन्नमय अने प्राणमय स्वरूपो वर्णन्या छे. प्रेमयुक्तर्नु जीवन टकता, प्राण टकतां तेना मनमा तद्विषयक संकल्पादि थाय है, ते दक्विाने प्रमुर्नु मनोमय स्वरूप वर्णव्युं छे. त्यारपछी हृदयमां अनुभवातुं भगवत्स्वरूप ते विज्ञानमय छे. हृदयमा अनुभव :थया पठी, विग्हनाप उत्कट एतां ए प्रभुनु यहिदर्शन याय छे. मा यहिर्दर्शनमा आवतां प्रभु ते आनन्दमय छे, आ दर्शनयी हरभंगादि भवस्याना अनुभवरूप मोद एने थाय , त्यार पठी प्रभुना समादि मुपथी प्रमोद थाय छ, 'रमो वै सः, रमहिएर अयं लभ्या आनन्दी भाति' ए वास्योनो साझादनुभव फरे है, प्रमुरुन गये मुकत छ, भने तदितम्यत सर्व दुधत वा मान हे तेनो पण अनुमय पायो, अक्षर-प्रम-धामनो २४ आनन्द गणित होगाथी आनन्दमय प्रभुना निरवधि आनन्द अनुभव्या पछी गौण कक्षारूप लागे छे. आनन्दमयनुं प्रेमातिशयथी प्राकट्यादि थतां तेनुं नित्य विग्रहवत्त्व पण अर्थाक्षिप्त स्फुरे छे. आज आनन्दमय रस छे. वस्तुतः रस एक ज छे, अने ते केवल शृंगार ज छे. हास्यादि अन्य रसो जे भरतादि शास्त्रकारोए गणाच्या छे, तेमनुं रसत्व पण शृंगारथी ज प्राप्त थाय छे. जेम जगत्तुं सत्यत्व अझथी भासे छे, तेम अन्य रसोनुं रसत्व शृंगारथी प्राप्त थाय छे. अथवा जेम ब्रह्म स्वतः अधिकृत रहीने जगद्रूपे परिणमे छे, तेम एक ज उत्कट प्रेमात्मक शृंगार-रस-आनन्दमय- स्वतः अविकृत रही हास्यादिरूपे अनुभवाय छे. आनन्दमय-रसात्मक पुरुषोत्तमनी निजांगमांथी प्रादुर्भूत साक्षाद् अलौकिक सृष्टि आनो अनुभव करे छे. आवा अनुभववान्ने श्रुति सन्त जाणे छ. अनुभववान्ने सत्त्वधर्मविशिष्ट ज्ञानक्रियाविशिष्ट महानुभावो जाणे छे. अनुभव स्वतः न होय परन्तु आq रसात्मक पुरुषोत्तम जेवू कांइ पारलौकिक वस्तु छे एटलं ज मात्र जो गुरूपदेशथी माने ते लोकोने महानुभावो मात्र सन्त-वर्तमान जाणे छे. आवा रसात्मक अनुभवैकवेद्य-लोक- वेदातीत-आनन्दप्रचुर-परमप्रेमविषय-साकार-पुरुषोत्तमनुं अस्तित्व मान पण जेमने स्फुरतुं नथी ते तो स्वतः गगनकुसुम जेवा छे, एम श्रुतिर्नु हृदय छे. आथी स्पष्ट समजाशे के श्रुतिनुं तात्पर्य मायावादमा नथी. श्रुति मात्र ब्रह्मप्रतिपादक-अलौ. किक छे. ए अलौकिक शब्दोमा अलौकिक आनन्दमय प्रभुनुं दर्शन नहि थतां, जीवकोशनु-लौकि- क्नु-जमने दर्शन थाय छे, भने तेने ज परमतत्त्व मानीने यद्वा तद्वा यशोगान फरी रह्या छे, तेमने वास्ते आपणे काइ कटु वक्तव्य नथी. प्रभु सर्वभवनसमर्थ छे. ते प्रकारे पण लीलावैचित्र्य प्रकट कर छे, परन्तु अतिना स्पष्ट शब्दोमांथी तो क्यांहि पण ए तात्पर्य छेशथी पण शोध्युं जडतुं नथी. गगनकुसुमसदृश मायावादना यशोगान करवामां कालझेप करवा करतां, आनन्दमयना गुणगान करवानुं आवा जीवोने केम स्फुरतुं नथी, अथवा प्रभु तेम करवाने तेमने नहि प्रेरीने अधिकारन्यूनता-वा-स्वकृपान्यूनता-सूचवता तो नथी ? गमे तेम हो, परन्तु आनन्दमयना रसात्मक पुरुषोत्तमना-गुणगान-अनुभव-विनानुं जीवन तो केवल निष्फल छे. प्रसीदतु मयि श्रीकृम्मा मापानियोत्सषः। येन भाति जगन् सत्यं विना येन न तत्तथा ॥१॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।

BHAVAN VIDY YA श्रीकृष्णाय नमः श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । BHARTI S.N............ तैत्तिरीयोपनिषद् । LIBRARY मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता। वहिबदलसन्मौलि वेणुवादविशारदम् । दुखं दलयतादुचैत्रिभङ्गाललितं महः ।। १॥ प्रणमामि हरि श्रीमहल्लभाचार्यरूपिणम् । श्रीविठ्ठलेश्वराख्यांश्च प्रभून् स्वाभीष्टसिद्धये ॥२॥ श्रीमद्भगोकुलनाथान् श्रीमत्कल्याणरायगुरुचरणान् | नामनिवेदनदातॄन् प्रणमामि मुहुर्मुहुः प्रेम्णा ॥ ३ ॥ तैलङ्गयज्वचिन्तामणितनयो मठपतित्वविख्यातः । जयगोपाल उपनिपाण्यं वितनोति तैत्तरीयायाम् ॥ ४॥ शङ्करैस्तु कृतं भाष्यं मायावादानुसारि हि । ब्रह्मवादविरुद्धं तदिति मेऽयं समुद्यमः ॥ ५ ॥ तत्र तावदुपनिपदोनेकविधाः, काश्चन केवलपूर्णपुरुषोत्तमतत्माप्तिसाधनप्रतिपादिकाः, काश्चन केवलपुरुषोत्तमस्वरूपप्रतिपादिकाः, यथा गोपाळतापिनीकृष्णोपनिपदादयः । काचन पूर्णपुरुषोत्तमस्वरूपतत्मातियोग्यतासम्पादकाक्षरब्रह्मज्ञानविषयीभूताक्षरब्रह्मस्वरूपस्य पुरु- पोत्तमस्वरूपस्य पुरुषोत्तमेन सह सर्वकामभोगरूपफलस्य च प्रतिपादिकाः, यथा तैत्तिरीयो- पनिपन्मुण्डकोपनिपदादयः। काश्चन केवलविभूतितत्प्राप्तिसाधनप्रतिपादिकाः, यथा वासुदेवो. पनिपनारायणोपनिषदादयः । काश्चन केवलाक्षरब्रह्मतत्प्राप्तिसाधनप्रतिपादिकाः, यथा वृहदारण्यकछान्दोग्योपनिषदादयः । काथन मुक्तिसाधनीभूतभक्तिज्ञानाइसंन्यासवैराग्ययो- गसांख्यादिपतिपादिकाः, यथा संन्यासोपनिपदारुणेयोपैनिपत्कण्ठश्रुत्युपनिपटू पनिषद- द्वैताख्योपनिपदलातशान्त्युपनिपदमृतविन्दूपनिपत्तेजोविन्दूपनिपयोगशिखोपनिपयोगतत्वोप- निपदादयः । काथन भक्तिज्ञानसाधनश्रवणादितत्साधनशरीरादीनामाधिभौतिकाध्यात्मिका- धिदैविकाग्रुपद्रवनिवारकसाधनप्रतिपादिकाः, यथा गरुडोपनिपदादयः । तय तावतैत्तिरीयोपनिपत् पूर्णपुरुपोचमस्वरूपतत्माप्तियोग्यतासम्पादकाक्षरब्रह्मज्ञान- विषयीभूताक्षरब्रह्मस्वरूपस्य पुरुषोत्तमेन सह सर्वकामभोगरूपफलस्य च प्रतिपादिका व्याख्यायते । तत्र गोपालतापिनीकृष्णोपनिपदी तु स्पष्टार्थे एव । मुण्डकोपनिषद् दुरूहापि त्वेतदपेक्षया स्वल्पेति पश्चात् व्याख्यास्यते । तत्र 'शं नो मित्रा," अथ शीक्षां व्याख्यास्यामः इत्यारभ्यानन्दवल्लीमध्यो भृगुवाटपन्तस्तैत्तिरीयोपनिषत्पूर्वखण्डः, द्वितीयखण्डस्तु 'अम्भस्यपार' इत्यारभ्य इति महोपनिपसमाप्'त्यन्तः । तत्र 'शं नो मित्रः' 'अय शीक्षां व्याख्यास्याम' .

, . तैत्तिरीयोपनिषद् । इत्युपासनाकाण्डं पश्चाद् व्याख्यातव्यम् । अत्युत्कण्ठावशेनानन्दवल्लीभृगुवल्यावेव क्रमेण पूर्व व्याख्यायेते। तत्रैतयाख्यानम् किं शक्तिवृत्तिमतीतार्थपरतया अथवा परस्परविरुद्धार्थश्रुति स्वो- सेक्षिततर्केण तात्पर्यमतीतार्थपरतया वा कर्तव्यम् । तत्र शक्तित्तिप्रतीतार्थपरतयैव सर्वस्मिन् चेदे व्याख्यानं कर्तव्यमिति वैदिकानां सिद्धान्तः । यतः 'कश्छन्दसां योगमावेद धीर' इति श्रुतिः कः पुरुपश्छन्दसां वेदानां योग योजनं इदं युक्तमिदमयुक्तमिति आसमन्तादि जाना- तीत्यर्थमतिपादिका, अथ च 'नेपा तर्केण मतिरापनेयेति श्रुतिः, अथ च ' अचिन्त्याः खलु ये भावा न तास्तर्केण योजयेत् , प्रकृतिभ्यः परं यच्च तदचिन्त्यं प्रचक्षत'इति ब्रह्माण्डपुराणम्, अथ च 'पुराणं मानवो धर्मःसाङ्गो वेदचिकित्सितम् , आज्ञासिद्धानि चत्वारि न हन्तव्यानि युक्ति- भिरिति गौतमस्मृतिश्च वेदे तर्ककरणं निषेधति । अत एवालङ्कारशास्त्रमपि प्रभुसम्मितो मित्रसम्मितः कान्तासम्मितथेति शब्दत्रयं विभज्य, प्रभुसम्मितः शब्दो वेदः, मित्रसम्मितः शक्षः पुराणादिः, कान्तासम्मितः शब्दः काव्यादिरिति कथयत्, प्रभुसम्मितः शब्दो वैद इति वदति । तथा च यथा प्रभुवचने न कश्चित्तकै करोत्येवमेव वेदेपि न कर्तव्यो दण्डभीत्या। तत्र लौकिके ताडनादिर्दण्डः, वेदे तु पापोत्पत्तिर्दण्डः, अत एव 'योन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते, किं तेन न, कृतं पापं चौरेणात्मापहारिणे'त्यन्यथार्थकरणे दोपरूपं दण्डमाहेति ज्ञेयम् । एवं च तर्कमुखनिरीक्षकत्वं न वेदे, वेदमुखनिरीक्षकत्वं तु तर्केऽस्त्येव । अत एव 'आफै धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राविरोधिना, यस्तकेंणानुसन्धत्ते स धर्म वेद नेतर' इति स्मृति- वचनं, चेदशास्त्राविरोधिनेति विशेषणेन तर्कस्य घेदमुखनिरीक्षकत्वमुक्तवती । एवं च सति वेदार्थो न खोमेक्षिततकेंण निर्णेतन्यः, किन्तु शक्तिकृत्या वेदो यथा वदति, तथैव प्रमा- णत्वेन मन्तव्य इति । विशेपतस्तु ब्रह्मप्रतिपादको वेदः । ब्रह्मणो 'यः सर्वज्ञः सर्वशक्ति'- रिति थुतेः सर्वशक्तिमत्वाद्विरुद्धसर्वधर्माश्रयत्वात्सर्वभवनसमर्थत्वाच । न च तर्हि पूर्वोत्तरमी- मांसावैयपिचिरिति वाच्यम् । वेदविरुद्धशास्त्रश्रवणजनितसंस्कारसहकृतया मत्या वेदे सन्देहे जाते तन्निवारणोपयोगित्वेन तयोः सार्थक्यात् । ननु तर्हि 'आकाशादेव समुत्पद्यन्ते। 'मृदववी'दित्यत्रापि प्रतीतार्थपरतास्त्विति चेत् । न । अत्र सन्देहे नारायणांशावताररूपैः श्री- मवेदव्यासचरणः मूत्रितम्, 'आकाशस्तचिवा', 'अभिमानिव्यपदेशाथेति । तथा च सोों नास्मदादितर्कपरिकल्पित इति न तत्र शक्तिवृत्तिमतीतार्थता कल्पयितुं शक्यते । एवं च, यथा नत्र सन्देहे सूत्रितम्, न तथा श्रीमद्यासचरणः 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्मे- सादिगु श्रुतिषु मतीतार्थेतरार्थबोधनाय किञ्चित्सूत्रं विरचितम् । तथा च, यत्र व्याससूत्रं प्रमा- णीभूतं तत्रैवान्यथार्थकल्पनम् , न त्वर्वाचीनलौकिकतर्कविरोधमापाय वेदे सर्वत्रान्यधार्यकल्पन- मस्मदादीनामपि युक्तम् । व्यासचरणानां भगवत्वादस्मदादीनां तु जीवत्वेनालौकिकपदार्था- नभित्वात् । अन एव, विभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं चालयिष्यतीति स्मृतिरप्यत्वं श्रुतं .

मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता। ३ वेदश्रवणं यस्य तस्मात्कुताभ्यासिनः सकाशाद्वेदस्य स्वस्मिन्नन्यार्थकल्पनरूपचालनाट्यं भवतीत्यर्थप्रकाशिकास्मदादिकृततर्कनिपेधं करोति वेदार्थनिर्णये । तया चं, न वेदे कुत्रापि युक्त्यपेक्षा, किन्तु यथा वदति शक्तिवृत्त्या, तथैव मन्तव्यः सर्वोपि वेद इति निश्चेतव्यम् । व्यासादिसूत्रोक्तयुक्तिस्तु वेदतुल्यैवेत्युक्तमेव । यस्माच ब्रह्मसूत्रोक्ततर्कानिधोन्यकृततर्कनिषेध एवोदाहुतश्रतिपुराणस्मृतिषु, अत एव 'ऋपिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्, ब्रह्म- सूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चित'मित्यनेन भगवता गीतायां युक्त्यपेक्षिणमर्जुनं प्रति हेतुमब्रह्म- सूत्रविनिश्चितमेय ज्ञानमुक्तम्, न त्वन्यमुनिमणीतन्यायादिसूत्रविनिश्चितज्ञानमिति । अन्यमुनि- प्रणीतसूत्रमूलानां न्यायादिदर्शनानां तु 'कणादो गौतमः शक्तिरुपमन्युश्च जैमिनिः । ऋपयस्तामसा एते शास्त्रमेपां विमोहन मित्यादिहयशीर्पपश्चरात्राद्युक्तेामोहकत्वात् । अत एव, भगवत्ममाणीकृतब्रह्मसूत्रेषु न्यायवैशेपिकवेदविरुद्धसांख्ययोगादीनां खण्डनमुपलभ्यते । जैमिनिप्रणीतमीमांसायां तु कस्यचित्कस्यचिदर्थस्य वेदविरुद्धस्योपनिवन्यात् 'कणादो गौतमः शक्ति'रिति वचने गणना जैमिनेः, न तु सर्वथा तच्छास्त्रस्याप्रमाणत्वाभिमायण, विचार्यमाणे तु नैमिनिना व्यामोहनार्थमेवोक्तं तथा, न तु तामसत्वं जैमिनः । मोहनस्य भगवचिकीर्पित- त्वात् । अतो नतत्र स्वाभिप्रायः, श्रीमयासशिष्यत्वेन तद्विरुद्धमतस्य तेन वक्तुमशक्यत्वात् । अस्मिन् पक्षे तु एतावद्विचाराकर्तन् प्रत्येव 'कणादो गौतमः शक्तिरित्यत्र जैमिनेस्तामसत्वेन गणना ज्ञेया । अत एव श्रीमदल्लभाचार्यासमताविरुद्धं जैमिनिसूत्रभाष्यं कृतमस्ति । वस्तु- तस्तु , 'मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्यापोह्यते ह्यहम्' 'एतावान् सर्ववेदार्थः शब्द आस्थाय मां भिदा' 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहै' 'सर्वे वेदा यत्सदमामनन्ती'त्यादि- श्रीभागवततदनुरुद्धार्थकगीताश्रुतिभिश्चाभिधात्त्यैव सर्वोपि वेदो निखिलाधिदैविकरूपे मां प्रतिपादयतीत्युक्तम् । तल्लौकिकैस्तर्कनिष्टैर्न ज्ञायत इति व्यासचरणैराकाशस्तल्लिनादभि- मानिन्यपदेशादित्या'दिसूत्राणि कृत्वा कृपया तर्केण ते वोधिताः, न तु वेदे शक्तियत्तिप्रति- पादितादन्योर्थोस्तीत्यभिमायेणेति योद्धव्यम् । एवं च सिद्धं सर्वस्यापि वेदस्य शक्तिवृत्ति- मतीतार्थपरयैव व्याख्यानं कर्तव्यमिति । तथा चात्राप्युपनिपदि शक्तितिप्रतीतार्थपरवयैव व्याख्यानमुचिततरमिति दिक। तत्र 'ब्रह्मविदामोती'त्यानन्दवल्यारम्भे ऋक्, ब्रह्मविदाप्नोति पर्रम्, तदेपाभ्युक्ता, सत्यं जानमनन्तं वर्भ, यो वेद नि- हितं गुहांयां परमे व्योमन्, सौश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्राह्मणा विपश्चितेति।। अत्रेदं विचार्यते, 'मम योनिर्महद्रम 'द्वे ब्राह्मणी वेदितव्ये 'शब्दग्राम परं च यन्' 'शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति । तदेतदक्षरं वाम स(व) कारणकारण' मित्यादिगीतातेजबिन्दपनिपगड़ीभागवतादिवचनः, अय च 'बामणा विपश्चित त्यात्यपरविव- रणतयोच्यमानेन ब्रह्मणेति पदेन परब्रह्म योधपत्याऽनयत्र श्रुत्या च क्रमेण प्रकृतिः, मणरः, " तैत्तिरीयोपनिपद् । वेदः, अक्षरब्रह्म, परब्रह्म चेति पश्चार्या ब्रह्मशब्देनोच्यन्ते । तत्राने 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मे- त्यनेन ब्रह्मस्वरूपे व्याख्यायमानज्ञानरूपत्वस्य तिरोहितज्ञानानन्दतया जडरूपत्वेन केवल- सदूपयोः प्रकृतिवेदयोरसम्भवेन, न जडरूपायाः प्रकृतेः, शब्दरूपस्य प्रणवस्य वेदस्य वा वाचकत्वमत्रत्यब्रह्मशब्दस्य । न चाधिदैविकमकृतेराधिदैविकमणवमूर्तिमद्वेदयोर्भगवद्रूपत्वेन सत्यज्ञानानन्दरूपत्वसम्भवेनाधिदैविकप्रकृत्याधिदैविकमणववेदान्यतमवाचकत्वमेवास्त्विति वाच्यम् । आधिदैविकमकृत्याधिदैविकमणववेदयोः प्रकृतित्वमणवत्ववेदत्वमात्रपुराकृतस्वरूप- ज्ञानेन ब्रह्मप्राप्तः कुत्रापि वेदादावश्रुतेर्ब्रह्मशब्दस्याधिदैविक कृतिप्रणववेदवाचकत्वस्याप्यत्रा- भावात् । न च मास्तु प्रकृतित्वेन प्रकृतिज्ञानं, प्रणवत्वेन प्रणवज्ञानं, वेदत्वेन च वेदज्ञानं ब्रह्मप्राप्तिकारणं, 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीते'ति श्रुतेः सर्वस्य ब्रह्मत्वेनो- पासना वोधिता, उपासनायाश्च चित्तशुद्धिद्वारा ब्रह्ममाप्तिसाधनत्वात् सर्वमध्ये ब्रह्मत्वेन प्रकृतिप्रणववेदान्यतमस्यापि सत्त्वात् , ब्रह्मत्वेन प्रकृतिप्रणववेदान्यतमज्ञानं ब्रह्ममाप्तौ कारण- मस्त्येवेति प्रकृतिप्रणववेदान्यतमवाचकत्वमेवास्त्वत्रत्यब्रह्मशब्दस्येति वाच्यम् । प्रकृतिप्रणव- वेदानां ब्रह्मत्वप्रकारकज्ञानेन श्रुतौ कुत्रापि ब्रह्ममाप्तिकारणत्वस्यानुक्तत्वात् । न चानयैव श्रुत्या कारणत्वमुच्यते, ब्रह्मशब्दस्य प्रकृतिप्रणववेदवाचकत्वादिति वाच्यम् । एवं ब्रह्मत्व- प्रकारेण प्रकृतिमणववेदान्यतमज्ञानस्य कारणत्वेपि 'ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवती 'ति श्रुत्यन्तरेण ब्रह्मज्ञानोत्तरसामयिकभगवदरणजनितभक्त्यभावे केवलब्रह्मज्ञानमात्रवतो जीवात्मनो ब्रह्म- रूपे आत्मनि लय उच्यते । तत्र त्वन्मते ब्रह्मशब्दस्य ब्रह्मत्वधर्मपुरस्कारेण प्रकृतिप्रणव- वेदान्यतमपरत्वात् प्रकृतिप्रणववेदेप्वेव लयः प्राप्तः । स न सम्भवति । प्रकृतिप्रणववेदानां जीवात्मविजातीयत्वात् । न हि विजातीये विजातीयस्य लयः कस्याप्यनुभवसिद्धः । न च ब्रह्मत्वेनैव साजात्यमिति वाच्यम् । तथापि जीवत्वमकृतित्वादिधमः परस्परं वैजात्यात् 'सर्व ब्रह्मेति ज्ञाने हि सर्वमध्ये अस्य जीवत्वप्रकृतित्वादीनां ब्रह्मत्वस्यैव जातित्वात् जीवस्या- क्षरब्रह्मसजातीयत्वेनाक्षरब्रह्मणि लयस्य सामञ्जस्यात् । न च 'प्रकृतिः पुरुपश्चैव लीयेते पर- मात्मनी'त्यनेन विजातीयस्यापि प्रकृतित्वस्य परमात्मनि लयप्रतिपादनं विरुध्येत । परमा- त्मनः सर्वमूलीभूतत्वात् सर्वसजातीयत्वात् मते प्रकृतित्वजीवात्मत्वयोरेव वैजात्यात् । परब्रह्मणा भोगेच्छया परस्परविजातीयपदार्थानामेव सम्भावितत्वात् । अत एव पुराणे सर्वेपां घटपटादीनां महामलये परमात्मनि लयप्रतिपादनं सङ्गततरम् । तस्मादपि न प्रकृति- प्रणववेदान्यतमवाचकत्वं ब्रह्मशब्दस्य । न च प्रकृतिजन्यशरीरादिस्वरूपज्ञानस्य वैराग्य- द्वारा प्रणवस्याप्युपासनादिद्वारा चेदयोधितनिष्कामकर्मश्रवणादिज्ञानस्य च निष्कामकर्म- श्रवणायनुष्ठानद्वारा च ब्रह्ममाप्तिसाधनत्वं सर्ववादिसिद्धम्, तेन 'ब्रह्मविदित्यत्र ब्रह्मशब्दः प्रकृनिवाचकत्वपक्षे स्वजनितशरीरादिपरः, प्रणववाचकत्वे तदुपासनापरः, वेदवाचकत्वपक्षे वेदयोधितनिष्कामार्मश्रवणादिरूपसाधनपरः, तथा च प्रकृतिजन्यशरीरादिस्वरूपवित् प्रणवो. " मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता। पासनाचित् वेदबोधितनिष्कामकर्मश्रवणादिसाधनविच, वैराग्यद्वारा प्रणवोपासनाद्वारा साधना- नुष्ठानद्वारा च, ब्रह्म प्रामोतीत्यर्थ इति लाक्षणिकार्थ एवास्तुब्रह्मशब्दस्येति वाच्यम् । शरीराणा चतुरशीतिलक्षसंख्याकत्वेन वेदवोधितप्रणवोपासनाया वेदवोधितसाधनानां चापि परि- मितत्वेनानित्यत्वेन च ब्रह्मस्वरूपव्याख्यानोक्तान्तराहित्यरूपस्य वाक्यानन्त्यरूपस्य वानन्त- त्वस्य प्रकृतिजन्यशरीरेषु प्रणवे वेदवोधितसाधनेषु चासम्भवेन त्वदुक्तस्यार्थस्याप्यसामञ्ज- स्यात् । तस्माल्लाक्षणिकार्थपरत्वेनापि न प्रकृतिप्रणववेदान्यतमवाचकत्वं ब्रह्मशब्दस्य । अतः परमवशिष्यतेऽक्षरब्रह्मपरब्रह्मान्यतरवाचकत्वम् । तत्राक्षरब्रह्मवाचकत्वमेव युज्यते 'ब्रह्मविदा- मोती'त्यत्रत्यब्रह्मशब्दस्य । परब्रह्मणो फलत्वेन वक्ष्यमाणत्वात् । एतस्य ब्रह्मणः साधनी. भूतज्ञानशेपत्वात् । न च साधनशेपब्रह्मफलरूपब्रह्मणोरैक्यमेवेति वाच्यम् । तदोभयोरक्षर- ब्रह्मत्वे परब्रह्मत्वे वा श्रुत्या तच्छब्देनैवोक्तं स्यात्, न तु सन्दिग्धार्थप्रतिपादकपरशन्देनेति त्वदुक्तेरनवकाशात् । तस्मात्साधनशेपब्रह्मणः परं भिन्नमुत्कृष्टमग्रे स्थितं वेत्येवार्थः परशब्द- स्येति । 'ब्रह्मविदामोती'त्यत्रत्यब्रह्मशब्दस्याक्षरतैवेति निप्पन्नम् । एवं च ब्रह्मवित्केवलाक्षर- ब्रह्मवित, न तु परब्रह्मविद्, अग्ने परमित्युक्तफलरूपस्य ब्रह्मणो वक्तव्यत्वात्परमेतद्ब्रह्मणाप्यु- स्कृष्टमग्रे स्थितमेतद्भिन्नं ब्रह्म प्रामोतीत्यर्थो ब्रह्मविदामोतीत्यस्य सिद्धा, अग्रे स्थितमिति पक्षे भिन्नत्वार्थपक्षे च फलत्वादेवोत्कृष्टत्वम्, उत्कृष्टत्वार्थपक्षे तु श्रुत्यैवोत्कृष्टत्वं वोध्यत इति सेयम् । यत्तु यस्य ज्ञानं तस्यैव माप्तिरिति लोकदृष्टम्, न त्वन्यज्ञानेनान्यस्य प्राप्तिः, अन्यथा घटज्ञानेन पटस्यापि माप्तिः स्यात् , अतो ब्रह्मवित्परशब्दोक्तं निरतिशयं तदेव ब्रह्म मामोती- त्येवार्थ उचित इति मायावादिन आचार्या वदन्ति । तत्र वदामः । यद्यन्यज्ञानेन नान्यस्य प्राप्तिरिति नियमः स्यात्, तदा तैरुक्तं घटेन । न त्वयं नियमः । यतः सगुणब्रह्मज्ञानेन निर्गुणब्रह्ममाप्तिरिति तेपामपि सिद्धान्तः । न च ब्रह्मत्वेनैकैव ब्रह्मव्यक्तिरिति नान्यज्ञानेनान्यस्य माप्तिः, किन्तु तज्ज्ञानेन तस्यैव प्राप्तिरिति वाच्यम् । एवं चाक्षरब्रह्मणोरपिब्रह्मत्वेनाभेदात्तज्ज्ञानेन तस्यैव प्राप्तेरस्मन्मतस्यापि निप्पत्यू- हत्वात् । न चोभयोरपि ब्रह्मत्वेनैक्ये परापरभावव्याहतिरिति वाच्यम् । यथा तन्मते ब्रह्मवे- नैक्येपि सगुणनिर्गुणत्वभेदेन परापरभावः, यथा वाग्नित्वेनाग्निविस्फुलिङ्गयोरक्यपि स्वल्प- प्रकाशवृहत्सकाशरूपधर्मभेदेन परापरभावः, तथा गणितानन्दत्वरूपधर्मभेदेन धर्मे देहे गृहे रश्मा विति विश्वकोपोक्तार्थवयवाचक 'तद्धाम परं मम', 'तदेतदक्षरं ब्रह्म सर्वकारणकारणं, विष्णोर्धाम परं साक्षात्पुरुषस्य महात्मन' इति गीताश्रीभागवतवचनस्थधामशब्दोक्तदेहत्व. गृहत्यरश्मित्वममशब्दोक्तसाक्षात्पुरुपशद्रोक्तहित्त्वदेहित्वरश्मित्वधर्मिभेदेन चात्रापि परा- परभावव्याहतेरभावात् । अक्षरब्रह्मणो गणितानन्दत्वं तु ‘स एको ब्रह्मण आनन्द' इत्यस्य व्याख्याने स्फुटीकरिप्यते । तस्मादस्मदुक्त एव व्याख्यानं साधीय इति दिछ । अप ब्रह्मविदामोतीत्यत्र ब्रह्मवित् परं मोतीति पदचतुष्टयमुक्तम्, तस्य स्वकपो- .

६ , . तैत्तिरीयोपनिषद् । लकल्पितार्थकरणव्यावृत्त्यर्थ ऋगेव तद्व्याचष्टे तदेपाभ्युक्तेति । तच्छब्देन ब्रह्मविदामोति पदचतुष्टयम् । अभि अभिमुखीकृत्यैपा ब्रह्मविदामोतीति ऋक् उक्ता व्याख्याता मया, श्रुत्या वा, ब्रह्मानुभवकर्तृभिर्या, भगवता चेति शेपः, इति श्रुतिरेवाह ब्रह्मस्वरूपमनुभबैकवेद्यं, नान्यमानगम्यमिति ज्ञापयितुम् । एतेनाग्रिम ऋगुक्तोर्थो यथाश्रुत एव कर्तव्यः, न तु स्वक- पोलकल्पितानुपपत्त्युद्भावनेन लक्षणाच्या मायावाद्याचार्यवदन्यथा कर्तव्य इति वोध्यते । अन्यथा यदि लाक्षणिक एवात्रार्थोभिप्रेतः स्यात्तदा श्रुत्यैव तादृशार्थवाचकशब्दैरेव व्याख्यातः स्यात्, तस्मात् शक्तिवृत्तिसिद्ध एवात्रार्थ इति ज्ञेयम् । किञ्च, व्याख्यानेपि लाक्षणिकशब्दैरेव व्याख्याने व्याख्यानस्याकृतमायत्वं च । अर्थसन्देहस्य तवस्थत्वात् । न च 'परोक्षप्रिया ह वै देवाः, परोक्षवादा ऋषयः परोक्षं च मम प्रिय मिति श्रुतिगीताश्रीभागवतवचनाभ्यां परो- क्षवादोस्तीति लक्षणादृत्त्याश्रयणमेव कर्तव्यमिति वाच्यम् । यदि परोक्षवाद एवात्राभिमेतः स्यात्तदा ब्रह्मविदामोतीत्येवोक्तं स्यात्, न तु तदेपाभ्युक्तेति व्याख्यानमप्युक्तं स्यात्, यदि च पूर्वोक्तवचनाभ्यां व्याख्याने तद्व्याख्याने तद्व्याख्यानेपि परोक्षवादस्तदाभिप्रेतार्थप्रत्य- याभावे सर्वोपि वेदो व्यर्थः स्याद् अभिप्राये ज्ञानाभावात् । तस्मान व्याख्याने परोक्षवादोस्तीति मन्तव्यम् । किञ्च, सोयं परोक्षवादो न सर्वत्र वेदे, किन्तु स्थलविशेष एव, कर्मोपासनाज्ञान- काण्डेषु । तत्र 'फलश्रुतिरिय नृणां न श्रेयो रोचनं परं, श्रेयोविवक्षया मोक्तं यथा भैपज्यरो- चन'मित्येकादशस्कन्धीयभगवद्वचनात् , कर्मकाण्डे 'ज्योतिष्टोमेन वर्गकामो यजेते'त्यत्र स्वर्गा- दिफलश्रुतिः, उपासनाकाण्डे 'य एता महासंहिता वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेना- नाद्येन सुवर्गेण लोकेने त्यादिफलश्रुतिः, ज्ञानकाण्डे तु 'अन्नवानन्नादो भवती'त्यादिफलश्रुतिः। परोक्षवादो जीवान् यथाकथञ्चिद्देदे मवर्तयितुं, यतो 'वेदा ब्रह्मात्मविपयास्त्रिकाण्डविपया' इत्ये- कादशस्कन्धीयभगवद्वचनात्सर्वस्यापि वेदस्य ब्रह्मात्मविपयत्वं भगवतोक्तम्, न तु स्वर्गादिविप- यत्वं, तथाप्येतदपि फलं भवति, केवळस्वर्गादिफलाकांक्षायां यागादिकर्तृणां भगवतः सत्यवा- क्त्वात् । परन्त्वत्र तात्पर्याभावो भगवतः, यथा ' त्वमिदं कटुभेपनं पिव, तुभ्यं सितोपलं दास्यामि' इत्युक्ते वालो भेपनं पिवति तल्लोभात्तदनन्तरं सितोपलमपि दीयते, परन्तु न तत्र भिपजस्तात्पर्य एवमपि ज्ञेयम् । एवञ्च तात्पर्यविपयीभूतगोपनप्रयोजनकं तात्पर्यविषयीभूत- कथन परोक्षवाद इति बोध्यम् । स च परोक्षवादो भगवद्वचनाविरुद्धसिद्धान्तमकटनेन भग- वता वा ज्ञापितो ज्ञायते । एवं च न सर्वत्र वेदे परोक्षवादः, अत एव यत्र ज्ञापकममाणा- भावः, तत्र यथाश्रुत एव वेदार्थ उक्तोस्मदाचार्यवयैरिति कृतं पल्लवितेन । अय यादृशब्रह्मानेन परमाप्तिरभिप्रेता परस्य रमणार्थ तादृशं ब्रह्म श्रुतिाचष्टे सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेति । सत्यं कालत्रयावाधितं, ज्ञानं चित्स्वरूपं, अनन्तं अपरि- च्छिन्नं चेत्यर्थः । एतेन ‘स एतावानास' 'सर्वं खल्विदं ब्रह्मेत्यादिश्रुतिभिर्यदस्ति पन्नास्ति च विवर्य वनानि विष्णुर्भुवनानि विष्णुः 'अणोरणीयान्महतो महीया' नित्यादि- " मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता । वचनैश्च सत्यासत्यस्वरूपस्य जडाजडवरूपस्य परिछिन्नापरिछिन्नस्वरूपस्य सर्वस्यैव ब्रह्म- लेपि कालत्रयावाधितत्वरूपेण चित्स्वरूपत्वेनापरिछिन्नरूपेणैव ब्रह्मणो ज्ञानं परमाप्तिसाधनं, न तु कालत्रयवाधितत्वरूपेण चित्स्वरूपत्वरूपेण परिछिन्नत्वरूपेण च । यतः 'सवै न रेमे, इति श्रुतेः सर्वस्यापि रमणान्तर्गतत्वात् तादृशज्ञानस्यैव परमाप्त्युपयोगत्वेन सिद्धत्वादिति भावः । न च यत्र यत्र श्रुतौ सत्यज्ञानपदे उक्ते तत्रानन्दपदमपि प्रयुक्तमित्यत्रापि कुतो नो- तमिति वाच्यम् । अत्र परब्रह्मणा सह सर्वकामभोगः फलत्वेनोच्यते । तत्र योग्यतास. म्पादकत्वेन चाक्षरब्रह्मज्ञानमुक्तं, तत्राक्षरब्रह्मण आनन्दरूपत्वेपि गणितानन्दत्वेन परिच्छि- नानन्दत्वादगणितानन्दपरब्रह्मफलाधिकारीहास्य मा करोतु, अथ च यत्र परिच्छिन्नानन्द- मक्षरब्रह्मैव फलत्वेनोक्तं श्रुत्याधिकारिविशेष प्रति, तत्रानन्दपदं प्रयुज्यते अक्षरस्य फलत्ववो- धनाय, अत्र त्वपरिमितानन्दरूपमेव परं ब्रह्म फलत्वेनोच्यत इति परमाप्तियोग्यतासम्पादकत्र- मज्ञानविषयीभूतस्याक्षरब्रह्मणः फलत्वाभावादानन्दपदस्यानुक्तत्वात् । न चाक्षरब्रह्मणोत्र फलत्वं मास्तु, साधनत्यमेवास्तु, परब्रह्मणस्तु फलत्वादत्रानन्दपदं विशेपणत्वेन कुतो न प्रयुक्तं फलत्ववोधनायेति वाच्यम् । सचिदानन्दात्मकाक्षरज्ञानफलत्वे श्रुत्या परस्योक्ते फळ- त्ववोधकानन्दपदपयोगस्य चैयर्थ्यात् । न च दुःखाभावः सुखं च पुरुषार्थों, तत्र मुखं मुख्यः पुरुषार्थः, दुःखाभावस्तु गौणः पुरुषार्थः, मुखस्यैव सर्वाकांक्षाविषयत्वात् , दुःखाभावस्य तु सर्वथा ' मुखमाप्तिनिश्चयाय निरन्तराप्रतिवद्धसुखानुभवार्थ वाकांक्षणीयत्वात् , एवञ्च सुखे मुख्यत्वं, दुःखाभावे गौणत्वं च स्पष्टमेव, तथा चानन्दपदामयोगे परस्य दुःखा- भावरूपगौणपुरुपार्थता कदाचिदायातीति वाच्यम् । सचिदानन्दमयाक्षरब्रह्मज्ञानफलत्वे श्रुत्या परस्य वोधिते दुःखाभावरूपगौणपुरुषार्थताया अनागमनात् । यतः सचिदानन्द- विपयकज्ञानस्योत्कृष्टसचिदानन्द एव फलं भवितुमर्हति । साधनतः फले सर्वोत्कृष्टत्वस्य- दृश्यमानत्वात् , तचोत्कृष्टत्वं तु निरवधिसच्चिदानन्दत्वमेव बोध्यम् । दुःखाभावस्य तु सुखा- पेक्षाया न्यूनत्वान्नानन्दफलत्वं वक्तुं शक्यमिति न किञ्चिदेतत् । अथ यादृशी वित परमाप्तिसाधनं तादृशीं विदमाह यो वेद निहितं गुहायामिति । एतादृशं ब्रह्म यः कश्चन भाग्यवान् गुहायां हृदयाकाशे निहितं स्थापितं मया (मायां?) तिर- स्कारिणी दरीकृत्याविर्भावितमिति यावत्, वेद अनुभवेत्, न तु शास्त्रीयज्ञानमात्रयानित्यर्थः । अत्र निहितपदस्याविर्भावितार्थकत्वादन्यककत्वेनाक्षरब्रह्मण आविर्भावे स्वातन्त्र्याभाव आयाती- त्यतोपि परान्यूनत्वं योध्यम् । अन्यथाक्षरब्रह्मणो व्यापकत्वात् तत्र स्थितत्वेन स्थितमित्येव वदेव, न त्याविर्भाविताकनिहितपदम् , तस्मादस्वातन्त्र्ययोधनायव निहितपदमिति ज्ञेयम् । न च शास्त्रीयसाधनैराविर्भावितमित्यर्थ इति क परान्यूनत्वमक्षरब्रह्मणो निहितपदेनायातीति चाच्यम् । एतादृशविवक्षायामर्याधिश्यस्यामतीयमानत्याव, अस्मत्कृतविवक्षायां तु परान्यू- नत्वमारब्रमणि पोध्यते इत्याधिक्यस्य प्रतीयमानत्वमित्यस्मदुक्त एवार्थः साधीपान ।

तैत्तिरीयोपनिषद् । अथ यादृशी परप्राप्तिरभिप्रेता तादृशीं चदन्त्याप्तिपदार्थमाचष्टे परमे व्योमन् सोश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति । साधनयापये कर्मणः पूर्वमेव क्रियापदमुक्तमिति व्याख्यानेपि कर्मणः पूर्वमेव क्रियापदं व्याख्यायते श्रुत्या, सतादृशो ब्रह्मवित, परमे व्योमन् व्यापिवैकुण्ठ इति यावत , तत्र सर्वान् कामानशेपानभिलपितानर्थानश्नुते भुंक्ते इत्यर्थः । अत्र लयस्वरूपप्राप्तिमात्र नाभिमेतं श्रुतेः । तथा सति, सोश्नुते सायुज्यमित्ये. वोक्तं स्यात्, न तु सोश्नुते सर्वान् कामानित्यनेन सर्वकामभोगरूपा विलक्षणा प्राप्तिरुक्ता स्यात् । तत्र सर्वकामभोगस्तु द्वितीयेन सह भवति । अत्र तु ब्रह्मणा सहेत्यनन्तरमेव वक्तव्य- स्वात् द्वितीयं ब्रह्मवेतीयं सर्वकामभोगरूपा प्राप्तिअंदघटिता । तत्र मुक्तिदशायां भेदस्तु भक्तिमार्ग एव, न ज्ञानमार्गे, 'भक्तिर्भेदकरी नृणा 'मिति श्रीभागवतवचनाद्भक्तिमार्ग एवा. नया श्रुत्या प्रतिपादितः । यस्माचेदं भक्तिमार्गीयमेव फलं, तस्मात् ब्रह्मणा सहेत्यत्र 'सह युक्तेऽमधाने' इति सूत्रेणामधाने तृतीया प्रयुक्ता, भोगे परब्रह्मणोमधानतावोधनाय । तचापा- धान्यं परब्रह्मणो भक्तिमार्ग एव, न ज्ञानमार्गे, अत एव 'अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज । साधुभिग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः। नाहमात्मानमाशासे मद्भक्तैः साधुभिविना । श्रियं चात्यन्तिकी ब्रह्मन् येपां गतिरहं परा। ये दारागारपुत्राप्तान् प्राणान् वित्तमिमं परं । हित्वा मां शरणं याताः कथं तांस्त्यक्तुमुत्सहे । मयि निर्बद्धहृदयाः साधवः समदर्शिनः । वशे कुर्वन्ति मां भक्त्या सत्वियः सत्पतिं यथेति श्रीभागवते नवमस्कन्धे अम्बरीपकथायां दुर्वासस प्रति भगवता स्वस्य भक्ताधीनत्वमुक्तम् , ज्ञानमार्गे 'ज्ञानी त्वात्मैव मे मत' मित्यनेन ज्ञानिनः स्वात्मत्वमात्रमुक्तम्, न तु तदधीनत्यम् , तस्मादियमुपनिषद्भक्तिमार्गीयसाधनभक्तिमार्गीय- फलभक्तिमार्गीयब्रह्मस्वरूपप्रतिपादकत्वान्मुख्यतया भक्तिमार्गप्रतिपादिकैव, न ज्ञानमार्ग- प्रतिपादिका । ज्ञानमार्गीयस्वरूपसाधनपतिपादनं तु भक्तिमार्गीयफलप्राप्तौ स्वरूपयोग्यता. सम्पादकमात्रत्वात्तच्छेपभूतमिति न मुख्यं, किं तु गौणमेवेति ज्ञेयम् । ननु किं साधनशेप- ब्रह्मणा भुंक्ते इत्याशङ्कायां परशब्दार्थ वितृण्वाना समाधत्ते ब्रह्मणा विपश्चितेति । विप- चितातिपण्डितेनेत्यर्थः । अत्र पाण्डित्यं सर्वकामभोगस्य पूर्वमुक्तत्वातद्विपयकपाण्डित्य- मेव मुख्यतया विवक्षितम् । सनिहितकामभोगरूपविपयकत्वस्य त्यागे कारणाभावात् । एवं च विपश्चिच्छन्दोपलक्षितः सकलो धर्मों भौगोपलक्षितो देहादिश्य परब्रह्मणि भोग । करि जीवे च सिध्यति । शरीरस्यैव भोगायतनत्वादिति परिभावनीयम् । अत एवं मायावाघाचार्यकृतहार्दाकाशत्वेन परमे व्योमन्नित्यस्य व्याख्यानमपि न समीची- नम्, एतादृशपरब्रह्मणा सह तत्र सर्वकामभोगस्यासम्भवात् । परब्रह्मणः सर्वशक्तिमचपि सकामभोगस्य पहिलोकाधारसापेक्षत्येनैतत्स्वेच्छया रचितत्वाच । अन्यथा वैकुण्ठादिलोकक- रणवयीपचिः । एवं च 'प्रधानपरमव्योन्नोरन्तरे विरजा नदी । तस्याः पारे परे प्योन्नि त्रिपाद्भुतं सनातनमिति पामोत्तरखण्डीयवचनोक्तविरजानदीपारस्थपरमव्योमशब्द- मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता। वाच्यस्य प्राकृते प्रलये प्राप्तेऽव्यक्तेऽव्यक्त गते पुरा, शिष्टे ब्रह्मणि चिन्मात्रे कालमायाति- गेऽक्षरे, ब्रह्मानन्दमयो लोको व्यापिवैकुण्ठसंज्ञकः, निर्गुणोनाद्यनन्तश्च वर्तते केवलेऽक्षरे' इत्यनेनाक्षरब्रह्मान्तर्गतत्वेनाक्षरब्रह्मानन्दरूपत्वेन च वृहद्वामनपुराणोक्तस्यापि वैकुण्ठाख्यस्य पूर्णपुरुपोत्तमाधारलोकस्यैव ग्रहणम् । अत एवात्रापि आनन्दमयनिरूपणे 'ब्रह्म पुच्छं प्रति- छे' त्यत्राप्यानन्दमयस्याधारत्वेन निरूपितमक्षरब्रह्मेति सर्वं चतुरस्रम् । तथा च सकलविप- श्चित्वादिधर्मवत् शरीरवत् फलरूपं ब्रह्म परशब्दार्थः । यद्वा, ब्रह्मवित् सर्वान् कामान् सह एक- वारमेव, न तु क्रमेण । अलौकिकसामर्थ्यस्य भगवता दत्तत्वात् । ब्रह्मणा विपश्चिता साधक- तमत्वात् करणभूतेनाश्नुते भुक्ते इत्यर्थः । एवमपि 'रामेण वाणेन हतो वाली त्यत्र, यथा वाणस्यामाधान्यं रामस्यैव प्राधान्यं, वाणक्षेपणस्य तदधीनत्वात् , तथात्रापि परब्रह्मणः कर- णत्वेनामधानत्वं, भोगकर्तुमुक्तस्यैव प्रधानत्वं शेयम् । न च वाणस्याचेतनत्वेन तत्क्षेपणस्य च रामाधीनत्वेन प्राधान्यमुचिततरं, प्रकृते तु भोगकर्तुजीवस्य 'सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वमिदं प्रशास्तीति श्रुतेब्रह्माधीनत्वात् कयं प्राधान्यमिति वाच्यम् । भोगकर्तृत्वं भक्ति- मार्गे एव, न तु ज्ञानमार्गे । एवञ्च अहं भक्तपराधीन ' इत्यादिना स्वस्मिन् भक्ताधीनत्व- स्य परब्रह्मणैव प्रतिपादितत्वेनात्र यौष्माकीणयुक्तीनां दुर्वलत्वात् । यद्वा, सहशब्दामयोगेपि 'विनापि तद्योगं तृतीयेति तृतीया । यद्वा, सह(त्र)शब्द एव देहलीदीपन्यायेनोभयत्र सम्बन्ध्यते, सर्वथा फलीभूतस्य परब्रह्मणोमाधान्यं भोगकर्तुजीवस्य प्राधान्यमिति सर्वपले- प्वपि भक्तिमार्ग एवानया श्रुत्या प्रतिपाद्यत इति निश्चेतव्यम् । एतेन साधनशेपब्रह्मणः तव मते निर्धर्मकत्वादस्मन्मते निर्धर्मकसधर्मकत्वेपि गणितानन्दत्वात् परशब्दवाच्यब्रह्मणस्त्वगणि- तानन्दधर्मकत्वान परशब्दवाच्यं भिन्नत्वम्, अथ च परमफलरूपत्वाचातुर्थवचादप्युत्कृष्टत्वमग्ने स्थितत्वं च सिद्धम् । ननु 'यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिपदावा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति श्रुत्या कर्मकरणे ब्रह्मज्ञानं सहायीभूतमुक्त, न तावताक्षरब्रह्मज्ञानापेक्षया कोत्कृष्एं, साक्षान्मो- शाजनकत्वात् । तथात्राप्यक्षरब्रह्मणो ज्ञानं सधर्मकब्रह्मणा सह भोगकरणे कारणमस्तु, तु ततः सधर्मकं ब्रह्मोत्कृष्टमिति वाच्यम् । अत्र हि सर्वकामभोगो ब्रह्मणा सह फलस्वेनोच्यते, स सर्वकामभोगस्तु भेदे सति भवति । स च भेदो 'भक्तिर्भेदकरी नृणामिति वाक्यात् भक्तिमार्ग एवेति । एवञ्च, भक्तिमार्गीयस्यैवेदं फलं, न तु ज्ञानमार्गीयस्य, 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भल इति श्रुतस्तं प्रति ब्रह्मत्वस्यैव फलत्वेनोक्तत्वात् । एवञ्च सति 'मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः सुदुर्लभः प्रशान्तामा कोटिप्वपि महामुने', 'मुक्ति ददाति कर्दिचित् स्म न भक्तियोगामित्यादिश्रीभागवतादिवाक्येभ्यो मुक्तेरप्यपेक्षया भक्तियोगस्य तत्फलस्य तदिपपस्य चोत्कृष्टले सिद्धेऽक्षरब्रह्मज्ञानस्य तद्विषयीभूतस्य चाक्षरब्रह्मण उत्कृष्टत्वाभावस्य वजलेपायि- तत्वात् । ननु यदि ब्रह्मविदः परमाप्तिः, तदा वामदेवादीनामपि सर्वकामभोगरूपा परमात १ भानन्दमये इति पाठो मरे। न . तैत्तिरीयोपनिषद् । स्यात् , न त्वेवं, यतो 'मुक्तानामपि सिद्धाना'मित्यादिवाक्यैः कस्यचिदेव परमाप्तिरिति श्री. भागवते उक्तमिति चेत् । अत्र वदन्त्यस्मदाचार्याः । अत्रामधानतृतीयानिर्देशात् भोगे परब्रह्म- णोपाधान्यं, तेन वशीकृतत्वं च लक्ष्यते, तत्तु फलत्वेन प्रधानभूतस्य सर्वप्रभुरूपस्य सर्वमूली- भूतस्य तदैव सम्भवति यदि मध्ये वशीकरणसमर्था भक्तिः स्यात् । अत एव, 'अहं भक्तपरा- धीनः 'वशे कुर्वन्ति मां भक्त्या सस्त्रियः सत्पतिं यथेति श्रीभागवते नवमे (पष्टे) भगवता स्वस्य भक्ताधीनत्वमुक्तम् । एवञ्च, 'यमेवैप वृणुते तेन लभ्य' इति श्रुतेर्भक्त्याहमेकया ग्राह्य' इति वचनाच, यस्य ब्रह्मविदो विशेषवरणं क्रियते भगवता, तस्य भक्तिरुत्पद्यते, यस्य न विशेपवरणम् , तस्य न भक्तिरिति न सर्वेषां वामदेवादीनां ब्रह्मविदां सर्वकामभोगरूपा परप्राप्तिः । अत एव गीतायां 'ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काति, समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते परा'मित्यत्र लभत इत्यनेन लाभत्वेनैव भक्तिरक्ता, न तु ब्रह्मभावे सति सर्वथैव तत्माप्तिरुक्ता, यदि ब्रह्मभावे सति सर्वथैव सर्वस्य भक्तिमाप्तिः स्यात्, तदा मद्भक्ति प्राप्नुयात् परामित्येवोक्तं स्यात्, न तु लभत इति । एतेन ब्रह्मवित्त्वं ब्रह्मणा सह सर्वकामभो- गरूपफलमाप्तौ स्वरूपयोग्यतासम्पादकमेव, न तु साक्षात्कारणरूपम् , अक्षरब्रह्मप्राप्तौ तु सा- क्षात्कारणरूपमिति ज्ञेयम् । न च ब्रह्मज्ञानं मास्तु निरपेक्षं साक्षात्कारणं परमाप्ती, भक्ति व्यापा- रीकृत्यैव कारणमस्त्विति वाच्यम् । भक्तेर्वरणजन्यत्वेन तज्जन्यत्वाभावाद् व्यापारत्वाभावात् । तजन्यस्तजन्यजनको हि व्यापार इति व्यापारलक्षणात् । न च यत्र भक्तिरुत्पद्यते ब्रह्मज्ञानो- त्तरं वरणेन, तत्र भक्तिसहकारीकृत्य ब्रह्मज्ञानं कारणमस्तु परप्राप्ताविति वाच्यम् । 'यत्कर्मभिर्य- तपसा ज्ञानवैराग्यतश्च यत् । सर्व मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेजसा । न ज्ञानं न च वैराग्य प्रायः श्रेयो भवेदिहे'त्यादिवाक्यैर्ज्ञानादिनिरपेक्षायाभक्तेस्तत्र स्वतन्त्रकारणत्वात् । तस्मादस्मदु- क्तमेव ढीय इति न किञ्चिदेतत् । अश्नुत इत्यादिधात्वर्थविषयकोधिको विचारस्त्वानन्दमया- धिकरणे श्रीमदल्लभाचार्यचरणैः प्रपश्चित इति तत एवात्रसेयः । अत्र 'ब्रह्मविदामोति पर मितिसूत्रभूतम् । तदेपाभ्युक्तेरत्यारभ्य 'विपश्चिते' त्यन्तं सूक्ष्मव्याख्यानभूतम् । तस्माद्वा एतस्मा' दित्यारभ्य सर्वोपि ग्रन्थोग्रेतनस्तु संलिप्तैतद्व्याख्यातार्थस्यैव प्रपञ्चभूत इति न प्रस्मर्तव्यम् । अथ पररूपं फलं को चेद, कस्मिन्देशेस्ति, तत्रास्मत्सविध एवास्तीति पञ्चकोशेषु सर्वान्तरं यत् तत्परमिति दर्शयन् , अथ च यथा सुदीप्तान पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभ- वन्ते सरूपाः, तथाऽक्षराद्विविधाः सौम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ती'त्यनेनाक्षरस्य मपश्चोत्पत्तिलपस्थानत्योक्त्या प्रपञ्चोपादानकारणत्वमुक्तम् । तदनु 'दिव्यो हामूर्तः पुरुषः स पादाभ्यन्तरो हजः । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः अक्षरात्परतः पर इत्यनेन पुरुषोत्तम- स्वरूपमुक्त्वा, 'एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च, खं वायुज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी'त्यनेन पुरुषोत्तमस्य च कर्तृत्वेन कारणत्वमुक्तम् । एवं चाक्षरब्रह्मणः मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता। ११ सकाशात् परब्रह्मणश्च सकाशात् प्रपञ्चोत्पत्तिरुक्ता मुण्डकादिश्रुतावितीयमपि श्रुतिरक्षरब- ह्मणः परब्रह्मणश्च सकाशात् सृष्टिमाह तस्माद्वा एतस्मादात्मन इत्यादिना । तस्मादा एतस्मादात्मने आकाशः सम्भूतः । आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी । पृथिव्या औषधयः । औपंधीभ्योन्नम् । अन्नात् पुरुपः । स वा एप पुरुपोनरसमयः। तस्येदमेव शिरः । अयं दक्षिणः पक्षः । अयमुत्तरपक्षः । अयमात्मा । इदं पुच्छ प्रतिष्ठा । तदप्येप श्लोको भवति । अन्नादै प्रजाः प्रजायन्ते । याः काश्च पृथिवीं श्रिताः । अथो अन्नेनैव जीवन्ति । अथैतदपियन्त्यन्ततः । अन्नहि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात् सौपधर्मुच्यते । सर्व वै तेनमाप्नुवन्ति । येन्नं ब्रह्मोपासते । अन्न हि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात् सर्वोपधर्मुच्यते । अन्नाद्भूतानि जायन्ते । जातान्यन्न वर्धन्ते । अद्यतेत्ति च भूतानि । तस्मादन्नं तदुच्यत इति । अत्र यद्यपि तच्छब्दस्य पूर्वस्थितप्रधानपरामर्शित्वमुत्सर्गतः सिद्धमिति पूर्वोक्तभो- गकर्तुर्जीवस्यैव शब्दतः प्राधान्यमायाति, न तु समासमविष्टतया गौणस्याक्षरब्रह्मणः, न वाप्रधानतृतीयाविभक्तिविशिष्टब्रह्मणा विपश्चितेति वाक्योक्तपरब्रह्मणो वा, तथापि भोग- कर्तृत्वेन जीवस्यापाततः शब्दात् प्रतीयमानेपि माधान्येक्षरब्रह्मणो जीवांशित्वात् परब्रह्मणश्व सर्वमूलीभूतत्वात् सर्वकर्तृत्वात् , 'य आत्मानमन्तरो यमयतीति श्रुतेर्नियामकत्वाच परमार्थतः प्राधान्यमिति पारमार्थिकपाधान्यमादाय तच्छब्दैतच्छब्दाभ्यामक्षरब्रह्मपरब्रह्मणी परामृश्यते । यथा 'पटोलपत्रं पित्तनं नाडी तस्य कफापहा । फलं तस्य त्रिदोपन्नं मूलं तस्य विरेचन'- मित्यत्र पटोलस्थपत्रनाडीफलानां शन्दत आपाततः प्राधान्ये मतीयमानेपि पत्रस्य फलाभा- वात फलस्य च मूलाभावात् शब्दतः प्रधानोपादानेसम्भवः स्यादायुर्वेदीयश्लोकस्पेति शब्दतो गौणस्यापि पटोलस्यार्थिकमाधान्यमादाय तच्छन्देन पटोल एव परामृश्यते । तथा प्रकृतेपीति बुध्यस्ख । एवं च वाधके सति सर्वनाम्नां उत्सर्गसिद्धं शब्दतः मधानपरामर्शित्वं त्यक्त्वार्थतः प्रधानपरामर्शित्वमेवाङ्गीक्रियते मेक्षावद्भिरिति सिद्धम् । अत्र जीवादाकाशादिसृष्टेः श्रुतिभिरनुक्तत्वमेव वाधकं ज्ञेयम् । तथा चायमर्यः । 'ब्रह्मविदाप्नोती'त्यत्र तस्मात् पूर्वोक्ता- दक्षरब्रह्मरूपोपादानकारणादध चैतस्मात् 'ब्रह्मणा विपश्चिते त्यनेनाव्यवहितोक्तात् परब्रह्म- रूपनिमित्तकारणादात्मनः केवलादेव, न तु मायावादिमतवदज्ञानसहितात, यद्यज्ञानसाहित्य- मभिप्रेतं स्याछुतेः, तदा 'तस्माद्वा एतस्मादज्ञानसहितादात्मन आकाशः सम्भूत' इत्येवोक्तं- स्यात् । एतादृशात्मनः सकाशादाकाश एकशब्दमात्रगुणविशिष्टः पदार्यः सम्भूतः सम्यक् सत्तां प्रातः । अन्यस्पात्मातिरिक्तस्याभावात्तत्सत्तांश इति यावत् , सत्तायां सम्यावं पार- १२ तैत्तिरीयोपनिपद् । मार्थिकत्वमेव , न तु मिथ्यावादिमतव्यावहारिकसचावत्वेनापारमार्थिकत्वम् । न च जगत्सत्ता पारमार्थिकीत्यत्र किं मानमिति वाच्यम् । 'आत्मैवेदमा आसीत् पुरुपविधः सोनुवीक्ष्य नान्य- दात्मनोऽपश्य'दिति वृहदारण्यकश्रुतिः सृष्टेः पूर्वमात्ममात्रसद्भावमात्मातिरिक्ताभावं चैवका. रेण प्रतिपादितवती । तैत्तरीयश्रुतिस्तु 'स द्वितीयमैच्छत् , स एतावानासे'ति वाक्येन ब्रह्मण एवं केवळस्य जगद्रूपेणाविर्भावमुक्तवती । एवं चाज्ञानादीनां द्वितीयानामभावात् , ब्रह्मण एव केव- लस्य जगदुपादानत्वात, ब्रह्मणश्च सचिदानन्दरूपत्वात्तदेव ब्रह्म तिरोहितचिदानन्दांशमात्र- मस्ति, मात्रमत्ययवेद्यत्वाजडरूपेण प्रकटं, तदेव च ब्रह्म तिरोहितानन्दमात्रांशमस्ति जानाती- त्येतावत्सत्ययवेद्यत्वाचिद्रूपेण प्रकटं, तदेव च ब्रह्म प्रकटसचिदानन्दांशं तथैवोपनिपदुपहणरू- पपुराणेतिहासवेद्यत्वादन्तर्यामिरूपेण च प्रकटं, तत्र 'सवै न रेमे तस्मादेकाकी न रमते, स द्वितीयमैच्छदित्यनेन रमणार्थमेव सृष्टेरुक्तत्वात् सच्चिदानन्दौचित्यानन्दस्तिरोभूतो शेयः। आनन्दरूपेन्तर्यामिणि तु त्रितयमपि प्रकटमेव, अन्यथा तारतम्याभावे सर्वत्र सच्चिदानन्दरूप- ब्रह्मत्वे समत्वे क्रीडायाः स्वरूपनिर्वाहो न स्यात् । क्रीडाया उच्चनीचभाव एवोपपत्तेः । तस्मा- ज्जगत्सत्तापारमार्थिक्येवेति बृहदारण्यकथुत्या तैत्तरीयश्रुत्या च स्पष्टमेव प्रतिपाद्यत इति, श्रुतेरेच मानत्वात् । नन्वेकमेव ब्रह्म नानारूपं जातम्, एकस्य च नानात्वं न पारमार्थिकम् , किन्तु व्यावहारिकमेव । अतो मिथ्याभूतमेव जगदिति शङ्करमतमेवेदमिति चेत् ? अत्र घूमः । यथा ब्रह्मणि सर्वे धर्मास्तथा नानात्वव्यावहारिकत्वादिकमपि तद्धर्म- रूपमेव । एवं च यदा यत्र यद्धर्माविर्भावेच्छा, तदा तत्र तद्धर्मप्राकट्यं क्रियते, परब्रह्मणो लीलाशक्त्येतिशङ्करमतसिद्धमिथ्यारूपव्यावहारिकत्वविशिष्टनानात्वाभावोऽस्मन्मत इति क्व तन्मतमिदमिति निपुणतरमाकलयेति दिक् । अथ प्रकृतमनुसरामः । पारमार्थिकसत्ताबदाकागान् स्वामाधारणम्पर्शगुणविशिष्टः शब्दगुणविशिष्टश्च वायुः सम्भूतः, तदनु वायोः स्पर्शशब्दरूपगुणद्वयविशिष्टः स्वासाधारण- रूपगुणविशिष्टवाग्निः सम्भूतः, तदन्यः शब्दस्पर्शरूपगुणत्रयविशिष्टाः स्वासाधारण- रसगुणविशिष्टाचापः सम्भूताः, तदन्वद्भयः शब्दस्पर्शरूपरसगुणविशिष्टा स्वासाधारणगन्ध- गुणविशिष्टा पृथिवी सम्भूता, तदनु पृथिच्या ओपधयो ब्रीह्यादयश्च सम्भूताः, तदन्वोषधी. भ्योऽन्नं भक्ष्यद्रव्यं तन्दुलादि सम्भूतम्, तदन्वन्नात् ‘स वा एप पुरुपोऽनरसमय' इति वक्ष्य- माणत्वाद्रसरूपतामापन्नात् पुरुषो विराडदेहः सम्भूतः, पारमार्थिकसत्ता प्राप्तः । अत्रात्म- रूपपुरुपस्यानादुत्पचेरसम्भवादनार्प (अन्नाप) आय वा पुरुषो विद्यते यस्मिन् स पुरुष इति व्युत्पत्तिसिद्धः पुरुपशब्दवाच्यो विराड्देह एवोच्यते इति बोध्यम् । वै निश्चयेन सोनादुत्पन्नत्वेन प्रसिद्धः, एप: परिदृश्यमानः पुरुपो विराइदेहः अन्नरसमयः अन्नरसप्रचुर इत्यर्थः । एतेन आकाशमारभ्यानरसमयाः पदार्याः कारणरूपा लौकिकाकाशादिभ्यो मिन्ना मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता । १३ ज्ञेयाः । अत्र श्रीभागवताद्युपश्रृंहणानुरोधात् प्रथमं विराइदेहरूपब्रह्माण्डोत्पत्तिः, तदनु भगव- मवेशा, 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशदित्यग्रे वक्ष्यमाणत्वात् । एवं च ब्रह्मशरीरमेवैतदुपनिषदुक्तो ब्रह्माण्डदेहः, न तु जीवशरीरमिति; तदन्वस्मदादिदेहोत्पत्तिस्तस्मादित्यादिकं ज्ञेयम् । अत्रान्नमपशब्दमारभ्यानन्दमयान्तशब्देषु सर्वत्र प्राचुर्य एव मयट् , न तु विकारे । 'यचश्छन्दसीति सूत्रेण छन्दसि यच एव विकारे मयडिधानात् । न चानरसमय- विज्ञानमयानन्दमयशब्देष्वनेकाच्त्वात् माचुयें मयडस्त, अन्नमयप्राणमयमनोमयेषु तु ह्यचू- स्वात् विकारार्थ एव मयडस्त्विति वाच्यम् । माचुर्यार्थकानरसमयविज्ञानमयानन्दमयमध्य- पतितमाणमयमनोमयशब्दयोरपि माचुर्यार्थ एव मयटो योग्यत्वात् । एकरूप्यस्य जायमान- त्वात् । अन्यथा, अर्धजरतीयतया वैषम्यं मसज्जेत । न चान्नरसमयप्राणमयमनोमयविज्ञान- मयानन्दमयशब्देषु विकारशब्दादिति चेन्न प्राचुर्यादिति सूत्रेण विकारार्थत्वं मयटः पूर्वपक्षीकृत्य प्राचुर्यार्थे मयडिति श्रीमयासचरणोक्त सिद्धान्तः कथं सङ्गच्छताम् ? माणमय- मनोमयशब्दयो_चत्वाद्विकारे मयटः सम्भवेपि विज्ञानमयानन्दमयशब्दयोरनेकाचत्वाद्विकारे छन्दसि मयटो दुर्लभत्वादिति वाच्यम् । अनेकाच्त्वादपि छन्दसि कचिद्विकारे मय- डित्यत्र 'विकारशब्दादिति चेदिति भगवन्निश्वसितरूपसूत्रोक्तपूर्वपक्षस्यैव प्रमाणत्वात् । अन्यथा, आनन्दमयशब्दस्यानेकाच्त्वाद्विकारे मपटोऽमसक्तेर्विकारार्थत्वस्य पूर्वपक्षीकरणमस- झतं स्यात् । तस्मादस्मदुक्तमेव साधु । यत्वन्नमयमाणमयमनोमयविज्ञानमयानन्दमयशब्देष्वनमाणमनोविज्ञानशब्देभ्यो वि. कारे आनन्दशब्दात् माचुर्ये, मयडिति मायावादित्तिकाराः । अन्नरसादिसर्वत्रशब्देभ्य एवाविशेषाद्विकार एवं मयडिति मायावादिभाष्यकाराश्य वदन्ति । तन्न साधीयः । प्राणमनःशब्दाभ्यां 'व्यवश्छन्दसी'ति सूत्रेण विकारे मयटः मुलभ- त्वेप्यन्नरसमयविज्ञानमयशब्दयोरनेकाविशिष्टयोर्विकारे दुर्लभत्वमिति न किश्चदेतत् । अत्र मायावाद्यनुसारिणो वैयाकरणंमन्या एवं समादधते । ' श्रीग्रामण्योश्छन्दसी"ति सूत्रे श्रियः श्छन्दसीत्यंशस्तावद्भगवता भाष्यकारेण प्रत्याख्यातः । छन्दसि सर्वविकल्पानां व्यवस्थितत्त्वात् । अत एव 'उत , नित्यं छन्दसि, धादिभ्यश्च, नित्यं छन्दसि' इत्यादयोपि वैयाकरणैरेवमेव प्रत्याख्याताः । न्यायसाम्पात् ! एवं स्थिते तात्पर्यग्रहस्य न्यायानुसन्धाने- नैव सिद्धेस्तदय पाणिनिसूत्रारम्भादर्शनाचेह 'मयदे॒तयोर्भापायामभक्ष्याच्छादनयोरिति सूत्रे भापायामिति त्याज्यम् , तथा च 'बचश्छन्दसि' 'नोत्वर्धविल्वादिति त्रिसूत्र्यपि त्याज्या । सति हि भापाग्रहणे शरमयं वर्दिरित्यादिसिद्धयर्थं द्वच इत्यारब्धं, 'मौझं शिक्यं वार्ध चर्म वैल्वो यूप' इत्यादौ द्यच इति प्राप्त प्रतिपेढुं 'नोत्व दिति सूत्रमारब्धम् । उक्तरीत्या तु सर्वमिदं निप्फलं, भाष्यकारैरेव प्रत्याख्यानमायं च । एपैव वेदान्तसूत्रत्तिकृतामपि गतिः । तैरप्यानन्दमयादितरेषु विकारे मयटः स्वीकाराव । अनमयमाणमयमनोमयेपु पच्त्वान्मय- तैत्तिरीयोपनिषट् । ट्सम्भवेपि विज्ञानमयशन्देपि विज्ञानमयडर्थे उक्तमकारस्यैवानुसतव्यत्वात् । तथा च आन- न्दमयेपि विकारार्थतैवोचिता । एकरूप्यात् । यद्वा, माचुर्ये मयट्यपि प्रकृत्यर्थविरोधिनो लेश- तोनुवृत्तिलाभात् प्रकृते विकारार्थः पर्यवस्यतीत्याशयः । अथवा, 'नित्यं वृद्धशरादिभ्य' इत्यत्र भापाग्रहणं नानुवर्तते । अनुचावपि भाषायां नित्यम्, अन्यत्र तु काचित्क इत्याश्रित्य मयट् सुसाध्यः । अत एव शरादिषु मृच्छब्दपाठोप्यर्थवान् । 'मोषु वरुण मृन्मयं गृहं राज. बह गममिति मन्त्रदर्शनात् । न च भापार्थ एव मृच्छब्दस्य पाठ इति वाच्यम् । आरम्भ- सामर्थ्यादेव सिद्धे नित्यग्रहणं योगविभागेनान्यत्रापि कचिन्नित्यार्थम् । तेन 'एकाचो नित्य मित्युक्त्वा वाड्मयं त्वङ्मयमित्यादेराकरे उदाहृतत्वात् । एवं वदता मृच्छन्दपाठवैयर्यस्य स्पष्टत्वात् । यता, 'हेतुमनुष्येभ्य ' इत्यनुवर्तमाने 'मय चेति सूत्रेणागतार्थे मयट् विकार इति त्वार्थिकार्थकथनमेव । सर्वथापि शङ्करभगवत्पादोक्तिरनवद्यैवेति दिक् । अत्र ब्रूमः । एवं मायावादिभाष्यकारसत्तिकारोक्तीनां विकारे मयटः साधनेन, अथ तत्कृतव्याख्यानस्यार्थिकार्थपरतया वा साधीयस्त्वेन विकारार्थे साधितेपि सूत्रकारमायावादि. भाष्यकारयोः खरूपविचारे क्रियमाणे प्राचुर्यार्थ एव मयडत्र वक्तुं योग्यः, न तु मायावा- दिभाष्यकारोक्तविकारार्थे । तथाहि, यतः 'अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितं यदृग्वेदो यर्जु- र्वेदः सामवेदोथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिपदः श्लोकाः सूत्राणि व्याख्यानान्य- नुव्याख्यानानि । अस्यैवैतानि निःश्वसितानीति बृहदारण्यकश्रुतिर्वेदेतिहासपुराणविद्यापदो- क्तवेदाङ्गोपनिपलोकसूत्रपदोक्तवेदान्तमीमांसासूत्रवेदान्तस्थिततदेपाभ्युक्तेति व्याख्याना- नुच्याख्यानपदोक्तपूर्वव्याख्यानपश्चाद्भाविगीतादीनां महतो भूतस्येति पदद्वयोक्तपरमकाष्ठा- पन्नस्य ब्रह्मणो निःश्वसितत्वमाह । एवञ्च, सूत्रकर्तृत्वं परमकाष्ठापनब्रह्मण एव, भाष्यकर्तृत्वं तु तदंशांशभूतमायावायाचार्याणाम् । तत्र कस्योक्तिलीयसीति विचारे उपजीच्यत्वात् परम- काष्ठापन्नब्रह्मण एकोक्तिर्वलीयसी, न त्वंशंशोक्तिः, उपजीवकत्वात् । एवञ्च, अन्नरसमयादिषु प्राचुर्यार्थक एव मयट् , न तु विकारे इति स्वाभिमायो 'विकारशब्दादिति चेन्न प्राचुर्यादिति सूत्रेण खनिःश्वसितरूपेण मकटीकृतपरमकाष्ठापनब्रह्मणैवेति नावकाशस्तदंशांशरूपाणां माया- वाघाचार्याणां परमकाष्ठापन्नब्रह्मनिःश्वसिताभिमायवर्णने । किञ्च, श्रीभागवतीयैकादशस्कन्धे 'किं विधत्ते कि माचष्टे किमन्य विकल्पयेत् । इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो मवेद कश्चन'त्यनेन स्वेतरेषां स्वनिःश्वसितरूपश्रुत्यभिप्रायानानं स्वस्यैव च तदभिमायज्ञानमुक्तं परमकाष्ठापन्न- ब्रह्मणा श्रीकृष्णेन । युक्तं चैतन् , स्वाभिमायः स्वेनैव युध्यत इति । एवञ्च, भगवदभिमा- याज्ञानादपिनावकाशोशांशरूपार्णा मायावाघाचार्याणां परमकाष्ठापनब्रह्मनि:श्वसिताभिमायव- र्णने , किश्चित् तेनाशवतां खद्योतपोतानां निजकिरणघोरणीविभूतविश्वध्वान्तस्य भास्वतोभि- भायवर्णन इव । ननु श्रीकृष्णस्वरूपस्य कयं परमकाष्ठापनब्रह्मत्वमिति चेत् ? शृश । वेदविभागे , मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता ! पुराणेतिहासधर्मब्रह्ममीमांसायाविर्भावनेनाप्यजातचित्तप्रसादानां श्रीमयासचरणानां नारदो- पदिष्टभक्तियोगकृतसामाध्यनुभूतश्रीकृष्णस्वरूपदर्शनेनैव चित्तप्रसादो जात इति स एव परमकाष्ठापनः । न तु नारायणादिः शिवादिति जानीहि । यत्पुनर्महाभाष्यकारकृतसूत्रप्रत्याख्यानमकारेण स्वयं सूत्राणि प्रत्याख्याय मायावा- दित्तिकारभाष्यकारोक्तविकारार्थकमयटा साधनं कृतं विज्ञानमयानन्दमयशब्दयोरपि माया- वाघनुसारिवैयाकरणंमन्यैः, तदपि महाभाष्यकारकृतसूत्रप्रत्याख्यानाभिमायाज्ञानविजृम्भित- मेव, यतो महाभाष्यकारा हि शेपावताराः, ते शेपास्तु सर्वदा दास्यभावेन भगवन्तं भजन्ते शय्यादिरूपेण । एवञ्च ते कथं स्वमभुभगवन्निश्वसितरूपाणि व्याकरणसूत्राणि प्रभुसम्मितश- ब्दत्वात् मत्याचक्षीरन् । न हि दासेन स्वमभुवचनं प्रत्याख्यातुं शक्यम् । दासधर्माभावात् । एवञ्च सति वृत्तिकारोक्तानां 'यणः प्रतिपेयो वाच्यः' इत्यादीनां वार्तिकानां 'झलो झली' त्यादेझल्ग्रहणाद्यपकृष्य यत् प्रत्याख्यानमत्याग्रहेण कृतं महाभाष्यकारैस्तन्न स्वमभ्वपेक्षयापि स्वस्मिन्नधिकज्ञानाविष्कारकृतौ वार्तिककारस्योपरि प्रद्वेपेणैवेति वयं ब्रूमः । एवं सर्वज्ञत्वात् स्व- प्रभुनिश्वासत्वेन व्याकरणसूत्रज्ञानवद्भिरपि महाभाष्यकारैर्यत्सूत्रमत्याख्यानप्रकारमर्दशनं कृतं, तदासुराणां भगवदभिप्रेतव्यामोहोत्पादनेन भगवनिश्वसितरूपव्याकरणसूत्रप्रत्याख्यानजनि- तपापोत्पत्तिद्वारा निरयपातनाभिमायेणैव । वेदविरुद्धपातञ्जलशास्त्रकरणवत् । न चमात्रालाय- वेन वैयाकरणाः पुत्रोत्सवं मन्यन्त इति व्याकरणसिद्धान्तान्महाभाष्यकारोक्तमकारकसूत्रमत्या- ख्यानमदर्शितलाघवानङ्गीकारे वैयाकरणसिद्धान्तभङ्गप्रसङ्ग इति वाच्यम् । मात्रालाघवेनेत्यादि- सिद्धान्तस्य व्याकरणसूत्रेषु कुत्रापि कण्ठरवेण प्रतिपादितत्वाभावात् । अयं हि लोकव्यवहार पाण्डित्यप्रकाशक इति लोक एव मन्तव्यः, न त्वलौकिकवाक्येष्वपि । अत एव प्रामाणिक गौरवं न दोपावहमिति प्रेक्षावतां प्रवादः। अन्यथा 'अथ शब्दानुशासन'मिति महाभाष्यकारक- तसन्दर्भस्थवर्णगौरवं प्रत्याख्याय 'अथ शब्दशास्त्र'मितिवर्णलाघवमूलक सन्दर्भविरचनं वैया- करणानां प्रसज्जेत । तस्मादयं सिद्धान्तो लौकिकवाक्यविषयक एव, न त्वलौकिकसावे. दादिवाक्येपीति न किञ्चिदेवत् । न च तर्हि व्याकरणे पाणिनीये पाणिनिकर्तृत्वप्रसिद्धच्या- यात इति वाच्यम् । 'तपश्चचार प्रथमममराणां पितामहः । आविर्भूतास्ततो वेदाः साङ्गो- पाङ्गपदक्रमा' इति मात्स्यवचनेन ब्रह्मणो मुखादेव साझोपावेदाविर्भावोक्तेः पाणिनेः स्म- स्वस्यैवाभ्युपगन्तुं योग्यत्वात् । एवं च सति सूत्रानुक्तानां वार्तिककारेण पूरणात सूत्रकारापे- क्षया वार्तिककारस्य बहुज्ञत्वातू सूत्रकारापेक्षयाधिकं प्रामाण्यम् । एवमेव वार्तिकानि प्रत्याख्याय सूत्रेष्वेव चार्तिककारोक्तमदर्शनान्महाभाष्यकारस्य वार्तिककारापेक्षया बहुज्ञत्वाद्वार्तिकका- रापेक्षया महाभाष्यकारस्य मामाण्यमिति प्रत्यक्षत एव परिदृश्यमानत्वायथोचरं मुनीनां मामाण्यं यत्सिद्धान्तितं वैयाकरणैस्तदपि परास्तम् । यतः 'अस्य महतो भूतस्येति श्रुतौ विद्या- पदोक्तपडङ्गविधाम व्याकरणस्यापि सहाद्भगवत एव व्याकरणसूत्रकारत्वातंदपेक्षया वार्ति- . तैत्तिरीयोपनिषद् । ककारमहाभाष्यकारयोर्वहुमत्वहेतुना सूत्रकारभगवदपेक्षया प्रामाण्यं वक्तुमशक्यमेव । न हि भगवान् कस्याप्यपेक्षयाल्पज्ञ इति श्रुतिपुराणेषु श्रुतमस्ति । अपरञ्च, चार्तिककारेण सूत्रका- रानुक्तकथनं यत्तत् किं वेदलोकयोस्तादृशप्रयोगादर्शनेन, आहोस्वित् तत्र प्रयोगदर्शनेन वा । नाद्यः । वेदलोकयोः प्रयोगादर्शनेन सूत्रानुक्तकथने तत्कथनस्य निष्प्रयोजनकत्वापत्तेः । नान्त्यः । वेदलोकयोः प्रयोगदर्शनेन सूत्रानुक्तकथने तु सूत्रेषु कथनाभावेपि भगवता तादृश- प्रयोगस्य वेदे कृतत्वेन तादृशमयोगस्य भगवभिप्रायगोचरत्वेन तदभिप्रायस्यैच चार्तिककारे- णोक्तत्वाद्वार्तिककारस्य बहुज्ञत्वाभावेन स्वतन्त्रप्रामाण्याभावात् । एवमेव महाभाष्यकारोक्त- प्रकारेपि पूर्वोक्तविकल्पद्वये कृते महाभाष्यकारस्यापि बहुज्ञत्वाभाव इति सूत्रकर्तृभगवदपेक्षया स्वतन्त्रप्रामाण्याभाव इति बुध्यध्वम् । एवं च सति महाभाष्यकारैर्व्याकरणसूत्रमत्याख्यानम- कारमदर्शनं यत्तत्यासुराणां व्यामोहोत्पादनेन निरयपातनाभिप्रायकंमेव, न तु सर्वथा सूत्र- प्रत्याख्यानाभिप्रायकमिति सिद्धम् । तथा च सूत्रप्रत्याख्यानप्रकारेण प्रयोगसाधनमसाधन- मेवेति नादरणीयमास्तिकैः प्रेक्षावद्भिः । अत्रेदं ज्ञेयम् । यत्र प्रयोगसाधकसूत्रे 'छन्दसी'त्युक्तं, स प्रयोगस्तु वेद एव साधुः, न लोके । यत्र तु भाषायामित्युक्तं, स प्रयोगस्तु लोक एव साधुः, न वेदे । यत्र तूभयमपि नोक्तं, स प्रयोगस्तु वेदे लोके च साधुः । यस्तु प्रयोगः सूत्रानुक्तोपि वेदे लोके च दृष्टः, स प्रयोगः स्वतन्त्रेच्छया भगवता वेदे प्रयुक्तो, निषेधकाभावात् स प्रयोगो लोकेपि प्रयुक्तः साधुरेव, भगवता प्रयुक्तत्वादिति दिक् । यदपि यद्वा प्राचुर्ये मयट्यपीत्यारभ्य विकार इति त्वार्थिकार्थकथनमेवेत्यन्तेनोक्तं पक्ष- प्रयम्, तदपि 'विकारशब्दादिति चेन्न प्राचुर्यादिति सूत्रेण विकारार्थस्य पूर्वपक्षीकरणेना- प्राचुर्यार्थत्वस्य स्थापनेन भगवतैन निरस्तमिति नास्माकं प्रयासकरणमिति सर्व चतुरस्रम् । ननु शाकमयः पाक इत्यत्र शाकमाचुर्येप्यन्यस्यापि द्विदलादेस्तदपेक्षया न्यूनसत्त्वं पति- यते, पाके न केवलशाकसत्त्वमेव, तथात्रापि माचुर्ये मयव्यङ्गीक्रियमाणे सर्वत्रानल्पसत्त्वमप्या- याति, तत्र तदन्यत्किमित्यत्रोत्तराभावः, अथ चानन्दे दुःखरूपान्यसत्त्वेङ्गीक्रियमाणे आनन्दस्य परब्रह्मताहानिः, एवं च फलत्वाभावोपीति चेत् ? सत्यम् । आकाशादिरूपान्यसम्भेदस्य विरा- देहरूपे अन्नमये व्यानमारभ्याकाशपृथिव्यन्तपदार्थसम्भेदस्य प्राणमये, अथच यजुरारभ्या- थर्वाझिरसान्तपदार्थसम्भेदस्य च मनोमये, अथ च श्रद्धामारभ्य महरन्तपदार्थसम्भेदस्य स्टूिपे विज्ञानमयशब्दोक्तेविरादात्मनि निरुपधिकारुण्यवचनानन्दमयेत्यलौकिकदुःखसम्भेदस्य, अथ घ प्रियमारभ्य ब्रह्मान्तसम्भेदस्य च सत्त्वेनेष्टापत्तेरिति न त्वदुक्त्यवकाशः । न च दुःख- सम्भेदे भगवत्सङ्गीक्रियमाणे विकारित्वमसङ्ग इति वाच्यम् । 'यः सर्वज्ञः सर्वशक्ति रिति श्रुतेः ब्रह्मणः सर्वशक्तिमत्त्वाविरुद्धसर्वधर्माणां तत्र विद्यमानत्वात् 'स्वाभाविकी ज्ञानवलक्रिया चेति श्रुतेः स्वाभाविकानामेव सर्वधर्माणां भगवति सच्चाधिकारसम्बन्धाभावादिति दिक् ।

मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता। १७ नन्वन्नरसमयस्य शिरआदिकं किं स्वरूपमित्याकांक्षायामाह तस्येमेव शिर इत्यादिना । तस्यानरसमयस्य इदमेव परिदृश्यमानमन्नरसमयमेव शिरः । अयं पूर्वोक्तपरि- दृश्यमानानरसमय एव दक्षिणः पक्षा, दक्षिणो बाहुः । अयं पूर्वोक्तपरिदृश्यमानान्नरसमय एव उत्तरः पक्षः, वामो वाहुः । अयं.पूर्वोक्तपरिदृश्यमानान्नरसमय एव आत्मा देहमध्यभागः । 'मध्य ोपामगानामात्मेति श्रुतेः । इदं परिदृश्यमानान्नरसमयमेव पुच्छं पश्चाद्भागः पृष्ट- कटिनितम्वाः । 'पुच्छः पश्चात्मदेशे स्याल्लाङ्कलेपि च कथ्यत' इति विश्वोक्तेः। अथ च प्रतिष्ठा आधारधारादिरूप इत्यर्थः । अयं प्रकारो व्याख्यानेऽस्मदादिवत्पुरुपरूपेण तत्त्वेषु ब्रह्माण्डे च प्रवेशपले, पक्षिरूपेण प्रवेशपक्षे तु 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखायौ समानं परिपस्वजाते। 'पुरश्चके द्विपदः पुरश्चक्रे चतुप्पदः पुरः पक्षी भूत्वा पुरः पुरुप आविश' दिति श्रुतिभ्यां कदाचिच्छरीराणि सृष्ट्वा, तत्र पक्षिरूपेणैव परमात्मा प्रविष्ट इति विराड्देहस्थानां पञ्चाना- मप्यानन्दमयान्तानां पक्षिदेहरूपत्वमेव, अत एव शिरःपक्षमध्यभागपुच्छपतिष्ठामात्रावयचा. नामेवोक्तिः। अन्यथा 'द्वादशाङ्गो वै पुरुप ' इति श्रुतेदशाङ्गान्युक्तानि स्युः । तस्मादनया श्रुत्या पक्षिरूपप्रविष्टपरमात्मस्वरूपानुसारेणैवान्ये कोपा उच्यन्ते । अत एव पुच्छशब्दस्य पुच्छपरत्वेन व्याख्यानेपि न क्षतिः । अनायं निष्कर्षः । तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूत' इत्पत्रात्मशब्देनोक्त आनन्दमयोऽनन्तरूपोऽनन्तस्वभावत्वात् सर्वत्र स्थित एव, यदा 'तत्सृष्ट्वा तदेव माविशदिति श्रुत्युक्तानुमवेशरूपायां लीलायां ब्रह्माण्डशरीरे श्रुत्युक्तास्मदादि- पक्षिरूपान्यतररूपानन्दमयरूपेण प्रविविक्षति, तदा तादृशमेवान्नरसमयादि विज्ञानमयान्तं सृजति, तथैव लीलायाश्च कीर्तितत्वात् । एवं च कदाचित् ब्रह्माण्डशरीरं पक्षिरूपं कदाचिद- स्मदादिवत् पुरुपरूपमिति सिद्धम् । अस्मदादिद्विपदचतुष्पदादिशरीरेषु स्वतन्त्रेच्छतया द्विपदचतुप्पदरूपाणि पूर्व सृष्ट्वा तेवभिलपितान्नमयाः पञ्चरूपेण प्रविशन्तीति बोध्यम् । अन्यथास्मदादिषु द्विपदचतुष्पदशरीराणामेवोपरि दृश्यमानत्वाच्छुत्युक्तपक्षिरूपत्व राधः प्रसज्जेत । अत एव पक्षिरूपेणास्मदादिशरीरमविविक्षायां पुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतु- प्पदः पुरः पक्षी भूत्वा पुरः पुरुप आविश 'दिति श्रुतिः पूर्वद्विपदचतुष्पदशरीरसष्टिं पश्चा- द्भगवतः पतिरूपेण तन प्रवेशमाह ! एवं चानन्दमयस्यैवाकारसमर्पकत्वेन ह्येत आकारा अन्यस्मादाविर्भूता इति दिक् । वस्तुतस्त्वानन्दरूपस्याधिदैविकत्वेन सर्वाकारवत्वात् पुरुप- रूपेप्वस्मदादिसशपुरुपरूपेणैव प्रवेशः, पक्ष्यादिशरीरेण पक्ष्यादिरूपेणैव प्रवेशः, सर्वरूप- विशिष्टत्वेनैव हेतुना च प्रत्येकं तत्त्वसदशरूपेण ब्रह्माण्डसशरूपेण च प्रवेशस्तत्त्वेए ब्रह्माण्डे च । अत एव ' तत्सृष्ट्वा तदेवानुमाविश 'दिति श्रुतौ शृगग्राहिकया पुरुपपक्ष्या- दिरूपनिर्देशेन नान्त:प्रवेश उक्ता, किन्तु सामान्यत एव । एवं च श्रुतो पतिरूपकयनं उप- लक्षणविधयेति ज्ञेयम् । ननु आनन्दमय एकस्यैव ब्राह्मणोऽचिन्त्यशक्तित्वान यम्मिन् समये पुन्छवं तस्मिन्नेव , ३ १८ तैत्तिरीयोपनिपद् । समये प्रतिष्ठात्वमपि । एवमेव विज्ञानमये एकस्यैव महत्तचस्यापि देवत्वाद्यस्मिन् समये पुच्छत्वं तस्मिन्नेव समये प्रतिष्ठात्वमपि, यस्मान्महत्तत्त्वादेर्दैवत्वम् , अत एव तृतीयस्कन्धे 'नमाम ते देव पदारविन्द 'मित्यादिका महत्तत्त्वादिककृता भगवत्स्तुतिः श्रूयते । एवमेव मनोमयेऽथर्वणाङ्गिरसां च दृष्टानां मन्त्राणां वहूनामेव प्रतिष्ठात्वोक्तेर्यस्मिन्नेव समये केपा- श्चिन्मन्त्राणां पुच्छत्वं तस्मिन्नेव समये केपाश्चिन्मन्त्राणां पुच्छत्वं प्रतिष्ठात्वमपि । एवमेव माणमये महत्तत्ववत् पृथिव्या अपि देवतावाद्यस्मिन्नेव समये पुच्छत्वं तस्मिन्नेव समये प्रतिष्ठात्वमपि । अन्नरसमये तु अन्नरसमयस्य चरणादेरधोमुखप्रमृतपादशयने पुच्छत्वेपि न तस्मिन्नेव समये प्रतिष्ठात्वम् । उत्थितदशायां प्रतिष्ठात्वेपि न पुच्छत्वमिति चेत् ? न । शयनोत्थितदशयोरपि चरणद्वये पुच्छत्वप्रतिष्ठात्वयोरविरोधात् । न चैकस्यैव पुच्छत्वं प्रतिष्ठात्वं चैकस्मिन् समये कापि न दृष्टमिति वाच्यम् । जिघांसूत्सिप्तदण्डदर्शने क्रुद्धस्येति स्थितस्य चतुरङ्गलपुच्छमात्रे भूमिष्ठस्य सर्पस्य पुच्छे पुच्छत्वप्रतिष्ठात्वयोईटत्वात् , तथैव प्रकृतेपि दीयतां दृष्टिरिति न किञ्चिदेतत् । यद्वा, पश्चाद्भागस्थितावयवस्य नितम्बस्य चरणद्वयस्पाप्यन्नरसमयत्वानितम्बस्य पुच्छत्वे चरणद्वयस्य प्रतिष्ठात्वेप्यनरसमयस्य श्रुत्युक्त- पुच्छत्वप्रतिष्ठात्वयोरव्याघातात् । यद्वा, विराइदेहस्थत्रयोविंशतितत्त्वानां यथा देवतात्वं, तथा तत्रत्यानरसमयस्य अन्नरसमयस्यापि देवतात्वात् पुच्छत्वप्रतिष्ठात्वे सम्भवत एव । वस्तुतस्तु 'नेपा सर्केण मतिरापनेयेति कठवल्लीश्रुतेः 'पुराणं मानवो धर्मः साङ्गो वेदश्चि- कित्सितम् । आज्ञासिद्धानि चत्वारि न हन्तव्यानि युक्तिभिरिति गौतमस्मृतेः 'तर्काप्रतिष्ठा- नादिति व्याससूत्राच वेदादीनामाज्ञारूपत्वेन सिद्धत्वाद्यथा वेदो वदति तथैवास्तिकैर्मन्त- व्यमिति न वेदे शङ्कासमाधानावतार इति निष्कर्षः । अत एवालङ्कारशास्त्रे वेदस्य प्रभु- सम्मितशब्दत्वं, पुराणस्य मित्रसम्मितशब्दत्वं, काव्यादेः कान्तासम्मितशब्दत्वमुच्यत इति दिक् । एतेनेदं नाभेरधस्तायद तत्पुच्छं मतितिष्ठत्यनयेति प्रतिष्ठा पुच्छमिव पुच्छं मध्ये लम्बमानसामान्यायथा गोपुच्छमिति लक्षणाच्याश्रयणेन कटिनितम्बोरुजानुजवाचरणानां यत् पुच्छत्वमुक्तं मायावाद्याचार्यकृतभाप्ये तत् प्रत्याख्यातं वेदितव्यम् । मुख्यत्तिरूपया शक्त्या व्याख्यानोपपत्तौ जघन्यत्तिरूपया लक्षणया व्याख्यानस्यायुक्तत्वात् । अथ पूर्वोक्ततर्थमेव निःसन्दिग्धत्वाय श्रुतिः श्लोकेनाप्याह 'तदप्येष श्लोको भवतीति । यद्यपि पूर्वमपि निःसन्दिग्ध एवार्थः प्रतिपादितोस्ति तदपि तथापि एप वक्ष्यमाणः पूर्वोक्तार्थस्य विराडेहरूपानरसमयस्य मतिपादकः श्लोकोपि भवति वर्तते इत्यर्थः । तमेव श्लोकमाह अन्नाद्ध प्रजा इत्यारभ्य अधैतदपियन्त्यन्तत इत्यन्तेन । अन्नं विद्यते यस्मिस्तदन्नमित्यर्प आद्यं चासिद्धं रूपम्, अन्यया व्याख्याने लाक्षणिकत्वमन्नशब्दस्य प्रसन्नेत । न चानात् पुरुष इत्यत्रोक्तानशब्दस्यैव ग्रहणमिति वान्यम् । तदा ' तदप्येप श्लोको भवतीत्यनेनोच्यमानं पूर्वोक्तानरसमयमकाशनं विरुध्येत, मठपतिश्रीजयगोपालभातभाप्यसमेता । १९ तस्मादनशब्देनानरसमय एवोच्यते । एवं चायमर्थः । अन्नात् पूर्वोक्तानरसमयान मजाः मकण जायन्त इति मना जन्मभाडयन्नरसमयानि देवतिर्यामनुष्यादिशरीराणि प्रजायन्ते जन्मभाञ्जि भवन्ति। ताः का मजा भवन्तीत्याकांक्षायामाह याः काश्च पृथिवीं श्रिता इति । या काश्चेति समानाशब्दोपादानादावल तृणस्तम्यपर्यन्तं याः पृथिवीं श्रिता आश्रितास्ता भवन्ति इत्यर्थः । अत्र मनुष्याणां पृथिव्याश्रितत्वं स्पष्टमेव । स्वर्गादिलोकानामपि सुमेरो- रुपरि स्थितत्वाद्देवादीनामपि पृथिव्याश्रितत्वमेव । एवमेवातलादिलोकानामपि भूविवरत्वात् तत्रत्यानां दैत्यदानवनागादीनां पृथिव्याश्रितत्वमेवेति पृथिवीं श्रिता इत्येवोक्तम् । एवं विराटनरसमंयात् सर्वेपामनरसमयानामुत्पत्तिमुक्त्वा तेपां स्थितिमपि तस्मादन्नरसमया- देवाह अथो अनेनेच जीवन्तीति । अथो उत्पत्यनन्तरं, अन्नेन तादृशानरसमयेनैव, जीवन्ति प्राणधारणं कुर्वन्ति । माणघारणे सत्येव स्थितेः सम्भवात् । एवं पूर्वोक्तानरसमयादेव सर्वेपा स्थितिमुक्त्वा ताहगन्नरसमय एच लयमाद्द अथैतदपियन्त्यन्तत इति । अथ स्थित्यनन्तरं अन्ततः ल्यकोपे पञ्चमी, अन्तं नाशं प्राप्य, अपियन्ति पूर्वोक्तानरसमय एव लयं प्राप्नुवन्तीत्यर्थः । एवं सर्वानरसमयान् प्रति पूर्वोक्तानरसमयस्य कारणत्वे सिद्धे सर्वेभ्यः पूर्वोत्पन्नत्वात् विराइदेह एवागतः पुरुषशब्देनेति पूर्वोक्तार्थेनेति पूर्वोक्तार्थे नि:- सन्दिग्धत्वं सिद्धमिति हृदयम् । अथ पूर्वोक्तानरसमयोपासनोपदेशेन पारलौकिकफलमाप्तिं वदन्ती श्रुतिः पूर्वोक्त- पुरुपस्य विरारूपत्वमेतेनापि प्रकारेण साधपति अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठमित्यादिना । अन्नं पूर्वोक्तान्नरसमयः, भूतानां उत्पन्नानामुत्पत्स्यमानानां च ज्येष्ठं, पूर्वोत्पन्नत्वात्। तस्मात् स्त्रज्येष्ठस्य पित्रादेः सर्वैरेवोपासना क्रियत इति, ज्येष्ठत्वरूपकारणात् । सर्वोपधं स्वोपासनया चित्तशुद्धिद्वारा संसाररूपरोगनिवर्तकं पारलौकिकमोक्षरूपफलदानसमर्थ चोच्यते । तदेवाह सर्व वै तेन्नमाप्नुवन्तीत्यादिना । ये अन्नं ब्रह्म अन्नरसमयं विराड्- देहरूपं ब्रह्म उपासते ध्यायन्ति, ते अन्नमेत 'पन्नमयमात्मानमुपसङ्क्रामतीति वक्ष्यमाणत्वात् क्रममुक्तावन्नरसमयं प्राप्नुवन्तीत्यर्थः । तथा च, सर्वज्येष्ठत्वं संसारनिवर्तकत्वं च पूर्वोक्तान- रसमयस्येति विरादेइत्वमेवोक्तम् । एतदुपासनाया द्वितीयस्कन्धीयद्वितीयाध्याये संसार- निवर्तकत्वस्योक्तत्वात् । अस्मदायनरसमयस्य तु ब्रह्मत्वेनोपासने संसाररोगनिवर्तकत्वेपि सर्वज्येष्ठत्वाभावानात्र ग्रहणमिति भावः । एतेनाग्रेतना अपि प्राणमयादयो विराज एवा- न्तस्था उक्ता अस्मदायन्नरसमयान्तःस्थमाणमयादिपुरुपकारणभूताः । अत एवाग्रे 'अद्य- तेऽत्ति च भूतानि तस्मादन्नं तदुच्यत' इत्यनेनादनकर्तृत्वमुच्यते चेतनधर्मः। न हि अस्मदायन्नरसमयश्चेतनः, अदनकर्मत्वं तु तस्य पुरुषोत्तमापेक्षया । एवञ्च 'सर्वे वेदा यत्पद- - मामनन्ति 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्या' मां विधत्तेभिधत्ते मां विकल्प्यापोह्यते वह 'मिति " तैत्तिरीयोपनिषद् । वेदगीताश्रीभागवतवचनसिद्धो वेदशब्दवाच्यो लौकिकपदार्थमूलीभूतो हलौकिक एव पदार्थ इति सिद्धान्तोपि नापैतीति दिक् । अथ अन्न हि भूतानां ज्येष्टमित्यारभ्य जातान्यन्नेन वर्धन्त इत्यन्तेन पूर्वो- तार्थ स्मारयन् उपसंहरति अन्न हीत्यारभ्य जातान्यनेन वर्धन्ते इत्यादिना । अर्थ: स्पष्ट एव । नन्वन्नशब्दस्य का व्युत्पत्तिरित्याकांक्षायां व्युत्पत्तिमाह अद्यतेत्ति च भूतानीति । अत्राप्यर्थः स्पष्ट एव । उच्यत इत्यत्रेति शब्दोऽनरसमयपुरुषनिरूपणपरिसमाप्त्यर्थः । अथान्नरसमयादिभ्यः क्रमेणोपासितेभ्यः सर्वान्तरमानन्दरूपत्वात् फलरूपं तत्का- रणस्यान्यस्यानुक्तत्वात्तदेव च मर्वकारणं सर्वमूलीभूतं, तत्माप्त्यैव च पूर्णफलपातिः, तदर्थ- मेव च यत्नः कर्तव्य इति वक्तमग्रिमग्रन्थं प्रस्तौति । तस्मादा एतस्मादन्नरसमयादन्यो- न्तर आत्मा प्राणमय इत्यादिना । तस्मादा एतस्मादन्नरसमयादन्योन्तर आत्मा प्राणमयः । तेनैप पूर्ण: । स था एप पुरुपविधं एव । तस्य पुरूंपविधतां अन्वये पुरुषविधः । तस्य प्राणं एव शिरः । व्यानी दक्षिणः पक्षः । अपान उत्तरः पक्षः । आकाश आत्मा। पृथिवी पुच्छे प्रतिष्टा । तदप्येप श्लोको भवति । प्राणं देवा अनु प्राणन्ति । मनुष्याः पशवश्च ये । प्राणो हि भूतानामायुः । तस्मात् सर्वायुपमुच्यते । सर्वमेव त आयुर्यन्ति । ये प्राणं ब्रह्मोपासते । प्राणो हि भूतानामायुः । तस्मात् सर्वा- युपमुच्यत इति । तस्यैप एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्येति । तस्माद्विराड्दे हत्येन प्रसिद्धादेतस्मान् मत्मत्यक्षादात्मनः आत्मशब्दवाच्याद्विराड- नरसमयात् वै निश्चयेनान्योन्तरस्तन्मध्यस्थः आत्मा आत्मशब्दवाच्यः प्राणमयः प्राण- प्रचुरः, प्राणस्य सर्वापानादिमूलीभूतत्वेन सर्वत्रानुस्यूतत्वात् पुरुषः । अस्तीति शेपः । यदा, तस्मात् पूर्वोक्तात् एतस्मादिदानी कथनार्थ बुद्धिस्थादिति चा व्याख्येयम् । अन्यत् पूर्ववत् । अथान्नमयाकाराविर्भावकत्वं प्राणमयत्वेनाविर्भूतस्यानन्दमयस्य वक्तपन्नमय प्राणमयस्य स्थितिमाद तेनैप पूर्ण इति । अत्र पूर्वोक्तानरसमयपुरुषनिरूपणे 'स वा एप पुरुषोन्नरसमय ' इत्यारभ्य 'इदं पुच्छं प्रतिष्ठा' इत्यन्तेन निरूप्यमाणान्नरसमयरूपा- व्यवहितप्रधानं तच्छब्दसमानविभक्तिकैतच्छब्दकवलतच्छब्देदंशब्दैः परामृष्टं शेयम् । सर्वनाम्नामुत्सर्गतः प्रधानपरामर्शकत्वात् । तथैव वक्ष्यमाणप्राणमयमारभ्यानन्दमयान्तेनापि निरूप्यमाणप्राणमयादिरूपाव्यवहितप्रधानमेव तच्छन्दसमानविभक्तिकैतच्छन्दैः केवल- तच्छन्दय परामृश्यते । उपक्रमसिद्धप्रकारेणैवोपसंहारपर्यन्तमेकरूपत्वेनैव सर्वत्र यथा ध्यारुपाया उचितत्वात् । न च 'तेनैप पूर्ण' इत्यादिवहितनिम्प्यमाणपरामर्शकत्वं तच्छ- मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता । ब्दस्य 'तस्य पुरुपविधता'मित्यादिषु व्यवहितनिरूपितपरामर्शकत्वं मायावादिभाष्यकारो- क्तमेव कुतो नाङ्गीकृतमिति वक्तं युक्तम् । उपक्रमोक्तमकारस्यात्यागात् । वाधकानुपलब्धेश्च । अत्रत्यकेवलैतन्छन्देदंशब्दानां तु निरूपितपरामर्शकत्वमेव, अर्थसङ्गतेस्तथैव जायमान- वादिति शेयम् । तथा चायमर्थः । तेन प्राणमयेन एपोन्नमयः पूर्णः सर्वावयवेषु व्यासः । यदा, पूर्णः साझोपाझो जातः, केनाप्यनेन न न्यून इत्यर्थः । ननु माणमयस्य वायुरूपत्वात् निराकारतैव भविष्यतीत्याशंक्याह स वा एप पुरुपविध एवेति । सः इदानीमेवोक्त एपः यस्य निःश्वसितत्वं वेदस्य सः । अथवोपनिपद्धा वदति, मत्मत्यक्षः माणमयः, वै निश्चयेन पुरुपविधः पुरुपस्य पूर्वोक्तान्नरसमयपुरुपस्येव विधा प्रकारो यस्य ईदृश एव, न तु भिन्नप्रकारः । अङ्गोपाङ्गसहित इत्यभिप्रायः । न चेदं कथं सम्भवतीति वक्तुं शक्यम् । वायुलोके वायुसेवकानां वायवीयशरीरस्य पुराणेषूपलभ्यमानत्वात् । ननु पुरुष- वियता अन्नरसमयात् प्राणमये समागता, माणमयादन्नरसमये वा समागतेत्याकांक्षायामाह तस्य पुरुपविधतामन्वयं पुरुपविध इति । तस्य प्राणमयस्य पुरुपविधतां पुरुषप्रकारतां साकारतामिति यावत् । तामनु पश्चादयमन्नरसमयः पुरुषविधः । तथा च श्रुतिमामाण्यात् प्राणमयो बन्नरसमयस्याकाराविर्भावकः न वन्नरसमयः माणमयाकाराविर्भावक इति भावः । वस्तुतस्तु, आनन्दमय एव सर्वाकाराविर्भावक इति सिद्धान्तोनुपदमेव वक्ष्यते । नन्वन्नरसमय एव प्राणमयस्याकाराविर्भावकोस्त्विति चेत् ? अत्र वदन्त्यस्मदाचार्याः । सर्वान्ते प्रतिपादि- तस्यानन्दमयस्याग्र उच्यमान मिदं सर्वमसृजते'त्यादिना सर्वसर्गकर्तृत्वम् । तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविश'दित्यादिना सर्वान्तर्यामित्वम् । 'को ह्येवान्यात् का प्राण्यात् यदेप आकाश आनन्दो न स्या'दित्यादिना सर्वप्राणनाय परपर्यायस्थितिजनकत्वम् । भीपास्माद्वातः पवत' इत्यादिना सर्वभयजनकत्वेन मलयकर्तृत्वम् । 'आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते, आनन्देन जातानि जीवन्ति आनन्दमेव प्रत्यभिसंविशन्ती' त्यादिना केवल- स्यैवानन्दस्य पुनरपि जगजन्मस्थितिलयस्थानत्वं च प्रतिपाद्यते । तथा चान्नरसमयादी- नामपि सर्वमध्यपातित्वात् तं प्रत्यपि कारणत्वादानन्दमयस्पैव सर्वाकाराविर्भावकत्वम् , न त्वन्नरसमयस्य । अत एव तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुपविध इत्यत्रान्नरसमयादीनामनुपद- मेव तत्पश्चाद्भावित्वमात्रमुक्तं, न त्वन्नरसमयादीन् मति प्राणमयादीनां कारणत्वमुक्तम् । श्रुतौ पद्यन्नरसमयादीनां प्राणमयादिषु प्राणमयादीनां चान्नरसमयादिष्वाकाराविर्भावकत्वेन कारण- वं स्याचदा तस्मात् पुरुषविधादयं पुरुपविध इत्येवोक्तं स्यात्, न तु तस्य पुरुषविध- वामन्वयं पुरुषविध इति ज्ञेयम् । न च भृगुवल्यामन्नमाणमनोविज्ञानानामपि सर्वनगजन्म- स्थितिलयस्थान तपसा शिष्येण ज्ञातमिति वाच्यम् । तत्रानादीनां सर्वजगज्जन्मस्थिति- लयस्थानत्वे ज्ञातेपि न तावता तस्याकांक्षा निवृत्ता, किन्तु आनन्दस्यैव जगज्जन्मस्थिति- लयस्थानत्वे ज्ञाते आकांक्षानिवृत्तेत्यानन्दपय एव मुख्यतया जगन्नन्मादिकारणम् , अन्यत्र २२ तैत्तिरीयोपनिषद् । तु तद्गतमेव कारणत्वं तस्यैव सर्वोपादानत्वादिति निश्चयस्य सिद्धत्वात् । अन्यथाग्रेप्या- कांक्षा स्यात् । न च तदेतदने 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेत्युच्यमानमक्षरब्रह्मैव मुख्यमिति वाच्यम् । अक्षरब्रह्मणः पुच्छत्वप्रतिपादनेनावयवत्वादमुख्यत्वस्यैव ज्ञापितत्वात् । न हि पुच्छे कचि- स्पक्ष्यादिषु प्रधानम् , किन्तु पक्ष्यादिरेव । तथात्राप्यानन्दमय एवं प्रधानम् , अक्षरब्रह' त्वप्रधानमेवेति जानीहि । अत एव गीतायामपि 'अव्यक्तोक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परम गतिम् , यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं ममे'त्यनेन योक्षरपदार्थः स सर्वस्यापि गतिः प्राप्यः, यत्माप्य सर्वे संसारे पुनर्न निवर्तन्ते, तादृशमपि तत् अक्षरब्रह्म धाम, 'देहे l रश्मा 'विति कोशाद् देहगेहकिरणरूपमिति कथनादमधानत्वमेव स्पष्टीकृतं भगवता ।। ह्यात्मा गृहस्यो रव्यादिश्वाप्रधानभूता, किन्तु देहगेहकिरणा एवामधानभूताः । एव सिद्धमानन्दमयस्यैव सर्वाकाराविर्भावकत्वम्, न त्वन्नरसमयस्य । एतेन मूपानिपिक्ताद्रुत ताम्रप्रतिमायां यथा मूपाया आकारसमर्पकत्वम् , तथान्नरसमयस्य तस्य पुरुपविधतामन्वर पुरुपविध इत्यनेनोक्तसाकारसमर्पकत्वमिति शङ्करभाप्योक्तं निरस्तं वेदितव्यम् । तेनै पूर्ण' इत्यादिषु निरूप्यमाणपदार्थपरामर्शकत्वेन सिद्धस्य प्रक्रमागतस्य तच्छन्दस्य पुरुष विधतामित्यत्रैव पूर्वनिरूपितपरामर्शकत्वे प्रक्रमत्यागार्धजरतीययोः प्रसक्ता उपक्रमो पसंहारयोरेकरूपताया अनिर्वाहात् अव्यवहितप्रधानपरामर्शकत्वस्य त्यागाच । किञ्च अन्नरसमयस्याकारसमर्पकत्वेन्नरसमये त्वाकारः केन समर्पित इति पृच्छामः । तत्रानरसेन समर्पित इत्युच्यते चेत् ? अन्नरसरूपस्य रेतआदेः स्वमादिस्खलितस्य स्वाकारविजातीया कारसमर्पकत्वस्यादृष्टत्वात् । न च योनिरजआदिसम्बन्धविशेपे सति स्वाकारविजातीया कारसमर्पकत्वं रेतआदेरिति वाच्यम् । सर्वेषु युगेषु विशेषतः कलौ च योनिरेतो रजआदि सम्बन्धेपि पुनाद्यनुत्पादनेनान्नरसरूपस्य रेतसः स्वाकारविजातीयाकारसमर्पकत्वस नियमेनादृष्टत्वात् । न च दुरदृष्टं तत्र प्रतिवन्धकमिति वाच्यम् । दुरदृष्टरूपप्रतिबन्धके सति यदन्नरूपरेतसो न स्वविजातीयाकारसमर्पकत्वं, तदभाव तत्समर्पकत्वमिति त्वयोच्यते तवानरसे स्वाकारविजातीयाकारः कुत आगतः, अन्नरसस्याप्यत्र कार्यत्वादिति प्रश्ने अन्नादागत इत्युत्तरम् , अन्नस्यापि कार्यत्वादन्ने कुत आगत इति प्रश्ने, पृषिच्या आगत इत्युत्तरम् , पृथिव्या अपि कार्यत्वात्तत्र कुत आगत इत्यादि प्रश्नोत्तरपरम्पराया विपश्चि- Bह्मण्यात्मशब्देनोक्ते विश्रान्ती सत्यां तस्य ब्रह्मण आनन्दमयत्वादानन्दमयस्यैवाकारसमर्पक- त्वमित्यानन्दमय एव सर्वत्राकारसमर्पक इति पूर्वोक्तकल्पनायामप्यन्नरसस्य तागाकार- सपर्पकत्वाभावाद । अथ ग्रहिलतयानरस एवाकारसमर्पक इति ब्रूपे, तदा स्वसमानाकार- समर्पकत्वादन्नरसमयस्य पुरुपस्य भस्मराशीवद्राशीभूतत्वमेव स्यात्, न तु शिरःपाण्याद्या. कारवचमित्यानन्दमय एव पुरुपविधः सर्वत्राकारसमर्पक इति सिद्धम् । यचन्नाद्रेतोरूपेण परिणतात् पुरुषः शिरःपाण्याद्याकृतिमान् स वा एप पुरुपोन्नरस.

मठपतिश्रीजयगोपालभदृतभाष्यसमेता | २३ मयोन्नरसविकारः । पुरुपाकृतिभावितं सर्वेभ्योङ्गेभ्यस्तेजःसम्भूतरेतो बीजम् । तस्माद्यो जायते सोपि पुरुषाकृतिरेव स्यात् । सर्वाजातिषु जायमानानां जनकाकृतिनियमदर्शनादिति प्रघट्ट- केन भावनैवान्नरसमयपुरुपाकृतौ कारणमिति । तद्विशिष्टं रेत एवाकारसमर्पकमिति माया- वादिभाष्यकारा आहुः। तत्र वदामः । यस्या भावनाया वैशिष्टयं पुरुषाकृतिवीजभूतरेतासि सा भावना 'कस्य ? किमस्मदादिभावना, उतेश्वरभावना, आहोस्त्रिव पुरुपसर्वावयवस्य सम्बन्धजनित- संस्काररूपा वा भावना । तत्र नाथः । सत्यामपि तादृशास्मदादिभावनायर्या नियमतः पुत्रादि- पपुरुपोत्पत्तेरदृश्यमानत्वात्, असत्यामपि तादृशभावनायां पामराणां कामोन्मादेनं विस्मृत- रेहादीनां च पुरुषाणां पुत्रादिपुरुषाकारोत्पत्तेस्त्पातसूचकविजातीयजीवोत्पत्तेश्योपलभ्य- मानत्वाच । पश्चादीनां सुतरां तादृशभावनाभावात्तदुदरे रेत:स्थिती सत्यां तेभ्यो नियमतः पुरुषाकारोत्पत्तेः प्रत्यक्षसिद्धत्वाच । पुरुपाकृतिभावनाविशिष्टरेतसः पुरुपाकृतिकारणले प्रमाणाभावाच्च । न द्वितीयः । तादृशसर्वसमर्थभगवद्भावनाया: कारणत्वे भगवत आनन्द- मयत्वादानन्दामयमात्रस्यैव पुरुषाकारे कारणत्यमस्तु, तेनैवास्तु किं तेनैवेति न्यायाव । एवं चास्मदुक्तार्थानतिरेक एव । न तृतीयः । एतादृशे संस्कारे अङ्गीक्रियमाणेपि उत्पातसूचक- पुरुषाकृतिभिन्नाकृत्युत्पत्तेोके दृश्यमानत्वात् , न च 'यो योन्नमत्ति यश्च रेतः सिञ्चति तय एव भवतीति छान्दोग्योपनिपच्छतिस्थ' तद्भूय एव भवतीति वाक्योक्तं नियमेन तदाकृति- जनकत्वं विरुध्येत । यता तय एव भवती'त्यस्य नियमेन तदाकृतिरेव भवतीत्यर्थस्य माया- वाद्याचायः स्वकृतैतद्भाप्येऽभिहितत्वादिति वाच्यम् । एतादृशार्थस्य झटिति मतीयमानत्वा- भावात् । प्रतीयते तु तत्सोऽनादो रेतःसिग्भूय एवं पुनरेव भवत्युत्पद्यते इत्यर्थ एव झटिति । एवं चान्नादस्य रेत:सिचो रेतोद्वारेण पुनरुत्पत्तिमात्रमेव प्रतीयते, न तु नियमेन तादृशा- कृत्युत्पत्तिः। अत एव सुश्रुते सद्युत्पत्तिर्मनुष्यादिभ्य उक्ता । दृश्यते चापि लोके मनुष्यादि- भ्यस्तदाकृतिभिन्नसर्पव्याघ्रादेरुत्पत्तिः। नियमे सति तस्माद्रेतसस्तद्भिन्नाकृति!त्पद्येतैव । पदा, भूयो बाहुल्येनोत्सर्गतस्तदेव च रेतःसिगेव रेत:सिगाकतिरेवेति यावत् । भवति कदाचिदन्याकृतिरपि भवतीत्यर्थः । तस्मादमदुक्तार्थ एव साधीपान, लोकानुभवविरोधा- भावात् । सुश्रुताद्यायुर्वेदविरोधाभावाच । मायावाद्याचार्यकृतीर्थस्तु लोकानुभवविरोधाव सुश्रुताधायुर्वेदोक्तिविरोधायोपेश्य एवेति कृतं विस्तरेण । न च तहि भन्नात्पुरुष' इत्यत्र इत्वर्थकपञ्चम्यनुपपत्तिरिति वाच्यम् । मृदो घट इत्युक्तपि घटाकाराविर्भावका कुलाल एव न तु मृत्, तथाकारसमर्पको भगवानानन्दमय एव । अनादिकं तूपादानकारणमिति पञ्चम्यनुपपत्तेरभावात् । न च भवतां हि ब्रह्मवादः, 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' 'स एतावानासे'- त्यादिश्रुतेः । एवं चान्नरसरूपस्य रेतसोपि ब्रह्मत्याब्रह्मणश्च भवता मते साकारत्वादेतसो. .

२४ तैत्तिरीयोपनिषद् । ध्याकारसमर्पकत्वे वाधकाभाव इति वाच्यम् । स वै न रेमे तस्मादेकाकी न रमते, स द्वितीय- पैच्छत् , स एतावानासे'ति श्रुत्या रमणार्थमियं हि सृष्टिः । तद्रमणं च समानत्वेन सम्भ- वति । एकस्य रमणेच्छायामन्यस्येच्छाया अनुदये रमणानिर्वाहात् । किञ्च, सर्वेपामपि समान- त्वेन पूर्णानन्दत्वात् रमणेच्छोदयोप्यसम्भवी । तस्माद्रमणनिर्वाहार्थं सर्वेषु पदार्थेषु यावान् धर्मों यत्रापेक्षितस्तावानेव धर्मस्तत्र प्रकटितः, अन्यस्तिरोभावितो, लीलाशक्त्या । एवञ्च, यस्य यं प्रति उपादानत्वादिपु यो धर्मः प्रकटः, स तद्धर्ममात्रेणैव तं प्रत्युपयोगी। एवश्चान्नादिषूपादानत्वमात्रमेव पुरुषाकृतौ न त्वाकारसमर्पकत्वमपि । सकलपूर्णधर्माणां स्वस्मिन्नेव भगवता मकटितत्वात् भगवानेवाकारसमर्पक: कुलालादिरिव, न त्वन्नादिरिति ज्ञेयम् । किञ्च, मानसानां सनकादीनामन्नरसजन्यत्वाभावेन'अन्नात् पुरुप' इति श्रुतेरमामाण्य- मापयेत । न च तत्र सनकादीनां पूर्वस्थितानामेवाविर्भावो मनसः, तेपामवतारत्वादिति वाच्यम् । प्रकृतेनेपि पूर्वस्थितस्यैवाकारस्य भगवताविर्भावितत्वादानन्दमयस्यैवाकारसमर्पकत्वं वजलेपायितमिति न किञ्चिदेतत् । एवञ्च, स आनन्दमयः सर्वान्तरः, स एव सर्वाकारसम- पंकः, न त्वन्नमयादिरिति सिद्धान्तो निःमत्यूहः सिद्धः । तत्र भगवान् सर्वकरणसर्वभवन- समर्थत्वादिच्छया वचनेन स्वरूपेणापि सर्व कर्तु भवितुं च शक्त इति स्वरूपेणैव पुरुपविध आनन्दमयो विज्ञानमयमनोमयमाणमयान्नमयेष्वपि स्वाकारसदृशाकारमाविर्भावितवान्, स्वविभूतिरूपविराड्देहेस्मदादिविज्ञानमयमनोमयप्राणमयान्नमयमूलीभूतमिति ध्येयम् । एवं यथा प्रतिमाकोरः सान्तरालप्रतिमाकरणे पूर्व मृदा प्रतिकृतिं कुर्वन्ति, पश्चात्तदुपरि यथा- वयव सिस्थकं लापयित्वा, पुनस्तदुपरि यथावयवं मृत्तिकां लापयन्ति, ततस्तच्छिरःस्थ- छिद्रेण पादस्थितछिद्रेण वा द्वारभूतेन तप्तद्रुतस्वादिधातून् पूरयन्ति, तदा तप्ततधातुसं. योगात्तदेव सिस्थकं विलीयाधोभागेन निर्गच्छति, तदा तत्र तदाकारसमर्पिका, मृत्प्रतिकृतिरिव भवति, तथाप्यन्तःस्थितानन्दमय एवाकारसमर्पकः, न त्वन्नरसमयादिः, उत्तरोत्तरस्या- कारसमर्पक इति दृष्टान्तदान्तिकभावः । अन्नरसमयादेः सिस्थकोपरि लापितमृत्तिका- स्थानीयवान तु मूपानिपिक्तद्रुतताम्रादिननिरन्तरालप्रतिमायां यथा मूपाया आकारसमर्पक- वं, तथान्नरसमयस्याकारसमर्पकत्वमिति मायावादिभाष्यकारोक्तदृष्टान्तदान्तिकभावः अस्मदुक्तमकारेणैव वस्तुस्थितः सम्भवादिति सर्वमनवद्यम् । नन्वानन्दमयस्पाकारसमर्पकः क इति प्रश्ने किमुत्तरमिति चेत् । शृणु । आनन्दमयस्य स्वत एव साकारत्वात् । अन्यस्य तदाकारसमर्पकस्यानुक्तवाद । न च तथानरसमयेपि स्वतः सिद्ध आकारः कुतो नाङ्गी- क्रियत इति वाच्यम् । अन्नाव पुरुष' इत्यनेनानरसमयस्योत्पत्तिश्रवणात् । न ह्युत्पन्नस्य सन आकारः सम्भवति । तस्मादस्मदाचार्यचरणोक्त एव प्रकारः साधुतर इति दिक् । अप प्रकृनमनुसरामः । एवं पुरुषविधत्वं माणमयस्योक्ता श्रुतिरवयवानाह तस्य , मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाप्यसमेता। प्राण एव शिर इत्यादिना । प्राणः प्राणवायुः, शिरो मूर्धा, व्यानः व्यानवायुः, दक्षिणः पहो दक्षिणो बाहुः, पक्षिरूपेण प्रवेशे पक्ष एव वा, अपानोपानवायुरुत्तरो वामः, पक्षो बाहुः, पक्षिरूपे पूर्वोक्तमकारे पक्ष एव था । आकाशः चायोरुत्पत्तिस्थानम्, आत्मा मध्यभागो व्यानादिविशिष्टः । 'मध्य ोपामशानामात्मेति श्रुतेः । मध्यभागादेव शिरोवाहादीनामुत्पत्तेः पिण्टोत्पत्ती निरूपितत्वात् । एवं चाकाशस्य कारणरूपसूक्ष्मवायुरूपत्वमेवायाति । मध्यभाग- स्यावयवसजातीयत्वनियमात् पृथिवी पुच्छं पश्चाद्भागस्थपक्षरूपः पतिरूपेण प्रवेशे । अस्मदा- दिशरीरसमानरूपेण प्रवेशे तु पृष्ठादिः, अथ प्रतिष्ठा प्रतितिष्ठत्यस्मिन्निति प्रतिष्ठा करुजवा- चरणादिः । पृथिव्या अप्याकाशवायुतेनोजलांशसहितत्वाद्वारवंशेन सजातीयत्वं ज्ञेयम् । 'सैपा पुरुषस्यापानमवष्टभ्ये 'ति श्रुतेः । अन्यथोदानगृत्योर्ध्वगमनं गुरुत्वाच पतनं वा भवेत शरीरस्य । तदप्येप श्लोको भवतीति । अत्र प्राणमयस्यानरसमयान्तरत्वं 'पुरुपविधत्वं च स्यपुरुपविधतामन्वन्नरसमयस्य पुरुषविधत्वं च प्रतिपादितम् । तेन चान्नरसमये पाण- । मयस्योपजीव्यत्वं सिद्धमेव यद्यपि, तथापि एप वक्ष्यमाणः, श्लोकः पूर्वोक्तार्थप्रति- । पादकः पूर्वोक्तार्थदाक्योच्यते । तमेव श्लोकमाह प्राणं देवा अनु प्राणन्तीति । अत्र णमयस्योपक्रान्तत्वात प्राणशब्देन प्राणमय एबोच्यते । भीमशब्देन भीमसेनवत् । न तु विलपाणवायुः । तथा चायमर्थः । देवा इन्द्रियाधिष्ठातारोऽग्न्यादयः, माणं प्राणमयं, भनु पश्चात् , माणन्ति जीवन्ति, प्राणनशक्तिमता प्राणमयांशभूतेन प्राणेन वायुना जीवन- मेति । ' यावद्धयस्मिन् शरीरे प्राणो वसति तायदायुरिति श्रुतेः । एवमेव मनुष्याः पशवो गवादयश्च ये वर्तन्त इति शेषः । प्राणो हि भूतानामायुरिति । हि निश्चयेन प्राणः भूतानां उत्पन्नानामायुः । यतः माणस्थित्यैवायुपो व्यवहारः। तस्मात् सर्वायुपमुच्यते इति । तस्मात् कारणात् सर्वायुरेव सर्वायुपमुच्यते कथ्यते । अकारान्तः शब्दोऽयं वेदत्वात् पयुक्तः । तस्योपासनां तत्फलं चाह सर्वमेव त आयुर्यन्तीत्यादिना । ते सर्व विंश- त्युत्तरशतवर्षपरिमितं शतवर्षपरिमितं वा आयुः यन्ति प्राप्ता भवन्ति । के त इत्याकांक्षायां आह ये प्राणं ब्रह्मेति । ये पुरुषाः प्राणं ब्रह्म प्राणरूपं ब्रह्म उपासते ब्रह्मत्वेन स्तुवन्ति नमन्ति, जलादिपानान्नादिभक्षणसमये जलान्नादिकं प्राणरूपाय ब्रह्मणे समर्पयाम इति बुद्धि कुर्वन्ति ते यन्तीत्यर्थः । एतेनापि देवगनुष्यपश्चनरसमयरूपदेहानामुपजीव्यः प्राण- मय इति बोधितम् । तेन प्राणमयाकारसमर्पकत्वं नान्नरसमयस्य, किन्त्वन्नरसमयाकारसम- पैकत्वं प्राणमयस्यैवेति सिद्धम् । नन्वन्नरसमयमाणमययोहरूपत्वाचत्राधिष्ठावात्मा मृग्य इत्याकांक्षायामाह तस्यैप एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्येति । तस्य प्राणमयस्यैप एव मढदिस्थो मत्मत्यक्षो वा शारीरः शरीरसम्बन्धी आत्माभिमानी। ननु बुद्धिस्थस्त्व- सत्यक्षो वात्मा स क इत्याकांक्षायामाह यः पूर्वस्यानरसमयस्य स एवात्मा प्राणमयस्या- पीत्यर्थः । इति प्राणमयात्मा निरूपितः ।

1 तैत्तिरीयोपनिषद् । नन्वन्नरसमयाकारे प्राणमय आकारसमर्पकः, प्राणमयस्याकारसमर्पकस्तु क इत्या- कांक्षायां मनोमयात्मानमाह तस्माद्वा एतस्मात् प्राणमयादन्योन्तर आत्मा मनोमय इत्यादिना। तस्माद्रा एतस्मात् प्राणमयादन्योन्तर आत्मा मनोमयः । तेनैप पूर्णः स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुपविधताम् । अन्वयं पुरुपविधः । तस्य यजुरेव शिरः। ऋद्गक्षिणः पक्षः । सामोत्तरः पक्षः । आदेश आत्मा । अथर्वांगिरसः पुच्छ प्रतिष्ठा । तदप्येप श्लोको भवति । यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कदाचनेति । तस्यैप एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्येति । तस्मात् पूर्वश्रुत्याव्यवहितोक्तादेतस्मात् प्रत्यक्षादात्मनोऽन्यो भिन्नोन्तरोन्तास्थ आत्मा पुरुपः मनोमयः सङ्कल्पविकल्पात्मकमन:प्रचुर इत्यर्थः । अथ प्राणमयाकारसमर्प- कत्वं मनोमयस्य वक्तं प्राणमये यावत्माणमयं मनोमयस्य स्थितिमाह तेनैप पूर्ण इति । तेन मनोमयेनैप प्राणमयः पूर्णो व्याप्तः साङ्गोपाझावयवो वा । मनोमयावयवैरेव प्राणमया- वयवानामाभूितत्वात् । तस्य प्रकारमाह स वा एप पुरुपविध एवेति । सः पूर्वमुक्तः एप मत्मत्यक्षः मनोमयः पे निश्चयेन पुरुपविध एव, पुरुपस्येव विधा प्रकारो यस्येदृशः साकार इति यावत् । ननु मनोमयस्य साकारत्वे किं प्रमाणमित्याकांक्षायामाह तस्य पुरुपविधतामन्ययं पुरुषविध इति । तस्य मनोमयस्य पुरुपविधतां पुरुषप्रकारतामनु पश्चादयं प्राणमयः पुरुषविधः पुरुषप्रकारकः । तथा च मनोमयस्य निराकारत्वे माणमये । आकारो न स्यादित्यन्यथानुपपत्तेरेव प्रमाणत्वात् । ननु प्राणमयाकारान्यथानुपपत्त्या मनोमयः साकार इत्युच्यते श्रुत्येति भवता श्रुत्यभिप्रायः कल्प्यते। तत्रानरसमयाकारेणैव प्राणमयाकारः, प्राणमयाकारेण मनोमयाकार!, मनोमयाकारण विज्ञानमयाकारः, विज्ञानमयाकारणानन्दमयाकारो मूपानिषिक्तद्रुतताम्रप्र- तिमावदिति मायावादिभाष्यकारोक्त एव श्रुत्यभिप्रायः कुतो नाङ्गीक्रियते। एतयापि प्रणाल्या प्राणमयादिप्वाकारसिद्धेरिति चेत् ? अत्र ब्रूमः । मायावादिभाष्यकारोक्तश्रुत्यभिप्रायेणाम्नरसमयस्यैव चेत् प्राणमया- घाकारसपर्पकत्वम्, तदा ' तस्माद्वा एतस्मादन्योन्तर आत्मा प्राणमयः तेनैप पूर्ण' इत्येतद- नन्तरं 'तस्य पुरुपविधतामन्वयं पुरुपविध' इत्यनेन तस्यानरसमयस्य पुरुपविधतामनु पथाव माणमयस्य पुरुपविधत्वं मूपानिपिक्तद्रुतताम्रप्रतिमादृष्टान्तेन प्रतिपाद्य, अनन्तरं तस्माद्वा एत- स्मात्माणमपादन्योन्तर आत्मा मनोमयः, तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयादन्योन्तर आत्मा विज्ञान- मया, तस्माद्वा एतस्माद्विमानमयादन्योन्तर आत्मानन्दमय इत्येव श्रृतिर्वदेव , न तु 'तेनैप मठपतिश्रीजयगोपालभकृतभाष्यसमेता । पूर्ण' इत्पारम्प 'अन्वयं पुरुपविध' इत्यन्तं प्रतिवाक्यं वदेव । माणमयन्यायेनान्येपामपि पुरु- पविधत्वस्यागतत्वेन तेनैप पूर्ण' इत्यादिश्रुतिभागो व्यर्थः स्यात् । अस्मदुक्तमकारे तु अन्न- रसमयस्योक्तपुरुपविधत्वं कुत आगतमित्याशङ्का मा भूदिति तस्माद्वा एतस्मा'दित्यनेन माणमयस्यात्मनस्तदन्तःस्थत्वमुक्त्वान्नरसमयस्याकारे प्राणमयः कारणमिति वक्तुं माणमयस्य 'स वा एप पुरुपविध' इत्यनेन पुरुषाकारत्वमुक्तम् । तदाकारणानरसमये आकार इति तस्य पुरुपविधतामन्वयं पुरुपविध' इत्येतच्छन्दोक्तमाणमयस्यानरसमयाकारसमर्पकत्वं भतिपादि- तम् । तदनु प्राणमयस्य वायुसमुदायरूपत्वाद्वायावन्नमयसदृशाकाराभावात् कथमन्नरसमया- कारसमर्पकत्वमित्याशङ्का मा भूदिति 'तस्मा'दित्यनेन मनोमयात्मनः माणमयान्तःस्थत्वमुक्त्या माणमये आकारसमर्पको मनोमय इति वक्तुं स वा एप पुरुषविध एवं त्यनेन मनोमयस्य पुरुपविधत्वमुक्तं, तदाकारेण प्राणमये आकार इति 'तस्य पुरुषविधतान्वयं पुरुषविध' इत्यनेन तच्छन्दोपात्तपनोमयस्य माणमयाकारसमर्पकत्वं च प्रतिपादितम् । अथ मनोमयस्य सह- त्तिकमनोरूपत्वाव सत्तिमनस्यप्याकाराभावात् कथं मनोमयस्य प्राणमयाकारसमर्पकत्वमि- त्याशङ्का मा भूदिति ' तस्माद्वा एतस्मा'दित्यनेन विज्ञानमयात्मनो मनोमयान्तःस्थत्वमुक्त्वा मनोमये आकारसमर्पको विज्ञानमय इति वक्तुं स वा एप पुरुपविध एवे'त्यनेन विज्ञानमयस्य पुरुषविधत्वमुक्तम् । तदाकारेण मनोमये आकार इति 'तस्य पुरुपविधतामन्वयं पुरुपविध इत्यनेन तच्छन्दोपात्तविज्ञानमयस्य मनोमयाकारसमर्पकत्वं च प्रतिपादितम् । अथ विज्ञान- मयस्य बुद्धिविशिष्टमुख्यजीवरूपसङ्कपणांशरूपत्वात् केवलमुख्यजीवरूपसर्पणांशत्वाद्वा विज्ञानमय आकाराभावात् कथं विज्ञानमयस्य मनोमयाकारसमर्पकत्वमित्याशङ्का मा भूदिति 'तस्माद्वा एतस्मादित्यनेनानन्दमयस्य तदन्तःस्थत्वमुक्त्वा विज्ञानमये आकारसमर्पक आनन्दमय इति वक्तुं ' स वा एप पुरुपविध एवे'त्यनेनानन्दमयस्य पुरुषविधत्वमुक्तम् । तदाकारेण विज्ञानमये आकार इति ' तस्य पुरुपविधतामन्वयं पुरुषविध' इत्यनेन तच्छन्दो- पात्तानन्दमयस्य विज्ञानमयाकारसमर्पकत्वं च प्रतिपादितम् । आनन्दमयस्याकारसमर्पकस्तु श्रुत्या कोपि नोक्त इति स्वतःसिद्धाकार एवानन्दमय इति श्रुत्सभिमायोऽवगम्यते । एवञ्च, आनन्दमय एव सर्वाकारसमर्पकः, न त्वन्नरसमय इत्यस्मादपि नानरसमयस्य सर्वाकारसम- पंकत्वम् । तथा चास्पकृतव्याख्याने कोपि श्रुतिभागो व्यों न भवति, मायावादिभाष्यकार- कृतव्याख्याने तु भूयान् श्रुतिभागो व्यों भवतीत्यास्तिकाचार्येरेव विचारणीयमिति दिक् । अथ प्रकृतमनुसरामः । तत्र मनोमयपुरुषस्यावयवानाह तस्य यजुरेव शिर इत्यारभ्य अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठेत्यन्तेन । यजरित्यनियतातरपादावसानो मन्त्रविशेषः । स एवं शिरः मूर्धा, 'मनःपूर्वरूपं वा उत्तररूपमिति श्रुतेः। पूर्व मनसि भगवता भावितीर्थविशेषः पश्चा- वर्णात्मकशब्दद्वारा मुखानिर्गत इति मनोवयवत्वम् । अन्यथा शब्दात्मकस्य यजुपो मनोवय- वता न स्यात् । तथा च यजुरादीनां भगवन्मनोत्तिविशेषत्वमेव । तस्यैव च मन्त्रत्वं, तस्य तन्म- २८ तैत्तिरीयोपनिषद् । नोवृत्तिविशेषत्वे तत्कार्यभृतास्मदादिमनोवृत्तिविशेषत्वमनिर्वाध सिध्यति । अत एव मानसन- पस्य फलातिशय उक्तः । तादृशजपस्य मुख्यमन्त्रजपत्वात् । तदपेक्षयोपांशुजपस्य मध्यमफल- स्वम् । तस्य सूक्ष्मशब्दद्वारा निर्गतस्य किञ्चिन्मनोसन्निहितत्त्वात्किञ्चिद्रौणत्वात् वाचनिकस्य तदपेलया निकृष्टफलत्वम् । तस्य स्थूलशब्दद्वारा निर्गतस्यातिमनोसन्निहितत्वेनातिगौणत्वात् । न च शब्दात्मक एव मन्त्रः, शब्दद्वारा तदर्थस्मरणमेव मानसो जप इति वाच्यम् । तदा मानस- जपस्यार्थभावनादत्तिरूपस्य गौणत्वेन मुख्यत्वाभावात्तत्फलातिशयकथनस्यासमञ्जसत्वापत्तेः। 'त्रिःमयमामन्याह निरुत्तमा मिति श्रुतेगात्तिरूपमुख्यार्थपरित्यागोपपत्तेश्च । नहि शब्दरू- पऋगर्थस्मरणस्य मुख्यमयूपत्वं सम्भवति, शब्दरूपत्वाभावात् । तस्माद्भगवन्मनोनिविशेष एव मन्त्रा। एवमेव ऋगादिरपि मनोष्टत्तिविशेष एव । वस्तुतस्तु सर्व लल्लिद अल राजला- नित्यादिश्रुतेः सर्वेपामेव ब्रह्मत्वादन्नमयादीनामपि विभूतिरूपत्वेन ब्रह्मत्वाह्मणश्व 'तदे- जति तन्नैजती'त्यादिश्रुतेविरुद्धधर्माश्रयत्वात् शब्दात्मकत्वेपि यजुरादीनां शिरस्त्वादिक विनियोजकममाण()वलादेव च मानसजपस्य मुख्यत्वं चेति किमपि नासमञ्जसमिति सर्व मुस्थम् । ऋग्दक्षिणः पक्षा, सामोत्तरः पक्ष इत्यत्रार्थः स्पष्टः । आदेश आत्मेति । आदेशो ब्राह्मणं अतिदिएविशेपानादिशतीति स आत्मा मध्यावयवः । अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रति- टेति । अथर्वणाङ्गिरसा च दृष्टा मन्त्राः अथर्वाङ्गिरसस्ते पुच्छं पश्चादागस्थपक्षिरूपं पक्षिरूपेण प्रवेशे, अस्मदादिशरीरसमानरूपेण प्रवेशे तु पृष्ठादिः । अथ च प्रतिष्ठा आधारः ऊरुजवाचर- णादिरित्यर्थः । तदप्येप श्लोको भवतीति । यद्यपि तस्य गजुरेव शिर इत्यारभ्याथर्वाङ्गिरसः पुच्छ प्रतिष्ठेत्यन्तेन मनोमयस्य वेदात्मकत्वं प्रतिपादितम् । तदपि तथापि एप मे बुद्धिस्थो वक्ष्यमाणः श्लोकोपि भवति, पूर्वोक्तार्यस्यैव दाढायोच्यते । तमेव श्लोकमाइ यतो वाच इति । यस्मात् ब्रह्मणः सकाशाद्वाचा वचनानि 'यदेकमव्यक्तमनन्तरूपामिति श्रुतेः 'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूस्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मनिति श्रुतश्च तस्यानन्तत्वात्खानां त. स्मात्परायत्याच मनसा संकल्पविकल्पकात्मकमनाशब्दवाच्यान्तःकरणेन सहापाप्याविषयीकृत्य निटत्ता भवन्ति, तन्न विषयीकुर्वन्तीत्यर्थः । ईदृशब्रह्मण आनन्द लीलादिरूपम् । यदा, ब्रह्मण भानन्दं अक्षरब्रह्मसम्बध्यानन्दं तद्धाम परमं ममेति गीतोक्ताक्षरब्रह्मण्यधिष्ठितमानन्दं पुरुषो- तमरूपं विद्वान् नानाननुभवन्या पुरुषः कदापि न विमेति । 'द्वितीयादै भयं भवतीति श्रुते. द्वितीयदर्शनस्यैव भयजनकत्वात् द्वितीयदर्शनजन्यं भयं संसाररूपं न मानोति, यतः स एवा. धस्तात्स उपरिष्टादिति छान्दोग्योपनिपत्स्थश्रुत्यन्तरात्सर्वत्र भावात्मकानन्दस्यैवानुभवात् । सोनुभवस्तु मनस्येव भवति, मनस्तु तादृशं तदैवानुभवेद्यदा वेदात्मकमनोमयोपासना कुर्यात् । तया च तादृशस्य मनसानुभवं कर्तुं वेदात्मको मनोमय उपास्य इति सिद्धम् । एवं च वेदात्मत्वं मनोमयस्य तात्पर्यवृत्या पुनरपि स्मारित शोकेनेति शेयम् । तदानमय माणमयविज्ञानमयोपासनानयी त्पन्न ब्रह्मोपासते, माणं ब्रह्मोपासते, विज्ञानं ब्रह्मोपासत इति मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता । कण्ठरवेणैवोक्ता श्रुत्या, मनोमयोपासना तु तात्पर्यस्त्येति भेदः । यतोन्नमयमुपक्रम्य विज्ञा- नमयान्तमुपासनैवोक्तेति तन्मध्यपतितस्य मनोमपस्याप्युपासनेवोक्ता । आनन्दमयानन्तरं तूपासनापदाभावान तस्योपासना, किन्तु सदनुभव एव फलरूप इति ज्ञेयम् । 'आनन्दं ब्रह्म- त्युपासीति श्रुतिस्तु अक्षरब्रह्मोपासनां बोधयति, न तु रसरूपपुरुषोत्तमोपासनां, पुरुष. पदाभावादिति दिक् । स्यादेतत् । मनोमयस्य त्तिरूपाः सर्वे वेदा अवयवाः उक्ताः तत्र 'अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितं यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोधर्वागिरस' इति वृहदारण्यकश्रुतेः, अथ च 'ऋग्यजुः सामाख्या वेदाश्चत्वार उद्धता' इति श्रीभागवताच ऋग्वेदस्य सर्ववेदेभ्यः माथम्येन श्रेष्ठस्वात्तस्य प्रधानावयवरूपशिरस्त्वकथनं विहाय यजुर्वेदस्य रत्तिम्पस्य प्रधानावयवरूप- शिरस्त्वकथने किं वीजमिति चेत् । अब वदामः। फलं पुरुषार्थश्व तावहुःखाभावः सुखं च । तत्साधने फलपुरुपार्थ- शब्दप्रयोग 'आयुघृत'मित्यादिष्विवोपचाराज्ज्ञेयः । तत्र दु:खाभावो गौणं फलं गौणः पुरुषा- र्थश्च । सुखं तु मुख्यं फलं मुख्यः पुरुषार्थश्च । तद् द्विविधम् , ऐहिकं पारलौकिकं च । तत्रैहिक मुखरूपं फलं लौकिकस्रक्चन्दनादिजन्यं स्थूलतयैकविधमेव । तत्र पारलौकिक सुखरूपं फलं तु त्रिविधम् । तत्रैक 'यन्न दुःखेन संभिन्नं न च ग्रस्तमनन्तरं, अभिलापोपनीतं च तरमुखं स्वापदास्पदमिति वाक्यशेषपूर्वाधोक्तं सत्वाकारान्तःकरणे सर्वेहानिहत्तौ सत्याम- भिलापाभावेवि नित्यस्य नियतफलजनकत्वाज्जायमानं दुःखासंभिन्नं ध्वंसामतियोगि च स्वर्गापरपर्यायं सुखम् । द्वितीयं त्वभिलापे सत्येव जायमानं वाक्यशेपद्वितीयाधोक्तं स्वर्गलोकं सुखम् । तृतीयं तु मोक्षमुखम् । तत्र मुखचतुष्टयस्यानन्दरूपत्वेपि ऐहिक सुखं पारलौकिकं च स्वर्गरूपं मुखं स्वर्गलोकसुखं च सुखशब्दवाध्यमेवोत्सर्गतः । कचित 'स एको मानुप आनन्दः' 'स एको देवगन्धर्वाणामानन्द' इत्यादिप्वानन्दवाच्यमपि । मोक्षमुखं त्वानन्दशब्दवाच्यमेवात्सर्गतः । 'आनन्दं ब्रह्मणो रूपं तथ मोक्षे प्रतिष्ठित मिति श्रुतेः रस हो- चायं लब्ध्वानन्दीभवतीति श्रुतेश्च । कचित्सुखशद्भवाच्यमपि, 'यो चै भूमा तत्सुखं', 'मुषुप्तिका- ले सकले विलीने तमोभिभूतः सुखरूपमेती'त्यादिषु । तदपि दुःखाभावरूपं सुखरूपं फलं स्वनिष्ठत्वेनानूभूयमानमेव फलम् । अन्यथा यज्ञदत्तकृतस्त्रीसम्भोगजन्यमुखस्य देवदत्तीयफलत्वं स्यात् । अननुभूयमानस्य फलत्वे मानाभावाच । एवं च यजुर्वेदभिन्नवेदोपनिपत्सु 'ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवतीत्यादिश्रुतिभिर्ब्रह्मज्ञानरूपसाधनेन जीवरूपस्य आत्मनः आनन्दरूपब्रह्मरूपता भवतीत्युच्यते, नतु स्वनिष्ठत्वेनानुभूयमानानन्दरूपफलवत्तोच्यते । अशरीरं वाब सन्तं मिया- प्रिये न स्पृशतः इत्यादितत्रत्यश्रुतिभ्यो मोक्षे शरीराधभावेन मुखस्पर्शस्य निषेधाव एवं चानुभूयमानानन्दुरूपताया अनुभूयमानदुःखाभावरूपताया वाभावात् न तत्रोक्तमोक्ष- खस्य मुख्यफलत्वं गौणफलत्वं वा संभवति , किन्तु स्वरूपतः संसाराभावरूपत्वमात्रमेव ।

तैत्तिरीयोपनिषद् । एवं च ऋग्वेदसामवेदाथर्ववेदोपनिपदुक्तमोक्षसुखस्य फलत्वाभावान पुरुषार्थत्वमिति सिद्धम्। यजुर्वेदीयोपनिषत्सु तु माध्यंदिनीयोपनिषदि यद्यपि अन्यवेदोक्तमकारक एव मोक्षः प्रति- पाद्यते, तथापि तत्रत्यतैत्तिरीयोपनिपदि तु पूर्वमन्नमयमुक्त्वा तदान्तरत्वं प्राणमयस्य, प्राण- मयान्तरत्वं च मनोमयस्य, मनोमयान्तरत्वं च विज्ञानमयस्य, विज्ञानमयान्तरत्वं चानन्दमयस्य प्रतिपाद्य, मोदप्रमोदयोस्तद्दक्षिणोत्तरपक्षत्वमानन्दस्य मध्यभागत्वमक्षरब्रह्मणः पुच्छत्वं चोक्त्वा, तदनन्तरमानन्दमयस्याशुद्धब्रह्मता 'मसन्नेव स भवतीति श्लोकस्य पूर्वार्धन निरा. कृत्य, 'अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेदे'त्युत्तरार्धेन शुद्धब्रह्मता च स्थापिता, यथा 'असन्नैव स भवति'अस- ब्रह्मेति वेद चैदेतस्य श्लोकस्याशुद्धब्रह्मतानिराकरणशुद्धब्रह्मतास्थापनपरत्वं तथानन्दमय- निरूपणे निरूपयिष्यते । तदनन्तरं 'सोकामयत वहु स्यां प्रजायेय'त्यारभ्य 'ततो वै सदजा- यते'त्यन्तेन तच्छब्दपरामृष्टानन्दमयात्मन एव सृष्टिं प्रतिपाद्य, तस्यां सृष्टौ 'तत्सृष्ट्वा तदेवानु भाविश'दित्यनेनानन्दमयात्मनः प्रवेश उच्यते तत्र, एवं च सति घटाद्यवछिन्नाकाशो यथा घटायुपाधिभेदेन वहुरूपा, नवभावतः, तथा 'बहु स्यां प्रजायेयेत्यनेनोक्तं बहुभवनं स्वाज्ञान- कल्पितपदार्थरूपोपाधिभेदेनानन्दमयेपि, न तु स्वभावतः, तथा चाकाशवदानन्दरूपः सर्वान्तर एव पारमार्थिकसत्तावान् , तदज्ञानकृतः प्रपञ्चस्तु तत्सत्तयैव सचावान् । अत एव 'तदनु प्रविश्ये' त्यारभ्य 'सत्यं चानृतं च सत्यमभवदित्यन्तेन तत्सत्ताविशिष्टप्रपञ्चोत्पत्तिरुक्ता । अत एव तत्सत्यमित्याचक्षते' इत्यत्र 'आचक्षते' इत्यनेन कथयन्त्येव, न तु परमार्थसत्यत्ववत् किम- पीति ज्ञेयम् । तथा च प्रपञ्चे न पारमार्थिकी सत्ता, किन्तु व्यावहारिकेव । इत्थं च मायवाद- प्राप्तौ जाताया 'मसद्धा इदमग्र आसीत्ततो वै सदजायते'ति श्लोकस्य पूर्वार्धनानन्दमयादेव प्रप- श्चोत्पत्तिं पुनरपि पूर्वोक्तार्थदाायोक्त्वा तदात्मानं स्वयमकुरुत तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत' इति तदुत्तरार्धेन प्रपञ्चस्य ब्रह्मतोक्ता | यथा चैतत्तथैव तस्य श्लोकस्य व्याख्याने स्फुटीभविष्यति। एवमेतावता प्रघट्टकेनानन्दमयस्य सर्वमपञ्चकारणतां प्रपञ्चस्य च मायिकत्वनिराकरणपूर्वक ब्रह्मतां प्रतिपाद्य पूर्वोक्तानन्दमयात्मनो 'रसो वै स' इत्यनेन रसानन्दस्वरूपत्वमुक्त्वा रस ह्येवायं लब्ध्वानन्दीभवती'त्यनेन स्थायिभावात्मकभगवत्माप्त्यैवानन्दी भेदेनानन्दवान्भवति, एतदन्यज्ञानादिप्रकारेण त्वानन्दस्वरूपमात्रं भवतीत्युच्यते । अत एव निधयवाचक शब्दोपि तत्र दृश्पते । एवं चानन्दमयस्यानुभूयमानानन्दरूपमुख्यफलत्वं यजुर्वेदीयतैत्तिरी- योपनिपदैवोच्यते समपञ्च, नान्यवेदोपनिपद्भिरिति तस्यैव शिरस्त्वकथने श्रुतेरभिप्राय इति जानीहाति दिक् । तथा च मनोमयस्य यद्यपि सर्वे वेदा वृत्तिरूपा अवयवाः, तथा- प्युपनिपदर्थरूपत्तिपरतयैव सामान्यतः स्येयं, तत्रापि यजुर्वेदस्य शिरस्त्वेनान्यवेदरूपानेभ्यः मधानत्वात फळरूपयजुर्वेदोपनिपदर्थरूपटचिपरतयैव तत्रापि तैत्तिरीयोपनिपदर्थरूपति- परतवैव च स्य सः । यजुर्वेदतैत्तिरीयोपनिपदयों हि मुख्यतया 'रसो वै स' इति वक्ष्यमाण- श्रुत्या रसरूपमेव ब्राह्म । तथा च मुख्यतया तवृत्तिरूपं मनोमयांशभूतं मनःस्थापपेद् ,अन्यचे. , . मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता। ३१ दोपनिषदर्यज्ञानादिकं तु तत्माप्तियोग्यतासम्पादकमिति गौणतया तवृत्तिरूपं मनोमयांशं मनः स्थापयेदिति तात्पर्यार्थः । एवं चानेन यतो वाच' इति श्लोकेनापि वेदरूपत्वमेव. मनोमयस्येति योध्यम् । अथवास्मिन् श्लोके ब्रह्मशब्दो वेदपरः। एवं च यतो यस्मादानन्दादाचः वचनानि मनसा सहामाप्याविषयीकृत्य निवर्तन्ते निटचानि भवन्ति, एतादृशमानन्दं ब्रह्मानन्दरूपं ब्राह्मणो वेदाद मकृतवेदात्मकमनोमयादिति यावत् । तस्माद्विद्वान् सर्वदा तदर्थानुसन्धानरूपो- पासनया जानन् भवेत्स कदाचन कदापि न विभेति, संसाररूपं: भयं न मानोतीत्यर्थः । अस्मिन् व्याख्याने वेदात्मकत्वं मनोमयस्य पुनरपि कण्ठरवेणोक्तमिति सर्व समञ्जसमिति बोध्यम् । ननु 'यो देहः स आत्माधिष्ठित' इत्पत्रात्मा क इत्याकांक्षायामाह तस्यैप एवेत्या- रभ्य यः पूर्वस्येत्यन्तम् । तस्य मनोमयस्यैप एव महद्धिस्य एव शारीरः शरीरसम्बन्धी शरीराभिमानीति यावत् , स आत्माधिष्ठातेत्यर्थः । स क इत्याकाक्षायामाह यः पूर्व- स्येति । य आत्मा पूर्वस्य माणमयस्य स एव मनोमयस्याप्यात्मा ज्ञेयः । ननु मनोमयस्य मनोरूपत्वान्मनस्यप्याकाराभावात्कथं मनोमयस्य प्राणमयाकारस- मर्पकत्वमित्याशङ्कायामाह तस्मादा एतस्मादित्यादि । तस्मादा एतस्मान्मनोमयादन्योन्तर आत्मा विज्ञानमयः । तेनैप पूर्णः । स वा एप पुरुषविध एव । तस्य पुरुपविधताम् । अन्वय पुरुविधः । तस्य अद्वैव शिरः । ऋतं दक्षिणः पक्षः । सत्यमुत्तरः पक्षः। योग आत्मा । महः पुच्छे प्रतिष्ठा । तदप्येप श्लोको भवति । विज्ञानं यज्ञं तनुते । कर्माणि तनुतेपि च । विज्ञानै दे॒वाः सर्वे । ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते । विज्ञान ब्रह्म चेदेद । तस्मा- ' चेन्न प्रमाद्यति । शरीरै पाप्मनो हित्वा। सर्वान् कामान् समभुत इति । तस्यैप एवं शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य । तस्मात् श्रुत्युक्तादेतस्मान्मत्प्रत्यक्षान्मनोमयादन्यो भिन्नोन्तरोन्तःस्य आत्मा देहो विज्ञानमयो विशिष्टज्ञानमयो ज्ञानप्रचुरः सर्वज्ञ इति यावत् । स वर्तत इति शेपः । 'अह- मात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित ' इति गीतोक्तः प्रथमजीवरूपो भगवान् , न त्वस्मदा- दिजीवात्मा । एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रम्ये त्यग्रे वक्ष्यमाणजीवकृतविज्ञानमयोपसंक्रम- स्यासामञ्जस्यापत्तेः । न हि स्वयमेव स्वमुपसंक्रामति कश्चित् । भेद एवोपसंक्रमस्य दृश्यमान- वात् । तेनैप पूर्ण इति । तेन विज्ञानमयेनैप मनुद्धिस्थो मत्मत्यक्षो वा मनोमयः पूर्णो व्याप्तः, साङ्गोपाङ्गावययो वा | विज्ञानमयावयवैरेव मनोमयावयवानामुत्पन्नत्वात् । तस्य (विज्ञानम- यस्य) मनोमयस्य प्रकारमाह स वा एप पुरुपविध एवेति । स पूर्वमुक्त एप मत्मत्यक्षो वै निश्चयेन विज्ञानमयः पुरुषस्येव विधा भकारो यस्पेशः साकार इत्यर्थः । अयमेव पुरु- पावताररूपः । ननु विज्ञानमयस्य साकारत्वे किं प्रमाणमित्याकांक्षायामाह तस्य पुरुषवि- ३२ तैत्तिरीयोपनिषद् । धतामन्वयं पुरुषविध इति । तस्य विज्ञानमयस्य पुरुपविधतां पुरुषमकारतामनु पश्चादयं मत्प्रत्यक्षो मनोमयः पुरुपविधः पुरुषप्रकारः । तथा च विज्ञानमयस्य निराकारत्वे मनोमये आकारो न स्यादित्यन्यथानुपपत्तेरेव प्रमाणत्वात् । तस्यावयवानाह तस्य श्रद्धव शिर इत्यारभ्य महः पुच्छं प्रतिष्ठेत्यन्तेन । तस्य कर्तव्यार्थे आस्तिकत्वबुद्धिः श्रद्धा, सा शिरो मस्तकम् । अत एव 'यो यच्छ्रद्धः स एव स' इति गीतावाक्यम् । ऋतं प्रमीयमाणो धर्मः। सत्यमनुष्ठीयमानो धर्मः । तत्र अतं दक्षिणो वाहुः । सत्यं वामो बाहुः । योगश्चित्तवृत्ति- निरोधः । स आत्मा मध्यभागः । महत्तत्त्वं विरिञ्चिरूपम् । तत् पुच्छं पश्चाद्भागः । प्रतिष्ठा आधारश्च चरणादिः । अत्र प्राणमय आकाशस्यात्मत्वं पृथिव्याः पुच्छादित्वं, मनोमये यजु. रादीनां शिरस्त्वादिकं, विज्ञानमये श्रद्धायाः शिरस्त्वं, प्रमीयमाणानुष्ठीयमानधर्मयोदक्षिणवा- मवाहुत्वं, योगस्यात्मत्वं, महत्तत्वस्य पुच्छमतिष्ठात्वं च सर्वस्याप्यन्नमयादिविज्ञानान्तस्य (पुरुपावतार)त्वान्नानुपपन्नमिति बोध्यम् । अत्रेदं क्षेयम् । 'अन्नात् पुरुष' इत्यनेन यः पुरुप उक्तः स नास्मदादिकार्यदेहरूपः अस्मदादिदेहानामनन्तत्वादेकस्योक्तावपि द्वितीयाकांक्षाया अपूर्तेः; किन्तु सर्वकारणरूपो 'जगृहे पौरुषं रूपं भगवान्महदादिभिः । सम्भूतं पोडशकलमादौ लोकसिमक्षयेत्यादिना द्वितीयस्कन्ध उक्तः पुरुपावतारदेहरूपो ब्रह्माण्डदेह उच्यते । न च पुरुपशब्देनात्मोच्यते, न देह इति वाच्यम् । ' स वा एप पुरुषोन्नरसमय ' इत्यनेन पुरुषावतारदेहस्यैवागतत्वात् । न ह्यात्मानरसमयो भवति । अत एवैकवचनमपि । अन्यथान्नात्पुरुषा इति बहुवचनमेवोक्तं स्यात् । तस्मात् पुरुपावतारदेह एवोक्त इति समञ्जसम् । अत एव महतो विरिञ्चेः पुच्छ. त्वप्रतिष्ठात्वे सङ्गच्छेते । 'यस्याम्भसि शयानस्य योगनिद्रा वितन्वतः । नाभिहदाम्बुजा- दासीत् ब्रह्मा विश्वसृजां पतिः' इत्यनेन द्वितीयस्कन्धे पुरुषावताराद्ब्रह्मण उत्पत्वेक्तत्वात् । अथ यद्यप्युक्तश्रुत्यर्थ उक्त एव, तदपि तथापि निःसन्देहत्वाय पूर्वोक्तार्थकः श्लोकोऽपि वर्तत इत्याह विज्ञानं यज्ञं तनुत इत्यादि । विज्ञानं विशिष्ट ज्ञानं यस्य तद्विज्ञानं, सामान्ये नपुंसकं, विशिष्टज्ञानरूपं वा, चिदूपत्वाद्, ईदृशः पुरुपावतारो यज्ञं ज्योतिष्टो- मादिरूपं तनुते विस्तारयत्ति । पुरुपावयवैरेव यज्ञसम्भारस्य जातत्वात् । अत एवोक्तं 'इति सम्भृतसंभारः पुरुपावयवैरहम् । खेनैव यज्ञपुरुपं तेनैवायजमीश्वर'मिति द्वितीयस्कन्धे च । पुनः कर्माणि यज्ञातिरिक्तान्यपि तनुते विस्तारयति । सर्वकर्मणां तदङ्गेप्वेव स्थितत्वात् । विज्ञानं पुरुपं देवा इन्द्रादयो ब्रह्मज्येष्ठं ब्रह्मणश्चतुर्मुखादपि ज्येष्ठं तस्मादपि पूर्ववर्तित्वा- दुपासते उपासनाविषयीकुर्वन्तीत्यर्थः । ईदृशं विज्ञानं ब्रह्म चेदेद, ब्रह्मत्वेन यदि जानाति, अथ तस्माद्विरापश्च ब्रह्मणवेद्यदि न प्रमाद्यति, असावधानो न भवति, सर्वदा तदुपासना- परो भवतीति यावत्, तदा शरीरे देहे पाप्मनः देहाधिकरणकपापान हित्वा सर्वान् कामान् समश्नुते मुनेः । अनेन शोकेन श्रद्धाममीयमाणानुष्टीयमानधर्मात्मकत्वमुक्तम् । द्वितीयेन - ।

३ । मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाप्यसमेता। श्लोकेन विज्ञानस्य ब्रह्मत्ववेदनरूपेण धारणोक्ता, 'ब्रह्म ज्येष्ठ मित्यनेन महत्तत्त्वरूपस्य ब्रह्मणः पुच्छत्वप्रतिष्ठात्वे उक्ते । एवेश्च योर्थः श्रुत्या पूर्वमुक्तः, स एवाभ्यां श्लोकाभ्यामुक्तः । ननु यो देहः स आत्माधिष्ठितः, अतो विज्ञानमयदेहे आत्मा के इत्याकांक्षायामाह तस्यैप एव शारीर आत्मेति । तस्य विज्ञानमयस्यैप एव मद्युद्धिस्थ एव शारीरः शरीरसम्बन्धी आत्मा स क इत्याकांक्षायामाह यः पूर्वस्येति । य आत्मा पूर्वस्य मनोमयस्य स एव विज्ञानमयस्यात्मेत्यर्थः । ननु विज्ञानमयस्यापि पुरुपरूपत्वाव पुरुपस्य चात्मत्वादात्मनश्च निराकारत्वात् कथं मनोमयाकारसमर्पकत्वमित्याशङ्कायामाह तस्मादा एतस्मादित्यादि । तस्मादा एतस्मादिज्ञानमयात् । अन्योन्तर आत्मानन्दमयः । तेनैप पूर्णः। स वा एप पुरुपविध एव । तस्य पुरुपविधताम् । अन्वयं पुरुपविधः। तस्य प्रियमेव शिरः । मोदो दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द आत्मा । ब्रह्म पुच्छे प्रतिष्ठा । तदप्येप श्लोको भवति । असन्नेव सं भवति । असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति ब्रह्मेति चेदेद । सन्तमेनं ततो विदुः । तस्यैप एव शारीर आत्मा। प: पूर्वस्येति । तस्मात् पूर्वोक्तादेतस्मान्मत्प्रत्यक्षादात्मनो विज्ञानमयादन्यो भिन्नो ह्यान्तरोन्तस्थ आत्मा आनन्दमय आनन्दप्रचुरः । तस्य स्वरूपमाह तेनैप पूर्ण इत्यारभ्य अन्वयं पुरुपविध इत्यन्तेन । तेनानन्दमयेनैपः विज्ञानमयः पूर्णों व्याप्तः साङ्गोपाङ्गावयवो वा । आनन्दमयावयवैरेव विज्ञानमयावयवानामुत्पन्नत्वात् । तस्य प्रकारमाह स वै निश्चयेन पुरुषविध एव, पुरुपस्येव विधा प्रकारो यस्येदृशः साकार इत्यर्थः । नन्वानन्द- मयस्य साकारत्वे किं प्रमाणमित्याकांक्षायामाह तस्येति । तस्यानन्दमयस्य पुरुपविधतां पुरुपप्रकारतामनु पश्चादयं मत्प्रत्यक्षो विज्ञानमयः पुरुषविधः पुरुषमकारः । तथा चान- न्दमयस्य निराकारत्वे विज्ञानमयेप्याकारो न स्यादित्यन्यथानुपपत्तेरेव प्रमाणत्वात् । तस्या- वयवानाह तस्य प्रियमेव शिर इत्यारभ्य ब्रह्म 'पुच्छं प्रतिष्ठेत्यन्तेन । तस्यानन्द- मयस्य 'रसो वैस' इत्यनेनानुपदमेव रसरूपत्वेन निरूपयिष्यमाणत्वालियमेव परस्परेट- दर्शनजन्यानन्द एव शिरः, प्रधानाङ्गं, तस्यैव पूर्व जायमानत्वात् । मोदो हर्पस्तदनन्तर- प्राप्तसंयोगानन्दविशेषा, स दक्षिणो वामेतरः पक्षो वाहुः । प्रमोदः पूर्वसञ्जातसंयोगा- नन्दादपि प्रकृष्टो मोदो हर्ष आनन्दविशेषो यस्मिन्, यस्माद्वा संयोगानन्तरभावी विभयोग: उत्तरो वामः पक्षः बाहुः । विप्रयोगे संयोगानन्दादपि प्रकृष्टानन्दाधिकरणत्वं प्रकृष्टा- नन्दजनकत्वं च स एवाधस्ताद स उपरिष्टा 'दिति श्रुतेः, अथ च 'प्रासादे सां दिशि . तैत्तिरीयोपनिपद् । दिशि च सा पृष्ठतः सा पुरः सा, पर्यः सा पथि पथि च सा तद्वियोगातुरस्य, हंहो चेतः प्रकृ- तिरपरा नास्ति ते कापि सा सा, सा सा सा सा जगति सकले कोयमद्वैतवादः ।' 'सङ्गम- विरहवितके वरमिह विरहो न संगमस्तस्याः, संयोगे सैवैका त्रिभुवनमपि तन्मयं विरह इत्यभियुक्तोक्तेः, अथ च 'संयोगो विप्रयोगेन विना न रसदायकः । कपायिते हि वस्त्रादौ भूयान् रागो विवर्धत' इति रसशास्त्र सिद्धान्ताच विप्रयोगान्तर्गतसर्वाधिकरणकमियदर्शनजे हर्षे विप्रयोगोत्तरभाविसंयोगजे ह च प्रकृष्टत्वं सिद्धमेव । अथवा, आनन्दः स्थायिभावः, प्रीत्यपरपर्यायो रतिशब्दवाच्यः, स आत्मा । आनन्दमयस्य मध्यभागः । मध्यं ोपा- मङ्गानामात्मेति श्रुतेः । अत्रात्मपदमुपलक्षणम्, प्राणेन्द्रियान्तःकरणादीनामपि । ब्रह्म गणितानन्दमक्षररूपं तत्पुच्छं पश्चाद्भागः पृष्ठादिः । 'अधर्मवत् धर्मस्ततोधर्मपथोस्य पृष्ठ' इति वचनात् । एतेन ब्रह्मणि न्यूनत्वं सूचितमानन्दमयापेक्षया, अन्याङ्गापेक्षयानुत्तमाङ्गत्व- कथनात् । अथ च प्रतिष्ठा प्रतितिष्ठत्यस्मिन्निति प्रतिष्ठा, आधारः । श्रुतौ ब्रह्मणोप्य- चिन्त्यशक्तित्वेनोक्तोकगृहपादुकासिंहासनादिरूपश्चेत्यर्थः । एतेनापि गौणत्वमेव अक्षर- ब्रह्मणः सूचितम् । अत्रानन्दमयो यथा विज्ञानमयाकारे, विज्ञानमयो मनोमयाकारे, मनो. मयः प्राणमयाकारे, प्राणमयोऽन्नरसमयाकार आकारसमर्पकत्वेन कारणमुक्तः, तथानन्दमय आकारसमर्पकत्वेन किमपि कारणं नोक्तम् , अतो ज्ञायते आनन्दमयाकारोऽकारणक एव, अकारणकत्वे के निरूपाधित्वात्समीचीनं परमकाष्ठापन्नं ब्रह्मैव भवति, न त्वज्ञानसंवलितत्वे- नासमीचीनं ब्रह्म भवति । एवं यद्यपि निर्विकारब्रह्मत्वमानन्दमयस्य सिद्धमेव, तथापि निःसन्दिग्धतया निर्षिकारब्रह्मत्ववोधनायाह तदप्येप श्लोक इति । यद्यपि पूर्वोक्तरीत्या- नन्दमयस्य सद्ब्रह्मत्वमुक्तमेव, तदपि तथापि सहह्मत्वमेव बोधक एप वक्ष्यमाणः श्लोकोपि भवति । तमेव श्लोकमाह असन्नेव स भवतीति । स पुरुपः असन्नेव भवति, मिथ्या- भूत एव भवति, य आनन्दमयमसदज्ञानावच्छिन्नत्वान्मिथ्याभूतमीदृशं ब्रह्म वेद जानाति; य आनन्दमयं सद् ब्रह्मास्तीति चेद्वेद जानाति, तं पुरुपं सन्तं समीचीनं ततः कारणा- द्विदुः । अत्र पूर्वार्धनासद्ब्रह्मज्ञस्य निन्दोक्ता, उत्तरार्धे सत्पदाभावेपि सामर्थ्यात् सही- त्यायातीति ज्ञेयम् । तथा च तादृशस्य सङ्गो न कर्तव्या, एतादृशस्य सङ्गः कर्तव्य इति भावः । यद्वा, सन्तं विद्यमानं विदुः, ब्रह्मणः सर्वात्मत्त्वात् स्वात्मा असत्यत्ववादिनोसत्त्व- मेव । स्वात्मत्यागात् । यद्वा, पूर्वोक्तमकारेणानन्दमयस्य शुद्धब्रह्मत्वं सिद्धमेव, तथापि 'विकारशब्दादिति चेन्न प्राचुर्या 'दित्यत्रत्यपूर्वपक्षोक्तविकारशब्दत्वोक्त्या 'यचः छन्दसीति सूत्रेण.ह्यच एव छन्दसि विकार मयटः पाणिनिसूत्रेधूपलभ्यमानत्वेपि भगवनिःश्वसित- रूपब्रह्मसूत्रेणानेकाच्वादपि छन्दसि कचिन्मयडिति ज्ञापितत्वादानन्दमयशब्दो विकारार्थ- कमयदमत्ययान्त एवेति विकारिब्रह्मतामानन्दमयस्य कश्चिद् ब्रूयात्तत्समाधानं विदधाना श्रुतिनिन्दास्तुतिभ्यामानन्दमयस्य शुद्धबलतामाह तदप्येष श्लोको भवति । यद्यपि मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता । पूर्वश्रुत्या शुद्धब्रह्मत्वं सिद्धमेव, तथापि निःसन्दिग्धतथाबोधनार्थमेप वक्ष्यमाणः शुद्धब्रह्म- स्वप्रतिपादकः श्लोकोपि भवति वर्तत इत्यर्थः । तमेव श्लोकमाह असन्नैवेति । स पुरुषोऽसन्नेवासमीचीन एव, अथवा भक्तिमान् वा न भवति । न हि समीचीनो भक्तो वा आनन्दमयं विकारि ब्रह्म वदति । स को ? योऽसद्विकारि ब्रह्म पूर्वोक्तानन्दमयं वेद जानाति, सोऽसन्नेव भवतीत्यर्थः । य आनन्दमयं 'निर्दोपं हि समं ब्रह्मेति वाक्याब्रह्म निंदोप समरूपमस्तीति चेद्भगवत्कृपया वेद जानाति तं सन्तं भक्तं शुकादितुल्यं ततः शुद्ध- ब्रह्माङ्गीकर्तृत्वरूपकारणाद्विदुः श्रुतयो भक्तां वेत्यर्थः । अनेन श्रुत्यैवानन्दमयस्य विका- रित्वे निरस्ते मयटूनत्ययोत्र न विकारे इति सिद्धम् । तहि मयत्प्रत्ययः कस्मिन्नर्थ इत्या- कांक्षायां प्राचुर्ये मयडत्रेति भगवानाह 'विकारशब्दादिति चेन प्राचुर्या 'दिति स्वनिःश्व- सितरूपसूत्रेण | ननु यो देहः स आत्माधिष्ठित इत्यत्रात्मा क इति आकांक्षायामाह तस्यैप एवं शारीर-आत्मेति । तस्यानन्दमयात्मनः शारीरः शरीरसम्बन्धी शरीराभिमानीति यावत् , स एप मत्सत्यक्षः । ननु स क इत्याकांक्षायामाह यः पूर्वस्येति । य आत्मा पूर्वस्य विज्ञानमयस्य स एवानन्दमयस्याप्यात्मेत्यर्थः । अत्र सर्वान्ते आनन्दमय एवोक्तः, न त्वान- न्दमयादग्ने कवनोक्त इत्यानन्दमय एवानन्दमयस्यात्मा, अथ चान्नमयादेरपि, परन्तु तत्रा- नमयादिरूपेण देहता, आनन्दमयरूपेणात्मता, अत्र त्वानन्दमयरूपेणैव देहता, आनन्द- मयरूपेणैव चात्मतेति तात्पर्यम् । अत एव 'निर्दोपपूर्णगुणविग्रहश्चात्पतन्त्रो निश्चेतना- स्मकशरीरगुणैश्च हीनः, आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादिः सर्वत्र च स्वगतभेदविवर्जितात्मे'- त्यादिना पुराणतन्त्रादिपु चानन्दरूपधर्मिणो धर्माणां चानन्दरूपत्वमेवोक्तमिति बोध्यम् । न च 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठे'त्यत्रोक्तब्रह्मण एव सर्वात्मत्वमिति वाच्यम् । पुच्छरूपाव- यवत्वेन धर्मित्वाभावात सर्वात्मत्वाभावात् । तस्मादस्मदुक्तव्याख्यानमेव साधीयः । अत्र मायावाधाचार्याः खकृतवेदान्तसूत्रभाष्ये त्वानन्दमयाधिकरणव्याख्याने ह्यान- न्दमयशब्दस्थमयटो भगवनिःश्वसितरूपविकारशब्दादिति सूत्रोक्तमाचुर्यार्थकत्वमेकदेशि- मतत्वेन योजितवन्तः । तन्न । तत्रैतस्यैकदेशिमतत्वे तन्नाम गृहीतं स्यात्, यथा 'प्रतिज्ञासिद्धेर्लिङ्गमाश्मरथ्यः' 'उत्क्रमिष्यत एवंभावादित्यौडुलोमिः, 'अवस्थितेरिति काशकृत्स्न' इत्यादिब्रह्मसूत्रे- विव, अथवा इत्येकदेशिन इति वा वदेयुः सूत्रकाराः । तस्मान्नैकदेशिमतमिदमिति । स्वसिद्धान्तं वदन्त 'इदं विह वक्तव्यम् । स वा एप पुरुषोन्नरसमयः तस्माद्वा एत- स्मादन्योन्तर आत्मा माणमयः 'तस्मादन्योन्तर आत्मा मनोमयः तस्मादन्योन्तर आत्मा विज्ञानमय' इति च विकारेर्थे मयप्रवाहे सत्यानन्दमये एवाकस्मादर्धजरतीयन्यायेन कथमिव मयटः प्राचुर्यार्थत्वं ब्रह्मविषयत्वं चाश्रीयत इति मान्त्रवर्णिकब्रह्माधिकारादिति चेन् । न। अन्नमयादीनामपि तहिं ब्रह्मत्वप्रसङ्ग इति वदन्ति ।

. तैत्तिरीयोपनिषद् । तन्न ।वेदो हि भगवनिःश्वसितभूतः। तदर्थश्च भगवदुक्त एव प्रामाणिकः, स्वाभिमाय- स्य स्वेनैव ज्ञायमानत्वात् । अत एवोक्तं 'किं विधत्ते किमाचष्टे किमनूय विकल्पयेत् । इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो मद्वेद कश्चने'त्येकादशस्कन्धे भगवता । स स्वाभिप्रायस्तु भगव- तैव स्वनिःश्वसितरूप 'विकारशब्दादिति चेन्न प्राचुर्यादिति सूत्रेण प्रकटित एव । एवं च सति तदभिप्रायविरुद्धा मायावाद्याचार्योक्ता श्रुत्यभिप्रायसराणिः कस्यास्तिकस्य प्रेक्षा- वत आदरणीयतामुपेयात् । अथवा, अन्नरसमयादिषु विकारे मयडपि नास्ति येन तत्प्रवाहपतितानन्दमयशब्दस्थोपि मयद विकारार्थतामवलम्वेत, किन्तु सर्वत्र प्राचुर्य एव मयडिति भगवदभिप्रायः । न चात्र किं प्रमाणमिति वाच्यम् । 'विकारशब्दादिति चेन्न प्राचुर्यादिति भगवनिःश्वसितरूप- सूत्रस्यैव प्रमाणत्वात् । न ह्यनेन सूत्रेणानन्दमयशब्दस्थमयट एव प्राचुर्यार्थकत्वमुच्यते, किन्त्वन्नरसमयाद्यानन्दमयान्तशब्दस्थसर्वमयटामपि । सङ्कोचे प्रमाणाभावात् • ! अपरश्च, 'विकारशब्दादिति चेदिति सूत्रभागेन पूर्वान्नमयादिषु यथा विकारे मयत्, तथानन्द- मयेपि विकारे मयडित्पन्नमयादारभ्यानन्दमयान्तं विकारे मयदं पूर्वपक्षत्वेनानूद्य 'नेती'त्य. नेने पक्षं निपिथ्य 'माधुर्यादिति सामान्यत एव समाधानमुक्तं सर्वमयडिपयकत्वेन । आनन्दमयशब्दस्थमयदर्थमात्रविपपकत्वे 'विकारशब्दादिति चेन्नात्र प्राचुर्यादित्येव सूत्रित स्यात् । न च 'आनन्दमयोऽभ्यासादित्यानन्दमयप्रकरणादन्नशब्दानुक्तिः । एवमप्यन्नरस- मयादिस्थमयद्धिकार इत्यस्यास्यानागमनात् विज्ञानमयान्तं मयविकार इत्यत्र प्रमाणाभावात् । अथ चान्नरसमयादीनामपि ब्रह्मत्वप्रसङ्गः इत्युक्तम् । तत्तु 'स एतावानासे'त्यादि- श्रुतेरिष्टापत्तिग्रस्तम् । न च तानन्दमय एव को विशेषः । स एकाकी न रमते, स द्वितीय- मेच्छ'दित्यादिश्रुतेः क्रीडार्थमेव सर्वरूपेण प्राकट्यं भगवतः । सा क्रीडा तु तारतम्याभावे रसालतां नापयत इत्यन्नरसमयादिपु केवलसत्त्वक्रियाशक्तिमधानसत्त्वक्रियाज्ञानोभयविशिष्ट- सच्चविशिष्टज्ञानक्रियाशक्तिविशिष्टसत्त्वरूपेण सच्चिदानन्दरूपेण पूर्णफलरूपसच्चिदानन्दरूपेण चानन्दमयस्य आविर्भावविशेषात् । तस्मादन्नरसमयादीनामपि ब्रह्मत्वेस्माकं न कापि हानिः । यदपि पुनस्तत्रैव तैरुक्तं 'अत्राह युक्तमन्नमयादीनामब्रह्मत्वं, तस्मात्तस्मादान्तरस्या- न्यस्यान्यस्यात्मन उच्यमानत्वाद् , आनन्दमयात्तु न कश्चिदन्य आन्तर आत्मोच्यते, तेनानन्दमयस्य ब्रह्मत्वम् , अन्यथा प्रकृतहानामकृतप्रक्रियाप्रसङ्गादिति पूर्वपक्षीकृत्य, 'अ- रोच्यते । यद्यप्यन्नमयादिभ्य इवानन्दमयादन्योन्तर आत्मेति न श्रूयते, तथापि नानन्द- मयस्य ब्रह्मत्वम् । यत आनन्दमयं प्रत्य श्रूयते 'तस्य मियमेव शिरः, मोदो दक्षिणः पक्षा, प्रमोद उत्तरः पक्षः, आनन्द आत्मा, ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेति । तत्र यद्रा मन्त्रवणे महतं 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेति तदिह 'पुच्छं प्रतिष्ठे'त्युच्यते, तद्विजिज्ञापयिपयै- पानपयादय आनन्दमयान्ताः पञ्च कोशाः कल्प्यन्ते, तर कुनः मतदानामकनपक्रि.

मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता । याप्रसङ्गः इति । नन्वानन्दमयस्यावयवत्वेन ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेत्युच्यते, अन्नमयादीना- मिव, 'इदं पुच्छे प्रतिष्ठे'त्यादि, तत्र कथं ब्रह्मणः स्वप्रधानत्वं. शक्यं विज्ञातुम् । प्रक- तत्वादिति ब्रूम' इति । तदपि न । प्रियादीनामवयवत्वं कल्पितमिति श्रुत्योच्यते, स्वतो वा । नायः । ताह- शश्रुतेः प्रचरद्रूपैकादशशाखास्वनुपलभ्यमानत्वात् । उत्सन्नशाखाश्रुतिषु तु कल्पितत्वभ्रमस्य जागरूकत्वात् । न च श्रुतयोपि कल्प्यन्त इत्यत्र किं प्रमाणम् । 'वर्णानां द्वापरे ध्वंसः सङ्की- यन्ते तथा मजाः । द्वैधमुत्पद्यते चैव युगे तस्मिन् श्रुतौ स्मृतौ । द्विधा श्रुतिः स्मृतिथैव निश्चयो नाधिगम्यते । अनिश्चयाधिगमनाद्धर्मतत्वं न विद्यते । धर्मतत्त्वे ह्यविज्ञाते मतिभेदश्च जायत' इत्यारभ्य ' कृच्छादर्थः प्रसिध्यती'त्यन्तेन पूर्वोक्तमुक्ताद्वापरे सर्वभूतानां कायाः क्लेशपुर- स्कृताः । लोभान्नभिर्वागपुच्छं तवानामविनिश्चयः । वेदशास्त्रप्रणयनं धर्माणां सङ्करस्तथा । दुरदृरैर्दुरधीतैर्दुराचारैर्दुरागमैः । विप्राणां कर्मदोपैश्च प्रजानां जायते भ्रम' इति मत्स्यपुराणी- यमन्वन्तरकल्पीयश्रीमत्स्योक्तप्रघट्टकस्थलोभननितवेदशास्त्रपणयनोक्तेरेव प्रमाणत्वात् । न च तर्युत्सन्नशाखास्येयं श्रुतिः कल्पिता नेयं कल्पितेति कथं ज्ञेयमिति वाच्यम् । प्रचरदूपैकाद- शशाखाश्रुतीतिहासपुराणगीतैकादशस्कन्धस्थसाक्षाद्भगवदुक्तिसंवादित्वासंवादित्वाभ्यां कल्पि- तत्वाकल्पितत्वयोर्जायमानत्वात् । नान्त्यः । स्वतःकृतकल्पनाया निश्वसितमूलकत्वाभावेनाम- माणत्वात् । तस्मात् प्रियशिरस्त्वाद्यवयवा ब्रह्मणि पारमार्थिका एव, न कल्पिता इति सारम् । अथावयवत्वेनोक्तरप्रधानत्वेन मतीयमानस्यापि 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठे'त्यत्रोक्तब्रह्मण एव मधानत्वं प्रकृतत्वादिति यदुक्तं, तदपि न । 'ब्रह्मविदामोति पर मित्यत्र सर्वकामभोग- रूपमाप्तिविशिष्टं 'ब्रह्मणा विपश्चिते त्यत्र विपश्चिद्ब्रह्मत्वेनोक्तं परब्रह्म फलम् , साधनशेपब्रह्म तु ज्ञानद्वारा तत्माप्तौ स्वरूपयोग्यतासम्पादकत्वेन कारणम्, साक्षात्कारणं तु तादृशयोग्यतावति भगवत्कृपया परभक्तिप्रादुर्भावः । एवं च साक्षादिष्टतमत्त्वात् परमेव प्रधान, पुच्छत्वेनोक्तं ब्रह्म तु स्वज्ञानद्वारा तत्र योग्यतामात्रसम्पादकत्वेनापेक्षितत्वादप्रधानम् । एवञ्च, 'गौणमु. ख्ययोर्मुख्य कार्यसंप्रत्यय ' इति न्यायात परमेव प्रकृतं मुख्यतयेति क पुच्छत्वेनोक्तं ब्रह्म मुख्यतया प्रकृतम् । अत एव यथा पुच्छत्त्वेनोक्तं ब्रह्मोपक्रमे गौणतयैव निर्दिष्टं, तथैवो. पसंहारेऽपि पुच्छत्वेन निर्दिष्टं गौणत्वज्ञापनायैवेति दिक् । अथवानन्दमयस्य युक्तिभिरमधानब्रह्मत्वस्थापनपूर्व यत् पुच्छब्रह्मण एव प्रधानत्व- मुक्तं मायावाद्याचार्यैस्तत्कि व्यासाभिप्रायेण स्वातन्त्र्येण वेति पृच्छामः । तत्र नाथः । 'ब्रह्म पुच्छमित्यत्रोक्तं ब्रह्मैव प्रधानत्वेन यदि व्यासाभिमतं स्याद्, अथवानन्दमयमशुद्धत्वा- दपधानत्वेनाभिमतं च स्यात्, तदानन्दमयाधिकरणं विरचितमेव न स्यात्, विकारार्थकमय- सत्ययान्तत्वेनानन्दमयशब्दे शुद्धब्रह्मवाचकत्वसन्देहाभावात् , 'सन्देहे ति न्यायेन मवृत्तिरिति सिद्धान्तविरचनेपि नानन्दमयो विकारार्थमत्ययान्तशब्दादित्येव कृतं स्यात् । आनन्दमये - तैत्तिरीयोपनिषद् । प्रधानब्रह्मत्वस्यैव निपेध्यत्वात् । न च पुच्छत्वेनोक्ते ब्रह्मणि (?) प्रधानब्रह्मसन्देहनि- राकरणार्थमिदमधिकरणमिति वाच्यम् । तदा 'ब्रह्म प्रधानमभ्यासादित्येव सूत्रितं स्यात्, 'न त्वानन्दमयोऽभ्यासादिति। न द्वितीयः । स्वातन्त्र्येण कृतस्य वेदव्याख्यानस्य 'शङ्करः शङ्करः स्या'दित्यादि वचनैः शङ्करस्य शङ्करत्वात् । 'त्वं च रुद्र महाबाहो' इत्यादिवचनोक्तव्यामोहै- कमयोजनत्वात् । भगवज्ज्ञानकलावतारस्य श्रीमतो व्यासस्य वेदपुराणविभागकरणवेदार्थ- विचारेतिहासकरणार्थमेवावतारात्तदुक्तवेदार्थस्य व्यामोहनार्थत्वाभावात् व्यामोहकशास्त्रकर- णार्थ व्यासावतार इति कुत्रापि पुराणादिषु प्रतिपादितत्वाभावाचेति सर्वे भव्यम् । यत्पुनस्वैरुक्तं निन्यानन्दमयस्यावयवत्वेन ब्रह्मणि विज्ञायमानेन प्रकृतत्वं हीयते । आनन्दमयस्यावि ब्रह्मत्वादिति पूर्वपलीकृत्य, 'अनोच्यते, तथा सति तदेव ब्रह्मानन्दमय आ- स्मावयवी, तदेव च ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठावयव इत्यसामञ्जस्यं स्यात् । अन्यतरपरिग्रहे तु युक्तं ब्रह्म पुच्छ मतिष्ठे'त्यत्रेय ब्रह्मनिर्देश आश्रयितुम् । ब्रह्मशब्दसंयोगात् । नानन्दमयवाक्ये, ब्रह्मशब्दसंयोगाभावादिति । तदापि न । यथा मृत्तिकापिण्डस्पैकत्वेपि प्रचुरमृत्तिकामयो घटोऽचयची, स्वल्पमृचिकामयी कन्धाकारग्रीवास्यवो, यथा च सुवर्णस्यैकत्वेपि प्रचुरमुवर्णमथ्यश्वप्रतिकृतिरवयवी, स्वल्पमु- वर्णमयी पुच्छमकृतिरवयवः, तथा तदेवानन्दमयमचुरानन्दरूपेणावयवी, स्वल्पानन्दाक्षररूपे- णावयव इत्यसामञ्जस्याभावात् । किञ्च, ब्रह्मशब्दसंयोगात् ब्रह्मनिर्देशो 'ब्रह्म पुच्छं मतिष्ठे'त्य- त्रेवाश्रयितुं शक्यत इत्युक्तं, तदपि न । यतो ब्रह्मनिर्देशो नाम ब्रह्मत्वमात्रकथनमुत प्रधान- ब्रह्मत्वेन । तत्र ब्रह्मत्वाश्रयणेस्माकं न क्षतिः । प्रधानब्रह्मत्वं तु नायितुं शक्यते । अन्न- रसमयमारभ्य विज्ञानमयान्तं पुच्छत्वेनोक्तानां सर्वेषामेव यदि प्राधान्यमाश्रितं भवेत, तदात्रापि पुच्छमाधान्यमाश्रीयेत । तथा तु नाश्रितम् । अतोत्रैवाकस्मात्तथाश्रयणे भवदुक्तार्धजरतीयन्याय- विरोधः । तस्मान्मयइन्तप्राधान्यनिरूपकप्रकरणे आनन्दमयस्यापि मयडन्तत्वाद प्राधान्य न पुच्छब्रह्मण इति ज्ञेयम् । यदपि तैरुक्तम् 'अपि च, ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठे'त्युक्त्वेदमुच्यते तदप्येप श्लोको भवति, असन्नेव स भवति, असद्ब्रह्मेति चेद चेत् । अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद, सन्तमेनं ततो विदुरिति । अस्मिन् श्लोकेऽननुकृप्यानन्दमयं, भावाभाववेदनयोर्गुणदोपाभिधानादम्यते 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठे'त्यत्र ब्रह्मण एव स्वप्रधानत्वमिति । न चानन्दमयस्यात्मनो भावाभावशङ्का युक्ता । मियमोदादिविशेपस्यानन्दमयस्य सर्वलोकमसिद्धत्वादिति । तदपि न । अन्नरसमयमारभ्य विज्ञानमयान्तमुक्तानां श्लोकानां तत्तन्मयडन्तस्तावक- त्वेनोक्तवादत्रापि मयडन्तानन्दमयस्तावकत्वमेव 'असन्नेव स भवतीति श्लोकस्यापि वस्तुं योग्यत्वात् । न चानन्दमयो ब्रह्मशब्दवाच्यो न भवतीति कथमस्मिन् श्लोके ब्रह्मशब्देन वस्तुं शपयत इति वाच्यम्। 'ब्रह्मविदामोति पर'मित्यत्रोक्तपरविवरणतयोच्यमानब्रह्मणा विपश्चिते- मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता । ३९ स्यत्र ब्रह्मणेति पदेनोक्तानन्दमये ब्रह्मशब्दवाच्यत्वस्य डिण्डिमवादितत्वात् । उक्तरीत्यास्य लोकस्य मयडन्तस्तावकत्ये सत्येतच्छोकस्थब्रह्मपदेन मयडन्तस्यैवोक्तावेतच्छोकरूपश्रुते- रपि मयडन्तस्य ब्रह्मपदवाच्यत्वे प्रमाणत्वाच । अब मियमोदादिविशेपस्यानन्दमयस्य सर्व- लोकमसिद्धत्वाद्भावाभावशङ्का न युक्तेत्युक्तम् । तत्राक्षरब्रह्मणोपि वेदमसिद्धत्वात्तत्रापि भावशङ्कनया अयुक्तत्वमित्यस्माभिरपि वक्तव्यत्वात् । किञ्च, ब्रह्मविषयकभावाभाचवेदनज- गुणदोपयोधनार्थ हि लोकोयं स किं नास्तिकं प्रत्युच्यते, अथवास्तिकं प्रति । तत्र नाद्यः । नास्तिकस्य खेतादृशवचनसहसेप्युक्ते ब्रह्मविपयकभावाभावगुणदोपयोर्मनस्यनागमनात् । नान्त्यः । आस्तिकस्यापि वेदोक्तत्वेन ब्रह्मणो निश्चयात् भावाभावज्ञानासम्भवात् । न च श्रुतिप्रसिद्धपि ब्रह्मणि नास्तिकयुक्तिश्रवणजन्यविपरीतमतेः पुरुपस्य ब्रह्मविषयकभाव- सन्देहः स्यात् , तन्नित्यर्थमयं श्लोक इति वाच्यम् । तर्हि मियमोदममोदादीनां लोकप्रसिद्ध- प्यानन्दमये नास्तिकयुक्तिश्रवणजन्यविपरीतमतेः पुरुपस्यानन्दमयब्रह्मविपयकभावाभावस- न्देहनिहत्त्यर्थमेवायं श्लोक इति अस्माभिरपि वक्तुं शक्यत्वात् । किञ्च, प्रियमोदादीनां लोकप्रसिद्धत्वेप्येतदवयव विशिष्टात्मरूपावयवी न प्रसिद्ध इति तादृशावयविविषयकसन्देहनिट- त्यर्थमयं श्लोक इत्यपि वक्तं शक्यते प्रतिवादिनं प्रतीति न किञ्चिदेतत् । वस्तुतस्तु यथास्य श्लोकस्वार्थस्तमवोचामैव । श्रीमदस्मदाचार्यचरणास्तु 'सह ब्रह्मणा विपश्चिते'त्यत्र सहशब्द- योगादत्राप्रधानतृतीयोक्ता । एवं च भोगकरणे परब्रह्माप्रधानमित्यागतम् । तत्र भ- क्तिसिद्धान्तानभिज्ञस्य 'कस्यचिदेतादृशपरब्रह्मविषयकभावाभावशङ्कग स्यात् । तन्नित्यर्थपयं श्लोक इत्याहुः। यदपि पुनस्तरुक्तं 'कथं पुनः स्वमधानं सद् ब्रह्मानन्दमयस्य पुच्छत्वेन निर्दिश्यते, 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठति' इति पूर्वपक्षीकृत्य, 'नैप दोप, पुच्छवत्पुच्छ, प्रतिष्ठा परायणमेकनीड लौकिकस्यानन्दजातस्य ब्रह्मानन्द इत्येतदनेन विवक्ष्यते, तेन नावयवत्वम्, 'एतस्यैवानन्द- स्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्तीति श्रुत्यन्तरादिति । तदपि न । पुच्छवत्युच्छमिति हि लाक्षणिकोर्थः । सा लक्षणा तु मुख्याथबाधे भवति । न चात्र मुख्यार्थवाधः । हंसावतारे श्रीमद्वाराहाद्यवतारे चाक्षरब्रह्मणः पुच्छत्वस्य सम्भवात् । अत एवोक्तं श्रीमदस्मदाचार्यचरणैर्भागवततत्त्वदीपे सर्वनिर्णयमकरणे - ईसा- कृतित्वकथने पुच्छत्वं परमात्मन' इति । अथ लौकिकानन्दजातस्य ब्रह्मप्रतिष्ठापरायणमे- कनीडमित्येवं या विवक्षा, सापि न साधुतरा । अलौकिकब्रह्मरूपानन्दमयनिरूपणप्रकरणं होतत् । एवं च ब्रह्मरूपानन्दमयस्यैवायमाधार इति युक्तम् । न चानन्दमयस्य ब्रह्माधारत्वे ब्रह्मण एव प्राधान्यमायातीति वाच्यम् । 'धाम देहे गृहे रश्मा विति कोपाखामशब्दस्य देहराहरश्मिरूपाश्चत्वारोाः । एवञ्च, देहटहरश्मिरूपत्वे ब्रह्मणो न माधान्यमायाति । देहगृहरश्मिषु देहिगृहिरश्मिवतामेव प्रधानत्वस्य दृश्यमानत्वात् ।

४० . तैत्तिरीयोपनिषद् । यदपि तैरुक्तम्, 'अपि चानन्दमयस्य ब्रह्मत्वे मियाद्यवयवत्वेन सविशेपं ब्रह्माभ्यु- पगन्तव्यम् , निर्विशेपं तु ब्रह्म वाक्यशेपे श्रूयते, वाङ्मनसागोचरत्वाभिधानात् । 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न विभेति कुतश्चनेति । तदपि न । ब्रह्म सविशेष निर्विशेपं वा न लौकिकममाणगम्यम् , किन्तु श्रुत्यैकसम- धिगम्यम् । श्रुतिश्चातिप्रमाणतमा । भगवन्निाश्वसितत्त्वात् । तदुक्तास्थूलादिवाक्यैर्यथा ब्रह्मणि निर्विशेपत्वमङ्गीकर्तव्यम् , तथा तदुक्तं 'विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतो मुखो विश्वतो वाहुरुत विश्वतः पा' दित्यादिवाक्यैः सविशेपत्वमप्यङ्गीकर्तव्यमेव । न च विरोधः । लोकविलक्षणब्रह्मणि विरोधाभावात् । अत एव 'नेपा तर्केण मतिरापनेये' त्यादिश्रुतिः । अत्राधिको विचारस्त्व- स्मदाचार्यतनुजरत्नकृतविद्वन्मण्डनाख्यग्रन्थे द्रष्टव्यः, विस्तरभिया नेह तन्यते । न च ' यतो वाच ' इत्यस्याः श्रुतेः का गतिः । अस्पा हि श्रुताववामानसगोचरत्वं यथोच्यते, तथानन्दं ब्रह्मणो विद्वानिति बामनोगोचरत्वमप्युच्यते । एवं च वामनसागोचरत्वं तद्गोचरत्वं च प्रकारभेदेन वक्तव्यम् । स प्रकारस्तु जीवेच्छया वाङ्मनोगोचरो न भवति, स्वेच्छया तु वाङ्मनसगोचरो भवतीत्यादिरेवेति न काप्यनुपपत्तिः । यदपि तैरुक्तं ' अपि चानन्दप्रचुर इत्युक्ते दुःखास्तित्वमपि गम्यते, प्राचुर्यस्य लोके प्रतियोग्यल्पत्वापेक्षत्त्वात् । तथा च 'यत्र नान्यत् पश्यति नान्यत् शृणोति नान्यद्विजानाति स भूमेति भूम्नि ब्रह्मणि तव्यतिरिक्ताभाषश्रुतिरुपरुध्येत । प्रतिशरीरं च प्रियादिभेदादानन्दस्य भिन्नत्वम् । ब्रह्म तु न मतिशरीरं भिद्यते, 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मे' त्यानन्त्यश्नुतेः । 'एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मेति च श्रुत्यन्तरादिति । तदपि न । अग्रे 'रसो वै स' इत्यनेनानन्दमयस्य रसरूपत्वेन वक्ष्यमाणत्वात् रसस्य च संयोगविप्रयोगात्मकत्वेन द्विविधत्वात् विप्रयोगस्य च दुःखात्मकत्वात् दुःखसम्भेद- शानन्दमये श्रुत्यैव प्रतिपाद्यत इति नास्मासु तत्र भरद्वचनावकाशः । न च जीवनुल्यता- पत्तिः । कर्मजन्यदुःख एव जीवतुल्यतापतेः । अत्र तु दुःखं स्वरूपभूतमेवेति जानीहि । न च रसो नाम तृप्तिहेतुरानन्दकरो मधुराम्लादिः प्रसिद्धो लोके 'रसमेवायं हि लब्ध्वानन्दी' मुखी भवति हि तत्रार्थः करिष्यत इति वाच्यम् । सम्भवति शक्यार्थत्व लाक्षणि- कार्यस्यान्याय्यत्वात् । न च तर्हि रसशब्देन सामान्यत उक्तः 'सर्वरस'इति श्रुत्यन्तराचाम्ला- दिरसरूपताप्यानन्दमयस्य स्यादिति वाच्यम् । ब्रह्मत्वात्सर्वरूपतायां शृङ्गारादिरसस्यापि सर्वमध्ये मतिमत्वात् शृङ्गारसरूपताया अपि सिद्धत्वात, परन्त्वेतावान् विशेपो यदम्लादिरस- रूपोक्षरब्रह्मरूपजगदूपेण, पुरुषोत्तमरूपेण तु शृङ्गारादिरसरूप एव । अथ 'नान्यत् पश्यती'- त्यादिश्रुतिरुपरुध्येतेति यदुक्तं, तत्र 'नान्यत्पश्यती'त्यादिश्रुतिस्तु स्वरूपतदन्तर्गतधर्मान्यधर्म- दर्शनश्रवणशानान्येव निपेति, न स्वरूपान्तर्गतधर्मदर्शनश्रवणशानान्यपीति न सा श्रुति- रुपरुध्यते। - मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता । कश्चि'चन्नमयमाणमयमनोमयविज्ञानमयानन्दमया मे शुध्यतां ज्योतिरहं विरजा विपा- प्मा भूयासं स्वाई'त्यनेन महानारायणोपनिपदुक्तविरजाहोमीयमन्त्रेण स्वानन्दमयस्य शुद्धि- कथनादशुद्धत्वनिश्चयेन न शुद्धब्रह्मत्वम् , किन्त्वशुद्धब्रह्मत्वमेवेति दूपणान्तरमाह । तत्रापि चूमः । यथा 'दुपदादि च मुश्चन्तु द्रुपदादि चेन्मुमुञ्चान' इति मन्ये 'आप: शुध्यन्तु मैनस' इत्यत्र शुध्यन्तुपदस्य शोधयन्त्वित्यन्तर्भूतणिजयंत्यम् । एवमेव 'ओमित्येका- क्षरं ब्रह्मेति मन्त्रे 'गायत्री छन्दसां मातेदं ब्रह्म जुषस्व मे' इत्यत्र च जुषस्व जोपयस्वेत्य- न्तर्भूतणिजयंत्वमेव वेदभाप्ये सन्ध्यामाप्ये चोक्तम् । अन्यथा प्रथममन्त्र मामिति पदस्यान- न्वितत्वापत्तेः। द्वितीयमन्त्रेऽर्थस्यासनतत्वापत्तेश्च । एवमेवात्राप्यन्नमयादिभ्यो देवताभ्यः 'इदं न ममेति त्यागस्य क्रियमाणत्वादन्नमयादीनां हविर्भागिदेवतात्वे सिद्धे शोधकत्वस्य सिद्ध शोध्यत्वस्यासम्भवाच्छुध्यन्तामित्पस्य शोधयन्तामित्यन्तर्भूतणिजयंत्वमेव सिध्यति । न चात्र णिजथ प्रति किं कर्मेति वाच्यम् । सन्निहितो ज्ञानमतिबन्धकरजोगुणविशिष्टः पापविशिष्टोग्रे वक्ष्यमाणैतद्वाक्योक्ताईपदोक्तात्मशब्दवाच्यपदार्थः, तस्यैव कर्मत्वात् । यद्वा, व्यत्ययो बहुल' मिति सूत्रान्मे' इति द्वितीयास्याने पष्ठी, गायत्री छन्दसां मातेदं ब्रह्म'त्यत्र गायत्रीशब्दात् प्रथमार्थे द्वितीयैव । तथा च पूर्वव्याख्याने 'अन्नं ब्रह्मेति व्यजाना'दित्यादिनान्नमयादीनां तपःसा- धनोत्तरं ब्रह्मत्वेनानुभवस्य भृगोभृगुवल्ल्यामुक्तत्वाद्ब्रह्मरूपा मे मत्सम्बन्धिनो मयि स्थिता इति यावदीदृशा अन्नमयादयः, अग्रेवाच्यरजोविशिष्टपापविशिष्टात्मस्वरूपं कर्मीभूतं शुध्यन्तां शोधयन्तामित्यर्थः। द्वितीयव्याख्याने मे मामन्नमयादयः शोधयन्तामित्येवार्थः । एवञ्च कानन्दमयस्याशुद्धत्वशङ्कापीति निपुणतरं निभालय । त्वत्सम्मतव्याख्याने तु शोध्येप्वन- मयाद्यानन्दमयान्तेषु स्वस्यैव शुद्धिसम्पादकत्वप्रतीतेरर्थविरोधः स्पष्ट एव । शुद्धिकर्मशुद्धि- कारभेदस्य लोके शास्त्रे वा दृश्यमानत्वाभावात् । न चान्नमयायधिष्ठातृदेवताः शोधिकाः, शोध्यास्त्वानन्दमयान्ता इति वाच्यम् । इविदर्दानोद्देश्यकदेवतावाचकान्नमयादिपदानां मन्त्रेऽनुपलभ्यमानत्वात इविनोदेश्यकदेवतावाचकपदविशिष्टानामेव सर्वमन्त्राणां यज्ञादिषु दृश्यमानत्वात् । यदि चान्नमयाद्यानन्दमयान्तपदानि देवतावाचकान्येवेत्युच्यते, तदा शुध्यन्तामिति पदस्य शोध्यशोधकयोरभेदस्य दृश्यमानत्वाभावेन णिजन्तरर्भाव विनाओं न वक्तुं शक्यत इत्यस्मदुक्त एवार्यस्त्वयाप्यङ्गीकृत इति जितमस्माभिः । न च वहिरेवान देवतेति वाच्यम् । मन्त्रे तद्वाचकपदाभावात् । अन्नमयादिभ्यो देवताभ्य 'इदं न ममेति त्याग- स्यैव सकलवैदिकशिष्टैः क्रियमाणत्वाचेत्यलं पलायितानुसरणप्रयासेन । अथ प्रियादिभेदादानन्दस्य प्रतिशरीरं भिन्नत्वं, ब्रह्म तु प्रतिशरीरं न भिद्यते, सत्यज्ञानानन्त्यश्रुतेः, 'एको देव' इति श्रुत्यन्तराचेत्युक्तम् । तदपि न ।' यदेकमव्यक्तमनन्तरूपं विश्वं पुराणं तमसः परस्तादिति महा- नारायणोपनिपच्छुत्या ब्रह्मणोनन्तरूपत्वेन प्रतिशरीरं भिन्नत्वस्यापि श्रुत्युक्तत्वात् । सत्यं ४२ तैत्तिरीयोपनिषद् । ज्ञानमनन्तमित्यत्राप्यनन्तपदं देशतः कालतो धर्मतः स्वरूपतनानन्तत्वमेव व्रते । सोचे प्रमाणाभावात् । यदपि तैरुक्तं 'न चानन्दमयाभ्यासः श्रूयते, मातिपदिकमात्रमेव हि सर्वत्राभ्यस्यते । 'यदेप आकाश आनन्दो न स्यात्, सैपानन्दस्य मीमांसा भवति, आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न विभेति कुतश्चन, आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानादिति । यदि चानन्दमयशब्दस्य ब्रह्मविषयत्वं निश्चितं भवेव , तदा तत उत्तरेष्वानन्दमात्रप्रयोगेष्वप्यानन्दमयाभ्यासः कल्प्येत । न त्वानन्दमयस्य ब्रह्मत्वमस्ति, मियशिरस्त्वादिहेतुभिरित्यवोचाम । तस्माच्छ्रुत्यन्तरे 'विज्ञानमा- नन्दं ब्रह्मेत्यानन्दमातिपदिकस्य ब्रह्मणि प्रयोगदर्शना द्यदेप आकाश आनन्दो न स्यादि- त्यादिब्रह्मविषयप्रयोगः, न त्वानन्दमयाभ्यास इत्यवगन्तव्य मिति । तदपि न । परविवरणतयोक्त'सह ब्रह्मणा विपश्चितेति प्रतिपादितविपश्चिद्रह्मत्वस्यान- न्दप्रचुरत्वेन परमकाष्ठापन्नफलरूपस्य प्रियशिरस्त्वादीनां कल्पितत्वे प्रमाणाभावान्नित्यसिद्ध- मियशिरस्त्वादिधर्मविशिष्टस्य परमफलतावोधनार्थमेव माचुर्यार्थकमयट्प्रत्ययान्ततया निर्दि- टस्यात एव प्रधानभूतस्य पथात्मयोजनाभावात् केवलप्रातिपदिकमात्रेणैवाभ्यस्तस्यैतमा- नन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रम्येत्यनेनोपसंक्रमणे प्रचुरानन्द- त्वज्ञापनार्थ पुनरपि मयडन्ततयैवोपसंहारे कथितस्यानन्दमयस्यैवाभ्यासो 'यदेप आकाश आनन्दो न स्या'दित्यादिषु, न तु ब्रह्मविपयकः प्रयोग इति सिद्धम् । एवञ्च, ब्रह्मणा विप- श्वितेत्युक्तब्रह्मत्वस्यानन्दमयस्याभ्यासः श्रूयत एवेति तैरुक्तं वाधितमेव । न हि सर्वत्राभ्यासे तेनैव शब्देनाभ्यास इति निपमः, किन्तु तद्वाचकशब्दैरेवाभ्यासः कर्तव्य इति सिद्धान्तात् । न वानन्दमयो नानन्दो येन प्रातिपदिकाभ्यासस्य तदभ्यासत्वाभाव उच्यतेति दिक् । अथवाभ्यासो हि द्विविधः । शब्दतोऽयंतश्च । तत्रानन्दमयशब्दतोभ्यासाभावेपि रस होगायं लब्ध्वानन्दी भवति । 'यदेष आकाश आनन्दो न स्पात' 'एप ह्येवानन्दयाति' 'सैपानन्दस्य मीमांसा भवति' ' आनन्दमयमात्मानमुपसंक्रामतीत्यर्थतोभ्यासस्य विद्यमान- त्वात् पुनः पुनः कथनरूपोर्थतोभ्यासोस्त्येव । न ह्यर्थतोभ्यासो नाभ्यासः, किन्तु शब्दत एवाभ्यासोभ्यास इत्यत्र नियामक किश्चित्पादिकमस्ति ? किश्च, श्रीमद्वयासचरणानाम- भिप्रेतोप्याभ्यास एवात्र । यत आनन्दमयशब्दस्य पुनः पुनः कथनरूपाभ्यासमानन्दवल्लयां भृगुवलयां चापश्यन्तोपि श्रीमदवासचरणा यदानन्दमयोभ्यासादिति सूत्रं कृतवन्तस्तत्वार्या- भ्यासाभिप्रायेणैवेति स्फुटतरमेव । इदमेवाभिसन्धाय श्रीमदस्मदाचार्यरिदमधिकरणं पाच- सागः 'को दोवान्यात् कः पाण्याद्यदेप आकाश आनन्दो न स्यात् । एप घेवानन्दयातीत्यान- न्दयतीत्यर्थ इत्यर्थतोऽभ्यास' इत्युक्तम् । अत्रेदं शेयम् । आनन्दमयशब्दार्थो ह्यानन्दविशेषणक- माधुर्य विशेष्य को न भवति ! आनन्दप्राचुर्यस्य प्रधानामधानब्रह्मत्वाभावात् । आनन्दस्पैच ब्रह्मत्वात् । न चानन्देन प्रचुर आनन्दमय इति प्रचुरविशेष्यकोपि । व्याकरणानभिमतत्वात् . मटपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता । पार्थकमयटः प्रथमान्तादेव मुचन्ताद्विधानाच, किन्तु प्राचुर्येण प्रकृतानन्दस्ताहगानन्दो चा यस्मिन्निति वानन्दविशेष्यकस्तविशेष्यको वानन्दमपशब्दस्यार्थः । 'तत् प्रकृतवचने मयोडिति सूत्रशब्दस्य वचनशब्दस्य भावार्थकाधिकरणार्थकल्युडन्तत्वमङ्गीकृत्य मकृतमन्नमय मकृतमन्नं यस्मिन् सोनमयो यज्ञ इत्युदाहरणद्वयं मदर्य उभयथापि सूत्रव्याख्यानस्य महा- भाष्यकारैः कृतत्वात् । एवं च प्रचुरानन्दस्य तागानन्दाधिकरणस्य चानन्दत्वमेवेत्पान- न्दीभवतीत्यादिनानन्दमयशब्दार्थ एवाभ्यस्त इति सुष्क्तं श्रीमदस्मदाचार्यचरणैर्थतोऽभ्या- स इति । नन्वधिकरणार्थकल्युडन्तत्वपक्षेधिकरणस्यानन्दत्वाभाव आयातीति चेत् ? न । वालवादे धर्मधर्मिणोरभेदादधिकरणस्याप्यानन्दत्वात । वस्तुतस्तु · आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । स एको ब्रह्मण आनन्द ' इत्यादिश्रुतिभिर्धर्मिरूपानन्दरूपत्वं धर्मरूपानन्दत्वं च स्पष्टमेवोक्तमिति, न कस्याप्युक्तेरवकाशः । एवं च श्रीमतां व्यासचरणानां सिद्धान्तस्य सामञ्जस्ये सिद्धे मायावाद्याचार्यकृतं लक्षणावृत्त्याश्रयणपूर्वकमत्याग्रहेणानन्दमयाधिकरणस्य व्याख्यानं लोकव्यामोहनार्थमेवेति विभावनीयं निर्मत्सरैरन्तर्वाणिभिरिति सर्व चतुरस्रम् । यदपि तैरुक्तं 'यस्त्वयं मयडन्तस्यैवानन्दशब्दस्याभ्यास: एतमानन्दमयमात्मान- मुपसंक्रामती'ति पूर्वपक्षीकृत्य, न तस्य ब्रह्मविषयत्वमस्ति । विकारात्मनामेवान्नमयादीनाम- नात्मनामुपसंक्रामयितव्यानां मवाहे पतितत्वादिति । तदपि न । अन्नमयादिषु विकारे मयडिति पक्षस्य सर्वत्रात्र प्राचुर्यार्थक एव मयडिति वदद्भिरस्माभिनिरस्तत्वात् । यदपि तैरुक्तं नन्वानन्दमयस्योक्तोपसंक्रमितव्यस्यानमयादिवग्रह्मत्वे सति नैव विदुपो ब्रह्ममाप्तिफलं निर्दिष्टं भवेदिति पूर्वपक्षीकृत्य, नैप दोपः, आनन्दमयोपसंक्रमणनिर्देशे- नैव पुच्छपतिष्ठाभूतब्रह्मप्राप्तेनिर्दिष्टत्वात् । ' तदप्येष श्लोको भवति, यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सहे'त्यादिना च प्रपञ्च्यमानत्वादिति । तदपि न । आनन्दमयोपसंक्रमणे पुच्छाधारभूतब्रह्मोपसंक्रमो भवन्नपि स उपक्रमो ब्रह्मणो गौणत्वपुरस्कारेणानन्दमयस्य च प्रधानत्वपुरस्कारेणैव । ब्रह्मणः पुच्छरूपाङ्गत्वादा- धारत्वाच । यस्माच तदन्तर्गततयैव ब्रह्ममाप्तिरत एवानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामत्यानन्दमय- मात्मानमुपसंक्रम्येत्येतावदेवोक्तम् । प्रधानप्राप्तौ गोणपालेर्जायमानत्वात् । राजप्राप्तौ तदन्त- तिसेवकतहादिप्राप्तिरिख । ' यतो वाच' इत्यत्रापि 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वा'नित्यनेन सचिदानन्दरूपस्य ब्रह्मणोपि यत् आनन्दं आनन्दरूपत्वेनाकांक्ष्यं तद्विद्वान् कुतश्चन न विभेतीत्यर्थस्य प्रतीयमानत्वेन ब्रह्मणोऽप्राधान्यमेव । यदि ब्रह्ममात्रविद्वत्त्वमेव भयाभावे कारणत्वेन प्रतिपिपादयिपितं स्यात् , तदा 'आनन्दं ब्रह्म विद्वा' नित्येवोच्येत श्रुत्या, तस्मात् ब्रह्मानन्दादपि भिन्न आनन्दः प्रतिपिपादयिपित इति पष्ठया निर्देशो ब्रह्मण इति । यदप्युक्तं तैः 'या त्वानन्दमयसन्निधाने 'सोकामयत बहु स्याम प्रजायेये'तीयं श्रुति- तैत्तिरीयोपनिषद् । रुदाहृता सा ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठ'त्यनेन सनिहिततरेण ब्रह्मणा सम्बध्यमानानन्दमयस्य ब्रह्मतां बोधयति । तदपेक्षत्वाञ्चोत्तरग्रन्थस्य 'रसो वै स' इत्यादेर्नानन्दमयविषयतेति । ननु 'सोकामयते ति पुल्लिङ्गनिर्देशो नोपपद्यते ! नायं दोपः । 'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूत' इत्यत्र पुल्लिङ्गेनाप्यात्मशब्देन ब्रह्मणः प्रकृतत्वात् । तदपि न । 'सोकामयते'त्यत्र हि तच्छन्दः, स तूत्सर्गतः पूर्वोक्तमधानपरामर्शी । तत्र पूर्वोक्तमकारेण मधानं चानन्दमय एव, सन्निहितत्वेपि न पुच्छत्वेन निर्दिष्टं ब्रह्म प्रधानम् । एवं चानन्दमयपरामश्यैव तच्छन्दः, न तु पुच्छब्रह्मपरामशीति । अथ पुल्लिङ्गनिर्देशो नोपपद्यत इति पूर्वपक्षीकृत्य, नायं दोपः, 'तस्माद्वा एतस्मादात्मनः आकाशः सम्भूत' इत्यत्र पुलिङ्गेनाप्यात्मशब्देन ब्रह्मणः प्रकृतत्वादिति समादधुः। तदपि न । तहिं पुल्लिङ्गविशिष्टतच्छन्देनात्मा परामृश्यते, तद्वाचकश्चात्मशब्दः । एवं चातिव्यवहितात्मवाच्यपरामर्शो नोचितः, किन्तु सन्निहिततरानन्दमयस्यैव पुल्लिङ्गनिर्दिष्ट- स्यानन्दमयशब्दवाच्यस्य परामर्श एव । प्राधान्यं तु शब्दतोऽर्थतो युक्तितश्चानन्दमयस्यैवे- त्यवोचामवेति योध्यम्। यत् पुनरपि तैरुक्तं 'या तु भार्गवी वारुणी विद्या 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानादिति तस्यां मयडश्रवणात् पियशिरस्त्वाधश्रवणाचायुक्तमानन्दमयस्य ब्रह्मत्वम् । तस्मादणुमात्र मपि विशेपमनाश्रित्य न स्वत एव मियशिरस्त्वादि ब्रह्मण उपपद्यते । न चेह सविशेष ब्रह्म प्रतिपिपादयिपितम् । वामनसगोचरातिक्रमश्रुतेः । तस्मादन्नमयादिग्विवानन्दमयेपि विकारार्थ एव मयविज्ञेयः, न प्राचुर्यार्थ' इति । तदपि न । भार्गववारुणपियाया'मानन्दो प्रति व्यजानादित्यत्र मयडश्रवणेषि आनन्दशन्देनानन्दमयाभिधानात् । न ह्यानन्दमयो नानन्दः येन मयडश्रवणे आनन्दशब्दो नानन्दमयमभिदध्यात् । अपरश्च, आनन्दमयशब्दार्थस्तु प्रचुरानन्द इति, माचुर्य च प्रियमोदप्रमोदानन्दः सामान्यविशेषानन्दरूपैरेवेत्यानन्दमयशब्दाक्षिप्तमियशिरस्वादिनामप्या- गमनात् । अथ च 'रसो वै स' इत्यनेन रसरूपग्रीव प्रतिपाद्यते, रसथालम्बनोद्दीपन- विभावविशिरोनुभावव्यभिचारिभावविशिष्श्य । एवं चालम्बनादिविभावे नापिकानायकयोः प्रविष्टत्वामुख्यत्वाच सविशेपबहीवात्र प्रतिपिपादयिपितम् , न निर्विशेषमेव । वामनसा- गोचरत्वश्रुतिस्तु ब्रह्म जीवेच्छया तद्वायनसागोचरी, ब्रह्मेच्छया तु वाय्मनसगोचर इत्यर्थ- परा अग्रे विद्यानिति वक्ति । सर्वत्रैच प्राचुर्याथै मयद, न तु कुत्रापि विकार इति तु पूर्वमवो. चापैवेति नार पुनरपि यत्तव्यमिति संक्षेपः । यदपि तैः पूर्वोत्तमकारकं स्वाभिमतं सिद्धान्तं परिकल्प्य सूत्रार्थविरोधे प्राप्ते सूत्राणि त्वे व्याख्येयानीत्युपत्या 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठ'त्या किमानन्दमयस्यावयवत्वेन ब्रह्म विव- पवे, उत समधानत्वेनेति । पुच्चदादवयवत्वेनेति प्राप्ते, उच्यते, 'आनन्दमयोभ्यासात् ।

४५ - मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता। आनन्दमय इत्यत्र 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेति स्वप्रधानमेव ब्रह्मोपदिश्यते, अभ्यासात् । असन्नेव स भवती'त्यस्मिन्निगमनश्लोके ब्रह्मण एव केवलस्याभ्यस्यमानत्वात् । विकारशब्दादिति चेत् न, प्राचुर्यात् । विकारशब्दोऽवयवशब्दोभिप्रेतः । पुच्छमित्यवयवशब्दान प्रधानत्वं ब्रह्मण इति यदुक्तं तस्य परिहारो वक्तव्यः । अत्रोच्यते । नायं दोपः । प्राचुर्यादप्यवयव- शब्दोपपत्तेः । माचुर्य मायापत्तिः, अवयवपायवचनमित्यर्थः । अन्नमयादीनां शिर आदि- पुच्छान्तेष्ववयवेक्तेप्वानन्दमयस्यापि शिरस्त्वादीन्यवयवान्तराण्युक्त्वाऽवयवमायापत्त्या 'ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठे'त्याइ, नावयवविवक्षया, यत्कारणमभ्यासादिति स्वप्रधानत्वं ब्रह्मणः समर्थि- तम् । तद्धतव्यपदेशाच । सर्वस्य च विकारजातस्य सानन्दमयस्य कारणत्वेन ब्रह्म व्यपदि- श्यते । ' स इदं सर्वमसृजत यदिदं किञ्चेति । न च कारणं सद्ब्रह्म स्वविकारस्यानन्दम- यस्य मुख्यया वृत्त्यावयव उपपद्यते । अपराण्यपि सूत्रवाक्यानि यथासम्भवं पुच्छवाक्यनिर्दिष्ट- स्यैव ब्रह्मण उपपादकानि द्रष्टव्यानीत्यन्तेन ग्रन्थेनानन्दमयाधिकरणसूत्राणि व्याख्यातानि । तत्रैवं व्याख्यानं तु न शब्दार्थ स्पृशतीति विस्पष्टमेव । न हि 'आनन्दमयोभ्यासादि- त्यनत्यानन्दमयशब्द आनन्दमय इत्यत्र 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठे'ति प्रधानमेव ब्रह्मोपदिश्यत इत्यर्थ, विकारशब्दादित्यत्रत्यविकारशब्दोवयवरूपार्थ, माचुर्यशब्दो वा मायापत्तिरूपं चार्थ, मतिपा- दयितुं शक्तः, शक्तिग्राहकाभावात् । सम्भवति वाच्यार्थे लक्षणाश्रयणस्यान्याय्यत्वाचेति विचा- रकै: प्रेक्षावद्भिर्विचारणीयम् । अपि च, यदि सूत्रकारस्थायमेव सिद्धान्तोभिप्रेतः स्यात्तदा पुच्छत्वेनोक्तं ब्रह्म प्रधानमभ्यासादवयवशब्दादिति चेन पायवचनादित्येव सूत्रितं स्यात्, न त्वानन्दमयोभ्यासाद्विकारशब्दादिति चेन्न प्राचुर्यादिति । अपरञ्च, व्यासचरणास्तु चतु- विशत्यवतारमध्ये गणिताः, अत ईश्वररूपाः। मायावाद्याचार्यास्तु जीवरूपा इति जीवेश्वरो- क्तिमध्ये ईश्वरोक्तेरेव प्रमाणत्वमित्यपि न मायावाद्याचार्योक्ताभिप्रायः प्रमाणम् । न च 'शङ्करः शङ्करः साक्षादिति मायावाद्याचार्या अपि शङ्कनरूपत्वादीश्वरा एच, न जीवा इति वाच्यम् । तर्हि विष्णुशङ्करयोरभिन्नत्वादेकाभिमायस्यैव योग्यत्वाद व्यासाभिमाय- विरुद्धाभिमायकल्पनपूर्वकमत्याग्रहेण शब्दार्थत्यागं कृत्वापि यत् सूत्राणामन्यथार्थकरणं तत्तु 'शङ्करः शङ्करः साक्षा'दित्यादिवचनसिद्धशङ्कनत्वानां मायावायाचार्याणां जगद्व्यामो- हकशास्त्रकरणकारणार्थ भगवताज्ञप्तानां जगद्वयामोहनार्थमेवेति निश्चयात् । न च शङ्करो | व्यामोहकशास्रकरणाथै भगवताशप्त इत्यत्र किं मानमिति वाच्यम् । 'त्वं च रुद्र महावाहो मोहशास्राणि कारय । अतथ्यानि वितथ्यानि दर्शयस्व महाभुज । प्रकाशं कुरु चात्मानम- प्रकाशं च मां कुरु । त्वं च रुद्र महाबाहो मोहशास्त्राणि कारय । अल्पायासं दर्शयित्वा मोहयाशु सुरेश्वरेति वाराहोक्तेः। अथ च, ' यदुक्तं हरिणा पश्चादुमायै प्राह तद्धरः । वामा- राध्य तथा शम्भो ग्रहीष्यामि वरं सदा । द्वापरादौ युगे भूत्वा कळया मानुपादिषु । स्वागमैः कल्पितैस्त्वं च जनान्मद्विमुखान कुरु । मां गोपय येन स्यात् वृष्टिरेपोत्तरोत्तरति । तैत्तिरीयोपनिपद् । पद्मपुराणीयभगवत्सहस्रनामस्तोत्रमध्योक्तः । अथ च ‘मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं वौद्धमुच्य. ते । मयैव कथितं देवि कलौ ब्राह्मणरूपिणा । सर्वस्य जगतोप्यस्य मोहनार्थ कलौ युगे इति पद्मपुराणीयोत्तरखण्डीयोक्तेश्च प्रमाणत्वादिति कृतं पल्लवेन । यत्तु श्रीकण्ठाचार्यों 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठे'त्यत्र ब्रह्मशब्देन प्रणवमत्र केचिदिति निगूढा- भिसन्धिना स्वमतं च वदन् केचिन्मतत्वेनानन्दमयशब्देन शैवी चिच्छक्तिरुच्यते, ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठत्यत्रत्यब्रह्मशब्देन शिवरूपं परं ब्रह्म चोच्यते इत्याह । शिवादित्यमणिदीपिकारूपतव्या- ख्याकारोप्यप्पयदीक्षितोपीममेव पसं शिवादित्यमणिदीपिकायां स्वकृतानन्दलहर्याख्यग्रन्थे च महता प्रवन्धेन स्थिरीचकार । तत्र वदामः । 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठे'त्यत्रत्यब्रह्मशण्दः प्रणवपर इति यदुक्तं, तत्तु किं चानन्दमयस्य ब्रह्म पुच्छमिति श्रूयते तद्ब्रह्म न प्रणवः, ' असन्नेव स भवती'त्यनन्तरश्लोके तदसत्त्वं मन्यमानस्य निन्दाश्रवणाव । प्रणवस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वेन तस्यासत्वशङ्कानास्पदत्वा- दिति शिवादित्यमणिदीपिकाकारेणैव स्वमतानुसारेण तु दूपितमेव । अस्मन्मते तु 'असन्नेव स भवतीति श्लोकस्त्वानन्दमयस्य भाव्यसब्रह्मत्वशङ्कानिवर्तकः, न तु लोकवेदप्रसिद्धपण- वाक्षरब्रह्मविपयकासत्वशानिवर्तकः तयोर्लोकवेदप्रसिद्धत्वेनासत्त्वशङ्कानुदयादस्य वैयकॊपातो भवेत् । न च तकस्यैव ब्रह्मणः परब्रह्मरूपानन्दमयरूपेण धमित्वं, गणितान- न्दरूपाक्षरब्रह्मरूपेण च पुच्छत्वमिति न समन्जसमिति वाच्यम् । 'स एतावानासेति श्रुत्या धर्मिधर्मरूपेण परब्रह्मैवाविर्भूतमिति श्रौतसिद्धान्तादसामञ्जस्याभावात् । अत एव गीतायां 'तद्धाम परमं ममे त्यत्रत्यदेहगृहरश्मिवाचकधामशब्देनाक्षरब्रह्मणो धर्मत्वं, ममेति पदेन च स्वस्मिन् धर्मित्वं, भगवतैव स्पष्टीकृतम् । प्रणवोपि तद्वाचक इति सुतरां धर्मरूप एव । एवं च ब्रह्म पुच्छेत्यत्रत्यब्रह्मशब्दस्य प्रणवपरत्वेऽक्षरब्रह्मत्वे वा नास्माकं क्षतिः । वस्तुतस्तु ब्रह्म- शब्दस्य प्रणवपरत्वे प्रणवः पुच्छ प्रतिष्ठत्येवोक्तं स्यात्, न तु सन्दिग्धार्थकब्रह्मपुच्छं मति- ऐति । किञ्च, ब्रह्मशब्दस्य ब्रह्मप्रकृतिप्रणववेदाक्षरब्रह्मवाचकत्वेन नानार्थकत्वेप्यक्षरब्रह्मरूपा- र्थस्यैव पुरःस्फुर्तिकत्वात् पूर्वोक्तप्रकारेण वाधकाभावाचाक्षरब्रह्मपरताया एवात्रसमञ्जसत्वान्न प्रणवपरता, किन्त्वक्षरब्रह्मपरतैवेति ज्ञेयम् । अपरं चानन्दमयस्य पूर्वोक्तरीत्यापरब्रह्मत्वेन धामत्वेन सन्निहिततरस्याक्षरब्रह्मण एव पुच्छत्वेनाधारत्वेन व कथनस्य साधीयस्त्वाच । केचित्तु ब्रह्मशब्दवाच्यपरब्रह्मभिनं ब्रह्मशब्दवाच्यं यावत्तत्तत्सर्वमेवात्र विवक्षितम् । तत्र त्रयं पुच्छ, 'पुन्छ पथात्प्रदेशे स्याल्लाङ्गुलेपि च कथ्यत' इति विश्वकोशात् पुच्छं पश्चात्प्रदेशः । एक त्वाधारः । तत्र प्रकृतिरूपं ब्रह्मानन्दमयादतिदूरप्रदेशरूपम् । ततः सन्नि हितपश्चात्मदेशरूपं, वेदरूपं ब्रह्म । ततोप्यारब्रह्मवाचकत्वात्मणवरूपं ब्रह्मातिसनिहित- पश्चात्मदेशरूपं पुच्छशब्दवाच्यम् । प्रतिष्ठत्यस्मिन्निति प्रतिष्ठागृहरूपाधारः 'तद्धाम परमं ममे'त्युस्तत्वादृहरूपमक्षरब्रह्मानन्दमयस्यातिसन्निहितत्वात् गृहाधार इति वदन्ति । एवं .

मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता । ४७ च, सर्वथापि 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठे'त्यत्रत्पब्रह्मशब्दवाच्यस्य गौणब्रह्मत्वमेव, न प्रधानब्रह्मत्व- मिति योध्यम् । अतः परमवशिष्यते परमव्योमापरपर्यायानन्दमयशब्देन चिच्छक्तिब्रह्म पुच्छं पतिष्ठेनत्यब्रह्मशब्देन तदाधारः परमशिवो भगवानारायणस्तदंशस्तदंशाः कृष्णाद्याथ पार्वतीरूपा इत्युच्यते । उपबृंहणरूपकूर्मपुराणादिवायुसंहिताग्रुपबृंहितश्वेताश्वतरायुपनिप- मन्त्रादिमिरेताएशार्थस्यैव प्रतिपादितत्वादिति । तत्रापि ब्रूमः । 'वेदार्थों यः स्वयं ज्ञातस्तत्र शङ्का भवेदपि । ऋपिभिनिश्चिते तत्र का शङ्का स्यान्मनीपिणा'मिति व्यासवचनं शिवतत्त्वविवेके तेनोदाहृत्यास्पदादिबुद्धिव्यव- स्थापितवेदार्थापेक्षया ऋपिव्यवस्थापितवेदार्थस्य ज्यायस्त्वं प्रतिपादितम् । अस्मदपेक्षया- धिकज्ञानवत्त्वात् । एवञ्च, यथास्मगुद्धिव्यवस्थापितवेदार्थापेक्षयर्पिव्यवस्थापितवेदार्थस्य ज्यायस्त्वं, तथैवर्पिव्यवस्थापितवेदार्थापेक्षया ब्रह्मशिवादिव्यवस्थापितवेदार्थस्य ज्यायस्त्वम्, ऋष्यपेक्षया तेपामधिकज्ञानवत्वात् । एवमेव ब्रह्मशिवादिव्यवस्थापितवेदार्थापेक्षया पूर्ण- पुरुपोत्तमरूपश्रीकृष्णव्यवस्थापितवेदार्थस्य ज्यायस्त्वम् , पूर्णपुरुपोत्तमापेक्षया तेषां ज्ञानस्य न्यूनत्वात् । अत एव 'सवनशस्तदुपधार्य सुरेशाः शक्रशर्वपरमेष्ठिपुरोगाः । कवय आनतकन्धर- चिताः कश्मलं ययुरनिश्चिततत्त्वा' इत्यनेन शक्रशर्वपरमेष्ठयादीनां भगवत्तत्वज्ञानेऽज्ञानमुक्तं श्रीभागवते । एवं च सर्वावतारावतारमूलभूतेन सारस्वतकल्पप्रकटेन सर्ववेदपुराणादिवि- भागकरणेनाप्यजातचित्तमसादस्य श्रीमतो व्यासस्यापि चित्तप्रसादजनकेन श्रीभागवतोक्तेन भगवता श्रीदेवकीनन्दनेन 'वैदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तवेदविदेव चाहमित्यनेन गीता- म् , अथ च ' किं विधत्ते किमाचष्टे किमनूध विकल्पयेत् । इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो देद कश्चने'त्यनेन श्रीभागवतैकादशस्कन्धे स्वस्यैव परमकाष्ठापनवेदहृदयज्ञानं, स्वाति- रक्तस्य च वेदहृदयाज्ञानमुक्त्वा सदैरहमेव वेद्यः, मदन्यो न वेद्य इत्येवकारेण विशेष्यसहा- सत्त्वादन्ययोगव्यवच्छेदकेन गीतायाम्, अथ 'मां विधतेभिधत्ते मां विकल्प्यापोह्यते ह्यहं, रतावान् सर्ववेदार्थः शब्द आस्थाय मां भिदे'त्यनेनैकादशस्कन्ध एव च विधानाभिधात्ति- मतिपादनविकल्पकरणतदपोहनविषयकस्य सर्वस्यापि वेदस्य स्वमतिपादकत्वमुक्त, गीतावा- क्यस्थ · अहमेव वेद्य' इत्यनेन गीतायां निश्चयवाचकहिशब्देनैकादशस्कन्धे च स्वातिरिक्त- मतिपादकत्वाभावश्च वेदस्योक्तः । तथा चानन्दमयशब्दस्य शैवचिच्छक्तिवाचकत्वं ब्रह्मश- ब्दस्य परमशिववाचकत्वं च खपुष्पायमाणमेव । सर्वेपामपि वेदशब्दाना 'महमेव वेद्यः इत्यनेन सामान्योक्त्या सर्वविधवृत्त्या 'मामभिधत्ते' इति वाक्येनाभिधयापि श्रीदेवकीनन्दनेन स्वपति- पादकत्वस्यैवोक्तत्वात् । कस्मिन्नप्युपबृंहणेनमयादिवानन्दमयशब्देन शैवचिच्छक्तिरक्तति कण्ठरवेणानुक्तत्वाच । श्रीभागवतरूपोपबृंहणे तु वेदस्तुस्तौ वेदैरेव 'पुरुपविधोन्वयोत्र चरमो- नमयादिषु यः सदसतः परं त्वमय यदेववशेषामृत'मित्यत्रानन्दमयस्य भगवत्त्वमुक्तं कण्ठर- घेणैव । अस्य श्लोकस्य ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठेत्यत्रोक्तपुच्छब्रह्मपरतया योजनं तु पूर्वोक्तमका- तैत्तिरीयोपनिषद् ।। रेणानन्दमयस्य प्राधान्यस्थापनेन पुच्छरूपब्रह्मणोप्राधान्यस्थापनेन च निरसनीयम् । एवं च नानन्दमयशब्देन शैवी चिच्छक्तिरायातीति न किञ्चिदेतत् । न च भागवतमप्रमाणमिति वाच्यम् । शिवतत्वविवेके कणों पिधाय निरयावदकल्प दीशे ययक्षरं नाम गिरेरितमित्यादिश्रीभागवतश्लोकानां प्रमाणत्वेनोपन्यासात्तेनैव प्रमाणत्वा ङ्गीकारात् । ननु वैष्णवैर्भागवतं प्रमाणमुच्यत इति तत्ममाणीकृत्य भागवतवचनैरे वैष्णवमुखमुद्रणं कर्तव्यमित्यभिप्रायेण भागवतवचनोपन्यासः कृतः शिवतत्वविवेकका, न तु तत्पमाणीकृत्य कृत इति वाच्यम् । एवंमकारेण शिवतत्त्वविवेकलिखनाभावाव एतादृशाभिप्रायेण लिखने संवत्सरपदीपायतिप्राचीनगौडनिबन्धेषु हेमायादिदाक्षिणात्ययति- क्षेमेन्द्रप्रकाशादिकाश्मीरदेशीयनिवन्धेषु स्मातभट्टाचार्यकृतस्मातनिवन्धेषु च श्रीभागवतवचन- निचयलिखनात् श्रीभागवतप्रामाण्यस्य ब्रह्मणापि दूरीकर्तुमशक्यत्वात् । न च व्यासचित्त- मसादसम्पाकत्वादि भागवतोक्तमर्थवादरूपमिति वाच्यम् । 'पुराणेष्वर्थवादत्वं ये बदन्ति नराधमाः। तैरर्जितानि पुण्यानि तदेव भवन्ति हि । समस्तकर्मनिर्मूलसाधनानि नराधमः । पुराणान्यर्थवादेन ब्रुवन्नरकमश्नुते ।' 'अहो हि वाक्ये चतुरक्षरे द्वे पुण्यस्य पापस्य निदानभूते, उच्चारणादेव नृणां मुनीन्द्रा नारायणश्चेति तथार्थवाद' इत्यादिवृहन्नारदीयपथमाध्याय- वचनैः पुराणेष्वर्थवादत्वोक्तनिपिद्धत्वात् । न चैतदप्यर्थवादरूपमिति वाच्यम् । यत्र यत्क धनादौ पापोत्पत्तिश्रवणं तत्र वाक्येऽर्थवादत्वकथने 'यस्य वेदश्च वेदी च विच्छियेते त्रिपु. रुपं, स वै दुर्ब्राह्मणो नाम सर्वकर्मसु गर्हित' इत्यादिवाक्यानामस्माभिरप्यर्थवादत्वस्य वक्तव्यत्वेन सन्ध्यावन्दनयागादिधर्माणां नित्यत्वाभावापत्तेः । तस्माद्यस्मिन् वाक्ये यत्करणे यत्कथनादौ वा पापोत्पत्तिरुच्यते, तद्वाक्यस्यार्थवादत्वरूपकथनं सर्वधर्ममार्गनाशकमेव एतद्भिन्नवाक्य एवार्थवादत्वकथनं कदाचित्सामञ्जस्यमामुयात् । वस्तुतस्तु तत्राप्यर्थवादत्व कथनं महासाहसरूपमेव । यतो हरिवंशे कलिधर्मीयभविष्यकथने ' अर्थवादः परं ब्रह्म वेदार्थ इति तं विदुः, अनिर्णितमविज्ञातं दायाद्यमिव धार्यते' इति वचनेन वेदार्थेऽर्थवादस्वकयनं कली करिष्यन्तीत्युक्तम् । ननु तर्हि पुराणान्तरोक्तार्थानाममामाण्यापत्तिरिति चेत् । न । सर्वपुरा- णोक्तानामप्यर्यानां प्रमाणत्वात् । न च तर्हि भागवतोक्तार्थे को विशेष इति वाच्यम् । पर मकाष्ठापनार्थप्रतिपादकत्वस्यैव विशेपात् । न च स विशेपः कथं ज्ञात इति वाच्यम् सर्ववेदविभागपुराणादिकरणेनापि व्यासचित्तमसादो न जाता, वदनु नारदोपदेशेन भक्तिः योगपूर्वकमनामणिधाने श्रीव्यासचरणैः कृते सति चित्तपसादो जातः, तदनन्तरं 'अपश्यत्र पुरुपं पूर्ण मापां च तदपाश्रया'मित्यादिना पूर्णपुरुषोत्तमदर्शनं जातम्, तदनु श्रीभागवत कृतम् । एवं च श्रीभागवते ये येऽर्था उपनिबद्धास्ते सर्वेऽपि स्वसमानजातीयेषु परमाकाठा- पन्ना एवेवि श्रीभागवतादेव ज्ञातत्वात् । एवं च न कस्यापि पुराणायुक्तार्यस्यामामाण्यम् किन्तु तारतम्पमात्रमेवेति कृतं प्रसक्तानुप्रसक्तचिन्तया ।

४९ । मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता । 'प्रकृतमनुसरामः । एतेनैव मायावाद्याचार्यकृततैत्तिरीयभाष्योक्तमेतच्छ्रुतिव्याख्यानं परास्तम् । अथाविदुपोप्रकृतत्वेप्यानन्दमयस्यैव सर्वान्तरात्मत्वात् विद्वदविदुपोरप्यन्तरात्मत्वेन वेदविद्वद्विपयकमनानाह अधातोनुप्रश्ना इत्यादिना । अथातौनु प्रश्नाः । उताविद्धानमुं लोक प्रेत्यं । कश्चन गच्छति । आहो वेद्वानमुं लोकं प्रेत्यं । कश्चित्समश्नुता ३ उ इति । अथैतदनन्तरं यस्मादानन्दमय एव सर्वेषामान्तर आत्मलाभस्यैव च 'आत्मलाभान परं विद्यत' इति श्रुतेः परमपुरुषार्थत्वम्, अतो हेतोरनु ब्रह्मोपदेशानन्तरं प्रश्नाः शिप्यकृता इति शेषः । तानेव प्रश्नानाह उताविद्वानमुं लोकमित्यारभ्य कश्चित्समभुता उ इत्य- न्तेन । उत अपि अविद्वान् 'ब्रह्मविदामोती त्यत्रोक्तत्वात् साधनशेपं ब्रह्म यो न जानाति सः अमुं लोकं प्रेत्य यदादीनां बुद्धिस्थवाचकत्वात् यत्रानन्दमयस्तिष्ठति, यत्र स्थित्वा सर्व कामभोगो यः पूर्व 'ब्रह्मविदामोति पर मित्युचि परमव्योमशब्देनोक्तस्तं लोक व्यापिवैकुठं कश्चन कोपि गच्छति । अथवा, सर्वोविद्वान् गच्छति, ब्रह्मणः सर्वात्मत्वात् विदुपम- विदुपं प्रत्यवशिष्टत्वात् । आहो अथवा विद्वान् पूर्वोक्तं ब्रह्म जानन्नमुं पूर्वोक्तं लोकं फश्चित्कोपि समश्नुते भुते ब्रह्मणा सह । अथवा सर्वोपि विद्वान् भुङ्क्ते इत्यर्थः । एवं प्रश्नचतुष्टयम् । तत्र मनद्वयं तु कण्डरवेणोक्तम् । प्रश्नद्वयं तु शब्दसामर्थ्यप्राप्तमिह ज्ञेयम् । यदा, प्रश्ना इति बहुवचनं भृगुवल्युक्तमश्नाभिप्रायेण योजनीयम् । ननु 'ब्रह्मविदामोती'त्यत्र ब्रह्मविद एव परमाप्तिरित्युक्तम्, अतो विद्वद्विपयक एव प्रश्न उचितः, न त्वविद्वद्विषयक इति चेत् ? न । ब्रह्मवित् परं प्राप्नोतीत्युक्त अब्रह्मवित परं न प्राप्नोतीति तु न प्रतीयते, ब्रह्मवि- स्पदोत्तरमेवकाराभावात् । तथा चावितिपयकोवि प्रश्न उचित एवेति गृहाण । न च ब्रह्मज्ञानं विनापि परब्रह्ममाप्तिरित्यत्र मानाभावः, तथा च कथमविद्वद्विपयकमश्नो घटत इति वाच्यम् । 'न ज्ञानं न च वैराग्य प्रायः श्रेयो भवेदिहेति श्रीभागवतीयभगवद्वचनस्यैव शानाभावपि परब्रह्ममाप्तौ प्रमाणत्वादविद्वद्विषयकमश्नोपपत्तेः । एवं प्रश्नचतुष्टये कृते परमाप्तौ विदविद्वत्वे न स्वतन्त्रप्रयोजके, किन्तु 'नायमात्मा मवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैप टणुते तेन लभ्य' इति श्रुतेर्भगवदरणमेव प्रयोजकम, वरणं चेच्छाधीनमेवेति भगवदिच्छायाः सर्वमूलत्वं प्रतिपादयन् 'तस्माद्वा एतस्मादित्यादिना 'सर्गः कारणसम्भूतिरिति लक्षणात् सर्वकारणरूपब्रह्माण्डरूपसर्ग- मुक्त्वा, 'विसर्गः पौरुषः स्मृत' इति लक्षणात सर्गकार्य विसर्ग वदन सर्वत्र इच्छेव मयोजिकेति प्रश्नचतुष्टयस्यायुत्तरमाह सोऽकामयतेत्यारभ्य एप होवानन्दयातीत्यन्तेन । सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेयेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ।

4 ५० तैत्तिरीयोपनिषद् । इश्सर्वमसृजत । यदिदं किच । तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविंशत् । तदनुपविश्य । सच त्याभवत् । निरुक्तं चानिरुक्तं च । निलयनं चानिलयनं च । (विज्ञान चाविज्ञानं च।) सत्यं चानृतं च सत्यमभवत् । यदिदं किञ्च । तत्सत्यमित्या चक्षते । तदप्येष श्लोको भवति । असदा इमम्र आसीत् । ततो वै सजा यत । तदात्मानस्वयंमकुरुत । तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत इति । यदै तत्सुकृतम् । रसो चै सः। रस ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति । को खेवान्यात् कः प्राण्यात् । यदेप आकाश आनन्दो न स्यात् । एप ह्येवानन्दयातीति । यतस्तस्मात् एतस्मादित्यत्रोक्तः सोऽकामयत इच्छां कृतवान्, कीदृशीमिच्छ। कृतवानित्यत आह बहु स्यामिति । अनेकरूपः स्यामाविर्भवामि । अथ च प्रजायेय प्रपञ्चे जन्मभाक् भवामीत्यर्थः । प्रपश्चाधिकरणकमादुर्भावविपयिणीच्छाच जातेति ज्ञापित तदा स आत्मा ' यस्य ज्ञानमयं तप' इति श्रुतेस्तप एवमेवं भविष्यामीत्यालोचनात्मकं ज्ञानं कतिप्यत, तापितवान् । अन्तर्भावितण्यर्थोयम् । सामान्यालोचने विशेपालोचनमपि कृत- वानित्यर्थः । यद्वा, धात्वर्थरूपविशेपस्य तपःशब्देनैवोक्तत्वात् सामान्यक्रियामात्रवाचकत्व. मेवातप्यतेत्यस्य । तथा च कृतवानित्यर्थः । स पुनस्तपस्तस्वा तापयित्वा कृत्वा वा इदं सर्व परिदृश्यमानमरजत सृष्टवान् । अथ च यदिदं किञ्च । किञ्चन (न) वर्तते । तत्सृष्ट्वा तदेव सृष्टमेव जगत्माविशत् प्रविष्ट इत्यर्थः । पुनस्तदनुमविश्य सत् पूर्वचक्षुः प्रत्यक्षमिति यावत् , त्यत् अमूर्त चक्षुःप्रत्यक्षाभाववत्, निरुक्तं वाग्विपयं, अनिरुक्तमवाग्विपयमनु- भवैकवेयं ज्ञानं प्रेमादि सुखदुःखादि च, निलयनं स्थानभूतमनिलयनमाधारत्वाभाववव यत्तदपि, सत्यं यथार्थवचनमनृतं मिथ्यावचनं सत्यं सत्यरूपं ब्रह्माभवजातम् । यस्माच सत्यमभवत् सर्वमतो यदिदं किञ्च किश्चिज्जातं तत् सत्यमिति परमार्थभूतम्, न तु मिथ्याभूतमिति ऋपप आचक्षते कथयन्तीत्पर्यः । एतेन ब्रह्मवाद एव श्रुतेरभिमतः, न तु मायावाद इति झेयम् । यद्यपि सत्यं ब्रह्मैवेदं सर्व जातम् , अतो नित्यत्वमागतमेव सृष्टी, तदपि तथापि जगत्सत्यत्वसाधनार्थमेप वक्ष्यमाणः श्लोकोपि भवति वर्तते । तं श्लोक- माह असदा इदमग्र आसीदित्यादि । इदं परिदृश्यमानं जगद् वै निश्येन अने भग- यत्कामातू पूर्वमसदविद्यमानमासीत् । वै निश्चयेन ततः सद्विद्यमानमजायत जातम् । यस्मात्पूर्वमसत्येन् सज्जातं तदा ज्ञेयं तत्सदेव । अत्यन्तासतो विद्यमानत्वाभावात् । अत एवोक्तं गीतायां भगवता 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत ' इति । तदात्मान स्वयमकुरुतेति । तद्ब्रह्म स्वयमन्यानपेक्षं सदात्मानं स्वस्वरूपमेव सर्वमकुम कृत. यत् । तत्र तिरोहितचिदानन्दांशस्वसदंशेन जई, तिरोहितानन्दशिस्वसचिटपांशाभ्यां जीवा- स्मनः, प्रकटस्वसचिदानन्दाचरन्तर्यामिणं कृतवदिति विवेतन्यम् । तस्मात्कारणात्तत् मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता। वोक्तं सृष्टं सुकृतमिति सुकृतनाम्ना उच्यते कथ्यते ब्रह्मवादिभिरिति शेषः । अथ यस्मा- कारणादै निश्चयेन । तत् सुकृतं सृष्ट्वानन्यसहायेन स्वेनैवोपादाननिमित्तभूतेन स्वात्मना तं रचितम् । अथ च रसौ वै सः । स आत्मा वै निश्चयेन रसरूपो विभावानुभाव- यभिचारिभावसमूहरूपः, अत आलम्बनविभावरूपोयं जीवो रसं ह्येव हि निश्चयेन रस- नेव लब्ध्वा लाभत्वेन प्राप्य, न तु स्वकृतसाधनेन, आनन्दी आनन्दवान् भवति, सत्तां सामोति, नान्यप्राप्त्येत्यर्थः । यथान्नात्पुरुष ' इत्युक्तत्वादन्नादुत्पन्नस्य शरीरस्यान्नमेव स्थितिसम्पादकं मुखकरं च, यथा च जलादुत्पन्नस्य मत्स्यादेर्जलमेव स्थितिकरं सुखकर व, तथा तस्माद्रसरूपब्रह्मण उत्पन्नस्य चेतनस्य रसलाभ एवानन्दाविर्भावः, तेनैव च स्वरूप- स्थितिरिति श्रुत्या सुष्टूक्तं रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी आनन्दवान् सन् भवति स्थिति माप्नोतीति । तदेतदाह को ह्येवान्यादित्यादिना । को जीवो हि निश्चयेन अन्यात् माणधारणं कुर्यात्, न कुर्यादेव । यद्येतस्य प्राप्तिर्न स्यातदा देहः पतेदेव । एतद्विपयोगस्य प्रलयानलादपि तीक्ष्णत्वात् । ननु देहपतनमन्तहगतादेहस्येव प्राकृतदेहस्य सम्भवति, न स्वलौकिकदेवतां रासमण्डलमण्डनायमानसदृशानामित्याशडून्याह का प्राण्यादिति । को जीवः प्रकर्षण अन्यात् प्राणधारणं कुर्यात् । यत् यदा एप रसरूप आकाशे हृदयाकाशे आनन्दो रसरूपानन्दो न स्यात्, किन्तु निकर्षणातिकप्टेन माणधारणं कुर्यादिति भावः। अत एवोक्तं भगवतोद्धवं प्रति 'धारयन्त्यतिकृच्छ्रेण मायः माणान् कथञ्चने ति दशमस्कन्धीय- चतुश्चत्वारिंशाध्याये । तथा चैतद्रसरूपभगवत्माप्त्यैवानन्दवान् जीवो भवतीति सिद्धम् । नन्वेताहगानन्दमाप्तौ किं कारणमित्यत आह एप होवानन्दयातीति । हि निश्चयेन एप | रसरूपो भगवानेव आनन्दयात्यानन्दयति, 'यमेवैप वृणुत' इति थुतेर्नान्य इत्यर्थः । दीर्घोत्र छान्दसो ज्ञेयः । तथा च यत्र कृपया स्वेन सह भोंगानन्दकरणेच्छा भगवतस्तस्यैव भक्त्युत्पत्तेः परमव्यौन्नि परब्रह्मणा सह सर्वकामभोगो भवति, यत्र तादृशी नेच्छा, तत्र पक्त्यनुत्पत्तेः परब्रह्मणा सह सर्वकामभोगो न भवतीति विद्वदविद्वत्त्वे तादृशसर्वकामभोग- करणे न स्वतन्त्रप्रयोजके, किन्तु भगवद्वरणमैवेति तात्पर्यम् । एवं प्रश्नचतुष्ठयस्योत्तरं दत्तम् । ननु परब्रह्म केवलमिच्छयैवानन्दयत्यथवान्यदपि किश्चित् कारयित्वा वेत्याशङ्काया- माह यदा घेवैप इत्यादि। यदायवैप एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते। मध सोऽभयं गतो भवति । यदा येवैप एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते । अथ तस्य मयं भवति । तत्त्वेवं विदुषो मन्वानस्य । तदप्येप श्लोको भवति । भीपास्मा- गतः पवते । भीपोदेति सूर्यः। भीपादग्निश्वेन्द्रश्च । मृत्युर्धावति पश्चम इतीति । यदा तस्येच्छया हि निश्येनैप जीवः एतस्मिन् रसरूपे अदृदये जीवप्रयत्नेन , तैत्तिरीयोपनिषद् । द्रष्टुमशक्ये, न तु तस्येच्छेया, यद्वा दृश्य विकारस्तद्रहिते, अनात्म्ये आत्मनोन्त:करणस्य भाव आत्म्यं, न विद्यते कामक्रोधादि भेदेन यस्य तादृशे, कामक्रोधादीनां परब्रह्मस्वरू- पभूतत्वात्, अनिरुक्ते वचनागोचरे, अत एव ' यतो वाचो निवर्तन्त' इत्युक्तम् । तथा चानुभवैकवेद्य इत्यर्थः । अनिलयने न विद्यते नितरां लयनं लयोऽक्षरब्रह्मणीव यस्मिन् , रसरूपत्वेन व्यभिचारभावरूपेणैव लयसत्त्वात् । ईदृशे अभयमथ च प्रतिष्ठां तदेकानत्वं तत्सेवासावधानत्वमिति यावत् , तत् विन्दते लभते । अथ एतदनन्तरं स पुरुषः अभयं भावे 'न विभेति कुतश्चने 'त्यत्रोक्तं पापपुण्यकरणाकरणाचिन्तनरूपं गतः प्राप्तो भवतीत्यर्थः । अथ यदा ह्येप एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुत इत्यादि । यदा भगवदिच्छया उदरं भरणीयं जठरमन्तरं मध्ये कुरुते सकामत्वं सम्पादयतीति यावत् । यद्वा, अल्पमपि अन्तरं भेदमयं सगुणं ब्रह्मेति, निर्गुणं त्वन्यत्, अथ तस्य भयं पापपुण्यकरणाकरणचिन्तनं भयं भवतीत्यर्थः । तत्वेवमित्यादि । एवमनेन प्रकारेण सकामरूपत्वेन सगुणनिर्गुणब्रह्मणोः कार्याकार्यरूपत्वरूपभेदकरणेन च भयं पूर्वोक्तं विदुपो जानतः, अत एव मन्वानस्या- झीकर्तुस्तु पुनस्तत् पूर्वोक्तं (म) भयं भवतीत्यर्थः। तत्रास्मदादिभिर्भयं कर्तव्यमित्यत्र किं वक्त- व्यम्। वातादयो देवा अपि यस्य भयेन निरन्तरं गमनादिकं कुर्वन्तीत्याह भीपास्मानातः पवत इत्यादि । अस्मात् परब्रह्मणः सकाशाद्भीपा भयेन वातः पवते, निरन्तरं गच्छती- त्यर्थः । एवमेवाग्रेप्यर्थो वोध्यः । अत्र भीपा इति हलन्तशब्दस्य तृतीयान्तं, तृतीयार्थे वा प्रथमा, 'व्यत्ययो बहुल मिति सूत्रात् । अत्र वातादीनामपि भयोक्त्या ब्रह्माधीनत्वमुपल- क्षणविधया सर्वेपामुक्तम् , तेन च परब्रह्मणि सर्वेशितृत्वमुक्तम् । तेन च जीवानां सहजदा- सत्वं प्रतिपादितमिति ज्ञेयम् । एवं च केवलेच्छयैव परब्रह्म नानन्दयति, किन्स्विच्छोत्तरं जीवे स्वदासत्वज्ञानं स्वस्य रसरूपत्वात् स्थायिभावरूपां स्नेहापरपर्यायां स्वविषयकरति तन्जनितामासक्त्यपरपर्यायां प्रतिष्ठापदवाच्यां स्वविषयकचित्तैकाग्रतामग्रे व्यसनजनिकां चावि- भर्भाव्यानन्दयतीति भावः। यदा, यदा घेवैप एतस्मिन्नदृश्य इत्यादरेयमर्थः । सर्वकामभोगानन्दप्राप्तिः परब्रह्मण इच्छयैव, विद्वदविद्वत्त्वे तु न स्वतन्त्रप्रयोजके । एवमेव यदा परब्रह्मण इच्छया हि निश्चयेनैप जीवो अदृश्ये चक्षुपा द्रष्टुमयोग्ये 'ये त्वमक्षरमनिर्देश्यमव्यक्त पर्युपासते', । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखामिति वाक्यादव्यक्तरूपत्वात् । अनेन व्यक्तरूपाभाव उक्तः । अनात्म्ये न विद्यते आत्म्यमन्तःकरणधर्मों यस्य, अनेनान्तःकरणधर्मतिरोभाव उक्तः। अनिरुक्ते न विद्यते निरुक्तं वचनं यस्य, अनेन वचनतिरोभाव उक्तः। अनिलयने न विद्यते निलयनं गृहं यस्य, गृहस्य पारीच्छिन्नत्वात्तदभाववोधने सर्वत्र व्यापकत्वमुक्तम्। एतेन परिच्छेदतिरोभाव उक्तः । एतादृशे एतस्मिन्साधनशेपब्रह्मस्वरूपे एप जीवो "द्वितीयादै भयं भवतीति द्वितीयस्य भयजनकत्वादभयमद्वितीयत्वं स्वास्माभिन्नत्वमिति -- मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता । यावत् , अथ च प्रतिष्ठामेकाग्रत्वं तदेकधारणात्मकतां च विन्दते, अथ स जीवः अभयं तदात्मकत्वमेव गच्छति, लयं मुक्तिं मामोतीत्यर्थः । उक्तं चैतत् ' सर्व ब्रह्मेति ज्ञानं हि मुक्तिसाधनम्, तत्र सर्वस्यैव ब्रह्मत्वेन ज्ञाने आधाराधेयादिज्ञानाभावादक्षरब्रह्मणि रूपादि- सत्त्वेपि रूपादिज्ञानाभाव' इति । अथ 'एप एव साधु कर्म कारयति यमुनिनीपति, एप ह्येवा- साधु कर्म कारयति यमधो निनीपती'ति श्रुतेः परब्रह्मेच्छायां यदा हि निश्चयेनैतस्मिन्साघ- नशेपब्रह्मणि उत् अल्पमन्तरं भेदं कुरुते, अन्योसावन्योहमस्मीति श्रुत्युक्तं, भेदज्ञान- वान्भवतीति यावत् । तदा 'द्वितीयाद्यं भवतीति श्रुत्युक्तं भयं संसाररूपमिति यावत् । तत् तस्य भवतीत्यर्थः । तथा च परब्रह्मणो यज्जीवविपयिणी सर्वकामभोगेच्छा तस्य प्रत्यक्षीभूते स्वस्वरूप प्रेमादिकमुत्पाद्य स्वेन सह सर्वकामभोगानन्दं ददाति । यद्विपयिणी तु न सर्वकामभोगानन्ददानेच्छा, किन्तु साधनशेपब्रह्ममाप्तीच्छा, तस्य तु पूर्वोक्तं ब्रह्माभेद- ज्ञानं जीवात्मन उत्पाद्य तस्मिन् लयरूपा मुक्तिं ददाति । यजीवविपयिणी न सर्वकाम- भोगानन्ददानेच्छा, न वा ब्रह्मणि लयरूपमुक्तिदानेच्छा, तस्य तु भेदज्ञानमुत्पाद्य संसारमेय ददातीति तात्पर्य ज्ञेयम् । तत्त्वेवं भयं संसाररूपं विदुषः शास्त्राजानतः अथवा मन्वानस्याङ्गीकर्नुर्भवति शास्त्राज्जानतो मन्वानस्याङ्गीकर्तुस्तु (न) भवतीत्यर्थः । अस्मिन्नर्थे निःसन्दिग्धत्वाय श्लोकोपि भवतीत्याह तदप्येप श्लोको भवतीति । तत्र मनुष्याणां भेदद्रष्ट्रणां भयं भवतीत्यत्र किं वक्तव्यं, मनुष्यापेक्षयोस्कृष्टानां वातादिदेवानामपि भेददर्श- नजभयात्तत्कार्य निरन्तरं दृश्यत इत्याह भीपास्मादित्यादि । अर्थः स्पष्ट एव । ननु 'नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्मे 'ति श्रुत्पन्तरात्सायनशेपब्राह्मणोप्यानन्दरूपत्वं परब्रह्मणोप्यानन्दरूपत्वम् , एवञ्च, द्वयोरप्यविशिष्टत्वात् किं परब्रह्मानन्दमाप्तावाधिक्यम् , किंवा साधनशेपब्रह्मानन्दप्राप्तौ न्यूनत्वमित्याशङ्कायां परब्रह्मानन्दो हि निरवध्यानन्दत्वात परमफलरूपः, साधनशेपब्रह्मानन्दस्तु सावध्यानन्दत्वान्यूनफलरूप इति सिद्धान्तं वक्तुमा- नन्दस्योत्कर्पापकर्षविचारमाह सैपानन्दस्य मीमांसा भवतीत्यारभ्य स एको ब्रह्मण आनन्द इत्यन्तेन । सैपानन्दस्य मीमांसा भवति । युवा स्यात् साधुर्युवाध्यायकः । आशिष्ठो दृढिष्ठो बलिष्ठः। तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य॑ पूर्णा स्यात् । स एको मानुप आनन्द इति । ये ते शतं मानुपा. आनन्दाः स एको मनुष्यगन्धर्वाणा- मानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ये ते शतं मनुष्यगन्धर्वामानन्दाः । स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ये ते शतं देव- गन्धर्याणामानन्दाः । स एको पितृणां चिरलोकानामानन्दः । श्रोत्रिस्य चाका. महतस्य । ये ते शतं पितॄणां चिरलोकानामानन्दाः । स एक आजानजानां ५४ तैत्तिरीयोपनिपद् । देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ये ते शतमाजानजानां देवानामा- नन्दाः । स एकः कर्मदेवानामानन्दः। ये कर्मणा देवानपियन्ति । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ये ते शतं कर्मदेवानामानन्दाः । स एको देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।ये ते शतं देवानामानन्दाः । स एक इन्द्रस्यानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहत्तस्य । ये ते शतमिन्द्रस्यानन्दाः । स एको बृहस्पतेरा- नन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ये ते शतं वृहस्पतैरानन्दाः । स एका प्रजापतैरानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ये ते शतं प्रजापतैरानन्दाः । स एको ब्रह्मर्ण आनन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहत्तस्य इति । एपा वक्ष्यमाणा सा प्रसिद्धा आनन्दस्य मीमांसा. विचारो भवति जायते । वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवदेति, भविष्यत्यर्थेपि वर्तमानार्थको लकारः प्रयुक्तः । युवा स्यात् साधुयुवाध्यायक इत्यारभ्य पूर्णा स्यादित्यन्तेन । मुख्यतया मनुष्याधिका- रित्वाच्छास्त्रस्य प्रथमतो मनुष्यानन्दमाह युवा स्यादित्यादिना । सर्वलोके हि तारुण्यमेव स्यादिविपयभोगे समय कारणमिति भगवतापि कंसवधोत्तर स्थविराणामपि यादयानां तारुण्यं दत्तमिति श्रीभागवतदशमस्कन्धे श्रूयत इति मनुष्यलोकेपि युवा तारुण्यवान् भवेत् । तत्र युवत्वं रोगायभिभूतस्यापि भवति । तथा च तेन विषयभोगः कर्तुमशक्य इति व्यथै युवत्वमित्याशङ्कयाह साधुयुवा स्यादिति । साधुरुतमयुवा रोगायनभिभूतो युवा स्याद्भवेत् । एवमपि यदि निवर्गशास्त्राणि नित्यं नाभ्यसेत् तदा धर्माभावाच्छत्रुनाशाभावात् वेश्यादिगमनप्रसक्तेवायुपो नाशे किञ्चित्कालिक एव विषय- भोगो भवतीति किं साधुयुवत्वेनेत्याशङ्कायामाह अध्यायक इति । वेदादिशास्त्राध्ययन- शील इत्यर्थः । अधिपूर्वादिङो बुलिरूपमिदम् । किश, आशिष्ठः । अशनं आशः स विद्यते यस्य, सोपि आश अर्शआधचा सिद्धस्तस्मादतिशायन इष्टश्च तेनाशिष्ठ इति सिद्धम् । अनेन प्रभूतभक्षकत्वम्, तेन स्यादिभोगकरणसमर्थत्वमुक्तम् । एतादृशः स्याद्भवे- दित्यर्थः । अत एवोक्तं 'भोज्यं भोजनशक्तिश्च रतिशक्तिर्वरस्त्रियाः। विभवो दानशक्तिश्च नात्पत्य तपसः फल'मिति । किश्च, दृदिष्टोतिशयेन दृढो, दृढः स्थूलवळयोरिति निपातना- नात्पन्तसौकुमार्यादियुक्तः । अत्यन्तसौकुमार्यादियुक्तत्वे श्रमस्य जायमानत्वात् किमपि कार्य न सिध्पेदित्यत उक्तं (च) दृदिष्टः स्याद्भवेदित्यर्थः । किञ्च, बलिष्ठोतिशयेन बलवान, सर्वप्रकारकालवान्, शरीरसेनामित्रादिमन्त्रादिवलवानित्यर्थः । एतादृशस्य सार्वभौमता भवतीत्याइ तस्येयमिति । तस्य पूर्वोक्तवलयत इयं पृथिवी सर्वा पञ्चाशतकोटियोजनपरिमिता वित्तस्य द्रव्यस्य स्थापनार्य पूर्णा पर्याप्ता स्यात् । एतावद् द्रव्यं स्यादिति भावः । एतेन सार्वभौमत्वं सूचितम् । यद्वा, ' व्यत्ययो बहुल मिति सूत्रात् मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता । तृतीयार्थे पष्ठी । तथा च वित्तेन पूर्णा सती स्याद्भवेत, सर्वविधवित्तयुक्तसर्वपृथिव्यधिपतिः सार्वभौम इति यावत्, स भवेदिति तात्पर्यम् । उपसंहरति स एपः पूर्वोक्तसम्पत्ति- युक्तस्यानन्दो मानुपो मनुष्यसम्बन्ध्यानन्दः। एतावननितानन्देन मनुप्यो मनुतेहं पूर्णा- नन्दवानस्मीत्यतोयं परमकाष्ठापन्नो मानुपानन्दः । अथैतदपेक्षयोत्कृष्टानन्दं वदन्नेताह- शानन्दशतं मनुष्यगन्धर्वाणामेक आनन्द इत्याह ये ते शतं मानुपा इत्यारभ्य मनुष्य- गन्धर्वाणामानन्द इत्यन्तेन । अत्र.ये शतं मानुपा आनन्दास्ते शतं आनन्दा मनुष्यगन्धर्वाणामेक आनन्द इत्यर्थः । ननु मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दास्तेपामेवाथवा कस्याप्यन्यस्यापि भवतीत्याशङ्कायामाह श्रोत्रियस्य चाकामहतस्येति । अकामहत- स्य निष्कामस्य, श्रोत्रियंश्छन्दोधीत इति । निपातनाच्छन्दोध्येतुरित्यपि सूचितम् । अकामहतस्य श्रोत्रियस्य तु ब्रह्मानन्देन सहाग्रे वक्ष्यमाणा आनन्दा सर्वेपि भवन्तीत्यग्रे निरूप्यमाणानन्दनिरूपणेषु श्रोत्रियस्य चाकामहतस्येति सर्वत्रोक्तं ज्ञेयम् । अत्रेदं ज्ञेयम् । यस्तु स्वधर्मकरणे निष्ठां परमकाष्ठा प्राप्तः, स 'स्वधर्मनिष्ठः शतजन्मभिः पुमान् विरि- श्चतामेति ततः परं हि मामिति श्रीभागवतवचनाचतुर्मुखतां प्राप्य तेन सह मुक्तो भवति । यस्तु श्रोत्रियत्वाकामहतत्वे वर्षे वर्षेऽधिकं प्राप्नोति, स तु विनैव पुनर्जन्मक्रमेण सर्वानन्दा- ननुभूयाक्षरब्रह्मसायुज्यं प्रामोति । यस्तु श्रोत्रियत्वाकामहतत्वे तारतम्येन प्राप्नोति, स तु तत्तल्लोकानन्दानुभवोत्तरं जन्म प्राप्याक्षरब्रह्मसायुज्यं मामोतीति दिक् । अत्र मानुपा भूत्वा ये कर्मविद्याविशेषाद्गन्धर्वत्वं प्राप्तास्ते मनुष्यगन्धर्वास्ते ह्यन्तर्धानादिशक्तियुक्ताः सूक्ष्मकार्यसम्पादका मनुष्यापेक्षयानन्दानुभवे विघ्नाल्पत्वं विघ्नदूरीकरणशक्तिसाधनसम्पन्नत्वं च तेपामिति मनुप्यापेक्षया तेपामानन्दस्य शतगुणत्वं वोध्यम् । अयमप्यानन्दो ब्रह्मानन्द- स्यांशभूत एव, तस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्तीति श्रुतेः । अत्र तु विघ्न- दूरीकरणसामर्थ्याचारतम्यादिन्नाभावतारतम्येन चित्तप्रसादतारतम्यादानन्दांशाभिव्यक्तितार- तम्यं यं सर्वत्र । अथैतदपेक्षयाप्यधिकमानन्दमाह ये ते शतं मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दाः स एको देवगन्धर्वाणामानन्द इति । देवाश्च ते गन्धर्वाश्च कर्मविद्याभ्यां ये गन्धर्वा न जाता किन्तपत्तिसिद्धा गन्धर्वास्ते देवगन्धर्वा उच्यन्ते, से मनुष्यगन्धर्वेभ्यो विशिष्यन्ते इति ज्ञेयम् । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्येति । अयमप्यानन्द अकामहतस्य श्रोत्रियस्य भवति । तत्माप्त- ब्रह्मानन्दे एतदानन्दस्याप्यन्तर्भावात् , समुद्रे विमुष इवेति योध्यम् । अथैतदपेक्षयाप्युकानन्द- माह ये ते शतं देवगन्धर्वाणामानन्दाः स एकः पितृणां चिरलोकानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्येति । चिरलोकश्चिरस्थायी लोको येप ते चिरळोका इत्यर्थः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्येति तु पूर्ववदेव व्याख्येयम् । एतदपेक्षयाप्युत्कष्टानन्दमाह ये ते शतं पितॄणां चिरलोकानामानन्दाः स एक आजानजानां देवानामानन्दः श्रोत्रि. पस्य चाकामहतस्येति । आजान इति देवलोकस्तस्मिन्नानाने जाता आजानना देवाः तैत्तिरीयोपनिपद् । स्मातकर्मविशेपतो देवस्थानेषु जातास्त इत्यर्थः । श्रोत्रियस्येत्यादि तु पूर्ववदेव व्याख्येयम् । एतदपेक्षयाप्युत्कृष्टानन्दमाह ये ते शतमाजानजानां देवानामानन्दाः । स एकः कर्मदेवानामानन्दः, ये कर्मणा देवानपियन्ति । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्येति । वैदिककर्मणाग्निहोत्रादिना केवलेन देवानपियन्ति माप्नुवन्ति ते कर्मदेवा इत्यर्थः । श्रोत्रि- यस्येत्यादि तु पूर्ववदेव व्याख्येयम् । एतदपेक्षयाप्युत्कृष्टानन्दमाह ये ते शतं कर्मदेवा- नामानन्दाः स एको देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्येति । अत्र देवाः त्रयस्त्रिंशद्धविर्भुजो ज्ञेयाः । अन्यत्पूर्ववदेव व्याख्येयम् । एतदपेक्षयाप्युत्कृष्टानन्दमाह ये ते शतं देवाना नन्दाः । स एक इन्द्रस्यानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्येति । इन्द्रो हि त्रयस्त्रिंशद्धविर्भुजां देवानामीश्वर इति तदपेक्षयाप्युत्कृष्टानन्दो ज्ञेयः । अन्यत्तु पूर्व- घदेव । एतदपेक्षयाप्युत्कृष्टानन्दमाह ये ते शतमिन्द्रस्यानन्दाः स एको बृहस्पतेरा- नन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्येति । इन्द्रस्याचार्यों बृहस्पतिरिन्द्रापेक्षयाप्युत्कृष्टाः नन्दः, इन्द्रानन्दस्य तदधीनत्वादित्यर्थः । अन्यत् पूर्ववत् । एतदपेक्षयाप्युत्कृष्टानन्दमाई थे ते शतं वृहस्पतेरानन्दाः स एकः प्रजापतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामह- तस्येति । प्रजापतिर्हि ब्रह्मा त्रैलोक्यशरीरो ब्रह्मा विराट् स समष्टिव्यष्टिरूपः, प्रपञ्चमण्डल- व्यापी, यत्रैते आनन्दभेदा एकतां गच्छन्ति, स सर्वेषामीश्वरः, स तदपेक्षयाप्युत्कृष्टानन्द: इति ज्ञेयम् । अन्यत्त पूर्ववत् । एतदपेक्षयाप्युत्कृष्टानन्दोऽक्षरब्रह्मानन्द इत्याह ये ते शतं प्रजापतेरानन्दाः स एको ब्रह्मण आनन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्येति । अत्र ब्राह्मशब्देन 'ब्रह्मविदाप्नोति पर 'मित्यत्रोक्तं साधनशेपभूतं 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठे 'त्यत्रानन्द- मयस्य पुच्छत्वेनोक्तं चाक्षरब्रह्मैवोच्यते । केवलब्रह्मशब्देन गणितानन्दत्वेन चोक्तत्वात् ।। परब्रह्मपरत्वे तु परशब्देनैवोक्तं स्यादिति ज्ञेयम् । तथा चायमर्थः । ये शतं शतसंख्या- विशिष्टा आनन्दाः प्रजापतेः सत्यलोकाधिष्ठातुस्त एव मिलिता एकत्वसंख्याविशिष्ट आनन्दोऽक्षरब्रह्मण इति । एवमक्षरब्रह्मण एकानन्दपरिमाणं कण्ठरवेण श्रुत्या प्रतिपादित- मेत्येतारगेकानन्दमक्षरं ब्रह्मेति प्रतिपाद्यते । तथा चैतादृशशतानन्दविशिष्टमक्षरब्रह्मापीति गणितानन्दमेवाक्षरं ब्रह्मेति सिद्धम् । आनन्दमयशब्दोक्तं परं ब्रह्म स्वगणनाविपयीकृतका- नन्दत्वादपरिमितानन्दमेव । अक्षरब्रह्मणस्त्वपरिमितानन्दत्वे स एकः प्रजापतेरानन्द इत्यु- तरं ये ते शतं प्रजापतेरानन्दाः स एको व्रत्मण आनन्द इति नोक्तं स्यात् , किन्तु ये ते शतं प्रजापतेरानन्दास्तादृगपरिमितानन्दब्रह्मण इत्येवोक्तं स्यात् । तदानन्दस्यापरि- मितत्वादिति मनसि विभावनीयम् । केचिनु पूर्वोक्तानन्दशतपरिमितकानन्द उत्तरस्मिन् मतिपादितः, ताहगेकानन्दपरिमिन- शनानन्दवानुत्तर इति नात्र प्रतिपाद्यते, किन्तु पूर्वोक्तकानन्दसनातीयशतानन्दमितैकानन्द- यानेवोचर इति प्रतिपाद्यते। एवं चैकानन्दवदेवाक्षरमोति गणितानन्दममक्षरं ब्रह्मेति वदन्ति। - ।

मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाष्यसमेता। तत्र एवं सति 'ये ते शतमानन्दाः स एकोऽमुकस्यानन्द इत्येव श्रुत्योक्तं स्यात् । तथाच सम्बन्धिपवैयर्थ्यम् । तस्मात्सम्बन्धन्यपि शतानन्द इति दिक् । अन्यत्तु पूर्ववदेव व्याख्येयम् । एवमक्षरानन्दगणनापर्यन्तमेवानन्दगणना, न तु तदग्रस्थपरशब्दवाच्यपुरुषोत्तमानन्द- स्यापि गणनेति ज्ञापयन्ती श्रुतिरानन्दगणनामुपसंहरति स यश्चायं पुरुषेत्यादिना । स यश्चायं पुरुषे । स यश्चासावादित्ये स एकः । स य एवंवित् । अस्माल्लो- कान्प्रेत्य । एतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रामति । एतं प्राणमयमात्मानमुपसंकामति । एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रामति । एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रामति । एत- मानन्दमयमात्मानमुपसंकामति । तदप्येप लोको भवति । यतो वाचो निर्वर्त- न्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न विभेति कुर्तश्च तीति । पुनर्ये ते शतं प्रजापतेरानन्दाः स एको ब्रह्मण आनन्द ब्रह्मण इत्यनेनैवोक्तो योऽयं मयानुभूयमान आनन्द स पुरुपे पुरुषपदवाच्ये 'विष्णोस्तु त्रीणि रूपाणि पुरुपाख्यान्यदो विदुः । प्रथमं महतः स्रष्ट्र द्वितीयं त्वण्डसंस्थितं । तृतीयं सर्वभूतस्थं तानि ज्ञात्वा विमुच्यते' इत्येनेनोक्ते पुरुपत्रये सः, अथवादित्ये उपलक्षणविधया सर्वासामक्षरविभूतिनां च जीवानां च मध्ये यः प्रसिद्धोसौ मयानुभूयमानश्चानन्दः स एक एव अक्षरब्रह्मानन्द एव गणितानन्द एवेति यावदित्यर्थः । स य एवंविदिति । स यः कश्चन अतिदुर्लभभक्तिमार्गी भगवद्वरण- विशिष्त्वरूपभाग्यवानेवंवित । अक्षरब्रह्मगणितानन्दं, परं ब्रह्म स्वगणितानन्दमिति जानाति स पुरुपोऽस्माल्लोकात्याकृतात्मेत्यैतच्छरीरं त्यक्त्वा एतं मत्सत्यक्ष अन्नमयमात्मानं माकृत- शरीरविलक्षणमुपसंकामति । अथ चैतं प्राकृतप्राणमयविलक्षणं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रामति। अथ चैतं प्राकृतमनोमयविलक्षणं मनोमयमात्मानं चोपसंक्रामति । अथचैतं विपश्चिच्छब्दवाच्य- विविधभोगचतुरपरब्रह्मभोगयोग्यचातुर्यादिविशिष्टं विशेपणभेदाहिशिष्टभेद' इति पूर्वजीवरूप- विज्ञानमयाद्विलक्षणं विज्ञानमयशब्दवाच्यं जीवरूपविज्ञानमयमात्मानं चोपसंक्रामति । अथ च तदनन्तरमेत निरवध्यानन्दात्मकमानन्दमयशब्दवाच्यपुरुपोत्तमरूपं 'ब्रह्मविदामोति पर' मित्यत्र परशब्देनोक्तमानन्दमयमात्मानं चौपसंक्रामति, सर्वकामभोगार्थ प्राप्तो भवति, तेन सह सर्वका पभोग करोतीत्यर्थः । यस्त्वक्षरब्रह्मागणितानन्दमिति जानाति स तु ये यथा मा मिति प्रतिज्ञा- तो ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवतीति श्रुतेश्चाक्षरब्रह्मण्येव लीनो भवतीति भावः । एवं प्राकृतशरीर- त्यागानन्तरमलौकिकशरीरादिधातिरक्तैव स्पष्ट, तदपि तथाप्येष चक्ष्यमाण एतादृशार्यप्रतिपा- दका श्लोको भवतीत्याह-यतो वाच इति । यतः यस्मादानन्दादाचो वचनानि मनसा सह संख्यातो धर्मतः स्वरूपतचापाप्याविषयीकृत्य निदृत्तानि भवन्ति । न वक्तुं न वा विचार- यितुं शक्नुवन्तीत्यर्थः । एतादृशं 'ब्रह्मविदामोति पर'मित्यवपरशब्देनोक्तस्य सह ब्रह्मणा विपश्चि- ते त्या विविद्विशेषणविशिष्टब्रह्मशब्देन चोक्तस्य ब्रह्मणः परब्रह्मणः आनन्दं 'रसो वैस' इत्य- --- ८ तैत्तिरीयोपनिपद् । तो रसात्मक यः कश्चन भाग्यवान् विद्वान् रसमर्यादया प्राकृतदेहत्यागोत्तरमाप्तालौकिदेहादिसं- क्रमणोत्तरमनुभवेत् , स कुतश्चन कालकर्मस्वभावादिभ्यो न बिभेति, न भयं प्राप्नोतीत्यर्थः। ननु अन्नमयादिसंक्रमणं क्रममुक्तिवद्विराड्देहस्यान्नमयादिमाप्तिरूपत्वेनोच्यताम् । अथ च यतो वाचो मनसा सहाप्राप्य निवर्तन्ते, एतादृशं ब्रह्मणोऽक्षरब्रह्मण आनन्दं प्रजापत्यान- न्दशतपरिमितं चिद्वाननुभवन् कुतश्चन न विभेतीत्यक्षरब्रह्मपरतयैवाय श्लोकः कुतो न व्याख्यायत इति चेत् । अत्र पृच्छामः । किमनेन श्लोकेनोक्तो भयाभावो जीवन्मुक्तिदशायामाहोस्वित् परममुक्तिदशायां वाक्षरब्रह्मज्ञानिनिष्ठः प्रतिपाद्यते । तत्र नाद्यः । 'अस्माल्लोकात् मेत्ये त्युक्ते- जीवन्मुक्तिदशायां वक्तुमशक्यत्वात् । न द्वितीयः । परममुक्तौ त्वक्षरे अक्षरज्ञानिनो लीन- त्त्वाच्छरीराभावात्तद्धर्मरूपभयापसिद्धः शरीररूपधर्मरूपभयाभावस्यापि प्रतिपादनानौचि- स्यात् । 'प्रसक्तस्यैव प्रतिपेध' इति सकलदर्शनसिद्धान्तात् । अस्मन्मते तु प्राकृतशरीरत्यागो त्तरमलौकिकशरीरमाप्तेस्तत्र शरीरधर्मरूपभयप्रसक्तेस्तदभावो ह्यलौकिकशरीरे श्रुत्या वोध्यत इति नानुपपत्तिः काचित् । तस्मादस्मदाचार्यचरणोक्तः परब्रह्मपर एवार्थोऽस्य श्लोकस्य सर्वोपरि विराजतेतरामिति कृतं. पल्लवितेन । यद्वा, अक्षरब्रह्मणः आनन्दमक्षरब्रह्मणि स्थितमानन्दं 'तद्धाम परमं ममति वाक्योक्तपुरुपोत्तमधामरूपाक्षरब्रह्मणि स्थितं पुरुपोत्तमा- नन्दमिति यावत्, तं विद्वाननुभवन् कुतश्चन न विभेतीत्यर्थः । अत्र मदुक्तार्थे मत्कृतबर्हि- मुखमर्दनमारम्भ एवोक्ता वृहद्वामनपुराणीया कथाप्यनुसन्धेया । अथ चैतादृशपरब्रह्मानन्दानुभववान वैदिकविहितनिपिद्धकर्माकरणकरण पश्चात्ताप- मपि न करोतीत्याह । एत ५ ह वा न तपति । किमह ५ साधु नाकरवम् । किमहं पापमकरवमिति। साधु साझं यथा स्यात्तथा, किमहं वैदिकं नाकरवम्, न कृतवान्, येन मम स्वर्गावभावः । किमहं पापं निपिद्धभकरवम् कृतवान् , येन मम दुःखमाप्तिरित्येतं परब्रह्मानन्दानुभववन्तं न तपति न पश्चात्तापं जनयति, स्वर्गादेरप्यधिकानन्दस्य प्राप्तत्वाद, प्राकृतदुःखलेशस्याभावाचेति भावः । अत एव 'नारायणपरा लोके न कुतश्चन विभ्यति । स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि तुल्यार्थदर्शिन' इति श्रीभागवतेप्युक्तम् । एवमक्षरब्रह्म गणितानन्द- स्वरूपम्, परं ब्रह्म त्वगणितानन्दस्वरूपम् , अक्षरब्रह्ममाप्तिस्त्वक्षरब्रह्मणि लया, परब्रममा- प्तिस्तु परब्रह्मणा सह सर्वकामभोगः, अक्षरब्रह्मणि लये साधनं त्वक्षरब्रह्मज्ञानम् , परब्रह्मणा सह सर्वकामभोगे साधनं तु भगवद्वरणनितपरमभक्तिलाभ इत्यादिकं प्रतिपाद्योपसंहरति । स य एवं विद्वानेते आत्मान स्पृणुत इति एवं पूर्वोक्तगणितानन्दागणितानन्दादिप्रकारेण एतेऽक्षरवापरब्रह्मणी विद्वाननुभवति संजीवो भक्तिमागीय एवं भवतीति स भक्तिमागीय आत्मानं स्वजीवात्मानं स्पृणुते, स्प

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मटपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतभाप्यसमेता।
५९
प्रीतिपालनयोरिति धात्वानुसारा, प्रीतियुक्तं ब्रह्मणा सह सर्वकामभोगानन्दयुक्तं करोति ।
ब्रह्मयानुभविनः सर्वकामभोगानन्दानुभवस्य 'ब्रह्मविदाप्नोति पर' मित्यनेनोपक्रम एवो-
क्तत्वात, केवलाक्षरब्रह्मानुभविनस्तु 'ब्रह्म वेद तथैव भवतीति श्रुतेरक्षरब्रह्मण्येव लयो
भवतीति सिद्धान्तात् । तथा चोपक्रमे 'ब्रह्मविदाप्नोति परमित्यत्राक्षरब्रह्मविदः परब्रह्मणा
सह सर्वकामभोग उक्तः, स एवात्रोपसंहारेपि स्पष्टीकृत इन्युपक्रमोपसंहारयोरेकवाक्यता
सम्पन्ना जातेति बोध्यम् । इममेवाथै पुनरपि निःसन्दिग्धत्वाय प्रतिपादयनि ।
उभे वप पते आत्मनिस्पृणुते । य एवं वेद ।
उभे इति मिलिते एव एते ब्रह्मणी हि निश्चयेन यो भगववरणात् महाभाग्यवत्वेन
पसिद्ध एप मद्बुद्धिमत्यक्ष एवं पूर्वोक्तप्रकारेण वेद जानाति, स भक्तिमार्गीयमात्मान
स्वजीवात्मानं स्पृणुत इत्यर्थः।
अत्रैवं विवेचनीयम् । आनन्दरूपं फलं हि पञ्चविधम् । ज्ञानमार्गीयं, उपासना-
मागीय, मर्यादाभक्तिमागीयं, मर्यादापुष्टिमार्गीय, शुद्धपुष्टिमार्गीयं च । तत्र ज्ञानमार्गीयं
फलं तु 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवतीति श्रुतेरक्षरब्रह्मणि जीवस्य लयः । उपासनामार्गीय
फलं तु मन्त्राधिष्ठाविभूतिस्वरूपे जीवस्य लयः । तत्र प्रमाणम् , 'आत्मानं गोपालोऽह-
मिति भावयेत्स एवाव्यक्तोऽनन्तो नित्यो गोपाल' इत्यादि गोपालतापनीगौतमीतन्त्रादयश्च ।
भक्त्या सञ्जातया भक्त्येति वाक्यात् भ्रमात्मकभक्तिसाधनत्वेन क्रियमाणः श्रवणादिर्मपी-
दाभक्तिमार्गः, तत्फलं तु परब्रह्मणि जीवस्य प्रवेशः । तत्र प्रमाणं तु ' भत्त्या मामभिना-
नाति यावान् यश्चास्मि तत्त्वतः, ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तर'मित्यादि गीता-
वाक्यम् । श्रीशुकदेवादिवन्मर्यादाफलनिष्ठस्य निःसाधनभगवदनुग्रहेण प्रेमात्मकभक्तिलाभो
मर्यादापुष्टिमार्गः । तत्फलमपि जीवस्य परब्रह्मप्रवेश एव । तत्रापि प्रमाणं ' भक्त्या माम-
मिजानातीत्यादिवाक्यमेव । परन्त्वेतावान् विशेषः । मर्यादामार्गीयभक्तस्य साधनवललभ्य-
भक्तिसत्त्वात् कदाचिदेव परब्रह्मकपायामवतारादिदशायामलौकिकशरीरमाप्त्या परब्रह्मणा
सह सर्वकामभोगः, अवतारसमाप्तौ परब्रह्मण्येव पुनः प्रवेशः । मर्यादापुष्टिमागीयस्य तु
निःसाधनस्य परब्रह्मविशेषकृपया यदा यदा अवतारस्तदा तदात्यलौकिकदेहप्राध्या परव-
सणासह सर्वकामभोगः, अन्यथा विशेषकृपाचयापत्तेः । अवतारसमाप्तौ परब्रह्मण्येव पुनः
मवेशः । मर्यादांशस्य प्रवेशपर्यवसायित्वात् । शुद्धपुष्टिमार्गफलं तु सर्वदा ब्रह्मणा सह सर्व-
कामभोगः । अत्रापि प्रमाणं 'सोऽश्नुते सर्वान् कामा 'निति श्रुतिरेव कैमुतिकन्यायेन ।
श्रीभागवतेप्युक्तं 'न ज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवे 'दिहेति सर्वमनवद्यम् ।
उपसंहरति । इत्युपनिषत् । इतिः समाप्तौ । उप समीपे निपीदति ब्रह्म यस्यां
विद्यायां जातायां सा विद्योपनिपदुपचारात्तत्मतिपादको ग्रन्थोप्युपनिपदुच्यते । तथा च
समाप्तेयमुपनिपदित्यर्थः ।
इति श्रीवल्लभाचार्यतत्सुतोत्तमभक्तिमान् । कृतवान् जयगोपालो भाप्यरत्नमिदं मुदा ॥१॥

विषयानुक्रमः। वि':. ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ८१ पग्रम्. विषयः पत्रम्. मंगलम् १] शांकरभाष्यमतम् मंगलद्वारा गुरपरम्परा निवेदनम् १. सराण्दनम् स्वस्य परिचयः १] प्रश्नचतुष्टयम् ५२ ग्रन्यययोजनम् १ प्याख्यानम् वपीपदामने विधत्वम् परतमानन्दमयाधिकरणद्वितीपच्यास्यानम उत्सानिका १] तरसण्डनम् व्यख्यानमकारः शतिरत्तिप्रतीतार्थपरतयैर करम्यम्पम सूत्रवाक्यं, तद्वचारल्यानरुपा ऋग् ३] श्रीपण्टमतम् नव्याख्यानम् ३ सत्रण्टनम् ब्रह्मशब्दस्याक्षरबत्सवाचात्यम् ३ अध्ययदीक्षितमतम् मायानादिमतम् ५ तत्पण्डनम् तत्संण्डनम् ५ श्रीमद्भागवतम्य परमप्रामाण्यम् परोक्षादस्वरूपम् ६ परप्राप्ती पिदविवर्ष न प्रयोजक, किन्तु ऋग्न्याख्यानम् ६ भगवरणमेर प्रयोजनम् अक्षरनधणः परव्रपणश्च साशात् सृष्टिः। १० प्रश्नचतुष्टयस्योत्तरम् अन्नमयः ११) आनन्दमयात् राष्टिः व्याख्यानम् ११. प्याग्यपानम् अन्नमय. पुरुप. ब्रह्माण्डददः, न तु जीगरीरम् २. भगदानन्ददाने इन्छैच नियामिना मयदः प्राचुर्यार्थकत्वम् १३) सर्वस्य भगदधीनता मयटो चिकारार्थत्वसण्डनम् १३ आनन्दमीमांसा. कृष्णस्यैव परमकाष्ठापनत्यम् १४ व्याख्यानम् प्राणमयः २० अक्षरनह्मणो गणितानन्दत्वम् व्याख्यानम् ...०० परब्राह्मणाऽगणितानन्दनम् मायारादिमतम २२ आनन्दमीमांसोपसंहार. तत्पण्डनम् २३) अन्नमयाधुपसंक्रमणम् मनोमयः २६ अनिदो भयाभावः व्याख्यानम् ... २६/ परब्रह्मानन्दानुभरतो विचिनिधास्पर्शः विज्ञानमयः ३१ परबलविदः सर्वकामभोगप्राप्तिः व्याख्यानम् ... ३१] अक्षरब्रह्मविदो प्रयणि ख्यः आनन्दमयः ३३] आनन्दरूपफलस्य पञ्चविधत्वम् व्याख्यानम् ३३] उपसंहारः आनन्दमयस्य अन्नमयागाकारसमर्पकत्रम् अस्य ग्रन्थस्यैकमेव पुस्तकं पं. गढूलालसंग्रहतः प्राप्तम् । तदाधारेणायं ग्रन्यो मुदितः । अस्यान्यव पुस्तकं जामनगरस्थमंदिरहस्तलिसितम्तकसंग्रहे वर्तते । तत्नैपास्माभिरुपलब्धम् । अन्धता स्वस्य परिचयो ग्रन्थारंभे एव कारित.। श्रीमद्गोस्वामिश्रीजरत्नानां प्रेरणया अस्य मुद्रणव्ययः पेटलादी रणडोडदास वरजीवनदास श्रोफेत्यनेन कृतः। एतत्पुस्तक लिवन फरचन्द्र वि० शाहेन्यस्योपकारः। मुंबई, कृष्णजयन्ती १९७४. मूलचन्द्र तेलीवाला. ... ... ८७ ... . ...१८ ... ... }

Taittiriyo Upnishad

Author
Mulchand Tulsidas
Title
Taittiriyo Upnishad
File name
Taittiriyo Upnishad
Text
OCR done
Citation
1928
Published
2012/08
Publisher
Mumbai.,marg Shirsh
Language
Sanskrit
Pages
83
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311654
Barcode
99999990320520.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
nPFHvwxSMAW
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